UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 10 (Section 1)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 10 भारत में यूरोपीय शक्तियों का आगमन एवं प्रसार (अनुभाग – एक)

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में आने वाली यूरोपीय शक्तियों की व्यापारिक तथा राजनीतिक गतिविधियों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
          या
भारत में किन यूरोपीय देशों ने प्रभुत्व स्थापित किया ?
          या
भारत में पुर्तगाली शक्ति के उत्थान और पतन का विवरण दीजिए।
उत्तर :
भारत में यूरोपीय शक्तियों का आगमन व्यापार के लिए हुआ था, किन्तु बाद में उन्होंने भारत में केन्द्रीय शक्ति के अभाव तथा इससे उपजी राजनीतिक अस्थिरता तथा दुर्बलता का लाभ उठाकर अपने उपनिवेश स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। इन देशों में पुर्तगाल, हॉलैण्ड, इंग्लैण्ड तथा फ्रांस सम्मिलित थे।

1. पुर्तगाल – सर्वप्रथम भारत में पुर्तगाली आये और उन्होंने गोआ, दमन व दीव, सूरत बेसिन, सालसेट बम्बई (मुम्बई) आदि स्थानों पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लिया। उन्होंने स्थानीय भारतीयों को ईसाई बनाने का बहुत (UPBoardSolutions.com) प्रयत्न किया। वे भारतीयों के साथ व्यापारिक समझौतों का भी पालन नहीं करते थे। इसलिए उनकी सफलता अधिक समय तक टिकी नहीं रह सकी। पुर्तगाल के 1580 ई० में स्पेन के साथ विलय से उसका पृथक् अस्तित्व समाप्त हो गया। सन् 1588 ई० में स्पेन के जहाजी बेड़े आरमेडा को इंग्लैण्ड द्वारा पराजित कर दिये जाने के पश्चात् एशिया के व्यापार पर पुर्तगाल का अधिकार समाप्त हो गया और इंग्लैण्ड तथा हॉलैण्ड इस व्यापार पर अपना प्रभाव स्थापित कर सके। पुर्तगालियों का प्रभाव केवल पश्चिमी समुद्र तट तक ही सीमित रह गया।

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2. हॉलैण्ड – सन् 1595 ई० में कार्नीलियस हाउटमैन नामक डच व्यापारी भारत पहुँचा तथा 1597 ई० में बहुत-सा माल लेकर ऐम्स्टर्डम (हॉलैण्ड) वापस लौटा। उसकी यात्री ने डचों के लिए भारत से व्यापार करने का मार्ग खोल दिया। सन् 1602 ई० में डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना हुई। डच कम्पनी का मुख्य उद्देश्य व्यापार करना था। इसलिए उन्होंने सबसे पहले मसालों के द्वीपों (जावा, सुमात्रा, बोर्नियो आदि) पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। फिर डचों ने भारत में अनेक स्थानों पर पुर्तगालियों को हराकर सूरत, चिनसुरा, कासिम बाजार, नेगापट्टम, कालीकट आदि स्थानों पर अपनी बस्तियाँ स्थापित कीं। अन्त में 1759 ई० में अंग्रेजों ने डचों को पराजित कर भारत में डच कम्पनी के प्रभाव का अन्त कर दिया।

3. इंग्लैण्ड – लन्दन के कुछ व्यापारियों की एक कम्पनी को 31 दिसम्बर, 1600 ई० को पूर्वी देशों से व्यापार करने का एकाधिकार (चार्टर) प्रदान किया गया। यही कम्पनी आगे चलकर ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के नाम से प्रसिद्ध हुई। सन् 1690 ई० में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने तीन हजार रुपये वार्षिक कर देकर बंगाल में व्यापार करना स्वीकार किया। सन् 1715 ई० में कम्पनी के एक शिष्टमण्डल ने जॉन सरमन की (UPBoardSolutions.com) अध्यक्षता में मुगल सम्राट से भेंट की और उससे व्यापारिक सुविधाओं के लिए एक शाही फरमान (आदेश) प्राप्त किया। इस फरमान के फलस्वरूप अंग्रेजों को बंगाल में व्यापारिक करों तथा चुंगी की छूट मिल गयी। सन् 1717 ई० में अंग्रेजों ने इस छूट का लाभ निजी व्यापार के लिए उठाना शुरू कर दिया। यही 1757 ई० में अंग्रेजों तथा बंगाल के नवाब के झगड़े का भी प्रमुख कारण बना।

4. फ्रांस – फ्रांसीसी ईस्ट इण्डिया कम्पनी 1664 ई० में स्थापित हुई। इस कम्पनी ने भारत में सूरत (1668 ई०) और पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) में 1669 ई० में अपनी बस्तियाँ स्थापित कीं। बंगाल में चन्द्रनगर (1690-92 ई०) नामक स्थान पर फ्रांसीसियों ने अपना व्यापारिक केन्द्र स्थापित किया। बाद में माही (1725 ई०) तथा कराईकल पर फ्रांसीसियों का प्रभुत्व स्थापित हो गया। भारत में राजनीतिक सत्ता की स्थापना में मुख्य संघर्ष अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच हुआ। इस संघर्ष की मुख्य कड़ी कर्नाटक के युद्ध थे। इन युद्धों में अन्तिम विजय अंग्रेजों को मिली और भारत में फ्रांसीसी शक्ति का सूर्यास्त हो गया।

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प्रश्न 2.
भारत में राजनीतिक सत्ता की स्थापना हेतु अंग्रेज और फ्रांसीसियों के बीच संघर्ष का वर्णन कीजिए तथा इसके परिणाम लिखिए।
          या
कर्नाटक युद्धों का संक्षेप में वर्णन कीजिए। इनके क्या परिणाम हुए ?
उत्तर :
अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों के मध्य भारत में राजनीतिक सत्ता की स्थापना के लिए मुख्यतः कर्नाटक में युद्ध हुए। इन युद्धों को ‘कर्नाटक युद्धों के नाम से जाना जाता है। सन् 1742 ई० में कर्नाटक के नवाब सफदर अली के चचेरे भाई मुर्तजा अली ने उसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचकर उसकी हत्या कर दी और गद्दी पर कब्जा कर लिया। लेकिन अर्कोट की जनता ने मुर्तजा अली का स्वागत नहीं किया और विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया (UPBoardSolutions.com) तथा सफदर अली के एक नाबालिग पुत्र सैयद मुहम्मद को कर्नाटक की गद्दी पर बैठा : दिया। जब किसी ने उस नाबालिग की भी हत्या कर दी तो निजाम ने अनवरुद्दीन को कर्नाटक का नवाब घोषित कर दिया। इसी भूमिका में अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों के मध्य संघर्ष आरम्भ हो गया। इन दोनों में तीन युद्ध हुए।

कर्नाटक का प्रथम युद्ध (सन् 1744-48 ई०)

कर्नाटक के प्रथम युद्ध में अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों के बीच व्यापारिक प्रतिस्पर्धा की प्रमुख भूमिका थी। इस युद्ध का दूसरा मुख्य कारण 1740 ई० में ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार के प्रश्न पर इंग्लैण्ड तथा फ्रांस का परस्पर संघर्षरत होना था। यूरोप में ऑस्ट्रिया के युद्ध के साथ-साथ भारत में भी इन दोनों शक्तियों के मध्य युद्ध आरम्भ हो गया। युद्ध के प्रारम्भ में फ्रांसीसियों ने अंग्रेजी बेड़े को पराजित किया, फिर मद्रास (चेन्नई) पर घेरा डाल दिया तथा कर्नाटक के नवाब को मद्रास देने का वादा करके अपनी ओर मिला लिया। सन् 1746 ई० में फ्रांस ने मद्रास पर अधिकार कर लिया, किन्तु सन्धि के अनुसार नवाब को मद्रास देने से इन्कार कर दिया। इस पर नवाब और डूप्ले (फ्रांसीसियों) में संघर्ष छिड़ गया। सेण्ट थॉमस (अड्यार) नामक स्थान पर भारतीय सेना पराजित हो गयी। इसके बाद डूप्ले ने फोर्ट सेण्ट डेविड किले पर आक्रमण किया, किन्तु अंग्रेज अफसर लॉरेन्स की रणकुशलता के कारण वह सफल न हो सका। इसके प्रत्युत्तर में अंग्रेजों ने पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) (UPBoardSolutions.com) जीतने का असफल प्रयास किया। सन् 1748 ई० में यूरोप में फ्रांस और इंग्लैण्ड में सन्धि होने के साथ भारत में भी दोनों के मध्य युद्ध बन्द हो गया। फ्रांस ने मद्रास (चेन्नई) अंग्रेजों को वापस लौटा दिया। प्रथम कर्नाटक युद्ध से भारत में फ्रांसीसियों की धाक जम गयी। डूप्ले अब खुलकर भारत की राजनीति में हस्तक्षेप करने लगा।

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कर्नाटक का द्वितीय युद्ध (सन् 1749-54 ई०)

अंग्रेज और फ्रांसीसी एक-दूसरे की शक्ति को नष्ट करना चाहते थे। सन् 1748 ई० में हैदराबाद के निजाम आसफशाह की मृत्यु होने पर उसके पुत्र मुजफ्फरजंग और दूसरे पुत्र नासिरजंग के मध्य उत्तराधिकार का युद्ध आरम्भ हो गया। इसी समय कर्नाटक में भी नवाब अनवरुद्दीन तथा भूतपूर्व नवाब दोस्त अली के दामाद चाँदा साहब के मध्य संघर्ष आरम्भ हो गया। तंजौर में राजा प्रतापसिंह से फ्रांसीसी गवर्नर ड्यूमा ने कराईकल की बस्ती प्राप्त की थी, जिससे अंग्रेज बहुत रुष्ट थे। अत: उन्होंने प्रतापसिंह के स्थान पर शाहजी को सहायता देकर उसे तंजौर की गद्दी पर बिठा दिया। बाद में धन के लालच में दूसरे पक्ष का समर्थन भी किया। डूप्ले, मुजफ्फरजंग और चाँदा साहब तीनों ने मिलकर कर्नाटक पर आक्रमण किया, जिसमें नवाब मारा गया। चाँदा साहब को कर्नाटक का नवाब बनाया गया। चाँदा साहब ने डूप्ले को पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) के निकट 80 गाँव जागीर में दिये।

हैदराबाद पर आक्रमण करके डूप्ले ने नासिरजंग को परास्त किया और उसके प्रथम पुत्र मुजफ्फरजंग को नवाब बनाया। मुजफ्फरजंग ने भी डूप्ले को एक जागीर प्रदान की। सन् 1751 ई० में अंग्रेजों ने मृतक निजाम असफशाह के तृतीय पुत्र सलावतजंग को गद्दी पर बैठा दिया।

चाँदा साहब ने फ्रांसीसी सेनाओं की सहायता से त्रिचनापल्ली पर घेरा डाल दिया, जहाँ कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन का पौत्र मुहम्मद अली छिपा था। इस पर अंग्रेज सेनापति क्लाइव ने चाँदा साहब की राजधानी अर्काट पर अधिकार कर लिया और उसके बाद क्लाइव ने त्रिचनापल्ली पर आक्रमण कर दिया। इस भीषण युद्ध में चाँदा साहब की मृत्यु हो गयी। क्लाइव ने मुहम्मद अली को कर्नाटक का नवाब बना दिया। जनवरी, (UPBoardSolutions.com) 1755 ई० में दोनों पक्षों में युद्ध विराम हो गया। पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) की सन्धि के अनुसार दोनों पक्षों (फ्रांस तथा इंग्लैण्ड) ने देशी राजाओं के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का निर्णय लिया और मुगल सम्राट द्वारा प्रदत्त अधिकारों को त्याग दिया। मद्रास (चेन्नई), फोर्ट सेण्ट डेविड तथा देवी कोटा पर अंग्रेजों का अधिकार मान लिया गया।

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कर्नाटक का तृतीय युद्ध (सन् 1756-63 ई०)

सन् 1754 ई० में डूप्ले के वापस लौटने के बाद फ्रांसीसी कम्पनी की आर्थिक दशा शोचनीय होती चली गयी। सन् 1756 ई० में यूरोप में फ्रांस तथा इंग्लैण्ड के बीच सप्तवर्षीय युद्ध आरम्भ हो गया। अत: भारत में भी दोनों पक्ष युद्ध की तैयारियों में लग गये।

अप्रैल, 1758 ई० में फ्रांसीसी सरकार ने काउण्ट डी-लैली को गवर्नर तथा प्रधान सेनापति बनाकर भारत भेजा। उसने मद्रास (चेन्नई) पर घेरा डाल दिया। सन् 1760 ई० में लैली ने अंग्रेजों के सेण्ट डेविड फोर्ट पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में ले लिया। किन्तु 1760 ई० में वाण्डेवाश के युद्ध में अंग्रेज सेनापति आयरकूट ने फ्रांसीसी सेना को परास्त कर दिया। इसके बाद अंग्रेजों ने कराईकल पर अधिकार कर लिया और 1761 ई० में पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) पर घेरा डाल दिया। आंशिक युद्ध के बाद लैली ने आत्मसमर्पण कर दिया और पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। (UPBoardSolutions.com) सन् 1763 ई० की पेरिस सन्धि के साथ ही कर्नाटक के तीसरे युद्ध का अन्त हो गया। पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी), माही तथा चन्द्रनगर के बन्दरगाह फ्रांस को लौटा दिये गये। हैदराबाद का निजाम और कर्नाटक का नवाब अंग्रेजों के प्रभाव में आ गये तथा सम्पूर्ण दक्षिण भारत पर अंग्रेजों का प्रभुत्व स्थापित हो गया।

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प्रश्न 3
भारत में अंग्रेजों की सफलता और फ्रांसीसियों की असफलताओं के कारणों का वर्णन कीजिए। [2011]
उत्तर :
अंग्रेजों के विरुद्ध फ्रांसीसियों की पराजय के निम्नलिखित कारण थे

1. व्यापार की शोचनीय दशा – फ्रांसीसी व्यापार की थति अंग्रेजी व्यापार की तुलना में बहुत शोचनीय थी। अंग्रेजों का अकेले बम्बई (मुम्बई) में ही इतना विस्तृत व्यापार था कि कई फ्रांसीसी बस्तियों का व्यापार मिलकर भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता था। अंग्रेज व्यापारियों ने कभी भी व्यापार की उपेक्षा नहीं की, क्योंकि वे सोचते थे कि इसी के माध्यम से भारत में धीरे-धीरे पैर जमाना सम्भव है। इसलिए अंग्रेजों की आर्थिक स्थिति बहुत सुदृढ़ थी।

2. दुर्बल सामुद्रिक शक्ति – इंग्लैण्ड विश्व में सामुद्रिक शक्ति के मामले में अजेय था, जबकि फ्रांसीसियों ने सामुद्रिक शक्ति को विशेष महत्त्व नहीं दिया। इस कारण भी फ्रांसीसियों की पराजय हुई। फ्रांसीसी इतिहासकार मार्टिन ने लिखा है, “नौशक्ति की दुर्बलता ही वह प्रधान कारण थी, जिसने डूप्ले की सफलता का विरोध किया।” इसके विपरीत, अंग्रेजों की सामुद्रिक स्थिति इतनी सुदृढ़ थी कि वे आवश्यकतानुसार कर्नाटक में यूरोप से अंग्रेजी सेनाएँ तथा बंगाल से रसद आदि भेज सकते थे। लेकिन फ्रांसीसियों को ऐसी सुविधा प्राप्त न थी।

3. फ्रांसीसी कम्पनी पर सरकारी नियन्त्रण – अंग्रेजी कम्पनी एक व्यक्तिगत कम्पनी थी और उसकी आर्थिक स्थिति बहुत सुदृढ़ थी, जबकि फ्रांसीसी कम्पनी एक सरकारी कम्पनी थी। इस कारण अपनी सहायता के लिए फ्रांसीसी सरकार पर (UPBoardSolutions.com) आश्रित रहना पड़ता था और फ्रांसीसी सरकार समय पर आर्थिक सहायता नहीं दे पाती थी।

4. फ्रांसीसियों में एकता का अभाव – ईस्ट इण्डिया कम्पनी के भारतीय उच्चाधिकारी उच्चकोटि के राजनीतिज्ञ और कुशल प्रशासक थे। फ्रांसीसी कम्पनी के डूप्ले, बुसी, लैली आदि में यद्यपि अनेक गुण थे फिर भी वे अंग्रेजों के समकक्ष कुशल राजनीतिज्ञ न थे। उनमें अंग्रेज राजनीतिज्ञों क्लाइव और लॉरेंस जैसे कुशल संगठनकर्ताओं के समान कार्यक्षमता न थी। इन अधिकारियों में आपस में एकता की भावना भी नहीं थी। इस प्रकार, एकता और संगठन के अभाव के कारण फ्रांसीसियों को असफलता ही प्राप्त हुई।

5. योग्य सेनापतियों का अभाव – फ्रांसीसी सेना में योग्य सेनापतियों का अभाव था। फ्रांसीसी सेनापति अयोग्य और रण-विद्या में अकुशल थे। इन्हें फ्रांस के मान-सम्मान की कोई चिन्ता नहीं रहती थी। इसके अतिरिक्त, अस्त्र-शस्त्रों का भी फ्रांसीसियों के पास सदैव अभाव बना रहता था।

6. डूप्ले द्वारा अपनी असफलताओं को छिपाना – डूप्ले भारत में व्यापार की उन्नति का उद्देश्य लेकर आया था। यहाँ आकर उसने फ्रांसीसी साम्राज्य की स्थापना का विचार बना लिया, लेकिन इसे विचार से उसने फ्रांसीसी सरकार और उच्च अधिकारियों को अवगत नहीं कराया। यहाँ तक कि जब उसे अपने सीमित साधनों के कारण सफलता प्राप्त नहीं हुई तब उसने सरकार को सूचना नहीं दी। वास्तव में, यह डूप्ले की भयंकर भूल थी जिसके कारण फ्रांसीसियों की असफलता निश्चित हो गई।

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7. डूप्ले की फ्रांस वापसी – यह फ्रांसीसी सरकार का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि उसने डूप्ले के विचारों को जानने या सम्मान देने की आवश्यकता अनुभव नहीं की और उसे ऐसे समय में फ्रांस बुला लिया, जबकि भारत में उसकी अत्यन्त आवश्यकता थी। यदि वह कुछ समय तक रहता और फ्रांसीसी : सरकार से उसे पर्याप्त सहायता मिलती तो वह भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य की सत्ता स्थापित करने में सफल हो सकता था।

8. भारतीय नरेशों की मित्रता से हानि – डुप्ले को चाँदा साहब की मित्रता से कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ। चाँदा साहब ने उसकी इच्छा के अनुसार समयानुकूल त्रिचनापल्ली पर चढ़ाई नहीं की और तंजौर की धनराशि प्राप्त करने के लिए ही संघर्ष करता रहा। परिणामस्वरूप त्रिचनापल्ली पर शीघ्र विजय प्राप्त नहीं की जा सकी। इसके पश्चात् जब चाँदा साहब ने त्रिचनापल्ली पर घेरा डाला, तो भी उसने डूप्ले की इच्छा के विरुद्ध (UPBoardSolutions.com) आधी सेना अर्काट भेज दी और अन्ततः उसका कोई भी सन्तोषजनक फल नहीं मिला। इसके अतिरिक्त, उसका मित्र हैदराबाद का वीर सूबेदार मुजफ्फरजंग भी संघर्ष में मारा गया।

9. अंग्रेजों द्वारा बंगाल की विजय – कर्नाटक के तृतीय युद्ध तक अंग्रेज बंगाल पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर चुके थे और बंगाल का धन, सम्पत्ति आदि सब उनके अधिकार में आ गए थे। बंगाल से प्राप्त सुविधाओं से ही मद्रास (चेन्नई) का अंग्रेज गवर्नर तीन वर्षों तक फ्रांसीसियों से सफलतापूर्वक युद्ध करता रहा था। अन्तत: फ्रांसीसियों के साधन समाप्त हो गए और पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) का पतन हो गया, जिसमें फ्रांसीसियों को अंग्रेजों के विरुद्ध सहायता मिलनी बन्द हो गई। 1757 ई० में प्लासी के निर्णायक युद्ध में विजय प्राप्त हो जाने के बाद अंग्रेजों की स्थिति अत्यधिक सुदृढ़ हो गई थी।

10. फ्रांसीसियों की अपेक्षा अंग्रेजों को अधिक समृद्ध क्षेत्रों की प्राप्ति – डूप्ले को अपनी सफलताओं के फलस्वरूप कर्नाटक और पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) जैसे निर्धन प्रान्त मिले थे। इसके विपरीत, अंग्रेजों को बंगाल जैसा समृद्धशाली प्रदेश मिला, जिससे अंग्रेजों की स्थिति दिन दूनी-रात चौगुनी गति से सुदृढ़ होती चली गई।

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11. लैली का असहयोगात्मक एवं घमंडी स्वभाव – फ्रांसीसियों की पराजय के लिए फ्रांसीसी सेनापति लैली भी कम उत्तरदायी नहीं था। वह घमण्डी, जल्दबाज तथा क्रोधी स्वभाव का था। फलस्वरूप उसे अन्य कर्मचारियों का सहयोग प्राप्त न हो सका और भारत में फ्रांसीसी सत्ता की सम्भावना समाप्त हो गई।

इन्हीं कारणों से अंग्रेजों के समक्ष फ्रांसीसियों की पराजय हुई। भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने के अभियान में फ्रांसीसी पराजित हो गए और अंग्रेज विजयी हुए। इस प्रकार, डूप्ले की सम्पूर्ण योजनाओं पर पानी फिर गया, तथापि अनेक कारणों (UPBoardSolutions.com) से उसका नाम इतिहास में अमर रहेगा।

अल्फ्रेड लॉयल के शब्दों में, “अठारहवीं शताब्दी में अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों के बीच समुद्र पार के साम्राज्य के लिए किए गए लम्बे तथा कठिन संघर्ष के संक्षिप्त घटना-चक्र में सबसे अधिक चमत्कारी
व्यक्ति डूप्ले ही था।”

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प्रश्न 4.
प्लासी तथा बक्सर के युद्धों ने किस प्रकार भारत में ब्रिटिश शासन की नींव डाली ? [2013]
          या
“बक्सर के युद्ध ने ब्रिटिश कम्पनी को प्रभुतासम्पन्न बना दिया।” संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
अठारहवीं सदी के आते-आते कम्पनी और बंगाल के नवाबों के बीच टकराव बढ़ने लगे। औरंगजेब की मृत्यु के बाद तत्कालीन क्षेत्रीय रियासतें शक्तिशाली होने लगीं। मुर्शीद कुली खाँ, अलीवर्दी खाँ तथा सिराजुद्दौला जैसे बंगाल के नवाबों ने कम्पनी को (UPBoardSolutions.com) रियायतें देने से साफ मना कर दिया। साथ ही अंग्रेजों को किलेबन्दी बढ़ाने से रोक दिया। धीरे-धीरे ये टकराव गम्भीर होते गये और इनकी परिणति प्लासी के युद्ध के रूप में हुई।

प्लासी को युद्ध–सन् 1756 ई० में सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना। परन्तु कम्पनी उसकी शक्ति को देखते हुए किसी अन्य को नवाब बनाना चाहती थी जो उन्हें व्यापारिक सुविधाएँ तथा अन्य रियायतें आसानी से दे सके। परन्तु वे कामयाब न हो सके। सिराजुद्दौला ने कम्पनी को किलेबन्दी रोकने तथा बकाया राजस्व चुकाने का आदेश दिया। कम्पनी के ऐसा न करने पर नवाब ने कलकत्ता (कोलकाता) स्थित कम्पनी के किले पर कब्जा कर लिया।

कलकत्ता (कोलकाता) की खबर सुनकर कम्पनी के अफसरों ने (UPBoardSolutions.com) रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में सेनाओं को रवाना कर दिया। आखिरकार सन् 1757 ई० में प्लासी के मैदान में रॉबर्ट क्लाइव तथा सिराजुद्दौला अपनी-अपनी सेनाओं के साथ आमने-सामने थे।

सिराजुद्दौला को हार का सामना करना पड़ा, जिसका एक बड़ा कारण उसके सेनापति मीरजाफर का षड्यन्त्र था।।

प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों की जीत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थी। क्योंकि भारत में यह कम्पनी की पहली बड़ी जीत थी। इस युद्ध के बाद मीरजाफर को बंगाल की कठपुतली नवाब बनाया गया। इस युद्ध ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन को भारत में स्थिरता प्रदान करते हुए ब्रिटिश उपनिवेशवाद का बीजारोपण किया।

