UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency (केंद्रीय प्रवृत्ति की माप)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित स्थितियों में कौन-सा औसत उपयुक्त होगा
(क) तैयार वस्त्रों के औसत आकार।
उत्तर :
बहुलक।
(ख) एक कक्षा में छात्रों की औसत बौद्धिक प्रतिभा।
उत्तर :
मध्यिका।
(ग) एक कारखाने में प्रति पाली औसत उत्पादन।
उत्तर :
बहुलक या समान्तर माध्य।
(घ) एक कारखाने में औसत मजदूरी।
उत्तर :
बहुलक या समान्तर माध्य।
(ङ) जब औसत से निरपेक्ष विचलनों का योग न्यूनतम हो।
उत्तर :
समान्तर माध्य।
(च) जब चरों की मात्रा अनुपात में हो।
उत्तर :
मध्यिका।
(छ) मुक्तांत बारम्बारता बंटन के मामले में।
उत्तर :
मध्यिका

प्रश्न 2.
प्रत्येक प्रश्न में दिए गए बहुविकल्पों में से सर्वाधिक उचित विकल्प को चिह्नित करें
(i) गुणात्मक मापन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त औसत है
(क) समान्तर माध्य।
(ख) मध्यिका
(ग) बहुलक
(घ) ज्यामितीय माध्य
(ङ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) मध्यिका।

(ii) चरंम मदों की उपस्थिति से कौन-सा औसत सर्वाधिक प्रभावित होता है
(क) मध्यिका
(ख) बहुलक
(ग) समान्तर माध्य
(घ) ज्यामितीय माध्य
(ङ) हरात्मक माध्ये
उत्तर :
(ग) समान्तर माध्य।

(iii) समान्तर माध्य से मूल्यों के किसी समुच्चय के विचलन का बीजगणितीय योग है

(क) दें
(ग) 1
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) 1

प्रश्न 3.
बताइए कि निम्नलिखित कथन सही हैं या गलत
(क) मध्यिका से मदों के विचलनों का योग शून्य होता है।
उत्तर :
गलत।

(ख)
श्रृंखलाओं की तुलना के लिए मौत्र औसत ही पर्याप्त नहीं है।
उत्तर :
सही

(ग)
समान्तर माध्ये एक स्थैतिक मूल्य है।
उत्तर :
गलत।

(घ)
उच्च चतुर्थक शीर्ष 25 प्रतिशत मदों का निम्नतम मान है।
उत्तर :
सही।

(ङ)
मध्यिका चरम प्रेक्षणों द्वारा अनुचित रूप से प्रभावित होती है।
उत्तर :
गलत।

प्रश्न 4.
यदि नीचे दिए गए आँकड़ों का समान्तर माध्य 28 है तो
(क) लुप्त आवृत्ति का पता करें
(ख) श्रृंखला की मध्यिका ज्ञात करना
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 01
उत्तर :
(क) लुप्त आवृत्ति ज्ञात करना-
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 2
(ख) श्रृंखला की मध्यिका ज्ञात करना
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 3
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 4
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 5

लुप्त आवृत्ति A का मान 20 और मध्यिका का मान 27.41 है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित सूचना 150 परिवारों की दैनिक आय से सम्बद्ध है। समान्तर माध्य का परिकल कीजिए।
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 6
हल :
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 7
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 8

प्रश्न 6.
नीचे एक गाँव के 380 परिवारों की जोतों का आकार दिया गया है। जोत का मध्यिका आकार ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 9
हल :
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 10
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 11

प्रश्न 7.
निम्नांकित श्रृंखला किसी कम्पनी में नियोजित मजदूरी की दैनिक आय से सम्बद्ध है। अभिकलन कीजिए
(क) निम्नतम 50 प्रतिशत मजदूरों की उच्चतम आय
(ख) शीर्ष 25 प्रतिशत मजदूरों द्वारा अर्जित न्यूनतम आय और
(ग) निम्नतम 25 प्रतिशत मजदूरों द्वारा अर्जित अधिकतम आय।
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 12
हल :
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 13

(क) निम्नतम 50 प्रतिशत मजदूरों की उच्चतम आय ज्ञात करने के लिए हमें मध्यिका का मान ज्ञात करना चाहिए
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 14

निम्नतम 50 प्रतिशत मजदूरों की उच्चतम आय = ₹ 25.11॥

(ख) उच्चतम 25 प्रतिशत श्रमिकों की न्यूनतम आय ज्ञात करने के लिए चतुर्थक Qj को ज्ञात करना चाहिए।
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 15
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 16

उच्चतम 25 प्रतिशत श्रमिकों द्वारा अर्जित न्यूनतम आय = ₹ 19.92

(ग) निम्नतम 25 प्रतिशत श्रमिकों की उच्चतम आय ज्ञात करने के लिए उच्च चतुर्थक Q3 ज्ञात करना चाहिए
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 17

निम्नतम 25 प्रतिशत मजदूरों द्वारा अर्जित अधिकतम आय = ₹ 29.19

प्रश्न 8.
निम्नांकित सारणी में किसी गाँव में 150 खेतों में गेहूं की प्रति हेक्टेयर पैदावार दी गई है। उत्पादित फसलों का समान्तर माध्य, मध्यिका तथा बहुलक परिकलित कीजिए

उत्पादित फसले
(प्रति हेक्टे० किग्रा में) :     50-53   53-56   56-59   59-62   62-65   65-68   68-71   71-74   74-77
खेतों की संख्या :                  3            8           14         30        36          28          16         10          5
हल :
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 18
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 19
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 20
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 21
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 22

बहुलक ज्ञात करने के लिए निम्नांकित सँरणी बनाएँगे
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 23
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 24
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 25

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. समान्तर माध्य का दोष है
(क) इसे निकालते समय समूह के सभी पदों का प्रयोग होता है।
(ख) समूह के सभी पदों को उनके आकार के अनुपात में बाँट दिया जाता है।
(ग) यह निश्चित और सदा एक ही होता है।
(घ) इसकी गणना में असाधारण एवं सीमान्त मूल्य का अधिक प्रभाव रहता है।
उत्तर :
(घ) इसकी गणना में असाधारण एवं सीमान्त मूल्य का अधिक प्रभाव रहता है।

प्रश्न 2.
“समान्तर माध्य किसी वितरण का केन्द्रीय मूल्य है।” यह कथन है
(क) किंग का
(ख) मिल का
(ग) मेहता का
(घ) पीगू का
उत्तर :
(ख) मिल की।

प्रश्न 3.
समंकमाला के पदों के जोड़ में उनकी संख्या 6, 2, 5, 3 का भाग देने से जो मूल्य प्राप्त होता है वह ………………………………….. कहलाता है।
(क) बहुलक
(ख) मध्यिका
(ग) समान्तर माध्य
(घ) कल्पित माध्य
उत्तर :
(ग) समान्तर माध्य।

प्रश्न 4.
बहुलक का गुण नहीं है
(क) कभी-कभी एक समूह में दो-या-दो से अधिक बहुलक भी हो सकते हैं।
(ख) गुणात्मक तथ्यों का भी बहुलक ज्ञात किया जा सकता है।
(ग) यह अति सीमान्त पदों से प्रभावित नहीं होता।
(घ) प्रर्तिदर्श के परिवर्तन के साथ बहुलक में परिवर्तन नहीं होता।
उत्तर :
(क) कभी-कभी एक समूह में दो-या-दो से अधिक बहुलक भी हो सकते हैं।

प्रश्न 5.
“औसत वह संख्या है जो समस्त वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है।’ कथन है
(क) प्रो० कॉनर का
(ख) प्रो० यूल का
(ग) बोडिंगटन का
(घ) क्लार्क का
उत्तर :
(घ) क्लार्क को

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप किसे कहते हैं?
उत्तर :
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप एक ऐसा प्रतिरूपी मूल्य है जिसका प्रयोग श्रेणी के सभी मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने के लिए किया जाता है।

प्रश्न 2.
समांन्तर माध्य किसे कहते हैं?
उत्तर :
समान्तर माध्ये वह मूल्य है जो किसी श्रेणी के समस्त पदों के मूल्य के योग में उनकी संख्या का भाग देने से प्राप्त होता है।

प्रश्न 3.
समान्तर माध्य के दो गुण बताइए।
उत्तर :

  • इसमें बीजगणित का प्रयोग सम्भव है। दो-या-दो से अधिक श्रेणियों का सामूहिक औसत इनके अलग-अलग औसतों की सहायता से निकाला जा सकता है।
  • समूह के सभी पदों को उनके आकार के अनुपात में बाँट दिया जाता है।

प्रश्न 4.
समान्तर माध्य के दो दोष बताइए।
उत्तर :

  • समंकमाला की आकृति देखकर इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
  • समंकमाला का कोई भी मूल्य ज्ञात न होने पर इसकी गणना नहीं की जा सकती।

प्रश्न 5.
पद विचलन रीति में समान्तर माध्य निकालने का सूत्र लिखिए।
उत्तर :
X = A + [latex s=2]\frac { \Sigma fdx }{ N } \times i[/latex]

प्रश्न 6.
श्रेणी के प्रत्येक मूल्य को समान भार देने की दिशा में सरल व भारित समान्तर माध्या कैसे होते हैं?
उत्तर :
बराबर।

प्रश्न 7.
मध्यिका के दो गुण बताइए।
उत्तर :

  • इसका निर्धारण निश्चित और शुद्ध होता है।
  • गुणात्मक विशेषताओं का अध्ययन करने में यह अन्य माध्यों से श्रेष्ठ है।

प्रश्न 8.
मध्यिका की दो सीमाएँ बताइए।
उत्तर :

  • मध्यिका के पदों की संख्या से गुणा करने पर पदों का कुल योग मालूम नहीं होता।
  • इसे ज्ञात करने के लिए समस्त पदों को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित करना पड़ता है।

प्रश्न 9.
अविच्छिन्न श्रेणी में मध्यिका का सूत्र दीजिए।
उत्तर :
सर्वप्रथम
(i) m = Size of [latex s=2]\frac { N }{ 2 }[/latex] th item की सहायता से निकाला जाएगा। तत्पश्चात् यह सूत्र लगाया जाएगा M = l1 [latex s=2]\frac { i }{ f }[/latex] (m -c)।

प्रश्न 10.
भूयिष्ठक का अर्थ एवं परिभाषा दीजिए।
उत्तर :
किसी भी समंकमाला में जो पद सबसे अधिक बार आता है अथवा जिसकी आवृत्ति सबसे अधिक होती है, वही बहुलक कहलाता है। काउडेन के शब्दों में “एक वितरण का बहुलक वह मूल्य है, जिसके निकट श्रेणी की इकाइयाँ अधिक-से-अधिक केन्द्रित होती हैं। उसे मूल्यों की श्रेणी का सबसे अधिक प्रतिरूपी माना जाता है।”

प्रश्न 11.
बहुलक के दो गुण बताइए।
उत्तर :

  • यह अति सीमान्त पदों से प्रभावित नहीं होता।
  • कभी-कभी एक समूह में दो-या-दो से अधिक बहुलके भी हो सकते हैं।

प्रश्न 12.
बहुलक के दो दोष बताइए।
उत्तर :

  • सभी पदों पर आधारित न होने के कारण इसका बीजीय विवेचन सम्भव नहीं है।
  • कभी-कभी एक समूह में दो-या-दो से अधिक बहुलक भी हो सकते हैं।

प्रश्न 13.
बहुलक के दो उपयोग बताइए। अथवा बहुलक का क्या व्यावहारिक प्रयोग है?
उत्तर :

  • उद्योग व प्रशासन के क्षेत्र में इसकी सहायता से औसत उत्पादन ज्ञात किया जाता है तथा विभिन्न विभागों की कार्यक्षमता की तुलना की जाती है।
  • मौसम सम्बन्धी पूर्वानुमानों में भी इसी का प्रयोग होता है।

प्रश्न 14.
अविच्छिन्न श्रेणी में बहुलक का सूत्र दीजिए।
उत्तर :
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 26

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
केन्द्रीय प्रवृत्ति क्या है? परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
केन्द्रीय प्रवृत्ति से आशय किसी सांख्यिकी श्रृंखला के केन्द्रीय मूल्य या प्रतिनिधि मूल्य से है। किसी भी मनुष्य के लिए आँकड़ों के एक बहुत बड़े समूह को समझना या अपनी स्मृति में रखना कठिन होता है। इसलिए वह ऐसे मूल्य का ज्ञान प्राप्त करना पसन्द करेगा जो किसी श्रेणी के सभी आँकड़ों की विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता हो। इस प्रकार के मूल्य को केन्द्रीय प्रवृत्ति के माप’ अथवा औसत या माध्य कहा जाता है। उदाहरण के लिए भारत के करोड़ों लोगों के आय सम्बन्धी आँकड़ों को समझना तथा याद रखना कठिन कार्य होगा परन्तु यदि यह कहा जाए कि वर्ष 2012 में भारत के लोगों की औसत आय १ 23,000 प्रतिवर्ष है तो हम सरलता से भारत के अधिकतर लोगों की आर्थिक स्थिति का अनुमान लगा सकेंगे। इस औसत मूल्य को ही श्रृंखला का केन्द्रीय माप कहा जाता है। इसे स्थिति सम्बन्धी माप भी कहते हैं। अत: केन्द्रीय प्रवृत्ति के माप से आशय सांख्यिकीय विश्लेषण की उन विधियों से है जिनके द्वारा किसी श्रेणी के चर को ऐसा मूल्य अर्थात् औसत ज्ञात किया जाता है जो समस्त श्रेणी का प्रतिनिधित्व करता है।

1. क्रोक्सटन तथा काउडेन के अनुसार – “आँकड़ों के विस्तार के अन्तर्गत स्थित एक ऐसे मूल्य को जिसका प्रयोग श्रृंखला के सभी मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने के लिए किया जाता है, औसत कहा जाता है। चूंकि औसत श्रृंखला के विस्तार के अन्तर्गत स्थित होता है इसलिए इसे केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप भी कहा जाता है।
2. क्लार्क के अनुसार – “औसत वह संख्या है जो समस्त वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है।”

प्रश्न 2.
मध्यिका का अर्थ व गुण बताइए।
उत्तर :
मध्यिका का अर्थ-मध्यिका आरोही अथवा अवरोही क्रम में अनुविन्यसित समंकमाला के विभिन्न पदों के मध्य का मूल्य होती है और वह समंकमाला को दो भागों में इस प्रकार बाँटती है कि उसके एक ओर के सभी पद उससे कम मूल्य के तथा दूसरी ओर के सब पद उससे अधिक मूल्य के होते हैं।
मध्यिका के गुण – मध्यिका के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं

  • यह बहुत सरल है और इसको बड़ी सुगमता से समझा जा सकता है।
  • इसका निर्धारण निश्चित और शुद्ध होता है।
  • इसे पदों की कुल संख्या मात्र से ज्ञात किया जा सकता है।
  • मध्यिका को बिन्दु रेखाओं द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।
  • मध्यिका पर चर मूल्यों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  • मध्य विचलन की गणना में मध्यिका का और अधिक बीजीय विवेचन सम्भव है।
  • गुणात्मक विशेषताओं को अध्ययन करने में यह अन्य माध्यों से श्रेष्ठ है।
  • मध्यिका से पदों के विचलनों का योग अन्य किसी भी विधि से निकाले गए विचलनों के योग से कम होता है।

प्रश्न 3.
मध्यिका के प्रमुख दोष बताइए। मध्यिका के क्या उपयोग हैं?
उत्तर :
मध्यिका के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं

  • मध्यिका के पदों की संख्या से गुणा करने पर पदों का कुल योग मालूम नहीं होता।
  • यदि पदों के विस्तार में असाधारण भिन्नता हो तो यह भ्रामक निष्कर्ष देती है।
  • इसे ज्ञात करने के लिए समस्त पदों को आरोही (ascending) या अवरोही (descending) क्रम में व्यवस्थित करना पड़ता है।
  • इसको ज्ञात करने के लिए समस्त समंकों का प्रयोग नहीं होता।
  • यदि मध्यपद दो वर्गों के बीच आता है तो मध्यिका को ठीक-ठीक ज्ञात करना कठिन हो जाता है।
  • सरल गणितीय सूत्र से इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
  • यदि पदों की संख्या सम (even) है तो मध्यिका वास्तविक मूल्य नहीं होता।
  • यदि पदों की संख्या कम हो या मध्य पद के ऊपर अथवा नीचे पदों का फैलाव अनियमित हो तो मध्यिका एक प्रतिनिधि माप नहीं रहता।

मध्यिका के उपयोग – मध्यिका समझने में सरल है; अत: व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए इसका बहुत अधिक उपयोग होता है। इसके द्वारा गुणात्मक तथ्यों जैसे—बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य आदि; का भी अध्ययन : किया जा सकता है। इसी कारण सामाजिक समस्याओं के विश्लेषण में यह अत्यधिक उपयोगी है। यही उन दशाओं में अधिक उपयोगी है, जहाँ अति सीमान्त पदों को महत्त्व नहीं दिया जाता अथवा वितरण विषम होता है।

प्रश्न 4.
बहुलक क्या है? बहुलक के गुण बताइए।
उत्तर :
बहुलक का अर्थबहुलक वह मूल्य है जो समंकमाला में सबसे अधिक बार आता है अथवा जिसकी आवृत्ति सबसे अधिक होती है। बहुलक के गुण-बहुलक के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं

  • यह एक सरल एवं लोकप्रिय माध्य है। कुछ दशाओं में तो यह केवल निरीक्षण द्वारा ही ज्ञात किया जा सकता है।
  • इसका मूल्य रेखाचित्र द्वारा भी निर्धारित किया जा सकता है।
  • यह वितरण में सर्वाधिक सम्भावित मूल्य होता है।
  • गुणात्मक तथ्यों का भी बहुलक ज्ञात किया जा सकता है।
  • यह अति सीमान्त पदों से प्रभावित नहीं होता।
  • यह श्रेणी के एक महत्त्वपूर्ण भाग का वास्तविक मूल्य होता है।
  • यह समूह की सर्वोत्तम प्रतिनिधि होता है।
  • प्रतिदर्श के परिवर्तन के साथ बहुलक में परिवर्तन नहीं होता।

प्रश्न 5.
बहुलक के दोष बताइए। इसके क्या उपयोग हैं?
उत्तर :
बहुलक के दोष-बहुलक के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं–

  • यदि श्रेणी के सभी पदों की आवृत्तियाँ समान हैं तो बहुलक का निर्धारण नहीं किया जा सकता।
  • कभी-कभी एक समूह में दो-या-दो से अधिक बहुलक भी हो सकते हैं।
  • यदि श्रेणी का वितरण अनियमित है तो इसे शुद्ध रूप में नहीं निकाला जा सकता।
  • यह चरम सीमाओं की उपेक्षा करता है जो कि गणितीय दृष्टि से उचित नहीं है।
  • सभी पदों पर आधारित न होने के कारण इसका बीजीय विवेचन सम्भव नहीं है।
  • यह श्रेणी का पूर्ण रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करता।।
  • वर्ग विस्तार में परिवर्तन कर देने पर बहुलक भी बदल जाएगा।

बहुलक के उपयोग – उपर्युक्त दोषों के बावजूद दैनिक जीवन तथा व्यापारिक क्षेत्र में बहुलक का बहुत अधिक उपयोग किया जाता है। यह शीघ्रता व सरलता से समझ में आ जाता है, इसलिए व्यावसायिक जीवन में इसका प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। व्यापारिक पूर्वानुमानों में यह एक महत्त्वपूर्ण पथ-प्रदर्शक है। उद्योग व प्रशासन के क्षेत्र में इसकी सहायता से औसत उत्पादन ज्ञात किया जाता है तथा विभिन्न विभागों की कार्यक्षमता की तुलना की जाती है। किसी वस्तु के उत्पादन में उसकी लागत का अनुमान बहुलक समय के निर्धारण द्वारा आसानी से लगाया जा सकता है। विभिन्न वस्तुओं की लोकप्रिंयता का अध्ययन बहुलक द्वारा ही किया जाता है। मौसम सम्बन्धी पूर्वानुमानों में भी इसी का प्रयोग होता है।

प्रश्न 6.
एक आदर्श माध्य के गुण बताइए।
उत्तर :

एक आदर्श माध्य के गुण

  • माध्य स्पष्ट तथा स्थिर होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, माध्य श्रेणी के न्यूनतम तथा अधिकतम मूल्यों से कम-से-कम प्रभावित होना चाहिए।
  • माध्य समग्र का प्रतिनिधि होना चाहिए।
  • माध्य निकालने तथा समझने में सरल होना चाहिए।
  • वह समंकमाला के समस्त पदों पर आधारित होना चाहिए।
  • वह सीमान्त पदों को समुचित महत्त्व देता हो।
  • उस पर संख्याओं के परिवर्तन का कम-से-कम प्रभाव पड़ना चाहिए।
  • वह एक निरपेक्ष संख्या होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, वह प्रतिशत में या अन्य कोई सापेक्ष रीति में व्यक्त नहीं होनी चाहिए।
  • वह एक निश्चित संख्या होनी चाहिए।
  • उसका प्रयोग अंकगणितीय व बीजगणितीय विधियों द्वारा किया जा सके।

प्रश्न 7.
सरल व भारित समान्तर माध्य की तुलना कीजिए।
उत्तर :

सरल व भारित समान्तर माध्य की तुलना

1. श्रेणी के प्रत्येक मूल्य को समान भार देने की दशा में सरल व भारित समान्तर माध्य बराबर होते हैं।

[latex s=2]\overline { X }[/latex] = [latex s=2]\overline { X }[/latex]w

2. जब श्रेणी के छोटे मूल्यों को अधिक भार और बड़े मूल्यों को कम भार दिया जाता है, तब सरल समान्तर माध्य भारित समान्तर माध्य से अधिक होता है।

[latex s=2]\overline { X }[/latex] > [latex s=2]\overline { X }[/latex]w

3. जब श्रेणी के छोटे मूल्यों को कम भार तथा बड़े मूल्यों को अधिक भार दिया जाता है, तब सरल समान्तर माध्य भारित समान्तर माध्य से कम होता है।

[latex s=2]\overline { X }[/latex] < [latex s=2]\overline { X }[/latex]w

प्रश्न 8.
समान्तर माध्य, मध्यिका एवं बहुलक में परस्पर सम्बन्ध दर्शाइए।
उत्तर :
समान्तर माध्य ([latex s=2]\overline { X }[/latex]), मध्यिका (M) तथा बहुलक (Z) में सम्बन्ध आवृत्ति वितरण की प्रकृति पर निर्भर करता है। आवृत्ति वितरण दो प्रकार का होता है
1. सममित आवृत्ति वितरण – इस स्थिति में X, M तथा Z के मूल्य एक-दूसरे के समान होते हैं

[latex s=2]\overline { X }[/latex] = M = Z

2. असममितीर्य आवृत्ति वितरण – इस स्थिति में (X – Z) सामान्यत: 3(X – M) के बराबर होते हैं अर्थात्

([latex s=2]\overline { X }[/latex] – Z) = 3([latex s=2]\overline { X }[/latex] – M)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
समान्तर माध्य किसे कहते हैं? समान्तर माध्य के गुण-दोषों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :

समान्तर माध्य का अर्थ

समान्तर माध्य (Arithmetic Mean) केन्द्रीय प्रवृत्ति का सबसे सरल एवं लोकप्रिय माप है। सामान्यतः औसत शब्द का प्रयोग इसी माध्य के लिए किया जाता है। यह सभी माध्यों में उत्तम माना जाता है। इसको इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है-“किसी भी श्रेणी के समस्त पदों के मूल्य के योग में उनकी संख्या का भाग देने से समान्तर मध्य प्राप्त होता है।”

साधारण शब्दों में, समंकमाला के पदों के जोड़ में उनकी संख्या का भाग देने से जो राशि प्राप्त होती है, उसे माध्य के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

किंग के अनुसार-“किसी श्रेणी के पदों के मूल्यों के योग में उनकी संख्या का भाग देने से जो मूल्य प्राप्त होता है, उसे समान्तर माध्य के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।” मिल के अनुसार-“समान्तर माध्य किसी वितरण का केन्द्रीय मूल्य है।”

समान्तर माध्य के गुण

  • इसका अर्थ एक सामान्य व्यक्ति के लिए भी समझना आसान है।
  • उपलब्ध आँकड़ों की सहायता से इसकी गणना बहुत सरल है। ।
  • इसमें बीजगणित का प्रयोग सम्भव है। दो-या-दो से अधिक श्रेणियों का सामूहिक औसत इनके अलग-अलग औसतों की सहायता से निकाला जा सकता है।
  • इसे निकालते समय समूह के सभी पदों का प्रयोग होता है।
  • समूह के सभी पदों को उनके आकार के अनुपात में बाँट दिया जाता हैं।
  • यह निश्चित और संदा एक ही होता है।
  • तुलनात्मक अध्ययन के लिए यह अधिक लोकप्रिय है।

समान्तर माध्य के दोष

  • समंकमाला में समान्तर माध्य हो, यह आवश्यक नहीं है।
  • समंकमाला की आकृति देखकर इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
  • इसकी गणना में असाधारण एवं सीमान्त मूल्य का अधिक प्रभाव रहता है।
  • समंकमाला का कोई भी मूल्य ज्ञात न होने पर इसकी गणना नहीं की जा सकती।
  • गुणात्मक सामग्री के लिए इसका प्रयोग नहीं किया जा सकता।
  • इसे लेखाचित्र द्वारा प्रदर्शित नहीं किया जा सकता।
  • अनुपात वे दर आदि के अध्ययन के लिए यह अनुपयुक्त है।

उपर्युक्त दोषों के होते हुए भी इसका प्रयोग सामाजिक तथा आर्थिक समस्याओं के अध्ययन में किया जाता है।

प्रश्न 2.
सरल समान्तर माध्य की गणना प्रक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर :
सरल समान्तर माध्य की गणन क्रिया सरल समान्तर माध्य की गणना तीन प्रकार से करते हैं
(I) व्यक्तिगत श्रेणी,
(II) खण्डित श्रेणी एवं
(III) अविच्छिन्न श्रेणी।
(1) व्यक्तिगत श्रेणी
व्यक्तिगत श्रेणी द्वारा समान्तर माध्य निकालने की दो रीतियाँ हैं
(अ) प्रत्यक्ष रीति तथा
(ब) लघु रीति।
(अ) प्रत्यक्ष रीति – इस रीति में श्रेणी के सभी पदों का योग करने के बाद उनको पदों की संख्या से भाग दिया जाता है।

सूत्र रूप में, [latex s=2]\overline { X }[/latex] = [latex]\frac { \Sigma X }{ N }[/latex]
यहाँ, [latex s=2]\overline { X }[/latex] = समान्तर माध्य
∑X = पद मूल्यों का योग
N = पदों की संख्या

गणन क्रिया –

  • पद मूल्यों का योग (∑X) ज्ञात करते हैं।
  • पद संख्या (N) ज्ञात करते हैं।
  • पद मूल्यों के योग में पद संख्या (N) का भाग देते हैं। परिणाम समान्तर माध्य होता है।

(ब) लघु रीति – इस रीति में गणन क्रिया निम्नलिखित प्रकार से की जाती है

  • किसी संख्या को कल्पित माध्य (A) मान लेते हैं।
  • कल्पित माध्य (A) की पद मूल्यों (X) से तुलना करके विचलन मालूम करते हैं d = X – A
  • विचलनों (d) का योग (d) ज्ञात करते हैं।
  • पदों की संख्या (N) ज्ञात करते हैं। फिर निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग करते हैं [latex s=2]\overline { X }[/latex] = A + [latex]\frac { \Sigma d }{ N }[/latex]

उदाहरण 1. 15 पदों का आकार निम्नलिखित है। प्रत्यक्ष व लघु रीति द्वारा समान्तर माध्य का परिकलन कीजिए।
रोल नं० :   1    2    3    4    5   6    7   8    9    10
प्राप्तांक :  30 28 32  12  18 20 25 15  26   14
हल :
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 27
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 27

(II) खण्डित श्रेणी
खण्डित श्रेणी द्वारा समान्तर माध्य निकालने की दो रीतियाँ हैं
(अ) प्रत्यक्ष रीति तथा
(ब) लघु रीति।
(अ) प्रत्यक्ष रीति – इस रीति में गणन क्रिया निम्नलिखित प्रकार से की जाती है–

  • पद मूल्यों (X) और आवृत्ति (ƒ) का गुणा करते हैं (X × ƒ)
  • गुणनफलों (ƒ × X) का योग ज्ञात करते हैं (∑fX)
  • आवृत्तियों का योग (∑ƒ) या (N) ज्ञात करते हैं।
  • निम्नांकित सूत्र का प्रयोग करते हैं

[latex]\overline { X } \frac { SfX }{ NSf }[/latex]

उदाहरण 2. प्रति परिवार जन्म लेने वाले औसत बच्चों की संख्या ज्ञात कीजिए-
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 29
हल :
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 30
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 31

(ब) लघु रीति – इस रीति में गणन क्रिया निम्नलिखित प्रकार से की जाती है

  • मूल्यों में से किसी एक को कल्पित माध्य (A) मान लेते हैं।
  • कल्पित माध्य (A) से श्रेणी प्रत्यक्ष मूल्य का विचलन (dx) निकालते हैं d = (x – A)
  • विचलनों को उनकी आवृत्तियों से गुणा करते हैं–(d × f)
  • इन गुणनफलों का योग निकालते हैं। अन्त में निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग करते हैं
    [latex s=2]\overline { X }[/latex] = A + [latex s=2]\frac { \Sigma fd }{ N }[/latex]

उदाहरण 3. निम्नलिखित समंकों में से प्रत्यक्ष व लघु रीति द्वारा समान्तर माध्य परिकलित कीजिए
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 32
हल :
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 33
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 34

(III) अविच्छिन्न श्रेणी
इसमें सर्वप्रथम श्रेणी में वर्गों के मध्यमान (X) ज्ञात किए जाते हैं। समान्तर मध्य ज्ञात करने की मुख्य रीतियाँ निम्नलिखित हैं–
(अ) प्रत्यक्ष रीति – सर्वप्रथम वर्गों के मध्य मूल्य (M.V.) निकाले जाते हैं। इसके बाद वही क्रिया अपनाई जाती है, जो खण्डित श्रेणी में प्रयुक्त की जाती है।
(ब) लघु रीति – इसके अन्तर्गत सर्वप्रथम वर्गों के मध्य मूल्य ज्ञात किए जाते हैं। फिर वही क्रिया अपनाई जाती है, जो खण्डित श्रेणी में प्रयुक्त की जाती है।

उदाहरण 4.
निम्नलिखित समंकों से समान्तर मध्य ज्ञात कीजिए
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 35
हल :
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 36
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 37

उदाहरण 5. निम्नांकित सारणी में प्रत्यक्ष व लघु रीति द्वारा समान्तर माध्य ज्ञात कीजिए
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 38
हल :
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 39
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 40

(स) पद विचलन रीति – गणन क्रिया निम्नलिखित प्रकार से की जाती है

(i) सर्वप्रथम सभी वर्गान्तरों के मध्य बिन्दु ज्ञात करते हैं।
(ii) मध्य बिन्दुओं में से किसी एक को कल्पित माध्य (A) मान लेते हैं।
(iii) कल्पित माध्य (A) में से प्रत्येक मध्य मूल्य के विचलन ज्ञात करते हैं।
(iv) विचलनों में वर्ग विस्तार से भाग देकर पद विचलन ज्ञात करते हैं। (d)
(v) पद विचलन की आवृत्तियों से गुणा करके गुणनफलों का योग कर लेते हैं (Σƒd’) और इस योग में N से भाग देते हैं।
(vi) निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग करते हैं
[latex s=2]\overline { X }[/latex] = A + [latex s=2]\frac { \Sigma fd }{ N }[/latex] × i

उदाहरण 6. निम्नांकित सारणी में पद विचलन रीति द्वारा समान्तर माध्य ज्ञात कीजिए–
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 41
हल :
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 42
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 43

प्रश्न 3.
भारित समान्तर माध्य से क्या आशय है? इसकी गणना विधि समझाइए। उपयुक्त उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर :

भारितसमान्तर माध्य

जब माध्य निकालते समय कुछ पदों को अन्य पदों की अपेक्षा अधिक महत्त्व दिया जाता है तो उसे ‘भार’ कहते हैं और वह माध्य भारित माध्य कहलाता है।

बोडिंगटन के शब्दों में – “भारित माध्य वह है, जिसे निकालने के लिए प्रत्येक पद को भार से गुणा किया जाता है और इस प्रकार प्राप्त की गई संख्याओं को जोड़कर भार के योग से भाग दे दिया जाता है।”
भारित समान्तर माध्य की गणना करना – भारित समान्तर माध्य की गणन क्रिया निम्नलिखित प्रकार से की जाती है
प्रत्यक्ष रीति-

  • श्रेणी के प्रत्येक पद को उसके महत्त्व के अनुसार भार प्रदान किया जाता है।
  • श्रेणी के मूल्यों तथा उनके तत्सम्बन्धी भारों की गुणा की जाती है तथा इनका योग निकाल लिया जाता है।
  • इस योग को भारों के योग से विभाजित कर दिया जाता है।
  • अन्त में निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है
    [latex]\overline { X } w=\frac { \Sigma XW }{ \Sigma W }[/latex]

यहाँ, [latex s=2]\overline { X }[/latex]w = भारित समान्तर माध्य
ΣXW = मूल्य व भारों के गुणनफलों का योग
ΣW = भारों का योग

लघु रीति –

  • श्रेणी के प्रत्येक पद को उसके महत्त्व के अनुसार भार प्रदान किया जाता है।
  • काल्पनिक भारित माध्य मानकरे मूल्यों से विचलन लिए जाते हैं।
  • विचलनों तथा तत्सम्बन्धी भारों के गुणनफल का योग ज्ञात किया जाता है।
  • अन्त में इस योग को भारों के योग से भाग दे दिया जाता है। जो मूल्य आता है, उसे काल्पनिक भारित माध्य (A) में जोड़ दिया जाता है।
  • अन्त में निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है|
    [latex s=2]\overline { X }[/latex]w = A + [latex s=2]\frac { \Sigma Wd }{ \Sigma W }[/latex]

उदाहरण 7. एक कारखाने के कर्मचारियों का मासिक वेतन और उनकी संख्या निम्नांकित सारणी में वर्णित हैं मासिक वेतन का प्रत्यक्ष व लघु रीति द्वारा भारत मध्य ज्ञात कीजिए
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 44
हल :
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 45
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 46

प्रश्न 4.
मध्यिका को परिभाषित कीजिए तथा उसके गुण, दोष व उपयोग बताइए। अथवा मध्यिका के गुण-दोषों पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर :

मध्यिका

अर्थ एवं परिभाषा – मध्यिका आरोही अथवा अवरोही क्रम में अनुविन्यसित समंकमाला के विभिन्न पदों के मध्य का मूल्य (middle item) होती है और वह समंकमाला को दो भागों में इस प्रकार बाँटती है। कि उसके एक ओर के सब पद उससे कम मूल्य के तथा दूसरी ओर के सब पद उससे अधिक मूल्य के होते हैं।

प्रो० कॉनर के शब्दों में – “मध्यिका समंक श्रेणी का वह पद है, जो समूह को दो समान भागों में इस प्रकार विभक्त करता है कि एक भाग में समस्त मूल्य मध्यिका से अधिक और दूसरे भाग में अन्य मूल्य मध्यिका से कम हों।”

प्रो० युल एवं केण्ड्राल के शब्दों में – “मध्यिका केन्द्रीय या मध्य मूल्य होता है, जबकि समूह के मूल्यों अर्थात् आवृत्तियों को इनके परिमाण के अनुसार क्रम से लिखा जाए या इस प्रकार लिखा जाए कि बड़े तथा छोटे मूल्य समाप्त आवृत्तियों में बँट जाएँ।”

डॉ० बाउले के शब्दों में – “यदि एक समूह के पदों को उनके मूल्यों के अनुसार क्रमबद्ध किया जाए, तब लगभग मध्य पद का मूल्य ‘मध्यिका’ होता है।”

मध्यिका के गुण

  • यह बहुत सरल है और इसको बड़ी सुगमता से समझा जा सकता है।
  • इसका निर्धारण निश्चित और शुद्ध होता है।
  • इसे पदों की कुल संख्या मात्र से ज्ञात किया जा सकता है।
  • मध्यिका को बिन्दु रेखाओं द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।
  • मध्यिका पर चरम मूल्यों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  • माध्य विचलन की गणना में मध्यिका का और अधिक बीजीय विवेचन सम्भव है।
  • गुणात्मक विशेषताओं को अध्ययन करने में यह अन्य माध्यों से श्रेष्ठ है।
  • मध्यिका से पदों के विचलनों का योग अन्य किसी भी विधि से निकाले गए विचलनों के योग से कम होता है।

मध्यिका के दोष या सीमाएँ

  • मध्यिका के पदों की संख्या से गुणा करने पर पदों का कुल योग मालूम नहीं होता।
  • यदि पदों के विस्तार में असाधारण भिन्नता हो तो यह भ्रामक निष्कर्ष देता है।
  • इसे ज्ञात करने के लिए समस्त पदों को आरोही (ascending) या अवरोही (descending) क्रम में व्यवस्थित करना पड़ता है।
  • इसको ज्ञात करने के लिए समस्त समंकों का प्रयोग नहीं होता।
  • यदि मध्यपद दो वर्गों के बीच आता है, तो मध्यिका को ठीक-ठीक ज्ञात करना कठिन हो जाता है।
  • सरल गणितीय सूत्रे से इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
  • यदि पदों की संख्या सम (even) है तो मध्यिका वास्तविक मूल्य नहीं होता।
  • यदि पदों की संख्या कम हो या मध्य पद के ऊपर अथवा नीचे पदों का फैलाव अनियमित हो तो मध्यिका एक प्रतिनिधि माप नहीं रहता।

मध्यिका के उपयोग
मध्यिका समझने में सरल है; अत: व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए इसका बहुत अधिक उपयोग होता है। इसके द्वारा गुणात्मक तथ्यों जैसे बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य आदि का भी अध्ययन किया जा सकता है। इसी कारण सामाजिक समस्याओं के विश्लेषण में यह अत्यधिक उपयोगी है। यह उन दशाओं में अधिक उपयोगी है, जहाँ अति सीमान्त पदों को महत्त्व नहीं दिया जाता अथवा वितरण विषम होता है।

प्रश्न 5.
विभाजन मूल्य चतुर्थकों (Qi , Qs) की गणना प्रक्रिया समझाइए।
उत्तर :
किसी श्रृंखला को दो से अधिक भागों में बाँटने वाले मूल्य को विभाजन मूल्य कहते हैं। मध्यिका एक श्रेणी को दो भागों में बाँटती है। यदि किसी श्रृंखला को चार बराबर भागों में बाँटा जाता है। तो प्रत्येक भाग की अन्तिम इकाई चतुर्थक (Quartile) कहलाती है। इसे अंग्रेजी भाषा के Q अक्षर द्वारा प्रकट किया जाता है। पहले चतुर्थक की प्रथम अथवा निम्न चतुर्थक’ Q), तीसरे चतुर्थक को उच्च चतुर्थक (Q3) कहते हैं। दूसरा चतुर्थक मध्यिका कहलाता है।

चतुर्थकों की गणन क्रिया

व्यक्तिगत व खण्डित श्रेणी में – इन शृंखलाओं में चतुर्थक मूल्य ज्ञात करने के लिए निम्नांकित सूत्रों का प्रयोग किया जाता है
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 47उदाहरण 8. विद्यार्थियों द्वारा सांख्यिकी में प्राप्तांक निम्नलिखित हैं18, 10, 4, 31, 25, 20, 24, 17, 35, 15, 2, 8, 19, 21, 11, 13, 22, 24, 30 उपर्युक्त में Q व Qs ज्ञात कीजिए।
हल :
सर्वप्रथम, प्राप्तांकों को आरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाएगा
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 48

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 49

उदाहरण 9. निम्नलिखित समंकों से Q व Qs ज्ञात कीजिए
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 50
हल :
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 51
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 52

अखण्डित अथवा अविच्छिन्न श्रेणी – अखण्डित श्रेणी में Q; तथा Q5 के आकार को निम्नलिखित सूत्रों की सहायता से ज्ञात किया जाता है|
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 53

फिर निम्नलिखित सूत्र की सहायता से इनका मान ज्ञात किया जाता है
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 54

उदाहरण 10. निम्नलिखित समंकमाला में Q व Qs ज्ञात कीजिए
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 55
हल :
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 56
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 57
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 58

प्रश्न 6.
बहुलक (भूयिष्ठक) को परिभाषित कीजिए। इसके गुण व दोष बताइए।
उत्तर :

बहुलक या भूयिष्ठक का अर्थ एवं परिभाषाएँ

किसी भी समंकमाला में जो पद सबसे अधिक बार आता है अथवा जिसकी आवृत्ति सबसे अधिक होती है, वही ‘बहुलक’ कहलाता है। यह ‘सर्वाधिक घनत्व की स्थिति का द्योतक है और इसे प्रायः मूल्यों के ‘अधिकतम संकेन्द्रण का बिन्दु’ भी कहते हैं। काउडेन के शब्दों में-“एक वितरण को बहुलक वह मूल्य है, जिसके निकट श्रेणी की इकाइयाँ अधिक-से-अधिक केन्द्रित होती हैं। उसे मूल्यों की श्रेणी का सबसे अधिक प्रतिरूपी माना जाता है।” जिजेक के अनुसार-“बहुलक वह मूल्य है, जो पदों की श्रेणी अथवा समूह में सबसे अधिक बार

आता है तथा जिसके चारों ओर सबसे अधिक घनत्व के पदों का वितरण रहता है।” कैने तथा कीपिंग के अनुसार-“बहुलक वह मूल्य है जो श्रेणी में सबसे अधिक बार आता हो अर्थात् जिसँकी सर्वाधिक आवृत्ति हो।” डॉ० बाउले के अनुसार–‘किसी सांख्यिकीय समूह में वर्गीकृत मात्रा का वह मूल्य, जहाँ पर पंजीकृत संख्याएँ सबसे अधिक हों, ‘बहुलक’ या ‘सबसे अधिक घनत्व का स्थान’ अथवा ‘सबसे महत्त्वपूर्ण मूल्य’ कहलाता है।”

बहुलक के गुण

  • यह एक सरल एवं लोकप्रिय माध्य है। कुछ दशाओं में यह केवल निरीक्षण द्वारा ही ज्ञात किया जा सकता है।
  • इसका मूल्य रेखाचित्र द्वारा भी निर्धारित किया जा सकता है।
  • यह वितरण में सर्वाधिक सम्भावित मूल्य होता है।
  • गुणात्मक तथ्यों का भी बहुलक ज्ञात किया जा सकता है।
  • यह अति सीमान्त पदों से प्रभावित नहीं होता।
  • यह श्रेणी के एक महत्त्वपूर्ण भाग का वास्तविक मूल्य होता है।
  • यह समूह का सर्वोत्तम प्रतिनिधि होता है।
  • प्रतिदर्श के परिवर्तन के साथ बहुलक में परिवर्तन नहीं होता।

बहुलक के दोष

  • यदि श्रेणी के सभी पदों की आवृत्तियाँ समान हैं तो बहुलक का निर्धारण नहीं किया जा सकता।
  • कभी-कभी एक समूह में दो-या-दो से अधिक बहुलक भी हो सकते हैं।
  • यदि श्रेणी का वितरण अनियमित है तो इसे शुद्ध रूप में नहीं निकाला जा सकता।
  • यह चरम सीमाओं की उपेक्षा करता है जो कि गणितीय दृष्टि से उचित नहीं है।
  • सभी पदों पर आधारित न होने के कारण इसका बीजीय विवेचन सम्भव नहीं है।
  • यह श्रेणी का पूर्ण रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करता।
  • वर्ग विस्तार में परिवर्तन कर देने पर बहुलक भी बदल जाएगा।

बहुलक के उपयोग
उपर्युक्त दोषों के बावजूद दैनिक जीवन तथा व्यापारिक क्षेत्र में बहुलक का बहुत अधिक उपयोग किया जाता है। यह शीघ्रता व सरलता से समझ में आ जाता है, इसलिए व्यावसायिक जीवन में इसका प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। व्यापारिक पूर्वानुमानों में यह एक महत्त्वपूर्ण पथ-प्रदर्शक है। उद्योग व प्रशासन के क्षेत्र में इसकी सहायता से औसत उत्पादने ज्ञात किया जाता है तथा विभिन्न विभागों की कार्यक्षमता की तुलना की जाती है। किसी वस्तु के उत्पादन में उसकी लागत का अनुमान बहुलक समय के निर्धारण द्वारा आसानी से लगाया जा सकता है। विभिन्न वस्तुओं की लोकप्रियता का अध्ययन बहुलक द्वारा ही किया जाता हैं मौसम सम्बन्धी पूर्वानुमानों में भी इसी का प्रयोग होता है।

प्रश्न 7.
बहुलक निर्धारण की विधि समझाइए।
उत्तर :

बहुलक का निर्धारण

(अ) व्यक्तिगत श्रेणी – व्यक्तिगत श्रेणी में बहुलक निकालने की निम्नलिखित विधियाँ हैं|
(i) निरीक्षण द्वारा – निरीक्षण द्वारा यह निश्चित किया जाता है कि कौन-सा मूल्य सबसे अधिक बार आया है। जो मूल्य सबसे अधिक बार आता है, वही बहुलक होता है।

उदाहरण 11. निम्नांकित जूतों की आकार संख्या से बहुलक आकार ज्ञात कीजिए
जूतों की आकार संख्या – 2, 4, 1, 2, 7, 7, 6, 6, 6, 5, 4, 2, 6, 6, 6, 3, 3
हल :
उपर्युक्त संख्याओं में 6 संख्या सबसे अधिक बार प्रयुक्त हुई है। अत: यही संख्या बहुलक होगी।
z = 6 यहाँ  Z = बहुलक
(ii) व्यक्तिगत श्रेणी को खण्डित श्रेणी में परिवर्तित करके – जब व्यक्तिगत श्रेणी के अनेक पद दो-या-दो से अधिक बार आते हैं तो उन्हें आरोही क्रम में रखकर उनके सामने उनकी आवृत्ति लिख दी जाती है। सर्वाधिक आवृत्ति वाला पद बहुलक होता है।

उदाहरण 12. यदि 10 अधिकारियों को प्रारम्भिक वेतन निम्नलिखित हो तो उन अधिकारियों का बहुलक वेतन ज्ञात कीजिए
625, 500, 480, 500, 460, 500, 525, 575, 525, 500.
हल :
पहले इन्हें खण्डित श्रेणी में इस प्रकार रखा जाएगा
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 59

उपर्युक्त उदाहरण में सर्वाधिक पदाधिकारियों (4) का प्रारम्भिक वेतन ₹ 500 है। अतः Z = ₹ 500

(iii) व्यक्तिगत श्रेणी को अविच्छिन्न श्रेणी में बदलकर – जब श्रेणी में किसी भी पद की आवृत्ति एक से अधिक बार नै हो, तो उसे अविच्छिन्न श्रेणी में बदलकर अधिकतम आवृत्ति वाला वर्गान्तर कर लेना चाहिए और फिर सूत्र द्वारा ‘बहुलक’ निकालना चाहिए।
नोट – इस विधि के लिए उदाहरण 21 देखिए।
(iv) मध्यिका व समान्तर माध्य के आधार पर बहुलक का निर्धारण – यदि व्यक्तिगत श्रेणी में मध्यिका व समान्तर माध्य के आधार पर बहुलक का मूल्य ज्ञात करना हो तो निम्नलिखित सूत्रे द्वारा बहुलक का मूल्य ज्ञात किया जा सकता है – z = 3 M – 2 X
(ब) खण्डित श्रेणी – खण्डित श्रेणी में बहुलक निम्नलिखित दो रीतियों द्वारा ज्ञात किया जा सकता है
(i) निरीक्षण रीति – इस रीति के अनुसार, जिस पद की सबसे अधिक आवृत्ति होगी, वही पद मूल्य ‘बहुलक’ होगा। लेकिन यह तब ही सम्भव है, जब पदमाला नियमित हो तथा उसके सभी पद सजातीय हों।
उदाहरण 13. निम्नलिखित श्रेणी में से बहुलक का आकार ज्ञात कीजिए

उदाहरण 14. निम्नलिखित सारणी में बहुलक ज्ञात कीजिए
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 60

हल :
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 61
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 62
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 63
उदाहरण 14.
निम्नलिखित सारणी में से बहुलक आयु ज्ञात कीजिए
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 64
हल :
उपर्युक्त श्रेणी में 180 सेमी पद मूल्य की आवृत्ति सबसे अधिक है। अतः Z = 180 सेमी
(ii) समूहीकरण रीति – आवृत्तियों का वितरण अनियमित होने पर समूहन रीति द्वारा आवृत्तियों के घनत्व बिन्दु का पता लगाया जाता है। समूहन विधि इस प्रकार हैसर्वप्रथम एक सारणी बनाई जाती है, जिसमें चर मूल्यों के अतिरिक्त आवृत्ति के 6 खाने बनाए जाते हैं। इन खानों में आवृत्तियों को निम्नलिखित प्रकार से रखा जाता है
Coln. (i) में प्रश्न में दी हुई आवृत्तियाँ लिखी जाती हैं।
Coln. (ii) में आरम्भ से दो-दो आवृत्तियों के जोड़ लिखे जाते हैं।
Coln. (iii) में Coln. (i) की सबसे पहली आवृत्ति को छोड़कर, दो-दो आवृत्तियों के जोड़ लिखे जाते हैं।
Coln. (iv) में Coin. (i) की तीन-तीन आवृत्तियों के जोड़ लिखे जाते हैं।
Coln. (v) में Coln. (i) की प्रथम आवृत्ति को छोड़कर आगे की तीन-तीन आवृत्तियों के जोड़ लिखे जाते हैं।
Coln. (vi) में Coln. (i) की पहली दो आवृत्तियों को छोड़कर तीन-तीन आवृत्तियों के जोड़ लिखे जाते हैं।

इसके पश्चात् प्रत्येक कॉलम की अधिकतम आवृत्ति को रेखांकित कर लिया जाता है तथा उन अधिकतम आवृत्तियों के चर मूल्यों पर चिह्न लगाकर उनकी गणना कर ली जाती है। जिस मूल्य के सामने अधिकतम चिह्न होते हैं, वही बहुलक का मूल्य होता है। इसका विश्लेषण सारणी (Analysis table) बनाकर भी किया जा सकता है।
उदाहरण 15. निम्नलिखित सारणी में से बहुलक आयु ज्ञात कीजिए
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 65

हल :
सर्वप्रथम समूहुन रीति द्वारा बहुलक वर्ग ज्ञात किया जाएगा।
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 66

उपर्युक्त सारणी के अनुसार बहुलक 40-45 वर्ग में है। सूत्रानुसार,

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 67

शून्य से भाग न दिए जा सकने के कारण, इस सूत्र द्वारा निकाला गया बहुलक शुद्ध रूप में निर्धारित नहीं किया जा सकता। अत: बहुलक मूल्य वैकल्पिक सूत्र द्वारा निर्धारित किया जाएगा। सूत्रानुसार,
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 5 Measures of Central Tendency 68

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods (समाजशास्त्र-अनुसंधान पद्धतियाँ)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods (समाजशास्त्र-अनुसंधान पद्धतियाँ).

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वैज्ञानिक पद्धति का प्रश्न विशेषतः समाजशास्त्र में क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर
समाजशास्त्र एक विज्ञान है क्योंकि इसमें वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाता है। समाजशास्त्र में वैज्ञानिक पद्धति के प्रयोग का प्रश्न इसलिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि कुछ विद्वान् इस विषय को विज्ञान मानने से इंकार करते हैं। वे समझते हैं कि समाजशास्त्र की विषय-वस्तु के बारे में उन्हें अपने अनुभवों के द्वारा ही काफी ज्ञान प्राप्त है। वास्तव में ऐसा नहीं है। जो ज्ञान हमें अपने अनुभवों से मिलता है जरूरी नहीं है कि वह वैज्ञानिक ज्ञान ही हो। उदाहरणार्थ-मित्रता या धर्म या बाजारों में मोल-भाव करने जैसी सामाजिक प्रघटनाओं का अध्ययन करते समय समाजशास्त्री केवल दर्शकों का अवलोकन ही नहीं करते अपितु इसमें सम्मिलित लोगों की भावनाओं तथा विचारों को भी जानना चाहते हैं। समाजशास्त्री विश्व को उनकी आँखों से देखना चाहते हैं। विभिन्न संस्कृतियों में लोगों के लिए मैत्री का अर्थ क्या है? जब कोई व्यक्ति विशेष अनुष्ठान करता है तो किस प्रकार के धार्मिक विचार उसके मन में आते हैं? एक दुकानदार तथा ग्राहक बेहतर मूल्य पाने के लिए शब्दों तथा भावभंगिमाओं को परस्पर कैसे समझते हैं? ऐसे प्रश्नों का उत्तर केवल वैज्ञानिक पद्धति द्वारा ही दिया। जा सकता है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

प्रश्न 2.
सामाजिक विज्ञान में विशेषकर समाजशास्त्र जैसे विषय में ‘वस्तुनिष्ठता के अधिक जटिल होने के क्या कारण हैं?
उत्तर
समाजशास्त्रीय अध्ययनों में प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति प्रामाणिकता लाना कठिन है। समाज विज्ञानों के नियम प्राकृतिक विज्ञानों के नियमों की भाँति अटल नहीं होते, वे तो सामाजिक व्यवहार के संबंध में संभावित प्रवृत्ति को प्रकट करते हैं। ऐसी स्थिति के लिए अनेक कारक उत्तरदायी हैं; जैसे-सामाजिक प्रघटना का स्वभाव, ठोस मापदंडों को विकसित न होना आदि। इन्हीं कारणों में एक प्रमुख समस्या वस्तुनिष्ठता की भी है। किसी भी वैज्ञानिक अध्ययन एवं अनुसंधान की सफलता की। पूर्वापेक्षित शर्त वस्तुनिष्ठता है। इसके अभाव में अनुसंधान के द्वारा प्राप्त निष्कर्षों की विश्वसनीयता एवं प्रामाणिकता संदिग्ध हो जाती है। यही कारण है कि समाजशास्त्र में प्रारंभ से ही इस समस्या पर विचार किया जाता रहा है। वस्तुनिष्ठता का अभिप्राय घटना का यथार्थ या वास्तविक रूप में अर्थात् उसी रूप, में, जिसमें वे हैं, वर्णन करना है। यह एक तरह से वैज्ञानिक भावना है जो अनुसंधानकर्ता को उसके पूर्व दृष्टिकोणों से उसके अध्ययन को प्रभावित करने से रोकती है। यदि कोई अनुसंधानकर्ता किसी घटना का वर्णन उसी रूप में करता है जिसमें कि वह विद्यमान है, चाहे उसके बारे में अनुसंधानकर्ता के विचार कुछ भी क्यों न हों, तो हम इसे वस्तुनिष्ठ अध्ययन कह सकते हैं।

सामाजिक विज्ञान में; विशेषकर समाजशास्त्र जैसे विषय में ‘वस्तुनिष्ठता के अधिक जटिल होने के अनेक कारण हैं। एक तो अनुसंधानकर्ता स्वयं अपने मूल्य रखता है तथा उसका अध्ययन उसके मूल्यों एवं पूर्वाग्रहों द्वारा प्रभावित होता है। दूसरे, सामाजिक घटनाएँ जटिल होती हैं तथा उनका तटस्थ रूप से अध्ययन करना सम्भव नहीं है। कुछ विद्वानों (जैसे-मैक्स वेबर) , का कहना है कि सामाजिक-सांस्कृतिक घटनाओं की प्रकृति ही ऐसी है कि इनका पूर्ण रूप से वस्तुनिष्ठ अध्ययन किया। ही नहीं जा सकता, जबकि अनेक अन्य विद्वानों (जैसे-दुखम) का विचार है कि समाजशास्त्रीय अध्ययनों में वस्तुनिष्ठता रखना सम्भव है। दुर्णीम ने इस बात का दावा ही नहीं किया अपितु धर्म, श्रम-विभाजन एवं आत्महत्या जैसे सामाजिक तथ्यों का वस्तुनिष्ठ अध्ययन करने में सफलता भी प्राप्त की; परंतु फिर भी आज अनेक विद्वान यह मानते हैं कि सामाजिक घटनाओं की प्रकृति प्राकृतिक घटनाओं की प्रकृति से भिन्न है जिसके कारण इनको पूर्ण वस्तुनिष्ठ अध्ययन सम्भव नहीं है। हाँ, अनुसंधानकर्ता अनेक सावधानियों का प्रयोग कर अपने विचारों के प्रभावों अर्थात् व्यक्तिनिष्ठता या व्यक्तिपरकता को कम-से-कम करने का प्रयास कर सकता है।

प्रश्न 3.
वस्तुनिष्ठता को प्राप्त करने के लिए समाजशास्त्री को किस प्रकार की कठिनाइयों और प्रयत्नों से गुजरना पड़ता है?
उत्तर
प्रत्येक विज्ञान अपनी विषय-वस्तु का अध्ययन वस्तुनिष्ठ रूप से करने का प्रयास करता है, परंतु सामाजिक घटनाओं की प्रकृति के कारण समाजशास्त्र जैसे विषय में वस्तुनिष्ठता रख पाना एक कठिन कार्य है। इसमें आने वाली प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं-

  1. समस्या का चयन मूल्य-निर्णयों द्वारा प्रभावित–सामाजिक अनुसंधान में वस्तुनिष्ठता न रख पाने का सर्वप्रथम कारण अनुसंधान समस्या का चयन है जो कि अंवेषणकर्ता के मूल्यों तथा रुचियों द्वारा प्रभावित होता है। समस्या का चयन सदैव मूल्यों से संबंधित होता है और इसीलिए सामाजिक-सांस्कृतिक घटनाओं को पूर्ण रूप से वस्तुनिष्ठ अथवा वैज्ञानिक अध्ययन सम्भव नहीं है।
  2. अध्ययन से तटस्थता असंभव–सामाजिक अनुसंधान में जब हम व्यक्तियों एवं समूहों का अध्ययन करते हैं तो स्वयं एक सामाजिक प्राणी होने के कारण हम अध्ययन से अपने आप को तटस्थ अथवा पृथक् नहीं रख पाते। प्राकृतिक विज्ञानों में ऐसा इसलिए संभव हो जाता है क्योंकि उनमें जड़ या निर्जीव वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है। स्वयं सामाजिक समूह, विशेष जाति एवं संप्रदाय का सदस्य होने के कारण अनुसंधानकर्ता का पक्षपात या किसी विशेष बात की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक ही है; अतः सामाजिक विज्ञानों में निष्कर्षों के अनुसंधानकर्ता की मनोवृत्तियों या मूल्यों द्वारा प्रभावित होने की संभावना अधिक होती है।
  3. बाह्य हितों द्वारा बाधा–सामाजिक विज्ञानों में वस्तुनिष्ठता से संबंधित तीसरी बाधा अनुसंधानकर्ता के बाह्य हित हैं। जब वह अपने समूह का अध्ययन करता है तो बहुत-सी बातों की, जिन्हें वह अनुचित मानता है, उपेक्षा कर देती है। दूसरी ओर, जब वह किसी दूसरे समूह को अध्ययन करता है तो वह ऐसी बातों की ओर अधिक ध्यान देता है। इससे अध्ययन की वस्तुनिष्ठता प्रभावित होती है।
  4. सामाजिक घटनाओं की प्रकृति-सामाजिक घटनाओं की प्रकृति भी सामाजिक विज्ञानों में वस्तुनिष्ठ अध्ययनों में एक बाधा है, क्योंकि इनकी प्रकृति गुणात्मक होती है और कई बार अनुसंधानकर्ता को समूह के सदस्यों की मनोवृत्तियों, मूल्यों एवं आदर्शों आदि का अध्ययन करना पड़ता है। इसीलिए उसके लिए परिशुद्ध एवं यथार्थ रूप में घटनाओं का निष्पक्ष अध्ययन . करना सम्भव नहीं रह पाती।
  5. संजातिकेंद्रवाद–अनुसंधानकर्ता स्वयं एक सामाजिक प्राणी है तथा वह किसी विशेष जाति, प्रजाति, वर्ग, लिंग समूह का सदस्य होने के नाते विभिन्न मानवीय क्रियाओं एवं सामाजिक पहलुओं के बारे में अपने विचार एवं मूल्ये रखता है। उसके ये विचार एवं मूल्य उसके अध्ययन को प्रभावित करते हैं। कुंडबर्ग (Lundberg) के अनुसार अनुसंधानकर्ता के नैतिक मूल्य का उसके अध्ययन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है।

उपर्युक्त बाधाओं के अतिरिक्त अनेक अन्य ऐसे कारण भी हैं जो समाजशास्त्र जैसे सामाजिक विज्ञानों में होने वाले अध्ययनों में पक्षपात या अभिनति (Bias) लाते हैं। अभिनति के ऐसे प्रमुख स्रोत निम्नांकित हैं—

  1. अनुसंधानकर्ता के अपने मूल्यों से संबंधित अभिनति,
  2. सूचनादाता की अभिनति,
  3. निदर्शन के चुनाव में अभिनति,
  4. सामग्री संकलन करने की दोषपूर्ण प्रविधियाँ तथा
  5. सामग्री के विश्लेषण एवं निर्वचन में अभिनति।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

प्रश्न 4.
प्रतिबिंबता का क्या तात्पर्य है तथा यह समाजशास्त्र में क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर
समाजशास्त्र में अनुसंधानकर्ता के अपने मूल्यों एवं पूर्वाग्रहों द्वारा प्रभावित होने तथा इस नाते वस्तुनिष्ठ अध्ययन न कर पाने की समस्या का समाधान करने के अनेक उपाय खोजने का प्रयास किया गया है। इसकी पहली पद्धति अनुसंधान के विषय के बारे में अपनी भावनाओं तथा विचारों को लगातार कठोरता से जाँचना है। अधिकांशत: समाजशास्त्री अपने कार्य के लिए किसी बाहरी व्यक्ति के दृष्टिकोण को ग्रहण करने का प्रयास करते हैं वे अपने आपको तथा अपने अनुसंधान कार्यों को दूसरों की आँखों से देखने का प्रयास करते हैं। इसी पद्धति को प्रतिबिंबता’ अथवा ‘स्व-प्रतिबिंबता’ कहा जाता है। समाजशास्त्री लगातार अपनी मनोवृत्तियों तथा मतों की स्वयं जाँच करते रहते हैं। वह अपने अनुसंधान से संबंधित अन्य व्यक्तियों के मतों को सावधानीपूर्वक अपनाते रहते हैं। प्रतिबिंबता का एक व्यावहारिक पहलू किसी व्यक्ति द्वारा किए जा रहे कार्य का सावधानीपूर्वक वर्णन करना है। भले ही समाजशास्त्री वस्तुनिष्ठ होने का भरसक प्रयास क्यों न करें, तथापि अवचेतन पूर्वाग्रह की संभावना सदैव बनी रहती है। पाठकों को अपने पूर्वाग्रह की संभावना से सचेत कर उन्हें मानसिक रूप से इसकी क्षतिपूर्ति करने के लिए तैयार किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
सहभागी प्रेक्षण के दौरान समाजशास्त्री और मानवविज्ञानी क्या कार्य करते हैं?
उत्तर
समाजशास्त्र तथा सामाजिक मानवशास्त्र में सहभागी अवलोकन (प्रेक्षण) एक लोकप्रिय पद्धति है जिसके द्वारा उस समाज, संस्कृति तथा उन लोगों के बारे में सीखने का प्रयास किया जाता है। जिनका कि अनुसंधानकर्ता अध्ययन कर रहा होता है। सहभागी अवलोकन के दौरान अनुसंधान के विषय के साथ लंबी अवधि की अंतक्रिया सम्मिलित होती है। अनुसंधानकर्ता कई महीने या लगभग एक वर्ष तक उन लोगों के बीच उनकी तरह बनकर रहता है जिनका वह अध्ययन कर रहा होता है। इस अवधि में वह उनका विश्वास प्राप्त करने का प्रयास करता है ताकि उसे ‘बाहरी व्यक्ति’ न माना जाए। यदि अध्ययन कर रहे लोगों को अनुसंधानकर्ता पर पूर्ण विश्वास न हो तो वे उसे सही सूचनाएँ प्रदान नहीं करते हैं। सहभागी अवलोकन का लक्ष्य समुदाय के जीने के संपूर्ण तरीके सीखना होता है। सहभागी अवलोकन को क्षेत्रीय कार्य भी कहा जाता है।

प्रश्न 6.
एक पद्धति के रूप में सहभागी प्रेक्षण की क्या-क्या खूबियाँ और कमियाँ हैं?
उत्तर
अध्ययन की किसी अन्य पद्धति की भॉति सहभागी प्रेक्षण की कुछ खूबियाँ भी हैं तथा कुछ कमियाँ भी। एक पद्धति के रूप में सहभागी प्रेक्षण की प्रमुख खूबियाँ निम्नलिखित हैं-

  1. सूक्ष्म रूप से घटना का अध्ययन–सहभागी प्रेक्षण में अनुसंधानकर्ता समुदाय के सदस्यों के साथ घुल-मिल जाता है, इसलिए यह प्रविधि सामाजिक घटनाओं का प्रत्यक्ष तथा सूक्ष्म रूप से गंभीरता से अध्ययन करती है। प्रेक्षणकर्ता को समूह की सदस्यता ग्रहण करने में ही अनेक महीने लग जाते हैं। वह घटनाओं को धैर्यपूर्ण ढंग से समझ सकता है।
  2. समूह के सदस्यों का सहयोग–सहभागी प्रेक्षण में अनुसंधानकर्ता समूह में काफी देर तक रहता है तथा उसका सदस्य बन जाता है। इसलिए अध्ययन-कार्य में उसे समूह के सदस्यों का सहयोग प्राप्त हो जाता है।
  3. विश्वसनीय सूचनाओं की प्राप्ति-सहभागी प्रेक्षण में निरीक्षणकर्ता व्यक्तिगत रूप से समुदाय का सदस्य रहता है। इसलिए समुदाय से संबंधित जो भी सूचनाएँ’ वह प्राप्त करता है वे विश्वसनीय होती हैं।
  4. विधि की सरलता सहभागी प्रेक्षण विधि किसी समुदाय या समूह का अध्ययन करने की | सरलतम विधि है, जिमसें किसी प्रकार का कोई अपव्यय नहीं होता।
  5. सूचनाओं की परीक्षा–सहभागी प्रेक्षण में जो सूचनाएँ प्राप्त की जाती हैं, उनकी परीक्षा कभी भी की जा सकती है। इसमें केवल सूचनाओं का संकलन ही सम्भव नहीं है, अपितु उनके अर्थ के संबंध में भी जानकारी प्राप्त होती है।
  6. रीति-रिवाजों का ज्ञान–सहभागी प्रेक्षण में अनुसंधानकर्ता अध्ययन किए जाने वाले समूह के सदस्यों के बीच जाकर बस जाता है, जिससे समूह के रीति-रिवाजों का अनुसंधानकर्ता को पूरा-पूरा ज्ञान हो जाता है। यह ज्ञान उसे सामाजिक घटनाओं को समझने में सहायता प्रदान करता है।

एक पद्धति के रूप में सहभारी प्रेक्षण की प्रमुख कमियाँ निम्नलिखित हैं-

  1. व्ययशील पद्धति–सहभागी प्रेक्षण एक खर्चीली पद्धति है, जिसमें अनुसंधानकर्ता को समूह का सदस्य बनने के लिए काफी समय सदस्यों का विश्वास प्राप्त करने में ही लग जाता है। अनुसंधानकर्ता को समस्या का अध्ययन करने के लिए अधिक समय और धन लगाना पड़ता है।
  2. अनुसंधानकर्ता पर निर्भरता-सहभागी प्रेक्षण की सफलता अनुसंधानकर्ता पर आधारित होती है; क्योंकि इसमें केवल एक ही व्यक्ति अनुसंधानकर्ता के रूप में कार्य करता है। यदि वह समूह के सदस्यों का ठीक प्रकार से विश्वास प्राप्त नहीं कर पाता तो वह अपने उद्देश्य में पूरी तरह से सफल नहीं हो सकता।
  3. वस्तुनिष्ठता का अभाव-सहभागी प्रेक्षण में तटस्थता का अभाव पाया जाता है, क्योंकि अनुसंधानकर्ता स्वयं ही समूह का सदस्य बन जाता है। वह निष्पक्ष भाव से समस्या का अध्ययन नहीं कर सकता। सहभागी प्रेक्षणकर्ता का समूह के साथ अनेक प्रकार का भावात्मक लगाव भी हो जाता है जो अध्ययन एवं प्रेक्षणकर्ता की वस्तुनिष्ठता को कम कर देता है।
  4. समस्याओं के विश्लेषण का अभाव-सहभागी प्रेक्षण में अनुसंधानकर्ता समुदाय का सदस्य। होने के कारण समुदाय की अनेक समस्याओं से परिचित हो जाता है, इसलिए बहुत-सी समस्याओं का विश्लेषण ही नहीं कर पाता। अनुसंधानकर्ता का प्रेक्षण उचित स्तर को नहीं रहता; क्योंकि वह समूह की विपत्तियों, प्रसन्नताओं तथा लड़ाई-झगड़ों से निरंतर प्रभावित होता रहता है, इसलिए उनका विश्लेषण भी नहीं कर पाता।
  5. पूर्ण सहभागिता संभव नहीं-बाहरी सदस्य के लिए प्रेक्षणित समूह अथवा समुदाय में पूर्ण रूप से भाग लेना सम्भव नहीं है क्योंकि बाहरी व्यक्ति होने के नाते उसे सदा संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। भिन्न संस्कृति होने के कारण भी समुदाय के सदस्यों में घुल-मिल जाना तथा ‘दिल की धड़कनें एक कर लेना’ सरल नहीं है। कुछ विद्वानों का कहना है कि समूह के सदस्यों * के विभिन्न प्रकार के कार्यों में सहायता करके, उनको अनिवार्य वस्तुएँ बाँटकर, उन्हें प्रभावित करके उनका विश्वास प्राप्त किया जा सकता है। परंतु यदि ऐसा किया जाता है तो प्रेक्षणकर्ता वास्तविक व्यवहार का अध्ययन ने करके कृत्रिम व्यवहार का अध्ययन ही कर पाएगा, क्योंकि इसमें पक्षपातपूर्ण अध्ययन हो सकता है।
  6. अनेक परिस्थितियों में सहभागिता असंभव–अनेक परिस्थितियाँ ऐसी हैं, जिनका सहभागी प्रेक्षण द्वारा अध्ययन नहीं किया जा सकता; क्योंकि प्रेक्षणकर्ता के लिए उनकी सदस्यता ग्रहण करना संभव नहीं है। उदाहरणार्थ-अगर हमें डाकूओं का अध्ययन करना है अथवा जेल के कैदियों या पुलिस के अफसरों अथवा लोकसभा के सदस्यों का अध्ययन करना है तो न तो हम डाकू बन सकते हैं, न जेल के कैदी, न पुलिस अफसर और न लोकसभा के सदस्य। इसलिए सहभागी प्रेक्षण का प्रयोग केवल सीमित परिस्थिति में ही किया जा सकता है।
  7. लघु समूहों का अध्ययन–सहभागी प्रेक्षण तभी प्रभावशाली हो सकता है जबकि समूह अथवा | समुदाय का आकार छोटा हो। विस्तृत क्षेत्र होने पर इस प्रविधि का प्रयोग करना संभव नहीं है; अतः क्षेत्र की दृष्टि से भी इसकी उपयोगिता सीमित है।
  8. भूमिका संतुलन की समस्या सहभागी प्रेक्षण में प्रेक्षणकर्ता को एक वैज्ञानिक अनुसंधानकर्ता तथा समूह के सक्रिय सदस्य की दो भिन्न प्रकार की भूमिकाएँ निभानी पड़ती हैं। ऐसा अनिवार्य नहीं है कि वह इन विपरीत भूमिकाओं में संतुलन रख ही पीएं। यदि संतुलन नहीं रख पाता तो अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

उपर्युक्त कमियों के बावजूद सहभागी प्रेक्षण प्राचीन समाजों तथा जनजातियों के अध्ययन में लोकप्रिय तथा सबसे अधिक प्रचलित प्रविधि बनी हुई है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

प्रश्न 7.
सर्वेक्षण पद्धति के आधारभूत तत्त्व क्या हैं? इस पद्धति का प्रमुख लाभ क्या है?
उत्तर
सामाजिक सर्वेक्षण अब तक ज्ञात सबसे अच्छी समाजशास्त्रीय पद्धति मानी जाती है। सर्वेक्षण आधुनिक सार्वजनिक जीवन का एक सामान्य हिस्सा बन गया है। सर्वेक्षण में संपूर्ण तथ्यों का पता लगाने का प्रयास किया जाता है। यह किसी विषय पर सावधानीपूर्वक चयन किए गए लोगों के प्रतिनिधि समग्र से प्राप्त सूचना का व्यापक दृष्टिकोण होता है। इसमें उत्तरदाता अनुसंधानकर्ता के समूह द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देते हैं। उत्तरदाताओं का चयन निदर्शन (प्रतिदर्श) द्वारा किया जाता है तथा इसीलिए इसे कई बार ‘प्रतिदर्श सर्वेक्षण’ भी कहा जाता है। प्रतिदर्श सर्वेक्षण पद्धति के प्रमुख लाभ निम्न प्रकार हैं-

  1. परिमाणात्मक सूचनाएँ-सामाजिक सर्वेक्षण विस्तृत सामग्री के संबंध में परिमाणात्मक सूचनाएँ प्रदान करने का मुख्य स्रोत है जिसमें सांख्यिकीय प्रविधियों को भी विस्तार से लागू किया जा सकता है।
  2. गुणात्मक सूचनाएँ-सामाजिक सर्वेक्षण परिमाणात्मक सूचनाओं के साथ-साथ गुणात्मक सूचनाओं के संकलन का भी एक अति उपयोगी साधन है।
  3. वैज्ञानिक परिशुद्धता-सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा प्राप्त परिणाम एवं निष्कर्ष सूक्ष्म, उपयुक्त और विश्वसनीय होते हैं क्योंकि इसमें वैज्ञानिकता का गुण पाया जाता है अर्थात् संपूर्ण सर्वेक्षण वैज्ञानिक पद्धति द्वारा किया जाता है।
  4. वस्तुनिष्ठता-सामाजिक सर्वेक्षण में क्योंकि सामान्यत: अनेक सर्वेक्षणकर्ता कार्यरत होते हैं। अतः अध्ययन को उनके व्यक्तिगत विचारों एवं मनोभावनाओं द्वारा प्रभावित होने या किसी प्रकार का पक्षपात होने की संभावना बहुत कम होती है। वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग करने तथा विषय-वस्तु से प्रत्यक्ष एवं निकट का संपर्क होने के कारण सर्वेक्षण द्वारा एकत्रित सूचनाएँ अधिक वस्तुनिष्ठ होती हैं।
  5. उपकल्पना का निर्माण एवं परीक्षण सामाजिक सर्वेक्षण उपकल्पना या प्रकल्पना के निर्माण में सहायता देते हैं तथा इतना ही नहीं अपितु इनसे संबंधित आँकड़े एकत्रित करके उनकी प्रामाणिकता की जाँच करने में भी सहायक होते हैं।

प्रश्न 8.
प्रतिदर्श प्रतिनिधित्व चयन के कुछ आधार बताएँ।
उत्तर
प्रतिदर्श प्रतिनिधित्व से अभिप्राय किसी विस्तृत समूह के एक अपेक्षाकृत लघु प्रतिनिधि से है। यह वह प्रतिदर्श है जिसमें समान संभावना या संयोग को महत्त्व दिया जाता है। दैव प्रतिदर्श (Random Sampling) संभावित प्रतिदर्श का प्रमुख प्रकार है। दैव प्रतिदर्श वह प्रतिदर्श है जिसमें समग्र की प्रत्येक इकाई के चुने जाने की संभावना या संयोग (Chance) एक समान होता है; अत: यह प्रतिदर्श पक्षपातरहित एवं समग्र का प्रतिनिधित्व करने वाला होता है। गुड एवं हैट (Goode and Hatt) के अनुसार, “दैव प्रतिदर्श में समग्र की इकाइयों को इस प्रकार से क्रमबद्ध किया जाता है कि चुनाव प्रक्रिया समग्र की प्रत्येक इकाई को चयन का समान अवसर प्रदान करती है। प्रतिदर्श प्रतिनिधित्व चयन के प्रमुख आधार अग्रांकित हैं-

  1. लाटरी पद्धति–यदि समग्र का आकार छोटा है तो सभी इकाइयों, को एक-से काजज की छोटी-छोटी पर्चियों पर लिखकर किसी ड्रम इत्यादि में डालकर हिलाया जाता है ताकि, पर्चियाँ आपस में इस प्रकार मिल जाएँ कि पक्षपात की कोई संभावना न रहे। फिर आँख बंद करके या किसी बच्चे की सहायता से एक-एक पर्ची निकाली जाती है। जितनी निदर्शने चाहिए उतनी पर्चियाँ एक-एक करके निकाल ली जाती हैं। कार्ड या निकट पद्धति भी इसी को ही कहते हैं, परंतु इसमें प्रत्येक पर्ची निकालने के बाद डुम को काफी हिलाया जाता है।
  2. ग्रिड पद्धति–इसे भौगोलिक क्षेत्र के किसी भाग को चुनने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। प्रस्तावित क्षेत्र पर एक पारदर्शी प्लेट रखी जाती है जिस पर विभिन्न भागों को संख्याओं के रूप में दिखाया जाता है। निदर्शन द्वारा संख्या एवं क्षेत्र का चयन किया जाता है।
  3. दैव संख्या सारणी पद्धति-जब समग्र का आकार बड़ा होता है तो लाटरी पद्धति को अपनाना एक कठिन कार्य हो जाता है; अतः दैव संख्या सारणी का प्रयोग किया जाता है। इन संख्याओं को वैज्ञानिक पद्धति द्वारा निर्धारित किया जाता है। सामान्यतः टिप्पेट (Tippet) अथवा फिशर | एवं येट्स (Fisher and Yates) की देव संख्या सारणी का प्रयोग किया जाता है। इस सारणी द्वारा निर्धारित संख्या इकाईयों का चयन किया जाता है। इसमें भी प्रत्येक इकाई चुने जाने की बराबर संभावना होती है।

प्रश्न 9.
सर्वेक्षण पद्धति की कुछ कमजोरियों का वर्णन करें।
उत्तर
सर्वेक्षण पद्धति की निम्नलिखित प्रमुख कमजोरियाँ हैं-

