UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 5 जननतन्त्रः प्रारम्भिक क्रिया विज्ञान एवं अन्तः स्त्रायी ग्रन्थयाँ

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Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 5
Chapter Name जननतन्त्रः प्रारम्भिक क्रिया विज्ञान एवं अन्तः स्त्रायी ग्रन्थयाँ
Number of Questions Solved 30
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 5 जननतन्त्रः प्रारम्भिक क्रिया विज्ञान एवं अन्तः स्त्रायी ग्रन्थयाँ

बहुविकल्पीय प्रश्न  (1 अंक)

प्रश्न 1.
बाह्य मादा जननांगों को सम्मिलित रूप से कहते हैं
(a) जघन उत्थान
(b) भग
(c) भगशेफ
(d) प्रकोष्ठ
उत्तर:
(b) भग

प्रश्न 2.
नर जनन अंगों से सम्बन्धित ग्रन्थि है
(a) प्रोस्टेट ग्रन्थि
(b) स्वेद ग्रन्थि
(c) एड्रीनल ग्रन्थि
(d) एपिडिडाइमिस
उत्तर:
(a) प्रोस्टेट ग्रन्थि

प्रश्न 3.
नर में शुक्राणुजनन किन नलिकाओं में होता है?
(a) अपवाही नलिका में
(b) शुक्रवाहिनी में
(c) शुक्रनलिका में
(d) स्खलन नलिका में
उत्तर:
(c) शुक्रनलिकाओं

प्रश्न 4.
वृषण की अन्तराली (लीडिंग) कोशिकाओं से स्रावित हॉर्मोन है
(a) टेस्टोस्टेरॉन
(b) एस्ट्रोजन
(c) FSH
(d) प्रोजेस्टेरॉन
उत्तर:
(a) टेस्टोस्टेरॉन

प्रश्न 5.
निम्न में से कौन मानव में मादी जनन तन्त्र का भाग नहीं हैं?
(a) अण्डाशय
(b) गर्भाशय
(c) शुक्रवाहिनी
(d) योनि
उत्तर:
(c) शुक्रवाहिनी

प्रश्न 6.
ग्राफियन पुटिका पाई जाती है
(a) स्तनधारियों के अण्डाशय में
(b) लसीका गाँठों में
(c) स्तनधारियों की प्लीहा में
(d) मेंढक के अण्डाशय में
उत्तर:
(a) स्तनधारियों के अण्डाशय में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक, 25 शब्द)

प्रश्न 1.
लैंगिक जनन की इकाइयाँ क्या कहलाती हैं? केवल उनके नाम लिखिए।
उत्तर:
नर तथा मादा युग्मकों का संग्युमन लैंगिक जनन कहलाता है। दो युग्मों के संयुग्मन (fusion) से युग्मनज (Zygote) बनता है। समान युग्मकों को संयुग्मन (Isogzmy) कहते हैं।

प्रश्न 2.
अनिषेकजनन की परिभाषा उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर:
अनिषेकजनन (Parthenogenesis) निषेचन के बिना अण्डाणु से वृद्धि और विभाजन द्वारा वयस्क का निर्माण होना अनिषेकजनन कहलाता है। नर मधुमक्खी और ततैया में अनिषेकजनन होता है।

प्रश्न 3.
वृषण जालिका क्या है?
उत्तर:
वृषण जालिका (Rete testes) शुक्रजनन नलिकाएँ वृषण की भीतरी सतह पर नलिकाओं के एक घने जाल में खुलती हैं, इसे वृषण जालिका कहते हैं। इससे 5-20 शुक्र वाहिकाएँ निकलकर एपिडिडाइमिस वाहिका (Epididymis duct) में खुलती है। एपिडिडाइमिस या अधिवृषण के अन्तिम भाग से शुक्रवाहिनी निकलती है।

प्रश्न 4.
शुक्राणुजनन का क्या अर्थ है?
उत्तर:
वह प्रक्रिया, जिसके द्वारा वृषणों में शुक्राणुओं का निर्माण होता है, शुक्राणुजनन कहलाती हैं। वृषणों की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई शुक्रजंने नलिकाएँ होती हैं। यहीं पर शुक्राणु जनन होता हैं।

प्रश्न 5.
सर्टोली कोशिकाओं पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
वृषण की शुक्रजनन नलिकाओं (Seminiferous tubules) की जननिक एपीथीलियम में जनन कोशिकाओं के मध्य में स्थान-स्थान पर फूली हुई लम्बी सटली कोशिकाएँ पाई जाती हैं। ये शुक्राणुओं को पोषण प्रदान करती हैं।

प्रश्न 6.
शुक्राणु में एक्रोसोम का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
शुक्राणु में एक्रोसोम से हायल्यूरोनिडेज एन्जाइम का स्रावण होता है, जो अण्डाणु की चाहा भित्ति के पाचन में सहायक हैं, जिसके कारण शुक्राणु अण्डाणु में सुगमता से प्रवेश कर पाता है।

प्रश्न 7.
मानव, स्त्री के एक अण्डाणु में कितने और किस प्रकार के गुणसूत्रं पाए जाते हैं?
उत्तर:
मानव, स्त्री के एक अण्डाणु में 28 गुणसूत्र उपस्थित होते हैं, जिसमें 22 कायिक गुणसूत्र और एक लिंग गुणसूत्र (Sex chromosome) ‘X’ होता है।

प्रश्न 8.
युग्मनज़ क्या है? इसमें गुणसूत्रों की संख्या कितनी होती है?
उत्तर:
शुक्राणु (n) और अण्डाणु (n) के संयोजन से युग्मनज का निर्माण होता  है। इसमें गुणसूत्रों की संख्या द्विगुणित (2n) होती है।

प्रश्न 9.
स्तनधारियों में निषेचन कहाँ होता है?
उत्तर:
नर शुक्राणु (n) व मादा अण्डाणु (n) युग्मकों के संयोजन को निषेचन कहते हैं। स्तनधारियों में निषेचन फैलोपियन नलिका में होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक, 50 शब्द)

प्रश्न 1.
लैंगिक जनन से आप क्या समझते हैं? मानव शरीर में नर तथा मादा युग्मक कहाँ बनते हैं? पूर्णशक्त युग्मनज क्या है?
उत्तर:
लैंगिक जनन (Sexual reproduction) नर तथा मादा युग्मकों अर्थात् शुक्राणु और अण्डाणु का संयुग्मन लैंगिक जनन कहलाता है, जिसके फलस्वरूप युग्मनज़ बनता है। नर युग्मक का निर्माण वृषण (Testis) की शुक्रजनन नलिकाओं में होता है। मादा युग्मक (अण्डाणु) का निर्माण अण्डाशय की ग्राफिया पुटिका में होता है। एक युग्मनज, जिसमें वृद्धि एवं विभाजन द्वारा भूण
का निर्माण होता है, पूर्णशक्त युग्मनज कहलाता है।

प्रश्न 2.
नर मनुष्य में वृषण उदर गुहा के बाहर क्यों होते हैं?
उत्तर:
नर मनुष्य में वृषण शरीर से बाहर वृषण कोष (Scrotum) में उपस्थित होते हैं। वृषण कोष का तापमान शरीर के तापमान से 3°C कम होता है, जिस पर शुक्राणुओं का निर्माण होता है। शरीर का तापमान अधिक होने के कारण शरीर के अन्दर शुक्राणुओं का निर्माण सम्भव नहीं हैं। अतः जन्म के समय वृषण अपने मूल स्थान से हटकर वृषण कोष में आ जाते हैं।

प्रश्न 3.
शुक्रजनन नलिका की अनुप्रस्थ काट का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर:
शुक्रजनन नलिका (वृषण) की अनुप्रस्थ काट

Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 1
प्रश्न 4.
शुक्राणुजनन क्या है? शुक्राणुजनन की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शुक्राणुजनन (Spermatogenesis) वह प्रक्रिया, जिसके द्वारा वृषणों में शुक्राणुओं का निर्माण होता है, शुक्राणुजनन कहलाती है। यह प्रक्रिया लैंगिक हॉर्मोन्स द्वारा नियमित होती है। शुक्राणुजनन की प्रक्रिया निम्नलिखित तीन चरणों में पूर्ण होती है।
1. गुणन प्रावस्था (Multiplication Phase) शुक्रजनन नलिकाओं की जनन उपकला की कोशिकाओं में समसूत्री विभाजन द्वारा शुक्राणुजन कोशिकाओं या स्पर्मेटोगोनिया का निर्माण होता है। ये कोशिकाएँ द्विगुणित (27) होती हैं।

2. वृद्धि प्रावस्था (Growth Phase) शुक्राणुजन कोशिकाएँ पोषक पदार्थों का संचय करके प्राथमिक शुक्रकोशिका (Prirmiry spermatocytes) में रूपान्तरित हो जाती हैं।

3. परिपक्वन प्रावस्था (Maturation Phas) प्राथमिक शुक्रकोशिकाओं स्पमेंटोसाइट्स में अर्द्धसूत्री प्रथम विभाजन द्वारा अगुणित या द्वितीयक शुक्राणु कोशिकाओं का निर्माण होता है। यह अर्द्धसूत्री द्वितीय विभाजन द्वारा प्राक्शुक्राणु कोशिका या स्पर्मेटिड बनाती हैं।
अतः एक प्राथमिक शुक्राणु कोशिकाओं से चार प्राक्शुक्राणु कोशिकाओं का निर्माण होता है। शुक्र-कायान्तरण (Sperritiogenesis) द्वारा अचल प्राक्शुक्राणु परिपक्व से चल शुक्राणु बनता है।

प्रश्न 5.
मानव के शुक्राणु की संरचना का वर्णन कीजिए।
अथवा
मानव शुक्राणु का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर:
शुक्राणु की संरचना प्रत्येक शुक्राणु तीन भागों में विभेदित होता है।
1. शीर्ष (Head) शीर्ष प्रायः फूला हुआ, घुण्डीदार होता है, परन्तु अनेक जन्तु
जातियों में यह लम्बा, दण्डनुमा होता है। इसमें केन्द्रक स्थित होता हैं और केन्द्रक के चारों ओर थोड़ा-सा कोशिकाद्रव्य होता हैं। इसके शीर्ष पर गॉल्जीकाय की बनी एक्रोसोम नामक रचना टोपी की भांति की होती है।

2. मध्य खण्ड (Middle piece) यह केन्द्र शीर्ष से पतला, दण्डनुमा भाग होता
है, जो छोटी-सी ग्रीवा (Neck) द्वारा शीर्ष से जुड़ा रहता है। मध्य खण्ड में माइटोकॉण्डुिया उपस्थित होते हैं। माइटोकॉण्डूिया के आगे ग्रीवा में एवं पीछे दो तारक केन्द्र (Centrioles) उपस्थित होते हैं।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 5

3. पुच्छ (Tail) पुच्छ प्रायः लम्बी, जाबुकनुमा और अत्यधिक गतिशील होती हैं।
पुच्छ द्वारा शुक्राणु तरल माध्यम में तैरता है।

प्रश्न 6.
मानव के स्त्रीजनन तन्त्र का नामांकित आरेखीय चित्र बनाइए।
उत्तर:

Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 6

प्रश्न 7.
अण्डाशय की अनुप्रस्थ काट (TS) का एक नामांकित आरेख बनाइए।
उत्तर:

Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 7

प्रश्न 8.
मानव अण्डाणु का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर:

Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 8

प्रश्न 9.
यौवनारम्भ क्या है? इस अवस्था में बालक एवं बालिकाओं के शरीर में होने वाले परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
पुरुष में यौवनारम्भ का प्रारम्भ
यौवनारम्भ (Puberty) प्राणी के प्रजनन के योग्य हो जाने को यौवनारम्भ कहते हैं। पुरुष (बालक) में यौवनारम्भ 13-16 वर्ष की आयु में होता है।
वृषण द्वारा स्रावित टेस्टोस्टेरॉन (Testosterone) और एण्ड्रोस्टेरॉन (Androsterone) लिंग हॉर्मोन्स से यौवनारम्भ प्रेरित होता है, जिसके फलस्वरूप बालकों में निम्नलिखित लक्षण विकसित होने लगते हैं।

  1.  पुरुष की आवाज भारी होने लगती है और शरीर की लम्बाई में वृद्धि होती है।
  2. अस्थियाँ और मांसपेशियाँ अधिक सुदृढ़ हो जाती हैं, कन्धे भी चौड़े हो जाते हैं।
  3. दाढ़ी, पूँछ निकल आती हैं।
  4. मैथुन अंग शिश्न और वृषण कोष सुविकसित हो जाते हैं।
  5. शुक्रजनन नलिकाओं में शुक्राणुओं का निर्माण आरम्भ हो जाता है।

स्त्री में यौवनारम्भ का प्रारम्भ
बालिकाओं में, यौवनारम्भ लड़कों की अपेक्षा जल्दी प्रारम्भ हो जाता है। इनमें 12-13 वर्ष की आयु में आर्तव चक्र प्रारम्भ हो जाता है। एस्ट्रोजन (Ostrogen) और FSH हॉमन्स यौवनावस्था को प्रेरित करते हैं, जिसके फलस्वरूप बालिकाओं में निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं।

  1. बाह्य जननांगों और स्तनों का विकास होने लगता है।
  2. आर्तव चक्र (Menstrual cycle) और अण्डोत्सर्ग (Ovulation) का प्रारम्भ हो जाता है।
  3. चेहरे, जाँघ और नितम्बों पर वसा का संचय प्रारम्भ हो जाता है।
  4. श्रोणि मेखला (Pelvice girdle) फैलकर चौड़ी हो जाती हैं।
  5. स्वर तीव्र और मधुर होने लगता है।
  6. कक्षीय और जघन बालों का उगना।

प्रश्न 10.
हॉर्मोन्स का क्या महत्त्व है? (2001)
अथवा
हॉर्मोन्स क्या है? शरीर में इसका क्या महत्त्व है? (2018)
अथवा
मानव शरीर में हॉर्मोन्स के विभिन्न कार्यों को लिखिए2006)
उत्तर:
अन्त:स्रावी ग्रन्थियों द्वारा स्रावित रासायनिक यौगिकों को हॉर्मोन्स कहते हैं। ये ग्रन्थियों द्वारा सीधे रुधिर में मुक्त होकर शरीर के अन्य अंगों तक पहुँचते हैं। हॉर्मोन्स सक्रिय उत्प्रेरक के रूप में विभिन्न शारीरिक क्रियाओं का नियन्त्रण एवं समन्वये करते हैं। इनकी सूक्ष्म मात्रा ही विशेष अंगों की कायिकी को वातावरणीय दशाओं की आवश्यकतानुसार अनुकूलित करती है।
अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ, तन्त्रिका तन्त्र के नियन्त्रण में कार्य करती हैं, किन्तु इनका स्वयं तन्त्रिका तन्त्र पर भी नियन्त्रण होता है। इस प्रकार शरीर में विभिन्न तन्त्रों की क्रियाओं का परस्पर समन्वय सुनिश्चित होता हैं।

हॉर्मोन्स का महत्त्व अथवा कार्य
हॉर्मोन्स द्वारा शरीर में विभिन्न महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पन्न किए जाते हैं, जो निम्नलिखित हैं।

