UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कृषि सम्बन्धी निबन्ध

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Name कृषि सम्बन्धी निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कृषि सम्बन्धी निबन्ध

कृषि सम्बन्धी निबन्ध प्रवास

ग्राम्य विकास की समस्याएँ और उनका समाधान

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारतीय कृषि की समस्याएँ
  • भारतीय किसानों की समस्याएँ और उनके समाधान [2009, 12, 15]
  • ग्रामीण कृषकों की समस्या [2012]
  • आज का किसान : समस्याएँ और समाधान [2014]
  • भारतीय किसान का जीवन [2014]
  • कृषक जीवन की त्रासदी [2015]
  • वर्तमान भारत में कृषकों की समस्या एवं समाधान (2016)

प्रमुख विचार-बिन्दु–

  1. प्रस्तावना,
  2. भारतीय कृषि का स्वरूप,
  3. भारतीय कृषि की समस्याएँ,
  4. समस्या का समाधान,
  5. ग्रामोत्थान हेतु सरकारी योजनाएँ,
  6. आदर्श ग्राम की कल्पना,
  7. उपसंहार

प्रस्तावना-प्राचीन काल से ही भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है। भारत की लगभग 70 प्रतिशत जनता गाँवों में निवास करती है। इस जनसंख्या का अधिकांश भाग कृषि पर ही निर्भर है। कृषि ने ही भारत को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में विशेष ख्याति प्रदान की है। भारत की सकल राष्ट्रीय आय का लगभग 30 प्रतिशत कृषि से ही आता है। भारतीय समाज को संगठन और संयुक्त परिवार-प्रणाली आज के युग में कृषि व्यवसाय के कारण ही अपना महत्त्व बनाये हुए है। आश्चर्य की बात यह है कि हमारे देश में कृषि बहुसंख्यक जनता का मुख्य और महत्त्वपूर्ण व्यवसाय होते हुए भी बहुत ही पिछड़ा हुआ और अवैज्ञानिक है। जब तक भारतीय कृषि में सुधार नहीं होता, तब तक भारतीय किसानों की स्थिति में सुधार की कोई सम्भावना नहीं और भारतीय किसानों की स्थिति में सुधार के पूर्व भारतीय गाँवों के विकास की कल्पना ही नहीं की जा सकती। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि भारतीय कृषि, कृषक और गाँव तीनों ही एक-दूसरे पर अवलम्बित हैं। इनके उत्थान और पतन, समस्याएँ और समाधान भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

भारतीय कृषि का स्वरूप-भारतीय कृषि और अन्य देशों की कृषि में बहुत अन्तर है। कारण अन्य देशों की कृषि वैज्ञानिक ढंग से आधुनिक साधनों द्वारा की जाती है, जब कि भारतीय कृषि अवैज्ञानिक और अविकसित है। भारतीय कृषक आधुनिक तरीकों से खेती करना नहीं चाहते और परम्परागत कृषि पर ही आधारित हैं। इसके साथ-ही भारतीय कृषि का स्वरूप इसलिए भी अव्यवस्थित है कि यहाँ पर कृषि प्रकृति । की उदारता पर निर्भर है। यदि वर्षा ठीक समय पर उचित मात्रा में हो गयी तो फसल अच्छी हो जाएगी अन्यथा बाढ़ और सूखे की स्थिति में सारी की सारी उपज नष्ट हो जाती है। इस प्रकार प्रकृति की अनिश्चितता पर निर्भर होने के कारण भारतीय कृषि सामान्य कृषकों के लिए आर्थिक दृष्टि से लाभदायक नहीं है।

भारतीय कृषि की समस्याएँ-आज के विज्ञान के युग में भी कृषि के क्षेत्र में भारत में अनेक समस्याएँ विद्यमान हैं, जो कि भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के लिए उत्तरदायी हैं। भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं में सामाजिक, आर्थिक और प्राकृतिक कारण हैं। सामाजिक दृष्टि से भारतीय कृषक की दशा अच्छी नहीं है। अपने शरीर की चिन्ता न करते हुए सर्दी, गर्मी सभी ऋतुओं में वह अत्यन्त कठिन परिश्रम करता है तब भी उसे पर्याप्त लाभ नहीं हो पाता। भारतीय किसान अशिक्षित होता है। इसका कारण आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार का न होना है। शिक्षा के अभाव के कारण वह कृषि में नये वैज्ञानिक तरीकों का प्रयोग नहीं कर पाता तथा अच्छे खाद और बीज के बारे में भी नहीं जानता। कृषि करने के आधुनिक वैज्ञानिक यन्त्रों के विषय में भी उसका ज्ञान शून्य होता है तथा आज भी वह प्रायः पुराने ढंग के ही खाद और बीजों का प्रयोग करता है। भारतीय किसानों की आर्थिक स्थिति भी अत्यन्त शोचनीय है। वह आज भी महाजनों की मुट्ठी में जकड़ा हुआ है। प्रेमचन्द ने कहा था, “भारतीय किसान ऋण में ही जन्म लेता है, जीवन भर ऋण ही चुकाता रहता है और अन्तत: ऋणग्रस्त अवस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।’ धन के अभाव में ही वह उन्नत बीज, खाद और कृषि-यन्त्रों का प्रयोग नहीं कर पाता। सिंचाई के साधनों के अभाव के कारण वह प्रकृति पर अर्थात् वर्षा पर निर्भर करता है।

प्राकृतिक प्रकोपों—बाढ़, सूखा, ओला आदि से भारतीय किसानों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। अशिक्षित होने के कारण वह वैज्ञानिक विधियों का खेती में प्रयोग करना नहीं जानता और न ही उन पर विश्वास करना चाहता है। अन्धविश्वास, धर्मान्धता, रूढ़िवादिता आदि उसे बचपन से ही घेर लेते हैं। इस सबके अतिरिक्त एक अन्य समस्या है—भ्रष्टाचार की, जिसके चलते न तो भारतीय कृषि का स्तर सुधर पाता है और न ही भारतीय कृषक का। हमारे पास दुनिया की सबसे अधिक उपजाऊ भूमि है। गंगा-यमुना के मैदान में इतना अनाज पैदा किया जा सकता है कि पूरे देश का पेट भरा जा सकता है। इन्हीं विशेषताओं के कारण दूसरे देश आज भी हमारी ओर ललचाई नजरों से देखते हैं। लेकिन हमारी गिनती दुनिया के भ्रष्ट देशों में होती है। हमारी तमाम योजनाएँ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं। केन्द्र सरकार अथवा विश्व बैंक की कोई भी योजना हो, उसके इरादे कितने ही महान् क्यों न हों पर हमारे देश के नेता और नौकरशाह योजना के उद्देश्यों को धूल चटा देने की कला में माहिर हो चुके हैं। ऊसर भूमि सुधार, बाल पुष्टाहार, आँगनबाड़ी, निर्बल वर्ग आवास योजना से लेकर कृषि के विकास और विविधीकरण की तमाम शानदार योजनाएँ कागजों और पैम्फ्लेटों पर ही चल रही हैं। आज स्थिति यह है कि गाँवों के कई घरों में दो वक्त चूल्हा भी नहीं जलता है तथा ग्रामीण नागरिकों को पानी, बिजली, स्वास्थ्य, यातायात और शिक्षा की बुनियादी सुविधाएँ भी ठीक से उपलब्ध नहीं हैं। इन सभी समस्याओं के परिणामस्वरूप भारतीय कृषि का प्रति एकड़ उत्पादन अन्य देशों की अपेक्षा गिरे हुए स्तर का रहा है।

समस्या का समाधान--भारतीय कृषि की दशा को सुधारने से पूर्व हमें कृषक और उसके वातावरण की ओर दृष्टिपात करना चाहिए। भारतीय कृषक जिन ग्रामों में रहता है, उनकी दशा अत्यन्त शोचनीय है। अंग्रेजों के शासनकाल में किसानों पर ऋण का बोझ बहुत अधिक था। शनैः-शनै: किसानों की आर्थिक दशा और गिरती चली गयी एवं गाँवों का सामाजिक-आर्थिक वातावरण अत्यन्त दयनीय हो गया। अत: किसानों की स्थिति में सुधार तभी लाया जा सकता है, जब विभिन्न योजनाओं के माध्यम से इन्हें लाभान्वित किया जा सके। इनको अधिकाधिक संख्या में साक्षर बनाने हेतु एक मुहिम छेड़ी जाए। ऐसे ज्ञानवर्द्धक कार्यक्रम तैयार किये जाएँ, जिनसे हमारी किसान कृषि के आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से अवगत हो सके।

ग्रामोत्थान हेतु सरकारी योजनाएँ—ग्रामों की दुर्दशा से भारत की सरकार भी अपरिचित नहीं है। भारत ग्रामों का ही देश है; अत: उनके सुधारार्थ पर्याप्त ध्यान दिया जाता है। पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा गाँवों में सुधार किये जा रहे हैं। शिक्षालय, वाचनालय, सहकारी बैंक, पंचायत, विकास विभाग, जलकल, विद्युत आदि की व्यवस्था के प्रति पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है। इस प्रकार सर्वांगीण उन्नति के लिए भी प्रयत्न हो रहे हैं, किन्तु इनकी सफलता ग्रामों में बसने वाले निवासियों पर भी निर्भर है। यदि वे अपना कर्तव्य समझकर विकास में सक्रिय सहयोग दें, तो ये सभी सुधार उत्कृष्ट साबित हो सकते हैं। इन प्रयासों के बावजूद ग्रामीण जीवन में अभी भी अनेक सुधार अपेक्षित हैं।

आदर्श ग्राम की कल्पना-गाँधी जी की इच्छा थी कि भारत के ग्रामों का स्वरूप आदर्श हो तथा उनमें सभी प्रकार की सुविधाओं, खुशहाली और समृद्धि का साम्राज्य हो। गाँधी जी का आदर्श गाँव से अभिप्राय एक ऐसे गाँव से था, जहाँ पर शिक्षा का सुव्यवस्थित प्रचार हो; सफाई, स्वास्थ्य तथा मनोरंजन की सुविधाएँ हो; सभी व्यक्ति प्रेम, सहयोग और सद्भावना के साथ रहते हों; रेडियो, पुस्तकालय, पोस्ट ऑफिस आदि की सुविधाएँ हों; भेदभाव, छुआछूत आदि की भावना न हो; तथा लोग सुखी और सम्पन्न हों। परन्तु आज भी हम देखते हैं कि उनका स्वप्न मात्र स्वप्न ही रह गया है। आज भी भारतीय गाँवों की दशा अच्छी नहीं है। चारों ओर बेरोजगारी और निर्धनता का साम्राज्य है। गाँधी जी को आदर्श ग्राम तभी सम्भव है। जब कृषि जो कि ग्रामवासियों का मुख्य व्यवसाय है, की स्थिति में सुधार के प्रयत्न किये जाएँ और कृषि से सम्बन्धित सभी समस्याओं का यथासम्भव शीघ्रातिशीघ्र निराकरण किया जाए।

उपसंहार-ग्रामों की उन्नति भारत के आर्थिक विकास में अपना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। भारत सरकार ने स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् गाँधी जी के आदर्श ग्राम की कल्पना को साकार करने का यथासम्भव प्रयास किया है। गाँवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई आदि की व्यवस्था के प्रयत्न किये हैं। कृषि के लिए अनेक सुविधाएँ; जैसे-अच्छे बीज, अच्छे खाद, अच्छे उपकरण और साख एवं सुविधाजनक ऋण-व्यवस्था आदि देने का प्रबन्ध किया गया है। इस दशा में अभी और सुधार किये जाने की आवश्यकता है। वह दिन दूर नहीं है जब हम अपनी संस्कृति के मूल्य को पहचानेंगे और एक बार फिर उसके सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करेंगे। उस समय हमारे स्वर्ग से सुन्दर देश के वैसे ही गाँव अँगूठी में जड़े नग की तरह सुशोभित होंगे और हम कह सकेंगे–

हमारे सपनों का संसार, जहाँ पर हँसता हो साकार,
जहाँ शोभा-सुख-श्री के साज, किया करते हैं नित श्रृंगार।
यहाँ यौवन मदमस्त ललाम, ये हैं वही हमारे ग्राम ॥

भारत में वैज्ञानिक कृषि

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारतीय विज्ञान एवं कृषि
  • वैज्ञानिक विधि अपनाएँ : अधिक अन्न उपजाएँ।
  • भारत का किसान और विज्ञान [2011]
  • भारतीय कृषि एवं विज्ञान [2014]
  • व्यावसायिक कृषि का प्रसार : किसान का आधार [2014]

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. प्रजनन : कृषि की विशिष्ट वैज्ञानिक विधि,
  3. विज्ञान की नयी तकनीकों के प्रयोग का सुखद परिणाम,
  4. उत्पादन के भण्डारण और भू-संरक्षण के लिए विज्ञान की उपादेयता,
  5. उपसंहार

प्रस्तावना किसान और खेती इस देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इसलिए सच ही कहा गया है। कि हमारे देश की समृद्धि का रास्ता खेतों और खलिहानों से होकर गुजरता है; क्योंकि यहाँ की दो-तिहाई जनता कृषि-कार्य में संलग्न है। इस प्रकार हमारी कृषि-व्यवस्था पर ही देश की समृद्धि निर्भर करती है और कृषि-व्यवस्था को विज्ञान ने एक सुदृढ़ आधार प्रदान किया है, जिसके कारण पिछले दशकों में आत्मनिर्भरता की स्थिति तक उत्पादन बढ़ा है। इस वृद्धि में उन्नत किस्म के बीजों, उर्वरकों, सिंचाई के साधनों, जल-संरक्षण एवं पौध-संरक्षण का उल्लेखनीय योगदान रहा है और यह सब कुछ विज्ञान की सहायता से ही सम्भव हो सका है। इस प्रकार विज्ञान और कृषि आज एक-दूसरे के पूरक हो गये हैं।