  1. अमूर्त घटनाओं का अध्ययन असंभव-सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा केवल अवलोकनीय घटनाओं को ही अध्ययन संभव हो पाता है; हम इससे अमूर्त घटनाओं या किसी प्रकार की आंतरिक सूचना प्राप्त नहीं कर सकते हैं। विचारों, विश्वासों एवं व्यवहारों की जटिलता को समझने में अनेक विद्वानों ने सामाजिक सर्वेक्षणों को अनुपयुक्त बताया है।
  2. अत्यधिक समय एवं धन-सामाजिक सर्वेक्षण हेतु अत्यधिक समय एवं धन की आवश्यकता होती है। विविध प्रकार के साधनों (जैसे–अनुसूचियों, प्रश्नावलियों, साक्षात्कार, सांख्यिकीय विश्लेषण आदि) के प्रयोग के कारण सामाजिक सर्वेक्षण में पैसा ही अधिक खर्च नहीं होता अपितु अनेक सर्वेक्षण कई-कई साल तक चलते रहते हैं।
  3. निदर्शन त्रुटि–सामान्यतः निदर्शन सर्वेक्षणों में निदर्शन त्रुटि की संभावना अधिक होती है। क्योंकि बड़े एवं व्यापक स्तर पर होने वाले सर्वेक्षणों में निदर्शन की विश्वसनीयता की जाँच कराना एक कठिन कार्य होता है।
  4. अवास्तविक सूचनाएँ-सामाजिक सर्वेक्षण के अंतर्गत यह संभावना अधिक रहती है कि उत्तरदाता अपनी वास्तविक स्थिति से हटकर समाज द्वारा स्वीकृत मूल्यों एवं मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए यथार्थ सूचनाएँ न देकर गलत सूचनाएँ दे। सर्वेक्षण में व्यक्तिगत भिन्नता के कारण भी निष्कर्षों में पक्षपात हो सकता है।
  5. अध्ययन का सीमित क्षेत्र–सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा किए जाने वाले अध्ययनों का क्षेत्र सीमित होता है, जिससे कई बार सामान्यीकरण करना तक कठिन हो जाता है। किसी एक सर्वेक्षण द्वारा हम किसी समस्या या समूह के एक ही पहलू या भाग का अध्ययन कर सकते हैं।
  6. पर्याप्त ज्ञान एवं प्रशिक्षण सामाजिक सर्वेक्षण के संचालन के लिए पर्याप्त ज्ञान एवं विशेषीकरण की आवश्यकता होती है। यदि बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण किया जा रहा है तो उनके (सर्वेक्षकों के) प्रशिक्षण की समस्या आ सकती है क्योंकि प्रशिक्षित सर्वेक्षक बहुत कम मिलते हैं।
  7. सूचनाएँ सँभालने की समस्या सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा काफी मात्रा में सूचनाओं या आँकड़ों का संकलन किया जाता है परंतु संकलन करने के पश्चात् इन्हें सँभालना तथा इनका समुचित प्रयोग करना एक कठिन कार्य हो जाता है। यदि सूचनाएँ गुणात्मक प्रकृति की हैं तो यह कार्य और भी कठिन हो जाता है।
  8. सूचनाएँ प्राप्त करने में कठिनाई-सामाजिक सर्वेक्षण में सूचनाएँ एकत्रित करना भी एक कठिन कार्य है। यदि अनुसंधान उपकरण जैसे कि अनुसूची अधिक विस्तृत एवं लंी है तो सूचनादाता उत्तर देते-देते उकता जाते हैं और बिना सोचे-समझे उत्तर देने लगते हैं। साथ ही, युवा अविवाहित लड़कियों तथा नवविवाहित स्त्रियों तक पहुँच पाना और उनसे सूचनाएँ एकत्रित कर पाना भी एक कठिन कार्य है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

प्रश्न 10.
अनुसंधान पद्धति के रूप में साक्षात्कार के प्रमुख लक्षणों का वर्णन करें।
उत्तर
साक्षात्कार दो या दो से अधिक व्यक्तियों की आमने-सामने होने वाली एक बैठक है। इसमें एक पक्ष तो साक्षात्कारकर्ता का है, जबकि दूसरा पक्ष एक या अधिक सूचनादाताओं की है। आज इसका प्रयोग निरंतर बढ़ता जा रहा है। अनुसंधान पद्धति के रूप में साक्षात्कार के प्रमुख लक्षण निम्नांकित हैं-

  1. अनुसंधान की प्रविधि-साक्षात्कार सामाजिक अनुसंधान एवं सर्वेक्षणों में प्रयोग की जाने वाली एक प्रविधि है, जिसका उद्देश्य समस्या की प्रकृति के अनुरूप सूचनादाताओं से सूचना एकत्रित करने में सहायता प्रदान करना है। यह आँकड़े एकत्रित करने की अपने में पूर्ण प्रविधि है; यद्यपि इसका प्रयोग एक सहायक अथवा पूरक प्रविधि के रूप में भी किया जाता है।
  2. प्रत्यक्ष संपर्क–साक्षात्कार, जैसाकि इसकी परिभाषाओं से ही स्पष्ट है, आमने-सामने की एक बैठक है, जिसमें साक्षात्कारकर्ता एवं सूचनादाता प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करते हैं; अर्थात् आमने-सामने बैठकर समस्या के बारे में वार्तालाप द्वारा साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता से सूचनाएँ एकत्रित करता है।
  3. सर्वाधिक प्रचलित प्रविधि–साक्षात्कार सामाजिक अन्वेषण एवं सर्वेक्षणों में प्रयोग होने वाली सर्वाधिक प्रचलित प्रविधि है। आज अधिकांश अध्ययनों से इसे एक स्वतंत्र प्रविधि के रूप में अथवा सहायक या पूरक प्रविधि के रूप में अपनाया जा रहा है।
  4. अधिकतम जानकारी-प्रत्यक्ष या आमने-सामने का संपर्क होने के कारण साक्षात्कार प्रविधि द्वारा साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता से अधिकतम सूचनाएँ एकत्रित कर लेता है। यदि संपर्क ठीक प्रकार से हुआ है तो सूचनादाता समस्या के सभी पहलुओं के बारे में विस्तृत जानकारी दे देता है।
  5. प्रमाणिक सूचनाएँ-साक्षात्कार द्वारा एकत्रित सूचनाएँ अधिक प्रमाणित होती हैं। मोजर (Moser) ने अपनी परिभाषा में ही इस तथ्य की महत्ता पर बल दिया है। बड़े सर्वेक्षणों में यह निश्चित रूप से अन्य प्रविधियों की तुलना में अधिक प्रमाणित सूचनाएँ एकत्रित करने में सहायक है।
  6. सभी प्रकार के सूचनादाताओं के लिए उपयोगी–साक्षात्कार एक ऐसी प्रविधि है, जो सभी प्रकार के सूचनादाताओं से सूचना एकत्रित करने में सहायक है। इसमें सूचनादाताओं को पढ़ा-लिखा होना अनिवार्य नहीं है (जैसा कि प्रश्नावली में है), अपितु यह सभी प्रकार की पृष्ठभूमि के सूचनादाताओं से सूचना एकत्रित करने में सहायक है।

क्रियाकलाप आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
क्या आप दूसरों को जैसे देखते हैं, उसी तरह अपने आपको भी देख सकते हैं? (क्रियाकलाप 1)
उत्तर
समाजशास्त्र में वस्तुनिष्ठता बनाए रखने के लिए जिन पद्धतियों को अपनाया जाता है उनमें से एक अपने आप को दूसरों की नजरों से देखना है। यह एक प्रकार से अन्य लोगों (जैसे अपने श्रेष्ठ मित्रों, अपने विरोधियों, अपने शिक्षकों आदि) के दृष्टिकोण से अपने आपको देखना है। प्रत्येक छात्र इस पद्धति द्वारा अपना स्वमूल्यांकन कर सकता है अर्थात् यह जान सकता है कि दूसरे उसके बारे में क्या सोचते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि यदि हमें इस बात का आभास हो जाए कि दूसरे हमारे बारे में कोई अच्छी छवि नहीं रखते तो हम अपने आचरण में सुधार लाने का भी प्रयास करते हैं।

प्रश्न 2.
क्षेत्रीय कार्य जिन स्थानों पर हुए हैं उनमें क्या समान है? एक मानवविज्ञानी के लिए इन ‘अनजानी संस्कृतियों में रहना कैसा रहा होगा? उन्होंने क्या-क्या कठिनाइयाँ सहन की होंगी? (क्रियाकलाप 2)
उत्तर
क्षेत्रीय कार्य से अभिप्राय अध्ययन के क्षेत्र में जाकर अनुसंधान संबंधी आँकड़े संकलन करने से है। यह पद्धति सहभागी अवलोकन के रूप में भी हो सकती है अथवा असहभागी अवलोकन के रूप में भी। जेम्स फ्रेजर, इमाईल दुर्णीम तथा मेनिस्लाव मैलिनोव्स्की द्वारा किए गए क्षेत्रीय अध्ययन में सबसे प्रमुख समानता यह रही है कि ऐसे सभी अध्ययन आदिम या जनजातियों से संबंधित हैं। इन अध्ययनों में सहभागी अवलोकन पद्धति का प्रयोग किया गया है। सहभागी अवलोकन पद्धति में जब कोई मानवविज्ञानी जनजातीय संस्कृति में रहता है तो उसे अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उसे भाषा समझने, खान-पान तथा जनजातीय लोगों का विश्वास जीतने जैसी अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता है। जनजातीय लोग बाहरी लोगों को शक की निगाहों से देखते हैं तथा सरलता से उन पर विश्वास नहीं करते हैं। इसलिए मानवविज्ञानी को पहले कुछ महीने बिना किसी प्रकार का अध्ययन किए इन लोगों का विश्वास प्राप्त करना होता है। कई बार ऐसा करने के लिए मानवविज्ञानी अपने आपको पर्यावरणवादी या संगीतकार या समाज-सुधारक के रूप में भी प्रस्तुत कर सकता है।

प्रश्न 3.
यदि आप गाँव में रहते हैं तो अपने गाँव के बारे में ऐसे व्यक्ति को बताने की कोशिश करें जो वहाँ कभी न गया हो। गाँव में आपके जीवन के वे कौन-से मुख्य लक्षण होंगे जिन्हें आप महत्त्व देना चाहेंगे? (क्रियाकलाप 3)
उत्तर
गाँव में रहने वाले व्यक्ति के लिए अपने गाँव के बारे में किसी अन्य व्यक्ति को बताने में ज्यादा सोचना नहीं पड़ता है। वह अपने गाँव की भौगोलिक स्थिति, जनसंख्या, जातीय संरचना, भू-स्वामित्व के प्रतिमान, व्यवसाय, आवास के प्रकार, खेतों में उगाई जाने वाली फसलों, ग्रामीण परिवारों, ग्रामवासियों में पाए जाने वाले पारस्परिक संबंधों, ग्राम पंचायत की गतिविधियों इत्यादि के बारे में विस्तार में बता सकता है। ऐसा करते समय बताए जाने वाले व्यक्ति को यह अहसास होना चाहिए कि उसने वास्तव में गाँव न देखकर भी गाँव की झलक प्राप्त कर ली है। गाँव में कच्चे एवं पक्के दोनों प्रकार के घर पाए जाते हैं। मुख्य सड़क से गाँव तक का रास्ता पक्का या खड्जे वाला हो। सकता है। गलियों में भी दोनों तरफ नालियाँ तथा बीच में खड़ेजा या कच्चा रास्ता हो सकता है। नालियों में प्रायः गंदगी रहती है तथा गलियों में भी नाली का पानी इधर-उधर से बाहर निकला हुआ दिखाई दे सकता है। ग्रामवासी कृषि से संबंधित क्रियाओं पर ही अपना ध्यान अधिक केंद्रित करते हैं। अधिकांश परिवारों की प्रकृति संयुक्त परिवार पद्धति वाली होती है तथा परिवारों का आकार भी अपेक्षाकृत बड़ा होता है। बड़े-बूढ़े छोटों का न केवल समाजीकरण करते हैं, अपतुि प्रत्येक सदस्य पर नियंत्रण भी रखते हैं। प्रत्येक सदस्य का प्रयास यह होता है कि वह कोई ऐसा कार्य न करे जिससे परिवार की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचे। ग्रामवासियों में संबंध प्रत्यक्ष एवं व्यक्तिगत होते हैं तथा उनमें सामुदायिक भावना पाई जाती है। गाँव में विभिन्न जातियों में पाया जाने वाला सामाजिक स्तरीकरण एवं भेदभाव स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है। हो सकता है कि विभिन्न जातियों में सेवाओं का विनिमय भी पाया जाता है जिसे समाजशास्त्र में जजमानी व्यवस्था’ कहा जाता है। गाँव में उपलब्ध सुविधाओं का जिक्र भी किया जा सकता है जिससे बताने वाले को पता चल सके कि गाँव किस सीमा तक सार्वजनिक सुविधाओं की दृष्टि से पिछड़े हुए हैं।

प्रश्न 4.
आपने फिल्मों या टेलीविजन पर दिखाए गए गाँवों अथवा कस्बों को भी अवश्य देखा होगा। आप इन गाँवों अथवा कस्बों के बारे में क्या सोचते हैं तथा ये आपके गाँव अथवा कस्बे से किस प्रकार भिन्न हैं? क्या आप इनमें रहना पसंद करेंगे? अषमे उत्तर के पक्ष में कारण बताएँ। (क्रियाकलाप 3)
उत्तर
फिल्मों या टेलीविजन पर दिखाए गए गाँवों अथवा कस्बों को यथासंभव वास्तविक गाँव अथवा कस्बे के रूप में दर्शाने का प्रयास किया जाता है। फिर भी, अनेक फिल्मों में अधिकांश दृश्य स्टूडियों में फिल्माए जाते हैं इसलिए कृत्रिम रूप से गाँव एवं कस्बे के दृश्यों को भी दिखाया जा सकता है। इसीलिए अधिकांशतः फिल्मों या टेलीविजन पर दिखाए गए गाँवों अथवा कस्बों को जिस रूप में दर्शाया जाता है वह वास्तविक गाँवों एवं कस्बों के वास्तविक रूप से भिन्न होता है। वस्तुत: भारत में गाँव एवं कस्बे भी एक जैसे नहीं हैं। आकार की दृष्टि से वे बड़े, मध्यम अथवा छोटे हो सकते हैं तथा सुविधाओं की दृष्टि से पूर्ण सुविधायुक्त, आंशिक सुविधायुक्त अथवा असुविधायुक्त भी हो सकते हैं। बहुत-से-गाँव नगरीकृत अथवा अर्द्ध-नगरीकृत भी हो सकते हैं। इन गाँवों में अन्य गाँवों की तुलना में अधिक साफ-सफाई एवं सुविधाएँ हो सकती हैं। ऐसे ही खेतों के आकार में भी अंतर हो सकता है। इसी भाँति, कस्बे भी आकार में बड़े, मध्यम एवं छोटे तथा सुविधाओं से दृष्टि से पूर्ण सुविधायुक्त, आंशिक सुविधायुक्त अथवा असुविधायुक्त हो सकते हैं। फिल्मों या टेलीविजन पर दिखाए गए गाँवों अथवा कस्बों में प्राय: वास्तविक गाँवों एवं कस्बों से अधिक साफ-सफाई एवं सुविधाएँ दिखाई जाती हैं। कोई भी ग्राम या कस्बे में रहने वाला व्यक्ति यह सोच सकता है कि काश उसका गाँव या कस्बा भी फिल्मों या टेलीविजन पर दिखाए गए गाँवों अथवा कस्बों की भाँति होता। न रहने वाला व्यक्ति भी फिल्म से प्रोत्साहित होकर वहाँ रहने की इच्छुक हो सकता है। इस प्रकार, फिल्मों या टेलीविजन पर दिखाए गए गाँव अथवा कस्बे संदर्भ भी भूमिका भी निभाते हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

प्रश्न 5.
अपने समूह में उन सर्वेक्षणों के बारे में चर्चा कीजिए जिनके बारे में आप जानते हैं। (क्रियाकलाप 4)
उत्तर
चुनाव के समय अनेक टेलीविजन चैनलों एवं अनुसंधान संस्थानों द्वारा अलग-अलग अथवा संयुक्त रूप से चुनाव सर्वेक्षण करवाए जाते हैं। यह सर्वेक्षण किसी अन्य समस्या (जैसे भारत में बढ़ती हुई हिंसा, भ्रष्टाचार, महँगाई इत्यादि) को लेकर समाचार-पत्रों या टेलीविजन माध्यमों द्वारा किए गए अन्य लघु सर्वेक्षण भी हो सकते हैं। अभी उत्तराखंड तथा पंजाब विधानसभाओं के लिए चुनाव से संबंधित जो चुनाव सर्वेक्षण किए गए थे उनमें कांग्रेस की पराजय का अनुमान सामने उभरकर आया था। जब मतों की गिनती द्वारा नतीजों की घोषणा की गई तो यह अनुमान काफी सीमा तक सही पाया गया। यदि सर्वेक्षण में सम्मिलित सूचनादाताओं का चयन प्रतिनिधित्व प्रतिदर्श द्वारा किया गया है तो अनुमान सही होने की काफी संभावना बनी रहती है। जब इन चुनाव सर्वेक्षण के परिणाम घोषित किए गए तो इनमें रही सीमांत त्रुटि के बारे में भी विश्लेषकों ने विस्तार से बताया था। चूंकि कुछ सर्वेक्षणों में सम्मिलित सूचनादाताओं का आकार समग्र की दृष्टि से अत्यंत छोटा होता है तथा चयन की पद्धति भी संभावित प्रतिदर्श जैसी नहीं होती, इसलिए इन सर्वेक्षणों के परिणाम त्रुटिपूर्ण भी हो सकते हैं।

प्रश्न 6.
यदि आपके सर्वेक्षण का उद्देश्य यह पता लगाना है कि जिन विद्यार्थियों के अनेक भाई तथा बहन हैं, वे विद्यार्थियों की तुलना में, जिनका एक भाई या बहन (या कोई भी नहीं है, पढाई में अच्छे हैं या बुरे तो आप अपने स्कूल के सभी विद्यार्थियों में से प्रतिनिधि प्रतिदर्श का चयन करने के लिए क्या करेंगे? (क्रियाकलाप 5)
उत्तर
पहले स्कूल में पढ़ने वाले सभी विद्यार्थियों के बारे में अनेक भाई-बहनों की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया जाएगा। फिर इन विद्यार्थियों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जाएगा। पहली श्रेणी उन विद्यार्थियों की होगी जिनके अनेक भाई तथा बहन हैं। दूसरी श्रेणी उन विद्यार्थियों की होगी जिनका केवल एक भाई या बहन है अथवा कोई भी बहन-भाई नहीं है। इन दोनों श्रेणियों के विद्यार्थियों के पढ़ाई के स्तर को भी ज्ञात करने का प्रयास किया जाएगा। यदि दोनों श्रेणियों के विद्यार्थियों की संख्या अधिक होगी तो उपयुक्त पद्धति द्वारा प्रतिदर्श प्रतिनिधित्व चयन करने का प्रयास किया जाएगा। इसके लिए लाटरी पद्धति, ग्रिड पद्धति अथवा दैव संख्या सारणी पद्धति का प्रयोग किया जा सकता है। यदि आप इनमें से किसी एक पद्धति द्वारा उनमें से 10 प्रतिशत छात्राओं के चयन करते हैं तो चयनित प्रतिदर्श को प्रतिनिधि प्रतिदर्श कहा जाएगा।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘डिक्शनरी ऑफ सोशियोलोजी पुस्तक के लेखक कौन हैं?
(क) फेयरचाइल्ड
(ख) लिंडमैन
(ग) वेल्स
(घ) गुड एंड हैट
उत्तर
(क) फेयरचाइल्ड

प्रश्न 2.
अवलोकन में मुख्य रूप से कौन-सी ज्ञानेंद्रिय का प्रयोग किया जाता है?
(क) हाथों को
(ख) कानों का
(ग) आँखों का
(घ) मुंह का
उत्तर
(ग) आँखों का

प्रश्न 3.
‘सोशल डिस्कवरी’ नामक पुस्तक के लेखक हैं-
(क) फेयरचाइल्ड
(ख) मैकाइवर एवं पेज।
(ग) रोबर्ट के० मर्टन
(घ) लिंडमैन
उत्तर
(घ) लिंडमैन

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन-सा साक्षात्कार किसी सामाजिक घटना के कारणों की खोज करने से संबंधित है?
(क) उपचार-संबंधी साक्षात्कार
(ख) कारक-परीक्षक साक्षात्कार
(ग) अनौपचारिक साक्षात्कार
(घ) पुनरावृत्ति साक्षात्कार
उत्तर
(ख) कारक-परीक्षक साक्षात्कार

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

प्रश्न 5.
अण्डमान निकोबार द्वीपों का अध्ययन किसने किया?
(क) ईवान्स प्रिचार्ड।
(ख) विलियम वाइजर
(ग) रैडक्लिफ ब्राउन
(घ) एस०सी० दुबे
उत्तर
(ग) रेडक्लिफ ब्राउन

प्रश्न 6.
इंडियन विलेज’ नामक पुस्तक के लेखक कौन हैं?
(क) एस०सी० दुबे
(ख) फेयरचाइल्ड
(ग) एम०एन० श्रीनिवा
(घ) ऑस्कर लेविस
उत्तर
(क) एस०सी० दुबे

प्रश्न 7.
“साक्षात्कार मौखिक रूप से सामाजिक अंतः क्रिया की एक प्रक्रिया है, यह कथन किसका
(क) एम०एन० बसु,
(ख) पी०वी० यंग
(ग) सी०ए० मोजर
(घ) गुड एवं हैट
उत्तर
(घ) गुड एवं हैट

निश्चित उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अनुसंधानकर्ता को सामाजिक अनुसंधान में विशिष्ट नजरिया किसके द्वारा प्रदान किया जाता है।
उत्तर
अनुसंधानकर्ता को सामाजिक अनुसंधान में विशिष्ट नजरिया पद्धति द्वारा प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 2.
‘पद्धति’ शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से किस अर्थ में किया जाता है?
उत्तर
‘पद्धति’ शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से वैज्ञानिक पद्धति के अर्थ में किया जाता है।

प्रश्न 3.
सामाजिक अनुसंधान में सूचनाएँ किसके द्वारा संकलित की जाती हैं?
उत्तर
सामाजिक अनुसंधान में सूचनाएँ यंत्र या तकनीक द्वारा संकलित की जाती हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

प्रश्न 4.
अवलोकने का प्रयोग किस प्रकार की सामग्री के संकलन के लिए किया जाता है?
उत्तर
अवलोकन का प्रयोग प्राथमिक सामग्री के संकलन के लिए किया जाता है।

प्रश्न 5.
अवलोकन में मुख्य रूप से किस ज्ञानेंद्रिय द्वारा सामग्री का संकलन किया जाता है?
उत्तर
अवलोकन में आँखों द्वारा सामग्री का संकलन किया जाता है।

प्रश्न 6.
सामाजिक, प्राकृतिक एवं भौतिक विज्ञानों में सर्वाधिक प्रचलित प्रविधि कौन-सी है?
उत्तर
सामाजिक, प्राकृतिक एवं भौतिक विज्ञानों में सर्वाधिक प्रचलित प्रविधि अवलोकन है।

प्रश्न 7.
सहभागी तथा असहभागी अवलोकन शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किस विद्वान ने किया था?
उत्तर
सहभागी तथा असहभागी अवलोकन शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम लिंडमैन ने किया था।

प्रश्न 8.
‘सर्वेक्षण का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर
‘सर्वेक्षण’ अंग्रेजी के सर्वे शब्द का हिंदी रूपान्तरण है जिसका शाब्दिक अर्थ ‘ऊपर देखना है।

प्रश्न 9.
किस विद्वान ने सामाजिक घटनाओं के वर्णन को सामाजिक सर्वेक्षण का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य बताया है?
उत्तर
मोजर एवं कैल्टन ने सामाजिक घटनाओं के वर्णन को सामाजिक सर्वेक्षण का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य बताया है।

प्रश्न 10.
बर्गेस ने सामाजिक सर्वेक्षण के किस उद्देश्य को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना है?
उत्तर
बर्गेस ने रचनात्मक कार्यक्रम बनाने को सामाजिक सर्वेक्षण का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य माना है।

प्रश्न 11.
टेलीफोन पर सूचनाएँ संकलित किए जाने वाले सर्वेक्षण को क्या कहा जाता है?
उत्तर
टेलीफोन पर सूचनाएँ संकलित किए जाने वाले सर्वेक्षण को टेलीफोन सर्वेक्षण’ कहा जाता है।

प्रश्न 12.
सामाजिक सर्वेक्षण में मुख्य रूप से किस पद्धति का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर
सामाजिक सर्वेक्षण में मुख्य रूप से वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाता है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

प्रश्न 13.
साक्षात्कार का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर
साक्षात्कार का शाब्दिक अर्थ ‘सूचनादाता के आंतरिक जीवन को देखना है।

प्रश्न 14.
सूचनादाताओं की भावनाओं, अनुभवों, संवेगों तथा मनोवृत्तियों के अध्ययन में कौन-सी प्रविधि सर्वाधिक उपुयक्त है?
उत्तर
साक्षात्कार सूचनादाताओं की भावनाओं, अनुभवों, संवेगों तथा मनोवृत्तियों के अध्ययन में सर्वाधिक उपयुक्त प्रविधि है।

प्रश्न 15.
साक्षात्कार की उपयुक्त परिभाषा लिखिए।
उत्तर
गुड एवं हैट के शब्दों में, “साक्षात्कार मौखिक रूप से सामाजिक अंतक्रिया की एक प्रक्रिया है।”

प्रश्न 16.
वह कौन-सा साक्षात्कार है जो किसी सामाजिक घटना के कारणों की खोज करने से संबंधित है?
उत्तर
वह साक्षात्कार ‘कारक-परीक्षक साक्षात्कार’ कहलाता है।

प्रश्न 17.
वह कौन-सा साक्षात्कार है जो किसी सामाजिक समस्या को दूर करने के उपायों की खोज करने से संबंधित है?
उत्तर
वह साक्षात्कार ‘उपचार-संबंधी साक्षात्कार’ कहलाता है।

प्रश्न 18.
वह कौन-सा साक्षात्कार है, जिसमें अनुसंधानकर्ता सूचनादाता से पूर्वनिर्मित प्रश्न नहीं पूछता है?
उत्तर
वह साक्षात्कार ‘अनौपचारिक साक्षात्कार’ है।

प्रश्न 19.
वह कौन-सा साक्षात्कार है, जिसमें अनुसंधानकर्ता सूचनादाताओं से एक से अधिक बार साक्षात्कार करके सूचना संकलित करता है?
उत्तर
वह साक्षात्कार ‘पुनरावृत्ति साक्षात्कार’ है।।

प्रश्न 20.
मैलिनोव्स्की किसके लिए प्रसिद्ध हैं?
उत्तर
मैलिनोव्स्की ट्रोबियाण्ड द्वीपों में रहने वाले निवासियों के क्षेत्रीय कार्य करने के लिए प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 21.
मैलिनोव्स्की कहाँ के रहने वाले थे?
उत्तर
मैलिनोव्स्की पोलैंड में जन्मे मानवशास्त्री थे जो ब्रिटेन में बसे हुए थे।

प्रश्न 22.
मानवशास्त्रियों ने जनजातियों के अध्ययन हेतु किस पद्धति को अपनाया है?
उत्तर
मानवशास्त्रियों ने जनजातियों के अध्ययन हेतु मुख्य रूप से सहभागी अवलोकन की पद्धति को अपनाया है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

प्रश्न 23.
भारत में क्षेत्रीय कार्य पर आधारित ग्रामीण समाज को समझने वाले किसी एक समाजशास्त्री का नाम लिखिए।
उत्तर
एम०एन० श्रीनिवास ने क्षेत्रीय कार्य पर आधारित ग्रामीण समाज को समझने का प्रयास किया है। उन्होंने मैसूर के निकट रामपुरा गाँव का अध्ययन किया है।

प्रश्न 24.
एस०सी० दुबे ने किस गाँव का अध्ययन किया है?
उत्तर
एस०सी० दुबे ने आंध्र प्रदेश में सिकंदराबाद के निकट समीरपेट नामक गाँव का अध्ययन किया है।

प्रश्न 25.
प्रतिदर्श किसे कहते हैं?
उत्तर
किसी बड़ी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने वाले छोटे भाग को प्रतिदर्श कहते हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पद्धति किसे कहते हैं?
उत्तर
अध्ययन-वस्तु का ज्ञान प्राप्त करने हेतु जिन निश्चित तरीकों का प्रयोग किया जाता है उन्हें सामाजिक अनुसंधान में पद्धति कहा जाता है।

प्रश्न 2.
स्वाभाविकता के आधार पर नियंत्रित एवं अनियंत्रित अवलोकन में क्या अंतर है?
उत्तर
अनियंत्रित अवलोकन में स्वाभाविक व्यवहार का अवलोकन किया जाता है, जबकि नियंत्रित अवलोकन कृत्रिम होता है क्योंकि यह अस्वाभाविक परिस्थितियों में किया जाता है।”

प्रश्न 3.
पुनरावृत्ति की दृष्टि से नियंत्रित एवं अनियंत्रित अवलोकन में क्या अंतर है?
उत्तर
अनियंत्रित अवलोकन की पुनरावृत्ति नहीं की जा सकती, जबकि नियंत्रित अवलोकन में पुनरावृत्ति सम्भव है।

प्रश्न 4.
पक्षपात की दृष्टि से नियंत्रित एवं अनियंत्रित अवलोकन में क्या अंतर है?
उत्तर
अनियंत्रित अवलोकन में पक्षपात की संभावना रहती है, जबकि नियंत्रित अवलोकन में पक्षपात की कोई संभावना नहीं होती है।

प्रश्न 5.
समय एवं धन की दृष्टि से सामाजिक सर्वेक्षण को क्या दोष है?
उत्तर
समय एवं धन की दृष्टि से सामाजिक सर्वेक्षण का दोष यह है कि इसमें समय भी अधिक लगता है तथा धन भी अधिक व्यय होता है।

प्रश्न 6.
अध्ययन-क्षेत्र की दष्टि से सामाजिक सर्वेक्षण एवं सामाजिक अनुसंधान में क्या अंतर है?
उत्तर
सामाजिक सर्वेक्षण का अध्ययन-क्षेत्र सीमित होता है, जबकि सामाजिक अनुसंधान का व्यापक होता है।

प्रश्न 7.
प्रकृति के आधार पर सामाजिक सर्वेक्षण एवं सामाजिक अनुसंधान में क्या अंतर है?
उत्तर
सामाजिक सर्वेक्षण की प्रकृति मूल रूप से व्यावहारिक होती है, जबकि सामाजिक अनुसंधान की प्रकृति मुख्यतया सैद्धांतिक होती है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

प्रश्न 8.
जनगणना किसे कहते हैं?
उत्तर
जनगणना एक व्यापक सर्वेक्षण है जिसमें किसी देश की जनसंख्या का प्रत्येक सदस्य सम्मिलित रहता है।

प्रश्न 9.
वंशावली किसे कहते हैं?
उत्तर
वंशावली से अभिप्राय एक विस्तृत वंशवृक्ष से है जो विभिन्न पीढ़ियों के सदस्यों के पारिवारिक संबंधों को दर्शाता है।

प्रश्न 10.
प्रतिबिंबता किसे कहते हैं?
उत्तर
प्रतिबिंबता से अभिप्राय किसी अनुसंधानकर्ता की उस क्षमता से है जिसमें वह स्वयं का प्रेक्षण और विश्लेषण अन्य लोगों की दृष्टि से करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अवलोकन किसे कहते हैं?
या
अवलोकन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
‘अवलोकन’ का शाब्दिक अर्थ ‘देखना है। इसे ‘निरीक्षण’ भी कहते हैं। अवलोकन, निरीक्षण अथवा प्रेक्षण का सभी प्रकार के विज्ञानों में महत्त्वपूर्ण स्थान है; क्योंकि हम सभी प्रकार की समस्याओं एवं घटनाओं को आँखों से देखकर पहचान सकते हैं। इस प्रकार अवलोकन किसी अध्ययन-वस्तु को निष्पक्ष भाव से देखने की वह प्रणाली है, जिसके द्वारा अनुसंधानकर्ता अध्ययन-वस्तु के संबंध में कुछ ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करता है। मोजर के अनुसार, “अवलोकन को सुंदर ढंग से वैज्ञानिक जाँच-पड़ताल की पद्धति कहा जा सकता है। ठोस अर्थों में अवलोकन में कानों तथा वाणी की अपेक्षा आँखों का प्रयोग होता है।”

प्रश्न 2.
अवलोकन की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
अवलोकन की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. मानव-इंद्रियों, विशेष रूप से आँखों का प्रयोग–अवलोकन में मानव इंद्रियों; विशेष रूप से आँखों का प्रयोग किया जाता है। इसलिए इसे ‘आँखों द्वारा देखने की एक कला’ कहा गया है, जिससे अध्ययन-वस्तु से संबंधित प्राथमिक सामग्री का संचय किया जात है। मोजर ने ठीक ही कहा है कि “ठोस अर्थ में अवलोकन में कानों और वाणी की अपेक्षा आँखों का अधिक प्रयोग होता है।’
  2. मूलभूत वैज्ञानिक पद्धति–अवलोकन को एक मूलभूत वैज्ञानिक पद्धति माना गया है; क्योंकि यह प्रत्येक विषय (चाहे वह प्राकृतिक विज्ञान है अथवा सामाजिक विज्ञान) में सामान्य रूप से प्रयोग की जाती है। एक मौलिक पद्धति होने के नाते इसके द्वारा विश्वसनीय सूचनाएँ एकत्रित की जा सकती हैं।

प्रश्न 3.
अनियंत्रित अथवा साधारण अवलोकन किसे कहते हैं?
उत्तर
जब अनुसंधानकर्ता किन्हीं प्राकृतिक अवस्थाओं का अध्ययन करने हेतु कुछ क्रियाओं का निरीक्षण करता है तो वह अपने निरीक्षण कार्य में पूर्ण स्वतंत्र होता है। उसके इस कार्य में किसी बाह्य शक्ति या आंतरिक भावना का कोई प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता। इस प्रकार की स्वतंत्र निरीक्षण विधि में अनुसंधानकर्ता को आंतरिक या बाह्य किसी भी प्रकार का कोई नियंत्रण नहीं होता। इसलिए इस अवलोकन को समाजशास्त्रियों ने ‘अनियंत्रित अवलोकन’ की संज्ञा दी है। इस प्रकार क अवलोकन से अनुसंधानकर्ता अध्ययन-वस्तु से संबंधित सम्पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लेता है। पी०वी० यंग ने लिखा है। कि “अनियंत्रित अवलोकनों में जीवन की वास्तविक दशाओं को सावधानीपूर्वक परीक्षा की जाती है। तथा अवलोकित घटना की यथार्थता की जाँच करने अथवा यथार्थता के परीक्षण-हेतु यंत्रों के प्रयोग करने का कोई प्रयत्न नहीं किया जाता।” अनियंत्रित अवलोकन में घटना का वास्तविक रूप में अध्ययन किया जाता है तथा उस घटना पर अथवा अवलोकनकर्ता पर किसी प्रकार का नियंत्रण रखने का प्रयास नहीं किया जाता है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

प्रश्न 4.
नियंत्रित अथवा व्यवस्थित अवलोकन किसे कहते हैं?
उत्तर
नियंत्रित या व्यवस्थित अवलोकन में अनुसंधानकर्ता पर अनेक नियंत्रण लगे रहते हैं। यह नियंत्रण अनेक प्रविधियों के रूप में लगा होता है। दूसरे शब्दों में, नियंत्रित अवलोकन के अंतर्गत अनुसंधानकर्ता को अवलोकन कार्यों में अनेक सीमाओं का ध्यान रखना पड़ता है। ये सीमाएँ सामाजिक घटनाओं के लिए और साथ-ही-साथ अनुसंधानकर्ता के लिए लगाई जाती हैं। क्योंकि सामाजिक घटनाओं में घटना पर नियंत्रण रखना कठिन है, इसलिए अधिकांशतया अनुसंधानकर्ता को स्वयं पर ही नियंत्रण रखना पड़ता है। अनुसंधानकर्ता को अवलोकन करने की योजनाओं को बनाना पड़ता है। इसके अतिरिक्त अपनी डायरी में अवलोकित तथ्यों को लिखना पड़ता है या उन्हें टेपरिकॉर्डर द्वारा रिकॉर्ड करना पड़ता है। इस प्रकार नियंत्रित अवलोकन में अवलोकनकर्ता को निश्चित सिद्धांतों की सीमाओं में रहकर ही अवलोकन का कार्य करना पड़ता है।

प्रश्न 5.
नियंत्रित तथा अनियंत्रित अवलोकन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
नियंत्रित तथा अनियंत्रित अवलोकन में निम्नलिखित प्रमुख अंतर पाए जाते हैं-

  1. नियंत्रित अवलोकन में सामान्यतः यांत्रिक उपकरणों का प्रयोग किया जाता है, जबकि अनियंत्रित अवलोकन में यांत्रिक उपकरणों का प्रयोग नहीं होता है।
  2. नियंत्रित अवलोकन में वास्तविक घटनाओं का अवलोकन नहीं किया जा सकता है, क्योंकि उसमें कृत्रिमता आ सकती है; जबकि अनियंत्रित अवलोकन में वास्तविक घटनाओं का अवलोकन किया जाता है।
  3. नियंत्रित अवलोकन में अनुसंधान का विषय नियंत्रित होता है, जबकि अनियंत्रित अवलोकन में अनुसंधान का विषय नियंत्रणहीन होता है।
  4. नियंत्रित अवलोकन में पहले से ही योजना बना ली जाती है, जबकि अनियंत्रित अवलोकन में पहले से ही कोई योजना नहीं बनाई जाती है।
  5. नियंत्रित अवलोकन का उद्देश्य पूर्वनिर्धारित होता है, जबकि अनियंत्रित अवलोकन का उद्देश्य पूर्वनिश्चित नहीं होता है।
  6. नियंत्रित अवलोकन की पुनरावृत्ति सम्भव होती है,जबकि अनियंत्रित अवलोकन की पुनरावृत्ति नहीं की जा सकती।
  7. नियंत्रित अवलोकन सदैव क्रमबद्ध होता है, किन्तु अनियंत्रित अवलोकन क्रमबद्ध नहीं होता है।

प्रश्न 6.
सहभागी अवलोकन किसे कहते हैं?
उत्तर
इस प्रकार के अवलोकन में अनुसंधानकर्ता उस समूह में जाकर बस जाता है, जिसका वह अध्ययन करता है। अनुसंधानकर्ता समूह की सभी क्रियाओं में सक्रिय भाग लेता है और अपने आप को समूह के सदस्य के रूप में स्वीकार होने योग्य बना देता है। इस प्रकार सहभांगी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता अध्ययन किए जाने वाले समूह के लोगों से घुलमिलकर समूह की गतिविधियों व समस्या का अध्ययन करता है। किन्तु इस संबंध में अनुसंधानकर्ता को काफी सतर्क रहना पड़ता है। जिससे किसी भी स्तर पर समूह के सदस्यों को उस पर किसी प्रकार की शंका न होने पाए, अन्यथा समूह के सदस्यों के व्यवहार में औपचारिकता एवं कृत्रिमता आ जाएगी और अनुसंधानकर्ता अपने उद्देश्य की पूर्ति करने में असफल रहेगा। गुड तथा हैट के अनुसार, “इस प्रविधि का प्रयोग तभी किया जा सकता है जबकि अवलोकनकर्ता अपने उद्देश्य को प्रकट किए बिना उसी समूह का सदस्य मान लिया जाता है।”

प्रश्न 7.
असहभागी अवलोकन किसे कहते हैं?
उत्तर
इस प्रकार के अवलोकन में अनुसंधानकर्ता अध्ययन किए जाने वाले समूह का सदस्य नहीं बनता और न वह उस समूह की क्रियाओं में कोई भाग ही लेता है। वह दूर से ही समूह की क्रियाओं का अध्ययन करता है और साथ-ही-साथ समूह के सदस्यों को अपना परिचय देकर यह भी बतला देता है। कि उसका उद्देश्य समूह की क्रियाओं का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष भाव से अध्ययन करना है। इस प्रकार असहभागी अवलोकन सहभागी अवलोकन का विपरीत रूप है। पी०एच० मन के अनुसार, ‘असहभागी अवलोकन एक ऐसी विधि है जिसमें अवलोकन करने वाला अवलोकित से छिपा रहता है।’

प्रश्न 8.
असहभागी अवलोकन के दो प्रमुख गुण बताइए।
उत्तर
असहभागी अवलोकन के दो प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-

  1. मितव्ययिता-असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता कम समय में तथा कम खर्च करके अवलोकन का अपना कार्य पूरा करता है; अतः यह सहभागी अवलोकन की तुलना में कम खर्चीला प्रविधि है। अधिकांश अध्ययन इसी प्रविधि से पूरे कर लिए जाते हैं।
  2. निष्पक्षता-असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता समूह का सदस्य नहीं होता इसलिए वह निष्पक्ष भाव से तथा वस्तुनिष्ठ रूप से समस्या का अध्ययन करता है तथा विश्वसनीय आँकड़े एकत्रित करता है। क्योंकि इसमें अवलोकनकर्ता एक तटस्थ प्रेक्षक के रूप में निरीक्षण करता है। तथा समूह के साथ किसी प्रकार का भावात्मक लगाव नहीं रखता; अतः इस प्रकार किया गया अध्ययन अधिक निष्पक्ष एवं वस्तुनिष्ठ होता है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

प्रश्न 9.
असहभागी अवलोकन के दो प्रमुख दोष बताइए।
उत्तर
असहभागी अवलोकन के दो प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं-

  1. पूर्ण असहभागिता असंभव-असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता समूह के सदस्यों के कार्यों में भाग नहीं लेता है, किंतु विशुद्ध रूप से असहभागी अवलोकन संभव नहीं है। | अनुसंधानकर्ता अवलोकित सदस्यों की क्रियाओं से कुछ-न-कुछ प्रभावित हुए बिना अध्ययन नहीं कर सकता है। इसलिए गुड तथा हैट का कहना है कि पूर्ण सहभागिता की तरह पूर्ण असहभागिता भी संभव नहीं है।
  2. गहन अध्ययन असंभव-असहभागी अवलोकन गहन अध्ययनों में अधिक सहायक नहीं है। क्योंकि इससे अनुसंधानकर्ता समूह में सहभागिता नहीं करता तथा अपेक्षाकृत कम समय के लिए समूह में रहता है, इसलिए वह समस्या के विभिन्न पहलुओं का गहराई से अध्ययन नहीं कर पाता है। इसके द्वारा केवल सतही अध्ययन ही संभव है।

प्रश्न 10.
सामाजिक सर्वेक्षण से आप क्या समझते हैं?
या
सामाजिक सर्वेक्षण का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
सामाजिक सर्वेक्षण सामाजिक अनुसंधान का एक ऐसा तत्त्व है जो कि बड़ी संख्या में व्यक्तियों के विश्वासों, मनोवृत्तियों, विचारधाराओं तथा व्यवहारों के अध्ययन, उन्हें प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों तथा उनके पारस्परिक संबंधों का विश्लेषण एवं विवेचन करने के लिए तथ्यों के संकलन से संबंधित है। ‘डिक्शनरी ऑफ सोशियोलोजी’ में फेयरचाइल्ड ने एक समुदाय के संपूर्ण जीवन अथवा इसके किसी एक विशेष पक्ष; जैसे–स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन आदि से संबंधित व्यवस्थित एवं पूर्ण तथ्य-विश्लेषण को ही सर्वेक्षण कहा है। वेल्स के अनुसार, “श्रमिक वर्ग की निर्धनता तथा समुदाय की प्रकृति और समस्याओं संबंधी तथ्य खोजने वाला अध्ययन ही सामाजिक सर्वेक्षण है।”

प्रश्न 11.
सामाजिक सर्वेक्षण के दो प्रमुख गुण बताइए।
उत्तर
सामाजिक सर्वेक्षण के दो प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-

  1. परिमाणात्मक सूचनाएँ–सामाजिक सर्वेक्षण विस्तृत सामग्री के संबंध में परिमाणात्मक सूचनाएँ प्रदान करने का मुख्य स्रोत है, जिसमें सांख्यिकीय प्रविधियों को भी विस्तार से लागू किया जा सकता है।
  2. वैज्ञानिक परिशुद्धता-सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा प्राप्त परिणाम एवं निष्कर्ष सूक्ष्म, उपयुक्त और विश्वसनीय होते हैं, क्योंकि इसमें वैज्ञानिकता का गुण पाया जाता है; अर्थात् संपूर्ण सर्वेक्षण वैज्ञानिक पद्धति द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 12.
सामाजिक सर्वेक्षण एवं सामाजिक अनुसंधान में पाई जाने वाली दो समानताएँ बताइए।
उत्तर
सामान्यतः लोग सामाजिक सर्वेक्षण और सामाजिक अनुसंधान को एक ही मान लेते हैं। इस भ्रम का प्रमुख कारण दोनों में पायी जाने वाली कुछ समानताएँ हैं। सामाजिक सर्वेक्षण एवं सामाजिक अनुसंधान में निम्नलिखित दो समानताएँ पायी जाती हैं

  1. सामाजिक घटनाओं का अध्ययन–सामाजिक सर्वेक्षण तथा सामाजिक अनुसंधान दोनों के अंतर्गत सामाजिक घटनाओं का अध्ययन किया जाता है।
  2. मानव-व्यवहार को समझना–दोनों का उद्देश्य मानव-व्यवहार की यथार्थता को समझना है। मुख्य रूप से दोनों में मानव-व्यवहार के सामाजिक पक्ष को समझने एवं उसको नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है।

प्रश्न 13.
सामाजिक सर्वेक्षण एवं सामाजिक अनुसंधान में पाए जाने वाले दो अंतर लिखिए।
उत्तर
सामाजिक सर्वेक्षण सामाजिक अनुसंधान एक नहीं हैं। इनमें पाए जाने वाले दो प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं-

  1. अध्ययन-क्षेत्र में अंतर-सामाजिक सर्वेक्षण का अध्ययन-क्षेत्र सीमित होता है, क्योंकि यह . सामान्यतः किसी विशेष व्यक्ति, विशेष समस्या या परिस्थिति से संबंधित होता है; जबकि सामाजिक अनुसंधान का क्षेत्र व्यापक होता है, क्योंकि इसमें सामान्य एवं अमूर्त घटनाओं तक का अध्ययन किया जाता है।
  2. प्रकृति में अंतर–सामाजिक सर्वेक्षण एवं सामाजिक अनुसंधान की प्रकृति में काफी अंतर है; क्योंकि पहला (सर्वेक्षण) मूल रूप से व्यावहारिक है, जबकि अनुसंधान की प्रकृति मुख्य रूप से सैद्धांतिक है।

प्रश्न 14.
साक्षात्कार किसे कहते हैं?
या
साक्षात्कार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
साक्षात्कार का अर्थ साक्षात्कारकर्ता तथा उत्तरदाता के बीच आमने-सामने संपर्क स्थापित करके कुछ ऐसे रहस्यों का पता लगाने या उनकी जानकारी प्राप्त करना है जिनको उत्तरदाता के अतिरिक्त कोई नहीं जानता। इस प्रकार की जानकारी अन्य किसी प्रविधि के द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती। इस प्रकार की जानकारी प्रायः प्रत्यक्ष में प्रश्नोत्तर प्रणाली द्वारा की जाती है। उत्तरदाता से साक्षात्कारकर्ता सामने बैठकर प्रश्न पूछता है और साक्षात्कारकर्ता उत्तरदाता द्वारा किए गए कुछ उत्तरों को नोट कर लेता है तथा शेष जानकारी मौखिक रूप से ही कर ली जाती है। गुड एवं हैट के अनुसार, साक्षात्कार मौखिक रूप से सामाजिक अंतःक्रिया की एक प्रक्रिया है।”

प्रश्न 15.
औपचारिकता के आधार पर साक्षात्कार के प्रमुख प्रकार कौनसे हैं?
उत्तर
औपचारिकता के आधार पर साक्षात्कार के अग्रलिखित दो प्रमुख हैं

  1. औपचारिक साक्षात्कार-इस प्रकार के साक्षात्कार को नियंत्रित साक्षात्कार’ भी कहते हैं। इसमें अनुसंधानकर्ता साक्षात्कारदाता से पूर्वनिश्चित प्रश्नों को ही पूछ सकता है। इन प्रश्नों को पूछने में अनुसंधानकर्ता किसी प्रकार का संशोधन नहीं कर सकता और न ही इन प्रश्नों से हटकर दूसरे प्रश्न पूछ सकता है।
  2. अनौपचारिक साक्षात्कार-अनौपचारिक साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता पर किसी प्रकार के पूर्वनिर्मित प्रश्नों को पूछने पर कोई नियंत्रण नहीं होता और साक्षात्कारदाता भी प्रश्नों के उत्तर स्वतंत्र रूप से देता है। यह एक प्रकार से मुक्त वार्तालाप के रूप में होता है, जिसमें अनुसंधानकर्ता सूचनादाता से समस्या के विभिन्न पहलुओं पर सूचना प्राप्त करने का प्रयास करता है।

प्रश्न 16.
केंद्रीय साक्षात्कार किसे कहते हैं?
उत्तर
इस प्रकार का साक्षात्कार उत्तरदाता की उन परिस्थतियों के संबंध में किया जाता है, जिनमें उत्तरदाता पहले रहे चुका हो। इस प्रकार के साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता का ध्यान उसी परिस्थिति पर केंद्रित रहता है, जिसका पूर्वज्ञान साक्षात्कारदाता को है। साक्षात्कारकर्ता यह जानने का प्रयास करता है। कि अमुक परिस्थिति का उत्तरदाता पर क्या प्रभाव पड़ा है। इस प्रकार के साक्षात्कार को केंद्रित साक्षात्कार इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें किसी घटना या इसके किसी विशेष अंग पर ही ध्यान । केद्रित करके प्रश्न पूछे जाते हैं। उदाहरणार्थ-एक साक्षात्कारदाता ने कोई फिल्म देखी है; तो साक्षात्कारकर्ता केंद्रित साक्षात्कार में यह जानने का प्रयास करता है कि साक्षात्कारदाता पर उस फिल्म का क्या प्रभाव पड़ा है। इस प्रकार के साक्षात्कार में अनुसंधानकर्ता साक्षात्कारदाता को किसी प्रकार का कोई निर्देश नहीं देता,, वह निश्चित विषय या परिस्थति के अतिरिक्त अन्य किसी विषय या परिस्थिति पर केंद्रित नहीं रहता। इसके अतिरिक्त, इसमें साक्षात्कारकर्ता विषय का व्यक्तिगत रूप में गहन अध्ययन करता है। इस प्रकार के साक्षात्कार का प्रयोग रोबर्ट के० मर्टन ने रेडियो के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए किया था। आज केंद्रित साक्षात्कार, जनसंचार, अनुसंधान में एक प्रमुख प्रविधि बन चुका है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अवलोकन की संकल्पना स्पष्ट कीजिए तथा इसके विभिन्न प्रकारों को संक्षेप में बताइए।
या
अवलोकन से आप क्या समझते हैं? अवलोकन के विभिन्न स्वरूपों का उल्लेख कीजिए।
या
“विज्ञान अवलोकन से आरंभ होता है और अपनी अंतिम वैधता के लिए इसे अवलोकन पर ही लौटना होता है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर
वैज्ञानिक अध्ययन में तथ्यों के संकलन के लिए अपनाई जाने वाली विभिन्न पद्धतियों में अवलोकन का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसे सामाजिक तथा प्राकृतिक दोनों प्रकार के विज्ञानों में समान रूप से अपनाया जाता है। इसीलिए यह एक सार्वभौम पद्धति मानी जाती है। वास्तव में, प्रत्येक विज्ञान को प्रारंभ अवलोकन द्वारा होता है तथा अंत में सत्यापन का परीक्षण भी अवलोकन द्वारा ही होता है। अवलोकन को एक प्राचीन तथा अति आधुनिक अनुसंधान पद्धति कंहा गया है। अवलोकन में अधिकांशतः ज्ञानेंद्रियों तथा मुख्य रूप से आँखों द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जाता है। यह अत्यंत विश्वसनीय पद्धति मानी जाती है। इसीलिए इसका प्रयोग सर्वाधिक होता है।

अवलोकने का अर्थ एवं परिभाषाएँ

‘अवलोकन’ का शाब्दिक अर्थ ‘देखना’ है। इसे ‘निरीक्षण’ भी कहते हैं। ‘अवलोकन’, ‘निरीक्षण अथवा ‘प्रेक्षण’ को सभी प्रकार के विज्ञानों में महत्त्वपूर्ण स्थान है; क्योंकि हम सभी प्रकार की समस्याओं एवं घटनाओं को आँखों से देखकर पहचान सकते हैं। इस प्रकार अवलोकन किसी अध्ययन-वस्तु को निष्पक्ष भाव से देखने की वह प्रणाली है, जिसके द्वारा अनुसंधानकर्ता अध्ययन-वस्तु के संबंध में कुछ ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करता है।
प्रमुख विद्वानों ने अवलोकन की परिभाषाएँ निम्न प्रकार दी हैं-

ऑक्सफोर्ड कंसाइज डिक्शनरी’ (Oxford Concise Dictionary) में अवलोकन को इन शब्दों में परिभाषित किया गया है-“अवलोकन का अर्थ है घटनाओं को, जैसे कि वे प्रकृति में होती हैं, कार्य तथा कारण अथवा परस्पर संबंध की दृष्टि से यथातथ्य देखना और नोट करना।’

मोजर (Moser) के अनुसार-“अवलोकनको सुंदर ढंग से वैज्ञानिक जाँच-पड़ताल की पद्धति कहा जा सकता है। ठोस अर्थों में अवलोकन में कानों तथा वाणी की अपेक्षा आँखों का प्रयोग होता है।”

यंग (Young) के अनुसार—अवलोकन आँखों के द्वारा किया गया विचारपूर्ण अध्ययन है, जिसका प्रयोग सामूहिक व्यवहार तथा जटिल सामाजिक संस्थाओं के साथ-साथ संपूर्णता का निर्माण करने वाली पृथक्-पृथक् इकाइयों का सूक्ष्म निरीक्षण करने की एक पद्धति के रूप में किया जा सकता है।”

अवलोकन की प्रमुख विशेषताएँ

अवलोकन की संकल्पना को इसकी निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. मानव-इंद्रियों, विशेष रूप से आँखों का प्रयोग–अवलोकन में मानव इंद्रियों का; विशेष रूप से आँखों का प्रयोग किया जाता है। इसलिए इसे ‘आँखों द्वारा देखने की एक कला’ कहा गया है, जिससे अध्ययन-वस्तु से सम्बन्धित प्राथमिक सामग्री का संचय किया जाता है। मोजर ने ठीक ही कहा है कि “ठोस अर्थ में अवलोकन में कानों और वाणी की अपेक्षा आँखों का अधिक प्रयोग होता है।”
  2. मूलभूत वैज्ञानिक पद्धति–अवलोकन को एक मूलभूत वैज्ञानिक पद्धति माना गया है; क्योंकि – यह प्रत्येक विषय (चाहे वह प्राकृतिक विज्ञान है अथवा सामाजिक विज्ञान) में सामान्य रूप से प्रयोग की जाती है। इस प्रविधि के द्वारा विश्वसनीय सूचनाएँ एकत्रित की जा सकती हैं।
  3. अध्ययन-वस्तु का प्रत्यक्ष निरीक्षण–अवलोकन एक वैज्ञानिक पद्धति है, जिसमें अध्ययन-वस्तु का प्रत्यक्ष निरीक्षण किया जा सकता है। यह एक ऐसी पद्धति है जिसमें अनुसंधानकर्ता अपनी सभी इंद्रियों का प्रयोग करके अध्ययन-वस्तु से संबंधित तथ्यों की प्रत्यक्ष रूप से खोज करता है।
  4. उद्देश्यपूर्ण अध्ययन–अवलोकन पद्धति इसलिए भी वैज्ञानिक मानी जाती है क्योंकि यह उद्देश्यपूर्ण अध्ययनों में सहायक है। इसके द्वारा अनुसंधानकर्ता अपनी सभी इंद्रियों का प्रयोग केवल उन्हीं घटनाओं के अवलोकन के लिए करता है, जो अध्ययन की समस्या के अनुकूल हैं।
  5.  गहन अध्ययन–अवलोकन केवल उद्देश्यपूर्ण अध्ययन करने में ही सहायक नहीं है, अपितु गहन अध्ययन करने में भी सहायक है। यह सामाजिक मानवशास्त्र तथा मानवशास्त्र जैसे विषयों में एकमात्र ऐसी प्रविधि है, जो विश्वसनीय सूचनाओं को गहन रूप से संकलित करने में सहायक है। समाजशास्त्र में भी इसका प्रयोग एक पूर्ण अथवा पूरक प्रविधि के रूप में बढ़ता जा रहा है।
  6. कार्य-कारण संबंधों की व्याख्या-अवलोकन द्वारा विभिन्न घटनाओं में पाए जाने वाले कार्य-कारण संबंधों की व्याख्या की जा सकती है। प्राकृतिक विज्ञानों में यह कार्य-कारण संबंधों की व्याख्या करने की एकमात्र पद्धति है। समाजशास्त्र में भी इसका प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।
  7. विश्वसनीयता–अवलोकन द्वारा एकत्रित सूचनाएँ अधिक विश्वसनीय होती हैं। इसमें क्योंकि अनुसंधानकर्ता स्वयं देखकर अध्ययन करता है, इसलिए वस्तुनिष्ठ एवं विश्वसनीय सूचनाएँ ही संकलित होती हैं। इसमें किसी घटना एवं समस्या का अध्ययन उसी रूप में किया जाता है, जिस रूप में वह विद्यमान होती है।
  8. सामूहिक व्यवहार का अध्ययन–अवलोकन सामूहिक व्यवहार का अध्ययन करने में भी सहायक है। क्योंकि इसमें अवलोकनकर्ता सरलता से अवलोकित समूह के सदस्यों से घुल-मिल जाता है, इसलिए वह बिना अपना उद्देश्य बताए समूह के सदस्यों के सामूहिक व्यवहार का अध्ययन कर सकता है।

अवलोकन के प्रमुख प्रकार

सामाजिक अनुसंधान में अवलोकन का प्रयोग विविध रूपों में किया जाता है। प्रमुख रूप से अवलोकन को निम्नलिखित प्रकारों में बाँटा जा सकता है-

1. अनियंत्रित अथवा साधारण अवलोकन-जब अनुसंधानकर्ता किन्हीं प्राकृतिक अवस्थाओं का अध्ययन करने हेतु कुछ क्रियाओं का निरीक्षण करता है तो वह अपने निरीक्षण कार्य में पूर्ण स्वतंत होता है। उसके इस कार्य में किसी बाह्य शक्ति या आंतरिक भावना का कोई प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता। इस प्रकार की स्वतंत्र निरीक्षण विधि में अनुंसधानकर्ता का आंतरिक या बाह्य किसी भी प्रकार का कोई नियंत्रण नहीं होता, इसलिए इस अवलोकन को समाजशास्त्रियों ने अनियंत्रित अवलोकन की संज्ञा दी है। इस प्रकार के अवलोकन से अनुसंधानकर्ता अध्ययन-वस्तु से संबंधित संपूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लेता है। इसलिए गुड एवं हैट (Goode and Hatt) का कहना है, “व्यक्तियों के पास सामाजिक संबंधों के बारे में जो कुछ भी ज्ञान है,वह अनियंत्रित निरीक्षण के द्वारा ही प्राप्त हुआ है। इसी प्रकार पी०वी० यंग (PV. Young) ने लिखा है, “अनियंत्रित अवलोकनों में जीवन की वास्तविक दशाओं की सावधानीपूर्वक परीक्षा की जाती है तथा अवलोकित घटना की यथार्थता की जाँच करने अथवा यथार्थता के परीक्षण-हेतु यंत्रों के प्रयोग करने का कोई प्रयत्न नहीं किया जाता।” इस प्रकार, अनियंत्रित अवलोकन में घटना का वास्तविक रूप में अध्ययन किया जाता है तथा उस घटना पर अथवा अवलोकतनकर्ता पर किसी प्रकार का नियंत्रण रखने का प्रयास नहीं किया जाता। अनियंत्रित अवलोकन के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं-

  • सहभागी अवलोकन-इस प्रकार के अवलोकन में अनुसंधानकर्ता उस समूह में जाकर बस जाती है जिसका वह अध्ययन करता है। अनुसंधानकर्ता समूह की सभी क्रियाओं में सक्रिय भाग लेता है और अपने आपको समूह के सदस्य के रूप में स्वीकार होने योग्य बना देता है। इस प्रकार सहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता अध्ययन किए जाने वाले समूह के लोगों से घुल-मिलकर समूह की गतिविधियों व समस्या का अध्ययन करता है। किन्तु इस संबंध में अनुसंधानकर्ता को काफी सतर्क रहना पड़ता है ताकि किसी भी स्तर पर समूह के सदस्यों को उस पर किसी प्रकार की शंका न होने पाए, अन्यथा समूह के सदस्यों के व्यवहार में औपचारिकता एवं कृत्रिमता आ जाएगी और अनुसंधानकर्ता अपने उदृदेश्य की पूर्ति करने में असफल रहेगा।
  • असहभागी अवलोकन-इस प्रकार के अवलोकन में अनुसंधानकर्ता अध्ययन किए जाने वाले समूह का सदस्य नहीं बनता और न वह उस समूह की क्रियाओं में कोई भाग ही लेता है। वह दूर से ही समूह की क्रियाओं का अध्ययन करता है और साथ-ही-साथ समूह के सदस्यों को अपना परिचय देकर यह भी बतला देता है कि उसका उद्देश्य समूह की क्रियाओं का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष भाव से अध्ययन करना है। इस प्रकार असहभागी अवलोकन, सहभागी अवलोकन का विपरीत रूप है।
  • अर्द्ध-सहभागी अवलोकन-इस प्रकार के अवलोकन में अनुसंधानकर्ता समुदाय के कुछ कार्यों में भाग लेकर और कुछ कार्यों में वह भाग न लेकर समूह का तटस्थ रूप से अध्ययन करता है। इस प्रकार कुछ सीमा तक अनुसंधानकर्ता सहभागी अवलोकन द्वारा समुदाय का अध्ययन करता है। यह सहभागी तथा असहभागी अवलोकन दोनों का मिश्रित रूप है तथा वास्तव में अधिक, उपयोगी है।

2. नियंत्रित अथवा व्यवस्थित अवलोकन-इस प्रकार के अवलोकन में अनुसंधानकर्ता पर अनेक नियंत्रण लगे रहते हैं। यह नियंत्रण अनेक प्रविधियों के रूप में लगा होता है। दूसरे शब्दों में, नियंत्रित अवलोकन के अंतर्गत अनुसंधानकर्ता को अवलोकन कार्यों में अनेक सीमाओं का ध्यान रखना पड़ता है। ये सीमाएँ सामाजिक घटनाओं के लिए और साथ-ही-साथ अनुसंधानकर्ता के लिए लगाई जाती हैं। क्योंकि सामाजिक घटनाओं में घटना पर नियंत्रण रखना कठिन है, इसलिए अधिकांशतया अनुसंधानकर्ता को स्वयं पर ही नियंत्रण रखना पड़ता है। अनुसंधानकर्ता को अवलोकन करने की योजनाओं को बनाना पड़ता है। इसके अतिरिक्त अपनी डायरी में अवलोकित तथ्यों को लिखना पड़ता है या उन्हें टेपरिकॉर्डर द्वारा रिकॉर्ड करना पड़ता। है। इस प्रकार नियंत्रित अवलोकन में अवलोकनकर्ता को निश्चित सिद्धांतों की सीमाओं में रहकर ही अवलोकन का कार्य करना पड़ता है।

3. सामूहिक अवलोकन-इस प्रकार के अवलोकन में एक ही समस्या का अवलोकन कई अनुसंधानकर्ता एक साथ सामूहिक रूप से करते हैं। ये अनुसंधानकर्ता सामाजिक घटना के विभिन्न पक्षों के विशेषज्ञ होते हैं। अवलोकन करने के उपरांत ये सब अनुसंधानकर्ता विचार-विमर्श करके समस्या से संबंधित उपकल्पना निर्माण करते हैं। इस प्रकार के अवलोकन | में व्यक्तिगत पक्षपात होने तथा किसी पक्ष के छूट जाने की संभावना पूर्णतया समाप्त हो जाती है।

निष्कर्ष–उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि अवलोकन एक ऐसी प्रविधि है,जिसमें अनुसंधानकर्ता अपनी आँखों से देखकर किसी समस्या का विचारपूर्वक अध्ययन करता है। इस प्रकार का अवलोकन अनियंत्रित, नियंत्रित तथा सामूहिक हो सकता है। जब अनुसंधानकर्ता समस्या से संबंधित समुदाय का सदस्य बनकर समुदाय के कार्य में सक्रिय भाग लेता है तो वह सहभागी अवलोकन कहलाता है और जब वह समुदाय के कार्य में भाग न लेकर दूर से ही समुदाय को अध्ययन करता है तो वह असहभागी अवलोकन कहलाता है। कभी-कभी अनुसंधानकर्ता कुछ कार्यों में भाग लेकर और कुछ दूर से ही देखकर समस्या का अध्ययन करता है। ऐसी स्थिति को समाजशास्त्रियों ने अर्द्ध-सहभागी अवलोकन कहा है। सभी प्रकार के अवलोकन समुदाय और उसकी समस्याओं का पूर्ण ज्ञान प्रदान करने में सहायक होते हैं, इसलिए कहा गया है, जो कुछ भी किसी समस्या का हमें ज्ञान है, वह अवलोकन का ही प्रतिफल है।”

प्रश्न 2.
पद्धति एवं यंत्र (तकनीक) से आप क्या समझते हैं? पद्धति एवं यंत्र में अंतर स्पष्ट कीजिए। “अंतिम ध्येय तक का संपूर्ण मार्ग पद्धति है, जबकि उस संपूर्ण मार्ग को पूरा करने में प्रयुक्त उपकरण यंत्र है।” इस कथन की पुष्टि करते हुए ‘पद्धति’ तथा ‘यंत्र में सोदाहरण अंतर स्पष्ट कीजिए।
या
‘पद्धति’ तथा ‘यंत्र का अर्थ बताते हुए दोनों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
समाजशास्त्र तथा अन्य सभी सामाजिक विज्ञानों में कुछ पद्धतियों (Method) एवं यंत्रों (Tool or Technique) का प्रयोग किया जाता है। पद्धति हमारे अनुसंधान को दृष्टिकोण प्रदान करती है तथा अनुसंधान के सभी चरणों में सहायता प्रदान करती है। यह अनुसंधान करने वाले का मार्गदर्शन करती है। तथा उसे वास्तविकता को देखने तक एक विशिष्ट नजरिया प्रदान करती है। इसके विपरीत, यंत्र अथवा तकनीक केवल आँकड़ों के संकलन का एक माध्यम मात्र है। यह केवल अनुसंधान के एक चरण अर्थात् तथ्यों या आँकड़ों के संकलन से संबंधित है।

पद्धति का अर्थ एवं परिभाषाएँ

पद्धति वह तरीका है, जिसको अपनाकर एक अनुसंधानकर्ता अपना अध्ययन करता है। विभिन्न विद्वानों ने पद्धति को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है–

वुल्फ (Wolfe) के मतानुसार-“विस्तृत अर्थ में कोई भी अनुसंधान पद्धति, जिसके द्वारा विज्ञान का निर्माण हुआ हो अथवा उसका विस्तार किया जा रहा हो, वैज्ञानिक पद्धति कहलाती है।”

लुडबर्ग (Lundberg) के विचारानुसार-“वैज्ञानिक पद्धति में समंकों का क्रमबद्ध अवलोकन, वर्गीकरण तथा निर्वाचन सम्मिलित है। हमारे प्रतिदिन के निष्कर्षों तथा वैज्ञानिक पद्धति में अंतर; उसके स्वरूप, दृढ़ता, सत्यापन किए जाने की शक्ति, योग्यता तथा विश्वसनीयता के आधार हैं।”

एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका’ (Encyclopaedia Britanica) के अनुसार-“वैज्ञानिक पद्धति एवं विभिन्न प्रक्रियाओं का संकेत करने वाला एक समूहवाचक पद है, जिसकी सहायता से विज्ञान बनाए गए हैं। विस्तृत अर्थों में खोज की कोई भी विधि वैज्ञानिक पद्धति कहला सकती है, जिसके द्वारा वैज्ञानिक तटस्थ और व्यवस्थित ज्ञान प्राप्त कर सकता है।”

बर्टेड (Bertrand) के अनुसार-“प्रकृति में नियमितता के निर्धारण और वर्गीकरण में प्रयुक्त प्रणाली को वैज्ञानिक पद्धति कहा जाता है।”

गुड एवं हैट (Goode and Hatt) के अनुसार–“जब विज्ञान की आधारभूत बातों को समाजशास्त्र के क्षेत्र में लागू किया जाता है तो उसे समाजशास्त्र की अध्ययन पद्धति कहते हैं।’

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि पद्धति एक ऐसा उपकरण या माध्यम है, जिसके द्वारा वैज्ञानिक अपना अध्ययन करता है। यह संपूर्ण अध्ययन को दृष्टिकोण प्रदान करती है।

पद्धति की प्रमुख विशेषताएँ

पद्धति में निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं-

  1. सत्यापन तथा उसकी परीक्षा-वैज्ञानिक पद्धति द्वारा जो भी निष्कर्ष निकाले जाते हैं, वे सत्य होते हैं। किसी भी प्रकार का संदेह होने पर भविष्य में भी उनकी सत्यता की परीक्षा की जाती है।
  2. सुनिश्चितता–वैज्ञानिक पद्धति पूर्णत: सुनिश्चित होती है और उसका प्रयोग कोई भी व्यक्ति कर सकता है। इसके सुस्पष्ट चरण हैं, जिनके बारे में किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं पाया जाता है।
  3. निष्पक्षता–वैज्ञानिक पद्धति में अध्ययनकर्ता अपने स्वयं के विचारों से प्रभावित नहीं होता वरन् वह निष्पक्ष भाव से अपने अवलोकन के आधार पर ही निष्कर्षों का निर्माण करता है।
  4. सार्वभौमिकता-वैज्ञानिक पद्धति तथ्य विशेष पर लागू नहीं होती बल्कि वह वर्ग विशेष परे लागू होती है, इसलिए वह सार्वभौमिक होती है। दूसरे शब्दों में, वैज्ञानिक पद्धति का रूप सभी विषयों में एक समान होता है।
  5. निष्कर्षों का पूर्वानुमान-वैज्ञानिक पद्धति में जिन निष्कर्षों को प्राप्त किया जाता है उनके संबंध में पूर्व अनुमान लगा लिया जाता है। उपकल्पना का निर्माण एक प्रकार से पूर्वानुमान ही है। यदि यह (पूर्वानुमान) प्रमाणित हो जाता है तो निष्कर्ष बन जाता है।
  6. भविष्यवाणी–वैज्ञानिक पद्धति के अंतर्गत किसी तथ्य के संबंध में भविष्यवाणी की जा सकती है। क्योंकि इसमें कार्य-कारण संबंधों का पता चल जाता है इसलिए आने वाले समय में अनुमान भी लगाया जा सकता है।

समाजशास्त्र में प्रयुक्त प्रमुख पद्धतियाँ

आज समाशास्त्र में निम्नलिखित पद्धतियों का मुख्यत: प्रयोग किया जाता ह-

  1. ऐतिहासिक पद्धति-इस पद्धति के द्वारा अध्ययन की विषय-वस्तु के इतिहास तथा उसके विकास का पूर्ण अध्ययन किया जाता है और उस अध्ययन के आधार पर ही विषय-वस्तु के संबंध में अनेक नवीन खोजें की जाती हैं। यह विधि अतीत का अध्ययन करने की सर्वोत्तम पद्धति है।
  2. तुलनात्मक पद्धति–इस पद्धति के द्वारा विभिन्न विषयों पर परस्पर तुलना की जाती है। इस तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर विषयों से संबंधित अनेक नवीन तथ्यों की खोज की जाती है।
  3. आगमन तथा निगमन पद्धति-आगमन पद्धति में विशिष्ट इकाइयों का अध्ययन करके सामान्य सिद्धांतों का निर्माण किया जाता है और निगमन पद्धति में सामान्य सिद्धांतों को विशिष्ट इकाइयों पर लागू किया जाता है।
  4. संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक पद्धति–संरचनात्मक पद्धति में किसी विषय की संरचना का विश्लेषण करके उन तत्त्वों की खोज की जाती है, जो विषय की संरचना में मुख्य रूप से योगदान देते हैं। प्रकार्यात्मक पद्धति में किसी समग्र के किसी एक विशेष अंग या भाग का अध्ययन किया जाता है। वह अंग उस समग्र को बनाए रखने में जो योगदान देता है,उसे ही उसका प्रकार्य कहते हैं।

इन पद्धतियों के अतिरिक्त, समाजशास्त्र में संघर्ष पद्धति, व्यवस्थात्मक पद्धति, व्यवहारात्मक पद्धति, अंत-क्रियात्मक पद्धति इत्यादि का भी प्रयोग किया जाता है।

यंत्र या तकनीक का अर्थ एवं परिभाषा

यंत्र एक प्रकार से एक ऐसी युक्ति है, जिसका सहारा लेकर एक वैज्ञानिक अथवा समाजशास्त्री अपनी अध्ययन-वस्तु के संबंध में अनेक तंथ्यों का संकलन करता है। इसलिए गुड तथा हैट ने कहा है कि यंत्रों में वे विशिष्ट प्रणालियाँ सम्मिलित हैं जिनके द्वारा समाजशास्त्री अपने समंकों को एकत्रित और व्यवस्थित करता है। इस प्रकार यंत्र शोध कार्य में सहायता देने वाले तथ्यों को संकलन करने की एक प्रणाली का नाम है।

यंत्र यो तकनीक की प्रमुख विशेषताएँ

यंत्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1.  विषय-सामग्री के संकलन में सहायता-यंत्र एक उपकरण का नाम है, जिसके द्वारा एक समाजशास्त्री अपने क्षेत्र की विषय-सामग्री को संकलित एवं व्यवस्थित करता है। प्रश्नावली, अनुसूची, अवलोकन, साक्षात्कार, वैयक्तिक अध्ययन, समाजमिति इत्यादि ऐसे ही कुछ उपकरण हैं।
  2. अध्ययन की विषय-वस्तु के अनुसार भिन्नता–यंत्र भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भिन्न प्रकार का भी हो सकता है। सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर यह निर्णय लेना पड़ता है कि कौन-से यंत्र द्वारा तथ्यों का संकलन किया जाए। उदाहरणार्थ-जनजातियों के अध्ययन में सहभागी अवलोकन यंत्र उपयुक्त माना गया है, जबकि शिक्षित लोगों के अध्ययन में प्रश्नावली सर्वाधिक उपयुक्त यंत्र है।
  3. सामाजिक विज्ञानों से भिन्नता–भौतिक विज्ञानों की पद्धतियों और सामाजिक विज्ञानों के यंत्रों में अंतर पाया जाता है। क्योंकि सामाजिक-सांस्कृतिक तथा भौतिक घटनाओं की प्रकृति में अंतर है अतः दोनों की अध्ययन पद्धतियाँ भी भिन्न हैं।
  4. अंतर की कम संभावना-सामाजिक विज्ञानों में प्रयोग किए जाने वाले यंत्रों में बहुत कम अंतर देखने को मिलता है। परस्पर संबंधित विषय होने के कारण इनमें प्रयुक्त यंत्रों में समानता होना स्वाभाविक ही है।
  5. अनिश्चित प्रकृति-यंत्र अनिश्चित होते हैं। नई-नई समस्याओं का अध्ययन करने के लिए नए-नए यंत्रों का विकास होता है।
  6. असार्वभौमिकता-यंत्रों का प्रयोग सभी विज्ञानों में नहीं किया जाता और यंत्रों के स्वरूपों में अंतर पाया जाता है।
  7.  सामग्री का संकलन-यंत्र का उद्देश्य केवल सामग्री को एकत्रित करना ही नहीं है अपितु उसको व्यवस्थित करना भी है।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि यंत्र एक ऐसा उपकरण है जो अनुसंधान में आँकड़े एकत्रित करने में सहायता प्रदान करता है।

पद्धति और यंत्र में अंतर

कुछ लोग पद्धति तथा यंत्र को एक ही समझ लेते हैं जोकि उचित नहीं है। दोनों में निम्नलिखित प्रमुख अंतर पाए जाते हैं-
UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology Research Methods 1
UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology Research Methods 2
निष्कर्ष–उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि पद्धति तथा यंत्र दो भिन्नं संकल्पनाएँ हैं। पद्धति अनुसंधान को दृष्टिकोण प्रदान करती है तथा अनुसंधान के सभी चरणों में सहायक होती है। यंत्र का संबंध केवल आँकड़ों के संकलन के उपकरण से है।

प्रश्न 3.
अवलोकन कार्य के मार्ग में आने वाली बाधाओं का उल्लेख कीजिए और उनको दूर करने के उपायों का वर्णन कीजिए।
या
अवलोकन को वैज्ञानिक बनाने हेतु सुझाव दीजिए।
उत्तर
अवलोकन प्रविधि सामाजिक अनुसंधान में प्रयोग की जाने वाली सर्वाधिक प्रचलित प्रविधि है, परंतु यह जितनी सरल लगती है, वास्तव में इसके द्वारा ऑकड़े एकत्रित करना उतना ही कठिन कार्य है। अवलोकन अनेक रूपों में प्रभावित होता है, जिन्हें हम इसके मार्ग में आने वाली बाधाएँ कह सकते हैं।
अवलोकन के मार्ग की प्रमुख बाधाएँ अवलोकन के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाएँ इस प्रकार हैं-

1. नेत्रों के कार्य में पक्षपात–अवलोकन का कार्य करने में हमारी ज्ञानेंद्रियाँ महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं। इन ज्ञानेंद्रियों में सर्वप्रथम स्थान नेत्रों का है। नेत्रों के द्वारा ही हम अपना निरीक्षण कार्य करते हैं, किंतु कई परीक्षणों से यह सिद्ध हो चुका है कि नेत्रों द्वारा देखा गया दृश्य भी कभी-कभी विश्वसनीय नहीं होता है। दूसरे शब्दों में, हमारे नेत्रों की अवलोकन शक्ति भी अचूक नहीं होती है। हम कभी-कभी अत्यंत पक्षपातपूर्ण ढंग से या अपने मूल्यों वे शंकाओं के अनुरूप किसी वस्तु का निरीक्षण करते हैं; अतः हम अपने अवलोकन के कार्य में सफल नहीं होते। इसीलिए कहा गया है कि हम अपनी ज्ञानेंद्रियों के पक्षपातपूर्ण कार्यों के कारण भी अवलोकन को विश्वसनीय नहीं कह सकते।

2. व्यवहार की अनिश्चितता–अवलोकन के कार्य में एक मुख्य बाधा अवलोकन किए जाने वाले समूह के व्यक्तियों के व्यवहार की अनिश्चितता भी है। व्यक्ति अपने व्यवहार में वास्तविक नहीं होते। जब किसी समूह के व्यक्तियों को यह पता चलता है कि उनके व्यवहार का अवलोकन किया रहा है तो उनके व्यवहार में कृत्रिमता आ जाती है और इस व्यवहार की कृत्रिमता के कारण उनके द्वारा किए गए क्रिया-कलापों का अवलोकन विश्वसनीय नहीं होता। ऐसी दशा में सदस्यों के व्यवहार की कृत्रिमता अवलोकन के कार्य में बाधा पहुँचाती है।

3. पूर्वज्ञान का महत्त्व–अनुसंधानकर्ता पूर्वज्ञान के आधार पर भी बहुत-सी वस्तुओं के संबंध में अनुमान कर लेता है। इसलिए वह केवल अवलोकन पर ही आश्रित नहीं रहता। उसका पूर्वज्ञान कभी-कभी अध्ययन-वस्तु के संबंध में उसे धोखा भी दे सकता है या अपने पूर्वज्ञान के आधार पर वह वस्तु के संबंध में अपनी कल्पनाएँ बना लेता है और अवलोकन की उपेक्षा करके वस्तु के संबंध में कल्पनाओं के आधार पर प्राप्त ज्ञान को ही सत्य मान लेता है। इस प्रकार पूर्वज्ञान भी अवलोकन के मार्ग में बाधा उपस्थित करता है।

4. अनुसंधानकर्ता का स्वार्थ-अवलोकन के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा अनुसंधानकर्ता का व्यक्तिगत पक्षपात है। अनुसंधानकर्ता अपने व्यक्तिगत दृष्टिकोण से किसी विषय-वस्तु का अध्ययन करता है। सभी समस्याओं का अध्ययन अनुसंधानकर्ता अपने-अपने दृष्टिकोण से भिन्न-भिन्न रूप में करते हैं। इसके अतिरिक्त अनुसंधानकर्ता जिन समस्याओं का अध्ययन करना चाहता है, वह स्वयं भी उन्हीं घटनाओं से अथवा व्यक्तिगत पक्षपात से प्रभावित रहता है। अनुसंधानकर्ता का व्यक्तिगत पक्षपात भी अवलोकन के मार्ग में बाधक है।

5. घटनाओं के पूर्ण ज्ञान में कमी-अवलोकन के कार्य में सबसे बड़ी बाधा यह भी है कि अवलोकन के द्वारा घटनाओं का पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं होता है। जिन घटनाओं का हम अध्ययन कर रहे हैं, यह सम्भव है कि वे घटनाएँ किन्हीं विशेष परिस्थितियों में घटित हों। इन विशेष परिस्थितियों में घटित होने के कारण उनमें अनेक बाधाएँ उपस्थित होती हैं।

