UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 22 Emotional Development

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 22
Chapter Name Emotional Development (संवेगात्मक विकास)
Number of Questions Solved 21
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 22 Emotional Development (संवेगात्मक विकास)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
संवेग का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। संवेगों की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

संवेग का अर्थ
(Meaning of Emotion)

‘संवेग’ को अंग्रेजी में ‘Emotion’ कहते हैं। Emotion शब्द ‘Emovre’ से बना है, जिसका अर्थ है-उत्तेजित होना’। इस प्रकार संवेग की स्थिति में व्यक्ति उत्तेजित हो जाता है और उसका व्यवहार असामान्य हो जाता है। संवेग व्यक्ति के वैयक्तिक तथा आन्तरिक अनुभव हैं। प्रत्येक व्यक्ति सुख, दु:ख, पीड़ा तथा क्रोध का अनुभव करता है। जब तक ये अनुभव अपने साधारण रूप में रहते हैं, तब इन्हें राग या भाव (feeling) कहा जाता है, परन्तु जब किसी विशेष कारण या घटना से राग या भाव उग्र रूप धारण कर लेते हैं, तो उन्हें संवेग कहा जाता है।

संवेग की परिभाषा
(Definition of Emotion)

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने संवेगों को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है

1. किम्बाल यंग के अनुसार, “संवेग प्राणी की उत्तेजित, मनोवैज्ञानिक तथा शारीरिक दशा है, जिसमें शारीरिक क्रियाएँ तथा भावनाएँ एक निश्चित उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए स्पष्ट रूप से बढ़ जाती हैं।

2. टी० पी० नन के अनुसार, संवेग सम्पूर्ण प्राणी का वह मूलत: मनोवैज्ञानिक तीव्र विघ्न डालने वाला व्यवहार है, जिसमें चेतना, अनुभूति, व्यवहार तथा अन्तरावयव की क्रियाएँ शामिल रहती हैं।”

3. वुडवर्थ के अनुसार, “संवेग, प्राणी की उत्तेजित अथवा उद्वेग अवस्था है। यह अनुभूति की उस रूप में उत्तेजित अवस्था है, जिसमें व्यक्ति स्वयं अनुभव करता है। यह पेशीय तथा ग्रन्थीय क्रिया की गड़बड़ी है, जैसा कि बाहर से प्रतीत होता है।”

4. जेम्स ईवर के अनुसार, “संवेग शरीर की जटिल अवस्था है, जिसमें श्वास लेना नाड़ी, ग्रन्थियाँ, उत्तेजना, मानसिक दशा तथा अवरोध आदि का अनुभूति पर प्रभाव पड़ता है एवं मांसपेशियाँ एक विशेष व्यवहार करने लगती हैं।”

5. जर्सिल्ड के अनुसार, “संवेग शब्द किसी भी प्रकार से आवेग में आने, भड़क उठने अथवा उत्तेजित होने की दशा को सूचित करता है।”

संवेग की विशेषताएँ (लक्षण)
(Characteristics of Emotion)

संवेग की विभिन्न परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर संवेग की निम्नांकित विशेषताओं पर प्रकाश पड़ता

1. भावनाओं से सम्बन्धित- डॉ० जायसवाल के अनुसार, “संवेगों का सम्बन्ध भावनाओं और वृत्तियों से होता है। बिना भावना के संवेग सम्भव नहीं है। भावनाएँ एक प्रकार से संवेगों की पृष्ठभूमि है अथवा संवेगों के गर्भ में भावनाओं का ही बल है। वास्तव में भावात्मक प्रवृत्ति का बढ़ा हुआ रूप ही संवेग है।

2. वैयक्तिकता- संवेग की अन्य विशेषता उसका वैयक्तिक होना है। एक ही परिवेश में दो व्यक्ति भिन्न-भिन्न संवेगों का अनुभव करते हैं और उनकी प्रतिक्रियाएँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। उदाहरण के लिए-एक रोती हुई महिला को देखकर एक व्यक्ति दया से द्रवित हो जाता है, तो दूसरा व्यक्ति उसे ढोंगी समझकर उससे घृणा करने लगता है।

3. तीव्रता- संवेग की अनुभूति अत्यन्त तीव्र होती है। संवेग को यदि एक प्रकार का उद्वेग कहा जाए तो अनुचित नहीं है। वे व्यक्ति की मन:स्थिति को तीव्रता के कारण अस्त-व्यस्त कर देते हैं, परन्तु इनकी तीव्रता में अन्तर भी होता है। एक शिक्षित व्यक्ति में अशिक्षित व्यक्ति की अपेक्षा संवेग की तीव्रता कम होती है, क्योंकि शिक्षित व्यक्ति अपने संवेगों पर नियन्त्रण करना सीख जाता है।

4. व्यापकता- संवेग वैयक्तिक होते हुए भी सर्वानुभूति और सर्वव्यापक होते हैं। संवेगों का अनुभव समस्त प्राणी करते हैं। स्टाउट के अनुसार, “निम्न श्रेणी के प्राणियों से लेकर उच्चतर प्राणियों तक एक ही प्रकार के संवेग पाये जाते हैं।” अन्तर केवल मात्रा का होता है। किसी को क्रोध अधिक आता है और किसी को कम।

5. स्थानान्तरण- प्रायः संवेग स्थानान्तरित हो जाते हैं। यदि कोई अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारी पर क्रोधित हो जाता है और उसी दशा में यदि कर्मचारी का कोई साथी उसे छेड़ दे तो वह अपने साथी पर क्रोधित होने लगता है।

6. संवेगात्मक सम्बन्ध- संवेग का सम्बन्ध किसी व्यक्ति, वस्तु या विचार से सम्बद्ध होता है। हम किसी व्यक्ति या विचार के प्रति ही क्रोध या घृणा करते हैं। दूसरे शब्दों में, संवेग का कोई-न-कोई आधार अवश्य होता है।

7. सुख और दुःख की भावना- संवेग में किसी-न-किसी रूप में सुख या दु:ख का भाव निहित रहता है। जब हम किसी वस्तु को देखकर भयभीत होते हैं तो उसमें दु:ख का भाव निहित होता है। जब हम आशा करते हैं तो उसमें सुख की अनुभूति रहती है। स्टाउट के अनुसार, “अपनी विशेष भावना के अतिरिक्त संवेग में नि:सन्देह रूप से सुख या दु:ख की भांघना होती है।”

8. बाह्यशारीरिक परिवर्तन- संवेगात्मक अवस्था में हमारे शरीर में जो बाह्य परिवर्तन होते हैं, वे इस प्रकार हैं-भय या क्रोध में शरीर का काँपना, पसीना आना, रोंगटे खड़े होना, आँखों में लाली छाना या आँसू निकलना, प्रसन्नता में मुस्कराना या हँसना आश्चर्य के समय आँखों का खुला रह जाना।

9. आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन- संवेगात्मक अनुभूति के समय शरीर में आन्तरिक परिवर्तन भी होते हैं; जैसे-हृदय की धड़कन तीव्र होना, क्रोध की दशा में, पेट में पाचक रस निकलना बन्द होना तथा भोजन की पाचन की सम्पूर्ण प्रक्रिया का अस्त-व्यस्त हो जाना।

10. व्यवहार में परिवर्तन- संवेगात्मक दशा में व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है। क्रोध से ओत-प्रोत व्यक्ति का व्यवहार उसके सामान्य व्यवहार से पूर्णतया भिन्न हो जाता है।

11. मानसिक तनाव- संवेग की अवस्था में हम एक प्रकार की उत्तेजना, आवेग और मानसिक तनाव का अनुभव करते हैं।

12. चिन्तन- शक्ति का लोप-संवेग के कारण हमारी चिन्तन-शक्ति का लोप हो जाता है और संवेगात्मक अवस्था में अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं रहता। उदाहरण के लिए-क्रोध के वशीभूत होकर व्यक्ति हत्या तक कर देता है।

13. स्थिरता की प्रवृत्ति- संवेग की प्रवृत्ति में स्थिरता होती है। अपने प्रिय की मृत्यु का दु:ख पर्याप्त काल तक हमारे मन में रहता है। इसी प्रकार जब हम किसी पर क्रोधित होते हैं तो पर्याप्त काल तक उसका प्रभाव हमारे मन पर छाया रहता है। उसके सामने आने पर हमारा क्रोध फिर भड़क उठता है।

14. क्रियात्मक प्रवृत्ति का होना- जिस समय हम संवेग का अनुभव करते हैं, तो उस समय कुछ-न-कुछ क्रिया अवश्य होती है। उदाहरण के लिए-जब हम कोई घृणास्पद वस्तु को देखते हैं तो तुरन्त ही हम अपना मुख उसकी ओर से फेर लेते हैं। इसी प्रकार क्रोधित होने पर हम अपने हाथ मलने या दाँत किटकिटाने लगते हैं।

प्रश्न 2
संवेगात्मक विकास से क्या आशय है? संवेगात्मक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों को उल्लेख कीजिए।
या
उन कारकों का उल्लेख कीजिए,जो संवेगात्मक विकास पर प्रभाव डालते हैं।
उत्तर:

संवेगात्मक विकास का आशय
(Meaning of Emotional Development)

शिशु जन्म के उपरान्त क्रमश: संवेगों को प्रकट करना प्रारम्भ करता है। इस प्रकार से संवेगों के क्रमश: होने वाले विकास को ही संवेगात्मक विकास कहा जाता है। संवेगात्मक विकास की प्रक्रिया के अन्तर्गत व्यक्ति के संवेगों का स्वरूप क्रमश: सरल से जटिल की ओर अग्रसर होता है। संवेगात्मक विकास के अन्तर्गत ही संवेगों को नियन्त्रित करना भी सीखा जाता है। जैसे-जैसे बालक का संवेगात्मक विकास होता है, वैसे-वैसे उसके संवेगों में क्रमशः स्थिरता आने लगती है। संवेगात्मक विकास के ही परिणामस्वरूप व्यक्ति के संवेग उसकी आयु तथा सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप स्वरूप ग्रहण करते हैं। व्यक्तित्व के सुचारु विकास के लिए संवेगात्मक विकास का सामान्य होना अनिवार्य है।

संवेगात्मक विकास को प्रभावित करने वाले कारक
(Factors Influencing Emotional Development)

बालक के संवेगात्मक विकास को निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं|

1.शारीरिक स्वास्थ्य- शारीरिक स्वास्थ्य का संवेगों पर विशेष प्रभाव पड़ता है। जो बालक सबल और स्वस्थ होते हैं, उनमें संवेगात्मक स्थिरता निर्बल और अस्वस्थ बालकों की अपेक्षा अधिक होती है। क्रो एवं क्रो के अनुसार, “बालक के स्वास्थ्य का उसकी संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।”

2. मानसिक विकास- जिन बालकों का मानसिक विकास पर्याप्त हो जाता है, उनमें संवेगात्मक स्थिरता पायी जाती है। निम्न मानसिक विकास विकास के बालक की अपेक्षा प्रतिभाशाली बालक अपने संवेगों पर सफलता से नियन्त्रण स्थापित कर लेता है।

3. थकान- थकान का संवेगात्मक विकास पर विशेष प्रभाव पड़ता है। जब बालक थका हुआ होता है तो वह शीघ्र क्रोध और चिड़चिड़ेपन का शिकार हो जाता है।

4. परिवार का वातावरण- जिस परिवार के सदस्य अत्यधिक, आर्थिक संवेदनशील होते हैं, उस परिवार के बालक भी उसी प्रकार से, संवेदनशील हो जाते हैं। इसी प्रकार यदि परिवार का वातावरण उल्लासमय, सुखद तथा शान्तिपूर्ण रहता है, तो बालक पूर्ण सुरक्षा का अनुभव करता है और उसका संवेगात्मक विकास सन्तुलित रूप से होता है।

5. माता-पिता के आचरण और व्यवहार- माता-पिता के आचरण तथा व्यवहार का बालक के संवेगात्मक विकास पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। जो माता-पिता अपने बालकों की उपेक्षा करते हैं या आवश्यकता से अधिक उनको लाड़-प्यार करते हैं तथा उन्हें इच्छानुसार कार्य करने कीस्वतन्त्रता नहीं देते, उनका यह आचरण बालकों के अवांछनीय संवेगात्मक विकास में योग प्रदान करता है।

6. सामाजिक मान्यता- क्रो एवं क्रो के अनुसार, “यदि बालक को अपने कार्यों की सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं होती तो उनके संवेगात्मक व्यवहार में उत्तेजना या शिथिलता आ जाती है। उदाहरण के लिए–यदि एक बालक स्वयं करि बनाता है, परन्तु उस कविता को जन-समुदाय पसन्द नहीं करता तो बालक निराशा और कुण्ठा से ग्रसित हो जाता है।

7. आर्थिक स्थिति- आर्थिक स्थिति बालकों के संवेगों को प्रभावित करती है। एक निर्धन बालक में अनेक अवांछनीय संवेग स्थायी हो जाते हैं। धनी परिवारों के बालक की वेशभूषा तथा रहन-सहन देखकर निर्धन परिवार के बालक में द्वेष और ईर्ष्या के संवेग प्रबल रूप धारण कर लेते हैं।

8. अभिलाषा- प्रत्येक बालक कोई-न-कोई अभिलाषा रखता है। कोई महान् कवि बनना चाहता है तो । कोई डॉक्टर या इंजीनियर। परन्तु जब परिस्थितियाँ प्रतिकूल होती हैं और बालक की अभिलाषाएँ पूरी नहीं हो पाती हैं, तो वह निराशा में डूब जाता है। यह निराशा संवेगात्मक तनाव की जनक होती है।

9. विद्यालय का वातावरण- परिवार के पश्चात् विद्यालय ही वह स्थान है, जो बालकों की भावनाओं को सबसे अधिक प्रभावित करता है। बालक विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से संवेगों की अभिव्यंजना करता है। यदि विद्यालय में विभिन्न क्रियाओं का आयोजन इस ढंग से किया जाता है कि बालक अपनी अभिव्यक्ति, इच्छा और रुचियों के अनुकूल कर सके, तो उन्हें आनन्द और उल्लास का अनुभव होता है। परिणामस्वरूप उनके संवेगों का स्वस्थ विकास होता है। इसके विपरीत यदि विद्यालय में आतंक, भय तथा पक्षपात का वातावरण होता है, तो बालक उत्तेजना, क्रोध तथा घृणा से ग्रसित हो जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शैशवावस्था में होने वाले संवेगात्मक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

