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	<description>UP Board TextBook Solutions for Class 12th, 11th, 10th, 9th, 8th, 7th, and 6th</description>
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		<title>UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 1</title>
		<link>https://www.upboardsolutions.com/up-board-class-12-economics-model-papers-paper-1/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Safia]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jun 2025 12:28:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 12]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 1 are part of UP Board Class 12 Economics Model Papers. Here we have given UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 1. Board UP Board Textbook NCERT Class Class 12 Subject  Economics Model Paper Paper 1 Category UP Board Model Papers UP Board Class 12 Economics Model ... <a title="UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 1" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/up-board-class-12-economics-model-papers-paper-1/" aria-label="Read more about UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 1">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 1 are part of <a href="https://www.upboardsolutions.com/up-board-class-12-economics-model-papers/">UP Board Class 12 Economics Model Papers</a>. Here we have given UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 1.</p>
<table>
<tbody>
<tr>
<td><strong>Board</strong></td>
<td>UP Board</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Textbook</strong></td>
<td>NCERT</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Class</strong></td>
<td>Class 12</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Subject</strong></td>
<td> Economics</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Model Paper</strong></td>
<td>Paper 1</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Category</strong></td>
<td><a href="https://www.upboardsolutions.com/up-board-model-papers/">UP Board Model Papers</a></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h2>UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 1</h2>
<p><strong>समय: 3 घण्टे 15 मिनट</strong><br />
<strong>पूर्णांक : 100 </strong><br />
<strong>निर्देश</strong> प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्न-पत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं।</p>
<p><strong>नोट</strong></p>
<ul>
<li>सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।</li>
<li>प्रश्न संख्या 1 से 12 तक बहुविकल्पीय प्रश्न हैं, जिनका केवल सही उत्तर अपनी उत्तर पुस्तिका में लिखना है, प्रश्न संख्या 13 से 16 तक अतिलघु उत्तरीय प्रश्न हैं, जिनका उत्तर प्रत्येक लगभग 25 शब्दों में लिखना है, प्रश्न संख्या 17 से 22 तक लघु उत्तरीय प्रश्न हैं, जिनका उत्तर प्रत्येक लगभग 50 शब्दों में लिखना है तथा प्रश्न संख्या 23 से 28 तक दीर्घ उत्तरीय प्रश्न हैं, जिनका उत्तर प्रत्येक लगभग 150 शब्दों में लिखना है।</li>
<li>प्रत्येक प्रश्न के लिए निर्धारित अंक उसके सम्मुख अंकित हैं।</li>
</ul>
<p><strong>बहुविकल्पीय प्रश्न</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
व्य के माध्यम से किया जाने वाला विनिमय कहलाता है [1]<br />
(a) वस्तु-विनिमय<br />
(b) प्रत्यक्ष &#8211; विनिमय<br />
(c) क्रय-विक्रय<br />
(d) इनमें से कोई नहीं</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
किसी वस्तु का मूल्य निर्धारित होता है, उसकी [1]<br />
(a) मॉग दुरा<br />
(b) पूर्ति दुरा<br />
(c) मॉग और पूर्ति द्वारा<br />
(d) इनमें से कई नीं</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
जय सोपान लागत घटती है, तो औसत लागत [1]<br />
(a) स्थिर रहती है<br />
(b) तेजी से गिरती है।<br />
(c) तेजी से बदती है<br />
(d) इनमें से कोई नहीं</p>
<p>प्रश्न 4.<br />
&#8216;मजदूरी श्रम की कीमत है।&#8217; यह कथन किसका है? [1]<br />
(a) मार्शल का<br />
(b) रिकार्डों का<br />
(c) मात्थन का<br />
(d) जेनन्स का</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
लोक वित्त को विषय-वस्तु सम्बन्धित है- [1]<br />
(a) सरकार के व्यय से<br />
(b) सरकार की आय से<br />
(c) सरकार के ॠपा से<br />
(d) सरकार से माय, व्यय, ऋण एवं राजकीय नीति से</p>
<p>प्रश्न 6.<br />
भारत की राष्ट्रीय आय में सबसे अधिक योगदान है- [1]<br />
(a) उद्योगों का<br />
(b) कृषि का<br />
(c) बैकों का<br />
(d) निर्यात का</p>
<p>प्रश्न 7.<br />
भारत में प्रति 1000 पुरुष पर स्त्रियों की संख्या कितनी है? [1]<br />
(a) 972<br />
(b) 930<br />
(c) 933<br />
(d) 940</p>
<p>प्रश्न 8.<br />
प्रधानमन्त्री प्रामोदय योजना में सम्मिलित किया गया है । [1]<br />
(a) ग्रम सक योजना<br />
(b) ग्रामीण आवास योजना<br />
(c) ग्रमीण पेयजल परियोजना<br />
(d) ये सभी</p>
<p>प्रश्न 9.<br />
भारत में साक्षरता का प्रतिशत अधिक है [1]<br />
(a) रित्रयों में<br />
(b) पुरुषों में<br />
(c) दोनों में बराबर<br />
(d) इनमें से कोई नहीं</p>
<p>प्रश्न 10.<br />
शरत का विदेशी व्यापार किस देश के साथ सबसे अधिक होता है? [1]<br />
(a) अमेरिका<br />
(b) ग्रेट ब्रिटेन<br />
(c) जर्मनी<br />
(d) जापान</p>
<p>प्रश्न 11.<br />
भारत को प्राप्त विदेशी सहायता में सम्मिलित है [1]<br />
(a) ऋण<br />
(b) अनुदान<br />
(C) अण एवं अनुदान<br />
(d) इनमें से कोई नहीं</p>
<p>प्रश्न 12.<br />
भारत के नियोजनकाल में व्यापार सन्तुसन की दृष्टि से कौन सा केशन सा है? [1]<br />
(a) सभी वर्षों में अनुकूल रहा<br />
(b) सभी वर्षों में प्रतिकूल रहा<br />
(c) केवल दो वर्षों में अनुकून रहा<br />
(d) केवल दो वर्षों में प्रतिकूल रहा।</p>
<p><strong>अतिलघु उत्तरीय प्रश्न</strong></p>
<p>प्रश्न 13.<br />
अप्रत्यक्ष कर की परिभाषा लिखिए [4]</p>
<p>प्रश्न 14.<br />
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) किसे कहते हैं? [4]</p>
<p>प्रश्न 15.<br />
&#8216;तीव्र जनसंख्या वृद्धि में किन्हीं दो दुष्परिणामों का उल्लेख कीजिए। [4]</p>
<p>प्रश्न 16.<br />
राष्ट्रीय वन नीति (1988) के उद्देश्य लिखिए। [4]</p>
<p><strong>लघु उत्तरीय प्रश्न</strong><br />
प्रश्न 17.<br />
ममय के आधार पर बाजार के वर्गीकरण को लिखिए। [5]</p>
<p>प्रश्न 18.<br />
सीमा शुल्क पर व्याख्यात्मक टिप्पणी लिखिए। [5]</p>
<p>प्रश्न 19.<br />
राष्ट्रीय आय की गणना में वैचारिक कठिनाइयों को समझाइए। [5]</p>
<p>प्रश्न 20.<br />
भारत की नई जनसंख्या नीति सम्झाइए। [5]</p>
<p>प्रश्न 21.<br />
भारतीय रिज़र्व बैंक के कार्य लिखिए। [5]</p>
<p>प्रश्न 22.<br />
इन्टरनेट पर टिप्पणी लिखिए। [5]</p>
<p><strong>दीर्घ उत्तरीय प्रश्न</strong><br />
प्रश्न 23.<br />
पूर्ण प्रतियोगिता की दशा में उद्योग एवं फर्म के साम्वन्ध का सचित्र वर्णन कीजिए [7]<br />
<strong>अयवा</strong><br />
अंश अपूर्ण प्रतियोगिता की दशा में अकाल में लाभ, न एत्र सामान्य लाश की दशा का सचित्र वर्णन कीजिए।</p>
<p>प्रश्न 24.<br />
रिकाडों द्वारा दिए गए लगान सिद्धान्त का वर्णन कीजिए। [7]<br />
<strong>अयवा</strong><br />
वितरण के सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की विवेचना कीजिए। [7]</p>
<p>प्रश्न 25.<br />
कीन्स के व्याज के तरलता पसन्दगी सिद्धान्त की व्याख्या कॉजिए। [7]<br />
<strong>अयवा</strong><br />
लाभ के अनिश्चितता गहन सिद्धान्त का वर्णन कीजिए। [7]</p>
<p>प्रश्न 26.<br />
ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम को विस्तार से समझाए। [7]<br />
<strong>अयवा</strong><br />
सामाजिक वानिकी से क्या तात्पर्य है? सामाजिक वानिकी के उद्ढेरया बताइए [3+4]</p>
<p>प्रश्न 27.<br />
व्यापार सन्तुलन से क्या आशय है? भारत के प्रतिकूल व्यापार सन्तुलन के कारण सिखिए। [3+4]<br />
<strong>अयवा</strong><br />
भुगतान सन्तुलन को परिभाषित कीजिए। भुग सन्तुलन की मदे बताइए [3+4]</p>
<p>प्रश्न 28.<br />
निम्न तालिका में समान्तर मध्य ज्ञात कीजिए। [7]<br />
<img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-39861" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Class-12-Economics-Model-Papers-Paper-1-image-1.png" alt="UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 1 image 1" width="356" height="59" srcset="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Class-12-Economics-Model-Papers-Paper-1-image-1.png 356w, https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Class-12-Economics-Model-Papers-Paper-1-image-1-300x50.png 300w" sizes="(max-width: 356px) 100vw, 356px" /><br />
<strong>अयवा</strong><br />
<img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-39862" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Class-12-Economics-Model-Papers-Paper-1-image-2.png" alt="UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 1 image 2" width="377" height="61" srcset="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Class-12-Economics-Model-Papers-Paper-1-image-2.png 377w, https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Class-12-Economics-Model-Papers-Paper-1-image-2-300x49.png 300w" sizes="(max-width: 377px) 100vw, 377px" /></p>
<p style="text-align: center;"><strong>Answers</strong></p>
<p>उतर 1.<br />
(c)</p>
<p>उतर 2.<br />
(c)</p>
<p>उतर 3.<br />
(b)</p>
<p>उतर 4.<br />
(a)</p>
<p>उतर 5.<br />
(d)</p>
<p>उतर 6.<br />
(b)</p>
<p>उतर 7.<br />
(d)</p>
<p>उतर 8.<br />
(c)</p>
<p>उतर 9.<br />
(b)</p>
<p>उतर 10.<br />
(a)</p>
<p>उतर 11.<br />
(c)</p>
<p>उतर 12.<br />
(b)</p>
<p>उतर 16.<br />
राष्ट्रीय वन नीति 1988 का उद्ढेरया वनों की सुरक्षा, सरक्षथा तया विकास के सय -सय पर्यावरण एवं परिस्थतिकी सन्तूल की स्यापना करना है। प्राकृतिक सम्पदाओं कासंरक्षण एवं मूदा अपरदन रोकना भी इसके उद्ढेरया में शामिल है।</p>
<p>उतर 18.<br />
आयात-पात कर को सीमा शुल्क काया जाता है, इसमें देश से बाहर भने आने वाले माल पर चल कर तथा देश में बाहर से मंगवाए नि । वाले माल पर आयात कर लाया जाता है। जय यह शुल्क वस्तु |माल के मूल्यानुसर लगाया जाता है।<br />
जब यद्द शुल्क वस्तु या माल के मल्यानुसा र्लगाया जाता हैं। तब इसे मूल्यानुसार शुल्क और जब इस परिमाण या संस्था के आधर पर लगाया जाता है, तब इसे परिमाणनुमार कहा जाता है। ये दोनों प्रकार के शुल्क भारत में लगाए जाते हैं। भारत में चाथ पदसन, टन, आदि पर लगाया गया का निर्यात कर है। विलासिता की वस्तु पर अधिक दर से आयात कर लगाया जाता हैं।</p>
<p>उतर 27.<br />
एक वर्ष के भीतर एक के देश के विमों का के अन्य देशों के निवासियों के माम भी प्रकार के अधिक लेन-देन ( प, अदृश्य हा पॅनोगत) के विवराण को भगान मन्तुलन कहते हैं। हमें दी मात ने देश जाता है-चल । एवं पूरी पाता। खाता</p>
<p><strong>चालू खाते की मदं</strong> चालू खाता दृश्य मदों के आयात तथा नियत को प्रदर्शित करता है; जैसे—गेहूं, चावल, मशीन, इत्यादि। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रयोग होने वाली मुख्य अदृश्य मदे, परिवहनथीमा तथा बैंकिग, आदि सेवाएँ हैं। इसमें निम्न को शामिल किया जाता है</p>
<p><strong>1. निवेश आय</strong>  विदेशी कम्पनियों भारत के उद्योग तथा व्यापार में निवेश करती है, तो भारत को उनके शेयरधारकों के भांश के रूप में भुगतान करना पड़ता है। समान रूप से विदेशी लेनदारों को पहले लिए गए ऋण पा याज का न करना पड़ता है। समान रूप से भारत को भी शेष विश्व में किए गए नि। ता दिए गए ऋणों के लिए लाश तथा व्याज की प्राप्ति होती है। ,</p>
<p><strong>2.विदेशी यात्रा</strong> पर्यटन अशा विभिन देश का भ्रमणा भुगतान शेष का। एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन चुका हैं। उज्य विदेश गर्यटक भारत में आते हैं, तो वे अपने गा विदेश हा नाते हैं क्या हमारे अन् बाजार में खर्च करने के लिए उसे हमारी मुद्रा में परिवर्तित कराते हैं, इससे देश को विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होती हैं। सामान्य रूप में जब भारय पर्यटक विदेश में आते हैं, तो आन्हें करने के लिए। भारतीय मुद्रा को विदेशी मुद्रा में परिवर्तित कराना पड़ता है।<br />
इसमें विदेशी र्णिमय का भुगतान भी शामिल है। शिक्षा, अवसय, इण, आदि के लिए विदेश में गए लोग विदेशी मुद्रा में भुगतान करते हैं, जबकि भारत में आए विदेशी, विदेशी विनिमय की प्राप्ति का स्रोत होते हैं।</p>
<p><strong>3. मिति मदें</strong> इनमें चालू खाते के बचे हुए सभी लेन देन को शामिल किया जाता है; जैसे अब फौस, जल का | भता, टेलीफोन व टेलपाफ सेवाएं, आदि।</p>
<p><strong>पूँजी खाते पर भुगतान संतुलन</strong> पूँजी खाते पर भुगतान संतुलन के अन्तर्गत ऐसे विसीय लेन-देन का क्विाण होता है, जिसमें सभी प्रकार के अन्तर्राष्ट्रीय पुंजीगत तर, स्वर्ग का आदान-प्रदान, निजी भगत राष्ट्रीय समस्याओं से भिन्न भगवान व प्रति शमन होती हैं। कि पूंजी खाते के सभी लेन देने का काम्यय वित्तीय अनरणों से होता है, अतः इससे देश के उत्पादन, आय व रोजगार र प्रत्यक्षत: कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।<br />
पुँजी खाते को मदें इसमें निजी पूंजी, बैंकिग पूँजी, अधिकृत पूँजी, सोना तथा विदेशी पूँजी शामिल हैं।</p>
<ol>
<li>निजी पूंजी में चत क्रिमिया के पंजीत । को शामिल | किया जाता है। यह अल्पकालीन अथवा दीर्धकालीन पूँजी हो सकती है। दालीन पुंनी गे शेयरों मेंप्रश , शरतविक सम्पत्ति, बंधपत्र, दीर्घकालीन ऋण, आदि शामिल है, जबकि अल्पकालीन पंत में अन्यकाल मण तथा से ऋण के नृत की वापी एक वर्ष अचवा में कम ममम में करनी होती हैं। को मिल किया है। उदाहरण के लिए एक देश के व्यक्ति द्वारा दूसरे देश में निवेश।।</li>
<li>बैंकिग पूँजी इसमें सरकार की विदेशी जिले सम्पत्ति, दापित जया अनाराष्ट्र मुद्रा कोष (IME) में केन्द्रीय क द्वारा पुनः ।<br />
क्रय की गई प्राप्ति शाक्ति होती है।</li>
<li>अधिकत भी इसमें निम्नलिखित में से अटा शक हैं
<ul>
<li>ऋण इसको केन्द्रीय तथा राज्य सरकार की विदेश सरकार तभा अ य संस्थाओं द्वारा दी गई साख सम्मिलित है।</li>
<li>पूँजी का परिशोधन इसका अर्थ है विदेशियों को बैन गई प्रतिभूतियों का रूप तथा पुनः क्रिय।।</li>
<li>मिति गलतियाँ तथा भूल यह प्रति तय भगानो के अल्पारण अल्पारण तथा तववरण को दर्शाता है। यह भी सकता है कि आंकड़े अपूर्ण अत्रा सही न हो अथवा सही न हो अथवा एक तरफ के सौदे का लेखा छूट गया है।</li>
</ul>
</li>
<li>सोना तसा विदेशी पूजी गृह राष्ट्र को विदेशी विनमय दर में स्थिरता लाने में सोना तथा विदेशी पूँजी को हो भन्श्यक है। यह कोष ॥ सौदों के शुद्ध शेष द्वारा बदलता रहता है।</li>
</ol>
<p>उतर 28.</p>
<p><strong>समान्तर मध्य की गणना</strong></p>
<table style="height: 247px;" border="2" width="533">
<tbody>
<tr>
<td style="text-align: center;" width="83">अंक</td>
<td style="text-align: center;" width="43">मध्य बिन्दु (x)</td>
<td style="text-align: center;" width="66">आवृति (f)</td>
<td style="text-align: center;" width="90">Dx = (x-A)<br />
A = 35</td>
<td style="text-align: center;" width="72"> fdx</td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center;" width="83">0-10</td>
<td style="text-align: center;" width="43">5</td>
<td style="text-align: center;" width="66">10</td>
<td style="text-align: center;" width="90">-30</td>
<td style="text-align: center;" width="72">-300</td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center;" width="83">10-20</td>
<td style="text-align: center;" width="43">15</td>
<td style="text-align: center;" width="66">12</td>
<td style="text-align: center;" width="90">-20</td>
<td style="text-align: center;" width="72">-240</td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center;" width="83">20-30</td>
<td style="text-align: center;" width="43">25</td>
<td style="text-align: center;" width="66">20</td>
<td style="text-align: center;" width="90">-10</td>
<td style="text-align: center;" width="72">-200</td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center;" width="83">30-40</td>
<td style="text-align: center;" width="43">35</td>
<td style="text-align: center;" width="66">15</td>
<td style="text-align: center;" width="90">0</td>
<td style="text-align: center;" width="72">0</td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center;" width="83">40-50</td>
<td style="text-align: center;" width="43">45</td>
<td style="text-align: center;" width="66">10</td>
<td style="text-align: center;" width="90">10</td>
<td style="text-align: center;" width="72">100</td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center;" width="83">50-60</td>
<td style="text-align: center;" width="43">55</td>
<td style="text-align: center;" width="66">13</td>
<td style="text-align: center;" width="90">20</td>
<td style="text-align: center;" width="72">260</td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center;" width="83"></td>
<td style="text-align: center;" width="43"></td>
<td style="text-align: center;" width="66">N = 80</td>
<td style="text-align: center;" width="90"></td>
<td style="text-align: center;" width="72">∑fdx = -380</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p>समान्तर मध्य [latex]( \overline { X } ) = A + \frac { \Sigma f d x } { N } = 35 + \frac { &#8211; 380 } { 80 }[/latex]</p>
<p>=35-4.75=30.25<br />
<strong>अयवा</strong><br />
<img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-39863" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Class-12-Economics-Model-Papers-Paper-1-image-3.png" alt="UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 1 image 3" width="380" height="456" srcset="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Class-12-Economics-Model-Papers-Paper-1-image-3.png 380w, https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Class-12-Economics-Model-Papers-Paper-1-image-3-250x300.png 250w" sizes="(max-width: 380px) 100vw, 380px" /></p>
<p>We hope the UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 1 will help you. If you have any query regarding UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 1, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.</p>
]]></content:encoded>
					
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		<item>
		<title>UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 23 Foreign Trade of India</title>
		<link>https://www.upboardsolutions.com/class-12-economics-chapter-23/</link>
					<comments>https://www.upboardsolutions.com/class-12-economics-chapter-23/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Safia]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jun 2025 10:45:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 12]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.upboardsolutions.com/?p=17463</guid>

					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 23 Foreign Trade of India (भारत का विदेशी व्यापार) are part of UP Board Solutions for Class 12 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 23 Foreign Trade of India (भारत का विदेशी व्यापार). Board UP Board Textbook NCERT Class Class 12 ... <a title="UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 23 Foreign Trade of India" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/class-12-economics-chapter-23/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 23 Foreign Trade of India">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 23 Foreign Trade of India (भारत का विदेशी व्यापार) are part of <a href="https://www.upboardsolutions.com/class-12-economics/">UP Board Solutions for Class 12 Economics</a>. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 23 Foreign Trade of India (भारत का विदेशी व्यापार).</p>
<table>
<tbody>
<tr>
<td><strong>Board</strong></td>
<td>UP Board</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Textbook</strong></td>
<td>NCERT</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Class</strong></td>
<td>Class 12</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Subject</strong></td>
<td>Economics</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Chapter</strong></td>
<td>Chapter 23</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Chapter Name</strong></td>
<td>Foreign Trade of India (भारत का विदेशी व्यापार)</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Number of Questions Solved</strong></td>
<td>48</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Category</strong></td>
<td>UP Board Solutions</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h2>UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 23 Foreign Trade of India (भारत का विदेशी व्यापार)</h2>
<p style="text-align: center;"><strong>विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
विदेशी व्यापार से आप क्या समझते हैं ? विदेशी व्यापार के गुण एवं दोषों का विवेचन कीजिए।<br />
<strong>या</strong><br />
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए विदेशी व्यापार का महत्त्व समझाइए।<strong> [2013, 14]</strong><br />
उत्तर:<br />
<strong>विदेशी व्यापार का अर्थ &#8211;</strong> विदेशी व्यापार का तात्पर्य किसी देश द्वारा विदेशों को किये गये निर्यात और विदेशों से किये गये आयात से होता है। विदेशी व्यापार के दो प्रमुख पहलू होते हैं</p>
<p><strong>आयात &#8211;</strong> आयात का अर्थ किसी देश द्वारा विदेशों से वस्तुओं और सेवाओं के मँगाने से है; उदाहरण के लिए यदि भारत ईरान, इराक से पेट्रोल मँगाता है तब यह भारत के लिए आयात कहा जाता है।</p>
<p><strong>निर्यात &#8211;</strong> निर्यात का अर्थ किसी देश द्वारा वस्तुओं और सेवाओं को अन्य देशों को भेजने से है; उदाहरण के लिए&#8211;यदि भारत से जूट का सामान अमेरिका या इंग्लैण्ड जाता है, तब यह भारत के लिए निर्यात कहलाएगा।</p>
<p><strong>विदेशी व्यापार के गुण (लाभ) या भारत के आर्थिक विकास में इसका महत्त्व<br />
</strong>विदेशी व्यापार किसी देश की आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक उन्नति का आधार होता है। विदेशी व्यापार से अन्तर्राष्ट्रीय सामाजिक सहयोग एवं सम्पर्क बढ़ता है तथा देश-विदेश के लोगों के बीच भाई-चारे की भावना बढ़ती है। विदेशी व्यापार से भारत को निम्नलिखित लाभ हैं</p>
<p><strong>1. प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण दोहन &#8211;</strong> विदेशी व्यापार के कारण एक देश अपने प्राकृतिक संसाधनों को पूर्ण दोहन कर सकता है, क्योंकि उसे अति उत्पादन को भय नहीं रहता। वह अतिरिक्त उत्पादित सामग्री का निर्यात करके विदेशी मुद्रा प्राप्त कर सकती है, जिसके द्वारा देश का आर्थिक विकास किया जा सकता है।</p>
<p><strong>2. कृषि व उद्योगों का विकास &#8211;</strong> एक देश दूसरे देश से आधुनिक मशीनों व यन्त्रों आदि का आयात करके देश में उद्योगों का विकास कर सकता है। कृषि के क्षेत्र में भी कृषि के उपकरण, उर्वरक तथा उन्नत बीजों का आयात कर कृषि का विकास किया जा सकता है।</p>
<p><strong>3. आवश्यकता की वस्तुओं की प्राप्ति &#8211;</strong> विदेशी व्यापार के माध्यम से उपभोक्ताओं को अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ उचित कीमत पर प्राप्त हो जाती हैं और उपभोक्ताओं को उन वस्तुओं के उपभोग का अवसर मिलता है, जो देश में दुर्लभ या अल्प मात्रा में हैं।</p>
<p><strong>4. उत्पादकों को लाभ &#8211;</strong> विदेशी व्यापार से उत्पादकों को लाभ के अवसर प्राप्त होते हैं। उत्पादक श्रेष्ठ व अधिक उत्पादन द्वारा विदेशों को निर्यात करके विदेशी मुद्रा अर्जित कर सकता है।</p>
<p><strong>5. रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाने में सहायक &#8211;</strong> विदेशी व्यापार द्वारा नागरिकों को आवश्यकता की वस्तुएँ सरलतापूर्वक सस्ती कीमत पर उपलब्ध हो जाती हैं। इससे जीवन-स्तर ऊँचा उठता है, राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ती है।</p>
<p><strong>6. यातायात व सन्देशवाहन के साधनों का विकास &#8211;</strong> विदेशी व्यापार से यातायात व सन्देशवाहन के साधनों का घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसी कारण आज यातायात व सन्देशवाहन के साधनों का तीव्र गति से विकास हुआ है।</p>
<p><strong>7. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग में वृद्धि &#8211;</strong> विदेशी व्यापार से एक देश का दूसरे देश से पारस्परिक सम्पर्क बढ़ता है, वस्तुओं एवं विचारों का पारस्परिक आदान-प्रदान होता है तथा सभ्यता और संस्कृति का विकास होता है। प्राकृतिक संकट, बाढ़ व सूखे की स्थिति में विदेशी व्यापार के माध्यम से ही एक देश दूसरे देश की सहायता करता है।</p>
<p><strong>8. सरकार को राजस्व की प्राप्ति &#8211;</strong> विदेशी व्यापार के कारण ही सरकार वस्तुओं पर आयात-निर्यात कर लगाकर राजस्व की प्राप्ति करती है।</p>
<p><strong>9. एकाधिकार के दोषों से मुक्ति &#8211;</strong> विदेशी व्यापार के कारण एकाधिकार की प्रवृत्ति पर रोक लगती है तथा उपभोक्ताओं को सस्ती कीमत पर वस्तुएँ उपलब्ध करायी जाती हैं।</p>
<p><strong>10. श्रम-विभाजन व विशिष्टीकरण के लाभ &#8211;</strong> आज प्रत्येक देश उन वस्तुओं को अधिक उत्पादन करना चाहता है जिनके लिए उसके पास पर्याप्त प्राकृतिक संसाधन, श्रम व पूँजी उपलब्ध है। इससे उसे उस वस्तु के उत्पादन में विशिष्टता प्राप्त होती है और श्रम &#8211; विभाजन के सभी लाभ प्राप्त होते हैं। यह विदेशी व्यापार से ही सम्भव हुआ है।</p>
<p><strong>11. विदेशी मुद्रा की प्राप्ति &#8211;</strong> विदेशी व्यापार के कारण ही एक देश अपनी आवश्यकता से अधिक उत्पादन का, अन्य देशों को निर्यात कर विदेशी मुद्रा प्राप्त करता है। यह विदेशी मुद्रा विकास कार्यों में सहायक सिद्ध होती है।</p>
<p><strong>12. देश का आर्थिक विकास &#8211;</strong> किसी देश का बढ़ता हुआ विदेशी व्यापार उसकी प्रगति का सूचक होता है। इस प्रक्रिया में प्रत्येक देश अपने निर्यात में वृद्धि करने का प्रयास करता है। इसलिए उत्पादन बढ़ाने हेतु पूँजी का निवेश किया जाता है। पूँजी के विनियोग से रोजगार के अवसरों में वृद्धि होती है, राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है और देश का तीव्र आर्थिक विकास सम्भव होता है।</p>
<p><strong>विदेशी व्यापार के दोष या हानियाँ</strong><br />
विदेशी व्यापार में उपर्युक्त लाभों के साथ-साथ निम्नलिखित दोष भी पाये जाते हैं</p>
<p><strong>1. आत्मनिर्भरता में कमी &#8211;</strong> विदेशी व्यापार के कारण राष्ट्र परस्पर आश्रित हो गये हैं। यदि एक देश में किसी वस्तु की कमी है तो वह उसे अन्य देशों से आयात कर लेता है। वह आत्मनिर्भर नहीं होना चाहता, क्योंकि वस्तुएँ उसे विदेशों से सरलता से मिल जाती हैं।</p>
<p><strong>2. प्राकृतिक संसाधनों की शीघ्र समाप्ति &#8211;</strong> विदेशी व्यापार के कारण ही राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधनों का तीव्र गति से विदेशों को निर्यात कर दिया जाता है, जिससे प्राकृतिक स्रोत दिन-प्रतिदिन कम होते जा रहे हैं।</p>
<p><strong>3. राष्ट्रीय सुरक्षा में कमी &#8211;</strong> युद्ध काल में प्रायः विदेशी व्यापार में बाधा उत्पन्न हो जाती है; क्योंकि एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को अपनी वस्तुएँ देना बन्द कर देता है। ऐसे समय में राष्ट्र के सम्मुख संकट उत्पन्न हो जाता है।</p>
<p><strong>4. देश के औद्योगिक विकास में बाधा &#8211;</strong> विदेशी व्यापार के कारण देश के उद्योगों को विदेशी उद्योगों से प्रतियोगिता करनी पड़ती है। देश में निर्मित वस्तुएँ महँगी होने पर उन वस्तुओं का आयात कर लिया जाता है, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव स्वदेशी उद्योगों पर पड़ता है। इससे देश के औद्योगिक विकास में बाधा उत्पन्न होती है।</p>
<p><strong>5. प्रतियोगिता के कारण हानि &#8211;</strong> विदेशी व्यापार में वस्तुओं का उचित मूल्य प्राप्त नहीं हो पाता, क्योंकि वस्तुओं को विदेशी बाजार में प्रतियोगिता करनी पड़ती है। इसी कारण आज भारत जैसे देश को चाय, जूट व चीनी आदि के निर्यात में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।</p>
<p><strong>6. राजनीतिक परतन्त्रता &#8211;</strong> विदेशी व्यापार के कारण ही कभी-कभी योग्य शक्तिशाली राष्ट्र दूसरे राष्ट्रों को पराधीन कर लेते हैं। अंग्रेजों ने व्यापार के माध्यम से ही भारत को अपने अधीन कर लिया था।</p>
<p><strong>7. अन्तर्राष्ट्रीय वैमनस्य &#8211;</strong> प्रत्येक विकसित देश, विकासशील देशों में अपनी वस्तुओं का बाजार विस्तृत करना चाहता है। इस प्रयास में सफल होने पर अन्य देश उस देश से वैमनस्य की भावना रखना प्रारम्भ कर देते हैं। इससे कभी-कभी विश्व-शान्ति का खतरा उत्पन्न हो जाता है।</p>
<p><strong>8. देश की आर्थिक स्थिरता एवं नियोजन को हानि &#8211;</strong> विदेशी व्यापार के कारण कभी-कभी आयातकर्ता देश को आयातित माल के भुगतान करने में कठिनाई हो जाती है, जिसको हल करने के लिए निर्यातकर्ता देश आयातकर्ता देश को ऋण देता है। परिणामस्वरूप निर्यातकर्ता देश आयातकर्ता देश की आर्थिक व प्रशासनिक नीतियों में हस्तक्षेप करने लगता है, जिसका प्रभाव देश की आर्थिक स्थिरता व नियोजन पर पड़ता है।</p>
<p>संक्षेप में कहा जा सकता है कि विदेशी व्यापार से देश की सुरक्षा, आर्थिक नियोजन तथा उद्योगों के संरक्षण को हानि होती है तथा देश परावलम्बी हो जाता है। परन्तु यह कहना कि विदेशी व्यापार में हानियाँ अधिक हैं, उचित नहीं है; क्योंकि यह सत्य है कि व्यापार किसी भी देश की आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक उन्नति का कारण है। व्यापार के माध्यम से ही अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ता है, एकता की भावना बढ़ती है तथा वैज्ञानिक शोधों का लाभ प्राप्त होता है।</p>
<p>प्रश्न 2<br />
भारत के विदेश व्यापार की मुख्य प्रवृत्तियाँ बताइए। <strong>[2008, 10, 15]</strong><br />
<strong>या</strong><br />
भारत के विदेश व्यापार के आकार, संरचना एवं दिशा पर एक लेख लिखिए।<br />
<strong>या</strong><br />
गत वर्षों में भारत के विदेश व्यापार की संरचना में क्या प्रमुख परिवर्तन हुए हैं?<br />
<strong>या</strong><br />
विदेशी व्यापार से आप क्या समझते हैं? भारत के आयात व निर्यात की प्रमुख मदें बताइए।<strong> [2008]</strong><br />
<strong>या</strong><br />
भारत के विदेशी व्यापार पर एक निबन्ध लिखिए।<strong> [2016]</strong><br />
<strong>या</strong><br />
हाल के वर्षों में भारत के निर्यातों की मुख्य प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालिए। <strong>[2011, 12]</strong><br />
<strong>या</strong><br />
भारत के निर्यातों तथा आयातों की संरचना की मुख्य प्रवृत्तियों की विवेचना कीजिए। <strong>[2012]</strong><br />
उत्तर:<br />
<strong>विदेश व्यापार का अर्थ</strong><br />
जब दो या दो से अधिक राष्ट्र आपस में एक-दूसरे से वस्तुओं का लेन-देन करते हैं तो इसे विदेश व्यापार कहते हैं। किसी देश के विदेश व्यापार की स्थिति उसके आयात एवं निर्यात के अध्ययन से ज्ञात की जा सकती है। इसी प्रकार किसी देश की आर्थिक स्थिति का आकलन उसके विदेश व्यापार (निर्यात) की मात्रा से किया जा सकता है। कोई भी देश किसी वस्तु का आयात इसलिए करता है कि या तो उस देश में अमुक वस्तु का उत्पादन ही नहीं होता अथवा उसका उत्पादन लागत मूल्य आयात मूल्य से अधिक बैठता है। इसी प्रकार किसी वस्तु का निर्यात इसलिए किया जाता है कि उस देश में उत्पन्न की गई अतिरिक्त वस्तु की माँग विदेशों में अधिक है तथा उसे निर्यात कर विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है।</p>
