UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 9 Crime

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 9 Crime (अपराध) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 9 Crime (अपराध).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 9
Chapter Name Crime (अपराध)
Number of Questions Solved 40
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 9 Crime (अपराध)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1.
अपराध की परिभाषा दीजिए। भारत में अपराध के कारणों की विवेचना कीजिए। [2010, 11, 15]
या
अपराध के मुख्य व्यक्तिगत और मनोवैज्ञानिक कारणों को स्पष्ट कीजिए। [2015]
या
अपराध की परिभाषा दीजिए।
अपराध के आर्थिक और सामाजिक कारणों की व्याख्या कीजिए। अपराध के सामान्य कारणों की विवेचना कीजिए। [2007, 10, 11, 12]
या
अपराध के चार प्रमुख कारण लिखिए। [2007, 12]
या
क्या आपके विचार में अपराध का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कारण आर्थिक कारक है? [2007]
या
अपराध के विभिन्न कारकों का सविस्तार उल्लेख कीजिए। [2013]
उत्तर:

अपराध की परिभाषा

अपराध एक ऐसा कार्य है, जो लोक-कल्याण के लिए अहितकर समझा जाता है तथा जिसे राज्य के द्वारा पारित कानून द्वारा निषिद्ध कर दिया जाता है। इसके उल्लंघनकर्ता को दण्ड दिया जाता है। अपराध को विभिन्न समाजशास्त्रियों ने निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है

इलियट तथा मैरिल के अनुसार, “अपराध को एक ऐसे समाज-विरोधी व्यवहार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसे समाज ‘अमान्य करता है और इसके लिए दण्ड की व्यवस्था करता है।’

लैण्डिस और लैण्डिस के अनुसार, “अपराध वह कार्य है जिसे राज्य ने समूह-कल्याण के लिए हानिकारक घोषित किया है और जिसके लिए राज्य पर दण्ड देने की शक्ति है।”

थॉमस के अनुसार, “अपराध एक ऐसा कार्य है जो उस समूह के स्थायित्व का विरोधी है, जिसे व्यक्ति अपना समझता है।”

गिलिन तथा गिलिन के अनुसार, “कानूनी दृष्टिकोण से देश के कानूनों के विरुद्ध व्यवहारों को अपराध कहा जाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि अपराध की परिभाषा दो प्रकार से दी गयी है। इसे समाजशास्त्री दृष्टि से, कानूनी दृष्टि से तथा सामाजिक-कानूनी दृष्टि से परिभाषित किया गया है। किसी भी अपराध के लिए दो बातें होनी आवश्यक हैं
(अ) वह कार्य समाज-विरोधी समझा जाता है तथा
(ब) उस कार्य को करने वाले को राज्य कानूनी दृष्टि से दण्ड देता है।

अपराध के कारण

अपराध के लिए निम्नलिखित कारण उत्तर:दायी होते हैं
(अ) अपराध के व्यक्तिगत जैविकीय कारण
व्यक्ति की आयु, लिंग, बौद्धिक स्तर, शैक्षणिक स्थिति तथा सामाजिक-आर्थिक स्थिति जैसे अनेक व्यक्तिगत व जैविकीय कारण अपराध के लिए उत्तर:दायी बताये गये हैं। इनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं

  1. आयु-आयु की दृष्टि से 17 वर्ष से 24 वर्ष के बीच की आयु में अपराध तीव्र गति से किये जाते हैं। गम्भीर अपराध 20 से 26 वर्ष की आयु में तथा यौन सम्बन्धी अपराध प्रौढ़ावस्था में अधिक होते हैं। अमेरिकी समाज में हुए अध्ययनों से हमें अपराध की प्रकृति और आयु में सम्बन्ध देखने को मिलता है।
  2. लिंग-अपराध की दर महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में अधिक होती हैं। पुरुष का स्वभाव अधिक आक्रामक होता है, घर से बाहर रहने के कारण उन्हें उच्छृखलता का अवसर अधिक मिलता है तथा उन पर कार्यभार होने के कारण मानसिक तनाव अधिक पाया जाता है।
  3. शारीरिक दोष-व्यक्ति का कोई शारीरिक दोष भी कई बार अपराध का एक कारण बने
    जाता है। गोरिंग ने अपने अध्ययनों द्वारा यह बताया है कि अंग्रेज अपराधी कद में छोटे व वजन में कम होते हैं। यदि शारीरिक विकास आयु के अनुसार अत्यधिक है अथवा अत्यधिक अल्पविकसित है तो भी अपराध की प्रवृत्ति अधिक देखने को मिलती है।
  4. वंशानुक्रमण-वंशानुक्रमण भी अपराध का कारण है। बच्चा जन्म से ही अपराधी प्रवृत्तियाँ लेकर आता है। लॉम्बोसो, गैरोफेलो, फैरी इत्यादि विद्वानों ने अपने अध्ययनों द्वारा अपराध में वंशानुक्रमण का महत्त्व स्पष्ट किया है।

(ब) अपराध के मनोवैज्ञानिक कारण
अपराध को प्रोत्साहित करने वाली मानसिक दशाएँ निम्नलिखित हैं—

  1. मानसिक दुर्बलता मानसिक दुर्बलता या बुद्धिहीनता भी अपराध का कारण हो सकता है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति अच्छे और बुरे कार्यों में अन्तर नहीं कर सकते। गोडार्ड ने मानसिक दुर्बलता को अपराध का प्रमुख कारण बताया है, जब कि एडलर ने इसका विरोध करते हुए इस बात पर बल दिया है कि अधिकांश अपराधी अपने बौद्धिक स्तर में सामान्य व्यक्ति के समान होते हैं।
  2. संवेगात्मक अस्थिरता व संघर्ष-व्यक्ति संवेगात्मक तनाव को दूर करने के लिए भी अपराध करते हैं। हीले तथा ब्रोनर ने अपने अध्ययन द्वारा यह बताया है कि 91 प्रतिशत अपराधी अपनी हीनता की भावना को दूर करने के लिए अपराध करते हैं। अपराध भी एक संवेग है। बर्ट ने भी असन्तुलन तथा अस्थिरता पर बल दिया है।
  3. मानसिक बीमारियाँ-अनेक मानसिक बीमारियाँ भी अपराधी प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देती हैं। हीन मनोवृत्तियाँ, हिस्टीरिया, मेनिया इत्यादि मानसिक बीमारियाँ भी अपराध के लिए उत्तर दायी मानी गयी हैं। अमेरिका की राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य समिति के अनुसार 77 प्रतिशत कैदी किसी-न-किसी रूप में मानसिक रोग से पीड़ित थे। यह अध्ययन 34 जेलों के अपराधियों के मानसिक विश्लेषण पर आधारित था।

(स) अपराध के सामाजिक कारण
सामाजिक कारणों में हम निम्नलिखित दशाएँ सम्मिलित करते हैं–

1. परिवार-बच्चे के समाजीकरण तथा व्यक्तित्व के निर्माण में परिवार का महत्त्वपूर्ण योगदान होती है। यदि परिवार का वातावरण ही अच्छा नहीं है तो बच्चों का व्यक्तित्व भी ठीक प्रकारे से विकसित नहीं होता है। सामान्यत: निम्नलिखित गारिवारिक दशाएँ अपराध में सहायक मानी जाती हैं

  • विघटित परिवार-यदि परिवार विघटित है तथा सदस्यों में मतैक्य का अभाव है। तथा परिस्थितियों और भूमिकाओं में असन्तुलन आ गया है तो इसको सदस्यों पर बुरा प्रभाव पड़ता है और अपराधी प्रवृत्तियाँ अधिक पनपने लगती हैं।
  • नष्ट घर–जब पारिवारिक विघटन अधिक हो जाता है तो उसे नष्ट घर कहते हैं। तलाक, परित्याग, माता या पिता दोनों में से एक या दोनों की मृत्यु से घर नष्ट हो जाता है और बच्चों का विकास ठीक प्रकार से नहीं हो पाता। अधिकांश बालअपराधी नष्ट घरों के ही होते हैं।
  • तिरस्कृत बालक-यदि बच्चों को परिवार में संरक्षण तथा प्यार नहीं मिलती तथा अनचाहा बालक समझकर उसका तिरस्कार किया जाता है, तो वह अपराध की ओर अग्रसर हो जाता है। टैफ्ट के अनुसार, “निश्चित रूप से अनचाहा बालक बालअपराधी बन सकता है।”
  • अनैतिक परिवार यदि परिवार के सदस्य अनैतिक कार्यों में लगे हुए हैं तो भी इसका बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ता है और वे अपराध की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं। इलियट के अनुसार, 67 प्रतिशत अपराधी लड़कियाँ अनैतिक परिवारों से आती हैं।
  • अनुचित पारिवारिक नियन्त्रण–यदि सदस्यों पर परिवार का नियन्त्रण ठीक नहीं है और माता-पिता की व्यस्तता के कारण वे बच्चों को ठीक प्रकार से नहीं देख पा
    रहे हैं, तो बालक बुरी संगति में पड़कर आसानी से अपराधी बन जाते हैं।

2. शिक्षा- शिक्षा का भी अपराध से सम्बन्ध स्थापित किया गया है। शिक्षित व्यक्ति अधिकतर नियोजित अपराध करते हैं, जब कि अशिक्षित क्रूर अपराध अधिक करते हैं और सरलता से पकड़े जाते हैं।
3. धर्म-धर्म का नियन्त्रण आज प्रायः समाप्त होता जा रहा है तथा आज धर्म के नाम पर साम्प्रदायिकता का जहर पिलाकर अपराधों एवं गैर-कानूनी कार्यों को प्रोत्साहन मिल रहा है।
4. बुरी संगति-बुरा पड़ोस, अपराधी समूह आदि भी अपराध को प्रोत्साहन देते हैं। यदि व्यक्ति की संगति ठीक नहीं है और वह असामाजिक तत्वों के साथ रह रहा है, तो उसमें भी अपराध-वृत्ति पनपने लगती है। अपराध को जन्म देने में संगति का सबसे अधिक सहयोग रहता है।
5. सांस्कृतिक संघर्ष-सांस्कृतिक संघर्ष, सांस्कृतिक मूल्यों में परस्पर विरोध तथा सांस्कृतिक विलम्बन भी समाज में अव्यवस्था लाता है और अपराध-प्रवृत्तियों को विकसित होने में सहायता प्रदान करता है।
6. चलचित्र-चलचित्र को आज के युग में मनोरंजन की दृष्टि से प्रमुख स्थान प्राप्त है तथा इनका व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार पर गहन प्रभाव पड़ता है। काम-वासना के उत्तेजक दृश्यों, मार-धाड़ वाले दृश्यों, बलात्कार जैसे दृश्यों, अश्लील दृश्यों व गानों को युवा पीढ़ी पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। चलचित्रों में अपराध के जो दृश्य दिखाए जाते हैं, अनेक अपराधी उनका अनुसरण करके वैसे ही अपराध करना सीख जाते हैं तथा व्यवहार में करते भी हैं। चलचित्र मानसिक संघर्ष की स्थिति भी पैदा कर देते हैं, जो कि अपराध-वृत्ति के विकास में सहायक
7. समाचार-पत्र-समाचार-पत्र व पत्रिकाएँ भी अपराध को प्रोत्साहन देते हैं। प्रायः समाचार पत्रों में अपराध सम्बन्धी घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है तथा उन्हें रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है, जिसका युवा पीढ़ी पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
8. मद्यपाने मद्यपान तथा मादक द्रव्य-व्यसन अपराध का वैयक्तिक तथा सामाजिक कारण दोनों ही हैं। अधिकतर मद्यपान की आदत बुरी संगति, अनैतिक व विघटित परिवार होने के कारण तथा मानसिक तनाव के कारण पड़ती है। मद्यपान व्यक्ति, परिवार, समुदाय तथा समाज को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। इससे शारीरिक बीमारियों में वृद्धि होती है, शारीरिक पतन हो जाता है, व्यक्ति अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठता है और कई बार हत्या, आत्महत्या या बलात्कार जैसे अपराध भी कर बैठता है।

(द) अपराध के आर्थिक कारण
निम्नलिखित आर्थिक दशाएँ अपराध के लिए उत्तर:दायी बतायी जाती हैं
1. निर्धनता-निर्धनता अपराध का एक कारण हो सकता है। निर्धनता व्यक्ति को गन्दी बस्तियों में रहने के लिए विवश करती है, जिनका वातावरण अपराधी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देने वाला होता है।

2. व्यापारिक स्थिति-अपराध की दर तथा व्यापार-चक्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। व्यापार की गिरावट के कारण रोजगार की कमी हो जाती है, माल का निकास रुक जाता है, पैसे की कमी | पड़ जाती है, भ्रष्टाचार बढ़ जाता है तथा इन सबसे अपराध की सामान्य दर प्रभावित होती है।

3. बेरोजगारी-बेरोजगारी भी अपराध का कारण है। अध्ययनों से पता चलता है कि बेकारी, आवारागर्दी और सम्पत्ति के विरुद्ध अपराधों को बढ़ावा देती है। वेश्यावृत्ति तथा महिलाओं में अनैतिकता को कई विद्वानों ने उनकी आर्थिक स्थिति से जोड़ा है। बेरोजगारी मानसिक तनाव की स्थिति पैदा कर देती है, जिससे व्यक्ति आपराधिक कार्यों की ओर अधिक आकर्षित हो जाता है।

4. आर्थिक असन्तोष व अत्यधिक असमानता-
आर्थिक असन्तोष भी अपराध को प्रोत्साहन देता है। व्यक्ति अपनी अपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी कई बार अपराध की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं। अत्यधिक आर्थिक असमानता भी आर्थिक असन्तोष को जन्म देती है। आर्थिक असमानताओं से व्यक्ति में मानसिक तनाव पैदा हो जाता है, जो कि अपराध को बढ़ाता है।

5. औद्योगीकरण-
औद्योगीकरण के फलस्वरूप जो समस्याएँ पैदा हो रही हैं, उनसे भी अपराध को प्रोत्साहन मिलता है।

(य) अपराध के भौगोलिक कारण
भौगोलिक कारणों का भी अपराध को प्रोत्साहन देने में महत्त्वपूर्ण स्थान है। जलवायु, धरातल, ऋतु तथा मौसम के अनुसार अपराध की दरें घटने या बढ़ने सम्बन्धी अध्ययन हमारे सामने आये हैं। समतल क्षेत्र वाले भागों में बलात्कार की संख्या अधिक होती है, परन्तु संम्पत्ति के विरुद्ध अपराध कम होते हैं। अनेक गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में व्यक्ति के विरुद्ध अपराध तथा ठण्डे देशों में सम्पत्ति के विरुद्ध अपराध अधिक होने के निष्कर्ष निकाले गये हैं। अपराधशास्त्रियों ने अपराधी कैलेण्डर तक बनाकर यह बताने का प्रयास किया है कि किस प्रकार विशिष्ट प्रकार के अपराध विशिष्ट महीनों से सम्बन्धित हैं।

क्वेटलेट का कथन है कि “अपराध का प्रमुख सम्बन्ध जलवायु से है। जलवायु तथा मौसम में परिवर्तन होने के साथ ही अपराध में भी परिवर्तन देखने को मिलता है।”
लैकेसन ने इस सन्दर्भ में निम्नलिखित विचार व्यक्त किये हैं|
अपराध                                                                             महीना।
1. शिशु-हत्या                                               : जनवरी, फरवरी, मार्च तथा अप्रैल में अधिक
2. मानव-हत्या व अन्य गम्भीर अपराध          : जुलाई में सबसे अधिक
3. पितृ-हत्या                                                : जनवरी व अक्टूबर में सबसे अधिक
4. बच्चों पर बलात्कार                                  : जुलाई, अगस्त तथा सबसे कम दिसम्बर में
5. युवाओं से बलात्कार                                 : सबसे अधिक दिसम्बर और जनवरी में

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि अपराध का कोई एक कारण नहीं है, अपितु हो सकता है कि एक ही अपराध के पीछे एक से अधिक कारण हों। आपराधिक कारणों में व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक कारणों का भरपूर सहयोग रहता है।

प्रश्न 2
अपराध को नियन्त्रित करने हेतु सुझाव दीजिए।
या
अपराध की परिभाषा दीजिए तथा अपराध नियन्त्रण के दो उपाय बताइए।
या
अपराध क्या है? अपराध को नियन्त्रित करने के सुझाव दीजिए। [2015, 16]
उत्तर:

अपराध की परिभाषा

अपराध एक ऐसा कार्य है, जो लोक-कल्याण के लिए अहितकर समझा जाता है तथा जिसे राज्य के द्वारा पारित कानून द्वारा निषिद्ध कर दिया जाता है। इसके उल्लंघनकर्ता को दण्ड दिया जाता है। अपराध को विभिन्न समाजशास्त्रियों ने निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है

इलियट तथा मैरिल के अनुसार, “अपराध को एक ऐसे समाज-विरोधी व्यवहार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसे समाज ‘अमान्य करता है और इसके लिए दण्ड की व्यवस्था करता है।’

लैण्डिस और लैण्डिस के अनुसार, “अपराध वह कार्य है जिसे राज्य ने समूह-कल्याण के लिए हानिकारक घोषित किया है और जिसके लिए राज्य पर दण्ड देने की शक्ति है।”

थॉमस के अनुसार, “अपराध एक ऐसा कार्य है जो उस समूह के स्थायित्व का विरोधी है, जिसे व्यक्ति अपना समझता है।”

गिलिन तथा गिलिन के अनुसार, “कानूनी दृष्टिकोण से देश के कानूनों के विरुद्ध व्यवहारों को अपराध कहा जाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि अपराध की परिभाषा दो प्रकार से दी गयी है। इसे समाजशास्त्री दृष्टि से, कानूनी दृष्टि से तथा सामाजिक-कानूनी दृष्टि से परिभाषित किया गया है। किसी भी अपराध के लिए दो बातें होनी आवश्यक हैं
(अ) वह कार्य समाज-विरोधी समझा जाता है तथा
(ब) उस कार्य को करने वाले को राज्य कानूनी दृष्टि से दण्ड देता है।
अपराध निरोध के लिए, दण्ड, जेल, परिवीक्षा एवं पैरोल तथा उत्तम-संरक्षण सेवाओं के अतिरिक्त कुछ अन्य सुझाव निम्न प्रकार दिये जा सकते हैं

  1. पूर्व बाल-अपराधियों की खोज-हमें ऐसे बच्चों को खोजना होगा जिनके आगे चलकर अपराधी बनने की सम्भावना हो। उनको पहले ही ऐसी परिस्थितियाँ प्रदान की जाएँ कि वे आगे चलकर अपराधी नहीं बनें।
  2. मार्ग-दर्शन-अपराधियों को जेल में इस प्रकार का मार्गदर्शन प्रदान किया जाए, कि वे जेल से छूटने के बाद अपराधी नहीं बनें।
  3. समितियों का निर्माण-ऐसी सामुदायिक एवं पड़ोस समितियों का निर्माण किया जाए जो समुदाय की उन परिस्थितियों का पता लगाएँ जो अपराध के लिए उत्तर दायी हैं।
  4. परिवार का पुनर्गठन–कई अपराधी विघटित एवं टूटे परिवारों से आते हैं। अत: ऐसे उपाय अपनाये जाएँ जिससे परिवार के सदस्यों में प्रेम व सहयोग पनपे तथा मनमुटाव और तनाव समाप्त हो।
  5. स्वस्थ मनोरंजन–वर्तमान युग का अस्वस्थ एवं व्यापारिक मनोरंजन भी अपराध को जन्म देता है। भद्दे, भौंडे तथा नग्न व अर्द्ध-नग्न चित्र, अपराध से परिपूर्ण फिल्में, जासूसी उपन्यास एवं सस्ता साहित्य, नाचघर, नाइट क्लब, कैबरे आदि सभी व्यक्ति के पतन के लिए उत्तर:दायी हैं। इन सभी पर कठोर कानूनी पाबन्दी लगायी जानी चाहिए।
  6. स्वस्थ निवास–गन्दी बस्तियाँ एवं भीड़भाड़युक्त मकान भी अपराध के लिए उत्तर:दायी हैं। अतः सरकार को अधिकाधिक नियोजित बस्तियों का निर्माण करना चाहिए तथा मकान बनाने के लिए ऋण की सुविधाएँ उपलब्ध करायी जानी चाहिए।
  7. स्कूलों के वातावरण में सुधार किया जाना चाहिए, क्योंकि शिक्षण संस्थाओं में ही मानवता ढलती है एवं व्यक्ति में नैतिकता की भावनाएँ पनपती हैं। वहीं व्यक्ति के चरित्र का गठन भी होता है।
  8. जेलों की दशाएँ सुधारी जाएँ, उनमें चिकित्सा सेवा, स्वस्थ वातावरण एवं निवास की उचित व्यवस्था की जाए तथा अपराधियों के साथ सहानुभूतिपूर्ण एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार किया जाए।
  9. अपराधियों को सुधारने के लिए मन:चिकित्सकों एवं समाजशास्त्रियों की सहायता ली जाए, जिससे वे भविष्य में अपराध न करें।
  10. दण्ड का निर्धारण अपराधी की परिस्थितियों को देखकर किया जाए।
  11. अलग-अलग प्रकार के अपराधियों के लिए अलग-अलग प्रकार के बन्दीगृह हों, क्योंकि प्रथम अपराधी को आदतन अपराधी के साथ रखने से उसके सुधरने के बजाय बिगड़ने के अधिक अवसर रहते हैं।
  12. जनमत में परिवर्तन कर ऐसी प्रवृत्तियों का बहिष्कार किया जाए जो समाज-विरोधी कार्यों को जन्म देती हैं।
  13. अपराधियों को ऋण व प्रशिक्षण की सुविधाएँ दी जाएँ, जिससे वे अपना कोई व्यवसाय चला सकें और अपराधी कार्यों से मुक्ति पा सकें।
  14. जेल में अपराधियों को काम दिया जाए एवं उससे प्राप्त धन में से आधा भाग उनके परिवार वालों को दिया जाए जिससे उनका भरण-पोषण होता रहे।
  15. न्याय सस्ता हो एवं साथ ही उसे शीघ्र उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  16. अपराधी जनजातियों के सुधार के लिए योजनाबद्ध कार्य किये जाएँ।
  17. समाज में व्याप्त बेकारी एवं ग़रीबी की समस्या को शीघ्र उन्मूलन किया जाए, क्योंकि निर्धनता ही प्रमुखतः सभी अपराधों की जड़ है।

प्रश्न 3
भारत में भ्रष्टाचार निवारण हेतु सुझाव दीजिए। [2007, 08, 09, 15, 16]
या
भ्रष्टाचार एक सार्वभौमिक बुराई है। भारत में भ्रष्टाचार निवारण के उपायों का सुझाव दीजिए। [2008]
उत्तर:
भारत में स्वतन्त्रता-प्राप्ति के तुरन्त पश्चात् भ्रष्टाचार की समस्या के समाधान के लिए ‘भ्रष्टाचार निरोधक कानून’ (Prevention of Corruption Act) पास किया गया। यह कानून केवल सरकारी कर्मचारियों तक ही सीमित होने के कारण अधिक प्रभावपूर्ण नहीं हो सका। इसके पश्चात् सरकार ने भ्रष्टाचार निवारण हेतु सुझाव देने के लिए सन् 1962 में सन्तानम कमेटी की नियुक्ति की। इस समिति ने भ्रष्टाचार के सभी क्षेत्रों तथा तरीकों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए अपनी महत्त्वपूर्ण सिफारिशें प्रस्तुत कीं, लेकिन ये सिफारिशें इतनी आदर्शवादी तथा महत्त्वाकांक्षी थीं कि इन्हें लागू नहीं किया जा सका। सन् 1960 तथा 1970 के बीच हमारे समाज में भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया कि भ्रष्टाचार उन्मूलन की बात करने वाले मन्त्रियों और अधिकारियों के विरुद्ध भी नियोजित षड्यन्त्र चलाये जाने लगे।

सन् 1975 के पश्चात् यह माँग जोर पकड़ने लगी कि मन्त्रियों और बड़े-बड़े अधिकारियों के विरुद्ध जाँच करने वाले आयुक्तों की भी नियुक्ति की जानी चाहिए। इसके फलस्वरूप आज अनेक राज्यों में लोकपाल की नियुक्तियाँ की गयी हैं, जिन्हें बड़े-बड़े अधिकारियों तथा मन्त्रियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच करने के अधिकार दिये गये हैं। अनेक राज्यों में भ्रष्ट अधिकारियों को 50 वर्ष की आयु में अनिवार्य रूप से सेवा-मुक्त कर देने का प्रावधान रखा गया है। इसका उद्देश्य भ्रष्टाचार के मामलों में कानूनी जटिलताओं से बचना तथा प्रभावी कार्यवाही करना है।