शैशवावस्था में संवेगात्मक विकास
(Emotional Development in Infancy)

शिशु के संवेगात्मक विकास के सम्बन्ध में स्किनर तथा हैरीमन ने लिखा है कि “शिशु का संवेगात्मक व्यवहार क्रमशः अधिक स्पष्ट और निश्चित होता जाता है। उसके व्यवहार के विकास की सामान्य दिशा अनिश्चित और अस्पष्ट से विशिष्ट की ओर होती है।” एक शिशु के संवेगात्मक विकास की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं|

  1. जन्म के समय शिशु में कोई विशेष संवेग नहीं होता। वह केवल उत्तेजना का अनुभव करता है। शिशु को रोना, चिल्लाना और हाथ-पैर पटकना उत्तेजना का परिणाम है।
  2. तीन मास का शिशु उत्तेजना के साथ-साथ कष्ट और प्रसन्नता का अनुभव करने लगता है। छ: मास तक वह भय, घृणा तथा क्रोध भी प्रकट करने लग जाता है।
  3. एक वर्ष का शिशु आनन्द और स्नेहका अनुभव करने लग जाता है। दो वर्ष तक बालक के प्रायः सभी संवेग विकसित हो जाते हैं और पाँच वर्ष की आयु में बालक के संवेगों पर उसके वातावरण का प्रभाव पड़ना आरम्भ हो जाता है।
  4. शिशु का संवेगात्मक व्यवहार अत्यन्त अस्थिर होता है। यदि रोते हुए बालक को चॉकलेट दी जाए तो वह तुरन्त चुप हो जाता है। आयु के विकास के साथ-साथ शिशु के संवेगात्मक व्यवहार में स्थिरता आती जाती
  5. शिशु के संवेगों में प्रारम्भ में तीव्रता होती है धीरे-धीरे वह तीव्रता समाप्त हो जाती है।
  6. शिशु के संवेग प्रारम्भ में अस्पष्ट होते हैं, परन्तु धीरे-धीरे उनमें स्पष्टता आती जाती है।

प्रश्न 2
बाल्यावस्था में होने वाले संवेगात्मक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास
(Emotional Development in Childhood)

बाल्यावस्था में प्रवेश करते-करते बालक के संवेगों में पर्याप्त स्थिरता आ जाती है। शैशवकाल में विकसित संवेगों की अभिव्यक्ति बाल्यावस्था में ही होती है। बालक में सामूहिकता का विकास हो जाता है और वह अपने मित्रों के प्रति प्रेम, घृणा, द्वेष तथा प्रतियोगिता की भावना का प्रकटीकरण करने लग जाता है। वह शैशवकाल के समान शीघ्र उत्तेजित नहीं होता, भय और क्रोध पर वह पर्याप्त नियन्त्रण स्थापित कर लेता है। इस अवस्था में बालक के संवेगात्मक विकास पर विद्यालय के वातावरण का विशेष प्रभाव पड़ता है। जिन विद्यालयों में पर्याप्त स्वतन्त्रता तथा स्वस्थ परम्पराओं का वातावरण होता है, वहाँ बालकों का संवेगात्मक विकास उचित दिशा में होता है। इसके विपरीत दमन, आतंक तथा कठोरता के वातावरण में ऐसा नहीं होता। इस अवस्था में बालक के संवेगों में पर्याप्त शिष्टता आ जाती है। वह अपने अध्यापक तथा अभिभावकों के आगे उन संवेगों को प्रकट नहीं होने देता, जिनको वे उचित नहीं समझते।

प्रश्न 3
किशोरावस्था में होने वाले संवेगात्मक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास
(Emotional Development in Adolescence)

किशोरावस्था में संवेगों में तीव्रता से परिवर्तन होते हैं। एक किशोर के लिए अपने संवेगों पर नियन्त्रण करना अत्यन्त कठिन होता है। उसमें प्रेम, दया, क्रोध तथा सहानुभूति आदि संवेग स्थायित्व धारण कर लेते हैं। किसी को दु:खी देखकर वह अत्यन्त भावुक हो उठता है तथा अत्याचार को देखकर एकदम क्रोधित हो उठता है। इस अवस्था में किशोर न तो बालक होता है और न प्रौढ़। ऐसी दशा में उसके अपने संवेगात्मक जीवन में वातावरण से अनुकूलन करने में विशेष कठिनाई होती है। वातावरण में अनुकूलन की असफलता से उसे निराशा होती है।

यह निराशा उसे कभी घर से भागने के लिए प्रेरित करती है तो कभी आत्महत्या के लिए। इस अवस्था के किशोर-किशोरियों में काम-प्रवृत्ति का तीव्र विकास होता है, जिसके कारण उनके संवेगात्मक व्यवहार पर विशेष प्रभाव पड़ता है। वे दिवास्वप्न देखने लगते हैं तथा उनका अधिकांश समय कल्पना लोक में विचरण करने में व्यतीत होता है। प्रत्येक लड़का किसी लड़की के सम्पर्क में आकर भावुक हो उठता है। किशोर का संवेगात्मक विकास बहुत कुछ परिस्थितियों पर निर्भर करता है। अनुकूल परिस्थितियाँ उसे प्रोत्साहित करती हैं तथा प्रतिकूल परिस्थितियाँ उसे निराश करती हैं।

प्रश्न 4
बालक के सुचारु संवेगात्मक विकास के लिए शिक्षक के कर्तव्यों एवं भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

बालक के संवेगात्मक विकास में शिक्षक की भूमिका
(Role of Teacher in Emotional Development of Children)

बालक के संवेगात्मक विकास में विद्यालय की महत्त्वपूर्ण भूमिका एवं योगदान होता है। विद्यालय में भी शिक्षक या अध्यापक का सर्वाधिक महत्त्व होता है। बालक के उचित संवेगात्मक विकास के लिए अध्यापक को निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए

  1. बालकों में उत्तम रुचियाँ उत्पन्न करने के लिए अध्यापक को स्वस्थ सदों का सहारा लेना चाहिए, जैसे-आशा, हर्ष तथा उल्लास आदि।
  2. अध्यापक का कर्तव्य है कि अवांछित संवेगों; जैसे-भय, क्रोध, घृणा आदि का मार्गान्तीकरण या शोधन कर उन्हें उत्तम कार्यों के लिए प्रेरित करे।
  3. पाठ्यक्रम निर्धारण में भी बालकों के संवेगों को उचित स्थान दिया जाए।
  4. अध्यापक को चाहिए कि वह बालकों को संवेगों पर नियन्त्रण रखने का प्रशिक्षण दें।
  5. वांछनीय संवेगों का यथासम्भव विकास करके बालकों में श्रेष्ठ विचारों, आदर्शों तथा उत्तम आदतों का निर्माण किया जाए।
  6. बालकों को संवेगों के आधार पर महान् तथा साहित्यिक कार्यों के लिए प्रेरित किया जाए।
  7. अध्यापक को चाहिए कि बालकों के संवेगों को इस तरीके से परिष्कृत करे कि उनका आचरण समाज के अनुकूल हो सके।
  8. वांछनीय संवेगों के माध्यम से छात्रों में साहित्य, कला तथा देशभक्ति के प्रति प्रेम उत्पन्न किया जा सकता है।
  9. संवेग द्वारा अध्यापक बालकों को स्वाध्याय के लिए प्रेरित करके उनके मानसिक विकास में भी योग प्रदान कर सकता है।
  10. अध्यापक को सदा छात्रों के साथ प्रेम एवं मित्रता का व्यवहार करना चाए।
  11. अध्यापक को स्वयं संवेगात्मक सन्तुलन बनाये रखना चाहिए संक्षेप में, अध्यापकों का कर्तव्य है कि वे संवेगों के स्वरूप और विकास से भली-भाँति परिचित हों तथा शिक्षण कार्य द्वारा बालक में उचित संवेगों का विकास करें। प्रत्येक अध्यापक को यह ध्यान में रखना चाहिए कि संवेग विचार एवं व्यवहार के प्रमुख चालक अथवा प्रेरित शक्तियाँ हैं और उनका प्रशिक्षण एवं नियन्त्रण आवश्यक है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
बालकों के संवेगों एवं संवेगात्मक व्यवहार की मुख्य विशेषताएँ क्या होती हैं ?
उत्तर:
प्रौढ़ व्यक्तियों तथा बालकों के संवेगों में पर्याप्त अन्तर होता है। बालकों के संवेगों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित होती हैं

  1. बालकों द्वारा प्रकट किये जाने वाले संवेग प्राय: सरल, सीधे-सादे तथा क्षणिक होते हैं।
  2. बालकों के संवेग स्थायी नहीं होते बल्कि वे शीघ्र ही परिवर्तित होते रहते हैं।
  3. भिन्न-भिन्न बालकों द्वारा समान दशाओं में भी भिन्न-भिन्न संवेगात्मक प्रतिक्रियाएँ प्रकट की जाती हैं। ऐसा देखा जा सकता है कि डर की दशा में कोई बालक रोता है, कोई चिल्लाता है तथा कोई दुबक जाता है।

प्रश्न 2
संवेगों के नियन्त्रण के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
संवेगात्मक विकास की प्रक्रिया के अन्तर्गत कुछ संवेगों को नियन्त्रित करना भी आवश्यक होता है। संवेगों को नियन्त्रित करने के लिए निम्नलिखित विधियों को अपनाया जाता है

  1. दमन या विरोध- इस विधि के अन्तर्गत अवांछित संवेगों को दबा या रोक देने की व्यवस्था होती है। प्रबल संवेगों का दमन प्रायः हानिकारक माना जाता है।
  2. अध्यवसाय- संवेगों को नियन्त्रित करने के लिए आवश्यक है कि बालकों को सदैव ही किसी-न-किसी कार्य में व्यस्त रखा जाए। इससे उनका व्यवहार सामान्य रहता है।
  3. रेचन- संवेगों को नियन्त्रित रखने का एक उपाय रेचन भी है। रेचन के अन्तर्गत बालकों को अपने संवेगों को प्रकट करने का पर्याप्त अवसर दिया जाता है। इससे उनकी मन की भड़ास निकल जाती है और वे सामान्य हो जाते हैं।
  4. मार्गान्तीकरण- संवेगों को नियन्त्रित करने के लिए मार्गान्तीकरण के उपाय को भी अपनाया जाता है। इस उपाय के अन्तर्गत संवेगों की अभिव्यक्ति के मार्ग को परिवर्तित कर दिया जाता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
संवेग से क्या आशय है ?
उत्तर:
संवेग एक प्रकार की भावात्मक स्थिति होती है, जिसमें व्यक्ति को मन:शारीरिक सन्तुलन पूर्ण रूप से अस्त-व्यस्त हो जाता है।

प्रश्न 2
‘संवेग’ की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
“संवेग शब्द किसी भी प्रकार से आवेग में आने, भड़क उठने अथवा उत्तेजित होने की दशा को सूचित करता है।”

प्रश्न 3
मुख्य रूप से किन कारणों से संवेगों की उत्पत्ति होती है ?
उत्तर:
संवेगों की उत्पत्ति मुख्य रूप से मनोवैज्ञानिक कारणों से ही होती है।

प्रश्न 4
छोटे शिशुओं द्वारा किस प्रकार के संवेग अभिव्यक्त किये जाते हैं ?
उत्तर:
छोटे शिशुओं द्वारा सरल तथा अस्पष्ट संवेग अभिव्यक्त किये जाते हैं।

प्रश्न 5
शिशुओं द्वारा मुख्य रूप से कौन-कौन से संवेग अभिव्यक्त किये जाते हैं ?
उत्तर:
शिशुओं द्वारा मुख्य रूप से भय, क्रोध तथा प्रेम नामक संवेग ही अभिव्यक्त किये जाते हैं।

प्रश्न 6
किशोरों द्वारा अभिव्यक्त किये जाने वाले संवेग कैसे होते हैं ?
उत्तर:
किशोरों द्वारा अभिव्यक्त किये जाने वाले संवेग प्रबल तथा अनियन्त्रित होते हैं।

प्रश्न 7
संवेगात्मक विकास को प्रभावित करने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. शारीरिक स्वास्थ्य
  2. बौद्धिक स्तर
  3. घर एवं समाज का वातावरण
  4. लिंग-भेद

प्रश्न 8
संवेगों के अत्यधिक दमन का बालक के व्यक्तित्व पर कैसा प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
संवेगों के अत्यधिक दमन का बालक के व्यक्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है

प्रश्न 9
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. व्यक्ति के जीवन में संवेगों का कोई महत्त्व नहीं है
  2. संवेगावस्था में व्यक्ति का चिन्तन एवं निर्णय लेने की क्षमता अत्यधिक उत्तम एवं दोष रहित हो जाती है
  3. बाल्यावस्था में संवेगों को नियन्त्रित करने के उपाय किये जाने चाहिए।
  4. संवेगों की उत्पत्ति सदैव आर्थिक कारकों से होती है
  5. संवेगों को नियन्त्रित करने का एक उत्तम उपाय उनका शोधने है

उत्तर:

  1. असत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. अस्त्य
  5. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-

प्रश्न 1.
संवेग के विषय में सत्य है
(क) प्रसन्न होना तथा हँसना
(ख) आवेश में आ जाना, भड़क उठना तथा उत्तेजित हो जाना
(ग) कष्ट अनुभव करना
(घ) अन्य व्यक्तियों की सहानुभूति की आशा करना

प्रश्न 2.
संवेगावस्था की पहचान का सही उपाय है-
(क) विचार-प्रक्रिया का तीव्र होना
(ख) भाषा का दोषपूर्ण होना
(ग) मुखाभिव्यक्ति
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 3.
प्रबल संवेगावस्था में व्यक्ति का चिन्तन
(क) सुव्यवस्थित हो जाता है
(ख) प्रबल हो जाता है
(ग) अस्त-व्यस्त हो जाता है
(घ) उत्तम हो जाता है

