UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 8 उत्सर्जन तन्त्र

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 8 उत्सर्जन तन्त्र (Excretory System)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 8 उत्सर्जन तन्त्र

UP Board Class 11 Home Science Chapter 8 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उत्सर्जन एवं उत्सर्जन तन्त्र से आप क्या समझती हैं? मुख्य उत्सर्जक अंग के रूप में गुर्दो की संरचना एवं कार्य-विधि का वर्णन कीजिए।
अथवा उत्सर्जन अंग कौन-कौन से हैं? वृक्क का चित्र बनाकर उसके कार्य समझाइए।
अथवा उत्सर्जन तन्त्र से क्या तात्पर्य है? वृक्क की रचना व कार्य चित्र द्वारा स्पष्ट कीजिए।
अथवा उत्सर्जन तन्त्र से आप क्या समझती हैं? इसके विभिन्न अंगों के नाम लिखिए।वृक्क की रचना एवं कार्य नामांकित चित्र की सहायता से समझाइए।
उत्तर:
उत्सर्जन तथा उत्सर्जन तन्त्र (Excretion and Excretory System):
शरीर में विभिन्न प्रकार की उपापचयी (metabolic) क्रियाओं के फलस्वरूप ऐसे पदार्थ बनते रहते हैं, जिन्हें शरीर में एकत्र नहीं किया जा सकता है। ये पदार्थ या तो व्यर्थ होते हैं अथवा हानिकारक। अधिक मात्रा में एकत्र होने पर व्यर्थ पदार्थ भी हानिकारक सिद्ध हो सकते हैं; अतः इन पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना आवश्यक है। व्यर्थ एवं हानिकारक पदार्थों की शरीर से बाहर निकालने की क्रिया को उत्सर्जन अथवा विसर्जन (excretion) कहते हैं। शरीर के जिन अंगों के माध्यम से व्यर्थ एवं हानिकारक पदार्थों को शरीर से बाहर निकाला जाता है, उन अंगों को उत्सर्जक अंग कहा जाता है। हमारे शरीर में विभिन्न उत्सर्जक अंग हैं। अत: हम कह सकते हैं-“उन विभिन्न अंगों की व्यवस्था को उत्सर्जन तन्त्र के रूप में जाना जाता है, जो शरीर में से व्यर्थ पदार्थों को बाहर निकालने का कार्य करते हैं।”

उत्सर्जी अंग तथा उनके कार्य (Excretory Organs and their Functions):
व्यर्थ एवं हानिकारक पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने का कार्य करने वाले शरीर के अंगों को उत्सर्जक या उत्सर्जी अंग कहा जाता है। गुर्दे या वृक्क, फेफड़े, त्वचा तथा बड़ी आँत शरीर के मुख्य उत्सर्जक अंग हैं। इनके अतिरिक्त यकृत भी अप्रत्यक्ष रूप से कुछ उत्सर्जी क्रिया करता है।

फेफड़े प्रमुखतः श्वसन क्रिया में सहायक होते हैं, किन्तु कार्बन डाइ-ऑक्साइड जैसी दूषित गैस को बाहर निकालने के कारण उत्सर्जी अंग की भूमिका भी निभाते हैं। त्वचा से पसीना निकलता है। पसीने में अनेक उत्सर्जी पदार्थ होते हैं। अत: त्वचा सुरक्षा करने का साधन होने के साथ-साथ उत्सर्जन का कार्य भी करती है। यकृत रुधिर में से अधिक मात्रा में प्राप्त अमीनो अम्लों (amino acids) को तोड़कर अमोनिया को यूरिया, यूरिक अम्ल आदि कम हानिकारक पदार्थों में बदलता है। ये हानिकारक पदार्थ गुर्दो के माध्यम से मूत्र में घुलित अवस्था में विसर्जित होते हैं। इस स्थिति में गुर्दे या वृक्क महत्त्वपूर्ण उत्सर्जन-अंग के रूप में कार्य करते हैं। बड़ी आँत मल या विष्ठा के साथ अपच पदार्थों को तो निकालती ही है, कुछ अन्य उत्सर्जी पदार्थों को भी यह बाहर निकाल देती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि गुर्दे, त्वचा, फेफड़े तथा बड़ी आँत मुख्य उत्सर्जक अंग हैं।

वृक्क की संरचना (Structure of Kidney):
बाह्य संरचना: उत्सर्जन तन्त्र का एक मुख्य अंग वृक्क या गुर्दे (kidneys) हैं। वृक्क संख्या में दो होते हैं। ये उदर गुहा में कशेरुक दण्ड (रीढ़ की हड्डी) के इधर-उधर (दाएँ व बाएँ) स्थित होते हैं। ये भूरे रंग की तथा सेम के बीज के आकार की संरचनाएँ हैं। प्रत्येक वृक्क लगभग 10 सेमी लम्बा, 6 सेमी चौड़ा तथा 2.5 सेमी मोटा होता है। बायाँ वृक्क दाएँ की अपेक्षा कुछ पीछे स्थित होता है। सामान्यतः वयस्क पुरुष के वृक्क का भार लगभग 125 ग्राम किन्तु स्त्री के वृक्क का भार 115-120 ग्राम होता है।

प्रत्येक वृक्क का बाहरी किनारा उभरा हुआ किन्तु भीतरी किनारा धंसा हुआ होता है, जिसमें से मूत्र नलिका (ureter) निकलती है। इस धंसे हुए भाग को नाभि कहते हैं। मूत्र नलिका नीचे जाकर एक पेशीय थैले में खुलती है जिसे मूत्राशय कहते हैं। मूत्र नली की लम्बाई 30 से 35 सेमी होती है।
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मनुष्य के वृक्क तथा उससे सम्बन्धित अंग। मूत्राशय श्रोणि गुहा में स्थित होता है (उदर गुहा का निचला भाग) और नीचे की ओर क्रमश: संकरा होकर मूत्र मार्ग का निर्माण करता है, जो अन्त में बाहर खुलता है।

आन्तरिक संरचना: वृक्क को बाहर से अन्दर की ओर लम्बाई में काटने से उसकी आन्तरिक संरचना देखी जा सकती है। इसके मध्य में लगभग खोखला तथा कीप के आकार का भाग होता है। यही भाग क्रमश: संकरा होकर मूत्र नलिका का निर्माण करता है। यह स्थान शीर्ष गुहा (pelvis) कहलाता है। वृक्क का शेष भाग ठोस तथा दो भागों में बँटा होता है। बाहरी, हल्के बैंगनी रंग का भाग वल्कुट या कॉर्टेक्स तथा भीतरी, गहरे रंग का भाग मेड्यूला कहलाता है।

वृक्क में असंख्य सूक्ष्म नलिकाएँ होती हैं। ये अत्यन्त कुण्डलित तथा लम्बी संरचनाएँ हैं। इन्हें वृक्क नलिकाएँ कहते हैं। प्रत्येक वृक्क नलिका के दो प्रमुख भाग होते हैं-एक प्याले के आकार का ग्रन्थिल भाग मैल्पीघियन कणिका (malpighian corpuscle) तथा दूसरा अत्यन्त कुण्डलित नलिकाकार भाग। यह नलिकाकार भाग एक स्थान पर ‘U’ के आकार में भी स्थित होता है और बाद में फिर शीर्ष गुहा कुण्डलित हो जाता है। यह नलिका एक बड़ी संग्रह । नलिका में खुलती है। प्रत्येक संग्रह नलिका एक मीनार जैसे भाग, पिरामिड में खुलती है। वृक्कों में ऐसे 10-12 पिरामिड दिखाई देते हैं जो अपने सँकरे भाग से शीर्षआन्तरिक संरचना का गुहा में खुलते हैं।
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वृक्क नलिका द्वारा मूत्र छनना : वृक्क की क्रिया-विधि (Filteration of Urine by Renal Duct : Mechanism of Kidney):
मैल्पीघियन कणिका में दो भाग होते हैं-
(i) प्याले के आकार का बोमेन सम्पुट तथा
(ii) वृक्क में आई धमनी की एक छोटी शाखा से बना केशिकाओं का जाल अर्थात् केशिकागुच्छ। केशिकागुच्छ में धमनी की जो शाखा आती है, वह इससे निकलने वाली शाखा से काफी चौड़ी होती है। इस प्रकार केशिका गुच्छ में अधिक रुधिर आता है, किन्तु निकल कम पाता है; अत: इसका प्लाज्मा केशिकाओं की पतली भित्ति से छन जाता है और सम्पुट में होकर वृक्क नलिका में आ जाता है। इस छने हुए तरल में आवश्यक तथा अनावश्यक सभी प्रकार के पदार्थ उपस्थित होते हैं। बाद में नलिका के अन्दर आगे बढ़ते हुए प्लाज्मा (तरल पदार्थ) से भोजन, लवण आदि आवश्यक पदार्थ वृक्क नलिका तथा उस पर लिपटी अनेक रुधिर केशिकाओं की भित्ति में होकर रुधिर में अवशोषित कर लिए जाते हैं; किन्तु अन्य पदार्थ, जिनमें हानिकारक उत्सर्म्य पदार्थ भी सम्मिलित हैं, अधिकांश जल के साथ वृक्क नलिका में ही रह जाते हैं। यही तरल मूत्र (urine) है। वृक्क नलिकाओं से मूत्र संग्रह नलिका, पिरामिड, शीर्ष गुहा से होता हुआ मूत्र नलिका द्वारा मूत्राशय में एकत्रित होता रहता है।
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वृक्क नलिका के ‘U’ भाग पर लिपटी हुई रुधिर केशिकाओं का निर्माण, केशिकागुच्छ से निकलने वाली धमनी की शाखा से होता है। बाद में केशिकाओं के जाल से छोटी-सी एक शिरा बन जाती है तथा वृक्क के अन्दर इस प्रकार की सभी शिराएँ मिलकर वृक्कीय शिरा (renal vein) का निर्माण करती हैं।

प्रश्न 2.
त्वचा की संरचना चित्र द्वारा समझाइए और इसके मुख्य कार्यों का वर्णन कीजिए।
अथवा त्वचा की रचना समझाइए एवं उसके मुख्य कार्यों का वर्णन कीजिए।
अथवा चित्र द्वारा त्वचा की बनावट तथा कार्य लिखिए।
उत्तर:
त्वचा की संरचना (Structure of Skin):
सम्पूर्ण शरीर के बाहरी आवरण को त्वचा कहते हैं। त्वचा की आन्तरिक रचना का अध्ययन करने के लिए जब हम त्वचा के किसी भाग की अनुदैर्घ्य काट को सूक्ष्मदर्शी यन्त्र के द्वारा देखते हैं, तो ज्ञात होता है कि इसके मुख्य दो भाग होते हैं-
(1) अधिचर्म (Epidermis)
(2) चर्म (Dermis)

(1) अधिचर्म (Epidermis): यह त्वचा की मोटी और ऊपरी परत होती है। इसमें कोशिकाओं की 3 या 4 परतें होती हैं। सबसे बाहरी परत में कोशिकाएँ मृत होती हैं, जिसको सिंगी स्तर (horny layer) कहते हैं। इसके नीचे की ओर जीवित कोशिकाओं की बनी परत, मैल्पीघियन स्तर (malpighian layer) कहलाती है। इसकी कोशिकाएँ विभाजित होती रहती हैं। जब शरीर की बाहरी त्वचा का सिंगी स्तर समाप्त हो जाता है, तब उसका स्थान मैल्पीघियन स्तर की सबसे बाहरी परत लेती है। यह परत भी इसके अन्दर उपस्थित परतों से बनती है। अधिचर्म (epidermis) के बाहरी ओर कुछ बाल और नलिकाएँ होती हैं, ये दोनों ही आन्तरिक त्वचा के भाग कहलाते हैं।
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(2) चर्म (Dermis): यह परत अधिचर्म से काफी मोटी होती है। इसमें निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण भाग पाए जाते हैं

  • रोम ग्रन्थियाँ (hair glands): ये ग्रन्थियाँ सम्पूर्ण शरीर में पायी जाती हैं। इनके स्तरों में एक ऊँची जगह होती है, जिनमें रक्त केशिकाएँ पायी जाती हैं। इनके अन्दर से एक पतला बाल निकलता है, जो ऊपर की ओर बाल नली द्वारा एक छिद्र से बाहर निकलता है।
  • पसीने की ग्रन्थियाँ (sweat or sebaceous glands): रोम ग्रन्थियों के ही आस-पास कुण्डलीदार आकृति वाली ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं। प्रत्येक ग्रन्थि एक लहरदार नलिका द्वारा अधिचर्म के बाहरी भाग में एक अलग छिद्र द्वारा खुलती है। इन ग्रन्थियों से शरीर में बना दूषित पदार्थ पसीने के रूप में बाहर निकलता रहता है। स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से इन ग्रन्थियों का विशेष महत्त्व होता है।
  • तेल ग्रन्थियाँ (oil glands): पसीने की ग्रन्थियों के कुछ ऊपर बाल नलिका के दोनों ओर अनियमित आकार की ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं। इनसे एक तेल जैसा चिकना पदार्थ निकलता है, जो बालों के छिद्रों द्वारा शरीर से बाहर निकलता रहता है।
  • नाड़ी सूत्र (nerve fibre): पिन चुभने या काँटा लगने पर इसका अनुभव तुरन्त हो जाता है। यह अनुभव नाड़ी सूत्रों के द्वारा होता है, जो त्वचा में जाल के रूप में बिछे रहते हैं।
  • रक्त केशिकाएँ (blood capillaries): चर्म भाग में शिरा और धमनियों की रक्त केशिकाएँ पायी जाती हैं। इनके द्वारा ही त्वचा के प्रत्येक भाग को रक्त मिलता है।
  • मांसपेशियाँ (muscles): शरीर के कुछ भागों में पेशियाँ पायी जाती हैं; जैसे-पेट तथा तलवे की त्वचा।
  • क्रोमेटोफोर्स (chromatophores): इनसे मनुष्य की त्वचा का रंग बनता है।
  • वसा के कण (fat granules): इन छोटे-छोटे कणों के गुच्छे चर्म की निचली सतह पर पाए जाते हैं। इनको वसा स्तर भी कहते हैं। त्वचा में पाए जाने वाले इन वसा स्तरों का मुख्य कार्य शरीर के ताप को नियमित बनाए रखना होता है।

त्वचा के कार्य (Functions of Skin):

  • सुरक्षा: त्वचा शरीर के भीतरी कोमल अंगों पर एक रक्षक आवरण बनाती है। उन्हें रगड़, धक्के या चोट से बचाती है तथा जीवाणुओं व अन्य हानिकारक जीवों को शरीर में नहीं घुसने देती है।
  • उत्सर्जन: मनुष्य व अन्य दूध देने वाले प्राणियों में त्वचा में विद्यमान पसीने की ग्रन्थियाँ (स्वेद ग्रन्थियाँ) पसीने के रूप में अनेक हानिकारक, दूषित एवं विजातीय पदार्थों का विसर्जन करती हैं। विसर्जन के इस गुण के कारण ही त्वचा को तीसरा गुर्दा भी कहा जाता है।
  • ताप नियन्त्रण: त्वचा में पाए जाने वाले वसा स्तर शरीर की गर्मी को रोकते हैं। पसीने के द्वारा भी शरीर के ताप का नियमन होता है। त्वचा से निकलने वाले पसीने के वाष्पन के लिए शरीर से गुप्त ऊष्मा ली जाती है। इससे शरीर का तापमान सामान्य बना रहता है तथा शरीर को वातावरण की
  • गर्मी परेशान नहीं करती।
  • संवेदनशीलता: त्वचा में तन्त्रिकाओं के सूत्र समाप्त होते हैं, इसलिए यह स्पर्श, दबाव, सर्दी, गर्मी, पीड़ा इत्यादि का अनुभव कराती है।
  • पोषण: मादा स्तनधारी प्राणियों की त्वचा में दूध की ग्रन्थियाँ मिलती हैं। इनसे उत्पन्न दूध शिशुओं के पोषण का सर्वोत्तम साधन है।
  • सौन्दर्य: आन्तरिक अंगों और पेशियों पर चढ़ा त्वचा का आवरण शरीर को सुन्दरता प्रदान करता है। त्वचा में एकत्र वसा भी इस कार्य में अंगों को सुडौल बनाने में सहायक होती है। यदि शरीर की त्वचा को उतार दिया जाए तो शरीर भयानक एवं कुरूप दिखाई देगा।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 8 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उत्सर्जन तन्त्र के महत्त्व का उल्लेख कीजिए। अथवा उत्सर्जन तन्त्र की शरीर में क्या उपयोगिता है?
उत्तर:
उत्सर्जन तन्त्र के महत्त्व शारीरिक स्वास्थ्य एवं सुचारु क्रियाशीलता के लिए उत्सर्जन तन्त्र का विशेष महत्त्व है। उत्सर्जन तन्त्र के विभिन्न अंग शरीर में उत्पन्न होने वाले सभी व्यर्थ एवं हानिकारक पदार्थों को शरीर से बाहर विसर्जित करने का अति महत्त्वपूर्ण एवं अनिवार्य कार्य करते हैं। शारीरिक आवश्यकताओं के लिए निरन्तर आहार, जल तथा वायु ग्रहण किए जाते हैं। ये पदार्थ जहाँ एक ओर पोषण के लिए तथा शरीर की क्रियाशीलता के लिए आवश्यक होते हैं, वहीं दूसरी ओर इनके पाचन आदि के उपरान्त शरीर में कुछ व्यर्थ एवं विजातीय तत्त्व भी उत्पन्न होते हैं। ये व्यर्थ पदार्थ गैसीय, द्रव, ठोस एवं अर्द्ध-ठोस अवस्था में पाए जाते हैं।

ये व्यर्थ पदार्थ न केवल व्यर्थ एवं विजातीय ही होते हैं बल्कि ये शरीर के लिए हानिकारक तथा विषैले भी होते हैं; अतः इन पदार्थों का शरीर से शीघ्र बाहर निकलना अति आवश्यक होता है। इन व्यर्थ पदार्थों के नियमित विसर्जन की स्थिति में हमारा शरीर स्वस्थ तथा नीरोग बना रहता है। यदि इन विजातीय तत्त्वों का समुचित विसर्जन रुक जाए तो निश्चित रूप से शरीर विकार-युक्त हो जाता है। इसीलिए उत्सर्जन तन्त्र का शरीर में विशेष महत्त्व है। वास्तव में उत्सर्जन तन्त्र शरीर की आन्तरिक सफाई की व्यवस्था को बनाए रखता है।

प्रश्न 2:.
वृक्क के चार प्रमुख कार्य लिखिए।
उत्तर:
वृक्क के चार प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं

  • उत्सर्जन (excretion): वृक्क मूत्र के रूप में नाइट्रोजनी उत्सर्जी पदार्थों को शरीर से बाहर निकालता है।
  • जल सन्तुलन (water balance): शरीर की विभिन्न क्रियाओं को सुचारु रूप में चलाने के लिए हम अत्यधिक मात्रा में जल पीते हैं। वृक्क मूत्र के रूप में जल की अतिरिक्त मात्रा को शरीर से बाहर निकालकर शरीर में जल का सन्तुलन बनाए रखते हैं।
  • लवण सन्तुलन (salt balance): मूत्र के साथ रुधिर में प्राप्त अतिरिक्त व व्यर्थ लवणों को वृक्क शरीर से बाहर निकालते हैं।
  • भ्रूणावस्था में वृक्क लाल रुधिर कणिकाओं का निर्माण करते हैं।

प्रश्न 3.
यकृत के प्रमुख उत्सर्जी कार्यों को बताइए।
उत्तर:
यकृत की उत्सर्जन में भूमिका यकृत की उत्सर्जन क्रिया में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यकृत के उत्सर्जन सम्बन्धी कुछ विशेष कार्य निम्नलिखित हैं
1. पित्त रस का स्राव करता है: यकृत शरीर की सबसे बड़ी ग्रन्थि है, जो एक विशेष प्रकार का क्षारीय द्रव बनाती है, जिसे पित्त रस कहते हैं। पित्त रस यद्यपि भोजन के पाचन आदि में सहायता करता है, तथापि इसके द्वारा उत्सर्जन का कार्य भी किया जाता है। पित्त वर्णक; लवण आदि उत्सर्जी पदार्थों को यकृत से लेकर आहार नाल में पहुँचा देता है। यहाँ से ये पदार्थ मल के साथ शरीर से बाहर कर दिए जाते हैं।

2. अतिरिक्त ऐमीनो अम्लों को यूरिया, यूरिक अम्ल आदि में बदलता है: यकृत ही अतिरिक्त ऐमीनो अम्लों को निम्नलिखित प्रक्रिया द्वारा यूरिया में बदलता है

(क) डीएमीनेशन: अतिरिक्त ऐमीनो अम्लों को यकृत कोशिकाओं में ऑक्सीजन की उपस्थिति में तोड़ा जाता है। इस क्रिया में अमोनिया बनती है। इसमें पाइरुविक अम्ल भी बनता है जो श्वसन के काम में आ जाता है।

(ख) यूरिया का निर्माण: अमोनिया एक हानिकारक गैस है। इसको यकृत कोशिकाएँ ही कार्बन डाइ-ऑक्साइड के साथ मिलाकर यूरिया (urea) का निर्माण करती हैं। इस कार्य के लिए अनेक जैव-रासायनिक क्रियाएँ होती हैं। ये सब क्रियाएँ एक चक्र के रूप में होती हैं।