अवलोकन को वैज्ञानिक बनाने के लिए सुझाव

अवलोकन की सीमाओं को यदि सामने रखा जाए तो इसको वैज्ञानिक बनाने के मार्ग में पक्षपात, व्यवहार में कृत्रिमता तथा अवलोकनकर्ता के स्वार्थ आदि प्रमुख समस्याएँ आती हैं, लेकिन इन्हें थोड़ी सावधानी बरतकर दूर किया जा सकता है। अवलोकन को निम्नलिखित उपायों द्वारा अधिक विश्वसनीय बनाया जा सकता है-

  1. अवलोकन योजना–अवलोकन करने से पहले अनुसंधानकर्ता को चाहिए कि वह किसी कार्य का अवलोकन करने से पूर्व अपनी अध्ययन-वस्तु के संबंध में पूर्ण योजना बना ले, जिससे अवलोकन को कार्य सरल हो जाता है तथा अवलोकनकर्ता निर्धारित योजना के अनुसार केवल संबंधित तथ्यों का ही अवलोकन करता है।
  2. निष्पक्षता–अवलोकनकर्ता को चाहिए कि वह उन तथ्यों को निष्पक्ष एवं भाव से चयन करे, जिनका उसे अध्ययन करना है। इस अध्ययन में उसके विचार पक्षपात का स्रोत हो सकते हैं। इसलिए अपने विचारों से प्रभावित हुए बिना उसे निष्पक्ष रूप से अपना अध्ययन करना चाहिए।
  3. अवलोकन पथप्रदर्शिका तथा अनुसूची का प्रयोग–अवलोकन में यदि अवलोकन पथप्रदर्शिका तथा अनुसूची का प्रयोग किया जाए तो वह अधिक सूक्ष्म तथा अर्थपूर्ण हो सकती है। अनुसूची इस प्रकार तैयार की जानी चाहिए कि उसके आधार पर अध्यय-वस्तु के संबंध में पूर्ण ज्ञान हो सके।
  4. उपकल्पना का निर्माण–अवलोकन कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए सुनिश्चित उपकल्पना का निर्माण करना अत्यन्त आवश्यक है; क्योंकि ऐसा करने से अनुसंधान कार्य केंद्रित हो जाता है।
  5. निश्चित समस्या का निर्माण–अवलोकन की सफलता के लिए यह भी आवश्यक है कि अध्ययन के लिए किसी निश्चित समस्या का निर्माण किया जाए और साथ-ही-साथ समस्या के अध्ययन का क्षेत्र भी निश्चित किया जाए। सामान्य समस्याओं का वैज्ञानिक अध्ययन एक कठिन कार्य है।
  6. यांत्रिक साधनों का प्रयोग–अवलोकन को फोटो-फिल्म (कैमरा) तथा टेप-रिकॉर्डर इत्यादि का प्रयोग करके अधिक सूक्ष्म और विश्वसनीय बनाया जा सकता है। यांत्रिक साधन मानवीय इंद्रियों के प्रयोग की कमी को दूर करने में सहायता प्रदान करते हैं।
  7. समाजमिति पैमानों का प्रयोग-समाजमिति पैमानों का प्रयोग करके गुणात्मक सामाजिक तथ्यों को ठीक प्रकार से मापा जा सकता है तथा अवलोकित सूचना की प्रामाणिकता की जाँच की जा सकती है। समाजमिति लघु समूहों में अवलोकन को अधिक विश्वसनीय एवं वैज्ञानिक बनाने में सहायक है।
  8. निष्पक्ष व्यवहार—अवलोकनकर्ता के कार्य में पक्षपातपूर्ण व्यवहार नहीं करना चाहिए। यदि वह निष्पक्ष रूप से व्यवहार का अवलोकन करेगा तो उसके निष्कर्ष अधिक प्रामाणिक, विश्वसनीय एवं वैज्ञानिक होंगे। यद्यपि यह एक कठिन कार्य है, तथापि अवलोकन-योजना बनाकर निष्पक्षता बनाए रखी जा सकती है।
  9. अवलोकन का सामूहिक रूप-अवलोकन को अधिक सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि अवलोकन का कार्य सामूहिक रूप से किया जाए, क्योंकि अनेक क्षेत्रों के विशेषज्ञों के द्वारा अवलोकन निष्पक्ष तथा त्रुटिहीन होता है। इसके लिए अनुसंधानकर्ताओं को एक दल सामूहिक रूप से घटनाओं को अवलोकन करता है। किसी एक अनुसंधानकर्ता की कमी अन्य अनुसंधानकर्ताओं के अवलोकन द्वारा दूर हो जाती है। इसलिए आजकल अवलोकन में सामूहिक दलों का महत्त्व निरंतर बढ़ता जा रहा है।

निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचने से यह स्पष्ट हो जाता है कि अवलोकन के मर्ग में आने वाली प्रमुख धाएँ वास्तव में अवलोकन पद्धति की कमियाँ नहीं हैं, अपितु अनुसंधानकर्ता द्वारा इस पद्धति का दोषपूर्ण रूप से प्रयोग करना है। इसलिए इसे वैज्ञानिक बनाने में अवलोकनकर्ता को ही अपने पर नियंत्रण रखना पड़ता है तथा उन सभी स्रोतों के प्रति सावधान रहना पड़ता है, जो अध्ययन को प्रभावित करके इसे अवैज्ञानिक बना देते हैं। सामूहिक दलों द्वारा अवलोकने का निरंतर बढ़ता हुआ उपयोग इस बात को प्रमाणित करता है कि यदि व्यक्तिगत पक्षपात पर नियंत्रण कर लिया जाए तो अवलोकन को काफी सीमा तक वैज्ञानिक बनाया जा सकता है।

प्रश्न 4.
सहभागी अवलोकन की संकल्पना स्पष्ट कीजिए।
या
सहभागी तथा असहभागी अवलोकन में अन्तर बताइए।
उत्तर
सामाजिक अनुसंधान में जिन पद्धतियों द्वारा आँकड़ों को संकलन किया जाता है, उनमें अवलोकन का प्रमुख स्थान है। यह सर्वाधिक प्रचलित पद्धति है, जिसमें आँखों का अधिकतर प्रयोग किया जाता है। सहभागी तथा असहभागी अवलोकन इसके प्रमुख प्रकार हैं।

सहभागी अवलोकन का अर्थ एवं परिभाषाएँ

सहभागी अवलोकन में अवलोकनकर्ता अध्ययन की जाने वाली परिस्थितियों में स्वयं भाग लेता है और इस समूह का औपचारिक सदस्य बन जाता है। समूह में पूर्ण रूप से घुल-मिलकर तथा सभी क्रिया-कलापों में भाग लेकर अपना उद्देश्य प्रकट किए बिना वह समूह के सदस्यों का अवलोकन करता है। सहभागी अवलोकन का प्रयोग तब किया जाता है जबकि अनुसंधानकर्ता उस समूह में स्वयं घुल-मिल जाता है जिसका कि वह अध्ययन करना चाहता है। प्रमुख विद्वानों ने इसे निम्न प्रकार परिभाषित किया है–

सोजर एवं कैल्टन (Moser and Kalton) के अनुसार—“इस विधि द्वारा अवलोकनकर्ता अध्ययन किए जाने वाले समूह अथवा संगठन के दैनिक जीवन में प्रवेश करता है।”

यंग (Young) के अनुसार–‘सहभागी अवलोकन में अवलोकनकर्ता किसी समूह की अस्थायी सदस्यता ग्रहण कर लेता है और समूह के सदस्यों के साथ मिलकर समूह के कार्यों में भाग लेता है, किंतु वह समूह के किसी भी सदस्य को यह आभास नहीं होने देता कि वह समूह का अध्ययन करने के उद्देश्य से समूह के कार्यों में समूह के सदस्य के साथ घुल-मिलकर भाग ले रहा है।”

गुड एवं हैट (Goode and Hatt) के अनुसार-“इस प्रविधि का प्रयोग तभी किया जा सकता है। जबकि अवलोकनकर्ता अपने उद्देश्य को प्रकट किए बिना उसी समूह का सदस्य मान लिया जाता है।” उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सहभागी अवलोकन में अवलोकनकर्ता उसी समूह का एक सदस्य बन जाता है जिसका कि उसे अवलोकन करना है। समूह में पूर्ण रूप से घुल-मिलकर तथा सभी क्रियाकलापों में भाग लेकर अपना उद्देश्य प्रकट किए बिना वह समूह के सदस्यों का अवलोकन करता है।

असहभागी अवलोकन का अर्थ एवं परिभाषाएँ

असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता समस्या से संबंधित समूह का न हो अस्थायी सदस्य बनता है। और न समूह के कार्यों में सक्रिय भाग लेता है, बल्कि वह दूर से ही एक तटस्थ निरीक्षणकर्ता के रूप में समस्याओं का अध्ययन करता है। इस अवलोकन में अवलोकनकर्ता अधिक गहराई तक पहुँचने का प्रयत्न नहीं करता। प्रमुख विद्वानों ने इसे इस प्रकारे परिभाषित किया

हैपी०एच० मन (PH, Mann) के अनुसार–‘असहभागी अवलोकन एक ऐसी विधि है जिसमें अवलोकन करने वाला अवलोकित से छिपा रहती है।” इस प्रकार असहभागी अवलोकन समूह के सदस्यों में सहभागिता किए बिना किया जाने वाला अवलोकन है। यह अवलोकन ही अधिकांश अध्ययनों में प्रयोग किया जाता है।

सहभागी तथा असहभागी अवलोकन में अंतर

सहभागी तथा असहभागी अवलोकन दो विपरीत प्रकार के अवलोकन हैं, जिनकी अपनी-अपनी उपयोगिताएँ तथा सीमाएँ हैं। दोनों में प्रमुख अंतर इस प्रकार से किया जा सकता है-

  1. सहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता समूह का अस्थायी सदस्य होता है, किन्तु असहभागी अवलोकन मे अनुसंधानकर्ता समूह का सदस्य नहीं होता।
  2. सहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता तटस्थ निरीक्षक के रूप में कार्य नहीं करता, परंतु असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता तटस्थ दर्शक के रूप में समस्या का अध्ययन करता है।
  3. सहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता एक प्रकार से परिचित व्यक्ति होता है, जबकि असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता एक अपरिचित व्यक्ति होता है।
  4. सहभागी अवलोकन के अंतर्गत अनुसंधानकर्ता स्वयं समूह का सदस्य रहता है, अतएव उसको अधिक समय तथा अधिक धन व्यय करना पड़ता है, जबकि असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता समूह की अस्थायी सदस्यता ग्रहण नहीं करता, अतएव उसके अनुसंधान कार्य करने में समय तथा धन कम लगता है।
  5. सहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता प्राप्त सूचनाओं की सत्यता की जाँच कर सकता है, परंतु असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता प्राप्त सूचनाओं की सत्यता की जाँच नहीं कर सकता।
  6. सहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता समूह का अस्थायी सदस्य होता है, जबकि असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता समूह का. सदस्य न होने के कारण एक अपरिचित तथा प्रतिष्ठित व्यक्ति होता है।

निष्कर्ष–उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि सहभागी एवं असहभागी अनुसंधान में प्रयोग किए जाने वाले दो भिन्न प्रकार के अवलोकन हैं। प्रथम में अनुसंधानकर्ता को अवलोकित समूह का अस्थायी सदस्य बनना पड़ता है। असहभागी अवलोकन में वह समूह में जाकर तटस्थ दर्शक के रूप में अवलोकन करता है।

प्रश्न 5.
एक अच्छे अवलोकनकर्ता के मुख्य गुणों का विवेचन कीजिए।
या
“अवलोकन की सफलता एक अच्छे अवलोकनकर्ता पर निर्भर करती है।” इस कथन के संदर्भ में एक अच्छे अवलोकनकर्ता के मुख्य गुणों की विवचेना कीजिए।
उत्तर
एक अच्छे अवलोकनकर्ता के गुण अवलोकन इतना सरल कार्य नहीं है जितना कि यह ऊपर से देखने में लगता है; अत: इसे ठीक प्रकार से करने के लिए तथा सही व वस्तुनिष्ठ सूचनाएँ एकत्रित करने के लिए एक कुशल अवलोकनकर्ता की आवश्यकता होती है। एक अच्छे अवलोकनकर्ता में निम्नांकित प्रमुख गुण पाए जाते हैं-

  1. बुद्धिबल—एक अच्छे अवलोकनकर्ता में बुद्धिबल होना अत्यंत अनिवार्य है। इसी बुद्धिमानी के आधार पर क्ह अपनी समस्या से संबंधित अर्थपूर्ण व वस्तुनिष्ठ सूचनाओं का संकलन करता
  2. विभिन्न साधनों व पद्धतियों का ज्ञान-एक अच्छे अवलोकनकर्ता को शोध कार्य को सफल बनाने के लिए विभिन्न साधनों व पद्धतियों का भी ज्ञान होना अनिवार्य है। वह अनेक अन्य पद्धतियों का प्रयोग सहायक पद्धतियों के रूप में करके अवलोकन द्वारा एकत्रित सूचनाओं को अधिक विश्वसनीय बना सकता है।
  3. सामाजिक जटिलता का ज्ञान-एक अच्छे अवलोकनकर्ता अथवा अनुसंधानकर्ता को सामाजिक व्यवहार तथा सामाजिक घटनाओं की जटिलता का भी पूर्ण ज्ञान होना चाहिए ताकि वह सभी सूचनाएँ एकत्रित कर सके। बिना इस ज्ञान के अधिक अर्थपूर्ण सूचनाएँ एकत्रित नहीं की जा सकतीं।
  4. सामाजिक मनोविज्ञान का ज्ञान-एक अच्छे व कुशल अवलोकनकर्ता का एक अच्छा मनोवैज्ञानिक होना भी अनिवार्य है ताकि वह अवलोकित समूह के सदस्यों को ठीक प्रकार से समझकर तथा उनका विश्वास प्राप्त करके ठीक सूचनाएँ एकत्रित कर सके।
  5. आवश्यक सूचनाओं के संकलन की क्षमता-एक अच्छे अनुसंधानकर्ता को अवलोकित विषय-क्षेत्र तथा समस्या के संबंध में पूर्ण ज्ञान होना चाहिए ताकि वह आवश्यक सूचनाओं का संकलन कर सके।
  6. दूरदर्शिता तथा व्यवहारकुशलता–एक अवलोकनकर्ता को दूरदर्शी होना चाहिए। उसे बहुत हो साच-समझकर कार्य करना चाहिए और अपने व्यवहार को परिस्थितियों के अनुकूल नियंत्रित रखना चाहिए। उसमें इतनी व्यवहारकुशलता होनी चाहिए कि वह दूसरों को अपनी ओर आकर्षित कर सके तथा सदस्यों से पूर्ण सहयोग प्राप्त कर सके।

निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि अगर सभी गुणों से संपन्न व्यक्ति एक कुशल अवलोकनकर्ता अथवा अनुसंधानकर्ता होगा तो वह अवलोकन के दोषों, जिनमें से अधिकांश अवलोकनकर्ता से ही संबंधित हैं, को दूर कर सकता है। आजकल सामूहिक अवलोकन द्वारा यह कार्य संभव हो गया है।

प्रश्न 6.
अवलोकन-पद्धति के गुणों एवं दोषों की विवेचना कीजिए।
या
सामाजिक अन्वेषण में प्रयोग की जाने वाली पद्धति के रूप में अवलोकन के गुण-दोषों की विवेचना कीजिए।
या
समाजशास्त्री अनुसंधान में अवलोकन-पद्धति के महत्त्व की व्याख्या कीजिए।
उत्तर

अवलोकन का मूल्यांकन

अवलोकन का अर्थ देखना है, अर्थात् आँखों के प्रयोग द्वारा घटनाओं की जाँच-पड़ताल करने की पद्धति को अवलोकन कहा जाता है। यह आँकड़े एकत्रित करने की एक विश्वसनीय एवं प्रामाणिक पद्धति मानी जाती है। अवलोकन का मूल्यांकन इसके गुणों एवं दोषों के आधार पर किया जा सकता है। किसी भी अनुसंधान पद्धति के अपने कुछ गुण तथा सीमाएँ होती हैं। अवलोकन के गुण-दोषों की विवचेना इस प्रकार से की जाती है-

अवलोकन के प्रमुख गुण

अवलोकन पद्धति में पाए जाने वाले प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-

  1. सरल अध्ययन–अवलोकन पद्धति का प्रयोग अत्यंत सरल कार्य है। इसमें अनुसंधानकर्ता को आँखों से निरीक्षण-मात्र करना होता है तथा घटना के बारे में तथ्य एकत्रित करने होते हैं। इस प्रकार के कार्य में अन्य किसी प्रकार के साधन की आवश्यकता नहीं होती है। क्योंकि सारे तथ्यों का संकलन देखकर किया जाता है, इसलिए अनुसंधानकर्ता तथ्यों के संकलन में भी सफल रहता है।
  2. सही सूचनाओं का संकलन–अवलोकन का अभिप्राय देखना है। व्यक्ति जिस वस्तु को स्वयं देखता है, वह उसके बारे में संपूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेता है। इसके अतिरिक्त ‘आँखों द्वारा देखकर एकत्रित सूचनाएँ अधिक विश्वसनीय होती हैं। किसी सूचनादाता द्वारा बताई गई बातें तो पक्षपातपूर्ण एवं गलत हो सकती हैं, परंतु आँखों द्वारा देखकर एकत्रित सूचनाएँ सदैव सही होती हैं।
  3. पुनः जाँच संभव–अवलोकन द्वारा प्राप्त निष्कर्षों के संबंध में यदि कोई शंका किसी समय होने लगे तो उसकी पुनः जाँच कभी भी की जा सकती है। पुनः जाँच द्वारा पहले से एकत्रित सूचनाओं की प्रामाणिकता को सिद्ध किया जा सकता है तथा तथ्यों की जाँच की जा सकती है।
  4. सार्वभौमिक पद्धति-अवलोकन एक सार्वभौमिक पद्धति है; क्योंकि एक तो इसका प्रयोग सभी विज्ञानों में होता है और दूसरे, विद्वानों का विचार है कि विज्ञान का कार्य अवलोकन द्वारा प्रारम्भ होता है और प्रामाणिकता की जाँच भी अवलोकन द्वारा ही होती है; अतः सभी सामजिक व प्राकृतिक विज्ञानों में ज्ञान प्राप्त करने की प्रथम श्रेणी अवलोकन हीं है और इसलिए इसे एक सार्वभौमिक पद्धति भी माना जाता है।
  5. ज्ञान में आशातीत वृद्धि—-अवलोकन पद्धति द्वारा ज्ञान में आशातीत वृद्धि होती है। हमारे ज्ञान में वृद्धि का प्रमुख स्रोत हमारा दैनिक घटनाओं का अवलोकन ही है। किसी भी वस्तु या दृश्य | को आँखों से देखकर वस्तु या प्रश्न के संबंध में पूर्ण ज्ञान हो सकता है।
  6. सर्वाधिक प्रचलित पद्धति-अवलोकन एक सर्वाधिक प्रचलित पद्धति है; क्योकि कोई भी ऐसा विज्ञान नहीं है जिसमें अवलोकन पद्धति का सर्वप्रथम प्रयोग नहीं किया जाता हो। इस पद्धति का प्रयोग केवल सूचनाएँ एकत्रित करने के लिए ही नहीं किया जाता, अपितु सूचनाओं की प्रामाणिकता की जाँच करने के लिए भी किया जाता है। इसलिए यह सर्वाधिक प्रचलित पद्धति है।
  7. उपकल्पनाओं का निर्माण–अवलोकन पद्धति उपकल्पनाओं के निर्माण का भी एक प्रमुख स्रोत है; क्योंकि अधिकांश उपकल्पनाओं का निर्माण व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर ही किया जाता है जो कि हमें अवलोकन द्वारा प्राप्त होता है।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि अवलोकन सूचनाओं के संकलन एवं संकलित सूचनाओं की प्रामाणिकता की जाँच करने की एक महत्त्वपूर्ण पद्धति है।

अवलोकन के प्रमुख दोष

एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पद्धति होने के बावजूद यह पूर्ण रूप से दोषरहित नहीं है। इसमें पाए जाने वाले प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं-

  1. अवलोकनकर्ता का वैयक्तिक दृष्टिकोण–प्रत्येक व्यक्ति की घटनाओं एवं वास्तविकता को देखने का अपना पृथक् दृष्टिकोण होता है तथा वह इस दृष्टिकोण से,अध्ययन के समय अधिक विमुख नहीं हो सकता। उसका यह वैयक्तिक दृष्टिकोण अवलोकन को अवैज्ञानिक बना देता है। तथा इससे एकत्रित सूचनाओं की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
  2. निष्पक्षता का अभाव-व्यक्ति अपने पूर्वजों की संस्कृति को विरासत में प्राप्त करता है और उसी संस्कृति को जीवन-पर्यंत पालन भी करता है। इसी संस्कृति द्वारा प्राप्त मूल्यों, विश्वासों व मनोवृत्तियों के आधार पर वह घटनाओं का अध्ययन भी करता है। अवलोकन करते समय वह अवलोकित घटना की व्याख्या अपने इन्हीं मूल्यों, मनोवृत्तियों एवं पूर्वाग्रहों के संदर्भ में करता है। जिससे संकलित आंकड़ों की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
  3. समय का अपव्यय-अवलोकन पद्धति में अवलोकनकता को घटना का अवलोकन करने के लिए स्वयं घटनास्थल पर जाना पड़ता है। वहाँ अनेक बार जाने व घटना का अवलोकन करने में काफी समय लग जाता है। यदि सहभागी अवलोकन द्वारा सूचना एकत्रित की जा रही है तो अवलोकनकर्ता को समूह के सदस्यों का विश्वास प्राप्त करने में ही काफी समय लग जाता है।।
  4. सदस्यों के व्यवहार में कृत्रिमता–यदि किसी समूह के सदस्यों को यह पता चल जाता है कि कोई अजनबी उनके बीच उपस्थित है और उनके व्यवहार का अवलोकन कर रहा है तो उनके व्यवहार में कृत्रिमता आ जाती है। इस दशा में अवलोकतनकर्ता सदस्यों के वास्तविक व्यवहार के बारे में ज्ञान प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाता।
  5. घटनाओं की अमूर्तता–समाजशास्त्र में अनेक घटनाएँ अमूर्त होती हैं, जिनका अवलोकन संभव नहीं है और इस प्रकार ऐसी घटनाओं के अवलोकन का अवसर अवलोकनकर्ता को प्राप्त ही नहीं होता है।
  6. घटनास्थल से दूरी-अवलोकन पद्धति का एक अन्य दोष अवलोकनकर्ता की घटनास्थल से दूरी है। क्योंकि पहले से यह पता नहीं होता है कि कौन-सी घटना कैब, कहाँ और किस रूप में घटित होगी, इसलिए अवलोकनकर्ता समय पर पहुँचकर उसका अध्ययन नहीं कर सकता।।
  7. घटनाओं की अनिश्चितता–घटनाओं के घटने के समय व स्थान निश्चित नहीं होते हैं। इसलिए अवलोकनकर्ता अधिकतर प्राथमिक स्तर पर आँकड़े एकत्रित करने में सफल नहीं हो पाता है। अनिश्चितता के कारण वह उनके संबंध में पूर्वानुमान नहीं लगा सकता है।
  8. भूतकालीन घटनाओं का अध्ययन अंसभव—अवलोकन पद्धति द्वारा भूतकालीन घटनाओं का अध्ययन नहीं किया जा सकता है, क्योंकि अतीत की घटनाओं को देखा नहीं जा सकता। अतः अवलोकन का प्रयोग केवल सीमित परिस्थितियों में ही किया जा सकता है।
  9. ज्ञानेंद्रियों की अपूर्ण क्षमता-ज्ञानेंद्रियों की क्षमता का पूर्ण न होना भी अवलोकन पद्धति का एक प्रमुख दोष है। यदि किसी घटना के कुछ पहलुओं को अवलोकनकर्ता देख न पाए अथवा जो वह देख रहा है उसे अर्थपूर्ण ढंग से समझ न सके तो प्राप्त सूचनाएँ दोषपूर्ण हो सकती हैं।

निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि अवलोकन एक महत्त्वपूर्ण पद्धति है, परंतु फिर भी यह पूरी तरह दोषरहित नहीं है। यदि दोषों को अवलोकनकर्ता के स्तर पर नियंत्रित करके कम कर दिया जाए तो यह एक अच्छी व अत्यंत विश्वसनीय पद्धति हो सकती है।

प्रश्न 7.
सामाजिक सर्वेक्षण के प्रमुख प्रकारों की विवचेना कीजिए।
उत्तर

सामाजिक सर्वेक्षणों के प्रकार

आज सामाजिक सर्वेक्षणों का विषय-क्षेत्र इतना अधिक विस्तृत है कि सामाजिक सर्वेक्षणों के कितने प्रकार हैं, यह बताना कठिन हो गया है। उद्देश्यों, विषय-वस्तु, प्रकृति एवं समयावधि के अनुसार सामाजिक सर्वेक्षणों का वर्गीकरण करने का प्रयास किया गया है।
वेल्स (Wells) ने सामाजिक सर्वेक्षणों को दो श्रेणियों में विभाजित किया है-

  1. प्रचार सर्वेक्षण-इस प्रकार के सर्वेक्षण सामान्यत: सरकारी योजनाओं अथवा सरकार द्वारा बनाए गए सामाजिक विधानों का प्रचार करने के उद्देश्य से किए जाते हैं। अन्य शब्दों में, इनका उद्देश्यं जनता में किसी बात के बारे में जागृति पैदा करना होता है।।
  2. तथ्य संकलन सर्वेक्षण—इस प्रकार के सर्वेक्षणों का उद्देश्य सामाजिक जीवन अथवा सामाजिक घटनाओं के बारे में तथ्यों का पता लगाना होता है। अगर इस कार्य में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाता है तो ऐसे सर्वेक्षण ‘वैज्ञानिक सर्वेक्षण’ कहे जाते हैं। अगर तथ्यों के संकलन के आधार पर किसी समस्या का समाधान बताना है तो ऐसे सर्वेक्षण व्यावहारिक सर्वेक्षण कहे जाते हैं।

यंग (Young) ने सामाजिक सर्वेक्षणों के निम्नांकित दो प्रकारों का उल्लेख किया है-

  1. प्रसंगात्मक सर्वेक्षण-इस प्रकार के सर्वेक्षणों का उद्देश्य सामाजिक जीवन के किसी एक पक्ष (जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक स्थिति आदि) के बारे में सूचना प्राप्त करना होता है। क्योंकि | ऐसे सर्वेक्षणों का एक ही प्रसंग होता है, इसलिए इन्हें प्रसंगात्मक सर्वेक्षण कहा जता है।।
  2. सामान्य सर्वेक्षण-इस प्रकार के सर्वेक्षण बहुपक्षीय विस्तृत अध्ययन पर आधारित होते हैं। राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा इस प्रकार के सर्वेक्षण अधिकतर किए जाते हैं। इन सर्वेक्षणों का उद्देश्य व्यक्तियों के सामान्य जीवन को समझना होता है।

हाइमन (Hyman) ने सामाजिक सर्वेक्षणों को निम्नलिखित दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया है-

  1. वर्णनात्मक सर्वेक्षण—इस प्रकार के सर्वेक्षणों को ‘विवरणात्मक सर्वेक्षण’ भी कहा जाता है, क्योंकि इनका उद्देश्य सामाजिक जीवन, सामाजिक घटना, सामाजिक दशा अथवा सामाजिक प्रक्रिया का विवरण प्राप्त करना होता है। इन सर्वेक्षणों में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाता
  2. अन्वेषणात्मक सर्वेक्षण-इस प्रकार के सर्वेक्षणों को व्याख्यात्मक सर्वेक्षण’ भी कहा जाता है; क्योंकि इनमें किसी घटना के विभिन्न कारकों की व्याख्या करने का प्रयास किया जाता है। अगर इनको उद्देश्य किसी कार्यक्रम का मूल्यांकन करना है तथा उसे प्रभावित करने वाले कारकों का पता लगाना है तो ऐसे सर्वेक्षण को ‘कार्यक्रम संबंधी सर्वेक्षण’ कहा जाता है। अगर सर्वेक्षण का उद्देश्य किसी समस्या के कारणों का पता लगाकर उसका निदान बताना है तो । ऐसे सर्वेक्षण को ‘निदानात्मक सर्वेक्षण’ कहा जाता है। अगर सर्वेक्षण का उद्देश्य भावी नीति बनाना है तो उसे ‘भविष्य निर्देशित सर्वेक्षण’ कहा जाता है। कुछ सर्वेक्षण ऐसे भी होते हैं, जिनका उद्देश्य पहले से किए गए सर्वेक्षणों से प्राप्त जानकारी की सत्यता की जाँच करना होता है। ऐसे सर्वेक्षणों को द्वितीयक सर्वेक्षण’ कहा जाता है।

सर्वेक्षणों को प्रकृति, उद्देश्यों एवं विषय-वस्तु के आधार पर निम्नांकित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. जनगणना सर्वेक्षण-इस प्रकार के सर्वेक्षण संपूर्ण समाज अथवा संपूर्ण समुदाय की इकाइयों का अध्ययन करते हैं। भारत में हर दस वर्ष बाद होने वाली जनगणना इस प्रकार के सर्वेक्षण का ही उदाहरण है।
  2. निदर्शन सर्वेक्षण-इस प्रकार के सर्वेक्षण में संपूर्ण समाज अथवा समुदाय का अध्ययन न करके उनका प्रतिनिधित्व करने वाली इकाइयों का अध्ययन किया जाता है। आजकले अधिकांश सर्वेक्षण निदर्शन पर ही आधारित होते हैं।
  3. मूल्यांकन सर्वेक्षण-इस प्रकार के सर्वेक्षणों का उद्देश्य सामाजिक जीवन अथवा सामाजिक घटना के विभिन्न पक्षों का मूल्यांकन करना होता है।
  4. मनोवृत्ति सर्वेक्षण-इस प्रकार के सर्वेक्षणों का उद्देश्य किसी समस्या अथवा घटना के बारे में – लोगों की मनोवृत्तियों का पता लगाना होता है।

उपर्युक्त सर्वेक्षणों के अतिरिक्त ग्रामीण सर्वेक्षण, नगरीय सर्वेक्षण, सरकारी सर्वेक्षण, अर्द्ध-सरकारी सर्वेक्षण, गैर-सरकारी सर्वेक्षण, गोपनीय सर्वेक्षण, सहकारी सर्वेक्षण, गुणात्मक सर्वेक्षण, गणनात्मक सर्वेक्षण, सामान्य सर्वेक्षण, विशिष्ट सर्वेक्षण, नियमित सर्वेक्षण, कार्यवाहक सर्वेक्षण, अंतिम सर्वेक्षण आदि सर्वेक्षणों का भी प्रयोग आधुनिक समाजों में किया जाने लगा है।

निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि समाजशास्त्र में अनेक प्रकार के सर्वेक्षणों का प्रयोग किया जाता है। वस्तुतः सर्वेक्षणों का प्रयोग समाजशास्त्र तक ही सीमित नहीं है। लगभग सभी विषयों में सर्वेक्षणों का किसी-न-किसी रूप में प्रयोग किया जाने लगा है।

प्रश्न 8.
सामाजिक सर्वेक्षण किसे कहते हैं? इसके प्रमुख उद्देश्य बताइए।
या
सामाजिक सर्वेक्षण की परिभाषा दीजिए तथा इसकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।
या
सामाजिक सर्वेक्षण से आप क्या समझते हैं। इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर
सामाजिक सर्वेक्षण आज के वैज्ञानिक युग की एक प्रमुख विशेषता है। यह वैज्ञानिक अध्ययन की एक प्रमुख पद्धति है जिसके द्वारा सामाजिक जीवन, सामाजिक संबंधों अथवा सामाजिक दशाओं की बड़ी सावधानीपूर्वक जाँच-पड़ताल की जाती है। इस जाँच-पड़ताल का उद्देश्य सामाजिक जीवन के बारे में जानकारी प्राप्त करके उसे अधिक सार्थक बनाना है। साथ ही इसका उद्देश्य सामाजिक दशाओं, घटनाओं एवं समस्याओं से संबंधित सामग्री का संकलन करना है तथा इनका आलोचनात्मक निरीक्षण करना है। सामाजिक सर्वेक्षण कोई आधुनिक बात नहीं है अपितु इसका इतिहास काफी लंबा रहा है। वस्तुतः सामाजिक सर्वेक्षण ने मानव सभ्यता का विकास करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सामाजिक सर्वेक्षण का अर्थ एवं परिभाषाएँ

‘सामाजिक सर्वेक्षण सामाजिक अनुसंधान की एक प्रमुख पद्धति मानी जाती है। सर्वेक्षण’ को अंग्रेजी , में ‘सर्वे’ (Survey) कहा जाता है, जो दो शब्दों से बना है-‘सर’ (sur) अथवा ‘सोर’ (sor) ‘वियर’ (veeir or veoir)। प्रथम शब्द का अर्थ ‘ऊपर’ (over) है जबकि दूसरे शब्द का अर्थ ‘देखना’ (see) है, अर्थात् ‘सर्वेक्षण’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘किसी घटना को ऊपर से देखना’ है। इस प्रकार ‘सामाजिक सर्वेक्षण’ का अर्थ हुआ ‘किसी सामाजिक घटना को ऊपर से देखना।’ परंतु ‘सामाजिक सर्वेक्षण’ शब्द का प्रयोग आज विशेष अर्थ में किया जाता है। इसका अर्थ सामाजिक अनुसंधान की उस पद्धति से है, जिसके द्वारा अनुसंधानकर्ता घटना स्थल पर जाकर उसका वैज्ञानिक रूप में अवलोकन करता है तथा उसके संबंध में जानकारी प्राप्त करता है।

प्रमुख विद्वानों ने इसे निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया है-
यांग (Yang) के अनुसार-“सामाजिक सर्वेक्षण सामान्यतया लोगों के एक समूह की रचना, क्रियाओं तथा रहन-सहन की दशाओं में छानबीन है।”

मोजर (Moser) के अनुसार-“समाजशास्त्रियों को सामाजिक सर्वेक्षण को एक तरीके, जो अत्यधिक व्यवस्थित है, के रूप में देखना चाहिए, जिसके द्वारा किसी क्षेत्र की खोज करने तथा अध्ययन विषय से प्रत्यक्ष संबंध रखने वाली सूचनाएँ एकत्रित करने में उपयोगी है जिससे समस्या पर प्रकाश पड़ता है और आवश्यक सुझावों की ओर संकेत किया जाता है।”

केलाँग (Kellong) के अनुसार-“सामाजिक सर्वेक्षण सामान्यतया वे सहकारी प्रयास माने गए हैं, जो वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग ऐसी सामाजिक समस्याओं के अध्ययन में करते हैं, जो इतनी गंभीर हैं कि जनमत को तथा समस्या के समाधान की इच्छा को जाग्रत करती हैं।”

बर्गेस (Burgess) के अनुसार-“एक समुदाय का सर्वेक्षण एवं सामाजिक विकास एक रचनात्मक योजना प्रस्तुत करने के उद्देश्य से किया गया उसे समुदाय की दशाओं और आवश्यकताओं का वैज्ञानिक अध्ययन है।”

अब्रामस (Abrams) के अनुसार—“सामाजिक सर्वेक्षण एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा एक समुदाय की संरचना एवं क्रियाओं के सामाजिक पहलुओं के बारे में संख्यात्मक तथ्य एकत्रित किए जाते हैं।”

बोगार्डस (Bogardus) के अनुसार-“एक सामाजिक सर्वेक्षण किसी विशेष क्षेत्र के लोगों के रहन-सहन तथा कार्य करने की दशाओं से संबंधित तथ्य एकत्रित करने को कहते हैं।’

यंग (Young) के अनुसार-“सामाजिक सर्वेक्षण

  1. किसी सुधार की क्रियात्मक योजना के निरूपण और
  2.  निश्चित भौगोलिक सीमाओं में व्याप्त तथा निश्चित सामाजिक परिणामों और महत्त्व की किसी प्रचलित यो तात्कालिक व्याधिकीय अवस्था के सुधार से संबंधित है,
  3. इन अवस्थाओं की माप व तुलना किन्हीं ऐसी परिस्थितियों के साथ हो सके जो कि आदर्श रूप में स्वीकार की जाती हैं।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक सर्वेक्षण को समुदाय के सामान्य जीवन के अध्ययन के रूप में, सामाजिक समस्याओं व समाज सुधार के रूप में तथा एक वैज्ञानिक पद्धति के रूप में परिभाषित किया गया है। अधिकांशतः इसे वैज्ञानिक अन्वेषण की एक शाखा के रूप में देखा जाता है। इसके अंतर्गत निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में निवास करने वाली वृहत् एवं कम आकार वाली जनसंख्याओं (समग्रों) की जीवन दशाओं, क्रियाओं; समस्याओं तथा व्याधिकीय दशाओं का अध्ययन किया जाता है ताकि समाज सुधार एवं सामाजिक प्रगति हेतु रचनात्मक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जा सकें।

सामाजिक सर्वेक्षण की प्रमुख विशेषताएँ

सामाजिक सर्वेक्षण की संकल्पना को इसकी निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. निश्चित पद्धति–सामाजिक सर्वेक्षण सामाजिक जीवन एवं सामाजिक समस्याओं के अध्ययन की एक निश्चित पद्धति है।।
  2. वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग-सामाजिक सर्वेक्षण में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाता है, | जिससे अध्ययन वस्तु के संबंध में किसी प्रकार के पक्षपात की संभावना नहीं रहती।
  3. सामाजिक पक्षों का अध्ययन–सामाजिक सर्वेक्षण के अंतर्गत सामान्यतः किसी समुदाय की संरचना, उसमें रहने वाले व्यक्तियों की जीवन दशाओं तथा उनकी क्रियाओं के सामाजिक पक्षों का अध्ययन किया जाता है। कई बार इसमें आर्थिक एवं सांस्कृतिक पक्षों को भी सम्मिलित किया जाता है।
  4. निश्चित भौगोलिक क्षेत्र–सामाजिक सर्वेक्षण का संबंध एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र तक ही सीमित होता है। अन्य शब्दों में, सर्वेक्षण के लिए किसी क्षेत्र-विशेष में रहने वाले व्यक्तियों का अध्ययन हेतु चयन किया जाना अनिवार्य है।
  5. प्रत्यक्ष एवं मूर्त पहलुओं का अध्ययन सामाजिक सर्वेक्षण में सामाजिक जीवन के प्रत्यक्ष एवं ।। मूर्त पहलुओं का अध्ययन किया जाता है।
  6. वस्तुनिष्ठ, तटस्थ तथा पक्षपातरहित अध्ययन सामाजिक सर्वेक्षण का संबंध सामाजिक जीवन के वस्तुनिष्ठ, तटस्थ तथा पक्षपातरहित अध्ययन से है। यह वैज्ञानिक पद्धति के प्रयोग के कारण संभव हो पाता है।
  7. सामाजिक समस्याओं के अध्ययन पर बल–सामाजिक सर्वेक्षण के अंतर्गत सामाजिक समस्याओं के अध्ययन पर बल दिया जाता है। ये समस्याएँ व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामुदायिक, सामाजिक, स्थानीय, राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय स्तर की हो सकती हैं।
  8. सहकारी अध्ययन–सामाजिक सर्वेक्षण मुख्य रूप से सहकारी अध्ययन होता है, क्योंकि इसमें एक से अधिक सर्वेक्षणकर्ता अध्ययन क्षेत्र में जाकर चुने हुए सूचनादाताओं से सूचनाएँ एकत्रित करते हैं।
  9. सुधारात्मक प्रकृति-सामाजिक सर्वेक्षण की प्रकृति सुधारात्मक होती है, अर्थात् इसका प्रयोग मुख्य रूप से सामाजिक सुधार अथवा सामाजिक प्रगति हेतु किया जाता है। अन्य शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि सामाजिक सर्वेक्षण रचनात्मक जीवन से संबंधित होता है।
  10. तुलनात्मक अध्ययन-सामाजिक सर्वेक्षण के अंतर्गत सामाजिक जीवन तथा सामाजिक घटनाओं के तुलनात्मक अध्ययन पर बल दिया जाता है।

सामाजिक सर्वेक्षण के उद्देश्य एवं महत्त्व

आधुनिक युग में सामाजिक सर्वेक्षण का महत्त्व निरंतर बढ़ता जा रही है। इसके महत्त्व को इसके . निम्नलिखित उद्देश्यों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. तथ्यों का संकलन--सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य अध्ययन हेतु चुने गए सूचनादाताओं से उनके सामाजिक जीवन अथवा सामाजिक समस्या के संबंध में तथ्यों का संकलन करना है। उदाहरणार्थ-अगर सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य गंदी बस्तियों में रहने वाले लोगों की जीवन दशाओं का अध्ययन करना है तो हम चयनित गंदी बस्ती में रहने वालों से उन्हीं के बारे में तथ्यों का संकलन करने का प्रयास करते हैं।
  2. समस्याओं का अध्ययन–सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य अधिकतर उपयोगितावादी होता है, क्योंकि इसके द्वारा सामाजिक एवं व्यावहारिक समस्याओं का अध्ययन किया जाता है तथा उनके समाधान हेतु रचनात्मक कार्यक्रम बनाए जाते हैं। प्रत्येक समाज में निर्धनता, बेरोजगारी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, अपराध, बाल अपराध आदि विविध प्रकार की समस्याएँ पाई जाती हैं जो कि समाज की स्थिरता एवं निरंतरता को चुनौती देती रहती हैं। इन समस्याओं का अध्ययन सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा ही किया जाता है।
  3. कार्य-कारण संबंधों की खोज–सामाजिक सर्वेक्षण सामाजिक समस्याओं के कारणों तथा उनके परिणामों का अध्ययन करने में सहायक है। किसी समस्या का समाधान तब तक संभव नहीं है, जब तक कि हमें उसके कारणों का विस्तृत ज्ञान न हो। सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा सामाजिक समस्याओं की उत्पत्ति के कारणों तथा समाज पर पड़ने वाले प्रभावों का पता लगाया जाता है। इस ज्ञान को सामाजिक, समस्याओं के निराकरण हेतु प्रयोग में लाया जाता है।
  4. जनसाधारण की भावनाओं का अध्ययन–सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य समाज में प्रचलित विवादों, संस्थाओं, कुप्रथाओं तथा प्रगतिशील योजनाओं के बारे में जनसाधारण की भावनाओं का पता लगाना है। इससे हम जनसाधारण की रुचियों अथवा किसी विकास नीति के बारे में प्रतिक्रियाओं का अध्ययन भी कर सकते हैं।
  5. श्रमिक वर्गों का अध्ययन–सामाजिक सर्वेक्षण का प्रयोग मुख्य रूप से श्रमिक वर्गों की जीवन दशाओं तथा समस्याओं का अध्ययन करने के लिए ही किया गया है। वास्तव में, सामाजिक सर्वेक्षण की उत्पत्ति ही ऐसे अध्ययनों से हुई है। इन अध्ययनों के आधार पर श्रमिकों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान हेतु कार्यक्रम बनाए जाते हैं। कुछ समाजशास्त्री तो सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य ही श्रमिक वर्गों की समस्याओं का अध्ययन करना बताते हैं।
  6. उपकल्पनाओं का निर्माण एवं परीक्षण सामाजिक सर्वेक्षण का उद्देश्य उपकल्पनाओं के निर्माण में सहायता प्रदान करना है। सामाजिक सर्वेक्षण उपकल्पनाओं की सत्यता की जाँच करने में भी सहायक है। यद्यपि उपकल्पना का निर्मण करना सामाजिक सर्वेक्षण का अनिवार्य चरण नहीं है, तथापि अधिकांश सर्वेक्षणों में अध्ययन को अधिक निर्देशित करने हेतु उपक़ल्पनाओं का निर्माण किया जाता है।
  7. सामाजिक सिद्धांतों का परीक्षण–मानव व्यवहार परिवर्तनशील है। जैसे-जैसे समाज में परिवर्तन होता है, व्यवहार के बारे में पूर्व-निर्मित सिद्धांतों के परीक्षण की आवश्यकता महसूस की जाने लगती है। इस कार्य में सामाजिक सर्वेक्षण सहायता प्रदान करता है तथा सामाजिक सिद्धांतों का परीक्षण करके उनमें सुधार एवं संशोधन करता है।
  8. सामाजिक नियोजन में सहायक–सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा प्राप्त किया गया ज्ञान सामाजिक नियोजन में सहायता प्रदान करता है। इसके द्वारा विभिन्न विकास योजनाओं का मूल्यांकन भी किया जाता है जिससे नियोजन के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाओं का पता चल सके तथा उन्हें समय रहते दूर किया जा सके।
  9. नीति-निर्धारण एवं मार्गदर्शन में सहायक–सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा समाज के विभिन्न पक्षों के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की जाती है। यह जानकारी नीति-निर्धारण तथा समाज को अपने निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने में मार्गदर्शन का कार्य करती है।
  10. पूर्वानुमान में सहायक–सामाजिक सर्वेक्षण द्वारा विभिन्न सामाजिक घटनाओं एवं सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों में पाए जाने वाले कार्य-कारण संबंधों की खोज की जाती है। जो जानकारी इनके बारे में प्राप्त होती है, उसके आधार पर सर्वेक्षणकर्ता पूर्वानुमान लगाने का प्रयास करता है। अनेक बाजार सर्वेक्षणों को उद्देश्य आने वाले समय में किसी विशेष वस्तु की बिक्री का अनुमान लगाना होता है।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक सर्वेक्षण आज के आधुनिक युग में अपने महत्त्व के कारण अत्यधिक लोकप्रिय होता जा रहा है। वास्तव में यह इतने उद्देश्यों की पूर्ति करता है। कि जीवन के किसी भी पक्ष में आज सामाजिक सर्वेक्षणों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 9.
साक्षात्कार के प्रमुख प्रकारों की विवचेना कीजिए।
या
सामाजिक शोध में साक्षात्कार के जिन प्रकारों का प्रयोग किया जाता है उनकी संक्षिप्त विवचेना कीजिए।
उत्तर
साक्षात्कार के विभिन्न प्रकार सामाजिक अनुसंधान में साक्षात्कार पद्धति का प्रयोग विभिन्न रूपों में किया जाता है। इसका प्रमुख रूप से वर्गीकरण अनेक आधारों पर किया गया है। वर्गीकरण के प्रमुख आधार तथा उनके अनुरूप, साक्षात्कार के प्रकार अग्रलिखित हैं-
(अ) उद्देश्यों या कार्यों के आधार पर वर्गीकरण
उद्देश्यों तथा कार्यों के आधार पर साक्षात्कार को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. कारक-परीक्षक साक्षात्कार-इस प्रकार के साक्षात्कार में गंभीर सामाजिक घटना के कारणों की समीक्षा की जाती है। समाज में घटित होने वाली विभिन्न घटनाओं अथवा परिस्थितियों के कुछ विशेष कारक या तत्त्व होते हैं। इन कारकों की खोज करना ही कारक-परीक्षक साक्षात्कार का प्रमुख उद्देश्य है।।
  2. उपचार-संबंधी साक्षात्कार-समाज में, चाहे वह आदिम हो या आधुनिक, किसी-न-किसी प्रकार की समस्याएँ रहती ही हैं। उपचार संबंधी साक्षात्कार इसी प्रकार की समस्याओं को दूर करने के उपायों की खोज से संबंधित है। इस प्रकार के साक्षात्कार में, जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, अनुसंधानकर्ता का उद्देश्य किसी समस्या का उपचार करना होता है।
  3. अनुसंधान-संबंधी साक्षात्कार–इस प्रकार के साक्षात्कार का उद्देश्य नवीन ज्ञान की खोज करना है। यह नवीन ज्ञान सामाजिक समस्याओं और सामाजिक घटनाओं से संबंधित होता है। अनुसंधान-संबंधी साक्षात्कार में विषयों एवं घटनाओं से संबंधित तथ्यों तथा कारकों की खोज की जाती है। इस प्रकार के साक्षात्कार का उद्देश्य पहले दोनों प्रकार के साक्षात्कारों से विस्तृत है।

(ब) औपचारिकता के आधार पर वर्गीकरण
औपचारिकता के आधार पर साक्षात्कार को निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. औपचारिक साक्षात्कार–इस प्रकार के साक्षात्कार को नियंत्रित साक्षात्कार’ भी कहते हैं। इसमें अनुसंधानकर्ता साक्षात्कारदाता से पूर्वनिश्चित प्रश्नों को ही पूछ सकता है। इन प्रश्नों को पूछने में अनुसंधानकर्ता किसी प्रकार का संशोधन नहीं कर सकता और न ही इन प्रश्नों से हटकर दूसरे प्रश्न पूछ सकता है। इसे संचालित साक्षात्कार’, ‘व्यवस्थित साक्षात्कार’ अथवा ‘नियोजित साक्षात्कार’ भी कहा जा सकता है।
  2. अनौपचारिक साक्षात्कार-अनौपचारिक साक्षात्कार को ‘अनियंत्रित साक्षात्कार , ‘असंचालित साक्षात्कार’, ‘अव्यवस्थित साक्षात्कार’ अथवा ‘नियोजित साक्षात्कार’ भी कहा जाता है। इसमें साक्षात्कारकर्ता पर किसी प्रकार के पूर्वनिर्मित प्रश्नों को पूछने का कोई नियंत्रण नहीं होता और साक्षात्कारदाता भी प्रश्नों के उत्तर स्वतंत्र रूप से देता है। यह एक प्रकार से मुक्त वार्तालाप के रूप में होता है, जिसमें अनुसंधानकर्ता सूचनादाता से समस्या के विभिन्न पहलुओं पर सूचना प्राप्त करने का प्रयास करता है।

(स) उत्तरदाताओं की संख्या के आधार पर वर्गीकरण
उत्तरदाताओं की संख्या के आधार पर साक्षात्कार के निम्नलिखित दो प्रकार हैं-

  1. व्यक्तिगत साक्षात्कार–व्यक्तिगत साक्षात्कार में, जैसाकि इसके नाम से ही स्पष्ट है, किसी व्यक्ति के बारे में विस्तृत सूचनाएँ प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। इसमें सूचनादाता से औपचारिक अथवा अनौपचारिक रूप से समस्या की प्रकृति के अनुकूल एक के बाद एक प्रश्न पूछा जाता है। इस प्रकार के साक्षात्कार में केवल सूचनादाता और अंवेषणकर्ता ही उपस्थित रहते हैं।
  2. सामूहिक साक्षात्कार–व्यक्तिगत साक्षात्कार के विपरीत सामूहिक साक्षात्कार, जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, एक ही समय में अनेक सूचनादाताओं से सूचना एकत्रित करने से संबंधित साक्षात्कार है। इसमें व्यक्तिगत साक्षात्कार के दोष समाप्त हो जाते हैं। जब एक सदस्य उत्तर देता है तो अन्य सदस्य उसकी पुष्टि करते हैं। इस प्रकार के साक्षात्कार से प्राप्त सूचनाएँ अधिक विश्वसनीय मानी जाती हैं।

(द) अध्ययन-पद्धति के आधार पर वर्गीकरण
अध्ययन-पद्धति के आधार पर साक्षात्कार को निम्नांकित चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. गैर-निर्देशित साक्षात्कार—यह साक्षात्कार अनियंत्रित अथवा अनौपचारिक साक्षात्कार के समान है। इस प्रकार के साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता अथवा उत्तरदाता पर न तो किसी प्रकार का नियंत्रण ही होता है और न ही पहले से निर्मित कोई प्रश्नावली इत्यादि। साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता को विषये के संबंध में एक कहानी के रूप में अपने मनोभाव व्यक्त करने के लिए प्रेरित करता है और सूचनादाता स्वतंत्र रूप से उसका विवरण प्रस्तुत करता है। यह स्वतंत्र एवं मुक्त प्रकार का वार्तालाप है।
  2. केंद्रित साक्षात्कार-इस प्रकार का साक्षात्कार उत्तरदाता की उन परिस्थितियों के संबंध में | किया जाता है, जिनमें उत्तरदाता पहले रह चुका हो। इस प्रकार के साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता। का ध्यान उसी परिस्थिति पर केंद्रित रहता है, जिसका पूर्वज्ञान साक्षात्कारदाता को है। साक्षात्कारकर्ता यह जानने का प्रयास करता है कि अमुक परिस्थिति का उत्तरदाता पर क्या प्रभाव पड़ा है। इस प्रकार के साक्षात्कार को केंद्रित साक्षात्कार इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें किसी घटना या इसके किसी विशेष अंमं पर ही ध्यान केंदित करके प्रश्न पूछे जाते हैं। उदाहरण के लिए एक साक्षात्कारदाता ने कोई फिल्म देखी है; तो साक्षात्कारकर्ता केंद्रित साक्षात्कार में यह जानने का प्रयास करता है कि साक्षात्कारदाता पर उस फिल्म का क्या प्रभाव पड़ा है। इस प्रकार के साक्षात्कार में अनुसंधानकर्ता साक्षात्कारदाता को किसी प्रकार का कोई निर्देश नहीं देता, वह निश्चित विषय या परिस्थिति के अतिरिक्त अन्य किसी विषय या । परिस्थिति में केंद्रित नहीं रहता। इसके अतिरिक्त, इसमें साक्षात्कारक़र्ता विषय का व्यक्तिगत रूप से गहन अध्ययन करता है। इस प्रकार के साक्षात्कार का प्रयोग रोबर्ट के० मर्टन ने रेडियो के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए किया था। आज केंद्रित साक्षात्कार, जनसंचार अनुसंधान में एक प्रमुख प्रविधि बन चुका है।
  3. पुनरावृत्ति साक्षात्कार—यह साक्षात्कार, जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, एक से अधिक बार साक्षात्कार करने से संबंधित है। जब सूचनादाताओं से एक से अधिक बार साक्षात्कार करके सूचनाएँ एकत्रित की जाती हैं तो उसे पुनरावृत्ति साक्षात्कार कहा जाता है। इस प्रकार के साक्षात्कार का प्रयोग अधिकतर व्यक्तियों के मूल्यों एवं मनोवृत्तियों में होने वाले परिवर्तनों के अध्ययनों के लिए किया जाता है। यदि कुछ चुने हुए सूचनादाताओं (निश्चित संख्या में) से एक से अधिक बार साक्षात्कार करके सूचना एकत्रित की जाती है तो उसे हम ‘पैनल (Panel) अध्ययन’ कहते हैं।
  4. गहन साक्षात्कार–इस प्रकार के साक्षात्कार का प्रयोग वैयक्तिक अध्ययन तथा ऐसे अन्य अध्ययनों में किया जाता है, जिनमें अत्यधिक विस्तृत व गहन सूचनाएँ एकत्रित करनी होती हैं। इसमें औपचारिक साक्षात्कार द्वारा संबंधित घटना के बारे में (उसके सभी पक्षों के बारे में) गहन व विस्तृत सूचनाएँ एकत्रित की जाती हैं। सामाजिक समस्याओं की प्रकृति जानने के लिए भी इस प्रकार के साक्षात्कार का प्रयोग किया जाता है।

साक्षात्कार के उपर्युक्त प्रकारों के अतिरिक्त कुछ विद्वानों ने अल्पकालीन साक्षात्कार’ तथा ‘दीर्घकालीन साक्षात्कार का भी उल्लेख किया है। अल्पकालीन साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता एक बार में सबसे सूचनाएँ प्राप्त करने का प्रयास करता है और सभी कार्य थोड़े ही समय में पूरा करता है। इसके विपरीत, दीर्घकालीन साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता को उत्तरदाता के पास कई बार जाना पड़ता है।

और सूचना प्राप्ति का कार्य देर तक करना पड़ता है। निष्कर्ष–उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि, साक्षात्कार पद्धति में साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता के आमने-सामने की परिस्थति में सूचना प्राप्त करने का प्रयास करता है।

इसके विविध प्रकार हैं, परंतु अधिकांशत: औपचारिक एवं अनौपचारिक साक्षात्कार का ही प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 10.
साक्षात्कार क्या है? साक्षात्कार के प्रमुख उद्देश्यों की विवेचना कीजिए।
या
साक्षात्कार से आप क्या समझते हैं? सामाजिक अनुसंधान की प्रविधि के रूप में साक्षात्कार के उद्देश्य बताइए।
उत्तर
सामाजिक अनुसंधान की पद्धतियों में सर्वाधिक प्रयोग की जाने वाली पद्धति साक्षात्कार है। आज यह एक सर्वप्रचलित एवं सर्वोपरि पद्धति मानी जाती है तथा मुख्य रूप में प्रयोग होने के साथ-साथ यह अन्य पद्धतियों (जैसे अवलोकन, अनुसूची इत्यादि) में एक सहायक पद्धति या पूरक पद्धति के रूप में भी प्रयोग होती है। इसमें अंवेषणकर्ता सूचनादाता से आमने-सामने की परिस्थिति में समस्या से संबंधित प्रश्न पूछता है और उनके उत्तर प्राप्त करता है। इससे सूचनादाताओं की मनोवृत्तियों एवं दृष्टिकोणों का भी पता चल जाता है।

साक्षात्कार का अर्थ एवं परिभाषाएँ

साक्षात्कार का अर्थ कार्यकर्ता तथा उत्तरदाता के बीच आमने-सामने सम्पर्क स्थापित करके कुछ ऐसे रहस्यों का पता लगाना या उनकी जानकारी प्राप्त करना है, जिनको उत्तरदाता के अतिरिक्त कोई नहीं जानता। इस प्रकार की जानकारी अन्य किसी प्रविधि के द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती। इस प्रकार की जानकारी प्रायः प्रत्यक्ष रूप में प्रश्नोत्तरी प्रणाली द्वारा की जाती है। उत्तरदाता से कार्यकर्ता सामने बैठकर प्रश्न पूछता है और कार्यकर्ता उत्तरदाता द्वारा दिए गए कुछ उत्तरों को नोट कर लेता है तथा शेष जानकारी मौखिक रूष से ही प्रापत कर ली जाती है।
प्रमुख विद्वानों ने इसे निम्न प्रकार से परिभाषित किया है-

गुड एवं हैट (Goode and Hatt) के अनुसार-“साक्षात्कार मौखिक रूप से सामाजिक अंत:क्रिया की एक प्रक्रिया है।”

पी०वी० यंग (PV. Young) के अनुसार-“साक्षात्कार को एक व्यवस्थित पद्धति माना जा सकता है, जिसके द्वारा एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के आंतरिक जीवन में अधिक या कम कल्पनात्मक रूप से प्रवेश करता है, जो साधारणतया उसके लिए तुलनात्मक दृष्टि से अपरिचित है।”

वी०एम० पामर (VM. Palmer) के अनुसार-“साक्षात्कार दो व्यक्तियों में सामाजिक स्थिति बताता है, जिनमें निहित मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया के लिए यह आवश्यक है कि दोनों व्यक्ति परस्पर प्रत्युत्तर करते रहें, यद्यपि साक्षात्कार में सामाजिक खोज के उद्देश्य से संबंधित दलों से बहुत भिन्न प्रत्युत्तर प्राप्त होते हैं।”

एम०एन० बसु (M.N. Basu) के अनुसार-“एक साक्षात्कार को कुछ विषयों पर व्यक्तियों के आमने-सामने की भेंट के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”

सी०ए० मोजर (C.A. Moser) के अनुसार-“औपचारिक साक्षात्कार, जिसमें कि पहले से निर्मित प्रश्नों को पूछा जाता है तथा उत्तरों को प्रमाणीकृत रूप में संकलित किया जाता है, बड़े सर्वेक्षणों में निश्चित रूप से सामान्य है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि साक्षात्कार सामाजिक अनुसंधान की वह पद्धति है, जिसके द्वारा साक्षात्कारकर्ता वार्तालाप के द्वारा सूचनादाता के विचारों और भावनाओं में प्रवेश करके तथ्यों का संकलन करता है। यह साक्षात्कारकर्ता एवं सूचनादाता के बीच आमने-सामने की मीटिंग है, जो साक्षात्कारकर्ता को सूचनादाता के मन के भीतर छिपे विचारों को जानने में भी सहायता प्रदान करती है।

साक्षात्कार के प्रमुख उद्देश्य

साक्षात्कार पद्धति का प्रयोग विविध प्रकार के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है। इसके प्रमुख उद्देश्य अग्रलिखित हैं-

  1. प्रत्यक्ष संपर्क साक्षात्कार का सबसे प्रमुख उद्देश्य साक्षात्कारकर्ता का सूचनादाता से प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करना है जिससे उस अनुसंधान समस्या से परिचित कराकर उससे सहयोग लिया | जा सके। प्रत्यक्ष संपर्क अधिक विश्वसनीय सूचनाएँ एकत्रित करने में सहायक है।
  2. व्यक्तिगत सूचनाएँ-साक्षात्कार का दूसरा प्रमुख उद्देश्य सूचनादाता से प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करके उससे समस्या एवं उसकी पृष्ठभूमि के बारे में व्यक्तिगत सूचनाएँ प्राप्त करना है। इसमें | साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता की भावनाओं को भी जानने का प्रयास करता है।
  3. पूर्ण जानकारी–साक्षात्कार का एक अन्य उद्देश्य सूचनादाताओं से अनुसंधान की समस्या के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त करना है। कई बार साक्षात्कार अनौपचारिक वार्तालाप के रूप में होता है, जिसमें सूचनादाता काफी जानकारी दे देते हैं।
  4. विभिन्न पहलुओं की जानकारी-साक्षात्कार का उद्देश्य विभिन्न प्रकार के पहलुओं की विस्तृत जानकारी प्राप्त कर समस्या की प्रकृति को ठीक प्रकार से समझने में सहायता प्रदान करना है। साक्षात्कार के विभिन्न प्रकार; जैसे-केंद्रित साक्षात्कार, औपचारिक व अनौपचारिक साक्षात्कार इत्यादि; समस्या के सभी पहलुओं के विषय में जानकारी प्रदान करने में सहायता प्रदान करते हैं।
  5. अवलोकन संभव-साक्षात्कार का एक उद्देश्य अवलोकन को भी संभव बनाना है। साक्षात्कार के समय साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता से समस्या के बारे में बातचीत ही नहीं करता, अपितु उसके चेहरे पर आने वाले मनोभावों से उसके द्वारा बताई गई सूचना की सत्यता के बारे में अनुमान भी लगता है; अतः इसमें अवलोकने प्रविधि एक पूरक प्रविधि की भूमिका निभाती है।
  6. आंतरिक भावनाओं का ज्ञान–साक्षात्कार का एक अन्य उद्देश्य सूचनादाताओं की आंतरिक भावनाओं का पता लगाना है। यंग (Young) का कहना है कि साक्षात्कार को एक ऐसी क्रमबद्ध पद्धति माना जा सकता है, जिसके द्वारा साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता के आंतरिक जीवन में अधिक या कम काल्पनिक रूप से प्रवेश करता है। इससे उसे सूचनादाता की आंतरिक भावनाओं का काफी सीमा तक पता चल जाता है। वह उसके चेहरे पर आने वाले उतार-चढ़ाव को सरलता से देख सकता है और इस बात का अनुमान लगा सकता है कि सूचनादाता सही सूचना दे रहा है या नहीं।
  7. उपकल्पनाओं का निर्माण–साक्षात्कार का अंतिम उद्देश्य साक्षात्कारकर्ता को उपकल्पनाओं के निर्माण में सहायता प्रदान करना है। साक्षात्कार को उपकल्पनाओं को एक महत्त्वपूर्ण स्रोत माना गया है; क्योंकि इससे समस्या के विभिन्न पक्षों के बारे में यथेष्ट जानकारी प्राप्त होती है। यह जानकारी उपकल्पना के निर्माण का स्रोत होती है।

प्रश्न 11.
एक अच्छे साक्षात्कारकर्ता के गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
किसी भी समस्या पर अनुसंधान करना इतना सरल नहीं है जितना कि यह ऊपर से प्रतीत होता है। वास्तव में, यह एक ऐसी कला है, जिसमें हर कोई व्यक्ति पारंगत नहीं हो सकता। इसके लिए कुशल अनुसंधानकर्ता अथवा साक्षात्कारकर्ता की आवश्यकता होती है। एक अच्छा अनुसंधानकर्ता ही अच्छी तरह से सूचनाएँ एकत्रित कर सकता है और सही निष्कर्ष निकाल सकता है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

एक अच्छे साक्षात्कारकर्ता के गुण

सामाजिक अंवेषण में वास्तविक सूचनाएँ एकत्रित करना एक कठिन कार्य है। सफल अनुसंधानकर्ता अथवा साक्षात्कारकर्ता अपनी सूझ-बूझ के आधार पर इसे अधिक सरल बना देता है। एक अच्छे अनुसंधानकर्ता अथवा साक्षात्कारकर्ता में निम्नलिखित गुण होने अनिवार्य हैं

  1. उच्च व्यक्तित्व–एक अच्छे साक्षात्कारकर्ता या अनुसंधानकर्ता का सबसे प्रथम गुण उसका अच्छा एवं उच्च व्यक्तित्व है। उसके व्यक्तित्व का इतना प्रभाव होना चाहिए कि सूचनादाता उसे सूचनाएँ देने के लिए तत्पर हो जाए।
  2. उन्मुक्त वार्तालाप की क्षमता साक्षात्कारकर्ता में उन्मुक्त वार्तालाप करने की क्षमता होनी चाहिए। साक्षात्कारकर्ता को चाहिए कि वह सूचनादाता को वार्तालाप करने की पूर्ण सुविधा दे। यदि साक्षात्कारकर्ता में समय-समय पर सूचनादाता को प्रोत्साहन देने की क्षमता हो तो वह सूचनादाता से पूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकता है।
  3. सत्यता की खोज की क्षमता-साक्षात्कारदाता अथवा सूचनादाता विविध प्रकार के व्यक्ति होते हैं, जो कई बार भावावेश में आकर बढ़-चढ़कर बातें बनाने लगते हैं या पक्षपातपूर्ण तथ्यों को प्रस्तुत करते हैं या कुछ तथ्यों को छिपाने का प्रयास करते हैं। इन परिस्थितियों में सही सूचना की प्राप्ति की संभावना अत्यधिक कम रहती है। ऐसी परिस्थितियों में एक सफल वे कुशल साक्षात्कारकर्ता में ऐसे गुणों का होना आवश्यक है, जिनके आधार पर वह दी गई सूचनाओं में से सत्यता का अंश निकाल सके तथा वह इस बात का अनुमान लगा सके कि सूचनादाता द्वारा दी गई सूचनाओं में सत्यता का अंश कितना है।।
  4. उच्च कोटि की मनोवैज्ञानिकता–-एक अच्छे साक्षात्कारकर्ता में उच्च कोटि की मनोवैज्ञानिकता होना भी अनिवार्य है। यह मनोवैज्ञानिकता साक्षात्कारदाताओं के हृदय को पहचानने में तथा उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से उत्तर एवं सूचना देने के लिए तत्पर करने में तथा बीच-बीच में प्रेरणा देने में सहायता प्रदान करती है।
  5. सक्रिय सहयोग लेने की क्षमता–साक्षात्कारकर्ता में इतनी क्षमता एवं योग्यता का होना आवश्यक है कि वह सूचनादाताओं से अधिक-से-अधिक सहयोग ले सके। यदि साक्षात्कारदाता साक्षात्कारकर्ता से मिलकर कार्य नहीं करेगा या उसको सहयोग नहीं देगा तो साक्षत्कारकर्ता अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता।।
  6. निष्पक्षता तथा ईमानदारी–एक सफल साक्षात्कारकर्ता का एक अन्य विशिष्ट गुण निष्पक्षता तथा ईमानदारी है। एक साक्षात्कारकर्ता को निष्पक्ष भाव से सूचनादाताओं के पास जाना चाहिए और अपनी ईमानदारी व चरित्र की पवित्रता से साक्षात्कारदाताओं को सूचना देने के लिए राजी करना चाहिए।
  7. कुशलता एवं चतुराई–एक अच्छे साक्षात्कारकर्ता का कुशल एवं चतुर होना भी अनिवार्य है। एक कुशल एवं चतुर साक्षात्कारकर्ता ही सूचनादाताओं, जो कि विविध प्रकार की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के होते हैं, से ठीक प्रकार से सूचना प्राप्त कर सकता है। उसमें परिस्थितियों के अनुरूप वे सभी सूचनाएँ लेने की क्षमता होनी चाहिए।

निष्कर्ष–उपर्युक्त विवेचन से यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि साक्षात्कार करना एक कला है। इस कला में निपुण होने के लिए साक्षात्कारकर्ता को विविध प्रकार के गुणों से युक्त होना अनिवार्य है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

प्रश्न 12.
साक्षात्कार पद्धति के गुण एवं दोषों का वर्णन कीजिए।
या
तथ्यों के संकलन में साक्षात्कार पद्धति की महत्ता एवं सीमाओं को बताइए।
उत्तर
साक्षात्कार को सभी प्रकार के अनुसंधानों में मुख्य अथवा पूरक प्रविधि के रूप में अपनाया जाता है। यह इसके महत्त्व का द्योतक है परंतु सामग्री अथवा आँकड़े संकलन करने की अन्य पद्धतियों की भाँति साक्षात्कार के कुछ दोष भी हैं। इसके विभिन्न गुण-दोषों के आधार पर ही इसका मूल्यांकन किया जा सकता है।

साक्षात्कार का महत्त्व या गुण साक्षात्कार के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-

  1. मनोवैज्ञानिक दृष्टि से उपयोगी–इस पद्धति का सबसे बड़ा महत्त्व इसकी मनोवैज्ञानिक उपयोगिता है। इसमें व्यक्ति के मनोभावों का अध्ययन करने का अवसर प्राप्त होता है। साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता से समस्या से संबंधित सूचनाएँ ही प्राप्त नहीं करता अपितु वह साक्षात्कारदाता (उत्तरदाता या सूचनादाता) के मन के भावों को भी ‘पहचानने का प्रयास करता है और साथ ही उसके व्यवहार का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करता है। इसलिए इस प्रविधि को साक्षात्कारकर्ता द्वारा सूचनादाता, जो कि अपेक्षाकृत अपरिचित व्यक्ति है, के मन में प्रवेश करने की प्रविधि कहा गया है। अन्य किसी पद्धति द्वारा इस प्रकार का अध्ययन संभव नहीं है।
  2. अमूर्त घटनाओं का अध्ययन–साक्षात्कार प्रविधि के अंतर्गत मूर्त तथा अमूर्त दोनों प्रकार की घटनाओं का अध्ययन किया जा सकता है। समाज में व्यक्ति की भावनाओं तथा उसके संवेगों एवं मनोवृत्तियों का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। ये भावनाएँ एवं संवेग अमूर्त होते हैं। इनका अध्ययन करने के लिए साक्षात्कार प्रविधि के अतिरिक्त अन्य कोई प्रविधि उपयुक्त नहीं है, क्योंकि इस प्रविधि में साक्षात्कारकर्ता तथा साक्षात्कारदाता का प्रत्यक्ष संपर्क होता है, इसलिए दोनों एक-दूसरे के मनोभावों तथा संवेगों को जानने का प्रयास करते हैं। दोनों एक-दूसरे के व्यवहार को भी जानने का प्रयास करते हैं। साक्षात्कारकर्ता क्योंकि प्रशिक्षित होता है, इसलिए उत्तरदाता के मनोभावों तथा संवेगों का सरलता से अनुमान लगा सकता है।
  3. मर्मभेदी अध्ययन–समस्या से संबंधित अनेक पहलू अथवा घटनाएँ ऐसी हो सकती हैं, जो मर्मभेदी होने के कारण नहीं देखी जा सकतीं। सामान्यतया सूचनादाता के व्यक्तिगत जीवन से संबंधित अनेक बातों की जानकारी अवलोकन इत्यादि द्वारा प्राप्त नहीं हो सकती, अपितु ऐसे गोपनीय विषयों के बारे में सूचना प्राप्त करने की एकमात्र पद्धति साक्षात्कार ही है।
  4. भूतकालीन घटनाओं का अध्ययन–साक्षात्कार प्रविधि में भूतकालीन घटनाओं का अध्ययन करना भी संभव है। साक्षात्कारदाता के जीवन में बहुत-सी घटनाएँ घटित होती हैं, जिनकी पुनरावृत्ति भी संभव नहीं है। इन घटनाओं का अध्ययन करने के लिए साक्षात्कार प्रविधि ही सर्वोत्तम है। साक्षात्कारदाता साक्षात्कारकर्ता से अपनी भूतकालीन घटनाओं का वर्णन कर सकता है। इस प्रकार के वर्णन से वह साक्षात्कारकर्ता को भूतकालीन घटनाओं से परिचित कराता है। यदि साक्षात्कारदाता इस प्रकार की घटनाओं से साक्षात्कारकर्ता को परिचित न कराए तो उन घटनाओं का अध्ययन करना ही अंसभव हो जाए; क्योंकि उन घटनाओं का अन्य किसी व्यक्ति को पता नहीं होता है और उनके पुनः घटित होने की संभावना भी बहुत कम होती है।
  5. विस्तृत सूचनाओं की प्राप्ति–साक्षात्कार प्रविधि में व्यक्तियों से विस्तृत सूचनाएँ एकत्रित की जा सकती हैं, चाहे वे समाज के किसी भी वर्ग से संबंधित क्यों न हों। इसलिए इस प्रकार का अध्ययन शिक्षित, अशिक्षित, ग्रामीण, नगरीय सभी स्तर के लोगों में किया जा सकता है। साक्षात्कार प्रविधि विस्तृत सूचनाओं की प्राप्ति की सबसे सरल मार्ग है, क्योंकि जो सूचनादाता प्रश्नों को नहीं समझते, अनुसंधानकर्ता उन प्रश्नों को उन्हें समझाकर उनके उत्तर प्राप्त कर लेता है।
  6. सभी स्तर के व्यक्तियों का अध्ययन–विस्तृत सूचनाओं की प्राप्ति के साथ-साथ साक्षात्कार * सभी प्रकार के सूचनादाताओं से सूचना एकत्रित करने की एक प्रमुख प्रविधि है। क्योंकि इसमें साक्षात्कारकर्ता को ही साक्षात्कार से प्राप्त सूचनाएँ अंकित करनी होती हैं, इसलिए सूचनादाताओं को पढ़ा-लिखा होना अनिवार्य नहीं है। यह प्रविधि वास्तव में सभी स्तर के तथा सभी प्रकार की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के व्यक्तियों से सूचना संकलित करने में अत्यंत उपयोगी है।
  7. विचारों के आदान-प्रदान की सुविधा-साक्षात्कार प्रविधि में साक्षात्कारकर्ता तथा साक्षात्कारदाता के बीच विचारों का आदान-प्रदान होता है। सूचनाओं की प्राप्ति में जो भी विलंब यो शंका होती है, उसका समाधान साथ-ही-साथ हो जाता है। विचारों के आदान-प्रदान से इस प्रकार के संत्य सामने आ जाते हैं, जिनका परिचय अन्य किसी प्रविधि से नहीं हो सकता है। इस प्रकार साक्षात्कार प्रविधि में द्वंद्ववाद के माध्यम से साक्षात्कारदाता तथा साक्षात्कारकर्ता एक-दूसरे के विचारों से अवगत होते हैं और विचार-विमर्श करके किसी एक निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं।
  8. सूचनाओं की विश्वसनीयता-साक्षात्कार प्रविधि में साक्षात्कारदाता से जो सूचनाएँ प्राप्त की जाती हैं उनकी विश्वसनीयता की परीक्षा भी की जा सकती है। इन सूचनाओं की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए साक्षात्कारकर्ता साक्षात्कारदाता से विभिन्न के अन्वेषक प्रश्न पूछता है और उनके उत्तरों से पूर्व दिए गए उत्तरों की जाँच कर लेता है। साक्षात्कारकर्ता साक्षात्कारदाता के मन के भाव को पहचानकर सूचनाओं की सत्यता की परीक्षा कर सकता है। साथ ही वह साक्षात्कार के समय थोड़ा-बहुत अवलोकन करके सूचनाओं की विश्वसनीयता को परख लेता है।
  9. पारस्परिक प्रेरणा—नए तथ्यों की प्राप्ति के लिए पारस्परिक प्रेरणा का तत्त्व महत्त्वपूर्ण होता है। साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता सूचनादाता के सामने होता है, इसलिए वह निरंतर सूचनादाता को वार्तालाप की प्रेरणा देकर विषय से संबंधित सूचनाएँ प्राप्त करता है। सूचनादाता भी साक्ष्ज्ञात्कारकर्ता को अनेक ऐसे पहलुओं की जानकारी देता है, जिनके बारे में हो सकता है कि वह पहले से न जानता हो। अतः यह पारस्परिक प्रेरणा पर आधारित होने के कारण एक अत्यंत उपयोग प्रविधि है।

साक्षात्कार की सीमाएँ या दोष

सामाजिक अनुसंधान में साक्षात्कार पद्धति अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हुए भी पूर्णतया दोषमुक्त नहीं है। इसकी कुछ अपनी ही सीमाएँ हैं, जो निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत स्पष्ट की जा सकती हैं-

  1. दोषपूर्ण स्मरण-शक्ति–साक्षात्कार पद्धति में सामान्यतः साक्षात्कार के परिणामों को घटनास्थल पर ही नहीं लिखा जाता। यदि अनौपचारिक व गहन अध्ययन के उद्देश्य से साक्षात्कार किया जा रहा है तो वार्तालाप को उसी समय नहीं लिखा जाता। जब साक्षात्कारकर्ता बाद में इन्हें लिखने बैठता है तो हो सकता है कि दोषपूर्ण स्मरण-शक्ति के कारण वह महत्त्वपूर्ण तथ्यों को लिखना ही भूल जाए।
  2. अप्रमाणित सूचनाएँ—यदि साक्षात्कारदाता गलत सूचनाएँ देता है तो उन्हें प्रमाणित करने का कोई उपाय नहीं है। कई बार साक्षात्कारकर्ता भी सूचनादाता के साथ पक्षपात करने के कारण उसके द्वारा दी गई सूचनाओं को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करता है।
  3. अवैज्ञानिक पद्धति–साक्षात्कार को ‘अनेक विद्वान वैज्ञानिक पद्धति स्वीकार नहीं करते हैं। एक तो इसमें अमूर्त तत्त्वों; जैसे सूचनादाता के संवेगों व भावनाओं का विश्लेषण किया जाता है। जो कि वैज्ञानिक नहीं हो सकता। दूसरे, साक्षात्कार करने तथा प्रतिवेदन तैयार करने में होने वाली देरी भी इसे अवैज्ञानिक बना देती है; क्योंकि कई बार महत्त्वपूर्ण तथ्य छूट जाते हैं। तीसरे, इसमें सूचनादाता की इधर-उधर की बातें ज्चादा सुननी पड़ती हैं।
  4. कुशल साक्षात्कारकर्ताओं का अभाव–साक्षात्कार पद्धति का एक अन्य दोष कुशल साक्षात्कारकर्ताओं का अभाव है। एक तो अच्छे व प्रशिक्षित साक्षात्कारकर्ता मिलते ही नहीं हैं। और दूसरे यदि उन्हें प्रशिक्षण देकर कुशल बनाया भी जाता है तो वे बची में ही अपना काम छोड़कर चले जाते हैं। इससे एकत्रित सूचनाओं की विश्वसनीयता कम हो जाती है।
  5. साक्षात्कारदाता की हीनता-कई बार साक्षात्कारकर्ता का व्यक्तित्व सूचनादाताओं पर इस प्रकार का प्रभाव छोड़ता है कि उनमें हीनता की भावना आ जाती है। इस हीनता की भावना के कारण वे बहुत-सी बातों को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं। इससे सूचनाओं की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
  6. सामाजिक स्थिति में अंतर–सामाजिक अनुसंधान में साक्षात्कारकर्ता तथा साक्षात्कारदाता की सामाजिक स्थिति में यदि समानता है तो उत्तर ही सरलता से प्राप्त नहीं हो जाते, अपितु वे अधिक विश्वसनीय भी होते हैं। परंतु अधिकतर साक्षात्कारकर्ता और साक्षात्कारदाता की सामाजिक स्थिति में अत्यधिक अंतर पाया जाता है, इसके कारण उपयुक्त स्तर पर वार्तालाप करने में अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ पैदा हो जाती हैं।
  7. महत्त्वपूर्ण अनुभवों की उपेक्षा–साक्षात्कार द्वारा अध्ययन करने में अनुसंधानकर्ता को सूचनादाताओं पर ही निर्भर रहना पड़ता है। वे कई बार महत्त्वपूर्ण पक्षों पर सूचना ही नहीं देते और कई बार साक्षात्कारकर्ता ही प्रशिक्षित व अनुभवी न होने के कारण महत्त्वपूर्ण तथ्यों की उपेक्षा कर देता है। इससे निष्कर्ष प्रभावित होते हैं।
  8. अधिक समय-साक्षात्कार पद्धति में साक्षात्कारकर्ता को प्रत्येक सूचनादाता से प्रत्यक्ष एवं व्यक्तिगत संपर्क स्थापित करना पड़ता है। अनेक बार एक सूचनादाता के पास जाने के बाद वह साक्षात्कार के लिए राजी हो पाता है। कई बार तो निर्धारित समय पर वह मिलता ही नहीं है। इस सारी प्रक्रिया में अनुसंधानकर्ता का अत्यधिक समय बरबाद हो जाता है।
  9. अधिक खर्चीली-अत्यधिक समय के साथ-साथ साक्षात्कार पद्धति अधिक खर्चीली भी है, क्योंकि प्रत्येक सूचनादाता से सम्पर्क स्थापित करने के लिए बार-बार जाने में पैसा भी काफी खर्च हो जाता है। निदर्शन के लिए जिस स्रोत का प्रयोग किया गया है, उसमें लिखे पते भी कई बार बदल गए होते हैं; अर्थात् कई सूचनादाता अपना निवास बदल लेते हैं, जिससे उनके साथ संपर्क स्थापित करने में काफी पैसा लग जाता है।
  10. सूचनादाता द्वारा अनुपयोगी भाषण–साक्षात्कार पद्धति में अनुसंधानकर्ता पूरी तरह से सूचनादाताओं पर निर्भर रहता है। कई सूचनादाता अनुपयोगी भाषण अधिक देते हैं और काम की बात कम करते हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

निष्कर्ष–उपर्युक्त दोषों का अर्थ यह कदापि नहीं है कि साक्षात्कार एक अनुपयोगी पद्धति है। यदि अनुसंधानकर्ता प्रशिक्षित व कुशल है, सूचनादाता से ठीक प्रकार से संपर्क स्थापित करता है तो इसके अनेक दोष स्वत: ही दूर हो जाते हैं। साक्षात्कार आज तक अत्यंत उपयोगी पद्धति मानी जाती रही है।

प्रश्न 13.
क्षेत्रीय कार्य किसे कहते हैं? समाजशास्त्र में क्षेत्रीय कार्य का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
क्षेत्रीय कार्य को एक कठोर वैज्ञानिक पद्धति के रूप में स्वीकार किया जाता है। समाजशास्त्र तथा सामाजिक मानवशास्त्र में आज क्षेत्रीय कार्य पर आधारित अध्ययनों को प्राथमिकता दी जाने लगी है। पहले मानवशास्त्र में जो अध्ययन किए जाते थे वे क्षेत्रीय कार्य पर आधारित न होकर पुस्तकालय में उपलब्ध द्वितीयक स्रातों पर आधारित होते थे। इन स्रोतों के आधार पर किए गए अध्ययनों को पुस्तकीय दृष्टिकोण द्वारा किए गए अध्ययन कहा जाता है। अध्ययन का यह दृष्टिकोण आदर्शात्मक दृष्टिकोण, दर्शनशास्त्रीय दृष्टिकोण या भारतीय विद्याशास्त्रीय दृष्टिकोण भी कहा जाता है। क्षेत्रीय कार्य के आधार पर किए गए अध्ययनों को क्षेत्राधारित दृष्टिकोण द्वारा किए गए अध्ययन कहते हैं।

क्षेत्रीय कार्य का अर्थ

क्षेत्रीय कार्य अध्ययन की वह पद्धति है जो समाज की वर्तमान यथार्थता को क्षेत्र में जाकर समझने पर महत्त्व देती है। उदाहरणार्थ-यदि भारतीय समाज को समझने हेतु क्षेत्रीय वास्तविकता को आधार माना जाता है अर्थात् जिस प्रकार का समाज विद्यमान है उसका उसी यथार्थ रूप में चित्रण करने का प्रयास किया जाता है तो यह चित्रण क्षेत्रीय कार्य पर होगा। क्षेत्रीय कार्य में आनुभविक अनुसंधान पर आधारित अध्ययनों की महत्ता को स्वीकार किया जाता है। इसमें आनुभविक या प्रयोगसिद्ध अनुसंधान के आधार पर जो क्षेत्रीय आँकड़े संकलित किए जाते हैं जिन्हें प्राथमिक आँकड़े भी कहा जाता है। प्राथमिक आँकड़े वे सूचनाएँ होती हैं, जिन्हें अनुसंधानकर्ता प्रयोग में लाने के लिए पहली बार स्वयं एकत्रित करता है। ये आँकड़े मौलिक होते हैं। प्राथमिक आँकड़े अनुसंधानकर्ता द्वारा स्वयं अनुसंधान क्षेत्र में जाकर एकत्रित किए जाते हैं। अध्ययनकर्ता इस प्रकार के आँकड़ों का संकलन सहभागी एवं असहभागी अवलोकन, साक्षात्कार, अनुसूची तथा प्रश्नावली इत्यादि के माध्यम से करता है। प्राथमिक आँकड़े अधिक प्रमाणित एवं विश्वसनीय माने जाते हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods

समाजशास्त्र में क्षेत्रीय कार्य का महत्त्व

समाजशास्त्र एवं सामाजिक मानवशास्त्र में बहुत-से समुदाय या भौगोलिक स्थान क्षेत्रीय कार्य के प्रतिष्ठित उदाहरणों से संबंधित होने के कारण इन विषयों में काफी लोकप्रिय बन गए हैं। क्षेत्रीय कार्य में सामान्यत: अनुसंधानकर्ता अध्ययनरत् समुदाय में रह रहे सभी लोगों के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करता है। क्षेत्रीय कार्य की पद्धति को प्रतिस्थापित करने का श्रेय मैलिनोव्स्की को दिया जाता है जिन्होंने प्रथम युद्ध के समय ऑस्ट्रेलिया की जनजातियों तथा दक्षिणी प्रशांत के द्वीपों (मुख्य रूप से ट्रोबियाण्ड द्वीपों) के मूल निवासियों का अध्ययन किया। इसके पश्चात् रैडक्लिफ-ब्राउन ने अंडमान व निकाबोर द्वीपों का अध्ययन किया। ईवान्स प्रिचार्ड द्वारा सूडान में न्यूर, फ्रांज बोआस द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका में विभिन्न मूल अमेरिकन जनजातियों, मारग्रेट मीड द्वारा समोआ तथा क्लीफोर्ड गीट्स द्वारा बाली में किए गए अध्ययन भी क्षेत्रीय कार्य के आधार पर किए गए अध्ययनों में प्रमुख माने जाते हैं। विलियम वाइजर, ऑस्कर लेविस जैसे विदेशी विद्वानों तथा एम०एन० श्रीनिवास एवं एस०सी० दुबे इत्यादि भारतीय समाजशास्त्रियों द्वारा भी गाँव के क्षेत्रीय कार्य पद्धति द्वारा अध्ययन किए गए हैं। इन अध्ययनों तथा मानवशास्त्री अध्ययनों में मूल अंतर यह है कि समाजशास्त्री अध्ययनों में असहभागी अवलोकन पद्धति अथवा अर्द्ध-सहभागी अवलोकन पद्धति को अपनाया गया है, जबकि मानवशास्त्री अध्ययनों में सहभागी अवलोकन की पद्धति को। समाजशास्त्र में क्षेत्रीय कार्य पर आधारित अध्ययन गाँव को समझने तथा उनको यथार्थ चित्र प्रस्तुत करने में काफी सहायक रहे हैं।

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods (समाजशास्त्र-अनुसंधान पद्धतियाँ) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 5 Doing Sociology: Research Methods (समाजशास्त्र-अनुसंधान पद्धतियाँ), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 4 Culture and Socialisation

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 4 Culture and Socialisation (संस्कृति तथा समाजीकरण)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 4 Culture and Socialisation (संस्कृति तथा समाजीकरण).