प्रश्न 4.
बाल्यावस्था में अभिव्यक्त होने वाले संवेग-
(क) स्थायी होते हैं
(ख) प्रबल होते हैं
(ग) शीघ्र परिवर्तनीय होते हैं
(घ) असहनीय होते हैं

प्रश्न 5.
संवेगों को नियन्त्रित करने का उपाय है
(क) दमन
(ख) रेचन
(ग) मार्गान्तीकरण एवं शोधन
(घ) ये सभी

प्रश्न 6.
संवेग की अभिव्यक्ति होती है
(क) भाषा
(ख) इंगित चेष्टा
(ग) चेहरे का प्रदर्शन
(घ) ये सभी

उत्तर:

  1. (ख) आवेश में आ जाना, भड़क उठना तथा उत्तेजित हो जाना,
  2. (ग) मुखाभिव्यक्ति
  3. (ग) अस्त-व्यस्त हो जाता है
  4. (ग) शीघ्र परिवर्तनीय होते हैं
  5. (घ) ये सभी
  6. (घ) ये सभी

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 17 Process of Development

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Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 17
Chapter Name Process of Development (विकास की प्रक्रिया)
Number of Questions Solved 26
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 17 Process of Development (विकास की प्रक्रिया)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
‘विकास’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। विकास में होने वाले परिवर्तनों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

विकास का अर्थ
(Meaning of Development)

प्रायः विकास का अर्थ आयु में बड़े होने या कद में बड़े होने से लगाया जाता है, परन्तु विकास का यह अर्थ भ्रामक है। विकास का अर्थ है-“वे व्यवस्थित तथा समानुगत परिवर्तन, जो परिपक्वता की प्राप्ति में सहायक होते हैं। यहाँ पर व्यवस्थित का अर्थ है-क्रमबद्धता, अर्थात् शारीरिक और मानसिक परिवर्तन में कोई-न-कोई क्रम अवश्य होता है और प्रत्येक परिवर्तन अपने पूर्व परिवर्तन पर निर्भर रहता है। समुनगत शब्द का अर्थ है, इन परिवर्तनों में परस्पर सामंजस्य होता है अर्थात् ये परिवर्तन सम्बन्धविहीन नहीं होते। कुछ विद्वान् विकास को एक अवधारणा मानते हैं, परन्तु गैसल (Gassel) के अनुसार विकास एक अवधारणा मात्र नहीं है, वरन् विकास एक अवधारणा से कहीं अधिक है। विकास का निरीक्षण किया जा सकता है तथा उसका मूल्यांकन भी किया जा सकता है। विकास व्यक्ति में नवीन योग्यताएँ उत्पन्न करता है, जिससे उसमें नवीन विशेषताओं का जन्म होता है। दूसरे शब्दों में, विकास निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है, जो जन्म से पूर्व ही आरम्भ हो जाती है।

विकास की परिभाषाएँ
(Definitions of Development)

विकास की कुछ प्रमुख परिभाषाओं का विवरण इस प्रकार है-

  1. जेम्स ड्रेवर (James Drever) के अनुसार, “विकास वह दशा है, जो प्रगतिशील परिवर्तन के रूप में व्यक्ति में निरन्तर प्रकट होती है अर्थात् यह प्रगतिशील परिवर्तन किसी भी व्यक्ति में भ्रूणावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक चलता है और विकासतन्त्र को नियन्त्रण में रखता है। यह दशा प्रगति का मापदण्ड होती है तथा इसका प्रारम्भ शून्य से होता है।”
  2. मुनरो (Munro) के अनुसार, “परिवर्तन श्रृंखला की वह व्यवस्था, जिसमें बालक भ्रूणावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक गुजरता है, विकास के नाम से जानी जाती है।”
  3. हरलॉक (Hurlock) के अनुसार, “विकास अभिवृद्धि तक ही सीमित नहीं है। इसके बजाय उनमें प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम निहित रहता है। विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएँ और नवीन मान्यताएँ होती हैं।”
  4. इंगलिश (English) के अनुसार, “विकास प्राणी की शरीर अवस्था में एक लम्बे समय तक होने वाले लगातार परिवर्तन का एक क्रम है। यह विशेषतया ऐसा परिवर्तन है, जिसके कारण जन्म से लेकर परिपक्वता और मृत्यु तक प्राणी में स्थायी परिवर्तन होते हैं।’

विकास में परिवर्तन के रूप
(Types of Changes in Development)

विकास में मुख्यतया चार प्रकार के परिवर्तन होते हैं|

1. आकार में परिवर्तन- आयु-वृद्धि के साथ-साथ बालकों के शारीरिक पक्ष में पर्याप्त परिवर्तन दिखलाई पड़ने लगता है। आकार में यह परिवर्तन परिपक्वता तक चलता रहता है। जन्म लेने के पश्चात् आयु के बढ़ने के साथ-साथ बालक की लम्बाई, भार, आकार आदि में भी वृद्धि होने लगती है। इसी प्रकार शरीर के आन्तरिक भाग में भी अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं। उदाहरण के लिए-फेफड़े, हृदय तथा आँतों के आकार में वृद्धि हो जाती है। बालक नवीन शब्दों को सीखते हैं, जिससे उनके शब्दकोश का विस्तार होता है। धीरे-धीरे उनमें तर्कशक्ति का भी विकास होता जाता है।

2. अनुपात में परिवर्तन- विकास की प्रक्रिया में बालक के शारीरिक विकास में आनुपातिक परिवर्तन होता है। बालक को एक प्रौढ़ के रूप में समझना भारी भूल है, क्योंकि बालक तथा प्रौढ़ दोनों के शरीर में अनुपात सम्बन्धी विभिन्नता पायी जाती है। लगभग 14 वर्ष की आयु (किशोरावस्था) में जाकर बालक और प्रौढ़ के अनुपात के पुराने लक्षणों की समाप्ति में शारीरिक समानता आने लगती है। प्रारम्भ में शारीरिक विकास के अनुपात में इस प्रकार परिवर्तन होते हैं–सिर के अनुपात में दूनी, शरीर के अनुपात में तीन-गुनी तथा मस्तिष्क और शरीर के ऊपरी अंगों में चार-गुनी वृद्धि हो जाती है।

अनुपात सम्बन्धी परिवर्तन मानसिक रूप से भी दृष्टिगोचर होते हैं। छोटे बालक कल्पना तो करते हैं, परन्तु उनकी कल्पना लक्ष्यहीन होती है। जैसे-जैसे बालक बड़ा होता है, उसकी कल्पना में वास्तविकता का अंश आने लगता है। इसी प्रकार आयु के साथ-साथ बालक की रुचियों में भी परिवर्तन होता है। प्रारम्भ में बालक स्वयं अपने में तथा अपने खिलौनों में रुचि लेता है। जब वह पर्याप्त बड़ा हो जाता है, तब वह आस-पास के साथी बालकों के साथ खेलने में रुचि लेने लगता है।

3. पुराने लक्षणों की समाप्ति- जैसे-जैसे बालक बड़ा होता जाता है, वैसे-ही-वैसे उसके पुराने लक्षण लुप्त होते जाते हैं। उदाहरणार्थ–एक छोटा शिशु प्रारम्भ में हाथ-पैर चलाता है, सरक-सरक कर चलता है तथा तुतला कर बोलता है, परन्तु वर्ष भर के बाद इनमें से अभिकांश लक्षणों का लोप हो जाता है। इसी प्रकार आयु-वृद्धि के साथ शरीर के अन्दर थाईमस ग्लैण्ड (Thymus Gland) का लोप हो जाता है। दूध के दाँत, जो जन्म के पश्चात् निकलते हैं, कुछ वर्ष बाद गिर जाते हैं और उनके स्थान पर स्थायी दाँत निकल आते हैं।

4. नवीन विशेषताओं की प्राप्ति- विकास क्रम में जहाँ पुराने लक्षणों का लोप हो जाता है, वहीं बालक का शरीर नवीन रूपरेखा ग्रहण करने लगता है। उदाहरण के लिए-तुतलाहट के स्थान पर बालक स्पष्ट बोलने लगता है। किशोरावस्था में तो अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तन होते हैं। बालकों के दाढ़ी-मूंछ निकलने लगती है। उनकी आवाज में भारीपन आ जाता है। बालिकाओं के स्तनों में उभार आ जाता है। इन शारीरिक परिवर्तनों के कारण किशोर-किशोरियों की मानसिक क्रियाओं तथा सांवेगिक प्रतिक्रियाओं में पर्याप्त परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। दोनों वर्गों के सदस्यों में परस्पर आकर्षण तथा रुचि अत्यधिक तीव्रता से बढ़ने लगती है।

प्रश्न 2
विकास के मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
या
विकास के प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए तथा उनका शैक्षिक महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

विकास के सिद्धान्त
(Theories of Development)

विकास एक जटिल प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया का व्यक्ति के जीवन में सर्वाधिक महत्त्व है। विकास की प्रक्रिया की समुचित व्याख्या प्रस्तुत करने के लिए विभिन्न सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं। विकास सम्बन्धी मुख्य सिद्धान्तों का विवरण निम्नवर्णित है –

1. निरन्तर विकास का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार, बालक का विकास तभी से प्रारम्भ हो जाता है, जब वह गर्भावस्था में होता है। विकास की यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। दूसरे शब्दों में, विकास अचानक नहीं होता, वरन् उसमें निरन्तरता रहती है। स्किनर के अनुसार, “विकास प्रक्रियाओं की निरन्तरता का सिद्धान्त केवल इस बात पर बल देता है कि व्यक्ति में कोई अचानक परिवर्तन नहीं होता।”

2. सामान्य से विशिष्ट की ओर का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार, बालक का विकास सामान्य प्रक्रियाओं से विशिष्ट प्रक्रियाओं की ओर होता है। उदाहरण के लिए प्रारम्भ में बालक अपने सम्पूर्ण हाथ का संचालन करता है, तत्पश्चात् धीरे-धीरे वह अपनी उँगलियों पर नियन्त्रण स्थापित करता है। विकास की समस्त अवस्थाओं में बालक की प्रक्रियाएँ विशिष्ट बनने से पूर्व सामान्य होती हैं।

3. विकास की विभिन्न गति का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार एक ही मापदण्ड से समस्त बालकों के विकास का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। विभिन्न बालकों के विकास की गति में भिन्नता पायी जाती है और यह भिन्नता अन्त तक बनी रहती है।

4. समान प्रतिमान का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार समान प्रजाति (Race) में विकास की गति समान प्रतिमानों से प्रभावित होती है। हरलॉक के अनुसार, “प्रत्येक प्रजाति, वह चाहे मानव जाति हो या पशु जाति, अपनी जाति के अनुरूप विकास का अनुकरण करती है।” मनुष्य चाहे अमेरिका में पैदा हो या भारत में, उसका मानसिक, शारीरिक तथा संवेगात्मक विकास समान रूप से होता है।

5. विकास क्रम का सिद्धान्त- शिरले (Shirley) तथा गैसिल (Gassal) आदि ने परीक्षण करके यह सिद्ध कर दिया है कि बालक का गामक (Motor) तथा भाषा (Language) सम्बन्धी विकास एक निश्चित क्रम में होता है। प्रत्येक बालक जन्म के समय केवल रोना जानता है। तीन माह के पश्चात् वह ध्वनि निकालने लगता है। सात माह के पश्चात् वह मा, मी, पा, पा आदि शब्दों का उच्चारण करने लगता है।

6. विकास दिशा का सिद्धान्त- कुछ विद्वानों के अनुसार बालक के विकास की प्रक्रिया सिर से पैर की दिशा की ओर चलती है। प्रारम्भ में बालक केवल अपना सिर उठा पाता है। तीन माह के बाद वह अपने नेत्रों की गति पर नियन्त्रण कर लेता है। छह माह में उसका अपने हाथों की गतियों पर नियन्त्रण हो जाता है। नौ माह में वह सहारे से बैठने लगता है तथा एक वर्ष में लड़खड़ा कर चलने लगती है।

7. परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार विभिन्न अंगों के विकास में सामंजस्य और परस्पर सम्बन्ध रहता है। दूसरों शब्दों में, बालक के शारीरिक विकास, मानसिक और संवेगात्मक पक्षों के विकास में परस्पर सम्बन्ध रहता है। जब बालक का शारीरिक विकास होता है तो उसके साथ-साथ उसकी ध्यान केन्द्रित करने की शक्तियों, रुचियों तथा संवेदनाओं में भी परिवर्तन होता रहता है।

8. वैयक्तिक भिन्नता का सिद्धान्त- प्रत्येक बालक के विकास का अपना निजी स्वरूप होता है। ऐसी दशा में वैयक्तिक भिन्नताओं का होना स्वाभाविक है। सम आयु के दो बालकों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आदि पक्षों के विकास में वैयक्तिक विभिन्नताओं के दर्शन होते हैं।

9. वंशानुक्रमण तथा वातावरण की अन्तःक्रिया का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार बालक का विकास वंशानुक्रमण तथा वातावरण की अन्त:क्रिया द्वारा होता है। यदि यह कहा जाए कि केवल वंशानुक्रमण ही बालक के विकास में योग देता है, तो यह बात सर्वथा गलत है। यही बात वातावरण के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है।

विकास के सिद्धान्त का शैक्षिक महत्त्व
(Educational Importance of Principle of Development)

विकास की प्रक्रिया का बालक एवं व्यक्ति के जीवन के सभी पक्षों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि विकास के सिद्धान्तों का विशेष शैक्षिक महत्त्व भी है। वास्तव में शिक्षा की प्रक्रिया का विकास की प्रक्रिया से घनिष्ठ एवं अटूट सम्बन्ध है। शिक्षा की प्रक्रिया सदैव विकास की प्रक्रिया के साथ-साथ चलती है। विकास की प्रक्रिया के सुचारु होने की दशा में शिक्षा की प्रक्रिया भी सामान्य एवं सुचारु रूप से चलती है। विकास की प्रक्रिया का मूल्यांकन विकास के सिद्धान्तों के आधार पर ही किया जा सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि विकास के सिद्धान्तों का विशेष महत्त्व है।

