UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोक-वृत्त

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name आलोक-वृत्त
Number of Questions Solved 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोक-वृत्त

कथावस्तु पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1.
‘आलोक-वृत’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटना को संक्षेप में लिखिए। (2018)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का कथानक संक्षेप में लिखिए। (2016)
अथवा
“आलोक-वृत्त खण्डकाव्य में स्वतन्त्रता संग्राम की झाँकी के दर्शन होते हैं।” स्पष्ट कीजिए। (2016)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ को कथासार अपने शब्दों में लिखिए। (2016)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटना का वर्णन कीजिए। (2016)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्ड काव्य की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए। (2016)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य का सारांश अपने शब्दों में लिखिए। (2014)
अथवा
कथावस्तु की दृष्टि से ‘आलोक-वृत्त’ की समीक्षा कीजिए। (2013)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ के आधार पर वर्ष 1942 की जनक्रान्ति का सोदाहरण वर्णन कीजिए। (2014, 13, 11, 10, 09, 08)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य में वर्णित प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए। (2018, 14, 13)
उत्तर:
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की रचना कविवर गुलाब खण्डेलवाल द्वारा की गई है। इस खण्डकाव्य की कथा युगपुरुष महात्मा गाँधी के जीवन पर आधारित है। इस खण्डकाव्य की कथावस्तु निम्नलिखित है।

प्रथम सर्ग : भारत को स्वर्णिम अतीत

(2012, 11)

1869 ई. में महात्मा गाँधी का जन्म पोरबन्दर नामक स्थान पर हुआ था। गाँधीजी का व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि समस्त दानवी एवं पाश्विक शक्तियाँ भी उनके सामने टिक न सकीं। ब्रिटिश शासन भयभीत हो गया।

गाँधीजी ने अपने साहस और शक्ति से शासन के क्वर अत्याचारों और दमनात्मक कार्यों से पीड़ित जनता को शक्ति प्रदान की। गाँधीजी के रूप में भारतीय जनता को नया जीवनस्रोत मिली।

द्वितीय सर्ग : गाँधीजी का प्रारम्भिक जीवन

(2017, 12)

‘आलोक-वृत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए। (2018)

युवा होने पर गाँधीजी का विवाह कस्तूरबा के साथ हो गया। कुछ समय पश्चात् ही उनके पिताजी का स्वर्गवास हो गया। उनकी मृत्यु के समय गाँधीजी अपने पिता के पास नहीं थे। फिर उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए वह इंग्लैण्ड चले गए। गाँधीजी की माताजी को यह डर सता रहा था कि उनका पुत्र विदेश में जाकर मांस-मदिरा का सेवन न करने लगे। अतः विदेश जाने से पहले उन्होंने अपने पुत्र से वचन लिया

मद्य मांस-मदिराक्षी से बचने की शपथ दिलाकर।
माँ ने तो दी विदा पुत्र को मंगल-तिलक लगाकर।”

अपनी शिक्षा समाप्त कर जब गाँधीजी स्वदेश लौटे, तो उन्हें ज्ञात हुआ कि उनकी माताजी उन्हें छोड़कर स्वर्ग सिधार गई हैं। यह सुनकर उन्हें अत्यधिक कष्ट हुआ।

तृतीय सर्ग : गाँधीजी का अफ्रीका प्रवास (2012)

आलोक-वृत खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए। (2018)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का कथानक संक्षेप में लिखिए। (2016)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ के तृतीय सर्ग में वर्णित गाँधीजी के मानसिक संघर्ष को अपने शब्दों में लिखिए। (2014, 13)
उत्तर:
दक्षिण अफ्रीका में एक बार गाँधीजी रेल में प्रथम श्रेणी में यात्रा कर रहे थे। एक गोरे ने उन्हें अपमानित करके गाड़ी से नीचे उतार दिया। रंगभेद की इस नीति को देखकर वह बहुत दुःखी हुए। वह शान्त भाव से एकान्त में बैठे ठिठुरते रहे। वे वहाँ बैठे-बैठे भारतीयों की दुर्दशा पर चिन्तन करने लगे। उन्होंने अपनी जन्मभूमि से दूर विदेश की भूमि पर बैठकर मानवता के उद्धार का संकल्प लिया। सत्य और अहिंसा के इस मार्ग को उन्होंने सत्याग्रह का नाम दिया। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में सैकड़ों सत्याग्रहियों का नेतृत्व किया और संघर्ष में विजय प्राप्त की।

चतुर्थ सर्ग : गाँधीजी का भारत आगमन

‘आलोक-वृत’ के चतुर्थ सर्ग की घटना का उल्लेख कीजिए। (2018)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ के चतुर्थ सर्ग का सारांश लिखिए। (2016)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए है (2013, 14)
उत्तर:
गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आ जाते हैं। भारत आकर उन्होंने लोगों को स्वतन्त्रता प्राप्त करने हेतु जाग्रत किया। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, विनोबा भावे, सरोजिनी नायडू, सुभाषचन्द्र बोस, मदनमोहन मालवीय आदि अनेक प्रमुख देशप्रेमी उनके अनुयायी बन गए।

गाँधीजी के आह्वान पर देश के महान् नेता एकजुट होकर सत्याग्रह की तैयारी में जुट गए। गाँधीजी ने चम्पारण में नील की खेती को लेकर आन्दोलन प्रारम्भ किया, जिसमें वे सफल रहे। उनके भाषण सुनकर विदेशी सरकार विषम स्थिति में पड़ जाती थी। इस आन्दोलन में सरदार वल्लभभाई पटेल का व्यक्तित्व अच्छी तरह निखरकर सामने आया।

पंचम सर्ग : असहयोग आन्दोलन

‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के पंचम सर्ग (असहयोग आन्दोलन) की कथा पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए। (2011)
उत्तर:
गाँधीजी के नेतृत्व में स्वाधीनता आन्दोलन निरन्तर बढ़ता गया। अंग्रेजों की दमन नीति भी बढ़ती गई। गाँधीजी के ओजस्वी भाषण ने भारतीयों में नई स्फूर्ति भर दी, लेकिन अंग्रेजों की ‘फूट डालो और शासन करों’ की नीति ने यत्र-तत्र साम्प्रदायिक दंगे करवा दिए। गाँधीजी को बन्दी बना लिया गया।

जेल में गाँधीजी अस्वस्थ हो गए। अतः उन्हें छोड़ दिया गया। जेल से आकर गाँधीजी हरिजनोद्धार, हिन्दू-मुस्लिम एकता, शराब मुक्ति, खादी प्रचार आदि के रचनात्मक कार्यों में लग गए।

हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए गाँधीजी ने इक्कीस दिनों का उपवास रखा-

“आत्मशुद्धि का यज्ञ कठिन यह, पूरा होने को जब आया।
बापू ने इक्कीस दिनों के, अनशन का संकल्प सुनाया।”

षष्ठ सर्ग : नमक सत्याग्रह

“आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग (नमक सत्याग्रह) का सारांश अपने शब्दों में लिखिए। (2011)
उत्तर:
अंग्रेजों के द्वारा लगाए गए नमक कानून को तोड़ने के लिए गाँधीजी ने समुद्र तट पर बसे ‘डाण्डी’ नामक स्थान तक की पैदल यात्रा 24 दिनों में पूरी की। नमक आन्दोलन में हजारों लोगों को बन्दी बनाया गया।

तत्पश्चात् अंग्रेज शासकों ने ‘गोलमेज सम्मेलन’ बुलाया, जिसमें गाँधीजी को बुलाया गया। इस कॉन्फ्रेन्स के साथ-साथ कवि ने वर्ष 1937 के ‘प्रान्तीय स्वराज्य’ की स्थापना सम्बन्धी कार्यकलापों का सुन्दर वर्णन किया है।

सप्तम सर्ग : वर्ष 1942 की जनक्रान्ति’ (2013)

‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के सप्तम सर्ग में निरूपित वर्ष 1942 की जनक्रान्ति का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए। (2017)
उत्तर:
द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ हो गया। अंग्रेज सरकार भारतीयों को सहयोग तो चाहती थी, परन्तु उन्हें पूर्ण अधिकार देना नहीं चाहती थी।

क्रिप्स मिशन की असफलता के पश्चात् वर्ष 1942 में गाँधीजी ने ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ छेड़ दिया। सम्पूर्ण देश में विद्रोह की ज्वाला धधक उठी-

“थे महाराष्ट्र-गुजरात उठे, पंजाब-उड़ीसा साथ उठे-
बंगाल इधर, मद्रास उधर, मरुस्थल में थी ज्वाला घर-घर।”

कवि ने इस आन्दोलन का बड़ा ही ओजस्वी भाषा में वर्णन किया है। ‘बम्बई अधिवेशन’ के बाद गाँधीजी सहित सभी भारतीय नेता जेल में डाल दिए गए। इस पर सम्पूर्ण भारत में विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। कवि ने पूज्य बापू एवं कस्तूरबा के मध्य हुए वार्तालाप का बड़ा सुन्दर चित्रण किया है।

अष्टम सर्ग : भारतीय स्वतन्त्रता का अरुणोदय

देशवासियों के अथक प्रयासों और बलिदानों के फलस्वरूप भारत स्वतन्त्र हो । गया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के साथ ही देश में साम्प्रदायिक झगड़े आरम्भ हो गए। हिंसा की अग्नि चारों ओर भड़क उठी। इन सब को देखकर बापू अत्यन्त व्यथित हो गए।
वे कह उठे-

प्रभो! इस देश को सत्यपथ दिखाओ,
लगी जो आग भारत में, बुझाओ।
मुझे दो शक्ति इसको शान्त कर दें ,
लपट में रोष की निज शीश धर दें।”

प्रश्न 2.
‘आलोक-वृत’ खण्डकाव्य की प्रमुख विशेषताओं को संक्षेप में लिखिए। (2018)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2018, 17)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की विशेषताओं का निरूपण कीजिए। अथना कथानक की दृष्टि से ‘आलोक-वृत्त’ की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2016)
अथवा
खण्डकाव्य के लक्षणों के आधार पर ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की समीक्षा कीजिए। (2018, 11, 10)
अथवा
खण्डकाव्य की दृष्टि से ‘आलोक-वृत्त’ का मूल्यांकन कीजिए। (2011)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए। (2014)
उत्तर:
कवि गुलाब खण्डेलवाल द्वारा रचित ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी के जीवन को चित्रित किया गया है।
इसका कथावस्तु सम्बन्धी विवेचन इस प्रकार है।

1. कथानक की व्यापकता ‘आलोक वृत्त’ खण्डकाव्य की कथानक महात्मा गाँधी के जीवन-वृत्त पर आधारित है। इसमें महात्मा गाँधी के सदाचार एवं मानवता के गुणों से प्रकाशित व्यक्तित्व को चित्रित किया गया है। उन्होने भारतीय संस्कृति की चेतना को अपने सदगुणों एवं सदविचारों से प्रकाशित किया है। उन्होंने सत्य, प्रेम, अहिंसा आदि मानवीय भावनाओं का प्रकाश फैलाया है। अत: इस जीवन-वृत्त को आलोक-वृत्त कहा जा सकता है। यह कथानक महात्मा गाँधी के जीवन-वृत्त पर आधारित है, पर साथ-ही-साथ इसमें पं. मोतीलाल नेहरू, पं. मदनमोहन मालवीय, महात्मा गांधी की माता, उनकी पत्नी, सरदार वल्लभभाई पटेल, पं. जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद आदि के जीवन को झाकियां भी सम्मिलित हैं।

2. कथा का संगठन ‘आलोक वृत्त’ खण्डकाव्य का आरम्भ भारत के गौरवमय अतीत से होता है। कथा का प्रारम्भ 1857 ई. के पश्चात् की दयनीय स्थिति के वर्णन से प्रारम्भ हुआ है तथा गाँधीजी की जन्म की घटना को भी इसमें दिखाया गया है। इसके साथ ही इसमें गाँधीजी के समय तत्कालीन भारत की दुर्दशा का भी वर्णन किया गया है। शिक्षा ग्रहण करने गांधीजी का इंग्लैण्ड जाना, वहाँ बैरिस्टर बनना, दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह करना तथा तत्पश्चात् कथा का उतार दर्शाया गया है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् सम्पूर्ण देश में फैली साम्प्रदायिक हिंसा के कारण गाँधीजी का दुःखी होना और ईश्वर से प्रार्थना करने के साथ ही इस खण्डकाव्य की समाप्ति होती जाती है।

3. संवाद योजना कथावस्तु के विस्तार के कारण इस खण्डकाव्य में संवाद योजना को प्रमुखता प्रदान नहीं की गई है। यह खण्डकाव्य प्रमुख रूप से वर्णनात्मक ही है, पर फिर भी विभिन्न स्थानों पर गाँधीजी के संक्षिप्त संवाद प्रस्तुत किए गए हैं। कुछ अन्य पात्रों द्वारा भी संवादों का प्रयोग किया गया है, किन्तु इसे नगण्य ही कहा जाएगा। पात्र एवं चरित्र-चित्रण प्रस्तुत खण्डकाव्य में मुख्य चरित्र महात्मा गांधी का व्यक्तित्व है। उनका चरित्र एक धीरोदात्त नायक के रूप में विकसित हुआ है। यद्यपि उनमें कुछ दुर्वलताएँ भी हैं, परन्तु अपनी ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, सरलता और लगन के बल पर वे अपनी दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। वे अपने प्रेम से शत्रुओं के हृदय को भी जीत लेते हैं। उनका अहिंसा का सिद्धान्त मानव हृदय की एकता और सभी के प्रति समानता के भाव पर आधारित है। प्रस्तुत खण्डकाव्य में गाँधीजी को चरित्र नायक बनाकर उनके प्रेरणाप्रद विचारों को वाणी प्रदान की गई है। कुछ अन्य महापुरुषों की झलकियों को भी पात्र रूप में समायोजित किया गया है, लेकिन वे केवल महात्मा गांधी के चरित्र पर प्रकाश डालने हेतु कथा में संगठित किए गए हैं।