मनुष्यों को जीवित रहने के लिए खाद्यान्न, फल और सब्जियाँ चाहिए। ये सभी चीजें कृषि से ही प्राप्त होंगी। दूसरी ओर किसानों को अपनी कृषि की उपज बढ़ाने के लिए नयी तकनीक चाहिए, उन्नत किस्म के बीज चाहिए, उर्वरक और सिंचाई के साधनों के अलावा बिजली भी चाहिए। विज्ञान का ज्ञान ही उन्हें यह सब उपलब्ध करा सकता है।

प्रजनन : कृषि की विशिष्ट वैज्ञानिक विधि–चन्द्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने वित्तीय वर्ष 1999-2000 में गेहूँ की चार नयी प्रजातियाँ विकसित कीं। कृषि वैज्ञानिक प्रोफेसर जियाउद्दीन अहमद के अनुसार, ‘अटल’, ‘नैना’, ‘गंगोत्री’ एवं ‘प्रसाद’ नाम की ये प्रजातियाँ रोटी को और अधिक स्वादिष्ट बनाने में सक्षम होंगी। पहली प्रजाति-के-9644 को प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम से जोड़कर ‘अटल’ नाम दिया गया है, जिन्होंने ‘जय जवान जय किसान’ के साथ ‘जय विज्ञान’ जोड़कर एक नया नारा दिया है।

यह गेहूँ ऐच्छिक पौधों के प्रकार के साथ, वर्षा की विविध स्थितियों में भी श्रेयस्कर उत्पादक स्थितियाँ सँजोये रखेगा। हरी पत्ती और जल्दी पुष्पित होने वाली इस प्रजाति का गेहूँ कड़े दाने वाला। होगा। इसमें अधिक उत्पादकता के साथ अधिक प्रोटीन भी होगा। प्रजनन की विशिष्ट विधि का प्रयोग करके वैज्ञानिकों ने के-7903 नैना प्रजाति का विकास किया है, जो 75 से 100 दिन में पक जाता है। इसमें 12 प्रतिशत प्रोटीन होता है और इसकी उत्पादन-क्षमता 40 से 50 क्विटल प्रति हेक्टेयर है। इसी प्रकार विकसित के-9102 प्रजाति को गंगोत्री नाम दिया है। इसकी परिपक्वता अवधि 90 से 105 दिन के बीच घोषित की। गयी है। इसमें 13 प्रतिशत प्रोटीन होता है और 40 से 50 क्विटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन-क्षमता होती है। प्रजनन की विशिष्ट वैज्ञानिक विधि से ही ऐसा सम्भव हो पाया है।

विज्ञान की नयी तकनीकों के प्रयोग का सुखद परिणाम-आधारभूत वैज्ञानिक तकनीकें जो कृषि के क्षेत्र में प्रयुक्त हुई और हो रही हैं, उन्हें अब व्यापक स्वीकृति भी मिल रही है। ये वे आधार बनी हैं, जिससे कृषि की उपलब्धियाँ ‘भीख के कटोरे’ से आज निर्यात के स्तर तक पहुँच गयी हैं। कृषि में वृद्धि, विशेषकर पैदावार और उत्पादन में अनेक गुना वृद्धि, मुख्य अनाज की फसलों के उत्पादन में वृद्धि से सम्भव हुई है। पहले गेहूं की हरित क्रान्ति हुई और इसके बाद धान के उत्पादन में क्रान्ति आयी। विज्ञान की नयी-नयी तकनीकों के प्रयोग से ही यह सम्भव हो सका है।

उत्पादन के भण्डारण और भू-संरक्षण के लिए विज्ञान की उपादेयता-पर्याप्त मात्रा में उत्पादन के बाद उसके भण्डारण की भी आवश्यकता होती है। आलू, फल आदि के भण्डारण के लिए शीतगृहों एवं प्रशीतित वाहनों के लिए वैज्ञानिक विधियों की सहायता की आवश्यकता पड़ती है। फसलों के निर्यात के लिए साफ-सुथरी सड़कों, ट्रैक्टरों और ट्रकों का निर्माण विज्ञान के ज्ञान से ही सम्भव हो सका है, जिनकी आवश्यकता कृषकों के लिए होती है। इसके अलावा चीनी मिल, आटा मिल, चावल मिल, दाल मिल और तेल मिल की आवश्यकता पड़ती है। इन मिलों की स्थापना वैज्ञानिक विधि से ही हो सकती है। ट्यूबवेल एवं कृषि पर आधारित उद्योगों के लिए बिजली की आवश्यकता को वैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर पूरा किया जा सकता है। इसी प्रकार खेत की मिट्टी की जाँच कराकर, विश्लेषण के परिणामों के आधार पर सन्तुलित उर्वरकों एवं जैविक खादों के प्रयोग के लिए भी विज्ञान के ज्ञान की ही आवश्यकता होती है।

उपसंहार—इस प्रकार विज्ञान और कृषि का बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है। भूमण्डलीकरण के युग में आज विज्ञान की सहायता के बिना कृषि और कृषक को उन्नत नहीं बनाया जा सकता। यह भी सत्य है कि जब तक गाँव की खेती तथा किसान की दशा नहीं सुधरती, तब तक देश के विकास की बात बेमानी ही कही जाएगी। भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री चौधरी चरण सिंह के जन्मदिन 23 दिसम्बर को ‘किसान-दिवस’ के रूप में मनाये जाने की घोषणा से कृषि और कृषक के उज्ज्वल भविष्य की अच्छी सम्भावनाएँ दिखाई देती हैं।

भारत में कृषि क्रान्ति एवं कृषक आन्दोलन

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना,
  2. किसानों की समस्याएँ,
  3. कृषक संगठन व उनकी माँग,
  4. कृषक आन्दोलनों के कारण,
  5. उपसंहार

प्रस्तावना–हमारा देश कृषि प्रधान है और सच तो यह है कि कृषि क्रिया-कलाप ही देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। ग्रामीण क्षेत्रों की तीन-चौथाई से अधिक आबादी अब भी कृषि एवं कृषि से संलग्न क्रिया-कलापों पर निर्भर है। भारत में कृषि मानसून पर आश्रित है और इस तथ्य से सभी परिचित हैं कि प्रत्येक वर्ष देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा सूखे एवं बाढ़ की चपेट में आता है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था, भारतीय जन-जीवन का प्राणतत्त्व है। अंग्रेजी शासन-काल में भारतीय कृषि का पर्याप्त ह्रास हुआ।
किसानों की समस्याएँ-भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। भारत की अधिकांश जनता गाँवों में बसती है। यद्यपि किसान समाज का कर्णधार है किन्तु इनकी स्थिति अब भी बदतर है। उसकी मेहनत के अनुसार उसे पारितोषिक नहीं मिलता है। यद्यपि सकल घरेलू उत्पाद में कृषि-क्षेत्र का योगदान 30 प्रतिशत है, फिर भी भारतीय कृषक की दशा शोचनीय है।

देश की आजादी की लड़ाई में कृषकों की एक वृहत् भूमिका रही। चम्पारण आन्दोलन अंग्रेजों के खिलाफ एक खुला संघर्ष था। स्वातन्त्र्योत्तर जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ। किसानों को भू-स्वामित्व का अधिकार मिला। हरित कार्यक्रम भी चलाया गया और परिणामत: खाद्यान्न उत्पादकता में वृद्धि हुई; किन्तु इस हरित क्रान्ति का विशेष लाभ सम्पन्न किसानों तक ही सीमित रहा। लघु एवं सीमान्त कृषकों की स्थिति में कोई आशानुरूप सुधार नहीं हुआ।

आजादी के बाद भी कई राज्यों में किसानों को भू-स्वामित्व नहीं मिला जिसके विरुद्ध बंगाल, बिहार एवं आन्ध्र प्रदेश में नक्सलवादी आन्दोलन प्रारम्भ हुए।

कृषक संगठन व उनकी माँग-किसानों को संगठित करने का सबसे बड़ा कार्य महाराष्ट्र में शरद जोशी ने किया। किसानों को उनकी पैदावार का समुचित मूल्य दिलाकर उनमें एक विश्वास पैदा किया कि वे संगठित होकर अपनी स्थिति में सुधार ला सकते हैं। उत्तर प्रदेश के किसान नेता महेन्द्र सिंह टिकैत ने किसानों की दशा में बेहतर सुधार लाने के लिए एक आन्दोलन चलाया है और सरकार को इस बात का अनुभव करा दिया कि किसानों की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। टिकैत के आन्दोलन ने किसानों के मन में कमोवेश यह भावना भर दी कि वे भी संगठित होकर अपनी आर्थिक उन्नति कर सकते हैं।

किसान संगठनों को सबसे पहले इस बारे में विचार करना होगा कि “आर्थिक दृष्टि से अन्य वर्गों के साथ उनका क्या सम्बन्ध है। उत्तर प्रदेश की सिंचित भूमि की हदबन्दी सीमा 18 एकड़ है। जब किसान के लिए सिंचित भूमि 18 एकड़ है, तो उत्तर प्रदेश की किसान यूनियन इस मुद्दे को उजागर करना चाहती है कि 18 एकड़ भूमि को सम्पत्ति-सीमा को आधार मानकर अन्य वर्गों की सम्पत्ति अथवा आय-सीमा निर्धारित होनी चाहिए। कृषि पर अधिकतम आय की सीमा साढ़े बारह एकड़ निश्चित हो गयी, किन्तु किसी व्यवसाय पर कोई भी प्रतिबन्ध निर्धारित नहीं हुआ। अब प्रौद्योगिक क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भी शनैः-शनैः हिन्दुस्तान में अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाती जा रही हैं। किसान आन्दोलन इस विषमता एवं विसंगति को दूर करने के लिए भी संघर्षरत है। वह चाहता है कि भारत में समाजवाद की स्थापना हो, जिसके लिए सभी प्रकार के पूँजीवाद तथा इजारेदारी का अन्त होना परमावश्यक है। यूनियन की यह भी माँग है कि वस्तु विनिमय के , अनुपात से कीमतें निर्धारित की जाएँ, न कि विनिमय का माध्यम रुपया माना जाए। यह तभी सम्भव होगा जब । उत्पादक और उपभोक्ता दोनों रूपों में किसान के शोषण को समाप्त किया जा सके। सारांश यह है कि कृषि उत्पाद की कीमतों को आधार बनाकर ही अन्य औद्योगिक उत्पादों की कीमतों को निर्धारित किया जाना चाहिए।”

किसान यूनियन किसानों के लिए वृद्धावस्था पेंशन की पक्षधर है। कुछ लोगों का मानना है कि किसान यूनियन किसानों का हित कम चाहती है, वह राजनीति से प्रेरित ज्यादा है। इस सन्दर्भ में किसान यूनियन का कहना है “हम आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक शोषण के विरुद्ध किसानों को संगठित करके एक नये समाज की संरचना करना चाहते हैं। आर्थिक मुद्दों के अतिरिक्त किसानों के राजनीतिक शोषण से हमारा तात्पर्य जातिवादी राजनीति को मिटाकर वर्गवादी राजनीति को विकसित करना है। आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक दृष्टि से शोषण करने वालों के समूह विभिन्न राजनीतिक दलों में विराजमान हैं और वे अनेक प्रकार के हथकण्डे अपनाकर किसानों का मुंह बन्द करना चाहते हैं। कभी जातिवादी नारे देकर, कभी किसान विरोधी आर्थिक तर्क देकर, कभी देश-हित का उपदेश देकर आदि, परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि किसानों की उन्नति से ही भारत नाम का यह देश, जिसकी जनसंख्या का कम-से-कम 70% भाग किसानों का है, उन्नति कर सकता है। कोई चाहे कि केवल एक-आध प्रतिशत राजनीतिज्ञों, अर्थशास्त्रियों, स्वयंभू समाजसेवियों तथा तथाकथित विचारकों की उन्नति हो जाने से देश की उन्नति हो जाएगी तो ऐसा सोचने वालों की सरासर भूल होगी।

यहाँ एक बात का उल्लेख करना और भी समीचीन होगा कि आर्थर डंकल के प्रस्तावों ने कृषक आन्दोलन में घी का काम किया है। इससे आर्थिक स्थिति कमजोर होगी और करोड़ों कृषक बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के गुलाम बन जाएँगे।

कृषक आन्दोलनों के कारण भारत में कृषक आन्दोलन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