प्रश्न 4.
एक रोगी मनुष्य के यकृत ने कार्य करना बन्द कर दिया है। उस मनुष्य पर इसका क्या प्रभाव होगा?
उत्तर:
यकृत का कार्य करना बन्द कर देना
मनुष्य का यकृत सभी कशेरुकीय प्राणियों की तरह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थि है। यह ग्रन्थि यदि किसी मनुष्य में कार्य करना बन्द कर दे तो वह मनुष्य अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकेगा क्योंकि इसके निम्नलिखित दुष्प्रभाव होते हैं-

  1. यकृत के द्वारा सम्पादित उत्सर्जी कार्यों में बाधा पड़ जाएगी, जिसके कारण शरीर में हानिकारक पदार्थ एकत्रित हो जाएँगे।
  2. शरीर में टूटी-फूटी कोशिकाएँ; जैसे मृत रुधिर कोशिकाएँ एकत्रित हो जाएँगी, जो इन पदार्थों या अंगों को कार्य नहीं करने देंगी। इससे श्वसन क्रिया पर प्रभाव पड़ेगा।
  3. रोगी के शरीर का ताप नियन्त्रित नहीं रहेगा।
  4. रोगी का पाचन बिल्कुल बन्द.हो जाएगा क्योंकि यकृत पाचन के लिए पित्त बनाकर क्षारीय माध्यम बनाता है।

प्रश्न 5.
मूत्र क्या है? यह कहाँ एकत्रित रहता है? मूत्र त्याग करने से शरीर को क्या लाभ होते हैं?
उत्तर:
मूत्र तथा मूत्र त्याग मत्र हल्के पीले रंग का जल-जैसा तरल पदार्थ है, जिसमें अधिकतर भाग जल (लगभग 96%) तथा अन्य उत्सर्जी पदार्थ; प्रमुखत: यूरिया (urea), यूरिक अम्ल (uric acid) आदि कार्बनिक पदार्थ (लगभग 2%) होते हैं। शेष पदार्थों में लवण (लगभग 1.5%) होते हैं।

साधारण अवस्था में, एक स्वस्थ मनुष्य प्रतिदिन लगभग 1.5 से 2 : 0 लीटर मूत्र त्याग करता है। मूत्र वृक्क नलिकाओं से बनकर हर समय बूंद-बूंद मूत्राशय में आता रहता है। मूत्रमार्ग के निरन्तर बन्द रहने के कारण मूत्र इसी में एकत्रित होता रहता है। इसके द्वार पर वर्तुल पेशियाँ (circular muscles) होती हैं, जो फैलने पर ही मूत्र को बाहर जाने देती हैं। मूत्राशय में मूत्र की पर्याप्त मात्रा (लगभग 200-250 मिली) एकत्र हो जाने पर मूत्र त्याग की इच्छा अनुभव होने लगती है तथा मूत्र त्याग कर दिया जाता है। इस प्रकार मूत्र त्याग करने से मूत्र के माध्यम से शरीर के अनेक व्यर्थ एवं विषैले पदार्थ शरीर से विसर्जित हो जाते हैं।

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प्रश्न 1.
उत्सर्जन तन्त्र से क्या आशय है?
उत्तर:
शरीर के उन विभिन्न अंगों की व्यवस्था को उत्सर्जन तन्त्र के रूप में जाना जाता है जो शरीर से व्यर्थ एवं हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालने का कार्य करते हैं।

प्रश्न 2.
हमारे शरीर के मुख्य उत्सर्जक अंग कौन-कौन से हैं? अथवा मलोत्सर्जन संस्थान ( उत्सर्जन तन्त्र) के विभिन्न अंगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
हमारे शरीर के मुख्य उत्सर्जक अंग हैं-गुर्दे या वृक्क, फेफड़े, त्वचा, बड़ी आँत तथा यकृत।

प्रश्न 3.
किसी भी उत्सर्जक अंग के कार्य न करने की स्थिति में क्या होता है?
उत्तर:
किसी भी उत्सर्जक अंग के कार्य न करने की स्थिति में शरीर में व्यर्थ एवं हानिकारक पदार्थों की मात्रा बढ़ जाती है तथा इससे स्वास्थ्य एवं जीवन को खतरा उत्पन्न हो जाता है।

प्रश्न 4.
फेफड़े मुख्य रूप से किस हानिकारक गैस का उत्सर्जन करते हैं?
उत्तर:
फेफड़े मुख्य रूप से कार्बन डाइ-ऑक्साइड नामक हानिकारक गैस का उत्सर्जन करते हैं।

प्रश्न 5.
त्वचा किस रूप में व्यर्थ एवं हानिकारक पदार्थों का उत्सर्जन करती है?
उत्तर:
त्वचा पसीने के रूप में व्यर्थ एवं हानिकारक पदार्थों का उत्सर्जन करती है।

प्रश्न 6.
स्वेद ग्रन्थियों की स्थिति और कार्य लिखिए।
उत्तर:
हमारे शरीर में त्वचा के चर्म (Dermis) भाग में स्वेद ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं। स्वेद ग्रन्थियों का मुख्य कार्य शरीर में से दूषित पदार्थों को पसीने के माध्यम से बाहर निकालना है।

प्रश्न 7.
उत्सर्जन कार्यों को ध्यान में रखते हुए त्वचा को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
उत्सर्जन कार्यों को ध्यान में रखते हुए त्वचा को तीसरा गुर्दा कहा जाता है।

प्रश्न 8.
गुर्दे शरीर के हानिकारक पदार्थों को किस माध्यम से शरीर से विसर्जित करते हैं?
उत्तर:
गुर्दे मूत्र के माध्यम से हानिकारक पदार्थों को शरीर से विसर्जित करते हैं।

प्रश्न 9.
मूत्र के माध्यम से मुख्य रूप से किन दूषित पदार्थों का विसर्जन किया जाता है?
उत्तर:
मूत्र के माध्यम से मुख्य रूप से यूरिया, यूरिक अम्ल तथा कुछ लवण विसर्जित किए जाते हैं।

प्रश्न10.
स्वस्थ व्यक्ति के मूत्र में किन पदार्थों का अभाव होना चाहिए?
उत्तर:
स्वस्थ व्यक्ति के मूत्र में ग्लूकोज, ऐल्बुमिन, पीव-कोशिकाएँ तथा लाल रक्त कण नहीं होने चाहिए।

प्रश्न 11.
गर्मी के मौसम में मूत्र की मात्रा कम क्यों हो जाती है?
उत्तर:
गर्मी के मौसम में शरीर के तापक्रम को नियमित रखने के लिए त्वचा से पसीने की अधिक मात्रा विसर्जित होने लगती है। इस स्थिति में शरीर की अतिरिक्त जल की मात्रा पसीने के माध्यम से निकल जाने के कारण मूत्र की मात्रा घट जाती है।

प्रश्न 12.
बड़ी आँत किस रूप में हानिकारक पदार्थों का शरीर से विसर्जन करती है?
उत्तर:
बड़ी आँत मल के रूप में हानिकारक पदार्थों का शरीर से विसर्जन करती है।

प्रश्न 13.
मल क्या होता है?
उत्तर:
ग्रहण किए गए भोजन का व्यर्थ तथा बिना पचा दूषित भाग मल होता है।

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निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए

प्रश्न 1.
शरीर में बनने वाले व्यर्थ एवं हानिकारक पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने वाले अंगों की व्यवस्था को कहते हैं
(क) गुर्दे एवं मूत्र प्रणाली
(ख) बड़ी आँत
(ग) पाचन तन्त्र
(घ) उत्सर्जन अथवा विसर्जन तन्त्र।
उत्तर:
(घ) उत्सर्जन अथवा विसर्जन तन्त्र

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन-सा अंग उत्सर्जक अंग नहीं है
(क) गुर्दे (ख) त्वचा
(ग) हृदय/आमाशय
(घ) बड़ी आँत।
उत्तर:
(ग) हृदय/आमाशय।

प्रश्न 3.
उत्सर्जन तन्त्र द्वारा कार्य करना बन्द कर देने पर क्या होगा
(क) शरीर अत्यधिक मोटा हो जाएगा
(ख) व्यक्ति अधिक शक्तिशाली हो जाएगा
(ग) व्यक्ति का स्वास्थ्य एवं जीवन खतरे में हो जाएगा
(घ) कोई प्रभाव नहीं होगा।
उत्तर:
(ग) व्यक्ति का स्वास्थ्य एवं जीवन खतरे में हो जाएगा।

प्रश्न 4.
रक्त में से हानिकारक पदार्थों को छानकर अलग करने का कार्य करते हैं
(क) हृदय
(ख) गुर्दे
(ग) बड़ी आँत
(घ) तिल्ली।
उत्तर:
(ख) गुर्दे।

प्रश्न 5.
रुधिर की शुद्धि किस अंग में होती है
(क) श्वसन नलिका
(ख) आमाशय
(ग) फेफड़े
(घ) हृदया
उत्तर:
(ग) फेफड़े।

प्रश्न 6.
पसीना किस अंग द्वारा निकलता है
(क) हृदय
(ख) फेफड़े
(ग) त्वचा
(घ) कान।
उत्तर:
(ग) त्वचा।

प्रश्न 7.
सामान्य दशाओं में मूत्र में नहीं पाया जाता
(क) यूरिया
(ख) यूरिक अम्ल
(ग) लवण
(घ) रक्त कण।
उत्तर:
(घ) रक्त कण।

प्रश्न 8.
मूत्र की शुद्धि किस अंग में होती है
(क) आमाशय
(ख) फेफड़े
(ग) वृक्क
(घ) हृदय।
उत्तर:
(ग) वृक्का

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UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 13 व्यक्तिगत उत्तरदायित्व

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 13 व्यक्तिगत उत्तरदायित्व (Individual Responsibility)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 13 व्यक्तिगत उत्तरदायित्व

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प्रश्न 1.
स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से समाज के प्रति प्रत्येक व्यक्ति का क्या कर्त्तव्य है? समझाकर लिखिए।
अथवा
समाज के प्रति एक जागरूक नागरिक के उत्तरदायित्वों का सविस्तार वर्णन कीजिए।
अथवा
एक अच्छे नागरिक के उत्तरदायित्वों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
अथवा
टिप्पणी लिखिए-व्यक्तिगत उत्तरदायित्व।
उत्तरः
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मनुष्यों से ही मिलकर समाज बना है और समाज के अनुरूप ही व्यक्ति का व्यक्तित्व विकसित होता है; अत: व्यक्ति के भी समाज के प्रति अनेक कर्त्तव्य होने स्वाभाविक ही हैं। दूसरी ओर समाज के भी व्यक्ति के प्रति अनेक कर्त्तव्य हैं। इस प्रकार, व्यक्ति और समाज दोनों एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। जिस समाज में जितने अधिक लोग अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, वह समाज उतना ही सुदृढ़, स्वस्थ, सम्पन्न तथा उन्नतिशील रहता है। दूसरी ओर, यदि व्यक्ति समाज के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन नहीं करता है, तो उसका प्रभाव समाज के सभी सदस्यों पर पड़ता है। इसलिए अपने सुख और शान्ति तथा उन्नति के लिए हमें समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन बड़ी सतर्कता तथा तत्परता से करना चाहिए।

समाज के प्रति व्यक्ति के कर्तव्य (Duties of a Person towards Society) –
मनुष्य स्वस्थ और सुखी रहे, इस बात का ध्यान रखकर ही समाज अपने नियम बनाता है परन्तु नियमों का पालन या उल्लंघन करना व्यक्ति का काम होता है। जहाँ समाज के सभी लोग नियम पालन करते हैं वहाँ समाज का कार्य शान्तिपूर्वक चलता है। यदि समाज के कुछ व्यक्ति भी समाज के नियम भंग करते हैं, तो उसका प्रभाव पूरे समाज पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पड़ता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी प्रत्येक व्यक्ति के समाज के प्रति कुछ कर्त्तव्य हैं। इन कर्त्तव्यों का पालन हमें अपने सुख के लिए ही नहीं, समाज के लिए भी करना आवश्यक होता है। ये कर्त्तव्य निम्नलिखित हैं –

(1) स्वच्छता या सफाई का मानव-जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। स्वयं को तथा अपने अन्य साथियों या समाज को स्वस्थ बनाए रखने के लिए सफाई का ध्यान रखना आवश्यक है। साफ-सुथरा स्थान, कपड़े और साफ-सुथरे व्यक्ति सभी को अच्छे और आकर्षक लगते हैं। व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखकर हम केवल अपने को ही स्वस्थ और सुखी नहीं रखते बल्कि समाज को स्वस्थ और सुखी रखने के लिए भी यह अत्यन्त आवश्यक है। अपने निवास-स्थान की सफाई के साथ-साथ पास-पड़ोस और अपने शहर की सफाई को भी ध्यान में रखकर प्रत्येक कार्य करना चाहिए।

(2) कुएँ, तालाब, नदी इत्यादि के सम्बन्ध में इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि इनके आस-पास गन्दे कपड़ों को धोकर, मल-मूत्र त्यागकर या कूड़ा इत्यादि डालकर जल को अशुद्ध और अस्वास्थ्यकर न बनाएँ।

(3) प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह अपने क्षेत्र में टूटी सड़कों की सूचना नगर महापालिका को अवश्य दे। यदि कहीं कोई मृत जानवर पड़ा हो तो उसकी सूचना भी सम्बन्धित कार्यालय में दे देनी चाहिए।

(4) समाज के बनाए हुए सड़क के नियमों का पालन करके दुर्घटनाओं से बचाव करें।

(5) यदि अपने घर या पास-पड़ोस में कोई संक्रामक रोग फैला हो, तो रोगी को अन्य लोगों से पृथक् रखने की व्यवस्था और स्वास्थ्य विभाग को सूचना भेजकर टीका आदि लगवाने का प्रबन्ध करना अति आवश्यक है। यदि रोगी को अस्पताल भेजना आवश्यक हो, तो उसको वहाँ भेजकर समाज के अन्य लोगों के स्वस्थ रहने में सहायता करनी चाहिए।

(6) घर के बाहर मैदान में या सड़क के किनारे मल-मूत्र त्यागकर गन्दगी करने से वातावरण दूषित होता है। ऐसा न करें और यदि दूसरे लोगों को इस प्रकार की गन्दगी करते देखें तो उन्हें भी स्वच्छता का महत्त्व समझाकर वैसा करने के लिए मना करना पर्यावरण को बचाने के लिए आवश्यक है।

(7) जब कोई संक्रामक रोग का रोगी ठीक हो जाए तो उसके कपड़े सीधे धोबी को न देकर वस्त्रों को पहले नि:संक्रामक पदार्थों के साथ उबालें तब उन्हें धोबी को देने चाहिए। उसके सभी सामान तथा कमरे की सफाई आदि के लिए नि:संक्रामक पदार्थों का भी प्रयोग आवश्यक है।

(8) जहाँ कहीं धूम्रपान वर्जित हो वहाँ बीड़ी-सिगरेट कदापि नहीं पीनी चाहिए। यदि दूसरे व्यक्ति ऐसा करते हैं तो उन्हें समझाना तथा धूम्रपान न करने के लिए बाध्य करना आवश्यक है।

(9) मेले या नुमाइश इत्यादि में जाने पर सफाई का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए और टीका इत्यादि लगवाकर ही जाना चाहिए। अन्य व्यक्तियों को भी इसके लिए प्रेरित करना चाहिए।

(10) यदि अपना स्वास्थ्य खराब हो तो अन्य लोगों को अपने से बचाने वाले नियमों का पालन करना चाहिए।

इस प्रकार, जब प्रत्येक व्यक्ति सम्पूर्ण समाज को अपना परिवार समझकर स्वास्थ्य के नियमों का पालन करना तथा कराना अपना उत्तरदायित्व समझेगा तथा तदनुरूप पालन करेगा तभी जन-स्वास्थ्य में सुधार हो सकेगा।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 13  लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जन-स्वास्थ्य से क्या तात्पर्य है?
उत्तरः
जन-स्वास्थ्य से तात्पर्य –
‘जन-स्वास्थ्य’ का अर्थ जनता का स्वस्थ होना माना जाता है। जिस देश या समाज में जितने अधिक व्यक्तियों का स्वास्थ्य उत्तम होता है वह देश या समाज उतनी ही अधिक उन्नत अवस्था को प्राप्त करता है। अतः जन-स्वास्थ्य पर प्रत्येक व्यक्ति को ध्यान देना आवश्यक है। समाज के एक-एक व्यक्ति को जब स्वास्थ्य के नियमों का ज्ञान होगा तभी अधिकांश लोग अपने को स्वस्थ रख सकेंगे। अपने हित और स्वास्थ्य लाभ के साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि समाज के अन्य लोगों को हमारे व्यवहार या कार्यों से दुःख या हानि न पहुँचे।

उदाहरणार्थ-प्राय: यह देखा जाता है कि अपने स्वास्थ्य और अपने निवास स्थान को साफ-सुथरा और अच्छा बनाने की दृष्टि से हम अपनी और अपने घर की सफाई तो करते हैं, परन्तु घर की गन्दगी को बाहर निकालकर लापरवाही से डाल देते हैं। इस कारण समाज के अन्य लोगों को हानि उठानी पड़ती है। अतः इस बात के लिए विशेष रूप से सतर्क होना चाहिए कि हमें ऐसा कार्य या व्यवहार करना है जिससे सम्पूर्ण समाज के लोगों का स्वास्थ्य ठीक रहे।

वास्तव में, व्यक्तिगत स्वास्थ्य तथा जन-स्वास्थ्य एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। व्यक्तियों के अस्वस्थ होने से जन-स्वास्थ्य को खतरा होने लगता है तथा जन-स्वास्थ्य का स्तर गिरने से स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य को भी खतरा उत्पन्न हो जाता है।

प्रश्न 2.
जन-स्वास्थ्य की उन्नति के लिए शासन द्वारा किए जाने वाले उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
जन-स्वास्थ्य की उन्नति हेतु शासन द्वारा किए जाने वाले उपाय –
जनता के स्वास्थ्य को अच्छा बनाने के लिए शासन की ओर से अनेक उपाय किए जाते हैं। इनमें से कुछ उपाय शासन स्वयं करता है जबकि अन्य को नगरपालिकाओं, महानगरपालिकाओं, नगर पंचायतों आदि स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से कराता है। यही नहीं, इस ओर स्वतन्त्र सामाजिक संस्थाओं का योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सम्पूर्ण समाज का स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए शासन द्वारा किए जाने वाले उपायों में निम्नलिखित उपाय महत्त्वपूर्ण हैं –

  • अनिवार्य शिक्षा-शासन बालकों के लिए अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करता है ताकि वे ज्ञान अर्जित कर स्वास्थ्य के नियमों को समझ सकें तथा उनके अनुरूप उन्हें कार्य करने की प्रेरणा प्राप्त हो सके।
  • प्रौढ़ शिक्षा-बच्चों के साथ-साथ प्रौढ़ों को शिक्षित करना भी राज्य अपना कर्त्तव्य समझता है। प्रौढ़ शिक्षा के अन्तर्गत स्वास्थ्य सम्बन्धी उपयोगी जानकारी अनिवार्य रूप से प्रदान की जाती है।
  • चलते-फिरते तथा स्थायी पुस्तकालयों का विकास-जन-स्वास्थ्य के नियमों को समझाने हेतु विभिन्न स्थानों पर साहित्य उपलब्ध कराने के लिए इस प्रकार के पुस्तकालय आदि आवश्यक हैं। इन स्थानों पर नागरिकों को आपस में विचार-विनिमय के लिए भी अवसर मिलना चाहिए। राज्य ऐसे पुस्तकालयों की स्थापना एवं संचालन का प्रबन्ध करता है।
  • स्वास्थ्य के नियमों का प्रचार-राज्य द्वारा महामारी एवं संक्रामक रोगों की जानकारी और रोकथाम, स्वास्थ्य के सामान्य नियमों आदि का रेडियो, टेलीविजन, पत्र-पत्रिकाओं, पोस्टरों आदि के माध्यम से व्यापक प्रचार किया जाता है।
  • परिवार कल्याण योजनाओं का क्रियान्वयन राज्य सुखी व स्वस्थ जीवन के लिए परिवार नियोजन का प्रचार-प्रसार करता है और शिशु व माता के कल्याण के लिए प्रसूतिका गृहों का निर्माण तथा उचित चिकित्सा हेतु परामर्श के साधन उपलब्ध कराता है।
  • चिकित्सा व्यवस्था और स्वास्थ्य संस्थाएँ बनाना-शासन द्वारा जन-जन को उचित चिकित्सा परामर्श तथा उपर्युक्त कार्यों के क्रियान्वयन के लिए विशेष स्वास्थ्य संस्थाओं का जाल शासन द्वारा सम्पूर्ण देश में फैलाया गया है।

