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	<title>Prasanna &#8211; UP Board Solutions</title>
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		<title>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 11 कूड़ा-करकट व मल-मूत्र निस्तारण </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Prasanna]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 04 May 2025 06:21:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 11]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 11 कूड़ा-करकट व मल-मूत्र निस्तारण (Disposal of Refuse and Human Excreta) UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 11 कूड़ा-करकट व मल-मूत्र निस्तारण UP Board Class 11 Home Science Chapter 11 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर प्रश्न 1. घर के कूड़े-करकट के निष्कासन की क्या व्यवस्था ... <a title="UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 11 कूड़ा-करकट व मल-मूत्र निस्तारण " class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science-chapter-11/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 11 कूड़ा-करकट व मल-मूत्र निस्तारण ">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 11 कूड़ा-करकट व मल-मूत्र निस्तारण (Disposal of Refuse and Human Excreta)</p>
<h2>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 11 कूड़ा-करकट व मल-मूत्र निस्तारण</h2>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 11 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
घर के कूड़े-करकट के निष्कासन की क्या व्यवस्था होनी चाहिए? कूड़े-कचरे के अन्तिम विसर्जन की विभिन्न विधियों का भी उल्लेख कीजिए।<br />
अथवा<br />
कूड़ा-करकट तथा अपशिष्ट जल के निकास की व्यवस्था पर विस्तारपूर्वक लिखिए।<br />
अथवा<br />
शहर के कूड़े-कचरे के निस्तारण की सर्वोत्तम विधि क्या है? समझाइए।<br />
अथवा<br />
कूड़े को नष्ट करने की विभिन्न विधियों का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
कूड़ा-करकट (Refuse) &#8211;<br />
घर में अनेक कार्यों के परिणामस्वरूप कूड़ा-करकट एकत्र होता रहता है। सब्जियों के छिलके, आटे का चोकर, भोजन की जूठन, धूल-मिट्टी जो हाथ अथवा पैरों के साथ आती है तथा अन्य प्रकार का कूड़ा-करकट घर की सफाई में निकलता ही है। व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए इसका उचित विसर्जन अत्यावश्यक है। अगर ऐसा न किया गया तब पर्यावरण तो दूषित होगा ही, साथ ही स्थान-स्थान पर कूड़ा-कचरा भी होगा और विभिन्न प्रकार के रोगाणु आदि उत्पन्न होंगे। इस प्रकार प्रत्येक घर की सफाई के बाद निकला कूड़ा-करकट, इस प्रकार से विसर्जित होना चाहिए कि जन-स्वास्थ्य तथा पर्यावरण को कोई हानि न हो।</p>
<p>गाँव हो या शहर, प्रत्येक घर से निष्कासित कूड़ा-करकट गली, मुहल्ले, नगर अथवा गाँव का कूड़ा-करकट बन जाता है।</p>
<p>कूड़े-करकट का निस्तारण (Disposal of Refuse) &#8211;<br />
घर में सफाई इत्यादि से निकले कूड़े-करकट के विसर्जन के लिए सबसे उत्तम उपाय यह है कि घर में किसी स्थान पर कूड़ेदान रख दिया जाए। कूड़ेदान का ढक्कनदार होना आवश्यक है। बच्चों के कमरे या अन्य ऐसे स्थानों पर अलग टोकरी रखी जा सकती है जिनमें कागज इत्यादि डाले जा सकते हैं। इन सब कूड़ेदानों के कूड़े को एक मुख्य कूड़ेदान में पहुँचाने की क्रिया आवश्यक है। यह कूड़ेदान घर के मुख्य द्वार के आस-पास रखा जाना चाहिए। सम्पूर्ण घर का कूड़ा इसी कूड़ेदान में डाला जाए तो यह घर की सफाई की उत्तम व्यवस्था है। सड़क या गली में आने वाली गाड़ियों के साथ आने वाले सफाई कर्मचारी कूड़ेदान से अपने ठेले में इस कूड़े को ले जाकर सार्वजनिक खत्ते पर पहुँचाने की व्यवस्था कर सकते हैं।</p>
<p>इस प्रकार, नगर में कूड़ा-करकट मुख्य तीन स्थानों पर एकत्रित किया जाता है &#8211;</p>
<ol>
<li>प्रत्येक घर में मुख्य द्वार के निकट एक बड़ा कूड़ेदान रखा जाता है। इस कूड़ेदान में घर का सारा कूड़ा एकत्र किया जाता है तथा यहाँ से इस कूड़े को सफाई कर्मचारी उठा ले जाता है।</li>
<li>प्रत्येक मुहल्ले में जहाँ यह किसी बड़े ड्रम या इसी कार्य के लिए रखे गए विशेष प्रकार के ढक्कनदार कूड़ेदान में एकत्रित किया जाना चाहिए।</li>
<li>नगर के खत्ते पर जहाँ सम्पूर्ण नगर या बड़े नगर के एक बड़े भाग के प्रत्येक मुहल्ले से आए हुए कूड़े को अन्तिम विसर्जन के लिए एकत्रित किया जाता है।</li>
</ol>
<p>कूड़े-कचरे का अन्तिम विसर्जन (Last Disposal of Refuse) &#8211;<br />
नगर अथवा गाँव के एकत्र किए गए कूड़े का अन्तिम विसर्जन निम्नलिखित विधियों द्वारा किया जा सकता है &#8211;</p>
<p>1. जलाकर &#8211; इस कार्य के लिए विशेष प्रकार की भट्ठियाँ बनाई जाती हैं। ये भट्ठियाँ नगर से दूर होनी चाहिए क्योंकि कूड़े को जलाने से, उससे हानिकारक गैसें निकलती हैं। ये गैसें नागरिकों के स्वास्थ्य को हानि पहुँचा सकती हैं। जलने के बाद बचे अवशेष, राख आदि को कई प्रकार से काम में लाया जा सकता है; जैसे भराव करने के लिए, सड़क आदि बनाने के लिए अथवा सीमेण्ट आदि बनाने के लिए। वर्तमान परिस्थितियों में घरेलू कूड़े में प्लास्टिक, रबड़ तथा पॉलीथीन जैसी अकार्बनिक वस्तुओं की पर्याप्त मात्रा होती है। इस स्थिति में कूड़े को जलाने पर अत्यधिक पर्यावरण प्रदूषण होता है। अतः कूड़े-करकट को जलाकर ठिकाने लगाना उचित नहीं माना जाता।</p>
<p>2. जल प्रवाह में डालकर &#8211; अब से कुछ काल पूर्व तक कूड़े-करकट के निस्तारण के लिए यही विधि उपयोग में लाई जाती थी जो अत्यन्त हानिकारक है। नदी आदि का जल इस प्रकार के निस्तारण से अत्यधिक दूषित हो जाता है। अत: कूड़े के निस्तारण की यह विधि वर्जित होनी चाहिए।</p>
<p>3. भराव करने के लिए &#8211; गड्ढों अथवा नीची भूमि में भराव करने के लिए कूड़े-कचरे का प्रयोग भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक ही है। विशेषकर ऐसे गड्ढे इत्यादि यदि आवासीय क्षेत्र में हैं तो इनसे निकली गैसें आदि अनेक रोगों का कारण बन सकती हैं। इससे कुछ सीमा तक बचाव के लिए कूड़े के ऊपर मिट्टी की तह बनाई जा सकती है। फिर भी इस प्रकार का भराव केवल आवासीय क्षेत्र से दूर के क्षेत्र में ही किया जाना चाहिए।</p>
<p>4. खाद बनाना-कूड़े &#8211; कचरे में जो कार्बनिक पदार्थ होते हैं, उनको खाद बनाने के लिए खाद के गड्ढों में डाला जाता है। इसको मिट्टी की तहों के बीच-बीच में दबाया जाता है। इस प्रकार, एक उत्तम प्रकार की खाद, कम्पोस्ट खाद तैयार होती है। इस विधि से कूड़े-करकट को उपयोगी पदार्थ में बदला जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में घर के साधारण कूड़े के अतिरिक्त गाय, भैंस आदि पशुओं का कूड़ा (गोबर आदि) भी होता है। इनका कूड़ा अलग तरीके से विसर्जित किया जाना चाहिए। इसके लिए व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि ये पदार्थ किसी एक स्थान पर अधिक समय तक एकत्रित न रहें। उपले थपवा देने, खाद बनाने के लिए गड्ढे में डाल देना आदि व्यवस्था सामान्य तथा पुरानी है। आजकल गोबर आदि से बायो गैस बनाने का कार्यक्रम, कूड़े-करकट के निस्तारण का एक वैज्ञानिक तरीका है।</p>
<p>5. छंटाई करके इस्तेमाल करना &#8211; घरेलू कूड़े-करकट के विसर्जन का एक उपाय कूड़े-करकट की छंटाई करके विभिन्न प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल करना भी है। इस उपाय के अन्तर्गत खाद के अतिरिक्त प्लास्टिक आदि को पुनः इस्तेमाल किया जाता है।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
घरेलू मल विसर्जन के क्या-क्या तरीके हैं? कौन-सी प्रणाली उत्तम है और क्यों?<br />
अथवा<br />
जल-संवहन विधि से आप क्या समझती हैं? इसके द्वारा मल विसर्जन का वर्णन कीजिए।<br />
अथवा<br />
शहरों में वाहित मल का विसर्जन किस प्रकार होता है? स्पष्ट कीजिए।<br />
अथवा<br />
जल-संवहन विधि के शौचालय पर प्रकाश डालिए।<br />
उत्तरः<br />
घरेलू मल निस्तारण (Disposal of Excreta) &#8211;<br />
सामान्यत: नगर या कस्बे में रहने वाले व्यक्तियों को घर पर ही मल-मूत्र विसर्जन की व्यवस्था करना अब आवश्यक हो गया है। गाँवों में प्राचीनकाल की भाँति मल विसर्जन की कोई समस्या नहीं है। स्थानाभाव, आबादी की वृद्धि तथा व्यक्ति की व्यस्तता के अनुसार इस दशा में घरों पर शौचालयों की व्यवस्था, उनकी बनावट तथा एकत्रित मल को ठिकाने लगाने की अनेक प्रकार से व्यवस्था की जाती रही है। पारम्परिक से लेकर आधुनिक तरीकों तक निम्नलिखित चार विधियाँ प्रचलित हैं &#8211;</p>
<p>1. मल उठाकर ले जाने की विधि &#8211; छोटे नगरों, कस्बों आदि में इसी प्रकार की व्यवस्था होती है। शौचालय में परिवार का प्रत्येक व्यक्ति मल त्याग करता है जो किसी बर्तन (pot) में एकत्रित होता है। सफाई कर्मचारी दिन में एक या दो समय आकर मल को उठाकर ले जाता है तथा नगरपालिका द्वारा स्थापित खत्ते में डाल देता है। सामान्यतः इस खत्ते से खाद बनाया जाता है।</p>
<p>मल विसर्जन की यह विधि सामान्य है तथा किसी प्रकार से भी अच्छी नहीं कही जा सकती। सफाई कर्मचारी की लापरवाही अनेक बार इसको और भी विकृत रूप दे देती है। मल को शुष्क अवस्था में न ले जाना, नाली आदि में बहाना, कम सफाई आदि के कारण यह विधि वातावरण को दुर्गन्धयुक्त तथा अस्वास्थ्यकर बनाती है। दूसरी ओर, सफाई कर्मचारी के द्वारा मल उठाकर ले जाना किसी प्रकार भी मानवीय कार्य प्रतीत नहीं होता। इसलिए इस प्रणाली को अब लगभग समाप्त किया जा चुका है।</p>
<p>2. सण्डास विधि &#8211; इस विधि के अन्तर्गत शौचालय में एक गहरा गड्ढा खोदकर इसके ऊपर बैठने के लिए एक सीट लगाई जाती है, जहाँ बैठकर मल त्याग किया जाता है। इस गड्ढे को साफ करने की कोई व्यवस्था नहीं होती, अत: यह गड्ढा धीरे-धीरे भरने लगता है। यह विधि किसी भी प्रकार से ठीक नहीं मानी जा सकती क्योंकि इससे सड़न एवं दुर्गन्ध पैदा होती है जो वातावरण को दूषित करने के साथ-साथ विभिन्न रोगों को भी उत्पन्न करती है।</p>
<p>3. जल-संवहन विधि &#8211; सभी आधुनिक व बड़े नगरों में घरेलू मल विसर्जन के लिए जल-संवहन विधि को अपनाया जाता है। यह एक उत्तम विधि है। इस विधि से गन्दगी एवं दुर्गन्ध पर नियन्त्रण पाया जा सकता है।</p>
<p>इस विधि के अन्तर्गत घर पर एक व्यवस्थित शौचालय बनाया जाता है। शौचालय में मल त्यागने के लिए एक सीट लगाई जाती है जिसका सम्बन्ध भूमिगत पाइप द्वारा एक मुख्य पाइप से होता है जो शहर से बाहर तक जाता है। मल त्याग करने के उपरान्त सीट के पीछे लगे फ्लश सिस्टम से अधिक मात्रा में पानी छोड़ा जाता है। पानी के बहाव के साथ मल-मूत्र भी मुख्य पाइप में बह जाता है तथा शौचालय पूर्णतया स्वच्छ रहता है। नगर के बाहर एक स्थान पर इस मल को सड़ाकर खाद बना लिया जाता है जो कृषि कार्यों में बहुत उपयोगी होता है।</p>
<p>पहले कुछ नगरों में इस प्रकार से मल को बहाकर नगर के पास बहने वाली किसी नदी में मिला दिया जाता था, परन्तु अब इसे अच्छा नहीं माना जाता क्योंकि इससे नदियों का जल दूषित होता है। वास्तव में, घरेलू मल विसर्जन के लिए यह विधि सामान्यतः सभी प्रकार से उपयुक्त है, किन्तु इस विधि को केवल वहीं प्रयोग किया जा सकता है जहाँ पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध होता है तथा इसका प्रबन्ध व्यवस्थित रूप से नगरपालिका द्वारा किया जाता है।</p>
<p>4. सैप्टिक टैंक विधि &#8211; घरेलू मल-विसर्जन के लिए उपर्युक्त सार्वजनिक जल-संवहन के स्थान पर स्थानीय सैप्टिक टैंक विधि का भी प्रयोग किया जा सकता है। सैप्टिक टैंक बनाने के लिए एक गहरा गड्ढा बनाया जाता है जो ऊपर से बन्द होता है, केवल विषैली गैसों के निकलने के लिए इसके ऊपर एक पाइस लगा दिया जाता है। सैप्टिक टैंक में मल को कीड़े खाते रहते हैं अथवा इसका अपघटन (decomposition) हो जाता है तथा पानी जमीन में रिसता रहता है अथवा नाली से बाहर जाता है। यह टैंक कई वर्षों तक कार्य करता रहता है। कुछ वर्षों के बाद एक बार सफाई करवा देने से पुनः उतने ही समय के लिए टैंक कार्य कर सकता है। इस टैंक के साथ भी घर का शौचालय हर प्रकार से स्वच्छ एवं दुर्गन्धरहित रूप में कार्य करता है।</p>
<p>उपर्युक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि घरेलू मल विसर्जन की चारों विधियों में जल-संवहन विधि सर्वोत्तम है क्योंकि इसमें शौचालय पूर्णतया स्वच्छ रहता है और दुर्गन्ध भी नहीं फैलती तथा मल भूमिगत पाइपों द्वारा बहकर शहर से बाहर चला जाता है।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 11 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
गोबर का सबसे अच्छा उपयोग आप किस प्रकार करेंगी? समझाइए।<br />
उत्तरः<br />
गोबर का उत्तम उपयोग &#8211;<br />
पारम्परिक रूप से हमारे देश में गोबर को उपले आदि बनाकर जलाने के काम में लिया जाता था। इसके धुएँ आदि में उपस्थित विषैली गैसें फैलती थीं, साथ ही उन कार्बनिक पदार्थों की हानि होती थी जिनका प्रयोग अत्यधिक उपयोगी पदार्थों के रूप में किया जा सकता है। कुछ स्थानों पर इसका उपयोग खाद बनाने के लिए भी किया जाता रहा है।</p>
<p>गोबर का सबसे अच्छा उपयोग है इसको बायो गैस संयन्त्र में डालकर बायो गैस प्राप्त करना। इस प्रकार एक शक्तिशाली ईंधन, प्रकाश के लिए ऊर्जा का साधन प्राप्त हो जाता है। यही नहीं, शेष बचा हुआ पदार्थ अत्यन्त उपयोगी खाद के रूप में प्रयोग होता है।</p>
<p>स्पष्ट है कि गोबर का बायो गैस उत्पादक के रूप में उपयोग सबसे अच्छा है।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
घर की स्वच्छता एवं स्वास्थ्य में बाधक कीटों के रूप में मक्खी तथा मच्छर का सामान्य विवरण दीजिए।<br />
उत्तरः<br />
(क) मक्खी मक्खी गन्दगी में उत्पन्न होती है तथा सामान्य रूप से यह गन्दगी में रहना ही पसन्द करती है। एक मादा मक्खी एक बार में 100-500 अण्डे देती है। ये अण्डे छोटे, लम्बे तथा सिगार के आकार के होते हैं। इनका रंग सफेद व चमकीला होता है। जल्दी ही इनसे लारवा निकलता है जो बाद में प्यूपा बनकर मक्खी के रूप में बदल जाता है। बरसात के दिनों में गोबर, मल, कूड़ा-करकट इत्यादि के आस-पास इनका जन्म अधिक होता है, अतः इन्हें रोकने के लिए सफाई रखना अत्यन्त आवश्यक है। मक्खियों को नष्ट करने के लिए गन्दगी पर नियन्त्रण करना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त घरों से मक्खियों को समाप्त करने के लिए विभिन्न उपाय किए जा सकते हैं जैसे कि मक्खी मारने की औषधियों का छिड़काव।</p>
<p>(ख) मच्छर मच्छर की उत्पत्ति अण्डे से होती है। मादा मच्छर ठहरे हुए पानी के आस-पास अण्डे देती है। इसके अण्डे समूह में होते हैं। एक बार में एक मादा मच्छर 100-500 तक अण्डे देती है। बाद में अण्डों से लारवा तथा प्यूपा अवस्था बनती है और फिर मच्छर उत्पन्न होते हैं। इनके निवारण के लिए आस-पास पानी को रुकने नहीं देना चाहिए और यदि कहीं पानी रुका हुआ हो, तो उसके ऊपर मिट्टी का तेल डाल देना चाहिए। नाली, पानी के गड्ढे, टैंक, कूलर तथा अन्य स्थानों पर यदि पानी नहीं रुकेगा तो मच्छर भी पैदा नहीं होंगे।</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
घर के गन्दे पानी को निकालने के लिए क्या उपाय करना चाहिए?<br />
उत्तरः<br />
घर के गन्दे पानी को निकालने के लिए नगरपालिका और नगरवासियों को आपसी सहयोग करना अनिवार्य है। घर के अन्दर नालियों की उचित व्यवस्था होनी आवश्यक है ताकि इसमें पानी न रुके। पक्के फर्श ढालू होने चाहिए, विशेषकर स्नानघर, रसोईघर आदि स्थानों के फर्श। घर की सभी नालियों को मिलाकर एक मुख्य नाली के द्वारा गली या सड़क की नाली से जोड़ देना चाहिए। प्रत्येक नाली के ऊपर जाली होनी आवश्यक है ताकि कूड़ा-करकट नालियों में न भरने पाए और पानी न रुकने पाए। नालियों को कभी-कभी फिनायल से साफ करवा देना चाहिए। एक से अधिक मंजिल वाले मकानों में निचली मंजिलों तक गन्दा पानी लाने के लिए प्लास्टिक या सीमेण्ट के पाइप का प्रयोग होना चाहिए। खुले पतनाले किसी भी हालत में उचित नहीं।</p>
<p>घर के गन्दे पानी को बाहर निकाल देना ही काफी नहीं है। बल्कि गन्दे पानी को निकालने की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि यह घर से बाहर पहुँचे और सार्वजनिक नाली से मिल जाए। इस प्रकार, जहाँ नगर अथवा कस्बे में सार्वजनिक नालियाँ हैं वहाँ गन्दे पानी की निकासी की समस्या स्वयं ही सुलझ जाती है किन्तु इनके अभाव में घर के बाहर गहरा .पक्का गड्ढा या सोकिंग पिट (socking pit) बनवा देना आवश्यक होगा। इनकी सफाई की भी व्यवस्था होनी चाहिए; ताकि इनमें मक्खी, मच्छर इत्यादि न पनप सकें।</p>
<p>प्रत्येक अवस्था में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कहीं भी पानी बेकार न बिखरे और न ही अधिक समय तक रुके।</p>
<p>प्रश्न 4.<br />
सुलभ शौचालय से आप क्या समझती हैं? इसके महत्त्व को समझाइए।<br />
अथवा<br />
सुलभ शौचालय से क्या आशय है?<br />
अथवा<br />
टिप्पणी लिखिए-सुलभ शौचालय।<br />
उत्तरः<br />
सुलभ शौचालय की योजना एक राष्ट्रीय योजना है तथा इसका परिचालन केन्द्र सरकार द्वारा किया जाता है। इस योजना का उद्देश्य देश भर से मनुष्य द्वारा मैला ढोने की प्रथा का पूर्ण उन्मूलन तथा आदर्श शौचालय उपलब्ध कराना है।</p>
<p>सुलभ शौचालय सैद्धान्तिक रूप से सैप्टिक टैंक विधि के ही समान है, परन्तु इस विधि के अन्तर्गत जो टैंक बनाया जाता है वह पक्का नहीं होता; अतः शौचालय का समस्त पानी जमीन में ही सोख लिया जाता है तथा कीड़ों द्वारा मल को समाप्त कर दिया जाता है। इस विधि में किसी प्रकार की विषैली एवं दुर्गन्धपूर्ण गैस भी नहीं बनती; अत: वातावरण के प्रदूषण का भी भय नहीं रहता। इस गड्ढे से दूषित पानी भी बाहर नहीं निकलता। अत: यह एक उत्तम एवं आदर्श शौचालय है।</p>
<p>सुलभ शौचालय बनाने के लिए केन्द्र सरकार तथा विश्व बैंक की ओर से विशेष अनुदान की व्यवस्था है। अत: सुलभ शौचालय बनवाने पर लागत भी बहुत कम आती है।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 11 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
घर के कूड़े को कहाँ एकत्र करना चाहिए?<br />
उत्तरः<br />
घर के कूड़े को एक ढक्कनदार कूड़ेदान में एकत्र करना चाहिए।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
कूड़े-कचरे के अन्तिम विसर्जन की मुख्य विधियाँ कौन-कौन सी हैं?<br />
उत्तरः<br />
कूड़े-कचरे के अन्तिम विसर्जन की मुख्य विधियाँ हैं &#8211;</p>
<ul>
<li>जलाना</li>
<li>जल में प्रवाहित करना</li>
<li>गड्ढों में भराव करना</li>
<li>खाद बनाना तथा</li>
<li>छंटाई करके इस्तेमाल करना।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 3.<br />
मल-मूत्र के विसर्जन की किस प्रणाली को सर्वोत्तम माना जाता है?<br />
उत्तरः<br />
जल-संवहन प्रणाली को मल-मूत्र के विसर्जन की सर्वोत्तम प्रणाली माना जाता है।</p>
<p>प्रश्न 4.<br />
मल-मूत्र विसर्जन की जल-संवहन विधि के स्थानीय स्वरूप को क्या कहते हैं?<br />
उत्तरः<br />
सैप्टिक टैंक विधि।</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
वर्तमान समय में गोबर का सर्वोत्तम उपयोग क्या माना जाता है?<br />
उत्तरः<br />
वर्तमान समय में गोबर का सर्वोत्तम उपयोग है-गोबर से बायोगैस बनाना।</p>
<p>प्रश्न 6.<br />
घर से गन्दे पानी की निकासी के लिए किस प्रकार की नालियाँ होनी चाहिए?<br />
उत्तरः<br />
घर से गन्दे पानी की निकासी के लिए पक्की, ढलावदार तथा ढकी हुई नालियाँ होनी चाहिए।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 11 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए &#8211;<br />
1. घर के समस्त कूड़े को एकत्र करना चाहिए &#8211;<br />
(क) घर के किसी कोने में<br />
(ख) कूड़ेदान में<br />
(ग) सड़क पर<br />
(घ) पड़ोसियों के घर के सामने।<br />
उत्तरः<br />
(ख) कूड़ेदान में।</p>
<p>2. घरेलू कूड़े की समस्या के पूर्ण समाधान का उपाय क्या है &#8211;<br />
(क) घर में कूड़ा फैलने न दें<br />
(ख) कूड़े को घर से निकालने की समुचित व्यवस्था करें<br />
(ग) सभी घरों से निकलने वाले कूड़े को नष्ट करने के उपाय करें<br />
(घ) उपर्युक्त सभी उपाय आवश्यक हैं।<br />
उत्तरः<br />
(घ) उपर्युक्त सभी उपाय आवश्यक हैं।</p>
<p>3. भारत सरकार द्वारा शौचालय की किस योजना के लिए अनुदान दिया जाता है &#8211;<br />
(क) जल-संवहन विधि<br />
(ख) सैप्टिक टैंक विधि<br />
(ग) सुलभ शौचालय योजना<br />
(घ) उपर्युक्त सभी के लिए।<br />
उत्तरः<br />
(ग) सुलभ शौचालय योजना।</p>
<p>4. गोबर का सर्वोत्तम वैज्ञानिक उपयोग क्या है &#8211;<br />
(क) कण्डे बनाना<br />
(ख) कच्चे घर को लीपना<br />
(ग) गड्ढों में भर देना<br />
(घ) बायोगैस बनाना।<br />
उत्तरः<br />
(घ) बायोगैस बनाना।</p>
<p>5. मक्खियों द्वारा कौन-सा रोग फैलता है<br />
(क) चेचक<br />
(ख) हैजा<br />
(ग) टाइफॉइड<br />
(घ) मलेरिया।<br />
उत्तरः<br />
(ख) हैजा।</p>
<h4><a href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science/">UP Board Solutions for Class 11 Home Science</a></h4>
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		<item>
		<title>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 19 भारतीय परिवार और उसके प्रत्येक सदस्य की भूमिका</title>
		<link>https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science-chapter-19/</link>
					<comments>https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science-chapter-19/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Prasanna]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 04 May 2025 06:18:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 11]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 19 भारतीय परिवार और उसके प्रत्येक सदस्य की भूमिका (Indian Family and the Role Played by its Each Member) UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 19 भारतीय परिवार और उसके प्रत्येक सदस्य की भूमिका UP Board Class 11 Home Science Chapter 19 विस्तृत ... <a title="UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 19 भारतीय परिवार और उसके प्रत्येक सदस्य की भूमिका" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science-chapter-19/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 19 भारतीय परिवार और उसके प्रत्येक सदस्य की भूमिका">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 19 भारतीय परिवार और उसके प्रत्येक सदस्य की भूमिका (Indian Family and the Role Played by its Each Member)</p>
<h2>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 19 भारतीय परिवार और उसके प्रत्येक सदस्य की भूमिका</h2>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 19 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
भारतीय परिवार की मुख्य विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।<br />
अथवा<br />
भारतीय परिवार का क्या अर्थ है? भारतीय परिवार में विभिन्न सदस्यों की भूमिकाओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।<br />
अथवा<br />
भारतीय परिवार की कौन-सी विशेषताएँ होती हैं? विस्तारपूर्वक लिखिए।<br />
अथवा<br />
भारतीय परिवार की क्या विशेषताएँ हैं? उन पर प्रकाश डालिए।<br />
उत्तरः<br />
भारतीय परिवार की विशेषताएँ (Characteristics of Indian Family) &#8211;<br />
परिवार एक सामाजिक संस्था है। समाज के धार्मिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मूल्य तथा सामाजिक परिस्थितियाँ परिवार की विशेषताओं एवं आदर्शों को निर्धारित करती हैं। यही कारण है कि विश्व के विभिन्न समाजों में विद्यमान परिवारों के स्वरूप एवं विशेषताओं में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। भारतीय समाज के परिवार की कुछ मौलिक विशेषताएँ हैं, जो उसे पाश्चात्य समाज के परिवार से भिन्न प्रमाणित करती हैं। भारतीय समाज पारम्परिक रूप से आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख रहा है। यही कारण है कि भारतीय परिवार भी कुछ मौलिक विशेषताओं से युक्त है। पारम्परिक भारतीय परिवार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं</p>
<p>1. संयुक्त परिवार प्रणाली-पारम्परिक भारतीय परिवार की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि हम संयुक्त रूप से रहकर &#8216;संयुक्त कुटुम्ब प्रणाली&#8217; का पालन करते हैं। संयुक्त परिवार में तीन अथवा तीन से अधिक पीढ़ियों के सदस्य एक साथ रहते हैं। इस प्रणाली के अन्तर्गत माँ-बाप, बच्चे, चाचा-चाची, भाई-भतीजे, बहन आदि मिलकर रहते हैं तथा एक ही साथ रहकर भोजन की व्यवस्था होती है। इस प्रणाली का सबसे बड़ा सिद्धान्त &#8216;संगठन&#8217; है, जिसके अन्तर्गत सभी सदस्य मिल-जुलकर अपने-अपने उद्देश्यों की प्राप्ति करते हैं।</p>
<p>भारतीय संयुक्त परिवार के आशय को डॉ० इरावती कर्वे ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है“संयुक्त परिवार उन व्यक्तियों का एक समूह है, जो साधारणतया एक मकान में रहते हैं, जो एक रसोई में पका भोजन करते हैं, जो सामान्य सम्पत्ति के स्वामी होते हैं और जो सामान्य उपासना में भाग लेते हैं तथा जो किसी-न-किसी प्रकार से एक-दूसरे के रक्त सम्बन्धी होते हैं।”</p>
<p>2. पितृसत्तात्मक परिवार-हमारे भारतीय परिवार का मुखिया प्रारम्भ से ही पुरुष रहा है तथा उसे ही पूरे परिवार की सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना पड़ता है। ऐसे परिवार को पितृसत्तात्मक परिवार कहते हैं।</p>
<p>आदिम काल में परिवार की देखभाल तथा जिम्मेदारी माता पर निर्भर रहती थी, अत: उसे मातृसत्तात्मक परिवार कहते थे। कुछ क्षेत्रों में; जैसे कि मालाबार इत्यादि में आज भी इस प्रकार की परिवार प्रणाली विद्यमान है जहाँ कि परिवार की सभी जिम्मेदारियाँ माता पर निर्भर हैं।</p>
<p>3. परिवार में स्त्रियों का उच्च स्थान-भारतीय परिवार के अन्तर्गत प्रारम्भ से ही स्त्री को सर्वोच्च एवं सम्मान का स्थान प्रदान किया गया है। परिवार में स्त्री तथा पुरुष को समान अधिकार प्राप्त होते हैं। महर्षि मनु ने स्त्रियों की महत्ता निम्नलिखित रूप में बताई है &#8211;</p>
<p>“जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवताओं का वास होता है; जहाँ स्त्रियों की पूजा नहीं होती, वहाँ के सारे कार्य विफल होते हैं; तथा जहाँ स्त्रियाँ तंग की जाती हैं, दुःखी की जाती हैं, वहाँ परिवार बिल्कुल नष्ट हो जाते हैं।&#8221;</p>
<p>इस प्रकार हम कह सकते हैं कि परिवार में स्त्रियों को उच्च स्थान प्रदान करना भारतीय परिवार की एक विशेषता है।</p>
<p>4. संस्कारों एवं आदर्शों को प्राथमिकता-परिवार का गठन विवाह पर आधारित होता है। भारतीय समाज में विवाह एक पवित्र बन्धन एवं धार्मिक संस्कार है, न कि सामाजिक समझौता। इस स्थिति में भारतीय परिवार में संस्कारों एवं आदर्शों को भी विशेष महत्त्व दिया जाता है।</p>
<p>5. भारतीय परिवार का उच्च उद्देश्य-पारम्परिक रूप से भारतीय परिवार में जीवन के उच्च उद्देश्यों को प्राथमिकता दी जाती है। भारतीय परिवार में आध्यात्मिकता का विशेष महत्त्व है। परिवार में सन्तान के आदर्श, पालन-पोषण तथा महान संस्कारों को ध्यान में रखा जाता है। वास्तव में भारतीय परिवार पुरुषार्थों की प्राप्ति का केन्द्र ही है।</p>
<p>6. अतिथि सत्कार भारतीय परिवार में अतिथि को सबसे महान व्यक्ति का दर्जा दिया गया है। जब वह घर में आता है तो उसका आदर सत्कार उच्च रीति से किया जाता है तथा इसमें केवल शिष्टाचार का ही पालन नहीं किया जाता बल्कि अपने को सौभाग्यशाली मानकर उसकी सेवा की जाती है।</p>
<p>7. पारस्परिक अधिकार एवं कर्तव्य-भारतीय परिवार के सदस्यों में एक-दूसरे के प्रति अधिकारों एवं कर्तव्यों की भावना पायी जाती है। बड़े, छोटों को स्नेह देते हैं, उनका समाजीकरण करते हैं तथा यथासम्भव उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयास करते हैं। छोटे, बड़ों का सम्मान करते हैं तथा उनकी आज्ञा का पालन करते हैं।</p>
<p>उपर्युक्त विवरण द्वारा पारम्परिक भारतीय परिवार की मुख्य विशेषताएँ स्पष्ट हो जाती हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि आधुनिक परिस्थितियों में भारतीय परिवार पर पाश्चात्य संस्कृति का गम्भीर प्रभाव पड़ा है तथा इस प्रभाव के परिणामस्वरूप भारतीय परिवार की पारम्परिक विशेषताओं में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है।</p>
<p>(नोट&#8211;भारतीय परिवार के विभिन्न सदस्यों की भूमिकाओं के विवरण के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 1, 2 तथा 3 का उत्तर देखें।)</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
&#8220;व्यक्ति के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास परिवार के विभिन्न सदस्यों पर निर्भर है।&#8221; इस कथन की पुष्टि कीजिए।<br />
अथवा<br />
&#8220;गृह वातावरण व्यक्तित्व निर्माण में विशेष रूप से सहायक है।&#8221; इस कथन की पुष्टि कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
व्यक्ति के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास परिवार के विभिन्न सदस्यों या घर के वातावरण पर निर्भर रहना &#8211;<br />
बालक परिवार में पैदा होता है। उसके व्यक्तित्व के विकास से परिवार के अन्य सदस्यों का गहरा सम्बन्ध होता है तथा बालक पर उन सदस्यों का पूरा-पूरा प्रभाव पड़ता है। बालक के व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करने वाले पारिवारिक कारकों का विवरण निम्नलिखित है &#8211;</p>
<p>1. माता-पिता का प्रभाव-परिवार में व्यक्ति/बालक के व्यक्तित्व पर सबसे अधिक प्रभाव उसके माता-पिता का पड़ता है। जिस प्रकार का माता-पिता का स्वभाव, चरित्र एवं पारस्परिक सम्बन्ध होते हैं, उसी प्रकार से बालक के व्यक्तित्व का विकास होता है।</p>
<p>माता-पिता के दमन की प्रक्रिया के कारण तथा प्यार के अभाव में बालक दब्बू बन जाता है। वह एकान्तप्रिय हो जाता है और कल्पना की दुनिया में विचरण करने लगता है। इस प्रकार माता-पिता के अनुचित व्यवहार से बालक के व्यक्तित्व का विकास ठीक से नहीं हो पाता। बहुत-से माता-पिता बच्चों को गाली से सम्बोधित करके बातें करते हैं। इससे बालक पर बुरा प्रभाव पड़ता है।</p>
<p>इसके विपरीत कुछ माता-पिता अपने बच्चों को अत्यधिक प्यार करते हैं और अपने बच्चों की प्रत्येक कठिनाई दूर करने के लिए चिन्तित रहते हैं, जिससे बच्चा अधिक परावलम्बी हो जाता है। उसमें स्वतन्त्र इच्छा-शक्ति बिल्कुल नहीं रहती। उसमें आत्म-निर्भरता के गुण का अभाव हो जाता है। उसका व्यक्तित्व भी ठीक से विकसित नहीं होता है। अतः कहा जा सकता है कि अधिक लाड़-प्यार भी बच्चे को बिगाड़ देता है।</p>
<p>माता-पिता के पारस्परिक सम्बन्धों; आचरणों तथा विचारों का प्रभाव भी उनके बच्चों पर कम नहीं पड़ता। जो माँ-बाप स्वयं दिन-रात लड़ाई-झगड़ा करते हैं, एक-दूसरे को गालियाँ दिया करते हैं या अनुचित आचरण करते हैं, उनका अनुकरण उनके बच्चे जानबूझकर और उत्सुकतापूर्वक करते हैं। यदि माता-पिता सदाचरण द्वारा बच्चे के समक्ष अच्छे आदर्श प्रस्तुत करते हैं तो बच्चे अच्छे बनेंगे।</p>
<p>2. जन्म-क्रमका प्रभाव &#8211; बालक के व्यक्तित्व पर उसके जन्म-क्रम का भी प्रभाव पड़ता है। बच्चा जब इकलौता होता है तो उसकी सुविधाओं एवं उपलब्ध वस्तुओं में हिस्सा बँटाने वाला कोई नहीं होता। इससे बालक जहाँ एक ओर अत्यधिक परावलम्बी हो जाता है, वहाँ वह निर्दयी भी हो जाता है। कुछ वर्षों तक अकेला रहने के बाद दूसरे बच्चे के जन्म लेने पर वह उसके प्रति ईर्ष्यालु हो सकता है। इसी प्रकार सबसे छोटा बच्चा परिवार में सदा बबुआ ही बने रहने की कोशिश करता है। संक्षेप में कह सकते हैं कि सबसे बड़े बच्चे में लड़ने-झगड़ने तथा नेतागीरी करने की प्रवृत्ति कम होती है तथा आत्म-चिन्तन एवं एकान्तप्रियता का गुण अधिक होता है। बीच के बच्चे तथा छोटे साधारण रहते हैं। इकलौते बच्चे लड़ाकू, जिद्दी, प्रेम के बाह्य प्रदर्शन के इच्छुक और विचारों में अस्थिर होते हैं।</p>
<p>3. परिवार के टूटने का प्रभाव &#8211; परिवार के टूट जाने का भी बच्चे के व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ता है। माता की मृत्यु हो जाने पर सौतेली माता के साथ रहना या तलाक के कारण माता-पिता का परिवर्तन हो जाना आदि अवस्थाओं में यदि सौतेली माता अथवा सौतेले पिता का व्यवहार उचित नहीं होता अथवा बालकों को छोटी-छोटी बातों के लिए डाँट या मार सहनी पड़ती है तथा अवहेलना और ताड़ना का सामना करना पड़ता है तो बालक के मन और मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। जो बालक दब्बू होते हैं, वे चिड़चिड़े, एकान्तप्रिय और कल्पनाओं में खोए रहने वाले बन जाते हैं। जो बालक साहसी और उग्र स्वभाव के होते हैं, वे अपराधी प्रवृत्ति के हो जाते हैं। प्राय: वे घर से भाग भी जाते हैं। ऐसे बालकों के व्यक्तित्व का समुचित विकास बहुत ही कम हो पाता है।</p>
<p>4. भाई-बहन का प्रभाव &#8211; भाई-बहनों के आचरण का भी बालक पर प्रभाव पड़ता है। यदि परिवार का बड़ा बच्चा दबंग और उद्दण्ड बन जाता है तो परिवार के दूसरे बच्चों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है क्योंकि बच्चे बड़ों का अनुसरण करते हैं।</p>
<p>इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति (बालक) के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास परिवार के सदस्यों तथा पारिवारिक वातावरण पर निर्भर होता है।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 19 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
परिवार में पत्नी (माता) की भूमिका स्पष्ट कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
परिवार में पत्नी (माता) की भूमिका &#8211;<br />
हिन्दू विवाह एक धार्मिक संस्कार माना जाता है। इस संस्कार में बँधकर पत्नी पति को विशेष सम्मान एवं महत्त्व प्रदान करती है। परिवार में घर से बाहर का कार्य पति की जिम्मेदारी पर और घर के अन्दर के कार्यों की देख-रेख पत्नी पर रहती है। आजकल आवश्यकता पड़ने पर पत्नी धनोपार्जन में भी सहयोग देती है।</p>
<p>गृहस्वामिनी के रूप में घर के सब कार्यों को भली प्रकार करना उसका पुनीत कर्त्तव्य है। अपने सास-ससुर की सेवा करना तथा अपने स्वभाव की सरलता के द्वारा एक आदर्श नारी की भूमिका को निभाना भी उसका महत्त्वपूर्ण कर्तव्य है।</p>
<p>माता के रूप में; स्वस्थ सन्तान की उत्पत्ति करना, उसकी सेवा करना, उसका लालन-पालन करना व उसकी प्रतिदिन की आवश्यकताओं की पूर्ति करना, जिससे परिवार में अच्छे बालक और सुयोग्य नागरिक विकसित हो सकें; उसका कर्तव्य है। स्त्री का कर्त्तव्य एक आदर्श पत्नी, आदर्श वधू और आदर्श माँ बनने का होना चाहिए, जिसके अनुसार वह परिवार में अपनी यह सब भूमिका भली प्रकार से निभा सके। सम्मिलित परिवार में तो पत्नी को सबके साथ रहना पड़ता है; अतः उसे अपनी कार्यकुशलता व मधुर स्वभाव से आदर्श वातावरण का निर्माण करना चाहिए। परिवार में पत्नी को एक अन्य भूमिका भी निभानी पड़ती है, यह है-नियन्त्रक की भूमिका। पत्नी को जहाँ एक ओर बच्चों को पारिवारिक मूल्यों के अनुसार नियन्त्रित रखना होता है, वहीं दूसरी ओर अपने पति को भी अनेक क्षेत्रों में विचलित होने से बचाना होता है।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
परिवार में पति (पिता) की भूमिका स्पष्ट कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
परिवार में पति (पिता) की भूमिका &#8211;<br />
परिवार का जन्म मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु हुआ है, जिसमें पति, जिसको कि दूसरे शब्दों में घर का मुखिया भी कहा जाता है, को महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी की भूमिका निभानी पड़ती है। मुखिया वह स्तम्भ होता है, जिस पर पूरे परिवार का ढाँचा खड़ा रहता है और इस स्तम्भ अथवा मुखिया का मुख्य काम पूरे परिवार के लिए भोजन, वस्त्र, मकान व सुरक्षा सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। साथ ही सामाजिक प्रतिष्ठा तथा भौतिक सुरक्षा की व्यवस्था करना भी उसी का धर्म एवं कर्त्तव्य है।</p>
<p>व्यक्ति के रूप में वह पिता है, उसको अपने बच्चों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना और उनकी पूर्ति करना होता है। अपनी आय को अपने परिवार पर खर्च करना ही उसका परम कर्त्तव्य है।</p>
<p>पति के रूप में पत्नी की आवश्यकताओं को समझना और गृहस्थी के लिए सब साधन जुटाना उसका कर्त्तव्य है। गृहस्थी के भिन्न-भिन्न कार्यों में रुचि लेना और स्त्री के साथ पूर्ण सहयोग देना होता है। इसके अतिरिक्त, पति को घर का मुखिया होने के नाते अनेक प्रकार के उत्तरदायित्वों को समझना होता है। उसे दूर के तथा निकट के नाते-रिश्तेदारों के साथ अपने सम्बन्ध बनाए रखने तथा समय-समय पर अपने सम्बन्धियों की सहायता के लिए तैयार रहना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, सामान्य रूप से पुरुष ही समाज में परिवार का प्रतिनिधित्व करता है। अत: इस रूप में भी पुरुष को विशिष्ट दायित्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ती है।</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
परिवार में बच्चों एवं अन्य सदस्यों की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
परिवार में बच्चों एवं अन्य सदस्यों की भूमिका &#8211;<br />
प्रत्येक परिवार में पुत्र और पुत्रियों का भिन्न-भिन्न कर्त्तव्य समझा जाता है। सन्तान-रहित परिवार की कल्पना तो असम्भव-सी प्रतीत होती है। प्रत्येक परिवार में; विशेषकर हिन्दू परिवार में पुत्र का न होना नरक में जाने की भाँति पाप समझा जाता है, यद्यपि यह एक अन्धविश्वास-मात्र है। प्रत्येक दम्पती की यही हार्दिक इच्छा होती है कि पुत्र का जन्म हो तथा वह पढ़-लिखकर गुणवान बनकर उनके बुढ़ापे का सहारा बन सके तथा वंश की रक्षा कर सके। पढ़ा-लिखाकर युवावस्था में उसकी शादी एक अच्छी कन्या के साथ कर दी जाती है।</p>
<p>इसी प्रकार पुत्रियों को भी परिवार में विशेष स्थान दिया गया है। उन्हें उचित शिक्षा देकर भविष्य के लिए एक अच्छी गृहिणी के रूप में तैयार किया जाता है। प्राचीन काल में तो कन्याओं को देवी की तरह पूजा जाता था तथा अब भी विशेष अवसरों पर उन्हें देवी की तरह पूजा जाता है। आगे चलकर ये पुत्रियाँ ही किसी की पत्नी, पुत्रवधू आदि के रूप में गृह की नैया को पार लगाती हैं। इस प्रकार सन्तान की परिवार .&#8217; में प्रमुख भूमिका है।</p>
<p>वर्तमान परिवर्तित परिस्थितियों में पुत्र एवं पुत्रियों द्वारा लगभग समान भूमिका निभाई जाती है। यह माना जाता है कि पुत्र एवं पुत्रियों को पढ़-लिखकर परिवार के कल्याण में यथासम्भव योगदान देना चाहिए।</p>
<p>पारम्परिक भारतीय परिवार में पति-पत्नी, सन्तान के अतिरिक्त, संयुक्त परिवार प्रणाली के आधार पर परिवार के अन्य सदस्य; जैसे भाई, भतीजा, चाचा, चाची, ताऊ, ताई आदि भी होते हैं, जिनकी अपनी अलग-अलग भूमिका होती है। इन सदस्यों को अपनी सामर्थ्य, शक्ति एवं आयु के अनुकूल पारिवारिक गतिविधियों में समुचित योगदान अवश्य ही देना चाहिए। परिवार के सभी सदस्यों की सहयोगपूर्ण भूमिका अति अनिवार्य होती है।</p>
<p>इस प्रकार सम्पूर्ण परिवार को सुखी और समृद्धशाली बनाने हेतु परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपने-अपने कर्तव्य का पालन करना अनिवार्य है।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 19 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