4. पात्र एवं चरित्र-चित्रण प्रस्तुत खण्डकाव्य में मुख्य चरित्र महात्मा गाँधी का व्यक्तित्व हैं। उनका चरित्र एक धीरोदात्त नायक के रूप में विकसित हुआ है। यद्यपि उनमें कुछ दुर्बलताएं भी हैं, परन्तु अपनी ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, सरलता और लगन के बल पर वे अपनी दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। वे अपने प्रेम से शत्रुओं के हृदय को भी जीत लेते हैं। उनका अहिंसा का सिद्धान्त मानव हृदय की एकता और सभी के प्रति समानता के भाव पर आधारित है। प्रस्तुत खण्डकाव्य में गाँधीजी को चरित्र नायक बनाकर उनके प्रेरणाप्रद विचारों को वाणी प्रदान की गई हैं। कुछ अन्य महापुरुषों की झलकियों को भी पात्र रूप में समायोजित किया गया है, लेकिन वे केवल महात्मा गाँधी के चरित्र पर प्रकाश डालने हेतु कथा में संगठित किए गए हैं।

5. उददेश्य इस कथा के संगठन का उद्देश्य राष्ट्रीयता, सत्य, अहिंसा, मानवीयता आदि सद्गुणों के प्रति भावनात्मक संवेग उत्पन्न करके समाज में उनका महत्त्व स्थापित करना है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि आलोक वृत्त में गाँधीजी जैसे महानायक के गुणों को आधार बनाकर काव्य की रचना की गई है। कथा की पृष्ठभूमि विस्तृत है। गौण पात्रों का चित्रण नायक के चरित्र की विशेषताओं को प्रकाशित करने हेतु किया गया है।

प्रश्न 3.
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य में सत्य और अहिंसा का सुन्दर सन्देश दिया गया है। स्पष्ट कीजिए। (2017)
अथवा
“आलोक-वृत्त’ पीड़ित मानवता को सत्य और अहिंसा का सन्देश देता है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए। (2016)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के उद्देश्य (सन्देश) को स्पष्ट कीजिए। (2014, 13, 11, 10)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के नामकरण की सार्थकता को स्पष्ट करते हुए उसके उद्देश्य पर प्रकाश डालिए। (2013)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ में निहित मानव कल्याण के सन्देश की विवेचना कीजिए।
अथवा
“आलोक-वृत्त खण्डकाव्य पीड़ित मानवता को सत्य एवं अहिंसा का शाश्वत सन्देश देता है।” इस कथन की विवेचना कीजिए। (2014, 13, 11)
उत्तर:

‘आलोक-वृत्त’ : शीर्षक की सार्थकता (2013)

कविवर गुलाब खण्डेलवाल ने ‘आलोक वृत्त’ खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व को चित्रित किया है। महात्मा गाँधी के चरित्र को हम प्रकाशस्वरूप कह सकते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने सद्गुणों एवं सद्विचारों से भारतीय संस्कृति की चेतना को प्रकाशित किया है। उन्होंने विश्व में सत्य, प्रेम, अहिंसा आदि भावनाओं का प्रकाश फैलाया। इस दृष्टिकोण से यह शीर्षक उपयुक्त है। यह गाँधी जी के जीवन, उनके चरित्र, गुणों, सिद्धान्तों एवं दर्शन को पूर्णरूप से परिभाषित करता हुआ एक साहित्यिक एवं दार्शनिक शीर्षक है।

आलोक-वृत्त : उद्देश्य (सन्देश) श्री खण्डेलवाल की रचना ‘आलोक-वृत्त’ में उनके उद्देश्य इस प्रकार परिलक्षित होते हैं।

  1. देशप्रेम की भावना को जागृत करना इस खण्डकाव्य का सर्वप्रथम उद्देश्य देशवासियों में स्वदेश प्रेम की भावना जागृत करना है। यह खण्डकाव्य भारतीय जनों के हृदय में भारत के गौरवमय अतीत का वर्णन करके देशप्रेम की भावना जगाना चाहता है।
  2. सत्य और अहिंसा का महत्व इस खण्डकाव्य के माध्यम से कवि ने सत्य और अहिंसा के महत्त्व को दर्शाया है। कवि का मानना है कि सत्य और अहिंसा ऐसे अस्त्र हैं, जिनके बल पर हम विरोधियों को भी परास्त कर सकते हैं। कवि ने गाँधीजी के उदाहरण द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि सत्य और अहिंसा के द्वारा हम प्रत्येक संकल्प को पूरा कर सकते हैं।
  3. त्याग और बलिदान की भावना का सन्देश महात्मा गाँधी ने देश को स्वतन्त्र कराने के लिए महान् त्याग एवं अपना सर्वस्व बलिदान किया। वे अनेक बार जेल गए और उन्होंने अनेक कष्टों को सहन किया। इस प्रकार कवि गाँधीजी के उदाहरण को प्रस्तुत करके देश के युवकों को देश के लिए त्याग और बलिदान करने की प्रेरणा देता है।
  4. साधनों की पवित्रता में विश्वास गाँधीजी का विचार था कि मनुष्य को सदैव पवित्र आचरण अपनाना चाहिए और साधनों को भी पवित्र होना चाहिए अर्थात् वह जो भी साधन अपनाए, वे पवित्र होने चाहिए। उन्होंने देश को स्वतन्त्र कराने के लिए छल-कपट और हिंसा का आश्रय कभी नहीं लिया। उन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिए प्रेम, सत्य, अहिंसा जैसे साधनों का प्रयोग किया, जिसमें वे सफल भी रहे।
  5. राष्ट्रीय एकता एवं सहयोग की भावना अंग्रेज शासकों ने हमारे देश में फूट के बीज बोकर परस्पर घृणा एवं हिंसा के भाव भर दिए थे। आज का भारत प्राचीन भारत के समान ही विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों का संगम हैं। हमारे देश को स्वतन्त्रता तभी सुरक्षित रह सकती है, जब हम धर्म, सम्प्रदाय एवं जातिगत भावनाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता को बनाए रखें।

इसी को ध्यान में रखकर यह सन्देश दिया गया है कि हमें साम्प्रदायिक एवं प्रान्तीय भेद-भाव को भूलकर राष्ट्र की एकता बनाए रखनी चाहिए। इस प्रकार आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य गाँधीजी के जीवन चरित्र को माध्यम बनाकर लोगों को राष्ट्र प्रेम, सत्य, अहिंसा, परोपकार, न्याय, सदाचार आदि की प्रेरणा देने के उद्देश्य में सफल रहा है।

प्रश्न 4.
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए। (2015)
उत्तर:
कवि गुलाब खण्डेलवाल द्वारा रचित ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की भाषा-शैली इस प्रकार है।

  1. भाषा-शैली ‘आलोक वृत्त की भाषा अत्यन्त सुन्दर और मन को छूने वाली है। भाषा विचारों और भावों के अनुरूप हैं। प्रारम्भ से लेकर अन्त तक ओज गुण का निर्वाह हुआ है, परन्तु जिन प्रसंगों में माधुर्य की अपेक्षा है, वहाँ भाषा अत्यन्त मधुर रूप ग्रहण कर लेती है। प्रसाद गुण तो इसकी प्रत्येक पंक्ति में देखा जा सकता है। ‘आलोक-वृत्त’ की शैली प्रमुख रूप से वर्णनात्मक है। साथ ही संवादात्मक भी है, किन्तु शैली का स्वरूप वर्णनात्मक ही हैं। कथावस्तु के विस्तृत स्वरूप को देखते हुए कवि ने इस शैली को अपनाया है, किन्तु इस वर्णनात्मक शैली में भावात्मकता को स्थान देकर उन्होंने भावों को कुशल अभिव्यक्ति दी है।
  2. अलंकार-योजना ‘आलोक-वृत्त’ में अलंकारों का प्रयोग दर्शनीय है। कहीं पर भी वे सप्रयास लाए हुए प्रतीत नहीं होते। अलंकारों ने कहीं पर भी भाषा को बोझिल नहीं किया है।
  3. छन्द-योजना ‘आलोक-वृत्त’ में छन्दों की विविधता है। 16 मात्राओं के छोटे छन्द से लेकर 32 मात्राओं के लम्बे छन्दों का प्रयोग इसमें सफलतापूर्वक किया गया है। प्रथम सर्ग में मुक्त छन्द का प्रयोग हुआ हैं। सर्गों के मध्य में गीत-योजना भी की गई है, जिससे राष्ट्रीय भावनाओं की वृद्धि में सहयोग मिला है। इस प्रकार यह द्रष्टव्य है कि ‘आलोक-वृत्त’ में गाँधी जैसे महान् लोकनायक के गुणों को आधार बनाकर काव्य-रचना की गई है। कथा की पृष्ठभूमि विस्तृत है, किन्तु कवि ने गाँधीजी की चारित्रिक विशेषताओं को स्पष्ट करने हेतु आवश्यक प्रसंगों का चयन कर उसे इस प्रकार संगठित एवं विकसित किया है कि वह खण्डकाव्य के उपयुक्त बन गई है। गौण पात्रों का चित्रण नायक के चरित्र की विशेषताओं को प्रकाशित करने हेतु किया गया है। आदर्शपूर्ण भावनाओं की स्थापना हेतु रचित इस काव्य-ग्रन्थ में यद्यपि रसों एवं छन्दों की विविधता है, तथापि इससे खण्डकाव्य के उद्देश्य एवं उसके विधा सम्बन्धी तत्त्वों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अत: इस काव्य-ग्रन्थ को एक सफल खण्डकाव्य कहना उपयुक्त होगा।

चरित्र-चित्रण पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 5.
‘आलोक-तृत’ खण्डकाव्य के आधार पर महात्मा गाँधी की चरित्रगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2018)
अथवा
‘आलोकवृत’ खण्डकाव्य के आधार पर गाँधी जी के जीवन की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए। (2018)
अथवा
आलोक-तृत खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र का चरित्रांकन कीजिए। (2018)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के ऐसे पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए, जिसने आपको अधिक प्रभावित किया हो। (2017)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण (चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए) कीजिए। (2018, 16)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2015)
अथवा
आलोक-वृत्त के नायक का चरित्रांकन कीजिए। धना ‘आलोक-तृत्त’ के आधार पर गाँधीजी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2018, 14, 13, 12, 11, 10)
अथवा
“आलोक-वृत्त खण्डकाव्य में गाँधीजी का व्यक्तित्व सर्वोपरि है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए। (2012)
अथवा
“आलोक-वृत्त में गाँधीजी का चरित्र धीरोदात्त नायक के रूप में प्रस्फुटित हुआ है।” इस कथन के आधार पर गाँधीजी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2013, 10)
अथवा
‘आलोक वृत्त’ खण्डकाव्य में वर्णित गाँधीजी के मानसिक संघर्ष को अपने शब्दों में लिखिए। (2013)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के नायक की विशेषताएँ बताइए। (2017)
उत्तर:
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र का चरित्रांकन कीजिए। उत्तर ‘आलोक वृत्त’ खण्डकाव्य के नायक महात्मा गाँधी हैं। कवि ने इन्हें एक लोकनायक के रूप में प्रस्तुत किया है। इनका जीवन एवं इनके कार्य हमारे लिए सदैव प्रेरणा के स्रोत रहे हैं। गाँधीजी की चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं।

1. देशप्रेमी गाँधीजी के चरित्र की सर्वप्रथम विशेषता है—उनका देशप्रेमी होना। गाँधीजी अपने देश से इतना प्रेम करते थे कि उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ देश के लिए समर्पित कर दिया। वे अनेक बार कारागार में गए। अंग्रेजों के अपमान और अत्याचार सहे।

2. सत्य और अहिंसा के उपासक गाँधीजी देश की स्वतन्त्रता सत्य और अहिंसा के बल पर प्राप्त करना चाहते थे। वे अहिंसा को महान् शक्तिशाली अस्त्र मानते रहे। उन्होंने अपने जीवन में हिंसा न करने का दृढ़ निश्चय किया। कोई विरला व्यक्ति ही इस प्रकार अहिंसा का पूर्णरूप से पालन कर सकता है।

3. ईश्वर के प्रति आस्थावान गाँधीजी पुरुषार्थी तो हैं, पर ईश्वर के प्रति दृढ़ आस्थावान भी हैं। उन्होंने अपने जीवनकाल में जो कुछ भी किया, ईश्वर को साक्षी मानकर ही किया। उनका मानना था कि साधन पवित्र होने चाहिए और परिणाम की इच्छा नहीं करनी चाहिए। परिणाम ईश्वर पर ही छोड़ देने चाहिए।

4. मानवीय मूल्यों के प्रति निष्ठावान गाँधीजी ने अपने जीवन में मानवीय मूल्यों एवं सदाचरण को सदैव बनाए रखा। वे मानव-मानव में अन्तर नहीं मानते थे। वे समानता के सिद्धान्त में विश्वास करते हैं। उनके अनुसार जाति, धर्म, वर्ण एवं रूप के आधार पर भेदभाव करना अनुचित है। वे कहते थे कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं।’