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सामाजिक विज्ञान में संस्कृति की समझ, दैनिक प्रयोग के शब्द संस्कृति से कैसे भिन्न है?
उत्तर
संस्कृति’ समाजशास्त्र की शब्दावली में प्रयुक्त की जाने वाली एक विशिष्ट संकल्पना है। इस नाते इसका एक सुस्पुष्ट अर्थ है, जो इस संकल्पना के दैनिक प्रयोग में लगाए गए अर्थ से भिन्न होता है। रोजमर्रा की बातों अथवा दैनिक प्रयोग में संस्कृति’ शब्द को कला तक सीमित कर दिया जाता है। अथवा इसका अर्थ कुछ वर्गों या देशों की जीवन-शैली से लगाया जाता है। कला के रूप में संस्कृति शब्द का प्रयोग शास्त्रीय संगीत, नृत्य अथवा चित्रकला में परिष्कृत रुचि का ज्ञान प्राप्त करने के संदर्भ में किया जाता है। यह परिष्कृत रुचि लोगों को असांस्कृतिक अर्थात् आम लोगों से भिन्न करती है। समाजशास्त्र में संस्कृति को व्यक्तियों में विभेद करने वाला साधन नहीं माना जाता है, अपितु इसे जीवन जीने का एक तरीका माना जाता है जिसमें समाज के सभी सदस्य भाग लेते हैं। टायलर (Tylor) ने संस्कृति की एक विस्तृत परिभाषा देते हुए लिखा है, “संस्कृति वह जटिल संपूर्ण व्यवस्था है जिसमें समस्त ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, प्रथाएँ तथा अन्य समस्त क्षमताएँ एवं आदतें सम्मिलित हैं जिन्हें व्यक्ति समाज का सदस्य होने के नाते प्राप्त करता है। इसी भाँति, मैलिनोव्स्की (Malinowski) के शब्दों में, “संस्कृति में उत्तराधिकार में प्राप्त कलाकृतियाँ, वस्तुएँ, तकनीकी प्रक्रिया, विचार, आदतें तथा मूल्य सम्मिलित होते हैं। इन विद्वानों द्वारा सूचीबद्ध वस्तुओं की प्रकृति भौतिक एवं अभौतिक दोनों प्रकार की है। भौतिक वस्तुओं को सभ्यता कहा जाता है तथा यह संस्कृति का भौतिक पक्ष है। अभौतिक पक्ष मूल्यों, ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 4 Culture and Socialisation

प्रश्न 2.
हम कैसे दर्शा सकते हैं कि संस्कृति के विभिन्न आयाम मिलकर समग्र बनाते हैं।
उत्तर
संस्कृति के तीन प्रमुख आयाम होते हैं-संज्ञानात्मक, आदर्शात्मक (मानकीय) तथा भौतिक। संज्ञानात्मक आयाम को संदर्भ हमारे द्वारा देखे या सुने गए को व्यवहार में लाकर उसे अर्थ प्रदान करने क्री प्रक्रिया से हैं। किसी नेता की कार्टून की पहचान करना अथवा अपने मोबाइल फोन की घंटी को पहचानना इसके उदाहरण हैं। आदर्शात्मक आयाम का संबंध आचरण के नियमों से हैं। अन्य व्यक्तियों के पत्रों को न खोलना, निधन पर अनुष्ठानों का निष्पादन करना ऐसे ही आचरण के नियम हैं। भौतिक आयाम में भौतिक साधनों के प्रयोग संबंधों क्रियाकलाप सम्मिलित होते हैं। इंटरनेट पर चैटिंग करना इसका उदाहरण है। इन तीनों आयामों के समग्र से ही संस्कृति का निर्माण होता है। व्यक्ति अपनी पहचान अपनी संस्कृति से ही करता है तथा संस्कृति के आधार पर ही अपने को अन्य संस्कृतियों के लोगों से अलग समझता है।

प्रश्न 3.
उन दो संस्कृतियों की तुलना करें जिनसे आप परिचित हों। क्या अनृजातीयता (नृजातीय नहीं बनना) कठिन नहीं है?
उत्तर
व्यक्ति अपनी पहचान अपनी संस्कृति से करता है। समानं भाषा, क्षेत्र, धर्म, प्रजाति, अंतर्विवाह, रीति-रिवाज और धार्मिक विश्वासों के आधार पर बने सांस्कृतिक समूहों को नृजातीय समूह भी कहा जाता है। प्रत्येक नृजातीय समूह की अपनी नृजातीय अस्मिता होती है जिसका अर्थ समानता और अनन्यता से है। एक ओर, नृजातीय अस्मिता इस बात की ओर संकेत करती है कि । नृजातीय समूहों के सदस्यों में कौन-सी विशेषताएँ समान हैं तथा दूसरी ओर, इससे उन विशेषताओं का भी पता चलता है जो उन्हें दूसरे नृजातीय समूह से अलग करती है। जब हम दो संस्कृतियों की तुलना करते हैं तो हम दो नृजातीय समूहों में भेद करने का प्रयास करते हैं। उदाहरणार्थ-जब हम हिंदु संस्कृति की तुलना मुस्लिम संस्कृति से करने का प्रयास करते हैं तो दोनों में नृजातीय समानता एवं असमानता का पता लगाने का प्रयास करते हैं। चूँकि नृजातीय अस्मिता ही संस्कृति की पहचान होती है। इसलिए अनुजातीयता अर्थात् नृजातीय नहीं बनना बहुत कठिन होता है। वस्तुतः राष्ट्रीयता, भाषा, धर्म, क्षेत्र, प्रजाति, जाति, अहम् आदि की भावनाएँ नृजातीयता से जुड़ी होती हैं। इन्हें छोड़कर दो नृजातीय समूह या दो संस्कृतियों के लोग एक हों जाएँ, ऐसा असंभव तो नहीं है परंतु अत्यधिक कठिन है। जनजातियों में विभिन्न संस्कृतियों में आमनप्रदान से जनजातीय अस्मिता कम हुई है तथा सात्मीकरण की प्रक्रिया द्वारा अनेक जनजातियाँ अपनी संस्कृति खोकर हिंदू संस्कृति में आत्मसात् कर दी गई हैं।

प्रश्न 4.
सांस्कृतिक परिवर्तनों का अध्ययन करने के लिए दो विभिन्न उपागमों की चर्चा करें।
उत्तर
संस्कृति के विभिन्न पक्षों में होने वाले परिवर्तन को सांस्कृतिक परिवतर्न कहते हैं। सांस्कृतिक परिवर्तन समाज के आदर्शों और मूल्यों की व्यवस्था में होने वाला परिवर्तन है। सांस्कृतिक परिवर्तन वह तरीका है जिसके द्वारा समाज अपनी संस्कृति के प्रतिमानों को बदलता है। रूथ बेनेडिक्ट (Ruth Benedict) ने संस्कृति के प्रतिमानों की चर्चा करते हुए स्पष्ट लिखा है कि उनमें परिवर्तन सदैव होते रहते हैं। उन्हीं के शब्दों में, “हमें याद रखना चाहिए कि परिवर्तन से, चाहे उसमें कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, बचा नहीं जा सकता।” सास्कृतिक परिवर्तन की संकल्पना सामाजिक परिवर्तन की संकल्पना से अधिक विस्तृत मानी जाती है। डेविस (Davis) के अनुसार, सामाजिक परिवर्तन, वास्तव में, सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं अपितु इसका एक अंग है। सांस्कृतिक परिवर्तन के अंतर्गत संस्कृति की किसी भी शाखा, जैसे कला, विज्ञान, दर्शन तथा तकनीकी में परिवर्तन को सम्मिलित किया जा सकता है।’ भौतिक संस्कृति में परिवर्तन यद्यपि सामाजिक परिवर्तन ला सकता है परंतु वह स्वयं सामाजिक परिवर्तन नहीं है। सांस्कृतिक परिवर्तन संस्कृति से संबंधित होते हैं, सार्वभौम होते हैं, इनका क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत होता है, इनकी प्रकृति जटिल होती है तथा सभी समाजों में इनकी गति एक समान नहीं होती। सांस्कृतिक परिवर्तन का अध्ययन करने की दो पद्धतियाँ ‘सर्वसम्मत समाधन की पद्धति’ तथा ‘संघर्ष की पद्धति है। पहली पद्धति के अंतर्गत सांस्कृतिक अंत: संबंधों को प्रकार्यात्मक परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है। आत्मसात् करने का सिद्धांत, जिसे मैल्टिग पॉट का सिद्धांत भी कहा जाता है, इसका उदाहरण है। इस सिद्धांत के अनुसार एक समूह अपनी सांस्कृतिक अस्मिता खोकर दूसरे सांस्कृतिक समूह में पूर्णतः आत्मसात हो जाता है। संघर्ष की पद्धति सांस्कृतिक समूहों को हित समूह के रूप में देखती है जो सदैव असमानता की स्थिति में होते हैं तथा किसी समान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। दक्षिण अफ्रीका में गोरे लोगों द्वारा काले लोगों से प्रजातीय भेदभाव अथवा श्रीलंका में अप्रवासी तमिलों और स्थानीय सिंहलियों के बीच धार्मिक संघर्ष सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित संघर्ष ही हैं।

प्रश्न 5.
क्या विश्वव्यापीकरण को आप आधुनिकता से जोड़ते हैं? नृजातीयता का प्रेक्षण करें तथा उदाहरण दें।
उत्तर
नृजातीयता में सांस्कृतिक श्रेष्ठता की भावना निहित होती है। नृजातीयता का प्रयोग अपने सांस्कृतिक मूल्यों का अन्य संस्कृतियों के लोगों के व्यवहार तथा आस्थाओं के मूल्यांकन करने के लिए। किया जाता है। प्रत्येक नृजातीय समूह अपने सांस्कृतिक मूल्यों को अन्य समूहों के सांस्कृतिक मूल्यों से श्रेष्ठ मानता है। इसी भावना के कारण नृजातीयता की भावना को विश्व-बंधुत्व एवं विश्वव्यापीकरण के विपरीत माना जाता है विश्वव्यापीकरण में व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के मूल्यों एवं आस्थाओं का मूल्यांकन अपने मूल्यों एवं आस्थाओं के अनुसार नहीं करता। विश्वव्यापीकरण विभिन्न सांस्कृतिक प्रवृत्तियों को मान्यता प्रदान करता है तथा इन्हें अपने अंदर समायोजित करता है। इसमें संस्कृति को समृद्ध बनाने हेतु सांस्कृतिक विनिमय तथा लेम-देन पर भी बल दिया जाता है। विश्वव्यापीकरण को निश्चित रूप से आधुनिकता के साथ जोड़ा जा सकता है क्योंकि एक आधुनिक समाज सांस्कृतिक विभिन्नता का प्रशंसक होता है तथा बाहर से पड़ने वाले सांस्कृतिक प्रभावों के लिए अपने दरवाजे बंद नहीं करता। ऐसे सभी प्रभावों को सदैव इस प्रकार सम्मिलित किया जाता है कि ये देशीय संस्कृति के तत्त्वों के साथ मिल सकें। एक विश्वव्यापी पर्यवेक्षण प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संस्कृति को विभिन्न प्रभावों द्वारा सशक्त करने की स्वतंत्रता देता है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 4 Culture and Socialisation

प्रश्न 6.
आपके अनुसार आपकी पीढी के लिए समाजीकरण का सबसे प्रभावी अभिकरण क्या है? यह पहले अलग कैसे था, आप इस बारे में क्या सोचते हैं।
उत्तर
समाजीकरण का अर्थ सीखने की उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा व्यक्ति को एक सामाजिक प्राणी बनाया जाता है तथा जिससे वह सांस्कृतिक मूल्यों का आंतरीकरण करता है। बच्चे का सामाजीकरण अनेक अभिकरणों एवं संस्थाओं द्वारा किया जाता है जिनमें वह भाग लेता है। परिवार, विद्यालय, समकक्ष समूह, पड़ोस, व्यावसायिक समूह तथा सामाजिक वर्ग/जाति, धर्म आदि ऐसे ही प्रमुख अभिकरण हैं। पहले कभी परिवार को समाजीकरण का प्रमुख माध्यम माना जाता था। यद्यपि आज भी समाजीकरण में परिवार को अत्यंत महत्त्व है, तथापि जन माध्यमों को आज समाजीकरण का सबसे प्रभावी अभिकरण माना जाने लगा है। इन माध्यमों में टेलीविजन प्रमुख है। बच्चा माता-पिता एवं परिवार के अन्य सदस्यों तथा समकक्ष समूह से बहुत-सी बातों को सीखता ही है, टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले कार्टूनों एवं बच्चों के लिए कार्यक्रमों का भी उस पर गहरा प्रभाव पड़ता है। बहुत-से शब्द, खान-पान के ढंग एवं बातचीत के तरीके आज बच्चे टेलीविजन के माध्यम से सीखने लगे हैं। ब्रिटेन में हुए एक अध्ययन में पाया गया है कि बच्चों द्वारा टेलीविजन देखने पर व्यय किया गया समय एक साल में एक सौ स्कूली दिवसों के समान है तथा इसमें बड़े भी पीछे नहीं हैं। टेलीविजन के परदे पर हिंसा तथा बच्चों के बीच आक्रमण व्यवहार में संबंध की पुष्टि भी अनेक अध्ययनों से हुई है।

क्रियाकलाप आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आप किसी अन्य व्यक्ति को अपनी संस्कृति में कैसे अभिवादन करेंगे? (क्रियाकलाप 1)
उत्तर
प्रत्येक संस्कृति में दूसरे का अभिवादन करने का अपना एक विशिष्ट ढंग होता है। भारतीय संस्कृति में बड़ों के पैर छूकर या हाथ जोड़कर नमस्ते द्वारा उनका अभिवादन किया जाता है। हमउम्र में अब मुस्कराकर, हाथ मिलाकर, हैलो कहकर भी अभिवादन किया जाने लगा है। पश्चिमी देशों में अभिवादन को ढंग बिना आयु के भेदभाव के हाथ मिलाने का है। यदि आप किसी अंग्रेज का हाथ जोड़कर अभिवादन करते हैं तो हो सकता है वह भारतीय संस्कृति के इस ढंग से अनभिज्ञ होने के नाते इसका अर्थ न समझ पाए। उसे इसका अर्थ बताने पर यही समझ में आएगा कि भारतीय संस्कृति में बड़ों का अभिवादन इसी ढंग से किया जाता है।

प्रश्न 2.
अपने क्षेत्र के अतिरिक्त कम-से कम किसी एक क्षेत्र के बारे में पता लगाएँ कि प्राकृतिक वातावरण खाने-पीने की आदतों, रहने के ढंग, कपड़ों तथा देवी-देवताओं की पूजा करने के तरीकों को कैसे प्रभावित करता है? (क्रियाकलाप 2)
उत्तर
यदि हम अपने निकटवर्ती पर्वतीय स्थलों पर रहने वाले लोगों को देखें तो भिन्न प्राकृतिक पर्यावरण के प्रभावों को सरलता से समझ सकते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोग सर्दी होने के कारण या बर्फ पड़ने के कारण खाने में दाल, सब्जी के अतिरिक्त अंडों एवं मांस का सेवन भी काफी मात्रा में करते हैं। वे सोचते हैं कि मांसाहारी खाना उनके शरीर को गर्म रखने में अधिक सक्षम होता है। रहने के ढंग में भी अंतर स्पष्ट देखा जा सकता है। उनके मकानों की बनावट भिन्न होती है तथा पहाड़ी लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर पैदल ही जाते हैं क्योंकि रिक्शा-तॉगे न तो उपलब्ध होते हैं और न ही वे पहाडी क्षेत्रों में चल सकते हैं। सर्दी से बचने के लिए वे गर्म कपड़ों का इस्तेमाल अधिक करते हैं। कठिन जीवन होने के कारण ऐसा ही माना जाता है कि पहाड़ों पर रहने वाले अधिक धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं। वे देवी-देवताओं पर अधिक विश्वास करते हैं।

प्रश्न 3.
भारतीय भाषाओं में संस्कृति शब्द के समतुल्य शब्दों की पहचान कीजिए। वे किस प्रकार से संबंधित हैं? (क्रियाकलाप 3)
उत्तर
‘संस्कृति’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-‘सम’ तथा ‘कृति’। संस्कृत में ‘सम’ उपसर्ग का अर्थ है ‘अच्छा’ तथा ‘कृति’ शब्द का अर्थ है ‘करना’। इस अर्थ में यह ‘संस्कार’ का समानार्थक है। हिंदू जीवन में जन्म से मृत्यु तक अनेक संस्कार होते हैं जिससे जीवन परिशुद्ध होता है। व्यक्ति की आंतरिक व बाह्य क्रियाएँ संस्कारों के अनुसार ही होती है। मध्यकाल में इस शब्द का प्रयोग फसलों के उत्तरोत्तर परिमार्जन के लिए किया जाता था। इसी से खेती करने की कला के लिए ‘कृषि (Agriculture) शब्द बना है परंतु अठारहवीं तथा उन्नीसवीं शताब्दियों में इस शब्द का प्रयोग व्यक्तियों के परिमार्जन के लिए भी किया जाने लगा। जो व्यक्ति परिष्कृत अथवा पढ़ा-लिखा था, उसे सुसंस्कृत कहा जाता था। इस युग में यह शब्द अभिजात वर्गों के लिए प्रयोग होता था। जिन्हें असंस्कृत जनसाधारण से अलग किया जाता था।

प्रश्न 4.
संस्कृति की विभिन्न परिभाषाओं की तुलना करें तथा सबसे संतोषजनक परिभाषा का पता लगाएँ। (क्रियाकलाप 4)
उत्तर
क्रोबर एवं क्लूखोन नामक अमेरिकी मानवशास्त्रियों ने संस्कृति की परिभाषा जिन शब्दों द्वारा देने का प्रयास किया है उन्हें निम्न प्रकार से सूचीबद्ध किया है-

  1. संस्कृति सोचने, अनुभव करने तथा विश्वास करने का एक तरीका है।
  2. संस्कृति लोगों के जीने का एक संपूर्ण तरीका है।
  3. संस्कृति व्यवहार का सारांश है।
  4. संस्कृति सीखा हुआ व्यवहार है।
  5. संस्कृति सीखी हुई चीजों का एक भंडार है।
  6. संस्कृति सामाजिक धरोहर है जो कि व्यक्ति अपने समूह से प्राप्त करता है।
  7. संस्कृति बार-बार घट रही समस्याओं के लिए मानकीकृत दिशाओं का एक समुच्चय है।
  8.  संस्कृति व्यवहार के मानकीय नियमितीकरण हेतु एक साधन है।

उपर्युक्त अर्थों में संस्कृति को उस सामाजिक धरोहर के रूप में स्वीकार करना उचित है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांरित होती रहती है। यह सीखा हुआ व्यवहार है। जब हम अठारहवीं शताब्दी में लखनऊ की संस्कृति, अतिथि सत्कार की संस्कृति या सामान्यतया प्रयुक्त शब्द ‘पाश्चात्य संस्कृति का प्रयोग करते हैं तो हमारा तात्पर्य व्यवहार के मानकीकृत ढंग से ही होता है। व्यवहार के भिन्न ढंग के कारण ही आज भी हम लखनऊ की संस्कृति को अन्य शहरों की संस्कृतियों से भिन्न मानते हैं।

प्रश्न 5.
क्या आपको अपने आस-पास में बने किसी उप-सांस्कृतिक समूह की जानकारी है? आप ” इनको पहचानने में कैसे सफल हुए? (क्रियाकलाप 5)
उत्तर
आपके आस-पास यदि निर्माण कार्य में लगे हुए बिहारी मजदूर अथवा रिक्शाचालक बिहारी एक स्थान पर रहते हैं तो आप इस उम-सांस्कृतिक समूह की सरलता से पहचान कर सकते हैं। उनकी बोलचाल से ही आप यह अनुमान लगा सकते हैं कि वे बिहार या पूर्वी उत्तर प्रदेश के हैं। इसी भाँति, यदि आपके आस-पड़ोस या किसी अन्य मुहल्ले में शहर से थोड़ा बाहर कूड़ा बीनने वाले परिवारों का झुंड रहता है तो उन्हें भी आप न केवल कार्य के आधार पर अपितु उनके रहन-सहन के आधार पर भी अलग उप-सांस्कृतिक समूह के रूप में पहचान सकते हैं।

प्रश्न 6.
वे बातें बताएँ जिनमें एक घरेलू नौकर का बच्चा अपने आपको उस बच्चे से अलग समझे, जिसके परिवार में उसकी माँ काम करती है। साथ ही उन वस्तुओं के बारे में बताएँ जिन्हें वह आपस में बाँट सकते हैं या बदल सकते हैं? (क्रियाकलाप 6)
उत्तर
एक घरेलू नौकर का बच्चा अपने आपको उस बच्चे से, जिसके परिवार में उसकी माँ काम करती है, कई बातों में अलग समझ सकता है। वह सापेक्षिक वंचना की भावना से भी ग्रसित हो सकता है क्योंकि खाने-पीने के लिए जो सामान मालिक के बच्चे को उपलब्ध है अथवा खेलने के लिए जो खिलौने मालिक के बच्चे के पास है वह उसके पास नहीं है। नौकर के बच्चे के पास न तो वैसे कपड़े पहनने के लिए हो सकते हैं और हो सकता है कि वह स्कूल में भी पढ़ने नहीं जाता हो। उसकी बोलचाल का ढंग भी मालिक के बच्चे से अलग हो सकता है। नौकरानी के बच्चे की भाषा थोड़ी-बहुत अशिष्ट भी हो सकती है। इससे हमें यह पता चलता है कि विभिन्न पारिवारिक परिस्थितियों में होने वाले समाजीकरण से बच्चों की सीख में भी अंतर हो सकता है। हो सकता है कि मालिक की लड़की सुंदर कपड़े अधिक पहनती हो, जबकि नौकरानी की लड़की काँच की चूड़ियाँ अधिक पहनती हो। इसी भाँति उनकी अन्य रुचियों में भी अंतर हो सकता है। हो सकता है कि दोनों बच्चों में आपस में बाँटने के लिए कोई वस्तु न हो, तथापि वे किसी फिल्म के गाने के बारे में आपस में विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं। मालिक का बच्चा अपने पुराने कपड़ों या खिलौनों को नौकरानी के बच्चों को दे सकता है अथवा अपने सामान्य खिलौनों के साथ. उससे खेल भी सकता है।

प्रश्न 7.
टेलीविजन, जगह, समय, सुअवसर, आपके आस-पास के लोग इत्यादि में किस चीज की उपस्थिति या अनुपस्थिति आपको व्यक्तिगत रूप से ज्यादा प्रभावित करेगी? (क्रियाकलाप 7)
उत्तर
यह परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। हो सकता है कि किसी बच्चे को अपना मकान न होने का गम ही सबसे अधिक प्रभावित कर रहा हो तो दूसरे को अपना मकान होने के बावजूद टेलीविजन न होने का। किसी निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चे को, जिसे की अपनी माता का हाथ बँटाने अनेक परिवारों में झाड़े-पोंछा या बर्तन साफ करने हेतु साथ जाता है, घर के कार्यों या विद्यालय के समय में सामंजस्य बैठाने की समस्या हो सकती है। छोटे घरों में रहने वाले बच्चे को अपनी पढ़ाई हेतु अलग कमरा उपलब्ध न होने की समस्या का सामना करना पड़ता है।

प्रश्न 8.
अपने मित्रों के साथ की गई अपनी अंतःक्रिया की तुलना अपने माता-पिता तथा अन्य बड़ों से की गई अंतःक्रिया से करने पर क्या अंतर स्पष्ट होता है? (क्रियाकलाप 8)
उत्तर
मित्रों की गणना समवयस्क समूह के रूप में होती है। समवयस्क समूह के सदस्यों का एक-दूसरे पर प्रभाव अधिक होता है। हमउम्र या एक व्यवसाय में लगे होने के कारण वे अपने विचारों को खुलकर एक-दूसरे को बता सकते हैं तथा विचारों में भिन्नता पर खुलकर वाद-विवाद कर सकते हैं। ऐसे समूह व्यक्ति की मनोवृत्ति तथा व्यवहार को निर्धारित करने में प्रायः महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। माता-पिता तथा अन्य बड़ों के साथ अंत:क्रिया समकक्ष समूहों के सदस्यों के साथ होने वाली अंतःक्रियाओं से भिन्न होती है। अक्सर बच्चे अपने माता-पिता या बड़ों के दृष्टिकोण को बिना किसी विवाद के अपना लेते हैं। इसीलिए यदि माता-पिता द्वारा किए जाने वाले समाजीकरण तथा समवयस्क समूह या विद्यालय द्वारा किए जाने वाले समाजीकरण में अधिक अंतर हो जाए तो बच्चे के सामने दुविधा की स्थिति पैदा हो सकती है कि वह माता-पिता द्वारा बताई गई बात को उचित माने या अपने दोस्तों व प्राध्यापकों द्वारा बताई गई बात को। इसलिए आज समाजीकरण के विभिन्न अभिकरणों में जीवन के लक्ष्यों के प्रति एवं व्यक्तित्व के निर्माण के प्रति सामंजस्य स्थापित करने की बात पर अधिक बल दिया जाने लगा है।

प्रश्न 9.
लोग अपने आस-पास के परिवेश के विपरीत परिवेशों में बने धारावाहिकों से खुद को कैसे जोड़ते हैं? यदि बच्चे अपने दादा-दादी के साथ टेलीविजन देख रहे हैं तो कौन-से कार्यक्रम देखने योग्य हैं, क्या इस पर उनमें असहमति है? यदि ऐसा है तो उनके दृष्टिकोण में क्या अंतर पाया गया? क्या इन अंतरों में क्रमशः संशोधन होता है (क्रियाकलाप 9)
उत्तर
आज टेलीविजन समाजीकरण का एक प्रमुख अभिकरण बन गया है। इसमें अनेक धारावाहिक़ दिखाए जाने लगे हैं। बहुत-से धारावाहिकों में किसी कॉलेज में अमीर परिवारों के छात्र-छात्राओं का प्रदर्शन बिगड़ते हुए बच्चों के रूप में भी हो सकता है। इन विपरीत परिवेशों में बने धारावाहिकों से बच्चा खुद को आँकने का प्रयास करता है। वह यह भी सोच सकता है कि धारावाहिकों में दिखाए जाने वाले ऐसे बिगड़े हुए बच्चे बनना अच्छी बात नहीं है। इसके विपरीत, यह भी हो सकता है कि उन बच्चों की जीवन-शैली का उस पर गहरा प्रभाव पड़े तथा वह उस शैली को अपने जीवन में भी अपनाने का प्रयास करने लगे। धारावाहिक देखते समय सामान्यत बच्चों एवं दादा-दादी में मतभेद हो सकता है क्योंकि पीढ़ी अंतर होने के कारण दोनों की रुचियों में काफी अंतर हो सकता है। पढ़ने वाले बच्चे हो सकता है कि विभिन्न विद्यालयों के बच्चों में दिखाए जाने वाले क्विज जैसे कार्यक्रम देखने या क्रिकेट का मैच देखने में अधिक रुचि रखते हों, जबकि दादा-दादी की इन दोनों प्रकार के कार्यक्रमों में कोई रुचि न हो और वे टेलीविजन पर उस समय प्रदर्शित की जाने वाली किसी पुरानी फिल्म को देखने के लिए उत्सुक हों। आजकल छोटी आयु में ही बच्चे कार्टून आधारित कार्यक्रम देखने के आदी हो जाते हैं तथा वे नहीं चाहते कि इन कार्यक्रमों के अतिरिक्त टेलीविजन पर कोई अन्य कार्यक्रम भी देखे जाएँ। दादा-दादी की ऐसे कार्यक्रमों में हो सकता है कि कोई रुचि ही न हो। इस प्रकार के अंतर पीढ़ी अंतराल के द्योतक हैं तथा दोनों पक्षों में इस बात को लेकर समझौता हो सकता है कि जिस समय बच्चे कार्यक्रम देखें उस समय उन्हें अपनी रुचि का कार्यक्रम देखने की अनुमति प्रदान की जाए तथा जब दादा-दादी कार्यक्रम देखें तो बच्चे अपना कार्यक्रम देखने पर जोर न दें। अन्य शब्दों में, समय निर्धारित कर दृष्टिकोण में अंतर को कम किया जा सकता है।

प्रश्न 10.
कस्बों तथा गाँवों में संस्कृति के मानकीय आयाम कैसे अलग हैं? (क्रियाकलाप 11)
उत्तर
कस्बों एवं गाँव के मानकीय आयामों में काफी भिन्नता पाई जाती है। कस्बों की जनसंख्या अधिक होने के कारण संबंध आमने-सामने के, व्यक्तिगत एवं घनिष्ठ नहीं होते हैं। औपचारिक नियंत्रण अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है तथा अनौपचारिक नियंत्रण का प्रायः अभाव पाया जाता है। इसके विपरीत, गाँव में आमने-सामने के प्रत्यक्ष एवं घनिष्ठ संबंध पाए जाते हैं तथा अनौपचारिक नियंत्रण ही अनुपालन के लिए पर्याप्त होता है। कस्बे एवं गाँव में रहने वाले लोगों का जीवन का ढंग, खान-पान, पहनावा, धार्मिक प्रवृत्ति एवं विश्व के प्रति दृष्टिकोण भी भिन्न-भिन हो सकता है। कस्बे में असुरक्षा का वातावरण भी अधिक हो सकता है। इसी के फलस्वरूप हो सकता है कि लड़की यदि किसी कार्य से कहीं बाहर जाती है तो उसके साथ उसका भाई या परिवार का अन्य बड़ा सदस्य जरूर जाए। हो सकता है कि यह स्थिति संबंधित लड़की को काफी उपहासजनके लगे क्योंकि वह विद्यालय में तो अकेली ही जाती है परंतु माता-पिता किसी अन्य कार्य हेतु उसे अकेले जाने से क्यों रोकते हैं। गाँव में इस प्रकार की परिस्थितियाँ ही विकसित नहीं होती हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 4 Culture and Socialisation

प्रश्न 11.
पुजारी की बेटी को घंटी छूने की अनुमति जैसी प्रदत्त प्रस्थिति पर प्रश्न अन्य लड़कियों में किस प्रकार की प्रतिक्रिया विकसित कर सकता है? (क्रियाकलाप 11)
उत्तर
प्रदत्त प्रस्थिति कई बार समाज में प्रचलित मूल्यों के प्रति विद्रोह अथवा समतावादी व्यवहार की प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकती है। उदाहरणार्थ-यदि एक लड़की मंदिर में जाकर घंटी बजाने को उत्सुक है परंतु उसके माता-पिता उसे यह कहकर रोक रहे हैं कि लड़कियाँ मंदिर में घंटी नहीं बजा सकती है तो ऐसी स्थिति में लड़की के मन में अनेक प्रकार के विचार आ सकते हैं। वह माता-पिता को यह तर्क दे सकती है कि पिछली बार उसने मंदिर के पुजारी की लड़की को घंटी बजाते हुए देखा था तो फिर वह घंटी क्यों नहीं बजा सकती। माता-पिता यह तर्क दे सकते हैं कि चूंकि वह मंदिर के पुजारी की लड़की है इसलिए उसे घंटी बजाने का अधिकार प्राप्त है। हो सकता है लड़की इस तर्क को न माने तथा माँ-बाप को कहे कि जब भगवान की नजरों में सब एकसमान हैं तो इस प्रकार का भेदभाव कहाँ तक उचित है। बड़े लोग सदैव यह सोचते हैं कि वे जो तर्क बच्चों को देंगे वे चुपचाप उन्हें स्वीकार कर लेंगे।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
व्यक्ति और समाज एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं और एक-दूसरे पर आश्रित हैं। यह कथन किसका है?
(क) दुर्वीम’
(ख) चार्ल्स कूले
(ग) मैकाइवर एवं पेज
(घ) प्लेटो
उत्तर
(ग) मैकाइवर एवं पेज

प्रश्न 2.
‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।’ यह कथन है-
(क) रूसो का
(ख) हरबर्ट स्पेन्सर का
(ग) मैकाइवर व पेज का
(घ) अरस्तू को
उत्तर
(घ) अरस्तू का

प्रश्न 3.
किसने कहा है कि समाज एक अधि-जैविक व्यवस्था है?
(क) मैकाइवर और पेज
(ख) किंग्सले डेविस
(ग) हरबर्ट स्पेन्सर
(घ) ऑगबर्न
उत्तर
(ग) हरबर्ट स्पेन्सर

प्रश्न 4.
संस्कृति के भौतिक पक्ष को कहा जाता है-
(क) समाज
(ख) सामाजिक व्यवस्था
(ग) सभ्यता
(घ) मानव समाज
उत्तर
(ग) सभ्यता

प्रश्न 5.
“सभ्यता संस्कृति का वाहक है।” यह कथन किसका है?
(क) क्लाइव बेल
(ख) मैकाइवर एवं पेज
(ग) फेयरचाइल्ड
(घ) ऑगबर्न एवं निमकॉफ
उत्तर
(ख) मैकाइवर एवं पेज

प्रश्न 6.
रॉबर्ट बीरस्टीड ने सामाजिक आदर्शों को कितनी श्रेणियों में विभाजित किया है?
(क) दो।
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर
(ख) तीन

प्रश्न 7.
किसके अनुसार सामाजिक मूल्य प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक संगठन व सामाजिक व्यवस्था से संबंधित होते हैं?
(क) इलियट एवं मैरिल
(ख) सी०एम०केस
(ग) राधाकमल मुखर्जी
(घ) जॉनसन
उत्तर
(ग) राधाकमल मुखर्जी

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 4 Culture and Socialisation

प्रश्न 8.
ह्यूमन नेचर एंड दि सोशल ऑर्डर’ पुस्तक के लेखक कौन हैं?
(क) फ्रॉयड
(ख) कूले
(ग) मैकाइवर एवं पेजं
(घ) मीड
उत्तर
(ख) कुले

निश्चित उत्तरीय प्रश्नोत्तरे

प्रश्न 1.
संस्कृति के भौतिक पक्ष को क्या कहा जाता है?
उत्तर
संस्कृति के भौतिक पक्ष को सभ्यता कहा जाता है।

प्रश्न 2.
उन भौतिक साधनों को क्या कहा जाता है जिनमें उपयोगिता का तत्व पाया जाता है?
उत्तर
जिन भौतिक साधनों में उपयोगिता का तत्त्व पाया जाता है उन्हें सभ्यता कहते हैं।

प्रश्न 3.
निम्न कथन किसने कहा है “अधिजैविक संस्कृति के बाद की अवस्था के रूप में सभ्यता की परिभाषा दी जा सकती है?
उत्तर
यह कथन ऑगबर्न तथा निमकॉफ का है।

प्रश्न 4.
“सभ्यता संस्कृति का वाहक हैं” किसने कहा है?
उत्तर
यह कथन मैकाइवर और पेज का है।

प्रश्न 5.
उच्चस्तरीय मानदंडों को क्या कहा जाता है?
उत्तर
उच्चस्तरीय मानदंडों को सामाजिक मूल्य कहा जाता है।

प्रश्न 6.
वह कौन-सी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति पहले से सीखे हुए व्यवहारों को भुला देता है?
उत्तर
व्यक्ति द्वारा पहले से सीखे हुए व्यवहारों को भुला देने की प्रक्रिया को वि-समाजीकरण कहा जाता है।

प्रश्न 7.
उस प्रक्रिया को क्या कहा जाता है जिसमें व्यक्ति समाज द्वारा अस्वीकृत व्यवहारों (जैसी चोरी करना, अपराध करना आदि) को सीखता है?
उत्तर
समाज द्वारा अस्वीकृत व्यवहारों को सीखने की प्रक्रिया को नकारात्मक समाजीकरण कहते हैं।

प्रश्न 8.
इड, इगो एवं सुषर इगो के आधार पर समाजीकरण की व्याख्या करने वाले विद्वान कौन हैं?
उत्तर
इड, इगो एवं सुपर इगो के आधार पर समाजीकरण की व्याख्या करने वाले विद्वान् फ्रॉयड हैं।

प्रश्न 9.
‘ह्यूमन नेचर एण्ड दि सोशल ऑर्डर’ पुस्तक के लेखक कौन हैं?
उत्तर
‘ह्यूमन, नेचर एण्ड दि सोशल ऑर्डर’ पुस्तक के लेखक का नाम कूले है।

प्रश्न 10.
‘माइण्ड, सेल्फ एण्ड सोसाइटी पुस्तक के लेखक कौन हैं?
उत्तर
‘माइण्ड, सेल्फ एण्ड सोसाइटी’ पुस्तक के लेखक का नाम मीड है।

प्रश्न 11.
अपनी पहली जीवन पद्धति के स्थान पर दूसरी जीवन पद्धति को अपनाने से संबंधित सीख की प्रक्रिया को क्या कहते हैं?
उत्तर
पहली जीवन पद्धति के स्थान पर दूसरी जीवन पद्धति को अपनाने से संबंधित सीख की प्रक्रिया को पुनर्समाजीकरण कहते हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 4 Culture and Socialisation

प्रश्न 12.
‘लिबिडो किस विद्वान की संकल्पना है?
उत्तर
‘लिबिडो’ फ्रॉयड द्वारा प्रतिपादित संकल्पना है।

प्रश्न 13.
कौन-सा विद्वान समाजीकरण की प्रक्रिया को काम प्रवृत्तियों (लिबिडो) द्वारा निर्धारित प्रक्रिया मानता है?
उत्तर
समाजीकरण की प्रक्रिया को काम प्रवृत्तियों (लिबिडो) द्वारा निर्धारित प्रक्रिया मानने वाले विद्वान का नाम फ्रॉयड है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सभ्यता किसे कहते हैं?
उत्तर
संस्कृति के भौतिक पक्ष को सभ्यता कहा जाता है। सभ्यता का संबंध उस कला-विन्यास से है। जिसे मनुष्य ने अपने जीवन की दशाओं को नियंत्रित करने हेतु रचा है। यह संस्कृति का अधिक जटिल व विकसित रूप है जिसमें मानव-निर्मित भौतिक वस्तुएँ सम्मिलित होती हैं। मैकाइवर तथा पेज के अनुसार, “सभ्यता से हमारा अर्थ उस संपूर्ण प्रविधि तथा संगठन से हैं जिसे कि मनुष्य ने अपने जीवन की दशाओं को नियंत्रित करने के उद्देश्य से बनाया है।

प्रश्न 2.
भौतिक तथा अभौतिक संस्कृति में दो अंतर बताइए।
उत्तर
भौतिक एवं अभौतिक संस्कृति में पाए जाने वाले दो अंतर निम्नलिखित हैं|

  1. भौतिक संस्कृति के अंतर्गत मनुष्य द्वारा निर्मित वे सभी वस्तुएँ आ जाती हैं जिनका उनकी उपयोगिता द्वारा मूल्यांकन किया जाता है, जबकि अभौतिक संस्कृति का संबंध मूल्यों, विचारों व ज्ञान से है।
  2. भौतिक संस्कृति मानव द्वारा निर्मित वस्तुओं का योग है, जबकि अभौतिक संस्कृति रीति-रिवाजों, रूढ़ियों, प्रथाओं, मूल्यों, नियमों का उपनियमों का योग है।

प्रश्न 3.
संस्कृति और सभ्यता में दो प्रमुख अंतर बताइए।
उत्तर
संस्कृति और सभ्यता में पाए जाने वाले दो प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं-

  1. उपयोगिता के आधार पर अंतर-सभ्यता के अंतर्गत मनुष्य द्वारा निर्मित वे सभी वस्तुएँ आ जाती हैं जिनका इनकी उपयोगिता द्वारा मूल्यांकन किया जाता है, किंतु संस्कृति का संबंध उस ज्ञाने से है जिसके आधार पर वस्तुओं का निर्माण किया जाता है।
  2. स्वरूप में अंतर-सभ्यता का संबंध व्यक्ति की बाहरी दशा से होता है जो व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति करती है, किंतु संस्कृति का संबंध व्यक्ति की आंतरिक अवस्था से है जो व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करती है। संस्कृति से व्यक्ति सर्वांग रूप से प्रभावित होता है।

प्रश्न 4.
सामाजिक मूल्यों के दो प्रमुख कार्य बताइए।
उत्तर
सामाजिक मूल्यों के दो प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं—

  1. मानव समाज में व्यक्ति सामाजिक मूल्यों के आधार पर समाज द्वारा स्वीकृत नियमों का पालन करता है। वह उनके अनुकूल अपने व्यवहार को ढालकर अपना जीवन व्यतीत करता है। इस प्रकार सामाजिक मूल्य सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने में सहायता प्रदान करते हैं।
  2. मनुष्य अपनी अनंत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सतत् प्रयत्न करता रहता है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति में उसे सामाजिक मूल्यों से पर्याप्त सहायता प्राप्त होती है।

प्रश्न 5.
सभ्यता की परिभाषा लिखिए।
उत्तर
क्लाइव बेल के शब्दों में, “वह (सभ्यता) मूल्यों के ज्ञान के आधार पर स्वीकृत किया गया तर्क और तर्क के आधार पर कठोर व भेदनशील बनाया गया मूल्यों का ज्ञान है।”

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
संस्कृति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
संस्कृति को सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों तथा सामाजिक विरासत के आधार पर समझाने का प्रयास किए गया है। प्रत्येक समाज की अपनी भिन्न संस्कृति होती है। संस्कृति वह संपूर्ण जटिलता है। जिसमें वे सभी वस्तुएँ सम्मिलित हैं जिन पर हम विचार करते हैं, कार्य करते हैं और समाज का सदस्य होने के नाते अपने पास रखते हैं। संस्कृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांरित होती रहती है। प्रत्येक पीढ़ी ने अपने पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान एवं कला का और अधिक विकास किया है। अन्य शब्दों में, प्रत्येक पीढी ने अपने पूर्वजों के ज्ञान को संचित किया है। और इस ज्ञान के आधार पर नवीन ज्ञान और अनुभव का भी। ज्ञान अर्जन किया है। इस प्रकार के ज्ञान व अनुभव के अंतर्गत यंत्र, प्रविधियाँ, प्रथाएँ, विचार और मूल्य आदि आते हैं। ये मूर्त और अमूर्त वस्तुएँ संयुक्त रूप से संस्कृति’ कहलाती हैं। इस प्रकार वर्तमान पीढ़ी ने अपने पूर्वजों तथा स्वयं के प्रयासों से जो अनुभव व व्यवहार सीखा है वहीं संस्कृति है।

मैकाइवर एवं पेज के शब्दों में, “संस्कृति हमारे दैनिक व्यवहार में कला, साहित्य, सीखा है वहीं संस्कृति है। मैकाइवर एवं पेज’ के शब्दों में, “संस्कृति हमारे दैनिक व्यवहार में कला, साहित्य, धर्म, मनोरंजन और आनंद में पाए जाने वाले रहन-सहन और विचार के ढंगों से हमारी प्रकृति की अभिव्यक्ति है।”

प्रश्न 2.
भौतिक संस्कृति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
मनुष्यों ने अपनी आवश्यकताओं के कारण अनेक आविष्कारों को जन्म दिया है। ये आविष्कार हमारी संस्कृति के भौतिक तत्त्व माने जाते हैं। इस प्रकार भौतिक संस्कृति उन आविष्कारों का नाम है। जिनको मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं के कारण जन्म दिया है। यह भौतिक संस्कृति मानव-जीवन के बाह्य रूप से संबंधित है। भौतिक संस्कृति को ही सभ्यता कहा जाता है। मोटर, रेलगाड़ी, हवाईजहाज, मेज-कुर्सी, बिजली का पंखा आदि सभी भौतिक तत्त्व; भौतिक संस्कृति अथवा सभ्यता के ही प्रतीक है। संस्कृति के भौतिक पक्ष को मैथ्यू आरनोल्ड, अल्फर्ड, वेबर तथा मैकाइवर एवं पेज ने ही सभ्यता कहा है। भौतिक संस्कृति अथवा सभ्यता की परिभाषा करते हुए मैकाइवर और पेज ने लिखा है कि “मनुष्य ने अपने जीवन की दशाओं को नियंत्रित करने के प्रयत्न से जिस संपूर्ण कला-विन्यास की रचना की है, उसे सभ्यता कहते हैं।”

प्रश्न 3.
अभौतिक संस्कृति किसे कहते हैं?
उत्तर
मानव जीवन को संगठित करने के लिए मनुष्य ने अनेक रीति-रिवाजों, प्रथाओं, रूढ़ियों आदि को जन्म दिया है। ये सभी तत्त्व मनुष्य की अभौतिक संस्कृति के रूप हैं। ये तत्त्व अमूर्त हैं। इसलिए ‘संस्कृति मानव-जीवन के उन अमूर्त तत्त्वों का योग है जो नियमों, उपनियमों, रूढ़ियो, रीति-रिवाजों आदि के रूप में मानव व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। इस प्रकार संस्कृति जीवन के अमूर्त तत्त्वों को कहते हैं वास्तव में संस्कृति के अंतर्गत वे सभी चीजें सम्मिलित की जा सकती हैं जो व्यक्ति की आंतरिक व्यवस्था को प्रभावित करती हैं। दूसरे शब्दों में, संस्कृति में वे पदार्थ सम्मिलित किए जा सकते हैं जो मनुष्य के व्यवहारों को प्रभावित करते हैं। टॉयलर ने लिखा है, “संस्कृति वह जटिल समग्रता है जिसमें समस्त ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता के सिद्धांत, विधि-विधान, प्रथाएँ एवं अन्य समस्त योग्यताएँ सम्मिलित हैं जिन्हें व्यक्ति समाज का सदस्य होने के नाते प्राप्त करता है।”

प्रश्न 4.
संस्कृति और सभ्यता में संबंध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
संस्कृति तथा सभ्यता के मध्य एक विभाजन-रेखा खींच देना बहुत अधिक वैज्ञानिक नहीं है। वास्तविकता यह है कि समाज का बाह्य व्यवहार (सभ्यता) तथा आंतरिक व्यवहार (संस्कृति) एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं। ऐसी चीजों, जिन्हें हम सभ्यता की संज्ञा देते हैं, में कुछ अंशों में सांस्कृतिक पहलू भी होता है। यही बात संस्कृति के संबंध में लागू होती है। सांस्कृतिक पदार्थ कही जाने वाली वस्तुओं में उपयोगिता का तत्त्व निश्चित रूप से सम्मिलित होता है। जब भी कोई वस्तु, जिसमें आवश्यकता पूर्ति की जाती है, खरीदी जाती है तो उसकी उपयोगिता के साथ-साथ उसके सौंदर्य पर भी विचार किया जाता है। उदाहरणार्थ-स्कूटर या टेलीविजन खरीदते समय उसकी उपयोगिता को तो हम देखते ही हैं, साथ ही उसमें कलात्मकता कितनी है इस पर भी ध्यान देते हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 4 Culture and Socialisation

प्रश्न 5.
संस्कृति सभ्यता को क्या योगदान करती है?
उत्तर
संस्कृति सभ्यता को निम्नलिखित योगदान करती है–

  1. संस्कृति सभी वस्तुओं एवं विषयों का अंतिम माप है-संस्कृति केवल विचारों और आचारों का माप मात्र नहीं है वरन् इसके मूल्यों व आदर्शों के आधार पर ही संसार की हर वस्तु या घटना का अर्थ लगाया जाता है। उदाहरणार्थ-सिक्खों में ‘कृपाण धार्मिक आवश्यकता है जो सभ्यता का भाग होते हुए भी आज के युग में केवल सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में प्रचलित है।
  2. सभ्यता में संस्कृति की भूमिका–समाज अपनी शक्तियों, साधनों व आविष्कारों का निर्माण व प्रयोग संस्कृति द्वारा निर्धारित दिशा के अनुसार ही करता है। मैकाइवर तथा पेज ने लिखा है कि “सभ्यता संबंधी साधनों को उस एक जहाज के रूप में देखा जा सकता है जो कि विभिन्न बंदरगाहों पर जा सकता है; परंतु वह बंदरगाह, जिधर हम बढ़ते हैं, सांस्कृतिक वरण है।”

प्रश्न 6.
सभ्यता संस्कृति को क्या योगदान करती है?
उत्तर
सभ्यता संस्कृति को निम्नलिखित योगदान करती है-

  1. सभ्यता संस्कृति की वाहक है–संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करने का कार्य सभ्यता करती है। रवींद्रनाथ ठाकुर की कविताएँ, विचार, लेख, गीत (जो संस्कृति के तत्त्व हैं)–पुस्तक (जो सभ्यता का तत्त्व है) रूप में छपे हैं और उनके विचारों से अन्य लोग आज भी लाभांवित होते हैं।
  2. सभ्यता संस्कृति के प्रसार में सहायक है-संस्कृति के तत्त्व सभ्यता के द्वारा प्रसारित होते हैं। उदाहरणार्थ-मार्क्स के विचार दुनिया के कोने-कोने में प्रसारित हुए हैं। इनका प्रसार संचार के साधनों; जैसे-प्रेस तथा रेडियो (जोकि सभ्यता के प्रतीक हैं) के माध्यम से किया गया है।
  3. सभ्यता संस्कृति का वातावरण है—सभ्यता में विकास के साथ-साथ संस्कृति को सभ्यता के अनुसार सामंजस्य स्थापित करना पड़ता है। उदाहरणार्थ-औद्योगीकरण के कारण हमारा जीवन बहुत व्यस्त हो गया है जिसके परिणामस्वरूप विवाह की प्रक्रिया बहुत छोटी हो गई है। जो विवाह संस्कार पहले आठ-नौ घंटे में संपन्न होता था वह आज आधा घंटे में ही पूरा हो जाता है।

प्रश्न 7.
राधाकमल मुखर्जी ने किन चार प्रकार के मूल्यों का उल्लेख किया है?
उत्तर
राधाकमल मुखर्जी ने निम्नलिखित चार प्रकार के मूल्यों का उल्लेख किया है-

  1. वे मूल्य जो सामाजिक संगठन व व्यवस्था को सृदृढ़ बनाने के लिए समाज में समानता व सामाजिक न्याय का प्रतिपादन करते हैं।
  2. वे मूल्य जिनके आधार पर सामान्य सामाजिक जीवन के प्रतिमानों व आदर्शों का निर्धारण होता है। इन मूल्यों के अंतर्गत एकता व उत्तरदायित्व की भावना आदि समाहित होती है।
  3. वे मूल्य जिनका संबंध आदान-प्रदान व सहयोग आदि से होता है। इन मूल्यों के आधार पर आर्थिक जीवन की उन्नति होती है व आर्थिक जीवन संतुलित होता है।
  4. वे मूल्य जो समाज में उच्चता लाने व नैतिकता को विकसित करने में सहायता प्रदान करते हैं।

प्रश्न 8.
समाजीकरण क्या है? समाजीकरण का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
या
समाजीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
मनुष्य का जन्म समाज में होता है। समाज में जन्म लेने के पश्चात् वह धीरे-धीरे आसपास के वातावण के संपर्क में आता है और उससे प्रभावित होता है। प्रारंभ में मनुष्य एक प्रकार से जैविक प्राणी मात्र ही होता है; क्योंकि आहार, निद्रा आदि के अतिरिक्त उसे और किसी बात का ज्ञान नहीं होता; अत: उसकी अवस्था बहुत-कुछ पशुओं के ही समान होती है। इसके अतिरिक्त, जन्म के समय बालक में सभी प्रकार के सामाजिक गुणों का भी अभाव होता है और समाजिक गुणों के अभाव में कोई भी बालक एक जैविक प्राणी मात्र ही होता है। माता-पिता के संपर्क में आकर वह मुस्कराना और पहचानना सीखता है। धीरे-धीरे वह अपने परिवार के अन्य सदस्यों के संपर्क में आता है और उनसे सामाजिक शिष्टाचार की अनेक बातें सीखता है। आगे चलकर और बड़े होने पर उसके संपर्क का क्षेत्र और अधिक व्यापक हो जाता है तथा वह विभिन्न सामाजिक तरीकों से अपने कार्यों का संचालन करना सीख लेता है। इस प्रकार वह जैविक प्राणी से सामाजिक प्राणी बन जाता है और समाजशास्त्र में बच्चे के सामाजिक बनने की इस प्रक्रिया को ही समाजीकरण कहा जाता है। अतः समाजीकरण सीखने की एक प्रक्रिया है। इसी के परिणामस्वरूप व्यक्ति समाज में रहना सीखता है अर्थात् एक सामाजिक प्राणी बनता हैं। संस्कृति का हस्तांतरण भी इसी प्रक्रिया के माध्यम से होता है। ग्रीन (Green) के अनुसार, समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बच्चा सांस्कृतिक विशेषताओं, स्वानुभूति और व्यक्तित्व प्राप्त करता है।”

प्रश्न 9.
व्यक्ति को समाजीकरण की क्यों आवश्यकता होती है?
उत्तर
समाजीकरण एक अत्यंत अनिवार्य प्रक्रिया है जिसकी आवश्यकता व्यक्ति को निम्नलिखित कारणों से होती है-

  1. ‘स्व’ का विकास-मानव चरित्र का विकास व्यक्ति के ‘स्व’ या ‘अहं’ के विकास पर निर्भर है। जब तक व्यक्ति के ‘स्व’ का विकास नहीं हो जाता, तब तक व्यक्ति को भले-बुरे का ज्ञान नहीं होता। व्यक्ति के ‘स्व’ का विकास करने के लिए व्यक्ति को शिष्टाचार, बोलचाल तथा उठने-बैठने के तरीकों को जानना चाहिए। इन तरीकों को जानना ही समाजीकरण कहलाता है। इसलिए समाजीकरण मानव जीवन में ‘स्व’ के विकास के लिए नितांत आवश्यक है। वस्तुतः समाजीकरण का अर्थ ही ‘स्व’ का विकास करना है।
  2. व्यक्तित्व के विकास में सहायक–व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास समाज में रहकर ही कर सकता है। जो व्यक्ति किसी कारणवश समाज के बाहर रहे, उनमें व्यक्ति के उचित गुणों का विकास नहीं हो पाता। ऐसे अनेक बालकों का अध्ययन किया गया है जो भेड़ियों की माँद में पाए गए थे या किन्हीं कारणवश माता-पिता से बिछुड़करे जंगलों पशुओं के साथ रहे। उन बच्चों का व्यवहार भेड़िए या जंगली पशु जैसा ही था, क्योंकि मानव समाज से उनका कोई संबंध नहीं बन पाया था। फलस्वरूप उनमें व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाया था तथा वे समाज से अलग रहने के कारण पशुतुल्य ही रहे। इससे यह सिद्ध होता है कि व्यक्तित्व का विकास करने के लिए व्यक्ति को समाजीकरण की अत्यंत आवश्यकता है।

प्रश्न 10.
समाजीकरण में कौन-से कारक सहायक माने जाते हैं?
उत्तर
अमेरिकी समाजशास्त्री क्यूबर ने समाजीकरण में निम्नलिखित तीन कारकों को सहायक माना है-

  1. पैतृक गुण-मनुष्य में जो कुछ भी गुण पाए जाते हैं वे अपने पूर्वजों के कारण पाए जाते हैं। व्यक्ति अपने पूर्वजों के अनुसार ही खाता-पीता तथा जीवन-यापन करता है। अपने समूह के अनुरूप ही वह अपने को ढालता है तथा मान्यताओं का निर्माण करता है।
  2. सांस्कृतिक पर्यावरण-सांस्कृतिक पर्यावरण में व्यक्ति पलता है और उसी में उसका पोषण होता है। सांस्कृतिक पर्यावरण प्रत्येक स्थान पर अलग-अलग प्रभाव डालता है। इस कारण ही भिन्न-भिन्न संस्कृतियों में रहने वाले व्यक्तियों के व्यवहारों में भिन्नता पायी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भिन्नता के अनुसार ही समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा व्यवहार करना सीखता है। तथा उसके आदर्शों के अनुसार अपने जीवन को ढालता है।
  3. नवीनतम अनुभव–प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कुछ-न-कुछ नवीन अनुभवों को अवश्य प्राप्त करता रहता है। ये अनुभव ही उसे सीखने में सहायता देते हैं। चाहे और अनचाहे अनुभव मनुष्य का समाजीकरण करने में अपना योग देते हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 4 Culture and Socialisation

प्रश्न 11.
आनुवंशिकता अथवा वंशानुक्रमण किस प्रकार से मानव जीवन को प्रभावित करते हैं?
उत्तर
व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण एवं विकास को प्रभावित करने वाले एक मुख्य कारक को आनुवंशिकता अथवा वंशानुक्रमण कहा जाता है। हिंदी के ‘वंशानुक्रमण’ शब्द के अंग्रेजी पर्यायवाची ‘हेरेडिटी’ (Heredity) है। यह शब्द वास्तव में लैटिन शब्द ‘हेरिडिटास’ (Heriditas) से व्युत्पन्न हुआ है। लैटिन भाषा में इस शब्द का आशय उस पूँजी से होता है, जो बच्चों को माता-पिता से उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त होती है। प्रस्तुत संदर्भ में वंशानुक्रमण का आशय व्यक्तियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित होने वाले शारीरिक, बौद्धिक तथा अन्य व्यक्तित्व संबंधी गुणों से है। इस मान्यता के अनुसार बच्चों या संतान के विभिन्न गुण एवं लक्षण अपने माता-पिता के समान होते हैं।
उदाहरणार्थ-गोरे माता-पिता की संतान गोरी होती है। लंबे कद के माता-पिता की संतान भी. लंबी होती है। इसी तथ्य के अनुसार प्रजातिगत विशेषताएँ सदैव बनी रहती हैं। घंशानुक्रमण के ही कारण मनुष्य की प्रत्येक संतान मनुष्य ही होती है। कभी भी कोई बिल्ली कुत्ते को जन्म नहीं देती। ऐसा माना जाता है कि लिंग-भेद, शारीरिक लक्षणों, बौद्धिक प्रतिभा, स्वभाव पर वंशानुक्रमण का गंभीर प्रभाव पड़ता हैं। वंशानुक्रमण एक प्रबल एवं महत्त्वपूर्ण कारक हैं, परंतु इसे एकमात्र कारक मानना अंसंगत है। इसके अतिरिक्त पर्यावरण भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है, जिसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सभ्यता को परिभाषित कीजिए तथा इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
या
सभ्यता की संकल्पना को स्पष्ट कीजिए। यह संस्कृति से किस प्रकार अलग है? समझाइए।
उत्तर
प्रायः संस्कृति और सभ्यता के अर्थों में भ्रम पैदा हो जाती है। अधिकतर लोगों द्वारा इनको एक-दूसरे के पर्यायवाची के रूप में प्रयोग किया जाता है, परंतु यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो दोनों में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। गंग्वृति के दो पक्ष होते हैं—अभौतिक एवं भौतिक। संज्ञानात्मक एवं आदर्शात्मक पक्ष को संस्कृति कहते हैं, जबकि भौतिक पक्ष को अधिकतर सभ्यता के नाम से जाना जाता है।

सभ्यता का अर्थ तथा परिभाषाएँ

संस्कृति के भौतिक पक्ष को सभ्यता कहा जाता है। सभ्यता में औजारों, तकनीकों, यंत्रों, भवनों तथा यातायात के साधनों के साथ-साथ उत्पादन तथा संप्रेक्षण के उपकरणों को सम्मिलित किया जाता है। मानव ने अपनी सुख-सुविधा के लिए जिन वस्तुओं का उत्पादन किया है उन्हें हम सभ्यता कहते हैं। सभ्यता को उत्पादन बढ़ाने तथा जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने के लिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है। प्रमुख विद्वानों ने सभ्यता को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है-

  1. मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) के अनुसार-सभ्यता से हमारा अर्थ उस संपूर्ण प्रविधि तथा संगठन से है जिसे कि मनुष्य ने अपने जीवन की दशाओं को नियंत्रित करने के उद्देश्य से बनाया हैं।”
  2. ग्रीन (Green) के अनुसार-“एक संस्कृति तभी सभ्यता बनती है जब उसके पास एक लिखित भाषा, विज्ञान, दर्शन, अत्यधिक विशेषीकरण वाला श्रम-विभाजन, एक जटिल प्रविधि तथा राजनीतिक पद्धति हो।”
  3. ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार-“अधिजैविक संस्कृति के बाद की अवस्था के रूप में सभ्यता की परिभाषा दी जा सकती है।”
  4. क्लाइव बेल (Cliye Bell) के अनुसार-“वह (सभ्यता) मूल्यों के ज्ञान के आधार पर स्वीकृत किया गया तर्क और तर्क के आधार पर कठोर और भेदनशील बनाया गया मूल्यों का ज्ञान है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि सभ्यता का संबंध उस कला विन्यास से है जिसे मनुष्य ने अपने जीवन की दशाओं को नियंत्रित करने हेतु रचा है। यह संस्कृति का अधिक जटिल व विकसित रूप है जिसमें मानव निर्मित भौतिक वस्तुएँ सम्मिलित होती हैं।

सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ

सभ्यता की प्रमुख परिभाषाओं से इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं-

  1. सभ्यता संस्कृति के विकास का उच्च व जटिल स्तर है।
  2. सभ्यता में परिवर्तनशीलता का गुण पाया जाता है।
  3. सभ्यता भौतिक संस्कृति है, क्योंकि इसमें मानव निर्मित भौतिक वस्तुएँ ही सम्मिलित की जाती हैं।
  4. भौतिक वस्तुओं से संबंधित होने के कारण सभ्यता की प्रकृति मूर्त होती है।
  5. सभ्यता में उपयोगिता का गुण पाया जाता है अर्थात् यह मनुष्यों के लिए किसी-न-किसी प्रकार से उपयोगी होती है।
  6. सभ्यता में प्रगतिशीलता का गुण पाया जाता है।
  7. सभ्यता मानव आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन है। इनसे मानव आनंद व संतुष्टि प्राप्त करता है।
  8. सभ्यता में एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रसारित होने की क्षमता पाई जाती है। इसलिए जो कोई वस्तु किसी एक देश में बनती व विकसित होती है उसका अन्य देशों में शीघ्र ही प्रसार हो जाता है।
  9. सभ्यता मानव कार्यों को सरल बनाती है।
  10. सभ्यता सांस्कृतिक क्रियाओं को शक्ति प्रदान करती है तथा संस्कृति के विकास के उत्थान में सहायता देती है।

सभ्यता एवं संस्कृति में अंतर

सभ्यता और संस्कृति में पाए जाने वाले प्रमुख अंतर निम्न प्रकार हैं-

  1. गिलिन एवं गिलिन के मत में, “सभ्यता, संस्कृति को अधिक जटिल तथा विकसित रूप है।”
  2. ए० डब्ल्यू० ग्रीन सभ्यता और संस्कृति के अंतर को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि “एक संस्कृति तभी सभ्यता बनती है जब उसके पास लिखित भाषा, विज्ञान, दर्शन, अत्यधिक विशेषीकरण वाला श्रम-विभाजन, एक जटिल प्रविधि और राजनीतिक पद्धति हो।”
  3. संस्कृति का संबंध आत्मा से है और सभ्यता का संबंध शरीर से है।
  4. सभ्यता को सरलता से समझा जा सकता है, लेकिन संस्कृति को हृदयंगम करना कठिन है।
  5. सभ्यता को कुशलता के आधार पर मापना चाहें तो मापा जा सकता है, परंतु संस्कृति को नहीं।
  6. सभ्यता में फल प्राप्त करने का उद्देश्य होता है, परंतु संस्कृति में क्रिया ही साध्य है।
  7. मैकाइवर एवं पेज के अनुसार-संस्कृति केवल समान प्रवृत्ति वालों में ही संचारित रहती है। कलाकार की योग्यता के बिना कोई भी कला के गुण की परख नहीं कर सकता, न ही संगीतकार के गुण के बिना ही कोई संगीत का मजा ले सकता। सभ्यता सामान्य तौर पर ऐसी माँग नहीं करती। हम उसको उत्पन्न करने वाली सामर्थ्य में हिस्सा लिए बिना ही उसके उत्पादकों का आनंद ले सकते हैं।”
  8. सभ्यता का संपूर्ण हस्तांतरण हो सकता है, परंतु संस्कृति का हस्तांतरण पूर्ण रूप से कभी नहीं ” हो सकता।
  9. सभ्यता का रूप बाह्य होता है, जबकि संस्कृति का आंतरिक।
  10. सभ्यता बिना प्रयास के प्रसारित होती है, जबकि संस्कृति ज्यों-की-त्यों प्रसारित नहीं होती।
  11. सभ्यता सदा प्रगति करती है, जबकि संस्कृति सदैव प्रगति नहीं करती।।

निष्कर्ष–उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृति एवं सभ्यता दो भिन्न संकल्पनाएँ हैं, यद्यपि दोनों में परस्पर घनिष्ठ संबंध पाया जाता है। सभ्यता संस्कृति का भौतिक पक्ष है। इसलिए ठीक ही कहा जाता है कि “हमारे पास जो कुछ है वह सभ्यता है, हम जो कुछ हैं वह संस्कृति है।”

प्रश्न 2.
संस्कृति को परिभाषित कीजिए तथा इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
या
संस्कृति का अर्थ समझाते हुये, संस्कृति की संकल्पना को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
संस्कृति समाजशास्त्र की प्रमुख संकल्पना है। समाजशास्त्र में संस्कृति को सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों तथा सामाजिक विरासत के आधार पर समझाने का प्रयास किया जाता है। प्रत्येक समाज की अपनी भिन्न संस्कृति होती है। संस्कृति में समाजशास्त्रियों की रुचि इसलिए है क्योंकि संस्कृति तथा सांस्कृतिक परिवर्तन समाज और सामाजिक परिवर्तन को प्रभावित करते हैं। इसलिए, संस्कृति की संकल्पना इसके आयामों तथा भेदों का अध्ययन समाजशास्त्र की विषय-वस्तु में सम्मिलित किया जाता है। वैसे संस्कृति का अध्ययन मानवशास्त्र में किया जाता है। संस्कृति का समाजशास्त्र में अध्ययन करने का एक अन्य कारण इसका व्यक्तित्व पर पड़ने वाला गहरा प्रभाव है।

संस्कृति का अर्थ तथा परिभाषाएँ

मनुष्य प्राकृतिक वातावरण में अनेक सुविधाओं का उपभोग करता है तो दूसरी ओर उसे अनेक असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। परंतु मनुष्य ने आदिकाल से प्राकृतिक बाधाओं को दूर करने के लिए वे अपनी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेक समाधानों की खोज की है। इन खोजे गए उपायों को मनुष्य ने आगे आने वाली पीढ़ी को भी हस्तांतरित किया। प्रत्येक पीढ़ी ने अपने पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान और कला को और अधिक विकास किया है। अन्य शब्दों में, प्रत्येक पीढ़ी ने अपने पूर्वजों के ज्ञान को संचित किया है और इस ज्ञान के आधार पर नवीन ज्ञान और अनुभव का भी ज्ञान अर्जन किया है। इस प्रकार के ज्ञान व अनुभव के अंतर्गत यंत्र, प्रविधियाँ, प्रथाएँ, विचार और मूल्य आदि आते हैं। ये मूर्त और अमूर्त वस्तुएँ संयुक्त रूप से ‘संस्कृति’ कहलाती हैं। इस प्रकार, वर्तमान पीढ़ी ने अपने पूर्वजों तथा स्वयं के प्रयासों से जो अनुभव व व्यवहार सीखा है वही संस्कृति है। प्रमुख विद्वानों ने संस्कृति को निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया है-

  1. हॉबल (Hoebel) के अनुसार-संस्कृति संबंधित सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का संपूर्ण योग है जो कि एक समाज के सदस्यों की विशेषताओं को बतलाता है और जो इसलिए प्राणिशास्त्रीय विरासत का परिणाम नहीं होता।”
  2. बीरस्टीड (Bierstedt) के अनुसार-“संस्कृति वह संपूर्ण जटिलता है जिसमें वे सभी वस्तुएँ सम्मिलित हैं जिन पर हम विचार करते हैं, कार्य करते हैं और समाज का सदस्य होने के नाते अपने पास रखते हैं।”
  3. मैकाइवर एवं पेंज (Maclver and Page) के शब्दों में—“संस्कृति हमारे दैनिक व्यवहार में कला, साहित्य, धर्म, मनोरंजन और आनन्द में पाए जाने वाले रहन-सहन और विचार के ढंगों में हमारी प्रकृति की अभिव्यक्ति है।”
  4. पिडिंगटन (Piddington) के अनुसार-संस्कृति उन भौतिक एवं बौद्धिक साधनों या उपकरणों का संपूर्ण योग है जिनके द्वारा मानव अपनी जैविक एवं सामाजिक आवश्यकताओं की संतुष्टि तथा अपने पर्यावरण से अनुकूलन करता है।”
  5. मजूमदार (Mazumdar) के अनुसार-“संस्कृति मानव-उपलब्धियों, भौतिक तथा अभौतिक, * का संपूर्ण योग है जो समाजशास्त्रीय रूप से, अर्थात् परंपरा एवं संचरण द्वारा, क्षितिजीय एवं लंबे रूप में हस्तांतरणीय है।”
  6. कोनिग (Koenig) के अनुसार-“संस्कृति मनुष्य द्वारा स्वयं को अपने पर्यावरण के साथ अनुकूलित करने एवं अपने जीवन के ढंगों को उन्नत करने के प्रयत्नों का संपूर्ण योग है।”
  7.  रैडफील्ड (Redfield) के अनुसार-संस्कृति ऐसे परंपरागत विश्वासों के संगठित समूह को कहते हैं जो कला एवं कलाकृतियों में प्रतिबिंबित होते हैं तथा जो परंपरा द्वारा चलते रहते हैं। और किसी मानव समूह की विशेषता को चित्रित करते हैं।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृति में दैनिक जीवन में पाई जाने वाली समस्त वस्तुएँ आ जाती हैं। मनुष्य भौतिक, मानसिक तथा प्राणिशास्त्रीय रूप में जो कुछ पर्यावरण से सीखता है उसी को संस्कृति कहा जाता है। यह सीखने की प्रक्रिया (समाजीकरण) द्वारा पूर्व पीढ़ियों से प्राप्त सामाजिक विरासत है जो शुक्राणुओं द्वारा स्वचालित रूप से हस्तांतरित जैविक विरासत से पूर्णतः भिन्न है। वस्तुतः संस्कृति पर्यावरण का मानव-निर्मित भाग है। यह उन तरीकों को कुल योग है जिनके द्वारा मनुष्य अपना जीवन व्यतीत करता है।

संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ

संस्कृति की संकल्पना को इसकी निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

1. परिवर्तनशीलता-संस्कृति सदा परिवर्तनशील है। इसमें परिवर्तन होते रहते हैं, चाहे वे परिवर्तन धीरे-धीरे हों या आकस्मिक रूप में। वास्तव में, संस्कृति मनुष्य की विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति की विधियों का नाम हैं। चूंकि समाज में परिस्थितियाँ सदा एक-सी नहीं रहती हैं इसलिए आवश्यकताओं की पूर्ति की विधियों में भी परिवर्तन करना पड़ता है। पहले तलवार से युद्ध किया जाता था, परंतु अब बंदूकों, तोपों, बमों द्वारा यह काम किया जाता हैं। पहले लोग बैलगाड़ियों से और पैदल यात्रा करते थे, अब वे हवाई जहाजे और मोटरों से यात्रा करते हैं। जब इस प्रकार की पद्धतियाँ समाज द्वारा स्वीकृत हो जाती हैं और आने वाली पीढ़ियों में हस्तांतरित कर दी जाती हैं तो संस्कृति में परिवर्तन हो जाता है। यह तो स्पष्ट ही है। कि प्रत्येक समाज के रहन-सहन में कुछ-न-कुछ परिवर्तन होता ही रहता है; अत: यह कहना ठीक ही है कि संस्कृति सदा परिवर्तनशील है।

2. आदर्शात्मक-संस्कृति में सामाजिक विचार, व्यवहार-प्रतिमान आदि आदर्श रूप में होते हैं। इनके अनुसार कार्य करना सुसंस्कृत होने का प्रतीक माना जाता है। सभी मनुष्य संस्कृति के आदर्श प्रतिमानों के अनुसार अपने जीवन को बनाने का प्रयास करते हैं। इसीलिए संस्कृति की प्रकृति आदर्शात्मक होती है।

3. सामाजिकता का गुण-संस्कृति का जन्म समाज में तथा समाज के सदस्यों द्वारा होता है। इसीलिए यह कहा जाता है कि मानव स्वयं अपनी संस्कृति का निर्माता होता है। मानव समाज के बाहर संस्कृति की रक्षा नहीं की जा सकती। पशु समाज संस्कृति-विहीन समाज है क्योंकि इसमें किसी प्रकार की संस्कृति नहीं होती है।