उपर्युक्त प्रयासों के पश्चात् भी भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं हो सकी। इसका कारण एक ओर, भ्रष्टाचार की जड़ों का बहुत गहराई तक फैला होना है और दूसरी ओर, सरकार तथा प्रशासन की अक्षमता इसके लिए उत्तर:दायी है। केवल यह कहना कि राजनीतिज्ञों, अधिकारियों और जनसाधारण को ईमानदार बनाकर, नैतिक मूल्यों का प्रचार करके तथा राष्ट्रीयता की भावना को प्रोत्साहन देकर भ्रष्टाचार को समाप्त करना चाहिए, एक ख्याली पुलावे पकाना है। भ्रष्टाचार निवारण केवल तभी सम्भव है जब भ्रष्टाचार के मूल कारणों को देखते हुए एक व्यावहारिक योजना के द्वारा इस बुराई को दूर करने के प्रयत्न किये जाएँ। इस योजना के विभिन्न अंगों के रूप में निम्नलिखित सुझाव अधिक उपयोगी हो सकते हैं|

1. व्यापारिक वर्ग में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कर-संरचना में परिवर्तन करना आवश्यक है। व्यापारियों द्वारा सर्वाधिक भ्रष्टाचार करों की चोरी तथा नकली हिसाब-किताब के रूप में मिलता है। यदि प्रत्येक वस्तु के उत्पादन स्थान पर ही पूर्ण सतर्कता के साथ सम्पूर्ण कर (Taxes) ले लिये जाएँ तो सरकार को प्रशासनिक व्यय भी कम करना पड़ेगा और करों की चोरी की सम्भावना भी कम हो जायेगी।

2. छोटे कर्मचारियों में भ्रष्टाचार निवारण के लिए उनके वेतन-स्तर में सुधार आवश्यक है। प्रत्येक स्तर के कर्मचारी को इतना वेतन अवश्य मिलना चाहिए जिससे वह अपने परिवार की अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा कर सके।

3. उच्च प्रशासनिक पदों, टेक्निकल कुशलता वाली सेवाओं तथा व्यवसायियों के लिए सेवा के स्थायीकरण (Confirmation of service) की परम्परा प्रजातान्त्रिक समाजों के लिए पूर्णतया गलत है। इन पदों पर एक विशेष अवधि के लिए नियुक्तियाँ की जानी चाहिए। ऐसा करने से प्रत्येक व्यक्ति अपनी कुशलता को बढ़ाने का प्रयत्न करेगा तथा अधिक-से-अधिक ईमानदारी से कार्य करके अपने जीवन को निष्कलंक बनाने के लिए प्रयत्नशील रहेगा।

4. सरकारी कार्यालयों में कामकाजी प्रक्रिया में सरलता लाने से भी रिश्वत और दूसरे प्रकार के भ्रष्टाचारों को दूर किया जा सकता है। प्रत्येक विभाग में कार्य की प्रक्रिया को सरल बनाने तथा प्रत्येक निर्णय के लिए अधिकतम समय सीमा का निर्धारण होना चाहिए।

5. जनसाधारण में प्रत्येक कार्यालय के नियमों तथा कार्यविधि का प्रचार करने से भी रिश्वतों को कम किया जा सकता है। ऐसे प्रचार से सरकारी दफ्तरों में आने वाले लोग वहाँ के बाबुओं पर निर्भर नहीं रहेंगे और न ही उन्हें बाबुओं द्वारा गुमराह किया जा सकेगा।

6. वर्तमान परिस्थितियों में यह आवश्यक है कि महत्त्वपूर्ण निर्णयों का जनसाधारण में प्रकाशन किया जाये। देश को आज सबसे अधिक हानि ऐसे भ्रष्टाचार से होती है जिसमें मन्त्रियों अथवा अधिकारियों द्वारा लाखों और करोड़ों रुपयों की राशि का उपयोग गुप-चुप ढंग से कर लिया जाता है। लोक सम्पत्ति के उपयोग की पूरी जानकारी जनसाधारण को मिलने से भ्रष्टाचार में कमी हो सकती है।

7. राजनीतिक दलों के भ्रष्टाचार पर नियन्त्रण लगाने के लिए यह आवश्यक है कि सभी राजनीतिक दलों की वार्षिक आय और व्यय का हिसाब जनसाधारण के लिए प्रकाशित किया जाए। ऐसी सूची प्रकाशित होने से राजनीतिक दलों को चुनाव के समय तरह-तरह के भ्रष्ट व्यवहार करने से रोका जा सकेगा।

8. इन प्रयत्नों के साथ ही देश में एक भ्रष्टाचार विरोधी गुप्त सरकारी संगठन’ का होना आवश्यक है। इस संगठन में प्रशासनिक, तकनीकी तथा व्यावसायिक कुशलता से सम्पन्न अधिकारियों की नियुक्ति होनी चाहिए। यह आरोप लगाया जा सकता है कि कालान्तर में ऐसे गुप्त संगठनों के अधिकारी भी भ्रष्ट बन सकते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि दिल्ली में नियुक्त अधिकारियों का दस्ता यदि चेन्नई के किसी गाँव में जाकर निर्माणाधीन सरकारी इमारत में लगने वाली वस्तुओं की किस्म का निरीक्षण करे तो इससे भ्रष्टाचार उन्मूलन में सहायता ही मिलेगी।

9. अन्त में भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए दण्ड की प्रक्रिया को कठोर बनाना आवश्यक है। भ्रष्टाचार के अभियोग में पकड़े गये व्यक्तियों को जमानत की सुविधा नहीं मिलनी चाहिए। भ्रष्टाचार को कानून के द्वारा एक जघन्य अपराध घोषित किये बिना स्थिति में सुधार नहीं किया जा सकता।

गुन्नार मिर्डल ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘एशियन ड्रामा’ (Asian Drama) में एशिया और मुख्य रूप से भारत के लोक जीवन में बढ़ते हुए भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अनेक सुझाव दिये हैं-

  1. भ्रष्टाचार के अपराधी लोगों को दण्ड देने के लिए सरल कानून बनाये जाएँ;
  2. रिश्वत देने वाले लोगों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाए;
  3. आयकर देने वाले लोगों के विवरण को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित किया जाए;
  4. व्यापारियों द्वारा राजनीतिक दलों को दिये जाने वाले चन्दों पर रोक लगायी जाएँ;
  5. वेतनभोगी कर्मचारियों को इतना वेतन अवश्य दिया जाए जिससे उनकी सामान्य आवश्यकताएँ पूरी हो सकें;
  6. लाइसेन्स और परमिट देने वाले अधिकारियों की गतिविधियों पर नियन्त्रण रखा जाए;
  7. जो लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध शिकायत करते हैं, उन्हें सुरक्षा दी जाए;
  8. भ्रष्टाचार सम्बन्धी झूठे समाचार छापने वाले समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं के विरुद्ध कार्यवाही की जाए;
  9. मन्त्रियों तथा उच्च अधिकारियों की आय-व्यय का नियमित निरीक्षण किया जाए तथा
  10. भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सतर्कता अभियान को तेज किया जाए।

उपर्युक्त सभी सुझाव इस मान्यता पर आधारित हैं कि एक प्रजातान्त्रिक समाज में भ्रष्टाचार की समस्या जब सभी वर्गों और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त हो जाती है, तो केवल अनुनय, विनम्रता, प्रचार और पुराने कानूनों के द्वारा ही इसका समाधान नहीं किया जा सकता। इस दशा में भ्रष्टाचार का उन्मूलन केवल कठोर अनुशासन और समय के अनुरूप कानूनों के द्वारा ही सम्भव है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिन देशों को उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का चस्का लग चुका है वे पूँजीवादी स्वार्थों को लेकर अब उन प्रजातान्त्रिक देशों को भ्रष्ट बनाने का षड्यन्त्र कर रहे हैं, जो अपनी प्रगति स्वयं ही करना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में हमारी जनतान्त्रिक स्वतन्त्रता पर भले ही अंकुश लग जाए, लेकिन सम्पूर्ण राष्ट्र की प्रगति और समृद्धि के लिए भ्रष्टाचार पर कठोरता से नियन्त्रण लगाना आज अंत्यधिक आवश्यक है।

प्रश्न 4
‘अपराध राज्य के नियमों का उल्लंघन है।’ स्पष्ट करते हुए अपराध के मुख्य प्रकार बताइए।
उत्तर:

अपराध राज्य के नियमों का उल्लंघन

राज्य में व्यवस्था कायम रखने के लिए और उसका भली-भाँति संचालन करने के लिए कुछ कानून और नियम बनाये जाते हैं। राज्य के हर व्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि वह कानूनों को माने। किन्तु कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जो कानूनों का पालन नहीं करते हैं। वे कानून को भंग करते हैं। भंग करने वालों में दो तरह के लोग होते हैं-एक तो वे लोग, जो अनजाने में कानून-विरोधी कार्य कर डालते हैं और दूसरे वे, जो जान-बूझकर कानून को तोड़ते हैं। कानून को भंग करने का कार्य जब जान-बूझकर किया जाता है, तो ऐसा कार्य कानूनी दृष्टि से ‘अपराध’ कहलाता है।

इसलिए इस दृष्टि से उन बच्चों के गलत कार्यों को अपराध नहीं माना जाता, जो छः वर्ष से कम आयु के होते हैं। यदि कोई छोटा बच्चा कोई गलती करता है, तो उसकी अज्ञानता के कारण हम प्रारम्भ में उसे क्षमा कर देते हैं। नशे में चूर और पागल व्यक्ति यदि कोई गलत कार्य कर बैठता है, तो उसे भी ‘अपराध’ के अन्तर्गत नहीं रखा जाता। प्रत्येक राज्य में समुदाय की आवश्यकता के अनुसार सार्वजनिक कल्याण के आधार पर राज्य के नियम व कानून भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, इसलिए अपराध के अन्तर्गत आने वाले व्यवहारों की कोई ऐसी सूची नहीं बनायी जा सकती जो समाजों तथा समुदायों के लिए सार्वभौमिक हो। इसके उपरान्त भी कानूनी दृष्टिकोण से अपराध की धारणा चार विशेषताओं से सम्बन्धित है

  1. अपराध कोई भी वह व्यवहार है जो एक समुदाय में प्रचलित कानूनों के उल्लंघन से सम्बद्ध हो।
  2. ऐसे व्यवहार में अपराधी इरादे (criminal intentions) की समावेश हो। वास्तव में, व्यक्ति की नीयत’ में जब दोष आ जाता है तथा वह जान-बूझकर किसी निषिद्ध अपराध को करता है, तभी इसे अपराध कहा जाता है।
  3. अपराध का सम्बन्ध एक बाह्य क्रिया (over act) से है। व्यक्ति की नीयत में दोष आने पर भी यदि वह किसी बाह्य क्रिया द्वारा कानून का उल्लंघन नहीं करता तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता।
  4. राज्य की ओर से दण्ड की व्यवस्था अपराध का अन्तिम तत्त्व है। व्यक्ति यदि कोई ऐसा व्यवहार करे जिससे सार्वजनिक जीवन को हानि होती हो, लेकिन राज्य की ओर से ऐसे व्यवहार के लिए कोई दण्ड निर्धारित न हो तो ऐसे व्यवहार को अपराध नहीं कहा जा सकता। उपर्युक्त विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए अनेक विद्वानों ने कानूनी दृष्टिकोण से अपराध को

परिभाषित किया है। डॉ० सेथना के अनुसार, “अपराध कोई भी वह कार्य अथवी त्रुटि है जो किसी विशेष समय पर राज्य द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार दण्डनीय है, इसका सम्बन्ध चाहे ‘पाप’ से हो अथवा नहीं।” लगभग इसी प्रकार हाल्सबरी का कथन है कि, “अपराध एक अवैधानिक त्रुटि है जो जनता के विरुद्ध है और जिसके लिए अभियुक्त को कानूनी दण्ड दिया जाता है। विलियम ब्लेकस्टोन के अनुसार, “किसी भी सार्वजनिक कानून की अवज्ञा अथवा उल्लंघन से सम्बन्धित व्यवह्मर ही अपराध है।’ टैफ्ट ने अपराध की संक्षिप्त परिभाषा देते हुए लिखा है, “वैधानिक रूप से अपराध एक ऐसा कार्य है जो कानून के अनुसार दण्डनीय होता है।

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि कानून का एक बुरे इरादे से जान-बूझकर उल्लंघन करना तथा इस प्रकार सार्वजनिक हित को हानि पहुँचाना ही अपराध है। कानूनी दृष्टि से अपराधी व्यक्ति को राज्य द्वारा दण्ड मिलता है और असामाजिक कार्य करने पर स्वयं समाज व्यक्ति को बहिष्कृत करके, अपमानित करके या हुक्का-पानी बन्द करके दण्डित करता है।

अपराध के प्रकार

विभिन्न समाजशास्त्रियों ने अपराध को अपने-अपने ढंग से वर्गीकृत किया है। सामान्य रूप से अपराध निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-
(क) गम्भीरता के आधार पर वर्गीकरण-गम्भीरता के आधार पर अपराध को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है–

  1. कम गम्भीर अपराध या कदाचार-इसमें उन अपराधों को सम्मिलित किया जाता है, जो कानून की दृष्टि से अधिक गम्भीर नहीं होते। जुआ, मद्यपान, बिना टिकट के यात्रा करना। इत्यादि लघु या कम गम्भीर अपराध के उदाहरण हैं।
  2. गम्भीर अपराध या महापराध-इसमें गम्भीर प्रकृति के अपराध सम्मिलित किये जाते हैं। हत्या, बलात्कार, देशद्रोह इत्यादि अपराध इसके प्रमुख उदाहरण हैं। ऐसे अपराधों के लिए दण्ड भी गम्भीर होता है; जैसे-सम्पत्ति जब्त कर लेना, आजीवन कारावास अथवा मृत्युदण्ड आदि।।

(ख) अपराध के प्रयोजन के आधार पर वर्गीकरण-बोन्जर (Bonger) ने अपराधियों के प्रयोजन के आधार पर अपराध को अग्रलिखित चार श्रेणियों में विभाजित किया है

  1. आर्थिक अपराध;
  2. लिंग सम्बन्धी अपराध;
  3. राजनीतिक अपराध तथा
  4. विविध (Miscellaneous) अपराध।

(ग) उद्देश्यों के आधार पर वर्गीकरण-हेज (Hayes) ने अपराधियों के उद्देश्यों तथा प्रेरणाओं को सामने रखकर अपराध को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित किया है।

  1. व्यवस्था के विरुद्ध अपराध,
  2. सम्पत्ति के विरुद्ध अपराध तथा
  3. व्यक्ति के विरुद्ध अपराध।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4अंक)

प्रश्न 1
अपराध के लक्षणों का विवरण दीजिए।
उत्तर:
जिरोम हाल ने उन विशेषताओं का उल्लेख किया है जिनके आधार पर किसी मानवीय व्यवहार को अपराध घोषित किया जाता है। वे इस प्रकार हैं

  1. हानि-अपराधी क्रिया का बाह्य परिणाम ऐसा होना चाहिए जिससे अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों को शारीरिक, मानसिक या आर्थिक हानि हो। इस प्रकार के अपराध से समाज को नुकसान होता हो।
  2. क्रिया-जब तक कोई व्यक्ति अपराधी क्रिया न करे और अपराध करने का केवल मन में . विचार ही रखे, तब तक वह विचार अपराध नहीं माना जाएगा।
  3. कानून के द्वारा निषेध-कोई भी कार्य तब तक अपराध नहीं माना जाएगा जब तक कि उस देश का कानून उसे अवैधानिक घोषित न करे।
  4. अपराधी उद्देश्य-अपराध निर्धारण में अपराधी उद्देश्य एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। जान बूझकर इरादतन किया हुआ कानून-विरोधी कार्य अपराध है। अनजाने में बिना इरादे के या भूल से किये हुए कार्य को हम अपराध तो मानते हैं, किन्तु उतना गम्भीर नहीं जितना कि पूर्व इरादे से किये कार्य को।
  5. उद्देश्य और व्यवहार में सह-सम्बन्ध-अपराध के लिए अपराधी उद्देश्य के साथ ही क्रिया का होना भी आवश्यक है। उद्देश्यहीन क्रिया या क्रियाहीन उद्देश्य अपराध नहीं होगा। दोनों का प्रकाशन साथ-साथ होनी चाहिए।
  6. दण्ड-अपराध करने पर राज्य और समाज अपराधी को दण्ड देता है। यह दण्ड शारीरिक .. दण्ड या जुर्माना आदि के रूप में हो सकता है।
  7. समय व स्थान सापेक्ष-अपराधी क्रियाओं का सम्बन्ध समय व स्थान से भी है। एक समय में एक क्रिया अपराध मानी जाती है, वही दूसरे समय में नहीं। सती–प्रथा, दहेज-प्रथा । और बाल-विवाह कभी अपराध नहीं माने जाते थे, किन्तु आज ये अपराधी क्रियाएँ हैं। इसी प्रकार से जो कार्य भारत में अपराध माने जाते हैं, वे अफ्रीका में भी अपराध माने जाते हों, यह आवश्यक नहीं है, क्योंकि सभी देशों के अपने-अपने कानून हैं।

प्रश्न 2
अपराधों के कारण सम्बन्धी ‘शास्त्रीय सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
शास्त्रीय सिद्धान्त का विकास 18वीं सदी के अन्त में हुआ। इसके प्रमुख समर्थकों में बैकरिया, बेन्थम और फ्यूअरबेक थे। इस सिद्धान्त में विश्वास रखने वाले सुखदायी दर्शन (Hedonistic Philosophy) से प्रभावित थे। इस दर्शन की यह मान्यता है कि प्रत्येक व्यक्ति किसी भी कार्य को करने से पूर्व उससे मिलने वाले सुख व दुःख का हिसाब लगाता है और वही कार्य करता है जिससे उसको सुख मिलता है। एक अपराधी भी अपराध इसलिए करता है कि उसे अपराध करने पर दु:ख की तुलना में सुख अधिक मिलता है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति चोरी करने से पूर्व यह सोचेगा कि चोरी करने पर उसे जो दण्ड मिलेगी, वह चोरी करने पर मिलने वाले सुख की तुलना में निश्चित ही कम होगा, तभी वह चोरी करेगा अन्यथा नहीं। इन विद्वानों का मत है कि अपराध को रोकने के लिए दण्ड इतना दिया जाए कि अपराध से मिलने वाले सुख की तुलना में वह अधिक हो। उनका मत है कि पागल, मूर्ख, बालक एवं वृद्धों को दण्ड नहीं दिया जाना चाहिए।

इस सिद्धान्त को एकांगी होने के कारण स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह सही नहीं है कि हर समय व्यक्ति सुख-दु:ख से प्रेरित होकर ही कोई कार्य करता है। कई बार वह मजबूरी एवं दुःखों से मुक्ति के लिए भी अपराध करता है। अपराध के सामाजिक कारणों की भी इस सिद्धान्त में अवहेलना की गयी है।

प्रश्न 3
अपराधों के कारण सम्बन्धी इटैलियन सम्प्रदाय अथवा प्रारूपवादी सम्प्रदाय सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
या
‘अपराधी जन्मजात होते हैं।’ इस कथन की व्याख्या कीजिए। [2007, 09]
उत्तर:
इस सम्प्रदाय के जन्मदाता इटली के लॉम्ब्रोसो, उनके समर्थक गैरोफैलों और एनरिकोफेरी थे। इटली के निवासी होने के कारण इस सम्प्रदाय का यह नामकरण किया गया। इस सम्प्रदाय के लोगों ने अपराध के कारणों की व्याख्या अपराधी की शरीर-रचना के आधार पर की है।

लॉम्ब्रोसो इटली की सेना में डॉक्टर थे। अपने सेवाकाल के दौरान उन्होंने देखा कि कुछ सैनिक अनुशासन-प्रिय हैं, तो कुछ उद्दण्ड। अपराधी सैनिकों की शरीर-रचना और सामान्य सैनिकों की शरीर-रचना में उल्लेखनीय अन्तर था। उन्होंने इटली की जेलों का भी अध्ययन किया और पाया कि शरीर-रचना और मानसिक विशेषताओं में घनिष्ठ सम्बन्ध है। उन्होंने उस समय के एक प्रसिद्ध डाकू की खोपड़ी (Skull) और मस्तिष्क (Brain) का अध्ययन किया तो पाया कि उसमें अनेक विचित्रताएँ हैं, जो साधारण मनुष्यों में नहीं होतीं। इसके अतिरिक्त उन्होंने 383 मृत अपराधियों की खोपड़ियों का भी अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि अपराधियों की शारीरिक रचना आदिमानव और पशुओं से बहुत-कुछ मिलती-जुलती है। इसलिए ही उनमें जंगलीपन और पशुता के गुण हैं जो उन्हें अपराध के लिए प्रेरित करते हैं। ये शारीरिक विशेषताएँ वंशानुक्रमण में मिलती। हैं और अपराधियों को विशेष प्रारूप प्रदान करती हैं। इसलिए इस मत को प्रारूपवादी सम्प्रदाय भी कहते हैं। यही कारण है कि अपराधी जन्मजात होते हैं। उन्होंने लगभग 15 शारीरिक अनियमितताओं का उल्लेख किया और बतलाया कि जिसमें भी इनमें से 4 अनियमितताएँ होंगी, वह निश्चित रूप से अपराधी होगा। वे अपराधियों को दण्ड देने के साथ-साथ बाल-अपराधियों के सुधार के पक्ष में भी थे।

इटैलियन सम्प्रदाय की अनेक विद्वानों ने आलोचना की है। उनमें डॉ० गोरिंग और थान सेलिन प्रमुख हैं। गोरिंग ने 12 वर्ष तक तीन हजार अपराधियों का अध्ययन करके बताया कि अपराधी और गैर-अपराधी की शरीर-रचना में कोई अन्तर नहीं होता। यदि अपराधी आदिमानव का प्रारूप है तो क्या सभी आदिमानव अपराधी थे? आज यह भी कोई नहीं मानता कि अपराधी जन्मजात होते हैं और शारीरिक एवं मानसिक लक्षण वंशानुक्रमण में मिलते हैं।

प्रश्न 4
प्राचीर-विहीन जेल पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
डॉ० सम्पूर्णानन्द के प्रयासों के परिणामस्वरूप वर्ष 1952-53 में चन्द्रप्रभा नदी पर अपराधियों को एक शिविर लगाया गया, जिसमें उनके भोजन, वस्त्र, शिक्षा और मनोरंजन की व्यवस्था की गयी। ऐसे शिविरों में अपराधियों को बन्दी बनाकर नहीं रखा जाता है और न ही उनके लिए चौकीदारी की व्यवस्था की जाती है। केरल, राजस्थान, उत्तर: प्रदेश, तमिलनाडु तथा गुजरात में इस प्रकार की जेलों की व्यवस्था की गयी है।

यहाँ जेलों की ऊँची-ऊंची दीवारों के स्थान पर काँटेदार तार लगाये गये। वह भी इसलिए कि अपराधी उस सीमारेखा का अतिक्रमण न करें। अपराधियों के लिए बने ये शिविर दीवारों से रहित थे। अतः इन्हें प्राचीर-विहीन बन्दीगृह कहा गया। बन्दीगृहों में रहने वाले अपराधियों से कार्य कराया जाता था। उसके बदले उन्हें पारिश्रमिक दिया जाता था। बन्दी अपनी आधी आमदनी अपने घर भेज सकते थे और उसका चौथाई अंश अपने पर व्यय कर सकते थे, जब कि चौथाई अंश कोष में जमा कराया जाता था। उनकी सजा की अवधि समाप्त होने पर उनकी बचत उन्हें सौंप दी जाती थी। सम्पूर्णानन्द शिविर बन्दियों में आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान जगाने के माध्यम थे। अपराधी स्वयं सुधरकर, आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होकर समाज में पहुँचता था। छूटने पर उसे व्यवसाय करने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती थी। सरकार भी कैदियों की सुरक्षा, रखवाली तथा भारी रख-रखाव के व्यय से बच जाती थी।