5 स्वतन्त्रता प्रेमी गाँधीजी के जीवन का मुख्य उद्देश्य देश को स्वतन्त्र करवाना है। वे भारत माता की स्वतन्त्रता के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। वे देशवासियों को गुलामी की जंजीरों को काटने के लिए प्रेरित करते हैं।

6. हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक उन्होंने सदैव हिन्दू और मुसलमानों को एक साथ रहने की प्रेरणा दी। वे ‘विश्वबन्धुत्व’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से ओत-प्रोत थे। वे सभी को सुखी देखना चाहते थे। वे जीवन भर जनता को एकता के सूत्र में बाँधने के लिए प्रयास करते रहे और हिन्दू-मुसलमानों को भाई-भाई की तरह रहने की प्रेरणा देते रहे।

7. स्वदेशी वस्तु एवं खादी को महत्त्व गाँधीजी ने स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने की प्रेरणा दी और उन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया। जन-जन में खादी का प्रचार किया और उसे अपनाने की प्रेरणा दी।

8. आत्मविश्वासी गाँधीजी आत्मविश्वास से परिपूर्ण थे। अपने जीवन में उन्होंने जो भी किया, पूर्ण आत्मविश्वास के साथ किया और उसमें वे सफल भी रहे।

9. सत्याग्रही गाँधीजी ने सत्य की शक्ति पर पूर्ण भरोसा किया। अपने सत्याग्रह के बल पर ही उन्होंने देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त करवाया और भारत को आजादी दिलवाई।

अतः कहा जा सकता है कि गाँधीजी एक श्रेष्ठ मानव हैं। उनके निर्मल चरित्र पर उँगली उठाने का साहस किसी में भी नहीं हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi समसामयिक निबन्ध

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name समसामयिक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi समसामयिक निबन्ध

1. स्वच्छ भारत अभियान (2018)
प्रस्तावना यह सर्वविदित है कि 2 अक्टूबर भारतवासियों के लिए कितने महत्त्व का दिवस है। इस दिन हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का जन्म हुआ था। इस युग-पुरुष ने भारत सहित पूरे विश्व को मानवता की नई राह दिखाई। हमारे देश में प्रत्येक वर्ष गाँधी जी का जन्मदिवस एक राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है और इसमें कोई सन्देह नहीं है कि उनके प्रति हमारी श्रद्धा प्रतिवर्ष बढ़ती जाती है। इस बार (वर्ष 2014 में) भी 2 अक्टूबर को ससम्मान गाँधी जी को याद किया गया, लेकिन ‘स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत के कारण इस बार यह दिन और भी विशिष्ट रहा।

स्वच्छता अभियान से तात्पर्य ‘स्वच्छ भारत अभियान’ एक राष्ट्र स्तरीय अभियान है। गाँधी जी की 145वीं जयन्ती के अवसर पर माननीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इस अभियान के आरम्भ की घोषणा की। यह अभियान प्रधानमन्त्री जी की महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है। 2 अक्टूबर, 2014 को उन्होंने राजपथ पर जनसमूह को सम्बोधित करते हुए सभी राष्ट्रवासियों से स्वच्छ भारत अभियान में भाग लेने और इसे सफल बनाने की अपील की। साफ-सफाई के सन्दर्भ में देखा जाए, तो यह अभियान अब तक का सबसे बड़ा स्वच्छता अभियान है।

स्वच्छता अभियान एक जन आन्दोलन साफ-सफाई को लेकर दुनियाभर में भारत की छवि बदलने के लिए प्रधानमन्त्री जी बहुत गम्भीर हैं। उनकी इच्छा स्वच्छ भारत अभियान को एक जन आन्दोलन बनाकर देशवासियों को गम्भीरता से इससे जोड़ने की है। हमारे नवनिर्वाचित प्रधानमन्त्री जी ने 2 अक्टूबर के दिन सर्वप्रथम गाँधी जी को राजघाट पर श्रद्धांजलि अर्पित की और फिर नई दिल्ली स्थित वाल्मीकि बस्ती में जाकर झाड़ लगाई। कहा जाता है कि वाल्मीकि बस्ती दिल्ली में गाँधी जी का सबसे प्रिय स्थान था। वे अक्सर यहाँ आकर ठहरते थे।

इसके बाद, मोदी जी ने जनपथ जाकर स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत की। इस अवसर पर उन्होंने लगभग 40 मिनट का भाषण दिया और स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया। अपने भाषण के दौरान उन्होंने महात्मा गाँधी और लालबहादुर शास्त्री का जिक्र करते हुए बड़ी ही खूबसूरती से इन दोनों महापुरुषों को इस अभियान से जोड़ दिया, उन्होंने कहा-“गांधी जी ने आजादी से पहले नारा दिया था ‘क्विट इण्डिया क्लीन इण्डिया, आजादी की लड़ाई में उनका साथ देकर देशवासियों ने ‘क्विट इण्डिया’ के सपने को तो साकार कर दिया, लेकिन अभी उनका ‘क्लीन इण्डिया’ का सपना अधूरा ही है।।

अब समय आ गया है कि हम सवा सौ करोड़ भारतीय अपनी मातृभूमि को स्वच्छ बनाने का प्रण करें। क्या साफ-सफाई केवल सफाई कर्मचारियों की जिम्मेदारी हैं? क्या यह हम सभी की जिम्मेदारी नहीं हैं? हमें यह नज़रिया बदलना होगा। मैं जानता हूं कि इसे केवल एक अभियान बनाने से कुछ नहीं होगा। पुरानी आदतों को बदलने में समय लगता है। यह एक मुश्किल काम है, मैं जानता है, लेकिन हमारे पास वर्ष 2019 तक का समय है।”

प्रधानमन्त्री जी ने पाँच साल में देश को साफ-सुथरा बनाने के लिए लोगों को शपथ दिलाई कि न में गन्दगी करूगा और न ही गन्दगी करने दें। अपने अतिरिक्त मैं सौ अन्य लोगों को साफ-सफाई के प्रति जागरूक करूगा और उन्हें सफाई की शपथ दिलवाऊँगा। उन्होने कहा कि हर व्यक्ति साल में 100 घण्टे का श्रमदान करने की शपथ ले और सप्ताह में कम-से-कम दो घण्टे सफाई के लिए निकाले। अपने भाषण में प्रधानमन्त्री ने स्कूलों और गांवों में शौचालय निर्माण की आवश्यकता पर भी बल दिया।

भारत को स्वच्छ बनाने में सरकार का योगदान केन्द्र सरकार और प्रधानमन्त्री की ‘गन्दगी मुक्त भारत’ की संकल्पना अच्छी है तथा इस दिशा में उनकी ओर से किए गए आरम्भिक प्रयास भी सराहनीय हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर क्या कारण है कि साफ-सफाई हम भारतवासियों के लिए कभी महत्त्व का विषय ही नहीं रहा? आखिर क्यों तमाम प्रयासों के बाद भी हम साफ-सुथरे नहीं रहते? हमारे गाँव गन्दगी के लिए बहुत पहले से बदनाम हैं, लेकिन प्यान दिया जाए, तो यह पता चलता है कि इस मामले में शहरों की स्थिति भी गाँवों से बहुत भिन्न नहीं है।

स्वच्छता अभियान की आवश्यकता आज पूरी दुनिया में भारत की छवि एक गन्दे देश की है। जब-जब भारत की अर्थव्यवस्था, तरक्को, ताकत और प्रतिभा की बात होती है, तब-तब इस बात की भी चर्चा होती है कि भारत एक गन्दा देश है। पिछले ही वर्ष हमारे पड़ोसी देश चीन के कई ब्लॉगों पर गंगा में तैरती लाशों और भारतीय सड़कों पर पड़े कूड़े के ढेर वाली तस्वीरें छाई रहीं।

कुछ साल पहले इण्टरनेशनल हाइजीन काउंसिल ने अपने एक सर्वे में यह कहा था कि औसत भारतीय घर बेहद गन्दे और अस्वास्थ्यकर होते हैं। इस सर्वे में काउंसिल ने कमरों, बाथरूम और रसोईघर की साफ-सफाई को आधार बनाया था। उसके द्वारा जारी गन्दे देशों की सूची में सबसे पहला स्थान मलेशिया और दूसरा स्थान भारत को मिला था। हद तो तब हो गई जब हमारे ही एक पूर्व केन्द्रीय मन्त्री ने यहाँ तक कह दिया कि यदि गन्दगी के लिए नोबेल पुरस्कार दिया जाता, तो वह शर्तिया भारत को ही मिलता।

ये सभी बाते और तथ्य हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि हम भारतीय साफ-सफाई के मामले में भी पिछड़े हुए क्यों हैं? जबकि हम उस समृद्ध एवं गौरवशाली भारतीय संस्कृति के अनुयायी हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य सदा ‘पवित्रता’ और ‘शुद्धि’ रहा है। वास्तव में, भारतीय जनमानस इसी अवधारणा के चलते एक उलझन में रहा है। उसने इसे सीमित अर्थों में ग्रहण करते हुए मन और अन्त:करण की शुचिता को ही सर्वोपरि माना है, इसलिए हमारे यहाँ कहा गया है।

“मन चंगा तो कठौती में गंगा’

यह सही है कि चरित्र की शुद्धि और पवित्रता बहुत आवश्यक है, लेकिन बाहर की सफाई भी उतनी ही आवश्यक है। यदि हमारा आस-पास का परिवेश ही स्वच्छ नहीं होगा, तो मन भला किस प्रकार शुद्ध रह सकेगा? अस्वच्छ परिवेश का प्रतिकूल प्रभाव हमारे मन पर भी पड़ता है। जिस प्रकार एक स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है, उसी प्रकार एक स्वस्थ और शुद्ध व्यक्तित्व का विकास भी स्वच्छ और पवित्र परिवेश में ही सम्भव हैं।

अतः अन्त:करण की शुद्धि का मार्ग बाहरी जगत् की शुद्धि और स्वच्छता से होकर ही गुजरता है। साफ-सफाई के अभाव से हमारे आध्यात्मिक लक्ष्य तो प्रभावित होते ही हैं, साथ ही हमारी आर्थिक प्रगति भी बाधित होती है। अपने भाषण में प्रधानमन्त्री जी ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक आकलन का हवाला देते हुए कहा है कि गन्दगी के कारण औसत रूप से प्रत्येक भारतीय को प्रतिवर्ष लगभग 6,500 का अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। यदि उच्च वर्ग को इसमें शामिल न किया जाए, तो यह आँकड़ा 12 से 15 हजार तक पहुंच सकता हैं। इस तरह देखा जाए, तो हम स्वच्छ रहकर इस आर्थिक नुकसान से बच सकते हैं।

उपसंहार कुल मिलाकर सार यहीं है कि वर्तमान समय में स्वच्छता हमारे लिए एक बड़ी आवश्यकता है। यह समय भारतवर्ष के लिए बदलाव का समय है। बदलाव के इस दौर में यदि हम स्वच्छता के क्षेत्र में पीछे रह गए, तो आर्थिक उन्नति का कोई महत्व नहीं रहेगा। हाल ही में हमारे प्रधानमन्त्री ने 25 सितम्बर, 2014 को ‘मेक इन इण्डिया’ अभियान का भी शुभारम्भ किया है, जिसका लक्ष्य भारत को मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में अव्वल बनाना है। इस अभियान से आर्थिक गति तो अवश्य मिलेगी, लेकिन इसके साथ ही हमें प्रदूषण’ के रूप में एक बड़ी चुनौती भी मिलने वाली है। अतः हमें अपने दैनिक जीवन में तो सफ़ाई को एक मुहिम की तरह शामिल करने की जरूरत है ही, साथ ही हमें इसे एक बड़े स्तर पर भी देखने की ज़रूरत है, ताकि हमारा पर्यावरण भी स्वच्छ रहे।

स्वच्छता समान रूप से हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी हैं। हर समय कोई सरकारी संस्था या बाहरी बल हमारे पीछे नहीं लगा रह सकता। हमें अपनी आदतों में सुधार करना होगा और स्वच्छता को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना होगा. हालाँकि आदतों में बदलाव करना आसान नहीं होगा, लेकिन यह इतना मुश्किल भी नहीं है। प्रधानमन्त्री ने ठीक ही कहा है कि यदि हम कम-से-कम खर्च में अपनी पहली ही कोशिश में मंगल ग्रह पर पहुंच गए, तो क्या हम स्वच्छ भारत का निर्माण सफलतापूर्वक नहीं कर सकते? कहने का तात्पर्य है कि ‘क्लीन इण्डिया’ का सपना पूरा करना कठिन नहीं है। हमें हर हाल में इस लक्ष्य को वर्ष 2019 तक प्राप्त करना होगा, तभी हमारी ओर से राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को उनकी 150वीं जयन्ती पर सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकेगी।

2. आतंकवाद : समस्या और समाधान (2016, 13, 11, 10)
अन्य शीर्षक भारत में आतंकवाद की समस्या (2017), आतंकवाद की समस्या (2017), आतंकवाद और विश्व शान्ति (2014, 13, 11), आतंकवाद एक चुनौती, आतंकवाद और उसके दुष्परिणाम, आतंकवादः कारण एवं निवारण (2013), आतंकवाद और राष्ट्रीय एकता।

संकेत बिन्दु आतंकवाद का अर्थ, भारत में आतंकवाद के रूप में नक्सलवाद, आतंकवाद को पड़ोसी देशों का समर्थन, प्रगति में बाधक, वैश्विक समस्या, समाधान, उपसंहार।