पारम्परिक रूप से भारत में किस प्रकार के परिवार अधिक पाए जाते थे?<br />
उत्तरः<br />
पारम्परिक रूप से भारत में संयुक्त परिवार अधिक पाए जाते थे।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
सत्ता के दृष्टिकोण से भारत में किस प्रकार के परिवार पाए जाते हैं?<br />
उत्तरः<br />
सत्ता के दृष्टिकोण से भारत में मुख्य रूप से पितृसत्तात्मक परिवार पाए जाते हैं।</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
भारतीय परिवार में स्त्रियों की स्थिति कैसी है?<br />
उत्तरः<br />
भारतीय परिवार में स्त्रियों की सम्मानजनक स्थिति है।</p>
<p>प्रश्न 4.<br />
वर्तमान नगरीय परिवारों में स्त्री की भूमिका में क्या उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है?<br />
उत्तरः<br />
वर्तमान नगरीय परिवारों में स्त्रियाँ परिवार के लिए धनोपार्जन के लिए भी यथासम्भव कार्य करने लगी हैं।</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
भारतीय परिवार में पुरुष की क्या स्थिति है?<br />
उत्तरः<br />
भारतीय परिवार में पुरुष को मुखिया माना जाता है।</p>
<p>प्रश्न 6.<br />
बच्चों के व्यक्तित्व पर सर्वाधिक प्रभाव किसका पड़ता है?<br />
उत्तरः<br />
बच्चों के व्यक्तित्व पर सर्वाधिक प्रभाव माता-पिता का पड़ता है।</p>
<p>प्रश्न 7.<br />
विघटित परिवार का बच्चों के व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ता है?<br />
उत्तरः<br />
विघटित परिवार के बच्चों का व्यक्तित्व असामान्य हो जाता है।</p>
<p>प्रश्न 8.<br />
माता-पिता के बीच तनाव का बच्चों पर क्या दुष्प्रभाव पड़ सकता है?<br />
उत्तरः<br />
माता-पिता के बीच तनाव का बच्चों के सामान्य विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है उनका व्यक्तित्व क्रमश: असामान्य होने लगता है।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 19 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए &#8211;<br />
1. भारतीय परिवार की विशेषता है &#8211;<br />
(क) संयुक्त परिवार प्रणाली का प्रचलन<br />
(ख) पितृसत्तात्मक परिवार<br />
(ग) संस्कारों एवं आदर्शों को प्राथमिकता<br />
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ।<br />
उत्तरः<br />
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ।</p>
<p>2. परिवार में स्त्री की भूमिका होती है &#8211;<br />
(क) पत्नी के रूप में<br />
(ख) माता के रूप में<br />
(ग) गृहिणी के रूप में<br />
(घ) उपर्युक्त सभी रूपों में।<br />
उत्तरः<br />
(घ) उपर्युक्त सभी रूपों में।</p>
<p>3. परिवार में मुखिया का कर्तव्य है &#8211;<br />
(क) खाना बनाना<br />
(ख) पैसे देना<br />
(ग) बच्चों को पढ़ाना<br />
(घ) सभी सदस्यों का ध्यान रखना।<br />
उत्तरः<br />
(घ) सभी सदस्यों का ध्यान रखना।</p>
<p>4. निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषता भारतीय परिवार की नहीं है &#8211;<br />
(क) यौन-सम्बन्ध<br />
(ख) रक्त सम्बन्ध<br />
(ग) सामाजिक असुरक्षा की भावना पैदा करना<br />
(घ) नैतिक मूल्यों का ज्ञान देना।<br />
उत्तरः<br />
(ग) सामाजिक असुरक्षा की भावना पैदा करना।</p>
<h4><a href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science/">UP Board Solutions for Class 11 Home Science </a></h4>
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		<title>UP Board Solutions for Practical Home Science प्रयोगात्मक गृह विज्ञान सम्बन्धी मौखिक प्रश्नोत्तर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Prasanna]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 30 Apr 2025 12:22:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 11]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Practical  Home Science प्रयोगात्मक गृह विज्ञान सम्बन्धी मौखिक प्रश्नोत्तर (Viva Voce Regarding Practical Home Science) UP Board Solutions for Practical Home Science प्रयोगात्मक गृह विज्ञान सम्बन्धी मौखिक प्रश्नोत्तर प्रश्न 1. गृहिणी को पाक-कला का ज्ञान होना क्यों आवश्यक है? उत्तरः गृहिणी के ज्ञान व कार्य कुशलता का प्रभाव परिवार के सदस्यों ... <a title="UP Board Solutions for Practical Home Science प्रयोगात्मक गृह विज्ञान सम्बन्धी मौखिक प्रश्नोत्तर" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/practical-home-science-viva-voce/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Practical Home Science प्रयोगात्मक गृह विज्ञान सम्बन्धी मौखिक प्रश्नोत्तर">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Practical  Home Science प्रयोगात्मक गृह विज्ञान सम्बन्धी मौखिक प्रश्नोत्तर (Viva Voce Regarding Practical Home Science)</p>
<h2>UP Board Solutions for Practical Home Science प्रयोगात्मक गृह विज्ञान सम्बन्धी मौखिक प्रश्नोत्तर</h2>
<p>प्रश्न 1.<br />
गृहिणी को पाक-कला का ज्ञान होना क्यों आवश्यक है?<br />
उत्तरः<br />
गृहिणी के ज्ञान व कार्य कुशलता का प्रभाव परिवार के सदस्यों पर पड़ता है। प्रत्येक खाद्य पदार्थ में मनुष्य के शरीर की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले तत्त्व उपस्थित रहते हैं परन्तु यह गृहिणी के ही ज्ञान पर निर्भर करता है कि वह उनका अधिक-से-अधिक लाभ, परिवार के सदस्यों को पहुँचा सके। यह उसके खाद्य पदार्थों के चुनाव व भोजन पकाने के ऊपर निर्भर करता है। उसको यह देखना चाहिए कि परिवार के किस सदस्य को किस प्रकार का भोजन देना है जिससे प्रत्येक व्यक्ति को उसकी शारीरिक आवश्यकता एवं रुचि के अनुसार पोषक तत्त्व मिल सकेंगे और कोई तत्त्व पकाने पर व्यर्थ नहीं जा सकेगा। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि गृहिणी को पाक-कला का ज्ञान होना अनिवार्य है।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
भोजन पकाने की कौन-कौन सी विधियाँ हैं?<br />
उत्तरः<br />
1. उबालना (Boiling) &#8211; चावल व पत्ते वाली हरी तरकारियों को उबालकर पकाया जाता है। इन खाद्य सामग्रियों को पानी में उबालकर उनका पानी फेंक देने से उनके पोषक तत्त्व निकल जाते हैं। ऐसे पदार्थों में पानी की मात्रा कम रखनी चाहिए। आलू, अरवी, रतालू को छिलके सहित साबुत उबालना चाहिए।<br />
2. भाप से पकाना (Steaming) &#8211; यह विधि सर्वोत्तम है। भाप से पकाया गया भोजन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक, सुपाच्य व स्वादिष्ट होता है।<br />
3. तलना (Frying) &#8211; कुछ खाद्य पदार्थों को तलकर बनाया जाता है। तलना दो प्रकार का होता है &#8211;</p>
<ul>
<li>उथली चिकनाई &#8211; थोड़ी-सी चिकनाई को कड़ाही, तवे या फ्राइपैन में डालकर पदार्थों को बनाया जाता है, जैसे-आलू की टिकिया, डोसे, पराँठे, ऑमलेट, चीले आदि।</li>
<li>गहरी चिकनाई &#8211; कढ़ाई में अधिक चिकनाई डालकर पदार्थों को पकाया या तला जाता है, जैसे-पूड़ी, कचौड़ी, समोसे, मठरी, पकौड़ी, पापड़, जिमीकन्द, पनीर आदि।</li>
</ul>
<p>4. भूनना तथा सेंकना (Roasting and Baking) &#8211; कुछ खाद्य पदार्थों को गर्म बालू के माध्यम से भूनकर पकाया जाता है; जैसे &#8211; आलू, बैंगन, शकरकन्दी, चना, मक्का, मुरमुरे, मटर, ज्वार, खीलें, मूंगफली आदि। कुछ अन्य पदार्थों को गर्म वायु के ताप पर सेंका जाता है; जैसे &#8211; तन्दूर की रोटी, कोयले पर डालकर सेंका गया फुलका, नानखताई, कबाब, बिस्कुट, डबलरोटी आदि। इस विधि द्वारा पदार्थों को बनाने से पोषक तत्त्व कम नष्ट होते हैं तथा भोजन स्वादिष्ट और सुपाच्य होता है।</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
भोजन पकाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>भोजन बनाने का स्थान मक्खीरहित तथा हर प्रकार से स्वच्छ होना चाहिए।</li>
<li>गृहिणी के वस्त्र साफ होने चाहिए। केश बँधे हुए रहने चाहिए।</li>
<li>बर्तन व जल साफ होना चाहिए।</li>
<li>सब्जियाँ ताजी व दागरहित होनी चाहिए।</li>
<li>सब्जियों को काटने से पहले साफ जल से धोना चाहिए, काटने के बाद धोने से खनिज लवण व विटामिन का कुछ अंश पानी के साथ निकल जाता है।</li>
<li>सब्जियों को पकाते या उबालते समय उनमें उतना ही पानी डालिए जितना कि सब्जी के लिए पर्याप्त हो। उबली या पकी हुई सब्जी में पानी अधिक होने पर उसका पानी निकाल देने से उसके विटामिन &#8216;C&#8217; व &#8216;B&#8217; और खनिज लवण पानी के साथ घुलकर निकल जाते हैं।</li>
<li>दाल के अनुमान से उसमें उतना ही पानी प्रारम्भ में रखना चाहिए जितने में वह पककर तैयार हो जाए। बीच-बीच में पानी डाल देने से दाल स्वादिष्ट नहीं बनती है तथा देर से गलती है।</li>
<li>प्रेशर कुकर में पतीली की अपेक्षा पानी की मात्रा कम रखिए।</li>
<li>चावलों को पकाने के लिए उतना ही पानी डालिए जितना कि उसमें चावल गलकर पक जाए। चावलों का माँड निकाल देने से विटामिन &#8216;B&#8217; व स्टार्च का अंश निकल जाता है।</li>
<li>सब्जियों व दालों को पकाते समय बेकिंग पाउडर (खाने वाला सोडा) नहीं डालना चाहिए। इससे विटामिन &#8216;B&#8217; नष्ट हो जाता है।</li>
<li>अधिक मसाले व घी का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इनकी अधिकता भोजन को गरिष्ठ बनाती है तथा पाचन-संस्थान में जलन हो सकती है।</li>
<li>सूखी सब्जियों को बनाते समय आग धीमी होनी चाहिए।</li>
<li>दाल, चावल, सब्जी, सूप आदि को ढककर पकाना व उबालना चाहिए।</li>
<li>आटे को छानकर भूसी नहीं निकालनी चाहिए।</li>
<li>घर में सदस्यों की संख्या व आवश्यक मात्रा के अनुसार भोजन पकाना चाहिए। अधिक बना लेने से भोजन व्यर्थ जाता है या बासी भोजन खाना पड़ता है। इससे फिजूलखर्च होता है या स्वास्थ्य की हानि होती है। अत: अनुमान से उचित मात्रा में भोजन बनाना चाहिए।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 4.<br />
भोजन पकाने से क्या लाभ हैं?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>भोजन सुपाच्य हो जाता है; जैसे-चावल, दाल आदि मुलायम हो जाते हैं जो सरलता से पच जाते हैं। स्टार्च वाले पदार्थों के कण फूलकर मुलायम हो जाते हैं; जैसे-आलू, अरवी, चावल आदि चबाने योग्य हो जाते हैं तथा सरलतापूर्वक पचाए जा सकते हैं। .</li>
<li>भोजन स्वादिष्ट बन जाता है। कुछ ही सब्जियों जैसे-मूली, गाजर, टमाटर आदि का प्रयोग कच्चे रूप में किया जा सकता है; शेष सभी को पकाकर बनाने से वे स्वादिष्ट बन जाती हैं। इसी प्रकार दाल, चावल, रोटी सभी खाद्य पदार्थ पकाकर बनाए जाने से स्वादिष्ट होते हैं।</li>
<li>भोजन देखने में आकर्षक लगता है। तैयार किया हुआ भोजन देखने में सुन्दर व सुगन्ध युक्त होता है। इससे भूख उद्दीप्त होती है तथा भोजन भी ठीक प्रकार से पचता है।</li>
<li>भोजन सुरक्षित रहता है, जैसे खोया, दूध, मांस, मुरब्बा, जैम आदि को अच्छी तरह से पका लिया जाए तो ये शीघ्र खराब नहीं होते हैं।</li>
<li>खाद्य पदार्थों को ताप मिलने से उनमें विद्यमान कीटाणु नष्ट हो जाते हैं जिससे रोग होने की आशंका नहीं रहती है। दूध को कभी भी कच्चा नहीं पीना चाहिए।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 5.<br />
आधुनिक युग में रसोई के श्रम व समय के बचाव के लिए कौन-कौन से यन्त्र हैं?<br />
उत्तरः<br />
गैस, प्रेशर कुकर, ग्राइण्डर, मिक्सी, टोस्टर, हीटर, बिजली की केतली, स्टोव, विभिन्न प्रकार के कटर; जैसे-प्याज, सलाद, तरकारी काटने हेतु एवं पूरी व फुलका बेलने की मशीन, रेफ्रिजरेटर आदि।</p>
<p>प्रश्न 6.<br />
प्रेशर कुकर से तरकारी व दाल बनाने से क्या लाभ हैं?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>तरकारी या दाल शीघ्र तैयार हो जाती है जिससे समय व ईंधन की बचत होती है।</li>
<li>इनके पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते हैं।</li>
<li>ये स्वादिष्ट बनती हैं।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 7.<br />
प्रेशर कुकर के प्रयोग में क्या-क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>तरकारी व सब्जी में पानी की आवश्यक मात्रा रखनी चाहिए। पानी कम होने से वस्तु जल जाएगी।</li>
<li>बन्द करते समय ढक्कन के ऐरो के निशान को प्रेशर कुकर पर बने ऐरो के निशान से मिलाकर ढक्कन को अन्दर कीजिए और बन्द कर दीजिए।</li>
<li>पदार्थ के बन जाने पर नीचे उतारकर रख दीजिए, जब वह पूर्ण रूप से ठण्डा हो जाए अर्थात् भाप का दबाव न रहे तब उसको खोलिए।</li>
<li>यदि शीघ्रता में कोई काम करना है तो किसी चमचे आदि से उसका &#8216;वेट&#8217; उठाकर उसकी भाप धीरे-धीरे निकाल दीजिए। गर्म खोलने का प्रयत्न करने से दुर्घटना की आशंका रहती है।</li>
<li>ढक्कन बाहर निकालने के लिए प्रेशर कुकर पर बने &#8216;→&#8217; से &#8216;,&#8217; चिह्नों को मिलाकर तब निकालना चाहिए।</li>
<li>कार्य समाप्त होने पर रबड़ निकालकर साफ कर लेनी चाहिए।</li>
<li>प्रेशर कुकर को विम से साफ करना चाहिए।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 8.<br />
शाकाहारी व मांसाहारी भोजन में क्या अन्तर है?<br />
उत्तरः<br />
जो खाद्य पदार्थ वनस्पति जगत अर्थात् पेड़, पौधों आदि से प्राप्त होते हैं वे शाकाहारी आहार की श्रेणी में आते हैं और जो खाद्य पदार्थ जीव-जन्तुओं के शरीर से प्राप्त किए जाते हैं वे मांसाहारी आहार की श्रेणी में आते हैं। सामान्य रूप से मांस, मछली तथा अण्डा मांसाहार हैं। दूध भले ही पशु जगत से प्राप्त होता है, परन्तु इसे व्यवहार में मांसाहार नहीं माना जाता है।</p>
<p>प्रश्न 9.<br />
भोजन के पोषक तत्त्व हमको किस प्रकार के भोजन से अधिक मिलते हैं?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>ताजे फल व तरकारियों से।</li>
<li>बासी भोजन की अपेक्षा ताजे भोजन से।</li>
<li>सावधानीपूर्वक बनाए गए भोजन से।</li>
<li>प्रोटीन व कार्बोहाइड्रेट्स की अपेक्षा वसा से हमें अधिक कैलोरी मिलती है।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 10.<br />
सब्जियों को किन-किन रूपों में बना सकती हैं?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>सूखी</li>
<li>शोरबेदार</li>
<li>तली व कुरकुरी चिप्स</li>
<li>उबालकर, कुचली हुई</li>
<li>भुरता आदि।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 11.<br />
कार्बोहाइड्रेट्स (स्टार्च और शक्कर) किन-किन सब्जियों से प्राप्त हो सकता है?<br />
उत्तरः<br />
जड़ों और गाँठ वाली सब्जियों में स्टार्च रहता है। आलू, शकरकन्द, अरवी, गाजर, चुकन्दर, मटर, सेम के बीज, रतालू, काशीफल आदि में कार्बोज विद्यमान रहता है।</p>
<p>प्रश्न 12.<br />
शरीर में विटामिन्स की आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए कौन-कौन सी सब्जियों का सेवन करना चाहिए?<br />
उत्तरः<br />
पीले रंग की सब्जियों जैसे गाजर में कैरोटीन तत्त्व से विटामिन &#8216;A&#8217; बनता है। अंकुरित मटर से विटामिन &#8216;B&#8217; की प्राप्ति की जा सकती है। टमाटर, हरी मिर्च, नीबू, पत्ते वाली गोभी आदि में विटामिन &#8216;C&#8217; तथा ऐस्कॉर्बिक एसिड की पर्याप्त मात्रा रहती है। मूंगफली में विटामिन &#8216;D&#8217; व पत्ते वाली सब्जियों में &#8216;E&#8217; और अल्फाफा नामक घास से विटामिन &#8216;K&#8217; तत्त्व की प्राप्ति की जा सकती है।</p>
<p>प्रश्न 13.<br />
हरी सब्जियों में जल का भाग कितना प्रतिशत होता है?<br />
उत्तरः<br />
ताजी सब्जियों में 80% जल का अंश होता है। सूखी सब्जियों जैसे मटर, चने का सूखा हुआ साग आदि में जल की मात्रा कम होती है इसलिए इनको बनाने से पहले पानी में भिगोना आवश्यक होता है।</p>
<p>प्रश्न 14.<br />
मनुष्य के लिए सेलुलोस की क्या आवश्यकता है?<br />
उत्तरः</p>
<p>जो कार्य औषधि के क्षेत्र में विरेचक चूर्ण करता है, वही कार्य भोजन के क्षेत्र में सेलुलोस करता है। यह कब्ज को दूर करता है, मल को शरीर से बाहर निकलने में सहायता करता है। हरे साग, भूसी, पत्ते वाली गोभी आदि से सेलुलोस प्राप्त होता है।</p>
<p>प्रश्न 15.<br />
एक साधारण कार्य करने वाले व्यक्ति को प्रतिदिन कितनी कैलोरी की आवश्यकता होती है?<br />
उत्तरः<br />
2300 से 3000 तक प्रतिदिन कैलोरी की आवश्यकता होती है।</p>
<p>प्रश्न 16.<br />
एक बोझा ढोने वाले व्यक्ति को कितनी कैलोरी की आवश्यकता होती है?<br />
उत्तरः<br />
3500 से 4000 कैलोरी की आवश्यकता होती है।</p>
<p>प्रश्न 17.<br />
एक गर्भवती स्त्री की प्रतिदिन कैलोरी की माँग क्या है?<br />
उत्तरः<br />
3600 से 4000 तक प्रतिदिन कैलोरी की आवश्यकता होगी।</p>
<p>प्रश्न 18.<br />
एक मानसिक कार्य करने वाले व्यक्ति के भोजन में कौन-कौन से तत्त्व होने चाहिए?<br />
उत्तरः<br />
मानसिक कार्य करने वाले व्यक्ति को मुख्य रूप से प्रोटीन, वसा, खनिज लवण तथा विटामिन्सयुक्त भोजन की आवश्यकता होती है। इसीलिए उसे दूध, मक्खन, अण्डा, फल, दालें आदि भोज्य पदार्थ देने चाहिए।</p>
<p>प्रश्न 19.<br />
ऊर्जा उत्पादक पदार्थ कौन-कौन से होते हैं?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>कार्बोहाइड्रेट (स्टार्च तथा शर्करा)-गेहूँ, मक्का, चना, बाजरा, जौ, आलू, अरवी, कच्चा केला, शकरकन्द आदि।</li>
<li>शर्करा-चीनी, खाँड, गुड़, गन्ना, शहद, विभिन्न मिठाइयाँ, जैम तथा मुरब्बा, अंगूर, अंजीर आदि।</li>
<li>वसा-सूखे मेवे, मछली का तेल, मूंगफली, मक्खन, घी, गोला, तेल आदि।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 20.<br />
शरीर निर्माणक पदार्थों के नाम बताइए।<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>प्रोटीन-समस्त प्रकार की दालें, अण्डा, मांस, सोयाबीन, दूध, दही, पनीर, मक्खन आदि।</li>
<li>खनिज लवण-कैल्सियम, फॉस्फोरस, लोहा, दूध, केला, अंजीर, पनीर, आइसक्रीम, हरी सब्जियाँ, पालक, दालें, सूखे मेवे आदि।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 21.<br />
गाँठ वाली सब्जी कौन-कौन सी होती हैं?<br />
उत्तर<br />
अरवी, आलू, जिमीकन्द, शकरकन्द, मूंगफली आदि।</p>
<p>प्रश्न 22<br />
पर्त वाली सब्जियों के नाम बताइए।<br />
उत्तरः<br />
लहसुन, प्याज आदि।</p>
<p>प्रश्न 23.<br />
जड़ों वाली कौन-कौन सी सब्जियाँ होती हैं?<br />
उत्तरः<br />
शकरकन्दी, शलजम, मूली, चुकन्दर, गाजर आदि।</p>
<p>प्रश्न 24.<br />
फल वाली कौन-कौन सी सब्जियाँ होती हैं?<br />
उत्तरः<br />
बैंगन, लौकी, तोरई, भिण्डी, परमल, टमाटर, मिर्च, कच्चा केला, खीरा, नीबू आदि।</p>
<p>प्रश्न 25.<br />
अचार को किस प्रकार सुरक्षित रखा जा सकता है?<br />
उत्तरः<br />
अचार का मसाला तैयार कर लेने के पश्चात् उसमें थोड़ा सोडियम बेंजोएट डाल देने से या अधिक समय तक धूप में रखा रहने से अचार सुरक्षित रहता है। नमक व तेल की मात्रा ठीक होने से अचार खराब नहीं होता है। थोड़ा सिरके (एसिटिक एसिड) की मात्रा डालने से भी ठीक रहता है।</p>
<p>प्रश्न 26.<br />
अचार को धूप में क्यों रखा जाता है?<br />
उत्तरः<br />
जो बैक्टीरिया व फफूंदी अचार को खराब करते हैं वे धूप की गर्मी से नष्ट हो जाते हैं जिससे पदार्थ सुरक्षित रहता है।</p>
<p>प्रश्न 27.<br />
अचार के प्रति क्या-क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>सीलन से बचाना चाहिए।</li>
<li>अन्न के हाथ अचार के मर्तबान में नहीं डालने चाहिए।</li>
<li>ढक्कन बन्द रखना चाहिए।</li>
<li>कभी-कभी धूप में रख देना चाहिए।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 28.<br />
मर्तबान का निःसंक्रमण करना क्यों आवश्यक है?<br />
उत्तरः<br />
पदार्थों को खराब करने वाले बैक्टीरिया को नष्ट करना आवश्यक है।</p>
<p>प्रश्न 29.<br />
कौन-कौन से हानिकारक पदार्थ हैं जो अचार,मुरब्बावस्क्वेशकोखराबकरते हैं?<br />
उत्तरः<br />
पदार्थों को सड़ाने वाले बैक्टीरिया और फफूंदी हैं।</p>
<p>प्रश्न 30.<br />
अचार के लिए कैसे नीब लेंगी?<br />
उत्तरः<br />
दागरहित पीले रंग वाले, दबाने पर कुछ नर्म व बड़े होने चाहिए।</p>
<p>प्रश्न 31.<br />
अचार बनाते समय किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>नमक व तेल की मात्रा कम नहीं होनी चाहिए।</li>
<li>फल का चुनाव सही होना चाहिए।</li>
<li>बर्तन का नि:संक्रमण अवश्य कर लेना चाहिए।</li>
<li>मसाले घर पर तैयार किए हुए होने चाहिए।</li>
<li>फल व बर्तन में नमी नहीं होनी चाहिए।</li>
<li>अन्न के हाथ मसाले व फल में नहीं लगने चाहिए।</li>
<li>मसाले सही अनुपात में डालने चाहिए।</li>
<li>मीठा अचार बनाने के लिए चीनी की मात्रा 40% से कम नहीं होनी चाहिए।</li>
<li>तेल बढ़िया किस्म का होना चाहिए।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 32.<br />
Eye test किसे कहते हैं?<br />
उत्तरः<br />
जैली में बड़े-बड़े बबूले पड़ने लगें तथा उनका रंग सफेद दिखाई दे तो समझिए कि जैली तैयार हो गई है। इसे ही Eye test कहते हैं।</p>
<p>प्रश्न 33.<br />
Sheet test किस प्रकार तैयार करते हैं?<br />
उत्तरः<br />
कलछी में जैली लेकर उसकी डण्डी की ओर लाइए और उसको थोड़ी देर हवा में रखकर देखना चाहिए कि वह जमकर एक पतली चादर के रूप में बन जाएगी। यदि बूंद-बूंद करके गिरे और जरा भी जमे नहीं तो समझना चाहिए कि जैली अभी तैयार नहीं हुई है। इसे ही Sheet test कहते हैं।</p>
<p>प्रश्न 34.<br />
अच्छी जैली की क्या पहचान है?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>जैली का रंग सुर्ख लाल-भूरा सा होना चाहिए।</li>
<li>जैली पारदर्शक होनी चाहिए।</li>
<li>जिस पात्र में जमा दी जाए उसी का आकार ग्रहण करे।</li>
<li>फल की मौलिक सुगन्ध होनी चाहिए।</li>
<li>छूने पर उँगली पर नहीं चिपकनी चाहिए।</li>
<li>चाकू से काटने पर चाकू में चिपके नहीं व उसके किनारे साफ करें।</li>
<li>बोतल को उलटने पर जैली गिरे नहीं।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 35.<br />
जैली को कब बर्तन में भरना चाहिए?<br />
उत्तरः<br />
जैली के तैयार हो जाने के पश्चात् गर्म-गर्म बोतल में भरते हैं। बोतल में डालते समय उसे किसी लकड़ी के टुकड़े या कपड़े की गद्दी पर रख लेना चाहिए। ऐसा न करने पर बोतल टूट जाएगी।</p>
<p>प्रश्न 36.<br />
गर्म पदार्थ भरने पर बोतल क्यों टूट जाती है?<br />
उत्तरः<br />
गर्म पदार्थ भरने पर अन्दर का तापक्रम अधिक होगा और बाहर का कम व नीचे ठण्डक होने के कारण उसमें असमान प्रसार होने के कारण वह चटक जाती है।</p>
<p>प्रश्न 37.<br />
खोया व छेने में क्या अन्तर है?<br />
उत्तरः<br />
खोया दूध को गाढ़ा करके तथा दूध के जलांश को लगभग समाप्त करके बनाया जाता है और छेना दूध को फाड़कर दूध का प्रोटीन अलग करके बनाया जाता है।</p>
<p>प्रश्न 38.<br />
लौकी व गाजर कसने के पश्चात् जो पानी निकलता है उसका आप क्या करेंगी?<br />
उत्तरः<br />
सब्जी में डाल लेंगे या आटा गूंधने में पानी के स्थान पर प्रयोग करेंगे।</p>
<p>प्रश्न 39.<br />
खीर स्वास्थ्य के लिए कैसी रहती है?<br />
उत्तरः<br />
खीर स्वास्थ्यवर्द्धक तथा स्वादिष्ट व्यंजन है। यह sweet dish के रूप में प्रयुक्त की जा सकती है। जिन बच्चों को दूध से अरुचि हो जाती है उनके लिए दूध की मात्रा शरीर में पहुँचाने का अच्छा साधन है।</p>
<p>प्रश्न 40.<br />
मशीन में कोई खराबी हो जाएगी तो आप किस प्रकार दूर करेंगी?<br />
उत्तरः<br />
सर्वप्रथम हम देखेंगे कि मशीन के पुर्जे में किस प्रकार की खराबी है। साधारण घुमाव-फिराव देकर ठीक करने का स्वयं प्रयास करेंगे। जहाँ तक सम्भव हो सकेगा उसे दूर करने की भरसक चेष्टा करेंगे।</p>
<p>प्रश्न 41.<br />
सुई में यदि धागा ठीक नहीं डाला जाएगा तो क्या होगा?<br />
उत्तरः<br />
थोड़ी-सी मशीन चलाने पर ही उसका धागा बार-बार टूटता रहेगा।</p>
<p>प्रश्न 42.<br />
बॉबिन में धागा डालते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>बॉबिन अधिक ऊपर तक नहीं भरना चाहिए।</li>
<li>धागे के तनाव को ठीक रखने के लिए धागे को बॉबिन बाइण्डर टेंशन ऐंगिल के बीच से होकर निकालना चाहिए।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 43.<br />
बॉबिन केस में लगे पेंच का क्या काम है?<br />
उत्तरः<br />
यह बॉबिन में भरे हुए धागे के तनाव को ठीक रखता है। जब नीचे की बखिया कसी या ढीली आती है तब इस पेंच को कसा व ढीला किया जाता है।</p>
<p>प्रश्न 44.<br />
बॉबिन ठीक न लगने की क्या पहचान है?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>मशीन चलाने पर वह अपने स्थान से हटकर नीचे गिर जाता है।</li>
<li>ऊपर धागा नहीं आता है।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 45.<br />
पतले वस्त्र सिलने के लिए कितने नम्बर का धागा व सुई का प्रयोग किया जाता है?<br />
उत्तरः<br />
100 से 150 नम्बर का सूती धागा और 9 नम्बर की सुई का प्रयोग करना चाहिए।</p>
<p>प्रश्न 46.<br />
सिल्क, लिलन, जार्जट आदि सिलने के लिए कितने नम्बर का धागा व सुई प्रयुक्त की जाती है?<br />
उत्तरः<br />
24 से 30 नम्बर का रेशमी धागा और 80 से 100 नम्बर का सूती धागा तथा 12, 13, 14 नम्बर की सुई प्रयोग में लानी चाहिए।</p>
<p>प्रश्न 47.<br />
साधारण सूती वस्त्र सिलने के लिए कितने नम्बर का धागा व सुई की आवश्यकता है?<br />
उत्तरः<br />
60 से 80 नम्बर का सूती धागा तथा 14 नम्बर की सुई की आवश्यकता होती है।</p>
<p>प्रश्न 48.<br />
मशीन की बखिया या सिलाई खराब आ रही है तो आप क्या करेंगी?<br />
उत्तरः<br />
सर्वप्रथम ध्यान से देखेंगे कि किधर के धागे पर तनाव अधिक है। यदि ऊपर की ओर तनाव अधिक है तो थ्रेड टेंशन डिवाइडर को ढीला करेंगे। यदि नीचे की ओर वाले धागे का तनाव अधिक है तो बॉबिन केस में एक बारीक पेंच होता है उसे ढीला कर देंगे। फिर एक रफ कपड़े पर बखिया की परीक्षा करेंगे।</p>
<p>प्रश्न 49.<br />
किन कारणों से मशीन की सुई टूट जाया करती है?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>यदि सुई कपड़े के अनुकूल नहीं है।</li>
<li>नीडिल बार स्क्रू ठीक से कसा न होने पर सुई निकलकर टूट जाती है।</li>
<li>कपड़ा निकालते समय नीडिल बार ऊँचा न किया गया हो।</li>
<li>नीचे का पुर्जा खोलकर सफाई आदि करने के पश्चात् यदि वह दोबारा ठीक से नहीं लगता है तब भी सुई टूटने का कारण बन जाता है।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 50.<br />
ऊपर का धागा किस कारण से टूटता है?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>यदि ऊपर का धागा ठीक से न डाला गया हो।</li>
<li>स्पूल पिन में अटक जाने पर धागा टूट जाता है।</li>
<li>शटल केस में कपड़े के रेशे इकट्ठे हो जाने पर।</li>
<li>सुई टेढ़ी होने पर।</li>
<li>रफ क्वालिटी का धागा प्रयोग करने पर।</li>
<li>सुई ठीक से फिट न होने पर।</li>
<li>ऊपर के धागे का तनाव अधिक होने पर।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 51.<br />
यदि सिलाई करते समय कपड़ा इकट्ठा हो रहा हो तो किस प्रकार ठीक करेंगी?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>कपड़े के समान महीन बखिया करेंगे।</li>
<li>धागे के तनाव को ठीक करने के लिए थ्रेड टेंशन डिवाइडर में लगे स्क्रू को ढीला कर देंगे।</li>
<li>शटल केस में मैल या कपड़े के धागे जमा होने पर निकालकर सफाई कर देंगे।</li>
<li>फीड डाग (feed dog) की अच्छी तरह से सफाई कर देंगे।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 52.<br />
सिलाई करते समय धागे का गुच्छा क्यों बनता है?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>धागे का तनाव ढीला होने से।</li>
<li>ऊपर का धागा ठीक से न डाला गया हो।</li>
<li>बॉबिन केस का पेंच ढीला हो गया हो।</li>
<li>बॉबिन केस में लगी हुई पत्ती अपने स्थान से अधिक ऊँचाई पर उठ जाने पर।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 53.<br />
मशीन भारी कब चलती है?<br />
उत्तरः</p>
<ul>
<li>तेल न डालने पर।</li>
<li>फीड डाग में कपड़े या धागे के रेशे अटक जाने पर।</li>
<li>बॉबिन केस में धागा अटक जाने पर।</li>
<li>बॉबिन वाइण्डर के फ्लाई व्हील से लग जाने पर।</li>
<li>सफाई न करने पर।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 54.<br />
मशीन का प्रयोग करते समय किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए?<br />
उत्तरः<br />
मशीन का प्रयोग करने के लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए &#8211;</p>
<ul>
<li>मशीन में नियमित रूप से समय-समय पर तेल डालते रहना चाहिए।</li>
<li>रबड़ और रिंगों पर तेल नहीं पड़ना चाहिए।</li>
<li>मशीन के प्रयोग के अतिरिक्त उसे ढककर रखना चाहिए।</li>
<li>सुई को लगाते समय स्क्रू को अच्छी तरह से कस देना चाहिए।</li>
<li>बॉबिन को अधिक ऊपर तक मत भरिए।</li>
<li>ऊपर और नीचे वाले धागे को ठीक प्रकार से डालना चाहिए।</li>
<li>सिलाई प्रारम्भ करने से पहले किसी कपड़े पर जाँच कर लीजिए।</li>
<li>बहुत मोटे कपड़े को महीन सुई से मत सिलिए वरना सुई टूट जाएगी।</li>
<li>सिलाई करते समय कपड़े को मत खींचिए।</li>
<li>मशीन के पहिये को उल्टी तरफ मत चलाइए।</li>
<li>सिलाई करने के पश्चात् प्रेशर फुट को ऊँचा करके रखिए।</li>
<li>कपड़े को बाएँ हाथ की तरफ रखिए।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 55.<br />
मशीन में तेल डालने से क्या लाभ हैं?<br />
उत्तरः<br />
मशीन में तेल डालने से निम्नलिखित लाभ हैं &#8211;</p>
<ul>
<li>मशीन हल्की चलती है।</li>
<li>पुर्जे कम घिसते हैं।</li>
</ul>
<h4><a href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science/">UP Board Solutions for Class 11 Home Science</a></h4>
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		<title>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 9 व्यक्तिगत स्वास्थ्य : शारीरिक स्वच्छता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Prasanna]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 29 Apr 2025 09:23:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 9 व्यक्तिगत स्वास्थ्य : शारीरिक स्वच्छता (Individual Health: Cleanliness of Body) UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 9 व्यक्तिगत स्वास्थ्य : शारीरिक स्वच्छता UP Board Class 11 Home Science Chapter 9 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर प्रश्न 1. व्यक्तिगत स्वास्थ्य से क्या तात्पर्य है? इसकी ... <a title="UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 9 व्यक्तिगत स्वास्थ्य : शारीरिक स्वच्छता" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science-chapter-9/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 9 व्यक्तिगत स्वास्थ्य : शारीरिक स्वच्छता">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 9 व्यक्तिगत स्वास्थ्य : शारीरिक स्वच्छता (Individual Health: Cleanliness of Body)</p>
<h2>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 9 व्यक्तिगत स्वास्थ्य : शारीरिक स्वच्छता</h2>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 9 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
व्यक्तिगत स्वास्थ्य से क्या तात्पर्य है? इसकी देख-रेख तथा रक्षा के क्या उपाय किए जाने चाहिए?<br />
अथवा<br />
व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए शारीरिक स्वच्छता क्यों आवश्यक है? सविस्तार लिखिए।<br />
अथवा<br />
व्यक्तिगत स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए आप किन-किन नियमों का पालन करेंगी?<br />
अथवा<br />
व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के प्रति किस प्रकार से सजग रहना चाहिए?<br />
अथवा<br />
व्यक्तिगत स्वच्छता क्या है?<br />
अथवा<br />
टिप्पणी लिखिए-व्यक्तिगत स्वच्छता क्यों आवश्यक है?<br />
अथवा<br />
दैनिक जीवन में व्यक्तिगत स्वच्छता के महत्त्व का वर्णन कीजिए।<br />
उत्तर:<br />
स्वास्थ्य : व्यक्तिगत स्वास्थ्य (Health : Individual Health) &#8211;<br />
&#8216;स्वास्थ्य&#8217; को सामान्यत: रोग से मुक्त अवस्था समझा जाता है। वास्तव में, रोगमुक्त शरीर का हृष्ट-पुष्ट तथा बलशाली भी होना आवश्यक है। यह जीवन का एक विशेष गुण है जिसके अनुसार व्यक्ति सर्वोत्तम जीवन व्यतीत करता है तथा सर्वाधिक क्रिया करने के लिए समर्थ रहता है। अत: शरीर के विभिन्न अंगों की बनावट व क्रियाओं की सर्वोत्तम दशा तथा उनके कार्यों के करने की शक्ति का समुचित सन्तुलन ही स्वास्थ्य है।</p>
<p>इसके अतिरिक्त, व्यक्ति का मानसिक एवं संवेगात्मक सन्तुलन भी उसके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक कारक होता है। शारीरिक रूप से स्वस्थ होते हुए भी यदि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से असन्तुलित या असामान्य हो तो उस व्यक्ति को पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं माना जाएगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वास्थ्य के अर्थ को इन शब्दों में स्पष्ट किया है, &#8220;शरीर की रोगों से मुक्त दशा स्वास्थ्य नहीं है, व्यक्ति के स्वास्थ्य में तो उसका सम्पूर्ण शारीरिक, मानसिक एवं संवेगात्मक कल्याण निहित है।&#8221; प्रस्तुत कथन के आधार पर कहा जा सकता है कि व्यक्तिगत स्वास्थ्य अपने आप में एक बहुपक्षीय अवधारणा है। स्वास्थ्य का सम्बन्ध व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक तथा संवेगात्मक पक्षों से है। उसी व्यक्ति को पूर्ण रूप से स्वस्थ माना जाएगा जो क्रमशः शारीरिक, मानसिक तथा संवेगात्मक रूप से पूर्ण स्वस्थ हो।</p>
<p>व्यक्तिगत स्वास्थ्य : देख-रेख तथा रक्षा (Individual Health : Care and Protection)<br />
अथवा<br />
व्यक्तिगत स्वास्थ्य रक्षा के नियम (Rules of Individual Hygiene) &#8211;<br />
व्यक्तिगत स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए निम्नलिखित नियमों का ध्यान रखना होगा &#8211;</p>
<p>1. नियमबद्धता &#8211; अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक है कि दैनिक कार्यों को नियमानुसार किया जाए। उदाहरणार्थ-समय पर शौच आदि से निवृत्त होना, नाश्ता या भोजन समय से करना, व्यायाम नियमानुसार नित्यप्रति करना, समय पर सोना, समय से उठना आदि अनेक कार्य प्रतिदिन समय से करने होते हैं।</p>
<p>2. शारीरिक स्वच्छता &#8211; सम्पूर्ण शरीर की नियमित स्वच्छता स्वास्थ्य की दृष्टि से अति आवश्यक है अन्यथा अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो सकते हैं। शारीरिक स्वच्छता के अभाव में विभिन्न संक्रामक रोगों के रोगाणु शरीर के सम्पर्क में आते रहते हैं तथा व्यक्ति रोगग्रस्त हो सकता है। इसके अतिरिक्त, मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी शारीरिक-स्वच्छता आवश्यक है। शारीरिक स्वच्छता के लिए निम्नलिखित अंगों की स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए &#8211;</p>
<p>(क)त्वचा की स्वच्छता &#8211; त्वचा की सफाई प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है किन्तु भारतवर्ष जैसे गर्म देश में तो यह और भी अधिक आवश्यक है क्योंकि यहाँ अधिक पसीना आता है। पसीना एक दूषित पदार्थ है और इसमें अनेक पदार्थ; जैसे &#8211; उपचर्म की टूटी-फूटी कोशिकाएँ, धूल के कण आदि के अतिरिक्त अनेक जीवाणु भी फंस जाते हैं तथा इन पदार्थों को सड़ाते हैं। इससे दुर्गन्ध आने लगती है तथा अनेक प्रकार के चर्म रोग उत्पन्न हो जाते हैं।</p>
<p>त्वचा की सफाई के लिए स्नान करना आवश्यक है। इससे त्वचा के छिद्र खुल जाते हैं और पसीना निकलता रहता है। त्वचा से गन्दगी हट जाने से बीमारियों की आशंका नहीं रहती है। स्नान करते समय शरीर को साबुन आदि से साफ करना अच्छा रहता है। शरीर को रगड़ना भी आवश्यक है ताकि इसकी मालिश हो सके। इससे शरीर में रक्त का संचार सुचारु बना रहता है।</p>
<p>(ख) मुँह तथा दाँतों की स्वच्छता &#8211; मुँह को स्वच्छ करना आवश्यक है क्योंकि भोजन इत्यादि के टुकड़े दाँतों में अथवा अन्य स्थानों पर रुक जाते हैं जो बाद में सड़ने लगते हैं। फलस्वरूप जीवाणु अपना घर बना लेते हैं, जो भोजन के साथ आहार नाल में चले जाते हैं तथा विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न कर सकते हैं। वैसे भी मुँह में अम्ल (तेजाब) बन जाने से दाँतों का इनेमल (पॉलिश) खराब हो जाता है।</p>
<p>मुंह एवं दाँतों की स्वच्छता के लिए भोजन या नाश्ते के बाद भली भाँति कुल्ला करना आवश्यक है। प्रातः शौच के बाद दाँतों को अच्छे मंजन, दातून या ब्रुश इत्यादि से साफ करना चाहिए। रात्रि को सोने से पूर्व भी दाँतों तथा मुँह की पूर्ण सफाई आवश्यक है।</p>
<p>(ग) नाखूनों की स्वच्छता &#8211; नाखूनों के अन्दर किसी प्रकार की गन्दगी नहीं रहनी चाहिए क्योंकि भोजन के साथ इनमें उपस्थित रोगों के कीटाणु, जीवाणु आदि आहार नाल में पहुँचकर विकार उत्पन्न करेंगे। नाखूनों को काटते रहना चाहिए अथवा ब्रुश इत्यादि से भली-भाँति साफ करना चाहिए।</p>
<p>(घ) बालों की स्वच्छता &#8211; बालों को स्वच्छ रखने के लिए इनको धोना आवश्यक है। धूल, मैल, पसीना आदि पदार्थ इससे साफ हो जाते हैं। साबुन, रीठा, बेसन आदि पदार्थों को बाल धोने के लिए प्रयोग में लाने से अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। सिर के बालों को गन्दा रखने से उनमें आदि होने का भय रहता है जिससे सिर में घाव भी हो सकते हैं तथा अन्य रोग भी होने की सम्भावना रहती है।</p>
<p>(ङ) आँखों की स्वच्छता &#8211; आँखों की स्वच्छता तथा सुरक्षा के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना आवश्यक है &#8211;</p>
<ul>
<li>आँखों को धूल, मिट्टी, गन्दगी आदि से बचाना चाहिए।</li>
<li>आँखों को गन्दे वस्त्र आदि से साफ नहीं करना चाहिए।</li>
<li>कोई वस्तु या धूल इत्यादि गिर जाने पर आँखों को मलना नहीं चाहिए बल्कि पानी से साफ करना चाहिए।</li>
<li>चेहरे को साफ रखना चाहिए और धोते समय स्वच्छ जल के छीटें आँखों में लगाने चाहिए।</li>
<li>कम या अत्यधिक तेज रोशनी से आँखों को बचाना चाहिए। अध्ययन करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।</li>
<li>आँखों के किसी भी साधारण रोग के होते ही उचित उपचार करना चाहिए। इसमें किसी प्रकार की लापरवाही नहीं करनी चाहिए।</li>
</ul>
<p>(च) नाक की स्वच्छता &#8211; नाक के अन्दर से निकले हुए तरल श्लेष्मक में गन्दगी एकत्रित होती है। प्रतिदिन इसे अच्छी प्रकार साफ कर देना चाहिए। नाक की नियमित सफाई से हमारा श्वसन-तन्त्र स्वच्छ रहता है तथा श्वसन-तन्त्र सम्बन्धी रोगों की प्राय: आशंका नहीं रहती।</p>
<p>(छ) कानों की स्वच्छता-कान की भित्ति के अन्दर एक प्रकार का तरल पदार्थ निकलता रहता है जो बाहरी पदार्थों को अपने अन्दर उलझाकर अन्दर जाने से रोकता है। इसी कारण कान में मैल एकत्रित होता है। इसको सरसों का तेल डालकर रुई की फुरहरी से साफ करना चाहिए।</p>
<p>(ज) वस्त्रों की स्वच्छता-शारीरिक स्वच्छता के लिए जहाँ एक ओर शरीर के विभिन्न अंगों को स्वच्छ रखना अनिवार्य है, वहीं शरीर पर धारण किए जाने वाले वस्त्रों की स्वच्छता का भी ध्यान रखना आवश्यक है। वस्त्र जहाँ एक ओर शरीर की रक्षा एवं ढकने का कार्य करते हैं वहीं दूसरी ओर . गन्दे वस्त्रों से स्वास्थ्य को खतरा पैदा हो सकता है। इनमें अनेक प्रकार के रोगों के रोगाणु पल सकते हैं। त्वचा की अनेक बीमारियाँ गन्दे वस्त्र पहनने से होती हैं।</p>