  1. हॉर्मोन्स शरीर की कोशिकाओं के उपापचय का नियन्त्रण करके शरीर की कार्यात्मक क्षमता को बनाए रखते हैं। ये शरीर की समुचित वृद्धि एवं विकास को सुनिश्चित करते हैं। कुछ हॉमन्स, रक्त में ग्लूकोज, लवण, आयरन आदि की मात्रा को नियन्त्रित करते हैं एवं शरीर के अन्त: वातावरण के सन्तुलन की अवस्था को बनाए रखते हैं।
  2. कुछ हॉर्मोन्स हृदय स्पन्दन दर, श्वास दर आदि को नियमित रखते हैं।
  3. लिग हॉमन्स द्वारा प्रजनन से सम्बन्धित अंगों का विकास तथा उनको सम्पूर्ण क्रियाविधि पर नियन्त्रण का कार्य किया जाता है।
  4. आहारनाल के विभिन्न भागों की श्लेष्मिका से स्रावित हॉमोंन पाचक रसों के स्रावण को प्रेरित करते हैं।
  5. कुछ हॉर्मोन्स; जैसे-एड्रीनेलिन, शरीर को संकटकालीन परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार करते हैं। इस प्रकार हॉर्मोन्स की हमारे शरीर में विशेष भूमिका होती है। यदि इनका स्रावण समुचित रूप से न हो, तो शरीर कई कार्यात्मक रोगों (Functional diseases) से ग्रस्त हो जाता है।

प्रश्न 11.
पीयूष ग्रन्थि पर टिप्पणी लिखिए। (2002)
उत्तर:
पीयूष ग्रन्थि (Pituitary gland) एक नलिकाविहीन (अन्तःस्रावी) ग्रन्थि है। यह अग्र मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस की दीवार के पास, स्फेनॉइड हड्डी के गर्त में पाई जाती है। यह अन्य अन्त:स्रावी ग्रन्थियों के स्रावण को नियन्त्रित करती है। अत: इसे मास्टर ग्रन्थि भी कहा जाता है। ग्रन्थि के दो मुख्य भाग होते हैं- अग्न पिण्ड तथा पश्च पिण्ड। दोनों के मध्य एक संकरा मध्य पिण्ड होता हैं।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 11

पीयूष ग्रन्थि के विभिन्न भागों से स्रावित हॉर्मोन्स के कार्य
ग्रन्थि के विभिन्न भागों से स्रावित हॉर्मोन्स के कार्य इस प्रकार हैं।

  1. वृद्धि हॉर्मोन्स, शरीर की उचित वृद्धि के लिए आवश्यक है। बाल्यकाल में इसके अल्पस्रावण से बौनेपन (Dwarfism) एवं अतिस्रावण से भीमकायता (Giantism) की समस्या उत्पन्न होती है। वृद्धिकाल के बाद अति स्रावण से शरीर बेडौल, भीमकाय एवं कुरूप हो जाता है। इस अवस्था को एक्रोमीगैली कहते हैं। थायरॉइड प्रेरक हॉमन्स, थायरॉइड ग्रन्थि की क्रियाशीलता को बनाए रखता है।
  2. ACTII (एड्रीनल कॉर्टेक्स ट्रॉपिक हॉर्मोन) हॉर्मोन्स, एड्रीनल ग्रन्थि के कॉर्टेक्स भाग को क्रियाशील बनाता है।
  3. इस ग्रन्थि से स्रावित हॉमन्स पुरुषों में शुक्राणुओं एवं स्त्रियों में अण्डजनन को प्रेरित करता है। ल्यूटिन प्रेरक हॉमन्स, स्त्री एवं पुरुष में लैंगिक हॉर्मोन्स के स्रावण को प्रेरित करता है।
  4. प्रोलैक्टिन या मैमोट्रॉपिक हॉर्मोन, गर्भकाल में स्तनों की वृद्धि तथा दुग्ध स्रावण को प्रेरित करता है।

वैसोप्रेसिन, वृक्क की वाहिनियों एवं कोशिकाओं में जल के अवशोषण को नियन्त्रित करता है एवं मूत्र की मात्रा को कम करता है, इसी कारण इसे मूत्र रोधी कहते हैं। ऑक्सीटोसिन, प्रसव के समय गर्भाशय को फैलने तथा प्रसव के पश्चात् गर्भाशय के सिकुड़ने को प्रेरित करता है। यह दुग्ध स्रावण को प्रेरित करता हैं।

विस्तृत उत्तर प्रश्न (5 अंक 100 शब्द)

प्रश्न 1.
नर जनन तन्त्र या पुरुष के जनन अंगों का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नर जनन अंगों को निम्नलिखित तीन भागों में बाँट सकते हैं।

1. मुख्य जनन अंग इन अंगों में युग्मकों का निर्माण होता हैं।
(i) वृषण (Testis) वृषण एक जोड़ी होते हैं। ये उदर गुहा से बाहर वृषण कोष (Scrotal sac) में स्थित होते हैं। वृषण लगभग 4-5 सेमी लम्बा 2,5 सेमी चौड़ा व 3 सेमी मोटा होता है। वृषण अनेक कुण्डलित नलिकाओं के बने होते हैं, जो शुक्रजनन नलिकाएँ कहलाती हैं। शुक्रजनन नलिकाओं में शुक्राणुओं का निर्माण होता है।
Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 5M 1

2. सहायक जनन अंग ये अंग जनन की प्रक्रिया में सहायक अंग होते हैं। इनका वर्णन निम्नलिखित हैं।
(i) अधिवृषण (Epididymis) ये लगभग 6 मीटर लम्बी, पतली तथा अत्यधिक कुण्डलित नलिका होती है, जो वृषण के अग्र पश्च तथा भीतरी भाग को ढकने में सहायक हैं। यह अति कुण्डलित होकर लगभग 4 सेमी लम्बी, चपटी, कोमा के आकार की संरचना बनाती हैं।

एपीडिडाइमिस में शुक्राणु का संग्रहण व परिपक्वन होता है। एपीडिडाइमिस के तीन भाग होते हैं-शीर्ष एपीडिडाइमिस (Caput epididymis), मध्य भाग या एपौडिडाइमिस काय (Corpus epididymis) तथा पुच्छ एपीडिडाइमिस (Cauda epididymis) से एक शुक्रवाहिनी निकलकर वृषण नाल से होती हुई उदरगुहा में प्रवेश करते हुए मूत्रमार्ग के अधर भाग में खुलती हैं।

(ii) शुक्रवाहिनी (Vas deferens) एपोडिडाइमिस से एक शुक्रवाहिनी निकलकर वृषण नाल से होती हुई उदरगुहा में प्रवेश करते हुए मूत्रमार्ग के अधर भाग में खुलती है।

(iii) शुक्राशय (Serminal vesicle) यह एक द्विपालित थैलीनुमा ग्रन्थिल संरचना होती है। इससे चिपचिपा द्रव स्रावित होता है, जो वीर्य का मुख्य भाग बनाता है तथा शुक्राणुओं का पोषण करता हैं।

(iv) शिश्न (Penis) यह मैथुन अंग है। यह वृषण कोषों के मध्य स्थित होता है। शिश्न के मध्य मूत्रमार्ग (Urethra) गुजरता है, जो शिश्न के अग्र छोर पर खुलता है। मूत्रमार्ग द्वारा ही वीर्य के साथ शुक्राणु बाहर निकलते हैं।

3. सहायक जनन ग्रन्थियाँ इन ग्रन्थियों का स्रावण जनन प्रक्रिया में सहायक है। वर्णन निम्नलिखित हैं।
(i) प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostate gland) यह ग्रन्थि मूत्रमार्ग के अधर तल पर स्थित होती है। यह अनेक पिण्डों (Lobules) की बनी होती है। इस ग्रन्थि से हल्का क्षारीय तरल स्रावित होता है। यह मूत्रमार्ग की अम्लीयता को नष्ट करता है, जिससे शुक्राणु सक्रिय बने रहते हैं।

(ii) काउपर्स ग्रन्थियाँ (Cowper’s glands) ये एक जोड़ी ग्रन्थियाँ होती हैं तथा मूत्रमार्ग के दाएँ व बाएँ ओर स्थित होती हैं। काउपर्स ग्रन्थियाँ मैथुन से पहले एक क्षारीय एवं चिकने द्रव का स्रावण करती हैं। यह मूत्रमार्ग की अम्लता को समाप्त करता है तथा योनि मार्ग को चिकना बनाकर मैथुन में सहायक है।

(iii) पेरीनियल ग्रन्थियाँ (Perineal glands) एक जोड़ी ग्रन्थियाँ मलाशय के पास स्थित होती हैं। इनसे स्रावित रसायन विशेष गन्ध प्रदान करता है।

प्रश्न 2.
अण्डाणुजनन क्या है? अण्डाणुजनन की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए। अण्डाणुजनन तथा शुक्राणुजनन में समानताएँ एवं असमानताएँ बताइए।
अथवा
युग्मकजनन किसे कहते हैं? शुक्रजनन एवं अण्डजनन का तुलनात्मक विवरण दीजिए। युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या के आधार पर युग्मकजनन के महत्व की विवेचना कीजिए।
अथवा
अण्डाणुजनन तथा शुक्राणुजनन में अन्तर लिखिए।
अथवा
युग्मकजनन की परिभाषा लिखिए। अण्डाणुजनन की क्रिया समझाइए। अण्डाणुजनन तथा शुक्राणुजनन में अन्तर बताइट।
उत्तर:
युग्मकजनन (Gametogenesis) युग्मकजनन एक जटिल प्रक्रम है, इसमें अर्द्धसूत्री और समसूत्री विभाजन द्वारा अगुणित (Haploid) युग्मकों (शुक्राणु/अण्डाणु) का निर्माण होता है।
अण्डाणुजनन (Oogenesis) अण्डाशय की ग्राफियन पुटिका (Graafian follicles) के निर्माण की प्रक्रिया, अण्डाणुजनन कहलाती है।
अण्डाणुजनन प्रक्रिया अण्डजनन की प्रक्रिया को तीन भागों में बाँटा गया है।
1. गुणन प्रावस्था (Multiplication Phase) अण्डाशय के निर्माण के समय ही प्राथमिक जनन कोशिकाएँ अण्डाशयी पुटिकाओं (0varian follicles) के रूप में एकत्रित हो जाती हैं, जिसमें से एक कोशिका अण्डाणु मातृ कोशिका (Egg mother cell) के रूप में विभेदित होती है।

2. वृद्धि प्रावस्था (Growth Phase) यह प्रावस्था बहुत लम्बी होती है। अण्डाणु मातृ कोशिका, अण्डाणु जनन कोशिका या ऊगोनियम (0ogonium) में विभेदित होकर वृद्धि प्रावस्था में प्रवेश करती हैं। यह अधिक मात्रा में पोषक पदार्थों को संचित करके आकार में वृद्धि कर लेती है। इसे पूर्व अण्डाणु कोशिका या प्राथमिक ऊसाइट (Primary 0OCyte) कहते हैं।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 2

3. परिपक्वन अवस्था (Maturation Phase) ग्राफियन पुटिका के
परिपक्व होने के बाद इसमें उपस्थित प्राथमिक ऊसाइट (Primary 00cyte) में प्रथम अर्द्धसूत्री विभाजन होता है, जो असमान होता है, जिसके फलस्वरूप एक अगुणित द्वितीयक ऊसाइट (Haploid Secondary 00cyte) और एक छोटी लोपिकाओं (Polar body) का निर्माण होता है। ग्राफियन पुटिका के फटने से यह द्वितीयक अण्डाणु कोशिका मुक्त होकर फैलोपियन नलिका में प्रवेश कर जाती है। इसमें द्वितीय अर्धसूत्री विभाजन शुक्राणु के अण्डाणु में प्रवेश के पश्चात् होता है ।

शुक्राणुजनन और अण्डाणुजनन में अन्तर निम्नलिखित हैं

शुक्राणुजनन

अण्डाणुजनन

यह प्रक्रिया वृषणों में होती है। यह प्रक्रिया अण्डाशयों में होती है।
इसमें वृद्धि प्रावस्था छोटी होती है। वृद्धि प्रावस्था बहुत लम्बी होती है।
एक प्राथमिक शुक्राणु कोशिका से चार अगुणित शुक्राणुओं का निर्माण होता है। प्राथमिक अण्डाणु कोशिका से  केवल एक अगुणित निर्माण होता है।
स्पर्मेटिइस से थान्तरण द्वारा गतिशील शुक्राणुओं का निर्माण होता है। अचल आण्डाणु में कायान्तरण नहीं होता है।
दोनों अर्द्धसूत्री विभाजन शुक्राणु निर्माण  से पूर्व हो जाते हैं। दूसरा अर्द्धसूत्री विभाजन अण्डाणु में शुक्राणु के प्रवेश के बाद पूर्ण होता है।

शुक्राणुजनन और अण्डाणुजनन में समानताएँ

  1. दोनों क्रियाएँ तीन प्रावस्था में पूर्ण होती हैं- गुणन प्रावस्था, वृद्धि प्रावस्था और परिपक्वन प्रावस्था।
  2. दोनों क्रियाएँ जनदों की जनन उपकला कोशिकाओं में होती हैं।

युग्मकजनन का महत्त्व युग्मकजनन एक जटिल प्रक्रम है। इसमें अर्द्धसूत्री और समसूत्री विभाजन द्वारा अगुणित युग्मकों का निर्माण होता है। नर और मादा युग्मकों के निषेचन के समय समेकन (Fusion) से द्विगुणित युग्मनज का निर्माण होता है। युग्मकजनन और निषेचन के फलस्वरूप जीवधारी का गुणसूत्र प्रारूप निश्चित बना रहता है।

प्रश्न 3.
मादा जनन तन्त्र का वर्णन करते हुए मासिक चक्र की विभिन्न प्रावस्थाओं के सन्दर्भ में संक्षिप्त में लिखिए।
उत्तर:
मादा जनन तन्त्र इसके अन्तर्गत निम्नलिखित जनन अंग आते हैं।
1. अण्डाशय एक जोड़ी अण्डाशय उदरगुहा में स्थित होते हैं। अण्डाशय संयोजी ऊतक से बनी ठोस अण्डाकार संरचना (लगभग 3 सेमी लम्बा, 2 सेमी चौड़ा तथा 1 सेमी मोटा) होती है।
अण्डाशय में ग्राफियन पुटिकाएँ छोटे-छोटे दानों-जैसी रचनाओं के रूप में उभरी होती हैं। यहीं अण्डाणु का निर्माण होता है।

2. अण्डवाहिनी इसका प्रारम्भिक भाग अण्डाशय से सटी हुई झालरदार कीपनुमा संरचना अण्डवाहिनी मुखिका (Oviducal funnel) बनाता है, जो फैलोपियन नलिका में खुलती हैं। अण्डवाहिनी का प्रारम्भिक संकरा भाग फैलोपियन नलिका तथा पश्च भाग गर्भाशय कहलाता है। अण्डे का निषेचन फैलोपियन नलिका में होता है।