आतंकवाद का अर्थ आतंक की कोई विचारधारा नहीं होती, इस कारण इसे ‘आतंकवाद’ कहना गैर-जरूरी है, किन्तु सामान्य बोलचाल तथा सम्प्रेषण के लिए इस शब्द का प्रयोग सर्वथा अनुचित नहीं है। हिंसा तथा आतंक के पीछे निहित स्वार्थ हो सकता है। यह उद्देश्य प्राप्ति या जनसामान्य के विकास के लक्ष्य से सम्बन्ध नहीं रखता, बल्कि यह वर्चस्ववाद की नीति का आयाम है।

आज हमारा देश आतंकवाद की समस्या से जूझ रहा है। वास्तव में, आतंकवाद वैश्विक रूप धारण कर चुका है। यह धर्म, सम्प्रदाय तथा समुदाय की आड़ में कतिपय कुत्सित विचार वाले लोगों की मानसिकता का परिणाम है।

भारत में आतंकवाद के रूप में नक्सलवाद ‘आतंकवाद’ भारत में कोई पुरानी समस्या नहीं है। आजादी के बाद लोकतन्त्र ने अभिव्यक्ति की जो परम्परा दी, उसमें अपनी जगह न बना पाने की जद्दोजहद में कुछ असामाजिक तत्वों ने आतंक का रास्ता अपना लिया। देश की राजनीतिक तथा सामाजिक प्रक्रिया भी इसमें जिम्मेदार रही है।

समाज की विषमता तथा आर्थिक विभाजन ने एक पूरे वर्ग को हिंसा का रास्ता अपनाने को विवश किया। किसान-मजदूरों की समस्या ने ‘नक्सलवाद’ को उभारा। आज ‘नक्सलवाद’ एक हिंसात्मक आन्दोलन की तरह फैल चुका है, किन्तु हम नक्सलवाद को सीधे तौर पर आतंकवाद नहीं कह सकते हैं।

यह एक उद्देश्य के लिए संघर्ष है। आज भारत में ‘नक्सलवाद’ को अधिक बड़ा खतरा मानकर उसके विरुद्ध बड़े-बड़े ऑपरेशन (अभियान) चलाए जा रहे हैं। हमारी सेना देश के बाहर जाकर भी नक्सलवादियों का सफाया कर रही है, किन्तु आतंकवाद की खतरनाक तथा विध्वंसक प्रक्रिया पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है।

आतंकवाद को पड़ोसी देशों का समर्थन भारत में आतंकवाद क्षेत्रीय तथा साम्प्रदायिक आधार ले चुका है। यह किसी विशेष उद्देश्य के अतिरिक्त देश को मात्र अस्थिर रखने की चाल के साथ संचालित है, जिसे हमारे पड़ोसी देशों का समर्थन प्राप्त है। कश्मीर, असम तथा अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों में कई आतंकी गुट अपनी कार्रवाइयों को अंजाम दे रहे हैं।

कश्मीर में इस्लामी कट्टरपन्थी आतंकी गुट सक्रिय हैं, जिन्हें पाकिस्तान की खुफिया एजेन्सी आई एस आई का समर्थन प्राप्त है। यह एजेन्सी आतंकवादियों को प्रशिक्षण तथा धन उपलब्ध कराती है। असम में सक्रिय ‘उल्फा’ जैसे आतंकी संगठन को बांग्लादेश के आतंकी गुटों का समर्थन प्राप्त है। उल्फा बांग्लादेश में अपने ठिकानों से ही कार्रवाई का संचालन कर रहा है।

प्रगति में बाधक आतंकवाद की समस्या भारत की प्रगति में बाधक है। यह लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती है। भारत के विभिन्न शहरों में हुई आतंकवादी घटनाएँ यह प्रमाणित कर चुकी हैं कि आतंकवादी कहीं भी, कभी भी अपने कुत्सित उद्देश्य को पूरा करने में सफल हो सकते हैं।

मुम्बई में वर्ष 1993 का बम विस्फोट, होटल ताज पर हमला, दिल्ली में सीरियल विस्फोट, संसद पर हमला, वाराणसी के संकटमोचन मन्दिर परिसर में विस्फोट, वर्ष 2002 में गुजरात में अक्षरधाम मन्दिर पर आतंकियों का हमला, वर्ष 2015 में दोना नगर के गुरुदासपुर में हुआ आतंकी हमला तथा हाल ही में 2016 में पठानकोट में हुआ विस्फोट आदि घटनाएँ वास्तव में हमारी सुरक्षा प्रणाली के लिए चुनौती हैं। निर्दोष नागरिकों की जान लेने वाले केवल भय तथा अशान्ति की प्रक्रिया को अंजाम देना चाहते हैं। यह मानवीय क्रूरता का उदाहरण हैं। आज देश का कोई शहर आतंकवाद से सुरक्षित नहीं है।

वैश्विक समस्या आतंकवादियों ने देश के कोने-कोने में अपना नेटवर्क स्थापित कर लिया है। यदि सरकार आतंकवाद को समाप्त करने की किसी ठोस नीति को क्रियान्वित नहीं करती, तो इसे नियन्त्रित करना भी कठिन हो जाएगा। आज आतंकवाद न केवल भारत वरन् पूरे विश्व के लिए एक समस्या बन गया है। इसने दुनिया के लोगों में खौफ पैदा करने का अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया है। इस वैश्विक समस्या से संघर्ष करने के लिए विभिन्न देशों के बीच आपसी समन्वय बनाने की आवश्यकता है।

समाधान आतंकवाद को नियन्त्रित करना कठिन नहीं है। इसके लिए ठोस कार्यनीति बनाकर उसके क्रियान्वयन की जरूरत है। धर्म तथा सम्प्रदाय के नाम पर आतंक फैलाने वाले गुटों को जवाब देने के लिए धार्मिक रूप से सहिष्णु लोगों को आगे आना होगा। शक्ति तथा संसाधनों के माध्यम से आतंकियों के इरादों को ध्वस्त किया जा सकता है। इस समस्या से निपटने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय की भी आवश्यकता है।

उपसंहार महावीर, बुद्ध, गुरुनानक, महात्मा गाँधी जैसे महापुरुषों को जन्म देने वाली इस पुण्य भारत-भूमि पर आतंकवाद कलंक का टीका है। हम सभी भारतवासियों को इसे समूल नष्ट करने का संकल्प लेकर फिर से देश को सत्य, अहिंसा एवं शान्ति की तपोभूमि बनाना होगा, तभी भारत और विश्व का कल्याण सम्भव है।

3. बढ़ती जनसंख्या : बड़ी समस्या (2016, 15, 00)
अन्य शीर्षक जनसंख्या वृद्धि की समस्या (2012, 11, 10), भारत में जनसंख्या वृद्धि : कारण और निवारण, बढ़ती जनसंख्या : समस्या और समाधान (2018, 11, 12, 11, 10), जनसंख्या का विरफोट : एक समस्या (2011), बढ़ती जनसंख्या के कुप्रभाव (2017, 15)।।

संकेत बिन्दु भूमिका, जनसंख्या में दूसरा सबसे बड़ा देश, जनसंख्या वृद्धि के कारण, जनसंख्या वृद्धि का कुप्रभाव, नियन्त्रण के उपाय, उपसंहार।

भूमिका सुप्रसिद्ध विचारक गार्नर का कहना है कि जनसंख्या किसी भी राज्य के लिए उससे अधिक नहीं होनी चाहिए, जितनी साधन-सम्पन्नता राज्य के पास है अर्थात् जनसंख्या किसी भी देश के लिए वरदान होती हैं, परन्तु जब अधिकतम सीमा-रेखा को पार कर जाती है, तब वही अभिशाप बन जाती है।

जनसंख्या में दूसरा सबसे बड़ा देश वर्तमान में जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में चीन के बाद दूसरा स्थान है। हमारे सामने अभी जनसंख्या विस्फोट की समस्या है। बढ़ती हुई जनसंख्या का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत की जनसंख्या मात्र 36 करोड़ थी, जो अब वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार बढ़कर 121 करोड़ से भी अधिक हो गई है।

जनसंख्या वृद्धि के कारण जनसंख्या वृद्धि के विभिन्न महत्त्वपूर्ण कारणों में जन्म एवं मृत्यु दर के बीच अधिक दूरी, विवाह के समय कम आयु, अत्यधिक निरक्षरता, परिवार नियोजन के प्रति धार्मिक दृष्टिकोण, निर्धनता (अधिक हाथ अधिक आमदनी का सिद्धान्त), मनोरंजन के साधनों की कमी, संयुक्त परिवार, परिवारों में युवा दम्पतियों में अपने बच्चों के पालन पोषण के प्रति जिम्मेदारी में कमी तथा बन्ध्याकरण, ट्यूबेक्टॉमी एवं लूप के प्रभावों के विषय में गलत सूचना या । सूचना का अभाव आदि उल्लेखनीय हैं।

जनसंख्या वृद्धि का कुप्रभाव जनसंख्या वृद्धि का प्रत्यक्ष प्रभाव लोगों के जीवन-स्तर पर पड़ता है। यही कारण है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद से कृषि एवं औद्योगिक क्षेत्रों में चामत्कारिक प्रगति के बावजूद यहाँ प्रति व्यक्ति आय में सन्तोषजनक वृद्धि नहीं हो पाई हैं।

जनसंख्या वृद्धि एवं नियन्त्रण की सैद्धान्तिक व्याख्याओं के अन्तर्गत एक व्याख्या मानती है कि विकास जनन क्षमता (fertility) की दर को कम कर देता है। यह भी कहा जाता है कि विकास मृत्यु दर को जन्म दर की अपेक्षा अधिक कम करता है। जिसका परिणाम, जनसंख्या में वृद्धि का होना है।

नियन्त्रण के उपाय यदि देश लगभग 1.5 करोड़ व्यक्तियों की प्रतिवर्ष की वृद्धि से बचना चाहता है, तो केवल एक ही मार्ग शेष है कि आवश्यक परिवार नियोजन एवं जनसंख्या हतोत्साहन का कड़वा घूट लोगों को पिलाया जाए। इसके लिए एक उपयुक्त जनसंख्या नीति की आवश्यकता है। सबसे अधिक बल इस बात पर दिया जाना चाहिए कि परिवार नियोजन कार्यक्रम में अत्यधिक जोर बन्ध्याकरण पर देने की अपेक्षा ‘फासले’ की विधि को प्रोत्साहित किया जाए, जिससे इसके अनुरूप जनांकिकीय प्रभाव प्राप्त किया जा सके। हमारे देश में लगभग पांच में से तीन (576) विवाहित स्त्रियाँ 30 वर्ष से कम आयु की हैं और दो या दो से अधिक बच्चों की माँ हैं। ‘बच्चियाँ ही बच्चे पैदा करे’ इस सच्चाई को बदलना होगा। यह केवल फासले की विधि तथा लड़कियों की अधिक विवाह-उम्र को प्रोत्साहन देने से ही सम्भव हो सकेगा।

भारत जैसे विकासशील देश में बढ़ती जनसंख्या पर नियन्त्रण पानी अत्यन्त आवश्यक है अन्यथा इसके परिणामस्वरूप देश में अशिक्षा, गरीबी, बीमारी, भूखमरी, बेरोजगारी, आवासहीनता जैसी कई समस्याएँ उत्पन्न होगी और देश का विकास अवरुद्ध हो जाएगा। अतः जनसंख्या को नियन्त्रित करने के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकारों के साथ-साथ देश के प्रत्येक नागरिक को इस विकट समस्या से लड़ना होगा। समाज-सेवी संस्थाओं की भी इस समस्या के समाधान हेतु महत्त्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए।

जनसंख्या वृद्धि रोकने हेतु शिक्षा का व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार अति आवश्यक है। महिलाओं के शिक्षित होने से विवाह की आयु बढ़ाई जा सकती है, प्रजनन आयु वाले दम्पतियों को गर्भ निरोध स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। उन्हें छोटा परिवार सुखी परिवार की बात समझाई जा सकती है।

केन्द्रीय एवं राज्य स्तरों पर जनसंख्या परिषद् स्थापित करना भी इस समस्या का उपयुक्त उपाय हो सकता है, क्योंकि ऐसा करके न केवल विभिन्न स्तरों पर समन्वय का कार्य किया जा सकेगा, बल्कि अल्पकालीन व दीर्घकालीन योजनाओं का निर्धारण भी किया जा सकेगा। मीडिया को भी इस कार्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की आवश्यकता है। इन सब बातों पर ध्यान देकर जनसंख्या विस्फोट पर निश्चय ही नियन्त्रण पाया जा सकता हैं।

उपसंहार विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक ‘स्टीफन हॉकिंग’ ने मानव को सावधान करते हुए कहा है-“हमारी जनसंख्या एवं हमारे द्वारा पृथ्वी के निश्चित संसाधनों के उपयोग, पर्यावरण को स्वस्थ या बीमार करने वाली हमारी तकनीकी क्षमता के साथ घातीय रूप में बढ़ रहे हैं। आज प्रत्येक देशवासी को उनकी बातों से प्रेरणा लेकर देश को समृद्ध एवं विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प लेना चाहिए।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi आर्थिक निबन्ध

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Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name आर्थिक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi आर्थिक निबन्ध

1. ग्रामीण रोजगार योजनाएँ (2016)
संकेत विन्दु भूमिका, ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार द्वारा बनाई गई नवीन योजनाएँ, उपसंहार।