<p>3. उचित पोषण-व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए उचित पोषण भी आवश्यक है। उचित पोषण के लिए पर्याप्त मात्रा में सन्तुलित आहार की आवश्यकता होती है। इस प्रकार के आहार के अभाव में व्यक्ति अनेक कुपोषण अथवा अल्प-पोषणजनित रोगों का शिकार हो जाता है तथा उसका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है।</p>
<p>4. व्यायाम करना-शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए प्रतिदिन नियमित व्यायाम करना आवश्यक है। व्यायाम शरीर की मांसपेशियों को आवश्यक क्रियाशीलता देता है। इस प्रकार उसकी कार्य करने की शक्ति बढ़ती है। शरीर पुष्ट, स्फूर्तियुक्त तथा सुन्दर बन जाता है।</p>
<p>5. विश्राम तथा निद्रा-शरीर की थकान को दूर कर फिर से कार्य करने की शक्ति उत्पन्न करने के लिए आराम (विश्राम) आवश्यक है। इससे कार्यकुशलता बढ़ती है। विश्राम का सर्वोत्तम उपाय निद्रा है। निद्रा की अवस्था में मांसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं और उनके अन्दर एकत्र हुए विजातीय तत्त्व शरीर से विसर्जित हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप शरीर की मांसपेशियाँ अधिक कुशलता से कार्य करने की क्षमता अर्जित कर लेती हैं।</p>
<p>6. मादक वस्तुओं से बचाव-व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति हर प्रकार के नशों से दूर रहे। वास्तव में, सभी मादक पदार्थों के सेवन का स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।</p>
<p>7. स्वस्थ मनोरंजन व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ मनोरंजन भी आवश्यक है। वास्तव में, मानसिक एवं संवेगात्मक स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ मनोरंजन आवश्यक माना गया है। मनोरंजन के कुछ उपाय शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी विशेष लाभदायक होते हैं। खेल-कूद एवं व्यायाम इसी प्रकार के साधन हैं।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
स्वास्थ्य के लिए विश्राम तथा निद्रा का क्या महत्त्व है? विश्राम तथा निद्रा के समय किन-किन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है?<br />
अथवा<br />
निद्रा का स्वास्थ्य से सम्बन्ध लिखिए।<br />
उत्तर:<br />
विश्राम तथा निद्रा का महत्त्व (Importance of Rest and Sleep) &#8211;<br />
शारीरिक अथवा मानसिक कार्य करने से शरीर में थकान आ जाती है। वास्तव में, शारीरिक परिश्रम करते समय शरीर में अनेक विषैले पदार्थ एकत्र हो जाते हैं। ये पदार्थ ही हमारी मांसपेशियों की थकाते हैं। इसके अतिरिक्त, कार्य करते समय शरीर के ऊतक अधिक टूटते-फूटते रहते हैं। इस समय इनकी मरम्मत भी पूर्ण रूप से नहीं हो पाती। अत: शरीर के स्वास्थ्य के लिए इन ऊतकों की मरम्मत तथा विषैले पदार्थों को बाहर निकालना अनिवार्य होता है। इन क्रियाओं के लिए विश्राम आवश्यक होता है।</p>
<p>विश्राम का सबसे उत्तम उपाय नींद है। विश्राम तथा निद्रा के समय शरीर में कार्य करने के परिणामस्वरूप हुई टूट-फूट की क्षतिपूर्ति हो जाती है। इस प्रकार शरीर नई शक्ति अर्जित कर लेता है। पर्याप्त नींद ले लेने से व्यक्ति एकदम तरोताजा एवं स्वस्थ हो जाता है। नींद के समय नाड़ी एवं श्वास की गति कुछ मन्द हो जाती है तथा रक्त चाप घट जाता है; अतः सम्बन्धित अंगों को कुछ आराम मिलता है। जिस व्यक्ति को पर्याप्त नींद नहीं आती उसका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है, व्यक्ति दुर्बल हो जाता है, स्वभाव में चिड़चिड़ाहट आ जाती है तथा चेहरे पर उदासी छा जाती है, कार्य करने की चुस्ती तथा शारीरिक तेज कम हो जाता है। ऐसा व्यक्ति थका-थका रहता है, मस्तिष्क अत्यधिक तनावयुक्त हो जाता है तथा उसमें कार्यों के परिणाम के प्रति निराशा उत्पन्न हो जाती है।</p>
<p>नींद की कमी के उपर्युक्त लक्षणों को दूर करने के लिए, शरीर को रोगों से बचाने तथा स्वस्थ रखने के लिए उचित तथा आवश्यक विश्राम आवश्यक है। इसी प्रकार विश्राम की सर्वश्रेष्ठ विधि शान्त व गहरी नींद लेना है। इस प्रकार स्पष्ट है कि निद्रा का व्यक्ति के स्वास्थ्य से घनिष्ठ सम्बन्ध है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्यक्ति को समुचित नींद अवश्य लेनी चाहिए।</p>
<p>विश्राम तथा निद्रा के समय ध्यान देने योग्य बातें (Important points to be kept in Mind at the Time of Rest and Sleep) &#8211;<br />
शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को सामान्य बनाए रखने के लिए तथा पर्याप्त गहरी एवं शान्त नींद लेने के लिए निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए &#8211;<br />
1. निद्रा का समय-सामान्यतः रात्रि का समय सोने के लिए उपयुक्त है फिर भी विश्राम हेतु थोड़े समय के लिए दिन में (दोपहर के समय) सोया जा सकता है। शारीरिक श्रम करने वाले को अधिक समय तथा मानसिक कार्य करने वालों को अपेक्षाकृत कम समय की निद्रा चाहिए। सोने का समय तथा काल दोनों ही निश्चित होने चाहिए। कम-से-कम 6-8 घण्टे की निद्रा एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए आवश्यक होती है।</p>
<p>2. विश्राम व निद्रा के लिए वातावरण-नींद तथा विश्राम के लिए वातावरण शान्त, तनावरहित तथा स्वस्थ होना चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है &#8211;</p>
<p>(क) शयन कक्ष शान्त स्थान में शोरगुल से दूर होना चाहिए।<br />
(ख) शयन कक्ष के अन्दर का वातावरण भी शान्त होना आवश्यक है।<br />
(ग) शयन कक्ष में शुद्ध वायु के लिए उचित संवातन व्यवस्था होनी चाहिए।<br />
(घ) व्यक्ति का मस्तिष्क तनावरहित होना चाहिए।</p>
<p>3. निद्रा के लिए व्यवस्थाएँ–स्वस्थ व शान्त निद्रा के लिए निम्नलिखित व्यवस्थाएँ उपयोगी होती हैं &#8211;<br />
(क) मच्छरों से बचने का प्रबन्ध किया जाना आवश्यक है। इसके लिए मच्छरदानी का उपयोग लाभदायक है।<br />
(ख) चारपाई, पलंग इत्यादि कसा हुआ होना चाहिए।<br />
(ग) बिस्तर मुलायम होना चाहिए।<br />
(घ) विश्राम के समय वस्त्र ढीले-ढाले पहनने चाहिए।<br />
(ङ) सोने के स्थान में सीलन, दुर्गन्ध आदि नहीं होनी चाहिए।<br />
(च) ताजा या ठण्डे पानी से मुँह, हाथ व पैर धोकर सोना शान्त तथा गहरी निद्रा के लिए सभी प्रकार से उचित है।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 9 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
&#8220;स्वास्थ्य मानव जीवन की अमूल्य निधि है।&#8221; स्पष्ट कीजिए।<br />
उत्तर:<br />
व्यक्ति के जीवन में स्वास्थ्य का सर्वाधिक महत्त्व है। सामान्य स्वास्थ्य वाला व्यक्ति सामान्य जीवन व्यतीत करता है तथा दैनिक जीवन के सभी क्रिया-कलाप सुचारु रूप से सम्पन्न करता है। स्वस्थ व्यक्ति अपनी क्षमता एवं योग्यता के अनुसार जीविकोपार्जन करता है तथा अपनी और अपने परिवार की आवश्यकताओं की भली-भाँति पूर्ति करता है। शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति मानसिक रूप से भी स्वस्थ रहता है तथा सामाजिक जीवन में समायोजित रहता है। इसके विपरीत दुर्बल स्वास्थ्य वाला व्यक्ति सामान्य जीवन व्यतीत नहीं कर पाता तथा अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करता है। अतः कहा जाता है कि &#8216;स्वास्थ्य मानव जीवन की अमूल्य निधि है।&#8217;</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
मुँह एवं दाँतों की स्वच्छता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। अथवा मुख एवं दाँतों की सफाई और देखभाल क्यों आवश्यक है?<br />
उत्तर:<br />
मुँह एवं दाँतों की स्वच्छता के महत्त्व &#8211;<br />
व्यक्तिगत शारीरिक स्वच्छता में मुँह तथा दाँतों की स्वच्छता का अपना महत्त्व है। मुखगुहा में स्थित विभिन्न अंगों में से जीभ और गला सामान्य प्रक्रियाओं से ही साफ हो जाते हैं। साधारण कुल्ले आदि करने से मुँह साफ हो जाता है, किन्तु दाँतों की विशेष स्वच्छता आवश्यक होती है। भोजन को चबाते समय भोज्य-पदार्थों के कण दाँतों के मध्य उपस्थित स्थान में फँस जाते हैं। ये फँसे हुए भोजन के कण सड़कर दुर्गन्ध पैदा करते हैं। यह दुर्गन्ध विभिन्न बैक्टीरिया के कारण उत्पन्न होती है। इससे मुख में ही नहीं, आहार नाल में भी अनेक प्रकार के रोग पैदा हो जाते हैं। इन रोगों के होने से दाँत कमजोर हो सकते हैं, मसूड़े खराब हो सकते हैं, यहाँ तक कि पाचन-शक्ति कमजोर हो जाती है। दाँतों की सफाई के अभाव में पायरिया नामक रोग होने की आशंका रहती है। वैसे भी यदि दाँत कमजोर हैं, तो भोजन को ठीक प्रकार से नहीं चबाया जा सकता है, फलस्वरूप पाचन क्रिया में विघ्न पैदा होता है। अत: दाँतों का स्वच्छ होना अत्यन्त आवश्यक है।</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
दाँतों को स्वच्छ एवं स्वस्थ रखने की विधि का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तर:<br />
दाँतों को स्वच्छ एवं स्वस्थ रखने की विधि दाँतों एवं मुख को स्वच्छ रखने के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है &#8211;</p>
<ul>
<li>कुछ भी खाने के बाद कुल्ला अवश्य करना चाहिए ताकि दाँतों में फंसे हुए खाद्य-पदार्थों के कण निकल जाएँ। प्रतिदिन सुबह कोई भी कार्य करने से पूर्व दाँतों की सफाई आवश्यक है। इसी प्रकार रात्रि को सोते समय भी दाँतों की सफाई करनी चाहिए।</li>
<li>ब्रुश, दातून, पेस्ट अथवा किसी बारीक मंजन से दाँतों को प्रतिदिन साफ करना आवश्यक है। (3) मसूड़ों की सफाई तथा मालिश करते रहने से दाँत सुरक्षित एवं मजबूत रहते हैं।</li>
<li>दाँतों को स्वस्थ रखने के लिए अधिक गर्म एवं अधिक ठण्डे खाद्य अथवा पेय-पदार्थ ग्रहण नहीं करने चाहिए।</li>
<li>यदि कोई चिपकने वाला खाद्य-पदार्थ खाया जाए तो उसके उपरान्त दाँतों की सफाई का अतिरिक्त ध्यान रखना चाहिए।</li>
<li>समय-समय पर दन्त-चिकित्सक से परामर्श करते रहना चाहिए।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 4.<br />
बालों की सफाई क्यों आवश्यक है? बालों को साफ करने की उपयुक्त विधि लिखिए।<br />
उत्तर:<br />
बालों की सफाई की आवश्यकता एवं विधि &#8211;<br />
सिर के बालों की सफाई करना आवश्यक है क्योंकि बालों को साफ न करने से इत्यादि पड़ सकती हैं, जो हमारे शरीर का खून चूसती हैं। बालों के गन्दे रहने से त्वचा के छिद्र भी बन्द हो जाते हैं फलतः पसीना नहीं निकल पाता है और त्वचा के रोग उत्पन्न हो सकते हैं। अत: यह आवश्यक है कि बालों को नियमित रूप से साफ किया जाए। स्वच्छ बाल सौन्दर्य बढ़ाने वाले होते हैं, विशेषकर नारियों के लिए।</p>
<p>बालों को साफ करने के लिए प्रमुख रूप से इन्हें धोना आवश्यक है। बालों को धोने के लिए कम-से-कम सोडे वाला साबुन प्रयोग में लाना चाहिए। अधिक सोडे वाला साबुन बालों की जड़ों को कमजोर कर देता है, इसलिए दही, रीठा, बेसन, मुलतानी मिट्टी आदि से बालों को धोया जाना उचित रहता है। आजकल अनेक प्रकार के शैम्पू भी बालों को धोने के लिए उपलब्ध हैं। किसी अच्छे शैम्पू द्वारा भी बालों को धोया जा सकता है। बालों की सफाई के लिए, विशेषकर ज़े मारने के लिए सोडे में सिरका मिलाकर बालों में लगाया जा सकता है।</p>
<p>नीबू तथा लहसुन के रस को बालों में लगाने से भी मर जाती हैं। जुएँ नष्ट करने के लिए कुछ औषधियाँ भी उपलब्ध हैं। नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर उस पानी से नियमित रूप से बालों को धोने से भी जुएँ समाप्त हो जाती हैं। बालों की रक्षा करने के लिए नित्यप्रति कंघा करना चाहिए। इससे एक ओर तो बाल सँवरे रहते हैं तथा दूसरी ओर बालों से गन्दगी निकलती रहती है।</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
थकान किसे कहते हैं? इसे किस प्रकार दूर किया जा सकता है?<br />
उत्तर:<br />
थकान का अर्थ तथा दूर करने की विधि &#8211;<br />
विभिन्न प्रकार के शारीरिक अथवा मानसिक कार्य करते रहने से शरीर के अंगों में थकान पैदा हो जाती है। श्रम करने से मांसपेशियों में उत्पन्न हुए विषैले पदार्थों के कारण विभिन्न अंग थक जाते हैं। सामान्य रूप से थकान का मुख्य कारण मांसपेशियों में लैक्टिक एसिड की मात्रा बढ़ जाना होता है। इसके अतिरिक्त, कार्य करते समय शरीर के ऊतक टूटते-फूटते रहते हैं और इस दौरान इनकी पूरी मरम्मत भी नहीं हो पाती है।</p>
<p>थकान को दूर करने के लिए विश्राम अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। शरीर में उत्पन्न विषैले पदार्थों को बाहर निकालना तथा टूट-फूट की मरम्मत करना आदि क्रियाओं के लिए विश्राम आवश्यक होता है। मस्तिष्क एवं स्नायु सम्बन्धी अंगों को विश्राम देने से इनकी कार्यकुशलता तथा कार्यक्षमता अत्यधिक बढ़ जाती है। विश्राम करने के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया निद्रा है। निद्रा शरीर के अवयवों तथा इन्द्रियों का शिथिलन है। अत: ऐसे समय में शरीर के अन्दर विभिन्न प्रकार की टूट-फूट की मरम्मत हो जाती है और नई कार्य-शक्ति अर्जित हो जाती है तथा पर्याप्त नींद लेने के बाद व्यक्ति तरोताजा एवं प्रसन्नचित्त हो जाता है। इस समय नाड़ी तथा श्वास गति, रक्तचाप एवं शरीर का ताप कम हो जाता है तथा व्यक्ति थकान से मुक्त हो जाता है।</p>
<p>कई बार कार्यों के परिवर्तन से थकान दूर हो जाती है। इसके लिए मनोरंजन, व्यायाम तथा योगाभ्यास लाभदायक होता है। ये शरीर की कार्यक्षमता को बढ़ा देते हैं और थके हुए शरीर को शीघ्रता से, विश्राम के समय, पहले जैसी स्थिति में लाने में सहायता प्रदान करते हैं।</p>
<p>प्रश्न 6.<br />
श्वसन और व्यायाम का क्या सम्बन्ध है?<br />
उत्तर:<br />
व्यायाम से शरीर के अंगों को उचित रूप से सुचारु गति प्राप्त होती है। इस गति से शरीर की ऊर्जा इस्तेमाल होती है। इस स्थिति में ऑक्सीकरण के लिए अधिक मात्रा में ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। अधिक मात्रा में ऑक्सीजन ग्रहण करने के लिए श्वसन-क्रिया को सामान्य से तीव्र होना पड़ता है। व्यायाम की दशा में श्वसन के माध्यम से अधिक मात्रा में वायु ग्रहण की जाती है। इससे फेफड़ों में अधिक वायु भरती है तथा फेफड़ों द्वारा रक्त के शुद्धीकरण की दर में भी वृद्धि होती है। स्पष्ट है कि व्यायाम तथा श्वसन में घनिष्ठ सम्बन्ध है। व्यायाम श्वसन-क्रिया को सुचारु बनाने में सहायक होता है तथा सुचारु श्वसन से व्यक्ति के स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।</p>
<p>प्रश्न 7.<br />
निम्नलिखित मादक पदार्थों के विषय में आप क्या जानते हैं? इनके सेवन करने से लाभ तथा हानियाँ समझाइए &#8211;<br />
(क) अफीम<br />
(ख) भाँग<br />
(ग) गाँजा व चरस।<br />
उत्तर:<br />
सामान्यतः सभी प्रकार की मादक वस्तुएँ शरीर के लिए हानिकारक होती हैं। इनके लाभ बहुत सीमित, केवल दवाएँ आदि बनाने में होते हैं। इनकी लत या आदत निश्चित रूप से स्वास्थ्य को नष्ट कर देती है।</p>
<p>(क) अफीम &#8211; यह एक तीव्र मादक पदार्थ है। इसका निर्माण पोस्त के पौधे से किया जाता है। यद्यपि इसकी खेती एवं व्यापार पूर्णत: नियन्त्रित तथा कानूनन प्रतिबन्धित है, फिर भी चोरी-छिपे या तस्करी से इसका निर्माण किया जाता है। इसका प्रयोग अनेक प्रकार से किया जाता है। कुछ व्यक्ति इसके चूर्ण को खाते हैं तो कुछ इसको सूंघकर नशा प्राप्त करते हैं। सिगरेट में भरकर धूम्रपान के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। कुछ लोगों को इसके इंजेक्शन लगवाने की आदत पड़ जाती है।<br />
अफीम के सेवन से अनेक हानियाँ हैं &#8211;</p>
<ul>
<li>व्यक्ति आलसी हो जाता है।</li>
<li>शरीर पीला पड़ जाता है अर्थात् रक्त की कमी हो जाती है।</li>
<li>शारीरिक शक्ति क्षीण हो जाती है।</li>
<li>आँखों की ज्योति कम हो जाती है।</li>
</ul>
<p>वास्तव में, अफीम एक मीठा और भयंकर विष है। इसके सेवन से अनेक प्रकार की स्नायु तथा मस्तिष्क सम्बन्धी शिथिलताएँ उत्पन्न हो जाती हैं।</p>
<p>(ख) भाँग-भाँग एक पौधे की पत्तियों से प्राप्त की जाती है। इसकी पत्तियों को पीसकर ऐसे ही खाया जाता है अथवा ठण्डाई आदि के रूप में घोटकर पिया जाता है। भाँग के सेवन से व्यक्ति का मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। यह आँतों को शुष्क व कमजोर बनाती है।</p>
<p>(ग) गाँजा व चरस-गाँजा एवं चरस पौधों से प्राप्त किए गए अधिक सान्द्र नशीले पदार्थ हैं। इनका सेवन सिगरेट, चिलम इत्यादि में भरकर धूम्रपान के रूप में किया जाता है। इन पदार्थों का नशा अत्यन्त तीव्र होता है। इनके सेवन से शरीर एवं स्वास्थ्य पर अत्यधिक गहरा प्रभाव पड़ता है। पाचन शक्ति नष्ट हो जाती है और मानसिक चेतना जाती रहती है। इस प्रकार इस नशे का सम्पूर्ण शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव होता है।</p>
<p>प्रश्न 8.<br />
धूम्रपान अथवा तम्बाकू सेवन से होने वाली हानियों का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तर:<br />
धूम्रपान अथवा तम्बाकू से हानि &#8211;<br />
तम्बाकू एक मुख्य मादक पदार्थ है। इसे एक प्रकार के पौधे की पत्तियों को विशेष रूप से पकाकर तैयार किया जाता है। इसे खाने, पीने, सूंघने, धुआँ निकालने आदि के रूप में प्रयोग किया जाता है, जिनमें बीड़ी, सिगरेट, हुक्का आदि के रूप में धूम्रपान (smoking) करना प्रमुख है। पान में चूना, कत्था आदि वस्तुओं के साथ या सुर्ती के रूप में चूने के साथ खाने में, नसवार के रूप में सूंघने में भी इसका प्रयोग किया जाता है।</p>
<p>तम्बाक में अनेक विषैले पदार्थ होते हैं जिसमें सबसे घातक व तेज विष निकोटिन (nicotine) है। यह पदार्थ सूक्ष्म रूप में मादक है। तम्बाकू चाहे किसी भी प्रकार प्रयोग में लाया जाए, इसके प्रयोग से अनेक हानियाँ हैं। यदि बाल्यावस्था या युवावस्था में इसके सेवन की आदत पड़ गई तो वह अत्यन्त घातक एवं स्थायी प्रभाव उत्पन्न करती है। प्रौढ़ व्यक्ति पर इसका प्रभाव धीरे-धीरे होता है।</p>
<ul>
<li>तम्बाकू का धुआँ फेफड़े, गले इत्यादि की श्लेष्म कला (भीतरी झिल्ली) को खराब कर देता है जिससे पहले कफ-खाँसी तथा बाद में दमा, तपेदिक तक हो जाते हैं।</li>
<li>गले, नाक, फेफड़े, श्वसन मार्ग आदि तथा सम्पूर्ण शरीर में शुष्कता (dryness) पैदा हो जाती है जिससे खराश तथा चटखन हो जाती है।</li>
<li>पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है, पेट खराब रहता है, जी मिचलाता है, भूख मर जाती है, कब्ज रहने लगता है।</li>
<li>हृदय गति तेज होने से रुधिर परिसंचरण तथा हृदय सम्बन्धी रोग जैसे उच्च रक्त चाप (high blood pressure), केशिकाओं का चौड़ा होना आदि हो सकते हैं।</li>
<li>नींद कम हो जाती है।</li>
<li>मांसपेशियों की संकुचन-क्षमता (सिकुड़ने-फैलने की शक्ति) कम होने से कार्यकुशलता कम हो जाती है।</li>
<li>तम्बाकू के सेवन से कैंसर जैसा भयानक रोग हो सकता है, जिसमें मुँह, गाल, होंठ, फेफड़े, गले आदि का कैंसर प्रमुख है।</li>
<li>अधिक खुश्की होने के कारण मस्तिष्क कमजोर हो जाता है। इस प्रकार मानसिक शक्ति का ह्रास होता है।</li>
</ul>
<p>यूरोपीय देशों में तो स्त्रियाँ भी धूम्रपान के रूप में तम्बाकू का सेवन करती हैं जिससे उनका सौन्दर्य कम हो जाता है। गर्भकाल में माता के धूम्रपान करने से अपरिपक्व और समय से पूर्व ही कम वजन के शिशु का जन्म होता है।</p>
<p>प्रश्न 9.<br />
त्वचा की स्वच्छता के महत्त्व एवं उपायों का उल्लेख कीजिए। अथवा त्वचा की स्वच्छता से क्या तात्पर्य है? यह क्यों आवश्यक है?<br />
उत्तर:<br />
त्वचा की स्वच्छता का महत्त्व एवं उपाय &#8211;<br />
शारीरिक स्वच्छता के लिए सम्पूर्ण शरीर को ढकने वाली अपनी त्वचा को सदैव स्वच्छ रखना चाहिए। त्वचा पर असंख्य छिद्रों से हर समय, अनेक विषैले तथा हानिकारक पदार्थ पसीने के रूप में रिसते रहते हैं। यह पसीना सूखकर त्वचा पर ही जम जाता है। इसके अतिरिक्त, अनेक प्रकार की बाहरी गन्दगी, धूल, रोगाणु आदि त्वचा पर पसीने के साथ ही जमते रहते हैं। इसी प्रकार त्वचा के गन्दा रहने से पसीने के छिद्र भी बन्द हो सकते हैं और शरीर से हानिकारक पदार्थों के न निकलने से अनेक रोग उत्पन्न हो सकते हैं। वैसे भी गन्दगी से अनेक चर्म रोग (skin diseases) पैदा होते हैं क्योंकि इस गन्दगी में रोगाणु पनप जाते हैं। त्वचा की गन्दगी से व्यक्ति के शरीर एवं कपड़ों में दुर्गन्ध आने लगती है। अत: त्वचा की स्वच्छता व्यक्ति के लिए परम आवश्यक है।</p>
<p>त्वचा की स्वच्छता का मुख्य उपाय स्नान है। अत: सामान्यत: नित्य स्नान करना आवश्यक है किन्तु ठण्डे प्रदेशों में कभी-कभी बिना स्नान के ही रहा जा सकता है। भारत जैसे देश में सर्दियों में दिन में एक बार तथा गर्मियों में दो बार स्नान करना स्वास्थ्य के लिए हितकर है। साधारण रूप से ठण्डे पानी (अपने शरीर के ताप के लगभग ताप वाला जल) से स्नान करना चाहिए। बच्चों, दुर्बल व्यक्तियों तथा वृद्धजनों को गर्म पानी से स्नान कराया जा सकता है। स्नान करते समय पूरे शरीर को रगड़-रगड़कर साफ करना चाहिए। साबुन अथवा उबटन द्वारा भी त्वचा की गन्दगी को साफ किया जा सकता है। स्नान करने से जहाँ एक ओर त्वचा की सफाई होती है वहीं दूसरी ओर इससे चित्त प्रसन्न रहता है। अत: स्नान करना स्फर्तिदायक है।</p>
<p>प्रश्न 10.<br />
बालक-बालिकाओं में व्यक्तिगत स्वच्छता का ज्ञान कराना क्यों आवश्यक है?<br />
उत्तर:<br />
बालक-बालिकाओं को व्यक्तिगत स्वच्छता का ज्ञान प्रदान करना &#8211;<br />
बालक-बालिकाओं में व्यक्तिगत स्वच्छता का ज्ञान कराना अति आवश्यक है क्योंकि &#8211;</p>
<ul>
<li>किसी कार्य को सम्पादित करने के लिए सर्वप्रथम उसके बारे में जानकारी होनी आवश्यक है।</li>
<li>छोटी उम्र में व्यक्तिगत स्वच्छता का ज्ञान करा देने से उसके अन्दर संस्कार तथा आदत का निर्माण हो सकता है।</li>
<li>बालक या बालिका अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहकर स्वच्छता का स्वयं ही ध्यान रखते हैं इस प्रकार उनका स्वास्थ्य बना रहता है। उनके पास रोग कम-से-कम आते हैं।</li>
</ul>
<p>अत: यह आवश्यक है कि बालक-बालिकाओं को कम आयु में ही व्यक्तिगत स्वच्छता का ज्ञान कराना चाहिए तथा इसको उनकी आदत बना देना चाहिए।</p>
<p>प्रश्न 11.<br />
बालकों को स्वस्थ एवं स्वच्छ रहने की आदत आप कैसे सिखाएँगी?<br />
उत्तर:<br />
बालकों में स्वस्थ रहने के लिए स्वच्छता की आदत डालना &#8211;<br />
अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता आवश्यक है तथा बालकों में अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्वच्छता की आदत डालने के लिए कुछ नियमों को अपनाना आवश्यक है। माता-पिता, अभिभावक, सम्बन्धियों तथा परिवार के सभी सदस्यों का कर्त्तव्य है कि स्वयं स्वच्छता सम्बन्धी क्रियाओं का अनुसरण करें तथा इन्हें नियमों के रूप में बच्चों के लिए प्रतिस्थापित करें। इसके लिए निम्नलिखित आदतें अनुकरणीय हैं &#8211;</p>
<ul>
<li>सोने व उठने में नियमितता निश्चित समय पर निश्चित अवधि की निद्रा अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। अत: सोने तथा जागने का समय निश्चित करना आवश्यक है।</li>
<li>नियमित शौच आदि-नियमित शौच आदि से निवृत्त होना आवश्यक है। यह कार्य प्रात: उठने के बाद होना चाहिए।</li>
<li>मुँह व दाँतों की सफाई–मुँह और दाँतों की सफाई मंजन, पेस्ट आदि के द्वारा शौच के बाद करना आवश्यक है। उसी समय हाथ-पैर आदि की सफाई भी नियमपूर्वक करनी चाहिए।</li>
<li>व्यायाम तथा योगासन-शरीर को उचित रूप से क्रियाशील रखने के लिए नियमित व्यायाम तथा योगासन आवश्यक हैं।</li>
<li>नियमित स्नान-प्रतिदिन नियमपूर्वक स्नान करना स्वच्छता के लिए आवश्यक है। इसके साथ ही स्वच्छ वस्त्र आदि धारण करने चाहिए।</li>
<li>अन्य आदतें-नियमित नाखून काटना तथा उनकी सफाई, भोजन करने से पूर्व तथा बाद में साबुन से हाथों को भली-भाँति साफ करना आवश्यक है।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 12.<br />
टिप्पणी लिखिए &#8211; &#8216;जनसाधारण को स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों की जानकारी देने के आधुनिक साधन।&#8217;<br />
उत्तर:<br />
आधुनिक युग जन-संचार का युग है। आज महत्त्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी को जन-साधारण तक पहुँचाने के लिए कुछ ऐसे उपाय प्रयोग में लाए जाते हैं जो व्यापक-क्षेत्र में प्रभावकारी होते हैं। इस प्रकार के प्रमुख उपाय या साधन हैं-दूरदर्शन, रेडियो तथा समाचार-पत्र एवं पत्रिकाएँ। इन समस्त साधनों में भी सर्वाधिक उपयोगी आधुनिक उपाय दूरदर्शन ही है। अत: जन-साधारण को स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों की जानकारी प्रदान करने के लिए दूरदर्शन को ही अपनाया जाना चाहिए। दूरदर्शन के कार्यक्रमों में स्वास्थ्य के नियमों को भली-भाँति दर्शाया जा सकता है तथा उसके व्यावहारिक महत्त्व को भी स्पष्ट किया जा सकता है।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 9 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
स्वास्थ्य से क्या आशय है? .<br />
उत्तर:<br />
“शरीर की रोगों से मुक्त दशा स्वास्थ्य नहीं है, व्यक्ति के स्वास्थ्य में तो उसका सम्पूर्ण शारीरिक, मानसिक एवं संवेगात्मक कल्याण निहित है।&#8221; &#8211; ( विश्व स्वास्थ्य संगठन )</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
व्यक्तिगत स्वास्थ्य के नियमों का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तर:<br />
व्यक्तिगत स्वास्थ्य के मुख्य नियम हैं &#8211;</p>
<ul>
<li>नियमबद्धता</li>
<li>शारीरिक स्वच्छता</li>
<li>उचित पोषण</li>
<li>व्यायाम करना</li>
<li>विश्राम एवं निद्रा</li>
<li>मादक वस्तुओं से बचाव तथा</li>
<li>स्वस्थ मनोरंजन।।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 3.<br />
व्यक्तिगत स्वच्छता की परिभाषा लिखिए।<br />
उत्तर:<br />
शरीर के समस्त अंगों तथा शरीर पर धारण किए जाने वाले वस्त्रों की स्वच्छता को व्यक्तिगत स्वच्छता कहा जाता है।</p>
<p>प्रश्न 4.<br />
व्यक्तिगत स्वच्छता क्यों आवश्यक है?<br />
उत्तर:<br />
शरीर को स्वच्छ, नीरोग, चुस्त एवं प्रसन्नचित्त रखने के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता आवश्यक है।</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
उचित पोषण से क्या आशय है?<br />
उत्तर:<br />
पर्याप्त मात्रा में सन्तुलित आहार ग्रहण करना ही ‘उचित पोषण&#8217; है।</p>
<p>प्रश्न 6.<br />
विश्राम तथा निद्रा को क्यों आवश्यक माना जाता है?<br />
उत्तर:<br />
शारीरिक एवं मानसिक थकान के निवारण के लिए विश्राम एवं निद्रा को आवश्यक माना जाता है।</p>
<p>प्रश्न 7.<br />
नियमित रूप से व्यायाम का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है? अथवा व्यायाम से क्या लाभ है?<br />
उत्तर:<br />
नियमित रूप से व्यायाम करने से शरीर सुन्दर, सुडौल तथा ओजस्वी बनता है।</p>
<p>प्रश्न 8.<br />
दाँतों की नियमित रूप से सफाई न करने की दशा में किस रोग के हो जाने की आशंका रहती है?<br />
उत्तर:<br />
दाँतों की नियमित रूप से सफाई न करने की दशा में दाँतों में पायरिया रोग हो जाने की आशंका रहती है।</p>
<p>प्रश्न 9.<br />
त्वचा की स्वच्छता का प्रमुख उपाय क्या है?<br />
उत्तर:<br />
त्वचा की स्वच्छता का प्रमुख उपाय है-प्रतिदिन स्नान करना।</p>
<p>प्रश्न 10.<br />
मादक-द्रव्यों के सेवन का व्यक्तिगत स्वास्थ्य पर कैसा प्रभाव पड़ता है?<br />
उत्तर:<br />
मादक-द्रव्यों के सेवन का व्यक्तिगत स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।</p>
<p>प्रश्न 11.<br />
शराब से होने वाली एक मुख्य हानि बताइए।<br />
उत्तर:<br />
शराब के अधिक सेवन से केन्द्रीय तन्त्रिका-तन्त्र दुर्बल हो जाता है जिससे सोचने-समझने की शक्ति क्षीण हो जाती है।</p>
<p>प्रश्न 12.<br />
नाखूनों की सफाई क्यों आवश्यक है?<br />
उत्तर:<br />
नाखूनों के बड़े होने पर उनमें गन्दगी भर जाती है तथा उसमें अनेक प्रकार के कीटाणु एकत्र हो जाते हैं जो भोजन करते समय मुँह में पहुँचकर आहार-नाल में पहुँच जाते हैं तथा विभिन्न रोग उत्पन्न करते हैं।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 9 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए &#8211;<br />
1. व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है &#8211;<br />
(क) शारीरिक रूप से स्वस्थ होना<br />
(ख) मानसिक रूप से स्वस्थ होना<br />
(ग) संवेगात्मक रूप से स्वस्थ होना<br />
(घ) उपर्युक्त सभी।<br />
उत्तर:<br />
(घ) उपर्युक्त सभी।</p>
<p>2. व्यक्तिगत स्वास्थ्य की देख-रेख के लिए आवश्यक है &#8211;<br />
(क) नियमित जीवन तथा उचित पोषण<br />
(ख) शारीरिक स्वच्छता तथा नियमित व्यायाम<br />
(ग) समुचित विश्राम, निद्रा तथा स्वस्थ मनोरंजन<br />
(घ) उपर्युक्त सभी।<br />
उत्तर:<br />
(घ) उपर्युक्त सभी।</p>
<p>3. त्वचा की स्वच्छता प्रतिदिन करनी चाहिए क्योंकि &#8211;<br />
(क) इससे शरीर ठीक रहता है<br />
(ख) इससे त्वचा का कोई रोग नहीं होता<br />
(ग) इससे शरीर कोमल रहता है<br />
(घ) इससे भूख अधिक लगती है।<br />
उत्तर:<br />
(ख) इससे त्वचा का कोई रोग नहीं होता।</p>
<p>4. स्वस्थ रहने के लिए व्यायाम आवश्यक है क्योंकि यह शरीर को बनाता है &#8211;<br />
(क) आलसी एवं निष्क्रिय<br />
(ख) क्रियाशील एवं स्वस्थ<br />
(ग) आलसी एवं स्वस्थ<br />
(घ) निष्क्रिय एवं स्वस्था<br />
उत्तर:<br />
(ख) क्रियाशील एवं स्वस्थ।</p>
<p>5. व्यायाम का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है &#8211;<br />
(क) शरीर स्वस्थ रहता है<br />
(ख) शरीर का समुचित विकास होता है एवं क्रियाशील बनता है<br />
(ग) शरीर के विकार दूर हो जाते हैं<br />
(घ) इनमें से सभी।<br />
उत्तर:<br />
(घ) इनमें से सभी।।</p>
<p>6. शारीरिक थकान के निवारण का सर्वोत्तम उपाय है &#8211;<br />
(क) घूमना-फिरना<br />
(ख) टी० वी० देखना<br />
(ग) नींद<br />
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।<br />
उत्तर:<br />
(ग) नींद।</p>
<p>7. स्वस्थ मनोरंजन से सुधार होता है &#8211;<br />
(क) व्यवहार में<br />
(ख) पाचन-शक्ति में<br />
(ग) मानसिक स्वास्थ्य में<br />
(घ) रोग में।<br />
उत्तर:<br />
(ग) मानसिक स्वास्थ्य में।</p>
<p>8. व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए बचना चाहिए &#8211;<br />
(क) व्यायाम से<br />
(ख) विश्राम से<br />
(ग) मनोरंजन से<br />
(घ) मादक द्रव्यों के सेवन से।<br />
उत्तर:<br />
(घ) मादक द्रव्यों के सेवन से।</p>
<p>9. &#8216;विश्व तम्बाकू निषेध दिवस कब मनाया जाता है &#8211;<br />
(क) 1 मई<br />
(ख) 11 मई<br />
(ग) 21 मई<br />
(घ) 31 मई।<br />
उत्तर:<br />
(घ) 31 मई।</p>
<p>10. व्यायाम से लाभ है &#8211;<br />
(क) शारीरिक विकास<br />
(ख) स्वास्थ्य में सुधार<br />
(ग) मानसिक विकास<br />
(घ) इनमें से सभी।<br />
उत्तर:<br />
(घ) इनमें से सभी।</p>
<h4><a href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science/">UP Board Solutions for Class 11 Home Science</a></h4>
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		<title>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 10 गृह स्वच्छता एवं संवातन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Prasanna]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 29 Apr 2025 07:27:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 11]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 10 गृह स्वच्छता एवं संवातन (Home Cleanliness and Ventilation) UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 10 गृह स्वच्छता एवं संवातन UP Board Class 11 Home Science Chapter 10 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर प्रश्न 1. घर की स्वच्छता (सफाई) की क्या आवश्यकता है? घर की ... <a title="UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 10 गृह स्वच्छता एवं संवातन" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science-chapter-10/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 10 गृह स्वच्छता एवं संवातन">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 10 गृह स्वच्छता एवं संवातन (Home Cleanliness and Ventilation)</p>
<h2>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 10 गृह स्वच्छता एवं संवातन</h2>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 10 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
घर की स्वच्छता (सफाई) की क्या आवश्यकता है? घर की सफाई कितने प्रकार की होती है? घर की साप्ताहिक सफाई गृहिणी किस प्रकार करे जिससे उसकी शक्ति तथा समय कम-से-कम खर्च हो?<br />
अथवा<br />
घर की सफाई का क्या महत्त्व है? घर की दैनिक व साप्ताहिक सफाई आप किस प्रकार करेंगी? विस्तारपूर्वक लिखिए।<br />
उत्तरः<br />
घर की सफाई का महत्त्व (आवश्यकता) (Importance (Necessity) of Home Cleaning) &#8211;<br />
घर में कीमती सामान का होना तथा उसका व्यवस्थित रूप से सजा होना इतना आवश्यक नहीं है जितनी घर की सफाई व स्वच्छता आवश्यक है। घर की सफाई से आशय है &#8211; घर में गन्दगी का व्याप्त न होना।</p>
<p>स्वच्छता; घर और घर की वस्तुओं को सुन्दर व आकर्षक बनाती है। उदाहरणार्थ-अत्यन्त कीमती सजावट की वस्तुएँ बैठक में लगी हैं, किन्तु सभी वस्तुओं पर धूल जमी है, मकड़ी के जाले लगे हैं, तो कौन सभ्य मनुष्य वहाँ बैठना पसन्द करेगा जबकि एक साधारण और स्वच्छ बैठक में अधिक आकर्षण होगा। स्वच्छता से मानसिक प्रेरणा प्राप्त होती है, मन प्रसन्न होता है। गन्दगी अनेक बीमारियों की जननी है, कीटाणुओं के पनपने का स्थान है। यदि नालियों में पानी भरा सड़ रहा है तो उसमें दुर्गन्ध तो पैदा होगी ही, साथ ही मक्खी व मच्छर भी बहुतायत में पैदा होंगे जो अनेक रोगों का कारण बनेंगे।</p>
<p>इस प्रकार स्वच्छता; सजावट तथा आकर्षण की पूरक तो है ही, यह रोगों से भी हमको बचाती है और मन को प्रफुल्लित करती है।</p>
<p>सफाई की व्यवस्था, विधि तथा प्रकार (System, Process and Types of Cleaning) &#8211;<br />
गृहिणी को घर में अनेक प्रकार के कार्य होने के कारण प्रत्येक वस्तु, स्थान आदि की प्रतिदिन सफाई करना न तो सम्भव है और न ही आवश्यक। अत: घरेलू सफाई को पाँच भागों या प्रकारों में बाँटा जाता है। सफाई के इन भागों को घरेलू सफाई के प्रकार भी माना जाता है। ये प्रकार निम्नलिखित हैं &#8211;</p>
<ul>
<li>दैनिक सफाई (Daily Cleaning)</li>
<li>साप्ताहिक सफाई (Weekly Cleaning)</li>
<li>मासिक सफाई (Monthly Cleaning)</li>
<li>वार्षिक सफाई (Annual Cleaning),</li>
<li>आकस्मिक सफाई (Casual Cleaning)।</li>
</ul>
<p>1. दैनिक सफाई (Daily cleaning) &#8211;<br />
घर की कुछ सफाई प्रतिदिन ही की जाती है। गृह स्वच्छता के लिए दैनिक सफाई को ही सर्वाधिक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है। दैनिक घरेलू सफाई का संक्षिप्त विवरण अग्रवर्णित है &#8211;</p>
<p>(अ) विभिन्न कमरों की सफाई &#8211; हवा से उड़कर अथवा जूतों आदि के साथ आई मिट्टी आदि कमरों को तथा कमरे में रखी वस्तुओं को गन्दा करती है। बच्चों वाले घर में बच्चे कागज के टुकड़े, पेंसिल की छीलन आदि फैलाते हैं। अतः इन सबकी सफाई प्रतिदिन ही होनी चाहिए। इसके लिए प्रतिदिन कमरों में झाडू लगाना तथा. फर्नीचर को कपड़े से झाड़ना-पोंछना आवश्यक है। दरवाजे के पास रखे गए पायदान को अवश्य झाड़ना चाहिए। अस्त-व्यस्त फैले हुए सामान एवं कपड़ों को समेटकर यथास्थान रखना अनिवार्य है। बिस्तर को ठीक करना तथा यदि आवश्यक हो तो उठाकर निर्धारित स्थान पर भी रखना चाहिए। यदि घर में फूलदानों में फूल रखे जाते हैं, तो उनकी भी देखभाल करनी चाहिए। फर्श पर गीले कपड़े से पोंछा लगाना अच्छा रहता है। पोंछे के पानी में फिनायल अथवा कोई अन्य नि:संक्रामक अवश्य मिला लेना चाहिए।</p>
<p>(ब) रसोईघर को साफ करना &#8211; रसोईघर या पाककक्ष को भी नित्य ही साफ करना अत्यन्त आवश्यक होता है। रसोईघर में जूठे बर्तन, भोजन के टुकड़े अथवा अन्न कण जो फैल जाते हैं, उनकी सफाई प्रतिदिन ही होनी चाहिए। रसोईघर को साफ रखना गृहिणी का मुख्य कर्त्तव्य है।</p>
<p>(स) स्नानगृह एवं शौचालय की सफाई &#8211; स्नानगृह एवं शौचालय की सफाई भी नित्य ही करनी चाहिए। स्नानगृह में तो साबुन आदि के कारण काफी गन्दगी हो जाती है। उसी में कपड़े भी धोए जाते हैं जिनका मैल फर्श पर रुक जाता है। अत: नित्य ही स्नानगृह के फर्श को झाडू से रगड़कर साफ करना आवश्यक होता है। स्नानगृह में प्रयोग होने वाली बाल्टी, लोटा, मग आदि को साफ करके उलटकर रखना चाहिए। इसी प्रकार शौचालय की सफाई भी प्रतिदिन होनी चाहिए। शौचालय में फिनायल डालने से वातावरण स्वास्थ्यकर तथा स्वच्छ रहता है।</p>
<p>(द) घर की नालियों एवं अन्य स्थानों की सफाई &#8211; घर के अन्दर बनी नालियों, जैसे रसोईघर से पानी निकालने वाली नाली आदि की सफाई भी नित्य होनी चाहिए। इनमें भी फिनायल आदि डाली जाती है। इनके अतिरिक्त आँगन तथा अन्य स्थानों को भी झाड़-बुहारकर साफ रखना चाहिए।</p>
<p>2. साप्ताहिक सफाई (Weekly cleaning) &#8211;<br />
घर के सभी स्थानों की सफाई प्रतिदिन की जानी न तो सम्भव है और न ही आवश्यक। अत: कुछ स्थानों एवं वस्तुओं की सफाई सप्ताह में एक बार सामान्यतः छुट्टी के दिन की जाती है। इसे साप्ताहिक सफाई कहते हैं। इसके अन्तर्गत घर की दरियों एवं कालीनों को झाड़ा जाता है, फर्नीचर को पूरी तरह झाड़कर उनकी गद्दियों आदि को ठीक किया जाता है, दरवाजों तथा खिड़कियों के पास लगे मकड़ी के जालों आदि को साफ किया जाता है। कमरे में लगी हुई तस्वीरों, चित्रों एवं सजावट की अन्य वस्तुओं को भी साप्ताहिक सफाई के समय साफ करना चाहिए। यदि आवश्यकता समझी जाए तो कमरों के फर्श को धोया भी जा सकता है।</p>
<p>घर के बिस्तर एवं चादरों को भी एक दिन धूप में कुछ समय के लिए अवश्य डालना चाहिए। सर्दियों में तो यह अति आवश्यक होता है। इससे पलंग आदि की सफाई में सहायता मिलती है। यदि पलंग अथवा चारपाइयों में खटमल हों, तो इस दिन उन्हें मारने के लिए कोई कीटनाशक दवा छिड़कनी चाहिए। साप्ताहिक सफाई के अन्तर्गत रसोईघर में दाल-मसाले आदि रखने वाले डिब्बों को साफ करके तथा सुखाकर यथास्थान रख देना चाहिए। इसी दिन रसोइघर में लगी सिंक एवं अन्य वस्तुओं को विशेष रूप से साफ करना चाहिए और घर के मैले कपड़े एवं चादरें आदि गिनकर धोबी के पास भेज देने चाहिए।</p>
<p>3. मासिक सफाई (Monthly cleaning) &#8211;<br />
कुछ वस्तुएँ एवं स्थान ऐसे होते हैं जिनकी साप्ताहिक सफाई नहीं हो पाती। वास्तव में, यह सफाई हर सप्ताह आवश्यक भी नहीं होती है। ऐसी सफाई महीने में एक बार अवश्य हो जानी चाहिए इसलिए इस सफाई को मासिक सफाई कहा जाता है। मासिक सफाई के अन्तर्गत मुख्य रूप से भण्डारगृह अथवा स्टोर रूम की सफाई आती है। भण्डारगृह में रखी सभी वस्तुओं को झाड़-पोंछकर साफ किया जाता है तथा उन्हें धूप में रखा जाता है। इसी प्रकार रसोईघर में रखी वस्तुओं को महीने में एक बार अवश्य धूप में रखना चाहिए। इससे दाल, चावल जैसे खाद्यान्नों में घुन, कीड़ा आदि नहीं लग पाता। अचार, चटनी आदि को महीने में एक बार धूप में रखना अच्छा होता है। इसके साथ ही भारी बिस्तर जैसे रजाई तथा गद्दों को भी धूप में फैलाना आवश्यक होता है। इससे उनमें से नमी की दुर्गन्ध तथा कुछ रोगाणु आदि समाप्त हो जाते हैं। मासिक सफाई का अपना विशेष महत्त्व होता है।</p>
<p>4. वार्षिक सफाई (Annual cleaning) &#8211;<br />
दैनिक, साप्ताहिक एवं मासिक सफाई के अतिरिक्त वार्षिक सफाई, जो वर्ष में केवल एक बार ही की जाती है, अनेक कारणों से आवश्यक है। हमारे देश में इस प्रकार की सफाई दीपावली के अवसर पर करने की परम्परा है। यह इसलिए भी उत्तम है क्योंकि दीपावली वर्षा के बाद सर्दियों के प्रारम्भ में होती है। इस समय सबसे अधिक कीड़े-मकोड़े व फफूंद आदि हो सकते हैं। इस अवसर पर घर के सभी सामान को बाहर निकाला जाता है तथा उसे झाड़-पोंछकर एवं साफ करके रखा जाता है।</p>
