UP Board Solutions for Class 10 Hindi रस

UP Board Solutions for Class 10 Hindi रस

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रस

परिभाषा-‘रस’ का अर्थ है–‘आनन्द’ अर्थात् काव्य से जिस आनन्द की अनुभूति होती है, वही ‘रस’ है। इस प्रकार किसी काव्य को पढ़ने, सुनने अथवा अभिनय को देखने पर पाठक, श्रोता या दर्शक को जो आनन्द प्राप्त होता है, उसे ‘रस’ कहते हैं। रस को ‘काव्य की आत्मा’ भी कहा जाता है।

रस के स्वरूप और उसके व्यक्त होने की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में लिखा है-‘विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः’ अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती (UPBoardSolutions.com) है। इस सूत्र में स्थायी भाव का स्पष्ट उल्लेख नहीं है; अत: इस सूत्र का पूरा अर्थ होगा कि स्थायी भाव ही विभाव, संचारी भाव और अनुभाव के संयोग से रस-रूप में परिणत हो जाते हैं।

अंग या अवयव-रस के चार अंग होते हैं, जिनके सहयोग से ही रस की अनुभूति होती है। ये चारों अंग या अवयव निम्नलिखित हैं–

  1. स्थायी भाव,
  2. विभाव,
  3. अनुभाव तथा
  4. संचारी भाव। स्थायी भाव

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जो भाव मानव के हृदय में हर समय सुप्त अवस्था में विद्यमान रहते हैं और अनुकूल अवसर पाते ही जाग्रत या उद्दीप्त हो जाते हैं, उन्हें स्थायी भाव कहते हैं। प्राचीन आचार्यों ने नौ रसों के नौ स्थायी भाव माने हैं, किन्तु बाद में आचार्यों ने इनमें दो रस और जोड़ दिये। इस प्रकार रसों की कुल संख्या ग्यारह हो गयी। रस और उनके स्थायी भाव निम्नलिखित हैं-

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विभाव

जिन कारणों से मन में स्थित सुप्त स्थायी भाव जाग्रत या उद्दीप्त होते हैं, उन्हें विभाव कहते हैं। विभाव के दो भेद होते हैं|

(1) आलम्बन-विभाव-जिस वस्तु या व्यक्ति के कारण किसी व्यक्ति में कोई स्थायी भाव जाग्रत हो जाये तो वह वस्तु या व्यक्ति उस भाव का आलम्बन-विभाव कहलाएगा; जैसे-जंगल से गुजरते समय अचानक शेर के दिखाई देने से भय नामक स्थायी भाव जागने पर ‘शेर आलम्बन-विभाव होगा।
आलम्बन-विभाव के भी दो भेद होते हैं—आश्रय और विषय। जिस व्यक्ति के मन में स्थायी भाव उत्पन्न होते हैं उसे आश्रय तथा जिस व्यक्ति या वस्तु के कारण आश्रय के चित्त में स्थायी भाव उत्पन्न होते हैं, उसे विषय कहते हैं। इस उदाहरण में व्यक्ति को ‘आश्रय’ तथा शेर को ‘विषय’ कहेंगे।

(2) उद्दीपन-विभाव-जो कारण स्थायी भावों को उत्तेजित या उद्दीप्त करते हैं, (UPBoardSolutions.com) वे उद्दीपन- विभाव कहलाते हैं; जैसे—शेर की दहाड़। यह स्थायी भाव ‘भय’ को उद्दीप्त करता है।

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अनुभाव

मन में आने वाले स्थायी भाव के कारण मनुष्य में कुछ शारीरिक चेष्टाएँ उत्पन्न होती हैं, वे अनुभाव कहलाती हैं; जैसे–शेर को देखकर भाग खड़ा होना या बचाव के लिए जोर-जोर से चिल्लाना। इस प्रकार उसकी बाह्य चेष्टाओं से दूसरों पर भी यह प्रकट हो जाता है कि उसके मन में अमुक भाव जाग्रत हो गया है।

अनुभाव मुख्यत: चार प्रकार के होते हैं—

  1. कायिक,
  2. मानसिक,
  3. आहार्य तथा
  4. सात्त्विक

(1) कायिक अनुभाव–आश्रय द्वारा इच्छापूर्वक की जाने वाली आंगिक चेष्टाओं को कायिक, (शरीर से सम्बद्ध) अनुभाव कहते हैं; जैसे—भागना, कूदना, हाथ से संकेत करना आदि।

(2) मानसिक अनुभाव-हृदय की भावना के अनुकूल मन में हर्ष-विषाद आदि भावों के उत्पन्न होने से जो भाव प्रदर्शित किये जाते हैं, वे मानसिक अनुभाव कहलाते हैं।

(3) आहार्य अनुभाव-मन के भावों के अनुसार अलग-अलग प्रकार की कृत्रिम वेश-रचना करने को आहार्य अनुभाव कहते हैं।

(4) सात्त्विक अनुभाव-जिन शारीरिक विकारों पर आश्रय का कोई वश नहीं होता, अपितु वे स्थायी भाव के उद्दीप्त होने पर स्वत: ही उत्पन्न हो जाते हैं, वे सात्त्विक अनुभाव कहलाते हैं। ये आठ प्रकार के होते हैं—

  1. स्तम्भ (शरीर के अंगों का जड़ हो जाना),
  2. स्वेद (पसीने-पसीने हो जाना),
  3. रोमांच (रोंगटे खड़े हो जाना),
  4. स्वर-भंग (आवाज न निकलना),
  5. कम्प (काँपना),
  6. विवर्णता (चेहरे का रंग उड़ जाना),
  7. अश्रु (आँसू),
  8. प्रलय (सुध-बुध खो बैठना)।

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संचारी भाव

आश्रय के मन में उठने वाले अस्थिर मनोविकारों को संचारी भाव कहते हैं। ये मनोविकार पानी के बुलबुलों की भाँति बनते-मिटते रहते हैं। संचारी भाव को व्यभिचारी भाव के नाम से भी पुकारते हैं। ये स्थायी भावों को अधिक पुष्ट करने में सहायक का कार्य करते हैं। (UPBoardSolutions.com) ये अपना कार्य करके तुरन्त स्थायी भावों में ही विलीन हो जाते हैं। प्रमुख संचारी भावों की संख्या तैंतीस मानी गयी है, जो इस प्रकार हैं-

  1. निर्वेद,
  2. आवेग,
  3. दैन्य,
  4. श्रम,
  5. मद,
  6. जड़ता,
  7. उग्रता,
  8. मोह,
  9. विबोध,
  10. स्वप्न,
  11. अपस्मार,
  12. गर्व,
  13. मरण,
  14. आलस्य,
  15. अमर्ष,
  16. निद्रा,
  17. अवहित्था,
  18. उत्सुकता,
  19. उन्माद,
  20. शंका,
  21. स्मृति,
  22. मति,
  23. व्याधि,
  24.  सन्त्रास,
  25. लज्जा,
  26. हर्ष,
  27. असूया,
  28. विषाद,
  29. धृति,
  30. चपलता,
  31. ग्लानि,
  32. चिन्ता और
  33. वितर्क।

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[विशेष—कक्षा 10 के पाठ्यक्रम में केवल हास्य और करुण रस ही निर्धारित हैं, किन्तु अध्ययन में परिपक्वता की दृष्टि से श्रृंगार और वीर रस को भी संक्षेप में यहाँ दिया जा रहा है; क्योंकि पद्यांशों का । काव्य-सौन्दर्य लिखने के लिए इनका ज्ञान भी आवश्यक है।]

(1) श्रृंगार रस

परिभाषा–स्त्री-पुरुष के पारस्परिक प्रेम (मिलन या विरह) के वर्णन से हृदय में उत्पन्न होने वाले आनन्द को श्रृंगार रस कहते हैं। यह रसराज कहलाता है। इसका स्थायी भाव ‘रति’ है।

भेद-श्रृंगार रस के दो भेद होते हैं–

  1. संयोग श्रृंगार तथा
  2. वियोग (विप्रलम्भ) श्रृंगार।

(1) संयोग श्रृंगार-जब नायक-नायिका के विविध प्रेमपूर्ण कार्यों, मिलन, वार्तालाप, स्पर्श आदि का वर्णन होता है, तब संयोग श्रृंगार होता है; उदाहरण-

बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।
सौंह करै भौंहनि हँसै, दैन कहै नटि जाय।

स्पष्टीकरण-

(1) स्थायी भाव–रति।
(2) विभाव—

  • आलम्बन-कृष्ण। आश्रय-राधा।
  • उद्दीपन-बतरस लालच।

(3) अनुभाव-बाँसुरी छिपाना, भौंहों से हँसना, मना करना।
(4) संचारी भाव-हर्ष, उत्सुकता, चपलता आदि।

(2) वियोग (विप्रलम्भ) श्रृंगार—प्रबल प्रेम होते हुए भी जहाँ नायक-नायिका के वियोग का । वर्णन हो, वहाँ वियोग श्रृंगार होता है; उदाहरण-

ऊधौ मन न भये दस बीस ।
एक हुतौ सो गयौ स्याम सँग, को अवराधै ईस ॥
इंद्री सिथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस।
आसा लागिरहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस ॥
तुम तौ सखा स्यामसुन्दर के, सकल जोग के ईस ।
सूर हमारें नंदनंदन बिनु, और नहीं जगदीस ॥

स्पष्टीकरण–

(1) स्थायी भाव–रति।
(2) विभाव—

  • आलम्बन–कृष्ण। आश्रय-गोपियाँ।
  • द्दीपन—उद्धव का योग सन्देश।

(3) अनुभाव-विषाद।।
(4) संचारी भाव-दैन्य, जड़ता, स्मृति आदि।

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(2) हास्य रस [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]

परिभाषा-किसी व्यक्ति के विकृत रूप, आकार, वेशभूषा आदि को देखकर (UPBoardSolutions.com) हृदय में जो विनोद का भाव उत्पन्न होता है, वही ‘हास’ कहलाता है। यही ‘हास’ नामक स्थायी भाव विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव से पुष्ट होकर हास्य रस कहलाता है; उदाहरण-

बिन्ध्य के बासी उदासी तपोब्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे।
गौतम तीय तरी तुलसी, सो कथा सुनि भै मुनिबूंद सुखारे ॥
छैहैं सिला सब चन्द्रमुखी, परसे पद-मंजुल-कंज तिहारे।
कीन्हीं भली रघुनायक जू करुना करि कानन को पगु धारे॥ [2009]

स्पष्टीकरण–

  1.  स्थायी भाव-हास (हँसी)।
  2. विभाव—
    • आलम्बन–विन्ध्य के वासी तपस्वी। आश्रय-पाठक।
    • उद्दीपन-अहिल्या की कथा सुनना, राम के आगमन पर प्रसन्न होना, स्तुति करना।।
  3. अनुभाव-हँसना।।
  4. संचारी भाव–स्मृति, चपलता, उत्सुकता आदि।
    अन्य उदाहरण—

    • पूछति ग्रामवधू सिय सों, ‘कहौ साँवरे से, सखि रावरे क़ो हैं ?
    • आगे चना गुरुमात दए ते, लए तुम चाबि हमें नहिं दीने ।
      स्याम कह्यो मुसकाय सुदामा सौं, चोरी की बान में हौ जू प्रवीने ।।
      पोटरी कॉख में चॉपि रहे तुम, खोलत नाहिं सुधारस भीने ।
      पाछिली बानि अजौ ने तजौ तुम, तैसेई भाभी के तन्दुल कीन्हे ।।

(3) करुण रस [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]

परिभाषा–प्रिय वस्तु तथा व्यक्ति के नाश या अनिष्ट से हृदय में उत्पन्न क्षोभ से ‘शोक’ उत्पन्न होता है। यही शोक नामक स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव से पुष्ट हो जाता है तब ‘करुण रस’ दशा को प्राप्त होता है; उदाहरण-श्रवणकुमार की मृत्यु पर उसकी माता की यह दशा करुण रस की निष्पत्ति कराती है–

मणि खोये भुजंग-सी जननी,
फन-सा पटक रही थी शीश,
अन्धी आज बनाकर मुझको,
किया न्याय तुमने जगदीश ?

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स्पष्टीकरण–

  1. स्थायी भाव—शोक।
  2. विभाव—
    • आलम्बन-श्रवण। आश्रय–पाठक।
    • उद्दीपन-दशरथ की उपस्थिति।
  3. अनुभाव-सिर पटकना, प्रलाप करना आदि।
  4. संचारी भाव-स्मृति, विषाद आदि।

अन्य उदाहरण

(1) अभी तो मुकुट बँधा था माथ, हुए कल ही हल्दी के हाथ ।
खुले भी न थे लाज के बोल, खिले भी चुम्बन शून्य कपोल ।।
हाय रुक गया यहीं संसार, बना सिन्दूर अनल अंगारे ।
वातहत लतिका यह सुकुमार, पड़ी है। छिन्नाधार ।।

(2) सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूप सीले बल तेज बखानी ।।
करहिं बिलाप अनेक प्रकारा। परहिं भूमि तल बारहिं बारा ।। [2017]

(4) वीर रस

परिभाषा-शत्रु के उत्कर्ष को मिटाने, दोनों की दुर्दशा देख उनका उद्धार करने, (UPBoardSolutions.com) धर्म का उद्धार करने आदि में जो उत्साह कर्मक्षेत्र में प्रवृत्त करता है, वह वीर रस कहलाता है। वीर रस का स्थायी भाव ‘उत्साह’ है; उदाहरण-

मैं सत्य कहता हूँ सखे, सुकुमार मत जानो मुझे।
यमराज से भी युद्ध में प्रस्तुत सदा मानो मुझे ॥
है और की तो बात ही क्या, गर्व मैं करता नहीं।
मामा तथा निज तात से भी, समर में डरता नहीं ॥

स्पष्टीकरण-

  1. स्थायी भाव–उत्साह।
  2. विभाव-
    • आलम्बन-कौरव। आश्रय-अभिमन्यु।
    • उद्दीपन-चक्रव्यूह की रचना।
  3. अनुभाव-अभिमन्यु की उक्ति।
  4.  संचारी भाव-गर्व, हर्ष, उत्सुकता आदि।