प्रश्न 5
परिवीक्षा (Probation) पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
परिवीक्षा में अपराधी को सजा के बदले सशर्त मुक्त कर दिया जाता है और उससे अपेक्षा की जाती है कि वह परिवीक्षा की अवधि में अपना आचरण उत्तम रखेगा। इस प्रकार अपराधी को दण्ड के बजाय, दण्ड सुनाने के बाद ही, उसे परिवीक्षा पर छोड़ा जाता है। छूटने से पूर्व परिवीक्षा काल में उत्तम आचरण रखने का प्रमाण-पत्र देना होता है। अपराधी को सरकार की ओर से निर्देशन एवं सहायता प्रदान की जाती है, जिससे वह समाज के साथ सामंजस्य स्थापित कर सके। परिवीक्षा अधिकारी सरकार की ओर से परिवीक्षा पर छोड़े गये अपराधियों की देख-रेख करता है। वही अपराधी की छानबीन कर प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है। उत्तर: प्रदेश में प्रत्येक ऐसे अपराधी को प्रोबेशन पर छोड़ने का प्रावधान है जिसकी आयु 21 वर्ष से कम हो तथा जिसे न्यायालय ने 6 माह की सजा सुनाई हो। परिवीक्षा पर छोड़ने से अनेक लाभ होते हैं; जैसे-

  1. अपराधी की मनोवृत्ति में परिवर्तन होता है और उसे भविष्य में समाज-विरोधी कार्य न करने का प्रोत्साहन मिलता है।
  2. वह जेल के दूषित वातावरण से बच जाता है।
  3. उसमें अनुशासन की भावना उत्पन्न होती है।
  4. जेल में रहने पर उस पर जो खर्च होता है वह परिवीक्षा पर छोड़ने से बच जाता है।

प्रश्न 6
“प्रत्येक मानव व्यवहार सीखा हुआ व्यवहार है-अपराधी व्यवहार भी मानव व्यवहार है, अतः सीखा हुआ व्यवहार है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सदरलैण्ड (Sutherland) का विचार है कि अपराध एक सीखा हुआ व्यवहार है, जो अन्तक्रिया तथा सम्पर्क के द्वारा एक से दूसरे व्यक्ति द्वारा ग्रहण किया जाता है, इसे कभी भी वंशानुक्रम के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। यद्यपि इस व्यवहार को किसी भी समूह में रहकर सीखा जा सकती है, लेकिन मुख्यतः यदि व्यक्ति के प्राथमिक समूहों का वातावरण अपराधी हो तो व्यक्ति जल्दी ही अपराधी व्यवहार को ग्रहण कर लेता है। कोई व्यक्ति कितनी परिस्थिति से तथा किस सीमा तक अपराधी व्यवहार को सीखेगा यह प्राथमिक समूहों की चार परिस्थितियों पर निर्भर करता है, अर्थात्

  1. प्राथमिकता,
  2. पुनरावृत्ति,
  3. अवधि तथा
  4. तीव्रता।

इसका तात्पर्य है कि एक व्यक्ति कितनी कम आयु में अपराधी समूहों के सम्पर्क में आया (प्राथमिक), कितनी बार उसे ऐसे सम्पर्क का अवसर मिला (पुनरावृत्ति), कितने अधिक समय तक यह अपराधियों के सम्पर्क में रहा (अवधि) तथा यह सम्पर्क कितनी घनिष्ठता का रहा (तीव्रता) आदि कारक ही इस बात का निर्धारण करते हैं कि अपराधी व्यवहारों की सीख कितनी प्रभावपूर्ण होगी। सदरलैण्ड का कथन है कि अपराधी व्यवहारों की सीख एक व्यक्ति को केवल अपराध के तरीकों का ही प्रशिक्षण नहीं देती बल्कि उसकी मनोवृत्तियों तथा प्रेरणाओं को भी बदल देती है। व्यक्ति की मनोवृत्तियाँ जब इस तरह बदल जाती हैं कि वह नियमों के पालन की अपेक्षा नियमों के उल्लंघन को अपने व्यक्तित्व को अंग बना लेता है तो स्वाभाविक रूप में वह अपराध की ओर बढ़ने लगता है। सीख की यह मात्रा सभी अपराधियों में भिन्न-भिन्न होती है। यही कारण है कि सभी अपराधियों की विशेषताएँ भी एक-दूसरे से कुछ भिन्न होती हैं। इसी आधार पर सदरलैण्ड ने अपने सिद्धान्त को विभिन्नतायुक्त संगति सिद्धान्त’ (Theory of Differential Association) का नाम दिया है। इस सिद्धान्त द्वारा प्रस्तुत मुख्य निष्कर्ष इस प्रकार हैं-

  1. अपराधी व्यवहार एक सीखा हुआ व्यवहार है;
  2. अपराधी व्यवहार की सीख अन्तक्रिया और संचार के माध्यम से प्रभावपूर्ण बनती है;
  3. अपराधी व्यवहार का एक बड़ा भाग प्राथमिक समूहों में सीखा जाता है;
  4. अपराधी व्यवहार की सीमा अथवा दर सीखने की प्रक्रिया की प्राथमिकता, पुनरावृत्ति, अवधि तथा तीव्रता के अनुसार घटती-बढ़ती है तथा
  5. अपराधी व्यवहार भी अन्य प्रक्रियाओं के समान एक सामाजिक प्रक्रिया है।

प्रश्न 7
“हमें अपराधी से नहीं अपराध से घृणा करनी चाहिए। इस परिप्रेक्ष्य में मृत्युदण्ड अपराध निरोध का निकृष्टतम साधन है।” स्पष्ट कीजिए।
या
‘अपराधी जन्मजात नहीं होते वरन बनाये जाते हैं। व्याख्या कीजिए [2007, 11]
या
यह कथन किसका है कि अपराधी बनाये जाते हैं? [2009, 10, 12, 15]
उत्तर:
समाजशास्त्रीय सिद्धान्त के अनुसार अपराधी जन्मजात नहीं होते, बल्कि समाज द्वारा बनाये जाते हैं। सदरलैण्ड के अनुसार, दूसरे व्यवहारों के समान अपराध भी एक सीखा हुआ व्यवहार है, जो पारस्परिक सम्पर्क तथा अन्तक्रिया के द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है। कोई व्यक्ति कितनी शीघ्रता से तथा किस मात्रा में अपराध सीखेगा, यह उसकी आयु, पुनरावृत्ति, अवधि तथा तीव्रता पर निर्भर करता है। यही कारण है कि कुछ अपराधी सामान्य श्रेणी के होते हैं, जब कि कुछ बहुत गम्भीर प्रकार के अपराधी बन जाते हैं।

कुछ समाजशास्त्रियों का मत है कि अपराध को सम्बन्ध बुरी संगति अथवा दोषपूर्ण सामाजिक पर्यावरण से है। इस दृष्टिकोण से अपराध के लिए व्यक्ति की अपेक्षा समाज अधिक उत्तर:दायी है। वास्तव में अनेक सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, मानसिक और शैक्षणिक दशाएँ संयुक्त रूप से अपराधी व्यवहार को प्रोत्साहन देती हैं। अत: यह कहा जा सकता है कि अपराधी जन्मजात नहीं होते हैं, बल्कि व्यक्ति जब एक से अधिक कारकों द्वारा प्रभावित होता है, केवल उसी समय उसमें अपराधी प्रवृत्ति जाग्रत होती है।

अपराध के लिए दण्ड-विधान का औचित्य समझने के लिए अपराध के कारणों को समझने की आवश्यकता है। अपराध के लिए अपराधी की जगह व्यक्ति के दोषपूर्ण वंशानुक्रम, मानसिक अस्वस्थता एवं बीमारी, मानसिक अस्थिरता और संघर्ष, औद्योगीकरण और नगरीकरण, व्यापारिक उतार-चढ़ाव, निर्धनता तथा बेरोजगारी, सामाजिक कुरीतियाँ, टूटे परिवार, अशिक्षा आदि को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में किसी भी अपराधी को दण्ड देने की बजाय, सामाजिक दशाओं को बदलने के लिए गम्भीर प्रयास किये जाने चाहिए। हमें अपराधी से नहीं बल्कि उन सामाजिक परिस्थितियों से घृणा करनी चाहिए जो अपराधी को जन्म देती हैं।

अतः मृत्युदण्ड को अपराध रोकने का निकृष्टतम साधन कहना सर्वथा उचित ही है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
अपराधी कितने प्रकार के होते हैं ? [2007]
उत्तर:
विभिन्न विद्वानों ने अपराध तथा अपराधियों का वर्गीकरण विभिन्न प्रकार से किया है। सामान्यतया अपराधी निम्न प्रकार के होते हैं|

  1. जन्मजात अपराधी
  2. अपस्मारी अपराधी-ये अपराधी मानसिक विकारों के कारण उचित और अनुचित में भेद नहीं कर पाते।
  3. आकस्मिक अपराधी-ये अपराधी विशेष परिस्थितियों में ही अपराध करते हैं।
  4. आवेगयुक्त अपराधी-वे अपराधी, जो बहुत शीघ्र आवेग-पूर्ण स्थिति में आकर अपराध करते हैं।
  5. व्यावसायिक अपराधी-ये अपराधी अपराध को अपनी आजीविका का साध्य मानते हैं।
  6. श्वेतवसन अपराधी–ये अपराधी समाज में उच्च वर्ग के सदस्य होते हैं तथा महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक पदों अथवा व्यापार में लगे होते हैं।

प्रश्न 2
अपराध के चार प्रमुख कारण लिखिए।
उत्तर:
अपराध के चार प्रमुख कारण लिखिए।

  1. तलाक, मृत्यु, कलह आदि पारिवारिक दशाएँ।
  2. निर्धनता, बेरोजगारी एवं अशिक्षा जैसे आर्थिक कारक।
  3. औद्योगीकरण एवं नगरीकरण की प्रक्रियाएँ।
  4. विधवा पुनर्विवाह निषेध, वेश्यावृत्ति, देवदासी प्रथा आदि सामाजिक कुरीतियाँ।

प्रश्न 3
क्या मद्यपान भी अपराधों का कारण है ?
उत्तर:
मद्यपान (शराबखोरी) ने भी अपराधों को बढ़ावा दिया है। कई लोग सामान्य स्थिति में अपराध नहीं कर पाते, वे शराब पीकर अपराध करते हैं। यौन अपराध, लड़ाई-झगड़े, हत्या, घातक आक्रमण, जुआ, भ्रष्टाचार एवं वाहन द्वारा दुर्घटना आदि अपराध कई बार शराब पीकर ही

किये जाते हैं। शराब पीने पर व्यक्ति का मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है और उसमें उत्तेजना पैदा हो जाती है। परिणामस्वरूप वह अपराध कर बैठता है। शराबी व्यक्ति का अक्सर नैतिक पतन हो जाता है, वह उचित-अनुचित में भेद नहीं कर पाता और अपराध करने लगता है। ब्रुसेल्स ने अपने अध्ययन में यह पाया कि 70 प्रतिशत अपराधी शराब पीते थे। स्पष्ट है कि मद्यपान भी अपराध का एक प्रमुख कारण है।

प्रश्न 4
नगरीकरण कैसे अपराधों का एक कारक है ?
उत्तर:
औद्योगीकरण एवं नगरीकरण परस्पर सम्बन्धित प्रक्रियाएँ हैं। इसलिए जो परिस्थितियाँ औद्योगीकरण के कारण अपराध के लिए उत्तर:दायी हैं, लगभग वे ही परिस्थितियाँ नगरों में मौजूद हैं। नगरों में संयुक्त परिवारों का विघटन हो रहा है, वहाँ पर आवास-सुविधाओं का अभाव है, नवीनता का आकर्षण एवं फैशन नगरीय जीवन की विशेषताएँ हैं। व्यापारिक मनोरंजन, स्त्री-पुरुषों के अनुपात में अन्तर, स्त्रियों को मिलने वाली स्वतन्त्रता, नैतिकता के बदलते प्रतिमान, जाति एवं संयुक्त परिवार के नियन्त्रण का अभाव आदि कारक नगरीय जीवन में अपराध को जन्म देने में सहायक हो रहे हैं।

प्रश्न 5
औद्योगीकरण कैसे अपराधों का एक कारक है ?
उत्तर:
औद्योगीकरण ने हमारे सामाजिक जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन किये हैं। इसके कारण बड़े-बड़े नगरों का जन्म हुआ, लोगों में गतिशीलता बढ़ी, जाति का नियन्त्रण शिथिल हुआ, संयुक्त परिवार टूटे तथा सामुदायिक जीवन का ह्रास हुआ। मिल-मालिकों एवं मजदूरों के बीच संघर्ष बढ़ा, आए दिन हड़ताल, तोड़-फोड़, घेराव, तालाबन्दी और आगजनी जैसे सामूहिक अपराध होने लगे। औद्योगिक केन्द्रों में वेश्यावृत्ति, जुआखोरी एवं शराबी-वृत्ति में भी वृद्धि हुई।

प्रश्न 6
‘आयु भी अपराधों का एक प्रभावी कारक है, व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अपराध एवं आयु में भी सह-सम्बन्ध पाया जाता है। सामान्यतः 20 से 24 वर्ष की आयु में ही अपराध अधिक किये जाते हैं, बचपन एवं वृद्धावस्था में कम। इंग्लैण्ड में पुरुषों द्वारा सर्वाधिक अपराध 12 से 15 वर्ष की आयु में तथा स्त्रियों द्वारा 15 से 17 वर्ष की आयु में किये गये। इसकी तुलना में अमेरिका में 18 से 44 वर्ष की आयु में अपराध अधिक हुए हैं। अपराध की प्रकृति के साथ-साथ अपराधियों की आयु में भी अन्तर पाया जाता है। हत्या एवं डकैती युवा लोगों द्वारा अधिक की जाती है, बच्चों द्वारा छोटे-छोटे झगड़े एवं चोरियाँ तथा वृद्धों द्वारा यौनसम्बन्धी अपराध अधिक किये जाते हैं। आयु का सम्बन्ध शारीरिक विकास से है। पूर्ण विकसित व्यक्ति ऐसे अपराध अधिक करता है जिनमें शारीरिक शक्ति की अधिक आवश्यकता होती है।

प्रश्न 7
अपराध के कारणों से सम्बन्धित आर्थिक सिद्धान्त के बारे में बताइए।
उत्तर:
कार्ल मार्क्स, एंजिल्स, विलियम बोंजर आदि का मत है कि अपराध आर्थिक कारणों से ही होते हैं। जब समाज में आर्थिक विषमता बढ़ती है, लोगों की भोजन, वस्त्र और निवास सम्बन्धी आवश्यक आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं होतीं, तो मजबूरन उन्हें अपराध का सहारा लेना पड़ता है। किन्तु यह मत एकपक्षीय है, क्योंकि आर्थिक कारणों के अलावा कई अन्य कारण भी अपराध के लिए उत्तर:दायी होते हैं।

प्रश्न 8
पैरोल (Parole) पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
पैरोल पर उन अपराधियों को छोड़ा जाता है जिन्हें लम्बी अवधि की सजा मिली हो और उसका कुछ भाग वे काट चुके हों। सजा काटने के दौरान यदि अपराधी का आचरण अच्छा रहता है तो जेल अधिकारी की सिफारिश पर उसे शेष सजा से मुक्ति मिल जाती है। पैरोल का उद्देश्य भी अपराधी का सुधार करना है। पैरोल पर छूटने वाले से अपेक्षा की जाती है कि वह कुछ शर्तों का पालन करेगा। ऐसा न करने पर उसे पुनः दण्ड भुगतने को कहा जाता है। पैरोल पर छूटे अपराधी की देखभाल के लिए पैरोल अधिकारी होता है। पैरोल से भी कई लाभ हैं; जैसे–

  1. राज्य के खर्चे में कमी आती है। तथा अच्छे आचरण को बढ़ावा मिलता है,
  2. जेल के दूषित वातावरण से अपराधी को शीघ्र मुक्ति मिल जाती है और
  3. उसे समाज से अनुकूलन करने का एक अवसर मिल जाता है।

प्रश्न 9
अपराध किसे कहते हैं? [2014]
उत्तर:

अपराध का अर्थ एवं परिभाषा

समाज की व्यवस्था बनाये रखने के लिए नियमों, कानूनों, प्रथाओं और परम्पराओं के अनुपालन पर बल दिया गया है। कुछ समाज-विरोधी ऐसे भी व्यक्ति होते हैं, जो नियमों और कानूनों का उल्लंघन करते हैं। उनके द्वारा किए गये राज्य–विरोधी या कानून-विरोधी कार्य ही अपराध कहलाते हैं।

अपराध एक ऐसा कार्य है, जो लोक-कल्याण के लिए अहितकर समझा जाता है तथा जिसे राज्य के द्वारा पारित कानून द्वारा निषिद्ध कर दिया जाता है। इसके उल्लंघनकर्ता को दण्ड दिया जाता है। अपराध को लैण्डिस तथा लैण्डिस ने निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है
लैण्डिस तथा लैण्डिस के अनुसार, “अपराध वह कार्य है जिसे राज्य ने समूह-कल्याण के लिए हानिकारक घोषित किया है और जिसके लिए राज्य पर दण्ड देने की शक्ति है।”

निश्चित उत्तीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
इलियट और मैरिल के अनुसार अपराध की क्या परिभाषा है?
उत्तर:
इलियट और मैरिल के अनुसार, “समाज-विरोधी व्यवहार जो कि समूह द्वारा अस्वीकार किया जाता है, जिसके लिए समूह दण्ड निर्धारित करता है, अपराध के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”

प्रश्न 2
डॉ० हैकरवाल ने अपराध की क्या परिभाषा दी है ?
उत्तर:
डॉ० हैकरवाल ने अपराध के सामाजिक पक्ष को प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि, सामाजिक दृष्टिकोण से अपराध व्यक्ति का एक ऐसा व्यवहार है जो कि उन मानव सम्बन्धों की व्यवस्था में बाधा डालता है, जिन्हें समाज अपने अस्तित्व के लिए प्राथमिक दशा के रूप में स्वीकार करता है।”

प्रश्न 3
‘अपराधी जन्मजात होते हैं। यह कथन किसका है ? [2007, 08, 09, 11, 12, 13, 14, 15]
उत्तर:
यह कथन लॉम्ब्रोसो का है।

प्रश्न 4
“समाज की असन्तुलित आर्थिक व्यवस्था ही अपराध का प्रमुख कारण है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
यह कथन प्रसिद्ध विद्वान् लॉम्ब्रोसो का है।

प्रश्न 5
“अपराध का प्रमुख सम्बन्ध जलवायु से है। जलवायु तथा मौसम में परिवर्तन होने के साथ ही अपराधी में भी परिवर्तन देखने को मिलता है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
यह कथन प्रसिद्ध विद्वान् क्वेटलेट का है।

प्रश्न 6
यह कथन किसका है-‘अपराधी बनाये जाते हैं ? [2009, 10, 15, 16]
या
“अपराधी समाज द्वारा बनाए जाते हैं?” किसका कथन है? [2016, 17]
उत्तर:
सदरलैण्ड का।

प्रश्न 7
“करुणा और ईमानदारी की प्रचलित भावनाओं का उल्लंघन ही अपराध है।” यह किसका कथन है ?
उत्तर:
यह कथन गैरोफैलो का है।

प्रश्न 8
‘अपराध सीखा हुआ व्यवहार है।’ यह कथन किसका है ?
उत्तर:
यह कथन ‘सदरलैण्ड’ का है।

प्रश्न 9
अपराध सम्बन्धी कैलेण्डर किसने बनाया ?
उत्तर:
अपराध सम्बन्धी कैलेण्डर लैकेसन ने बनाया।

प्रश्न 10
अपराधों के कारणों से सम्बन्धित समाजशास्त्रीय सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक कौन हैं?
उत्तर:
अपराधों के कारणों से सम्बन्धित समाजशास्त्रीय सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक सदरलैण्ड

प्रश्न 11
अपराध के लिए जैविकीय कारकों को उत्तर:दायी ठहराने वाले समाजशास्त्री कौन हैं?
उत्तर:
अपराध के लिए जैविकीय कारकों को उत्तर:दायी ठहराने वाले समाजशास्त्री लॉम्ब्रोसो

प्रश्न 12
‘आर्थिक निर्धारणवाद’ अवधारणा से कौन समाजशास्त्री सम्बन्धित है ?
उत्तर:
आर्थिक निर्धारणवाद’ अवधारणा से सदरलैण्ड सम्बन्धित हैं।

प्रश्न 13
‘प्रिन्सिपल्स ऑफ क्रिमिनोलॉजी’ नामक पुस्तक के लेखक कौन हैं ?
उत्तर: ‘
प्रिन्सिपल्स ऑफ क्रिमिनोलॉजी’ नामक पुस्तक के लेखक सदरलैण्ड हैं।

प्रश्न 14
लॉम्ब्रोसो ने अपराधियों को कितने भागों में बाँटा ?
उत्तर:
लॉम्ब्रोसो ने अपराधियों को निम्नलिखित चार भागों में बाँटा है-

  1. जन्मजाते,
  2. अपस्मारी,
  3. आकस्मिक तथा
  4. आवेगयुक्त अपराधी।

प्रश्न 15
किसी भी समाज का अपराध से पूर्णतया रहित हो पाना सम्भव है। (सत्य/असत्य) [2017]
उत्तर:
असत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
‘अपराधिक कैलेण्डर’ के प्रतिपादक कौन थे ?
(क) समनर
(ख) जिंन्सबर्ग।
(ग) कार्ल मार्क्स
(घ) हंटिंग्टन और क्वेटलेट
उत्तर:
(घ) हंटिंग्टन और क्वेटलेट

प्रश्न 2.
कौन-सा सिद्धान्त अपराध की व्याख्या सुख-दुःख की धारणा के आधार पर करता है ?
(क) बहुकारकीय
(ख) जैविकीय
(ग) शास्त्रीय
(घ) आर्थिक
उत्तर:
(ग) शास्त्रीय

प्रश्न 3.
श्वेतवसन अपराध अवधारणा से कौन समाजशास्त्री जुड़ा है ? [2008, 10]
(क) सदरलैण्ड
(ख) लॉम्ब्रोसो
(ग) कार्ल मार्क्स
(घ) एंजिल्स
उत्तर:
(क) सदरलैण्ड

प्रश्न 4.
अपराध के शास्त्रीय सिद्धान्त से सम्बन्धित हैं [2011, 17]
या
अपराध के शास्त्रीय सिद्धान्त के प्रवर्तक कौन हैं? [2015, 16]
(क) बेन्थम
(ख) मॉण्टेस्क्यू
(ग) बकल
(घ) कार्ल मार्क्स
उत्तर:
(क) बेन्थम

प्रश्न 5.
अच्छे आचरण के कारण बन्दीगृह से अस्थायी मुक्ति को कहते हैं
(क) प्रोबेशन
(ख) पैरोल
(ग) मुक्ति सहायता
(घ) आचरण मुक्ति
उत्तर:
(ख) पैरोल

प्रश्न 6.
सदरलैण्ड किस पुस्तक के लेखक थे ?
(क) सोशल डिसऑर्गेनाइजेशन
(ख) सोशल चेंज
(ग) प्रिन्सिपल्स ऑफ क्रिमिनोलॉजी
(घ) सोसायटी
उत्तर:
(ग) प्रिन्सिपल्स ऑफ क्रिमिनोलॉजी।

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UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 15 Indian Government Act of 1919 and 1935

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Chapter Chapter 15
Chapter Name Chapter 15 Indian Government
Act of 1919 and 1935
(1919 तथा 1935 का
भारत सरकार अधिनियम)
Number of Questions Solved 13
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 15 Indian Government Act of 1919 and 1935 (1919 तथा 1935 का भारत सरकार अधिनियम)

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1919 ई० के अधिनियम की चार प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उतर:
1919 ई० के अधिनियम की चार प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • 1919 ई० के ऐक्ट की मुख्य विशेषता प्रान्तों में द्वैध-शासन की स्थापना थी। इसके लिए केन्द्रीय और प्रान्तीय विषयों को अलग किया गया।
  • इस अधिनियम के तहत गर्वनर जनरल व गर्वनर के अधिकारों में वृद्धि की गई जिसका उपयोग वे स्वेच्छा से कर सकते थे।
  • गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद में भारतीय सदस्यों की संख्या को बढ़ाया गया।
  • केन्द्रीय विधान मण्डल को विस्तृत अधिकार दिए गए जिनमें प्रमुख कानून बनाने, कानून परिवर्तन करने तथा बजट पर बहस आदि प्रमुख थे।