<p>आवश्यकतानुसार घर की लिपाई-पुताई कराई जाती है, साथ ही छोटी-मोटी टूट-फूट की मरम्मत भी करवा ली जाती है। दरवाजों एवं खिड़कियों पर रंग-रोगन तथा फर्नीचर पर पॉलिश करवाने से इनकी भी सफाई हो जाती है। वार्षिक सफाई के अवसर पर ही घर के सामान को छाँटा जाता है तथा व्यर्थ के सामान को या तो फेंक दिया जाता है अथवा उसे बेच दिया जाता है।</p>
<p>5. आकस्मिक सफाई (Casual cleaning) &#8211;<br />
घर की सफाई के उपर्युक्त चार प्रकारों के अतिरिक्त एक अन्य प्रकार का भी उल्लेख किया जा सकता है। यह नियमित सफाई से भिन्न है। उदाहरण के लिए किसी दिन यदि धूलभरी आँधी आ जाए तो उसके बाद की जाने वाली सफाई को आकस्मिक सफाई की श्रेणी में रखा जाएगा। इसी प्रकार यदि घर में कोई उत्सव आयोजित किया गया हो तो उसके पहले तथा बाद में की जाने वाली सफाई को भी अन्य किसी श्रेणी में न रखकर आकस्मिक सफाई की श्रेणी में ही रखा जाता है। आकस्मिक घरेलू सफाई का न तो समय निश्चित होता है और न ही व्यापकता। घर की आकस्मिक सफाई को पूरा करने के लिए गृहिणी तथा परिवार के अन्य सदस्यों को अपनी दैनिक दिनचर्या में कुछ परिवर्तन करना पड़ता है तथा कुछ अतिरिक्त परिश्रम तथा उपाय करने पड़ते हैं।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
घर की सफाई में किस-किस प्रकार के सामान की आवश्यकता होती है? इनका प्रयोग किस प्रकार किया जाता है?<br />
उत्तरः<br />
घर की सफाई में काम आने वाला सामान (Material for Cleaning Home) &#8211;<br />
व्यवस्थित ढंग से सफाई करने के लिए कुछ सामग्री आवश्यक होती है। यदि उपकरण तथा सफाई के पदार्थ आवश्यकतानुसार हों, तो सफाई अच्छी भी होती है तथा सरल भी। इस कार्य के लिए निम्नलिखित उपकरण तथा सुविधाएँ होनी उपयुक्त हैं &#8211;</p>
<p>1. झाड़-घर की सफाई के लिए सर्वाधिक उपयोग झाड़ का होता है। ये कई प्रकार की होती हैं, जिनमें से मुख्य खजूर की झाड़, नारियल की झाड़ तथा फूल-झाड़ घरों में प्रयोग की जाती हैं। झाड़ घर के कमरों, आँगन, बरामदे आदि के फर्श को बुहारने के काम आती है। ईंटों के फर्श तथा नालियों आदि को साफ करने के लिए सींक वाली कड़ी व मजबूत झाड़ काम में लाई जाती है, फूल-झाड़ मुलायम होती है। इससे चिकने फर्श की सफाई की जाती है।</p>
<p>2. झाड़न एवं पोंछा-झाड़न उस कपड़े को कहा जाता है जिससे वस्तुओं को झाड़ा-पोंछा जाता है। यह पुराने मुलायम कपड़े का बनाया जाता है। सुविधा के लिए इस कपड़े को एक छोटे डण्डे पर बाँधा जा सकता है। झाड़न से फर्नीचर, दरवाजे, खिड़कियाँ तथा घर की सजावट की वस्तुओं अर्थात् तस्वीर, फूलदानों आदि की धूल झाड़ी जा सकती है। इस प्रकार के झाड़न के अतिरिक्त फर्श को साफ करने अथवा पोंछा लगाने के लिए एक मोटा कपड़ा प्रयोग करना चाहिए। पोंछा लगाने के लिए पानी में फिनायल या अन्य कीटाणुनाशक मिलाया जा सकता है।</p>
<p>3. बुश-घर की विभिन्न वस्तुओं एवं दीवारों आदि की सफाई के लिए झाड़ तथा झाड़न के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के ब्रुश प्रयोग में लाए जाते हैं। कुछ ब्रुश पशुओं के नरम बालों अथवा नायलॉन के बने होते हैं। इनसे घर की सजावटी, नक्काशी, कटिंग अथवा अन्य कीमती वस्तुओं की सफाई की जाती है। फर्श अथवा दीवारों को रगड़कर साफ करने के लिए तिनके अथवा सन के ब्रुश उपयोगी होते हैं। छत पर लगे मकड़ी के जालों को साफ करने के लिए भी इसी प्रकार के ब्रुश को बाँस के साथ बाँधकर प्रयोग किया जाता है। पानी के स्थानों पर, जहाँ काई लगी है या अन्य प्रकार की गन्दगी जमने की आशा है, तारों के बने ब्रुश प्रयोग किए जाते हैं। रसोईघर के बर्तनों को साफ करने के लिए मुलायम ब्रुश प्रयोग किए जाते हैं। बोतलों आदि को भी अन्दर से ब्रुश से साफ किया जाता है।</p>
<p>4. सफाई के लिए आवश्यक बर्तन-घर की सफाई करने के लिए कुछ बर्तन भी आवश्यक हैं। सामान्यतः पानी भरने एवं पोंछा लगाने के लिए बाल्टी एवं एक डिब्बा आवश्यक है। कूड़ा एवं गन्दगी डालने के लिए अलग-अलग स्थानों पर छोटे-छोटे कूड़ेदान तथा घर का समस्त कूड़ा डालने के लिए एक बड़ा कूड़ादान होना चाहिए जो मुख्य द्वार के निकट रखा रहे। कूड़ेदान ढक्कन वाले होने ही उचित हैं।</p>
<p>5. अन्य सामग्री-सफाई के लिए उपयोगी साबुन, सर्फ, विम, सोडा आदि तथा वस्तुओं के दाग-धब्बे छुड़ाने के लिए स्प्रिट, बेन्जीन, तारपीन का तेल, हल्का तेजाब आदि की भी आवश्यकता होती है। कुछ कीटाणुनाशक घोल जैसे फिनायल आदि भी घर पर अवश्य होने चाहिए। ।</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
वायु के संघटन पर एक नोट लिखिए।वायु में नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड एवं नमी के महत्त्व को समझाइए। अथवा वायु का संघटन बताइए। वायु में ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के महत्त्व को समझाइए।<br />
उत्तरः<br />
वायु विभिन्न गैसों का मिश्रण है। यह स्वादहीन, रंगहीन तथा गन्धहीन होती है। यह हमारी पृथ्वी के चारों ओर एक व्यापक क्षेत्र में उपस्थित है, इसी को वायुमण्डल कहा जाता है।<br />
वायु का संघटन (Composition of Air) &#8211;<br />
वैज्ञानिक युग से पहले लोग वायु को तत्त्व समझते थे किन्तु अब यह सर्वविदित है कि वायु प्रमुखत: ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन का मिश्रण है। इन गैसों के अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन, ओजोन, आर्गन, जलवाष्प आदि गैसें भी वायु में उपस्थित रहती हैं। वायु में उपस्थित इन गैसों में से सामान्यत: ऑक्सीजन सक्रिय और नाइट्रोजन निष्क्रिय गैस है। ऑक्सीजन वायु के आयतन का लगभग 1/5 भाग होती है। हमारे श्वसन के लिए यही गैस आवश्यक है। इसके अतिरिक्त इसमें रोगों के कीटाणु, पेड़-पौधों तथा अन्य जीवों के उत्सर्जी पदार्थ, बीजाणु आदि भी होते हैं।<br />
<img decoding="async" src="https://live.staticflickr.com/65535/48628941087_3a7a8a7790_o.png" alt="UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 10 गृह स्वच्छता एवं संवातन 1" width="209" height="210" /><br />
वायु में विभिन्न गैसों का प्रतिशत निम्नांकित सारणी में दर्शाया गया है &#8211;<br />
<img fetchpriority="high" decoding="async" src="https://live.staticflickr.com/65535/48628788846_e5a4e5051e_o.png" alt="UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 10 गृह स्वच्छता एवं संवातन 2" width="614" height="230" /></p>
<p>यद्यपि समय-समय पर और स्थान-स्थान पर यह संघटन बदलता रहता है, फिर भी अनेक कारणों से प्रकृति में यह संघटन काफी सन्तुलित रहता है और यदि यह सन्तुलित नहीं है, तो वायु को प्रदूषित समझा जाता है। ऐसी वायु निश्चित ही किसी-न-किसी रूप में हानिकारक होती है।</p>
<p>वायु में ऑक्सीजन (O<sub>2</sub>) का महत्त्व (Importance of Oxygen in Air) &#8211;<br />
ऑक्सीजन एक प्राणदायक गैस है। सभी जीव-जन्तु तथा पौधे इसे श्वसन के लिए ग्रहण करते हैं तथा भोजन से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए प्रयोग में लाते हैं। यह गैस वस्तुओं के जलने में सहायता करती है तथा उनके ऑक्साइड बनाती है। ऑक्सीजन एक रंगहीन, गन्धहीन तथा स्वादहीन गैस है।</p>
<p>वायु में नाइट्रोजन (N<sub>2</sub>) का महत्त्व (Importance of Nitrogen in Air) &#8211;<br />
वायु में विद्यमान नाइट्रोजन गैस एक निष्क्रिय गैस है जो ऑक्सीजन इत्यादि की तीव्रता को कम करती है। वैसे वायुमण्डल की नाइट्रोजन इस स्वरूप में सामान्यतया जीवधारियों के लिए किसी काम की नहीं है। दूसरी ओर जीवधारियों में उपस्थित प्रोटीन में नाइट्रोजन पर्याप्त मात्रा में होती है और बिना नाइट्रोजन के इस कोशिकीय पदार्थ के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। इसका अर्थ यह भी है कि नाइट्रोजन प्रोटीन के संगठक तत्त्व के रूप में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह भी सत्य है कि जन्तु इसे सीधे वायु से प्राप्त नहीं कर सकते। वायु की नाइट्रोजन मिट्टी के द्वारा पौधों में तथा वहाँ से सभी जन्तुओं में पहुँचती है। मृदा में नाइट्रोजन निम्नलिखित प्रकार से पहुँचती है &#8211;</p>
<ul>
<li>घर्षण विद्युत द्वारा नाइट्रोजन व ऑक्सीजन के संयोग से अनेक ऑक्साइड्स बनते हैं जो वर्षा द्वारा भूमि में पहुँच जाते हैं।</li>
<li>मिट्टी में उपस्थित कुछ जीवाणु तथा कुछ शैवाल इस स्वतन्त्र नाइट्रोजन को बन्धित कर लेते हैं।</li>
<li>कुछ पौधों की जड़ों में उपस्थित सहजीवी जीवाणु भी इसे बन्धित कर लेते हैं।</li>
</ul>
<p>मृदा से नाइट्रोजन के यौगिक पौधों में तथा वहाँ से जन्तुओं में पहुँचते हैं। इन जीवों के उत्सर्जन से अथवा मृत जीवों के भूमि पर गिरने तथा बाद में जीवाणुओं द्वारा सड़ने (decompose) से यह नाइट्रोजन स्वतन्त्र होकर वापस वायुमण्डल में आ जाती है और वायु में इसका सन्तुलन बना रहता है। इस प्रकार प्रकृति में नाइट्रोजन-चक्र के लिए वायु की नाइट्रोजन अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।</p>
<p>वायु में कार्बन डाइऑक्साइड (CO<sub>2</sub>) का महत्त्व (Importance of Carbon dioxide in Air) &#8211;<br />
शुद्ध वायु में, जो जीवों के श्वसन के लिए अत्यन्त आवश्यक है, कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा अत्यन्त अल्प होती है। आयतन के अनुसार यह लगभग 0.03 % होती है। जीव के द्वारा छोड़ी गई श्वास में इसकी मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है। इसी प्रकार वस्तुओं के जलने से भी यही गैस अधिकतम मात्रा में उत्पन्न होती है। अधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड की वायु में उपस्थिति मनुष्य सहित सभी जन्तुओं के लिए हानिकारक है। यह श्वसन योग्य वायु में एक ओर तो ऑक्सीजन की मात्रा को कम करती है दूसरी ओर धीमे विष के रूप में कार्य करती है।</p>
<p>हरे पौधों के लिए कार्बन डाइऑक्साइड की वायु में उपस्थिति अत्यन्त लाभदायक है। ये पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में इस गैस का प्रयोग कार्बोज तथा बाद में मण्ड आदि बनाने में करते हैं। वास्तव में जो भी खाद्य पदार्थ पृथ्वी पर उपस्थित है अथवा प्राप्त होता है, पौधों को इसी क्रिया से प्राप्त होता है। इस क्रिया को प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) कहते हैं। इस क्रिया में भोजन (कार्बनिक पदार्थ) बनाने के लिए कार्बन, कार्बन डाइऑक्साइड (CO<sub>2</sub>) से ही प्राप्त किया जाता है।</p>
<p>उपर्युक्त के अनुसार पृथ्वी पर कार्बन चक्र (carbon cycle) को चलाए रखने के लिए कार्बन डाइऑक्साइड अत्यन्त आवश्यक है।</p>
<p>वायु में नमी का महत्त्व (Importance of Humidity in Air) &#8211;<br />
वायु में नमी भी अल्पमात्रा में उपस्थित होती है। इसकी अधिक मात्रा वायु को श्वसन के अयोग्य बनाती है। वायु की नमी अधिक मात्रा में होने पर, जलवाष्प में परिणत होकर जल में बदलती रहती है। इस नमी के प्राकृतिक स्वरूप बादल, कोहरा, धुंध, ओस, वर्षा आदि हैं। ठण्डे स्थानों में गिरने वाली बर्फ भी इसी नमी का अति ठण्डा स्वरूप है। प्रत्येक खुले हुए जल-तल से जलवाष्प नमी के रूप में वायु में सदैव ही मिलती रहती है। पृथ्वी पर आवश्यक रूप में उपस्थित जल चक्र (Water cycle) में इसका अत्यधिक महत्त्व है।</p>
<p>प्रश्न 4.<br />
संवातन से आप क्या समझती हैं? संवातन का सिद्धान्त क्या है? संवातन के साधनों का भी उल्लेख कीजिए।<br />
अथवा<br />
संवातन के प्रमुख साधन लिखिए।<br />
उत्तरः<br />
संवातन (Ventilation) &#8211;<br />
किसी स्थान पर वायु के आने-जाने (विसरित होने) की क्रिया को संवातन (Ventilation) कहा जाता है। यह एक प्रकार की व्यवस्था है जो किसी आवासीय स्थान, कार्य करने के स्थान आदि पर विशेष रूप से की जाती है ताकि वहाँ रहने वाले व्यक्तियों को शुद्ध (प्रदूषणरहित) वायु प्राप्त होती रहे। इस प्रकार की व्यवस्था के लिए दो बातों पर ध्यान देना आवश्यक होता है। एक तो कमरे या उक्त स्थान की अशुद्ध वायु को बाहर निकालने की व्यवस्था। दूसरे बाहर से शुद्ध वायु को अन्दर लाने की प्रक्रिया। स्पष्ट है कि खुले स्थान में तो प्रकृति स्वयं ही वायु की शुद्धता को सन्तुलित रखती है।</p>
<p>संवातन का सिद्धान्त (Principle of Ventilation) &#8211;<br />
ताप के बढ़ने से वायु हल्की हो जाती है तथा ऊपर उठने लगती है। कमरे की वायु व्यक्तियों की श्वसन क्रिया के कारण अशुद्धियाँ प्राप्त होने के साथ-साथ गर्म भी हो जाती है; अत: छत की ओर ऊपर उठती है, अपेक्षाकृत ठण्डी तथा शुद्ध वायु कमरे के नीचे के स्थानों में रहेगी। गर्म होकर जब किसी आवासीय स्थल की वायु ऊपर उठ जाती है तब वहाँ का स्थान खाली होने लगता है। इस खाली स्थान को भरने के लिए अतिरिक्त वायु की आवश्यकता होती है। इस सैद्धान्तिक तथ्य के आधार पर संवातन की व्यवस्था की जाती है। उत्तम संवातन के लिए कमरे में ऊपरी भाग में अशुद्ध वायु के विसर्जन के लिए रोशनदान होना चाहिए तथा नीचे भाग में शुद्ध वायु के प्रवेश के लिए दरवाजों एवं खिड़कियों का प्रावधान होना चाहिए।</p>
<p>संवातन के साधन (Resources of Ventilation) &#8211;<br />
स्वास्थ्य एवं श्वसन की सुविधा के लिए संवातन अनिवार्य है। संवातन की व्यवस्था मुख्य रूप से दो प्रकार के साधनों से होती है &#8211; (क) प्राकृतिक साधन तथा (ख) कृत्रिम साधन।</p>
<p>(क) प्राकृतिक साधन-प्रकृति ने स्वयं ही संवातन की व्यवस्था की है। वायु के कुछ गुण, जैसे विसरण का गुण, संवातन में स्वयं ही सहायक होते हैं। जब किसी स्थान पर कोई गैस एकत्रित हो जाती है तो वह स्वयं ही विभिन्न दिशाओं में फैलने लगती है। इस प्रकार इस क्रिया में एक स्थान की गैसें दूसरे स्थान पर चली जाती हैं तथा वहाँ पर अन्य स्थान से वायु आ जाती है। विसरण की क्रिया धीमी गति से होती है। इस प्रकार मन्द गति से विसरण के द्वारा वायु शुद्ध होती रहती है। तेज गति से चलने वाली हवाएँ संवातन का दूसरा प्राकृतिक साधन हैं। विभिन्न प्राकृतिक कारकों से प्रभावित होकर वायुमण्डल में अनेक । बार तेज गति से हवाएँ चलती हैं और वायु का विलोडन कर देती हैं। वातावरण में होने वाले तापमान के अन्तर से भी संवातन की प्रक्रिया को बल मिलता है। यह विसरण की गति को प्रभावित करता है। इस प्रकार वायु गर्म होकर हल्की हो जाती है तथा ऊपर उठ जाती है। खाली स्थान को भरने के लिए अन्य स्थान से वायु बहकर आ जाती है और संवातन होता है।</p>
<p>(ख) कृत्रिम साधन &#8211; वातावरण में चलने वाली प्राकृतिक संवातन की क्रियाओं को ध्यान में रखकर हम अपने मकानों में विभिन्न प्रकार की व्यवस्था करते हैं जो कृत्रिम संवातन के अन्तर्गत आती हैं। प्राकृतिक संवातन उत्तम एवं स्वाभाविक होता है। इसका लाभ उठाने के लिए मकान, कार्य करने के स्थान आदि पर खिड़कियाँ, दरवाजे, रोशनदान तथा चिमनियाँ आदि बनाई जाती हैं। इस प्रकार, इन स्थानों में गर्म वायु ऊपर उठकर रोशनदान या चिमनियों से बाहर निकल जाती है और ठण्डी वायु खिड़कियों, दरवाजों के रास्ते अन्दर आ जाती है।</p>
<p>कुछ स्थानों पर संवातन की उपर्युक्त व्यवस्था सम्भव नहीं हो पाती। उदाहरणार्थ-सिनेमाघरों, अस्पतालों तथा अत्यधिक ठण्डे स्थानों में निरन्तर खिड़कियाँ, दरवाजे. खुले नहीं रखे जा सकते हैं। ऐसे स्थानों पर प्राकृतिक संवातन के लाभ प्राप्त नहीं किए जा सकते। इनके अभाव में कृत्रिम संवातन के कुछ अन्य साधनों को अपनाया जाता है। इनमें से कुछ साधन निम्नलिखित हैं</p>
<p>(1) निर्वातक पंखे (Exhaust Fans) कमरे के अन्दर की दूषित वायु को खींचकर बाहर फेंक देते हैं। इस प्रकार अन्दर स्थान खाली हो जाता है जिसे भरने के लिए दूसरी ओर के किसी भी मार्ग से बाहर की शुद्ध वायु भीतर आ जाती है।</p>
<p>(2) कमरे की गन्दी वायु को बाहर से अथवा किसी अन्य साधन से लाई गई शुद्ध वायु के द्वारा कमरे से बाहर धकेल दिया जाता है। उदाहरण-कूलर।।</p>
<p>(3) कमरे की वायु को पाइपों में गर्म भाप प्रवाहित करके गर्म कर दिया जाता है। गर्म होकर हल्की वायु रोशनदानों से बाहर निकल जाती है तथा शुद्ध वायु दरवाजों, खिड़कियों से अन्दर आ जाती है।</p>
<p>(4) वातानुकूलन की विधि द्वारा संवातन किया जाता है। यह अनेक यन्त्रों का बना उपकरण होता है। इसमें कुछ यन्त्र कमरे की दूषित वायु को खींचकर बाहर निकालने का कार्य करते हैं। दूसरे यन्त्र वायु से धूल आदि के कणों को छानकर इसे साफ-सुथरी करते हैं साथ ही इसको उचित ताप पर लाते हैं। तीसरे प्रकार के यन्त्र शुद्ध, आवश्यक रूप में शीतल तथा उचित नमी वाली वायु को अन्दर भेजने का कार्य करते हैं। यह एक महँगी विधि है।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 10 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
गृह स्वच्छता से क्या लाभ हैं? गृह स्वच्छता के प्रकारों का वर्णन कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
घर को गन्दगी से मुक्त रखना ही गृह स्वच्छता कहलाता है। गृह स्वच्छता के लिए निरन्तर समुचित प्रयास करने पड़ते हैं। व्यक्ति एवं परिवार के लिए गृह स्वच्छता के निम्नलिखित महत्त्व या लाभ हैं &#8211;</p>
<ul>
<li>घर की सफाई घर की सजावट में सहायक होती है। घर की सफाई के अभाव में घर की सजावट हो ही नहीं सकती।</li>
<li>घर की सफाई घर में जीवाणुओं को पनपने से रोकती है। वास्तव में विभिन्न रोगों के जीवाणु गन्दगी में ही पनपते हैं।</li>
<li>घर की सफाई घर में रहने वालों के स्वास्थ्य में भी सहायक होती है। साफ-सुथरे घर में व्यक्ति का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य उत्तम रहता है।</li>
<li>घर की सफाई सुचारु गृह-व्यवस्था में सहायक होती है।</li>
<li>घर की सफाई से घर के आकर्षण में भी वृद्धि होती है।</li>
<li>घर की सफाई वहाँ रहने वालों के जीवन-स्तर को भी उन्नत बनाती है।</li>
<li>घर की सफाई से व्यक्ति स्वस्थ, प्रसन्न तथा उत्साहित रहता है। ये कारक व्यक्ति की। व्यावसायिक सफलता में भी सहायक होते हैं।</li>
<li>साफ-सुथरे घर की सभी आगन्तुक प्रशंसा करते हैं।</li>
</ul>
<p>घर की स्वच्छता के पाँच प्रकार हैं-दैनिक सफाई, साप्ताहिक सफाई, मासिक सफाई, वार्षिक सफाई तथा आकस्मिक सफाई।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
घर की सफाई के लिए अपनाए जाने वाले आधुनिक उपकरणों का सामान्य परिचय दीजिए।<br />
अथवा घर की सफाई के दो आधुनिक उपकरणों के नाम व कार्य लिखिए।<br />
उत्तरः<br />
घर की सफाई के आधुनिक उपकरण घर की सफाई के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले मुख्य आधुनिक उपकरण निम्नलिखित हैं &#8211;</p>
<p>1. वैक्यूम क्लीनर-वैक्यूम क्लीनर घर की सफाई के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला एक आधुनिक उपकरण है जो बिजली से चलता है। इस उपकरण में ऐसी व्यवस्था रहती है कि यह फर्श पर बिखरी धूल को अपनी ओर खींच लेता है तथा यह धूल साथ में लगी हुई एक कपड़े की थैली में इकट्ठी हो जाती है। बाद में, इस कपड़े की थैली को कूड़ेदान में झाड़ दिया जाता है। वैक्यूम क्लीनर द्वारा घर के फर्श, दीवारों एवं कोनों पर रुकी हुई धूल को सरलता से साफ किया जा सकता है।</p>
<p>2. कारपेट क्लीनर-दरी एवं कालीन को साफ करने के लिए प्रयोग किए जाने वाले उपकरण को कारपेट क्लीनर कहा जाता है। इस उपकरण में एक ब्रुश लगा रहता है जो कालीन आदि की धूल को झाड़कर साफ करता है। यह धूल एक डिब्बे में एकत्र होती रहती है जिसे बाद में खाली किया जा सकता है।</p>
<p>3. बर्तन साफ करने की मशीन-अब बर्तन साफ करने के लिए एक मशीन बना ली गई है। इस मशीन के एक भाग में जो ढोल के आकार का होता है जूठे बर्तन रखकर सोडा अथवा विम डाल दिया जाता है। तत्पश्चात् मशीन को चालू कर दिया जाता है, बर्तन स्वतः ही साफ हो जाते हैं।</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
शुद्ध वायु की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
शुद्ध वायु की आवश्यकता &#8211;<br />
भोजन से भी अधिक शुद्ध वायु जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह श्वसन क्रिया को चलाती है। इस क्रिया में जीव ऑक्सीजन लेते हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड निकालते हैं। वास्तव में, ऑक्सीजन शरीर के अन्दर विभिन्न कोशिकाओं में रुधिर के हीमोग्लोबिन द्वारा पहुँचकर कोशिकीय श्वसन में काम आती है। इस क्रिया के अन्तर्गत भोज्य पदार्थों का ऑक्सीकरण होता है तथा ऊर्जा उत्पन्न होती है। यही ऊर्जा हमारे शरीर में विभिन्न कार्यों के लिए आवश्यक है। इस क्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न होती है। यह रुधिर के प्लाज्मा द्वारा श्वसन अंगों में पहुँचकर शरीर से बाहर निकल जाती है। इस प्रकार, वायु की ऑक्सीजन का उपयोग सभी जीव करते हैं। फलस्वरूप वायुमण्डल में ऑक्सीजन की कमी होती है तथा&#8217; कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है। कम ऑक्सीजन तथा अधिक कार्बन डाइऑक्साइड वाली वायु श्वसन के योग्य नहीं रहती तथा अनेक कष्टप्रद लक्षण उत्पन्न करती है।</p>
<p>प्रश्न 4.<br />
वायु में पायी जाने वाली अशद्धियाँ कौन-कौन सी होती हैं?<br />
अथवा<br />
वायु में कौन-कौन सी अशुद्धियाँ पायी जाती हैं?<br />
उत्तरः<br />
वायु की अशुद्धियाँ &#8211;<br />
वायु में विभिन्न क्रियाओं के परिणामस्वरूप दो प्रकार की अशुद्धियाँ उत्पन्न हो जाती हैं &#8211;</p>
<p>(अ) गैसीय अशुद्धियाँ-वायु अपने आप में विभिन्न गैसों का मिश्रण मात्र है। वातावरण में विभिन्न क्रियाओं के परिणामस्वरूप विभिन्न गैसें बनती हैं जो वायु को अशुद्ध बनाती रहती हैं। इस प्रकार की मुख्य गैसें हैं-कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, हाइड्रोक्लोरिक एसिड, अमोनिया आदि।</p>
<p>(ब)ठोस अथवा लटकने वाली अशुद्धियाँ-कुछ हल्के ठोस पदार्थ भी वायु में व्याप्त रहते हैं। वायु की इन ठोस अशुद्धियों को देखा जा सकता है। ये अशुद्धियाँ दो प्रकार की होती हैं &#8211;</p>
<p>(i) सजीव अशुद्धियाँ-विभिन्न प्रकार के जीवाणु, बीजाणु, परागकण आदि इसी प्रकार की अशुद्धियाँ हैं। ये अशुद्धियाँ हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।</p>
<p>(ii) निर्जीव अशुद्धियाँ-ये अशुद्धियाँ विभिन्न प्रकार के कणों के रूप में होती हैं। मिट्टी, धुल, रेत आदि के हल्के कण वायु में व्याप्त रहते हैं। इसके अतिरिक्त, वनस्पतियों के कण, ऊन, धागे तथा लकड़ी आदि के महीन कण इसी प्रकार की अशुद्धि को जन्म देते हैं। विभिन्न फैक्ट्रियों आदि की चिमनियों से निकलने वाले धुएँ के साथ कोयले के महीन कण तथा कुछ अन्य धातुओं के कण भी वायु में घुल-मिल जाते हैं। इन सभी प्रकार के कणों को वायु की अशुद्धियाँ ही माना जाता है।</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
वायु को अशुद्ध बनाने वाले मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
वायु को अशुद्ध बनाने वाले कारक &#8211;<br />
वायु को अशुद्ध करने वाले मुख्य कारक निम्नलिखित हैं &#8211;</p>
<p>1. श्वसन क्रिया द्वारा-वायु का सर्वाधिक उपयोग श्वसन क्रिया के लिए होता है। श्वसन क्रिया द्वारा वायुमण्डल से जीव ऑक्सीजन का सेवन कर लेते हैं तथा बदले में कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं। इस क्रिया के परिणामस्वरूप वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती जाती है और वायु अशुद्ध हो जाती है।</p>
<p>2. विभिन्न पदार्थों के जलने से लकड़ी, कोयला, गैस, तेल तथा अन्य अनेक पदार्थों के जलने में ऑक्सीजन प्रयुक्त होती है। इससे वायु में ऑक्सीजन की मात्रा तो घटती ही है, साथ ही कार्बन डाइऑक्साइड गैस की मात्रा में भी बढ़ोतरी होती है। इससे वायु का सन्तुलन बिगड़ जाता है तथा वायु अशुद्ध हो जाती है। जलने की क्रिया से कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी कुछ विषैली गैसें भी उत्पन्न होती हैं, जो वायु को और अधिक दूषित बनाती हैं।</p>
<p>3. व्यावसायिक अशुद्धियाँ-उद्योगों में अनेक प्रकार की रासायनिक क्रियाएँ होती हैं। इससे अनेक प्रकार की विषैली गैसें तथा गन्दगी उत्पन्न होती है। ये सब वायुमण्डल में व्याप्त होती रहती हैं और वायुमण्डल दूषित होता रहता है। भिन्न-भिन्न प्रकार के उद्योग भिन्न-भिन्न प्रकार की अशुद्धियाँ वायुमण्डल में छोड़ते रहते हैं।</p>
<p>4. वाहन-डीजल, पेट्रोल, गैस आदि से चलने वाले वाहन भी वायु को निरन्तर अशुद्ध बनाते रहते हैं।</p>
<p>प्रश्न 6.<br />
अशुद्ध वायु का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?<br />
उत्तरः<br />
अशुद्ध वायु का स्वास्थ्य पर प्रभाव &#8211;<br />
शुद्ध वायु हमारे स्वास्थ्य के लिए सहायक एवं लाभदायक होती है। इसके विपरीत, अशुद्ध वायु हमारे स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती है। अधिक समय तक अशुद्ध वायु में साँस लेते रहने से अनेक रोग हो सकते हैं। यदि व्यक्ति को पर्याप्त मात्रा में शुद्ध वायु नहीं मिलती तो उसकी आयु घटकर शीघ्र ही मृत्यु भी हो सकती है। अशुद्ध वायु फेफड़ों को दूषित करती है तथा शरीर में अनेक विजातीय तत्त्व एकत्रित होने लगते हैं। पाचन क्रिया भी अशुद्ध वायु से अस्त-व्यस्त होने लगती है। अशुद्ध वायु शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है। अशुद्ध वायु के निरन्तर सेवन से व्यक्ति का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। ऐसा व्यक्ति कोई भी कार्य ठीक से नहीं कर पाता, वह प्राय: बेचैन-सा रहता है तथा उसके व्यवहार में असामान्यता आ जाती है।</p>
<p>अशुद्ध वायु में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाती है। इससे वायु में विभिन्न रोगों के कीटाणु बढ़ने लगते हैं। इस प्रकार अनेक प्रकार के रोग; जैसे-सिरदर्द, चक्कर आना, भूख न लगना, अजीर्ण, आँखों, गले आदि के रोग, तपेदिक, खाँसी, जुकाम आदि अशुद्ध वायु से फैलते हैं।</p>
<p>प्रश्न 7.<br />
वायु मानव-जीवन के लिए क्यों आवश्यक है?<br />
उत्तरः<br />
वायु मानव-जीवन के लिए आवश्यक है &#8211;<br />
वायु, सभी जीवधारियों के लिए प्राणदायिनी है। यह पेड़-पौधों के लिए भी आवश्यक है, जिनसे हमें अनेक प्रकार की आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। यह मनुष्य के लिए दो प्रकार से आवश्यक है &#8211;</p>
<p>1. श्वसन क्रिया के लिए आवश्यक गैसों का आदान-प्रदान–शरीर में उपस्थित प्रत्येक जीवित कोशिका, ऊतक आदि को जीवित रहने तथा जैविक कार्यों को करने के लिए प्राणदायक ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। इन जीवित कोशिकाओं में ऑक्सीजन, जो रुधिर के माध्यम से यहाँ पहुँचती है, के द्वारा भोज्य पदार्थों का ऑक्सीकरण होता है। इससे ऊर्जा उत्पन्न होती है। इस क्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड भी उत्पन्न होती है। यह शरीर के लिए अनुपयोगी एवं हानिकारक गैस है। रुधिर के द्वारा ही कार्बन डाइऑक्साइड इन कोशिकाओं तथा ऊतकों से हटाई जाती है।</p>
<p>श्वसन के लिए ऑक्सीजन श्वसनांगों में वायु से ही उपलब्ध होती है तथा कार्बन डाइऑक्साइड रुधिर से वायु में छोड़ी जाती है।</p>
<p>2. शरीर का ताप सामान्य रखना-वायु के सम्पर्क में शरीर का ताप कम होता रहता है; अत: स्थिर बना रहता है। त्वचा पर आए हुए पसीने को भी वायु उड़ा ले जाती है। इससे त्वचा ठण्डी होती है। दूसरी ओर श्वसन क्रिया से भी शरीर के तापक्रम का नियमन होता है।</p>
<p>प्रश्न 8.<br />
अशुद्ध वायु की शुद्धि के प्राकृतिक साधनों का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
अशुद्ध वायु की शुद्धि के प्राकृतिक साधन &#8211;<br />
प्रकृति में ही ऐसे अनेक साधन हैं जो वायु को निरन्तर शुद्ध करते रहते हैं; यथा &#8211;</p>
<p>1. पेड़-पौधों द्वारा वायु शुद्ध करना &#8211; वायु को शुद्ध करने वाले मुख्य प्राकृतिक साधन पेड़-पौधे हैं जो वायुमण्डल से कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण कर लेते हैं तथा सूर्य के प्रकाश में<br />
ऑक्सीजन छोड़ते हैं। इस क्रिया में जहाँ एक ओर वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा घटती है वहीं दूसरी ओर ऑक्सीजन की मात्रा में वृद्धि होती है।</p>
<p>2. सूर्य के प्रकाश द्वारा वायु का शुद्ध होना &#8211; सूर्य के प्रकाश में अत्यधिक ताप होता है। इसकी गर्मी से अनेक अशुद्धियाँ स्वयं ही नष्ट हो जाती हैं; जैसे—विभिन्न रोगों के कीटाणु सूर्य की गर्मी से मर जाते हैं, जलवाष्प की अधिकता सूर्य की गर्मी से कम होती है तथा वस्तुओं के सड़ने-गलने से उत्पन्न होने वाली अशुद्धियाँ तथा दुर्गन्धपूर्ण गैसें सूर्य के प्रकाश एवं गर्मी से ऑक्सीजन की उपस्थिति में नष्ट हो जाती हैं।</p>
<p>3. वर्षा द्वारा वायु का शुद्ध होना &#8211; वर्षा का जल वायुमण्डल की अनेक अशुद्धियों को घोलकर अपने साथ बहा ले जाता है। उदाहरणार्थ-वायुमण्डल में उपस्थित धूल-कण एवं अन्य अनेक धातुओं के महीन कण जल के साथ बहकर पृथ्वी पर आते हैं तथा अनेक गैसें जल में घुलनशील होती हैं जो वर्षा के जल में घुलकर पृथ्वी पर आती हैं।</p>
<p>4. वायु की ऑक्सीजन द्वारा वायु का शुद्ध होना &#8211; ऑक्सीजन सभी वस्तुओं को ऑक्सीकृत करने वाली गैस है। इस प्रकार वायु में उपस्थित ऑक्सीजन वायु की अनेक अशुद्धियों को ऑक्सीकृत कर देती है। इसी प्रकार की दूसरी गैस तथा ऑक्सीजन का एक रूप ओजोन भी एक तीव्र गैस है। ओजोन अनेक जीवाणुओं को नष्ट कर देती है।</p>
<p>5. तेज हवाओं द्वारा वायु का शुद्ध होना &#8211; वायु का शुद्धीकरण तेज गति से बहने वाली हवाओं से भी होता है। ये हवाएँ एक स्थान पर एकत्रित होने वाली अशुद्धियों को तीव्र गति से उड़ाकर दूर क्षेत्रों में पहुँचा देती हैं। इस क्रिया से वायु का विलोडन होता है तथा सभी स्थानों पर सन्तुलन बना रहता है। उदाहरणार्थ-यदि हवाएँ न चलें तो औद्योगिक क्षेत्रों का वातावरण इतना अधिक दूषित हो जाए कि वहाँ रहना असम्भव हो जाए।</p>
<p>6. विसरण द्वारा वायु का शुद्ध होना &#8211; विसरण पदार्थों का एक विशेष गुण है, विशेषकर गैसों का; जिसमें एक गैस अपने से अधिक सान्द्रण से कम सान्द्रण वाले स्थान पर स्वयं ही बहती है। यह क्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि उस गैस का दोनों स्थानों (सभी स्थानों) पर बराबर सान्द्रण नहीं हो जाता। इस गुण के कारण वायु की गैसें इधर-उधर बहती रहती हैं। जब किसी एक स्थान पर कुछ विषैली गैसें अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाती हैं तो वे स्वयं ही किसी भी दिशा में विसरित हो जाती हैं। इस प्रकार विसरण से वायु शुद्ध बनी रहती है।</p>
<p>प्रश्न 9.<br />
अशुद्ध वायु की शुद्धि के कृत्रिम साधनों का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
अशुद्ध वायु की शुद्धि के कृत्रिम साधन &#8211;<br />
अशुद्ध वायु को शुद्ध करने के लिए निम्नलिखित कृत्रिम साधनों को मुख्य रूप से अपनाया जाता है &#8211;</p>
<ul>
<li>सभी मकानों एवं निवास स्थानों को बनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वायु एवं सूर्य के प्रकाश के आने-जाने की व्यवस्था रहे।</li>
<li>घरों में जहाँ अँगीठी आदि जलाई जाती हैं वहाँ से धुआँ निकलने की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। इसके लिए एक ऊँची चिमनी लगा देना उचित है ताकि धुआँ एवं दूषित गैसें घर के अन्दर तथा अन्य निवास स्थानों के पास एकत्रित न होने पाएँ।</li>
<li>यदि पशु पालने हों तो उन्हें निवास स्थान से कुछ दूर ही रखना चाहिए।</li>
<li>प्रत्येक बस्ती में काफी संख्या में पेड़-पौधे एवं वनस्पति उगानी चाहिए।</li>
<li>भूमि खाली नहीं छोड़नी चाहिए। खाली भूमि में धूल उड़ती है जो वायु को दूषित करती है।</li>
<li>विभिन्न औद्योगिक संस्थानों तथा फैक्ट्रियों को बस्ती से दूर बनाना चाहिए। इसके साथ ही फैक्ट्रियों का धुआँ निकालने वाली चिमनियाँ काफी ऊँची होनी चाहिए, जिससे दूषित गैसें काफी ऊँचाई पर वायुमण्डल में चली जाएँ।</li>
<li>जहाँ अधिक वाहन चलते हैं वहाँ की सड़कें पक्की होनी चाहिए। कच्ची सड़कों से धूल उड़ती है तथा यह धूल वायु को दूषित करती है। कच्ची सड़कों पर धूल को उड़ने से रोकने के लिए पानी छिड़कने की व्यवस्था होनी चाहिए।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 10.<br />
गृह तथा स्कूल में उत्तम संवातन व्यवस्था को क्यों महत्त्वपूर्ण माना जाता है?<br />
अथवा<br />
स्कूलों में संवातन व्यवस्था का महत्त्व लिखिए।<br />
अथवा<br />
टिप्पणी लिखिए-संवातन से लाभ।<br />
उत्तरः<br />
घर तथा स्कूल में संवातन व्यवस्था का महत्त्व &#8211;<br />
सभी जीवों को जीवित रहने के लिए शुद्ध वायु आवश्यक है। शुद्ध वायु का अर्थ है ऐसी वायु जिसमें पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन उपस्थित हो। वायुरूपी इस मिश्रण में ऑक्सीजन के अतिरिक्त अन्य संगठक गैसों आदि का प्रतिशत भी सामान्य के इधर-उधर नहीं होना चाहिए अन्यथा यह वायु प्रदूषित कहलाएगी। किसी भी प्रकार से प्रदूषित वायु श्वसन के अयोग्य होती है। घर हो या विद्यालय या अन्य कोई स्थान जहाँ मनुष्य रहता है अथवा एकत्रित होते हैं, सभी जगह श्वसन के लिए शुद्ध तथा श्वसन योग्य वायु का होना आवश्यक है। दूसरी ओर ऐसे स्थान पर रहने वाले व्यक्ति या व्यक्ति समूह वायु में से श्वसन योग्य प्राणदायक ऑक्सीजन को ग्रहण ही नहीं करेंगे वरन् कार्बन डाइऑक्साइड तथा नमी छोड़कर इसे प्रदूषित भी करेंगे। इसका अर्थ यह भी है कि अल्प समय में ही कमरे या किसी भी बन्द स्थान की वायु को ये व्यक्ति केवल श्वसन द्वारा ही श्वसन योग्य नहीं रहने देंगे। बच्चों पर तो प्रदूषित वायु अथवा अशुद्ध वायु का अत्यधिक प्रभाव होता है।</p>
<p>आवश्यक है कि उपर्युक्त स्थानों में ऐसी व्यवस्था अवश्य ही होनी चाहिए कि श्वसन में छोड़ी गई दूषित वायु को कमरे से बाहर निकाला जाए तथा शुद्ध, श्वसन योग्य वायु कमरे में लाई जाए। अत: आवश्यक है कि ऐसे सभी स्थानों पर उचित तथा उपयोगी संवातन व्यवस्था अपनाई जाए। इसके लिए सामान्य प्राकृतिक साधनों को ही कृत्रिम रूप से अपनाकर व्यवस्थित किया जा सकता है, जैसे पारगामी संवातन (Cross Ventilation) तथा छत के आस-पास चिमनी अथवा रोशनदान बनाना।</p>
<p>उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि गृह तथा स्कूल में संवातन व्यवस्था का अत्यधिक महत्त्व है। स्कूल में प्रत्येक कक्ष पर्याप्त बड़ा होना चाहिए तथा उसमें खिड़की, दरवाजे एवं रोशनदान अवश्य होने चाहिए। स्कूल के कमरों की दिशा वायु की गति के अनुकूल होनी चाहिए ताकि एक दिशा से आने वाले वायु के झोंके दूसरी दिशा वाले दरवाजे खिड़कियों से बाहर निकल जाएँ। कमरों के अतिरिक्त स्कूल का प्रांगण भी पर्याप्त खुला होना चाहिए। स्कूल का निर्माण तंग गलियों में या औद्योगिक क्षेत्र में नहीं किया जाना चाहिए। स्कूल के निकट कोई गन्दा नाला या खत्ता भी नहीं होना चाहिए।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 10 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
गृह स्वच्छता क्या है?<br />
उत्तरः<br />
गृह स्वच्छता का अर्थ है-घर में गन्दगी का न होना। गृह स्वच्छता के लिए घर तथा घर की वस्तुओं की सफाई के विभिन्न उपाय किए जाते हैं तथा घर से कूड़े-करकट को नियमित रूप से विसर्जित किया जाता है।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
गृह स्वच्छता के कितने प्रकार हैं?<br />
उत्तरः<br />
घर की सफाई के मुख्य पाँच प्रकार हैं &#8211;</p>
<ol>
<li>दैनिक सफाई</li>
<li>साप्ताहिक सफाई</li>
<li>मासिक सफाई</li>
<li>वार्षिक सफाई</li>
<li>आकस्मिक सफाई।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 3.<br />
घर की सफाई के दो मुख्य आधुनिक उपकरणों के नाम बताइए।<br />
उत्तरः<br />
घर की सफाई के दो मुख्य आधुनिक उपकरण हैं-वैक्यूम क्लीनर तथा कारपेट क्लीनर।</p>
<p>प्रश्न 4.<br />
घर की सफाई का प्रमुख लाभ क्या है?<br />
उत्तरः<br />
घर की सफाई वहाँ रहने वालों के स्वास्थ्य में सहायक होती है।</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
क्या सफाई के अभाव में गृह-सज्जा सम्भव है?<br />
उत्तरः<br />
सफाई के अभाव में गृह-सज्जा कदापि सम्भव नहीं है।</p>
<p>प्रश्न 6.<br />
वायु जीवन के लिए क्यों आवश्यक है?<br />
उत्तर<br />
वायु से ही जीव श्वसन के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करता है तथा वायु में ही वह कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है।</p>
<p>प्रश्न 7.<br />
प्राणदायक गैस कौन-सी है?<br />
उत्तरः<br />
प्राणदायक गैस ऑक्सीजन है। यह श्वसन के लिए आवश्यक होती है।</p>
<p>प्रश्न 8.<br />
वायु कैसे दूषित होती है?<br />
उत्तरः<br />
जीवों के द्वारा की जाने वाली श्वसन-क्रिया, पदार्थों के जलने तथा औद्योगिक संस्थानों के अवशेषों के वायु में मिलने से वह दूषित हो जाती है।</p>
<p>प्रश्न 9.<br />
वायु प्रदूषण को आप कैसे रोकेंगी?<br />
उत्तरः<br />
औद्योगीकरण एवं नगरीकरण में आवश्यक सावधानियाँ रखकर, वाहनों को सुधारकर तथा अधिक-से-अधिक पेड़ लगाकर वायु प्रदूषण को रोका जा सकता है।</p>
<p>प्रश्न 10.<br />
वायु को शुद्ध करने में सर्वाधिक योगदान किसका है?<br />
उत्तरः<br />
वायु को शुद्ध करने में सर्वाधिक योगदान पेड़-पौधों का है।</p>
<p>प्रश्न 11.<br />
संवातन से क्या आशय है? ।<br />
उत्तरः<br />
किसी आवासीय स्थान पर वायु के आने-जाने की उचित व्यवस्था को &#8216;संवातन&#8217; कहते हैं।</p>
<p>प्रश्न 12.<br />
संवातन का उद्देश्य क्या है?<br />
उत्तरः<br />
संवातन का उद्देश्य आवासीय स्थल पर शुद्ध वायु प्राप्त करना तथा अशुद्ध वायु का विसर्जन है।</p>
<p>प्रश्न 13.<br />
संवातन के प्राकृतिक साधन कौन-कौन से हैं?<br />
उत्तरः<br />
संवातन के प्राकृतिक साधन हैं-वायु की गति, तेज हवाएँ, गैसों के विसरण का गुण तथा ताप पाकर वायु का हल्का होकर ऊपर उठना।</p>
<p>प्रश्न 14.<br />
रोशनदान छत के पास तथा खिड़कियाँ नीचे की ओर होती हैं। ऐसा क्यों होता है?<br />
उत्तरः<br />
ताजी एवं ठण्डी वायु खिड़कियों से कमरे में प्रवेश करती है तथा गर्म एवं अशुद्ध वायु रोशनदान से बाहर निकल जाती है।</p>
<p>प्रश्न 15.<br />
कृत्रिम संवातन का कोई एक उपाय बताइए।<br />
उत्तरः<br />
कृत्रिम संवातन का एक मुख्य उपाय है-निर्वातक पंखा (Exhaust fan)।</p>
<p>प्रश्न 16.<br />
निर्वातक पंखों की क्या उपयोगिता है?<br />
उत्तरः<br />
किसी कक्ष से दूषित वायु को बाहर निकालने के लिए निर्वातक पंखे विशेष रूप से उपयोगी होते हैं। ये कृत्रिम संवातन के प्रमुख साधन होते हैं।</p>
<p>प्रश्न 17.<br />
घर को मक्खी व मच्छरों से मुक्त करने के उपाय लिखिए।<br />
उत्तरः<br />
घर को मक्खी व मच्छरों से मुक्त करने का सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय है-घर में हर प्रकार की सफाई की व्यवस्था करना/रखना। इसके अतिरिक्त घर में नियमित रूप से कीटनाशक दवाओं का छिड़काव किया जाना चाहिए। घर पर फिनायल का पोंछा लगाना चाहिए। घर के सभी बाहरी दरवाजे-खिड़कियाँ जाली वाले होने चाहिए तथा उन्हें सामान्य रूप से बन्द रखना चाहिए।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 10 बहविकल्पीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए &#8211;<br />
1. घर की सफाई में सर्वाधिक महत्त्व है &#8211;<br />
(क) दैनिक सफाई का<br />
(ख) साप्ताहिक सफाई का<br />
(ग) मासिक सफाई का<br />
(घ) वार्षिक सफाई का।<br />
उत्तरः<br />
(क) दैनिक सफाई का।</p>
<p>2. घर की सफाई महत्त्वपूर्ण है &#8211;<br />