भूमिका स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत के सामने एक बड़ी चुनौती थीप्रामीणों की दशा सुधारने के लिए उन्हें रोजगार के अवसर प्रदान करना, क्योंकि किसानों को समृद्ध किए बिना देश की पूर्ण समृद्धि की कल्पना नहीं की जा सकती थी। देश के प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने भी कहा है-“जब तक देश के किसान खुशहाल नहीं होंगे तब तक राष्ट्र एवं समाज का पूर्ण विकास नहीं हो सकता।” उस समय देश के लिए अन्न उपजाने वाले किसान कृषि कार्यों के लिए पूर्णतः प्रकृति पर निर्भर थे। सूखा, अतिवृष्टि, बाढ़ आदि प्राकृतिक आपदाएँ आने पर किसानों की दशा अति दयनीय हो जाती थी और उनके रोजगार ठप पड़ जाते थे।

ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार द्वारा बनाई गई नवीन योजनाएँ स्वतन्त्र भारत में किसानों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने के उद्देश्य से केन्द्र सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में समय-समय पर कई रोजगार योजनाओं व कार्यक्रमों को मूर्त रूप दिया गया, जिनमें ग्रामीण मज़दूर रोजगार कार्यक्रम, मनरेगा, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना, काम के बदले अनाज कार्यक्रम, स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना आदि प्रमुख हैं। इन विकासोन्मुख योजनाओं व कार्यक्रमों के कारण देश के किसानों की दशा में पहले से बहुत सुधार आया है, परन्तु अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में काफी अधिक बेरोजगारी है, जिसका प्रमुख कारण है—देश की जनसंख्या का दिनों-दिन अत्यधिक तेज गति से बढ़ना।

प्रामीण क्षेत्रों में सरकार द्वारा किए गए महत्त्वपूर्ण प्रयास इस प्रकार है
(i) ग्रामीण मजदूरी रोजगार कार्यक्रम केन्द्र सरकार द्वारा वर्ष 1960-61 में ग्रामीण जनशक्ति कार्यक्रम के रूप में इस कार्यक्रम का शुभारम्भ किया गया। उसके बाद वर्ष 1971-72 के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराए जाने हेतु ग्रामीण रोजगार क्रैश स्कौम, कृषि श्रमिक स्कीम, लघु कृषक विकास एजेन्सी, सूखा संवेदी क्षेत्र कार्यक्रम की आधारशिला रखी गई। वर्ष 1980 में इन सबको सम्मिलित रूप से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम और प्रामीण भूमिहीन रोजगार गारण्टी कार्यक्रम में और वर्ष 1993 में इन्हें पुनः विस्तारित कर जवाहर रोजगार योजना में परिवर्तित कर दिया गया। वर्ष 1999.2000 में जवाहर रोजगार योजना को जवाहर ग्राम समृद्धि योजना में शामिल कर लिया गया। वर्ष 2001-02 में इसे सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम एवं वर्ष 2005 में काम के बदले अनाज कार्यक्रम में विलय किया गया। केन्द्र सरकार द्वारा किए गए इन प्रयासों का ग्रामीण रोजगार के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान हैं।

(ii) मनरेगा महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम अर्थात् मनरेगा ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने का एक अधिकार सम्बद्ध कार्यक्रम है। इसका कार्यान्वयन वर्ष 2006 में देश के अत्यन्त पिछड़े 200 जिलों में किया गया। वर्ष 2007 एवं पुनः वर्ष 2008 में इसे विस्तारित कर देश के समस्त जिलों में प्रभावी कर दिया गया। मनरेगा का उद्देश्य इच्छुक बेरोजगार वयस्कों को वर्षभर में कम-से-कम 100 दिनों का निश्चित रोजगार प्रदान करना रखा गया। ग्रामीणों को जीविका प्रदान करने के साथ-साथ इसका उद्देश्य पंचायती राज व्यवस्था को प्रभावी बनाना भी हैं। इस कार्यक्रम के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति श्रम दिवस औसत मजदूरी में
81% की वृद्धि हुई है।

(iii) राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) ग्रामीण विकास मन्त्रालय का एक अति महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2021-22 तक देश के ग्रामीण क्षेत्रों के आठ से दस करोड़ निर्धन परिवारों को लाभ पहुँचाना है। पंचायती राज संस्थाओं को विशेष महत्त्व देने वाले इस मिशन को मार्च, 2014 तक देश के 27 राज्यों सहित पुदुचेरी संघ राज्य क्षेत्र में कार्यान्वित कर दिया गया। इस मिशन की सहायता से अब तक देश के डेढ़ लाख महिला श्रमिकों को लाभान्वित किया जा चुका है। (NRLM) के द्वारा वर्ष 2013-14 के दौरान लगभग तीन लाख स्व सहायता समूहों को मदद पहुँचाई गई और कुल 1,300 से भी अधिक ब्लॉकों को इसके अन्तर्गत लाया गया।

(iv) सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना देश में पूर्व से प्रभावी जवाहर ग्राम समृद्धि योजना और रोजगार आश्वासन योजना को सम्मिलित कर वर्ष 2001 में केन्द्र सरकार द्वारा सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना को कार्यरूप दिया गया। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण इलाकों में खाद्य सुरक्षा प्रदान करना तथा स्थायी परिसम्पत्तियों के माध्यम से रोजगार के अवसर का विस्तार करना है। गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे लोगों को इस योजना में प्राथमिकता दी गई है। इस योजना में व्यय की जाने वाली राशि को केन्द्र व राज्य सरकारों में 75; 25 में बाँटा गया हैं। वहीं जिला पंचायत, मध्यवर्ती पंचायत एवं ग्राम पंचायतों के मध्य संसाधनों का वितरण 20 : 30 : 50 के आधार पर किया गया है। वर्ष 2004 में सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना के द्वारा उपलब्ध किए जाने वाले संसाधनों को छोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से काम के बदले अनाज कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया। योजना आयोग द्वारा संचालित इस कार्यक्रम का लक्ष्य देश के सर्वाधिक पिछड़े 150 जिलों में खाद्य सुरक्षा व पूरक दैनिक मजदूरी रोजगार के क्षेत्र को विस्तार देना है।

(v) स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा से ऊपर जीवन यापन करने वाले निर्धन लोगों को स्वरोजगार प्रदान करने के उद्देश्य से इस योजना को वर्ष 1999 में प्रारम्भ किया गया। इस योजना के अन्तर्गत गैर-सरकारी संस्थाओं को सुविधा प्रदाता के रूप में सम्मिलित कर स्वयंसेवी सहायता समूहों के विकास एवं पोषण पर ध्यान दिया जाता है। इस योजना द्वारा सरकारी सब्सिडी एवं बैंक ऋण के माध्यम से ग्रामीणों तक सहायता पहुंचाई जाती हैं। कुल परियोजना लागत की 30% दर से दी जाने वाली सब्सिडी की अधिकतम सीमा ₹ 7,500 तक निर्धारित की गई है। सामान्यतः 10-20 सदस्यों के द्वारा स्वयं सहायता समूह का गठन किया जा सकता है। इस योजना के अन्तर्गत अब तक लगभग 22 लाख से भी अधिक स्वयं सहायता समूहों को गठित किया गया है। लाभान्वित होने वाले स्वरोजगारियों में लगभग 45% अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति के लोग एवं लगभग 48% महिलाएँ हैं।

उपसंहार निश्चय ही देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के तमाम साधन उपलब्ध हैं और केन्द्र व राज्य की सरकारों द्वारा समय-समय पर चलाए गए विभिन्न रोजगार सम्बद्ध कार्यक्रमों से बड़ी संख्या में ग्रामीणों को लाभ प्राप्त हुआ है, पर आज भी रोजगार के क्षेत्र में गाँवों की स्थिति दयनीय ही है। सरकारी स्तर पर और प्रभावी एवं लाभप्रद योजनाओं को मूर्त रूप देकर ग्रामीणों की दशा सुधारी जा सकती है, पर इसके लिए प्रामीणों में शिक्षा का विस्तार किया जाना अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि बिना लोगों को जागरूक किए काम के प्रति लगन पैदा नहीं की जा सकती। सरकारी सुविधाओं का पूर्ण लाभ प्राप्त करने हेतु भी ग्रामीणों का शिक्षित होना अत्यन्त आवश्यक है। इसके लिए गाँवों में रोजगारमूलक शिक्षा का प्रचार प्रसार खूब जोर-शोर से करना चाहिए।

2. बेकारी/बेरोजगारी की समस्या एवं समाधान (2015, 14, 13, 12)
अन्य शीर्षक भारत में बेरोजगारी की समस्या (2013, 11, 07, 06, 05), शिक्षित बेरोजगारी की समस्या (2018, 11, 10)

संकेत बिन्दु बेरोजगारी का तात्पर्य, बेरोजगार युवा वर्ग, अनेक समस्याओं की जड़ बेरोजगारी, बेरोजगारी के कारण, बेरोजगारी दूर करने के उपाय, उपसंहार।

बेरोजगारी का तात्पर्य बेरोजगारी से अभिप्राय उस स्थिति से है, जब कोई योग्य तथा काम करने का इच्छुक व्यक्ति प्रचलित मजदूरी की दरों पर काम करने के लिए तैयार हो। बालक, वृद्ध, रोगी, अक्षम एवं अपंग व्यक्तियों को बेरोजगारों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। भारत में बेरोजगारी एक आर्थिक समस्या है।

यह एक ऐसी बुराई है, जिसके कारण केवल उत्पादक मानव शक्ति ही नष्ट नहीं होती, बल्कि देश का भावी विकास भी अवरुद्ध हो जाता है, जो श्रमिक अपने कार्य द्वारा देश के आर्थिक विकास में सक्रिय सहयोग दे सकते थे, ये कार्य के अभाव में बेरोजगार रह जाते हैं। यह स्थिति हमारे आर्थिक विकास में बाधक है।

बेरोजगार युवा वर्ग आज हमारे समाज में बेरोजगारी की समस्या में वृद्धि होती जा रही है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण आज का युवा वर्ग है। आज का नवयुवक जो विश्वविद्यालय से अच्छे अंक व डिग्री प्राप्त करके निकलता है, परन्तु वह रोजगार की तलाश में भटकता रहता है। बेरोजगारी के कारण नवयुवक प्रतिदिन रोजगार पाने के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाते रहते हैं तथा अखबारों, इण्टरनेट आदि में दिए गए विज्ञापनों के द्वारा अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी की खोज में लगे रहते हैं, परन्तु उन्हें रोजगार की प्राप्ति नहीं हो पाती, उन्हें केवल निराशा ही मिलती है।

अनेक समस्याओं की जड़ बेरोजगारी रोजगार न मिलने के कारण युवा वर्ग निराशावादी बन जाता है और आँसुओं के खारेपन को पीकर समाज को अपनी मौनव्यथा सुनाता है। बेरोजगारी किसी भी देश अथवा समाज के लिए अभिशाप है। इससे एक ओर निर्धनता, भुखमरी और मानसिक अशान्ति फैलती है, तो दूसरी ओर युवकों में आक्रोश तथा अनुशासनहीनता को भी प्रोत्साहन मिलता है। चोरी, डकैती, हिंसा, अपराघवृत्ति एवं आत्महत्या आदि समस्याओं के मूल में एक बड़ी सौमा तक बेरोजगारी ही विद्यमान है। बेरोजगारी एक ऐसा भयंकर विष है, जो सम्पूर्ण देश के आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन को दूषित कर देता है।

बेरोजगारी के कारण हमारे देश में बेरोजगारी के निम्न कारण हैं-दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली, जनसंख्या में वृद्धि, कुटीर उद्योगों की उपेक्षा, औद्योगीकरण की उपेक्षा, औद्योगीकरण की मन्द प्रक्रिया, कृषि का पिछड़ापन, कुशल एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों की कमी। इसके अतिरिक्त मानसून की अनियमितता, भारी संख्या में शरणार्थियों का आगमन, अत्यधिक मशीनीकरण के फलस्वरूप होने वाली श्रमिकों की छंटनी, श्रम और माँग की पूर्ति में असन्तुलन, स्वरोजगार के साधनों की कमी इत्यादि इन कारणों से भी बेरोजगारी में वृद्धि हुई हैं। देश को बेरोजगारी से उभारने के लिए इसका समुचित समाधान नितान्त आवश्यक है।

बेरोजगारी दूर करने के उपाय बेरोजगारी को दूर करने के लिए हमें जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण, शिक्षा प्रणाली में व्यापक परिवर्तन, कुटीर उद्योगों का विकास, औद्योगीकरण, सहकारी खेती, सहायक उद्योगों का विकास, राष्ट्र-निर्माण सम्बन्धी विभिन्न कार्य आदि का विस्तार करना चाहिए। बेरोजगारी की समस्या का समाधान तब ही सम्भव है, जब व्यावहारिक एवं व्यावसायिक रोजगारोन्मुखी शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित कर लोगों को स्वरोजगार अर्थात् निजी उद्यम और व्यवसाय प्रारम्भ करने के लिए प्रेरित किया जाए।

उपसंहार हमारी सरकार बेरोजगारी उन्मूलन के प्रति जागरूक है और इस दिशा में उसने महत्त्वपूर्ण कदम भी उठाए हैं। परिवार नियोजन, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, कच्चे मालों को एक स्थान-से-दूसरे स्थान पर ले जाने की सुविधा, कृषि-भूमि की चकबन्दी, नए-नए उद्योगों की स्थापना, अप्रेण्टिस (शिनु) योजना, प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना आदि अनेकानेक कार्य ऐसे हैं, जो बेरोजगारी दूर करने में एक सीमा तक सहायक सिद्ध हुए हैं, परन्तु वर्तमान स्थिति को देखते हुए इनको और अधिक विस्तृत एवं प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 11 दूत वाक्यम्