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बक्सर का युद्ध – ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी को यह एहसास हो गया कि कठपुतली नवाब हमेशा उनका साथ देने वाला नहीं है। अत: जब मीरजाफर कम्पनी का विरोध करने लगा तो उसे हटाकर मीरकासिम को नवाब बना दिया गया। परन्तु जब मीरकासिम भी देशहित में स्वतन्त्र निर्णय लेने लगा और अंग्रेजों के हित प्रभावित होने लगे तो अंग्रेजों को 1764 ई० में एक दूसरा युद्ध करना पड़ा जिसे ‘बक्सर का युद्ध’ कहा जाता है। इस युद्ध में एक ओर अंग्रेजों की सेना तथा दूसरी ओर बंगाल के पूर्व नवाब मीरकासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुगल सम्राट शाहआलम की संयुक्त सेनाएँ थी। इस युद्ध में भी अन्तत: ‘हेक्टर मुनरो’ के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना विजयी हुई। इस युद्ध ने न केवल प्लास के अपूर्ण कार्य को पूरा किया बल्कि उसने ब्रिटिश कम्पनी को एक पूर्ण प्रभुतासम्पन्न बना दिया।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में डच व्यापारी एकाधिकार स्थापित करने में क्यों असफल रहे ?
उत्तर :
सन् 1595 ई० में डच व्यापारी हाउटमैन ने भारत में प्रवेश किया और दो वर्षों बाद वह बहुत-सा माल लेकर हॉलैण्ड वापस पहुँचा। उसकी यात्रा ने डचों के लिए भारत से व्यापार करने का मार्ग खोल दिया। सन् 1602 ई० में डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना हुई, जिसका मुख्य उद्देश्य व्यापार करना था। इस कम्पनी ने पहले मसाले के द्वीपों पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया, फिर भारत में पुर्तगालियों को हराकर सूरत, चिनसुरा, (UPBoardSolutions.com) कासिम बाजार, नेगापट्टम, कालीकट आदि स्थानों पर अपनी बस्तियाँ स्थापित कीं। अन्त में 1759 ई० में अंग्रेजों ने डचों को पराजित कर भारत में डच शासन का अन्त कर दिया। डच लोग भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित न कर सके, क्योंकि अंग्रेज या फ्रेंच कम्पनी की भाँति उनके पास कोई सेना या यूरोप की डचे सरकार का समर्थन न था।

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प्रश्न 2.
डूप्ले की उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
डूप्ले एक महत्त्वाकांक्षी, योग्य तथा कूटनीतिक व्यक्ति था, जिसे फ्रांसीसी सरकार ने भारत में पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) का गवर्नर नियुक्त किया था। उसने स्थानीय भारतीय सैनिकों को अपनी सेना में नियुक्त करके उन्हें आधुनिक युद्ध रणनीति एवं प्रणाली में प्रशिक्षण देना आरम्भ कर दिया। इस सेना की सहायता से डूप्ले ने अपने चिर प्रतिद्वन्द्वी इंग्लैण्ड तथा स्थानीय शासकों के विरुद्ध संघर्ष किये। किन्तु फ्रांसीसी कम्पनी की आर्थिक दशा अच्छी न होने के कारण डुप्ले ने मॉरीशस के फ्रेंच गवर्नर से सहायता प्राप्त करके मद्रास (चेन्नई) पर घेरा डाल दिया तथा प्रथम कर्नाटक युद्ध के दौरान 1746 ई० में मद्रास पर अधिकार कर लिया। अंग्रेजों ने जब पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) पर कब्जा करने का प्रयत्न किया तो डूप्ले ने सफलतापूर्वक इसकी रक्षा की।

द्वितीय कर्नाटक युद्ध के दौरान डूप्ले ने हैदराबाद के निजाम की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के युद्ध में मुजफ्फरजंग का साथ दिया, फिर चॉदा साहब से मिलकर 1749 ई० में अनवरुद्दीन को हराकर चाँदा साहब को कर्नाटक का नवाब बनाया, (UPBoardSolutions.com) जिसने फ्रांसीसियों को पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) के निकट 80 गाँव जागीर के रूप में उपहारस्वरूप प्रदान किये। उधर, मुजफ्फरजंग (हैदराबाद के निजाम) ने भी फ्रांसीसियों को पर्याप्त उपहार दिये। डूप्ले की सफल कूटनीति के कारण ही दक्षिण भारत में फ्रांसीसियों के पैर जम सके, किन्तु जब फ्रांसीसी शक्ति भारत में अपने शिखर पर थी, तभी डूप्ले को यूरोप वापस बुला लिया गया।

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प्रश्न 3.
क्लाइवे पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
रॉबर्ट क्लाइव अंग्रेजी सेना में एक मामूली सैनिक था। अपनी योग्यता के बल पर वह अंग्रेजी सेना का सेनापति बन गया। वह एक सफल कूटनीतिज्ञ भी था। कर्नाटक के तीनों युद्धों में उसने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी तथा अंग्रेजों को विजय दिलाकर फ्रांसीसियों के प्रभाव को क्षीण कर दिया। इससे समस्त दक्षिण भारत पर अंग्रेजों का प्रभुत्व कायम हो गया। सन् 1757 ई० में प्लासी के युद्ध में विजय प्राप्त करके बंगाल में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव डाली। बक्सर के युद्ध (1764 ई०) के बाद बंगाल में अंग्रेजों की राजनीतिक सत्ता स्थापित करने में भी क्लाइव का ही हाथ था।

प्रश्न 4.
यूरोपीय कम्पनियों के भारत आने के क्या कारण थे ?
उत्तर :
भारत की समृद्धि की चर्चाओं से प्रेरित होकर व्यापार के उद्देश्य से अनेक यूरोपीय व्यापारी पन्द्रहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी के मध्य भारत आये। उनके भारत आगमन का देश के भावी इतिहास पर गहरा प्रभाव पड़ा। इनमें पुर्तगाली, अंग्रेज, डच, डेनिश एवं फ्रांसीसी जातियाँ मुख्य थीं। इनके भारत-आगमन के मुख्य कारण निम्नवत् थे –

  1. भारत आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न देश था। यहाँ की आर्थिक सम्पन्नता ने यूरोपीय व्यापारियों को आकर्षित किया।
  2. यूरोपीय बाजार में भारतीय मसालों की प्रचुर मात्रा में माँग थी। यहाँ के मसाले यूरोप में अधिकाधिक मात्रा में बिकते थे।
  3. वेनिस और जेनेवा के व्यापारियों ने यूरोप व एशिया के व्यापार (UPBoardSolutions.com) पर अपना अधिकार कर लिया था। वे स्पेन व पुर्तगाली व्यापारियों को हिस्सा देने के लिए तैयार न थे।
  4. वास्कोडिगामा द्वारा भारत आने का सुगम जलमार्ग खोज लेना यूरोपीय व्यापारियों के लिए लाभकर रहा।
  5. भारत में निर्मित मिट्टी के बर्तनों की यूरोपीय देशों में व्यापक माँग थी। 6. भारत में कुटीर उद्योग एवं कच्चे माल की अत्यधिक सम्भावना व्याप्त थी।

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प्रश्न 5.
अंग्रेजों एवं बंगाल के नवाब के बीच टकराव के क्या कारण थे ? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर :
ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के बीच टकराव के निम्नलिखित कारण थे –

  1. बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला एक शक्तिशाली शासक था। उसकी शक्ति से अंग्रेज घबरा रहे थे और वह सिराजुद्दौला के स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को बंगाल का नवाब बनाना चाहते थे।
  2. अंग्रेजों को नवाब सिराजुद्दौला से भरपूर व्यापारिक सुविधाएँ नहीं मिल पा रही थीं, क्योंकि नवाब अंग्रेजों को किसी प्रकार की रियायत देने के पक्ष में नहीं था। इसलिए अंग्रेज एक ऐसे व्यक्ति को बंगाल का नवाब बनाना चाहते थे जो उन्हें अधिक-से-अधिक व्यापारिक सुविधाएँ एवं रियायतें दे सके।
  3. सिराजुद्दौला ने कम्पनी को किलेबन्दी रोकने तथा बकाया राजस्व (UPBoardSolutions.com) चुकाने का आदेश दिया। कम्पनी के ऐसा न करने पर नवाब ने कलकत्ता (कोलकाता) स्थित कम्पनी के किले पर कब्जा कर लिया।

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प्रश्न 6. 
प्लासी के युद्ध के क्या कारण थे?
उत्तर :

प्लासी के युद्ध के कारण

अलीवर्दी खाँ द्वारा मृत्यु शय्या पर दी गई चेतावनी को सिराजुद्दौला भूला नहीं था। यद्यपि इस समय बंगाल में व्यापार करने वाली यूरोपियन शक्तियों-फ्रांसीसी, डच तथा अंग्रेज-में सिराजुद्दौला के सबसे अधिक अच्छे सम्बन्ध अंग्रेजों के साथ ही थे।

1. अंग्रेजों का षड्यन्त्र – बंगाल में अंग्रेजों की बढ़ती हुई शक्ति से नवाब सशंकित हो उठा था। उसके राज्याभिषेक के समय अंग्रेजी कम्पनी की उदासीनता से नवाब अत्यन्त क्रुद्ध था। नवाब की प्रजा होने के नाते ब्रिटिश कम्पनी को नवाब के प्रति सम्मान प्रदर्शित करना आवश्यक था किन्तु अंग्रेजों ने उसके राज्याभिषेक के समय कोई भेट आदि नहीं भेजी थी। यही नहीं, अंग्रेजों से सिराजुद्दौला से व्यक्तिगत ईष्र्या रखने वाले सम्बन्धियों (UPBoardSolutions.com) और अधिकारियों का साथ देना प्रारम्भ कर दिया था। उन्होंने हिन्दुओं के साथ मिलकर मुस्लिम शासन के विरुद्ध षड्यन्त्र रचना आरम्भ कर दिया था तथा कलकत्ता (कोलकाता) नवाब के शत्रुओं का शरण-स्थल बन गया था।

2. व्यापारिक सुविधाओं का दुरुपयोग – नवाब द्वारा दी गई व्यापारिक सुविधाओं का दुरुपयोग करना अंग्रेजों ने आरम्भ कर दिया था। फर्रुखसियर ने कम्पनी को बिना चुंगी के व्यापार करने की सुविधा दी थी परन्तु कम्पनी के कर्मचारी इसका अपने व्यक्तिगत व्यापार के लिए भी लाभ उठाने लगे। दस्तक-प्रथा के दुरुपयोग के कारण बंगाल के नवाब को आर्थिक क्षति पहुँची।

3. किलेबन्दी का प्रश्न – नवाब और अंग्रेजों के मध्य वैमनस्य का सबसे प्रमुख कारण अंग्रेजों द्वारा अपनी बस्तियों की किलेबन्दी करना था। नवाब ने अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों को उनके द्वारा की जा रही किलेबन्दी को रोकने की आज्ञा दी, परन्तु अंग्रेजों ने आज्ञा का पालन नहीं किया।

सारांश यह है कि अंग्रेज केवल दस्तकों के सम्बन्ध में अपने अधिकारों का ही दुरुपयोग नहीं कर रहे थे अपितु अनधिकार वे अपने यूरोपियन प्रतिद्वन्द्वियों से भय के बहाने अपनी बस्तियों की किलेबन्दी भी कर रहे थे। इसके परिणामस्वरूप नवाब को अंग्रेजों को दंड देने के लिए बाध्य होना पड़ा। वास्तव में यदि देखा जाए तो अंग्रेज अपराधी थे तथा उन्होंने नवाब की आज्ञा का उल्लंघन किया था। बंगाल में भी अंग्रेज दक्षिण भारत (कर्नाटक) के समान ही कुचक्र रच रहे थे। अलीवर्दी खाँ का संशय ठीक था। यही संशय सिराजुद्दौला के काल में प्लासी के युद्ध के रूप में प्रकट हुआ।

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प्रश्न 7.
इलाहाबाद की सन्धि का भारतीय इतिहास में क्या महत्त्व है ?
उत्तर :
अंग्रेजों ने बक्सर के युद्ध में विजय के बाद नाममात्र के मुगल सम्राट शाहआलम के साथ 1765 ई० में सन्धि कर ली, जो इलाहाबाद की सन्धि के नाम से प्रसिद्ध है। इस सन्धि के अनुसार मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय ने शाही फरमान द्वारा अंग्रेज कम्पनीको बंगाल, बिहार और उड़ीसा (ओडिशा) की दीवानी प्रदान कर दी। साथ-साथ अंग्रेजों ने सम्राट को र 26 लाख की वार्षिक पेंशन बाँध दी। दीवानी के अधिकार के बदले कम्पनी (UPBoardSolutions.com) ने कड़ा और इलाहाबाद के किले अवध के नवाब से लेकर शाहआलम को दे दिये। नवाब ने कम्पनी को १ 50 लाख युद्ध का हर्जाना दिया। क्लाइव और अवध के नवाब के बीच यह भी समझौता हुआ कि दोनों भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर मराठों के आक्रमणों के समय एक-दूसरे की सहायता करेंगे।

अतः स्पष्ट है कि दोनों युद्धों के पश्चात् जो लाभ अंग्रेजों को हुआ उसकी पुष्टि इलाहाबाद की सन्धि (1765) के द्वारा हो गयी। .

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. 
भारत में सर्वप्रथम किस यूरोपियन जाति ने प्रवेश किया ?
उत्तर :
भारत में सर्वप्रथम पुर्तगालियों ने प्रवेश किया।

प्रश्न 2. 
भारत के दो पुर्तगाली गवर्नरों के नाम लिखिए।
उत्तर :
भारत के दो पुर्तगाली गवर्नर थे –

  1. डी-अल्मोडा तथा
  2. अल्बुकर्क।

प्रश्न 3. 
डूप्ले कौन था ?
उत्तर :
डूप्ले पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) का गवर्नर था, जिसने कर्नाटक के प्रथम तथा द्वितीय युद्ध में फ्रांसीसी सेनाओं का नेतृत्व किया था।

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प्रश्न 4. 
लाइव की दो उपलब्धियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
क्लाइव की दो उपलब्धियाँ थीं

  1. तृतीय कर्नाटक युद्ध में फ्रांसीसियों के विरुद्ध विजय।
  2. प्लासी-युद्ध में विजय के साथ. बंगाल में अंग्रेजों की सत्ता की नींव डालना।

प्रश्न 5. 
कर्नाटक में कितने युद्ध हुए ?
उत्तर :
कर्नाटक में तीन युद्ध हुए।

प्रश्न 6. 
कर्नाटक का दूसरा युद्ध किनके बीच हुआ था ? [2011]
उत्तर :
कर्नाटक का दूसरा युद्ध मुजफ्फरजंग तथा नासिरजंग के बीच हुआ था।

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प्रश्न 7. 
कर्नाटक युद्धों में अंग्रेजों की विजय के दो कारण लिखिए।
उत्तर :
कर्नाटक युद्धों में अंग्रेजों की विजय के दो कारण निम्नवत् थे –

  1. अंग्रेजों को अपनी सरकार को पूर्ण सहयोग तथा समर्थन प्राप्त था।
  2. अंग्रेजों के पास लॉरेन्स, क्लाइव, आयरकूट आदि योग्य तथा कूटनीतिज्ञ सेनापति थे।

प्रश्न 8. 
भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना कब हुई ? [2010]
उत्तर :
भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना सन् 1600 ई० में हुई।

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प्रश्न 9. 
ईस्ट इण्डिया कम्पनी को पूरब के देशों में व्यापार करने के लिए आदेश कब मिला ?
उत्तर :
ईस्ट इण्डिया कम्पनी को पूरब के देशों में (UPBoardSolutions.com) व्यापार करने का आदेश 31 दिसम्बर, 1600 ई० को मिला।

प्रश्न 10. 
अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के बीच लड़े गये युद्धों को किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर :
अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों के मध्य लड़े गये युद्धों को ‘कर्नाटक युद्ध’ के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 11. 
प्लासी का युद्ध कब और किस-किस के बीच हुआ ? (2018)
उत्तर :
प्लासी का युद्ध अंग्रेजों तथा बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के बीच सन् 1757 ई० में लड़ा गया।

प्रश्न 12. 
बक्सर का युद्ध कब और किस-किस के बीच हुआ ?
उत्तर :
बक्सर का युद्ध अंग्रेजों तथा बंगाल के पूर्व नवाब मीरकासिम, (UPBoardSolutions.com) अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुगल सम्राट शाहआलम की संयुक्त सेनाओं के मध्य हुआ था।

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बहुविकल्पीय प्रशन

1. डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना कब हुई थी?

(क) 1595 ई० में
(ख) 1597 ई० में
(ग) 1602 ई० में
(घ) 1615 ई० में

2. भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कौन था ? [2012]

(क) अल्बुकर्क
(ख) अल्मोडा
(ग) कोलम्बस
(घ) वास्कोडिगामा

3. बंगाल में फ्रांसीसियों ने सर्वप्रथम किस स्थान पर व्यापारिक बस्ती स्थापित की?

(क) कासिम बाजार
(ख) चन्द्रनगर
(ग) हुगली
(घ) चिनसुरा

4. भारत में फ्रांसीसी कम्पनी का गवर्नर था

(क) हॉकिन्स
(ख) वास्कोडिगामा
(ग) क्लाइव
(घ) डूप्ले

5. भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का संस्थापक किसे माना जाता है?

(क) क्लाइव को
(ख) वारेन हेस्टिग्स को
(ग) आयरकूट को
(घ) लॉर्ड वेलेजली को।

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6. यूरोप के किस देश ने सर्वप्रथम भारत में अपना उपनिवेश स्थापित किया? [2013, 14, 16]
          या
भारत के पश्चिमी तट पर किस यूरोपीय देश ने सबसे पहले अपना उपनिवेश स्थापित किया था ? [2013]

(क) फ्रांस
(ख) इंग्लैण्ड
(ग) पुर्तगाल
(घ) हॉलैण्ड

7. कर्नाटक का युद्ध किस-किस के बीच हुआ ?

(क) फ्रांसीसी-पुर्तगाली
(ख) पुर्तगाली-डच
(ग) अंग्रेज-फ्रांसीसी
(घ) अंग्रेज-पुर्तगाली

8. प्लासी का युद्ध हुआ था (2012)

(क) 1754 ई० में
(ख) 1757 ई० में
(ग) 1864 ई० में
(घ) 1857 ई० में

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9. इलाहाबाद की सन्धि हुई थी

(क) 1757 ई० में
(ख) 1765 ई० में
(ग) 1857 ई० में
(घ) 1865 ई० में

10. निम्न में कौन भारत में फ्रांसीसी उपनिवेश था? [2014]

(क) फोर्ट विलियम
(ख) मद्रास
(ग) पॉण्डिचेरी।
(घ) सूरत

11. फ्रेंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की गई थी [2014]

(क) 1600 ई० में
(ख) 1611 ई० में
(ग) 1615 ई० में
(घ) 1664 ई० में

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12. प्लासी के युद्ध के समय बंगाल का नवाब कौन था? (2014)

(क) सिराजुद्दौला
(ख) अलीवर्दी खाँ
(ग) मुर्शीद कुली खां
(घ) मीर कासिम

13. किस यूरोपीय शक्ति ने भारत में सबसे अन्त में प्रवेश किया? [2015, 17]

(क) हॉलैण्ड
(ख) इंग्लैण्ड
(ग) फ्रांस
(घ) पुर्तगाल

14. प्लासी के युद्ध में निम्नलिखित में से किसकी पराजय हुई थी? [2015, 17]

(क) लॉर्ड क्लाइव
(ख) सिराजुद्दौला
(ग) मीरजाफर
(घ) मीरकासिम

उत्तरमाला

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 10 भारत में यूरोपीय शक्तियों का आगमन एवं प्रसार 1

Hope given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 10 are helpful to complete your homework.

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 7 (Section 2)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 7 भारतीय विदेश नीति (अनुभाग – दो)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 7 भारतीय विदेश नीति (अनुभाग – दो).

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विदेश-नीति का क्या अर्थ है ? भास्तीय विदेश-नीति के निर्धारक तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
या
भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? पंचशील के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। [2014]
या

भारत की विदेश नीति की कोई दो विशेषताएँ लिखिए। [2014, 16, 18]
या

भारत की विदेश-नीति की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2011, 12, 17]
या

किसी विदेशी पत्रिका में भारत को एक साम्राज्यवादी देश बताया गया है। इसका खण्डन करने के लिए उस पत्रिका के सम्पादक को क्या लिखेंगे ?
या
भारतीय विदेश नीति के विशिष्ट लक्षणों की व्याख्या कीजिए। [2013]
या

भारतीय विदेश नीति के किन्हीं तीन सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। [2013, 15]
या

पंचशील तथा भारत की विदेश नीति पर एक लेख लिखिए। [2013]
या

भारतीय विदेश नीति के आधारभूत सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए। [2015, 17]
या

भारत की विदेश नीति के मुख्य सिद्धान्त क्या हैं? उनमें से किन्हीं तीन का उल्लेख कीजिए। [2016]
या

भारत की विदेश नीति की किन्हीं चार विशेषताओं की विवेचना कीजिए। [2016]
उत्तर :
विदेश-नीति से तात्पर्य उस नीति से है जो कोई देश अन्य देशों के प्रति अपनाता है।

भारत की विदेश-नीति की विशेषताएँ/लक्षण/व/सिद्धान्त

भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ/लक्षण/तत्त्व/सिद्धान्त निम्नलिखित हैं–

1. गुट-निरपेक्षता– 
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सम्पूर्ण विश्व दो सैन्य मुटों में बँट गया था। प्रथम गुट
संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में तथा (UPBoardSolutions.com) दूसरा गुट पूर्ववर्ती सोवियत संघ के नेतृत्व में था। ऐसी स्थिति में भारत ने स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद गुट-निरपेक्ष रहने का निर्णय लिया। गुट-निरपेक्षता भारत की । विदेश-नीति में सर्वोपरि है। गुट-निरपेक्षता की नीति साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद की घोर विरोधी है। देश के विकास के लिए किसी विशेष गुट में सम्मिलित होने की अपेक्षा गुट-निरपेक्ष रहकर सभी देशों को सहयोग करना इस नीति का मूल आधार है।

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2. पंचशील के सिद्धान्त में आस्था- 
भारत बौद्ध धर्म के पाँच व्रतों पर आधारित ‘पंचशील’ के सिद्धान्त
में गहन आस्था रखता है। सन् 1954 ई० में भारत तथा चीन ने एक मैत्री सन्धि के अन्तर्गत इस सिद्धान्त की घोषणा की थी। सन् 1955 ई० में बाण्डंग सम्मेलन में तृतीय विश्व के 29 देशों तथा बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस सिद्धान्त को स्वीकार किया। इस सिद्धान्त के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं

  • सभी देशों की परस्पर प्रादेशिक अखण्डता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना,
  • दूसरे देशों पर आक्रमण न करना,
  • दूसरे देशों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना,
  • सभी देशों को बराबर समझना तथा
  • शान्ति और सौहार्दपूर्वक सह-अस्तित्व की नीति का पालन करना।

3. समस्त राष्ट्रों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध– भारत की विदेश नीति के निर्धारणकर्ता पं० जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि “भारत की विदेश नीति का मूल उद्देश्य विश्व के समस्त राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना है। भारत इस नीति का (UPBoardSolutions.com) निरन्तर पालन करता रहा है। वह अपने पड़ोसी देशों से ही नहीं, अपितु सभी राष्ट्रों से राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा व्यापारिक मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखना चाहता है।

4. शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व- 
शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व भारत की विदेश नीति का प्रमुख अंग है। यह भी पंचशील के सिद्धान्तों पर आधारित है। इसकी तीन प्रमुख शर्ते हैं-

  • प्रत्येक राष्ट्र के स्वतन्त्र अस्तित्व को पूर्ण मान्यता,
  • प्रत्येक राष्ट्र को अपने भाग्य का निर्माण करने के अधिकार की मान्यता तथा
  • पिछड़े हुए राष्ट्रों का विकास एक निष्पक्ष अन्तर्राष्ट्रीय अभिकरण द्वारा किया जाना। इस सिद्धान्त के पीछे यह चिन्तन है कि यदि महाशक्तियाँ कमजोर देशों के भाग्य का निर्धारण करेंगी तो कोई भी देश आर्थिक विकास नहीं कर सकेगा। इसलिए सभी राष्ट्रों को अपने ढंग से आर्थिक विकास
    करने का अवसर मिलना चाहिए। इस सिद्धान्त का अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों पर अच्छा प्रभाव पड़ा है।

5. रंग-भेद नीति का विरोध- भारत रंग-भेद नीति अथवा नस्लवाद का कट्टर विरोधी है। इसलिए | उसने दक्षिण अफ्रीका में 1994 ई० तक स्थापित अल्प मत वाली गोरी सरकार द्वारा अपनायी गयी रंग-भेद’ की नीति का सदैव विरोध किया। वास्तव में रंग-भेद नीति मानवता का घोर अपमान है।

6. विश्व-शान्ति तथा संयुक्त राष्ट्र संघ में सहयोग– 
भारत अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का शान्तिपूर्ण ढंग से निपटारा करने का समर्थक है। इसलिए वह संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ। सहयोग का पक्षधर है। विश्व शान्ति कायम करने के लिए भारत निरस्त्रीकरण पर भी बल देता है।