<p><strong>व्यापार परिदृश्य &#8211;</strong> स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद भारत के विदेश व्यापार में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। फिर भी यह वृद्धि सन्तोषजनक नहीं हैं क्योंकि विश्व के कुल विदेश व्यापार में भारत को अंश वर्ष 2000 तक लगभग 0.5% ही था। विश्व व्यापार संगठन (WTO) की विश्व व्यापार रिपोर्ट 2006 के अनुसार सन् 2009 तक विश्व के वस्तुओं और सेवाओं के कुल विदेश व्यापार में भारत का अंश 2% हो जाने का अनुमान था। सन् 2004 में यह 1.1% तथा 2010 में 1.5% था। भारत का विदेश व्यापार विश्व के लगभग सभी देशों के साथ है। भारत, 7,500 से भी अधिक वस्तुएँ लगभग 190 देशों को निर्यात करता है तथा 6,000 से अधिक वस्तुएँ 140 देशों से आयात की जाती हैं। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत की विदेश व्यापार की उत्तरोत्तर प्रगति<br />
<img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-35984" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Economics-Chapter-23-Foreign-Trade-of-India-1.png" alt="UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 23 Foreign Trade of India 1" width="595" height="615" srcset="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Economics-Chapter-23-Foreign-Trade-of-India-1.png 595w, https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Economics-Chapter-23-Foreign-Trade-of-India-1-290x300.png 290w" sizes="auto, (max-width: 595px) 100vw, 595px" /></p>
<p><strong>व्यापार परिदृश्य</strong><br />
भारत का कुल विदेश व्यापार 1991-92 में ₹ 91,893 करोड़ (आयात और निर्यात को मिलाकर जिसमें पुनर्निर्यात भी शामिल) था। इसके बाद कभी-कभार छोड़कर निरन्तर वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2012-13 में भारत का विदेश व्यापार बढ़कर ₹ 43,03,481 करोड़ तक पहुंच गया। तालिका 1 में 1991-92 से 2013-14 के आयात-निर्यात, विदेश व्यापार का कुल मूल्य और व्यापार सन्तुलन के पूरे आँकड़े दिये गये हैं।</p>
<p>भारत का निर्यात 2012-13 में ₹16,34,319 करोड़ के स्तर तक 11.48 प्रतिशत तक पहुँच गया जो रुपये के सम्बन्ध में 11.48 प्रतिशत की वृद्धि थी। अमेरिकी डॉलर के रूप में निर्यात 300 बिलियन डॉलर के स्तर तक पहुँच गया, जिसमें पिछले साल की तुलना में 1.82% की गिरावट दर्ज की गई। 2013-14 में भारत का निर्यात ₹ 18,94, 182 करोड़ के स्तर पर पहुँच गया जो रुपये के सम्बन्ध में 15.90 प्रतिशत वृद्धि के साथ है।</p>
<p>2012-13 के दौरान, आयात का स्तर ₹ 26,69,162 करोड़ की बढ़ोतरी तक पहुँच गया जो कि पिछले वर्ष की तलुना में 13.80%, सकारात्मक वृद्धि के साथ है। तात्कालिक वर्ष 2013-14 में भारत का आयात ₹ 27,14,182 करोड़ के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है, जिसमें पिछले वर्ष की तुलना में 1.69 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अमेरिकी डॉलर के रूप में 2012-13 में 490.7 अरब के स्तर पर पहुँच गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 0.29 प्रतिशत वृद्धि दर के साथ है। 2013-14 में 450.1 अरब के स्तर पर गिरने से पहले 2012-13 ( अनंतिम) में यह 490.9 के अरव के स्तर पर पहुँच गया। 2013-14 के दौरान व्यापार घाटा कम होकर ₹8,20,000 करोड़ पर गया, जो 2012-13 में ३१ 10,34,843 करोड़ था।</p>
<p>अमेरिकी डॉलर के रूप में व्यापार घाटा 2013-14 में कम होकर 1375 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया, जो इससे पिछले वर्ष 190.3 अरब अमेरिकी डॉलर था। व्यापार के व्यापारिक सम्बन्ध सभी बड़े व्यापारिक ब्लॉकों और दुनिया के सभी भौगोलिक क्षेत्रों से हैं। 2013-14 की अवधि के दौरान पूर्व एशिया, आसियान, पश्चिम एशिया, अन्य पश्चिम एशिया, पूर्वोत्तर एशिया और दक्षिण एशिया&#8211;जीसीसी को मिलाकर एशिया क्षेत्र का हिस्सा भारत के कुल निर्यात का 49.95 प्रतिशत रहा। भारत से यूरोप को 18.57 प्रतिशत निर्यात किया गया जो यूरोपियन यूनियन देशों (27) को 16.44 प्रतिशत निर्यात किया गया। उत्तर और लैटिन अमेरिका दोनों भारत के कुल निर्यात का 17.23 प्रतिशत हिस्से के साथ तीसरे स्थान पर हैं। इसी अवधि के दौरान शीर्ष लक्ष्य (तालिका-2) में 12.42 प्रतिशत के साथ अमेरिका निर्यात स्थल के रूप में सबसे महत्त्वपूर्ण है, जिसके बाद संयुक्त अरब अमीरात (9.7 प्रतिशत), चीन (4.77 प्रतिशत), हांगकांग्र (4.05 प्रतिशत) तथा सिंगापुर (3.94 प्रतिशत) हैं।</p>
<p>तालिका 2: पाँच शीर्ष निर्यातकर्ता देश (लागत &#8216;करोड़ में)<br />
<img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-35986" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Economics-Chapter-23-Foreign-Trade-of-India-2.png" alt="UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 23 Foreign Trade of India 2" width="595" height="170" srcset="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Economics-Chapter-23-Foreign-Trade-of-India-2.png 595w, https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Economics-Chapter-23-Foreign-Trade-of-India-2-300x86.png 300w" sizes="auto, (max-width: 595px) 100vw, 595px" /></p>
<p>तालिका 3: पाँच शीर्ष आयातक देश (लागत &#8216;करोड़ में) श्रेणी देश<br />
<img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-35988" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Economics-Chapter-23-Foreign-Trade-of-India-3.png" alt="UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 23 Foreign Trade of India 3" width="595" height="199" srcset="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Economics-Chapter-23-Foreign-Trade-of-India-3.png 595w, https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Economics-Chapter-23-Foreign-Trade-of-India-3-300x100.png 300w" sizes="auto, (max-width: 595px) 100vw, 595px" /></p>
<p><strong>भारत के प्रमुख आयात</strong><br />
भारत के प्रमुख आयात निम्नलिखित हैं</p>
<p><strong>1. मशीनरी तथा परिवहन-उपकरण &#8211;</strong> भारत आर्थिक विकास योजनाओं में गति लाने के लिए सुधरी हुई एवं उन्नत किस्म की मशीनों का भारी मात्रा में आयात करता है। इनमें विभिन्न प्रकार की औद्योगिक मशीनें, विद्युत मशीनें, उत्खनन मशीनें तथा परिवहन-उपकरणों का आयात किया जाता है। इसमें विद्युत मशीनों का आयात सबसे अधिक किया जाता है। यह आयात मुख्यत: संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, पोलैण्ड, फ्रांस, जापान, इटली, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया तथा रूस से होता है। यद्यपि देश में मशीनों का निर्माण पर्याप्त मात्रा में प्रारम्भ हो गया है तथापि विभिन्न प्रकार की मशीनरी वस्तुओं का आयात किया जाता है।</p>
<p><strong>2. लोहा तथा इस्पात &#8211;</strong> विगत वर्षों से भारत के औद्योगीकरण में तीव्र गति से विकास हुआ है। इसी कारण लोहा तथा इस्पात की माँग में वृद्धि हुई है परन्तु अभी तक इस क्षेत्र में भारत पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है। यह आयात अमेरिका, ब्रिटेन तथा जर्मनी से किया जाता है।</p>
<p><strong>3. पेट्रोलियम &#8211;</strong> भारत में पेट्रोलियम तथा उससे सम्बन्धित वस्तुओं का उत्पादन बहुत कम होता है। पेट्रोल का घरेलू उत्पादन देश की अधिकांशत: 70-75% आवश्यकता की पूर्ति ही कर पाता है, शेष 25-30% आवश्यकता के लिए हमें विदेशों पर आश्रित रहना पड़ता है। भारत कच्चा तेल अधिक मात्रा में आयात करता है, जिसका शोधन देश के तेलशोधक कारखानों में किया जाता है। तेल का आयात मुख्यतः ईरान, कुवैत, म्यांमार, इराक, सऊदी अरब, बहरीन द्वीप, मैक्सिको, अल्जीरिया, इण्डोनेशिया, रूस आदि देशों से किया जाता है। तेल व पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर भारत का व्यय लगातार बढ़ता जा रहा है।</p>
<p><strong>4. अन्य आयात &#8211;</strong> उपर्युक्त वस्तुओं के अतिरिक्त भारत और भी विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का आयात करता है, जिनमें विद्युत उपकरण एवं अन्य मशीनें, रासायनिक पदार्थ, कागज, उर्वरक, प्लास्टिक सामग्री, कागज की लुगदी, कृत्रिम रेशे, रबड़, मोती एवं बहुमूल्य पत्थर, ऊन, कपास, दवाइयाँ आदि वस्तुएँ प्रमुख हैं।</p>
<p><strong>भारत के प्रमुख निर्यात</strong><br />
भारत की प्रमुख निर्यातक निम्नलिखित हैं</p>
<p><strong>1. चाय &#8211;</strong> चाय भारत के तीन प्रमुख निर्यातों में से एक है। विगत वर्षों से इसके निर्यात व्यापार में चार-गुने से भी अधिक वृद्धि हुई है। ब्रिटेन भारतीय चाय का सबसे बड़ा ग्राहक है। इसके अतिरिक्त कनाडा, अमेरिका, ईरान, संयुक्त अरब गणराज्य, रूस, जर्मनी, सूडान तथा अन्य देशों को भी भारत चाय का निर्यात करता है। भारत को चाय के निर्यात व्यापार में श्रीलंका, इण्डोनेशिया व कीनिया से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है।</p>
<p><strong>2. सूती वस्त्र &#8211;</strong> सूती वस्त्र भारत के निर्यात व्यापार में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। भारत से सूती वस्त्रों विशेष रूप से सिले-सिलाए परिधानों का निर्यात मुख्यत: अमेरिका, रूस, न्यूजीलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, मलयेशिया, सूडान, अदन, अफगानिस्तान आदि देशों को किया जाता है।</p>
<p><strong>3. जूट का सामान &#8211;</strong> जूट भारत का परम्परागत निर्यात है। विभाजन से पूर्व भारतको जूट पर एकाधिकार प्राप्त था परन्तु अब यह अधिकार समाप्त हो गया है क्योंकि भारत को बांग्लादेश तथा अन्य देशों के रेशों से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। महँगा होने के कारण जूट के कुल निर्यात में भारत का प्रतिशत धीरे-धीरे घटता जा रहा है। भारतीय जूट का सबसे बड़ा ग्राहक अमेरिका है। आज आयातक देशों में क्यूबा, संयुक्त अरब गणराज्य, हांगकांग, रूस, ब्रिटेन, कनाडा, अर्जेण्टीना आदि मुख्य हैं। भारत से पटसन तथा नारियल रेशे से निर्मित गलीचे आदि सामान का प्रतिवर्ष निर्यात किया जाती है।</p>
<p><strong>4. अयस्क एवं खनिज &#8211;</strong> भारत विश्व का महत्त्वपूर्ण अभ्रक उत्पादक देश है तथा विश्व उत्पादन का 80% अभ्रक भारत में उत्पन्न होता है। अभ्रक का निर्यात अमेरिका, जापान तथा ग्रेट ब्रिटेन को किया जाता है।</p>
<p><strong>5. चमड़ा तथा चमड़े का सामान &#8211;</strong> भारत चमड़ा तथा चमड़े से निर्मित वस्तुएँ मुख्यतः ब्रिटेन, रूस, अमेरिका, फ्रांस तथा जर्मनी को निर्यात करती है।</p>
<p><strong>6. गर्म मसाले &#8211;</strong> भारत से मसालों का निर्यात प्रमुख रूप से यूरोपीय देशों तथा अमेरिका को किया जाता है। आज भारत विश्व के मसाला बाजार में 27% से 30% तक योगदान कर लगभग 800 करोड़ की विदेशी मुद्रा कमाता है। भारत मसालों का विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और निर्यातक है। भारत में प्रतिवर्ष लगभग 16 लाख टन मसाले पैदा किये जाते हैं जिसमें से लगभग 2 लाख टन मसालों का विदेशों को निर्यात किया जाता है। मसालों में मुख्यतः इलायची, कालीमिर्च, सुपारी, लौंग, हल्दी, अदरक, अजवायन आदि वस्तुओं का निर्यात किया जाता है। विश्व में मसालों का व्यापार के आकार लगभग 4.5 लाख मीट्रिक टन है, जिसमें अकेले भारत की हिस्सेदारी 46% है।।</p>
<p><strong>7. समुद्री उत्पाद &#8211;</strong> भारत से समुद्री उत्पाद भी निर्यात किये जाते हैं। इनमें जमी हुई झींगा मछली का विशेष स्थान है। हमारे समुद्री उत्पादों के प्रमुख ग्राहक जापान और श्रीलंका हैं।</p>
<p><strong>8. कहवा &#8211;</strong> भारत कहवा के निर्यात से विदेशी मुद्रा कमाने में बहुत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ है। कहवा विश्व के अनेक देशों को निर्यात किया जाता है।</p>
<p><strong>9. इन्जीनियरिंग का सामान &#8211;</strong> भारत से इन्जीनियरिंग का सामान प्रमुख रूप से पूर्वी एशिया, अफ्रीकी, पूर्वी तथा पश्चिमी यूरोपीय देशों को निर्यात किया जाता है। इन्जीनियरिंग सामान के निर्यात मूल्य में तेजी से वृद्धि हो रही है।</p>
<p><strong>10. दस्तकारी का सामान &#8211;</strong> भारत के निर्यात में दस्तकारी उद्योग का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनमें रत्न, जवाहरात एवं अन्य हस्तर्निमत वस्तुएँ सम्मिलित हैं। रत्न और आभूषण के निर्यात में 90% रत्न<br />
और 10% आभूषण होते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, बेल्जियम हांगकांग, फ्रांस, जापान, सिंगापुर, रूस, बैंकाक, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और न्यूजीलैण्ड भारतीय माल के प्रमुख आयातक देश हैं।</p>
<p><strong>11. अन्य निर्यात &#8211;</strong> उपर्युक्त वस्तुओं के अतिरिक्त भारत अन्य वस्तुओं; जैसे-काजू, कालीमिर्च, चीनी, कपास, चावल, रसायन, कच्चा लोहा, खली, फल आदि का भी निर्यात करता है। कुछ वर्षों से बिजली के पंखों, कपड़ों, सिलाई की मशीनों, साइकिलों, इन्जीनियरिंग वस्तुओं, खेल का सामान तथा पेट्रोलियम उत्पाद के निर्यात में भी पर्याप्त वृद्धि हुई है।</p>
<p>भारत के विदेश व्यापार की विशेषताएँ<br />
<strong>अथवा</strong><br />
भारत के विदेश व्यापार की अभिनव (नूतन) प्रवृत्तियाँ</p>
<p>भारत के विदेश व्यापार में सामान्यत: निम्नलिखित विशेषताएँ या अभिनव (नूतन) प्रवृत्तियाँ पायी जाती हैं।</p>
<ol>
<li>भारत का 90% विदेश व्यापार समुद्री मार्गों द्वारा सम्पन्न होता है। वायु-परिवहन एवं सड़क परिवहन का योगदान केवल 10% है।।</li>
<li>भारत स्वतन्त्रता-प्राप्ति से पूर्व आयात अधिक करता था, परन्तु स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद आयात में वृद्धि के साथ-साथ निर्यात में भी वृद्धि हुई है।</li>
<li>भारत के आयात में मशीनें, खाद्य तेल, खनिज तेल एवं सम्बन्धित उत्पाद, इस्पात का बना सामान, उत्तम एवं लम्बे रेशे की कपास, रासायनिक सामान एवं उर्वरक, कच्चा जूट, कागज एवं लुगदी और अखबारी कागज, रबड़, कल-पुर्जे तथा विद्युत उपकरणों एवं मशीनरी का प्रमुख स्थान होता है।</li>
<li>भारत से सूती वस्त्र व सिले-सिलाए परिधान, जूट का सामान, चाय, चीनी, चमड़ा एवं चमड़े की वस्तुएँ, कीमती मोती एवं जवाहरात, कोयला, कोक एवं ब्रिकेट, औषधियाँ, कृत्रिम रेशे, वनस्पति तेल, तिलहन, खनिज पदार्थ, खेल का सामान, रत्न एवं आभूषण, इलेक्ट्रिॉनिक्स और कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर, हस्तशिल्प, कालीन, पेट्रोलियम उत्पाद, इन्जीनियरिंग का सामान, मशीनें एवं उपकरण, भारी संयन्त्र, परिवहन उपकरण, उर्वरक, रबड़ की वस्तुएँ, मछली एवं मछली से निर्मित पदार्थ, नारियल, काजू तथा गर्म मसाले आदि पदार्थ निर्यात किये जाते हैं।</li>
<li>स्वतन्त्रता-पूर्व भारत कच्चे मालों का निर्यात अधिक करता था, परन्तु स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् औद्योगिक विकास औद्योगीकरण में प्रगति होने के कारण अब तैयार माल विदेशों को अधिक भेजा जाने लगा है।</li>
<li>भारत में खनिज तेल की माँग निरन्तर बढ़ने के कारण आयातित खनिज तेल की मात्रा भी निरन्तर बढ़ रही है। भारत में सम्पूर्ण आयात का लगभग 28% भाग खनिज तेल का ही होता है।</li>
<li>भारत के आयात में खाद्यान्नों में निरन्तर कमी आई है, बल्कि अब आयात बन्द ही कर दिया गया है क्योंकि खाद्यान्न उत्पादन में पर्याप्त प्रगति हुई है।</li>
<li>हाल के वर्षों में भारत के निर्यात व्यापार में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है और इनका आधार ज्यादा व्यापक बना है, जो एक शुभ संकेत माना जा रहा है। विगत वर्षों में जिन वस्तुओं का निर्यात लगातार बढ़ा है उनमें समुद्री उत्पाद, अयस्क और खनिज, रेडीमेड गारमेण्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद, जवाहरात और आभूषण, रसायन, इन्जीनियरिंग सामान और दस्तकारी का सामान आदि प्रमुख हैं।</li>
<li>उदारीकरण के दौर में आयात-निर्यात नीति में उदारवादी एवं मित्रवत् परिवर्तन लाकर जहाँ एक ओर भारतीय निर्यातकों के लिए विस्तृत परिक्षेत्र तैयार किया गया है वहीं विश्व व्यापार संगठन (WTO) को किये गये वादे के अनुरूप परिमाणात्मक नियन्त्रणों को भी समाप्त करने का दौर भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी से लागू कर दिया गया है।</li>
<li>2000-01 की आयात-निर्यात नीति में चीनी मॉडल का अनुसरण करते हुए भारत सरकार ने देश के निर्यातों में वृद्धि के उद्देश्य से सात परम्परागत निर्यात संवर्द्धन क्षेत्रों (EPZs) को विशेष आर्थिक परिक्षेत्र (SEZs) में रूपान्तरित कर दिया है। कांडला (गुजरात), सान्ताक्रुज (महाराष्ट्र), कोच्चि (केरल), फाल्टा (प० बंगाल), नोएडा (उत्तर प्रदेश), चेन्नई (तमिलनाडु) तथा विशाखापट्टनम (आन्ध्र प्रदेश) विशेष आर्थिक परिक्षेत्र में सम्मिलित हैं।</li>
<li>भारत का विदेश व्यापार अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों के आधार पर किया जाता है। भारत का अधिकांश विदेश व्यापार लगभग 200 देशों के साथ होता है।</li>
<li>भारत के अधिकांश आयात-निर्यात (व्यापार) देश के पूर्वी तथा पश्चिमी तट पर स्थित बड़े पत्तनों द्वारा ही सम्पन्न किये जाते हैं।</li>
<li> भारत का विदेश व्यापार सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा संचालित किया जाता है। इस कार्य के लिए सरकार आयात-निर्यात लाइसेंस प्रदान करती है तथा कुछ वस्तुओं के व्यापार को लाइसेंस से मुक्त कर दिया गया है। सरकार ने निर्यात को प्रोत्साहन देने के लिए जिंस बोर्ड, निर्यात निरीक्षण परिषद्, भारतीय विदेश व्यापार संस्थान, सुमद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण, कृषि एवं संसाधित खाद्य सामग्री निर्यात विकास अभिकरण तथा निर्यात एवं संवर्द्धन परिषद् की स्थापना की है। अन्य संगठनों में भारतीय निर्यात संगठन परिसंघ, भारतीय मध्यस्थता परिषद् तथा भारतीय हीरा संस्थान प्रमुख हैं।</li>
<li>विदेश व्यापार में वृद्धि के लिए भारत अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मेलों में भाग लेता है तथा उनका आयोजन अपने देश में भी करता रहता है।</li>
<li>सरकार निर्यात पर अधिक बल दे रही है; अत: उन्हीं कम्पनियों को आयात की छूट दी जा रही है जो निर्यात करने में सक्षम हैं। भारत सरकार ने निर्यात को प्रोत्साहन देने के लिए करों में अनेक रियायतों का प्रावधान किया है तथा निजी क्षेत्र को प्राथमिकता प्रदान कर रही है।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 3<br />
भारत का निर्यात-व्यापार कम होने के कारण बताइए। सरकार द्वारा निर्यात-वृद्धि के लिए किये गये प्रयासों का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तर:<br />
भारत के निर्यात-व्यापार में मन्द (कम) वृद्धि होने के निम्नलिखित कारण हैं</p>
<p><strong>1. निर्यातकर्ताओं को सुविधाओं का अभाव &#8211;</strong> भारत में निर्यातकर्ताओं को निर्यात के सम्बन्ध में अनेक कठिनाइयों का सामना करना होता है; जैसे–निर्यात सम्बन्धी कानून कड़े होना, साख-सुविधाओं की कमी, जहाजी लदान की कठिनाइयाँ, निर्यात कर अधिक होना आदि। इससे निर्यात में बाधा आती है।</p>
<p><strong>2. औद्योगिक प्रगति धीमी &#8211;</strong> औद्योगिक प्रगति धीमी होने के कारण भी औद्योगिक उत्पादन तेजी से नहीं बढ़ पा रहा है। इसी कारण जुलाई, 1991 ई० में घोषित नयी उदारवादी औद्योगिक नीति के अन्तर्गत सरकार ने उद्योगों को लाइसेन्स मुक्त कर दिया है।</p>
<p><strong>3. उन्नत देशों की व्यापार नीति &#8211;</strong> विश्व के उन्नत एवं विकसित देश भारतीय निर्यात के विरुद्ध भारी आयात-कर तथा अन्य व्यापारिक बाधाएँ खड़ी करते रहते हैं, जिनका भारतीय निर्यात पर प्रतिकूल असर पड़ता है।</p>
<p>4. विज्ञापन एवं प्रचार की कमी &#8211;<strong> विदेशों में यथेष्ट मात्रा में विज्ञापन तथा प्रचार हेतु बनी संस्थाएँ प्रभावी ढंग से कार्य नहीं करती हैं। फलत: भारतीय माल की</strong> माँग कम रहती है।</p>
<p><strong>5. ऊँची कीमत &#8211;</strong> माल की उत्पादन लागत अधिक होने के कारण तथा आयात किये जाने वाले कच्चे माल की ऊँची कीमतों के कारण भारत द्वारा निर्मित माल की कीमतें भी ऊँची रहती हैं। परिणामस्वरूप वे विदेशी प्रतियोगिता में पिट जाती हैं।</p>
<p><strong>6. विदेशी प्रतियोगिता &#8211;</strong> भारत को जूट के सामान के निर्यात में बांग्लादेश से, चाय के निर्यात में श्रीलंका व चीन से, चीनी के मामले में क्यूबा व जावा से और सूती वस्त्र के निर्यात में जापान, चीन व इंग्लैण्ड से कड़ी प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता है, जिससे इन मुख्य वस्तुओ के निर्यात में वृद्धि नहीं हो पा रही है।</p>
<p><strong>7. घटिया माल का निर्यात &#8211;</strong> भारतीय निर्यातक कई बार घटिया माल विदेशों को निर्यात कर देते हैं, जिससे विदेशों में भारतीय माल की प्रतिष्ठा गिर जाती है।</p>
<p>विगत वर्षों में निर्यात बढ़ाने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गये प्रयास निम्नलिखित हैं</p>
<p><strong>1. अग्रिम लाइसेन्स व लाइसेन्स से मुक्ति &#8211;</strong> सरकार ने कुछ उद्योगों को अग्रिम लाइसेन्स देने की व्यवस्था की है। इन लाइसेन्सों के आधार पर निर्यातकों द्वारा निर्यात के लिए बनने वाले सामान हेतु कच्चे माल का क्रय किया जाता है। अब सरकार ने अनेक उद्योगों को लाइसेन्स मुक्त भी कर दिया है।</p>
<p><strong>2. ऋण सुविधाएँ &#8211;</strong> निर्यातकर्ताओं की सुविधाओं के लिए बैंकों द्वारा 6 मास की अवधि या इससे अधिक अवधि के लिए ऋणों की सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु एक निर्यात साख एवं गारण्टी निगम की भी स्थापना की गयी है।</p>
<p><strong>3. व्यापारिक समझौते &#8211;</strong> सभी महत्त्वपूर्ण राष्ट्रों से उन देशों को विशिष्ट वस्तुओं का निर्यात करने तथा उनसे निश्चित वस्तुएँ आयात करने के लिए व्यापारिक समझौते किये गये हैं।</p>
<p><strong>4. राज्य व्यापार निगम की परिषदें &#8211;</strong> निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा राज्य व्यापार निगम की तथा विभिन्न वस्तुओं के लिए निर्यात संवर्द्धन परिषदें स्थापित की गयी हैं।</p>
<p><strong>5. भाड़े तथा करों में रियायत &#8211;</strong> निर्यात किये जाने वाले माल को बन्दरगाह तक पहुँचाने के लिए भाड़े में रियायत तथा लदान सम्बन्धी सुविधाएँ भी दी जाती हैं। चाय, पटसन के सामान इत्यादि परम्परागत वस्तुओं के निर्यात पर निर्यात शुल्क में कमी भी की गयी है।</p>
<p><strong>6. प्रदर्शनियों का आयोजन &#8211;</strong> संसार के सभी देशों की होने वाली औद्योगिक प्रदर्शनियों में भारत भाग लेता है तथा अपने देश में भी इस प्रकार की प्रदर्शनियों का आयोजन करता है।</p>
<p><strong>7. पर्यटकों को सुविधाएँ &#8211;</strong> भारत के प्राय: सभी भागों में विदेशी पर्यटक केन्द्र खोले गये हैं। इन केन्द्रों द्वारा पर्यटक स्थलों पर भारतीय माले बेचने का प्रबन्ध किया गया है। इस प्रकार पर्यटक भारतीय माल को अपने देश ले जाते हैं और फिर वहाँ से ऑर्डर लेने की चेष्टा की जाती है।</p>
<p><strong>8. लचीले रुख की नीति &#8211;</strong> निर्यात वायदों को पूरा करने के लिए औद्योगिक सुविधाएँ प्रदान करने की घोषणा की गयी है। इससे लाल फीताशाही सम्बन्धी औपचारिकताओं की आवश्यकता नहीं रहेगी।</p>
<p><strong>9. शत-प्रतिशत निर्यातोन्मुखी उद्योग &#8211;</strong> निर्यात के लिए गैर-परम्परागत वस्तुओं का उत्पादन करने वाले उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए पूँजीगत वस्तुओं व कच्चे माल तथा उपकरणों के शुल्क-मुक्त आयात, केन्द्रीय उत्पादन शुल्क व अन्य केन्द्रीय करों की उगाही आदि में रियायत तथा विदेशी सहयोग की शर्तों में अधिक उदारता जैसी सुविधाएँ दी जाती हैं।</p>
<p><strong>10. बिजली करघों का नियमितीकरण &#8211;</strong> वस्त्रों का निर्यात बढ़ाने के लिये अनधिकृत बिजली करघों को नियमित कर दिया गया है।</p>
<p><strong>11. खनिज तेल का आयात &#8211;</strong> भारत की आयात मदों में सबसे बड़ी मद पेट्रोलियम पदार्थों की है। इस मद का आयात घटाने के लिए भारत ने मुम्बई हाई के समुद्र में तथा अन्य भागों में तेल के उत्पादन में वृद्धि के लिए ठोस प्रयास किये हैं और इनमें उसे पर्याप्त सफलता भी मिली है। भारत में खनिज तेल के उत्पादन में वृद्धि होने के कारण वर्ष 1988-89 में इस मद की आयात राशि घट गयी थी, किन्तु माँग बढ़ने के कारण वर्ष 1993-94 के बाद यह राशि फिर बढ़ गयी।</p>
<p><strong>12. भारतीय विदेशी व्यापार संस्थान &#8211;</strong> यह सरकारी संस्थान उद्योगों व निर्यात संस्थाओं के &#8221; कर्मचारियों को निर्यात प्रबन्ध का प्रशिक्षण देता है, निर्यात की गुंजाइश वाले देशों का पता लगाता हैं। तथा विदेशों में बाजारों का सर्वेक्षण करता है।</p>
<p><strong>13. निर्यात-आयात बैंक &#8211;</strong> निर्यात-आयात सम्बन्धी विविध समस्याओं के समाधान के लिए जनवरी, 1982 ई० में भारत में निर्यात-आयात बैंक की स्थापना की गयी है।</p>
<p>प्रश्न 4<br />
व्यापार सन्तुलन से आप क्या समझते हैं ? भारत सरकार ने व्यापार सन्तुलन को अनुकूल बनाने के लिए कौन-कौन-से कदम उठाये हैं ? कारण सहित व्याख्या कीजिए। <strong>[2010]</strong><br />
उत्तर:<br />
किसी देश का व्यापार सन्तुलन’ उस देश के आयातों तथा निर्यातों के सम्बन्ध को बताता है। व्यापार सन्तुलन एक ऐसा विवरण होता है जिसमें वस्तुओं के आयात तथा निर्यातों का विस्तृत ब्यौरा दिया जाता है। व्यापार सन्तुलन में केवल दृष्ट निर्यातों तथा आयातों को ही सम्मिलित किया जाता है, अदृष्ट निर्यातों तथा आयातों का उसमें कोई हिसाब नहीं रखा जाता, किसी देश का व्यापार सन्तुलन उसके अनुकूल अथवा प्रतिकूल दोनों हो सकता है। जब दो देशों के बीच आयात-निर्यात बराबर होते हैं, तो व्यापार सन्तुलन की स्थिति होती है। यदि देश ने निर्यात अधिक किया है तथा आयात कम तो व्यापार सन्तुलन अनुकूल कहा जाएगा। इसके विपरीत, यदि आयात अधिक तथा निर्यात कम किया गया है तो प्रतिकूल व्यापार सन्तुलन की स्थिति होगी।<br />
<strong><br />
भारत सरकार द्वारा व्यापार सन्तुलन को अनुकूल बनाने के लिए उठाये गये कदम<br />
</strong>द्वितीय विश्व युद्ध से पहले व्यापार सन्तुलन प्रायः भारत के अनुकूल ही रहता था, परन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् से भारत का व्यापार सन्तुलन निरन्तर प्रतिकूल होता गया। भारत सरकार ने व्यापार सन्तुलन को अनुकूल बनाने के लिए कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाये हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है|</p>
<p><strong>1. निर्यात प्रोत्साहन द्वारा  &#8211;</strong> निर्यातों को प्रोत्साहन देकर व्यापार सन्तुलन को अनुकूल करने का उपाय सबसे उत्तम है। निर्यातों को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण कदम उठाये गये हैं, जो निम्नवत् हैं</p>
<ul>
<li>देश के निर्यात व्यापार को सुनियोजित और संगठित ढंग से बढ़ाने के लिए उद्योग और वाणिज्य मन्त्रालय में एक संगठन बनाया गया। इसी मन्त्रालय के अन्तर्गत चाय, कॉफी, रबड़ और इलायची के लिए चार अलग बोर्ड हैं।</li>
<li>विभिन्न वस्तुओं के लिए निर्यात प्रोत्साहन परिषदें बनायी गयीं, जो अपनी-अपनी वस्तुओं के लिए विदेशी मण्डियों की जाँच करती थीं, वस्तुओं के स्तर निर्धारित करती थीं, शिकायतें दूर करती थीं तथा उनको प्रचार करती थीं।</li>
<li>विभिन्न निर्यात प्रोत्साहन परिषदों, बोर्डों और अन्य निर्यात संस्थाओं के काम में तालमेल स्थापित करने के लिए इन संगठनों की शीर्ष संस्था के रूप में भारतीय निर्यात संगठनों का संघ&#8217; बनाया गया है।</li>
<li>बोर्ड ऑफ ट्रेड या व्यापार मण्डल (स्थापना मई, 1962 ई०) देश के विदेशी व्यापार से सम्बन्धित समस्याओं और नीतियों के बारे में सलाह देता है।</li>
<li>व्यापार सलाहकार परिषद् की भी स्थापना की गयी है, जो अर्थव्यवस्था के वाणिज्यिक पहलुओं की सफलताओं-असफलताओं का विवेचन करने के साथ-साथ व्यापार के विस्तार तथा आयात के नियमों से सम्बद्ध समस्याओं पर भी विचार-विमर्श करती है।</li>
<li>निर्यात वस्तुओं की किस्म पर नियन्त्रण रखने के लिए और जहाज पर लादने से पहले माल का सुनियोजित ढंग से नियन्त्रण करने के लिए एक निर्यात निरीक्षण संस्था बनायी गयी है। इसके कारण विदेशी मण्डियों में भारतीय माल की प्रतिष्ठा बढ़ी है।</li>
<li>व्यापार विकास प्राधिकरण&#8217; नामक एक विशेष संगठन भी बनाया गया है, जो निर्यात उत्पादन और बिक्री के क्षेत्र में विशिष्ट सेवाएँ प्रदान करता है।</li>
<li> इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए मुम्बई में निर्यात विधायन (प्रॉसेसिंग) जोन बनाया गया है। निर्यात-व्यापार को बढ़ावा देने के लिए कांदला में एक मुक्त व्यापार क्षेत्र भी बनाया गया है।</li>
<li>भारत का राजकीय व्यापार निगम अब एक प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक संस्था माना जाता है। यह लगभग 140 वस्तुओं का निर्यात करता है। इसके तीन सहायक संगठन भी हैं &#8211;  (क) परियोजना और उपकरण निगम, (ख) हथकरघा और दस्तकारी विकास निगम और (ग) भारतीय काजू निगम।।</li>
<li>उद्योग और वाणिज्य मन्त्रालय के अधीन अन्य निगम हैं–निर्यात-साख़ और गारण्टी निगम, भारतीय कपास निगम, भारतीय पटसन निगम और भारतीय चाय निगम।</li>
<li>आयात-निर्यात बैंक (EXIM) की स्थापना की गयी है।</li>
<li>निर्यातों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने निर्यात जोखिम बीमा निगम की स्थापना की है। सरकार की वर्तमान निर्यात-नीति द्वारा निर्यात में वृद्धि की पर्याप्त सम्भावनाएँ दृष्टिगोचर होती हैं।</li>
</ul>
<p><strong>2. आयातों पर प्रतिबन्ध लगाना &#8211;</strong> व्यापार सन्तुलन को ठीक करने के लिए एक दूसरा प्रभावशाली उपाय देश के आयातों को कम करना है। आयातों की मात्रा को कम करने के लिए आयातों पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबन्ध अथवा कर लगाये जाते हैं। भारत सरकार ने आयात-नीति में आयातों को कम करने का प्रयास किया है।</p>
<p><strong>3. अवमूल्यन द्वारा &#8211;</strong> मुद्रा के अवमूल्यन के द्वारा भी एक देश अपने प्रतिकूल व्यापार सन्तुलन को ठीक कर सकता है। अवमूल्यन से अभिप्राय देश की मुद्रा के विदेशी मूल्य को कम करने से होता है। अवमूल्यन के द्वारा देश के निर्यातों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है तथा आयातों की मात्रा को कम किया जा सकता है। भारत सरकार ने 1949 ई० में सबसे पहले भारतीय रुपये का अवमूल्यन किया। इसके पश्चात् 6 जून, 1966 ई० को और पुन: जुलाई, 1991 ई० में रुपये का अवमूल्यन किया गया है। रुपये का अवमूल्यन होने से निर्यातों में वृद्धि हुई है तथा व्यापार सन्तुलन कुछ अनुकूल हुआ, परन्तु कुछ समय पश्चात् व्यापार सन्तुलन पुनः प्रतिकूल ही होता गया है।</p>
<p><strong>4. मुद्रा-प्रसार पर नियन्त्रण करके &#8211;</strong> मुद्रा-प्रसार को कम करने के लिए भारत सरकार ने अनेक कदम उठाये हैं, जिनके परिणामस्वरूप 1993 ई० में मुद्रा-प्रसार की दर, जो 17% तक पहुँच गयी थी, घटकर 7% तक आ गयी। लेकिन मई, 1994 ई० में यह दर पुन: बढ़ने लगी और 11.8% हो गयी। मुद्रा-प्रसार पर नियन्त्रण करने से व्यापार सन्तुलन को अनुकूल बनाया जा सकता है।</p>
<p><strong>5. जनसंख्या-वृद्धि पर नियन्त्रण द्वारा &#8211;</strong> व्यापार सन्तुलन को अनुकूल करने के लिए तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या को नियन्त्रित करने के प्रयास किये जाने चाहिए, जिससे आन्तरिक माँग में वृद्धि न हो। भारत सरकार ने परिवार कल्याण कार्यक्रम के द्वारा जनसंख्या-वृद्धि को कम करने के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं।<br />
<strong><br />
6. कृषि-उत्पादन में वृद्धि द्वारा &#8211;</strong> भारत जैसे विकासशील देश में व्यापार सन्तुलन को अनुकूल करने के लिए कृषि-उत्पादन में वृद्धि के प्रयास अनवरत रूप से किये जाने चाहिए। कृषि-उत्पादकता में वृद्धि करके आयातों में कमी की जा सकती है।</p>
<p>प्रश्न 5<br />
भुगतान सन्तुलन व व्यापार सन्तुलन में अन्तर कीजिए। इन दोनों में किसके अध्ययन का अधिक महत्त्व है?<strong> [2010, 13, 14]</strong><br />
उत्तर:<br />
भुगतान सन्तुलन व व्यापार सन्तुलन में निम्नलिखित अन्तर हैं<br />
<img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-35992" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Economics-Chapter-23-Foreign-Trade-of-India-4.png" alt="UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 23 Foreign Trade of India 4" width="598" height="223" srcset="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Economics-Chapter-23-Foreign-Trade-of-India-4.png 598w, https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Economics-Chapter-23-Foreign-Trade-of-India-4-300x112.png 300w" sizes="auto, (max-width: 598px) 100vw, 598px" /><br />
<img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-35995" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Economics-Chapter-23-Foreign-Trade-of-India-5.png" alt="UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 23 Foreign Trade of India 5" width="598" height="541" srcset="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Economics-Chapter-23-Foreign-Trade-of-India-5.png 598w, https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Economics-Chapter-23-Foreign-Trade-of-India-5-300x271.png 300w" sizes="auto, (max-width: 598px) 100vw, 598px" /><br />
<strong>व्यापार सन्तुलन एवं भुगतान सन्तुलन का तुलनात्मक महत्त्व</strong><br />
किसी देश के लिए व्यापार सन्तुलन की अपेक्षा उसका भुगतान सन्तुलन अधिक महत्त्वपूर्ण होता । है। व्यापार सन्तुलन के अध्ययन से देश की आर्थिक स्थिति का सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता। केवल भुगतान सन्तुलन ही देश की अन्तर्राष्ट्रीय लेन-देन की स्थिति का ज्ञान सही-सही अनुकूल तथा प्रतिकूल हो सकता है, किन्तु दीर्घकाल में व्यापार सन्तुलन का अनुकूल अथवा प्रतिकूल होना हमें देश की आर्थिक स्थिति के विषय में कुछ नहीं बताता है। देश की आर्थिक समृद्धि का प्रमाण समझा जाता था किन्तु आजकल यह विचार अधिक उपयुक्त नहीं है।</p>