  1. भूमि सुधारों का क्रियान्वयन दोषपूर्ण है। भूमि का असमान वितरण इस आन्दोलन की मुख्य जड़ है।
  2. भारतीय कृषि को उद्योग को दर्जा न दिये जाने के कारण किसानों के हितों की उपेक्षा निरन्तर हो रही है।
  3. किसानों द्वारा उत्पादित वस्तुओं का मूल्य-निर्धारण सरकार करती है जिसका समर्थन मूल्य बाजार मूल्य से नीचे रहता है। मूल्य-निर्धारण में कृषकों की भूमिका नगण्य है।
  4. दोषपूर्ण कृषि विपणन प्रणाली भी कृषक आन्दोलन के लिए कम उत्तरदायी नहीं है। भण्डारण की अपर्याप्त व्यवस्था, कृषि मूल्यों में होने वाले उतार-चढ़ावों की जानकारी न होने से भी किसानों को पर्याप्त आर्थिक घाटा सहना पड़ता है।
  5. बीजों, खादों, दवाइयों के बढ़ते दाम और उस अनुपात में कृषकों को उनकी उपज को पूरा मूल्य भी न मिल पाना अर्थात् बढ़ती हुई लागत भी कृषक आन्दोलन को बढ़ावा देने के लिए उत्तरदायी है।
  6. नयी कृषि तकनीक का लाभ आम कृषक को नहीं मिल पाता है।
  7. बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का पुलन्दा लेकर जो डंकल प्रस्ताव भारत में आया है, उससे भी किसान बेचैन हैं और उनके भीतर एक डर समाया हुआ है।
  8. कृषकों में जागृति आयी है और उनका तर्क है कि चूंकि सकल राष्ट्रीय उत्पाद में उनकी महती भूमिका है; अत: धन के वितरण में उन्हें भी आनुपातिक हिस्सा मिलना चाहिए।

उपसंहार–विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं का अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है कि कृषि की हमेशा उपेक्षा हुई है; अतः आवश्यक है कि कृषि के विकास पर अधिकाधिक ध्यान दिया जाए।

स्पष्ट है कि कृषक हितों की अब उपेक्षा नहीं की जा सकती। सरकार को चाहिए कि कृषि को उद्योग का दर्जा प्रदान करे। कृषि उत्पादों के मूल्य-निर्धारण में कृषकों की भी भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। भूमि-सुधार कार्यक्रम के दोषों का निवारण होना जरूरी है तथा सरकार को किसी भी कीमत परे डंकल प्रस्ताव को अस्वीकृत कर देना चाहिए और सरकार द्वारा किसानों की माँगों और उनके आन्दोलनों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए।

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UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 2 ऑपरेटिंग सिस्टम

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Computer
Chapter Chapter 2
Chapter Name ऑपरेटिंग सिस्टम
Number of Questions Solved 21
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 2 ऑपरेटिंग सिस्टम

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
निम्न में से ऑपरेटिंग सिस्टम का कौन-सा प्रकार सर्वाधिक धीमी गति से कार्य करता है? [2014]
(a) मल्टीटास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम
(b) बैच ऑपरेटिंग सिस्टम
(c) टाइम शेयरिंग ऑपरेटिंग सिस्टम
(d) नेटवर्क ऑपरेटिंग सिस्टम
उत्तर:
(b) बैच ऑपरेटिंग सिस्टम

प्रश्न 2
निम्न में से कौन-सा ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं है? [2018]
(a) Sun
(b) Linux
(c) Windows
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(d) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 3
वी एम एस (VMS) किस ऑपरेटिंग सिस्टम का उदाहरण है?
(a) मल्टी यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम
(b) बैच ऑपरेटिंग सिस्टम
(c) सिंगल यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम
(d) रियल टाइम ऑपरेटिंग सिस्टम
उत्तर:
(a) मल्टी यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम

प्रश्न 4
सिंगल टास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम है।
(a) विण्डोज
(b) Mac OS
(c) पॉम
(d) MS-Windows 3X
उत्तर:
(c) पॉम

प्रश्न 5
यूनिक्स पर आधारित ऑपरेटिंग सिस्टम कौन-सा है?
(a) यूनिक्स
(b) लाइनक्स
(c) एम एस विण्डोज
(d) सोलेरिस
उत्तर:
(b) लाइनक्स

प्रश्न 6
पर्सनल कम्प्यूटर के लिए आजकल सर्वाधिक लोकप्रिय ऑपरेटिंग सिस्टम कौन-सा है? [2013]
(a) OS/2
(b) SUN
(c) MS-DOS
(d) MS-Windows
उत्तर:
(d) MS-Windows

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1:
ऑपरेटिंग सिस्टम को परिभाषित कीजिए। [2007]
उत्तर:
ऑपरेटिंग सिस्टम (Operating System, OS) एक ऐसा सॉफ्टवेयर है, जो यूजर (कम्प्यूटर पर कार्य करने वाला व्यक्ति), एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर और कम्प्यूटर हार्डवेयर के बीच संवाद (Communication) स्थापित करता है।

प्रश्न 2
ऑपरेटिंग सिस्टम के कोई दो कार्य लिखिए।
उत्तर:
आपरेटिंग सिस्टम के निम्न दो कार्य इस प्रकार हैं

  1. प्रोसेसिंग प्रबन्धन
  2. फाइल प्रबन्धन

प्रश्न 3
मेमोरी प्रबन्धन में ऑपरेटिंग सिस्टम का क्या कार्य है?
उत्तर:
प्रोग्राम के सफल निष्पादन के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम मैमोरी प्रबन्धन का कार्य करता है।

प्रश्न 4
मल्टी यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम को परिभाषित कीजिए। [2015, 09]
उत्तर:
मल्टी यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम एक समय में एक से अधिक उपयोगकर्ता को कार्य करने की अनुमति देता है।

प्रश्न 5
किन्हीं दो ऑपरेटिंग सिस्टम के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
(i) लाइनक्स
(ii) एम एस डॉस

प्रश्न 6
PC में प्रयोग होने वाले OS का उदाहरण दीजिए। [2015]
उत्तर:
एम एस विण्डोज

लघु उत्तरीय प्रश्न I (1 अंक)

प्रश्न 1
ऑपरेटिंग सिस्टम कम्प्यूटर के लिए क्यों आवश्यक है? इसके प्रमुख कार्य लिखिए। [2011]
अथवा
ऑपरेटिंग सिस्टम का मुख्य उद्देश्य बताइए। [2017]
उत्तर:
ऑपरेटिंग सिस्टम, एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जो यूजर, कम्प्यूटर के हार्डवेयर तथा सॉफ्टवेयर के मध्य संवाद स्थापित करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम सॉफ्टवेयर को मैनेज करने, प्रोसेस करने, संरक्षण (Protection) आदि में मुख्य भूमिका निभाता है, इसलिए कम्प्यूटर के लिए यह अति आवश्यक है।

ऑपरेटिंग सिस्टम के कार्य निम्न हैं।

  1. प्रोसेसिंग प्रबन्धन
  2. मेमोरी प्रबन्धन
  3. फाइल प्रबन्धन
  4. इनपुट-आउटपुट युक्ति प्रबन्धन
  5. सुरक्षा प्रबन्धन
  6. कम्यूनिकेशन

प्रश्न 2
ऑपरेटिंग सिस्टम की आवश्यकताएँ लिखिए।
उत्तर:
ऑपरेटिंग सिस्टम की आवश्यकताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. यह उपयोगकर्ता के कार्यों व फाइलों को सुरक्षा प्रदान करता है।
  2. यह प्रोग्राम के क्रियान्वयन पर नियन्त्रण रखता है।
  3. इसके द्वारा यूजर्स कम्प्यूटर के विभिन्न भागों का उचित रूप से प्रयोग कर सकते हैं।
  4. यह यूजर व कम्प्यूटर के मध्य सम्बन्ध स्थापित करता है।

प्रश्न 3
प्रचालन तन्त्र (ऑपरेटिंग सिस्टम) के प्रकार की व्याख्या कीजिए। [2016]
उत्तर:
ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रकार निम्न हैं।

  1. बैच ऑपरेटिंग सिस्टम
  2. सिंगल यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम
  3. मल्टी यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम
  4. सिंगल टास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम
  5. मल्टीटास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम
  6. टाइम शेयरिंग ऑपरेटिंग सिस्टम
  7. रियल टाइम ऑपरेटिंग सिस्टम
  8. डिस्ट्रीब्यूटीड ऑपरेटिंग सिस्टम

प्रश्न 4
मल्टीप्रोग्राम ऑपरेटिंग सिस्टम का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। [2017]
उत्तर:
मल्टीप्रोग्राम ऑपरेटिंग सिस्टम में, मुख्य मेमोरी में एक या अधिक प्रोग्राम लोड होते है, जो एक्जीक्यूशन के लिए तैयार होते हैं। एक समय में, केवल एक प्रोगाम सीपीयू को अपने निर्देशों को एक्जीक्युट करने में सक्षम होता है, जबकि अन्य सभी अपनी बारी का इन्तजार कर रहे होते हैं। मल्टीप्रोग्रामिंग का मुख्य उद्देश्य (CPU) समय के उपयोग को अधिकतम करना है।

लघु उत्तरीय प्रश्न II (3 अंक)

प्रश्न 1
ऑपरेटिंग सिस्टम क्या है? उदाहरण सहित टाइम शेयरिंग ऑपरेटिंग सिस्टम को समझाइए। [2006]
उत्तर:
ऑपरेटिंग सिस्टम (Operating System, OS) एक ऐसा सॉफ्टवेयर है, जो यूजर (कम्प्यूटर पर कार्य करने वाला व्यक्ति) एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर और कम्प्यूटर हार्डवेयर के बीच संवाद (Communication) स्थापित करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम, कम्प्यूटर तथा यूजर के मध्य सम्बन्ध स्थापित करने का भी कार्य करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम कम्प्यूटर के विभिन्न क्रियाकलापों (Activities); जैसे-मेमोरी, प्रोसेसर, फाइल सिस्टम तथा अन्य इनपुट-आउटपुट डिवाइसों का संचालन (0peration) करता है।
टाइम शेयरिंग ऑपरेटिंग सिस्टम इस प्रकार के ऑपरेटिंग सिस्टम में एक साथ एक से अधिक उपयोगकर्ता या प्रोग्राम कम्प्यूटर के संसाधनों का प्रयोग करते हैं। इस कार्य में, कम्प्यूटर अपने संसाधनों के प्रयोग हेतु प्रत्येक उपयोगकर्ता को समय का एक भाग आवण्टित करते हैं। सीपीयू सभी यूजर्स के कार्य को उनके आवण्टित समय में क्रमानुसार सम्पन्न करता है।
उदाहरण: Mac OS

प्रश्न 2
रियल टाइम ऑपरेटिंग सिस्टम को विस्तार से समझाइए।
उत्तर:
रियल टाइम ऑपरेटिंग सिस्टम एक ऐसा मल्टीटास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम है, जिसमें रियल टाइम एप्लीकेशन्स का क्रियान्वयन (Execution) किया जाता। है। इसमें एक प्रोग्राम के आउटपुट को दूसरे प्रोग्राम के आउटपुट की तरह प्रयोग किया जाता है। यह दो प्रकार के होते हैं।

  • हार्ड रियल टाइम सिस्टम ये सिस्टम किसी महत्त्वपूर्ण कार्य को करने की गारण्टी देते हैं और समय पर कार्य पूरा न होने की स्थिति में प्रोग्राम का क्रियान्वयन (Execution) फेल कर दिया जाता है।
  • सॉफ्ट रियल टाइम सिस्टम इसमें किसी कार्य को करने की डेडलाइन दी जाती है, परन्तु कार्य का निष्पादन डेडलाइन से पहले और बाद में भी पूरा हो। सकता है और इस स्थिति में कार्य का निष्पादन फेल नहीं होता।

प्रश्न 3
निम्न पर टिप्पणी लिखिए।
(i) यूनिक्स
(ii) एम एस डॉस
(iii) लाइनक्स
उत्तर:
(i) यूनिक्स यह एक मल्टीटास्किंग व मल्टी यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम है, जिसे AT & T Bell लैब में रिची एवं थॉमसन नामक इंजीनियरों ने विकसित किया था। यह स्थिर, मल्टीयूजर, मल्टीटास्किंग सिस्टम में प्रयोग किया जाता है।
(ii) लाइनक्स यह यूनिक्स पर आधारित ऑपरेटिंग सिस्टम है, जिसको सन्1991 में लीनस टोरवॉल्ड्स ने विकसित किया था। यह एक ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर है तथा सभी प्रकार के कम्प्यूटर पर चल सकता है। इसका प्रयोग मुख्यतः सर्वर के लिए होता हैं।
(iii) एम एस डॉस यह एक सिंगल यूजर जुलाई, 1981 में माइक्रोसॉफ्ट द्वारा विकसित ऑपरेटिंग सिस्टम है। यह एक नॉन-ग्राफिकल, कमाण्ड लाइन बेस्ड सिस्टम है। यह यूजर फ्रेंडली नहीं है, क्योंकि इसमें कमाण्ड याद रखनी पड़ती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)

प्रश्न 1
ऑपरेटिंग सिस्टम क्या है? इसके द्वारा किए जाने वाले कार्यों का वर्णन कीजिए। [2005]
अथवा
प्रचालन तन्त्र (ऑपरेटिंग सिस्टम) का अर्थ समझाइए [2008]
उत्तर:
ऑपरेटिंग सिस्टम या प्रचालन तन्त्र एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जो मानव, एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर और कम्प्यूटर हार्डवेयर के बीच संवाद स्थापित करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम, सिस्टम सॉफ्टवेयर का एक महत्त्वपूर्ण प्रकार है। इसके बिना कम्प्यूटर से कार्य नहीं किया जा सकता। यह सीपीयू से मिलने वाले सिग्नल्स को कम्प्यूटर के विभिन्न भागों तक पहुँचाता है तथा उन्हें नियन्त्रित करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम कम्प्यूटर तथा यूजर के मध्य सम्बन्ध स्थापित करने का भी कार्य करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम को कण्ट्रोल प्रोग्राम भी कहा जाता है, क्योंकि ये कम्प्यूटर सिस्टम तथा उसकी गतिविधियों को नियन्त्रित करता है।