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7. साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध- 
साम्राज्यवादी शोषण से त्रस्त भारत ने अपनी विदेश-नीति में साम्राज्यवाद के प्रत्येक रूप का कटु विरोध किया है। भारत इस प्रकार की प्रवृत्तियों को विश्व-शान्ति एवं विश्व-व्यवस्था के लिए घातक एवं कलंकमय मानता है। के० एम० पणिक्कर के अनुसार, “भारत की नीति हमेशा से यही रही है कि यह पराधीन लोगों की स्वतन्त्रता के प्रति आवाज उठाता रहा है; क्योंकि भारत का दृढ़ (UPBoardSolutions.com) विश्वास है कि साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद हमेशा से आधुनिक युद्धों का कारण रहा है।

भारत की विदेश नीति के ऊपर उल्लिखित बिन्दुओं के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि भारत एक साम्राज्यवादी देश नहीं है। यदि किसी विदेशी पत्रिका में ऐसा लिखा गया है कि भारत एक साम्राज्यवादी देश है तो यह पूर्णतया असत्य एवं भ्रामक है। इसके लिए सम्बन्धित पत्रिका के सम्पादक
के प्रति भारत को कड़ा विरोध जताना चाहिए।

प्रश्न 2.
गुट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं ? इसके बदलते स्वरूप का वर्णन कीजिए।
या
भारत की गुट-निरपेक्ष नीति को स्पष्ट कीजिए। गुट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं ?
या
गुट-निरपेक्षता में भारत के योगदान का वर्णन कीजिए। “भारतीय विदेश नीति का आधार गुटनिरपेक्षता है।” स्पष्ट कीजिए। [2013]
या

विश्व-शान्ति के लिए गुट-निरपेक्षता क्यों आवश्यक है ? इसके महत्व का वर्णन उचित उदाहरणों सहित कीजिए। [2015, 17]
या

गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रारम्भ क्यों हुआ ? प्रारम्भ में इसमें भाग लेने वाले दो प्रमुख देशों के नाम लिखिए। [2015]
या

गृट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? क्या वर्तमान समय में भी भारत को इसका पालन करना चाहिए? [2016]
उत्तर :
गुट-निरपेक्षता.का अर्थ-शक्ति के किसी भी गुट में सम्मिलित न होना तथा अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में बिना किसी बाह्य दबाव के अच्छाई व बुराई को ध्यान में रखकर स्वतन्त्र निर्णय लेना गुटनिरपेक्षता है।

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द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् सम्पूर्ण विश्व दो गुटों में बँट गया। एक गुट का नेतृत्व अमेरिका ने किया और दूसरे गुट का सोवियत संघ (रूस) ने। दोनों गुटों में अनेक कारणों को लेकर भीषण शीतयुद्ध प्रारम्भ हो गया। यूरोप और एशिया के अधिकांश देश इस गुटबन्दी में फँस गये और वे किसी-न-किसी गुट में
सम्मिलित हो गये। स्वतन्त्र भारत की विदेश (UPBoardSolutions.com) नीति के निर्माता पं० जवाहरलाल नेहरू ने विदेश नीति का आधार गुट-निरपेक्षता (Non-Alignment) को बनाया। उन्होंने स्पष्ट किया, “हम किसी गुट में सम्मिलित नहीं हो सकते, क्योंकि हमारे देश में आन्तरिक समस्याएँ इतनी अधिक हैं कि हम दोनों गुटों से सम्बन्ध बनाये बिना उन्हें सुलझा नहीं सकते।’ सन् 1961 ई० में बेलग्रेड में हुए गुट-निरपेक्ष देशों के प्रथम शिखर सम्मेलन में केवल 25 देशों ने भाग लिया था, किन्तु धीरे-धीरे गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने वाले देशों की संख्या में वृद्धि होती गयी। अब इनकी संख्या 120 हो गयी है। इसमें भाग लेने वाले दो प्रमुख देश इण्डोनेशिया व मिस्र थे।

गृट-निरपेक्षता में भारत का योगदान

गुट-निरपेक्षता के विकास में भारत का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत की विदेश नीति का प्रमुख सिद्धान्त ही गुट-निरपेक्षता है। सर्वप्रथम, भारत ने ही एशिया तथा अफ्रीका के नवोदित स्वतन्त्र राष्ट्रों को परस्पर एकता और सहयोग के सूत्र में बाँधने का प्रयास किया था। ‘बाण्डंग सम्मेलन में भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। इस प्रकार भारत गुट-निरपेक्षता का अग्रणी रहा है। पं० जवाहरलाल नेहरू का कथन था, “चाहे कुछ भी हो जाए, हम किसी भी देश के साथ सैनिक सन्धि नहीं करेंगे। जब हम गुट-निरपेक्षता का विचार छोड़ते हैं तो हम अपना संसार छोड़कर हटने लगते हैं। किसी देश से बँधना अपने आत्म-सम्मान को खोना तथा अपनी बहुमूल्य नीति का अनादर करना है।” पं० नेहरू के बाद श्रीमती इन्दिरा गांधी ने गुट-निरपेक्षता के विकास को अग्रसरित (UPBoardSolutions.com) किया। प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने सातवें सम्मेलन (1983 ई०) में नयी दिल्ली में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की अध्यक्षता ग्रहण की थी। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने अपने एक भाषण में कहा था कि “गुट-निरपेक्षता स्वयं में एक नीति है। यह केवल एक लक्ष्य ही नहीं, इसके पीछे उद्देश्य यह है कि निर्णयकारी स्वतन्त्रता और राष्ट्र की सच्ची भक्ति तथा बुनियादी हितों की रक्षा की जाए।

प्रधानमन्त्री श्री राजीव गांधी भी गुट-निरपेक्ष आन्दोलन को प्रभावशाली बनाने के लिए कृत-संकल्प थे। 15 अगस्त, 1986 ई० को श्री राजीव गांधी ने कहा था, “भारत की गुट-निरपेक्षता की नीति के कारण ही भारत का विश्व में आदर है। उसके साथ संसार के दो-तिहाई गुट-निरपेक्ष देशों की आवाज होती है।” नवे शिखर सम्मेलन (सितम्बर, 1989 ई०) में प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने कहा था कि “गुट-निरपेक्ष आन्दोलन तभी गतिशील रह सकता है, जब यह उन्हीं सिद्धान्तों पर चले, जिन पर चलने का वायदा यहाँ 1961 ई० में प्रथम सम्मेलन में सदस्यों ने किया था।” ग्यारहवें शिखर सम्मेलन में भारत ने दो बातों के प्रसंग में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की। भारत ने आणविक शस्त्रों पर आणविक शक्तियों के एकाधिकार का विरोध किया। बारहवें सम्मेलन में भारत और पाकिस्तान (UPBoardSolutions.com) की आणविक विस्फोट के लिए आलोचना की गयी। सम्मेलन के अध्यक्ष नेल्सन मण्डेला द्वारा कश्मीर समस्या का उल्लेख किये जाने पर भारत द्वारा कड़ी आपत्ति की गयी। भारत की आपत्ति को दृष्टि में रखते हुए नेल्सन मण्डेला ने अपना वक्तव्य वापस ले लिया।

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तेरहवें शिखर सम्मेलन में प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता हेतु भी पहल की। प्रधानमन्त्री श्री वी० पी० सिंह भी गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के प्रबल समर्थक रहे हैं और तत्पश्चात् प्रधानमन्त्री श्री चन्द्रशेखर भी इस आन्दोलन को सफल बनाने के लिए प्रयत्नशील थे। प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव ने भी इसी नीति को जारी रखा। इसके बाद प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार देश की सुरक्षा और अखण्डता के मुद्दे पर समयानुसार विदेश नीति निर्धारित करने के लिए दृढ़ संकल्प थी।

सोवियत रूस के विघटन के बाद गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का राजनीतिक महत्त्व अवश्य कुछ कम हो गया है, परन्तु इसकी आर्थिक भूमिका पहले से भी ज्यादा बढ़ गयी है। औद्योगिक राष्ट्रों द्वारा उदार अर्थव्यवस्था को विश्वस्तरीय आकार देने के कारण बहुसंख्यक गरीब एवं विकासशील देश आज न चाहते हुए भी आर्थिक एवं व्यापारिक क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धी की भूमिका में खड़े हो गये हैं। धनी एवं सम्पन्न राष्ट्रों में संरक्षणवादी प्रवृत्तियाँ बढ़ी हैं और साम्राज्यवाद का एक नया आर्थिक रूप सामने आ रहा है। मुक्त व्यापार के नाम पर अमीर देश विकासशील देशों पर हर प्रकार के प्रतिबन्ध चाहते हैं। अत: विकासशील राष्ट्रों के लिए सामूहिक रूप से अपने आर्थिक एवं व्यापारिक हितों की सुरक्षा करने की आवश्यकता बढ़ गयी है। इस प्रकार गुट-निरपेक्ष आन्दोलन को अपना स्वरूप बदलकर; अर्थात् स्वयं को राजनीतिक मोर्चे से आर्थिक मोर्चे की (UPBoardSolutions.com) ओर मोड़कर; अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में आमूल परिवर्तन लाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। निश्चित ही यह गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की नयी भूमिका की शुरुआत होगी।

प्रश्न 3.
पंचशील से आप क्या समझते हैं ? इसके प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। [2012]
या

पंचशील से आपका क्या अभिप्राय है ? इसके किन्हीं दो सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए। पंचशील के तीन सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए। [2012, 14, 17, 18]
या
वर्तमान राजनीतिक स्थिति में पंचशील के कौन-से दो सिद्धान्त अधिक उपयोगी हैं?
या
पंचशील’ के प्रस्ताव पर सर्वप्रथम किन दो देशों में सहमति बनी थी?
या
पंचशील के किन्हीं दो बिन्दुओं का उल्लेख कीजिए। [2016]
उत्तर:
भारत की विदेश नीति का प्रमुख आदर्श पंचशील रहा है। जून, 1954 ई० में पं० जवाहरलाल नेहरू के द्वारा इस सिद्धान्त की सर्वप्रथम घोषणा तथा प्रतिपादन भारत और चीन के मध्य हुए एक समझौते में की गयी थी। पंचशील का सिद्धान्त महात्मा बुद्ध के उन पाँच सिद्धान्तों पर आधारित है, जो उन्होंने व्यक्तिगत आचरण के लिए निर्धारित किये थे। पंचशील के सिद्धान्तों का सूत्रपात पं० जवाहरलाल नेहरू व चीन के तत्कालीन (UPBoardSolutions.com) प्रधानमन्त्री चाऊ-एन-लाई के मध्य तिब्बत सम्बन्धी समझौते के समय में हुआ था। भारत व चीन तथा अनेक एशियाई व अफ्रीकी देशों ने अप्रैल, 1995 ई० में बाण्डंग सम्मेलन में इन्हें स्वीकार किया था, जिससे अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और सद्भाव में वृद्धि हो। पंचशील के पाँच सिद्धान्त निम्नलिखित हैं|

  • सभी राष्ट्र एक-दूसरे की सम्प्रभुता तथा अखण्डता का सम्मान करें।
  • कोई भी राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण न करे तथा शान्तिपूर्ण तरीकों से पारस्परिक विवादों का समाधान करें।
  • कोई भी राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करे।
  • सभी राष्ट्र पारस्परिक समानता तथा पारस्परिक हितों में अभिवृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहें।
  • सभी राष्ट्र शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना के साथ अर्थात् मिल-जुलकर शान्तिपूर्वक रहें और | परस्पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध कायम रखें।

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भारत और चीन के साथ अन्य राष्ट्रों ने भी इसका समर्थन किया था तथा संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया। यद्यपि पंचशील के सिद्धान्त की घोषणा सर्वप्रथम भारत और चीन के बीच हुई थी; किन्तु फिर भी, चीन ने पंचशील के समझौते और सिद्धान्त का पालन नहीं किया तथा 1962 ई० में भारत पर आक्रमण कर दिया।

भले ही, उस समय चीन ने इस सिद्धान्त के महत्त्व को नहीं समझा; किन्तु आज जब विश्व पर परमाणु युद्ध के बादल मँडरा रहे हैं, यह सिद्धान्त बहुत महत्त्वपूर्ण हो गया है। आज इस बात की आवश्यकता है कि सम्पूर्ण विश्व में शान्ति कायम रहे, जिससे विश्व को तीसरे महायुद्ध की विभीषिका का सामना न करना पड़े। इसके लिए प्रत्येक राष्ट्र को पंचशील के मर्म अर्थात् ‘शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व’ का पालन करना चाहिए। सभी देशों को अपनी स्वतन्त्रता और अखण्डता के साथ पड़ोसी या अन्य देशों की अखण्डता का भी आदर करना चाहिए। वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में पंचशील ही विश्व-शान्ति का एकमात्र मार्ग है।

प्रश्न 4.
निःशस्त्रीकरण से आप क्या समझते हैं ? इसके सम्बन्ध में भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :

निःशस्त्रीकरण

भारत की विदेश नीति शान्ति और अहिंसा की विदेश नीति रही है। फलत: भारत नि:शस्त्रीकरण का प्रबल समर्थक रहा है। नि:शस्त्रीकरण के सम्बन्ध में यह मान्यता रही है कि युद्धों का एक प्रमुख कारण शस्त्रों का अस्तित्व है। अत: नि:शस्त्रीकरण ही अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को सुदृढ़ बना सकता है। यह शस्त्रों के उत्पादन पर होने वाले बेहिसाब खर्च से छुटकारा दिला सकता है। इसके द्वारा बचाये गये साधनों तथा धन का प्रयोग सभी राष्ट्रों के विकास के लिए किया जा सकता है। इसीलिए भारत की विदेश नीति हथियारों विशेषकर परमाणु हथियारों के नि:शस्त्रीकरण की प्रबल समर्थक रही है। अपनी इस मान्यता के (UPBoardSolutions.com) कारण भारत और उसके अन्य सहयोगी देशों ने सन् 1961 ई० में आणविक परीक्षणों को बन्द करने का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र महासभा में रखा। सन् 1962 ई० में जेनेवा के नि:शस्त्रीकरण सम्मेलन में भारत ने अपने सात अन्य सहयोगी देशों के सहयोग से सम्मेलन में एक स्मरण-पत्र प्रस्तुत किया। सन् 1988 ई० में नि:शस्त्रीकरण के लिए आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के तीसरे सत्र में भारत ने एक कार्ययोजना ‘परमाणु शस्त्रमुक्त और अहिंसक विश्व-व्यवस्था प्रस्तुत की थी।

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भारत परमाणु अप्रसार सन्धि (NPT) और व्यापक परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि (CTBT) का, उसकी भेदभावपूर्ण नीति के कारण दृढ़ता से विरोध करता रहा है। भारत ने अपने परमाणु कार्यक्रम को शान्तिपूर्ण उद्देश्यों और न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता बनाये रखने तक सीमित रखा है। भारत के इस दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए अमेरिका ने भारत के साथ सन् 2008 ई० में परमाणु ऊर्जा से सम्बन्धित एक समझौता किया, जिसका समर्थन परमाणु आपूर्ति कर्ता समूह (NSG) के 45 देशों ने भी किया। भारत अपने परमाणु विकल्प को तब तक छोड़ने पर सहमत नहीं है, जब तक कि अन्य परमाणु शस्त्र सम्पन्न राष्ट्र इसके लिए तैयार नहीं हो जाते।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गुट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? क्या यह वर्तमान परिस्थितियों में प्रासंगिक है? उदाहरण दीजिए। [2012, 14, 18]
उत्तर :
गुट-निरपेक्षता की नीति का उद्भव सन् 1961 ई० के बेलग्रेड सम्मेलन में हुआ था। इस सम्मेलन में भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू, इण्डोनेशिया के पूर्व राष्ट्रपति सुकर्णो, मिस्र के राष्ट्रपति गामेल अब्दुल नासिर तथा यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो ने सम्मिलित रूप से गुट-निरपेक्षता की नीति की घोषणा की थी और इस नीति में अपना पूर्ण विश्वास प्रकट किया था। यही इसके प्रवर्तक थे। इस नीति से आशय; विभिन्न देशों के गुटों से तटस्थ रहते (UPBoardSolutions.com) हुए अपनी स्वतन्त्र नीति को अपनाना तथा समस्त देशों की अखण्डता में विश्वास प्रकट करना है। इस नीति के अन्तर्गत किसी भी प्रकार के शोषण, साम्राज्यवाद, रंग-भेद, युद्ध अथवा सैनिक गुटबन्दी का कोई स्थान नहीं है।

वर्तमान में गुट-निरपेक्षता की नीति की प्रासंगिकता

वर्तमान में शीत युद्ध की स्थिति नहीं है। इस समय विश्व में एक ही महाशक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका है। इस बदली हुई स्थिति में कुछ लोग इस नीति की प्रासंगिकता पर सन्देह करते हैं, किन्तु ऐसी बात है नहीं। गुट-निरपेक्ष देशों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। यह इसके बढ़ते हुए महत्त्व का प्रतीक है। जर्मनी तथा नीदरलैण्ड तो इसके शिखर सम्मेलन में अतिथि देश के रूप में तथा चीन ने पर्यवेक्षक देश के रूप में भाग लिया। इन देशों का प्रयास है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में इनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण रहे। इस प्रकार गुट-निरपेक्षता की नीति वर्तमान में भी प्रासंगिक है।

प्रश्न 2.
रंगभेद से आप क्या समझते हैं?
या
रंग-भेद की नीति से कौन देश सबसे अधिक प्रभावित हुआ ? इसका तीव्र विरोध क्यों किया गया है? संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसके विरुद्ध जनपद निर्माण करने के लिए क्या कदम उठाये हैं ? [2013]
या
मानवाधिकार प्रत्येक मानव के लिए इतने अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों हैं ? संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकार का सार्वभौम घोषणा-पत्र कब निर्गत किया था ? [2013]
उत्तर :
रंगभेद-नीति एक अन्तर्राष्ट्रीय समस्या है। अंग्रेज लोग अश्वेत लोगों के साथ अमानवीय एवं बर्बर व्यवहार करते थे। यह मानवता के विरुद्ध था। अफ्रीकी देशों में इस समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया था। अफ्रीका महाद्वीप की यह प्रमुख समस्या है-जातिवाद अथवा गोरे-काले की। इस समस्या का उदय यूरोपीय शक्तियों द्वारा किया गया। उनके शासनकाल में यहाँ श्वेत लोग आकर बसे तथा प्रशासन एवं उच्चस्तरीय कार्य इन्हीं के हाथों में था। ये शासक थे, अत: स्थानीय निवासियों पर मनमाना अत्याचार करते तथा उनको दास समझते थे। यह क्रम उस समय तक चलता रहा जब तक उनका शासन था यद्यपि अनेक बार इसका विरोध किया गया। किन्तु यूरोपीय अपनी जातीय उच्चता की भावना के कारण स्थानीय जनता का शोषण करते रहे। आज जबकि यहाँ के देश स्वतन्त्र हैं फिर भी (UPBoardSolutions.com) जहाँ विदेशी हैं वहाँ यह समस्या वर्तमान है। इसके अतिरिक्त, यहाँ अनेक आदिवासी जातियाँ निवास करती हैं। उनका तथा शेष अफ्रीकियों में सामंजस्य करना इनके विकास के लिए अति आवश्यक है। यह समस्या द० रोडेशिया तथा द० अफ्रीका में उग्र रूप धारण कर चुकी है तथा वहाँ संघर्ष होता रहता है। अफ्रीकी राष्ट्रों ने एकजुट होकर संयुक्त राष्ट्रसंघ के मंच पर बार-बार यह मुद्दा उठाया और इनके साथ ‘मानव अधिकार’ का संदर्भ देकर इसे अन्तर्राष्ट्रीय अभिरुचि का विषय बना दिया। यही कारण था कि संयुक्त महासभा ने रंगभेद की नीति को 1973 में मानवता के प्रति अपराध’ घोषित किया तथा 1978 वर्ष को ‘रंगभेद विरोध वर्ष के रूप में मनाया गया।

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प्रश्न 3.
विश्व-शान्ति के लिए निःशस्त्रीकरण क्यों आवश्यक है ? किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिए। [2013]
उत्तर :
आधुनिक युग में निःशस्त्रीकरण की आवश्यकता आधुनिक आणविक युग में विश्व के राष्ट्रों के लिए नि:शस्त्रीकरण का मार्ग अपनाना श्रेयस्कर है, क्योंकि इसी रास्ते पर चलकर मानव की उपलब्धियों की रक्षा की जा सकती है। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं

1. विश्व-शान्ति की स्थापना के लिए- 
शस्त्रास्त्र नियन्त्रण में ही विश्व शान्ति निहित है। कोहन के
अनुसार, “नि:शस्त्रीकरण द्वारा राष्ट्रों के भय और मतभेद को कम करके शान्तिपूर्ण समझौतों की प्रक्रिया को सुविधापूर्ण तथा शक्तिशाली बनाया जा सकता है।” प्रो० शूमेन के अनुसार, “संघर्ष की आशंका ही शस्त्रीकरण की होड़ को जन्म देती है और युद्ध की सम्भावना से शस्त्रों में वृद्धि होती है। शस्त्रीकरण युद्ध मनोविज्ञान को जन्म देता है और उससे अविश्वास और भय की अभिव्यक्ति होती है। उससे समाज में एक ऐसे वर्ग का जन्म होता है जिसका युद्ध में निहित स्वार्थ होता है। (UPBoardSolutions.com) शस्त्रास्त्र आरम्भ में व्यापक भुखमरी पैदा करते हैं और अन्त में उसकी परिणति व्यापक हत्याओं में होती है।
2. आर्थिक हानि से बचने के लिए- जिस धन का प्रयोग गन्दी बस्तियों को खत्म करने तथा सभी निर्धनों के लिए आवासगृहों को बनाने में व्यय किया जा सकता था उसको उस युद्ध के लिए हथियार बनाने में खर्च किया जाता है, जिसे न लड़ने की कसम अनेक बार खायी जा चुकी है। इससे विश्व में भुखमरी तथा गरीबी बढ़ती है, जो अन्ततोगत्वा विश्व-शान्ति के लिए खतरा पैदा करते हैं। जब तक विश्व में भुखमरी तथा गरीबी है तब तक विश्व शान्ति की स्थापना करना कठिन है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गुट-निरपेक्षता के तीन सिद्धान्तों को लिखिए। [2014]
उत्तर :
गुट-निरपेक्षता के तीन सिद्धान्त निम्नलिखित हैं—

  • सैनिक गुटों से अलग रहना तथा महाशक्तियों के साथ समझौता न करना।
  • स्वतन्त्र विदेश नीति का निर्धारण करना।
  • साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध करना।

प्रश्न 2.
पंचशील सिद्धान्त के प्रवर्तक कौन थे ?
उत्तर :
पंचशील सिद्धान्त के प्रवर्तक पं० जवारूलाल नेहरू थे।

प्रश्न 3.
पंचशील समझौता किस-किसके बीच हुआ ?
उत्तर :
पंचशील समझौता भारत तथा चीन के बीच हुआ था।

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प्रश्न 4.
भारत द्वारा गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने के दो कारण लिखिए।
उत्तर :

  • भारत किसी भी शक्ति-शिविर में सम्मिलित नहीं होना चाहता था।
  • भारत का पंचशील के सिद्धान्तों में पूरा विश्वास था।

प्रश्न 5.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम सम्मेलन कब और कहाँ आयोजित हुआ ?
उत्तर:
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम सम्मेलन बेलग्रेड (यूगोस्लाविया) में सितम्बर, 1961 ई० में आयोजित हुआ था।

प्रश्न 6.
गुट-निरपेक्षता की त्रिमूर्ति से क्या आशय है ?
या
गुट-निरपेक्षता की चौकड़ी से क्या आशय है ? [2017]
या

गुट-निरपेक्षता की नीति का सूत्रपात करने वाले किन्हीं दो गैर-भारतीयों के नाम और उनके देशों का उल्लेख कीजिए। [2009]
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के जन्मदाताओं में से किन्हीं दो का नाम लिखिए। [2013]
उत्तर :
भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तावित गुट-निरपेक्षता की नीति का इण्डोनेशिया के पूर्व राष्ट्रपति सुकर्णो, मिस्र के राष्ट्रपति नासिर तथा यूगोस्लाविया के पूर्व राष्ट्रपति मार्शल टीटो ने समर्थन किया था। इन्होंने ही निर्गुट (UPBoardSolutions.com) आन्दोलन की नींव रखी थी। इन्हें ही गुट-निरपेक्षता की चौकड़ी समझना चाहिए। गुट-निरपेक्षता की त्रिमूर्ति से आशय जवाहरलाल नेहरू, मार्शल टीटो तथा अब्दुल नासिर से है।

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प्रश्न 7.
भारत की विदेश-नीति के उद्देश्य बताइट। [2015]
उत्तर :
भारतीय विदेश नीति के निम्न उद्देश्य हैं

  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की व्यवस्था में सकारात्मक सहयोग प्रदान करना।
  • साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का वैधानिक विरोध करना।
  • सैनिक गुटबन्दियों से अपने आपको अलग रखना।
  • सभी राष्ट्रों के साथ शान्तिपूर्ण व सम्मानपूर्वक सम्बन्ध स्थापित करना।
  • सैनिक गुटबन्दियों व समझौतों से अपने आपको सर्वथा (UPBoardSolutions.com) अलग रखना चाहिए।

बहुविकल्पीय

प्रश्न1. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के अब तक आयोजित शिखर सम्मेलनों की संख्या है

(क) 17
(ख) 16
(ग) 14
(घ) 13

2. 1961 ई० में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम शिखर सम्मेलन कहाँ हुआ? [2014, 16]
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का सर्वप्रथम शिखर सम्मेलन किस नगर में हुआ था? (2015, 16, 18]

(क) बेलग्रेड (यूगोस्लाविया) में
(ख) दिल्ली (भारत) में
(ग) काहिरा (मिस्र) में
(घ) हवाना (क्यूबा) में

3. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का सातवाँ शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था- [2011]

(क) हरारे में
(ख) जकार्ता में
(ग) नयी दिल्ली में
(घ) बेलग्रेड में

4. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का 14वाँ शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था- [2012]

(क) जकार्ता में
(ख) हरारे में
(ग) बेलग्रेड में
(घ) नयी दिल्ली में

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5, पंचशील समझौता कब हुआ?