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 11
Chapter Name दूत वाक्यम्
Number of Questions Solved 7
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 11 दूत वाक्यम्

गद्यांशों का सन्दर्भ-सहित हिन्दी अनुवाद

गद्यांश ।
काञ्चुकीयः-भो भो; प्रतीहाराधिकृताः! महाराजो दुर्योधन: समाज्ञापयति- अद्य सर्वैः पार्थिवैः सह मन्त्रयितुम् इच्छामि! तदाहूयन्तां सर्वे राजानः इति। (परिक्रम्य अवलोक्य) अये! अयं महाराजो दुर्योधनः इत एवाभिवर्तते। (ततः प्रविशति यथानिर्दिष्टो दुर्योधनः)
काञ्चुकीयः-जयतु महाराजः! महाराजशासनात् समानीत सर्व राजमण्डलम्।
दुर्योधनः-सम्यक कृतम्! प्रविश त्वम् अवरोधम्।
काञ्चुकीयः-यदाज्ञापयति महाराजः। (निष्क्रान्तः, पुनः प्रविश्य)
काञ्चुकीयः-जयतु महाराजः एष खलु पाण्डवस्कन्धावारात् दौत्येनागतः पुरुषोत्तम: नारायणः।।
दुर्योधनः-मा तावद् भोः बादरायण! किं किं कंसभृत्यो दामोदरस्तय नारायणः। स गोपालकस्तव पुरुषोत्तमः ब्रार्हद्रथापहृतविजयकीर्तिभोगः तव पुरुषोत्तमः।
अहो! पार्थिवासन्नमाश्रितस्य भृत्यजनस्य समुदाचारः। क एष दूतः प्राप्तः।
सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘दूतवाक्यम्’ नामक पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद
कांचुकीय-हे पहरेदारों! महाराज दुर्योधन आज्ञा देते हैं, “मैं आज सभी राजाओं के साथ मन्त्रणा (विचार-विमर्श करना चाहता हूँ, इसलिए सभी राजाओं को बुलाओ।” (घूमकर देखते हुए) “अरे! ये महाराज दुर्योधन तो इधर ही आ रहे हैं।” (तब जैसा कि निर्दिष्ट किया गया, दुर्योधन प्रवेश करता है)
कांचुकीय-महाराज की जय हो। महाराज की आज्ञा के अनुसार सम्पूर्ण राजमण्डल को बुला लिया गया है।
दुर्योधन–अच्छा किया। तुम रनिवास में जाओ।
कांचुकीय-जैसी आज्ञा महाराज। (निकलकर पुन: प्रवेश करता है)
कांघुकीय-महाराज की जय हो। निश्चय ही पाण्डव शिविर से दूतरूप में पुरुषोत्तम नारायण श्रीकृष्ण पधारे हैं।।

गद्यांश 2.
भो भोः राजानः!
दौत्येनागतस्य केशवस्य किं युक्तम्। किमाहुर्भवन्तः ‘अर्घ्यप्रदानेन पूजयितव्यः केशवः’ इति। न में रोचते। ग्रहणे अत्र अस्य हितं पश्यामि।
अपि च योऽत्र केशवस्य प्रत्युत्थास्यति स मया द्वादशसुवर्णभारेण दण्ड्यः
तदप्रमत्ता भवन्तु भवन्तः। कोऽत्र भोः। (2014, 12, 11, 10)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद हे राजाओ! दूतरूप में आए केशव के लिए क्या उचित है?
आप लोगों का क्या कहना है? अर्घ्य अर्पित कर केशव को पूजना चाहिए। मुझे यह नहीं भाता। यहीं उसे पकड़ लेने (बन्दी बना लेने) में ही मुझे हित दिखता है। और, जो भी यहाँ केशव की ओर से खड़ा होगा, उसे मैं बारह स्वर्ण मुद्राओं से दण्डित करूँगा। अत: आप सब सावधान रहें। अरे! यहाँ कौन है?

गद्यांश 3
काञ्चुकीयः अथ किम् अथ किम्। प्रवेष्टुमर्हति पदमनाभः।
वासुदेव (प्रविश्य स्वगतम्) कथं कथं मां दृष्ट्वा सम्भ्रान्ताः सर्वे क्षत्रिया:। (प्रकाशम्) अलमले सम्भ्रमेण, स्वैरमासतां भवन्तः।
दुर्योधनः कथं कथं केशवं दृष्ट्वा सम्भ्रान्ताः सर्वे क्षत्रियाः। अलम् अलम् सम्भमेण। स्मरणीयः पूर्वमाश्रावितो दण्डः। ननु अहम् आज्ञप्ता।
वासुदेवः-भोः सुयोधन! कि भणसि।
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद
कांचुकीय-निश्चय ही, निश्चय ही। श्रीकृष्ण! आप प्रवेश के अधिकारी हैं।
वासुदेव (प्रवेश करके मन-ही-मन में क्यों, मुझे देखकर सभी क्षत्रिय क्यों घबराए हुए हैं? (प्रकट रूप में) घबराएँ नहीं, आप सब निश्चिन्त होकर बैठे।
दुर्योधन-क्या, क्या, सभी क्षत्रिय केशव को देखकर घबरा उठे हैं। मत घबराएँ। पूर्व में सुनाए गए दण्ड को स्मरण रखें। नि:सन्देह, मैं माझा देने वाला हैं।
वासुदेव हे दुर्योधन! क्या कहते हो?

गद्यांश 4
वासुदेवः-भोः सुयोधन! किं न जानासि अर्जुनस्य पराक्रमम्।
दुर्योधनः न जानामि।
वासुदेवः-भोः श्रूयताम्, एकेनैव अर्जुनेन तदा विराटनगरे भीमादयो निर्जिताः। अपि च चित्रसेनेन नभस्तलं नीयमानस्त्वं फाल्गुनेनैव मोचितः।
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद
वासुदेव-हे दुर्योधन! क्या अर्जुन के पराक्रम को नहीं जानते?
दुर्योधन-नहीं जानता।
वासुदेव-हे दुर्योधन सुनो! विराट्नगर में अर्जुन ने अकेले ही भीष्म आदि को जीता था तथा अर्जुन ने ही तुम्हें आकाश में ले जाते हुए चित्रसेन से छुड़ाया था।

गद्यांश 5
वासुदेवः-भोः कुरुकुलकलङ्कभूत!
दुर्योधनः-भोः गोपालक!
वासुदेवः-भोः सुयोधन ! ननु क्षिपसि माम्।।
दुर्योधनः आः अनात्मज्ञस्त्वम्। अहं कथयामि यद् भवविधैः सह न भाषे।
वासुदेवःभोः शठ! त्वदर्थात् अयं कुरुवंशः अचिरान्नाशमेष्यति। भो भो राजानः! गच्छामस्तावत्।।
दुर्योधनः कथं यास्यति किल केशवः। भोः दुःशासन! दूतसमुदाचारमतिक्रान्तः केशवः बध्यताम्। मातुल! बध्यतामयं केशवः। कथं पराङ्मुखः पतति। भवतु अहमेव पाशैर्बध्नामि (उपसर्पति) ।।
वासुदेवः कथं बद्धकामो मां किल सुयोधनः। भवतु, सुयोधनस्य सामर्थ्य पश्यामि (विश्वरूपमास्थितः) ।
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद
वासुदेव-है कुरुवंश के कलंक!
दुर्योधन-हे ग्वाले! वासुदेव-है दुर्योधन! मुझ पर आक्षेप करते हो।
दुर्योधन-अरे, तू स्वयं से अनभिज्ञ है। मैं कह देता हूँ कि तुझ जैसों से मैं नहीं बोलता।
वासुदेव-हे मूर्ख! तेरे कारण यह कुरुवंश शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा। हे, हे राजाओ! हम जाते हैं।
दुर्योधन-केशव भला कैसे चला जाएगा। हे दुःशासन! दूत की मर्यादा का उल्लंघन करने वाले केशव को बाँध दो। मामा! इस केशव को बाँध दो। अरे आप उल्टे मुँह क्यों गिर रहे हैं? अच्छा, इसे मैं ही बन्धन से बाँधता हूँ (समीप जाता है)।
वासुदेव-क्या, दुर्योधन मुझे बाँधना चाहता है? अच्छा, देखें दुर्योधन की सामर्थ्य (विरारूप धारण करते हैं।

गद्यांश 6
आः तिष्ठ इदानीम्। कथं न दृष्टः केशवः? अहो क्लस्यत्वं केशवस्य। आः तिष्ठ इदानीम् कथं न दृष्टः केशवः! अहो दीर्घत्वं केशवस्या कथं न दृष्टः केशवः! अयं केशवः। कथं सर्वत्र शालायां कैशवा एव केशवा: दृश्यन्ते! किम् इदानीं करिष्ये! भवतु, दृष्टम्। भो राजानः! एकेन एक: केशवः बध्यताम्। कथं स्वयमेव पाशैर्बद्धाः पतन्ति राजानः। (निष्क्रान्ताः सर्वे)। (2018)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद अरे! अब ठहर! क्यों नहीं दिख रहा कैशव? अरे! केशव की सूक्ष्मता! अरे! अब ठहर। केशव क्यों नहीं दिख रहा? अरे! केशव की विशालता। क्यों नहीं दिख रहा केशव? यह है केशव! क्या इस सभा में सर्वत्र केशव-ही-केशव दिख रहा है? अब मैं क्या करूं? अच्छा, समझा है राजाओं! (आप में से) प्रत्येक एक केशव को बाँधे। क्या बन्धन में बँधे राजागण स्वयं ही गिर रहे हैं! (सभी निकलते हैं)

श्लोकों का सन्दर्भ-सहित हिन्दी अनुवाद

श्लोक 1
ग्रहणमुपगते तु वासुदेवे हृतनयना इव पाण्डवा भवेयुः। गतिमतिरहितेषु पाण्डवेषु, क्षितिरखिलापि भवेन्ममासपत्ना।। (2012, 11)
सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘दूतवाक्यम् पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद वासुदेव को बन्दी बना लेने से पाण्डव नेत्रहीन हो जाएँगे। पाण्डवों के गतिविहीन एवं मतिविहीन हो जाने पर मेरे लिए सम्पूर्ण पृथ्वी शत्रु-रहित हो जाएगी।

श्लोक 2
प्राप्तः किलाद्य वचनादिह पाण्डवानां दौत्येन भृत्य इव कृष्णमतिः स कृष्णः। श्रोतुं सखे! त्वमपि सज्जय कर्ण कर्णी नारीमृदूनि वचनानि युधिष्ठिरस्य।।। (2017, 15, 11)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद निश्चय ही पाण्डवों के कहने पर कुटिल बुद्धि वाला कृष्ण आज दूत रूप में सेवक सदृश यहीं आया है। हे कर्ण युद्धितिर के नारी के सदृश कोमल वचन सुनने के लिए तुम भी अपने कानों को तैयार कर लो।।

श्लोक 3
दुष्टवादी गुणद्वेषी शठः स्वजननिर्दयः।।
सुयोधनो हि मां दृष्ट्वा नैव कार्य करिष्यति।।
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद बुरे वचन बोलने वाला, गुणों से द्वेष रखने वाला, दुष्ट और स्वजनों के प्रति निर्दयीं दुर्योधन मुझे देखकर कार्य नहीं करेगा।

श्लोक 4
अनुभूतं मददु:खं सम्पूर्णः सुम्यः स च।
अस्माकपि धर्म्यं यद् दायाचं तद् विभज्यताम्।। (2018)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद वासुदेव सब कुशलतापूर्वक हैं। आपके राज्य की कुशलता और शरीर के स्वास्थ्य को पूछकर निवेदन करते हैं हमने अत्यधिक कष्ट भोग लिया है। अब वह शर्त भी पूरी हो गई है। अतः धर्म के अनुसार जो भी देने योग्य हो, वह बाँट दीजिए।

श्लोक 5
राज्यं नाम नृपात्मजैस्सहृदयैर्जित्वा रिपून् भुज्यते।
तल्लोके न तु याच्यते न च पुनर्दीना वा दीयते।।
काङ्क्षा चेन्नृपतित्वमाप्तुमचिरात् कुर्वन्तु ते साहसम्।।
स्वैरं वा प्रविशन्तु शान्तमतिभिर्जुण्टं शुमायाश्रमत्।।
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद सह्दय राजकुमारों के द्वारा राज्य तो शत्रुओं को जीतकर भौगा जाता है। वह न तो लोक (संसार) में माँगा जाता है तथा न ही किसी निर्धन व्यक्ति को प्रदान किया जाता है। यदि उन्हें (पाण्डवों को) राज़ पाने की चाह हो तो साहस करें, अन्यथा शान्ति हेतु शान्त चित्त वाले तपस्वियों से युक्त आश्रम में प्रवेश करें।

श्लोक 6
कर्तव्यो भ्रातृषु स्नेहो विस्मर्तव्या गुणेतराः।।
सम्बन्धो बन्धुभिः श्रेयान् लोकयोरुभयोरपि।। (2017)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद भाइयों से स्नेह करना कर्तव्य है। उनके अवगुणों को भुला देना चाहिए। भाइयों से मेल-मिलाप रखना दोनों ही लोकों में मंगलकारी होता है।

