UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 2 (Section 3)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 2 जलवायु (अनुभाग – तीन)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 2 जलवायु (अनुभाग – तीन).

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जलवायु से आप क्या समझते हैं ? जलवायु को प्रभावित करने वाले कारकों (परिघटनाओं) का वर्णन कीजिए। [2006, 11, 13]
या

भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले किन्हीं दो तत्त्वों का वर्णन कीजिए। [2007, 08, 10]
या

भारत की जलवायु पर हिमालय की स्थिति (उच्चावच) के दो प्रभावों का उल्लेख कीजिए। [2010]
या

भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले तीन कारकों को स्पष्ट कीजिए। [2013]
या
भारतीय जलवायु को प्रभावित करने वाले किन्हीं पाँच कारकों का उल्लेख कीजिए। [2011, 13]
या

भारत की स्थिति का उसकी जलवायु पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
या
भारत की जलवायु पर हिमालय पर्वत का क्या प्रभाव पड़ता है ?
या
भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले तीन कारकों को बताइए। [2015, 16]
उत्तर :

जलवायु

लम्बी अवधि (30 से 50 वर्षों) के दौरान मौसम सम्बन्धी दशाओं के साधारणीकरण को जलवायु कहते हैं, अर्थात् भू-पृष्ठ के विस्तृत क्षेत्र में मौसम की दशाओं की समग्र जटिलता, उसके औसत लक्षण और परिवर्तन का परिसर जलवायु कहलाता है। सामान्यतः (UPBoardSolutions.com) ये दशाएँ अनेक वर्षों की दशाओं का परिणाम होती हैं और ताप, वायुमण्डलीय दाब, वायु आर्द्रता, मेघ, वर्षण तथा अन्य मौसम तत्त्वों के कारण उत्पन्न होती हैं।

भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक

विभिन्न स्थानों पर भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं
1. अवस्थिति- भारत भूमध्य रेखा के उत्तर में 8°4′ तथा 37°6′ उत्तर अक्षांश तथा 68°7′ से 97°25 पूर्वी देशान्तर के बीच स्थित है। कर्क वृत्त रेखा देश के लगभग मध्य से होकर गुजरती है। इसीलिए देश का उत्तरी भाग उपोष्ण कटिबन्ध में तथा दक्षिणी भाग उष्ण कटिबन्ध में पड़ता है। इस कटिबन्धीय स्थिति के कारण दक्षिणी भाग में ऊँचे तापमान तथा उत्तरी भाग में विषम तापमान पाये जाते हैं। भारत हिन्द महासागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी से घिरा एक प्रायद्वीपीय देश है। इस प्रायद्वीपीय स्थिति का प्रभाव तापमानों तथा वर्षा पर पड़ता है। समुद्रतटीय भागों की जलवायु सम रहती है, जब कि आन्तरिक भागों में विषम जलवायु पायी जाती है। वर्षा की मात्रा भी तटीय भगों से आन्तरिक भागों की ओर घटती है।

2. पृष्ठीय पवनें- उपोष्ण कटिबन्धीय स्थिति के कारण भारत शुष्क व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में पड़ता है, किन्तु भारत की विशिष्ट प्रायद्वीपीय स्थिति, तापमानों-वायुदाब की भिन्नता आदि कारणों से भारत में मानसूनी पवनें सक्रिय रहती हैं। ये पवनें ऋतु-क्रम से अपनी दिशा बदलती रहती हैं। तदनुसार भारत में ग्रीष्मकालीन (दक्षिण-पश्चिमी) मानसून तथा शीतकालीन (उत्तर-पूर्वी) मानसून सक्रिय होते हैं। इन्हीं मानसूनों से भारत को अधिकांश वर्षा प्राप्त होती है। अत: भारतीय मानसून के अध्ययन के बिना उसकी जलवायु के विषय में नहीं जाना जा सकता।

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3. उच्चावच (हिमाचल)– भारत के उत्तर में हिमालय पर्वत-श्रेणी एक प्रभावशाली जलवायु विभाजक का कार्य करती है। यह उत्तरी बर्फीली पवनों को भारत में प्रवेश करने से रोकती है तथा दक्षिण की ओर से आने वाली मानसूनी पवनों को रोककर देश में व्यापक वर्षा कराती है। इसी प्रकार पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ भी अरबसागरीय मानसूनों को रोककर पश्चिमी ढालों पर भारी वर्षा कराती हैं। हिमालय रूपी पर्वत-श्रृंखला के कारण ही उत्तरी भारत में उष्ण-कटिबन्धीय जलवायु पायी जाती है। इस जलवायु की दो विशेषताएँ हैं—(i) पूरे वर्ष में अपेक्षाकृत उच्च तापमान तथा (ii) शुष्क शीत ऋतु। कुछ क्षेत्रों को छोड़कर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में ये दोनों ही विशेषताएँ पायी जाती हैं।

4. उपरितन वायु- उपरितन वायु से अभिप्राय ऊपरी वायुमण्डल में चलने वाली वायुधाराओं से है। ये भूपृष्ठ से बहुत ऊँचाई पर (9 किमी से 12 किमी तक) तीव्र गति से चलती हैं। इन्हें जेट वायुधाराएँ भी कहते हैं। ये बहुत सँकरी पट्टी में चलती हैं। (UPBoardSolutions.com) शीत ऋतु में हिमालय के दक्षिणी भाग के ऊपर स्थित समताप मण्डल में पश्चिमी जेट वायुधारा चलती है। जून में यह उत्तर की ओर खिसक जाती है तथा 15° उत्तरी अक्षांश के ऊपर चलने लगती है। उत्तरी भारत में मानसून के अचानक विस्फोट के लिए यही वायुधारा उत्तरदायी मानी जाती है। इसके शीतल प्रभाव से बादल उमड़ने लगते हैं, फिर बरसते हैं। आठ-दस दिनों में ही पूरे देश में मानसून का प्रसार हो जाता है। ग्रीष्म ऋतु की अपेक्षा शीत ऋतु में इनका वेग दोगुना हो जाता है। साधारणत: इनको वेग लगभग 500 किमी प्रति घण्टा होता है तथा ध्रुवों की ओर बढ़ने पर इनके वेग में कमी आ जाती है।

5. अलनिनो- यह एक ऐसी मौसमी परिघटना है, जिसका प्रभाव समूचे विश्व पर पड़ता है। भारत की मानसूनी जलवायु भी इस परिघटना से प्रभावित होती है। इस तन्त्र में पूर्वी प्रशान्त महासागर के पीरू तट पर गर्म धारा प्रकट होने पर हिन्द महासागर में स्थित भारत में अकाल या वर्षा की कमी की स्थिति हो जाती है। अलनिनो के समाप्त होने पर प्रशान्त महासागर की सतह पर तापमान तथा वायुदाब की स्थिति पहले जैसी हो जाती है। इन उतार-चढ़ावों को दक्षिणी दोलन’ (Southern Oscillation) कहा जाता है। मानसूनों के प्रबल या दुर्बल होने में ‘दक्षिणी दोलन’ का बहुत प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 2.
भारत की ग्रीष्मकालीन एवं शीतकालीन जलवायु का वर्णन कीजिए।
या
भारतीय जलवायु का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए
(क) शीत ऋतु तथा (ख) ग्रीष्म ऋतु।
या
शीत ऋतु में दक्षिण भारत में वर्षा क्यों होती है ?
उत्तर :
भारत की ग्रीष्मकालीन जलवायु भारत में ग्रीष्मकालीन जलवायु मार्च से मध्य जून तक रहती है। इस ऋतु में देश में मौसम की सामान्य दशाएँ निम्नलिखित होती हैं

1. तापमान– 
सूर्य के उत्तरायण होने के कारण ऊष्मा की पेटी दक्षिण से उत्तर की ओर खिसकने लगती है। सम्पूर्ण देश में तापमान बढ़ने लगता है। अप्रैल में, गुजरात तथा मध्य प्रदेश में तापमान 42° से 43° सेल्सियस तक पहुँच जाता है। मई में, तापमान की वृद्धि 48° सेल्सियस तक हो जाती है तथा मरुस्थलीय क्षेत्र में 50° सेल्सियस तक तापमान पहुँच जाता है।

2. वायुदाब तथा पवनें– 
उत्तरी भारत में तापमानों की वृद्धि होने से वायुदाब घट जाता है। मई के अन्त तक एक लम्बा सँकरा निम्न वायुदाब गर्त थार मरुस्थल से लेकर बिहार में छोटा नागपुर के पठार तक विस्तृत हो जाता है। इस निम्न वायुदाब (UPBoardSolutions.com) गर्त के चारों ओर वायु का संचरण होने लगता है। दोपहर के बाद शुष्क और गर्म ‘लू (पवने) चलने लगती हैं। पंजाब, हरियाणा, पूर्वी राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में सायंकाल को धूलभरी आँधियाँ आती हैं। यदा-कदा आँधियों के बाद हल्की वर्षा हो जाती है तथा मौसम सुहाना हो जाता

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3. वर्षण– 
यदा-कदा आर्द्रता से लदी पवनें मानसून के निम्न दाब गर्त की ओर खिंच आती हैं। तब शुष्क और आर्द्र वायु-राशियों के मिलने से स्थानीय तूफान आते हैं। तेज पवनें, मूसलाधार वर्षा और कभी-कभी ओले भी पड़ते हैं।

केरल तथा कर्नाटक के तटीय भागों में ग्रीष्म ऋतु के अन्त में तथा मानसून से पूर्व कुछ वर्षा होती है, जिसे स्थानीय रूप से ‘आम्रवर्षा’ कहते हैं। यह वर्षा आम के फल को शीघ्र पकाने में सहायक होती है, इसीलिए इसे ‘आम्रवृष्टि’ नाम दिया गया है। अप्रैल में, बंगाल और असोम में उत्तर-पश्चिमी तथा उत्तरी पवनों द्वारा मेघ गर्जन, तड़ित-झंझा के साथ तेज बौछारें पड़ती हैं। इन्हें ‘काल-बैसाखी’ कहते हैं। कभी-कभी इन पवनों के द्वारा इन क्षेत्रों को भारी हानि भी उठानी पड़ जाती है।

भारत की शीतकालीन जलवायु

भारत में शीतकालीन जलवायु दिसम्बर से फरवरी तक रहती है। इस जलवायु की सामान्य दशाएँ निम्नलिखित हैं

1. तापमान– सामान्यतः देश में तापमान दक्षिण से उत्तर की ओर तथा समुद्र तट से आन्तरिक भागों की ओर घटते हैं। तिरुवनन्तपुरम् तथा चेन्नई में दिसम्बर में औसत तापमान 25°से 27°C के लगभग रहते हैं। दिल्ली और जोधपुर में तापमान 15° से 16°C तक रहते हैं। लेह में औसत तापमान -6°C तक गिर जाते हैं। उत्तरी मैदान में व्यापक रूप से पाला पड़ता है। इस ऋतु में दिन सामान्यतः कोष्ण (कम उष्ण) एवं रातें ठण्डी होती हैं।

2. वायुदाब- देश के उत्तर-पश्चिमी भाग में उच्च वायुदाब क्षेत्र स्थापित होता है। यहाँ से पवनें बाहर की ओर 3 किमी से 5 किमी प्रति घण्टा के वेग से चलने लगती हैं। इस क्षेत्र की स्थलाकृति का प्रभाव भी इन पवनों पर पड़ता है। समुद्रवर्ती भागों में कम वायुदाब रहता है; अतः पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं। गंगा घाटी में इन पवनों की दिशा पश्चिमी या उत्तर-पश्चिमी होती है। गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा में इनकी दिशा उत्तरी हो जाती है। स्थलाकृति के प्रभाव से मुक्त होकर बंगाल की खाड़ी के ऊपर इनकी दिशा उत्तर- पूर्वी हो जाती है।

3. वर्षा- स्थलीय पवनें शुष्क होती हैं; अतः प्राय: सम्पूर्ण देश में मौसम शुष्क रहता है। भूमध्य सागर की ओर से आने वाले पश्चिमी विक्षोभों से कुछ वर्षा देश के उत्तर-पश्चिमी भागों में होती है। हिमालय श्रेणी में हिमपात होता है। तमिलनाडु तट पर भी शीतकाल में वर्षा होती है। उत्तर-पूरब की ओर से चलने वाली स्थलीय मानसूनी पवनें जब बंगाल की खाड़ी को पार कर तमिलनाडु तट पर पहुँचती हैं, तो ये कुछ आर्द्रता ग्रहण (UPBoardSolutions.com) कर लेती हैं तथा तटों पर वर्षा करती हैं।

प्रश्न 3.
भारत में वर्षा के वार्षिक वितरण को स्पष्ट कीजिए तथा अपने उत्तर की पुष्टि रेखाचित्र से कीजिए।
या
भारतीय वर्षा के वितरण पर एक लेख लिखिए।
उत्तर :

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भारत में वर्षा का वार्षिक वितरण

भारत में वर्षा का वितरण बहुत विषम है। देश में कुल वर्षा का औसत लगभग 110 सेमी (40 इंच) है किन्तु इस सामान्य से वर्षा का विचलन 10% से 40% तक हो जाता है। सामान्यतः 85% वर्षा दक्षिण-पश्चिमी मानसूनों (जुलाई-सितम्बर) से प्राप्त होती है, लगभग 10% ग्रीष्मकालीन मानसूनों से, 5% लौटते हुए मानसूनों से (अक्टूबर-दिसम्बर) तथा 5% शीतकाल में होती है। देश में वर्षा का प्रादेशिक वितरण भी बहुत असमान रहता है। सामान्य रूप से भारत में वर्षा की निश्चितता तथा अनिश्चितता के आधार पर उसे दो भागों में विभाजित किया जा सकता है
1. निश्चित वर्षा के प्रदेश- इस प्रदेश के अन्तर्गत हिमालय को तराई प्रदेश, पश्चिमी बंगाल, असोम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैण्ड, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर, पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढाल, ऊपरी नर्मदा घाटी तथा मालाबार तट सम्मिलित किये जाते हैं।
2. अनिश्चित वर्षा के प्रदेश- अनिश्चित वर्षा के प्रदेश में उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात के मध्यवर्ती भाग, पूर्वी घाट, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश के दक्षिणी और पश्चिमी भाग, कर्नाटक, बिहार तथा ओडिशा सम्मिलित हैं। अनिश्चित वर्षा वाले प्रदेशों को निम्नलिखित भागों में बाँटा गया है

  • अधिक वर्षा वाले क्षेत्र– इसके अन्तर्गत पश्चिमी तट के कोंकण, मालाबार, दक्षिणी कनारा तथा उत्तर में हिमालय के दक्षिणी क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, मेघालय, असोम, नागालैण्ड, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर तथा (UPBoardSolutions.com) त्रिपुरा राज्य सम्मिलित हैं। इन क्षेत्रों में वर्षा का औसत 200 सेमी से अधिक रहता है।
  • साधारण वर्षा वाले क्षेत्र– इन क्षेत्रों में बिहार, ओडिशा, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी घाट के पूर्वोत्तर ढाल, पश्चिम बंगाल, दक्षिणी उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश सम्मिलित हैं। यहाँ वर्षा का औसत 100 से 200 सेमी के मध्य रहता है। इन क्षेत्रों में वर्षा की विषमता 15 से 20% तक पायी जाती है। कभी-कभी इन क्षेत्रों में अधिक वर्षा होने से बाढ़ आ जाती है, जबकि कभी वर्षा
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    की कमी से अकाल पड़ जाते हैं। इस प्रकार इन क्षेत्रों में वर्षा की अधिकता एवं कमी में मानसूनों का प्रमुख योगदान होता है। इसी कारण यहाँ बड़ी-बड़ी बहुउद्देशीय नदी-घाटी परियोजनाएँ क्रियान्वित की गयी हैं।
  • न्यून वर्षा वाले क्षेत्र– इन क्षेत्रों में वर्षा की कमी अनुभव की जाती है। यहाँ पर वर्षा का वार्षिक औसत 50 से 100 सेमी तक रहता है। इस प्रदेश के अन्तर्गत दक्षिण का प्रायद्वीप, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी मध्य प्रदेश, उत्तरी एवं दक्षिणी आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, पूर्वी राजस्थान, दक्षिणी पंजाब तथा दक्षिणी उत्तर प्रदेश राज्यों के भाग सम्मिलित हैं। वर्षा की विषमता 20 से 25 सेमी तक तथा अपर्याप्त व अनिश्चित रहती है। इन प्रदेशों में अकाल की सम्भावना बनी रहती है। अतः यहाँ सिंचाई के सहारे गेहूँ, कपास, ज्वार, बाजरा, तिलहन आदि फसलें उत्पन्न की जाती हैं।
  • अपर्याप्त वर्षा के क्षेत्र अथवा मरुस्थलीय क्षेत्र- ये भारत के शुष्क क्षेत्र हैं, जहाँ पर 50 सेमी से भी कम वर्षा होती है। वर्षा की कमी के कारण यहाँ सदैव सूखे की समस्या बनी रहती है। बिना सिंचाई के कृषि कार्य इन क्षेत्रों में बिल्कुल असम्भव है। (UPBoardSolutions.com) पश्चिमी राजस्थान के सम्पूर्ण क्षेत्र इसके अन्तर्गत आते हैं। तमिलनाडु का रायलसीमा क्षेत्र भी इसके अन्तर्गत आता है।

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प्रश्न 4.
भारत की अधिकांश वर्षा गर्मियों में होती है-कारणों का उल्लेख करते हुए भारत में वर्षा का वितरण लिखिए।
या
भारत की मानसून ऋतु का वर्णन कीजिए।
या
दक्षिण-पश्चिमी मानसून की वर्षा से प्रभावित किन्हीं दो क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए। [2010]
या
भारत में दक्षिण-पश्चिमी मानसून द्वारा होने वाली वर्षा का वर्णन कीजिए।
या
आगे बढ़ता हुआ मानसून’-भारत की इस ऋतु का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

भारत की वर्षा ऋतु (मानसून ऋतु)

वर्षा ऋतु ( आगे बढ़ते हुए मानसून की ऋतु )–जून से सितम्बर के मध्य सम्पूर्ण देश में व्यापक रूप से वर्षा होती है। वर्षा का 75% से 90% भाग इसी अवधि में प्राप्त हो जाता है।
दक्षिण-पश्चिमी मानसून की उत्पत्ति- ग्रीष्म ऋतु में देश के उत्तर-पश्चिमी मैदानी भागों में निम्न वायुदाब का क्षेत्र विकसित हो जाता है। जून के प्रारम्भ तक निम्न वायुदाब का यह क्षेत्र इतना प्रबल हो जाता है कि दक्षिण गोलार्द्ध की व्यापारिक पवनें भी इस ओर खिंच आती हैं। इन दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों की उत्पत्ति समुद्र से होती है। हिन्द महासागर में विषुवत् वृत्त को पार करके ये पवनें बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर में पहुँच जाती हैं। इसके बाद ये भारत के वायु-संचरण का अंग बन जाती हैं। विषुवतीय गर्म धाराओं के ऊपर से गुजरने के कारण ये भारी मात्रा में आर्द्रता ग्रहण कर लेती हैं। विषुवत् वृत्त पार करते ही इनकी दिशा दक्षिण-पश्चिम हो जाती है। इसीलिए इन्हें दक्षिण-पश्चिमी मानसून’ कहा जाता है।

मानसून का फटना- वर्षावाहिनी पवनें बड़ी तेज चलती हैं। इनकी औसत गति 30 किमी प्रति घण्टा होती है। उत्तर-पश्चिम के दूरस्थ भागों को छोड़कर ये पर्वनें एक महीने के अन्दर-अन्दर सारे भारत में फैल जाती हैं। आर्द्रता से लदी इन पवनों के साथ ही (UPBoardSolutions.com) बादलों का प्रचण्ड गर्जन तथा बिजली का चमकना शुरू हो जाता है। इसे मानसून का ‘फटना’ अथवा ‘टूटना’ कहते हैं।

दक्षिण-पश्चिमी मानसून की शाखाएँ- भारत की प्रायद्वीपीय स्थिति के कारण मानसून की दो शाखाएँ। हो जाती हैं
(1) अरब सागर की शाखा- अरब सागर की शाखा सबसे पहले पश्चिमी घाट के पर्वतों से टकराकर सह्याद्रि के पवनाभिमुख ढालों पर भारी वर्षा करती है। पश्चिमी घाट को पार करके यह शाखा दकन के पंठार और मध्य प्रदेश में पहुँच जाती है। वहाँ भी इससे पर्याप्त मात्रा में वर्षा होती है। तत्पश्चात् इसका प्रवेश गंगा के मैदानों में होता है, जहाँ बंगाल की खाड़ी की शाखा भी आकर इसमें मिल जाती है। अरब सागर के मानसून की शाखा का दूसरा भाग सौराष्ट्र के प्रायद्वीप तथा कच्छ में पहुँच जाता है। इसके बाद यह पश्चिमी राजस्थान और अरावली पर्वत-श्रेणियों के ऊपर से गुजरता है। वहाँ इसके द्वारा बहुत हल्की वर्षा होती है। पंजाब और हरियाणा में पहुँचकर यह शाखा भी बंगाल की खाड़ी की शाखा में मिलकर हिमालय के पश्चिमी भाग में भारी वर्षा करती है।
(2) बंगाल की खाड़ी की शाखा- बंगाल की खाड़ी की मानसून शाखा म्यांमार (बर्मा) तट की ओर तथा बांग्लादेश के दक्षिण-पूर्वी भागों की ओर बढ़ती है। परन्तु म्यांमार के तट के साथ-साथ फैली अराकान पहाड़ियाँ इस शाखा के बहुत बड़े भाग को भारतीय उपमहाद्वीप की दिशा में मोड़ देती हैं। इस प्रकार यह पश्चिमी दिशा से न आकर दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्वी दिशाओं से आती है। विशाल हिमालय तथा उत्तर-पश्चिमी भारत के निम्न वायुदाब के प्रभाव से यह शाखा दो भागों में बँट जाती है। एक शाखा पश्चिम की ओर बढ़ती है तथा गंगा के मैदानों को पार करती हुई पंजाब के मैदानों तक पहुँचती है। इसकी दूसरी शाखा ब्रह्मपुत्र की घाटी की ओर बढ़ती है। यह उत्तर-पूर्वी भारत में भारी वर्षा करती है। इसकी एक उपशाखा मेघालय में गारो और खासी की पहाड़ियों से टकराती है और वहाँ खूब वर्षा करती है। सबसे अधिक वर्षा मॉसिनराम (Mausinram) (मेघालय) में होती है। यहाँ वार्षिक वर्षा को औसत 11,405 मिलीमीटर है।

वर्षा का वितरण– दक्षिण-पश्चिमी मानसून से होने वाली वर्षा के वितरण पर उच्चावच का बहुत प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए-पश्चिमी घाट के पवनविमुख ढालों पर 250 सेमी से अधिक वर्षा होती है। इसके विपरीत पश्चिमी घाट के पवनाभिमुख ढालों पर 50 सेमी से भी कम वर्षा होती है। इसी प्रकार उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी भारी वर्षा होती है, परन्तु उत्तरी मैदानों में वर्षा की मात्रा पूर्व से पश्चिम की ओर घटती जाती है। इस विशिष्ट ऋतु में (UPBoardSolutions.com) कोलकाता में लगभग 120 सेमी, पटना में 102 सेमी, इलाहाबाद में 91 सेमी तथा दिल्ली में 56 सेमी वर्षा होती है।

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प्रश्न 5.
भारतीय जलवायु के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
या
भारतीय जलवायु में पायी जाने वाली विषमताओं तथा कृषि पर उनके प्रभाव का वर्णन कीजिए।
या
भारत में मानसून के किन्हीं दो प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
भारतीय जलवायु के मुख्य तत्त्व-तापमान तथा वर्षा हैं। समस्त देश में तापमानों तथा वर्षा का वितरण असमान पाया जाता है। इन विषमताओं का प्रभाव भारतीय कृषि पर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। भारत की जलवायु में बहुत अधिक विषमताएँ पायी जाती हैं। इन विषमताओं को उत्पन्न करने में निम्नलिखित कारक सहायक होते हैं

1. तापमानों की विषमताएँ- देश के विभिन्न भागों में तापमानों की भिन्नता पायी जाती है। दक्षिणी | भारत उष्ण कटिबन्ध में पड़ता है; अत: वहाँ वर्षपर्यन्त ऊँचे तापमान रिकॉर्ड किये जाते हैं। इसके विपरीत, कर्क रेखा के उत्तर के क्षेत्र उपोष्ण कटिबन्धीय स्थिति के कारण ग्रीष्म तथा शीत ऋतु में तापमानों की अतिशयताओं का अनुभव करते हैं। हिमालय के पर्वतीय भागों में तो शीत काल में तापमान शून्य के ऊपर रहते हैं। मरुस्थलीय भागों में शीत काल में बहुत कम तापमान तथा ग्रीष्म काल में बहुत ऊँचे तापमान पाये जाते हैं।

2. वर्षा के वितरण की विषमताएँ- देश में वर्षा का प्रादेशिक वितरण बहुत विषम है। मेघालय, असम, बंगाल आदि में 200 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा होती है, जब कि गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश में वार्षिक वर्षा का वितरण औसत 25 सेमी से 100 सेमी तक रहता है। आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा दकन के पठार के आन्तरिक भागों में 50 से 100 सेमी तक वार्षिक वर्षा होती है। इसी प्रकार पूर्वी हिमालय में 200 सेमी से अधिक तथा पश्चिमी हिमालय में 100 से 150 सेमी तक वार्षिक वर्षा होती है। हम जानते हैं कि वायुराशियों द्वारा अवरोधं के सम्मुख वाले भाग में अत्यधिक (UPBoardSolutions.com) वर्षा होती है, जब कि विमुख भागों तक पहुँचते-पहुंचते वायुराशियाँ अपनी आर्द्रता खो देने के कारण शुष्क और उष्ण हो जाती हैं और वहाँ बहुत कम वर्षा ही हो पाती है। इन प्रदेशों को वृष्टिछाया प्रदेश कहते हैं; उदाहरणार्थ-भारत में दक्षिण-पश्चिमी मानसून पवनों की अरब सागरीय शाखा द्वारा पश्चिमी घाट के वायु अभिमुख ढाल पर 640 सेमी (महाबलेश्वर) वर्षा होती है, जब कि इसके विमुख ढाल पर पुणे में 50 सेमी वर्षा भी कठिनाई से हो पाती है; अत: दक्षिणी भारत का यह क्षेत्र-वृष्टिछाया प्रदेश कहलाता है।

3. वर्षा की ऋत्विक विषमताएँ- देश के अधिकांश भागों में जुलाई से सितम्बर के मध्य अधिकांश वर्षा (85% तक) होती है, किन्तु तमिलनाडु में शीतकालीन तथा लौटते हुए मानसूनों से अधिक वर्षा होती है। उत्तरी भारत में चक्रवातों से शीत ऋतु में वर्षा प्राप्त होती है। पर्वतीय क्षेत्रों में हिमपात होता है।

4. वर्षा का सामान्य से विचलन– प्रत्येक वर्ष मानसून एक जैसे सक्रिय नहीं होते। किसी वर्ष सामान्य से अधिक वर्षा होती है तथा किसी वर्ष सामान्य से कम। वर्षा की यह अनियमित तथा अनिश्चित प्रकृति प्रादेशिक रूप से भी दृष्टिगोचर होती है। इसीलिए देश के कुछ भागों में जब बाढ़े आती हैं, तब कुछ भागों में सूखे की स्थिति भी होती है।

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जलवायु की विषमता का कृषि-उपजों या मानव-जीवन पर प्रभाव

भारत की जलवायु मानसूनी है। मानसून की विलक्षणता के कारण इसे ‘भारत के आर्थिक जीवन की धुरी’ कहा गया है। पर्यावरण के सभी अंगों में जलवायु मानव-जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करती है। मनुष्य की वेशभूषा, खान-पान, गृह-प्रकार, जन-स्वास्थ्य आदि सभी पर जलवायु का गहरा प्रभाव पड़ता है। इसके निम्नलिखित प्रभाव उल्लेखनीय हैं

  1. भारत में खरीफ फसलों की बुवाई वर्षा के आरम्भ होने के साथ शुरू हो जाती है। यदि वर्षा समय से प्रारम्भ हो जाती है और नियमित अन्तराल पर होती रहती है तो कृषि उत्पादन पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होता है।
  2. जिन भागों में कम वर्षा होती है अथवा सूखा पड़ता है वहाँ कृषि फसलें सिंचाई के बिना पैदा नहीं की जा सकती हैं।
  3. अत्यधिक उष्णता एवं आर्द्रता बीमारियों को जन्म देती हैं। इनसे मनुष्य पुरुषार्थहीन हो जाता है तथा उसकी कार्यक्षमता में कमी आती है।
  4. ग्रीष्म ऋतु में उत्तरी भारत में तापमान बहुत ऊँचे हो जाते हैं और (UPBoardSolutions.com) ‘लू’ चलने लगती है, जिससे खेतों में काम करना भी कठिन हो जाता है।
  5. मूसलाधार वर्षा से बाढ़ आ जाती हैं और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में कृषि-फसलें नष्ट हो जाती हैं।
  6. भीषण गर्मी के बाद वर्षा का मौसम आरम्भ हो जाता है, जो मानव स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालता है। इससे अनेक संक्रामक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। देश के कुछ भागों में मलेरिया व हैजा जैसे रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
  7. मानव की वेशभूषा भी जलवायु से प्रभावित होती है। उत्तर भारत में लोग शीत ऋतु में ऊनी कपड़े पहनते हैं तथा दक्षिण भारत में सफेद हल्के व सूती वस्त्र पहने जाते हैं।
  8. समय से पूर्व वर्षा आरम्भ होने तथा समय से पहले वर्षा समाप्त होने से भी आर्थिक क्रिया- कलाप प्रभावित होते हैं।
  9. जलवायु का प्रभाव घरों के निर्माण पर भी पड़ता है। भारत में मकान हवादार बनाये जाते हैं। उनमें आँगन व बरामदों की अधिक आवश्यकता होती है, क्योंकि भारत में ग्रीष्म काल की अवधि लम्बी होती है, जब कि शीत ऋतु थोड़े समय के लिए ही होती है।
  10. भारत में ग्रीष्म ऋतु में हरे चारे की कमी हो जाती है, जिससे पशुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  11. भारत के कुछ प्रदेशों; विशेषकर पंजाब में गेहूं व गन्ना की फसलों को लाभ मिलता है।
  12. भारत के वित्तीय बजट को ‘मानसून का जुआ’ कहा गया है, क्योंकि भारत में किसी वर्ष वर्षा बहुत | कम होती है, जिससे फसलें नष्ट हो जाती हैं और देश में अकाल पड़ जाता है तथा कभी-कभी वर्षा अधिक हो जाती है, जिसके (UPBoardSolutions.com) कारण नदियों में बाढ़ आ जाती है। इससे भी फसलें नष्ट हो जाती हैं।
  13. भारत की जलवायु ने कृषकों को भाग्यवादी एवं निराशावादी बना दिया है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मानसूनी वर्षा के रूप में भारतीय जलवायु कृषि-उपजों को सर्वाधिक प्रभावित करती है।

प्रश्न 6.
भारत की जलवायु की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [2013]
या

भारतीय जलवायु की किन्हीं पाँच विशेषताओं की विवेचना कीजिए। [2013]
या
सम और विषम जलवायु में अन्तर लिखिए।
या
विषम जलवायु से क्या अभिप्राय है ? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
या
मानसूनी जलवायु की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2016]
उत्तर :
भारत की स्थिति भूमध्य रेखा के उत्तर में है और कर्क रेखा देश के मध्य से गुजरती है। कर्क रेखा देश को दो भागों में विभाजित कर देती है। इस प्रकार भारत का उत्तरी भाग उपोष्ण कटिबन्ध तथा दक्षिणी भाग उष्ण कटिबन्ध में स्थित है। भारत में उत्तर की ओर हिमालय पर्वत-श्रेणी तथा दक्षिण-पूर्वी एवं दक्षिण-पश्चिमी दिशाओं में हिन्द महासागर की स्थिति है, जिन्होंने इसकी जलवायु को बहुत प्रभावित किया है। इसी कारण (UPBoardSolutions.com) भारत में विविध प्रकार की जलवायु दशाएँ पाई जाती हैं। वस्तुतः भारत की जलवायु पूर्णतः मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है। जिन भागों में मानसूनों के मार्ग में कोई अवरोध उपस्थित होता है, उन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है; जैसे–पश्चिमी घाट तथा हिमालय पर्वत के दक्षिणी ढालों पर।

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एक स्थान से दूसरे स्थान और एक ऋतु से दूसरी ऋतु में तापमान एवं वर्षण में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। ग्रीष्म ऋतु में भारत के पश्चिम में स्थित थार मरुस्थल में इतनी प्रचण्ड गर्मी पड़ती है कि तापमान प्रायः 55° सेल्सियस तक पहुँच जाता है, जब कि शीत ऋतु में कश्मीर राज्य के लद्दाख क्षेत्र के लेह नगर में इतनी कड़ाके की ठण्ड पड़ती है कि तापमान जमाव बिन्दु से 45° सेल्सियस तक नीचे चला जाता है; अर्थात् -45° सेल्सियस तक चला जाता है। केरल और अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में दिन और रात के तापमान में 7° या 8° सेल्सियस का अन्तर पाया जाता है। इसके विपरीत थार मरुस्थल में यदि दिन का तापमान 50° सेल्सियस रहता है तो रात में यह जमाव बिन्दु 0° तक पहुँच सकता है। जब हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में हिमपात होता है, तब शेष भारत में वर्षा की बौछारें पड़ती हैं। कुछ विदेशी विद्वानों ने भारत को अनेक जलवायु वाला देश बताया है। ब्लैनफोर्ड (Blanford) का कथन है कि “हम भारत की जलवायुओं के विषय में कह सकते हैं, जलवायु के विषय में (UPBoardSolutions.com) नहीं, क्योंकि सम्पूर्ण विश्व में जलवायु की इतनी विषमताएँ नहीं मिलतीं जितनी अकेले भारत में प्रसिद्ध जलवायु विज्ञानवेत्ता मार्सडेन ने भी कहा है कि “विश्व की समस्त जलवायु की किस्में भारत में पाई जाती हैं।” स्पष्ट है कि भारत में विभिन्न प्रकार की जलवायु दशाएँ पाई जाती हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान और एक ऋतु से दूसरी ऋतु में तापमान, वायुदाब तथा पवनें एवं वर्षण में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। भारत में प्रमुख रूप से दो प्रकार की जलवायु पाई जाती हैं—(1) सम और (2) विषम।

1. समजलवायु- सम जलवायु उस जलवायु को कहा जाता है जहाँ गर्मियों में न अधिक गर्मी पड़ती है। और ने सर्दियों में अधिक सर्दी। जहाँ तापमान वर्षभर लगभग समान रहता है। ऐसी जलवायु प्रायः . समुद्र के तटीय प्रदेशों में पाई जाती है। समुद्र के प्रभाव के कारण तटीय क्षेत्रों में सम जलवायु पाई जाती है। ऐसी जलवायु में दैनिक तथा वार्षिक तापान्तर बहुत ही कम पाया जाता है। केरल के तिरुवनन्तपुरम् में इसी प्रकार की जलवायु पाई जाती है।

2. विषम जलवायु- विषम जलवायु उस जलवायु को कहा जाता है जहाँ गर्मियों में अत्यधिक गर्मी तथा सर्दियों में अधिक सर्दी पड़ती है। जहाँ तापमान वर्षभर असमान रहता है। ऐसी जलवायु महाद्वीपों के आन्तरिक भागों अथवा समुद्र से दूर के भागों में पाई जाती है। सूर्य की किरणों से जल की अपेक्षा धरती दिन में जल्दी गर्म और रात में जल्दी ठण्डी हो जाती है। अत: धरती के प्रभाव के कारण विषम जलवायु का जन्म होता है। ऐसी जलवायु में दैनिक तापान्तर और वार्षिक तापान्तर अपेक्षाकृत अधिक पाया जाता है। जोधपुर (राजस्थान) तथा अमृतसर (पंजाब) में इसी प्रकार की जलवायु पाई जाती है।

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प्रश्न 7.
भारत में मानसून की उत्पत्ति तथा वर्षा का वितरण बताइट। [2013, 14]
या
भारत में मानसून की उत्पत्ति पर प्रकाश डालिए। [2015]
या
निम्नलिखित शीर्षकों में भारत में मानसूनी वर्षा का वर्णन कीजिए [2015]
(क) वायु की दिशा, (ख) वर्षा का वितरण।
उत्तर :
मानसून का अर्थ , मानसून शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के ‘मौसिम’ शब्द से हुई है जिसका तात्पर्य मौसम या ऋतु है। मौसम का आवर्तन मानसूनी जलवायु की प्रमुख विशेषता है। भारत में इस प्रकार की हवाएँ वर्ष में दो बार उच्च वायु भार से (UPBoardSolutions.com) निम्न वायु भार की ओर चलती हैं। ग्रीष्म ऋतु में ये हवाएँ समुद्र से स्थल की ओर चलती हैं, जबकि शीत ऋतु में ये हवाएँ स्थल से समुद्र की ओर बहती हैं। ग्रीष्म ऋतु तथा शीत ऋतु के मौसम के मध्य पवनों की दिशा में 120° का अन्तर पाया जाता है। इन पवनों की न्यूनतम गति तीन मीटर प्रति सेकण्ड होती है, इसलिए इन्हें मानसूनी पवनें कहते हैं।

मानसून की रचना

मानसून की रचना के सम्बन्ध में अनेक मत प्रचलित हैं। इसके लिए सबसे मुख्य और प्राचीन मत है स्थलीय और जलीय हवाएँ जो शीत ऋतु में स्थल की ओर और ग्रीष्म ऋतु में जल की ओर बहती हैं। ग्रीष्म ऋतु में अधिक तापमान के कारण स्थर पर निम्न वायुदाब का केन्द्र बन जाता है जिससे हवाएँ समुद्र से स्थल की ओर चलने लगती हैं, जबकि शीत ऋतु में इसके बिल्कुल विपरीत होता है। समुद्री भाग पर निम्न वायुदाब के केन्द्र के कारण हवाएँ स्थल से समुद्र की ओर बहती हैं। आधुनिक शोधों के कारण अब यह मत मान्य नहीं है। अब वैज्ञानिक मानसून की उत्पत्ति के लिए जेट पवनों को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। इस मत के अनुसार । मानसून की उत्पत्ति वायुमण्डलीय पवन के संचार से होती है जिसमें तिब्बत का पठार मुख्य है। ऊँचाई पर स्थित होने के कारण ये पठार गर्म होकर भट्ठी की तरह (UPBoardSolutions.com) काम करता है। इस कारण इन अक्षांशों (20° उत्तरी अक्षांश से 20° दक्षिणी अक्षांश) में धरातल एवं क्षोभमण्डल के बीच वायु का एक आवृत्त बन जाता है।

क्षोभमण्डल में उष्णकटिबन्धीय पुरवा जेट तथा उपोष्ण कटिबन्धीय पछुआ जेट धाराओं के चलने से वायुमण्डल की आर्द्रतायुक्त हवाएँ ऊपर क्षोभमण्डल में पहुँचकर विभिन्न दिशाओं में फैल जाती हैं और निम्न क्षोभमण्डल में बहने लगती हैं। अधिक ऊँचाई पर पहुँचकर यही हवाएँ घनीभूत होकर भारतीय महाद्वीप में मानसूनी पवनों को उत्पन्न करती हैं, जिनसे समस्त भारत में वर्षा होती है।

वर्षा का वितरण- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 3 का उत्तर देखें।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वर्षा और वर्षण में अन्तर लिखिए।
उत्तर :
वर्षा- 
यह वर्षण का एक विशिष्ट रूप है, जिसमें बादलों के जल-वाष्प कण संघनित होकर जल की बूंदों या हिमकणों के रूप में भू-पृष्ठ पर गिरते हैं। जलवर्षा तथा हिमवर्षा इसके दो रूप हैं। वर्षण–यह एक व्यापक प्रक्रिया है, जिसमें वायुमण्डल की आर्द्रता संघनित होकर वर्षा, हिम, ओला, पाला
आदि रूपों में धरातल पर गिरती है। जल-वर्षा, वर्षण का एक साधारण रूप है। हिमवृष्टि, ओलावृष्टि, हिमपात आदि इसके अनेक रूप हैं।

प्रश्न 2.
भारत में कितनी ऋतुएँ होती हैं ? कौन-सी ऋतु कृषि के लिए महत्त्वपूर्ण है और क्यों ?
उत्तर :
भारत की जलवायु मानसूनी है। मानसूनों की प्रगति के आधार पर देश में चार ऋतुएँ होती हैं