(क) 1950 ई० में
(ख) 1960 ई० में
(ग) 1945 ई० में
(घ) 1954 ई० में

6. पंचशील के सिद्धान्त में निम्नलिखित में से कौन-सा सिद्धान्त शामिल है?

(क) अनाक्रमण
(ख) समानता एवं पारस्परिक लाभ
(ग) शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व
(घ) ये सभी

7. भारत की विदेश-नीति निम्नलिखित में से किसका समर्थन नहीं करती है? [2012]

(क) नि:शस्त्रीकरण ।
(ख) उपनिवेशवाद
(ग) गुट-निरपेक्षता
(घ) पंचशील

8. निम्नलिखित में से कौन गुट-निरपेक्ष आन्दोलन से सम्बन्धित नहीं है? [2013]

(क) मिस्र के नासिर
(ख) इण्डोनेशिया के सुकणों
(ग) भारत के जवाहरलाल नेहरू
(घ) चीन के चाऊ-एन-लाई

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9. वर्ष 2012 में गुट-निरपेक्ष शिखर सम्मेलन किस देश में आयोजित हुआ था ? [2013]

(क) भारत
(ख) पाकिस्तान
(ग) ईरान
(घ) बांग्लादेश

10. निम्नलिखित में से कौन-सा एक तत्त्व भारतीय विदेश-नीति का आधार नहीं है ? [2013]

(क) विश्व शान्ति की स्थापना में सहयोग
(ख) अन्तर्राष्ट्रीय कानून का पालन
(ग) उपनिवेशवाद का समर्थन
(घ) सैनिक गुटबन्दियों से पृथकता

11. निःशस्त्रीकरण आवश्यक है [2014]

(क) विश्व शान्ति के लिए
(ख) युद्ध रोकने के लिए
(ग) मानव संहार रोकने के लिए।
(घ) ये सभी

12. निम्नलिखित में से गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का अग्रदूत कौन था ? [2015, 17]

(क) मार्शल टीटो
(ख) जोसेफ स्टालिन
(ग) विंस्टन चर्चिल
(घ) फ्रेंकलिन रुजवेल्ट

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13. निम्नलिखित में से पंचशील सिद्धान्त के प्रतिपादक कौन थे ? [2015]

(क) जवाहरलाल नेहरू
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) सुभाषचन्द्र बोस
(घ) बी०आर० अम्बेडकर

14. ‘सह-अस्तित्व’ का सिद्धान्त निरूपित किया गया था (2017)

(क) संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में
(ख) पंचशील की घोषणा में
(ग) मानवाधिकारों की घोषणा में
(घ) भारतीय संविधान की उद्देशिका में

15. ‘डिस्कवरी ऑफ इण्डिया’ पुस्तक का लेखक कौन है? (2017)

(क) जवाहरलाल नेहरू
(ख) मौलाना अब्दुल कलाम आजाद
(ग) सुभाष चन्द्र बोस
(घ) महात्मा गाँधी

उत्तरमाला

1. (क), 2. (क), 3. (ग), 4. (ख), 5. (घ), 6. (घ), 7. (ख), 8. (घ), 9. (ग), 10. (ग), 11. (घ), 12. (क), 13. (क), 14. (ख), 15. (क)

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 3 (Section 2)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 3 राज्य सरकार (अनुभाग – दो)

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विधानसभा के संगठन तथा उसके अधिकारों की विवेचना कीजिए। [2011]
               या
अपने राज्य के विधानसभा के संगठन पर प्रकाश डालिए।
               या
विधानसभा की सदस्यता की क्या अर्हताएँ (योग्यताएँ) हैं ?
               या
विधानसभा के अध्यक्ष का निर्वाचन कैसे होता है? उसके कोई चार कार्य लिखिए। [2013]
               या
विधानसभा का निर्वाचन कैसे होता है? [2017]
               या
उत्तर प्रदेश की विधानसभा का गत चुनाव कब हुआ था? इसकी चुनाव प्रक्रिया का वर्णन कीजिए। [2018]
उत्तर :
उत्तर प्रदेश की विधानसभा का गत चुनाव 2017 में हुआ था। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 168 के अनुसार, प्रत्येक राज्य में एक विधानमण्डल होगा। कुछ राज्यों में विधानमण्डल के दो सदन हैं—विधानसभा (निम्न सदन) तथा (UPBoardSolutions.com) विधान-परिषद् (उच्च सदन)। विधानसभा के सदस्यों को एम० एल० ए० (Member of Legislative Assembly) तथा विधान परिषद् के सदस्यों को एम० एल० सी० (Member of Legislative Council) कहते हैं। कुछ राज्यों में केवल एक सदन होता है, जिसे विधानसभा कहते हैं।

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विधानसभा का संगठन

1. सदस्य संख्या– संविधान के अनुच्छेद 170 के अनुसार राज्यों की विधानसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 500 तथा न्यूनतम संख्या 60 होती है। किसी राज्य की विधानसभा के सदस्यों की वास्तविक संख्या का निर्धारण राज्य की जनसंख्या के आधार पर संसद द्वारा किया जाता है। कुछ स्थान अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए आरक्षित रखे जाते हैं। राज्यपाल आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व न होने की स्थिति (UPBoardSolutions.com) में इसके एक सदस्य को मनोनीत कर सकता है। उत्तर प्रदेश की विधानसभा के सदस्यों की संख्या वर्तमान में 403 निर्धारित की गयी है।

2. सदस्यों को निर्वाचन- 
विधानसभा के सदस्यों का निर्वाचन जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से वयस्क मताधिकार के आधार पर गुप्त मतदान रीति से होता है। वयस्क मताधिकार का अर्थ 18 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके नागरिकों (स्त्री व पुरुष) के मत देने के अधिकार से है।

3. सदस्यों की योग्यताएँ- 
विधानसभा का सदस्य बनने के लिए किसी स्त्री या पुरुष में इन योग्यताओं का होना आवश्यक है-

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • वह 25 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  • वह भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर न हो।
  • संसद द्वारा निर्धारित अन्य सभी शर्ते पूरी करता हो, किसी न्यायालय द्वारा उसे दण्डित न किया गया हो तथा वह पागल व दिवालिया न हो।

4. सदस्यों का कार्यकाल- विधानसभा का कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है, किन्तु राज्यपाल इस अवधि से पूर्व भी विधानसभा को भंग कराकर पुनः नये चुनाव करा सकता है। संकटकाल में विधानसभा की अवधि संसद द्वारा एक बार में एक वर्ष के लिए बढ़ाई जा सकती है।

5. पदाधिकारी –
विधानसभा के सदस्य अपने में से एक अध्यक्ष तथा एक उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं। अध्यक्ष का कार्य सदन की बैठकों की अध्यक्षता करना तथा कार्यवाही का संचालन करना है। अध्यक्ष की अनुपस्थिति में यही कार्य उपाध्यक्ष (UPBoardSolutions.com) करता है।

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विधानसभा के अधिकार/कार्य/शक्तियाँ

विधानसभा के प्रमुख अधिकार निम्नलिखित हैं-
1. विधायिनी अधिकार- विधानसभा का प्रमुख कार्य कानून बनाना है। इसे नये कानून बनाने, पुराने कानूनों में संशोधन करने तथा उन्हें रद्द करने का अधिकार है। राज्य सूची में दिये गये सभी विषयों पर इसे कानून बनाने का अधिकार है। समवर्ती सूची के विषयों पर भी यह कानून बना सकती है, किन्तु संसद द्वारा पारित कानून से विरोध हो जाने की स्थिति में केवल संसद द्वारा बनाया गया कानून ही मान्य होता है।

2. शासन सम्बन्धी अधिकार- 
राज्य के शासन की वास्तविक बागडोर मन्त्रिपरिषद् के हाथ में रहती है, किन्तु मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है; अर्थात् शासन पर वास्तविक नियन्त्रण विधानसभा का ही रहता है। विधानसभा के सदस्य मन्त्रियों से सम्बन्धित विषयों पर प्रश्न पूछकर, काम रोको प्रस्ताव द्वारा, अविश्वास प्रस्ताव पारित करके, विधेयकों को अस्वीकृत करके, बजट में कटौती करके तथा उनके कार्यों की जाँच करके मन्त्रिपरिषद् पर नियन्त्रण रखते हैं। मन्त्रिपरिषद् तभी तक अस्तित्व में बनी रह सकती है, जब तक कि उसे विधानसभा में बहुमत का विश्वास प्राप्त होता है।

3 वित्तीय अधिकार राज्य के आय- 
व्यय पर पूर्ण नियन्त्रण विधानसभा को ही प्राप्त होता है। नये कर लगाने, पुराने करों में वृद्धि करने, किसी कर को समाप्त करने तथा करों से प्राप्त आय को व्यय करने के लिए मन्त्रिपरिषद् को विधानमण्डल मुख्यत: विधानसभा से स्वीकृति लेना आवश्यक होता है। मन्त्रिपरिषद् द्वारा तैयार वार्षिक बजट के क्रियान्वयन के लिए विधानसभा की स्वीकृति अनिवार्य है। कुछ मदों को छोड़कर शेष (UPBoardSolutions.com) सभी मदों में कटौती करने या उसे अस्वीकार करने का विधानसभा को अधिकार है। इसकी स्वीकृति के बिना सरकार न तो कोई कर लगा सकती है और न ही राजकोष से एक पैसा खर्च कर सकती है।

4. अन्य अधिकार– 
विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों को निम्नलिखित अधिकार भी प्राप्त हैं|

  • राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेना।
  • राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन करना।
  • विधान-परिषद् के 1/3 सदस्यों का निर्वाचन करना।
  • विधान परिषद् की स्थापना अथवा उसकी समाप्ति के बारे में प्रस्ताव पास करना।
  • संविधान के संशोधन में भाग लेना।

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प्रश्न 2.
विधान-परिषद् का संगठन किस प्रकार होता है ? इसके कार्यों एवं अधिकारों का वर्णन कीजिए।
               या
विधानपरिषद् का गठा कैसे होता है ? इसे स्थायी सदन क्यों कहा जाता है ? [2013]
               या
उत्तर प्रदेश विधान-परिषद के गठन का वर्णन कीजिए। [2014]
               या
विधान-परिषद् की किन्हीं दो वित्तीय शक्तियों का उल्लेख कीजिए। [2015]
               या
अपने प्रदेश में विधान-परिषद् की रचना एवं उसके कार्यों का वर्णन कीजिए।[2016, 17]
               या
विधान-परिषद के सदस्यों की योग्यताओं का उल्लेख कीजिए। [2016, 18]
               या
अपने प्रदेश की विधानपरिषद के सदस्यों की संख्या कितनी होती है? इसका गठन कैसे होता है? इसकी विधायिनी (कानून-निर्माण सम्बन्धी) शक्तियों का वर्णन कीजिए। [2016]
               या
विधान-परिषद् में कानून-निर्माण की प्रक्रिया समझाइए। [2016]
उत्तर :

विधान-परिषद् का संगठन

‘विधान-परिषद् राज्य विधानमण्डल का द्वितीय या उच्च सदन है। यह एक स्थायी सदन है। विधान-परिषद् सभी राज्यों के विधानमण्डलों में नहीं है। इस समय केवल छः राज्यों-बिहार, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर तथा आन्ध्र प्रदेश में विधान (UPBoardSolutions.com) परिषद् की व्यवस्था है। वर्ष 2007 के चुनावों के पश्चात् आन्ध्र प्रदेश का विधानमण्डल भी दो सदनों वाला हो गया। इसके संगठन सम्बन्धी प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं

1. सदस्य-संख्या- विधान-परिषद् के सदस्यों की संख्या कम-से-कम 40 तथा अधिक-से-अधिक विधानसभा के सदस्यों की संख्या की 1/3 हो सकती है। जम्मू-कश्मीर राज्य के सम्बन्ध में एक विशेष व्यवस्था के अन्तर्गत वहाँ के विधान परिषद् के सदस्यों की संख्या 36 रखी गयी है।

2. सदस्यों का निर्वाचन एवं मनोनयन- 
विधान-परिषद् के सदस्यों का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से जनता नहीं करती, वरन् इसके सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से जनता के प्रतिनिधियों द्वारा इस प्रकार होता है-परिषद् के समस्त सदस्यों को 1/3 भाग राज्य के स्थानीय निकायों अर्थात् राज्य की नगर महापालिकाओं, जिला परिषदों, पंचायतों तथा अन्य स्थानीय स्वायत्त शासन की संस्थाओं द्वारा, 1/3 भाग राज्य की विधानसभा के सदस्यों द्वारा, 1/12 भाग स्नातकों द्वारा तथा 1/12 भाग शिक्षकों द्वारा पूरा किया जाता है। शेष 1/6 सदस्यों को राज्यपाल मनोनीत करता है। ये मनोनीत सदस्य ऐसे व्यक्ति होते हैं जिन्हें साहित्य, कला, विज्ञान और समाज-सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान प्राप्त होता है।

3. सदस्यों की योग्यताएँ- 
विधान-परिषद् का सदस्य बनने के लिए किसी व्यक्ति में इन योग्यताओं का होना अनिवार्य है-

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • उसकी आयु 30 वर्ष से कम न हो।
  • वह किसी सरकारी लाभ के पद पर न हो।
  • वह संसद द्वारा निर्धारित अन्य शर्ते पूरी करता हो।

4. सदस्यों का कार्यकाल- विधान परिषद् एक स्थायी सदन होता है तथा वह कभी भी पूर्ण रूप से भंग या समाप्त नहीं होता। किन्तु इसके 1/3 सदस्यों का कार्यकाल प्रति दो वर्ष बाद समाप्त हो जाता है। और उनके स्थान पर उतने ही नये सदस्य निर्वाचित कर लिये जाते हैं। इस प्रकार प्रत्येक सदस्य अपने पद पर 6 वर्ष तक बना रहता है।
5. पदाधिकारी- विधान-परिषद् के दो पदाधिकारी होते हैं-सभापति तथा (UPBoardSolutions.com) उपसभापति। दोनों का निर्वाचन विधान परिषद् के सदस्य अपने सदस्यों में से करते हैं। सभापति का कार्य सदन की बैठक की अध्यक्षता करना तथा उसकी कार्यवाही का संचालन करना होता है। सभापति की अनुपस्थिति में इन्हीं कार्यों को सम्पादन उपसभापति करता है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद उत्तर प्रदेश की विधानसभा से 22 सदस्य कम हो गये हैं तथा विधान-परिषद् के सदस्यों की संख्या 108 से घटकर 99 + 1 = 100 रह गयी है।

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विधान-परिषद् के कार्य एवं अधिकार

विधान-परिषद् के कार्य एवं अधिकार निम्नलिखित हैं-
1. विधायिनी अधिकार- विधान-परिषद् को कानून निर्माण सम्बन्धी अधिकार प्राप्त हैं। विधानसभा द्वारा पारित विधेयक  विधान परिषद् द्वारा पारित किये जाने पर ही राज्यपाल के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाता है।

2. वित्तीय अधिकार– 
विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को विधान परिषद् 14 दिन तक रोके रख सकती है। वह वित्त विधेयक में आवश्यक संशोधन भी कर सकती है। यह विधानसभा पर निर्भर करता है कि वह विधान-परिषद् की सिफारिशों को माने या नहीं। यदि परिषद् चौदह दिन के अन्दर विधेयक पर कोई निर्णय नहीं लेती, तो वह दोनों सदनों द्वारा स्वीकृत मान लिया जाता है।

3. कार्यपालिका सम्बन्धी अधिकार- 
विधान-परिषद् के सदस्य राज्य की मन्त्रिपरिषद् में सम्मिलित ।
हो सकते हैं। विधानपरिषद् मन्त्रिपरिषद् के कार्यों की आलोचना कर सकती है तथा सुझाव भी दे सकती है। इस प्रकार वह मन्त्रिपरिषद् पर नियन्त्रण रखती है।

4. सदस्यों के विशेषाधिकार- 
विधान-परिषद् के सदस्यों को निम्नलिखित विशेषाधिकार भी प्राप्त

  • सदन के नियमों का पालन करते हुए उन्हें सदन में भाषण देने का अधिकार है।
  • सदन में दिये गये भाषण के लिए उनके विरुद्ध किसी (UPBoardSolutions.com) न्यायालय में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
  • अधिवेशन के दिनों में उपस्थित किसी सदस्य को सभापति की आज्ञा के बिना गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

5. अन्य अधिकार- विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को विधान परिषद् तीन माह तक रोककर जनमत जानने का प्रयत्न कर सकती है।

राज्य विधानमण्डल में कानून निर्माण की प्रक्रिया

(i) साधारण विधेयक के सम्बन्ध में

  1. धन विधेयक से विभिन्न विधेयकों को विधानसभा या विधान-परिषद् दोनों में से किसी एक में प्रस्तुत किया जा सकता है।
  2. यदि विधेयक विधान-परिषद् में प्रस्तुत किया गया है तो वह विधानपरिषद् से पारित होने के पश्चात् विधानसभा को भेजा जाता है।
  3. यदि विधानसभा इस विधेयक को पारित कर देता है तो यह कानून बन जाता है और यदि विधेयक को अस्वीकार कर देती है तो यह विधेयक वहीं पर समाप्त हो जाता है।
  4. यदि विधेयक विधानसभा में प्रस्तुत किया जाता है तो वह विधानसभा से पारित होने के पश्चात् विधान परिषद् को भेजा जाता है।
  5. विधान परिषद् विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को यदि स्वीकार कर लेती है तो वह राज्यपाल की अनुमति से अधिनियम बन जाता है।
  6. यदि विधान-परिषद्, विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को
  • अस्वीकार कर देती है, या
  • संशोधनों सहित पारित करती है, या
  • विधेयक प्रेषित किये जाने के दिनांक से तीन मास के भीतर पारित करके वापस नहीं करती, तो विधानसभा ऐसे विधान परिषद् द्वारा पारित विधेयक को पुनः संशोधनों सहित या बिना संशोधन के पुनः

पारित करके विधान परिषद् को भेजती है, यदि विधान-परिषद् पुनः–

  • उसे स्वीकार कर लेती है, तो वह विधेयक राज्यपाल (UPBoardSolutions.com) की अनुमति से अधिनियम बन जाता है, लेकिन यदि
  • उसे अस्वीकार कर देती है, या
  • संशोधनों सहित पारित करती है, या
  • विधानसभा द्वारा प्रेषित किये जाने के एक मास तक विधेयक को पारित नहीं करती तो,
  • यह विधेयके उसी रूप में पारित समझा जाएगा जिस रूप में विधानसभा ने पारित किया था।

(ii) धन विधेयक के सम्बन्ध में ।

  • धन विधेयक केवल विधानसभा में ही प्रस्तुत किया जाता है, विधानपरिषद में नहीं।
  • विधानपरिषद् धन विधेयक को केवल चौदह (14) दिन तक रोक सकती है। चौदह दिन बाद वह स्वतः ही पारित समझा जाता है।
  • विधानसभा विधान-परिषद् के किसी भी संशोधन या सिफारिश को मानने के लिए बाध्य नहीं है। धन विधेयकों के विषय में विधानसभा को ही समस्त वास्तविक अधिकार हैं। अतः धन विधेयकों को लेकर विधानसभा तथा विधान-परिषद् में कोई गतिरोध उत्पन्न नहीं होता है।

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प्रश्न 3.
राज्य की मन्त्रिपरिषद् का गठन किस प्रकार होता है ? उसके प्रमुख कार्य क्या हैं ? [2010, 12]
               या
राज्य की मन्त्रिपरिषद् पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
               या
राज्य मन्त्रिपरिषद् का गठन कैसे होता है ? [2012]
               या
राज्य मन्त्रिपरिषद् के प्रमुख कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मन्त्रिपरिषद् का गठन राज्य की वास्तविक कार्यपालिका राज्य की मन्त्रिपरिषद् होती है। भारत के संविधान के अनुसार, राज्यपाल को सहायता तथा मन्त्रणा देने के लिए एक मन्त्रिपरिषद् होती है, जिसका प्रधान मुख्यमन्त्री होता है। मन्त्रिपरिषद् के गठन सम्बन्धी प्रमुख बातें अग्रवत् हैं

मन्त्रिपरिषद् का गठन– विधानसभा के चुनाव के बाद जिस दल का विधानसभा में बहुमत होता है, उस दल के नेता को राज्यपाल मुख्यमन्त्री नियुक्त करता है। मुख्यमन्त्री की सलाह से राज्यपाल अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है तथा उनके विभागों का वितरण करता है। यदि विधानसभा में किसी भी एक दल का बहुमत नहीं है तो राज्यपाल अपने विवेक से उसे मुख्यमन्त्री नियुक्त करता है जो विधानसभा के आधे से अधिक सदस्यों (UPBoardSolutions.com) का विश्वास प्राप्त कर सके तथा अपने द्वारा बनाये गये मन्त्रिपरिषद् का संचालन कर सके। राज्य के मन्त्रिपरिषद् में तीन स्तर के मन्त्री होते हैं-कैबिनेट मन्त्री, राज्यमन्त्री और उपमन्त्री। संविधान के अन्तर्गत यद्यपि मन्त्रियों की संख्या निश्चित नहीं की गयी है तथापि मन्त्रियों की संख्या (मुख्यमन्त्री सहित) विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15% से अधिक नहीं हो सकती।

मन्त्रियों की योग्यताएँ- मुख्यमन्त्री तथा अन्य मन्त्रियों को विधानमण्डल के किसी भी सदन का सदस्य होना आवश्यक है। यदि कोई मन्त्री किसी भी सदन का सदस्य नहीं है तो उसे मन्त्री बनने के छः महीने के अन्दर किसी-न-किसी सदन का सदस्य बन जाना चाहिए अन्यथा उसे मन्त्रि-पद से त्याग-पत्र देना पड़ेगा।

मन्त्रिपरिषद् का कार्यकाल-

  1. मन्त्रिपरिषद् तभी तक कार्यरत रहती है जब तक कि उसे विधानसभा का विश्वास प्राप्त होता है। यदि विधानसभा मन्त्रिपरिषद् के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पारित कर दे तो उसे अपने पद से हटना पड़ेगा।
  2. मुख्यमन्त्री या कोई मन्त्री अपनी इच्छानुसार त्याग-पत्र देकर अपने पद से अलग हो सकता है। मुख्यमन्त्री द्वारा त्याग-पत्र दिये जाने पर समस्त मन्त्रिपरिषद् का कार्यकाल समाप्त हो जाता है।
  3. यदि राज्य का शासन संविधान के अनुसार नहीं चल रहा हो तो राज्यपाल अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजकर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किये जाने की सिफारिश कर सकता है।

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मन्त्रिपरिषद् के कार्य

संविधान के अन्तर्गत राज्यपाल को जो शासन सम्बन्धी शक्तियाँ प्रदान की गयी हैं, व्यवहार में उनका प्रयोग मन्त्रिपरिषद् द्वारा ही किया जाता है। मन्त्रिपरिषद् राज्यपाल के नाम से राज्य का शासन चलाती है। शासन के संचालन हेतु उसे निम्नलिखित कार्य करने होते हैं

1. राज्यपाल को सलाह तथा सहायता प्रदान करना– 
संविधान के अनुसार मन्त्रिपरिषद् के संगठन का एकमात्र उद्देश्य राज्यपाल के कार्यों के निर्वाह में उसे सहायता तथा सलाह देना है।

2. शासन सम्बन्धी नीति का निर्धारण- 
मन्त्रिपरिषद् का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य शासन सम्बन्धी नीति को निर्धारित करना है। इन नीतियों की पुष्टि मन्त्रिपरिषद् विधानमण्डल से कराती है।

3. प्रशासन सम्बन्धी कार्य- 
राज्य का समस्त प्रशासन अनेक विभागों में बँटा होता है तथा प्रत्येक विभाग का भार एक मन्त्री को सौंप दिया जाता है। विधानमण्डल में पूछे गये प्रश्नों का उत्तर साधारणतया सम्बन्धित विभाग का मन्त्री देता है। वैसे मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से ही विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।