श्लोक 7
दातुमर्हसि मद्वाक्याद् राज्यार्द्ध धृतराष्ट्रज।
अन्यथा सागरान्तां ग हरिष्यन्ति हि पाण्डवाः।। (2018)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद हे धृतराष्ट्रकुमार! तुम्हें मेरे कथन के अनुसार राज्य का आधा भाग दे देना चाहिए अन्यथा पाण्डव (निश्चय ही) समुद्र के अन्त तक की धरती तुमसे छीन लेंगे।

श्लोक 8
प्रहरति यदि युद्धे मारुतो भीमरूपी
प्रहरति यदि साक्षात्पर्थरूपेण शक्रः ।।
परुषवचनदक्ष! त्वद्वचोभिर्न दास्ये
तृणमपि पितृभुक्ते वीर्यगुप्ते स्वराज्ये।।
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद कटुवचन बोलने में दक्ष हे कृष्ण! यदि युद्ध में स्वयं वायु देव भी भीम रूप में प्रहार करें तथा साक्षात् इन्द्र भी अर्जुन रूप में प्रहार करें, तो भी मैं तुम्हारे कहने से पिता द्वारा भोगे गए, पराक्रम से संरक्षित अपने राज्य का तिनका भी नहीं दूंगा।।

श्लोक 9
सृञ्जसि यदि सुमन्ताद् देवमायाः स्वमायाः
प्रहरसि यदि वा त्वं दुर्निवारैस्सुरास्त्रैः।
हयगजवृषभाणां पातनाज्जादपों ।
नरपतिगणमध्ये बध्यसे त्वं मुयाद्य।। (2010)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद यदि तुम चारों ओर अपनी देवमाया रच दो, यदि तुम अबाध दिव्यास्त्रों से प्रहार करो, घोड़े, हाथियों एवं बैलों को मारने से उत्पन्न घमण्ड वाले, आज मैं इन राजाओं के मध्य तुम्हें बॉधूंगा।

प्रश्न – उत्तर

प्रश्न-पत्र में संस्कृत दिग्दर्शिका के पाठों (गद्य व पद्य) से चार अतिलघु उत्तरीय प्रश्न दिए जाएंगे, जिनमें से किन्हीं दो के उत्तर संस्कृत में लिखने होंगे, प्रत्येक प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

प्रश्न 1.
पाण्डवदूतः कः आसीत् (2014)
उत्तर:
पाण्डवदूतः श्रीकृष्णः आसीत्।

प्रश्न 2.
श्रीकृष्ण कस्य समीपे दौत्येन गतः? (2014, 13, 12, 11)
अथवा
श्रीकृष्णः दूतरूपेण कुत्र गतः?
उत्तर:
श्रीकृष्णः दुर्योधनस्य समीपे दौत्येन गतः।

प्रश्न 3.
वासुदेव कस्य दौत्येन कुत्र गतः? (2017)
उत्तर:
वासुदेव युधिष्ठिरस्य दौत्येन दुर्योधनस्य समीपे गतः

प्रश्न 4.
दुर्योधनः कर्णं किम् अवोचत्? (2014, 12)
उत्तर:
दुर्योधनः कर्णम् अवोचत् सखे कर्ण! त्वमपि युधिष्ठिरस्य नारीमृदूनि वचनानि श्रोतुं कणों सज्जय।

प्रश्न 5.
दुर्योधनः श्रीकृष्णं किम् अपृच्छत् ? (2016)
उत्तर:
दुर्योधनः श्रीकृष्णं अपृच्छत् यत् तस्थ भ्रातरः अपि कुशलिनः ?

प्रश्न 6.
दुर्योधनः कस्य पुत्रः आसीत्? (2018, 10)
उत्तर:
दुर्योधनः धृतराष्ट्रस्य पुत्रः आसीत्।

प्रश्न 7.
कः पाण्डवः दूतः अभवत् (2018)
उत्तर:
श्रीकृष्णः पाण्डवः दूतः अभवत्।।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 7 नौका विहार / परिवर्तन / बापू के प्रति

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 7
Chapter Name नौका विहार / परिवर्तन / बापू के प्रति
Number of Questions Solved 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 7 नौका विहार / परिवर्तन / बापू के प्रति

नौका विहार / परिवर्तन / बापू के प्रति – जीवन/साहित्यिक परिचय

(2018, 17, 16, 15, 14, 13, 11, 10)

प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार कवियों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। जिनमें से एक का उत्तर देना होता है। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ
सुकुमार भावनाओं के कवि सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म हिमालय के सुरम्य प्रदेश कुर्माचल (कुमाऊँ) के कौसानी नामक ग्राम में 20 मई, 1900 को हुआ था। हाईस्कूल में अध्ययन के लिए वे अल्मोड़ा के राजकीय हाईस्कूल में प्रविष्ट हुए। यहीं पर उन्होंने अपना नाम गुसाईं दत्त से बदलकर सुमित्रानन्दन पन्त रखा। इलाहाबाद के म्योर सेण्ट्रल कॉलेज में प्रवेश लेने के बाद गाँधीजी के आह्वान पर उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया। फिर स्वाध्याय से ही अंग्रेजी, संस्कृत और बांग्ला साहित्य का गहन अध्ययन किया।

उपनिषद्, दर्शन तथा आध्यात्मिक साहित्य की ओर उनकी रुचि प्रारम्भ से ही थी। इलाहाबाद (प्रयाग) वापस आकर ‘रुपाभा’ पत्रिका का प्रकाशन करने लगे। बीच में प्रसिद्ध नर्तक उदयशंकर के सम्पर्क में आए और फिर उनका परिचय अरविन्द घोष से हुआ। इनके दर्शन से प्रभावित पन्त जी ने अनेक काव्य संकलन स्वर्ण किरण, स्वर्ण धूलि, उत्तरा आदि प्रकाशित किए। वर्ष 1961 में उन्हें पद्मभूषण सम्मान, ‘कला एवं बूढ़ा चाँद’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार, ‘लोकायतन’ पर सोवियत भूमि पुरस्कार तथा ‘चिदम्बरा’ पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। 28 दिसम्बर, 1977 को प्रकृति के सुकुमार कवि पन्त जी प्रकृति की गोद में ही विलीन हो गए।

साहित्यिक गतिविधियाँ
छायावादी युग के प्रतिनिधि कवि सुमित्रानन्दन पन्त ने सात वर्ष की आयु में ही कविता लेखन करना प्रारम्भ कर दिया था। उनकी प्रथम रचना वर्ष 1916 में आई, उसके बाद वर्ष 1919 में उनकी काव्य के प्रति रुचि और बढ़ गई। पन्त जी के काव्य में कोमल एवं मृदुल भावों की अभिव्यक्ति होने के कारण इन्हें प्रकृति का सुकुमार कवि’ कहा जाता है। इनकी निम्नलिखित रचनाएँ उल्लेखनीय हैं।

कृतियाँ
काव्य रचनाएँ यीणा (1919), ग्रन्थि (1920), पल्लव (1926), गुंजन (1932), युगान्त (1987), युगवाणी (1938), ग्राम्या (1940), स्वर्ण-किरण (1947), युगान्तर (1948), उत्तरा (1949), चिदम्बरा (1958), कला और बूढ़ा चाँद (1959), लोकायतन आदि।
गीति-नाट्य ज्योत्स्ना, रजत शिखर, अतिमा (1955)
उपन्यास हार (1960)
कहानी संग्रह पाँच कहानियाँ (1938)

काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष

  1. सौन्दर्य के कवि सौन्दर्य के उपासक पन्त की सौन्दर्यानुभूति के तीन मुख्य केन्द्र प्रकृति, नारी एवं कला हैं। उनका सौन्दर्य प्रेमी मन प्रकृति को देखकर विभोर हो उठता है। वीणा, ग्रन्थि, पल्लव आदि प्रारम्भिक कृतियों में प्रकृति का कोमल रूप परिलक्षित हुआ है। आगे चलकर ‘गुंजन’ आदि काव्य रचनाओं में कवियर पन्त का प्रकृति-प्रेम मांसल बन जाती है और नारी सौन्दर्य का चित्रण करने लगता हैं। ‘पल्लव’, एवं ‘गुंजन’ में प्रकृति और नारी मिलकर एक हो गए हैं।
  2. कल्पना के विविध रूप व्यक्तिवादी कलाकार के समान अन्तर्मुखी बनकर अपनी कल्पना को असीम गगन में खुलकर विचरण करने देते हैं।
  3. रस चित्रण पन्त जी का प्रिय रस गार है, परन्तु उनके काव्य में शान्त, अद्भुत, करुण, रौद्र आदि रसों का भी सुन्दर परिपाक हुआ है।

कला पक्ष

  1. भाषा पन्त जी की भाषा चित्रात्मक है। साथ ही उसमें संगीतात्मकता के गुण भी विद्यमान हैं। उन्होंने कविता की भाषा एवं भावों में पूर्ण सामंजस्य पर बल दिया है। उनकी प्रकृति सम्बन्धी कविताओं में चित्रात्मकता अपनी चरम सीमा पर दिखाई देती है।कोमलकान्त पदावली से युक्त सहज खड़ी बोली में पद-लालित्य का गुण विद्यमान है। उन्होंने अनेक नए शब्दों का निर्माण भी किया; जैसे-टलमल, रलमल आदि। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ एवं परिमार्जित है, जिसमें एक सहज प्रवाह एवं अलंकृति देखने को मिलती है।
  2. शैली पन्त जी की शैली में छायावादी काव्य शैली की समस्त विशेषताएँ: जैसे—लाक्षणिकता, प्रतीकात्मकता, ध्वन्यात्मकता, चित्रात्मकता, सजीव एवं मनोरम बिम्ब-विधान आदि पर्याप्त रूप से विद्यमान हैं।
  3. छन्द एवं अलंकार पन्त जी ने नवीन छन्दों का प्रयोग किया। मुक छन्दों का विरोध किया, क्योंकि वे उसकी अपेक्षा तुकान्त छन्दों को अधिक सक्षम मानते थे। उन्होंने छन्द के बन्धनों का विरोध किया। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अन्योक्ति जैसे अलंकार उन्हें विशेष प्रिय थे। वे उपमाओं की लड़ी बाँधने में अत्यन्त सक्षम थे। उन्होंने मानवीकरण एवं ध्वन्यर्थ-व्यंजना जैसे पाश्चात्य अलंकारों के भी प्रयोग किए।

हिन्दी साहित्य में स्थान
सुमित्रानन्दन पन्त के काव्य में कल्पना एवं भावों की सुकुमार कोमलता के दर्शन होते हैं। पन्त जी सौन्दर्य के उपासक थे। वे युगद्रष्टा व युगस्रष्टा दोनों हीं थे। वे असाधारण प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार थे। छायावाद के युग प्रवर्तक कवि के रूप में उनकी सेवाओं को सदा याद किया जाता रहेगा।

पद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्य भाग से दो पद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे।

नौका विहार

प्रश्न 1.
शान्त, स्निग्ध ज्योत्स्ना उज्ज्वल!
अपलक अनन्त नीरव भूतल!
सैकत शय्या पर दुग्ध धवल, तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म विरल,
लेटी है श्रान्त, क्लान्त, निश्चल!
तापस-बाला गंगा निर्मल, शशिमुख से दीपित मृदु करतल,
लहरें उर पर कोमल कुन्तल!
गोरे अंगों पर सिहर-सिहर, लहराता तार-तरल सुन्दर
चंचल अंचल-सा नीलाम्बर!
साड़ी की सिकुड़न-सी जिस पर, शशि की रेशमी विभा से भर
सिमटी हैं वर्तुल, मृदुल लहर!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश किस कविता से उद्धत है तथा इसके कवि कौन हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत पशि ‘नौका विहार’ कविता से उदधत है तथा इसके कवि प्रकृति के सुकुमार कवि ‘सुमित्रानन्दन पन्त’ हैं।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने किसका उल्लेख किया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने चाँदनी रात में किए गए भौका विहार का चित्रण किया है। इसमें कवि ने गंगा की कल्पना का उल्लेख नायिका के रूप में किया है।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने अपने आसपास कैसे वातावरण का वर्णन किया हैं?
उत्तर:
कवि के अनुसार चारों ओर शान्त, तरल एवं उज्वल चाँदनी छिटकी हुई है। आकाश टकटकी बोधे पृथ्वी को देख रहा है। पृथ्वी अत्यधिक शान्त एवं शब्दरहित है। ऐसे मनोहर एवं शान्त वातावरण में क्षीण धार वाली गंगा बालू के बीच मन्द-मन्द बह रही है।

(iv) गंगा बालू के बीच बहती हुई कैसी प्रतीत हो रही हैं?
उत्तर:
गंगा बालू के बीच बहती हुई ऐसी प्रतीत हो रही है, मानो कोई छरहरे, दुबले-पतले शरीर वाली सुन्दर युवती दूध जैसी सफेद शय्या पर गर्मी से व्याकुल होकर थकी, मुरझाई एवं शान्त लेटी हुई हो।

(v) ‘नीलाम्बर’ का समास-विग्रह करते हुए भेद बताएँ।
उत्तर:
नीलाम्बर-नीला है जो अम्बर (कर्मधारय समास)।।