3. गर्भाशय दोनों अण्डवाहिनी मिलकर पेशीय थैलीनुमा एवं उल्टे नाशपाती के आकार की संरचना गर्भाशय में खुलती हैं। इसका सामान्य आकार 8 सेमी लम्बा, 5 सेमी चौड़ा तथा 2 सेमी मोटा होता है। गर्भाशय अत्यधिक फैल सकता है। गर्भावस्था में भ्रूण का रोपण गर्भाशय में होता हैं।

4. योनि यह लगभग 8 सेमी लम्बी नलिकारूपी संरचना होती है। मूत्राशय तथा योनि मादा जनन छिद्र द्वारा शरीर से बाहर खुलती है। मादा जनन छिद्र भाग की बाह्य सतह पर एक पेशीय संरचना क्लाइटोरिस होती हैं।

5. बार्थोलिन ग्रन्थियाँ ये योनि के पार्श्व में स्थित होती हैं। इनसे स्रावित तरल योनि को क्षारीय तथा चिकना बनाता है।

6. पेरीनियल ग्रन्थियाँ इनसे विशिष्ट गन्धवत् तरल स्रावित होता है, जो लैंगिक आकर्षण पैदा करता है।

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मासिक चूक (Menstrual Cycle)
व्यस्क स्त्रियों में एक माह की अवधि के दौरान गर्भाशय में चक्रीय परिवर्तन होते हैं, जिसे मासिक चक्र या आर्तव चक्र कहते हैं। मासिक चूक मासिक चूक की तीन अवस्थाएँ होती हैं।
1. क्रम प्रसारी अवस्था (Proliferative Phase) FSH, पुटिकाओं को एस्ट्रोजन के स्रावण के लिए प्रेरित करता है। इस अवस्था का अन्तराल 10-12 दिनों का होता हैं। यह पुटिकीय अवस्था (Follicular phase) भी कहलाती हैं।

2. स्रावित अवस्था (Secretory Phase) कॉर्पस ल्यूटियम, प्रोजेस्टेरॉन का स्रावण करती हैं। इस अवस्था का अन्तराल 12-14 दिन का होता है।

3. मासिक अवस्था (Menstrual Phase) यह पुराने मासिक चक्र की अन्तिम तथा नए मासिक चक्र की प्रारम्भिक अवस्था होती है। यदि अण्डाणु निषेचित नहीं होता है, तो कॉर्पस ल्यूटियम, प्रोजेस्टेरॉन स्तर में कमी के कारण नष्ट हो जाता है। एण्डोमीट्रियम के टूटने से रुधिर का स्राव होता है। यह स्राव लगभग पाँच दिन चलता है।
यह FSH, LH, एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टेरॉन के द्वारा नियन्त्रित होता है। मासिक चक्र गर्भावस्था तथा दुग्ध स्रावण (Lactation) के दौरान नहीं होता है।

रजोनिवृत्त (Menopause)
इसमें अण्डोत्सर्ग तथ मासिक चक्र स्थायी रूप से रुक जाता है। यह 45 या 50 साल की आयु में होता हैं। इस अवस्था में स्त्री में जनन की क्षमता नहीं होती है।

प्रश्न 4.
नलिकाविहीन ग्रन्थियों पर टिप्पणी लिखिए। (2004)
अथवा
अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ क्या हैं? मानव शरीर में पाई जाने वाली अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के कार्यों का वर्णन कीजिए। (2016)
अथवा
मानव शरीर के विभिन्न अन्तः स्रावी ग्रन्थियों के नाम लिखिए। (2018)
उत्तर:
मानव शरीर में पाई जाने वाली ऐसी विशिष्ट ग्रन्थियाँ, जिनमें स्रावित पदार्थ को लक्ष्य स्थान तक ले जाने के लिए नलिकाएँ नहीं होती, नलिकाविहीन ग्रन्थियाँ कहलाती हैं। इन ग्रन्थियों को अन्त:स्रावी ग्रन्थि भी कहते हैं।
इनसे स्रावित पदार्थ, सीधे रक्त में मुक्त होकर शरीर के अन्य अंगों तक पहुँचता हैं। इन स्रावित पदार्थों को हॉमन्स कहते हैं। हॉमन्स रासायनिक यौगिक हैं, जो प्राणियों में विभिन्न शारीरिक क्रियाओं का नियन्त्रण एवं समन्वय करते हैं। ये उपापचय क्रियाओं, शारीरिक वृद्धि एवं विकास, लैंगिक लक्षणों एवं जनन आदि के नियन्त्रण में भाग लेते हैं।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 5m 4
मानव शरीर में नलिकाविहीन/अन्त: स्रावी ग्रन्थियाँ
मानव शरीर में निम्नलिखित नलिकाविहीन ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं
1. पीयूष ग्रन्थि (Pituitary Gland) यह अग्र मस्तिष्क के ‘हाइपोथैलेमस’ की दीवार के पास, स्फेनॉइड हड्डी के गर्त में पाई जाती है। इसे मास्टर ग्रन्थि भी कहा जाता हैं, क्योकि यह अन्य अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के स्रावण को नियन्त्रित करती हैं। इसके साथ यह व्यक्ति के स्वभाव, स्वास्थ्य वृद्धि एवं लैंगिक विकास को भी प्रेरित करती है।

2. थायरॉइड ग्रन्थि (Thyroid Gland) यह दो पिण्डों की रचना है एवं श्वासनली के | दोनों ओर लैरिक्स (Larynx) के नीचे स्थित रहती हैं। इससे स्रावित थायरॉक्सिन, हॉर्मोन शरीर की उपापचयी क्रियाओं का नियमन तथा नियन्त्रण करता है।

3. पैराथायरॉइड ग्रन्थि (Parathyroid Gland) यह थायरॉइड ग्रन्थि के पीछे स्थित रहती हैं। इसके द्वारा स्रावित पैराथॉर्मोन नामक हॉमोंन रक्त में कैल्शियम तथा फॉस्फोरस की मात्रा का नियन्त्रण करता है। यह अस्थि एवं दाँतों के निर्माण में सहायक होता है।

4. थायमस ग्रन्थि (Thymus Gland) यह ग्रन्थि वक्ष में हृदय के सामने स्थित होती है। युवावस्था तक यह लुप्त हो जाती है। इस ग्रन्थि से स्रावित थायमोसिन हॉर्मोन, लिम्फोसाइट्स को भिन्न-भिन्न प्रकार के जीवाणुओं और एण्टीजन को नष्ट करने हेतु प्रेरित करता है।

5. अधिवृक्क ग्रन्थि (Adrenal Gland) यह ग्रन्थि प्रत्येक वृक्क (Kidney) के ऊपरी भाग पर स्थित होती है, इसका बाहरी भाग काँटेक्स व आन्तरिक भाग मेड्यूला कहलाता है। कॉर्टेक्स से स्रावित हॉमोंन उपापचयी नियन्त्रण, रक्त में लवण की मात्रा का नियन्त्रण एवं लैंगिक परिपक्वता आदि को नियन्त्रित करते हैं। मेड्यूला से स्रावित, एडीनलीन तथा नॉर एडीनेनीन हॉमन्स शरीर को संकटकालीन परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार करते हैं।

6. अग्न्याशय (Pancreas) यह एक मिश्रित ग्रन्थि है, इसका बहि:स्रावी भाग, अग्न्याशय रस स्रावित करता है। अग्न्याशय में विशिष्ट प्रकार की कोशिकाओं के समूह पाए जाते हैं, जिन्हें लैंगरहँन्स की द्वीपिकाएँ (Iglete of Langarhans) कहते हैं।
ये अन्त:स्रावी ग्रन्थि का काम करती हैं। इनसे स्रावित हॉर्मोन्स निम्नलिखित हैं

  • इन्सुलिन आवश्यकता से अधिक ग्लुकोज का ग्लाइकोजन में परिवर्तन करता है। इसकी कमी से शरीर से शर्करा की मात्रा मूत्र में आने लगती है, जिसे मधुमेह रोग कहते हैं।
  • ग्लूकैगॉन ग्लाइकोजन से ग्लूकोज को संश्लेषण करता है।

7. जनन ग्रन्थियाँ (Gonada) स्त्री में अण्डाशय (Ovary) तथा पुरुष में वृषण (Testha) विशेष हॉर्मोन्स स्रावित करते हैं, जिनसे लैंगिक लक्षणों का विकास होता है। स्त्रियों में एस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्टेरॉन का स्रावण होता है, जबकि पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन स्रावित होता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 9 C++ का परिचय

UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 9 C++ का परिचय are part of UP Board Solutions for Class 12 Computer. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 9 C++ का परिचय.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Computer
Chapter Chapter 9
Chapter Name C++ का परिचय
Number of Questions Solved 32
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 9 C++ का परिचय

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
निम्न में से कौन-सी प्रोग्रामिंग भाषा ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग की सुविधा देती है?
(a) C
(b) C++
(c) BASIC
(d) ये सभी
उत्तर:
(b) C++ भाषा ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग की सुविधा देती है।

प्रश्न 2
निम्न में से कौन-सा शब्द आइडेण्टीफायर नहीं हो सकता?
(a) lotus_123
(b) word
(c) const
(d) sum
उत्तर:
(c) const एक की-वर्ड है, जो आइडेण्टीफायर की तरह प्रयोग नहीं हो सकता।

प्रश्न 3
निम्न में से कौन C++ का मान्य फ्लोटिंग प्वॉइण्ट स्थिरांक है? [2018]
(a) 22.0/7
(b) 120
(c) 1.2.3
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(d) 22.0/7

प्रश्न 4
टाइप डाटा का साइज होता है। [2018, 17]
(a) 1 बाइट
(b) 2 बाइट
(c) 4 बाइट
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 2 बाइट

प्रश्न 5
किस डाटा टाइप का परास – 32768 से 32767 है? [2016]
(a) इण्ट
(b) अनसाइण्ड इण्ट
(c) साइण्ड इण्ट
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) इण्ट डाटा टाइप का आकार 2 बाइट है, जिसकी रेंज (परास)- 32768 से 32767 होती है।

प्रश्न 6
किसका उपयोग इनपुट देने में किया जाता है?
(a) cin
(b) gets( )
(C) getchar( )
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) C++ में, cin, gets ( ) तथा getchar ( ) को प्रयोग इनुपट युक्तियों से इनपुट देने के लिए किया जाता है।

प्रश्न 7
फंक्शन gets ( ), puts ( ), getchar ( ) तथा putchar ( ) किस हैडर फाइल में शामिल होते हैं?
(a) stdio.h
(b) iostream.h
(c) conio.h
(d) ये सभी
उत्तर:
(a) stdio.h

प्रश्न 8
निम्न में से कौन-सा इस्केप कैरेक्टर कर्सर के दायीं ओर 8 स्थान होता है? [2018]
(a) la
(b) \b
(c) \t
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) \t

प्रश्न 9
कर्सर को Next Page पर ले जाने के लिए निम्न Escape sequence characters में से कौन-सा प्रयुक्त होता है? [2017]
(a) \t
(b) \n
(c) \f
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) \f

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1अंक)

प्रश्न 1
टोकन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
प्रोग्राम में प्रयुक्त होने वाली सबसे छोटी इकाई को टोकन कहते हैं।

प्रश्न 2
वैरिएबल को परिभाषित कीजिए। [2011]
उत्तर:
मेमोरी की वह स्थिति जिसमें कोई मान या डाटा संग्रहीत रहता है। वैरिएबल कहलाता है।

प्रश्न 3
कैरेक्टर कॉन्स्टेण्ट से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
कैरेक्टर कॉन्स्टेण्ट में कोई वर्ण (अक्षर, अंक या चिह्न) एकल कोटेशन चिह्न (‘ ‘) में लिखे जाते हैं; जैसे-‘N’, ‘8’ तथा ‘*’ आदि।

प्रश्न 4.
जो ऑपरेटर दो ऑपरेण्डों पर क्रिया करते हैं, उन्हें क्या कहा जाता है?
उत्तर:
बाइनरी ऑपरेटर

प्रश्न 5
रिलेशनल ऑपरेटर्स को परिभाषित कीजिए। [2011]
उत्तर:
जिन ऑपरेटर्स का प्रयोग दो विभिन्न संख्याओं या एक्सप्रेशन की तुलना करने के लिए किया जाता है, रिलेशनल ऑपरेटर्स कहलाते हैं।

प्रश्न 6
C++ में, लॉजिकल ऑपरेटर्स कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
C++ में लॉजिकल ऑपरेटर्स निम्न हैं।

  1. लॉजिकल एण्ड (AND)
  2. लॉजिकल और (OR)
  3. लॉजिकल नॉट (NOT)

प्रश्न 7.
जो ऑपरेटर वैरिएबल के बाद उपयोग किए जाते हैं, उन्हें क्या कहा जाता है?
उत्तर:
पॉस्टफिक्स ऑपरेटर

प्रश्न 8
पॉइण्टर एक्सप्रेशन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
ऐसी एक्सप्रेशन जो एड्रेस का मान स्टोर और उसे प्रस्तुत करती है, पॉइण्टर एक्सप्रेशन कहलाती है।

प्रश्न 9
वैरिएबल sum का मान कॉन्सोल (स्क्रीन) पर दिखाने के लिए क्या कथन होगा?
उत्तर:
cout<<sum;

प्रश्न 10
प्रोग्राम के पहले आउटपुटों को क्लीयर करने के लिए किस कमाण्ड का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
clrscr ( ) फंक्शन का प्रयोग पहले आउटपुटों को क्लीयर करने के लिए किया जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न I (2 अंक)

प्रश्न 1
C++ की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2015, 14, 08]
उत्तर:
C++ की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं।

  1. इसमें किसी भी समस्या की जटिलता को कम करने की क्षमता होती हैं।
  2. इसमें अलग-अलग प्रकार के ऑपरेटिंग सिस्टम पर रन होने की क्षमता होती है।
  3. यह गणितीय एवं तार्किक ऑपरेटर का प्रयोग करता है।
  4. यह मशीन पर आत्मनिर्भर भाषा है।

प्रश्न 2
उदाहरण सहित टोकन का अर्थ समझाइए। [2015, 07]
उत्तर:
प्रोग्राम में प्रयुक्त होने वाली सबसे छोटी इकाई को टोकन कहते हैं। टोकन प्रोग्राम की अविभाज्य इकाई है। अनेक टोकन की क्रमबद्ध श्रृंखला से स्टेटमेण्ट बनते हैं। C++ में प्रयुक्त टोकन निम्न प्रकार हैं।

  1. की-वर्ड
  2. आइडेण्टीफायर
  3. कॉन्स्टेण्ट
  4. ऑपरेटर्स
  5. स्टिंग

प्रश्न 3
आइडेण्टीफायर तथा की-वई में अन्तर बताइए।
उत्तर:
आइडेण्टीफायर तथा की-वर्ड में अन्तर इस प्रकार हैं।
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प्रश्न 4
हैडर फाइल पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए। [2012]
उत्तर:
वे फाइलें जिनमें लाइब्रेरी फंक्शन्स संकलित होते हैं, हैडर फाइल कहलाती हैं। C++ में, अनेक हैडर फाइल्स होती हैं, जो अलग-अलग फंक्शन्स को सम्मिलित करती हैं।
जैसे <iostream.h> हैडर फाइल cin और cout के लिए तथा <atdio.h> हैडर फाइल gets ( ), puts ( ), getchar ( ) और putchar ( ) फंक्शन्स के लिए होती हैं।

प्रश्न 5
निम्नलिखित प्रोग्राम का आउटपुट क्या होगा?
#include<iostream.h>
void main( )
{
int age;
cout<<“Mera “;
cout<<” Bharat “;
cout<<” Mahan. “;
cout<<“Vande Mataram !”;
}
उत्तर:
Mera Bharat Mahan. Vande Mataram !