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अभ्यास

प्रश्न 1
निम्नलिखित में कौन-सा रस है ? उसका स्थायी भाव एवं परिभाषा लिखिए
(1) बिपति बँटावन बंधु बाहु बिनु करौं भरोसो काको ?
(2) नाना वाहन नाना वेषा। बिहसे सिव समाज निज देखा ।।
कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद–कर कोऊ बहु-बाहू ।।
(3) जो भूरि भाग्य भरी विदित थी निरुपमेय सुहासिनी ।
हे हृदयवल्लभ! हूँ वही अब मैं महा हतभागिनी ।।
जो साथिनी होकर तुम्हारी थी अतीव सनाथिनी ।।
है अब उसी मुझ-सी जगत में और कौन अनाथिनी ।।
(4) जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फन करिबर कर हीना ।।
अस मम जिवन बन्धु बिन तोही। जौ जड़ दैव जियावइ मोही ।। [2010, 11]
(5) सीस पर गंगा हँसै, भुजनि भुजंगा हँसै ।
हास ही को दंगा भयो नंगा के विवाह में ।। [2010, 12, 14]
(6) हँसि हँसि भाजै देखि दूलह दिगम्बर को,
पाहुनी जे आवें हिमाचल के उछाह में। [2011, 12, 13, 15]
(7) हे जीवितेश ! उठो, उठो यह नींद कैसी घोर है।
है क्या तुम्हारे योग्य, यह तो भूमि सेज कठोर है।।
(8) हरि जननी मैं बालक तेरा। काहे न अवगुण बकसहु मेरा ।।
सुत अपराध करै दिन केते। जननी कैचित रहै न तेते ।।
कर गहि केस करे जो घाता। तऊ न हेत उतारै माता ।।
कहैं कबीर एक बुधि बिचारी। बालक दुःखी-दुःखी महतारी ।।
(9) जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि तेहिं न बिलोकी भूली ।।
पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलानी। देखि दसा हर गन मुसुकाहीं ।। [2014]
(10) ब्रज के बिरही लोग दुखारे।
बिनु गोपाल ठगे से ठाढ़े, अति दुर्बल तन कारे ।।
नंद जसोदा मारग जोवति, निस दिन साँझ सकारे ।
चहुँ दिसि कान्ह कान्ह कहि टेरते, अँसुवन बहत पनारे ।।
(11) ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं ।।
वृंदावन गोकुल वन उपवन सघन कुंज की छाहीं ।।
(12) चहुँ दिसि कान्ह कान्हें कहि टेरत, अँसुवने बहत पनारे ।। [2013]
(13) तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल व्याकुल भारी ।।
चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहिं सौंपेउ मोही ।। [2009, 10]
(14) हा! वृद्धा के अतुल धन, हा! मृदुता के सहारे ।
ही ! प्राणों के परमप्रिय, हा! एक मेरे दुलारे ।
(15) गोपी ग्वाल गाइ गो सुत सब, अति ही दीन विचारे ।
सूरदास प्रभु बिनु यौं देखियत, चंद बिना ज्यौं तारे ।।

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(16) प्रिय पति वह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है ।
दु:ख जलनिधि डूबी का सहारा कहाँ है ।।
लख मुख जिसका आज लौं जी सकी हूँ, |
वह हृदय हमारा नैन- तारा कहाँ है ।। [2011]
(17) करि विलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपति किमि जाय बखानी ।।
सुन विलाप दुखहूँ दुख लागा। धीरजहूँ कर धीरज भागा ।।
(18) कौरवों का श्राद्ध करने के लिए।
या कि रोने को चिता के सामने।
शेष अब है रह गया कोई नहीं,
एक वृद्धा एक अन्धे के सिवा।। [2010, 12, 14]
(19) पति सिर देखत मन्दोदरी। मुरुछित बिकले धरनि खसि परी।।
जुबति बूंद रोवत उठि धाई। तेहि उठाइ रावन पहिं आई ।। [2012]
(20) राम-राम कहि राम (UPBoardSolutions.com) कहि, राम-राम कहि राम ।
तन परिहरि रघुपति विरहं, राउ गयउ सुरधाम् ।। [2012]
(21) मम अनुज पड़ा है, चेतनाहीन होके,
तरल हृदय वाली जानकी भी नहीं है ।
अब बहु दु:ख से अल्प बोला न जाता,
क्षण भर रह जाता है न उद्विग्नता से ।। [2013]
(22) बिलपहिं बिकलदास अरु दासी। घर घर रुदन करहिं पुरवासी ।
अँथयउ आजु भानुकुल भानू। धरम अवधि गुन रूप निधानू ।। [2018]
उत्तर
(1) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक।
(2) रस — हास्य, स्थायी भाव – शोक।
(3) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक।
(4) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक।
(5) रस — करुण, स्थायी भाव शोक।
(6) रस — हास्य, स्थायी भाव – हास।
(7) रस – करुण, स्थायी भाव – शोक।
(8) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक।
(9) रस — हास्य, स्थायी भावे – हास।
(10) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक।
(11) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक!
(12) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक।
(13) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक।
(14) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक।
(15) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक।
(16) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक।
(17) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक।
(18) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक।
(19) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक।
(20) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक।
(21) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक।
(22) रस — करुण, स्थायी भाव – शोक।

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[ संकेत-परिभाषा के लिए सम्बन्धित रस की सामग्री का अध्ययन करें।]

प्रश्न 2
करुण रस का स्थायी भाव बताते हुए एक उदाहरण दीजिए। [2011]
या
करुण रस की परिभाषा लिखिए और उसका एक उदाहरण दीजिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 16, 17]
या
करुण रस की परिभाषा सोदाहरण लिखिए।
उत्तर
[संकेत-करुण रस के अन्तर्गत दिये गये विवरण को पढ़िए।]

प्रश्न 3
हास्य रस की परिभाषा लिखिए और उसका स्थायी भाव भी बताइए। [2011]
या
हास्य रस की परिभाषा उदाहरण सहित  लिखिए। [2009, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17]
या
हास्य रस का लक्षण और उदाहरण दीजिए।
या
हास्य रस का स्थायी भाव लिखिए तथा एक उदाहरण बताइट। [2009, 11]
उत्तर
[ संकेत-हास्य रस के अन्तर्गत दिये गये विवरण को पढ़िए।]

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प्रश्न 4
निम्नांकित पद्यांश में वर्णित रस का उल्लेख करते हुए उसका स्थायी भाव बताइए-
मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय।
जा तन की झाँईं परै, स्याम हरित दुति होय ॥
उत्तर
प्रस्तुत दोहे के एक से अधिक अर्थ हैं। एक अर्थ के आधार पर इसे भक्ति रस का दोहा माना जाता है तथा दूसरे अर्थ के आधार पर श्रृंगार रस का। भक्ति रस का स्थायी भाव है—देव विषयक रति तथा शृंगार रस का स्थायी (UPBoardSolutions.com) भाव है-रति।
[ संकेत–उपर्युक्त दोनों ही रस पाठ्यक्रम में निर्धारित नहीं हैं।]

प्रश्न 5
‘भक्ति रस’ और ‘वात्सल्य रस’ में क्या अन्तर है ? कोई एक उदाहरण लिखिए।
या
वात्सल्य रस की उदाहरण सहित परिभाषा लिखिए।
उत्तर
देवताविषयक रति अर्थात् भगवान् के प्रति अनन्य प्रेम ही विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट होकर भक्ति रस में परिणत हो जाता है;
उदाहरण-

पुलक गात हिय सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू॥ पुत्र, बालक, शिष्य, अनुज आदि के प्रति रति को भाव स्नेह कहलाता है। इसका वत्सल नामक स्थायी भाव; विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट होकर वात्सल्य रस में परिणत हो जाता है; उदाहरण-

जसोदा हरि पालने झुलावै ।
हलराउँ, दुलरावें, मल्हावै, जोइ-सोइ कछु गावें ॥

[संकेत-उपर्युक्त दोनों ही रस पाठ्यक्रम में निर्धारित नहीं हैं।]

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प्रश्न 6
सिसु सब राम प्रेम बस जाने। प्रीति समेत निकेत बखाने ।।
निज-निज रुचि सब लेहिं बुलाई। सहित सनेह जायँ दोउ भाई ।।
उपर्युक्त चौपाई में निहित रस तथा उसका स्थायी भाव लिखिए।
उत्तर
प्रश्न में दी गई चौपाई में श्रृंगार रस है, जिसका स्थायी भाव ‘रति’ है।

[संकेत-यह रस पाठ्यक्रम में निर्धारित नहीं है।

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 6 अजन्ता (गद्य खंड)

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जीवन-परिचय एवं कृतियाँ

प्रश्न 1.
भगवतशरण उपाध्याय के जीवन-परिचय एवं साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डालिए। [2009, 10]
या
भगवतशरण उपाध्याय का जीवन-परिचय दीजिए एवं उनकी एक रचना का नामोल्लेख कीजिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
संस्कृत-साहित्य तथा पुरातत्त्व के समर्थ अध्येता एवं हिन्दी-साहित्य के प्रसिद्ध उन्नायक भगवतशरण उपाध्याय अपने मौलिक और स्वतन्त्र विचारों के लिए प्रसिद्ध हैं। ये प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति के प्रमुख अध्येता और व्याख्याकार होते हुए भी रूढ़िवादिता एवं परम्परावादिता से ऊपर रहे हैं। |

जीवन-परिचय-भगवतशरण उपाध्याय का जन्म सन् 1910 ई० में बलिया (उत्तर प्रदेश) जिले के ‘उजियारपुर’ नामक ग्राम में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा अपने ग्राम में हुई। उच्च शिक्षा-प्राप्ति के लिए ये बनारस आये और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास में एम० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। ये संस्कृत-साहित्य और पुरातत्त्व के अध्येता तथा हिन्दी-साहित्य के उन्नायक रहे हैं। ये प्रयाग एवं लखनऊ संग्रहालयों (UPBoardSolutions.com) के पुरातत्त्व विभाग के अध्यक्ष भी रहे हैं। इन्होंने पिलानी स्थित बिड़ला महाविद्यालय में प्राध्यापक के पद पर भी कार्य किया। तत्पश्चात् विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में प्राचीन इतिहास विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष पद पर कार्य करके अवकाश ग्रहण किया और देहरादून में स्थायी रूप से निवास करते हुए साहित्य-सेवा में जुट गये। अगस्त, सन् 1982 ई० में इसे मनीषी साहित्यकार ने इस असारे संसार से विदा ले ली।

रचनाएँ–उपाध्याय जी ने हिन्दी में तो विपुल साहित्य की रचना की ही है, किन्तु अंग्रेजी में भी इनकी कुछ एक प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। इनकी उल्लेखनीय रचनाएँ निम्नलिखित हैं

  1. पुरातत्त्व-‘मन्दिर और भवन’, ‘भारतीय मूर्तिकला की कहानी’, ‘भारतीय चित्रकला की कहानी’, ‘कालिदास का भारत’। इन पुस्तकों में प्राचीन भारतीय संस्कृति, साहित्य और कला का सूक्ष्म वर्णन हुआ है।। |
  2. इतिहास–‘खून के छींटे’, ‘इतिहास साक्षी है’, ‘इतिहास के पन्नों पर’, ‘प्राचीन भारत का इतिहास’, ‘साम्राज्यों के उत्थान-पतन’ आदि। इन पुस्तकों में प्राचीन इतिहास को साहित्यिक सरसता के साथ प्रस्तुत किया गया है।
  3. आलोचना-‘विश्व साहित्य की रूपरेखा’, ‘साहित्य और कला’, ‘कालिदास’ आदि। इन ग्रन्थों में साहित्य के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। |
  4. यात्रा-वृत्तान्त-‘कलकत्ता से पीकिंग’, ‘सागर की लहरों पर’, ‘मैंने देखा लाल चीन’ आदि। इनमें इनकी विदेश-यात्राओं का सजीव विवरण है।
  5. संस्मरण और रेखाचित्र--‘मैंने देखा’, ‘इँठा आम’। इनमें स्मृति के साथ-साथ संवेदना के रंगों से भरे सजीव शब्द-चित्र उभारे गये हैं।
  6. अंग्रेजी ग्रन्थ-‘इण्डिया इन कालिदास’, ‘वीमेन इन ऋग्वेद’ तथा ‘एंशियेण्ट इण्डिया’।

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साहित्य में स्थान-उपाध्याय जी पुरातत्त्व और संस्कृति के महान् विद्वान् हैं। उन्होंने अपने गम्भीर और सूक्ष्म अध्ययन को अपनी रचनाओं में साकार रूप प्रदान किया है। वे हिन्दी के पुरातत्त्वविद्, भारतीय

संस्कृति के अध्येता, रेखाचित्रकार और महान् शैलीकार थे। विदेशों में दिये गये उनके व्याख्यान हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। इन्होंने सौ से भी अधिक पुस्तकें लिखकर हिन्दी-साहित्य में अपना उल्लेखनीय स्थान बनाया है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्न

प्रश्न-पत्र में केवल 3 प्रश्न (अ, ब, स) ही पूछे जाएँगे। अतिरिक्त प्रश्न अभ्यास एवं परीक्षोपयोगी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण दिए गये हैं।
प्रश्न 1.
जिन्दगी को मौत के पंजों से मुक्त कर उसे अमर बनाने के लिए आदमी ने पहाड़ काटा है। किस तरह इंसान की खूबियों की कहानी सदियों बाद आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचायी जाए, इसके लिए आदमी ने कितने ही उपाय सोचे और किये।  उसने चट्टानों पर अपने संदेश खोदे, ताड़ों-से ऊँचे धातुओं-से चिकने पत्थर के खम्भे खड़े किये, ताँबे और पीतल के पत्तरों पर अक्षरों के मोती बिखेरे और उसके जीवन-मरण की कहानी सदियों के उतार पर सरकती चली आयी, चली आ रही है, जो आज हमारी अमानत-विरासत बन गयी है। [2011]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
  2. व्यक्ति ने आगामी पीढ़ी तक अपनी  बातों को पहुँचाने के लिए क्या-क्या किया है ?
  3. आगामी पीढ़ी तक पहुँचायी गयी बातें आज हमारे लिए क्या स्थान रखती हैं ?
  4. लेखक की दृष्टि में अजन्ता की गुफाओं के निर्माण का क्या उद्देश्य रहा है ?