(क) शारीरिक स्वास्थ्य के लिए<br />
(ख) मानसिक स्वास्थ्य के लिए<br />
(ग) जीवन में आनन्द-प्राप्ति के लिए<br />
(घ) उपर्युक्त सभी के लिए।<br />
उत्तरः<br />
(घ) उपर्युक्त सभी के लिए।</p>
<p>3. घर की सफाई क्यों आवश्यक है &#8211;<br />
(क) रोग के कीटाणुओं की रोकथाम के लिए<br />
(ख) घर की सजावट के लिए<br />
(ग) सुचारु रूप से गृह व्यवस्था के लिए<br />
(घ) इन सभी कारणों के लिए।<br />
उत्तरः<br />
(घ) इन सभी कारणों के लिए।</p>
<p>4. शौचालय की नाली को प्रतिदिन धोना चाहिए &#8211;<br />
(क) डी०डी०टी० से<br />
(ख) साबुन से<br />
(ग) फिनायल से<br />
(घ) सादे पानी से।<br />
उत्तरः<br />
(ग) फिनायल से।</p>
<p>5. वायु में पायी जाने वाली मुख्य निष्क्रिय गैस है &#8211;<br />
(क) ऑक्सीजन<br />
(ख) नाइट्रोजन<br />
(ग) ओजोन<br />
(घ) कार्बन डाइऑक्साइड।<br />
उत्तरः<br />
(ख) नाइट्रोजन।</p>
<p>6. वायु है &#8211;<br />
(क) एक मिश्रण<br />
(ख) यौगिक<br />
(ग) तत्त्व<br />
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।<br />
उत्तरः<br />
(क) एक मिश्रण।</p>
<p>7. वर्षा ऋतु में वायु में बढ़ जाती है &#8211;<br />
(क) सुगन्ध<br />
(ख) नमी<br />
(ग) ऑक्सीजन<br />
(घ) नाइट्रोजन।<br />
उत्तरः<br />
(ख) नमी।</p>
<p>8. कमरे के अच्छे संवातन के लिए आवश्यक है &#8211;<br />
(क) एक खिड़की तथा एक दरवाजा<br />
(ख) एक खिड़की, रोशनदान व एक दरवाजा<br />
(ग) पारगामी संवातन व्यवस्था<br />
(घ) कूलर की व्यवस्था।<br />
उत्तरः<br />
(ग) पारगामी संवातन व्यवस्था।</p>
<p>9. किसी कार्बनिक वस्तु के जलने से उत्पन्न होती है &#8211;<br />
(क) ऑक्सीजन<br />
(ख) कार्बन डाइऑक्साइड<br />
(ग) नाइट्रोजन<br />
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।<br />
उत्तरः<br />
(ख) कार्बन डाइऑक्साइड।</p>
<h4><a href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science/">UP Board Solutions for Class 11 Home Science</a></h4>
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		<title>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 22 प्रत्याशित माता की देख-रेख</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Prasanna]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 28 Apr 2025 12:04:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 11]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 22 प्रत्याशित माता की देख-रेख (Care of the Expectant Mother) UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 22 प्रत्याशित माता की देख-रेख UP Board Class 11 Home Science Chapter 22 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर प्रश्न 1. गर्भावस्था के समय उत्पन्न होने वाले सामान्य लक्षणों का ... <a title="UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 22 प्रत्याशित माता की देख-रेख" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science-chapter-22/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 22 प्रत्याशित माता की देख-रेख">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 22 प्रत्याशित माता की देख-रेख (Care of the Expectant Mother)</p>
<h2>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 22 प्रत्याशित माता की देख-रेख</h2>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 22 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
गर्भावस्था के समय उत्पन्न होने वाले सामान्य लक्षणों का वर्णन कीजिए। अथवा गर्भावस्था के सामान्य लक्षणों का वर्णन कीजिए। अथवा गर्भधारण करने पर गर्भिणी के लक्षणों की चर्चा कीजिए।<br />
उत्तर:<br />
गर्भावस्था के सामान्य लक्षण (Signs of Pregnancy) &#8211;<br />
गर्भाधान की क्रिया के पश्चात् नए जीव के विकास की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है। इस अवस्था को &#8216;गर्भावस्था&#8217; कहा जाता है। नए जीव के विकास के कारण गर्भवती स्त्री के शरीर में अनेक परिवर्तन होते हैं जो गर्भावस्था के लक्षणों के रूप में प्रकट होने लगते हैं। गर्भावस्था के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं</p>
<p>1. मासिक धर्म का बन्द होना-जब गर्भधारण हो जाता है तो नियमित रूप से होने वाला मासिक रक्तस्राव सामान्य रूप से बन्द हो जाता है। ऐसे समय यदि यह लगातार 3 माह तक बन्द रहता है तो यह समझ लेना चाहिए कि स्त्री निश्चित रूप से गर्भवती है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि किसी स्त्री का मासिक धर्म गर्भधारण के अतिरिक्त कुछ अन्य कारणों से भी बन्द हो सकता है। अत: गर्भधारण के निर्धारण के लिए कुछ अन्य लक्षणों एवं परीक्षणों को भी ध्यान में रखना आवश्यक होता है।</p>
<p>2. सुस्त रहना तथा नींद अधिक आना-गर्भधारण करने के उपरान्त विभिन्न आन्तरिक परिवर्तनों के कारण स्त्रियाँ कुछ सुस्त रहने लगती हैं तथा आलस्य अनुभव करने लगती हैं। इसके साथ ही नींद की अधिक इच्छा होने लगती है।</p>
<p>3. चेहरा-गर्भवती स्त्री के चेहरे पर कुछ परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं, उसकी आँखों के नीचे व ऊपर, होंठों के आस-पास का रंग कुछ काला हो जाता है।</p>
<p>4. स्वभाव सम्बन्धी परिवर्तन गर्भधारण करने के साथ-साथ कुछ स्वभावगत परिवर्तन भी दृष्टिगोचर होने लगते हैं। प्रायः स्त्रियों के स्वभाव में कुछ चिड़चिड़ापन आ जाता है तथा वे बात-बात पर झुंझलाहट अनुभव करने लगती हैं। इस स्वभावगत परिवर्तन को भी गर्भधारण का लक्षण माना जा सकता है।</p>
<p>5. जी का बार-बार मिचलाना-जब गर्भधारण हो जाता है तो अधिकतर स्त्रियों का जी मिचलाने लगता है। कभी-कभी ऐसी स्थिति में उल्टियाँ भी हो जाती हैं। यह क्रिया गर्भधारण करने के लगभग तीन माह पश्चात् प्रारम्भ हो जाती है तथा 1 या 1- माह बाद बन्द हो जाती है।</p>
<p>6. गर्भ की हलचल-जब गर्भधारण किए लगभग 4 या 5 महीने का समय हो जाता है तो गर्भ में हलचल प्रारम्भ हो जाती है। गर्भ में ऐसा अनुभव होता है कि कुछ घूम रहा है।</p>
<p>7. बार-बार मूत्र-त्याग की इच्छा-गर्भधारण के उपरान्त स्त्रियों को बार-बार मूत्र-त्याग की इच्छा होती है। प्रायः गर्भाशय के बढ़ जाने से मूत्राशय पर पड़ने वाले दबाव के कारण ऐसा होता है। इस लक्षण को भी गर्भधारण का एक लक्षण माना जा सकता है।</p>
<p>8. पेट की स्थिति &#8211;</p>
<ul>
<li>गर्भधारण करने के दो महीने पश्चात्, पेट अधिक चपटा हो जाता है तथा पेट का आकार भी बढ़ जाता है।</li>
<li>कोख अण्डाकार हो जाती है।</li>
<li>गर्भाशय में स्थित शिशु के हृदय की धड़कन को स्टेथस्कोप द्वारा सुना जा सकता है।</li>
<li>गर्भधारण होने से पेट का आकार बढ़ जाता है तथा उसके चारों तरफ का भाग उभर आता है। छठे महीने से स्तन-मुख से सफेद रंग का दूध जैसा द्रव निकलने लगता है।</li>
</ul>
<p>9. आन्तरिक लक्षण–गर्भधारण करने को निश्चित करने के लिए मूत्र का एक विशिष्ट परीक्षण भी किया जाता है। इस परीक्षण से ज्ञात हो जाता है कि स्त्री ने गर्भधारण कर लिया है। इसके अतिरिक्त आजकल अल्ट्रासाउण्ड द्वारा भी गर्भधारण की जानकारी प्राप्त की जाती है।<br />
अत: उपर्युक्त सभी लक्षणों के आधार पर भली-भाँति पहचाना जा सकता है कि कोई स्त्री गर्भवती है या नहीं।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
गर्भावस्था के समय स्त्री के सामान्य कष्टों का वर्णन कीजिए। अथवा गर्भावस्था के समय स्त्री के सामान्य कष्ट कौन-कौन से हैं? इन्हें कैसे दूर किया जा सकता है?<br />
उत्तर:<br />
गर्भावस्था के सामान्य कष्ट तथा उन्हें दूर करने के उपाय  (Troubles of Pregnancy and their Treatment) &#8211;<br />
गर्भावस्था महिला के लिए सामान्य से पर्याप्त भिन्न अवस्था होती है। इस अवस्था में महिला विभिन्न शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तनों से गुजरती है। इन परिवर्तनों के कारण प्रायः अधिकांश स्त्रियों को गर्भावस्था के काल में कुछ-न-कुछ कष्ट अवश्य होते हैं। इन कष्टों से अधिक चिन्तित नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये स्वाभाविक होते हैं तथा प्रकृति-प्रदत्त हैं, जो कुछ समय उपरान्त स्वतः समाप्त हो जाते हैं। फिर भी यदि कष्ट का अधिक अनुभव होता हो तो निश्चित रूप से डॉक्टर का परामर्श आवश्यक है। इस काल में होने वाले सामान्य कष्टों का संक्षिप्त परिचय निम्नवर्णित है &#8211;</p>
<p>1. जी मिचलाना-गर्भावस्था काल में अनेक महिलाओं का प्रायः सुबह के समय कभी-कभी लगभग दो या तीन मास तक जी मिचलाता है। अत: जिन स्त्रियों को चाय की आदत है, वे प्रायः एक प्याला चाय तथा बिस्कुट ले सकती हैं। इसके विपरीत स्थिति पर भुने चने प्रयोग में लाए जा सकते हैं। खाने-पीने के उपरान्त लेटना आवश्यक है। लेटकर जब उठे तो धीरे-धीरे उठना चाहिए, झटके से नहीं। इतने पर भी जी मिचलाना न रुके तो लौंग, इलायची, पिपरमिण्ट आदि लिया जा सकता है।</p>
<p>2. वमन होना-गर्भावस्था में कुछ स्त्रियों को भोजन ग्रहण करने के तुरन्त उपरान्त वमन हो जाता है। अत: उन्हें भोजन ग्रहण करने से पूर्व लगभग आधा घण्टा विश्राम कर लेना चाहिए। तदुपरान्त रेशे वाली हल्की सब्जी के साथ चबा-चबाकर रोटी खानी चाहिए। पानी का प्रयोग कम करना चाहिए। चिकित्सकों के मतानुसार दवा का सेवन करना चाहिए।<br />
गर्भिणी को स्वत: ही अपना ध्यान रखना चाहिए अन्यथा खाने-पीने की गड़बड़ से शिशु का स्वाभाविक विकास न हो सकेगा। उसे स्वच्छ एवं शुद्ध वायु ग्रहण करनी चाहिए।</p>
<p>3. कलेजे में जलन-बहुत देर तक बैठे रहने अथवा रात्रि में देर से भोजन ग्रहण करने पर गर्भवती को कलेजे में जलन का अनुभव होने लगता है। ऐसा इस कारण होता है, क्योंकि भ्रूण बढ़ने के कारण, भोजनोपरान्त आमाशय को फैलने व फूलने का पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाता। इसके लिए तले एवं गरिष्ठ पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। इस अवस्था में पानी में नीबू मिलाकर पीना लाभकारी होता है।</p>
<p>4. मांसपेशियों में ऐंठन-गर्भवती स्त्री के शरीर में यदि कैल्सियम कम हो जाता है तो मांसपेशियाँ ऐंठने लगती हैं। गर्भावस्था के इस कष्ट से बचने के लिए कैल्सियम युक्त विटामिन &#8216;A&#8217; व &#8216;D&#8217; का प्रयोग तथा हरी सब्जियों का प्रयोग लाभकारी होता है। खाने के बाद पान खाना भी अच्छा रहता है।</p>
<p>5. टाँगों में सूजन-गर्भावस्था में कभी-कभी कुछ समय तक निरन्तर खड़े रहने से टाँगों व पैरों पर सूजन आ जाती है। ऐसी स्थिति में अधिक समय तक खड़े नहीं रहना चाहिए बल्कि बीच-बीच में विश्राम कर लेना चाहिए। काम आवश्यक हो तो बैठकर पूर्ण करना चाहिए।</p>
<p>6. कब्ज-प्राय: गर्भावस्था में स्त्रियों को कब्ज की शिकायत हो जाती है। इसके फलस्वरूप पेट में गैस बनने लगती है, सिर में दर्द होने लगता है अथवा बवासीर आदि हो जाती है। यदि वमन की शिकायत न हो तो प्रायः शौच जाने से पूर्व ताजा जल ग्रहण करना चाहिए। प्रातः घूमना भी लाभकारी हो सकता है। चोकरयुक्त आटा, छिलके वाली दाल तथा हरी सब्जी का सेवन करना चाहिए। रात्रि में दूध के साथ ईसबगोल की भूसी, मुनक्का, अंजीर आदि ली जा सकती हैं। इतने पर भी कब्ज की शिकायत दूर न हो तो डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।</p>
<p>7. पीठ में दर्द का होना–समयानुसार भ्रूण का विकास होता है। इसके बढ़ने के साथ उसके भार व आकार में भी वृद्धि होती है। फलस्वरूप मांसपेशियों के खिंचाव से पीठ में पीड़ा होने लगती है। इसके लिए समुचित विश्राम अवश्य करना चाहिए तथा आरामदायक बिस्तर पर ही लेटना चाहिए।</p>
<p>8. निद्रा में कमी आना-गर्भावस्था में गर्भ के बढ़ने से लेटना, उठना आदि कठिन हो जाता है, फलस्वरूप नींद भी नहीं आती। अधिक भोजन कर लेने पर भी कठिनाई होती है; अत: हल्का, सुपाच्य व कम भोजन ग्रहण करना चाहिए। रात्रि में भी सोने से लगभग दो घण्टे पूर्व भोजन ग्रहण कर लेना चाहिए, इससे नींद आने में सुविधा होती है। खुली वायु में यदि टहला जाए तो वह भी अच्छा रहता है।</p>
<p>9. कुछ गम्भीर रोग-कभी-कभी बाँह व टाँग में सूजन आ जाती है, रक्त स्राव होने लगता है अथवा पेडू व कमर में पीड़ा होने लगती है। ऐसी स्थिति में तुरन्त डॉक्टर अथवा नर्स को बुलाना चाहिए।</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
गर्भावस्था में आहार में किन-किन भोज्य-तत्त्वों की प्रधानता होनी चाहिए और क्यों? विस्तारपूर्वक लिखिए।<br />
अथवा<br />
&#8220;स्वस्थ शिशु के जन्म के लिए माता का भोजन उत्तरदायी है।&#8221;इस कथन की पुष्टि कीजिए।<br />
अथवा<br />
एक गर्भवती महिला को सन्तुलित आहार देना क्यों आवश्यक है? गर्भवती महिला के सन्तुलित आहार में किन तत्त्वों की अधिकता होनी चाहिए? कारण सहित समझाइए।<br />
अथवा<br />
एक गर्भवती महिला को सन्तुलित आहार देना क्यों आवश्यक है? सविस्तार वर्णन कीजिए।<br />
अथवा<br />
गर्भिणी के सन्तुलित आहार के अन्तर्गत भोजन के कौन-कौन से तत्त्व आते हैं?<br />
अथवा<br />
गर्भावस्था में किन पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता होती है? ये तत्त्व किन खाद्य-पदार्थों से प्राप्त किए जा सकते हैं?<br />
उत्तर:<br />
गर्भावस्था में स्त्री की देखभाल एवं स्वास्थ्य रक्षा के लिए उसके आहार के प्रति विशेष रूप से सजग रहना अनिवार्य होता है। आहार की दृष्टि से स्त्रियों के लिए गर्भधारण करने की अवस्था एक विशिष्ट अवस्था है। इस अवस्था में अनेक शारीरिक परिवर्तन एवं वृद्धि होने के कारण स्त्री को अधिक पोषक तत्त्वों तथा भिन्न प्रकार के आहार की आवश्यकता होती है। गर्भावस्था में गर्भस्थ भ्रूण के विकास के लिए भी माता को अतिरिक्त पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है। गर्भस्थ भ्रूण अपनी आवश्यकता के समस्त पोषक तत्त्व माता के शरीर से ही ग्रहण करता है। अतः यदि माता के आहार में आवश्यक पोषक तत्त्वों की कमी रहती है तो उस दशा में भ्रूण के विकास के लिए आवश्यक तत्त्व माता के रक्त से ही लिए जाते हैं।</p>
<p>इसका प्रतिकूल प्रभाव माता के स्वास्थ्य पर पड़ता है, साथ ही गर्भस्थ शिशु भी अल्प-पोषण का शिकार बन जाता है। इसके अतिरिक्त यह भी एक तथ्य है कि गर्भावस्था में स्त्रियों को जी मिचलाने तथा उल्टियों की समस्या का भी सामना करना पड़ता है; अत: उनके द्वारा ग्रहण किए गए आहार की कुछ मात्रा तो व्यर्थ ही चली जाती है। साथ-ही-साथ इस अवस्था में कभी-कभी आहार के प्रति अरुचि होने के कारण भी सुचारु रूप से आहार ग्रहण नहीं किया जाता। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए गर्भवती स्त्री के आहार का नियोजन विशेष प्रकार से करना अनिवार्य होता है।</p>
<p>गर्भवती स्त्री को साधारण अवस्था की तुलना में काफी अधिक प्रोटीन, लोहा, कैल्सियम तथा विटामिन दिए जाने चाहिए। गर्भावस्था में उचित पौष्टिक एवं सन्तुलित आहार ग्रहण करने से इस अवस्था की सामान्य समस्याएँ एवं कठिनाइयाँ कम हो जाती हैं तथा गर्भस्थ शिशु स्वस्थ होता है। गर्भस्थ शिशु के जन्म के उपरान्त नवजात शिशु का मुख्य आहार माता का दूध ही होता है। अतः स्तनपान कराने के लिए भी माता को स्वयं पौष्टिक आहार ग्रहण करना अनिवार्य होता है। जन्म के समय एक सामान्य शिशु, जिसका वजन 3.2 किग्रा हो, के शरीर में 500 ग्राम प्रोटीन, 30 ग्राम कैल्सियम, 14 ग्राम फॉस्फेट, 0•4 ग्राम आयरन तथा आवश्यक विटामिन भी संचित होते हैं। ये सब पोषक तत्त्व वह माता के शरीर से ही ग्रहण करता है।</p>
<p>इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि गर्भावस्था में माता एवं गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य के लिए सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार आवश्यक होता है।</p>
<p>गर्भवती के लिए आवश्यक पौष्टिक आहार  (Necessary Nutritious Food for Pregnant Woman) &#8211;</p>
<p>1. ऊर्जा &#8211; गर्भावस्था में स्त्री को सामान्य से कुछ अधिक मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसका मुख्य कारण गर्भावस्था में स्त्री का वजन बढ़ जाना तथा चयापचय की दर बढ़ जाना होता है। ICMR ने सुझाव दिया है कि गर्भवती महिला को प्रतिदिन लगभग 300 कैलोरी अतिरिक्त ऊर्जा आवश्यक होती है। दूध पिलाने वाली महिला को ऊर्जा की आवश्यकता सामान्य से कुछ अधिक ही होती है। इस अवस्था में सामान्य से 700 कैलोरी ऊर्जा अधिक लेनी चाहिए।</p>
<p>2. प्रोटीन &#8211; विशेषज्ञों का विचार है कि गर्भावस्था में महिला को सामान्य से 10 ग्राम अधिक प्रोटीन प्रतिदिन ग्रहण करनी चाहिए। प्रोटीन की यह अधिक मात्रा गर्भस्थ शिशु के शारीरिक विकास के लिए आवश्यक होती है। इसके अतिरिक्त गर्भावस्था में स्त्री के शरीर में कुछ टूट-फूट होती रहती है, जिसकी मरम्मत के लिए प्रोटीन की अधिक मात्रा लेनी पड़ती है। गर्भावस्था के अन्तिम छह माह में प्रोटीन की अधिक मात्रा अवश्य ही ग्रहण करनी चाहिए। प्रोटीन की अधिक मात्रा ग्रहण करने के लिए गर्भवती के आहार में दूध, पनीर, मांस, मछली, अण्डा, दालें और हरी सब्जियाँ तथा सूखे मेवे तथा फलों की मात्रा सामान्य से कुछ अधिक कर देनी चाहिए।</p>
<p>3. कैल्सियम &#8211; गर्भावस्था में स्त्री के आहार में कैल्सियम की मात्रा भी साधारण अवस्था से अधिक होनी चाहिए। यह अतिरिक्त कैल्सियम गर्भस्थ शिशु के शरीर की अस्थियों के निर्माण के लिए प्रयुक्त होता है। गर्भस्थ शिशु जन्म से पूर्व लगभग 30 ग्राम कैल्सियम अपने शरीर में संचित कर लेता है। यदि गर्भावस्था में स्त्री के आहार में कैल्सियम की अतिरिक्त मात्रा नहीं होती तो उस स्थिति में गर्भस्थ भ्रूण अपनी आवश्यकता के लिए माता के शरीर से कैल्सियम लेता है। इससे माता की हड्डियाँ एवं दाँत कमजोर हो जाते हैं। यदि गर्भावस्था में स्त्री कैल्सियम की पर्याप्त मात्रा ग्रहण करती रहती है तो जन्म लेने वाले शिशु को दाँत निकलते समय अधिक कष्ट नहीं होता। विशेषज्ञों का विचार है कि गर्भवती के दैनिक आहार में सामान्य से 500 से 600 मिली ग्राम तक कैल्सियम की अधिक मात्रा होनी चाहिए। कैल्सियम की यह अतिरिक्त मात्रा ग्रहण करने के लिए गर्भवती के आहार में अण्डा, दूध, मछली, पनीर, सेम, फूलगोभी, शलजम, गाजर, चुकन्दर, हरी सब्जियों, बादाम आदि की अधिक मात्रा का समावेश होना चाहिए।</p>
<p>4. आयरन &#8211; गर्भावस्था में आयरन या लौह तत्त्व की सामान्य से अधिक मात्रा आवश्यक होती है। यदि आयरन की यह अतिरिक्त मात्रा ग्रहण न की जाए तो गर्भावस्था में महिलाओं को प्रायः रक्त-अल्पता की समस्या का सामना करना पड़ जाता है। गर्भस्थ भ्रूण के विकास के लिए भी आयरन की आवश्यकता होती है। इन आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों का सुझाव है कि गर्भावस्था में प्रतिदिन स्त्री को सामान्य से 10 मिग्रा अधिक आयरन ग्रहण करना चाहिए। गर्भावस्था के अन्तिम तीन माह में आयरन की यह आवश्यकता विशेष रूप से अनुभव की जाती है। आयरन की अतिरिक्त मात्रा ग्रहण करने के लिए गर्भवती स्त्री के आहार में हरी सब्जियों, टमाटर, आँवला, अण्डा, सेब, केला तथा नारंगी आदि का समावेश होना चाहिए।</p>
<p>5. विटामिन &#8216;A&#8217; &#8211; ऐसा विश्वास है कि गर्भावस्था में स्त्री को सामान्य से अधिक मात्रा में विटामिन &#8216;A&#8217; की आवश्यकता होती है। इस विटामिन की आवश्यकता शारीरिक वृद्धि तथा शारीरिक क्रियाओं को. नियमित रखने के लिए होती है। सामान्य रूप से पर्याप्त मात्रा में प्रोटीनयुक्त आहार ग्रहण करने से विटामिन &#8216;A&#8217; की आवश्यकता पूरी हो जाती है।</p>
<p>भिन्न-भिन्न क्रियाशीलता वाली गर्भवती स्त्रियों के लिए<br />
आवश्यक पौष्टिक तत्त्व</p>
<p>6. विटामिन &#8216;D&#8217; &#8211; गर्भावस्था में स्त्री के लिए विटामिन &#8216;D&#8217; का भी विशेष महत्त्व होता है। इस अवस्था में स्त्री के आहार में विटामिन &#8216;D&#8217; की प्रचुर मात्रा का समावेश होना चाहिए। विटामिन &#8216;D&#8217; कैल्सियम तथा फॉस्फोरस के साथ मिलकर दाँतों व अस्थियों को दृढ़ता प्रदान करने में सहायक होता है। यदि किसी कारणवश गर्भवती स्त्री को विटामिन &#8216;D&#8217; की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध नहीं होती तो इसका प्रतिकूल प्रभाव स्त्री तथा भावी सन्तान दोनों पर ही पड़ता है। विटामिन &#8216;D&#8217; की समुचित प्राप्ति के लिए गर्भवती स्त्री के आहार में दूध, मक्खन, अण्डे की जर्दी तथा मछली के तेल का समावेश होना चाहिए। सूर्य की किरणों से भी शरीर में विटामिन &#8216;D&#8217; का निर्माण होता है।</p>
<p>7. अन्य विटामिन &#8211; ICMR के विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि गर्भवती महिला को सामान्य से कुछ अधिक मात्रा में विटामिन्स; जैसे 0.2 मिग्रा थायमिन, 0.2 मिग्रा राइबोफ्लेविन, 0.2 मिग्रा निकोटिनिक एसिड की अधिक आवश्यकता होती है। इसी प्रकार कुछ मात्रा में फोलिक एसिड तथा विटामिन B12 भी अधिक दिया जाना चाहिए। &#8211; उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट हो जाता है कि गर्भावस्था में स्त्री तथा गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य एवं शरीर के सुचारु विकास के लिए पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक एवं सन्तुलित आहार दिया जाना अनिवार्य होता है। वास्तव में गर्भस्थ शिशु का स्वास्थ्य भी माता के आहार पर निर्भर करता है। गर्भावस्था में आवश्यक तत्त्वों की मात्रा उपर्युक्त तालिका द्वारा दर्शायी गई है।</p>
<p>प्रश्न 4.<br />
&#8220;गर्भावस्था में माता की शारीरिक तथा मानसिक अवस्था का गर्भस्थ शिशु के विकास पर प्रभाव पड़ता है।&#8221; इस कथन की पुष्टि विस्तारपूर्वक कीजिए।<br />
उत्तर:<br />
भ्रूण का निर्माण पिता के शुक्राणु तथा माता के अण्डाणु (ovum) के संयोग से होता है, परन्तु भ्रूण का विकास एवं पोषण केवल माता के शरीर से प्राप्त होने वाले तत्त्वों से ही होता है। गर्भस्थ शिशु का विकास पूर्ण रूप से माता के शरीर पर ही निर्भर रहता है। इस स्थिति में गर्भस्थ शिशु का विकास माता की शारीरिक तथा मानसिक अवस्था पर निर्भर रहना नितान्त स्वाभाविक है।</p>
<p>माता की शारीरिक अवस्था का गर्भस्थ शिशु पर प्रभाव  (Effect of Mother&#8217;s Physical State on the Child in Womb) &#8211;<br />
गर्भस्थ शिशु के शरीर का विकास माता के शरीर से प्राप्त तत्त्वों द्वारा ही होता है। इस स्थिति में यदि माता की शारीरिक अवस्था सामान्य नहीं है तो गर्भस्थ शिशु को पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्त्व प्राप्त नहीं हो पाते तथा गर्भस्थ शिशु दुर्बल एवं अभावग्रस्त रह जाता है। उसकी मांसपेशियों तथा हड्डियों का समुचित विकास नहीं हो पाता। यदि माता के शरीर में कैल्सियम, फॉस्फोरस आदि खनिजों की न्यूनता हो तो निश्चित रूप से गर्भस्थ शिशु की अस्थियों का सामान्य विकास नहीं हो पाता। इसी प्रकार गर्भस्थ शिशु के विकास के लिए प्रोटीन की भी पर्याप्त मात्रा की आवश्यकता होती है।</p>
<p>प्रोटीन की यह मात्रा प्राप्त करने के लिए माता की शारीरिक अवस्था अच्छी होनी आवश्यक है। माता के शरीर में प्रोटीन की कमी होने की दशा में गर्भस्थ शिशु भी प्रोटीन कुपोषण का शिकार हो सकता है। पोषक तत्त्व प्रदान करने के अतिरिक्त एक अन्य रूप में भी गर्भावस्था में माता की शारीरिक अवस्था गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य एवं विकास को प्रभावित करती है। यदि गर्भावस्था में माता किसी गम्भीर संक्रामक रोग की शिकार हो तो निश्चित रूप से रोग का संक्रमण गर्भस्थ शिशु में भी पहुँच जाता है। गर्भस्थ शिशु द्वारा अर्जित किया जाने वाला संक्रमण अत्यधिक गम्भीर होता है तथा इसका गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव शिशु के विकास पर पड़ता है। उदाहरण के लिए गर्भावस्था में यदि माता एड्स, सिफलिस या टी०बी० जैसे किसी संक्रामक रोग से पीड़ित हो तो निश्चित रूप से गर्भस्थ शिशु भी सम्बन्धित रोग का शिकार हो जाता है।</p>
<p>माता की मानसिक अवस्था का गर्भस्थ शिशु पर प्रभाव  (Effect of Mother&#8217;s Mental State on the Child in Womb) &#8211;<br />
शारीरिक अवस्था के अतिरिक्त, गर्भावस्था में माता की मानसिक अवस्था भी गर्भस्थ शिश के विकास को प्रभावित करती है। यदि गर्भावस्था में माता भय, चिन्ता अथवा क्रोध जैसे प्रबल संवेगों से ग्रस्त रहती है तो निश्चित रूप से गर्भस्थ शिशु के मानसिक एवं संवेगात्मक विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। गर्भस्थ शिशु जन्म लेने के उपरान्त प्रायः संवेगात्मक अस्थिरता का शिकार रहा करता है। वास्तव में यदि गर्भावस्था में माता की मानसिक अवस्था सामान्य नहीं होती तो उसकी विभिन्न अन्तःस्रावी ग्रन्थियों का स्राव भी असन्तुलित हो जाता है। इसका प्रभाव रक्त के माध्यम से गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों का तो यहाँ तक कहना है कि गर्भावस्था में माता की मानसिक व मनोवैज्ञानिक अवस्था का प्रभाव जन्म लेने वाले शिशु के सम्पूर्ण व्यक्तित्व एवं विकास पर पड़ता है।</p>
<p>उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि गर्भावस्था में माता की शारीरिक तथा मानसिक अवस्था का प्रभाव गर्भस्थ शिशु के विकास पर अनिवार्य रूप से पड़ता है। गर्भावस्था में स्त्री को अपने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना चाहिए। हर प्रकार के संक्रमण से बचना चाहिए और यदि किसी प्रकार का संक्रमण हो भी जाए तो उसका तुरन्त उपचार करना चाहिए। गर्भस्थ शिशु के सुचारु विकास के लिए पर्याप्त मात्रा में सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार ग्रहण करना चाहिए। आहार में ऊर्जा, प्रोटीन, कैल्सियम, आयरन तथा विटामिन्स की अतिरिक्त मात्रा ग्रहण करनी चाहिए। इसके साथ-साथ गर्भावस्था में माता को प्रसन्नचित्त रहना चाहिए तथा संवेगात्मक उत्तेजनाओं से बचना चाहिए। उसे धार्मिक एवं आध्यात्मिक विचारों का मनन करना चाहिए। इन समस्त गतिविधियों का अनुकूल प्रभाव गर्भस्थ शिशु के विकास पर पड़ता है।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 22 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
मातृ-कला एवं शिशु-कल्याण से क्या आशय है?<br />
उत्तर:<br />
मातृ-कला एवं शिशु-कल्याण का अर्थ मातृत्व का हमारे समाज के लिए सर्वाधिक महत्त्व है। इसीलिए मातृत्व से सम्बन्धित बहुपक्षीय ज्ञान का व्यवस्थित अध्ययन किया जाने लगा है। मातृत्व सम्बन्धी इस ज्ञान का अध्ययन &#8216;मातृ-कला&#8217; (mother craft) के अन्तर्गत किया जाता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि &#8216;मातृ-कला&#8217; वह विषय-क्षेत्र है, जिसके अन्तर्गत मातृत्व सम्बन्धी व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है।</p>
<p>मातृत्व के साथ अनिवार्य रूप से शिशु का जन्म भी सम्बद्ध होता है। शिशु के जन्म तथा जन्म के उपरान्त उसके उचित पालन-पोषण का विशेष महत्त्व होता है। शिशु के पालन-पोषण पर ही उसका भविष्य निर्भर करता है। शिशु के व्यवस्थित पालन-पोषण सम्बन्धी तथ्यों का अध्ययन &#8216;शिश-कल्याण&#8217; के अन्तर्गत किया जाता है। इस प्रकार &#8216;शिशु-कल्याण&#8217; वह विषय-क्षेत्र है जिसके अन्तर्गत शिशु के जन्म एवं उसके पालन-पोषण सम्बन्धी नियमों आदि का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है।</p>
<p>उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि &#8216;मातृ-कला&#8217; तथा &#8216;शिशु-कल्याण&#8217; दोनों आपस में घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध हैं। इसीलिए इन दोनों विषय-क्षेत्रों का एक साथ ही अध्ययन किया जाता है।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
मातृ-कला एवं शिशु-कल्याण के अध्ययन-क्षेत्र का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए।<br />
उत्तर:<br />
मातृ-कला एवं शिशु-कल्याण का अध्ययन-क्षेत्र &#8211;<br />
मातृ-कला एवं शिशु-कल्याण का अध्ययन-क्षेत्र पर्याप्त व्यापक है। संक्षेप में मातृ-कला तथा शिशु-कल्याण के अध्ययन-क्षेत्र का विवरण निम्नवर्णित है &#8211;</p>
<ul>
<li>मातृत्व के अर्थ एवं विभिन्न पक्षों का अध्ययन।</li>
<li>गर्भावस्था से सम्बन्धित समस्त तथ्यों का अध्ययन।</li>
<li>परिवार नियोजन तथा परिवार-कल्याण सम्बन्धी अध्ययन।</li>
<li>प्रसूता एवं नवजात शिशु का अध्ययन।</li>
<li>बाल्यावस्था तक क्रमिक रूप से होने वाले विकास का अध्ययन।</li>
<li>शिशु के स्वास्थ्य का बहुपक्षीय अध्ययन।</li>
<li>व्यक्तिगत स्वास्थ्य के नियमों एवं व्यावहारिक पक्ष का अध्ययन।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 3.<br />
मातृ-कला एवं शिशु-कल्याण के महत्त्व का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तर:<br />
मातृ-कला एवं शिशु-कल्याण का महत्त्व &#8211;<br />
गृहविज्ञान के अन्तर्गत “मातृ-कला&#8217; एवं &#8216;शिशु-कल्याण&#8217; नामक विषय-क्षेत्र का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। इस विषय के अध्ययन-क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि यह एक विस्तृत विषय-क्षेत्र है तथा इसका सम्बन्ध माता, शिशु तथा इन दोनों के आपसी सम्बन्धों के प्राय: सभी पक्षों से है। मातृ-कला एवं शिशु-कल्याण एक व्यावहारिक एवं उपयोगी विषय है। यह कोई सैद्धान्तिक महत्त्व का विषय नहीं है बल्कि इसका सम्बन्ध दैनिक जीवन से है। प्रत्येक युवती भावी माँ होती है।</p>
<p>स्त्री ही चूँकि माँ बनती है। अत: उसके लिए &#8216;मातृ-कला&#8217; एवं &#8216;शिशु-कल्याण&#8217; सम्बन्धी ज्ञान परम आवश्यक है। इस ज्ञान से जहाँ एक ओर स्त्रियों का अपना जीवन सरल एवं विभिन्न समस्याओं से मुक्त होता है, वहीं दूसरी ओर बच्चों के उत्तम पालन-पोषण में सहायता प्राप्त होती है। इस विषय के उचित ज्ञान के अभाव में अनेक प्रकार के भ्रम एवं समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। इसीलिए आधुनिक युग में प्रत्येक बालिका, युवती एवं गृहिणी के लिए &#8216;मातृ-कला&#8217; एवं &#8216;शिशु-कल्याण&#8217; सम्बन्धी अध्ययन एवं ज्ञान आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है।</p>
<p>प्रश्न 4.<br />
मातृत्व से पहले महिला को मानसिक रूप से तैयार क्यों होना चाहिए?<br />
उत्तर:<br />
मातृत्व से पहले मानसिक तैयारी मातृत्व एक शारीरिक एवं जैविक प्रक्रिया है तथा इसके लिए महिला को शारीरिक रूप से परिपक्व होना अनिवार्य है, परन्तु इसके साथ-ही-साथ मातृत्व से पहले महिला को मानसिक रूप से भी तैयार होना चाहिए। वास्तव में मातृत्व एक गम्भीर विषय है तथा इसके साथ अनेक दायित्व तथा कार्य सम्बद्ध हैं। जन्म लेने वाले शिशु के उचित पालन-पोषण एवं विकास का दायित्व माता पर होता है। मातृत्व से परिवार का विस्तार होता है। परिवार पर आर्थिक जिम्मेदारियाँ बढ़ती हैं तथा माता-पिता की अपनी दैनिक दिनचर्या में भी अनेक प्रकार के परिवर्तन करने पड़ते हैं। विश्राम एवं मनोरंजन आदि में भी कटौती करनी पड़ती है; अत: इन समस्त तथ्यों को ध्यान में रखकर ही महिला को मानसिक रूप से मातृत्व के लिए तैयार होना चाहिए।</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
गर्भवती स्त्री की देखभाल करना क्यों आवश्यक है? गर्भवती स्त्री की देखभाल करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?<br />
उत्तर:<br />
गर्भवती स्त्री की देखभाल &#8211;<br />
गर्भावस्था महिला के जीवन में विशेष महत्त्व की अवस्था या काल होता है। गर्भावस्था में महिला के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु के सुचारु विकास तथा उसके भावी जीवन एवं स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर व्यापक देखभाल की आवश्यकता होती है। वास्तव में गर्भस्थ शिशु हर प्रकार से माँ पर निर्भर करता है तथा उससे घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध होता है। गर्भवती स्त्री की आवश्यक देखभाल के अन्तर्गत मुख्य रूप से निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है &#8211;</p>
<ul>
<li>व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना</li>
<li>स्वास्थ्य रक्षा का ध्यान रखना</li>
<li>सन्तुलित एवं आवश्यक आहार की व्यवस्था करना</li>
<li>चिकित्सक से नियमित रूप से जाँच करवाना।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 6.<br />
गर्भावस्था में स्त्री के आहार-नियोजन के लिए ध्यान रखने योग्य बातों का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तर:<br />
गर्भावस्था में आहार-नियोजन के लिए<br />
ध्यान रखने योग्य बातें &#8211;<br />
एक गर्भवती स्त्री के लिए आहार-नियोजन करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए &#8211;</p>
<ul>
<li>यह एक ज्ञात तथ्य है कि गर्भावस्था में स्त्री को साधारण अवस्था की तुलना में अधिक मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऊर्जा की इस अतिरिक्त मात्रा को प्राप्त करने के लिए गर्भवती के आहार में अधिक कार्बोज का समावेश नहीं होना चाहिए बल्कि ऊर्जा प्राप्ति के लिए प्रोटीन, खनिज तथा विटामिन युक्त आहार ग्रहण करना चाहिए। इससे मोटापा नहीं बढ़ता।</li>
<li>गर्भावस्था में स्त्री को सदैव बिना छने हुए अर्थात् चोकरयुक्त आटे को ही रोटी के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। इससे कब्ज से बचने में सहायता मिलती है तथा विटामिन्स भी प्राप्त होते हैं।</li>
<li>गर्भवती स्त्री के आहार में जहाँ तक सम्भव हो अधिक तली हुई तथा मिर्च मसालेदार खाद्य सामग्री का समावेश नहीं होना चाहिए।</li>
<li>गर्भवती स्त्री को सदैव ताजा तथा सफाई से पकाया हुआ आहार ग्रहण करना चाहिए। बासी तथा देर से रखा आहार ग्रहण नहीं करना चाहिए।</li>
<li>जहाँ तक सम्भव हो सके गर्भवती स्त्री के दैनिक आहार में दूध एवं दूध से बने पदार्थों का समावेश अवश्य ही होना चाहिए।</li>
<li>भोजन के प्रति रुचि बनाए रखने के लिए आहार के मीनू में परिवर्तन करते रहना चाहिए।</li>
<li>जहाँ तक सम्भव हो दैनिक आहार में मौसम के फलों का समावेश अवश्य होना चाहिए। ताजे फलों के अतिरिक्त मेवे आदि भी लिए जा सकते हैं।</li>
<li>गर्भवती स्त्री के आहार को इस प्रकार से तैयार करना चाहिए कि खाद्य सामग्री के पौष्टिक तत्त्व नष्ट न हों। इसके लिए सब्जियों को या तो छीलें ही नहीं और यदि छीलना अनिवार्य हो तो पतला छिलका ही उतारें। काटने से पहले सब्जी को धोएँ, काटकर न धोएँ। चावलों को अधिक न धोएँ तथा चावलों के माँड को अलग न करें। इसके अतिरिक्त खाद्य सामग्री को अधिक तले या भूने नहीं। इससे पौष्टिक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।</li>
<li>यदि सामान्य आहार से सभी विटामिन एवं खनिज समुचित मात्रा में उपलब्ध न हों तो इनकी पूर्ति के लिए अलग से गोलियाँ ली जानी चाहिए।</li>
<li>यदि वमन की शिकायत न हो तो गर्भवती स्त्री को काफी मात्रा में पानी भी अवश्य पीना चाहिए।</li>
<li>रात का भोजन सोने के दो घण्टे पूर्व अवश्य ही ग्रहण कर लेना चाहिए। इसके साथ-साथ विशेष रूप से ध्यान रखने योग्य बात यह है कि भोजन ग्रहण करते समय गर्भवती स्त्री अपने आपको हर प्रकार की चिन्ता से मुक्त रखे।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 7.<br />
गर्भावस्था में स्त्री के सामान्य कार्य-कलापों तथा विश्राम की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।<br />
उत्तर:<br />
गर्भावस्था में सामान्य कार्य-कलाप तथा विश्राम &#8211;<br />
गर्भावस्था सामान्य अवस्था से भिन्न अवस्था है, परन्तु इस अवस्था में भी शरीर की समस्त क्रियाएँ सामान्य रूप से होती हैं। अत: जहाँ तक सम्भव हो महिला को अपनी दिनचर्या सामान्य ही रखनी चाहिए; अर्थात् परिश्रम, व्यायाम तथा विश्राम नियमित रूप से करने चाहिए। केवल विश्राम ही करना उचित नहीं है। स्त्री को अपने घरेलू दैनिक कार्य सामान्य रूप से करते रहना चाहिए।</p>
<p>गर्भवती को उन कार्यों से बचना चाहिए, जिनमें अधिक परिश्रम और शक्ति लगे। रात में पूर्ण विश्राम करना चाहिए। कम-से-कम आठ घण्टे अवश्य सोना चाहिए। इसके अतिरिक्त यदि सम्भव हो तो दिन में भी, भोजन ग्रहण करने के बाद एक-दो घण्टे या तो सो जाए अन्यथा आराम से लेटना चाहिए। गर्भवती स्त्री को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि वह निरन्तर लम्बी अवधि तक कार्य में न लगी रहे। कार्य के बीच-बीच में अल्पकालीन विश्राम करना भी लाभप्रद होता है। किसी भी स्थिति में अधिक थकान नहीं होनी चाहिए।</p>
<p>प्रश्न 8.<br />
स्पष्ट कीजिए कि गर्भावस्था में शारीरिक स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।<br />
उत्तर:<br />
गर्भावस्था में शारीरिक स्वच्छता &#8211;<br />
गर्भावस्था में स्त्री को हर प्रकार की शारीरिक स्वच्छता का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। उसे नियमित रूप से स्नान करना चाहिए। सामान्य रूप से गुनगुने पानी से ही स्नान करना चाहिए। गर्भावस्था में दाँतों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए कैल्सियम की अधिक मात्रा ग्रहण करनी चाहिए। गर्भावस्था में आँतों की सफाई का भी अधिक ध्यान रखना चाहिए। कब्ज से बचना चाहिए, परन्तु जुलाब की कोई तेज दवा नहीं लेनी चाहिए। गर्भावस्था में स्त्री को अपने स्तनों की स्वच्छता का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। यदि गर्भावस्था में स्तनों की नियमित रूप से सफाई नहीं की जाती तो इस बात की आशंका रहती है कि कहीं स्तन-मुख के दुग्ध निकालने वाले छिद्र बन्द न हो जाएँ। गर्भावस्था में अधिक कसी हुई चोली भी नहीं पहननी चाहिए। गर्भावस्था में स्त्री को अपनी वेशभूषा का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। उसे साफ-सुथरे तथा ढीले-ढाले वस्त्र ही धारण करने चाहिए। गर्भवती को ऊँची एड़ी वाले सैण्डिल नहीं पहनने चाहिए।</p>
<p>प्रश्न 9.<br />
गर्भावस्था में किए जाने वाले व्यायाम का सामान्य परिचय दीजिए।<br />
उत्तर:<br />
गर्भावस्था में व्यायाम हल्का व्यायाम गर्भिणी स्त्री के लिए विशेष लाभदायक है। बहत-सी स्त्रियाँ गर्भवती होने पर काम छोड़कर आलसी हो जाती हैं, यह गलत है। काम करते रहने से मांसपेशियाँ मजबूत रहती हैं और प्रसव के समय कष्ट नहीं होता है। हाँ, गर्भिणी स्त्री को भारी चीज नहीं उठानी चाहिए। घरेलू काम करना भी एक प्रकार का व्यायाम ही है, तथापि यहाँ व्यायाम सम्बन्धी कुछ ऐसी क्रियाएँ बताई जा रही हैं जो गर्भावस्था में लाभप्रद हैं &#8211;</p>
<ul>
<li>पाँव अलग करके खड़ा होना चाहिए और हाथों को कमर पर रखना चाहिए। कमर से शरीर को एक ओर फिर दूसरी ओर झुकाना चाहिए। सिर को सीधा रखना चाहिए और लम्बी साँस खींचनी चाहिए।</li>
<li>पाँव लम्बे करके और हाथों को कमर पर रखकर जमीन पर बैठना चाहिए। कन्धों को धीरे-धीरे पीछे गिराना चाहिए।</li>
<li>हाथों को साइड में रखकर पीठ के बल लेटना चाहिए। फिर दोनों पैरों को धीरे-धीरे बिना अधिक जोर दिए, जितना ऊँचा हो सके उठाना चाहिए।</li>
<li>व्यायाम करते समय ढीले वस्त्र पहनने चाहिए। आरम्भ में प्रत्येक व्यायाम को तीन बार से अधिक नहीं करना चाहिए। व्यायाम इतना करना चाहिए कि अधिक थकावट न हो। व्यायाम करते समय लम्बी साँस अवश्य लेनी चाहिए।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 10.<br />
गर्भवती महिला के स्वास्थ्य से गर्भस्थ शिशु का क्या सम्बन्ध है?<br />
उत्तर:<br />
गर्भवती महिला के स्वास्थ्य का गर्भस्थ शिशु से सम्बन्ध &#8211;<br />