4. कानूनों का निर्माण– 
प्रत्येक मन्त्री अपने विभाग सम्बन्धी विधेयक तैयार कराकर उसे पारित कराने के लिए विधानमण्डल में प्रस्तुत करता है। विधेयक के पारित हो जाने पर वह कानून को रूप धारण कर लेता है, जिसे लागू करवाने का कार्य मन्त्रिपरिषद् करती है।

5. वित्त सम्बन्धी कार्य- 
वित्तीय वर्ष प्रारम्भ होने से पूर्व, पूर्ण वर्ष का आय-व्यय का बजट तैयार करना और उसे विधानमण्डल के समक्ष प्रस्तुत करके उसे पारित करवाने का काम राज्य का वित्त मन्त्री करता है।

6. विभागों के कार्यों में समन्वय- 
विभिन्न प्रशासनिक विभागों में परस्पर झगड़े उत्पन्न हो जाने की स्थिति में मन्त्रिपरिषद् उनका निपटारा करती है।

7. नियुक्तियों सम्बन्धी राज्यपाल का परामर्श- 
लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य, महाधिवक्ता, विश्वविद्यालयों के कुलपतियों आदि जिन उच्च पदों पर राज्यपाल को नियुक्ति करने का अधिकार है उन सभी पदों पर वह नियुक्तियाँ मन्त्रिपरिषद् के परामर्श (UPBoardSolutions.com) से करता है।

8. सूचना देना– 
मन्त्रिपरिषद् अपनी नीतियों तथा कार्यों के बारे में राज्यपाल को समय-समय पर सूचना | देती रहती है। राज्यपाल स्वयं कोई भी प्रशासनिक जानकारी मन्त्रिपरिषद् से प्राप्त कर सकता है।

9. जनमत तैयार करना- 
मन्त्रियों का यह भी कर्तव्य है कि वे सरकारी नीतियों के पक्ष में जनमत तैयार | करें। इसके लिए मन्त्री राज्य के दौरे तथा सरकारी नीतियों का प्रचार करते हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मन्त्रिपरिषद् ही राज्य की वास्तविक कार्यपालिका है। शासन-सम्बन्धी सम्पूर्ण कार्यवाही इन्हीं मन्त्रियों के द्वारा सम्पन्न की जाती है। इसलिए राज्य की वास्तविक शक्ति इसी के हाथ में होती है। मात्र विधानसभा ही इस पर अपना अंकुश रख सकती है।

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प्रश्न 4.
राज्यपाल की नियुक्ति किस प्रकार होती है ? उसके प्रमुख कार्यों/अधिकारों (शक्तियों) का वर्णन कीजिए। [2010, 12]
               या
राज्यपाल के अधिकारों पर प्रकाश डालिए। दो उदाहरण दीजिए। [2015, 16]
               या
राज्यपाल की विधायी शक्तियों का उल्लेख कीजिए।[2010]
               या
राज्यपाल के पद के लिए क्या-क्या योग्यताएँ निर्धारित की गई हैं?
               या
राज्यपाल को न्यायिक क्षेत्र में क्या अधिकार प्राप्त हैं?
राज्यपाल के तीन अधिकारों के विषय में लिखिए। [2017, 18]
उत्तर :

राज्यपाल की नियुक्ति

राज्यपाल राज्य की कार्यपालिका का मुखिया होता है। राज्य की समस्त कार्यकारी शक्तियाँ राज्यपाल में निहित होती हैं तथा राज्य का प्रशासन उसी के नाम से चलता है। संविधान के अनुसार, प्रत्येक राज्य के लिए अथवा दो या अधिक राज्यों के लिए एक राज्यपाल होता है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 155 के अनुसार, “राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति अधिकार-पत्र पर अपने हस्ताक्षर और सील लगाकर करेगा। इस प्रकार राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है, किन्तु व्यवहार में राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की सलाह पर राज्यपाल की नियुक्ति करता है।
कार्यकाल-राज्यपाल का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, किन्तु यदि राष्ट्रपति चाहे तो वह इस अवधि से पूर्व भी राज्यपाल को हटा सकता है।
योग्यताएँ–केवल वही व्यक्ति राज्यपाल के पद पर नियुक्त किया जा सकता है, जिसमें निम्नलिखित योग्यताएँ होती हैं

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • उसकी आयु 35 वर्ष से कम न हो।
  • वह संसद या विधानमण्डल के किसी भी सदन का सदस्य न हो। यदि ऐसा कोई व्यक्ति राज्यपाल नियुक्त हो जाता है तो उसे पद-ग्रहण करने से पूर्व सम्बन्धित संसद या विधानमण्डल की सदस्यता से त्याग-पत्र देना होगा।
  • वह किसी लाभ के पद पर न हो।
  • वह उस राज्य का निवासी न हो जिस राज्य को वह (UPBoardSolutions.com) राज्यपाल नियुक्त किया जा रहा है।
  • वह किसी न्यायालय द्वारा दण्डित न किया गया हो।

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राज्यपाल के अधिकार/कार्य/शक्तियाँ

राज्य के शासन एवं सुव्यवस्था का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व राज्यपाल पर होता है। इस दायित्व को पूरा करने के लिए संविधान के अन्तर्गत उसे निम्नलिखित अधिकार दिये गये हैं
1. कार्यपालिका सम्बन्धी अधिकार- कार्यपालिका का प्रधान होने के कारण राज्यपाल को कार्यपालिका सम्बन्धी निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हैं

  • राज्य के शासन सम्बन्धी कार्य राज्यपाल के नाम से किये जाते हैं।
  • राज्यपाल मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करता है तथा मुख्यमन्त्री की सलाह से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है एवं उनके विभागों का वितरण करता है।
  • वह मुख्यमन्त्री के परामर्श पर राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य, महाधिवक्ता, विश्वविद्यालयों के कुलपतियों आदि की नियुक्तियाँ करता है।
  • वह मुख्यमन्त्री से शासन सम्बन्धी कोई भी सूचना माँग सकता है।
  • यदि राज्य का शासन संविधान के अनुसार नहीं चल रहा हो तो राज्यपाल अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजकर राज्य में राष्ट्रपति शासन के लागू किये जाने की सिफारिश कर सकता है।

2. कानून निर्माण (विधायी) सम्बन्धी अधिकार –

  • राज्यपाल को विधानमण्डल के अधिवेशन को बुलाने, स्थगित करने तथा विधानसभा को अवधि से पहले भंग करने का अधिकार है।
  • राज्यपाल को विधानमण्डल के एक सदन या दोनों सदनों को संयुक्त रूप से सम्बोधित करने तथा लिखित सन्देश भेजने का अधिकार है।
  • विधानमण्डल द्वारा पारित कोई भी विधेयक राज्यपाल (UPBoardSolutions.com) के हस्ताक्षर के बिना कानून नहीं बन सकता। कुछ विधेयकों को वह राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकता है। जब विधानमण्डल का अधिवेशन न चल रहा हो तब राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने का अधिकार है, जो विधानमण्डल की बैठक आरम्भ होने के छ: सप्ताह तक ही लागू रह सकता है।
  • राज्य विधान-परिषद् की कुल संख्या के 1/6 सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार है, जिन्हें साहित्य, कला, विज्ञान, समाज-सेवा, सहकारिता के क्षेत्र में निपुणता प्राप्त हो।
  • राज्यपाल को ऐंग्लो इण्डियन समुदाय का एक सदस्य मनोनीत करने का तथा अध्यक्ष- उपाध्यक्ष की खाली जगह पर नियुक्ति करने का अधिकार भी है।

3. वित्तीय अधिकार- राज्यपाल को निम्नलिखित वित्तीय अधिकार प्राप्त हैं

  • विधानमण्डल के समक्ष राज्यपाल के नाम से वित्तमन्त्री राज्य का बजट प्रस्तुत करता है।
  • राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति के बिना कोई भी वित्त विधेयक सदन में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
  • वह आकस्मिक निधि में से सरकार को खर्च के लिए धन दे सकता है।

4. न्याय सम्बन्धी अधिकार|

  • राज्यपाल उच्च न्यायालय के परामर्श से अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीशों तथा जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है। |
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति उस राज्य के राज्यपाल से भी | परामर्श करता है।
  • राज्य विधानमण्डल द्वारा बनाये गये कानूनों को तोड़ने वाले अपराधियों की सजा को (मृत्युदण्ड के अतिरिक्त) माफ कर सकता है, कम कर सकता है तथा बदल सकता है।

5. अन्य अधिकार

  • विधानसभा में किसी भी दले का स्पष्ट बहुमत न होने पर वह अपने विवेक से मुख्यमन्त्री की | नियुक्ति करता है।
  • संकट काल में वह राज्य के शासन का संचालन अपने विवेक से करता है।

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प्रश्न 5. राज्य शासन में राज्यपाल का क्या महत्त्व है? राज्यपाल तथा मुख्यमन्त्री के सम्बन्धों का वर्णन कीजिए। [2011]
               या
राज्य शासन में राज्यपाल का क्या महत्त्व है ? [2013]
उत्तर :
राज्यपाल की स्थिति एवं महत्त्व राज्यपाल को अपने राज्य के शासन-तन्त्र को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए पर्याप्त अधिकार दिये। गये हैं। राज्यपाल को स्व-विवेक के आधार पर प्रयुक्त शक्तियाँ भी प्राप्त हैं। विधानसभा में किसी दल का स्पष्ट बहुमत न होने पर तथा संविधान की विफलता की स्थिति में भी उसे स्वविवेकी अधिकार प्राप्त हैं। अतः इस स्थिति में वह अपनी वास्तविक शक्ति का उपयोग करता है। संकटकाल की स्थिति में वह केन्द्रीय सरकार के अभिकर्ता (Agent) के रूप में कार्य करता है। इस स्थिति में वह अपनी वास्तविक स्थिति का प्रयोग कर सकता है।

इस पर भी वह केवल वैधानिक अध्यक्ष ही होता है। वास्तविक कार्यपालिका शक्तियाँ तो राज्य की मन्त्रिपरिषद् में निहित होती हैं। राज्यपाल बाध्य है कि वह मन्त्रिपरिषद् के परामर्श से ही कार्य करे। जब तक राज्यपाल मन्त्रिपरिषद् के परामर्श पर कार्य (UPBoardSolutions.com) करता है और विधानमण्डल के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी मन्त्रिमण्डल को उसके शासन-कार्य में सहायता तथा परामर्श देता है, तब तक उनके लिए राज्यपाल के परामर्श की अवहेलना करने की बहुत ही कम सम्भावना है। महाराष्ट्र के भूतपूर्व राज्यपाल (स्वर्गीय) श्रीप्रकाश ने कहा था कि “मुझे पूरा विश्वास है कि संवैधानिक राज्यपाल के अतिरिक्त मुझे कुछ नहीं करना होगा।” इस प्रकार राज्यपाल का पद शक्ति व अधिकार का नहीं, वरन् सम्मान व प्रतिष्ठा का है।

राज्य प्रशासन में राज्यपाल की स्थिति बहुत महत्त्वपूर्ण है। वह राज्य के विभिन्न हितों और दलों के विवादों को मध्यस्थ बनकर दूर करता है। यदि राज्य के शासन द्वारा संविधान का उल्लंघन किया जाए तो राज्यपाल उसकी सूचना तुरन्त राष्ट्रपति को दे सकता है। राज्यपाल के पद का महत्त्व संवैधानिक भी है और परम्परागत भी। इस पद का महत्त्व राज्यपाल के व्यक्तित्व पर निर्भर करता है।

राज्यपाल और मुख्यमंत्री (मन्त्रिपरिषद्) का सम्बन्ध

संविधान के अनुच्छेद 164 में कहा गया है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा तथा राज्यपाल के प्रासादपर्यन्त मंत्रीगण अपना पद धारण करेंगे। परन्तु वास्तविकता यह है कि राज्यपाल विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को ही मुख्यमंत्री बनने व सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करता है। राज्य की कार्यपालिका में राज्यपाल और मन्त्रिपरिषद् दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, अत: दोनों में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है

  • मुख्यमंत्री की सलाह पर ही राज्यपाल अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है।
  • राज्यपाल राज्य में नाममात्र का शासक है और मन्त्रिपरिषद् वास्तविक शासक है।
  • राज्यपाल प्रत्येक दशा में मन्त्रिपरिषद् की सलाह को मानने के लिए बाध्य है।
  • राष्ट्रपति शासन के समय राज्यपाल राज्य में वास्तविक शासक हो जाता है।

अनुच्छेद 167 के अनुसार राज्य के मुख्यमंत्री का यह कर्तव्य है कि राज्य प्रशासन से सम्बन्धित मन्त्रिपरिषद् के सभी निर्णयों और विचाराधीन विधेयकों की सूचना राज्यपाल को दे। राज्यपाल इस सम्बन्ध में अन्य
आवश्यक जानकारी माँग सकता है। इस प्रकार राज्य प्रशासन की वास्तविक शक्ति राज्यपाल के हाथ में न होकर मन्त्रिपरिषद्, अर्थात् मुख्यमंत्री के हाथ में होती है।

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प्रश्न 6.
मुख्यमन्त्री का चयन कैसे होता है ? मुख्यमन्त्री के प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए। [2011]
               या
राज्य के मुख्यमन्त्री की नियुक्ति किस प्रकार की जाती है? सम्पूर्ण प्रक्रिया समझाइट। [2013, 14]
या

मुख्यमन्त्री के अधिकार और कार्यों का वर्णन कीजिए। राज्य के शासन में उसका क्या महत्त्व है ?
               या
किसी राज्य के मुख्यमन्त्री की नियुक्ति किस प्रकार की जाती है ? राज्य के प्रशासन में उसकी भूमिका की व्याख्या कीजिए। [2013, 16]
               या
मुख्यमंत्री के कार्यों को लिखिए। [2011]
उत्तर :

मुख्यमन्त्री का चयन

राज्य की विधानसभा के चुनाव के बाद जिस दल का विधानसभा में बहुमत होता है उस दल के नेता को राज्यपाल मुख्यमन्त्री नियुक्त करती है। किसी भी एक दल का बहुमत न होने पर दो या दो से अधिक दलों के संयुक्त नेता को मुख्यमन्त्री नियुक्त किया जाता है। (UPBoardSolutions.com) जब किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता तो राज्यपाल अपने विवेक का प्रयोग करके किसी भी ऐसे दल के नेता को मुख्यमन्त्री नियुक्त कर सकता है, जो विधानसभा में अपना बहुमत सिद्ध करने में सक्षम हो। राज्यपाल मुख्यमन्त्री को पद की गोपनीयता तथा विश्वसनीयता की शपथ दिलाता है। फिर मुख्यमन्त्री की सलाह से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है।

योग्यता- मुख्यमन्त्री के लिए विधानमण्डल के किसी भी सदन का सदस्य होना अनिवार्य है। यदि वह पद पर नियुक्ति के समय किसी भी सदन का सदस्य नहीं है तो उसे छ: माह के अन्दर किसी भी सदन का सदस्य बनना आवश्यक है अन्यथा उसे अपने पद से त्याग-पत्र देना पड़ेगा।

कार्यकाल- मुख्यमन्त्री उसी समय तक अपने पद पर रह सकता है, जब तक उसे विधानसभा का विश्वास प्राप्त हो। इसके अतिरिक्त, वह अपनी इच्छानुसार कभी भी त्याग-पत्र देकर अपने पद से अलग हो सकता है।

मुख्यमन्त्री के कार्य तथा अधिकार

मुख्यमन्त्री के प्रमुख कार्य और अधिकार निम्नलिखित हैं –
1. मन्त्रिपरिषद् का गठन- मुख्यमन्त्री का प्रथम महत्त्वपूर्ण कार्य अपने मन्त्रिपरिषद् का गठन करना होता है। मुख्यमन्त्री मन्त्रियों की सूची राज्यपाल के सम्मुख प्रस्तुत करता है और राज्यपाल मन्त्रियों को शपथ दिलाता है। मन्त्रियों की संख्या का निर्धारण भी मुख्यमन्त्री ही करता है।

2. विभागों का वितरण- मुख्यमन्त्री की सलाह से राज्यपाल मन्त्रियों के मध्य विभागों तथा राज्य के अन्य कार्यों का वितरण करता है।

3. नियुक्ति सम्बन्धी अधिकार- 
राज्यपाल को अनेक उच्च पदाधिकारियों की नियुक्ति करने का अधिकार होता है; जैसे-कुलपति, महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य आदि की नियुक्ति। वास्तव में इस अधिकार का प्रयोग मुख्यमन्त्री ही करता है, क्योंकि राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह से ही इन पदाधिकारियों की नियुक्ति करता है।

4. नीति-निर्धारण का अधिकार- 
राज्य की शासन-नीति तथा अन्य महत्त्वपूर्ण विषयों सम्बन्धी नीतियों को निर्धारित करने का अधिकार मुख्यमन्त्री को ही होता है।

5. शासन-व्यवस्था का स्वामी- 
संवैधानिक दृष्टि से राज्य की शासन-व्यवस्था का स्वामी राज्यपाल होता है, किन्तु व्यावहारिक दृष्टि से राज्य के समस्त शासन-तन्त्र का स्वामी मुख्यमन्त्री होता है। वह विभिन्न मन्त्रालयों पर नियन्त्रण रखता है तथा विभागों के मध्य मतभेद (UPBoardSolutions.com) होने पर उनमें समझौता कराता है। अन्य मन्त्रियों के लिए सभी महत्त्वपूर्ण विषयों पर मुख्यमन्त्री से परामर्श लेना आवश्यक होता है। इस प्रकार राज्य की कार्यपालिका का वास्तविक प्रमुख मुख्यमन्त्री ही होता है।

6. विभागों में समन्वय– 
मुख्यमन्त्री का एक प्रमुख कार्य शासन के सभी विभागों में समन्वय स्थापित | करना है, जिससे सभी विभाग एक इकाई के रूप में कार्य करें।

7. मन्त्रिमण्डल का सभापति– 
मुख्यमन्त्री राज्य के मन्त्रिमण्डल (Cabinet) का अध्यक्ष होता है। वह मन्त्रिमण्डल की सभाओं (बैठकों) का सभापतित्व करता है। यदि कोई मन्त्री मुख्यमन्त्री से सहमत नहीं ह्येता तो उसे त्याग-पत्र देना पड़ता है।

8. विधानसभा का नेता मुख्यमन्त्री राज्य की शासन-
व्यवस्था का प्रमुख होने के साथ-साथ विधानसभा का नेता भी होता है। उसके परामर्श से ही राज्यपाल द्वारा विधानसभा के अधिवेशन बुलाये जाते हैं। वह दोनों सदनों में सरकार को अधिकृत वक्ता होता है।

9. राज्यपाल का सलाहकार –
राज्यपाल का प्रमुख परामर्शदाता मुख्यमन्त्री ही होता है। वही
मन्त्रिपरिषद् के निर्णयों से राज्यपाल को अवगत कराता है तथा राज्यपाल के सन्देशों को मन्त्रियों तक पहुंचाता है। इस प्रकार वह राज्यपाल तथा मन्त्रिपरिषद् के मध्य एक कड़ी के रूप में कार्य करता है। मुख्यमन्त्री राज्यपाल को विधानसभा भंग करने की सलाह भी दे सकता है।

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राज्य के शासन में महत्त्व

केन्द्र में जो स्थिति प्रधानमन्त्री की होती है राज्य में वही स्थिति मुख्यमन्त्री की होती है। प्रधानमन्त्री का कार्यक्षेत्र समूचा देश होता है, किन्तु मुख्यमन्त्री केवल अपने राज्य की सीमा के अन्दर ही कार्य करता है। राज्य के शासन में मुख्यमन्त्री के महत्त्व को निम्नलिखित रूप में आसानी से समझा जा सकता है|

1.
राज्य की शासन-व्यवस्था में वास्तविक कार्यपालिका मन्त्रिपरिषद् होती है और मुख्यमन्त्री राज्य की मन्त्रिपरिषद् का अध्यक्ष तथा नेता होता है। इस प्रकार मन्त्रिपरिषद् यदि राज्य के शासन की नौका है तो मुख्यमन्त्री उसका नाविक। (UPBoardSolutions.com) वह मन्त्रिपरिषद् की बैठकों की अध्यक्षता तथा उसकी कार्यवाही का
संचालन करता है। मन्त्रिपरिषद् के निर्णय उसकी इच्छा से प्रभावित होते हैं।

2. राज्यपाल द्वारा मन्त्रियों की नियुक्ति तथा उनमें विभागों का वितरण मुख्यमन्त्री की इच्छानुसार ही किया जाता है। वह जब चाहे किसी भी मन्त्री से त्याग-पत्र माँग सकता है। मन्त्री द्वारा त्याग-पत्रे न दिये जाने | पर, मुख्यमन्त्री के परामर्श पर, राज्यपाल मन्त्री को उसके पद से हटा देता है।

3.
मुख्यमन्त्री ही मन्त्रिपरिषद् के निर्णयों तथा प्रशासनिक कार्यों की सूचना समय-समय पर राज्यपाल कोदेता रहता है।

4.
राज्य विधानमण्डल में भी मुख्यमन्त्री को विशेष स्थान प्राप्त होता है। वह विधानसभा का नेता होता है।
और सरकार की नीतियों का स्पष्टीकरण करता है।

5.
मुख्यमन्त्री, राज्यपाल और मन्त्रिपरिषद् तथा विधानमण्डल एवं मन्त्रिपरिषद् के बीच सम्पर्क बनाये . रखने वाली एक कड़ी का कार्य करता है।

संक्षेप में, राज्य के शासन में मुख्यमन्त्री की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा निर्णायक होती है। राज्य प्रशासन में सर्वेसर्वा होने के बावजूद मुख्यमन्त्री तानाशाह नहीं बन सकता, क्योंकि उसकी शक्तियों पर कई प्रतिबन्ध होते हैं; जैसे–संवैधानिक नियमों का प्रतिबन्ध, केन्द्रीय सरकार का नियन्त्रण, राज्यपाल का प्रतिबन्ध, विरोधी दलों का प्रतिबन्ध तथा जनमत का भय।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विधानसभा तथा विधान-परिषद् की निर्वाचन पद्धति में क्या अन्तर है ?
उत्तर :
विधानसभा के सदस्यों का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर गुप्त रीति से होता है। विधान परिषद् के सदस्यों का निर्वाचन जनता प्रत्यक्ष रूप से नहीं करती, वरन् समस्त सदस्यों का 1/3 भाग राज्य के स्थानीय निकायों के द्वारा, 1/3 भाग राज्य की विधानसभा के सदस्यों द्वारा, 1/12 भाग राज्य के स्नातकों द्वारा तथा 1/12 भाग राज्य के शिक्षकों द्वारा किया जाता है। शेष 1/6 सदस्यों को राज्यपाल मनोनीत करता है। ये ऐसे व्यक्ति होते हैं जिन्हें साहित्य, कला, विज्ञान और समाजसेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान प्राप्त होता है।

प्रश्न 2.
विधान-परिषद् की उपयोगिता का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
विधान-परिषद्, विधानसभा की तुलना में एक कमजोर सदन है। कानून-निर्माण के क्षेत्र में साधारण विधेयक राज्य विधानमण्डल के किसी भी सदन में प्रस्तावित किये जा सकते हैं तथा वे विधेयक दोनों सदनों द्वारा स्वीकृत होने चाहिए। साथ ही यदि कोई विधेयक विधानसभा से पारित होने के बाद विधान-परिषद् द्वारा अस्वीकृत कर दिया जाता है या परिषद् विधेयक में ऐसे संशोधन करती है, जो विधायकों को स्वीकार्य नहीं होते या परिषद् के समक्ष विधेयक रखे (UPBoardSolutions.com) जाने की तिथि से तीन माह तक विधेयक पारित नहीं किया जाता है तो विधानसभा उस विधेयक को संशोधन सहित या संशोधन के बिना विधानमण्डल द्वारा पुनः पारित करके विधान परिषद् को भेजती है। इस बार विधान-परिषद् विधेयक को स्वीकृत करे या न करे अथवा ऐसे संशोधन पेश करे, जो विधानसभा को स्वीकार न हों तो भी यह विधेयक एक माह बाद विधान-परिषद् द्वारा स्वीकृत मान लिया जाता है।

विधान परिषद् प्रश्नों, प्रस्तावों तथा वाद-विवाद के आधार पर मन्त्रिपरिषद् के विरुद्ध जनमत तैयार करके उसको नियन्त्रित कर सकती है, किन्तु उसे मन्त्रिपरिषद् को पदच्युत करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि कार्यपालिका केवल विधानसभा के प्रति ही उत्तरदायी होती है।

वित्त विधेयक केवल विधानसभा में ही प्रस्तावित किये जाते हैं, विधान परिषद् में नहीं। विधानसभा किसी वित्त विधेयक को पारित कर स्वीकृति के लिए विधान परिषद के पास भेजती है तो विधान-परिषद या तो 14 दिन के अन्दर ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर सकती है या फिर अपनी सिफारिशों सहित विधानसभा को वापस लौटा सकती है। यह विधानसभा पर निर्भर है कि वह विधान-परिषद् की सिफारिशों को माने या नहीं। यदि परिषद् 14 दिन के अन्दर विधेयक पर कोई निर्णय नहीं लेती तो वह दोनों सदनों द्वारा स्वीकृत मान । लिया जाता है।