प्रश्न 3.
व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य और सुख के सम्बन्ध में किन-किन बातों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है?
उत्तरः
व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य और सुख के लिए विशेष ध्यान देना आवश्यक होता है क्योंकि स्वास्थ्य और सुख का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है और स्वास्थ्य ऐसी वस्तु है जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनमोल सम्पत्ति है। संसार की समस्त सम्पत्ति खोने के बाद पुन: प्राप्त हो सकती है परन्तु खोया हुआ स्वास्थ्य किसी भी प्रयास द्वारा पुनः प्राप्त करना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हो जाता है। अपने को स्वस्थ और सुखी बनाए रखने के लिए व्यक्ति को अनेक बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्वच्छता, समय, निष्ठा तथा नियम पालन करना आवश्यक है।

स्वच्छता अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी है। किसी एक स्थान की गन्दगी भी स्वास्थ्य को खराब करने के लिए पर्याप्त होती है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने शरीर, वस्त्र, भोजन, घर और खाने-पीने की समस्त चीजों तथा पास-पड़ोस की सफाई का ध्यान रखना आवश्यक होता है।

अच्छे स्वास्थ्य के लिए नियमित जीवन व्यतीत करना; जैसे—प्रात: जल्दी उठना, शौच इत्यादि से निवृत्त होकर टहलना या व्यायाम करना, थोड़ा आराम करके स्नान करना, फिर ताजा शुद्ध नाश्ता लेकर अपने कार्य में लगना, समय से विश्राम और कार्य करने के साथ नियत समय पर पौष्टिक, हल्का, ताजा भोजन करना इत्यादि आवश्यक होता है।

परिश्रम और लगन से काम करने के साथ जीवन में सन्तोष रखना ही अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक होता है। सन्तोष के साथ कर्त्तव्य-पथ पर चलने वाला व्यक्ति सदैव प्रसन्न रहता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि एक व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य और सुख के सम्बन्ध में उन सभी कर्त्तव्यों को ध्यान में रखना चाहिए जिनके आधार पर उसका अपना स्वास्थ्य और जीवन सुखी बनता है। स्वास्थ्य के सम्बन्ध में मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों का ध्यान आवश्यक होता है। मन और शरीर दोनों से सन्तुष्ट व्यक्ति ही सुखी रह सकता है।

प्रश्न 4.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए-‘स्वास्थ्य के नियमों का प्रचार कार्य।’
उत्तरः
स्वास्थ्य के नियमों का प्रचार कार्य –
स्वास्थ्य के मुख्य नियमों का पालन व्यक्ति एवं समाज के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। आज के वैज्ञानिक युग में भी अधिकांश भारतीय स्वास्थ्य के नियमों से भली-भाँति परिचित नहीं हैं। अतएव सार्वजनिक हितों को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य के नियमों का व्यापक स्तर पर प्रचार कार्य अनिवार्य है।

स्वास्थ्य के नियमों का प्रचार कार्य विभिन्न स्तरों पर विभिन्न माध्यमों द्वारा किया जा सकता है। व्यापक स्तर पर यह कार्य सरकारी प्रचार तन्त्र के माध्यमों से किया जाता है। स्वास्थ्य विभाग निरन्तर रूप से यह कार्य करता रहता है। इसके लिए जन-सम्पर्क के समस्त साधनों का प्रयोग किया जाता है। पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर लेख एवं विज्ञापन देकर, स्वास्थ्य विभाग द्वारा स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रदर्शनियों आदि का आयोजन करके, अनेक प्रकार से यह प्रचार कार्य सम्पन्न किया जा सकता है।

सरकारी क्षेत्र के अतिरिक्त निजी एवं सामाजिक क्षेत्रों में भी स्वास्थ्य नियमों के प्रचार का कार्य किया जा सकता है। सभी सामाजिक संस्थाओं को चाहिए कि वे अन्य कार्यों के साथ-साथ जनता को स्वास्थ्य के नियमों से भी अवगत कराएँ। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक व्यक्ति भी अपने स्तर पर यह कार्य कर सकता है। अपने पास-पड़ोस में स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों का प्रचार करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। इस क्षेत्र में शिक्षा संस्थाएँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। समय-समय पर लगने वाले कैम्पों द्वारा ग्रामीण जनता को स्वास्थ्य के नियमों से अवगत कराया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, ग्राम पंचायतों के माध्यम से ग्रामीण जनता को स्वास्थ्य के नियमों से अवगत कराया जा सकता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 13 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जन-स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से व्यक्ति का प्रमुख कर्त्तव्य क्या है?
उत्तरः
जन-स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से व्यक्ति का प्रमुख कर्त्तव्य है-पर्यावरण को साफ-सुथरा तथा प्रदूषण-रहित रखना।

प्रश्न 2.
जन-स्वास्थ्य से क्या आशय है?
उत्तरः
जन-साधारण के सामान्य स्वास्थ्य को ‘जन-स्वास्थ्य’ कहा जाता है।

प्रश्न 3.
जन-स्वास्थ्य का व्यक्तिगत स्वास्थ्य से क्या सम्बन्ध है?
उत्तरः
जन-स्वास्थ्य तथा व्यक्तिगत स्वास्थ्य परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं। ये एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं।

प्रश्न 4.
जन-स्वास्थ्य के मुख्य नियम क्या हैं?
उत्तरः

  • खाँसने एवं छींकने में सावधानी रखें,
  • जहाँ-तहाँ न थूकें,
  • मल-मूत्र त्याग करने में सावधानी रखें तथा
  • जहाँ-तहाँ कूड़ा-करकट न फेंकें।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 13 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए.
1. व्यक्ति के समाज के प्रति कर्त्तव्य हैं
(क) हर प्रकार की सफाई का ध्यान रखें
(ख) संक्रामक रोगों की रोकथाम में सहयोग दें
(ग) सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान न करें
(घ) उपर्युक्त सभी कर्त्तव्य।
उत्तर
(घ) उपर्युक्त सभी कर्त्तव्य।

2. व्यक्तिगत स्वास्थ्य तथा जन-स्वास्थ्य का सम्बन्ध है –
(क) कोई सम्बन्ध नहीं है
(ख) व्यक्तिगत स्वास्थ्य ही महत्त्वपूर्ण है
(ग) दोनों में घनिष्ठ सम्बन्ध है
(घ) जनस्वास्थ्य ही महत्त्वपूर्ण है।
उत्तर
(ग) दोनों में घनिष्ठ सम्बन्ध है।

UP Board Solutions for Class 11 Home Science

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 7 आहार में दूध का पौष्टिक मूल्य

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 7 आहार में दूध का पौष्टिक मूल्य (Nutritional Value of Milk in Diet)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 7 आहार में दूध का पौष्टिक मूल्य

UP Board Class 11 Home Science Chapter 7 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
एक आहार के रूप में दूध का सामान्य परिचय दीजिए तथा दूध के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समस्त स्तनधारी जीवों के नवजात शिशुओं का प्रकृति प्रदत्त आहार माँ का दूध ही होता है। प्रकृति ने दूध में उन समस्त पोषक तत्त्वों को उस अनुपात में रखा है, जिस अनुपात में शिशु को उसकी आवश्यकता होती है। इस प्रकार शिशुओं के लिए दूध ही सर्वोत्तम आहार है। शिशुओं के अतिरिक्त अन्य सभी आयु वर्गों के व्यक्तियों के लिए भी दूध एक उत्तम एवं सम्पूर्ण आहार माना जाता है। दूध में आहार के प्राय: सभी पोषक तत्त्व विद्यमान होते हैं। आहार के अनिवार्य पोषक तत्त्वों के उत्तम स्रोत होने के साथ-साथ दूध एक सुपाच्य एवं स्वादिष्ट भोज्य-पदार्थ भी है। दूध से विभिन्न भोज्य पदार्थ तैयार किए जाते हैं जिनका हमारे आहार में विशेष योगदान है। दूध के बहुपक्षीय महत्त्व को ध्यान में रखते हुए ही इसे सम्पूर्ण एवं आदर्श आहार माना जाता है।

दूध का महत्त्व:

  • दूध एक पूर्ण एवं सुपाच्य आहार है अर्थात् यह सरलता और शीघ्रता से पच जाता है। इसी कारण शिशु, बालक, किशोर, वयस्क और वृद्ध सभी के लिए दूध उपयोगी होता है। शिशु और वृद्धों के लिए यह सबसे उपयुक्त सुपाच्य आहार माना जाता है।
  • शिशुओं के लिए माँ का दूध सर्वोत्तम तथा गाय का दूध सबसे उपयुक्त होता है। इसके सेवन से शरीर स्वस्थ रहता है और बुद्धि का तीव्र विकास होता है। गाय का दूध गरिष्ठ नहीं होता क्योंकि इसमें वसा की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। यह भैंस के दूध की तुलना में सुपाच्य होता है।
  • दूध के सेवन से मानसिक विकास तीव्र गति से होता है।
  • दूध में विटामिन ‘A’ तथा ‘B’ प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसमें विटामिन ‘C’ तथा ‘D’ की मात्रा कम होती है। दूध का पाउडर बनाने और इसे बार-बार गर्म करने से विटामिन ‘B’ तथा ‘C’ की कुछ मात्रा नष्ट हो जाती है। विटामिन शरीर की रोगों से रक्षा करते हैं।
  • दूध में लैक्टोज शर्करा पायी जाती है जिसके कारण दूध प्राकृतिक रूप से मीठा होता है। दूध शरीर को आवश्यक ऊर्जा प्रदान करता है।
  • दूध में उत्तम कोटि की केसीन प्रोटीन पायी जाती है जो शरीर की वृद्धि में सहायक होती है।
  • दूध में कैल्सियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस के लवण पाए जाते हैं। ये अस्थियों और दाँतों के विकास में सहायक होते हैं।
  • रात्रि में सोने से पूर्व दूध का सेवन पाचन क्रिया को सुगम एवं सुचारु बनाता है।
  • दूध शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करके उसे रोगों से बचाता है।
  • रोगावस्था में दूध सर्वोत्तम, सुपाच्य आहार होता है।
  • वनस्पति प्रोटीन के साथ मिलकर दूध उसके जैविक मूल्य को बढ़ा देता है। यह शाकाहारी . व्यक्तियों के लिए एकमात्र पशु-जन्य पोषक आहार होता है।
  • दूध से विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों का निर्माण होता है जैसे दही, पनीर, मट्ठा, क्रीम, खोया, मक्खन, घी आदि। इनसे मिष्टान्न बनाए जाते हैं। ये मिष्टान्न स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पौष्टिक भी होते हैं।उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि दूध एक उत्तम आहार है जो शरीर की वृद्धि के साथ-साथ अस्थियों को दृढ़ता प्रदान करता है एवं रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है।

प्रश्न 2.
दूध का संघटन स्पष्ट करने के लिए दूध में पाए जाने वाले तत्त्वों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
अथवा “दूध एक ऐसा आहार है जिसमें आहार के सभी आवश्यक तत्त्व समुचित मात्रा में पाए जाते हैं।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
दूध में सामान्यतया जल के अतिरिक्त सभी पोषक पदार्थ; जैसे कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, वसा, लवण, विटामिन आदि पाए जाते हैं। अलग-अलग प्राणियों के दूध में पोषक पदार्थों की मात्रा भिन्न-भिन्न होती है। निम्नांकित तालिका में स्त्री (माता), गाय, बकरी तथा भैंस के दूध में पाए जाने वाले पोषक पदार्थों की प्रतिशत मात्रा को प्रदर्शित किया गया है।

तालिका-विभिन्न प्रकार के दूध तथा उनका संघटन:
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 41
मनुष्य अपने भोजन में गाय, भैंस, बकरी के दूध का ही प्रायः प्रयोग करते हैं। बकरी का दूध औषधीय गुणों से परिपूर्ण माना जाता है। विभिन्न पशुओं के दूध में पाए जाने वाले पोषक तत्त्वों की मात्रा उनके आहार पर निर्भर करती है। गाय की तुलना में भैंस का दूध अधिक पौष्टिक एवं गरिष्ठ होता है। यह अधिक शारीरिक परिश्रम करने वाले व्यक्तियों के लिए उपयोगी माना जाता है। शिशु के लिए माँ का दूध ही सर्वोत्तम माना जाता है। प्रसव के पश्चात् स्रावित होने वाले दूध में ऐसे पोषक तत्त्व भी होते हैं जो शिशु को विभिन्न रोगों से बचाते हैं। दूध में पाए जाने वाले तत्त्व निम्नलिखित हैं-

1. जल: दूध में लगभग 88% से 90% तक जल होता है। जल में पोषक तत्त्व घुलनशील अवस्था में तथा वसा कोलॉइडल अवस्था में पायी जाती है।

2. दुग्ध प्रोटीन: दूध का सर्वश्रेष्ठ पौष्टिक तत्त्व केसीन तथा लैक्टोऐल्बुमिन प्रोटीन होती है। दूध की प्रोटीन दाल और अनाज की प्रोटीन से अधिक श्रेष्ठ होती है। केसीन तथा लैक्टोऐल्बुमिन प्रोटीन सुपाच्य होती है। यह अन्य प्रोटीन्स की अपेक्षा सुगमता से पच जाती है। यह शारीरिक और मानसिक विकास के लिए अत्यन्त लाभदायक होती है। दूध की प्रोटीन को शिशु, वृद्ध और रोगी सुगमता से पचा लेते हैं। दूध की प्रोटीन में शरीर के लिए सभी आवश्यक अमीनो अम्ल पाए जाते हैं। दूध की प्रोटीन अनाज की प्रोटीन्स के साथ मिलकर प्रोटीन के जैविकीय मूल्यों में वृद्धि करती है। 100 ग्राम दूध में 2.5 से 3.5 ग्राम प्रोटीन पायी जाती है। दूध की केसीन प्रोटीन के कारण पनीर प्राप्त होता है।

3. दुग्ध कार्बोहाइड्रेट: दूध में घुलनशील कार्बोहाइड्रेट लैक्टोज (lactose) शर्करा के रूप में पाया जाता है। लैक्टोज की प्रतिशत मात्रा विभिन्न प्राणियों के दूध में भिन्न-भिन्न होती है। यह मात्रा लगभग 4.5% से 6.5% तक होती है। लैक्टोज शर्करा के कारण दूध प्राकृतिक रूप से मीठा होता है। लैक्टोज शर्करा सुगमता से लैक्टिक अम्ल में बदल जाती है जिससे दूध सुगमता से दही में बदल जाता है। दही में बदल जाने से दूध में उपस्थित पोषक तत्त्वों का पाचन भली प्रकार हो जाता है। दूध के लैक्टोज के कारण आँत में ई० कोलाई (E. coli) जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि सुगमता से होती है। ई. कोलाई जीवाणु हमारे शरीर में विटामिन B12 का संश्लेषण करते हैं। विटामिन B12 लाल रुधिराणुओं तथा न्यूक्लिक अम्ल निर्माण में सहायक होता है। इसकी कमी से अरक्तता (एनीमिया) हो जाता है। लैक्टोज भोज्य पदार्थों से कैल्सियम तथा फॉस्फोरस के अवशोषण में सहायक होता है।

4. दुग्ध वसा-दूध में वसा पायस या इमल्शन (emulsion) के रूप में पायी जाती है। वसा छोटी-छोटी बूंदों के रूप में घुलित अवस्था में पायी जाती है। वसा की प्रतिशत मात्रा विभिन्न प्राणियों के दूध में भिन्न-भिन्न होती है। यह मात्रा 3 से 8% तक होती है। भैंस के दूध में वसा की मात्रा सर्वाधिक होती है। दूध को उबालकर ठण्डा करने पर वसा मलाई के रूप में एकत्र हो जाती है। दुग्ध वसा में विटामिन ‘A’ तथा ‘D’ पाया जाता है। दूध की वसा से मक्खन तथा घी प्राप्त होता है। मांसपेशियों के विकास में दुग्ध वसा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

5. खनिज लवण-दूध का महत्त्व इसमें पाए जाने वाले खनिज लवणों के कारण होता है। एक लीटर दूध में कैल्सियम की मात्रा लगभग 1-162 ग्राम, फॉस्फोरस की मात्रा 0.907 ग्राम, लौह की मात्रा 0.002 ग्राम, मैग्नीशियम 0.08 ग्राम और सोडियम की मात्रा 0• 497 ग्राम होती है। इसके अतिरिक्त दूध में अति सूक्ष्म मात्रा में आयोडीन, ताँबा तथा अन्य महत्त्वपूर्ण खनिज लवण पाए जाते हैं। दूध में खनिज लवणों की मात्रा 0.3% से 0.8% तक होती है। दूध में पाए जाने वाले कैल्सियम तथा फॉस्फोरस लवण अस्थियों और दाँतों के निर्माण के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं। इसके अतिरिक्त कैल्सियम तथा फॉस्फोरस मांसपेशियों और रक्त के निर्माण में सहायता करते हैं। इसके फलस्वरूप शरीर स्वस्थ और सुगठित रहता है। इसी कारण दूध शिशुओं और बालकों के लिए उपयुक्त आहार माना जाता है। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली स्त्रियों के लिए दूध अत्यन्त आवश्यक होता है। इससे माता के साथ-साथ शिशु को प्रचुर मात्रा में कैल्सियम, फॉस्फोरस, पोटैशियम, मैग्नीशियम आदि लवण उपलब्ध हो जाते हैं। दूध में फ्लैविन (flavin) रंगा कण पाए जाते हैं।

दूध के माध्यम से हमें लौह, ताँबा, आयोडीन आदि तत्त्वं भी उपलब्ध हो जाते हैं। प्राकृतिक रूप से उपलब्ध इन खनिजों का पाचन सुगमता से हो जाता है। लौह रक्त निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। खनिज लवणों की सर्वाधिक मात्रा हमें हरी सब्जियों और फलों से प्राप्त होती है। इसलिए दूध के साथ-साथ हरी सब्जियों और फलों का आहार में समावेश करना अति आवश्यक होता है।

6. विटामिन्स–दूध को सर्वोत्तम स्वास्थ्य रक्षक कहा जाता है। इससे स्वास्थ्य की रक्षा हेतु आवश्यक प्रोटीन, खनिज लवण तथा आवश्यक विटामिन प्रचुर मात्रा में प्राप्त होते हैं। दूध में विटामिन ‘A’ तथा ‘B’ प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। लेकिन दूध में विटामिन ‘C’ तथा ‘D’ अपेक्षाकृत बहुत कम मात्रा में पाए जाते हैं। विटामिन स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु अत्यन्त आवश्यक होते हैं। विटामिन ‘A’ हमारे रक्षा तन्त्र के लिए आवश्यक होता है। यह नेत्रों की ज्योति के लिए आवश्यक है। विटामिन ‘A’ की कमी के कारण रतौंधी रोग हो जाता है। विटामिन ‘B’ शरीर वृद्धि तथा अमीनो अम्ल उपापचय के लिए आवश्यक होता है। इसकी कमी से बेरी-बेरी रोग, होठों का फटना (कीलोसिस), पेलाग्रा (जीभ व त्वचा पर पपड़ी का बनना), अरक्तता (एनीमिया) आदि रोग होते हैं। विटामिन ‘C’ दाँतों की डेण्टीन तथा अस्थियों का मैट्रिक्स बनाता है। इसकी कमी से स्कर्वी रोग हो जाता है। दूध को उबालने से विटामिन ‘C’ नष्ट हो जाता है। विटामिन ‘D’ आहार नाल में कैल्सियम तथा फॉस्फोरस के अवशोषण में सहायता करता है। यह अस्थियों और दाँतों के स्वास्थ्य और वृद्धि के लिए आवश्यक होता है। इसकी कमी से रिकेट्स (सूखा रोग) हो जाता है। दूध के विटामिन्स की पूर्ति के लिए मछली का तेल, सन्तरे का रस अवश्य लेना चाहिए। इससे हमें आवश्यक विटामिन ‘D’ तथा ‘C’ प्राप्त हो जाता है। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि दूध एक सर्वोत्तम आहार है। इसमें शरीर की वृद्धि, मरम्मत तथा ऊर्जा प्रदान करने वाले सभी आवश्यक पोषक तत्त्व पाए जाते हैं। इसलिए शिशु, बच्चों और वृद्धों को आवश्यकतानुसार दूध का सेवन अवश्य करना चाहिए।

प्रश्न 3.
दूध के उपलब्ध विभिन्न रूपों का सामान्य परिचए दीजिए।
उत्तर:
दूध स्वास्थ्य के लिए सर्वाधिक उपयोगी आहार है। दूध का सुरक्षित उपयोग करने के लिए सामान्य रूप से प्रयोग किए जाने वाले दूध को विभिन्न रूपों में बदलकर प्रयोग करते हैं। दूध के विभिन्न रूप निम्नलिखित हैं-

1.शुद्ध दूध (Pure Milk): यह दूध का प्राकृतिक स्वरूप होता है। इसमें पोषक तत्त्वों की मात्रा सर्वाधिक होती है। इसमें पानी या किसी अन्य प्रकार की मिलावट नहीं की जाती है। यह दूध प्राकृतिक रूप से मीठा, स्वास्थ्यवर्धक एवं पौष्टिक होता है।