  • आगे बढ़ते हुए मानसून (दक्षिण-पश्चिमी मानसून) की ऋतु अर्थात् वर्षा ऋतु,
  • लौटते हुए मानसून की ऋतु अर्थात् शरद् ऋतु,
  • शीत ऋतु (उत्तर-पूर्वी मानसून) तथा
  • ग्रीष्म ऋतु।। देश की कृषि पर ऋतुओं का प्रभाव महत्त्वपूर्ण होता है। कृषि का आधार वर्षा है तथा देश की अधिकांश वर्षा आगे बढ़ते हुए मानसून (जुलाई से सितम्बर के मध्य) द्वारा होती है। इसलिए यह ऋतु, जिसे वर्षा ऋतु भी कहते हैं, कृषि के लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि
  1. इसी ऋतु में देश की 75 से 90% तक वर्षा होती है।
  2. वर्षा की अवधि तथा मात्रा का वितरण देशभर में (UPBoardSolutions.com) असमान है। इसका कृषि पर बहुत प्रभाव पड़ता है। उत्तरी मैदान में वर्षा की मात्रा पूर्व से पश्चिम की ओर घटती है, जबकि प्रायद्वीपीय भारत में पश्चिम से | पूरब की ओर वर्षा की मात्रा घटती है।
  3. वर्षा के वितरण का कृषि के प्रकार तथा फसलों के उत्पादन से गहरा सम्बन्ध है।
  4. आगे बढ़ते हुए मानसून ही देश की कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था की आधारशिला है। इसीलिए भारतीय कृषि को ‘मानसून का जुआ’ कहा जाता है।

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प्रश्न 3.
आम्रवृष्टि’ और ‘काल-बैसाखी’ में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
आम्रवृष्टि-ग्रीष्म ऋतु के अन्त में केरल तथा कर्नाटक के तटीय भागों में मानसून से पूर्व की वर्षा का यह स्थानीय नाम इसलिए पड़ा है; क्योकि यह वर्षा आम के फलों को शीघ्र पकाने में सहायता करती है। काल-बैसाखी-ग्रीष्म ऋतु में बंगाल तथा असोम में भी उत्तर-पश्चिमी तथा उत्तरी पवनों द्वारा वर्षा की तेज बौछारें पड़ती हैं। यह वर्षा प्रायः सायंकाल में होती है। इसी वर्षा को काल-बैसाखी’ कहते हैं। इसका अर्थ है-बैसाख मास की काल।

प्रश्न 4.
भारत में आगे बढ़ते हुए मानसून की ऋतु की तीन विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
भारत में आगे बढ़ते हुए मानसून की ऋतु की तीन विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • भारत में आगे बढ़ते हुए मानसून की ऋतु जून से सितम्बर तक रहती है। इस ऋतु में समस्त भारत में वर्षा होती है।
  • वर्षा ऋतु की अवधि दक्षिण से उत्तर की ओर (UPBoardSolutions.com) तथा पूर्व से पश्चिम की ओर घटती जाती है। देश के सबसे उत्तर-पश्चिमी भागों में यह अवधि केवल दो महीने की होती है।
  • देश की 75 से 90% वर्षा इसी ऋतु में होती है।

प्रश्न 5.
भारत में कम वर्षा वाले तीन क्षेत्र कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
कम वर्षा वाले क्षेत्रों से अभिप्राय ऐसे क्षेत्रों से है, जहाँ 50 सेमी से भी कम वार्षिक वर्षा होती है। ये क्षेत्र हैं

  • पश्चिमी राजस्थान तथा इसके निकटवर्ती पंजाब, हरियाणा तथा गुजरात के क्षेत्र।
  • सह्याद्रि के पूर्व में फैले दकन के पठार के आन्तरिक भाग।
  • कश्मीर में लेह के आस-पास का प्रदेश।

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प्रश्न 6.
जाड़ों में वर्षा वाले भारत के दो क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए। [2018]
उत्तर:
शीत ऋतु में स्थलीय पवनें शुष्क होती हैं; अतः प्रायः सम्पूर्ण देश में मौसम शुष्क रहता है। परन्तु निम्नलिखित दो क्षेत्रों में जाड़ों में भी वर्षा होती है

  • देश के उत्तर-पश्चिमी भाग-भूमध्य सागर की ओर से आने वाले पश्चिमी विक्षोभों से कुछ वर्षा देश के उत्तर-पश्चिमी भागों में होती है।
  • तमिलनाडु तट-तमिलनाडु तट पर भी शीतकाल में वर्षा (UPBoardSolutions.com) होती है। उत्तर-पूरब की ओर से चलने वाली स्थलीय मानसून पवनें जब बंगाल की खाड़ी को पार कर तमिलनाडु तट पर पहुँचती हैं, तो ये कुछ आर्द्रता ग्रहण कर लेती हैं तथा तटों पर वर्षा करती हैं।

प्रश्न 7.
जलवायु का प्राकृतिक वनस्पति व जीव-जन्तुओं पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
पर्यावरण के सभी अंगों में जलवायु मानव-जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करती है। भारत में कृषि राष्ट्र के अर्थतन्त्र की धुरी है, जो वर्षा की विषमता से सबसे अधिक प्रभावित होती है। मानसूनी वर्षा बड़ी ही अनियमित एवं अनिश्चित है। जिस वर्ष वर्षा अधिक एवं मूसलाधार रूप में होती है तो अतिवृष्टि के परिणामस्वरूप बाढ़ आ जाती हैं तथा भारी संख्या में धन-जन का विनाश करती हैं। इसके विपरीत जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है या अनिश्चितता की स्थिति होती है तो अनावृष्टि के कारण सूखा पड़ जाता है, जिससे फसलें सूख जाती हैं तथा पशुधन को भी पर्याप्त हानि उठानी पड़ती है। जलवायु का प्राकृतिक वनस्पति व जीव-जन्तुओं पर प्रभाव निम्नलिखित है-

1. प्राकृतिक वनस्पति पर प्रभाव- किसी देश की प्राकृतिक वनस्पति न केवल धरातल और मिट्टी के गुणों पर निर्भर करती है, वरन् वहाँ के तापमान और वर्षा का भी उस पर प्रभाव पड़ता है, क्योंकि पौधे के विकास के लिए वर्षा, तापमान, प्रकाश और वायु की आवश्यकता पड़ती है; उदाहरणार्थभूमध्यरेखीय प्रदेशों में निरन्तर तेज धूप, कड़ी गर्मी और अधिक वर्षा के कारण ऐसे वृक्ष उगते हैं; जिनकी पत्तियाँ घनी, ऊँचाई बहुत और लकड़ी अत्यन्त कठोर होती है। इसके विपरीत मरुस्थलों में काँटेदार झाड़ियाँ भी बड़ी कठिनाई से उग पाती हैं; क्योंकि यहाँ वर्षा का अभाव होता है। वास्तव में जलवायु वनस्पति का प्राणाधार है।

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2. जीव-जन्तुओं पर प्रभाव– जलवायु की विविधता ने प्राणियों में भी विविधता स्थापित की है। जिस प्रकार विभिन्न जलवायु में विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ पायी जाती हैं, वैसे ही विभिन्न जलवायु प्रदेशों में अनेक प्रकार के जीव-जन्तु पाये जाते हैं; उदाहरणार्थ-कुछ जीव-जन्तु वृक्षों की शाखाओं पर रहकर सूर्य की गर्मी और प्रकाश प्राप्त करते हैं; जैसे-नाना प्रकार के बन्दर, चमगादड़ आदि। इसके विपरीत कुछ जीव-जन्तु जल में निवास (UPBoardSolutions.com) करते हैं; जैसेमगरमच्छ, दरियाई घोड़े आदि। ठीक इससे भिन्न प्रकार के प्राणी टुण्ड्री प्रदेश में पाये जाते हैं जिनके शरीर पर लम्बे और मुलायम बाल होते हैं, जिनके कारण वे कठोर शीत से अपनी रक्षा करते हैं।

प्रश्न 8.
अल्पवृष्टि तथा अतिवृष्टि का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

1. अल्पवृष्टि

अल्पवृष्टि का तात्पर्य वर्षा न होने से है जिसके कारण अकाल की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। जलाभाव के कारण फसलें नष्ट हो जाती हैं। नदी, तालाब, कुएँ सूखने लगते हैं। पानी का घोर संकट उत्पन्न हो जाता है। जिससे सभी प्रकार के जीवों का जीवन संकटग्रस्त हो जाता है। पशुओं के लिए पानी तथा चारे की समस्या , पैदा हो जाती है।

2. अतिवृष्टि

अतिवृष्टि का तात्पर्य ऐसी अत्यधिक वर्षा से है जो लाभ की अपेक्षा हानि पहुँचाती है। अतिवृष्टि से नदी, जलाशय, तालाब सभी जल से भर जाते हैं। नदियों में बाढ़ आ जाती है जिससे उनके किनारे बसे गाँव, नगर तथा फसलें प्रभावित हो जाती हैं। अतिवृष्टि से बहुत-से लोग घर-विहीन हो जाते हैं। बाढ़ के बाद अनेक प्रकार के संक्रामक रोग फैलने लगते हैं। अतिवृष्टि का सर्वाधिक प्रभाव फसलों पर पड़ता है। इससे सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।

प्रश्न 9.
पीछे हटते हुए मानसून की ऋतु में मौसम की विभिन्न दशाओं तथा वर्षा के वितरण का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अक्टूबर और नवम्बर के महीने में भारत में पीछे हटते हुए मानसून की ऋतु पायी जाती है। इस ऋतु में मानसून का निम्न वायुदाब का गर्त कमजोर पड़ जाता है और इसका स्थान उच्च वायुदाब ले लेता है। परिणामस्वरूप मानसून पीछे हटने लगता है। इस (UPBoardSolutions.com) समय तक इन पवनों में आर्द्रता की मात्रा पर्याप्त कम हो चुकी होती है। अत: इसके द्वारा बहुत कम वर्षा होती है। भारतीय भू-भागों पर इसका प्रभाव-क्षेत्र सिकुड़ने लगता है। और पृष्ठीय पवनों की दिशा उलटनी शुरू हो जाती है। अक्टूबर तक मानसून उत्तरी मैदानों से पीछे हट जाता है।

अक्टूबर-नवम्बर के दो महीने, एक संक्रान्ति काल है। इस काल में वर्षा ऋतु के स्थान पर शुष्क ऋतु का आगमन प्रारम्भ हो जाता है। मानसून के हटने से आकाश साफ हो जाता है और तापमान फिर से बदलने लगता है। परन्तु भूमि अभी भी आर्द्र बनी रहती है। उच्च तापमान तथा आर्द्रता के कारण मौसम कष्टदायक हो जाता है। इस कष्टदायक मौसम को ‘क्वार की उमस’ कहते हैं। अक्टूबर के उत्तरार्द्ध में मौसम बदलने लगता है और विशेषकर उत्तरी मैदानों में तापमान तेजी से गिरने लगता है।

नवम्बर के प्रारम्भ में उत्तर-पश्चिमी भारत के निम्न वायुदाब का क्षेत्र बंगाल की खाड़ी की ओर खिसक जाता है। इस अवधि में अण्डमान सागर में चक्रवात बनने लगते हैं। इनमें से कुछ चक्रवात दक्षिणी प्रायद्वीप के पूर्वी तटों को पार कर जाते हैं और इन क्षेत्रों में भारी तथा व्यापक वर्षा करते हैं। ये उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात अधिकतर गोदावरी, कृष्णा और कावेरी के डेल्टाई प्रदेशों में ही आते हैं। ये बहुत ही विनाशकारी होते हैं। कोई भी वर्ष इनकी विनाशलीला से खाली नहीं जाता। कभी-कभी ये चक्रवात सुन्दरवन और बांग्लादेश में भी पहुँच जाते हैं। कोरोमण्डल तट पर अधिकतर वर्षा इन्हीं चक्रवातों और अवदाबों के कारण होती है।

प्रश्न 10.
भारत की चार प्रमुख ऋतुओं के नाम लिखकर उनका संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत की चार ऋतुओं के नाम तथा उनका संक्षिप्त विवेचन निम्नवत् है

1. शीत ऋतु- लगभग पूरे भारत में दिसम्बर, जनवरी तथा फरवरी के महीनों में शीत ऋतु होती है। इस ऋतु में उत्तर-पश्चिमी मैदानी भागों में उच्च वायुदाब रहता है तथा देश के ऊपरी भागों में उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवने स्थल से सागरों की ओर चलती हैं। पवनों के स्थल भागों से चलने के कारण यह ऋतु शुष्क होती है। इस ऋतु में दक्षिण से उत्तर की ओर जाने में तापमान घटता जाता है। यहाँ दिन ‘ सामान्यत: अल्प उष्ण एवं रातें ठण्डी होती हैं। ऊँचे स्थानों पर पाला भी पड़ जाता है।

2. ग्रीष्म ऋतु- 
21 मार्च के बाद सूर्य की स्थिति उत्तरायण हो जाती है। अब मार्च, अप्रैल और मई के बीच अधिक तापमान की पेटी दक्षिण से उत्तर की ओर खिसक जाती है। इस समय देश के उत्तर-पश्चिमी भांगों में तापमान 48° सेल्सियस तक पहुँच जाता है। फलस्वरूप अत्यधिक गर्मी पड़ने के कारण इस भाग में निम्न वायुदाब के क्षेत्र बन जाते हैं। इसे मानसून का निम्न वायुदाब गर्त’ कहते हैं। इस ऋतु में शुष्क एवं गर्म पवनें चलने लगती हैं, (UPBoardSolutions.com) जिन्हें ‘लू’ कहा जाता है। इन दिनों पंजाब, हरियाणा, पूर्वी राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में धूलभरी आँधियाँ भी चलती हैं।

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3. आगे बढ़ते हुए मानसून की ऋतु– 
सम्पूर्ण देश में जून, जुलाई, अगस्त और सितम्बर के महीनों में ही अधिकांश वर्षा होती है। वर्षा की अवधि एवं मात्रा उत्तर से दक्षिण तथा पूर्व से पश्चिम की ओर घटती जाती है। भारत के उत्तर-पश्चिमी भागों में यह अवधि केवल दो महीनों की होती है तथा वर्षा का 75% से 90% भाग इसी अवधि में प्राप्त हो जाता है।

4. पीछे लौटते हुए मानसून की ऋतु- 
अक्टूबर और नवम्बर के महीनों में मानसून पीछे लौटने लगता है। अक्टूबर माह के अन्त तक मानसून मैदान से पूर्णतः पीछे हट जाता है। इस समय शुष्क ऋतु का आगमन होता है तथा आकाश स्वच्छ हो जाता है। तापमान (UPBoardSolutions.com) में कुछ वृद्धि होती है। उच्च तापमान और आर्द्रता के कारण मौसम कष्टदायी हो जाता है। निम्न वायुदाब के क्षेत्र बंगाल की खाड़ी में स्थानान्तरित हो जाते हैं। इस अवधि में पूर्वी तट पर व्यापक वर्षा होती है। सम्पूर्ण कोरोमण्डल तट पर अधिकांश वर्षा इन्हीं चक्रवातों और अवदाबों के कारण होती है।

प्रश्न 11.
मानसून से क्या अभिप्राय है ? भष्मकालीन मानसूनी वर्षा की चार विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
मानसून’ शब्द की व्युत्पत्ति अरबी भाषा के ‘मौसिम’ शब्द से हुई है। इनका शाब्दिक अर्थ ऋतु है। इस प्रकार मानसून का अर्थ एक ऐसी ऋतु से है, जिसमें पवनों की दिशा पूरी तरह से उलट जाती है। मानसूनी पवनें हिन्द महासागर में विषुवतं वृत्त पार करने के बाद दक्षिण-पश्चिमी व्यापारिक पवनों के रूप में बहने लगती हैं। इस प्रकार शुष्क तथा गर्म स्थलीय व्यापारिक पवनों का स्थान आर्द्रता से परिपूर्ण समुद्री पवनें ले लेती हैं। मानसूनी पवनों के अध्ययन से पता चला है कि इन पवनों का प्रसार 20° उत्तर तथा 20° दक्षिण अक्षांशों के बीच उष्ण कटिबन्धीय भू-भागों पर होता है। लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून हिमालय की पर्वत-श्रेणी से बहुत अधिक प्रभावित होता है। इन पर्वत-श्रेणियों के कारण पूरा भारतीय उपमहाद्वीप दो से पाँच महीनों तक आई विषुवतीय पवनों के प्रभाव में आ जाता है। अतः जून से लेकर सितम्बर तक ही 75-90% के बीच वार्षिक वर्षा होती है।

ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा की चार विशेषताएँ

  • ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा की अवधि दक्षिण से उत्तर तथा पूर्व से पश्चिम की ओर घटती जाती है। देश के सबसे उत्तर-पश्चिमी भाग में यह अवधि केवल दो महीने की होती है। इस अवधि में 75% से 90% तक वर्षा हो जाती है।
  • ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षावाहिनी पवनें बड़ी तेजी से चलती हैं। इनकी औसत गति 30 किलोमीटर प्रति घण्टा होती है। उत्तर-पश्चिमी भागों को छोड़कर ये एक महीने में सारे भारत में फैल जाती हैं। आर्द्रता से भरी इन पवनों के आने के साथ ही (UPBoardSolutions.com) बादलों का प्रचण्ड गर्जन तथा बिजली चमकनी शुरू हो. जाती है। इसे मानसून का ‘फटना’ या टूटना’ कहते हैं।
  • ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा लगातार नहीं होती। कुछ दिनों तक वर्षा होने के बाद मौसम सूखा रहता है। मानसून के इस घटते-बढ़ते स्वरूप का कारण चक्रवातीय अवदाब है, जो मुख्य रूप से बंगाल की खाड़ी के शीर्ष भाग में उत्पन्न होते हैं और भारत-भूमि के ऊपर से गुजरते हैं।’
  • ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा अपनी स्वेच्छाचारिता के लिए विख्यात है। इससे एक ओर तो कहीं भारी, । वर्षा से भयंकर बाढ़ आ सकती है तो दूसरे स्थान पर सूखा पड़ सकता है। इससे करोड़ों किसानों के खेती के काम प्रभावित होते हैं।

प्रश्न 12.
रतीय मानसूनी वर्षा की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2009]
या
भारत में मानसूनी वर्षा की दो विशेषताएँ बताइए। [2009]
या
मानसूनी वर्षा की किन्हीं छः विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [2015, 16, 17]
उत्तर:
भारतीय वर्षा की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. मानसूनी वर्षा- भारतीय वर्षा का लगभग 75% भाग दक्षिण-पश्चिमी मानसूनों द्वारा प्राप्त होता है, अर्थात् कुल वार्षिक वर्षा का 75% वर्षा ऋतु में, 13% शीत ऋतु में, 10% वसन्त ऋतु में तथा 2% ग्रीष्म ऋतु में प्राप्त होता है।

2. वर्षा की अनिश्चितता- 
भारतीय मानसूनी वर्षा का प्रारम्भ अनिश्चित है। मानसून कभी शीघ्र आते हैं। तो कभी देर से। कभी-कभी वर्षा ऋतु में सूखा पड़ जाता है तथा कभी अत्यधिक वर्षा से बाढ़े तक आ जाती हैं। किसी वर्ष वर्षा नियत समय से पूर्व ही आरम्भ हो जाती है एवं निश्चित समय से पूर्व ही समाप्त हो जाती है।

3. वितरण की असमानतो- 
भारतीय वर्षा का वितरण बड़ा ही असमान है। (UPBoardSolutions.com) कुछ भागों में वर्षा 400 सेमी या उससे अधिक हो जाती है, जबकि कुछ भाग ऐसे हैं जहाँ वर्षा का औसत 12 सेमी से भी कम रहता है।

4. मूसलाधार वर्षा– 
भारत में वर्षा अनवरत गति से नहीं होती, वरन् कुछ दिनों के अन्तराल से होती है। कभी-कभी वर्षा मूसलाधार रूप में होती है और एक ही दिन में 50 सेमी तक हो जाती है। यह मिट्टी का अपरदन करती है, जिससे मिट्टी के उत्पादक तत्त्व बह जाते हैं।

5. असमान वर्षा- 
कुछ भागों में वर्षा बड़ी तीव्र गति से होती है तथा कुछ भागों में केवल बौछारों के रूप में। एक ओर मॉसिनराम गाँव (चेरापूंजी) में 1,354 सेमी से भी अधिक वर्षा होती है, तो वहीं राजस्थान में केवल 10 सेमी से भी कम। कुछ स्थामों पर वर्षा की प्राप्ति असन्दिग्ध रहती है। वर्षा हो भी सकती है और नहीं भी। भारत के उत्तरी मैदान में तथा दक्षिणी भागों में ऐसी ही स्थिति पायी जाती है।

6. वर्षा की अल्पावधि- 
भारत में वर्षा के दिन बहुत ही कम होते हैं। उदाहरण के लिए चेन्नई में 50 दिन, मुम्बई में 75 दिन, कोलकाता में 118 दिन तथा अजमेर में केवल 30 दिन।

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7. वर्षा की निश्चित अवधि- 
कुंल वर्षा का लगभग 80% जून से सितम्बर तक प्राप्त हो जाता है, फलत: वर्ष का दो-तिहाई भाग सूखा ही रह जाता है, जिससे फसलों की सिंचाई करनी पड़ती है।

8. पर्वतीय वर्षा- 
भारत की लगभग 95% वर्षा पर्वतीय है, जबकि मात्र 5% वर्षा ही चक्रवातों द्वारा होती है।

9. वर्षा की निरन्तरता- 
भारत में प्रत्येक मास में किसी-न-किसी क्षेत्र में वर्षा होती रहती है। शीतकालीन चक्रवातों द्वारा जनवरी एवं फरवरी महीनों में उत्तरी भारत में वर्षा होती है। मार्च में चक्रवात असोम एवं पश्चिम बंगाल राज्यों में सक्रिय रहते हैं। इनसे तब तक वर्षा होती है जब तक दक्षिण-पश्चिमी मानसून पुनः चलना न आरम्भ कर दें।

प्रश्न 13.
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में अधिक वर्षा के दो कारणों का उल्लेख कीजिए। [2015]
उत्तर :
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में अधिक वर्षा के दो कारण निम्नलिखित हैं।

  • बंगाल की खाड़ी की मानसून शाखा का विभाजन, भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश के बाद, उच्च हिमालय तथा उत्तर-पश्चिमी भारत के निम्न वायुभार के प्रभाव से दो भागों में हो जाता है। इस मानसून की दूसरी शाखा उत्तर एवं उत्तर-पूर्व दिशा (UPBoardSolutions.com) से ब्रह्मपुत्र नदी की घाटी में प्रवेश करती है, जिससे भारत के उत्तर-पूर्वी भागों में भारी वर्षा होती है।
  • भारत की 75-90% वर्षा ग्रीष्मकालीन मानसूनों द्वारा प्राप्त होती है। यही कारण है कि वर्षा के वितरण में पर्याप्त असमानताएँ पायी जाती हैं। भारत के उत्तर-पूर्वी भाग में उच्चावचीय लक्षणों के कारण 300 सेमी से भी अधिक वार्षिक वर्षा होती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानसून से क्या अभिप्राय है ? [2016]
उत्तर :
मानसून उन पवनों को कहते हैं जो वर्ष में छ: महीने (ग्रीष्म ऋतु) सागरों से स्थल की ओर तथा शेष छः महीने (शीत ऋतु) स्थल से सागरों की ओर चलती हैं।

प्रश्न 2.
भारत में अधिकांश वर्षा किस ऋतु में होती है ?
उत्तर :
भारत में अधिकांश अर्थात् 75% से 90% तक वर्षा आगे बढ़ते हुए मानसूनों द्वारा (जून से सितम्बर माह में) वर्षा ऋतु में होती है।

प्रश्न 3.
थार मरुस्थल में अल्प वर्षा क्यों होती है ? दो कारण लिखिए।
उत्तर :
थार मरुस्थल में अल्प वर्षा होने के दो कारण निम्नलिखित हैं|

  • थार मरुस्थल अरबसागरीय मानसूनों के मार्ग में पड़ता है, किन्तु यहाँ मानसून पवनों को रोकने के लिए कोई ऊँची पर्वत-श्रेणी स्थित नहीं है।
  • अरावली की पहाड़ियाँ नीची हैं तथा पवनों की दिशा के समानान्तर हैं।

प्रश्न 4.
दक्षिण-पश्चिमी मानसून की उत्पत्ति का प्रमुख क्या कारण है ?
उत्तर :
दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्पत्ति के दो प्रमुख कारण हैं|

  • ग्रीष्म काल में देश के उत्तर-पश्चिमी (स्थलीय) भू-भागों में निम्न (UPBoardSolutions.com) वायुदाब तथा समीपवर्ती समुद्री भागों (हिन्द महासागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी) में उच्च वायुदाब का होना।
  • क्षोभमण्डल की ऊपरी परतों में तीव्रगामी पुरवा जेट पवनों का चलना।

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प्रश्न 5.
जेट वायुधाराएँ किन्हें कहते हैं ?
उत्तर :
वायुमण्डल की क्षोभमण्डल नामक परत के ऊपरी भाग में तेज गति से चलने वाली पवनों को जेट वायुधाराएँ कहते हैं। ये बहुत सँकरी पट्टी में चलती हैं।

प्रश्न 6.
भारत में पायी जाने वाली ऋतुओं के नाम लिखिए।
उत्तर :

  • शीत ऋतु,
  • ग्रीष्म ऋतु,
  • वर्षा ऋतु (आगे बढ़ते मानसून की ऋतु) तथा
  • शरद ऋतु (पीछे हटते हुए मानसून की ऋतु।)

प्रश्न 7.
भारत में सर्वाधिक वर्षा किस राज्य में होती है ? [2011]
उत्तर:
भारत में सर्वाधिक वर्षा मेघालय (मॉसिनराम) राज्य में होती है।

प्रश्न 8.
मानसून के ‘फटने’ या ‘टूटने से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
आर्द्रता से भरी दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी पवनें बड़ी तेज चलती हैं। इनकी औसत गति 30 किलोमीटर प्रति घण्टा है। उत्तर-पश्चिमी भागों को छोड़कर ये एक महीने की अवधि में सारे भारत में फैल जाती हैं। आर्द्रता से भरी इन पवनों के आने (UPBoardSolutions.com) के साथ ही बादलों का प्रचण्ड गर्जन तथा बिजली का चमकना शुरू हो जाता है। इसे ही मानसून का फटना’ या टूटना’ कहा जाता है।

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प्रश्न 9.
ग्रीष्मकालीन मानसूनी पवनों की दिशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
ग्रीष्मकालीन मानसूनी पवनों की दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम होती है।

प्रश्न 10.
भारत में अधिकांश वर्षा किस प्रकार की होती है ?
उत्तर :
भारत की लगभग 95% अधिकांश वर्षा पर्वतीय है।

प्रश्न 11.
लौटते हुए मानसून से भारत के किन दो राज्यों में वर्षा होती है ?
उत्तर :
लौटते हुए मानसून से भारत में तमिलनाडु एवं पॉण्डिचेरी (अब पुदुचेरी) राज्यों में वर्षा होती है।

प्रश्न 12.
मौसम किसे कहते हैं? मौसम और जलवायु में क्या अन्तर है? [2014]
उत्तर:
मौसम-किसी स्थान के वातावरण की सूचना जैसे कि वह गर्म है, ठण्डा है, शुष्क है, आई है। की जानकारी हमें मौसम के द्वारा प्राप्त होती है। यह दिन प्रतिदिन बदल सकता है। जलवायु-किसी स्थान पर लम्बे समय तक पाये जाने (UPBoardSolutions.com) वाले तापमान, वर्षा, आर्द्रता, शुष्कता आदि का औसत उस स्थान की जलवायु कहलाती है।

बहुविकल्पीय

प्रश्न 1. भारत में न्यूनतम तापमान कहाँ पाया जाता है?

क) लेह में ।
(ख) शिमला में
(ग) चेरापूंजी में
(घ) श्रीनगर में

2. भारत में अधिकतम तापमान कहाँ पाया जाता है?

(क) तिरुवनन्तपुरम् में।
(ख) भोपाल में
(ग) जैसलमेर में
(घ) अहमदाबाद में

3. भारत में अधिकतम वर्षा वाला स्थान है [2011]

(क) शिलांग ।
(ख) मॉसिनराम
(ग) गुवाहाटी
(घ) पंजाब

4. भारत का नगर जो वृष्टिछाया प्रदेश में पड़ता है|

(क) मुम्बई
(ख) जोधपुर
(ग) पुणे
(घ) चेन्नई

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5. आम्रवृष्टि कहाँ होती है?

(क) केरल में
(ख) आन्ध्र प्रदेश में
(ग) तमिलनाडु में
(घ) असोम में

6. काल-बैसाखी’ कहाँ प्रचलित है?

(क) केरल में
(ख) असोम में
(ग) उत्तर प्रदेश में
(घ) पंजाब में

7. जेट धाराएँ हैं|

(क) हिन्द महासागरों में चलने वाली
(ख) बंगाल की खाड़ी के चक्रवात
(ग) उपरितन वायु
(घ) मानसूनी पवनें

8. उत्तर भारत में शीतकालीन वर्षा का कारण है

(क) लौटते हुए मानसून
(ख) आगे बढ़ते हुए मानसून
(ग) शीतकालीन मानसून ,
(घ) पश्चिमी विक्षोभ

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9. सम्पूर्ण भारत में सर्वाधिक वर्षा वाला महीना है

(क) जून
(ख) जुलाई
(ग) अगस्त
(घ) ये सभी

10. चेरापूंजी किस राज्य में स्थित है?

(क) असोम में
(ख) मेघालय में
(ग) मिजोरम में
(घ) मणिपुर में

11. भारत में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र कौन-सा है?

(क) उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र
(ख) उत्तर-पूर्वी क्षेत्र
(ग) दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र
(घ) दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र

12. दैनिक तापान्तर निम्नलिखित में से किस क्षेत्र में सर्वाधिक पाया जाता है? [2011]

(क) दक्षिणी पठारी क्षेत्र
(ख) पूर्वी तटवर्ती क्षेत्र
(ग) थार मरुस्थल
(घ) पश्चिमी तटवर्ती क्षेत्र

13. निम्नलिखित में से कौन राज्य भारत के सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्र में सम्मिलित है? [2012]
या
निम्नलिखित में से किस राज्य में सर्वाधिक वर्षा होती है? [2016]

(क) मेघालय
(ख) मध्य प्रदेश
(ग) ओडिशा
(घ) गुजरात

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14. भारत के किस राज्य में शीत ऋतु में वर्षा होती है? [2014]
या
भारत का कौन-सा राज्य शीत ऋतु में वर्षा प्राप्त करता है? [2016]

(क) गुजरात
(ख) पश्चिम बंगाल
(ग) कर्नाटक
(घ) तमिलनाडु

15. भारत में सबसे कम वर्षा होती है [2017]

(क) तमिलनाडु में
(ख) राजस्थान में
(ग) आन्ध्र प्रदेश में
(घ) कर्नाटक में

उत्तरमाला

1. (क), 2. (ग), 3. (ख), 4. (ग), 5. (क), 6. (ख), 7. (ग), 8. (घ), 9. (ख), 10. (ख), 11. (ख), 12. (ग), 13. (क), 14. (घ), 15. (ख)।

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 11 (Section 3)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 11 मानवीय संसाधन : विनिर्माणी उद्योग (अनुभाग – तीन)

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों का क्या महत्त्व है ? ‘आधुनिक उद्योगों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव की समीक्षा कीजिए।
या
भारत में कृषि पर आधारित उद्योगों के नाम लिखिए। भारतीय अर्थव्यवस्था में उनका क्या महत्त्व है ?
या
देश के आर्थिक विकास में उद्योगों के योगदान पर एक विशिष्ट लेख लिखिए।
उत्तर :
भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों का महत्त्व आधुनिक अर्थशास्त्री औद्योगिक विकास और आर्थिक विकास को पर्यायवाची मानते हैं। उनका मानना है कि उद्योगों के विकास के बिना आर्थिक विकास में तेजी नहीं आ सकती। उद्योगों के समुचित विकास के बिना राष्ट्रीय आय के प्रति व्यक्ति आय में अपेक्षित वृद्धि करना बड़ा कठिन है। यही कारण है कि भारत जैसे विकासशील देश के लिए बड़े पैमाने के उद्योगों के विकास (UPBoardSolutions.com) का अत्यधिक महत्त्व है। इसी को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं में औद्योगिक विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप भारत ने कृषि के साथ-साथ उद्योग-धन्धों के विकास के क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति की।

आधुनिक उद्योगों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

औद्योगिक विकास किसी भी देश के विकास की गति का सूचक होता है। आज कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश भी औद्योगिक विकास के लिए प्रयत्नशील हैं। वास्तव में देश की अर्थव्यवस्था के बहुमुखी विकास के लिए औद्योगिक विकास आवश्यक है। आधुनिक उद्योगों का देश की अर्थव्यवस्था पर निम्नलिखित रूपों में प्रभाव पड़ा है

1. कृषि का विकास – 
उद्योगों की स्थापना के पूर्व भारतीय कृषि पिछड़ी दशा में थी। उद्योगों के विकास से विशेषत: उर्वरक, कीटनाशकों, मशीनरी, कृषि उपकरण, टूक निर्माण आदि के कारण कृषि उन्नत हो गयी है। उद्योगों के ही विकास से कृषि में हरित क्रान्ति सम्भव हो सकी है।

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2. नगरीकरण में वृद्धि – 
औद्योगीकरण तथा नगरीकरण साथ-साथ चलते हैं। उद्योगों की स्थापना से अनेक नये नगर स्थापित हो जाते हैं तथा छोटे नगरों के आकार में वृद्धि होती है। भारत के प्रायः सभी महानगर औद्योगिक विकास से ही विकसित हुए हैं।

3. रोजगार के अवसरों में वृद्धि – 
उद्योगों से रोजगार के अवसरों में वृद्धि होती है, पिछड़े हुए क्षेत्रों की निर्धनता दूर होती है तथा उनका आर्थिक विकास होता है।

4. राष्ट्रीय आय में वृद्धि – 
आधुनिक उद्योगों के कारण देश की आय में निरन्तर वृद्धि हो रही है।

5. विदेशी व्यापार में वृद्धि – 
विदेशी व्यापार में वृद्धि तथा विकास उद्योगों के कारण ही सम्भव हुआ है। उद्योगों की स्थापना के पूर्व भारत केवल कृषि-परक वस्तुओं तथा कच्चे माल का निर्यात करता था, किन्तु औद्योगिक विकास के कारण अब वह विनिर्मित वस्तुओं, मशीनरी आदि का भी निर्यात करने लगा है।

6. परिवहन के साधनों में वृद्धि – 
औद्योगिक विकास से (UPBoardSolutions.com) जनसंख्या की सघनता में वृद्धि होती है। उसके आवागमन के लिए परिवहन के साधनों में वृद्धि होती है, जो आर्थिक प्रगति का सूचक है।

7. बहुमुखी विकास –
आर्थिक समृद्धि बढ़ने पर देश में शिक्षा, साहित्य, विज्ञान आदि के क्षेत्र में भी विकास होता है।

कृषि पर आधारित उद्योग एवं भारतीय अर्थव्यवस्था में उनका महत्त्व

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि तथा उद्योग एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों का विकास एक-दूसरे पर निर्भर करता है। कृषि के विकास के लिए आवश्यक वस्तुएँ; जैसे-रासायनिक खाद, औजार, ट्रैक्टर, कीटनाशक आदि उद्योगों से ही प्राप्त होते हैं।

उद्योगों को कच्चा माल; जैसे—कपास, जूट, गन्ना, तिलहन, रबड़ आदि कृषि क्षेत्र से ही प्राप्त होते हैं। ऐसे उद्योग जिनका कच्चा माल कृषि से प्राप्त होता है, कृषि पर आधारित उद्योग कहलाते हैं। सूती वस्त्र उद्योग, चीनी व खाण्डसारी उद्योग, जूट उद्योग, रबड़ उद्योग, चाय उद्योग, तेल उद्योग आदि कृषि पर
आधारित उद्योग हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि पर आधारित उद्योगों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनके महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है–

  • भारत में बेकारी और अर्द्धबेकारी पर्याप्त मात्रा में पायी जाती है। कृषि पर आधारित उद्योग इस बेकारी को कम कर सकते हैं; क्योकि इन उद्योगों को छोटे पैमाने पर भी कम पूँजी लगाकर चलाया जा सकता है।
  • कृषि पर आधारित उद्योग भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के अनुकूल हैं। ये उद्योग देश की राष्ट्रीय आय में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
  • कृषि पर आधारित उद्योगों से कृषि पर जनसंख्या के भार में कमी आती है और बहुत-से लोगों को रोजगार मिलता है।
  • इन उद्योगों से बड़े उद्योगों को सहायता (UPBoardSolutions.com) मिलती है।
  • इन उद्योगों से देश को विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है तथा निर्यातों में वृद्धि के आयातों में कमी होती है।
  • कृषि पर आधारित उद्योगों से देश में औद्योगीकरण के विकास को प्रोत्साहन मिलता है।

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प्रश्न 2.
भारत में इंजीनियरिंग उद्योग के विकास के बारे में आप क्या जानते हैं ? प्रमुख इंजीनियरिंग उद्योगों का विवरण दीजिए।
उत्तर :

इंजीनियरिंग उद्योग

इंजीनियरिंग उद्योगों में अनेक विनिर्माण उद्योग सम्मिलित होते हैं; जैसे-औजार व मशीनें बनाने वाले उद्योग, लोहा व इस्पात उद्योग, परिवहन उपकरण उद्योग; जैसे-रेल इंजन उद्योग, वायुयान उद्योग, जलयान उद्योग, मोटर उद्योग तथा रासायनिक खाद उद्योग आदि। भारत में इन उद्योगों का तेजी से विकास और विस्तार हो रहा है। यहाँ इनमें से अधिकांश उद्योगों को आधारभूत उद्योग की सूची में सम्मिलित किया हुआ है तथा इनमें से अनेक इंजीनियरिंग उद्योग सरकारी क्षेत्र में चलाये जा रहे हैं।

भारी मशीनरी उद्योग
देश में भारी इंजीनियरिंग उद्योग का वास्तविक विकास 1958 ई० में हेवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन (राँची) की स्थापना के पश्चात् हुआ। इसकी तीन इकाइयाँ हैं–

  • भारी मशीनरी निर्माण संयन्त्र,
  • फाउण्ड्री फोर्ज संयन्त्र तथा
  • भारी मशीन उपकरण (HMT) संयन्त्र।

विशिष्ट प्रकार के इस्पात के ढाँचों का डिजाइन बनाने का कारखाना 1965 ई० में ऑस्ट्रिया के सहयोग से त्रिवेणी स्ट्रक्चरल्स लि०, नैनी (इलाहाबाद) में स्थापित हुआ। तुंगभद्रा स्टील प्रॉडक्ट्स लि० 1947 ई० में तुंगभद्रा (कर्नाटक) में स्थापित हुआ था। निजी क्षेत्र में मुम्बई में लार्सन एण्ड टुब्रो लि०, गेस्ट-कीन एवं विलियन एण्ड ग्रीव्ज़ कॉटन स्थापित हैं। सन् 1966 ई० में चेकोस्लोवाकिया के सहयोग से भारत हेवी प्लेट एण्ड (UPBoardSolutions.com) वेसल्स लि०, विशाखापत्तनम् स्थापित हुआ। यहाँ उर्वरक, पेट्रो रसायन तथा अनेक सम्बद्ध उद्योगों की मशीनरी तैयार होती है। भारी इंजीनियरिंग उद्योग के अन्तर्गत क्रेन, इस्पात के ढाँचे, ट्रांसमिशन टॉवर, ढलाई में काम आने वाले उपकरण आदि बनाये जाते हैं। दुर्गापुर में स्थापित माइनिंग एण्ड एलाइड मशीनरी कॉर्पोरेशन लि० (MAMC) खनन में काम आने वाली मशीनरी तैयार करता है। औद्योगिक मशीनरी के उत्पादन में भारत अब आत्मनिर्भर हो गया है। टेक्सटाइल मशीनरी का निर्माण करने वाला निजी क्षेत्र का सबसे बड़ा कारखाना टेक्समैको (TEXMACO) मुम्बई में 1939 ई० में स्थापित किया गया था।

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मशीनों के उपकरण उद्योग

भारत में गत वर्षों में मशीनों के औजार बनाने में भी पर्याप्त प्रगति हुई है। इस कार्य में है 700 करोड़ वार्षिक क्षमता की 200 इकाइयाँ संलग्न हैं। बड़े कारखाने हिन्दुस्तान मशीन टूल्स लिमिटेड (HMT) बंगलुरु के अतिरिक्त पिंजौर (हरियाणा), कलामासेरी (केरल), हैदराबाद (आन्ध्र प्रदेश) तथा श्रीनगर (कश्मीर) में हैं। इनमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न प्रकार की मशीनें तथा सूक्ष्म वैज्ञानिक उपकरणों का निर्माण किया जाता है। सेण्ट्रल मशीन टूल्स इन्स्टीट्यूट, बंगलुरु (UPBoardSolutions.com) की स्थापना 1965 ई० में की गयी थी। यहाँ मशीनरी औजारों के क्षेत्र में अनुसन्धान किये जाते हैं। मशीन टूल कॉर्पोरेशन ऑफ इण्डिया, अजमेर की स्थापना 1967 ई० में की गयी थी। यहाँ घिसाई के काम आने वाले मशीनी औजार तैयार किये जाते हैं। हेवी मशीन टूल प्लाण्ट (राँची) में धुरी तथा पहिये तैयार किये जाते हैं। प्रागा टूल्स कॉर्पोरेशन लि० (सिकन्दराबाद) भी मशीनों के उपकरण तैयार करता है।