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प्रश्न 3.
विधानसभा तथा विधान-परिषद् के सम्बन्धों की विवेचना कीजिए। [2006]
उत्तर :
भारत में वर्तमान समय में मात्र छ: राज्यों में विधानमण्डल में दो सदन हैं और शेष में एक। द्वि-सदनीय विधानमण्डल में निम्न सदन को विधानसभा और उच्च सदन को विधान-परिषद् कहते हैं। विधानसभा विधान परिषद् की अपेक्षा अधिक समर्थ एवं अधिकारसम्पन्न होती है। यह निम्नलिखित शीर्षकों के आधार पर स्पष्ट होता है–

1. वित्तीय क्षेत्र में –
वित्तीय विधेयक केवल विधानसभा में ही प्रस्तुत किये जा सकते हैं, विधानपरिषद् में नहीं; किन्तु विधान परिषद् की राय जानने के लिए ये विधेयक उसके पास भेजे अवश्य जाते हैं, परन्तु विधेयक पर परिषद् द्वारा दी गयी (UPBoardSolutions.com) राय मानने के लिए विधानसभा बाध्य नहीं है। चौदह दिन के अन्दर विधान-परिषद् को अपनी राय भेज देनी होती है। यदि इस अवधि में वह अपनी राय नहीं भेजता है तो भी विधेयक उसके द्वारा स्वीकृत माना जाता है। इस प्रकार वित्तीय क्षेत्र में विधानसभा शक्तिशाली है और विधान-परिषद् विधेयक को मात्र 14 दिन के लिए विलम्बित कर सकती है।

2. विधायिनी क्षेत्र में- 
साधारण विधेयक राज्य विधानमण्डल के किसी भी सदन में प्रस्तावित किये जा सकते हैं, परन्तु ये विधेयक दोनों सदनों द्वारा स्वीकृत होने चाहिए। जब कोई साधारण विधेयक विधानसभा द्वारा स्वीकृत हो जाता है, तब उस पर विधान परिषद् की स्वीकृति लेने के लिए उसे विधान परिषद् के पास भेजा जाता है। यदि विधान-परिषद् द्वारा विधेयक रखे जाने की तिथि से तीन माह तक उसे पारित न किया जाए तो विधानसभा पुन: इसे पारित करके विधान परिषद् में भेजती है। इस बार भी यदि विधान-परिषद् इसे अस्वीकृत करती है या उसे संशोधित करती है या एक महीने तक उस पर कोई निर्णय नहीं लेती है तो ऐसी स्थिति में साधारण विधेयक स्वीकृत मान लिया जाता है और उसे राज्यपाल के पास हस्ताक्षर हेतु भेज दिया जाता है। इस प्रकार विधान-परिषद् साधारण विधेयक को चार माह तक विलम्बित अवश्य कर सकती है; किन्तु उसे पारित होने से नहीं रोक सकती।

3. कार्यपालिका के क्षेत्र में – सम्पूर्ण मन्त्रिपरिषद् विधानसभा के प्रति ही सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। विधान परिषद् मन्त्रिपरिषद् के सदस्यों से प्रश्न एवं पूरक-प्रश्न पूछ सकती है, उनकी आलोचना कर सकती है; किन्तु उसे मन्त्रिपरिषद् के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव रखने का अधिकार (UPBoardSolutions.com) नहीं है। वास्तव में विधानसभा को ही मन्त्रिपरिषद् पर नियन्त्रण रखने का अधिकार प्राप्त होता है और यही उसके विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पारित कर सकती है।

प्रश्न 4.
राज्य विधानमण्डल के किन्हीं दो अधिकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
राज्य विधानमण्डल के दो अधिकारों का संक्षिप्त वर्णन निम्नानुसार है-

1.
वित्तीय अधिकार- विधानमण्डल को राज्य के वित्त पर पूर्ण नियन्त्रण प्राप्त होता है। विधानसभा द्वारा आय-व्यय वार्षिक बजट स्वीकृत होने पर ही शासन द्वारा आय-व्यय से सम्बन्धित किसी कार्य को किया जा सकता है। विधानमण्डल द्वारा विनियोग विधेयक पारित होने के बाद ही सरकार संचित निधि से आवश्यक व्यय हेतु धन निकाल सकती है।

2.
प्रशासनिक अधिकार – भारतीय संविधान द्वारा राज्यों के क्षेत्र में भी संसदात्मक व्यवस्था स्थापित की गई है। परिणामत: राज्य की मन्त्रिपरिषद् को अपनी नीतियों एवं कार्यों के लिए विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी रहना होता है। विधानमण्डल द्वारा विभिन्न विभागों के मन्त्रियों से उनके विभागों के बारे में प्रश्न पूछे जा सकते हैं तथा मन्त्रिपरिषद् के विरुद्ध निन्दा का प्रस्ताव पारित किया जा सकता है। यही नहीं, विधानमण्डल द्वारा मन्त्रिपरिषद् के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव भी पारित किया जा सकता है, जिसके फलस्वरूप मन्त्रिपरिषद् के मन्त्रियों को अपने पद का त्याग करना पड़ जाता है।

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प्रश्न 5.
राज्यपाल और राष्ट्रपति की कार्यपालिका सम्बन्धी शक्तियों की तुलना कीजिए।
उत्तर :
राज्यपाल और राष्ट्रपति की कार्यपालिका सम्बन्धी शक्तियों की तुलना निम्नलिखित है

  • राज्यपाल राज्य के शासन का तथा राष्ट्रपति देश के शासन का प्रधान होता है। दोनों क्रमश: विधानमण्डल तथा संसद में कार्यपालिका के प्रधान होते हैं।
  • राज्य तथा देश में शासन के सभी कार्य क्रमश: राज्यपाल तथा राष्ट्रपति के नाम से किये जाते हैं।’
  • राज्यपाल राज्य के मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करता है तथा राष्ट्रपति देश के प्रधानमन्त्री की। राज्यपाल तथा राष्ट्रपति अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति तथा उनके कार्य (विभाग) विभाजन का बँटवारा क्रमशः मुख्यमन्त्री तथा प्रधानमन्त्री की (UPBoardSolutions.com) सलाह से करते हैं।
  • राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह से राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा अन्य सदस्यों एवं राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति करता है। राष्ट्रपति संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष, सदस्यों, सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों एवं राज्यपालों की नियुक्ति करता है।
  • राज्यपाल राज्य के मुख्यमन्त्री से तथा राष्ट्रपति देश के प्रधानमन्त्री से शासन सम्बन्धी किसी भी सूचना की जानकारी प्राप्त कर सकता है।

प्रश्न 6.
राज्यपाल के विवेकाधिकार पर एक टिप्पणी लिखिए। [2011]
               या
यदि राज्य विधानसभा में किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत न मिले तो राज्यपाल किसे मुख्यमन्त्री नियुक्त करेगा ? [2013]
               या
राज्यों में राज्यपालों के विवेकाधीन अधिकारों की विवेचना कीजिए। [2015]
उत्तर :
केन्द्र में राष्ट्रपति के समान ही राज्य में राज्यपाल की स्थिति संवैधानिक प्रमुख की होती है। वह राज्य के मुख्यमन्त्री तथा मन्त्रिपरिषद् की सलाह पर ही कार्य करता है, परन्तु कुछ ऐसी भी परिस्थितियाँ होती हैं, जहाँ राज्यपाल मुख्यमन्त्री के परामर्श पर कार्य न करके स्वयं अपने विवेक के अनुसार निर्णय लेने के लिए स्वतन्त्र होता है। ऐसी स्थितियों को राज्यपाल के विवेकाधिकार के नाम से जाना जाता है। जब राज्यपाल स्वविवेक से कार्य करता है, उस समय वह मन्त्रियों के परामर्श की अवहेलना भी कर सकता है। उदाहरण के लिए–असोम के राज्यपाल को कबीलों तथा सीमा के प्रदेशों का शासन चलाने में स्वविवेक से कार्य करने (UPBoardSolutions.com) का अधिकार है। दूसरे, जब विधानसभा में किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता है तो राज्यपाल को मुख्यमन्त्री की नियुक्ति में स्वविवेक का अधिकार प्राप्त हो जाता है। तीसरे, राज्य में उत्पन्न संवैधानिक संकट की रिपोर्ट को राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करने में भी वह स्वविवेक से कार्य करता है। राज्यपाल को विधानसभा के विघटन में भी कुछ सीमा तक स्वविवेक का अधिकार है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्तर प्रदेश के विधानमण्डल के अंग लिखिए।
उत्तर :
उत्तर प्रदेश के विधानमण्डल के तीन अंग हैं

  • राज्यपाल,
  • विधानसभा तथा
  • विधान-परिषद्।

प्रश्न 2.
राज्य विधानमण्डल के दोनों सदनों के नाम लिखिए। [2010]
उत्तर :
राज्य विधानमण्डल के दोनों सदनों के नाम हैं–

  • विधानसभा तथा
  • विधानपरिषद्।

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प्रश्न 3.
विधानसभा का कार्यकाल कितना होता है ?
उत्तर :
विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।

प्रश्न 4.
उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्यों की संख्या कितनी है ?
उत्तर :
उत्तर प्रदेश की विधानसभा में कुल 403 सदस्य तथा 1 राज्यपाल द्वारा नामित अर्थात् 404 सदस्य हैं।

प्रश्न 5.
विधानसभा के एक ऐसे अधिकार का उल्लेख कीजिए जो कि विधान-परिषद् को प्राप्त नहीं है।
उत्तर :
राज्य की मन्त्रिपरिषद् के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित करने का अधिकार केवल विधानसभा को प्राप्त है; विधान-परिषद् को यह अधिकार प्राप्त नहीं है।

प्रश्न 6.
विधानसभा, विधानपरिषद से अधिक शक्तिशाली है। क्यों ?
उत्तर :
वित्त विधेयक को प्रस्तुत करने, कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखने तथा राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेने का अधिकार केवल विधानसभा को है; अतः वह विधानपरिषद् से अधिक शक्तिशाली है।

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प्रश्न 7.
विधान-परिषद् के सदस्यों के लिए न्यूनतम आयु कितनी होनी चाहिए ?
उत्तर :
विधान-परिषद् की सदस्यता के लिए न्यूनतम आयु (UPBoardSolutions.com) 30 वर्ष होनी चाहिए। एन 8 विधान-परिषद् के सदस्यों का कार्यकाल कितना होता है ? उत्तर : विधान-परिषद् के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है।

प्रश्न 9.
उन राज्यों के नाम लिखिए, जहाँ विधान-परिषद् का अस्तित्व है।
उत्तर :

  • उत्तर प्रदेश,
  • बिहार,
  • महाराष्ट्र,
  • कर्नाटक,
  • आन्ध्र प्रदेश,
  • जम्मू एवं कश्मीर

प्रश्न 10.
उत्तर प्रदेश विधान-परिषद् में कितने सदस्य हैं ?
उत्तर :
उत्तर प्रदेश विधान-परिषद् में 100 सदस्य हैं।

प्रश्न 11.
विधानपरिषद् में राज्यपाल कितने सदस्यों को मनोनीत करता है ?
उत्तर :
विधान-परिषद् में राज्यपाल को विधान-परिषद् की कुल सदस्य-संख्या के 1/6 सदस्य मनोनीत करने का अधिकार है।

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प्रश्न 12.
विधेयक कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर :
विधेयक दो प्रकार के होते हैं
(1) साधारण विधेयक तथा
(2) वित्त (धन) विधेयक।

प्रश्न 13.
धन-विधेयक विधानमण्डल के किस सदन में प्रस्तुत किये जाते हैं ?
उत्तर :
धन-विधेयक विधानमण्डल के निचले सदन अर्थात् विधानसभा में प्रस्तुत किये जाते हैं।

प्रश्न 14.
वित्त-विधेयक को विधान-परिषद् अधिक-से-अधिक कितने दिन रोक सकती है ?
उत्तर :
वित्त विधेयक को विधान-परिषद् अधिक-से-अधिक 14 दिनों तक रोक सकती है।

प्रश्न 15.
राज्यपाल-पद पर नियुक्ति हेतु अपेक्षित कोई दो अर्हताएँ लिखिए।
उत्तर :
राज्यपाल-पद पर नियुक्ति हेतु अपेक्षित दो अर्हताएँ निम्नलिखित हैं

  • वह संसद या विधानमण्डले के किसी सदन का सदस्य न हो।
  • वह उस राज्य का निवासी न (UPBoardSolutions.com) हो जिस राज्य में उसे नियुक्त किया गया है।

प्रश्न 16.
किन्हीं चार राज्यों के नाम लिखिए, जहाँ विधानसभा तथा विधान-परिषद् दोनों सदन हैं। [2012, 15, 18]
उत्तर :

  • उत्तर प्रदेश,
  • महाराष्ट्र,
  • बिहार तथा
  • कर्नाटक।

प्रश्न 17.
राज्यपाल की नियुक्ति कौन करता है? उसके कार्यकाल की अवधि क्या है ? [2008]
उत्तर :
राज्यपाल की नियुक्ति भारत का राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री के परामर्श से करता है। राज्यपाल की नियुक्ति सामान्यत: 5 वर्षों के लिए की जाती है।

प्रश्न 18.
राज्यपाल बनने के लिए न्यूनतम आयु क्या होती है ?
उत्तर :
राज्यपाल बनने के लिए न्यूनतम (UPBoardSolutions.com) आयु 35 वर्ष है तथा उसे भारत का नागरिक होना चाहिए।

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प्रश्न 19.
राज्यपाल के किन्हीं दो अधिकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
राज्यपाल के दो अधिकार निम्नलिखित हैं

  • वित्तीय अधिकार-कोई भी धन विधेयक राज्यपाल की अनुमति के बिना विधानसभा में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
  • विधायी अधिकार राज्यपाल विधानसभा को कार्यकाल की समाप्ति के पूर्व भंग कर सकता है।

प्रश्न 20.
क्या राज्यपाल पर महाभियोग लगाया जा सकता है ?
उत्तर :
हाँ, राज्यपाल पर महाभियोग लगाया जा सकता है।

प्रश्न 21.
राज्य का वैधानिक प्रमुख कौन है? उसकी नियुक्ति किसके द्वारा की जाती है? [2012]
उत्तर :
राज्य का वैधानिक प्रमुख राज्यपाल होता है। इसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

प्रश्न 22.
उत्तर प्रदेश के राज्यपाल और मुख्यमन्त्री के नाम बताए। [2012]
उत्तर :
उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्री राम नाईक तथा मुख्यमन्त्री श्री योगी आदित्यनाथ हैं।

प्रश्न 23.
राज्य की मन्त्रिपरिषद् के दो प्रमुख कार्य लिखिए। [2013]
उत्तर :
राज्य की मन्त्रिपरिषद् के दो प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं

  • राज्य के सम्पूर्ण प्रशासन का कार्य मन्त्रिपरिषद् द्वारा किया जाता है।
  • विधानमण्डल के समक्ष विधेयक प्रस्तुत करना तथा उन्हें पारित कराना मन्त्रिपरिषद् का ही कार्य है।

प्रश्न 24.
विधानसभा तथा विधान-परिषद के किन्हीं दो अन्तरों को स्पष्ट कीजिए। [2014]
उत्तर :
विधानसभा तथा विधान-परिषद् के दो अन्तर निम्नवत् हैं

  • मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है न कि विधान परिषद् के।
  • विधानसभा की सदस्य संख्या (UPBoardSolutions.com) विधान-परिषद् से अधिक होती है।

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प्रश्न 25.
अपने राज्य की विधान-परिषद् में शिक्षकों और स्नातकों के प्रतिनिधित्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
विधानपरिषद् राज्य के विधानमण्डल का उच्च सदन और स्थायी सदन है। प्रदेश में अध्यापकों का निर्वाचन-मण्डल कुल सदस्यों के 1/12 भाग को चुनता है। इसी प्रकार स्नातकों को निर्वाचन–मण्डल भी कुल सदस्यों के 1/12 भाग को चुनता है।

बहुविकल्पीय

प्रश्न 1. विधानसभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए व्यक्ति की आयु कितनी होनी चाहिए?

(क) 18 वर्ष
(ख) 25 वर्ष
(ग) 21 वर्ष ।
(घ) 35 वर्ष

2. विधानसभा के सदस्यों हेतु कौन-सी योग्यता आवश्यक है?

(क) भारत का नागरिक हो
(ख) राज्य सरकार के किसी पद पर अवश्य हो
(ग) आयु 40 वर्ष से अधिक हो
(घ) स्नातक हो

3. राज्यपाल की नियुक्ति कौन करता है? [2018]

(क) उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश
(ख) निर्वाचन आयोग
(ग) प्रधानमन्त्री
(घ) राष्ट्रपति

4. राज्यपाल की नियुक्ति कितने वर्ष के लिए की जाती है?

(क) 4 वर्ष
(ख) 5 वर्ष
(ग) 3 वर्ष
(घ) 6 वर्ष

5. राज्य का मुख्यमन्त्री वही हो सकता है

(क) जिसे सर्वोच्च न्यायालय आदेश दे
(ख) जिसे राष्ट्रपति चाहे।
(ग) जो स्नातक हो
(घ) जो विधानसभा के बहुमत प्राप्त दल का नेता हो

6. भारत के किस राज्य में द्विसदनीय व्यवस्थापिका है? [2011, 18)

(क) बिहार
(ख) मध्य प्रदेश
(ग) पश्चिम बंगाल
(घ) पंजाब

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7. निम्नलिखित राज्यों में से किस एक राज्य में द्विसदनीय व्यवस्थापिका नहीं है? [2013]

(क) कर्नाटक
(ख) पश्चिम बंगाल
(ग) बिहार
(घ) महाराष्ट्र

8. भारत में द्विसदनात्मक विधानमण्डले यहाँ दिए गए राज्य में है [2014]

(क) मध्य प्रदेश
(ख) उत्तर प्रदेश
(ग) पश्चिम बंगाल
(घ) गुजरात

9. राज्य का मुख्यमन्त्री किसके प्रति उत्तरदायी होता है? [2015]

(क) राज्यपाल
(ख) मन्त्रिपरिषद
(ग) विधानसभा
(घ) विधानपरिषद्

उत्तरमाला

1. (ख), 2. (क), 3. (घ), 4. (ख), 5. (घ), 6. (ख), 7. (ख), 8. (ख), 9. (ख)

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UP Board Class 10 English Model Paper

UP Board Class 10 English Model Paper

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 English. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 English Model Paper.

Section ‘A’

1. Read the passage and answer the questions given below it :

“Your brothers died because they did not heed my words. They tried to drink water without answering my questions. Do not follow them. Answer my questions first and then you can quench your thirst. This pool belongs to me.” It did not take Yudhishthira a moment to understand that these could be none other than the words of a Yaksha (UPBoardSolutions.com) and guessed what had happened to his brothers. It took him no time to see a possible way of bringing them back to life. He said to the bodiless voice: “Please ask your questions.’
(i) Write the name of the lesson from which the above passage has been taken. Who is the author of the lesson ?  [2]
(ii) Who was the owner of the pool ? [2]

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2. Answer one of the following questions in about 60 words:  [4]
(i) What do you come to know about Pt. Nehru after reading the lesson “The Ganga”?
(ii) Why did the old merchant want to judge his two sons ? What test did he give to them to find out who was the cleverer of the two?

3. Answer any two of the following questions in about 25 words : [2+2=4]
(i) Why did postman go to his boss laughing heartily?
(ii) What did Socrates want Athens to be? (UPBoardSolutions.com) What did he ask the Athenians to do to achieve this end ?
(iii) Who was Swami Hari Das? Where did Akbar go to listen to his misic ?

4. Match the words of List ‘A’ with their meanings in List ‘B’: [4×1 = 4 ]
UP Board Class 10 English Model Paper img 1

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5. Read the following piece of poetry and answer the questions given below it :
Ever in motion,
Blithesome and cheery,
Still climbing heavenward,
Never a weary.
(i) From which poem has the above stanza been taken ? WHe is the author of the poem? [2]
(ii) Each of the above four lines describes a (UPBoardSolutions.com) particular quality of the fountain. Mention them. [2]

6. Give the central idea of one of the following poems : [3]
(i) The Psalın of Life
(ii) The Village Song
                      or
Write four lines from on 1 of the poems given in your textbook.
(Do not copy out the lines given in the question paper.)

7. Answer any two of the following questions in about 25 words: [2 + 2 = 4]
(i) Why has the life of Edison been called great and eventful ?
(ii) Why did the king of Ujjain want to sit on the judgement-seat of Vikramaditya?
(iii) What was Jesse Owens’ ‘Greatest Olympic Prize’?

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8. Point out the ‘True’ or ‘False’ statements in the following: [4 x 1 = 4]
(i) Edison was a great inventor but he was never awarded a medal for his inventions.
(ii) Edison said, “I shall never invent anything which (UPBoardSolutions.com) will destory life. I want to make people happy.”
(iii) Vikramaditya was the king of Ujjain.
(iv) Jesse Owens helped Luz Long in qualifying for the final jump.

9. Select the most suitable alternative to complete the following statements : [4 x1 = 4]
(a) Edison died on ….
(i) 14th September, 1886.
(ii) 18th October, 1931.
(iii) 2nd November, 1930.
(iv) 13the September, 1918.

(b) Edison got a beating from his mother because ….
(i) he has sold the eggs.
(ii) he had hatched the eggs.
(iii) he had smashed the eggs and sopiled his shorts.
(iv) he had eaten up all the eggs.

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(c) When the mound was dug, the king found …..
(i) seven jars full of gold coins
(ii) skeletons of dead bodies
(iii) rare musical (UPBoardSolutions.com) instruments
(iv) the judgement seat of Vikramaditya.

(d) Hitler believed in the……………
(i) superiority of English race.
(ii) superiority of German race.
(iii) equality of all races.
(iv) superiority of all race.

Section ‘B’

10. Do as indicated against each of the following sentences :
(i) on sunday play hockey they every. [2]
(Frame correct sentence by re-ordering the words.)……..
(ii) The pilgrim said to the policeman, “Is this the way to Sangam?” (Change into indirect speech) [2]
(iii) I know him very well. (UPBoardSolutions.com) (Change into passive voice) [2]
(iv) The naughty boy ran away as he …………… afraid of punishment. [2]
(Use correct form of the verb ‘be’ to fill in the blanks)

11. (a) Choose the correct preposition from the ones given below the sentence to fill in the blank :
The sun sets …………. ti [2]
(in, into, to)

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(b) Complete the following sentence: [2]
He kept on working …………………….

(c) Complete the spellings of the following words: 1/2+1/2=1
(i) suc_e_d
(ii) c_r_y.

(d) Punctuate the following using capital letters wherever necessary: is this your final decision said amit to his father yes i cannot make any alternation said his father [2]

12. Translate the following into English:  [4]
आज भारत के कुछ शहरों को स्मार्ट बनाने का प्रयत्न जारों पर है। इसका लक्ष्य शहर को स्वच्छ, सुन्दर एवं आधुनिक सुविधाओं से युक्त बनाना है। इसके अन्तर्गत कूड़े-करकट का प्रबन्धन, जनता शौचालयों का निर्माण, बिजली एवं पानी की समुचित (UPBoardSolutions.com) व्यवस्था आती है। चौड़ी व समतल सड़कों, फ्लाई ओवर्स एवं पार्किंग स्थलों के निर्माण से यातायात सुगम हो जाएगा।

13. Your college is organizing a three day educational tour. Write a letter to your father requesting him to allow you to go on the tour and to send you two thousand rupees for the expenses.
(Do not write your Name and Place.)  [4]
                                      Or
Write an application to the Principal of your college for the regular opening of the library and purchase of some new books. (Do not write your Name and Roll No.)

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14. Write a composition on one of the following topics in about 60 words. Points are given below for each topic :  [6]

(a) A Visit to a River :
(i) Introduction-name of the river and time of visit
(ii) Boats and pilgrims, birds floating and flying to the surface to pick up food
(iii) People bathing and offering (UPBoardSolutions.com) prayers with flowers and milk
(iv) Shops and temples near the bank
(v) Conclusion-your feelings.

(b) An Indian Festival :
(i) Introduction-name and when it is celebrated
(ii) Why it is celebrated
(iii) How it is celebrated
(iv) Conclusion-some evils associated with it.

(c) Usefulness of Mobile Phones :
(i) Introduction-small, handy and easy to carry,
(ii) Cheap and quick means of communication
(iii) Facility of internet-money transfer, purchase of rail tickets, getting any information
(iv) Wastage of money on chatting and useless talking

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15. Read the passage carefully and answer the questions based on it:
Books are a delightful company. If you go into a room filled with books even without taking them down from the shelves, they seem to speak to you, seem to welcome you, seem to tell you that they (UPBoardSolutions.com) have something inside their covers that will be good for you and that they are willing to impart it to you. Value them and endeavour to turn them to good account. As to the books which you should read, there is hardly anything definite that can be said. Any good book that is wiser you, will teach you something-a great many things directly or indirectly. If your mind be open to learn, you have to read it indicating that you are a person who likes to get good out of it.