2. दूध पाउडर (Milk Powder): दूध को वैज्ञानिक विधियों से सुखाया जाता है। दूध का जल वाष्पित होकर निकल जाता है और हल्के पीले रंग के पाउडर के रूप में दूध के अन्य पोषक तत्त्व शेष रह जाते हैं। दूध को सुखाते समय इसमें उपस्थित विटामिन ‘B’ तथा ‘C’ नष्ट हो जाते हैं, लेकिन विटामिन ‘A’ तथा ‘D’ नष्ट नहीं होते। नष्ट हुए विटामिन्स की पूर्ति अन्य पोषक पदार्थों को मिलाकर कर दी जाती है। दूध पाउडर को सुरक्षित रखने के लिए अधिक प्रयत्न नहीं करने पड़ते। जल के अभाव में जीवाणु दूध पाउडर को खराब नहीं कर पाते। दूध पाउडर बनाते समय अगर शुद्ध दूध या सम्पूर्ण दूध का प्रयोग करते हैं तो वसायुक्त दूध पाउडर प्राप्त होता है। अगर दूध को सुखाने से पूर्व इससे वसा को पृथक् कर लिया जाता है तो वसारहित दूध पाउडर प्राप्त होता है। दूध पाउडर को उबलते पानी में मिलाकर प्राकृतिक दूध प्राप्त हो जाता है। दूध पाउडर को सुविधापूर्वक एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जा सकता है। यह हर समय सुगमता से उपलब्ध रहता है। दूध पाउडर ऐसे शिशुओं के लिए उपयुक्त आहार है जिन्हें माँ का दूध किसी कारण से उपलब्ध नहीं हो पाता।

3. गाढ़ा दूध (Condensed Milk): वैज्ञानिक विधि से दूध से जल को वाष्पित करने पर यह शहद के समान गाढ़ा हो जाता है। इसे गाढ़ा करते समय इसमें अतिरिक्त शर्करा मिलाई जाती है जिससे यह अधिक समय तक संरक्षित रह सके। इसे निर्जीकृत डिब्बों में उच्च ताप एवं दाब पर पैक कर दिया जाता है। डिब्बे को खोलने के पश्चात् दूध का उपयोग एक सप्ताह में कर लेना चाहिए। अन्यथा इसमें जीवाणुओं के पनपने की सम्भावना हो जाती है। यह बच्चों के लिए उपयुक्त आहार नहीं है। गाढ़ा होने के कारण यह गरिष्ठ हो जाता है और देर से पचता है। लेकिन किशोर एवं वयस्कों के भोजन में इसका उपयोग किया जा सकता है। सामान्यतया इसका उपयोग चाय, कॉफी बनाने में अथवा दूध वाली मिठाइयाँ बनाने के लिए किया जाता है।

4. वसारहित दूध (Skimmed Milk): प्राकृतिक दूध या शुद्ध दूध से वसा निकाल लेने के पश्चात् जो दूध शेष रहता है इसे वसारहित दूध या सप्रैटा या मखनियाँ दूध भी कहते हैं। इसमें वसा नहीं होती। वसा के अतिरिक्त इसमें सभी पोषक तत्त्व जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स, लवण, विटामिन आदि पाए जाते हैं। यह हृदय रोगियों तथा ऐसे रोगी बच्चों और किशोरों के लिए लाभदायक होता है, जिनको वसा का परहेज बताया जाता है। घर पर भी वसारहित दूध तैयार किया जा सकता है। दूध को उबालकर ठण्डा करके फ्रिज में रख देने से वसा मलाई के रूप में दूध के ऊपर आ जाती है। मलाई को पृथक् कर लेने के पश्चात् वसारहित दूध प्राप्त हो जाता है। अन्यथा दुकानों पर क्रीम निकालने वाली मशीन में दूध को घुमाने पर क्रीम के रूप में वसा दूध से अलग हो जाती है। वसारहित दूध मोटे व्यक्तियों के लिए लाभदायक होता है।

5. खमीरीकृत दूध (Fermented Milk): दूध का खमीरीकरण जीवाणुओं द्वारा किया जाता है। इससे दही बन जाती है। दही को मथकर मट्ठा प्राप्त होता है, इसे ही खमीरीकृत दूध कहते हैं। यह सुपाच्य होता है। यह प्राकृतिक दूध की अपेक्षा जल्दी पच जाता है। यह दूध के ही समान पौष्टिक होता है। ग्रीष्म ऋतु में मट्ठा दूध की अपेक्षा अधिक लाभदायक होता है। दही को मथकर इसमें से मक्खन निकालकर भी उपयोग में लाया जा सकता है।

प्रश्न 4.
दूध को अधिक उपयोगी, रुचिकर तथा पौष्टिक बनाए जाने के लिए तैयार किए जाने वाले भोज्य पदार्थों का विवरण दीजिए। अथवा दूध से निर्मित मुख्य भोज्य पदार्थों का सामान्य परिचय तथा उपयोग बताइए।
उत्तर:
मानव के भोजन में दूध का.बहुत महत्त्व है। दूध का शुद्ध रूप में प्रयोग सभी के लिए लाभप्रद होता है, क्योंकि दूध के पोषक तत्त्व सुपाच्य होते हैं। इन्हें शिशु, वृद्ध और रोगी सुगमता से पचा लेते हैं। दूध से निर्मित भोज्य पदार्थ हमारे भोजन को अधिक रुचिकर एवं पौष्टिक बनाने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। दूध से दही, मट्ठा, मक्खन, घी, पनीर, खोया, क्रीम आदि तैयार किए जाते हैं। इनका उपयोग विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ तैयार करने के लिए किया जाता है।

1. दही (Curd): दूध से दही बनाने के लिए दूध को गर्म करके वातावरण के अनुसार ठण्डी या गर्म अवस्था में थोड़ा-सा दही मिला देते हैं। इसे जामन लगाना कहते हैं। इससे दही में उपस्थित जीवाणु संख्या वृद्धि करके दूध की लैक्टोज शर्करा को लैक्टिक अम्ल में बदल देते हैं। इससे दूध दही में बदल , जाता है। ग्रीष्म ऋतु में जीवाणुओं की संख्या वृद्धि बहुत तेजी से होती है और लगभग 2-2घण्टे में दही जम जाती है। शीत ऋतु में जीवाणुओं की संख्या वृद्धि धीमी गति से होने के कारण दही जमने में लगभग 8-10 घण्टे लगते हैं। शीत ऋतु में दूध में जामन लगाते समय हल्का-सा गर्म कर लेते हैं।दही दूध की तुलना में अधिक सुपाच्य होता है। दही में उपस्थित कैल्सियम तथा फॉस्फोरस का आहार नाल में अवशोषण सुगमता से हो जाता है। दूध की तरल केसीन प्रोटीन जम जाने के कारण और अधिक सुगमता से पच जाती है। जिन व्यक्तियों को दूध नहीं पंचता, उन्हें भोजन में दही का उपयोग करना चाहिए, यह उनके हित में है।

2. मट्ठा (Butter Milk): दही के मथने से मट्ठा प्राप्त होता है। दही को मथने से वसा अलग हो जाती है। वसा मक्खन के रूप में पृथक् कर लेने के पश्चात् शेष तरल को मट्ठा या छाछ कहते हैं। मट्ठा दूध की तुलना में अधिक पोषक माना जाता है, इसमें केवल वसा का अभाव होता है। मट्ठा सुपाच्य एवं पौष्टिक होता है। इसका उपयोग प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था में अधिक लाभदायक होता है। वसा का परहेज करने वाले व्यक्तियों के लिए मट्ठा उपयुक्त आहार है।

3. मक्खन (Butter): मक्खन प्राप्त करने के लिए दूध को पहले जमाकर दही बना लेते हैं। दही को मथने पर मक्खन मटे से पृथक् हो जाता है। मक्खन जल से हल्का होने के कारण मटे के ऊपर आ जाता है। मक्खन को पृथक् कर लेते हैं। मक्खन में वसा की मात्रा लगभग 80-85%, जल की मात्रा लगभग 15-17%, खनिज लवण की मात्रा 2% तथा अन्य पदार्थ लगभग 1% होते हैं। मक्खन जल और वसा का पायस या इमल्सन (emulsion) होता है। मक्खन को अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए इसमें थोड़ा-सा नमक मिलाकर फ्रिज या रेफ्रिजरेटर में रखते हैं।

4.घी (Ghee): दूध से पृथक् की गई मलाई या दही से पृथक् किए गए मक्खन को गर्म करने से जल पृथक् होकर वाष्पित हो जाता है और तरल घी और कुछ ठोस पदार्थ शेष रह जाता है। घी को कपड़े या छलनी से छानकर पृथक् कर लिया जाता है। घी को अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। गर्म जलवाय वाले देशों में मक्खन की अपेक्षा घी का उपयोग अधिक किया जाता है। घी बनाते समय विटामिन ‘A’ नष्ट हो जाता है। घी में लगभग 99% वसा होती है। बहुत अधिक समय तक घी को रखने से इसकी सुगन्ध और पौष्टिकता में अन्तर आ जाता है। घी का उपयोग प्रतिदिन के भोजन में तथा स्वादिष्ट पकवान बनाने में किया जाता है। घी मांसपेशियों को पुष्ट करता है।

5. छेना एवं पनीर (Cheese): उबलते दूध में टाटरी या नींबू का रस डालकर दूध को फाड़ते हैं। टाटरी या नींबू के रस के कारण दूध की केसीन प्रोटीन दूध से छोटे-छोटे थक्के के रूप में अलग हो जाती है। दूध का पानी अलग हो जाता है। इसे बारीक कपड़े में छान लेते हैं। केसीन प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट आदि छेने के रूप में रह जाता है। छेना में खनिज लवण नहीं होते। छेना में कुछ मात्रा में जल शेष रहता है। जल की उपस्थिति के कारण छेना को अधिक समय तक संरक्षित नहीं रख सकते। छेना को साँचों में रखकर दबाकर जल को निकाल देने से पनीर बनता है। पनीर में जल की मात्रा छेना की तुलना में बहुत कम होती है। पनीर को अधिक समय तक संरक्षित रख सकते हैं। पनीर छेना की तुलना में अधिक कड़ा होता है। पनीर का उपयोग मिष्ठान बनाने में, सब्जियाँ और पुलाव आदि में किया जाता है। पनीर में दूध की वसा का लगभग 90% तथा प्रोटीन का 80% भाग पाया जाता है, शेष वसा और प्रोटीन पानी के साथ निकल जाती है।

6. खोया या मावा (Mava): कढ़ाई में दूध को गर्म करते रहते हैं, साथ ही इसे चलाते रहते हैं। इसके फलस्वरूप दूध सूखकर ठोस पदार्थ में बदल जाता है, इसे खोया कहते हैं। इसमें जल बहुत कम मात्रा में रह जाता है। इसमें वसायुक्त प्रोटीन सर्वाधिक होती है। लैक्टोज शर्करा के कारण खोया प्राकृतिक रूप से मीठा लगता है। यह दूध की तुलना में अधिक पौष्टिक लेकिन गरिष्ठ होता है। इसमें विटामिन ‘C’ नष्ट हो जाता है। यह सुपाच्य नहीं होता। इसका उपयोग मिष्टान्न बनाने में किया जाता है।

7. क्रीम (Cream): इसे कच्चे दूध से मशीन की सहायता से पृथक् किया जाता है। इसमें वसा की मात्रा सर्वाधिक होती है। जल तथा अन्य घटकों (प्रोटीन, शर्करा, खनिज आदि) की मात्रा न्यूनतम होती है। व्यापारिक स्तर पर क्रीम निम्नलिखित तीन प्रकार की होती है-

  • हल्की क्रीम: इसमें वसा की मात्रा 15-20% होती है। इसका उपयोग चाय, कॉफी, लस्सी, फ्रूट क्रीम आदि बनाने में किया जाता है। ..
  • मध्यम क्रीम: इसमें वसा की मात्रा 25-35% होती है। इसका उपयोग केक, पेस्ट्री, आइसक्रीम तथा मिष्टान्न आदि बनाने में किया जाता है।
  • गाढ़ी क्रीम: इसमें लगभग 40% वसा होती है। इसका उपयोग मक्खन, घी आदि बनाने में किया जाता है।

प्रश्न 5.
स्पष्ट कीजिए कि दूध एक सन्तुलित एवं सम्पूर्ण आहार है।
उत्तर:
सन्तुलित आहार से आशय है-वह आहार जिसमें सभी पोषक तत्त्व; जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स, वसा, खनिज लवण, विटामिन्स, जल आदि हों, जो प्रत्येक दृष्टि से व्यक्ति को पूर्ण स्वस्थ रहने और उसका उचित विकास करने में सहायक हो और जिनसे वह अपने दैनिक कार्यों को पूरा करने के लिए उचित मात्रा में आवश्यक ऊर्जा प्राप्त कर सके।

दूध को सन्तुलित आहार माना जाता है। इसमें शरीर के लिए आवश्यक सभी पोषक पदार्थ उपस्थित होते हैं। दूध में आवश्यक मात्रा में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, खनिज लवण, विटामिन आदि उचित मात्रा में होते हैं। दूध में उपस्थित सभी पोषक तत्त्व सुपाच्य होते हैं। इनका पाचन तथा पचे पदार्थों का अवशोषण सुगमता से हो जाता है।

तालिका-दूध का संघटन:
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 42
दूध को सन्तुलित एवं सम्पूर्ण आहार मानने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-
(1) दूध में शरीर की मरम्मत तथा वृद्धि के लिए आवश्यक मात्रा में प्रोटीन्स तथा खनिज लवण (कैल्सियम, फॉस्फोरस, लौह आदि) पाए जाते हैं।
(2) दूध में ऊर्जा उत्पादन हेतु पर्याप्त मात्रा में कार्बोहाइड्रेट्स तथा वसा पायी जाती है।
(3) दूध में रोगों से सुरक्षा हेतु आवश्यक विटामिन्स पाए जाते हैं। उपर्युक्त कारणों से स्पष्ट है कि दूध एक सन्तुलित एवं सम्पूर्ण आहार है। शिशु को दूध से ही सभी आवश्यक पोषक तत्त्व प्राप्त हो जाते हैं।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 7 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
स्पष्ट कीजिए कि दूध एक ऊर्जा उत्पादक आहार है।
उत्तर:
दूध ऊर्जा उत्पादक होता है। गाय के एक लीटर दूध से हमें 600 कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। एक अण्डे से जितनी ऊर्जा हमें प्राप्त होती है एक प्याले दूध से हमें उतनी ही ऊर्जा प्राप्त हो जाती है। एक प्याले दूध से हमें लगभग 100 कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। इसका तात्पर्य यह है कि एक प्याला दूध में इतने ऊर्जा उत्पादक पोषक तत्त्व होते हैं कि उनसे हमें 100 कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। विभिन्न आयु वर्ग के बालक या वयस्क को एक लीटर दूध से प्राप्त ऊर्जा उसकी दैनिक कैलोरी आवश्यकताओं की कितनी पूर्ति करती है, उसका प्रदर्शन निम्नांकित तालिका द्वारा किया जा सकता है-

तालिका:
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 43
प्रश्न 2.
टिप्पणी लिखिए-‘हमारे लिए दूध की दैनिक आवश्यक मात्रा।’
उत्तर:
सामान्यतया यह माना जाता है कि शाकाहारी व्यक्तियों के लिए दूध एकमात्र प्राणिजन्य आहार है जिसका उपयोग किया जा सकता है। दूध व्यक्ति को स्वस्थ एवं सुडौल बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मांसाहारी व्यक्तियों को आवश्यक प्रोटीन अण्डा, मांस, मछली से प्राप्त हो जाती है। शाकाहारी व्यक्तियों को आवश्यक प्रोटीन दूध के अतिरिक्त दालों, सोयाबीन, मूंगफली आदि से प्राप्त होती है। विभिन्न आयु वर्ग में एक अवस्था के व्यक्तियों के लिए आवश्यक दूध की दैनिक मात्रा निम्नवत् होती है-

तालिका:
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 44
प्रश्न 3.
टिप्पणी लिखिए-दूध का पाश्चुरीकरण (Pasteurization of Milk)।
उत्तर:
पाश्चुरीकरण द्वारा दूध को खराब होने से तथा दूध के पौष्टिक तत्त्वों को नष्ट होने से बचाया जाता है। कच्चा दूध शीघ्र खराब हो जाता है। इसमें लैक्टोबैसीलस लैक्टस (Lactobacillus lactus) जीवाणु उत्पन्न होकर इसकी लैक्टोज शर्करा को लैक्टिक अम्ल में बदल देते हैं। इससे दूध खट्टा हो जाता है। पाश्चुरीकरण तकनीक द्वारा दूध में पहले से उपस्थित जीवाणुओं को नष्ट कर दिया जाता है। पाश्चुरीकरण में दूध को 62.8°C पर लगभग 30 मिनट तक गर्म किया जाता है अथवा 71°C ताप पर . लगभग 15 मिनट तक गर्म किया जाता है। इसके पश्चात् दूध को शीघ्रता से ठण्डा कर देते हैं। इस क्रिया से जीवाणु तो नष्ट हो जाते हैं लेकिन उसके पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते। यद्यपि कुछ विटामिन्स की मात्रा अवश्य कम हो जाती है। पाश्चुरीकृत दूध स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। पाश्चुरीकरण द्वारा जीवाणुओं के अन्त:बीजाणु (endospores) नष्ट नहीं होते। इस कारण पाश्चुरीकृत दूध को कम ताप पर ही अधिक समय तक संरक्षित रख सकते हैं अन्यथा अन्त:बीजाणुओं से मुक्त जीवाणु दूध की लैक्टोज का किण्वन करके इसे खराब कर देते हैं।

प्रश्न 4.
टिप्पणी लिखिए-दूध का निर्जीकण या रोगाणुनाशन (Sterilization of Milk)
उत्तर:
दूध को जीवाणुओं से सुरक्षित रखने के लिए इस तकनीक का प्रयोग किया जाता है। इसमें उच्च ताप जैसे 120° से 126°C ताप तथा उच्च दाब जैसे 15 पौण्ड प्रति वर्ग इंच में रखकर दूध को निर्जीकृत किया जाता है। इस दूध को निर्जीकृत डिब्बों में बन्द कर दिया जाता है। इस दूध को तीन से छह माह तक सुरक्षित रखा जा सकता है। वर्तमान में टिन के डिब्बों के स्थान पर टेट्रापैक का उपयोग भी किया जा रहा है।

प्रश्न 5.
आहार के रूप में दूध के प्रयोग में आवश्यक सावधानियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
दूध का उपयोग करने और उसे खराब होने से बचाने के लिए निम्नलिखित सावधानियाँ रखनी चाहिए

  • किसी रोगी पशु का दूध प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • दूध निकालने के लिए इन्जेक्शन का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • कच्चे दूध का सीधे प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • दूध को सदैव उबालकर रखना चाहिए। गर्मियों में दूध स्वतः जम जाता है या फट जाता है। इससे बचने के लिए दूध को उबालकर रखने से उसमें पनपने वाले जीवाणु नष्ट हो जाते हैं और दूध खराब होने से बच जाता है।
  • दूध को स्वच्छ बर्तन में रखना चाहिए।
  • बच्चों को दूध में पानी मिलाकर उबालकर ठण्डा करके ही देना चाहिए।
  • रात्रि को भोजन के लगभग एक घण्टे बाद दूध पीना चाहिए।
  • दूध को हमेशा ढक कर रखना चाहिए।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 7 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
दूध में कौन-कौन से पोषक तत्त्व पाए जाते हैं?
उत्तर:
दूध में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज तथा विटामिन पाए जाते हैं। दूध में विटामिन ‘C’ की कमी होती है।

प्रश्न 2.
नवजात शिशु के लिए माँ का दूध किस प्रकार का आहार है?
उत्तर:
नवजात शिशु के लिए माँ का दूध प्रकृति प्रदत्त सम्पूर्ण आहार है।

प्रश्न 3.
दूध प्राकृतिक रूप से मीठा होता है, क्यों?
उत्तर:
दूध में लैक्टोज शर्करा पायी जाती है जिसके कारण दूध प्राकृतिक रूप से मीठा होता है।

प्रश्न 4.
पनीर क्या है?
उत्तर:
पनीर दूध से निर्मित एक भोज्य पदार्थ है इसमें केसीन नामक प्रोटीन की अधिकता होती है। पनीर में जल की अल्प मात्रा ही होती है।

प्रश्न 5.
एक वयस्क शाकाहारी और मांसाहारी व्यक्ति को कितने दूध की प्रतिदिन आवश्यकता होती है?
उत्तर:
एक वयस्क शाकाहारी पुरुष को प्रतिदिन 400 मिली तथा मांसाहारी वयस्क. पुरुष को. 150 मिली दूध की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6.
शिशु के लिए सर्वोत्तम आहार क्या है?
उत्तर:
शिशु के लिए माँ का दूध सर्वोत्तम आहार है।

प्रश्न 7.
दूध में कौन-से रंगा कण पाए जाते हैं?
उत्तर:
दूध में फ्लैविन (Flavin) रंगा कण पाए जाते हैं।

प्रश्न 8.
दूध के ‘C’ तथा ‘D’ विटामिन्स की क्षतिपूर्ति किस प्रकार की जाती है?
उत्तर:
दूध के ‘C’ तथा ‘D’ विटामिन्स की कमी की पूर्ति के लिए बच्चों को मछली के तेल की अल्प मात्रा तथा सन्तरे का रस दिया जाना चाहिए। .