परिवहन उपकरण उद्योग 

(i) रेल इंजन उद्योग – स्वतन्त्रता-प्राप्ति से पूर्व भारत रेल इंजनों के लिए विदेशों पर निर्भर था। अतः 1947 ई० के बाद भारत ने देश में ही रेल इंजन बनाने की दिशा में कार्य आरम्भ किये, जिनका विवरण निम्नलिखित है–
चितरंजन–सन् 1948 ई० में भारत सरकार ने रेल के इंजनों का एक बहुत बड़ा कारखाना पश्चिमी बंगाल में चितरंजन नामक स्थान पर लगाया। यहाँ भाप के इंजनों का निर्माण किया जाता था, किन्तु 1981 ई० में इस कारखाने ने भाप के इंजन बनाने (UPBoardSolutions.com) बन्द कर दिये। अब यह कारखाना बिजली तथा डीजल के इंजनों का निर्माण कर रहा है।
वाराणसी-उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थापित इस कारखाने में केवल डीजल इंजन बनाये जाते हैं। यह कारखाना प्रति वर्ष 150 डीजल इंजन बनाती है।

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(ii) रेल पटरियाँ, वैगन एवं कोच – रेल की पटरियाँ बनाने में हिन्दुस्तान स्टील लि० (HSL), टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (TISCO), इण्डियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (ISCO) संलग्न हैं।
वैगन तथा कोच बनाने का कार्य सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों में किया जाता है। इण्टीग्रल कोच फैक्ट्री, पेराम्बुर (ICF), चेन्नई के निकट 1955 ई० में सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित की गयी। यहाँ विविध प्रकार के कोच (वातानुकूलित, विद्युत तथा डीजल रेल, कार आदि) तैयार किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त रेलकोच फैक्ट्री (कपूरथला) में मार्च, 1988 ई० में रेल के डिब्बे बनाने का कारखाना स्थापित किया गया। डीजल कम्पोनेण्ट वर्क्स (DCw), पटियाला में डीजल इंजनों के पुर्जे आदि तैयार किये जा रहे हैं। इस प्रकार, अब भारत रेल इंजनों के बारे में पूर्णतया आत्मनिर्भर है।

(iii) वायुयान-निर्माण उद्योग – द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व भारत में वायुयान बनाने का कोई भी कारखाना नहीं था। द्वितीय विश्व युद्ध के समय ऐसे कारखानों की आवश्यकता अनुभव की गयी। सन् 1940 ई० में मैसूर सरकार व बालचन्द हीराचन्द नामक एक फर्म की सम्मिलित साझेदारी में हिन्दुस्तान एयरक्राफ्ट कम्पनी’ के नाम से हवाई जहाज बनाने का एक कारखाना बंगलुरु (कर्नाटक) में खोला गया। सन् 1942 ई० में सुरक्षा कारणों से भारत सरकार ने इसका प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया और इसका नाम ‘हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड’ (HAL) रखा गया। इसकी इकाइयाँ बंगलुरु, कानपुर, नासिक, कोरापुट, हैदराबाद तथा कोरवा (लखनऊ) में स्थापित हैं।

पूर्व सोवियत संघ, ब्रिटेन, जर्मनी तथा फ्रांस से तकनीकी जानकारी प्राप्त करके (UPBoardSolutions.com) अब देश में ही मिग, जगुआर, चीता, चेतक जैसे वायुयान, लड़ाकू विमान तथा हेलिकॉप्टर तैयार किये जा रहे हैं।

(iv) जलयान-निर्माण उद्योग – भारत में तीन हजार किलोमीटर लम्बा विशाल समुद्रतट है; अत: देश की सुरक्षा तथा विदेशी व्यापार की दृष्टि से भारत को बड़ी मात्रा में जलयानों की आवश्यकता होती है; किन्तु विदेशी शासन काल में इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। इस समय भारत में पाँच बड़े पोत निर्माण केन्द्र–मुम्बई, कोलकाता, कोचीन, विशाखापत्तनम् तथा गोआ हैं।

विशाखापत्तनम् – सन् 1941 ई० में सिंधिया कम्पनी ने जलयान निर्माण का पहला कारखाना आन्ध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम् बन्दरगाह पर खोला। सन् 1947 ई० में भारत सरकार ने इस कारखाने का राष्ट्रीयकरण कर दिया और इसका नाम हिन्दुस्तान शिपयार्ड रखा। सन् 1948 ई० में इसमें सबसे पहला जलयान बना और अब तक इसमें 86 जलयान बन चुके हैं।

कोच्चि – पश्चिमी तट पर केरल राज्य में कोच्चि बन्दरगाह पर भी जापान के सहयोग से एक जलयान का कारखाना स्थापित किया गया है। सन् 1979 ई० से इसमें जहाज बनने शुरू हो गये हैं। इसके अतिरिक्त पश्चिम बंगाल में ‘गार्डन रीच जहाजी कारखाने में समुद्री व्यापारिक जहाजों तथा मझगाँव (मुम्बई) स्थित जहाजी कारखाने में नौ-सेना के लिए फिगेट जहाजों का निर्माण किया जाता

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प्रश्न 3.
भारत में चीनी उद्योग का सविस्तार वर्णन कीजिए। भारत में किंन्हीं तीन राज्यों के चीनी उद्योग का वर्णन कीजिए। [2014]
या
भारत में चीनी उद्योगं का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए
(क) उत्पादक क्षेत्र/राज्य तथा (ख) उत्पादन एवं व्यापार।
उत्तर :

भारत में चीनी उद्योग

चीनी उद्योग कृषि पर आधारित उद्योगों में प्रमुख स्थान रखता है। भारत में गन्ने से गुड़, शक्कर तथा खाँड बनाने का व्यवसाय (खाँडसारी उद्योग) बहुत प्राचीन काल से प्रचलित रहा है, किन्तु आधुनिक विधि से. चीनी बनाने का उद्योग बीसवीं शताब्दी से ही उन्नत हो पाया है। इससे पूर्व वर्ष 1841-42 में उत्तरी बिहार में डच लोगों तथा सन् 1899 ई० में अंग्रेजों द्वारा चीनी की फैक्ट्रियाँ स्थापित करने के असफल प्रयास किये गये थे। इस उद्योग का वास्तविक आरम्भ सन् 1930 ई० से हुआ।

सन् 1931 ई० तक चीनी उद्योग के विकास की गति बहुत धीमी रही और प्रचुर मात्रा में चीनी का आयात विदेशों से किया जाता रहा। सन् 1931 ई० में केवल 31 चीनी की फैक्ट्रियाँ कार्यरत थीं, जिनको उत्पादन 6.58 लाख टन था। सन् 1932 ई० में इस उद्योग की सरकार द्वारा संरक्षण प्रदान किया गया और तभी से चीनी के उत्पादन में वृद्धि होने लगी। संरक्षण के 4 वर्ष बाद मिलों की संख्या बढ़कर 35 हो गयी और चीनी का उत्पादन बढ़कर 9.19 लाख टन हो गया। वर्ष 1938-39 में इनकी संख्या बढ़कर 132 हो गयी। द्वितीय विश्व युद्ध के समय चीनी की माँग बढ़ जाने के कारण चीनी के मूल्य तेजी से बढ़ने आरम्भ हो गये। अतएव सरकार ने सन् 1942 ई० में इसके मूल्य पर नियन्त्रण लगा दिया तथा इसकी राशनिंग आरम्भ कर दी। सन् 1950 ई० में चीनी पर से नियन्त्रण हटा लिया गया। वर्ष 1991-92 में देश में 370 चीनी के कारखाने थे। वर्ष 1998 में देश में चीनी मिलों की संख्या 465 तक पहुँच गयी, जिनमें से लगभग आधी सहकारी क्षेत्र में हैं, जो कुल उत्पादन का 60% उत्पादन करती हैं। इस उद्योग में लगभग १ 1,500 करोड़ की पूँजी लगी हुई है। और लगभग 3 लाख व्यक्तियों को रोजगार मिला हुआ है। वर्ष 2006-07 में देश में चीनी का उत्पादन 281.99 लाख टेन (अस्थायी) से अधिक हो चुका था।

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उत्पादक राज्य

1. महाराष्ट्र – महाराष्ट्र राज्य ने चीनी के उत्पादन में पिछले कुछ वर्षों में अत्यधिक प्रगति की है। चीनी के उत्पादन में इसका देश में प्रथम स्थान है। यहाँ 129 चीनी मिलें हैं जिनमें देश की लगभग 35% से भी अधिक चीनी उत्पादित की जाती है। गोदावरी, प्रवरा, मूला-मूठा, नीरा एवं कृष्णा नदियों की घाटियों में चीनी मिलें केन्द्रित हैं। मनमाड़, नासिक, पुणे, अहमदनगर, शोलापुर, कोल्हापुर, औरंगाबाद, सतारा एवं साँगली प्रमुख चीनी उत्पादक जिले हैं।

2. उत्तर प्रदेश – 
इस राज्य का चीनी के उत्पादन में द्वितीय तथा गन्ना उत्पादन की दृष्टि से प्रथम स्थान है। इस प्रदेश में 128 चीनी मिले हैं। प्रदेश में उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ही चीनी मिलों का केन्द्रीकरण हुआ है। यह राज्य देश की 24% चीनी का उत्पादन करता है तथा यहाँ देश का सर्वाधिक गन्ना उगाया जाता है।

3. कर्नाटक – 
चीनी के उत्पादन में कर्नाटक राज्य को देश में (UPBoardSolutions.com) तीसरा स्थान है। यहाँ पर चीनी उद्योग के 37 केन्द्र हैं, जिनमें देश की 9% चीनी का उत्पादन किया जाता है। बेलगाम, मांड्या, बीजापुर, बेलारी, शिमोगा एवं चित्रदुर्ग महत्त्वपूर्ण चीनी उत्पादक जिले हैं।

4. तमिलनाडु – 
इस राज्य में 22 चीनी मिलें हैं। यहाँ देश की लगभग 8% चीनी उत्पादित की जाती है। मदुराई, उत्तरी एवं दक्षिणी अर्कोट, कोयम्बटूर एवं तिरुचिरापल्ली प्रमुख चीनी उत्पादक जिले हैं।

5. बिहार – 
बिहार में देश की 5% चीनी का उत्पादन किया जाता है। यहाँ चीनी की 40 मिले हैं, जो विशेष रूप से सारन, चम्पारन, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, पटना, गोपालगंज आदि उत्तरी जिलों के गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में केन्द्रित हैं। उपर्युक्त के अतिरिक्त चीनी उत्पादक अन्य राज्यों में गुजरात, आन्ध्र प्रदेश, पंजाब, केरल, उत्तराखण्ड, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं पश्चिम बंगाल मुख्य हैं।

व्यापार
भारत चीनी का निर्यातक देश है और विश्व के चीनी निर्यात व्यापार में भारत 0.6% का हिस्सा रखता है। देश की आवश्यकता को पूरी करने के उपरान्त केवल 2 लाख टन चीनी निर्यात के लिए शेष बचती है, जिससे निर्यात की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। चीनी उद्योग को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार ने 20 अगस्त, 1998 ई० को इसे लाइसेन्स व्यवस्था से मुक्त कर दिया है।

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प्रश्न 4.
भारत में कागज उद्योग के उत्पादन एवं वितरण का वर्णन कीजिए।
या
भारत में कागज उद्योग का संक्षिप्त भौगोलिक विवरण दीजिए।
या
भारत में कागज उद्योग के कच्चे माल की उपलब्धता एवं प्रमुख केन्द्रों का वर्णन कीजिए। [2013]
उत्तर :

भारत में कागज उद्योग

भारत को वर्तमान कागज उद्योग 19वीं शताब्दी की देन माना जाता है। आधुनिक ढंग की प्रथम कागज मिल 1816 ई० में ट्रंकुवार (चेन्नई के समीप) नामक स्थान पर खोली गयी, परन्तु इसे सफलता न मिल सकी। हुगली : नदी के किनारे सिरामपुर (UPBoardSolutions.com) (प० बंगाल) में स्थापित मिल को भी असफलता ही मिली। इसके पश्चात् 1867 ई० में बाली (कोलकाता) नामक स्थान पर रॉयल पेपर मिल की स्थापना हुई। इस उद्योग का वास्तविक विकास तब हुआ जब 1879 ई० में लखनऊ में अपर इण्डिया पेपर मिल्स तथा 1881 ई० में पश्चिम बंगाल में टीटागढ़ पेपर मिल्स की स्थापना की गयी। इसके बाद कारखानों की संख्या में वृद्धि होती गयी।

वर्तमान में भारत में गत्ता एवं कागज की 759 इकाइयाँ हैं, जिनमें से केवल 651 चालू हालत में हैं और 2,748 लघु इकाइयाँ उत्पादन में संलग्न हैं। कुल स्थापित क्षमता लगभग 128 लाख टन है, किन्तु रुग्णता (बीमार) के कारणं बहुत-सी कागज मिलें बन्द पड़ी हैं। इसलिए उत्पादन क्षमता घटकर 60 प्रतिशत ही रह गयी है। पेपर और पेपर बोर्ड क्षेत्र में भारत सक्षम है। पारंपरिक तौर पर स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के लिए कुछ विशेष प्रकार के कागजों का आयात करना पड़ता है। वर्ष 2010-11 में कागज बोर्ड का उत्पादन 7.37 मिलियन टन रहा जो पिछले वर्ष 7.06 मिलियन टन था।

कागज और कागज बोर्ड का 2010-11 के दौरान कुल आयात (न्यूज प्रिंट छोड़कर) 0.72 मिलियन टन रही। 2011-12 (अप्रैल-दिसम्बर) में यह 0.72 मिलियन टन रहा।

न्यूजप्रिंट नियंत्रण आदेश, 2004 की अनुसूची में 113 मिलें सूचीबद्ध हैं। इन्हें उत्पाद शुल्क से छूट मिली हुई है। इस समय 68 मिलें न्यूजप्रिंट का उत्पादन करती हैं, जिनकी प्रचालन स्थापित क्षमता 1.3 मिलियन टन प्रतिवर्ष है। एनसीओ में सूचीबद्ध किये जाने के बाद 20 मिलों ने काम करना बंद कर दिया है और 25 ने न्यूजप्रिंट का उत्पादन रोक दिया है।

उत्पादन एवं वितरण
कागज के उत्पादन की दृष्टि से भारत की गणना विश्व के मुख्य 15 कागज-निर्माताओं में की जाती है। देश के 70% से भी अधिक कागज का उत्पादन पश्चिम बंगाल, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं मध्य प्रदेश राज्यों में होता है। प्रमुख कागज उत्पादक राज्यों का विवरण इस प्रकार है-

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1. पश्चिम बंगाल – 
यहाँ देश का लगभग 20% कागज का उत्पादन होता है। राज्य में कागज की 19 मिले हैं। टीटागढ़, नैहाटी, रानीगंज, त्रिवेणी, कोलकाता, काकीनाड़ा, चन्द्रहाटी (हुगली), आलम बाजार (कोलकाता), बड़ानगर, बाँसबेरिया तथा शिवराफूली कागज उद्योग के प्रमुख केन्द्र हैं। टीटागढ़ में देश की सबसे बड़ी कागज मिल है, जिसमें बाँस का कागज निर्मित किया जाता है।

2. महाराष्ट्र – 
यहाँ 14 कागज ऐवं 3 कागज-गत्ते के सम्मिलित कारखाने हैं, जो देश के लगभग 13% कागज का उत्पादन करते हैं। यहाँ पर कोमल लकड़ी की लुगदी विदेशों से आयात की जाती है। इसके अतिरिक्त बाँस, खोई एवं फटे-पुराने चिथड़ों का उपयोग कागज (UPBoardSolutions.com) बनाने में किया जाता है। गन्ने की खोई एवं धान की भूसी से गत्ता बनाया जाता है। पुणे, खोपोली, मुम्बई, बलारपुर, चन्द्रपुर, ओगेलवाडी, चिचवाडा, रोहा, कराड़, कोलाबा, कल्याण, वाड़ावाली, काम्पटी, नन्दुरबाद, पिम्परी, भिवण्डी एवं वारसनगाँव कागज उद्योग के प्रधान केन्द्र हैं। बलारपुर एवं साँगली में अखबारी कागज की मिलें भी स्थापित की गयी हैं।

3. आन्ध्र प्रदेश – 
यहाँ देश का 12% कागज तैयार किया जाता है। कागज उद्योग के लिए बाँस इस राज्य का प्रमुख कच्चा माल है। सिरपुर, तिरुपति तथा राजमुन्दरी प्रमुख कागज उत्पादक केन्द्र हैं।

4. मध्य प्रदेश – 
इस राज्य में वनों का विस्तार अधिक है। यहाँ बाँस एवं सवाई घास पर्याप्त मात्रा में उगती है। यहाँ देश का 10% कागज तैयार किया जाता है। इस राज्य में इन्दौर, भोपाल, सिहोर, शहडोल, रतलाम, मण्डीदीप, अमलाई एवं विदिशा प्रमुख कागज उत्पादक केन्द्र हैं। नेपानगर में अखबारी कागज
(1955 ई०) तथा होशंगाबाद में नोट छापने के कागज बनाने का सरकारी कारखाना स्थापित है।

5. कर्नाटक – 
यहाँ देश का 10% कागज बनाया जाता है। इस राज्य में भद्रावती, बेलागुला तथा डाँडली केन्द्रों पर कागज की मिलें हैं।

6. उत्तर प्रदेश – 
इस राज्य का कागज उद्योग शिवालिक एवं तराई क्षेत्रों में सवाई, भाबर एवं मूंज घास तथा बाँस की प्राप्ति के ऊपर निर्भर करता है। यहाँ देश का लगभग 4% कागज उत्पन्न किया जाता है। लखनऊ, गोरखपुर एवं सहारनपुर कागज उत्पादन के प्रमुख केन्द्र हैं। इनके अतिरिक्त मेरठ, मुजफ्फरनगर, उझानी, पिपराइच, मोदीनगर, नैनी, लखनऊ तथा सहारनपुर प्रमुख गत्ता उत्पादक केन्द्र हैं। भारत के अन्य (UPBoardSolutions.com) कागज उत्पादक राज्यों में बिहार, गुजरात, ओडिशा, केरल, हरियाणा एवं तमिलनाडु प्रमुख हैं।

प्रश्न 5.
भारत के सीमेण्ट उद्योग का विस्तपूर्वक वर्णन कीजिए। [2010]
या
भारत में सीमेण्ट उद्योग कहाँ स्थापित हैं ? एक भौगोलिक टिप्पणी लिखिए।
या
भारत में सीमेण्ट उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए- [2011]
(क) केन्द्र, (ख) उत्पादन तथा (ग) व्यापार
उत्तर :

भारत में सीमेण्ट उद्योग

किसी भी विकासोन्मुख राष्ट्र के लिए सीमेण्ट का अत्यधिक महत्त्व है। प्रत्येक प्रकार के भवन-निर्माण में इसकी आवश्यकता होती है। भारत में संगठित रूप से सीमेण्ट तैयार करने का प्रथम प्रयास चेन्नई में 1904 ई० में किया गया था, परन्तु इसमें पूर्ण सफलता नहीं मिल सकी। इस उद्योग का वास्तविक विकास 1914 ई० में हुआ, जब कि मध्य प्रदेश में कटनी, राजस्थान में लखेरी-बूंदी तथा गुजरात में पोरबन्दर में तीन कारखाने स्थापित किये गये। सीमेण्ट वर्तमान युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए सीमेण्ट उद्योग का विकास अति आवश्यक है। यह अनेक उद्योगों के विकास की कुंजी है। भारत संसार का चौथा बड़ा सीमेण्ट उत्पादक देश है। अप्रैल, 2003 ई० को देश में 124 बड़े सीमेण्ट संयन्त्र थे, जिनकी संस्थापित क्षमता लगभग 14 करोड़ टन (UPBoardSolutions.com) थी। सीमेण्ट अनुसन्धान संस्थान ने देश में लघु सीमेण्ट संयन्त्र लगाने के सुझाव दिये हैं। इससे प्रेरित होकर विभिन्न राज्यों में 300 लघु संयन्त्र स्थापित किये हैं, जिनकी उत्पादन क्षमता 111 लाख टन वार्षिक है। 31 मार्च, 2012 तक प्राप्त आँकड़ों के अनुसार देश में 173 बड़े सीमेंट संयंत्र हैं जिनकी स्थापित क्षमता 294.04 मिलियन टन प्रति वर्ष है, जबकि 350 छोटे सीमेण्ट संयंत्र हैं। जिनकी स्थापित क्षमता 11.10 मिलियन टन/वर्ष है और कुल स्थापित क्षमता 305.14 मिलियन टन प्रतिवर्ष कुछ बड़े सीमेण्ट संयंत्रों का स्वामित्व केन्द्र और राज्य सरकारों के पास है।

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उत्पादन एवं वितरण
सीमेण्ट उद्योग देशभर में विकेन्द्रित है। अधिकांश कारखाने देश के पश्चिमी तथा दक्षिणी भागों में विकसित हुए हैं, जब कि सीमेण्ट की अधिकांश माँग उत्तरी एवं पूर्वी क्षेत्रों में अधिक है। तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, गुजरात, बिहार, राजस्थान, कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश राज्य देश का 74% सीमेण्ट उत्पन्न करते हैं, जब कि कुल उत्पादित क्षमता का 86% भाग इन्हीं राज्यों में केन्द्रित है। अग्रलिखित राज्यों का सीमेण्ट उत्पादन में महत्त्वपूर्ण स्थान है

1. मध्य प्रदेश – सीमेण्ट उत्पादन की दृष्टि से इस राज्य का भारत में प्रथम स्थान है। यहाँ सीमेण्ट के आठ विशाल कारखाने तथा कई लघु संयन्त्र कार्यरत हैं। मध्य प्रदेश राज्य देश का 15% सीमेण्ट उत्पन्न कर प्रथम स्थान पर है। इस राज्य में सीमेण्ट उद्योग के लिए आधारभूत सामग्री स्थानीय रूप से उपलब्ध है तथा कोयला झारखण्ड से मँगवाया जाता है। इस राज्य के कटनी, कैमूर, सतना, जबलपुर, बनमोर, नीमच एवं दमोह में सीमेण्ट के प्रमुख कारखाने हैं।

2. तमिलनाडु – 
यहाँ सीमेण्ट के 8 बड़े कारखाने हैं, जो देश का 12% सीमेण्ट उत्पन्न करते हैं। सीमेण्ट उत्पादन में इस राज्य का दूसरा स्थान है। चूना-पत्थर की पूर्ति स्थानीय क्षेत्रों के साथ-साथ कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश राज्यों से भी की जाती है। तुलुकापट्टी, तिलाईयुथू, तिरुनेलवेली, डालमियापुरम, राजमलायम, संकरी दुर्ग एवं मधुकराई प्रमुख सीमेण्ट उत्पादक केन्द्र हैं।

3. आन्ध्र प्रदेश – 
आन्ध्र प्रदेश में सीमेण्ट के 11 कारखाने एवं 12 लघु संयन्त्र हैं, जो गुण्टूर, कर्नूल, नालगोण्डा, मछलीपत्तनम्, हैदराबाद एवं विजयवाड़ा में केन्द्रित हैं। इस राज्य में चूना-पत्थर के विशाल भण्डार पाये जाते हैं, इसी कारण इस राज्य (UPBoardSolutions.com) की सीमेण्ट उत्पादन क्षमता 45 लाख टन तक पहुँच गयी है। सीमेण्ट उत्पादन में इस राज्य का तीसरा स्थान है।

4. राजस्थान – 
सीमेण्ट के उत्पादन में राजस्थान राज्य का चौथा स्थान है। यहाँ अरावली पहाड़ियों में । चूने-पत्थर व जिप्सम के पर्याप्त भण्डार हैं। ऐसी सम्भावना है कि भविष्य में राजस्थान भारत का सबसे बड़ा सीमेण्ट उत्पादक राज्य हो जाएगा। यहाँ सीमेण्ट उत्पादन के 10 कारखाने हैं, जिनमें देश का 10% सीमेण्ट निर्मित किया जाता है। लखेरी (बूंदी), सवाई माधोपुर, चित्तौड़गढ़, चुरू,. निम्बाहेड़ा एवं उदयपुर सीमेण्ट उत्पादन के प्रमुख केन्द्र हैं।

5. झारखण्ड – 
झारखण्ड सीमेण्ट उत्पादक राज्यों में एक विशेष स्थान रखता है। यहाँ डालमियानगर, सिन्द्री, बनजोरी, चौबासा, खलारी, जापला एवं कल्याणपुर प्रमुख केन्द्र हैं।

6. कर्नाटक – 
इस राज्य में बीजापुर, भद्रावती, गुलर्गा, उत्तरी कनारा, तुमुकुर एवं बंगलुरु प्रमुख सीमेण्ट उत्पादक केन्द्र हैं। यहाँ सीमेण्ट उत्पादन के 6 बड़े संयन्त्र स्थापित किये गये हैं।

7. गुजरात – 
गुजरात राज्य में सीमेण्ट के 8 कारखाने हैं। सीमेण्ट उद्योग का प्रारम्भ इसी राज्य से किया गया था। सिक्का (जामनगर), अहमदाबाद, राणाबाव, बड़ोदरा, पोरबन्दर, सेवालिया, ओखामण्डल एवं द्वारका प्रमुख सीमेण्ट उत्पादक केन्द्र हैं।

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8. छत्तीसगढ़ – 
यहाँ सीमेण्ट के कुछ कारखाने हैं जिनमें दुर्ग व गन्धार के कारखाने मुख्य हैं।

9. अन्य राज्य – 
हरियाणा में सूरजपुर एवं डालमिया-दादरी; केरल (UPBoardSolutions.com) में कोट्टायम; उत्तर प्रदेश में चुर्क एवं चोपन; ओडिशा में राजगंगपुर एवं हीराकुड; जम्मू-कश्मीर में वुयान तथा असम में गौहाटी अन्य प्रमुख सीमेण्ट उत्पादक केन्द्र हैं।

व्यापार
भारत के सीमेण्ट उद्योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ कुल उत्पादन-क्षमता का 84% सीमेण्ट को उत्पादन किया जाता है। सन् 1965 ई० में इस उद्योग के विकास एवं विस्तार हेतु सीमेण्ट निगम की स्थापना की गयी थी। इस निगम का प्रमुख कार्य कच्चे माल के नये क्षेत्रों का पता लगाना तथा इस उद्योग से सम्बन्धित समस्याओं को हल करना था। वर्तमान समय में हम सीमेण्ट उत्पादन में आत्म-निर्भर हो गये हैं। वर्ष 2004-05 में 78.3 लाख टन सीमेण्ट का निर्यात भी किया गया था। बांग्लादेश, इण्डोनेशिया, मलेशिया, नेपाल, म्यांमार, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान आदि हमारे सीमेण्ट के प्रमुख ग्राहक हैं।

वर्ष 2010-11 के दौरान सीमेंट उत्पादन (अप्रैल, 2011 से मार्च, 2012 तक) 224.49 मिलियन टन हुआ और 2010-11 की इसी अवधि तुलना में 6.55 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। भारत ने अप्रैल, 2011-12 के दौरान 3.86 मिलियन टन सीमेंट और खंगरों का निर्यात किया है। इस क्षेत्र में प्रचुर माँग और ज्यादा लाभ उद्योग के विकास के अनुकूल है। यह उद्योग 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान लगभग 100 मिलियन टन की क्षमता वृद्धि की योजना थी लेकिन इस अवधि के दौरान क्षमता वृद्धि 126.25 मिलियन टन की हुई।

प्रश्न 6.
भारतीय अर्थव्यवस्था में ग्राम उद्योगों की समस्याएँ बताइए तथा उनके हल के लिए उपाय सुझाष्ट।
उत्तर :
भारतीय अर्थव्यवस्था में ग्राम उद्योगों की समस्याएँ ग्रामीण उद्योगों की प्रमुख समस्याएँ अग्र हैं

  • इन उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चा माल नहीं उपलब्ध हो पाता। जो माल इन्हें प्राप्त होता है वह अच्छी किस्म का नहीं होता।
  • बैंकों से ऋण मिलने की प्रक्रिया इतनी जटिल हैं कि इन्हें मजबूर होकर स्थानीय साहूकारों से ऋण लेना पड़ता है।
  • उत्पादित वस्तुओं को बेचने के लिए नियमित बाजार न होने से इन उद्योगों का विकास अवरुद्ध हुआ है।
  • ग्रामीण उद्योगों को बड़े उद्योगों में बनी वस्तुओं से प्रतियोगिता करनी पड़ती है, क्योंकि बड़े उद्योगों की वस्तुएँ सस्ती एवं आकर्षक होती हैं, जिससे इन्हें अपनी वस्तुएँ बेचने में कठिनाई होती है।
  • इन उद्योगों को चलाने के लिए कुशल प्रबन्धक नहीं मिल पाते।
  • इन उद्योगों में काम करने वाले कारीगर आज भी पुराने औजारों एवं पुरानी पद्धतियों के अनुसार कार्य करते हैं जिनसे कम उत्पादन प्राप्त होता है।
  • इन उद्योगों के कारीगर इतने गरीब होते हैं कि वे नवीन यन्त्रों और औजारों को नहीं खरीद पाते, जिससे सस्ती एवं अच्छी वस्तु नहीं बन पाती।
  • इनमें काम करने वाले शिल्पकारों का कोई सामूहिक संगठन नहीं है, जिससे इनमें सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति का अभाव पाया जाता है।

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ग्राम उद्योगों की समस्याओं के समाधान के लिए सुझाव

ग्रामीण उद्योगों की समस्याओं के समाधान के लिए निम्न सुझाव दिये जा रहे हैं

  • कच्चे माल की व्यवस्था के लिए पर्याप्त मात्रा में सुख-सुविधाएँ उपलब्ध करायी जाएँ जिसमें सहकारी सहयोग की आवश्यकता होती है।
  • शिल्पकारों को सहकारिता के आधार पर संगठित किया जाए, जिससे उनकी सामूहिक क्रयशक्ति में वृद्धि की जा सके।
  • तैयार माल के क्रय-विक्रय में इन उद्योगों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • उत्पादन विधियों में सुधार करने तथा आधुनिक ढंगों को अपनाने के लिए विशिष्ट प्रशिक्षण एवं तकनीकी शिक्षा की अत्यन्त आवश्यकता है।
  • कारीगरों को आधुनिक यन्त्रों एवं औजारों को उचित मूल्य पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  • सहकारी विपणन समितियों की स्थापना की जाए।
  • ग्रामीण उद्योगों को बड़े उद्योगों के साथ प्रतिस्पर्धा से बचना आवश्यक है।
  • ग्रामीण उद्योग के विकास की सम्भावनाओं का पता लगाने के लिए व्यापक रूप से सर्वेक्षण कराया जाना चाहिए।
  • इन उद्योगों की सुरक्षा के लिए अनेक बोर्डो और निगमों (UPBoardSolutions.com) की स्थापना की गयी है; जैसे-अखिल भारतीय खादी एवं ग्रामोद्योग निगम, राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम आदि।
  • 2 अप्रैल, 1990 को लघु उद्योगों को ऋण देने के उद्देश्य से भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) की स्थापना की गयी।
  • 2000-01 में नयी ऋण नीति में मिश्रित ऋण सीमा को 25 लाख के ऊपर तक बढ़ाया गया। ऋण गारण्टी योजना को लागू किया गया।

प्रश्न 7.
उत्तर भारत में चीनी उद्योग के स्थानीयकरण के प्रमुख तीन कारणों की समीक्षा कीजिए। मध्य भारत में इस उद्योग के लगाने में प्रमुख दो बाधाओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
उत्तर भारत में चीनी उद्योग के स्थानीयकरण के कारण

  • कच्चे माल के रूप में गन्ने का पर्याप्त उत्पादन।
  • अनुकूल जलवायु
  • शक्ति के संसाधनों की उपलब्धता।
  • सस्ते एवं कुशल श्रम की बहुलता।
  • परिवहन के सस्ते साधनों की उपलब्धता।
  • व्यापक बाजार।

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मध्य भारत में चीनी उद्योग स्थापित करने में आने वाली बाधाएँ मध्य भारत में चीनी उद्योग को स्थापित करने में आने वाली दो प्रमुख बाधाएँ निम्नलिखित हैं
1. श्रमिकों की अनुपलब्धता – गन्ने की एक फसल 10-12 महीनों में तैयार होती है। गन्ने के लिए खेत तैयार करने, बोने, निराई-गुड़ाई करने तथा उन्हें काटकर मिलों तक पहुँचाने के लिए सस्ते एवं कुशल श्रमिकों की पर्याप्त संख्या में आवश्यकता होती है। इसी कारण से गन्ना सघन जनसंख्या वाले क्षेत्रों में ही उगाया जाता है। मध्य भारत के अन्तर्गत आने वाले राज्यों में भौगोलिक स्थितियों के कारण जनसंख्या अत्यधिक विरल है, अतः श्रमिकों की अनुपलब्धता है, जो कि इस उद्योग के स्थापित होने में प्रमुख रूप से बाधक है।

2. उपयुक्त मृदा की अनुपलब्धता – गन्ने की खेती के लिए उपजाऊ दोमट तथा नमीयुक्त गहरी– चिकनी मिट्टी उपयुक्त होती है। यह मिट्टी से अधिक पोषक तत्त्व भी ग्रहण करता है। इसलिए इसे अतिरिक्त खाद की भी आवश्यकता होती है। मध्य भारत (UPBoardSolutions.com) के अन्तर्गत आने वाले राज्यों में न तो गन्ने की उपज के लिए अनुकूल उपजाऊ मृदा उपलब्ध है और न ही खादों की आपूर्ति सुगम है। यही कारण इस उद्योग के स्थापित होने में बाधक हैं।। उपर्युक्त दोनों कारणों से भी अधिक गन्ने की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु, परिवहन के साधन, समुचित वर्षा, सिंचाई के साधनों का अभाव आदि मध्य भारत में इस उद्योग को स्थापित करने में प्रमुख रूप से बाधक हैं।

प्रश्न 8.
भारत में सूती वस्त्र उद्योग के विकास एवं स्थानीयकरण की विवेचना कीजिए। [2018]
या
भारत में तीन प्रदेशों के सूती वस्त्र उद्योग के केन्द्रों का वर्णन कीजिए। [2014, 17]
या
भारत के सूती वस्त्र उद्योग के विकास का कच्चे माल की उपलब्धता एवं उसके प्रमुख केन्द्रों के साथ वर्णन कीजिए।
उत्तर :

भारत में सूती वस्त्र उद्योग

भारत में सूती वस्त्रों के उपयोग की परम्परा बहुत प्राचीन है। सिन्धु सभ्यता में बने वस्त्रों की माँग यूरोपीय और मध्य-पूर्व के देशों में बहुत अधिक थी। उस काल में सूती वस्त्र उद्योग ग्रामीण या कुटीर उद्योग के रूप में संचालित किया जाता था। वस्त्र के (UPBoardSolutions.com) लिए धागा बनाने की मशीन मात्र चरखा थी। उन्नीसवीं शताब्दी के
आरम्भिक वर्षों में कोलकाता के निकट सूती मिल की स्थापना की गई। परन्तु इस उद्योग का वास्तविक विकास सन् 1954 ई० से प्रारम्भ हुआ, जब पूर्ण रूप से भारतीय पूँजी द्वारा मुम्बई में सूती मिल की स्थापना की गई थी।

महत्त्व – सूती वस्त्र उद्योग एक प्रमुख उद्योग है। यह न केवल वस्त्र जैसी अनिवार्य आवश्यकता की पूर्ति करता है वरन् बड़ी मात्रा में रोजगार भी उपलब्ध कराता है। यह निर्यात द्वारा बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भी कमाकर देता है।

स्थानीयकरण के कारण – भारत में सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण के निम्नलिखित कारण हैं

  • पर्याप्त कच्चे माल (कपास) का स्थानीय उत्पादन।
  • अनुकूल नम जलवायु तथा स्वच्छ जल।
  • रासायनिक पदार्थों का सरलता से मिलना।
  • सस्ते एवं कुशल श्रमिकों का मिलना।
  • परिवहन के सस्ते साधनों का मिलना।
  • वस्त्र बनाने वाली मशीनरी की उपलब्धता।
  • वस्त्र उद्योग को सरकारी संरक्षण तथा सहायता प्राप्त होना।
  • उपभोक्ता बाजार निकट स्थित होना।
  • शक्ति के पर्याप्त संसाधन मिलना।
  • विदेशी सूती वस्त्रों पर भारी आयात कर का होना।
  • सूती वस्त्र निर्यात की उदार सरकारी नीति का पालन करना।

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उत्पादन-सूती वस्त्र उद्योग भारत का प्राचीनतम एवं महत्त्वपूर्ण उद्योग है। यह वर्तमान में भारत का सबसे बड़ा तथा विकसित उद्योग है। यह देश के कुल औद्योगिक उत्पादन में लगभग 14% का अंशदान करता है। देश के कुल निर्यात व्यापार में लगभग 23% की हिस्सेदारी रखने वाला निर्यातपरक यह उद्योग लगभग 35 लाख लोगों की जीविका चला रहा है। भारत का विश्व के सूती वस्त्र उत्पादन में चीन के बाद दूसरा स्थान है। (UPBoardSolutions.com) परन्तु तकुओं की दृष्टि से प्रथम स्थान है। भारत में सूती वस्त्र बनाने का कार्य पहले कुटीर उद्योग के रूप में किया जाता था, परन्तु अब यह एक महत्त्वपूर्ण संगठित उद्योग के रूप में विकसित हो गया है। भारत के अनेक राज्यों में सूती वस्त्र उद्योग का स्थानीयकरण हुआ है। यह क्षेत्र हैं-मुम्बई, हैदराबाद, सूरत, शोलापुर, कोयम्बटूर, नागपुर, मदुरै, कानपुर, बंगलुरु, पुणे और चेन्नई।

सूती वस्त्र उद्योग उत्पादन के क्षेत्र एवं महत्त्वपूर्ण केन्द्र

यद्यपि भारत के अनेक राज्यों में सूती वस्त्रों का उत्पादन किया जाता है, परन्तु इसका सर्वाधिक विकास गुजरात एवं महाराष्ट्र राज्यों में हुआ है। मुम्बई तथा अहमदाबाद नगर सूती वस्त्र उद्योग के प्रधान केन्द्र हैं। भारत के प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादन राज्यों का विवरण निम्न प्रकार है

1. गुजरात-
सूती वस्त्र उत्पादन के क्षेत्र में गुजरात राज्य का भारत में प्रथम स्थान है। यह देश का लगभग 33% सूती वस्त्र का उत्पादन करता है। अहमदाबाद महानगर सूती वस्त्र उद्योग का मुख्य केन्द्र है। यही कारण है कि अहमदाबाद को भारत का मानचेस्टर और पूर्व का बोस्टन कहा जाता है। बड़ोदरा, सूरत, भरूच, बिलिमोरिया, मोरवी, सुरेन्द्रनगर, राजकोट, कलोल, भावनगर, नाडियाड, पोरबन्दर तथा जामनगर अन्य प्रमुख सूती वस्त्र बनाने वाले केन्द्र हैं।

2. महाराष्ट्र – 
इस राज्य का भारत के सूती वस्त्र उद्योग में दूसरा स्थान है। मुम्बई महानगर में खटाऊ, फिनले तथा सेंचुरी जैसी प्रसिद्ध सूती वस्त्र मिले हैं। महाराष्ट्र में सूती वस्त्र उद्योग के अन्य केन्द्रों में शोलापुर, कोल्हापुर, पुणे, नागपुर, सतारा, वर्धा, (UPBoardSolutions.com) अमरावती, सांगली, थाणे, जलगाँव, अकोला, सिद्धपुर, चालीसगाँव, धूलिया, औरंगाबाद आदि प्रमुख हैं।

3. तमिलनाडु – 
इस राज्य में कोयम्बटूर सूती वस्त्र का प्रमुख केन्द्र है। सलेम, चेन्नई, रामनाथपुरम, तूतीकोरिन, तंजावूर, मदुरै, पेराम्बूर आदि अन्य प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।

4. उत्तर प्रदेश – 
यह उत्तर भारत का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक राज्य है, कानपुर महानगर इस उद्योग का मुख्य केन्द्र है, इसे उत्तर भारत का मानचेस्टर कहा जाता है। अन्य सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्रों में वाराणसी, रामपुर, मुरादाबाद, आगरा, बरेली, अलीगढ़, हाथरस, मोदीनगर, पिलखुवा, सण्डीला, इटावा आदि मुख्य हैं।

5. पश्चिम बंगाल – 
सूती वस्त्र उत्पादन की दृष्टि से इस राज्य का भारत में तीसरा स्थान है। यह राज्य भारत का 15% सूती वस्त्र उत्पादित करता है। कच्चे माल की कमी आयातित कपास से पूरी की जाती है। चौबीस-परगना, हावड़ा एवं हुगली प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादन जिले हैं। कोलकाता, श्रीरामपुर, हुगली, मुर्शिदाबाद, हावड़ा, रिशरा, फूलेश्वर, धुबरी आदि प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।

अन्य राज्य – भारत के अन्य सूती वस्त्र उत्पादक राज्यों में कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, केरल, बिहार एवं दिल्ली प्रमुख हैं।