प्रश्न 2.
1935 ई० के गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया ऐक्ट की दो प्रमुख विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए।
उतर:
1935 ई० के गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया ऐक्ट की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(i) केन्द्र में द्वैध-
शासन प्रणाली की स्थापना- 1919 ई० के अधिनियम में प्रान्तों में द्वैध-शासन पद्धति की स्थापना लागू की गई थी, जो कि पूर्णतया असफल रही थी। इसके पश्चात् 1935 ई० के अधिनियम के द्वारा केन्द्र में द्वैध-शासन प्रणाली की स्थापना की गई। केन्द्रीय विषयों को दो भागों-आरक्षित एवं हस्तान्तरित में विभक्त किया गया। आरक्षित भाग में प्रतिरक्षा, वैदेशिक और धार्मिक मामले थे, जो गवर्नर जनरल की अधिकारिता में थे। हस्तान्तरित विषयों के अन्तर्गत शेष सभी विषय थे। मन्त्रिपरिषद् के परामर्श से गवर्नर जनरल इन विषयों की प्रशासनिक व्यवस्था कर सकता था। मन्त्रिपरिषद् व्यवस्थापिका सभा के प्रति उत्तरदायी होती थी और गवर्नर जनरल मन्त्रिपरिषद् के निर्णय को मानने के लिए बाध्य न था। अत: वास्तविक शासन गवर्नर जनरल के हाथों में केन्द्रित था।

(ii) विधायी शक्तियों का वितरण-
सम्पूर्ण विधायी विषयों को केन्द्रीय सूची, प्रान्तीय सूची और समवर्ती सूची में विभाजित किया गया था। केन्द्रीय अथवा संघ सूची में 59 विषय, प्रान्तीय सूची में 54 और समवर्ती सूची में 36 विषय निर्धारित किए गए। समवर्ती सूची पर गवर्नर जनरल का अधिकार निहित था जो स्वविवेक से केन्द्रीय अथवा प्रान्तीय विधानमण्डलों को हस्तगत कर सकता था।

प्रश्न 3.
1935 ई० के अधिनियम के चार प्रमुख दोष लिखिए।
उतर:
1935 ई० के अधिनियम के चार प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं

  • इस अधिनियम द्वारा ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता को बरकरार रखा गया। भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य प्रदान नहीं किया गया।
  • प्रान्तों में स्थापित द्वैध-शासन प्रणाली को हटाकर अब नए रूप में केन्द्र में द्वैध-शासन प्रणाली लागू कर दी। इसका स्पष्ट मतलब था कि अंग्रेज भारतीयों को किसी प्रकार की सुविधा देने के पक्ष में न थे।
  • भारतीयों द्वारा साम्प्रदायिक चुनाव पद्धति का विरोध करने के बावजूद इस अधिनियम में इसे समाप्त नहीं किया गया।
  • इस अधिनियम द्वारा गवर्नर जनरल व गवर्नरों के अधिकारों में वृद्धि की गई। इस प्रकार भारतीय प्रशासन पर इंग्लैण्ड का पर्ण नियन्त्रण था।

प्रश्न 4.
1919 ई० के अधिनियम में प्रान्तीय कार्यपालिका में क्या परिवर्तन किए गए?
उतर:
1919 ई० के अधिनियम में प्रान्त में द्वैध-शासन प्रणाली की स्थापना की गई। इसके लिए केन्द्रीय और प्रान्तीय विषयों को पृथक कर दिया गया। इसके पश्चात् प्रान्तीय विषयों को दो भागों में विभक्त कर दिया गया-

  • सुरक्षित विषय; जैसे- अर्थव्यवस्था, शान्ति व्यवस्था, पुलिस आदि।
  • हस्तान्तरित विषय; जैसे- स्थानीय स्वशासन, शिक्षा आदि।

प्रश्न 5.
1935 ई० के अधिनियम के प्रति राष्ट्रीय दलों का दृष्टिकोण स्पष्ट कीजिए।
उतर:
1935 ई० के अधिनियम के सम्बन्ध में जवाहरलाल नेहरू ने कहा “यइ इतना प्रतिक्रियावादी था कि इसमें स्वविकास का कोई भी बीज नहीं था।” उन्होंने और आगे कहा कि 1935 ई० का विधान, दासता का एक नवीन राजपत्र था। वह दृढ़ आरोपों से युक्त ऐसा यंत्र था जिसमें इंजन नहीं था। मदनमोहन मालवीय ने इसे ‘बाह्य रूप से जनतंत्रवादी और अंदर से खोखला कहा। चक्रवती राजगोपालचारी ने इसे द्वैध शासन पद्धति से भी बुरा एवं बिलकुल अस्वीकृत बताया।

प्रश्न 6.
1919 ई० के भारत शासन अधिनियम की क्या उल्लेखनीय विशेषता थी?
उतर:
प्रान्तों में द्वैध-शासन की स्थापना 1919 ई० के ऐक्ट की मुख्य विशेषता थी। इसके लिए केन्द्रीय और प्रान्तीय विषयों को पृथक् किया गया था। इसके पश्चात् प्रान्तीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया

  • सुरक्षित विषय; जैसे- अर्थव्यवस्था, शान्ति-व्यवस्था, पुलिस आदि और
  • हस्तान्तरित विषय; जैसे- स्थानीय स्वशासन, शिक्षा आदि।

सुरक्षित विषयों का शासन गवर्नर अपनी परिषद् के सदस्यों की सलाह से करता था और हस्तान्तरित विषयों का शासन गवर्नर भारतीय मन्त्रियों की सलाह से करता था। इस व्यवस्था से गवर्नर की कार्यकारिणी भी दो भागों में बँट गई- गवर्नर और उसकी परिषद् तथा गवर्नर और भारत मन्त्री। इससे प्रान्तीय शासन के दो भाग हो गए- पहला शासन का वह भाग, जिसके अधिकार में सुरक्षित विषय थे अर्थात् गर्वनर और उसकी परिषद् जो शासन का उत्तरदायित्वहीन भाग था और दूसरा शासन का वह भाग, जिसके अधिकार में हस्तान्तरित विषय थे अर्थात् गवर्नर और भारत मन्त्री जो शासन का उत्तरदायित्वपूर्ण भाग माना जा सकता था। शासन के इसी विभाजन के कारण इस व्यवस्था को द्वैध-शासन कहा जाता है।

प्रश्न 7.
1935 ई० के भारत शासन अधिनियम द्वारा देशी रियासतों के सम्बन्ध में क्या व्यवस्था थी?
उतर:
1935 ई० के भारत शासन अधिनियम द्वारा सभी रियासतों का एक संघ बनाने की व्यवस्था थी। किन्तु संघ के निर्माण की प्रक्रिया को अत्यन्त जटिल बना दिया गया था। संघों में प्रान्तों को आवश्यक रूप से सम्मिलित होना था; किन्तु देशी रियासतों के लिए यह ऐच्छिक था। अधिकांश रियासतों के शासक ऐसी केन्द्रीय सरकार के अन्तर्गत संगठित होने को तैयार न थे।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1919 ई० के मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार कानून के प्रमुख प्रावधानों का वर्णन करते हुए उनकी कमियों पर प्रकाश डालिए।
उतर:
सन् 1918 ई० में मॉण्टेग्यू और चेम्सफोर्ड ने संयुक्त हस्ताक्षरों से भारत में सुधारों के लिए एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई जिसके आधार पर 1919 ई० का भारत सरकार कानून बनाया गया। इसे भारत सरकार अधिनियम-1919 या मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड अधिनियम के नाम से जाना जाता है। मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड अधिनियम के प्रावधान

(i) भारत सचिव व इंग्लैण्ड की संसद द्वारा भारतीय शासन पर नियन्त्रण में कमी की गई। भारत सचिव के कार्यालयों का सम्पूर्ण खर्चा भी ब्रिटिश राजस्व से ही लिया जाना था। इससे पहले यह खर्चा भारतीय राजस्व से लिया जाता था, जिसका भारतीय विरोध कर रहे थे।

(ii) इंग्लैण्ड में भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में एक नवीन पद का सृजन किया गया। इस नए पदाधिकारी को भारतीय उच्चायुक्त’ कहा गया। भारतीय उच्चायुक्त को भारत सचिव से अनेक अधिकार लेकर दे दिए गए। भारतीय उच्चायुक्त की नियुक्ति भारत सरकार द्वारा की जानी थी तथा उसका खर्च भी भारत को ही वहन करना था।

(iii) गवर्नर जनरल व गवर्नरों के अधिकारों में वृद्धि की गई, जिनका उपयोग वे स्वेच्छा से कर सकते थे।

(iv) भारतीयों की यह माँग कि साम्प्रदायिक चुनाव पद्धति को समाप्त कर दिया जाए, को स्वीकार नहीं किया गया। इसके विपरीत इस प्रणाली को और बढ़ावा दिया गया। इस अधिनियम के अनुसार सिक्खों, एंग्लो-इण्डियन्स, ईसाइयों और यूरोपियनों को भी पृथक् प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया।

(v) केन्द्रीय- 
शासन व्यवस्था में उत्तरदायी शासन लागू नहीं किया गया। अत: केन्द्रीय शासन पूर्ववत् स्वेच्छाचारी तथा नौकरशाही के नियन्त्रण में ही रहा।

(vi) गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद् में भारतीय सदस्यों की संख्या को बढ़ाया गया।

(vii) एक सदन वाले केन्द्रीय विधानमण्डल का पुनसँगठन किया गया। अब दो सदन वाले विधानमण्डल की व्यवस्था की गई। उच्च सदन को राज्य परिषद् तथा निचले सदन को केन्द्रीय विधानसभा कहा गया।

(viii) केन्द्र में पहली बार द्विसदनात्मक व्यवस्था की गई। पहले सदन को विधानसभा कहा गया। विधानसभा में सदस्यों की कुल संख्या 145 थी, जिनमें 41 नामजद सदस्य थे और 104 चुने हुए सदस्य होते थे। दूसरे सदन को राज्यसभा कहा गया। राज्यसभा के कुल 60 सदस्य थे। उनमें 33 चुने हुए तथा 27 नामजद सदस्य होते थे।

(ix) गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में 8 सदस्यों की संख्या निश्चित की गई, जिनमें से 3 सदस्यों का भारतीय होना आवश्यक था।

(x) भारत परिषद्
के कार्यकारिणी सदस्यों की संख्या न्यूनतम 8 व अधिकतम 12 निश्चित कर दी गई। इनमें से आधे सदस्य वे होंगे जो दीर्घकाल से भारत में रहते आए हों। इनका कार्यकाल 5 वर्ष रखा गया।

(xi) केन्द्रीय विधान
मण्डल को विस्तृत अधिकार दिए गए जिनमें कानून बनाने, कानून परिवर्तन करने तथा बजट पर बहस करने के अधिकार आदि प्रमुख थे।

(xii) इस अधिनियम
के अनुसार केन्द्रीय और प्रान्तीय विषयों का पहली बार बँटवारा किया गया। 47 विषयों को केन्द्रीय विषय बनाया गया। उदाहरणस्वरूप- प्रतिरक्षा, विदेशों से सम्बन्ध, विदेशियों को भारत की नागरिकता प्रदान करना, आवागमन के साधन, सीमा शुल्क, नमक, आयकर, डाकखाने, सिक्के तथा नोट, सार्वजनिक ऋण, वाणिज्य जिसमें बैंक तथा बीमा इत्यादि शामिल थे, केन्द्र को दिए गए। प्रान्तीय सूची में 50 विषय रखे गए। स्थानीय स्वशासन, स्वास्थ्य, सफाई, चिकित्सा, शिक्षा, पुलिस तथा जेल, न्याय, जंगल, कृषि, भू-कर इत्यादि विषय प्रान्तीय सरकारों को दिए गए। जो विषय सूची में शामिल नहीं किए गए उन पर कानून बनाने का अधिकार केन्द्र को होगा।

(xiii) प्रान्तों में द्वैध- 
शासन की स्थापना 1919 ई० के ऐक्ट की मुख्य विशेषता थी। इसके लिए केन्द्रीय और प्रान्तीय विषयों को पृथक् किया गया था। इसके पश्चात् प्रान्तीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया- (क) सुरक्षित विषय; जैसेअर्थव्यवस्था, शान्ति-व्यवस्था, पुलिस आदि और (ख) हस्तान्तरित विषय; जैसे- स्थानीय स्वशासन, शिक्षा आदि। सुरक्षित विषयों का शासन गवर्नर अपनी परिषद् के सदस्यों की सलाह से करता था और हस्तान्तरित विषयों का शासन गवर्नर भारतीय मन्त्रियों की सलाह से करता था। इस व्यवस्था से गवर्नर की कार्यकारिणी भी दो भागों में बंट गईं- गवर्नर और उसकी परिषद् तथा गवर्नर और भारत मन्त्री। इससे प्रान्तीय शासन के दो भाग हो गए- पहला शासन का वह भाग, जिसके अधिकार में सुरक्षित विषय थे अर्थात् गर्वनर और उसकी परिषद् जो शासन का उत्तरदायित्वहीन भाग था और दूसरा शासन का वह भाग, जिसके अधिकार में हस्तान्तरित विषय थे अर्थात् गवर्नर और भारत मन्त्री जो शासन का उत्तरदायित्वपूर्ण भाग माना जा सकता था। शासन के इसी विभाजन के कारण इस व्यवस्था को द्वैध-शासन कहा जाता है।

(xiv) इस अधिनियम
द्वारा एक लोक सेवा आयोग की स्थापना की गई। भारत सचिव को इस आयोग की नियुक्ति का कार्य सौंपा गया।

(xv) 1919 ई० का
अधिनियम भी केन्द्रीय विधानसभा को ब्रिटिश संसद से मुक्त नहीं कर सका। भारत की केन्द्रीय विधानसभा ब्रिटिश संसद के किसी कानून के विरुद्ध विधेयक पास नहीं कर सकती थी।

(xvi) इस अधिनियम
के लागू होने के 10 वर्षों के अन्दर एक आयोग की नियुक्ति की जानी थी, जिसका कार्य इस अधिनियम के प्रति प्रतिक्रियाओं की रिपोर्ट इंग्लैण्ड की संसद को देना था।

अधिनियम की कमियाँ- मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड अधिनियम में निम्नलिखित कमियाँ थीं
(क) केन्द्र में उत्तरदायी शासन की स्थापना नहीं की गई थी।
(ख) द्वैध-शासन प्रणाली सिद्धान्ततः दोषपूर्ण थी। एक ही प्रान्त में दो शासन करने वाली संस्थाएँ कैसे कार्य कर सकती हैं?
(ग) द्वैध-शासन प्रणाली के अन्तर्गत विषयों का विभाजन भी अत्यन्त अतार्किक एवं अव्यवहारिक था। ऐसे विभाग जो एक-दूसरे से सम्बन्धित थे, अलग-अलग संस्थाओं के अधीन कर दिए गए थे। उदाहरण के लिए- सिंचाई व कृषि का घनिष्ठ सम्बन्ध है, किन्तु दोनों को अलग-अलग कर दिया गया था। मद्रास (चेन्नई) के तत्कालीन मन्त्री श्री के०वी० रेड्डी ने लिखा है, “मैं विकास मन्त्री था, किन्तु वन विभाग हमारे अधिकार में नहीं था। मैं कृषि मन्त्री था, किन्तु सिंचाई विभाग पृथक् था।”
(घ) गवर्नर को अत्यधिक शक्ति प्रदान की गई थी। गवर्नर किसी भी मन्त्री के प्रस्ताव को अस्वीकार कर सकता था।
(ङ) इस अधिनियम में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया गया था।

प्रश्न 2.
1919 ई० के अधिनियम के अन्तर्गत स्थापित द्वैध-शासन से आप क्या समझते हैं? यह क्यों असफल रहा?
उतर:
उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 3.
1919 ई० के भारत सरकार अधिनियम की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उतर:
उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 4.
1919 ई० के अधिनियम के अन्तर्गत केन्द्र एवं प्रान्तीय विधान सभाओं के अधिकारों की समीक्षा कीजिए।
उतर:
उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 5.
1935 ई० के अधिनियम के अन्तर्गत स्वायत्तता, गर्वनरों के लिए स्वायत्तता थी, न कि प्रान्तीय विधान मण्डल और मन्त्रियों के लिए।” व्याख्या कीजिए।
उतर:
सर सैमुअल होर द्वारा संयुक्त समिति की रिपोर्ट के आधार पर, ब्रिटिश संसद में 19 दिसम्बर, 1934 को भारत सरकार विधेयक प्रस्तुत किया गया। ब्रिटिश संसद ने इस विधेयक को बहुमत से पारित कर 3 अगस्त, 1935 को अपनी सहमति प्रदान की। यह अधिनियम भारत शासन अधिनियम, 1935 ई० (गवर्नमेन्ट ऑफ इण्डिया ऐक्ट 1935 ई०) के नाम से जाना जाता है। सर्वप्रथम प्रान्तों में द्वैध-शासन प्रणाली की स्थापना 1919 ई० के अधिनियम में की गई थी जो कि पूर्णतया असफल रही थी। इसके बाद 1935 ई० के अधिनियम द्वारा केन्द्र में जो कि पूर्णतया असफल रही थी। इसके बाद 1935 ई० के अधिनियम द्वारा केन्द्र में द्वैध-शासन प्रणाली को लागू किया गया।

केन्द्रीय विषयों को आरक्षित एवं हस्तान्तरित नामक दो भागों में विभाजित किया गया। आरक्षित भाग में प्रतिरक्षा, धार्मिक एवं वैदेशिक मामले थे जो गवर्नर जनरल की अधिकारिता में थे। हस्तान्तरित विषयों के अन्तर्गत शेष सभी विषय थे। मन्त्रिपरिषद् के परामर्श से गवर्नर जनरल इन विषयों की प्रशासनिक व्यवस्था कर सकता था। मन्त्रिपरिषद् व्यवस्थापिका सभा के प्रति उत्तरदायी होती थी और गवर्नर जनरल मन्त्रिपरिषद् के निर्णय को मानने के लिए बाध्य नहीं था। अत: वास्तविक शासन गवर्नर जनरल के हाथों में था।

1935 ई० के अधिनियम में 1919 के अधिनियम द्वारा प्रान्तों में स्थापित द्वैध-शासन प्रणाली को समाप्त करके स्वायत शासन प्रणाली को स्थापित कर दिया गया और प्रान्तों को नवीन संवैधानिक अधिकार दिये गये थे। प्रशासन का कार्य गवर्नर मन्त्रिपरिषद् के परामर्श पर करता था। मन्त्रिपरिषद् विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी थी। गवर्नरों से मन्त्रिपरिषद् के सुझावों के आधार पर कार्य करने की अपेक्षा की गई थी। गवर्नरों को इतनी शक्ति प्रदान की गई थी कि प्रान्तीय स्वायतता के बावजूद प्रान्तीय स्वायता नाम मात्र की रह गई थी।

प्रश्न 6.
1935 ई० के अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों की व्याख्या और उसकी संक्षिप्त आलोचना कीजिए।
या
भारत के प्रजातांत्रिकरण में 1935 ई० के अधिनियम ने एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं?
उतर:
1935 ई० के अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं
(i) केन्द्र में द्वैध- शासन प्रणाली की स्थापना- 1919 ई० के अधिनियम में प्रान्तों में द्वैध-शासन पद्धति की स्थापना लागू की गई थी, जो कि पूर्णतया असफल रही थी। इसके पश्चात् 1935 ई० के अधिनियम के द्वारा केन्द्र में द्वैध-शासन प्रणाली की स्थापना की गई। केन्द्रीय विषयों को दो भागों-आरक्षित एवं हस्तान्तरित में विभक्त किया गया। आरक्षित भाग में प्रतिरक्षा, वैदेशिक और धार्मिक मामले थे, जो गवर्नर जनरल की अधिकारिता में थे। हस्तान्तरित विषयों के अन्तर्गत शेष सभी विषय थे। मन्त्रिपरिषद् के परामर्श से गवर्नर जनरल इन विषयों की प्रशासनिक व्यवस्था कर सकता था। मन्त्रिपरिषद् व्यवस्थापिका सभा के प्रति उत्तरदायी होती थी और गवर्नर जनरल मन्त्रिपरिषद् के निर्णय को मानने के लिए बाध्य न था। अत: वास्तविक शासन गवर्नर जनरल के हाथों में केन्द्रित था।

(ii) विधायी शक्तियों का वितरण-
सम्पूर्ण विधायी विषयों को केन्द्रीय सूची, प्रान्तीय सूची और समवर्ती सूची में विभाजित किया गया था। केन्द्रीय अथवा संघ सूची में 59 विषय, प्रान्तीय सूची में 54 और समवर्ती सूची में 36 विषय निर्धारित किए गए। समवर्ती सूची पर गवर्नर जनरल का अधिकार निहित था जो स्वविवेक से केन्द्रीय अथवा प्रान्तीय विधानमण्डलों को हस्तगत कर सकता था।

(iii) व्यापक विधान-
भारत सरकार अधिनियम -1935 अत्यन्त लम्बा और जटिल विधान था। इसमें 451 धाराएँ और 15 अनुसूचियाँ थीं। कुछ विशेष कारणों से इसका विशाल होना स्वाभाविक भी था। एक तो यह जटिल परिसंघीय संविधान की व्यवस्था करता था जो परिसंघात्मक संविधानवाद के इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलता। दूसरे, यह भारतीय मन्त्रियों और विधायकों द्वारा कदाचार के विरुद्ध विधिक सुरक्षाओं का उल्लेख करता था।

(iv) उद्देशिका का न होना-
1935 ई० के अधिनियम की अपनी कोई उद्देशिका नहीं थी। स्मरणीय है कि, 1919 ई० के अधिनियम के अधीन सरकार की घोषित नीति, ब्रिटिश भारत में उत्तरदायी शासन का क्रमिक विकास था। 1935 ई० के अधिनियम के पश्चात् 1919 ई० के अधिनियम को उद्देशिका के अलावा निरस्त कर दिया गया।

(v) अखिल भारतीय संघ का प्रस्ताव-
इस अधिनियम की सर्वप्रमुख विशेषता थी- पहली बार भारत में संघात्मक शासन प्रणाली को लागू किया जाना। सभी भारतीय प्रान्तों व देशी रियासतों का एक संघ बनाने का प्रस्ताव था। संघ के दोनों सदनों में राज्यों को उचित प्रतिनिधित्व दिया गया। संघीय असेम्बली में 375 में से 125 व कौंसिल ऑफ स्टेट में 260 में से 104 सदस्य नियुक्त करने का उन्हें अधिकार दिया गया, किन्तु संघ के निर्माण की प्रक्रिया को अत्यन्त जटिल बना दिया गया था। संघों में प्रान्तों को आवश्यक रूप से सम्मिलित होना था, किन्तु देशी रियासतों के लिए यह ऐच्छिक था। अधिकांश रियासतों के शासक ऐसी केन्द्रीय सरकार के अन्तर्गत संगठित होने के लिए तैयार न थे। अतः यह क्रियान्वित नहीं हो सका।

(vi) भारतीय परिषद् का विघटन-
भारत में भारतीय कौंसिल के विरोध को देखते हुए भारतीय कौंसिल को समाप्त कर दिया गया। इसका स्थान भारत सचिव के सलाहकारों ने ले लिया। भारत सचिव की सलाहकार समिति में अधिकतम 6 सदस्य हो सकते थे। इनमें से आधे ऐसे होते थे जो कम-से-कम 10 वर्ष तक भारत सरकार की सेवा में ही रहे हों। इस प्रकार भारत सचिव का नियन्त्रण उन क्षेत्रों तक ही सीमित रह गया जिनमें गवर्नर जनरल संघीय मन्त्रिमण्डल की सलाह नहीं मानता था, अथवा, अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करता था।

(vii) विधानमण्डलों का विस्तार-
1935 ई० के अधिनियम के अनुसार संघीय विधानमण्डल का स्वरूप दो सदन वाला था। उच्च सदन को राज्य परिषद् और निचले सदन को संघीय विधानसभा कहते थे। राज्य परिषद् के सदस्यों को चुनने का अधिकार सीमित लोगों को ही था। संघीय विधान सभा में 375 सदस्य होते थे, जिनमें से 125 भारतीय नरेशों के प्रतिनिधि और मुसलमानों के 80 सदस्य होते थे। संघीय विधान सभा के अधिकार सीमित थे।