UP Board Class 11 Home Science Chapter 7 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए

प्रश्न 1.
दूध में पाया जाने वाला निम्नलिखित में से कौन-सा पदार्थ कार्बोहाइड्रेट होता है
(क) ग्लूकोस
(ख) फ्रक्टोज
(ग) लैक्टोज
(घ) सुक्रोज।
उत्तर:
(ग) लैक्टोज।

प्रश्न 2.
शर्करा की मात्रा सबसे अधिक किसके दूध में होती है
(क) माँ के दूध में
(ख) गाय के दूध में ।
(ग) भैंस के दूध में
(घ) बकरी के दूध में।
उत्तर:
(क) माँ के दूध में।

प्रश्न 3.
दूध में पायी जाने वाली प्रोटीन को क्या कहते हैं
(क) केसीन
(ख) ऐल्बुमिन
(ग) ग्लूटेलिन्स
(घ) मायोसीन।
उत्तर:
(क) केसीन।

प्रश्न 4.
दूध किस जीवाणु के कारण खराब होता है
(क) लैक्टोबैसीलस लैक्टस
(ख) नाइट्रोबैक्टर
(ग) बैसिलस मेगाथीरियम
(घ) क्लॉस्ट्रीडियम।
उत्तर:
(क) लैक्टोबैसीलस लैक्टस।

प्रश्न 5.
उबले हुए दूध में प्रायः निम्नलिखित में से किस विटामिन का अभाव होता है
(क) विटामिन ‘A’
(ख) विटामिन ‘B’
(ग) विटामिन ‘C’
(घ) विटामिन ‘D’
उत्तर:
(ग) विटामिन ‘C’

प्रश्न 6.
दूध क्या है
(क) स्वादिष्ट पेय
(ख) स्फूर्तिदायक पेय
(ग) पौष्टिक आहार
(घ) सन्तुलित आहार।
उत्तर:
(घ) सन्तुलित आहार।

प्रश्न 7.
गर्भवती शाकाहारी स्त्री को प्रतिदिन दूध की कितनी आवश्यकता होती है
(क) 400 मिली
(ख) 500 मिली
(ग) 750 मिली
(घ) 1000 मिली। .
उत्तर:
(ग) 750 मिली।

प्रश्न 8.
वसा की सबसे अधिक मात्रा किस दूध में पायी जाती है
(क) माँ के दूध में
(ख) गाय के दूध में
(ग) बकरी के दूध में
(घ) भैंस के दूध में।
उत्तर:
(घ) भैंस के दूध में।

प्रश्न 9.
कितने दूध से 100 कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है
(क) एक कटोरी दूध से
(ख) एक प्याले दूध से
(ग) एक गिलास दूध से
(घ) एक लीटर दूध से।
उत्तर:
(ख) एक प्याले दूध से।

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UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 15 विकास तथा क्रियात्मक क्षमता पर व्यायाम का प्रभाव

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 15 विकास तथा क्रियात्मक क्षमता पर व्यायाम का प्रभाव (Effect of Exercise on Development and Functional Capacity)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 15 विकास तथा क्रियात्मक क्षमता पर व्यायाम का प्रभाव

UP Board Class 11 Home Science Chapter 15 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
व्यायाम से क्या आशय है? व्यायाम के मुख्य लाभ तथा नियम भी बताइए।
उत्तरः
शारीरिक स्वास्थ्य के लिए सन्तुलित आहार तथा शारीरिक स्वच्छता के साथ-साथ उचित व्यायाम, विश्राम तथा निद्रा भी नितान्त आवश्यक हैं। व्यायाम से प्रत्येक व्यक्ति परिचित है। बच्चों को प्रारम्भ से ही व्यायाम के गुणों से अवगत कराया जाता है। व्यायाम के गुणों एवं महत्त्व से प्रत्येक व्यक्ति परिचित है तथा समझता है कि नियमित रूप से व्यायाम करने से अनेक लाभ होते हैं, परन्तु फिर भी आलस्यवश अधिकांश व्यक्ति या तो व्यायाम करते ही नहीं अथवा करते भी हैं तो नियमित रूप से नहीं करते। हमारे स्वास्थ्य के लिए व्यायाम भी उतना ही आवश्यक है जितना कि भोजन तथा विश्राम।

व्यायाम का अर्थ –
ऐसी शारीरिक क्रियाएँ एवं गतिविधियाँ जो मनुष्य के समस्त अंगों के पूर्ण और सन्तुलित विकास में सहायक होती हैं व्यायाम कहलाती हैं। व्यायाम में शरीर के विभिन्न अंगों को विभिन्न प्रकार से गति करनी पड़ती है। व्यायाम के विभिन्न प्रकार हो सकते हैं। सुबह व शाम को घूमना भी एक प्रकार का व्यायाम ही है। खेल खेलना भी व्यायाम है। भागना-दौड़ना, दण्ड-बैठक लगाना, मलखम्भ, योगाभ्यास आदि भी व्यायाम के ही रूप हैं। तैरना भी एक अच्छा व्यायाम है। इसके अतिरिक्त स्त्रियों द्वारा घर के कार्य करना भी एक प्रकार से व्यायाम में सम्मिलित किया जा सकता है। जो व्यक्ति किसी भी प्रकार के श्रम के कार्य; जैसे-बढ़ईगीरी, राजगीरी आदि करते हैं, उन्हें अलग से व्यायाम करने की विशेष आवश्यकता नहीं होती। इसके विपरीत, मानसिक कार्य एवं अधिक समय तक बैठने वाले कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए अलग से व्यायाम करना आवश्यक होता है।

नियमित रूप से व्यायाम करने से शरीर सुन्दर, सुडौल एवं ओजस्वी बनता है। व्यायाम करने से मांसपेशियाँ सुविकसित होती हैं तथा शरीर की कार्यक्षमता में भी वृद्धि होती है। व्यायाम के परिणामस्वरूप शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य बढ़ता है। व्यायाम करते समय श्वसन क्रिया तीव्र हो जाती है; अतः अधिक मात्रा में ऑक्सीजन ग्रहण की जा सकती है। व्यायाम करने से पाचन क्रिया ठीक हो जाती है तथा भूख बढ़ती है। व्यायाम करने से नींद अच्छी आती है।

व्यायाम के लाभ –
समुचित व्यायाम करने से निम्नलिखित लाभ होते हैं –

  • शरीर अधिक स्वस्थ, सुन्दर, सुडौल तथा आकर्षक हो जाता है।
  • पेशियों के अधिक क्रियाशील हो जाने से शरीर तेजस्वी तथा स्फूर्तिदायक हो जाता है। आलस्य नहीं रहता है।
  • व्यायाम करते समय श्वसन क्रिया अधिक तेज हो जाती है जिससे फेफड़े शुद्ध वायु ग्रहण करते हैं। उनकी सामर्थ्य, धारिता तथा कार्यक्षमता बढ़ती है। इससे शरीर को अधिक ऑक्सीजन मिलने के साथ ही विषैली कार्बन डाइऑक्साइड को अधिक मात्रा में निकालने में सहायता मिलती है।
  • व्यायाम से हृदय गति बढ़ती है, अधिक रुधिर संचार होता है तथा शरीर के कोने-कोने तक पोषक तत्त्व तथा ऑक्सीजन पहुँचते हैं।
  • हृदय रोग, श्वसन तन्त्र के रोग तथा पाचन सम्बन्धी रोगों के होने की आशंकाएँ घटती हैं।
  • व्यायाम से मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं अर्थात् शारीरिक शक्ति का विकास होता है।
  • पाचन क्रिया तेज होती है, भूख अधिक लगती है। इससे शरीर स्वस्थ रहता है।
  • व्यायाम से मानसिक विकास होता है, मानसिक तनाव भी कम होता है। मस्तिष्क की कार्यशीलता में वृद्धि होती है।

व्यायाम के सामान्य नियम –
व्यायाम से लाभ प्राप्त करने के लिए व्यायाम के निम्नलिखित नियमों को जानना चाहिए। यदि अज्ञानवश व्यायाम किया जाए तो लाभ के स्थान पर हानि भी हो सकती है –

  • व्यायाम सदैव अपनी क्षमता के अनुकूल करना चाहिए। जब थकान अनुभव हो तो व्यायाम बन्द कर देना चाहिए।
  • प्रारम्भ में हल्का व्यायाम करना चाहिए तथा शक्ति बढ़ने पर क्रमशः कठिन एवं भारी व्यायाम किया जा सकता है।
  • व्यायाम सदैव नियमित रूप से करना चाहिए।
  • व्यायाम सदैव खुली हवा में ही करना चाहिए, बन्द कमरे में नहीं।
  • व्यायाम करते समय शरीर अधिक-से-अधिक खुला रहना चाहिए अर्थात् शरीर पर कम-से-कम कपड़े पहनने चाहिए।
  • सामान्य रूप से व्यायाम सुबह के समय करना ही उपयुक्त होता है।
  • व्यायाम से पहले तथा व्यायाम के तुरन्त पश्चात् कुछ खाना-पीना नहीं चाहिए। कुछ समय विश्राम करने के बाद ही कुछ खाना-पीना चाहिए।
  • व्यायाम सदैव रुचि से करना चाहिए। प्रसन्नता से किया गया व्यायाम मनोरंजक तथा लाभदायक होता है।

प्रश्न 2.
विकास पर व्यायाम का क्या प्रभाव पड़ता है? विस्तार से स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
विकास जीवन की प्रमुख विशेषता तथा लक्षण है। विकास की प्रक्रिया आजीवन किसी-नकिसी रूप में चलती रहती है। विकास वह जटिल प्रक्रिया है, जिसके परिणामस्वरूप बालक या व्यक्ति की अन्तर्निहित शक्तियाँ एवं गुण प्रस्फुटित होते हैं। विकास के लिए विभिन्न कारक जिम्मेदार होते हैं। कुछ कारक विकास की प्रक्रिया को सुचारु बनाने में सहायक होते हैं तथा इसके विपरीत कुछ कारक ऐसे भी हैं जो विकास की प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। विकास का प्रत्यक्ष सम्बन्ध व्यक्ति की क्रियात्मक क्षमता से भी है। विकास के साथ-साथ व्यक्ति की क्रियात्मक क्षमता भी बढ़ती है। ‘विकास’ तथा ‘क्रियात्मक क्षमता’ को सुचारु बनाए रखने वाले कारकों में से एक महत्त्वपूर्ण कारक है-नियमित रूप से व्यायाम करना।

विकास पर व्यायाम का प्रभाव –
विकास अपने आप में एक बहुपक्षीय प्रक्रिया है। इसीलिए विकास के विभिन्न स्वरूप माने गए हैं। विकास के मुख्य स्वरूप या पक्ष हैं-शारीरिक विकास, सामाजिक विकास, मानसिक विकास, संवेगात्मक विकास तथा नैतिक विकास। विकास के इन सभी पक्षों को सुचारु बनाए रखने में नियमित व्यायाम का विशेष योगदान होता है। विकास पर व्यायाम के प्रभावों को स्पष्ट करने के लिए विकास के सभी स्वरूपों पर व्यायाम के पड़ने वाले प्रभावों का विवरण अग्रवर्णित है –

1. व्यायाम का शारीरिक विकास पर प्रभाव – विकास का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष शारीरिक विकास है। सुचारु शारीरिक विकास का अनुकूल प्रभाव विकास के अन्य पक्षों पर भी पड़ता है। जहाँ तक व्यायाम का प्रश्न है, नियमित व्यायाम निश्चित रूप से शारीरिक विकास को सुचारु बनाने में उल्लेखनीय योगदान देता है। नियमित व्यायाम से हमारा शरीर स्वस्थ रहता है, पुष्ट होता है तथा पर्याप्त स्फूर्ति बनी रहती है। उचित रूप से व्यायाम करने से शरीर के सभी संस्थान भी अपने कार्यों को सुचारु रूप से करते हैं।

उदाहरण के लिए शारीरिक व्यायाम से हमारा पाचन-तन्त्र सुचारु रूप से कार्य करता है, भूख सही रहती है, ग्रहण किए गए आहार का पाचन एवं अवशोषण भी सामान्य बना रहता है। इसके परिणामस्वरूप शरीर कुपोषण का शिकार नहीं होता तथा शरीर क्रमशः पुष्ट होता जाता है। इसी प्रकार शरीर का अस्थि संस्थान भी नियमित व्यायाम से दोषरहित तथा सुदृढ़ बना रहता है। उचित व्यायाम से अस्थि-संस्थान की गतिविधियाँ नियमित रहती हैं तथा हड्डियों के जोड़ों से सम्बन्धित दोषों से व्यक्ति बचा रहता है।

जहाँ तक शरीर के पेशी तन्त्र का प्रश्न है, निश्चित रूप से व्यायाम से यह तन्त्र भी प्रभावित होता है। व्यायाम से शरीर की सभी पेशियाँ सुविकसित तथा पुष्ट होती हैं। इसी प्रकार नियमित व्यायाम शरीर के श्वसन तन्त्र तथा परिसंचरण तन्त्र को भी अनुकूल रूप में प्रभावित करता है। व्यायाम करते समय शरीर का श्वसन तन्त्र पूर्ण रूप से सक्रिय हो जाता है तथा फेफड़ों में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन पहुँचती है। शरीर में पर्याप्त ऑक्सीजन पहुँचने से रक्त का शुद्धिकरण भी सही रूप में होता रहता है तथा साथ ही शरीर के विजातीय तत्त्व श्वसन तथा पसीने के माध्यम से शरीर से विसर्जित होते रहते हैं। इन दशाओं में शरीर निश्चित रूप से स्वस्थ बना रहता है।

नियमित व्यायाम शरीर के सुचारु विकास में योगदान देने के साथ-ही-साथ शरीर को विभिन्न रोगों से बचाए रखने में भी सहायक होता है। नियमित व्यायाम से व्यक्ति मोटापे का शिकार नहीं होता। इस स्थिति में व्यक्ति मोटापे से सम्बन्धित रोगों जैसे कि उच्च रक्त चाप, उच्च कोलेस्ट्रॉल, हृदय रोग तथा मधुमेह से बचा रहता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यायाम से व्यक्ति का शारीरिक विकास सुचारु रहता है तथा व्यक्ति का स्वास्थ्य उत्तम रहता है।

2. व्यायाम का सामाजिक विकास पर प्रभाव – विकास का दूसरा मुख्य पक्ष या स्वरूप हैसामाजिक विकास। सामाजिक विकास माध्यम से ही व्यक्ति का सामाजिक व्यवहार सामाजिक मान्यताओं एवं मर्यादाओं के अनुकूल बनता है। सामाजिक विकास ही व्यक्ति को सामाजिक समायोजन की योग्यता प्रदान करता है। सामाजिक विकास की प्रक्रिया अनिवार्य रूप से सामाजिक सम्पर्क तथा सम्बन्धों की स्थापना से परिचालित होती है।

सामाजिक विकास की प्रक्रिया सबसे तीव्र बाल्यावस्था में होती है। इस अवस्था में बालक का सामाजिक सम्पर्क परिवार के अतिरिक्त सबसे अधिक खेल समूह से होता है। खेल एवं व्यायाम के लिए एक सम-आयु समूह की आवश्यकता होती है। खेल के दौरान बालक सामाजिक मान्यताओं एवं नियमोंमर्यादाओं से भली-भाँति परिचित हो जाता है। इससे बालक के सामाजिक विकास में समुचित योगदान मिलता है। सामूहिक खेलों तथा व्यायाम की प्रक्रिया में बच्चों को सहयोग, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा तथा समता आदि सामाजिक गुणों के महत्त्व की व्यावहारिक जानकारी प्राप्त हो जाती है। यह सुचारु विकास के लिए अति महत्त्वपूर्ण सिद्ध होती है।

सामूहिक खेल तथा व्यायाम से बच्चों को आत्म-प्रदर्शन, नेतृत्व, प्रभुत्व आदि गुणों के विकास के अवसर भी उपलब्ध होते हैं। इन गुणों से व्यक्ति का समुचित विकास होता है तथा इन गुणों से बालक के सामाजिक विकास की प्रक्रिया भी सुचारु बनी रहती है। इसके अतिरिक्त सामूहिक खेल एवं व्यायाम निश्चित रूप से बच्चों में सामाजिक समायोजन के गुण का भी विकास करते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यायाम से सामाजिक विकास अनुकूल रूप से प्रभावित होता है।

3. व्यायाम का मानसिक विकास पर प्रभाव – बालक की मानसिक क्षमताओं का सुचारु विकास ही मानसिक विकास कहलाता है। मानसिक विकास के माध्यम से बालक की मानसिक क्षमताओं का उदय होता है तथा ये क्षमताएँ क्रमश: विकसित तथा पुष्ट होती हैं।

मानसिक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों में एक मुख्य कारक है, बालक का शारीरिक रूप से स्वस्थ तथा पुष्ट होना। वास्तव में शारीरिक रूप से पुष्ट बालक अधिक मानसिक श्रम कर सकते हैं तथा इसके परिणामस्वरूप उनका बौद्धिक विकास सुचारु होता है। इस सन्दर्भ में यह पूर्व निश्चित है कि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए व्यायाम की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। व्यायाम से मानसिक क्षमताओं के विकास में भी समुचित योगदान मिलता है। सामूहिक रूप से खेलने तथा व्यायाम करने से बालक की मानसिक तथा बौद्धिक क्षमताओं का सुचारु तथा बहुपक्षीय विकास होता है। इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि नियमित रूप से व्यायाम करना मानसिक विकास के लिए एक अनुकूल कारक है।

4. व्यायाम का संवेगात्मक विकास पर प्रभाव – बाल-विकास का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष संवेगात्मक विकास भी है। संवेगात्मक विकास का सम्बन्ध बालक के संवेगों के सुचारु विकास से है। जैसे-जैसे बालक का संवेगात्मक विकास होता है, वैसे-वैसे बालक संवेगों को नियन्त्रित करना सीख लेता है। बालक के संवेग क्रमशः सरल से जटिल रूप ग्रहण करते हैं।

सुचारु संवेगात्मक विकास के लिए व्यायाम तथा खेलों का विशेष महत्त्व होता है। विभिन्न मनोवैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा ज्ञात हुआ है कि नियमित रूप से व्यायाम करने से तथा सामूहिक खेलों एवं प्राणायाम आदि से संवेगों की उग्रता को नियन्त्रित करने में सहायता मिलती है। सामूहिक खेलों में सम्मिलित होने वाले बालक क्रमशः क्रोध, भय तथा ईर्ष्या आदि उग्र संवेगों को नियन्त्रित करने में सफल होते हैं। यह भी पाया गया है कि शारीरिक रूप से स्वस्थ बालकों में प्राय: अस्वस्थ रहने वाले तथा दुर्बल बालकों की अपेक्षा संवेगात्मक स्थिरता अधिक होती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि नियमित व्यायाम तथा खेल सुचारु संवेगात्मक विकास के लिए अनुकूल कारक हैं।

5. व्यायाम का नैतिक विकास पर प्रभाव – सम्पूर्ण विकास के लिए नैतिक विकास पर भी ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक है। नैतिक विकास का मूल्यांकन सामाजिक मान्यताओं एवं निर्धारित नियमों से होता है जो बालक या व्यक्ति समाज द्वारा निर्धारित नियमों एवं मान्यताओं का स्वेच्छा से पालन करता है, उसका नैतिक विकास सुचारु माना जाता है। नैतिकता के नियम उचित-अनुचित से सम्बन्धित होते हैं। अनुचित व्यवहार करने वाले व्यक्ति को अनैतिक माना जाता है तथा उचित व्यवहार करना नैतिकता का प्रतीक माना जाता है।

सुचारु नैतिक विकास के लिए जहाँ उचित शिक्षा आदि विभिन्न कारक जिम्मेदार होते हैं, वहीं व्यायाम तथा सामूहिक खेल सम्बन्धी गतिविधियों का भी उल्लेखनीय योगदान होता है। व्यायाम तथा नियमित रूप से खेलों में सम्मिलित होने से बालक का जीवन नियमित तथा संयमित होता है। इस स्थिति में बालक की संकल्प शक्ति का भी समुचित विकास होता है।

विकसित संकल्प शक्ति वाले बालक को नैतिक नियमों के पालन के लिए शक्ति तथा प्रेरणा मिलती है। व्यायाम तथा सामूहिक खेलों के दौरान खेल के साथियों से भी नैतिक विकास में काफी सहयोग प्राप्त होता है। निश्चित रूप से समूह में खेलने वाले बालक को सहयोग, सच्चाई तथा ईमानदारी एवं साहस का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त होता है। ये सभी नैतिक सद्गुण हैं तथा इनका समुचित विकास ही नैतिक विकास है। स्पष्ट है कि बालक के नैतिक विकास में खेल एवं व्यायाम का उल्लेखनीय योगदान होता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 15 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
व्यक्ति की क्रियात्मक क्षमता पर व्यायाम का प्रभाव स्पष्ट करें
उत्तरः
व्यक्ति के स्वास्थ्य एवं विकास के मूल्यांकन के लिए उसकी क्रियात्मक क्षमता को जानना भी आवश्यक होता है। कार्य या श्रम करने की शक्ति या क्षमता को क्रियात्मक क्षमता के रूप में जाना जाता है। सामान्य क्रियात्मक क्षमता के लिए शरीर का स्वस्थ तथा समुचित स्तर का ऊर्जावान होना अनिवार्य कारक है। जहाँ तक शारीरिक स्वास्थ्य एवं ऊर्जा का प्रश्न है, इसके लिए सबसे अनुकूल कारक नियमित रूप से व्यायाम करना ही है। नियमित रूप से व्यायाम करने वाले व्यक्ति के सभी तन्त्र स्वस्थ तथा सुदृढ़ बनते हैं।