ऑपरेटिंग सिस्टम द्वारा किए जाने वाले कार्य
यह कम्प्यूटर के सफल संचालन की प्रक्रिया में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसके द्वारा किए जाने वाले कार्य निम्न प्रकार हैं।

(i) प्रोसेसिंग प्रबन्धन कम्प्यूटर के सीपीयू के प्रबन्धन का कार्य ऑपरेटिंग सिस्टम ही करता है।
(ii) मेमोरी प्रबन्धन प्रोग्राम के सफल निष्पादन के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम मेमोरी प्रबन्धन का अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण कार्य करता है, जिसके अन्तर्गत मेमोरी में कुछ स्थान सुरक्षित रखे जाते हैं, जिनका विभाजन प्रोग्रामों के मध्य किया जाता है तथा साथ ही यह भी ध्यान में रखा जाता है कि प्रोग्रामों को मेमोरी के अलग-अलग स्थान प्राप्त हो सकें।
(iii) इनपुट-आउटपुट युक्ति प्रबन्धन डाटा को इनपुट युक्ति से पढ़कर मेमोरी में उचित स्थान पर संग्रहीत करने एवं प्राप्त परिणाम को मेमोरी में आउटपुट यूनिट तक पहुँचाने का कार्य ऑपरेटिंग सिस्टम का ही होता है। प्रोग्राम लिखते समय कम्प्यूटर केवल यह बताता है कि हमें क्या इनपुट करना है और क्या आउटपुट लेना है, बाकि का कार्य ऑपरेटिंग सिस्टम ही करता है।
(iv) फाइल प्रबन्धन ऑपरेटिंग सिस्टम फाइलों को एक सुव्यवस्थित ढंग से किसी डायरेक्टरी में स्टोर करने की सुविधा प्रदान करता है। किसी प्रोग्राम के निष्पादन के समय इसे सेकेण्डरी मेमोरी से पढ़कर प्राइमरी मेमोरी में भेजने का कार्य भी ऑपरेटिंग सिस्टम ही करता है।
(v) सुरक्षा प्रबन्धन जब मल्टी यूजर तथा मल्टीप्रोग्रामिंग सिस्टम प्रयोग में होते हैं, उस समय सैकड़ों की संख्या में प्रोग्राम क्रिया में होते हैं, ऐसे में उन प्रोग्रामों और उनके डाटा की सुरक्षा व्यवस्था एक जटिल कार्य है। ऑपरेटिंग सिस्टम इस बात को सुनिश्चित करता है कि एक गलत तरीके से रन हुआ प्रोग्राम किसी अन्य प्रोग्राम को प्रभावित न करे।
(vi) कम्युनिकेशन ऑपरेटिंग सिस्टम का महत्त्वपूर्ण कार्य नेटवर्किंग के माध्यम से एक यूजर सिस्टम का दूसरे यूजर सिस्टम से कम्यूनिकेशन की सुविधा प्रदान करना है।

प्रश्न 2
कुछ सर्वाधिक प्रचलित पर्सनल कम्प्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम की संक्षिप्त जानकारी दीजिए। [2012]
उत्तर:
सर्वाधिक प्रचलित पर्सनल कम्प्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम इस प्रकार है।

  1. यूनिक्स यह एक मल्टीटास्किंग व मल्टी यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम है, जिसे AT & T Bell लैब में वर्ष 1969 में रिची एवं थॉमसन नामक इंजीनियरों द्वारा विकसित किया गया था। इस ऑपरेटिंग सिस्टम को सर्वर तथा वर्क स्टेशन दोनों में प्रयोग किया जा सकता है। इसमें डाटा प्रबन्धन का कार्य कर्नेल द्वारा होता है।
  2. लाइनक्स यह यूनिक्स का अधिक विकसित संस्करण (Edition) है। यह ऑपरेटिंग सिस्टम सन् 1991 में लीनस टोरवॉल्ड्स द्वारा विकसित किया गया था। लाइनक्स मूल रूप से इण्टेल X86 पर आधारित है।
  3. सोलेरिस इस ऑपरेटिंग सिस्टम का विकास सन माइक्रोसिस्टम्स द्वारा सन् 1992 में किया गया था। ये ऑपरेटिंग सिस्टम, सिस्टम मैनेजमेण्ट तथा नेटवर्क के कार्यों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है।
  4. एम एस डॉस यह एक सिंगल यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम है, जिसे माइक्रोसॉफ्ट द्वारा सन् 1981 में विकसित किया गया था। यह एक नॉन-ग्राफिकल, कमाण्ड लाइन बेस्ड ऑपरेटिंग सिस्टम है। एम एस डॉस यूजर फ्रेंडली नहीं है, क्योंकि इसमें कमाण्ड याद रखनी पड़ती है।
  5. एम एस विण्डोज यह माइक्रोसॉफ्ट द्वारा विकसित ग्राफिकल यूजर इण्टरफेस है। यह सर्वाधिक लोकप्रिय पर्सनल कम्प्यूटर में प्रयुक्त ऑपरेटिंग सिस्टम है।
  6. OS/2 इस ऑपरेटिंग सिस्टम को IBM ने सन् 1987 में लॉन्च किया था। यह ऑपरेटिंग सिस्टम मल्टीटास्किंग तथा GUI बेस्ड होता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 1 कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर

UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 1 कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर are part of UP Board Solutions for Class 12 Computer. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 1 कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Computer
Chapter Chapter 1
Chapter Name कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर
Number of Questions Solved 22
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 1 कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1:
निम्न में से कौन-सा सिस्टम सॉफ्टवेयर नहीं है? [2014]
(a) वर्ड प्रोसेसर
(b) ऑपरेटिंग सिस्टम
(c) कम्पाइलर
(d) लिंकर
उत्तर:
(a) वर्ड प्रोसेसर एक एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर है।

प्रश्न 2
निम्न में से कौन-सा प्रोग्राम एक प्रोग्राम के अनेक भागों को कम्पाइलेशन के बाद आपस में जोड़ता है? [2013]
(a) लिंकर
(b) लोडर
(C) इण्टरप्रेटर
(d) लाइब्रेरियन
उत्तर:
(a) लिंकर

प्रश्न 3
वर्ड प्रोसेसर क्या है? [2016]
(a) सिस्टम सॉफ्टवेयर
(b) एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर
(c) ‘a’ और ‘b’ दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर

प्रश्न 4
टेक्स्ट एडिटर का उदाहरण है।
(a) नोटपैड
(b) प्रिण्टर ड्राइवर
(c) टैली
(d) पेजमेकर
उत्तर:
(a) विण्डोज ऑपरेटिंग सिस्टम में नोटपैड टेक्स्ट एडिटर का उदाहरण है।

प्रश्न 5
कम्प्यूटर के वायरस को डिलीट करने के लिए किसका प्रयोग किया जाता है?
(a) एण्टीवायरस प्रोग्राम
(b) बैकअप यूटिलिटी
(c) डिस्क डिफ़ेग्मेण्टर
(d) डिस्क कम्प्रेशन
उत्तर:
(a) एण्टीवायरस प्रोग्राम

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंकः)

प्रश्न 1
एक से अधिक लाइनों, विवरण, कमेण्टों या निर्देशों के समूह को क्या कहते हैं?
उत्तर:
एक से अधिक लाइनों, विवरण, कमेण्टों या निर्देशों के समूह को प्रोग्राम कहते हैं।

प्रश्न 2
सॉफ्टवेयर की व्याख्या एक वाक्य में कीजिए। [2016]
उत्तर:
कम्प्यूटर के क्षेत्र में निर्देशों के समूह को प्रोगाम कहा जाता है और प्रोग्रामों के समूह को सॉफ्टवेयर कहा जाता है।

प्रश्न 3
लोडर से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
यह ऑपरेटिंग सिस्टम को एक भाग होता है, जो प्रोग्राम तथा लाइब्रेरी को, लोड करने के लिए उत्तरदायी होता है।

प्रश्न 4
एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर को परिभाषित कीजिए। [2017, 11]
उत्तर:
एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर उन प्रोग्रामों को कहा जाता है, जो उपयोगकर्ता के वास्तविक कार्य कराने के लिए लिखे जाते हैं।

प्रश्न 5
एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर के प्रकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
प्लीकेशन सॉफ्टवेयर दो प्रकार के होते हैं।

  • सामान्य उद्देश्य के एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर
  • विशिष्ट उद्देश्य के एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर

प्रश्न 6
यूटिलिटी सॉफ्टवेयर के कोई दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
यूटिलिटी सॉफ्टवेयर के दो उदाहरण निम्नलिखित हैं।

  • टेक्स्ट एडिटर
  • फाइल सॉर्टिग प्रोग्राम

लघु उत्तरीय प्रश्न I (1 अंक)

प्रश्न 1
सॉफ्टवेयर व हार्डवेयर में अन्तर बताइए। [2012]
उत्तर:
सॉफ्टवेयर व हार्डवेयर में निम्न अन्तर है
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 1 कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर img-1

प्रश्न 2
सिस्टम सॉफ्टवेयर व एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर में अन्तर बताइए। [2006, 05]
उत्तर:
सिस्टम सॉफ्टवेयर व एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर में निम्न अन्तर है।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 1 कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर img-2

प्रश्न 3
कम्प्यूटर ग्राफिक्स सॉफ्टवेयर का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। [2017]
उत्तर:
कम्प्यूटर ग्राफिक्स सॉफ्टवेयर एक एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर है, जो कम्प्यूटर पर सेव इमेजिस में बदलाव करने और उन्हें सुन्दर बनाने की अनुमति देते हैं। इन सॉफ्टवेयर्स के द्वारा इमेजिस को रीटच, कलर एडजस्ट, एनहेन्स, शैडो व ग्लो जैसे विशेष इफेक्ट्स दिए जा सकते हैं; जैसे-एडोब फोटोशॉप, पेजमेकर आदि।

प्रश्न 4
सामान्य व विशिष्ट उद्देश्य के सॉफ्टवेयरों का विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग लिखिए।
उत्तर:
सामान्य उद्देश्य के सॉफ्टवेयर का विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग निम्नवत् है

  1. कम्प्यूटर आधारित डिजाइन।
  2. सूचना संचार।
  3. डाटाबेस प्रबन्धन प्रणाली

विशिष्ट उद्देश्य के सॉफ्टवेयर की विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग निम्नवत् है।

  1. रेलवे, वायुयान आदि के आरक्षण हेतु
  2. होटल प्रबन्धन में
  3. अस्पतालों में
  4. स्कूलों व लाइब्रेरी में

प्रश्न 5
निम्नलिखित को परिभाषित कीजिए [2009]
(i) यूटिलिटी सॉफ्टवेयर
(ii) ड्राइवर
उत्तर:
(i) यूटिलिटी सॉफ्टवेयर यह कम्प्युटर के रख-रखाव से सम्बन्धित कार्य करता है। यह कई ऐसे कार्य करता है, जो कम्प्यूटर का उपयोग करते समय हमें कराने पड़ते हैं।
(ii) डाइवर यह एक विशेष प्रकार का सॉफ्टवेयर होता है, जो किसी डिवाइस के प्रचालन (Operation) को समझाता है। यह हार्डवेयर डिवाइस और उपयोगकर्ता के मध्य सॉफ्टवेयर इण्टरफेस प्रदान करता है।

प्रश्न 6
निम्न को परिभाषित कीजिए [2010]
(i) डिस्क डिफ़ेग्मेण्टर
(ii) वायरस स्कैनर
उत्तर:
(i) डिस्क डिफ़ेग्मेण्टर यह कम्प्यूटर की हार्ड डिस्क पर विभिन्न जगहों पर रखी हुई फाइलों को खोजकर उन्हें एक स्थान पर लाता है।
(ii) वायरस स्कैनर यह एक यूटिलिटी प्रोग्राम है, जिसका प्रयोग कम्प्यूटर के वायरस ढूंढने में किया जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न II (3 अंक)

प्रश्न 1
निम्नलिखित पर टिप्पणी कीजिए। [2013]
(i) लोडर
(ii) सब-प्रोग्राम अथवा मॉड्यूल
उत्तर:
(i) लोडर यह ऑपरेटिंग सिस्टम का एक भाग होता है, जो किसी एक्जीक्यूटेबल फाइल को मुख्य मेमोरी में लोड करने का कार्य करता है। यह लिंकर द्वारा कम्पाइल किए गए प्रोग्राम को एक साथ जोड़कर कार्य करने योग्य बनाता है।
(ii) सब-प्रोग्राम या मॉड्यूल सब-प्रोग्राम या मॉड्यूल ऐसा प्रोग्राम है, जो किसी निर्धारित टास्क या फंक्शन को चलाने के लिए एक अन्य प्रोग्राम द्वारा कॉल किया जाता है।

प्रश्न 2
कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर कितने प्रकार के होते हैं? उदाहरण सहित समझाइए। [2002]
उत्तर:
कम्प्यूटर के क्षेत्र में निर्देशों के समूह को प्रोग्राम कहा जाता है और प्रोग्रामों के समूह को सॉफ्टवेयर कहा जाता है।
कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर तीन प्रकार के होते हैं।