व्यापार – भारत सूती वस्त्र का निर्यात मुख्यतः हिन्द महासागर के तटवर्ती देशों-ईरान, इराक, म्यांमार (बर्मा), श्रीलंका, बंगलादेश, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, इण्डोनेशिया, थाईलैण्ड, मिस्र, सूडान, टर्की, इथोपिया, नेपाल, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड आदि को करता है।

प्रश्न 9.
भारत में लौह-इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण, वितरण एवं भावी सम्भावनाओं का विवरण दीजिए। [2017]
या
भारत में लौह-इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण के कोई तीन कारण बताइए। [2013]
उत्तर :

भारत में लोहा-इस्पात उद्योग

उद्योग का महत्त्व एवं विकास
लोहा-इस्पात उद्योग की गणना भारत के महत्त्वपूर्ण भारी उद्योगों में की जाती है। वर्तमान में भारत में लोहा-इस्पात के 11 कारखाने है, जिनमें से 4 बिल्कुल नए हैं। लोहा-इस्पात उद्योग, औद्योगिक क्रान्ति का जनक है। इस्पात का उपयोग मशीनों, रेलवे (UPBoardSolutions.com) लाइन, परिवहन के साधन, भवन निर्माण, रेल के पुल, जलयान, अस्त्र-शस्त्र तथा कृषि यन्त्र आदि बनाने में किया जाता है अर्थात् इससे एक सुई से लेकर विशालकाय टैंकों तक का निर्माण किया जाता है। वर्तमान में भारत में एक इस्पात कारखाना निजी क्षेत्र में (टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी) तथा शेष 10 सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित किए गए हैं।

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स्थानीयकरण के कारण – भारत में लोहा-इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

  • लौह-अयस्क एवं कोयला जैसे कच्चे माल निकट स्थित होना।
  • अन्य उपयोगी खनिज पदार्थों (मैंगनीज, अभ्रक, डोलोमाइट व चूना पत्थर) का मिलना।
  • सस्ती एवं सुलभ जल विद्युत-शक्ति का मिलना।
  • स्वच्छ जल की आपूर्ति होना
  • विस्तृत उपभोक्ता बाजार की सुविधा प्राप्त होना।
  • सस्ते एवं कुशल श्रमिकों का मिलना।
  • परिवहन के सस्ते साधन का मिलना।
  • पर्याप्त पूँजी की व्यवस्था होना।
  • उद्योग को सरकारी संरक्षण एवं सहायता प्राप्त होना।

उत्पादन एवं उद्योग के प्रमुख केन्द्र
भारत के प्रमुख लोहा-इस्पात कारखानों का विवरण निम्नलिखित है|

1. टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी, जमशेदपुर (TISCO) – 
इसे कम्पनी की स्थापना सन् 1907 में जमशेद जी टाटा द्वारा तत्कालीन बिहार (वर्तमान में झारखण्ड राज्य) के साँकची (वर्तमान में जमशेदपुर) नामक स्थान पर की गई थी। वर्तमान (UPBoardSolutions.com) में यह एशिया महाद्वीप का सबसे बड़ा लोहा-इस्पात कारखाना है। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 20 लाख टन इस्पात पिण्ड तथा 19 लाख टन ढलवाँ लोहा प्रतिवर्ष तैयार करने की है। जमशेदपुर को ही इस्पात नगरी या टाटानगर भी कहा जाता है।

2. इण्डियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (ISCO) – 
इस कम्पनी के अधीन इस्पात के तीन कारखाने-पश्चिम बंगाल के बर्नपुर, कुल्टी तथा हीरापुर स्थानों पर स्थापित किए गए हैं। सन् 1952 से इन तीनों कारखानों को ‘इण्डियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी के नाम से जाना जाता है। सन् 1976 से सरकार ने इस कम्पनी को अपने अधिकार में ले लिया है। बर्नपुर में इस्पात, हीरापुर में ढलवाँ लोहा तथा कुल्टी में इस्पात पिण्ड बनाए जाते हैं। इस कम्पनी का मुख्य कार्यालय कोलकाता में है। इन तीनों इकाइयों की वार्षिक उत्पादन क्षमता 10 लाख टन इस्पात तथा 13 लाख टन ढलवाँ लोहा तैयार करने की है।

3. विश्वेश्वरैया आयरन स्टील लिमिटेड –
कर्नाटक राज्य के शिमोगा जिले में भद्रा नदी के किनारे भद्रावती नामक स्थान पर सन् 1923 में इस कारखाने की स्थापना की गई थी। इस क्षेत्र में पर्याप्त लौह-अयस्क निकाला जाता है, परन्तु कोयले का अभाव है। अत: कोयले के स्थान पर लकड़ी का कोयला प्रयोग में लाया जाता है। यहाँ लौह-अयस्क केमानगुण्डी तथा बाबाबूदन की पहाड़ियों से प्राप्त होता है। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 85,000 टन ढलवाँ लोहा तथा 2 लाख टन इस्पात तैयार करने की है। सन् 1962 ई० से इस कारखाने पर कर्नाटक सरकार तथा भारत सरकार का संयुक्त अधिकार है।

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4. राउरकेला इस्पात लिमिटेड – 
ओडिशा राज्य में सन् 1955 में जर्मनी की सहायता से सुन्दरगढ़ जिले के राउरकेला नामक स्थान पर इस कारखाने की स्थापना की गई थी। वर्तमान में इसकी उत्पादन क्षमता 18 लाख टन इस्पात तैयार करने की है। इस कारखाने को (UPBoardSolutions.com) लौह-अयस्क क्योंझर तथा गुरुमहिसानी की खदानों से तथा कोयला झरिया, तालचेर एवं कोरबा की खदानों से प्राप्त होता है। हीराकुड बाँध से इसे , सस्ती जलविद्युत शक्ति प्राप्त होती है।

5. भिलाई इस्पात कारखाना – 
इस कारखाने की स्थापना वर्तमान छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मध्य प्रदेश) राज्य के दुर्ग जिले में भिलाई नामक स्थान पर सन् 1955 ई० में तत्कालीन सोवियत संघ की सरकार के सहयोग से की गई थी। इस कारखाने में उत्पादन सन् 1962 ई० में आरम्भ हुआ था। इस कारखाने को सभी भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 40 लाख टन इस्पात प्रतिवर्ष तैयार करने की है। यहाँ लोहे की छड़े, शहतीर, रेल की पटरियाँ तथा इस्पात के ढाँचे बनाए जाते हैं।

6. दुर्गापुर इस्पात कारखाना – 
पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर नामक स्थान पर ब्रिटिश सरकार की सहायता से सन् 1956 ई० में इस कारखाने की स्थापना की गई थी परन्तु इस कारखाने से सन् 1962 ई० में उत्पादन प्रारम्भ हो सका। इसमें रेल की पटरियाँ, शहतीर तथा ब्लेड बनाए जाते हैं। इसकी उत्पादन क्षमता 16 लाख टन इस्पात पिण्ड तैयार करने की है।

7. बोकारो इस्पात कारखाना –
वर्तमान झारखण्ड (तत्कालीन बिहार) राज्य के बोकारो नामक स्थान पर चौथी पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत सन् 1964 ई० में सोवियत संघ के सहयोग से इस कारखाने की स्थापना की गई थी। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 40 लाख टन इस्पात प्रतिवर्ष तैयार करने की है।

अन्य प्रतिष्ठान – भारत में इस्पात की बढ़ती हुई माँग की पूर्ति के लिए लोहा-इस्पात के अनेक नए कारखानों की स्थापना की गई है। इनमें कर्नाटक राज्य में बेल्लारी जिले में हॉस्पेट के निकट विजयनगर, आन्ध्र प्रदेश में विशाखापत्तनम, तमिलनाडु में सलेम तथा ओडिशा राज्य में दैतारी नामक स्थानों पर नए इस्पात कारखानों की स्थापना प्रमुख है।

उत्पादन एवं व्यापार – भारत अनेक देशों को इस्पात का निर्यात करता है। न्यूजीलैण्ड, मलेशिया, बांग्लादेश, ईरान, म्यांमार (बर्मा), सऊदी अरब, श्रीलंका, कीनिया आदि देश भारतीय इस्पात के प्रमुख ग्राहक हैं। भविष्य में इस्पात के निर्यात की सम्भावना बढ़ी है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक ढाँचे का क्या तात्पर्य है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
भारत के औद्योगिक उद्यमों को मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र एवं निजी क्षेत्र में वर्गीकृत किया जा सकता है। वे कम्पनियाँ जिन पर सरकारी विभागों अथवा केन्द्र या राज्यों द्वारा स्थापित संस्थाओं का स्वामित्व होता है, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम कहलाते हैं। (UPBoardSolutions.com) दूसरे निजी क्षेत्र के उद्यम हैं। कुछ उद्यमों का मिश्रित रूप भी है जिन पर सार्वजनिक क्षेत्र की संस्था और निजी उद्यम दोनों का संयुक्त स्वामित्व होता है। संयुक्त क्षेत्र और निजी क्षेत्र के उद्योगों को कभी-कभी निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जाता है

(क) गैर-कारखाना विनिर्माण इकाइयाँ – ये दो प्रकार की होती हैं

  • ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में कुटीर उद्योग और
  • अन्य औद्योगिक इकाइयाँ, जो इतनी छोटी होती हैं कि वे कारखाना कहलाने लायक नहीं होतीं और इसलिए उन्हें छोटी विनिर्माण इकाइयाँ कहा जाता है।

(ख) ऐसे उद्यम जिन्हें अधिक मात्रा में विदेशी विनिमय का प्रयोग करना पड़ता है, जो कि भारत के लिए दुर्लभ स्रोत है। ये उद्यम विदेशी विनिमय अधिनियम के प्रावधानों के अन्तर्गत काम करते हैं और फेरा (FERA) कम्पनियाँ कहलाते हैं। वर्तमान में ‘फेरा’ के स्थान पर ‘फेमा’ (FEMA) के नियमों के अन्तर्गत कार्य किया जाता है।

(ग)
ऐसे उद्यम जो इतने बड़े हैं कि जिन्हें एकाधिकार एवं प्रतिबन्धात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम (MRTP Act) के अन्तर्गत काम करना पड़ता है। इन्हें MRTP कम्पनियाँ कहते हैं। प्रश्न

प्रश्न 2.
पेट्रो-रसायन उद्योग पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
पेट्रो-रसायन उद्योग रसायन उद्योग कम ही एक भाग है। इनके अन्तर्गत पेट्रोल, कोयला तथा अनेक रसायनों से विविध प्रकार के पदार्थ; जैसे—प्लास्टिक, कीटनाशक दवाइयाँ, रंग तथा रोगन आदि बनाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त पॉलीमर, कृत्रिम कार्बनिक रसायन, कृत्रिम रेशे तथा धागे, पॉलिस्टर, नाइलोन चिप्स, स्पेण्डेक्स धागे (तैराकी की पोशाकों हेतु) आदि भी बनाये जाते हैं। भारत में यह उद्योग स्वतन्त्रता के बाद आरम्भ किया गया। विगत दो दशकों में इसके उत्पादन तथा उपभोग में अत्यधिक वृद्धि हुई है। सरकारी प्रोत्साहन तथा उदारीकरण ने इस उद्योग की प्रगति में विशेष योगदान दिया है।

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प्लास्टिक प्रोसेसिंग मूलत: लघु उद्योग क्षेत्र में है। पेट्रो-रसायन उद्योग में बड़ी-बड़ी वस्तुओं का निर्माण किया जाने लगा है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था में इसका स्थान सर्वोपरि हो गया है। यह एक ऐसा उद्योग है, जिसमें कच्चे माल को पुनः परिष्कृत कर विभिन्न वस्तुओं का निर्माण किया जाता है, जिससे इसकी महत्ता में और भी वृद्धि हो गयी है। पेट्रो-रसायन उद्योग मुम्बई के निकट ट्रॉम्बे एवं कोयली, गुजरात में अंकलेश्वर तथा बड़ोदरा में केन्द्रित हो गया है। इनके अतिरिक्त हल्दिया (प० बंगाल), डिगबोई (असोम), कोचीन (केरल), बरौनी (बिहार), चेन्नई (तमिलनाडु), करनाल (हरियाणा), मथुरा (उत्तर प्रदेश), (UPBoardSolutions.com) मार्मागाओ (गोवा) आदि स्थानों पर पेट्रो-रसायन उद्योग प्रगति पर है। इस उद्योग का प्रसार देश के अन्य भागों में भी होता जा रहा है। वर्ष 2004-05 में पेट्रो-रसायन पदार्थों का उत्पादन 7,018 किलो टन था। वर्ष 2009-10 में पेट्रो रसायन पदार्थों का उत्पादन 8.681 हजार मीट्रिक टन हो गया था।

प्रश्न 3.
पेट्रो-रसायन और रसायन उद्योग में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
पेट्रो-रसायन उद्योग खनिज तेल पर आधारित होते हैं। खनिज तेल को परिष्कृत करके उसमें से स्नेहक तेल, फर्नेस तेल, डीजल, मिट्टी का तेल, सफेद तेल, पेट्रोल, एल०पी०जी० गैस, नेफ्था, रासायनिक गोंद, ग्रीस, मेन्थॉल, नाइलोन, पॉलिस्टर प्राप्त किये जाते हैं। रेयॉन, नाइलोन, टेरीन और डेकरॉन कृत्रिम रेशे पेट्रो-रसायन उद्योग के वे उत्पाद हैं जिनसे आकर्षक, अधिक टिकाऊ वस्त्र बनाये जाते हैं। अपने उत्कृष्ट गुणों के कारण पेट्रो-रसायन उत्पाद, परम्परागत कच्चे माल; जैसे-लकड़ी, शीशा और धातु का स्थान ले रहे हैं। घरों, कारखानों और खेतों में इनका उपयोग हो रहा है। उदाहरण के लिए- प्लास्टिक के उपयोग से जन-जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ रहे हैं। सिन्थेटिक डिटर्जेण्ट एक क्रान्तिकारी पेट्रो-रसायन उत्पाद ही है।

रसायन उद्योग – लोहा तथा इस्पात, इंजीनियारिंग और वस्त्र उद्योग के बाद रसायन उद्योग का देश में चौथा स्थान है। पिछले कुछ वर्षों में कार्बनिक तथा अकार्बनिक रसायन उद्योग ने बड़ी तेजी से विकास किया है। ये उद्योग रसायनों पर आधारित होते हैं। इन भारी रसायनों से अनेक उत्पाद बनाये जाते हैं। इनमें औषधियाँ, रँगाई के सामान, नाशकमार (कीटनाशक आदि), पेण्ट, दियासलाई, साबुन आदि उत्पाद उल्लेखनीय हैं। अमेरिका का रसायन उद्योग में विश्व में प्रथम स्थान है।

नाशकमार दवाओं में कीटनाशक, खरपतवारनाशक, फफूदनाशक और कृतंकनाशक, कृषि और जन-स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। डी०डी०टी० बनाने का कारखाना सन् 1954 में दिल्ली में लगाया गया था। सन् 1996-97 में इसका उत्पादन १ 900 अरब मूल्य का था। औषध निर्माण उद्योग में भारत का अब विश्व में श्रेष्ठ स्थान है। देश मूलभूत तथा व्यापक (Bulk) औषधियों के उत्पादन में लगभग आत्मनिर्भर बन गया है।

प्रश्न 4.
सूती वस्त्र उद्योग महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों में अधिक केन्द्रित हैं, क्यों ? [2010]
उत्तर :
महाराष्ट्र के सूती वस्त्र उद्योग का सबसे बड़ा एवं प्रमुख केन्द्र मुम्बई है। इस महानगर में सूती वस्त्रों की 71 मिले हैं, जिस कारण इसे ‘सूती वस्त्रों की राजधानी कहा जाता है। इसी प्रकार अहमदाबाद गुजरात राज्य का सूती वस्त्र उद्योग का सबसे बड़ा एवं प्रमुख केन्द्र है। यहाँ सूती वस्त्रों की 81 मिले हैं, जिस कारण इसे भारत का मानचेस्टर’ तथा पूर्व का बोस्टन’ कहा जाता है। इन राज्यों में सूती वस्त्र उद्योग के केन्द्रित होने के लिए (UPBoardSolutions.com) निम्नलिखित भौगोलिक कारण उत्तरदायी रहे हैं
1. कपास का पर्याप्त उत्पादन – महाराष्ट्र एवं गुजरात राज्यों की काली मिट्टी में कपास का पर्याप्त उत्पादन किया जाता है।
2. आर्द्र जलवायु – सागर की निकटता के कारण इन दोनों ही राज्यों की जलवायु आर्द्रता प्रधान है। इस जलवायु में बुनाई के समय धागा नहीं टूटता।
3. पत्तन की सुविधा  मुम्बई तथा काँदला पत्तनों से सूती वस्त्र उद्योग हेतु मशीनें, कल-पुर्जे, रासायनिक पदार्थ, कपास तथा अन्य आवश्यक पदार्थों के विदेशों से आयात करने की सुविधा रहती
4. ऊर्जा के पर्याप्त साधन – इन केन्द्रों के सूती वस्त्र कारखानों को जलविद्युत शक्ति सस्ती दर पर सरलता से उपलब्ध हो जाती है।
5. पर्याप्त पूँजी – महाराष्ट्र तथा गुजरात राज्यों में पूँजीपति निवास करते हैं, जो बहुत ही धनाढ्य हैं; अर्थात् यहाँ इस उद्योग के विकास के लिए पर्याप्त पूँजी उपलब्ध है।
6. पर्याप्त माँग – यहाँ उत्पादित सूती वस्त्रों का उपभोक्ता बाजार बड़ा ही विस्तृत है।
7. सस्ते एवं कुशल श्रमिक – मुम्बई तथा अहमदाबाद महानगरों में परम्परागत, सस्ते तथा कुशल श्रमिक आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।

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प्रश्न 5.
हुगली नदी के किनारे कागज के अनेक कारखाने क्यों स्थापित हो गये हैं ?
उत्तर :
पश्चिम बंगाल राज्य में हुगली नदी के किनारे कागज के अनेक कारखाने स्थापित हुए हैं। यहाँ इस उद्योग की स्थापना के निम्नलिखित कारण हैं

  1. पश्चिम बंगाल तथा उसके समीपवर्ती राज्यों में घास पर्याप्त मात्रा में उगती है, जो कागज उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है। यहाँ उत्पादित बॉस का उपयोग भी कच्चे माल के रूप में किया जाता है।
  2. कागज उद्योग में स्वच्छ जल की आवश्यकता होती है। हुगली नदी के सदावाहिनी होने के कारण यहाँ पर्याप्त जल उपलब्ध हो जाता है। यही एक प्रमुख कारण है कि हुगली नदी के किनारे टीटागढ़, रानीगंज, नैहाटी, आलम बाजार, कोलकाता, बाँसबेरिया तथा शिवराफूली में कागज के कारखाने स्थापित किये गये हैं।
  3. कागज उद्योग के लिए आवश्यक शक्ति-संसाधन पश्चिम बंगाल (UPBoardSolutions.com) राज्य में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।
  4. पश्चिम बंगाल तथा समीपवर्ती राज्यों में पर्याप्त संख्या में कुशल एवं अनुभवी श्रमिक उपलब्ध हो जाते हैं।
  5. कागज उद्योग के विकास के लिए पश्चिम बंगाल राज्य में परिवहन के साधनों का पर्याप्त विकास हुआ है, जिससे कच्चा माल आयात करने तथा तैयार माल देश के विभिन्न भागों में भेजने की सुविधा रहती है।

प्रश्न 6.
भारत में सूती वस्त्र उद्योग की प्रमुख समस्याओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
भारत में सूती वस्त्र उद्योग की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं

  1. देश में उत्तम कपास की कमी है। देश के विभाजन के कारण अच्छी कपास उत्पन्न करने वाले दो क्षेत्र (पंजाब का पश्चिमी भाग तथा सिन्ध) पाकिस्तान में चले गये।
  2. इस उद्योग को जापान, चीन, पाकिस्तान आदि देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। इन देशों में लम्बे रेशे की कपास सुलभ होने तथा आधुनिक मशीनों एवं विधियों के प्रयोग के कारण उत्पादन लागत बहुत कम है।
  3. सूती वस्त्र उद्योग की अधिकांश मशीनें घिसी हुई तथा पुरानी हैं, जिस कारण देश में वस्त्र की उत्पादन लागत अधिक आती है।
  4. अनेक मिलें अनार्थिक आकार की हैं, जिस कारण इन्हें आन्तरिक किफ़ायत प्राप्त नहीं हो पाती। फलतः उत्पादन-लागत बढ़ जाती है।
  5. सूती वस्त्रों पर सरकार द्वारा आरोपित उत्पादन कर अधिक है।

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प्रश्न 7.
भारत में लौह-इस्पात उद्योग छोटा नागपुर के पठार के आस-पास क्यों केन्द्रित है? दो प्रमुख कारणों का उल्लेख, कीजिए।
उतर :
लोहा-इस्पात उद्योग की दो आधारभूत आवश्यकताएँ होती हैं-लौह-अयस्क तथा कोयला। छोटा नागपुर का पठार इन दोनों आवश्यकताओं की पूर्ति भली प्रकार करता है। यही कारण है कि लौह-इस्पात उद्योग इसके आस-पास ही केन्द्रित हैं। दोनों कारणों का संक्षिप्त उल्लेख आगे किया जा रहा है

  1. लौह-अयस्क की उपलब्धता – भारत के कुल लौह-अयस्क उत्पादन का 40% लौह-अयस्क छोटा नागपुर की खानों से निकाला जाता है। यहाँ लौह-खनिज के लिए सिंहभूम जिला महत्त्व रखता है। सिंहभूम और ओडिशा की सीमा (UPBoardSolutions.com) पर कोल्हन पहाड़ियाँ लोहे की खानों के लिए प्रसिद्ध हैं।
  2. कोयला – भारत का 90% कोकिंग कोयला झरिया की खानों से मिलता है। भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार यहाँ 2,000 लाख टन कोयले के भण्डार हैं। यह कोयला यहाँ के आस-पास स्थित लोहा-इस्पात के उद्योगों को सरलता से बिना अधिक परिवहन व्यय के उपलब्ध है।

उपर्युक्त दो कारणों से अधिकांश लोहा-इस्पात उद्योग छोटा नागपुर के पठार के आस-पास ही स्थित हैं, जिनमें टाटा लोहा-इस्पात कारखाना, जमशेदपुर, बोकारो स्टील प्लाण्ट, दुर्गापुर इस्पात कारखाना आदि मुख्य हैं।

प्रश्न 8.
आधारभूत उद्योग किसे कहते हैं? इनका क्या महत्त्व है? [2009]
उत्तर
लोहा-इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग कहते हैं। लोहा-इस्पात उद्योग की गणना भारत के महत्त्वपूर्ण भारी उद्योगों में की जाती है। वर्तमान समय में भारत में लोहा-इस्पात के 11 कारखाने हैं। लोहा-इस्पात उद्योग औद्योगिक क्रान्ति का जनक है। इस्पात का उपयोग मशीनों, रेलवे लाइन, परिवहन के साधन, भवन-निर्माण, रेल के पुल, जलयान, अस्त्र-शस्त्र तथा कृषि-यन्त्र आदि के निर्माण में किया जाता है। वर्तमान समय में भारत में एक इस्पात कारखाना निजी क्षेत्र में (टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी) तथा शेष 10 सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित किए गए हैं।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लौह-इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग क्यों कहा जाता है ?
उत्तर :
लोहा और इस्पात से भारी मशीनें तथा औजार बनाये जाते हैं। यही मशीनें तथा औजार अन्य उद्योगों के आधार हैं। यही कारण है कि लोहा और इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग कहा जाता है।

प्रश्न 2 भारत में प्रथम आधुनिक इस्पात कारखाना कहाँ तथा कब स्थापित किया गया ?
उत्तर भारत में प्रथम आधुनिक इस्पात कारखाना 1907 ई० (UPBoardSolutions.com) में जमशेदपुर में (वर्तमान में झारखण्ड राज्य के साँकची नामक स्थान) लगाया गया।

प्रश्न 3.
लौह-इस्पात उद्योग के चार प्रमुख केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर :
लोहा-इस्पात उद्योग के चार प्रमुख केन्द्रों के नाम हैं—

  • भिलाई,
  • बोकारो,
  • जमशेदपुर तथा
  • राउरकेला।

प्रश्न 4.
चीनी उद्योग के प्रमुख केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर :
चीनी उद्योग के प्रमुख केन्द्र अर्थात् चीनी उत्पादक प्रमुख राज्य निम्नलिखित हैं

  • महाराष्ट्र,
  • उत्तर प्रदेश,
  • कर्नाटक,
  • तमिलनाडु,
  • बिहार,
  • आन्ध्र प्रदेश आदि।

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प्रश्न 5.
भारत में सूती वस्त्रोद्योग किन राज्यों में महत्वपूर्ण है ? कुछ प्रमुख केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर :
भारत के गुजरात तथा महाराष्ट्र राज्यों में सूती वस्त्रोद्योग (UPBoardSolutions.com) महत्त्वपूर्ण है। कुछ प्रमुख केन्द्र मुम्बई, अहमदाबाद, इन्दौर, कानपुर आदि हैं।

प्रश्न 6.
भारत में ऊनी वस्त्र उद्योग के प्रमुख केन्द्र लिखिए।
उत्तर :
अमृतसर, लुधियाना, मुम्बई, कानपुर, जामनगर, श्रीनगर आदि भारत में ऊनी वस्त्र उद्योग के प्रमुख केन्द्र हैं।

प्रश्न 7.
भारत के तीन राज्यों के नाम बताइए, जहाँ रेशम अधिक पैदा होता है।
या
भारत में रेशमी वस्त्र उत्पादन के प्रमुख केन्द्र बताइए।
उत्तर :
भारत के वे राज्य; जहाँ रेशम अधिक पैदा होता है; के नाम हैं—

  • कर्नाटक,
  • तमिलनाडु,
  • आन्ध्र प्रदेश,
  • असोम आदि।

प्रश्न 8.
भारत में अखबारी कागज का प्रथम कारखाना कब और कहाँ स्थापित किया गया ?
उत्तर :
भारत में अखबारी कागज का प्रथम कारखाना सन् 1955 ई० में नेपानगर (म० प्र०) में स्थापित किया गया।

प्रश्न 9 .
लेम किसलिए प्रसिद्ध है ?
उत्तर :
सलेम इस्पात संयन्त्र के लिए प्रसिद्ध है। यह तमिलनाडु राज्य में स्थित है।

प्रश्न 10.
बड़ोदरा कहाँ स्थित है ? यह किसलिए प्रसिद्ध है ?
उत्तर  :
ड़ोदरा गुजरात राज्य में स्थित है। यह सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र, सीमेण्ट उद्योग तथा पेट्रो-रसायन के लिए प्रसिद्ध है।

प्रश्न 11.
हिन्दुस्तान मशीन टूल्स के तीन केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  • बंगलुरु (कर्नाटक),
  • हैदराबाद (तेलंगाना) तथा
  • पिंजौर (हरियाणा), हिन्दुस्तान मशीन टूल्स के तीन केन्द्र हैं।

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प्रश्न 12.
लोकोमोटिव उद्योग के दो केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  • चितरंजन (प० बंगाल) तथा
  • वाराणसी (उत्तर प्रदेश), लोकोमोटिव उद्योग के दो प्रधान केन्द्र हैं।

प्रश्न 13.
पोत (जलयान) निर्माण के चार केन्द्र कौन-कौन से हैं ?
उत्तर :

  • मझगाँव डॉक, मुम्बई,
  • कोचीन शिपयार्ड, केरल,
  • गार्डन रीच, कोलकाता तथा
  • विशाखापत्तनम् पोत-निर्माण के चार केन्द्र हैं।

प्रश्न 14.
भिलाई किस उद्योग से सम्बन्धित है ?
उत्तर :
भिलाई लोहा-इस्पात उद्योग से सम्बन्धित है।

प्रश्न 15.
नेपानगर किस प्रदेश में स्थित है और क्यों प्रसिद्ध है ?
उत्तर :
नेपानगर मध्य प्रदेश में स्थित है। यह अखबारी कागज के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

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प्रश्न 16.
विशाखापत्तनम् किस उद्योग से सम्बन्धित है ?
उत्तर :
विशाखापत्तनम् लोहा-इस्पात उद्योग (UPBoardSolutions.com) और जहाज-निर्माण उद्योग से सम्बन्धित है।

प्रश्न 17.
जमशेदपुर किस राज्य में स्थित है ?
उत्तर :
जमशेदपुर झारखण्ड राज्य में स्थित है।

प्रश्न 18.
कृषि उत्पादों पर आधारित किन्हीं चार उद्योगों के नाम लिखिए। [2010, 14]
उत्तर :
कृषि उत्पादों पर आधारित चार उद्योगों के नाम हैं–

  • सूती वस्त्र उद्योग,
  • चीनी उद्योग,
  • जूट उद्योग तथा
  • चाय उद्योग।

प्रश्न 19.
भारत में कागज उद्योग के दो प्रमुख केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर :
भारत में कागज उद्योग के दो प्रमुख केन्द्र हैं-मध्य प्रदेश में अमलाई तथा महाराष्ट्र में बल्लारपुर।

प्रश्न 20.
सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र के एक-एक लौह-इस्पात कारखाने का नाम लिखिए।
उत्तर :
सार्वजनिक क्षेत्र – 
दुर्गापुर इस्पात कारखाना, दुर्गापुर, पश्चिम बंगाल।
निजी क्षेत्र – टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी, जमशेदपुर, झारखण्ड।

प्रश्न 21.
भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के दो इस्पात कारखानों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  • भिलाई इस्पात कारखाना, भिलाई, छत्तीसगढ़ तथा
  • बोकारो इस्पात कारखाना, बोकारो, (UPBoardSolutions.com) झारखण्ड, सार्वजनिक क्षेत्र के दो इस्पात कारखाने हैं।

प्रश्न 22.
भारत के पेट्रो-रसायन के किन्हीं दो उद्योगों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  • प्लास्टिक उद्योग तथा
  • सिन्थेटिक डिटर्जेण्ट उद्योग; पेट्रो-रसायन के दो उद्योग हैं।

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प्रश्न 23.
भारत में कौन-सा नगर ‘सूती वस्त्र उद्योग की राजधानी कहा जाता है ?
उत्तर :
महाराष्ट्र के मुम्बई नगर को ‘सूती वस्त्र उद्योग की राजधानी कहा जाता है।

प्रश्न 24.
भारत में रेल के डिब्बों का निर्माण किन दो स्थानों पर होता है ?
उत्तर :
भारत में रेल के डिब्बों का निर्माण–

  • पेराम्बुर (चेन्नई के निकट) तथा
  • कपूरथला, पंजाब नामक दो स्थानों पर होता है।

प्रश्न 25.
भारत में औद्योगिक दृष्टि से विकसित दो राज्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
महाराष्ट्र तथा गुजरात।

प्रश्न 26.
टाटा आयरन स्टील कम्पनी का मुख्यालय कहाँ स्थित है ? [2015]
उत्तर :
टाटा आयरन स्टील कम्पनी का मुख्यालय जमशेदपुर में है।

प्रश्न 27.
सीमेण्ट के निर्माण में किस कच्चे माल का उपयोग किया जाता है ?
उत्तर :
सीमेण्ट के निर्माण में चूना-पत्थर का (UPBoardSolutions.com) उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 28 .
पेट्रो-रसायन उद्योग का सम्बन्ध किस खनिज पदार्थ से है ?
उत्तर :
पेट्रो-रसायन उद्योग का सम्बन्ध गैस, एल्कोहल, कैल्सियम, लकड़ी, शशा और धात्विक खनिजों से है।

प्रश्न 29.
चीनी उद्योग की प्रमुख चार समस्याएँ लिखिए।
उत्तर :
भारत में चीनी उद्योग की चार प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं.

  • उत्तम किस्म के गन्ने की कमी होना।
  • चीनी मिलों द्वारा कुल गन्ना उत्पादन का आंशिक भाग ही प्रयुक्त कर पाना।
  • उत्पादन लागतों में लगातार वृद्धि होना।
  • मिलों में आधुनिक तकनीकी तथा मशीनों के प्रयोग का अभाव होना।

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प्रश्न 30.
कुटीर उद्योग की दो समस्याओं को लिखिए।
उत्तर :
कुटीर उद्योग की दो समस्याएँ निम्नलिखित हैं

  • बैंकों से ऋण मिलने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि इन्हें मजबूर होकर स्थानीय साहूकारों से ऋण लेना पड़ता है।
  • इन उद्योगों को चलाने के लिए कुशल (UPBoardSolutions.com) प्रबन्धक नहीं मिल पाते।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. लोहा-इस्पात उद्योग कहाँ संकेन्द्रित हैं?

(क) गंगा घाटी में ,
(ख) दामोदर घाटी में
(ग) दकन के पठार में
(घ) बिहार में

2. रेलवे कोच बनाये जाते हैं

(क) पटियाला में
(ख) मेरठ में
(ग) कपूरथला में
(घ) येलाहांका में

3. नेपानगर निम्नलिखित में से किस उद्योग से सम्बन्धित है? [2015]

(क) कागज उद्योग
(ख) चीनी उद्योग
(ग) सीमेण्ट उद्योग
(घ) लोहा तथा इस्पात उद्योग

4. ‘प्लास्टिक’ किस उद्योग का प्रमुख उत्पाद है?

(क) रसायन
(ख) पेट्रो-रसायन,
(ग) सिन्थेटिक वस्त्र
(घ) उर्वरक

5. भारत में कागज का प्रथम कारखाना कहाँ स्थापित किया गया?

(क) कुल्टी में
(ख) नेपानगर में
(ग) टीटागढ़ में
(घ) सिरामपुर में

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6. निम्नलिखित में से कौन-सा नगर कागज उद्योग से सम्बन्धित है? [2013, 15, 17] “

(क) कानपुर
(ख) नेपानगर
(ग) जयपुर
(घ) लखनऊ

7. पेट्रो-रसायन उद्योग का प्रमुख केन्द्र है

(क) बड़ोदरा
(ख) अहमदाबाद
(ग) बंगलुरु
(घ) कानपुर

8. भारत में सबसे अधिक सीमेण्ट कारखाने किस राज्य में हैं?

(क) मध्य प्रदेश में ,
(ख) उत्तर प्रदेश में
(ग) आन्ध्र प्रदेश में
(घ) बिहार में

9. किस राज्य में सर्वाधिक चीनी मिलें हैं?

(क) बिहार में
(ख) उत्तर प्रदेश में
(ग) महाराष्ट्र में।
(घ) मध्य प्रदेश में

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10. निम्नलिखित में कौन-सा उद्योग कृषि पर आधारित है?

(क) सीमेण्ट उद्योग
(ख) सूती वस्त्र उद्योग
(ग) इस्पात उद्योग
(घ) रसायन उद्योग

11. ‘भारत का मैनचेस्टर’ और ‘पूर्व का बोस्टन’ कहलाता है [2012, 14]

(क) कानपुर
(ख) मुम्बई
(ग) अहमदाबाद
(घ) जमशेदपुर

12. निम्नलिखित में से कागज उद्योग से कौन-सा स्थान सम्बन्धित है? (2012)

(क) आगरा।
(ख) फिरोजाबाद
(ग) टीटागढ़
(घ) धनबाद

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13. निम्नलिखित में से कौन-सा नगर सीमेण्ट उद्योग से सम्बन्धित है? [2013]

(क) कटनी
(ख) आगरा।
(ग) भोपाल
(घ) ग्वालियर

14. निम्नलिखित में से कौन-सा उद्योग कृषि आधारित नहीं है? [2013, 15]

(क) सूती वस्त्र उद्योग
(ख) चीनी उद्योग
(ग) सीमेण्ट उद्योग
(घ) जूट उद्योग

15. उत्तर भारत का मैनचेस्टर किसे कहा जाता है? [2014]

(क) लुधियाना
(ख) दिल्ली
(ग) कानपुर
(घ) लखनऊ

16. निम्न में से किसे इस्पात-नगरी कहा जाता है? [2014, 16]

(क) भिलाई
(ख) बोकारो
(ग) जमशेदपुर
(घ) राउरकेला

17. राउरकेला लोहा-इस्पात कारखाना किस राज्य में स्थित है? [2014]

(क) बिहार
(ख) छत्तीसगढ़
(ग) ओडिशा
(घ) उत्तर

प्रदेश 18. भिलाई सम्बन्धित है [2015]

(क) सीमेण्ट उद्योग से
(ख) लौह-इस्पात उद्योग से
(ग) जूट उद्योग से
(घ) ऐलुमिनियम उद्योग से

19. किसी उद्योग की स्थापना के लिए निम्न में से किसकी आवश्यकता होती है? [2015]

(क) कच्चा माल
(ख) जल
(ग) परिवहन
(घ) उपर्युक्त सभी

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20. भिलाई लौह-इस्पात कारखाना किस राज्य में स्थित है? [2017]

(क) बिहार
(ख) छत्तीसगढ़
(ग) ओडिशा
(घ) उत्तर प्रदेश

21. निम्न में से किस राज्य में टाटा लौह-इस्पात संयन्त्र स्थापित है? [2017, 18]

(क) मध्य प्रदेश
(ख) बिहार
(ग) झारखण्ड
(घ) छत्तीसगढ़

उत्तरमाला

1. (ख), 2. (ग), 3. (क), 4. (ख), 5. (घ), 6. (ख), 7. (क), 8. (क), 9. (ग), 10. (ख), 11. (ग), 12. (ग), 13. (क), 14. (ग), 15. (ग), 16. (ग), 17.(ग), 18. (ख), 19. (घ), 20. (ख), 21. (ग)।

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 8 तुमुल (खण्डकाव्य)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 8 तुमुल (खण्डकाव्य)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 8 तुमुल (खण्डकाव्य).