[ सरकती = फिसलती। अमानत = सुरक्षित रखने के लिए दी गयी वस्तु, धरोहर। विरासत = पूर्वजों से। प्राप्त सम्पत्ति या गुण, उत्तराधिकार।]

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उत्तर
(अ) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘गद्य-खण्ड’ में संकलित तथा भारतीय पुरातत्त्व के महान् विद्वान् श्री भगवतशरण उपाध्याय द्वारा लिखित ‘अजन्ता’ शीर्षक निबन्ध से उद्धृत है। अथवा निम्नवत् लिखेंपाठ का नाम-अजन्ता। लेखक का नाम—भगवतशरण उपाध्याय।।
[विशेष—इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के प्रश्न ‘अ’ (UPBoardSolutions.com) के लिए यही उत्तर इसी रूप में लिखा जाएगा।]

(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्यो-मनुष्य का जीवन क्षणभंगुर है। मृत्यु सबको निगल जाती है। मृत्यु से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है, वह है कृति (रचना)। मनुष्य को कुछ ऐसी रचना कर देनी चाहिए, जो अनन्तकाल तक स्थायी रहे। जब तक वह रचना विद्यमान रहेगी, उसके रचयिता का नाम जीवित रहेगा। लोग उसे भी याद करेंगे। किसी व्यक्ति विशेष को अगली पीढ़ियाँ जानें और सैकड़ों-हजारों वर्षों के बाद आने वाली पीढ़ियाँ भी अपने महान् पूर्वजों की विशेषताओं और इतिहास से परिचित हों, इसके लिए मनुष्य ने अनेक उपाय सोचे और उन उपायों को कार्यरूप में परिणत भी किया।

द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या–लेखक का कहना है कि अपनी बातों को अग्रिम पीढ़ी तक पहुँचाने के उद्देश्य से मनुष्य ने पत्थर की विशाल चट्टानों पर सन्देश खुदवाये जिससे आने वाली सन्तति उन्हें पढ़े और जाने। कभी मनुष्य ने ताड़ के वृक्षों के समान ऊँचे चिकने पत्थरों से स्तम्भ बनवाये तथा ताँबे और पीतल के पत्रों पर सुन्दर मोती जैसे अक्षरों में लेख लिखवाये जो आगे आने वाली पीढ़ियों को उनके पूर्वजों की कहानी सुनाएँ। इसी प्रकार मानव-जाति का इतिहास एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चला आ रहा है। ये पहाड़ों की गुफाएँ, चट्टान, स्तम्भ तथा लेख आज हमारे समाज की धरोहर हैं। ये हमारे पूर्वजों की परम्परा से चली आती हुई हमारी सम्पत्ति हैं। हम इन पर गर्व करते हैं।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक कहना चाहता है कि अमरत्व प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को कला का सहारा लेना चाहिए।
  2. अपनी बातों को आगामी पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए व्यक्ति ने पत्थर की चट्टानों पर सन्देश खुदवाये, ऊँचे-चिकने पत्थरों के खम्भे बनवाये, ताँबे-पीतल के पत्रों पर लेख लिखवाये तथा पर्वतों पर गुफा-मन्दिर बनवाये।
  3. आगामी पीढ़ी तक विभिन्न माध्यमों से पहुँचायी गयी बातें आज हमारे लिए धरोहर को स्थान रखती हैं, जो पूर्वजों की परम्परा से आयी हमारी सम्पत्ति हैं।
  4. लेखक की दृष्टि में अजन्ता की गुफाओं के निर्माण का (UPBoardSolutions.com) उद्देश्य यह है कि सैकड़ों-हजारों वर्षों के बाद आने वाली पीढ़ियाँ भी अपने पूर्वजों की विशेषताओं और अपने देश के इतिहास से परिचित हो सकें।

प्रश्न 2.
जैसे संगसाजों ने उन गुफाओं पर रौनक बरसायी है, चितेरे जैसे रंग और रेखा में दर्द और दया की कहानी लिखते गये हैं, कलावन्त छेनी से मूरतें उभारते-कोरते गये हैं, वैसे ही अजन्ता पर कुदरत का नूर बरस पड़ा है, प्रकृति भी वहाँ थिरक उठी है। बम्बई के सूबे में बम्बई और हैदराबाद के बीच, विन्ध्याचल के पूरब-पश्चिम दौड़ती पर्वतमालाओं से निचौंधे पहाड़ों का एक सिलसिला उत्तर से दक्खिन चला गया है, जिसे सह्याद्रि कहते हैं। (2015)
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने किस स्थान का और कैसा चित्रण किया है ?
  2. अजन्ता के गुफा मन्दिर किस पहाड़ की श्रृंखला को सनाथ करते हैं ?
  3. सह्याद्रि की भौगोलिक स्थिति को स्पष्ट कीजिए।

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[ संगसाज = शिल्पी, पत्थरों पर चित्र कुरेदने वाले। रौनक = सुन्दरता। कलावन्त = कलाकार। कुदरत = प्रकृति। नूर = आभा, चमक। निचौंधे = नीचे का। गुहा = गुफा।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या-अजन्ता की गुफाओं को देखकर ऐसा लगता है कि पत्थरों को काटकर मूर्ति बनाने वाले कलाकारों ने इन गुफाओं में चारों ओर सौन्दर्य की वर्षा कर दी है। चित्रकारों ने रंगों और रेखाओं के माध्यम से पीड़ा और (UPBoardSolutions.com) करुणा की भावनाओं को व्यक्त करने वाले सजीव चित्र अंकित कर दिये हैं। शिल्पकारों ने अपनी छेनी की चोटों से पत्थरों को काटकर और उभारकर सजीव मूर्तियाँ बना दी हैं। अजन्ता की गुफाओं में प्रकृति ने भी विशेष सौन्दर्य बरसाया है। ऐसा लगता है कि प्रकृति भी उस कलात्मक सौन्दर्य को देखकर आनन्द से नृत्य करने लगी है।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने अजन्ता की गुफाओं के चारों ओर की प्राकृतिक वैभव की छटा, गुफाओं के पत्थरों पर भावपूर्ण चित्र एवं जीवन्त मूर्तियों का बड़ा सजीव, हृदयग्राही और आलंकारिक चित्रण किया है।
  2. अजन्ता के गुफा मन्दिर; जो देशी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र हैं; सह्याद्रि की पर्वतश्रृंखला को सनाथ करते हैं।
  3. बम्बई प्रदेश (स्वतन्त्रता पूर्व बम्बई एक प्रदेश था, अब महाराष्ट्र प्रदेश में मुम्बई नाम का एक महानगर) में बम्बई और हैदराबाद के मध्य में विन्ध्याचल की पूर्व-पश्चिम की ओर जाती हुई पर्वतश्रेणियों के नीचे से पर्वतों की एक श्रृंखला उत्तर से दक्षिण की ओर चली गयी है। इस पर्वत-श्रृंखला का नाम सह्याद्रि’ है। इसी पर्वत-श्रृंखला को लेखक ने पहाड़ी जंजीर कहा है। इसी पर अजन्ता के गुफा-मन्दिर स्थित हैं।

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प्रश्न 3.
अजन्ता गाँव से थोड़ी दूर पर पहाड़ों के पैरों में साँप-सी लोटती बाधुर नदी कमान-सी मुड़ गयी है। वहीं पर्वत का सिलसिला एकाएक अर्द्धचन्द्राकार हो गया है, कोई दो-सौ पचास फुट ऊँचा हरे वनों के बीच मंच पर मंच की तरह उठते पहाड़ों का यह सिलसिला हमारे पुरखों को भा गया और उन्होंने उसे खोदकर भवनों-महलों से भर दिया। सोचिए, जरा ठोस पहाड़ की चट्टानी छाती और कमजोर इंसान का उन्होंने मेल जो किया, तो पर्वत का हिया दरकता चला गया और वहाँ एक-से-एक बरामदे, हॉल और मन्दिर बनते चले गये।
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
  2. अजन्ता की भौगोलिक स्थिति का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

[ अर्द्धचन्द्राकार = आधे चन्द्रमा के आकार का। पुरखे = पूर्वज। भा गया = अच्छा लगा।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक श्री भगवतशरण उपाध्याय जी का कहना है कि दो-सौ पचास फुट ऊँचे पर्वतों की अर्द्धचन्द्राकार पंक्ति हमारे पूर्वजों को बहुत अच्छी लगी और उन्होंने वहाँ पर्वतों को काट-छाँटकर भवन और महल बना दिये। (UPBoardSolutions.com) विचार करके देखिए कि दुर्बल मनुष्य और कठोर चट्टानों का जो मेल हुआ उससे पर्वतों का हृदय कटता चला गया और वहाँ एक-से-एक सुन्दर बरामदे, हॉल और मन्दिरों का निर्माण होता चला गया। मनुष्य के दुर्बल हाथों ने पर्वतों की कठोर चट्टानों को काटकर सुन्दर भवन, उनके विभिन्न भाग और मन्दिरों का निर्माण कर डाला।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि लगन और परिश्रम से मनुष्य कठिन से कठिन कार्य भी कर सकता है। ।
  2. अजन्ता गाँव से कुछ ही दूरी पर बाधुर नदी पर्वत की तलहटी में साँप की भाँति लोटती हुई धनुष के आकार में मुड़ गयी है। इसी स्थान पर पर्वत भी आधे चन्द्रमा के आकार के हो गये हैं। हरे-भरे वनों के बीच में ऐसा लगता है कि जैसे पर्वतों ने मंच के ऊपर मंच का निर्माण कर दिया हो।

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प्रश्न 4.
पहले पहाड़ काटकर उसे खोखला कर दिया गया, फिर उसमें सुन्दर भवन बना लिए गए, जहाँ खंभों पर उमादी मूरतें विहँस उठीं। भीतर की समूची दीवारें और छतें रगड़कर चिकनी कर ली गयीं और तब उनकी जमीन पर चित्रों की एक दुनिया ही बसा दी गयी। पहले पलस्तर लगाकर आचार्यों ने उन पर लहराती रेखाओं में चित्रों की काया सिरज दी, फिर उनके चेले कलावन्तों ने उनमें रंग भरकर प्राण फेंक दिए। फिर तो दीवारें उमग उठीं, पहाड़ पुलकित हो उठे। [2014]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश का सन्दर्भ (पाठ और लेखक का नाम) लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स) पहाड़ों को किस प्रकार जीवन्त बनाया गया?
[ मूरतें = मूर्तियाँ। विहँस = मुसकराना, खिलना। सिरजना = बनाना। कलावन्तों = कलाकारों। प्राण फेंक देना = जीवन्त बना देना।]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश में लेखक कहते हैं कि सर्वप्रथम गुफाओं के अन्दर की दीवारों और छतों को रगड़-रगड़कर अत्यधिक चिकना बना लिया गया। तत्पश्चात् उस चिकनी पृष्ठभूमि पर चित्रकारों के द्वारा अनेकानेक चित्र (UPBoardSolutions.com) बना दिये गये, जिनको देखकर ऐसा लगता है। कि चित्रों की एक नयी दुनिया ही निर्मित कर दी गयी हो।।
द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत गद्यांश में लेखक का कहना है कि गुफा की भीतरी दीवारों पर चित्रकारों के द्वारा विभिन्न चित्रों को बाहरी रेखाओं के द्वारा प्रदर्शित किया गया और उसके बाद उनके शिष्यों ने उन चित्रों को रँगकर ऐसा बना दिया कि वे सजीव लगने लगे।

(स) पहाड़ों को काटकर भवन का रूप दिया गया। दीवारों, छतों और खम्भों को चिकना कर उन पर सजीव चित्र निर्मित किये गये। चित्रों में रंग भी भरा गया। इस प्रकार पहाड़ों को जीवन्त बना दिया गया।

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प्रश्न 5.
कितना जीवन बरस पड़ा है इन दीवारों पर; जैसे फसाने अजायब का भण्डार खुल पड़ा हो। कहानी से कहानी टकराती चली गयी है। बन्दरों की कहानी, हाथियों की कहानी, हिरनों की कहानी, क्रूरता और भय की, दया और त्याग की। जहाँ बेरहमी है, वहीं दया का भी समुद्र उमड़ पड़ा है। जहाँ पाप है, वहीं क्षमा की सोता फूट पड़ा है। राजा और कैंगले, विलासी और भिक्षु, नर और नारी, मनुष्य और पशु सभी कलाकारों के हाथों सिरजते चले गये हैं। हैवान की हैवानी को इंसान की इंसानियत से कैसे जीता जा सकता है, कोई अजन्ता में जाकर देखे। बुद्ध का जीवन हजार धाराओं में होकर बहता है। जन्म से लेकर निर्वाण तक उनके जीवन की प्रधान घटनाएँ कुछ ऐसे लिख दी गयी हैं कि आँखें अटक जाती हैं, हटने का नाम नहीं लेतीं। [2009, 12, 14, 17]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. अजन्ता की दीवारों पर किनकी कहानियाँ चित्रित हैं ?
  2. अजन्ता की गुफाओं में किस महापुरुष के जीवन को विस्तार से चित्रित किया गया है?
  3. अजन्ता की गुफाओं में किन-किन विरोधी भावों और व्यक्तियों का चित्रण है ? या दीवारों पर बने चित्र किन-किन से सम्बन्धित हैं ?
  4. कलाकारों के हाथों क्या सिरजते चले गये हैं?

[ फसाने = कहानियाँ। बेरहमी = निर्दयता। सिरजना = बनाना। हैवान = क्रूर। हैवानी = क्रूरता। इंसान = मनुष्य। इंसानियत = मानवता।]

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उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत गद्यांश में लेखक कहते हैं कि अजन्ता की गुफाओं की दीवारों पर बने चित्र इतने सुन्दर हैं कि उन्हें देखकर लगता है कि इन दीवारों पर मानो जीवन स्वयं ही उतर आया है। अजन्ता के इन भित्ति-चित्रों में आश्चर्यजनक कथा-कहानियाँ एक-दूसरे से जुड़ती हुई चली गयी हैं। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि आश्चर्यजनक कथाओं का एक विशाल भण्डार ही यहाँ स्थित है। बन्दरों, हाथियों और (UPBoardSolutions.com) हिरणों की चित्र-कथाओं द्वारा क्रूरता, भय, दया और त्याग की भावनाओं का यहाँ सजीव चित्रण हुआ है। किसी चित्र में क्रूरता है तो किसी में असीम दया की कहानी चित्रित है। कहीं पाप का दृश्य अंकित है तो कहीं क्षमा का भी दृश्य है।

द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-श्री भगवतशरण उपाध्याय जी का कहना है कि अजन्ता की गुफाओं में राजा हो या दरिद्र, विलासी हो या भिखारी, पुरुष हो या स्त्री, मनुष्य हो या पशु कलाकारों ने इन सभी के चित्रों में रंग-रेखाओं के द्वारा जीवन भर दिया है और यह भाव व्यक्त किया है कि ‘असाधु साधुना जयेत्’ अर्थात् दुष्ट को सज्जनता से जीतना चाहिए, क्योंकि मानवता के सामने हैवानियत नतमस्तक हो जाती है। अजन्ता की गुफाओं में बने ऐसे चित्रों को देखकर कोई भी व्यक्ति सत्प्रेरणा ग्रहण कर सकता है।
(स)

  1. अजन्ता की दीवारों पर बन्दरों की, हाथियों की, हिरनों की, क्रूरता और भय की, दया और त्याग की कहानियाँ चित्रित हैं। ।
  2. अजन्ता की गुफाओं में भगवान् बुद्ध के सम्पूर्ण जीवन की; जन्म से लेकर निर्वाण तक; सभी प्रधान घटनाओं को इतनी खूबसूरती से चित्रित किया गया है कि उन चित्रों पर से आँखें हटती ही नहीं।
  3. अजन्ता की गुफा में बेरहमी और दया, पाप और क्षमा आदि विरोधी भावों का तथा राजा और रंक, विलासी और भिक्षु, नर और नारी, मनुष्य और पशु आदि विरोधी व्यक्तियों का चित्रण है।
  4. कलाकारों के हाथों राजा और रंक, विलासी और भिक्षु, नर (UPBoardSolutions.com) और नारी, मनुष्य और पशु आदि विरोधी व्यक्तियों के चित्र सिरजते (बनते) चले गये हैं।