इस स्थिति में व्यक्ति की क्रियात्मक क्षमता का सुचारु विकास एक स्वाभाविक परिणाम होता है। इस तथ्य को कुछ उदाहरणों से भी स्पष्ट किया जा सकता है। जब कोई व्यक्ति सही रूप में व्यायाम करता है तब श्वसन तन्त्र के माध्यम से शरीर में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन प्रवेश करती है। इससे शरीर का रक्त तेजी से शुद्ध होता रहता है तथा शुद्ध रक्त का शरीर में अधिक परिसंचरण होता है।

इससे शरीर को उचित पोषण प्राप्त होता है तथा शरीर में अधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है। पर्याप्त ऊर्जा उत्पन्न होने की स्थिति में व्यक्ति की क्रियात्मक-क्षमता भी बढ़ती है। एक अन्य उदाहरण पाचन-तन्त्र से सम्बन्धित है। यदि व्यक्ति नियमित रूप से व्यायाम करता है तो उसके पाचन-तन्त्र की क्रियाएँ सुचारु रूप से सम्पन्न होती हैं। इससे शरीर को समुचित पोषण प्राप्त होता है तथा वह आलस्य से बचा रहता है। इस दशा में व्यक्ति की क्रियात्मक क्षमता भी सामान्य बनी रहती है। पाचन तन्त्र के ही समान हमारे उत्सर्जन तन्त्र की क्रियाओं पर भी व्यायाम का अच्छा प्रभाव पड़ता है तथा यह स्थिति भी कार्यात्मक क्षमता के लिए अनुकूल कारक बनती है।

इसके अतिरिक्त एक अन्य तथ्य भी महत्त्वपूर्ण है। सामान्य तथा उत्तम क्रियात्मक क्षमता के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति का चित्त प्रसन्न हो तथा उसमें उत्साह और उल्लास की कमी न हो। यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि नियमित रूप से व्यायाम करने तथा खेल-कूद में सम्मिलित होने से चित्त प्रसन्न रहता है. तथा व्यक्ति उत्साहित रहता है। इन दशाओं में व्यक्ति प्रत्येक कार्य को प्रसन्नतापूर्वक करता है तथा कार्य के प्रति रुचि बनाए रखता है। इन परिस्थितियों में नि:सन्देह रूप से व्यक्ति की क्रियात्मक क्षमता भी निरन्तर उत्तम ही रहती है। स्पष्ट है कि नियमित व्यायाम क्रियात्मक क्षमता के सुचारु विकास के लिए एक अनुकूल कारक है। अच्छी क्रियात्मक क्षमता वाला व्यक्ति जीवन के सभी क्षेत्रों में सफल रहता है।

प्रश्न 2.
व्यायाम न करने के शरीर एवं स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल परिणामों का उल्लेख करें। ‘
उत्तरः
जहाँ एक ओर व्यायाम करने से विभिन्न लाभ होते हैं तथा विकास एवं क्रियात्मक क्षमता पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है, वहीं व्यायाम न करने की स्थिति में व्यक्ति के स्वास्थ्य एवं जीवन पर अनेक प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ सकते हैं।

निश्चित रूप से व्यायाम न करने की स्थिति में सामान्य स्वास्थ्य को सामान्य बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। यदि कोई व्यक्ति व्यायाम या खेल-कूद नहीं करता तो व्यक्ति के चेहरे का स्वाभाविक तेज या रौनक कम होने लगती है। यही नहीं व्यक्ति की शारीरिक चुस्ती-फुर्ती भी घटने लगती है। व्यायाम न करने की दशा में व्यक्ति के स्वभाव तथा व्यवहार पर भी बुरा प्रभाव पड़ने लगता है। इन दशाओं में व्यक्ति का स्वभाव उत्साहरहित तथा उदासीन बन जाता है।

उसके व्यवहार में चिड़चिड़ापन तथा झुंझलाहट देखी जा सकती है। कुछ व्यक्ति व्यायाम तो करते नहीं परन्तु स्वाद एवं लोभवश अधिक तथा पौष्टिक आहार ग्रहण करते रहते हैं। इस स्थिति में शरीर में वसा की मात्रा बढ़ जाती है तथा व्यक्ति मोटापे का शिकार हो जाता है। इस स्थिति में व्यक्ति को विभिन्न रोग भी घेर लेते हैं। मधुमेह, उच्च रक्तचाप तथा हृदय रोग इसी श्रेणी के रोग हैं। लगातार व्यायाम न करने से व्यक्ति की पाचन-क्रिया पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति अपच का शिकार होने लगता है तथा उसकी भूख भी घट जाती है।

प्रश्न 3.
टिप्पणी लिखिए—विभिन्न अवस्थाओं में उपयोगी व्यायाम।
उत्तरः
विभिन्न अवस्थाओं में उपयोगी व्यायाम
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 15 विकास तथा क्रियात्मक क्षमता पर व्यायाम का प्रभाव 1
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 15 विकास तथा क्रियात्मक क्षमता पर व्यायाम का प्रभाव 2

UP Board Class 11 Home Science Chapter 15 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘व्यायाम’ से आप क्या समझती हैं?
उत्तरः
उन समस्त क्रियाओं तथा गतिविधियों को व्यायाम माना जाता है जो व्यक्ति के शरीर के समस्त अंगों के पूर्ण तथा सन्तुलित विकास में सहायक होती हैं।

प्रश्न 2.
नियमित रूप से व्यायाम करने से क्या मुख्य लाभ होता है?
उत्तरः
नियमित रूप से व्यायाम करने से शरीर सुन्दर, सुडौल तथा ओजस्वी बनता है।

प्रश्न 3.
व्यायाम के दो मुख्य नियम बताइए।
उत्तरः

  1. व्यायाम सदैव अपनी क्षमता के अनुकूल करना चाहिए। जब थकान अनुभव हो तब व्यायाम करना बन्द कर देना चाहिए।
  2. व्यायाम सदैव नियमित रूप से करना चाहिए।

प्रश्न 4.
व्यायाम करने से किस वर्ग के रोगों को नियन्त्रित किया जा सकता है?
उत्तरः
व्यायाम करने से मोटापे से सम्बन्धित रोगों को नियन्त्रित किया जा सकता है। इस वर्ग के मुख्य रोग हैं-उच्च रक्तचाप, उच्च कोलेस्ट्रॉल, हृदय रोग तथा मधुमेह।

प्रश्न 5.
व्यायाम से शरीर का कौन-सा तन्त्र या संस्थान प्रभावित होता है?
उत्तरः
व्यायाम से शरीर के सभी तन्त्र या संस्थान प्रभावित होते हैं। व्यायाम से शरीर के सभी तन्त्रों की क्रियाशीलता में सुधार होता है तथा शरीर की क्रियात्मक क्षमता का समुचित विकास होता है।

प्रश्न 6.
व्यायाम से व्यक्ति के विकास के कौन-कौन से पक्ष प्रभावित होते हैं?
उत्तरः
व्यायाम से व्यक्ति का सम्पूर्ण विकास सुचारु बनता है अर्थात व्यायाम से विकास के सभी पक्षों पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। .

प्रश्न 7.
अच्छी क्रियात्मक क्षमता से क्या लाभ होता है?
उत्तरः
अच्छी क्रियात्मक क्षमता वाला व्यक्ति जीवन के सभी क्षेत्रों में सफल रहता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 15 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –
1. स्वस्थ रहने के लिए व्यायाम आवश्यक है, क्योंकि यह शरीर को बनाता है –
(क) आलसी एवं निष्क्रिय
(ख) क्रियाशील एवं स्वस्थ
(ग) स्वस्थ एवं आलसी ।
(घ) दुर्बल एवं बुद्धिमान।
उत्तरः
(ख) क्रियाशील एवं स्वस्था

2. व्यायाम करने से त्वचा द्वारा शरीर से पृथक होते रहते हैं –
(क) अधिक उत्सर्जी पदार्थ
(ख) अधिक पौष्टिक पदार्थ
(ग) अधिक दुर्गन्धयुक्त पदार्थ
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तरः
(क) अधिक उत्सर्जी पदार्थ।

3. मनुष्य को व्यायाम कब करना चाहिए –
(क) भोजन के पश्चात
(ख) रात्रि में
(ग) प्रात:काल खाली पेट
(घ) चाहे जब।
उत्तरः
(ग) प्रात:काल खाली पेट।

4. व्यायाम से लाभान्वित हो सकते हैं –
(क) केवल स्कूल जाने वाले लड़के-लड़कियाँ
(ख) केवल छोटे बच्चे तथा वृद्ध जन
(ग) केवल खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले
(घ) सभी व्यक्ति लाभान्वित होते हैं।
उत्तरः
(घ) सभी व्यक्ति लाभान्वित होते हैं।

5. व्यायाम का अनुकूल प्रभाव पड़ता है –
(क) स्वास्थ्य एवं शारीरिक विकास पर
(ख) मानसिक एवं बौद्धिक विकास पर
(ग) संवेगात्मक विकास तथा स्वभाव पर
(घ) उपर्युक्त सभी अनुकूल प्रभाव।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी अनुकूल प्रभाव।

6. वृद्ध जनों के लिए उपयोगी व्यायाम है –
(क) सुबह-शाम घूमना तथा शारीरिक स्वास्थ्य के अनुसार हल्के कार्य करना
(ख) दौड़ लगाना या जॉगिंग करना
(ग) दौड़-धूप के खेल खेलना
(घ) कोई भी व्यायाम उपयोगी नहीं है।
उत्तरः
(क) सुबह-शाम घूमना तथा शारीरिक स्वास्थ्य के अनुसार हल्के कार्य करना।

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UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति (Water and Food Materials Supply)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति

UP Board Class 11 Home Science Chapter 12 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जल प्राप्ति के प्राकृतिक स्रोतों को बताइए। गाँवों में इन स्रोतों का किस प्रकार लाभ उठाया जा सकता है?
अथवा
जल क्या है? गाँव में जल प्राप्ति के प्रमुख साधनों को समझाइए।
अथवा
जल का संघटन बताइए। जल प्राप्ति के स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
जल से आशय (Meaning of Water) –
जल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का एक यौगिक है। इसमें दो भाग हाइड्रोजन और एक भाग ऑक्सीजन है। इसका रासायनिक सूत्र H2O है। यही शुद्ध जल होता है। सामान्यत: जल में कई प्रकार के लवण घुले रहते हैं जिसके कारण यह अशुद्ध हो जाता है। जल एक महत्त्वपूर्ण विलायक होने के कारण अनेक पदार्थों (जैसे अनेक तत्त्वों के लवण इत्यादि) को अपने अन्दर घोल लेता है।

जल प्राप्ति के स्रोत (Sources of Water) –
वर्षा ही जल प्राप्ति का प्रमुख स्रोत है। समुद्र और झीलों का जल, वाष्प बनकर वायुमण्डल में पहुँचता है। वायुमण्डल में यह ठण्डा होकर बादलों का रूप ले लेता है और वर्षा के रूप में भूमि पर गिरता है।

वर्षा के जल का कुछ भाग पृथ्वी पर बहता है जबकि उसका काफी भाग मिट्टी से होकर भूमि के अन्दर चला जाता है। यह भूमि के अन्दर उपस्थित कच्ची या पक्की चट्टानों के ऊपर एकत्र होता रहता है। इस प्रकार जल स्रोतों को दो भागों में विभाजित किया जाता है – (1) पृष्ठ स्रोत तथा (2) भूमिगत स्रोत। इनका विवरण निम्नवत् है –

1. पृष्ठ स्रोत (Surface water) –
जैसा उपर्युक्त विवरण में बताया गया है, जल के सभी स्रोत वर्षा के जल से ही बनते हैं, इनका हम निम्नलिखित प्रकार से अध्ययन करते हैं –

(क) वर्षा का जल–अनेक स्थानों पर वर्षा के जल को जलरोधी कुण्डों में एकत्र कर लिया जाता है, वैसे भी गड्डे इत्यादि में यह जल एकत्र हो जाता है। यह जल पीने आदि के लिए उपयोगी नहीं होता है, फिर भी यदि जलकुण्ड साफ-सुथरे हों, तो सामान्य क्रिया द्वारा इसे पीने योग्य बनाया जा सकता है।

(ख) जलधाराएँ-पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा का जल, जलधाराओं के रूप में प्रवाहित होता है। प्रारम्भिक रूप में जल शुद्ध होता है किन्तु मिट्टी इत्यादि मिल जाने के कारण इसमें अनेक अशुद्धियाँ व्याप्त हो जाती हैं।

(ग) नदियाँ-बर्फ के पिघलने तथा जलधाराओं आदि के मिलने से नदियाँ बनती हैं। इनके जल में अनेक प्रकार की अशुद्धियाँ हो सकती हैं जो धरातलीय स्रोत अथवा रास्ते में मिलती रहती हैं।

(घ) झीलें-वर्षा और बर्फ के पिघले जल से पहाड़ी क्षेत्रों में झीलें बन जाती हैं। सामान्यतः झीलों का तल जलरोधी होता है। कई बार झीलों में अन्य स्रोत भी मिल जाते हैं। कभी-कभी झरने इत्यादि भी झीलों को भरने में सम्मिलित होते हैं। यह जल भी अनेक कारणों से अशुद्ध होता है।

(ङ) समुद्र-पृथ्वी के सम्पूर्ण तल से बहकर आने वाला जल समुद्र में एकत्रित हो जाता है। यह जल अत्यन्त अशुद्ध एवं खारा होता है। यह न तो पीने योग्य होता है और न ही कृषि-कार्यों के लिए उपयोगी होता है।

(च) परिबद्ध जलाशय-यह एक कृत्रिम झील होती है जो जलधाराओं को रोककर बनाई जाती है। इसको कृत्रिम जलाशय भी कहा जा सकता है। जल की कमी के समय में इनका जल किसी अच्छी विधि द्वारा शुद्ध करके उपयोग में लाया जा सकता है।

2. भूमिगत स्रोत (Ground water) –
वर्षा का जल भूमि के अन्दर धीरे-धीरे समाता रहता है तथा भीतरी भागों में पहुँचकर पक्के स्थानों में, कंकरीली या चट्टानी परतों के ऊपर जमा हो जाता है। इस प्रकार का जल कभी-कभी अपने आप स्रोत के रूप में निकल आता है अन्यथा कृत्रिम विधियों द्वारा इसे बाहर निकाला जाता है। प्रमुख भूमिगत स्रोत – (क) झरने, (ख) कुएँ, (ग) ट्यूबवैल होते हैं।

(क) झरने – यह भूमि द्वारा अवशोषित जल ही है जो किसी स्थान पर जल-स्तर के खुल जाने से बाहर निकल आता है। इसी को झरना (spring) कहते हैं। इसमें भी अनेक पदार्थ घुले हुए हो सकते हैं। विभिन्न स्थानों पर पाए जाने वाले झरनों के पानी के गुण भिन्न-भिन्न होते हैं।

(ख) कुएँ-यह भूमि द्वारा अवशोषित जल है जो किसी चट्टान पर जाकर रुक जाता है। इसमें भी अनेक विलेय अशुद्धियाँ होती हैं। इसे भूमि को खोदकर निकाला जाता है। कुछ कुएँ उथले होते हैं जो ऊपरी जलधारी स्तर तक ही बनाए जाते हैं। अन्य अधिक नीचे तथा अधिक पक्के जलधारी स्तर तक खोदे जाते हैं। यह जल अच्छा तथा पीने योग्य होता है। कुएँ से रहट, घिरौं या शक्तिचालित पम्प द्वारा जल निकालने की व्यवस्था होती है।

(ग) ट्यूबवैल-भूमिगत जल को प्राप्त करने के लिए ट्यूबवैल भी बनाए जाते हैं। ये अत्यधिक गहरे होते हैं तथा इनसे जल प्राप्त करने के लिए विद्युत-चालित पम्प इस्तेमाल किए जाते हैं। इनकी गहराई 100 मीटर तक भी हो सकती है।

गाँवों में परिस्थितियों के अनुसार नदियों, झीलों तथा वर्षा के जल को उपयोग में लाया जाता है। इसके अतिरिक्त भूमिगत जल को भी कुओं. ट्यूबवैल अथवा हैंडपम्प के माध्यम से प्राप्त कर लिया जाता है। इन स्रोतों से प्राप्त जल को सामान्य रूप से किसी घरेलू विधि द्वारा शुद्ध करके ही पीने के काम में लाना चाहिए।

प्रश्न 2.
नगरों में किस प्रकार से पेयजल तैयार किया जाता है?
अथवा
जल को पीने योग्य बनाने की बड़े शहरों में जो व्यवस्था होती है, उसका क्रमवार वर्णन कीजिए।
उत्तरः
नगरों में पेयजल आपूर्ति तथा जल शोधन (Supply of Drinking Water and Purification of Water in Cities) –
नगरों में प्राय: नदियों के जल को जल आपूर्ति के लिए प्रयोग में लाया जाता है। यह जल वर्षा का तथा प्राकृतिक होता है। प्राकृतिक जल में अनेक अवांछित एवं हानिप्रद अशुद्धियाँ होती हैं जिन्हें दूर करने के लिए जल का शोधन होता है। इसमें नदी का जल विभिन्न हौजों; जैसे-स्कन्दन हौज, तलछटी हौज, निस्यन्दन हौज और क्लोरीनीकरण हौज से होकर निकाला जाता है। जब इन हौजों में होकर पानी निकलता है तो इसकी अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं तथा जल पीने योग्य हो जाता है। इसके लिए एक निश्चित विधि निश्चित चरणों में अपनाई जाती है –

1. स्कन्दन हौज (Coagulation tank) – जल को पहले इसी हौज में भेजा जाता है। पानी की अशुद्धियों को दूर करने के लिए स्कन्दन पदार्थ जैसे लोहा और ऐलुमिनियम के लवण प्रयोग में आते हैं।
2. तलछटी हौज (Setling tank) – स्कन्दित जल को निस्तारण हेतु इस हौज में भेजा जाता है जहाँ जल स्थिर रहता है और अशुद्धियाँ हौज की तली में नीचे बैठ जाती हैं।
3. निस्यन्दन हौज (Filtration tank) – जल को छानने के लिए बड़े आयताकार टैंकों में बजरी, कंकड़, मोटी रेत, महीन रेत तथा चारकोल से निर्मित फिल्टर बेड्स (Filter Beds) बनाए जाते हैं।
4. वातन तथा क्लोरीनीकरण (Ventilation and Chlorination) – आवश्यकता पड़ने पर जल का क्लोरीनीकरण तथा वातन किया जाता है।
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति 1

उपर्युक्त सभी टैंकों से निकालने पर जल की विभिन्न अशुद्धियों और जीवाणुओं का निराकरण हो जाता है। किन्तु जल में अब भी कुछ रोगाणु शेष रह जाते हैं। इन्हें नष्ट करने के लिए द्रव क्लोरीन, ब्लीचिंग पाउडर या ओजोन आदि को निश्चित मात्रा में मिलाया जाता है। ये पदार्थ रोगाणुओं को पूर्णत: नष्ट कर देते हैं।

वातन के लिए जल को फव्वारे के रूप में निकालते हैं। इस प्रकार, जल में वायु के मिलने से इसकी गन्ध इत्यादि दूर हो जाती है तथा कीटाणु आदि को नष्ट करने में सहायता मिलती है।

प्रश्न 3.
शुद्ध जल से क्या तात्पर्य है? जल में किस प्रकार की अशुद्धियाँ हो सकती हैं? दूषित जल को शुद्ध करने की विधियाँ बताइए।
अथवा
जल किन कारणों से अशुद्ध होता है? दूषित जल को शुद्ध करने की विधियाँ लिखिए।
उत्तरः
शुद्ध जल (Pure Water) –
शुद्ध जल स्वादहीन, गन्धहीन तथा रंगहीन द्रव होता है। यह स्वच्छ एवं पूर्ण रूप से पारदर्शी होता है। इसमें एक प्रकार की प्राकृतिक चमक होती है। जल एक सार्वभौमिक तथा उत्तम विलायक है, इसलिए इसके अशुद्ध होने की अत्यधिक सम्भावना रहती है। यह अनेक वस्तुओं को बिना घुली अवस्था में भी रोके रखता है।

जल की अशुद्धियाँ (Impurities of Water) –
जल में दो प्रकार की अशुद्धियाँ मिलती हैं –

  1. विलेय (घुलित) अशुद्धियाँ तथा
  2. अविलेय (अघुलित) अशुद्धियाँ।

1. विलेय अशुद्धियाँ (Soluble impurities) – जल अनेक पदार्थों के सम्पर्क में आने पर उन्हें घोल लेता है। सामान्य अवस्था में जो जल हम पीते हैं उसमें भी अनेक रासायनिक पदार्थ, विशेषकर लवण आदि थोड़ी मात्रा में घुले रहते हैं। इनकी अधिक मात्रा होने पर ये हानिकारक हो जाते हैं। ये अशुद्धियाँ निम्नलिखित प्रकार की हो सकती हैं –