प्रश्न 1
तुमुल’ खण्डकाव्य का कथानक या सारांश संक्षेप में लिखिए। [2010, 11, 12, 13, 14, 17, 18]
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए। (2016)
उत्तर
श्री श्यामनारायण पाण्डेय द्वारा रचित ‘तुमुल’ खण्डकाव्य का कथानक पौराणिक आख्यान के आधार पर लिखा गया है। इसमें लक्ष्मण-मेघनाद के युद्ध का वर्णन है, जिसे पन्द्रह सर्गों में विभक्त किया गया है। कथानक का सर्गानुसार संक्षेप निम्नलिखित है-

प्रथम सर्ग ( ईश-स्तवन) में कवि ने मंगलाचरण के रूप में ईश्वर की स्तुति की है, जिसमें निराकार, निर्गुण और सर्वशक्तिमान ईश्वर की सर्वव्यापकता पर प्रकाश डाला गया है।

द्वितीय सर्ग ( दशरथ-पुत्रों का जन्म एवं बाल्यकाल ) में कवि ने (UPBoardSolutions.com) राजा दशरथ के चार पुत्रों के जन्म एवं बाल्यकाल का वर्णन किया है। राजा दशरथ के राम्, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न चार पुत्र उत्पन्न हुए। इन भाइयों में परस्पर प्रगाढ़ प्रेम था। इनके बचपन की लीलाएँ राजमहल की शोभा को द्विगुणित कर देती हैं। राम एवं लक्ष्मण का जन्म राक्षसों के विनाश एवं साधु-सन्तों को अभयदान देने के लिए ही हुआ था। राजा दशरथ नीतिज्ञ, सुख-शान्ति में विश्वास रखने वाले तथा सच्चरित्र थे।

तृतीय सर्ग ( मेघनाद) में रावण के पराक्रमी पुत्र मेघनाद के व्यक्तित्व का वर्णन किया गया है। वह अत्यन्त संयमी, धीर, पराक्रमी, उदार और शीलवान् था। युद्ध में उसके सामने टिकने का किसी में साहस न था।

चतुर्थ सर्ग (मकराक्ष-वध) में ‘मकराक्ष के वध’ की कथा और रावण द्वारा मेघनाद की शौर्य-गाथा वर्णित है। राम से संग्राम में मकराक्ष मारा गया था। इससे रावण बहुत भयभीत और चिन्तित हुआ। उसी समय उसे महाबली मेघनाद का स्मरण आता है; क्योंकि मेघनाद भी उसके समान ही पराक्रमी और वीर था।

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पञ्चम सर्ग ( रावण का आदेश ) में रावण मेघनाद को बुलाकर मकराक्ष की मृत्यु का बदला लेने का आदेश देता है तथा मेघनाद के अतुल शौर्य का वर्णन करता है। उसके तेज से सारा सदन प्रकाशित हो रहा है। रावण बड़ी कठिनता से मेघनाद के सम्मुख अपनी व्यथा (UPBoardSolutions.com) प्रकट करता हुआ कहता है कि हे पुत्र! राम से बदला न लेने में हमारी कायरता है। इसलिए मेरा आदेश है कि तुम युद्ध में लक्ष्मण को मृत्यु की गोद में सुला दो और राम को अपना बल दिखा दो तथा वानर-सेना को बाणों से बींध दो।

षष्ठ सर्ग ( मेघनाद-प्रतिज्ञा ) में मेघनाद सिंहनाद करता हुआ युद्ध में विजयी होने की प्रतिज्ञा करता है। मेघनाद के गर्जन से पूरा स्वर्ण-महल हिल उठता है। वह अपने पिता को आश्वस्त करता हुआ कहता है। कि हे पिता! मेरे होते हुए आप किसी प्रकार का शोक न करें। मैं अधिक न कहकर केवल इतना कहता हूँ कि यदि मैं आपके कष्ट को दूर न कर सकें तो मैं कभी धनुष को हाथ भी नहीं लगाऊँगा। यदि मैं युद्ध में विजयी न हुआ तो कभी जीवन में युद्ध का नाम न लूंगा।

सप्तम सर्ग ( मेघनाद का अभियान) में मेघनाद के युद्ध के लिए प्रस्थान करने का वर्णन है। रावण के सम्मुख प्रतिज्ञा करके मेघनाद जब युद्धक्षेत्र की ओर चलने लगा तो देवलोक के सभी देवता भय से काँपने लगे। मेघनाद ने युद्ध का रथ सजवाया तो पवन भयभीत हो गया, पर्वत काँपने लगा, पृथ्वी शोकाकुल हो गयी और सूर्य त्रस्त हो गया। युद्ध हेतु प्रस्थान करने से पूर्व मेघनाद ने यज्ञ किया और उसके बाद रथ पर बैठकर शत्रुओं से लोहा लेने चल पड़ा और रणभूमि में पहुँचकर सिंह की तरह गर्जना की।

अष्टम सर्ग (युद्धासन्न सौमित्र) में युद्ध के लिए प्रस्तुत लक्ष्मण का चित्रण है। मेघनाद की रण-गर्जना सुनकर शत्रु सेना भी भयंकर नाद करने लगी। राम की आज्ञा लेकर लक्ष्मण भी युद्ध के लिए तैयार होने लगे। युद्धातुर लक्ष्मण को देखकर हनुमान आदि वीर भी युद्ध हेतु तत्पर हो गये। लक्ष्मण ने क्षण भर में ही मेघनाद के सम्मुख मोर्चा ले लिया। शत्रु को सम्मुख देखकर मेघनाद युद्ध करने की ठानता है।

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नवम सर्ग (लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध तथा लक्ष्मण की मूच्र्छा ) में लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध और लक्ष्मण के मूर्च्छित होने का वर्णन है। मेघनाद ने नम्र भाव से लक्ष्मण से कहा कि तुम्हारी अवस्था देखकर मैं तुमसे युद्ध करना नहीं चाहता, फिर भी आज मैं विवश हूँ; क्योंकि मैं अपने पिता से यह प्रतिज्ञा करके आया हूँ कि युद्ध में समस्त शत्रुओं का संहार करूंगा; अतः युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। यह सुनकर लक्ष्मण क्रुद्ध हो गये। (UPBoardSolutions.com) उनके क्रोधयुक्त वचनों को सुनकर मेघनाद हँस पड़ा। मेघनाद के हँसने पर मानो लक्ष्मण के क्रोध की अग्नि में घी पड़ गया। दोनों ओर से भयंकर युद्ध होने लगा। लक्ष्मण के भीषण प्रहारों से मेघनाद की सेना के छक्के छूट गये। इसके बाद मेघनाद ने भीषण युद्ध किया और लक्ष्मण के द्वारा छोड़े गये सभी बाणों को नष्ट कर दिया। दोनों वीर सिंह के समान लड़ रहे थे। लक्ष्मण को कुछ शिथिल देखकर मेघनाद ने उन पर ‘शक्ति-बाण’ का प्रयोग कर दिया, जिससे लक्ष्मण मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।

दशम सर्ग ( हनुमान द्वारा उपदेश) में हनुमान द्वारा दु:खी वानरों को समझाने का वर्णन है। लक्ष्मण के शक्ति-बाण लगने और उनके मूर्च्छित होने से देवताओं में खलबली मच गयी। वानर सेना अत्यधिक व्याकुल हो विलाप करने लगी। हनुमान ने वानरों को समझाया कि लक्ष्मण अंचेत हुए हैं। वीरों का विलाप करना उचित नहीं होता। हनुमान के उपदेश को सभी पर प्रभाव पड़ा और वे शोकरहित हो गये। दूसरी ओर कुटी में बैठे हुए श्रीराम का मन कुछ उदास था। उसी समय कुछ अपशकुन होने लगे, जिससे राम चिन्तित हो गये।

एकादश सर्ग ( उन्मन राम ) में राम की व्याकुलता का चित्रण है। कुटिया में बैठे श्रीराम विचार कर रहे हैं कि आज व्यर्थ ही मन में व्यथा क्यों जन्म ले रही है। उसी समय अंगद-हनुमान-सुग्रीव आदि मूच्छित लक्ष्मण को लेकर वहाँ आते हैं। लक्ष्मण को देखते ही राम पछाड़ खाकर (UPBoardSolutions.com) गिर पड़ते हैं।

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द्वादश सर्ग ( राम-विलाप और सौमित्र का उपचार) में राम के विलाप और लक्ष्मण के उपचार का वर्णन है। लक्ष्मण की दशा को देखकर राम विलाप करने लगे। उन्होंने कहा-हे लक्ष्मण! मैं तुम्हारे बिना जीवित नहीं रह सकता।

राम की दु:खी दशा देखकर जांबवन्त जी ने बताया कि लंका में सुषेण नाम के कुशल वैद्य हैं, आप उन्हें सादर बुला लें। हनुमान क्षण भर में ही सुषेण वैद्य को लेकर आते हैं। सुषेण वैद्य कहते हैं कि संजीवनी बूटी के बिना लक्ष्मण की चिकित्सा नहीं हो सकती। हनुमान वायु के वेग से संजीवनी बूटी लाने के लिए चल पड़ते हैं और बूटी की पहचान न होने से हनुमान पूरे पर्वत को ही उठा लाते हैं। वैद्य के उपचार से लक्ष्मण पुनः सचेत होकर मुस्कराते हुए उठ जाते हैं।

त्रयोदशसर्ग( विभीषण की मन्त्रणा ) में विभीषण द्वारा राम को दिये गये परामर्श का वर्णन है। वह आकर राम को सूचना देता है कि मेघनाद निकुम्भिला पर्वत पर यज्ञ कर रहा है। यदि यज्ञ पूर्ण हो गया तो वह युद्ध में अजेय हो जाएगा। इसलिए (UPBoardSolutions.com) लक्ष्मण को यज्ञ करते हुए मेघनाद पर तुरन्त आक्रमण कर देना चाहिए। राम के चरण छूकर लक्ष्मण ने मेघनाद का वध करने की प्रतिज्ञा की और ससैन्य युद्ध के लिए प्रस्थान किया।

चतुर्दशसर्ग ( यज्ञ-विध्वंस और मेघनाद-वध) में यज्ञ-विध्वंस और मेघनाद के वध का वर्णन है। लक्ष्मण ने ससैन्य यज्ञ-स्थल पर पहुँचकर मेघनाद पर बाण-वर्षा कर दी। लक्ष्मण के तीव्र बाण प्रहार से मेघनाद का रुधिर यज्ञ-भूमि में बहने लगा। उसके शरीर से इतना रक्त बहा कि यज्ञ की अग्नि भी बुझती प्रतीत हुई। लक्ष्मण को बाणों की वर्षा करता देखकर मेघनाद कहने लगा कि इस प्रकार छल-कपट से युद्ध करना वीरता का लक्षण नहीं है। मुझसे सम्मुख युद्ध में एक बार पराजित होने पर तुमने जो घृणित कार्य किया है, वह सर्वथा निन्दनीय है।

मेघनाद की यह धिक्कार सुनकर एक बार प्रत्यंचा पर आया हुआ लक्ष्मण का बाण रुक गया और सिर झुक गया, परन्तु विभीषण के उकसाने पर लक्ष्मण के तीक्ष्ण प्रहार से मेघनाद यज्ञ-भूमि में मारा गया।

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पंचदश सर्ग ( राम की वन्दना ) में राम की वन्दना की गयी है। मेघनाद के शव को यज्ञ-भूमि में ही छोड़कर वानर सेना राम की ओर चली। युद्ध में लक्ष्मण की विजय का समाचार विभीषण ने राम को दिया।

लक्ष्मण अपनी प्रशंसा सुनकर राम की वन्दना करते हुए कहते हैं कि हे राम! (UPBoardSolutions.com)  जिस पर आपकी कृपा हो जाती है वह तो जग-विजेता हो ही जाता है।

इस प्रकार खण्डकाव्य की कथा पन्द्रह सर्गों में विभक्त होकर समाप्त होती है।

प्रश्न 2
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। [2012, 15]
उत्तर
प्रथम सर्ग (ईश-स्तवन) इस सर्ग में कवि ने मंगलाचरण के रूप में ईश्वर की स्तुति की है, जिसमें निराकार, निर्गुण और सर्वशक्तिमान ईश्वर की सर्वव्यापकता पर प्रकाश डाला गया है।

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प्रश्न 3
‘तुमुलखण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। [2013, 15, 17]
उत्तर
द्वितीय सर्ग (दशरथ-पुत्रों का जन्म एवं बाल्यकाल)

इस सर्ग में कवि ने राजा दशरथ के चार पुत्रों के जन्म एवं बाल्यकाल का वर्णन किया है। राजा दशरथ के राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न चार पुत्र उत्पन्न हुए। इन भाइयों में परस्पर प्रगाढ़ प्रेम था। इनके बचपन की लीलाएँ राजमहल की शोभा को द्विगुणित कर देती हैं। राम एवं लक्ष्मण का जन्म राक्षसों के विनाश एवं साधु-सन्तों को अभयदान देने के लिए ही हुआ था। राम के छोटे भाई लक्ष्मण, नीतिज्ञ, ज्ञानी, गुणवान्, सच्चरित्र और उदार थे। वे शेषनाग के (UPBoardSolutions.com) अवतार एवं पृथ्वी के आधार थे। इक्ष्वाकु वंश के महाराज दशरथ का यश संसार के कोने-कोने में फैला है। वे कर्तव्यपरायण, दानवीर तथा युद्ध विद्या में पारंगत हैं। युद्ध विद्या में उनकी समानता करने वाला कोई नहीं था। राजा दशरथ नीतिज्ञ, सुख-शान्ति में विश्वास रखने वाले तथा सच्चरित्र थे।

प्रश्न 4
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग को कथानक लिखिए। [2012]
उत्तर
तृतीय सर्ग (मेघनाद)

इस सर्ग में रावण के पराक्रमी पुत्र मेघनाद के व्यक्तित्व का वर्णन किया गया है। वह अत्यन्त संयमी, धीर, पराक्रमी, उदार और शीलवान था। उसने इन्द्र के पुत्र जयन्त को पराजित कर दिया था। युद्ध में उसके सामने टिकने का किसी में साहस न था।

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प्रश्न 5
‘तुमुल’ के आधार पर ‘मकराक्ष-वध’ नामक चतुर्थ सर्ग के कथानक का सारांश लिखिए। [2010]
उत्तर
चतुर्थ सर्ग (मकराक्ष-वध) इस सर्ग में ‘मकराक्ष के वध’ की कथा और रावण द्वारा मेघनाद की शौर्य-गाथा वर्णित है। राम से युद्ध करते हुए संग्राम में मकराक्ष मारा गया था। उसके मारे जाने के बाद अन्य राक्षस युद्ध-स्थल छोड़कर भाग खड़े हुए। इससे रावण (UPBoardSolutions.com) बहुत भयभीत और चिन्तित हुआ। उसी समय उसे महाबली मेघनाद का स्मरण आता है; क्योंकि मेघनाद भी उसके समान ही पराक्रमी और वीर था तथा युद्ध में राम और लक्ष्मण से निपटने में समर्थ था।

प्रश्न 6
‘तुमुल’ के आधार पर रावण का आदेश’ नामक पञ्चम सर्ग का सारांश लिखिए। [2009,14]
उत्तर
पञ्चम सर्ग (रावण का आदेश)। इस सर्ग में रावण मेघनाद को बुलाकर मकराक्ष की मृत्यु का बदला लेने का आदेश देता है। इसी सर्ग में रावण मेघनाद के अतुल शौर्य का वर्णन करता है तथा उसकी अजेय शक्ति के सम्मुख वह मकराक्ष की मृत्यु की भी भूल जाता है। रावण को अत्यधिक चिन्तित जानकर मेघनाद उसके पास आता है और उसके चरण-स्पर्श कर विनम्रभाव से बैठ जाता है। उसके तेज से सारा सदन प्रकाशित हो रहा है। रावण बड़ी कठिनता से मेघनाद के सम्मुख अपनी व्यथा प्रकट करता हुआ कहता है कि हे पुत्र! सम्पूर्ण राज्य में युद्ध के भय से हलचल मची हुई है। हमें युद्ध से किसी प्रकार भी भयभीत नहीं होना है। राम से बदला न लेने में हमारी कायरता है। इसलिए मेरा आदेश है कि तुम युद्ध में लक्ष्मण को मृत्यु की गोद में सुला दो और राम को अपना बल दिखा दो। इसके पश्चात् रावण मेघनाद के शौर्य की प्रशंसा करते हुए उसे युद्ध के लिए भेज देता है और कहता है कि मकराक्ष का बदला युद्ध में जीत के साथ लेना चाहिए और वानर-सेना को बाणों से बांध देना चाहिए।

प्रश्न 7
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘मेघनाद-प्रतिज्ञा’ नामक षष्ठ सर्ग का सारांश लिखिए। [2010, 13, 18] |
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के ‘मेघनाद-प्रतिज्ञा’ सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए। [2016]
उत्तर
षष्ठ सर्ग (मेघनाद-प्रतिज्ञा) इस सर्ग में मेघनाद सिंहनाद करता हुआ युद्ध में विजयी होने की प्रतिज्ञा करता है। मेघनाद के गर्जन से पूरा स्वर्ण-महल हिल उठता है। वह अपने पिता को आश्वस्त करता हुआ कहता है कि हे पिता! मेरे होते हुए आप किसी भी प्रकार का शोक न करें। मैं अधिक न कहकर केवल इतना कहता हूँ कि यदि मैं आपके कष्ट को दूर न कर सकें तो मैं कभी धनुष को हाथ भी नहीं लगाऊँगा। मैं राम के सम्मुख होकर (UPBoardSolutions.com) युद्ध करूंगा और लक्ष्मण की शक्ति को भी देख लूंगा। यदि शत्रु आकाश में भी वास करने लगे अथवा पाताल में भी जाकर छिप जाये. तो भी उसके प्राणों की रक्षा न हो सकेगी। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं अवश्य ही विजयश्री को प्राप्त करूंगा। यदि मैं युद्ध में विजयी न हुआ तो कभी जीवन में युद्ध का नाम न लूंगा।

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प्रश्न 8
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के ‘मेघनाद-अभियान’ सर्ग का सारांश लिखिए। [2018]
उत्तर

सप्तम सर्ग (मेघनाद का अभियान)

इस सर्ग में मेघनाद के युद्ध के लिए प्रस्थान करने का वर्णन है। रावण के सम्मुख प्रतिज्ञा करके मेघनाद जब युद्धक्षेत्र की ओर चलने लगा तो देवलोक के सभी देवता भय से काँपने लगे। उस समय मेघनाद का मुख क्रोध से लाल हो गया था। उसकी हुंकार से बड़े-बड़े धैर्यशाली वीरों का साहस छूटने लगा। सेनापति मेघनाद के क्रोध का कारण पूछने लगे। मेघनाद ने युद्ध का रथ सजवाया तथा युद्ध के वाद्य बजाने का आदेश दिया तो पवन भयभीत हो गया, पर्वत काँपने लगा, पृथ्वी शोकाकुल हो गयी और सूर्य त्रस्त हो गया। युद्ध हेतु प्रस्थान करने से पूर्व मेघनाद ने यज्ञ किया और उसके बाद रथ पर बैठकर शत्रुओं से लोहा लेने (UPBoardSolutions.com) चल पड़ा। उसकी शक्ति का अनुमान करके देवता आपस में विचार करने लगे कि अब मेघनाद के सम्मुख राम-लक्ष्मण के प्राण कैसे बच सकेंगे? देवता चिन्तित होकर बातचीत कर ही रहे थे कि मेघनाद ने रणभूमि में पहुँचकर सिंह की तरह गर्जना की।

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प्रश्न 9
‘तुमुल’ के ‘युद्धासन्न सौमित्र’ नामक अष्टम सर्ग का सारांश लिखिए। [2017]
उत्तर

अष्टम सर्ग (युद्धासन्न सौमित्र)

इस सर्ग में युद्ध के लिए प्रस्तुते लक्ष्मण का चित्रण है। मेघनाद की रण-गर्जना सुनकर शत्रु सेना भी भयंकर नाद करने लगी। राम की आज्ञा लेकर लक्ष्मण भी युद्ध के लिए तैयार होने लगे। युद्धातुर लक्ष्मण को देखकर हनुमान आदि वीर भी युद्ध हेतु तत्पर हो गये। लक्ष्मण ने क्षण भर में ही मेघनाद के सम्मुख मोर्चा ले लिया। दोनों वीरों में से कौन विजयी होगा, इसका अनुमान नहीं किया जा सकता था। मेघनाद के उन्नत ललाट, लम्बी भुजाओं और वीरवेश को देखकर स्वयं लक्ष्मण उसकी प्रशंसा करने लगे। लक्ष्मण ने कहा कि तुम्हें अपने सामने देखकर भी युद्ध करने की इच्छा नहीं होती। मुझे चिन्ता है कि मैं अपने बाणों से तेरी छाती को कैसे छलनी करूंगा? मेघनाद लक्ष्मण के मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर उंनकी उदारता के विषय में विचार करने लगा। यद्यपि वह लक्ष्मण के ज्ञान की गरिमा को समझता है, फिर भी शत्रु समझकर उनकी मधुर (UPBoardSolutions.com) वाणी के जाल में उलझना नहीं चाहता और युद्ध करने की ठानता है।

प्रश्न 10
तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर मेघनाद-लक्ष्मण युद्ध का वर्णन कीजिए। [2010, 13, 15, 16]
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के ‘लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध’ तथा ‘लक्ष्मण की मूच्र्छा’ नामक नवम सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए। [2009, 11, 12, 13, 14]
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर मेघनाद की वीरता का वर्णन कीजिए।
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के किसी एक सर्ग की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। [2009, 13]
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के नवम् सर्ग का सारांश लिखिए। [2017, 18]
उत्तर
नवम सर्ग (लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध तथा लक्ष्मण की मूच्र्छा) | इस सर्ग में लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध और लक्ष्मण के मूर्च्छित होने का वर्णन है। मेघनाद ने नम्र भाव से लक्ष्मण से कहा कि जो कुछ भी तुमने कहा है, मैं उसे सत्य ही मानता हूँ; क्योंकि तुम नीतिज्ञ हो तथा सर्वज्ञ भी हो। तुम्हारी अवस्था देखकर मैं भी तुमसे युद्ध करना नहीं चाहता, फिर भी आज मैं विवश हूँ; क्योंकि मैं अपने पिता से यह प्रतिज्ञा करके आया हूँ कि युद्ध में समस्त शत्रुओं का संहार करूंगा। तुम्हारी इच्छा लड़ने । की हो या न हो, तुम मेरी प्रतिज्ञा को सफल करने में मेरी सहायता करो। मैं बिना लड़े यहाँ से नहीं जाऊँगा, अतः युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। यह सुनकर लक्ष्मण क्रुद्ध हो गये। उनके क्रोध को देखकर सम्पूर्ण संसार थर्राने लगी। उन्होंने मेघनाद से कहा-अरे अधम! मैंने तुमसे अपने मन का भाव न जाने क्यों कह दिया। (UPBoardSolutions.com) जिस प्रकार दूध पीने पर भी सर्प अपना विष नहीं त्यागते, उसी प्रकार यह सत्य ही है कि मधुर वाणी से दुष्टजन कभी नहीं सुधरते। उनके क्रोधयुक्त वचनों को सुनकर मेघनाद हँस पड़ा। मेघनाद के हँसने पर मानो लक्ष्मण के क्रोध की अग्नि में घी पड़ गया। दोनों ओर से भयंकर युद्ध होने लगा। लक्ष्मण के भीषण प्रहारों से मेघनाद की सेना के छक्के छूट गये। भागते हुए सैनिकों को रोककर उनका उत्साह बढ़ाते हुए मेघनाद ने कहा कि मेरे युद्ध-कौशल को भी देखो। मैं शीघ्र ही इनको परास्त कर दूंगा। मैंने पिता के सम्मुख जो प्रतिज्ञा की है, उसे पूरा करूंगा।’ इसके बाद मेघनाद ने भीषण युद्ध किया और लक्ष्मण के द्वारा छोड़े गये सभी बाणों को नष्ट कर दिया। दोनों वीर सिंह के समान लड़ रहे थे। दोनों के शरीर रक्त से लथपथ थे। लक्ष्मण को कुछ शिथिल देखकर मेघनाद ने उन पर ‘शक्ति-बाण’ का प्रयोग कर दिया, जिससे लक्ष्मण मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। पृथ्वी पर मूर्च्छित पड़े लक्ष्मण को देखकर मेघनाद सिंह-गर्जना करता हुआ और भागती हुई कपि सेना को मारता हुआ लंका की ओर चल पड़ा।

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प्रश्न 11
तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर हनुमान द्वारा दिये गयें उपदेश का वर्णन कीजिए। [2010]
उत्तर
दशम सर्ग (हनुमान द्वारा उपदेश) इस सर्ग में हनुमान द्वारा दु:खी वानरों को समझाने का वर्णन है। लक्ष्मण के शक्ति-बाण लगने और उनके मूर्च्छित होने से देवताओं में खलबली मच गयी। वानर सेना अत्यधिक व्याकुल हो विलाप करने लगी। हनुमान ने वानरों को समझाया कि लक्ष्मण अचेत हुए हैं। वीरों को विलाप करना उचित नहीं होता। शोक को त्यागकर बदला लेने के लिए तैयार हो जाओ। जिसके रक्षक राम हैं उसका संसार में कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। तुम्हारी व्याकुल दशा को देखकर शत्रु तुम्हारा उपहास करेंगे। हनुमान के उपदेश का सभी पर प्रभाव पड़ा और वे शोकरहित हो गये। दूसरी ओर कुटी में बैठे हुए श्रीराम (UPBoardSolutions.com) का मन कुछ उदास था। उसी समय कुछ अपशकुन होने लगे, जिससे राम चिन्तित हो गये।

प्रश्न 12
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के एकादश सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
एकादशे सर्ग (उन्मन राम)। | इस सर्ग में राम की व्याकुलता का चित्रण है। कुटिया में बैठे श्रीराम विचार कर रहे हैं कि आज व्यर्थ ही मन में व्यथा क्यों जन्म ले रही है। मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है जो मेरा मन सशंकित हो रहा है और मेरे पैर काँप रहे हैं। सोचते-सोचते राम का मन व्यथित होने लगा, नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी तथा हृदय कम्पित होने लगा। उसी समय अंगद-हनुमान-सुग्रीव आदि मूर्च्छित लक्ष्मण को लेकर वहाँ आते हैं। लक्ष्मण को देखते ही राम पछाड़ खाकर गिर पड़ते हैं।।

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प्रश्न 13
‘तुमुल’ के ‘राम-विलाप और सौमित्र का उपचार’ जामवः द्वादश सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए। [2014]
या
‘तुमुल’ के आधार पर युद्ध में लक्ष्मण के ‘मूर्च्छित होने पर राम-विलाप का वर्णन कीजिए।
उत्तर

द्वादश सर्ग (राम-विलाप और सौमित्र का उपचार)

इस सर्ग में राम के विलाप और लक्ष्मण के उपचार का वर्णन है। लक्ष्मण की दशा को देखकर राम विलाप करने लगे। उन्होंने कहा-हे लक्ष्मण! तुम्हारी इस दशा से मैं अत्यधिक दुःखी हूँ। हे धनुर्धर! तुम धनुष हाथ में लेकर उठ खड़े हो। मैं तुम्हारे बिना जीवित नहीं रह सकता-

मैं जी न सकता तुम बिना, तुम बाल भक्त अनन्य हो।
हे उर्मिलेश उठो, उठो खोलो नयन चैतन्य हो ।

राम की दु:खी दशा देखकर जामवन्त जी ने बताया कि लंका में सुषेण नाम के कुशल वैद्य हैं, आप उन्हें सादर बुला लें। हनुमान क्षणभर में ही सुषेण वैद्य को लेकर आते हैं। सुषेण वैद्य कहते हैं कि संजीवनी बूटी के बिना लक्ष्मण की चिकित्सा नहीं हो सकती। (UPBoardSolutions.com) हनुमान वायु के वेग से संजीवनी बूटी लाने के लिए चल पड़ते हैं और मार्ग में कालनेमि राक्षस का वध करते हुए उस पर्वत पर पहुँचते हैं, जिस पर संजीवनी बूटी है। . बूटी की पहचान न होने से हनुमान पूरे पर्वत को ही उठी लाते हैं। वैद्य के उपचार से लक्ष्मण पुनः सचेत होकर मुस्कराते हुए उठ गये, जिससे वानर-सेना में प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी।

प्रश्न 14
‘तुमुल’ के ‘विभीषण की मन्त्रणा सर्ग का सारांश लिखिए।
या
विभीषण ने मेघनाद के वध के लिए राम को कौन-सी मन्त्रणा दी ? ‘तुमुल खण्डकाव्य के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

त्रयोदश सर्ग (विभीषण की मन्त्रणा)

इस सर्ग में विभीषण द्वारा राम को दिये गये परामर्श का वर्णन है। राम-लक्ष्मण के निकट सभी वानर और रीछ बैठे हैं, तभी विभीषण आकर राम को सूचना देता है कि मेघनाद निकुम्भिला पर्वत पर यज्ञ कर रहा है। यदि यज्ञ पूर्ण हो गया तो वह युद्ध में अजेय हो जाएगा और आप सीता को कभी भी प्राप्त नहीं कर सकेंगे। इसलिए लक्ष्मण को यज्ञ करते हुए मेघनाद पर तुरन्त आक्रमण कर देना चाहिए। विभीषण के बार-बार आग्रह करने पर (UPBoardSolutions.com) और विचार करके राम ने लक्ष्मण और अन्य वीरों को यज्ञ-विध्वंस करने का आदेश दे दिया और हनुमान, नील, नल, अंगद, जामवन्त आदि से कहा कि तुम सभी लोग युद्ध में लक्ष्मण के साथ ही रहना; क्योंकि रावण का यह पुत्र बहुत ही दुर्धर्ष योद्धा है। राम के चरण छूकर लक्ष्मण ने मेघनाद का वध करने की प्रतिज्ञा की और ससैन्य युद्ध के लिए प्रस्थान किया।

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प्रश्न 15
‘तुमुल’ के ‘मख (यज्ञ) विध्वंस’ और ‘मेघनाद-वध’ सर्ग का सारांश लिखिए। [2010, 11]
या
‘तुमुल’ का जो सर्ग आपको बहुत रुचिकर लगा हो, उसकी कथा संक्षेप में लिखिए।
या
‘तुमुल खण्डकाव्य की किसी मुख्य घटना का वर्णन कीजिए। [2012]
उत्तर

चतुर्दश सर्ग (यज्ञ-विध्वंस और मेघनाद-वध)

इस सर्ग में यज्ञ-विध्वंस और मेघनाद के वध का वर्णन है। लक्ष्मण ने ससैन्य यज्ञ-स्थल पर पहुँचकर मेघनाद पर बाण-वर्षा कर दी। लक्ष्मण के तीव्र बाण-प्रहार से मेघनाद का रुधिर यज्ञ-भूमि में बहने लगा। उसके शरीर से इतना रक्त बहा कि यज्ञ की अग्नि भी बुझती प्रतीत हुई। रीछ और वानरों के हाथों से वहाँ उपस्थित सभी यज्ञकर्ता मारे गये। केवल मेघनाद नाम का वह वीर अपने स्थान पर दृढ़ आहुतियाँ डालता रहा। अन्य यज्ञकर्ताओं का संहार करके वानर सेना यज्ञ-विध्वंस करने लगी। लक्ष्मण को बाणों की वर्षा करता देखकर मेघनाद कहने लगा कि इस प्रकार छल-कपट से युद्ध करना वीरता को लक्षण नहीं है। मुझसे सम्मुख युद्ध में एक (UPBoardSolutions.com) बार पराजित होने के बाद तुमने जो घृणित कार्य किया है, वह सर्वथा निन्दनीय है। जब तुम्हें मेरे बल का पता लग गया तब यह युद्ध अधर्म से जीतने की राय क्या तुमको विभीषण ने दी है ? यह कहता हुआ मेघनाद लक्ष्मण की वीरता को धिक्कारने लगा–

जीते मुझे, पर आपकी इस जीत में ही हार है।
रघुवंश की रणनीति पर, धिक्कार सौ-सौ बार है॥
इस कार्य से रघुवंश में जो, कालिमा है लग रही।
उसको न घन भी धो सकेगा, भार नत होगी मही॥

मेघनाद की यह धिक्कार सुनकर एक बार प्रत्यंचा पर आया हुआ लक्ष्मण का बाण रुक गया और सिर झुक गया, परन्तु विभीषण के उकसाने पर लक्ष्मण के तीक्ष्ण प्रहार से मेघनाद यज्ञ-भूमि में मारा गया। देवता लक्ष्मण की कीर्ति का जयगान करने लगे।

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प्रश्न 16
‘तुमुल’ के आधार पर अन्तिम सर्ग ‘राम की वन्दना’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

पञ्चदश सर्ग (राम की वन्दना)

इस सर्ग में राम की वन्दना की गयी है। मेघनाद के शव को यज्ञ-भूमि में ही छोड़कर वानर सेना राम की ओर चली। युद्ध में लक्ष्मण की विजय का समाचार विभीषण ने राम को दिया। राम लक्ष्मण से कहते हैं कि-

मैं जानता था तुम्हीं, मार सकते हो मेघनाद को।
था व्यग्र सुनने के लिए, निज बन्धु जय संवाद को॥

लक्ष्मण अपनी प्रशंसा सुनकर राम के चरणों में झुक जाते हैं और भाव-विभोर (UPBoardSolutions.com) होकर सर्वशक्तिमान् राम की वन्दना करते हुए कहते हैं कि हे राम! जिस पर आपकी कृपा हो जाती है वह तो जग-विजेता हो ही जाता है।

इस प्रकार खण्डकाव्य की कथा पन्द्रह सर्गों में विभक्त होकर समाप्त होती है।

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प्रश्न 17
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक अथवा प्रधान पात्र लक्ष्मण का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 17, 18]
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य का नायक कौन है ? उसकी चारित्रिक विशेषताएँ बताइए। [2011, 12, 13, 14, 17, 18]
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर लक्ष्मण के चरित्र की किन्हीं तीन विशेषताओं; सौन्दर्य शील और शक्ति का वर्णन कीजिए।
या
“तुमूल’ खण्डकाव्य के नायक और प्रतिनायक के नाम बताइए तथा उनके चरित्र की दोदो विशेषताएँ भी लिखिए। ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के नायक की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।
[2015]
या
‘तुमुल खण्डकाव्य के आधार पर नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2016]
[ संकेत–प्रश्न 18 से मेघनाद (प्रतिनायक) के चरित्र की विशेषताएँ लें।]
उत्तर
वीर रस के प्रसिद्ध कवि श्री श्यामनारायण पाण्डेय द्वारा रचित ‘तुमुल’ खण्डकाव्य का नायक लक्ष्मण को माना जा सकता है। प्रस्तुत काव्य में लक्ष्मण और मेघनाद के युद्ध का वर्णन है। कवि ने लक्ष्मण के तेजस्वी चरित्र-व्यक्तित्व को अपने काव्य का केन्द्रबिन्दु बनाया है। इस खण्डकाव्य से लक्ष्मण के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं|

(1) नायक-लक्ष्मण ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के नायक हैं। वे राम के छोटे भाई एवं रघुकुल के प्रदीप हैं। उनमें नायकोचित वीरता, धीरता और उदारता है। वे मेघनाद के ललकारने पर युद्ध करते हैं। यद्यपि पहले वे मेघनाद के शक्ति-प्रहार से मूर्च्छित हो जाते हैं, परन्तु अन्त में विजय उन्हीं की होती है।

(2) अद्वितीय सौन्दर्यशाली-लक्ष्मण दशरथ के पुत्र और राम के छोटे भाई हैं। (UPBoardSolutions.com) उनके व्यक्तित्व में तेजस्विता, सहज कोमलता एवं स्वभाव में नम्रता है। उनके अधरों पर सहज मुस्कान खेलती है। मेघनाद भी उन्हें ‘लावण्ययुक्त ब्रह्मचारी’ कहकर सम्बोधित करता है

लावण्यधारी ब्रह्मचारी, आप बुद्धि निधान हैं।
संसार में अत्यन्त वीर, पराक्रमी महान् हैं।

सभी लक्ष्मण के सौन्दर्य को देखते ही रह जाते हैं। वे जब बोलते हैं तो अत्यन्त मधुर तथा कर्णप्रिय संगीत कानों में घोल देते हैं। कवि उनके सौन्दर्य की प्रशंसा इस प्रकार करते हैं-

थी बोल में सुन्दर सुधा, उर में दया का वास था।
था तेज में सूरज, हँसी में चाँद का उपहास था।

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(3) अतुलनीय शक्तिसम्पन्न-लक्ष्मण अत्यन्त विनयशील वीर हैं। वे शत्रु के ललकारने पर युद्ध करने से पीछे नहीं हटते। वे केवल शक्तिसम्पन्न ही नहीं हैं, वरन् वीरों के प्रशंसक भी हैं। उन्होंने मेघनाद के सौन्दर्य, शौर्य एवं तेज की प्रशंसा भी की है। उन्होंने संकल्प करके जिससे भी युद्ध किया, उसे युद्ध में परास्त ही किया-

रण ठानकर जिससे भिड़े, उससे विजय पायी सदा।
संग्राम में अपनी ध्वजा, सानन्द फहरायी सदा ॥

जब मेघनाद उनकी बातें सुनकर हँस पड़ता है, तब उनकी क्रोधाग्नि में मानो घी पड़ जाता है। युद्ध में उनके प्रलयंकारी रूप को देखिए-

आकाश को अपने निशित नाराच से भरने लगे।
उस काल देवों के सहित देवेन्द्र भी डरने लगे।

शत्रु के मनोभावों को भली-भाँति पहचानने में लक्ष्मण अत्यन्त कुशल हैं। युद्ध में मेघनाद की गर्वोक्ति को सुनकर वे कहते हैं-

सच है सुधामय भारती से, खल सुधरते हैं नहीं।
क्या क्षीर पीने पर फणी, विष त्याग देते हैं कहीं।

(4) विनम्र और शीलवान्–बाल्यकाल से ही लक्ष्मण दयालु एवं उदार हैं। उनका अन्त:करण भी सरल, शुद्ध तथा कोमल है। वे अपने भाई राम के प्रति अटूट श्रद्धा रखते हैं। उनके चरित्र में कृत्रिमता नहीं है। वे युद्धभूमि में अपने शत्रु मेघनाद के सौन्दर्य और ओज को (UPBoardSolutions.com) देखकर मुग्ध होकर दयार्द्र हो जाते हैं-

आके, आँखों से तुझे देख के तो, इच्छा होती युद्ध की ही नहीं है।
कैसे तेरे साथ में मैं लडूंगा, कैसे बाणों से तुझे मैं हतूंगा ॥

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लक्ष्मण के हृदय में कोमलता है। नि:शस्त्र मेघनाद को यज्ञ करते देखकर उनका हृदय द्रवित हो जाता है।।

(5) शत्रुओं को परास्त करने वाले–लक्ष्मण अपने पराक्रम से, अपने बाहुबल से और अपने युद्धकौशल से शत्रु पर विजय प्राप्त करते हैं। यद्यपि वे यज्ञ-भूमि में नि:शस्त्र मेघनाद का वध करते हैं, परन्तु मेघनाद को मारने की शक्ति भी केवल उन्हीं में थी। राम उनकी पीठ ठोंकते हुए कहते हैं-

मैं जानता था तुम्हीं मार सकते हो मेघनाद को।

(6) मानवीय गुणों के भण्डार-लक्ष्मण के व्यक्तित्व में मानवीय गुण विशेष रूप से भरे पड़े हैं। कवि के शब्दों में-

निशि दिन क्षमा में क्षिति बसी, गम्भीरता में सिन्धु था।
था धीरता में अद्रि, यश में खेलता शरदिन्दु था॥
थी बोल में सुन्दर सुधा, उर में दया का वास था।
था तेज में सूरज, हँसी में चाँद का उपहास था।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि लक्ष्मण परम शीलवान, विनम्र, पराक्रमी, अतुल शक्तिसम्पन्न (UPBoardSolutions.com) एवं अजेय योद्धा थे। वस्तुतः नायक होने के लिए जितने भी गुण किसी व्यक्ति में होने चाहिए, वे सभी गुण लक्ष्मण में मौजूद हैं। वे ‘तुमुल खण्डकाव्य के नायक एवं मानवमात्र के लिए आदर्श हैं।

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प्रश्न 18
‘तुमुल खण्डकाव्य के आधार पर प्रतिनायक मेघनाद का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 11, 12, 13, 14, 15 |
या
“तुमुल’ खण्डकाव्य में नायक लक्ष्मण के समान प्रबल एवं प्रभावशाली मेघनाद का चरित्र है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य में कौन-सा पात्र आपको सर्वप्रिय है? उसकी चारित्रिक विशेषताएँ संक्षेप में लिखिए। [2010, 11, 14]
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य में लक्ष्मण-मेघनाद की वीरता और पराक्रम को उजागर किया गया है। दोनों में से किसकी वीरता आपको सर्वाधिक प्रभावित करती है ? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर मेघनाद की चरित्रगत विशेषताएँ लिखिए। [2015]
उत्तर
श्री श्यामनारायण पाण्डेय द्वारा विरचित ‘तुमुल’ नामक खण्डकाव्य में मेघनाद प्रमुख पात्र है। उसका व्यक्तित्व भी लक्ष्मण के समान ही प्रभावशाली है। वह भी लक्ष्मण के समान ही शक्ति, शील और सौन्दर्य का आगार है। वह अपने चरित्र द्वारा पाठकों को अपनी (UPBoardSolutions.com) ओर आकृष्ट किये रहता है। इस खण्डकाव्य से उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं|

(1) सौन्दर्यवान् एवं प्रभावशाली-मेघनाद मेघ के समान वर्ण वाला सुन्दर एवं शक्तिसम्पन्न था। वह रावण का पुत्र था। उसके सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कवि कहता है

महारथी प्रसिद्ध था, गुणी विवेक-बद्ध था।
सुदेश था सुकेश था, नितान्त रम्य वेष था।

नीलगगन में चन्द्रमा की कान्ति के समान उसका आभामय मुकुट था। उसका उन्नत ललाट, पुष्ट वक्षस्थल और प्रलम्ब भुजाएँ उसके व्यक्तित्व की शोभा बढ़ाने वाली थीं। उसके मुख-मण्डल पर ऐसा ओज तथा कान्ति है कि बड़े-बड़े वीर पुरुष उसे देखते ही रह जाते हैं। उसके तेजवान् रूप को देखकर अन्य वीरों की दशा का वर्णन कवि ने इस प्रकार किया है–

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जो वीर थे बैठे वहाँ, वे टक-टक लखने लगे।

(2) पितृ-आज्ञापालक-मकराक्ष का वध हो जाने पर रावण अत्यन्त शोकाकुल हो उठा था। उसने मेघनाद को बुलाकर उसे मकराक्ष की मृत्यु का बदला राम-लक्ष्मण से लेने का आदेश दिया। मेघनाद पिता के आदेश को सुनते ही विजय की प्रतिज्ञा करता हुआ युद्ध के लिए प्रस्थान करता है। पिता की आज्ञा का पालन करना वह अपना कर्त्तव्य मानता है तथा युद्ध में जाने से पूर्व पिता के चरण स्पर्श भी करता है।

(3) अतुल पराक्रमी रावण को अपने पुत्र मेघनाद के पराक्रम पर गर्व है। मकराक्ष की मृत्यु का बदला लेने के लिए वह केवल मेघनाद को ही उपयुक्त मानता है और कहता है

हे तात! तेरी शक्तियों का अन्त है मिलता नहीं।
घमसान में भी पुत्र तेरा, बाल तक हिलता नहीं।

जिस समय वह युद्ध के लिए प्रस्थान करता है, पवन और पर्वतों में कम्पन, पृथ्वी में शोक एवं सूर्य में त्रास व्याप्त हो जाता है। वृक्ष अपने-आप गिरने लगते हैं और बड़े-बड़े धैर्यशाली वीरों का कलेजा दहलने लगता है। वह रघुकुल के वंशजों की युद्ध-नीति की कटु आलोचना करता (UPBoardSolutions.com) है। वह अधर्म युद्ध और लक्ष्मण की कुत्सित वीरता से घृणा करता है। मरणावस्था में पड़ा हुआ वह लक्ष्मण की वीरता को धिक्कारता हुआ कहता है|

जीते मुझे, पर आपकी इस जीत में ही हार है।
रघुवंश की रणनीति पर, धिक्कार सौ-सौ बार है।

(4) यज्ञनिष्ठ-मेघनाद की यज्ञ में महती निष्ठा है। वह शत्रु पक्ष पर विजय प्राप्त करने के लिए। केवल अपने बल का ही अभिमान नहीं करता, वरन् आशीर्वाद पाने के लिए देवताओं को प्रसन्न करना भी अत्यन्त आवश्यक मानता है। युद्ध में प्रस्थान करने से पूर्व यज्ञ करता है तथा लक्ष्मण के मूच्छित होने के बाद युद्ध में अजेय होने के लिए भी यज्ञानुष्ठान करता है। यज्ञ करते समय जब लक्ष्मण अपने तीक्ष्ण बाणों के प्रहार से उसे घायल करते हैं, तब भी वह यज्ञ से उठता नहीं है।

(5) आत्मविश्वासी तथा अभिमानी–मेघनाद को अपने पराक्रम, शौर्य तथा युद्ध-कौशल पर पूर्ण विश्वास है, तभी तो वह अपने पिता से कहता है कि वह युद्ध में लक्ष्मण को परास्त कर देगा और वह ऐसा करके दिखाता भी है। उसकी गर्व से भरी बातों को सुनकर सभी भयभीत हो जाते हैं। युद्ध में लक्ष्मण की बातों को वह बड़े ध्यान से सुनता है और फिर व्यंग्यपूर्वक हँस देता है। ऐसा करके वह अपने अभिमान को प्रकट करता है। कवि ने उसके इस भाव का चित्रण इस प्रकार किया है-

जो जो कहा उसको उन्होंने, ध्यान से तो सुन लिया।
पर गर्व से घननाद ने, सौमित्र को लख हँस दिया।

(6) शिष्ट एवं विवेकशील–युद्ध में लक्ष्मण की विनम्र वाणी से मेघनाद अत्यन्त प्रभावित होता है। वह विनम्रता से लक्ष्मण से युद्ध का दान माँगता है-

मैं माँगता हूँ भीम रण का, दान मुझको दीजिए।
चैतन्य होकर तुमुल संगर, आप मुझसे कीजिए।

यज्ञ करते समय लक्ष्मण द्वारा घायल कर दिये जाने पर वह तुरन्त (UPBoardSolutions.com) आक्रमण के रहस्य को जान जाता है। और अपने विवेक से विभीषण को ही दोषी ठहराता है। अपने शील स्वभाव के कारण वह लक्ष्मण के कार्यों पर संकेत करता हुआ कहता है कि-

सम्मुख समर में हारने पर, यह नया संग्राम है।।
योद्धा न कर सकता कभी, इतना घृणास्पद काम है॥

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इस प्रकार मेघनाद अत्यन्त सौन्दर्यशाली, प्रतिभावान्, पित्राज्ञापालक, अतुल पराक्रमी, यज्ञनिष्ठ, आत्मविश्वासी और विवेकशील है। वह लक्ष्मण के वीर-चरित्र की असलियत उतारता हुआ तीक्ष्ण व्यंग्य करता है, जिससे लक्ष्मण स्वयं भी अपने कार्य पर लज्जित हो शीश झुका लेते हैं। यही कारण है कि लक्ष्मण की विजय की अपेक्षा मेघनाद की पराजय अधिक प्रभावी हो गयी है। कवि की लेखनी भी यहाँ प्रतिनायक की श्रेष्ठता स्थापित हो जाने के कारण किंचित् मौन हो रही है

प्रियमाण मरता है, बहाना ढूंढ़ लेता काल है।
पाठक न कुछ सोचें, यही घननाद काल है।

प्रश्न 19
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर राम के चरित्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर
‘तुमुल’ खण्डकाव्य में राम के चरित्र की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं’
(1) वीर योद्धा-राम अतुलित बलशाली हैं, जिससे भी वे युद्ध करते हैं अवश्य ही विजयी होते हैं। उनके द्वारा मकराक्ष युद्ध में मारा जाता है।

(2) हृदय के कोमल-लक्ष्मण जब मेघनाद की शक्ति लगने से मूर्च्छित हो जाते हैं, तब राम व्याकुल होकर आँसू बहाते हैं और करूण विलाप करते हैं मैं जी सकतुम बिना, तुम बाल भक्त अनन्य हो।

(3) बन्धुस्नेही–रम्मको लक्ष्मण से अनन्य प्रेम था। वे लक्षण का यश (UPBoardSolutions.com) चाहते थे। वे लक्ष्मण की विजय का समाचार सुनने को व्यग्र थे था-अग्र सुनने के लिए, निज बन्धु जय संवाद को। वे लक्ष्मण को आशीष देते हैं और उनके लिए विलाप भी करते हैं।

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(4) भक्त का हठ मानने वाले–यज्ञरत मेघनाद को नि:शस्त्र मारने का आदेश देना, निश्चित ही एक अनीतिपूर्ण कार्य था; फिर भी भक्त विभीषण के हठ की पूर्ति करने के लिए वे सौमित्र को आज्ञा देते हैं-

कुछ देर सोच-विचार कर, भगवान ने यह तय किया।
रखना उचित है भक्त का हठ, तय यही निश्चय किया।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि राम वीर योद्धा, बन्धु-स्नेही, हृदय के कोमल तथा भक्त का हठ मानने वाले चरित्र के रूप में खण्डकाव्य में चित्रित होते हैं।

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 7 मुक्ति -दूत (खण्डकाव्य)

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These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 7 मुक्ति -दूत (खण्डकाव्य).