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प्रश्न 6.
यह हाथ में कमल लिये बुद्ध खड़े हैं, जैसे छवि छलकी पड़ती है, उभरे नयनों की जोत पसरती जा रही है। और यह यशोधरा है, वैसे ही कमल-नाल धारण किये त्रिभंग में खड़ी। और यह दृश्य है। महाभिनिष्क्रमण का-यशोधरा और राहुल निद्रा में खोये, गौतम दृढ़ निश्चय पर धड़कते हिया को सँभालते। और यह नन्द है, अपनी पत्नी सुन्दरी का भेजा, द्वार पर आए बिना भिक्षा के लौटे भाई बुद्ध को जो लौटाने आया था और जिसे भिक्षु बन जाना पड़ा था। बार-बार वह भागने को होता है, बार-बार पकड़कर संघ में लौटा लिया जाता है। उधर वह यशोधरा है बालक राहुल के साथ। [2013]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में क्या वर्णित किया गया है ? या प्रस्तुत गद्यांश में कहाँ के दृश्यों का चित्रण किया गया है ?
  2. “महाभिनिष्क्रमण’ क्या है ? इसके दृश्य का विस्तृत वर्णन कीजिए।

(जोत = प्रकाश। त्रिभंग = शरीर को तीन जगह से टेढ़ा करके खड़ा होना। दृढ़ निश्चय = पक्का इरादा।]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत गद्यांश में लेखक भगवान् बुद्ध के घर त्यागते समय के अजन्ता के चित्रों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि एक तरफ हाथ में कमल पकड़े हुए भगवान् बुद्ध खड़े हैं जिनका सौन्दर्य सर्वत्र छलककर बिखरता प्रतीत हो रहा है और उनकी आँखों का प्रकाश सर्वत्र फैल रहा है। उनकी पत्नी यशोधरा भी, वैसा ही कमल का फूल, कमल-नाल पकड़कर त्रिभंगी (तीन स्थान से बल पड़ी हुई) मुद्रा (UPBoardSolutions.com) में खड़ी हुई चित्रित की गयी हैं। यह चित्र बड़ा ही जीवन्त लग रहा

द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत गद्यांश में लेखक भगवान् बुद्ध के गृह-त्याग के पश्चात् भिक्षा माँगने के एक चित्र का वर्णन करते हुए कहते हैं कि एक चित्र में गौतम बुद्ध के साथ उनका भाई नन्द है, जो अपनी पत्नी सुन्दरी के द्वारा भेजा गया है गौतम बुद्ध को वापस लौटा लाने के लिए। सुन्दरी ने भिक्षा माँगने आए गौतम बुद्ध को बिना भिक्षा दिये द्वार से ही वापस कर दिया था। लेकिन नन्द बुद्ध को वापसे तो नहीं लौटा पाता वरन् उनके उपदेशों से प्रभावित होकर स्वयं भिक्षु बन जाता है।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में अजन्ता की गुफाओं में चित्रित भगवान् बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण (गृह-त्याग) के दृश्य का चित्र-रूप में अत्यधिक भावात्मक और विस्तृत वर्णन किया गया है।
  2. संसार से वैराग्य होने पर शान्ति की खोज जैसे महान् उद्देश्य के लिए गौतम बुद्ध द्वारा अपनी पत्नी, पुत्र, परिवार और राजप्रासाद को त्यागकर निष्क्रमण कर जाने की क्रिया ‘महाभिनिष्क्रमण’ कहलायी। इस चित्र में गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को निद्रामग्न और गौतम बुद्ध को अपने धड़कते हृदय को सँभालते हुए गृह-त्याग की दृढ़ निश्चयी मुद्रा में चित्रित किया गया है। .

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प्रश्न 7.
और उधर वह बन्दरों का चित्र है, कितना सजीव-कितना गतिमान्। उधर सरोवर में जल-विहार करता वह गजराज कमलदण्ड तोड़-तोड़कर हथिनियों को दे रहा है। वहाँ महलों में प्यालों के दौर चल रहे हैं, उधर वह रानी अपनी जीवन-यात्रा समाप्त कर रही है, उसका दम टूटा जा रहा है। खाने-खिलाने, बसने-बसाने, नाचने-गाने, कहने-सुनने, वन-नगर, ऊँच-नीच, धनी-गरीब के जितने नज़ारे हो सकते हैं, सब आदमी अजन्ता की गुफाओं की इन दीवारों पर देख सकता है। [2012]
(अ) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स) आदमी अजन्ता की गुफाओं की दीवारों पर क्या देख सकता हैं ?
[ सरोवर = तालाब। गजराज = हाथियों का राजा।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत गद्यांश में लेखक अजन्ता की गुफाओं में चित्रित चित्रों का वर्णन करते हुए लिख रहे हैं कि गुफा में एक ओर सरोवर में जल-क्रीड़ा करते हुए गजराज और हथिनियों को चित्रित किया है, जिसमें वह सरोवर में उगे हुए कमल-नाल को तोड़कर साथ में क्रीड़ा करने वाली हथिनियों को दे रहा है तो दूसरे चित्र में महलों में मनाये जाने वाले किसी उत्सव का चित्रण है। इस चित्र में लोगों को मद्यपान (UPBoardSolutions.com) करते हुए दिखाया गया है। जहाँ एक ओर महल में कुछ लोग जश्न मना रहे हैं तो दूसरी ओर एक रानी को प्राण-त्याग करते हुए दर्शाया गया है। यह चित्र इतना सजीव है कि ऐसा प्रतीत होता है कि उसकी जीवन-लीला अब समाप्त होने ही वाली है। ऐसे सजीव दृश्य अजन्ता की गुफा की दीवारों पर ही देखे जा सकते हैं, अन्यत्र कहीं नहीं।

(स) व्यक्ति अजन्ता की गुफा की दीवारों पर खाने-खिलाने, बसने-बसाने, नाचने-गाने, कहने-सुनने, वन-नगर, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब से सम्बन्धित जितने भी सम्भव दृश्य हो सकते हैं, उन सभी को देख सकता है।

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प्रश्न 8.
इन पिछले जन्मों में बुद्ध ने गज, कपि, मृग आदि के रूप में विविध योनियों में जन्म लिया था और संसार के कल्याण के लिए दया और त्याग का आदर्श स्थापित करते वे बलिदान हो गये थे। उन स्थितियों में किस प्रकार पशुओं तक ने मानवोचित व्यवहार किया था, किस प्रकार औचित्य का पालन किया था, यह सब उन चित्रों में असाधारण खूबी से दर्शाया गया है और उन्हीं को दर्शाते समय चितेरों ने अपनी । जानकारी की गाँठ खोल दी है। [2013]
(अ) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए। (ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स) अपनी जानकारी की गाँठ खोलने का क्या आशय है ?
[कपि = बन्दर। औचित्य = उचित होने का भाव। चितेरों = चित्रकारों। गाँठ खोलना = बात प्रकट करना।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने अजन्ता की गुफाओं में चित्रित चित्रों का वर्णन किया है। बुद्ध के अनेक योनियों में जन्म लेने की कथा ‘जातक’ नामक ग्रन्थ में वर्णित है। वे लिखते हैं कि जब बुद्ध का जन्म विविध जानवरों की योनियों में हुआ था, उस समय विद्यमान अन्य जानवरों ने भी ऐसा व्यवहार किया था, जो कि मनुष्यों के लिए उचित हो। उन सभी ने किस प्रकार औचित्य अथवा उपयुक्तता का निर्वाह किया था यह सब कुछ अजन्ता के चित्रों में अत्यधिक खूबी के साथ चित्रित किया गया है। आशय यह है कि बुद्ध के पूर्वजन्मों के समस्त विवरणों का विशेष चित्रांकन किया गया है।

(स) अपनी जानकारी की गाँठ खोलने का आशय यह है कि अपने ज्ञान को विस्तार से प्रकट कर देना।।

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प्रश्न 9.
अजन्ता संसार की चित्रकलाओं में अपना अद्वितीय स्थान रखता है। इतने प्राचीन काल के इतने सजीव, इतने गतिमान, इतने बहुसंख्यक कथा-प्राण चित्र कहीं नहीं बने। अजन्ता के चित्रों ने देश-विदेश सर्वत्र की चित्रकला को प्रभावित किया। उसका प्रभाव पूर्व के देशों की कला पर तो पड़ा हीं, मध्य-पश्चिमी एशिया भी उसके कल्याणकर प्रभाव से वंचित न रह सका। [2014]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स) अजन्ती की कला का प्रभाव किन-किन देशों पर पड़ा ? या अजन्ता की चित्रकला का बाहर के देशों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक का कथन है कि अजन्ता की चित्रकला अद्भुत और बेजोड़ है। संसार में उसका उपमान नहीं है। निस्सन्देह, विश्व में चित्रकला का यह सर्वोत्कृष्ट नमूना है। दुनिया में कोई दूसरा ऐसा स्थान नहीं, जहाँ (UPBoardSolutions.com) इतने प्राचीन और इतने सजीव चित्र पाये जाते हों। ऐसी कोई चित्रशाला नहीं, जहाँ ऐसे गतिशील तथा इतनी बड़ी संख्या में चित्र मिलते हों, जिनमें कथाओं को चित्रित कर दिया गया हो। ऐसे स्थान समस्त संसार में दुर्लभ हैं। इसीलिए देश और विदेश की चित्रकलाओं पर अजन्ता की चित्रकला का विशेष प्रभाव पड़ा है।

द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत गद्यांश में लेखक का कहना है कि अजन्ता की चित्रकला का विशेष प्रभाव अपने देश पर ही नहीं विदेश की चित्रकलाओं पर भी पड़ा है। चीन, जापान, इण्डोनेशिया आदि पूर्व के देशों में इसके जैसे प्रयोग स्पष्ट रूप से देखने को मिलते हैं। साथ ही ईरान, मिस्र आदि मध्य-पश्चिमी एशिया के देशों की चित्रकला भी इसके प्रभाव से अपने को मुक्त नहीं कर सकी है।

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(स) अजन्ता की कला का प्रभाव चीन, जापान, इण्डोनेशिया आदि पूर्व के देशों के साथ-साथ ईरान, मिस्र आदि मध्य-पश्चिमी एशिया के देशों की चित्रकला पर भी पर्याप्त रूप से पड़ा।

व्याकरण एवं रचना-बोध

प्रश्न 1
निम्नलिखित शब्दों से उपसर्ग पृथक् कीजिए-
सन्देश, अभिराम, सनाथ, विहँस, बेरहमी, अद्वितीय।।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 6 अजन्ता (गद्य खंड) img-1

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प्रश्न 2
निम्नलिखित उपसर्गों के योग से तीन-तीन शब्दों की रचना कीजिए-
अति, उप, सु, वि, परि, अ।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 6 अजन्ता (गद्य खंड) img-2

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प्रश्न 3
प्रत्ययरहित और प्रत्ययसहित शब्द-युग्म यहाँ दिये जा रहे हैं। इनका स्वरचित वाक्यों में इस प्रकार प्रयोग कीजिए कि इनके अर्थ का अन्तर स्पष्ट हो जाए।
कला-कलावन्त, हैवान-हैवानी, इंसान-इंसानियत, सुरक्षा-सुरक्षित, कल्याण-कल्याणकर।
उत्तर
कला-कलावन्त–कला की उपासना को कलावन्त अपना धर्म मानते हैं।
हैवान-हैवानी-हैवान की हैवानी के सम्मुख सभी विवश हो जाते हैं।
इंसान-इंसानियत-इंसान को कभी भी इंसानियत नहीं छोड़नी चाहिए।
सुरक्षा-सुरक्षित–कड़ी सुरक्षा-व्यवस्था के बावजूद (UPBoardSolutions.com) मन्त्री जी, सुरक्षित नहीं रह सके।
कल्याण-कल्याणकर-केवल कल्याणकर योजनाएँ बनाकर ही समाज का कल्याण नहीं हो सकता।

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 8 माखनलाल चतुर्वेदी (काव्य-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 8 माखनलाल चतुर्वेदी (काव्य-खण्ड)

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कवि-परिचय

प्रश्न 1.
माखनलाल चतुर्वेदी का जीवन-परिचय देते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए। [2009]
या
कवि माखनलाल चतुर्वेदी का जीवन-परिचय दीजिए एवं उनकी किसी एक रचना का नाम लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 17]
उत्तर
श्री माखनलाल चतुर्वेदी एक ऐसे कवि थे, जिनमें राष्ट्रप्रेम कूट-कूटकर भरा हुआ था। परतन्त्र भारत की दुर्दशा को देखकर इनकी आत्मा चीत्कार कर उठी थी। ये एक ऐसे कवि थे, जिन्होंने युग की आवश्यकता को पहचाना। ये स्वयं त्याग (UPBoardSolutions.com) और बलिदान में विश्वास करते थे तथा अपनी कविताओं के माध्यम से देशवासियों को भी यही उपदेश देते थे। राष्ट्रीय भावनाओं से पूर्णतया ओत-प्रोत होने के कारण इन्हें ‘भारतीय आत्मा’ के नाम से सम्बोधित किया जाता है।

जीवन-परिचय–श्री माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म सन् 1889 ई० में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के ‘बाबई’ नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम पं० नन्दलाल चतुर्वेदी था, जो पेशे से अध्यापक थे। प्राथमिक शिक्षा विद्यालय में प्राप्त करने के पश्चात् इन्होंने घर पर ही संस्कृत, बांग्ला, गुजराती, हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। कुछ दिनों तक अध्यापन करने के अनन्तर आपने ‘प्रभा’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन किया। ये खण्डवा से प्रकाशित ‘कर्मवीर’ पत्र का 30 वर्ष तक सम्पादन और प्रकाशन करते रहे।

श्री गणेशशंकर विद्यार्थी की प्रेरणा और सम्पर्क से इन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलनों में भाग लिया और अनेक बार जेल-यात्रा भी की। कारावास के समय भी इनकी कलम नहीं रुकी और कलम के सिपाही के रूप में ये देश की स्वाधीनता के लिए लड़ते रहे। सन् 1943 ई० में आप हिन्दी-साहित्य सम्मेलन के सभापति निर्वाचित किये गये। इनकी हिन्दी-सेवाओं के लिए सागर विश्वविद्यालय ने इन्हें डी० लिट्० की उपाधि तथा भारत सरकार ने पद्मविभूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया। अपनी कविताओं द्वारा नव-जागरण और क्रान्ति का शंख फेंकने वाला कलम का यह सिपाही 30 जनवरी, सन् 1968 ई० को दिवंगत हो गया।

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कृतियाँ-चतुर्वेदी जी एक पत्रकार, समर्थ निबन्धकार, प्रसिद्ध कवि और सिद्धहस्त सम्पादक थे, | परन्तु कवि के रूप में ही इनकी प्रसिद्धि अधिक है। इनके कविता-संग्रह हैं—(1) हिमकिरीटिनी, (2) हिमतरंगिनी, (3) माता, (4) युगचरण, (5) समर्पण, (6) वेणु लो गॅजे धरा। इनकी ‘हिमतरंगिनी साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत रचना है। इनकी अन्य प्रमुख कृतियाँ हैं

‘साहित्य देवता’ चतुर्वेदी जी के भावात्मक निबन्धों का संग्रह है। ‘रामनवमी’ में प्रभु-प्रेम और देश-प्रेम को एक साथ चित्रित किया गया है। ‘सन्तोष’ और ‘बन्धन सुख’ नामक रचनाओं में श्री गणेशशंकर विद्यार्थी की मधुर स्मृतियाँ सँजोयी गयी हैं। इनकी कहानियों (UPBoardSolutions.com) का संग्रह कला का अनुवाद’ नाम से प्रकाशित हुआ। ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ नामक रचना में पौराणिक कथानक को भारतीय नाट्य-परम्परा के अनुसार प्रस्तुत किया गया है।

साहित्य में स्थान–श्री माखनलाल चतुर्वेदी जी की रचनाएँ हिन्दी-साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। आपने ओजपूर्ण भावात्मक शैली में रचनाएँ कर युवकों में जो ओज और प्रेरणा का भाव भरा है, उसका राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में बहुत बड़ा योगदान है। राष्ट्रीय चेतना के कवियों में आपका मूर्धन्य स्थान है। हिन्दी साहित्य जगत् में आप अपनी हिन्दी-साहित्य सेवा के लिए सदैव याद किये जाएँगे।

पद्यांशों की सन्दर्भ व्याख्या

पुष्प की अभिलाषा
प्रश्न 1.
चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़े भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ में देना तुम फेंक।
मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने,
जिस पर जावें वीर अनेक ॥ [2009, 13, 15]
उत्तर
[चाह = इच्छा। सुरबाला = देवबाला। बिंध = गुंथकर। शव = मृत शरीर। इठलाऊँ = इतराऊँ,
अभिमान करू].