  • लवण-अनेक तत्त्वों के लवण जल में घुल जाते हैं और जल को दूषित कर देते हैं। कुछ लवण जल को कठोर बना देते हैं। इनमें कैल्सियम तथा मैग्नीशियम के बाइकार्बोनेट, सल्फेट तथा क्लोराइड्स इत्यादि प्रमुख हैं।
  • सड़े हुए जैविक पदार्थ-अनेक जैविक पदार्थों के मृत भाग जल में घुल जाते हैं तथा उनसे प्राप्त लवण इसी में घुले रहते हैं। इनमें नाइट्राइट्स, नाइट्रेट्स व अमोनिया इत्यादि के लवण हो सकते हैं।
  • गैसें-अनेक गैसें जल में घुलनशील हैं। उदाहरणार्थ-हाइड्रोजन सल्फाइड, कार्बन डाइऑक्साइड, अमोनिया आदि जल में घुलकर उसे दूषित कर देती हैं।

2. अविलेय अशुद्धियाँ (Insoluble impurities) – अशुद्ध जल में कुछ ऐसी अशुद्धियाँ भी पायी जाती हैं जो जल में घुलती नहीं परन्तु इनका जल में अस्तित्व ही जल को दूषित एवं हानिकारक बना देता है। इस प्रकार की मुख्य अशुद्धियाँ निम्नलिखित हैं –

  • धूल-मिट्टी के कण एवं विभिन्न प्रकार का कूड़ा-करकट; उदाहरणार्थ–पत्ते, घास, तिनके आदि।
  • विभिन्न रोगों के कीटाणु व बीजाणु। पानी में मुख्य रूप से हैजा, पेचिश, मोतीझरा आदि रोगों के कीटाणु विद्यमान हो सकते हैं।
  • विभिन्न कीटाणुओं के अण्डे तथा छोटे बच्चे।
  • विभिन्न पशुओं द्वारा उत्पन्न गन्दगी; जैसे-मल-मूत्र आदि।

उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि जल अनेक प्रकार से प्रदूषित हो सकता है। वास्तव में, किसी भी प्रकार से जल में किसी अशुद्धि के समावेश से जल प्रदूषित हो जाता है।

दूषित जल को शुद्ध करने की विधियाँ (Methods of Purification of Contaminated Water) –
अशुद्ध जल को शुद्ध करने के लिए तीन प्रकार की विधियाँ अपनाई जाती हैं –
(क) भौतिक विधि
(ख) यान्त्रिक विधि तथा
(ग) रासायनिक विधि।

(क) भौतिक विधि (Physical method) –
अशुद्ध जल को भौतिक विधि द्वारा निम्नलिखित तीन प्रकार से शुद्ध किया जा सकता है –

1. उबालकर (By boiling) – अशुद्ध जल को शुद्ध करने के लिए यह सर्वोत्तम उपाय है। जल को उबालने से उसमें घुलित या अघुलित अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं। विभिन्न प्रकार के कीटाणु, जीवाणु या रोगाणु इत्यादि मर जाते हैं। अधिक मात्रा में घुले हुए लवण अलग होकर नीचे बैठ जाते हैं। विभिन्न प्रकार की घुली हुई गैसें उबालने से निकल जाती हैं। इस प्रकार अशुद्ध जल को उबालने से उसकी अधिकांश अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं तथा जल पीने योग्य हो जाता है। घरेलू स्तर पर पीने के लिए जल को शुद्ध करने के लिए यह विधि सर्वोत्तम है।

2. आसवन द्वारा (By distillation) – आसवन की विधि के अन्तर्गत अशुद्ध जल को भाप में परिवर्तित कर लिया जाता है। इसके बाद जलवाष्प को ठण्डा कर पुन: जल में बदल दिया जाता है। इस क्रिया के लिए एक वाष्पीकरण उपकरण प्रयोग में लाया जाता है जिसका एक भाग भाप बनाने का तथा दूसरा भाग भाप को ठण्डा करने का कार्य करता है।

आसवन से प्राप्त जल आसुत जल कहलाता है। इसमें किसी प्रकार की घुलित या अघुलित अशुद्धियाँ नहीं रह जाती हैं। यह सर्वथा शुद्ध जल है किन्तु सामान्य अवस्था में इस जल का पीने के जल के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता क्योंकि आवश्यक लवण इस जल में उपस्थित नहीं रहते हैं। आसुत जल को दवाइयों आदि के लिए तथा इंजेक्शन को घोलने के उपयोग में लाया जाता है। आसवन विधि द्वारा केवल सीमित मात्रा में ही जल को शुद्ध किया जा सकता है।

3. पराबैंगनी किरणों द्वारा (By Ultraviolet rays) – प्रकाश में उपस्थित पराबैंगनी किरणें (Ultraviolet rays) जल को शुद्ध कर देती हैं। ये किरणें जल में उपस्थित रोगाणुओं को भी नष्ट कर देती हैं। बड़े पैमाने पर इस प्रकार की किरणों को यन्त्रों द्वारा बनाकर उपयोग में लाया जा सकता है।

(ख) यान्त्रिक विधि (Mechanical method) –
अशुद्ध जल को शुद्ध करने के लिए अनेक यान्त्रिक साधन भी अपनाए जा सकते हैं जिसमें विभिन्न प्रकार से छानना, निथारना आदि सम्मिलित हैं। पहली विधि में केवल मोटी अघुलित अशुद्धियों को दूर किया जा सकता है। दूसरी विधि में सभी अघुलित अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं परन्तु इसमें घुलित अशुद्धियों को दूर नहीं कर सकते हैं। विभिन्न परिमाप के कणों (पदार्थों) का उपयोग करके कुछ सीमा तक जल को शुद्ध किया जा सकता है। चार घड़ों द्वारा जल को शुद्ध करने की विधि का प्राचीनकाल से भारत में प्रचलन रहा है। इसके अतिरिक्त, अब विभिन्न प्रकार के वाटर फिल्टर उपलब्ध हैं जो पानी को सूक्ष्मता से छानते हैं तथा शुद्ध जल उपलब्ध हो जाता है। कुछ विद्युत-चालित उपकरण भी जल को शुद्ध करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। एक्वागार्ड इसी प्रकार का एक लोकप्रिय उपकरण है।

(ग) रासायनिक विधि (Chemical method) –
जल में घुलित या अघुलित अशुद्धियों को नष्ट करने के लिए कुछ रासायनिक पदार्थों का प्रयोग भी किया जाता है। ये रासायनिक पदार्थ दो प्रकार से क्रिया करते हैं। पहली क्रिया में ये अघुलित या घुलित अशुद्धियों को अवक्षेपण द्वारा अलग कर देते हैं जिसको छानकर अलग किया जा सकता है, जबकि दूसरी विधि, जल में उपस्थित रोगाणुओं को नष्ट करने के लिए होती है।

1. अवक्षेपण विधि (Dispersal method) – कुछ पदार्थ जल में उपस्थित अशुद्धियों को अलग कर उनके साथ तल में नीचे बैठ जाते हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण पदार्थ फिटकरी है। थोड़ी-सी फिटकरी जल के अविलेय तथा विलेय पदार्थों को अवक्षेपित कर जल को शुद्ध करके तल में बैठ जाती है। यद्यपि यह कुछ सीमा तक कीटाणुनाशक भी है किन्तु इसका अधिक प्रभाव नहीं होता। इससे कठोर जल भी मृदु हो जाता है। अवक्षेपण के लिए उपयोगी निर्मली नामक फल का ग्रामीण क्षेत्रों में प्रयोग किया जाता है।

2. कीटाणुनाशक पदार्थ (Germicidic substances) – अशुद्ध जल में रहने वाले विभिन्न रोगों के कीटाणुओं को नष्ट करने के लिए अनेक रासायनिक पदार्थ प्रयोग किए जाते हैं। इनमें से मुख्य निम्नलिखित हैं –

(क) लाल दवा – जल को शुद्ध करने के लिए यह उत्तम पदार्थ है। इसका रासायनिक नाम पोटैशियम परमैंगनेट है। इसके प्रयोग से अधिकांश कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। गाँवों में तालाब, कुओं तथा एकत्रित जल में इस दवा का प्रयोग किया जाता है। इसकी थोड़ी-सी मात्रा जल में घोलकर उस जल में डाली जाती है जिसमें कीटाणु उपस्थित होते हैं। इस दवा के प्रभाव से जल में विद्यमान कीटाणु नष्ट हो जाते हैं व जल शुद्ध हो जाता है।

(ख) कॉपर सल्फेट (तूतिया) – यह अत्यन्त अल्पमात्रा में प्रयुक्त किए जाने पर अशुद्ध जल को कीटाणुरहित कर सकता है। इसका रासायनिक नाम कॉपर सल्फेट है। घरेलू रूप में इसका प्रयोग इसलिए वर्जित है क्योंकि थोड़ी भी अधिक मात्रा में यह हानिकारक सिद्ध हो सकता है।

(ग) ब्लीचिंग पाउडर – ब्लीचिंग पाउडर की बहुत कम मात्रा ही जल को कीटाणुरहित कर सकती है। 2.5 किग्रा ब्लीचिंग पाउडर एक लाख गैलन पानी को रोगाणु-मुक्त कर देता है।

(घ) क्लोरीन – यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कीटाणुनाशक गैस है। सभी बड़े नगरों में जल-आपूर्ति की संस्था होती है जिसके द्वारा क्लोरीन गैस का प्रयोग कीटाणुओं को नष्ट करने के लिए किया जाता है।

पर्वोक्त रासायनिक पदार्थों के अतिरिक्त आयोडीन, ओजोन आदि गैसें भी जल को कीटाणुरहित कर सकती हैं, यद्यपि इनका प्रयोग प्रचलित नहीं है। ऑक्सीजन गैस स्वयं भी बहुत-सी अशुद्धियों का ऑक्सीकरण कर देती है।

प्रश्न 4.
खाद्य-पदार्थों के संग्रह से क्या आशय है? घर पर खाद्य-पदार्थों के उचित संग्रह की व्यवस्था का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तरः
आहार के लिए विभिन्न प्रकार के खाद्य-पदार्थों की निरन्तर आवश्यकता होती है। आहार की नियमित आपूर्ति के लिए घर पर विभिन्न खाद्य-सामग्रियों को संगृहीत करके रखना आवश्यक होता है। बाजार से लाई गई खाद्य-सामग्री को घर में सँभालकर सुरक्षित ढंग से रखना आहार-संग्रह कहलाता है। आहार-संग्रह व्यवस्थित ढंग से तथा खाद्य-सामग्री की प्रकृति के अनुरूप होना चाहिए। घर पर आहार-संग्रह की उचित व्यवस्था को आवश्यक एवं लाभकारी माना जाता है।

इससे रसोईघर के कार्य अर्थात् भोजन तैयार करने में विशेष सुविधा होती है, समय एवं श्रम की बचत होती है तथा आर्थिक लाभ भी होता है। उचित संग्रह से खाद्य-सामग्री नष्ट होने से बची रहती है। उचित संग्रह की समुचित जानकारी होने की दशा में अनाज आदि फसल के अवसर पर एक साथ वर्ष भर की आवश्यकतानुसार ले लिए जाते हैं। इस अवसर पर भाव कम होते हैं जिससे धन की बचत हो जाती है। इसी प्रकार प्याज, आलू, अदरक, लहसुन आदि खाद्य-सामग्रियों को भी एक साथ थोक के भाव खरीदने से आर्थिक लाभ होता है।

खाद्य-सामग्री के संग्रह की विधियाँ (Methods of Food Storage) –
भिन्न-भिन्न प्रकृति वाली खाद्य-सामग्रियों के संग्रह के लिए भिन्न-भिन्न उपाय एवं विधियाँ अपनाई जाती हैं। आहार-संग्रह के दृष्टिकोण से खाद्य-पदार्थों को तीन वर्गों में बाँटा जाता है। ये वर्ग हैं – नाशवान भोज्य-पदार्थ, अर्द्ध-नाशवान भोज्य-पदार्थ तथा अनाशवान भोज्य-पदार्थ।

खाद्य-सामग्री के नष्ट या विकृत होने के लिए दो प्रकार के कारण जिम्मेदार होते हैं। प्रथम वर्ग के कारणों को आहार को नष्ट करने वाले आन्तरिक कारण कहा जाता है तथा द्वितीय वर्ग के कारणों को बाहरी कारण कहा जाता है। आन्तरिक कारणों में मुख्य रूप से आहार में विद्यमान एन्जाइम उल्लेखनीय भूमिका निभाते हैं। बाहरी कारणों में मुख्य हैं-बैक्टीरिया, मोल्ड तथा यीस्ट का प्रभाव। इन सभी कारकों की सक्रियता नमी की उपस्थिति में बढ़ जाती है। इन कारकों के अतिरिक्त विभिन्न घरेलू जीव, कीट एवं पशु-पक्षी भी खाद्य-सामग्री को नष्ट एवं दूषित करते हैं।

नाशवान भोज्य पदार्थों का संग्रह (Storage of perishable food materials) – नाशवान भोज्य पदार्थों को नष्ट या विकृत होने से बचाने के लिए दो विधियों को अपनाया जा सकता है – प्रथम गर्म अथवा ताप पर आधारित विधि है तथा द्वितीय ठण्डी या प्रशीतन पर आधारित विधि है। गर्म अथवा ताप पर आधारित विधि के अन्तर्गत खाद्य-सामग्री को अधिक ताप पर गर्म करके विकृत होने से बचाया जा सकता है। कच्चे दूध को उबालकर रखने से वह फटने एवं विकृत होने से बच जाता है। ठण्डी अथवा प्रशीतन पर आधारित विधि के अन्तर्गत खाद्य-सामग्री को कम या अति कम तापक्रम पर संगृहीत करने की व्यवस्था की जाती है। घरों में इस विधि को फ्रिज के माध्यम से अपनाया जाता है, जबकि व्यापक स्तर पर यह कार्य कोल्ड स्टोरेज के माध्यम से किया जाता है।

अर्द्ध-नाशवान भोज्य पदार्थों का संग्रह (Storage of semi perishable food materials) – अर्द्ध-नाशवान भोज्य पदार्थों में नमी की मात्रा कम होती है जैसे कि आलू, प्याज, अदरक, लहसुन आदि। इस प्रकार के भोज्य पदार्थों के संग्रह के लिए किन्हीं विशिष्ट उपायों को अपनाना आवश्यक नहीं होता। इन खाद्य-पदार्थों को मुख्य रूप से आहार को नष्ट करने वाले बाहरी कारकों तथा नमी से बचाकर रखना आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ये खाद्य-पदार्थ अधिक गर्म वातावरण में न रखे जाएँ। साथ ही इन्हें जीव-जन्तुओं से बचाकर रखने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए।

अनाशवान भोज्य पदार्थों का संग्रह (Storage of imperishable food materials) – अनाशवान भोज्य-पदार्थों के संग्रहण में मुख्य रूप से बाहरी कारकों को नियन्त्रित करना अनिवार्य होता है। इस श्रेणी में मुख्य रूप से अनाजों, दालों आदि को सम्मिलित किया जाता है। इन भोज्य पदार्थों को संगृहीत करने के लिए दो प्रकार के उपाय किए जाते हैं। प्रथम प्रकार के उपायों के अन्तर्गत अनाजों एवं दालों को बन्द ढक्कनदार पात्रों या डिब्बों में पूर्ण रूप से नमीरहित दशा में रखा जाता है। द्वितीय प्रकार के उपायों के अन्तर्गत अनाजों में कीटनाशक दवाओं, नीम के सूखे पत्ते, नमक, हल्दी या बोरिक अम्ल को रखकर कीड़ों तथा घुन आदि से बचाया जा सकला है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 12 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पेयजल के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
शुद्ध जल (पेयजल) के गुण बताइए।
उत्तरः
पेयजल के गुण ऐसा जल, जो उन सभी हानिकारक पदार्थों से मुक्त हो जो स्वास्थ्य को हानि पहुँचा सकते हैं तथा जिसमें शरीर के लिए आवश्यक खनिज पदार्थ मौजूद हों, ‘पेयजल’ कहलाता है। आदर्श पेयजल में निम्नलिखित गुण होते हैं

  • यह स्वच्छ (पारदर्शी), गन्धहीन, रंगहीन तथा कुछ आवश्यक खनिज लवणयुक्त होना चाहिए।
  • यह सुस्वादु होना चाहिए।
  • इसका ताप सामान्यत: 4°-10°C के मध्य होना चाहिए।
  • यह जीवाणुओं, विषाणुओं, रोगाणुओं आदि से मुक्त होना चाहिए।
  • इससे बर्तनों, पाइपों तथा कपड़ों पर धब्बे नहीं लगने चाहिए।
  • यह हानिकारक पदार्थों से मुक्त होना चाहिए।
  • यह मृदु जल होना चाहिए।
  • अधिक देर तक रखने पर भी यह ताजा बना रहना चाहिए।

प्रश्न 2.
जल की कठोरता को कैसे दूर करेंगी?
उत्तरः
जल में दो प्रकार की कठोरता हो सकती है – अस्थायी कठोरता तथा स्थायी कठोरता। जल की अस्थायी कठोरता दो उपायों द्वारा दूर की जा सकती है। ये उपाय हैं –

1. जल को उबालना तथा
2. जल में चूना मिलाना। जल की स्थायी कठोरता को दूर करने के तीन उपाय हैं –

  • कपड़े धोने के सोडे द्वारा
  • सोडे तथा चूने द्वारा तथा
  • परम्यूरिट विधि द्वारा।

प्रश्न 3.
पेयजल तैयार करने के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
पेयजल तैयार करने के उपाय –
पेयजल सामान्यतः जल को उबालकर, छानकर तैयार किया जा सकता है। बड़े पैमाने पर विशेषकर शहरों में प्राकृतिक जल से अवांछित एवं हानिप्रद अशुद्धियों को निकालकर जल शोधन किया जाता है, तब यह पीने योग्य होता है। इसके लिए एक निश्चित विधि अपनाई जाती है जिसके निम्नलिखित सोपान होते हैं –

1. स्कन्दन (Coagulation)-इस विधि में अशुद्ध जल को ऐसे हौज में भेजा जाता है जिसमें कुछ स्कन्दन पदार्थ (Coagulants) मिलाए जाते हैं जो सामान्यत: लोहा तथा ऐलुमिनियम के लवण होते हैं। इस प्रकार के लवणों में फिटकरी, फेरस सल्फेट, फेरिक क्लोराइड, चूना आदि प्रमुख हैं। ये पदार्थ जल में घुलकर एक चिपचिपा पदार्थ बना देते हैं जो जल में उपस्थित अशुद्धियों को अपने साथ चिपकाकर भारी बना देते हैं और हौज की तली में बैठ जाते हैं। ये कुछ निलम्बित कणों को उदासीन भी बनाते हैं; अतः वे भारी होकर तली में बैठ जाते हैं और इस प्रकार जल शुद्ध हो जाता है।

2. निथारना-जल में बैठने वाली अशुद्धियों को निकालने का तरीका ‘निथारना’ कहलाता है। इस विधि में जल को कुछ समय के लिए स्थिर रखा जाता है जिससे उसमें उपस्थित अशुद्धियाँ नीचे बैठ जाती हैं। अब ऊपर के साफ जल को निथारकर अलग कर लिया जाता है तथा प्रयोग में लाया जाता है। तली में शेष बचे जल में अशुद्धियाँ रह जाती हैं जिसे विसर्जित कर दिया जाता है।

3. निस्यन्दन-इस विधि में जल को छाना जाता है ताकि छोटी-बड़ी सभी प्रकार की अशुद्धियाँ उसमें से निकल जाएँ।

4. कीटाणुनाशक-जब पानी में से विभिन्न प्रकार की अशुद्धियाँ निकल जाती हैं, तो उसमें कुछ जीवाणु इत्यादि रह जाते हैं जो रोग उत्पन्न कर सकते हैं। इन्हें नष्ट करने के लिए जल में क्लोरीन भेजी जाती है (ब्लीचिंग पाउडर का प्रयोग करके)। इस गैस के प्रभाव से सभी प्रकार के रोगाणु पूर्णत: नष्ट हो जाते हैं। सामान्यतः घरों में पोटैशियम परमैंगनेट (लाल दवा) का प्रयोग भी जल को कीटाणु-रहित करने के लिए किया जाता है। कुओं आदि में भी इस दवा को डलवाया जाता है।

प्रश्न 4.
मनुष्य के शरीर के लिए जल की उपयोगिता बताइए।
अथवा
ल की मानव-जीवन में क्या उपयोगिता है?
उत्तरः
शरीर के लिए जल अत्यन्त आवश्यक है। शरीर के अन्दर जल ही अनेक कार्यों को करने के लिए माध्यम तथा क्रियाशीलता प्रदान करता है। जल के निम्नलिखित मुख्य उपयोग हैं –