प्रश्न 6
डाटा प्रकार के उदाहरण देकर व्याख्या संक्षेप में कीजिए। [2018]
उत्तर:
कम्प्यूटर में दिए जाने वाले इनपुट को डाटा कहते हैं। प्रत्येक प्रोग्राम किसी डाटा पर किसी विशेष क्रम में क्रियाएँ करता है और ये डाटा एक टाइप पर निर्भर करते हैं, जिन्हें डाटा टाइप कहते हैं।
उदाहरण
इण्टीजर डाटा टाइप जैसे – 453, 75 आदि
करैक्टर डाटा टाइप जैसे – ‘M’, ‘+’ आदि।
फ्लोट डाटा टाइप जैसे – 154.02, 145.44 आदि

प्रश्न 7
C व C ++ के बीच कोई दो अन्तर बताइट। [2017]
उत्तर:

C एक प्रोसीजर ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग लैंग्वेज है। c++ एक प्रोसीजर प्रोग्रामिंग तथा ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग दोनों लैंग्वेज का मिश्रण है।
C में इनहेरिटेन्स की सुविधा उपलब्ध नहीं है। C++ में इनहेरिटेन्स की सुविधा उपलब्ध है।

लघु उत्तरीय प्रश्न II (3 अंक)

प्रश्न 1
C++ के सन्दर्भ में अर्थमैटिक तथा लॉजिकल ऑपरेटर्स को समझाइए। [2011, 09]
उत्तर:
अर्थमैटिक ऑपरेटर्स ये ऑपरेटर्स सामान्य अर्थमैटिक क्रियाओं में प्रयोग किए जाते हैं। इस प्रकार के ऑपरेटर को बाइनरी ऑपरेटर भी कहा जाता है। अर्थमैटिक ऑपरेटर्स निम्न प्रकार हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 9 C++ का परिचय img-2

लॉजिकल ऑपरेटर्स इन ऑपरेटर्स का प्रयोग दो लॉजिकल या सम्बन्धवाचक एक्सप्रेशन को जोड़ने में किया जाता है। ये ऑपरेटर्स बूलियन बीजगणित के अन्तर्गत आते हैं। लॉजिकल ऑपरेटर्स निम्न प्रकार हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 9 C++ का परिचय img-3

प्रश्न 2
रिलेशनल ऑपरेटर का प्रयोग करके एक प्रोग्राम लिखिए। [2016]
उत्तर:
#include<iostream.h>
void main( )
{
int a = 20, b= 10;
if (a==b)
{
cout<<“a is equal to b”;
}
else
{
cout<<“a is not equal to b”;
}
}

प्रश्न 3
C++ में ऑपरेटर्स तथा एक्सप्रेशन्स को समझाइए। [2016]
उत्तर:
ऑपरेटर्स किसी विशेष प्रकार के डाटा पर की जाने वाली क्रिया को व्यक्त करने के लिए जिस चिह्न का प्रयोग किया जाता है, उसे ऑपरेटर कहते हैं।
ऑपरेटर्स निम्न प्रकार के होते हैं।

  1. अंकगणितीय ऑपरेटर
  2. लॉजिकल ऑपरेटर
  3. रिलेशनल ऑपरेटर
  4. असाइनमेण्ट ऑपरेटर
  5. कण्डीशनल ऑपरेटर
  6.  इन्क्रीमेण्ट तथा डिक्रीमेण्ट ऑपरेटर्स

एक्सप्रेशन कोई एक्सप्रेशन एक या एक से अधिक वैरिएबलों, कॉन्स्टेण्टों तथा ऑपरेटरों का एक ऐसा वैध (Valid) समूह है, जिसका C++ भाषा में एक निश्चित मान निकाला जा सकता है। सभी एक्सप्रेशन को ऑपरेटर की प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाता है। एक से ज्यादा ऑपरेटर्स की समान प्राथमिकता होने पर एक्सप्रेशन को बाएँ से दाएँ हल किया जाता है। एक्सप्रेशन निम्न प्रकार की होती है।

  1. अंकगणितीय एक्सप्रेशन
  2. सम्बन्धवाचक एक्सप्रेशन
  3. लॉजिकल एक्सप्रेशन
  4. पॉइण्टर एक्सप्रेशन

प्रश्न 4
निम्न को परिभाषित कीजिए।
(i) cin
(ii) cout
(ii) getch ( )
उत्तर:
(i) cin यह एक फंक्शन न होकर ऑपरेटर है, जिसका कार्य इनपुट युक्तियों द्वारा इनपुट देना है। cin को >> चिह्न के साथ प्रयोग किया जाता है। इसकी हैडर फाइल <iostream.h> है।
(ii) cout यह भी एक ऑपरेटर है, जिसका कार्य आउटपुट युक्ति द्वारा ‘ आउटपुट प्रदर्शित करना है। यह << चिह्न के साथ प्रयोग किया जाता है। इसकी हैडर फाइल <iostream.h> है।
(iii) getch ( ) यह एक फंक्शन है, जिसका प्रयोग प्रोग्राम रन करने के बाद आउटपुट को स्क्रीन पर रोकने के लिए किया जाता है। इसकी हैडर फाइल <conio.h> है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)

प्रश्न 1
उदाहरण सहित C++ के विभिन्न प्रकार के ऑपरेटर्स को समझाइए। [2007]
उत्तर:
किसी विशेष प्रकार के डाटा पर की जाने वाली क्रिया को व्यक्त करने के लिए जिस चिह्न का प्रयोग किया जाता है, उसे ऑपरेटर कहते हैं।
C++ में प्रयुक्त ऑपरेटर्स के निम्न प्रकार हैं।

(i) अंकगणितीय ऑपरेटर्स ये ऑपरेटर्स सामान्य अर्थमैटिक क्रियाओं में प्रयोग किए जाते हैं, इन्हें बाइनरी ऑपरेटर भी कहा जाता है। अंकगणितीय ऑपरेटर्स निम्न हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 9 C++ का परिचय img-4

(ii) रिलेशनल ऑपरेटर्स इन ऑपरेटर्स का प्रयोग दो विभिन्न संख्याओं या एक्सप्रेशन की तुलना करने के लिए किया जाता है। रिलेशनल ऑपरेटर्स निम्न हैं। कम अधिक कम या बराबर अधिक या बराबर बराबर
बराबर नहीं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 9 C++ का परिचय img-5

(iii) लॉजिकल ऑपरेटर्स इन ऑपरेटर्स का प्रयोग दो लॉजिकल या सम्बन्धवाचक एक्सप्रेशन को जोड़ने में किया जाता है। ये ऑपरेटर्स बूलियन बीजगणित के अन्तर्गत आते हैं। लॉजिकल ऑपरेटर्स निम्न हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 9 C++ का परिचय img-6

(iv) असाइनमेण्ट ऑपरेटर्स इन ऑपरेटर्स का प्रयोग किसी वैरिएबल की वैल्यू निश्चित करने या बदलने के लिए किया जाता है।
असाइनमेण्ट ऑपरेटर्स निम्न हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 9 C++ का परिचय img-7

प्रश्न 2
निम्न पर टिप्पणी लिखिए
(i) ऑपरेटर प्राथमिकता
(ii) इनपुट-आउटपुट फंक्शन
उत्तर:
(i) ऑपरेटर प्राथमिकता एक्सप्रेशन को हल करने के लिए ऑपरेटर की प्राथमिकता का ज्ञान होना आवश्यक है, क्योंकि सभी एक्सप्रेशन को ऑपरेटर्स की प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाता है। एक एक्सप्रेशन में दो या दो से अधिक ऑपरेटर्स की समान प्राथमिकता होने पर एक्सप्रेशन को बाएँ से दाएँ क्रम में हल किया जाता है।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 9 C++ का परिचय img-8

(ii) इनपुट-आउटपुट फंक्शन सभी कम्प्यूटर प्रोग्राम में, इनपुट युक्तियों द्वारा इनपुट दिया जाता है, जो प्रोसेस होकर आउटपुट युक्तियों द्वारा उटपुट प्रदर्शित करता है। C++ भाषा में, इनपुट-आउटपुट क्रियाओं के लिए, जो फंक्शन प्रयोग किए गए हैं, उन्हें इनपुट-आउटपुट फंक्शन कहा जाता है, जिनकी अलग हैडर फाइल होती है। C++ में प्रयुक्त होने वाले कुछ इनपुट-आउटपुट फंक्शन निम्न प्रकार हैं।

  • gets( )
  • puts( )
  • putchar( )
  • getchar( )

प्रश्न 3
C++ के प्रोग्राम के ढाँचे को समझाइए। [2013, 11, 09]
उत्तर:
C++ भाषा में, प्रोग्राम की संरचना का ज्ञान होना अति आवश्यक है, क्योंकि इसके बिना हम कोई भी प्रोग्राम नहीं बना सकते हैं।
C++ का साधारण प्रोग्राम

#include<iostream.h>
#include<conio.h>
void main( )
{
clrscr( );
cout<<“This is Arihant”;
getch( );
}

उपरोक्त प्रोग्राम की पहली पंक्ति # include<iostream.h> से शुरू है, जो प्रीप्रोसेसर डाइरेक्टिव है जिसमें cout की परिभाषा शामिल है।

दूसरी पंक्ति में #include<conio.h>, clrscr( ) तथा getch( ) फंक्शन्स की हैडर फाइल हैं जो इनके बारे में सूचना देती है।
यदि प्रोग्राम में क्लास डिफाइन नहीं है तो इसके बाद main( ) फंक्शन आता है, जिसमें प्रोग्राम का कथन लिखा जाता है।
{ } (curly braces) का प्रयोग main ( ) फंक्शन की शुरुआत व अन्त को प्रदर्शित करता है।
clrscr ( ) फंक्शन का प्रयोग आउटपुट स्क्रीन से पहले आउटपुट को हटाने के लिए किया जाता है।
cout<<” This is Arihant”;
यह प्रोग्राम का मुख्य कथन है, जो स्क्रीन पर This is Arihant प्रदर्शित करेगा।
getch ( ) फंक्शन का प्रयोग आउटपुट को स्क्रीन पर रोकने के लिए किया जाता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 4 तन्त्रिका तन्त्र एवं ज्ञानेन्द्रियाँ

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Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 4
Chapter Name तन्त्रिका तन्त्र एवं ज्ञानेन्द्रियाँ
Number of Questions Solved 43
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 4 तन्त्रिका तन्त्र एवं ज्ञानेन्द्रियाँ

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
न्यूरॉन किस तन्त्र की कोशिका है? (2011, 15)
(a) पाचन तन्त्र
(b) अस्थि तन्त्र
(c) तन्त्रिका तन्त्र
(d) परिसंचरण तन्त्र
उत्तर:
(c) तन्त्रिका तन्त्र

प्रश्न 2.
न्यूरॉन कहते हैं  (2017)
(a) अस्थि कोशिका को
(b) पेशी कोशिका को
(c) तन्त्रिका कोशिका को
(d) रक्त कोशिका को
उत्तर:
(c) तन्त्रिका कोशिका को

प्रश्न 3.
अनुमस्तिष्क का कार्य है  (2016)
(a) गन्ध ग्रहण करना
(b) स्मृति
(c) दृश्य संवेदनाएँ ग्रहण करना
(d) शरीर का सन्तुलन
उत्तर:
(d) शरीर का सन्तुलन

प्रश्न 4.
प्रतिवर्ती क्रिया का उदाहरण है
(a) हृदय गति
(b) आमाशय में क्रमांकुचन
(c) तीव्र प्रकाश में पुतली का सिकुड़ना
(d) ग्रन्थियों की क्रियाएँ
उत्तर:
(c) तीव्र प्रकाश में पुतली का सिकुड़ना

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन परिधीय तन्त्रिका तन्त्र की तन्त्रिकाएँ हैं?
(a) कपालीय तन्त्रिकाएँ
(b) रीढ़ तन्त्रिकाएँ
(c) ‘a’ और ‘b’ दोनों
(d) स्वायत्त तन्त्रिकाएँ
उत्तर:
(c) ‘a’ और ‘b’ दोनों

प्रश्न 6.
नलिकाविहीन ग्रन्थि कौन-सी है? (2006, 09, 11, 13)
(a) पीयूष ग्रन्थि
(b) लार ग्रन्थि
(c) अमाशय
(d) हृदय
उत्तर:
(a) पीयूष ग्रन्थि

प्रश्न 7.
डायबिटीज किसकी कमी के कारण होता है?  (2015)
(a) ग्लूकैगन
(b) थायरॉक्सिन
(c) इन्सुलिन
(d) ये सभी
उत्तर:
(c) इन्सुलिन

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से किसका सम्बन्ध इन्सुलिन निर्माण से है?  (2016)
(a) पीयूष ग्रन्थि
(b) अधिवृक्क ग्रन्थि
(c) अग्न्याशय
(d) लार ग्रन्थि
उत्तर:
(c) अग्न्याशय

प्रश्न 9.
आँख के किस भाग पर वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिम्ब बनता है?  (2012, 14)
(a) लेन्स पर
(b) पीत बिन्दु पर
(c) अन्ध बिन्दु पर
(d) ये सभी
उत्तर:
(b) पीत बिन्दु पर

प्रश्न 10.
दूर की वस्तु को न देख पाना रोग है  (2017)
(a) निकट दृष्टि दोष
(b) दूर दृष्टि दोष
(c) मोतियाबिन्द
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) निकट दृष्टि दोष

प्रश्न 11.
एक छात्रा मेज पर रखी पुस्तक पढ़ने में कठिनाई अनुभव करती है, परन्तु श्यामपट्ट पर लिखे शब्दों को ठीक पढ़ लेती है। इस दोष को क्या कहते हैं?  (2010)
(a) दूर दृष्टि दोष
(b) निकट दृष्टि दोष
(C) रंग दृष्टि दोष (वर्णान्धता)
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) दूर दृष्टि दोष

प्रश्न 12.
कान के अन्दर अस्थि होती है  (2017)
(a) मुगदर (Malleus)
(b) पैरिलिम्फ
(c) एम्पुला
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(d) मुगदर

प्रश्न 13.
किस लेंस को दूर दृष्टि दोष में प्रयोग करते हैं?  (2017)
(a) उत्तर लेंस
(b) अवतल लेंस
(c) ‘d’ और ‘b’ दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) उत्तल लेंस

प्रश्न 14.
कान की अर्द्धचन्द्राकार नलिकाओं का क्या कार्य है?  (2012)
(a) ज्ञान प्राप्त करना
(b) शरीर का सन्तुलन बनाना
(c) सँघना
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) शरीर का सन्तुलन बनाना।

प्रश्न 15.
जिह्वा विभिन्न स्वाद ग्रहण करती है  (2012)
(a) जिह्वा के अग्र भाग से
(b) जिह्वा के भिन्न-भिन्न भागों से
(c) जिह्वा के पिछले भाग से
(d) जिह्वा के मध्य भाग से
उत्तर:
(b) जिह्वा के भिन्न-भिन्न भागों से