सन्दर्भ-प्रस्तुत कविता हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘काव्य-खण्ड में संकलित और माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित ‘पुष्प की अभिलाषा’ शीर्षक कविता से अवतरित है। यह कविता चतुर्वेदी जी के ‘युगचरण’ नामक काव्य-संग्रह से संगृहीत है।

प्रसंग-इन पंक्तियों में कवि ने पुष्प के माध्यम से देश पर (UPBoardSolutions.com) बलिदान होने की प्रेरणा दी है।

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व्याख्या-कवि अपनी देशप्रेम की भावना को पुष्प की अभिलाषा के रूप में व्यक्त करते हुए कहता है कि मेरी इच्छा किसी देवबाला के आभूषणों में गूंथे जाने की नहीं है। मेरी इच्छा यह भी नहीं है कि मैं प्रेमियों को प्रसन्न करने के लिए प्रेमी द्वारा बनायी गयी माला में पिरोया जाऊँ और प्रेमिका के मन को आकर्षित करूं। हे प्रभु! न ही मेरी यह इच्छा है कि मैं बड़े-बड़े राजाओं के शवों पर चढ़कर सम्मान प्राप्त करूं। मेरी यह कामना भी (UPBoardSolutions.com) नहीं है कि मैं देवताओं के सिर पर चढ़कर अपने भाग्य पर अभिमान करूं। भाव यह है कि इस प्रकार के किसी भी सम्मान को पुष्प अपने लिए निरर्थक समझता है।

पुष्प उपवन के माली से प्रार्थना करता है कि हे माली ! तुम मुझे तोड़कर उस मार्ग में डाल देना, जिस मार्ग से होकर अनेक राष्ट्र-भक्त वीर, मातृभूमि पर अपने प्राणों का बलिदान करने के लिए जा रहे हों। फूल उन वीरों की चरण-रज का स्पर्श पाकर भी अपने को धन्य मानेगा; क्योंकि उनके चरणों पर चढ़ना ही देश के बलिदानी वीरों के लिए उसकी सच्ची श्रद्धांजलि है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. कवि ने फूल के माध्यम से अपने देशप्रेम की भावना को व्यक्त किया है।
  2. कवि किसी राजनेता की भॉति सम्मान-प्राप्ति की अपेक्षा,देश की रक्षा के लिए नि:स्वार्थ प्राण-उत्सर्ग करने में गौरव मानता है।
  3. भाषा-सरल खड़ीबोली।
  4. शैली–प्रतीकात्मक, आत्मपरक तथा भावनात्मक
  5. रस-वीर।
  6. गुण-ओज।
  7. शब्दशक्ति-अभिधा एवं लक्षणा।
  8. अलंकार पद्य में सर्वत्र (UPBoardSolutions.com) अनुप्रास और पुनरुक्तिप्रकाश।
  9. छन्द-तुकान्त-मुक्त।

जवानी
प्रश्न 1.
प्राण अन्तर में लिये, पागल जवानी।
कौन कहता है कि तू
विधवा हुई, खो आज पानी ?
चल रही घड़ियाँ, चले नभ के सितारे,
चल रही नदियाँ, चले हिम-खण्ड प्यारे;
चल रही है साँस, फिर तू ठहर जाये ?
दो सदी पीछे कि तेरी लहर जाये ?
पहन ले नर-मुंड-माला,
उठ, स्वमुंड सुमेरु कर ले,
भूमि-सा तू पहन बाना आज धानी :
प्राण तेरे साथ हैं, उठ री जवानी ! (2018)
उत्तर
[विधवा = निस्तेज के लिए प्रयुक्त। पानी = तेज, स्वाभिमानी के लिए प्रयुक्त चल रही घड़ियाँ लहर जाये = सबमें गति है और तेरी प्रगति रुक जाए, यह कैसे सम्भव है। दो शताब्दियों के बाद तेरी उमंग जागे, यह ठीक नहीं। स्वमुंड सुमेरु कर ले = अपने सिर को मुण्ड-माला का सबसे बड़ा दाना बना ले। जीने की ममता त्याग दे। भूमि-सा“ आज धानी = जैसे लहलहाते हुए धानों की हरियाली में धरती का जीवन झलकता है, (UPBoardSolutions.com) उसी प्रकार अपनी निस्तेज उदास जवानी को जीवन दो।] सन्दर्भ–प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी के काव्य-खण्ड में संकलित और श्री माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित ‘जवानी’ कविता से उद्धृत है। यह कविता श्री चतुर्वेदी जी के संग्रह ‘हिमकिरीटिनी’ से ली गयी है।

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[ विशेष—इस शीर्षक के अन्तर्गत आने वाले समस्त पद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग-इस पद्य में देश की युवा-शक्ति में उत्साह का संचार करते हुए उसे देशोत्थान के कार्यों में प्रवृत्त होने का आह्वान किया गया है। कवि युवाओं को सम्बोधित करता हुआ कहता है

व्याख्या–अरी युवकों की पागल जवानी! तू अपने भीतर उत्साह एवं शक्तिरूपी प्राणों को समेटे है। यह कौन कहता है कि तूने अपना पानी (तेज) रूपी पति खो दिया है और तू विधवा होकर निस्तेज हो गयी है ? मैं आज जिधर भी दृष्टिपात करता हूँ, उधर गति-ही-गति देखता हूँ। घड़ियाँ अर्थात् समय निरन्तर चल रहा है। आसमान के सितारे भी गतिमान हैं। नदियाँ निरन्तर प्रवहमान हैं और पहाड़ों पर बर्फ के टुकड़े सरक-सरककर अपनी गति का प्रदर्शन कर रहे हैं। प्राणिमात्र की साँसें भी निरन्तर चल रही हैं। इस सर्वत्र गतिशील वातावरण में ऐसा कैसे सम्भव हो सकता है कि तू ठहर जाये ? इस गतिमान समय में (UPBoardSolutions.com) यदि तू ठहर गयी और तुझमें गति का ज्वार-भाटा न आया तो तू दो शताब्दी पिछड़ जाएगी। समय बीत जाने पर जब तुझमें तरंगें उठेगी तो उन तरंगों में दो शताब्दी पीछे वाली गति होगी; अर्थात् जवानी के अलसा जाने पर देश की प्रगति दो शताब्दी पिछड़ जाएगी।

हे नवयुवकों की जवानी! तू उठ और दुर्गा की भाँति मनुष्यों के मुण्डों की माला पहन ले। नरमुण्डों की इस माला में तू अपने सिर को सुमेरु बना, अर्थात् बलिदान के क्षेत्र में तू सर्वोपरि बन। यदि आज समर्पण की आवश्यकता पड़े तो तू उससे पीछे मत हट। जिस प्रकार लहलहाते हुए धानों की हरियाली में धरती का जीवन झलकता है, ऐसे ही हे जवानी, तू भी उत्साह में भरकर धानी चूनर ओढ़ ले। प्राण-तत्त्व तेरे साथ है; अतः हे युवकों की जवानी! तू आलस्य को त्यागकर उठ खड़ी हो और सर्वत्र क्रान्ति ला दे।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. इन पंक्तियों में कवि ने देश के युवा वर्ग का आह्वान किया है कि वह देश पर अपने को उत्सर्ग कर इसे स्वतन्त्र कराये।
  2. भाषा–सहज और सरल खड़ी बोली
  3. शैलीउद्बोधन।
  4. रस–वीर।
  5. गुण-ओज।
  6. शब्दशक्ति-अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना।
  7. अलंकारे–अनुप्रास, उपमा एवं रूपक।
  8. छन्द-तुकान्त-मुक्त।

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प्रश्न 2.
द्वार बलि का खोल चल, भूडोल कर दें
एक हिम-गिरि एक सिर का मोल कर दें,
मसल कर, अपने इरादों-सी, उठा कर,
दो हथेली हैं कि पृथ्वी गोल कर दें?
रक्त है ? या है नसों में क्षुद्र पानी !
जाँच कर, तू सीस दे-देकर जवानी ? [2016, 18]
उत्तर
[ भूडोल = पृथ्वी को कॅपाना। इरादों = संकल्पों, इच्छाओं, विचारों। क्षुद्र = तुच्छ।]

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से चतुर्वेदी जी (UPBoardSolutions.com) देश के युवा वर्ग को उत्साहित कर रहे हैं कि वह देश की वर्तमान परिस्थिति को बदल दें।।

व्याख्या-चतुर्वेदी जी युवकों का आह्वान करते हुए कहते हैं कि हे युवको! तुम अपनी मातृभूमि के लिए बलिदान देने की परम्परा का द्वार खोलकर इस धरती को कम्पायमान कर दो और हिमालय के एक-एक कण के लिए एक-एक सिर समर्पित कर दो।।

हे नौजवानो! तुम्हारे संकल्प बहुत ऊँचे हैं जिन्हें पूर्ण करने के लिए तुम्हारे पास दो हथेलियाँ हैं। अपनी उन हथेलियों को अपने ऊँचे संकल्पों के समान उठाकर तुम पृथ्वी को गोल कर सकते हो; अर्थात् बड़ी-सेबड़ी बाधा को हटा सकते हो।

हे वीरो! तुम अपनी युवावस्था की परख अपने शीश देकर कर सकते हो। इस बलिदानी परीक्षण से तुम्हें यह भी ज्ञात हो जाएगा कि तुम्हारी धमनियों में शक्तिशाली रक्त दौड़ रहा है अथवा उनमें केवल शक्तिहीन पानी ही भरा हुआ है।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. कवि के अनुसार युवक अपनी संकल्प-शक्ति से सब कुछ बदल सकते हैं।
  2. कवि द्वारा नवयुवकों में उत्साह का संचार किया गया है।
  3. भाषा-विषय के अनुकूल शुद्ध परिमार्जित खड़ी बोली।
  4. शैली–उद्बोधन।
  5. रस-वीर।
  6. गुण-ओज।
  7. शब्दशक्तिव्यंजना।
  8. अलंकार-‘अपने इरादों-सी, उठाकर’ में उपमा तथा सम्पूर्ण पद में अनुप्रास। “
  9. छन्द-तुकान्त-मुक्त।

प्रश्न 3.
वह कली के गर्भ से फल रूप में, अरमान आया !
देखें तो मीठा इरादा, किस तरह, सिर तान आया ।
डालियों ने भूमि रुख लटका दिया फल देख आली !
मस्तकों को दे रही संकेत कैसे, वृक्ष-डाली ! [2016]
फल दिये? या सिर दिये तरु की कहानी
गॅथकर युग में, बताती चल जवानी !
उत्तर
[ कली के गर्भ से = कली के अन्दर से। अरमान = अभिलाषा। आली = सखी।]

प्रसंग-कवि ने अपनी ओजस्वी वाणी में वृक्ष और (UPBoardSolutions.com) उसके फलों के माध्यम से युवकों में देश के लिए बलिदान होने की प्रेरणा प्रदान की है।

व्याख्या-हे युवाओ! फल के भार से लदे हुए वृक्षों की ओर देखो। वे पृथ्वी की ओर अपना मस्तक झुकाये हुए हैं। कली के भीतर से झाँकते फल कली के संकल्पों (अरमानों) को बता रहे हैं। ‘तुम्हारे हृदय से भी इसी प्रकार बलिदान हो जाने का संकल्प प्रकट होना चाहिए। यह तो बहुत ही प्यारा संकल्प है, इसीलिए पुष्प-कली गर्व से सिर उठाये हुए हैं। जब फल पक गये, तब डालियों ने पृथ्वी की ओर सिर झुका दिया है। अब ये फल दूसरों के लिए अपना बलिदान करेंगे। हे मित्र नौजवानो! वृक्षों की ये शाखाएँ तुम्हें संकेत दे रही हैं कि औरों के लिए मर-मिटने को तैयार हो जाओ। वृक्षों ने फल के रूप में अपने सिर बलिदान हेतु दिये हैं। तुम भी अपना सिर देकर वृक्षों की इस बलिदान-परम्परा को अपने जीवन में उतारो, आचरण में ढालो और युग की आवश्यकतानुसार स्वयं को उसकी प्रगतिरूपी माला में गूंथते हुए आगे बढ़ते रहो।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. प्रस्तुत अंश द्वारा कवि युवाओं को यह सन्देश देते हैं कि जिस प्रकार वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, उसी प्रकार उन्हें भी अपनी जवानी परहित में लगानी चाहिए।
  2. भाषा-सरल खड़ी बोली
  3. शैली–उद्बोधन।
  4. रस-वीर।
  5. गुण-ओज।
  6. शब्दशक्ति-व्यंजना।
  7. अलंकार-अनुप्रास, उपमा एवं रूपक।
  8. छन्द-मुक्त-तुकान्तः

प्रश्न 4.
श्वान के सिर हो-चरण तो चाटता है!
भौंक ले—क्या सिंह को वह डाँटता है?
रोटियाँ खायीं कि साहस खो चुका है,
प्राणि हो, पर प्राण से वह जा चुका है।
तुम न खेलो ग्राम-सिंहों में भवानी !
विश्व की अभिमान मस्तानी जवानी !
उत्तर
[श्वान = कुत्ता। ग्राम सिंह = कुत्ता। भवानी = दुर्गारूपी जवानी।]