  1. सिस्टम सॉफ्टवेयर इस प्रकार के सॉफ्टवेयर्स कम्प्युटर को चलाने, उसको नियन्त्रित करने, उसके विभिन्न भागों की देखभाल करने तथा उसकी सभी । क्षमताओं का सही प्रकार से उपयोग करने के लिए बनाए जाते हैं।
    उदाहरण ऑपरेटिंग सिस्टम, लिंकर, लोडर आदि।
  2. एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर इस प्रकार के सॉफ्टवेयर्स उपयोगकर्ता के वास्तविक कार्य कराने के लिए बनाए जाते हैं। ये कार्य हर कम्पनी या उपयोगकर्ता के लिए अलग-अलग होते हैं, इसलिए उपयोगकर्ता की आवश्यकतानुसार इसके प्रोग्राम प्रोग्रामर द्वारा लिखे जाते हैं। उदाहरण एमएस-वर्ड, एमएस-एक्सेल, टैली आदि।
  3. यूटिलिटी सॉफ्टवेयर ये सॉफ्टवेयर्स कम्प्यूटर के कार्यों को सरल बनाने, उसे अशुद्धियों से दूर रखने तथा सिस्टम के विभिन्न सुरक्षा कार्यों के लिए बनाए जाते हैं। ये कम्प्यूटर के निर्माता द्वारा ही उपलब्ध कराए जाते हैं। उदाहरण टेक्स्ट एडिटर, डिस्क क्लीनर्स आदि।

प्रश्न 3
एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर को विस्तार में समझाइए।
उत्तर:
यह उन प्रोग्रामों का समूह होता है, जो उपयोगकर्ता के वास्तविक कार्य कराने के लिए बनाए जाते हैं; जैसे-स्टॉक की स्थिति का विवरण देना, लेन-देन व खातों का हिसाब रखना आदि। मुख्य रूप से प्रयोग होने वाले एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर: जैसे-एमएस वर्ड, एमएस-एक्सेल, टैली, पेजमेकर, फोटोशॉप आदि हैं।
सामान्यतः एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर्स दो प्रकार के होते हैं, जो निम्न हैं ।

  • सामान्य उद्देश्य के एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर प्रोग्रामों का वह समूह, जिसे यूजर्स अपनी आवश्यकतानुसार अपने सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उपयोग करता है, सामान्य उद्देश्य का सॉफ्टवेयर कहलाता हैं। जैसे-ग्राफिक्स सॉफ्टवेयर, स्प्रेडशीट, डाटाबेस प्रबन्धन आदि।
  • विशिष्ट उद्देश्य के एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर प्रोग्रामों का वह समूह, जो एक विशेष प्रकार के कार्य को निष्पादित करने के लिए प्रयोग किया जाता है, विशिष्ट उद्देश्य का सॉफ्टवेयर कहलाता है; जैसे-होटल प्रबन्धन सम्बन्धी सॉफ्टवेयर का प्रयोग बुकिंग विवरण, बिलिंग विवरण आदि को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)

प्रश्न 1
सिस्टम सॉफ्टवेयर से आपका क्या तात्पर्य है? इनके प्रमुख कार्यों को लिखिए। [2009]
अथवा
सिस्टम सॉफ्टवेयर पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [2010]
उत्तर:
ऐसे प्रोग्राम जो कम्प्यूटर को चलाने, नियन्त्रित करने, उसके विभिन्न भागों की देखभाल करने तथा उसकी सभी क्षमताओं का सही प्रकार से उपयोग करने के लिए बनाए जाते हैं, उनको सम्मिलित रूप से ‘सिस्टम सॉफ्टवेयर’ कहा जाता है। कम्प्यूटर से हमारा सम्पर्क या संवाद सिस्टम सॉफ्टवेयर के माध्यम से ही हो पाता है।

सिस्टम सॉफ्टवेयर्स निम्न प्रकार के होते हैं।

  • ऑपरेटिंग सिस्टम इसमें वे प्रोग्राम्स शामिल होते हैं, जो कम्प्यूटर के विभिन्न अवयवों के कार्यों को नियन्त्रित करते हैं, उनमें समन्वय स्थापित करते हैं। तथा उन्हें प्रबन्धित करते हैं। इनका प्रमुख कार्य उपयोगकर्ता तथा हार्डवेयर के मध्य एक समन्वय स्थापित करना है।
  • लिंकर यह एक ऐसा प्रोग्राम होता है, जो पहले से कम्पाइल की गई एक या एक से अधिक ऑब्जेक्ट फाइलों को एक साथ जोड़कर उन्हें क्रियान्वयन के लिए तैयार कर बड़े प्रोग्राम का रूप प्रदान करता है।
  • लोडर यह ऑपरेटिंग सिस्टम का एक भाग होता है, जो प्रोग्राम तथा लाइब्रेरी को लोड करने के लिए उत्तरदायी होता है। लोडर निर्देशों की एक श्रृंखला होती है, जो किसी एक्जीक्यूटेबल प्रोग्राम को मुख्य मेमोरी में लोड करने का कार्य करता है, ताकि सीपीयू उसे एक्सेस कर सके।
  • डिवाइस ड्राइवर यह एक विशेष प्रकार का सॉफ्टवेयर होता है, जो किसी डिवाइस के प्रचालन को समझाता है। एक ड्राइवर हार्डवेयर डिवाइस और उपयोगकर्ता के मध्य सॉफ्टवेयर इण्टरफेस प्रदान करता है। किसी भी डिवाइस को सुचारु रूप से चलाने के लिए उसके साथ एक ड्राइवर प्रोग्राम जुडा होता हैं।

प्रश्न 2
यूटिलिटी सॉफ्टवेयर क्या होता है? उदाहरण सहित समझाइए।
अथवा
यूटिलिटी सॉफ्टवेयर का अर्थ तथा कार्य समझाइए। ऐसे किन्हीं दो सॉफ्टवेयर्स का वर्णन भी कीजिए।[2009]
उत्तर:
ये प्रोग्राम्स कम्प्यूटर के रख-रखाव से सम्बन्धित कार्य करते हैं। प्रोग्राम्स कम्प्यूटर के कार्यों को सरल बनाने, उसे अशुद्धियों से दूर करने तथा सिस्टम के विभिन्न सुरक्षा कार्यों के लिए बनाए जाते हैं। यूटिलिटी सॉफ्टवेयर, कई
ऐसे कार्य करता है, जो कम्प्यूटर का उपयोग करते समय हमें कराने पड़ते हैं।
यूटिलिटी सॉफ्टवेयर के प्रमुख उदाहरण निम्न है।

  1. टेक्स्ट एडिटर यह एक ऐसा प्रोग्राम होता है, जो टेक्स्ट फाइलों के निर्माण और उनके सम्पादन की सुविधा देता है। इसका उपयोग केवल टेक्स्ट टाइप करने में किया जाता है। विण्डोज ऑपरेटिंग सिस्टम में नोटपैड एक ऐसा ही प्रोग्राम है।
  2. फाइल सॉटिंग प्रोग्राम ये ऐसे प्रोग्राम होते हैं, जो किसी डाटा फाइल के रिकॉर्डो को यूजर के किसी इच्छित क्रम (Order) में लगा सकते हैं। फाइल सॉर्टिग किसी विशेष सूचना को ढूंढने के लिए उपयोगी होती है।
  3. डिस्क डिफ़ेग्मेण्टर यह कम्प्यूटर की हार्ड डिस्क पर विभिन्न जगहों पर रखी हुई फाइलों को खोजकर उन्हें एक स्थान पर लाता है।
  4. बैकअप यूटिलिटी यह कम्प्यूटर की डिस्क पर उपस्थित सारी सूचनाओं की एक कॉपी रखता है तथा जरूरत पड़ने पर कुछ जरूरी फाइलें या पूरी हार्ड डिस्क के कण्टेण्ट को वापस रिस्टोर कर देता है।
  5. एण्टीवायरस प्रोग्राम ये ऐसे यूटिलिटी प्रोग्राम्स होते हैं, जिनका प्रयोग कम्प्यूटर के वायरस ढूंढने और उन्हें डिलीट (Delete) करने में किया जाता है।
  6. डिस्क क्लीनर्स यह उन फाइलों को ढूंढकर डिलीट करता है, जिनका बहुत समय से उपयोग नहीं हुआ है। इस प्रकार यह कम्प्यूटर की गति को भी तेज करता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests (उपलब्धि तथा उपलब्धि परीक्षण) are part of UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests (उपलब्धि तथा उपलब्धि परीक्षण).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 24
Chapter Name Achievement and Achievement Tests
(उपलब्धि तथा उपलब्धि परीक्षण)
Number of Questions Solved 30
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests (उपलब्धि तथा उपलब्धि परीक्षण)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
उपलब्धि परीक्षण से आप क्या समझते हैं ? निबन्धात्मक परीक्षण के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए। [2014, 15]
या
निबन्धात्मक परीक्षण के गुण और दोषों की विवेचना कीजिए। [2013]
या
निबन्धात्मक परीक्षणों की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? इनके गुण-दोषों पर प्रकाश डालिए। [2014]
या
निबन्धात्मक परीक्षण के दोषों को बताइए। [2008, 12]
उत्तर :
उपलब्धि परीक्षण
प्रत्येक विद्यालय में विद्यार्थी ज्ञान प्राप्त करने के लिए जाते हैं। एक निश्चित समय में विद्यार्थियों ने कितना ज्ञान अर्जित किया तथा जीवन की परिस्थितियों में उसे कहाँ तक हस्तान्तरित किया आदि की जाँच उपलब्धि परीक्षण द्वारा की जाती है। अध्यापक उपलब्धि परीक्षाओं द्वारा समय-समय पर यह जानने का प्रयास करता है कि कक्षा में प्रदान किया जाने वाला ज्ञान विद्यार्थियों ने किस सीमा तक ग्रहण कर लिया है।

विभिन्न विद्वानों ने उपलब्धि परीक्षणों की परिभाषाएँ निम्नलिखित शब्दों में दी हैं

  1. हेनरी चौनसी (Henry Chauncy) के अनुसार, “प्रत्येक उपलब्धि परीक्षा में छात्रों को किसी-न-किसी रूप में अपने प्राप्त ज्ञान का इस प्रकार प्रदर्शन करना पड़ता है, जिससे उसका अवलोकन और मूल्यांकन किया जा सके।”
  2.  गैरीसन (Garrison) के अनुसार, “उपलब्धि परीक्षा बालक की वर्तमान योग्यता या किसी विशिष्ट विषय के क्षेत्र में उसके ज्ञानार्जन की सीमा का मापन करती है।”
  3. फ्रीमैन (Freeman) के अनुसार, “एक उपलब्धि परीक्षा वह है जिसका निर्माण ज्ञान समूह में कौशल के मापन के लिए किया जाता है।”

निबन्धात्मक परीक्षण
आजकल हमारे देश में निबन्धात्मक परीक्षाओं का अधिक प्रचलन है। ये परीक्षाएँ एक प्रकार से राष्ट्रीय शिक्षा का अंग हो गयी हैं। इनमें छात्रों को कुछ प्रश्न दिये जाते हैं और छात्र उनके उत्तर लिखित रूप में देते हैं। उत्तर देने का समय निर्धारित होता है। यह परीक्षा की परम्परागत प्रणाली है।

गुण :
निबन्धात्मक परीक्षाओं के निम्नलिखित गुण हैं।

  1. इन परीक्षाओं का आयोजन सरलतापूर्वक किया जा सकता है।
  2. इन परीक्षाओं के प्रश्नों को सुगमता से तैयार किया जा सकता है।
  3. यह विधि समस्त विषयों के लिए उपयोगी है।
  4. इसमें बालक को पूर्ण अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रहती है।
  5. यह प्रणाली बालकों के लिए भी सुगम होती है, क्योंकि प्रश्न-पत्र समझने में उन्हें विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  6. छात्रों की तर्क, विचार संगठन तथा चिजन शक्ति का ज्ञान कराने में ये परीक्षाएँ विशेष सहायक होती हैं।
  7. यह प्रणाली छात्रों को परिश्रम करने के लिए प्रेरित करती है।
  8. यह प्रणाली बालकों के अर्जित ज्ञान का वास्तविक मूल्यांकन करती है।