प्रश्न 3
विकास को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए। या विकास को प्रभावित करने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

विकास को प्रभावित करने वाले कारक
(Factors Influencing the Development)

यह सत्य है कि विकास की प्रक्रिया में एक प्रकार की समरूपता पायी जाती है, परन्तु इसके साथ-ही-साथ यह भी सत्य है कि विकास एवं व्यक्तिगत प्रक्रिया भी है। प्रत्येक व्यक्ति का विकास उसके अपने ही ढंग से होता है। इस भिन्नता का मूल कारण यह है कि व्यक्ति के विकास की प्रक्रिया पर विभिन्न कारक अपना-अपना विशिष्ट प्रभाव डालते हैं। इस स्थिति में विकास को प्रभावित करने वाले कारकों को जानना भी आवश्यक है। विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

1. बुद्धि- बालकों के विकास पर प्रभाव डालने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण कारक बुद्धि है। प्रायः तीव्र बुद्धि के बालकों का विकास तेजी से होता है और मन्द बुद्धि के बालकों का धीमी गति से। टरमन (Turman) के अनुसार, कुशाग्र बुद्धि के बालक 13 माह की आयु में चलना सीख जाते हैं, सामान्य बुद्धि के 14 माह में, मूर्ख बालक 22 माह की आयु में तथा मूढ़ बालक 30 माह की आयु में चलना सीखते हैं। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि बुद्धि और विकास में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है।

2. प्रजाति- प्रजातीय भिन्नता बालक के विकास को भी प्रभावित करती है। विभिन्न प्रजातियों की विकास दरें एक-दूसरे से भिन्न होती हैं। आर्य, द्रविड़, मंगोल आदि के मानसिक तथा शारीरिक विकास में पर्याप्त भिन्नता मिलती है।

3. संस्कृति- जंग (Jung) के अनुसार, “व्यक्ति के विकास में संस्कृति की स्थिति की भूमिका विशेष महत्त्व रखती है। बालक का विकास जातीय संस्कृति के अनुरूप ही होता है। जो संस्कृति जितनी अधिक उन्नत होगी, बालक उससे उसी मात्रा में गुणों का अर्जन करेगा।” विभिन्न संस्कृतियों के बालकों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि सोमान्य.सहज प्रवृत्तियाँ प्रत्येक संस्कृति में पायी जाती हैं, परन्तु उनको अभिव्यक्त करने के ढंग अलग-अलग हैं।

4. यौन- भिन्नता–इस बात के पर्याप्त प्रमाण मिल चुके हैं कि यौन-भेद बालक के शारीरिक तथा मानसिक विकास में एक विशिष्ट भूमिका रखते हैं। लड़के और लड़कियों के शारीरिक विकास में पर्याप्त अन्तर होता है। लड़के जन्म से लड़कियों से कुछ बड़े होते हैं, परन्तु विकास लड़कियों का अधिक तीव्रता से होता है। वे लड़कों की अपेक्षा पहले युवा हो जाती हैं। इसी प्रकार लड़कियों के मानसिक विकास में भी तीव्रता होती है। लड़कों की अपेक्षा वे शीघ्र बोलना सीख जाती हैं।

5. अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ- अन्त:स्रावी ग्रन्थियाँ भी बालक के विकास को प्रभावित करती हैं। इनका प्रभाव मुख्य रूप से बालक के मानसिक विकास पर पड़ता है। इन ग्रन्थियों का अभाव मांसपेशियों में पर्याप्त उत्तेजना उत्पन्न करता है तथा अस्थियों का विकास भी ठीक प्रकार से नहीं हो पाता। गल ग्रन्थियों से निकलने वाला रस सबसे अधिक बालक के शारीरिक तथा मानसिक विकास को प्रभावित करता है। इसकी न्यूनता से बालक को शारीरिक तथा मानसिक विकास रुक जाता है।

6. पौष्टिक भोजन- पौष्टिक आहार का प्रत्येक अवस्था में महत्त्व होता है, परन्तु सबसे अधिक महत्त्व बाल्यावस्था में होता है। यदि बालक को बाल्यावस्था में ही पौष्टिक भोजन मिलना आरम्भ हो जाता है तो उसका विकास उचित दिशा में होता है। भोजन की मात्रा की अपेक्षा खाद्य सामग्री का विटामिन युक्त होना आवश्यक है। जिन बालकों को उचित मात्रा में पौष्टिक भोजन नहीं मिलता, उनका शारीरिक विकास उचित ढंग से नहीं हो पाता तथा वे विभिन्न रोगों से भी ग्रस्त हो जाते हैं। अत: बालकों के उचित विकास के लिए सन्तुलित भोजन का विशेष महत्त्व है।

7. शुद्ध वायु और प्रकाश- शुद्ध वायु तथा प्रकाश बालक के कद, परिपक्वता तथा सामान्य स्वास्थ्य को विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। जिन बालकों का पालन-पोषण पर्याप्त एवं शुद्ध वायु तथा सूर्य के प्रकाश में होता है, उनका शारीरिक विकास उन बालकों की अपेक्षा उत्तम होता है, जो प्रकाशहीन तथा अशुद्ध वायु से परिपूर्ण वातावरण में रहते हैं।

8. रोग तथा चोट- यदि बालक के सिर तथा अन्य कोमल अंगों में चोट लग जाती है तो उसका भी शारीरिक व मानसिक विकास पर प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार विषैली ओषधियों का भी विकास पर कुप्रभाव पड़ता है।

9. परिवार की स्थिति- परिवार की स्थिति भी बालक के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। यदि परिवार में तीन बालक हैं तो उनकी विकास प्रक्रिया में अन्तर मिलेगा। पहले बालक की अपेक्षा तीसरे बालक का विकास अपेक्षाकृत शीघ्र होता है, क्योंकि उसे अपने भाई-बहनों के अनुकरण के पर्याप्त अवसर मिलते हैं। इसी प्रकार जिन बालकों का परिवार में लाड़-प्यार अधिक होता है, उनका विकास उन बालकों से भिन्न होता है, जिसके साथ डाँट-फटकार तथा उपेक्षा का व्यवहार किया जाता है। उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि विकास की प्रक्रिया को विभिन्न कारक प्रभावित करते हैं। सन्तुलित विकास के लिए पौष्टिक भोजन तथा स्वास्थ्यवर्द्धक परिस्थितियाँ अत्यधिक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विकास के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

विकास के मुख्य कारण
(Main Causes of Development)

विकास की प्रक्रिया के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

1. परिपक्वीकरण- परिपक्वीकरण का अर्थ होता है-स्वाभाविक विकास। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति को वंशानुगत रूप से प्राप्त शील गुणों को, जो उसके अन्दर विद्यमान हैं, का विकास ही परिपक्वता है। प्रायः यह देखा गया है कि परिपक्वता के आधार पर बालक में एकाएक शील गुण प्रकट होते हैं। हरलॉक ने परिपक्वता की परिभाषा देते हुए लिखा है-”परिपक्वता से तात्पर्य वंशानुक्रम के प्रभाव के कारण व्यक्ति में शील गुणों के प्रभावी विकास से है, जिनकी व्यक्ति में जन्म के समय क्षमता होती है।” संक्षेप में, बालक के शील गुणों का स्पष्टीकरण ही परिपक्वता है। यह मानव के विकास की अनवरत प्रक्रिया है। आयु के विकास के साथ-साथ जैसे-जैसे बालक परिपक्व होता जाता है, वैसे ही उसमें कुछ विशेषताएँ स्पष्ट होती जाती हैं तथा परिपक्वता के साथ-साथ शरीर में विभिन्न क्रियाओं के लिए क्षमता भी उत्पन्न होती जाती है।

2. सीखना- सीखने को अधिगम (Learning) भी कहा जाता है। जन्म लेने के पश्चात् बालक अपने को एक विशेष प्रकार के भौतिक तथा सामाजिक वातावरण से घिरा पाता है। बालक की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति इस भौतिक और सामाजिक वातावरण के अन्दर ही होती है, परन्तु इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति को अपने वातावरण में कुछ-न-कुछ संघर्ष अथवा अनुकूलन करना पड़ता है। इस प्रकार के अनुकूलन के लिए वह गत अनुभवों की सहायता से अपने व्यवहार में परिवर्तन लाता है और इस प्रकार सीख जाता है। गेट्स (Gates) के अनुसार, “अनुभवों और प्रशिक्षण द्वारा अपने व्यवहारों का संशोधन करना ही सीखना है।’ अनुभव जन्म से लेकर मृत्यु तक चलता रहता है। हर व्यक्ति कुछ-न-कुछ सीखता रहता है और इससे लाभ ” उठाकर व्यक्ति अपने व्यवहार में परिवर्तन करता है। अतः सीखना परिवर्तन है। सीखना एक विकास भी है, जिसका कभी अन्त नहीं होता। जीवन-पथ के प्रत्येक कदम पर व्यक्ति कुछ-न-कुछ सीखता रहता है।

प्रश्न 2
विकास तथा वृद्धि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

विकास तथा वृद्धि में अन्तर
(Difference between Development and Growth)

सामान्य अर्थ में विकास और वृद्धि समानार्थी है, परन्तु वास्तविकता यह है कि विकास और वृद्धि में पर्याप्त अन्तर है। शरीर के अंगों में बढ़ोतरी वृद्धि कहलाती है और इस वृद्धि का मापन तथा मूल्यांकन भी किया जा सकता है। इसके विपरीत विकास शरीर में होने वाले गुणात्मक परिवर्तन का बोध कराता है। उदाहरण के लिए-आयु-वृद्धि के साथ बालक की हड्डियों में वृद्धि होती जाती है तथा इनमें कठोरता और मजबूती आती जाती है। इस प्रकार वृद्धि शब्द का प्रयोग सामान्यतः शरीर तथा उसके अंगों के भार अथवा आकार में बढ़ोतरी के लिए किया जाता है। इस वृद्धि का मापन व मूल्यांकन किया जा सकता है, जबकि विकास प्रमुखतया शरीर में होने वाले गुणात्मक परिवर्तनों को प्रकट करता है। इस प्रकार वृद्धि के बाद विकास होता है। वृद्धि आकार में परिवर्तन है, जबकि विकास गुणों में परिवर्तन है। वृद्धि एक निश्चित आयु आने पर रुक जाती है, किन्तु विकास की प्रक्रिया जीवन-पर्यन्त चलती रहती है।
संक्षेप में विकास और वृद्धि में अन्तर निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है-
UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 17 Process of Development 1

प्रश्न 3
विकास के मुख्य रूपों का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:

विकास के मुख्य रूप
(Main Kinds of Development)

व्यक्ति का विकास अपने आप में समग्रता का विकास है। उसके भिन्न-भिन्न पक्षों में होने वाले विकास को विकास के विभिन्न रूप कहा जाता है। विकास के मुख्य रूप निम्नलिखित हैं|

  1. शारीरिक विकास- शरीर सम्बन्धी विकास को शारीरिक विकास कहा जाता है। विकास के इस रूप के अन्तर्गत मुख्य रूप से शरीर के अंगों में आने वाली परिपक्वता का अध्ययन किया जाता है। शरीर के अंगों में परिपक्वता आने के साथ-ही-साथ उनकी क्रियाशीलता में भी वृद्धि होती है।
  2. मानसिक विकास- व्यक्ति की मानसिक क्षमताओं में होने वाले विकास को मानसिक विकास के रूप में जाना जाता है।
  3. संवेगात्मक विकास- व्यक्ति के संवेगों में स्थिरता एवं परिपक्वता के गुण के विकास को संवेगात्मक विकास के रूप में जाना जाता है।
  4. सामाजिक विकास-व्यक्ति के समाजीकरण के परिणामस्वरूप कुछ सामाजिक सद्गुणों का आविर्भाव होता है। सामाजिक गुणों के इस विकास को ही सामाजिक विकास के रूप में जाना जाता है।
  5. नैतिक एवं चरित्र सम्बन्धी विकास- नैतिक गुणों के प्रति सचेत होना तथा चरित्र को दृढ़ता प्राप्त होना ही नैतिक एवं चरित्र सम्बन्धी विकास कहलाता है।
  6. भाषागत विकास- भाषा के सीखने, बोलने आदि को भाषागत विकास कहा जाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विकास की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
विकास की प्रक्रिया अपने आप में एक जटिल प्रक्रिया है। विकास की मुख्य विशेषताएँ अग्रलिखित हैं

  1. विकास का तात्पर्य केवल बढ़ने से नहीं है।
  2. विकास- बालक की अवस्था में दीर्घकाल तक होने वाले निरन्तर परिवर्तनों का एक क्रम है।
  3. विकास में परिवर्तन एक दिशा में होते हैं।
  4. यह परिवर्तन आगे की ओर होता है, पीछे की ओर नहीं।
  5. विकास में पूर्व स्तर का आने वाले स्तर से सम्बन्ध होता है।
  6. विकास में निरन्तरता का गुण होता है।
  7. विकास अपने आप में एक संगठित प्रक्रिया है।

प्रश्न 2
स्पष्ट कीजिए कि विकास की प्रक्रिया पर पोषण का प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला एक मुख्य तत्त्व या कारक पोषण है। पोषण का आशय है–सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार ग्रहण करना। वास्तव में बालक के सामान्य एवं सुचारु विकास के लिए पर्याप्त मात्रा में सन्तुलित आहार आवश्यक होता है। उचित पोषण से व्यक्ति का शारीरिक तथा मानसिक विकास भी सामान्य रूप से होता है। उचित पोषण के अभाव में बालक का विकास अवरुद्ध हो जाता है।

प्रश्न 3
स्पष्ट कीजिए कि विकास जीवन भर चलता रहता है।
उत्तर:
विकास की प्रक्रिया जीवन भर किसी-न-किसी रूप में अवश्य चलती रहती है। शरीर में परिपक्वता आती है, मानसिक एवं संवेगात्मक विकास भी सदैव होता रहता है। व्यक्ति के विचारों में जो परिपक्वता प्रौढ़ावस्था के उपरान्त आती है वह बाल्यावस्था अथवा युवावस्था में नहीं होती है। इसी प्रकार वृद्धावस्था में बालों का सफेद होना तथा त्वचा का कठोर होना आदि भी विकास के ही प्रमाण ।