प्रसंग-इन पंक्तियों में कवि ने स्वाभिमान के महत्त्व पर (UPBoardSolutions.com) प्रकाश डालते हुए युवकों से उसे किसी भी कीमत पर न खोने का आह्वान किया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि कहने को सिर तो कुत्ते का भी होता है, पर उसमें स्वाभिमान तो नहीं होता । वह तो अपनी क्षुधापूर्ति के लिए दूसरों की चाटुकारी करता फिरता है और उनके पैरों को चाटता रहता है। इसलिए स्वाभिमान के अभाव में उसकी वाणी में कोई शक्ति नहीं रह जाती। कुत्ता चाहे कितना ही जोर से भौंक ले, किन्तु उसमें इतना साहस ही नहीं होता कि उसके भौंकने से सिंह डर जाए; क्योंकि दूसरे की रोटियाँ खाते ही उसका स्वाभिमान नष्ट हो जाता है। उसमें साहस नहीं रह जाता। इस प्रकार जीवित होने पर भी वह मरे हुए के समान हो जाता है; अतः हे देश के शक्तिस्वरूप नवयुवको! तुम्हें अपने स्वाभिमान की रक्षा करनी है और पराधीन नहीं रहना है। कुत्तों की भाँति रोटी के टुकड़ों के लिए अपने स्वाभिमान को नहीं खोना है। तुम्हें अपनी प्रचण्ड दुर्गा जैसी असीम शक्ति को आपसी झगड़ों (UPBoardSolutions.com) में नष्ट नहीं करना है, अपितु उसे देश के दुश्मनों के संहार में लगाना है। तुम्हारी ऐसी मस्तानी जवानी का सारी दुनिया लोहा मानती है।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. यहाँ कवि ने युवकों को कायरता और चाटुकारिता से बचकर स्वाभिमान से जीने और देश के हित में कार्य करने की प्रेरणा दी है।
  2. श्वान (कुत्ता) यहाँ उन लोगों का प्रतीक है, जो अंग्रेजों की रोटियाँ खाकर उनके हाथों की कठपुतली बने हुए हैं।
  3. भाषा-परिमार्जित खड़ी बोली।
  4. शैली-उद्बोधन।
  5. रस-वीर।
  6. गुण-ओज।
  7. अलंकार–अनुप्रास, रूपक और उपमा।
  8. छन्द-मुक्त और तुकान्त।
  9. भावसाम्य-स्वाभिमान को जीवन का प्रतीक बताते हुए गुप्त जी ने कहा है

जिसमें न निज गौरव तथा निज जाति का अभिमान है।
वह नर नहीं है, पशु निरा और मृतक समान है।।

प्रश्न 5.
ये न मग हैं, तव चरण की रेखियाँ हैं,
बलि दिशा की अमर देखा-देखियाँ हैं।
विश्व पर, पद से लिखे कृति लेख हैं ये,
धरा तीर्थों की दिशा की मेख हैं ये !
प्राण-रेखा खींच दे उठ बोल रानी,
री मरण के मोल की चढ़ती जवानी।
उत्तर
[ मग = मार्ग। तव = तुम्हारे। रेखियाँ = रेखाएँ। बलि-दिशा = बलिदान की दिशा। कृति-लेख = कर्मों के लेख] |

प्रसंग-इन पंक्तियों में कवि नवयुवकों को अपने महान् और बलिदानी पूर्वजों के बनाये और दिखाये गये मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करता है। |

व्याख्या—मेरे देश के नवयुवको! जिस मार्ग पर तुम चलते हो, वह कोई साधारण मार्ग नहीं है, अपितु तुम्हारे पूर्वजों द्वारा चरणों की रेखाओं से निर्मित आदर्श मार्ग है। जिन आदर्शों के आधार पर हम अपने जीवन का निर्माण करते हैं, वे सभी आदर्श तुम्हारे सदृश (UPBoardSolutions.com) युवा-पुरुषों के द्वारा निर्मित हैं। यह मार्ग बलिदान का आदर्श मार्ग है, जिसको देखकर युगों-युगों तक लोग स्वयं ही बलिदान के लिए प्रेरित होते रहेंगे।

कवि कहता है कि इन बलिदान-पथों का निर्माण उत्साही नवयुवकों ने किया है। कर्मशील युवकों ने अपने सत्कार्यरूपी पदों से इन विश्व-मोर्गों का निर्माण किया है; अत: ये कर्मशील युवकों के कर्म के लेख हैं, जो बलिदान के मार्ग पर चलने वाले युवकों का मार्गदर्शन करते हैं। ये बलिदान के मार्ग संसार के तीर्थों की दिशा बताने वाली कील (दिशासूचक) हैं। युवक जिन स्थानों पर अपना बलिदान करते हैं, वे स्थान पृथ्वी पर बलिदान के तीर्थ (पवित्र स्थान) समझे जाते हैं।

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कवि अन्त में कहता है कि हे उत्साहपूर्ण जवानीरूपी रानी! आज तू अपने प्राणों का बलिदान देकर विश्व के युवकों के लिए बलिदान की नयी रेखा खींच दे अर्थात् एक नया प्रतिमान बना दे। हे युवको ! तुम । उठो और संसार को बता दो कि जवानी की महत्ता देश के लिए मर-मिटने में ही है।

काव्यगत सौन्दर्य–

  1. युवा-शक्ति के बलिदान से ही नये आदर्शों का निर्माण हुआ करता है।
  2. युवकों की जवानी का महत्त्व त्याग-बलिदान से ही जाना जाता है।
  3. यहाँ राष्ट्र-कल्याण के लिए बलिदान का पथ-प्रशस्त करने की बात कहकर कवि ने अपनी देशभक्ति का पावन भाव व्यक्त किया है।
  4. भाषा-सरल खड़ी. बोली।
  5. शैली–प्रतीकात्मक और (UPBoardSolutions.com) उद्बोधनात्मक।
  6. रस-वीर।
  7. गुण-ओज।
  8. अलंकार-पद्य में सर्वत्र रूपक और अनुप्रास।
  9. छन्द-तुकान्त-मुक्त।
  10. भावसाम्य-महाकवि ‘निराला’ भी मातृभूमि पर अपने सर्वस्व को अर्पित करते हुए कहते हैं

नर-जीवन के स्वार्थ सकल
बलि हों तेरे चरणों पर, माँ,
मेरे श्रम-संचित सब फल।

प्रश्न 6.
टूटता-जुड़ता समय-‘भूगोल’ आया,
गोद में मणियाँ समेट ‘खगोल’ आया,
क्या जले बारूद? हिम के प्राण पाये !
क्या मिला? जो प्रलय के सपने में आये।
धरा? यह तरबूज है दो फाँक कर दे,
चढ़ा दे स्वातन्त्र्य-प्रभु पर अमर पानी !
विश्व माने-तू जवानी है, जवानी !
उत्तर
[भूगोल = भूमण्डल। मणियाँ = ग्रह-नक्षत्र। खगोल = आकाश-मण्डल। हिम के प्राण पाये = ठण्डी .. होकर। स्वातन्त्र्य-प्रभु = स्वतन्त्रतारूपी ईश्वर। ]

प्रसंग-कवि ने युवकों को देश के गौरव की रक्षा के लिए, देश में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने के लिए उन्हें प्रेरित और प्रोत्साहित किया है।

व्याख्या-चतुर्वेदी जी कहते हैं कि हे युवको! समय का भूगोल हमेशा एक जैसा नहीं रहा। तुमने जब-जब क्रान्ति की है, तब-तब यह टूटा है और जुड़ा है अर्थात् नये-नये राष्ट्र बने हैं। तुम्हारी क्रान्ति का सत्कार करने के लिए ही यह ब्रह्माण्ड अनेक रंग-बिरंगे तारारूपी मणियों को अपनी गोद में लेकर प्रकट हुआ है। अतः तुम्हारा स्वभाव इतना ओजस्वी होना चाहिए, जिससे कि विश्व का मानचित्र और इतिहास बदला जा सके। (UPBoardSolutions.com) हे युवको! तुम्हें चाहिए कि तुम अपने जीवन की जगमगाहट से देश के गौरव को प्रकाशित करो, किन्तु जिनके हृदय बर्फ की तरह ठण्डे पड़ गये हैं, वे उसी प्रकार क्रान्ति नहीं कर सकते, जिस प्रकार कि ठण्डा बारूद नहीं जल सकता। हे युवको! तुम यदि प्रलय की भाँति पराधीनता और अन्याय के प्रति क्रान्ति नहीं कर सकते तो तुम्हारी जवानी व्यर्थ है। तुम चाहो तो पृथ्वी को भी तरबूज की तरह चीर सकते हो। हे देश के युवकों की जवानी! तू यदि देश की आजादी के लिए अपना रक्तरूपी अमर पानी दे दे तो तू अमर हो जाएगी और संसार में तेरा उदाहरण देकर तुझे सराहा जाएगा।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. कवि का मानना है कि विध्वंस की गोद से ही निर्माण के पुष्प खिलते हैं। और प्रलय के बाद ही नयी सृष्टि का निर्माण होता है।
  2. युवा-शक्ति के द्वारा ही परिवर्तन लाया जा सकता है; अत: युवाओं को क्रान्ति के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए।
  3. भाषा-प्रवाहपूर्ण, सरल खड़ी बोली।
  4. शैली–प्रतीकात्मक और उद्बोधनात्मक।
  5. रस-वीर।
  6. छन्द-मुक्त-तुकान्त।
  7. गुणओजः
  8. शब्दशक्ति–लक्षण एवं व्यंजना।
  9. अलंकार-अनुप्रास, उपमा एवं रूपक।
  10. भावसाम्य–कविवर श्यामनारायण पाण्डेय ने भी ऐसे ही भाव व्यक्त किये हैं

उस कालकूट पीने वाले के, नयन याद कर लाल-लाल।।
डग-डंग ब्रह्माण्ड हिला देगा, जिसके ताण्डव का ताल-ताल ।।

प्रश्न 7.
लाल चेहरा है नहीं–पर लाल किसके?
लाल खून नहीं ? अरे, कंकाल किसके ?
प्रेरणा सोयी कि आटा-दाल किसके?
सिर न चढ़ पाया कि छापा-माल किसके ?
वेद की वाणी कि हो आकाश-वाणी,
धूल है जो जम नहीं पायी जवानी।
उत्तर
[ लाल = लाल रंग, पुत्र, एक बहुमूल्य मणि। कंकाल = हड्डी का ढाँचा। छापा-माल = तिलक एवं माला। ]

प्रसंग–प्रस्तुत पद में कवि ने युवकों को प्रेरणा देते हुए उन्हें वीर पुरुष के लक्षण समझाये हैं।

व्याख्या-हे युवको! यदि तुम्हारे खून में लाली नहीं है अथवा तुम्हारा चेहरा ओज गुण से लाल नहीं है अर्थात् देश के गौरव की रक्षा के लिए यदि तुममें बलिदान होने का उत्साह नहीं है तो तुम्हें भारतमाता का लाल नहीं कहा जा सकता। (UPBoardSolutions.com) तुम्हारे रक्त में यदि लालिमा नहीं है अर्थात् उष्णतारूपी जोश नहीं है तो तुम्हारा अस्थि-पंजर देश के किस काम आएगा ? यदि देश पर बलिदान होने की तुम्हारी प्रेरणा सो गयी है तो तुम्हारे ये शरीर शत्रु के लिए आटा-दाल के रूप में भोज्य-पदार्थमात्र बनकर रह जाएँगे। तुम्हारे सिर की शोभा धार्मिक क्रिया-काण्डों के छापा-तिलक लगाने से या माला धारण करने से नहीं बढ़ेगी, वरन् देश पर बलिदान होने से बढ़ेगी। तात्पर्य यह है कि इन धार्मिक प्रतीकों का तब तक कोई मूल्य नहीं है जब तक मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने का भाव हृदय में न पैदा हो। कवि पुनः कहता है कि जिस कविता से युवकों में उत्साह न जगाया जा सके, वह कविता भी निरर्थक है। भले ही वह पवित्र वेदों से उधृत हो अथवा स्वयं देवताओं के मुख से निकली आकाशवाणी हो। –

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. यहाँ स्वाभिमान तथा बलिदान का महत्त्व समझाया गया है।
  2. त्याग की भावना को ही प्रेम की शोभा बताया गया है।
  3. भाषा-साहित्यिक खड़ी बोली।
  4. शैली–प्रवाहमयी तथा ओजपूर्ण।
  5. रस-वीर।
  6. गुण-ओज।
  7. छन्द-मुक्त-तुकान्त।
  8. अलंकार-‘लाल चेहरा है नहीं, फिर लाल किसके’ में अनुप्रास तथा यमक एवं ‘टूटता-जुड़ता ………….. हे जवानी’ में सर्वत्र उपमा । और रूपक की छटा।
  9. भावसाम्य-बलिदान को महिमामण्डित करते हुए अन्यत्र भी कहा गया है

त्याग बिना निष्प्राण प्रेम है,
करो प्रेम पर प्राण निछावर।

प्रश्न 8.
विश्व है असि का नहीं संकल्प का है;
हर प्रलय का कोण, कायाकल्प का है।
फूल गिरते, शूल शिर ऊँचा लिये हैं,
रसों के अभिमान को नीरस किये हैं।
खून हो जाये न तेरा देख, पानी
मरण का त्यौहार, जीवन की जवानी ! [2016, 18]
उत्तर
[ असि = तलवार। संकल्प = दृढ़ निश्चय। प्रलय = क्रान्ति। कायाकल्प = पूर्ण परिवर्तन, क्रान्ति। शूल = काँटे। रस = सौन्दर्य, शृंगारिक आनन्द। नीरस = रस-विहीन, आभाहीन, परास्त।]

प्रसंग-इन पंक्तियों में युवा-शक्ति को क्रान्ति का अग्रदूत मानते हुए युवकों को आत्म-बलिदान की प्रेरणा दी गयी है।

व्याख्या-कवि नवयुवकों को क्रान्ति के लिए उत्तेजित करते हुए कहता है कि क्या यह संसार तलवार का है ? क्या संसार को तलवार की धार या शस्त्र-बल से ही जीता जा सकता है ? नहीं, यह बात नहीं है। यह संसार दृढ़ निश्चय वाले व्यक्तियों का है। इसे (UPBoardSolutions.com) उन्हीं के द्वारा ही जीता जा सकता है। प्रत्येक प्रलय का उद्देश्य संसार के अन्दर पूर्ण परिवर्तन (क्रान्ति) ला देना होता है। हे युवाओ! यदि तुम निश्चय करके नव-निर्माण के लिए अग्रसर हो जाओ तो तुम समाज व व्यवस्था में प्रलय की तरह पूर्ण परिवर्तन कर सकते हो; अतः तुम्हें दृढ़ संकल्प के द्वारा नयी क्रान्ति के लिए अग्रसर होना चाहिए।