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक, 25 शब्द)

प्रश्न 1.
तन्त्रिकाएँ कितने प्रकार की होती हैं?
अथवा
तन्त्रिका तन्त्र के मुख्य भाग कौन-कौन से हैं?  (2018)
उत्तर:
तन्त्रिकाएँ मुख्यतः तीन प्रकार की होती हैं
1. संवेदी तन्त्रिका ये उद्दीपनों को केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र तक पहुँचाती हैं।
2. प्रेरक या चालक तन्त्रिका ये मस्तिष्क या मेरुरज्जु से आदेश को सम्बन्धित कंकाल पेशी या ग्रन्थि तक पहुँचाती है।
3. मिश्रित तन्त्रिका ये उद्दीपन व प्रेरणा दोनों का संवहन करती हैं।

प्रश्न 2.
प्रतिवर्ती क्रिया क्या है?   (2006, 10, 12)
उत्तर:
ऐसी अनैच्छिक क्रिया, जो बाहरी उद्दीपनों के कारण अनुक्रिया के रूप में होती है, प्रतिवर्ती क्रिया कहलाती है। इसे मेरुरज्जु नियन्त्रित करती है।

प्रश्न 3.
प्रतिवर्ती क्रियाओं से आप क्या समझते हैं? (2017)
अथवा
स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र का क्या कार्य है?
उत्तर:
स्वायत्त तन्त्रका तन्त्र शरीर को स्वायत्त अनैच्छिक क्रियाओं का संचालन करता है; जैसे-हृदय, यकृत, आमाशय, अन्त:स्रावी ग्रन्थियों की क्रियाएँ आदि। यह तन्त्र स्वतन्त्र रूप से कार्य करते हुए भी अन्तिम रूप से केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र द्वारा नियन्त्रित होता है।

प्रश्न 4.
किस ग्रन्थि से स्रावित हॉर्मोन शरीर की उपापचय क्रियाओं का नियमन करता है?
उत्तर:
थायरॉइड ग्रन्थि से स्रावित हॉर्मोन शरीर की उपापचय क्रियाओं का नियमन करता है। शरीर में इसकी कमी से हृदय की गति धीमी, शरीर में सुस्ती, मस्तिष्क की कमजोरी आदि रोग हो जाते हैं।

प्रश्न 5.
लैंगरहैन्स की द्वीपिकाएँ कौन-से हॉर्मोन्स स्रावित करती हैं?
उत्तर:
लैंगरहैन्स की द्वीपिकाएँ ग्लूकैगन एवं इन्सुलिन नामक हॉर्मोन्स स्रावित करती हैं। इन्सुलिन रक्त में शर्करा की मात्रा को नियन्त्रित करने का कार्य करता है। इन्सुलिन के अल्पस्रावण से मधुमेह (Diabetes) नामक रोग हो जाता है।

प्रश्न 6.
शरीर में रुधिर शर्करा के स्तर को नियन्त्रित करने वाले सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हॉर्मोन का नाम बताइए।  (2005)
उत्तर:
शरीर में रुधिर शर्करा के स्तर को नियन्त्रित करने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण हॉर्मोन इन्सुलिन है।

प्रश्न 7.
शरीर की दो आन्तरिक ज्ञानेन्द्रियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
शरीर की दो आन्तरिक ज्ञानेन्द्रियाँ हैं-
1. गति संवेदन तन्त्र
2. प्रघाण तन्त्र।

प्रश्न 8.
नेत्र की समंजन शक्ति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
नेत्र लेन्स की फोकस दूरी की घटाने-बढ़ाने की क्षमता को समंजन शक्ति कहते हैं।

प्रश्न 9.
नेत्र की किस परत पर प्रतिबिम्ब का निर्माण होता है?
उत्तर:
नेत्र की सबसे भीतरी परत रेटिना पर प्रतिबिम्ब का निर्माण होता है।

प्रश्न 10.
निकट दृष्टि दोष से क्या आशय है?  (2018)
उत्तर:
इस दोष में पास की वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं, किन्तु दूर की वस्तुएँ धुंधली दिखाई देती हैं। प्रतिबिम्ब रेटिना के आगे बनता है।

प्रश्न 11.
वर्णान्धता से क्या आशय है?  (2016)
उत्तर:
यह एक वंशानुगत रोग हैं। इस रोग से ग्रसित व्यक्तियों में विभिन्न रंगों (विशेषत: लाल एवं हरा रंग) को पहचाने की क्षमता नहीं होती है। इससे मुख्यतः पुरुष प्रभावित होता है। सामान्य रूप से इस दोष का निवारण नहीं हो | पाता है।

प्रश्न 12.
नाक में बाल क्यों होते हैं?  (2018)
उत्तर:
धूल के कणों एवं जीवाणुओं को रोकने के लिए नासागुहा की सतह पर छोटे-छोटे रोएँ (बाल) होते हैं।

प्रश्न 13.
स्वादेन्द्रिय के कार्य बताइए।  (2011)
उत्तर:
स्वादेन्द्री अर्थात् जीभ का प्रमुख कार्य अनेक प्रकार के स्वाद की संवेदनाओं को ग्रहण करना है, इसके लिए जीभ पर विशिष्ट भाग पाए जाते हैं।

लघु उतरीय प्रश्न (2 अक, 50 शब्द)

प्रश्न 1.
‘तन्त्रिका तन्त्र के भाग’ टिप्पणी लिखिए।  (2017)
अथवा
स्नायु की रचना का सचित्र वर्णन कीजिए।  (2005)
अथवा
तन्त्रिका कोशिका का सचित्र वर्णन कीजिए।  (2010)
उत्तर:
मस्तिष्क, मेरुरज्जु तथा तन्त्रिकाएँ सभी तन्त्रिका ऊतक से बनी होती हैं। तन्त्रिका ऊतक की कोशिका को न्यूरॉन कहते हैं। इन कोशिकाओं का निर्माण पूणावस्था में ही हो जाता है। ये एक बार नष्ट होने पर दोबारा नहीं बनती अर्थात् इनका पुनरुद्भव (Regeneration) सम्भव नहीं है।

ये कोशिकाएँ विशिष्ट प्रकार की होती हैं, जो सन्देशवाहक का कार्य करती हैं। एक न्यूरॉन से सन्देश दूसरे न्यूरॉन तक पहुँचता है, वहाँ से लक्ष्य तक पहुँचने के लिए एक, दो या बहुत से न्यूरॉन्स की सहायता लेता है।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 4 1

न्यूरॉन के प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं
1. कोशिका काय (Cyton) जिसमें एक केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य होता हैं।
2. डेण्ड्राइट न्यूरॉन (Neuron) के कोशिका काय से निकले हुए पतले तन्तु, जो एक या अधिक होते हैं, डेण्ड्राइट (Dendrite) कहलाते हैं।
3. एक्सॉन कोशिका काय से प्रारम्भ होकर एक बहुत पतला एवं लम्बा तन्त्रिका तन्तु निकलता है। यह एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक सन्देशवाहक का कार्य करता है, जिसे एक्सॉन (Axon) कहते हैं।

प्रश्न 2.
मेरुरज्जु की अनुप्रस्थ काट का नामांकित चित्र बनाकर संक्षिप्त वर्णन कीजिए।  (2005, 16)
अथवा
मेरुरज्जु के कार्य बताइए।  (2017)
उत्तर:
मस्तिष्क पुच्छ अर्थात् मेड्यूला ऑब्लोंगटा का पिछला भाग ही मेरुरज्जु (Spinal cord) बनाता है। केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र का यह भाग कशेरुक दण्ड (Vertebral column) के अन्दर स्थित रहता है। कशेरुक दण्ड या रीढ़ की हड्डी कशेरुकाओं से बनी होती हैं तथा इनके मध्य में एक तन्त्रिको नाल (Neural canal) होती है। मेरुरज्जु इसी तन्त्रिका नाल में सुरक्षित रहती हैं। मेरुरज्जु का अन्तिम सिरा एक पतले सूत्र के रूप में होता है, यह भाग अन्त्य सूत्र कहलाता है।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 4 2

मस्तिष्क के समान मेरुरज्जु के चारों ओर तीन झिल्लियों-इथूरामैटर, एरेक्नॉइड तथा पायामैटर का बना आवरण पाया जाता है। इन झिल्लियों के बीच में एक लेसदार तरल द्रव्य भरा रहता है, जो बाह्य आघातों से मेरुरज्जु की रक्षा करता है।

मेरुरज्जु के मध्य में एक संकरी नाल पाई जाती है, जिसे केन्द्रीय नाल (Central canal) कहते हैं। केन्द्रीय नाल के चारों ओर मेरुरज्जु का भाग दो स्तरों में बंटा होता हैं-भीतरी स्तर को धूसर द्रव्य (Grey matter) तथा बाहरी स्तर को श्वेत द्रव्य (White matter) कहते हैं। धूसर द्रव्य से पंख के समान पृष्ठ श्रृंग (horm) तथा प्रतिपृष्ठ भुग निकले रहते हैं। इन्हीं श्रृंगों में तन्त्रिका तन्तु एकत्रित होकर स्पाइनल तन्त्रिकाओं (Spinal nerve) का निर्माण करते हैं। मेरुरज्जु के धूसर द्रव्य का ऊपरी आधा भाग संवेदी (Sensory) क्रियाओं से तथा निचला आधा भाग चालक या प्रेरक (Motor) क्रियाओं से सम्बन्ध रखती हैं।

मेरुरज्जु के कार्य
मेरुरज्जु के दो कार्य इस प्रकार है
1. यह मस्तिष्क द्वारा प्रेषित आदेशों तथा मस्तिष्क को जाने वाली संवेदनाओं को मार्ग प्रदान करता है।
2. यह प्रतिवर्ती क्रियाओं का नियन्त्रण एवं समन्वय करता है।

प्रश्न 3.
प्रतिवर्ती क्रिया किसे कहते हैं? इसे उदाहरण सहित समझाइए।  (2002, 03, 06, 09)
अथवा
प्रतिवर्ती क्रिया पर टिप्पणी लिखिए।   (2018, 16)
उत्तर:
प्रतिवर्ती क्रिया का अर्थ
मनुष्य के दैनिक जीवन में कुछ क्रियाएँ, किसी बाह्य उद्दीपन के अनुक्रिया स्वरूप, बिना मस्तिष्क की जानकारी के अकस्मात् हो जाती हैं।उदाहरणतः किसी सर्प (साँप) को अकस्मात् देखते ही एकाएक कूदकर पीछे हट जाना। यहाँ सर्प ने या उद्दीपन का कार्य किया और चौंककर कूदना एक ऐसी अनैच्छिक क्रिया हुई, जिसके लिए मस्तिष्क ने प्रेरणा नहीं दी। ऐसी अनैच्छिक क्रियाओं को ही प्रतिवर्ती क्रियाओं (Reflex actions) की संज्ञा दी जाती हैं।

इनके लिए किसी विचार अथवा प्रेरणा की आवश्यकता नहीं होती। ये क्रियाएँ मेरुरज्जु (Spinal cord) से नियन्त्रित होती हैं। बाह्य उद्दीपनों या संवेदनाओं को ग्राही अंगों (नेत्र, कान, नाक, जीभ एवं त्वचा) द्वारा ग्रहण कर संवेदी तन्त्रिका कोशिका से मेरुरज्जु तक पहुंचा दिया जाता हैं। मेरुरज्जु इन संकेतों को प्राप्त कर उचित आदेश निर्गत करता है। ये आदेश प्रेरक तन्त्रिका कोशिका द्वारा सम्बन्धित अंगों की ऐच्छिक पेशियों तक पहुँचा दिए जाते हैं। इस सम्पूर्ण मार्ग को प्रतिवर्ती चाप (Reflex arc) की संज्ञा दी जाती हैं।

प्रतिवर्ती क्रिया के प्रकार
प्रतिक्त क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं
1. अनुबन्धित प्रतिवर्ती क्रिया (Conditioned Reflex Action) कुछ | क्रियाएँ नियमित अभ्यास के बाद स्वचालित हो जाती हैं। इनका नियन्त्रण मस्तिष्क के स्थान पर मेरुरज्जु द्वारा होने लगता है; जैसे- भोजन देखकर मुंह में पानी आना, साइकिल चलाना, नृत्य करना एवं अन्य कौशल आदि।
2. अबन्धित प्रतिवर्ती क्रियाएँ (Unconditioned Reflex Action) ये प्रतिवर्ती क्रियाएँ अर्जित न होकर जन्मजात होती है; जैसे-तेज प्रकाश पड़ने पर पुतली का सिकुड़ना, ठण्ड में रोंगटे खड़े होना, छींकना, खाँसना, पलक का झपकना एवं उबासी लेना आदि।

प्रश्न 4.
प्रतिवर्ती क्रियाओं के महत्त्व को उदाहरण सहित समझाइए।  (2010, 12)
उत्तर:
प्रतिवर्ती क्रियाओं का महत्त्व
प्रतिवर्ती क्रियाओं के महत्त्वे का संक्षिप्त विवरण निम्न है
1. प्रतिवर्ती क्रियाओं द्वारा विभिन्न बाह्य आक्रमणों एवं खतरों से हमारी रक्षा सुनिश्चित हो पाती है। उदाहरणतः किसी गर्म वस्तु पर हाथ पड़ जाने से एकदम से हाथ को वापस खींच लेना अथवा आँख के सामने अचानक किसी वस्तु के आ जाने से पलक का झपकना, जिससे आँखें सुरक्षित रहें।

2. कुछ आन्तरिक प्रतिवर्ती क्रियाएँ भी विशेष महत्त्व रखती हैं। ये क्रियाएँ शरीर | के लिए आवश्यक एवं उपयोगी क्रियाओं को पूरा करने में सहायक होती हैं। उदाहरणत: भोजन ग्रहण से पूर्व मुंह में लार का स्राव, भोजन के पाचन के लिए विशेष महत्त्व रखता है।

3. कुछ प्रतिवर्ती क्रियाएँ, परिवर्तनशील पर्यावरण के साथ अनुकूलन स्थापित करने में भी विशेष भूमिका निभाती हैं। उदाहरणत: अचानक वातावरण का | ताप बढ़ जाने पर, शरीर प्रतिवर्ती क्रिया द्वारा त्वचा से पसीने को निकालना , प्रारम्भ कर देता है तथा शरीर का ताप सामान्य बना रहता है।

प्रश्न 5.
मादक पदार्थों का स्नायु तन्त्र पर क्या प्रभाव पड़ता है? (2006, 08)
उत्तर:
मादक पदार्थ ऐसे नशीले पदार्थ हैं, जो शरीर के तन्त्रिका-तन्त्र को उत्तेजित करते हैं, इनसे अल्प समय के लिए तन्त्रिका तन्त्र से शेष शरीर का सन्तुलन बिगड़ जाता है। शरीर में उत्पन्न उत्तेजना के कारण व्यक्ति को आंशिक स्फूर्ति का आभास होता है। उल्लेखनीय है कि इन मादक पदार्थों का कोई पोषक मूल्य नहीं होता है। मादक पदार्थ तरल एवं ठोस दोनों रूपों में पाए जाते हैं। इनके उदाहरण हैं- एल्कोहॉल (शराब), तम्बाकू, अफीम, कोकीन, भाँग आदि।