4. सीखा हुआ आचरण-व्यक्ति समाजीकरण की प्रक्रिया में कुछ-न-कुछ सीखता ही रहता है। ये सीखे हुए अनुभव, विचार-प्रतिमान आदि ही संस्कृति के तत्त्व होते हैं। इसलिए संस्कृति को सीखा हुआ व्यवहार कहा जाता है। बाल कटवाना, लाइन में खड़ा होना, अच्छे कपड़े पहनना, अभिवादन करना, नाचना-गाना आदि सीखे हुए व्यवहार के उदाहरण हैं। इस संबंध में ध्यान रखने की एक बात यह है कि मनुष्य समाज में रहकर अज्ञात रूप से भी अनेक बातें सीखता है। जिनको सीखने को वह स्वयं प्रयत्न नहीं करता। परिवार में रहकर व्यक्ति अनेक बातें अपना माता-पिता तथा अन्य व्यक्तियों से धीरे-धीरे सीखती है तथा अनेक बातें ऐसी होती हैं जिनकी उसको समुचित रूप से शिक्षा दी जाती है। मनुष्य जो कुछ भी ज्ञात-अज्ञात से समाज से सीखता। है वह सब संस्कृति में सम्मिलित होता है।

5. संगठित प्रतिमान-संस्कृति में सीखे हुए आचरण संगठित प्रतिमानों के रूप में होते हैं। संस्कृति में प्रत्येक व्यक्ति के आचरणों की इकाइयों में एक व्यवस्था और सबंध होता है। किसी भी मनुष्य का आचरण उसके पृथक्-पृथक् आचरणों की सूची नहीं होता। उदाहरण के लिए-बच्चा परिवार में जन्म लेता है। परिवार में उसे प्रारंभ से ही उसकी संस्कृति का ज्ञान कराया जाता है। बच्चे का बोलना, चलना-फिरना, व्यवहार करना आदि ऐसे प्राथमिक आचरण हैं जो आजीवन चलते रहते हैं। हमारे मस्तिष्क में इन सब वर्गों के व्यवहारों की जो एक संगठित रूपरेखा या स्वरूप है उसी को हम प्रतिमान कहते हैं। संस्कृति के अंतर्गत सीखे हुए व्यवहारों के इसी प्रकार के संगठित प्रतिमान सम्मिलित होते हैं।

6. पार्थिव या अपार्थिव दोनों तत्वों का विद्यमान रहना–संस्कृति के अंतर्गत दो प्रकार के तत्त्व आते हैं-एक, पार्थिव और दूसरे, अपार्थिव। ये दोनों ही तत्त्व संस्कृति का निर्माण करते हैं। अपार्थिव स्वरूप को हम आचरण या क्रिया कह सकते हैं अर्थात् जिन्हें छुआ या देखा न जा सके या जिनका कोई स्वरूप नहीं; जैसे-बोलना, गाना, अभिवादन करना आदि। जिन् पार्थिव या साकार वस्तुओं का मनुष्य सृजन करता है वे पार्थिव तत्त्वों के अंतर्गत आती हैं; जैसे—रेडियो, मोटर, टेलीविजन, सिनेमा आदि।

7. भिन्नता–प्रत्येक समाज की संस्कृति भिन्न होती हैं अर्थात् प्रत्येक समाज की अपनी पृथक् प्रथाएँ, परंपराएँ, धर्म, विश्वास, कला का ज्ञान आदि होते हैं। संस्कृति में भिन्नता के कारण ही विभिन्न समाजों में रहने वाले लोगों का रहन-सहन, खान-पान, मूल्य, विश्वास एवं रीति-रिवाज भिन्न-भिन्न होते हैं।

8. हस्तातंरण की विशेषता-संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित हो जाती है। संस्कृति का अस्तित्व हस्तांतरण के कारण स्थायी बना रहता है। हस्तांतरण की यह प्रक्रिया निरंतर होती रहती है। संस्कृति का हस्तांतरण माता-पिता, वयोवृद्धों, अध्यापकों आदि के द्वारा होता है। यहाँ हस्तांतरण का आशय केल यही है कि एक पीढ़ी अपने आचरणों को दूसरी पीढ़ी को सिखा देती है अर्थात् ये एक पीढ़ी से दूसरी में स्वतः हस्तांतरित होते रहते हैं। यह हस्तांतरण या सीखना अज्ञात या आकस्मिक रूप में भी हुआ करता है। इस प्रकार, संस्कृति की यह एक और विशेषता है कि वह युगों से हस्तांतरित होती आती है।

प्रश्न 3.
सामाजिक आदर्श की परिभाषा दीजिए तथा सामाजिक आदर्शों के प्रमुख प्रकार एवं विशेषताएँ बताइए।
या
सामाजिक आदर्श से आप क्या समझते हैं? सामाजिक आदर्शों का महत्त्व बताइए।
उत्तर
किसी समाज में व्यवहार करने के जो नियम हैं उन्हें सामाजिक आदर्श कहा जाता है। इन्हीं आदर्शो से हमें उचित-अनुचित का पता चलता है और इन्हीं से समाज की आचरण संबंधी प्रत्याक्षाएँ विकसित होती हैं। सामाजिक आदर्शों से ही हमें पता चलता है किससे, किन परिस्थितियों में, किसके द्वारा, क्या कार्य करने या न करने की आशा की जाती है तथा इनको पालन न करने पर क्या दंड दिया जाता है।

सामाजिक आदर्शों का अर्थ एवं परिभाषाएँ

सामाजिक आदर्श व्यवहार के वे नियम हैं जो समाज द्वारा स्वीकृति के कारण संस्थागत हो जाते हैं तथा स्वीकृत व्यवहार के नियम आदर्श कहलाते हैं। इन्हें निम्न प्रकार से परिभाषित किया जा सकता हैं-

  1. रॉबर्ट बीरस्टीड (Robert Bierstedt) के अनुसार-“एक आदर्श, संक्षेप में प्रक्रिया को मानकी प्रतिरूप है। अपने समाज के लिए स्वीकार करने योग्य कुछ करने का तरीका है।”
  2. किंग्स्ले डेविस (Kingsley Davis) के अनुसार–“आदर्श नियंत्रण हैं। ये वे तत्त्व हैं जिनके द्वारा मानव समाज अपने सदस्यों के व्यवहारों का नियमन इस प्रकार करता है कि वे सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए अपनी क्रियाओं का संपादन करते रहें और कभी-कभी सावयवी आवश्यकताओं के मूल्य पर भी।”
  3. ग्रीन (Green) के अनुसार-“सामाजिक आदर्श मानकीकृत सामान्यीकरण है जिनके परिणामस्वरूप सदस्यों से एक निश्चित व्ययवहार करने की आशा की जाती है।”
  4. शेरिफ एवं शेरिफ (Sheriff and Sheriff) के अनुसार-“जीवन और उसके उन्नयन के विविध कार्यों में संलग्न व्यक्तियों की अंतक्रिया के बीच समूह की संरचना का जन्म होता है, व्यक्ति विभिन्न कार्य करते हैं और प्रत्येक की एक सापेक्ष परिस्थिति हो जाती है। कार्य संचालन का क्रम और उनके नियमों का स्वरूप स्थिर हो जाता है। इस प्रकार नियम, व्यवहार के तरीके तथा अनुकरणीय जीवन मूल्य आदि सामूहिक अंतःक्रिया के ही सह-उत्पादन हैं, नियमों, मानकों और मूल्यों के इस विशिष्ट गठन को समूह के सामाजिक आदर्शों के रूप में जाना जाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक आदर्श समाज के वे नियम हैं जो सदस्यों के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं तथा समाज द्वारा अनुमोदित होते हैं।

सामाजिक आदर्शों की विशेषताएँ

सामाजिक आदर्श की संकल्पना को इसकी निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. संस्कृति के प्रतिनिधि–सामाजिक आदर्शों को संबंधित संस्कृति अथवा समूह का प्रतिनिधि माना जाता है। इन आदर्शों की प्रकृति से हम उस समाज या समूह की प्रकृति के बारे में अनुमान लगा सकते हैं।
  2. सामाजिक अनुमोदन–सामाजिक आदर्शों की दूसरी विशेषता समाज अथवा संबंधित समूह द्वारा इनको प्राप्त स्वीकृति है। सामूहिक स्वीकृति के कारण ही इनमें स्थायित्व का गुण पाया जाता है। अतः आदर्श में वे व्यवहार नियम नहीं आते जिनको सामूहिक अनुमोदन प्राप्त नहीं है।
  3. स्थायी प्रकृति-सामाजिक आदर्शों की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इनमें स्थायित्व पाया जाता है, क्योंकि इनका विकास शनैःशनैः होता है और ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होते रहते हैं। इसलिए इनमें परिवर्तन लाना कठिन है। इस स्थायी प्रकृति के कारण ही आदर्श समूह के सदस्यों का अंग बन जाते हैं।
  4. लिखित व अलिखित स्वरूप-सामाजिक आदर्शों का स्वरूप लिखित एवं अलिखित दोनों प्रकार का हो सकता है। अधिकांशतः आदर्श दोनों ही रूपों में समाज में विद्यमान होते हैं तथा व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं।
  5. कर्तव्य की भावना–सामाजिक आदर्शों का पालन इसलिए किया जाता है क्योंकि इनके साथ । कर्त्तव्य की भावना जुड़ी होती है। सामान्यतः इनका पालन करना सदस्य अपना गौरव समझते
  6. रूढ़िवादी प्रकृति-यद्यपि सामाजिक आदर्श हमारे व्यवहार के प्रमुख आधार हैं फिर भी इनकी । प्रकृति रूढ़िवादी होती है। इस रूढ़िवादी प्रकृति के कारण ही इनमें परिवर्तन सरलता से नहीं किया जा सकता है।
  7. दोहरी प्रकृति-सामाजिक आदर्शों की प्रकृति दोहरी होती है। ये एक ओर व्यक्तियों को प्रभावित करते हैं और उन पर नियंत्रण रखते हैं तो दूसरी ओर स्वयं व्यक्तियों से प्रभावित होते रहते हैं।
  8.  कल्याणकारी प्रकृति–सामाजिक आदर्श सामूहिक होते हैं तथा इनकी प्रकृति कल्याणकारी होती है। इसी प्रकृति के कारण इनमें स्थायित्व होता है और सदस्य इन्हें अपने व्यक्तित्व का अंग बना लेते हैं।

सामाजिक आदर्शों के प्रकार

सामाजिक आदर्श सामाजिक परिस्थितियों की देन हैं, समाज द्वारा अनुमोदित होते हैं तथा व्यक्तियों के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। आदर्श अनेक प्रकार के होते हैं। रॉबर्ट बीरस्टीड (Robert Bierstedt) ने सामाजिक आदर्शों को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित किया है–

  1. जनरीतियाँ (Folkways),
  2. रूढ़ियाँ (Mores) तथा
  3. कानून (Law)

किंग्स्ले डेविस (Kingsley Davis) ने सामाजिक आदर्शों के अग्रलिखित प्रकारों का उल्लेख किया है–

  1. रूढ़ियाँ (Mores),
  2. प्रथागत कानून (Customary law),
  3. जनरीतियाँ (Folkways),
  4. फैशन तथा सनक (Fashion and fad),
  5. संस्थाएँ (Institutions),
  6. परिपाटी एवं शिष्टाचार (Convention and etiquette) तथा
  7. प्रथा, नैतिकता तथा धर्म (Custom, morality and religion)।

आदर्शों को सकारात्मक एवं नकारात्मक में भी विभाजित किया गया है। प्रथम प्रकार के आदर्श व्यक्तियों के अनुपालन हेतु निर्देश देते हैं, जबकि दूसरे प्रकार के आदर्श किसी व्यवहार का न करने पर बल देते हैं।

सामाजिक आदर्शों का महत्त्व

सामाजिक आदर्श समाज द्वारा अनुमोदित व्यवहार के वे नियम होते हैं जिनका पालन करना व्यक्ति अपना कर्तव्य मानते हैं; अत: समाज में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। इनके महत्त्व को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. सामाजिक आदर्श समाज के सदस्यों के व्यवहार में अनुरूपता लाने में सहायक है।
  2. सामाजिक आदर्श समाज के सदस्यों को उचित तथा अनुचित का ज्ञान कराते हैं और इस प्रकार उनका मार्गदर्शन करते हैं।
  3. सामाजिक आदर्श समाज को संगठित करने तथा इस प्रकार समाज की व्यवस्था को बनाए रखने ‘ व एकता लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  4. सामाजिक आदर्श नागरिक नियंत्रण के प्रमुख साधन हैं तथा वे केवल व्यक्तियों के व्यवहार को ही नियंत्रित नहीं करते अपितु समूहों के व्यवहार को भी नियंत्रित करते हैं।
  5. सामाजिक आदर्श सामाजिक विरात के रूप में संस्कृति की रक्षा करते हैं तथा इसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित करते हैं।
  6. सामाजिक आदर्श व्यक्तित्व के विकास की प्रक्रिया में सहायक होते हैं।
  7. सामाजिक आदर्श सामाजिक प्रतिष्ठा का निर्धारण करते हैं तथा साथ ही इसकी रक्षा करते हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 4 Culture and Socialisation

प्रश्न 4.
सामाजिक मूल्य क्या हैं? सामाजिक मूल्यों के प्रकार तथा महत्त्व की विवेचना कीजिए।
या
सामाजिक मूल्यों की संकल्पना स्पष्ट कीजिए तथा सामाजिक मूल्यों की विशेषताएँ बताइएं।
उत्तर
सामाजिक मूल्य समाज के प्रमुख तत्त्व हैं तथा इन्हीं मूल्यों के आधार पर हम किसी समाज की प्रगति, उन्नति, अवनति अथवा परिवर्तन की दिशा निर्धारित करते हैं। इन्हीं मूल्यों द्वारा व्यक्तियों की क्रियाएँ निर्धारित की जाती हैं तथा इससे समाज का प्रत्येक पक्ष प्रभावित होता है। सामाजिक मूल्यों के बिना न तो समाज की प्रगति की कल्पना की जा सकती है और न ही भविष्य में प्रगतिशील क्रियाओं का निर्धारण ही संभव है। मूल्यों के आधार पर ही हमें यह पता चलता है कि समाज में किस चीज को अच्छा अथवा बुरा समझा जाता है। अतः सामाजिक मूल्य मूल्यांकन का भी प्रमुख आधार हैं। विभिन्न समाजों की आवश्यकताएँ तथा आदर्श भिन्न-भिन्न होते हैं; अतः सामाजिक मूल्यों के मापदंड भी भिन्न-भिन्न होते हैं।
किसी भी समाज में सामाजिक मूल्य उन उद्देश्यों, सिद्धांतों अथवा विचारों को कहते हैं जिनको समाज के अधिकांश सदस्य अपने अस्तित्व के लिए आवश्यक समझते हैं और जिनकी रक्षा के लिए बड़े-से-बड़ा बलिदान करने को तत्पर रहते हैं। मातृभूमि, राष्ट्रगान, धर्म निरपेक्षता, प्रजातंत्र इत्यादि हमारे सामाजिक मूल्यों को ही व्यक्त करते हैं।

सामाजिक मूल्यों का अर्थ तथा परिभाषाएँ

सामाजिक मूल्य प्रत्येक समाज के वातावरण और परिस्थितियों के वैभिन्न्य के कारण अलग-अलग होते हैं। ये मानव मस्तिष्क को विशिष्ट दृष्टिकोण प्रदान करते हैं, जो सामाजिक मूल्यों के निर्माता होते हैं। प्रत्येक समाज की सांस्कृतिक विशेषताएँ अपने समाज के सदस्यों में विशिष्ट मनोवृत्तियों उत्पन्न कर देती हैं जिनके आधार पर भिन्न-भिन्न विषयों और परिस्थितियों का मूल्यांकन किया जाता है। यह संभव है कि जो ‘आदर्श’ और ‘मूल्य एक समाज के लिए मान्य हैं, वे ही दूसरे समाज में अक्षम्य अपराध माने जाते हों। उदाहरणार्थ-भारत के सभ्य समाजों में विवाहेतर यौन संबंध मूल्यों की दृष्टि से घातक हैं किंतु जनजातियों के ये सर्वोच्च लाभदायी मूल्य हैं। अतः मूल्यों का निर्धारण समाज की विशेषता पर आधारित है। प्रमुख विद्वानों ने सामाजिक मूल्यों की परिभाषाएँ निम्न प्रकार से दी हैं–

  1. राधाकमल मुखर्जी (R.K. Mukherjee) के अनुसार-“मूल्य समाज द्वारा मान्यता प्राप्त वे। इच्छाएँ तथा लक्ष्य हैं जिनका आंतरीकरण समाजीकरण की प्रक्रिया क माध्यम से होता है और जो व्यक्पितरक अधिमान्यताएँ, मानदंड (मानक) तथा अभिलाषाएँ बन जाती हैं।”
  2. रॉबर्ट बीरस्टीड (Robert Bierstedt) के अनुसार-“जब किसी समाज के स्त्री-पुरुष अपने ही तरह के लोगों के साथ मिलते हैं, काम करते हैं या बात करते हैं, तब मूल्य ही उनके क्रमबद्ध सामाजिक संसर्ग को संभव बनाते हैं।”
  3. एच० एम० जॉनसन (H.M. Johnson) के अनुसार-“मूल्य को एक धारणा या मानक के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। यह सांस्कृतिक हो सकता है या केवल व्यक्तिगत और इसके द्वारा चीजों की एक-दूसरे के साथ तुलना की जाती है, इसे स्वीकृत या अस्वीकृति प्राप्त । होती है, एक-दूसरे की तुलना में उचित अनुचित, अच्छा या बुरा, ठीक अथवा गलत माना जाता है।”
  4. वुड्स (Woods) के अनुसार-“मूल्य दैनिक जीवन के व्यवहार को नियंत्रित करने के सामान्य सिद्धांत हैं। मूल्य न केवल मानव व्यवहार को दिशा प्रदान करते हैं अपितु वे अपने आप में आदर्श एवं उद्देश्य भी हैं। जहाँ मूल्य होते हैं वहाँ न केवल यह देखा जाता है कि क्या चीज होनी चाहिए बल्कि यह भी देखा जाता है कि वह सही है या गलत है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह स्पष्ट हो होता है कि मूल्य का एक सामाजिक आधार होता है। और वे समाज द्वारा मान्यता प्राप्त लक्ष्यों की अभिव्यक्ति करते हैं। मूल्य हमारे व्यवहार का सामान्य तरीका है। मूल्यों द्वारा ही हम अच्छे या बुरे, सही या गलत में अंतर करना सीखते हैं।

मूल्यों का समाजशास्त्रीय महत्त्व

सामाजिक मूल्य समाज के सदस्यों की आंतरिक तथा मनोवैज्ञानिक भावनाओं पर आधारित होते हैं। इसीलिए समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से मूल्यों का अत्यधिक महत्त्व होता है। इनके आधार पर ही सामाजिक घटनाओं एवं समस्याओं का मूल्यांकन किया जाता है। मूल्य व्यक्तिगत, सामाजिक और अंतर्राष्ट्रीय जीवन को भी अपने अनुरूप बनाने का प्रयास करते हैं।

सामाजिक मूल्य सामाजिक एकरूपता के जनक हैं, क्योंकि मूल्य व्यवहार के प्रतिमान अथवा मानकों को प्रस्तुत करते हुए समाज के सदस्यों से अपेक्षा करते हैं कि वे अपने आचरण द्वारा मूल्यों का स्तर बनाए रखेंगे। इस तरह सामाजिक प्रतिमानों के रूप में मूल्यों का निर्धारण होता है।

सामाजिक मूल्यों से ही विभिन्न प्रकार की मनोवृत्तियों का निर्धारण होता है तथा व्यक्ति को उचित एवं अनुचित का ज्ञान होता है। शिल्स तथा पारसन्स (Shils and Parsons) के अनुसार, सामाजिक मूल्य सामाजिक व्यवहार के कठोर नियंत्रक हैं। इनके अनुसार, सामाजिक मूल्यों के बिना सामाजिक जीवन असंभव है, सामाजिक व्यवस्था सामूहिक लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सकती तथा व्यक्ति अन्य व्यक्तियों को अपनी आवश्यकताओं एवं जरूरतों को भावात्मक रूप से नहीं बता पाएँगे। संक्षेप में सामाजिक मूल्यों का निम्नलिखित महत्त्व हैं-

  1. मानव समाज में व्यक्ति इन मूल्यों के आधार पर समाज द्वारा स्वीकृत नियमों का पालो करता | है। वह उनके अनुकूल अपने व्यवहार को ढालकर अपना जीवन व्यतीत करता है।
  2. सामाजिक मूल्यों के आधार पर सामाजिक तथ्यों और घटनाओं; जैसे-विचार, अनुभव तथा क्रियाओं आदि का ज्ञान प्राप्त होता है। अतः सामाजिक तथ्यों को समझने के लिए सामाजिक मूल्यों का ज्ञान होना आवश्यक है।
  3. समाज के सदस्यों की प्रवृत्तियाँ व मनोवृत्तियाँ सामाजिक मूल्यों के आधार पर निर्धारित की जाती
  4. मनुष्य अपनी अनंत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सतत प्रयत्न करता रहता है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति में उसे सामाजिक मूल्यों से पर्याप्त सहायता प्राप्त होती है।
  5. सामाजिक मूल्य व्यक्तियों को अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं व उद्देश्यों को वास्तविकता प्रदान करने का आधार प्रस्तुत करते हैं।
  6. समाज सामाजिक संबंधों का जाल है। सामाजिक मूल्य संबंधों के इस जाल को संतुलित करने व समाज़ के सदस्यों में सामंजस्य बनाए रखने में सहयोग प्रदान करते हैं।
  7. सामाजिक मूल्य व्यक्ति के समाजीकरण एवं विकास में सहायक होते हैं।
  8. सामाजिक मूल्यों के आधार पर ही सामाजिक क्रियाओं एवं कार्यकलापों का ज्ञान होता है।

सामाजिक मूल्यों की प्रमुख विशेषताएँ

सामाजिक मूल्यों की प्रमुख विशेषताएँ अथवा लक्षण निम्नलिखित हैं-

  1. किसी भी समाज के मूल्य वहाँ की संस्कृति द्वारा निर्धारित होते हैं; अत: मूल्य संस्कृति की उपज हैं तथा वे संस्कृति को बनाए रखने में भी सहायक होते हैं।
  2. सामाजिक मूल्य मानसिक धारणाएँ हैं; अतः जिस प्रकार समाज अमूर्त है उसी प्रकार मूल्य भी अमूर्त होते हैं। अन्य शब्दों में, सामाजिक मूल्यों को न तो देखा जा सकता है और न ही इनको स्पर्श किया जा सकता है, इनका केवल अनुभव किया जा सकता है।
  3. मूल्य व्यवहार करने के विस्तृत तरीके ही नहीं है अपितु समाज द्वारा वांछित तरीकों के प्रति व्यक्त की जाने वाली प्रतिबद्धता भी है।
  4. प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक मूल्यों को अपने ढंग से लेता है और उनका निर्वाचन करता है। एक सन्यासी एवं व्यापारी के लिए ईमानदारी’ (जो कि एक सामाजिक मूल्य है) का अर्थ भिन्न-भिन्न हो सकता है।
  5. सामाजिक मूल्य मानव व्यवहार के प्रेरक अथवा चालक के रूप में कार्य करते हैं।
  6. सामाजिक मूल्य व्यक्ति पर थोपे नहीं जाते अपितु वह समाजीकरण द्वारा स्वयं इनका अंतरीकरण कर लेता है और इस प्रकार वे उसके व्यक्तित्व के ही अंग बन जाते हैं।
  7. सामाजिक मूल्य व्यक्ति के लक्ष्यों, साधनों व तरीकों के चयन के पैमाने हैं। हम सामाजिक मूल्यों के आधार पर ही किसी एक लक्ष्य को अन्य की अपेक्षा अधिक प्राथमिकता देते हैं।
  8. सामाजिक मूल्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते रहते हैं और इसलिए इनमें परिवर्तन करना कठिन होता है। व्यक्तियों की इनके प्रति प्रतिबद्धता या वचनबद्धता के कारण भी इनमें परिवर्तन करना कठिन होता है।
  9. सामाजिक मूल्यों में संज्ञानात्मक, आदर्शात्मक तथा भौतिक तीनों प्रकार के तत्त्व निहित होते हैं।
  10. किसी भी समाज की प्रगति का मूल्यांकन सामाजिक मूल्यों के आधार पर ही किया जाता है।
  11. सामाजिक मूल्य ही नैतिकता-अनैतिकता अथवा उचित-अनुचित के मापंदड होते हैं।

सामाजिक मूल्यों के प्रकार

सामाजिक मूल्य विभिन्न प्रकार के होते हैं तथा विद्वानों ने इनका वर्गीकरण विविध प्रकार से किया है। प्रमुख विद्वानों द्वारा प्रस्तुत वर्गीकरण इस प्रकार हैं—
(अ) राधाकमल मुखर्जी (Radhakamal Mukherjee) के अनुसार सामाजिक मूल्य प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक संगठन व सामाजिक व्यवस्था से संबंधित होते हैं। इन्होंने चार प्रकार के मूल्यों का उल्लेख किया है-

  1. वे मूल्य जिनका संबंध आदान-प्रदान व सहयोग आदि से होता है। इन मूल्यों के आधार पर आर्थिक जीवन की उन्नति होती है व आर्थिक जीवन संतुलित होता है।
  2. वे मूल्य जिनके आधार पर सामान्य सामाजिक जीवन के प्रतिमानों व आदर्शों का निर्धारण होता है। इन मूल्यों के अंतर्गत एकता व उत्तरदायित्व भी भावना आदि समाहित होती है।
  3. वे मूल्य जो सामाजिक संगठन व व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए समाज में समानता व सामाजिक न्याय का प्रतिपादन करते हैं।
  4. वे मूल्य जो समाज में उच्चता लाने व नैतिकतों को विकसित करने में सहायता प्रदान करते हैं।

(ब) इलियट एवं मैरिल (Elliott and Merrill) ने अमेरिकी समाज के संदर्भ में तीन प्रकार के सामाजिक मूल्यों का उल्लेख किया है-

  1. आर्थिक सफलता
  2. मानवीय स्नेह तथा
  3. देशभक्ति या राष्ट्रीयता की भावना।

(स) सी० एम० केस (C.M. Case) ने सामाजिक मूल्यों को चार भागों में विभाजित किया है–

  1. सामाजिक मूल्य-ये मूल्य सामाजिक जीवन से संबंधित होते हैं। सहयोग, दान, सेवा, निवास, भूमि, समूह इत्यादि के निर्धारित मूल्य इस कोटि में आते हैं।
  2. सांस्कृतिक मूल्य-इन मूल्यों की उत्पत्ति व्यक्ति के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में नियमितता और नियंत्रण के लिए हुई। परंपरा, लोक कला, रीति-रिवाज, धार्मिक क्रियाएँ, गायन, नृत्य सभी सांस्कृतिक मूल्य कहे जाते हैं।
  3. विशिष्ट मूल्य–इनका निर्धारण परिस्थितियों के लिए किया जाता है। अवसर-विशेष के लिए जिन मूल्यों का प्रचलन किया जाता है वे ही विशिष्ट मूल्य कहलाते हैं, जैसे—ब्रिटिश सत्ता को | उखाड़ फेंकने के लिए भारतीय जनता एक साथ कृत संकल्प हुई थी।
  4. जैविक या सावयवी मूल्य–ये मूल्य व्यक्ति की शरीर रक्षा के लिए निर्धारित किए जाते हैं। जैसे-‘शराब मत पियो’ सावयवी मूल्य ही है क्योंकि शराब के परिणाम खराब स्वास्थ्य, विभिन्न बीमारियों तथा मानसिक असमर्थता आदि हैं जिनको प्रभाव व्यक्ति के शरीर के साथ ही भावी संतान पर भी पड़ता है तथा समाज में भी शराब के दुष्परिणाम देखे जा सकते हैं।

प्रश्न 5.
अनुपालन को परिभाषित कीजिए तथा इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
या
अनुपालन के अर्थ को समझाते हुए अनुपालन की संकल्पना को स्पष्ट कीजिए।
या
अनुपालन किसे कहते हैं? इसके प्रमुख कारण बताइए।
उत्तर
‘अनुपालन’ समाजशास्त्र की प्रमुख संकल्पना है। अनुपालन का अर्थ व्यक्तियों द्वारा समाज की मान्यताओं के अनुकूल व्यवहार करना है। इसकी विपरीत स्थिति को ‘विचलन’ कहते हैं जिसका अर्थ समाज के आदर्शों एवं मान्यताओं से हटकर व्यवहार करना है। यद्यपि समाज के अधिकांश व्यक्ति समाज की मान्यताओं एवं आदर्शों के अनुरूप व्यवहार करते हैं, तथापि प्रत्येक समाज में कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो कि समाज की मान्यताओं व आदर्शों से हटकर व्यवहार करते हैं। उनके इसी व्यवहार को विचलन कहा जाता है। इस अर्थ में ये दोनों संकल्पनाएँ एक-दूसरे के विपरीत हैं।

अनुपालन का अर्थ तथा परिभाषाएँ

प्रत्येक समाज में व्यवहार करने के कुछ आदर्श प्रतिमान होते हैं। जब बच्चा पैदा होता है तो उसे समाज में प्रचलित आदर्शो, मान्यताओं, मूल्यों, प्रथाओं, रूढ़ियों आदि का कोई ज्ञान नहीं होता। समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा समाज अपने सदस्यों को इनका ज्ञान प्रदान करता है। इसी प्रकार के माध्यम से व्यक्तेि उनका अपने व्यक्तित्व में आंतरीकरण कर लेते हैं और उन्हीं के अनुकूल व्यवहार करने लगते हैं। इसी को हम अनुपालन कहते हैं। अतः समाज द्वारा स्वीकृत आदर्श नियमों के अनुरूप व्यवहार करना ही अनुपालन है। इसे विद्वानों ने निम्नवर्णित प्रकार से परिभाषित किया है-

  1. मर्टन (Merton) के अनुसार-“इस शब्द का सामान्य अर्थ यह है कि व्यक्ति जिस समूह का सदस्य है उसमें प्रचलित आदर्शों एवं प्रत्याशाओं के अनुरूप व्यवहार करें।
  2.  जॉनसन (Johnson) के अनुसार-“अनुपालन वह क्रिया है जो (1) सामाजिक आदर्श या आदर्शों की ओर अभिमुख होती है और (2) सामाजिक आदर्श द्वारा स्वीकृत व्यवहार के अनुसार होती है। अन्य शब्दों में, अनुपालन केवल मान्य सामाजिक आदर्शों के अनुसार व्यवहार करना ही नहीं है। संबंधित आदर्श भी क्रिया करने वाले कर्ता की प्रेरणा के अंग हैं, चाहे वह अनिवार्य रूप से इनके बारे में एक समय विशेष पर अथवा सदैव जागरूक नहीं होता।”
  3. कुले (Cooley) के अनुसार-“अनुपालन एक समूह द्वारा निर्धारित प्रतिमानों को बनाए रखने ” का प्रयत्न है। यह क्रिया के स्वरूपों का एक स्वैच्छिक अनुकरण है।”
  4.  थियोडोरसन एवं थियोडोरसन (Theodorson and Theodorson) के अनुसार “सामाजिक समूह की प्रत्याशाओं के अनुसार व्यवहार करना ही अनुपालन है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी समाज के सदस्यों द्वारा स्वीकृत आदर्शो या प्रतिमानों के अनुसार व्यवहार करना ही अनुपालन है। वास्तव में, समाज के आदर्शों एवं मूल्यों में समाज या समूह की दबाव की शक्ति होती है जो व्यक्ति को इनके अनुसार व्यवहार करने के लिए प्रेरित करती है। समाजीकरण तथा सामाजिक नियंत्रण द्वारा व्यक्तियों के व्यवहार में अनुपालन लाने का प्रयास किया जाता है।

अनुपालन की विशेषताएँ

अनुपालन की संकल्पना को इसकी निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. सामाजिक आदर्शों से संबंधित सामाजिक आदर्श, प्रथाएँ, रूढ़ियाँ जनरीतियाँ अथवा कानून वे मानदंड हैं जो व्यक्ति को समाज द्वारा स्वीकृत व्यवहार करने के लिए प्रेरित करते हैं। अनुपालन का संबंध व्यवहार के इन्हीं मानदंडों से है क्योंकि इनके अनुसार व्यवहार करना ही अनुपालन कहलाता है।
  2. कर्तव्यों का ज्ञान–अनुपालन का संबंध कर्तव्यों के ज्ञान से हैं अर्थात् अनुपालन में व्यक्ति से यह आशा की जाती है कि वह अपने कर्तव्यों व अधिकारों के अनुसार ही समाज द्वारा स्वीकृत व्यवहार करेगा।
  3. मूर्त क्रियाएँ-अनुपालन की दूसरी विशेषता यह है कि इसका संबंध मानदंडों के अनुरूप मूर्त क्रियाओं से है अर्थात् व्यक्ति की क्रियाओं से ही हम इस बात का पता लगा सकते हैं कि व्यक्ति में अनुपालन पाया जाता है अथवा नहीं।
  4. संगठन से संबंधित–अनुपालन का एक अन्य लक्षण यह है कि इससे किसी समाज में संगठन तथा व्यवस्था बनाए रखने में सहायता मिलती है। अगर किसी समाज के व्यक्ति मान्यताओं के अनुरूप व्यवहार नहीं करेंगे तो उस समाज में विघटन की स्थिति पैदा हो सकती है।
  5. मानदंडों में भिन्नता–अनुपालन की प्रकृति में भिन्नता पाई जाती है अर्थात् यह सभी समाजों के एक समान व्यवहार से संबंधित नहीं है। इसलिए इसके मानदंडों में भी भिन्नता पाई जाती है।

अनुपालन के प्रमुख कारण

प्रत्येक समाज यह, चाहता है कि उसके सभी सदस्य समाज द्वारा स्वीकृत आदर्शों के अनुसार ही व्यवहार करें ताकि इससे अनुपालन बना रहे और समाज में स्थायित्व व संगठन भी बना रहे। अतः प्रत्येक समाज अनेक ऐसे उपाय करता है जो अनुपालन को प्रोत्साहन दें तथा इसकी विपरीत स्थिति (अर्थात् विचलन) पर अंकुश लगाए रखें। अनुपालन को बनाए रखने में सहायक प्रमुख कारण अग्रांकित हैं–

  1. समाजीकरण-अनुपालन में सहायक सर्वप्रथम कारण समाजीकरण की प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्ति में सामाजिक आदशों व मानदंडों के अनुरूप व्यवहार करने का ज्ञान प्रदान किया जाता है। वास्तव में समाजीकरण द्वारा ही सामाजिक आदर्शों व प्रतिमानों का आंतरीकरण होता है और वे व्यक्तित्व का अंग बन जाते हैं।
  2. पद-सोपान–पद-सोपान भी व्यक्ति के व्यवहार में अनुपालन लाता है। इससे हमें यह पता चलता है कि सामाजिक आदर्शों में किस प्रकार का क्रम पाया जाता है और अगर एक व्यक्ति किसी परिस्थिति में एक आदर्श के अनुरूप व्यवहार नहीं कर पाए तो उसे उसके बाद किस आदर्श को मानना होता। आदर्शों के विकल्पों में पदे-सोपान पाया जाता है।
  3. आवश्यकताओं की पूर्ति-व्यक्तियों के अनुपालन का एक अन्य कारण आवश्यकताओं की पूर्ति भी है। अनुपालन से जिन आवश्यकताओं की पूर्ति होती है वह विचलन से नहीं हो सकती और अगर होती भी है तो वह समाज द्वारा स्वीकृत नहीं होती।
  4. समूह का दबाव-समूह के दबाव के कारण भी व्यक्तियों में अनुपालन अधिक पाया जाता है। अगर व्यक्ति को यह अनुभव होता है कि सामूहिक मान्यताओं का उल्लंघन करने पर उसे समूह द्वारा दंड दिया जाएगा तो वह मान्यताओं व आदर्शों के अनुरूप ही व्यवहार करने का प्रयास करता है।
  5. विचारधारा–विचारधारा व्यक्तियों के व्यवहार में अनुपालन बनाए रखने में सहायता प्रदान करती है। अगर समाज में प्रचलित विचारधाराएँ सामाजिक आदर्शों व मूल्यों का ही समर्थन करने वाली हैं तो व्यक्तियों के व्यवहार में अनुपालन की संभावना अधिक होती है।
  6. निहित स्वार्थ-व्यक्ति निहित स्वार्थों के कारण भी सामाजिक आदर्शों का अनुकरण करता है। ताकि उसे इनसे सामाजिक सुरक्षा मिलती रहे। अनुपालन के कारण ही समाज व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा करते हैं।
  7. सामाजिक नियंत्रण-जो व्यक्ति समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा आदर्शों के अनुरूप व्यवहार करना नहीं सीखते और इनके विरुद्ध व्यवहार करते हैं, उन पर समाज राज्य व कानून द्वारा नियंत्रण रखता है तथा उनके द्वारा बलपूर्वक उन्हें सामाजिक आदर्शों के अनुकूल व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है।
  8. विसंवाहन–विसंवाहन का संबंध व्यक्तियों द्वारा विभिन्न भूमिकाओं के संपादन से है। व्यक्ति को अनेक भूमिकाएँ निभानी पड़ती हैं और कई बार कुछ भूमिकाएँ परस्पर विरोधी भी होती हैं। विसंवाहन द्वारा व्यक्ति अपनी भूमिकाओं को इस प्रकार से निभाता है कि उसके व्यवहार में अनुपालन बना रहता है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 4 Culture and Socialisation

प्रश्न 6.
समाजीकरण क्या है? इसके प्रमुख अभिकरणों की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
या
समाजीकरण क्या है? संक्षेप में समाजीकरण के प्रमुख अभिकरणों का उल्लेख कीजिए।
या
समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवार तथा विद्यालय की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
या
“परिवार समाजीकरण का प्रमुख आधार है।” इस कथन की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
उत्तर
मनुष्य का जन्म समाज में होता है। समाज में जन्म लेने के पश्चात् वह धीरे-धीरे आस-पास के वातावरण के संपर्क में आता है और उससे प्रभावित होता है। प्रारंभ में मनुष्य एक प्रकार से जैविक प्राणी मात्र होता है; क्योंकि आहार, निद्रा आदि के अतिरिक्त उसे और किसी बात का ज्ञान नहीं होता। और उसकी अवस्था बहुत-कुछ पशुओं के समान होती है। इसके अतिरिक्त जन्म के समय बालक में सभी प्रकार के सामाजिक गुणों का भी अभाव होता है। सामाजिक गुणों के अभाव में बालक एक जैविक प्राणी मात्र ही होता है। माता-पिता के संपर्क में आकर वह मुस्कराना और पहचानना सीखता है। धीरे-धीरे वह अपने परिवार के अन्य सदस्यों के संपर्क में आता है और उनसे सामाजिक शिष्टाचार की अनेक बातें सीखता हैं। आगे चलकर और बड़े होने पर उसके सपंर्क का क्षेत्र और अधिक व्यापक हो जाता है तथा वह विभिन्न सामाजिक तरीकों से अपने कार्यों का संचालन करना सीख लेता है तथा उसका प्रत्येक व्यवहार समाज के नियमों के अनुसार होने लगता है। इस प्रकार, वह प्राणी से सामाजिक प्राणी बन जाता है और समाजशास्त्र में बच्चे के सामाजिक बनने की इस प्रक्रिया को ही समाजीकरण कहा जाता है।

समाजीकरण का अर्थ एवं परिभाषाएँ

समाजीकरण सीखने की एक प्रक्रिया है। इसी के परिणामस्वरूप व्यक्ति समाज में रहना सीखता है। अर्थात् एक सामाजिक प्राणी बनता है। संस्कृति का हस्तांतरण भी इसी प्रक्रिया के माध्यम से होता है। विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रतिपादित समाजीकरण की परिभाषाएँ निम्नवर्णित हैं-

  1. ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार-“समाजीकरण से समाजशास्त्रियों का तात्पर्य है वह प्रक्रिया जिससे व्यक्ति का मानवीकरण होता है।”
  2. ग्रीन (Green) के अनुसार--“समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बच्चा अपनी सांस्कृतिक विशेषताओं, आत्मपन और व्यक्तित्व प्राप्त करता है।”
  3. जॉनसन (Johnson) के अनुसार–“समाजीकरण एक प्रकार का सीखना है जो सीखने वाले को सामाजिक कार्य करने योग्य बनाता है।”
  4.  बोगार्ड्स (Bogardus) के अनुसार–“समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति एक-दूसरे पर निर्भर रहकर व्यवहार करना सीखता है और इसके द्वारा सामाजिक आत्म-नियंत्रण सामाजिक उत्तरदायित्त्व तथा संतुलित व्यक्तित्व का अनुभव प्राप्त करता है।”
  5. डेविस (Davis) के अनुसार-“परिवर्तन की इस प्रक्रिया के बिना, जिसे हम समाजीकरण कहते हैं, समाज एक पीढ़ी से भी आगे स्वयं को संतुलित नहीं कर सकता है और न ही संस्कृति जीवित रह सकती है। इसके बिना व्यक्ति सामाजिक प्राणी भी नहीं बन सकता है।’
  6. कोनिग (Koenig) के अनुसार-“समीकरण से तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसमें एक व्यक्ति अपने समाज, जिसमें वह जन्मा है, जो कार्यरत (या उपयोगी) सदस्य बनता है अर्थात् समाज | की जनरीतियों एवं रूढ़ियों के अनुसार व्यवहार एवं कार्य करता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि समाजीकरण की प्रक्रिया जीवन भर किसी-न-किसी रूप में चलती रहती है। इसी प्रक्रिया के माध्यम से संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्सांतरित होती है।

समाजीकरण के प्रमुख अभिकरण

समाज की विभिन्न संस्थाएँ व्यक्ति के समाजीकरण में योगदान देती आई हैं। ये संस्थाएँ अथवा अभिकरण निम्नलिखित हैं-
1. परिवार–बालक का समाजीकरण करने वाली प्रथम तथा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संस्था परिवार है। परिवार में ही बच्चे का जन्म होता है तथा सबसे पहले वह माता-पिता व अन्य परिवारजनों के ही संपर्क में आता है। परिवार के सदस्य बालक के समाजीकरण में अपना प्रथम तथा स्थायी योगदान प्रदान करते हैं। परिवार के सदस्यों का परस्पर सहयोग और प्रेम-भाव बालक को समाजीकरण के लिए प्रेरित करता है। किम्बाल यंग (Kimball Young) के शब्दों में, “समाज के अंतर्गत समाजीकरण की भिन्न-भिन्न संस्थाओं में परिवार’ अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।” प्रत्येक बालक अपने माता-पिता से रीति-रिवाज, सामाजिक परंपराओं तथा सामाजिक शिष्टाचार का ज्ञान प्राप्त करता है। वह परिवार में ही रहकर आज्ञाकारिता, सामाजिक अनुकूलन तथा सहनशीलता की प्रवृत्ति को विकसित करता है। संभवतः इसलिए परिवार को बच्चे की प्रथम पाठशाला कहा गया है जो कि ठीक भी है। समाजीकरण में परिवार के महत्त्व को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है-

  1. माता-पिता के व्यवहार का प्रभाव-बच्चों के साथ माता-पिता का क्या और कैसा व्यवहार है, इस बात से ही बच्चे के सामाजिक जीवन का अनुमान लगाया जा सकता है। माता-पिता के व्यवहार को बालक के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अधिक लाड़-प्यार में पला बालक प्रायः बिगड़ जाता है। इसके साथ ही साथ माता-पिता से प्यार न मिलने पर बालक में हीन भावना ग्रन्थियाँ बनने लगती हैं और उसका व्यक्तित्व ठीक प्रकार से विकसित नहीं हो पाता।
  2. माता-पिता के चरित्र का प्रभाव-समाजीकरण में माता-पिता के चरित्र का विशेष प्रभाव पड़ता है। चरित्रहीन माता-पिता के बालकों के व्यक्तित्व के संतुलित होने की कोई संभावना नहीं होती। जुआरी व शराबी माता-पिता की संतान नियंत्रणहीन हो जाती है और वह समाज-विरोधी कार्य करने लगती है। इसके विपरीत, चरित्रवान माता-पिता की संतान पर रीति-रिवाजों और प्रतिमानों द्वारा सामाजिक नियंत्रण की संभावना बनी रहती है।
  3. भाई-बहनों का प्रभाव-परिवार में रहने वाले भाई-बहनों को भी बालक के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है। भाई-बहनों में बालक का जो स्थान होता है उससे बालक का व्यक्तित्व प्रभावित होता है। यदि उसका स्थान परिवार में सबसे प्रथम है तो वह अपने आचरण को संतुलित रखने का प्रयास करता है ताकि उसके छोटे भाई-बहन उसका सम्मान करें। एक ही पीढ़ी के होने के कारण भाई-बहनों का प्रभाव समाजीकरण में अत्यधिक पड़ता है।
  4. पारिवारिक नियंत्रण का प्रभाव-माता-पिता के निंयत्रण का भी बच्चों अथवा परिवार के युवक-युवतियों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। नियंत्रणहीन परिवार में युवक-युवितयों के बिगड़ने की संभावना अधिक बनी रहती है। इसके विपीरत, जो परिवार नियंत्रित रहते हैं। उनके बच्चे पूर्ण से सुयोग्य एवं नियंत्रित रहते हैं।
  5. परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रभाव-परिवार की आर्थिक स्थिति भी बच्चे के समाजीकरण को प्रभावित करती है। यदि परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है तो बच्चे की संभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर दी जाती है जिससे बच्चा अपराधों की ओर आकर्षित नहीं होता। इसके विपरीत, निर्धन परिवार के बच्चों की आवश्यकता की पूर्ति नहीं होती। इन परिवारों के बच्चों में हीन-भावना ग्रथियों का निर्माण हो जाता है और वे समाज-विरोधी कार्य करने लगते हैं।
  6.  नागरिक गुणों की पाठशाला—परिवार को ही नागरिक गुणों की प्रथम पाठशाला कहो गया है। परिवार में रहकर ही बच्चा सर्वप्रथम सहानुभूति, प्रेम, त्याग, सहिष्णुता, आज्ञापालन आदि गुणों को सीख जाता है। इन्हीं से व्यक्ति का समाजीकरण संभव होता है।

2. पड़ोस-परिवार के पश्चात् बालक अपने पड़ोस के संपर्क में आता है। पड़ोस के वातावरण से बालक पर्याप्त प्रभावित होता है। पड़ोसियों का परस्पर प्रेम, सहयोग तथा सद्भाव बालक के समाजीकरण में विशेष योगदान करता है। पड़ोस के बालक परस्पर मिलकर खेलते हैं। इस खेल में या तो बालक अन्य बालकों का नेतृत्व करता है या किसी बालक के नेतृत्व में कार्य करता है।

इस प्रकार, बालक के समाजीकरण की प्रक्रिया चलती रहती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए अच्छे पड़ोस में रहना पसंद किया जाता है। यदि पड़ोस अच्छा नहीं है तो बच्चों के समाजीकरण की प्रक्रिया भी दूषित हो जाती है।

3. विद्यालय परिवार तथा पड़ोस के पश्चात बालक के समाजीकरण में विद्यालय महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है। विद्यालय समाज का लघु रूप होता है; अतः बालक को वहाँ अनेक सामाजिक अनुभव होते हैं और अनेक सामाजिक क्रियाओं में भाग लेने के अवसर मिलते हैं। बालक के परस्पर मिलने-जुलने, उठने-बैठने, खेलने-कूदने तथा सहयोगपूर्वक श्रमदान आदि में भाग लेने से उसमें सामाजिकता की भावना का विकास होता है। समाज के नियमों और व्यवहारों का प्रायोगिक ज्ञान प्राप्त करने की दृष्टि से विद्यालय का सर्वोच्च स्थान है यह समाजीकरण का महत्त्वपूर्ण औपचारिक अभिकरण है। विद्यालय के महत्त्व को निम्नलिखित तथ्यों से समझा जा सकता है-

  1. स्कूल के वातावरण का प्रभाव-स्कूल का वातावरण भी बच्चों के जीवन को प्रभावित करता है। यदि स्कूल में अनुशासन ठीक है और सभी अध्यापक अपने उत्तरदायित्व का पूरा ध्यान रखते हैं तो बच्चे का जीवन भी सुधरता है और उनमें जीवन को अनुशासित एवं संतुलित करने की क्षमता विकसित होती है। यदि स्कूल का वातावण दूषित हो तो इसके प्रभाव के कारण बच्चों के व्यक्तित्व का ठीक प्रकार से विकास नहीं हो पाता है।
  2. शिक्षक के व्यक्तित्व का प्रभाव-बालक के जीवन पर उसके अध्यापकों तथा गुरुओं के व्यक्तित्व और चरित्र का गहरा प्रभाव पड़ता है। अध्यापक के आदर्श बच्चों के जीवन को पूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं। बच्चों के सोचने-विचारन, उठने-बैठने, बोलने तथा हाव-भाव आदि पर अध्यापकों के व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ता है। यह प्रभाव दोनों ही प्रकार का हो सकता है। सुयोग्य अध्यापक बालकों में लोकप्रिय होकर अपना आदर्श बच्चों के अनुभव के लिए छोड़ जाते हैं। इसके विपरीत, कुछ अध्यापक अपने प्रति घृणा
    के भाव भी बच्चों के मन में छोड़ जाते हैं।
  3. सहपाठियों का प्रभाव-बच्चों के व्यक्तित्व पर उनके सहपाठियों का भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। यदि सभी छात्र योग्य परिवार के हों तो बालकों की आदत पर अच्छा प्रभाव पड़ता है और यदि छात्रों की अधिकतर संख्या टूटे हुए (भग्न) परिवारों से संबंधित है। तो बच्चों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।
  4. अध्यापकों के व्यवहार का प्रभाव-अध्यापकों के व्यवहार का भी बच्चों के चरित्र एवं व्यक्तित्व पर विशेष प्रभाव पड़ता है। बच्चों के साथ यदि अध्यापकों का व्यवहार उचित हो तो बच्चे मन लगाकर कार्य करते हैं। इसके विपरीत, यदि बच्चों के साथ कठोर व्यवहार हो तो वे कक्षा में उपस्थित होने से मन चुराने लगते हैं तथा विद्यालय के समय को बुरी संगति में बिताकर छुट्टी के समय घर पहुँच जाते हैं। इस प्रकार कुसंगति में पड़कर वे समाज-विरोधी कार्य करने लगते हैं और उनके समाजीकरण की प्रक्रिया में बाधा पड़ती है।

4. मित्र-मण्डली–अपनी मित्र-मंडली में रहना प्रत्येक बालक पसंद करता है। मित्र-मंडली एक ऐसा प्राथमिक समूह है जिसमें बालक अनेक बातें सीखता है। मित्रों का परस्पर व्यवहार तथा शिष्टाचार भी समाजीकरण में सहायक होता है। बच्चा अपने मित्रों से बहुत कुछ सीखता है। क्योंकि एक ही आयु-समूह होने के कारण बच्चे एक-दूसरे को अत्यधिक प्रभावित करते हैं। परंतु बुरी मित्र-मंडली का प्रभाव बालक को असामाजिक बना देता है। परिवार के बाद मित्र-मंडली ही एक ऐसा प्राथमिक अभिकरण है जिसकी बच्चे के समाजीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

5. क्रीड़ा-समूह-मित्र-मंडली के समान बालक के समाजीकरण में क्रीड़ा-समूह भी अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। बड़े होने पर बालक अपने साथी-समूह में खेलता है तो वह अनेक परिवारों से आए बालको के संपर्क में आता है और उनके बोलचाल तथा शिष्टाचार के ढंगों को सीखता है। प्रत्येक बालक एक-दूसरे को कुछ-न-कुछ सामाजिक व्यवहार के पाठ का शिक्षण देता है। क्रीड़ा-समूह बालकों में सामाजिक अनुशासन भी उत्पन्न करता है। क्रीड़ा-समूह में रहकर बालक सहयोग, न्याय, अनुकूलन तथा प्रतिस्पर्धा आदि सामाजिक गुणों को अर्जित करता है तथा ये गुण क्रमशः विकसित होकर जीवन भर उसके काम आते हैं।

6. जाति–जाति’ (Caste) से भी व्यक्ति को समाजीकरण होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति के प्रति श्रद्धा की भावना रखता है और उसके प्रति कर्तव्य का पालन करना सीखता है। प्रत्येक जाति को अपनी प्रथाएँ परंपराएँ और सांस्कृतिक उपलब्धियाँ होती हैं। व्यक्ति इनको किसी-न-किसी रूप में ग्रहण करता है। जाति के नियम पालन, उसके अनुशासन में रहना आदि व्यक्ति के समाजीकरण में योगदान देते हैं।

7. जन-माध्यम-आज के इलेक्ट्रॉनिक युग में जन-माध्यम हमारे दैनिक जीवन का अनिवार्य अंग बन गए हैं। इसमें पत्र-पत्रिकाएँ, रेडियो, टेलीविजन, फिल्मों इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है। बच्चों को संस्कृति तथा इसमें हो रहे परिवर्तनों का ज्ञान देने में जन-माध्यमों की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो गई है। बच्चों तथा बड़ों पर हुए अध्ययनों से यह पता चलता है कि विभिन्न जन-माध्यमों को उनके मूल्यों, आदर्शो, व्यवहार प्रतिमानों, दृष्टिकोण इत्यादि पर गहरा प्रभाव पड़ता है। रामायण तथा महभारत जैसे धारावाहिकों ने बच्चों को परंपरागत भारतीय संस्कृति के आदर्शों से परिचित कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि समाजीकरण की प्रक्रिया में अनेक अभिकरण महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। इन अभिकरणों के अतिरिक्त संस्थाएँ, आर्थिक संस्थाएँ एवं राजनीतिक संस्थाएँ भी समाजीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इन सभी के सामूहिक योगदान के परिणामस्वरूप ही व्यक्ति सामाजिक विरासत को ग्रहण कर पाता है।

प्रश्न 7.
व्यक्तित्व किसे कहते हैं? इसको प्रभावित करने वाले कारक बताइए।
या
व्यक्तित्व को परिभाषित कीजिए तथा इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
या
व्यक्तित्व की संकल्पना स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘व्यक्तित्व’ शब्द का साधारण बोल-चाल में बहुत अधिक प्रयोग होता है। प्रत्येक बालक भी अपने व्यक्तित्व के विकास एवं निखार के प्रति सजग रहता है। अन्य व्यक्तियों के व्यक्तित्व का भी भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से निरंतर मूल्यांकन किया जाता रहता है। फिल्मी कलाकारों, राजनीतिक नेताओं, शिक्षकों तथा अभिभावकों तक के व्यक्तित्व की चर्चा की जाती है। इसके अतिरिक्ति व्यवसाय वरण करने वाले युवक भी व्यक्तित्व परीक्षण की बात किया करते हैं; यथा-इंटरव्यू में व्यक्तित्व का विशेष प्रभाव पड़ता है’ आदि। स्पष्ट है कि व्यक्तित्व’ शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया जाता है।

व्यक्तित्व का अर्थ एवं परिभाषाएँ

सामान्य बोलचाल की भाषा में प्रयोग होने वाले शब्द ‘व्यक्तित्व’ का आशय संबंधित व्यक्ति के बाहरी पक्ष से होता है। इस दृष्टिकोण से यदि व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) समय के अनुकूल वस्त्र धारण करे, अच्छे तथा सौम्य ढंग का फैशन करे तो माना जाता है कि अमुक व्यक्ति का व्यक्तित्व श्रेष्ठ है। इस दृष्टिकोण से व्यक्तित्व के निर्धारण में शारीरिक पक्ष को ही महत्त्व दिया जाता है। इस प्रचलित अर्थ के अतिरिक्ति दार्शनिक दृष्टिकोण से भी व्यक्तित्व का विवेचन किया जाता है। दार्शनिक दृष्टिकोण से व्यक्तित्व से आशय व्यक्ति के आंतरिक रूप से होता है। इस दृष्टिकोण से व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्धारण उसकी आत्मा या आध्यात्मिक गुणों के आधार पर किया जाता है। यदि तटस्थ भाव से देखा जाए तो मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्यक्तित्व संबंधी उपर्युक्त दोनों ही मत एकांगी तथा अपने आप में अपूर्ण हैं। व्यक्तित्व की पूर्ण व्याख्या के लिए इस शब्द के शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ वास्तविक अर्थ एवं परिभाषाओं का भी विवेचन करना होगा।

व्यक्तित्व की अवधारणा एक जटिल अवधारणा है। व्यक्तित्व’ शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द *Personality’ का हिंदी रूपांतर है जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के persona’ शब्द से हुई है। इसका पारंपरिक अर्थ वेशभूषा है, जो नाटकों के समय कलाकरों द्वारा धारण की जाती थी। उदाहरणार्थ-यदि कोई कलाकार सम्राट की वेशभूषा धारण करके रंगमंच पर प्रस्तुत होता था तो उस रूप को विशिष्ट व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया जाता था। इस पारंपरिक अर्थ को ही आधार पर आगे चलकर व्यक्ति के गुणों को ‘पर्साना’ (व्यक्तित्व) के रूप में जाना जाने लगा। व्यक्तित्व के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा जाता है कि व्यक्ति की जितनी भी विशेषताएँ अथवा विलक्षणताएँ होती हैं, उन सबका समन्वित अथवा संगठित (Integrated) रूप ही व्यक्तित्व है। यह एक प्रकार का गत्यात्मक संगठन (Dynamic organisation) होता है। शरीर से संबंधित विशेषताओं को व्यक्तित्व का बाहरी पक्ष माना जाता है। इससे भिन्न व्यक्ति की बुद्धि, योग्यताएँ, आदतें, रुचियाँ, दृष्टिकोण, चरित्र आदि विशेषताएँ व्यक्तित्व के आंतरिक पक्ष का प्रतिनिधित्व करती हैं।

व्यक्तित्व को निम्न प्रकार से परिभाषित करते हैं।

  1. ऑलपोर्ट के अनुसार-“व्यक्तित्व व्यक्ति के भीतर उन मनोदैहिक गुणों का गत्यात्मक संगठन है जो परिवेश के प्रति होने वाले अपूर्व अभियोजनों का निर्णय करते हैं।”
  2. मन के अनुसार-“व्यक्तित्व की परिभाषा एक व्यक्ति के ढाँचे, व्यवहार के रूपों, रुचियों, अभिवृत्तियों, सामथ्र्यो, योग्यताओं तथा अभिरुचियों के सबसे अधिक लाक्षणिक संकलन के रूप में की जा सकती है।”
  3. मार्टन प्रिन्स के शब्दों में-“व्यक्तित्व समस्त शारीरिक, जन्मजात तथा अर्जित प्रवृत्तियों का योग है।” प्रकार के आंतरिक एवं बाहरी गुणों का समावेश होता है। व्यक्ति के व्यवहार से जो कुछ भी प्रकट होता है, वह सब उसके व्यक्तित्व का ही परिणाम होता है। इन समस्त परिभाषाओं से ज्ञात होता है कि व्यक्ति के केवल बाहरी रूप को ही नहीं बल्कि बाहरी व आंतरिक अर्थात् शारीरिक व मानसिक गुणों के योग को व्यक्तित्व के रूप में परिभाषित किया जाता है।

व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले कारक

व्यक्ति अथवा बालक के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों के अभीष्ट विकास के लिए मुख्य रूप से दो कारकों को उत्तरदायी ठहराया जाता है, ये कारक हैं-वंशानुक्रमण (Heredity) तथा पर्यावरण (Environment)। भिन्न-भिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से इन दोनों की भूमिका तथा महत्त्व का वर्णन किया है। कुछ विद्वान् व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण एवं विकास के लिए केवल आनुवंशिकता को ही महत्त्व देते हैं तथा स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जैसी वंश परंपरा एवं विशेषताएँ होंगी, वैसी ही उनकी संतानें भी होंगी। इस मत के समर्थक विद्वान् पर्यावरण को गौण मानते हैं तथा उनके अनुसार व्यक्ति स्वयं अपने अनुकूल पर्यावरण को तैयार कर लेता है। इसके विपरीत, विद्वानों का एक अन्य वर्ग व्यक्ति के विकास में पर्यावरण के कार्य भाग को अधिक महत्त्व देता है। इस मत के समर्थक एक विद्वान का कहना है, “नवजात शिशु अनिश्चित रूप से लचीला होता है। उसके अनुसार, “मुझे एक दर्जन बच्चे दे दीजिए, मैं आपकी माँग के अनुसार उनमें से किसी को भी चिकित्सक, वकील, व्यापारी अथवा चोर बना सकता हूँ। मनुष्य कुछ नहीं है, वह पर्यावरण का दास है, उसकी उपज है। इस कथन के अनुसार स्पष्ट है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में उसके वंश-परंपरा का कोई महत्त्व नहीं है, केवल पर्यावरण ही उसके व्यक्तित्व का निर्धारण करता है। आज यह स्वीकार किया जाने लगा है कि व्यक्तित्व के निर्माण में वंशानुक्रमण एवं पर्यावरण दोनों का ही प्रभाव पड़ता है। इसलिए इन दोनों को थोड़ा विस्तारपूर्वक समझ लेना अनिवार्य है-

1. वंशानुक्रमण-व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण एवं विकास को प्रभावित करने वाले एक मुख्य कारक को आनुवंशिकता अथवा वंशानुक्रमण कहा जाता है। हिंदी के वंशानुक्रमण’ शब्द के अंग्रेजी पर्यायवाची ‘हेरेडिटी’ (Heredity) है। यह शब्द वास्तव में लैटिन शब्द ‘हेरिडिस’ (Heriditas) से व्युत्पन्न हुआ है। लैटिन भाषा में इस शब्द का आशय उस पूँजी से होता है, जो बच्चों को माता-पिता से उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त होती है। प्रस्तुत संदर्भ में वंशानुक्रमण का आशय व्यक्तियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित होने वाले शारीरिक, बौद्धिक तथा अन्य व्यक्तित्व संबंधी गुणों से है। इस मान्यता के अनुसार बच्चों या संतान के विभिन्न गुण एवं लक्षणे अपने माता-पिता के समान होते हैं। उदाहरणार्थ-गोरे माता-पिता की संतान गोरी होती हैं। लंबे कद के माता-पिता की संतान भी लंबी होती है। इसी तथ्य के अनुसार प्रजातिगत विशेषताएँ सदैव बनी रहती है। वंशानुक्रमण के ही कारण मनुष्य की प्रत्येक संतान मनुष्य ही होती है। कभी भी कोई बिल्ली कुत्ते को जन्म नहीं देती। ऐसा माना जाता है कि लिंग-भेद, शारीरिक लक्षणों, बौद्धिक प्रतिभा, स्वभाव पर वंशानुक्रमण का गंभीर प्रभाव पड़ता है। वंशानुक्रमण एक प्रबल एवं महत्त्वपूर्ण कारक है, परंतु इसे एकमात्र कारक मानना अंसगत है। इसके अतिरिक्त पर्यावरण भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है, जिसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिए।

2. पर्यावरण-व्यक्ति को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाला एक मुख्य कारक पर्यावरण भी है। पर्यावरण का प्रभाव केवल मनुष्यों पर ही नहीं, वरन् विश्व की प्रत्येक जड़-चेतन वस्तू पर पड़ता है। मनुष्य के साथ-साथ पेड़-पौधे, पशु-पक्षी एवं भौतिक पदार्थ भी पर्यावरण के प्रभाव से मुक्त नहीं हैं। वनस्पतिशास्त्रियों ने सिद्ध कर दिया है कि अनेक पेड़-पौधे केवल एक विशिष्ट प्रकार के पर्यावरण (जलवायु आदि) में ही उग सकते हैं। इसी प्रकार पशु-पक्षी भी पर्यावरण पर निर्भर करते हैं। पहाड़ों पर रहने वाला सफेद भालू गर्म मैदानों में नहीं रह सकता। जहाँ तक मनुष्य का प्रश्न है वह भी पर्यावरण से अत्यधिक प्रभावित होता है। वैसे यह सत्य है। कि मनुष्य पूर्णतया पर्यावरण का दास नहीं है। मनुष्य में अपने पर्यावरण को एक सीमा तक नियंत्रित एवं परिवर्तित करने की भी क्षमता है, परंतु इस क्षमता के होते हुए भी सामान्य रूप से व्यक्ति को पर्यावरण के प्रभाव से मुक्त नहीं माना जा सकता। पर्यावरण मनुष्य को कहाँ तक प्रभावित करता है तथा पर्यावरण को मनुष्य कहाँ तक नियंत्रित कर सकता है, यह एक भिन्न प्रश्न है। इस विवाद से बचते हुए यह स्वीकार किया जा सकता है कि व्यक्ति का जीवन पर्यावरण से प्रभावित अवश्य होता है। हिंदी के ‘पर्यावरण’ शब्द का अंग्रेजी पयार्यवाची Environment है। पर्यावरण’ शब्द, दो शब्दों ‘परि + आवरण’ से मिलकर बना है। ‘परि शब्द का अर्थ है ‘चारों ओर’ तथा ‘आवरण’ शब्द का अर्थ है ‘ढके हुए। इस प्रकार से * ‘पर्यावरण’ को अर्थ हुआ चारों ओर ढके हुए’ या ‘चारों ओर से घिरे हुए। इस स्थिति में व्यक्ति का पर्यावरण वह समस्त क्षेत्र है जो व्यक्ति को घेरे रहता है; अर्थात् विश्व में व्यक्ति के अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह उसका पर्यावरण है। पर्यावरणविदों को तो यहाँ तक कहना है कि व्यक्ति केवल अपने पर्यावरण की ही उपज है।” इस वर्ग के विद्वानों का कहना है कि पर्यावरण व्यक्ति को अनेक प्रकार से प्रभावित करता है। व्यक्ति के जीवन के विभिन्न पक्ष पर्यावरण के ही परिणामस्वरूप विकसित होते हैं। इस मत के अनुयायिओं के अनुसार मानव शिशु को इच्छानुसार विकसित किया जा सकता है, केवल अनुकूल पर्यावरण उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। पर्यावरणविदों के अनुसार यदि कोई समूह अपने पर्यावरण को नियंत्रित करने में सफल हो जाये तो वह अपने सदस्यों को सरलता से अभीष्ट रूप से विकसित कर सकता है। वातावरण के बहुपक्षीय तथा निश्चित प्रभावों को प्रमाणित करने के लिए अनेक सफल परीक्षण भी किए जा चुके हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 4 Culture and Socialisation

व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ

व्यक्तित्व का निर्माण मुख्य रूप से कुछ शीलगुणों की समग्रता के द्वारा होता है जिन्हें इसकी प्रमुख विशेषताएँ भी कहा गया है। ये विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

1. मानसिक गुण या तत्त्व-व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले मानसिक तत्त्वों (Mental Traits) को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जा सकता है। इन तीनों का संक्षिप्त परिचय निम्नवत् हैं-

  1. स्वभाव-व्यक्तित्व के निर्माण में व्यक्ति के स्वभाव का भी विशेष महत्त्व एवं योगदान होता है। स्वभाव के अनुसार ही व्यक्तित्व का निर्माण भी हो जाता है। सामान्य रूप से स्वभाव के आधार पर व्यक्तियों के चार वर्ग निर्धारित किए जाते हैं, जिन्हें क्रमशः आशावादी, निराशावादी, चिड़चिड़े तथा अस्थिर स्वभाव वाले कहा जाता है। स्वभाव के आधार पर व्यक्तियों के कुछ अन्य वर्ग भी निर्धारित किए जा सकते हैं, जैसे कि मिलनसार या संकोची स्वभाव वाले। सामान्य रूप से आशवादी तथा मिलनसार स्वभाव वाले व्यक्तियों के व्यक्तित्व को उत्तम माना जाता है।
  2. ज्ञान एवं बुद्धि-व्यक्तित्व के निर्माण में व्यक्ति के ज्ञान एवं बुद्धि का विशेष योगदान होती है। बुद्धि ज्ञान-प्राप्ति का साधन है। उच्च बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति का व्यक्तिव निश्चित रूप से प्रभावशाली एवं उत्तम माना जाता है। इससे भिन्न औसत बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व भी सामान्य श्रेणी का होता है। मंदबुद्धि वाले व्यक्तियों में ज्ञान का भी प्रायः अभाव ही पाया जाता है। ऐसे व्यक्तियों का व्यक्तित्व निम्न स्तर का होता है तथा समाज में उनका किसी प्रकार का प्रभाव नहीं होता।
  3. संकल्प-शक्ति एवं चरित्र-व्यक्तित्व के निर्माण में व्यक्ति की संकल्प-शक्ति तथा चरित्र का भी विशेष योगदान होता है। व्यक्तित्व के निर्माण का एक मुख्य तत्त्व व्यक्ति का चरित्र है। चरित्र एक ऐसा तत्त्व है, जिसे प्रत्यक्ष रूप में नहीं देखा जा सकता, परंतु व्यवहार में यह शीघ्र ही प्रकट हो जाता है। उच्च एवं सृदृढ़ चरित्र वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व उत्तम एवं सराहनीय होता है। इसके विपरीत निम्न चरित्र एवं दुर्बल। संकल्प-शक्ति वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व निम्न एवं निंदनीय होता है।

2. शारीरिक गुण एवं तत्व-व्यक्तित्व के निर्माण में व्यक्ति के शारीरिक गुणों एवं तत्त्वों को भी विशेष योगदान होता है। शारीरिक गुण एवं तत्त्व व्यक्ति के व्यक्तित्व के बाहरी पक्ष का निर्माण करते हैं। व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले शारीरिक तत्त्वों को प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले शारीरिक तत्त्वों में मुख्य हैं-शरीर की आकृति, लंबाई, गठन, वाणी, मुख-मुद्रा तथा भाव-भंगिमाएँ आदि। इसके अतिरिक्त शरीर पर धारण की जाने वाली वेशभूषा तथा शरीर को सजाने-सँवारने के ढंग आदि भी व्यक्तित्व के निर्माण में योगदान देते हैं। भिन्न-भिन्न शारीरिक लक्षणों वाले व्यक्तियों के व्यक्तित्व की भी भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ निर्धारित की गई हैं। आकर्षक शारीरिक लक्षणों वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व प्रथम दृष्टि से ही आकर्षक प्रतीत होती है, परंतु यदि मानसिक गुण अनुकूल न हों तो शारीरिक पक्ष आकर्षक होते हुए भी। क्रमशः व्यक्ति का व्यक्तित्व अपनी गरिमा खो बैठता है तथा प्रथम दृष्टि में पड़ने वाला उसका प्रभाव घटने लगता है।

3. सामाजिकता—यह सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण एवं विकास सामाजिक पर्यावरण में ही होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर कहा जा सकता है कि व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले तत्त्वों में सामाजिकता का भी विशेष स्थान है। व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास उसकी सामाजिक अभिवृत्ति के ही अनुकूल होता है। सामाजिकता को अधिक महत्त्व देने वाले व्यक्तियों का व्यक्तित्व भिन्न प्रकार का होता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति सामाजिक कार्यकलापों में कम भाग लेते हैं, उनको व्यक्तित्व कुछ भिन्न रूप में विकसित होता है। अनेक व्यक्ति सामाजिक दृष्टिकोण से कुछ आक्रामक वृत्ति के होते हैं। ऐसे व्यक्तियों का व्यक्तित्व समाज में निंदनीय माना जाता है। स्पष्ट है कि सामाजिकता की मात्रा तथा स्वरूप भी व्यक्तित्व के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

4. दृढ़ता–व्यक्तित्व के निर्माण में उपर्युक्त तीन तत्त्वों के अतिरिक्त दृढ़ता (Persistence) को भी विशेष योगदान है। दृढ़ता से आशय है व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व संबंधी गुणों के प्रति स्थिर रहना। व्यक्तित्व संबंधी गुणों में दृढ़ता रहने पर ही व्यक्तित्व में स्थायित्व आता है तथा उसका प्रभाव पड़ता है। व्यक्तित्व की दृढ़ता से ही जीवन में अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है। तथा सफलता प्राप्त होती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि व्यक्तित्व के चारों आवश्यक तत्त्वों में सर्वाधिक महत्त्व दृढ़ता का ही है।

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 4 Culture and Socialisation (संस्कृति तथा समाजीकरण) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 4 Culture and Socialisation (संस्कृति तथा समाजीकरण), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement (गमन एवं संचलन)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Biology . Here we  given UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement (गमन एवं संचलन)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कंकाल पेशी के एक सार्कोमियर का चित्र बनाइए और विभिन्न भागों को चिह्नित कीजिए।
उत्तर :
कंकाल पेशी के सार्कीमियर की संरचना
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement image 1

प्रश्न 2.
पेशी संकुचन के सप तन्तु सिद्धान्त को परिभाषित कीजिए।
उत्तर :
हक्सले (Huxley,1954)
ने रेखित पेशी तन्तुओं का इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी द्वारा अध्ययन करके इनमें उपस्थित एक्टिन तथा मायोसिन छड़ों (actin and myosin filaments) का विशिष्ट विन्यास देखा। इस विन्यास को देखते हुए इन्होंने पेशी तन्तु संकुचन का सप तन्तु या छड़ विसर्पण सिद्धान्त (UPBoardSolutions.com) (sliding filament theory) दिया।

UP Board Solutions

रेखित पेशियों के संकुचन की कार्य-विधि

रेखित पेशियों में संकुचन तन्त्रिका उद्दीपन के फलस्वरूप होता है। एक्टिन छड़े मायोसिन छड़ों के ऊपर फिसलकर इनके भीतर (सामियर के केन्द्र की ओर) प्रवेश कर जाती हैं, जिससे पेशी तन्तु में संकुचन हो जाता है।

पेशी संकुचन का सप तन्तु या छड़ विसर्पण सिद्धान्त

सामान्य अवस्था में सार्कोमियर (sarcomere) में ATP तथा मैग्नीशियम आयन होते हैं; कैल्सियम आयन भी सूक्ष्म मात्रा में होते हैं। एक्टिन छड़े ट्रोपोमायोसिन (tropomyosin) के साथ इस प्रकार जुड़ी रहती हैं कि ये मायोसिन छड़ों के साथ नहीं जुड़ सकतीं। जब पेशी तन्तु को तन्त्रिका आवेग द्वारा श्रेशहोल्ड उद्दीपन (threshold stimulus) प्राप्त होता है, तब पेशी तन्तु के अन्तर्द्रव्यीय जाल (ER) से Ca++ (कैल्सियम आयन) सार्कोमियर में मुक्त हो जाते हैं। ये कैल्सियम आयन ट्रोपोमायोसिन के साथ संयुक्त (bind) हो जाते हैं और एक्टिन छड़े (actin filaments) स्वतन्त्र हो जाती हैं। इसी समय ATP के जल विघटन (hydrolysis) के फलस्वरूप (UPBoardSolutions.com) ऊर्जा मुक्त होती है। इस ऊर्जा की उपस्थिति में एक्टिने तथा मायोसिन सक्रिय हो जाते हैं और नए सेतु बन्धों (across bridges) की रचना होती है। इसके फलस्वरूप एक्टिन छड़े मायोसिन छड़ों के ऊपर फिसलकर साकमियर के केन्द्र की ओर चली जाती हैं। एक्टिन तथा मायोसिन मिलकर एक्टोमायोसिन (actomyosin) की रचना करते हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement image 2

इस प्रक्रिया में पेशी तन्तु की लम्बाई कम हो जाती है अर्थात् संकुचन हो जाता है। जब उद्दीपन समाप्त हो जाता है, तब सक्रिय पम्पिंग द्वारा कैल्सियम आयनों को अन्तर्रव्यीय जाल में पम्प कर दिया जाता है। ट्रोपोमायोसिन स्वतन्त्र हो जाता है, इससे एक्टिन व मायोसिन के बीच के सेतु बन्ध टूट जाते हैं। एक्टिन फिर ट्रोपोमायोसिन के साथ संयुक्त (bind) हो जाता है। पेशी तन्तु वापस अपनी पुरानी लम्बाई में लौट आता है। मृत्यु के पश्चात् ATP के न बनने के कारण Ca++ वापस सार्कोप्लाज्मिक जाल में नहीं जा सकते; अतः पेशियाँ सिकुड़ी रह जाती हैं और शरीर अकड़ा रह जाता

UP Board Solutions

ऊर्जा आपूर्ति (Energy supply) :
पेशी संकुचन के लिए ऊर्जा की आपूर्ति ATP द्वारा होती है। पेशियों में ATP का निर्माण ग्लाइकोजन के अपचय (catabolism) के फलस्वरूप होता है।

पेशी संकुचन के समय ATP के जल विघटन (hydrolysis) से ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement image 3
पेशियों में एक और उच्च ऊर्जा यौगिक उपस्थित होता है, जिसे क्रिएटिन फॉस्फेट (creatine phosphate-PCr) कहते हैं। इसका प्रयोग भी ATP निर्माण में होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement image 4
विश्रामावस्था में ATP द्वारा फिर से क्रिएटिन फॉस्फेट का निर्माण हो जाता है।
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement image 5
इस प्रकार पेशी में क्रिएटिन फॉस्फेट का भण्डार बना रहता है, जो आवश्यकता पड़ने पर ATP प्रदान कर सकता है।

प्रश्न 3.
पेशी संकुचन के प्रमुख चरणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
[संकेत-कृपया उपर्युक्त प्रश्न 2 का उत्तर देखें]

प्रश्न 4.
‘सही’ या ‘गलत लिखें
(क) एक्टिन पतले तन्तु में स्थित होता है।
(ख) रेखित पेशी रेशे का H-क्षेत्र मोटे और पतले, दोनों तन्तुओं को प्रदर्शित करता है।
(ग) मानव कंकाल में 206 अस्थियाँ होती हैं।
(घ) मनुष्य में 11 जोड़ी पसलियाँ होती हैं।
(ङ) उरोस्थि शरीर के अधर भाग में स्थित होती है।
उत्तर :
(क) सही
(ख) गलत
(ग) सही
(घ) गलत
(ङ) सही।

UP Board Solutions

प्रश्न 5.
इनके बीच अन्तर बताइए
(क) एक्टिन और मायोसिन
(ख) लाल और श्वेत पेशियाँ
(ग) अंस और श्रोणि मेखला।
उत्तर :
(क)
एक्टिन और मायोसिन में अन्तर

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement image 6

(ख)
लाल तथा श्वेत पेशियों में अन्तर

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement image 7UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement image 8

(ग)
अंस तथा श्रोशिमेखला में अन्तर

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement image 9

UP Board Solutions

प्रश्न 6.
स्तम्भ I का स्तम्भ II से मिलान करें
स्तम्भ-I                      स्तम्भ-II
(i) चिकनी पेशी         (क) मायोग्लोबिन
(ii) ट्रोपोमायोसिन     (ख) पतले तन्तु
(iii) लाल पेशी          (ग) सीवन (suture)
(iv) कपाल               (घ) अनैच्छिक
उत्तर :
(i) (घ)
(ii) (ख)
(iii) (क)
(iv) (ग)

प्रश्न 7.
मानव शरीर की कोशिकाओं द्वारा प्रदर्शित विभिन्न गतियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर :
मानव शरीर की कोशिकाओं में मुख्यत: निम्नलिखित तीन प्रकार की गतियाँ होती हैं

1. अमीबीय या कूटपादी गति (Amoeboid or Pseudopodial Movement) :
मानव शरीर में पाई जाने वाली श्वेत रुधिराणु (leucocytes) एवं महाभक्षकाणु (macrophages) कोशिकाएँ कूटपाद द्वारा अमीबा की भाँति गति करती हैं।

2. पक्ष्माभी गति (Ciliary movement) :
स्तनियों (मानव) में शुक्रवाहिनियों, अण्डवाहिनियों, श्वास नाल में पक्ष्माभ (cilia) पाए (UPBoardSolutions.com) जाते हैं। इनकी गति से शुक्रवाहिनियों में शुक्राणु और अण्डवाहिनियों में अण्डाणु का परिवहन होता है। श्वासनाल के पक्ष्माभ श्लेष्मा को बाहर की ओर धकेलते हैं।