प्रश्न 2.
जब पहुँची चपला बीच धार
छिप गया चाँदनी का कगार!
दो बाँहों से दूरस्थ तीर धारा का कृश कोमल शरीर
आलिंगन करने को अधीर!
अति दूर, क्षितिज पर विटप-माल लगती भू-रेखा-सी अराल,
अपलक नभ, नील-नयन विशाल,
माँ के उर पर शिशु-सा, समीप, सोया धारा में एक द्वीप,
उर्मिल प्रवाह को कर प्रतीप,
वह कौन विहग? क्या विकल कोक, उड़ता हरने निज विरह शोक?
छाया को कोकी का विलोक!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने प्राकृतिक दृश्यों का चित्र किस प्रकार किया हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने नौका-विहार करते हुए दोनों तटों के प्राकृतिक दृश्यों एवं द्वीप और समुद्र का अपनी सूक्ष्म कल्पनाओं द्वारा वर्णन किया है। साथ-ही-साथ गंगा नदी के सौन्दर्य को अति रंजित करने का प्रयास किया है।

(ii) नौका-विहार के समय कवि को दूर से दिखने वाले तट कैसे प्रतीत हो रहे हैं?
उत्तर:
जब कवि की नाव गंगा के मध्य धार में पहुँचती है, तो वहाँ से चन्द्रमा की चाँदनी में चमकते हुए रेतीले तट स्पष्ट दिखाई नहीं देते हैं। कवि को दूर से दिखते दोनों किनारे ऐसे प्रतीत हो रहे हैं जैसे वे व्याकुल होकर गंगा की धारासपी नायिका के पतले कोमल शरीर का आलिंगन करना चाहते हों।

(iii) कवि को वृक्षों को देखकर कैसा प्रतीत हुआ?
उत्तर:
कवि को दूर क्षितिज पर कतारबद्ध वृक्षों को देख ऐसा लग रहा है, मानो वे नीले आकाश के विशाल नेत्रों की तिरछी भौहें हैं और धरती को एकटक निहार रही हैं।

(iv) गंगा नदी के ऊपर पक्षी को उड़ता देख कवि ने क्या कल्पना की?
उत्तर:
गंगा नदी के ऊपर एक पक्षी को उड़ते देख कवि ने कल्पना की कि कहीं यह चकवा तो नहीं है, जो भ्रमवश जल में अपनी ही छाया को चकमी समझ उसे पाने की चाह लिए विरह-वेदना को मिटाने हेतु व्याकुल होकर आकाश में उड़ता जा रहा है।

(v) ‘नयन’ का सन्धि-विच्छेद करते हुए भेद बताइए।
उत्तर:
नयन–ने + अन (अयादि सन्धि)।।

परिवर्तन

प्रश्न 3.
कहाँ आज वह पूर्ण पुरातन, वह सुवर्ण का काल?
भूतियों का दिगन्त छवि जाल, ज्योति चुम्बित जगती का भाल?
राशि-राशि विकसित वसुधा का वह यौवन-विस्तार?
स्वर्ग की सुषमा जब साभार। धरा पर करती थी अभिसार!
प्रसूनों के शाश्वत श्रृंगार, (स्वर्ण भूगों के गन्ध विहार)
गूंज उठते थे बारम्बार सृष्टि के प्रथमोद्गार।
नग्न सुन्दरता थी सुकुमार ऋद्धि औं सिद्धि अपार।
अये, विश्व का स्वर्ण स्वप्न, संसृति का प्रथम प्रभात,
कहाँ वह सत्य, वेद विख्यात?
दुरित, दुःख दैन्य न थे जब ज्ञात,
अपरिचित जरा-मरण भू-पात।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के शीर्षक तथा कवि का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश ‘परिवर्तन’ नामक कविता से उदधृत है तथा इसके रचयिता प्रकृति के सुकुमार कवि ‘सुमित्रानन्दन पन्त’ जी हैं।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि ने किस ओर संकेत किया हैं?
उत्तर:
कवि ने भारतवर्ष के वैभवपूर्ण और समृद्ध अतीत का उल्लेख करते हुए समय के साथ-साथ देश की भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों में होने वाले परिवर्तनों की ओर संकेत किया है।

(iii) कवि ने अतीत के वैभवपूर्ण व समृद्धशाली भारत की तुलना वर्तमान से किस प्रकार की हैं।
उत्तर:
कवि के अनुसार आज हमारी समृद्धि और ऐश्वर्य विलुप्त हो चुके हैं, जो हमारे स्वर्णिम अतीत की पहचान थी। कभी हमारा देश सोने की चिड़िया कहलाता था, आज वह स्वर्ण युग विलुप्त सा हो गया है। इस प्रकार हमारे देश से ज्ञान, हरियाली इत्यादि भी समय-समय पर कम होती जा रही हैं।

(iv) कवि ने स्वर्णिम भारत का चित्रण किस रूप में किया है?
उत्तर:
स्वर्णिम भारत में धरती के चारों और छाया हुआ सौन्दर्य उन्मुक्त और सुकुमार था। धरती अपूर्व वैभव और सुख-समृद्धि से पूर्ण थी। सचमुच वह वैभवशाली युग विश्व के स्वर्णिम स्वप्न का युग था। वह युग सृष्टि के प्रथम प्रभाव के समान आशा, उल्लास, सौन्दर्य व जीवन से परिपूर्ण था।

(v) “विश्व का स्वर्ण स्वप्न संसृति का प्रथम प्रभात” पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
इस पंक्ति में ‘स’ और ‘प्र’ वर्ण की आवृत्ति होने के कारण अनुप्रास अलंकार है।

प्रश्न 4.
आज बचपन का कोमल गात। जरा का पीला पात।
चार दिन सुखद चाँदनी रात और फिर अन्धकार, अज्ञात!
शिशिर-सा झर नयनों का नीर झुलस देता गालों के फूल!
प्रणय का चुम्बन छोड़ अधीर अधर जाते अधरों को भूल!
मृदुल होठों का हिमजल हास उड़ा जाता नि:श्वास समीर;
सरल भौंहों का शरदाकाश घेर लेते घन, घिर गम्भीर।
शून्य साँसों का विधुर वियोग छुड़ाता अधर मधुर संयोग!
मिलन के पल केवल दो चार, विरह के कल्प अपार!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवि द्वारा परिवर्तनशीलता को किस प्रकार स्पष्ट किया गया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि द्वारा विविध उदाहरणों के माध्यम से समय की परिवर्तनशीलता को स्पष्ट करते हुए उसकी शक्ति के प्रभाव को समझाने का प्रयास किया गया है।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में प्रेमी-प्रेमिका के माध्यम से दुःख के समय का वर्णन किस प्रकार किया गया है?
उत्तर:
समय की परिवर्तनशीलता को स्पष्ट करते हुए कवि ने आँख से गिरते हुए आँसू की समानता पतझड़ के पीले पत्तों से की है। दुःख के क्षणों में गिरते रहने वाले आँसू, पुष्पों के समान गालों को इस प्रकार झुलसा देते हैं जैसे शिशिर की ओस फूल एवं पत्तों को झुलसा देती है। उस समय प्रेमी के अधर प्रणय के चुम्बनों को भूलकर अपने प्रिय के अधरों को भी भूल जाता है।

(iii) पद्यांश में कवि ने समय की परिवर्तनशीलता को स्पष्ट करने के लिए युवावस्था और वृद्धावस्था के समय का उल्लेख किस रूप में किया है?
उत्तर:
कवि के अनुसार युवावस्था में जिन होंठों पर हमेशा ओस कणों-सी निर्मल और आकर्षण हँसी विद्यमान रहती है, वृद्धावस्था में वही होंठ गहरी साँसों को छोड़ने से मलिन पड़ जाते हैं और उनकी हँसी गायब हों। जाती है।

(iv) “मिलन का समय अल्प, जबकि वियोग का दीर्घ होता है-स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में स्पष्ट है कि मिलन के सुखद समय में प्रेमी-प्रेमिका के जो होंठ आपस में जुड़े होते हैं, वियोग के विकट समय में वही होंठ विरह-वेदना से व्याकुल हो उठते हैं। इस प्रकार मिलन का समय तो अल्प होता है, परन्तु वियोग दीर्घकालीन होता है अर्थात् सुख कुछ समय साथ रहकर चला जाता है, जबकि दुःख का प्रभाव देर तक बना रहता है।

(v) ‘समीर’ के चार पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर:
पवन, हवा, अनिल और वायु ‘समीर’ के पर्यायवाची हैं।

प्रश्न 5.
खोलता इधर जन्म लोचन मूदती उधर मृत्यु क्षण-क्षण
अभी उत्सव औ हास हुलास अभी अवसाद, अश्रु, उच्छ्वास!
अचरिता देख जगत् की आप शून्य भरता समीर नि:श्वास,
डालता पातों पर चुपचाप ओस के आँसू नीलाकाश,
सिसक उठता समुद्र का मन, सिहर उठते उहुगन!
अहे निष्ठुर परिवर्तन! तुम्हारा ही ताण्डव नर्तन
विश्व का करुण विवर्तन! तुम्हारा ही नयनोन्मीलन,
निखिल उत्थान, पतन! अहे वासुकि सहस्रफन!
लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे चिह्न निरन्तर
छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षःस्थल पर!
शत शत फेनोच्छ्वसित, स्फीत फूत्कार भयंकर
घुमा रहे हैं घनाकार जगती को अम्बर
मृत्यु तुम्हारा गरल दन्त, कंचुक कल्पान्तर
अखिल विश्व ही विवर, वक्र-कुण्डल दिमण्डल।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश द्वारा कवि ने संसार की परिवर्तनशीलता को किस प्रकार स्पष्ट किया है?
उत्तर:
कवि संसार की परिवर्तनशीलता को स्पष्ट करते हुए कहता है कि इस मृत्युलोक में जन्म-मरण का चक्र सदा चलता ही रहता है।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में परिवर्तन को किसके समान बताया गया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में परिवर्तन को विनाशक तथा सप के राजा वासुकि के समान बताया गया है, क्योंकि इन सर्यों के विष के झागों से भरी हुई और सारे विश्व को अपनी लपेट में ले लेने वाली सैकड़ों भयंकर फैंकारें इस संसार के मेघों के आकार से परिपूर्ण आकार को निरन्तर घुमाती रहती हैं।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश में एक और सुख का वर्णन है तो दूसरी ओर दुःख का। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि ने सुख के क्षण का वर्णन मानव धरती पर जन्म लेने से किया है, तो दुःख का वर्णन मृत्यु को प्राप्त होने वाले कितने ही लोगों द्वारा आँख मूंद लेने से किया है। इस प्रकार एक ओर जन्म पर हर्षोल्लास का उत्सव है तो वहीं दूसरी ओर मृत्यु के शोक में आँसू बहाए जाते हैं।

(iv) अचरिता देख जगत् की आप’, ‘शून्य भरता समीर निःश्वास” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति से आशय यह है कि जैसे संसार की क्षणिकता देख पवन दु:खी होकर आहे भरने लगी हैं तथा नीले आकाश से भी यह सब नहीं देखा जाता और वह व्यथित होकर अनुरूप में पेड़ की शाखा पर ओस की बूंदें टपकाने लगा है।

(v) “शत-शत फेनोवसित, स्फीत फूत्कार भयंकर’ में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति में ‘शत’ शब्द की पुनरावृत्ति होने के कारण यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।

बापू के प्रति

प्रश्न 1.
तुम मांसहीन, तुम रक्तहीन           हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीन,
तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल          हे चिर पुराण! हे चिर नवीन!
तुम पूर्ण इकाई जीवन की,           जिसमें असार भव-शून्य लीन,
आधार अमर, होगी जिस पर        भावी की संस्कृति समासीन।।
तुम मांस, तुम्हीं हो रक्त-अस्थि      निर्मित जिनसे नवयुग का तन,
तुम धन्य! तुम्हारा नि:स्व त्याग        हे विश्व भोग का वर साधन;
इस भस्म-काम तन की रज से,        जग पूर्ण काम नव जगजीवन,
बीनेगा सत्य-अहिंसा के                  ताने-बानों से मानवपन!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश किस कविता से अवतरित है तथा इसके रचयिता कौन हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश ‘बापू के प्रति’ नामक कविता से अवतरित है तथा इसके रचयिता प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त’ जी हैं।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के आदर्शों को भारतीय संस्कृति का वाहक बताया हैं तथा कवि ने गाँधी जी को सत्य और अहिंसा की प्रतिमूर्ति मानकर उनके बताए गए आदर्शों पर चलने की कामना व्यक्त की है।

(iii) कवि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को नमन करते हुए क्या कह रहे हैं?
उत्तर:
कवि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को नमन करते हुए कहते हैं कि हे महात्मन! तुम्हारे शरीर में मांस और रक्त का अभाव है। तुम हड्डियों का ढाँचा मात्र हो। तुम्हें देख ऐसा आभास होता है कि तुम पवित्रता एवं उत्तम ज्ञान से परिपूर्ण केवल आत्मा हो। हे प्राचीन संस्कृतियों के पोषक! तुम्हारे विचारों में प्राचीन व नवीन दोनों आदर्शों का सार विद्यमान है।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने राष्ट्रपिता को नवयुग के रूप में किस प्रकार प्रस्तुत किया हैं?
उत्तर:
कवि राष्ट्रपिता को नवयुग के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि हे बापू! तुम नवयुग के आदर्श हो, जिस प्रकार शरीर के निर्माण में मांस, रक्त और अरिथ की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, उसी प्रकार नवयुग के निर्माण में तुम्हारे सआदशों की अमूल्य योगदान है।।

(v) ‘तन’ शब्द के चार पर्याय लिखिए।
उत्तर::
देह, अंग, काया, गात तन के पर्यायवाची शब्द हैं।

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