स्नायु-तन्त्र पर प्रभाव
मादक वस्तुएँ परिसंचरण के माध्यम से मस्तिष्क तथा शरीर के समस्त भागों में पहुँचती हैं। धूम्रपान के प्रभाव को फेफड़े से दिमाग तक पहुँचने में केवल सात सेकण्ड लगते हैं। मादक वस्तुओं के प्रभाव से स्नायु तन्त्र का पेशियों पर नियन्त्रण क्रमशः कमजोर होने लगता है। ऐसे व्यक्ति का प्रतिक्रिया काल बढ़ जाता है अर्थात् वह उत्तेजनाओं के प्रति देर से प्रतिक्रिया करता है।
इसी प्रकार व्यक्ति का शारीरिक सन्तुलन भी बिगड़ने लगता है। मादक पदार्थों के अत्यधिक व्यसन से व्यक्ति की सोचने-समझने एवं विश्लेषण करने की शक्ति क्षीण होती रहती है। एकाग्रता हीनता, स्मरण शक्ति की क्षीणता, पहचान शक्ति की
कमी एवं आत्मसंयम का अभाव इसके अन्य दुष्प्रभाव हैं।

प्रश्न 6.
ज्ञानेन्द्रिय क्या हैं? शरीर की ज्ञानेन्द्रियों के नाम लिखकर उनके कार्य लिखिए।  (2010)
अथवा
टिप्पणी लिखिए-ज्ञानेन्द्रियाँ।   (2014)
उत्तर:
ज्ञानेन्द्रियों का अर्थ
हमारे बाह्य वातावरण में विविध प्रकार के उद्दीपक उपस्थित होते हैं; जैसे—संगीत, मिठाई, फूल की सुगन्ध, कपड़े का चिकनापन आदि। ये उद्दीपन विभिन्न प्रकार की सूचनाओं के स्रोत हैं। शरीर के वे अंग जो इन सूचनाओं को प्राप्त एवं संग्रहीत करते हैं तथा उन्हें आवेग के रूप में तन्त्रिका तन्त्र को पहुँचाते हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ या संवेदनाग्राही अंग कहलाते हैं।

मानव शरीर में ज्ञानेन्द्रियाँ
हमारे शरीर में पाँच बाह्य ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जिल्ला एवं त्वचा) च दो आन्तरिक ज्ञानेन्द्रियाँ हैं गति संवेदी तन्त्र, प्रद्याण तन्त्र हैं।

बाह्य ज्ञानेन्द्रियाँ
1. कर्ण (Ear) इनका कार्य ध्वनि संवेदनाओं को ग्रहण करना है। कानों के माध्यम से हम ध्वनि की विशेषताओं तीव्रता (Loudness), तारत्व (Pitch) ” अथवा स्वर का ज्ञान प्राप्त करते हैं।
2. नेत्र (Eyes) इनका मुख्य कार्य बाहरी वस्तुओं के आकार एवं रंग की संवेदनाओं को ग्रहण करना हैं। दृष्टिपटल (Retina) की प्रकाश संवेदी
कोशिकाएँ दण्ड (Rodes) एवं शंकु (Cones) दृष्टि के ग्राही होते हैं।

3. नासिका (Nose) नाक के माध्यम से हमें गन्ध विशेष का ज्ञान होता है।
4. जिल्ला (Tongue) इसका प्रमुख कार्य स्वाद सम्बन्धी संवेदनाओं को ग्रहण करना है।
5. त्वचा (Skin) त्वचा एक संवेदी अंग है, जिससे स्पर्श (दबाव), गर्मी, सर्दी तथा पीड़ा आदि की संवेदनाएँ उत्पन्न होती हैं। हमारी त्वचा में इनमें से प्रत्येक संवेदना के लिए विशिष्ट ग्राहियाँ होती हैं।

आन्तरिक ज्ञानेन्द्रियाँ
1. गति संवेदन तन्त्र (Kinesthetic System) इसके ग्राही अंग स्नायु तथा मांसपेशियों में पाए जाते हैं। यह तन्त्र हमारे शरीर के अंगों की परस्पर स्थिति के विषय में सूचना देता है।
2. प्रघाण तन्त्र (Vestibular System) यह तन्त्र हमारे सन्तुलन बोध को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। इस तन्त्र के संवेदी अंग, आन्तरिक कान में स्थित होते हैं।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए। (2004)
1. स्वादेन्द्रियाँ
2. घ्राणेन्द्रियाँ
अथवा
टिप्पणी लिखिए-स्वादेन्द्रिय के कार्य।  (2011)
उत्तर:
1. स्वादेन्द्रिय जिह्वा स्वादेन्द्रिय है। स्वाद के संवेदी ग्राहक, हमारी जीभ के छोटे उभरे हुए भाग में पाए जाते हैं, जिन्हें पैपिला या अंकुर कहते हैं। प्रत्येक पैपिला में स्वाद कलिका के गुच्छे होते हैं। इन्हीं स्वाद कलिकाओं में संवेदी कोशिकाएँ पाई जाती हैं, जो स्वाद के अनुभवों को मस्तिष्क को भेजती हैं। मूल स्वाद केवल चार प्रकार के होते हैं- मीठा, खट्टा, कड़वा तथा नमकीन। जीभ के स्वतन्त्र छोर पर मीठे तथा नमकीन का, जीभ के पाश्र्व में खट्टे का और पश्च में कड़वे का ज्ञान कराने वाले स्वाद ग्राही होते हैं, किन्तु हम अन्य कई स्वादों का अनुभव भी करते हैं, कारण कि हम केवल भोजन के स्वाद से ही परिचित नहीं होते, बल्कि उसकी गन्ध, कण, तापमान, जीभ पर उसके दबाव तथा अन्य बहुत-सी संवेदनाओं से परिचित होते हैं। ये सभी कारक मिलकर हमें विशिष्ट स्वाद का अनुभव देते हैं।

2. घ्राणेन्द्रियाँ नाक गन्धग्राही इन्द्री है, इसके माध्यम से हमें गन्ध का ज्ञान होता है। गन्ध संवेदना के उद्दीपक हवा में विद्यमान विभिन्न पदार्थों के अणु होते हैं। ये अणु नासा वेश्म (Nasal chamber) में प्रवेश करते हैं, जहाँ वे नाक की श्लेष्मा (नमी) में घले जाते हैं। यहाँ से गन्ध के रासायनिक उद्दीपनों को नासा वेश्म की भित्ति (घ्राण उपकला) में स्थित संवेदी कोशिकाएँ ग्रहण करती है एवं मस्तिष्क को भेजती हैं।
मस्तिष्क के विश्लेषण के पश्चात् मनुष्य को सुगन्ध या दुर्गन्ध का बोध होता हैं। जुकाम आदि होने पर गन्ध की अनुभूति नहीं होती, क्योंकि श्लेष्मा झिल्ली पर सूजन आ जाने के कारण वायु के कण ऊपर तक नहीं पहुँच पाते हैं।

प्रश्न 8.
बहरेपन के क्या कारण हैं? (2014)
उत्तर:
कान एक श्रवणेन्द्रिय है, जिसका मुख्य कार्य ध्वनि की संवेदनाओं को ग्रहण करना है। इस क्रिया के अवरुद्ध होने को कान का बहरापन कहा जाता है। इसमें या तो कान की बनावट में ही कोई विशेष कमी या विकृति होती हैं अथवा किसी अन्य कारणों से; जैसे—संक्रमण होने या चोट लगने, आदि से कान कोई भी ध्वनि उद्दीपन ग्रहण नहीं कर पाते हैं।

बहरेपन के कारण

बहरेपन के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं।

  1. किसी दुर्घटना अथवा असावधानों के कारण कान का पर्दा फट जाने से।
  2. किसी आन्तरिक संरचना की अतिवृद्धि के कारण कर्ण नली का बन्द हो जाना।
  3. कान में संक्रमण के कारण मवाद आदि के भर जाने से।
  4. संवेदनाओं का संवहन करने वाली श्रवण तन्त्रिका अथवा मस्तिष्क के श्रवण केन्द्रों में दोष भी बहरेपन के कारण हो सकते हैं।
  5. कान के पर्दे पर अधिक गन्दगी अथवा स्राव इत्यादि के मैल के रूप में जमा होने पर।
  6. लम्बी अवधि तक ध्वनि प्रदूषण के कारण भी बहरेपन की समस्या उत्पन्न हो सकती है।
  7. जुकाम, एवं फ्लू आदि की स्थिति में कण्ठ-कर्ण नली प्रभावित हो सकती है। नली के बन्द होने तथा सूजन आदि आने से कान में वायुदाब सन्तुलन के बिगड़ने की सम्भावना बढ़ जाती है। इससे ध्वनि उद्दीपनों को ग्रहण करने में व्यवधान उत्पन्न होता है।

प्रश्न 9.
कार्य के आधार पर त्वक् ज्ञानेन्द्रिय (Cutinuous Sense 0rgan) को कितने भागों में बाँटा जाता है?
उत्तर:
कार्य के आधार पर इन्हें दो वर्गों में बाँटा जा सकता है। |
1. पीड़ा संवेदांग (Pain Receptore) त्वचा की अधिचर्म तथा चर्म में । शाखामय संवेदी तन्त्रिका तन्तुओं का जाल फैला रहता है। इसके स्वतन्त्र पुटिकाविहीन छोर पीड़ा, खुजली, जलन आदि का ज्ञान कराते हैं।

2. स्पर्श संवेदांग (Tactile Receptors) इन संवेदी तन्त्रिका तन्तुओं के अन्तिम छोर घुण्डीदार, चपटे या तश्तरीनुमा होते हैं। चर्म में स्थित संवेदी । तन्त्रिका तन्तुओं के छोर पर बेलनाकार संवेदी संरचनाएँ मीसनर के देहाणु (Moiteners corpuscles) होते हैं। इसी प्रकार अधिचर्म में प्यालीनुमा देहाणु के समूह ‘मरकेल की तश्तरियाँ’ (Merkel’s dises) पाए जाते हैं। ये स्पर्श की संवेदनाओं को ग्रहण करते हैं। चर्म की गहराई में स्थित पैसिनाइ के देहाणु (Pacinian corpuscles) दबाव के उद्दीपनों को ग्रहण करते हैं।

प्रश्न 10.
नाक से साँस लेना क्यों लाभदायक है? (2018)
उत्तर:
नाक द्वारा साँस लेने से अनेक लाभ हैं। यह हमारे मस्तिष्क के साथ-साथ फेफड़ों के लिए भी बहुत लाभकारी होती है। नाक से गहरी साँस लेना दिमागी ताकत को बढ़ाता है तथा इससे यादाशश्त भी मजबूत होती है। नाक से श्वास लेने पर दिमाग पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, किन्तु मुंह से साँस लेने पर यह प्रक्रिया लागू नहीं होती। नाक के छिद्रों में रोएँ होते हैं। ये रोएँ सांस लेने की प्रक्रिया के दौरान नमी, धूल के कण, जीवाणु तथा गर्मी इत्यादि को छानकर फेफड़ों तक पहुँचाते हैं। इससे बाहरी गन्दगी फेफड़ों तक नहीं पहुंच पाती।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक, 100 शब्द)

प्रश्न 1.
मस्तिष्क की रचना चित्र बनाकर समझाइए तथा इसके विभिन्न भागों के कार्यों का वर्णन कीजिए। (2018, 07)
अथवा
मस्तिष्क की रचना एवं कार्य समझाइए। (2009)
उत्तर:
मस्तिष्क : संरचना तथा विभिन्न भागों के कार्य
मस्तिष्क पूरे शरीर तथा स्वयं तन्त्रिका तन्त्र का नियन्त्रण कक्ष है। यह तन्त्रिका ऊतकों का बना एक कोमल अंग है। इसका कुल औसतन भार 1300 ग्राम होता है। मस्तिष्क अस्थियों के खोल क्रेनियम में बन्द रहता है, जो इसे बाहरी आघातों से बचाता है। इसके चारों ओर तीन झिल्लियों का आवरण होता है, इसे मेनिनजेस कहते हैं। आवरण की सबसे चाहा झिल्ली को दृढ़तानिका (Duramater), मध्य परत को जालतानिका (Arachnoid) तथा सबसे भीतरी परत को मृदुतानिका (Pin tmater) कहते हैं। भीतरी झिल्ली में अनेक रुधिर केशिकाओं का जाल फैला रहता है। इन्हीं के माध्यम से मस्तिष्क को ऑक्सीजन एवं भोज्य पदार्थों की आपूर्ति होती हैं।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 4 3
मस्तिष्क आवरण गुहा में एक पोषक द्रव्य भरा रहता है। सेरीम्रोस्पाइनल द्रव नामक यह तरल मस्तिष्क को नम बनाए रखता है।

मस्तिष्क के तीन प्रमुख भाग होते हैं– अग्न, मध्य एवं पश्च मस्तिष्क। इन भागों का विवरण निम्नलिखित है।
मस्तिष्क के तीन

  • अग्र मस्तिष्क
  • मध्य मस्तिष्क
  • पश्न मस्तिष्क

1. अग्र मस्तिष्क (Fore Brain)
यह मस्तिष्क का सबसे अगला भाग है। यह कुल मस्तिष्क का 2/3 भाग होता है, इसके प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं।
(i) घ्राण पिण्ड (Olfactory lobes) मस्तिष्क में सबसे आगे धूसर द्रव्य (Gray matter) के बने दो पृथक् घ्राण पिण्ड होते हैं।
कार्य यह भाग गन्ध को पहचानने (Sense of   smell) का कार्य करता है।

(ii) प्रमस्तिष्क (Cerebrum) घ्राण पिण्डों के ठीक पीछे स्थित प्रमस्तिष्क, बाहर से धूसर पदार्थ (Gray matter) तथा अन्दर से श्वेत पदार्थ (White matter) द्वारा निर्मित होता है। यह दो गोलाद्ध का बना होता है, जिन्हें प्रमस्तिष्क अर्द्ध-गोलाई (Cerebral hemispheres) कहते हैं।प्रमस्तिष्क की बाहरी सतह पर अनेक टेढ़े मेढे उभार होते हैं, जिनके बीच-बीच में खाँचे होते हैं। इन उभारों के आधार पर सेरीब्रम् को चार भागों में बाँटा जा सकता है-फ्रण्टल पालि, पैराइटल पालि, टैम्पोरल पालि तथा ऑक्सीपीटल पालि।

  • फ्रण्टल पालि द्वारा ऐच्छिक पेशियों पर नियन्त्रण होता है।
  • पैराइटल पालि द्वारा हमारी त्वचा से प्राप्त संवेदन प्राप्त किए जाते हैं; जैसे-स्पर्श, दबाव आदि।
  • ऑक्सीपीटल पालि द्वारा दृश्य संवेदनाएँ ग्रहण की जाती हैं।
  • टेम्पोरल पालि श्रवण (सुनने) में सहायक है।