गर्भवती महिला के स्वास्थ्य और गर्भस्थ शिशु का घनिष्ठ सम्बन्ध है। वास्तव में गर्भस्थ शिशु माँ के शरीर से सम्बद्ध होता है। उसका पोषण एवं विकास माँ के शरीर के माध्यम से ही होता है। इस स्थिति में यदि माँ स्वस्थ है तो गर्भस्थ शिशु का स्वास्थ्य भी अच्छा होता है एवं उसका विकास भी सामान्य होता है। इसके विपरीत यदि माँ का स्वास्थ्य सामान्य नहीं है अर्थात् वह किसी अभावजनित रोग से पीड़ित है अथवा किसी संक्रामक रोग से पीड़ित है तो उस स्थिति में गर्भस्थ शिशु के विकास एवं स्वास्थ्य के विकृत होने की बहुत अधिक आशंका रहती है। उदाहरण के लिए यदि कोई महिला तपेदिक या एड्स आदि रोगों से ग्रस्त है तो गर्भस्थ शिशु भी संक्रमित हो सकता है। इसी प्रकार गर्भवती महिला के संवेगात्मक असन्तुलन का प्रतिकूल प्रभाव भी गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास पर पड़ सकता है।</p>
<p>प्रश्न 11.<br />
गर्भवती स्त्री को यात्रा में क्या सावधानी रखनी चाहिए?<br />
उत्तर:<br />
गर्भवती स्त्री द्वारा यात्रा के समय सावधानियाँ &#8211;<br />
गर्भावस्था में यदि कोई विशेष कष्ट या समस्या न हो तो छोटी यात्रा करने में किसी प्रकार का डर या कष्ट नहीं होता, परन्तु यदि महिला लम्बी रेल या हवाई यात्रा करने की योजना बनाए तो उसे सर्वप्रथम अपनी महिला चिकित्सक से पूरी जाँच करवाकर परामर्श लेना अनिवार्य होता है। यदि चिकित्सक अनुमति दे देती है तो गर्भवती महिला सावधानीपूर्वक यात्रा कर सकती है। गर्भावस्था में यात्रा तभी करनी चाहिए जब रेल में सीट रिजर्व हो और लेटने की सुविधा उपलब्ध हो। लम्बी यात्रा करते समय महिला को ढीले-ढाले वस्त्र धारण करने चाहिए तथा ऊँची एड़ी की सैण्डिल या चप्पल बिल्कुल नहीं पहननी चाहिए। यात्रा के दौरान अपने खान-पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए। यदि महिला को वमन की शिकायत हो तो उसकी भी समुचित व्यवस्था रखनी चाहिए। इसके अतिरिक्त यात्रा के दौरान यह ध्यान रखना चाहिए कि निरन्तर लम्बे समय तक पैर लटकाकर न बैठे। इससे टाँगों में सूजन आ सकती है। यदि चिकित्सक द्वारा कुछ औषधियों के सेवन का परामर्श दिया गया हो तो उन्हें अपने साथ अवश्य रखें तथा ठीक समय पर उनका सेवन करती रहें। यात्रा के दौरान प्रसन्नचित्त रहें, किसी प्रकार का तनाव न लें।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 22 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
&#8216;मातृ-कला&#8217; से क्या आशय है?<br />
उत्तर:<br />
&#8216;मातृ-कला&#8217; वह विषय-क्षेत्र है जिसके अन्तर्गत मातृत्व सम्बन्धी व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
&#8216;शिशु-कल्याण&#8217; से क्या आशय है?<br />
उत्तर:<br />
&#8216;शिशु-कल्याण&#8217; वह विषय-क्षेत्र है जिसके अन्तर्गत शिशु के जन्म एवं उसके पालन-पोषण सम्बन्धी नियमों आदि का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है।</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
गर्भावस्था के चार सामान्य कष्टों का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तर:</p>
<ol>
<li>जी मिचलाना</li>
<li>वमन होना</li>
<li>कलेजे में जलन तथा</li>
<li>कब्ज की शिकायत।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 4.<br />
गर्भावस्था में स्त्री को अतिरिक्त आहार की आवश्यकता क्यों होती है?<br />
अथवा<br />
गर्भावस्था में पोषक तत्त्वों की माँग क्यों बढ़ जाती है?<br />
उत्तर:<br />
गर्भस्थ शिशु की आहार सम्बन्धी आवश्यकता स्त्री के शरीर से ही पूर्ण होती है, इस कारण से गर्भावस्था में स्त्री को अतिरिक्त आहार एवं पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है।</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
गर्भवती स्त्री का क्या आहार होना चाहिए?<br />
उत्तर:<br />
गर्भवती स्त्री को पौष्टिक, सन्तुलित तथा सुरुचिकर आहार ग्रहण करना चाहिए। उसके आहार में प्रोटीन, लौह-खनिज, कैल्सियम तथा विटामिनों की मात्रा सामान्य से अधिक होनी चाहिए।</p>
<p>प्रश्न 6.<br />
गर्भावस्था में स्त्री को किन खनिज लवणों की अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता होती है?<br />
उत्तर:<br />
गर्भावस्था में स्त्री को कैल्सियम तथा आयरन नामक खनिज लवणों की अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता होती है।</p>
<p>प्रश्न 7.<br />
कैल्सियम गर्भिणी के लिए क्यों आवश्यक है?<br />
उत्तर:<br />
गर्भस्थ शिशु की हड्डियों के विकास के लिए गर्भिणी के आहार में कैल्सियम की अधिक मात्रा का समावेश होना चाहिए। यदि गर्भिणी स्त्री के आहार में कैल्सियम की पर्याप्त मात्रा नहीं होती तो गर्भिणी की हड्डियाँ तथा दाँत कमजोर हो जाते हैं।</p>
<p>प्रश्न 8.<br />
रक्ताल्पता से आप क्या समझती हैं?<br />
उत्तर:<br />
रक्ताल्पता का शाब्दिक अर्थ है-रक्त की कमी होना परन्तु वास्तव में रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा घट जाना ही रक्ताल्पता है। गर्भावस्था में प्राय: यह समस्या उत्पन्न हो जाती है।</p>
<p>प्रश्न 9.<br />
गर्भावस्था में स्त्री को दैनिक घरेलू कार्य करने चाहिए या छोड़ देने चाहिए?<br />
उत्तर:<br />
गर्भावस्था में स्त्री को समस्त दैनिक घरेलू कार्य करते रहना चाहिए परन्तु अधिक परिश्रम तथा भारी वजन उठाने के कार्यों से बचना चाहिए।</p>
<p>प्रश्न 10.<br />
गर्भावस्था में स्त्री को अपना मानसिक स्वास्थ्य कैसे सामान्य रखना चाहिए?<br />
उत्तर:<br />
गर्भावस्था में स्त्री को प्रसन्नचित्त रहना चाहिए तथा संवेगात्मक उत्तेजनाओं से बचना चाहिए। उसे धार्मिक एवं आध्यात्मिक विचारों का मनन करना चाहिए।</p>
<p>प्रश्न 11.<br />
प्रत्याशित माता को कौन-कौन से टीके लगाए जाते हैं?<br />
उत्तर:<br />
प्रत्याशित माता को सामान्य रूप से टिटेनस से बचाव का टीका लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त आवश्यकता पड़ने पर आयरन तथा विटामिन के टीके भी लगाए जाते हैं। अन्य किसी संक्रमण की आशंका होने पर सम्बन्धित टीके लगाए जाते हैं।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 22 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए &#8211;</p>
<p>1. विद्यालय में पढ़ने वाली युवतियों के लिए &#8216;मातृ-कला&#8217; एवं &#8216;शिशु-कल्याण&#8217; का अध्ययन &#8211;<br />
(क) अनावश्यक है<br />
(ख) आवश्यक एवं लाभकारी है<br />
(ग) ऐच्छिक होना चाहिए<br />
(घ) व्यर्थ है।<br />
उत्तर:<br />
(ख) आवश्यक एवं लाभकारी है।</p>
<p>2. गर्भधारण करने के प्रारम्भिक लक्षण हैं &#8211;<br />
(क) मासिक धर्म बन्द होना<br />
(ख) जी का बार-बार मिचलाना<br />
(ग) सुस्त रहना तथा नींद अधिक आना<br />
(घ) उपर्युक्त सभी लक्षण।<br />
उत्तर:<br />
(घ) उपर्युक्त सभी लक्षण।</p>
<p>3. गर्भावस्था में सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार आवश्यक होता है &#8211;<br />
(क) स्त्री को प्रसन्न करने के लिए<br />
(ख) शिशु को सुन्दर बनाने के लिए<br />
(ग) माता एवं गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य के लिए<br />
(घ) अनावश्यक होता है।<br />
उत्तर:<br />
(ग) माता एवं गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य के लिए।</p>
<p>4. &#8216;मातृ-कला&#8217; एवं &#8216;शिशु-कल्याण&#8217; के अन्तर्गत अध्ययन किया जाता है &#8211;<br />
(क) गर्भावस्था से सम्बन्धित समस्त तथ्यों का<br />
(ख) प्रसूता एवं नवजात शिशु का<br />
(ग) बाल्यावस्था तक क्रमिक रूप.से होने वाले विकास का<br />
(घ) उपर्युक्त सभी तथ्यों का।<br />
उत्तर:<br />
(घ) उपर्युक्त सभी तथ्यों का।</p>
<p>5. गर्भावस्था में ध्यान रखना चाहिए &#8211;<br />
(क) सन्तुलित आहार का &#8211;<br />
(ख) समुचित विश्राम का<br />
(ग) शारीरिक स्वच्छता का<br />
(घ) उपर्युक्त सभी का।<br />
उत्तर:<br />
(घ) उपर्युक्त सभी का।</p>
<p>6. गर्भावस्था में धूम्रपान से &#8211;<br />
(क) माँ का मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहता है<br />
(ख) गर्भस्थ शिशु पर बुरा प्रभाव पड़ता है।<br />
(ग) कोई प्रभाव नहीं पड़ता<br />
(घ) माँ एवं शिशु दोनों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।<br />
उत्तर:<br />
(घ) माँ एवं शिशु दोनों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।</p>
<p>7. गर्भवती महिला को &#8211;<br />
(क) असन्तुलित आहार लेना चाहिए<br />
(ख) कम आहार लेना चाहिए<br />
(ग) केवल फल लेना चाहिए<br />
(घ) दोगुना आहार लेना चाहिए।<br />
उत्तर:<br />
(घ) दोगुना आहार लेना चाहिए।</p>
<p>8. गर्भावस्था में महिला को मिलना चाहिए &#8211;<br />
(क) केवल फल<br />
(ख) केवल दूध<br />
(ग) सन्तुलित आहार<br />
(घ) जो भी उपलब्ध हो।<br />
उत्तर:<br />
(ग) सन्तुलित आहार।</p>
<p>9. उत्तम स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है &#8211;<br />
(क) मक्खन<br />
(ख) मिठाई<br />
(ग) सन्तुलित आहार<br />
(घ) मनपसन्द व्यंजन।<br />
उत्तर:<br />
(ग) सन्तुलित आहार।</p>
<h4><a href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science/">UP Board Solutions for Class 11 Home Science</a></h4>
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		<title>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 14 उद्यान, खेल के मैदान तथा खुले स्थान</title>
		<link>https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science-chapter-14/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Prasanna]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 28 Apr 2025 11:17:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 11]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 14 उद्यान, खेल के मैदान तथा खुले स्थान (Gardens, Playground and Open Places) UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 14 उद्यान, खेल के मैदान तथा खुले स्थान UP Board Class 11 Home Science Chapter 14 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर प्रश्न 1. उद्यान किसे कहते हैं? ... <a title="UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 14 उद्यान, खेल के मैदान तथा खुले स्थान" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science-chapter-14/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 14 उद्यान, खेल के मैदान तथा खुले स्थान">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 14 उद्यान, खेल के मैदान तथा खुले स्थान (Gardens, Playground and Open Places)</p>
<h2>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 14 उद्यान, खेल के मैदान तथा खुले स्थान</h2>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 14 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
उद्यान किसे कहते हैं? ये कितने प्रकार के होते हैं?<br />
उत्तरः<br />
उद्यान तथा इसके प्रकार &#8211;<br />
उद्यान उस स्थान को कहते हैं जहाँ फल-फूल एवं सब्जियों आदि के पेड़-पौधों को प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रदर्शन के दृष्टिकोण से लगाया जाता है। ये स्थल रमणीक तथा आनन्ददायक होते हैं। उद्यान अनेक प्रकार के होते हैं; यथा &#8211;</p>
<ul>
<li>जनता उद्यान</li>
<li>चिकित्सालय उद्यान</li>
<li>पाठशाला उद्यान</li>
<li>गृह उद्यान।</li>
</ul>
<p>इन सभी प्रकार के उद्यानों का प्रमुख उद्देश्य जनता को शुद्ध वायुयुक्त शान्तिप्रिय स्थान प्रदान करने के साथ-साथ प्रकृति का ज्ञान कराना होता है। अधिकांश जनता नगरों की घनी बस्तियों में रहती है, जहाँ मीलों दूर तक पेड़-पौधे दिखाई नहीं देते हैं। इन घनी बस्तियों में रहने वालों के स्वास्थ्य लाभ के लिए ही सरकार नगर के मध्य भाग के ऐसे स्थान पर जनता उद्यान बनवाती है, जहाँ नगर के अधिकांश लोग स्वेच्छा से आकर पेड़-पौधों की सुन्दरता को देखने के साथ-साथ शुद्ध वायु का सेवन करें, मन बहलाएं और इन प्राकृतिक पौधों के विषय में ज्ञान प्राप्त करें।</p>
<p>पाठशाला भवन की सुन्दरता बढ़ाने तथा बच्चों के स्वास्थ्य की दृष्टि से अधिकांश स्कूलों में पाठशाला उद्यान लगाया जाता है। इसी प्रकार चिकित्सालय की सुन्दरता बढ़ाने, रोगियों और उनके साथ रहने वालों के मनोरंजन, चिकित्सालय की वायु को शुद्ध करने आदि के उद्देश्य से अस्पतालों के मैदान में चिकित्सालय उद्यान लगाए जाते हैं। कुछ घरों में भी भवन के आगे अथवा पीछे उपलब्ध खुले स्थान पर लघु वाटिका या उद्यान बना लिया जाता है। इस प्रकार के उद्यान को गृह उद्यान कहा जाता है।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
उद्यानों की उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।<br />
अथवा<br />
नगरों में सार्वजनिक उद्यानों का महत्त्व लिखिए।<br />
अथवा<br />
मानव जीवन में उद्यानों की उपयोगिता लिखिए।<br />
उत्तरः<br />
उद्यानों का महत्त्व प्रत्येक व्यक्ति को शुद्ध वायु की आवश्यकता होती है। शुद्ध वायु के अभाव में अनेक प्रकार के रोग फैलते हैं, जिनसे व्यक्ति का स्वास्थ्य खराब हो जाता है तथा मृत्यु दर बढ़ जाती है। यही कारण है कि जहाँ कहीं भी थोड़े-से स्थान में अधिक लोग रहते हैं या सघन आबादी होती है, वहाँ स्वच्छ वायु और सूर्य के प्रकाश की कमी के कारण रोगों का साम्राज्य होता है तथा बालकों की मृत्यु-दर अधिक होती है। इन्हीं बुराइयों को दूर करने के उद्देश्य से नगर निर्माण के समय इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि प्रत्येक मकान में सूर्य का प्रकाश और वायु का अच्छा आवागमन हो और कूड़े-करकट तथा गन्दे पानी के निकास का उचित प्रबन्ध हो ताकि गन्दगी न फैल सके।</p>
<p>इन स्थानों या मकानों में रहने वालों को बाग की शुद्ध वायु और पेड़-पौधों के सम्पर्क में लाने के लिए सरकार जनता उद्यान बनवाती है। इसके अतिरिक्त यहाँ छायादार सघन वृक्ष लगाए जाते हैं ताकि उनके नीचे बैठकर व्यक्ति प्रकृति का आनन्द उठा सके। यहाँ घुमावदार सुन्दर रास्ते तथा घास के सुन्दर मैदान इत्यादि इसीलिए बनाए जाते हैं ताकि अधिक-से-अधिक लोग यहाँ घूमकर या बैठकर शुद्ध वायु प्राप्त कर सकें। घरों में खुले स्थान का अभाव होने की स्थिति में अनेक व्यक्ति इन उद्यानों में ही आकर व्यायाम अथवा योगाभ्यास करते हैं।</p>
<p>इस प्रकार उद्यान, वायु को शुद्ध करने (वायु प्रदूषण समाप्त करने), मनोरंजन, ज्ञानवर्द्धन, स्वास्थ्य आदि के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान हैं।</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
टिप्पणी लिखिए-खेल के मैदान, खले स्थान व पार्क।<br />
अथवा<br />
टिप्पणी लिखिए-खेल के मैदानों तथा खुले स्थानों का महत्त्व।<br />
उत्तरः<br />
खेल के मैदान, खुले स्थान व पार्क &#8211;<br />
जनता के स्वास्थ्य एवं मनोरंजन के उद्देश्य से नगरपालिका अथवा कुछ अन्य संस्थाओं द्वारा नगर में खेल के मैदान, खुले स्थानों एवं पार्कों की व्यवस्था की जाती है। इन स्थानों में लोग प्रात:काल या सन्ध्या के समय टहलने आते हैं और दिन के समय बालक, युवा, स्त्री, पुरुष आदि अनेक प्रकार से अपना मनोरंजन करते हैं। कोलकाता, मुम्बई, दिल्ली जैसे बड़े नगरों में, जहाँ 6-7. मंजिल के फ्लैटों में लोग रहते हैं, सन्ध्या के समय अपनी थकान उतारने और मनोरंजन के लिए ये इन स्थानों पर भ्रमण करते हैं इसलिए इन स्थानों में बाल उद्यानों (Children&#8217;s Park) के बनाने का विशेष आयोजन किया जाता रहा है।</p>
<p>इन उद्यानों में बालकों के खेलने के सभी प्रकार के उपकरण रखे जाते हैं। यहाँ आकर बच्चे खेल-खेल में शारीरिक व्यायाम और शुद्ध वायु का सेवन दोनों ही कार्य करते हैं। इस प्रकार उद्यानों के द्वारा शारीरिक और मानसिक विकास होता है। शुद्ध वायु और शुद्ध व ताजे फल और सब्जियाँ प्राप्त होती हैं जिनसे व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। स्कूल या पाठशाला में उद्यान बनवाने का भी यही उद्देश्य होता है कि बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास साथ-साथ हो और उनका स्वास्थ्य अच्छा बना रहे।</p>
<p>पार्क नगर की शोभा में भी वृद्धि करते हैं तथा पर्यावरण में आवश्यक सन्तुलन बनाए रखने में भी सहायक होते हैं।</p>
<p>प्रश्न 4.<br />
हमारे लिए वनों का क्या महत्त्व है?<br />
उत्तरः<br />
वनों का महत्त्व &#8211;<br />
स्वास्थ्य की दृष्टि से वन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होते हैं। इनके महत्त्व का विवरण इस प्रकार दिया गया है</p>
<ul>
<li>वनों से ही वातावरण का प्रदूषण (Pollution) नियन्त्रित होता है।</li>
<li>वनों से वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ी हुई मात्रा कम की जाती है तथा ऑक्सीजन की कमी को पूरा किया जाता है। ऑक्सीजन स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए ही नहीं बल्कि जीवित रहने के लिए भी आवश्यक है।</li>
<li>वनों से अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थ प्राप्त होते हैं जो भोजन की समस्या को हल करते हैं।</li>
<li>अनेक प्रकार की औषधियाँ वनों से ही प्राप्त होती हैं जो अनेक प्रकार के रोगों से शरीर को &#8211; मुक्त कराती हैं।</li>
<li>वनों के उचित अनुपात से पृथ्वी के तल का तापमान भी नियमित रहता है तथा अधिक नहीं बढ़ता। यदि पृथ्वी पर वनों का क्षेत्र घटता है तो निश्चित रूप से पृथ्वी तल के तापमान में वृद्धि होगी।</li>
<li>वन वर्षा लाने में सहायक होते हैं तथा साथ ही बाढ़-नियन्त्रण में भी योगदान देते हैं। पेड़ मिट्टी के कटाव को रोकते हैं।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 5.<br />
स्कूल में खुले स्थानों तथा खेल के मैदानों के महत्त्व का उल्लेख कीजिए।<br />
अथवा<br />
विद्यालयों में खेल के मैदान का क्या महत्त्व है?<br />
अथवा<br />
खेल के मैदान की क्या उपयोगिता है?<br />
उत्तरः<br />
अध्ययनरत छात्र-छात्राओं के सर्वांगीण विकास के लिए खेल-कूद, व्यायाम आदि आवश्यक हैं। शारीरिक विकास यदि पूर्ण रूप से नहीं हुआ तो मस्तिष्क भी भली-भाँति विकसित नहीं हो सकेगा। स्वास्थ्य तथा शरीर के भली-भाँति विकास के लिए अन्य बातों के अतिरिक्त दो बातें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं &#8211;</p>
<ol>
<li>शुद्ध अप्रदूषित पर्यावरण तथा</li>
<li>खेल-कूद, व्यायाम, प्राणायाम, योग आदि।</li>
</ol>
<p>उपर्युक्त दोनों आवश्यकताओं के लिए विद्यार्थियों के प्रयोगार्थ विद्यालय में खुले स्थानों तथा खेल के मैदानों की अति आवश्यकता होती है।</p>
<p>स्कूलों में खुले स्थानों का महत्त्व &#8211;<br />
पर्यावरण की शुद्धता, किसी भी स्थान पर, वहाँ उपलब्ध खुले स्थानों पर निर्भर करती है। विद्यालयों में विद्यार्थी यदि अध्ययन कक्ष में ही रहता है तो उसके अध्ययन कक्ष के आस-पास ऐसे खुले स्थान होने आवश्यक हैं जिनसे कमरों में वायु का आवागमन हो सके। मानसिक विकास भी बिना शुद्ध पर्यावरण के सम्भव नहीं है। इसके अतिरिक्त, खुले स्थान विद्यालय का आकर्षण बढ़ाते हैं, इस प्रकार ये मनोरंजन के लिए भी आवश्यक हैं। समय-समय पर अथवा विशेष अवसरों पर सांस्कृतिक, सामाजिक आदि समारोहों, आयोजनों अथवा उत्सवों के लिए भी इस प्रकार के स्थलों का होना महत्त्वपूर्ण है।</p>
<p>स्कूलों में खेल के मैदानों का महत्त्व &#8211;<br />
खेल-कूद से मनोरंजन के साथ-साथ शारीरिक विकास में भी सहायता मिलती है। खेल-कूद के अनेक लाभ हैं; जैसे &#8211;</p>
<ul>
<li>शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है।</li>
<li>समय का सदुपयोग होता है। बच्चा गन्दी आदतों आदि से बचा रहता है।</li>
<li>सहकारिता की भावना बढ़ती है क्योंकि वे साथ-साथ खेलते-कूदते हैं।</li>
<li>चारित्रिक तथा नैतिक विकास होता है।</li>
<li>श्वसन क्षमता में वृद्धि होने से मानसिक पुष्टता में भी वृद्धि होती है। स्पष्ट है खेलकूद के लिए विद्यालयों में खेल के मैदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।</li>
</ul>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 14 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
उद्यान से क्या आशय है?<br />
उत्तरः<br />
उद्यान उस स्थान को कहते हैं जहाँ फल-फूल एवं सब्जियों आदि के पेड़-पौधों को प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रदर्शन के दृष्टिकोण से लगाया जाता है।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
उद्यानों के मुख्य प्रकार कौन-कौन से होते हैं?<br />
उत्तरः<br />
उद्यानों के मुख्य प्रकार हैं-जनता उद्यान, चिकित्सालय उद्यान, पाठशाला उद्यान तथा गृह उद्यान।</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
उद्यान का क्या महत्त्व है? अथवा उद्यानों की उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
उद्यान वायु-प्रदूषण को नियन्त्रित करते हैं। ये जन-सामान्य के लिए मनोरंजन, ज्ञानवर्द्धन तथा स्वास्थ्यवर्द्धन के प्राकृतिक साधन हैं।</p>
<p>प्रश्न 4.<br />
पेड़-पौधों से मुख्य लाभ क्या होता है?<br />
उत्तरः<br />
पेड़-पौधे ऑक्सीजन विसर्जित करके तथा कार्बन डाइ-ऑक्साइड ग्रहण करके वातावरण को शुद्ध बनाए रखते हैं।</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
विद्यालय में खेल के मैदान क्यों आवश्यक होते हैं?<br />
उत्तरः<br />
विद्यालय के छात्रों के खेलने तथा उत्तम संवातन के लिए खेल के मैदान आवश्यक होते हैं। प्रश्न 6-वनों का मुख्य महत्त्व क्या है? उत्तर-वन पर्यावरण में सन्तुलन बनाए रखते हैं।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 14 </strong><strong>बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए &#8211;<br />
1. नगरों में उद्यानों की उपयोगिता है &#8211;<br />
(क) नागरिकों के भ्रमण के स्थल हैं<br />
(ख) बच्चों के खेलने के स्थल हैं<br />
(ग) नगर की शोभा में वृद्धि करते हैं<br />
(घ) उपर्युक्त सभी उपयोगिताएँ।<br />
उत्तरः<br />
(घ) उपर्युक्त सभी उपयोगिताएँ।</p>
<p>2. हमारे लिए वन महत्त्वपूर्ण हैं &#8211;<br />
(क) पर्यावरण में सन्तुलन बनाए रखने के लिए<br />
(ख) लकड़ी, औषधियाँ एवं अन्य सामग्रियों की प्राप्ति के लिए<br />
(ग) वर्षा को आकर्षित करने तथा बाढ़-नियन्त्रण के लिए<br />
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व।<br />
उत्तरः<br />
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व।</p>
<h4><a href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science/">UP Board Solutions for Class 11 Home Science</a></h4>
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		<title>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 16 समाजशास्त्र : एक परिचय</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Prasanna]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 28 Apr 2025 10:15:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 11]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 16 समाजशास्त्र : एक परिचय (Sociology: An Introduction) UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 16 समाजशास्त्र : एक परिचय UP Board Class 11 Home Science Chapter 16 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर प्रश्न 1. समाजशास्त्र (Sociology) से आप क्या समझती हैं? इसकी विभिन्न परिभाषाएँ (Definitions) ... <a title="UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 16 समाजशास्त्र : एक परिचय" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science-chapter-16/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 16 समाजशास्त्र : एक परिचय">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 16 समाजशास्त्र : एक परिचय (Sociology: An Introduction)</p>
<h2>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 16 समाजशास्त्र : एक परिचय</h2>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 16 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
समाजशास्त्र (Sociology) से आप क्या समझती हैं? इसकी विभिन्न परिभाषाएँ (Definitions) लिखिए तथा अर्थ स्पष्ट कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
समाजशास्त्र से तात्पर्य (Meaning of Sociology) &#8211;<br />
परिचय-किसी भी विषय का व्यवस्थित अध्ययन करने से पूर्व, उस विषय की एक स्पष्ट एवं निश्चित परिभाषा निर्धारित कर लेनी चाहिए। समाजशास्त्र के अध्ययन के लिए भी इसके अर्थ एवं परिभाषा को जान लेना परम आवश्यक है। समाजशास्त्र एक नवविकसित विज्ञान है; अतः इसका अर्थ क्रमश: स्पष्ट एवं सुनिश्चित हो रहा है। यही कारण है कि इस विषय के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों में अभी तक मतैक्य नहीं है, परन्तु फिर भी अब लगभग समान रूप से यह स्वीकार किया जाने लगा है कि समाजशास्त्र वह विज्ञान है, जो मानवीय सम्बन्धों, सम्बन्धों के प्रकार, स्वरूप, क्रियाओं एवं घटनाओं का समाज के सन्दर्भ में वैज्ञानिक अध्ययन करता है।</p>
<p>समाजशास्त्र की विभिन्न परिभाषाएँ (Definitions of Sociology) &#8211;<br />
समाजशास्त्र की विभिन्न विद्वानों ने निम्नलिखित परिभाषाएँ दी हैं &#8211;</p>
<ul>
<li>रॉस के अनुसार-“समाजशास्त्र, सामाजिक तथ्यों का ज्ञान है।&#8221;</li>
<li>गिडिंग्स के अनुसार -&#8220;विकास क्रम में सामूहिक रूप से लगे हुए भौतिक, जैविक तथा मानसिक कारणों द्वारा हुए समाज के जन्म, विकास, ढाँचे और क्रियाओं का वर्णन समाजशास्त्र है।&#8221;</li>
<li>मैकाइवर और पेज के अनुसार-“समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों के विषय में है। सामाजिक सम्बन्धों के इस जाल को हम &#8216;समाज&#8217; कहते हैं।&#8221;</li>
<li>जिन्सबर्ग के अनुसार-“समाजशास्त्र को समाज के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।&#8221;</li>
<li>एबल के अनुसार-“समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों, उनके प्रकारों, उनके स्वरूपों, जो कुछ उनको प्रभावित करता है और जिसको वे प्रभावित करते हैं, उनका वैज्ञानिक अध्ययन है।&#8221; ।</li>
<li>मैक्स वेबर के अनुसार-“समाजशास्त्र वह विज्ञान है जोकि सामाजिक क्रियाओं की अर्थपूर्ण व्याख्या करते हुए समझाने की कोशिश करता है।&#8221;</li>
<li>बेनेट और ट्यूमिन के अनुसार-“समाजशास्त्र सामाजिक जीवन के ढाँचे और कार्यों का विज्ञान है।&#8221;</li>
<li>ऑगबर्न तथा निमकॉफ के अनुसार-“समाजशास्त्र सामाजिक जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन है।&#8221;</li>
<li> ग्रीन के अनुसार-“समाजशास्त्र संश्लेषणात्मक और सामान्यीकरण करने वाला वह विज्ञान है, जो मनुष्यों और सामाजिक सम्बन्धों का अध्ययन करता है।&#8221;</li>
<li>दुर्थीम के अनुसार-“समाजशास्त्र सामूहिक प्रतिनिधियों का विज्ञान है।&#8221;</li>
</ul>
<p>समाजशास्त्र की परिभाषाओं की सामान्य विवेचना (General Discussion of Definitions of Sociology) &#8211;<br />
समाजशास्त्र की उपर्युक्त विभिन्न परिभाषाओं का अध्ययन करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि समाजशास्त्र की परिभाषाओं को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है &#8211;</p>
<p>(क) प्रथम भाग के अन्तर्गत उन समाजशास्त्रियों की परिभाषाएँ आती हैं, जो समाजशास्त्र की परिधि में मानव का सम्पूर्ण जीवन ले आते हैं।<br />
(ख) दूसरे वर्ग के अन्तर्गत वे परिभाषाएँ आती हैं जिनमें विद्वान समाजशास्त्र को मानवीय सम्बन्धों के विशेष पक्ष तक ही सीमित रखना चाहते हैं।</p>
<p>यदि उपर्युक्त दोनों भागों या वर्गों की परिभाषाओं का अध्ययन करें तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वास्तव में समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है, जिसमें हम सामाजिक. जीवन, सामाजिक सम्बन्धों, कार्यों तथा समाज के स्वरूप का व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन करते हैं।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
समाजशास्त्र (Sociology) के विषय-क्षेत्र (Scope) की विवेचना कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र (Scope of Sociology) &#8211;<br />
विषय-क्षेत्र का तात्पर्य एक ऐसी सम्भावित सीमा से होता है जिसके अन्तर्गत ही किसी ज्ञान को विकसित किया जाता है। यद्यपि सभी विद्वान यह मानते हैं कि समाजशास्त्र में सामाजिक सम्बन्धों का अध्ययन होना चाहिए, तथापि इसी प्रश्न को लेकर समाजशास्त्र के अध्ययन-क्षेत्र के विषय में विद्वानों में मतभेद रहा है। इस विवाद ने मुख्य रूप से दो सम्प्रदायों को जन्म दिया है। एक सम्प्रदाय को हम विशेषात्मक अथवा स्वरूपात्मक सम्प्रदाय (Specialistic or Formal School) कहते हैं, जिसके अनुसार समाजशास्त्र एक विशेष सामाजिक विज्ञान है।</p>
<p>दूसरा सम्प्रदाय समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र को व्यापक बनाने के पक्ष में है, इसे हम समन्वयात्मक सम्प्रदाय (Synthetic School) कहते हैं। इसके अनुसार, समाजशास्त्र सामान्य विज्ञान है, जिसमें सभी प्रकार के सामाजिक सम्बन्धों का अध्ययन किया जाना चाहिए। इन दोनों सम्प्रदायों का दृष्टिकोण समझने से समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र को सरलतापूर्वक समझा जा सकता है जो निम्न प्रकार है &#8211;</p>
<p>(1) विशेषात्मक सम्प्रदाय (Specialistic School) &#8211;<br />
इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक जॉर्ज सिमेल, वीरकान्त, वॉन वीज, मैक्स वेबर, रॉस, पार्क, बर्गेज तथा टानीज आदि हैं। इन विद्वानों के अनुसार समाजशास्त्र एक विशेष विज्ञान के रूप में है; अतः समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र के सम्बन्ध में इस सम्प्रदाय के मानने वाले निम्नलिखित विशेषताएँ बतलाते हैं &#8211;</p>
<ul>
<li>इस सम्प्रदाय के समर्थकों के अनुसार समाजशास्त्र का क्षेत्र सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों का अध्ययन करना होना चाहिए।</li>
<li>समाज के विभिन्न पक्षों का अध्ययन विभिन्न सामाजिक विज्ञान; जैसे राजनीतिशास्त्र, इतिहास,अर्थशास्त्र आदि करते हैं; अतः समाजशास्त्र में इनके अध्ययन की आवश्यकता नहीं।</li>
<li>समाजशास्त्र का एक विशिष्ट निश्चित क्षेत्र होना चाहिए।</li>
<li>समाजशास्त्र एक स्वतन्त्र विज्ञान है।</li>
<li>समाजशास्त्र एक विश्लेषणात्मक विज्ञान है।</li>
</ul>
<p>समाजशास्त्र के विशेषात्मक सम्प्रदाय के विचारों को समझने के लिए प्रमुख समाजशास्त्रियों की विचारधाराएँ &#8211; इस सम्प्रदाय के प्रमुख विद्वानों के विचार इस प्रकार हैं &#8211;</p>
<p>(अ) जॉर्ज सिमेल के विचार-स्वरूपात्मक सम्प्रदाय के प्रमुख समर्थक जॉर्ज सिमेल (George Simmel) ही हैं। जॉर्ज सिमेल ने स्पष्ट किया है कि समाजशास्त्र का सम्बन्ध सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों के अध्ययन से है। समाजशास्त्र विशिष्ट विज्ञान है तथा वह केवल सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों का ही अध्ययन करता है। उसके अनुसार सामाजिक सम्बन्धों की अन्तर्वस्तु का अध्ययन अन्य विशिष्ट सामाजिक विज्ञानों के अन्तर्गत किया जाता है। सिमेल ने मुख्य रूप से प्रतिस्पर्धा, प्रभुत्व, अनुकरण, श्रम-विभाजन तथा अधीनता आदि सामाजिक सम्बन्धों का वर्णन किया है। सिमेल के अनुसार समाजशास्त्र को अन्तर्वस्तु से कोई वास्ता नहीं, उसे तो केवल सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूप का अध्ययन करना है।</p>
<p>(ब) वीरकान्त के विचार-जर्मन समाजशास्त्री वीरकान्त के अनुसार, समाजशास्त्र का कार्य समाज के उन तत्त्वों का अन्वेषण करना है, जिनकी उत्पत्ति सामाजिक सम्बन्धों के कारण होती है; उदाहरण के लिए—प्रेम, द्वेष, लज्जा, सहकारिता आदि। ये वे तत्त्व हैं, जिनसे मानसिक एकता उत्पन्न होती है। अन्य शब्दों में, ये सम्बन्धित व्यक्तियों को एक-दूसरे से बाँधते हैं। समाजशास्त्र में इन मूल तत्त्वों या सम्बन्धों का ही अध्ययन किया जाता है। इनके अनुसार व्यक्तियों और व्यक्ति-समूहों को बाँधने वाले मानसिक बन्धनों या तत्त्वों का अध्ययन समाजशास्त्र का विषय है। इस प्रकार समाजशास्त्र का मुख्य कार्य मनुष्यों के मध्य सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने वाले तत्त्वों का अध्ययन करना है।</p>
<p>(स) मैक्स वेबर के विचार-मैक्स वेबर (Max Weber) के अनुसार, समाजशास्त्र सामाजिक क्रिया को समझने और व्याख्या करने में सहायक होता है। उनके अनुसार सामाजिक व्यवहार दो व्यक्तियों के मध्य तब होता है जबकि वे एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं और परस्पर कोई व्यवहार या अन्त:क्रिया करते हैं। इस पर भी यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक व्यवहार सामाजिक व्यवहार ही हो। उदाहरण के लिए-दो व्यक्ति साइकिल से टकरा जाते हैं, इस प्रकार का टकराना भौतिक घटना है, परन्तु उन व्यक्तियों में से एक का दूसरे की चोट के लिए खेद व्यक्त करना और क्षमा माँगना एक सामाजिक क्रिया है। इस प्रकार वेबर के अनुसार समाजशास्त्र का कार्य सामाजिक क्रिया की व्याख्या करना है।</p>
<p>विशेषात्मक सम्प्रदाय की आलोचना-विशेषात्मक सम्प्रदाय की फ्रेंच तथा ब्रिटिश समाजशास्त्रियों ने निम्नलिखित आलोचना की है &#8211;</p>
<ul>
<li>समाजशास्त्र, सामाजिक सम्बन्धों के सूक्ष्म तथा अमूर्त स्वरूपों के अध्ययन तक सीमित नहीं है।</li>
<li>इस सम्प्रदाय के समर्थकों के अनुसार स्वरूप और अन्तर्वस्तु एक-दूसरे से अलग हैं, परन्तु यथार्थ में सामाजिक सम्बन्धों में स्वरूप और अन्तर्वस्तु को अलग नहीं किया जा सकता।</li>
<li>इस सम्प्रदाय के समर्थकों का यह कहना सत्य प्रतीत नहीं होता कि समाजशास्त्र से ही सामाजिक सम्बन्धों के रूपों का अध्ययन किया जाता है।</li>
<li>यह विचारधारा समाज के सदस्यों को कम महत्त्व देती है।</li>
<li>इस सम्प्रदाय ने समाजशास्त्र के क्षेत्र को अत्यधिक संकुचित कर दिया है।</li>
</ul>
<p>(2) समन्वयात्मक सम्प्रदाय (Synthetic School) &#8211;<br />
इस सम्प्रदाय के प्रमुख समर्थक फ्रेंच तथा ब्रिटिश समाजशास्त्री हैं। इस सम्प्रदाय के अनुसार समाजशास्त्र को अपना क्षेत्र सीमित व संकुचित न बनाकर विस्तृत तथा व्यापक बनाना चाहिए। इस. सम्प्रदाय के मुख्य समर्थक हैं-दुर्थीम, हॉबहाउस, सोरोकिन, जिन्सबर्ग तथा मोटवानी।</p>
<p>इस सम्प्रदाय के समर्थकों के अनुसार समाजशास्त्र ‘विज्ञानों का विज्ञान&#8217; है। सभी विज्ञान उसके क्षेत्र में आ जाते हैं और वह सभी को अपने में समन्वित करता है। सामाजिक जीवन के समस्त भाग परस्पर सम्बन्धित हैं, इस कारण किसी एक पक्ष का अध्ययन करने से सम्पूर्ण बात को हम नहीं समझ सकते। ऐसी दशा में आवश्यक है कि हम समाजशास्त्र के अन्तर्गत सम्पूर्ण सामाजिक जीवन का व्यवस्थित अध्ययन करें। केवल सूक्ष्म सिद्धान्तों का अध्ययन करने से काम नहीं चलेगा। मोटवानी के अनुसार—“समाजशास्त्र जीवन को पूरी तरह और एक समग्र रूप में देखने का प्रयास करता है।&#8221; इस प्रकार समाजशास्त्र के क्षेत्र के अन्दर समाज के सामाजिक सम्बन्धों का सामान्य अध्ययन होना चाहिए।</p>
<p>समाजशास्त्र के इस सम्प्रदाय के विचारों को समझने के लिए प्रमुख समाजशास्त्रियों की विचारधाराएँ &#8211;<br />
इस सम्प्रदाय के प्रमुख समर्थक दुर्थीम हैं जिन्होंने समाजशास्त्र को तीन भागों में विभाजित किया है &#8211;</p>
<ul>
<li>सामाजिक रचनाशास्त्र-इसके अन्तर्गत वे समस्त विषय आ जाते हैं जिनका आधार भौगोलिक होता है; जैसे-जनसंख्या का घनत्व और उसका वितरण।</li>
<li>सामाजिक क्रियाशास्त्र सामाजिक क्रियाशास्त्र में उन प्रक्रियाओं और व्यवस्थाओं का अध्ययन किया जाता है, जो समाज के अस्तित्व और सत्ता को बनाए रखने में सहायक होती हैं। ये प्रक्रियाएँ धार्मिक व राजनीतिक होती हैं।</li>
<li>सामान्य समाजशास्त्र-इसके अन्तर्गत विभिन्न सामाजिक विज्ञानों के सामान्य सिद्धान्त तथा नियमों की खोज की जाती है, किसी विशेष पक्ष पर बल नहीं दिया जाता।</li>
</ul>
<p>दुर्थीम के अनुसार प्रत्येक समाज में कुछ विचार, धारणाएँ एवं भावनाएँ होती हैं, जिनका पालन सम्बन्धित समाज के अधिकांश सदस्य करते हैं। ये विचार एवं धारणाएँ सम्बन्धित समाज के सामाजिक जीवन का सामूहिक प्रतिनिधित्व करती हैं। दुर्थीम के अनुसार समाजशास्त्र का कार्य इसी सामूहिक प्रतिनिधित्व का अध्ययन करना है। इस स्थिति में स्पष्ट है कि समाजशास्त्र को एक सामान्य विज्ञान होना चाहिए।</p>
<p>समन्वयात्मक सम्प्रदाय की आलोचना–समाजशास्त्र के समन्वयात्मक सम्प्रदाय की भी विभिन्न आधारों पर आलोचना की गई है। सामान्य रूप से कहा जाता है कि यदि समन्वयात्मक सम्प्रदाय के विचारों को मान लिया जाए तो उस स्थिति में समाजशास्त्र का महत्त्व ही समाप्त हो जाएगा। समाजशास्त्र उन्हीं तथ्यों का दोबारा अध्ययन करेगा, जिनका अध्ययन पहले ही विभिन्न विज्ञानों द्वारा हो चुका होगा। इसके अतिरिक्त, समाजशास्त्र को सामान्य विज्ञान स्वीकार कर लेने से इसका क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत हो जाएगा, जिसका व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन कर पाना कठिन हो जाएगा।</p>
<p>उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि समाजशास्त्र की विषय-वस्तु के समुचित अध्ययन के लिए समन्वयात्मक तथा विशेषात्मक दोनों दृष्टिकोणों के समन्वय की आवश्यकता है। केवल एक ही दृष्टिकोण को अपनाने से हमारी समस्याओं का हल नहीं हो पाएगा। अन्य शब्दों में, समाजशास्त्र के पूर्ण अध्ययन के लिए विशिष्ट व सामान्य दोनों पक्षों का अध्ययन आवश्यक है। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो समाजशास्त्र को एक जटिल विज्ञान के रूप में परिणत कर देंगे। यथार्थ में विशेषात्मक और समन्वयात्मक विचारधाराएँ एक-दूसरे की विरोधी नहीं वरन् पूरक हैं।</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
गृहविज्ञान विषय में समाजशास्त्रीय ज्ञान का समावेश होना क्यों आवश्यक है? विस्तारपूर्वक लिखिए।<br />
अथवा<br />
गृहविज्ञान की छात्राओं के लिए समाजशास्त्रीय ज्ञान का क्या महत्त्व है? स्पष्ट कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
मुख्य रूप से बालिकाओं को पढ़ाया जाने वाला गृहविज्ञान (Home Science) विषय अपने आप में कोई स्वतन्त्र विषय नहीं है। गृहविज्ञान का संगठन विभिन्न सामाजिक एवं भौतिक विज्ञानों के कुछ ऐसे अंशों के समन्वय से हुआ है, जिनका ज्ञान घर तथा सामाजिक परिवेश के सामान्य क्रिया-कलापों में भाग लेने तथा पारिवारिक जीवन की दैनिक समस्याओं के समाधान हेतु आवश्यक है। इस स्थिति में गृहविज्ञान के अन्तर्गत विभिन्न विषयों का व्यावहारिक दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाता है। अन्य विषयों के साथ-साथ गृहविज्ञान के अन्तर्गत समाजशास्त्र का, विशेष रूप से पारिवारिक समाजशास्त्र का भी अध्ययन किया जाता है। गृहविज्ञान के दृष्टिकोण से समाजशास्त्रीय ज्ञान का विशेष महत्त्व है।</p>
<p>गृहविज्ञान के लिए समाजशास्त्रीय ज्ञान का महत्त्व (Importance of Sociological Knowledge to Home Science) &#8211;<br />
गृहविज्ञान एक व्यावहारिक विज्ञान है, जिसके अध्ययन का उद्देश्य व्यक्ति एवं परिवार के जीवन को अधिक उन्नत, समृद्ध, सरल एवं विभिन्न प्रकार की समस्याओं से मुक्त बनाना है। व्यक्ति एवं परिवार का जीवन समाज में ही व्यतीत होता है। अतः समाज एवं समस्त सामाजिक परिस्थितियों का व्यक्ति एवं परिवार के जीवन पर प्रभाव पड़ना नितान्त अनिवार्य है।</p>