  • रुधिर का अधिकतम भाग जल ही होता है तथा रुधिर को तरल बनाए रखने का कार्य यही करता है।
  • जल भोजन को पचाने में सहायक है। पचा हुआ भोजन भी इसी के साथ आंत्र की दीवार में और वहाँ से सम्पूर्ण शरीर में घुलित अवस्था में पहुँचता है।
  • जल शरीर के ताप को नियन्त्रित तथा नियमित करता है।
  • हानिकारक, व्यर्थ तथा विषैले पदार्थों को जल ही अपने अन्दर घोलकर उत्सर्जन क्रिया के द्वारा वृक्कों से मूत्र के रूप में तथा त्वचा से पसीने के रूप में निकालता है।
  • जल शरीर के अनेकानेक भागों को कोमल तथा मुलायम बनाए रखता है, मुख्यतः मांसपेशियों, तन्तु तथा त्वचा आदि को।
  • शरीर जिन कोशिकाओं से मिलकर बना है उनमें प्रमुख भाग लगभग 85% से 90% तक जल ही होता है।
  • शरीर के अन्दर होने वाली सभी छोटी-बड़ी, निर्माण या टने-फटने सम्बन्धी क्रियाओं को. जिन्हें सम्मिलित रूप में उपापचय (metabolism) कहते हैं, जल ही आधार प्रदान करता है (बिना जल के ये क्रियाएँ नहीं हो सकती हैं)।
  • प्यास लगने पर जल ही प्यास को शान्त करता (बुझाता) है।

प्रश्न 5.
दैनिक कार्यों के लिए हमें कितने जल की आवश्यकता होती है?
उत्तरः
जल एक महत्त्वपूर्ण विलायक है। यह हमारे जीवन, रहन-सहन, व्यवसाय, भोजन, जलवायु के निर्माण आदि के लिए अत्यन्त आवश्यक है। कई बार हम यह भी सोच सकते हैं कि जल के बिना हमारा जीवन असम्भव है। यद्यपि व्यक्ति की जल सम्बन्धी आवश्यकता भिन्न-भिन्न होती है और इस सम्बन्ध में सामान्यत: नियम बनाना उचित प्रतीत नहीं होता। फिर भी एक सामान्य व्यक्ति को औसतन 120-140 लीटर तक जल की आवश्यकता होती है। यद्यपि जीवित रहने भर के लिए 1 – 1.5 लीटर जल ही प्रतिदिन आवश्यक होता है। निम्नांकित सारणी एक व्यक्ति के दिन भर के सामान्य जल-प्रयोग को प्रदर्शित करती है
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति 2

जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति 145 पूर्वोक्त विभाजन में ग्रीष्मकाल में जल की मात्रा में वृद्धि हो सकती है। इसी प्रकार सामान्यत: गर्म प्रदेशों में ठण्डे प्रदेशों की अपेक्षा निवासियों को अधिक जल की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6.
अशुद्ध जल क्या है? शुद्ध तथा अशुद्ध जल में अन्तर बताइए।
अथवा
शुद्ध जल तथा अशुद्ध जल में अन्तर लिखिए।
उत्तरः
अशुद्ध जल –
शुद्ध जल एक उत्तम विलायक है, इसी गुण के कारण जल शीघ्र ही विभिन्न लवणों तथा अन्य पदार्थों को घोल लेता है तथा इसके परिणामस्वरूप शीघ्र ही अशुद्ध हो जाता है। कुछ पदार्थ लटकी हुई अवस्था में भी जल को अशुद्ध बनाते हैं। जिस जल में शुद्ध जल के उपर्युक्त गुण नहीं होते वह जल अशुद्ध जल कहलाता है। शुद्ध एवं अशुद्ध जल के अन्तर को निम्नांकित सारणी द्वारा समझा जा सकता है –
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति 3

प्रश्न 7.
मृदु जल और कठोर जल में अन्तर लिखिए।
उत्तरः
जल में अनावश्यक लवणों की उपस्थिति/अनुपस्थिति के आधार पर जल के दो प्रकार निर्धारित किए गए हैं जिन्हें क्रमश: मृदु जल (soft water) तथा कठोर जल (hard water) कहा जाता है। मृदु जल तथा कठोर जल की पहचान के लिए मुख्य उपाय है-साबुन द्वारा पानी में झाग बनाना। मृदु जल तथा कठोर जल के अन्तर का विवरण निम्नांकित है –
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति 4

प्रश्न 8.
अशुद्ध जल से होने वाली हानियों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
अशुद्ध जल से होने वाले रोगों की सूची बनाइए।
उत्तरः
अशुद्ध जल से होने वाली हानियाँ –
अशुद्ध जल में अनेक प्रकार के हानिकारक पदार्थ हो सकते हैं जिनकी उपस्थिति से ही यह दोषयुक्त होता है। जब ऐसा जल पीने के काम में लाया जाता है तो यह आहारनाल में पहुँचता है। जल में उपस्थित रोगों के जीवाणु इत्यादि आहारनाल के विभिन्न स्थानों में अपनी क्रिया प्रारम्भ कर देते हैं। इस प्रकार शरीर में कुछ ऐसे लक्षण उत्पन्न होते हैं जो किसी रोग को उत्पन्न करते हैं।

अशुद्ध जल से फैलने वाले रोग – अशुद्ध जल से सामान्यतः आहारनाल सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते हैं। उदाहरणार्थ – हैजा, टायफॉइड, अतिसार, संग्रहणी, आंत्रक्षय तथा पीलिया आदि।

दूषित जल का स्वास्थ्य पर प्रभाव –
दूषित जल का जन-जीवन पर स्पष्ट रूप से कुप्रभाव पड़ता है। दूषित जल से अनेक प्रकार की महामारियाँ; जैसे-टायफॉइड, पेचिश आदि रोग हो जाते हैं क्योंकि इन रोगों के रोगाणु दूषित जल में उपस्थित रहते हैं। गोलकृमि, सूत्रकृमि आदि आँतों में रहने वाले परजीवी भी दूषित जल द्वारा मनुष्य की आँत में पहुंचते हैं। दूषित जल में ऑक्सीजन की कमी होती है; अत: ऐसे जल में रहने वाली मछलियाँ आदि भी मर जाती हैं। यही नहीं, दूषित जल दुर्गन्ध के कारण वायुमण्डल को अशुद्ध करता है। इस जल का पशुओं को प्रयोग कराना वर्जित होना चाहिए क्योंकि यह उनमें भी रोग पैदा करता है।

दूषित जल, रोगाणु मुक्त होने पर भी अन्य कई प्रकार से स्वास्थ्य को हानि पहुँचाने वाला होता है। इससे नज़ला, त्वचा के रोग, उल्टियाँ, हैजा, डायरिया आदि जैसे रोगों के लक्षण भी पैदा होते हैं।

प्रश्न 9.
जल को शुद्ध करने की घरेलू विधियों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
जल को शुद्ध करने की चार-घड़ों की विधि का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तरः
जल शुद्ध करने की घरेलू विधियाँ

  1. जल किसी भौतिक साधन से शुद्ध किया जा सकता है; जैसे – उबालना, आसवन आदि।
  2. रासायनिक पदार्थों के प्रयोग के द्वारा भी जल शुद्ध किया जा सकता है; जैसे-कीटाणुनाशक पोटैशियम परमैंगनेट (लाल दवा) का प्रयोग संगृहीत जल में किया जाता है।
  3. अशुद्ध जल को शुद्ध करने के लिए अनेक यान्त्रिक साधन अपनाए जा सकते हैं, जिसमें कपड़े द्वारा छानना तथा छन्ने कागज द्वारा छानना आदि सम्मिलित हैं। पहली विधि में केवल मोटी अघुलित अशुद्धियों को दूर किया जा सकता है। दूसरी विधि में सभी अघुलित अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं, परन्तु इसमें सभी घुलित अशुद्धियों को दूर नहीं कर सकते हैं।

घरेलू फिल्टर बेड विधि : चार घड़ों की विधि –
इस विधि में चार घड़े लिए जाते हैं। इनमें से तीन घड़ों की पेंदी में एक छोटा-सा छिद्र कर लिया जाता है जिससे पानी बूंद-बूंद करके निकल सके। इन घड़ों को एक बड़े स्टैण्ड में एक के ऊपर एक करके इस प्रकार रख दिया जाता है कि ऊपर वाले घड़े का जल बूंद-बूंद करके दूसरे घड़े में आ जाए। इसी प्रकार दूसरे घड़े का जल तीसरे में और तीसरे का चौथे में आ सकता है।

इस प्रकार रखे गए घड़ों में सबसे ऊपरी घड़े में अशुद्ध जल रखा जाता है जो बूंद-बूंद करके निचले घड़े में गिरता रहता है। दूसरे घड़े में रखे । लकड़ी के कोयलों पर यह जल गिरकर छनता है और पेंदी से निकलकर चित्र 12.2-जल शुद्ध करने की तीसरे घड़े में पहुँचता है। इस घड़े में पहले से ही रेत (बालू) भरकर रखी जाती है। इस घड़े में जल एक बार और छनता है और अत्यन्त बारीक कण भी रेत के द्वारा छान लिए जाते हैं। इस प्रकार चौथे (सबसे निचले) घड़े में जल निलम्बित अशुद्धियों से रहित होता है।

यह विधि बड़े पैमाने पर जल शुद्ध करने की आधारभूत विधि है।
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति 5

प्रश्न 10.
खाद्य पदार्थों की प्राप्ति के मुख्य स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
खाद्य पदार्थों की प्राप्ति के स्रोत –
मनुष्य ने अपने आहार में असंख्य खाद्य-पदार्थों को सम्मिलित किया है। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में निवास करने वाले व्यक्तियों के आहार में बहुत अधिक विविधता देखी जा सकती है। इस स्थिति में खाद्य पदार्थों की प्राप्ति के स्रोतों का व्यवस्थित अध्ययन करने के लिए उनका स्पष्ट वर्गीकरण करना आवश्यक है। सामान्य रूप से खाद्य पदार्थों की प्राप्ति के स्रोतों के दो वर्ग निर्धारित किए जाते हैं। खाद्य-प्राप्ति के वनस्पतिजन्य स्रोत तथा खाद्य-प्राप्ति के प्राणिजन्य स्रोत। इन दोनों स्रोतों का सामान्य परिचय निम्नलिखित है –

1.खाद्य-प्राप्ति के वनस्पतिजन्य स्त्रोत-मनुष्य के खाद्य-पदार्थों की प्राप्ति का एक मुख्य स्रोत वनस्पति-जगत है। वनस्पति-जगत से अनाज, दालें, सब्जियाँ तथा फल प्राप्त होते हैं। ये सभी खाद्य पदार्थ विभिन्न पोषक-तत्त्वों से भरपूर तथा भूख को शान्त करने वाले होते हैं। फलों एवं सब्जियों में पर्याप्त मात्रा में विटामिन एवं खनिज लवण पाए जाते हैं। अनाज कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होते हैं। दालों में प्रोटीन की प्रचुरता होती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि वनस्पति-जगत से प्राप्त होने वाले खाद्य-पदार्थ हमारी आहार सम्बन्धी सम्पूर्ण आवश्यकता को पूरा कर सकते हैं।

2. खाद्य-प्राप्ति के प्राणिजन्य स्रोत-मनुष्य की खाद्य-सामग्री की प्राप्ति का एक स्रोत प्राणि-जगत भी है। प्राणि-जगत से मनुष्य मुख्य रूप से दूध, मांस तथा अण्डे प्राप्त करता है। प्राणि-जगत से प्राप्त खाद्य-पदार्थ भी विभिन्न पोषक तत्त्वों से भरपूर होते हैं। दूध एक आदर्श एवं सम्पूर्ण आहार है। इसमें आहार के प्रायः सभी पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। अण्डों में भी प्रायः सभी पोषक तत्त्व पाए जाते हैं। मांस, प्रोटीन एवं खनिज लवणों की प्राप्ति का उत्तम स्रोत है। मांस में पायी जाने वाली प्रोटीन उत्तम प्रकार की तथा अधिक उपयोगी होती है।

प्रश्न 11.
खाद्य पदार्थों में मिलावट से क्या आशय है?
उत्तरः
खाद्य पदार्थों में मिलावट –
प्रत्येक खाद्य पदार्थ का अपना एक विशेष संघटन होता है। उसमें उपस्थित ये संघटक तत्त्व ही उस खाद्य पदार्थ के पोषक गुणों को निर्धारित करते हैं। किसी खाद्य पदार्थ से, निश्चित मात्रा में उपस्थित उस पोषक तत्त्व को निकाल लिया जाए अथवा अन्य कम मूल्य का या विजातीय कोई पदार्थ मिला दिया जाए तो यह क्रिया मिलावट या अपमिश्रण कहलाती है।

भारत सरकार के खाद्य अपमिश्रण निवारण नियम (Prevention of Food Adulteration Act, 1954) के अनुसार निम्नलिखित स्थितियों में खाद्य पदार्थ को ‘अपमिश्रण’ या ‘मिलावट-युक्त’ कहा जाएगा –

  • खाद्य पदार्थ जब अपने वास्तविक रूप-रंग वाले नहीं रहते हैं।
  • खाद्य पदार्थों में स्वास्थ्य को हानि पहुँचाने वाला कोई तत्त्व होता है।
  • खाद्य पदार्थ से कोई पोषक तत्त्व निकाल लिया जाता है।
  • खाद्य पदार्थ में जब कोई घटिया या कम स्तर का कोई पदार्थ मिला दिया जाता है।
  • खाद्य पदार्थ में जब कोई हानिकर या विषैला तत्त्व मिला दिया जाता है या मिल जाता है।
  • जब खाद्य पदार्थ को ऐसे बर्तन (container) में रखा जाता है जिसके सम्पर्क से यह दूषित हो जाता है।
  • जब खाद्य पदार्थ किसी रोगी पशु-पक्षी से प्राप्त किया गया हो।
  • जब खाद्य पदार्थ में कोई वर्जित या न खाने योग्य रासायनिक पदार्थ, रंग आदि मिला दिया गया हो।
  • जब खाद्य पदार्थों के संग्रह करते समय अथवा डिब्बाबन्दी के समय दूषित हाथों या दूषित विधि का उपयोग किया गया हो।
  • जब खाद्य पदार्थ में संरक्षण के लिए प्रयुक्त रंग या संरक्षक पदार्थ निर्धारित सीमा से अधिक मिला दिया गया हो।
  • जब भोज्य पदार्थ के गुणों एवं शुद्धता का गलत विवरण उनके डिब्बे पर दिया गया हो।

इस प्रकार, मिलावट से खाद्य पदार्थ में पोषक तत्त्व या तत्त्वों की कमी हो जाती है अर्थात् उनका पोषक स्तर कम हो जाता है। यही नहीं, वे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध होते हैं और कभी-कभी तो रोग फैलाने वाले या मृत्यु को निमन्त्रण देने वाले भी हो सकते हैं।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 12 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जल से आप क्या समझती हैं?
अथवा
जल का संघटन लिखिए।।
उत्तरः
जल एक यौगिक है। यह दो तत्त्वों-हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के संयोग से बना है। इसका रासायनिक सूत्र H2O होता है।

प्रश्न 2.
जल का रासायनिक सूत्र लिखिए।
उत्तरः
जल का रासायनिक सूत्र है – H2O.

प्रश्न 3.
जल प्राप्ति के मुख्य स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तरः
जल प्राप्ति के मुख्य स्रोत हैं-समुद्र, वर्षा, नदियाँ, तालाब, कुएँ, झीलें, झरने एवं सोते।

प्रश्न 4
प्राणियों के लिए जल की मुख्य उपयोगिता क्या है?
उत्तरः
प्राणियों के लिए जल की मुख्य उपयोगिता है – प्यास को शान्त करना।

प्रश्न 5.
हमारे रक्त में जल की क्या भूमिका है?
उत्तरः
जल रक्त को आवश्यक तरलता प्रदान करता है।

प्रश्न 6.
शरीर के तापक्रम पर जल का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तरः
जल शरीर के तापक्रम का नियमन करता है।

प्रश्न 7.
शुद्ध जल के मुख्य गुण क्या हैं?
अथवा
शुद्ध जल की पहचान कैसे करेंगी?
उत्तरः
शुद्ध जल रंगहीन, गन्धहीन तथा स्वादहीन होता है। यह पारदर्शी होता है तथा इसमें एक विशेष प्रकार की चमक होती है।

प्रश्न 8.
अशुद्ध जल में कौन-कौन सी अशुद्धियाँ पायी जाती हैं?
उत्तरः
अशुद्ध जल में दो प्रकार की अशुद्धियाँ पायी जाती हैं-

  1. घुलित अशुद्धियाँ तथा
  2. अघुलित अशुद्धियाँ।

प्रश्न 9.
अशुद्ध जल को मुख्य रूप से किन-किन विधियों द्वारा शुद्ध किया जा सकता है?
उत्तरः
अशुद्ध जल को मुख्य रूप से तीन विधियों से शुद्ध किया जाता है –

  1. यान्त्रिक विधि
  2. भौतिक विधि तथा
  3. रासायनिक विधि।

प्रश्न 10.
जल के कीटाणुओं को मारने वाले मुख्य रासायनिक पदार्थ कौन-कौन से हैं?
अथवा
अशुद्ध जल को शुद्ध करने के मुख्य रासायनिक पदार्थों के नाम लिखिए।
उत्तरः
जल के कीटाणुओं को मारने वाले मुख्य रासायनिक पदार्थ हैं – लाल दवा, कॉपर सल्फेट, ब्लीचिंग पाउडर तथा क्लोरीन।

प्रश्न 11.
मनुष्य अपना आहार मुख्य रूप से किन स्रोतों से प्राप्त करता है?
उत्तरः
मनुष्य अपना आहार मुख्य रूप से दो स्रोतों से प्राप्त करता है –

  1. वनस्पतिजन्य स्रोत तथा
  2. प्राणिजन्य स्रोत।

प्रश्न 12.
वनस्पति-जगत से मुख्य रूप से कौन-कौन से खाद्य पदार्थ प्राप्त होते हैं?
उत्तरः
वनस्पति-जगत से मुख्य रूप से अनाज, दालें, सब्जियाँ तथा फल प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 13.
प्राणि-जगत से प्राप्त होने वाले भोज्य पदार्थ कौन-कौन से हैं?
उत्तरः
प्राणि-जगत से प्राप्त होने वाले भोज्य पदार्थ हैं-दूध, अण्डा तथा मांस।

प्रश्न 14.
खाद्य पदार्थों में मिलावट से क्या आशय है?
उत्तरः
किसी खाद्य पदार्थ से निश्चित मात्रा में उपस्थित उस पोषक तत्त्व को निकाल लिया जाए अथवा अन्य कम मूल्य का या विजातीय कोई पदार्थ मिला दिया जाए तो यह क्रिया मिलावट कहलाती है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 12 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –
1. जल महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी है –
(क) प्यास बुझाने के लिए
(ख) फसलों को सींचने के लिए
ग) दैनिक कार्यों को पूरा करने के लिए
(घ) उपर्युक्त सभी के लिए।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी के लिए।

2. जल का रासायनिक सूत्र है –
(क) H2O2
(ख) H2O
(ग) HO2
(घ) 2HO.
उत्तरः
(ख) H2O

3. हमारे शरीर के लिए जल उपयोगी है –
(क) रक्त को तरलता प्रदान करने में
(ख) पाचन-क्रिया में सहायक के रूप में
(ग) हानिकारक तत्त्वों के विसर्जन में सहायक के रूप में
(घ) उपर्युक्त सभी रूपों में।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी रूपों में।

4. घरेलू स्तर पर जल को शुद्ध करने की उपयुक्त विधि है –
(क) उबालना
(ख) आसवन
(ग) अवक्षेपण
(घ) क्लोरीनीकरण।
उत्तरः
(क) उबालना।।

5. आसवन विधि द्वारा शुद्ध किए गए जल का नाम है –
(क) कठोर जल
(ख) आसुत जल
(ग) प्राकृतिक जल
(घ) मृदु जला
उत्तरः
(ख) आसुत जल।

6. वनस्पति-जगत से प्राप्त होने वाले भोज्य पदार्थ होते हैं –
(क) पोषक तत्त्वों से रहित
(ख) प्रोटीन का नितान्त अभाव होता है
(ग) पोषक तत्त्वों के उत्तम स्रोत
(घ) केवल कार्बोहाइड्रेट युक्त।
उत्तरः
(ग) पोषक तत्त्वों के उत्तम स्रोत।

7. प्राणि-जगत से प्राप्त खाद्य पदार्थों में भरपूर पाया जाने वाला पोषक तत्त्व है –
(क) कार्बोहाइड्रेट
(ख) जल
(ग) प्रोटीन
(घ) विटामिन ‘C’.
उत्तरः
(ग) प्रोटीन।

8. जो जल साबुन के साथ कम झाग देता है, वह होता है –
(क) मृदु जल
(ख) कठोर जल
(ग) शुद्ध जल
(घ) कठोर या मृदु दोनों में से कोई नहीं।
उत्तरः
(ख) कठोर जल।

9. कुएँ के पानी के शुद्धीकरण हेतु क्या मिलाया जाएगा –
(क) पोटैशियम परमैंगनेट ।
(ख) सोडियम क्लोराइड
(ग) जिंक ऑक्साइड
(घ) सिरका।
उत्तरः
(क) पोटैशियम परमैंगनेट।

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