<p>व्यापार सन्तुलन का पक्ष में होना देश की आर्थिक समृद्धि का संकेत नहीं है किन्तु किसी देश की आर्थिक समृद्धि उस देश के भुगतान सन्तुलन की स्थिति पर निर्भर होती है। भुगतान सन्तुलन के पक्ष में होने से देश के ऋण दूसरे देशों पर होते हैं और वह देश ऋणदाता होता है। इसके विपरीत भुगतान सन्तुलन का विपक्ष में होना देश को ऋणी बनाता है। अतः। किसी देश की आर्थिक स्थिति का सही ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें उसके भुगतान सन्तुलन का अध्ययन करना चाहिये।</p>
<p>प्रश्न 6<br />
भारत की आयात-निर्यात नीति (विदेशी व्यापार नीति) 2001-02 पर एक लेख लिखिए।<br />
<strong>या</strong><br />
भारतीय व्यापार नीति में हाल में हुए परिवर्तनों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।<br />
<strong>या</strong><br />
आर्थिक सुधारों की अवधि में भारत की व्यापार नीति में हुए मुख्य परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तर:<br />
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद से भारत ने समय-समय पर अपनी आयात-निर्यात नीति घोषित की है और आवश्यकता के अनुसार इन नीतियों में उचित समायोजन भी किया है। विगत शताब्दी के अन्तिम दशक में उदारीकरण, निजीकरण एवं भूमण्डलीकरण की नीतियाँ अपनायी गयीं और आयात-निर्यात नीति को भी इन उदारवादी आर्थिक सुधारों के साथ जोड़ा गया।<br />
आठवीं तथा नवीं पंचवर्षीय योजना के लिए उदारवादी आयात-निर्यात नीतियाँ घोषित की गयी थीं, जिनके उद्देश्य निम्नवत् थे।</p>
<ul>
<li>भारत को भूमण्डलीय अर्थव्यवस्था की ओर ले जाना जिससे कि बढ़ते हुए भूमण्डलीय बाजार का लाभ उठाया जा सके।</li>
<li>देश के आर्थिक विकास को बढ़ावा देना जिसके लिए आवश्यक कच्चा माल, साज-सज्जा व पूँजीगत माल उपलब्ध कराना।</li>
<li>भारतीय कृषि, उद्योग एवं सेवा की तकनीकी मजबूती को बढ़ावा देना।</li>
<li>उपभोक्ताओं को अच्छी क्वालिटी की वस्तुएँ उचित मूल्यों पर उपलब्ध कराना।।</li>
</ul>
<p>भारत में आयात-निर्यात नीति, 2001-02 की घोषणा तत्कालीन केन्द्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मन्त्री श्री मुरासोली मारन ने 31 मार्च, 2001 ई० को की। भारतीय विदेशी व्यापार के इतिहास में यह नीति ऐतिहासिक है। इस नीति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं</p>
<ol>
<li>इस नीति द्वारा 1 अप्रैल, 2001 ई० से 1429 में से शेष बचे सभी 715 उत्पादों के आयात पर से मात्रात्मक प्रतिबन्ध हटा लिये गये। यह स्मरण रखना चाहिए कि विश्व व्यापार संगठन के नियमों के प्रति प्रतिबद्धता के चलते इसके अतिरिक्त अन्य 714 उत्पादों के आयात पर से यह प्रतिबन्ध 1 अप्रैल, 2000 ई० से हटा लिये गये थे। अब सुरक्षा की दृष्टि से अति संवेदनशील उत्पादों को छोड़कर लगभग सभी उत्पादों का आयात देश में किया जा सकेगा। इन उत्पादों में से 147 उत्पाद कृषि-क्षेत्र से तथा 342 उत्पाद टेक्सटाइल क्षेत्र से सम्बन्धित हैं। अन्य 226 उत्पादों में ऑटोमोबाइल्स सहित दूसरे उपभोक्ता उत्पाद सम्मिलित हैं।</li>
<li>जिन 715 उत्पादों के आयात परे 1 अप्रैल, 2001 से प्रतिबन्ध समाप्त किये गये उनमें ये पदार्थ हैं&#8212;चाय, कॉफी, चावल व अन्य कृषिगत उत्पाद, प्रसंस्करित खाद्य-पदार्थ, शराब, ग्रीटिंग कार्ड, ब्रीफकेस, सूती व सिन्थेटिक वस्त्र, टाइयाँ, जैकेट, जूते, प्रेशर कुकर, बर्तन, टोस्टर, रेडियो, कैसेट प्लेयर, टेलीविजन, मोपेड, मोटरसाइकिलें, कारें, घड़ियाँ, खिलौने, ब्रश, कंघे, पेन, पेंसिलें, दूध, पनीर, डेयरी उत्पाद, हीटर, इलेक्ट्रिक चूल्हे, बल्ब, वीडियो गेम्स, अण्डे, पोल्ट्री उत्पाद व फल आदि।</li>
<li>300 अति संवेदनशील उत्पादों के आयात पर निगरानी हेतु वाणिज्य सचिव की अध्यक्षता में ‘वाच रूम का गठन किया गया है।</li>
<li>भारत में अपना माल बेचने के लिए विदेशी उत्पादकों द्वारा अनुसूचित तरीके अपनाये जाने पर आयातों पर अंकुश हेतु ‘ऐण्टी डम्पिंग ड्यूटी&#8217; (प्रतिपाटन कर) लगायी जाएगी।</li>
<li>गेहूं, चावल, मक्का, पेट्रोल, डीजल व यूरिया का आयात केवल अधिकृत एजेन्सियों द्वारा ही किया जाएगा।</li>
<li>निर्यातों में 18% वार्षिक वृद्धि का लक्ष्य प्राप्त किया जाएगा।</li>
<li>निर्यात वृद्धि के लिए नये कदम उठाये जाएँगे।</li>
<li>विशेष आर्थिक परिक्षेत्रों की स्थापना के साथ ही उनकी सुविधाओं में भी वृद्धि की जाएगी।</li>
<li>सस्ते आयातों से स्वदेशी उद्योग व कृषि-क्षेत्र को बचाने के लिए आवश्यक उपाय किये जाएँगे। उनकी गुणवत्ता में सुधार कर उनकी कीमतों को भी प्रतिस्पर्धी बनाया जाएगा।</li>
</ol>
<p>इस नीति के अन्तर्गत की गयी कार्यवाहियाँ निम्नलिखित हैं</p>
<ol>
<li>भारत सरकार ने 7 मई, 2001 से 300 अति संवेदनशील उपभोक्ता वस्तुओं के आयात पर निगरानी के लिए इनके आयात के 200 रास्ते बन्द कर दिये हैं। पहले 211 प्रवेश मार्गों में से कहीं से भी माल का आयात किया जा सकता था, किन्तु अब केवल 11 बन्दरगाहों व हवाई अड्डों के रास्ते ही आयात किया जा सकता है।</li>
<li>खुली बाजार व्यवस्था व आयात व्यवस्था के कारण यदि कोई देश अनुचित तरीके अपनाकर अपने माल से भारत के बाजार को पाट देता है अर्थात् अपने माल की भारत के बाजार में भरमार कर देता है तो ऐसी दशा में भारत सरकार ऐसी वस्तुओं पर ‘ऐण्टी डम्पिंग ड्यूटी&#8217; (प्रतिपाटन कर) लगाकर उन पर नियन्त्रण करेगी। भारत ने मई, 2001 ई० तक डम्पिग के 89 मामले दर्ज किये हैं, जिनमें से आधे मामले चीन से होने वाली आयातित वस्तुओं के खिलाफ हैं।</li>
</ol>
<p>इस प्रकार सरकार का निगरानी कक्ष स्थिति पर बराबर निगाह रखेगा और किसी वस्तु के अनुचित आयात की भरमार पर तत्काल कार्यवाही करेगा तथा देश की कृषि, उद्योग व अर्थव्यवस्था पर : खुले आयात का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ने देगा।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
भारत के विदेशी व्यापार की प्रमुख विशेषताओं को बताइए।<br />
उत्तर:<br />
भारत के विदेशी व्यापार की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं</p>
<ol>
<li>अधिकांश भारतीय विदेशी व्यापार लगभग (90%) समुद्री मार्गों द्वारा किया जाता है। हिमालय पर्वतीय अवरोध के कारण समीपवर्ती देशों एवं भारत के मध्य धरातलीय आवागमन की सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसी कारण देश का अधिकांश व्यापार पत्तनों द्वारा अर्थात् समुद्री मार्गों द्वारा ही किया जाता है।</li>
<li>भारत के निर्यात व्यापार का 27% पश्चिमी यूरोपीय देशों, 20% उत्तर अमेरिकी देशों, 51% एशियाई एवं ऑस्ट्रेलियाई देशों तथा 2% अफ्रीकी देशों एवं दक्षिण अमेरिकी देशों में किया जाता है। कुल निर्यात का लगभग 40% भाग विकसित देशों को किया जाता है। इसी प्रकार आयात व्यापार में 26% पश्चिमी यूरोपीय देशों, 39% एशियाई एवं ऑस्ट्रेलियाई देशों, 13% उत्तरी अमेरिकी देशों तथा 7% अफ्रीकी देशों का स्थान है।</li>
<li>यद्यपि भारत में विश्व की 17.5% जनसंख्या निवास करती है, परन्तु विश्व व्यापार में भारत का भाग 0.67% है, जबकि अन्य विकसित एवं विकासशील देशों की भाग इससे कहीं अधिक है।</li>
<li>भारत का व्यापार सन्तुलन सदैव भारत के विपक्ष में रहा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि भारत के आयात की मात्रा निर्यात से सदैव अधिक रहती है। परिणामस्वरूप विदेशी व्यापार का सन्तुलन प्रायः भारत के विपक्ष में रहती है।</li>
<li>देश का अधिकांश विदेशी व्यापार मात्र 35 देशों (कुल 190 देश) के मध्य होता है जो विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों के आधार पर किया जाता है। भारत का सर्वाधिक विदेशी व्यापार संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ है।</li>
<li>भारत के विदेशी व्यापार में खाद्यान्नों के आयात में निरन्तर कमी आयी है, जिसका प्रमुख कारण खाद्यान्न उत्पादन में उत्तरोत्तर वृद्धि का होना है। वर्ष 1989-90 से देश खाद्यान्नों को निर्यात करने की स्थिति में आ गया था, परन्तु वर्ष 1993-94 से पुनः देश को खाद्य-पदार्थ-गेहूं और चीनी-विदेशों से आयात करने पड़ रहे हैं।</li>
<li>भारत अपनी विदेशी मुद्रा के संकट का हल अधिकाधिक निर्यात व्यापार से ही कर सकता है; अतः उन्हीं कम्पनियों को आयात की छूट दी जाती है, जो निर्यात करने की स्थिति में हैं।</li>
<li>भारत के आयातों में मशीनरी, खनिज तेल, उर्वरक, रसायन तथा कपास की अधिकता रहती है और निर्यातों में हीरे-जवाहरात, चमड़ा, सूती वस्त्र व खनिज पदार्थों का मुख्य स्थान है।</li>
<li>स्वतन्त्रता के पूर्व भारत अधिकतर कच्चे माल का निर्यात और पक्के माल (अधिकतर उपभोग वस्तुओं) का आयात करता था। स्वतन्त्रता के बाद उद्योग-धन्धों का विकास होने के कारण भारत द्वारा अब पक्के माल का भी पर्याप्त निर्यात किया जा रहा है। इसके आयात किये गये पक्के माल में अब अधिकतर मशीनें होती हैं। इसके साथ ही भारत में औद्योगिक विकास में वृद्धि होते रहने के कारण कच्चे माल का आयात भी बढ़ रहा है।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 2<br />
भारत के आयात-निर्यात व्यापार (विदेशी व्यापार) की वर्तमान प्रवृत्तियाँ बताइए। <strong>[2010, 11]</strong><br />
<strong>या</strong><br />
हाल के वर्षों में भारत के निर्यातों की मुख्य प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालिए।<strong> [2011]</strong><br />
<strong>या</strong><br />
भारत के विदेशी व्यापार की आधुनिक प्रवृत्तियों का वर्णन कीजिए।<strong> [2015]</strong><br />
उत्तर:<br />
अंग्रेजी राज्य की स्थापना से पूर्व भारत विश्व के प्रमुख निर्यातकों में से था। भारत सूती-वस्त्र, रेशमी वस्त्र, बर्तन, इत्र, मसाले आदि रोम, मिस्र, यूनान, चीन, अफगानिस्तान, ईरान आदि देशों को भेजता था तथा शराब, घोड़े, बहुमूल्य जवाहरात आदि का आयात करता था। स्वतन्त्रता-प्राप्ति से पूर्व भारत का विदेशी व्यापार एक उपनिवेश एवं कृषि-पदार्थों तक ही सीमित था। इसका अधिकांश व्यापार ग्रेट-ब्रिटेन तथा राष्ट्रमण्डलीय देशों से ही होता था। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् से भारत के विदेशी व्यापार में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं। भारत के विदेशी व्यापार की प्रवृत्ति निम्नवत् रही है</p>
<p><strong>(1) व्यापार की दिशा और स्वभाव में परिवर्तन &#8211;</strong> स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् हमारे देश से चाय व जूट के निर्यात में कमी हुई है तथा मशीनों, औजारों, इंजीनियरिंग वस्तुओं, चमड़ा तथा चमड़े से बनी वस्तुओं, हस्तशिल्प तथा जवाहरात आदि के निर्यात में वृद्धि हुई है। सबसे अधिक मात्रा में पेट्रोलियम और क्रूड उत्पादों का आयात होता है। मशीनों व उपकरणों का आयात भी अधिक मात्रा में किया जा रहा है। अनाज का आयात कम हुआ है। अब हम विदेशों से तैयार माल के स्थान पर कच्चा माल अधिक मॅगाते हैं। निर्यात के मामले में भारत अब केवल प्राथमिक एवं कृषिगत वस्तुओं का ही निर्यातक नहीं रह गया है, बल्कि इसके निर्यात में विनिर्मित (मैन्युफैक्चर्ड) वस्तुओं का प्रतिशत भी बढ़ता जा रहा है।</p>
<p><strong>(2) विदेशी व्यापार के आकार एवं परिमाण में परिवर्तन &#8211;</strong> स्वतन्त्रता के उपरान्त भारत के विदेशी व्यापार में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। यद्यपि यह वृद्धि व्यापार की मात्रा एवं मूल्य दोनों में ही हुई है, फिर भी इस वृद्धि को सन्तोषजनक नहीं कहा जा सकता; क्योंकि विश्व के कुल विदेशी व्यापार में भारत का अंश पिछले वर्षों में लगभग स्थिर ही रहा है। भारत का विदेशी व्यापार विश्व के लगभग सभी देशों के साथ है। 7,500 से भी अधिक वस्तुएँ लगभग 190 देशों को निर्यात की जाती हैं, जब कि 6,000 से अधिक वस्तुएँ 140 देशों से आयात की जाती हैं।</p>
<p><strong>(3) व्यापार घाटा &#8211;</strong> भारत का व्यापार घाटा भी निरन्तर बढ़ता जा रहा है। वित्त वर्ष 2001-02 के प्रथम 9 महीनों में देश का व्यापार घाटा 5.79 अरब डॉलर पर पहुँच गया था, परन्तु अप्रैल-सितम्बर, 2011-12 ई० की अवधि में देश का व्यापार घाटा लगभग 8 अरब आ गया है।</p>
<p>वर्तमान समय में भारत में विदेशी व्यापार की निम्नलिखित प्रवृत्तियाँ स्पष्ट होती हैं</p>
<ul>
<li>भारत के विदेशी व्यापार में तीव्रता से वृद्धि हो रही है।</li>
<li>भारत के विदेशी व्यापार के क्षेत्र में विकास हो रहा है और नये व्यापार सम्बन्ध स्थापित हो रहे हैं।</li>
<li>तेल उत्पादक राष्ट्रों के आयात की राशि में असाधारण वृद्धि हुई है।</li>
<li>समाजवादी देशों के साथ विशेष रूप से रूस के साथ व्यापार सम्बन्ध सुदृढ़ हो रहे हैं।</li>
<li>विदेशी व्यापार के निर्यात में अपरम्परागत क्षेत्र का अनुपात तेजी से बढ़ रहा है।</li>
<li>भारत के विदेशी व्यापार में निर्यात का अंशदान बढ़ता जा रहा है।</li>
<li>भारत के विदेशी व्यापार में प्रतिकूल भुगतान सन्तुलन की अवस्था बनी हुई है।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 3<br />
भारत के निर्यातों एवं आयातों की प्रमुख मदे बताइए। <strong>[2012]</strong><br />
<strong>या</strong><br />
भारत की आयात व निर्यात प्रत्येक की किन्हीं दो प्रमुख मदों का उल्लेख कीजिए।<strong> [2016]</strong><br />
उत्तर:<br />
भारत के निर्यात की प्रमुख मदें</p>
<p><strong>(क) कृषि और सम्बद्ध उत्पाद </strong></p>
<ol>
<li>काजू की गिरी,</li>
<li>कॉफी,</li>
<li>समुद्री उत्पाद,</li>
<li>कपास,</li>
<li>चावल,</li>
<li>मसाले,</li>
<li>चीनी,</li>
<li>चाय,</li>
<li>तम्बाकू।</li>
</ol>
<p><strong>(ख) अयस्क और खनिज &#8211;</strong> (1) लौह-अयस्क।</p>
<p><strong>(ग) विनिर्मित वस्तुएँ</strong></p>
<ol>
<li>इंजीनियरी वस्तुएँ,</li>
<li>रसायन,</li>
<li>टैक्सटाइल्स सिलेसिलाए परिधान,</li>
<li>जूट व जूट से निर्मित सामान,</li>
<li>चमड़ा और चमड़ा उत्पाद,</li>
<li>हस्त शिल्प,</li>
<li>हीरे और जवाहरात।</li>
</ol>
<p><strong>(घ) खनिज ईंधन और लुब्रीकेण्ट कोयले सहित।<br />
</strong>भारत के आयात की प्रमुख मदें</p>
<ol>
<li>अनाज और अनाज के उत्पाद,</li>
<li>काजू की गिरी,</li>
<li>कच्चा रबर,</li>
<li>ऊनी, कपास तथा जुट के रेशे,</li>
<li>पेट्रोलियम तेल और लुब्रीकेण्ट,</li>
<li>खाद्य तेल,</li>
<li>उर्वरक,</li>
<li>रसायन,</li>
<li>रँगाई व रँगाई की सामग्री,</li>
<li>प्लास्टिक सामग्री,</li>
<li>चिकित्सीय एवं औषध उत्पाद,</li>
<li>कागज, गत्ता,</li>
<li>मोती एवं रत्न,</li>
<li>लौह-इस्पात,</li>
<li>अलौह धातुएँ।।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 4<br />
भारत में निर्यात में वृद्धि हेतु अपने सुझाव दीजिए।<strong> [2009, 12, 14]</strong><br />
उत्तर:<br />
निर्यात-वृद्धि के लिए सुझाव<br />
र्यात में वृद्धि हेतु निम्नलिखित सुझाव हैं</p>
<ol>
<li>प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति बढ़ाने के लिए उत्पादन लागत घटाई जाए।</li>
<li>उत्पादन पद्धति में सुधार किया जाए तथा श्रमिकों की उत्पादकता बढ़ाई जाए।</li>
<li>कृषि उत्पादन तथा व्यापार सुविधाओं में वृद्धि की जाए।</li>
<li>निर्यात वस्तुओं की किस्म में सुधार किया जाए।</li>
<li>निर्यात प्रोत्साहन के लिए सकारात्मक प्रेरणाएँ दी जाएँ।</li>
<li>निर्यात वस्तुओं के उत्पादकों व निर्यातकों को वित्तीय सुविधाएँ प्रदान की जाएँ।</li>
<li>व्यापार समझौते के लाभों को प्राप्त करने के लिए भरपूर प्रयत्न किए जाएँ।</li>
<li>पर्याप्त मात्रा में विदेशों में प्रचार एवं प्रसार किया जाए।</li>
<li>विदेशी बाजारों का गहन एवं व्यापक सर्वेक्षण किया जाए।</li>
<li>भारतीय माल की कीमतों को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धात्मक स्तरों के समरूप रखा जाए।</li>
<li>केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा स्थापित विभागों में उचित एवं प्रभावपूर्ण समन्वय स्थापित किया जाए।</li>
<li>देश में निर्यात विकास कोष की स्थापना की जाए।</li>
<li>निर्यातगृहों तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक केन्द्रों की स्थापना में सहायता दी जाए।</li>
<li>बन्दरगाहों का सुधार एवं अभिनवीकरण किया जाए।</li>
<li>व्यापार विपणन हेतु प्रशिक्षण दिया जाए।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 5:<br />
भारत में भुगतान-शेष में असन्तुलन के क्या कारण हैं?<strong> [2010]</strong><br />
उत्तर:<br />
भारत के भुगतान-शेष में असन्तुलन के अनेक कारण हैं, जिनमें प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं</p>
<ol>
<li>तेल उत्पादक देश अपने पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य पिछले कुछ वर्षों से प्रति वर्ष बढ़ाते रहे हैं। इसके साथ ही देश में पेट्रोलियम पदार्थों की खपत भी बढ़ी है, जिससे पर्याप्त मात्रा में इनका आयात किया गया है।</li>
<li>आर्थिक योजना के कारण देश में औद्योगीकरण व कृषि विकास की गति तेज हो गयी, जिसके फलस्वरूप मशीनों का पर्याप्त आयात करना पड़ा।</li>
<li>भारत के भुगतान-असन्तुलन का एक कारण निर्यातों का आशा के अनुरूप न बढ़ना है। वर्ष 1950-51 में भारत के निर्यात १ 606 करोड़ के थे, जो वर्ष 2011-12 में बढ़कर १ 14,59,28,050 करोड़ के हो गये हैं, जबकि आयात इसी काल में 608 करोड़ से बढ़कर है 23,44,772.04 करोड़ के हो गये हैं।</li>
<li>भारत ने विकास-कार्य के लिए पर्याप्त मात्रा में ऋण लिये हैं, जिसमें ब्याज व मूलधन वापसी के लिए भी विदेशी विनिमय का व्यय करना पड़ता है। इससे भी भुगतान-शेष में असन्तुलन पैदा हो गया है।</li>
<li>भारत की जनसंख्या बराबर बढ़ रही है, जिससे आयातों में वृद्धि हो रही है तथा घरेलू उपभोग बढ़ने से निर्यात-क्षमता में कमी आयी है। इससे भी भुगतान-शेष में असन्तुलन की स्थिति बन गयी है।</li>
<li>देश का अपने विदेशी दूतावासों, यात्रियों, विद्यार्थियों आदि पर सरकारी व्यये बराबर बढ़ रहा है। इससे भी भुगतान-शेष का असन्तुलन बढ़ा है।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 6<br />
भुगतान सन्तुलन को परिभाषित करते हुए इसे अनुकूल बनाने हेतु सुझाव दीजिए। <strong>[2010]</strong><br />
<strong>या</strong><br />
प्रतिकूल भुगतान सन्तुलन को सुधारने के लिए कोई चार सुझाव दीजिए। <strong>[2013, 16]</strong><br />
<strong>या</strong><br />
प्रतिकूल भुगतान सन्तुलन का अर्थ लिखिए। भारत के प्रतिकूल भगतान सन्तुलन के सुधार के लिए कोई दो उपाय सुझाइए। <strong>[2016]</strong><br />
उत्तर:<br />
भुगतान सन्तुलन किसी देश के आर्थिक लेन-देन का एक व्यवस्थित लेखा-जोखा है, जो किसी देश के निवासियों द्वारा विश्व के अन्य देशों के निवासियों के साथ किया जाता है। भुगतान सन्तुलन के विवरण में प्राय: लेन-देन की मदों में चालू खाता और पूँजी खाता की मदों का उल्लेख होता है। जब किसी देश का चालू खाती, पूँजी खाता के अन्तर्गत कुल लेनदारियों तथा देनदारियों की तुलना में अधिक होता है, तो उस देश का भुगतान सन्तुलन अनुकूल कहा जाएगा। वर्तमान समय में अनुकूल भुगतान सन्तुलन आर्थिक विकास और आर्थिक समृद्धि का सूचक माना जाता है।</p>
<p>भारत एक विकासशील देश है। भारत जैसे विकासशील देशों में प्रतिकूल भुगतान सन्तुलन एक विकट समस्या बनी हुई है। इसे अनुकूल बनाने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं</p>
<p><strong>1. आयातों को कम करना &#8211;</strong> यदि भुगतान सन्तुलन को भारत के अनुकूल करना है तब यह आवश्यक है कि हमें अपने आयातों में कमी करनी होगी, क्योंकि आयातों में कमी से देनदारियाँ कम होंगी और भुगतान सन्तुलन अनुकूल हो सकेगा। सरकार आयात की वस्तुओं पर अधिक आयात कर. लगाकर, देश में आयातित वस्तुओं का उत्पादन बढ़ाकर, व्यापारियों को आयात लाइसेन्स देकर तथा आयात कोटा निश्चित कर, आयातों को कम कर सकती है।</p>
<p><strong>2. निर्यातों में वृद्धि &#8211;</strong> निर्यातों में वृद्धि करके विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है और भुगतान सन्तुलन को अपने पक्ष में किया जा सकता है। निर्यातों में वृद्धि के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं</p>
<ul>
<li>वस्तुओं के गुण और मात्रा में वृद्धि तथा उत्पादन लागत में कमी द्वारा।</li>
<li>वस्तुओं से सम्बद्ध उद्योगों को संरक्षण प्रदान कर।</li>
<li>निर्यात कर में कमी करना।</li>
<li>बन्दरगाहों तक तैयार उत्पादों को ले जाने की उचित व्यवस्था करना।</li>
<li>बन्दरगाहों से जहाज में लदान की कारगर व्यवस्था करना।</li>
</ul>
<p><strong>3. मुद्रा का अवमूल्यनं &#8211;</strong> मुद्रा का अवमूल्यन करके निर्यात बढ़ाने के प्रयास किये जा सकते हैं। मुद्रा के मूल्य में कमी कर देने से विदेशी व्यापारियों को अपेक्षाकृत कम मुद्रा देकर वस्तुएँ प्राप्त हो जाती हैं। मुद्रा के अवमूल्यन से निर्यातों के बढ़ने की सम्भावना होती है।</p>
<p><strong>4. विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करके &#8211;</strong> विदेशी पर्यटकों को अपने देश में दर्शनीय स्थलों की ओर आकर्षित करके विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है।</p>
<p><strong>5. विनिमय-नियन्त्रण द्वारा विनिमय &#8211;</strong> नियन्त्रण के द्वारा भी भुगतान सन्तुलन को पक्ष में लाया जा सकता है। सरकार आयात पर प्रतिबन्ध लगाकर भुगतान सन्तुलन को अपने पक्ष में कर सकती है।</p>
<p><strong>6. विदेशी विनियोजकों को आकर्षित करके &#8211;</strong> भुगतान सन्तुलन को नियन्त्रित करने हेतु विदेशी विनियोजकों को पूँजी विनियोग के लिए अपने देश में आकर्षित करना चाहिए, जिसके द्वारा उत्पादन की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है।</p>
<p><strong>7. विदेशी ऋण प्राप्त करके &#8211;</strong> विदेशी ऋण प्राप्त करके भी भुगतान सन्तुलन को अपने अनुकूल किया जा सकता है, परन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि विदेशी ऋण उत्पादक-कार्यों के लिए ही लिये जाएँ।</p>
<p><strong>8. जनसंख्या-वृद्धि पर नियन्त्रण द्वारा &#8211;</strong> देश की जनसंख्या-वृद्धि को नियन्त्रित करने के लिए अधिक प्रयास होना चाहिए, जिससे आन्तरिक माँग में वृद्धि न हो। इस सम्बन्ध में सरकार द्वारा परिवार नियोजन के कार्यक्रम को व्यापक और अनिवार्य कर देना चाहिए।</p>
<p>प्रश्न 7<br />
दसवीं पंचवर्षीय योजना के लिए घोषित नयी आयात-निर्यात नीति पर टिप्पणी लिखिए। <strong>[2009]</strong><br />
उत्तर:<br />
दसवीं योजना के लिए नयी आयात-निर्यात नीति की घोषणा केन्द्र सरकार द्वारा 31 मार्च, 2002 ई० को की गयी, जिसमें पूर्व दशक में अपनाये गये उदारीकरण एवं भूमण्डलीकरण के दृष्टिकोण को यथावत् जारी रखा गया और निर्यात की प्रक्रिया के अन्तर्गत आने वाली जटिलताओं को कम करते हुए नीति को निर्यातकों के हितों का संरक्षक बनाया गया। नवीन आयात-निर्यात के अन्तर्गत निम्नलिखित उद्देश्यों को समाहित किया गया है</p>
<ol>
<li>विश्व बाजार के बढ़ते अवसरों से फायदा उठाने के उद्देश्य से देश को विश्व-अभिमुख अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ाना।।</li>
<li>देश में उत्पादन बढ़ाने के लिए आवश्यक कच्चे माल, तकनीक, मशीनी उपकरण आदि को आसानी से उपलब्ध करवाकर सतत आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना।</li>
<li>भारतीय कृषि उद्योग एवं सेवाओं की तकनीकी क्षमता और कुशलता को बढ़ावा देना।</li>
<li>रोजगार के नये अवसर सृजित करना।</li>
<li>उत्पादों की तैयारी गुणवत्ता के अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप करना।</li>
<li>उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर अच्छे उत्पाद उपलब्ध कराना।</li>
</ol>
<p>नयी आयात-निर्यात नीति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं</p>
<ol>
<li>दसवीं योजना की अवधि के अन्त तक (अर्थात् 31 मार्च, 2007 ई० तक) देश के कुल निर्यात को 80 अरब डॉलर वार्षिक के स्तर पर पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है।</li>
<li>मार्च, 2007 ई० के अन्त तक भारत की विदेशी व्यापार में हिस्सेदारी मौजूदा 0.67% से बढ़ाकर 1.0% करने का लक्ष्य रखा गया है।</li>
<li>कुछ संवेदनशील उत्पादों को छोड़कर शेष सभी उत्पादों के निर्यात पर से मात्रात्मक प्रतिबन्ध हटा लिये गये हैं।</li>
<li>कृषिगत निर्यातों को विशेष प्रोत्साहन देने की योजना बनायी गयी है।</li>
<li>देश के निर्यातों को बढ़ाने के लिए बनाये गये विशेष आर्थिक क्षेत्रों में सुविधाएँ बढ़ायी गयी हैं।</li>
<li>इलेक्ट्रॉनिक, हार्डवेयर तथा रत्नों एवं आभूषणों के निर्यातों को बढ़ाने के लिए विशेष योजना तैयार की गयी है।</li>
<li>कुटीर एवं हथकरघा उद्योग पर विशेष ध्यान केन्द्रित किया गया है।</li>
<li>निर्यात बाजार के विस्तार हेतु अफ्रीका पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया गया है, जिसके पहले चरण में सात देशों-नाइजीरिया, दक्षिणी अफ्रीका, मॉरीशस, केन्या. इथोपिया, तंजानिया एवं घाना को सम्मिलित किया गया है। इन देशों के लिए निर्यात वस्तुओं में कपास एवं धागा, कपड़ा, सिले-सिलाए वस्त्र, दवाएँ, मशीनी उपकरण तथा दूरसंचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण सम्मिलित हैं।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 8<br />
सरकार की वर्तमान आयात-नीति के प्रमुख तत्त्वों को बताइए।<br />
उत्तर:<br />
सरकार की वर्तमान आयात-नीति के प्रमुख तत्त्व इस प्रकार हैं</p>
<p>वित्तीय वर्ष 2001-02 के लिए नयी आयात नीति की घोषणा तत्कालीन केन्द्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मन्त्री मुरासोली मारन ने 31 मार्च, 2001 ई० को की। भारतीय विदेशी व्यापार के इतिहास में यह नीति ऐतिहासिक है, क्योंकि इस नीति से शेष बचे सभी 715 उत्पादों के आयात पर से परिमाणात्मक प्रतिबन्ध हटा लिये गये हैं। अब सुरक्षा की दृष्टि से अति संवेदनशील उत्पादों को छोड़कर सभी उत्पादों का आयात देश में किया जा सकेगा। विश्व-व्यापार संगठन के नियमों के प्रति प्रतिबद्धता के चलते 714 उत्पादों के आयात पर से यह प्रतिबन्ध 1 अप्रैल, 2000 ई० से ही हटा लिये गये थे; परन्तु आयातों पर नियन्त्रण रखने के लिए निम्नलिखित उपाय किये गये हैं</p>
<ol>
<li>आयात आवश्यक पूँजीगत साधनों के अभाव की पूर्ति के लिए हो।</li>
<li>विकास आवश्यकताओं की प्राथमिकता के अनुसार, कच्चा माल तथा खनिज तेल का आयात किया जाए।</li>
<li>कम आवश्यक आयातों को या तो प्रतिबन्धित किया जाए या अनुज्ञापन प्रणाली के द्वारा न्यूनतम आयात किया जाए।</li>
<li>ऊँचे सीमा शुल्क द्वारा आयातों को हतोत्साहित भी किया जाए।</li>
<li>आवश्यक वस्तुओं के आयातों को ध्यान में रखकर अनावश्यक या विलासिता की वस्तुओं के आयात पर नियन्त्रण लगाया जाए।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 9<br />
आयात-निर्यात बैंक (Import-Export Bank) पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।<br />
उत्तर:<br />
स्वतन्त्रता के पश्चात् से ही भारत के विदेशी व्यापार का सन्तुलन प्रतिकूल ही रहा है, क्योंकि भारत का आयात अधिक और निर्यात कम रहता है। आयात-निर्यात में समन्वय लाने के लिए भारत सरकार ने देश में एक निर्यात-आयात बैंक स्थापित करने का निश्चय किया। 14 सितम्बर, 1981 ई० को इस बैंक की स्थापना से सम्बन्धित एक बिल संसद के दोनों सदनों ने पास किया और जनवरी, 1982 ई० से इस बैंक ने कार्य करना आरम्भ कर दिया।</p>
<p>निर्यात-आयात बैंक के प्रबन्ध के लिए 17 व्यक्तियों का एक निदेशक मण्डल बनाया गया है, जिसमें रिजर्व बैंक का एक प्रतिनिधि भी है। 3 निदेशक अनुसूचित बैंकों के हैं। 4 निदेशक विशिष्ट विद्वान व्यक्तियों में से मनोनीत किये गये हैं। इसका एक चेयरमैन भी होता है।<br />
इस बैंक द्वारा 1998-99 में कुल ₹2,832 करोड़ ऋण की सहायता राशि मंजूर की गयी। निर्यात-आयात बैंक के मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्य हैं</p>
<ol>
<li>निर्यात के लिए ऋण उपलब्ध कराना।</li>
<li>व्यापार सम्बन्धी विश्व बाजार की सूचनाएँ देना।</li>
<li>आयात-निर्यात सम्बन्धी सलाह देना।</li>
<li>निर्यात विकास निधि का निर्माण करना।</li>
<li>विश्व को बाजार सम्बन्धी सूचनाएँ देना।</li>
<li>निर्यात बढ़ाने के लिए विभिन्न उपाय अपनाना।</li>
<li>इस सम्बन्ध में सलाह देना कि आयात में कहाँ-कहाँ और कैसे कमी की जा सकती है और कहाँ पर आयात प्रतिस्थापना सम्भव है।</li>
<li>आयातकों व निर्यातकों को विनिमय-दर के परिवर्तनों से परिचित रखना।</li>
</ol>
<p>यह आशा की जाती है कि निर्यात-आयात बैंक की स्थापना से विदेशी व्यापार के समक्ष उत्पन्न समस्याओं का समाधान होगा तथा विदेशी व्यापार की स्थिति सुधरेगी।</p>
<p>प्रश्न 10<br />
नयी आयात-निर्यात (एक्जिम) नीति की विशेषताएँ लिखिए। उत्तर नयी आयात-निर्यात नीति (एक्जिम नीति) की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं</p>
<ol>
<li>शेष बचे सभी 715 उत्पादों के आयात पर से परिमाणात्मक प्रतिबन्धों की समाप्ति। मुख्यतः कृषिगत उत्पाद व उपभोक्ता वस्तुएँ सम्मिलित।</li>
<li>300 अति संवेदनशील उत्पादों के आयात पर निगरानी हेतु वाणिज्य सचिव की अध्यक्षता में ‘वार रूम&#8217; (War Room) का गठन।</li>
<li>भारत में अपना माल बेचने के लिए विदेशी उत्पादकों द्वारा अनुचित तौर-तरीके अपनाये जाने की स्थिति में आयातों पर अंकुश हेतु काउण्टरवेलिंग ड्यूटी व एण्टी डम्पिंग ड्यूटी आदि प्रशुल्कों का ही सहारा।</li>
<li>पुराने वाहनों का आयात कतिपय शर्तों के आधीन ही सम्भव।</li>
<li>गेहूं, चावल, मक्का, पेट्रोल, डीजल व यूरिया का आयात केवल अधिकृत एजेन्सियों के द्वारा ही।</li>
<li>निर्यातों में 18 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि का लक्ष्य तथा निर्यात संवर्धन हेतु अनेक नये कदम।</li>
<li>विशेष आर्थिक परिक्षेत्रों में इकाइयों की सुविधाओं में वृद्धि।</li>
<li>कृषिगत आर्थिक परिक्षेत्रों की स्थापना की योजना।</li>
<li>निर्यातकों को उपलब्ध ‘ड्यूटी एक्जैक्शन स्कीम&#8217; व निर्यात संवर्धन पूँजीगत सामान योजना का कृषि-क्षेत्र में विस्तार।</li>
<li>विश्व में भारतीय उत्पादों के बाजार के विस्तार के लिए मार्केट एक्सेस इनीशिएटिव योजना।</li>
<li>आयातकों व निर्यातकों को विश्व बाजार की अद्यतन जानकारियाँ उपलब्ध कराने के लिए भारतीय व्यापार संवर्धन संगठन परिसर में बिजनेस कम ट्रेड फैसिलिटेशन सेण्टर&#8217; तथा ट्रेड पोर्टल&#8217; की स्थापना की योजना।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 11<br />
भारत के प्रतिकूल व्यापार शेष के आधारभूत कारण क्या हैं? <strong>[2013, 14, 16]</strong><br />
<strong>या</strong><br />
भारत के प्रतिकूल भुगतान संतुलन के कोई चार कारण लिखिए।<strong> [2015]</strong><br />
उत्तर:<br />
भारत योजनाकाल में असन्तुलित व्यापार की समस्या से ग्रसित रहा है। इस असन्तुलन के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं</p>
<ol>
<li>स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद खाद्यान्नों एवं अन्य कृषि-पदार्थों की कमी आमतौर पर बनी रही है, जिसकी पूर्ति के लिए अत्यधिक मात्रा में आयात करना पड़ा है।</li>
<li>आर्थिक नियोजन के कारण देश के औद्योगीकरण एवं कृषि के विकास की गति तेज हो गयी, फलतः मशीनों व पूँजीगत वस्तुओं को पर्याप्त मात्रा में आयात करना पड़ा।</li>
<li>अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए भारत को आधुनिकतम युद्ध-सामग्री का पर्याप्त आयात करना पड़ा।</li>
<li>भारत का विदेशी व्यापार के असन्तुलित होने का कारण तेल उत्पादक देशों द्वारा अपने तेल का मूल्य बढ़ा देना भी है।</li>
<li>विदेशी व्यापार के असन्तुलित होने के कारणों में एक कारण निर्यात व्यापार की आशा के अनुरूप वृद्धि न होना भी रहा है। पिछले कुछ वर्षों से निर्यात तेजी से बढ़े हैं और आशा है कि निकट भविष्य में व्यापार सन्तुलित हो जाएगा।</li>
<li>देश के विभाजन ने भी विदेशी व्यापार को असन्तुलित किया है। विभाजन के फलस्वरूप देश का अधिकांश उपजाऊ क्षेत्र पाकिस्तान में चला गया जिसकी पूर्ति हेतु भारत को पर्याप्त मात्रा में आयात करना पड़ा।</li>
</ol>
<p style="text-align: center;"><strong>अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
विदेशी व्यापार से होने वाले प्रमुख चार लाभ बताइए।<br />
उत्तर:<br />
विदेशी व्यापार से होने वाले लाभ निम्नलिखित हैं</p>
<ol>
<li>प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण रूप से दोहन सम्भव होता है।</li>
<li>कृषि व उद्योगों का पर्याप्त विकास होता है।</li>
<li>रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाने में और यातायात व सन्देशवाहन के साधनों के विकास में सहायक होता है।</li>
<li>विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होती है और देश का आर्थिक विकास होता है।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 2<br />
विदेशी व्यापार से होने वाली चार प्रमुख हानियों का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तर:<br />
विदेशी व्यापार से होने वाली चार हानियाँ निम्नलिखित हैं</p>
<ol>
<li>देश की आत्म-निर्भरता और राष्ट्रीय सुरक्षा में कमी आती है।</li>
<li>देश के औद्योगिक विकास में बाधा उत्पन्न होती है।</li>
<li>राजनीतिक परतन्त्रता और अन्तर्राष्ट्रीय वैमनस्य की भावना में वृद्धि होती है।</li>
<li>प्राकृतिक संसाधनों के शीघ्र समाप्ति की सम्भावना प्रबल होती है।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 3<br />
भुगतान-सन्तुलन की समस्या को दूर करने के लिए सरकार द्वारा किये गये चार उपाय बताइए।<br />
उत्तर:<br />