प्रश्न 4
अभिवृद्धि की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जीवित प्राणियों के शरीर के अंगों में होने वाली बढ़ोतरी को वृद्धि या अभिवृद्धि (Growth) कहा जाता है। उदाहरण के रूप में शरीर का वजन तथा लम्बाई का बढ़ना वृद्धि कहलाता है। शारीरिक वृद्धि का निर्धारित इकाइयों में मापन एवं मूल्यांकन किया जा सकता है। वृद्धि का सीधा सम्बन्ध आकार से होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विकास से क्या आशय है?
उत्तर:
विकास एक जटिल प्रक्रिया है। इसके माध्यम से बालक अथवा व्यक्ति की निहित शक्तियाँ एवं गुण क्रमश: प्रकट होते हैं।

प्रश्न 2
विकास की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
“परिवर्तन श्रृंखला की वह व्यवस्था जिसमें बालक भ्रूणावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक गुजरता है। विकास के नाम से जानी जाती है।”

प्रश्न 3
विकास की प्रक्रिया व्यक्ति के जीवन में कब तक चलती है?
उत्तर:
विकास की प्रक्रिया व्यक्ति में किसी-न-किसी रूप में जीवन भर चलती रहती है।

प्रश्न 4
क्या बालक एवं बालिकाओं के विकास की प्रक्रिया पूर्ण रूप से एकसमान होती है?
उत्तर:
नहीं, बालक एवं बालिकाओं के विकास की प्रक्रिया में उल्लेखनीय अन्तर होता है।

प्रश्न 5
क्या ‘वृद्धि एवं विकास’ एक ही हैं?
उत्तर:
नहीं, वृद्धि एवं विकास में स्पष्ट अन्तर है।

प्रश्न 6
विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. वृद्धि
  2. प्रजाति
  3. यौन-भिन्नता तथा
  4. अन्त:स्रावी ग्रन्थियाँ

प्रश्न 7
बालक के विकास पर वंशानुक्रमण तथा पर्यावरण में से किस कारक का प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
बालक के विकास पर वंशानुक्रमण तथा पर्यावरण दोनों ही कारकों का प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 8
विकास के अन्तर्गत किस प्रकार के परिवर्तन होते हैं?
उत्तर:
विकास के अन्तर्गत गुणात्मक परिवर्तन होते हैं, जैसे कि हड्डियों तथा माँसपेशियों में क्रमश: कठोरता एवं पुष्टता आना।

प्रश्न 9
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. विकास तथा वृद्धि में कोई अन्तर नहीं है
  2. वृद्धि परिपक्वता तथा विकास परस्पर सम्बन्धित हैं
  3. विकास की प्रक्रिया का बालक की शिक्षा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता
  4. युवावस्था में आकर विकास की प्रक्रिया रुक जाती है
  5. पोषण का विकास की प्रक्रिया पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
विकास की प्रक्रिया है
(क) एक सरल प्रक्रिया
(ख) एक जटिल एवं बहुपक्षीय प्रक्रिया
(ग) एक अस्पष्ट प्रक्रिया
(घ) एक कृत्रिम प्रक्रिया

प्रश्न 2.
“विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएँ और नवीन योग्यताएँ प्रकट होती है।” यह कथन किसका है?
(क) डगलस का
(ख) हरलॉक का
(ग) टरमन का
(घ) गेस्टालर का

प्रश्न 3.
बालक के विकास तथा उसकी शिक्षा के सम्बन्ध में सत्य है
(क) विकास तथा शिक्षा में कोई सम्बन्ध नहीं है
(ख) विकास शिक्षा को प्रभावित नहीं करता
(ग) शिक्षा से विकास पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता
(घ) विकास तथा शिक्षा में घनिष्ठ सम्बन्ध है

प्रश्न 4.
बालक के विकास तथा उसकी आयु में क्या सम्बन्ध है?
(क) विकास सदैव आयु के अनुसार होता है
(ख) विकास पर आयु का कोई प्रभाव नहीं पड़ता
(ग) आयु विकास की प्रक्रिया में बाधक है
(घ) उपर्युक्त सभी कथन असत्य हैं

प्रश्न 5.
विकास को प्रभावित करने वाला कारक नहीं है
(क) वृद्धि
(ख) प्रजाति
(ग) उपलब्धि
(घ) संस्कृति

प्रश्न 6.
विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला कारक है
(क) वृद्धि
(ख) आयु
(ग) पोषण
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 7.
विकास की प्रक्रिया की विशेषता नहीं है
(क) विकास की प्रक्रिया जीवन भर चलती है
(ख) विकास की निश्चित रूप से नाप-तौल की जा सकती है
(ग) विकास में समग्रता का गुण होता है
(घ) अन्तर्निहित गुणों का प्रस्फुटन होता है

उत्तर:

  1. (ख) एक जटिल एवं बहुपक्षीय प्रक्रिया
  2. (ख) हरलॉक का
  3. (घ) विकास तथा शिक्षा में घनिष्ठ सम्बन्ध है
  4. (क) विकास सदैव आयु के अनुसार होता है
  5. (ग) उपलब्धि
  6. (घ) उपर्युक्त सभी
  7. (ख) विकास की निश्चित रूप से नाप-तौल की जा सकती है

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 6 गेहूँ बनाम गुलाब

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name गेहूँ बनाम गुलाब (रामवृक्ष बेनीपुरी)
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 6 गेहूँ बनाम गुलाब (रामवृक्ष बेनीपुरी)

लेखक का साहित्यिक परिचय और कुतियाँ

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साहित्य में स्थान–बेनीपुरी जी ने हिन्दी की विविध विधाओं में साहित्य-सृजन किया है। फिर भी वे ललित निबन्धकार, रेखाचित्रकार, संस्मरण-लेखक तथा पत्रकार के रूप में विशेष उभरकर आये हैं। इन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा से हिन्दी-साहित्य को मात्रा और गुण दोनों दृष्टियों से समृद्ध किया है और इस प्रकार हिन्दी-साहित्य में अपना प्रमुख स्थान बना लिया है।
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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 10 State: As an Informal Agency of Education

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 10
Chapter Name State: As an Informal Agency of Education (राज्य: शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण के रूप में)
Number of Questions 15
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 10 State: As an Informal Agency of Education (राज्य: शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण के रूप में)

वस्तुत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्य से आप क्या समझते हैं? राज्य के मुख्य शैक्षिक कार्यों का उल्लेख कीजिए।
शिक्षा के अभिकरण के रूप में राज्य के कार्यों की विवेचना कीजिए।
या
राज्य के शैक्षिक कार्यों का वर्णन कीजिए।
या
शिक्षा के क्षेत्र में राज्य के उत्तर:दायित्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

राज्य की परिभाषा

राज्य व्यक्तियों का वह समूह है जो निश्चित भूमि पर रहता है, जिसकी अपनी संगठित सरकार होती है और जो बाह्य नियन्त्रणों से पूर्ण स्वतन्त्र होती है। इस प्रकार से स्पष्ट होता है कि राज्य के चार तत्त्व होते हैं-भूमि या प्रदेश, जनसंख्या, सरकार एवं सम्प्रभुता।

राज्य की परिभाषा देते हुए गार्नर ने लिखा है, “राज्य न्यून संख्यक या बहुसंख्यक व्यक्तियों के समुदाय को कहते हैं जो कि निश्चित भूभाग में रहता है, जो बाहरी नियन्त्रण से पूर्णतया मुक्त है और जिसकी एक ऐसी संगठित सरकार होती है, जिसकी आज्ञा का पालन अधिकांश निवासी स्वाभाविक रूप से करते हैं।’

राज्य के शैक्षिक कार्य

राज्य के शैक्षिक कार्यों का विवेचन निम्नलिखित है
1. राष्ट्रीय शिक्षा योजना का निर्माण-राज्य का सबसे पहला कार्य यह है कि वह देश में एक ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा योजना का संचालन करे, जिससे समाज के सभी वर्गों के व्यक्तियों के हितों की रक्षा हो सके। इस दृष्टिकोण को सामने रखकर राज्य शिक्षाशास्त्रियों, विचारकों एवं राजनीतिज्ञों के सहयोग से एक शिक्षा योजना बनाता है और उसके द्वारा नागरिकों के सर्वांगीण विकास का। प्रयत्न करता है। इसके अतिरिक्त राज्य शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम एवं माध्यम को निर्धारित करता है। राष्ट्रीय शिक्षा योजना का वास्तविक जीवन के निकट होना अत्यन्त आवश्यक है, जिससे शिक्षा पाने के बाद व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा होने में समर्थ हो सके।

2. शिक्षा को अनिवार्य करना-
राज्य को राष्ट्र के सभी बालकों के बौद्धिक और मानसिक विकास की ओर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि बौद्धिक विकास होने पर ही वह इसे योग्य बन सकेंगे कि अपने कर्तव्यों और अधिकारों को समझ सकें। इसलिए राज्य को चाहिए कि वह निश्चित स्तर तक शिक्षा को अनिवार्य बनाए। इससे देश के सभी नागरिक शिक्षित होंगे और वे अपना तथा देश का कल्याण कर सकेंगे।

3. विद्यालयों की स्थापना-
वर्तमान समय में प्रत्येक राज्य का यह कर्तव्य है कि वह विभिन्न स्थानों पर विभिन्न प्रकार के विद्यालयों की स्थापना करे और व्यक्तिगत प्रयासों से खुले हुए विद्यालयों को मान्यता प्रदान करे। राज्य को विद्यालयों के निरीक्षण की भी व्यवस्था करनी चाहिए।

4. शिक्षा हेतु धन का प्रबन्ध-
राज्य का यह एक आवश्यक कर्तव्य हो जाता है कि वह सभी स्तरों की शिक्षा के लिए धन की व्यवस्था करे। इसके साथ-ही-साथ राज्य को सभी प्रकार के विद्यालयों को आर्थिक सहायता देनी चाहिए। राज्य सरकारी विद्यालयों के व्यय का वहन तो करेगा ही, लेकिन गैर-सरकारी विद्यालयों को भी उसे अनुदान देना चाहिए।

5. योग्य शिक्षकों की व्यवस्था-
शिक्षा प्रक्रिया को समुचित रूप से चलाने के लिए कुशल एवं योग्य शिक्षकों की बहुत आवश्यकता होती है, इसलिए राज्य का यह प्रमुख कर्तव्य हो जाता है कि वह विद्यार्थियों के लिए योग्य शिक्षकों की व्यवस्था करे। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए राज्य स्थान-स्थान पर प्रशिक्षण विद्यालय खोलता है, जो देश के लिए योग्य शिक्षक तैयार करते हैं। इसके साथ-ही-साथ राज्य यह भी व्यवस्था करता है कि प्रशिक्षित अध्यापकों को उनकी योग्यतानुसार विद्यालयों में अध्यापन कार्य का अवसर मिले, ताकि देश की शिक्षा का स्तर ऊँचा उठ सके।

6. सैनिक शिक्षा की व्यवस्था-
उच्च विद्यालयों में सैनिक शिक्षा की व्यवस्था करना राज्य का एक प्रमुख कर्तव्य है, जिससे आवश्यकता पड़ने पर हमारे देश के नवयुवक बाह्य आक्रमण से देश की रक्षा कर सकें। इसके लिए राज्य की ओर से स्थान-स्थान पर सैनिक विद्यालयों की स्थापना की जाती है।

7. नागरिकता का प्रशिक्षण-
लोकतन्त्र की प्रगति एवं स्थायित्व योग्य नागरिकों पर निर्भर है। अतः राज्य का कार्य बालकों को नागरिकता का प्रशिक्षण देना है, जिससे वह नागरिक गुणों से सुसज्जित होकर राज्य के आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक विकास में योगदान दे सके। प्रशिक्षण चार रूपों में होना चाहिए

  • राजनीतिक प्रशिक्षण- राज्य को चाहिए कि वह नवयुवकों के मन में अपनी राजनीतिक विचारधारा को समाविष्ट कर दे। इसके लिए उन्हें राजनीतिक प्रशिक्षण देना चाहिए। इससे नागरिक यह समझने लगेंगे कि उनके कर्तव्य और अधिकार क्या हैं और उनका पालन किस प्रकार करना चाहिए। वह राजनीतिक कार्यों में भी सक्रिय भाग ले सकेंगे। इसके लिए राज्य को रेडियो प्रसारण, राजनीतिक प्रदर्शनी, राजनीतिक उत्सवों आदि का आयोजन करना चाहिए।
  • सामाजिक प्रशिक्षण- राज्य को छात्रों को सामाजिक प्रशिक्षण देना चाहिए जिससे कि वह समाज के महत्त्वपूर्ण सदस्य बन सकें। राज्य को इस प्रकार का सामाजिक वातावरण प्रस्तुत करना चाहिए जिसमें रहकर सामाजिक भावना का विकास हो और व्यक्ति समाज की प्रगति के लिए कार्य करे।
  • आर्थिक प्रशिक्षण- किसी भी राष्ट्र की उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि नागरिकों को आर्थिक दृष्टि से प्रशिक्षित किया जाए। इसके लिए राज्य को चाहिए कि वह कृषि, उद्योग, विज्ञान आदि के प्रशिक्षण की सुविधा प्रदान करे, जिससे कि नवयुवक जीविकोपार्जन का प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें।
  • सांस्कृतिक प्रशिक्षण- राज्य को चाहिए कि वह देश के नवयुवकों को सांस्कृतिक प्रशिक्षण प्रदान करे, जिससे कि वे अपनी संस्कृति की सुरक्षा तथा उसका विकास कर सकें। इसके लिए राज्य को स्थान-स्थान पर सांस्कृतिक सोसाइटियों, चित्रशालाओं, अजायबघरों, मनोरंजन गृहों इत्यादि की स्थापना करनी चाहिए। इसके साथ-ही-साथ राज्य को चाहिए कि वह सांस्कृतिक मण्डलों, सांस्कृतिक भ्रमणों एवं सामुदायिक केन्द्रों को पर्याप्त आर्थिक सहायता प्रदान करे।

8. शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण-राज्य का कार्य शिक्षा के उद्देश्यों को निर्धारित करने में सहायता देना है। इसके लिए राज्य के उच्चकोटि के दार्शनिकों, शिक्षा विशेषज्ञों, राजनीतिज्ञों व शिक्षा मन्त्रियों को समाज की आवश्यकताओं का अध्ययन करना चाहिए और फिर इन आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य निर्धारित करने चाहिए।

9. परिवार और विद्यालयों में सम्बन्ध स्थापित करना-
राज्य को एक ऐसी संस्था का निर्माण करना चाहिए जिसमें कि अभिभावकों एवं शिक्षकों के प्रतिनिधि और उच्चकोटि के शिक्षा अधिकारी सम्मिलित हों। इस संस्था का कार्य यह विचार करना है कि किस तरह से शिक्षा द्वारा व्यक्ति और समाज का हित सम्भव हो सकता है।

10. शैक्षणिक शोध को प्रोत्साहन- 
शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार के शैक्षणिक अन्वेषणों की आवश्यकता है। इन अन्वेषणों के लिए राज्य को धन की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे शिक्षा के नए-नए आदर्श एवं नई-नई विधियाँ निर्मित हो सकें।

11. शिक्षण-संस्थाओं पर आवश्यक नियन्त्रण-
प्रायः यह देखने में आता है कि राजकीय शिक्षण संस्थाओं के अधिकारी अनैतिक कार्य करते हैं, जिससे अध्यापकों एवं विद्यार्थियों के समक्ष अनेक कठिनाइयाँ आती हैं। इसलिए राज्य का कर्तव्य है कि वह शिक्षण संस्थाओं पर आवश्यक नियन्त्रण रखे, जिससे इन शिक्षण संस्थाओं का विघटन न होने पाए। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि राज्य को अनेक प्रकार के शैक्षिक कार्य करने पड़ते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण एक बुराई है।
उत्तर:

शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण : एक बुराई

शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण हो या शिक्षा राज्य के नियन्त्रण से मुक्त हो, इस विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। व्यक्तिवादियों के अनुसार राज्य को शिक्षा में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, क्योंकि राज्य का कार्य केवल नागरिकों की रक्षा करना है। लॉक (Locke), मिल (Mill), बेन्थम (Benthem) आदि विचारकों ने भी इसी तथ्य का समर्थन किया है। व्यक्तिवादियों का कथन है कि यद्यपि कुछ निश्चित उद्देश्यों के लिए व्यक्ति राज्य का अनुशासन स्वीकार करेगा, परन्तु बहुत-से ऐसे कार्य भी हैं जिनमें व्यक्ति पूर्ण स्वतन्त्र है। मिल का कहना है कि “व्यक्ति पवित्र है और उसकी स्वतन्त्रता में राज्य का सहसा हस्तक्षेप सहन नहीं किया जा सकता।”
इस मत के समर्थकों का तर्क है–

  1. राज्य का शिक्षा पर नियन्त्रण रहने से व्यक्तियों में स्वतन्त्र विचारों का प्रसार रुक जाता है और धीरे-धीरे वाणी की स्वतन्त्रता का लोप हो जाता है।
  2. राज्य द्वारा नियन्त्रित शिक्षा-व्यवस्था में बालक के व्यक्तिव के विकास पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता, क्योंकि उनकी रुचियों, सीमाओं और इच्छाओं की पूर्ण अवहेलनी की जाती है और उसे राज्य द्वारा निर्धारित एक निश्चित साँचे के अनुसार अपने को ढालना होता है। प्रश्न 2 स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण आवश्यक है।

शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण आवश्यक है।

कुछ विद्वान् शिक्षा पर राज्य के नियन्त्रण को अच्छी बताते हैं। इनका मत है कि शिक्षित व्यक्तियों का उपयोग राज्य को ही करना है। शिक्षा पा लेने पर व्यक्ति सुयोग्य नागरिक के रूप में समाज और राज्य की सेवा में जुटेगा। इस सेवा के रूप का निर्धारण करना राज्य का कर्तव्य है। इसलिए राज्य यह अधिक अच्छी तरह समझ सकता है कि शिक्षित व्यक्तियों का उपयोग किस क्षेत्र में और कैसे किया जाए। यदि शिक्षा पर राजकीय नियन्त्रण के समर्थकों का यह तर्क ठीक है तो वस्तुतः राज्य को यह अधिकार है कि वह बालक की शिक्षा के रूप का निर्धारण करे।

इस मत के समर्थकों का यह भी कहना है कि शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्तिगत प्रयत्नों को प्रोत्साहन नहीं देना। चाहिए, क्योंकि व्यक्तिगत संस्थाएँ बालकों के हित को सर्वोपरि न रखकर व्यावसायिक दृष्टिकोण से अपना काम करती हैं। इनमें अध्यापकों का वेतन बहुत कम होता है और आवश्यक शैक्षिक उपकरण उपलब्ध नहीं रहते। इस प्रकार समष्टिवादी मत के अनुसार शिक्षा की पूर्ण व्यवस्था राज्य द्वारा ही होनी चाहिए। राज्य को शिक्षा पर पूर्ण नियन्त्रण रखना चाहिए। रूस के साम्यवादी विचारक पिंकविच (Pinckvitch) ने इस मत का समर्थन करते हुए लिखा है, “सार्वजनिक शिक्षा, जिसका उद्देश्य भावी नागरिकों का सुधार करना है, एक ऐसा शक्तिशाली यन्त्र है जो राज्य दूसरों को हस्तान्तरित नहीं कर सकता।

प्रश्न 3.
बालक की शिक्षा में राज्य का अधिक महत्त्व है अथवा समाज का? इस प्रकरण पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

बालक की शिक्षा में राज्य तथा समाज का महत्त्व

बालक की शिक्षा में राज्य तथा समाज दोनों का ही विशेष योगदान तथा महत्त्व होता है। राज्य द्वारा शिक्षा की नीतियों का निर्धारण किया जाता है, शिक्षण-संस्थाओं की स्थापना की जाती है तथा उनकी व्यवस्था एवं संचालन किया जाता है। शिक्षा के स्तर का निर्धारण तथा शिक्षण संस्थाओं के निरीक्षण का कार्य भी राज्य द्वारा ही किया जाता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि औपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में राज्य की अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इससे भिन्न बालक के समाजीकरण तथा सद्गुणों के विकास में समाज की भूमिका अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होती है।

बालक की अनौपचारिक शिक्षा का एक मुख्य अभिकरण समाज ही है। समाज द्वारा बालक को आजीवन शिक्षित किया जाता है, जब कि राज्य द्वारा की गई शिक्षा की व्यवस्था केवल सीमित समय के लिए ही होती है। राज्य द्वारा प्रदान की गई शिक्षा प्राप्त करके बालक जीविका-उपार्जन के लिए योग्यता का प्रमाण-पत्र प्राप्त कर सकता है, जब कि समाज द्वारा प्रदान की गई शिक्षा को प्राप्त करके बालक व्यावहारिक जीवन में सफलता प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि बालक की औपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में राज्य का महत्त्व अधिक है, जब कि बालक की अनौपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में समाज का महत्त्व अधिक है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्य और शिक्षा के सम्बन्ध के विषय में समन्वयवादी दृष्टिकोण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक शिक्षाशास्त्री न तो पूर्णरूप से व्यक्तिवादी मत को स्वीकार करते हैं और न ही समष्टिवादी मत को, बल्कि उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाया है। उनके अनुसार शिक्षा को न तो राज्य के पूर्ण नियन्त्रण में रखा जा सकता है और न ही उसे राज्य के नियन्त्रण से सर्वथा मुक्त किया जा सकता है। उनका कथन है कि शिक्षा जीवन की एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। कोई भी एक संस्था सभी के लिए इसकी व्यवस्था नहीं कर सकती। इसलिए शिक्षा पर राज्य के नियन्त्रण के साथ-साथ परिवार एवं धार्मिक संस्थाओं का भी नियन्त्रण होना चाहिए। इस प्रकार हमें राज्य के सीमित हस्तक्षेप तथा सीमित नियन्त्रण की नीति अपनानी चाहिए। राज्य का सीमित हस्तक्षेप केवल मार्गदर्शन के लिए होना चाहिए।

प्रश्न 2.
स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा के क्षेत्र में एकरूपता लाने का कार्य केवल राज्य ही कर सकता है।
उत्तर:
शिक्षा एक सार्वजनिक रूप से सम्पन्न होने वाली प्रक्रिया है। देश के सभी क्षेत्रों में बालक-बालिकाओं की शिक्षा का प्रावधान है। इस स्थिति में आवश्यक है कि शिक्षा के स्वरूप में एकरूपता हो। शिक्षा के क्षेत्र में एकरूपता लाने का कार्य राज्य द्वारा ही किया जा सकता है। यदि शिक्षा को राज्य के नियन्त्रण से मुक्त कर दिया जाए तो शिक्षा को संचालित करने वाली विभिन्न संस्थाएँ अपने-अपने दृष्टिकोण से शिक्षा को भिन्न-भिन्न स्वरूप प्रदान कर सकती हैं, परन्तु यदि शिक्षा राज्य के नियन्त्रण में होगी तो देश के सभी क्षेत्रों में शिक्षा का स्वरूप एक ही होगा तथा शिक्षा के क्षेत्र में एकरूपता होगी।

निश्चित उत्तरीय प्रत

प्रश्न 1.
‘राज्य’ की एक सरल परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
“राज्य एक संगठन है, जो किसी निश्चित भूभाग पर सर्वशक्तिमान सरकार के माध्यम से शासन करता है। यह सामान्य नियमों के द्वारा व्यवस्था बनाए रखता है।” -मैकाइवर

प्रश्न 2.
एक व्यवस्थित संगठन के रूप में राज्य के अनिवार्य तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
एक व्यवस्थित संगठन के रूप में राज्य के अनिवार्य तत्त्व हैं—

  • भूमि,
  • जनसंख्या,
  • सरकार तथा
  • सत्ता।

प्रश्न 3.
बालकों की शिक्षा के दृष्टिकोण से राज्य का मुख्यतम शैक्षिक कार्य क्या है?
उत्तर:
बालकों की शिक्षा के दृष्टिकोण से राज्य का मुख्यतम शैक्षिक कार्य है-शिक्षा की राष्ट्रीय नीति का निर्धारण तथा उसे लागू करना।

प्रश्न 4.
राज्य शिक्षा का औपचारिक/अनौपचारिक अभिकरण है।
उत्तर:
राज्य शिक्षा का औपचारिक अभिकरण है।

प्रश्न 5.
आपके दृष्टिकोण से शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
शिक्षा के क्षेत्र में एकरूपता तथा एक निश्चित स्तर बनाए रखने के लिए शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण आवश्यक है।

प्रश्न 6.
अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था कौन कर सकता है?
उत्तर:
अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था केवल राज्य ही कर सकता है।

प्रश्न 7.
राज्य शिक्षा के किस अभिकरण का उदाहरण है ?
उत्तर:
औपचारिक अभिकरण।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र वाले सत्ता सम्पन्न राजनीतिक संगठन को राज्य कहते हैं।
  2. राज्य द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में कोई योगदान नहीं दिया जा सकता।
  3. हमारे देश में शिक्षा की नीति का निर्धारण राज्य द्वारा ही किया जाता है।
  4. शिक्षा के क्षेत्र में एकरूपता लाने का कार्य केवल विभिन्न धार्मिक संस्थाएँ ही कर सकती हैं।
  5. औपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में राज्य का महत्त्व अधिक है, जब कि अनौपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में समाज का महत्त्व अधिक है।

उत्तर:

  1. सत्य,
  2. असत्य,
  3. सत्य,
  4. असत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
लॉक, मिल तथा बेन्थम आदि व्यक्तिवादी विचारकों की मान्यता है–
(क) शिक्षा पर राज्य का पूर्ण नियन्त्रण होना चाहिए।
(ख) शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण एक बुराई है।
(ग) केवल प्राथमिक शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण होना चाहिए।
(घ) केवल विज्ञान की शिक्षा पर राज्य का नियन्त्रण होना चाहिए।

प्रश्न 2.
सार्वजनिक शिक्षा, जिसका उद्देश्य भावी नागरिकों का सुधार करना है, एक ऐसा शक्तिशाली यन्त्र
है जो राज्य दूसरों को हस्तान्तरित नहीं कर सकता है।” यह कथन किसका है।
(क) बेन्थम का
(ख) पिंकविच का
(ग) लॉक का
(घ) प्लेटो का

प्रश्न 3.
हमारे देश में शैक्षिक नीति का निर्धारण किया जाता है
(क) शिक्षकों के द्वारा
(ख) धर्माचार्यों के द्वारा
(ग) राज्य के द्वारा।
(घ) प्रधानमन्त्री के द्वारा

प्रश्न 4.
राज्य का प्रमुख शैक्षिक दायित्व क्या है?
(क) सुरक्षा का प्रबन्ध करना
(ख) अपने विचारों को जनता तक पहुँचाना
(ग) धर्म का प्रचार करना
(घ) जनशिक्षा का प्रबन्ध करना।

प्रश्न 5.
देश में शिक्षा को एकरूपता प्रदान कर सकता है
(क) समाज
(ख) धर्म
(ग) राज्य
(घ) कोई नहीं

उत्तर:

1. (ख) शिक्षा पर राज्य को नियन्त्रण एक बुराई है,
2. (ख) पिंकविच का,
3. (ग) राज्य के द्वारा,
4. (घ) जनशिक्षा का प्रबन्ध करना,
5. (ग) राज्य।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 21 Development of Language

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Subject Pedagogy
Chapter Chapter 21
Chapter Name Development of Language (भाषा का विकास)
Number of Questions Solved 21
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 21 Development of Language (भाषा का विकास)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भाषा के विकास से क्या आशय है? भाषा के विकास की विभिन्न अवस्थाओं का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
शैशवावस्था में भाषा-विकास के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:

भाषा-विकास का आशय
(Meaning of Language Development)

बालकों के मानसिक विकास को समझने के लिए भाषा के विकास का जानना आवश्यक है। भाषा भाव तथा विचार व्यक्त करने का एक साधन है। भाषा के अतिरिक्त हम दूसरी तरह से भी भाव तथा विचार व्यक्त करते हैं, किन्तु जितनी सुविधा से हेम शब्दों द्वारा उन्हें व्यक्त कर सकते हैं, उतनी सुविधा से हम किसी दूसरी तरह से व्यक्त नहीं कर सकते। भाषा केवल विचार अभिव्यक्ति का ही साधन मात्र नहीं है, वरन् वह हमारी अनेक मानसिक शक्तियों की वृद्धि का भी मुख्य आधार है। प्रो० स्वीट के शब्दों में, “भाषा; ध्वनि तथा वाणी द्वारा विचार की अभिव्यक्ति है।’ बालक जन्म के समय केवल क्रन्दन करता है। वह क्रमश: भाषा सीखता है। इस प्रकार से बालक द्वारा भाषा को सीखने की प्रक्रिया को ही ‘भाषा का विकास’ या ‘भाषागत विकास’, कहते हैं। भाषा के विकास के लिए शिशु का अन्य व्यक्तियों के साथ सम्पर्क स्थापित होना अनिवार्य शर्त है।

भाषा-विकास का स्वरूप
(Nature of Language Development)

क्रो और क्रो (Crow & Crow) के अनुसार भाषा के विकास पर विचार करते समय दो बातों का ध्यान रखना आवश्यक है

  1. संवेदनात्मक प्रतिक्रियाएँ; जैसे-देखना और सुनना।
  2. संवेदन क्रिया सम्बन्धी अनुक्रियाएँ; जैसे-बोलना, लिखना तथा चित्रांकन।

भाषा-विकास की अवस्थाएँ (चरण)
(Stages of Language Development)

बालक के भाषा-विकास की प्रमुख अवस्थाएँ (चरण) निम्नांकित हैं|

1. चिल्लाना एवं रोना- बालक जन्म लेने के पश्चात् ही रोना और चिल्लाना प्रारम्भ कर देता है। अत: चिल्लाना तथा रोना ही उसकी प्रारम्भिक भाषा मानी जा सकती है। जब शिशु कुछ बड़ा हो जाता है तो उसका मास का शिशु भूख लगने या पेट में दर्द होने पर रोने लग जाता है। रोते समय उसका चेहरा लाल हो जाता है और आँखों में आँसू भी बहने लगते हैं, परन्तु ज्यों-ज्यों बालक बड़ा होने लगता है, उसके रोने में
बलबलाना कमी आ जाती है।
हाव-भाव

2. बलबलाना- बालक का चिल्लाना ही उसके बलबलाने में परिवर्तित हो जाता है और इसी बलबलाने से शब्द उच्चारण का विकास होता है। बलबलाना चिल्लाने की ध्वनियों से अलग होता है। क्रो एवं क्रो के अनुसार बलबलाने की आयु 3 मास से 8 मास तक। होती है। हैवलाक इसे 12 मास मानता है। बालक बलबलाना कब प्रारम्भ करता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके स्वर यन्त्रों का विकास कहाँ तक हुआ है। मैकार्थी बलबलाने को एक खेल मानते हैं। बालक इसमें एक आनन्द का अनुभव करता है। प्रायः प्रसन्नता की दशा में ही बालक बलबलाता है। बलबलाने में एक ही ध्वनि की पुनरावृत्ति होती है। बालक प्रथम स्वरों को ही दोहराता है और व्यंजनों का उच्चारण बाद में करता है। अतः सर्वप्रथम अ, इ, उ, ए आदि स्वर दोहराये जाते हैं।

3. हाव-भाव- हाव-भाव भी भाषा विकास में अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। बालक में हाव-भाव का आविर्भाव बलबलाने के साथ-साथ ही हो जाता है। छोटे बालक शब्दों के उच्चारण के साथ हाव-भाव भी प्रदर्शित करते हैं और इस प्रकार बोले गये शब्दों पर बल देते हैं। वास्तव में छोटे बालकों के साथ हाव-भाव को शब्दों का स्थानापन्न समझना चाहिए।

4. शब्द-भण्डार- ज्यों-ज्यों बालक बड़ा होने लगता है, त्यों-त्यों उसके शब्द-भण्डार में वृद्धि होती जाती है। प्रारम्भ में बालक संज्ञाओं का प्रयोग अधिक करता है। दो वर्ष का बालक लगभग पचास प्रतिशत से अधिक संज्ञाएँ बोलता है। इन संज्ञाओं में मुख्यतया मूल आवश्यकताओं से सम्बन्धित संज्ञाएँ होती हैं। धीरे-धीरे उसकी रुचि खिलौने आदि में होने लगती है। अतः वह उनके नाम भी लेना सीख जाता है। संज्ञाओं के पश्चात् बालक क्रियाओं का प्रयोग करना सीखते हैं। प्रायः साधारण क्रिया-सूचक शब्द; जैसे-लाओ, आओ, लो, दो, पकड़ो आदि का प्रयोग बालक पहले करता है। डेढ़-दो वर्ष का बालक विशेषण शब्दों का प्रयोग करना सीख जाता है। प्रारम्भ में प्रायः गरम, ठण्डा, अच्छा, बुरा आदि विशेषणों का ही प्रयोग करता है। तीन वर्ष का बालक सर्वनामों का भी प्रयोग करना सीख जाता है। स्मिथ, शर्ती, गैसेल, थॉमसन आदि के अनुसार इस अवस्था के बालक लगभग 900 शब्दों का प्रयोग करते हैं। बालक पाँच वर्ष में दो हजार और छह वर्ष में लगभग 2500 शब्दों का प्रयोग करने लग जाते हैं। संक्षेप में उसके शब्द भण्डार में तीव्रता से वृद्धि होती

5. वाक्य-निर्माण- भाषा विकास की एक अन्य अवस्था वाक्य-निर्माण की अवस्था है। 12वें मास में बालक वाक्य प्रयोग करने लग जाता है। प्रारम्भ में बालक एक शब्द के वाक्यों का प्रयोग करते हैं; जैसे-‘पानी’। इसका अर्थ है-‘मुझे पानी दो।’ 18वें मास में दो शब्दों के वाक्यों का प्रयोग करने लगते हैं। इन दो शब्दों में प्राय: एक शब्द संज्ञा होती है और दूसरी क्रिया; जैसे-‘खाना खाऊँ। गैसेल, गैरीसन, मैकार्थी तथा जर्सील्ड का मत है कि ढाई वर्ष के पश्चात् बालक पूरे वाक्यों का प्रयोग करने लग जाता है। प्रारम्भ में बालक सरल वाक्यों का प्रयोग करता है, बाद में लम्बे और मिश्रित वाक्यों का। कुशाग्र और प्रतिभाशाली बालक अपेक्षाकृत लम्बे तथा मिश्रित वाक्यों का प्रयोग सरलता से कर लेता है। 5 वर्ष के बालक छ: से दस शब्दों का प्रयोग अपने वाक्यों में करने लग जाते हैं।

6. शुद्ध उच्चारण- दस मास की आयु तक के बालक की बोली को समझना बहुत कठिन है। केवल परिवार के लोग ही उसकी भाषा या बोली का अर्थ लगा पाते हैं, क्योंकि उसका उच्चारण शुद्ध नहीं होता। लगभग 18 मास के पश्चात् ही उसका उच्चारण सुधर पाता है तथा तीन वर्ष की आयु तक उसमें पर्याप्त सुधार हो जाता है। जरसील्ड के अनुसार, बालकों के उच्चारण में व्यक्तिगत भेद पाये जाते हैं। कुछ छोटे बालके बड़े होने पर भी शुद्ध उच्चारण नहीं कर पाते। इस भेद का प्रमुख कारण है-स्वर यन्त्रों के विकास में अन्तर, परिवार के सदस्यों द्वारा अशुद्ध उच्चारण, प्रेरणा में अन्तर। उपर्युक्त विवरण द्वारा भाषा के विकास की विभिन्न अवस्थाओं का सामान्य परिचय प्राप्त हो जाता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि बालक के भाषागत विकास को विभिन्न कारक या तत्त्व प्रभावित करते हैं। इस प्रकार के मुख्य कारक हैं-परिपक्वता, शारीरिक स्वास्थ्य, सीखने के अवसर एवं अनुकरण, ” बौद्धिक क्षमता, लिंग-भेद, पारिवारिक सम्बन्ध तथा परिवार का सामाजिक-आर्थिक स्तर।

प्रश्न 2
वे कौन-से कारक हैं, जो बालकों के भाषा-विकास को प्रभावित करते हैं? विवेचना कीजिए।
उत्तर:

भाषा-विकास को प्रभावित करने वाले कारक
(Factors Influencing the Language Development)

बालकों के भाषा-विकास को प्रभावित करने वाले कारक इस प्रकार हैं|

1. स्वास्थ्य स्वास्थ्य का प्रभाव भाषा- विकास पर भी पड़ता है। जीवन के पहले दो वर्षों में गम्भीर या लम्बी बीमारी होने से बालक का भाषा-विकास ठीक से नहीं हो पाता। रोगी बालक को अन्य बालकों का सम्पर्क नहीं मिलता। बिना बोले ही उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है। उसे बोलने की कोई प्रेरणा नहीं मिलती, जिससे उसका भाषा-विकास पिछड़ जाता है। जिन बालकों में श्रवण दोष पाया जाता है उनका भाषा-विकास अवरोधित हो जाता है। दोषयुक्त तालु, कण्ठ, दाँत तथा जबड़ों के कारण भी बालक शुद्ध भाषा की योग्यता प्राप्त नहीं कर पाता।

2. बुद्धि परीक्षणों के द्वारा यह देखा गया है कि बालक की बुद्धि व उसकी भाषा- योग्यता में गहरा सम्बन्ध है। तीव्रबुद्धि बालक सामान्य बालक की अपेक्षा कम-से-कम चार माह पूर्व बोलना प्रारम्भ कर देता है और मन्दबुद्धि बालक सामान्य बुद्धि वाले बालक से बोलने में तीन वर्ष पिछड़ जाता है। परन्तु सभी मन्दबुद्धि बालकों के सम्बन्ध में यह बात नहीं कही जा सकती। ऐसा भी देखा गया है कि जो बालक अपनी प्रारम्भिक कक्षाओं में भाषा में पिछड़े रहते हैं, ऊँची कक्षाओं में काफी आगे बढ़ जाते हैं।

3. सामाजिक-आर्थिक स्थिति बालक के भाषा- विकास पर परिवार की सामाजिक व आर्थिक स्थिति का प्रभाव भी पड़ता है। शिक्षित परिवार के बालकों का भाषा-विकास अशिक्षित परिवार के बालकों की तुलना में अधिक द्रुतगति से होता है। उच्च सामाजिक स्तर के परिवारों के बालकों का शब्द-भण्डार निर्धन परिवारों के बालकों की अपेक्षा अधिक होता है। मेकार्थी के अनुसार, “उच्च व्यवसाय वाले परिवारों के बालकों पारिवारिक सम्बन्ध की वाक्य-रचना निम्नकोटि के व्यवसाय वाले परिवारों के बालकों की वाक्य-रचना की अपेक्षा कहीं अधिक सुन्दर होती है। इन सबका कारण यही है कि शिक्षित और उच्च सामाजिक व आर्थिक स्तर के परिवारों के बालकों को सीखने और समझने के अधिक अवसर उपलब्ध होते हैं।”

4. पारिवारिक सम्बन्ध- बालक के माता-पिता के साथ क्या सम्बन्ध हैं, माता-पिता बालक के साथ कितना समय व्यतीत करते हैं, माता-पिता बालक से अत्यधिक प्रेम करते हैं या उसे हर समय झिड़कते हैं, इन सब बातों का प्रभाव बालक के भाषा-विकास पर पड़ता है। जिन परिवारों में बालकों की संख्या अधिक होती है, वहाँ माता-पिता बालकों की ओर उचित ध्यान नहीं दे पाते, जिसके परिणामस्वरूप बालकों का भाषा-विकास पिछड़ जाता है। अकेले बालक का विकास जुड़वाँ बालक की तुलना में अधिक अच्छा होता है। क्योंकि जुड़वाँ बालकों को अनुकरण के अवसर नहीं मिलते। सामान्य परिवार में पले बालक का भाषा-विकास अनाथालय में पले बालक की अपेक्षा अच्छा होता है।

5. लिंग-भेद- जीवन के प्रथम वर्ष में शिशु के भाषा-विकास में किसी प्रकार का लिंग-भेद नहीं पाया जाता लेकिन दूसरे वर्ष के आरम्भ से ही यह अन्तर स्पष्ट होने लगता है। लड़कियाँ लड़कों की अपेक्षा शीघ्र बोलना शुरू करती हैं। शब्द-भण्डार, वाक्यों की लम्बाई और उनकी शुद्धता, भाषा की समझ और उच्चारण आदि में लड़कियाँ लड़कों से आगे होती हैं और यह श्रेष्ठता लड़कियों में काफी बड़ी अवस्था तक बनी रहती है लेकिन अन्त में पूर्ण विकास की स्थिति में बहुधा लड़के लड़कियों से आगे हो जाते हैं।}

6. दो भाषाएँ- जहाँ बालक को एक साथ दो भाषाएँ सिखाई जाती हैं वहाँ बालक का भाषा-विकास अवरुद्ध हो जाता है। क्योंकि बालक का ध्यान दोनों ओर रहता है, उसके मस्तिष्क में सन्देह पैदा हो जाता है, उसे एक ही बात के लिए दो-दो शब्द याद करने पड़ते हैं। इससे बालक का शब्द-भण्डार नहीं बढ़ पाता। वह सही उच्चारण नहीं कर पाता। उसमें तनाव पैदा हो जाता है। उसके मस्तिष्क पर व्यर्थ का बोझा लदा रहता है, जिससे उसे समायोजन करने में कठिनाई पैदा होती है। दो भाषाएँ सीखने से केवल भाषा-विकास पर ही नहीं उसके चिन्तन पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। वह यह निश्चय नहीं कर पाता कि किस समय कौन-सा शब्द बोलना उचित है। अतः शैशवावस्था में बालक को केवल उसकी मातृभाषा ही सिखाई जानी चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भाषा-विकास के मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
या
भाषा का विकास बालक में किस प्रकार सम्भव है? इस सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:

भाषा-विकास के मुख्य सिद्धान्त
(Main Theories of Language Development)

बालक में भाषा का विकास कुछ सिद्धान्तों के अनुसार होता है। इन सिद्धान्तों का विवरण निम्नलिखित है-

1. बोलने के लिए प्रेरणा- बालक को प्रारम्भ में बोलने के लिए किसी-न-किसी प्रकार की प्रेरणा या प्रोत्साहन की आवश्यकता रहती है। वह प्रारम्भ में अपनी मूल आवश्यकताओं के अनुसार ही बोलना सीखता है। दूसरे शब्दों में, बालक भाषा का प्रयोग करके अपने माता-पिता को अपनी विभिन्न आवश्यकताओं से अवगत कराने का प्रयास करता है। संक्षेप में, बालकों में भाषा का विकास प्रेरणाओं पर आधारित होता है।

2. अनुकरण- बालक का भाषा का विकास उसकी अनुकरण-क्षमता पर भी निर्भर करता है। वह अपने परिवारजनों द्वारा बोले गये शब्दों का भी अनुकरण बड़े चाव से करता है। अत: यह आवश्यक है कि बालकों के सम्मुख जिन शब्दों का प्रयोग किया जाए उनको शुद्ध और स्पष्ट उच्चारण किया जाए।

3. स्वर यन्त्र की परिपक्वता- गले, फेफड़ों और स्वर यन्त्र के द्वारा शब्द उच्चारण का कार्य होता है। इनके अतिरिक्त तालू, होंठ, नाक और दाँत भी शब्दोच्चारण में सहायक होते हैं। ज्यों-ज्यों इन अंगों में परिपक्वता आती है, त्यों-त्यों भाषा विकसित होती है।

4. सम्बद्धता- बालक के भाषा-विकास में सम्बद्धता का अपना विशेष योग रहता है। वह अपने विकास-क्रम में शब्दों और उसके अर्थों का सम्बन्ध तथा साहचर्य समझने लगता है। उदाहरण के लिएबालक के सम्मुख जब ‘कुत्ता’ शब्द बोला जाता है, तो उसके सम्मुख कुत्ता उपस्थित किया जाता है। इस प्रकार कुत्ता शब्द के अर्थ से वह ‘कुत्ते’ नामक जानवर से परिचित हो जाता है। भविष्य में जब कभी ‘कुत्ता’ शब्द बोला जाता है तो बिना कुत्ता देखे ही बालक के मानस पटल पर उसकी प्रतिभा अंकित हो जाती है।

प्रश्न 2
मानव-समाज के लिए भाषा का क्या महत्त्व है?
उत्तर:

मानव-समाज के लिए भाषा का महत्त्व
(Importance of Language for Human Society)

समस्त प्राणी-जगत् में केवल मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है, जिसके पास अत्यधिक विकसित भाषा है। विकसित भाषा के ही कारण मनुष्य एक विकसित एवं बहुक्षमतायुक्त प्राणी है। भाषा के ही आधार पर मानव-समाज अत्यधिक संगठित एवं व्यवस्थित है। मानवीय संस्कृति के भरपूर विकास में भी सर्वाधिक योगदान भाषा का ही है। भाषा के अभाव के ही कारण अन्य कोई भी पशु संस्कृति का विकास नहीं कर पाया है। मानव-समाज में सम्पन्न होने वाली समस्त सामाजिक अन्त:क्रियाएँ मुख्य रूप से भाषा के ही माध्यम से परिचालित होती हैं। इस तथ्य को शैरिफ तथा शैरिफ ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “शब्दों के द्वारा व्यक्ति एक-दूसरे के निकट सम्बन्ध में आते हैं। भाषा के माध्यम से व्यक्ति ऐसी योजनाएँ बनाता है जो मनुष्य को भविष्य में उन्नति की ओर ले जाती हैं। भाषा के माध्यम से व्यक्ति संचित ज्ञान को अन्य व्यक्तियों तक पहुँचाता है। मानव-समाज में व्यक्ति के समाजीकरण की प्रक्रिया में भी सर्वाधिक योगदान भाषा का ही होता है। भाषा के माध्यम से ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है तथा व्यक्ति पर समाज का नियन्त्रण लागू किया जाता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना भी आवश्यक है कि समाज में बालकों की शिक्षा की प्रक्रिया भी मुख्य रूप से भाषा के ही माध्यम से सम्पन्न होती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
बालक के सन्दर्भ में भाषा के विकास पर परिपक्वता तथा शारीरिक स्वास्थ्य का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
बालक के भाषागत विकास पर उसकी परिपक्वता तथा शारीरिक स्वास्थ्य को अनिवार्य रूप से प्रभाव पड़ता है। बोलना अनेक अंगों पर निर्भर करता है; जैसे–फेफड़े, गला, जीभ, होंठ, दाँत, स्वर यन्त्र तथा मस्तिष्क के बाकी केन्द्र आदि। बालक के ये अंग जब परिपक्व हो जाते हैं, तब ही बालक ठीक से बोल पाता है। इसके अतिरिक्त यदि कोई बालक दीर्घकाले तक बीमार रहता है तो भी उसके बोलने की क्रिया कुछ बिगड़ सकती है। यदि बालक के सुनने की क्षमता कम हो या उसके कानों में कुछ दोष हो तो भी बालक की भाषा का विकास सामान्य नहीं रह पाता। यही कारण है कि बधिर बच्चे मूक या गूंगे भी होते हैं।

प्रश्न 2
भाषागत विकास का बालक की बौद्धिक क्षमता से क्या सम्बन्ध है?
उत्तर
टरमन, शर्ली, मैकार्थी आदि मनोवैज्ञानिकों का मत है कि बालक की बौद्धिक क्षमता और उसके भाषा-विकास में विशेष सम्बन्ध है। बालक की बोली सुनकर उसकी बौद्धिक योग्यता का ज्ञान हो जाता है, परन्तु जरसील्ड का कहना है कि बोलने की क्षमता को बौद्धिक योग्यता से कोई सम्बन्ध नहीं है। उनके अनुसार जो बालक शीघ्र बोलना सीख जाता है, वह प्राय: सामान्य बुद्धि का होता है और यह भी आवश्यक नहीं है कि जो बालक देर से बोलना सीखता है, वह मन्दबुद्धि वाला ही हो।

प्रश्न 3
भाषागत विकास पर लिंग-भेद का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
एक वर्ष तक बालक तथा बालिका में भाषा-विकास प्राय: एक-सा होता है, परन्तु दूसरे वर्ष से ही दोनों में अन्तर प्रारम्भ हो जाता है। बालिकाएँ बालकों की अपेक्षा पहले बोलना प्रारम्भ कर देती हैं। बालिकाएँ लम्बे वाक्य सरलता से बोल सकती हैं, परन्तु बालक छोटे-छोटे वाक्य ही बोल पाते हैं। इसी प्रकार बालिकाओं को शब्दोच्चारण बालकों की तुलना में अधिक शुद्ध होता है। मैकार्थी के अनुसार, इस भिन्नता का कारण है, बाल्यावस्था में बालिकाओं का अपनी माँ के साथ अधिक रहना। बालक अपने पिता से अधिक लगाव का अनुभव करते हैं, परन्तु पिता प्रायः जीविका हेतु बाहर जाकर कार्य करते हैं। अत: बालकों का भाषा-विकास उचित ढंग से नहीं हो पाता।

प्रश्न 4
भाषागत विकास पर सीखने के अवसरों तथा अनुकरण का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
वातावरण में अनेक ऐसे तत्त्व होते हैं, जो बालक के भाषा-विकास में सहायक होते हैं। इन तत्त्वों में सीखने के अवसर और अनुकरण प्रमुख हैं। जिन बालकों को भाषा सीखने के पर्याप्त अवसर प्रदान किये जाते हैं, वे शीघ्र ही सीख जाते हैं। बालक का शब्द-भण्डार पड़ोसी बालकों के साथ खेलने से भी पर्याप्त विकसित होता है। माता-पिता के बोलने-चालने का अनुकरण करके भी बालक बहुत-कुछ सीखते हैं। अत: माता-पिता का कर्तव्य है कि वे अपने बच्चे के सम्मुख शुद्ध और प्रभावमयी भाषा का ही प्रयोग करें। जिन परिवारों के सदस्य आपस में गाली-गलौज और असभ्य शब्दों का प्रयोग करते हैं, वहाँ बालक भी गाली-गलौज करने लग जाते हैं।

प्रश्न 5
बालक के भाषागत विकास पर पारिवारिक सम्बन्धों का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
पारिवारिक सम्बन्ध भाषा-विकास में विशेष योग देते हैं। मैकार्थी और थॉमसन के अनुसार, अनाथालय में रहने वाले बालक बहुत अधिक रोते हैं और कम बलबलाते हैं। ये बालक प्राय: देर से बोलना प्रारम्भ करते हैं। अतः यह सिद्ध होता है कि बालक का भाषा-विकास परिवार में ही समुचित ढंग से होता है। माता-पिता के सम्पर्क और दुलार में बालक शीघ्र बोलना सीख जाता है। डेविस तथा मैकार्थी के अनुसार, बड़े लड़के की भाषा अन्य बच्चों की अपेक्षा अधिक शुद्ध होती है, क्योंकि प्रौढ़ लोगों के साथ उसका सम्पर्क अधिक रहता है।

प्रश्न 6
भाषागत विकास पर परिवार के सामाजिक-आर्थिक स्तर का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
कुछ मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि जिन परिवारों का सामाजिक तथा आर्थिक स्तर निम्न होता है, उनमें पले बालक देर से बोलना सीखते हैं। जर्सील्ड, गेसेल, डेविस, यंग तथा मैकार्थी के अनुसार, उच्च वर्गों के बालक जल्दी बोलना सीखते हैं तथा अधिक बोलते हैं। इस प्रकार के वातावरण में पले बालकों का उच्चारण भी शुद्ध होता है तथा शब्द-भण्डार बड़ा होता है। इन बच्चों की भाषा अधिक सुसंस्कृत, शिष्ट तथा परिष्कृत होती है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भाषा से क्या आशय है?
उत्तर:
पारस्परिक संचार के शाब्दिक रूप को भाषा कहा जाता है।

प्रश्न 2
भाषा की एक संक्षिप्त परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
‘‘भाषा की परिभाषा व्यक्तियों के बीच परम्परागत प्रतीकों के पाध्यम से विचार-विनिमय की प्रणाली के रूप में की जा सकती है।”

प्रश्न 3
नवजात शिशु की भाषा किस रूप में होती है?
उत्तर:
नवजात शिशु का क्रन्दन या जन्म-रोदन ही उसकी प्रारम्भिक भाषा होती है।

प्रश्न 4
भाषा के विकास के लिए सर्वाधिक अनिवार्य कारक क्या है?
उत्तर:
भाषा के विकास के लिए सर्वाधिक अनिवार्य कारक है-सामाजिक सम्पर्क।

प्रश्न 5
मानवीय भाषा के मुख्य प्रकारों या रूपों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मानवीय भाषा के मुख्य प्रकार यो रूप हैं-

  1. वाचिक अथवा मौखिक भाषा
  2. अंकित अथवा लिखित भाषा तथा
  3. सांकेतिक भाषा।

प्रश्न 6
संस्कृति के विकास में भाषा के योगदान या महत्त्व को स्पष्ट करने वाला कोई कथन लिखिए।
उत्तर:
“निश्चित रूप से भाषा मानव-संस्कृति की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण वस्तु है तथा भाषा के बिना संस्कृति का अस्तित्व और कार्य नहीं हो सकता।”

प्रश्न 7
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. भाषा पारस्परिक संचार का सर्वोत्तम माध्यम है
  2. शिशु की प्रारम्भिक भाषा क्रन्दन के रूप में होती है
  3. भाषा के विकास के अभाव में शिक्षा की प्रक्रिया सुचारु रूप से चलती है
  4. संस्कृति के विकास, संरक्षण एवं हस्तान्तरण में सर्वाधिक योगदान भाषा का ही होता है
  5. सामाजिक सम्पर्क के नितान्त अभाव में भी भाषा को सुचारु रूप से विकास हो सकता है

उत्तर:

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. सत्य
  5. असत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
विचारों के आदान-प्रदान का प्रमुख साधन है
(क) भाषा
(ख) संकेत
(ग) प्रतीक
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 2.
शिशु की भाषा का प्रारम्भ होता है
(क) बुब्बू शब्द से
(ख) माँ शब्द से
(ग) जन्म-रोदन से
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 3.
भाषागत विकास के लिए अनिवार्य शर्त है
(क) नियमित रूप से विद्यालय में जाना
(ख) लिखना-पढ़ना सीखना
(ग) सामाजिक सम्पर्क
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 4.
भाषा के विकास को प्रभावित करने वाले कारक हैं
(क) परिपक्वता
(ख) सामाजिक सम्पर्क
(ग) परिवार का सामाजिक एवं आर्थिक स्तर
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 5.
भाषा तथा शिक्षा का सम्बन्ध है
(क) भाषा तथा शिक्षा में कोई सम्बन्ध नहीं है
(ख) भाषा तथा शिक्षा का सम्बन्ध स्पष्ट नहीं है
(ग) भाषा सीखने के लिए शिक्षा आवश्यक है
(घ) सामान्य रूप से भाषा के माध्यम से ही शिक्षा का आदान-प्रदान होता है

उत्तर:

  1. (क) भाषा
  2. (ग) जन्म रोदन से
  3. (ग) सामाजिक सम्पर्क
  4. (घ) उपर्युक्त सभी
  5. (घ) सामान्य रूप से भाषा के माध्यम से ही शिक्षा का आदान-प्रदान होता है

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