UP Board Solutions

3. पेशीय गति (Muscular Movement) :
हमारे उपांगों (अग्रपाद, पश्चपाद), जबड़ों, जिह्वा, नेत्रपेशियों, आहारनाल, हृदय आदि में पेशीय गति होती है। पेशीय गति में कंकाल, पेशियाँ तथा तन्त्रिकाएँ सम्मलित होती हैं।

  1. नेत्र गोलक-नेत्र कोटर में अरेखित पेशियों द्वारा गति करता है। आइरिस तथा सिलियरी काय (iris and ciliary body) पेशियाँ नेत्र में जाने वाले प्रकाश की मात्रा का नियमन करती हैं।
  2. हृदय की हृदपेशियाँ तथा रक्त वाहिनियों की अरेखित पेशियाँ रक्त परिसंचरण में सहायक होती हैं।
  3. डायफ्राम तथा पसलियों के मध्य स्थित अरेखित पेशियों के संकुचन एवं शिथिलन के फलस्वरूप श्वास क्रिया (breathing) सम्पन्न होती है।
  4. आहारनाल की पेशियों में क्रमाकुचन गतियों के कारण भोजन आगे खिसकता है। भोजन की लुगदी (chyme) बनती है।
  5. कंकालीय पेशियाँ (skeletal muscles) कंकाल से जुड़ी होती हैं। प्रचलन एवं अंगों की गति से ये सीधे सम्बन्धित होती हैं। कंकाल या रेखित पेशियों के संकुचन एवं शिथिलन के कारण प्रचलन/गति होती है।

प्रश्न 8.
आप किस प्रकार से एक कंकाल पेशी और हृद पेशी में विभेद करेंगे?
उत्तर :
कंकाल (रेखिल):मेशी.और हृद पेशी में अन्तर
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement image 10

प्रश्न 9.
निम्नलिखित जोड़ों के प्रकार बताइए

(क) एटलस/अक्ष (एक्सिस)
(ख) अंगूठे के कार्पल/मेटाकार्पल
(ग) फैलेंजेज के बीच
(घ) फीमर/एसीटेबुलम
(ङ) कपालीय अस्थियों के बीच
(च) श्रोणि मेखला की प्यूबिक अस्थियों के बीच
उत्तर :
(क) उपास्थिमय संधि
(ख) सेडल संधि
(ग) कब्जा संधि
(घ) कंदुक खल्लिका संधि
(ङ) सीवन
(च) उपास्थिमय संधि।

UP Board Solutions

प्रश्न 10.
रिक्त स्थानों में उचित शब्दों को भरिए
(क) सभी स्तनधारियों में (कुछ को छोड़कर)………..ग्रीवा कशेरुक होते हैं।
(ख) प्रत्येक मानव पाद में फैलेंजेज की संख्या………है।
(ग) मायोफाइब्रिले के पतले तन्तुओं में 2 ‘F’ एक्टिन और दो अन्य दूसरे प्रोटीन, जैसे……..और…….होते हैं।
(घ) पेशी रेशे में कैल्सियम……….में भण्डारित रहता है।
(च) ……..मनुष्य का कपाल……..अस्थियों से बना होता है।
उत्तर :
(क) सात।
(ख) 14 फैलेंजेज।
(ग) ट्रोपोनिन (troponin), ट्रोपोमायोसिन (tropomyosin)
(घ) सार्कोप्लाज्मिक जालक (sarcoplasmic reticulum)
(च) 11वीं, 12वीं।
(छ) 8

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एक पेशी एक भाग को दूसरे पर झुकाती है, वह है
(क) फ्लेक्सर
(ख) एक्सटेन्सर
(ग) एबडेक्टर
(घ) एडेक्टर
उत्तर :
(क) फ्लेक्सर

प्रश्न 2.
मानव शरीर में प्लावी पसलियों की संख्या है
(क) 6 जोड़ी
(ख) 5 जोड़ी
(ग) 3 जोड़ी
(घ) 2 जोड़ी
उत्तर :
(घ) 2 जोड़ी

UP Board Solutions

प्रश्न 3.
अंसमेखला का भाग कौन-सा है?
(क) ग्लीनॉएड गुहा
(ख) उरोस्थि
(ग) इलियम
(घ) श्रोणि उलूखने
उत्तर :
(क) ग्लीनॉएड गुहा

प्रश्न 4.
मानव करोटि की हड्डियों के बीच संधि है
(क) कब्जा संधि
(ख) साइनोवियल संधि
(ग) उपास्थिमय संधि
(घ) तन्तुमय संधि
उत्तर :
(घ) तन्तुमय संधि

UP Board Solutions

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पेशियों में पाये जाने वाले दो प्रकार की प्रोटीन्स के नाम लिखिए।
उत्तर :
ऐक्टिन, तथा मायोसीन प्रोटीन।

प्रश्न 2.
मनुष्य के अन्तःकंकाल तन्त्र को कितने भागों में बाँटा गया है? उनके नाम लिखिए।
उत्तर :
मनुष्य के अन्तः कंकाल को दो भागों में बाँटते हैं

(क)
अक्षीय कंकाल :
इसके अन्तर्गत खोपड़ी, कशेरुक दण्ड, पसलियाँ एवं स्टर्नम आते हैं।

(ख)
उपांगीय कंकाल :
इसके अन्तर्गत मेखलाएँ तथा हाथ-पैर की अस्थियाँ आती हैं।

प्रश्न 3.
शशक के निचले जबड़े की मुख्य अस्थि का नाम लिखिए।
उत्तर :
मैन्डिबल (mandible)

प्रश्न 4.
सैडल संधि (saddle joint) कहाँ पायी जाती हैं?
उत्तर :
अंगूठे के कार्पल और मेटा कार्पल के बीच।

UP Board Solutions

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गति के पक्ष्माभी (सिलिअरी) तथा कशाभि (फ्लैजेलर) प्रकारों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर :
मानव के शरीर की अनेक कोशिकाएँ: जैसे-श्वासनली के भीतरी स्तर की दीवार की (UPBoardSolutions.com) कोशिका, मादा अंग अंडवाहिनी (oviduct) की भीतरी दीवार की कोशिका में महीन रोम, पक्ष्माभ (cilia) पाए जाते हैं, जो पैरामीशियम की पक्ष्माभी गति को प्रदर्शित करते हैं। इसके विपरीत नर में निर्मित शुक्राणु (sperm) अपनी पूंछ (tail) द्वारा कशाभि गति (flagellar movement) प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 2.
मनुष्य की ग्रीवा की प्रथम कशेरुका को स्वच्छ एवं नामांकित चित्र बनाइए (वर्णन की आवश्यकता नहीं)।
उत्तर :
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement image 12

प्रश्न 3.
अंसमेखला तथा उसके कार्यों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर :

अंसमेखला

मनुष्य में अंसमेखला पूरी तरह अलग-अलग दो अर्द्ध-भागों से मिलकर बनी होती है, जिसका प्रत्येक अर्द्ध-भाग मुख्यतः एक तिकोनी और चपटी अस्थि से बना होता है। इसे अंसफलक या स्कैपुला (scapula) कहते हैं और यह पीठ व गर्दन के दोनों ओर तथा पसलियों के पीछे स्थित (UPBoardSolutions.com) होता है। अस्थि का चौड़ा भाग ऊपर की ओर तथा नुकीला भाग नीचे की ओर रहता है। स्कैपुला के पश्च भाग में एक उभार होता है, जो एक उठी हुई छोटी-सी भित्ति के समान दिखाई देता है तथा कण्टक (spine) कहलाता है। इसी के कारण अंसमेखला दो भागों में विभाजित दिखाई देती है। कण्टक का बाहर निकला हुआ ऊपरी भाग चपटा हो जाता है। इसे ऐक्रोमियन प्रवर्ध (acromian process) कहते हैं।

UP Board Solutions

इसी प्रवर्ध से हॅसली की अस्थि या क्लैविकल (collar bone or clavicle) जुड़ी रहती है, जिससे हमारे उठे हुए कन्धे (shoulders) बनते हैं। इस प्रवर्ध के पास स्कैपुला में एक गड्ढा अंस उलूखल (glenoid cavity) होता है। अंस उलूखेल में अग्रबाहु की प्रगण्डिका (humerus) का गोल सिर स्थित रहता है और कन्दुक-खल्लिका सन्धि बनाता है। इस सन्धि के कारण ही हमारी भुजाएँ चारों ओर सुविधापूर्वक घूम सकती हैं। अंसमेखला पसलियों के साथ केवल मांसपेशियों से ही जुड़ी रहती है। (UPBoardSolutions.com) हॅसली की अस्थि अंसमेखला की दूसरी अस्थि है, जो ‘F’ अक्षर की भाँति दिखाई देती है। यह एक ओर अंसकूट प्रवर्ध (acromian process) और दूसरी ओर उरोस्थि से जुड़ी रहती है। यह अस्थि बाहु के भार को सम्भाले रखती है।

अंसमेखला के कार्य

अंसमेखला के द्वारा ही कन्धे का निर्माण होता है। इसकी हँसली की अस्थि बाहु को सम्भालने में सहायता करती है तथा अंस उलूखल में अग्रबाहु (प्रगण्डिका) का सिर कन्दुक-खल्लिका सन्धि बनाता है। इस सन्धि के होने से ही बाहु चारों ओर आसानी से घुमायी जा सकती है।

प्रश्न 4.
मानव की श्रोणि मेखला का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर :
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement image 13

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पेशी ऊतंक कितने प्रकार के होते हैं? अरेखित पेशी ऊतक की संरचना चित्र सहित समझाइए।
उत्तर :

पेशी ऊतक तथा उनके प्रकार

पेशी ऊतक की उत्पत्ति भ्रूण (embryo) के मध्य जनन स्तर या मीसोडर्म (mesodem) से होती है। पेशी ऊतक शरीर को 40-50% भाग बनाता है। पेशी ऊतक का निर्माण लम्बी, सँकरी, तरूपी, सकुंचनशील कोशिकाओं या तन्तुओं से होता है। पेशी ऊतक तीन प्रकार के होते हैं

  1. अरेखित (Unstriped or Smooth)
  2. रेखित (Striped or Striated) तथा
  3.  C (Cardiac)

अरेखित पेशी ऊतक

अरेखित पेशियों के आकुंचन पर जन्तु की इच्छा का कोई नियन्त्रण नहीं होता। ये शरीर की कार्यिकी (physiology) तथा आन्तरिक वातावरण के प्रभाव से स्वतः ही क्रियाशील होती हैं; अतः इन्हें अनैच्छिक पेशियाँ (involuntary muscles) भी कहते हैं। इन पेशियों को (UPBoardSolutions.com) सम्बन्ध आंतरांगों से होने के कारण इन्हें आंतरांगी (visceral) पेशियाँ भी कहते हैं सामान्यतः खोखले आंतरांगों की भित्तियों; जैसे-आहारनाल (alimentary canal), श्वास नली, गर्भाशय, रुधिर वाहिनियों, चित्र-अरेखित पेशी या अनैच्छिक पेशी तन्तु। पित्ताशय, पित्त नली, शिश्न आदि, में उपस्थित होती हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement image 14

UP Board Solutions

संरचना 
इनकी संरचना सरल होती है। इनके तन्तु (fibres) 100-200µ तथा 10µ व्यास के पतले (सँकरे) तथा तरूप होते हैं। इन कोशिकाओं के बीच-बीच में कोशिकाविहीन, तन्तुमय संयोजी ऊतक (connective tissue) होता है। पेशी तन्तु या पेशी कोशिका सार्कोलेमा (sarcolemma) नामक कोशिका कला से घिरी होती है। कोशिका के पेशीद्रव्य (sarcoplasm) में एक्टोमायोसिन (actomyocin) प्रोटीन के बने समानान्तर पेशी तन्तुक (myofibrils) तथा एक बड़ा केन्द्रक (nucleus) होता है। पेशी की सकुंचनशीलता इन्हीं तन्तुओं के कारण होती है।

UP Board Solutions

अरेखित पेशियाँ अपने समूहीकरण के आधार पर एकल इकाई (single unit) अथवा बहु-इकाई (multi-unit) के रूप में होती हैं। बहु-इकाई अरेखित पेशियों में तन्तु स्वतन्त्र रूप में कार्य करते हैं, जबकि एकल इकाई में ये आपस में बँधे रहते हैं तथा मिलकर कार्य करते हैं। नेत्रों में सिलियरी पेशियाँ, (UPBoardSolutions.com) उपतारा की पेशियाँ आदि बहु-इकाई पेशियाँ हैं। आंतरांगों में अरेखित पेशियाँ एकल प्रकार की होती हैं। छिद्र के चारों ओर ये पेशियाँ संवरणी (sphincter) बनाती हैं।

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement (गमन एवं संचलन) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 Locomotion and Movement (गमन एवं संचलन) , drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions (सामाजिक संस्थाओं को समझना)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions (सामाजिक संस्थाओं को समझना).

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ज्ञात करें कि आपके समाज में विवाह के कौन-से नियमों का पालन किया जाता है?
उत्तर
विवाह एक सार्वभौमिक संस्था है। यह यौन संतुष्टि एवं प्रजनन का समाज द्वारा मान्य तरीका है। विवाह द्वारा ही परिवार का निर्माण होता है। भारतीय समाज में विवाह में अनेक नियमों का पालन किया जाता है। इन नियमों का संबंध विवाह करने वाले साथियों की संख्या और कौन किससे विवाह कर सकता है, को नियंत्रित करने से है। वैधानिक रूप से भारत में एकविवाह के नियम का प्रचलन है। इस प्रकार के विवाह में एक व्यक्ति को एक समय में एक ही जीवनसाथी तक सीमित रहना पड़ता है। अर्थात् पुरुष केवल एक पत्नी और स्त्री केवल एक पति रख सकती है। जहाँ बहुविवाह की अनुमति है। (जैसे मुसलमानों में) वहाँ भी एकविवाह ही ज्यादा प्रचलित है। पुनः विवाह की अनुमति पहले साथी की मृत्यु या तलाक के बाद दी जाती है। पहले भारत में उच्च जातियों की हिंदू महिलाओं/विधवाओं के लिए पुनर्विवाह की स्वीकृति नहीं थी। इसका प्रचलन 19वीं शताब्दी के सुधार आंदोलनों के बाद ही हुआ।

परंपरागत रूप से भारत में जीवनसाथी के चयन का निर्णय अभिभावकों/संबंधियों द्वारा किया जाता रहा है। अब जीवनसाथी के चयन करने में व्यक्तियों को अपेक्षाकृत कुछ स्वतंत्रता प्रदान की जाने लगी है। अंतर्विवाह का नियम व्यक्ति को अपनी सांस्कृतिक समूह (जैसे जाति) में ही विवाह की अनुमति देता है, जबकि बहिर्विवाह का नियम अपने समूह से बाहर (जैसे गोत्र से बाहर) विवाह करने पर बल देता है। उत्तरी भारत में गाँव-बहिर्विवाह का नियम भी प्रचलित है अर्थात् एक ही गाँव के लड़के एवं लड़की में विवाह नहीं हो सकता। पितृवंशीय व्यवस्था के नियम यह भी सुनिश्चित करते हैं कि विवाहित लड़कियाँ अपने अभिभावकों के पास बार-बार न जाएँ। विवाह के नियमों में भिन्नता का पता आप अपनी कक्षा में अन्य विद्यार्थियों द्वारा किए गए प्रेक्षणों से अपने प्रेक्षणों की तुलना करके भी लगा सकते हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions

प्रश्न 2.
ज्ञात करें कि व्यापक सन्दर्भ में आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन होने से परिवार में सदस्यता, आवासीय प्रतिमान और यहाँ तक कि पारस्परिक संपर्क का तरीका कैसे परिवर्तित होता है?
उत्तर
भारत में परिवार के स्वरूपों में होने वाले परिवर्तन के संदर्भ में अधिकतर यह मान लिया जाता है कि संयुक्त परिवारों के विघटन के परिणामस्वरूप एकाकी परिवारों में वृद्धि हो रही है। एकांकी परिवार भारतीय समाज के लिए नए नहीं हैं। भारत में अभावग्रस्त जातियों एवं वर्गों में इस प्रकार के परिवारों का अतीत में भी प्रचलन रहा है। परिवार में होने वाले परिवर्तन व्यापक संदर्भ में आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों से जुड़े हुए होते हैं। इसे प्रवसने के उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। जो व्यक्ति प्रवास कर अन्य स्थानों पर चले जाते हैं उनका परिवार, ग्रह, उसकी संरचना और मानक उसके परंपरागत समाज से भिन्न हो सकते हैं। औद्योगीकरण एवं नगरीकरण जैसी प्रक्रियाओं ने परिवार एवं नातेदारी के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं। आज नातेदारी से संबंधित विभिन्न परिवारों में पारस्परिक सम्पर्क कम होता जा रहा है। यह केवल सुख-दु:ख के समय तक ही सिमटने लगा है। परिवार के सदस्यों के संबंधों में भी औपचारिकता का अंश आने लगा है। 1990 के दशक में जर्मनी का एकीकरण यद्यपि एक राजनीतिक घटना है, तथापि इसका प्रभाव परिवार पर स्पष्ट देखा जा सकता है। नए जर्मन राज्य ने एकीकरण से पूर्व परिवारों को प्राप्त संरक्षण और कल्याण की सभी योजनाएँ रद्द कर दी थीं। आर्थिक असुरक्षा की बढ़ती भावना के कारण लोग विवाह से इन्कार करने लगे।

प्रश्न 3.
कार्य पर एक निबंध लिखिए। कार्यों की विद्यमान श्रेणी तथा ये किस तरह बदलती हैं, दोनों पर ध्यान केंद्रित करें।
उत्तर
कार्य का संबंध भूमिका निष्पादन से हैं। प्रत्येक परिवार एवं गृह में कार्यों का स्पष्ट विभाजन विद्यमान होता है। कार्य स्पष्ट रूप से सवेतन रोजगार का द्योतक है। कार्य की यह आधुनिक संकल्पना अत्यधिक सरलीकृत है क्योंकि बहुत-से कार्य सवेतन नहीं होते। उदाहरणार्थ-अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में किए जाने वाले अधिकांश कार्य प्रत्यक्षतः किसी औपचारिक रोजगार आँकड़ों में नहीं गिने जाते। नकद भुगतान के अतिरिक्त कार्य या सेवा के बदले वस्तुओं या सेवाओं का प्रत्यक्ष आदान-प्रदान भी किया जाता है। भारत में जजमानी व्यवस्था का प्रचलन इसी का द्योतक है। पूर्व आधुनिक समाजों में अधिकतर लोग खेती में कार्य करते या पशुओं की देखभाल करते थे। औद्योगिक समाजों में छोटा भाग कृषि कार्यों में संलग्न होता है तथा स्वयं कृषि का औद्योगीकरण हो जाता है। इसका अर्थ यह है कि कृषि में भी मानव द्वारा किए जाने वाले कार्य को मशीनों द्वारा किया जाने लगता है। सेवा क्षेत्र का विस्तार कार्यों में विविधता लाता है। इसीलिए अत्यधिक जटिल श्रम-विभाजन को आधुनिक समाजों का लक्षण माना जाता है। आधुनिक समाज में कार्य की स्थिति में परिवर्तन देखा जा सकता है। पहले कभी पूरा परिवार कार्य की इकाई माना जाता था, जबकि अब घर और कार्य एक-दूसरे से अलग हो गए हैं। उद्योगों में कार्य करने के लिए विशेष प्रशिक्षण की भी आवश्यकता होती है। पिछले कुछ दशकों से भूमंडलीकरण के कारण ‘उदार उत्पादन’ और ‘कार्य के विकेंद्रीकरण’ की तरफ झुकाव देखा जा सकता है।

कई बार कार्यों की विद्यमान श्रेणी में भी परिवर्तन स्पष्ट देखे जा सकते हैं। उदाहरणार्थ-जब पुरुष शहरी क्षेत्रों में चले जाते हैं तो महिलाओं को हल चलाना पड़ता है और खेतों के कार्य का प्रबंध करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में वे अपने परिवार की एकमात्र भरण-पोषण करने वाली बन जाती हैं। दक्षिण-पूर्व महाराष्ट्र तथा उत्तरी आंध्र प्रदेश में कोलम जनजाति समुदाय में इस प्रकार के परिवर्तनों से ही महिला-प्रधान घरों की संकल्पना का विकास हुआ है।

प्रश्न 4.
अपने समाज में विद्यमान विभिन्न प्रकार के अधिकारों पर चर्चा करें। वे आपके जीवन को किस तरह प्रभावित करते हैं?
उत्तर
प्रारंभ में प्रभुसत्तात्मक राज्यों में नागरिकता के साथ राजनीतिक भागदारी के अधिकारों का पालन नहीं किया जाता था। इन अधिकारों को अधिकतर संघर्ष द्वारा प्राप्त किया जाता था। राजतंत्र की शक्तियों को सीमित करना अथवा उन्हें सक्रिय रूप से पदच्युत करना इसी संघर्ष का परिणाम है। फ्रांस की क्रांति तथा भारत का स्वतंत्रता संग्राम इस प्रकार के आंदोलनों के उदाहरण हैं। नागरिकता के अधिकारों में नागरिक, राजनीतिक और सामाजिक अधिकार सम्मिलित होते हैं। भारत में सभी व्यक्तियों को बिना किसी भेदभाव के नागरिक, राजनीतिक और सामाजिक अधिकार प्राप्त है। नागरिक अधिकारों में व्यक्तियों को अपनी इच्छानुसार रहने की जगह चुनने की, भाषण और धर्म की स्वतंत्रता, संपत्ति रखने का अधिकार तथा कानून के समक्ष समान न्याय का अधिकार सम्मिलित है। राजनीतिक अधिकारों में प्रत्येक वयस्क व्यक्ति चुनाव में भाग ले सकता है तथा सार्वजनिक पद के लिए खड़ा हो सकता है। सामाजिक अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न्यूनतम स्तर तक आर्थिक कल्याण और सुरक्षा प्रदान करते हैं। अनुसूचित जातियों को दिए गए विशेष अधिकार इसी श्रेणी के उदाहरण हैं। स्वास्थ्य लाभ, बेरोजगारी भत्ता और न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करना भी व्यक्तियों को सामाजिक अधिकार देना ही है।

अधिकार व्यक्तियों के जीवन को प्रभावित करते हैं। समाज के बहुत-से वर्ग अन्य वर्गों को उनके अधिकारों से वंचित करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार वे उन लोगों को आगे बढ़ने से रोकते हैं। समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता भी इसी का ही परिणाम है। बहुत-से विकासशील देशों में सामाजिक अधिकारों को आर्थिक विकास से रुकावट मानकर इन पर आक्रमण किए जाने लगे हैं तथा इन्हें प्रतिबंधित करने का भी प्रयास किया जाने लगा है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions

प्रश्न 5.
समाजशास्त्र धर्म का अध्ययन कैसे करता है?
उत्तर
धर्म का संबंध अलौकिक शक्तियों पर विश्वास से है। यद्यपि धर्म सभी ज्ञात समाजों में विद्यमान है, तथापि धार्मिक विश्वास और व्यवहार एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में बदलते रहते हैं। धर्म के साथ अनेक अनुष्ठान जुड़े हुए होते हैं। प्रार्थना करना, गुणगान करने, भजन गाना, विशेष प्रकार का भोजन करना या न करना, उपवास रखना आदि आनुष्ठानिक कार्य ही है। समाजशास्त्र में धर्म का अध्ययन धार्मिक या ईश्वरमीमांसीय अध्ययन से भिन्न है। समाजशास्त्र की मुख्य रुचि यह ज्ञात करने में है कि धर्म समाज में कैसे कार्य करता है तथा अन्य संस्थाओं से इसका क्या संबंध है। विभिन्न समाजों के तुलनात्मक अध्ययनों द्वारा धर्म की भूमिका की समीक्षा करने का प्रयास किया जाता है। धर्म, धार्मिक विश्वास, व्यवहार एवं संस्थाएँ संस्कृति के अन्य पक्षों को जिस रूप में प्रभावित करती हैं इसे ज्ञात करने में भी समाजशास्त्रियों की विशेष रुचि होती है। धर्म एक पवित्र क्षेत्र है। संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि समाजशास्त्र की रुचि धर्म का अलग क्षेत्र के रूप में अध्ययन करने में नहीं है, अपितु इसे समाज की अन्य संस्थाओं के साथ संबंधों के संदर्भ में ही देखा जाता है।

प्रश्न 6.
सामाजिक संस्था के रूप में विद्यालय पर एक निबंध लिखिए। अपनी पढ़ाई और वैयक्तिक प्रेक्षणों, दोनों का इसमें प्रयोग कीजिए।
उत्तर
शिक्षा सामाजिक नियंत्रण का औपचारिक साधन है। औपचारिक शिक्षा विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में दी जाती है। सीख के रूप में परिवार में दी जाने वाली शिक्षा को अनौपचारिक शिक्षा कहते हैं। शिक्षा जीवन-पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है। विद्यालयों में प्रवेश लेना महत्त्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसी से प्रारंभ होने वाली औपचारिक शिक्षा रोजगार प्राप्त करने की ओर एक महत्त्वपूर्ण कदम है। शिक्षा द्वारा कुछ आवश्यक सामाजिक दक्षताएँ भी प्राप्त होती हैं। शिक्षा का पाठ्यक्रम शिक्षार्थियों को जीवन के विभिन्न पक्षों की जानकारी तो उपलब्ध कराता ही है, साथ ही यह समूह की विरासत के प्रेषण/संप्रेषण की आवश्यकता की भी पूर्ति करता है। साधारण समाजों में औपचारिक विद्यालयों में जाने की आवश्यकता नहीं होती थी। आधुनिक समाजों मे श्रम के आर्थिक विभाजन के कारण औपचारिक शिक्षा का महत्त्व बढ़ गया है। आज यह माना जाने लगा है कि विद्यालय में दी जाने वाली शिक्षा बच्चे को विशिष्ट व्यवसाय के लिए तैयार करने वाली होनी चाहिए और साथ ही वह उसे समाज के मुख्य मूल्यों को समाहित करने में सक्षम बनाने वाली भी होनी चाहिए।

प्रश्न 7.
चर्चा कीजिए कि सामाजिक संस्थाएँ परस्पर कैसे संपर्क करती हैं।
उत्तर
सामाजिक संस्थाओं में परस्पर संपर्क एवं अंतक्रिया पाई जाती है। कोई भी संस्था शुन्य में कार्य नुहीं करती है। उदाहरणार्थ–धर्म की संस्था समाज में एकीकरण का महत्त्वपूर्ण सामाजिक कार्य करती है तो शिक्षा रोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर समाज की अर्थव्यवस्था को ठोस आधार प्रदान करती है। मैक्स वेबर ने धर्म के अध्ययन में इसके पूँजीवाद नामक आर्थिक संस्था पर पड़ने वाले प्रभाव का विवेचन किया है। उन्होंने यह दर्शाने का प्रयास किया है कि ईसाई धर्म की कैल्विनवादी शाखा ने आर्थिक संगठन के साधन के रूप में पूँजीवाद के उद्भव एवं विकास को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया है। इसी भाँति, धर्म का शक्ति और राजनीति के साथ घनिष्ठ संबंध रहा है। उदाहरणार्थ-इतिहास इस बात का साक्षी है कि समय-समय पर सामाजिक परिवर्तन हेतु धार्मिक आंदोलन हुए हैं। जाति विरोधी आंदोलन या लिंग आधारित भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन इसी श्रेणी के उदाहरण हैं। धर्म किसी व्यक्ति किसी निजी आस्था का मामला ही नहीं होता, अपितु इसका सार्वजनिक स्वरूप भी होता है। धर्म का यही सार्वजनिक स्वरूप समाज की अन्य संस्थाओं के संबंध में महत्त्वपूर्ण होता है।

क्रियाकलाप आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
लोगों द्वारा परिवार, धर्म, राज्य के लिए बलिदान देने के उदाहरणों के बारे में चर्चा कीजिए। (क्रियाकलाप 1)
उत्तर
लोगों में अपने परिवार, धर्म एवं राज्य के लिए निष्ठा कोई नहीं बात नहीं है। वे इनके लिए अपन हितों को अनदेखा करने तथा किसी भी प्रकार का बलिदान देने के लिए तत्पर रहते हैं। सुरक्षा बलों के जवानों का राज्य की रक्षा हेतु दुश्मनों के हाथों मारा जाना उनका राज्य के प्रति बलिदान ही दर्शाता हैं। अनेक धार्मिक संप्रदायों में अनेक धर्म-गुरुओं द्वारा अपने धर्म की रक्षा हेतु अपने अथवा परिजनों के बलिदान के उदाहरण पाए जाते हैं। बहुत-से लोग अपने परिवार के आर्थिक हितों के सामने अपने हितों का बलिदान कर देते हैं। इसके लिए वे परिवार छोड़ दूरदराज के क्षेत्रों में या विदेशों में नौकरी करने में भी संकोच नहीं करते हैं। क्षेत्रवाद की भावना भी अपने क्षेत्र के प्रति निष्ठा का ही परिणाम है। यह भावना विभिन्न क्षेत्रों अथवा राज्य के लोगों को कई बार आपस में लड़ने-मरने पर विवश कर देती है।

प्रश्न 2.
प्रसिद्ध कहावतों में समाज की सामाजिक व्यवस्था की झलक कैसे मिलती है? (क्रियाकलाप 2)
उत्तर
ऐसा माना जाता है कि कहावतों में समाज की सामाजिक व्यवस्था की झलक ही मिलती है। उदाहरणार्थ-लड़कियों को ‘पराया धन’ माना जाता है। इस विश्वास के कारण कि लड़का वृद्धावस्था में अपने माता-पिता की सहायता करेगा और लड़की विवाह के बाद दूसरे घर चली जाएगी, परिवारों में लड़कों पर अधिक धन खर्च किया जाने लगा। परिवार में होने वाला यह लिंग-भेदभाव भारत सहित अनेक समाजों में संस्थागत रूप में विद्यमान रहा है। इससे संबंधित अनेक कहावतें भी विकसित हुई हैं। उदाहरणार्थ-एक तेलुगु कहावत है कि “एक लड़की का पालन करना दूसरे के आँगन में पौधे को पानी देने के बराबर है।” यह कहावत लड़कियों को पराया धन माने जाने को चरितार्थ करती है।

प्रश्न 3.
विभिन्न समाजों द्वारा विवाह के लिए साथियों की तलाश किए जाने वाले विभिन्न तरीकों का पता लगाइए। (क्रियाकलाप 3)
उत्तर
विभिन्न समाजों में विवाह के लिए जीवनसाथी की तलाश के अनेक तरीके अपनाए जाते हैं। पहले कभी हिन्दुओं में विवाह कराने में बिचौलियों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। कुछ लोग लड़के या लड़की वालों को उपयुक्त जीवनसाथी के बारे में बताते थे। अब अनेक जातियाँ अपनी पत्रिकाएँ निकालने लगी हैं जिनमें वैवाहिक विज्ञापन दिए जाते हैं। प्रमुख समाचार-पत्रों में ऐसे वैवाहिक विज्ञापन आने लगे हैं। मुसलमानों में चूंकि नातेदारों में विवाह हो सकता है, इसलिए जीवनसाथी के चयन में नातेदारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। जनजातियों में जीवनसाथी के चयन के अनेक तरीके अपनाए जाते हैं। कठिन जीवन होने के कारण लड़कियाँ लड़कों की परीक्षा ले सकती हैं (परीक्षा विवाह); लड़के-लड़की को विवाह से पूर्व कुछ समय के लिए एक-दूसरे को समझने के लिए साथ रहने की अनुमति दी जा सक़ती थी (परिवीक्षा विवाह); लड़की के पिता को वधु-मूल्य देकर विवाह किया जा सकता (क्रय विवाह); लड़की को जबरदस्ती उठाकर विवाह किया जा सकता है (अपहरण विवाह); लड़की होने वाले पति के माता-पिता की सेवा द्वारा उन्हें विवाह के लिए राजी कर सकती है (सेवा विवाह); एक परिवार के लड़के-लड़की का विवाह दूसरे परिवार की लड़की-लड़के से विनिमय द्वारा हो सकता है (विनिमय विवाह); लड़का और लड़की परस्पर सहमति से विवाह कर सकते हैं। (सहपलायन विवाह) आदि।

प्रश्न 4.
शादी से संबंधित विभिन्न गीतों को इकट्ठा कीजिए। चर्चा कीजिए कि ये किस तरह शादियों में सामाजिक परिवर्तनों और लिंग संबंधों को प्रतिबिंबित करते हैं? (क्रियाकलाप 4)
उत्तर
शादियों से संबंधित अधिकांश लोकगीत लड़की को पराया धन, उसकी विदाई के दु:ख अथवा उसके होने वाले संबंधियों को चित्रित करने वाले होते हैं। इसमें कुछ उदाहरण अग्रलिखित हैं-

1. पिताजी हम चिड़ियों के झुंड की तरह हैं।
हम दूर उड़ जाएँगी : और हमारी उड़ान बहुत लंबी होगी,
हमें नहीं मालूम कि हम कहाँ जाएँगी,
पिताजी, मेरी पालकी आपके घर से नहीं जा सकती,
(क्योंकि द्वार बहुत छोटा है)
बेटी, मैं एक ईंट निकाल दूंगा
(तुम्हारी पालकी के लिए द्वार बड़ा करने के लिए)
तुम्हें अपने घर अवश्य जाना होगा।

2. मैं अपनी बच्ची को पालने में झुलाता हूँ, और
उसके सुंदर बालों में अँगुलियों फिरा रहा हूँ,
एक दिन दूल्हा आएगा और तुम्हें दूर ले जाएगा।
जोर से ढोल-नगाड़े बजते हैं।
और मधुर शहनाई बज रही है।
एक अजनबी का बेटा मुझे लेने आ गया है।
मेरी सहेलियों, अपने खिलौने लेकर आओ।
चलो हम खेलेंगी, क्योंकि अब मैं कभी नहीं खेल पाऊँगी
जब मैं एक अजनबी के घर चली जाऊँगी।।

3. जमुन जल बरसे, हाय धीरे-धीरे
जमुन जल बरसे-2, गागर मोरी टपके हाय धीरे-2
गागर मोरी टपके-2, पैर मोरा फिसले हाय धीरे-2
पैर मोरा फिसले-2, सास मोरी मारे हाथ धीरे-2
सास मोरी मारे-2, ननद पिटवावे हाय धीरे-2
ननद पिटवावे-2, छज्जे पे ठाड़ों देखे हाय धीरे-2
छज्जे पे ठाड़ो देखे-2, तरस नहीं आवे धीरे-2
तरस नहीं आवे-2, मैं पीहर चली जाऊँगी हाय धीरे-2
मैं पीहर चली जाऊँगी-2, भइया पे बुलवाय लऊँ हाय धीरे-2
भइया पे बुलवाय लऊँ-2, बाबुल पे पिटवाऊँ हाय ‘धीरे-2
बाबुल पे पिटवाऊ लऊँ-2, तरस मोहे आवे हाय धीरे-2
तरस मोहे आवे-2, मैं फौरन छुड़वाऊँ हाय धीरे-2
मैं फौरन छुड़वा-2, मैं संग चली जाऊँ हाय धीरे-2
जमुन जल बरसे, हाय धीरे-धीरे।

प्रश्न 5.
क्या आप सोचते हैं कि अंतर्विवाह आज भी प्रचलित मानक है? (क्रियाकलाप 5)
उत्तर
अंतर्विवाह का अर्थ है अपने ही समूह में विवाह करना। भारतीय समाज में अंतर्विवाह के नियम स्पष्ट देखे जा सकते हैं। जाति एक अंतर्विवाही समूह है अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति को अपनी ही जाति में विवाह करना पड़ता है। फोलसम (Folsom) के अनुसार अंतर्विवाह वह नियम है जिसके अनुसार एक व्यक्ति को अपनी जाति या समूह में विवाह करना पड़ता है यद्यपि निकट के रक्त संबंधियों में विवाह की अनुमति नहीं होती है। भारत में सभी जातियाँ तथा उपजातियाँ अंतर्विवाह हैं। अंतर्विवाह संबंधी निषेध हिंदुओं, मुसलमानों तथा जनजातियों में भी पाए जाते हैं। इस सब में यह पहले से ही निश्चित है। कि विवाह किनसे किया जा सकता है अर्थात् विवाह का क्षेत्र सीमित है। प्रजातीय भिन्नता तथा अपनी प्रजाति की शुद्धता बनाए रखना इस निषेध का प्रमुख कारण माना जाता है। यद्यपि अंतर्जातीय विवाहों के परिणामस्वरूप आज भारत में अंतर्विवाह का नियम थोड़ा-बहुत शिथिल होने लगा है, तथापि आज भी अधिकांशतया अंतर्विवाह ही एक प्रचलित मानक है। यदि हम वैवाहिक विज्ञापनों को देखें तो उनमें से अधिकांश में जाति का प्रतिबंध लिखा हुआ नहीं होता। इससे यह पता चलता है कि बहुत-से-लोग अब इस अंतर्विवाह के नियम को नहीं मानते हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions

प्रश्न 6.
विवाह की पसंद को समझने में विज्ञापन आपकी कैसे सहायता करते हैं? (क्रियाकलाप 5)
उत्तर
प्रत्येक माता-पिता में अपने लड़के एवं लड़की अथवा स्वयं वर एवं वधू में जीवनसाथी में पाए। जाने वाले गुणों के बारे में कुछ प्राथमिकताएँ होती हैं। वैवाहिक विज्ञापनों में आज इस कार्य को सरल बना दिया है। अधिकांश वैवाहिक विज्ञापनों में वर एवं वधू के शारीरिक, पारिवारिक, व्यावसायिक, जातीय एवं धार्मिक लक्षणों का वर्णन मिलता है। इनसे परिवार वाले या स्वयं लड़का या लड़की अपनी पसंद के जीवनसाथी का चयन कर उससे पत्र व्यवहार कर सकते हैं। विज्ञापनों द्वारा होने वाले अनेक विवाह काफी सफल रहे हैं क्योंकि इनसे जीवनसाथी के चयन का दायरा बढ़ जाता है।

प्रश्न 7.
ग्राम आधारित व्यवसायों में लगे भारतीयों की संख्या की गणना कीजिए और उन व्यवसायों की एक सूची बनाइए। (क्रियाकलाप 6)
उत्तर
भारत को गाँवों का देश कहा जाता है। 2011 ई० की जनगणना के अनुसार आज भी लगभग 62 प्रतिशत जनसंख्या गाँवों में निवास करती है। ऐसा माना जाता है कि भारत की एक-तिहाई जनसंख्या प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से कृषि से जुड़ी हुई है तथा रोजगार एवं आय के लिए अभी भी कृषि क्षेत्र पर आश्रित है। कृषि क्षेत्र कुल राष्ट्रीय उत्पाद का 22 प्रतिशत है। ग्रामीण परिवारों द्वारा जो कार्य किए जाते हैं वे या तो कृषि से संबंधित होते हैं या कृषि से जुड़े हुए अन्य व्यवसाय होते हैं। कृषि से संबंधित कार्यों में खेती करना तथा पशुओं की देखभाल करना प्रमुख हैं, जबकि कृषि से जुड़े कार्यों में परंपरागत जातिगत कार्य; जैसे लकड़ी का काम करने वाले बढ़ई, लोहे का काम करने वाले लोहार, मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार आदि को सम्मिलित किया जाता है। खेतिहर मजदूर भी कृषि में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। कुक्कुट एवं डेरी उद्योग में भी अनेक ग्रामवासी कार्यरत होते हैं। पारंपरिक समाजों में गैर-कृषि कार्य को हस्तकौशल की दक्षता के साथ जोड़ा जाता था। पहले कभी ग्रामीण उद्योगों में भी काफी ग्रामवासी लगे हुए थे। अब लघु एवं कुटीर उद्योगों के हृास के कारण इनमें लगे लोगों की संख्या कम हुई है। वाइजर नामक समाजशास्त्री ने करीमपुर गाँव में जजमानी व्यवस्था पर किए गए, अध्ययन में वहाँ रहने वाली चौबीस जातियों के कार्यों का उल्लेख किया है। इनमें से अधिकांश जातियाँ अन्य जातियों को अपनी परंपरागत सेवाएँ प्रदान करती है। इनमें उन्होंने पुरोहित अथवा अध्यापक (ब्राह्मण); वंश परम्परा का वर्णन करने वाले (भाट); खजांची (कायस्थ); सोने का काम करने वाले (सुनार); फूल-पत्ती का प्रबंध करने वाले (माली); सब्जियाँ उगाने वाले (काछी); चावल उगाने वाले (लोधा); बढ़ईगिरी का काम करने वाले (बढ़ई); हजामत बनाने वाले (नाई); पानी लाने वाले (कहार); भेड़-बकरियाँ पालने वाले (गड़रिया); भाड़ में अनाज भूनने वाले (भड़पूँजा); कपड़े सिलने वाले (दर्जी); मिट्टी के बर्तन बनाने वाले (कुम्हार); व्यापार करने वाले (साहूकार या महाजन); तेल निकालने वाले (तेली); कपड़े धाने वाले (धोबी); मेट बनाने वाले (धानुक); चमड़े का काम करने वाले (चर्मकार); सफाईकर्मी; पैतृक मुसलमान भिखारी (फकीर); शीशे की चूड़ियाँ बेचने वाले (मनिहार); कपास धुनाई करने वाले (धुनक) तथा नाचने वाली लड़की (तवायफ) को सम्मिलित किया है।

प्रश्न 8.
हाल ही के वर्षों में क्या भारत में सेवा क्षेत्र में परिवर्तन हुआ है? ये क्षेत्र कौन-कौन से हैं? ज्ञात कीजिए। (क्रियाकलाप 7)
उत्तर
भारत में पिछले कुछ दशकों में सेवा के क्षेत्र में अत्यधिक विस्तार हुआ है। 2011-12 ई० में कुल राष्ट्रीय उत्पाद में सेवा क्षेत्र का प्रतिशत 58.3 था। 2000 के दशक के पश्चात् कृषि एवं औद्योगिक क्षेत्र की कीमत पर इस क्षेत्र का अत्यधिक विकास हुआ है। इसका प्रमुख कारण सूचना प्रौद्योगिकी, औद्योगीकरण एवं नगरीकरण की प्रकियाएँ हैं। औद्योगिक प्रौद्योगिकी में विकास ने सेवा के क्षेत्र के विस्तार तथा घर एवं कार्य को अलग करने में योगदान दिया है। अब कारखाने औद्योगिक विकास का केंद्र-बिंदु बन गए हैं। उद्योगों में कार्य करने वाले लोग विशिष्ट कार्यों के लिए प्रशिक्षित होते हैं तथा उन्हें कार्य के बदले वेतन मिलता है। बीमा एवं बैंकिंग क्षेत्र के विस्तार तथा नौकरशाही के विकास ने दफ्तरों में नौकरियों की संख्या में वृद्धि की है। भूमंडलीकरण, उदारीकरण एवं निजीकरण के परिणामस्वरूप निजी क्षेत्र का भी अत्यधिक विकास हुआ है और इसमें सूचना प्रौद्योगिकी, मनोरंजन उद्योग, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा एवं पर्यटन उद्योग का काफी विस्तार हुआ है। अब सेवा क्षेत्र में अधिकाधिक अवसर उपलब्ध होने लगे हैं।

प्रश्न 9.
क्या आपने मुख्य बुनकर को कार्य करते देखा है? उसे एक शाल बनाने में कितना समय लगता है? ज्ञात करें। (क्रियाकलाप 8)
उत्तर
भारत में शाल बनाने का एक लंबा इतिहास रहा है। बुनकर बिना किसी अन्य परिजन की सहायता से दो दिन में एक शाल बना सकता है। यदि बुनकर लंबी अवधि तक कार्य करता है तथा परिवार के अन्य सदस्य भी उसकी सहायता करते हैं तो वह एक दिन में एक शाल बना सकता है। बुनकर हैंडलूम द्वारा एक दिन में एक से अधिक शाल तथा पावरलूम द्वारा एक दिन में अनेक शाल बना सकता है। पावरलूम हेतु उसे बिजली की उपलब्धता पर भी आश्रित होना पड़ता है।

प्रश्न 10.
अपने खाने वाले भोजन, रहने वाले मकान में प्रयुक्त सामग्री और पहनने वाले वस्त्रों की सूची बनाइए। ज्ञात कीजिए कि इन्हें किसने और कैसे बनाया। (क्रियाकलाप 9)
उत्तर
खाने वाले भोजन में गेहूं, चावल, दालों, सब्जियों इत्यादि का उत्पादन कृषकों द्वारा किया जाता है। गाँव में भैंस एवं गाय पालन करने वाले अथवा डेरियाँ दुग्ध को उपलब्ध कराने के प्रमुख साधन हैं। मकान में प्रयुक्त होने वाली सामग्री में ईंट, सीमेंट, बालू, रोड़ी, बदरपुर, लकड़ी, लोहे, पत्थर/टाइल्स, सेनेटरी का सामान, शीशे इत्यादि सामग्री का प्रयोग किया जाता है। इन सबकी उपलब्धता विभिन्न स्रोतों द्वारा होती है। उदाहरणार्थ-ईंटें भट्टों द्वारा उपलब्ध कराई जाती हैं, सीमेंट एवं सेनेटरी का सामान व शीशे इत्यादि फैक्टरियों द्वारा उपलब्ध कराए जाते हैं, जबकि बालू, रोड़ी, बदरपुर आदि इनसे संबंधित ठेकेदारों या दुकानदारों द्वारा उपलब्ध होते हैं। लकड़ी टिंबर व्यवसायियों के यहाँ से खरीदी जाती है। वस्त्रों में प्रयुक्त होने वाला कपड़ा कपास, रेशम, ऊन इत्यादि से हैंडलूम पर या कारखानों में बनता है, फिर बाजार के माध्यम से ग्राहकों तक पहुँचता है तथा ग्राहक अपनी पसंद का कपड़ा खरीदकर दर्जी से अपना पहनावा तैयार कराते हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions

प्रश्न 11.
पता लगाएँ कि विभिन्न देशों में महिलाओं को मतदान का अधिकार कब मिला। (क्रियाकलाप 10)
उत्तर
मताधिकार प्राप्त करने हेतु महिलाओं को सभी देशों में काफी प्रयास करना पड़ा है। महिला संगठनों द्वारा किए जाने वाले आंदोलनों में राजनीतिक समता की माँग के परिणामस्वरूप ऑस्ट्रेलिया में 1918 ई०, अमेरिका में 1920 ई०, कनाडा में 1940 ई०, लैटिन अमेरिकी देशों (मैक्सिको, चिली, अर्जेंटीना, ब्राजील, इक्वेडोर आदि) में 1953 ई०, अफ्रीका में 1994 ई०, एशिया में जापान में 1924, ई० तथा भारत में 1950 ई० में महिलाओं को मताधिकार प्रदान किया गया। यूरोप में फिनलैंड में सबसे पहले 1906 ई० में, ब्रिटेन में 1918 ई० में, जर्मनी 1919 ई० में, स्वीडन में 1921 ई० में, फ्रांस में 1944 ई० में तथा इटली में 1945 ई० में महिलाओं को मताधिकार प्राप्त हुआ। कुवैत, सऊदी अरब, कतार, ओमान, यूनाइटेड अरब अमीरात, गुआना, हाँगकाँग, सूरीनाम तथा ताइवान जैसे देशों में अभी महिलाओं को मताधिकार प्राप्त नहीं है। भूटान में परिवार का केवल एक सदस्य ही मताधिकार का प्रयोग कर सकता है।

प्रश्न 12.
संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की माँग क्यों की जा रही है? ज्ञात कीजिए। (क्रियाकलाप 10)
उत्तर
सामाजिक संरचना में लिंग असमता के परिणामस्वरूप विकसित विसंगतियों को दूर करने हेतु यह आवश्यक है कि महिलाओं हेतु संसद जैसी सर्वोच्च संस्था में भी उचित प्रतिनिधित्व हेतु आवश्यक कदम उठाए जाएँ। भारत में स्थानीय निकाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान पहले से ही किया जा चुका है। लिंग समता एवं महिला सशक्तिकरण हेतु संसद में भी महिलाओं के लिए यदि आधे स्थान सुरक्षित रखना संभव नहीं तो कम-से-कम 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान होना आवश्यक है। सरकार के बार-बार प्रयास करने के बाद भी अभी तक महिलाओं का आरक्षण संबंधी बिल पारित नहीं हो पाया है। सरकार सहमति के आधार पर यथाशीघ्र इसे पारित करने हेतु प्रयासरत है। इस आरक्षण से महिलाओं में न केवल राजनीतिक सहभागिता में वृद्धि होगी, अपितु उनके सशक्तिकरण का मार्ग भी प्रशस्त हो जाएगा।

प्रश्न 13.
क्या आप राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों के बीच कोई संबंध देख पाते हैं? (क्रियाकलाप 11)
उत्तर
राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में घनिष्ठ संबंध पाया जाता है। सामाजिक या कल्याणकारी अधिकारी को लागू करने का दायित्व राज्य पर होता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् पश्चिमी समाजों में कल्याणकारी राज्यों की स्थापना से राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में पाए जाने वाले घनिष्ठ संबंधों का पता चलता है। पूर्व समाजवादी देशों के राज्यों की इस क्षेत्र में काफी अच्छी व्यवस्था थी। आजकल पूरे विश्व में सामाजिक अधिकारों को राज्य को उत्तरदायित्व और आर्थिक विकास में रुकावट मानकर इन पर आक्रमण किया जा रहा है। समकालीन विश्व सार्वभौमिक बाजार के तेजी से विस्तार और गहन राष्ट्रवादी भावनाओं एवं संघर्षों दोनों की वजह से जाना जाता है। भूमंडलीकरण एवं निजीकरण जैसी आर्थिक प्रक्रियाओं का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि इनका लाभ समाज के सभी वर्गों को नहीं प्राप्त हो पाता है। प्रजाति, भाषा एवं धर्म पर आधारित दलों, वर्गों, जातियों एवं समुदायों के बीच शक्ति वितरण का प्रभाव केवल राजनीतिक दलों पर ही नहीं पड़ता अपितु विद्यालयों, बैंकों और धार्मिक संस्थाओं पर भी पड़ता है जिनका प्राथमिक उद्देश्य राजनीतिक नहीं है। इससे आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों के बीच पाए जाने वाले संबंधों का पता चलता है।

प्रश्न 14.
ऐसी घटनाओं की सूचनाएँ एकत्रित करें जो सार्वभौमिक अन्तःसंबंधित विकास को दर्शाती हैं तथा साथ ही प्रजातीय, धार्मिक और राष्ट्रीय मतभेदों को प्रदर्शित करने वाली घटनाओं के बारे में भी सूचनाएँ एकत्रित करें। चर्चा कीजिए कि राजनीति और अर्थशास्त्र उनमें क्या भूमिका निभा सकते हैं? (क्रियाकलाप 12)
उत्तर
सार्वभौमिक अन्त:संबंधित विकास को प्रभावित करने में राजनीति और अर्थशास्त्र की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। पूरे विश्व में होने वाले महिला आंदोलन अथवा पर्यावरण संबंधी आंदोलन ऐसी घटनाएँ हैं जिनका संबंध विकास से है। विकास ने न केवल महिलाओं की समस्याओं के निराकरण में रुचि को बढ़ावा दिया है, अपितु पर्यावरणीय अवक्रमण जैसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों को भी महत्त्वपूर्ण बना दिया है। इन दोनों प्रकार के आंदोलनों की प्रकृति यद्यपि राजनीतिक है, तथापि इनके दूरगामी आर्थिक परिणाम भी हैं। अब यह सोचा जाने लगा है कि यदि आर्थिक विकास का लाभ लिंग असमानता को दूर नहीं कर पाता अथवा पर्यावरणीय प्रदूषण के रूप में आर्थिक विकास की कीमत देनी पड़ती है तो ऐसे आर्थिक विकास का क्या लाभ है? क्या ऐसा संभव नहीं है कि आर्थिक विकास के साथ-साथ महिलाओं में भी आर्थिक स्वावलंबने बढ़े तथा पर्यावरण का अवक्रमण भी न हो? राज्यों द्वारा बनाई जाने वाली आर्थिक नीतियों में इस प्रकार के मुद्दों की प्राथमिकता राजनीति और अर्थशास्त्र के घनिष्ठ संबंधों को दर्शाती है।

प्रश्न 15.
कार्य संबंधित क्रियाकलाप खेल संबंधित क्रियाकलापों की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। सोचकर बताइए। (क्रियाकलाप 13)
उत्तर
विद्यालयों के पाठ्यक्रमों से तो ऐसा ही प्रतीत होता है कि कार्य संबंधित क्रियाकलाप खेल संबंधित क्रियाकलापों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। छोटे बच्चों के एक विद्यालय के अध्ययन से इस तथ्य की पुष्टि होती है। इस अध्ययन से पता चलता है कि बच्चों ने यही सीखा कि कार्य संबंधित क्रियाकलाप खेल संबंधित क्रियाकलापों की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं। कार्य संबंधित क्रियाकलापों में कोई भी या अध्यापक द्वारा निर्देशित सभी क्रियाकलाप सम्मिलित होते हैं। विद्यालय में होने वाला शिक्षण कार्य अनिवार्य होता है। खाली समय के क्रियाकलापों को खेल कहा जाता है। आज इस धारणा में परिवर्तन हो रहा है तथा शारीरिक शिक्षा व खेलकूद को सामान्य शिक्षा का अभिन्न अंग माना जाने लगा है। साथ ही, स्कूलों के पाठ्यक्रमों को इस प्रकार का बनाए जाने पर जोर दिया जाने लगा है जो मनोरंजक हों तथा बच्चे खेल-खेल में ही बहुत कुछ सीख जाएँ।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सामाजिक संस्था का अर्थ है।
(क) अधिक लोगों का साथ-साथ रहना
(ख) कार्य करने का निश्चित ढंग
(ग) बड़ा सामाजिक समूह
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ख) कार्य करने का निश्चित ढंग

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में कौन-सी संस्था है ?
(क) मानव-समाज
(ख) दुकान
(ग) महाविद्यालय
(घ) राष्ट्र
उत्तर
(ग) महाविद्यालय

प्रश्न 3.
सामाजिक संस्था की विशेषता है।
(क) सदस्यता
(ख) अस्थायी प्रकृति
(ग) अमूर्त प्रकृति
(घ) औपचारिक नियंत्रण
उत्तर
(ग) अमूर्त प्रकृति

प्रश्न 4.
वह प्रथा, जिसमें स्त्री एक समय पर एक से अधिक पुरुषों से विवाह संबंध स्थापित कर सकती है, कहलाती है-
(क) बहुपत्नी विवाह
(ख) बहुपति विवाह
(ग) एक विवाह
(घ) समूह विवाह
उत्तर
(ख) बहुपति विवाह

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions

प्रश्न 5.
वह प्रथा, जिसके अनुसार कोई भी पुरुष एक समय में एकाधिक स्त्रियों से विवाह कर सकता है, कहलाता है-
(क) समूह विवाह
(ख) एक विवाह
(ग) बहुपति विवाह
(घ) बहुपत्नी विवाह
उत्तर
(घ) बहुपत्नी विवाह

प्रश्न 6.
बहिर्विवाह का तात्पर्य है-
(क) गोत्र के बाहर विवाह
(ख) प्रवर के बाहर विवाह
(ग) पिण्ड के बाहर विवाह
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 7.
बहिर्विवाह निषेध के अंतर्गत निषेध लिखिए-
(क) जाति
(ख) गाँव
(ग) गोत्र
(घ) प्रजाति
उत्तर
(ग) गोत्र

प्रश्न 8.
अंतर्विवाह का नियम है-
(क) अपनी जाति के बाहर विवाह
(ख) अपनी जाति में विवाह
(ग) एक-विवाह
(घ) बिना दहेज विवाह
उत्तर
(ख) अपनी जाति में विवाह

प्रश्न 9.
“विवाह स्त्री और पुरुष के-फरिवारिक जीवन में प्रवेश की संस्था है।” यह किसका कथन है ?
(क) बोगास
(ख) वेस्टरमार्क
(ग) पी० वी० यंग
(घ) देसाई
उत्तर
(क) बोगार्ड्स

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से हिन्दू विया की विशेषता कौन-सी है ?
(क) सामाजिक समझौता
(ख) धार्मिक संस्कार
(ग) अस्थायी संबंध
(घ) बिना अदालत तलाक
उत्तर
(ख) धार्मिक संस्कार

प्रश्न 11.
हिंदू विवाह के निम्नलिखित प्रकारों में कौन-सा अप्रशस्त है?
(क) दैव
(ख) प्राजापत्य
(ग) राक्षस
(घ) ब्राह्म
उत्तर
(ग) राक्षस

प्रश्न 12.
वर्तमान समय में हिंदू विवाह का सबसे प्रचलित प्रकार लिखिए
(क) ब्राह्म विवाह
(ख) दैव विवाह
(ग) गांधर्व विवाह
(घ) राक्षस विवाह
उत्तर
(क) ब्राह्म विवाह

प्रश्न 13.
यह कथन किसका है ‘धर्म आध्यात्मिक शक्तियों पर विश्वास है?
(क) मैकाइवर
(ख) डेविस
(ग) पैरेटो
(घ) टॉयलर
उत्तर
(घ) टॉयलर

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions

प्रश्न 14.
धर्म की विशेषता क्या है ?
(क) पारस्परिक सहयोग
(ख) समानता
(ग) अलौकिक शक्ति पर विश्वास
(घ) गुरु पर विश्वास
उत्तर
(ग) अलौकिक शक्ति पर विश्वास

प्रश्न 15.
निम्नलिखित में से धर्म की विशेषता नहीं है
(क) पवित्रता
(ख) आदर
(ग) विश्वास
(घ) सदाचार
उत्तर
(घ) सदाचार

प्रश्न 16.
निम्नलिखित में धर्म की विशेषता नहीं है-
(क) कर्मकाण्डों का समावेश
(ख) अलौकिक शक्ति के प्रति विश्वास
(ग) तर्क का समावेश
(घ) अपरिवर्तनशील व्यवहार
उत्तर
(ग) तर्क का समावेश

निश्चित उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
परिवार सामाजिक नियंत्रण का किस प्रकार का साधन है?
उत्तर
परिवार सामाजिक नियंत्रण का अनौपचारिक साधन है।

प्रश्न 2.
अंतर्विवाह क्या है?
उत्तर
विशिष्ट जाति, वर्ग या जनजातीय समूह के अंतर्गत किए जाने वाले विवाह को अंतर्विवाह कहते हैं।

प्रश्न 3.
बहिर्विवाह क्या है?
उत्तर
संबंधी के कुछ समूहों के बाहर किए जाने वाले विवाह को बहिर्विवाह कहते हैं।

प्रश्न 4.
पति-पत्नी, पिता-पुत्र, माता-पुत्री, भाई-बहन इत्यादि किस प्रकार के नातेदार हैं?
उत्तर
पति-पत्नी, पिता-पुत्र, माता-पुत्री, भाई-बहन इत्यादि प्राथमिक नातेदार हैं।

प्रश्न 5.
दो संबंधियों में प्रत्यक्ष संबंध एवं अंतःक्रिया को सीमित करने वाली नातेदारी रीति कौन-सी है?
उत्तर
दो संबंधियों में प्रत्यक्ष संबंध एवं अंत:क्रिया को सीमित करने वाले नातेदारी रीति का नाम परिहार है।

प्रश्न 6.
जिन नातेदारों में प्रत्यक्ष एवं घनिष्ठ संबंध पाए जाते हैं उन्हें क्या कहा जाता है?
उत्तर
जिन नातेदारों में प्रत्यक्ष एवं घनिष्ठ संबंध पाए जाते हैं उन्हें प्राथमिक नातेदार कहा जाता है।

प्रश्न 7.
ऐजूकेशन शब्द लैटिन भाषा के किस शब्द से बना है?
उत्तर
‘ऐजूकेशन’ शब्द लैटिन भाषा के ‘ऐजूकेयर’ शब्द से बना है।

प्रश्न 8.
स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा को क्यों कहा जाता है?
उत्तर
स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा को औपचारिक शिक्षा’ कहा जाता है।

प्रश्न 9.
पवित्र और अपवित्र की अवधारणा से संबंधित समाजशास्त्री का नाम लिखिए।
उत्तर
पवित्र और अपवित्र की अवधारणा से संबंधित समाजशास्त्री का नाम दुखम है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions

प्रश्न 10.
‘ऐलीमेण्टरी फॉर्स ऑफ रिलिजियस लाइफ’ नामक पुस्तक के लेखक का नाम बताइए।
उत्तर
‘ऐलीमेण्टरी फॉर्स ऑफ रिलिजियस लाइफ’ नामक पुस्तक के लेखक का नाम दुर्चीम है।।

प्रश्न 11.
शिक्षा के क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर
शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य शिक्षार्थी का सर्वांगीण विकास करना है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
परिवार किसे कहते हैं।
उत्तर
परिवार समाज की वह केंद्रीय इकाई है जिसमें माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची, भतीजे-भतीजी, पुत्र-पुत्री आदि सदस्य सम्मिलित होते हैं और जो पारस्परिक स्नेह तथा उत्तरदायित्व की भावना से परिपूर्ण होते हैं परंतु परिवार का यह रूप भारतवर्ष में ही पाया जाता है। पाश्चात्य देशों में परिवार का तात्पर्य समाज की उस इकाई से लगाया जाता है जिसमें माता-पिता और उनके अविवाहित बच्चे ही सम्मिलित होते हैं। इलियट तथा मैरिल (Elliott and Merrill) के अनुसार, “परिवार को पति-पत्नी तथा क्च्चों की एक जैविक-सामाजिक इकाई के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।” इनके अनुसार यह एक सामाजिक संस्था और एक सामाजिक संगठन भी है जिसके द्वारा कुछ मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है।

प्रश्न 2.
नातेदारी के दो प्रमुख भेद बताइए।
उत्तर
नातेदारी के दो प्रमुख भेद इस प्रकार हैं-

  1. विवाह संबंधी नातेदारी–इसमें हम उन सब नातेदारों को सम्मिलित करते हैं जो विवाह के संबंध के आधार पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। उदाहरणार्थ–एक स्त्री अपने पति अथवा एक पति का अपनी पत्नी से संबंध अथवा पति-पत्नी, बहनोई, दामाद, जीजा, फूफा, ननदोई, मौसा, साढ़, पुत्रवधू, भाभी, देवरानी, जेठानी, चाची, मामी आदि रिश्तेदारों को विवाह संबंधी नातेदारों में सम्मिलित किया जा सकता है।
  2. रक्त संबंधी नातेदारी-इसमें उन नातेदारों को सम्मिलित किया जाता है तो समान रक्त के | संबंध के आधार पर एक-दूसरे के साथ जुड़े होते हैं। उदाहरणार्थ-भाई-बहन, चाचा, ताऊ, मामा, मौसी इत्यादि को इस श्रेणी में रखा जाता है।

प्रश्न 3.
पूँजीवाद की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
पूँजीवाद में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं-

  1. पूँजीवाद में निजी संपत्ति को मान्यता दी जाती है। निजी संपत्ति चाहे चल हो या अचल उस पर निजी अधिकार होता है, उसे छीनने का अधिकार राज्य को प्राप्त नहीं होता है।
  2. पूँजीवाद में प्रतिस्पर्धा प्रमुख संस्था है। श्रमिक, उपभोक्ता और उत्पादक तीनों में प्रतिस्पर्धा पाई जाती है।

प्रश्न 4.
साम्यवाद की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
साम्यवाद की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. इसमें निजी संपत्ति को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता है अपितु संपत्ति पर राज्य के अधिकार को अर्थात् सार्वजनिक अधिकार को अधिक मान्यता दी जाती है।
  2. साम्यवाद, श्रम को अत्यधिक महत्त्व देता है और इसमें व्यक्ति को पद उसकी कार्यकुशलता के आधार पर दिया जाता है।

प्रश्न 5.
सहकारी समाजवाद से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
सहकारी समाजवाद में उत्पादन के साधनों पर किसी एक व्यक्ति का स्वामित्व न होकर सामूहिक स्वामित्व होता है। इसमें कुछ लोग सहयोग द्वारा कोई कार्य करते हैं। ये लोग श्रमिक भी होते हैं और लाभ पाने वाले सदस्य भी। उदाहरण के लिए–100 व्यक्तियों ने पूँजी लगाकर एक कारखाना खोला, ये व्यक्ति वहाँ के कार्यकर्ता भी होंगे तथा जो लाभ होगा वह इन व्यक्तियों में समान रूप से बाँट लिया जाएगा। सहकारी समाजवाद में घनिष्ठ आर्थिक संबंध, सहकारिता, सामूहिक संपत्ति आदि प्रमुख आर्थिक संस्थाएँ हैं। सहकारी समाजवाद का विकसित रूप इंग्लैंड तथा स्केण्डिनेवियन देशों में पाया जाता है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions

प्रश्न 6.
संपत्ति की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
संपत्ति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नांकित हैं-

  1. संपत्ति एक सार्वभौमिक आर्थिक संस्था है। यह बिल्कुल ही आदिम समाज से लेकर अत्यधिक विकसित समाजों-सभी में पाई जाती है।
  2. संपत्ति की अवधारणा सीमित और मूल्यवान वस्तुओं पर अधिकार में निहित होती है। यह अधिकार संबंधित वस्तुओं पर नियंत्रण के विभिन्न रूपों को प्रकट करता है; जैसे–कब्जा, उपयोग, भोग, आय, वितरण आदि। सीमित और मूल्यवान वस्तुएँ दो प्रकार की हो सकती ” है—मूर्त तथा अमूर्त।।

प्रश्न 7.
जन्मजात शक्तियों को अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया के रूप में शिक्षा की परिभाषा दीजिए।
उत्तर
कुछ विद्वानों का विचार है कि प्रत्येक व्यक्ति में कुछ शक्तियाँ जन्मजात रूप से ही विद्यमान होती हैं परंतु इन शक्तियों की अभिव्यक्ति के लिए कुछ प्रयास करने पड़ते हैं, ये प्रयास ही शिक्षा हैं। इस मत के मुख्य समर्थक सुकरात, फ्रोबेल तथा विवेकानंद आदि हैं। सुकरात के अनुसार, “शिक्षा का आशय सार्वजनिक प्रामाणिकता के विचारों को प्रकाश में लाना है जो कि प्रत्येक व्यक्ति के मन में प्रच्छन्न रूप में निहित हैं। इसी प्रकार फ्रोबेल के अनुसार, “शिक्षा वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बालक की जन्मजात शक्तियाँ बाहर प्रकट होती है।”

प्रश्न 8.
धर्म किसे कहते हैं?
या
धर्म से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
‘धर्म’ को अंग्रेजी में रिलीजन’ (Religion) कहते हैं, जो लैटिन भाषा के ‘rel (I) igio’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है ‘बाँधना’। इस प्रकार शाब्दिक अर्थों में ‘धर्म’ का अभिप्राय उन संस्कारों के प्रतिपादन से है जो मनुष्य और ईश्वर या अलौकिक शक्ति को एक-दूसरे से बाँधते या जोड़ते हैं। अन्य शब्दों में, धर्म मनुष्य की युगों से विद्यमान उस श्रद्धा का नाम है जो सर्वशक्तिमान के प्रति होती है। टायलर के अनुसार, “आध्यात्मिक सत्ताओं में विश्वास ही धर्म है। ये सत्ताएँ दैवी तथा राक्षसी दोनों ही प्रकार की हो सकती हैं।”

प्रश्न 10.
पारिवारिक विघटन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
मार्टिन न्यूमेयर के शब्दों में, “पारिवारिक विघटन का अर्थ एकता तथा निष्ठा को भंग होना, पहले से स्थापित संबंधों की समाप्ति, पारिवारिक चेतना का नाश अथवा अलगाव का विकास है।”

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
परिवार को नागरिकता का प्रशिक्षण स्थल क्यों कहा जाता है।
उत्तर
मैजिनी के अनुसार, “बालक नागरिकता का प्रथम पाठ माता के चुंबन तथा पिता के संरक्षण के मध्य सीखता है। परिवार बालक में अनेक नागरिकता के गुणों का विकास करता है। इस संबंध में परिवार के प्रमुख कार्य निम्नांकित हैं-

  1. स्नेह की शिक्षा-स्नेह की शिक्षा बालक सर्वप्रथम माता के चुंबन और माता के दुलार से सीखता है। टी० रेमण्ट का यह कथन पूर्णतया सत्य है कि “घर में ही घनिष्ठ प्रेम की भावनाओं का विकास होता है। माता-पिता का स्नेह बालक में भी प्रेम के बीज डाल देता है। बालक भी अपने माता-पिता से प्रेम करना सीख जाता है। भविष्य में यही पारिवारिक प्रेम व्यापक होकर सामाजिक प्रेम में परिणत हो जाता है।
  2. सहयोग की शिक्षा-सामाजिक जीवन में सहयोग का विशेष महत्त्व है। सामाजिक जीवन का आधार सहयोग ही है। बालक सहयोग का प्रथम पाठ परिवार में ही पढ़ता है; क्योंकि वह देखता है कि परिवार के समस्त सदस्य मिल-जुलकर घर का कार्य करते हैं। विद्वान् बोसो के अनुसार, “परिवार वह स्थान है, जहाँ प्रत्येक नई पीढ़ी नागरिकता का यह नया पाठ सीखती है। कि कोई भी मनुष्य बिना सहयोग के जीवित नहीं रह सकता।”
  3. सहानुभूति की शिक्षा-परिवार में माता-पिता बालक के दुःख को देखकर तुरंत चितिंत हो उठते हैं और दौड़-भाग कर उसके दुःख को दूर करने का प्रयास करते हैं। इसी सच्ची सहानुभूति का प्रदर्शन बालक पर गहरा प्रभाव डालता है और वह भी समय पड़ने पर परिवार के सदस्यों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करता है।
  4. कर्त्तव्यपालन और आज्ञापालन की शिक्षा–आज्ञपालन और कर्तव्यपालन की शिक्षा भी बालक परिवार में ही सीखता है। प्रत्येक बालक अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करना अपना कर्तव्य समझता है। इस प्रकार वह अनुशासन का पाठ सीखता है।
  5. नि:स्वार्थता की शिक्षा–माता-पिता अपने बालक से नि:स्वार्थ प्रेम करते हैं और उनका लालन-पालन किसी स्वार्थ की भावना से नहीं करते। इससे परिवार के सदस्यों में नि:स्वार्थता के गुण का विकास होता है।

प्रश्न 2.
विवाह-प्रणाली के आधार पर परिवार को किन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है?
उत्तर
विवाह-प्रणाली के आधार पर परिवार को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है–

  1. एकविवाही परिवार इस प्रकार के परिवार में पुरुष केवल एक ही विवाह करता है। आजकल इस प्रकार के परिवारों का ही अधिक प्रचलन है। ईसाइयों और यहूदियों में अतीतकाल में इस प्रकार के परिवार पाए जाते हैं।
  2. बहुपत्नी परिवार—जिस परिवार का पुरुष एक से अधिक पत्नियाँ रखता है वह बहुपत्नी ‘ परिवार कहलाता है।
  3. बहुपति परिवार-इस प्रथा का प्रचलन स्त्रियों की कमी के कारण हुआ। इस प्रकार के परिवारों में अनेक पुरुषों के मध्य एक स्त्री रहती है। हमारे देश में टोडा और खस जनजाति में इस प्रकार के परिवार पाए जाते है। चकराता में निवास करने वाली खस जनजाति में सभी भाइयों की एक ही पत्नी होती है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions

प्रश्न 3.
अंतर्विवाह के बारे में आप क्या जानते हैं? समझाइए।
उत्तर
अंतर्विवाह का अर्थ है किसी व्यक्ति का समूह, वर्ण या जाति के अंदर ही विवाह करना। प्राचीनकाल में वर्ण व्यवस्था का प्रचलन था अतः लोग सामान्यतया अपने वर्ण में ही विवाह करते थे, परंतु धीरे-धीरे अनेक जातियों का विकास हो गया और लोग अपनी जाति के अंतर्गत विवाह करने लगे। उदाहरण के लिए ब्राह्मणों में गौड़ ब्राह्मण केवल गौड़ ब्राह्मणों में ही विवाह करते हैं। इस प्रकार अंतर्विवाह एक ऐसी वैवाहिक मान्यता है जिसमें एक स्त्री अथवा पुरुष को अपनी ही जाति अथवा उपजाति में विवाह करने का नियम होता है। अन्य शब्दों में, हिंदू समाज में एक व्यक्ति को अपनी जाति से बाहर विवाह करने का निषेध हैं। इसी निषेधु के पालन के लिए अंतर्विवाही समूहों का निर्माण किया गया। जाति प्रथा की परिभाषा के अनुसार, जाति एक अंतर्विवाही समूह है। इस प्रकार के निषेधों का प्रमुख प्रजातीय शुद्धता, रक्त की शुद्धता तथा जातीय संगठन को दृढ़ बनाने की इच्छा प्रमुख रहे हैं। यद्यपि आज अधिकांशतया अंतर्विवाही मान्यताओं का पालन तो किया जाता है, तथापि अंतर्जातीय विवाहों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. शिक्षा के प्रसार ने जनसाधारण को अंधविश्वास और अज्ञानता से मुक्त कर दिया है।
  2. सह-शिक्षा के प्रसार एवं युवक-युवतियों के पारस्परिक संपर्क ने विवाह के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन किया है।
  3. दहेज प्रथा के दोषों के कारण।
  4. औद्योगीकरण तथा नगरीकरण के कारण दृष्टिकोण के व्यापक होने का परिणाम।
  5. यातायात के साधनों के विकास के कारण।
  6. व्यावसायिक कार्यालयों तथा महाविद्यालयों में स्त्री-पुरुषों का साथ-साथ काम करना।
  7. युवक व युवतियों में स्वयं जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्र प्रवृत्ति।।
  8. विभिन्न सामाजिक सुधारों के प्रभाव।

प्रश्न 4.
नातेदारी की प्रमुख श्रेणियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर
नातेदारी की श्रेणियों से अभिप्राय नातेदारों में परस्पर संबंधों की निकटता से है अर्थात् कोई नातेदार किसी व्यक्ति का कितना नजदीकी अथवा दूर का नातेदार है। नातेदारी को मुख्य रूप से निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जाता है-

  1. प्राथमिक नातेदार–जिन रिश्तेदारों के साथ हमारा प्रत्यक्ष वैवाहिक या रक्त संबंध होता है, उन्हें हम प्राथमिक नातेदार कहते हैं। प्राथमिक नातेदारों में आठ संबंधियों को सम्मिलित किया जाता है। ये हैं–पति-पत्नी, पिता-पुत्र, माता-पुत्री, पिता-पुत्री, माता-पुत्र, छोटे-बड़े भाई, छोटी-बड़ी बहन तथा भाई-बहन। ये वे प्रत्यक्ष संबंधी हैं जिनके साथ हमारा घनिष्ठ संबंध है।
  2. द्वितीयक नातेदार—इसमें हम उन रिश्तेदारों को सम्मिलित करते हैं जो हमारे प्राथमिक नातेदारों के प्राथमिक संबंधी होते हैं। ये संबंधी हमसे प्राथकमिक संबंधियों द्वारा संबंधित होते हैं। उदाहरणार्थ-बहनाई-साले में संबंध, दादा-पोते में संबंध, चाचा-भतीजे में संबंध, देवर-भाभी में संबंध इस श्रेणी के संबंधों के उदाहरण हैं। मरडोक (Murdock) ने 33 प्रकार के द्वितीयक नातेदार बताए हैं।
  3. तृतीयक नातेदार–इस श्रेणी में उन नातेदारों को सम्मिलित किया जाता है जो हमारे द्वितीयक संबंधियों के प्राथमिक संबंधी हैं अर्थात् हमारे प्राथमिक संबंधियों के द्वितीयक संबंधी हैं। उदाहरणार्थ-साले की पत्नी, साले का लड़का, पड़दादा हमारे तृतीयक नातेदार हैं। मरडोक ने 151 ऐसे संबंधियों का उल्लेख किया है।

इसी प्रकार हम चातुथिक, पांचमिक इत्यादि संबंधों की चर्चा करते हैं।

प्रश्न 5.
हिंदुओं में बहिर्विवाह के नियम को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
बहिर्विवाह का तात्पर्य है अपने रक्त-समूह आदि के अंतर्गत आने वाले सदस्य से विवाह न करना। इस मान्यता के अनुसार विवाह अपने गोत्र, प्रवर और सपिंड वाले परिवारों में नहीं किया जा सकता। हिंदुओं में तीन प्रकार के बहिर्विवाह का प्रचलन है-

  1. गोत्र बहिर्विवाह-गोत्र बहिर्विवाह को ठीक प्रकार से समझने के लिए आवश्यक है कि ‘गोत्र के अर्थ को समझा जाए। मजूमदार एवं मदन के शब्दों में, ‘एक गोत्र अधिकांश रूप से कुछ वंश-समूहों को योग होता है, जो अपनी उत्पत्ति एक कल्पित पूर्वज से मानते हैं। यह पूर्वज मानव, मानव के समान पश, पेड़, पौधा या निर्जीव वस्तु हो सकता है।’ गोत्र के संबंध में यह प्रथा प्रचलित है कि एक ही गोत्र के व्यक्तियों के बीच में निकट रक्त-संबंध होते हैं। इसलिए एक ही गोत्र के सभी युवक-युवतियाँ एक-दूसरे के भाई-बहन हैं। अतः सगोत्र अथव अंत:गोत्र विवाहों पर प्रतिबंध हैं; क्योंकि हिंदू समाज में भाई-बहन के बीच विवाह संबंध स्थापित नहीं हो सकते।।
  2. सपिंड बहिर्विवाह–पिंड का अर्थ रक्त-संबंध से है। हिंदू समाज में सपिंड’ में वैवाहिक संबंध का निषेध किया गया है। सपिंड का संबंध माता की ओर से पाँच पीढ़ियों तक और पिता की ओर से सात पीढ़ियों तक माना जाता है। विज्ञानेश्वर ने सपिंड की व्याख्या इस प्रकार की है, एक ही पिंड अर्थात् एक देह से संबंध रखने वालों में शरीर के अवयव समान रहने के कारण सपिंड संबंध होता है। पिता और पुत्र सपिंड है। इसी प्रकार दादा आदि के शरीर के अवयव पिता द्वारा पोते में आने से तथा पुत्री की माता के साथ सपिंडता होती है; अतः जहाँ-जहाँ ‘सपिंड’ शब्द का प्रयोग हुआ है वहाँ एक शरीर के अवयवों का संबंध समझना चाहिए। इस प्रकार, पिता से सात और माता से पाँच पीढ़ी के बीच लड़के और लड़कियों में विवाह नहीं हो सकता।
  3. प्रवर बहिर्विवाह-प्रवर’ शब्द का अर्थ है ‘आह्वान करना। वैदिक काल में पुरोहित जिस समय अग्नि प्रज्वलित करते थे, उस समय अपने ऋषि-पूर्वजों का नाम लेते थे। आगे चलकर एक ऋषि का आह्वान करके यज्ञ करने वाले व्यक्ति परस्पर एक-दूसरे को संबंधी समझने लगे। यह सत्य है कि ये संबंध धार्मिक भावना पर आधारित थे, परंतु इस पर भी वे अपने को एक वंश का सदस्य समझने लगे। ये सभी सदस्य प्रवर माने जाने लगे और उनमे आपस में विवाह संबंध का निषेध हो गया।

प्रश्न 6.
राजनीतिक संस्थाओं का क्या महत्त्व है?
उत्तर
राजनीतिक संस्थाओं की समाज तथा व्यक्तियों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण भमिका होती है। राजनीतिक संस्थाएँ सामाजिक व्यवस्था के रूप में राज्य की एक प्रमुख प्रकार्यात्मक समस्या लक्ष्य-प्राप्ति का समाधान करने में सहायता प्रदान करती है। राज्य तथा सरकार द्वारा केवल लक्ष्य ही निर्धारित नहीं किए जाते अपितु इन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु अनिवार्य साधन भी उपलब्ध कराए जाते हैं। राजनीतिक संस्थाएँ ही समाज में कानून एवं व्यवस्था बनाए रखने में सहायता प्रदान करती है। राज्य, सरकार तथा कानून के डर से ही सभी नागरिक सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप व्यवहार करने का प्रयास करते हैं। जो व्यक्ति कानूनों का पालन नहीं करते हैनको राज्य दंडित करता है। राज्य एक सर्वशक्तिशाली संस्था है तथा इसे व्यक्ति का जीवन लेने अर्थात् उसे मृत्युदंड तक देने का अधिकार प्राप्त होता है। आर्थिक साधनों की प्राप्ति हेतु होने वाली होड़ को भी राजनीतिक संस्थाएँ ही नियमित करती है। शैक्षिक उप-व्यवस्था एवं अन्य उप-व्यवस्थाओं को दिशा-निर्देश देने का कार्य भी ” राजनीतिक संस्थाओं द्वारा ही किया जाता है। इस प्रकार, राजनीतिक संस्थाएँ सामाजिक व्यवस्था तथा इसकी निरंतरता को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं।