भारत में भुगतान-सन्तुलन की समस्या को दूर करने के लिए सरकार द्वारा किये गये चार उपाय निम्नलिखित हैं</p>
<ol>
<li>यहाँ निर्यातों को बढ़ावा दिया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों से अनेक ऐसी इकाइयाँ स्थापित की गयी हैं जो अपना शत-प्रतिशत उत्पादन निर्यात करती हैं।</li>
<li>आयातों पर यहाँ प्रतिबन्ध है, लेकिन देश में आर्थिक नियोजन के कारण आयात बढ़ रहे हैं, परन्तु आयात-निर्यात नीति घोषित कर इस पर नियन्त्रण लगाया जा रहा है।</li>
<li>देश में आयात प्रतिस्थापन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।</li>
<li>मूल रूप से भारत के निवासियों को भारत में धन भेजने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 4<br />
भारत में व्यापार को सन्तुलित करने के लिए चार उपाय सुझाइए। <strong>[2009]</strong><br />
उत्तर:<br />
व्यापार को सन्तुलित करने के लिए निम्नलिखित चार उपाय सुझाए जा सकते हैं</p>
<ol>
<li>सरकार को कृषि विकास पर विशेष जोर देना चाहिए, जिससे कि खाद्यान्न व अन्य कृषि-पदार्थों का उत्पादन बढ़े व आयातों में कमी हो।</li>
<li>प्राकृतिक तेल व गैस आयोग को तेल के कुओं की खोज के लिए और अधिक प्रयत्नशील होना चाहिए जिससे पेट्रोलियम पदार्थों के आयात में कमी हो सके।</li>
<li>निर्यात संवर्धन के प्रयासों को भी प्रभावी बनाया जाना चाहिए।</li>
<li>नये बाजारों का पता लगाना चाहिए।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 5<br />
भारत के विदेशी मुद्रा-भण्डार में वृद्धि होने के कारण बताइए।<br />
उत्तर:<br />
भारत के विदेशी मुद्रा-भण्डार में वृद्धि के निम्नलिखित कारण हैं</p>
<ol>
<li>रुपये का अवमूल्यन।</li>
<li>अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से ऋण प्राप्ति।</li>
<li>अनिवासी भारतीयों के लिए चलाई गयी योजनाओं से प्राप्त विदेशी मुद्रा।</li>
<li>भारत में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश में वृद्धि।</li>
<li>रुपये की चालू खाते में पूर्ण परिवर्तनीयता।।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 6<br />
भुगतान संतुलन और व्यापार सन्तुलन में भेद कीजिए। <strong>[2009, 10]</strong><br />
उत्तर:<br />
भुगतान सन्तुलन किसी देश की अन्तर्राष्ट्रीय लेन-देन की स्थिति का सही ज्ञान करा सकता है। क्योंकि इसमें सभी मदों से प्राप्त लेनदारियों व देनदारियों का स्पष्ट विवरण होता है।<br />
व्यापार सन्तुलन किसी देश की आर्थिक स्थिति का पूर्ण चित्र प्रस्तुत नहीं करता क्योंकि इसमें आयात-निर्यात के अतिरिक्त अन्य मदें सम्मिलित नहीं होतीं।</p>
<p>प्रश्न 7<br />
विशेष आर्थिक क्षेत्र पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।<strong> [2014]</strong><br />
उत्तर:<br />
आमतौर पर किसी को आधुनिक आर्थिक क्षेत्र का उल्लेख करने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र एक सामान्य शब्द के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह क्षेत्र किसी भी देश की राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर स्थित होता है लेकिन ये विशेष क्षेत्र के नियमों का प्रयोग करके व्यापार करते हैं। इस क्षेत्र को प्रमुख उद्देश्य व्यापार बढ़ाना, निवेश बढ़ाना, रोजगार देना और प्रभारी प्रशंसा है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
विदेशी व्यापार का अर्थ स्पष्ट कीजिए।<strong> [2011, 12, 15]</strong><br />
उत्तर:<br />
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 का आरम्भिक भाग देखें।</p>
<p>प्रश्न 2<br />
भारत के आयातों में किस देश का हिस्सा सर्वाधिक है? <strong>[2011]</strong><br />
उत्तर:<br />
एशिया व ओसीनिया का।</p>
<p>प्रश्न 3<br />
व्यापार शेष क्या है? <strong>[2012, 12]</strong><br />
उत्तर:<br />
किसी देश के निर्यात और आयात अथवा आयात और निर्यात के अन्तर को व्यापार शेष कहते हैं।</p>
<p>प्रश्न 4<br />
‘WTO&#8217; पद को विस्तृत कीजिए। <strong>[2009]</strong><br />
उत्तर:<br />
&#8216;WTO&#8217; = World Trade Organization (विश्व व्यापार संगठन)।</p>
<p>प्रश्न 5<br />
भारत में प्रतिकूल भुगतान शेष के सुधार के लिए कोई दो सुझाव दीजिए। <strong>[2009]</strong><br />
उत्तर:<br />
(1) निर्यातों को प्रोत्साहन दिया जाए।<br />
(2) आयातों पर प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक है।<br />
(3) विदेशों से ऋण प्राप्त करना।<br />
(4) मूलरूप से अनिवासियों को धन भेजने के लिए प्रेरित करना।</p>
<p>प्रश्न 6<br />
भारत में वर्ष 2008 में तेल और गैस के स्रोत की खोज करने में किस भारतीय कम्पनी ने सफलता प्राप्त की है? <strong>[2009]</strong><br />
उत्तर:<br />
रिलायन्स इण्डस्ट्रीज लिमिटेड कम्पनी ने।</p>
<p>प्रश्न 7<br />
नयी आयात-निर्यात नीति की घोषणा कब की गई?<br />
उत्तर:<br />
31 अगस्त, 2004 को नयी आयात-निर्यात नीति 2004-2009 की घोषणा की गई थी।</p>
<p>प्रश्न 8<br />
भारत में आयात की जाने वाली प्रमुख दो वस्तुएँ कौन-सी हैं?<strong> [2008, 09, 10, 11, 12]</strong><br />
उत्तर:<br />
(1) पेट्रोलियम व उसके उत्पाद,<br />
(2) रासायनिक उर्वरक।</p>
<p>प्रश्न 9<br />
भारत में निर्यात की जाने वाली चार प्रमुख वस्तुओं के नाम लिखिए। <strong>[2007, 09, 10, 11, 12, 14]</strong><br />
उत्तर:<br />
जूट, चाय, सूती वस्त्र तथा समुद्री उत्पाद।</p>
<p>प्रश्न 10<br />
भारत के विदेशी व्यापार में किस देश का अंश सर्वाधिक है? <strong>[2007, 13]</strong><br />
उत्तर:<br />
भारत के विदेशी व्यापार में संयुक्त राज्य अमेरिका का अंश सर्वाधिक है।</p>
<p>प्रश्न 11<br />
भारत के विदेशी व्यापार में अदृश्य निर्यात का क्या महत्त्व है?<br />
उत्तर:<br />
अदृश्य स्थिति की मदों में (बीमा, परिवहन, पर्यटन उपहार आदि) आते हैं। अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता की स्थिति जानने के लिए भुगतान सन्तुलन के चालू खाते का सन्तुलन अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होता है, जिसके अन्तर्गत अदृश्य निर्यात सम्मिलित रहते हैं।</p>
<p>प्रश्न 12<br />
देश के भुगतान सन्तुलन के प्रतिकूल होने के दो कारण लिखिए।<strong> [2012]</strong><br />
उत्तर:<br />
(1) भारत के विदेशी व्यापार के असन्तुलित होने का करण तेल उत्पादक देशों द्वारा अपने तेल का मूल्य बढ़ा देना है।<br />
(2) देश की सुरक्षा के लिए भारत को आधुनिकता युद्ध-सामग्री का पर्याप्त मात्रा में आयात करना है।</p>
<p>प्रश्न 13<br />
भुगतान शेष को परिभाषित कीजिए।<strong> [2007, 12]</strong><br />
उत्तर:<br />
भुगतान शेष अथवा भुगतान सन्तुलन किसी देश के आर्थिक लेन-देन का एक व्यवस्थित लेखा-जोखा है जो किसी देश के निवासियों द्वारा अन्य देश के निवासियों के साथ किया जाता है।</p>
<p>प्रश्न 14<br />
व्यापार सन्तुलन का अर्थ लिखिए। <strong>[2014]</strong><br />
उत्तर:<br />
किसी देश का व्यापार सन्तुलन’ उस देश के आयातों तथा निर्यातों के सम्बन्ध को बताता है। व्यापार सन्तुलन एक ऐसा विवरण होता है जिसमें वस्तुओं के आयात तथा निर्यातों का विस्तृत ब्यौरा दिया जाता है। व्यापार सन्तुलन में केवल दृष्ट निर्यातों तथा आयातों को ही सम्मिलित किया जाता है, अदृष्ट निर्यातों तथा आयातों का उसमें कोई हिसाब नहीं रखा जाता, किसी देश का व्यापार सन्तुलन उसके अनुकूल अथवा प्रतिकूल दोनों हो सकता है। जब दो देशों के बीच आयात-निर्यात बराबर होते हैं, तो व्यापार सन्तुलन की स्थिति होती है। यदि देश ने निर्यात अधिक किया है तथा आयात कम तो व्यापार सन्तुलन अनुकूल कहा जाएगा। इसके विपरीत, यदि आयात अधिक तथा निर्यात कम किया गया है तो प्रतिकूल व्यापार सन्तुलन की स्थिति होगी।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
निम्नलिखित में से किन दो वर्षों के दौरान भारत का विदेशी व्यापार शेष अनुकूल था? <strong>[2012]</strong><br />
(क) 1972 &#8211; 73, 1976 &#8211; 77<br />
(ख) 1972 &#8211; 73, 1973 &#8211; 74<br />
(ग) 1975 &#8211; 76, 1977 &#8211; 78<br />
(घ) 1975 &#8211; 76, 1976 &#8211; 77<br />
उत्तर:<br />
<strong>(क)</strong> 1972 &#8211; 73, 1976 &#8211; 77</p>
<p>प्रश्न 2<br />
भारत का कितने प्रतिशत विदेशी व्यापार समुद्र मार्ग से किया जाता है? <strong>[2011]</strong><br />
(क) 60%<br />
(ख) 70%<br />
(ग) 80%<br />
(घ) 90%<br />
उत्तर:<br />
<strong>(घ)</strong> 90%.</p>
<p>प्रश्न 3<br />
भारत के निर्यात का सर्वाधिक प्रतिशत भाग जाता है <strong>[2010]</strong><br />
(क) यूरोपीय संघ में<br />
(ख) अरब देशों में<br />
(ग) पूर्वी यूरोपीय देशों में<br />
(घ) विकासशील देशों में<br />
उत्तर:<br />
<strong>(क)</strong> यूरोपीय संघ में।</p>
<p>प्रश्न 4<br />
वर्तमान में भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार हैया भारत का सबसे बड़ा विदेशी व्यापार भागीदार है <strong>[2014]</strong><br />
(क) अमेरिका<br />
(ख) रूस<br />
(ग) ब्रिटेन<br />
(घ) जापान<br />
उत्तर:<br />
<strong>(क)</strong> अमेरिका।</p>
<p>प्रश्न 5<br />
भारत के भुगतान सन्तुलन नियोजन काल में रहे हैं<br />
(क) सन्तुलन में<br />
(ख) घाटे में<br />
(ग) आधिक्य में<br />
(घ) इनमें से कोई नहीं<br />
उत्तर:<br />
<strong>(ख)</strong> घाटे में।</p>
<p>प्रश्न 6<br />
विशेष आर्थिक क्षेत्रों का सम्बन्ध किससे है?<br />
(क) निर्यातों से<br />
(ख) सूखाग्रस्त क्षेत्रों से<br />
(ग) बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों से<br />
(घ) पिछड़े क्षेत्रों से<br />
उत्तर:<br />
<strong>(क)</strong> निर्यातों से।</p>
<p>प्रश्न 7<br />
निम्नलिखित में से कौन-सा समूह भारत की निर्यात वस्तुओं को प्रदर्शित करता है?<br />
(क) पेट्रोलियम, स्वर्ण एवं चाँदी<br />
(ख) खाद, तेल, उर्वरक<br />
(ग) मोती एवं बहुमूल्य पत्थर, पूँजीगत वस्तुएँ<br />
(घ) सिले-सिलाए वस्त्र, समुद्री उत्पाद<br />
उत्तर:<br />
<strong>(घ)</strong> सिले-सिलाए वस्त्र, समुद्री उत्पाद।</p>
<p>प्रश्न 8<br />
निम्नलिखित में से भारत किसका निर्यात नहीं करता है?<br />
(क) चीनी<br />
(ख) चाय<br />
(ग) उर्वरक<br />
(घ) जूट की वस्तुएँ<br />
उत्तर:<br />
<strong>(ग)</strong> उर्वरक।</p>
<p>प्रश्न 9<br />
निम्नलिखित में से भारत की प्रमुखतया आयात वस्तु है? <strong>[2016]</strong><br />
(क) पेट्रोलियम उत्पाद<br />
(ख) मशीनरी<br />
(ग) रसायन<br />
(घ) कम्प्यू टर<br />
उत्तर:<br />
<strong>(क)</strong> पेट्रोलियम उत्पाद।</p>
<p>प्रश्न 10<br />
निम्नलिखित वस्तुओं में से भारत किसका आयात नहीं करता है? <strong>[2016]</strong><br />
(क) उर्वरक<br />
(ख) पेट्रोलियम पदार्थ<br />
(ग) चाय<br />
(घ) मशीनें<br />
उत्तर:<br />
<strong>(ग)</strong> चाय।</p>
<p>We hope the UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 23 Foreign Trade of India (भारत का विदेशी व्यापार) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 23 Foreign Trade of India (भारत का विदेशी व्यापार), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.</p>
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		<title>UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 4</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Safia]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jun 2025 10:30:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 12]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 4 are part of UP Board Class 12 Economics Model Papers. Here we have given UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 4. Board UP Board Textbook NCERT Class Class 12 Subject  Economics Model Paper Paper 4 Category UP Board Model Papers UP Board Class 12 Economics Model ... <a title="UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 4" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/up-board-class-12-economics-model-papers-paper-4/" aria-label="Read more about UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 4">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 4 are part of <a href="https://www.upboardsolutions.com/up-board-class-12-economics-model-papers/">UP Board Class 12 Economics Model Papers</a>. Here we have given UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 4.</p>
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<tbody>
<tr>
<td><strong>Board</strong></td>
<td>UP Board</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Textbook</strong></td>
<td>NCERT</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Class</strong></td>
<td>Class 12</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Subject</strong></td>
<td> Economics</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Model Paper</strong></td>
<td>Paper 4</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Category</strong></td>
<td><a href="https://www.upboardsolutions.com/up-board-model-papers/">UP Board Model Papers</a></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h2>UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper</h2>
<p><strong>समय: 3 घण्टे 15 मिनट<br />
</strong><strong>पूर्णांक : 100<br />
</strong><strong>निर्देश<br />
</strong>प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्न-पत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं।<br />
<strong>नोट</strong></p>
<ul>
<li>सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।</li>
<li>प्रश्न संख्या 1 से 12 तक बहुविकल्पीय प्रश्न हैं, जिनका केवल सही उत्तर अपनी उत्तर पुस्तिका में लिखना है, प्रश्नपंख्या 13 से 16 तक अतिलघु उत्तरीय प्रश्न हैं, जिनका उत्तर प्रत्येक लगभग 25 शब्दों में लिखना है, प्रश्न संख्या 17 से 22 तक लघु उत्तरीय प्रश्न हैं, जिनका उत्तर प्रत्येक लगभग 50 शब्दों में लिखना है तथा प्रश्न संख्या 23 से 28 तक दीर्घ उत्तरीय प्रश्न हैं, जिनका उत्तर प्रत्येकलगभग 150 शब्दों में लिखना है।</li>
<li>प्रत्येक प्रश्न के निर्धारित अंक उसके सम्मुख अंकित हैं।</li>
</ul>
<p style="text-align: left;"><strong>बहुविकल्पीय प्रश्न</strong><br />
प्रश्न 1.<br />
कुल उत्पादन बढ़ने पर उत्पादन की परिवर्तनशील लागत [1]<br />
(a) घटती है।<br />
(b) बढ़ती है।<br />
(c) पहले बढ़ती है, फिर घटती है<br />
(d) अपरिवर्तित रहती है।</p>
<p style="text-align: left;">प्रश्न 2.<br />
लगान के आधुनिक सिद्धान्त के प्रतिपादक का नाम है । [1]<br />
(a) डेविड रिकार्डो<br />
(b) एडम स्मिथ<br />
(C) जे. आर. हिक्स<br />
(d) श्रीमती जॉन रॉबिन्सन</p>
<p style="text-align: left;">प्रश्न 3.<br />
लाभ का अनिश्चितता वहन करने के सिद्धान्त का प्रतिपादन किसने दिया? [1]<br />
(a) एफ. एच. नाइट<br />
(b) पी. एम. स्टीजी<br />
(c) डी. पैटिन्किन<br />
(d) आर. जी. हा</p>
<p style="text-align: left;">प्रश्न 4.<br />
व्यापार कर किसके द्वारा लगाया जाता है?[1]<br />
(a) केन्द्र सरकार<br />
(b) राज्य सरकार<br />
(C) नगरपालिका<br />
(d) दुकानदार</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
वर्तमान समय में भारत की राष्ट्रीय आय में सर्वाधिक अंश है [1]<br />
(a) कृषि क्षेत्र का<br />
(b) औद्योगिक क्षेत्र का<br />
(C) प्रसंस्करण उद्योगों का<br />
(d) सेवा क्षेत्र का</p>
<p>प्रश्न 6.<br />
औसत लागत का सूत्र है। [1]<br />
<img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-36931" src="https://www.upboardguide.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Class-12-Economics-Model-Papers-Paper-4-image-1.png" alt="UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 4 image 1" width="241" height="39" /><br />
<img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-36932" src="https://www.upboardguide.com/wp-content/uploads/2019/02/UP-Board-Class-12-Economics-Model-Papers-Paper-4-image-2.png" alt="UP Board Class 12 Economics Model Papers Paper 4 image 2" width="232" height="104" /><br />
प्रश्न 7.<br />
निम्नलिखित में व्यापारिक बैंकों का कौन-सा कार्य है? [1]<br />
(a) साख नियन्त्रण<br />
(b) नोटों का निर्गमन<br />
(c) विदेशी विनिमय नियन्त्रण<br />
(d) साख सृजन</p>
<p>प्रश्न 8.<br />
बारहवीं पंचवर्षीय योजना की समयावधि है। [1]<br />
(a) 2002-07<br />
(b) 2007-12<br />
(c) 2011-16<br />
(d) 2012-17</p>
<p>प्रश्न 9.<br />
भारत में अन्तरिक्ष आयोग की स्थापना की गई [1]<br />
(a) वर्ष 1961 में।<br />
(b) वर्ष 1972 में<br />
(c) वर्ष 1975 में<br />
(d) वर्ष 1980 में</p>
<p>प्रश्न 10.<br />
भारत का कितने प्रतिशत विदेशी व्यापार समुद्री मार्ग से किया जाता है? [1]<br />
(a) 60%<br />
(b) 70%<br />
(c) 80%<br />
(d) 90%</p>
<p>प्रश्न 11.<br />
केन्द्रीय प्रवृत्ति की एक माप है। [1]<br />
(a) समान्तर माध्य<br />
(b) माध्य विचलन<br />
(c) प्रमाप विचलन<br />
(d) सह-सम्बन्ध</p>
<p>प्रश्न 12.<br />
निम्नलिखित में कौन-सी योजना उद्योग प्रधान था? [1]<br />
(a) पहली<br />
(b) पाँचवीं<br />
(C) दूसरी<br />
(d) दसवीं</p>
<p><strong>उत्तरीय प्रश्न</strong><br />
प्रश्न 13.<br />
लोकवित्त की परिभाषा एवं महत्त्व का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। [4]</p>
<p>प्रश्न 14.<br />
सकल घरेलू उत्पाद और सकल राष्ट्रीय उत्पाद में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [4]</p>
<p>प्रश्न 15.<br />
भारत में परिवार कल्याण कार्यक्रम की सफलता के लिए कोई चार सुझाव दीजिए। [4]</p>
<p>प्रश्न 16.<br />
सूचकांकों की विशेषताएँ बताइए। [4]</p>
<p><strong>लघु उत्तरीय प्रश्न</strong><br />
प्रश्न 17.<br />
विनिमय से क्या लाभ है? वर्णन कीजिए। [5]</p>
<p>प्रश्न 18.<br />
सकल एवं शुद्ध ब्याज में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [5]</p>
<p>प्रश्न 19.<br />
पूर्ण व अपूर्ण प्रतियोगिता में अन्तर बताइए। [5]</p>
<p>प्रश्न 20.<br />
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना क्या है? [5]</p>
<p>प्रश्न 21.<br />
भारत में जनसंख्या के घनत्व को प्रभावित करने वाले चार प्रमुख कारकों का उल्लेख कीजिए। [5]</p>
<p>प्रश्न 22.<br />
भारत के विदेशी व्यापार की मुख्य प्रवृत्तियाँ बताइए। [5]</p>
<p><strong>दीर्घ उत्तरीय प्रश्न</strong><br />
प्रश्न 23.<br />
अपूर्ण प्रतियोगिता का अर्थ समझाइए। दीर्घकाल में कीमत निर्धारण . किस प्रकार होता.है? [7]<br />
<strong>अथवा</strong><br />
कुल लागत, औसत लागत तथा सीमान्त-लागत का अर्थ बताइए तथा उदाहरण देकर सीमान्त-लागत व औसत लागत के बीच सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए। [7]</p>
<p>प्रश्न 24.<br />
वितरण से आप क्या समझते हैं? वितरण की समस्याओं के प्रकारों को स्पष्ट कीजिए। [7]<br />
<strong>अथवा</strong><br />
रिकाडों के लगान सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। [7]</p>
<p>प्रश्न 25.<br />
केन्द्र सरकार के व्यय की मदों को लिखिए। [7]<br />
<strong>अथवा</strong><br />
राष्ट्रीय आय क्या है? इसके महत्त्व की विवेचना कीजिए। [7]</p>
<p>प्रश्न 26.<br />
भारत में जनसंख्या वृद्धि के कारणों को स्पष्ट कीजिए। [7]<br />
<strong>अथवा</strong><br />
नाबार्ड क्या है? नाबार्ड के कार्य बताइए। [7]</p>
<p>प्रश्न 27.<br />
सामाजिक वानिकी से क्या आशय है? इस कार्यक्रम की सफलता के लिए चार सुझाव दीजिए। [7]<br />
<strong>अथवा</strong><br />
भारत में अन्तरिक्ष शोध कार्यक्रम की प्रगति पर प्रकाश डालिए। [7]</p>
<p>28. निम्नलिखित सारणी से प्रत्यक्ष विधि द्वारा समान्तर माध्य की गणना कीजिए। [7]</p>
<table style="height: 335px;" border="2" width="110">
<tbody>
<tr>
<td width="188">
<p style="text-align: center;"><strong>वर्ग अन्तराल</strong></p>
</td>
<td width="188">
<p style="text-align: center;"><strong>आवृति</strong></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="188">
<p style="text-align: center;">0-10</p>
</td>
<td style="text-align: center;" width="188">8</td>
</tr>
<tr>
<td width="188">
<p style="text-align: center;">10-20</p>
</td>
<td style="text-align: center;" width="188">4</td>
</tr>
<tr>
<td width="188">
<p style="text-align: center;">20-30</p>
</td>
<td width="188">
<p style="text-align: center;">6</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center;" width="188">30-40</td>
<td width="188">
<p style="text-align: center;">3</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center;" width="188">40-50</td>
<td width="188">
<p style="text-align: center;">2</p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p><strong>अथवा</strong><br />
निम्नलिखित आँकड़ों के लिए माध्यिका की गणना कीजिए। [7]</p>
<table style="height: 35px;" border="2" width="396">
<tbody>
<tr>
<td width="60"><strong>प्राप्तांक</strong></td>
<td width="61">10-15</td>
<td width="61">15-20</td>
<td width="61">20-25</td>
<td width="61">25-30</td>
<td width="61">30-35</td>
<td width="58">35-40</td>
</tr>
<tr>
<td width="60"><strong>विद्यार्थियों की संख्था</strong></td>
<td width="61">40</td>
<td width="61">52</td>
<td width="61">68</td>
<td width="61">58</td>
<td width="61">32</td>
<td width="58">20</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p style="text-align: center;"><strong>Answers</strong></p>
<p>उतर 1.<br />
(b)</p>
<p>उतर 2.<br />
(d)</p>
<p>उतर 3.<br />
(a)</p>
<p>उतर 4.<br />
(b)</p>
<p>उतर 5.<br />
(d)</p>
<p>उतर 6.<br />
(a)</p>
<p>उतर 7.<br />
(d)</p>
<p>उतर 8.<br />
(d)</p>
<p>उतर 9.<br />
(b)</p>
<p>उतर 10.<br />
(d)</p>
<p>उतर 11.<br />
(a)</p>
<p>उतर 12.<br />
(d)</p>
<p>उतर 28.<br />
समान्तर माध्य (X) = 19.35<br />
<strong>अथवा</strong><br />
माध्यिका (M) = 23.16</p>
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		<item>
		<title>UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi वाणिज्य सम्बन्धी निबन्ध</title>
		<link>https://www.upboardsolutions.com/class-12-samanya-hindi-vaanijy-sambandhee-nibandh/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Safia]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jun 2025 10:14:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 12]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi वाणिज्य सम्बन्धी निबन्ध are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi वाणिज्य सम्बन्धी निबन्ध. Board UP Board Textbook NCERT Class Class 12 Subject Samanya Hindi Chapter Name वाणिज्य सम्बन्धी निबन्ध Category UP ... <a title="UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi वाणिज्य सम्बन्धी निबन्ध" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/class-12-samanya-hindi-vaanijy-sambandhee-nibandh/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi वाणिज्य सम्बन्धी निबन्ध">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi वाणिज्य सम्बन्धी निबन्ध are part of <a href="https://www.upboardsolutions.com/class-12-samanya-hindi/">UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi</a>. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi वाणिज्य सम्बन्धी निबन्ध.</p>
<table>
<tbody>
<tr>
<td><strong>Board</strong></td>
<td>UP Board</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Textbook</strong></td>
<td>NCERT</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Class</strong></td>
<td>Class 12</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Subject</strong></td>
<td>Samanya Hindi</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Chapter Name</strong></td>
<td>वाणिज्य सम्बन्धी निबन्ध</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Category</strong></td>
<td>UP Board Solutions</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h2>UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi वाणिज्य सम्बन्धी निबन्ध</h2>
<p style="text-align: center;"><strong>वाणिज्य सम्बन्धी निबन्ध</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>कुटीर एवं लघु उद्योग</strong></p>
<p><strong>प्रमुख विचार-बिन्दु-</strong></p>
<ol>
<li>प्रस्तावना,</li>
<li>कुटीर उद्योगों की स्वतन्त्रतापूर्व स्थिति,</li>
<li>कुटीर उद्योगों की आवश्यकता,</li>
<li>गाँधी जी का योगदान,</li>
<li>कुटीर उद्योगों का नया स्वरूप,</li>
<li>उपसंहार</li>
</ol>
<p><strong>प्रस्तावना–वर्तमान</strong> सभ्यता को यदि यान्त्रिक सभ्यता कहा जाए तो कोई अत्युक्ति न होगी। पश्चिमी देशों की सभ्यता यान्त्रिक बन चुकी है। हाथ से बनी वस्तु और यन्त्र से निर्मित वस्तु में किसी प्रकार की होड़ हो ही नहीं सकती; क्योंकि यन्त्र-युग अपने साथ अपरिमित शक्ति एवं साधन लेकर आया है। परन्तु विज्ञान की यह वरदान मानव-शान्ति के लिए अभिशाप भी सिद्ध हो रहा है। इसलिए युग-पुरुष महात्मा गाँधी ने यान्त्रिक सभ्यता के विरुद्ध कुटीर एवं लघु उद्योगों को बढ़ावा देने की आवाज उठायी। वे कुटीर एवं लघु उद्योगों के माध्यम से ही गाँवों के देश भारत में आर्थिक समता लाने के पक्ष में थे।</p>
<p>थोड़ी पूँजी द्वारा सीमित क्षेत्र में अपने हाथ से अपने घर में ही वस्तुओं का निर्माण करना कुटीर तथा लघु उद्योग के अन्तर्गत है। यह व्यवसाय प्रायः परम्परागत भी होता है। दरियाँ, गलीचे, रस्सियाँ बनाना, खद्दर, मोजे, शाल बुनना, लकड़ी, सोने, चाँदी, ताँबे, पीतल की दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुओं का निर्माण करना आदि अनेक प्रकार की हस्तकला के कार्य इसके अन्तर्गत आते हैं।</p>
<p><strong>कुटीर उद्योगों की स्वतन्त्रतापूर्व स्थिति-</strong>औद्योगिक दृष्टि से भारत का अतीतकाल अत्यन्त स्वर्णिम एवं सुखद था। लगभग सभी प्रकार के कुटीर एवं लघु उद्योग अपनी उन्नति की पराकाष्ठा पर थे। ‘ढाके की मलमल अपनी कलात्मकता में बहुत ऊँची उठ गयी थी। मुसलमानी बादशाहों और नवाबों के द्वारा भी इसे विशेष प्रोत्साहन मिला। देश को आर्थिक दृष्टि से कुछ इस प्रकार व्यवस्थित किया गया था कि प्राय: प्रत्येक गाँव स्वयं में अधिक-से-अधिक आर्थिक स्वावलम्बन प्राप्त कर सके। किन्तु अंग्रेजी शासन की विनाशकारी आर्थिक नीति तथा यान्त्रिक सभ्यता की दौड़ में न टिक सकने के कारण ग्रामीण जीवन की। औद्योगिक स्वावलम्बता छिन्न-भिन्न हो गयी। देश की राजनीतिक पराधीनता इसके लिए पूर्ण उत्तरदायी थी। ग्रामीण-उद्योगों के समाप्त होने से ग्राम्य जीवन का सारा सुख भी समाप्त हो गया।</p>
<p><strong>कुटीर उद्योगों की आवश्यकता–</strong>भारत की दरिद्रता का प्रधान कारण कुटीर एवं लघु उद्योगों को विनाश ही रहा है। भारत में उत्पादन का पैमाना अत्यन्त छोटा है। देश की अधिकांश जनता अब भी छोटे-छोटे व्यवसायों से अपनी जीविका चलाती है। भारत के किसानों को वर्ष में कई महीने बेकार बैठना पड़ता है। कृषि में रोजगार की प्रकृति मौसमी होती है। इस बेरोजगारी को दूर करने के लिए कुटीर-उद्योग का सहायक साधनों के रूप में विकास होना आवश्यक है। जापान, फ्रांस, जर्मनी, इटली, रूस आदि सभी देशों में गौण-उद्योग की प्रथा प्रचलित है।</p>
<p>भारत में कुटीर उद्योगों और छोटे पैमाने के कला-कौशल के विकास के महत्त्व इस रूप में भी विशेष महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि यदि हम अपने बड़े पैमाने के संगठित उद्योगों में चौगुनी-पंचगुनी वृद्धि कर दें तो भी देश में वृत्तिहीनता की विशाल समस्या सुलझायी नहीं जा सकती। ऐसा करके हम केवल मुट्ठी भर व्यक्तियों की रोटी का ही प्रबन्ध कर सकते हैं। इस जटिल समस्या के सुलझाने का एकमात्र उपाय बड़े पैमाने के साथ-साथ कुटीर एवं लघु उद्योगों का समुचित विकास ही है, जिससे कि ग्रामीण क्षेत्रों को सहायक व्यवसाय और किसानों को अपनी आय में वृद्धि करने का अवसर मिल सके।</p>
<p><strong>गाँधी जी का योगदान–</strong>गाँधी जी का विचार था कि बड़े पैमाने के उद्योगों को विशेष प्रोत्साहन न देकर विशालकाय मशीनों के उपयोग को रोका जाए तथा छोटे उद्योगों द्वारा पर्याप्त मात्रा में आवश्यक वस्तुएँ उत्पादित की जाएँ। कुटीर-उद्योग मनुष्य की स्वाभाविक रुचियों और प्राकृतिक योग्यताओं के विकास के लिए पूर्ण सुविधा प्रदान करता है। मशीन के मुंह से निकलने वाले एक मीटर टुकड़े को भी कौन अपना कह सकता है, जबकि वह भी उसी मजदूर के खून-पसीने से तैयार हुआ है। हाथ से बनी हुई प्रत्येक वस्तु पर बनाने वाले के नैतिक, सांस्कृतिक तथा आत्मिक व्यक्तित्व की छाप अंकित होती है, जबकि मशीन की स्थिति में इनका लोप हो जाता है और व्यक्ति केवल उस मशीन का एक निर्जीव पुर्जा मात्र रह जाता है।</p>
<p>कुटीर एवं लघु उद्योगों में आधुनिक औद्योगीकरण से उत्पन्न वे दोष नहीं पाये जाते, जो औद्योगिक नगरों की भीड़-भाड़, पूँजी तथा उद्योगों के केन्द्रीकरण, लोक-स्वास्थ्य की पेचीदा समस्याओं, आवास की कमी तथा नैतिक पतन के कारण उत्पन्न होते हैं।</p>
<p>कुटीर, लघु उद्योग थोड़ी पूँजी के द्वारा जीविका-निर्वाह के साधन प्रस्तुत करते हैं। पारस्परिक सहयोग से कुटीर उद्योग बड़े पैमाने में भी परिणत किया जा सकता है। कुटीर-उद्योग में छोटे-छोटे बालकों एवं स्त्रियों के परिश्रम का भी सुन्दर उपयोग किया जा सकता है। कुटीर-उद्योग की इन्हीं विशेषताओं से प्रभावित होकर बड़े- बड़े औद्योगिक राष्ट्रों में भी कुटीर एवं लघु उद्योग की प्रथा प्रचलित है। जापान में 60 प्रतिशत उद्योगशालाएँ कुटीर एवं लघु उद्योग से संचालित हैं। कहा जाता है कि जर्मनी में प्रत्येक मनुष्य को रोटी देने का प्रबन्ध करने के लिए हिटलर ने कुटीर-उद्योगों की ही शरण ली थी।</p>
<p><strong>कुटीर उद्योगों का नया स्वरूप—</strong>इस समय देश में छोटे कारखानों की संख्या मोटे तौर पर एक करोड़ से अधिक आँकी गयी है, परन्तु तेल की घानियाँ, खाँडसारी और ऐसी वस्तुओं के छोटे कारखाने, जिन्हें केवल एक आदमी चलाती है आदि को मिलाकर इनकी संख्या बहुत कम है। पंचवर्षीय योजनाओं का उद्देश्य उद्योगों को आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बनाने का रहा है। अतः मुख्य रूप से ध्यान इस पर दिया जाएगा कि उद्योगों का विकास विकेन्द्रीकरण के आधार पर हो, शिल्पिक कुशलता में सुधार किया जाए और उत्पादकता बढ़ाने के लिए सहायता देकर छोटे उद्योग वालों की आय बढ़ाने में सहायता की जाए तथा दस्तकारों को सहकारिता के आधार पर संगठित करने के प्रयास किये जाएँ। इससे छोटे उद्योगों में उत्पादन का क्षेत्र बढ़ेगा। | उपसंहार—छोटे उद्योगों की गाँवों में स्थापना से न केवल ग्रामीण दस्तकारों की स्थिति में सुधार हुआ है, बल्कि गाँवों में रोजगार की सुविधा भी बढ़ी है। अत: ग्राम विकास कार्यक्रमों में कुटीर एवं लघु उद्योगों का स्थान बहुत महत्त्वपूर्ण है। पूर्ण रूप से सफल बनाने के लिए हमारी सरकार इन्हें वैज्ञानिक पद्धति से सहकारिता के आधार पर संचालित करने की व्यवस्था कर रही है। इसकी सफलता पर ही हमारे जीवन में पूर्ण शान्ति, सुख और समृद्धि की कल्याणकारी गूंज ध्वनित हो सकेगी।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>आर्थिक उदारीकरण एवं निजीकरण की नीति</strong></p>
<p><strong>प्रमुख विचार-बिन्दु-</strong></p>
<ol>
<li>प्रस्तावना,</li>
<li>पं० नेहरू की विचारधारा,</li>
<li>भारतीय अर्थव्यवस्था,</li>
<li>उदारीकरण की अर्थ,</li>
<li>निजीकरण का अर्थ,</li>
<li>नयी औद्योगिक नीति,</li>
<li>उपसंहार</li>
</ol>
<p><strong>प्रस्तावना-आजकल</strong> &#8216;उदारीकरण&#8217; शब्द का प्रयोग अत्यधिक प्रचलित हो गया है और इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे देश की जर्जर अर्थव्यवस्था का उद्धार केवल यही पद्धति कर सकती है। इस व्यवस्था के पक्षधरों का मानना है कि स्वातन्त्र्योत्तर भारत ने आर्थिक विकास हेतु जिस नीति का अनुगमन किया वह सरकारी नियन्त्रण पर आधारित रही और निजी उद्यमिता इससे :भावित हुई। फलतः देश की आर्थिक उन्नति में अपेक्षित उन्नति नहीं हुई। यह भी तर्क दिया जा रहा है कि ‘परमिट लाइसेंस राज ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था में गतिरोध ही उत्पन्न किया है।</p>
<p><strong>पं० नेहरू की विचारधारा-</strong>-ज्ञातव्य है कि सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र किसी भी उन्नतिशील देश के विकास के मूल में होते हैं और इन्हीं से उस देश की आर्थिक प्रक्रिया नियन्त्रित होती है। पं० जवाहरलाल नेहरू का विचार था कि यदि देश का सर्वांगीण विकास करना है तो प्रमुख उद्योगों को विकसित किया जाना आवश्यक होगा। उनका विचार था कि दुनिया में अनेक आर्थिक विचारधाराओं में संघर्ष हो रहा है। मुख्यतः दो धाराएँ हैं-एक ओर तो तथाकथित पूँजीवादी विचारधारा है और दूसरी ओर तथाकथित सोवियत रूस की साम्यवादी विचारधारा। प्रत्येक पक्ष अपने दृष्टिकोण की यथार्थता का कायल है। लेकिन इससे जरूरी तौर पर यह नतीजा नहीं निकलता है कि आप इन दोनों पक्षों में से एक को स्वीकार करें। बीच के कई दूसरे तरीके भी हैं। पूँजीवादी औद्योगिक व्यवस्था ने उत्पादन की समस्या को अत्यधिक सफलता से हल किया है। लेकिन उसने कई समस्याओं को हल नहीं भी किया है। यदि वह इन समस्याओं को हल नहीं कर सकता तो कोई और रास्ता निकालना होगा। यह सिद्धान्त का नहीं कठोर तथ्य का सवाल है। भारत में यदि हम अपने देश की भोजन, वस्त्र, मकान आदि की बुनियादी समस्याएँ हल नहीं कर सकते तो हम अलग कर दिये जाएँगे और हमारी जगह कोई और आएगा। इस समस्या के हल के लिए चरमपंथी तरीका ही नहीं वरन् बीच का रास्ता भी अपनाया जा सकता है।</p>