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जब व्यक्ति के अन्दर दृढ़ संकल्पों की कमी होती है तो उसका पतन हो जाता है। वायु के हल्के झोंके से ही फूल नीचे गिर जाते हैं और उनकी सुन्दरता नष्ट हो जाती है, लेकिन काँटे आँधी और तूफान में भी गर्व से अपना सिर उठाये खड़े रहते हैं। हे युवको! दृढ़ संकल्प से मर-मिटने की भावना उत्पन्न होती है और ऐसे व्यक्ति कभी अपने इरादे से विचलित नहीं होते। काँटे फूलों की कोमलता और सरसता के अभिमान को अपनी दृढ़ संकल्प-शक्ति से चकनाचूर कर देते हैं।

कवि जवानी को सम्बोधित करते हुए कहता है कि हे जवानी! देख तेरी नसों के रक्त में जो उत्साहरूपी उष्णता है, उस उत्साह के नष्ट हो जाने से तेरा रक्त शीतल होकर कहीं पानी के रूप में परिवर्तित न हो जाये; अर्थात् तेरा जोश ठण्डा न पड़ जाये। जीवन में जवानी उसी का नाम है, जो मृत्यु को उत्सव और उल्लासपूर्ण क्षण समझे। जीवन में बलिदान का दिन ही जवानी का सबसे आनन्दमय दिन होता है। |

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. दृढ़ संकल्प से ही क्रान्ति लायी जा सकती है। परिवर्तन शस्त्र-प्रयोग से नहीं, दृढ़ संकल्प से सम्भव है।
  2. नवयुवक अपने प्राणों का बलिदान करके विश्व का नव-निर्माण कर सकते हैं।
  3. भाषा-ओजपूर्ण खड़ीबोली।
  4. शैली–उद्बोधनात्मक।
  5. रस-वीर।
  6. छन्दमुक्त-तुकान्त।
  7. गुण-ओज।
  8. शब्दशक्ति-लक्षणा एवं व्यंजना।
  9. अलंकार-सम्पूर्ण पद्य में उपमा और अनुप्रास।

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काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध

प्रश्न 1.
‘जवानी’ कविता का सौन्दर्य उसकी फड़कती ओजपूर्ण शब्द-शैली में प्रस्फुटित हुआ है। कविता से उदाहरण देते हुए इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर
‘जवानी’ कविता का वास्तविक सौन्दर्य उसकी ओजपूर्ण शब्द-शैली में ही प्रस्फुटित हुआ है। शब्दों का आघात इतना तीव्र है कि निष्प्राण-सा व्यक्ति भी उत्साह में आकर कुछ कर गुजरने के लिए तत्पर हो जाये। निम्नलिखित पंक्तियाँ भला किसकी रगों (UPBoardSolutions.com) में उत्साह का संचार नहीं कर सकतीं-

  1. दो हथेली हैं कि पृथ्वी गोल कर दें ?
  2. री मरण के मोल की चढ़ती जवानी !
  3. धरा ? यह तरबूज है दो फाँक कर दे।
  4. लाल चेहरा है नहीं–पर लाल किसके ?
  5. खून हो जाये न तेरा देख, पानी।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार का नाम सहित स्पष्टीकरण दीजिए-
(क) मसलकर, अपने इरादों-सी उठाकर,
दो हथेली हैं कि पृथ्वी गोल कर दें?
(ख) लाल चेहरा है नहीं-पर लाल किसके ?
उत्तर
(क) इरादों की उच्चता से हथेलियों की समानता करने के कारण उपमा अलंकार है।
(ख) प्रथम ‘लाल’ शब्द का अर्थ लाल रंग तथा द्वितीय ‘लाल’ शब्द का अर्थ पुत्र है; अतः यहाँ यमक अलंकार है।

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प्रश्न 3.
माखनलाल चतुर्वेदी की पुस्तक में दी गयी दोनों कविताएँ वीर रस से परिपूर्ण हैं। वीर रस को परिभाषित करते हुए पाठ से दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर
परिभाषा ‘काव्य-सौन्दर्य के तत्त्व’ के अन्तर्गत देखें। उदाहरण के लिए प्रश्न (2) की काव्य पंक्तियाँ देखें।

प्रश्न 4.
कविताओं में आये निम्नलिखित मुहावरों को अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए- :-
पृथ्वी को गोल करना, नसों में पानी होना, चरण चाटना, प्रलय के सपने आना, माई का लाल, कायाकल्प होना, खून पानी होना।
उत्तर
पृथ्वी गोल करना–यदि व्यक्ति मन में ठान ले तो वह अपने हाथों से मसलकर पृथ्वी को गोल कर सकता है।
नसों में पानी होना—किसी भी देश को हमसे टकराने से पहले यह सोच लेना चाहिए कि हमारी नसों में पानी नहीं बहता। |
चरण चाटना-चरण चाटकर आजीविका कमाने से अच्छा तो सम्मानसहित मर जाना है।
प्रलय के सपने आना-हमारी चुप्पी का मतलब हमारी कमजोरी (UPBoardSolutions.com) नहीं है, हमें भी प्रलय के सपने आते हैं, यह पड़ोसी राष्ट्र को भली प्रकार समझ लेना चाहिए।
माई का लाल-है कोई माई का लाल, जो शतरंज में विश्वनाथ आनन्द का सामना कर सके।
कायाकल्प होना–दो ही सालों में मेरठ का कायाकल्प हो गया।
खून पानी होना-आतंकवादी आते हैं और सरेआम हत्याएँ करके चले जाते हैं, कोई उनका विरोध नहीं करता, लगता है जैसे सबका खून पानी हो गया है।

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 7 छान्दोग्य उपनिषद् षष्ठोध्यायः (संस्कृत-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 7 छान्दोग्य उपनिषद् षष्ठोध्यायः (संस्कृत-खण्ड)

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अवतरणों का ससन्दर्भ हिन्दी अनुवाद

प्रश्न 1.
॥ ॐ ॥ श्वेतकेतुहरुणेय आस तं ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यं न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥1॥
उत्तर
[आरुणेय = आरुणि का पुत्र। आस = था। पितोवाच = पिता ने कहा। वस ब्रह्मचर्यम् = ब्रह्मचर्य का पालन करो। वै = क्योंकि। कुलीनोऽननूच्य = कुल (परिवार) में कोई ऐसा (व्यक्ति) नहीं हुआ। ब्रह्मबन्धुरिव = ब्रह्मबंधु के समान।]

सन्दर्भ-प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘संस्कृत-खण्ड’ के ‘छान्दोग्य उपनिषद् । षष्ठोध्यायः’ पाठ से उद्धृत है।

प्रसंग—इस श्लोक में आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को ज्ञान (UPBoardSolutions.com) की बातें बता रहे हैं। [विशेष—इस पाठ के अन्य सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ व प्रसंग प्रयुक्त होगा।

व्याख्या–आरुणि का पुत्र श्वेतकेतु था। उससे एक बार पिता ने कहा-“हे श्वेतकेतु! तुम ब्रह्मचर्य का पालन करो क्योंकि हमारे कुल में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं हुआ, जो ब्रह्मबन्धु के समान ने लगता हो।

(जो ब्राह्मण अपने को ब्राह्मण समझता हो लेकिन ब्राह्मणोचित आचरण न करता हो उसे गुरुकुल जाना आवश्यक है। उसे गुरुकुलावास आवश्यक प्रतीत होता है।)

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प्रश्न 2.
स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान्चेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तं ह पितोवाच ॥2॥
उत्तर
[द्वादशवर्षम् उपेत्य = बारह वर्ष पर्यन्त। सर्वान्वेदानधीत्य = समस्त वेदों को (UPBoardSolutions.com) पढ़कर। मेहामना = पांडित्यमना। अनूचानमानी = स्वाभिमानी, अहंकार युक्त होकर। स्तब्ध = शान्त होकर। एयाय = लौटा।] |

व्याख्या-बारह वर्ष पर्यन्त आश्रम जाकर चौबीस वर्ष आयु पर्यन्त श्वेतकेतु समस्त वेदों को पढ़कर स्वाभिमानी, पाण्डित्यमना, अहंकार युक्त होकर लौटा तो उसके पिता ने कहा।

प्रश्न 3.
श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्य: येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ॥3॥
उत्तर
[स्तब्धोऽस्युत = किंकर्तव्यविमूढ़ होते हुए। तमादेशमप्राक्ष्यः = तुमने कौन-सी विशेषता पायी है। येनाश्रुतम् = जिसके द्वारा (समझ लेने पर) जो सुना न गया हो ऐसा पदार्थ। अविज्ञातम् = जो ज्ञात न हुआ हो। कथं नु भगवः = क्या आपने पूछा है।]

व्याख्या-हे श्वेतकेतु! तुम जो इस तरह से अमनस्वी, पाण्डित्यमना और अभिमान से युक्त हो, तुमने कौन-सी विशेषता पायी है? क्या तुम जानते हो कि कौन-सा ऐसा पदार्थ है जिसके समझ लेने पर अश्रुत पदार्थ का ज्ञान हो जाता है, जो अतार्किक है उसे (UPBoardSolutions.com) तार्किक भी याद हो जाये और अविज्ञात भी ज्ञात होता है? अनिश्चित भी निश्चित हो जाता है। क्या तुमने गुरु से पूछा है?

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प्रश्न 4.
यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥4॥
उत्तर
[मृत्पिण्डेन = मिट्टी से बने पदार्थ विशेष के द्वारा। मृन्मयम् = मिट्टी से युक्त। आचारम्भणम् = आवरण। मृत्तिकेत्येव = मिट्टी ही है।]

व्याख्या-पिता आरुणि ने कहा-“हे श्वेतकेतु! जिस प्रकार (मिट्टी के बने) पात्रों को देखकर उनके मिट्टी द्वारा बने होने का आभास नहीं किया जा सकता है किन्तु वास्तव में वे मिट्टी के बने होते हैं। अर्थात् पात्रों में मृत्तिकत्व है यही सत्य है।

प्रश्न 5.
यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम् ॥5॥
उत्तर
[यथा = जैसे। लोहमणिना = चुम्बक। लोहमयम् =लौहत्व। ]

व्याख्या–पिता आरुणि ने कहा-“हे श्वेतकेतु! जिस प्रकार चुम्बक को (UPBoardSolutions.com) देखकर उसके लोहे द्वारा बने होने का आभास नहीं किया जा सकता है किन्तु वास्तव में वह लोहे का बना होता है। अर्थात् चुम्बक में लौहत्व है यही सत्य है।

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प्रश्न 6.
यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं काष्र्णायसं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कृष्णायसमित्येव सत्यमेवं सोम्य स आदेशो भवतीति ॥6॥
उत्तर
[नखनिकृन्तनेन = नाखून काटने का यंत्र विशेष (नेलकटर)। काष्र्णायसम् =काँसे की धातु का।]

व्याख्या–पिता आरुणि ने आगे कहा–“हे श्वेतकेतु! जिस प्रकार नेलकटर को देखकर उसके काँसे द्वारा बने होने का आभास नहीं किया जा सकता है किन्तु वास्तव में वह काँसे का बना होता है। अर्थात् नेलकटर में काँसत्व है यही सत्य है।

प्रश्न 7.
न वै नूनं भगवन्तस्त एतदवेदिषुर्यध्द्येतदवेदिष्यन्कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवांस्त्वेव मे तदबीविति तथा सोम्येति होवाच ॥7॥
उत्तर
[न वै नूनम् =ऐसा कहे जाने पर। भगवांस्त्वेव =आप ही मेरे।]

व्याख्या-पिता के ऐसा कहने पर श्वेतकेतु ने कहा-“आप ही (UPBoardSolutions.com) मेरे पूजनीय गुरुजी हैं। जिसने उसे इस प्रकार का आत्म-बोध कराया।

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अतिलघु-उत्तरीय संस्कृत प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1
श्वेतकेतुः कस्य पुत्रः आसीत्?
या
श्वेतकेतुः कः आसीत?
उत्तर
श्वेतकेतुः आरुणेयपुत्रः आसीत्।

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प्रश्न 2
कः द्वादशवर्षम् उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः वेदानधीत्य आगतः? ।
उत्तर
श्वेतकेतुः द्वादशवर्षम् उपेत्य चतुर्विंशतिवर्ष: वेदानधीत्य आगतः।

प्रश्न 3
श्वेतकेतुः कतिवर्षाणि सर्वान् वेदान् अपठत्?
उत्तर
श्वेतकेतुः द्वादशवर्षाणि (UPBoardSolutions.com) सर्वान् वेदान् अपठत्।

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प्रश्न 4
अनूचानमानी कः अभवत्?
उत्तर
अनूचानमानी श्वेतकेतुः अभवत्।

प्रश्न 5
मृत्पिण्डेन किं विज्ञातम्?
उत्तर
मृत्पिण्डेन सर्वं मृण्मयं विज्ञातम्।

प्रश्न 6
कुत्र लोहमयं विज्ञातम्?
उत्तर
लोहमणिनी लोहमयं विज्ञातम्।

प्रश्न 7
कः आरुणिं गुरुरूपेण स्वीकरोति?
उत्तर
श्वेतकेतुः आरुणिं गुरुरूपेण (UPBoardSolutions.com) स्वीकरोति।

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अनुवादात्मक

प्रश्न 1.
निम्नलिखित वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद कीजिए-
उत्तर
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व्याकरणत्मक

प्रश्न 1
निम्नलिखित संधि पदों का संधि-विच्छेद कीजिए-
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 7 छान्दोग्य उपनिषद् षष्ठोध्यायः (संस्कृत-खण्ड) img-2

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प्रश्न 2
निम्नलिखित शब्दों में से उपसर्ग अथवा प्रत्यय अलग कीजिए
उत्तर
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UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 9 सुभद्राकुमारी चौहान (काव्य-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 9 सुभद्राकुमारी चौहान (काव्य-खण्ड)

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कवयित्री-परिचय

प्रश्न 1.
श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान का जीवन-परिचय देते हुए उनकी प्रमुख काव्य-कृतियों (रचनाओं) पर प्रकाश डालिए। [2009, 10]
या
कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान का जीवन-परिचय दीजिए एवं उनकी किसी एक रचना का नाम लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 16, 18]
उत्तर
सुभद्राकुमारी चौहान की कविताओं से एक सच्ची वीरांगना का ओज और शौर्य प्रकट होता है। इनकी काव्य-रचनाओं ने भारतीय युवाओं के उदासीन जीवन में उत्साह का संचार कर स्वतन्त्रता-प्राप्ति के लिए अग्रसर होने की प्रेरणा प्रदान की। आपकी (UPBoardSolutions.com) कविताएँ जन-जन के गले का हार बनीं और आप जन-कवयित्री के रूप में जानी जाने लगीं।