दोष :
निबन्धात्मक परीक्षाओं में निम्नांकित दोष भी हैं

  1. निबन्धात्मक परीक्षाएँ केवल पुस्तकीय ज्ञान का मूल्यांकन करती हैं। इनके द्वारा छात्र की विभिन्न क्षमताओं का मूल्यांकन नहीं हो पाता।।
  2. इस परीक्षा में सम्पूर्ण पाठ्यक्रम के समस्त भागों में प्रश्न नहीं पूछे जाते हैं। जो भाग शेष रहता है, उसका मूल्यांकन नहीं हो पाता।
  3. इस परीक्षा का प्रमुख दोष यह है कि छात्र अनुमान के आधार पर ही परीक्षा की तैयारी करते हैं। इस प्रकार कम परिश्रम करके उन्हें सफलता मिल जाती है।
  4. निबन्धात्मक परीक्षा में मूल्यांकन कठिनता से होता है। मूल्यांकन के लिए प्रत्येक प्रश्न के उत्तर को। पढ़ना आवश्यक है, परन्तु यह एक कठिन कार्य है।
  5. इनमें आत्मनिष्ठता का प्रभाव रहता है। छात्रों द्वारा दिये गये प्रश्नों के उत्तरों का मूल्यांकन करते समय परीक्षक के विचारों, अभिवृत्ति तथा मानसिक स्तर का भी प्रभाव पड़ता है। एक उत्तर-पुस्तिका की। यदि विभिन्न परीक्षकों से जाँच कराई जाए, तो विभिन्न परिणाम देखने में आएँगे। एक उत्तर में यदि एक । अध्यापक आठ अंक देता है, तो उसी उत्तर में दूसरा अध्यापक तीन अंक भी प्रदान कर सकता है।
  6. निबन्धात्मक परीक्षाएँ विश्वसनीय नहीं होतीं। यदि एक ही उत्तर-पुस्तिका को एक ही अध्यापक जाँचने के कुछ काला पश्चात् पुनः जाँचे तो दोनों बार के अंकों में पर्याप्त अन्तर मिलती है।
  7. इस परीक्षा के परिणामों के आधार पर छात्र के विषय में निश्चित रूप से कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। इस परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाला छात्र आवश्यक नहीं कि व्यावहारिक जीवन में भी सफलता प्राप्त करे, क्योंकि इस परीक्षा में अंक प्राप्ति रटने की शक्ति, लेखी शक्ति तथा संयोग पर बहुत कुछ निर्भर करती है।
  8. यह परीक्षा प्रणाली छात्रों के स्वास्थ्य पर बुरे प्रभाव डालती है। छात्र वर्ष-भर तो कुछ पढ़ते-लिखते नहीं हैं, परन्तु परीक्षा के निकट आने पर दिन-रात पढ़कर परीक्षा पास करने का प्रयास करते हैं। फलतः उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 2
वस्तुनिष्ठ परीक्षण से आप क्या समझते हैं ? वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के प्रकारों एवं गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए। [2007, 12]
या
वस्तुनिष्ठ परीक्षण से आप क्या समझते हैं ? इस परीक्षण के गुणों का उल्लेख कीजिए। [2007, 13]
या
वस्तुनिष्ठ परीक्षा-प्रणाली के दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
वस्तुनिष्ठ परीक्षण
निबन्धात्मक परीक्षण के दोषों को दूर करने के लिए शिक्षाशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों ने वस्तुनिष्ठ परीक्षणों का प्रतिपादन किया। सर्वप्रथम 1854 ई० में होरेसमेन (Horaceman) ने वस्तुनिष्ठ परीक्षण का निर्माण किया। वस्तुनिष्ठ परीक्षणों में प्रश्नों का स्वरूप ऐसा होता है कि उनका उत्तर पूर्ण रूप से निश्चित होता है। इन प्रश्नों के उत्तर में सम्बन्धित व्यक्ति की रुचि, पसन्द या दृष्टिकोण का कोई महत्त्व नहीं होता। वस्तुनिष्ठ प्रश्न का उत्तर प्रत्येक उत्तरदाता के लिए एक ही होता है।

गुड (Good) ने वस्तुनिष्ठ परीक्षण को स्पष्ट करते हुए कहा :
“वस्तुनिष्ठ परीक्षा प्रायः सत्य-असत्य उत्तर, बहुसंख्यक चुनाव, मिलान या पूरक प्रश्नों पर आधारित होती है, जिनको शुद्ध उत्तरों की सहायता से अंकन किया जाता है। यदि कोई उत्तर तालिका के विपरीत होता है, तो उसे अशुद्ध माना जाता है।” वर्तमान परीक्षा में वस्तुनिष्ठ परीक्षणों को अत्यधिक महत्त्व दिया जा रहा है।

वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के प्रकार
वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं

1. सत्य-असत्य परीक्षण :
इन परीक्षणों में ‘सत्य’ या ‘असत्य में छात्र उत्तर देते हैं।
निर्देश :
निम्नलिखित कथन यदि शुद्ध हों तो सत्य’ और अशुद्ध हों तो ‘असत्य’ को रेखांकित कीजिए-

  1. बाबर का जन्म 1525 में हुआ था। सत्य/असत्य
  2. कार्बन डाइऑक्साइड जलने में सहायक नहीं है। सत्य/असत्य
  3. ऑक्सीजन जीवधारियों के लिए अनिवार्य है। सत्य/असत्य
  4. रामचरितमानस की रचना तुलसीदास ने की थी। सत्य/असत्य

2. सरल पुनः स्मरण परीक्षण :
इन प्रश्नों का उत्तर छात्र स्वयं स्मरण करके लिखता है।
निर्देश :
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर उनके समक्ष कोष्ठकों में लिखो

  1. प्लासी का युद्ध कब हुआ था ? ( )
  2. सविनय अवज्ञा आन्दोलन किसने चलाया था? ( )
  3. महाभारत ग्रन्थ की रचना किसने की थी ? ( )
  4. उत्तर प्रदेश का वर्तमान राज्यपाल कौन है ? ( )

3. पूरक परीक्षण :
इस परीक्षण में छात्र वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति करते हैं।
निर्देश :
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

  1. भारत के प्रधानमन्त्री की नियुक्ति ………….. करता है।
  2. मुख्यमन्त्री विधानसभा के ………….. का नेता होता है।
  3. मूल अधिकारों की रक्षा …………..करता है।
  4. राज्य व्यवस्थापिका के उच्च सदन को …………..कहते हैं।
  5. ‘कामायनी’ की रचना ………….. ने की थी।

4. बहुसंख्यक चुनाव या बहुविकल्पीय परीक्षण :
इस परीक्षण में छात्रों को दिये हुए अनेक उत्तरों में से ठीक उत्तर का चुनाव करना पड़ता है।
निर्देश :
सही कथन के सामने कोष्ठक में सही का चिह्न लगाओराज्य के प्रशासन का वास्तविक प्रधान

  1. राष्ट्रपति होता है।
  2. प्रधानमन्त्री होता है।
  3. राज्यपाल होता है।
  4. मुख्यमन्त्री होता है।

5. मिलान परीक्षण :
इस परीक्षण में छात्रों को दो पदों में मिलान करके कोष्ठक में सही पद लिखना पड़ता है।
निर्देश :
नीचे कुछ घटनाओं का उल्लेख किया जा रहा है। उनके सामने अव्यवस्थित रूप में उनसे सम्बन्धित तिथियाँ दी हुई हैं। प्रत्येक कोष्ठक में सम्बन्धित सही तिथि लिखो
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वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के गुण
वस्तुनिष्ठ परीक्षणों में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं|

1. विश्वसनीयता :
वस्तुनिष्ठ परीक्षण का सबसे बड़ा गुण उसकी विश्वसनीयता (Reliability) है। इसमें ही परीक्षण में विभिन्न समय में प्राप्त अंकों की समानता रहती है, अर्थात् एक उत्तर को कितनी ही बार जाँचा जाए, उसमें  अन्तर की सम्भावना नहीं रहती।

2. वस्तुनिष्ठता :
यह परीक्षण वस्तुनिष्ठ होता है। इसमें परीक्षण के मूल्यांकन पर परीक्षक की मानसिक स्थिति, रुचि, अभिवृत्ति तथा छात्रों के सुलेख का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसका मूल कारण। प्रश्नों के उत्तरों का निश्चित तथा छोटा होना है।

3. वैधता :
वस्तुनिष्ठ परीक्षण का अन्य गुण है-उसकी वैधता (Validity)। ये परीक्षण उसी निर्धारित योग्यता का मापन करते हैं, जिसके लिए इनका निर्माण किया जाता है।

4. उपयोगिता :
इन परीक्षणों के परिणामों के आधार पर छात्रों को शैक्षणिक तथा व्यावसायिक निर्देशन दिया जा सकता है।

5. विभेदीकरण :
ये परीक्षण प्रतिभाशाली और मन्दबुद्धि बालकों के मध्य भेद को स्पष्ट कर देते हैं।

6. व्यापकता :
इन परीक्षणों में पाठ्यक्रम के अन्तर्गत पढ़ाये जाने वाले समस्त प्रकरणों को शामिल किया जा सकता है। इस प्रकार बालकों द्वारा किये गए सम्पूर्ण अर्जित ज्ञान का मापन सम्भव हो जाता है।

7. मूल्यांकन में सुविधा :
वस्तुनिष्ठ परीक्षण का मूल्यांकन बहुत सुविधाजनक ढंग से हो जाता है, क्योंकि उत्तर निश्चित और छोटे होते हैं। दूसरे, इस प्रणाली में अंकन, उत्तर की तालिका की सहायता से किया जा सकता है।

8. ज्ञान की यथार्थता का परीक्षण :
निबन्धात्मक परीक्षण में छात्र प्रभावशाली भाषा का प्रयोग करके अपने ज्ञान की कमी को भी छिपा जाता है, परन्तु वस्तुनिष्ठ परीक्षणों में ऐसा सम्भव नहीं है, क्योंकि छात्रों को अति संक्षिप्त उत्तर देने पड़ते हैं। अतः वे अपनी अज्ञानता को भाषा के आडम्बर में नहीं छिपा सकते। इस प्रकार इन परीक्षणों में छात्रों के ज्ञान की यथार्थ जाँच की जाती है।

9. धन की बचत :
इन परीक्षणों में छात्रों को कम लिखना पड़ता है। प्रायः दो या तीन पृष्ठों की पुस्तिकाएँ पर्याप्त होती हैं। इस प्रकार धन की काफी बचत हो जाती है।

10. समय की बचत :
इस प्रणाली में छात्रों व अध्यापक दोनों के समय की बचत होती है, क्योंकि छात्रों को कम लिखना पड़ता है और अध्यापक को कम जाँचना पड़ता है।

11. रटने की प्रवृत्ति का अन्त :
इस प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह रटने की प्रवृत्ति का अन्त कर देती है। इसमें प्रश्नों के उत्तरों को रटने से काम नहीं चलता। विषय-वस्तु को ध्यान से पढ़ना आवश्यक हो जाता है।

12. छात्रों का सन्तोष :
निबन्धात्मक परीक्षण से छात्रों को सन्तोष नहीं मिलती, क्योंकि छात्रों का मूल्यांकन ठीक प्रकार से नहीं हो पाता और उन्हें ठीक प्रकार से अंक नहीं मिलते। परन्तु वस्तुनिष्ठ परीक्षण में छात्रों को ठीक अंक मिलते हैं, जिनसे उनको पूर्ण सन्तोष मिलता है।

वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के दोष
वस्तुनिष्ठ परीक्षणों में कुछ दोष भी पाये जाते हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है

1.निर्माण में कठिनाई :
वस्तुनिष्ठ परीक्षण का निर्माण निबन्धात्मक परीक्षण की तुलना में अधिक कठिनाई से होता है। छोटे-छोटे प्रश्नों के निर्माण में अनेक कठिनाइयाँ आती हैं।

2. अपूर्ण सूचना :
इन परीक्षणों से छात्रों के ज्ञान की अपूर्ण सूचना प्राप्त होती है, क्योंकि छोटे-छोटे उत्तरों द्वारा पूर्ण ज्ञान की जानकारी प्राप्त नहीं की जा सकती।

3. आलोचनात्मक तथ्यों व समस्याओं की उपेक्षा :
इन परीक्षणों का सबसे बड़ा दोष यह है। कि इनमें आलोचनात्मक तथ्यों तथा विभिन्न समस्याओं की पूर्ण उपेक्षा की जाती है। वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के प्रश्नों के उत्तर पूर्णतया निश्चित होते हैं। अत: उनमें आलोचना तथा समस्या समाधान का कोई स्थान नहीं होता, परन्तु राजनीति, इतिहास, साहित्य आदि का अध्ययन बिना आलोचना तथा समस्या विवेचन के पूर्ण नहीं हो सकता।

4. उच्च मानसिक योग्यताओं को मापन असम्भव :
इन परीक्षणों के द्वारा छात्रों की चिन्तन, मनन तथा तर्क शक्ति की जाँच सम्भव नहीं है। इस प्रकार उनकी उच्च मानसिक योग्यताओं का मापन सम्भव नहीं हो पाता।

5. केवल तथ्यात्मक ज्ञान की जाँच :
इन परीक्षणों द्वारा केवल तथ्यात्मक ज्ञान का पता चलता है। शेष क्षमताओं का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

6. भाव प्रकाशन की अवरुद्धता :
इन परीक्षणों में छात्रों की भाव प्रकाशन की शक्ति को विकसित होने का अवसर नहीं मिलता, क्योंकि वे अति संक्षिप्त उत्तर देते हैं।

7. अनुमान को प्रोत्साहन :
इस प्रकार के परीक्षणों से छात्रों में अनुमान लगाने की प्रवृत्ति का विकास होता है। वे विचार तथा बुद्धि का प्रयोग न करके केवल अनुमान से ही ‘सत्य’ या ‘अंसत्य’ पर चिह्न लगा देते हैं।

8. भाषा व शैली की उपेक्षा :
इन परीक्षणों में भाषा व शैली की पूर्ण उपेक्षा की जाती है। अत: छात्रों की भाषा व शैली का उचित दिशा में विकास नहीं हो पाता।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
उपलब्धि परीक्षणों के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए। [2012, 13]
उत्तर :
उपलब्धि परीक्षण के निम्नांकित उद्देश्य हैं।

  1. छात्रों की क्षमताओं तथा योग्यताओं का ज्ञान कराना।
  2. यह पता लगाना कि बालकों ने अर्जित ज्ञान को किस सीमा तक आत्मसात् किया है।
  3. बालकों को अर्जित ज्ञान को उचित ढंग से अभिव्यक्त करने के लिए प्रेरित करना।।
  4. बालकों की उपलब्धि के सामान्य स्तर का निर्धारण करना।
  5. ज्ञानार्जन के क्षेत्र में बालकों की वास्तविक स्थिति का पता लगाना।
  6. बालकों के ज्ञान की सीमा का मापन करना।
  7. यह ज्ञात करना कि बालक पाठ्यक्रम के लक्ष्यों या उद्देश्यों की ओर अग्रसर हो रहे हैं या नहीं।
  8. यह पता लगाना कि अध्यापक का शिक्षण किस सीमा तक सफल रहा है।
  9. प्रशिक्षण के परिणामों का मूल्यांकन करना।