<p><strong>भारतीय अर्थव्यवस्था-</strong>-भारत में जिस प्रकार की अर्थव्यवस्था प्रारम्भ हुई उसे मिश्रित अर्थव्यवस्था का नाम दिया गया। मिश्रित अर्थव्यवस्था से तात्पर्य है ऐसी व्यवस्था जहाँ कुछ क्षेत्र में सरकारी नियन्त्रण रहता है तथा अन्य क्षेत्र निजी व्यवस्था के अधीन रहते हैं और क्षेत्रों का वर्गीकरण पूर्णतया पूर्व सुनिश्चित रहता है।</p>
<p>हिन्दुस्तान में आजादी से पूर्व किसी सुनियोजित औद्योगिक नीति की घोषणा नहीं हुई थी। स्वातन्त्र्योत्तर प्रथम औद्योगिक नीति की घोषणा मिश्रित अर्थव्यवस्था की संकल्पना पर आधारित थी। सन् 1956 में जो औद्योगिक नीति बनी, वह प्रमुख एवं आधारभूत उद्योगों के त्वरित विकास तथा समाजवादी समाज की स्थापना जैसे लक्ष्यों पर आधारित थी। बाद में उसमें कतिपय नीतिगत परिवर्तन हुए जिससे सार्वजनिक क्षेत्र में व्याप्त अवरोधों को दूर किया जा सका।</p>
<p><strong>उदारीकरण का अर्थ-</strong>आर्थिक प्रतिबन्धों की न्यूनता को ही उदारीकरण कह सकते हैं। प्रतिबन्धों के कारण प्रतियोगिता का अभाव रहता है, फलतः उत्पादक वर्ग वस्तु की गुणवत्ता के प्रति उदासीन रहता है किन्तु यदि प्रतिबन्धों का अभाव कर दिया जाए तो इसका परिणाम दूरगामी होता है। उदारवादियों का मानना है और नियन्त्रित अर्थव्यवस्था या सरकारीकरण से उद्यमिता का विकास बाधित होता है।</p>
<p>यहाँ पर उल्लेख किया जाना आवश्यक है कि निजीकरण को सम्प्रति विश्व के अधिकांश विकसित एवं अर्द्धविकसित देशों में अपनाया गया है। चूंकि सरकारी उद्योगों में प्रतियोगिता का अभाव रहता है और इसमें उत्पादकता को बढ़ाने का कोई विशेष प्रयास नहीं होता। फलतः इन उद्योगों में कुशलता घट जाती है, किन्तु विकल्प रूप में निजीकरण ही सबसे बेहतर व्यवस्था है, यह भी नहीं कहा जा सकता।</p>
<p><strong>निजीकरण का अर्थ-</strong>निजीकरण&#8217; का अर्थ उत्पादनों के साधनों का निजी हाथों में होना है। इसमें सबसे बड़ी त्रुटि यह है कि निजीकरण का उद्देश्य अल्पकाल में अधिक से अधिक लाभ कमाना होता है। इस कारण यह दीर्घकालीन प्रतिस्पर्धात्मक बाजार नहीं बनाये रहता। प्रायः सरकारी घाटों को पूरा करने के लिए निजीकरण का तरीका अपनाया जाता है। सार्वजनिक सम्पत्ति का निजी हाथों में विक्रय उसी दशा में किया जाना चाहिए जब कि वह राष्ट्रीय ऋण को कम करने में सहायक हो। सन् 1993 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया था कि उदारीकरण की प्रक्रिया के फलस्वरूप बेरोजगारी और मुद्रा स्फीति दोनों में वृद्धि हुई है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर रुद्र दत्त ने ‘इम्पैक्ट ऑफ इकनॉमिक पॉलिसी ऑन लेबर एण्ड इण्डस्ट्रियल रिलेशन की रिपोर्ट में कहा था कि उदारीकरण ने उत्पादन की संरचना को भी विकृत किया है।</p>
<p>&#8216;नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एण्ड पॉलिसी के प्रमुख शोधकर्ता सुदीप्तो मण्डल का मानना है कि उदारीकरण के परिणामस्वरूप मिल-मालिकों की उग्रता बढ़ी है जबकि श्रमिक वर्ग के जुझारूपन में कमी आयी है।</p>
<p><strong>नयी औद्योगिक नीति–</strong>विगत वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था अत्यधिक नियन्त्रित एवं विनियमित अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित हुई है। 24 जुलाई, 1991 को भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था के एक अंग के रूप में विकसित करने के लिए नयी औद्योगिक नीति तैयार हुई जिसे उदार एवं क्रान्तिकारी नीति की संज्ञा दी गयी है। इस नीति का लक्ष्य है</p>
<ol>
<li>अर्थव्यवस्था में खुलेपन को लाना।</li>
<li>अर्थव्यवस्था को अनावश्यक नियन्त्रणों से मुक्त रखना।</li>
<li>विदेशी सहयोग एवं भागीदारी को बढ़ावा देना।</li>
<li>रोजगार के अवसर बढ़ाना।</li>
<li>सार्वजनिक क्षेत्र को प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाना।</li>
<li>आधुनिक प्रतिस्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था को विकसित करना।</li>
<li>निर्यात बढ़ाने के लिए आयातों को उदार बनाना।</li>
<li>उत्पादकता वृद्धि हेतु प्रोत्साहन देना आदि।</li>
</ol>
<p>वर्तमान औद्योगिक नीति के अन्तर्गत उद्योगों पर लगे प्रशासनिक एवं कानूनी नियन्त्रणों में शिथिलता दी गयी है। सभी मौजूदा उत्पादन इकाइयों को विस्तार परियोजनाओं को लागू करने के लिए पूर्वानुमति की आवश्यकता नहीं है। उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में विदेशी पूँजी के निवेश को 40 प्रतिशत के स्थान पर 51 प्रतिशत तक की अनुमति देने के साथ-साथ सार्वजनिक क्षेत्र के महत्त्व को बनाये रखने पर बल दिया गया है। विदेशी तकनीशियनों की सेवाएँ किराये पर लेने तथा स्वदेश में विकसित प्रौद्योगिकी की विदेशों में जॉच करने के लिए अब स्वतः अनुमति की व्यवस्था है।</p>
<p>यह तो ठीक है कि नयी औद्योगिक नीति से उत्पादन वृद्धि, निर्यात संवर्द्धन, औद्योगीकरण, तकनीकी सुधार, प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति का विकास तथा नये उद्यमियों को प्रोत्साहन प्राप्त होगा किन्तु अत्यधिक उदारीकरण एवं विदेशी पूँजी के निवेश की स्वतन्त्र छूट से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था बहुराष्ट्रीय निगमों एवं बड़े औद्योगिक घरानों के चक्र में फंस जाएगी। इस नीति के निम्नलिखित दूरगामी दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं|</p>
<ol>
<li>आर्थिक विषमता में वृद्धि।</li>
<li>आत्मनिर्भरता में ह्रास।</li>
<li>आयतित संस्कृति को बढ़ावा।</li>
<li>बहुराष्ट्रीय कम्पनियों एवं विदेशी विनियोजकों को स्वतन्त्र छूट देने से देशी उद्यमियों का प्रतिस्पर्धा में टिक पाना कठिन।</li>
<li>अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के दबाव।</li>
<li>काले धन की समानान्तर अर्थव्यवस्था।</li>
</ol>
<p>ध्यान देने योग्य बात यह है कि उदारीकरण की हवा पश्चिम से चली है। ठीक है कि निजी उद्योगों की उत्पादन संवृद्धि में विशेष भूमिका हो सकती है किन्तु हस्तक्षेप के अभाव में निजी उद्यमिता विनाशात्मक हो सकती है और किसी भी रूप में निजीकरण सार्वजनिक इकाइयों की त्रुटियों को दूर करने वाला प्रभावपूर्ण उपकरण नहीं हो सकता है। निजीकरण से निजी क्षमता का लाभ होगा और सार्वजनिक इकाइयाँ अस्वस्थ होंगी।</p>
<p><strong>उपसंहार-</strong>उदारीकरण से आशय यह नहीं है कि सरकार की भूमिका इसमें कम होती है, अपितु इसमें उसका उत्तरदायित्व और बढ़ जाता है और आर्थिक उदारीकरण का औचित्य सही मायने में तभी सिद्ध हो सकेगा, जब उससे जन-साधारण लाभान्वित हो सकेगा। उदारीकरण की नीति भारतीय अर्थव्यवस्था को गतिशील एवं प्रतिस्पर्धात्मक बनाने में सफल हो सकती है। किन्तु विदेशी पूँजी पर आश्रितता, विदेशी आर्थिक उपनिवेशवाद की स्थापना एवं बड़े औद्योगिक घरानों का वर्चस्व बढ़ेगा, जिससे गरीबी और बेरोजगारी में वृद्धि होगी। अतः इस नीति को दूरदर्शितापूर्वक लागू करना होगा अन्यथा अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनियों के भारत में आने से भारतीय कम्पनियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा, जो कि आर्थिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भारत के लिए अत्यधिक हानिकारक है।</p>
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		<title>UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कृषि सम्बन्धी निबन्ध</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Safia]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jun 2025 10:09:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 12]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कृषि सम्बन्धी निबन्ध are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कृषि सम्बन्धी निबन्ध. Board UP Board Textbook NCERT Class Class 12 Subject Samanya Hindi Chapter Name कृषि सम्बन्धी निबन्ध Category UP ... <a title="UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कृषि सम्बन्धी निबन्ध" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/class-12-samanya-hindi-krshi-sambandhee-nibandh/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कृषि सम्बन्धी निबन्ध">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कृषि सम्बन्धी निबन्ध are part of <a href="https://www.upboardsolutions.com/class-12-samanya-hindi/">UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi</a>. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कृषि सम्बन्धी निबन्ध.</p>
<table>
<tbody>
<tr>
<td><strong>Board</strong></td>
<td>UP Board</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Textbook</strong></td>
<td>NCERT</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Class</strong></td>
<td>Class 12</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Subject</strong></td>
<td>Samanya Hindi</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Chapter Name</strong></td>
<td>कृषि सम्बन्धी निबन्ध</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Category</strong></td>
<td>UP Board Solutions</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h2>UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कृषि सम्बन्धी निबन्ध</h2>
<p style="text-align: center;"><strong>कृषि सम्बन्धी निबन्ध प्रवास</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>ग्राम्य विकास की समस्याएँ और उनका समाधान</strong></p>
<p><strong>सम्बद्ध शीर्षक</strong></p>
<ul>
<li>भारतीय कृषि की समस्याएँ</li>
<li>भारतीय किसानों की समस्याएँ और उनके समाधान<strong> [2009, 12, 15]</strong></li>
<li>ग्रामीण कृषकों की समस्या <strong>[2012]</strong></li>
<li>आज का किसान : समस्याएँ और समाधान <strong>[2014]</strong></li>
<li>भारतीय किसान का जीवन <strong>[2014]</strong></li>
<li>कृषक जीवन की त्रासदी<strong> [2015]</strong></li>
<li>वर्तमान भारत में कृषकों की समस्या एवं समाधान <strong>(2016)</strong></li>
</ul>
<p><strong>प्रमुख विचार-बिन्दु–</strong></p>
<ol>
<li>प्रस्तावना,</li>
<li>भारतीय कृषि का स्वरूप,</li>
<li>भारतीय कृषि की समस्याएँ,</li>
<li>समस्या का समाधान,</li>
<li>ग्रामोत्थान हेतु सरकारी योजनाएँ,</li>
<li>आदर्श ग्राम की कल्पना,</li>
<li>उपसंहार</li>
</ol>
<p><strong>प्रस्तावना-प्राचीन</strong> काल से ही भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है। भारत की लगभग 70 प्रतिशत जनता गाँवों में निवास करती है। इस जनसंख्या का अधिकांश भाग कृषि पर ही निर्भर है। कृषि ने ही भारत को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में विशेष ख्याति प्रदान की है। भारत की सकल राष्ट्रीय आय का लगभग 30 प्रतिशत कृषि से ही आता है। भारतीय समाज को संगठन और संयुक्त परिवार-प्रणाली आज के युग में कृषि व्यवसाय के कारण ही अपना महत्त्व बनाये हुए है। आश्चर्य की बात यह है कि हमारे देश में कृषि बहुसंख्यक जनता का मुख्य और महत्त्वपूर्ण व्यवसाय होते हुए भी बहुत ही पिछड़ा हुआ और अवैज्ञानिक है। जब तक भारतीय कृषि में सुधार नहीं होता, तब तक भारतीय किसानों की स्थिति में सुधार की कोई सम्भावना नहीं और भारतीय किसानों की स्थिति में सुधार के पूर्व भारतीय गाँवों के विकास की कल्पना ही नहीं की जा सकती। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि भारतीय कृषि, कृषक और गाँव तीनों ही एक-दूसरे पर अवलम्बित हैं। इनके उत्थान और पतन, समस्याएँ और समाधान भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।</p>
<p><strong>भारतीय कृषि का स्वरूप-</strong>भारतीय कृषि और अन्य देशों की कृषि में बहुत अन्तर है। कारण अन्य देशों की कृषि वैज्ञानिक ढंग से आधुनिक साधनों द्वारा की जाती है, जब कि भारतीय कृषि अवैज्ञानिक और अविकसित है। भारतीय कृषक आधुनिक तरीकों से खेती करना नहीं चाहते और परम्परागत कृषि पर ही आधारित हैं। इसके साथ-ही भारतीय कृषि का स्वरूप इसलिए भी अव्यवस्थित है कि यहाँ पर कृषि प्रकृति । की उदारता पर निर्भर है। यदि वर्षा ठीक समय पर उचित मात्रा में हो गयी तो फसल अच्छी हो जाएगी अन्यथा बाढ़ और सूखे की स्थिति में सारी की सारी उपज नष्ट हो जाती है। इस प्रकार प्रकृति की अनिश्चितता पर निर्भर होने के कारण भारतीय कृषि सामान्य कृषकों के लिए आर्थिक दृष्टि से लाभदायक नहीं है।</p>
<p><strong>भारतीय कृषि की समस्याएँ-</strong>आज के विज्ञान के युग में भी कृषि के क्षेत्र में भारत में अनेक समस्याएँ विद्यमान हैं, जो कि भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के लिए उत्तरदायी हैं। भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं में सामाजिक, आर्थिक और प्राकृतिक कारण हैं। सामाजिक दृष्टि से भारतीय कृषक की दशा अच्छी नहीं है। अपने शरीर की चिन्ता न करते हुए सर्दी, गर्मी सभी ऋतुओं में वह अत्यन्त कठिन परिश्रम करता है तब भी उसे पर्याप्त लाभ नहीं हो पाता। भारतीय किसान अशिक्षित होता है। इसका कारण आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार का न होना है। शिक्षा के अभाव के कारण वह कृषि में नये वैज्ञानिक तरीकों का प्रयोग नहीं कर पाता तथा अच्छे खाद और बीज के बारे में भी नहीं जानता। कृषि करने के आधुनिक वैज्ञानिक यन्त्रों के विषय में भी उसका ज्ञान शून्य होता है तथा आज भी वह प्रायः पुराने ढंग के ही खाद और बीजों का प्रयोग करता है। भारतीय किसानों की आर्थिक स्थिति भी अत्यन्त शोचनीय है। वह आज भी महाजनों की मुट्ठी में जकड़ा हुआ है। प्रेमचन्द ने कहा था, “भारतीय किसान ऋण में ही जन्म लेता है, जीवन भर ऋण ही चुकाता रहता है और अन्तत: ऋणग्रस्त अवस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।&#8217; धन के अभाव में ही वह उन्नत बीज, खाद और कृषि-यन्त्रों का प्रयोग नहीं कर पाता। सिंचाई के साधनों के अभाव के कारण वह प्रकृति पर अर्थात् वर्षा पर निर्भर करता है।</p>
<p><strong>प्राकृतिक प्रकोपों—</strong>बाढ़, सूखा, ओला आदि से भारतीय किसानों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। अशिक्षित होने के कारण वह वैज्ञानिक विधियों का खेती में प्रयोग करना नहीं जानता और न ही उन पर विश्वास करना चाहता है। अन्धविश्वास, धर्मान्धता, रूढ़िवादिता आदि उसे बचपन से ही घेर लेते हैं। इस सबके अतिरिक्त एक अन्य समस्या है—भ्रष्टाचार की, जिसके चलते न तो भारतीय कृषि का स्तर सुधर पाता है और न ही भारतीय कृषक का। हमारे पास दुनिया की सबसे अधिक उपजाऊ भूमि है। गंगा-यमुना के मैदान में इतना अनाज पैदा किया जा सकता है कि पूरे देश का पेट भरा जा सकता है। इन्हीं विशेषताओं के कारण दूसरे देश आज भी हमारी ओर ललचाई नजरों से देखते हैं। लेकिन हमारी गिनती दुनिया के भ्रष्ट देशों में होती है। हमारी तमाम योजनाएँ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं। केन्द्र सरकार अथवा विश्व बैंक की कोई भी योजना हो, उसके इरादे कितने ही महान् क्यों न हों पर हमारे देश के नेता और नौकरशाह योजना के उद्देश्यों को धूल चटा देने की कला में माहिर हो चुके हैं। ऊसर भूमि सुधार, बाल पुष्टाहार, आँगनबाड़ी, निर्बल वर्ग आवास योजना से लेकर कृषि के विकास और विविधीकरण की तमाम शानदार योजनाएँ कागजों और पैम्फ्लेटों पर ही चल रही हैं। आज स्थिति यह है कि गाँवों के कई घरों में दो वक्त चूल्हा भी नहीं जलता है तथा ग्रामीण नागरिकों को पानी, बिजली, स्वास्थ्य, यातायात और शिक्षा की बुनियादी सुविधाएँ भी ठीक से उपलब्ध नहीं हैं। इन सभी समस्याओं के परिणामस्वरूप भारतीय कृषि का प्रति एकड़ उत्पादन अन्य देशों की अपेक्षा गिरे हुए स्तर का रहा है।</p>
<p><strong>समस्या का समाधान-</strong>-भारतीय कृषि की दशा को सुधारने से पूर्व हमें कृषक और उसके वातावरण की ओर दृष्टिपात करना चाहिए। भारतीय कृषक जिन ग्रामों में रहता है, उनकी दशा अत्यन्त शोचनीय है। अंग्रेजों के शासनकाल में किसानों पर ऋण का बोझ बहुत अधिक था। शनैः-शनै: किसानों की आर्थिक दशा और गिरती चली गयी एवं गाँवों का सामाजिक-आर्थिक वातावरण अत्यन्त दयनीय हो गया। अत: किसानों की स्थिति में सुधार तभी लाया जा सकता है, जब विभिन्न योजनाओं के माध्यम से इन्हें लाभान्वित किया जा सके। इनको अधिकाधिक संख्या में साक्षर बनाने हेतु एक मुहिम छेड़ी जाए। ऐसे ज्ञानवर्द्धक कार्यक्रम तैयार किये जाएँ, जिनसे हमारी किसान कृषि के आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से अवगत हो सके।</p>
<p><strong>ग्रामोत्थान हेतु सरकारी योजनाएँ—</strong>ग्रामों की दुर्दशा से भारत की सरकार भी अपरिचित नहीं है। भारत ग्रामों का ही देश है; अत: उनके सुधारार्थ पर्याप्त ध्यान दिया जाता है। पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा गाँवों में सुधार किये जा रहे हैं। शिक्षालय, वाचनालय, सहकारी बैंक, पंचायत, विकास विभाग, जलकल, विद्युत आदि की व्यवस्था के प्रति पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है। इस प्रकार सर्वांगीण उन्नति के लिए भी प्रयत्न हो रहे हैं, किन्तु इनकी सफलता ग्रामों में बसने वाले निवासियों पर भी निर्भर है। यदि वे अपना कर्तव्य समझकर विकास में सक्रिय सहयोग दें, तो ये सभी सुधार उत्कृष्ट साबित हो सकते हैं। इन प्रयासों के बावजूद ग्रामीण जीवन में अभी भी अनेक सुधार अपेक्षित हैं।</p>
<p><strong>आदर्श ग्राम की कल्पना-</strong>गाँधी जी की इच्छा थी कि भारत के ग्रामों का स्वरूप आदर्श हो तथा उनमें सभी प्रकार की सुविधाओं, खुशहाली और समृद्धि का साम्राज्य हो। गाँधी जी का आदर्श गाँव से अभिप्राय एक ऐसे गाँव से था, जहाँ पर शिक्षा का सुव्यवस्थित प्रचार हो; सफाई, स्वास्थ्य तथा मनोरंजन की सुविधाएँ हो; सभी व्यक्ति प्रेम, सहयोग और सद्भावना के साथ रहते हों; रेडियो, पुस्तकालय, पोस्ट ऑफिस आदि की सुविधाएँ हों; भेदभाव, छुआछूत आदि की भावना न हो; तथा लोग सुखी और सम्पन्न हों। परन्तु आज भी हम देखते हैं कि उनका स्वप्न मात्र स्वप्न ही रह गया है। आज भी भारतीय गाँवों की दशा अच्छी नहीं है। चारों ओर बेरोजगारी और निर्धनता का साम्राज्य है। गाँधी जी को आदर्श ग्राम तभी सम्भव है। जब कृषि जो कि ग्रामवासियों का मुख्य व्यवसाय है, की स्थिति में सुधार के प्रयत्न किये जाएँ और कृषि से सम्बन्धित सभी समस्याओं का यथासम्भव शीघ्रातिशीघ्र निराकरण किया जाए।</p>
<p><strong>उपसंहार-</strong>ग्रामों की उन्नति भारत के आर्थिक विकास में अपना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। भारत सरकार ने स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् गाँधी जी के आदर्श ग्राम की कल्पना को साकार करने का यथासम्भव प्रयास किया है। गाँवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई आदि की व्यवस्था के प्रयत्न किये हैं। कृषि के लिए अनेक सुविधाएँ; जैसे-अच्छे बीज, अच्छे खाद, अच्छे उपकरण और साख एवं सुविधाजनक ऋण-व्यवस्था आदि देने का प्रबन्ध किया गया है। इस दशा में अभी और सुधार किये जाने की आवश्यकता है। वह दिन दूर नहीं है जब हम अपनी संस्कृति के मूल्य को पहचानेंगे और एक बार फिर उसके सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करेंगे। उस समय हमारे स्वर्ग से सुन्दर देश के वैसे ही गाँव अँगूठी में जड़े नग की तरह सुशोभित होंगे और हम कह सकेंगे&#8211;</p>
<p style="text-align: center;">हमारे सपनों का संसार, जहाँ पर हँसता हो साकार,<br />
जहाँ शोभा-सुख-श्री के साज, किया करते हैं नित श्रृंगार।<br />
यहाँ यौवन मदमस्त ललाम, ये हैं वही हमारे ग्राम ॥</p>
<p style="text-align: center;"><strong>भारत में वैज्ञानिक कृषि</strong></p>
<p><strong>सम्बद्ध शीर्षक</strong></p>
<ul>
<li>भारतीय विज्ञान एवं कृषि</li>
<li>वैज्ञानिक विधि अपनाएँ : अधिक अन्न उपजाएँ।</li>
<li>भारत का किसान और विज्ञान <strong>[2011]</strong></li>
<li>भारतीय कृषि एवं विज्ञान <strong>[2014]</strong></li>
<li>व्यावसायिक कृषि का प्रसार : किसान का आधार <strong>[2014]</strong></li>
</ul>
<p><strong>प्रमुख विचार-बिन्दु-</strong></p>
<ol>
<li>प्रस्तावना,</li>
<li>प्रजनन : कृषि की विशिष्ट वैज्ञानिक विधि,</li>
<li>विज्ञान की नयी तकनीकों के प्रयोग का सुखद परिणाम,</li>
<li>उत्पादन के भण्डारण और भू-संरक्षण के लिए विज्ञान की उपादेयता,</li>
<li>उपसंहार</li>
</ol>
<p>प्रस्तावना किसान और खेती इस देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इसलिए सच ही कहा गया है। कि हमारे देश की समृद्धि का रास्ता खेतों और खलिहानों से होकर गुजरता है; क्योंकि यहाँ की दो-तिहाई जनता कृषि-कार्य में संलग्न है। इस प्रकार हमारी कृषि-व्यवस्था पर ही देश की समृद्धि निर्भर करती है और कृषि-व्यवस्था को विज्ञान ने एक सुदृढ़ आधार प्रदान किया है, जिसके कारण पिछले दशकों में आत्मनिर्भरता की स्थिति तक उत्पादन बढ़ा है। इस वृद्धि में उन्नत किस्म के बीजों, उर्वरकों, सिंचाई के साधनों, जल-संरक्षण एवं पौध-संरक्षण का उल्लेखनीय योगदान रहा है और यह सब कुछ विज्ञान की सहायता से ही सम्भव हो सका है। इस प्रकार विज्ञान और कृषि आज एक-दूसरे के पूरक हो गये हैं।</p>
<p>मनुष्यों को जीवित रहने के लिए खाद्यान्न, फल और सब्जियाँ चाहिए। ये सभी चीजें कृषि से ही प्राप्त होंगी। दूसरी ओर किसानों को अपनी कृषि की उपज बढ़ाने के लिए नयी तकनीक चाहिए, उन्नत किस्म के बीज चाहिए, उर्वरक और सिंचाई के साधनों के अलावा बिजली भी चाहिए। विज्ञान का ज्ञान ही उन्हें यह सब उपलब्ध करा सकता है।</p>
<p><strong>प्रजनन :</strong> कृषि की विशिष्ट वैज्ञानिक विधि–चन्द्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने वित्तीय वर्ष 1999-2000 में गेहूँ की चार नयी प्रजातियाँ विकसित कीं। कृषि वैज्ञानिक प्रोफेसर जियाउद्दीन अहमद के अनुसार, &#8216;अटल&#8217;, &#8216;नैना&#8217;, &#8216;गंगोत्री&#8217; एवं &#8216;प्रसाद&#8217; नाम की ये प्रजातियाँ रोटी को और अधिक स्वादिष्ट बनाने में सक्षम होंगी। पहली प्रजाति-के-9644 को प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम से जोड़कर &#8216;अटल&#8217; नाम दिया गया है, जिन्होंने &#8216;जय जवान जय किसान&#8217; के साथ &#8216;जय विज्ञान&#8217; जोड़कर एक नया नारा दिया है।</p>
<p>यह गेहूँ ऐच्छिक पौधों के प्रकार के साथ, वर्षा की विविध स्थितियों में भी श्रेयस्कर उत्पादक स्थितियाँ सँजोये रखेगा। हरी पत्ती और जल्दी पुष्पित होने वाली इस प्रजाति का गेहूँ कड़े दाने वाला। होगा। इसमें अधिक उत्पादकता के साथ अधिक प्रोटीन भी होगा। प्रजनन की विशिष्ट विधि का प्रयोग करके वैज्ञानिकों ने के-7903 नैना प्रजाति का विकास किया है, जो 75 से 100 दिन में पक जाता है। इसमें 12 प्रतिशत प्रोटीन होता है और इसकी उत्पादन-क्षमता 40 से 50 क्विटल प्रति हेक्टेयर है। इसी प्रकार विकसित के-9102 प्रजाति को गंगोत्री नाम दिया है। इसकी परिपक्वता अवधि 90 से 105 दिन के बीच घोषित की। गयी है। इसमें 13 प्रतिशत प्रोटीन होता है और 40 से 50 क्विटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन-क्षमता होती है। प्रजनन की विशिष्ट वैज्ञानिक विधि से ही ऐसा सम्भव हो पाया है।</p>
<p>विज्ञान की नयी तकनीकों के प्रयोग का सुखद परिणाम-आधारभूत वैज्ञानिक तकनीकें जो कृषि के क्षेत्र में प्रयुक्त हुई और हो रही हैं, उन्हें अब व्यापक स्वीकृति भी मिल रही है। ये वे आधार बनी हैं, जिससे कृषि की उपलब्धियाँ ‘भीख के कटोरे&#8217; से आज निर्यात के स्तर तक पहुँच गयी हैं। कृषि में वृद्धि, विशेषकर पैदावार और उत्पादन में अनेक गुना वृद्धि, मुख्य अनाज की फसलों के उत्पादन में वृद्धि से सम्भव हुई है। पहले गेहूं की हरित क्रान्ति हुई और इसके बाद धान के उत्पादन में क्रान्ति आयी। विज्ञान की नयी-नयी तकनीकों के प्रयोग से ही यह सम्भव हो सका है।</p>
<p>उत्पादन के भण्डारण और भू-संरक्षण के लिए विज्ञान की उपादेयता-पर्याप्त मात्रा में उत्पादन के बाद उसके भण्डारण की भी आवश्यकता होती है। आलू, फल आदि के भण्डारण के लिए शीतगृहों एवं प्रशीतित वाहनों के लिए वैज्ञानिक विधियों की सहायता की आवश्यकता पड़ती है। फसलों के निर्यात के लिए साफ-सुथरी सड़कों, ट्रैक्टरों और ट्रकों का निर्माण विज्ञान के ज्ञान से ही सम्भव हो सका है, जिनकी आवश्यकता कृषकों के लिए होती है। इसके अलावा चीनी मिल, आटा मिल, चावल मिल, दाल मिल और तेल मिल की आवश्यकता पड़ती है। इन मिलों की स्थापना वैज्ञानिक विधि से ही हो सकती है। ट्यूबवेल एवं कृषि पर आधारित उद्योगों के लिए बिजली की आवश्यकता को वैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर पूरा किया जा सकता है। इसी प्रकार खेत की मिट्टी की जाँच कराकर, विश्लेषण के परिणामों के आधार पर सन्तुलित उर्वरकों एवं जैविक खादों के प्रयोग के लिए भी विज्ञान के ज्ञान की ही आवश्यकता होती है।</p>
<p><strong>उपसंहार—</strong>इस प्रकार विज्ञान और कृषि का बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है। भूमण्डलीकरण के युग में आज विज्ञान की सहायता के बिना कृषि और कृषक को उन्नत नहीं बनाया जा सकता। यह भी सत्य है कि जब तक गाँव की खेती तथा किसान की दशा नहीं सुधरती, तब तक देश के विकास की बात बेमानी ही कही जाएगी। भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री चौधरी चरण सिंह के जन्मदिन 23 दिसम्बर को &#8216;किसान-दिवस&#8217; के रूप में मनाये जाने की घोषणा से कृषि और कृषक के उज्ज्वल भविष्य की अच्छी सम्भावनाएँ दिखाई देती हैं।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>भारत में कृषि क्रान्ति एवं कृषक आन्दोलन</strong></p>
<p><strong>प्रमुख विचार-बिन्दु</strong></p>
<ol>
<li>प्रस्तावना,</li>
<li>किसानों की समस्याएँ,</li>
<li>कृषक संगठन व उनकी माँग,</li>
<li>कृषक आन्दोलनों के कारण,</li>
<li>उपसंहार</li>
</ol>
<p><strong>प्रस्तावना&#8211;</strong>हमारा देश कृषि प्रधान है और सच तो यह है कि कृषि क्रिया-कलाप ही देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। ग्रामीण क्षेत्रों की तीन-चौथाई से अधिक आबादी अब भी कृषि एवं कृषि से संलग्न क्रिया-कलापों पर निर्भर है। भारत में कृषि मानसून पर आश्रित है और इस तथ्य से सभी परिचित हैं कि प्रत्येक वर्ष देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा सूखे एवं बाढ़ की चपेट में आता है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था, भारतीय जन-जीवन का प्राणतत्त्व है। अंग्रेजी शासन-काल में भारतीय कृषि का पर्याप्त ह्रास हुआ।<br />
किसानों की समस्याएँ-भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। भारत की अधिकांश जनता गाँवों में बसती है। यद्यपि किसान समाज का कर्णधार है किन्तु इनकी स्थिति अब भी बदतर है। उसकी मेहनत के अनुसार उसे पारितोषिक नहीं मिलता है। यद्यपि सकल घरेलू उत्पाद में कृषि-क्षेत्र का योगदान 30 प्रतिशत है, फिर भी भारतीय कृषक की दशा शोचनीय है।</p>
<p>देश की आजादी की लड़ाई में कृषकों की एक वृहत् भूमिका रही। चम्पारण आन्दोलन अंग्रेजों के खिलाफ एक खुला संघर्ष था। स्वातन्त्र्योत्तर जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ। किसानों को भू-स्वामित्व का अधिकार मिला। हरित कार्यक्रम भी चलाया गया और परिणामत: खाद्यान्न उत्पादकता में वृद्धि हुई; किन्तु इस हरित क्रान्ति का विशेष लाभ सम्पन्न किसानों तक ही सीमित रहा। लघु एवं सीमान्त कृषकों की स्थिति में कोई आशानुरूप सुधार नहीं हुआ।</p>
<p>आजादी के बाद भी कई राज्यों में किसानों को भू-स्वामित्व नहीं मिला जिसके विरुद्ध बंगाल, बिहार एवं आन्ध्र प्रदेश में नक्सलवादी आन्दोलन प्रारम्भ हुए।</p>
<p><strong>कृषक संगठन व उनकी माँग-</strong>किसानों को संगठित करने का सबसे बड़ा कार्य महाराष्ट्र में शरद जोशी ने किया। किसानों को उनकी पैदावार का समुचित मूल्य दिलाकर उनमें एक विश्वास पैदा किया कि वे संगठित होकर अपनी स्थिति में सुधार ला सकते हैं। उत्तर प्रदेश के किसान नेता महेन्द्र सिंह टिकैत ने किसानों की दशा में बेहतर सुधार लाने के लिए एक आन्दोलन चलाया है और सरकार को इस बात का अनुभव करा दिया कि किसानों की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। टिकैत के आन्दोलन ने किसानों के मन में कमोवेश यह भावना भर दी कि वे भी संगठित होकर अपनी आर्थिक उन्नति कर सकते हैं।</p>
<p>किसान संगठनों को सबसे पहले इस बारे में विचार करना होगा कि “आर्थिक दृष्टि से अन्य वर्गों के साथ उनका क्या सम्बन्ध है। उत्तर प्रदेश की सिंचित भूमि की हदबन्दी सीमा 18 एकड़ है। जब किसान के लिए सिंचित भूमि 18 एकड़ है, तो उत्तर प्रदेश की किसान यूनियन इस मुद्दे को उजागर करना चाहती है कि 18 एकड़ भूमि को सम्पत्ति-सीमा को आधार मानकर अन्य वर्गों की सम्पत्ति अथवा आय-सीमा निर्धारित होनी चाहिए। कृषि पर अधिकतम आय की सीमा साढ़े बारह एकड़ निश्चित हो गयी, किन्तु किसी व्यवसाय पर कोई भी प्रतिबन्ध निर्धारित नहीं हुआ। अब प्रौद्योगिक क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भी शनैः-शनैः हिन्दुस्तान में अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाती जा रही हैं। किसान आन्दोलन इस विषमता एवं विसंगति को दूर करने के लिए भी संघर्षरत है। वह चाहता है कि भारत में समाजवाद की स्थापना हो, जिसके लिए सभी प्रकार के पूँजीवाद तथा इजारेदारी का अन्त होना परमावश्यक है। यूनियन की यह भी माँग है कि वस्तु विनिमय के , अनुपात से कीमतें निर्धारित की जाएँ, न कि विनिमय का माध्यम रुपया माना जाए। यह तभी सम्भव होगा जब । उत्पादक और उपभोक्ता दोनों रूपों में किसान के शोषण को समाप्त किया जा सके। सारांश यह है कि कृषि उत्पाद की कीमतों को आधार बनाकर ही अन्य औद्योगिक उत्पादों की कीमतों को निर्धारित किया जाना चाहिए।&#8221;</p>
<p>किसान यूनियन किसानों के लिए वृद्धावस्था पेंशन की पक्षधर है। कुछ लोगों का मानना है कि किसान यूनियन किसानों का हित कम चाहती है, वह राजनीति से प्रेरित ज्यादा है। इस सन्दर्भ में किसान यूनियन का कहना है “हम आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक शोषण के विरुद्ध किसानों को संगठित करके एक नये समाज की संरचना करना चाहते हैं। आर्थिक मुद्दों के अतिरिक्त किसानों के राजनीतिक शोषण से हमारा तात्पर्य जातिवादी राजनीति को मिटाकर वर्गवादी राजनीति को विकसित करना है। आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक दृष्टि से शोषण करने वालों के समूह विभिन्न राजनीतिक दलों में विराजमान हैं और वे अनेक प्रकार के हथकण्डे अपनाकर किसानों का मुंह बन्द करना चाहते हैं। कभी जातिवादी नारे देकर, कभी किसान विरोधी आर्थिक तर्क देकर, कभी देश-हित का उपदेश देकर आदि, परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि किसानों की उन्नति से ही भारत नाम का यह देश, जिसकी जनसंख्या का कम-से-कम 70% भाग किसानों का है, उन्नति कर सकता है। कोई चाहे कि केवल एक-आध प्रतिशत राजनीतिज्ञों, अर्थशास्त्रियों, स्वयंभू समाजसेवियों तथा तथाकथित विचारकों की उन्नति हो जाने से देश की उन्नति हो जाएगी तो ऐसा सोचने वालों की सरासर भूल होगी।</p>
<p>यहाँ एक बात का उल्लेख करना और भी समीचीन होगा कि आर्थर डंकल के प्रस्तावों ने कृषक आन्दोलन में घी का काम किया है। इससे आर्थिक स्थिति कमजोर होगी और करोड़ों कृषक बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के गुलाम बन जाएँगे।</p>
<p><strong>कृषक आन्दोलनों के कारण भारत में कृषक आन्दोलन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं</strong></p>
<ol>
<li>भूमि सुधारों का क्रियान्वयन दोषपूर्ण है। भूमि का असमान वितरण इस आन्दोलन की मुख्य जड़ है।</li>
<li>भारतीय कृषि को उद्योग को दर्जा न दिये जाने के कारण किसानों के हितों की उपेक्षा निरन्तर हो रही है।</li>
<li>किसानों द्वारा उत्पादित वस्तुओं का मूल्य-निर्धारण सरकार करती है जिसका समर्थन मूल्य बाजार मूल्य से नीचे रहता है। मूल्य-निर्धारण में कृषकों की भूमिका नगण्य है।</li>
<li>दोषपूर्ण कृषि विपणन प्रणाली भी कृषक आन्दोलन के लिए कम उत्तरदायी नहीं है। भण्डारण की अपर्याप्त व्यवस्था, कृषि मूल्यों में होने वाले उतार-चढ़ावों की जानकारी न होने से भी किसानों को पर्याप्त आर्थिक घाटा सहना पड़ता है।</li>
<li>बीजों, खादों, दवाइयों के बढ़ते दाम और उस अनुपात में कृषकों को उनकी उपज को पूरा मूल्य भी न मिल पाना अर्थात् बढ़ती हुई लागत भी कृषक आन्दोलन को बढ़ावा देने के लिए उत्तरदायी है।</li>
<li>नयी कृषि तकनीक का लाभ आम कृषक को नहीं मिल पाता है।</li>
<li>बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का पुलन्दा लेकर जो डंकल प्रस्ताव भारत में आया है, उससे भी किसान बेचैन हैं और उनके भीतर एक डर समाया हुआ है।</li>
<li>कृषकों में जागृति आयी है और उनका तर्क है कि चूंकि सकल राष्ट्रीय उत्पाद में उनकी महती भूमिका है; अत: धन के वितरण में उन्हें भी आनुपातिक हिस्सा मिलना चाहिए।</li>
</ol>
<p><strong>उपसंहार–</strong>विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं का अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है कि कृषि की हमेशा उपेक्षा हुई है; अतः आवश्यक है कि कृषि के विकास पर अधिकाधिक ध्यान दिया जाए।</p>