कार्य मस्तिष्क का यह भाग बुद्धिमता, चेतना शक्ति तथा स्मरण शक्ति का केन्द्र है। ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त संवेदनाओं का यहाँ विश्लेषण चे समन्वय करता है तथा ऐच्छिक पेशियों को समुचित प्रतिक्रिया हेतु सूचनाएं प्रसारित करता है।
Arihant Home Science Class 12 Chapter 4 4

(iii) डाइएनसिफैलान (Diencephalon) इस भाग से पीनियल काय (Pineal body) तथा पिट्यूटरी ग्रन्थि (Pituitary gland) निकलती हैं। थैलेमस व हाइपोथैलेमस इसी के भाग हैं।

थैलेमस के कार्य यह अत्यधिक ताप, शीत या पीड़ा आदि के ज्ञान का केन्द्र होता है।
हाइपोथैलेमस के कार्य यह भूख, प्यास, निद्रा, थकान, आदि का अनुभव करता है, इसके अतिरिक्त यह प्यार, घृणा, क्रोध आदि मनोभावनाओं का केन्द्र होता है। यह उपापचय तथा जनन क्रिया आदि का नियमन भी करता है।

2. मध्य मस्तिष्क (Mid Brain) प्रमस्तिष्क के पीछे गोल उभारों के रूप में मध्य मस्तिष्क होता है। मध्य मस्तिष्क का तन्तुओं के बण्डल सदृश भाग अग्न मस्तिष्क को पश्च मस्तिष्क से जोड़ने का कार्य करता है।
कार्य
यह दृष्टि-ज्ञान तथा सुनने की संवेदनाओं के समन्वय को नियन्त्रित
करता है।.
3. पश्च मस्तिष्क (Hind Brain)
इसके अन्तर्गत अनुमस्तिष्क तथा मस्तिष्क पुच्छ आता है।
(i) अनुमस्तिष्क (Cerebellum) यह प्रमस्तिष्क के पिछले भाग में नीचे की
ओर स्थित होता है। यह पिचके गोले के समान संरचना है, जिसके तल पर धारियाँ होती हैं।

कार्य

  •   यह प्रमस्तिष्क द्वारा भेजी गई सूचनाओं के अनुसार ऐच्छिक पेशियों के संकुचन पर नियन्त्रण करता है
  • चलना, कूदना, दौड़ना आदि सभी गतियाँ इसी के नियन्त्रण द्वारा होती हैं।
  • शरीर का सन्तुलन भी इसी से बना रहता है।

(ii) मस्तिष्क पुच्छ (Medulla 0blongata) यह मस्तिष्क का सबसे पिछला भाग हैं। यह अनुमस्तिष्क के सामने स्थित होता है, इसकी आकृति बेलनाकार होती हैं।
कार्य
यह भाग हृदय स्पन्दन, श्वास-दर, रक्त दाब, उपापचय, आहारनाल के क्रमांकुचन, ताप नियन्त्रण, ग्रन्थियों के स्राव आदि को नियन्त्रित करता हैं।

  • उल्टी, छींक, जुकाम, हिचकी आदि पर भी नियन्त्रण करता है।
  • यह मेरुरज्जु तथा शेष मस्तिष्क के बीच संवेदनाओं के संवहन मार्ग का कार्य भी करता है।

प्रश्न 2.
नेत्र का नामांकित चित्र बनाकर उसके कार्य लिखिए। (2018, 04)
अथवा
आँख के गोलक में कौन-कौन सी तीन परतें पाई जाती हैं? उनके नाम व कार्य लिखिए। (2013, 16)
उत्तर:
आँखें दृश्येन्द्रियाँ हैं, ये प्रकाश के लिए संवेदी होती हैं और वस्तुओं को देखने में सहायता करती हैं। चेहरे पर प्रत्येक आँख एक गोलक (Eyeball) के रूप में अस्थियों के बने एक साँचे (नेत्र कोटर) में स्थित होती हैं। ये नेत्र गोलक मांसपेशियों से जुड़े होते हैं, फलतः नेत्र कोटर के भीतर सभी दिशाओं में घुमाए जा सकते हैं। आँखों की सुरक्षा के लिए ऊपर-नीचे दो पलकें होती हैं। पलकों के किनारों पर बरौनियाँ (Eyelashes) तथा माइबोमियन ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं। इन ग्रन्थियों से तेल सदृश पदार्थ स्रावित होता है, जो पलकों के किनारों पर फैला रहता है। यह आँखों को धूल-मिट्टी के कणों से सुरक्षा प्रदान करता है। आँखों के कोनों में अश्रु या लैक्राइमल ग्रन्थियाँ होती हैं।

इनसे स्रावित जलीय तरल पलकों व आँखों को सदैव नम बनाए रखता है एवं इनकी सफाई करता है। शिशु जन्म के चार महीने बाद अश्रु ग्रन्थियां सक्रिय होती हैं।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 4 5

नेत्र की आन्तरिक संरचना
प्रत्येक नेत्र गोलक की रचना तीन परतों से होती है। ये तीन परतें निम्नलिखित प्रकार हैं।
1. बाह्य पटल या दृव पटल (Sclerotic) नेत्र गोलक की सबसे बाहरी परत श्वेत तथा दृढ़ होती है, इसे दृढ़ पटल कहते हैं। इसका 4/5 अपारदर्शक भाग नेत्र कोटर में स्थित होता है, केवल 1/5 पारदर्शक भाग बाहर की ओर उभरा रहता है. इस उभरे भाग को कॉर्निया (Cornea) कहते हैं। कॉर्निया पर एक पतली झिल्ली फैली होती है, जिसे कंजक्टाइवा (Conjunctiva) कहते हैं। यह ऊपरी और निचली पलकों के मध्य की त्वचा होती हैं। दृढ़ पटल के पिछले भाग से दृष्टि तृन्त्रिका (0ptic nerve) निकलती है, जो मस्तिष्क से सम्बन्ध स्थापित करती है। दृढ़ पटल के द्वारा नेत्र के भीतरी भागों की सुरक्षा होती है। साथ ही यह नेत्रों को स्पष्ट आकृति प्रदान करता हैं।

2. मध्य पटल या रक्तकपटल (Choroid) यह नेत्रगोलक का कोमल, अपेक्षाकृत पतला तथा मध्य स्तर होता है। इसमें रक्त-नलिकाओं तथा अनेक रंगयुक्त कोशिकाओं का जाल फैला रहता है। इसी कारण यह परत काले रंग की दिखाई पड़ती है। काले रंग के कारण यह प्रकाश को अवशोषित करती है तथा नेत्र के भीतरी परावर्तन को रोकती हैं। इससे सुनिश्चित होता है कि केवल बाहर से आने वाली प्रकाश किरणे ही रेटिना पर पड़ती हैं। इस स्तर के प्रमुख भाग निम्नलिखित प्रकार हैं।

(i) उषतारा या आइरिस जितने वृत्ताकार भाग में कॉर्निया रहता है, वहां से यह मध्य परत दर पटल से पृथक् हो जाती है एवं भीतर की ओर एक रंगीन गोल पर्दा बनाती है, जिसे उपतारा या आइरिस कहते हैं।
(ii) नेत्र तारा या पुतली आइरिस के बीच में एक छिद्र होता है, जिसको नेत्र तारा या पतली कहते हैं। यह गोल एवं कालो दिखाई देती है। आइरिस की पेशियों आवश्यकतानुसार पुतली के व्यास को पटा-बढ़ा सकती हैं। इससे नेत्र में जाने वाले प्रकाश की मात्रा को नियन्त्रित करना सम्भव होता है।
(iii) सिनियरी काय उपता के आधार पर मध्य पटन अत्यधिक पेशोयुक्त होकर एक मोटी धारी के रूप में भीतर की ओर उभरा रहता है, जिसे स्पिलियरी काय कहते हैं। यह अत्यधिक संकुचनशील संरचना है।

(iv) नेत्र लेन्स नेत्र गोलक में एक उभयोत्तल लेन्स (Biconvex lens) स्थित होता है। यह पारदर्शी, रंगहीन और लचीला होता है। लेन्स सिलियरी तन्तुओं द्वारा सिलियरी काय से जुड़ा होता है। सिलियरी तन्तुओं द्वारा लेन्स की फोकस दूरी को घटाया या बढ़ाया जा सकता है। इस शक्ति को समंजन शक्ति (Accommodation power) कहते हैं।
(v) जल वेश्म तथा जेली वेश्म कॉर्निया एवं नेत्र-लेन्स के बीच के स्थान को जल वेश्म (Aqueous chamber) कहते हैं। इसमें जल के समान पारदर्शी द्रव भरा रहता है। इसी प्रकार लेन्स एवं अन्तः पटल के बीच के स्थान को जेली वेश्म (Vitreous chamber) कहते हैं। इसमें एक पारदर्शक जेली सदृश काचाभ द्रव भरा रहता है। ये द्रव, नेत्र में प्रवेश करने वाली प्रकाश किरणों को अपवर्तित (तिरछा) करते हैं, जिससे अन्तः पटल पर प्रतिबिम्ब बनता हैं।

3. अन्तः पटल या दृष्टिपटले (Retina) यह सबसे अन्दर की तन्त्रिका संवेदी परत है। इसकी रचना काफी जटिल होती है, इसका निर्माण स्नायु कोशिकाओं से होता है। यह आँख की सबसे महत्त्वपूर्ण परत हैं, क्योंकि इसी पर वस्तु का प्रतिबिम्ब बनता है।

नेत्र गोलक के पिछले स्तर पर बाह्य पटल एवं मध्य पटल को भेदती हुई दृष्टि तन्त्रिका, दृष्टि पटल पर तन्त्रिका जाल के रूप में फैली रहती है, जिस स्थान पर यह प्रवेश करती है, वहाँ रेटिना की अनुपस्थिति के कारण कोई प्रतिबिम्ब नहीं बन सकता, इसलिए इसे अन्ध विन्द (Blind spot) कहते हैं। अन्ध बिन्दु के पास पीत बिन्दु (Yellow spot) होता है, जहाँ सबसे स्पष्ट चित्र बनता है।

नेत्र की कार्यविधि
जब हम किसी वस्तु को प्रकाश में देखते हैं, तो प्रकाश की किरणे वस्तु से टकराकर नेत्र की कॉर्निया पर पड़ती हैं। कॉर्निया तथा अलीय द्रव, प्रकाश किरणों को लगभग दो-तिहाई तिरछा कर देते हैं अर्थात् इनको अपवर्तित कर देते हैं। तत्पश्चात् ये किरणे पुतली में प्रवेश करती हैं। आइरिस, पुतली को छोटा या बड़ा करके प्रकाश की मात्रा का नियन्त्रण करता है। तीव्र प्रकाश में पुतली सिकुड़ जाती है तथा कम प्रकाश नेत्र के अन्दर प्रवेश करता है। कम प्रकाश में पुतली फैल जाती हैं तथा अधिक प्रकाश नेत्र के भीतर प्रवेश करता है। तत्पश्चात् किरणे पुतली से होकर लेन्स पर पड़ती हैं।

लेन्स इनको पूर्ण अपवर्तित कर देता हैं और रेटिना पर वस्तु का वास्तविक एवं उल्टा प्रतिबिम्ब बनता है। रेटिना की संवेदी कोशिकाएँ दृष्टि के उद्दीपनों को ग्रहण करती हैं। इन संवेदनाओं को दृष्टि तन्त्रिका मस्तिष्क में पहुँचाती हैं, जहाँ
प्रतिबिम्ब का विश्लेषण होता है और व्यक्ति को वस्तु की वास्तविक स्थिति का | ज्ञान हो जाता है।

प्रश्न 3.
दृष्टि के मुख्य दोष कौन-कौन से हैं? इनके प्रारम्भिक लक्षण एवं उपचार क्या हैं? समझाइए।  (2003, 09, 12)
अथवा
निकट दृष्टि दोष का संक्षिप्त विवरण दीजिए।  (2016)
उत्तर:
दृष्टि के मुख्य दोष/लक्षण एवं उपचार
दृष्टि के दोष, कारण, लक्षण एवं उपचार के उपाय निम्नलिखित हैं।
1. निकट दृष्टि दोष (Short Sightedness or Myopia) इस दोष में नेत्र के गोलक के कुछ बड़े हो जाने या कॉर्निया अथवा लेन्स के अधिक उत्तल (Convex) हो जाने के कारण फोकस बिन्दु एवं रेटिना के बीच की दूरी बढ़ जाती है अर्थात् प्रतिविम्ब रेटिना के आगे बनता है। अतः इस दोष में पास की वस्तुएँ तो साफ दिखाई देती हैं, परन्तु दूर की वस्तुएं धुंधली दिखाई देती हैं।
कारण पौष्टिक भोजन का अभाव, गलत तरीके से बैठकर या लेटकर पढ़ना, बहुत कम या अधिक प्रकाश में पढ़ना, आँखों पर अधिक जोर देना आदि कारणों से यह दोष हो सकता है।
लक्षण दूर की वस्तुएँ अस्पष्ट दिखाई देना, आँखों के ऊपरी भागों तथा सिर में दर्द रहना, आँखों में पानी आना तथा टीवी देखने में परेशानी आदि।
उपचार अवतल लेन्स (Concave) वाले चश्मे का प्रयोग करना चाहिए। इसके अतिरिक्त उपरोक्त कारणों का निदान आवश्यक है।

2. दूर दृष्टि दोष (Long Sightedness or Hypermetropia) इस दोष में नेत्र गोलक का व्यास छोटा होने अथवा लेन्स के चपटा होने से प्रकाश की किरणे अपवर्तन के बाद केन्द्रीभूत होने से पहले ही रेटिना पर पड़ती हैं। अतः प्रतिबिम्ब रेटिना के पीछे बनता है। फलतः पास की वस्तुएँ धुंधली दिखाई देती हैं। दूरदर्शिता में दूर की वस्तु स्पष्ट दिखाई पड़ती है।
कारण पोषण के अभाव में इस दोष की उत्पत्ति होती है। इसके अतिरिक्त बढ़ती उम्र में शारीरिक क्षमता घटने के साथ इस दोष की सम्भावना बढ़ जाती है।
लक्षण वस्तु को अपने से दूर करके देखना, आँखों का अन्दर की ओर धंस जाना, बारीक काम करने में अत्यधिक परेशानी होना एवं सिर में दर्द रहना आदि इस दोष के लक्षण हैं।
उपचार इस दोष की स्थिति में उत्तल (Convex) लेन्स वाले चश्मे का प्रयोग करना चाहिए। साथ ही, आहार में पोषक तत्वों का अधिक प्रयोग करना चाहिए।

3. जरादूरदृष्टिता (Preubyopia) वृद्धावस्था में लेन्स अथवा सिलियरी पेशियों की लचक कम हो जाती हैं, जिसके कारण समीपवर्ती वस्तुओं का प्रतिबिम्ब अच्छी तरह फोकस नहीं हो पाता। इस प्रकार मूलत: समस्या सामंजस्य में होती हैं।
लक्षण इस दोष में व्यक्ति दूर की वस्तुएँ देखने में सक्षम होता है। अतः व्यक्ति पढ़ते समय पुस्तक को आँखों से बहुत दूर रखती हैं।
उपचार इस दोष में व्यक्ति को उत्तल लेन्स के चश्मे का प्रयोग करना चाहिए।