प्रश्न 2
बुद्धि परीक्षण तथा उपलब्धि परीक्षण में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2007, 10, 13, 15]
उत्तर :
बुद्धि परीक्षण तथा उपलब्धि परीक्षण में निम्नलिखित अन्तर हैं
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प्रश्न 3
वस्तुनिष्ठ परीक्षण और निबन्धात्मक परीक्षण में अन्तर बताइए। [2014, 15]
उत्तर :
वस्तुनिष्ठ परीक्षण में तथ्यों पर आधारित उत्तर दिये जाते हैं। इसमें उत्तरदाता की रुचि, पसन्द या दृष्टिकोण का कोई स्थान नहीं होता। इससे भिन्न निबन्धात्मक के परीक्षण में उत्तरदाता के दृष्टिकोण, पसन्द, रुचि एवं शैली आदि को समुचित महत्त्व दिया जाता है। वस्तुनिष्ठ परीक्षण में अति संक्षिप्त तथा निश्चित उत्तर देना होता है, जबकि निबन्धात्मक परीक्षण में विस्तृत उत्तर देने को प्रावधान होता है। वस्तुनिष्ठ परीक्षण में मूल्यांकन सरल तथा निष्पक्ष होता है, जबकि निबन्धात्मक परीक्षण में मूल्यांकन कठिन होता है तथा इसमें पक्षपात की पर्याप्त सम्भावना होती है। इसमें परीक्षणकर्ता के व्यक्तिगत दृष्टिकोण का भी महत्त्व होता है।

प्रश्न 4
निबन्धात्मक परीक्षण से क्या आशय है?
उत्तर :
वर्तमान औपचारिक शिक्षा :
प्रणाली के अन्तर्गत ज्ञानार्जन के लिए मुख्य रूप से निबन्धात्मक परीक्षणों को अपनाया जाता है। निबन्धात्मक परीक्षण निश्चित रूप से लिखित परीक्षा के रूप में आयोजित किये जाते हैं। इस प्रणाली के अन्तर्गत किसी भी विषय के निर्धारित पाठ्यक्रम से सम्बन्धित कुछ प्रश्नों को एक प्रश्न-पत्र के रूप में एकत्र कर लिया जाता है तथा उनमें से कुछ प्रश्नों का विस्तृत उत्तर लिखित रूप में एक निर्धारित समयावधि में देना होता है।

परीक्षणकर्ता उत्तर :
पुस्तिका को पढ़कर छात्र/छात्रा के ज्ञानार्जन स्तर का मूल्यांकन कर लेता है तथा अंक प्रदान कर देता है। इस परीक्षण के भी कुछ गुण-दोष हैं। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि यह परीक्षण-प्रणाली एक व्यक्तिनिष्ठ परीक्षण प्रणाली है तथा इसके माध्यम से छात्र/छात्रा के सम्पूर्ण ज्ञानार्जन का सही तथा तटस्थ मूल्यांकन नहीं हो पाता।

प्रश्न 5
निबन्धात्मक परीक्षण प्रणाली में सुधार के लिए कुछ सुझाव दीजिए।
उत्तर :
निबन्धात्मक परीक्षा के दोषों को दूर करने के लिए निम्नलिखित सुझावों को अपनाया जा सकता है

  1. प्रश्नों का निर्माण सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को ध्यान में रखकर किया जाए।
  2. परीक्षा प्रश्न-पत्र में पहले सरल और बाद में कठिन प्रश्न रखे जाएँ।
  3. समस्त प्रश्न अनिवार्य हों।
  4. परीक्षण को शिक्षण प्रक्रिया का साधन माना जाए, साध्य नहीं।
  5. निबन्धात्मक प्रश्नों के साथ वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को भी रखा जाए।
  6. मौखिक परीक्षा को भी स्थान दिया जाए।
  7. परीक्षाओं द्वारा यह जानने का प्रयास न किया जाए कि छात्र कितना नहीं जानता, वरन् यह जानने का प्रयास किया जाए कि छात्र कितना जानता है।
  8. परीक्षकों का यह स्पष्ट उद्देश्य होना चाहिए कि वे किस बात की परीक्षा लेना चाहते हैं।
  9. अंक प्रदान करने के स्थान पर श्रेणियों का प्रयोग किया जाए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
उपलब्धि-लब्धि से क्या आशय है?
उत्तर :
बौद्धिक परीक्षणों के आधार पर बौद्धिक योग्यता की गणना करने के लिए बुद्धि-लब्धि की अवधारणा विकसित की गयी थी तथा इसी अवधारणा के समानान्तर एक अन्य अवधारणा निर्धारित की गई, जिसे ज्ञान-लब्धि या उपलब्धि-लब्धि के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 2
विद्यालयों में उपलब्धि परीक्षण का क्या उपयोग है?
उत्तर :
विद्यालय शिक्षा के औपचारिक अभिकरण हैं। विद्यालयों में योजनाबद्ध ढंग से नियमित रूप से शिक्षण-कार्य होता है। छात्रों द्वारा ग्रहण की गयी शिक्षा के मूल्यांकन के लिए निर्धारित परीक्षणों को ही उपलब्धि परीक्षण कहते हैं। उपलब्धि परीक्षण से छात्रों द्वारा अर्जित ज्ञान एवं योग्यता का तटस्थ मूल्यांकन किया जाता है। छात्रों को अगली कक्षा में भेजने के लिए तथा शैक्षिक योग्यता का प्रमाण-पत्र प्रदान करने के लिए उपलब्धि परीक्षण ही सर्वाधिक आवश्यक एवं उपयोगी होता है।

प्रश्न 3
उपलब्धि परीक्षणों के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए। [2014, 15]
उत्तर :
डगलस (Douglas) तथा हालैंड (Holland) ने उपलब्धि परीक्षाओं का विभाजन निम्नवत् किया है

    1. प्रामाणिक परीक्षण (Standardized Tests)।
    2. शिक्षक निर्मित परीक्षण (Teacher Made Tests)।
      • आत्मनिष्ठ परीक्षण (Subjective Tests)।
      • वस्तुनिष्ठ परीक्षण (Objective Tests)।
        • सौखिक परीक्षण (Objective Tests)।
        • र्निबन्धात्मक परीक्षण (Essay Type Tests)।

प्रश्न 4
मौखिक परीक्षण से क्या आशय है?
उत्तर :
उपलब्धि या ज्ञानार्जन परीक्षण का प्राचीनतम तथा सर्वाधिक लोकप्रिय स्वरूप मौखिक परीक्षण रही है। इस प्रकार के परीक्षण के अन्तर्गत परीक्षणकर्ता अर्थात् शिक्षक या अध्यापक द्वारा छात्र/छात्रा से विषय से सम्बन्धित कुछ प्रश्न आमने-सामने बैठकर पूछे जाते हैं। छात्र/छात्रा द्वारा दिए । गए उत्तरों की शुद्धता/अशुद्धता या ठीक/गलत के आधार पर उसके ज्ञान का समुचित मूल्यांकन कर लिया जाता है।

यह सत्य है कि यह एक प्रत्यक्ष परीक्षण है तथा इस परीक्षण के अन्तर्गत परीक्षणकर्ता से पूछे गए प्रश्नों के उत्तर के साथ-ही-साथ कुछ अन्य उपायों द्वारा भी परीक्षादाता के ज्ञान का अनुमान लगा सकता है। परन्तु इस परीक्षण के कुछ दोष भी हैं; यथा-छात्र/छात्रा का घबरा जाना या भयभीत हो जाना, वाणी-दोष या आत्म-विश्वास की कमी के कारण सही उत्तर न दे पानी।

प्रश्न 5
क्रियात्मक परीक्षण से क्या आशय है? [2014, 15]
उत्तर :
छात्र-छात्राओं के उपलब्धि परीक्षण के लिए क्रियात्मक परीक्षणों को भी अपनाया जाता है। इन परीक्षणों के अन्तर्गत विषय से सम्बन्धित कुछ कार्यों को यथार्थ रूप से करवाया जाता है तथा परीक्षमादाता द्वारा किए गए कार्यों को देखकर उनके ज्ञानार्जन का समुचित मूल्यांकन कर लिया जाता है। सामान्य रूप से क्रियात्मक परीक्षणों के अन्तर्गत विषय से सम्बन्धित कुछ प्रश्न मौखिक रूप से भी पूछे जाते हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि सभी विषयों में क्रियात्मक परीक्षणों को सफलतापूर्वक आयोजन नहीं किया जा सकता। केवल प्रयोगात्मक विषयों का परीक्षण ही क्रियात्मक परीक्षण के माध्यम से किया जा सकता है। शुद्ध सैद्धान्तिक विषयों का परीक्षण इस आधार पर नहीं किया जा सकता।

प्रग 6
वस्तुनिष्ठ परीक्षण से क्या आशय है?
उत्तर :
निबन्धात्मक परीक्षण-प्रणाली के दोषों के निवारण के लिए वस्तुनिष्ठ परीक्षण को प्रारम्भ किया गया है। इस परीक्षण के अन्तर्गत ज्ञानार्जन के मूल्यांकन के लिए विषय से सम्बन्धित अनेक ऐसे प्रश्नों को संकलित किया जाता है जिनका एक ही शुद्ध उत्तर होता है। इन प्रश्नों में उत्तरदाता की रुचि, पसन्द, इच्छा या दृष्टिकोण का कोई महत्त्व नहीं होता। वस्तुनिष्ठ परीक्षण एक तटस्थ परीक्षण-प्रणाली है। इसमें पक्षपात या पूर्वाग्रह के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती। लेकिन इस परीक्षण के भी कुछ दोष एवं सीमाएँ हैं जैसे कि भाषा-शैली तथा लेखन-क्षमता का मूल्यांकन करना सम्भव नहीं है।

प्रश्न 7
निबन्धात्मक परीक्षण (परीक्षाओं) के कोई पाँच गुण लिखिए। या निबन्धात्मक परीक्षण के क्या लाभ हैं। [2011]
उत्तर :
निबन्धात्मक परीक्षाओं के पाँच गुण निम्नलिखित हैं

  1. इन परीक्षाओं का आयोजन सरलतापूर्वक किया जा सकता है।
  2. इन परीक्षाओं के प्रश्नों को सुगमता से तैयार किया जा सकता है।
  3. यह विधि समस्त विषयों के लिए उपयोगी है।
  4. इसमें बालक को पूर्ण अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रहती है।
  5. यह प्रणाली बालकों के लिए भी सुगम होती है, क्योंकि प्रश्न-पत्र समझने में उन्हें विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ती।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
उपलब्धि परीक्षण से क्या आशय है? (2015)
उत्तर :
छात्रों द्वारा किए गए ज्ञानार्जन के मूल्यांकन के लिए निर्धारित किए गए परीक्षणों को उपलब्धि परीक्षण कही जाती है।

प्रश्न 2
विद्यालय में उपलब्धि परीक्षण का प्रमुख उद्देश्य क्या होता है?
उत्तर :
विद्यालय में उपलब्धि परीक्षण का प्रमुख उद्देश्य छात्र को अगली कक्षा में भेजने का निर्णय लेना होता है।

प्रश्न 3
उपलब्धि परीक्षण के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
उपलब्धि परीक्षण के मुख्य प्रकार हैं-मौखिक परीक्षण, क्रियात्मक परीक्षण, निबन्धात्मक परीक्षण तथा वस्तुनिष्ठ परीक्षण।

इन 4
कौन-सा परीक्षण उपलब्धि-परीक्षण का प्राचीनतम प्रकार है?
उत्तर :
मौखिक परीक्षण उपलब्धि-परीक्षण का प्राचीनतम प्रकार है।

प्रश्न 5
किस परीक्षा-प्रणाली में विद्यार्थी प्रश्नों का उत्तर निबन्ध के रूप में देते हैं?
उत्तर :
निबन्धात्मक परीक्षण के अन्तर्गत विद्यार्थी प्रश्नों के उत्तर निबन्ध के रूप में देते हैं।

प्रथम 6
निम्न सूत्र से क्या निकालते हैं। [2009]
UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests image 4
उत्तर :
इस सूत्र से शिक्षा-लब्धि ज्ञात करते हैं।

प्रश्न 7
विश्वसनीयता और वैधता किस प्रकार के परीक्षण की मुख्य विशेषताएँ हैं ?
उत्तर :
विश्वसनीयता और वैधता वस्तुनिष्ठ परीक्षणों की मुख्य विशेषताएँ हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1
कक्षा-शिक्षण के परिणामस्वरूप किए गए ज्ञानार्जन का मूल्यांकन किया जाता है
(क) बुद्धि परीक्षण द्वारा
(ख) अभिरुचि परीक्षण द्वारा
(ग) उपलब्धि परीक्षण द्वारा
(घ) बिना किसी परीक्षण द्वारा
उत्तर :
(ग) उपलब्धि परीक्षण द्वारा

प्रश्न 2
ज्ञान आयु (A.A.)
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उत्तर :
UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 24 Achievement and Achievement Tests image 6

प्रश्न 3
निबन्धात्मक परीक्षण का गुण है।
(क) विचारों को प्रस्तुत करने की छूट
(ख) प्रश्न-पत्र का सरलता से निर्माण सम्भव
(ग) समग्र विधि को अपनाया जाता है।
(घ) ये सभी
उत्तर :
(घ) ये सभी