प्रश्न 7.
राजनीतिक संस्थाएँ क्या हैं?
उत्तर
राजनीतिक संस्थाओं का वृहद् अध्ययन राजनीतिशास्त्र में किया जाता है। चूंकि समाजशास्त्र सभी प्रकार के संबंधों को अध्ययन करता है, इसलिए राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन भी इसके अंतर्गत किया जाता है। राजनीतिक संस्थाएँ सामाजिक जीवन की अत्यंत महत्वपूर्ण संस्थाएँ हैं। राजनीतिक संस्थाओं का संबंध शक्ति के वितरण से हैं तथा इनके द्वारा ही समाज में सामाजिक नियंत्रण का कार्य किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार कार्य करना चाहता है और यदि सभी व्यक्ति ऐसा करने लगे तो सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो जाएगी। शांति तथा नियंत्रण बनाए रखने के लिए राजनीतिक संस्थाओं का महत्त्व सभी युगों में रहा है और आज भी है। व्यक्ति रांजनीतिक संस्थाओं द्वारा अपनी अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। समाज में व्यवस्था, प्रगति व शांति बनाए रखने का उत्तरदायित्व राजनीतिक संस्थाओं एवं समितियों पर ही हैं।

बॉटोमोर के अनुसार राजनीतिक संस्थाएँ समाज में शक्ति के वितरण से संबंधित हैं। इस संदर्भ में, राज्य के बारे में वेबर का विचार है कि राज्य एक ऐसा मानवीय समुदाय है जिसका एक निश्चित भौगोलिक सीमा में भौतिक बेल के वैधानिक प्रयोग का एकाधिकार होता है और जो इस अधिकार से सफलतापूर्वक लागू करता है। इस प्रकार, राज्य सामाजिक नियंत्रण का एक महत्त्वपूर्ण अभिकरण है। जिसके कार्य कानून द्वारा किए जाते हैं। राज्य संपूर्ण समाज नहीं है अपितु समाज की एक संस्था मात्र है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions

प्रश्न 8.
आर्थिक संस्थाएँ क्या हैं?
उत्तर
मानव के जन्म के साथ ही उसे अनेक आवश्यकताएँ घेर लेती हैं। इनमें से कुछ आवश्यकताएँ उसकी प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं; जैसे कि भोजन, वस्त्र तथा निवास की; और इन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समाज में आर्थिक संस्थाओं का जन्म होता है। मनुष्य की आर्थिक क्रियाएँ उत्पादन, विनिमय, वितरण से संबंधित होती है। आर्थिक संस्थाओं का प्रत्यक्ष संबंध मानवीय आवश्यकताओं से होता है। आर्थिक संस्थाएँ मनुष्य के जीवन को व्यवस्थित करती हैं। यदि मानवीय आवश्यकताएँ; विशेषकर भौतिक आवश्यकताएँ बिना नियमों के संघर्ष से प्राप्त होने की स्थिति में आ जाएँ तो सामाजिक संरचना ही नष्ट हो जाएगी। अर्थशास्त्रियों को मत है कि आर्थिक संस्थाओं को समाज में केंद्रीय स्थिति प्राप्त है। यहाँ पर आर्थिक संस्था व आर्थिक व्यवस्था के संदर्भ में यह बताना आवश्यक है कि ‘आर्थिक व्यवस्था’ एक विस्तृत धारणा है, जबकि ‘आर्थिक संस्था’ सीमित धारणा है।

आर्थिक संस्थाओं का संबंध समाज की अनुकूलन संबंधी समस्या से होता है। इनमें उने संस्थाओं को सम्मिलित किया जाता है। जो समाज में वस्तुओं के उत्पादन एवं वितरण से संबंधित होती है। आर्थिक संस्थाओं द्वारा ही जीवन निर्वाह से सबंधित आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। प्रमुख विद्वानों ने आर्थिक संस्था की परिभाषाएँ निम्नांकित प्रकार से दी हैं-

  1. एण्डरसन एवं पार्कर (Aderson and Parker) के अनुसार-“वस्तुओं के उत्पादन तथा वितरण के माध्यम से आर्थिक संस्थाएँ समाज के अस्तित्व को बनाए रखती हैं। यह कार्य पूँजी, श्रम, भूमि, कच्चे माल तथा व्यवस्था संबंधी योग्यता के अधिकतम उपयोग द्वारा सम्भव होता है।
  2. डेविस (Davis) के अनुसार-समाज चाहे सभ्य हो या असभ्य, सीमित वस्तुओं के वितरण को नियंत्रित करने वाले आधारभूत विचारों, आदर्श नियमों तथा पदों को आर्थिक संस्था की संज्ञा दी जाएगी।

प्रश्न 9.
आर्थिक संस्थाओं का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
किसी भी समाज में आर्थिक संस्थाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। वस्तुतः आर्थिक संस्थाएँ किसी समाज की उस प्रकार्यात्मक उप-व्यवस्था का निर्माण करती हैं जो समाज की अनुकूलन संबंधी समस्या को हल करती है। इसलिए अर्थव्यवस्था एवं आर्थिक संस्थाओं को कई बार अनुकूलनकारी उप-व्यवस्था भी कहा जाता है। वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन, वितरण और उपभोग में लगी सभी इकाइयों के पारस्परिक संबंधों को नियमित करने का कार्य आर्थिक संस्थाएँ ही करती हैं। इन्हीं से ऐसी सुविधाएँ उत्पन्न होती हैं जो सामान्य रूप से परिवार, समुदाय तथा राज्य आदि के लिए आवश्यक होती है। इन्हीं संस्थाओं द्वारा कोई भी समाज मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति को सुनिश्चित करता है तथा प्रतियोगिता पर नियंत्रण रखने का प्रयास करता है।

आर्थिक संस्थाओं की प्रकृति एवं पूर्व-औद्योगिक तथा औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है। पूर्व-औद्योगिक अर्थव्यवस्था में भूमि ही धन का स्रोत होती है, जीवंत शक्ति का अत्यधिक प्रयोग होता है, सरल प्रौद्योगिकी पायी जाती है, श्रम-विभाजन एवं विशेषीकरण का निम्न स्तर पाया जाता है, प्रत्यक्ष एवं परंपरागत विनिमय तथा वितरण द्वारा मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति होती है तथा अधिकतर प्रबंध का आधार परिवार ही होता है। इसलिए इन समाजों में संपत्ति तथा विनिमय संबंधी आर्थिक संस्थाओं की ही प्रमुखता होती है। औद्योगिक अर्थव्यवस्था आर्थिक संस्थाएँ विकसित श्रम-विभाजन, उत्पादन, व्यापार एवं लाभ तथा अप्रत्यक्ष विनिमय व वितरण से संबंधित होती है क्योंकि औद्योगिक अर्थव्यवस्था में इन्हीं विशेषताओं की प्रमुखता पायी जाती है। समाज की विभिन्न उप-व्यवस्थाओं के लिए अनिवार्य साधने आर्थिक उप-व्यवस्था पर ही निर्भर करते हैं। इसलिए इस उप-व्यवस्था, जिसमें आर्थिक संस्थाएँ भी सम्मिलित होती हैं, की समाज में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

प्रश्न 10.
संपत्ति की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
संपत्ति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नांकित हैं-

  1. संपत्ति एक सार्वभौमिक आर्थिक संस्था है। यह बिल्कुल ही आदिम समाज से लेकर अत्यधिक विकसित समाजों-सभी में पायी जाती है।
  2. संपत्ति की अवधारणा सीमित और मूल्यवान वस्तुओं पर अधिकार में निहित होती है। यह अधिकार संबंधित वस्तुओं पर नियंत्रण के विभिन्न रूपों को प्रकट करता है; जैसे—कब्जा, उपयोग, भोग, आय, वितरण आदि। सीमित और मूल्यवान वस्तुएँ दो प्रकार की होती हैं-मूर्त तथा अमूर्त।
  3. संपत्ति में उसके विषय में किसी अन्य पक्ष से सौदा कर सकने की क्षमता का तत्त्व मौजूद होता
  4. संपत्ति में हस्तांतरण किए जाने की क्षमता का होना भी आवश्यक है।
  5. संपत्ति एक आर्थिक तथ्य ही नहीं है वरन् एक सामाजिक तथ्य भी है। समाज ही संपत्ति अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है और समाज ही उन अधिकारों का सीमांकन करता है। समाज की स्वीकृति के बिना संपत्ति का कोई अर्थ नहीं है।
  6. अंत में, यह भी कहा जा सकता है कि संपत्ति अधिकार से आशय सदैव स्वामित्व के अधिकार से नहीं है। संपत्ति अधिकार वस्तु पर नियंत्रण से भी संबंधित है। इसलिए स्वामित्व और वस्तु के उपयोग का अधिकार समांतर रूप में दो प्रकार की संपत्तियों को प्रकट करता है।

प्रश्न 11.
पूँजीवाद की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
पूँजीवाद में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं-

  1. पूँजीवाद में निजी संपत्ति को मान्यता दी जाती है। निजी संपत्ति चाहे चंल हो या अचल, उस पर निजी अधिकार होता है, उसे छीनने का अधिकार राज्य को प्राप्त नहीं होता है।
  2. पूँजीवाद में प्रतिस्पर्धा प्रमुख संस्था है। श्रमिक, उपभोक्ता और उत्पादक तीनों में प्रतिस्पर्धा पायी जाती है।
  3. पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के अंतर्गत कार्ल मार्क्स का कथन है कि समाज दो भागों में विभाजित होता है-
    • पूँजीपति, जिनका कि आर्थिक साधनों पर पूर्ण अधिकार होता है तथा
    • श्रमिक, जिनके पास केवल बेचने के लिए श्रम होता है। इन दोनों वर्गों में संघर्ष चलता है जिसे मार्क्स ‘वर्ग संघर्ष’ कहते हैं।
  4. पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है और अनेक श्रमिक काम करते हैं।
  5. पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में श्रमिकों का शोषण होता है। इस कारण अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए मजूदर संघों का निर्माण किया जाता है। ये मजदूर संघ श्रमिकों को सुविधाएँ प्राप्त कराने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions

प्रश्न 12.
शिक्षा का शाब्दिक अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘शिक्षा का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ-हिंदी भाषा में प्रयोग होने वाला शब्द ‘शिक्षा’ वास्तव में संस्कृत भाषा से लिया गया है तथा संस्कृत भाषा में इसका संबंध ‘शिक्षा’ धातु से है। संस्कृत भाषा में इस धातु का आशय ‘ज्ञान ग्रहण करने या विद्या प्राप्त करने से है। इस व्युत्पत्तिमूलक अर्थ के आधार पर कहा जा सकता है कि शिक्षा वह प्रक्रिया है जो ज्ञान अथवा विद्या प्राप्त करने या प्रदान करने की माध्यम है। अनेक विद्वान शिक्षा के इसी अर्थ को स्वीकार करते हुए शिक्षा की व्याख्या एवं व्यवस्था करने के पक्ष में हैं।

‘Education’ का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ-अंग्रेजी शब्द Education’ की उत्पत्ति लैटिन भाषा से हुई है। विद्वानों का विचार है कि Education शब्द का संबंध लैटिन भाषा के तीन शब्दों educatium’ (एजूकेसीयम) educere’ (एजूसीयर) तथा ‘educare’ (एजूकेयर) से है। इन तीनों ही शब्दों का लैटिन भाषा में लगभग समान अर्थ है। इन शब्दों का क्रमशः अर्थ है–विकसित करना, निकालना या आगे बढ़ाना, बाहर निकालना या शिक्षित करना। इस शाब्दिक अर्थ को ध्यान में रखते हुए यह कहा जाता है कि शिक्षा वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से बालक या व्यक्ति की निहित शक्तियों एवं क्षमताओं को विकसित किया जाता है या प्रस्फुटित किया जाता है। इस प्रकार का विकास जीवनभर होता रहता है; अतः शिक्षा की प्रक्रिया भी जीवनभर चलती रहती है। स्पष्ट है कि इस दृष्टिकोण से शिक्षा का शिय संस्थागत शिक्षा तक सीमित नहीं है।

प्रश्न 13.
शिक्षा का व्यापक अर्थ क्या है?
उत्तर
अनेक विद्वानों ने ‘शिक्षा’ की प्रक्रिया की व्याख्या उसके व्यापक अर्थ में की है। इस अर्थ के अनुसार शिक्षा ज्ञान प्राप्ति के माध्यम के रूप में एक अति व्यापक एवं जटिल प्रक्रिया है। इस रूप में शिक्षा जन्म के साथ ही प्रारंभ हो जाती है तथा जीवन भर निरंतर चलती रहती है। काल या अवधि के ही समान इस अर्थ के अनुसार शिक्षा प्रदान करने अथवा ग्रहण करने का क्षेत्र भी सीमित नहीं होता अर्थात् शिक्षण का क्षेत्र शिक्षा संस्थाओं तक ही सीमित नहीं होता बल्कि पूरा का पूरा जगत् ही शिक्षा ग्रहण करने एवं शिक्षा प्रदान करने का क्षेत्र है। शिक्षा की इस व्यापक व्याख्या को मैकेंजी ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “विस्तृत अर्थ में शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जो आजीवन चलती रहती है तथा जीवन के प्रायः प्रत्येक अनुभव से उसके भंडार में वृद्धि होती है। व्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार के अनुभव जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से प्राप्त करता है। ये अनुभव किसी भी व्यक्ति के माध्यम से प्राप्त किए जा सकते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि केवल विद्यालय या किसी अन्य शिक्षा संस्था के अध्यापक ही शिक्षक नहीं होते बल्कि प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में शिक्षक की भूमिका निभा सकता है। जिस भी व्यक्ति से कोई नई बात सीखी जाए, वही व्यक्ति उस संदर्भ में शिक्षक है। इस तथ्य को स्वीकार कर लेने पर कोई बालक भी किसी प्रौढ़ व्यक्ति के लिए शिक्षक सिद्ध हो सकता है। बालक ही क्या, पर्यावरण से भी अनेक बातें सीखी जा सकती हैं। अत: पर्यावरण भी हमारे लिए शिक्षक ही है।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा के संकुचित अर्थ से भिन्न शिक्षा के व्यापक़ अर्थ के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य भी अति व्यापक है। इस दृष्टिकोण से शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है, न कि विभिन्न स्तरों के प्रमाण-पत्र प्राप्त करना। इस प्रकार शिक्षा की प्रक्रिया व्यक्ति के सर्वांगीण विकास की प्रक्रिया है। इस तथ्य को एडलर (Adler) ने इन शब्दों में प्रस्तुत किया है, “शिक्षा मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन से संबंधित क्रिया है, यह केवल छोटे बालकों से ही संबंधित नहीं होती। यह तो जन्म से ही प्रारंभ होती है और मृत्यु तक चलती रहती है।”

प्रश्न 14.
शिक्षा के दो कौन-से प्रमुख सामाजिक कार्य हैं? विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
शिक्षा के दो प्रमुख सामाजिक कार्यों का विवरण निम्न प्रकार है-

  1. राष्ट्रीय विकास में योगदान-राष्ट्रीय जीवन में शिक्षा का एक मुख्य कार्य राष्ट्रीय विकास में योगदान करना है। वास्तव में, किसी भी राष्ट्र के संमुचित विकास के लिए आवश्यक होता है। कि उसके अधिक-से-अधिक नागरिक शिक्षित हों। अधिकांश नागरिकों के अशिक्षित होने की स्थिति में कोई भी राष्ट्र किसी भी क्षेत्र में उन्नति एवं प्रगति नहीं कर सकता। यह दो दृष्टिकोणों से सत्य है। सर्वप्रथम तो यह सत्य है कि अशिक्षित नागरिक राष्ट्र की उन्नति एवं विकास में समुचित योगदान दे ही नहीं सकते। दूसरी बात यह सत्य है कि केवल शिक्षित व्यक्ति ही इस तथ्य को समझ पाते हैं कि व्यक्तिगत उन्नति की अपेक्षा राष्ट्रीय उन्नति का महत्त्व अधिक होता है। शिक्षा के द्वारा इस विवेक के विकास के परिणामस्वरूप राष्ट्र का विकास तीव्र गति से होने लगता है।
  2. राष्ट्रीय एकता के विकास में योगदान–राष्ट्रीय जीवन में शिक्षा का एक उल्लेखनीय कार्य राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाए रखना भी है। हमारे देश के सदंर्भ में शिक्षा का यह कार्य और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि हमारे देश में बहुपक्षीय विविधता विद्यमान है। जातिगत, भाषागत, धार्मिक तथा क्षेत्रीय विविधता हमारी राष्ट्रीय एकता के लिए बाधक कारक है। इन कारकों के विद्यमान होने के कारण राष्ट्रीय एकता के लिए शिक्षा की भूमिका अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है।

प्रश्न 15.
शिक्षा को त्रिमुखी प्रक्रिया क्यों कहा जाता है? बताइए।
उत्तर
कुछ विद्वानों ने शिक्षा की प्रक्रिया में निहित प्रक्रियाओं का उल्लेख करते हुए इसको एक त्रिमुखी प्रक्रिया कहा है। इस मान्यता के अनुसार शिक्षा के तीन अंग हैं—शिक्षक, पाठ्यक्रम तथा बालक। इस मान्यता के अनुसार शिक्षक तथा बालक के मध्य पाठ्यक्रम के माध्यम से संबंध स्थापित होता है। शिक्षा को एक त्रिमुखी प्रक्रिया स्थापित करने के लिए जॉन डीवी ने अपने दृष्टिकोण से व्याख्या प्रस्तुत की है। डीवी के अनुसार शिक्षा की प्रक्रिया में मनोवैज्ञानिक पक्ष के साथ-ही-साथ सामाजिक पक्ष का भी समान रूप से महत्त्व है। शिक्षा की प्रक्रिया सदैव समाज में रहकर ही चलती है। समाज से बिल्कुल अलग रहकर शिक्षा की प्रक्रिया का चल पाना संभव नहीं है। यह भी कहा जा
कता है कि समाज के सहयोग से ही बालक का मनोवैज्ञानिक विकास भी सुचारू रूप से हो सकता है। इस प्रकार, शिक्षा द्वारा बालक को सामाजिक विकास भी होता है। अतः बालक को उस समाज के लिए शिक्षित करना चाहिए, आगे चलकर जिस समाज का उसे सदस्य बनना है। यह तभी हो सकता है। जबकि बालक का शिक्षा समाज के ही माध्यम से हो। समाज द्वारा ही यह निर्धारित किया जा सकता है। कि परिवर्तित होती हुई परिस्थितियों में बालक को कौन-कौन से विषय पढ़ाए जाने चाहिए तथा पढ़ाने के लिए किस-किस शिक्षण पद्धति को अपनाया जाना चाहिए जिससे कि बालक की कार्यकुशलता में वृद्धि हो तथा वह समाज द्वारा स्वीकृत आचरण करे। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए पाठ्यक्रम का निर्धारण होता है। शिक्षक पाठ्यक्रम के अनुसार बालकों को शिक्षित करता है। इसी व्याख्या के आधार पर शिक्षा के तीन अंग माने जाते हैं–शिक्षक, पाठ्यक्रम तथा बालक।,

प्रश्न 16.
समाज में विद्यमान विभिन्न प्रकार के अधिकार व्यक्तियों के जीवन को कैसे प्रभावित करते हैं?
उत्तर
प्रांरभ में प्रभुसत्तात्मक राज्यों में नागरिकम के साथ राजनीतिक भागीदारों के अधिकारों का पालन नहीं किया जाता था। इन अधिकारों को अधिकतर संघर्ष द्वारा प्राप्त किया जाता था। राजतंत्र की शक्तियों को सीमित करना अथवा उन्हें सक्रिय रूप से पदच्युत करना इसी संघर्ष का परिणाम है। फ्रीस की क्रांति तथा भारत का स्वतंत्रता संग्राम इस प्रकार के आंदोलनों के उदाहरण हैं। नागरिकता के अधिकारों में नागरिक, राजनीतिक और सामाजिक अधिकार सम्मिलित होते हैं। भारत में सभी व्यक्तियों को बिना किसी भेदभाव के नागरिक, राजनीतिक और सामाजिक अधिकार प्राप्त हैं। नागरिक अधिकारों में व्यक्तियों को अपनी इच्छानुसार रहने की जगह चुनने का, भाषण और धर्म की स्वतंत्रता, संपत्ति रखने का अधिकार तथा कानून के समक्ष समान न्याय का अधिकार, सम्मिलित हैं। राजनीतिक अधिकारों में प्रत्येक वयस्क व्यक्ति चुनाव में भाग ले सकता है तथा सार्वजनिक पद के लिए खड़ा हो सकता है। सामाजिक अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न्यूनतम स्तर तक आर्थिक कल्याण और सुरक्षा प्रदान करते हैं। अनुचित जातियों को दिए गए विशेष अधिकार इसी श्रेणी के उदाहरण हैं। स्वास्थ्य लाभ, बेरोजगारी भत्ता और न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करना भी व्यक्तियों को सामाजिक अधिकार देना ही है।

अधिकार व्यक्तियों के जीवन को प्रभावित करते हैं। समाज के बहुत-से वर्ग अन्य वर्गों को उनके अधिकारों से वंचित करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार वे उन लोगों को आगे बढ़ने से रोकते हैं। समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता भी इसी का ही परिणाम है। बहुत-से विकासशील देशों में सामाजिक अधिकारों को आर्थिक विकास में रुकावट मानकर इन पर आक्रमण किए जाने लगे हैं तथा इन्हें प्रतिबंधित करने का भी प्रयास किया जाने लगा है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
परिवार की संकल्पना स्पष्ट कीजिए।
या
परिवार से आपका क्या तात्पर्य है? परिवार की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
या
परिवार से आप क्या समझते हैं? इसके प्रमुख प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर
परिवार एक सार्वभौमिक संगठन अथवा इकाई है क्योंकि यह किसी-न-किसी रूप में प्रत्येक समाज में पाया जाता है। अन्य प्राणियों के समान मनुष्य में भी जाति-सृजन तथा वंश-संरक्षण की । नैसर्गिक प्रेरणाएँ होती हैं। इन प्ररेणाओं से ही परिवार तथा घर का जन्म हुआ। परिवार पति-पत्नी तथा उनकी संतान से मिलकर बनता है। समाजशास्त्र के अंतर्गत परिवार का अध्ययन आवश्यक प्रतीत होता है क्योंकि यह समाज की एक महत्त्वपूर्ण इकाई है और समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है।

परिवार का अर्थ एवं परिभाषाएँ

परिवार-समाज की वह केंद्रीय इकाई है जिसमें माता-पिता, भाई-बहिन, चाचा-चाची, भतीजे-भतीजी, पुत्र-पुत्री आदि होते हैं और जो पारस्परिक स्नेह तथा उत्तरदायित्व की भावना से परिपूर्ण होते हैं परंतु परिवार का यह रूप भारतवर्ष में ही पाया जाता है। पाश्चात्य देशों में परिवार का तात्पर्य समाज की उस इकाई से लगाया जाता है जिसमें माता-पिता और उनके अविवाहित बच्चे ही सम्मिलित होते हैं। इसके विभिन्न प्रकार के स्वरूप होने के कारण ही इसकी परिभाषा के बारे में विद्वानों में मतैक्य नहीं पाया जाता है।
प्रमुख विद्वानों ने परिवार को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है–
ऑगर्बन एवं निमकॉफ (Ogbum and Nimkoff) के अनुसार-“परिवार स्त्री और पुरुष की बच्चों सहित या बच्चों रहित अथवी केवल बच्चों सहित पुरुष की अथवा बच्चों सहित स्त्री की एक कम या अधिक स्थायी समिति है।”
बीसेंज एवं बीसेंज (Biesanz and Biesanz) के अनुसार-“एक सा अधिक बालकों सहित एक स्त्री और उनकी देखरेख करने के लिए एक पुरुष हो तो इन सबको मिलाकर एक परिवार बन जाता है।”
किंग्स्ले डेविस (Kingsley Davis) के अनुसार-“परिवार ऐसे व्यक्तियों का समूह है जिनमें सगोत्रता के संबंध होते हैं और जो इस प्रकार एक-दूसरे के संबंधी होते हैं।”
मैकाइवर एंव पेज(Maclver and Page) के अनुसार-“परिवार पर्याप्त निश्चित यौन-संबंधों द्वारा परिभाषित एक ऐसा समूह है जो बच्चों को पैदा करने (प्रजनन) तथा लालन-पालन करने की व्यवस्था करता है।”
इलियट एवं मैरिल (Elliott and Merrill) के अनुसार–“परिवार को पति-पत्नी तथा बच्चों की एक जैविक सामाजिक इकाई के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इनके अनुसार यह एक सामाजिक संस्था भी है और एक सामाजिक संगठन भी है जिसके द्वारा कुछ मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है।
बील्स एवं हॉइजर (Beals and Hoijar) के अनुसार-संक्षेप में, परिवार एक सामाजिक समूह के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसके सदस्य रक्त के संबंधों द्वारा बद्ध होते हैं।”
जुकरमैन (Zuckerman) के अनुसार-“एक परिवार-समूह पुरुष स्वामी, उसकी समस्त स्त्रियों और उनके बच्चों को मिलाकर बनता है। कभी-कभी एक या अधिक अविवाहित अथवा पत्नी-विहीन पुरुषों को भी सम्मिलित किया जाता है।”
बोगार्डस (Bogardus) के अनुसार-“परिवार एक छोटा सामाजिक समूह है जिसमें साधारणतः माता-पिता एवं एक या अधिक बच्चे होते हैं, जिसमें स्नेह एवं उत्तरदायित्व का समान हिस्सा होता है। तथा जिसमें बच्चों का पालन-पोषण उन्हें स्वनियंत्रित एवं सामाजिक प्रेरित व्यक्ति बनाने के लिए होता है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि परिवार प्रत्यक्ष नातेदारी संबंधों से जुड़े व्यक्तियों को एक समूह है जिसके बड़े सदस्य बच्चों के पालन-पोषण को दायित्व निभाते हैं। परिवार की नींव स्त्री-पुरुष के यौन संबंधों के नियोजन पर होती है। बच्चों का जन्म, लालन-पालन एवं समाजीकरण आदि इसके मुख्य कार्य होते हैं।

परिवार की प्रमुख विशेषताएँ

परिवार की कुछ मूलभूत विशेषताएँ हैं जो सामान्य रूप से विश्व के समस्त परिवारों में पाई जाती हैं। परिवार की निम्नांकित विशेषताएँ परिवार की संकल्पना को स्पष्ट करने में भी सहायक हैं-

  1. यौन-संबंध—यौन-संबंध की प्रवृत्ति प्रत्येक प्राणी में पाई जाती है। वास्तव में सृष्टि का अस्तित्व ही इस पर निर्भर करता है। मनुष्य में भी काम-भावना प्रबल रूप से पाई जाती है। इस भावना की संतुष्टि के लिए ही स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के निकट आते हैं। यह एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है जो स्त्री और पुरुष दोनों में पाई जाती है। सभ्य समाजों में विवाह-संबंध द्वारा इस प्रवृत्ति की संतुष्टि होती है और परिवार का जन्म होता है, परंतु यह बात ध्यान रखने की है कि विवाह से पूर्व बनाए गए यौन-संबंधों द्वारा परिवार का जन्म नहीं होता।
  2. पति-पत्नी का संबंध-परिवार का विकास पति-पत्नी के यौन संबंध द्वारा होता है। बिना पति-पत्नी के संबंधों के परिवार की कल्पना नहीं की जा सकती। यह संबंध अनेक रूपों में हो सकता है। कुछ स्थानों पर यह संबंध एकविवाह-प्रथा के रूप में पाया जाता है तो कुछ में बहुविवाह-प्रथा के रूप में हो सकता है। स्त्री-पुरुष के संबंधों को नियमित करने वाली संस्था को ‘विवाह’ कहा जाता है।
  3. रक्त-संबंध-परिवार की एक अन्य विशेषता है कि उसके विभिन्न सदस्यों का एक-दूसरे से पर रक्त-संबंधों द्वारा जुड़ा होना। माता-पिता द्वारा जो संतान उत्पन्न होती है वह पूर्णतया उनके रक्त से संबंधित होती है। एक स्त्री के गर्भ से उत्पन्न समस्त संतानों में रक्त-संबंध होती  है। इस रक्त-संबंध से ही परिवार का जन्म होता है। वास्तव में, रक्त-संबंध बाबा, चाचा, चाची और उनकी संतान में भी अप्रत्यक्ष रूप से होता है।
  4. आर्थिक सुरक्षा–प्रत्येक परिवार अपने सदस्यों को शारीरिक सुरक्षा प्रदान करता है तथा अस्वस्थ होने पर उपचार की व्यवस्था करता है। प्रत्येक सदस्य के भोजन की व्यवस्था करना भी परिवार का कार्य हैं। परिवार में श्रम-विभाजन के नियमों का अनुसरण होता है, जिसको आधार लिंग तथा आयु है। स्त्रियाँ घर के खाने-पीने की व्यवस्था करती हैं तो पुरुष घर से बाहर अर्थोपार्जन में लगे रहते हैं। प्रत्येक परिवार की अपनी विशेष संपत्ति होती है जिस पर उसका अपना अधिकार होता है।
  5. निवास स्थान परिवार का चौथी महत्त्वपूर्ण विशेषता स्थायी निवास स्थान है। परिवार के समस्त सदस्य अपनी शारीरिक सुरक्षा तथा विभिन्न सुविधाओं के लिए एक ही घर या निवास स्थान में रहते हैं। आवश्यकता पड़ने पर या नौकरी के लिए परिवार का कोई सदस्य किसी स्थान पर चला जाए तो इससे परिवार की समाप्ति नहीं होती; क्योंकि इस प्रकार का जाना अस्थायी होता है।
  6. सभ्यता और संस्कृति का ज्ञान-परिवार बाल को सर्वप्रथम सामाजिक प्राणी बनने का पाठ पढ़ाता है। समाजीकरण के अभिकरण के रूप में परिवार का योगदान अद्वितीय है। माता-पिता द्वारा बालक सामाजिक संस्कृति का ज्ञान प्राप्त करता है तथा विभिन्न शिष्टाचारों से परिचित होता है। सामाजिकता की जो शिक्षा बालक को परिवार से प्राप्त होती है वह अन्य किसी संस्था से प्राप्त नहीं होती। परिवार बच्चे की प्रथम पाठशाला है।
  7. सार्वभौमिकता–परिवार एक ऐसा संघ है जो विश्व के समस्त समाजों में पाया जाता है। यदि हम अतीतकालीन इतिहास पर अध्ययन करें तो हमें ज्ञात होगा कि आदिकाल से ही परिवार का अस्तित्व चला आ रहा है। इसके स्वरूप में अवश्य परिवर्तन आया है, परंतु यह सभी समाजों में आज भी पाया जाता है। इसलिए यह कहा जाता है कि परिवार विश्व में पाई जाने वाली एक सार्वभौमिक इकाई है।
  8. सामाजिक सुरक्षा-परिवार के प्रत्येक सदस्य का परिवार में विशेष स्थान या पद होता है; जैसे माता-पिता, चाचा-चाची, भाई-बहिन इत्यादि। परिवार के सदस्य अपनी ही नहीं, अपितु परिवार की सामाजिक सुरक्षा के लिए भी जागरूक रहते हैं और इस बात का प्रयास करते हैं कि सामाजिक अपमान तथा दिवालिएपन आदि की नौबत न आ सके।
  9. भावात्मक आधार-परिवार की अन्य विशेषता उसका भावात्मक आधार है। यह मनुष्य की अनेक स्वाभाविक प्रवृत्तियों एवं भावनाओं पर आधारित होता है; जैसे-वात्सल्य, प्रेम, यौन सम्बन्ध, दया तथा ममता आदि। अन्य संस्थानों या संघों में इस प्रकार की प्रवृत्तियाँ नहीं पाई जातीं।
  10. स्थायी और अस्थायी प्रकृति-परिवार एक स्थायी संगठन भी है और अस्थायी भी। परिवार का निर्माण पति-पत्नी से होता है, परंतु यदि इनमें से किसी एक की मुत्यु हो जाती या तलाक हो जाता है तो परिवार भंग हो जाती है। इस पर भी संस्था के रूप में परिवार का स्वरूप स्थायी होता है क्योंकि एक परिवार के भंग हो जाने से परिवार नामक संस्था भंग नहीं हो जाती।
  11.  सीमित आकार-परिवार प्राणिशास्त्रीय दशाओं पर आधारित होता है। परिवार का सदस्य वही व्यक्ति बन पाता है जो कि उसमें जन्म लेता है। व्यक्ति विवाह द्वारा उसका सदस्य बनता है। प्रत्येक व्यक्ति किसी अन्य परिवार का सदस्य नहीं बन सकता। इन कारणों से परिवार का आकार सीमित होता है।

परिवार के भेद या प्रकार

परिवार का वर्गीकरण अनेक आधारों पर किया जाता है। यहाँ हम तीन प्रकार के प्रमुख वर्गीकरणों का ही उल्लेख करेंगे-
(अ) सत्ता, वंश तथा निवास स्थान के आधार पर वर्गीकरण
सत्ता, वंश तथा निवास स्थान के आधार पर परिवार को निम्नलिखित दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. पितृमूलक परिवार-इस प्रकार के परिवार में सबसे अधिक आयु का पुरुष परिवार का प्रधान होता है। वह प्रधान पुरुष (कर्ता) ही परिवार की देखभाल करता है तथा अन्य सदस्य उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। इस प्रकार के परिवार में स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त नहीं होते। वंश पिता (प्रधान) के नाम पर चलता है तथा पिता की संपत्ति का उत्तराधिकारी पुत्र होता है। पितृमूलक परिवार पितृसत्तात्मक होने के साथ-साथ पितृस्थानीय भी होते हैं अर्थात् वधू विवाह के पश्चात् अपने पति के घर रहती है। हमारे देश में अधिकांश परिवार पितृमूलक एवं पितृसत्तात्मक ही है।
  2. मातृमूलक परिवार–मातृमूलक परिवार में माता परिवार की प्रधान होती है और उसके नियंत्रण में शेष सदस्य रहते हैं। इस प्रकार के परिवार में पिता की अपेक्षा माता का अधिक महत्त्व होता है। वंश का नाम भी पत्नी अर्थात् स्त्री के नाम से चलता है। मातृमूलक परिवारों का चलन अब बहुत कम है। भारत में मालाबारे और असम में ही मातृमूलक परिवार पाए जाते हैं। ये परिवार मातृस्थानीय भी होते हैं अर्थात् विवाह के पश्चात् लड़का-लड़की वालों के घर रहने लगता है।

(ब) विवाह-प्रणाली के आधार पर वर्गीकरण
विवाह-प्रणाली के आधार पर परिवार को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. एकविवाही परिवार–इस प्रकार के परिवार में पति केवल एक ही विवाह करता है। आजकल इस प्रकार के परिवारों का ही अधिक प्रचलन है। ईसाइयों और यहूदियों में अतीतकाल से ही इस प्रकार के परिवार पाए जाते हैं।
  2. बहुपत्नी परिवार—जिस परिवार का पुरुष एक से अधिक पत्नियाँ रखता है वह बहुपत्नी परिवार कहलाता है। बहुविवाह का प्रचलन अनेक देशों में पाया जाता था। संपन्न लोग अपनी वासनों की पूर्ति के लिए तथा कई बार प्रतिष्ठा के रूप में एक से अधिक पत्नियाँ रखते थे। भारत के जमींदार, सामन्त तथा राजा-महाराजा इसके उदाहरण रहे हैं। इसके अलावा जब समाज में स्त्रियों की संख्या पुरुषों की अपेक्षा अधिक होती है तो एक पुरुष एक से अधिक स्त्रियाँ रखने पर मजबूर होता है, परंतु अब यह प्रथा हानिकारक होने के कारण धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।
  3. बहुपति परिवार इस प्रथा का प्रचलन स्त्रियों की कमी के कारण हुआ। इस प्रकार के परिवारों में अनेक पुरुषों के मध्य एक स्त्री रहती है। हमारे देश में टोडा और खस जनजाति में इस प्रकार के परिवार पाए जाते हैं। चकराता में निवास करने वाली खस जनजाति में सभी भाइयों की एक ही पत्नी होती है।

(स) संगठन के आधार पर वर्गीकरण
पारिवारिक संगठन या संरचना के आधार पर परिवार को अग्रलिखित दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकती है

  1. एकाकी परिवार-एकाकी परिवार में केवल पति-पत्नी तथा उनके अविवाहित बच्चे सम्मिलित होते हैं। इस प्रकार के परिवार प्रायः पाश्चात्य देशों में पाए जाते हैं। भारत में भी नगरीय क्षेत्रों में इस प्रकार के परिवारों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है।
  2. संयुक्त परिवार-संयुक्त परिवार एकाकी परिवार से आकार में बड़ा होता है। इस प्रकार के परिवार में पति-पत्नी, माता-पिता, चाचा-चाची, बेटे-बहू तथा पौत्र-प्रपौत्र आदि रहते हैं। परिवार का प्रधान (कर्ता) सबसे अधिक वृद्ध पुरुष होता है और उसी के द्वारा परिवार का संचालन होता है। हमारे देश में प्राचीनकाल में ही इस प्रकार के परिवारों के पाए जाने की उल्लेख मिलता है तथा आज भी ग्रामीण क्षेत्र में अधिकतर इसी प्रकार के परिवार पाए जाते हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions

प्रश्न 2.
परिवार के कार्यों को स्पष्ट कीजिए।
या
परिवार द्वारा किए जाने वाले कार्यों को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर
परिवार के कार्य अथवा महत्त्व सामाजिकता का प्रथम पाठ मनुष्य परिवार में ही पढ़ता है; अत: सबसे पहली सामाजिक संस्था परिवार ही है, जो शिक्षा प्रदान करने का कार्य करती है और बच्चे को समाज में रहने योग्य बनाती है। संक्षेप में, व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में परिवार का महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है। परिवार का महत्त्व इसके द्वारा निष्पादित निम्नलिखित कार्यों से आँका जा सकता है-

(1) प्राणिशास्त्रीय कार्य
परिवार के प्राणिशास्त्रीय कार्य निम्नलिखित हैं-

  1. यौन-इच्छा की पूर्ति-परिवार का प्रथम कार्य स्त्री-पुरुष की यौन इच्छा की पूर्ति करना है। यह सत्य है कि व्यक्ति परिवार के बाहर भी अपनी काम-इच्छा की पूर्ति कर सकता है, परंतु उसका यह कृत्य पूर्णतया असामाजिक माना जाता है। विवाह के द्वारा ही समाज स्त्री-पुरुष के यौन-संबंधों को सामाजिक स्वीकृति प्रदान करता है।
  2. सन्तानोत्पत्ति-संतान की कामना करना प्रत्येक स्त्री-पुरुष के लिए स्वाभाविक है। परिवार मनुष्य की इस जन्मजात इच्छा को पूरा करता है। पति-पत्नी के यौन-संबंधों की स्थापना के पश्चात् संतान की उत्पत्ति होती है। विवाह तथा परिवार की संस्थाओं के दायरे में उत्पन्न हुई। संतान को वैध सन्तान माना जाता है।
  3.  संतान का लालन-पालन-जन्म के समय शिशु पूर्णतया अबोध होता है। उसके लालन-पालन और भरण-पोषण का कार्य परिवार द्वारा ही होता है। यदि परिवार द्वारा बालक की उपेक्षा की जाए, तो उसकी मृत्यु तक हो सकती है। परिवार का कार्य केवल प्रजनन अथवा संतानोपत्ति ही नहीं है, अपितु संतान का लालन-पालन भी है।
  4. भोजन की व्यवस्था परिवार अपने सदस्यों के लिए भोजन की व्यवस्था करता है, जो सभी की एक मौलिक एवं आधारभूत आवश्यकता है। सदस्यों में पाया जाने वाला प्रारम्भिक सहयोग इसमें सहायता प्रदान करता है।
  5. जीवन की सुरक्षा-परिवार के सदस्य परस्पर मिलकर रहते हैं और एक-दूसरे की सुरक्षा तथा रोग-निवारण में योगदान प्रदान करते हैं। परिवार का प्रत्येक सदस्य परिवार में अपने को हर प्रकार से सुरक्षित अनुभव करता है। यह एक प्रकार से सदस्य के लिए सामाजिक बीमा है।
  6.  वस्त्रों की व्यवस्था–परिवार अपने सदस्यों के लिए वस्त्रों की भी व्यवस्था करता है। यह भी एक मौलिक व आधारभूत आवश्यकता है।
  7. निवास की व्यवस्था परिवार के सदस्य भली प्रकार सुरक्षित जीवन व्यतीत कर सकें, इसके लिए परिवार निवास स्थान या घर की भी व्यवस्था करता है।

(2) सामाजिक कार्य
परिवार के अनेक प्रकार के सामाजिक कार्य हैं। इसके प्रमुख सामाजिक कार्य निम्नांकित हैं-

  1. बालक का समाजीकरण—परिवार का प्रमुख तथा महत्त्वपूर्ण सामाजिक कार्य बालक का सामाजीकरण करना है। जन्म लेने के पश्चात बालक में अनेक पाशविक प्रवृत्तियाँ होती हैं। परिवार के वातावरण द्वारा ही इन प्रवृत्तियों का शोधन एवं मार्गन्तीकरण होता है, जिससे वह एक सामाजिक प्राणी बनता है। अन्य लोगों से व्यवहार करना, उठने-बैठने तथा बात करने का शिष्टाचार आदि बालक परिवार से ही सीखता है। बाल्यावस्था में ही नहीं, बल्कि जीवन भर परिवार किसी-न-किसी रूप में समाजीकरण की प्रक्रिया में योगदान प्रदान करता है।
  2. सामाजिक विरासत का हस्तांतरण व प्रसार करना–परिवार सामाजिक विरासत को प्रसार एवं हस्तांतरण करता है। यह जनरीतियाँ, कानून, विश्वास, रूढ़ियाँ, नैतिक नियम, शिक्षा आदि को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को प्रदान करता है तथा उनका संग्रह और विस्तार करता है।
  3. सदस्यों को सामाजिक स्थिति प्रदान करना–परिवार की स्थिति के अनुसार उसके सदस्यों को समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। परिवार की सामाजिक स्थिति के अनुसार ही यह निश्चित किया जाता है कि उसके सदस्यों को किन-लोगों में उठना-बैठना चाहिए। वैवाहिक संबंधों की स्थापना भी इसी आधार पर की जाती है।
  4. सदस्यों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना-परिवार अपने सदस्यों के सामाजिक अपमान दिवालिएपन आदि से सुरक्षा प्रदान करने का प्रयास करता है। परिवार ही एक ऐसा संगठन है। जो व्यक्ति के सामाजिक सम्मान की सुरक्षा के प्रति चिंतित रहता है तथा उसे यथासंभव सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है।
  5. जीवनसाथी के चुनाव में सहायक–परिवार अपने सदस्यों के विवाह या जीवनसाथी के चुनाव . में योगदान प्रदान करता है। इस प्रकार परिवार एक अन्य परिवार को जन्म देता है।
  6. सामाजिक नियंत्रण में सहायक–परिवार सामाजिक नियंत्रण का एक महत्त्वपूर्ण तथा प्रबल अभिकरण है। परिवार अपने सभी सदस्यों के व्यवहारों को निरंतर रूप से नियंत्रित करता रहता है तथा व्यक्ति के असामाजिक कार्यों पर प्रतिबंध लगाता है। परिवार द्वारा लागू किया गया नियंत्रण अनौपचारिक तथा अधिक प्रभावशाली होता है।

(3) मनोवैज्ञानिक कार्य
परिवार द्वारा अनेक प्रकार के मनोवैज्ञानिक कार्य भी किए जाते हैं। इनमें से प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-

  1. परिवार बालकों को मानसिक सुरक्षा प्रदान करता है।
  2. परिवार बालकों का संवेगात्मक विकास उचित दिशा में करता है।
  3. परिवार में अनेक मूलप्रवृत्तियों की संतुष्टि होती है। काम, वात्सल्य, सहानुभूति तथा प्रेम इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
  4. अनेक मानसिक प्रक्रियाएँ; जैसे-जिज्ञासा, निरीक्षण, प्रत्यक्षीकरण, तर्क, विचार आदि का विकास परिवार में ही होता है।

(4) धार्मिक कार्य
परिवार वह स्थल है जहाँ अनेक धार्मिक एवं आध्यात्मिक बातों की पृष्ठभूमि तैयार होती है। परिवार के समस्त सदस्य सामान्य रीति से ईश्वर की उपासना करते हैं। छोटे-छोटे बालक अपने माता-पिता से कहानियाँ सुनकर ईश्वर और अध्यात्मक संबंधी ज्ञान प्राप्त करते हैं। माता-पिता के धार्मिक आचरण बालकों को प्रभावित करते हैं और वे अनुकरण द्वारा अनेक धार्मिक क्रियाएँ सीख जाते हैं। परिवार में आयोजित होने वाले धार्मिक उत्सवों द्वारा भी बालकों को धर्म को ज्ञान प्राप्त होता है।

(5) आर्थिक कार्य
परिवार द्वारा किए जाने वाले प्रमुख आर्थिक कार्य निम्नांकित हैं-

  1. श्रम-विभाजन-परिवार के अधिकांश कार्य श्रम-विभाजन पर आधारित रहते हैं। परिवार का प्रत्येक सदस्य अपनी योग्यता और क्षमता तथा लिंग और आयु के आधार पर अपना-अपना कार्य करता है। पिता द्वारा प्रायः धनोपार्जन होता है तो माता घर में खाने-पीने तथा सफाई आदि की प्रबंध करती है। पुत्र साग-सब्जी तथा सौदा आदि लाते हैं तो बेटियाँ अपनी माँ के घरेलू कार्यों में सहयोग प्रदान करती हैं। इस प्रकार जहाँ एक ओर परिवार के सभी कार्य सुविधापूर्वक हो जाते हैं वहीं साथ-ही-साथ प्रत्येक व्यक्ति को पारस्परिक कार्यों का ज्ञान भी प्राप्त हो जाता है।
  2. व्यावसायिक प्रशिक्षण–पविावर में बालक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करता है। पिता यदि दुकानदान, लुहार या बढ़ई है तो बालक बचपन से ही उसके साथ रहकर उसके व्यवसाय में दक्षता प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रकार परिवार व्यावसायिक प्रशिक्षण देने का कार्य करता है।
  3. उत्पादन की प्रेरणा-परिवार अपने सदस्यों को आर्थिक उत्पादन की प्रेरणा प्रदान करता है। प्रत्येक सदस्य परिवार की देशी को सुधारने हेतु कुछ-न-कुछ आर्थिक उत्पादन की चेष्टा करता है।
  4. आर्थिक क्रियाओं का केंद्र–अतीतकाल से ही परिवार विभिन्न आर्थिक क्रियाओं का केंद्र रहा है। सर्वप्रथम आर्थिक क्रियाओं का प्रारंभ परिवार से ही हुआ और वहीं से उनका प्रसार समाज के विभिन्न क्षेत्रों में हुआ।
  5. उत्तराधिकार का निश्चय–परिवार में संपत्ति के उत्तराधिकार का भी निश्चय होता है। गृह-विभाजन किस प्रकार का हो, इसका निश्चय परिवार में ही होता है।

(6) शैक्षिक कार्य
परिवार को बच्चों की प्रथम पाठशाला कहा गया है। आगस्त कॉम्टे के शब्दों में, “परिवार सामाजिक जीवन की अमर पाठशाला है।” पेस्तोलॉजी के अनुसार, “परिवार शिक्षा का सबसे उत्तम और बालक का प्रथम विद्यालय है। वास्तव में, परिवार में बालक अपने माता-पिता तथा बड़ों का अनुकरण करके अनेक बातें सीखता है तथा अपना बौद्धिक विकास करता है। प्राचीन समाजों में शिक्षा संस्थाओं का कार्य भी परिवार ही करते हैं तथा आज भी अनौपचारिक शिक्षा प्रदान करने में परिवार महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

(7) सांस्कृतिक कार्य
परिवार का संस्कृति के विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। परिवार में रहकर बालक अपनी संस्कृति से परिचित होता है। परिवार का सांस्कृतिक वातावरण बालक को समाज की संस्कृति का ज्ञान कराता है। बालक अनुसरण द्वारा भाषा और अन्य संस्कृति संबंधी बातें सीखते हैं और उन्हें अपने जीवन का अंग बनाते हैं। रीति-रिवाज, परंपराओं तथा रीतियों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ परिवार बालकों को उनका ज्ञान भी कराता है। परिवार ही सामाजिक एवं सांस्कृतिक विरासत का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरण करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।

(8) राजनीतिक कार्य
परिवार एक प्रशासकीय इकाई भी है। अन्य शब्दों, यदि परिवार को राज्य का छोटा रूप कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा। भूमि, जनसंख्या, सरकार आदि राज्य के आवश्यक तत्त्व परिवार में उपस्थित रहते हैं। जिस प्रकार राज्य में प्रभुत्त्व सर्वोच्च होता है उसी प्रकार परिवार में प्रधान (कर्ता) को प्रभुत्व सर्वोच्च होता है। उसकी आजा का पालन प्रत्येक सदस्य को करना पड़ता है। परिवार की पंरपराओं और नियमों का पालन प्रत्येक सदस्य उसी प्रकार करता है जिस प्रकार राज्य के कानूनों का पालन प्रत्येक नागरिक करता है। सिडनी ई० गोल्डस्टीन (Sydme E. Goldstein) के शब्दों में, “परिवार वह झूला है जिसमें भविष्य का जन्म होता है और वह शिशुगृह है जिसमें नवीन प्रजातंत्र का विकास होता है।’

(9) मनोरंजनात्मक कार्य
मनुष्य के जीवन में मनोरंजन का भी अपना अलग महत्त्व है। मनुष्य के लिए दिन भर परिश्रम करने के पश्चात मनोरंजन करना आवश्यक हो जाता है। मनोरंजन से शरीर की थकावट दूर होती है तथा शरीर में स्फूर्ति आती है। परिवार स्वस्थ मनोरंजन का प्रमुख केंद्र रहा है। थका हुआ व्यक्ति घर में अपने बाल-बच्चों के बीच बैठकर आनंद और स्फूर्ति का अनुभव करता है। छोटे बालक अपने दादा तथा दादी से कहानियाँ आदि सुनकर अपना मनोरंजन करते हैं। देवर-भाभी तथा ननद-भाभी के कुछ रिश्ते बहुत मधुर होते हैं तथा परिवार में रहकर इन रिश्तों वाले सदस्य भरपूर आनंद उठाते हैं।

(10) नागरिकता का प्रशिक्षण स्थल
मैजिनी के अनुसार, “बालक नागरिकता का फ्रथम पाठ माता के चुंबन तथा पिता के संरक्षण के मध्य सीखता है। परिवार बालक में अनेक नागरिकता के गुणों का विकास करता है। इस संबंध में परिवार के प्रमुख कार्य अग्रांकित हैं-

  1. स्नेह की शिक्षा–स्नेह की शिक्षा बालक सर्वप्रथम माता के चुंबन और पिता के दुलार से सीखता है। टी० रेमण्ड का यह कथन पूर्णतया सत्य है कि “घर में ही घनिष्ठ प्रेम की भावनाओं का विकास होता है। माता-पिता का स्नेह बालक में भी प्रेम के बीज डाल देता है। बालक भी अपने माता-पिता से प्रेम करना सीख जाता है। भविष्य में यही पारिवारिक प्रेम व्यापक होकर सामाजिक प्रेम में परिणत हो जाता है।”
  2. सहानुभूति की शिक्षा-परिवार में माता-पिता बालक के दु:ख को देखकर तुरंत चिंतित हो उठते हैं और दौड़-भाग कर उनके दु:ख को दूर करने का प्रयास करते हैं। इसी सच्ची सहानुभूति का प्रदर्शन बालक पर अत्यन्त गहरा प्रभाव डालता है और वह भी समय अनुसार परिवार के सदस्यों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करता है।
  3.  निःस्वार्थता की शिक्षा–माता-पिता अपने बालक से नि:स्वार्थ प्रेम करते हैं और माता-पिता उनका लालन-पालन किसी स्वार्थ की भावना से नहीं करते। इससे परिवार के सदस्यों में नि:स्वार्थता के गुण का विकास होता है।
  4. सहयोग की शिक्षा-सामाजिक जीवन में सहयोग का विशेष महत्त्व है। सामाजिक जीवन का आधार सहयोग ही है। बालक सहयोग का प्रथम पाठ परिवार में ही पढ़ता है; क्योंकि वह देखता है कि परिवार के समस्त सदस्य मिलजुलकर घर का कार्य करते हैं। विद्वान बोसो के अनुसार, परिवार वह स्थान है, जहाँ प्रत्येक नई पीढ़ी नागरिकता का या नया पाठ सीखती है कि कोई भी मनुष्य बिना सहयोग के जीवित नहीं रह सकता।”
  5. कर्तव्यपालन और आज्ञापालने की शिक्षा–आज्ञापालन और कर्तव्यपालन की शिक्षा भी बालक परिवार में ही सीखता है। प्रत्येक बालक अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करना अपना कर्त्तव्य समझता है। इस प्रकार वह अनुशासन का पाठ सीखता है।। निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि परिवार समाज की एक आधारभूत इकाई है। परिवारों का वर्गीकरण विविध आधारों पर किया गया है। परिवार प्राणिशास्त्रीय आवश्यकताओं को पूरा करके तथा अन्य सभी कार्यों के कारण समाजीकरण का एक प्रमुख अभिकरण माना जाता है। परिवार को इसीलिए बच्चे की प्राथमिक पाठशाला भी कहा जाता है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions

प्रश्न 3.
विवाह का क्या अर्थ है? विवाह के प्रमुख उद्देश्यों एवं प्रकारों की विवेचना कीजिए।
या
विवाह को परिभाषित कीजिए। विवाह कितने प्रकार के होते हैं? संक्षेप में बताइए।
उत्तर
मानव समाज में विवाह एक प्राचीन तथा महत्त्वपूर्ण संस्था है जो कि सार्वभौमिक है; अर्थात् सभी समाजों में किसी-न-किसी रूप में पाई जाती है। हिंदू समाज में तो इसे विशेष महत्त्व प्रदान किया गया है। आश्रम व्यवस्था में गृहस्थ आश्रम में विवाह द्वारा प्रवेश करना एक अनिवार्य कर्म ठहराया गया है। प्रायः विवाह का मुख्य उद्देश्य स्त्री तथा पुरुष के यौन-संबंधों को नियंत्रित तथा नियमित करना माना जाता है। परंतु हिंदू धर्म के अनुसार, विवाह के एक नहीं वरन् अनेक उद्देश्य है, जिनमें धर्म तथा प्रजा (संतान) अनिवार्य हैं और यौन-संबंधों की संतुष्टि अंतिम उद्देश्य है।

विवाह का अर्थ एवं परिभाषाएँ

विवाह समाज द्वारा मान्यता प्राप्त एक सामाजिक संस्था है, जिसमें स्त्री-पुरुष को काम-वासना की संतुष्टि के लिए समाज द्वारा स्वीकृत प्रदान की जाती है। समाज की यह स्वीकृति कुछ संस्कारों को पूरा करने के पश्चात् ही प्राप्त होती है। इस अर्थ में विवाह यौन-संबंधों के नियंत्रण एवं नियमन का साधन है। अन्य शब्दों में, समाज द्वारा अनुमोदित स्त्री-पुरुष के संयोग को विवाह कहते हैं। विभिन्न समाजाशास्त्रियों ने इसे निम्न प्रकार परिभाषित किया है-

  1. जेम्स (James) के अनुसार-“विवाह मानव समाज में सार्वभौमिक रूप से पाई जाने वाली संस्था है जो कि यौन-संबंध, गृह-संबंध, प्रेम तथा मानवीय स्तर पर व्यक्तित्व के जैविकीय, मनोवैज्ञानिक सामाजिक, नैतिक व आध्यात्मिक विकास की आवश्यकताओं को पूरा करती है।”
  2. जेकब्स एवं स्टर्न (Jacobs and Stern) के अनुसार–“विवाह एक अथवा अनेक पति तथा पत्नियों के सामाजिक संबंध का नाम है। विवाह उस संस्कार का भी नाम है, जिसके द्वारा पति-पत्नी आपस में सामाजिक संबंधों में बँधे होते हैं।”
  3. वेस्टरमार्क (Westermarck) के अनुसार-“विवाह एक या अधिक पुरुषों का एक अथवा अधिक स्त्रियों के साथ होने वाला वह संबंध है, जो प्रथा व कानून द्वारा स्वीकृत होता है और जिसमें संगठन में आने वाले दोनों पक्षों तथा उनसे उत्पन्न बच्चों के अधिकारों व कर्तव्यों का समावेश होता है।”
  4. बोगार्डस (Bogardus) के अनुसार-“विवाह स्त्रियों और पुरुषों को पारिवारिक जीवन में प्रवेश कराने वाली संस्था है।”
  5. मैलिनोव्स्की (Malinowski) के अनुसार–‘विवाह केवल यौन-संबंधों को अपनाना नहीं है, अपितु यह सामाजिक संस्था है, जो मिश्रित सामाजिक परिस्थितियों पर आश्रित है।”
  6. गिलिन एवं गिलिन (Gillin and Gillin)के अनुसार-“विवाह एक प्रजननमूलक परिवार की स्थापना का समाज-स्वीकृत तरीका है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि विवाह एक सामाजिक संस्था है, जिसके अंतर्गत स्त्री-पुरुष समाज द्वारा मान्यता प्राप्त ढंग से आपस में पति-पत्नी के रूप में यौन-संबंध स्थापित करके स जान को जन्म देते हैं तथा उनका समुचित पालन-पोषण करते हैं।

विवाह के प्रमुख उद्देश्य

विवाह के कुछ सर्वमान्य उद्देश्य हैं जो कि इस संस्था द्वारा समाज में पूरे किए जाते हैं। विवाह के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  1. यौन-सुख की प्राप्ति-प्रायः विवाह का उद्देश्य यौन-सुख प्राप्त करना माना जाता है। विवाह व्यक्ति को समाज द्वारा स्वीकृत तरीके से अपनी यौन-इच्छा की तृप्ति करने का अवसर प्रदान करता है। विवाह संस्था के अंतर्गत स्थापित हुए यौन-संबंधों को ही समाज द्वारा मान्यता प्रदान की जाती है।
  2. संतानोत्पत्ति तथा बच्चों को सामाजिक स्थिति प्रदान करना—विवाह का दूसरा उद्देश्य संतान उत्पन्न करना है; क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने वंश की निरंतरता को बनाए रखना चाहता है। विवाह द्वारा उत्पन्न संतान ही उसके वंश को चलाती है। विवाह के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई संतान को सामाजिक एवं वैधानिक मान्यता प्राप्त होती है।
  3. परिवार का निर्माण करना—विवाह केवल यौन-इच्छा की संतुष्टि का साधन-मात्र ही नहीं है, अपितु इससे स्त्री और पुरुष पत्नी एवं पति के रूप में परिवार का निर्माण करते हैं। वास्तव में विवाह का सर्वप्रथम उद्देश्य परिवार का निर्माण करना ही है।।
  4. मनोवैज्ञानिक उद्देश्य–विवाह का उद्देश्य स्त्री-पुरुष को मानसिक संतोष प्रदान करना भी है। मानसिक संतोष के कारण ही परिवार का सदस्य बड़े-से-बड़ा दु:ख सहन करने को तैयार रहते हैं।
  5. आर्थिक तथा सामाजिक उद्देश्य–कुछ विद्वानों के अनुसार विवाह का उद्देश्य आर्थिक तथा सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना भी है। स्त्री-पुरुष विवाह द्वारा गृहस्थी का निर्माण करते हैं तथा गृहस्थी चलाने हेतु आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से भी परस्पर सहयोग देते हैं। यह उद्देश्य अन्य उद्देश्यों की अपेक्षा कम महत्त्वपूर्ण है।
  6. संबंधों में स्थायित्व-विवाह का एक अन्य उद्देश्य स्त्री-पुरुष संबंधों में स्थायित्व लाना है। क्योंकि विवाह संस्था समाज द्वारा स्वीकृत होती है, इसलिए यह समाज में स्थायी संबंधों की स्थापना और उन्हें स्थायित्व प्रदान करने में सहायक है।

विवाह के प्रमुख स्वरूप या प्रकार

विवाह एक अत्यंत प्राचीन संस्था है। मानव समाज में इसके अनेक रूप मिलते हैं जिनमें से प्रमुख निम्न प्रकार हैं-

1. एकविवाह-एकविवाह से तात्पर्य उस विवाह से है, जिसमें एक पुरुष केवल एक ही स्त्री से विवाह करें तथा इसी प्रकार एक स्त्री केवल एक ही पुरुष से विवाह करे। इस विवाह को आदर्श विवाह माना गया है; क्योंकि इसमें एक व्यक्ति की एक ही पत्नी हो सकती है, जिस पर उसका यौन-संबंधों के बारे में पूर्ण अधिकार होता है। केवल पत्नी की मुत्यु के पश्चात् पति तथा पति की मृत्यु के पश्चात् पत्नी को दूसरा विवाह करने का अधिकार होता है। तलाक के पश्चात् भी दूसरा विवाह किया जा सकता है। सभी सभ्य समाजों में एकविवाह प्रथा का ही प्रचलन है। वेस्टरमार्क तथा मैलिनोव्स्की जैसे विद्वानों ने एकविवाह को ही विवाह का सच्चा व आदि स्वरूप माना है।।
2.बहुविवाह-बहुविवाह वह विवाह है, जिसमें कई पुरुष एक स्त्री से या कई स्त्रियाँ एक पुरुष से विवाह करती हैं। यदि जीवनसाथी की संख्या एक से अधिक है तो उसे बहुविवाह कहा जाता है। बहुविवाह के निम्नलिखित दो रूप होते हैं|

  1. बहुपत्नी विवाह-इस विवाह में एक पुरुष एक ही समय में एक से अधिक स्त्रियों से विवाह करता है। बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन मुख्यतया धनी वर्ग, मुसलमानों तथा कुछ जनजातियों में पाया जाता है, परंतु अब इस प्रकार के विवाह का प्रचलन कम होता जा रहा है। इस प्रकार के विवाह के अनेक कारण है; जैसे—प्रथम पत्नी से संतान का न होना, किसी समाज में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या अधिक होना, स्त्रियों की स्थिति निम्न होना, सामाजिक मान्यताओं द्वारा स्वीकृत तथा कुछ लोग सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए भी अनेक पत्नियाँ रखते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ पुरुषों का अधिक कामुक प्रवृत्ति का होना भी बहुपत्नी विवाह का एक कारण है।
  2. बहुपति विवाह-इसमें एक स्त्री एक समय में एक से अधिक पुरुषों से विवाह करती है। बहुपति प्रथा का प्रचलन सभ्य समाज में नहीं है। कुछ जनजातियों (जैसे खस इत्यादि) में इस तरह का विवाह पाया जाता है। इस प्रकार के विवाह के कारण भी अनेक होते हैं; जैसे—प्रथम, जब किसी समाज में स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों की संख्या
    अधिक होती है। दूसरे, कहीं-कहीं आर्थिक कारणों तथा निर्धनता के कारण प्रत्येक व्यक्ति के लिए पृथक् रूप से परिवार बसाना संभव नहीं होता, इसलिए अनेक पुरुष मिलकर एक परिवार बसाते हैं जैसा कि लद्दाख में होता है। तीसरे, जब वधू-मूल्य अधिक होता है, तब भी इस प्रकार के विवाह किए जाते हैं। बहुपति विवाह भी दो प्रकार के हो सकते हैं—प्रथम प्रकार हैं भ्रातृक बहुपति विवाह तथा द्वितीय है अभ्रातृक बहुपति बिवाह। प्रथम प्रकार के विवाह में एक स्त्री के सभी पति आपस में भाई होते हैं।
    तथा द्वितीय प्रकार में ये पति कोई अन्य भी हो सकते हैं।

3. समूह विवाह-उविकासवादियों के अनुसार प्रारंभिक अवस्था में समूह विवाहों का प्रचलन था जैसा कि इस विवाह के नाम से ही स्पष्ट है; इसमें पुरुषों का एक समूह स्त्रियों के एक समूह से विवाह कर लेता है। यह विवाह समूह के किसी पुरुष विशेष एवं स्त्री विशेष में न होकर दो संपूर्ण समूहों के स्तर पर होता है। इसमें प्रत्येक पुरुष, प्रत्येक स्त्री से यौन-संबंध स्थापित करने के लिए स्वतंत्र होता है। समूह विवाह जनजातियों में पाया जाता था तथा यह विवाह के प्रारंभिक रूप का द्योतक माना गया है। ली तथा ली (Lee and Lee) के अनुसार समूह विवाह से तात्पर्य उस विवाह से हैं, जिसमें एक ही समय में दो या दो से अधिक पुरुष दो तथा दो से अधिक स्त्रियाँ परस्पर विवाह करते हैं। वेस्टरमार्क के अनुसार तिब्बत, भारत व लंका में यह विवाह पाया जाता था। विवाह के इस प्रकार का उल्लेख ऑस्ट्रेलिया की जनजातियों में भी मिलता है, जहाँ एक कुल की सभी लड़कियाँ दूसरे कुल की भावी पत्नियाँ समझी जाती हैं।

कुछ विद्वानों ने समूह विवाह को साम्यवाद एवं समानतावाद का द्योतक माना है, परंतु इस प्रकार के विवाह वस्तुतः विवाह के वास्तविक अर्थ से ही मेल नहीं खाते हैं। इसके परिणामस्वरूप समूहों में अस्थायित्व एवं संघर्ष की भावना विकसित होती है। यद्यपि उविकासवादी इसकी कल्पना विवाह एवं परिवार के प्रारंभिक रूप में करते हैं, तथापि आजकल इस प्रकार के विवाह अशोभनीय माने जाते हैं। शायद इसलिए विश्व में अब इस प्रकार के विवाह नहीं पाए जाते हैं।

प्रश्न 4.
हिंदू विवाह के परंपरागत निषेध कौन-कौन से हैं? इन निषेधों में आजकल सर्वाधिक प्रभावी निषेध कौन-सा है? स्पष्ट रूप से समझाइए।
या
अनुलोम तथा प्रतिलोम विवाह की विवेचना कीजिए।
या
अंतर्विवाह तथा बहिर्विवाह नियमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
प्रत्येक समाज विवाह के संबंध में कुछ नियमों का पालन करता है। ये नियम दो प्रकार के होते हैं—प्रथम, वे नियम जो यह तय करते हैं कि विवाह कहाँ किया जाए तथा दूसरे, वे नियम जो यह बताते हैं कि विवाह कहाँ नहीं किया जाए। हिंदू समाज में भी इस प्रकार के नियमों का पालन होता है; जिन्हें ‘हिंदू विवाह के निषेध’ कहा जाता है।

हिंदू विवाह के प्रमुख निषेध

हिंदू विवाहों में पाए जाने वाले निषेध चार प्रकार के हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित हैं-

(अ) अनुलोम अथवा कुलीन विवाह
अनुलोम या कुलीन विवाह उस विवाह को कहते हैं, जिसमें उच्च वर्ण का पुरुष निम्न वर्ण की कन्या से विवाह करता है। रिजले के अनुसार, “क्योंकि आर्यों में स्त्रियों की कमी थी अतः उन्होंने यहाँ के मूल निवासियों की कन्याओं से विवाह किया, परंतु अपनी प्रजातीय श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए अपनी कन्याएँ मूल निवासियों को नहीं दीं।” ‘महाभारत’ में लिखा है कि “ब्राह्मण तीन वर्ण अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की कन्या से, क्षत्रिय दो वर्ण अर्थात् क्षत्रिय तथा वैश्य की कन्या से और वैश्य अपने ही वर्ण की कन्या से विवाह करे तो उत्तम संतान उत्पन्न होती है। यह विवाह शास्त्रों के अनुसार ही मान्य रहा है। इस प्रकार के विवाहों ने बहुविवाह या बहुपत्नी प्रथा को जन्म दिया, जिसके परिणामस्वरूप उच्च वर्ग के लोग एक से अधिक पत्नियाँ रखने लगे। उच्च वर्ण के लड़कों की माँग बढ़ गई जिसके परिणामस्वरूप दहेज प्रथा को प्रोत्साहन मिला। इसने स्त्रियों के स्तर को निम्न कर दिया। अनुलोम विवाहों ने संतानों की समस्याओं को भी जन्म दिया। विषम जाति के माता-पिता से
उत्पन्न बच्चों को हीन दृष्टि से देखा जाने लगा।

(ब) प्रतिलोम विवाह
प्रतिलोम विवाह एक प्रकार से अनुलोम विवाह का विपरीत होता है। यह विवाह हिंदू विवाह संबंधी वह नियम है जिसकी सहायता से निम्न वर्ण अथवा कुल के लड़के का विवाह उसमें उच्च वर्ण अथवा उच्च कुल की लड़की के साथ होना अवैध और निंदनीय समझा गया है अथवा समझा जाता है। स्मृतिकार प्रतिलोम विवाहों का उग्रता के साथ विरोध करते हैं। ब्राह्मण कन्या का शूद्र पुरुष के साथ विवाह विशेष रूप से निषिद्ध बताया गया है। यदि कोई शूद्र, ब्राह्मण कन्या से संबंध स्थापित कर लेता है तो स्मृतिकारों के अनुसार उसे सार्वजनिक स्थान पर कठोर दंड दिया जाना चाहिए। वर्तमान युग में इस प्रकार के बंधन समाप्त हो गए हैं।

यद्यपि प्राचीनकाल में केवल अनुलोम विवाह को ही मान्यता प्राप्त थी, प्रतिलोम विवाह को नहीं, परंतु समकालीन समाज में वर्ण व्यवस्था की महत्ता कम होने के कारण इन दोनों प्रकार के विवाहों की महत्ता कम हो गई है। आज अंतर्जातीय विवाहों को मान्यता प्राप्त होती जा रही है। राष्ट्रीय एकीकरण के लिए इन्हें प्रोत्साहन देना आवश्यक भी है।

(स) अंतर्विवाह
अंतर्विवाह का अर्थ है किसी व्यक्ति का समूह, वर्ण या जाति के अंदर ही विवाह करना। प्राचीनकाल में वर्ण व्यवस्था का प्रचलन था अतः लोग सामान्यतया अपने वर्ण में ही विवाह करते थे, परंतु धीरे-धीरे अनेक जातियों का विकास हो गया और लोग अपनी जाति के अंतर्गत विवाह करने लगे। उदाहरण के लिए ब्राह्मणों में गौड़ ब्राह्मण केवल गौड़ ब्राह्मणों में ही विवाह करते हैं। इस प्रकार अंतर्विवाह एक ऐसी वैवाहिक मान्यता है जिसमें एक स्त्री अथवा पुरुष को अपनी ही जाति अथवा उपजाति में विवाह करने का नियम होता है। अन्य शब्दों में, हिंदू समाज में एक व्यक्ति को अपनी जाति से बाहर विवाह करने का निषेध है। इसी निषेध के पालन के लिए अंतर्विवाही समूहों का निर्माण किया गया। जाति प्रथा की परिभाषा के अनुसार, जाति एक अंतर्विवाही समूह है। इस प्रकार के निषेधों का प्रमुख कारण प्रजातीय शुद्धता, रक्त की शुद्धता तथा जातीय संगठन को दृढ़ बनाने की इच्छा प्रमुख रहे हैं।
यद्यपि आज अधिकांशतया अंतर्विवाही मान्यताओं का पालन तो किया जाता है, तथापि अंतर्जातीय विवाहों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं–

  1. सह-शिक्षा के प्रसार एवं युवक-युवतियों के पारस्परिक संपर्क ने विवाह के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन किया है।
  2. शिक्षा के प्रसार ने जनसाधारण को अंधविश्वास और अज्ञानता से मुक्त कर दिया है।
  3. औद्योगीकरण तथा नगरीकरण के कारण दृष्टिकोण के व्यापक होने का परिणाम।
  4. दैहेज प्रथा के दोषों के कारण।
  5. व्यावसायिक कार्यालयों तथा महाविद्यालयों में स्त्री-पुरुषों का साथ-साथ काम करना।
  6. यातायात के साधनों के विकास का कारण।
  7. युवक व युवतियों में स्वयं जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्र प्रवृत्ति।।
  8. विभिन्न सामाजिक सुधारों के प्रभाव।

(द) बहिर्विवाह
बहिर्विवाह का तात्पर्य है, अपने रक्त-समूह आदि के अंतर्गत आने वाले सदस्य से विवाह न करना। इस मान्यता के अनुसार विवाह अपने प्रवर, गोत्र और सपिंड वाले परिवारों में नहीं किया जा सकता। हिंदुओं में तीन प्रकार के बहिर्विवाह का प्रचलन है-
1. प्रवर बहिर्विवाह-‘प्रवर’ शब्द का अर्थ है आह्वान करना। वैदिक काल में पुरोहित जिस समय अग्नि प्रज्वलित करते थे, उस समर्म-अपने ऋषि-पूर्वजों को नाम लेते थे। आगे चलकर एक ऋषि का आह्वान करके यज्ञ करने वाले व्यक्ति परस्पर एक-दूसरे को संबंधी समझने लगे। यह सत्य है कि ये संबंध धार्मिक भावना पर आधारित थे, पंरतु इस पर भी वे अपने को एक वंश का सदस्य समझने लगे। ये सभी सदस्य प्रवर माने जाने लगे और उनमें आपस में विवाह संबंध
का निषेध हो गया।

2. गोत्र बहिर्विवाह-गोत्र बहिर्विवाह को ठीक प्रकार से समझने के लिए आवश्यक है कि ‘गोत्र के अर्थ को समझा जाए। मजूमदार व मदन के शब्दों में, “एक गोत्र अधिकांश रूप से कुछ वंश-समूहों का योग होता है, जो अपनी उत्पत्ति एक कल्पित पूर्वज से मानते हैं। यह पूर्वज मनुष्य, मनुष्य के समान पशु, पेड़, पौधा या निर्जीव वस्तु हो सकता है। गोत्र के संबंध में यह प्रथा प्रचलित है कि एक ही गोत्र के व्यक्तियों के बीच में निकट रक्त-संबंध होते हैं। इसलिए एक ही गोत्र के सभी युवक-युवतियाँ एक-दूसरे के भाई-बहन हैं। अतः सगोत्र अथवा अंत:गोत्र विवाहों पर प्रतिबन्ध है; क्योंकि हिंदू समाज में भाई-बहन के बीच विवाह संबंध स्थापित नहीं।
हो सकते।।

3. सपिंड बहिर्विवाह-पिंड का अर्थ रक्त-संबंध से है। हिंदू समाज में सपिंड’ में वैवाहिक संबंध का निषेध किया गया है। सपिंड का संबंध माता की ओर से पाँच पीढ़ियों तक और पिता की ओर से सात पीढ़ियों तक माना जाता है। विज्ञानेश्वर ने सपिंड की व्याख्या इस प्रकार की है, एक ही पिंड अर्थात् एक देह से संबंध रखने वालों में शरीर के अवयव समान रहने के कारण सपिंड संबंध होता है। पिता और पुत्र सपिंड है। इसी प्रकार दादा आदि के शरीर के अवयव पिता द्वारा पोते में आने से पुत्री की माता के साथ सपिंडता होती है; अतः जहाँ-जहाँ ‘सपिंड शब्द का प्रयोग हुआ है वहाँ एक शरीर के अवयवों का संबंध समझना चाहिए। इस प्रकार, पिता से सात और माता से पाँच पीढ़ी के बीच लड़के और लड़कियों में विवाह नहीं हो सकता।

प्रश्न 5.
नातेदारी व्यवस्था क्या है? नातेदारों के भेद तथा नातेदारी शब्दावली को स्पष्ट कीजिए।
या
नातेदारी व्यवस्था को परिभाषित कीजिए तथा इसकी विभिन्न रीतियों एवं श्रेणियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
साधारण शब्दों में नातेदारी व्यवस्था रिश्ते-नाते के आधार पर बने मानवीय संबंधों की एक व्यवस्था है। नातेदारी बंधन व्यक्तियों के बीच के सूत्र होते हैं जो या तो वंश परंपरा के माध्यम से रक्त संबंधियों या विवाह के माध्यम से संबंधियों को जोड़ते हैं। इसलिए व्यक्ति दो परिवारों का सदस्य माना जाता है—प्रथम, उस परिवार का जिसमें उसका जन्म हुआ है तथा द्वितीय, उस परिवार का जिसमें उसका विवाह हुआ है। रक्त के माध्यम से नातेदारों को समरक्त नातेदार तथा विवाह के माध्यम से बने नातेदारों को वैवाहिक नातेदार कहा जाता है।

नातेदारी का अर्थ एवं परिभाषाएँ

मानव का जन्म परिवार में होता है। यहीं से उसका पालन-पोषण प्रारंभ होता है। समाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्ति परिवार से निरंतर कुछ-न-कुछ सीखता ही रहता है। परिवार में ही उसे अपने रीति-रिवाजों, परंपराओं एवं रूढ़ियों की शिक्षा मिलती है। परिवार के सदस्य ही मानव के विचारों, मूल्यों, जीवन के ढंगों, भावनाओं आदि को विकसित करते हैं। प्रत्येक बालक को माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची, दादा-दादी, मामा-मामी अनेक प्रकार के रिश्तेदारों का पता परिवार से ही चलता है। नातेदारी व्यवस्था रिश्तेदारी की ही व्यवस्था है। इसे अग्र प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है-

  1. चार्ल्स विनिक (Charles Winick) के अनुसार-“नातेदारी व्यवस्था में समाज द्वारा मान्यता प्राप्त वे संबंध आते हैं जो कि अनुमानित और वास्तविक वंशावली संबंधों पर आधारित होते हैं।”
  2. रैडक्लिफ-ब्राउन (Radcliffe-Brown) के अनुसार “नातेदारी सामाजिक उद्देश्यों के लिए स्वीकृत वंश संबंध है जो कि सामाजिक संबंधों के परंपरागत संबंधों का आधार है।”

नातेदारी के भेद

नातेदारी को संबंधों के आधार पर निम्नलिखित दो भेदों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. विवाह संबंधी नातेदारी।।
  2. रक्त संबंधी नातेदारी तथा

इन दोनों प्रकारों में निम्न प्रकार के नातेदार सम्मिलित किए जाते हैं-

  1. विवाह संबंधी नातेदारी—इसमें हम उन सब नातेदारों को सम्मिलित करते हैं जो विवाह के संबंध के आधार पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। उदाहरणार्थ–एक स्त्री अपने पति अथवा एक पति का अपनी पत्नी से संबंध अथवा पति-पत्नी, बहनाई, दामाद, जीजा, फूफां, नन्दोई, मौसा, साढ़, पुत्रवधू, भाभी, देवरानी, जेठानी, चाची, मामी आदि रिश्तेदारों को विवाह संबंधी नातेदारों में सम्मिलित किया जा सकता है।
  2. रक्त संबंधी नातेदारी- इसमें उन नातेदारों को सम्मिलित किया जाता है जो समान रक्त के संबंध के आधार पर एक-दूसरे के साथ जुड़े होते हैं। उदाहरणार्थ-भाई-बहन, चाचा, ताऊ, मामा, मौसी इत्यादि को इस श्रेणी में रखा जाता है।

नातेदारी शब्दावली

प्रत्येक समाज में नातेदारों को भिन्न-भिन्न शब्दों का संबोधन करके बुलाया जाता है। मॉर्गन के अनुसार मुख्यतः दो प्रकार की नातेदारी शब्दावलियों का अधिक प्रचलन है-