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जीवन-परिचय–क्रान्ति की अमरसाधिका सुभद्राकुमारी चौहान का जन्म सन् 1904 ई० में इलाहाबाद जिले के निहालपुर गाँव में हुआ था। इनके पिता रामनाथ सिंह सुशिक्षित, सम्पन्न और प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा क्रॉस्थवेट गर्ल्स कॉलेज में हुई और 15 वर्ष की उम्र में इनका विवाह खण्डवा (मध्य प्रदेश) के ठाकुर लक्ष्मणसिंह चौहान के साथ हुआ। इनके पति ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध राष्ट्रीय आन्दोलनों में भाग लेते थे। सुभद्राकुमारी भी पति के साथ राजनीतिक आन्दोलनों में भाग लेती रहीं, जिसके परिणामस्वरूप ये अनेक बार जेल भी गयीं। असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के कारण इनका अध्ययन-क्रम भंग हो गया था। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी से प्रेरित होकर ये राष्ट्र-प्रेम पर कविताएँ लिखने लगीं। हिन्दी-काव्य-जगत् में ये ही ऐसी कवयित्री थीं, जिन्होंने अपनी ओजमय कविता द्वारा लाखों (UPBoardSolutions.com) भारतीय तरुण-तरुणियों को स्वतन्त्रता-संग्राम में भाग लेने हेतु प्रेरित किया। ‘झाँसी वाली रानी थी’ तथा ‘वीरों का कैसा हो वसन्त’ कविताएँ तरुण-तरुणियों में क्रान्ति की ज्वाला फेंकती रहीं। इन्हें पं० माखनलाल चतुर्वेदी से भी पर्याप्त प्रोत्साहन मिला, परिणामस्वरूप इनकी देशभक्ति का रंग और भी गहराता गया। आप मध्य प्रदेश विधानसभा की सदस्या भी रहीं। सन् 1948 ई० में हुई एक वाहन-दुर्घटना में नियति ने एक प्रतिभाशाली कवयित्री को हिन्दी-साहित्य जगत् से असमय ही छीन लिया। ।

काव्य-कृतियाँ-सुभद्राकुमारी चौहान की प्रमुख काव्य-कृतियाँ निम्नवत् हैं

(1) मुकुल–इस संग्रह में वीर रस से पूर्ण ‘वीरों का कैसा हो वसन्त’ आदि कविताएँ संग्रहीत हैं। इस काव्य-संग्रह पर इन्हें सेकसरिया’ पुरस्कार प्राप्त हुआ था। |
(2) त्रिधारा-इस काव्य-संग्रह में ‘झाँसी की रानी की समाधि पर’ प्रसिद्ध कविता संग्रहीत है। इनके इस संग्रह में देशप्रेम की भावना व्यक्त होती है।
(3) सीधे-सादे चित्र,
(4) बिखरे मोती तथा
(5) उन्मादिनी। ये तीनों इनके कहानी-संकलन- हैं।

साहित्य में स्थान–श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान ने अपने काव्य में जिस वीर नारी को प्रदर्शित किया है वह अपने आपमें स्पृहणीय और नारी जगत् के लिए आदर्श है। आप अपनी ओजस्वी वाणी और एक समर्थ कवयित्री के रूप में हिन्दी-साहित्य में अपना (UPBoardSolutions.com) विशेष स्थान रखती हैं। .

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पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या

झाँसी की रानी की समाधि पर
प्रश्न 1.
इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी ।।
जल कर जिसने स्वतन्त्रता की, दिव्य आरती फेरी ॥
यह समाधि यह लधु समाधि है, झाँसी की रानी की ।
अंतिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ॥
यहीं कहीं पर बिखर गयी वह, भग्न विजय-माला-सी।
उसके फूल यहाँ संचित हैं, है यह स्मृति-शाला-सी ॥
सहे वार पर वार अंत तक, लड़ी वीर बाला-सी ।
आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर, चमक उठी ज्वाला-सी ॥ [2009, 11, 12, 15, 17]
उत्तर
[दिव्य = अलौकिक। लीलास्थली = कर्मस्थली। मरदानी = (UPBoardSolutions.com) पौरुषयुक्त आचरण करने वाली। भग्न = टूटी हुई। फूल = अस्थियाँ संचित = एकत्रित। स्मृतिशाली = स्मारक, स्मृति-भवन। वार = आघात। ]

सन्दर्भ-प्रस्तुत काव्य-पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘काव्य-खण्ड’ में संकलित श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान की कविता ‘झाँसी की रानी की समाधि पर’ शीर्षक से अवतरित हैं। यह कविता उनके ‘त्रिधारा’ नामक काव्य-संग्रह से ली गयी है।

[विशेष—इस शीर्षक से सम्बन्धित सभी पद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग-इन पंक्तियों में रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए उनके प्रति भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गयी है।

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व्याख्या-यह रानी लक्ष्मीबाई की समाधि है। इसमें रानी के शरीर की राख है। रानी ने अपने शरीर का बलिदान देकर यहीं पर स्वतन्त्रता की आरती उतारी थी। यह छोटी-सी समाधि लक्ष्मीबाई के महान् त्याग और देशभक्ति की निशानी है। यही स्थान (UPBoardSolutions.com) रानी की जीवन-लीला का अन्तिम स्थल है, जहाँ रानी ने पुरुषों जैसी वीरता का प्रदर्शन कर स्वयं का बलिदान कर दिया था।

कवयित्री कहती हैं कि अपनी समाधि के आस-पास ही रानी लक्ष्मीबाई टूटी हुई विजयमाला के समान बिखर गयी थीं। युद्धभूमि में अंग्रेजी सेना के साथ बहादुरी से लड़ते हुए रानी के शरीर के अंग यहीं-कहीं बिखर गये थे। इस समाधि में वीरांगना लक्ष्मीबाई की अस्थियाँ एकत्र कर रख दी गयी हैं, जिससे कि देश की भावी पीढ़ी उनके गौरवपूर्ण त्याग-बलिदान से प्रेरणा ले सके। | कवयित्री कहती हैं कि वीरांगना लक्ष्मीबाई अन्तिम साँस तक शत्रुओं की तलवारों के प्रहार सहती रहीं। जिस प्रकार यज्ञ-कुण्ड में आहुतियाँ पड़ने से अग्नि प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार रानी के आत्मबलिदान से आजादी की आग चारों ओर (UPBoardSolutions.com) फैल गयी। रानी के इस महान् त्याग ने अग्नि में आहुति का काम किया, जिससे लोग अधिक उत्साह से स्वतन्त्रता-संग्राम में भाग लेने लगे और रानी की कीर्ति चारों ओर फैल गयी।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और बलिदान की गौरवगाथा का। गान किया है।
  2. भाषा-सरल सुबोध खड़ी बोली।
  3. शैली–ओजपूर्ण आख्यानक गीति शैली।
  4. रस-वीर।
  5. छन्द-तुकान्त-मुक्त।
  6. गुण–प्रसाद और ओज।
  7. शब्दशक्ति–अभिधा।
  8. अलंकार-‘यहीं-कहीं …………….. ज्वाला-सी’ में उपमा, उदाहरण देने में दृष्टान्त, ‘आरती’ और ‘फूल’ में श्लेष और सर्वत्र अनुप्रास एवं रूपक ।। |

प्रश्न 2.
बढ़ जाता है मान वीर का, रण में बलि होने से ।
मूल्यवती होती सोने की, भस्म यथा सोने से ॥
रानी से भी अधिक हमें अब, यह समाधि है प्यारी ।
यहाँ निहित है स्वतन्त्रता की, आशा की चिनगारी ॥ [2011, 15]
उत्तर
[ मान = सम्मान। रण = युद्ध। मूल्यवती = मूल्यवान। निहित = रखी है।]

प्रसंग-इन पंक्तियों में कवयित्री कहती हैं कि देश के गौरव की रक्षा के लिए अपना बलिदान करने से रानी का महत्त्व और अधिक बढ़ गया है।

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व्याख्या-कवयित्री कहती हैं कि स्वतन्त्रता पर बलि होने से वीर का सम्मान बढ़ जाता है। रानी लक्ष्मीबाई भी युद्ध में बलिदान हुईं; अत: उनका सम्मान उसी प्रकार और भी अधिक बढ़ गया, जैसे कि सोने की अपेक्षा स्वर्णभस्म अधिक मूल्यवान होती है। (UPBoardSolutions.com) यही कारण है कि रानी लक्ष्मीबाई की यह समाधि हमें रानी लक्ष्मीबाई से भी अधिक प्रिय है; क्योंकि इस समाधि में स्वतन्त्रता-प्राप्ति की आशा की एक चिंगारी छिपी हुई है, जो आग के रूप में फैलकर पराधीनता से मुक्त होने के लिए देशवासियों को सदैव प्रेरणा प्रदान करती रहेगी।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. कवयित्री ने लक्ष्मीबाई की समाधि से स्वतन्त्रता-प्राप्ति की प्रेरणा प्राप्त करने के लिए युवकों का आह्वान किया है।
  2. भाषा-सरल खड़ी बोली।
  3. शैली–ओजपूर्ण व आख्यानक गीति शैली।
  4. रस-वीर।
  5. छन्द-तुकान्त-मुक्त।
  6. गुण-ओज एवं प्रसाद।
  7. शब्दशक्ति –अभिधा।
  8. अलंकार-‘बढ़ जाता है ……………..” सोने से’ में दृष्टान्त, ‘आशा की चिनगारी’ में रूपक और अनुप्रास।
  9. भावसाम्य-कवयित्री के समान ही ओज के कवि श्यामनारायण पाण्डेय भी देशहित में अपना सिर कटवा देने वाले को ही सच्चा वीर मानते हैं

जो देश-जाति के लिए, शत्रु के सिर काटे, कटवा भी दे .
उसको कहते हैं वीर, आन हित अंग-अंग छैटवा भी दे।

प्रश्न 3.
इससे भी सुन्दर समाधियाँ, हम जग में हैं पाते ।
उनकी गाथा पर निशीथ में, क्षुद्र जंतु ही गाते ॥
पर कवियों की अमर गिरा में, इसकी अमिट कहानी।
स्नेह और श्रद्धा से गाती, है, वीरों की बानी ॥ [2012, 17]
बुंदेले हरबोलों के मुख, हमने सुनी कहानी ।
खूब लड़ी मरदानी वह थी, झाँसी वाली रानी ॥
यह समाधि, यह चिर समाधि-है, झाँसी की रानी की। [2016]
अंतिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ॥
उत्तर
[ निशीथ = रात्रि। क्षुद्र = तुच्छ, छोटे-छोटे। जन्तु = प्राणी, कीड़े। गिरा = वाणी। अमिट = कभी न मिटने वाली। बानी = वाणी।]

प्रसंग-इन पंक्तियों में कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई की (UPBoardSolutions.com) समाधि को अन्य समाधियों से अधिक महत्त्वपूर्ण माना है।

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व्याख्या-कवयित्री कहती हैं कि संसार में रानी लक्ष्मीबाई की समाधि से भी सुन्दर अनेक समाधियाँ बनी हुई हैं, परन्तु उनका महत्त्व इस समाधि से कम ही है। उन समाधियों पर रात्रि में गीदड़, झींगुर, छिपकली आदि क्षुद्र जन्तु गाते रहते हैं अर्थात् वे समाधियाँ अत्यन्त उपेक्षित हैं, जिन पर तुच्छ जन्तु निवास करते हैं, परन्तु कवियों की अमर वाणी में रानी लक्ष्मीबाई की समाधि की कभी न समाप्त होने वाली कहानी गायी जाती है; क्योंकि रानी की समाधि के प्रति उनमें श्रद्धाभाव है पर अन्य समाधियाँ ऐसी नहीं हैं। इस समाधि की कहानी को वीरों की वाणी बड़े प्रेम और श्रद्धा के साथ गाती है। अतः यह समाधि अन्य समाधियों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण और पूज्य है।

बुन्देले और हरबोलों के मुँह से हमने यह गाथा सुनी है कि झाँसी की रानी (UPBoardSolutions.com) लक्ष्मीबाई पुरुषों की भाँति बहुत वीरता से लड़ी। यह अमर समाधि उसी झाँसी की रानी की है। यही उस वीरांगना की अन्तिम कार्यस्थली है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. कवयित्री ने रानी की समाधि के प्रति अपना श्रद्धा-भाव व्यक्त किया है।
  2. भाषा-सरल साहित्यिक खड़ी बोली।
  3. शैली-आख्यानक गीति की ओजपूर्ण शैली।
  4. रसवीर।
  5. गुण–प्रसाद और ओज।
  6. शब्दशक्ति -व्यंजना।
  7. अलंकार सर्वत्र अनुप्रास है।
  8. भावसाम्य-कला और कविता उन्हीं का गान करती है, जो विलासमय मधुर वंशी के स्थान पर रणभेरी का घोर-गम्भीर गर्जन करते हैं। जो कविता ऐसा नहीं करती, वह बाँझ स्त्री के समान है। कवि माखनलाल चतुर्वेदी ने कवयित्री की भाँति ही कवि और कविता के विषय में कहा है-

यह किसने कहा कला कविता सब बाँझ हुई ?
बलि के प्रकाश की सुन्दरता ही साँझ हुई,
मधुरी वंशी रणभेरी का डंका हो अब,
नव तरुणाई पर किसको, क्या शंका हो अब ?

काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार का नाम लिखकर उनका लक्षण भी लिखिए-
(क) बढ़ जाता है मान वीर का रण में बलि होने से।
मूल्यवती होती सोने की भस्म यथा सोने से ।
रानी से भी अधिक हमें अब, यह समाधि है प्यारी,
यहाँ निहित है स्वतन्त्रता की, आशा की चिनगारी॥
(ख) यहीं कहीं पर बिखर गयी वह, भग्न विजयमाला-सी।
उत्तर
(क) अनुप्रास, रूपक और पुनरुक्तिप्रकाश।
(ख) उपमा।
अनुप्रास का लक्षण-एक ही वर्ण की आवृत्ति दो या दो से अधिक बार होती है।
रूपकका लक्षण–उपमेय में उपमान का निषेधरहित आरोप होता है; जैसे—आशा की चिनगारी।
पुनरुक्तिप्रकाश का लक्षण–एक ही शब्द की पुनः-पुनः आवृत्ति होती है; जैसे—सोने।
उपमा का लक्षण-उपमेय की उपमान से सुन्दर और स्पष्ट समता दिखाई जाती है; जैसेविजयमाला-सी।।
काव्य-पंक्तियों में जब उदाहरण रूप में कुछ कहा (UPBoardSolutions.com) जाता है; जैसे-सोने की भस्म यथा सोने से।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों में रस को पहचानिए
बुंदेले हरबोलों के मुख, हमने सुनी कहानी।
खूब लड़ी मरदानी वह थी, झाँसी वाली रानी ॥
उतर
वीर रस।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पदों में समास का नाम बताते हुए समास-विग्रह कीजिए-
विजय-माला, स्मृति-शाला, वीर-बाला, अमिट
उत्तर
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प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों में उपसर्ग और प्रत्ययों को पृथक् करके लिखिए-
मूल्यवती, निहित, अमर, अन्तिम।
उत्तर
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