<p>स्पष्ट है कि कृषक हितों की अब उपेक्षा नहीं की जा सकती। सरकार को चाहिए कि कृषि को उद्योग का दर्जा प्रदान करे। कृषि उत्पादों के मूल्य-निर्धारण में कृषकों की भी भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। भूमि-सुधार कार्यक्रम के दोषों का निवारण होना जरूरी है तथा सरकार को किसी भी कीमत परे डंकल प्रस्ताव को अस्वीकृत कर देना चाहिए और सरकार द्वारा किसानों की माँगों और उनके आन्दोलनों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए।</p>
<p>We hope the UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कृषि सम्बन्धी निबन्ध help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कृषि सम्बन्धी निबन्ध, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.</p>
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		<title>UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 10 संस्कृत-पदों का स्वरचित वाक्यों में प्रयोग (रचना)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Safia]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jun 2025 06:15:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 9]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 10 संस्कृत-पदों का स्वरचित वाक्यों में प्रयोग (रचना) are the part of UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 10 संस्कृत-पदों का स्वरचित वाक्यों में प्रयोग (रचना). Board UP Board Textbook NCERT Class Class 10 ... <a title="UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 10 संस्कृत-पदों का स्वरचित वाक्यों में प्रयोग (रचना)" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/class-9-sanskrit-chapter-10-rachana/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 10 संस्कृत-पदों का स्वरचित वाक्यों में प्रयोग (रचना)">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 10 संस्कृत-पदों का स्वरचित वाक्यों में प्रयोग (रचना) are the part of <a href="https://www.upboardsolutions.com/class-9-sanskrit/">UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit</a>. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 10 संस्कृत-पदों का स्वरचित वाक्यों में प्रयोग (रचना).</p>
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<tbody>
<tr>
<td><strong>Board</strong></td>
<td>UP Board</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Textbook</strong></td>
<td>NCERT</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Class</strong></td>
<td>Class 10</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Subject</strong></td>
<td>Sanskrit</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Chapter</strong></td>
<td>Chapter 10</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Chapter Name</strong></td>
<td>संस्कृत-पदों का स्वरचित वाक्यों में प्रयोग (रचना)</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Category</strong></td>
<td>UP Board Solutions</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h2>UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 10 संस्कृत-पदों का स्वरचित वाक्यों में प्रयोग (रचना)</h2>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-27090" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/01/UP-Board-Solutions-for-Class-9-Sanskrit-Chapter-10-संस्कृत-पदों-का-स्वरचित-वाक्यों-में-प्रयोग-रचना-1.png" alt="UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 10 संस्कृत-पदों का स्वरचित वाक्यों में प्रयोग (रचना)" width="305" height="648" srcset="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/01/UP-Board-Solutions-for-Class-9-Sanskrit-Chapter-10-संस्कृत-पदों-का-स्वरचित-वाक्यों-में-प्रयोग-रचना-1.png 305w, https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/01/UP-Board-Solutions-for-Class-9-Sanskrit-Chapter-10-संस्कृत-पदों-का-स्वरचित-वाक्यों-में-प्रयोग-रचना-1-141x300.png 141w" sizes="auto, (max-width: 305px) 100vw, 305px" /><br />
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		<title>UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 2 ऑपरेटिंग सिस्टम</title>
		<link>https://www.upboardsolutions.com/class-12-computer-chapter-2/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Safia]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jun 2025 05:55:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 12]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 2 ऑपरेटिंग सिस्टम are part of UP Board Solutions for Class 12 Computer. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 2 ऑपरेटिंग सिस्टम. Board UP Board Textbook NCERT Class Class 12 Subject Computer Chapter Chapter 2 Chapter Name ऑपरेटिंग सिस्टम Number of Questions ... <a title="UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 2 ऑपरेटिंग सिस्टम" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/class-12-computer-chapter-2/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 2 ऑपरेटिंग सिस्टम">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 2 ऑपरेटिंग सिस्टम are part of <a href="https://www.upboardsolutions.com/class-12-computer/">UP Board Solutions for Class 12 Computer</a>. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 2 ऑपरेटिंग सिस्टम.</p>
<table>
<tbody>
<tr>
<td><strong>Board</strong></td>
<td>UP Board</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Textbook</strong></td>
<td>NCERT</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Class</strong></td>
<td>Class 12</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Subject</strong></td>
<td>Computer</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Chapter</strong></td>
<td>Chapter 2</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Chapter Name</strong></td>
<td>ऑपरेटिंग सिस्टम</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Number of Questions Solved</strong></td>
<td>21</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Category</strong></td>
<td>UP Board Solutions</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h2>UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 2 ऑपरेटिंग सिस्टम</h2>
<p style="text-align: center;"><strong>बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
निम्न में से ऑपरेटिंग सिस्टम का कौन-सा प्रकार सर्वाधिक धीमी गति से कार्य करता है?<strong> [2014]</strong><br />
(a) मल्टीटास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम<br />
(b) बैच ऑपरेटिंग सिस्टम<br />
(c) टाइम शेयरिंग ऑपरेटिंग सिस्टम<br />
(d) नेटवर्क ऑपरेटिंग सिस्टम<br />
उत्तर:<br />
(b) बैच ऑपरेटिंग सिस्टम</p>
<p>प्रश्न 2<br />
निम्न में से कौन-सा ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं है? <strong>[2018]</strong><br />
(a) Sun<br />
(b) Linux<br />
(c) Windows<br />
(d) इनमें से कोई नहीं<br />
उत्तर:<br />
(d) इनमें से कोई नहीं</p>
<p>प्रश्न 3<br />
वी एम एस (VMS) किस ऑपरेटिंग सिस्टम का उदाहरण है?<br />
(a) मल्टी यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम<br />
(b) बैच ऑपरेटिंग सिस्टम<br />
(c) सिंगल यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम<br />
(d) रियल टाइम ऑपरेटिंग सिस्टम<br />
उत्तर:<br />
(a) मल्टी यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम</p>
<p>प्रश्न 4<br />
सिंगल टास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम है।<br />
(a) विण्डोज<br />
(b) Mac OS<br />
(c) पॉम<br />
(d) MS-Windows 3X<br />
उत्तर:<br />
(c) पॉम</p>
<p>प्रश्न 5<br />
यूनिक्स पर आधारित ऑपरेटिंग सिस्टम कौन-सा है?<br />
(a) यूनिक्स<br />
(b) लाइनक्स<br />
(c) एम एस विण्डोज<br />
(d) सोलेरिस<br />
उत्तर:<br />
(b) लाइनक्स</p>
<p>प्रश्न 6<br />
पर्सनल कम्प्यूटर के लिए आजकल सर्वाधिक लोकप्रिय ऑपरेटिंग सिस्टम कौन-सा है? <strong>[2013]</strong><br />
(a) OS/2<br />
(b) SUN<br />
(c) MS-DOS<br />
(d) MS-Windows<br />
उत्तर:<br />
(d) MS-Windows</p>
<p style="text-align: center;"><strong>अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)</strong></p>
<p>प्रश्न 1:<br />
ऑपरेटिंग सिस्टम को परिभाषित कीजिए।<strong> [2007]</strong><br />
उत्तर:<br />
ऑपरेटिंग सिस्टम (Operating System, OS) एक ऐसा सॉफ्टवेयर है, जो यूजर (कम्प्यूटर पर कार्य करने वाला व्यक्ति), एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर और कम्प्यूटर हार्डवेयर के बीच संवाद (Communication) स्थापित करता है।</p>
<p>प्रश्न 2<br />
ऑपरेटिंग सिस्टम के कोई दो कार्य लिखिए।<br />
उत्तर:<br />
आपरेटिंग सिस्टम के निम्न दो कार्य इस प्रकार हैं</p>
<ol>
<li>प्रोसेसिंग प्रबन्धन</li>
<li>फाइल प्रबन्धन</li>
</ol>
<p>प्रश्न 3<br />
मेमोरी प्रबन्धन में ऑपरेटिंग सिस्टम का क्या कार्य है?<br />
उत्तर:<br />
प्रोग्राम के सफल निष्पादन के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम मैमोरी प्रबन्धन का कार्य करता है।</p>
<p>प्रश्न 4<br />
मल्टी यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम को परिभाषित कीजिए।<strong> [2015, 09]</strong><br />
उत्तर:<br />
मल्टी यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम एक समय में एक से अधिक उपयोगकर्ता को कार्य करने की अनुमति देता है।</p>
<p>प्रश्न 5<br />
किन्हीं दो ऑपरेटिंग सिस्टम के उदाहरण दीजिए।<br />
उत्तर:<br />
(i) लाइनक्स<br />
(ii) एम एस डॉस</p>
<p>प्रश्न 6<br />
PC में प्रयोग होने वाले OS का उदाहरण दीजिए।<strong> [2015]</strong><br />
उत्तर:<br />
एम एस विण्डोज</p>
<p style="text-align: center;"><strong>लघु उत्तरीय प्रश्न I (1 अंक)</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
ऑपरेटिंग सिस्टम कम्प्यूटर के लिए क्यों आवश्यक है? इसके प्रमुख कार्य लिखिए। <strong>[2011]</strong><br />
<strong>अथवा</strong><br />
ऑपरेटिंग सिस्टम का मुख्य उद्देश्य बताइए। <strong>[2017]</strong><br />
उत्तर:<br />
ऑपरेटिंग सिस्टम, एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जो यूजर, कम्प्यूटर के हार्डवेयर तथा सॉफ्टवेयर के मध्य संवाद स्थापित करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम सॉफ्टवेयर को मैनेज करने, प्रोसेस करने, संरक्षण (Protection) आदि में मुख्य भूमिका निभाता है, इसलिए कम्प्यूटर के लिए यह अति आवश्यक है।</p>
<p>ऑपरेटिंग सिस्टम के कार्य निम्न हैं।</p>
<ol>
<li>प्रोसेसिंग प्रबन्धन</li>
<li>मेमोरी प्रबन्धन</li>
<li>फाइल प्रबन्धन</li>
<li>इनपुट-आउटपुट युक्ति प्रबन्धन</li>
<li>सुरक्षा प्रबन्धन</li>
<li>कम्यूनिकेशन</li>
</ol>
<p>प्रश्न 2<br />
ऑपरेटिंग सिस्टम की आवश्यकताएँ लिखिए।<br />
उत्तर:<br />
ऑपरेटिंग सिस्टम की आवश्यकताएँ निम्नलिखित हैं।</p>
<ol>
<li>यह उपयोगकर्ता के कार्यों व फाइलों को सुरक्षा प्रदान करता है।</li>
<li>यह प्रोग्राम के क्रियान्वयन पर नियन्त्रण रखता है।</li>
<li>इसके द्वारा यूजर्स कम्प्यूटर के विभिन्न भागों का उचित रूप से प्रयोग कर सकते हैं।</li>
<li>यह यूजर व कम्प्यूटर के मध्य सम्बन्ध स्थापित करता है।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 3<br />
प्रचालन तन्त्र (ऑपरेटिंग सिस्टम) के प्रकार की व्याख्या कीजिए।<strong> [2016]</strong><br />
उत्तर:<br />
ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रकार निम्न हैं।</p>
<ol>
<li>बैच ऑपरेटिंग सिस्टम</li>
<li>सिंगल यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम</li>
<li>मल्टी यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम</li>
<li>सिंगल टास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम</li>
<li>मल्टीटास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम</li>
<li>टाइम शेयरिंग ऑपरेटिंग सिस्टम</li>
<li>रियल टाइम ऑपरेटिंग सिस्टम</li>
<li>डिस्ट्रीब्यूटीड ऑपरेटिंग सिस्टम</li>
</ol>
<p>प्रश्न 4<br />
मल्टीप्रोग्राम ऑपरेटिंग सिस्टम का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।<strong> [2017]</strong><br />
उत्तर:<br />
मल्टीप्रोग्राम ऑपरेटिंग सिस्टम में, मुख्य मेमोरी में एक या अधिक प्रोग्राम लोड होते है, जो एक्जीक्यूशन के लिए तैयार होते हैं। एक समय में, केवल एक प्रोगाम सीपीयू को अपने निर्देशों को एक्जीक्युट करने में सक्षम होता है, जबकि अन्य सभी अपनी बारी का इन्तजार कर रहे होते हैं। मल्टीप्रोग्रामिंग का मुख्य उद्देश्य (CPU) समय के उपयोग को अधिकतम करना है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>लघु उत्तरीय प्रश्न II (3 अंक)</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
ऑपरेटिंग सिस्टम क्या है? उदाहरण सहित टाइम शेयरिंग ऑपरेटिंग सिस्टम को समझाइए। <strong>[2006]</strong><br />
उत्तर:<br />
ऑपरेटिंग सिस्टम (Operating System, OS) एक ऐसा सॉफ्टवेयर है, जो यूजर (कम्प्यूटर पर कार्य करने वाला व्यक्ति) एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर और कम्प्यूटर हार्डवेयर के बीच संवाद (Communication) स्थापित करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम, कम्प्यूटर तथा यूजर के मध्य सम्बन्ध स्थापित करने का भी कार्य करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम कम्प्यूटर के विभिन्न क्रियाकलापों (Activities); जैसे-मेमोरी, प्रोसेसर, फाइल सिस्टम तथा अन्य इनपुट-आउटपुट डिवाइसों का संचालन (0peration) करता है।<br />
टाइम शेयरिंग ऑपरेटिंग सिस्टम इस प्रकार के ऑपरेटिंग सिस्टम में एक साथ एक से अधिक उपयोगकर्ता या प्रोग्राम कम्प्यूटर के संसाधनों का प्रयोग करते हैं। इस कार्य में, कम्प्यूटर अपने संसाधनों के प्रयोग हेतु प्रत्येक उपयोगकर्ता को समय का एक भाग आवण्टित करते हैं। सीपीयू सभी यूजर्स के कार्य को उनके आवण्टित समय में क्रमानुसार सम्पन्न करता है।<br />
<strong>उदाहरण:</strong> Mac OS</p>
<p>प्रश्न 2<br />
रियल टाइम ऑपरेटिंग सिस्टम को विस्तार से समझाइए।<br />
उत्तर:<br />
रियल टाइम ऑपरेटिंग सिस्टम एक ऐसा मल्टीटास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम है, जिसमें रियल टाइम एप्लीकेशन्स का क्रियान्वयन (Execution) किया जाता। है। इसमें एक प्रोग्राम के आउटपुट को दूसरे प्रोग्राम के आउटपुट की तरह प्रयोग किया जाता है। यह दो प्रकार के होते हैं।</p>
<ul>
<li><strong>हार्ड रियल टाइम सिस्टम</strong> ये सिस्टम किसी महत्त्वपूर्ण कार्य को करने की गारण्टी देते हैं और समय पर कार्य पूरा न होने की स्थिति में प्रोग्राम का क्रियान्वयन (Execution) फेल कर दिया जाता है।</li>
<li><strong>सॉफ्ट रियल टाइम सिस्टम</strong> इसमें किसी कार्य को करने की डेडलाइन दी जाती है, परन्तु कार्य का निष्पादन डेडलाइन से पहले और बाद में भी पूरा हो। सकता है और इस स्थिति में कार्य का निष्पादन फेल नहीं होता।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 3<br />
निम्न पर टिप्पणी लिखिए।<br />
(i) यूनिक्स<br />
(ii) एम एस डॉस<br />
(iii) लाइनक्स<br />
उत्तर:<br />
<strong>(i) यूनिक्स</strong> यह एक मल्टीटास्किंग व मल्टी यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम है, जिसे AT &amp; T Bell लैब में रिची एवं थॉमसन नामक इंजीनियरों ने विकसित किया था। यह स्थिर, मल्टीयूजर, मल्टीटास्किंग सिस्टम में प्रयोग किया जाता है।<br />
<strong>(ii) लाइनक्स</strong> यह यूनिक्स पर आधारित ऑपरेटिंग सिस्टम है, जिसको सन्1991 में लीनस टोरवॉल्ड्स ने विकसित किया था। यह एक ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर है तथा सभी प्रकार के कम्प्यूटर पर चल सकता है। इसका प्रयोग मुख्यतः सर्वर के लिए होता हैं।<br />
<strong>(iii) एम एस डॉस</strong> यह एक सिंगल यूजर जुलाई, 1981 में माइक्रोसॉफ्ट द्वारा विकसित ऑपरेटिंग सिस्टम है। यह एक नॉन-ग्राफिकल, कमाण्ड लाइन बेस्ड सिस्टम है। यह यूजर फ्रेंडली नहीं है, क्योंकि इसमें कमाण्ड याद रखनी पड़ती है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
ऑपरेटिंग सिस्टम क्या है? इसके द्वारा किए जाने वाले कार्यों का वर्णन कीजिए।<strong> [2005]</strong><br />
<strong>अथवा</strong><br />
प्रचालन तन्त्र (ऑपरेटिंग सिस्टम) का अर्थ समझाइए <strong>[2008]</strong><br />
उत्तर:<br />
ऑपरेटिंग सिस्टम या प्रचालन तन्त्र एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जो मानव, एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर और कम्प्यूटर हार्डवेयर के बीच संवाद स्थापित करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम, सिस्टम सॉफ्टवेयर का एक महत्त्वपूर्ण प्रकार है। इसके बिना कम्प्यूटर से कार्य नहीं किया जा सकता। यह सीपीयू से मिलने वाले सिग्नल्स को कम्प्यूटर के विभिन्न भागों तक पहुँचाता है तथा उन्हें नियन्त्रित करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम कम्प्यूटर तथा यूजर के मध्य सम्बन्ध स्थापित करने का भी कार्य करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम को कण्ट्रोल प्रोग्राम भी कहा जाता है, क्योंकि ये कम्प्यूटर सिस्टम तथा उसकी गतिविधियों को नियन्त्रित करता है।</p>
<p><strong>ऑपरेटिंग सिस्टम द्वारा किए जाने वाले कार्य</strong><br />
यह कम्प्यूटर के सफल संचालन की प्रक्रिया में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसके द्वारा किए जाने वाले कार्य निम्न प्रकार हैं।</p>
<p><strong>(i) प्रोसेसिंग प्रबन्धन</strong> कम्प्यूटर के सीपीयू के प्रबन्धन का कार्य ऑपरेटिंग सिस्टम ही करता है।<br />
<strong>(ii) मेमोरी प्रबन्धन</strong> प्रोग्राम के सफल निष्पादन के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम मेमोरी प्रबन्धन का अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण कार्य करता है, जिसके अन्तर्गत मेमोरी में कुछ स्थान सुरक्षित रखे जाते हैं, जिनका विभाजन प्रोग्रामों के मध्य किया जाता है तथा साथ ही यह भी ध्यान में रखा जाता है कि प्रोग्रामों को मेमोरी के अलग-अलग स्थान प्राप्त हो सकें।<br />
<strong>(iii) इनपुट-आउटपुट युक्ति प्रबन्धन</strong> डाटा को इनपुट युक्ति से पढ़कर मेमोरी में उचित स्थान पर संग्रहीत करने एवं प्राप्त परिणाम को मेमोरी में आउटपुट यूनिट तक पहुँचाने का कार्य ऑपरेटिंग सिस्टम का ही होता है। प्रोग्राम लिखते समय कम्प्यूटर केवल यह बताता है कि हमें क्या इनपुट करना है और क्या आउटपुट लेना है, बाकि का कार्य ऑपरेटिंग सिस्टम ही करता है।<br />
<strong>(iv) फाइल प्रबन्धन</strong> ऑपरेटिंग सिस्टम फाइलों को एक सुव्यवस्थित ढंग से किसी डायरेक्टरी में स्टोर करने की सुविधा प्रदान करता है। किसी प्रोग्राम के निष्पादन के समय इसे सेकेण्डरी मेमोरी से पढ़कर प्राइमरी मेमोरी में भेजने का कार्य भी ऑपरेटिंग सिस्टम ही करता है।<br />
<strong>(v) सुरक्षा प्रबन्धन</strong> जब मल्टी यूजर तथा मल्टीप्रोग्रामिंग सिस्टम प्रयोग में होते हैं, उस समय सैकड़ों की संख्या में प्रोग्राम क्रिया में होते हैं, ऐसे में उन प्रोग्रामों और उनके डाटा की सुरक्षा व्यवस्था एक जटिल कार्य है। ऑपरेटिंग सिस्टम इस बात को सुनिश्चित करता है कि एक गलत तरीके से रन हुआ प्रोग्राम किसी अन्य प्रोग्राम को प्रभावित न करे।<br />
<strong>(vi) कम्युनिकेशन</strong> ऑपरेटिंग सिस्टम का महत्त्वपूर्ण कार्य नेटवर्किंग के माध्यम से एक यूजर सिस्टम का दूसरे यूजर सिस्टम से कम्यूनिकेशन की सुविधा प्रदान करना है।</p>
<p>प्रश्न 2<br />
कुछ सर्वाधिक प्रचलित पर्सनल कम्प्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम की संक्षिप्त जानकारी दीजिए। <strong>[2012]</strong><br />
उत्तर:<br />
सर्वाधिक प्रचलित पर्सनल कम्प्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम इस प्रकार है।</p>
<ol>
<li>यूनिक्स यह एक मल्टीटास्किंग व मल्टी यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम है, जिसे AT &amp; T Bell लैब में वर्ष 1969 में रिची एवं थॉमसन नामक इंजीनियरों द्वारा विकसित किया गया था। इस ऑपरेटिंग सिस्टम को सर्वर तथा वर्क स्टेशन दोनों में प्रयोग किया जा सकता है। इसमें डाटा प्रबन्धन का कार्य कर्नेल द्वारा होता है।</li>
<li>लाइनक्स यह यूनिक्स का अधिक विकसित संस्करण (Edition) है। यह ऑपरेटिंग सिस्टम सन् 1991 में लीनस टोरवॉल्ड्स द्वारा विकसित किया गया था। लाइनक्स मूल रूप से इण्टेल X86 पर आधारित है।</li>
<li>सोलेरिस इस ऑपरेटिंग सिस्टम का विकास सन माइक्रोसिस्टम्स द्वारा सन् 1992 में किया गया था। ये ऑपरेटिंग सिस्टम, सिस्टम मैनेजमेण्ट तथा नेटवर्क के कार्यों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है।</li>
<li>एम एस डॉस यह एक सिंगल यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम है, जिसे माइक्रोसॉफ्ट द्वारा सन् 1981 में विकसित किया गया था। यह एक नॉन-ग्राफिकल, कमाण्ड लाइन बेस्ड ऑपरेटिंग सिस्टम है। एम एस डॉस यूजर फ्रेंडली नहीं है, क्योंकि इसमें कमाण्ड याद रखनी पड़ती है।</li>
<li>एम एस विण्डोज यह माइक्रोसॉफ्ट द्वारा विकसित ग्राफिकल यूजर इण्टरफेस है। यह सर्वाधिक लोकप्रिय पर्सनल कम्प्यूटर में प्रयुक्त ऑपरेटिंग सिस्टम है।</li>
<li>OS/2 इस ऑपरेटिंग सिस्टम को IBM ने सन् 1987 में लॉन्च किया था। यह ऑपरेटिंग सिस्टम मल्टीटास्किंग तथा GUI बेस्ड होता है।</li>
</ol>
<p>We hope the UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 2 ऑपरेटिंग सिस्टम help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 2 ऑपरेटिंग सिस्टम, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.</p>
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		<title>UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 1 कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर</title>
		<link>https://www.upboardsolutions.com/class-12-computer-chapter-1/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Safia]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jun 2025 05:13:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 12]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 1 कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर are part of UP Board Solutions for Class 12 Computer. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 1 कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर. Board UP Board Textbook NCERT Class Class 12 Subject Computer Chapter Chapter 1 Chapter Name कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर Number of Questions ... <a title="UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 1 कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/class-12-computer-chapter-1/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 1 कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 1 कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर are part of <a href="https://www.upboardsolutions.com/class-12-computer/">UP Board Solutions for Class 12 Computer</a>. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 1 कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर.</p>
<table>
<tbody>
<tr>
<td><strong>Board</strong></td>
<td>UP Board</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Textbook</strong></td>
<td>NCERT</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Class</strong></td>
<td>Class 12</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Subject</strong></td>
<td>Computer</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Chapter</strong></td>
<td>Chapter 1</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Chapter Name</strong></td>
<td>कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Number of Questions Solved</strong></td>
<td>22</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Category</strong></td>
<td>UP Board Solutions</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h2>UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 1 कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर</h2>
<p style="text-align: center;"><strong>बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)</strong></p>
<p>प्रश्न 1:<br />
निम्न में से कौन-सा सिस्टम सॉफ्टवेयर नहीं है?<strong> [2014]</strong><br />
(a) वर्ड प्रोसेसर<br />
(b) ऑपरेटिंग सिस्टम<br />
(c) कम्पाइलर<br />
(d) लिंकर<br />
उत्तर:<br />
(a) वर्ड प्रोसेसर एक एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर है।</p>
<p>प्रश्न 2<br />
निम्न में से कौन-सा प्रोग्राम एक प्रोग्राम के अनेक भागों को कम्पाइलेशन के बाद आपस में जोड़ता है?<strong> [2013]</strong><br />
(a) लिंकर<br />
(b) लोडर<br />
(C) इण्टरप्रेटर<br />
(d) लाइब्रेरियन<br />
उत्तर:<br />
(a) लिंकर</p>
<p>प्रश्न 3<br />
वर्ड प्रोसेसर क्या है?<strong> [2016]</strong><br />
(a) सिस्टम सॉफ्टवेयर<br />
(b) एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर<br />
(c) &#8216;a&#8217; और &#8216;b&#8217; दोनों<br />
(d) इनमें से कोई नहीं<br />
उत्तर:<br />
(b) एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर</p>
<p>प्रश्न 4<br />
टेक्स्ट एडिटर का उदाहरण है।<br />
(a) नोटपैड<br />
(b) प्रिण्टर ड्राइवर<br />
(c) टैली<br />
(d) पेजमेकर<br />
उत्तर:<br />
(a) विण्डोज ऑपरेटिंग सिस्टम में नोटपैड टेक्स्ट एडिटर का उदाहरण है।</p>
<p>प्रश्न 5<br />
कम्प्यूटर के वायरस को डिलीट करने के लिए किसका प्रयोग किया जाता है?<br />
(a) एण्टीवायरस प्रोग्राम<br />
(b) बैकअप यूटिलिटी<br />
(c) डिस्क डिफ़ेग्मेण्टर<br />
(d) डिस्क कम्प्रेशन<br />
उत्तर:<br />
(a) एण्टीवायरस प्रोग्राम</p>
<p style="text-align: center;"><strong>अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंकः)</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
एक से अधिक लाइनों, विवरण, कमेण्टों या निर्देशों के समूह को क्या कहते हैं?<br />
उत्तर:<br />
एक से अधिक लाइनों, विवरण, कमेण्टों या निर्देशों के समूह को प्रोग्राम कहते हैं।</p>
<p>प्रश्न 2<br />
<strong>सॉफ्टवेयर की व्याख्या एक वाक्य में कीजिए।</strong> [2016]<br />
उत्तर:<br />
कम्प्यूटर के क्षेत्र में निर्देशों के समूह को प्रोगाम कहा जाता है और प्रोग्रामों के समूह को सॉफ्टवेयर कहा जाता है।</p>
<p>प्रश्न 3<br />
लोडर से क्या तात्पर्य है?<br />
उत्तर:<br />
यह ऑपरेटिंग सिस्टम को एक भाग होता है, जो प्रोग्राम तथा लाइब्रेरी को, लोड करने के लिए उत्तरदायी होता है।</p>
<p>प्रश्न 4<br />
एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर को परिभाषित कीजिए।<strong> [2017, 11]</strong><br />
उत्तर:<br />
एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर उन प्रोग्रामों को कहा जाता है, जो उपयोगकर्ता के वास्तविक कार्य कराने के लिए लिखे जाते हैं।</p>
<p>प्रश्न 5<br />
एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर के प्रकारों के नाम लिखिए।<br />
उत्तर:<br />
प्लीकेशन सॉफ्टवेयर दो प्रकार के होते हैं।</p>
<ul>
<li>सामान्य उद्देश्य के एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर</li>
<li>विशिष्ट उद्देश्य के एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर</li>
</ul>
<p>प्रश्न 6<br />
यूटिलिटी सॉफ्टवेयर के कोई दो उदाहरण दीजिए।<br />
उत्तर:<br />
यूटिलिटी सॉफ्टवेयर के दो उदाहरण निम्नलिखित हैं।</p>
<ul>
<li>टेक्स्ट एडिटर</li>
<li>फाइल सॉर्टिग प्रोग्राम</li>
</ul>
<p style="text-align: center;"><strong>लघु उत्तरीय प्रश्न I (1 अंक)</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
सॉफ्टवेयर व हार्डवेयर में अन्तर बताइए।<strong> [2012]</strong><br />
उत्तर:<br />
सॉफ्टवेयर व हार्डवेयर में निम्न अन्तर है<br />
<img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-46055" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Computer-Chapter-1-कम्प्यूटर-सॉफ्टवेयर-img-1.png" alt="UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 1 कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर img-1" width="388" height="134" srcset="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Computer-Chapter-1-कम्प्यूटर-सॉफ्टवेयर-img-1.png 388w, https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Computer-Chapter-1-कम्प्यूटर-सॉफ्टवेयर-img-1-300x104.png 300w" sizes="auto, (max-width: 388px) 100vw, 388px" /></p>
<p>प्रश्न 2<br />
सिस्टम सॉफ्टवेयर व एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर में अन्तर बताइए।<strong> [2006, 05]</strong><br />
उत्तर:<br />
सिस्टम सॉफ्टवेयर व एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर में निम्न अन्तर है।<br />
<img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-46056" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Computer-Chapter-1-कम्प्यूटर-सॉफ्टवेयर-img-2.png" alt="UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 1 कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर img-2" width="378" height="132" srcset="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Computer-Chapter-1-कम्प्यूटर-सॉफ्टवेयर-img-2.png 378w, https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Computer-Chapter-1-कम्प्यूटर-सॉफ्टवेयर-img-2-300x105.png 300w" sizes="auto, (max-width: 378px) 100vw, 378px" /></p>
<p>प्रश्न 3<br />
कम्प्यूटर ग्राफिक्स सॉफ्टवेयर का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।<strong> [2017]</strong><br />
उत्तर:<br />
कम्प्यूटर ग्राफिक्स सॉफ्टवेयर एक एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर है, जो कम्प्यूटर पर सेव इमेजिस में बदलाव करने और उन्हें सुन्दर बनाने की अनुमति देते हैं। इन सॉफ्टवेयर्स के द्वारा इमेजिस को रीटच, कलर एडजस्ट, एनहेन्स, शैडो व ग्लो जैसे विशेष इफेक्ट्स दिए जा सकते हैं; जैसे-एडोब फोटोशॉप, पेजमेकर आदि।</p>
<p>प्रश्न 4<br />
सामान्य व विशिष्ट उद्देश्य के सॉफ्टवेयरों का विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग लिखिए।<br />
उत्तर:<br />
सामान्य उद्देश्य के सॉफ्टवेयर का विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग निम्नवत् है</p>
<ol>
<li>कम्प्यूटर आधारित डिजाइन।</li>
<li>सूचना संचार।</li>
<li>डाटाबेस प्रबन्धन प्रणाली</li>
</ol>
<p>विशिष्ट उद्देश्य के सॉफ्टवेयर की विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग निम्नवत् है।</p>
<ol>
<li>रेलवे, वायुयान आदि के आरक्षण हेतु</li>
<li>होटल प्रबन्धन में</li>
<li>अस्पतालों में</li>
<li>स्कूलों व लाइब्रेरी में</li>
</ol>
<p>प्रश्न 5<br />
निम्नलिखित को परिभाषित कीजिए<strong> [2009]</strong><br />
(i) यूटिलिटी सॉफ्टवेयर<br />
(ii) ड्राइवर<br />
उत्तर:<br />
(i) यूटिलिटी सॉफ्टवेयर यह कम्प्युटर के रख-रखाव से सम्बन्धित कार्य करता है। यह कई ऐसे कार्य करता है, जो कम्प्यूटर का उपयोग करते समय हमें कराने पड़ते हैं।<br />
(ii) डाइवर यह एक विशेष प्रकार का सॉफ्टवेयर होता है, जो किसी डिवाइस के प्रचालन (Operation) को समझाता है। यह हार्डवेयर डिवाइस और उपयोगकर्ता के मध्य सॉफ्टवेयर इण्टरफेस प्रदान करता है।</p>
<p>प्रश्न 6<br />
<strong>निम्न को परिभाषित कीजिए</strong> [2010]<br />
(i) डिस्क डिफ़ेग्मेण्टर<br />
(ii) वायरस स्कैनर<br />
उत्तर:<br />
(i) डिस्क डिफ़ेग्मेण्टर यह कम्प्यूटर की हार्ड डिस्क पर विभिन्न जगहों पर रखी हुई फाइलों को खोजकर उन्हें एक स्थान पर लाता है।<br />
(ii) वायरस स्कैनर यह एक यूटिलिटी प्रोग्राम है, जिसका प्रयोग कम्प्यूटर के वायरस ढूंढने में किया जाता है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>लघु उत्तरीय प्रश्न II (3 अंक)</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
निम्नलिखित पर टिप्पणी कीजिए।<strong> [2013]</strong><br />
(i) लोडर<br />
(ii) सब-प्रोग्राम अथवा मॉड्यूल<br />
उत्तर:<br />
(i) लोडर यह ऑपरेटिंग सिस्टम का एक भाग होता है, जो किसी एक्जीक्यूटेबल फाइल को मुख्य मेमोरी में लोड करने का कार्य करता है। यह लिंकर द्वारा कम्पाइल किए गए प्रोग्राम को एक साथ जोड़कर कार्य करने योग्य बनाता है।<br />
(ii) सब-प्रोग्राम या मॉड्यूल सब-प्रोग्राम या मॉड्यूल ऐसा प्रोग्राम है, जो किसी निर्धारित टास्क या फंक्शन को चलाने के लिए एक अन्य प्रोग्राम द्वारा कॉल किया जाता है।</p>
<p>प्रश्न 2<br />
कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर कितने प्रकार के होते हैं? उदाहरण सहित समझाइए। <strong>[2002]</strong><br />