(खण्डकाव्य)

प्रश्न 1
डॉ० राजेन्द्र मिश्र द्वारा रचित ‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य का कथानक संक्षेप में लिखिए। [2010, 11, 12, 18]
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य का सारांश लिखिए। [2012, 13, 15]
या
‘मुक्ति-दूत’ की कथावस्तु या कथासार अपने शब्दों में लिखिए। [2012, 13, 14, 15, 17, 18]
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य का कथानक संक्षेप में लिखिए। [2016, 17]
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के प्रतिपाद्य विषय (उद्देश्य) को समझाइए। [2018]
उत्तर
डॉ० राजेन्द्र मिश्र द्वारा रचित ‘मुक्ति-दूत’ नामक खण्डकाव्य गाँधीजी के जीवन-दर्शन का एक पक्ष चित्रांकित करता है। इस कथानक की घटनाएँ सत्य एवं ऐतिहासिक हैं। कवि ने इसके कथानक को पाँच सर्गों में विभक्त किया है।

प्रथम सर्ग में कवि ने महात्मा गाँधी के अलौकिक एवं मानवीय स्वरूप की विवेचना की है। पराधीनता के कारण उस समय भारत की दशा अत्यधिक दयनीय थी। आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक सभी परिस्थितियों में भारत (UPBoardSolutions.com) का शोषण हो रहा था। अवतारवाद की धारणा से प्रभावित होकर कवि कहता है कि जब संसार में पाप और अत्याचार बढ़ जाता है, तब ईश्वर किसी महापुरुष के रूप में जन्म लेता है। अन्यायी रावण से मानवता को मुक्ति दिलाने के लिए राम का और अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए श्रीकृष्ण का अवतार हुआ। इसी क्रम में भारत-भूमि के परित्राण के लिए काठियावाड़ प्रदेश में पोरबन्दर नामक स्थान पर करमचन्द के यहाँ मोहनदास के नाम से एक महान् विभूति का जन्म हुआ था।

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महात्मा गाँधी के दुर्बल शरीर में महान् आत्मिक बल था। भारत को स्वतन्त्र कराने के लिए उन्होंने तीस वर्षों तक भारत का जैसा नेतृत्व किया, वह भारतीय इतिहास में सदा स्मरणीय रहेगा। इनके अथक प्रयासों के फलस्वरूप ही भारतवर्ष को स्वतन्त्रता प्राप्त हो सकी।

‘मुक्ति-दूत’ के द्वितीय सर्ग में गाँधीजी की मनोदशा का चित्रण किया गया है। उनका हृदय यहाँ के निवासियों की दयनीय दशा को देखकर व्यथित और उनके उद्धार के लिए चिन्तित था।

एक दिन गाँधीजी स्वप्न में अपनी माता को देखते हैं। माताजी उन्हें समझा रही हैं कि जो तुम्हारा थोड़ा भी भला करे, तुम उसका अधिकाधिक हित करो; गिरते को सहारा दो; केवल अपना नहीं, औरों का भी पेट भरो। माँ का स्मरण करके गाँधीजी (UPBoardSolutions.com) का हृदय भर आया। उन्होंने सोचा-माँ ने सही कहा है, मैं मातृभूमि के बन्धन काढूँगा। मैं कोटि-कोटि दलित भाइयों की रक्षा करूंगा।

एक बार गाँधीजी ने स्वप्न में श्री गोखले (गोपाल कृष्ण) को देखा। उन्होंने गाँधीजी को निरन्तर स्वतन्त्रता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी और यह आशा प्रकट की कि गाँधीजी ही भारतवर्ष के मुक्ति-दूत बनेंगे

जो बिगुल बजाया है तुमने, दक्षिण अफ्रीका में प्रियवर।
देखो उसकी गति क्षीण न हो, भारतमाता के पुत्र-प्रवर ।।

‘तृतीय सर्ग में अंग्रेजों की दमन-नीति के प्रति गाँधीजी का विरोध व्यक्त हुआ है। देश में अंग्रेजों का शासन था और उनके अत्याचार चरम-सीमा पर थे। भारतीय बेबसी और अपमान की जिन्दगी जी रहे थे। केवल वही लोग सुखी थे, जो अंग्रेजों की चाटुकारिता करते थे। जब उनकी नीति से अंग्रेजों का हृदय नहीं बदला, तब उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध ‘सविनय सत्याग्रह’ के रूप में संघर्ष छेड़ दिया।

गाँधीजी ने प्रथम विश्वयुद्ध के समय देशवासियों से अंग्रेों की सहायता करने का आह्वान किया, परन्तु युद्ध में विजय पाने के बाद अंग्रेजों ने ‘रॉलेट ऐक्ट’ पास करकेचना अत्याचारी शिकंजा और अधिक कड़ा कर दिया। गाँधीजी ने अंग्रेजों के इस काले कानून का उग्र (UPBoardSolutions.com) विरोध किया। उनके साथ जवाहरलाल नेहरू, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, पटेल आदि नेता संघर्ष में सम्मिलित हो गये। इन्हीं दिनों जलियाँवाला बाग की अमानवीय घटना घटित हुई।

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यह दृश्य देखकर गाँधीजी का हृदय दहल उठा और उनकी आँखों में खून उतर आया। इस युग-पुरुष ने क्रोध का जहर पीकर सभी को अमृतमय आशा प्रदान की और यह निश्चय कर लिया कि अंग्रेजों को अब भारत में अधिक दिनों तक नहीं रहने देंगे।

चतुर्थ सर्ग में भारत की स्वतन्त्रता के लिए गाँधीजी द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलनों का वर्णन है। जलियाँवाला बाग की नृशंस घटना हो जाने पर गाँधीजी ने अगस्त, सन् 1920 ई० में देश की जनता का ‘असहयोग आन्दोलन’ के लिए आह्वान किया। लोगों ने सरकारी उपाधियाँ लौटा दीं, विदेशी सामान का बहिष्कार किया। छात्रों ने विद्यालय, वकीलों ने कचहरियाँ और सरकारी कर्मचारियों ने नौकरियाँ छोड़ दीं। इस आन्दोलन से सरकार महान् संकट और निराशा के भंवर में फंस गयी।

असहयोग आन्दोलन को देखकर अंग्रेजों को निराशा हुई। उन्होंने भारतीयों पर ‘साइमन कमीशन’ थोप दिया। ‘साइमन कमीशन के आने पर गाँधीजी के नेतृत्व में सारे भारत में इसका विरोध हुआ। परिणामस्वरूप सरकार हिंसा पर उतर आयी। पंजाब केसरी लाला लाजपत राय पर निर्मम लाठी-प्रहार हुआ, जिसके फलस्वरूप देश भर में हिंसक क्रान्ति फैल गयी। गाँधीजी देशवासियों को समझा-बुझाकर मुश्किल से अहिंसा के मार्ग पर ला सके।

गाँधीजी ने 79 व्यक्तियों को साथ लेकर नमक कानून तोड़ने के लिए डाण्ड़ी की पैदल यात्रा की। अंग्रेजों ने गाँधीजी को बन्दी बनाया तो प्रतिक्रियास्वरूप देश भर में सत्याग्रह छिड़ गया।

बापू की एक ललकार पर देश भर में अंग्रेजो भारत छोड़ो आन्दोलन फैल गया। सब जगह एक ही स्वर सुनाई पड़ता था-‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’। स्थान-स्थान पर सभाएँ की गयीं, विदेशी वस्त्रों की होलियाँ जलायी गयीं, पुल तोड़ दिये गये, रेलवे लाइनें उखाड़ दी गयीं, थानों में आग लगा दी गयी, बैंक लुटने लगे, अंग्रेजों को शासन करना दूभर हो गया।
मुक्ति-दूत के पञ्चम सर्ग में स्वतन्त्रता-प्राप्ति तक की प्रमुख घटनाओं का वर्णन है। कारागार में गाँधीजी के अस्वस्थ होने के कारण सरकार ने उन्हें मुक्त कर दिया। इंग्लैण्ड के चुनावों में मजदूर दल की सरकार बनी। फरवरी, सन् 1947 ई० में प्रधानमन्त्री एटली ने जून, 1947 ई० से पूर्व अंग्रेजों के भारत छोड़ने की घोषणा की। भारत में हर्षोल्लास छा गया। मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान बनाने की अपनी मांग पर अड़े रहे। 15 अगस्त, सन् 1947 ई० को भारत स्वतन्त्र हो गया और देश की बागडोर जवाहरलाल नेहरू के हाथों में आ गयी। गाँधीजी ने अनुभव किया कि उनका स्वतन्त्रता का लक्ष्य पूर्ण हो गया; अतः वे संघर्षपूर्ण (UPBoardSolutions.com) राजनीति से अलग हो गये।

खण्डकाव्य के अन्त में गाँधीजी भारतवर्ष के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं और इसी के साथ खण्डकाव्य की कथा समाप्त हो जाती है।

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प्रश्न 2
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए। [2009, 13]
या
‘मुक्ति-दूत’ के प्रथम सर्ग के आधार पर गाँधीजी के लोकोत्तर गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
प्रथम सर्ग में कवि ने महात्मा गाँधी के अलौकिक एवं मानवीय स्वरूप की विवेचना की है। पराधीनता के कारण उस समय भारत की दशा अत्यधिक दयनीय थी। आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक सभी परिस्थितियों में भारत का शोषण हो रहा था। कवि अवतारवाद की धारणा से प्रभावित होकर कहता है। कि जब संसार में पाप और अत्याचार बढ़ जाता है, तब ईश्वर किसी महापुरुष के रूप में जन्म लेता है। अन्यायी रावण से मानवता को मुक्ति दिलाने के लिए राम का और अत्याचारी (UPBoardSolutions.com) कंस का विनाश करने के लिए श्रीकृष्ण का अवतार हुआ। वही ईश्वर कभी गौतम, कभी महावीर, कभी ईसा मसीह, कभी हजरत मुहम्मद, कभी गुरु गोविन्द सिंह आदि महापुरुषों के रूप में अत्याचार के निवारण के लिए प्रकट होता रहता है। उसके अनेक रूप और नाम होते हैं। लोग उसे पहचान नहीं पाते; क्योंकि वह मनुष्य के समान आचरण करता है। उसके आचरण से लोगों के कष्ट दूर हो जाते हैं। उसके त्याग और बलिदान से लोग सन्मार्ग पर चलने को प्रेरित होते हैं। अमेरिका में लिंकन और फ्रांस में नेपोलियन के रूप में वही दिव्य शक्ति थी। इसी क्रम में भारत-भूमि के परित्राण के लिए काठियावाड़ प्रदेश में पोरबन्दर नामक स्थान पर करमचन्द के यहाँ मोहनदास के नाम से एक महान् विभूति का जन्म हुआ था।

महात्मा गाँधी के दुर्बल शरीर में महान् आत्मिक बल था। उन्होंने अपने बीस वर्ष के अफ्रीका प्रवास में वहाँ के भारतीय मूल निवासियों पर होने वाले अत्याचारों का विरोध किया था। भारत लौटकर यहाँ के शोषित, दलित, दीन-हीन हरिजनों की दशा देखकर (UPBoardSolutions.com) गाँधीजी व्याकुल हो उठे थे। गाँधीजी को हरिजनों और हिन्दुस्तान से अगाध प्रेम था। हरिजनों का उद्धार करने और भारत को स्वतन्त्र कराने के लिए उन्होंने तीस वर्षों तक भारत का जैसा नेतृत्व किया, वह भारतीय इतिहास में सदा स्मरणीय रहेगा। इनके अथक प्रयासों के फलस्वरूप ही भारतवर्ष को स्वतन्त्रता प्राप्त हो सकी।

प्रश्न 3
‘मुक्ति-दूत’ के द्वितीय सर्ग का सारांश लिखिए। [2009, 11, 14, 15, 17]
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
या
“मैं घृणा-द्वेष की यह आँधी, न चलने दूंगा न चलाऊँगा। या तो खुद ही मर जाऊँगा, या इसको मार भगाऊँगा।।”
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य की उक्त पंक्तियों के आधार पर नायक की मनोदशा का वर्णन कीजिए। या । मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य में किसकी मुक्ति का वर्णन है सोदाहरण स्पष्ट कीजिए। (2010)
उत्तर
‘मुक्ति-दूत’ के द्वितीय सर्ग में गाँधीजी की मनोदशा का चित्रण किया गया है। उनका हृदय यहाँ के निवासियों की दयनीय दशा को देखकर व्यथित और उनके उद्धार के लिए चिन्तित था।

एक दिन गाँधीजी स्वप्न में अपनी माता को देखते हैं। माताजी उन्हें समझा रही हैं कि जो तुम्हारा थोड़ा भी भला करे, तुम उसका अधिकाधिक हित करो; गिरते को सहारा दो; केवल अपना नहीं, औरों का भी पेट भरो। माँ का स्मरण करके गाँधीजी का हृदय भर आया। उन्होंने सोचा—माँ ने सही कहा है, मैं मातृभूमि के बन्धन काढूंगा। मैं कोटि-कोटि दलित भाइयों की रक्षा करूंगा। जब तक मेरे देश को एक बच्चा भी नंगा और भूखा रहेगा, मैं चैन (UPBoardSolutions.com) से नहीं सोऊँगा। मेरे देश के निवासी अपमान भरा जीवन जी रहे हैं। मनुष्य-मनुष्य का तथा धनी-निर्धन का यह घृणित भेद मिटाना ही होगा। हरिजनों की दुर्दशा को देखकर उनका हृदय क्षोभ से जलने लगता है। हम सभी ईश्वर की सन्तान हैं, उनमें भेद कैसा? गुरु वशिष्ठ ने निषाद को हृदय से लगा लिया था, राम ने शबरी के जूठे बेर खाये थे। हरिजन सत्यकाम को गौतम बुद्ध ने शिक्षा दी थी। मेरा तो मत है कि हरिजन के स्पर्श से किसी मन्दिर की पवित्रता नष्ट नहीं होती। ये भी अपने भाई हैं, हमें चाहिए कि हम इन्हें हृदय से लगाकर प्यार करें।

गाँधीजी ने हरिजनों को आश्रम में रहने के लिए आमन्त्रित किया। इस पर कुछ लोगों ने रुष्ट होकर आश्रम के लिए चन्दा देने से इनकार कर दिया। आश्रम के प्रबन्धक मगनलाल ने जब गाँधीजी को बताया कि हरिजनों को आश्रम में रखकर आपने अच्छा नहीं किया, तब गाँधीजी ने कठोर स्वर में कहा–

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असवर्णो की बस्ती में भी रह लँगा उनके संग भले।।
करके मजदूरी खा लूंगा, सो लँगा सुख से वृक्ष तले ॥
पर मगनलाल ! मेरे जीते, अस्पृश्य न कोई हो सकता।
समता की उर्वर धरती में, कटुता के बीज न बो सकता ॥

पहले देश स्वतन्त्र हो जाये, फिर मुझे इस छुआछूत से ही लड़ना है। गाँधीजी के इस उत्तर से आश्रमवासियों ने अनुभव किया कि गाँधीजी असाधारण मनुष्य हैं।

एक बार गाँधीजी ने स्वप्न में श्री गोखले (गोपाल कृष्ण) को देखा। उन्होंने गाँधीजी को निरन्तर (UPBoardSolutions.com) स्वतन्त्रता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी और यह आशा प्रकट की कि गाँधीजी ही भारतवर्ष के मुक्ति-दूत बनेंगे

जो बिगुल बजाया है तुमने, दक्षिण अफ्रीका में प्रियवर।
देखो उसकी गति क्षीण न हो, भारतमाता के पुत्र-प्रवर॥

प्रश्न 4
‘मुक्ति-दूत’ काव्य के तृतीय सर्ग की कथा का सार लिखिए। [2009, 12, 16, 17]
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए। [2010, 12, 13, 14, 15, 17]
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के आधार पर जलियाँवाला बाग की घटना का वर्णन कीजिए। [2009]
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के किस सर्ग ने आपको सर्वाधिक प्रभावित किया है और क्यों ? संक्षेप में अपने विचार व्यक्त कीजिए। [2011]
उत्तर
तृतीय सर्ग में अंग्रेजों की दमन-नीति के प्रति गाँधीजी का विरोध व्यक्त हुआ है। देश में अंग्रेजों । का शासन था और उनके अत्याचार चरम-सीमा पर थे। भारतीय बेबसी और अपमान की जिन्दगी जी रहे थे। केवल वही लोग सुखी थे, जो अंग्रेजों की चाटुकारिता करते थे। गाँधीजी भारत की दुर्दशा का कारण भली-भाँति समझते थे, इसके बाद भी उन्होंने अंग्रेजों के प्रति पहले नम्रता की नीति अपनायी। वे उनको जनता के दु:ख-दर्द बताकर कुछ विनम्र बनाना चाहते थे, परन्तु जब उनकी नीति से अंग्रेजों का हृदय नहीं बदला, तब उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध ‘सविनय सत्याग्रह’ के रूप में संघर्ष छेड़ दिया।

गाँधीजी ने प्रथम विश्व युद्ध के समय देशवासियों से अंग्रेजों की सहायता करने का आह्वान किया, जिससे अंग्रेजों का हृदय भारतीयों के प्रति कोमल हो, परन्तु युद्ध में विजय पाने के बाद अंग्रेजों ने ‘रॉलेट ऐक्ट पास करके अपना अत्याचारी शिकंजा और अधिक कड़ा कर दिया। गाँधीजी ने अंग्रेजों के इस काले कानून का उग्र विरोध किया। उनके साथ तेज बहादुर सपू, जवाहरलाल नेहरू, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, जिन्ना, पटेल आदि नेता संघर्ष में सम्मिलित हो गये। इन्हीं दिनों जलियाँवाला बाग की अमानवीय घटना घटित हुई। वैशाखी के अवसर पर अमृतसर के इस बाग में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध प्रस्ताव पारित (UPBoardSolutions.com) करने के लिए जनता एकत्र हुई थी कि जनरल डायर नामक अंग्रेज सेनानायक ने निहत्थी भारतीय जनता पर अन्धाधुन्ध साढ़े सोलह सौ चक्र गोलियों की वर्षा कर उसे भून डाला। डायर की इस नृशंस पशुता का शिकार माताओं, विधवाओं, बिलखते बच्चों को भी होना पड़ा-

दस मिनट गोलियाँ लगातार, साढ़े सोलह सौ चक्र चलीं ।
जल मरे सहस्राधिक प्राणी, लाशों से संकुल हुई गली ॥
चंगेज, हलाकू, अब्दाली, नादिर, तैमूर सभी हारे ।
जनरल डायर की पशुता से, पशुता भी रोई मन मारे ।।

यह दृश्य देखकर गाँधीजी का हृदय दहल उठा और उनकी आँखों में खून उतर आया। इस युग-पुरुष ने क्रोध का जहर पीकर सभी को अमृतमय आशा प्रदान की और यह निश्चय कर लिया कि अंग्रेजों को अब भारत में अधिक दिनों तक नहीं रहने देंगे।

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प्रश्न 5
‘मुक्ति-दूत’ काव्य के चतुर्थ सर्ग की घटनाओं का सार अपने शब्दों में लिखिए। [2010, 11]
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य का चौथा सर्ग गाँधीजी के कर्मयोग का प्रतीक है। सिद्ध कीजिए। [2010]
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के आधार पर चतुर्थ एवं पंचम सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए। [2011]
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग की कथावस्तु को लिखिए। [2015, 16, 17]
उत्तर
चतुर्थ सर्ग में भारत की स्वतन्त्रता के लिए गाँधीजी द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलनों का वर्णन है। जलियाँवाला बाग की नृशंस घटना हो जाने पर गाँधीजी ने अगस्त सन् 1920 ई० में देश की जनता को ‘असहयोग आन्दोलन’ के लिए आह्वान किया। लोगों ने सरकारी उपाधियाँ लौटा दीं, विदेशी सामान का बहिष्कार किया। छात्रों ने विद्यालय, वकीलों ने कचहरियाँ और सरकारी कर्मचारियों ने नौकरियाँ छोड़ दीं। इस आन्दोलन से सरकार महान् संकट और निराशा के भंवर में फँस गयी।

असहयोग आन्दोलन को देखकर अंग्रेजों को निराशा हुई। उन्होंने भारतीयों पर ‘साइमन कमीशन थोप दिया। ‘साइमन कमीशन’ के आने पर गाँधीजी के नेतृत्व में सारे भारत में इसका विरोध हुआ। लाला लाजपत राय, सुभाषचन्द्र बोस, डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, (UPBoardSolutions.com) जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, खान अब्दुल गफ्फार खान ने गाँधीजी के स्वर में स्वर मिलाकर साइमन कमीशन का विरोध किया। परिणामस्वरूप सरकार हिंसा पर उतर आयी। पंजाब केसरी लाला लाजपत राय पर निर्मम लाठी-प्रहार हुआ, जिसके फलस्वरूप देशभर में हिंसक क्रान्ति फैल गयी। गाँधीजी देशवासियों को समझा-बुझाकर मुश्किल से अहिंसा के मार्ग पर ला सके।

गाँधीजी ने 79 व्यक्तियों को साथ लेकर नमक कानून तोड़ने के लिए डाण्डी की पैदल यात्रा की। अंग्रेजों ने गाँधीजी को बन्दी बनाया तो प्रतिक्रियास्वरूप देशभर में सत्याग्रह छिड़ गया। द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारम्भ में अंग्रेजों ने समझौता करना चाहा, परन्तु गाँधीजी की आजादी की माँग न मानने के कारण समझौता , भंग हो गया। नमक का कानून तोड़ने, डाण्डी यात्रा, सविनय अवज्ञा आन्दोलन व साइमन कमीशन के विरोध में गाँधीजी के अटूट साहस और नायकत्व को देखकर अंग्रेजी सरकार चौंक गयी। वह स्वयं अपने द्वारा किये गये अत्याचारों के प्रति चिन्तित थी।

बापू की एक ललकार पर देश भर में अंग्रेजो भारत छोड़ो आन्दोलन फैल गया। सब जगह एक ही स्वर सुनाई पड़ता था-‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’। स्थान-स्थान पर सभाएँ की गयीं, विदेशी वस्त्रों की होलियाँ जलायी गयीं, पुल तोड़ दिये गये, रेलवे लाइनें उखाड़ दी गयीं, थानों में आग लगा दी गयी, बैंक लुटने लगे, अंग्रेजों को शासन करना दूभर हो गया। उन्होंने दमन-चक्र चलाया तो गाँधीजी ने 21 दिन का अनशन’ कर दिया। इन्हीं दिनों कारागार से गाँधीजी की पत्नी की मृत्यु हो गयी। आजीवन पग-पग पर साथ देने वाली जीवन-संगिनी के वियोग से बापू की वेदना का समुद्र उमड़ पड़ा। गाँधीजी की आँखों से आँसू बहने लगे। वे इस अप्रत्याशित आघात से (UPBoardSolutions.com) व्याकुल अवश्य हुए, परन्तु पत्नी के स्वर्गवास ने अंग्रेजों के विरुद्ध उनके मनोबल को और अधिक दृढ़ कर दिया। कवि इसका चित्रण करता हुआ कहता है–

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बूढ़े बापू की आहों से, कारा की गूंजी दीवारें।
बन अबाबील चीत्कार उठीं, थर्राई ऊँची मीनारें।

प्रश्न 6
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के पञ्चम सर्ग या अन्तिम सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए। [2012, 13, 14]
उत्तर
मुक्ति-दूत के पञ्चम सर्ग में स्वतन्त्रता-प्राप्ति तक की प्रमुख घटनाओं का वर्णन है। कारागार में गाँधीजी के अस्वस्थ होने के कारण सरकार ने उन्हें मुक्त कर दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व की रजिनीति बदलने लगी। इंग्लैण्ड के चुनावों में मजदूर दल की सरकार बनी। फरवरी, सन् 1947 ई० में प्रधानमन्त्री एटली ने जून 1947 ई० से पूर्व अंग्रेजों के भारत छोड़ने की घोषणा की। भारत में हर्षोल्लास छा गया। तब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के नाम से अपना अलग राष्ट्र बनाने की माँग की। गाँधीजी को भारत के विभाजन से महान् दुःख हुआ। मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान बनाने की अपनी माँग पर अड़े रहे। नोआखाली (UPBoardSolutions.com) और बिहार में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे। गाँधीजी ने लोगों को समझा-बुझाकर शान्त किया। 15 अगस्त, सन् 1947 ई० को भारत स्वतन्त्र हो गया और देश की बागडोर जवाहरलाल नेहरू के हाथों में आ गयी। गाँधीजी ने अनुभव किया कि उनका स्वतन्त्रता का लक्ष्य पूर्ण हो गया; अतः वे संघर्षपूर्ण राजनीति से अलग हो गये। उन्होंने कहा-

लड़ाई मेरी हुई समाप्त, विदा ओ जीवन के जंजाल।
नया गाँधी बन तुम्हें स्वदेश करेगा प्यार जवाहरलाल ॥

खण्डकाव्य के अन्त में गाँधीजी भारतवर्ष के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं और इसी के साथ खण्डकाव्य की कथा समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 7
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के आधार पर काव्य के नायक (प्रमुख पात्र) महात्मा गाँधी का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के नायक की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2016, 18]
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि गाँधीजी को मुक्ति-दूत क्यों कहा गया है ? उनके चारित्रिक गुणों पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 11, 14]
या
‘मुक्ति-दूत’ के आधार पर गाँधीजी के लोकोत्तर गुणों का वर्णन कीजिए। [2010]
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य में मुक्ति-दूत कौन हैं ? उनके चरित्र की तीन विशेषताएँ बताइए।
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के आधार पर गाँधी जी की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2015]
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के पुरुष पात्र के व्यक्तित्व की विशेषताएँ लिखिए। [2015, 17]
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के उस पात्र का चरित्र-चित्रण लिखिए जिसने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया है। [2016, 17]
उत्तर
डॉ० राजेन्द्र मिश्र द्वारा रचित ‘मुक्ति-दूत’ नामक खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी के पावन चरित्र का वर्णन किया गया है। गाँधीजी इस खण्डकाव्य के नायक हैं। प्रस्तुत काव्य के आधार पर महात्मा गाँधी के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ दृष्टिगत होती हैं-

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(1) अलौकिक दिव्य पुरुष—कवि ने गाँधीजी को ईश्वर का अवतार बताया है जो पृथ्वी पर दु:खों का हरण करने के लिए यदा-कदा आते हैं। जिस श्रेणी में राम, कृष्ण, ईसा मसीह, पैगम्बर, बुद्ध, महावीर आदि हैं, उसी श्रेणी में कवि ने गाँधीजी को (UPBoardSolutions.com) भी रखा है। भारत में अंग्रेजों के अत्याचार बढ़ जाने पर देश को स्वतन्त्र कराने के लिए मानो स्वयं परमात्मा ने महात्मा गाँधी के रूप में जन्म लिया था। इस प्रकार मुक्ति–दूत के नायक महात्मा गाँधी साधारण पुरुष न होकर दिव्य पुरुष थे।

(2) महान् देशभक्त-गाँधीजी महान् देशभक्त थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन देश को स्वतन्त्र कराने और जनता की सेवा में लगा दिया। उनका हृदय देशवासियों की दुर्दशा देखकर व्यथित हो उठा था। उन्होंने जीवन की अन्तिम श्वास तक देश-सेवा करने का जो प्रण किया था, उसे भली प्रकार निभाया तथा सारा सुख एवं वैभव त्यागकर अपना जीवन भारत को स्वतन्त्र कराने में लगा दिया। अन्त में वे अपने देश के लिए मंगल-कामना करते हैं

रहो खुश भेरे हिन्दुस्तान, तुम्हारा पथ हो मंगल-मूल।
सदा महके वन चन्दन चारु, तुम्हारी अँगनाई की धूल।

(3) हरिजनोद्धारक-गाँधीजी असहाय और दलितों के सहायक थे। उनकी दुर्दशा देखकर उनका हृदय वेदना से भर जाता था। संसार में वे सभी को ईश्वर की सन्तान मानते थे। उनका कहना था

जिन हाथों ने संसार गढ़ा, क्या उसने हरिजन नहीं गढ़े।
तब फिर यह कैसा छुआछूत, किस गीता में पाठ पढ़े॥

गाँधीजी साबरमती आश्रम में हरिजनों को भी रखते थे। आश्रम के प्रबन्धक और (UPBoardSolutions.com) दान-दाताओं द्वारा विरोध करने पर गाँधीजी ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया-

असवर्णो की बस्ती में भी, रह लँगा उनके संग भले।
करके मजदूरी खा लूंगा, सो नँगा सुख से वृक्ष तले॥
x                                    x                               x
मैं घृणा द्वेष की यह आँधी, न चलने दूंगा, न चलाऊँगा।
या तो खुद ही मर जाऊँगा, या इसको मार भगाऊँगा ॥

गाँधीजी के जीवन का मुख्य उद्देश्य हरिजनों का उद्धार करना ही था। कवि ने स्पष्ट शब्दों में कहा है-

दलितों के उद्धार हेतु ही, तुमने झण्डा किया बुलन्द।
तीस बरस तक रहे जूझते, अंग्रेजों से अथक अमन्द।

(4) हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक-गाँधीजी साम्प्रदायिक वैर-भाव के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने स्वतन्त्रता-संग्राम में हिन्दू-मुस्लिम दोनों को साथ लिया था। उन्होंने हिन्दू और मुस्लिम एकता का अथक प्रयत्न किया। नोआखाली में हिन्दू-मुस्लिमों के साम्प्रदायिक दंगों के समय उन्होंने प्राण हथेली पर रखकर शान्ति का प्रयास किया था। वे हिन्दू-मुस्लिम को एक डाली पर खिले फूल समझते थे–

मुझे लगते हिन्दू-मुस्लिम, एक ही डाली के दो फूल।
एक ही माटी के दो रूप, एक ही जननी के दो लाल॥

(5) आर्थिक समृद्धि के पोषक–गाँधीजी ने भारत की दीन-हीन दशा को सुधारने के लिए स्वदेशी वस्त्रों का निर्माण एवं विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार, खादी एवं चरखे को प्रोत्साहन, सादा जीवन और उच्च विचार की प्रेरणा, मादक द्रव्यों का त्याग आदि अनेक प्रयत्न किये। उनका कहना था

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छोटा बच्चा भी भारत का है, एक अगर नंगा भूखा।
गाँधी को चैन कहाँ होगा, वह भी सो जाएगा भूखा॥

(6) मातृभक्त-गाँधीजी माँ के प्रति अगाध श्रद्धा और भक्ति-भावना रखते हैं। माँ को (UPBoardSolutions.com) स्वप्न में देखने पर वे सोचते हैं—’माँ जैसी कहीं नहीं ममता’ और माँ की प्रेरणा से ही देश-सेवा में जुट जाते हैं। गाँधीजी ने उदारता, दया, परोपकार, सत्यती आदि गुणों को अपनी माता से सीखा था।

(7) अहिंसा और करुणा की मूर्ति-गाँधीजी अहिंसा के पुजारी और करुणा को साकार मूर्ति थे। अंग्रेजों के संकट के समय भी वे उन कठोर शासकों से लाभ उठाना न्यायसंगत नहीं मानते थे। भारत की दयनीय दशा देखकर उनके हृदय में करुणा का सागर लहराने लगता था।

(8) भारत के मुक्ति-दूत-महात्मा गाँधी ने भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम का कुशल नेतृत्व किया। उनके तीस वर्ष के सतत प्रयासों से भारत की मुक्ति का स्वप्न पूर्ण हुआ। उनके कुशल नेतृत्व में परतन्त्रता की श्रृंखला टूटकर छिन्न-भिन्न हो गयी और भारत 15 अगस्त, 1947 ई० को स्वतन्त्र हो गया। अतः निश्चित ही वे सच्चे अर्थों में भारत के मुक्ति–दूत थे।

(9) सम्मान और पद के निर्लोभी-गाँधीजी का त्याग एवं बलिदान एक आदर्श है। उन्होंने भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए जीवनभर अनेक यातनाएँ भोगीं और संघर्ष करते रहे। भारत के स्वाधीन होने पर जब उनका लक्ष्य पूर्ण हो गया, तब उन्होंने संघर्षपूर्ण राजनीति से संन्यास ग्रहण कर लिया।

(10) मानवीय गुणों से भरपूर-गाँधीजी का चरित्र अनेक गुणों का भण्डार था। (UPBoardSolutions.com) उनमें सत्यता, दया, परोपकारे, करुणा, अहिंसा तथा देशभक्ति के गुण कूट-कूटकर भरे थे। वे विश्व-बन्धुत्व तथा भाईचारे की भावना से ओत-प्रोत थे तथा सभी धर्मों के प्रति आदर भाव रखने वाले थे।

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इस प्रकार गाँधीजी देवतुल्य मानव, स्वतन्त्रता के अग्रदूत, हरिजनों के उद्धारक, भारत को आर्थिक समृद्धि के पोषक, निर्लोभी एवं अहिंसा-प्रेमी थे। वे सत्य, अहिंसा, करुणा, प्रेम, उदारता, सहानुभूति, समता, देश-प्रेम आदि मानवीय गुणों के साकार रूप थे। वास्तव में वे भारत में एक अलौकिक पुरुष के रूप में अवतरित हुए।

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 (Section 4)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का स्थान (अनुभाग – चार)

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में भूमि-सुधार कार्यक्रमों की कमियों का उल्लेख कीजिए तथा सुधार हेतु सुझाव दीजिए। [2014]
उत्तर :
भारत में भूमि-सुधार कार्यक्रम की कमियाँ – भारत में भूमि सुधार कार्यक्रमों की प्रमुख कमियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग भूमि-सुधार कानून हैं जिससे भूमि सुधार कार्यक्रम सन्तोषजनक ढंग से लागू नहीं किया जा सका।
  2. भू-जोतों की सीमा का उचित निर्धारण नहीं हो सका क्योंकि जमींदारों ने अनियमित रूप से भूमि स्थानान्तरित की है।
  3. भूमि-सुधार कार्यक्रमों में काश्तकारों से ऊँची दर पर लगान (UPBoardSolutions.com) वसूल किया जाता है जिसका प्रभाव कृषि की उत्पादकता पर पड़ता है।
  4. भारत में भूमि सम्बन्धी दस्तावेज अधूरे हैं। भूमि स्वामित्व को लेकर चकबन्दी के दौरान नये-नये विवादों ने जन्म लिया है।
    भूमि-सुधार हेतु सुझाव–[संकेत–विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 7 देखें।

प्रश्न 2.
भारतीय कृषि में किन्हीं पाँच कृषि निविष्टियों के महत्त्व पर प्रकाश डालिए। [2012, 15]
या
कृषि निविष्टियों से क्या तात्पर्य है? भारतीय कृषि के लिए किन्हीं पाँच निविष्टियों की विस्तृत विवेचना कीजिए। [2011, 15, 17]
या
कृषि निविष्टियों से क्या तात्पर्य है ? कृषि उत्पादन बढ़ने में किन्हीं चार निविष्टियों का महत्त्व बताइए। [2010]
या
कृषि की किन्हीं छः निविष्टियों की विवेचना कीजिए। [2011, 16]
या
कृषि की किन्हीं तीन निविष्टियों का महत्त्व बताइए। [2016]
उत्तर :

कृषि निविष्टियाँ (इन्पुट्स)

कृषि भारत का प्रधान व्यवसाय है। अत: भारतीय कृषकों को कृषि उत्पादन को सम्पन्न क़रने में जिन वस्तुओं तथा सेवाओं की आवश्यकता पड़ती है, उन्हें कृषि निविष्टियाँ (Inputs) कहा जाता है। प्रमुख कृषि निविष्टियों का विवरण इस प्रकार है –

1. तकनीकी जानकारी – कृषि-कार्य की यह महत्त्वपूर्ण निविष्टि है। कृषि करने की सही तकनीकी की जानकारी शिक्षा के अनौपचारिक तरीकों से ही प्राप्त की जा सकती है। तकनीकी जानकारी के अन्तर्गत बीजों के प्रकार, उर्वरक, फसल-प्रबन्ध, भण्डारण, फसल बीमा, विपणन आदि की जानकारी आती है। खेती की आधुनिक विधियों का प्रयोग करने के लिए किसान को इन सभी की पर्याप्त जानकारी होनी आवश्यक है।