(viii) प्रान्तीय स्वायत्तता-
1919 ई० के अधिनियम द्वारा प्रान्तों में स्थापित द्वैध-शासन को समाप्त करके 1935 ई० के अधिनियम में स्वायत्त शासन की स्थापना की गई तथा प्रान्तों को नवीन संवैधानिक अधिकार प्रदान किए गए। प्रशासन का कार्य गवर्नर मन्त्रिपरिषद् के परामर्श पर करता था। मन्त्रिपरिषद् विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी थी। गवर्नरों से यह अपेक्षा की गई थी कि वे मन्त्रिपरिषद् के सुझावों के अनुसार ही कार्य करें, किन्तु प्रान्तीय स्वायत्तता के बावजूद भी गवर्नरों को इतनी शक्तियाँ प्रदान कर दी गई कि स्वायत्तता नाममात्र की रह गई।

1935 ई० के अधिनियम की आलोचना- इस अधिनियम द्वारा ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता को बनाए रखा गया तथा भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य प्रदान नहीं किया गया। प्रान्तों में से द्वैध-शासन प्रणाली को हटाना तथा केन्द्र में द्वैध-शासन प्रणाली को लागू करने का मतलब था कि अंग्रेज भारतीयों को कोई सुविधा देने के पक्ष में नहीं थे। पं० जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में यह नियम इतना प्रतिक्रियावादी था कि इसमें स्वविकास का कोई भी बीज नहीं था।” उन्होंने आगे कहा कि 1935 ई० का विधान दासता का एक नवीन राजपत्र था। वास्तव में इस अधिनियम में एक ओर भारतीयों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया गया कि उन्हें सब कुछ दे दिया गया है कि उन्होंने कुछ भी नहीं खोया है। इस प्रकार यह अधिनियम भारतीयों की आकांक्षाओं को सन्तुष्ट नहीं कर सका। विश्व के प्रत्येक संघ में निचले सदन के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव पद्धति को अपनाया गया था। इस प्रकार 1935 ई० के अधिनियम में जनतान्त्रिक शक्तियों की उपेक्षा की गई थी।

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UP Board Class 12 Physics Model Papers Paper 1

UP Board Class 12 Physics Model Papers Paper 1 are part of UP Board Class 12 Physics Model Papers. Here we have given UP Board Class 12 Physics Model Papers Paper 1.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Physics
Model Paper Paper 1
Category UP Board Model Papers

UP Board Class 12 Physics Model Papers Paper 1

समय 3 घण्टे 15 मिनट
पूर्णांक 70

निर्देश
प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्नपत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं।
नोट

  1. इस प्रश्न-पत्र में कुल पाँच प्रश्न हैं।
  2. सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
  3. प्रत्येक प्रश्न के जितने खण्ड हल करने हैं, उनकी संख्या प्रश्न के प्रारम्भ में लिखी है।
  4. प्रश्नों के अंक उनके सम्मुख लिखे हैं।
  5. प्रश्न-पत्र में प्रयुक्त प्रतीकों के सामान्य अर्थ हैं।

प्रश्न 1.
सभी खण्डों के उत्तर दीजिये।
(i) दो चालकीय गोले जिनकी त्रिज्यायें r1 तथा r2 ; हैं, समान आवेश घनत्व द्वारा आवेशित हैं। इनके पृष्ठों के निकट वैद्युत क्षेत्रों का अनुपात हैं।
(a) [latex]\cfrac { { r }_{ 1 }^{ 2 } }{ { r }_{ 2 }^{ 2 } } [/latex]
(b) [latex]\cfrac { { r }_{ 2 }^{ 2 } }{ { r }_{ 1 }^{ 2 } } [/latex]
(c) [latex]\cfrac { { r }_{ 1 }^{ } }{ { r }_{ 2 }^{ } } [/latex]
(d) 1:1

(ii) एक धात्विक प्रतिरोधक एक बैटरी से जुड़ा है। मुक्त इलेक्ट्रॉनों की प्रतिरोधक में धातु के धनायनों से टक्करों की संख्या कम होती हैं, तो धारा
(a) नियत रहेगी।
(b) बढ़ेगी।
(c) घटेगी
(d) शून्य हो जाएगी

(iii) डोमेन किस पदार्थ में बनते हैं?
(a) प्रतिचुम्बकीय ।
(b) लौहचुम्बकीय
(c) अनुचुम्बकीय
(d) इन सभी में

(iv) किसी कैथोड पृष्ठ का कार्यफलन 3.3 eV है। इस पृष्ठ से प्रकाश इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जन के लिए आपतित प्रकाश की न्यूनतम आवृत्ति होगी (h = 6.6 x 1034जूल-से)
(a) 6.6 x 10-34 हर्ट्ज
(b) 0.5 x 1034 हर्ट्ज
(c) 8 x 1014 हर्ट्ज
(d) 3.2 x 1015 हज़

(v) दूर दृष्टि दोष का निवारण होता है।
(a) उचित फोकस दूरी के अवतल लेन्स के प्रयोग से
(b) उचित फोकस दूरी के उत्तल लेन्स के प्रयोग से
(c) किसी भी अवतल लेन्स के प्रयोग से
(d) किसी भी उत्तल लेन्स के प्रयोग से

(vi) एक अर्द्ध-तरंगीय डायोड दिष्टकारक, जिसका भरण ज्यावक्रीय सिग्नल द्वारा किया गया है, के निर्गत् में बिना फिल्टर के शिखर वोल्टता का मान 10 V है। निर्गत् वोल्टता का DC अंश होगा
(a) [latex]\cfrac { 10 }{ \sqrt { 2 } } V [/latex]
(b) [latex]\cfrac { 10 }{ \pi } V[/latex]
(c) 10v
(d) [latex]\cfrac { 20 }{ \pi } V[/latex]

प्रश्न 2.
सभी खण्डों के उत्तर दीजिये। (1 x 6= 6) 
(i) परावैद्युत सामर्थ्य से क्या अभिप्राय है?
(ii) अनुनाद परिपथ में L-C-R परिपथ के शक्ति गुणांक का मान बताइये।
(iii) 600 नैनोमीटर तरंगदैर्ध्य का प्रकाश विद्युत चुम्बकीय वर्णक्रम के किस 
भाग में होगा?
(iv) प्रकाश का वह अभिलक्षण बताइये, जो अपवर्तन की घटना में अपरिवर्तित 
रहता है।
(v) प्रकाश की तरंगदैर्घ्य बढ़ाने पर किसी माध्यम के अपवर्तनांक पर क्या 
प्रभाव पड़ता है?
(vi) आयाम मॉडुलन क्या है?

प्रश्न 3.
सभी खण्डों के उत्तर दीजिये। (2 x 4= 8)
(i) एक आवेश qको दो भागों में किस प्रकार विभाजित करें कि उन्हें एकदूसरे से कुछ 
दूरी पर रखने पर उनके बीच अधिकतम प्रतिकर्षण बल लगे?
(ii) प्रत्यावर्ती परिपथ के लिये औसत शक्ति का व्यंजक प्राप्त कीजिये।
(iii) हाइगेन्स के तरंग संचरण सम्बन्धी सिद्धान्त की व्याख्या कीजिये।
(iv) चित्र में दिये गये गेटो P तथा ५ के नाम बताइये तथा निर्गत् सिग्नल Y की सत्यता 
सारणी बनाइये।
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प्रश्न 4.
सभी खण्डों के उत्तर दीजिये। (3 x 10 = 30)
(i) विभवमापी की सुग्राहिता किस प्रकार बढ़ाई जाती है? वोल्टमीटर की तुलना में इसे 
श्रेष्ठ क्यों समझा जाता है?
(ii) किसी धारामापी की कुण्डली का प्रतिरोध 15 ओम है। 4 मिली ऐम्पियर की वैद्यत 
धारा प्रवाहित होने पर यह पूर्ण स्केल विक्षेप दर्शाता है। आप इस धारामापी को से 6 ऐम्पियर परास वाले अमीटर में कैसे रूपान्तरित करेंगे?
(iii) एक धात्विक चालक का प्रतिरोध ताप बढ़ने पर बढ़ता है, जबकि अर्सचालक का 
प्रतिरोध ताप बढ़ने के साथ घटता है। कारण स्पष्ट कीजिये।
(iv) संलग्न चित्र में जुड़े तीन प्रतिरोध वाटों में प्रत्येक 22 है तथा प्रत्येक को अधिकतम 
18 वाट तक विद्युत शक्ति दी जा सकती है (अन्यथा वह पिघल जायेगा)। पूर्ण परिपथ कितनी अधिकतम शक्ति ले सकता है?
UP Board Class 12 Physics Model Papers Paper 1 image 2

(v) आयाम मॉडुलित e का मान ? = 150[1+ 0.5 cos 32501] cos 5 x 105 t से व्यक्त किया जाता है। गणना कीजिये।
(a) मॉडुलन सूचकांक
(b) मॉडुलन आवृत्ति
(c) वाहक आवृत्ति
(d) वाहक आयाम।
(vi) पतले लेन्स की फोकस दूरी के लिये न्यूटन के सूत्र का व्यंजक स्थापित कीजिये।
(vii) 25 वाट के एकवर्षीय प्रकाश स्रोत से उत्सर्जित तरंगदैर्ध्य 6000 A वाले फोटॉनों 
की प्रति सेकण्ड संख्या ज्ञात कीजिये। 5% प्रकाश वैद्युत प्रभाव दक्षता मानने पर, प्रकाश वैद्युत धारा क्या होगी?
(h = 6.6 x 10-34 जूल-सेकण्ड, c= 3.0 x 108 मी/से, e = 1.6 x 1019 कूलॉम)
(viii)
(a) हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर प्रति 
 सेकण्ड 6 x 1015  चक्कर लगाता हैं। वृत्तीय पथ में धारा का मान क्या होगा?
(b) बोहर का परमाणु मॉडल रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल से कैसे 
श्रेष्ठ है?
(ix)
(a) नाभिकीय श्रृंखला अभिक्रिया में क्रान्तिक द्रव्यमान से क्या ।
अभिप्राय है?
UP Board Class 12 Physics Model Papers Paper 1 image 3
(x) एक समतल वैद्युत चुम्बकीय तरंग में वैद्युत क्षेत्र 2.0×100 हर्ट्ज की आवृत्ति से ज्यावक्रीय रूप से दोलन करता है। इसका आयाम 48 वोल्ट/मी है। ज्ञात कीजिये।
(a) दोलित्र चुम्बकीय क्षेत्र का आयाम
(b) औसत वैद्युत ऊर्जा घनत्व
(c) औसत चुम्बकीय ऊर्जा घनत्व

प्रश्न 5.
सभी खण्डों के उत्तर दीजिये। (5 x 4= 20)
(i) गाँस की प्रमेय का उल्लेख कीजिए। एकसमान आवेशित गोलीय कोश के कारण वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का व्यंजक ज्ञात कीजिए, जबकि बिन्दु कोश के
(a) बाहर
(b) पृष्ठ पर
(c) अन्दर स्थित हो।
(ii) प्रत्यावर्ती धारा जनित्र की रचना एवं कार्यविधि समझाइए। दिष्ट धारा की तुलना में | प्रत्यावर्ती धारा के क्या लाभ हैं? जिनके कारण अब समान्यतः प्रत्यावर्ती धारा ही प्रयोग 
की जाती है।
(iii) प्रकाश के व्यतिकरण सम्बन्धी प्रयोग में दो स्लिटों के बीच अन्तराल 0.2 मिमी है। इनसे निर्गत् प्रकाश के व्यतिकरण से 1 मी दूरी पर स्थित पर्दे पर 3 मिमी चौड़ी फ्रिजें बनती हैं। गणना कीजिए
(a) स्लिटों पर आपतित प्रकाश की तरंगदैर्ध्य ।
(b) केन्द्रीय दीप्त फ्रिन्ज से तृतीय अदीप्त फ्रिज की दूरी
(iv)
(a) जेनर डायोड क्या होता है? इसके उपयोग समझाइये।
(b) दर्शाइये कि चित्र में दिया गया परिपथ OR गेट की भाँति व्यवहार करता है।
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Answers

उत्तर 1(i).
(b)
 [latex]\cfrac { { r }_{ 2 }^{ 2 } }{ { r }_{ 1 }^{ 2 } } [/latex]
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उत्तर 1(ii).
(b) बढ़ेगी।
यदि मुक्त इलेक्ट्रॉनों की धातु के धनायनों के साथ टक्करों की संख्या 
घटती है, तो इलेक्ट्रॉनों का अनुगमन वेग बढ़ जाता है, इसलिए धारा बढ़ जाएगी।

उत्तर (iii).
(b) लौहचुम्बकीय
डोमेन की रचना केवल लौहचुम्बकीय पदार्थों में होती है। डोमेन के कारण इनका चुम्बकत्व बहुत अधिक बढ़ जाता है।

उत्तर 5.
(b) उचित फोकस दूरी के उत्तल लेन्स के प्रयोग से
UP Board Class 12 Physics Model Papers Paper 1 image 6
उत्तर 6.
(b) [latex]\cfrac { 10 }{ \pi } V[/latex]
UP Board Class 12 Physics Model Papers Paper 1 image 7

उत्तर 2
(i) किसी परावैद्युत पदार्थ के लिये महत्तम अथवा अधिकतम वैद्युत क्षेत्र लिये 
बिना वैद्युत भंजन के सहन कर सकता है, परावैद्युत सामर्थ्य कहलाता है।

UP Board Class 12 Physics Model Papers Paper 1 image 8
(vi) आयाम मॉडुलन वह क्रिया है, जिसमें उच्च आवृत्ति की वाहक तरंगों के आयाम मॉडुलक तरंग के तात्कालिक मान के अनुसार बढ़ता है।

उत्तर 3.
UP Board Class 12 Physics Model Papers Paper 1 image 9

(ii) जब किसी वैद्युत परिपथ में प्रतिरोध (R) तथा प्रेरकत्व (L) दोनों हो, तो धारा । वोल्टेज V से φ कलान्तर पश्चगामी होती है, इस प्रकार के परिपथ में वोल्टेज एवं धारा के मान निम्न समीकरण से व्यक्त किए जाते हैं।
UP Board Class 12 Physics Model Papers Paper 1 image 10

(iii) हाइगेन्स के तरंग संचरण सम्बन्धी सिद्धान्त के अनुसार,
(a) जब किसी माध्यम में स्थित तरंग स्रोत से तरंगें निकलती हैं, तो स्रोत 
के चारों ओर स्थित माध्यम के कण कम्पन करने लगते हैं। माध्यम में वह पृष्ठ जिसमें स्थित सभी कण कम्पन की समान कला में हों, तरंगाग्र कहलाता है।
(b) तरंगाग्र पर स्थित प्रत्येक कण एक नये तरंग स्रोत का कार्य करता है,
जिससे नई तरंगें सभी दिशाओं में निकलती हैं। इन तरंगों को द्वितीयक तरंगिकाएँ कहते हैं।
(c) यदि किसी क्षण आगे बढ़ती हुई इन द्वितीयक तरंगिकाओं का 
आवरण (Envelope) उन्हें स्पर्श करते हुए पृष्ठ खींचे, तो यह आवरण उस क्षण तरंगाग्र की नई स्थिति प्रदर्शित करेगा।

(iv) P.NAND गेट तथा Q-OR गेट है।
UP Board Class 12 Physics Model Papers Paper 1 image 11
उत्तर 4.
(i) विभवमापी की सुग्राहिता इसके तार की विभव प्रवणता के व्युत्क्रमानुपाती होती है। तार की विभव प्रवणता K =V/L जहाँ L तार की लम्बाई है। अतः स्पष्ट है कि L का मान जितना अधिक होगा अर्थात् विभवमापी के तार की लम्बाई जितनी अधिक होगी, उसकी विभव प्रवणता उतनी ही कम होगी, जिससे उसकी सुग्राहिता उतनी ही अधिक होगी। इस प्रकार विभवमापी के तार की लम्बाई बढ़ाने पर सुग्राहिता को बढ़ाया जा सकता है।
विभवमापी की वोल्टमीटर से श्रेष्ठता ।

(a) जब विभवमापी से सेल का वैद्युत वाहक बल नापते हैं, तो शुन्य 
विक्षेप की स्थिति में सेल के परिपथ में कोई धारा प्रवाहित नहीं। होती है अर्थात् सेल खुले परिपथ में होते हैं। अतः इस स्थिति में सेल के वैद्युत वाहक बल का वास्तविक मान प्राप्त होता है। इस प्रकार विभवमापी अनन्त प्रतिरोध के वोल्टमीटर के समतुल्य होता है।

(b) वोल्टमीटर द्वारा सेल का वैद्युत वाहक बल नापते समय विक्षेप पढ़ना होता है। विक्षेप के पढ़ने में त्रुटि हो सकती है, जबकि विभवमापी में । शुन्य विक्षेप की स्थिति पढ़नी होती है तथा तार की लम्बाई अधिक होती है। अतः इसमें प्रतिशत त्रुटि बहुत कम होती है।

(ii) यदि शन्ट का प्रतिरोध S तथा धारामापी का प्रतिरोध G हो, तो धारामापी में पूर्ण स्केल विक्षेप के लिए आवश्यक धारा ।
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(iv)
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(vi) न्यूटन का सूत्र माना कि परिमित आकार की कोई वस्तु 00′ एक पतले उत्तल लेन्स की मुख्य अक्ष के प्रथम फोकस F’ के बायीं ओर अक्ष के लम्बवत् रखी है। 2′ से मुख्य अक्ष के समान्तर चलने वाली प्रकाश किरण लेन्स से अपवर्तन के बाद द्वितीय फोकस से जाएगी तथा प्रथम फोकस F” से जाने वाली किरण लेन्स से अपवर्तन के बाद मुख्य अक्ष के समान्तर हो जाती है। इस प्रकार 00′ का प्रतिबिम्ब II’ बनता है।
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 (b) रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल के अनुसार, इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर किन्हीं भी कक्षाओं में घूम सकते हैं जबकि बोहर मॉडल के अनुसार, इलेक्ट्रॉन केवल कुछ निश्चित त्रिज्याओं वाली कक्षाओं में ही घूम सकते हैं। रदरफोर्ड मॉडल के अनुसार, इलेक्ट्रॉन सभी आवृत्तियों की तरंगें उत्सर्जित करते हैं अर्थात् स्पेक्ट्रम सतत् होता है। बोहर मॉडल के अनुसार, इलेक्ट्रॉन केवल कुछ निश्चित आवृत्तियों की ही तरंगें उत्सर्जित करते है, जिनके कारण रैखिक स्पेक्ट्रम प्राप्त होता है।

(ix)
(a) किसी विखण्डनीय पदार्थ में श्रृंखला अभिक्रिया बनाये रखने के लिए, पदार्थ का द्रव्यमान एक विशेष मान से अधिक होना चाहिए अन्यथा विखण्डन से उत्पन्न अधिकांश न्यूट्रॉन आगे विखण्डन करने से पहले ही पदार्थ से बाहर निकल जायेंगे तथा अभिक्रिया बन्द हो जायेगी। अतः वह न्यूनतम द्रव्यमान जिससे कम पर श्रृंखला अभिक्रिया सम्भव नहीं है, क्रान्तिक द्रव्यमान कहलाता है।
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उत्तर 5
(i) गॉस प्रमेय किसी बन्द पृष्ठ से गुजरने वाले वैद्युत फ्लक्स  φEहै, उस पृष्ठ । द्वारा परिबद्ध कुल आवेश q का 1/ε0 गुना होता है।अर्थात् φE= q / ε0

माना R त्रिज्या के गोलीय कोश की सतह पर q आवेश समान रूप से वितरित है। इस गोले के केन्द्र 0 से  दूरी पर बिन्दु P पर वैद्युत क्षेत्र का । मान ज्ञात करना है।
(a) जब बिन्दु गोलीय कोश से बाहर स्थित हो (r >R) 
अब, चित्र के अनुसार O को केन्द्र मानकर त्रिज्या r के एक गॉसीय पृष्ठ की कल्पना करते हैं। इस गोलाकार। पृष्ठ को गाँसियन पृष्ठ भी कहते हैं। समान दूरी पर होने के कारण, इस 0 पृष्ठ के प्रत्येक बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र E का परिमाण तो समान होता है। परन्तु उसकी दिशा अलग-अलग एवं उस बिन्दु पर त्रिज्यीय होती हैं। बिन्दु P पर गॉसीय पृष्ठ की सतह पर एक अल्पांश क्षेत्रफल dA लेते हैं, जिसके सदिश क्षेत्रफल की दिशा भी त्रिज्य होती है।
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समी (iii) से स्पष्ट होता है कि बाह्य बिन्दु के लिए गोलीय कोश पर वितरित आवेश इस प्रकारे व्यवहार करता है जैसे कि सम्पूर्ण आवेश गोलीय कोश के केन्द्र पर स्थित हो।

(b) जब बिन्दु गोलीय कोश की सतह पर हो (r = R) जब बिन्दु गोलीय कोश की सतह पर होता है, तब उसके लिए केन्द्र से दूरी r = R होती है। अतः समी (ii) में r का मान । रखने पर
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अतः स्पष्ट है कि आवेशित गोलीय कोश के कारण वैद्युत क्षेत्रका मान उसकी सतह पर अधिकतम होता है।

(c) जब बिन्दु गोलीय कोश के अन्दर स्थित हो (r<R) माना गोलीय कोश के अन्दर उसके केन्द्र 0 से r दूरी पर । एक बिन्दु P है, जिस पर । वैद्युत क्षेत्र E का मान ज्ञात करना है। चित्र के अनुसार, 0 को केन्द्र मानकर । त्रिज्या के एक गॉ सीय पृष्ठ की कल्पना करते हैं। चूँकि इस पृष्ठ के। अन्दर आवेश का मान शून्य। होता है, अत: इस पृष्ठ के लिए गॉस के नियम से,
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UP Board Class 12 Physics Model Papers Paper 1 image 22
अतः आवेशित गोलीय कोश के अन्दर वैद्युत क्षेत्र का मान शून्य 
होता है।

(ii) प्रत्यावर्ती धारा जनित्र अथवा डायनेमो एक ऐसी वैद्युत चुम्बकीय मशीन है, जिसके द्वारा यान्त्रिक ऊर्जा को वैद्युत ऊर्जा में बदला जाता है। प्रत्यावर्ती धारा को उत्पन्न करने के लिए प्रत्यावर्ती धारा डायनेमो तथा दिष्ट धारा को उत्पन्न करने के लिए दिष्ट्र धारा डायनेमो का उपयोग होता है। सिद्धान्त जब किसी बन्द कुण्डली को चुम्बकीय क्षेत्र में तेजी से घूर्णन कराया जाता है, तो उसमें से गुजरने वाली फ्लक्स रेखाओं की संख्या ‘ में लगातार परिवर्तन होता रहता है, जिसके कारण कुण्डली में वैद्युत धारा उत्पन्न हो जाती है। कुण्डली को घुमाने में जो कार्य करना पड़ता है अर्थात् जो यान्त्रिक ऊर्जा व्यय होती है। वही कुण्डली में वैद्युत ऊर्जा के रूप में प्राप्त होती है। रचना प्रत्यावर्ती धारा जनित्र के मुख्यतः तीन भाग होते हैं।
(a) क्षेत्र चुम्बक यह एक शक्तिशाली चुम्बक N-S होता है। इसके द्वारा । 
उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की बल रेखाएँ चुम्बक के ध्रुव N से S की ओर होती है। |
(b) आर्मेचर चुम्बक के ध्रुवों के बीच में पृथक्कृत ताँबे के तारों की एक 
कुण्डली ABCD होती है, जिसे आमेचर कुण्डली कहते हैं। कुण्डली कई फेरों की होती है तथा ध्रुवों के बीच क्षैतिज अक्ष पर पानी के टरबाईन से घुमाई जाती है।
(c) सप-वलय तथा ब्रश कुण्डली के सिरों को सम्बन्ध अलग-अलग दो 
ताँबे के छल्लों से होता है, जो आपस में एक-दूसरे को स्पर्श नहीं करते। हैं और कुण्डली के साथ उसकी अक्ष पर घूमते हैं, इन्हें सर्दी-वलय । कहते हैं। इन छल्लों को दो कार्बन के ब्रुश X तथा Y स्पर्श करते रहते । हैं। ये ब्रुश स्थिर रहते हैं तथा इन छल्लों के नीचे फिसलते हुए घूमते हैं। इन ब्रुशों का सम्बन्ध उस बाह्य परिपथ से कर देते हैं, जिसमें वैद्युत धारा भेजनी होती है।
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कार्यविधि जब आमेचर कुण्डली ABCD घूमती है, तो कुण्डली में से होकर जाने वाली फ्लक्स रेखाओं की संख्या में परिवर्तन होता है। अत: कुण्डली में धारा प्रेरित हो जाती है। माना कुण्डली दक्षिणावर्त दिशा में घूम रही है तथा | किसी क्षण क्षैतिज अवस्था में है। इस क्षण कुण्डली की भुजा AB ऊपर उठ रही है तथा भुजा CD नीचे जा रही है। फ्लेमिंग के दाएँ हाथ के नियम के अनुसार, इन भुजाओं में प्रेरित धारा की दिशा वही है जो चित्र में प्रदर्शित है।
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अतः धारा ब्रश x से बाहर जा रही है अर्थात् यह धन ध्रुव है तथा बुश Y पर वापस आ रही है अर्थात् यह ब्रुश ऋण ध्रुव है। जैसे ही कुण्डली अपनी ऊध्र्वाधर स्थिति से गुजरेगी भुजा AB की ओर आने लगेगी तथा CD ऊपर की ओर जाने लगेगी। अतः अब, धारा ब्रुश Y से बाहर जायेगी तथा बुश X पर वापस आयेगी। इस प्रकार आधे चक्कर के बाद बाह्य परिपथ में धारा की दिशा बदल जायेगी। अतः परिपथ में प्रत्यावर्ती धारा उत्पन्न होगी। प्रत्यावर्ती धारा की दिष्ट धारा की तुलना में उपयोगिता वर्तमान में घरेलू व औद्योगिक कार्यों में प्रत्यावर्ती धारा का ही उपयोग होता है, क्योकि दिष्ट धारा की तुलना में इसके निम्न लाभ हैं। |