उत्तर:<br />
कम्प्यूटर के क्षेत्र में निर्देशों के समूह को प्रोग्राम कहा जाता है और प्रोग्रामों के समूह को सॉफ्टवेयर कहा जाता है।<br />
कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर तीन प्रकार के होते हैं।</p>
<ol>
<li><strong>सिस्टम सॉफ्टवेयर</strong> इस प्रकार के सॉफ्टवेयर्स कम्प्युटर को चलाने, उसको नियन्त्रित करने, उसके विभिन्न भागों की देखभाल करने तथा उसकी सभी । क्षमताओं का सही प्रकार से उपयोग करने के लिए बनाए जाते हैं।<br />
उदाहरण ऑपरेटिंग सिस्टम, लिंकर, लोडर आदि।</li>
<li><strong>एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर</strong> इस प्रकार के सॉफ्टवेयर्स उपयोगकर्ता के वास्तविक कार्य कराने के लिए बनाए जाते हैं। ये कार्य हर कम्पनी या उपयोगकर्ता के लिए अलग-अलग होते हैं, इसलिए उपयोगकर्ता की आवश्यकतानुसार इसके प्रोग्राम प्रोग्रामर द्वारा लिखे जाते हैं। उदाहरण एमएस-वर्ड, एमएस-एक्सेल, टैली आदि।</li>
<li><strong>यूटिलिटी सॉफ्टवेयर</strong> ये सॉफ्टवेयर्स कम्प्यूटर के कार्यों को सरल बनाने, उसे अशुद्धियों से दूर रखने तथा सिस्टम के विभिन्न सुरक्षा कार्यों के लिए बनाए जाते हैं। ये कम्प्यूटर के निर्माता द्वारा ही उपलब्ध कराए जाते हैं। उदाहरण टेक्स्ट एडिटर, डिस्क क्लीनर्स आदि।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 3<br />
एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर को विस्तार में समझाइए।<br />
उत्तर:<br />
यह उन प्रोग्रामों का समूह होता है, जो उपयोगकर्ता के वास्तविक कार्य कराने के लिए बनाए जाते हैं; जैसे-स्टॉक की स्थिति का विवरण देना, लेन-देन व खातों का हिसाब रखना आदि। मुख्य रूप से प्रयोग होने वाले एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर: जैसे-एमएस वर्ड, एमएस-एक्सेल, टैली, पेजमेकर, फोटोशॉप आदि हैं।<br />
सामान्यतः एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर्स दो प्रकार के होते हैं, जो निम्न हैं ।</p>
<ul>
<li>सामान्य उद्देश्य के एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर प्रोग्रामों का वह समूह, जिसे यूजर्स अपनी आवश्यकतानुसार अपने सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उपयोग करता है, सामान्य उद्देश्य का सॉफ्टवेयर कहलाता हैं। जैसे-ग्राफिक्स सॉफ्टवेयर, स्प्रेडशीट, डाटाबेस प्रबन्धन आदि।</li>
<li>विशिष्ट उद्देश्य के एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर प्रोग्रामों का वह समूह, जो एक विशेष प्रकार के कार्य को निष्पादित करने के लिए प्रयोग किया जाता है, विशिष्ट उद्देश्य का सॉफ्टवेयर कहलाता है; जैसे-होटल प्रबन्धन सम्बन्धी सॉफ्टवेयर का प्रयोग बुकिंग विवरण, बिलिंग विवरण आदि को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है।</li>
</ul>
<p style="text-align: center;"><strong>दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
सिस्टम सॉफ्टवेयर से आपका क्या तात्पर्य है? इनके प्रमुख कार्यों को लिखिए।<strong> [2009]</strong><br />
<strong>अथवा</strong><br />
सिस्टम सॉफ्टवेयर पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। <strong>[2010]</strong><br />
उत्तर:<br />
ऐसे प्रोग्राम जो कम्प्यूटर को चलाने, नियन्त्रित करने, उसके विभिन्न भागों की देखभाल करने तथा उसकी सभी क्षमताओं का सही प्रकार से उपयोग करने के लिए बनाए जाते हैं, उनको सम्मिलित रूप से &#8216;सिस्टम सॉफ्टवेयर&#8217; कहा जाता है। कम्प्यूटर से हमारा सम्पर्क या संवाद सिस्टम सॉफ्टवेयर के माध्यम से ही हो पाता है।</p>
<p>सिस्टम सॉफ्टवेयर्स निम्न प्रकार के होते हैं।</p>
<ul>
<li><strong>ऑपरेटिंग सिस्टम</strong> इसमें वे प्रोग्राम्स शामिल होते हैं, जो कम्प्यूटर के विभिन्न अवयवों के कार्यों को नियन्त्रित करते हैं, उनमें समन्वय स्थापित करते हैं। तथा उन्हें प्रबन्धित करते हैं। इनका प्रमुख कार्य उपयोगकर्ता तथा हार्डवेयर के मध्य एक समन्वय स्थापित करना है।</li>
<li><strong>लिंकर</strong> यह एक ऐसा प्रोग्राम होता है, जो पहले से कम्पाइल की गई एक या एक से अधिक ऑब्जेक्ट फाइलों को एक साथ जोड़कर उन्हें क्रियान्वयन के लिए तैयार कर बड़े प्रोग्राम का रूप प्रदान करता है।</li>
<li><strong>लोडर</strong> यह ऑपरेटिंग सिस्टम का एक भाग होता है, जो प्रोग्राम तथा लाइब्रेरी को लोड करने के लिए उत्तरदायी होता है। लोडर निर्देशों की एक श्रृंखला होती है, जो किसी एक्जीक्यूटेबल प्रोग्राम को मुख्य मेमोरी में लोड करने का कार्य करता है, ताकि सीपीयू उसे एक्सेस कर सके।</li>
<li><strong>डिवाइस ड्राइवर</strong> यह एक विशेष प्रकार का सॉफ्टवेयर होता है, जो किसी डिवाइस के प्रचालन को समझाता है। एक ड्राइवर हार्डवेयर डिवाइस और उपयोगकर्ता के मध्य सॉफ्टवेयर इण्टरफेस प्रदान करता है। किसी भी डिवाइस को सुचारु रूप से चलाने के लिए उसके साथ एक ड्राइवर प्रोग्राम जुडा होता हैं।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 2<br />
यूटिलिटी सॉफ्टवेयर क्या होता है? उदाहरण सहित समझाइए।<br />
<strong>अथवा</strong><br />
यूटिलिटी सॉफ्टवेयर का अर्थ तथा कार्य समझाइए। ऐसे किन्हीं दो सॉफ्टवेयर्स का वर्णन भी कीजिए।<strong>[2009]</strong><br />
उत्तर:<br />
ये प्रोग्राम्स कम्प्यूटर के रख-रखाव से सम्बन्धित कार्य करते हैं। प्रोग्राम्स कम्प्यूटर के कार्यों को सरल बनाने, उसे अशुद्धियों से दूर करने तथा सिस्टम के विभिन्न सुरक्षा कार्यों के लिए बनाए जाते हैं। यूटिलिटी सॉफ्टवेयर, कई<br />
ऐसे कार्य करता है, जो कम्प्यूटर का उपयोग करते समय हमें कराने पड़ते हैं।<br />
यूटिलिटी सॉफ्टवेयर के प्रमुख उदाहरण निम्न है।</p>
<ol>
<li>टेक्स्ट एडिटर यह एक ऐसा प्रोग्राम होता है, जो टेक्स्ट फाइलों के निर्माण और उनके सम्पादन की सुविधा देता है। इसका उपयोग केवल टेक्स्ट टाइप करने में किया जाता है। विण्डोज ऑपरेटिंग सिस्टम में नोटपैड एक ऐसा ही प्रोग्राम है।</li>
<li>फाइल सॉटिंग प्रोग्राम ये ऐसे प्रोग्राम होते हैं, जो किसी डाटा फाइल के रिकॉर्डो को यूजर के किसी इच्छित क्रम (Order) में लगा सकते हैं। फाइल सॉर्टिग किसी विशेष सूचना को ढूंढने के लिए उपयोगी होती है।</li>
<li>डिस्क डिफ़ेग्मेण्टर यह कम्प्यूटर की हार्ड डिस्क पर विभिन्न जगहों पर रखी हुई फाइलों को खोजकर उन्हें एक स्थान पर लाता है।</li>
<li>बैकअप यूटिलिटी यह कम्प्यूटर की डिस्क पर उपस्थित सारी सूचनाओं की एक कॉपी रखता है तथा जरूरत पड़ने पर कुछ जरूरी फाइलें या पूरी हार्ड डिस्क के कण्टेण्ट को वापस रिस्टोर कर देता है।</li>
<li>एण्टीवायरस प्रोग्राम ये ऐसे यूटिलिटी प्रोग्राम्स होते हैं, जिनका प्रयोग कम्प्यूटर के वायरस ढूंढने और उन्हें डिलीट (Delete) करने में किया जाता है।</li>
<li>डिस्क क्लीनर्स यह उन फाइलों को ढूंढकर डिलीट करता है, जिनका बहुत समय से उपयोग नहीं हुआ है। इस प्रकार यह कम्प्यूटर की गति को भी तेज करता है।</li>
</ol>
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		<title>UP Board Class 12 Hindi Model Papers Paper 4</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Safia]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 03 Jun 2025 10:54:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Class 12 Hindi Model Papers Paper 4 are part of UP Board Class 12 Hindi Model Papers. Here we have given UP Board Class 12 Hindi Model Papers Paper 4. Board UP Board Textbook NCERT Class Class 12 Subject Hindi Model Paper Paper 4 Category UP Board Model Papers UP Board Class 12 ... <a title="UP Board Class 12 Hindi Model Papers Paper 4" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/up-board-class-12-hindi-model-papers-paper-4/" aria-label="Read more about UP Board Class 12 Hindi Model Papers Paper 4">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Class 12 Hindi Model Papers Paper 4 are part of <a href="https://www.upboardsolutions.com/up-board-class-12-sahityik-hindi-model-papers/">UP Board Class 12 Hindi Model Papers</a>. Here we have given UP Board Class 12 Hindi Model Papers Paper 4.</p>
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<tbody>
<tr>
<td><strong>Board</strong></td>
<td>UP Board</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Textbook</strong></td>
<td>NCERT</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Class</strong></td>
<td>Class 12</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Subject</strong></td>
<td>Hindi</td>
</tr>
<tr>
<td><strong> Model Paper</strong></td>
<td>Paper 4</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Category</strong></td>
<td><a href="https://www.upboardsolutions.com/up-board-model-papers/">UP Board Model Papers</a></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h2>UP Board Class 12 Hindi Model Papers Paper 4</h2>
<p><strong>समय 3 घण्टे 15 मिनट<br />
</strong><span style="font-weight: 400;"><strong>पूर्णांक 100</strong></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="font-weight: 400;"><strong>खण्ड &#8216;क&#8217;</strong><br />
</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>निर्देश</strong><br />
(i) प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्न-पत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं।<br />
</span><span style="font-weight: 400;">(ii) सभी प्रश्नों के उत्तर देने अनिवार्य हैं।<br />
</span><span style="font-weight: 400;">(iii) सभी प्रश्नों हेतु निर्धारित अंक उनके सम्मुख अंकित हैं</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रश्न 1.<br />
</span>(क) आदिकाल का नाम &#8216;वीरगाथा काल&#8217; किस इतिहासकार ने रखा है? <strong>(1)</strong><br />
<span style="font-weight: 400;">(a) हजारीप्रसाद द्विवेदी<br />
(b) महावीर प्रसाद द्विवेदी<br />
</span><span style="font-weight: 400;">(c) शान्तिप्रिय द्विवेदी |<br />
(d) रामचन्द्र शुक्ल</span></p>
<p>(ख) “खलिक बारी&#8217; के रचयिता हैं। <strong>(1)</strong><br />
(a) अमीर खुसरों<br />
<span style="font-weight: 400;">(b) अबुल फजल<br />
(c) ख्वाजा अहमद<br />
</span>(d) अब्दुर्रहमान</p>
<p>(ग) निम्नलिखित में से कौन अपनी व्यंग्य-रचनाओं के लिए प्रसिद्ध हैं? <strong>(1)</strong><br />
(a) श्यामसुन्दर दास<br />
<span style="font-weight: 400;">(b) गुलाब राय<br />
(c) हरिशंकर परसाई :<br />
(d) रामचन्द्र शुक्ल</span></p>
<p>(घ) &#8216;रूपक रहस्य&#8217; रचना है ।<strong>(1)</strong><br />
<span style="font-weight: 400;">(a) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की<br />
(b) श्यामसुन्दर दास की<br />
</span><span style="font-weight: 400;">(c) वासुदेवशरण अग्रवाल की<br />
(d) जैनेन्द्र कुमार की</span></p>
<p>(ङ) &#8216;तन्त्रालोक से यन्त्रालोक तक रचना की विधा है। <strong>(1)</strong><br />
<span style="font-weight: 400;">(a) भेट वार्ता<br />
(b) संस्मरण<br />
(c) रिपोर्ताज<br />
(d) यात्रा-वृत्त</span></p>
<p>प्रश्न 2.<br />
(क) “श्रृंगार शिरोमणि&#8217; के रचनाकार हैं। <strong>(1)</strong><br />
(a) जसवन्त सिंह द्वितीय<br />
(b) द्विजदेव<br />
(c) ग्वाल<br />
<span style="font-weight: 400;">(d) बेनीबन्दीजन</span></p>
<p>(ख) सोमनाथ&#8217; की स्चना है। <strong>(1)</strong><br />
<span style="font-weight: 400;">(a) अंगदर्पण<br />
(b) रस प्रबोध<br />
(c) रसपीयूषनिधि<br />
(d) पदावली ।</span></p>
<p>(ग) हरी घास पर क्षण भर&#8217; के रचयिता हैं। <strong>(1)</strong><br />
(a) त्रिलोचन<br />
<span style="font-weight: 400;">(b) अज्ञेय<br />
(c) केदारनाथ अग्रवाल<br />
(d) प्रभाकर माचवे</span></p>
<p>(घ) सही सुमेलित है। <strong>(1)</strong><br />
<span style="font-weight: 400;">(a) भारत-भारती/महाकाव्य<br />
(b) प्रणभंग/चरितकाव्य<br />
(c) गीतिका/वीरकाव्य<br />
</span><span style="font-weight: 400;">(d) रश्मिरथी/खण्डकाव्य</span></p>
<p>(ङ) निम्नलिखित में से कौन-सी पन्त जी की प्रगतिवादी रचना मानी <span style="font-weight: 400;">जाती हैं? <strong>(1)</strong><br />
</span><span style="font-weight: 400;">(a) पल्लव<br />
(b) युगान्त<br />
(c) गुंजन<br />
(d) वीणा</span></p>
<p>प्रश्न 3.<br />
निम्नलिखित अवतरणों को पढ़कर उनपर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।<span style="font-weight: 400;"><strong>(5 x 2 = 10)</strong><br />
इच्छाएँ नाना हैं और नानाविधि हैं और उसे प्रवृत्त रखती हैं। उस प्रवृत्ति से वह रह-रहकर थक जाता है और निवृत्ति चाहता है। यह प्रवृत्ति और निवृत्ति का चक्र उसको द्वन्द्व से थका मारता है। इस संसार को अभी राग-भाव से वह चाहता है कि अगले क्षण उतने ही विराग भाव से वह उसका विनाश चाहता है। पर राग-द्वेष की वासनाओं से अन्त में झुंझलाहट और छटपटाहट </span><span style="font-weight: 400;">ही उसे हाथ आती है। ऐसी अवस्था में उसका सच्चा भाग्योदय कहलाएगा | अगर वह नत-नम्र होकर भाग्य को सिर आँखों लेगा और प्राप्त कर्त्तव्य में </span><span style="font-weight: 400;">ही अपने पुरुषार्थ की इति मानेगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।</strong><br />
(i) प्रवृत्ति-निवृत्ति के चक्र में फैसा मनुष्य क्यों थक जाता है?<br />
(ii) प्रेम और ईष्र्या की वासनाओं में पड़कर व्यक्ति की स्थिति कैसी हो । </span><span style="font-weight: 400;">जाती है?<br />
(iii) लेखक के अनुसार मनुष्य का सच्चा भाग्योदय कब सम्भव है?<br />
(iv) प्रवृत्ति, राग&#8217; शब्दों के क्रमश: विलोम शब्द लिखिए।<br />
(v) &#8216;राग-द्वेष का समास विग्रह करके समास का भेद भी लिखिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>अथवा</strong><br />
आज के अनेक आर्थिक और सामाजिक विधानों की हम जाँच करें, तो पता चलेगा कि वे हमारी सांस्कृतिक चेतना के क्षीण होने के कारण युगानुकूल परिवर्तन और परिवर्द्धन की कमी से बनी हुई रूदियों, परकीयों के साथ संघर्ष की परिस्थिति से उत्पन्न माँग को पूरा करने के लिए अपनाए गए उपाय अथवा परकीयों द्वारा थोपी गई या उनका अनुकरण कर स्वीकार की गई व्यवस्थाएँ मात्र हैं। भारतीय संस्कृति के नाम पर उन्हें जिन्दा रखा जा सकता। उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।<br />
(i) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है तथा इसके लेखक कौन हैं?<br />
(ii) लेखक के अनुसार भारतीय सांस्कृतिक चेतना के कमजोर होने का मुख्य </span><span style="font-weight: 400;">कारण क्या हैं?<br />
(iii) युगानुरूप परिवर्तन एवं विकास नहीं होने का मुख्य कारण क्या है?<br />
(iv) भारतीय नीतियाँ एवं सिद्धान्त किस प्रकार विदेशियों की नकल मात्र </span><span style="font-weight: 400;">बनकर रह गए हैं?<br />
(v) &#8216;परिस्थिति&#8217;, व सांस्कृतिक&#8217; शब्दों में क्रमश: उपसर्ग एवं प्रत्यय छाँटकर </span><span style="font-weight: 400;">लिखिए।</span></p>
<p>प्रश्न 4.<br />
निम्नलिखित काव्यांशों को पढ़कर उनपर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए। <span style="font-weight: 400;"><strong>(5 x 2 = 10)</strong><br />
भई थकित छबि चकित हेरि हर-रूप मनोहर। है आनहि के प्रान रहे तन घरे धरोहर।। भयो कोप कौ लोप चोप औरै उमगाई। चित चिकनाई चढ़ी कढ़ी सब रोष, रुखाई।। कृपानिधान सुजान सम्भु हिय की गति जानी। दियौ सौस पर ठाम बाम करि कै मनमानी।। सकुचति ऐचति अंग गंग सुख संग लजानी। जटाजूट हिम कूट सघन बन सिमटि समानी।। उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।<br />
(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने किसका वर्णन किया हैं?<br />
(ii) गंगा का क्रोध किस प्रकार शान्त हुआ?<br />
(iii) &#8220;सकुचति ऐचति अंग गंग सुख संग लजानी।” पंक्ति का आशय स्पष्ट </span><span style="font-weight: 400;">कीजिए।<br />
</span><span style="font-weight: 400;">(iv) शिवजी की जटाओं में स्थान पाकर गंगा की स्थिति में क्या परिवर्तन </span><span style="font-weight: 400;">हुआ?<br />
(v) प्रस्तुत पद्यांश में कौन-सा रस निहित है?</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>अथवा</strong></span></p>
<p style="padding-left: 30px;"><span style="font-weight: 400;">झूम-झूम मृदु गरज-गरज घन घोर!<br />
राग–अमर! अम्बर में भर निज रोर!<br />
झर झर झर निर्झर-गिरि-सर में,<br />
घर, मरु तरु-मर्मर, सागर में,<br />
सरित-तड़ित-गति–चकित पवन में मन में,<br />
विजन-गहंन-कानन में,<br />
आनन-आनन में,<br />
रव घोर कठोरराग–अमर!<br />
अम्बर में भर निज रोर!<br />
अरे वर्ष के हर्ष!<br />
बरस तू बरस बरस रसधार!<br />
पार ले चल तू मुझको बहा,<br />
दिखा मुझको भी निज ।<br />
गर्जन-भैरव-संसार! </span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।<br />
</strong></span>(i) प्रस्तुत पशि किस कविता से अवतरित है तथा इसके कवि कौन हैं?<br />
(ii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने बादल के किस रूप का वर्णन किया है?<br />
(iii) &#8220;पार ले चल तू मुझको, बहा दिखा मुझको भी निज&#8217;–पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।<br />
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने बादलों से क्या आह्वान किया है?<br />
(v) &#8216;निर्भर’ और ‘संसार&#8217; शब्द में से उपसर्ग शब्दांश छाँटकर लिखिए।</p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रश्न </span>5.<br />
निम्नलिखित लेखकों में से किसी एक लेखक का जीवन परिचय देते हुए <span style="font-weight: 400;">उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए <strong>(4)</strong><br />
(क) मोहन राकेश ।<br />
(ख) वासुदेवशरण अग्रवाल ।<br />
(ग) जैनेन्द्र कुमार |<br />
(घ) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन &#8216;अज्ञेय&#8217;</span></p>
<p>प्रश्न 6.<br />
निम्नलिखित कवियों में से किसी एक का जीवन परिचय देते हुए उनकी <span style="font-weight: 400;">कृतियों पर प्रकाश डालिए। <strong>(4)</strong><br />
(क) महादेवी वर्मा ।<br />
</span><span style="font-weight: 400;">(ख) मैथिलीशरण गुप्त<br />
(ग) जयशंकर प्रसाद<br />
</span><span style="font-weight: 400;">(घ) सुमित्रानन्दन पन्त</span></p>
<p>प्रश्न 7.<br />
<strong>(क)</strong> &#8216;खून का रिश्ता&#8217; अथवा &#8216;पंचलाइट&#8217; कहानी के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए। <span style="font-weight: 400;"><strong>(4)</strong></span><br />
<span style="font-weight: 400;"><strong>अथवा</strong><br />
‘कर्मनाशा की हार&#8217; अथवा &#8216;बहादुर&#8217; कहानी का कथानक संक्षेप में निम्तिए।<br />
</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>(ख)</strong> स्वपठित नाटक के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों में से किसी एक प्रश्न | का उत्तर दीजिए।<br />
(i) &#8216;कुहासा और किरण&#8217; एक समस्या मूलक नाटक है। सिद्ध कीजिए। अधा &#8216;कुहासा और किरण&#8217; नाटक के शीर्षक की सार्थकता पर अपने विचार </span><span style="font-weight: 400;">व्यक्त कीजिए।<br />
(ii) &#8216;आन का मान&#8217; नाटक की समीक्षा नाटकीय तत्वों की दृष्टि से कीजिए। अथवा &#8216;आन का मान&#8217; नाटक के आधार पर औरंगजेब का चरित्र-चित्रण </span><span style="font-weight: 400;">कीजिए।<br />
(iii) &#8216;गरुड़ध्वज&#8217; नाटक के तृतीय अंक की कथा अपने शब्दों में लिखिए। अथवा &#8216;गरुड़ध्वज&#8217; नाटक में किस समस्या को उठाया गया है? स्पष्ट </span><span style="font-weight: 400;">कीजिए।<br />
(iv) &#8216;सूत-पुत्र&#8217; नाटक के नायक कर्ण के अन्तर्द्वन्द्व पर अपने शब्दों में </span><span style="font-weight: 400;">| प्रकाश डालिए। अयना &#8216;सूतपुत्र&#8217; नाटक के तृतीय अंक में वर्णित कुन्ती एवं कर्ण के संवाद </span><span style="font-weight: 400;">को अपने शब्दों में लिखिए।<br />
(v) राजमुकुट&#8217; नाटक के कथानक को अपने शब्दों में लिखिए। अधना &#8216;राजमुकुट&#8217; नाटक के आधार पर शक्तिसिंह का चरित्र-चित्रण </span>कीजिए।</p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रश्न </span>8.<br />
निम्नलिखित खण्डकाव्यों में से स्वपठित खण्डकाव्य के आधार पर किसी <span style="font-weight: 400;">एक प्रश्न का उत्तर दीजिए। <strong>(4)</strong><br />
(क) &#8220;श्रवण कुमार खण्डकाव्य में करुणा एवं प्रेम की विह्वल मन्दाकिनी </span>प्रवाहित होती है।”—इस कथन की विवेचना कीजिए। <span style="font-weight: 400;"><strong>अथवा</strong></span><br />
&#8216;दशरथ का अन्तर्दन्द्र श्रवण कुमार&#8217; खण्डकाव्य की अनुपम निधि है।&#8221; | इस उक्ति के आलोक में दशरथ का चरित्र-चित्रण कीजिए।</p>
<p>(ख) &#8216;मुक्तियज्ञ&#8217; नाटक के कथानक की विशेषताएँ लिखिए।<br />
<span style="font-weight: 400;"><strong>अथवा</strong></span><br />
&#8216;मुक्तियज्ञ&#8217; नाटक के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।</p>
<p>(ग) “त्यागपथी खण्डकाव्य में सम्राट हर्षवर्द्धन का चरित्र ही केन्द्र में है और <span style="font-weight: 400;">उसी के चारों ओर कथानक का चक्र घूमता है।”<br />
इस कथन को </span><span style="font-weight: 400;">स्पष्ट कीजिए।<br />
<strong>अथवा</strong><br />
खण्डकाव्य की विशेषताओं के आधार पर &#8216;त्यागपथी&#8217; का मूल्यांकन </span><span style="font-weight: 400;">कीजिए। |</p>
<p>(घ) रश्मिरथी&#8217; खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग का कथासार अपने शब्दों में । </span><span style="font-weight: 400;">लिखिए।<br />
<strong>अथवा</strong><br />
जैसा कर्ण के चरित्र में ऐसे कौन-से गुण हैं, जो उसे महामानव की कोटि तक </span><span style="font-weight: 400;">उठा देते हैं? &#8216;रश्मिरथी&#8217; खण्डकाव्य के आधार पर स्पष्ट कीजिए।</p>
<p>(ङ) &#8216;सत्य की जीत&#8217; खण्डकाव्य की कथा की मुख्य घटनाओं को अपने </span>शब्दों में लिखिए।<br />
<span style="font-weight: 400;"><strong>अथवा</strong></span><br />
&#8216;सत्य की जीत&#8217; खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी का चरित्र चित्रण <span style="font-weight: 400;"> कीजिए। |</p>
<p>(च) &#8216;आलोक-वृत्त&#8217; खण्डकाव्य का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।<br />
<strong>अथवा</strong><br />
आलोक-वृत्त खण्डकाव्य पीड़ित मानवता को सत्य एवं अहिंसा का </span><span style="font-weight: 400;">सन्देश देता है। इस कथन की विवेचना कीजिए।</span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="font-weight: 400;"><strong>खण्ड &#8216;ख&#8217;</strong></span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रश्न 1.<br />
निम्नलिखित अवतरणों का सन्दर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए।<strong> </strong></span><span style="font-weight: 400;"><strong>(5 + 5 = 10)</strong><br />
<strong>(क)</strong><br />
याज्ञवल्क्यो मैत्रेयीमुवाच-मैत्रेयी! उद्यास्यन् अहम् अस्मात् स्थानादस्मि। </span><span style="font-weight: 400;">ततस्तेऽनया कात्यायन्या विच्छेदं करवाणि इति। मैत्रेयी उवाचयदीयं सर्वा पृथ्वी विनेन पूर्णा स्यात् तत् किं तेनाहममृता स्यामिति। याज्ञवल्क्य उवाच-नेति। यर्थापकरणवतां जीवनं तथैव ते जीवन स्यात्। अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन इति। सा मैत्रेयी उवाच-येनाहं नामृता स्याम् किमहं तेन कुर्याम् यदेव भगवान् केवलममृतत्वसाधन जानाति, तदेव में ब्रूहि। याज्ञवल्क्य उवाच-प्रिया नः सती त्वं प्रियं भाषसे। एहि, उपविश, व्याख्यास्यामि ते अमृतत्वसाधनम्।<br />
</span><span style="font-weight: 400;"><strong>अथवा</strong><br />
हिन्दी-संस्कृताङ्ग्लभाषासु अस्य समान अधिकारः आसीत् ।। हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्थानानामुत्थानायअयं निरन्तर प्रयत्नमकरोत् शिक्षयैव देशे समाजे च नवीन: प्रकाशः उदेति अतः श्रीमालवीयः वाराणस्यां काशीविश्वविद्यालयस्य संस्थापनमकरोत्। अस्य निर्माणाय अयं जनान् । धनम् अयाचत जनाश्च महत्यस्मिन् ज्ञानयज्ञे प्रभूतं धनमस्मै प्रायच्छन्, तेन निर्मितोऽयं विशाल: विश्वविद्यालयः भारतीयानां दानशीलतायाः श्रीमालवीयस्य यशसः च प्रतिमूर्तिरिव विभाति। साधारणस्थितिकोऽपि जनः महतोत्साहेन, मनस्वितया, पौरुषेण च असाधारणमपि कार्य कर्तुं क्षमः इत्यदर्शयत् मनीषिमूर्धन्यः मालवीयः। एतदर्थमेव जनास्तं महामना </span><span style="font-weight: 400;">इत्युपाधिना अमिधातुमारब्धवन्तः।</span></p>
<p><strong>(ख)</strong><br />
स्वनैर्धनानां प्लवगा: प्रबुद्ध विहाय निद्रा चिरसन्निरुहाम्।<br />
<span style="font-weight: 400;">अनेकरूपाकृतिवर्णनादा: नवाम्बुधाराभिहता नदन्ति।<br />
मत्ता गजेन्द्रा मुदिता गवेन्द्रः वनेषु विक्रान्ततर मृगेन्द्राः ।<br />
रम्या नगेन्द्रा निभृता नरेन्द्राः प्रक्रीडितो वारिधरैः सुरेन्द्रः।<br />
<strong>अथवा</strong><br />
</span><span style="font-weight: 400;">राज्यं नाम नृपात्मजैसहृदयैर्जित्वा रिपून् भुज्यते।।<br />
तल्लोके न तु याच्यते न च पुनर्दीनाग्न वा दीयते।।<br />
काङ्क्षा चेन्नृपतित्वमाप्तुमचिरात् कुर्वन्तु ते साहसम्।<br />
</span><span style="font-weight: 400;">स्वैरं वा प्रविशन्तु शान्तमतिभिर्जुष्टं शमायाश्रमम्॥</span></p>
<p>प्रश्न 2.<br />
निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं दो के उत्तर संस्कृत में दीजिए। <strong>(4+4=8)<br />
</strong><span style="font-weight: 400;">(क) अन्यदा भोजः कुत्र अगच्छत्?<br />
(ख) राजहंसः पषिन्मथे कस्मै दुहितरम् अददात् ?<br />
</span><span style="font-weight: 400;">(ग) मालवीयमहोदयस्य प्रारम्भिक शिक्षा कुत्र अभवत्?<br />
(घ) वासुदेव कस्य दौत्येन कुत्र गत:?</span></p>
<p>प्रश्न 3.<br />
(क) &#8216;वीभत्स&#8217; अथवा &#8216;वियोग श्रृंगार रस की परिभाषा उदाहरण सहित लिखिए। <span style="font-weight: 400;"><strong>(2)</strong></span><br />
(ख) &#8216;उपमा&#8217;,अथवा यमक अलंकार की परिभाषा उदाहरण सहित लिखिए। <span style="font-weight: 400;"><strong>(2)</strong></span><br />
<span style="font-weight: 400;">(ग) &#8216;वसन्ततिलका&#8217; अथवा &#8216;सोरठा&#8217; का लक्षण एवं उदाहरण लिखिए। <strong>(2)</strong></span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रश्न 4.<br />
निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर अपनी भाषा-शैली में निबन्ध </span><span style="font-weight: 400;">लिखिए। <strong>(9) </strong><br />
(क) वर्तमान शिक्षा प्रणाली के गुण-दोष<br />
(ख) दूरदर्शन की उपयोगिता<br />
(ग) मेरे जीवन की अविस्मरणीय घटना<br />
(घ) स्वदेश प्रेम ।<br />
</span><span style="font-weight: 400;">(इ) वर्तमान समय में समाचार-पत्रों का महत्व</span></p>
<p>5.<br />
<strong>(क)</strong><br />
(i) &#8216;सत् + चयन&#8217; अथवा हुरिः + चन्द्र की संन्धि कीजिए। <strong>(1)</strong><br />
<span style="font-weight: 400;">(ii) उल्लासः अथवा सन्चयनम में से किसी एक का सन्धि-विच्छेद | कीजिए।<strong> (1)</strong><br />
</span><span style="font-weight: 400;">(iii) मोऽनुस्वारः अथवा प्रभुत्वा में से कौन-सी सन्धि है?<strong> (2)</strong></span></p>
<p><strong>(ख)</strong><br />
(i) &#8216;एषु’ रूप है &#8216;इदम्&#8217; (पुल्लिग) शब्द का <strong> (1/2)</strong><br />
<span style="font-weight: 400;">(a) चतुर्थी एकवचन<br />
(b) पञ्चमी बहुवचन<br />
(c) चतुर्थी बहुवचन<br />
</span><span style="font-weight: 400;">(d) सप्तमी बहुवचन</span></p>
<p>(ii) &#8216;जगत् तृतीया बहुवचन को रूप होगा <strong>(1/2)</strong><br />
(a) जगद्भिः<br />
<span style="font-weight: 400;">(b) जगद्भ्यः<br />
(c) जगभ्याम्<br />
</span><span style="font-weight: 400;">(d) जगताम्।</span></p>
<p><strong>(ग)</strong><br />
(i) &#8216;कृ&#8217; धातु के लुट् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन का रूप लिखिए। <span style="font-weight: 400;"><strong>(1)</strong><br />
</span><span style="font-weight: 400;">(ii) &#8216;पोयथ&#8217; रूप किस धातु, किस लकार, किस पुरुष तथा किस वचन का <strong>(1)</strong></span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>(घ)</strong><br />
(i) निम्नलिखित में से किसी एक शब्द में धातु एवं प्रत्यय का योग स्पष्ट </span><span style="font-weight: 400;">कीजिए। </span><span style="font-weight: 400;">दृष्टम्, शयित्वा, स्थातव्यम् <strong>(1)</strong><br />
(ii) निम्नलिखित में से किसी एक शब्द में प्रत्यय बताइए। </span><span style="font-weight: 400;">गतिमती, ब्राह्मणता, कटुत्व <strong>(1)</strong></span></p>
<p><strong>(ङ)</strong><br />
निम्नलिखित रेखांकित पदों में से किन्हीं दो में प्रयुक्त विभक्ति तथा <span style="font-weight: 400;">उससे सम्बन्धित नियम का उल्लेख कीजिए। <strong>(2)</strong><br />
(i) मातुः दय <strong>कन्या</strong> प्रति स्निग्धं भवति।<br />
(ii) <strong>छात्रासु</strong> लता श्रेष्ठा।<br />
</span>(iii) अहमपि <strong>त्वया</strong> साधं यास्यामि।</p>
<p><strong>(च)</strong><br />
निम्नलिखित में से किसी एक का विग्रह करके समास का नाम लिखिए।<br />
<span style="font-weight: 400;">(i) दीर्घकशी<br />
(ii) उपराजम्<br />
(iii) रक्तवर्णः <strong>(2)</strong></span></p>
<p>प्रश्न 6.<br />
निम्नलिखित वाक्यों में से किन्हीं चार वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद <span style="font-weight: 400;">कीजिए।  <strong>(4)</strong><br />
(क) हमें राष्ट्रभाषा का आदर करना चाहिए।<br />
(ख) मैं कल वाराणसी नगर जाऊँगा।<br />
(ग) कश्मीर की शोभा पर्यटकों का मन मोह लेती है।<br />
(घ) दरिंद्र को भिक्षा देना पुण्यकार्य है।<br />
(ङ) मेरे विद्यालय के पास एक फुलवारी हैं।</span></p>
<p>We hope the UP Board Class 12 Hindi Model Papers Paper 4 help you. If you have any query regarding UP Board Class 12 Hindi Model Papers Paper 4, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.</p>
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		<title>UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests</title>
		<link>https://www.upboardsolutions.com/class-12-pedagogy-chapter-24/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Safia]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 03 Jun 2025 10:52:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 12]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests (उपलब्धि तथा उपलब्धि परीक्षण) are part of UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests (उपलब्धि तथा उपलब्धि परीक्षण). Board UP Board Textbook NCERT Class Class ... <a title="UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/class-12-pedagogy-chapter-24/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests (उपलब्धि तथा उपलब्धि परीक्षण) are part of <a href="https://www.upboardsolutions.com/class-12-pedagogy/">UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy</a>. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests (उपलब्धि तथा उपलब्धि परीक्षण).</p>
<table>
<tbody>
<tr>
<td><strong>Board</strong></td>
<td>UP Board</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Textbook</strong></td>
<td>NCERT</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Class</strong></td>
<td>Class 12</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Subject</strong></td>
<td>Pedagogy</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Chapter</strong></td>
<td>Chapter 24</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Chapter Name</strong></td>
<td>Achievement and Achievement Tests<br />
(उपलब्धि तथा उपलब्धि परीक्षण)</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Number of Questions Solved</strong></td>
<td>30</td>
</tr>
<tr>
<td><strong>Category</strong></td>
<td>UP Board Solutions</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h2>UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests (उपलब्धि तथा उपलब्धि परीक्षण)</h2>
<p style="text-align: center;"><strong>विस्तृत उत्तरीय प्रश्न</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
उपलब्धि परीक्षण से आप क्या समझते हैं ? निबन्धात्मक परीक्षण के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए। <strong>[2014, 15]</strong><br />
<strong>या</strong><br />
निबन्धात्मक परीक्षण के गुण और दोषों की विवेचना कीजिए। <strong>[2013]</strong><br />
<strong>या</strong><br />