  1. Why should we value books?’ [3]
  2. Which books should we read and how should we approach them? [3]

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 9 (Section 1)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 9 द्वितीय विश्वयुद्ध-कारण तथा परिणाम (अनुभाग – एक)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 9 द्वितीय विश्वयुद्ध-कारण तथा परिणाम (अनुभाग – एक)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए। [2009, 13, 14]
            या
द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रमुख कारण क्या थे ? इसका तात्कालिक प्रभाव क्या पड़ा ? [2013]
            या
द्वितीय विश्वयुद्ध के चार प्रमुख कारण बताइट। [2009, 13, 18]
            या
द्वितीय विश्वयुद्ध के कारणों तथा परिणामों पर प्रकाश डालिए। (2013)
            या
द्वितीय विश्वयुद्ध के किन्हीं तीन कारणों का उल्लेख कीजिए जो आपकी दृष्टि से अधिक प्रभावकारी थे। (2014, 17)
            या
द्वितीय विश्वयुद्ध कब हुआ? इसका तात्कालिक कारण क्या था? [2016]
            या
उत्तर :
द्वितीय विश्वयुद्ध का प्रारम्भ 1 सितम्बर, (UPBoardSolutions.com) 1939 को हुआ।

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द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रमुख कारण

द्वितीय विश्वयुद्ध के विस्फोट के लिए भी वही कारण उत्तरदायी थे, जो प्रथम विश्वयुद्ध के लिए थे; यथा-धुरी राष्ट्रों की आक्रामक नीति तथा इंग्लैण्ड और फ्रांस की तुष्टीकरण व स्वार्थपूर्ण नीति। संक्षेप में, इस युद्ध के लिए निम्नलिखित कारणों को उत्तरदायी माना जाता है

1. वर्साय की सन्धि में जर्मनी का अपमान – वर्साय की सन्धि ही द्वितीय विश्वयुद्ध का मूल कारण थी। यह वास्तविक अर्थों में शान्ति सन्धि नहीं थी, वरन् इसमें दूसरे विश्वयुद्ध के बीज छिपे हुए थे। इस सन्धि में जर्मनी का बड़ा ही अपमान किया गया तथा जर्मन प्रतिनिधियों को बलपूर्वक सन्धि-पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया गया था। जर्मनी के सारे साम्राज्य को छिन्न-भिन्न कर दिया गया था। उसकी सैनिक तथा (UPBoardSolutions.com) समुद्री शक्ति को नष्ट कर दिया गया था। उसकी राष्ट्रीय भावनाओं को इतना कुचल दिया गया था कि जर्मन जनता अपने अपमान का बदला लेने के लिए बेचैन हो उठी थी। दूसरी ओर इटली भी इस सन्धि से असन्तुष्ट था। वह भी फ्रांस और इंग्लैण्ड से बदला लेने के इन्तजार में था। ऑस्ट्रिया और टर्की भी इस सन्धि से रुष्ट थे।

2. हिटलर का उत्थान – जर्मनी के सम्राट कैसर विलियम द्वितीय के पतन के बाद जर्मनी में गणराज्य की स्थापना हुई थी। लेकिन वीमर गणतन्त्र की सरकार जर्मनी में बढ़ती हुई बेकारी, भुखमरी तथा अराजकता को रोकने में विफल रही। इस सरकार ने वर्साय सन्धि को स्वीकार करके जर्मन जनता की भावनाओं को गहरी चोट पहुँचायी। जर्मनी की आन्तरिक दशा का लाभ उठाकर हिटलर ने नाजी पार्टी की स्थापना की और जनता के समक्ष जोरदार शब्दों में घोषणा की कि नाजी पार्टी जर्मनी को पुनरुत्थान करेगी तथा वर्साय में हुए जर्मनी के अपमान का बदला लेगी।

3. साम्राज्यवादी भावना का विकास – साम्राज्यवादी भावना का विकास भी द्वितीय महायुद्ध का एक मुख्य कारण था। यूरोप के बहुत-से राष्ट्र सैनिक दृष्टि से सबल होते हुए भी साम्राज्य की दृष्टि से अपने को हीन समझते थे। जर्मनी, इटली और जापान का स्थान ऐसे ही राष्ट्रों में था। ये राष्ट्र सैन्य-शक्ति की दृष्टि से ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस आदि देशों से किसी भी प्रकार कम नहीं थे, किन्तु उनके पास इंग्लैण्ड व फ्रांस के समान विशाल साम्राज्य नहीं थे; अतः साम्राज्य–विस्तार की भावना उनके हृदय में निरन्तर बढ़ती जा रही थी। ऐसी स्थिति में युद्ध का छिड़ना अनिवार्य था।

4. राष्ट्र संघ की दुर्बलता – द्वितीय विश्वयुद्ध का एक महत्त्वपूर्ण कारण राष्ट्र संघ की असफलता थी। जर्मनी, जापान तथा इटली ने अपनी इच्छानुसार ऑस्ट्रिया, मंचूरिया और अबीसीनिया पर विजय प्राप्त की। निर्बल राष्ट्रों ने राष्ट्र संघ से अपनी सुरक्षा की प्रार्थना की। उसकी उदासीनता तथा दुर्बलता को देखकर विश्व के राष्ट्र अपने-अपने बचाव के लिए सैनिक तैयारियाँ करने लगे।

5. विभिन्न गुटबन्दियाँ – हिटलर की आक्रामक कार्यवाहियों को देखकर यूरोप के राष्ट्रों में खलबली मच गयी। सभी राष्ट्र अपनी-अपनी सुरक्षा करने के लिए गुटबन्दियाँ करने लगे। इन गुटबन्दियों में विचित्र बात यह थी कि एक ही राष्ट्र कई गुटों में सम्मिलित हो जाता था। सबसे पहले फ्रांस, रूस, पोलैण्ड, चेकोस्लोवाकिया, रूमानिया और यूगोस्लाविया ने अपना गुट बनाया। इसके बाद जर्मनी, इटली और जापान में गुटबन्दी हो गयी। इस प्रकार यूरोप (UPBoardSolutions.com) के प्रमुख राष्ट्र दो गुटों में बँट गये। इन गुटबन्दियों का फल यह हुआ कि विश्व के सभी राष्ट्र एक-दूसरे को अविश्वास और शंका की दृष्टि से देखने लगे।

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6. तुष्टीकरण की नीति – द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व ब्रिटेन तथा फ्रांस ने फासीवादी शक्तियों के प्रति तुष्टीकरण की नीति अपनायी। सन् 1931 ई० से 1938 ई० के मध्य जापान ने मंचूरिया, इटली ने अबीसीनिया और जर्मनी ने ऑस्ट्रिया को हड़प लिया, किन्तु यूरोपीय देशों और अमेरिका ने उनका कोई प्रतिरोध नहीं किया। म्यूनिख समझौते में तुष्टीकरण की नीति पराकाष्ठा पर जा पहुँची, जबकि ब्रिटेन के प्रधानमन्त्री चैम्बरलेन तथा फ्रांस के प्रधानमन्त्री दलादियर ने चेकोस्लोवाकिया की बलि दे दी। साम्यवाद को रोकने के लिए अपनायी गयी तुष्टीकरण की नीति आगे चलकर विश्वयुद्ध का एक कारण बन गयी।

7. पोलैण्ड की समस्या तथा युद्ध का आरम्भ अथवा तत्कालीन कारण – पेरिस के शान्ति सम्मेलन के निर्णय के अनुसार पोलैण्ड को एक स्वतन्त्र राज्य बना दिया गया था और वहाँ पर लोकतन्त्र की स्थापना की गयी थी। पोलैण्ड को समुद्र तट से मिलाने के लिए जर्मनी के बीच से होकर एक मार्ग बना दिया गया था। यह पोलिश गलियारा डेन्जिग के बन्दरगाह तक जाता था। हिटलर का कहना था कि डेन्जिंग में जर्मन जाति के लोग निवास करते हैं; अत: डेन्जिंग पर जर्मनी का अधिकार होना चाहिए। हिटलर की इस बात को मानने के लिए पोलैण्ड तैयार नहीं था। जर्मन सेनाओं ने 1 सितम्बर, 1939 ई० को पोलैण्ड पर आक्रमण (UPBoardSolutions.com) कर दिया। पोलैण्ड की सुरक्षा का आश्वासन देने के कारण ब्रिटेन, सभी ब्रिटिश उपनिवेश तथा फ्रांस ने भी जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर डाली। इस प्रकार द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारम्भ हो गया।

8. युद्ध की अनिवार्यता – वास्तव में प्रथम विश्वयुद्ध तथा उसके बाद की परिस्थितियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध को अनिवार्य बना दिया था। कुछ राष्ट्रों ने इसे रोकने का प्रयास भी किया, किन्तु अन्य राष्ट्र ‘यह समझते थे कि वे युद्ध से भयभीत हो गये हैं; अत: उनके लिए साम्राज्य–विस्तार का यह एक अच्छा अवसर है। इसीलिए साम्राज्यवादी देशों ने अन्य राज्यों को अपने साम्राज्य में मिलाना प्रारम्भ कर दिया। इस प्रकार साम्राज्य–विस्तार की नीति तथा शस्त्रीकरण ने द्वितीय विश्वयुद्ध को अनिवार्य बना दिया। [संकेत–परिणामों (प्रभाव) के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 3 का उत्तर देखें।

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प्रश्न 2
द्वितीय विश्वयुद्ध की प्रमुख घटनाओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

द्वितीय विश्वयुद्ध की प्रमुख घटनाएँ

द्वितीय विश्वयुद्ध 1 सितम्बर, 1939 ई० को प्रारम्भ हुआ, जिसकी शुरुआत जर्मनी ने पोलैण्ड पर आक्रमण करके की और 14 अगस्त, 1945 ई० को जापान के आत्मसमर्पण के साथ ही समाप्त हो गया। इस महायुद्ध की उल्लेखनीय घटनाएँ निम्नलिखित रहीं–

1. पोलैण्ड का युद्ध – 1 सितम्बर, 1939 ई० की सुबह 5 बजे जर्मनी की सेनाओं ने पोलैण्ड पर आक्रमण कर दिया।

2. रूस का फिनलैण्ड पर आक्रमण – पूर्वी पोलैण्ड पर प्रभुत्व जमाने के बाद सोवियत रूस की सेनाओं ने 20 नवम्बर, 1939 ई० को फिनलैण्ड पर आक्रमण किया। भीषण युद्ध के बाद फिनलैण्ड की सेना ने हथियार डाल दिये और उस पर (UPBoardSolutions.com) रूस का अधिकार हो गया।

3. हिटलर का नार्वे तथा डेनमार्क पर आक्रमण – 9 अप्रैल, 1940 ई० की सुबह अचानक ही हिटलर ने जर्मन सेनाओं को नार्वे और डेनमार्क पर हमला करने का आदेश दे दिया। 8 जून, 1940 ई० को नार्वे के महत्त्वपूर्ण नगर जर्मनी के अधिकार में आ गये।

4. हॉलैण्ड और बेल्जियम का फ्तन – 10 मई, 1940 ई० को जर्मनी ने हॉलैण्ड पर आक्रमण किया। 14 मई, 1940 ई० को डच सेनाओं ने हथियार डाल दिये। हॉलैण्ड पर जर्मनी का अधिकार हो गया।

5. फ्रांस की पराजय – हिटलर का लक्ष्य फ्रांस से जर्मनी के अपमान का बदला लेना था। अत: उसने जर्मन सेनाओं को तीन दिशाओं से फ्रांस पर आक्रमण करने का आदेश दे दिया। 22 जून, 1940 ई० को फ्रांस ने हार मान ली।

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6. ब्रिटेन पर हवाई आक्रमण – जर्मनी की जलशक्ति इंग्लैण्ड की जलशक्ति की अपेक्षा निर्बल थी। इस कारण हिटलर ने 8 अगस्त, 1940 ई० को इंग्लैण्ड पर बमबारी करने के आदेश दे दिये। लेकिन ब्रिटेन के वायुयानों ने लगभग 2,500 जर्मन वायुयानों को नष्ट कर दिया।

7. जर्मनी का रूस पर आक्रमण – जर्मनी रूस का प्रबल शत्रु था। हिटलर भी रूस के उपजाऊ क्षेत्र यूक्रेन की खानों तथा तेल के कुओं पर अधिकार करना चाहता था। 22 जून, 1941 ई० को हिटलर ने जर्मन सेनाओं को रूस पर तीन दिशाओं से आक्रमण करने का आदेश दे दिया। जर्मन सेना ने यूक्रेन पर जल्दी ही अधिकार कर लिया, किन्तु लेनिनग्राड और मास्को पर अधिकार करने में असफल रही।

8. जापान तथा अमेरिका का युद्ध में प्रवेश – 7 दिसम्बर, 1941 ई० को अचानक ही जापानी सेना ने अमेरिका के प्रशान्त महासागर स्थित नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर भयानक आक्रमण कर दिया। जापान के इस आकस्मिक आक्रमण से (UPBoardSolutions.com) अमेरिका का नौसैनिक अड्डा पूरी तरह नष्ट हो गया। इसी दिन जापानी सेना ने शंघाई, हांगकांग, मलाया और सिंगापुर पर बमवर्षा की और ब्रिटिश जंगी जहाज ‘प्रिन्स ऑफ वेल्स’ को बमबारी करके नष्ट कर दिया। 11 दिसम्बर, 1941 ई० को संयुक्त राज्य अमेरिका ने धुरी राष्ट्रों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

9. धुरी राष्ट्रों की पराजय का आरम्भ – अमेरिका के युद्ध में कूद पड़ने से मित्रराष्ट्रों की शक्ति तथा उत्साह बहुत अधिक बढ़ गया। जून, 1943 ई० में मित्रराष्ट्रों ने जापानी जहाजी बेड़े को मिडवे द्वीपसमूह के युद्ध में पराजित कर दिया। अगस्त, 1942 ई० में अमेरिका ने सोलोमन द्वीप-समूह पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया।

10. मित्रराष्ट्रों की घेराबन्दी – 14 जनवरी, 1943 ई० को ब्रिटिश प्रधानमन्त्री चर्चिल और अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने कासा ब्लांका में एक गुप्त सम्मेलन किया, जिसमें जर्मनी और इटली की घेराबन्दी की योजना बनायी गयी।

11. इटली की पराजय – 10 जुलाई, 1943 ई० को मित्रराष्ट्रों की सेनाओं ने सिसली पर आक्रमण किया। शीघ्र ही सिसली मित्रराष्ट्रों के अधिकार में आ गया। 18 जुलाई, 1943 ई० को मित्रराष्ट्रों ने संगठित रूप से इटली पर आक्रमण कर दिया।

12. फ्रांस की स्वतन्त्रता – 5 जून, 1944 ई० से मित्रराष्ट्रों ने फ्रांस की मुक्ति का अभियान छेड़ दिया। 15 अगस्त, 1944 ई० को फ्रांस के पूर्व भूमध्यसागरीय तट पर मित्रराष्ट्रों की सेनाएँ पहुँच गयीं। शीघ्र ही तूलो तथा मारसेलीज के बन्दरगाहों पर मित्रराष्ट्रों का प्रभुत्व स्थापित हो गया।

13. जर्मनी की पराजय – नवम्बर, 1944 ई० में मित्रराष्ट्रों की सेनाएँ हॉलैण्ड के मार्ग से जर्मनी में प्रविष्ट हो गयीं। हिटलर के नेतृत्व में जर्मन सेनाओं ने शत्रुओं का जमकर सामना किया, परन्तु अब तक की पराजयों से जर्मनों की शक्ति क्षीण हो चुकी थी। अतः जर्मन सेनाएँ हारकर पीछे हटने लगीं। 4 मई, 1945 ई० को समस्त यूरोप में जर्मन सेनाओं ने हथियार डाल दिये। 7 मई, 1945 ई० को अन्तरिम जर्मन सरकार ने युद्ध विराम सन्धि पर (UPBoardSolutions.com) हस्ताक्षर कर दिये और 8 मई, 1945 ई० को सम्पूर्ण यूरोप में युद्ध बन्द हो गया।

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14. जापान की पराजय – 26 जुलाई, 1945 ई० को पोट्सडम सम्मेलन में मित्रराष्ट्रों ने जापान से बिना शर्त आत्मसमर्पण करने की माँग की, परन्तु जापान ने उनकी माँग पर कोई ध्यान न देकर युद्ध जारी रखा। फलस्वरूप 6 अगस्त, 1945 ई० को अमेरिका ने जापान के समृद्ध नगर हिरोशिमा पर पहला अणु बम डाल दिया। 9 अगस्त, 1945 ई० को अमेरिका ने जापानी नगर नागासाकी पर अपना दूसरा अणु बम गिराया। इन बमों की भयानक तबाही को देखकर जापान का सम्राट बुरी तरह भयभीत हो गया और उसने तत्काल ही जापानी सेना को हथियार डालने का आदेश दिया।

प्रश्न 3.
द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणामों का विवेचन कीजिए। [2009, 13, 17]
          या
द्वितीय विश्वयुद्ध के क्या परिणाम हुए? किन्हीं चार पर प्रकाश डालिए। [2015]
          या
द्वितीय विश्वयुद्ध के दो परिणामों का वर्णन कीजिए। [2009]
उत्तर :
द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रमुख परिणाम

द्वितीय विश्वयुद्ध के अग्रलिखित परिणाम हुए –

1. भयंकर विनाश और नरसंहार – इस युद्ध में 5 करोड़ से भी अधिक लोग मारे गये। करोड़ों लोग घायल व बेघर हो गये। लगभग एक करोड़ बीस लाख लोगों को तो जर्मनी व इटली के यन्त्रणा शिविरों में अपनी जान गॅवानी पड़ी। इस युद्ध में सबसे (UPBoardSolutions.com) अधिक हानि जर्मनी में रूस को उठानी पड़ी। इसके अतिरिक्त पोलैण्ड तथा चेकोस्लोवाकिया में शायद ही कोई गाँव बचा हो जो युद्ध में नष्ट न हुआ हो। फ्रांस, बेल्जियम, हॉलैण्ड आदि राष्ट्रों में असंख्य लोग भूख से तड़प-तड़पकर मर गये थे।

2. आर्थिक परिणाम – यूरोप के अनेक राष्ट्रों ने अपने साधनों को युद्ध में लगा दिया था, जिससे उनकी अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी। इस युद्ध में संलग्न सभी राष्ट्रों द्वारा लगभग 15 खरब डॉलर व्यय किये गये। युद्ध के बाद अनेक देशों की कीमतों में तीव्रता से वृद्धि हुई, जिससे मुनाफाखोरी तथा चोरबाजारी को बढ़ावा मिला। साथ ही बेरोजगारी भी बढ़ी।

3. जर्मनी का विभाजन – इस युद्ध में जर्मनी की पराजय होने पर मित्रराष्ट्रों द्वारा उसे दो भागों में विभाजित कर दिया गया-पूर्वी जर्मनी और पश्चिमी जर्मनी। पूर्वी जर्मनी पर रूस का अधिकार हो गया, जब कि पश्चिमी जर्मनी पर अमेरिका, फ्रांस व इंग्लैण्ड का प्रभुत्व रहा।

4. फासिस्टवाद का अन्त – इटली से फासीवाद का अन्त हो गया। वहाँ प्रजातन्त्र की स्थापना हुई। युद्ध के हर्जाने के रूप में उसे अत्यधिक धनराशि देनी पड़ी। इटली के अफ्रीकी उपनिवेश उसके अधिकार से छिन गये।

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5. साम्राज्यवाद में निरन्तर कमी – ब्रिटेन, फ्रांस, हॉलैण्ड, पुर्तगाल, इटली, बेल्जियम आदि देशों ने एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों में अपने उपनिवेश स्थापित किये हुए थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणामस्वरूप पराधीन देशों में राष्ट्रीयता तथा देशभक्ति की भावनाओं को बढ़ावा मिला, जिससे वहाँ स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष व आन्दोलन प्रारम्भ हो गये।

6. साम्यवाद का प्रसार – द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् विश्व में साम्यवाद का प्रसार बड़ी तेजी से हुआ। रूस के प्रभाव के कारण यूरोप में हंगरी, रूमानिया, पोलैण्ड, बुल्गारिया, यूगोस्लाविया, चेकोस्लोवाकिया तथा पूर्वी जर्मनी में साम्यवादी सरकारों की स्थापना हुई।

7. दो गुटों का निर्माण एवं शीत युद्ध का जन्म – द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व के अनेक राष्ट्र दो गुटों में बँट गये-पूँजीवादी तथा साम्यवादी। पूँजीवादी देशों का नेतृत्व अमेरिका, जबकि साम्यवादी देशों का नेतृत्व रूस के हाथों में था। यद्यपि द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका तथा रूस दोनों ने मिलकर : जर्मनी के विरुद्ध लड़ाई लड़ी थी, किन्तु युद्ध के बाद साम्यवाद के प्रसार के कारणों से अमेरिका तथा रूस में गम्भीर मतभेद उत्पन्न हो गये। (UPBoardSolutions.com) रूस की बढ़ती हुई शक्ति से चिन्तित होकर अमेरिका तथा कुछ अन्य राष्ट्रों ने नाटो, सीटो तथा सेण्टो नामक सैनिक गुटबन्दियों का निर्माण किया।

8. अस्त्र-शस्त्र के निर्माण में होड़ – द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद आणविक अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण का एक नया युग. प्रारम्भ हो गया। अमेरिका, रूस, फ्रांस, इंग्लैण्ड आदि राष्ट्र अपनी सुरक्षा को मजबूत करने हेतु विनाशकारी अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण में लग गये। अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण की बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में पुन: तनाव फैलाना शुरू कर दिया है, जिसके कारण आज विश्व तीसरे विश्वयुद्ध के कगार पर खड़ा प्रतीत हो रहा है।

9. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना – द्वितीय विश्वयुद्ध की विनाश-लीला को देखकर भविष्य में युद्धों को रोकने, अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से हल करने तथा विश्व में सहयोग एवं मैत्री स्थापित करने के उद्देश्य से विभिन्न राष्ट्रों ने मिलकर 24 अक्टूबर, 1945 ई० को संयुक्त राष्ट्र संघ’ नामक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था की स्थापना की। यह संस्था आज भी विश्व में शान्ति तथा मानव-जाति की सुरक्षा के लिए प्रयत्नशील है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
द्वितीय विश्वयुद्ध कब और क्यों शुरू हुआ ?
उत्तर :
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद की गयी वर्साय की सन्धि के द्वारा मित्रराष्ट्रों (इंग्लैण्ड, फ्रांस के रूस) ने पराजित राष्ट्रों (जर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी व तुर्की) के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किया। जर्मनी को प्रथम विश्वयुद्ध का दोषी ठहराकर उसे शक्तिहीन बना दिया गया। (UPBoardSolutions.com) इससे जर्मनी में बदला लेने की भावना उत्पन्न हो गयी। धीरे-धीरे अपनी शक्ति को संचित करके, जर्मनी ने 1 सितम्बर, 1939 ई० को पोलैण्ड पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। फ्रांस, व इंग्लैण्ड ने जर्मनी को पोलैण्ड से अपनी सेना वापस बुलाने की चेतावनी दी, जिसे जर्मनी ने अनसुना कर दिया। इस पर इंग्लैण्ड और फ्रांस ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इटली व जापान ने जर्मनी का साथ दिया। इस प्रकार 1 सितम्बर, 1939 ई० को द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया।

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प्रश्न 2.
उन देशों के नाम लिखिए जो द्वितीय विश्वयुद्ध में लड़े थे।
          या
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मित्रराष्ट्रों के नाम बताइए
          या
द्वितीय विश्वयुद्ध में सम्मिलित होने वाले देशों की एक सूची बनायी जाने वाली है। उस सूची में एशिया के किस देश का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। [2009]
उत्तर :
द्वितीय विश्वयुद्ध धुरी राष्ट्रों (जर्मनी, इटली और जापान) (UPBoardSolutions.com) और मित्रराष्ट्रों (फ्रांस, रूस, अमेरिका आदि) के बीच लड़ा गया था।

इस सूची में एशिया महाद्वीप के जापान देश का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

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प्रश्न 3.
तुष्टीकरण की नीति से क्या अभिप्राय है? यह द्वितीय विश्वयुद्धका कारण कैसे बनी ?
उत्तर :
तुष्टीकरण से अभिप्राय है, किसी के आक्रमण को मूक मान्यता देना अथवा किसी आक्रामक शक्ति को मनाने के लिए किसी अन्य देश की बलि दे देना। आक्रामक शक्तियों की निन्दा करने की अपेक्षा पश्चिमी देशों ने ऐसी शक्तियों के प्रति तुष्टीकरण की नीति अपनायी। इसी तुष्टीकरण की नीति के कारण विश्व को एक अन्य युद्ध झेलना पड़ा। इस तथ्य के निम्नलिखित प्रमाण दिये जा सकते हैं