प्रश्न 4
निबन्धात्मक परीक्षण का दोष है।
(क) यान्त्रिक प्रणाली
(ख) संयोग पर निर्भरता
(ग) दोषपूर्ण मूल्यांकन पद्धति
(घ) ये सभी
उत्तर :
(घ) ये सभी

प्रश्न 5
वस्तुनिष्ठ परीक्षणों का गुण है।
(क) छात्र सन्तुष्ट रहते हैं
(ख) विश्वसनीयता
(ग) समय की बचत
(घ) रटने को प्राथमिकता
उत्तर :
(ख) विश्वसनीयता

प्रश्न 6
वस्तुनिष्ठ परीक्षणों का गुण नहीं है।
(क) कम लिखना-पढ़ना
(ख) विषय को सम्पूर्ण ज्ञान आवश्यकता है।
(ग) अपनी रुचि एवं दृष्टिकोण से उत्तर देना।
(घ) सुलेख का कोई महत्त्व नहीं
उत्तर :
(ग) अपनी रुचि एवं दृष्टिकोण से उत्तर देना

प्रश्न 7
वस्तुनिष्ठ परीक्षण से हम माप कर सकते हैं। [2015]
(क) उपलब्धि की
(ख) विचार करने की प्रक्रिया की
(ग) तर्कशक्ति की
(घ) लेखन कौशल की
उत्तर :
(ग) तर्कशक्ति की

प्रश्न 8
“उपलब्धि-परीक्षा, बालक की वर्तमान योग्यता अथवा किसी विशिष्ट विषय के क्षेत्र में उसके ज्ञान की सीमा को मापन करती है। यह परिभाषा है
(क) थॉर्नडाइक की
(ख) टरमन की
(ग) गैरीसन की
(घ) बिने की
उत्तर :
(ग) गैरीसन की।

प्रश्न 9
जिस परीक्षा में छात्रों को उत्तर विस्तृत रूप से लिखकर देने पड़ते हैं, उस परीक्षा को कहते हैं
(क) वस्तुनिष्ठ परीक्षा
(ख) मौखिक परीक्षा
(ग) निबन्धात्मक परीक्षा
(घ) प्रयोगात्मक परीक्षा
उत्तर :
(ग) निबन्धात्मक परीक्षा

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UP Board Class 12 History Model Papers Paper 3

UP Board Class 12 History Model Papers Paper 3 are part of UP Board Class 12 History Model Papers. Here we have given UP Board Class 12 History Model Papers Paper 3.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Model Paper Paper 3
Category UP Board Model Papers

UP Board Class 12 History Model Papers Paper 3

समय: 3 घण्टे 15 मिनट
पूणक: 100
निर्देश
प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्न-पत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं।
नोट

  • सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
  • इस प्रश्न-पत्र में पाँच खण्ड हैं।
  • खण्ड ‘क’ में 10 बहुविकल्पीय प्रश्न हैं, खण्ड ‘ख’ में 05 अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (लगभग 50 शब्द) हैं।
  • खण्ड ‘ग’ में 06 लघु उत्तरीय प्रश्न (लगभग 100 शब्द) हैं।
  • खण्ड ‘घ’ में 03 विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (लगभग 500 शब्द) हैं।
  • खण्ड ‘ङ’ में ऐतिहासिक तिथियों व मानचित्र से सम्बन्धित 05 प्रश्न हैं। शब्द सीमा में (कम या ज्यादा) 10% की छूट अनुमन्य है।
  • सभी प्रश्नों के निर्धारित अंक उनके सम्मुख अंकित हैं।

खण्ड-‘क’

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
भारत में तुलगुमा युद्ध प्रणाली का प्रणेता कौन था? [1]
(a) शेरशाह सूरी
(b) बाबर
(c) हुमायूँ
(d) अकबर

प्रश्न 2.
हुमायूँ की मृत्यु कब हुई थी? [1]
(a) 1555 ई. में
(b) 1556 ई. में
(c) 1557 ई. में।
(d) 1558 ई. में

प्रश्न 3.
दिल्ली में लाल किले का निर्माण किसने करवाया था? [1]
(a) शाहजहाँ।
(b) जहाँगीर
(c) अकबर
(d) औरंगजेब

प्रश्न 4.
एतमाउद्दौला का मवंबरा किसके शासनकाल में बनाया गया था? [1]
(a) अकबर
(b) हुमायूँ
(c) शेरशाह
(d) जहाँगीर

प्रश्न 5.
मनसबदारी शब्द का अर्थ होता हैं?  [1]
(a) पद
(b) भूमि
(c) जागीर
(d) घुड़सवार

प्रश्न 6.
किस मुगल सेनापति ने शिवाजी को पुरन्दर की सन्धि हेतु बाध्य किया?  [1]
(a) शाइस्ता खान
(b) जसवन्त सिंह
(c) बैरम खान .
(d) जय सिंह

प्रश्न 7.
अंग्रेजों ने कहाँ के किले का नाम फोर्ट विलियम रखा?  [1]
(a) कोलकता
(b) मद्रास
(c) बम्बई
(d) पाण्डिचेरी

प्रश्न 8.
भारत में रेलवे को प्रारम्भ किसके शासनकाल में हुआ? [1]
(a) लॉर्ड डलहौजी
(b) लॉर्ड कर्जन
(c) लॉर्ड रिपन
(d) लॉर्ड लिटन

प्रश्न 9.
महात्मा गाँधी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन कब शुरू किया था?  [1]
(a) 1918 ई.
(b) 1919 ई.
(c) 1920 ई.
(d) 1921 ई.

प्रश्न 10.
भारत विभाजन के समय भारत का गवर्नर जनरल कौन था? [1]
(a) लॉर्ड इरविन |
(b) लॉर्ड लिनलिथगो
(c) लॉर्ड मेयो।
(d) इनमें से कोई नहीं

खण्ड -‘ख’

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 11.
आगरा की मोती मस्जिद पर टिप्पणी लिखिए। [2]

प्रश्न 12.
मराठों के उत्कर्ष के दो प्रमुख कारण लिखिए। [2]

प्रश्न 13.
लॉर्ड रॉबर्ट क्लाइव की दो सैन्य उपलब्धियों पर प्रकाश डालिए। [2]

प्रश्न 14.
आर्य समाज के प्रमुख सिद्धान्त कौन-से हैं? [2]

प्रश्न 15.
पंचशील के पाँच सिद्धान्त कौन-से हैं? [2]

खण्ड-‘ग’

लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 16.
हुमायूँ की प्रारम्भिक कठिनाइयों का वर्णन कीजिए। [5]

प्रश्न 17.
शेरशाह के जनकल्याणकारी कार्यों का उल्लेख कीजिए। [5]

प्रश्न 18.
शाहजहाँ के स्थापत्य कला की दो विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [5]

प्रश्न 19.
प्लासी को युद्ध क्यों हुआ? [5]

प्रश्न 20.
1857 ई. की क्रान्ति के तात्कालिक कारण क्या थे? [5] |

प्रश्न 21.
खिलाफत आन्दोलन से आप क्या समझते हैं? भारतीय राजनीति में इसके महत्त्व का उल्लेख करें। [5]

खण्ड-‘घ’

दीर्घ उत्तरीय (विस्तृत उत्तरीय) प्रश्न
प्रश्न 22.
“बाबर एक विजेता था न कि साम्राज्य संस्थापक’ इस कथन की समीक्षा कीजिए। [10]
अथवा
अकबर की धार्मिक नीति का वर्णन कीजिए। उसके क्या परिणाम हुए?   [10]

प्रश्न 23.
उत्तराधिकार के युद्ध में औरंगजेब की सफलता के क्या कारण [10]
अथवा
मुगलकालीन चित्रकला के विकास पर प्रकाश डालिए। [10]

प्रश्न 24.
1857 ई. की क्रान्ति का स्वरूप स्पष्ट कीजिए। [10]
अथवा
हैदर अली के जीवन, चरित्र तथा उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।  [10]

खण्ड- ‘ड’

प्रश्न 25.
निम्नलिखित तिथियों के ऐतिहासिक महत्त्व का उल्लेख कीजिए। [10]
1. 1526 ई.
2. 1556 ई.
3. 1563 ई.
4. 1628 ई.
5. 1665 ई.
6. 1761 ई.
7. 1758 ई.
8. 1764 ई.
9. 1905 ई.
10. 1916 ई.

मानचित्र सम्बन्धी प्रश्न
प्रश्न 26.
दिए गए भारत के मानचित्र में चार स्थान (.) दर्शाए गए हैं, इनकी पहचान कर इनके नाम लिखिए। सही नाम तथा सही स्थान दर्शाने के लिए 1+1 अंक निर्धारित है।
(i) वह स्थान जहाँ सेण्ट्रले हिन्दू कॉलेज की स्थापना की गई ची। [2]
(ii) वह स्थान जहाँ मुस्लिम विश्वविद्यालय स्थित है। [2]
(iii) वह नगर जहाँ जनसमूह द्वारा पुलिस स्टेशन में आग लगा देने के कारण गाँधीजी ने असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया था। [2]
(iv) वह स्थान जहाँ गाँधीजी ने नमक कानून भंग किया। [2]
(v) वह स्थान जहाँ गुजरात की राजधानी स्थित है। [2]

Answers

उत्तर 1.
(b) बाबर

उत्तर 2.
(b) 1556 ई. में

उत्तर 3.
(a) शाहजहाँ।

उत्तर 4.
(d) जहाँगीर

उत्तर 5.
(a) पद

उत्तर 6.
(c) बैरम खान

उत्तर 7.
(a) कोलकता

उत्तर 8.
(a) लॉर्ड डलहौजी

उत्तर 9.
(a) 1918 ई.

उत्तर 10.
(d) इनमें से कोई नहीं

उत्तर 11.
आगरा की मोती मस्जिद का निर्माण शाहजहाँ ने 1654 ई. में आगरा के किले में सफेद संगमरमर से करवाया था। इसका निर्माण शाहजहाँ ने अपनी पुत्री जहाँआरा के सम्मान में करवाया था। इसके बाहर लाल पत्थर अन्दर संगमरमर का प्रयोग किया गया है।

उत्तर 12.
मराठों के उत्कर्ष के दो प्रमुख कारण निम्न हैं।

(i) महाराष्ट्र की भौगोलिक स्थिति ने मराठों के उत्थान में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। |
(ii) मराठों को शिवाजी के रूप में शाहसी एवं योग्य नेतृत्व किया।

उत्तर 13.
लॉर्ड रॉबर्ट क्लाइव की दो सैन्य उपलब्धियाँ निम्न हैं।

(i) अर्काट की विजय 1751 ई. में रॉबर्ट क्लाइव ने मात्र 210 सैनिकों के साथ कर्नाटक की राजधानी अकट जीत ली। कर्नाटक के नवाब चाँदा साहब ने अर्काट को मुक्त कराने के लिए 4000 सैनिक भेजे, परन्तु वे असफल रहे।
(ii) प्लासी की विजय क्लाइव ने अपनी कूटनीति से बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के सेनापति मीरजाफर को अपनी ओर मिला लिया तथा 1757 ई. के प्लासी के युद्ध में नवाब को सरलता से पराजित कर दिया।

उत्तर 14.
आर्य समाज के प्रमुख सिद्धान्त स्वामी दयानन्द सरस्वती ने धर्म को प्रतिष्ठित करने के लिए निम्न सिद्धान्त दिए, जो इस प्रकार हैं। • सत्य केवल वेदों में निहित है। अतः वेदों का अध्ययन परम आवश्यक है।

  • वेद मन्त्रों के आधार पर हवन किया जाना चाहिए।
  •  मूर्ति पूजा का विरोध किया।
  •  अवतारवाद तथा तीर्थयात्राओं का विरोध किया।
  •  कर्म सिद्धान्त तथा आवागमन का समर्थन किया।
  •  ईश्वर निराकार तथा एक है।
  •  विशेष परिस्थितियों में विधवा-विवाह का समर्थन किया।
  •  बाल-विवाह, बहु-विवाह का विरोध किया।
  •  हिन्दी और संस्कृत भाषा का प्रचार किया।

उत्तर 15.
वर्ष 1969 में इसकी उपयोगिता को दृष्टिगत रखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसे मान्यता प्रदान की। इसके पाँच निम्न सिद्धान्त हैं।

(i) सभी देशों द्वारा अन्य देशों की क्षेत्रीय अखण्डता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना।
(ii) दूसरे देश के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करना।
(iii) शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का पालन करना।
(iv) दूसरे देश पर आक्रमण न करना।
(v) परस्पर सहयोग एवं लाभ को बढ़ावा देना।

उत्तर 25.
महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तिथियाँ एवं उनका घटनाक्रम

1. 1526 ई. पानीपत का प्रथम युद्ध।
2. 1556 ई. हुमायूँ की मृत्यु।
3. 1563 ई. अकबर ने तीर्थ यात्रा कर को समाप्त किया।
4. 1628 ई. शाहजहाँ का सिंहासनारोहण
5. 1665  ई. शिवाजी के मुगलों के बीच पुरन्दर की सन्धि।
6. 1761  ई. पानीपत का तीसरा युद्ध
7. 1758  ई. कर्नाटक का तीसरा युद्ध आरम्भ।
8. 1764  ई. बक्सर का युद्ध अंग्रेजों एवं बंगाल के नवाब मीर कासिम के बीच
9. 1905 ई. बंगाल विभाजन
10. 1916 ई. लखनऊ पैक्ट के तहत कांग्रेस व मुस्लिम लीग में समझौता

 

उत्तर 26.
UP Board Class 12 History Model Papers Paper 3 image 1

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