2. स्वयं का श्रम – किसान का निजी एवं उसके परिवार के सदस्यों का (UPBoardSolutions.com) श्रम भी कृषि की महत्त्वपूर्ण निविष्टि है। कभी-कभी इनकी संख्या कार्य की आवश्यकता से भी अधिक हो जाती है।

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3. भाड़े का श्रम – मजदूरी पर रखे गये श्रम को भाड़े का श्रम कहते हैं। कृषि-कार्य में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। ऐसे श्रमिकों का भारत में कोई संगठित बाजार नहीं है। फलत: भाड़े के श्रमिकों को उनके श्रम के लिए मजदूरी कम दी जाती है तथा अधिकांशतः मुद्रा के रूप में नहीं दी जाती।

4. पशुधन – बैल, गाय, भैंस आदि पशुधन हैं। पशुधन खेती के लिए बहुत ही मूल्यवान समझा जाता है। ये भी कृषि की एक महत्त्वपूर्ण निविष्टि हैं। जिस कृषक-परिवार के पास जितना अधिक पशुधन होता है, वह उतना ही अधिक सम्पन्न परिवार माना जाता है।

5. कृषि-उपकरण – कृषि-उपकरण में खेती में प्रयुक्त उपस्कर तथा मशीनें आती हैं। इस श्रेणी में लकड़ी एवं लोहे के हल जैसे परम्परागत उपकरण तथा बैलगाड़ी; जैसे-यातायात उपकरण, आधुनिक उपकरण तथा मशीनें; जैसे—नलकूप, ट्रैक्टर, यातायात के लिए तेज गति से चलने वाले ट्रक तथा तीन पहियों वाले वाहन सम्मिलित किये जाते हैं। ये भी कृषि-क्षेत्र की एक महत्त्वपूर्ण निविष्टि हैं।

6. सिंचाई – इसमें परम्परागत एवं आधुनिक दोनों प्रकार के साधन सम्मिलित हैं। यद्यपि सिंचाई के साधनों का प्रयोग सभी प्रकार की खेती के तरीकों तथा फसलों के लिए महत्त्वपूर्ण है, परन्तु विशिष्ट फसलों के उगाने में इनका बहुत अधिक महत्त्व है। खेती के परम्परागत तरीकों की अपेक्षा आधुनिक तरीके सिंचाई पर अधिक निर्भर करते हैं।

7. बीज – बीज कृषि के लिए एक महत्त्वपूर्ण निविष्टि है। कृषि में उत्पादन बीज की किस्मों पर निर्भर करता है। बीजों की कई किस्में होती हैं। कुछ बीज अधिक उपज देने वाले होते हैं। बीजों का चुनाव उनकी कीमतों तथा अन्य निविष्टियों (जल, उर्वरक आदि) पर निर्भर करता है।

8. उर्वरक एवं कीटनाशी दवाइयाँ – आधुनिक दृष्टि से ये दो महत्त्वपूर्ण निविष्टियाँ हैं। उर्वरक भूमि का उपजाऊपन बढ़ा देता है और कीटनाशी दवाइयाँ फसलों को कीड़े आदि लगने से बचाती हैं। जब इन्हें सिंचाई तथा उत्तम बीज जैसी अन्य निविष्टियों के साथ उचित मात्रा में प्रयोग किया जाता है तो ये भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाकर उत्पादन में तीव्र गति से वृद्धि करते हैं।

9. भण्डारण –भण्डारण की सुविधा से अनाज को कीड़ों तथा मौसम से नष्ट होने से बचाया जा सकता है। यह भी कृषि-क्षेत्र की एक महत्त्वपूर्ण निविष्टि है। इसकी उचित सुविधाओं के अभाव में भारत में उत्पन्न अनाज का एक बड़ा भाग प्रति वर्ष नष्ट (UPBoardSolutions.com) हो जाता है।

10. विपणन –कृषि के उत्पादन के लिए सामयिक वसूली एवं विपणन की सुविधाओं की उचित व्यवस्था करना आवश्यक है। अतः विपणन-सुविधा भी एक महत्त्वपूर्ण निविष्टि है।

11. बीमा और साख – फसलों का बीमा करवाने से फसलों की चोरी, नुकसान अथवा अन्य हानियों से पर्याप्त सीमा तक बचा जा सकता है। अत: कृषि के लिए बीमा और साख भी आवश्यक निविष्टियाँ हैं। इससे कृषि उत्पादन की अनिश्चितता पर नियन्त्रण पाया जा सकता है।

12. वित्त – कृषि में भी उत्पादक को अन्य उत्पादक क्रियाओं की तरह अपने उत्पादन के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। उत्पादन के बाद भी उसे प्रतीक्षा करनी पड़ती है जब तक कि वह बिक नहीं जाता। प्रतीक्षा की इस अवधि के दौरान उसे वित्त (साख) की आवश्यकता पड़ती है। प्रायः वित्त के लिए उसे सहकारी समितियों, साहूकारों, व्यावसायिक बैंकों व ग्रामीण बैंकों से ऋण लेना पड़ता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कृषि निविष्टियों के अन्तर्गत तकनीकी जानकारी तथा कृषि उपकरण सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनके अभाव में कृषि उत्पादन सम्भव नहीं है।

प्रश्न 3.
कृषि हेतु साख के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए कृषि साख के संस्थागत स्रोतों की विवेचना कीजिए।
या
भारत में कृषि वित्त के किन्हीं पाँच स्रोतों का वर्णन कीजिए।
या
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि वित्त के प्रमुख स्रोत कौन-कौन से हैं ?
उत्तर :
कृषि में भी उत्पादक (कृषक) को अन्य उत्पादक क्रियाओं की तरह अपने उत्पादन के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। उत्पादन के बाद भी उसे तब तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है जब तक कि उत्पादन बिक नहीं जाता। प्रतीक्षा की इस अवधि के दौरान उसे सब खर्चे; जैसे—बीज, सिंचाई, उर्वरक, भण्डारण एवं व्यक्तिगत खर्च आदि, के लिए वित्त का प्रबन्ध करना पड़ता है। इस वित्त के पाँच स्रोत निम्नलिखित हैं

1. भूस्वामी एवं व्यावसायिक साहुकार – हमारी अर्थव्यवस्था की एक समस्या यह है कि हमारे अधिकांश कृषक आर्थिक दृष्टि से इतने कमजोर हैं कि संगठित बैंक प्रणाली द्वारा सामान्य व्यावसायिक स्तर पर इन्हें ‘साख के योग्य नहीं माना जाता। किसानों का यह वर्ग बैंकिंग प्रणाली आसानी से सुलभ न हो पाने पर, भूस्वामियों और व्यावसायिक साहूकारों से अत्यन्त अनुचित शर्तों पर ऋण लेता है। सन् 1950 के दशक तक (UPBoardSolutions.com) किसानों को अपने कुल ऋण का 70% गाँव के परम्परागत साहूकारों से मिलता था, परन्तु अब यह स्थिति बदल गयी है। किसान अब सहकारी समितियों और दूसरे विकल्पों का लाभ उठा रहे हैं।

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2. व्यावसायिक बैंक – हमारे व्यावसायिक बैंकों का परम्परागत ढाँचा तो मूर्त जमानत के बदले तथा उन लोगों को ऋण देने के लिए बना है जिन्हें उनकी आय और सम्पत्ति के आधार पर ‘साख के योग्य माना जाता है। इसीलिए, बैंकिंग कभी भी ग्रामीण क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर पायी। लेकिन अब स्थिति बदल गयी है। सन् 1950 के दशक तक ऋण-प्रवाह में इनका हिस्सा 1% भी नहीं था। लेकिन यह हिस्सा अब लगभग 52% हो गया है।

3. सहकारी बैंक – सहकारी बैंकों की रचना मूलत: किसानों एवं अन्य सहकारिता की भावना पर आधारित संस्थाओं की वित्त समस्याओं के लिए की गयी थी। सन् 1950 के दशक तक इनका ऋण-प्रवाह में हिस्सा 7% से भी कम था। इन बैंकों की स्थापना ग्रामीण क्षेत्रों में सघन रूप से की गयी

4. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक – सन् 1975 ई० में भारत सरकार द्वारा यह तय किया गया कि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की एक कड़ी का निर्माण किया जाए। इनको विशेष रूप से पिछड़े एवं उन क्षेत्रों में स्थापित किया जाए जहाँ सहकारी एवं व्यावसायिक बैंक पर्याप्त रूप से नहीं पहुँच पाये हैं। इन बैंकों का झुकाव विशेष रूप से गरीब वर्ग के लोगों की साख की आवश्यकताओं को पूरा करने की ओर था। यह प्रयास भी सफल रहा और कृषि वित्त जुटाने में सहायक हुआ।

5. सहकारी समितियाँ – देश के कई भागों में किसानों की पंजीकृत समितियों ने गति पकड़ी है। ये समितियाँ अपने सदस्यों को साख-सुविधा प्रदान करती हैं। अब इनकी संख्या कई गुना बढ़ गयी है। और इन्होंने साहूकारों का स्थान भी ले लिया है। (UPBoardSolutions.com) इनकी स्थिति में इतना सुधार हुआ है कि अब सहकारी एजेन्सियों, सहकारी भूमि विकास बैंकों एवं व्यावसायिक बैंकों से मिलने वाली कुल संस्थागत साख का हिस्सा किसानों को दी जाने वाली कुल अल्पकालीन और मध्यकालीन साख में लगभग एक-तिहाई हो गया है।

प्रश्न 4.
कृषि निविष्टियों में वित्त के पाँच योगदान लिखिए।
उत्तर :
कृषि निविष्टियों में वित्त के प्रमुख योगदान निम्नलिखित हैं –

1. भाड़े का श्रम – कृषि का कार्य मौसमी होता है। किसान को खेत जोतने, बीज बोने, गुड़ाई- सिंचाई करने, फसल काटने आदि सभी कार्य समय-बद्धता के साथ करने पड़ते हैं। प्रायः ये सभी कार्य वह स्वयं नहीं कर पाता और इसके लिए भाड़े के श्रमिकों से काम लेता है। श्रमिकों को भाड़ा या मजदूरी देने में उसे वित्त-सुविधा का योगदान प्राप्त होता है।

2. कृषि-उपकरण – अब कृषि एक व्यवसाय बन गयी है। किसान अब पशुओं पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है और कृषि-उपकरण पशु-शक्ति का स्थान ले रहे हैं। इनमें टिलर, हैरो, ट्रैक्टर, थ्रेसर आदि प्रमुख हैं। इनको खरीदने में भी किसान को वित्त का योगदान प्राप्त होता है।

3. सिंचाई – सिंचाई के उपयुक्त साधन आज के किसान की आवश्यकता बन गये हैं। वर्षा पर निर्भर खेती मात्र एक जूआ साबित हुई है। अब किसान की प्राथमिकता सिंचाई की एक विश्वसनीय व्यवस्था करने में है। इसके लिए वह ट्यूबवेल या उससे पानी खींचने के लिए जेनरेटर को प्राथमिकता देता है। यह प्रबन्ध विशेषकर उन किसानों के लिए आवश्यक है जो सघन तथा द्विफसली खेती करते हैं या जिनके क्षेत्र में सिंचाई की पर्याप्त सुविधा नहीं होती। सिंचाई के प्रभावी एवं विश्वसनीय साधनों को जुटाने के लिए भी वित्त का योगदान वांछित होता है।

4. उर्वरक एवं कीटनाशी – सघन तथा द्विफसली खेती के लिए भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाये रखना। अति आवश्यक है। किसान को अपनी आवश्यकतानुसार उर्वरक व कीटनाशक दवाइयों को क्रय करना होता है। ये वस्तुएँ महँगी होती हैं और (UPBoardSolutions.com) इनके बिना किसान का काम भी नहीं चल सकता। प्राय: ये दोनों वस्तुएँ किसान को सहकारी समितियों द्वारा वित्त (साख) के रूप में उपलब्ध करायी जाती हैं।

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5. भण्डारण – किसान के उत्पाद सदैव तुरन्त ही नहीं बिक पाते। कीड़ों एवं मौसम से बचाव कर सकने वाले भण्डारण के तरीकों का लाभ उसे बाध्ये होकर उठाना पड़ता है। यहाँ उसे भण्डार-गृह का किराया देना होता है तथा वित्ते का योगदान लेना पड़ता है।

प्रश्न 5.
भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के क्या कारण हैं ? इसे सुधारने के लिए क्या उपाय किये गये हैं ?
या
भारतीय कृषि में उत्पादकता बढ़ाने के किन्हीं चार उपायों को लिखिए। [2010, 14, 15]
या
भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के पाँच कारण लिखिए। भारतीय कृषि की न्यून उत्पादकता की समस्या को दूर करने के लिए उपाय सुझाइए। [2012]
या
भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के छः कारणों को स्पष्ट कीजिए। [2012, 18]
या
भारत में कृषि उत्पादकता बढ़ाने के छः उपाय लिखिए। [2012, 15, 17]
या
भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के कोई तीन कारण लिखिए। [2013]
या
भारतीय कृषि की किन्हीं दो प्रमुख समस्याओं का उल्लेख कीजिए। [2015]
या
भारतीय कृषकों की किन्हीं छः समस्याओं का वर्णन कीजिए। [2016]
या
भारतीय कृषकों की किन्हीं चार समस्याओं का उल्लेख कीजिए। [2016, 17]
उत्तर :

भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के कारण

भारत एक कृषिप्रधान देश है। देश की लगभग 58% जनसंख्या अपनी जीविका के लिए आज भी कृषि पर आश्रित है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान होने के बावजूद यह पिछड़ी हुई अवस्था में है। अन्य देशों की तुलना में भारत में प्रति हेक्टेयर कृषि-उत्पादन बहुत कम है। इसके लिए मुख्यतया निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं –

1. कृषि जोतों का छोटा होना – भारत में कृषि जोतों का आकार बहुत छोटा है। लगभग 57% जोतों का आकार एक हेक्टेयर से भी कम है। इसके अतिरिक्त कृषि जोत विभाजित अवस्था में अर्थात् एक-दूसरे से दूर-दूर हैं। छोटी जोतों पर वैज्ञानिक ढंग (UPBoardSolutions.com) से खेती करना सम्भव नहीं होता तथा न ही सिंचाई की समुचित व्यवस्था हो पाती है।

2. कृषि का वर्षा पर निर्भर होना – आज भी भारतीय कृषि को लगभग 50% भाग वर्षा पर निर्भर करता है। वर्षा की अनिश्चितता एवं अनियमितता के कारण भारतीय कृषि ‘मानसून का जूआ’ कहलाती है। देश के कुछ क्षेत्रों में अतिवृष्टि तथा बाढ़ों के कारण फसलें बह जाती हैं तथा कुछ भागों में अनावृष्टि से सूख जाती हैं।

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3. भूमि पर जनसंख्या का अत्यधिक भार – जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण भूमि पर जनसंख्या का भार निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है। परिणामतः प्रति व्यक्ति उपलब्ध भूमि का क्षेत्रफल घटता गया है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में अदृश्य बेरोजगारी तथा अल्प रोजगार की समस्याएँ बढ़ी हैं और किसानों की गरीबी तथा ऋणग्रस्तता में वृद्धि हुई है।

4. सिंचाई सुविधाओं का अभाव – भारत में सिंचित क्षेत्र केवल 40% है। असिंचित क्षेत्रों में किसान अपनी भूमि में एक ही फसल उगा पाते हैं, जिस कारण भारतीय कृषि की उत्पादकता बहुत कम है।

5. प्राचीन कृषि-यन्त्र – पाश्चात्य देशों में आज कृषि के आधुनिक यन्त्रों का प्रयोग किया जा रहा है, जबकि भारत के अनेक क्षेत्रों में आज भी हल, पटेला, दराँती, कस्सी आदि अत्यधिक प्राचीन यन्त्रों द्वारा कृषि की जाती है। इनसे गहरी जुताई नहीं हो पाती; फलतः उत्पादन कम होता है।

6. दोषपूर्ण भूमि-व्यवस्था – भारत में अनेक वर्षों तक देश की लगभग 40% भूमि जमींदार, जागीरदार, इनामदार आदिं मध्यस्थों के पास रही। किसान इन मध्यस्थों के काश्तकार होते थे। स्वतन्त्रता- प्राप्ति के बाद इन मध्यस्थों के उन्मूलन के बाद भी छोटे किसानों की दशा में विशेष सुधार नहीं हो पाया है। आज भी ऐसे असंख्य किसान हैं जो दूसरों की भूमि पर खेती करते हैं।

7. कृषकों की अशिक्षा तथा निर्धनता – निर्धनता के कारण देश के कृषक आधुनिक यन्त्र, उत्तम बीज, खाद आदि खरीदने तथा उनका प्रयोग करने में असमर्थ हैं। शिक्षा के अभाव के कारणं वे आधुनिक कृषि–विधियों का प्रयोग नहीं कर पाते। वे रूढ़िवादिता से ग्रस्त हैं, भाग्य में विश्वास करते हैं तथा मुकदमेबाजी में ही अपना अत्यधिक धन बर्बाद कर देते हैं।

8. उत्तम बीज व खाद का अभाव – भारत में अधिक उपज देने वाले उन्नत बीजों की कमी है। कृषि-भूमि के केवल 25% भाग पर ही उत्तम बीजों का प्रयोग किया जा रहा है, जबकि 75% भूमि पर किसान आज भी परम्परागत बीज बोता है। इसके अतिरिक्त, गोबर का केवल 40% भाग खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है। पश्चिमी देशों में प्रति हेक्टेयर 300 किग्रा से अधिक रासायनिक खाद प्रयोग की जाती है, जबकि भारत में मात्र 65 किग्रा।

9. वित्तीय सुविधाओं का अभाव – किसानों को उचित ब्याज पर ऋण प्रदान करने वाली संस्थाओं की देश में आज भी कमी है। इस कारण किसानों को ऊँची ब्याज दरों पर महाजनों से ऋण लेने पड़ते हैं, जिससे उनकी ऋणग्रस्तता बढ़ती जाती है। अत्यधिक ऋणग्रस्त होने के कारण किसान अपना समय, शक्ति तथा धन कृषि की उन्नति में नहीं लगा पाते।

10. अन्य कारण – भूमि कटाव, जलाधिक्य, नाइट्रोजन की कमी, फसल (UPBoardSolutions.com) सम्बन्धी विभिन्न बीमारियाँ, अच्छे पशुओं का अभाव, दोषपूर्ण बिक्री व्यवस्था आदि के कारण भी भारतीय कृषि की उत्पादकता कम है।

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कृषि-क्षेत्र में सुधार के उपाय

भारतीय कृषि विश्व के अन्य देशों की तुलना में अत्यधिक पिछड़ी अवस्था में है। प्रति हेक्टेयर भूमि से कम उपज प्राप्त होती है; अतः कृषि उत्पादकता में वृद्धि हेतु निम्नलिखित प्रयास किये जाने चाहिए –

1. कृषि पर जनसंख्या का दबाव कम होना चाहिए – जोतों के उपविभाजन को रोकने तथा कृषि उत्पादन में वृद्धि हेतु यह आवश्यक है कि कृषि पर जनसंख्या का दबाव कम किया जाए। यह तभी सम्भव है जब जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण किया जाए तथा ग्रामीण क्षेत्रों में लघु व कुटीर उद्योग स्थापित किये जाएँ।

2. कृषि की नयी तकनीकी का प्रचार व प्रसार – आज इस बात की आवश्यकता है कि भारतीय कृषकों को नये व आधुनिक कृषि-यन्त्रों से अवगत कराया जाए तथा उन्नत प्रजातियों के बीज उपलब्ध कराये जाएँ, तभी भारतीय कृषि के पिछड़ेपन को दूर करके उत्पादन-क्षमता में वृद्धि की जा सकती है।

3. सिंचाई सुविधाओं का उचित विकास एवं बाढ़-नियन्त्रण – भारतीय कृषि की मानसून पर निर्भरता को समाप्त करने के लिए सिंचाई-सुविधाओं का व्यापक विस्तार किया जाना चाहिए तथा बाढ़-नियन्त्रण के उपाय अपनाये जाने चाहिए, जिससे भू-क्षरण को रोका जा सके तथा फसलों की सुरक्षा की जा सके।

4. साख-सुविधाओं का विस्तार – कृषि-क्षेत्र में नवीन तकनीकों को प्रोत्साहन देने, विपणन व्यवस्था में सुधार करने तथा उन्नत बीजों एवं उर्वरकों का प्रयोग करने के लिए उचित शर्तों पर पर्याप्त साख-सुविधाओं की आपूर्ति की जानी चाहिए। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए।

5. भू-सुधार कार्यक्रमों का प्रभावी क्रियान्वयन – कृषि उत्पादकता में वृद्धि के लिए यह आवश्यक है। कि भू-धारण व्यवस्था में सुधार किया जाए, कृषकों को भू-स्वामी बनाया जाए तथा अलाभकारी जोतों को समाप्त किया जाए।

6. विपणन व्यवस्था में सुधार – विपणन व्यवस्था में सुधार किया जाना चाहिए, जिससे किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त होता रहे और किसान अधिक परिश्रम से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित होते रहें।

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7. कृषि आगतों की उचित व्यवस्था – खाद एवं उर्वरक, कीटनाशक औषधियाँ एवं सुधरे बीजों को उचित मूल्य पर पर्याप्त मात्रा में वितरित किये जाने की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए। कृषि अनुसन्धान संस्थाओं द्वारा उन्नत और उत्कृष्ट बीजों के प्रयोग के लिए अनुसन्धान किये जाने चाहिए।

8. परस्पर समन्वय एवं सहयोग – कृषि से सम्बन्धित विभिन्न संस्थाओं एवं सरकार के मध्य, कृषि से सम्बन्धित अधिकारियों एवं कृषकों के मध्य तथा. बड़े एवं छोटे कृषकों के मध्य परस्पर समन्वय एवं सहयोग की भावना रहनी चाहिए।

9. कृषि का यन्त्रीकरण – कृषि उत्पादकता में वृद्धि के लिए कृषि का यन्त्रीकरण (UPBoardSolutions.com) अब आवश्यक हो गया है, अतः कृषि-कार्य में अधिकाधिक ट्रैक्टरों, पम्पों, आधुनिक हलों, श्रेसिंग मशीनों आदि का व्यापक प्रयोग किया जाना चाहिए।

10. अन्य सुझाव – उपर्युक्त के अतिरिक्त कुछ अन्य सुझाव निम्नलिखित हैं –

  1. शिक्षा के प्रसार द्वारा किसानों के परम्परावादी दृष्टिकोण में परिवर्तन किया जाए।
  2. गहन कृषि एवं बहुफसली कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाए।
  3. सहकारी कृषि सुविधाओं का विस्तार किया जाए।
  4. फसल बीमा योजना को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।

प्रश्न 6.
हरित क्रान्ति क्या है ? हरित क्रान्ति के लाभों तथा हानियों का उल्लेख कीजिए।
या
हरित क्रान्ति को परिभाषित कीजिए एवं इसके कोई चार लाभ लिखिए। [2011]
या
हरित क्रान्ति किसे कहते हैं? भारत में हरित क्रान्ति के कोई दो लाभ बताइए। [2015]
या
हरित क्रान्ति से आप क्या समझते हैं? भारत में हरित क्रान्ति को सफल बनाने के लिए सुझाव दीजिए। [2018]
उत्तर :

हरित क्रान्ति

हरित क्रान्ति का सम्बन्ध खेती की हरियाली और कृषि उत्पादकता को बढ़ाने से है। भारत की चौथी पंचवर्षीय योजना में देश को खाद्यान्नों के लिए आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य स्वीकार करते हुए हरित क्रान्ति का शुभारम्भ किया गया। हरित क्रान्ति का सम्बन्ध ऐसी रणनीति से है, जिसमें कृषि की परम्परागत तकनीक के स्थान पर आधुनिक तकनीक का प्रयोग करते हुए कृषि उत्पादन में वृद्धि के प्रयास किये गये। आधुनिक कृषिगत उपकरणों, (UPBoardSolutions.com) उन्नत बीजों, रासायनिक खादों, सिंचाई सुविधाओं का तेजी से प्रयोग बढ़ाते हुए कृषि क्षेत्र में उत्पादकता की दृष्टि से क्रान्ति लाने के प्रयास किये गये। उत्पादन तकनीक में सुधार करते हुए हल के स्थान पर ट्रैक्टर, गोबर खाद के स्थान पर रासायनिक खाद, परम्परागत घरेलू बीजों के स्थान पर उन्नत उर्वरता वाले बीज और मानसून पर सिंचाई की निर्भरता के स्थान पर ट्यूबवेल, पम्प आदि से सिंचाई करने के प्रयास हरित क्रान्ति के दौर से आरम्भ किये गये।

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हरित क्रान्ति के लाभ

भारतीय कृषि पर हरित क्रान्ति के सफल प्रभावों में निम्नलिखित बिन्दु महत्त्वपूर्ण हैं –

  1. हरित क्रान्ति से विभिन्न कृषि-फसलों का उत्पादन तेजी से बढ़ा है। गेहूँ, ज्वार, बाजरा आदि खाद्य फसलों के उत्पादन में हुई तीव्र वृद्धि के कारण भारत आज खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो चुका है।
  2. हरित क्रान्ति ने कृषि को एक सफल व्यवसाय के रूप में स्थापित किया है। आज कृषि किसान के लिए केवल पेट भरने की एक साधन मात्र नहीं है, वरन् आय-अर्जन का एक प्रमुख स्रोत बन चुकी है।
  3. कृषि-क्षेत्र के विकास ने देश के औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया है। वर्तमान में कृषि का देश के पूँजी-निर्माण एवं बचतों में पर्याप्त योगदान है।
  4. हरित क्रान्ति के कारण खाद्यान्नों की दृष्टि से भारत आत्मनिर्भर हो चुका है, जिससे देश में खाद्यान्नों के आयात में तेजी से कमी आयी है और भुगतान-सन्तुलन की प्रतिकूलता को कम करने में कृषि क्षेत्र ने पर्याप्त योगदान दिया है।
  5. हरित क्रान्ति ने कृषि एवं सम्बन्धित क्रियाओं में रोजगार के पर्याप्त अवसर सृजित किये हैं, जिससे देश की व्यावसायिक संरचना विस्तृत एवं आय-अर्जक बन गयी है।
  6. हरित क्रान्ति से कृषि श्रमिकों की आर्थिक दशा में सुधार आ गया है तथा यन्त्रों की सहायता मिलने से उनका कार्य भी सरल हो गया है।

हरित क्रान्ति के दोष (हानियाँ)

भारतीय कृषि पर हरित क्रान्ति के कुछ दोष भी हैं, जो निम्नवत् हैं –

1. कुछ फसलों तक सीमित – हरित क्रान्ति का प्रमुख दोष यह है कि यह गेहूँ, चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि फसलों तक ही सीमित है। सभी फसलों को इसका लाभ नहीं मिल सका। व्यावसायिक फसलें इससे अछूती रही हैं।

2. कुछ राज्यों तक सीमित – हरित क्रान्ति कार्यक्रम केवल उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु राज्यों तक ही सीमित रहा, जिससे राष्ट्र का सन्तुलित विकास नहीं हो पाया। अन्य प्रदेश इससे वंचित रह गये, जिससे प्रादेशिक विषमताएँ बढ़ गयीं।

3. बड़े कृषकों को लाभ – हरित क्रान्ति से केवल बड़े कृषकों को ही लाभ (UPBoardSolutions.com) हुआ है, क्योंकि छोटे किसान साधनहीन होने के कारण इस कार्यक्रम का लाभ नहीं उठा सके हैं।

4. लक्ष्य से कम उत्पादन – हरित क्रान्ति का एक दोष यह है कि इसके आधार पर आशानुरूप उत्पादन की दिशा में सफलता प्राप्त नहीं हो सकी। अत: लोगों का विश्वास इस कार्यक्रम से हट गया।

5. पर्यावरण विघटन – हरित क्रान्ति के अनेक पर्यावरणीय दुष्परिणाम हुए हैं। अत्यधिक सिंचाई के कारण भूमिगत जल-स्तर नीचा हो गया है तथा मृदा अपरदन और भूमि उत्पादकता का ह्रास हुआ है। एक ही फसल लगातार बोने तथा उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से भूमि के प्राकृतिक तत्त्व विनष्ट हो जाते हैं। इनक दीर्घकालीन दुष्परिणाम होते हैं।

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हरित क्रान्ति की सफलता सम्बन्धी सुझाव

हरित क्रान्ति को सफल बनाने के उपाय/सुझाव निम्नलिखित हैं –

  1. किसानों को उन्नत बीज तथा उर्वरक सस्ते दामों में मिलने चाहिए।
  2. उपज का पर्याप्त मूल्य मिले तथा उसके भण्डारण की व्यवस्था होनी चाहिए।
  3. फसलों को आपदा से नुकसान की दशा में किसानों को मुआवजा मिलना चाहिए।
  4. कृषि शिक्षा तथा उन्नत प्रौद्योगिकी का प्रसार होना चाहिए।
  5. शोध व अनुसन्धान केन्द्रों की वृद्धि की जानी चाहिए।
  6. चकबन्दी जैसे भूमि सुधार कार्यक्रम पुनः चलाए जाने चाहिए।

प्रश्न 7.
भूमि-सुधार कार्यक्रम क्या है ? भारत में भूमिसुधार तथा उत्पादन वृद्धि के लिए किये गये प्रयासों का वर्णन कीजिए। [2010, 14]
या
भारत में कृषि विकास के लिए किये जाने वाले प्रयासों का उल्लेख कीजिए।
या
भूमि-सुधार से क्या तात्पर्य है ? भारत में भूमि-सुधार कार्यक्रमों का उल्लेख कीजिए तथा इन कार्यक्रमों की सफलता के लिए सुझाव दीजिए।
या
भूमि-सुधार के अन्तर्गत लागू किन्हीं दो कार्यक्रमों का वर्णन कीजिए। [2011] भूमि-सुधार से आप क्या समझते हैं? भारत में भूमि सुधार के उद्देश्य तथा कोई दो कार्यक्रम बताइट। [2013, 16, 18]
या
भारत में भूमि-सुधार के तीन उद्देश्य बताइए। [2016]
उत्तर :

भूमि-सुधार

‘भूमि-सुधार’ से अभिप्राय उन संस्थागत परिवर्तनों से है जिनसे भूमि का वितरण खेती करने वाले किसानों के पक्ष में होता है जिनसे जोतों के आकार में वृद्धि होने से खेत आर्थिक दृष्टि से लाभदायक बन जाते हैं। दूसरे शब्दों में, भूमिसुधार में वे सभी कार्य सम्मिलित किये जाते हैं जिनका सम्बन्ध भूमि-स्वामित्व एवं भूमि जोत दोनों में होने वाले सुधारों से है; जैसे—मध्यस्थों को उन्मूलन, जोतों की सुरक्षा, चकबन्दी, जोतों की उच्चतम सीमा का निर्धारण, सहकारी (UPBoardSolutions.com) खेती आदि।

(क) भारत में भूमि-सुधार के लिए किये गये प्रयास
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारत सरकार ने यह अनुभव किया कि देश के आर्थिक विकास के लिए कृषि का विकास परमावश्यक है और कृषि का विकास भूमि-सुधारों के बिना सम्भव नहीं है। अतः गत वर्षों मेंभारत में अनेक भूमि-सुधार किये गये हैं, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं –

1. जमींदारी उन्मूलन – देश की लगभग 40% कृषि योग्य भूमि पर मध्यस्थ या जमींदार कब्जा किये हुए थे। ये मध्यस्थ कृषि-कार्य कृषि-श्रमिकों द्वारा करवाते थे। सन् 1952 तक लगभग सभी राज्यों में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन कर दिया गया था, जिसके फलस्वरूप 2 करोड़ काश्तकारों को भू-स्वामित्व के अधिकार प्राप्त हो गये।

2. लगान का नियमन – विभिन्न कानूनों के माध्यम से देश में लगान की राशि निश्चित कर दी गयी है, जिससे किसानों को आर्थिक भार घट गया है। पहले काश्तकारों को कुल उपज का लगभग आधा भाग भू-स्वामी को लगान के रूप में देना पड़ता था, किन्तु अब देश के किसी भी राज्य में लगान की दर उपज के 2.5% से अधिक नहीं है।

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3. भूमि की बेदखली पर रोक – विभिन्न राज्यों में अधिनियम पारित करके भू-स्वामियों द्वारा पट्टेदारों को मनमाने ढंग से बेदखल करने के अधिकार को समाप्त कर दिया गया है।

4. जोतों की अधिकतम सीमा का निर्धारण (हदबन्दी) – विभिन्न राज्यों में वहाँ की परिस्थितियों के अनुसार जोतों की अधिकतम सीमा का निर्धारण किया जा चुका है। अधिकतम सीमा से अधिक भूमि का सरकार अधिग्रहण कर लेती है और ऐसी भूमि को भूमिहीन किसानों में बाँट दिया जाता है। अब तक देश में 30 लाख हेक्टेयर भूमि अतिरिक्त घोषित की जा चुकी है, जिसमें से अधिकांश भूमि भूमिहीन किसानों में बाँटी जा चुकी है।

5. चकबन्दी – चकबन्दी का अर्थ है-एक ही परिवार के बिखरे हुए खेतों को एक स्थान पर संगठित करना। अब तक देश में लगभग 592 हेक्टेयर भूमि की चकबन्दी की जा चुकी है।

6. सहकारी खेती – इस व्यवस्था के अन्तर्गत एक गाँव के किसान अपनी भूमि को एकत्रित करके उसे बड़े-बड़े फार्मों में बाँट लेते हैं। भूमि पर किसानों का व्यक्तिगत स्वामित्व बना रहता है, किन्तु कृषि-कार्य के प्रबन्ध के लिए किसान सहकारी समिति गठित कर लेते हैं, (UPBoardSolutions.com) समस्त कृषि-कार्यों को मिलकर करते हैं तथा लाभ को भूमि के मूल्य के आधार पर सदस्यों में बाँट दिया जाता है।

7. भूदान आन्दोलन – भूदान का अर्थ है-स्वेच्छा से भूमि दान में देना। भूमि-सुधार के इस ऐच्छिक आन्दोलन के प्रवर्तक आचार्य विनोबा भावे थे जो भूमि के असमान वितरण को समाप्त करना चाहते थे। इस आन्दोलन के फलस्वरूप 45 लाख एकड़ भूमि तथा 39,672 गाँव दान में मिल चुके हैं। 12 लाख एकड़ भूमि का भूमिहीन किसानों में वितरण भी किया जा चुका है।

(ख) उत्पादन में वृद्धि के लिए किये गये प्रयास

भारत सरकार द्वारा किये गये प्रयासों की अपनी महत्ता है, जो निम्नवत् है –

1. सिंचाई और जल संसाधन – भारत सरकार सिंचाई क्षमता को निरन्तर बढ़ाने का प्रयास कर रही है। मार्च 2010 तक 9.82 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता सृजित की गयी है। सरकार को प्रयास है कि सृजित क्षमता और उसके उपभोग के बीच के अन्तर को पूरा किया जाए।

2. बीज – कृषि में प्रति एकड़ उच्च उत्पादकता के लिए अच्छी किस्म के बीजों का प्रयोग महत्त्वपूर्ण है। राष्ट्रीय बीज नीति, किसानों को बीज की श्रेष्ठ किस्में और पौधारोपण सामग्री पर्याप्त मात्रा में प्रदान करती है।

3. उर्वरक – उर्वरक (एन०पी०के०) की खपत में निरन्तर वृद्धि हो रही है। वर्ष 2009-10 में इसकीखपत 264.86 लाख टन तक पहुँच गयी। उर्वरकों पर सरकार अनुदान भी दे रही है, जिससे किसान लोग अधिक-से-अधिक इसका प्रयोग करें।

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4. कृषि यान्त्रिकीकरण – कृषि में अब पशु-शक्ति का योगदान घटता जा रहा है। सन् 1971 में 45.30% से घटकर चालू वर्ष 2001-02 के दौरान यह 9.89% ही रह गया। सिंचाई और फसल काटने तथा ग्राहकों के प्रचालनों में भी पर्याप्त यान्त्रिकीकरण की ओर प्रगति की गयी है।

5. कृषि ऋण का प्रवाह – कृषि और सम्बद्ध कार्यकलापों के लिए संस्थागत ऋण का प्रवाह वर्ष 2001-02 में हैं ₹ 66.771 करोड़ के स्तर तक पहुँच गया।

किसान क्रेडिट कार्ड योजना वर्ष 1998 में प्रारम्भ की गयी। इस योजना ने बड़ी लोकप्रियता प्राप्त की और 27 वाणिज्यिक बैंकों, 373 जिला केन्द्रीय सहकारी बैंकों, राज्य सहकारी बैंकों और 196 ग्रामीण बैंकों द्वारा इसको प्रारम्भ किया गया है। 30 नवम्बर, 2001 ई० की स्थिति के अनुसार 20.4 मिलियन किसान क्रेडिट कार्ड, जिनमें ₹ 43,392 करोड़ की ऋण मंजूरियाँ सम्मिलित हैं, जारी किये गये थे। देश में 31 मार्च, 2011 तक बैंक द्वारा (UPBoardSolutions.com) ₹ 1038 करोड़ किसान क्रेडिट कार्ड जारी किए जा चुके हैं। किसान क्रेडिट कार्ड धारकों के लिए दुर्घटना से होने वाली मृत्यु अथवा स्थायी अपंगता के लिए ₹ 50,000 तथा ₹ 2,50,000 के व्यक्तिगत बीमा कवच को भी अन्तिम रूप दे दिया गया है।

6. कृषि बीमा – किसानों के हित और कृषि को एक व्यवसाय का रूप प्रदान करने की दिशा में राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना’ एक सराहनीय कदम है। यह योजना कृषि-मन्त्रालय की ओर से साधारण बीमा निगम द्वारा लागू की जा रही है। इस योजना का उद्देश्य सूखे, बाढ़, ओलावृष्टि, चक्रवात, आग, कीट, बीमारियों जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसल को हुई क्षति से किसानों का संरक्षण करना है।

7. कृषि-शिक्षण एवं अनुसन्धान – देश में कृषि–शिक्षण के लिए 21 विश्वविद्यालय खोले गये हैं। इसके अतिरिक्त रेडियो तथा दूरदर्शन पर भी प्रतिदिन कृषि-उत्पादन बढ़ाने के उपाय बताये जाते हैं। कृषि सम्बन्धी शोध तथा अनुसन्धानों पर बल दिया जा रहा है।

8. कृषि उपज की बिक्री में सुधार – कृषक को उसकी उपज का उचित मूल्य दिलवाने के लिए कई प्रयत्न किये गये हैं –

  • नियमित मण्डियाँ – अब तक 7000 से अधिक मण्डियों को नियमित किया जा चुका है।
  • मूल्य समर्थन नीति – इसमें सरकार किसानों को उनकी उपज की न्यूनतम कीमत देने का विश्वास दिलाती है। यह नीति गेहूं, चावल, कपास, चना आदि उपजों पर लागू की गयी है।
  •  सहकारी विपणन समितियाँ – ये समितियाँ अपने सदस्यों की उपज को उचित मूल्यों पर बेचती हैं, जिससे किसानों के आर्थिक लाभ में वृद्धि होती है।

9. भण्डारण एवं वितरण की व्यवस्था – अन्न के भण्डारण के लिए गोदाम बनाये गये हैं तथा उनका समुचित वितरण किया जाता है।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से किन्हीं दो पर टिप्पणियाँ लिखिए – (क) जमींदारी उन्मूलन, (ख) चकबन्दी तथा (ग) हदबन्दी।
या
भूमि-सुधारों का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए (क) जमींदारी उन्मूलन, (ख) चकबन्दी। [2012, 16]
या
चकबन्दी किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार की होती है ?
या
निम्नलिखित का संक्षिप्त विवरण दीजिए (क) जमींदारी उन्मूलन, (ख) चकबन्दी। [2016]
उत्तर :
(क) जमींदारी उन्मूलन – देश की लगभग 40 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि पर मध्यस्थ या जमींदार कब्ज़ा किये हुए थे। ये मध्यस्थ कृषि-कार्य कृषि-श्रमिकों द्वारा करवाते थे। स्वतन्त्रता के पश्चात् सन् 1952 तक लगभग सभी राज्यों में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन कर दिया गया, जिसके फलस्वरूप 2 करोड़ काश्तकारों को भू-स्वामित्व के अधिकार प्राप्त हो गये। इसके अतिरिक्त जमींदारों द्वारा किया जाने वाला काश्तकारों का शोषण भी समाप्त हो गया और वे मन लगाकर खेती करने लगे, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई। किसानों का सरकार से सीधा सम्बन्ध स्थापित हो जाने के कारण अब किसानों को सरकारी सहायता प्राप्त करने (UPBoardSolutions.com) में भी कोई कठिनाई नहीं रही है।