(a) प्रत्यावर्ती धारा के पावर प्लांट से किसी स्थान पर ट्रान्सफॉर्मर की। सहायता से उच्च वोल्टेज पर भेजा जा सकता है तथा वहाँ इसे पुनः निम्न वोल्टेज पर लाया जा सकता है। इस प्रकार भेजने में लागत भी कम आती है तथा ऊर्जा ह्रास भी बहुत घट जाता है। ट्रान्सफॉर्मर का उपयोग दिष्ट धारा के लिए नहीं किया जा सकता। अतः दिष्ट धारा को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने में ऊर्जा हास भी । होता है तथा कीमत भी अधिक आती है। 

(b) प्रत्यावर्ती धारा को चोक कुण्डली द्वारा बहुत कम ऊर्जा हास परनियन्त्रित किया जा सकता है, जबकि दिष्ट धारा ओमीय प्रतिरोध द्वारा ही नियन्त्रित की जा सकती है, जिसमें अत्यधिक ऊर्जा ह्रास होता है।

(c) प्रत्यावर्ती धारा वाले यन्त्र, जैसे-वैद्युत मोटर दिष्ट धारा वाले यन्त्रों की तुलना में सुदृढ़ व सुविधाजनक होते हैं।

(d) जहाँ दिष्ट धारा की आवश्यकता होती है, वहाँ दिष्टकारी द्वारा प्रत्यावर्ती धारा को सुगमता से दिष्ट धारा में बदल दिया जाता है।
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जेनर डायोड के श्रेणीक्रम में एक प्रतिरोध है, को इस प्रकार संयोजित करते हैं कि जेनर डायोड उत्क्रम अभिनत हो जाए, क्योंकि भंजन क्षेत्र में जेनर वोल्टेज नियत बनी रहती है। अतः निवेशी वोल्टता में कमी । अथवा वृद्धि होने पर जेनर वोल्टता में बिना कोई परिवर्तन हुए प्रतिरोध R, के सिरों पर संगत परिवर्तन हो जाता है। इस प्रकार जेनर डायोड । एक वोल्टेज नियन्त्रक की तरह कार्य करता है। निर्गत् वोल्टता को । नियन्त्रित रखने के लिए तथा निवेशी वोल्टता को नियन्त्रित रखने के लिए तथा निवेशी वोल्टता को दी गई परास के लिए प्रतिरोध R, का मान इस प्रकार निर्धारित करते हैं कि जेनर डायोड भंजक क्षेत्र में प्रचलित हो तथा • जेनर डायोड में बहने वाली धारा का मान एक निश्चित मान से अधिक न हो, अन्यथा डायोड जल जाएगा।

(b) परिपथ में पहला गेट NOR गेट है। इसके निर्गत् को NOT गेट की निवेशी बनाया गया है, जिसका निर्गत Y है।
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UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 12 National Renaissance and Foundation of Indian National Congress

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Chapter Chapter 12
Chapter Name National Renaissance and
Foundation of
Indian National Congress
(राष्ट्रीय जनजागरण व
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना)
Number of Questions Solved 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 12 National Renaissance and Foundation of Indian National Congress (राष्ट्रीय जनजागरण व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना)

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किसने की थी? उसके प्रारम्भिक उद्देश्य क्या थे?
उतर:
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ऐलेन ऑक्ट्रेनियन ह्यूम (ए०ओ० ह्यूम) ने सन् 1885 ई० में की थी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक उद्देश्य निम्नलिखित थे

  • साम्राज्य के भिन्न-भिन्न भागों में देश-हित के लिए लगन से काम करने वालों की आपस में घनिष्ठता तथा मित्रता बढ़ाना।
  • राष्ट्रीय एकता की भावना बढ़ाना और जाति, धर्म या प्रादेशिकता के आधार पर उपजे भेदभाव को दूर करना।
  • महत्वपूर्ण एवं आवश्यक सामाजिक प्रश्नों पर भारत के शिक्षित लोगों में चर्चा करने के बाद परिपक्व समितियाँ तथा प्रामाणिक तथ्य स्वीकार करना।
  • उन उपायों और दिशाओं का निर्णय करना, जिनके द्वारा भारत के राजनीतिज्ञ देश-हित के लिए कार्य करें। कांग्रेस का अपने प्रथम काल में प्रमुख उद्देश्य प्रशासनिक सुधारों की मांग करना था, जिसकी प्राप्ति वे संवैधानिक साधनों से करना चाहते थे।

प्रश्न 2.
कांग्रेस के संघर्ष के इतिहास को कितने कालों में विभक्त किया जाता है?
उतर:
कांग्रेस के संघर्ष के इतिहास को तीन कालों में विभक्त किया जाता है

  • प्रथम काल (उदारवादी काल) सन् 1885 से 1905 ई० तक।
  • द्वितीय काल (गरम विचारधारावादी तथा क्रान्तिकारी काल) सन् 1906 से 1919 तक।
  • तृतीय काल (राष्ट्रीयता का गाँधीवादी युग) सन् 1920 से 1947 तक।

प्रश्न 3.
शिक्षा के प्रसार ने राष्ट्रीय जनजागरण में क्या भूमिका निभाई?
उतर:
भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने में अंग्रेजी शिक्षा ने बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया। शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने तथा अंग्रेजों का शासन होने के कारण भारत के प्रत्येक कोने में अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार हुआ। इससे देश में भाषा की एकता स्थापित हो गई तथा इसके परिणामस्वरूप विभिन्न प्रान्तों के प्रबुद्ध लोगों को आपस में (अंग्रेजी भाषा के माध्यम से) विचारविमर्श करने में सहायता मिली। इस प्रकार अनजाने में अंग्रेजी शासन की शिक्षा नीति से भारतीयों को भाषायी बन्धनों से मुक्त होकर एकता की भावना को प्रचारित व प्रसारित करने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्हें इस कटु सत्य का आभास हुआ कि उनके आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक शोषण का जिम्मेदार ब्रिटिश शासन ही है। इस राष्ट्रीय चेतना के फलस्वरूप ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म हुआ।

अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार ने राष्ट्रीय जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वामी विवेकानन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर, राजा राममोहन राय, विपिनचन्द्र पाल, चितरंजन दास, लाला लाजपतराय आदि ने पाश्चात्य शिक्षा ग्रहण कर उनकी सभ्यता एवं संस्कृति का ज्ञान अर्जित किया और राष्ट्रीय आन्दोलन में अहम योगदान दिया।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में राष्ट्रीय जनजागरण व उसके कारणों को सविस्तार उल्लेख कीजिए।
उतर:
भारत में राष्ट्रीय जनजागरण- भारत में अंग्रेजी राज्य के दौरान देशी शिक्षा, संस्कृति पर हुए प्रहार के कारण अनेक धार्मिक व सामाजिक सुधार आन्दोलन हुए। परम्परागत रूढ़िवादी संकीर्ण विचारों वाले वर्ग के अतिरिक्त अंग्रेजी शिक्षक के फलस्वरूप एक नए प्रबुद्ध वर्ग का भी उदय हुआ, जिसने सदियों से चलती आ रही रूढ़िवादी विचारधारा को बदलने का प्रयास किया।

नए शिक्षित समाज और उसके पश्चिमी प्रभाव वाले विचारों के फलस्वरूप भारत में राष्ट्रीय जागरण का सूत्रपात हुआ और भारतीयों में एक नवचेतना ने जन्म ले लिया। इस राष्ट्रीय जागरण ने राष्ट्र में एकता का संचार किया। उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में हुए धार्मिक व सामाजिक आन्दोलन ने उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में नई राजनीतिक चेतना का प्रसार कर दिया। पाश्चात्य शिक्षा ने भारतीयों में एक नई चेतना को पल्लवित कर दिया। अतः भारतीय अंग्रेजी शासन से मुक्ति पाने हेतु संघर्षरत हो गए। भारत में राष्ट्रीय जागरण की शुरूआत कुछ हद तक उपनिवेशवादी नीतियों के कारण ही हुई।

अंग्रेजी गवर्नर जनरलों के राष्ट्र में सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक सुधारों ने भारतीयों में एक बौद्धिक चेतना की नींव रख दी। उन्होंने अंग्रेजों के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण न अपनाते हुए उन्हें देश से बाहर करने का प्रयत्न आरम्भ कर दिया। इन सब गतिविधियों के कारण भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन का मार्ग प्रशस्त हुआ। 1885 ई० तक यह राष्ट्रीय आन्दोलन उग्र हो गया और भारतीयों ने अपनी माँगों को स्वीकृत कराने हेतु ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपनी गतिविधियों को तीव्र कर दिया। दिन-प्रतिदिन इस आन्दोलन ने एक नया रूप लेना आरम्भ कर दिया और एक राजनीतिक संगठन की उत्पत्ति हुई।

इस राष्ट्रीय जागरण का प्रथम श्रेय राजा राममोहन राय को जाता है, जिन्होंने युवा पीढ़ी को एकत्र किया तथा उन्हें एक नवीन भावना से भर दिया। उन्होंने उन्हें बताया कि हम पाश्चात्य शिक्षा का अनुसरण करके भी अपने देश, धर्म व समाज की रक्षा कर सकते हैं। राजा राममोहन राय के बाद तो अनेक समाज सुधारकों ने देश में नवीन विचारधाराओं की बाढ़-सी ला दी। भारतीयों का पुनरुत्थान हुआ तथा राष्ट्रीयता की भावना जागृत हो गई। उन्होंने समाज में फैली रूढ़िवादी परम्पराओं को विनष्ट कर दिया तथा व्याप्त कुरीतियों को काफी हद तक दूर करने का प्रयास किया। उनका अनुगमन करके नई पीढ़ी उत्साह से परिपूर्ण हो गई और उन्होंने स्वाधीनता के आन्दोलनों में अपना महत्वपूर्ण योगदान देना आरम्भ कर दिया।

राष्ट्रीय जनजागरण के कारण- भारतीय राष्ट्रीय जागरण एक ऐतिहासिक परम्परा का पुनरागमन तथा जनता की आत्मा की जागृति का प्रतिबिम्ब था। भारतीयों में यह नवीन चेतना अनेक कारणों से उत्पन्न हुई। इनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

(i) धार्मिक व सामाजिक पुनर्जागरण- 19वीं शताब्दी में हुए धर्म एवं समाज सुधार आन्दोलनों ने राष्ट्रीय जागरण के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सुधार आन्दोलन के प्रणेताओं में राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, विवेकानन्द आदि ने भारतीयों के हृदय में देशभक्ति तथा स्वतन्त्रता की भावना का संचार किया। राजा राममोहन राय ने भारतीयों को तत्कालीन समाज में फैली कुरीतियों से अवगत कराया तथा उन्हें त्यागने के लिए प्रेरित किया। राजा राममोहन राय ने विलियम बैंटिंक के सहयोग से 1829 ई० में सती प्रथा के विरुद्ध कानून पारित करवाया। दयानन्द सरस्वती ने कहा है कि ‘जो स्वदेशी राज्य होता है यह सर्वोपरि उत्तम होता है’, ‘भारत भारतीयों के लिए है। विवेकानन्द के अनुसार, “हमारे देश को दृढ़ इच्छा वाले ऐसे लौह-पुरुषों की आवश्यकता है, जिनका प्रतिरोध नहीं किया जा सके।” एनी बेसेण्ट ने “स्वतन्त्र व्यक्ति द्वारा ही स्वतन्त्र देश का निर्माण किया जा सकता है’ आदि नारों का उद्घोष कर लोगों में राष्ट्रीय जागरण की भावना का विकास किया।

(ii) राजनीतिक एकता की स्थापना- ब्रिटिश शासन की स्थापना के पूर्व भारत अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था। अतः भारतीयों में राष्ट्रीय एकता का अभाव था। अंग्रेजों ने साम्राज्यवाद की नीति का अनुसरण कर भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार किया। इस नीति से सम्पूर्ण भारत एक शासन-सूत्र में आबद्ध हो गया। एक राज्य की जनता दूसरे राज्य की जनता के निकट आई व उनमें राष्ट्रीयता का भाव जागृत हुआ। अंग्रेजों को जब तक यह ज्ञात हुआ कि उनकी साम्राज्यवादी नीति उनका ही अहित कर रही है तब तक भारतीय संगठित हो चुके थे तथा उनमें राष्ट्रीय जागरण की भावना का संचार हो चुका था।

(iii) साहित्यिक प्रभाव- साहित्य व समाचार-पत्रों ने भी राष्ट्रीय जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रारम्भ में सभी समाचार-पत्र अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होते थे परन्तु कुछ तत्कालीन बुद्धिजीवियों के कठिन प्रयत्न से समाचार-पत्रों का प्रकाशन हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में भी होना प्रारम्भ हो गया। इन समाचार-पत्रों में पायनिर, पेट्रीयाट, इंडियन मिरर, बंगदूत, दि पंजाबी, दि केसरी व अमृत बाजार पत्रिका आदि प्रमुख थे। इन समाचार-पत्रों में राष्ट्रीय प्रेम, राष्ट्रीय स्वतन्त्रता की भावना से ओत-प्रोत लेख, कविताएँ और भावोत्पादक भाषण व उपदेश प्रकाशित होते थे। इन समाचार-पत्रों का मूल्य बहुत कम रखा जाता था, जिससे अधिक से अधिक लोग उसे पढ़ सकें। इन समाचार-पत्रों ने साधारण जनता को जागृत करने में विशेष सहयोग किया।

(iv) लॉर्ड लिटन की प्रतिक्रियावादी नीतियाँ- लॉर्ड लिटन की तात्कालिक नीतियों ने भी राष्ट्रभावना जगाने का कार्य किया। भारतीय नागरिक सेवा की उम्र घटाने का कार्य भारतीय युवाओं को ठेस पहुँचाने का कार्य था। 1877 ई० में भीषण अकाल के समय दिल्ली में एक भव्यशाली दरबार लगाकर लाखों रुपया नष्ट करना एक ऐसा कार्य था जिस पर एक कलकत्ता (कोलकाता) के समाचार-पत्र ने कहा था, “नीरों बंशी बजा रहा था। उसने दो अन्य अधिनियम, भारतीय भाषा समाचार-पत्र अधिनियम तथा भारतीय शस्त्र अधिनियम भी पारित किए जिससे कटुता और भी बढ़ गई। फलस्वरूप भारत में अनेक राजनीतिक संस्थाएँ बनीं ताकि सरकार विरोधी आन्दोलन चला सकें।

(v) आर्थिक असन्तोष- अंग्रेजों ने भारतीयों के प्रति आर्थिक शोषण की नीति का अनुसरण किया। उन्होंने भारतीयों के उद्योग-धन्धों को प्रायः नष्ट कर दिया। लॉर्ड लिटन के शासनकाल में आयात कर समाप्त कर मुक्त व्यापार की नीति अपनाई गई। इस नीति के पीछे अंग्रेजों का एकमात्र उद्देश्य ब्रिटिश आयात को बढ़ावा देना तथा भारतीय व्यापार को नष्ट करना था। अंग्रेजों को अपने इस उद्देश्य में सफलता मिली तथा भारतीय व्यापार नष्ट होने लगा। अनेक उद्योग-धन्धे नष्ट हो गए। ऐसी स्थिति में बेरोजगार व्यक्तियों ने कृषि को उद्योगों के रूप में अपनाना चाहा लेकिन अंग्रेजों ने कृषि की उन्नति की ओर भी ध्यान नहीं दिया, जिससे भारतीय कृषक और कृषि, दोनों की दशा शोचनीय हो गई। भारतीय जनता में दरिद्रता बढ़ने लगी। भारतीयों में फैले इस आर्थिक असन्तोष ने उनमें राष्ट्रीय जागरण की भावना का संचार किया।

(vi) विभिन्न देशों से प्रेरणा- भारतीय शिक्षित वर्ग पर विश्व के अन्य देशों में हुए स्वतन्त्रता आन्दोलनों का भी व्यापक प्रभाव हुआ। भारतीयों ने देखा व पढ़ा कि किस प्रकार जर्मनी व इटली जैसे देशों की जनता ने अथक प्रयत्नों से अपने-अपने देश का एकीकरण किया। इसके साथ ही अमेरिका ने जिन परिस्थितियों में स्वतन्त्रता प्राप्त की थी, उससे भारतीयों को भी अपने अधिकारों व देश के प्रति जागृत होने की प्रेरणा मिली। फ्रांस की क्रान्तियों ने भी भारतीयों को प्रभावित किया तथा धीरे-धीरे भारत में भी राष्ट्रवाद की भावना पनपने लगी। इस सम्बन्ध में डॉ० मजूमदार ने ठीक ही लिखा है, “विदेशों में स्वतन्त्रता प्राप्ति की घटनाओं ने भारतीय राष्ट्रवादी धारा को स्वाभाविक रूप से प्रभावित किया।”

(vii) शिक्षित भारतीयों में असन्तोष की भावना- अंग्रेजों की विभिन्न पक्षपाती एवं दोषयुक्त नीतियों के कारण शिक्षित भारतीयों में असन्तोष की भावना व्याप्त हो गई थी। भारतीय नागरिक सेवा की परीक्षा केवल इंग्लैण्ड में ही आयोजित की जाती थी। बिना किसी ठोस कारण के भारतीयों को भारतीय नागरिक सेवा की नौकरी से निकाल दिया जाता था। अंग्रेजों ने भारतीय नागरिक सेवा में प्रवेश की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी थी। अंग्रेजों की इन नीतियों से भारतीयों में असन्तोष की भावना फैल गई। क्योंकि इसका स्पष्ट उद्देश्य भारतीयों को नागरिक सेवा से दूर रखना था। इस सम्बन्ध में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का कथन है कि अंग्रेजों का यह कार्य भारतीय विद्यार्थियों को भारतीय नागरिक सेवा से वंचित रखने की एक चाल है।

सुरेन्द्रनाथ के इस वक्तव्य का भारतीयों पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा। अत: जब 1877 ई० में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने भारत के विभिन्न स्थानों-आगरा, दिल्ली, अलीगढ़, मेरठ, कानपुर, लखनऊ, लाहौर, इलाहाबाद, वाराणसी, अमृतसर, पूना, मद्रास (चेन्नई) आदि का भ्रमण किया और शिक्षित भारतीयों को अंग्रेजों के षड्यन्त्रकारी उद्देश्य से अवगत कराया तो विभिन्न जाति एवं धर्म के लोग अंग्रेजों के विरुद्ध संगठित होने लगे। अब शिक्षित भारतीयों में राष्ट्रीय जागरण की भावना का व्यापक संचार हुआ।

(viii) तीव्र परिवहन तथा संचार साधनों का विकास- अंग्रेजों ने परिवहन एवं संचार साधनों का व्यापक पैमाने पर विकास किया। भारत के विशाल भाग में रेल लाइनें बिछाई गईं। यद्यपि अंग्रेजों ने यह सब अपने लाभ के लिए किया था, किन्तु इन साधनों ने भारतीयों को एक-दूसरे के काफी नजदीक ला दिया, परिणामस्वरूप राष्ट्रीय जागरण की भावना में द्रुतगति से विकास हुआ।

(ix) अंग्रेजों की जाति-सम्बन्धी भेदभाव की नीति- अंग्रेजों ने जाति के सम्बन्ध में भेदभाव की नीति अपनाई। उन्होंने महत्वपूर्ण पदों पर अंग्रेजों की नियुक्ति की तथा भारतीयों को इन पदों से दूर रखा। रेल में प्रथम श्रेणी के डिब्बों में भारतीयों की यात्रा करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। प्रथम श्रेणी के डिब्बे में केवल अंग्रेज ही यात्रा कर सकते थे। अगर प्रथम श्रेणी के डिब्बे में कोई भारतीय चढ़ भी जाता था, तो अंग्रेज यात्रियों द्वारा उसके साथ बेहद अपमानजनक व्यवहार किया जाता था। साथ ही उसे रेल के डिब्बे से उतार दिया जाता था। दरबार तथा उत्सवों में एक निश्चित सीमा तक ही भारतीय जूते पहन सकते थे, जबकि अंग्रेज जूते पहनकर कहीं भी आ-जा सकते थे। अंग्रेजों की इस भेदभावपूर्ण नीति से भारतीयों के आत्मसम्मान को काफी ठेस पहुंची थी। अत: वे अंग्रेजों के विरुद्ध हो गए और उनमें राष्ट्रीयता की भावना जागृत हुई जिसने एक राष्ट्रीय जनजागरण को जन्म दिया।

(x) धर्म तथा समाज सुधार आन्दोलन- उन्नीसवीं शताब्दी में पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव के फलस्वरूप भारत में नवजागरण हुआ। इस नवजागरण के अग्रदूतों राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द आदि ने भारतीय समाज व हिन्दू धर्म की कुरीतियों तथा अन्धविश्वासों को दूर करने के लिए आन्दोलन चलाया। भारतीय समाज और हिन्दू धर्म के दोष (जाति प्रथा, छुआछूत, बाल विवाह, सती प्रथा, अन्धविश्वास, मूर्तिपूजा, रूढ़िवादिता आदि), ब्रिटिश शासन का प्रभाव (लॉर्ड विलियम बैंटिंक द्वारा सती प्रथा का उन्मूलन), अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव, पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति का प्रभाव, ईसाई धर्म के प्रचार का प्रभाव, वैज्ञानिक तथा परिवहन के साधनों के आविष्कारों (रेल, तार, टेलीफोन, डाक आदि का प्रभाव) तथा राष्ट्रीय चेतना के विकास ने देश में धर्म व सुधार आन्दोलनों का वातावरण तैयार कर दिया।

(xi) पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार- ब्रिटिश साम्राज्य स्थापित होने के पश्चात् अंग्रेजों ने भारत में अपनी शिक्षा का प्रसार करना प्रारम्भ कर दिया। लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार-प्रसार के पीछे यह तर्क दिया था कि पाश्चात्य शिक्षा व संस्कृति के प्रचार से भारतीयों को गुलाम बनाया जा सकता है, शारीरिक बल प्रयोग से नहीं। मैकाले ने इसी उद्देश्य को दृष्टिगत रखते हुए अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार किया। उसे अपने उद्देश्य में सफलता भी मिली, परन्तु अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार ने राष्ट्रीय जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वामी विवेकानन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर, राजा राममोहन राय, विपिनचन्द्र पाल, चितरंजन दास, लाला लाजपतराय आदि ने पाश्चात्य शिक्षा ग्रहण कर उनकी सभ्यता एवं संस्कृति का ज्ञान अर्जित किया और राष्ट्रीय आन्दोलन में अहम योगदान दिया। भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने में अंग्रेजी शिक्षा ने बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया।

शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने तथा अंग्रेजों का शासन होने के कारण भारत के प्रत्येक कोने में अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार हुआ। इससे देश में भाषा की एकता स्थापित हो गई तथा इसके परिणामस्वरूप विभिन्न प्रान्तों के प्रबुद्ध लोगों को आपस में (अंग्रेजी भाषा के माध्यम से) विचार-विमर्श करने में सहायता मिली। इस प्रकार अनजाने में अंग्रेजी शासन की शिक्षा नीति से भारतीयों को भाषायी बन्धनों से मुक्त होकर एकता की भावना को प्रचारित व प्रसारित करने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्हें इस कटु सत्य का आभास हुआ कि उनके आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक शोषण का जिम्मेदार ब्रिटिश शासन ही है। इस राष्ट्रीय चेतना के फलस्वरूप ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म हुआ।

प्रश्न 2.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
उतर:
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 ई० में हुई थी। इसने 1885 ई० से 1947 ई० तक भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष किया। समय और परिस्थितियों के अनुसार इसके लक्ष्यों अथवा उद्देश्यों तथा साधनों में अन्तर होता चला गया। इसी के आधार पर कांग्रेस के इतिहास को निम्नलिखित तीन कालों में विभक्त किया जा सकता है

  • प्रथम काल (उदारवादी काल) सन् 1885 से 1905 ई० तक।
  • द्वितीय काल (गरम विचारधारावादी तथा क्रान्तिकारी काल) सन् 1906 से 1919 ई० तक।
  • तृतीय काल (राष्ट्रीयता का गाँधीवादी युग) सन् 1920 से 1947 ई० तक।

कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन 28 दिसम्बर, 1885 ई० के दिन 11 बजे गोकुलदास तेजपाल संस्कृत पाठशाला’ बम्बई में हुआ। इस अधिवेशन में 72 प्रतिनिधि थे। इस प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष कलकत्ता के प्रसिद्ध बैरिस्टर व्योमेशचन्द्र बनर्जी थे। इन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में कांग्रेस के निम्नलिखित उद्देश्यों का उल्लेख किया था

  1. साम्राज्य के विभिन्न भागों में देश-हित के लिए लगन से काम करने वालों में आपस में घनिष्ठता एवं मित्रता को बढ़ाना।
  2. सभी देश-प्रेमियों के हृदय में प्रत्यक्ष मैत्रीपूर्ण व्यवहार के द्वारा वंश, धर्म और प्रान्त सम्बन्धी सभी पहले के संस्कारों को मिटाना और राष्ट्रीय एकता की सभी भावनाओं का पोषण एवं परिवर्द्धन करना।
  3. महत्त्वपूर्ण एवं आवश्यक सामाजिक प्रश्नों के सम्बन्ध में भारत में शिक्षित लोगों में अच्छी तरह चर्चा के पश्चात् परिपक्व सम्मतियों का प्रामाणिक संग्रह करना।
  4. उन तरीकों और दिशाओं का निर्णय करना, जिनके द्वारा भारत के राजनीतिज्ञ देशहित में कार्य करें। कांग्रेस का अपने प्रथम काल में प्रमुख प्रशासनिक सुधारों की माँग करना था तथा इस उद्देश्य की प्राप्ति वे संवैधानिक साधनों द्वारा करना चाहते थे। इस काल में कांग्रेस के सभी नेताओं का विश्वास ब्रिटिश सरकार की ईमानदारी तथा न्यायप्रियता में था।

प्रश्न 3.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रारम्भिक स्वरूप कैसा था?
उतर:
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना सरकार के अवकाश प्राप्त अधिकारी ए०ओ० ह्यूम ने की थी। ह्यूम ने इसकी स्थापना का स्पष्टीकरण देते हुए बताया था कि पश्चिमी विचारों, शिक्षा, आविष्कारों और यन्त्रों से उत्पन्न हुई उत्तेजना को यहाँ-वहाँ फैलने की बजाय संवैधानिक ढंग से प्रचार करने के लिए यह कदम आवश्यक था। छूम महोदय जानते थे कि भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध घोर असन्तोष है और इस असन्तोष का भयंकर विस्फोट हो सकता है। अत: ह्यूम भारतीयों की क्रान्तिकारी भावनाओं को वैधानिक प्रवाह में परिणित करने के लिए अखिल भारतीय संगठन की स्थापना करना चाहता था। किन्तु लाला लाजपतराय ने कांग्रेस की स्थापना के बारे में लिखा है, “कांग्रेस की स्थापना का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य को खतरे से बचाना था, भारत की राजनीतिक स्वतन्त्रता के लिए प्रयास करना नहीं, ब्रिटिश साम्राज्य का हित प्रमुख था और भारत का गौण।”

आधुनिक अनुसन्धानों ने यह सिद्ध कर दिया कि ह्यूम एक जागरूक साम्राज्यवादी था। वह शासक और शासित वर्ग के बीच बढ़ती हुई खाई से चिन्तित था। कांग्रेस की स्थापना का दूसरा पहलू यह भी है कि उस समय की राष्ट्रव्यापी हलचलें, देशभक्ति की भावना, विभिन्न वर्गों में व्याप्त बेचैनी, ब्रिटेन की लिबरल पार्टी से भारतीयों को निराशा और विभिन्न राजनीतिक संगठनों ने इसकी भूमिका तैयार करने में योगदान दिया। कुछ विद्वानों का अभिमत है कि कांग्रेस की स्थापना का उद्देश्य गुप्त योजना था, किन्तु कांग्रेस की पृष्ठभूमि के आधार पर यह तर्कपूर्ण मत नहीं है।

कांग्रेस की स्थापना में ह्यूम को लॉर्ड रिपन और लॉर्ड डफरिन का भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त था। डफरिन अथवा रिपन के उद्देश्य जो भी कुछ रहे हों, यह स्वीकार करना ही पड़ेगा कि छूम महोदय एक सच्चे उदारवादी थे और वे एक राजनीतिक संगठन की आवश्यकता तथा वांछनीयता अनुभव करते थे। उन्होंने एक खुला पत्र कलकत्ता (कोलकाता) विश्वविद्यालय के स्नातकों को लिखा। इसमें उन्होंने लिखा था, “बिखरे हुए व्यक्ति कितने ही बुद्धिमान तथा अच्छे आशय वाले क्यों न हों, अकेले तो शक्तिहीन ही होते हैं। आवश्यकता है संघ की, संगठन की और कार्यवाही के लिए एक निश्चित और स्पष्ट प्रणाली की।” ह्यूम ने इण्डियन नेशनल कांग्रेस के लिए सरकारी तथा गैर-सरकारी व्यक्तियों की सहानुभूति तथा सहायता प्राप्त कर ली। इस प्रकार यह इंग्लैण्ड तथा भारत के सम्मिलित मस्तिष्क की उपज थी।

प्रथम अधिवेशन में देश के विभिन्न भागों से आए हुए 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिसमें सभी जातियों, सम्प्रदायों और वर्गों का प्रतिनिधित्व था। कुछ समय पश्चात् ही सरकार से कांग्रेस का टकराव हो गया और लॉर्ड डफरिन ने कांग्रेस को ‘पागलों की सभा’, ‘बाबुओं की संसद’, ‘बचकाना’ कहना प्रारम्भ किया। कर्जन (1899-1905 ई०) ने कांग्रेस की आलोचना करते हुए लिखा है कि “मेरा यह अपना विश्वास है कि कांग्रेस लड़खड़ाती हुई पतन की ओर जा रही है और एक महान् आकांक्षा यह है। कि भारत में रहते समय उसकी शान्तिमय मौत में मैं सहायता दे सकें।” हालाँकि कांग्रेस की स्थापना साम्राज्य के लिए रक्षा नली (Safety valve) के रूप में हुई थी, किन्तु जल्दी ही इसकी राजभक्ति राजद्रोह में बदल गई। समाज सुधार के नाम पर यह राजनीति माँगों को लेकर आगे बढ़ी और इसका परिणाम देश की आजादी के रूप में हुआ।

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UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 8 Distribution: Meaning and Theory

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 8 Distribution: Meaning and Theory (वितरण : अर्थ और सिद्धान्त) are part of UP Board Solutions for Class 12 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 8 Distribution: Meaning and Theory (वितरण : अर्थ और सिद्धान्त).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Economics
Chapter Chapter 8
Chapter Name Distribution: Meaning and Theory (वितरण : अर्थ और सिद्धान्त)
Number of Questions Solved 29
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 8 Distribution: Meaning and Theory (वितरण : अर्थ और सिद्धान्त)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
वितरण से आप क्या समझते हैं ? वितरण की समस्याएँ समझाइए।
उत्तर:
वितरण का अर्थ एवं परिभाषाएँ-उत्पादन के विभिन्न उपादानों में संयुक्त उपज को बाँटने की क्रिया को वितरण कहते हैं।
वितरण की परिभाषा विभिन्न विद्वानों ने निम्नलिखित प्रकार से की है

प्रो० चैपमैन के अनुसार, “वितरण का अर्थशास्त्र इस प्रकार की व्याख्या करता है कि समाज द्वारा उत्पन्न की गयी आय का, उन साधनों में अथवा साधनों के मालिकों में जिन्होंने उत्पादन में भाग लिया, किस प्रकार का बँटवारा होता है।”
प्रो० निकोलस के अनुसार, “आर्थिक दृष्टि से वितरण राष्ट्रीय सम्पत्ति को विभिन्न वर्गों में बाँटने की क्रिया की ओर संकेत करता है।”
प्रो० विक्स्टीड के शब्दों में, “अर्थशास्त्र में हम वितरण के अन्तर्गत उन सिद्धान्तों का अध्ययन करते हैं जिनके अनुसार किसी विशेष औद्योगिक संगठन की संयुक्त उत्पत्ति व्यक्तियों में बाँटी जाती है। जो उसे प्राप्त करने में सहायक होते हैं।”
संक्षेप में, वितरण के अन्तर्गत उन नियमों व सिद्धान्तों का अध्ययन किया जाता है जिनके द्वारा सामूहिक उत्पादन व राष्ट्रीय लाभांश को उत्पादन के उपादानों में बाँटा जाता है अर्थात राष्ट्रीय लाभांश को उपादानों में बाँटने की क्रिया को वितरण कहते हैं।”

वितरण की समस्या
आधुनिक औद्योगिक युग में उत्पादन प्रक्रिया जटिल होती जा रही है। आज प्रतिस्पर्धा के युग में उत्पादन बड़े पैमाने पर, श्रम-विभाजन व मशीनीकरण द्वारा सम्पादित किया जा रहा है। उत्पादन कार्य में उत्पादन के साधन-भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन व साहस-अपना सहयोग देते हैं। चूँकि उत्पादन समस्त उत्पत्ति के साधनों का प्रतिफल है; अत: यह प्रतिफल सभी उत्पत्ति के साधनों में उनके पुरस्कार के रूप में वितरित किया जाना चाहिए अर्थात् कुल उत्पादन में से श्रम को उसके पुरस्कार के रूप में दी जाने वाली मजदूरी, भूमिपति को लगान, पूँजीपति को ब्याज, संगठनकर्ता को वेतन तथा साहस को लाभ मिलना चाहिए।

अब प्रश्न यह है कि उत्पत्ति के साधनों को उनका पुरस्कार कुल उत्पादन में से किस आधार पर दिया जाए, यह वितरण की केन्द्रीय समस्या है। आज उत्पत्ति के विभिन्न उपादानों में २ष्ट्रीय उत्पादन में से अधिक पुरस्कार प्राप्त करने के लिए एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हो गयी है। कि राष्ट्रीय उत्पादन (लाभांश) में से कौन अधिक भाग प्राप्त करे ? यही प्रतिस्पर्धा वितरण की समस्या बन जाती है। इस कारण वितरण की समस्या बड़े पैमाने के सामूहिक उत्पादन के कारण उत्पन्न हुई है। यदि एक ही व्यक्ति उत्पादन के सभी साधनों का स्वामी होता तो वितरण की समस्या उत्पन्न ही नहीं होती, क्योंकि वही व्यक्ति समस्त उत्पादन का अधिकारी होता। वितरण की समस्या उत्पन्न होने के निम्नलिखित कारण हैं

  1.  सामूहिक उत्पादन के कारण उत्पादन के सभी उपादानों के सहयोग का अलग-अलग मूल्यांकन करना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। इस कारण वितरण की समस्या उत्पन्न होती है।
  2.  उत्पादन के उपादानों के स्वामी अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास करते हैं तथा प्रत्येक अपने सहयोग के लिए अधिक-से-अधिक भाग प्राप्त करने के लिए संघर्ष करता है।
  3. वितरण की समस्या को बढ़ाने में राजनीतिक व आर्थिक विचारधाराओं ने भी अपना पूर्ण सहयोग दिया है। पूँजीवादी विचारधारा के समर्थक राष्ट्रीय उत्पादन में से पूँजीपतियों के अधिक भाग का समर्थन करते हैं। दूसरी ओर साम्यवादी व समाजवादी विचारधारा में उत्पादन प्रक्रिया में श्रमिक केन्द्रीय धुरी होता है। अतः श्रमिकों को राष्ट्रीय लाभांश में से अधिक भाग मिलना चाहिए। इस कारण वितरण की समस्या विवादास्पद बन जाती है।

वितरण के समय कौन-कौन सी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं?
वितरण की निम्नलिखित प्रमुख समस्याएँ हैं

  1. वितरण किसका होता है या किसका होना चाहिए ?
  2. वितरण किस-किसके मध्य होता है या किस-किसके मध्य होना चाहिए ?
  3.  वितरण का क्रम क्या रहता है या क्या होना चाहिए ?
  4.  वितरण में प्रत्येक उत्पादन के उपादान का भाग किस प्रकार निर्धारित किया जाता है या किया जाना चाहिए ?

1. वितरण किसका होता है या किसका होना चाहिए ? – वितरण में सर्वप्रथम यह समस्या उत्पन्न होती है कि वितरण कुल उत्पादन का किया जाए या शुद्ध उत्पादन का। वितरण कुल उत्पादन गाता, वरन् कुले उत्पादन में से अचल सम्पत्ति पर ह्रास व्यय, चल पूंजी का प्रतिस्थापन व्यय, करों के भुगतान का व्यय तथा बीमे की प्रीमियम आदि व्यय को घटाने के पश्चात् जो वास्तविक या शुद्ध उत्पादन बचता है उसका वितरण किया जाता है। फर्म की दृष्टि से भी वास्तविक या शुद्ध उत्पत्ति का ही वितरण हो सकता है, कुल उत्पत्ति का नहीं अर्थात् कुल उत्पत्ति में से चल पूँजी के प्रतिस्थापन व्यय, अचल पूँजी के ह्रास, मरम्मत और प्रतिस्थापन व्यय, सरकारी कर तथा बीमा प्रीमियम निकाल देने के बाद जो शेष बचता है उसे वास्तविक उत्पत्ति (Net Produce) कहते हैं। यह वास्तविक उत्पत्ति ही उत्पत्ति के साधनों के बीच बाँटी जानी चाहिए। राष्ट्र की दृष्टि से राष्ट्रीय आय अथवा राष्ट्रीय लाभांश (National Dividend) का वितरण उत्पत्ति के समस्त साधनों में होता है।

2. वितरण किस-किसके मध्य होता है या किस – किसके मध्य होना चाहिए ? – दूसरी महत्त्वपूर्ण समस्या यह है कि वितरण किस-किसके मध्य होना चाहिए ? इस समस्या का समाधान सरल है-उत्पादन में उत्पत्ति के जिन उपादानों (भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन और साहस) ने सहयोग किया है, शुद्ध उत्पादन का विभाजन या वितरण उन्हीं को किया जाना चाहिए। उत्पादन के उपादानों (भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन एवं साहस) के स्वामी क्रमशः भूमिपति, श्रमिक, पूँजीपति, प्रबन्धक एवं साहसी कहलाते हैं। इन्हीं को राष्ट्रीय लाभांश में से भाग मिलता है। राष्ट्रीय लाभांश में से भूमिपति को लगान, श्रमिक को मजदूरी, पूँजीपति को ब्याज, प्रबन्धकं को वेतन तथा साहसी को प्राप्त होने वाला प्रतिफल लाभ कहा जाता है। अतः वास्तविक उत्पत्ति का वितरण उत्पादन के विभिन्न उपादानों में किया जाना चाहिए।

3. वितरण का क्रम क्या रहता है या क्या होना चाहिए ? – प्रत्येक उद्यमी उत्पादन के पूर्व यह अनुमान लगाता है कि वह जिस वस्तु का उत्पादन करना चाहता है उसे उस व्यवसाय में कितनी शुद्ध उत्पत्ति प्राप्त हो सकेगी। इन अनुमानित वास्तविक उत्पत्ति में से उत्पत्ति के चार उपादानों को अनुमानित पारिश्रमिक देना पड़ेगा। जब उद्यमी उत्पादन कार्य आरम्भ करने का निश्चय कर लेता है तो वह उत्पत्ति के उपादानों के स्वामियों से उसके पुरस्कार के सम्बन्ध में सौदा तय कर लेता है और अनुबन्ध के अनुसार समय-समय पर उन्हें पारिश्रमिक देता रहता है।

समस्त उपादानों को उनका पारिश्रमिक देने के उपरान्त जो शेष बचता है, वह उसका लाभ होता है। लेकिन यह भी सम्भव है कि शुद्ध आय विभिन्न उपादानों पर व्यय की जाने वाली राशि से कम हो। ऐसी स्थिति में साहसी को हानि होगी। इस प्रकार स्पष्ट है कि साहसी को छोड़कर उत्पादन के अन्य उपादानों का पारिश्रमिक तो उत्पादन कार्य आरम्भ होने से पूर्व ही निश्चित कर उन्हें दे दिया जाता है। उद्यमी का भाग अनिश्चित रहता है। उद्यमी का यह प्रयास रहता है कि उसे अपने व्यवसाय में हानि न हो। इस कारण वह उत्पत्ति के अन्य साधनों को पारिश्रमिक कम-से-कम देने का प्रयास करता है। उत्पादन के अन्य उपादानों का अनुमान ऐसा रहता है। कि उद्यमी उनका शोषण करके अधिक लाभ अर्जित करने का प्रयास कर रहा है। इस कारण वितरण की समस्या उत्पन्न हो जाती है। अत: उत्पादन के उपादानों को लाभ में सहभागिता प्राप्त होनी चाहिए।

4. वितरण में प्रत्येक उत्पादन के उपादान का भाग किस प्रकार निर्धारित किया जाता है। या किया जाना चाहिए ? – संयुक्त उत्पादन में से प्रत्येक उपादान का भाग किस आधार पर निश्चित किया जाए, इस सम्बन्ध में अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग विचार प्रस्तुत किये हैं। प्रो० एडम स्मिथ तथा रिका ने ‘वितरण का परम्परावादी सिद्धान्त’ दिया है जिसके अनुसार, राष्ट्रीय आय में से सर्वप्रथम भूमि का पुरस्कार अर्थात् लगान दिया जाए, उसके बाद श्रमिकों की मजदूरी, अन्त में जो शेष बचता है वह पूँजीपतियों को ब्याज व साहसी को लाभ के रूप में दिया जाना चाहिए। रिका के अनुसार, लगान का निर्धारण सीमान्त व अधिसीमान्त भूमि के उत्पादन के द्वारा निर्धारित होना चाहिए तथा मजदूरों को ‘मजदूरी कोष’ (Wage Fund) से पुरस्कार प्राप्त होना चाहिए। जे० बी० क्लार्क, विक्स्टीड एवं वालरस ने वितरण के सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है।

इनके अनुसार, “किसी साधन का पुरस्कार अथवा उसकी कीमत उसकी सीमान्त उत्पादकता द्वारा निर्धारित होती है अर्थात् एक साधन का पुरस्कार उसकी सीमान्त उत्पादकता के बराबर होता है। सीमान्त उत्पादकता को ज्ञात करना एक दुष्कर कार्य है। वितरण का आधुनिक सिद्धान्त माँग व पूर्ति का सिद्धान्त है। इसके अनुसार संयुक्त उत्पत्ति में उत्पत्ति के किसी उपादान का भाग उस उपादान की माँग और पूर्ति की शक्तियों के अनुसार उस स्थान पर निर्धारित होता है जहाँ पर उपादान की माँग और पूर्ति दोनों ही बराबर होते हैं। उपर्युक्त इन चारों सिद्धान्तों के द्वारा वितरण की समस्या को हल करने का प्रयास किया गया है।

प्रश्न 2
वितरण के सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। [2015, 16]
या
वितरण का सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त क्या है? इसकी मान्यताएँ लिखिए। [2006, 07]
या
वितरण के सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। [2011, 14, 16]
या
सीमान्त उत्पादकता से आप क्या समझते हैं? वितरण के सीमान्त उत्पादन सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। [2013]
उत्तर:
वितरण का सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त – इस सिद्धान्त को प्रतिपादित करने वाले प्रमुख अर्थशास्त्री जे० बी० क्लार्क, विक्स्टीड, वालरस, श्रीमती जॉन रॉबिन्सन और हिक्स हैं। इनके अनुसार, उत्पादन के किसी साधन की कीमत उसको उत्पादकता पर निर्भर करती है। उद्यमी को छोड़कर उत्पादन के अन्य उपादानों को पारिश्रमिक उनकी सीमान्त उत्पादिता के आधार पर निश्चित किया जाता है। सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त के अनुसार, “किसी साधन का पुरस्कार अर्थात उसकी कीमत उसकी सीमान्त उत्पादकता द्वारा निर्धारित होती है।”

सीमान्त उत्पादकता क्या है ? – उपादान की एक इकाई में कमी या वृद्धि करने से कुल उत्पादन में जो कमी या वृद्धि होती है, उसे साधन की सीमान्त उत्पादिता कहते हैं। सीमान्त उत्पादिता किसी उपादान विशेष की अन्तिम (सीमान्त) इकाई की उत्पत्ति (सीमान्त उत्पत्ति-Marginal Product) के बराबर होती है। उस साधन का पुरस्कार उसी के आधार पर निर्धारित किया जाता है।

सीमान्त उत्पादकता; साधन की एक अतिरिक्त इकाई को प्रयोग में लाने से कुल उत्पादन की मात्रा में हुई वृद्धि के बराबर होती है अर्थात् सीमान्त उत्पादकता उत्पादन के अन्य साधनों को स्थिर मानकर परिवर्तनशील साधन की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग करने से कुल उत्पादन में जो वृद्धि होती है, उसे उस साधन की सीमान्त उत्पादकता कहते हैं।

उत्पत्ति के साधनों की सीमान्त उत्पादकता उनकी कीमतों को निर्धारित करती है। उत्पत्ति के साधनों की माँग उनकी उत्पादिता से निर्धारित होती है। जिन साधनों की उत्पादकता अधिक होती है, उनकी माँग अधिक होती है, इसके दूसरी ओर जिन साधनों की उत्पादकता कम होती है, उनकी कीमत कम होगी।

सीमान्त उत्पादिता के आधार पर ही उत्पादन में प्रतिस्थापन का नियम (Law of Substitution) लागू होता है। प्रबन्धक तब तक उत्पत्ति के साधनों का प्रतिस्थापन करता रहता है जब तक कि प्रत्येक साधन की सीमान्त उत्पादिता उसे दिये जाने वाले पारिश्रमिक के लगभग बराबर न हो जाए। यदि किसी साधन का पारिश्रमिक सीमान्त उत्पादकता से कम होता है, तो उत्पादक उस साधन की इकाइयों को तब तक बढ़ाता जाएगा जब तक उस साधन की सीमान्त उत्पादकता कम होकर उसके पारिश्रमिक के समान नहीं हो जाती। इसके विपरीत, यदि पारिश्रमिक सीमान्त उत्पादकता से अधिक है तो उत्पादक को उस साधन के प्रयोग से हानि होगी। अत: उत्पादक उस उपादान की इकाइयों को तब तक कम रखता जाएगा जब तक कि उसकी सीमान्त उत्पादित बढ़कर पारिश्रमिक के बराबर न हो जाए। इस प्रकार सीमान्त उत्पादिता का सिद्धान्त यह बताता है कि दीर्घकाल में उत्पादन के प्रत्येक उपादान को दिया जाने वाला प्रतिफल उसकी सीमान्त उत्पादिता के बराबर होता है।

रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण
संलग्न चित्र में Ox – अक्ष पर साधन की मात्रा तथा OY-अक्ष पर सीमान्त भौतिक उत्पादकता दर्शायी गयी है। सीमान्त भौतिक उत्पादकता वक्र अंग्रेजी के उल्टे U-आकार के समान है, जिसे चित्र में MPP वक्र द्वारा दर्शाया गया है जिससे स्पष्ट होता है कि उत्पादन में उत्पत्ति के सीमान्त भौतिक नियम क्रियाशील हैं अर्थात् प्रारम्भ में उत्पादन में उत्पत्ति वृद्धि उत्पादकता वक्र या MPP नियम लागू हो रहा है, उत्पादन बढ़ रहा है तथा यह उत्पादन धीरे-धीरे अधिकतम सीमा पर पहुँचने के पश्चात् नीचे की ओर गिरने लगता है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 8 Distribution Meaning and Theory 1
चित्र में क से य बिन्दु तक उत्पादकता में वृद्धि, य बिन्दु पर उत्पादन अधिकतम और य बिन्दु के ६ पश्चात् उत्पादन में कमी होनी प्रारम्भ हो जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि उत्पत्ति वृद्धि होने पर भौतिक उत्पादकता में वृद्धि
साधन की मात्रा होती है तथा उत्पादन के उपादान के पुरस्कार में वृद्धि हो । जाती है, परन्तु ह्रास नियम लागू होने के पश्चात् पुरस्कार गिरना (घटना) प्रारम्भ हो जाता है।

सिद्धान्त की मान्यताएँ
वितरण का सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है

  1. साधन बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता पायी जाती है।
  2. साधन के द्वारा उत्पादित वस्तु के बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता पायी जाती है।
  3. साधन की प्रत्येक इकाई समान रूप से कुशल तथा विभिन्न इकाइयाँ एक-दूसरे की पूर्ण स्थापन्न (Perfect substitutes) होती हैं।
  4. अन्य साधनों की मात्रा को स्थिर रखकर एक साधन की मात्रा को घटाना-बढ़ाना सम्भव है।
  5. प्रत्येक फर्म अपने लाभ को अधिकतम करने के उद्देश्य से कार्य करती है।
  6. समाज में पूर्ण रोजगार की स्थिति पायी जाती है।
  7. क्रमागत उत्पत्ति द्वारा नियम लागू होता है।

सीमान्त भौतिक उत्पादकता
सिद्धान्त की आलोचनाएँ सीमान्त उत्पादिता सिद्धान्त की मान्यताओं के अवास्तविक होने के आधार पर उनकी कड़ी आलोचना की गयी है। इस सिद्धान्त की कुछ प्रमुख आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं

  1. उत्पादन संयुक्त प्रयत्न का परिणाम होता है। अत: उत्पत्ति में किसी उत्पादन-विशेष के योगदान को ज्ञात करना अर्थात् प्रत्येक साधन की सीमान्त उत्पादकता को ज्ञात करना कठिन होता है।
  2. सीमान्त उत्पादिता उत्पत्ति के किसी साधन के सहयोग का सही मापक नहीं है, क्योंकि उत्पादन के किसी साधन की एक इकाई की वृद्धि अथवा कमी से उसकी उत्पादिता ज्ञात नहीं की जा सकती।
  3. उत्पादन में स्नों की सभी इकाइयाँ एक-सी नहीं होतीं, उनमें भिन्नता पायी जा सकती है। वे एक-दूसरे की पूर्ण स्थानापन्न भी नहीं होती हैं।
  4. यह सिद्धान्त पूर्ण प्रतियोगिता की अवास्तविक मान्यता पर आधारित है। वास्तविक जीवन में पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति नहीं पायी जाती।
  5.  पूर्ण रोजगार की मान्यता ठीक नहीं है। उत्पत्ति के साधनों में बेरोजगारी सामान्यतया पायी जाती है। साधनों के बाजार में पूर्ण रोजगार पाये जाने के कारण एक साधन का प्रतिफल उसकी सीमान्त उत्पादकता से कम हो सकता है। ऐसी स्थिति में यह सिद्धान्त अव्यावहारिक हो जाता है।
  6. यह सिद्धान्त केवल माँग पक्ष को प्रस्तुत करता है और पूर्ति पक्ष को स्थायी मानकर चलता है। अतः यह सिद्धान्त एकपक्षीय है।
  7.  यह सिद्धान्त न्यायसंगत नहीं है, क्योंकि यह उत्पादन के सभी उपादानों, विशेषकर श्रमिक और मशीन आदि को एकसमान मानकर चलता है। श्रमिकों के पारिश्रमिक का निर्धारण केवल सीमान्त उत्पादिता के आधार पर ही नहीं, अपितु श्रम की सौदा करने की शक्ति से भी प्रभावित होता है। इसी प्रकार ब्याज की दर, पूँजी की सीमान्त उत्पादिता से प्रभावित होती है।
  8.  इस सिद्धान्त के आधार पर उद्यमी का पुरस्कार ज्ञात नहीं किया जा सकता।
  9. उत्पादन में वर्द्धमान प्रतिफल नियम (Law of Increasing Returns) के लागू होने की सम्भावनाएँ भी होती हैं।
    उपर्युक्त आलोचनाओं से स्पष्ट होता है कि सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त साधनों की कीमत-निर्धारण का अधूरा सिद्धान्त है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
वितरण के आधुनिक सिद्धान्त की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
या
वितरण के आधुनिक सिद्धान्त को रेखाचित्र की सहायता से समझाइए।
या
वितरण के आधुनिक सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। [2012]
उत्तर:
वितरण का आधुनिक सिद्धान्त – आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, उत्पादन के साधनों की कीमत का निर्धारण वस्तुओं की कीमत-निर्धारण का विस्तार एवं विशिष्ट रूप है। उत्पत्ति के साधन की कीमत एक वस्तु की भाँति उसकी माँग और पूर्ति से निर्धारित होती है। वितरण के आधुनिक सिद्धान्त के अनुसार, संयुक्त उत्पत्ति में उत्पत्ति के किसी उपादान का भाग उस उपादान की माँग और पूर्ति की शक्तियों के अनुसार उस स्थान पर निर्धारित होता है जहाँ पर उत्पादन के उपादानों की माँग और पूर्ति दोनों ही बराबर होती हैं। इस प्रकार वितरण का आधुनिक सिद्धान्त-माँग और पूर्ति का सिद्धान्त ही है।

सिद्धान्त की मान्यताएँ
वितरण का आधुनिक सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है

  1. यह सिद्धान्त यह मानकर चलता है कि साधन-बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता पायी जाती है।
  2. साधनों की सभी इकाइयाँ एकरूप हैं तथा वे एक-दूसरे के लिए पूर्ण स्थानापन्न हैं।
  3. उत्पत्ति ह्रास नियम की क्रियाशीलता सिद्धान्त की महत्त्वपूर्ण मान्यता है।
  4. यह सिद्धान्त यह मानकर चलता है कि प्रत्येक साधन पूर्णतया विभाज्य होता है।

सिद्धान्त की व्याख्या

1. साधन की माँग – किसी उत्पत्ति के साधन की माँग उसकी सीमान्त उत्पादिता पर निर्भर होती है। एक फर्म उत्पत्ति के साधन को उस सीमा तक प्रयोग करेगी जहाँ पर उसकी सीमान्त उत्पादकता सीमान्त साधन लागत के बराबर हो। यदि साधन की सीमान्त उत्पादकता का मूल्य सीमान्त साधन लागत से अधिक होता है तो फर्म के लिए उस साधन की अधिक इकाइयों का प्रयोग करना लाभपूर्ण होगा। फर्म तब तक साधन की अधिकाधिक इकाइयों का प्रयोग करती जाएगी जब तक साधन की सीमान्त उत्पादकता का मूल्य सीमान्त साधन लागत के बराबर नहीं हो जाता। कोई भी फर्म साधन के लिए उसकी सीमान्त उत्पादकता से अधिक मूल्य नहीं देगी। इस प्रकार सीमान्त उत्पादकता साधन की कीमत की अधिकतम सीमा निर्धारित करती है।

2. साधन की पूर्ति – साधन के पूर्ति पक्ष उत्पत्ति के उपादान के स्वामी होते हैं। किसी साधन की पूर्ति उसकी उपादान लागत पर निर्भर करती है, परन्तु यहाँ पर उत्पादन लागत से अभिप्राय ‘अवसर लागत’ (Opportunity Cost) अथवा हस्तान्तरण आय (Transfer Earning) से है। साधन की हस्तान्तरण आय वह आय होती है जो वह दूसरे सर्वश्रेष्ठ वैकल्पिक प्रयोग से प्राप्त कर सकता है। एक साधन को अपने वर्तमान व्यवसाय में कम-से-कम उतनी आय अवश्य प्राप्त होनी चाहिए जितनी कि वह किसी दूसरे सर्वश्रेष्ठ व्यवसाय में प्राप्त कर सकता हो। इस प्रकार हस्तान्तरण आय’ साधन की उत्पादन लागत होती है जो उस न्यूनतम सीमा को निर्धारित करती है जिससे नीचे उसकी कीमत नहीं गिर सकती। उत्पत्ति के उपादान को स्वामी कम-से-कम उतने मूल्य पर उपादान को बेचने के लिए। तैयार होगा जितना उसकी सीमान्त इकाई की लागत है। यह सीमा पूर्तिकर्ता की न्यूनतम सीमा है।

3. साधन मूल्य का निर्धारण – उत्पत्ति के उपादान का मूल्य उस साधन की माँग तथा पूर्ति की। शक्तियों के अनुसार उस स्थान पर निर्धारित होता है जहाँ उसकी सीमान्त उत्पादिता तथा उसके स्वामी के सीमान्त त्याग या हस्तान्तरण आय अर्थात् सीमान्त लागत बराबर होती है। यही साधन बाजार की सन्तुलन की स्थिति होती है। जिस कीमत पर माँग और पूर्ति में सन्तुलन स्थापित होता है उसे साधन की सन्तुलन कीमत कहा जाता है। इस प्रकार किसी साधन की कीमत उस बिन्दु पर निर्धारित होती है जहाँ पर उसकी माँग ठीक उसकी पूर्ति के बराबर होती है।।

रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण
संलग्न चित्र में OX-अक्ष पर साधन की माँग और पूर्ति (इकाइयों में) तथा OY-अक्ष पर साधन की सीमान्त उत्पादिता (₹ में) दर्शायी गयी है।
चित्र में DD साधन की माँग रेखा है, ss साधन कीपूर्ति रेखा है। E सन्तुलन बिन्दु है, क्योंकि यहाँ पर साधन की माँग व पूर्ति दोनों बराबर हैं। EQ या OP साधन की कीमत या पुरस्कार है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 8 Distribution Meaning and Theory 2
चित्र से स्पष्ट होता है कि एक साधन की कीमत या पुरस्कार EO या OP होगा, क्योंकि यहाँ पर साधन की माँग व पूर्ति दोनों बराबर हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
वितरण का क्या अर्थ है? [2012]
या
अर्थशास्त्र में वितरण से आप क्या समझते हैं? [2007, 14]
या
वितरण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [2012]
उत्तर:
अर्थशास्त्र के उस भाग को जिसमें धन को उत्पन्न करने वाले सहयोगियों में बाँटने के नियमों, सिद्धान्तों एवं इससे सम्बन्धित बातों का अध्ययन किया जाता है, ‘वितरण’ कहते हैं। संक्षेप में, अर्थशास्त्र का वह विभाग जो हमें वितरण की समस्या की जानकारी देता है, ‘वितरण’ कहलाता है।

कुछ विद्वानों ने वितरण को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है
विक्स्टीड के अनुसार, “वितरण में राजनीतिक अर्थव्यवस्था की शाखा के रूप में उन सिद्धान्तों का अध्ययन किया जाता है जिनके अधीन किसी जटिल औद्योगिक संगठन द्वारा की गयी संयुक्त उत्पत्ति का विभाजन उन व्यक्तियों के मध्य किया जाता है जिन्होंने उत्पादन में किसी प्रकार का सहयोग प्रदान किया है।”

चैपमैन के अनुसार, “वितरण का अर्थ किसी समुदाय द्वारा उत्पादित धन को उन साधनों अथवा साधनों के स्वामियों के मध्य वितरित करना है जो उसके उत्पादन में सक्रिय सहयोग प्रदान करते हैं।”

प्रश्न 2
सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त किन मान्यताओं पर आधारित है ? लिखिए। [2009]
उत्तर:
सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है

  1. उत्पादन के उपादानों की सभी इकाइयाँ समान होनी चाहिए।
  2. विभिन्न उपादानों का एक-दूसरे से प्रतिस्थापन सम्भव होना चाहिए।
  3. अन्य साधनों की मात्रा को स्थिर रखकर, एक साधन की मात्रा को घटाना-बढ़ाना सम्भव है। अर्थात् प्रत्येक उपादान की उपयोग की मात्रा में परिवर्तन सम्भव होना चाहिए।
  4. उत्पादन व्यवसाय में ह्रासमान प्रतिफल नियम (Law of Diminishing Returns) लागू होना चाहिए।
  5. साधन बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता होनी चाहिए अर्थात् साधन के क्रेताओं व विक्रेताओं की संख्या अधिक होती है।
  6. प्रत्येक फर्म अपने लाभ को अधिकतम करने के उद्देश्य से कार्य करती है।
  7. समाज में पूर्ण रोजगार की स्थिति पायी जाती है।

प्रश्न 3
सीमान्त भौतिक उत्पादकता क्या है ? समझाइए।
उत्तर:
सीमान्त भौतिक उत्पादकता (Marginal Physical Productivity) – जब किसी साधन की सीमान्त उत्पादकता को उत्पन्न की गयी वस्तु की भौतिक मात्रा के रूप में व्यक्त किया जाता है तो उसे साधन की सीमान्त भौतिक उत्पादकता (MPP) कहा जाता है।
अन्य साधनों को स्थिर रखकर किसी साधन की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग से कुल भौतिक उत्पादन में जो वृद्धि होती है, वह उस साधन की सीमान्त भौतिक उत्पादकता होती है। परिवर्तनशील अनुपातों के नियम (Law of variable MPP Proportions) के कार्यशील होने के कारण आरम्भ में परिवर्तनशील साधन की सीमान्त भौतिक उत्पादकता बढ़ती है,साधन की मात्रा किन्तु एक बिन्दु पर अधिकतम होने के पश्चात् वह गिरना आरम्भ (Quantity of Factors) हो जाती है। इसलिए सीमान्त भौतिक उत्पादकता वक्र उल्टे U-आकार को होता है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 8 Distribution Meaning and Theory 3
संलग्न चित्र में OX-अक्ष पर साधन की मात्रा तथा OY-अक्ष पर सीमान्त भौतिक उत्पादकता को दिखाया गया है। चित्र में MPP वक्र सीमान्त भौतिक उत्पादकता वक्र है, जो उल्टे U के आकार का है।

प्रश्न 4
औसत आय उत्पादकता एवं सीमान्त आय उत्पादकता को समझाइए।
उत्तर:
औसत आय उत्पादकता-किसी साधन से उत्पादित होने वाले कुल भौतिक उत्पादन को बेचकर जो कुल आय प्राप्त होती है, उसे साधन की कुल इकाइयों की मात्रा से भाग देकर उस साधन की औसत आय उत्पादकता ज्ञात की जाती है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 8 Distribution Meaning and Theory 4

सीमान्त आय उत्पादकता-अन्य साधनों की मात्रा स्थिर रखकर परिवर्तनशील साधन की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग से कुल आगम (आय) में जो वृद्धि होती है, उसे साधन की सीमान्त आय उत्पादकता कहा जाता है।
सीमान्त भौतिक उत्पादकता (MPP) को सीमान्त आय (MR) से गुणा करके भी सीमान्त आय उत्पादकता (MRP) को ज्ञात किया जा सकता है।
MRP = MPP x MR

प्रश्न 5
साधन की औसत लागत व सीमान्त लागत से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
एक साधन की आय फर्म के लिए लागत होती है।
साधन की औसत लागत – एक फर्म किसी साधन के लिए जो कुल व्यय करती है, उसे कुल लागत कहते हैं। उस कुल लागत को साधन की सम्पूर्ण इकाइयों से भाग देने पर जो राशि प्राप्त होती है, वह साधन की औसत लागत कहलाती है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 8 Distribution Meaning and Theory 5

सीमान्त लागत – एक फर्म किसी साधन की अन्तिम इकाई पर जो व्यय करती है वह साधन की सीमान्त लागत कहलाती है। एक फर्म की अन्य साधनों की मात्रा को स्थिर रखकर परिवर्तनशील साधन की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग से कुल लागत में जो वृद्धि होती है उसे उस साधन की सीमान्त लागत कहते हैं।

पूर्ण प्रतियोगिता की मान्यता के अन्तर्गत फर्म की औसत साधन लागत रेखा (Average factor cost curve) और सीमान्त साधन लागत रेखा (Marginal factor cost curve) एक ही होती है। यह रेखा एक पड़ी। हुई रेखा (Horizontal line) होती है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 8 Distribution Meaning and Theory 6
संलग्न चित्र में OX-अक्ष पर साधन की इकाइयाँ सीमान्त साधन लागत रेखा तथा OY-अक्ष पर साधन की लागत दिखायी गयी है। चित्र में सीधी रेखा औसत साधन लागत रेखा AFC तथा सीमान्त । साधन लागत रेखा MFC है। यह रेखा OX-अक्ष के साधन की इकाइयाँ समान्तर है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
‘सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त इस बात की सामान्य व्याख्या करता है कि उत्पत्ति के साधनों को पुरस्कार अर्थात् उनकी कीमतें किस प्रकार निर्धारित होती हैं। सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त के अनुसार किसी साधन की कीमत उसकी उत्पादकता के अनुसार होती है।

प्रश्न 2
वितरण के सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त को प्रतिपादित करने वाले प्रमुख अर्थशास्त्रियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त को प्रतिपादित करने वाले प्रमुख अर्थशास्त्री जे० बी० क्लार्क, विक्स्टीड, वालरा, श्रीमती जॉन रॉबिन्सन और हिक्स हैं।

प्रश्न 3
सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त को किस नाम से पुकारा जाता है ?
उत्तर:
सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त को वितरण का सामान्य सिद्धान्त भी कहा जाता है, क्योंकि इस सिद्धान्त की सहायता से उत्पत्ति के सभी साधनों की कीमत-निर्धारण की समस्या का अध्ययन किया जा सकता है।

प्रश्न 4
उत्पत्ति के साधनों की कीमत का निर्धारण किस प्रकार होता है ?
उत्तर:
उत्पत्ति के साधनों की कीमत साधनों की सीमान्त उत्पादकता द्वारा निर्धारित होती है।

प्रश्न 5
सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की दो आलोचनाएँ लिखिए।
उत्तर:
(1) एक साधन की सीमान्त उत्पादकता को अलग करना कठिन है; क्योंकि सभी उत्पत्ति के साधनों की उत्पादकता सामूहिक होती है।
(2) उत्पत्ति के साधनों की सभी इकाइयाँ एकरूप नहीं होती हैं; अतः सीमान्त उत्पादकता ज्ञात करना कठिन हो जाता है।

प्रश्न 6
वितरण का आधुनिक सिद्धान्त किस अर्थशास्त्री द्वारा प्रतिपादित किया जाता है ?
उत्तर:
प्रो० मार्शल के द्वारा।

प्रश्न 7
वितरण का आधुनिक सिद्धान्त क्या है ?
उत्तर:
वितरण का आधुनिक सिद्धान्त के अनुसार किसी साधन की कीमत भी उसकी माँग और पूर्ति के द्वारा निर्धारित होती है। साधन की कीमत उस बिन्दु पर निर्धारित होती है जहाँ पर उसकी माँग और पूर्ति बराबर होती हैं।

प्रश्न 8
वितरण के दो सिद्धान्त बताइए। [2007]
उत्तर:
(1) वितरण का सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त।
(2) वितरण का आधुनिक सिद्धान्त।

प्रश्न 9
वितरण के सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की चार मान्यताएँ बताइए। [2006]
उत्तर:

  1.  यह सिद्धान्त यह मानकर चलता है कि साधन बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता पायी जाती है।
  2.  साधनों की सभी इकाइयाँ एकरूप हैं तथा वे एक-दूसरे के लिए पूर्ण स्थानापन्न हैं।
  3.  उत्पत्ति द्वारा नियम की क्रियाशीलता सिद्धान्त की महत्त्वपूर्ण मान्यता है।
  4.  यह सिद्धान्त यह मानकर चलता है कि प्रत्येक साधन पूर्णतया विभाज्य होता है।

प्रश्न 10
सीमान्त उत्पादकता क्या है ? [2009, 10]
उत्तर:
अन्य साधनों को स्थिर रखकर परिवर्तनशील साधन की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग से कुल उत्पादन में जो वृद्धि होती है, उसे साधन की सीमान्त उत्पादकता कहा जाता है।

प्रश्न 11
किसी साधन की सीमान्त उत्पादकता कितने प्रकार की हो सकती है ?
उत्तर:
किसी साधन की सीमान्त उत्पादकता तीन प्रकार की हो सकती है

  1.  सीमान्त भौतिक उत्पादकता,
  2.  सीमान्त आगम उत्पादकता तथा
  3.  औसत उत्पादकता।

प्रश्न 12
औसत उत्पादकता कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर:
औसत उत्पादकता दो प्रकार की होती है

  1. औसत भौतिक उत्पादकता तथा
  2. औसत आय उत्पादकता।

प्रश्न 13
औसत आय उत्पादकता को अन्य किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर:
औसत आय उत्पादकता को ‘सकल आय उत्पादकता’ भी कहा जाता है।

प्रश्न 14
सीमान्त आय उत्पादकता और औसत आय उत्पादकता के सम्बन्ध को बताइए।
उत्तर:

  1.  जब औसत आय उत्पादन बढ़ता है तो सीमान्त आय उत्पादन उससे कम होता है।
  2. जब औसत आय उत्पादन स्थिर होता है तब सीमान्त आय उत्पादन उसके बराबर होता है।
  3.  जब औसत आय उत्पादन गिरता है तो सीमान्त आय उत्पादन उससे कम होता है।

प्रश्न 15
वितरण का आधुनिक सिद्धान्त किन मान्यताओं पर आधारित है ?
उत्तर:

  1. बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता पायी जाती है।
  2. उत्पादन में उत्पत्ति ह्रास नियम क्रियाशील होता है।
  3. साधन की सभी इकाइयाँ एक रूप तथा एक-दूसरे के लिए पूर्ण स्थानापन्न हैं।
  4.  प्रत्येक साधन पूर्णतया विभाज्य है।

प्रश्न 16
वितरण किस-किस के मध्य होता है? [2007]
उत्तर:
उत्पादन में उत्पत्ति के जो उपादान (भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन और साहस) सहयोग करते हैं, शुद्ध उत्पादन का विभाजन या वितरण उन्हीं के मध्य होता है।

प्रश्न 17
आर्थिक क्रिया से क्या अभिप्राय है? [2015]
उत्तर:
वे क्रियाएँ जो वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन, वितरण और उपभोग को समाज के सभी स्तरों पर शामिल होती हैं, आर्थिक क्रियाएँ कहलाती हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
वितरण के परम्परावादी सिद्धान्त के जन्मदाता कौन हैं ?
(क) एडम स्मिथ
(ख) मार्शल
(ग) जे० एस० मिल
(घ) जे० के० मेहता
उत्तर:
(क) एडम स्मिथ।

प्रश्न 2
वितरण में उद्यमी का हिस्सा प्राप्त होता है
(क) सबसे बाद में
(ख) सबसे पहले
(ग) बीच में
(घ) कभी नहीं
उत्तर:
(क) सबसे बाद में।

प्रश्न 3
सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त के जन्मदाता कौन हैं ? [2007,09]
(क) जे० बी० क्लार्क
(ख) रिकार्डो
(ग) मार्शल
(घ) कीन्स
उत्तर:
(क) जे० बी० क्लार्क।

प्रश्न 4
वितरण में उद्यमी के हिस्से को कहते हैं [2010, 12]
(क) ब्याज
(ख) लाभ
(ग) वेतन
(घ) मजदूरी
उत्तर:
(ख) लाभ।

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