<p>सामाजिक मान्यताएँ, प्रथाएँ तथा समस्याएँ निश्चित रूप से व्यक्ति एवं परिवार के जीवन को प्रभावित करती हैं। इस स्थिति में इन समाजशास्त्रीय तथ्यों की समुचित जानकारी आवश्यक है। इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ही गृहविज्ञान के अन्तर्गत समाजशास्त्रीय ज्ञान का समावेश किया जाता है। अब प्रश्न उठता है कि समाजशास्त्रीय ज्ञान का गृहविज्ञान के सन्दर्भ में क्या महत्त्व है? अध्ययन की सुविधा के लिए इस महत्त्व को दो वर्गों में बाँटा जा सकता हैप्रथम वर्ग में गृह के सन्दर्भ में समाजशास्त्रीय ज्ञान के महत्त्व का वर्णन किया जाएगा तथा द्वितीय वर्ग में समाज के सन्दर्भ में समाजशास्त्रीय ज्ञान के महत्त्व को स्पष्ट किया जाएगा।</p>
<p>(1) गृह के सन्दर्भ में समाजशास्त्रीय ज्ञान का महत्त्व &#8211;<br />
(i) समाजशास्त्र उत्तम पारिवारिक जीवन-यापन में सहायक है-समाजशास्त्र के अन्तर्गत विवाह एवं परिवार से सम्बन्धित सम्पूर्ण तथ्यों का सैद्धान्तिक अध्ययन किया जाता है। विवाह के नियमों, उद्देश्यों तथा समस्याओं आदि का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। इसी प्रकार ‘परिवार&#8217; नामकं सामाजिक संस्था का भी विस्तृत अध्ययन समाजशास्त्र के अन्तर्गत किया जाता है। समाजशास्त्र से प्राप्त होने वाली यह सम्पूर्ण जानकारी उत्तम पारिवारिक जीवन यापन करने में सहायक सिद्ध होती है। पारिवारिक जीवन के संचालन में स्त्री अर्थात् गृहिणी की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। आज की छात्राएँ ही भावी गृहिणियाँ हैं, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए गृहविज्ञान विषय में समाजशास्त्रीय ज्ञान का समुचित समावेश किया जाता है।</p>
<p>(ii) सामाजिक स्थिति के निर्धारण में सहायक-समाजशास्त्र ही &#8216;सामाजिक स्थिति&#8217; के आधारों, वर्गों तथा सम्बद्ध भूमिकाओं का अध्ययन करता है। सामान्य रूप से पारम्परिक समाजों में व्यक्ति की स्थिति उसके परिवार के सन्दर्भ में ही निर्धारित होती है। इससे भिन्न, आधुनिक समाजों में व्यक्ति के व्यक्तिगत गुणों, क्षमताओं एवं उपलब्धियों के आधार पर ही उसकी सामाजिक स्थिति निर्धारित की जाती है। गृहविज्ञान के अन्तर्गत जब इन समाजशास्त्रीय तथ्यों का अध्ययन कर लिया जाता है तो गृहिणियाँ अपनी तथा अपने परिवार की सामाजिक स्थिति के प्रति जागरूक रहती हैं। वे अपनी सामाजिक स्थिति को उन्नत बनाने के लिए भी आवश्यक प्रयास कर सकती हैं।</p>
<p>(iii) स्त्रियों के लिए समाजशास्त्रीय ज्ञान का महत्त्व-परिवार में स्त्रियों का क्या स्थान है? स्त्रियों के पारिवारिक अधिकार क्या हैं? पारिवारिक सम्पत्ति में स्त्रियों का क्या अधिकार है? स्त्रियों के शोषण एवं उत्पीड़न के क्या कारण हैं तथा उन पर रोक लगाने वाले कानून कौन-कौन से हैं? इस प्रकार के अनेक तथ्यों की व्यवस्थित जानकारी समाजशास्त्र से प्राप्त होती है। यदि गृहविज्ञान के अन्तर्गत इन उपयोगी समाजशास्त्रीय तथ्यों का समावेश कर दिया जाता है तो आज की छात्राएँ अपने भावी गृहस्थ जीवन में लाभान्वित होती हैं। वे अनेक प्रकार के शोषण से बच जाती हैं तथा अपने अधिकारों की माँग कर सकती हैं। इस दृष्टिकोण से कहा जा सकता है कि स्त्रियों के लिए समाजशास्त्रीय ज्ञान का विशेष महत्त्व है।</p>
<p>(2) समाज के सन्दर्भ में समाजशास्त्रीय ज्ञान का महत्त्व &#8211;<br />
आधुनिक युग में स्त्रियों का कार्य-क्षेत्र परिवार तक ही सीमित नहीं रह गया है। अब स्त्रियाँ विस्तृत समाज में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में स्त्रियाँ पुरुषों के समान ही भूमिका निभाती हैं। इस स्थिति में अनिवार्य है कि स्त्रियों को सामाजिक विषयों की समुचित जानकारी हो। यही कारण है कि गृहविज्ञान में समाजशास्त्रीय ज्ञान का समावेश किया जाता है। समाज के सन्दर्भ में समाजशास्त्रीय ज्ञान के महत्त्व का संक्षिप्त विवरण अग्रलिखित है &#8211;</p>
<p>(i) सामाजिक नियोजन के लिए उपयोगी-वर्तमान युग नियोजन का युग है। सामाजिक प्रगति एवं विकास के लिए प्रत्येक क्षेत्र में नियोजन की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। इस सामाजिक नियोजन में स्त्रियों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। उदाहरण के लिए-मातृत्व एवं बाल-कल्याण, पिछड़े वर्गों का कल्याण, विकलांगों का पुनर्वास, विस्थापितों का पुनर्वास, श्रमिकों का कल्याण, जन-स्वास्थ्य तथा जनशिक्षा एवं जनसंख्या नियन्त्रण आदि अनेक ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें नियोजन की अत्यधिक आवश्यकता है तथा इन क्षेत्रों में स्त्रियों द्वारा भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जा सकती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए गृहविज्ञान के अन्तर्गत सम्बद्ध समाजशास्त्रीय ज्ञान को सम्मिलित किया जाता है।</p>
<p>(ii) सामाजिक समस्याओं के समाधान में सहायक-प्रत्येक गृहिणी अपने परिवार तथा समाज से सम्बद्ध समस्याओं से किसी-न-किसी रूप में अवश्य ही प्रभावित होती है। सामाजिक समस्याओं का समुचित समाधान एवं निराकरण तभी सम्भव है जबकि समाज की महिलाएँ भी इस दिशा में प्रयास करें। सामाजिक समस्याओं के वास्तविक स्वरूप, उनके कारणों तथा निवारण के उपायों का व्यवस्थित अध्ययन समाजशास्त्र के अन्तर्गत ही किया जाता है।</p>
<p>इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही समाजशास्त्रीय ज्ञान का समावेश गृहविज्ञान विषय में किया जाता है। इस रूप में सामाजिक समस्याओं का अध्ययन करने के उपरान्त छात्राएँ अपने भावी जीवन में सामाजिक समस्याओं के समाधान एवं उन्मूलन में उल्लेखनीय योगदान दे सकती हैं। हमारे समाज की कुछ उल्लेखनीय सामाजिक समस्याएँ हैं—दहेज प्रथा, छुआछूत, जाति प्रथा, पर्दा प्रथा, बाल विवाह तथा बेमेल विवाह आदि। इसी प्रकार बालक-बालिका भेद तथा लड़कियों का तिरस्कार भी एक गम्भीर सामाजिक समस्या है। इन समस्याओं से मुक्ति के लिए समाजशास्त्रीय ज्ञान आवश्यक है।</p>
<p>(iii) सामाजिक सहिष्णुता की वृद्धि में सहायक-पारम्परिक रूप से ही भारतीय समाज अनेक प्रकार की भिन्नताओं से युक्त रहा है। हमारे समाज में धर्म, जाति, प्रजाति तथा भाषा आदि के दृष्टिकोण से पर्याप्त विविधता है। इस प्रकार की विविधता के परिणामस्वरूप हमारे समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रकार के विरोध भी विकसित होते रहते हैं जो सामाजिक तनाव को भी जन्म दे सकते हैं तथा सामाजिक दूरी को भी बढ़ावा देते हैं।</p>
<p>समाजशास्त्र का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि वास्तव में हमारे समाज एवं संस्कृति में, विविधता में एकता है। बाहरी रूप से दिखाई देने वाली भिन्नता के पीछे एक मौलिक एकता निहित है। इसके साथ-साथ समाजशास्त्रीय ज्ञान से स्पष्ट होता है कि सामाजिक भिन्नता का आशय ऊँच-नीच या भेदभाव नहीं है। इस प्रकार के समाजशास्त्रीय ज्ञान को प्राप्त करके छात्र-छात्राओं में सामाजिक सहिष्णुता का विकास होता है।</p>
<p>उपर्युक्त विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि गृहविज्ञान की छात्राओं को समाजशास्त्रीय ज्ञान प्रदान करना नितान्त आवश्यक है। यह ज्ञान उनके, उनके परिवार के तथा सम्पूर्ण समाज के जीवन को उन्नत एवं समस्यामुक्त बनाने में सहायक हो सकता है।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 16 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
समाजशास्त्र की प्रकृति स्पष्ट कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
समाजशास्त्र की प्रकृति समाजशास्त्र एक विज्ञान है। एक विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र की विशेषताओं का उल्लेख करके हम समाजशास्त्र की प्रकृति को स्पष्ट कर सकते हैं। सर्वप्रथम हम कह सकते हैं कि समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है। समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों का व्यवस्थित अध्ययन करता है। इस प्रकार समाजशास्त्र प्राकृतिक विज्ञानों से भिन्न है। समाजशास्त्र की प्रकृति को स्पष्ट करने वाला दूसरा तथ्य यह है कि समाजशास्त्र आदर्शात्मक विज्ञान नहीं है, यह एक तथ्यात्मक विज्ञान है।</p>
<p>समाजशास्त्र क्या है?&#8217; का अध्ययन करता है, न कि &#8216;क्या होना चाहिए&#8217; का। समाजशास्त्र अमूर्त सामाजिक सम्बन्धों का अध्ययन करने के कारण एक अमूर्त विज्ञान है। समाजशास्त्र एक व्यावहारिक विज्ञान है; अर्थात् यह विशुद्ध विज्ञान । नहीं है। समाजशास्त्र की एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता यह है कि यह विज्ञान एक सामान्य विज्ञान है; अर्थात् यह विशिष्ट विज्ञान नहीं है।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
गृहविज्ञान के अन्तर्गत समाजशास्त्रीय अध्ययन क्यों किया जाता है?<br />
उत्तरः<br />
गृहविज्ञान के अन्तर्गत समाजशास्त्रीय अध्ययन &#8211;<br />
गृहविज्ञान एक व्यावहारिक महत्त्व का विज्ञान है। गृहविज्ञान के अन्तर्गत उन समस्त विषयों का अध्ययन किया जाता है, जो उत्तम जीवन के लिए उपयोगी होते हैं। जहाँ तक समाजशास्त्र के अध्ययन का प्रश्न है, यह अध्ययन अनिवार्य रूप से उत्तम जीवन व्यतीत करने में सहायक होता है। समाजशास्त्र का ज्ञान उत्तम पारिवारिक जीवनयापन में सहायक होता है। इसके ज्ञान से व्यक्ति की सामाजिक स्थिति की समुचित जानकारी प्राप्त की जा सकती है। समाजशास्त्र का ज्ञान महिलाओं को उनके पारिवारिक एवं सामाजिक अधिकारों की उचित जानकारी प्रदान करता है।</p>
<p>इस दृष्टिकोण से गृहविज्ञान के अन्तर्गत समाजशास्त्र का अध्ययन करना आवश्यक माना जाता है। इसके अतिरिक्त समाजशास्त्र के अध्ययन से बालिकाओं को विभिन्न सामाजिक समस्याओं के विषय में तटस्थ ज्ञान की प्राप्ति होती है तथा इस ज्ञान से सामाजिक सहिष्णुता में भी वृद्धि होती है। इस दृष्टिकोण से भी गृहविज्ञान के अन्तर्गत समाजशास्त्र का अध्ययन किया जाता है।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 16 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
समाज की इकाई क्या है?<br />
उत्तरः<br />
&#8216;परिवार&#8217; समाज की इकाई है।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
समाजशास्त्र की मैकाइवर तथा पेज द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।<br />
उत्तरः<br />
“समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों के विषय में है। सामाजिक सम्बन्धों के इस जाल को हम समाज कहते हैं।”</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
समाजशास्त्र के क्षेत्र सम्बन्धी दो प्रमुख सम्प्रदाय कौन-कौन से हैं?<br />
उत्तरः<br />
समाजशास्त्र के क्षेत्र सम्बन्धी दो मुख्य सम्प्रदाय हैं &#8211;</p>
<ol>
<li>विशेषात्मक अथवा स्वरूपात्मक सम्प्रदाय तथा</li>
<li>समन्वयात्मक सम्प्रदाय।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 4.<br />
समाजशास्त्र के विशेषात्मक सम्प्रदाय के मुख्य समर्थक कौन हैं?<br />
उत्तरः<br />
समाजशास्त्र के विशेषात्मक सम्प्रदाय के मुख्य समर्थक हैं—जॉर्ज सिमेल, वीरकान्त, वॉन वीज, मैक्स वेबर, रॉस, पार्क, बर्गेज तथा टानीज।</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
समाजशास्त्र के समन्वयात्मक सम्प्रदाय के प्रमुख समर्थक कौन हैं?<br />
उत्तरः<br />
समाजशास्त्र के समन्वयात्मक सम्प्रदाय के प्रमुख समर्थक हैं—दुर्थीम, हॉबहाउस, सोरोकिन, जिन्सबर्ग तथा मोटवानी।</p>
<p>प्रश्न 6.<br />
गृहविज्ञान के अध्ययन का मुख्य उद्देश्य क्या है?<br />
उत्तरः<br />
गृहविज्ञान के अध्ययन का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति एवं परिवार के जीवन को अधिक उन्नत, समृद्ध, सरल एवं विभिन्न प्रकार की समस्याओं से मुक्त बनाना है।</p>
<p>प्रश्न 7.<br />
पारिवारिक जीवन के लिए समाजशास्त्र का ज्ञान क्यों महत्त्वपूर्ण माना जाता है?<br />
उत्तरः<br />
पारिवारिक जीवन के लिए समाजशास्त्र का ज्ञान उत्तम जीवन यापन करने में सहायक सिद्ध होता है।</p>
<p>प्रश्न 8.<br />
स्त्रियों के लिए समाजशास्त्र का ज्ञान क्यों उपयोगी माना जाता है?<br />
उत्तरः<br />
समाजशास्त्र का ज्ञान स्त्रियों को उनके पारिवारिक अधिकारों से अवगत कराने के कारण उपयोगी माना जाता है।</p>
<p>प्रश्न 9.<br />
व्यक्ति का समाज के प्रति क्या कर्त्तव्य होता है?<br />
उत्तरः<br />
व्यक्ति का समाज के प्रति कर्त्तव्य है—विवाह करना, परिवार स्थापित करना तथा सम्पूर्ण समाज की सुख-समृद्धि में आवश्यक योगदान प्रदान करना।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 16 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए &#8211;<br />
1. मनुष्य &#8211;<br />
(क) एकान्तप्रिय प्राणी है<br />
(ख) सामाजिक प्राणी है<br />
(ग) असामाजिक प्राणी है<br />
(घ) बुद्धिहीन प्राणी है।<br />
उत्तरः<br />
(ख) सामाजिक प्राणी है।</p>
<p>2. समाज की इकाई है &#8211;<br />
(क) स्कूल<br />
(ख) परिवार<br />
(ग) समुदाय<br />
(घ) घर।<br />
उत्तरः<br />
(ख) परिवार।</p>
<p>3. &#8220;समाजशास्त्र सामाजिक जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन है।&#8221; यह कथन किसका है &#8211;<br />
(क) मैकाइवर तथा पेज<br />
(ख) ऑगबर्न तथा निमकॉफ<br />
(ग) ग्रीन<br />
(घ) दुर्थीम।<br />
उत्तरः<br />
(ख) ऑगबर्न तथा निमकॉफ।</p>
<p>4. समाजशास्त्र के स्वरूपात्मक सम्प्रदाय के मुख्य समर्थक हैं<br />
(क) जॉर्ज सिमेल<br />
(ख) दुर्थीम<br />
(ग) सोरोकिन<br />
(घ) मोटवानी।<br />
उत्तरः<br />
(क) जॉर्ज सिमेल।</p>
<p>5. समाजशास्त्र के समन्वयात्मक सम्प्रदाय के मुख्य समर्थक हैं &#8211;<br />
(क) दुर्थीम<br />
(ख) जॉर्ज सिमेल<br />
(ग) मैक्स वेबर<br />
(घ) वीरकान्त।<br />
उत्तरः<br />
(क) दुर्थीम।</p>
<p>6. गृह के सन्दर्भ में समाजशास्त्रीय ज्ञान का महत्त्व है &#8211;<br />
(क) उत्तम पारिवारिक जीवन-यापन में सहायक<br />
(ख) सामाजिक स्थिति के निर्धारण में सहायक<br />
(ग) स्त्रियों के लिए उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण<br />
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व।<br />
उत्तरः<br />
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व।</p>
<p>7. समाज के सन्दर्भ में समाजशास्त्रीय ज्ञान का महत्त्व है &#8211;<br />
(क) सामाजिक नियोजन के लिए उपयोगी<br />
(ख) सामाजिक समस्याओं के समाधान में सहायक<br />
(ग) सामाजिक सहिष्णुता की वृद्धि में सहायक<br />
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व।<br />
उत्तरः<br />
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व।</p>
<h4><a href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science/">UP Board Solutions for Class 11 Home Science</a></h4>
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		<title>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 23 प्रसवकालीन तैयारियाँ </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Prasanna]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 28 Apr 2025 10:11:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 11]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 23 प्रसवकालीन तैयारियाँ (Preparations Regarding Confinement) UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 23 प्रसवकालीन तैयारियाँ UP Board Class 11 Home Science Chapter 23 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर प्रश्न 1. यदि घर पर ही प्रसव कराना हो तो मुख्य रूप से क्या-क्या तैयारियाँ करनी अनिवार्य ... <a title="UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 23 प्रसवकालीन तैयारियाँ " class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science-chapter-23/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 23 प्रसवकालीन तैयारियाँ ">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 23 प्रसवकालीन तैयारियाँ (Preparations Regarding Confinement)</p>
<h2>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 23 प्रसवकालीन तैयारियाँ</h2>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 23 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
यदि घर पर ही प्रसव कराना हो तो मुख्य रूप से क्या-क्या तैयारियाँ करनी अनिवार्य होती हैं?<br />
अथवा<br />
प्रसव यदि घर पर कराना हो तो इसके लिए नर्स या दाई के चुनाव, स्थान, आवश्यक सामग्री तथा अन्य व्यवस्थाओं का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
घर पर प्रसव &#8211;<br />
(Confinement in House)<br />
घर पर प्रसव कराने में बहुत-सी कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जाती हैं जिससे स्त्री और शिशु दोनों को ही कष्ट होता है और कभी-कभी उनका जीवन भी संकट में पड़ जाता है। इस समय डॉक्टरी सहायता बहुत आवश्यक होती है। घर पर यह सुविधा कठिन हो जाती है। फिर भी, यदि घर पर ही प्रसव कराना हो तो निम्नवर्णित तथ्यों एवं तैयारियों को ध्यान में रखना आवश्यक है &#8211;</p>
<p>1. नर्स या दाई का चुनाव-प्रसव के लिए योग्य दाई या नर्स का होना आवश्यक है। यदि प्रसव अस्पताल में हो तो नर्स या दाई का नियुक्त होना आवश्यक नहीं है। जब यह स्पष्ट हो जाए कि गर्भिणी को प्रसव-पीड़ा प्रारम्भ हो गई है, उसी समय ऐसी दाई को बुलाना चाहिए जो कि अपने काम में अनुभवी, चतुर और दक्ष हो, प्रसूता से स्नेह और मधुर वचन बोले, उसे धैर्य बँधाए। दाई व नर्स बहरी व गूंगी न हो।</p>
<p>2. प्रसव कक्ष का चुनाव-सर्वप्रथम प्रसूता के लिए चुना गया कमरा अच्छा, हवादार तथा साफ-सुथरा होना चाहिए, जिसमें दुर्गन्ध न आती हो। उसमें सीलन भी न हो और धूप भी आती हो। यह कक्ष किसी शौचालय के पास न हो। प्रसव कक्ष शोरगुल से दूर रहना चाहिए ताकि प्रसूता को पूर्ण विश्राम मिल सके। प्रसूता के लिए समुचित विश्राम अनिवार्य है।<br />
यदि जाड़े हों तो घर में कोयलों की धुआँरहित आग दहकती रखें (क्योंकि धुआँ बालक और प्रसूता दोनों के लिए हानिकारक होता है। जिससे कि ठण्डक उस घर में न आने पाए और वायु भी शुद्ध होती रहे। उस घर की जमीन और दीवार लिपी-पुती और सूखी होनी चाहिए। दरवाजों और खिड़कियों पर परदे लगवा देने चाहिए।</p>
<p>3. प्रसव के लिए आवश्यक सामग्री-घर पर प्रसव कराने की दशा में निम्नलिखित सामग्री की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए<br />
(i) खूब कसा हुआ पलंग, जिस पर गुदगुदा बिछौना हो और मोमजामा बिछा हो। प्रसव के समय इस पलंग का सिरहाना पैताने से एक फुट ऊँचा रहना चाहिए। (ii) पेट पर लपेटने का गाढ़े का कपड़ा। (iii) रेशम। (iv) ब्लेड। (v) गुनगुना पानी। (vi) आग। (vii) तेल। (viii) बेसन या साबुन। (ix) पुराने कपड़े।</p>
<p>प्रसूता के लिए निम्नलिखित वस्तुओं का होना आवश्यक है &#8211;<br />
(i) एक पौण्ड उत्तम स्वच्छ रुई। (ii) एक बड़ा रबड़ का टुकड़ा लगभग दो मीटर लम्बा। (iii) तीन &#8230; दर्जन सेनेटरी पैड्स। (iv) एक सेनेटरी पेटी। (v) एक डिब्बा सेफ्टी पिन। (vi) एक डिटॉल की शीशी। (vii) हाथ धोने के बर्तन। (viii) एनैमिल का तसला तथा बाल्टी। (ix) नाखून साफ करने का ब्रुश। (x) मछली का तेल लगभग दो औंस। (xi) रबड़ की थैली गर्म पानी के लिए। (xii) दो या तीन साफ तौलिए।</p>
<p>4. शिशु के लिए आवश्यक सामग्री-(i) पाउडर लगभग दो औंस। (ii) उत्तम प्रकार की वैसलीन। (iii) एक बोतल जैतून का तेल। (iv) एक टिकिया उत्तम साबुन। (v) बोरिक पाउडर। (vi) गर्म पानी की बोतल। (vii) एक पैकिट छोटे सेफ्टी पिन। (viii) कुछ अच्छी पट्टियाँ। (ix) कुछ धुले हुए साफ पुराने कपड़े।</p>
<p>5. प्रसूता के लिए वस्त्र आदि &#8211; (i) 6 धोती। (ii) 6 ब्लाउज । (iii) 6 पेटीकोट। (iv) 6 चोली।<br />
जाड़ों के दिनों में ऊनी स्वेटर, ऊनी शाल भी होना आवश्यक है। सफेद चादरें पलंग पर बिछाने के लिए, कम-से-कम 4 सफेद धुली चादरें ओढ़ने के लिए, एक दरी, जाड़ों में गद्दा, तकिये, कम्बल या लिहाफ।</p>
<p>6.शिशु के लिए वस्त्र-गर्म शाल शिशु को लपेटने के लिए, गर्म मौजे, फ्रॉक, कुर्ते, दो ढीले कोट रेशमी, 2 ढीले बास्केट। इसके अतिरिक्त डेढ़-दो दर्जन नेपकिन भी अवश्य तैयार रखने चाहिए। पहनने वाले कपड़ों का चुनाव मौसम को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।</p>
<p>घर पर प्रसव कराने की दशा में सर्वाधिक आवश्यक सावधानी है &#8211; हर प्रकार की स्वच्छता एवं शुद्धता की व्यवस्था करना। इसके अभाव में संक्रमण की आशंका रहती है। इसके अतिरिक्त प्रसव के लिए अनुभवी महिला चिकित्सक अथवा प्रशिक्षित दाई की व्यवस्था भी आवश्यक होती है। अप्रशिक्षित दाई अथवा किसी घरेलू स्त्री द्वारा प्रसव कराने पर माँ एवं शिशु के जीवन को खतरा हो सकता है।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 23 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
प्रसव से क्या आशय है? प्रसव के लिए आवश्यक तैयारियों का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
प्रसव तथा उसके लिए आवश्यक तैयारियाँ &#8211;<br />
प्रसव &#8211; प्रसव वह प्राकृतिक क्रिया है, जिसके द्वारा गर्भस्थ शिशु गर्भ से बाहर आता है। शिशु का गर्भ से बाहर आना ही प्रसव कहलाता है। इसी को शिशु का जन्म लेना भी कहते हैं। यह अवसर बड़ा महत्त्वपूर्ण होता है। इस अवसर पर स्त्री एवं बच्चे के जीवन की सुरक्षा के लिए बहुत सावधानी से काम लेना पड़ता है। इस अवसर के लिए पहले से कुछ-न-कुछ तैयारी करना आवश्यक होता है।</p>
<p>प्रसव की तैयारियाँ एवं उनका महत्त्व &#8211; प्रसव की तैयारी लगभग दो या तीन मास पूर्व कर लेनी चाहिए। इन तैयारियों पर न केवल माता व शिशु की तत्कालीन सुरक्षा अपितु शिशु का सम्पूर्ण भावी जीवन निर्भर रहता है। प्रसव के समय की तैयारी निम्न प्रकार से करनी चाहिए &#8211;</p>
<ul>
<li>प्रसव के स्थान का निर्धारण।</li>
<li>प्रसव के लिए योग्य नर्स अथवा दाई का चुनाव।</li>
<li>प्रसव क्रिया के लिए आवश्यक वस्तुएँ।</li>
<li>शिशु के वस्त्र तथा आवश्यक वस्तुएँ।</li>
<li>माता के वस्त्र तथा आवश्यक वस्तुएँ। .</li>
<li>उचित डॉक्टर का चुनाव।</li>
<li>अनुमानित व्यय की व्यवस्था करना।</li>
</ul>
<p>प्रसव सम्बन्धी तैयारियाँ आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण होती हैं। वास्तव में इन सभी तैयारियों के आधार पर प्रसव को सामान्य बनाया जा सकता है तथा किसी भी परेशानी का सफलतापूर्वक सामना किया जा सकता है। यदि इस प्रकार की तैयारियां पूरी नहीं की जातीं तो प्रसव के समय विभिन्न परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
अस्पताल में प्रसव कराने के मुख्य लाभों का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
अस्पताल में प्रसव कराने के लाभ &#8211;<br />
अस्पताल में प्रसव कराने के मुख्य लाभ निम्नलिखित होते हैं &#8211;</p>
<ul>
<li>निर्धन स्त्रियों को सरकारी अस्पताल या प्रसव केन्द्रों में नि:शुल्क प्रसव सुविधा मिल जाती है।</li>
<li>गर्भवती को अस्पतालों में आवश्यकतानुसार सब प्रकार की डॉक्टरी सहायता तुरन्त प्राप्त हो जाती है। यदि दुर्भाग्यवश प्रसव के समय कोई गम्भीर समस्या उत्पन्न हो जाए तो अस्पताल में विशिष्ट चिकित्सा सहायता मिल जाती है। अस्पताल में ऑक्सीजन, रक्त तथा शल्य क्रिया सम्बन्धी सुविधाएँ सरलता से प्राप्त हो सकती हैं।</li>
<li>अस्पताल में प्रसव कराने पर बहुत-सी मानसिक व शारीरिक चिन्ताओं तथा दौड़-धूप से छुटकारा मिल जाता है।</li>
<li>अस्पताल में गर्भवती को हवा तथा प्रकाशयुक्त कमरा व सफाई मिल जाती है।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 3.<br />
अस्पताल में प्रसव कराने से होने वाली हानियों या कठिनाइयों का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
अस्पताल में प्रसव कराने से हानियाँ &#8211;<br />
अस्पताल में प्रसव कराने पर मुख्य रूप से निम्नलिखित हानियाँ या कठिनाइयाँ होती हैं &#8211;</p>
<ul>
<li>परिवार की एक स्त्री को प्रसूता के पास अस्पताल में ही रहना पड़ता है। घर पर प्रसूता की देखभाल सुविधापूर्वक की जा सकती है।</li>
<li>साधारणतया अस्पतालों में प्रसव कराने पर व्यय भी अधिक करना पड़ता है।</li>
<li>आजकल सरकारी अस्पतालों में बहुत अधिक भीड़ होने लगी है। अनेक बार एक-एक बिस्तर पर दो-दो महिलाओं को लेटना पड़ता है अथवा फर्श पर ही लेटना पड़ता है। ऐसी स्थिति में प्रसूता को आवश्यक आराम एवं सुविधा प्राप्त नहीं हो पाती।</li>
<li>जहाँ तक प्राइवेट नर्सिंग होम का प्रश्न है, उनमें व्यय बहुत अधिक होता है; अत: साधारण आर्थिक स्थिति वाले परिवारों के लिए इस व्यय को वहन करना कठिन होता है।</li>
</ul>
<p>प्रश्न 4.<br />
प्रसूता की तात्कालिक परिचर्या का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
प्रसूता की तात्कालिक परिचर्या &#8211;<br />
प्रसव के पश्चात् प्रसूता का शक्तिहीन एवं निढाल होना स्वाभाविक है। इस समय उसे पूर्ण आराम की आवश्यकता होती है; अतः प्रसूता की शुद्धता के उपरान्त उसे आराम से सोते रहने देना चाहिए। उसकी इच्छा यदि पीने की हो तो गर्म दूध दे देना चाहिए अन्यथा जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए।</p>
<p>प्रसव के पश्चात् प्रसूता के गर्भ सम्बन्धी अंगों में परिवर्तन हो जाता है, परन्तु उन्हें स्वाभाविक स्थिति में आने के लिए समय चाहिए; अतः प्रसूता को अधिक-से-अधिक विश्राम की अवस्था में रहने देना चाहिए। गर्भाशय का भार इस समय 2 पौण्ड के लगभग हो जाता है, सामान्य अवस्था में उसे 2 औंस रहना चाहिए। इसे पूर्व-स्थिति में आने के लिए लगभग 40 दिन का समय चाहिए। यदि इस समय प्रसूता की परिचर्या नहीं की जाएगी तो गर्भाशय के स्थानान्तरित होने की सम्भावना रहती है; अतः प्रसव के 7वें दिन से प्रसूता को प्रतिदिन कुछ समय विशेष के लिए उल्टा लेटना चाहिए। प्रसव के पश्चात् लगभग 30-35 दिन तक रक्तस्राव होता रहता है, जो सामान्य बात है।</p>
<p>यदि इसके उपरान्त भी रक्तस्राव होता रहे तो डॉक्टर या नर्स से परामर्श लेना चाहिए। आँवलनाल के बाहर निकालने से गर्भाशय में जख्म हो जाते हैं; अत: उसकी पूर्ण स्वच्छता परमावश्यक है, अन्यथा संक्रमण की आशंका रहेगी। गर्भाशय के बार-बार सिकुड़ने से प्रसव के बाद तीन-चार दिन तक पेट में पीड़ा रहती है। इसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए क्योंकि इस सिकुड़न से ही गर्भाशय अपनी पूर्व-स्थिति में आ पाता है।</p>
<p>प्रसूता के आहार की ओर विशेष रूप से सजग होना चाहिए। उसे बहुत हल्का भोजन, दूध, बादाम, अजवायन, खिचड़ी, दलिया आदि देना चाहिए। छिलके वाली दाल दी जानी चाहिए। प्रसूता के लिए गोंद बहुत लाभदायक है। इससे शरीर की पीड़ा व जख्म को लाभ पहुँचता है। प्रसूता को सवा महीने तक पूर्ण विश्राम करना चाहिए। हाँ, वह शिशु के छोटे-छोटे कार्य कर सकती है।<br />
प्रसूता को स्वयं भी अपने स्वास्थ्य के प्रति सावधानी बरतनी चाहिए। यदि किसी प्रकार के कष्ट का अनुभव होता हो तो डॉक्टर को दिखाना चाहिए।</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
प्रसूता के द्वारा किए जाने वाले व्यायाम का विवरण प्रस्तुत कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
प्रसूता के लिए व्यायाम की विधियाँ &#8211;<br />
शिशु के जन्म के पश्चात् प्रसूता का शरीर कुछ ढीला-ढाला या बेडौल-सा हो जाता है; अत: उसे सामान्य स्थिति में लाने के लिए, प्रसूता को प्रसव-निवृत्ति के प्रथम दिन से ही व्यायाम का अभ्यास करना चाहिए ताकि उसका शरीर स्वस्थ, लचीला और सुडौल बना रहे। प्रसूता को शिशु के जन्म के पश्चात् प्रतिदिन इस प्रकार से व्यायाम करना उचित रहता है &#8211;</p>
<ul>
<li>पहला दिन &#8211; प्रसूता को सबसे पहले दिन आराम की अवस्था में कम-से-कम आठ बार गहरी साँस लेनी चाहिए।</li>
<li>दूसरा दिन &#8211; दूसरे दिन लेटने की अवस्था में घुटनों को मोड़ना और फैलाना चाहिए। यह विधि कई बार, विश्राम करने के बाद करनी चाहिए।</li>
<li>तीसरा दिन &#8211; गर्भाशय को ठीक अवस्था में लाने के लिए प्रसूता को लेटे-लेटे ही नितम्ब की मांसपेशियों को शौच जाने की भाँति सिकोड़ना और फैलाना चाहिए।</li>
<li>चौथा दिन &#8211; प्रसूता को बैठकर 4 या 5 बार अपनी बाँहों को मोड़ना तथा फैलाना चाहिए।</li>
<li>पाँचवाँ दिन &#8211; पाँचवें दिन चित्त लेटकर घुटने व पेट को सिकोड़कर पीठ ऊपर उठानी चाहिए।</li>
<li>छठा दिन &#8211; चित्त लेटकर घुटनों को एक-साथ मिलाकर उन पर दबाव डालते हुए पेट के भाग को ऊपर उठाना चाहिए। यह क्रिया 4-5 बार करनी चाहिए।</li>
<li>सातवाँ दिन &#8211; बैठकर, कूल्हों पर हाथ रखकर, ऊपर के धड़ को बारी-बारी से मोड़ना चाहिए।</li>
<li>आठवाँ दिन &#8211; सिर सीधा रखकर, प्रसूता को बैठकर कूल्हों पर हाथ रखकर, धड़ को गोल चक्कर से घुमाना चाहिए।</li>
<li>नवाँ दिन &#8211; लेटी हुई अवस्था में पैरों को भीतर की तरफ मोड़कर फैलाना तथा बिस्तर पर ले जाना चाहिए।</li>
<li>दसवाँ दिन &#8211; सीधे लेटकर, सिर पलंग के ऊपर उठाकर, ठोड़ी से छाती को छूने का प्रयास करना चाहिए।</li>
</ul>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 23 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
प्रसव से क्या आशय है?<br />
उत्तरः<br />
प्रसव वह प्राकृतिक क्रिया है, जिसके द्वारा शिशु गर्भ से बाहर आता है। शिशु का गर्भ से बाहर आना ही प्रसव कहलाता है।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
पारम्परिक रूप से प्रसव कहाँ कराया जाता था?<br />
उत्तरः<br />
पारम्परिक रूप से घर पर ही प्रसव कराया जाता था।</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
वर्तमान नगरीय समाज में स्त्रियाँ कहाँ प्रसव कराना पसन्द करती हैं?<br />
उत्तरः<br />
वर्तमान नगरीय समाज में स्त्रियाँ अस्पताल में ही प्रसव कराना पसन्द करती हैं।</p>
<p>प्रश्न 4.<br />
घर पर प्रसव कराने पर किस बात का ध्यान रखना आवश्यक है?<br />
उत्तरः<br />
घर पर प्रसव कराने पर सफाई एवं प्रशिक्षित दाई की व्यवस्था को ध्यान में रखना . आवश्यक है।</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
गाँव में प्रसव सम्बन्धी क्या समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं?<br />
उत्तरः<br />
गाँव में प्रसव के समय यदि कुशल नर्स/दाई उपस्थित न हो तो प्रसव कराना कठिन होता है। साथ ही प्रसव के लिए आवश्यक दशाएँ भी गाँवों में उपलब्ध नहीं होती हैं।</p>
<p>प्रश्न 6.<br />
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र कहाँ बनाए गए हैं?<br />
उत्तरः<br />
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र ग्रामों में बनाए गए हैं।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 23 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए &#8211;</p>
<p>1. अस्पताल में प्रसव कराना क्यों लाभकारी है &#8211;<br />
(क) माँ और शिशु की उचित देखभाल के लिए<br />
(ख) विशिष्ट चिकित्सा के लाभ के लिए<br />
(ग) अस्पताल के कमरे स्वच्छ, हवादार तथा प्रकाशयुक्त होते हैं<br />
(घ) इनमें से सभी। .<br />
उत्तरः<br />
(घ) इनमें से सभी।</p>
<p>2. सरकारी अस्पताल में प्रसव कराने से हानि है &#8211;<br />
(क) कोई डॉक्टरी सहायता उपलब्ध नहीं होती<br />
(ख) स्थान की कमी के कारण अनेक असुविधाएँ होती हैं<br />
(ग) अपमान सहना पड़ता है<br />
(घ) कोई हानि नहीं होती।<br />
उत्तरः<br />
(ख) स्थान की कमी के कारण अनेक असुविधाएँ होती हैं।</p>
<p><a href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science/">UP Board Solutions for Class 11 Home Science</a></p>
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		<item>
		<title>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 17 मानवीय आवश्यकताएँ एवं भग्नाशा</title>
		<link>https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science-chapter-17/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Prasanna]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 28 Apr 2025 09:31:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Class 11]]></category>
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					<description><![CDATA[UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 17 मानवीय आवश्यकताएँ एवं भग्नाशा (Human Needs and Frustration) UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 17 मानवीय आवश्यकताएँ एवं भग्नाशा UP Board Class 11 Home Science Chapter 17 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर प्रश्न 1. &#8216;आवश्यकता&#8217; से आप क्या समझती हैं? अर्थ स्पष्ट ... <a title="UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 17 मानवीय आवश्यकताएँ एवं भग्नाशा" class="read-more" href="https://www.upboardsolutions.com/class-11-home-science-chapter-17/" aria-label="Read more about UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 17 मानवीय आवश्यकताएँ एवं भग्नाशा">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 17 मानवीय आवश्यकताएँ एवं भग्नाशा (Human Needs and Frustration)</p>
<h2>UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 17 मानवीय आवश्यकताएँ एवं भग्नाशा</h2>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 17 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर<br />
प्रश्न 1.<br />
&#8216;आवश्यकता&#8217; से आप क्या समझती हैं? अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
व्यक्ति एवं समाज के जीवन में इच्छाओं एवं आवश्यकताओं का विशेष महत्त्व होता है। वास्तव में इच्छाओं से प्रेरित होकर आवश्यकताओं को.अनुभव करना, आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समुचित प्रयास करना तथा आवश्यकताओं की यथार्थ में पूर्ति करना ही जीवन है। यदि व्यक्ति के जीवन में इच्छाएँ एवं आवश्यकताएँ न हों तो जीवन नीरस, उत्साहरहित तथा निरर्थक बन जाता है। आवश्यकताओं की पूर्ति से व्यक्ति को एक विशेष प्रकार के सन्तोष एवं आनन्द की अनुभूति होती है। इसके विपरीत, यदि व्यक्ति की अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाती तो व्यक्ति क्रमशः निराश, असन्तुष्ट तथा कुण्ठित हो जाता है।</p>
<p>वास्तव में आवश्यकताएँ अनन्त हो सकती हैं तथा समस्त आवश्यकताओं को एकाएक पूरा नहीं किया जा सकता; अत: आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उनकी प्राथमिकता के आधार पर प्रयास किए जाने चाहिए। व्यक्ति की आवश्यकताओं की अनुभूति एवं पूर्ति का मुख्य स्थल घर एवं परिवार ही है। घर एवं परिवार की व्यवस्था एवं प्रबन्ध में गृहिणी की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इस स्थिति में अनिवार्य है कि प्रत्येक गृहिणी को व्यक्तिगत एवं पारिवारिक आवश्यकताओं का सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक ज्ञान हो। यही कारण है कि गृहविज्ञान के अन्तर्गत &#8216;आवश्यकताओं का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है।</p>
<p>आवश्यकता का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Need) &#8211;<br />
सामान्य रूप से &#8216;इच्छा&#8217; तथा &#8216;आवश्यकता&#8217; को समान अर्थों में प्रयोग किया जाता है, परन्तु सैद्धान्तिक रूप में इन दोनों प्रत्ययों में स्पष्ट अन्तर है। वास्तव में व्यक्ति के मन में उत्पन्न होने वाली अनन्त इच्छाओं में से कुछ इच्छाएँ ही आगे चलकर आवश्यकता का रूप ग्रहण कर लेती हैं। &#8216;इच्छा&#8217; जाग्रत होना मनुष्य की एक स्वभावगत विशेषता है। व्यक्ति के मन में असंख्य इच्छाएँ मुक्त रूप से जन्म लेती रहती हैं। समस्त इच्छाएँ व्यक्ति की भावनाओं द्वारा पोषित होती हैं। जो इच्छाएँ भौतिक जगत की यथार्थताओं से समर्थन प्राप्त कर लेती हैं, उन्हें ही &#8216;आवश्यकता के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है। वास्तव में व्यक्ति की वह इच्छा उसकी आवश्यकता बन जाती है, जो उसके उपलब्ध भौतिक साधनों के अनुरूप होती है। जिस इच्छा की पूर्ति के लिए व्यक्ति समुचित साधन-सम्पन्न होता है, उस इच्छा को व्यक्ति की आवश्यकता मान लिया जाता है।</p>
<p>&#8216;आवश्यकता&#8217; की अवधारणा को विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने दृष्टिकोण एवं ढंग से परिभाषित करने का प्रयास किया है; यथा &#8211;</p>
<p>(1) प्रो० पैन्सन ने &#8216;आवश्यकता&#8217; को इन शब्दों में परिभाषित किया है-&#8220;आवश्यकता व्यक्ति की उस इच्छा को कहते हैं, जिसकी पूर्ति के लिए उसके पास पर्याप्त साधन हों और वह उन साधनों को उस इच्छा की पूर्ति हेतु लगाने को तत्पर हो।&#8221; प्रस्तुत परिभाषा द्वारा स्पष्ट है कि वास्तव में वे इच्छाएँ ही &#8216;आवश्यकता के रूप में स्वीकृति प्राप्त करती हैं, जिनकी पूर्ति के लिए व्यक्ति साधन-सम्पन्न होता है तथा उनकी पूर्ति के लिए स्वयं तैयार भी होता है।</p>
<p>(2) लगभग इसी अर्थ को प्रतिपादित करते हुए स्मिथ एवं पैटर्सन ने भी आवश्यकता की परिभाषा प्रस्तुत की है। उनके शब्दों में &#8211; “आवश्यकता किसी वस्तु को प्राप्त करने की वह इच्छा है, जिसको पूरा करने के लिए मनुष्य में योग्यता हो और जो उसके लिए व्यय करने को तैयार हो।&#8221;</p>
<p>इन परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि उन समस्त इच्छाओं को हम व्यक्ति की आवश्यकताओं के रूप में स्वीकार कर सकते हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए व्यक्ति के पास समुचित साधन हैं तथा साथ-साथ वह व्यक्ति उस इच्छा की पूर्ति के लिए समुचित साधन को प्रयोग में लाने के लिए स्वयं तैयार भी हो। आवश्यकता के इस अर्थ को एक उदाहरण के माध्यम से भी स्पष्ट किया जा सकता है। मान लीजिए, एक व्यक्ति के मन में इच्छा जाग्रत होती है कि उसके पास एक मोटरकार हो।</p>
<p>अपने प्रारम्भिक रूप में यह एक इच्छा-मात्र ही होगी। यदि व्यक्ति के पास मोटरकार खरीदने तथा उसके रखरखाव के लिए पर्याप्त धन नहीं है तो उसकी इस इच्छा को केवल कोरी या कल्पनाजनित इच्छा ही माना जाएगा। उसे हम कदापि ‘आवश्यकता के रूप में स्वीकृति प्रदान नहीं कर सकते। यदि व्यक्ति के पास पर्याप्त धन है तो उसकी यह इच्छा आवश्यकता का रूप ग्रहण कर सकती है।</p>
<p>अब यह देखना होगा कि वह व्यक्ति मोटरकार पर इतना अधिक धन खर्च करने के लिए पूर्ण रूप से तैयार है या नहीं? यदि व्यक्ति सोचता है कि कार खरीदने एवं पेट्रोल आदि का खर्च अनावश्यक है तो उसकी कार खरीदने की इच्छा को आवश्यकता नहीं माना जाएगा। इसके विपरीत, यदि व्यक्ति पूर्णरूप से मोटरकार खरीदने के लिए तैयार हो तो उसकी इस इच्छा को उसकी आवश्यकता स्वीकार किया जा सकता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि प्रायः सभी आवश्यकताएँ सापेक्ष होती हैं; अर्थात् व्यक्ति की परिस्थितियों के साथ-साथ आवश्यकताएँ भी परिवर्तित होती रहती हैं। इसी प्रकार किसी एक व्यक्ति की आवश्यकता किसी अन्य व्यक्ति के लिए व्यर्थ अथवा कोरी काल्पनिक इच्छा ही हो सकती है।</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
मानवीय आवश्यकताओं की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।<br />
अथवा<br />
मानवीय आवश्यकताओं की विशेषताओं का वर्णन उदाहरण सहित कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
मानवीय आवश्यकताओं की विशेषताएँ (Characteristics of Human Needs) &#8211;<br />
व्यक्ति की आवश्यकताएँ उसके व्यक्तित्व के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। मानवीय आवश्यकताओं की मुख्य विशेषताओं का सामान्य परिचय निम्नलिखित है &#8211;</p>