निबन्धात्मक परीक्षणों की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? इनके गुण-दोषों पर प्रकाश डालिए। <strong>[2014]</strong><br />
<strong>या</strong><br />
निबन्धात्मक परीक्षण के दोषों को बताइए। <strong>[2008, 12]</strong><br />
उत्तर :<br />
<strong>उपलब्धि परीक्षण </strong><br />
प्रत्येक विद्यालय में विद्यार्थी ज्ञान प्राप्त करने के लिए जाते हैं। एक निश्चित समय में विद्यार्थियों ने कितना ज्ञान अर्जित किया तथा जीवन की परिस्थितियों में उसे कहाँ तक हस्तान्तरित किया आदि की जाँच उपलब्धि परीक्षण द्वारा की जाती है। अध्यापक उपलब्धि परीक्षाओं द्वारा समय-समय पर यह जानने का प्रयास करता है कि कक्षा में प्रदान किया जाने वाला ज्ञान विद्यार्थियों ने किस सीमा तक ग्रहण कर लिया है।</p>
<p><strong>विभिन्न विद्वानों ने उपलब्धि परीक्षणों की परिभाषाएँ निम्नलिखित शब्दों में दी हैं</strong></p>
<ol>
<li><strong>हेनरी चौनसी</strong> (Henry Chauncy) के अनुसार, “प्रत्येक उपलब्धि परीक्षा में छात्रों को किसी-न-किसी रूप में अपने प्राप्त ज्ञान का इस प्रकार प्रदर्शन करना पड़ता है, जिससे उसका अवलोकन और मूल्यांकन किया जा सके।”</li>
<li><strong> गैरीसन</strong> (Garrison) के अनुसार, “उपलब्धि परीक्षा बालक की वर्तमान योग्यता या किसी विशिष्ट विषय के क्षेत्र में उसके ज्ञानार्जन की सीमा का मापन करती है।”</li>
<li><strong>फ्रीमैन</strong> (Freeman) के अनुसार, “एक उपलब्धि परीक्षा वह है जिसका निर्माण ज्ञान समूह में कौशल के मापन के लिए किया जाता है।”</li>
</ol>
<p><strong>निबन्धात्मक परीक्षण </strong><br />
आजकल हमारे देश में निबन्धात्मक परीक्षाओं का अधिक प्रचलन है। ये परीक्षाएँ एक प्रकार से राष्ट्रीय शिक्षा का अंग हो गयी हैं। इनमें छात्रों को कुछ प्रश्न दिये जाते हैं और छात्र उनके उत्तर लिखित रूप में देते हैं। उत्तर देने का समय निर्धारित होता है। यह परीक्षा की परम्परागत प्रणाली है।</p>
<p><strong>गुण :</strong><br />
निबन्धात्मक परीक्षाओं के निम्नलिखित गुण हैं।</p>
<ol>
<li>इन परीक्षाओं का आयोजन सरलतापूर्वक किया जा सकता है।</li>
<li>इन परीक्षाओं के प्रश्नों को सुगमता से तैयार किया जा सकता है।</li>
<li>यह विधि समस्त विषयों के लिए उपयोगी है।</li>
<li>इसमें बालक को पूर्ण अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रहती है।</li>
<li>यह प्रणाली बालकों के लिए भी सुगम होती है, क्योंकि प्रश्न-पत्र समझने में उन्हें विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ती।</li>
<li>छात्रों की तर्क, विचार संगठन तथा चिजन शक्ति का ज्ञान कराने में ये परीक्षाएँ विशेष सहायक होती हैं।</li>
<li>यह प्रणाली छात्रों को परिश्रम करने के लिए प्रेरित करती है।</li>
<li>यह प्रणाली बालकों के अर्जित ज्ञान का वास्तविक मूल्यांकन करती है।</li>
</ol>
<p><strong>दोष :</strong><br />
निबन्धात्मक परीक्षाओं में निम्नांकित दोष भी हैं</p>
<ol>
<li>निबन्धात्मक परीक्षाएँ केवल पुस्तकीय ज्ञान का मूल्यांकन करती हैं। इनके द्वारा छात्र की विभिन्न क्षमताओं का मूल्यांकन नहीं हो पाता।।</li>
<li>इस परीक्षा में सम्पूर्ण पाठ्यक्रम के समस्त भागों में प्रश्न नहीं पूछे जाते हैं। जो भाग शेष रहता है, उसका मूल्यांकन नहीं हो पाता।</li>
<li>इस परीक्षा का प्रमुख दोष यह है कि छात्र अनुमान के आधार पर ही परीक्षा की तैयारी करते हैं। इस प्रकार कम परिश्रम करके उन्हें सफलता मिल जाती है।</li>
<li>निबन्धात्मक परीक्षा में मूल्यांकन कठिनता से होता है। मूल्यांकन के लिए प्रत्येक प्रश्न के उत्तर को। पढ़ना आवश्यक है, परन्तु यह एक कठिन कार्य है।</li>
<li>इनमें आत्मनिष्ठता का प्रभाव रहता है। छात्रों द्वारा दिये गये प्रश्नों के उत्तरों का मूल्यांकन करते समय परीक्षक के विचारों, अभिवृत्ति तथा मानसिक स्तर का भी प्रभाव पड़ता है। एक उत्तर-पुस्तिका की। यदि विभिन्न परीक्षकों से जाँच कराई जाए, तो विभिन्न परिणाम देखने में आएँगे। एक उत्तर में यदि एक । अध्यापक आठ अंक देता है, तो उसी उत्तर में दूसरा अध्यापक तीन अंक भी प्रदान कर सकता है।</li>
<li>निबन्धात्मक परीक्षाएँ विश्वसनीय नहीं होतीं। यदि एक ही उत्तर-पुस्तिका को एक ही अध्यापक जाँचने के कुछ काला पश्चात् पुनः जाँचे तो दोनों बार के अंकों में पर्याप्त अन्तर मिलती है।</li>
<li>इस परीक्षा के परिणामों के आधार पर छात्र के विषय में निश्चित रूप से कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। इस परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाला छात्र आवश्यक नहीं कि व्यावहारिक जीवन में भी सफलता प्राप्त करे, क्योंकि इस परीक्षा में अंक प्राप्ति रटने की शक्ति, लेखी शक्ति तथा संयोग पर बहुत कुछ निर्भर करती है।</li>
<li>यह परीक्षा प्रणाली छात्रों के स्वास्थ्य पर बुरे प्रभाव डालती है। छात्र वर्ष-भर तो कुछ पढ़ते-लिखते नहीं हैं, परन्तु परीक्षा के निकट आने पर दिन-रात पढ़कर परीक्षा पास करने का प्रयास करते हैं। फलतः उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 2<br />
वस्तुनिष्ठ परीक्षण से आप क्या समझते हैं ? वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के प्रकारों एवं गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।<strong> [2007, 12]</strong><br />
<strong>या</strong><br />
वस्तुनिष्ठ परीक्षण से आप क्या समझते हैं ? इस परीक्षण के गुणों का उल्लेख कीजिए।<strong> [2007, 13] </strong><br />
<strong>या</strong><br />
वस्तुनिष्ठ परीक्षा-प्रणाली के दोषों का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तर :<br />
<strong>वस्तुनिष्ठ परीक्षण </strong><br />
निबन्धात्मक परीक्षण के दोषों को दूर करने के लिए शिक्षाशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों ने वस्तुनिष्ठ परीक्षणों का प्रतिपादन किया। सर्वप्रथम 1854 ई० में होरेसमेन (Horaceman) ने वस्तुनिष्ठ परीक्षण का निर्माण किया। वस्तुनिष्ठ परीक्षणों में प्रश्नों का स्वरूप ऐसा होता है कि उनका उत्तर पूर्ण रूप से निश्चित होता है। इन प्रश्नों के उत्तर में सम्बन्धित व्यक्ति की रुचि, पसन्द या दृष्टिकोण का कोई महत्त्व नहीं होता। वस्तुनिष्ठ प्रश्न का उत्तर प्रत्येक उत्तरदाता के लिए एक ही होता है।</p>
<p><strong>गुड (Good) ने वस्तुनिष्ठ परीक्षण को स्पष्ट करते हुए कहा :</strong><br />
“वस्तुनिष्ठ परीक्षा प्रायः सत्य-असत्य उत्तर, बहुसंख्यक चुनाव, मिलान या पूरक प्रश्नों पर आधारित होती है, जिनको शुद्ध उत्तरों की सहायता से अंकन किया जाता है। यदि कोई उत्तर तालिका के विपरीत होता है, तो उसे अशुद्ध माना जाता है।” वर्तमान परीक्षा में वस्तुनिष्ठ परीक्षणों को अत्यधिक महत्त्व दिया जा रहा है।</p>
<p><strong>वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के प्रकार </strong><br />
वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं</p>
<p><strong>1. सत्य-असत्य परीक्षण : </strong><br />
इन परीक्षणों में &#8216;सत्य&#8217; या ‘असत्य में छात्र उत्तर देते हैं।<br />
<strong>निर्देश :</strong><br />
निम्नलिखित कथन यदि शुद्ध हों तो सत्य&#8217; और अशुद्ध हों तो ‘असत्य&#8217; को रेखांकित कीजिए-</p>
<ol>
<li>बाबर का जन्म 1525 में हुआ था। <strong>सत्य/असत्य</strong></li>
<li>कार्बन डाइऑक्साइड जलने में सहायक नहीं है। <strong>सत्य/असत्य</strong></li>
<li>ऑक्सीजन जीवधारियों के लिए अनिवार्य है। <strong>सत्य/असत्य</strong></li>
<li>रामचरितमानस की रचना तुलसीदास ने की थी। <strong>सत्य/असत्य</strong></li>
</ol>
<p><strong>2. सरल पुनः स्मरण परीक्षण :</strong><br />
इन प्रश्नों का उत्तर छात्र स्वयं स्मरण करके लिखता है।<br />
<strong>निर्देश :</strong><br />
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर उनके समक्ष कोष्ठकों में लिखो</p>
<ol>
<li>प्लासी का युद्ध कब हुआ था ? <strong>( )</strong></li>
<li>सविनय अवज्ञा आन्दोलन किसने चलाया था? <strong>( )</strong></li>
<li>महाभारत ग्रन्थ की रचना किसने की थी ? <strong>( )</strong></li>
<li>उत्तर प्रदेश का वर्तमान राज्यपाल कौन है ? <strong>( )</strong></li>
</ol>
<p><strong>3. पूरक परीक्षण :</strong><br />
इस परीक्षण में छात्र वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति करते हैं।<br />
<strong>निर्देश :</strong><br />
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए</p>
<ol>
<li>भारत के प्रधानमन्त्री की नियुक्ति <strong>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</strong> करता है।</li>
<li>मुख्यमन्त्री विधानसभा के <strong>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</strong> का नेता होता है।</li>
<li>मूल अधिकारों की रक्षा <strong>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</strong>करता है।</li>
<li>राज्य व्यवस्थापिका के उच्च सदन को <strong>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</strong>कहते हैं।</li>
<li>&#8216;कामायनी&#8217; की रचना <strong>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</strong> ने की थी।</li>
</ol>
<p><strong>4. बहुसंख्यक चुनाव या बहुविकल्पीय परीक्षण :</strong><br />
इस परीक्षण में छात्रों को दिये हुए अनेक उत्तरों में से ठीक उत्तर का चुनाव करना पड़ता है।<br />
<strong>निर्देश :</strong><br />
सही कथन के सामने कोष्ठक में सही का चिह्न लगाओराज्य के प्रशासन का वास्तविक प्रधान</p>
<ol>
<li>राष्ट्रपति होता है।</li>
<li>प्रधानमन्त्री होता है।</li>
<li>राज्यपाल होता है।</li>
<li>मुख्यमन्त्री होता है।</li>
</ol>
<p><strong>5. मिलान परीक्षण :</strong><br />
इस परीक्षण में छात्रों को दो पदों में मिलान करके कोष्ठक में सही पद लिखना पड़ता है।<br />
<strong>निर्देश :</strong><br />
नीचे कुछ घटनाओं का उल्लेख किया जा रहा है। उनके सामने अव्यवस्थित रूप में उनसे सम्बन्धित तिथियाँ दी हुई हैं। प्रत्येक कोष्ठक में सम्बन्धित सही तिथि लिखो<br />
<img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-43059" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Pedagogy-Chapter-24-Achievement-and-Achievement-Tests-image-1.png" alt="UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests image 1" width="588" height="108" srcset="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Pedagogy-Chapter-24-Achievement-and-Achievement-Tests-image-1.png 588w, https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Pedagogy-Chapter-24-Achievement-and-Achievement-Tests-image-1-300x55.png 300w" sizes="auto, (max-width: 588px) 100vw, 588px" /></p>
<p><strong>वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के गुण</strong><br />
वस्तुनिष्ठ परीक्षणों में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं|</p>
<p><strong>1. विश्वसनीयता :</strong><br />
वस्तुनिष्ठ परीक्षण का सबसे बड़ा गुण उसकी विश्वसनीयता (Reliability) है। इसमें ही परीक्षण में विभिन्न समय में प्राप्त अंकों की समानता रहती है, अर्थात् एक उत्तर को कितनी ही बार जाँचा जाए, उसमें  अन्तर की सम्भावना नहीं रहती।</p>
<p><strong>2. वस्तुनिष्ठता :</strong><br />
यह परीक्षण वस्तुनिष्ठ होता है। इसमें परीक्षण के मूल्यांकन पर परीक्षक की मानसिक स्थिति, रुचि, अभिवृत्ति तथा छात्रों के सुलेख का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसका मूल कारण। प्रश्नों के उत्तरों का निश्चित तथा छोटा होना है।</p>
<p><strong>3. वैधता :</strong><br />
वस्तुनिष्ठ परीक्षण का अन्य गुण है-उसकी वैधता (Validity)। ये परीक्षण उसी निर्धारित योग्यता का मापन करते हैं, जिसके लिए इनका निर्माण किया जाता है।</p>
<p><strong>4. उपयोगिता :</strong><br />
इन परीक्षणों के परिणामों के आधार पर छात्रों को शैक्षणिक तथा व्यावसायिक निर्देशन दिया जा सकता है।</p>
<p><strong>5. विभेदीकरण :</strong><br />
ये परीक्षण प्रतिभाशाली और मन्दबुद्धि बालकों के मध्य भेद को स्पष्ट कर देते हैं।</p>
<p><strong>6. व्यापकता :</strong><br />
इन परीक्षणों में पाठ्यक्रम के अन्तर्गत पढ़ाये जाने वाले समस्त प्रकरणों को शामिल किया जा सकता है। इस प्रकार बालकों द्वारा किये गए सम्पूर्ण अर्जित ज्ञान का मापन सम्भव हो जाता है।</p>
<p><strong>7. मूल्यांकन में सुविधा :</strong><br />
वस्तुनिष्ठ परीक्षण का मूल्यांकन बहुत सुविधाजनक ढंग से हो जाता है, क्योंकि उत्तर निश्चित और छोटे होते हैं। दूसरे, इस प्रणाली में अंकन, उत्तर की तालिका की सहायता से किया जा सकता है।</p>
<p><strong>8. ज्ञान की यथार्थता का परीक्षण :</strong><br />
निबन्धात्मक परीक्षण में छात्र प्रभावशाली भाषा का प्रयोग करके अपने ज्ञान की कमी को भी छिपा जाता है, परन्तु वस्तुनिष्ठ परीक्षणों में ऐसा सम्भव नहीं है, क्योंकि छात्रों को अति संक्षिप्त उत्तर देने पड़ते हैं। अतः वे अपनी अज्ञानता को भाषा के आडम्बर में नहीं छिपा सकते। इस प्रकार इन परीक्षणों में छात्रों के ज्ञान की यथार्थ जाँच की जाती है।</p>
<p><strong>9. धन की बचत :</strong><br />
इन परीक्षणों में छात्रों को कम लिखना पड़ता है। प्रायः दो या तीन पृष्ठों की पुस्तिकाएँ पर्याप्त होती हैं। इस प्रकार धन की काफी बचत हो जाती है।</p>
<p><strong>10. समय की बचत :</strong><br />
इस प्रणाली में छात्रों व अध्यापक दोनों के समय की बचत होती है, क्योंकि छात्रों को कम लिखना पड़ता है और अध्यापक को कम जाँचना पड़ता है।</p>
<p><strong>11. रटने की प्रवृत्ति का अन्त :</strong><br />
इस प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह रटने की प्रवृत्ति का अन्त कर देती है। इसमें प्रश्नों के उत्तरों को रटने से काम नहीं चलता। विषय-वस्तु को ध्यान से पढ़ना आवश्यक हो जाता है।</p>
<p><strong>12. छात्रों का सन्तोष :</strong><br />
निबन्धात्मक परीक्षण से छात्रों को सन्तोष नहीं मिलती, क्योंकि छात्रों का मूल्यांकन ठीक प्रकार से नहीं हो पाता और उन्हें ठीक प्रकार से अंक नहीं मिलते। परन्तु वस्तुनिष्ठ परीक्षण में छात्रों को ठीक अंक मिलते हैं, जिनसे उनको पूर्ण सन्तोष मिलता है।</p>
<p><strong>वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के दोष </strong><br />
वस्तुनिष्ठ परीक्षणों में कुछ दोष भी पाये जाते हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है</p>
<p><strong>1.निर्माण में कठिनाई :</strong><br />
वस्तुनिष्ठ परीक्षण का निर्माण निबन्धात्मक परीक्षण की तुलना में अधिक कठिनाई से होता है। छोटे-छोटे प्रश्नों के निर्माण में अनेक कठिनाइयाँ आती हैं।</p>
<p><strong>2. अपूर्ण सूचना :</strong><br />
इन परीक्षणों से छात्रों के ज्ञान की अपूर्ण सूचना प्राप्त होती है, क्योंकि छोटे-छोटे उत्तरों द्वारा पूर्ण ज्ञान की जानकारी प्राप्त नहीं की जा सकती।</p>
<p><strong>3. आलोचनात्मक तथ्यों व समस्याओं की उपेक्षा :</strong><br />
इन परीक्षणों का सबसे बड़ा दोष यह है। कि इनमें आलोचनात्मक तथ्यों तथा विभिन्न समस्याओं की पूर्ण उपेक्षा की जाती है। वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के प्रश्नों के उत्तर पूर्णतया निश्चित होते हैं। अत: उनमें आलोचना तथा समस्या समाधान का कोई स्थान नहीं होता, परन्तु राजनीति, इतिहास, साहित्य आदि का अध्ययन बिना आलोचना तथा समस्या विवेचन के पूर्ण नहीं हो सकता।</p>
<p><strong>4. उच्च मानसिक योग्यताओं को मापन असम्भव :</strong><br />
इन परीक्षणों के द्वारा छात्रों की चिन्तन, मनन तथा तर्क शक्ति की जाँच सम्भव नहीं है। इस प्रकार उनकी उच्च मानसिक योग्यताओं का मापन सम्भव नहीं हो पाता।</p>
<p><strong>5. केवल तथ्यात्मक ज्ञान की जाँच :</strong><br />
इन परीक्षणों द्वारा केवल तथ्यात्मक ज्ञान का पता चलता है। शेष क्षमताओं का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।</p>
<p><strong>6. भाव प्रकाशन की अवरुद्धता :</strong><br />
इन परीक्षणों में छात्रों की भाव प्रकाशन की शक्ति को विकसित होने का अवसर नहीं मिलता, क्योंकि वे अति संक्षिप्त उत्तर देते हैं।</p>
<p><strong>7. अनुमान को प्रोत्साहन :</strong><br />
इस प्रकार के परीक्षणों से छात्रों में अनुमान लगाने की प्रवृत्ति का विकास होता है। वे विचार तथा बुद्धि का प्रयोग न करके केवल अनुमान से ही &#8216;सत्य&#8217; या ‘अंसत्य&#8217; पर चिह्न लगा देते हैं।</p>
<p><strong>8. भाषा व शैली की उपेक्षा :</strong><br />
इन परीक्षणों में भाषा व शैली की पूर्ण उपेक्षा की जाती है। अत: छात्रों की भाषा व शैली का उचित दिशा में विकास नहीं हो पाता।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>लघु उत्तरीय प्रश्न</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
उपलब्धि परीक्षणों के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए। <strong>[2012, 13]</strong><br />
उत्तर :<br />
उपलब्धि परीक्षण के निम्नांकित उद्देश्य हैं।</p>
<ol>
<li>छात्रों की क्षमताओं तथा योग्यताओं का ज्ञान कराना।</li>
<li>यह पता लगाना कि बालकों ने अर्जित ज्ञान को किस सीमा तक आत्मसात् किया है।</li>
<li>बालकों को अर्जित ज्ञान को उचित ढंग से अभिव्यक्त करने के लिए प्रेरित करना।।</li>
<li>बालकों की उपलब्धि के सामान्य स्तर का निर्धारण करना।</li>
<li>ज्ञानार्जन के क्षेत्र में बालकों की वास्तविक स्थिति का पता लगाना।</li>
<li>बालकों के ज्ञान की सीमा का मापन करना।</li>
<li>यह ज्ञात करना कि बालक पाठ्यक्रम के लक्ष्यों या उद्देश्यों की ओर अग्रसर हो रहे हैं या नहीं।</li>
<li>यह पता लगाना कि अध्यापक का शिक्षण किस सीमा तक सफल रहा है।</li>
<li>प्रशिक्षण के परिणामों का मूल्यांकन करना।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 2<br />
बुद्धि परीक्षण तथा उपलब्धि परीक्षण में अन्तर स्पष्ट कीजिए। <strong>[2007, 10, 13, 15]</strong><br />
उत्तर :<br />
<strong>बुद्धि परीक्षण तथा उपलब्धि परीक्षण में निम्नलिखित अन्तर हैं</strong><br />
<img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-43060" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Pedagogy-Chapter-24-Achievement-and-Achievement-Tests-image-2.png" alt="UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests image 2" width="597" height="125" srcset="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Pedagogy-Chapter-24-Achievement-and-Achievement-Tests-image-2.png 597w, https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Pedagogy-Chapter-24-Achievement-and-Achievement-Tests-image-2-300x63.png 300w" sizes="auto, (max-width: 597px) 100vw, 597px" /><br />
<img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-43061" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Pedagogy-Chapter-24-Achievement-and-Achievement-Tests-image-3.png" alt="UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests image 3" width="594" height="218" srcset="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Pedagogy-Chapter-24-Achievement-and-Achievement-Tests-image-3.png 594w, https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Pedagogy-Chapter-24-Achievement-and-Achievement-Tests-image-3-300x110.png 300w" sizes="auto, (max-width: 594px) 100vw, 594px" /></p>
<p>प्रश्न 3<br />
वस्तुनिष्ठ परीक्षण और निबन्धात्मक परीक्षण में अन्तर बताइए। <strong>[2014, 15]</strong><br />
उत्तर :<br />
वस्तुनिष्ठ परीक्षण में तथ्यों पर आधारित उत्तर दिये जाते हैं। इसमें उत्तरदाता की रुचि, पसन्द या दृष्टिकोण का कोई स्थान नहीं होता। इससे भिन्न निबन्धात्मक के परीक्षण में उत्तरदाता के दृष्टिकोण, पसन्द, रुचि एवं शैली आदि को समुचित महत्त्व दिया जाता है। वस्तुनिष्ठ परीक्षण में अति संक्षिप्त तथा निश्चित उत्तर देना होता है, जबकि निबन्धात्मक परीक्षण में विस्तृत उत्तर देने को प्रावधान होता है। वस्तुनिष्ठ परीक्षण में मूल्यांकन सरल तथा निष्पक्ष होता है, जबकि निबन्धात्मक परीक्षण में मूल्यांकन कठिन होता है तथा इसमें पक्षपात की पर्याप्त सम्भावना होती है। इसमें परीक्षणकर्ता के व्यक्तिगत दृष्टिकोण का भी महत्त्व होता है।</p>
<p>प्रश्न 4<br />
निबन्धात्मक परीक्षण से क्या आशय है?<br />
उत्तर :<br />
<strong>वर्तमान औपचारिक शिक्षा :</strong><br />
प्रणाली के अन्तर्गत ज्ञानार्जन के लिए मुख्य रूप से निबन्धात्मक परीक्षणों को अपनाया जाता है। निबन्धात्मक परीक्षण निश्चित रूप से लिखित परीक्षा के रूप में आयोजित किये जाते हैं। इस प्रणाली के अन्तर्गत किसी भी विषय के निर्धारित पाठ्यक्रम से सम्बन्धित कुछ प्रश्नों को एक प्रश्न-पत्र के रूप में एकत्र कर लिया जाता है तथा उनमें से कुछ प्रश्नों का विस्तृत उत्तर लिखित रूप में एक निर्धारित समयावधि में देना होता है।</p>
<p><strong> परीक्षणकर्ता उत्तर :</strong><br />
पुस्तिका को पढ़कर छात्र/छात्रा के ज्ञानार्जन स्तर का मूल्यांकन कर लेता है तथा अंक प्रदान कर देता है। इस परीक्षण के भी कुछ गुण-दोष हैं। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि यह परीक्षण-प्रणाली एक व्यक्तिनिष्ठ परीक्षण प्रणाली है तथा इसके माध्यम से छात्र/छात्रा के सम्पूर्ण ज्ञानार्जन का सही तथा तटस्थ मूल्यांकन नहीं हो पाता।</p>
<p>प्रश्न 5<br />
निबन्धात्मक परीक्षण प्रणाली में सुधार के लिए कुछ सुझाव दीजिए।<br />
उत्तर :<br />
निबन्धात्मक परीक्षा के दोषों को दूर करने के लिए निम्नलिखित सुझावों को अपनाया जा सकता है</p>
<ol>
<li>प्रश्नों का निर्माण सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को ध्यान में रखकर किया जाए।</li>
<li>परीक्षा प्रश्न-पत्र में पहले सरल और बाद में कठिन प्रश्न रखे जाएँ।</li>
<li>समस्त प्रश्न अनिवार्य हों।</li>
<li>परीक्षण को शिक्षण प्रक्रिया का साधन माना जाए, साध्य नहीं।</li>
<li>निबन्धात्मक प्रश्नों के साथ वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को भी रखा जाए।</li>
<li>मौखिक परीक्षा को भी स्थान दिया जाए।</li>
<li>परीक्षाओं द्वारा यह जानने का प्रयास न किया जाए कि छात्र कितना नहीं जानता, वरन् यह जानने का प्रयास किया जाए कि छात्र कितना जानता है।</li>
<li>परीक्षकों का यह स्पष्ट उद्देश्य होना चाहिए कि वे किस बात की परीक्षा लेना चाहते हैं।</li>
<li>अंक प्रदान करने के स्थान पर श्रेणियों का प्रयोग किया जाए।</li>
</ol>
<p style="text-align: center;"><strong>अतिलघु उत्तरीय प्रश्न</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
उपलब्धि-लब्धि से क्या आशय है?<br />
उत्तर :<br />
बौद्धिक परीक्षणों के आधार पर बौद्धिक योग्यता की गणना करने के लिए बुद्धि-लब्धि की अवधारणा विकसित की गयी थी तथा इसी अवधारणा के समानान्तर एक अन्य अवधारणा निर्धारित की गई, जिसे ज्ञान-लब्धि या उपलब्धि-लब्धि के नाम से जाना जाता है।</p>
<p>प्रश्न 2<br />
विद्यालयों में उपलब्धि परीक्षण का क्या उपयोग है?<br />
उत्तर :<br />
विद्यालय शिक्षा के औपचारिक अभिकरण हैं। विद्यालयों में योजनाबद्ध ढंग से नियमित रूप से शिक्षण-कार्य होता है। छात्रों द्वारा ग्रहण की गयी शिक्षा के मूल्यांकन के लिए निर्धारित परीक्षणों को ही उपलब्धि परीक्षण कहते हैं। उपलब्धि परीक्षण से छात्रों द्वारा अर्जित ज्ञान एवं योग्यता का तटस्थ मूल्यांकन किया जाता है। छात्रों को अगली कक्षा में भेजने के लिए तथा शैक्षिक योग्यता का प्रमाण-पत्र प्रदान करने के लिए उपलब्धि परीक्षण ही सर्वाधिक आवश्यक एवं उपयोगी होता है।</p>
<p>प्रश्न 3<br />
उपलब्धि परीक्षणों के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए। <strong>[2014, 15]</strong><br />
उत्तर :<br />
डगलस (Douglas) तथा हालैंड (Holland) ने उपलब्धि परीक्षाओं का विभाजन निम्नवत् किया है</p>
<ol>
<li style="list-style-type: none;">
<ol>
<li>प्रामाणिक परीक्षण (Standardized Tests)।</li>
<li>शिक्षक निर्मित परीक्षण (Teacher Made Tests)।
<ul style="list-style-type: lower-roman;">
<li>आत्मनिष्ठ परीक्षण (Subjective Tests)।</li>
<li>वस्तुनिष्ठ परीक्षण (Objective Tests)।
<ul>
<li>सौखिक परीक्षण (Objective Tests)।</li>
<li>र्निबन्धात्मक परीक्षण (Essay Type Tests)।</li>
</ul>
</li>
</ul>
</li>
</ol>
</li>
</ol>
<p>प्रश्न 4<br />
मौखिक परीक्षण से क्या आशय है?<br />
उत्तर :<br />
उपलब्धि या ज्ञानार्जन परीक्षण का प्राचीनतम तथा सर्वाधिक लोकप्रिय स्वरूप मौखिक परीक्षण रही है। इस प्रकार के परीक्षण के अन्तर्गत परीक्षणकर्ता अर्थात् शिक्षक या अध्यापक द्वारा छात्र/छात्रा से विषय से सम्बन्धित कुछ प्रश्न आमने-सामने बैठकर पूछे जाते हैं। छात्र/छात्रा द्वारा दिए । गए उत्तरों की शुद्धता/अशुद्धता या ठीक/गलत के आधार पर उसके ज्ञान का समुचित मूल्यांकन कर लिया जाता है।</p>
<p>यह सत्य है कि यह एक प्रत्यक्ष परीक्षण है तथा इस परीक्षण के अन्तर्गत परीक्षणकर्ता से पूछे गए प्रश्नों के उत्तर के साथ-ही-साथ कुछ अन्य उपायों द्वारा भी परीक्षादाता के ज्ञान का अनुमान लगा सकता है। परन्तु इस परीक्षण के कुछ दोष भी हैं; यथा-छात्र/छात्रा का घबरा जाना या भयभीत हो जाना, वाणी-दोष या आत्म-विश्वास की कमी के कारण सही उत्तर न दे पानी।</p>
<p>प्रश्न 5<br />
क्रियात्मक परीक्षण से क्या आशय है?<strong> [2014, 15]</strong><br />
उत्तर :<br />
छात्र-छात्राओं के उपलब्धि परीक्षण के लिए क्रियात्मक परीक्षणों को भी अपनाया जाता है। इन परीक्षणों के अन्तर्गत विषय से सम्बन्धित कुछ कार्यों को यथार्थ रूप से करवाया जाता है तथा परीक्षमादाता द्वारा किए गए कार्यों को देखकर उनके ज्ञानार्जन का समुचित मूल्यांकन कर लिया जाता है। सामान्य रूप से क्रियात्मक परीक्षणों के अन्तर्गत विषय से सम्बन्धित कुछ प्रश्न मौखिक रूप से भी पूछे जाते हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि सभी विषयों में क्रियात्मक परीक्षणों को सफलतापूर्वक आयोजन नहीं किया जा सकता। केवल प्रयोगात्मक विषयों का परीक्षण ही क्रियात्मक परीक्षण के माध्यम से किया जा सकता है। शुद्ध सैद्धान्तिक विषयों का परीक्षण इस आधार पर नहीं किया जा सकता।</p>
<p>प्रग 6<br />
वस्तुनिष्ठ परीक्षण से क्या आशय है?<br />
उत्तर :<br />
निबन्धात्मक परीक्षण-प्रणाली के दोषों के निवारण के लिए वस्तुनिष्ठ परीक्षण को प्रारम्भ किया गया है। इस परीक्षण के अन्तर्गत ज्ञानार्जन के मूल्यांकन के लिए विषय से सम्बन्धित अनेक ऐसे प्रश्नों को संकलित किया जाता है जिनका एक ही शुद्ध उत्तर होता है। इन प्रश्नों में उत्तरदाता की रुचि, पसन्द, इच्छा या दृष्टिकोण का कोई महत्त्व नहीं होता। वस्तुनिष्ठ परीक्षण एक तटस्थ परीक्षण-प्रणाली है। इसमें पक्षपात या पूर्वाग्रह के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती। लेकिन इस परीक्षण के भी कुछ दोष एवं सीमाएँ हैं जैसे कि भाषा-शैली तथा लेखन-क्षमता का मूल्यांकन करना सम्भव नहीं है।</p>
<p>प्रश्न 7<br />
निबन्धात्मक परीक्षण (परीक्षाओं) के कोई पाँच गुण लिखिए। या निबन्धात्मक परीक्षण के क्या लाभ हैं। <strong>[2011]</strong><br />
उत्तर :<br />
निबन्धात्मक परीक्षाओं के पाँच गुण निम्नलिखित हैं</p>
<ol>
<li>इन परीक्षाओं का आयोजन सरलतापूर्वक किया जा सकता है।</li>
<li>इन परीक्षाओं के प्रश्नों को सुगमता से तैयार किया जा सकता है।</li>
<li>यह विधि समस्त विषयों के लिए उपयोगी है।</li>
<li>इसमें बालक को पूर्ण अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रहती है।</li>
<li>यह प्रणाली बालकों के लिए भी सुगम होती है, क्योंकि प्रश्न-पत्र समझने में उन्हें विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ती।</li>
</ol>
<p style="text-align: center;"><strong>निश्चित उत्तरीय प्रश्न</strong></p>
<p>प्रश्न 1<br />
उपलब्धि परीक्षण से क्या आशय है?<strong> (2015)</strong><br />
उत्तर :<br />
छात्रों द्वारा किए गए ज्ञानार्जन के मूल्यांकन के लिए निर्धारित किए गए परीक्षणों को उपलब्धि परीक्षण कही जाती है।</p>
<p>प्रश्न 2<br />
विद्यालय में उपलब्धि परीक्षण का प्रमुख उद्देश्य क्या होता है?<br />
उत्तर :<br />
विद्यालय में उपलब्धि परीक्षण का प्रमुख उद्देश्य छात्र को अगली कक्षा में भेजने का निर्णय लेना होता है।</p>
<p>प्रश्न 3<br />
उपलब्धि परीक्षण के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?<br />
उत्तर :<br />
उपलब्धि परीक्षण के मुख्य प्रकार हैं-मौखिक परीक्षण, क्रियात्मक परीक्षण, निबन्धात्मक परीक्षण तथा वस्तुनिष्ठ परीक्षण।</p>
<p>इन 4<br />
कौन-सा परीक्षण उपलब्धि-परीक्षण का प्राचीनतम प्रकार है?<br />
उत्तर :<br />
मौखिक परीक्षण उपलब्धि-परीक्षण का प्राचीनतम प्रकार है।</p>
<p>प्रश्न 5<br />
किस परीक्षा-प्रणाली में विद्यार्थी प्रश्नों का उत्तर निबन्ध के रूप में देते हैं?<br />
उत्तर :<br />
निबन्धात्मक परीक्षण के अन्तर्गत विद्यार्थी प्रश्नों के उत्तर निबन्ध के रूप में देते हैं।</p>
<p>प्रथम 6<br />
निम्न सूत्र से क्या निकालते हैं।<strong> [2009]</strong><br />
<img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-43062" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Pedagogy-Chapter-24-Achievement-and-Achievement-Tests-image-4.png" alt="UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests image 4" width="234" height="47" /><br />
उत्तर :<br />
इस सूत्र से शिक्षा-लब्धि ज्ञात करते हैं।</p>
<p>प्रश्न 7<br />
विश्वसनीयता और वैधता किस प्रकार के परीक्षण की मुख्य विशेषताएँ हैं ?<br />
उत्तर :<br />
विश्वसनीयता और वैधता वस्तुनिष्ठ परीक्षणों की मुख्य विशेषताएँ हैं।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>बहुविकल्पीय प्रश्न</strong></p>
<p>निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए</p>
<p>प्रश्न 1<br />
कक्षा-शिक्षण के परिणामस्वरूप किए गए ज्ञानार्जन का मूल्यांकन किया जाता है<br />
(क) बुद्धि परीक्षण द्वारा<br />
(ख) अभिरुचि परीक्षण द्वारा<br />
(ग) उपलब्धि परीक्षण द्वारा<br />
(घ) बिना किसी परीक्षण द्वारा<br />
उत्तर :<br />
<strong>(ग)</strong> उपलब्धि परीक्षण द्वारा</p>
<p>प्रश्न 2<br />
ज्ञान आयु (A.A.)<br />
<img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-43063" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Pedagogy-Chapter-24-Achievement-and-Achievement-Tests-image-5.png" alt="UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests image 5" width="508" height="104" srcset="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Pedagogy-Chapter-24-Achievement-and-Achievement-Tests-image-5.png 508w, https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Pedagogy-Chapter-24-Achievement-and-Achievement-Tests-image-5-300x61.png 300w" sizes="auto, (max-width: 508px) 100vw, 508px" /><br />
उत्तर :<br />
<img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-43064" src="https://www.upboardsolutions.com/wp-content/uploads/2020/11/UP-Board-Solutions-for-Class-12-Pedagogy-Chapter-24-Achievement-and-Achievement-Tests-image-6.png" alt="UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests image 6" width="224" height="50" /></p>
<p>प्रश्न 3<br />
निबन्धात्मक परीक्षण का गुण है।<br />
(क) विचारों को प्रस्तुत करने की छूट<br />
(ख) प्रश्न-पत्र का सरलता से निर्माण सम्भव<br />
(ग) समग्र विधि को अपनाया जाता है।<br />
(घ) ये सभी<br />
उत्तर :<br />
<strong>(घ)</strong> ये सभी</p>
<p>प्रश्न 4<br />
निबन्धात्मक परीक्षण का दोष है।<br />
(क) यान्त्रिक प्रणाली<br />
(ख) संयोग पर निर्भरता<br />
(ग) दोषपूर्ण मूल्यांकन पद्धति<br />
(घ) ये सभी<br />
उत्तर :<br />
<strong>(घ)</strong> ये सभी</p>
<p>प्रश्न 5<br />
वस्तुनिष्ठ परीक्षणों का गुण है।<br />
(क) छात्र सन्तुष्ट रहते हैं<br />
(ख) विश्वसनीयता<br />
(ग) समय की बचत<br />
(घ) रटने को प्राथमिकता<br />
उत्तर :<br />
<strong>(ख)</strong> विश्वसनीयता</p>
<p>प्रश्न 6<br />
वस्तुनिष्ठ परीक्षणों का गुण नहीं है।<br />
(क) कम लिखना-पढ़ना<br />
(ख) विषय को सम्पूर्ण ज्ञान आवश्यकता है।<br />
(ग) अपनी रुचि एवं दृष्टिकोण से उत्तर देना।<br />
(घ) सुलेख का कोई महत्त्व नहीं<br />
उत्तर :<br />
<strong>(ग)</strong> अपनी रुचि एवं दृष्टिकोण से उत्तर देना</p>
<p>प्रश्न 7<br />
वस्तुनिष्ठ परीक्षण से हम माप कर सकते हैं। <strong>[2015]</strong><br />
(क) उपलब्धि की<br />
(ख) विचार करने की प्रक्रिया की<br />
(ग) तर्कशक्ति की<br />
(घ) लेखन कौशल की<br />
उत्तर :<br />
<strong>(ग)</strong> तर्कशक्ति की</p>
<p>प्रश्न 8<br />
&#8220;उपलब्धि-परीक्षा, बालक की वर्तमान योग्यता अथवा किसी विशिष्ट विषय के क्षेत्र में उसके ज्ञान की सीमा को मापन करती है। यह परिभाषा है<br />
(क) थॉर्नडाइक की<br />
(ख) टरमन की<br />
(ग) गैरीसन की<br />
(घ) बिने की<br />
उत्तर :<br />
<strong>(ग)</strong> गैरीसन की।</p>
<p>प्रश्न 9<br />
जिस परीक्षा में छात्रों को उत्तर विस्तृत रूप से लिखकर देने पड़ते हैं, उस परीक्षा को कहते हैं<br />
(क) वस्तुनिष्ठ परीक्षा<br />
(ख) मौखिक परीक्षा<br />
(ग) निबन्धात्मक परीक्षा<br />
(घ) प्रयोगात्मक परीक्षा<br />
उत्तर :<br />
<strong>(ग)</strong> निबन्धात्मक परीक्षा</p>
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