1. तत्कालीन यूरोप में दो बड़े खतरे थे—फासीवाद से और साम्यवाद से। युद्धकालीन साम्यवाद ने पश्चिमी यूरोपीय देशों को आतंकित कर रखा था। उन्हें यह भी भय था कि कहीं उनके देश में मजदूर स्वयं को संगठित करके सामाजिक क्रान्ति न कर दें। पश्चिमी देशों ने फासीवाद को तो सहन कर लिया, परन्तु मजदूरों के समर्थक साम्यवादी देश रूस का विरोध किया। जब जापान, इटली तथा जर्मनी ने कोमिण्टर्न विरोधी गठबन्धन स्थापित किया तो पश्चिमी देशों ने राहत का अनुभव किया, किन्तु यह उनकी भूल थी। उन्हें धुरी शक्तियों को उसी समय दबा देना चाहिए था।

2. पश्चिमी देशों ने दूरदर्शिता से काम नहीं लिया। उन्हें प्रथम महायुद्ध में पराजित जर्मनी तथा इटली से सावधान रहना चाहिए था। सन् 1936 ई० में जर्मनी ने वर्साय सन्धि की शर्तों को भंग करते हुए जब राइनलैण्ड में प्रवेश किया तब उसे रोकने के लिए पश्चिमी देशों के द्वारा कुछ नहीं किया गया।

3. जापान ने जब चीन पर आक्रमण किया तो ब्रिटेन और फ्रांस ने राष्ट्र संघ के कहने पर भी उसके विरुद्ध प्रतिबन्धों पर कोई विचार नहीं किया। सन् 1933 ई० में जापान राष्ट्र संघ से अलग हो गया। उसने चीन में अमेरिका तथा ब्रिटेन की (UPBoardSolutions.com) सम्पत्ति भी जब्त कर ली, फिर भी इन देशों की तुष्टीकरण की नीति जारी रही।

4. सन् 1935 ई० में इटली ने इथोपिया पर आक्रमण किया। राष्ट्र संघ ने इटली की कड़ी आलोचना की तथा उसके विरुद्ध आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने की भी बात कही, किन्तु फ्रांस, इंग्लैण्ड और अमेरिका ने इटली को दण्ड देने के लिए कुछ नहीं किया।

5. सन् 1936 ई० में स्पेन में गृहयुद्ध छिड़ गया था। वहाँ सेना ने जनरल फ्रांको के नेतृत्व में लोकतान्त्रिक मोर्चा सरकार को उखाड़ फेंका। अन्य फासिस्ट देशों ने भी जनरल फ्रांको की सहायता की, तब ब्रिटेन और फ्रांस ने वहाँ की संवैधानिक सरकार को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया।

6. सन् 1938 ई० में जर्मनी ने चेकोस्लोवाकिया के सुदेतेनलैण्ड क्षेत्र पर अपना दावा किया, तब फ्रांस और इंग्लैण्ड के प्रधानमन्त्रियों ने म्यूनिख समझौते के तहत हिटलर की शर्तों को मान लिया। सन् 1939 ई० में जर्मनी ने सम्पूर्ण चेकोस्लोवाकिया पर अधिकार कर लिया। पश्चिमी देशों की तुष्टीकरण की नीति ने फासिस्ट शक्तियों को बल प्रदान किया। यदि फासिस्टों पर रोक लगा दी जाती तो सम्भव था कि द्वितीय विश्वयुद्ध टल जाता।

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प्रश्न 4.
द्वितीय विश्वयुद्ध कब और कैसे समाप्त हो गया ?
          या
द्वितीय विश्वयुद्ध श्रेष्ठ हथियारों का युद्ध था, जिसका अन्त सर्वाधिक विनाशकारी हथियार के आविष्कार द्वारा हुआ। स्पष्ट कीजिए। [2009]
          या
द्वितीय विश्वयुद्ध कब समाप्त हुआ ? इसमें किसकी पराजय हुई ? [2015]
उतर :
सन् 1942 ई० से ही जर्मनी रूस के साथ एक निर्णायक तथा विनाशकारी युद्ध में संलग्न था। सन् 1944 ई० में फ्रांस के नॉर्मण्डी तट पर अमेरिकी तथा ब्रिटिश सेनाएँ उतर पड़ीं तो जर्मनी के लिए दूसरा गोर्चा खुल गया। मित्रराष्ट्रों की सेनाओं ने (UPBoardSolutions.com) जर्मनी को सब ओर से घेर लिया। जब 2 मई, 1945 ई० को मित्र देशों की सेनाओं ने बर्लिन में प्रवेश किया तो हिटलर ने आत्महत्या कर ली। इसके साथ ही जर्मनी ने बिना शर्त के 7 मई, 1945 ई० को आत्मसमर्पण कर दिया तथा यूरोप से युद्ध का अन्त हो गया, किन्तु एशिया में अगस्त, 1945 ई० तक युद्ध जारी रहा। 6 तथा 9 अगस्त, 1945 ई० को क्रमशः हिरोशिमा और नागासाकी नगरों पर अमेरिका द्वारा लिटिल बॉय और फैट मैन नामक बम गिराने से हुई भारी क्षति के कारण जापान ने 14 अगस्त को आत्मसमर्पण कर दिया। इस प्रकार द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो गया।

प्रश्न 5.
द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की पराजय क्यों हुई? इसका क्या प्रभाव पड़ा? [2011]
उत्तर :
द्वितीय विश्व युद्ध के अन्तिम चरण में अमेरिका ने जापान के दो नगरों हिरोशिमा और नागासाकी पर 6 अगस्त, 1945 ई० को परमाणु बम गिराए। परमाणु बमों द्वारा किए गए जन-धन के इस महाविनाश ने जापान को आत्मसमर्पण करने के लिए विवश कर दिया। इस प्रकार 14 अगस्त, 1945 ई० को जापान पराजित हो गया। इसका प्रभाव यह पड़ा कि जापान की बढ़ती सैन्य क्षमता पर विराम लग गया तथा उसे विपरीत परिस्थितियों में आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर होना पड़ा और इसी के साथ द्वितीय विश्व युद्ध का भी अन्त हो गया।

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प्रश्न 6.
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका ने जापान तथा उसके सहयोगी देशों के विरुद्ध युद्ध में सम्मिलित होने का निर्णय क्यों लिया ? इसका क्या प्रभाव पड़ा ?
          या
“सन् 1941 में यदि जापान ने पर्ल हार्बर पर आक्रमण न किया होता तो एक शक्तिशाली राष्ट्र युद्ध में न कूद पड़ता।” यह किस राष्ट्र के विषय में कहा गया है? उसने किन राष्ट्रों के विरुद्ध युद्ध घोषित किया ?
          या
संयुक्त राज्य अमेरिका द्वितीय विश्वयुद्ध में क्यों सम्मिलित हो गया ?
          या
द्वितीय विश्वयुद्ध में संयुक्त राज्य अमेरिका मित्रराष्ट्रों के पक्ष में क्यों सम्मिलित हुआ ? [2011]
उत्तर :
जर्मनी ने पोलैण्डे पर आक्रमण करके द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत की थी। अमेरिका मित्रराष्ट्रों के प्रति सहानुभूति रखता था, इसके बावजूद वह युद्ध में सम्मिलित नहीं हुआ। जापान, जर्मनी के पक्ष में युद्ध में सम्मिलित हो चुका था। उसने 7 दिसम्बर, 1941 ई० को अचानक ही अमेरिका के प्रशान्त महासागर स्थित नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर नामक बन्दरगाह पर आक्रमण कर दिया तथा अमेरिका के 20 युद्धपोतों और 250 विमानों को (UPBoardSolutions.com) नष्ट कर दिया। परिणामस्वरूप अमेरिका भी 11 दिसम्बर, 1941 ई० को द्वितीय विश्वयुद्ध में कूद पड़ा तथा उसने धुरी राष्ट्रों जापान, इटली व जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। युद्ध में अमेरिका के आ जाने से मित्रराष्ट्रों की शक्ति बढ़ गयी और उनकी धुरी राष्ट्रों के विरुद्ध जो सतत पराजय हो रही थी वह क्रमशः विजय में परिवर्तित होने लगी।

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प्रश्न 7.
द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणाम अत्यन्त विनाशकारी थे। भविष्य में ऐसे युद्धों को रोकने के लिए दो सुझाव दीजिए।
उत्तर :
द्वितीय विश्वयुद्ध कितना विनाशकारी था, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें 5 करोड़ से अधिक लोग मारे गये, करोड़ों लोग घायल व बेकार हो गये। लगभग 1 करोड़ 20 लाख लोगों को तो जर्मनी व इटली के यन्त्रणा शिविरों में अपनी जान गॅवानी पड़ी। इस युद्ध में सबसे अधिक हानि जर्मनी व रूस को उठानी पड़ी। इनके अतिरिक्त पोलैण्ड तथा चेकोस्लोवाकिया में शायद ही कोई गाँव बचा हो, जो युद्ध में नष्ट न हुआ हो। फ्रांस, हॉलैण्ड, बेल्जियम आदि राष्ट्रों में असंख्य लोग भूख से तड़प-तड़प कर मर गये। मानवता का यही तकाजा है कि भविष्य में ऐसे युद्ध न हों। इसके लिए दो सुझाव आगे दिये गये हैं

1. निरस्त्रीकरण – द्वितीय विश्वयुद्ध में जितना भी जन-जीवन या सम्पत्ति का विनाश हुआ, उसका मुख्य कारण विनाशकारी अस्त्र-शस्त्रों का खुलकर प्रयोग किया जाना था। अन्त में परमाणु बमों के प्रयोग ने तो जैसे मानवता को ही अनदेखा कर दिया। विभिन्न देशों के आपसी हितों के टकराव के कारण उनके पारस्परिक मतभेद तो सदा चलते और सुलझते रहेंगे, परन्तु शस्त्रों से सुसज्जित राष्ट्रों का रवैया संयमविहीन हो जाता है और वहीं से युद्धों की भयानक विभीषिका का प्रारम्भ होता है। अत: सर्वप्रथम हमें निरस्त्रीकरण को अपनाना होगा।

2. शक्तिशाली संयुक्त राष्ट्र संघ – हमें संयुक्त राष्ट्र संघ को इतना शक्तिशाली व प्रभावी बनाना होगा कि वह विभिन्न राष्ट्रों के आपसी विवादों को प्रभावी ढंग से सुलझा सके, कोई भी राष्ट्र उसके द्वारा लिये गये निर्णयों की अवहेलना न कर सके और आवश्यकता (UPBoardSolutions.com) पड़ने पर संयुक्त राष्ट्र संघ बल प्रयोग भी कर सके। सभी राष्ट्र अपने विवादों को संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर ही प्रस्तुत करें और उसके निर्णय को मानने के लिए बाध्य हों। संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्य-क्षेत्र को भी विस्तृत बनाना होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ को महाशक्तियों के प्रभाव से मुक्त रखने के लिए वीटो’ की शक्ति का उन्मूलन किया जाना चाहिए।

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प्रश्न 8.
यदि आपको अपने विद्यालय में संयुक्त राष्ट्र संघ के स्थापना दिवस पर द्वितीय विश्वयुद्ध के भयानक विध्वंस की चर्चा करनी हो तो आप अणु बम से विनष्ट हुए किन दो नगरों की चर्चा करेंगे ? युद्ध पर इसका तात्कालिक प्रभाव क्या पड़ा ?
          या
द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के किन दो शहरों पर अणुबम गिराये गये ? [2010]
          या
किस देश पर अमेरिका ने द्वितीय विश्वयुद्ध काल में एटम बम गिराया ? उन दो नगरों के नाम भी लिखिए जो बमों के प्रहार से नष्ट हो गये। [2011]
उत्तर :
द्वितीय विश्वयुद्ध में जान-माल का भयंकर विनाश हुआ तथा पाँच करोड़ से भी अधिक लोग मारे गये। इस युद्ध में सर्वाधिक हानि जर्मनी व रूस को उठानी पड़ी। 26 जुलाई, 1945 ई० को पोट्सडनी सम्मेलन में मित्रराष्ट्रों ने जापान से बिना शर्त आत्मसमर्पण करने की माँग की, परन्तु जापान ने उनकी माँग पर कोई ध्यान न देकर युद्ध जारी रखा। फलस्वरूप 6 अगस्त, 1945 ई० को अमेरिका ने जापान के समृद्ध नगर हिरोशिमा पर पहला अणु बम; जिसका नाम ‘लिटिल ब्वाय’ रखा गया था; गिरा दिया। 9 अगस्त, 1945 ई० को अमेरिका ने जापानी नगर नागासाकी पर अपना दूसरा अणुबम; जिसका नाम ‘फैट मैन’ (UPBoardSolutions.com) रखा गया था; गिराया। इन दोनों बमों के परिणामस्वरूप वहाँ भयानक तबाही फैल गयी। इन नगरों पर अणुबम के प्रहार के बाद 14 अगस्त, 1945 ई० को जापान ने मित्रराष्ट्रों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।

प्रश्न 9.
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान किस देश ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए ? इस युद्ध के बाद विश्व किन दो गुटों में बँट गया और इन गुटों का नेतृत्व किन देशों ने किया ? [2011, 17]
उत्तर :
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व के अनेक राष्ट्र दो गुटों में बँट गये-पूँजीवादी तथा साम्यवादी। पूँजीवादी देशों का नेतृत्व अमेरिका, जबकि साम्यवादी देशों का नेतृत्व रूस के हाथों में था। यद्यपि द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका तथा रूस दोनों ने मिलकर जर्मनी के विरुद्ध लड़ाई लड़ी थी, किन्तु युद्ध के बाद साम्यवाद के प्रसार के कारणों से अमेरिका तथा रूस में गम्भीर मतभेद उत्पन्न हो गये। रूस की बढ़ती हुई शक्ति से चिन्तित होकर अमेरिका तथा कुछ अन्य राष्ट्रों ने नाटो, सीटो तथा सेण्टो नामक सैनिक गुटबन्दियों का निर्माण किया।

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प्रश्न 10.
क्या आपकी दृष्टि में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा जापान के विरुद्ध अणुबम का प्रयोग करना उचित था ? अपने उत्तर की पुष्टि में दो तर्क दीजिए।
उत्तर :
संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा जापान के विरुद्ध अणुबम का प्रयोग उचित नहीं था, क्योंकि –

1. जापान का 7 दिसम्बर, 1941 ई० को अमेरिका के पर्ल हार्बर नामक बन्दरगाह पर आक्रमण उसके नौसैनिक अड्डे पर केन्द्रित था। इस आक्रमण में अमेरिका के 20 युद्धपोत और 250 विमान नष्ट हुए थे, परन्तु कोई विशेष जन-हानि नहीं हुई थी। अमेरिका को भी जवाबी कार्यवाही में जापान के सैनिक ठिकानों को निशाना बनाना चाहिए था, परन्तु उसने हिरोशिमा और नागासाकी के सघन जन आबादी वाले 8 नगरों पर अणुबम गिराकर एक अमानवीय कृत्य किया, जिसमें जितने लोग मारे गये उनसे कई गुना अधिक के जीवन बर्बाद हो गये।

2. पर्ल हार्बर बन्दरगाह पर जापानी बमबारी दिसम्बर, 1941 ई० में की गयी थी। अमेरिका ने अणुबम 6 व 9 अगस्त, 1945 को जापानी नगरों पर गिराये। अमेरिका के पास पर्ल हार्बर पर बमबारी के उपरान्त होने वाले दूरगामी परिणामों का विश्लेषण करने के लिए पर्याप्त समय था। लेकिन अमेरिका ने दूरदर्शिता नहीं दिखायी। अणुबम के प्रयोग ने द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् एक शीत युद्ध तथा परमाणु अस्त्रों की होड़ को जन्म दिया, जिसने पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले लिया।

प्रश्न 11.
1941 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा क्यों की ? उन दो नगरों के नाम लिखिए जो अणु बम द्वारा नष्ट कर दिये गये थे। ये नगर किस देश में हैं ? [2014]
          या
द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका क्यों शामिल हुआ ? जापान आत्मसमर्पण करने को क्यों विवश हुआ ? [2014]
उत्तर :
जापान सम्पूर्ण एशिया पर अपना प्रभाव स्थापित करना चाहता था। अत: 7 दिसम्बर, 1941 ई० को अचानक ही जापानी सेना ने अमेरिका के प्रशान्त महासागर स्थित नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर भयानक आक्रमण कर दिया जिसमें अमेरिका को अत्यन्त जान-माल की हानि हुई। फलस्वरूप अमेरिका ने जापान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

अमेरिका ने जीपान के दो प्रमुख नगरों हिरोशिमा और (UPBoardSolutions.com) नागासाकी पर अणु बम गिराये जिसके कारण लाखों लोगों की मृत्यु हो गयी। इस विनाशलीला को देखकर जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया।

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प्रश्न 12. 
हिटलर कौन था? उसकी नीतियों ने किस प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध को प्रभावित किया? [2014]
उत्तर :
हिटलर जर्मनी का प्रधानमंत्री था जो बाद में वहाँ का तानाशाह बन गया। हिटलर ने वर्साय सन्धि-पत्र की अवहेलना करके जर्मनी का शस्त्रीकरण आरम्भ कर दिया, क्योंकि वह विश्व विजय करना चाहता था। इससे सम्पूर्ण यूरोप में खलबली मच गई। हिटलर की बढ़ती हुई शक्ति से भयभीत होकर यूरोप के राष्ट्र अपनी सुरक्षा के लिए युद्ध की तैयारियाँ करने लगे। यूरोप के राष्ट्रों ने एक-दूसरे के साथ मिलकर गुट बना लिये जिसके कारण द्वितीय विश्वयुद्ध का आरम्भ हुआ।।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
द्वितीय विश्वयुद्ध का आरम्भ कब और किसने किया ?
उत्तर :
द्वितीय विश्वयुद्ध का आरम्भ जर्मनी ने 1 सितम्बर, 1939 ई० को पोलैण्ड पर आक्रमण के साथ किया।

प्रश्न 2.
द्वितीय विश्वयुद्ध कब से कब तक चला ?
उत्तर :
द्वितीय विश्वयुद्ध 1939 ई० से 1945 ई० तक चला।

प्रश्न 3.
धुरी-राष्ट्रों में कौन-कौन-से देश सम्मिलित थे ?
उत्तर :
धुरी-राष्ट्रों में जर्मनी, इटली तथा जापान सम्मिलित थे।

प्रश्न 4.
जर्मनी और इटली के तानाशाहों के नाम लिखिए।
उत्तर :
जर्मनी का तानाशाह हिटलर तथा इटली का तानाशाह मुसोलिनी था।

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प्रश्न 5.
‘नकली युद्ध’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
सितम्बर, 1939 ई० से अप्रैल, 1940 ई० तक, जब तक कि वास्तविक विश्वयुद्ध नहीं छिड़ा था, उसे ‘नकली युद्ध’ कहा जाता है।

प्रश्न 6.
मित्रराष्ट्रों में कौन-कौन से देश सम्मिलित थे ?
उत्तर :
मित्रराष्ट्रों में ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ तथा फ्रांस सम्मिलित थे।

प्रश्न 7.
द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका मित्रराष्ट्रों के पक्ष में क्यों शामिल हुआ ? [2011]
          या
अमेरिका ने द्वितीय विश्वयुद्ध में किन कारणों से प्रवेश किया ?
उत्तर :
जापान द्वारा अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर बमबारी (UPBoardSolutions.com) करने से सुदूरपूर्व में अमेरिका के हित खतरे में पड़ गए थे। इसीलिए अमेरिका ने द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्रराष्ट्रों की ओर से प्रवेश किया।

प्रश्न 8.
अमेरिका ने परमाणु बम का प्रयोग सर्वप्रथम कब और कहाँ किया ?
उत्तर :
अमेरिका ने परमाणु बम का प्रयोग सर्वप्रथम 6 अगस्त, 1945 ई० को जापान के समृद्ध नगर हिरोशिमा पर किया गया।

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प्रश्न 9.
जर्मनी ने बिना शर्त आत्मसमर्पण कब किया ?
उत्तर :
जर्मनी ने 7 मई, 1945 ई० को बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया।

प्रश्न 10.
जापान ने आत्मसमर्पण कब और क्यों किया ?
उत्तर :
जापान ने हिरोशिमा और नागासाकी नगरों पर अणुबम प्रहार होने के बाद 14 अगस्त, 1945 ई० को आत्मसमर्पण किया, जबकि वास्तविक समर्पण कार्य 2 सितम्बर, 1945 ई० को सम्पन्न हुआ।

प्रश्न 11.
द्वितीय विश्वयुद्ध के दो महत्त्वपूर्ण परिणाम लिखिए।
उत्तर :
द्वितीय विश्वयुद्ध के दो महत्त्वपूर्ण परिणाम निम्नलिखित हैं—(1) धन और जन का भयंकर विनाश और संहार। (2) विश्व में दो गुटों का निर्माण एवं शीतयुद्ध का प्रारम्भ।

प्रश्न 12.
जापान के उन दो नगरों का उल्लेख कीजिए जो अणु बम द्वारा विनष्ट हुए। [2011]
उत्तर :
हिरोशिमा तथा (UPBoardSolutions.com) नागासाकी।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. द्वितीय विश्वयुद्ध का मूल कारण क्या था?

(क) वर्साय की सन्धि
(ख) जर्मनी में नाज़ी पार्टी का उत्थान
(ग) फ्रांस की महत्त्वाकांक्षा।
(घ) साम्राज्यवादी भावना

2. द्वितीय विश्वयुद्ध का आरम्भ कब हुआ? [2009, 16]

(क) 28 जुलाई, 1914 ई० को ।
(ख) 28 जून, 1919 ई० को।
(ग) 1 सितम्बर, 1939 ई० को
(घ) 3 सितम्बर, 1939 ई० को

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3. द्वितीय विश्वयुद्ध में प्रयुक्त होने वाला सबसे घातक अस्त्र कौन-सा था?

(क) टैंक
(ख) मिसाइल
(ग) परमाणु बम
(घ) हाइड्रोजन बम

4. इंग्लैण्ड का युद्धकालीन प्रधानमन्त्री कौन था?

(क) चर्चिल
(ख) चेम्बरलेन
(ग) पामस्टर्न
(घ) लॉयड जॉर्ज

5. जर्मनी ने आत्मसमर्पण कब किया?

(क) 1 मई, 1945 ई० को
(ख) 2 मई, 1945 ई० को
(ग) 7 मई, 1945 ई० को
(घ) 8 मई, 1945 ई० को

6. द्वितीय विश्वयुद्ध में अणु बम किस देश पर गिराया गया था? [2018]

(क) जापान
(ख) जर्मनी
(ग) कोरिया
(घ) इटली

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7. जापान का वास्तविक आत्मसमर्पण कब हुआ ?

(क) 7 मई, 1945 ई० को
(ख) 14 अगस्त, 1945 ई० को
(ग) 2 सितम्बर, 1945 ई० को
(घ) 6 अगस्त, 1945 ई० को

8. अमेरिका द्वारा हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया गया था [2009]

(क) 6 अगस्त, 1945 ई० को
(ख) 9 अगस्त, 1945 ई० को
(ग) 14 अगस्त, 1945 ई० को
(घ) 2 सितम्बर, 1945 ई० को

9. पर्ल हार्बर कहाँ स्थित है?

(क) प्रशान्त महासागर में
(ख) अन्ध महासागर में
(ग) हिन्द महासागर में
(घ) चीन सागर में

10. जर्मनी का तानाशाह कौन था?

(क) मुसोलिनी
(ख) हिटलर
(ग) स्टालिन
(घ) मार्शल टीटो

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11. द्वितीय विश्वयुद्ध कब-से-कब तक चला?

(क) 1939 ई० से 1942 ई० तक
(ख) 1939 ई० से 1943 ई० तक
(ग) 1939 ई० से 1944 ई० तक
(घ) 1939 ई० से 1945 ई० तक

12. वर्साय सन्धि को अस्वीकार करने वाला शासक था|

(क) स्टालिन
(ख) मुसोलिनी
(ग) हिटलर
(घ) जनरल फैंको

13. निम्नलिखित में से किस युद्ध में इटली ने भाग लिया था ? [2013]

(क) प्रथम विश्वयुद्ध में
(ख) द्वितीय विश्वयुद्ध में
(ग) दोनों युद्धों में ।
(घ) इनमें से किसी में नहीं

14. हिटलर का सम्बन्ध किस देश से था ? |2013]

(क) फ्रांस
(ख) जर्मनी
(ग) ऑस्ट्रिया
(घ) जापान

15. संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा द्वितीय विश्वयुद्ध में सम्मिलित होने का तात्कालिक कारण था (2015, 18)

(क) हिटलर द्वारा रूस पर आक्रमण
(ख) नालियों द्वारा पोलैण्ड पर आक्रमण
(ग) जापान द्वारा पर्ल हार्बर पर आक्रमण
(घ) इटली द्वारा अलवानिया पर आक्रमण

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16. पर्ल हार्बर पर आक्रमण निम्नलिखित में से किससे सम्बन्धित है? [2015]

(क) ऑस्ट्रिया-प्रशिया युद्ध
(ख) फ्रेंच-प्रशिया युद्ध
(ग) प्रथम विश्वयुद्ध
(घ) द्वितीय विश्वयुद्ध

उतरमाला

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 9 द्वितीय विश्वयुद्ध-कारण तथा परिणाम 1

Hope given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 9 are helpful to complete your homework.

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