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(ख) चकबन्दी – चकबन्दी का अर्थ है एक ही परिवार के बिखरे हुए खेतों को एक स्थान पर संगठित करना। अब तक देश में लगभग 592 हेक्टेयर भूमि की चकबन्दी की जा चुकी है चकबन्दी के दो रूप हैं-ऐच्छिक चकबन्दी एवं अनिवार्य चकबन्दी। ऐच्छिक चकबन्दी की प्रक्रिया में किसानों पर बिखरे हुए खेतों की चकबन्दी कराने के लिए कोई दबाव न डालकर किसान की इच्छा पर छोड़ दिया जाता है, जब कि अनिवार्य चकबन्दी की प्रक्रिया में किसानों की इच्छा को ध्यान में नहीं रखा जाता, वरन् किसानों को अनिवार्य रूप से चकबन्दी करानी पड़ती है। भारत में चकबन्दी का कार्य प्रगति पर है। पंजाब और हरियाणा में चकबन्दी का कार्य पूरा किया जा चुका है। उत्तर प्रदेश में भी 90% कार्य पूरा हो चुका है।

चकबन्दी के मार्ग में आने वाली कठिनाइयाँ निम्नलिखित हैं –

  1. किसानों का पैतृक भूमि के प्रति लगाव एवं मोह चकबन्दी के प्रयासों की दिशा में अनेक अवरोध खड़े करता है।
  2. किसान की बिखरी हुई भूमियाँ भिन्न-भिन्न उर्वरता वाली होती हैं, जिनका स्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न मूल्य होता है। चकबन्दी में किसानों को अपनी भूमि का उचित मूल्य नहीं मिलता और प्रायः भूमि की कम उर्वरता की समस्या चकबन्दी कार्य में आड़े आती है।
  3. पक्षपात एवं अविवेकपूर्ण ढंग से की गयी चकबन्दी प्रशासन तन्त्र की विश्वसनीयता पर प्रश्न- चिह्न लगाती है। इस पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण के कारण किसान चकबन्दी का विरोध करते हैं।
  4. चकबन्दी में बहुत कम किसानों को अनेक खेतों के बदले एक खेत मिलता है। (UPBoardSolutions.com) अधिकांश किसानों को उनके बिखरे हुए खेतों के बदले दो या तीन चक आवण्टित किये जाते हैं, जो चकबन्दी उद्देश्यों के विपरीत हैं।

चकबन्दी में अनेक कठिनाइयाँ निहित होते हुए भी यह किसानों को अनेक दृष्टि से लाभ पहुँचाती है –

  1. छोटे-छोटे खेतों की मेड़ों में भूमि का अपव्यय नहीं होता।
  2. बड़े चक के रूप में खेत का आकार बड़ा हो जाने के कारण आधुनिक उपकरणों; जैसे—ट्रैक्टर आदि का उपयोग आसान हो जाता है।
  3. एक स्थान पर भूमि हो जाने के कारण कृषि क्रियाकलापों की उचित देखभाल सम्भव हो पाती है।
  4. कृषि उत्पादन द्वारा आय और किसान के रहन-सहन के स्तर में सुधार होता है।
  5. खेत का आकार अधिक हो जाने से औसत उत्पादन लागत घट जाती है।
  6. कानूनी रूप से चक बन जाने के कारण भूखण्डों की सीमा को लेकर उत्पन्न होने वाले विवादों की समाप्ति हो जाती है।

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(ग) हदबन्दी – एक किसान को उतनी ही भूमि का स्वामी होना चाहिए जितनी भूमि को वह स्वयं जोत सकता हो। इससे अधिक भूमि पर वह मध्यस्थ का ही कार्य करेगा, अतः भू-जोतों की अधिकतम सीमा (हदबन्दी) लागू की जानी चाहिए। इस अतिरिक्त भूमि को भूमि जोतनेवाले अन्य कृषि श्रमिकों में वितरित कर देना चाहिए। भारत के राज्यों में भूमि की हदबन्दी के कानूनों को लागू करने के परिणामस्वरूप लगभग 30 लाख हेक्टेयर भूमि को अतिरिक्त घोषित कर दिया गया है। भूमि जोतों की हदबन्दी करने के चार उद्देश्य है।

  1. बड़े-बड़े भूखण्डों को प्रबन्ध योग्य छोटे भूखण्डों में बदलना ताकि उत्पादकता में वृद्धि की जा सके।
  2. किसानों की आवश्यकता से अधिक भूमि को भूमिहीन किसानों में वितरित करके सामाजिक न्याय की स्थापना करना।
  3. इस योजना द्वारा अधिक-से-अधिक व्यक्तियों को रोजगार की (UPBoardSolutions.com) सुविधाएँ उपलब्ध कराना।
  4. अतिरिक्त बंजर भूमि पर कमजोर वर्ग के लोगों को घर बसाने की सुविधा देना।

प्रश्न 9.
भारतीय कृषि का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए
(क) कृषि निविष्टियाँ और उनका महत्त्व [2014] तथा (ख) भावी सम्भावनाएँ।
उत्तर :
(क) कृषि निविष्टियाँ और उनका महत्त्व –
[संकेत–इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 2 का उत्तर देखें।]

(ख) भावी सम्भावनाएँ – कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय कृषि की भावी सम्भावनाएँ पर्याप्त उज्ज्वल हैं, क्योंकि भारतीय कृषि में सुधार आरम्भ हो चुके हैं और कई दिशाओं में उनके विस्तार की सम्भावनाएँ हैं। ये दिशाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. उर्वरक उपभोग की खपत लगभग 50 किग्रा प्रति हेक्टेयर है। इसका अर्थ है कि किसान उन्नत बीजों और विकसित उत्पादन तकनीकी का प्रयोग कर रहे हैं। यह इस बात का सूचक है कि नयी प्रौद्योगिकी के विस्तार से कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता में पर्याप्त वृद्धि होगी। इसी अधिक उपज देने वाली तकनीकी का विस्तार करके अन्य फसलों के उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि करना सम्भव है।
  2. लघु, मध्यम एवं विशाल स्तरीय सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार करके दूर-दराज के क्षेत्रों में सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराकर कृषि उत्पादकता में वृद्धि करना सम्भव है।
  3. ऐसे क्षेत्रों में, जहाँ सिंचाई के लिए जल पहुँचाना सम्भव नहीं है, शुष्क कृषि-भूमि में उचित प्रकार के प्रौद्योगिकीय सुधारों को लागू करने की भी सम्भावनाएँ हैं।
  4. देश में भूमि-सुधार कार्यक्रमों को कठोरता से लागू करके कृषि के दोषों से छुटकारा पाना सम्भव है। भारत में परती भूमि तथा अन्य भूमियाँ पर्याप्त मात्रा में ऐसी हैं, जिनमें सुधार करके कृषि भूमि में वृद्धि की जा सकती है और कृषि उत्पादकता बढ़ायी जा सकती है।

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प्रश्न 10.
कृषि श्रमिक किसे कहते हैं ? कृषि श्रमिकों की किन्हीं चार प्रमुख समस्याओं का वर्णन कीजिए। इन समस्याओं के समाधान के लिए उपाय सुझाइए। [2014]
या
कृषि श्रमिकों की समस्याएँ हल करने के कोई चार उपाय बताइए। [2010]
या
भारत में कृषि श्रमिकों की समस्याओं का उल्लेख कीजिए। [2010]
या
कृषि श्रमिकों का क्या तात्पर्य है? उनकी दो प्रमुख समस्याओं का उल्लेख कीजिए। [2015]
या
कृषि श्रमिक से क्या तात्पर्य है? भारत में उनकी दशा सुधारने के लिए चार उपाय सुझाइए। [2016]
उत्तर :

कृषि श्रमिक

कृषि श्रमिक से अभिप्राय ऐसे व्यक्तियों से है, जो अपनी आजीविका के लिए कृषि पर आश्रित हैं। दूसरे शब्दों में, जिनकी आय का अधिकांश भाग कृषि में मजदूरी करने से ही प्राप्त होता है। भारत एक कृषिप्रधान देश है। जहाँ 70% लोग कृषि से सम्बद्ध कार्यों में लगे हुए हैं, परन्तु सभी को कृषक नहीं कहा जा सकता। कुछ व्यक्ति भूमिहीन हैं और वे दूसरों की भूमि पर काम करते हैं। ये अपनी स्वयं की शारीरिक शक्ति, हल-बैल तथा अन्य उपकरणों से दूसरों (UPBoardSolutions.com) की भूमि जोतते हैं और उत्पन्न फसल में से एक निश्चित हिस्सा प्राप्त करते हैं। वे कहीं-कहीं बँधुआ मजदूरों के रूप में भी कार्य करते हैं। ऐसे व्यक्ति कृषि श्रमिक की श्रेणी में आते हैं।

कृषि जाँच समिति के अनुसार, “कृषि श्रमिक वह व्यक्ति है, जो वर्ष-पर्यन्त अपने कार्य के समस्त दिनों में आधे से अधिक दिन किराये के श्रमिक के रूप में कृषि-कार्यों में लगा रहता है।

भारतीय कृषि श्रमिकों की समस्याएँ

भारतीय कृषि श्रमिकों के सम्मुख प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

1. मौसमी रोजगार एवं बेरोजगारी – अधिकांश कृषि श्रमिकों को वर्षभर कार्य नहीं मिल पाता है। 7.46 करोड़ कृषि श्रमिकों को वर्ष में 197 दिन अर्थात् साढ़े छ: महीने काम मिल पाता है। 40 दिन वह अपना कार्य करता है तथा शेष 128 दिन अर्थात् लगभग 4 महीने वह बेकार रहता है। बाल श्रमिकों को। वर्ष में केवल 204 दिन व स्त्री श्रमिकों को 141 दिन रोजगार मिलता है। शेष समय में ये लोग बेरोजगार रहते हैं।

2. ऋणग्रस्तता – भारतीय कृषि श्रमिकों को कम मजदूरी मिलती है। वह वर्ष में कई महीने बेरोजगार रहते हैं। इस कारण उनकी निर्धनता बढ़ जाती है। अपने सामाजिक कार्यो; अर्थात् विवाह, जन्म, मरण आदि के खर्चे की पूर्ति वे महाजनों से ऋण लेकर करते हैं। परिणामस्वरूप ऋणग्रस्तता अधिक होती जाती है और वे महाजन के चंगुल से कभी भी नहीं छूट पाते।

3. निम्न मजदूरी तथा निम्न जीवन-स्तर – भारत में कृषि श्रमिकों की मजदूरी इनकी आयु, लिंग आदि से निर्धारित होती है। साधारणत: स्त्रियों, बच्चों व बूढ़ों को कम मजदूरी दी जाती है। औसत दैनिक मजदूरी की दर इतनी कम होती है कि उस कम आय से कृषि श्रमिकों की आवश्यक आवश्यकताओं की भी पूर्ति नहीं हो पाती। इस कारण उनका जीवन-स्तर अत्यधिक निम्नकोटि का हो जाता है।

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4. बेगार की समस्या – ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ बड़े भू-स्वामी कृषि श्रमिकों को ऋण देते हैं। जब तक श्रमिक उस ऋण को वापस नहीं लौटाते तब तक वे श्रमिकों को कम मजदूरी देकर काम लेते हैं तथा कभी-कभी बिना मजदूरी दिये बेगार के रूप में भी काम कराते हैं।

5. आवास की समस्या – कृषि श्रमिकों की आवासीय स्थिति दयनीय होती है। इनके मकान प्रायः मिट्टी के कच्चे या झोंपड़ियाँ होती हैं, जिनमें सर्दी, गर्मी व वर्षा ऋतु में सुरक्षा का अभाव होता है। प्रायः समस्त परिवार एवं पशु रात के समय एक ही मकान में रहते हैं, जिससे वातावरण भी दूषित रहता है।

6. सहायक धन्धों की कमी – भारतीय कृषि श्रमिक वर्ष में लगभग 4 माह (UPBoardSolutions.com) बेकार रहते हैं। इस बेकार समय में उन्हें कोई और कार्य नहीं मिल पाता, क्योंकि पूँजी के अभाव में वे सहायक कुटीर-धन्धों की भी स्थापना नहीं कर पाते।

7. मशीनीकरण के द्वारा उत्पन्न समस्या – आज कृषि के क्षेत्र में अनेक नवीन उपकरणों एवं मशीनों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। परिणामस्वरूप कृषि श्रमिकों के सामने और भी अधिक बेकारी की ” समस्या उत्पन्न होती जा रही है।

कृषि श्रमिकों की समस्याओं के समाधान हेतु सुझाव

भारतीय कृषि श्रमिकों की दशा में सुधार करने के लिए निम्नलिखित सुझाव भी दिये जा सकते हैं –

1. जनसंख्या पर नियन्त्रण – कृषि श्रमिकों की दशा में सुधार करने के लिए आवश्यक है कि जनसंख्या-वृद्धि पर नियन्त्रण किया जाए। इसके लिए परिवार नियोजन कार्यक्रम के प्रति श्रमिकों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

2. न्यूनतम मजदूरी कानून का प्रभावशाली क्रियान्वयन – कृषि श्रमिकों हेतु जो मजदूरी अधिनियम सरकार द्वारा बनाया हुआ है, उस नियम का क्रियान्वयन कड़ाई से किया जाना चाहिए।

3. काम करने की परिस्थितियों में सुधार – मौसम की दृष्टि से श्रमिक को किसी भी प्रकार की सुविधा नहीं होती, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। अत: कृषि श्रमिकों की कार्य करने की परिस्थितियों में परिवर्तन किया जाना चाहिए।

4. शिक्षा का प्रसार – अधिकांश कृषि श्रमिक अशिक्षित हैं। उन्हें अपने अधिकार एवं कर्तव्यों के विषय में उचित जानकारी नहीं है। इसके लिए कृषि श्रमिकों को शिक्षित करना अनिवार्य है।

5. कृषि श्रमिकों का दृढ़ संगठन – औद्योगिक श्रमिकों की भाँति कृषि श्रमिकों को भी अपने अधिकारों की रक्षा एवं विकास के लिए दृढ़ श्रमिक संगठन बनाने चाहिए।

6. वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था – कृषि श्रमिकों की समस्याओं के समाधान हेतु आवश्यक है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि व्यवसाय के अतिरिक्त कुटीर उद्योग, लघु उद्योग एवं अन्य ग्रामीण व्यवसायों का अधिक-से-अधिक विकास किया जाए।

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7. भूमिहीन श्रमिकों के लिए भूमि की व्यवस्था – भूमिहीन श्रमिकों की दशा में सुधार करने एवं उन्हें शोषण से मुक्त कराने के लिए यह आवश्यक है कि उनके लिए भूमि की व्यवस्था की जाए।

8. आवास की व्यवस्था – कृषि श्रमिकों को मकान के लिए नि:शुल्क भूमि (UPBoardSolutions.com) तथा बनाने के लिए आर्थिक सहायता भी उपलब्ध करायी जानी चाहिए।

9. कृषि श्रमिकों के लिए वित्त की व्यवस्था – कृषि श्रमिकों को ऋण से मुक्ति दिलाने के लिए पुराने ऋण पूर्णतः समाप्त किये जाएँ तथा भविष्य में श्रमिकों की आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखकर एक दीर्घकालीन वित्त-व्यवस्था की जाए, जो श्रमिकों के संकट के समय उन्हें सहायता प्रदान कर सके।

समस्या के निवारण हेतु सरकार द्वारा किये गये प्रयास

कृषि श्रमिकों की समस्या के निवारण हेतु सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाये हैं –

1. बँधुआ मजदूरी प्रथा का अन्त – ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीन मजदूरों की एक बड़ी संख्या ऐसी है जो बँधुआ मजदूरों के रूप में काम करती थी। जुलाई, 1975 ई० में प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने 20 सूत्री कार्यक्रम के अन्तर्गत यह घोषित किया कि अगर कहीं बँधुआ मजदूर हैं तो उन्हें मुक्त कर दिया जाए। केन्द्रीय श्रम मन्त्रालय ने एक अध्यादेश जारी करके बँधुआ मजदूरी प्रथा को समाप्त कर दिया।

2. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम – सन् 1948 ई० में भारत सरकार ने कृषि श्रमिकों पर न्यूनतम मजदूरी कानून लागू किया था। इस कानून में सन् 1951, 54, 59, 60 तथा 75 में संशोधन किये गये। इस कानून द्वारा मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी की दर निर्धारित कर दी गयी है।

3. भूमिहीन श्रमिकों के लिए भूमि की व्यवस्था – सरकार ने जोतों की सीमा का निर्धारण करके अतिरिक्त भूमि को भूमिहीन कृषि श्रमिकों में बाँटने की व्यवस्था की तथा भूदान (भूदान आन्दोलन का प्रारम्भ 1952 ई० में किया गया), ग्रामदान आन्दोलनों आदि से प्राप्त भूमि को भूमिहीन कृषि श्रमिकों में बाँटा गया। लगभग सभी राज्य सरकारों ने इस प्रकार से प्राप्त भूमि के हस्तान्तरण व प्रबन्ध के लिए आवश्यक कानून बनाये हैं।

4. भूमिहीन कृषि श्रमिकों के लिए आवास-व्यवस्था – भूमिहीन कृषि श्रमिकों को मकान बनाने के लिए नि:शुल्क भूमि की व्यवस्था कराने की योजना को 1971 ई० से आरम्भ किया गया है। निर्धन परिवारों को आवास-सुविधा उपलब्ध करने के लिए निर्बल वर्ग आवास योजना तथा इन्दिरा आवास योजनाएँ चल रही हैं।

5. ग्रामीण कार्य योजना – कृषि श्रमिकों की बेरोजगारी दूर करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा ग्रामीण कार्य योजना आरम्भ की गयी। इसके अन्तर्गत लघु और मध्यम सिंचाई साधनों का विकास, भूमि संरक्षण आदि कार्य सम्मिलित हैं।

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6. कृषि श्रमिक सहकारिता संगठन – कृषि श्रमिक सहकारी समितियाँ, लघु एवं सीमान्त कृषकों, ग्रामीण दस्तकारों तथा श्रमिकों को सुविधाएँ देने के उद्देश्य से स्थापित की गयी हैं। ऐसी समितियाँ नहरों एवं तालाबों की खुदाई, सड़कों के निर्माण आदि कार्यों का ठेका लेती हैं, जिससे श्रमिकों को रोजगार के अवसर मिलते हैं। अब तक लगभग ऐसी 213 समितियों की स्थापना हो चुकी है।

7. कुटीर एवं लघु उद्योगों का विकास – कृषि पर बढ़ती हुई जनसंख्या के भार को कम करने के लिए सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर एवं लघु उद्योगों के विकास को महत्त्व दिया है।

8. सीमान्त कृषक और कृषि श्रमिक योजना – सीमान्त कृषकों तथा कृषि श्रमिकों की सहायता के लिए सरकार ने देश के 87 जिलों में पायलट प्रोजेक्ट्स चलाये हैं। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत प्रत्येक जिले में 20 हजार सीमान्त कृषकों तथा कृषि श्रमिकों को वित्तीय सहायता दी गयी है।

9. ऋण-मुक्ति कानून – कृषि श्रमिकों को ऋण से मुक्ति दिलाने के लिए उत्तर प्रदेश तथा कई अन्य राज्यों ने अध्यादेश के माध्यम से कानून बनाया है। सन् 1975 में लघु कृषकों, भूमिहीन कृषकों व कारीगरों को महाजनों के ऋणों से मुक्ति की (UPBoardSolutions.com) घोषणा की गयी है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के योगदान पर प्रकाश डालिए। [2015]
या
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के छः महत्त्वों का वर्णन कीजिए। [2014, 15]
उत्तर :

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान

भारत एक कृषि-प्रधान देश है। यहाँ की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यहाँ 70% लोग कृषि और कृषि से सम्बद्ध कार्यों में लगे हुए हैं। कृषि ही देश की अधिकांश जनसंख्या को आजीविका प्रदान करती है। राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि का एक बड़ा अंश है। हमारे देश के अधिकतर उद्योग-धन्धे कृषि पर आधारित हैं। इस प्रकार भारतीय अर्थव्यवस्था का ताना-बाना कृषि पर ही बुना हुआ है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्त्व व योगदान को निम्नवत् स्पष्ट किया गया है –

1. राष्ट्रीय आय का प्रमुख आधार – भारत के 58% से अधिक लोग कृषि और कृषि से सम्बद्ध कार्यों में लगे हुए हैं। स्पष्ट है कि कृषि राष्ट्रीय आय का प्रमुख आधार है। वर्ष 2000-01 में, जब कृषि-क्षेत्र में वृद्धि-0.2% थी तो सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर भी घट कर 4% रह गयी थी। इसी आधार पर कहा जा सकता है कि कृषि-क्षेत्र राष्ट्रीय आय का मुख्य स्रोत और आधार है। राष्ट्रीय आय को लगभग 28% भाग कृषि-आय से प्राप्त होता है।

2. विदेशी व्यापार में महत्त्व व विदेशी मुद्रा की प्राप्ति – कृषि निर्यात देश के कुल वार्षिक निर्यात का 13 से 18% भाग है। वर्ष 2011-12 में यह 27.68% था। इस वर्ष देश से १ 3.804 करोड़ से अधिक मूल्य के कृषि उत्पादों का निर्यात किया गया, जिनमें 23% (UPBoardSolutions.com) हिस्सा समुद्री उत्पादों का था। अनाज (अधिकांश चावल), खली, चाय, कॉफी, काजू एवं मसाले अन्य महत्त्वपूर्ण उत्पाद हैं, जिनमें से प्रत्येक का देश के कुल कृषि निर्यातों में लगभग 5 से 15% हिस्सा है। मांस एवं मांस उत्पाद, फलों एवं सब्जियों के निर्यात में भी वृद्धि हुई है।

3. उद्योगों का आधार – भारत के प्रमुख उद्योग-धन्धे कच्चे माल के लिए कृषि पर ही आधारित हैं। सूती वस्त्र, जूट, चीनी, वनस्पति तेल, हथकरघा, खाद एवं पेय पदार्थ आदि धन्धे कृषि पर आधारित हैं। इसके अतिरिक्त कृषि में प्रयोग होने वाले यन्त्र; जैसे-ट्रैक्टर, टिलर, उर्वरक आदि बनाने वाले उद्योगों की तो कृषि ही जननी है। कीटनाशक दवाइयाँ बनाने का उद्योग भी कृषिजनित ही है।

4. राजस्व की प्राप्ति – कृषि से राज्य सरकारों को लगान के रूप में राजस्व की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त विभिन्न मण्डी समितियों को भी कृषि से आये प्राप्त होती है। कहीं पर स्थानीय निकाय भी कृषि उत्पादों के आवागमन पर चुंगी कर की वसूली करते हैं।

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5. रोजगार के अवसर – देश की लगभग 58% से अधिक जनसंख्या कृषि कार्य में लगी हुई है, जिसको कृषि से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्राप्त होता है। अन्यथा भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में इतने अधिक रोजगार के अवसर सम्भव नहीं हो पाते।

6. पूँजी संचय में योगदान – कृषि देश के आर्थिक विकास के लिए पूँजी जुटाने में सहायक होती है, क्योकि कृषि द्वारा उत्पादन तथा आय में वृद्धि होती है।

7. खाद्य पदार्थों की प्राप्ति – भारतीय जनसंख्या को भोज्य पदार्थ कृषि से ही प्राप्त होते हैं। पहले भारत खाद्य-पदार्थों का आयात करता था, जिसका हमारी आर्थिक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता था। परन्तु आज जनसंख्या बढ़ जाने पर भी कृषि में हरित क्रान्ति के कारण भारत खाद्य पदार्थों में आत्मनिर्भर हो गया है।

8. आजीविका का आधार – भारत की लगभग तीन-चौथाई आबादी गाँवों में रहती है, जिसकी आजीविका का प्रमुख स्रोत कृषि है। देश की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या कृषि-कार्य से आजीविका प्राप्त करती है। भू-स्वामियों तथा कृषकों के अतिरिक्त भूमिहीन कृषक, कृषि मजदूरी द्वारा आजीविका प्राप्त करते हैं।

9. बाजार के विस्तार में सहायक – कृषि उत्पादन में वृद्धि होने से वस्तुओं की माँग बढ़ती है, जिससे बाजार का विस्तार होता है।

10. परिवहन का विकास – कृषि उत्पादों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में रेल एवं सड़क परिवहन का उल्लेखनीय योगदान है। इस प्रकार कृषि परिवहन सेवाओं का भी विकास करती है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था (UPBoardSolutions.com) में कृषि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसी के माध्यम से ही उसे अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई है।

प्रश्न 2.
भूमि-सुधार से किसानों को मिलने वाले चार लाभों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भूमि सुधार से किसानों को मिलने वाले चार लाभ निम्नलिखित हैं –

  1. छोटे-छोटे खेतों की मेड़ों में भूमि का अपव्यय नहीं होता।
  2. बड़े चक के रूप में खेत का आकार बड़ा हो जाने के कारण आधुनिक उपकरणों; जैसे-ट्रैक्टर आदि का उपयोग आसान हो जाता है।
  3. एक स्थान पर भूमि हो जाने के कारण कृषि क्रियाकलापों की उचित देखभाल सम्भव हो पाती है।
  4. कृषि उत्पादन द्वारा आय और किसान के रहन-सहन के स्तर में सुधार होता है।

प्रश्न 3.
भारत की राष्ट्रीय आय में कृषि का क्या योगदान है ?
उत्तर :
भारत की सकल घरेलू उत्पाद दर 2009-10 में 8.4 प्रतिशत से घटकर 2011-12 में 6.9 प्रतिशत हो गयी जो 6.5 प्रतिशत अनुमानित थी। यद्यपि सकल घरेलू उत्पाद में हो रही धीमी बढ़ोत्तरी का मुख्य कारण 2011-12 में हुआ औद्योगिक विकास रहा लेकिन हम निर्यात में हो रही कमी को भी अनदेखा नहीं कर सकते। इसी आधार पर कहा जा सकता है कि कृषि-क्षेत्र राष्ट्रीय आय का मुख्य स्रोत और आधार है। राष्ट्रीय आय का लगभग एक-तिहाई भाग कृषि-क्षेत्र से प्राप्त होता है। यह एक विकासशील अर्थव्यवस्था की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। जब आर्थिक विकास की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो कृषि का योगदान घटता जाता है और उद्योगों का बढ़ता जाता है। ऐसा ही भारत में भी हो रहा है और अनुमान है कि आगे आने वाले समय में भी भारत की राष्ट्रीय आय में कृषि सबसे बड़े घटक की भूमिका निभाती रहेगी।

प्रश्न 4.
भूमि के उपविभाजन तथा अपखण्डन से क्या अभिप्राय है ? भारत में भूमि के अपखण्डन के क्या कारण हैं ?
उत्तर :
उपविभाजन – भूमि को किन्हीं कारणों से दो या दो से अधिक भागों में बाँटना अर्थात् विभाजन करना, भूमि का उपविभाजन कहलाता है। यह विभाजन उत्तराधिकार के नियमों या अन्य कारणों से भी हो सकता है, क्योंकि जब परिवार के मुखिया की मृत्यु हो जाती है तो उसकी भूमि को उसके पुत्रों में बाँट दिया जाता है।

अपखण्डन – भूमि के अपखण्डन का अर्थ है-कृषि की उस समस्त भूमि (UPBoardSolutions.com) से जो एक स्थान पर न होकर अनेक स्थानों पर छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखरी हुई होती है और उन सभी में से प्रत्येक हिस्सेदार को अपना हिस्सा प्राप्त करना होता है।

भारत में भूमि के अपखण्डन के निम्नलिखित कारण पाये जाते हैं –

  1. उत्तराधिकार के नियम।
  2. जनसंख्या की तीव्र गति से वृद्धि।
  3. पैतृक भूमि के प्रति लगाव।
  4. भारतीय कृषकों की ऋणग्रस्तता।
  5. ग्रामीण उद्योगों को पतन।
  6. कृषकों की अज्ञानता एवं शिक्षा का अभाव।
  7. संयुक्त परिवार प्रणाली का ह्रास।

प्रश्न 5.
हरित क्रान्ति ने भारत की खाद्य समस्या को हल करने में क्या योगदान दिया है ?
उत्तर :
भारत की लगातार बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए खाद्य पदार्थ अथवा अन्न का अधिक-से-अधिक उत्पादन करना आवश्यक था, अत: सरकार ने खाद्यान्नों के उत्पादन में वृद्धि के लिए कृषि में उन्नत बीज, खाद, रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया, सुनिश्चित जलपूर्ति की व्यवस्था की तथा नवीन उपकरणों का प्रयोग किया। परिणामस्वरूप गेहूँ तथा चावल के उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई। खाद्यान्नों के उत्पादन में लायी गयी इस क्रान्ति को ही (UPBoardSolutions.com) हरित क्रान्ति कहते हैं। हरित क्रान्ति कार्यक्रम से देश के कृषि उत्पादन में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। सन् 1977 से पूर्व भारत खाद्यान्नों का आयात करता था, अब वह इस क्षेत्र में लगभ आत्मनिर्भर बन गया है। डॉ० सी०एच० हनुमन्तराव के शब्दों में, “हरित क्रान्ति के लाभों में गाँव के सभी वर्गों को हिस्सा मिला है और इससे वास्तविक मजदूरी तथा रोजगार में वृद्धि हुई है।” यदि हरित क्रान्ति को लगन तथा हृदय से लागू किया जाए तो यह कृषि जगत् के लिए वरदान सिद्ध होगी।

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प्रश्न 6.
भारत में कृषि के विकास में प्रयोग की जाने वाली नवीन तकनीकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भारत में अब कृषि के क्षेत्र में उत्पादन के पुराने और परम्परागत तरीकों के स्थान पर नयी टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया जाने लगा है। भूमि-सुधार से अब भू-धारण प्रणाली में परिवर्तन लाने, भू-जोत की अधिकतम सीमा निर्धारित करने, चकबन्दी आदि पर बल दिया जाता है। इसी प्रकार आधुनिक टेक्नोलॉजी से अधिक उपज वाले बीजों, उर्वरकों, कीटनाशकों व पानी के नियन्त्रित प्रयोग पर अधिक बल दिया जाता है। इस प्रकार नयी कृषि टेक्नोलॉजी ‘पैकेज दृष्टिकोण’ पर जोर देती है, क्योंकि इसमें पैकेज के सभी तत्त्वों को एक साथ प्रयोग करना होता है। नयी टेक्नोलॉजी के प्रयोग से भारतीय कृषि का आधुनिकीकरण हो गया है। अधिक उपज वाले बीजों के प्रयोग के फलस्वरूप भारत में गेहूँ और चावल की खेती के क्षेत्रफल में तो वृद्धि हुई ही है, लेकिन इनके उत्पादन में गत वर्षों की तुलना में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। नयी टेक्नोलॉजी के फलस्वरूप कृषि-उत्पादन में होने वाली अधिक वृद्धि को हरित क्रान्ति का नाम दिया जाता है। यह वृद्धि अधिक भूमि पर खेती कर, अच्छे बीजों, खादों और पानी के नियन्त्रित प्रयोग के कारण सम्भव हो पायी है। फलस्वरूप भारत खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में सफल हुआ है।

उन्नत किस्म के बीजों में भारतीय भूमि तथा दशाओं के अनुसार सुधार करके विभिन्न फसलों की कृषि उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है। उदाहरण के लिए-रूस के कृषि वैज्ञानिक ने उन्नत बीजों की एक नयी विधि का आविष्कार किया है जिसके द्वारा आलू व टमाटर दोनों एक ही पौधे से तैयार किये जाएँगे। इस नयी विधि से पौधे की जड़ में आलू और ऊपर टहनियों में टमाटर पैदा होगा। इस नयी किस्म के पौधे का नाम आलू और टमाटर के नामों का मिला-जुला नाम पोमेटो (Pomato) रखा गया है।

केन्द्रीय आलू अनुसन्धान संस्थान, शिमला ने आलू के बहुत छोटे आकार के बीज का (UPBoardSolutions.com) आविष्कार किया है, जिसे ‘सूक्ष्म कन्द’ कहा जाता है। वर्तमान में आलू की औसत उपज 15 टन प्रति हेक्टेयर है किन्तु इस नये बीज ‘सूक्ष्म कन्द’ से आलू की औसत उपज 25 टन प्रति हेक्टेयर प्राप्त हुई है जो कि अमेरिका व जर्मनी की औसत उपज के बराबर है।

उन्नत बीजों व उर्वरकों के अधिक प्रयोग की स्थिति में खेती को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। अतः सिंचाई के साधनों में वृद्धि तथा सुधार करके कृषि उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व दर्शाने वाले दो प्रमुख बिन्दु लिखिए।
उत्तर :
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व दर्शाने वाले दो प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित हैं –

  1. राजस्व की प्राप्ति
  2. उद्योगों का आधार।

प्रश्न 2.
भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के तीन प्रमुख कारण लिखिए। [2013, 14]
उत्तर :
भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के तीन प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

  1. कृषि जोतों का छोटा होना
  2. सिंचाई-सुविधाओं का अभाव।
  3. उत्तम बीज व खाद का अभाव।

प्रश्न 3.
भारत में किन्हीं दो प्रमुख भूमि-सुधारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भारत के दो प्रमुख तथा प्रभावी भूमि-सुधार हैं –

  1. जमींदारी उन्मूलन व मध्यस्थों की समाप्ति तथा
  2. चकबन्दी व भूमि की अधिकतम जोत का निर्धारण अर्थात् हदबन्दी।

प्रश्न 4.
भारत में कृषि का राष्ट्रीय आय में कितना योगदान है ?
उत्तर :
भारत में कृषि का राष्ट्रीय आय में (UPBoardSolutions.com) लगभग 28% का योगदान है।

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प्रश्न 5.
भारत में मुख्यतः कितने प्रकार की फसलें होती हैं ?
उत्तर :
भारत में मुख्यत: दो प्रकार की फसलें होती हैं—

  1. रबी की फसल तथा
  2. खरीफ की फसल।

प्रश्न 6.
भारत की दो नकदी फसलों का उल्लेख कीजिए। (2018)
उत्तर :

  1. गन्ना तथा
  2. जूट भारत की दो नकदी फसलें हैं।

प्रश्न 7.
जमींदारी उन्मूलन के एक प्रमुख प्रभाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
जमींदारी के उन्मूलन से काश्तकार भू-स्वामी बन गये।

प्रश्न 8.
चकबन्दी से होने वाले एक प्रमुख लाभ का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
चकबन्दी द्वारा अपखण्डित जोतों (खेतों) को एक स्थान पर लाया जा सका, (UPBoardSolutions.com) जिससे उन पर कृषि निविष्टियों के प्रयोग में सुविधा हो गयी।

प्रश्न 9.
भूमि की चकबन्दी का एक प्रमुख उद्देश्य लिखिए।
या
जोतों की चकबन्दी का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
अपखण्डित जोतों (खेतों) को एक स्थान पर लाना ही चकबन्दी का प्रमुख उद्देश्य और अर्थ है।

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प्रश्न 10.
कृषि के उत्पादन में वृद्धि के लिए कोई दो महत्वपूर्ण उपाय लिखिए।
उत्तर :
कृषि के उत्पादन में वृद्धि के लिए दो महत्त्वपूर्ण उपाय निम्नलिखित हैं –

  1. किसानों को कृषि शिक्षा एवं प्रशिक्षण देना।
  2. कृषि सुविधाओं को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराना।

प्रश्न 11.
कृषि उत्पादों पर आधारित दो उद्योगों के नाम लिखिए। [2014]
उत्तर :
कृषि उत्पादों पर आधारित दो उद्योगों के नाम हैं—

  1. चीनी उद्योग तथा
  2. सूती वस्त्र उद्योग।

प्रश्न 12.
भूमिहीन श्रमिक से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
भूमिहीन श्रमिक वह है जो दूसरों की भूमि पर मजदूर के रूप में कृषि-कार्य करता है।

प्रश्न 13.
कृषि श्रमिक से क्या आशय है ?
उत्तर :
कृषि श्रमिक से आशय ऐसे व्यक्ति से है जो अपनी (UPBoardSolutions.com) आजीविका के लिए कृषि पर आश्रित है।

प्रश्न 14.
आश्रित जनसंख्या से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
वह जनसंख्या जो किसी भी उत्पादन क्रिया में लीन नहीं है तथा अपनी आजीविका के लिए दूसरों पर निर्भर है, आश्रित जनसंख्या कहलाती है।

प्रश्न 15.
भारत में भूमि-सुधार के कोई दो उद्देश्य लिखिए।
उत्तर :
भारत में भूमि सुधार के दो उद्देश्य हैं –

  1. उत्पादन में वृद्धि तथा
  2. सामाजिक न्याय दिलाना।

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प्रश्न 16.
भारत में नीची कृषि उत्पादकता के कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर :
भारत में नीची कृषि उत्पादकता के दो कारण हैं –

  1. उत्पादन की परम्परागत तकनीक तथा
  2. अपवाही सिंचाई एवं वित्त सुविधाओं का अभाव।

प्रश्न 17.
भारत में भूमि-सुधार कार्यक्रमों की सफलता के लिए दो सुझाव दीजिए। [2018]
उत्तर :
भूमि-सुधार कार्यक्रमों की सफलता के लिए दो सुझाव निम्नलिखित हैं –

  1. भूमि-सुधार कार्यक्रम को समन्वित रूप में लागू किया जाना चाहिए।
  2. भूमि सम्बन्धी अभिलेखों को पूर्ण किया (UPBoardSolutions.com) जाना चाहिए।

प्रश्न 18.
गहन कृषि पर टिप्पणी लिखिए। [2014]
उत्तर :
कृषि की वह पद्धति जिसके अन्तर्गत कृषक सापेक्षतः एक छोटे क्षेत्र पर अधिक श्रम व पूँजी की सहायता से कृषि करते हैं, गहन कृषि कहलाती है। इस पद्धति में भूमि में परती न छोड़कर लगातार फसलें उत्पन्न की जाती हैं। इसीलिए अधिक श्रम व पूँजी की आवश्यकता पड़ती है। गहन खेती के अन्तर्गत मुख्यतः नकदी फसलें उगायी जाती हैं जिससे कृषकों को अधिक-से-अधिक लाभ प्राप्त होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. भारत से निर्यात होने वाले प्रमुख कृषि पदार्थ हैं –

(क) गेहूँ, चावल; चाय, कहवा
(ख) चाय, कहवा, कपास, जूट
(ग) चाय, मसाले, काजू, तम्बाकू
(घ) गन्ना, फल, सब्ज़ियाँ, जूट

2. भारतीय कृषि में निम्न उत्पादकता का कारण है –

(क) पिछड़ी तकनीकी
(ख) जोत का छोटा आकार
(ग) साख का अभाव
(घ) ये सभी

3. हरित क्रान्ति सम्बन्धित है – [2013]

(क) कृषि के व्यापारीकरण से
(ख) कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भरता से
(ग) पशुधन विकास से
(घ) कृषि उत्पादन में वृद्धि से

4. हरित क्रान्ति का आधार है –

(क) उन्नत बीज, सिंचाई, उर्वरक, कीटनाशक
(ख) पशुधन, उर्वरक, उन्नत कृषि-उपकरण, भण्डारण
(ग) मानव-श्रम, पशुधन, उर्वरक, कृषि-उपकरण
(घ) सिंचाई, मानव-श्रम, कृषि-उपकरण, उर्वरक

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5. भारतीय कृषि के पिछड़ेपन का/के कारण है / हैं –

(क) कृषकों की निर्धनता
(ख) अपखण्डित कृषि-जोत
(ग) सिंचाई तथा उर्वरकों की कमी।
(घ) ये सभी

6. भारत में कृषि भूमि का प्रतिशत क्या है? [2012]

(क) 19.27%
(ख) 18%
(ग) 21.4%
(घ) 20%

7. भू-दान आन्दोलन कब प्रारम्भ किया गया?

(क) 1951 ई० में
(ख) 1952 ई० में
(ग) 1953 ई० में
(घ) 1954 ई० में

8. अन्त्योदय कार्यक्रम क्रियान्वित करने में अग्रणी राज्य है –

(क) उत्तर प्रदेश
(ख) राजस्थान
(ग) हिमाचल प्रदेश
(घ) बिहार

9. भारत में भूमि-सुधार के अन्तर्गत सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम है –

(क) चकबन्दी
(ख) मेंड़बन्दी
(ग) वृक्षारोपण
(घ) यन्त्रीकरण

10. भारत में हरित क्रान्ति का सूत्रपात बीसवीं शताब्दी के किस दशक में हुआ?

(क) पाँचवें
(ख) छठवें
(ग) सातवें
(घ) आठवें

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11. निम्नलिखित में से कौन कृषि निविष्टि है? [2016]

(क) बीज
(ख) शक्ति
(ग) सिंचाई
(घ) ये सभी

12. ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका का मुख्य स्रोत क्या है? [2010, 18]

(क) नौकरी
(ख) व्यापार
(ग) उद्योग
(घ) कृषि

13. निम्नलिखित में से कौन कृषि निविष्टि नहीं है? [2013]

(क) बीज
(ख) पूँजी
(ग) लगान
(घ) व्यापार

14. कौन कृषि आगत नहीं है? [2014]

(क) बीज
(ख) सिंचाई
(ग) उद्योग
(घ) उर्वरक

उत्तरमाला

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 (Section 4)

Hope given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 are helpful to complete your homework.

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