  1. विशिष्ट नातेदारी शब्दावली—इसमें प्रत्येक संबंधी के लिए एक पृथक् शब्द का प्रयोग किया जाता है। माँ, चाचा, मामा, मौसा इत्यादि इस शब्दावली केप्रमुख उदाहरण हैं। इस शब्दावली के अनुसार एक नातेदार के लिए प्रयुक्त शब्द का प्रयोग किसी अन्य नातेदार के लिए नहीं किया जा सकता है।
  2. वर्गीकृत नातेदारी शब्दावली–इसमें अनेक नातेदारों को एक ही श्रेणी में रख दिया जाता है। और सबको एक ही नाम से संबंधित किया जाता है। उदाहरणार्थ-अंग्रेजी के शब्द ‘अंकल का प्रयोग चाचा, ताऊ, मौसा, फूफा आदि संबंधियों के लिए किया जाता है, जबकि कजिन शब्द का प्रयोग चचेरे, ममेरे, फुफेरे और मौसेरे भाई-बहनों के लिए किया जाता है।

नातेदारी की श्रेणियाँ

  1. प्राथमिक नातेदार-जिन रिश्तेदारों के साथ हमारा प्रत्यक्ष वैवाहिक यो रक्त संबंध होता है, उन्हें हम प्राथमिक नातेदार कहते हैं। प्राथमिक नातेदारों में आठ संबंधियों को सम्मिलित किया जाता है। ये हैं—पति-पत्नी, पिता-पुत्र, मामा-पुत्री, माता-पुत्र, छोटे-बड़े भाई, छोटी-बड़ी बहन तथा भाई-बहन। ये वे प्रत्यक्ष संबंधी हैं जिनके साथ हमारा घनिष्ठ संबंध है।
  2. द्वितीयक नातेदार—इसमें हम उन रिश्तेदारों को सम्मिलित करते हैं जो हमारे प्राथमिक नातेदारों के प्राथमिक संबंधी होते हैं। ये संबंधी हमसे प्राथमिक संबंधियों द्वारा संबंधित होते हैं। उदाहरणार्थ-बहनोई-साले में संबंध, दादा-पोते में संबंध, चाचा-भतीजे में संबंध, देवर-भाभी में संबंध इस श्रेणी के संबंधों के उदाहरण हैं। मरडोक (Murdock) ने 33 प्रकार के द्वितीयक नातेदार बताए हैं।
  3. तृतीयक नातेदार—इस श्रेणी में उन,नातेदारों को सम्मिलित किया जाता है जो हमारे द्वितीयक संबंधियों के प्राथमिक संबंधी हैं अर्थात् हमारे प्राथमिक संबंधियों के द्वितीयक संबंधी है। उदाहरणार्थ-साले की पत्नी, साले का लड़का, पड़दादा हमारे तृतीयक नातेदार हैं। मरडोक ने 151 ऐसे संबंधियों का उल्लेख किया है। इसी प्रकार हम चातुर्थिक, पांचमिक इत्यादि संबंधों की चर्चा करते हैं।

नातेदारी की रीतियाँ

नातेदारी की रीतियाँ विभिन्न नातेदारों से हमारे संबंधों को व्यक्त करती है तथा इनसे हमें उनके साथ होने वाले व्यवहार का पता चलता है। अन्य शब्दों में, नातेदारी की रीतियों का संबंध दो संबंधियों के बीच संबंधों तथा व्यवहार से है। नातेदारी की निम्नांकित प्रमुख रीतियाँ हैं-

  1. परिहार सम्बन्ध-परिहार नातेदारी की वह रीति है जो दो नातेदारों को दूरी बनाए रखने तथा प्रत्यक्ष या आमने-सामने के संबंध स्थापित न करने पर बल देती है। भारतीय समाज में ससुर-बहु संबंध या भारतीय जनरीतियों में सास-दामाद संबंध इस श्रेणी के कुछ उदाहरण हैं।।
  2. माध्यमिक संबोधन-इस रीति में किसी नातेदार को संबोधित करने के लिए किसी अन्य को माध्यम बनाया जाता है। जिन संबंधियों के नाम पुकारना अच्छा नहीं समझा जाता, उनमें यह रीति प्रचलित है। उदाहरणार्थ-गाँव में पत्नी अपने पति का नाम न लेकर उसे पुकारने के लिए बच्चे को माध्यम बनाती है। उसका पति को ‘राजू के पिता’ कहना यह रीति प्रदर्शित करता है।
  3. परिहास संबंध-नातेदारी की यह रीति परिहार का विपरीत रूप है अर्थात् इसमें दो नातेदारों के बीच मधुर एवं हँसी-मजाक के संबंधों पर बल दिया जाता है। इसमें दूसरे पक्ष को छेड़ना, तंग करना तथा हँसी-मजाक करना सम्मिलित है। देवर-भाभी, जीजा-साली, साले-बहनाई में सबंध इस श्रेणी के संबंधों के मुख्य उदाहरण हैं।
  4. मातुलेय–इस रीति में मामा-भानजे या भानजी के संबंधों को प्राथमिकता दी जाती है। यह रीति मातृसत्तात्मक समाजों में प्रचलित है तथा इसमें बच्चों पर पिता से मामा का अधिकार अधिक होता है। संपत्ति का उत्तराधिकार भी भानजे-भानजी को होता है। अत: इस रीति में ममता का स्थान सर्वोपरि है।
  5. पितृश्वसेय—इस रीति में पितृश्वसा अर्थात् पिता की बहन (बुआ) का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। बुआ को माता से अधिक सम्मान दिया जाता है तथा बच्चों के विवाह भी बुआ ही कराती है। बच्चे बुआ की संपत्ति के अधिकारी होते हैं।
  6. सहकष्टी–इसे सहप्रसविता भी कहते हैं क्योंकि इसका संबंध प्रसव काल से है। इसमें पति से प्रसवा स्त्री के समान व्यवहार करने अर्थात् कष्ट प्रदर्शित करने की आशा की जाती है। जिस प्रकार का भोजन प्रसवी को मिलता है वैसा ही पति को दिया जाता है। उसे भी अलग कमरे में रखा जाता है तथा प्रसव अवधि के लिए अछूत माना जाता है।

प्रश्न 6.
राजनीतिक संस्थाएँ क्या हैं? समाज में इनका क्या महत्त्व है?
या
राज्य किसे कहते हैं? इसके प्रमुख कार्य कौन-से हैं?
या
राज्य को परिभाषित कीजिए तथा सरकार से इसका अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
आज समाजशास्त्र में समग्र समाज को एक व्यवस्था के रूप में देखा जाता है। व्यवस्था से अभिप्राय विभिन्न इकाइयों के बीच अंतर्संबंध से बना वह क्रमबद्ध ताना-बाना है जिसमें किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वे इकाइयाँ एक-दूसरे से इस प्रकार संबंध होती हैं कि एक भाग में परिवर्तन दूसरे भाग को प्रभावित करता है। प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था के दो पहलू होते हैं—संरचनात्मक एवं प्रकार्यात्मक। इन्हें समाज की संरचनात्मक उप-व्यवस्थाएँ तथा प्रकार्यात्मक उप-व्यवस्थाएँ भी कहते हैं। ये दोनों प्रकार की व्यवस्थाएँ समाज की प्रकार्यात्मक समस्याओं से संबंधित हैं अथवा इन्हें समाज की पूर्वपेक्षाओं से संबंधित माना जाता है।

समाज की चार प्रकार्यात्मक समस्याएँ या पूर्वापेक्षाएँ हैं: अनुकूलन, लक्ष्य-प्राप्ति, एकीकरण तथा प्रतिमानात्मक स्थायित्व एवं तनाव-नियंत्रण। सामाजिक व्यवस्था के रूप में समाज को अपना अस्तित्व एवं संतुलन बनाए रखने के लिए भौगोलिक तथा सामाजिकै सांस्कृतिक पर्यावरण से अनुकूलन करना पड़ता है। इस अनुकूलन हेतु प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था में एक विशेष प्रकार की यांत्रिकी पायी जाती है। अनुकूलन से संबंधित प्रकार्यात्मक उप-व्यवस्था को अर्थव्यवस्था कहते हैं जो कि आर्थिक संस्थाओं से संबंधित है। इसमें मुख्यतः सम्पत्ति, श्रम-विभाजन, विनिमय एवं बाजार तथा विभिन्न प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं को सम्मिलित किया जाता है।

सामाजिक व्यवस्था के रूप में समाज की दूसरी महत्त्वपूर्ण समस्या संबंधी पूर्वापेक्षा लक्ष्य-प्राप्ति है। इसके अनुरूप जो प्रकार्यात्मक उप-व्यवस्था होती है उसे राज-व्यवस्था कहते हैं जो कि राजनीतिक संस्थाओं से संबंधित है। इसमें मुख्य रूप से राज्य तथा सरकार को सम्मिलित किया जाता है क्योंकि इनके द्वारा ही लक्ष्यों का निर्धारण होता है और लक्ष्यों के बीच साधनों का वितरण होता है। एकीकरण की समस्या के अनुरूप प्रत्येक सामाजिक व्येवस्था में धार्मिक एवं कानूनी उप-व्यवस्थाएँ पाई जाती हैं। इनका संबंध क्रमशः धार्मिक एवं वैधानिक संस्थाओं से है। धार्मिक संस्थाओं में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान धर्म को दिया जाता है। प्रतिमानात्मक स्थायित्व एवं तनाव-नियंत्रण संबंधी समस्या के समाधान हेतु शैक्षिक एवं नातेदारी उप-व्यवस्थाएँ पाई जाती हैं। इस प्रकार, सामाजिक व्यवस्था के रूप में समाज को बनाए रखने के लिए आर्थिक संस्थाओं, राजनीतिक संस्थाओं तथा धार्मिक संस्थाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

राजनीतिक संस्थाओं का अर्थ

राजनीतिक संस्थाओं का वृहद् अध्ययन राजनीतिशास्त्र में किया जाता है। चूंकि समाजशास्त्र सभी प्रकार के संबंधों का अध्ययन करता है, इसलिए राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन भी इसके अंतर्गत किया जाता है। राजनीतिक संस्थाएँ सामाजिक जीवन की अत्यंत महत्त्वपूर्ण संस्थाएँ हैं। राजनीतिक संस्थाओं का संबंध शक्ति के वितरण से है तथा इनके द्वारा ही समाज में सामाजिक नियंत्रण का कार्य किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार कार्य करना चाहता है और यदि सभी व्यक्ति ऐसा करने लगे तो सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो जाएगी। शांति तथा नियंत्रण बनाए रखने के लिए राजनीतिक संस्थाओं का महत्त्व सभी युगों में रहा है और आज भी है। व्यक्ति राजनीतिक संस्थाओं द्वारा अपनी अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। समाज में व्यवस्था, प्रगति व शांति बनाए रखने का उत्तरदायित्व राजनीतिक संस्थाओं एवं समितियों पर ही है।

बॉटोमोर के अनुसार राजनीतिक संस्थाएँ समाज में शक्ति के वितरण से संबंधित हैं। इस संदर्भ में, राज्य के बारे में वेबर का विचार है कि राज्य एक ऐसा मानवीय समुदाय है जिसका एक निश्चित भौगोलिक सीमा में भौतिक बल के वैज्ञानिक प्रयोग का एकाधिकार होता है और जो इस अधिकार को सफलतापूर्वक लागू करती है। इस प्रकार राज्य सामाजिक नियंत्रण का एक महत्त्वपूर्ण अभिकरण है। जिसके कार्य कानून द्वारा किए जाते हैं। राज्य संपूर्ण समाज नहीं अपितु समाज की एक संस्था मात्र है।

राजनीतिक संस्थाओं का महत्त्व

राजनीतिक संस्थाओं की समाज तथ व्यक्तियों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। राजनीतिक संस्थाएँ सामाजिक व्यवस्था के रूप में राज्य की एक प्रमुख प्रकार्यात्मक समस्या, लक्ष्य-प्राप्ति का समाधान करने में सहायता प्रदान करती है। राज्य तथा सरकार द्वारा केवल लक्ष्य ही निर्धारित नहीं किए जाते अपितु इन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु अनिवार्य साधन भी उपलब्ध कराए जाते हैं। राजनीतिक संस्थाएँ ही समाज में कानून एवं व्यवस्था बनाए रखने में सहायता प्रदान करती है। राज्य, सरकार तथा कानून के डर से ही सभी नागरिक सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप व्यवहार करने का प्रयास करते हैं। जो व्यक्ति कानूनों का पालन नहीं करते उनको राज्य दंडित करता है। राज्य एक सर्वशक्तिशाली संस्था है तथा इसे व्यक्ति का जीवन लेने अर्थात् उसे मृत्युदंड तक देने का अधिकार प्राप्त होता है। आर्थिक साधनों की प्राप्ति हेतु होने वाली होड़ को भी राजनीतिक संस्थाएँ ही नियमित करती है। शैक्षिक उप-व्यवस्था एवं अन्य उप-व्यवस्थाओं को दिशा-निर्देश देने का कार्य भी राजनीतिक संस्थाओं द्वारा ही किया जाता है। इस प्रकार, राजनीतिक संस्थाएँ सामाजिक व्यवस्था तथा इसकी निरंतरता को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं।

राज्य का अर्थ एवं परिभाषाएँ

समाजशास्त्रीय दृष्टि से राज्य एक ऐसी संस्था है जो कि शक्ति के वितरण तथा इसके प्रयोग के एकाधिकार से संबंधित है। राज्य का अर्थ जानने के लिए राज्य की परिभाषाओं का विश्लेषण करना अनिवार्य है। इसकी प्रमुख परिभाषाएँ निम्न प्रकार हैं-

  1. गिलिन एवं गिलिन (Gillin and Gillin}.के अनुसार-“एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में निवास करने वाले व्यक्तियों के प्रभुता-संपन्न राजनीतिक संगठन को हम राज्य कहते हैं।”
  2. रौसेक (Roucek) के अनुसार-“संपूर्ण समाज के संदर्भ में, राज्य लोगों को ऐसी समिति है जो राजनीतिक उद्देश्यों से बनाई जाती है।”
  3. मैकाइवर (Maclver) के अनुसार-“राज्य एक ऐसी समिति है जो कानून द्वारा शासनतंत्र से क्रियांवित होती है और जिसे निश्चित भू-प्रदेश में सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के सर्वोच्च अधिकार प्राप्त होते हैं।”
  4. फेयरचाइल्ड (Fairchild) के अनुसार-“राज्य समाज की वह संस्था, पहलू या माध्यम है जो कि बल प्रयोग की सामर्थ्य एवं अधिकार रखती है, अर्थात् जो बलपूर्वक नियंत्रणं लागू कर सकती है। यह सामर्थ्य समाज के सदस्यों को नियंत्रित करने के काम भी आ सकती है और अन्य समाजों के विरुद्ध भी।”
  5.  जिसबर्ट (Gisbert) के अनुसार-“राज्य कानून एवं राजनीतिक मामले में अपील की सबसे अंतिम अदालत है; अत: यह प्रभुसत्ताशाली एवं एक अर्थ में निरपेक्ष है।”

इन परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि राज्य मनुष्यों द्वारा निर्मित एक राजनीतिक संगठन है। इस राजनीतिक संगठन का एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र होता है। राज्य का काम चलाने के लिए शासनतंत्र या सरकार होती है, जो राज्य का संस्थात्मक पहलू है। राज्य की अपनी प्रभुसत्ता होती है। राज्य के सभी नियमों का पालन करना उस राज्य के सदस्यों के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति इसका पालन नहीं करता, तब राज्य अपनी प्रभुसत्ता के आधार पर दंड देने का अधिकार रखता है। ऎसेक (Roucek) ने ठीक ही लिखा है कि “क्योंकि सरकार की सारी शक्ति व्यक्तियों के हाथ में ही निहित रहती है तथा वे ही उसका प्रयोग करते हैं अतः सरकार की संस्था बिना, राज्य की धारणा की कोई वास्तविकता नहीं।’

इस प्रकार, समाजशास्त्रीय दृष्टि से राज्य एक ऐसी संस्था है जो कि अन्य संस्थाओं से भिन्न है। इस संस्था के पास शक्ति भी होती है और उस शक्ति के प्रयोग का अधिकार भी। इसी आधार पर राज्य प्रत्येक नागरिक को अपना मत मनवाने को बाध्य कर सकता है। जो विद्वान संस्था को एक समिति मानते हैं वे भी इस बात से सहमत हैं कि इस समिति का संस्थागत रूप राज्य के कानून एवं व्यवस्थाएँ होती हैं।

राज्य के प्रमुख कार्य

मैकाइवर ने राज्य के कार्यों की विवेचना निम्नांकित प्रकार से की है-

  1. वे कार्य जिन्हें केवल राज्य ही कर सकता है-कानून एवं व्यवस्था को बनाए रखना केवल राज्य के वश की ही बात है क्योंकि राज्य के पास शक्ति होती है तथा उसे इस शक्ति का प्रयोग । करने का पूरा अधिकार होता है। राज्य ही सार्वभौमिक रूप से लागू होने वाले कानूनों को निर्माण करता है, सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के समान जीवन-अवसर प्रदान करता है तथा सबको समान सुविधाएँ प्रदान करता है। सार्वजनिक न्याय का कार्य भी राज्य द्वारा ही किया जाता है।
  2. वे कार्य जिन्हें राज्य कर ही नहीं सकता-ये वे कार्य हैं जिन्हें राज्य करने में असमर्थ है। उदाहरणार्थ-राज्य जनमत पर नियंत्रण नहीं कर पाता। राज्य व्यक्तियों की नैतिकता पर भी नियंत्रण नहीं लगा सकता। राज्य व्यक्तियों के बाह्य व्यवहार पर रोक लगाने हेतु कानून पारित कर सकता है, परंतु व्यक्ति किस सीमा तक उन कानूनों का पालन करेंगे, यह एक दूसरी बात है।
  3. वे कार्य जिन्हें राज्य अच्छी प्रकार से कर सकता है–ये वे सामाजिक कार्य हैं जिन्हें राज्य के अतिरिक्त कोई अच्छी समिति या संस्था नहीं कर सकती अपितु राज्य इन्हें अन्य समितियों एवं संस्थाओं के मुकाबले बहुत अच्छी प्रकार से कर सकता है। राज्य अपने साधनों से प्राकृतिक साधनों का सर्वाधिक शोषण करता है। वनों, खानों तथा सीमाओं इत्यादि की सुरक्षा राज्य से अच्छी कोई नहीं कर सकता। राज्य सार्वजनिक शिक्षा की व्यवस्था करता है प्रतियोगिता को नियमित करता है। सभी नागरिकों का समान कल्याण राज्य से बेहतर कोई अन्य संस्था नहीं कर सकती है।
  4. वे कार्य जिन्हें राज्य ठीक प्रकार से नहीं कर सकता है-वे वे कार्य हैं जो राज्य द्वारा ठीक प्रकार नहीं किया जा सकते। अन्य समितियाँ एवं संस्थाएँ इन्हें राज्य से ज्यादा अच्छी तरह कर सकती है। उदाहरणार्थ-राज्य हमारी धार्मिक एवं सांस्कृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति अच्छी प्रकार से नहीं कर पाता धार्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति धार्मिक संस्थाओं द्वारा अधिक अच्छे प्रकार से की जा सकती है। राज्य से व्यक्ति उतना अपनत्व प्राप्त नहीं कर पाता जितना उसे व्यक्तिगत, धार्मिक व आर्थिक संस्थाओं एवं समितियों से मिल सकता है।

राज्य तथा सरकार में अंतर

अधिकतर विद्वान राज्य को एक समिति मानते हैं तथा इस बात पर बल देते हैं कि राज्य अपने लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु कुछ संस्थागत नियमों को मान्यता देता है। सरकार समिति का संस्थागत पक्ष है। यद्यपि सरकार का निर्माण व्यक्तियों के द्वारा ही होता है तथापि सरकार स्वयं अपने आप में एक व्यवस्था है। क्योंकि यह नियमबद्धता एवं निश्चित कार्यप्रणाली से संबद्ध होती है। सरकार राज्य की सर्वाधिक प्रभावशाली संस्था के रूप में कार्य करती है। एण्डरसन तथा पार्कर (Anderson and Parker) के अनुसार सरकार तीन प्रकार के प्रमुख कार्य करती है—वैधानिक या व्यवस्थापिका संबंधी कार्य, कार्यपालिका संबंधी कार्य तथा न्यायपालिका संबंधी कार्य।।

राज्य तथा सरकार में निम्नलिखित प्रमुख अंतर पाए जाते हैं-

  1. राज्य व्यक्तियों का एक विशाल राजनीतिक संगठन है जिसका निर्माण निश्चित भौगोलिक सीमाओं के अंदर रहने वाले व्यक्तियों द्वारा किया जाता है अर्थात् राज्य की परिधि सीमित होती है। इसके विपरीत, सरकार एक संस्था है अर्थात् यह वह साधन है जिसके द्वारा राज्य अपने राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करता है।
  2. राज्य बहुत-कुछ स्थायी होता है, जबकि सरकार में परिवर्तन होता रहता है। अन्य शब्दों में, राज्य अपेक्षाकृत स्थायी होता है, जबकि सरकार परिवर्तनशील होती है।
  3. राज्य एक साध्य है, जबकि सरकार उस साध्य को प्राप्त करने का एक साधन-मात्र है।
  4. राज्यों की आधारभूत विशेषताएँ एकसमान हो सकती हैं, परंतु दो राज्यों की सरकारों में पूरी तरह से समानता नहीं पाई जाती है।

प्रश्न 7.
आर्थिक संस्थाएँ क्या हैं तथा समाज में इनका क्या महत्त्व है?
या
आर्थिक संस्थाओं को परिभाषित कीजिए तथा प्रमुख आर्थिक संस्थाओं को विस्तार में समझाइए।
या
आर्थिक संस्थाएँ क्या हैं एवं उनके प्रमुख प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर
मानव के जन्म के साथ ही उसे अनेक आवश्यकताएँ घेर लेती हैं। इनमें से कुछ आवश्यकताएँ उसकी प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं; जैसे कि भोजन, वस्त्र तथा निवास की; और इन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समाज में आर्थिक संस्थाओं का जन्म होता है। मनुष्य की आर्थिक क्रियाएँ उत्पादन, विनिमय, वितरण से संबंधित होती है। आर्थिक संस्थाओं का प्रत्यक्ष संबंध मानवीय आवश्यकताओं से होता है। आर्थिक संस्थाएँ मनुष्य के जीवन को व्यवस्थित करती हैं। यदि मानवीय आवश्यकताएँ; विशेषकर भौतिक आवश्यकताएँ बिना नियमों के संघर्ष से प्राप्त होने की स्थिति में आ जाएँ तो सामाजिक संरचना ही नष्ट हो जाएगी। अर्थशास्त्रियों का मत है कि आर्थिक संस्थाओं को समाज में केंद्रीय स्थिति प्राप्त है। यहाँ पर आर्थिक संस्था व आर्थिक व्यवस्था के संदर्भ में यह बताना आवश्यक है कि ‘आर्थिक व्यवस्था’ एक विस्तृत धारणा है, जबकि ‘आर्थिक संस्था’ सीमित धारणा है।

आर्थिक संस्था का अर्थ एवं परिभाषाएँ

आर्थिक संस्थाओं का संबंध समाज की अनुकूलन संबंधी समस्या से होता है। इनमें उन संस्थाओं को सम्मिलित किया जाता है जो समाज में वस्तुओं के उत्पादन एवं वितरण से संबंधित होती है। आर्थिक संस्थाओं द्वारा ही जीवन निर्वाह से संबंधित आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। प्रमुख विद्वानों ने आर्थिक संस्था की परिभाषाएँ निम्नांकित प्रकार से दी हैं-

  1. एण्डरसन एवं पार्कर (Anderson and Parker) के अनुसार-“वस्तुओं के उत्पादन तथा वितरण के माध्यम से आर्थिक संस्थाएँ समाज के अस्तित्व को बनाए रखती हैं। यह कार्य, पूँजी, श्रम, भूमि, कच्चे माल तथा व्यवस्था संबंधी योग्यता के अधिकतम उपयोग द्वारा संभव होता है।”
  2. जोंस (Jones) के अनुसार—“आर्थिक संस्थाएँ विभिन्न प्रविधियों, विचारों तथा प्रथाओं की उस समग्रता को कहते हैं जो जीवन निर्वाह की आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए भौतिक पर्यावरण के अधिकतम उपभोग से संबंधित हैं।”
  3. डेविस (Davis) के अनुसार-समाज चाहे सभ्य हो या असभ्य, सीमित वस्तुओं के वितरण को नियंत्रित करने वाले आधारभूत विचारों, आदर्श नियमों तथा पदों को आर्थिक संस्था की संज्ञा दी जाएगी।

आर्थिक संस्थाओं की विभिन्न परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि आर्थिक संस्थाएँ अर्थव्यवस्था से संबंधित उत्पादन तथा वितरण के नियमों का विवेचन करती है। समाजवाद, पूँजीवाद, साम्यवाद, सामन्तवाद, संपत्ति श्रम-विभाजन तथा अनुबंध (Contract) इत्यादि प्रमुख आर्थिक संस्थाएँ हैं। अर्थव्यवस्था को हम चार प्रमुख भागों में विभाजित कर सकते हैं-

  1. संग्रहकारी अर्थव्यवस्था
  2. सरल रूपान्तरकारी अर्थव्यवस्था
  3. जटिल रूपान्तरकारी अर्थव्यवस्था तथा
  4. मिश्रित अर्थव्यवस्था।

आर्थिक संस्थाओं का महत्त्व

किसी भी समाज के आर्थिक संस्थाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। वस्तुतः आर्थिक संस्थाएँ किसी समाज की उस प्रकार्यात्मक उप-व्यवस्था का निर्माण करती हैं जो समाज की अनुकूलन संबंधी समस्या को हल करती है। इसलिए अर्थव्यवस्था एवं आर्थिक संस्थाओं को कई बार अनुकूलनकारी उप-व्यवस्था भी कहा जाता है। वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन, वितरण और उपभोग में लगी सभी । इकाइयों के पारस्परिक संबंधों को नियमित करने का कार्य आर्थिक संस्थाएँ ही करती हैं। इन्हीं से ऐसी सुविधाएँ उत्पन्न होती हैं जो सामान्य रूप से परिवार, समुदाय तथा राज्य आदि के लिए आवश्यक होती हैं। इन्हीं संस्थाओं द्वारा कोई भी समाज मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति को सुनिश्चित करता है तथा प्रतियोगिता पर नियंत्रण रखने का प्रयास करता है।

आर्थिक संस्थाओं की प्रकृति पूर्व-औद्योगिक तथा औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है। पूर्व-औद्योगिक अर्थव्यवस्था में भूमि ही धन का स्रोत होती है, जीवंत शक्ति का अत्यधिक प्रयोग होता है, सरल प्रौद्योगिकी पायी जाती है, श्रम-विभाजन एवं विशेषीकरण का निम्न स्तर पाया जाता है, प्रत्यक्ष एवं परंपरागत विनिमय तथा वितरण द्वारा मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। तथा अधिकतर प्रबंध का आधार परिवार ही होती है। इसलिए इन समाजों में संपत्ति तथा विनिमय संबंधी आर्थिक संस्थाओं की ही प्रमुखता होती है। औद्योगिक अर्थव्यवस्था में आर्थिक संस्थाएँ विकसित श्रम-विभाजन, उत्पादन, व्यापार एवं लाभ तथा अप्रत्यक्ष विनिमय व वितरण से संबंधित होती हैं। क्योंकि औद्योगिक अर्थव्यवस्था में इन्हीं विशेषताओं की प्रमुखता पाई जाती है।

समाज की विभिन्न उप-व्यवस्थाओं के लिए अनिवार्य साधन आर्थिक उप-व्यवस्था पर ही निर्भर करते हैं। इसलिए इस उप-व्यवस्था, जिसमें आर्थिक संस्थाएँ भी सम्मिलित होती हैं, की समाज में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

आर्थिक संस्थाओं के प्रमुख प्रकार

आर्थिक संस्थाएँ अनेक प्रकार की होती हैं। समाजशास्त्र में निम्नलिखित पाँच आर्थिक संस्थाओं को प्रमुख माना जाता है-

(अ) समाजवाद
समाजवाद व्यक्तिगत पूँजी को सार्वजनिक पूँजी में बदलकर, प्रतियोगिता की मात्रा को कम कर अर्थव्यवस्था में लोकतांत्रिक प्रणाली को विकसित करने पर बल देता है। इस वाद का जन्म, पूँजीपतियों द्वारा शोषण तथा वर्ग-संघर्ष के विरुद्ध हुआ है। रोबर्ट ओवन, सेंट साइमन आदि विचारकों ने इसे क्रियात्मक रूप देने का प्रयास किया था, परंतु साधनों की अनिश्चिता ने इस वाद को पनपने नहीं दिया। समाजवाद के संदर्भ में रेमजे मैक्डानल्ड का विचार है कि साधारण अर्थों में समाजवाद की परिभाषा यही है कि उसका उद्देश्य समाज के आर्थिक व भौतिक साधनों का संगठन करना तथा मानव साधनों के द्वारा उनका नियंत्रण करना है। समाजवाद मानव मूल्यों की रक्षा करने में सहायता करता है। आज हमारे देश में समाजवादी अर्थव्यवस्था को प्रधानता दी जा रही है। समाजवादी अर्थव्यवस्था में आर्थिक संस्थाएँ भिन्न प्रकार की होती है। समाजवाद के कई रूप समाजों में प्रचलित हैं।

(ब) साम्यवाद
कुछ विद्वानों ने साम्यवाद को व्यवहारिकता की कमी के कारण मात्र विचारधारा निरूपित किया है। जिन विद्वानों ने साम्यवाद को प्रोत्साहन दिया है उनमें मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन आदि प्रमुख हैं। साम्यवाद में उत्पादन के सभी साधनों पर राज्य के अधिकार होते हैं। ऐसी संपत्ति, जो बिना श्रम से मिली हो, का उपभोग करने का अधिकार व्यक्ति को नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति को श्रम करना पड़ता है। इस ‘वाद’ में व्यक्ति की अपेक्षा राज्य को अधिक महत्त्व मिलता है। साम्यवादी व्यवस्था समानता को मानती है। साम्यवादी व्यवस्था के अंतर्गत राज्य को यह अधिकार है कि गंभीर संकट के समय व्यक्ति की संपत्ति पर अपना अधिकार जमा ले। साम्यवादी अर्थव्यवस्था सामाजिक व आर्थिक संरचना बदलने के लिए हिंसा का बुरा नहीं मानती है। अधिकार प्राप्त करने के लिए प्रत्येक माध्यम उचित है। इस ‘वाद’ के अंतर्गत धर्म का कोई महत्त्व नहीं है।

(स) पूँजीवाद
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में राज्य कानूनी तौर पर संपत्ति के व्यक्तिगत स्वामित्व पर विश्वास रखता है। अर्थात् पूँजीवाद, व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा को पूर्ण समर्थन करता है। पूँजीवाद, धन के संग्रह, प्रतियोगिता वं आर्थिक स्वतंत्रता को प्रश्रय देता है। बूचर के अनुसार, “पूँजीवाद का आवश्यक गुण उसके उत्पादन तथा उपभोग की वस्तुओं में पाया जाने वाला संबंध है। कुछ विद्वानों ने पूँजीवाद को एक ऐसी अर्थव्यवस्था माना है जिनमें सभी व्यक्तियों को काम करने का अवसर प्राप्त हो, सभी लाभ प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र हों तथा सभी अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए प्रतियोगिता कर सकें।

(द) संपत्ति संपत्ति
एक आर्थिक संस्था है जिसका संबंध वितरण व्यवस्था का स्थिर पहलू है। संपत्ति से अभिप्राय किसी भी वस्तु पर स्वामित्व एवं अधिकार से हैं। डेविस (Davis) के अनुसार, “संपत्ति वास्तव में वितरण-व्यवस्था का स्थिर पहलू है। इसमें कुछ सीमित वस्तुओं के प्रति समस्त व्यक्तियों एवं समूहों के विरुद्ध कुछ व्यक्तियों अथवा समूहों (स्वामी) के अधिकार व उसके कर्तव्य सम्मिलित हैं। इसी भाँति, हॉबहाउस (Hobhouse) के अनुसार, “संपत्ति का अर्थ वस्तुओं पर मनुष्यों के नियंत्रण से है, ऐसा नियंत्रण जो कि समाज द्वारा मान्यता प्राप्त होता है तथा जो कम या अधिक किसी-न-किसी अंश में स्थायी तथा पूर्ण होता है। अतः संपत्ति भौतिक एवं अन्य वस्तुओं से संबंधित व्यक्तियों के अधिकारों एवं कर्तव्यों की एक व्यवस्था है।

(य) श्रम-विभाजन
श्रम-विभाजन का प्रमुख आर्थिक संस्था है परंतु दुर्णीम (Durkheim) ने अपने अध्ययन द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि श्रम-विभाजन एक सामाजिक तथ्य भी है। श्रम-विभाजन की उत्पत्ति आधुनिक नहीं है क्योंकि प्राचीन समाजों में भी यह कुछ-न-कुछ मात्रा में पाया जाता था। 19वीं शताब्दी के अंत में श्रम-विभाजन के सिद्धांत को सामाजिक दृष्टिकोण से देखने के प्रयास शुरू हुए। एडम स्मिथ (Adam Smith) प्रथम विद्वान थे जिन्होंने श्रम-विभाजन का सिद्धांत प्रस्तुत किया परंतु श्रम-विभाजन केवल आर्थिक जगत तक ही सीमित नहीं है अपितु आज समाज के सभी क्षेत्रों में इसका प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। आज राजनीतिक, प्रशासनिक तथा न्यायिक कार्य अधिकाधिक विशेषीकृत होते जा रहे हैं। स्मिथ ने श्रम विभाजन को आर्थिक घटना के रूप में देखते हुए इसके दो प्रमुख परिणामों-उत्पादन में वृद्धि तथा वस्तुओं की श्रेणी में श्रेष्टता का उल्लेख किया परंतु दुर्णीम ने श्रम-विभाजन को एक सामाजिक तथ्य के रूप में देखते हुए इसके प्रमुख सामाजिक परिणाम-समाज में एकता बनाए रखने पर बल दिया।
फेयरचाइल्ड (Fairchild) द्वारा सम्पादित समाजशास्त्र एवं संबंधित विज्ञानों के शब्दकोश में श्रम-विभाजन को इस प्रकार परिभाषित किया गया है, “श्रम-विभाजन किसी भी समाज में पूरे किए जाने ब्राले कार्यों और सेवाओं का उन लोगों के मध्य वितरण और विभेदीकरण है, जिन्हें वास्तव में उन्हें पूरा करना है।”
जॉनसन (Johnson) श्रम-विभाजन को स्पष्ट करके हुए सरल शब्दों में लिखते हैं, “हमारे समाज में, एक मैराज मैकेनिक से यह उम्मीद नहीं की जाती है वह इलैक्ट्रीशियन का स्थान ले लेगा; प्रत्येक अपनी भूमिका अलग रखता है जो ‘स्थायी’ सामाजिक रूप से मान्यता प्राप्त, तकनीकी दृष्टि से कुशलताओं को विशिष्टीकृत संकुल है। इस भूमिका के साथ इसके अनुरूप दायित्व और सुस्पष्ट अलग प्रस्थिति (Status) जुड़े हैं। इसी अर्थ में हम श्रम-विभाजन की बात करेंगे।”
इस भाँति, हम देखते हैं श्रम-विभाजन केवल विशुद्ध संस्था ही नहीं रह जाती बल्कि उसके महत्त्वपूर्ण सामाजिक पक्ष भी हमारे सामनेउजागर हो जाते हैं क्योंकि श्रम-विभाजन द्वारा प्रस्थितियों की सृजन होता है और वह सृजन समाज में न केवल विभेदीकरण बढ़ाता है बल्कि समाज के संस्तरण को भी एक अलग आधार प्रदान करता है। परिणामतः सामाजिक संस्तरण में जटिलता की वृद्धि होती है। किसी समाज में जितना अधिक श्रम-विभाजन होता जाएगा उतना ही वह समाज जटिलं होता चला जाएगा। अमेरिका में ‘श्रम-विभाजन (1949)’ में व्यवसायों के विभिन्न शीर्षकों अर्थात् नामों का शब्दकोश प्रकाशित किया। हम आश्चर्य करेंगे कि हम उसमें 22,000 व्यवसायों का जिक्र पाते हैं जो समाज द्वारा वैधता प्राप्त है। यह आधुनिक, उन्नत एवं औद्योगिक समाज की जटिलता का लक्षण है। समाजशास्त्रियों के लिए श्रम-विभाजन में रुचि लेना और इसका अध्ययन करना स्वाभाविक ही है।

प्रश्न 8.
धर्म का अर्थ स्पष्ट कीजिए। सामाजिक जीवन में इसकी क्या भूमिका है?
या
धर्म से आप क्या समझते हैं? धर्म के प्रमुख तत्त्व कौन-कौन से हैं। समझाइए।
उत्तर
प्रत्येक सामाजिक व्यक्ति धर्म (Religion) से अनिवार्य रूप से परिचित होता है तथा किसी-न-किसी रूप में अपने जीवन में धार्मिक क्रियाओं को भी संपन्न करता है, परन्तु फिर भी ‘धर्म का अर्थ एकाएक स्पष्ट कर देना प्रायः सरल नहीं होता। ‘धर्म की अवधारणा एक जटिल एवं बहुपक्षीय अवधारणा है अतः इसका वर्णन कुछ सीमितं शब्दों में करना प्रायः कठिन होता है। यूँ तो विश्व में अनेक धर्मों की स्थापना हुई परंतु वास्तव में धर्म एवं धार्मिक प्रवृत्ति सब कहीं एक-समान ही है, अंतर केवल बाहरी रूप को है। धर्मों को अलग-अलग नाम देना धर्मवाद का प्रतीक है।

धर्म का अर्थ एवं परिभाषाएँ

धर्म को अंग्रेजी में रिलीजन’ (Religion) कहते हैं, जो कि लैटिन भाषा के ‘rel (Digio’ नामक शब्द से बना है, जिसका अर्थ है ‘बाँधना’। इस प्रकार शाब्दिक अर्थों में ‘धर्म’ का अभिप्राय उन संस्कारों के प्रतिपादन से है जो मनुष्य और ईश्वर या अलौकिक शक्ति को एक-दूसरे से बाँधते या जोड़ते हैं। अन्य शब्दों में, धर्म मनुष्य की युगों से विद्यमान उस श्रद्धा का नाम है जो सर्वशक्तिमान के प्रति होती है। विभिन्न विद्वानों ने धर्म को निम्नलिखित ढंग से परिभाषित किया है-

  1. मैलिनोव्स्की (Malinowsk) के अनुसार-“धर्म क्रिया का एक तरीका है और साथ ही विश्वासों की एक व्यवस्था भी; और धर्म एक समाजशास्त्रीय घटना के साथ-साथ एक व्यक्तिगत अनुभव भी है।”
  2. फ्रेजर (Frazer) के अनुसार-“धर्म से मैं मनुष्य से श्रेष्ठ उन शक्तियों की संतुष्टि या आराधना समझता हूँ, जिनके संबंध में यह विश्वास किया जाता है कि वे प्रकृति और मानव-जीवन को मार्ग दिखलाती है और नियंत्रित करती हैं।”
  3. टॉयलर (Tylor) के अनुसार-“आध्यात्मिक सत्ताओं में विश्वास ही धर्म हैं। से सत्ताएँ दैविक तथा राक्षसी दोनों ही प्रकार की हो सकती हैं।”
  4. जॉनसन (Johnson) के अनुसार-“धर्म कम या अधिक रूप में उच्च अलौकिक व्यवस्था या प्राणियों, शक्तियों, स्थानों एवं अन्य तत्त्वों के संबंध में विश्वासों एवं व्यवहारों की एक स्थिर | प्राणाली है।”
  5. हानिगशीम (Honigsheim) के अनुसार-“प्रत्येक मनोवृत्ति, जो कि इस विश्वास पर आधारित या संबंधित है कि अलौकिक शक्तियों का अस्तित्व है और उनसे संबंध स्थापित करना संभव व महत्त्वपूर्ण है, धर्म कहलाती है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्म को किसी-न-किसी रूप में अतिमानवीय शक्ति में विश्वास के रूप में स्पष्ट किया गया है। यह जीवन का सत्य और हमारी प्रकृति को निर्धारित करने वाली शक्ति है। मजूमदार एवं मदन (Majumdar and Madan) ने लिखा है, “धर्म किसी भय की वस्तु अथवा शक्ति का मानवीय प्रत्युत्तर तथा अनुकूलन का वह प्रकार है जो लोगों के लिए अलौकिक है, शक्ति के अर्थ से प्रभावित होता है।”

धर्म के प्रमुख तत्त्व । धर्म का अर्थ और परिभाषाओं का अध्ययन करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इनके बारे में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। इस पर भी विभिन्न परिभाषाओं का विश्लेषण करने के पश्चात् कुछ ऐसी बातें या तत्त्व अवश्य हैं जिन पर विद्वानों में बहुत कम मतभेद है। धर्म के ये तत्त्व निम्नलिखित हैं-

  1. संवेगात्मक भावनाएँ–पवित्र विश्वासों में दृढ़ श्रद्धा उत्पन्न करने में सबसे बड़ी भूमिका संवेगात्मक भावनाओं की होती है। प्रेम और भय इनके प्रमुख आधार हैं। एक व्यक्ति प्रेम विभोर होकर ईश्वर में श्रद्धा रखता है तो दूसरा दैवी विपत्तियों के भय से ईश्वर या भूतों की उपासना करता है।
  2. धर्माचरण–प्रत्येक धर्म में देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कुछ रीतियाँ तथा विधियाँ होती हैं। इन रीतियों और विधियों को ही आराधना कहा जाता है। आराधना का मूल उद्देश्य ईश्वरे या देवताओं को प्रसन्न करना होता है जिससे आराधना करने वाले को मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति हो सके। प्रत्येक धर्म में आराधना करने के लिए अलग-अलग ढंग होते हैं।
  3. पवित्र विश्वास–मानवीय ज्ञान को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है—(क) प्राकृतिक तथा (ख) पवित्र। प्राकृतिक घटनाओं को हम प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं; जैसे–बिजली का गिरना, भूकंप या भूचाल, पेड़, नदी आदि। इनका स्वरूप पूर्णतया इतिवृत्तात्मक होता है। दूसरे प्रकार की घटनाएँ पवित्र घटनाएँ होती हैं, जिनको प्रत्यक्ष या वैषयिक रूप से नहीं समझा जा सकता। इस कोटि की घटनाएँ ही धर्म का मूल आधार होती हैं। किस घटना को प्राकृतिक विश्वास की श्रेणी में रखा जाए और किस घटना को पवित्र विश्वासों में, यह समाज के सांस्कृतिक प्रतिमान पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए—पीपल का पेड़ कुछ व्यक्तियों के लिए प्राकृतिक घटना मात्र है, क्योंकि वह केवल पेड़ हैं, परंतु हिंदुओं के लिए पीपल’ एक पूजा योग्य पवित्र वृक्ष है। इसी प्रकार ‘गंगा’ कुछ व्यक्तियों के लिए नदी मात्र है तो कुछ के लिए पवित्र स्थान।
  4. धर्म के प्रतीक-प्रत्येक धर्म में अलौकिक शक्ति के प्रति श्रद्धा, विश्वास एवं आस्था को प्रकट करने के लिए प्रतीक निर्धारित कर लिए जाते हैं। वास्तव में ये प्रतीक अमूर्त तथ्यों का मूर्त प्रतिपादन होते हैं, जैसे कि कुछ वस्तुएँ एवं स्थान (तीर्थस्थान) धर्म के प्रतीक मान लिए जाते हैं।

धर्म के कार्य/भूमिका या महत्त्व

धर्म के कार्यों की कोई संख्या निश्चित नहीं की जा सकती। धर्म सदा से समाज को प्रभावित करता आया है और व्यक्तियों को विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न कार्य करने के लिए प्रेरित करता रहा है। यह सामाजिक नियंत्रण का एक महत्त्वपूर्ण एवं शक्तिशाली साधन है। धर्म के सामाजिक महत्त्व को निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत स्पष्ट किया जा सकता है-
1. सामाजिक नियंत्रण में सहायक-धर्म का मुख्य कार्य सामाजिक नियंत्रण का रहा है। अतीतकाल से ही धर्म मनुष्यों को बताया आया है कि बुरे कार्यों का परिणाम बुरा ही होता है। और भले कार्यों का अच्छा। धर्म के प्रभाव के कारण ही दुश्चरित्र एवं भ्रष्ट व्यक्तियों ने बुरे कार्यों का परित्याग कर दिया और लोग प्रेम, सहयोग और परोपकार के जीवन या व्यवहार को विशेष महत्त्व देने लगे। इस प्रकार धीरे-धीरे सामाजिक नियंत्रण के साधन के रूप में धर्म के दो स्वरूप हो गए—

  1. भय का धर्म, जो व्यक्ति को बुरे तथा पापपूर्ण कृत्य करने से रोकता था;
  2. विश्वास को धर्म, जिससे प्रेरित होकर व्यक्ति अपनी अंतरात्मा को शुद्ध करता था तथा समाज में प्रेम और सहयोग के साथ जीवन व्यतीत करता था।

विश्व के समस्त धर्म किसी-न-किसी रूप में सामाजिक नियंत्रण की स्थापना में अपना योगदान देते हैं। धर्म द्वारा लागू किया गया सामाजिक नियंत्रण अनौपचारिक नियंत्रण होता है तथा विश्व के समस्त धर्म किसी-न-किसी रूप में सामाजिक नियंत्रण की स्थापना में अपना योगदान देते हैं। धर्म द्वारा लागू किया गया सामाजिक नियंत्रण अनौपचारिक नियंत्रण होता है तथा बहुत अधिक प्रभावशाली होता है। धर्म द्वारा लागू किए गए सामाजिक नियंत्रण की सामान्य रूप से अवहेलना नहीं की जा सकती क्योंकि इसके साथ अलौकिक सत्ता तथा पाप-पुण्य एवं लोक-परलोक तथा पुनर्जन्म की धारणा जुड़ी रहती है। अतः धर्म मानव-व्यवहार को नियंत्रित
करने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देता रहा है।

2. नैतिकता का आधार-धर्म को यदि नैतिकता का आधार कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा। धर्म और नैतिकता में परस्पर घनिष्ठ संबंध है। प्रत्येक समाज की नैतिकता का आधार धर्म होता है। धर्म बताता है कि अनैतिक कार्यों का परिणाम बुरा होता है तथा बुरा काम करने वाले को नरक मिलता है। इन विचारों से भी सामाजिक नियंत्रण में सहायता मिलती है।

3. संस्कृति का अंग–धर्म और संस्कृति में परस्पर घनिष्ठ संबंध है। अन्य शब्दों में, धर्म संस्कृति का एक अंग होता है और इसके माध्यम से ही समाज अपनी संस्कृति का प्रचलन करता है। संस्कृति द्वारा धर्म का निर्धारण होता है।

4. सामाजिक एकता में वृद्धि करना-एक धर्म के मानने वाले समय-समय पर एक धार्मिक स्थल पर मिलते-जुलते रहते हैं तथा एक-सी परंपराओं में विश्वास करते हैं; अत: उनके अन्दर एकता तथा सहयोग की भावना का विकास होता है। दुर्णीम के अनुसार, धर्म का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य सामाजिक एकता बनाए रखना है।

5. मानसिक तनाव को कम करना-इस संसार में.प्रत्येक व्यक्ति को अनेक शारीरिक, मानसिक तथा आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ता है। इन संकटों के कारण मस्तिष्क में अनेक प्रकार के तनाव उत्पन्न हो जाते हैं। ये तनाव मनुष्य में निराशा उत्पन्न करते हैं। यदि ऐसी दशा में व्यक्ति को कोई सहारा न मिले तो वह मानसिक रूप से विक्षिप्त हो सकता है। धर्म निराश और टूटे दिलों को सहारा देता है तथा मानसिक तनाव को दूर करता है। ईश्वर-भरोसे सब-कुछ छोड़कर मनुष्य निश्चित हो जाता है।

6. कल्याणकारी भावनाओं को प्रोत्साहित करना-प्रत्येक धर्म परोपकार, दान, दया को महत्त्व देता है। धार्मिक भावनाएँ ही धनिकों को धर्मशाला, विश्राम-गृह, विद्यालय तथा औषधालय आदि बनवाने के लिए उत्साहित करती हैं। इस प्रकार धर्म समाज में कल्याणकारी कार्यों के लिए सर्वसाधारण को उत्साहित करता है।

7. परिवार की एकता को सुदृढ़ करना-धर्म परिवार को एकता के सूत्र में बाँधता है। एक परिवार के सभी सदस्य एक-सी धार्मिक क्रियाएँ करते हैं, एक ही देवी-देवता की पूजा करते हैं। तथा धार्मिक-समारोह मनाते हैं। धर्म ही विवाह, आचरण और पिता-पुत्र, पति-पत्नी के संबंधों पर प्रकाश डालता है।

8. कलात्मक विकास में योगदान देना-धर्म का कला के विकास में अपना विशेष योगदान रहा है। धर्म से प्रेरित होकर अनेक काव्य और कथा-ग्रंथों की रचना हुई। इसी प्रकार अनेक मंदिरों, मस्जिदों और चर्चा का निर्माण भी धार्मिक प्रेरणाओं का फल है। धर्म-भावनाओं से प्रेरित कलाकार अत्यंत तन्मयता से सृजन कार्य में लीन होते हैं।

9. देशभक्ति की भावना का विकास-धर्म अपनी मातृभूमि से प्यार करना सिखाता है। प्रायः एक देश के वासी एक ही धर्म के मानने वाले होते हैं अतः उनमें राष्ट्रीय एकता की भावना प्रबल रूप से पाई जाती है।

10. अध्यात्मवाद को प्रोत्साहित करना-धर्म व्यक्ति को बताता है कि इस संसार से परे भी कोई शक्ति होती है जो व्यक्ति को आपत्ति या संकट के समय बचा सकती है। अतः धर्म ही व्यक्ति के भौतिकता से परे हटाकर अध्यात्मवाद की ओर ले जाती है। इस प्रकार धर्म भौतिकता तथा आध्यात्मिकता में समन्वय करके संतुलन बनाए रखता है। निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि धर्म सामाजिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए यह नियंत्रण का एक अनौपचारिक परंतु काफी अधिक प्रभावशाली साधन माना जाता है।

प्रश्न 9.
शिक्षा किसे कहते हैं? इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
या
शिक्षा से आप क्या समझते हैं? मानव के सामाजिक जीवन में शिक्षा के मुख्य कार्य क्या हैं?
या
शिक्षा का सामाजिक अर्थ समझाते हुए शिक्षा की भूमिका पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
या
शिक्षा के सामाजिक कार्यों का संक्षेप में विवेचन कीजिए।
उत्तर
शिक्षा वास्तव में एक जटिल एवं बहुपक्षीय प्रक्रिया है। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति की निहित शक्तियों एवं क्षमताओं का विकास होता है। शिक्षा के ही द्वारा मनुष्य प्राणी’ से इंसान या सामाजिक प्राणी बनता है। शिक्षा का संबंध मनुष्य के जीवन के विभिन्न अथवा यह कहा जाए कि समस्त पक्षों से है। इससे मनुष्य का शारीरिक, संवेगात्मक, मानसिक तथा चारित्रिक विकास होता है। यह शिक्षा का व्यापक अर्थ है। इस अर्थ में शिक्षा मनुष्य के पूरे जीवन भर चलती रहती है। इससे भिन्न अनेक बार शिक्षा को संकुचित अर्थों में भी प्रतिपादित किया जाता है। संकुचित अर्थ में शिक्षा का आशय स्कूल, पाठशाला, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में होने वाले अध्ययन-अध्यापन से होता है। यह सीमित होती है तथा एक समय पर आकर समाप्त हो जाती है। इसे औपचारिक शिक्षा भी कहा जाता है।

शिक्षा का अर्थ एवं परिभाषाएँ।

शिक्षा अपने आप में एक अत्यधिक व्यापक एवं जटिल प्रक्रिया है जो किसी-न-किसी रूप में जीवनपर्यंत चलती रहती है। इस स्थिति में शिक्षा का अर्थ भी व्यापक, बहुपक्षीय तथा कुछ हद तक विवादास्पद होना स्वाभाविक ही है। भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से शिक्षा के भिन्न-भिन्न पक्षों को ध्यान में रखते हुए इसके अर्थ को निर्धारित किया गया है। विद्वानों तथा शिक्षाशास्त्रियों के व्यक्तिगत दृष्टिकोण ने भी शिक्षा के अर्थ को विविधता प्रदान करने में योगदान दिया है। इस स्थिति में शिक्षा के वास्तविक अर्थ को जानने के लिए विभिन्न पक्षों से शिक्षा के अर्थ का विवेचन करना प्रासंगिक होगा। मुख्य रूप से शिक्षा का शाब्दिक अर्थ, शिक्षा के प्रचलित अर्थ, शिक्षा के संकुचित अर्थ तथा शिक्षा के व्यापक अर्थ की चर्चा करना आवश्यक है।

(अ) शिक्षा का शाब्दिक अर्थ
पत्येक शास्त्र या विषय का कुछ-न-कुछ नाम रखा जाता है। यह नाम सार्थक तथा विषय के लिए परिचयात्मक होता है अतः नाम के शाब्दिक अर्थ को जान लेने से विषय के प्रति पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो जाती है। हमें ‘शिक्षा’ के अर्थ का निर्धारण करना है अत: हिंदी के शब्द ‘शिक्षा’ तथा इसके अंग्रेजी पर्यायवाची शब्द Education’ का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ जानना हमारे लिए अभीष्ट होगा।
‘शिक्षा’ का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ-हिंदी भाषा में प्रयोग होने वाला शब्द ‘शिक्षा’ वास्तव में संस्कृत भाषा से लिया गया है तथा संस्कृत भाषा में इसका संबंध ‘शिक्षा’ धातु से है। संस्कृत भाषा में इस धातु का आशय ज्ञान ग्रहण करने या विद्या प्राप्त करने से है। इस व्युत्पत्तिमूलक अर्थ के आधार पर कहा जा सकता है कि शिक्षा वह प्रक्रिया है जो ज्ञान अथवा विद्या प्राप्त करने या प्रदान करने की माध्यम है। अनेक विद्वान् शिक्षा के इसी अर्थ को स्वीकार करते हुए शिक्षा की व्याख्या एवं व्यवस्था करने के पक्ष में हैं।
“Education’ का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ-अंग्रेजी शब्द Education’ की उत्पत्ति लैटिन भाषा से हुई है। विद्वानों का विचार है कि Education शब्द का संबंध लैटिन भाषा के तीन शब्दों ‘educatium (एजूकेसीयम) educere’ (एजूसीयर) तथा ‘educare’ (एजूकेयर) से है। इन तीनों ही शब्दों को लैटिन भाषा में लगभग समान अर्थ है। इन शब्दों का क्रमश: अर्थ है-विकसित करता, निकालना या आगे बढ़ाना, बाहर निकालना या शिक्षित करना।
इस शाब्दिक अर्थ को ध्यान में रखते हुए यह कहा जाता है कि शिक्षा वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से बालक या व्यक्ति को निहित शक्तियों या क्षमताओं को विकसित किया जाता है या प्रस्फुटित किया जाता है। इस प्रकार का विकास जीवन भर होता रहता है; अत: शिक्षा की प्रक्रिया भी जीवन भर चलती रहती है। स्पष्ट है कि इस दृष्टिकोण से शिक्षा का आशय संस्थागत शिक्षा तक सीमित नहीं है।

(ब) शिक्षा का संकुचित अर्थ
‘शिक्षा’ के सामान्य परिचय को प्रस्तुत करते समय स्पष्ट किया गया है कि शिक्षा एक व्यापक प्रक्रिया है तथा इसके अर्थ को सरलता से स्पष्ट नहीं किया जा सकता। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए एक दृष्टिकोण से शिक्षा के संकुचित अर्थ का भी प्रतिपादन किया गया है। इस दृष्टिकोण से शिक्षण-कार्य के लिए विधिवत् स्थापित की गई शिक्षा संस्थाओं (पाठशाला, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय आदि) द्वारा ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया ही शिक्षा है। इस दृष्टिकोण से शिक्षा की प्रक्रिया एक औपचारिक एवं व्यवस्थित तथा नियमित रूप से चलने वाली प्रक्रिया है। इस अर्थ को आधार मानकर वही बालक या व्यक्ति शिक्षित माना जा सकता है जो किसी मान्यता प्राप्त शिक्षा संस्था में प्रवेश प्राप्त करके निर्धारित पाठ्यक्रम का अध्ययन करता है, परीक्षा में सम्मिलित होता है तथा परीक्षा में उत्तीर्ण होकर प्रमाण-पत्र प्राप्त कर लेता है। जे०एस० मैकेन्जी (J.S. Mackenzi) ने स्पष्ट किया है कि संकुचित अर्थ में शिक्षा वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति की शक्तियों के विकास के लिए प्रयास किए जाते हैं। उन्हीं के शब्दों में, “संकुचित अर्थ में शिक्षा का अर्थ हमारी शक्तियों के विकास तथा सुधार के लिए सचेत रूप से किए गए किसी भी प्रयास से ही हो सकता है।”

(स) सामान्य रूप से शिक्षा का प्रचलित अर्थ
शिक्षा के शाब्दिक अर्थ के अतिरिक्त उसके सामान्य रूप से प्रचलित अर्थ की भी चर्चा की जाती है। समाज में अधिकांश व्यक्ति शिक्षा के इसी अर्थ से परिचित हैं। इस अर्थ के अनुसार विभिन्न विषयों से संबंधित कुछ तथ्यों एवं सूचनाओं को किसी भी माध्यम से प्राप्त कर लेना या एकत्र कर लेना ही शिक्षा : कहलाता है। इस दृष्टिकोण से तथ्यों के संकलन के ढंग आदि के विषय में कुछ भी विचार नहीं किया जाता। तथ्य संकलन एवं सूचनाएँ एकत्र करने के ढंग उचित भी हो सकते हैं तथा अनुचित भी। शिक्षा के इस अर्थ के संदर्भ में संबंधित व्यक्ति के आतंरिक विकास को कोई महत्त्व प्रदान नहीं किया गया बल्कि केवल बाहरी जगत् से प्राप्त होने वाली सूचनाओं के एकत्रीकरण को ही शिक्षा माना गया है। शिक्षा के अर्थ के इस स्पष्टीकरण की पर्याप्त आलोचना की गई है। विद्वानों का कहना है कि इस व्याख्या से न तो शिक्षा की प्रक्रिया का समुचित परिचय ही प्राप्त होता है और न ही यह शिक्षा के वास्तविक अर्थ को ही स्पष्ट करने में सहायक है। इस दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए कहा गया है। कि शिक्षा से आशय अंदर से होने वाले विकास से है न कि बाहर से किया जाने वाला संचय। शिक्षा की प्रक्रिया का परिचालन स्वाभाविक मूलप्रवृत्तियों तथा रुचियों की सक्रियता से होता है। अतः बाहरी शक्तियों के प्रति होने वाली प्रतिक्रिया को शिक्षा नहीं कहा जा सकता।

(द) शिक्षा का व्यापक अर्थ
अनेक विद्वानों ने ‘शिक्षा’ की प्रक्रिया की व्याख्या उसके व्यापक अर्थ में की है। इस अर्थ के अनुसार शिक्षा ज्ञान प्राप्ति के माध्यम के रूप में एक अति व्यापक एवं जटिल प्रक्रिया है। इस रूप में शिक्षा जन्म के साथ ही प्रारंभ हो जाती है तथा जीवन भर निरंतर चलती रहती है। काल या अवधि के ही समान इस अर्थ के अनुसार शिक्षा प्रदान करने अथवा ग्रहण करने का क्षेत्र भी सीमित नहीं होता अर्थात् शिक्षण का क्षेत्र शिक्षा संस्थाओं तक ही सीमित नहीं होता बल्कि पूरा का पूरा जगत् ही शिक्षा ग्रहण करने एवं शिक्षा प्रदान करने का क्षेत्र है। शिक्षा की इस व्यापक व्याख्या को मैकेन्जी ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “विस्तृत अर्थ में शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जो आजीवन चलती रहती है तथा जीवन के प्राय: प्रत्येक अनुभव से उसके भण्डार में वृद्धि होती है। व्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार के अनुभव जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से प्राप्त करता है। ये अनुभव किसी भी व्यक्ति के माध्यम से प्राप्त किए जा सकते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि केवल विद्यालय या किसी अन्य शिक्षा संस्था के अध्यापक ही शिक्षक नहीं होते बल्कि प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में शिक्षक की भूमिका निभा सकता है। जिस भी व्यक्ति से कोई नई बात सीखी जाए, वहीं व्यक्ति उस संदर्भ में शिक्षा है। इस तथ्य को स्वीकार कर लेने पर कोई बालक भी किसी प्रौढ़ व्यक्ति के लिए शिक्षक सिद्ध हो सकता है। बालक ही क्या, पर्यावरण से भी अनेक बातें सीखी जा सकती हैं। अत: पर्यावरण भी हमारे लिए शिक्षक ही हैं।
उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा के संकुचित अर्थ से भिन्न शिक्षा के व्यापक अर्थ के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य भी अति व्यापक है। इसे दृष्टिकोण से शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है, न कि विभिन्न स्तरों के प्रमाण-पत्र प्राप्त करना। इस प्रकार शिक्षा की प्रक्रिया व्यक्ति के सर्वांगीण विकास की प्रक्रिया है। इस तथ्य को एडलर (Adler) ने इन शब्दों में प्रस्तुत किया है, “शिक्षा मनुष्य के संपूर्ण जीवन से संबंधित क्रिया है, यह केवल छोटे बालकों से ही संबंधित नहीं होती है। यह तो जन्म से प्रारंभ होती है और मृत्यु तक चलती रहती है।”

शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ

‘शिक्षा की परिभाषाओं के उपर्युक्त विवरण द्वारा काफी हद तक शिक्षा का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। इसके और अधिक स्पष्टीकरण के लिए शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवर्णित हैं–
1. निरंतर चलने वाली प्रक्रिया–शिक्षा अपने आप में एक प्रक्रिया है जो निरंतर रूप से जीवन भर चलती रहती है। शिक्षा के माध्यम से ही जीवन का विकास होता है।

2. विकास की प्रक्रिया-शिक्षा की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसके माध्यम से व्यक्ति का विकास होता है। यह भी कहा जा सकता है कि शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति के आंतरिक गुणों तथा निहित शक्तियों का प्रकटीकरण तथा प्रस्फुटन होता है। इस विशेषता को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि शिक्षा की प्रक्रिया में बाहर से कुछ भी थोपना संभव नहीं होता।

3. सचेतन प्रक्रिया–-एक दृष्टिकोण से शिक्षा को सचेतन प्रक्रिया भी स्वीकार किया गया है। शिक्षा की इस विशेषता के अनुसार, शिक्षा को जानबूझकर ग्रहण किया जाता है तथा इसके लिए भी प्रयास करने पड़ते हैं। शिक्षा की प्रक्रिया में काफी हद तक नियमितता भी होती है।

4. आजीवन चलने वाली प्रक्रिया जैसा की पहले भी स्पष्ट किया जा चुका है; शिक्षा केवले स्कूल, कॉलेज आदि शिक्षण संस्थाओं तक ही सीमित नहीं, बल्कि जीवन के समस्त क्षेत्र ही शिक्षा प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस दृष्टिकोण को स्वीकार कर लेने पर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि शिक्षा जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है। यह जन्म से ही प्रारंभ हो जाती है तथा मृत्यु तक किसी-न-किसी रूप में चलती ही रहती है।

5. परिवर्तनकारी प्रक्रिया–शिक्षा अपने आप में एक ऐसी प्रक्रिया है जो संबद्ध व्यक्तियों के जीवन में अनेक परिवर्तन लांती है। इसके माध्यम से व्यक्ति के व्यवहार में बहुमुखी परिवर्तन आता है। शिक्षा के परिणामस्वरूप जहाँ एक ओर बालक की मूलप्रवृत्तियों, संवेगों, मनोवृत्तियों तथा प्रकृति प्रदत्त क्षमताओं का परिमार्जन होता है, वहीं साथ-ही-साथ शिक्षा के ही प्रभाव से व्यक्ति की चिंतन प्रणाली, कार्य-प्रणाली तथा विभिन्न उत्तेजनाओं के प्रति होने वाली प्रतिक्रियाओं के ढंग में भी परिवर्तन होता है।

6. गत्यात्मक प्रक्रिया–शिक्षा प्रक्रिया की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए इसकी एक अन्य विशेषता का भी उल्लेख किया जा सकता है। इस विशेषता के अनुसार शिक्षा को एक गत्यात्मक प्रक्रिया कहा जा सकता है। गत्यात्मक से आशय है कि शिक्षा की प्रक्रिया न तो स्थिर है और न | ही जड़। शिक्षा का संबंध व्यक्ति के निरंतर होने वाले विकास से है तथा विकास सदैव उन्नयनकारी होता है। अतः शिक्षा की प्रक्रिया गत्यात्मक प्रक्रिया है।

7. द्विमुखी प्रक्रिया-शिक्षा की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कुछ विद्वानों ने इसे द्विमुखी प्रक्रिया कहा है। इस विशेषता का विस्तृत विश्लेषण एवं प्रतिपादन मुख्य रूप से प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री एडम्स (Adams) ने किया है। सर्वप्रथम एडम्स ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा में दो व्यक्ति सम्मिलित होते हैं, जो एक-दूसरे को निरंतर प्रभावित करते हैं। एडम्स के ही शब्दों में, शिक्षा एक द्विमुखी प्रक्रिया है जिसमें एक व्यक्तित्व दूसरे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। जिससे उसके विकास में परिवर्तन हो जाए।” यह भी कहा जा सकता है कि शिक्षा की प्रक्रिया के अंतर्गत शिक्षक के प्रयासों के द्वारा बालक के व्यवहार एवं विकास में परिवर्तन आता है। सामान्य रूप से शिक्षक के व्यक्तित्व का बालक के व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त, ज्ञान के विभिन्न अंगों का प्रयोग करके भी बालक के विकास को प्रभावित किया जाता है। शिक्षा प्रक्रिया को जब द्विमुखी प्रक्रिया कहा जाता है तब शिक्षा का एक ध्रुव (Pole) शिक्षक होता है तथा दूसरा ध्रुव बालक होता है।

8. त्रिमुखी प्रक्रिया-कुछ विद्वानों ने शिक्षा की प्रक्रिया में निहित प्रक्रियाओं का उल्लेख करते हुए इसको एक त्रिमुखी प्रक्रिया कहा है। इस मान्यता के अनुसार शिक्षा के तीन अंग हैं–शिक्षक, पाठ्यक्रम तथा बालक। इस मान्यता के अनुसार ‘शिक्षक’ तथा ‘बालक’ के मध्य पाठ्यक्रम के माध्यम से संबंध स्थापित होता है। शिक्षा को एक त्रिमुखी प्रक्रिया स्थापित करने के लिए जॉन डीवी ने अपने दृष्टिकोण से व्याख्या प्रस्तुत की है। डीवी के अनुसार शिक्षा की प्रक्रिया में मनोवैज्ञानिक पक्ष के साथ-ही-साथ सामाजिक पक्ष का भी समान रूप से महत्त्व है। शिक्षा की प्रक्रिया सदैव समाज में रहकर ही चलती है। समाज से बिलकुल अलग रहकर शिक्षा की प्रक्रिया का चल पाना संभव नहीं है। यह भी कहा जा सकता है कि समाज के सहयोग से ही बालक को मनोवैज्ञानिक विकास भी सुचारू रूप से हो सकता है। इस प्रकार, शिक्षा द्वारा बालक का सामाजिक विकास भी होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है। कि बालक को उस समाज के लिए शिक्षित करना चाहिए, आगे चलकर जिस समाज को उसे सदस्य बनना है। यह तभी हो सकता है जबकि बालक की शिक्षा समाज के ही माध्यम से हो। समाज द्वारा ही यह निर्धारित किया जा सकता है कि परिवर्तित होती हुई परिस्थितियों में बालक को कौन-कौन से विषय पढ़ाए जाने चाहिए तथा पढ़ाने के लिए किस-किस शिक्षण पद्धति को अपनाया जाना चाहिए जिससे कि बालक की कार्यकुशलता में वृद्धि हो तथा वह समाज द्वारा स्वीकृत आचरण करे। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए पाठ्यक्रम का निर्धारण होता है। शिक्षक पाठ्यक्रम के अनुसार बालकों को शिक्षित करता है। इसी व्याख्या के आधार पर शिक्षा के तीन अंग माने जाते हैं। शिक्षक, पाठ्यकम तथा बालक।।

9. शिक्षण संस्थाओं तक सीमित नहीं—सामान्य रूप से शिक्षण संस्थाओं अर्थात् स्कूल, कॉलेज में संपन्न होने वाली गतिविधियों को ही शिक्षा माना जाता है परंतु यह सत्य नहीं है। शिक्षा की। एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि यह शिक्षण संस्थाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के समस्त क्षेत्रों से सम्बद्ध है।

शिक्षा के प्रमुख सामाजिक कार्य

शिक्षा के प्रमुख सामाजिक कार्यों का विवरण निम्न प्रकार हैं-

1. राष्ट्रीय विकास में योगदान-राष्ट्रीय जीवन में शिक्षा का एक मुख्य कार्य राष्ट्रीय विकास में योगदान प्रदान करना है। वास्तव में, किसी भी राष्ट्र के समुचित विकास के लिए आवश्यक होता है कि उसके अधिक-से-अधिक नागरिक शिक्षित हों। अधिकांश नागरिकों के अशिक्षित होने की स्थिति में कोई भी राष्ट्र किसी भी क्षेत्र में उन्नति एवं प्रगति नहीं कर सकता। यह दो दृष्टिकोणों से सत्य है। सर्वप्रथम तो यह सत्य है कि अशिक्षित नागरिक राष्ट्र की उन्नति एवं विकास में समुचित योगदान दे ही नहीं सकते। दूसरी बात यह सत्य है कि केवल शिक्षित व्यक्ति ही इस तथ्य को समझ पाते हैं कि व्यक्तिगत उन्नति की अपेक्षा राष्ट्रीय उन्नति का महत्त्व अधिक होता है। शिक्षा द्वारा इस विवेक के विकास के परिणामस्वरूप राष्ट्र का विकास तीव्र गति से होने लगता है|

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions

2. राष्ट्रीय एकता के विकास में योगदान-राष्ट्रीय जीवन में शिक्षा का एक उल्लेखनीय कार्य राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाए रखना भी है। हमारे देश के संदर्भ में शिक्षा का यह कार्य और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि हमारे देश में बहुपक्षीय विविधता विद्यमान है। जातिगत, भाषागत, धार्मिक तथा क्षेत्रीय विविधता हमारी राष्ट्रीय एकता के लिए बाधक कारक हैं। इन कारकों के विद्यमान होने के कारण राष्ट्रीय एकता के लिए शिक्षा की भूमिका अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है।

3. भावात्मक एकता की वृद्धि–राष्ट्र की उन्नति एवं प्रगति के लिए भावात्मक एकता भी अति आवश्यक होती है। हमारे देश में विभिन्न क्षेत्रों के रीति-रिवाज, प्रथाएँ, परंपराएँ तथा रहन-सहन में बहुत अधिक भिन्नता विद्यमान हैं। इस स्थिति में देश के विभिन्न भागों में नागरिकों में भावात्मक एकता को विकसित करने तथा बनाए रखने के लिए अनेक प्रयास आवश्यक होते हैं। ये प्रयास शिक्षा के माध्यम से किए जा सकते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है शिक्षा का एक मुख्य कार्य देश के नागरिकों में भावात्मक एकता में वृद्धि करना भी है।

4. सार्वजनिक हित के लिए व्यक्तिगत हित के बलिदान का भाव विकसित करना—राष्ट्र के विकास, प्रगति एवं सुरक्षा आदि के लिए अनेक बार सार्वजनिक हितों की रक्षा के लिए व्यक्तिगत हितों का बलिदान करनी भी आवश्यक होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए शिक्षा का एक कार्य यह भी स्वीकार किया जाता है कि वह देश के नागरिकों में सार्वजनिक हित के लिए व्यक्तिगत हित के बलिदान का भाव विकसित करे।।

5. योग्य कार्यकर्ता तैयार करना-राष्ट्रीय जीवन में शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण कार्य योग्य एवं निपुण कार्यकर्ता तैयार करना भी है। वास्तव में, योग्य एवं निपुण व्यक्ति ही राष्ट्रीय उन्नति एवं प्रगति में योगदान देते हैं। ऐसे व्यक्ति सभी कार्यों को उत्तम ढंग से करते हैं। औद्योगिक, व्यावसायिक तथा अनुसंधान के क्षेत्र में योग्य व्यक्तियों द्वारा ही उल्लेखनीय कार्य किए जाते हैं। तथा राष्ट्र प्रगति करता है। इस प्रकार के योग्य एवं निपुण व्यक्ति शिक्षा के माध्यम से ही तैयार होते हैं।

6. सामाजिक विकास का कार्य-राष्ट्रीय जीवन में शिक्षा का एक कार्य सामाजिकता का विकास करना भी है। इस गुण के विकास के परिणामस्वरूप समाज में अधिकांश व्यक्ति सामाजिक संघर्षों तथा तनावों से बचकर रहते हैं। सामाजिकता के गुण से युक्त नागरिक समाज तथा राष्ट्र की उन्नति के लिए कार्य करते हैं, वे अनावश्यक रूप से एक-दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं किया करते।

7. सभ्यता तथा संस्कृति के सरंक्षण का कार्य किसी भी राष्ट्र की गरिमा को बनाए रखने तथा उसमें समुचित वृद्धि करने के लिए संबंधित सभ्यता तथा संस्कृति का संरक्षण अति आवश्यक होता है। यह कार्य सर्वाधिक उत्तम रूप में शिक्षा द्वारा ही किया जा सकता है। एकं प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री ओटावे (Ottawey) के अनुसार, “शिक्षा का एक कार्य समाज के सांस्कृतिक मूल्यों और व्यवहार प्रतिमानों को उसके नवयुवकों तथा कार्यशील सदस्यों को प्रदान करना है।”

8. योग्य नागरिकों का निर्माण-न्यूयार्क की वैधानिक समिति ने अपनी एक रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि “सार्वजनिक शैक्षिक व्यवस्था का एक प्रधान कार्य यह है कि वह विद्यार्थियों को राज्य में नागरिकता के अधिकारों और कर्तव्यों को निभाने योग्य बनाए।” वास्तव में, वही राष्ट्र उन्नति करता है जिसके अधिकांश नागरिक योग्य एवं नागरिकता के गुणों से युक्त होते हैं। शिक्षत्र का ही कार्य है कि वह लोगों को नागरिकता के गुणों की समुचित जानकारी प्रदान करे।

9. नेतृत्व के लिए प्रशिक्षण प्रदान करना-जनतांत्रिक देशों में कुशल नेतृत्व का भी विशेष महत्त्व होता है। जनतंत्र की सफलता के लिए योग्य, अनुभवी तथा कुशल नेताओं का होना अति आवश्यकता होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि शिक्षा का एक कार्य युवकों में नेतृत्व के गुणों के विकास के लिए समुचित प्रशिक्षण की व्यवस्था भी है।

10. अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकास का कार्य-आज प्रत्येक राष्ट्र का राष्ट्रीय जीवन अतंर्राष्ट्रीय क्षेत्र से भी जुड़ा हुआ है। विभिन्न क्षेत्रों में विश्व के विभिन्न राष्ट्रों को पारस्परिक सहयोग से कार्य करने पड़ते हैं। अब विभिन्न राष्ट्र परस्पर पूरक रूप में कार्य करते हैं। इस प्रकार की वर्तमान परिस्थितियों में अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना के महत्त्व को स्वीकार किया जा चुका है। इस धारणा के विकास के साथ-ही-साथ शिक्षा का एक कार्य अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना का विकास करना भी मान लिया गया है। शिक्षा द्वारा विकसित की गई अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना ही विश्व-शान्ति तथा मैत्री को बढ़ावा दे सकती है तथा विश्व को युद्धों से बचाया जा सकता है।

पूर्वोक्त विवरण द्वारा शिक्षा के मुख्य कार्य स्पष्ट हो जाते हैं। वास्तव में शिक्षा के कार्य असंख्य हैं तथा व्यक्ति के संपूर्ण जीवन से संबद्ध है। व्यक्ति के जीवन में प्रत्येक पक्ष को उत्तम बनाना शिक्षा का ही कार्य है। राष्ट्र की प्रगति भी उत्तम शिक्ष पर ही निर्भर करती है।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions

सामाजिक नियंत्रण में शिक्षा की भूमिका

आधुनिक समाजों में शिक्षा भी सामाजिक नियंत्रण का महत्त्वपूर्ण औपचारिक साधन है। इसे औपचारिक इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह स्कूलों व कॉलेजों में औपचारिक विधि द्वारा प्रदान की जाती है। शिक्षा द्वारा व्यक्ति समूह की मान्यताओं का ज्ञान प्राप्त करता है तथा इससे इसे प्राप्त करने वालों के व्यवहार में नियमितता आती है। शिक्षा व्यक्ति को अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित करती है तथा उसके चरित्र का निर्माण करती है। शिक्षा संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांरित करने में भी सहायक है।

  1. सामाजिक व्यवहार का नियमन–शिक्षा मूल्यों, आदर्शों एवं मतों के संचार द्वारा व्यक्ति को सामान्य व्यवहार करने की प्रेरणा मिलती है तथा इनसे उसका व्यवहार नियमित होता है। शिक्षा के माध्यम से ही हम यह सीखते हैं कि किस प्रकार का व्यवहार करना उचित है तथा किस प्रकार को अनुचित। शिक्षा उचित व्यवहार की प्रेरणा देकर मानव के सामाजिक व्यवहार को नियमित करती है।
  2. व्यक्तित्व का विकास–औपचारिक शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति अच्छे गुण सीखता है और अपने व्यक्तित्व का विकास करता है। इन गुणों व अच्छे व्यक्तित्व से वह अच्छा नागरिक बनता है और इस प्रकार वह स्वतः समाज के आदर्शों के अनुकूल व्यवहार करता है। शिक्षा को व्यक्तित्व के विकास का एक प्रमुख साधन माना गया है।
  3. आर्थिक सुरक्षा–शिक्षा आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के अवसर उपलब्ध कराकर भी सामाजिक नियंत्रण रखने में सहायक है। वस्तुतः शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य ही व्यक्ति को आर्थिक दृष्टि से निर्भर बनाना, जीविकोपार्जन में सहायता देना तथा उसका तकनीकी ज्ञान बढ़ाना है।
  4. अनुकूलन–शिक्षा सामाजिक परिस्थितियों से अनुकूलन करने में सहायता प्रदान कर सामाजिक नियंत्रण में सहायता प्रदान करती है। शिक्षा के माध्यम से ही समाज में पाई जाने वाली भिन्नताओं का ज्ञान होता है तथा व्यक्ति का दृष्टिकोण व्यापक हो जाता है। इससे अनुकूलन’ में , सहायता मिलती है।
  5. संस्कृति का हस्तांतरण-शिक्षा संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित करने में सहायता देकर भी सामाजिक नियंत्रण रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है। शिक्षा द्वारा ही बच्चों को अपनी सामाजिक विरासत का ज्ञान प्राप्त होता है।
  6. भौतिक, बौद्धिक व नैतिक विकास–शिक्षा व्यक्ति के भौतिक, बौद्धिक व नैतिक विकास में सहायक है। इस बहुमुखी विकास द्वारा व्यक्ति तार्किक बन जाता है और समाज के आदर्शों के अनुरूप ही व्यवहार करता है।
  7. तनावों पर नियंत्रण शिक्षा व्यक्ति में अनुकूलनशीलता को प्रोत्साहन देती है और तनावों पर नियंत्रण रखने में सहायक है। यह व्यक्तियों को नवीन परिस्थितियों से अनुकूलन करना सिखाती है। इससे भी सामाजिक नियंत्रण में इसका महत्त्व स्पष्ट होता है।

अतः शिक्षा सामाजिक नियंत्रण की एक महत्त्वपूर्ण औपचारिक अभिकरण है तथा बाल्यावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक औपचारिक व अनौपचारिक रूप से व्यक्ति के व्यवहार को निर्देशित व नियंत्रित करने में महत्त्वूपर्ण भूमिका निभाती है।

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions (सामाजिक संस्थाओं को समझना) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Sociology Introducing Sociology Chapter 3 Understanding Social Institutions (सामाजिक संस्थाओं को समझना), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.