<p>1. आवश्यकताएँ असीमित होती हैं &#8211; मनुष्य की आवश्यकताएँ अनन्त तथा असीमित होती हैं, उनको वह कभी भी पूर्ण नहीं कर सकता। मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक आवश्यकताओं से घिरा रहता है। बालक जन्म लेता है तो उसी क्षण से उसको माँ के दूध व वस्त्र की आवश्यकता होती है। जैसे-जैसे बालक बढ़ता जाता है, उसकी आवश्यकताएँ भी बढ़ती जाती हैं। मनुष्य जब मृत्यु के कगार पर होता है, तब भी उसको औषधियों की आवश्यकता होती है।</p>
<p>2. आवश्यकताएँ बार-बार उत्पन्न होती हैं &#8211; प्रत्येक मनुष्य के जीवन में आवश्यकताएँ बार-बार उत्पन्न होती हैं; अर्थात् एक व्यक्ति किसी आवश्यकता की कुछ समय के लिए ही सन्तुष्टि कर सकता है। जैसे &#8211; मनुष्य भूख लगने पर भोजन करता है, परन्तु वह जिन्दगी भर के लिए एक साथ भोजन नहीं कर सकता। वह अपनी निश्चित समय के लिए तो भूख मिटा सकता है, परन्तु उसको कुछ घण्टों पश्चात् फिर भूख लगेगी और भूख मिटाने के लिए वह फिर भोजन करेगा। इस प्रकार आवश्यकताएँ बार-बार उत्पन्न होती हैं और मनुष्य उनको पूर्ण करने की बार-बार चेष्टा करता है।</p>
<p>3. आवश्यकताओं में प्रतियोगिता रहती है &#8211; सभी आवश्यकताओं की प्रकृति समान नहीं होती, उनकी तीव्रता में अन्तर रहता है। सन्तुलित भोजन की आवश्यकता सुन्दर वस्त्र से अधिक है। कार की आवश्यकता बालकों की शिक्षा की आवश्यकता से कम है। सीमित आय के कारण प्रत्येक परिवार को आवश्यकता पूर्ति हेतु प्रबल एवं अधिक अनिवार्य आवश्यकताओं का चुनाव करना होता है; अत: सदैव<br />
अधिक महत्त्वपूर्ण आवश्यकताएँ ही चुनी जाती हैं। इस प्रकार की आवश्यकताओं को मौलिक अथवा प्राथमिक आवश्यकता कहा जाता है।</p>
<p>4. एक आवश्यकता में अनेक आवश्यकताएँ निहित हैं &#8211; एक आवश्यकता में अनेक आवश्यकताएँ निहित होती हैं। उदाहरणार्थ-हम एक भवन का निर्माण करते हैं तो भवन का निर्माण पूर्ण होते ही हमारे समक्ष अनेक आवश्यकताएँ आ खड़ी होती हैं। जैसे-भवन की सज्जा के लिए विभिन्न साज-सामान की आवश्यकता पड़ती है आदि।</p>
<p>5. आवश्यकताएँ पूरक होती हैं &#8211; आवश्यकताएँ एक-दूसरे की पूरक होती हैं। एक आवश्यकता की पूर्ति के लिए बहुधा एक या दो अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करना अनिवार्य होता है। उदाहरण के लिए कार की आवश्यकता के साथ-साथ पेट्रोल की भी आवश्यकता हुआ करती है।</p>
<p>6. आवश्यकताएँ आदत में परिणत हो जाती हैं &#8211; जब आवश्यकताओं को बार-बार सन्तुष्ट किया जाता है तो वे आदत में परिणत हो जाती हैं। मनुष्य उनकी पूर्ति का आदी हो जाता है। ऐसी आदतों की पूर्ति के अभाव में उसे कष्ट होता है। जैसे—प्रारम्भ में बहुत-से व्यक्ति शराब या सिगरेट शौक के लिए पीते हैं, बाद में चलकर यही शौक उनकी आदत में बदल जाता है।</p>
<p>7. आवश्यकताएँ ज्ञान की वृद्धि के साथ-साथ बढ़ती हैं &#8211; प्राचीनकाल में जब मनुष्य आदिम अवस्था में था तो उसकी आवश्यकताएँ बहुत सीमित थीं; किन्तु जैसे-जैसे उसके ज्ञान एवं साधनों का विकास होता गया वैसे-वैसे उसकी आवश्यकताएँ भी बढ़ती गईं। आज विज्ञान के युग में जैसे-जैसे व्यक्ति को विभिन्न साधनों एवं सेवाओं की जानकारी प्राप्त होती है, वैसे-वैसे व्यक्ति की आवश्यकताओं में भी वृद्धि होती जाती है। आजकल दूरदर्शन पर आधुनिक जीवन-शैली के विस्तृत प्रदर्शन से व्यक्ति एवं परिवार की आवश्यकताओं में निरन्तर वृद्धि हो रही है।</p>
<p>8. आवश्यकता तथा प्रेरक &#8211; प्राणी के विभिन्न व्यवहारों के कारणों को समझने के लिए उसकी विभिन्न आवश्यकताओं को समझना आवश्यक है; क्योंकि आवश्यकताएँ ही उसे किसी विशिष्ट दिशा में गतिशील होने के लिए प्रेरणा देती हैं। प्राणियों की आवश्यकताओं में जातीय और वैयक्तिक रुचि का भेद पाया जाता है। उदाहरणार्थ-मनुष्य जाति की आवश्यकता शेर जाति की आवश्यकता से भिन्न होगी और एक व्यक्ति की आवश्यकता दूसरे व्यक्ति की आवश्यकता से भिन्न होगी। वस्तुतः इस भिन्नता के कारण ही जगत का व्यापार इस प्रकार चल रहा है, अन्यथा उसमें या तो शैथिल्य ही आ जाता या उथल-पुथल मच जाती।</p>
<p>9. वर्तमान सम्बन्धी आवश्यकताएँ अधिक प्रबल होती हैं &#8211; मानवीय आवश्यकताएँ अनेक प्रकार की होती हैं। कुछ का सम्बन्ध मुख्य रूप से वर्तमान से ही होता है, जबकि कुछ आवश्यकताएँ भविष्य से सम्बन्धित होती हैं। इन दोनों प्रकार की आवश्यकताओं में से वर्तमान सम्बन्धी आवश्यकताएँ अधिक प्रबल होती हैं। अनेक व्यक्ति भविष्य सम्बन्धी आवश्यकताओं की अवहेलना कर देते हैं, भले ही वे आवश्यकताएँ अधिक महत्त्वपूर्ण ही क्यों न हों।</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
मनुष्य की आवश्यकताओं का वर्गीकरण करते हुए प्राथमिक एवं गौण आवश्यकताओं की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।<br />
अथवा<br />
मनुष्य की आवश्यक आवश्यकताएँ कौन-कौन सी होती हैं? इनकी पूर्ति किस प्रकार की जा सकती है?<br />
अथवा<br />
परिवार की आवश्यकताओं को कितने वर्गों में बाँटा जा सकता है? उनके विषय में विस्तार से लिखिए।<br />
उत्तरः<br />
आवश्यकताओं का वर्गीकरण (Classification of Needs) &#8211;<br />
मनुष्य की आवश्यकताएँ अन्य प्राणियों से अधिक होती हैं, क्योंकि वह सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। परन्तु कुछ आवश्यकताएँ ऐसी हैं, जो मनुष्य के अतिरिक्त अन्य सभी प्राणियों में भी समान रूप में पायी जाती हैं; जैसे-साँस लेना, पानी पीना, भोजन करना, मल-मूत्र त्याग करना तथा अपने शरीर के तापक्रम का एक स्थायित्व बनाए रखना।</p>
<p>इन आवश्यकताओं की पूर्ति के अभाव में प्राणी का जीना कठिन हो जाएगा। इसके अतिरिक्त, कुछ अन्य ऐसी आवश्यकताएँ होती हैं, जिनकी पूर्ति के बिना प्राणी का विकास नहीं होगा। जैसे-कुछ लोगों को दूसरों की अपेक्षा अधिक धन अथवा दूसरों से प्रेम या प्रशंसा पाने की आवश्यकता होती है। जिन आवश्यकताओं की पूर्ति के बिना प्राणी का जीना कठिन हो जाता है, उन्हें प्राथमिक अथवा जन्मजात आवश्यकता कहा जा सकता है और अन्य, गौण या अर्जित आवश्यकताएँ कही जा सकती हैं।</p>
<p>आवश्यकताओं के प्राथमिक तथा गौण वर्गीकरण से यह समझना भूल होगी कि प्राथमिक आवश्यकताएँ अधिक प्रबल होती हैं और गौण आवश्यकताएँ अपेक्षाकृत निर्बल हैं। उदाहरणार्थ-किसी व्यक्ति में दूसरों से प्रशंसा प्राप्त करने की इच्छा इतनी प्रबल हो सकती है कि उसकी धुन में वह अपना स्वास्थ्य खोकर मरने के सन्निकट आ सकता है। ऐसी स्थिति में गौण आवश्यकताओं का प्राधान्य हो जाता है और प्राथमिक आवश्यकताएँ अवरोधित हो जाती हैं। एक अर्थ में, गौण आवश्यकता प्राथमिक आवश्यकता से अधिक महत्त्वपूर्ण बन सकती है। उदाहरणार्थ-व्यक्ति अपनी मानहानि अथवा धन का हरण होने पर आत्महत्या करते देखे जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों को मान अथवा धन के बिना जीना व्यर्थ लगता है और वे आत्महत्या तक कर बैठते हैं।</p>
<p>प्राथमिक जन्मजात आवश्यकताओं में हवा, जल, भोजन तथा आत्मरक्षार्थ अन्य साधारण वस्तुओं का नाम लिया जा सकता है। आत्मरक्षा के अतिरिक्त जाति-रक्षा की भी प्राणी में प्रेरणा होती है। इसी आवश्यकता से प्रेरित होकर वह कामेच्छा की पूर्ति करता है तथा सन्तान उत्पन्न करता है। जैसाकि ऊपर स्पष्ट किया गया है; ऐसी आवश्यकताओं को प्राथमिक अथवा स्वाभाविक आवश्यकता ही कहा जाएगा। इन आवश्यकताओं के अतिरिक्त कुछ अन्य ऐसी आवश्यकताएँ होती हैं, जिन्हें व्यक्ति अपने अनुभव के अनुसार अर्जित करता है।</p>
<p>विभिन्न व्यक्तियों के अनुभव भिन्न-भिन्न होते हैं। अतः उनकी अर्जित आवश्यकताओं में भी बड़ा विभेद पाया जा सकता है। इन आवश्यकताओं के विकास में व्यक्ति की इच्छा और आदत का प्रमुख हाथ होता है। किसी व्यक्ति की इच्छा और आदत-पढ़ने-लिखने, दूसरे से प्रशंसा पाने, देशाटन करने अथवा मकान बनवाने की हो सकती है। तदनुसार उसे विभिन्न वस्तुओं अथवा साधनों की आवश्यकता का अनुभव हो सकता है। इस अनुभव से प्रेरित होकर वह विभिन्न प्रकार की क्रियाशीलता प्रदर्शित कर सकता है।</p>
<p>मनुष्य वैसे तो अपने निजी प्रयत्नों के द्वारा ही अपनी समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, किन्तु उसके इस कार्य में समाज एवं राज्य भी पर्याप्त सहायता देते हैं। दोनों संस्थाओं के द्वारा ही उसे वे महत्त्वपूर्ण साधन प्रदान किए जाते हैं, जिनके द्वारा वह अपनी विभिन्न आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करता है। उदाहरणार्थ-समाज तथा राज्य अनेक औद्योगिक एवं व्यावसायिक संस्थानों की स्थापना करते हैं, जिनमें कार्य करके व्यक्ति अपनी अनेक दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धनोपार्जन करता है।</p>
<p>इसी प्रकार से वह अपनी सामाजिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए पारस्परिक सम्बन्धों की स्थापना करता है और समाज के विभिन्न वर्गों की सहायता से ही उसकी शिक्षा, आवास, मनोरंजन तथा अन्य अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। इस प्रकार से हम देखते हैं कि व्यक्तिगत रूप में मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में समाज एवं राज्य पर अवलम्बित होता है।</p>
<p>मनुष्य के जीवन का मुख्य उद्देश्य अपनी आवश्यकताओं की समुचित पूर्ति करना होता है। यदि समुचित प्रयास करने के उपरान्त भी किसी व्यक्ति की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाती तो व्यक्ति के जीवन एवं व्यक्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस स्थिति में कभी-कभी व्यक्ति अपनी अभावग्रस्त दशा के लिए समाज को जिम्मेदार मान बैठता है। इस धारणा के प्रबल हो जाने पर कुछ व्यक्ति समाज-विरोधी बन जाते हैं। उदाहरण के लिए यदि व्यक्ति पर्याप्त परिश्रम करके भी अपना तथा अपने परिवार का पालन-पोषण नहीं कर पाता तो इस स्थिति में इस बात की सम्भावना रहती है कि वह व्यक्ति समाज-विरोधी बन जाए तथा चोरी, डकैती आदि गतिविधियों में लिप्त हो जाए।</p>
<p>यदि परिवार के सन्दर्भ में प्रमुख आवश्यकताओं की चर्चा की जाए तो कहा जा सकता है कि परिवार की प्रमुख आवश्यकताएँ हैं-पर्याप्त तथा सन्तुलित भोजन, समुचित वस्त्र, समुचित आवास &#8211; व्यवस्था, बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था, स्वास्थ्य-रक्षा तथा चिकित्सा सुविधा, मनोरंजन की आवश्यकता, बच्चों की देख-भाल, परिवार के सदस्यों में प्रेम, स्नेह तथा सहयोगपूर्ण सम्बन्धों की आवश्यकता तथा पारिवारिक आय एवं बचत की आवश्यकता। इन सभी आवश्यकताओं की समुचित पूर्ति के लिए व्यक्ति एवं परिवार संयुक्त रूप से प्रयास करते हैं। कुछ आवश्यकताएँ धन आदि भौतिक साधनों द्वारा पूरी होती हैं। इसके लिए व्यक्ति एवं परिवार को आर्थिक प्रयास करने पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ आवश्यकताएँ शारीरिक, मानसिक एवं भावात्मक प्रयासों द्वारा पूरी की जाती हैं। व्यक्ति की अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति का केन्द्र परिवार ही होता है।</p>
<p>प्रश्न 4.<br />
व्यक्ति की आवश्यकताओं की उत्पत्ति के सामान्य नियमों का उल्लेख कीजिए। परिवार द्वारा आवश्यकताओं की पूर्ति कैसे होती है?<br />
उत्तरः<br />
यह एक व्यावहारिक दृष्टि से सत्यापित तथ्य है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में असंख्य आवश्यकताएँ अनुभव करता है तथा उनकी पूर्ति के लिए तरह-तरह के प्रयास भी करता है। यदि व्यक्ति की कोई आवश्यकता ही प्रबल न हो तो व्यक्ति की क्रियाशीलता भी घट जाती है। अब प्रश्न उठता है कि कोई व्यक्ति किसी आवश्यकता को क्यों और कैसे अनुभव करता है; अर्थात् आवश्यकताओं की उत्पत्ति कैसे होती है? इस विषय में विभिन्न कारणों को आवश्यकताओं की उत्पत्ति के लिए जिम्मेदार माना गया है। इन कारणों को आवश्यकताओं की उत्पत्ति के नियम भी कहा गया है।</p>
<p>आवश्यकताओं की उत्पत्ति के नियम (Rules of Origin of Needs) &#8211;<br />
व्यक्ति की आवश्यकताओं के सम्बन्ध में कुछ प्रमुख नियम हैं, जिनका वर्णन निम्न प्रकार किया जा सकता है &#8211;</p>
<p>1. शारीरिक रचना और आवश्यकता &#8211; शारीरिक रचना के आधार पर आवश्यकताओं का अनुभव होता है। मनुष्य और जानवरों की आवश्यकताओं में अन्तर होता है। मनुष्यों में आपस में यदि शारीरिक भिन्नता है तो उनकी आवश्यकताओं में अन्तर होगा। जैसे—एक अन्धे व्यक्ति को चश्मे की आवश्यकता नहीं होती, जबकि स्वस्थ व्यक्ति को चश्मे की आवश्यकता हो सकती है। इसी प्रकार दिव्यांग (विकलांग) व्यक्ति को बैसाखियों की आवश्यकता होती है, स्वस्थ व्यक्ति को नहीं। अतः स्पष्ट है कि शारीरिक आवश्यकताओं के निर्धारण में शारीरिक रचना भी एक महत्त्वपूर्ण कारक होता है।</p>
<p>2. आवश्यकताएँ तथा आर्थिक स्थिति &#8211; व्यक्ति की आवश्यकताओं की उत्पत्ति के पीछे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति का भी विशेष हाथ होता है। यदि व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती तो उस दशा में व्यक्ति की आवश्यकताएँ सीमित ही रहती हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपनी मूलभूत या प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति ही कठिनता से कर पाता है। इसके विपरीत यदि व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है तथा उसके पास अतिरिक्त धन आ जाता है तो निश्चित रूप से व्यक्ति की आवश्यकताओं में वृद्धि हो जाती है; अर्थात् नित्य नई आवश्यकताएँ उत्पन्न होने लगती हैं। .</p>
<p>3. आवश्यकताएँ और आदत &#8211; बहुत-सी आवश्यकताएँ आदत पर निर्भर करती हैं। एक सिगरेट पीने की आदत वाले व्यक्ति को सिगरेट की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, जिस व्यक्ति को सिगरेट पीने की आदत नहीं होती, उसे सिगरेट की कोई आवश्यकता नहीं होती। आदत का आवश्यकताओं पर बहुत प्रभाव पड़ता है। आवश्यकता पड़ने पर ही व्यक्ति चोरी करता है और वह आदत में बदल जाती है। अतः आवश्यकता और आदत में गहरा सम्बन्ध है।</p>
<p>4. आवश्यकताएँ और संस्कृति &#8211; बहुत-सी आवश्यकताएँ संस्कृति पर निर्भर करती हैं। जिस समाज में जिस प्रकार के नियम व रीति-रिवाज होते हैं, उन्हीं के आधार पर मनुष्यों की आवश्यकताएँ निर्धारित होती हैं। खान-पान, रहन-सहन के आधार पर आवश्यकताओं का अनुभव होता है। जैसी समाज की संस्कृति होती है, उसी के अनुसार सम्बन्धित व्यक्तियों को चलना पड़ता है। यदि व्यक्ति समाज के नियमों के विपरीत चलेगा तो समाज में उसका अपमान तथा बहिष्कार भी हो सकता है। अतः . आवश्यकताएँ संस्कृति से सम्बन्धित होती हैं।</p>
<p>5. आवश्यकताएँ और वातावरण &#8211; वातावरण का भी व्यक्ति की आवश्यकताओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति जैसे वातावरण में रहता है, उसको वैसी ही आवश्यकता महसूस होती है। उदाहरणार्थ—एक रजाई जाड़ों के दिनों में तन ढकने के काम आती है, परन्तु वही रजाई गर्मियों में बेकार है। अत: वातावरण का भी आवश्यकताओं पर प्रभाव पड़ता है। भौतिक वातावरण के अतिरिक्त सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण भी व्यक्ति की आवश्यकताओं के निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।</p>
<p>6. व्यक्ति का जीवन के प्रति दृष्टिकोण &#8211; व्यक्ति की आवश्यकताओं पर उसके जीवनदर्शन का भी प्रभाव पड़ता है। एक भौतिकवादी दृष्टिकोण वाले व्यक्ति की आवश्यकताएँ, अध्यात्मवादी दृष्टिकोण वाले व्यक्ति की आवश्यकताओं से पर्याप्त भिन्न होती हैं।</p>
<p>7. प्रचलन एवं रीति-रिवाज &#8211; सामाजिक प्रचलनों एवं रीति-रिवाजों से भी व्यक्ति की आवश्यकताओं का निर्धारण होता है। बहुत-से व्यक्ति अनेक ऐसी वस्तुएँ खरीदा करते हैं, जो केवल फैशन के लिए ही होती हैं।</p>
<p>8. दिखावा तथा अनुकरण &#8211; दिखावे की प्रवृत्ति मनुष्य की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है। व्यक्ति बहुत-से कार्य केवल इस प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप ही करता है। अच्छी तथा कीमती साड़ी खरीदना, दावतों का आयोजन करना आदि कार्य अनेक बार केवल दिखावे के लिए ही किए जाते हैं। इस रूप में दिखावा भी हमारी आवश्यकताओं को प्रभावित करता है।</p>
<p>दिखावे के अतिरिक्त अनुकरण भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है, जो हमारी आवश्यकताओं को प्रभावित करता है। ऐसा प्रायः देखा या सुना जाता है कि अमुक पड़ोसिन ने रंगीन टी०वी० ले लिया है; अतः हम भी लेंगे। अमुक परिवार के बच्चे कॉन्वेण्ट में पढ़ते हैं, इसलिए हमारे बच्चे भी कॉन्वेण्ट में ही पढ़ेंगे। इस प्रकार अनुकरण की भावना से अनेक आवश्यकताएँ निर्धारित होती हैं।</p>
<p>(नोट-&#8216;परिवार द्वारा आवश्यकताओं की पूर्ति कैसे होती है?&#8217; इस प्रश्न के उत्तर के लिए अध्याय 18 का विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 2 का उत्तर देखें।)</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
भग्नाशा का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। भग्नाशा की उत्पत्ति के कारणों एवं परिस्थितियों का उल्लेख कीजिए।<br />
अथवा<br />
भग्नाशा से आप क्या समझती हैं? अथवा भग्नाशा के कारणों का वर्णन कीजिए।<br />
अथवा<br />
भग्नाशा का क्या आशय है? भग्नाशा उत्पन्न होने के क्या कारण हैं?<br />
उत्तरः<br />
सामान्य रूप से प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में विभिन्न इच्छाओं एवं सम्बन्धित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यथाशक्ति प्रयास किया करता है। अपने प्रयासों से व्यक्ति द्वारा कुछ या अधिकांश आवश्यकताओं को पूरा कर लिया जाता है तथा कुछ आवश्यकताएँ बिना पूरी हुए ही रह जाती हैं या उन्हें प्राप्त करने का प्रयास छोड़ दिया जाता है। इन परिस्थितियों में जीवन सामान्य रूप से चलता रहता है।</p>
<p>इससे भिन्न कुछ व्यक्तियों के जीवन में कुछ परिस्थितियों एवं कारणों के परिणामस्वरूप उनकी अधिकांश इच्छाएँ एवं आवश्यकताएँ पूर्ण नहीं हो पातीं। ऐसे व्यक्तियों के मन में इच्छाएँ भी जाग्रत होती हैं तथा वे सम्बन्धित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यथाशक्ति प्रयास भी करते हैं, परन्तु निरन्तर प्रयास करने के उपरान्त भी उन्हें अभीष्ट सफलता नहीं प्राप्त होती। इस स्थिति में वे निराश होकर प्रयास करना भी छोड़ देते हैं। निराशा की इस स्थिति को ही भग्नाशा या कुण्ठा (frustration) कहा जाता है।</p>
<p>भग्नाशा का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Frustration) &#8211;<br />
शाब्दिक रूप से कहा जा सकता है कि व्यक्ति की आशाओं के भग्न हो जाने के परिणामस्वरूप उत्पन्न मानसिक स्थिति ही भग्नाशा है। व्यक्ति के जीवन में अनेक प्रेरणाएँ निरन्तर रूप से सक्रिय रहा करती हैं। ये प्रेरणाएँ व्यक्ति को सम्बन्धित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयास करने को बाध्य करती हैं तथा व्यक्ति प्रयास करता है। कभी-कभी समस्त प्रयास करने पर भी व्यक्ति अपने उद्देश्य को प्राप्त . करने में असफल ही रहता है। इस निरन्तर असफलता के कारण व्यक्ति को निराशा का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार की निराशा व्यक्ति को तनावग्रस्त बना देती है। निरन्तर रहने वाली निराशा एवं तनाव की स्थिति व्यक्ति को पूर्ण रूप से असन्तुष्ट तथा पराजित बना देती है। यही मानसिक स्थिति भग्नाशा या कुण्ठा कहलाती है।</p>
<p>भग्नाशा को प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मन ने इन शब्दों में परिभाषित किया है &#8211; “भग्नाशा या कुण्ठा जीव की वह अवस्था है, जो किसी प्रेरणात्मक व्यवहार की सन्तुष्टि के कठिन अथवा असम्भव हो जाने के कारण उत्पन्न होती है।&#8221; (&#8220;Frustration is a state of organism resulting when the motivated behaviour is rendered difficult or impossible.&#8221;- N. L. Munn).</p>
<p>कोलमैन ने भी भग्नाशा की स्थिति का स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया है। उसके अनुसार व्यक्ति की प्रेरणाओं के निरन्तर कण्ठित होने से जो आघात की स्थिति उत्पन्न होती है. उसी के परिणामस्वरूप भग्नाशा की मानसिक स्थिति आ जाती है। इस स्थिति के लिए कोलमैन ने मुख्य रूप से दो कारणों को जिम्मेदार माना है। प्रथम कारण को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि यदि व्यक्ति द्वारा निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति के मार्ग में निरन्तर बाधाएँ आती हैं तो एक स्थिति में भग्नाशा उत्पन्न हो सकती है।</p>
<p>द्वितीय कारण को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि यदि व्यक्ति के सम्मुख कोई निश्चित एवं समुचित उद्देश्य ही न हो तो भी क्रमश: भग्नाशा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यह भी कहा जा सकता है कि यदि व्यक्ति के प्रेरकों की सन्तुष्टि नहीं होती तथा उनमें संघर्ष होते हैं, तो भग्नाशा या कुण्ठा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। भग्नाशा का प्रतिकूल प्रभाव व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर पड़ सकता है।</p>
<p>भग्नाशा के कारण एवं परिस्थितियाँ (Causes and Conditions of Frustration) &#8211;<br />
भग्नाशा के उत्पन्न होने के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण एवं परिस्थितियाँ जिम्मेदार होती है &#8211;</p>
<p>1. वस्तु द्वारा उत्पन्न बाधा-अनेक बार वस्तु-विशेष के द्वारा भी भग्नाशा की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उदाहरण के लिए मान लीजिए, व्यक्ति कोई महत्त्वपूर्ण पत्र लिखना चाह रहा हो, परन्तु उस समय उसे पर्याप्त खोज करने पर भी अपना पेन या सम्बन्धित व्यक्ति के घर का पता न मिले, तो निश्चित रूप से व्यक्ति की खीज बढ़ जाती है तथा अन्तत: वह भग्नाशा का शिकार हो सकता है। यह भग्नाशा, वस्तु द्वारा उत्पन्न होने वाली भग्नाशा ही कही जाएगी।</p>
<p>2. व्यक्ति द्वारा उत्पन्न बाधा-यह स्थिति पहली स्थिति से अधिक भयंकर है। यदि हम किसी चुनाव में खड़े होते हैं और विजय प्राप्त करना चाहते हैं, तो बिल्कुल यही इच्छा किसी दूसरे व्यक्ति के मन में भी उत्पन्न हो सकती है और परिणामस्वरूप दो विरोधी पक्ष बन जाते हैं। दूसरे व्यक्ति के द्वारा हमारे मार्ग में उत्पन्न बाधा हमें निराश कर देती है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम स्वयं किसी इच्छा की पूर्ति किसी अन्धविश्वास अथवा किसी दूसरे के कहने के कारण नहीं कर पाते और इस प्रकार निराश होकर रह जाते हैं।</p>
<p>3. दो धनात्मक प्रेरकों का संघर्ष-कभी-कभी एक ही व्यक्ति में दो प्रबल भावनाएँ एक साथ कार्य .करती हैं। एक माँ का बालक उच्च शिक्षार्जन के लिए विदेश जा रहा है। एक ओर माँ की ममता उसे अपने पास रखना चाहती है, पर दूसरी ओर पुत्र के हित की भावना उससे पुत्र को विदेश भेजने का आग्रह करती है। इस स्थिति में दोनों प्रेरकों में से एक चुनना पड़ता है। जिस प्रेरक का मार्ग चुना जाता है, उससे सम्बन्धित क्रियाचक्र पूर्ण हो जाता है, परन्तु दूसरे का अधूरा रह जाता है। यह स्थिति भी भग्नाशा को जन्म दे सकती है।</p>
<p>4. एक धनात्मक एवं एक ऋणात्मक प्रेरक का संघर्ष-जब व्यक्ति में एक धनात्मक प्रेरक उसे आगे ले जाने वाला तथा दूसरा ऋणात्मक प्रेरक (सुस्ती, भय, दूसरों द्वारा आलोचना) परस्पर संघर्ष में आ जाए और व्यक्ति दुविधा में पड़ जाए, तो भी भग्नाशा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसे समय में व्यक्ति अपना मार्ग नहीं चुन पाता है।</p>
<p>5. व्यक्तिगत दोष एवं सीमाएँ-कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति के शारीरिक अथवा मानसिक दोष भी भग्नाशा उत्पन्न कर देते हैं। उदाहरण के लिए दिव्यांग (विकलांग) बालक भाग-दौड़ वाले खेलों से वंचित रह जाता है और आगे चलकर जीवन में अधिक परिश्रम न कर सकने के कारण अपनी आवश्यकता के अनुसार धनोपार्जन नहीं कर सकता। इस प्रकार से शारीरिक दोषों के कारण आवश्यकताओं की पूर्ति न हो पाने की वजह से व्यक्ति कुण्ठित हो जाता है।</p>
<p>6. सामर्थ्य से उच्च आकांक्षाएँ-प्रत्येक व्यक्ति की कुछ आकांक्षाएँ होती हैं। प्रत्येक आकांक्षा को पूरा करने के लिए कुछ-न-कुछ सामर्थ्य की आवश्यकता होती है। यदि व्यक्ति की आकांक्षाएँ इतनी ऊँची हों कि उन्हें पूरा करने के लिए व्यक्ति में सामर्थ्य ही न हो, तो इस स्थिति में मानसिक संघर्ष के प्रबल हो जाने पर भग्नाशा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।</p>
<p>7. नैतिक परिस्थितियाँ-कुछ नैतिक परिस्थितियाँ एवं सम्बन्धित नैतिक मानदण्ड भी व्यक्ति के जीवन में भग्नाशा या कुण्ठा को जन्म देते हैं। उदाहरण के लिए प्रत्येक समाज में यौन सम्बन्धों के सन्दर्भ में कुछ नैतिक पूर्व-धारणाएँ प्रचलित होती हैं। इन नैतिक मान्यताओं से प्रभावित एवं बाध्य होकर अनेक बार व्यक्ति निराश एवं हताश हो जाते हैं तथा यही निराशा भग्नाशा या कुण्ठा को जन्म देती है।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 17 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
व्यक्ति के जीवन में आवश्यकताओं के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।<br />
उत्तरः<br />
जीवन में आवश्यकताओं का महत्त्व &#8211;<br />
व्यक्ति के जीवन में आवश्यकताओं का अत्यधिक महत्त्व होता है। वास्तव में व्यक्ति के जीवन के संचालन में उसकी आवश्यकताओं के द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती है। जीवन का सुचारु संचालन वास्तव में व्यक्ति की आवश्यकताओं के ही माध्यम से होता है। व्यक्ति अनवरत रूप से विभिन्न आवश्यकताओं को अनुभव करता है, अनुभव की गई आवश्यकताओं की प्राथमिकता को निर्धारित करता है तथा तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यथासम्भव प्रयास करता है।</p>
<p>समुचित प्रयासों द्वारा वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति से व्यक्ति को एक प्रकार के सुख एवं सन्तोष की प्राप्ति होती है। इसके साथ-साथ व्यक्ति कुछ अन्य इच्छाओं को आवश्यकता की श्रेणी में सम्मिलित कर लेता है तथा उनकी पूर्ति के लिए प्रयत्नशील हो जाता है। इस प्रकार व्यक्ति का जीवन अग्रसर होता रहता है। आवश्यकताओं के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि &#8216;आवश्यकताओं का जन्म जीवन के अस्तित्व व सुख के लिए होता है।&#8217;</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
आवश्यकताओं की पूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले अथवा बाधक कारकों का उल्लेख कीजिए।<br />
अथवा<br />
मनुष्य की आवश्यकताएँ किन कारणों से अपूर्ण रह जाती हैं?<br />
उत्तरः<br />
आवश्यकताओं की पूर्ति में बाधक कारक &#8211;<br />
मनुष्य की आवश्यकताएँ असंख्य होती हैं तथा सभी आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो पातीं। वास्तव में मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के मार्ग में अनेक बाधाएँ उत्पन्न हुआ करती हैं। यह भी कहा जा सकता है कि मानवीय आवश्यकताओं को विभिन्न कारक प्रभावित करते हैं। इस प्रकार के कुछ कारकों का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है &#8211;</p>
<p>1. निर्धनता अथवा आर्थिक कारक-व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति के मार्ग में प्रमुख बाधक कारक है धन की कमी या निर्धनता। धनाभाव के कारण मनुष्य अपनी अनिवार्य आवश्यकता को जब पूरा नहीं कर पाता है तो वह समाज का शत्रु बन जाता है। जब उसे भोजन नहीं मिलेगा तो वह चोरी करेगा, लड़ाई-झगड़े करेगा, दूसरे से धन छीनने का प्रयत्न करेगा। गरीब मनुष्य को रिश्तेदार भी हीनता की दृष्टि से देखते हैं। ऐसी अवस्था में व्यक्ति समाज-विरोधी भी बन सकता है।</p>
<p>2. समाज-मनुष्य समाज में रहकर ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। यदि समाज के विभिन्न वर्गों में परस्पर सहयोग की भावना होगी तो आवश्यकताओं की पूर्ति भी सुचारु रूप से होती रहेगी। यदि समाज के विभिन्न वर्ग एक-दूसरे के प्रति विरोधी भावना रखेंगे तो आवश्यकताओं की पूर्ति में बाधा पड़ेगी। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले कारकों में समाज का महत्त्वपूर्ण स्थान है।</p>
<p>3. अज्ञान-विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सम्बन्धित ज्ञान की भी आवश्यकता होती है। समुचित ज्ञान के अभाव की स्थिति में आवश्यकताओं की पूर्ति प्राय: सम्भव नहीं हो पाती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि अज्ञान भी आवश्यकताओं की पूर्ति के मार्ग में एक बाधा है।</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
निरन्तर बनी रहने वाली भग्नाशा की स्थिति के परिणामों का उल्लेख कीजिए। अथवा टिप्पणी लिखिए-भग्नाशा के परिणाम।<br />
उत्तरः<br />
भग्नाशा के परिणाम निरन्तर बनी रहने वाली भग्नाशा का व्यक्ति के जीवन पर गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। वास्तव में यदि व्यक्ति भग्नाशा का शिकार हो तो उसके जीवन में विभिन्न प्रेरणाओं का कोई महत्त्व नहीं रह जाता; अर्थात् उस व्यक्ति के लिए प्रेरणाएँ निरर्थक हो जाती हैं। इस स्थिति में व्यक्ति किसी भी कार्य को करने के लिए प्रेरित नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपने जीवन को सुचारु रूप से नहीं चला पाता; क्योंकि वह जीवन की सामान्य गतिविधियों को पूरा नहीं कर पाता। व्यक्ति अपने जीवन में हर प्रकार से अभावग्रस्त होने लगता है। उसे सुख, सन्तोष एवं आनन्द की कदापि प्राप्ति नहीं हो पाती। वह न तो उन्नति ही कर पाता है और न ही प्रगति। भग्नाशाग्रस्त व्यक्ति प्रायः निराश, हताश एवं उदासीन बना रहता है। निरन्तर भग्नाशा की स्थिति बनी रहने पर विभिन्न मानसिक रोग हो जाने की भी आशंका रहती है। यही नहीं, प्रबल भग्नाशाग्रस्त व्यक्ति आत्महत्या तक कर सकता है।</p>
<p>प्रश्न 4.<br />
भग्नाशा की स्थिति से छुटकारा पाने के लिए उपयोगी सुझाव दीजिए।<br />
उत्तरः<br />
भग्नाशा से छुटकारा पाने के उपयोगी सुझाव &#8211;<br />
भग्नाशा को दूर करने के लिए इसको जन्म देने वाले शारीरिक, सामाजिक व मानसिक कारणों को दूर करना आवश्यक है। भग्नाशाग्रस्त व्यक्ति के साथ समाज का व्यवहार कोमल तथा सौहार्दपूर्ण होना चाहिए और उसकी समस्याओं पर सहानुभूति से विचार करना चाहिए। स्वयं व्यक्ति को भी अपने मन में हीनता की भावना नहीं लानी चाहिए और असन्तोष का परित्याग करते हुए जीवनयापन करना चाहिए। किसी प्रबल प्रेरक को जीवन में स्थान देकर भी भग्नाशा से बचा जा सकता है। भग्नाशा के शिकार हुए व्यक्ति के मित्रों, परिवार के सदस्यों तथा अन्य सम्बन्धित व्यक्तियों का यह कर्त्तव्य होता है कि वे उसे प्रोत्साहित करें तथा जीवन की यथार्थता के प्रति अनुकूल दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करें।</p>
<p>एक बार प्रबल प्रेरणा प्राप्त हो जाने पर भग्नाशा से मुक्त होना सरल हो जाता है। कुशल निर्देशन एवं परामर्श द्वारा भी भग्नाशा से मुक्त हो सकते हैं। भग्नाशा के शिकार व्यक्ति को सुझाव देना चाहिए कि उसका जीवन उसके लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है तथा उसे जीवन में अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य करने हैं। भग्नाशा के शिकार व्यक्ति के सम्मुख उन महान व्यक्तियों के उदाहरण प्रस्तुत किए जाने चाहिए, जिन्होंने अपने स्वयं के प्रयासों, परिश्रम एवं आत्म-विश्वास के बल पर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। यदि कुण्ठित व्यक्ति में एक बार आत्म-विश्वास जाग्रत हो जाए तो वह शीघ्र ही भग्नाशा से मुक्त हो सकता है।</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
वे कौन-सी विभिन्न आवश्यकताएँ हैं जिनकी बाल्यकाल में पूर्ति न होने के कारण किशोरावस्था में भग्नाशा तथा असामंजस्य उत्पन्न हो जाता है? कारण सहित समझाइए।।<br />
अथवा<br />
वे कौन-सी आवश्यकताएँ हैं जिनकी पूर्ति न होने पर बच्चों में भग्नाशा उत्पन्न हो जाती है?<br />
उत्तरः<br />
प्रत्येक बालक की अनेक ऐसी आवश्यकताएँ होती हैं जो कि उसके बाल्य जीवन में पूर्ण नहीं होती हैं; अतः किशोरावस्था एवं भावी जीवन में उसे भग्नाशा का शिकार होना पड़ता है। बालक की इस प्रकार की मुख्य आवश्यकताएँ निम्नलिखित हैं-</p>
<p>1. उचित पालन-पोषण की आवश्यकता &#8211; यदि किसी बालक को खाने के लिए उचित भोजन तथा पहनने के लिए उचित वस्त्र नहीं मिलेंगे तो वह चिड़चिड़े स्वभाव का बन जाता है तथा आगे चलकर जब उसकी किशोरावस्था आती है तो वह समाज के साथ प्रायः सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता। उसका व्यवहार असामान्य हो जाता है तथा वह अनेक बार प्रबल भग्नाशा का शिकार हो जाता है।</p>
<p>2. माता-पिता के प्यार और संरक्षण की आवश्यकता &#8211; यदि किसी बच्चे को बचपन में माता-पिता का प्यार नहीं मिलता तो वह किशोरावस्था में अपने माता-पिता के प्रति बिल्कुल भी कर्तव्यपरायण नहीं रहता है तथा उनको घृणा की दृष्टि से देखता है। इस प्रकार का अभावग्रस्त किशोर भी प्राय: असामान्य एवं कुण्ठित व्यक्तित्व वाला बन जाता है।</p>
<p>3. यौन-शिक्षा की आवश्यकता &#8211; प्रत्येक व्यक्ति में बचपन से ही यौनेच्छाएँ विद्यमान रहती हैं। यदि बाल्यावस्था से ही उसे उचित यौन शिक्षा नहीं दी जाती है तो वह अनावश्यक व अनैतिक प्रकार के कार्य करने लगता है तथा अपने रास्ते से हटकर, नैतिकता से पतन की दिशा में अग्रसर हो जाता है। स्पष्ट है कि समुचित यौन-शिक्षा के अभाव में व्यक्ति भग्नाशा का शिकार हो सकता है तथा उसका व्यवहार असामान्य हो सकता है।</p>
<p>4. जिज्ञासा और संवेगात्मक भावनाओं की पूर्ति की आवश्यकता &#8211; प्रत्येक व्यक्ति में बचपन से ही जिज्ञासा प्रबल होती है। वह यह जानने की पूर्ण कोशिश करता है कि अमुक कार्य कैसे और क्यों किया जा रहा है। अगर उसकी जिज्ञासा प्रवृत्ति प्रारम्भ से ही दबा दी जाती है तो निश्चय ही वह भग्नाशा का शिकार हो जाता है। अत: प्रत्येक बालक की जिज्ञासा तथा संवेगात्मक भावनाओं की पूर्ति का होना नितान्त आवश्यक है।</p>
<p>5. उचित नियन्त्रण की आवश्यकता &#8211; प्रत्येक बालक का प्रारम्भ से ही कोमल मस्तिष्क होता है। प्रत्येक बात का प्रभाव उसके मस्तिष्क पर तुरन्त पड़ता है। अगर बालक कोई गलती करता है तो उसे समझा-बुझाकर किसी कार्य को करने के लिए कहना चाहिए। अगर इस बात के स्थान पर उसे मार-पीटकर समझाने की कोशिश की जाएगी तो वह किशोरावस्था में जाकर बिगड़ जाएगा। अत: बाल्यकाल में बालक पर उचित नियन्त्रण की परम आवश्यकता है।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 17  अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>प्रश्न 1.<br />
&#8216;आवश्यकता&#8217; की एक सरल एवं स्पष्ट परिभाषा लिखिए।<br />
उत्तरः<br />
&#8220;आवश्यकता व्यक्ति की उस इच्छा को कहते हैं जिसकी पूर्ति के लिए उसके पास पर्याप्त साधन हों और वह उन साधनों को उस इच्छा की पूर्ति हेतु लगाने को तत्पर हो।&#8221; &#8211; (पैन्सन)</p>
<p>प्रश्न 2.<br />
मुख्य मानवीय आवश्यकताएँ कौन-कौन सी हैं? अथवा मनुष्य की मूल आवश्यकताएँ कौन-कौन सी हैं?<br />
उत्तरः<br />
मनुष्य की मुख्य (मूल) आवश्यकताएँ हैं &#8211; क्रमशः पर्याप्त तथा सन्तुलित भोजन, समुचित वस्त्र, समुचित आवास-व्यवस्था, बच्चों के लिए शिक्षा-व्यवस्था, स्वास्थ्य-रक्षा तथा चिकित्सा सुविधा, मनोरंजन के साधन तथा बच्चों की देखभाल।</p>
<p>प्रश्न 3.<br />
मानवीय आवश्यकताओं की चार मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।<br />
उत्तरः</p>
<ol>
<li>आवश्यकताएँ असीमित होती हैं।</li>
<li>आवश्यकताएँ बार-बार उत्पन्न होती हैं।</li>
<li>आवश्यकताओं में प्रतियोगिता होती है।</li>
<li>आवश्यकताएँ ज्ञान की वृद्धि के साथ-साथ बढ़ती हैं।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 4.<br />
आवश्यकताओं की पूर्ति में बाधा पड़ने से मनुष्य समाज विरोधी क्यों हो जाता है? उदाहरण दीजिए।<br />
उत्तरः<br />
यदि अत्यधिक प्रयास करने पर भी व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाता तथा उसे विभिन्न बाधाओं का सामना करना पड़ता है तो वह इसके लिए समाज को जिम्मेदार मानने लगता है तथा उसका व्यवहार प्रायः समाज विरोधी हो जाता है। उदाहरण के लिए जीविका-उपार्जन न कर पाने वाला व्यक्ति चोरी कर सकता है।</p>
<p>प्रश्न 5.<br />
भग्नाशा से क्या आशय है?<br />
उत्तरः<br />
व्यक्ति की आशाओं के भग्न हो जाने के परिणामस्वरूप उत्पन्न मानसिक स्थिति को भग्नाशा कहते हैं।</p>
<p>प्रश्न 6.<br />
भग्नाशा के दो कारण लिखिए।<br />
उत्तरः</p>
<ol>
<li>अधिकांश इच्छाओं एवं आवश्यकताओं का पूर्ण न होना।</li>
<li>जीवन में प्रेरणाओं का अभाव होना।</li>
</ol>
<p>प्रश्न 7.<br />
निरन्तर भग्नाशा की स्थिति का व्यक्ति के व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ता है?<br />
उत्तरः<br />
निरन्तर भग्नाशा की स्थिति बनी रहने से व्यक्ति का व्यक्तित्व विघटित हो जाता है।</p>
<p>प्रश्न 8.<br />
व्यक्तियों में भग्नाशा उत्पन्न करने वाले सामान्य प्राकृतिक कारक बताइए।<br />
उत्तरः<br />
व्यक्तियों में भग्नाशा उत्पन्न करने वाले सामान्य प्राकृतिक कारक हैं-भूकम्प, बाढ़ अथवा सूखा तथा महामारी आदि प्राकृतिक आपदाएँ।</p>
<p>प्रश्न 9.<br />
भग्नाशा की स्थिति से मुक्त होने का सर्वोत्तम उपाय क्या है?<br />
उत्तरः<br />
भग्नाशा की स्थिति से मुक्त होने का सर्वोत्तम उपाय है—किसी प्रबल प्रेरणा को उत्पन्न करना।</p>
<p>प्रश्न 10.<br />
बच्चों को भग्नाशा से कैसे बचाया जा सकता है?<br />
उत्तरः<br />
उचित परामर्श द्वारा बच्चों को भग्नाशा से बचाया जा सकता है।</p>
<p><strong>UP Board Class 11 Home Science Chapter 17 बहविकल्पीय प्रश्नोत्तर</strong></p>
<p>निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए &#8211;<br />
1. आवश्यकता व्यक्ति की वह इच्छा है, जिसकी पूर्ति के लिए उसके पास पर्याप्त होने चाहिए &#8211;<br />
(क) धन<br />
(ख) साधन<br />
(ग) प्रतिष्ठा<br />
(घ) बचत।<br />
उत्तरः<br />
(ख) साधना</p>
<p>2. परिवार की सर्वाधिक अनिवार्य आवश्यकता है &#8211;<br />
(क) भव्य भवन<br />
(ख) भोजन<br />
(ग) मोटर कार<br />
(घ) ये सभी।<br />
उत्तरः<br />
(ख) भोजन।</p>
<p>3. मनुष्य की आवश्यक आवश्यकता क्या है &#8211;<br />
(क) टी० वी०<br />
(ख) भोजन<br />
(ग) पढ़ाई<br />
(घ) मनोरंजन।<br />
उत्तरः<br />
(ख) भोजन।</p>
<p>4. मानव की मूलभूत आवश्यकताएँ कौन-कौन सी हैं &#8211;<br />
(क) मनोरंजन<br />
(ख) घूमना<br />
(ग) रोटी, कपड़ा और मकान<br />
(घ) व्यायाम।<br />
उत्तरः<br />
(ग) रोटी, कपड़ा और मकान।</p>
<p>5. व्यक्ति की गौण आवश्यकता माना जाता है &#8211;<br />
(क) सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार<br />
(ख) प्राकृतिक कारकों से रक्षा करने वाले वस्त्र<br />
(ग) भव्य भवन एवं कीमती गहने<br />
(घ) शिक्षा एवं स्वास्थ्य रक्षा।<br />
उत्तरः<br />
(ग) भव्य भवन एवं कीमती गहने।</p>
<p>6. एक से अधिक कारें, भव्य भवन तथा बहुमूल्य गहने किस वर्ग की आवश्यकताएँ हैं &#8211;<br />
(क) प्राथमिक आवश्यकता<br />
(ख) आरामदायक आवश्यकता<br />
(ग) विलासात्मक आवश्यकता<br />
(घ) अनावश्यक आवश्यकता।<br />
उत्तरः<br />
(ग) विलासात्मक आवश्यकता।</p>
<p>7. भग्नाशा को समाप्त किया जा सकता है &#8211;<br />
(क) विवाह करके<br />
(ख) औषधियों द्वारा<br />
(ग) पर्याप्त धन उपलब्ध कराकर<br />
(घ) प्रबल प्रेरणा द्वारा।<br />
उत्तरः<br />
(घ) प्रबल प्रेरणा द्वारा।</p>
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