4. भैंगापन (Strabismus) यह दोष नेत्र गोलक को घुमाने वाली पेशियों में कमजोरी आ जाने के कारण या पेशियों के छोटे अथवा बड़े हो जाने के कारण होता है।
लक्षण इस दोष में व्यक्ति का नेत्र गोलक एक ओर को झुका सा दिखाई देता है।
उपचार ऑपरेशन द्वारा सम्बन्धित पेशी को ठीक किया जा सकता है।

5. मोतियाबिन्दै (Cataract) इस दोष में लेन्स आंशिक रूप से अथवा पूर्णत: अपारदर्शी हो जाता हैं। फलत: प्रकाश किरणें दृष्टिपटल तक नहीं पहुंच पाती।
लक्षण इस दोष में व्यक्ति को धीरे-धीरे दिखाई देना बन्द हो जाता है।
उपचार ऑपरेशन द्वारा अपारदर्शी लेन्स को निकालकर उसके स्थान पर कृत्रिम लेन्स प्रतिस्थापित कर दिया जाता हैं। इसके अतिरिक्त सीसीएम फेको विधि में मोतियाबिन्द (आच्छादित परत) को काटकर उसे बाहर खींच लिया जाता हैं। इस ऑपरेशन में अल्ट्रासाउण्ड तरंगों का प्रयोग किया जाता है।

6. रतौंधी (Night Blindness) यह रोग भोजन में विटामिन ‘A’ की कमी के कारण होता है। इसमें रेडॉप्सिन नामक दृष्टि वर्णक का संश्लेषण कम होता है।
लक्षण इसमें व्यक्ति को कम या धुंधले प्रकाश में कम दिखाई देता है।
उपचार आहार में विटामिन ‘A’ युक्त भोज्य पदार्थों; जैसे-पपीता, गाजर,
मछली का तेल आदि को शामिल करके इस रोग का उपचार सम्भव है।

7. वर्णान्यता (Colour Blindness) यह एक वंशानुगत रोग है। इस रोग से ग्रसित व्यक्तियों में विभिन्न रंगों (विशेषतः लाल एवं हरा रंग) को पहचानने की क्षमता नहीं होती है। इससे मुख्यतः पुरुष प्रभावित होता है। सामान्य रूप से इस दोष का निवारण नहीं हो पाता है।

8. नेत्रों के कुछ अन्य सामान्य रोग निम्नलिखित हैं
(i) कंजक्टाइवा शोथ (Conjunctivitis) यह विभिन्न सूक्ष्मजीवों के संक्रमण से होता है। इससे प्रभावित नेत्र में जलन तथा किरकिरापन – अनुभव होता है, पलके सूज जाती हैं तथा कंजक्टाइवा (नेत्र श्लेष्म) लाल हो जाता है। रोगी प्रकाश सहन नहीं कर पाता है। इसके उपचार हेतु चिकित्सीय परामर्श लेना चाहिए एवं संक्रमण से बचाव के उपाय करने चाहिए।
(ii) आँखों का तिरछा होना (Squint) इसमें बच्चों की दोनों आँखों की दृष्टि में अन्तर होता है, जिसके कारण प्रत्येक वस्तु को देखने के लिए आँखों को परिश्रमपूर्वक इधर-उधर घुमाना पड़ता है। इससे पेशियों की कार्यक्षमता क्षीण होती जाती है। यह रोग ऑपरेशन द्वारा ठीक किया जा सकता है।
(iii) गुहेरी (Sty) पलकों की वसा ग्रन्थियों में सूजन आने से आँख में एक छोटी फुन्सी हो जाती है। आँखों में गन्दे हाथ लगाने या पेट की खराबी से भी यह रोग उत्पन्न हो जाता है। इसके उपचार हेतु आँखों को साफ रखना आवश्यक है।

प्रश्न 4.
कान का नामांकित चित्र बनाकर उसके कार्यों को समझाइए।  (2004, 06)
उत्तर:
मानव खोपड़ी में, नेत्रों के पीछे की ओर दोनों ओर एक-एक कान स्थित होते हैं। कान दो प्रमुख कार्य करते हैं-एक सुनने (Hearing) का तथा दूसरा शरीर का सन्तुलन बनाए रखने का, इसी कारण इन्हें श्रवणोसन्तुलन ज्ञानेन्द्रियाँ कहते हैं।
कान की संरचना
कान को तीन प्रमुख भागों में बाँटा जा सकता है-बाह्य कर्ण, मध्य कर्ण तथा अन्तः कर्ण।.

Arihant Home Science Class 12 Chapter 4 6

1. बाह्य कर्ण (External ear) यह कान का सबसे बाहरी भाग है, इसके दो भाग होते हैं।

(i) कर्णपल्लव अथवा पिन्ना (Pinna) यह उपास्थि से बना कीपनुमा बाहर से दिखाई देने वाला भाग है। यह खोपड़ी की हड्डियों से जुड़ा
रहता है। यह ध्वनि तरंगों को एकत्र करने में सहायक है।

(ii) कर्ण नली (Auditory Canal) कर्णपल्लव अन्दर की ओर एक पतली नली से जुड़ा रहता है, इसे कर्ण नली कहते हैं। नली का कुछ भाग अस्थि एवं कुछ भाग उपास्थि का बना होता है। नली की भीतरी सतह पर छोटे-छोटे रोम पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त सतह से सीबम नामक मोम जैसा पदार्थ स्रावित होता है। इन्हीं कारणों से धूल आदि के कण अन्दर प्रवेश नहीं कर पाते एवं मैल के रूप में कर्ण नली से चिपक जाते हैं।कर्ण नली के अन्तिम सिरे पर, झिल्ली के समान कान का पर्दा होता है, जहाँ ध्वनि तरंगें टकराती हैं।

2. मध्य कर्ण (Middle ear) यह कान के पर्दे के भीतर की ओर एक गुहा के रूप में होता है, इसे कर्ण-गुहा (Tyrmpanic cavity) कहते हैं। इसमें हवा भरी रहती है।
यह गुहा एक चौड़ी नलिका द्वारा कण्ठ से मिलती है। इस नलिका को कण्ठ-कर्ण नली (Eustachian tube) कहते हैं। यह नली, कान के पर्दे के दोनों ओर वायुदाब समान रखती हैं, जिससे पर्दा सुरक्षित रहता है। कर्ण गुहा में तीन क्रमानुसार (बाहर से भीतर की ओर) छोटी-छोटी हड्डियाँ होती हैं, जिनका नाम उनकी आकृति के अनुसार होता है। पहली हथौड़े के आकार की मेलियस, दूसरी नेहाई के आकार की इन्कस तथा तीसरी रकाब के आकार की स्टेपीज कहलाती है। जब ध्वनि तरंगे कान के पर्दे से टकराती हैं, तो कम्पन उत्पन्न होता है। उपरोक्त तीन अस्थियों की श्रृंखला इस कम्पन्न को अन्त:कर्ण तक पहुँचाती हैं।

3. अन्त:कर्ण (Internal ear) अन्त:कर्ण एक अर्द्धपारदर्शक झिल्ली से बनी जटिल रचना होती है, जिसे कलागन (Membranous labyrinth) कहते हैं। कलागहन, खोपड़ी की टैम्पोरल अस्थि के खोल (कोष) में रहता है, इस खोल को अस्थीय लेबिरिन्थ (Bony labyrinth) कहते हैं। अस्थीय लेबिरिन्थ में परिलसीका (Perilymph) भरा रहता है, जिसमें कलागहन तैरता रहता है। कलागहन के भीतर अन्तः लसीका (Endolymph) भरा रहता है। कलागहन के मुख्य भाग निम्नलिखित हैं।

  • अर्द्धवृत्ताकार नलिकाएँ कलागहन से तीन अर्द्धवृत्ताकार नलिकाएँ निकलती हैं, जो घूमकर वापस इसी में खुल जाती हैं। ये नलिकाएँ जहाँ खुलती हैं, वह भाग कुछ फूला हुआ होता है। इस फूले भाग को ऐपुला (Ampulla) कहते हैं। इस भाग में संवेदी अंग उपस्थित होते हैं, जो शारीरिक सन्तुलन को बनाए रखने में सहायक होते हैं।
  •  वैस्टीब्यूल यह भाग अन्त:कर्ण के मध्य में स्थित होता है, इसमें एक बड़ा अण्डाकार छिद्र होता है, जो एक झिल्ली से ढका रहता है। यह भाग अन्त:कर्ण के प्रथम भाग को अन्तिम भाग से जोड़ता है।
  • कॉक्लियर नलिका (Cochlear tube) यह एक कुण्डलित नलिका है, जो घोंघे के कवच के समान स्वयं पर मुड़ी होती है। काँक्लियर नलिका की गुहा में संवेदी संरचना कॉरटाई के अंग (Organ of corti) पाए जाते हैं। ये अंग ध्वनि के उद्दीपनों को ग्रहण करते हैं। ये सुनने की क्रिया के महत्त्वपूर्ण अंग हैं।

कानों की क्रियाविधि
1. सुनने की क्रिया (Process of Hearing) कर्णपल्लव ध्वनि तरंगों को एकत्र करने में सहायक होते हैं। ध्वनि तरंगें, कर्णपल्लव से टकराकर कर्ण नली में आगे की ओर बढ़ती हैं तथा कान के पर्दे से टकराकर इसमें कम्पन उत्पन्न करती हैं। मध्य कर्ण में उपस्थित कर्ण अस्थियाँ इन कम्पनों की तीव्रता को लगभग 10 गुना बढ़ाकर अन्त:कर्ण तक पहुँचाती हैं। इसके फलस्वरूप सर्वप्रथम अन्त:कर्ण के परिलसीका तथा इसके बाद कलागहन के भीतर स्थित अन्तः लसीका में कम्पन होने लगता है। कम्पनों के कारण कॉरट के अंग में संवेदनाएँ उत्पन्न होती हैं, जो श्रवण तन्त्रिकाओं द्वारा ग्रहण करके मस्तिष्क में भेज दी जाती हैं। मस्तिष्क में इन कम्पनों का विश्लेषण होता है और अन्ततः सुनने की क्रिया सम्पन्न होती हैं।

2. सन्तुलन क्रिया (Control on Body Balance) शरीर का सन्तुलन बनाए रखने में ऐम्पुला की विशेष भूमिका होती है। शरीर की गति एवं गमन के अनुसार कलागहन के भीतर स्थित अन्त: लसीका में भी गति होती है। अन्तः । लसीका के हिलने-डुलने से ऐम्पुला की संवेदी कोशिकाएँ उत्तेजित हो जाती हैं। यही उत्तेजना अर्थात् संवेदनाएँ तन्त्रिकाओं के माध्यम से सेरीबेलम (अनुमस्तिष्क) में पहुँचती हैं। मस्तिष्क का यह भाग सम्बन्धित पेशियों को सूचना भेजकर शरीर के सन्तुलन को बनाए रखता है।
उल्लेखनीय है कि शरीर की स्थिर अवस्था में होने के बाद भी सिर की स्थिति में परिवर्तन से ऐम्पुला की संवेदी कोशिकाएँ उत्तेजित हो जाती हैं तथा ये संवेदनाएँ मस्तिष्क में पहुँचती हैं। इसी कारण लिफ्ट में चढ़ते-उतरते समय अथवा रेल या गाड़ियों के धक्कों आदि से हमें मितली या उल्टी का आभास होने लगता है। सिर को झुका लेने से यह संवेदना कम हो जाती है।

प्रश्न 5.
त्वचा की रचना तथा कार्यों का चित्र सहित वर्णन कीजिए।  (2018)
उत्तर:
त्वचा या त्वक् (Skin) शरीर का बाह्य आवरण होती है, जिसे आह्यत्वचा (एपिडर्मिस) भी कहते हैं। यह वेष्टन प्रणाली का सबसे बड़ा अंग हैं, जो उपकला ऊतकों की कई परतों द्वारा निर्मित होती है और अन्तर्निहित मांसपेशियों, अस्थियों, अस्थिबध (लिगामेण्ट) और अन्य आन्तरिक अंगों की रक्षा करती है। त्वचा सीधे वातावरण के सम्पर्क में आती है, इसलिए यह रोगजनकों के विरुद्ध शरीर की सुरक्षा में एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके अन्य कायों में; जैसे-तापवरोधन (इन्सुलेशन), तापमान विनियमन, संवेदना, विटामिन डी का संश्लेषण और विटामिन बी फोलेट का संरक्षण करती हैं। क्षतिग्रस्त त्वचा निशान ऊतक बना कर ठीक होने की कोशिश करती हैं। यह अक्सर रंगहीन और वर्णनहीन होती हैं।

त्वचा की बनावट त्वचा शरीर की खाल को कहते हैं। इसे चर्म तथा त्वचा आदि नामों के अतिरिक्त अग्रेजी में स्किन के नाम से भी जाना जाता है। चर्म समस्त शरीर की रक्षा के लिए कई परतों वाला एक स्तर है। इससे स्पर्श ज्ञान भी होता है। हथेली और तलुओं को छोड़कर लगभग सभी स्थानों पर इसके ऊपर न्यूनाधिक बाल लगे रहते हैं। त्वचा के दो भाग होते हैं —

1. उपचर्म (बाहर की त्वचा) इसे अंग्रेजी में एपिडर्मिस कहा जाता है। यह भीतरी चर्म के ऊपर आवरण के रूप में चढ़ी रहती हैं। यह कठोर और नुकीले ऊतकों (Tishu) से बनी है और शरीर के रात-दिन काम करने से घिसती और पुनः बनती रहती है। यह साँप की केंचुली के समान होती है, जिसकी मोटाई भिन्न भिन्न स्थानों पर अलग-अलग होती है। हथेली और पैर के तलवों पर इसकी मोटाई 1.25 मिमी तक होती है। पीठ पर इसकी मोटाई मिमी होती है दूसरे स्थानों पर इसकी मोटाई 0.12 मिमी होती हैं। बाहरी चर्म के पित्त में रक्त वाहिनियों (Blood vessels) नहीं होती हैं, बाह्य त्वचा (उपचर्म) के नीचे मनुष्य का रंग बनाने वाली त्वचा रहती हैं। यह जिस रंग की होती है, मनुष्य उसी रंग का गोरा, काला अथवा गेहूआ दिखाई पड़ता है। वर्ण सूचक रंजित त्वचा की सेले सूरज की सख्त गर्मी और सर्दी से शरीर की रक्षा करती हैं।

2. चर्म या अन्तस्तवक चर्म (भीतर की त्वचा) यह बाहरी चर्म के नीचे की त्वचा है, जो संयोजन एवं स्थितिस्थापक ऊतकों (Connective and Elastic tissues ) से बनी होती है। यह मांसपेशीय ऊतको (Muscular tissues) और चर्बी के ऊपर होती है। भीतर चर्म में अनेकों रक्त कोशिकाओं, सूक्ष्म रक्त वाहिनियों एवं स्नायु के सिरों के जाल फैले हुए रहते हैं। इसके ऊपरी भाग में रक्त कोशिकाओं (Blood capilaries) के गुच्छे होते हैं। नीचे का भाग लचीला होता है, जिसके अधोभाग में क्रमशः चर्बी वाले ऊतक (Fatty tissues), कोशीय ऊतक (Cellular tissue8) होते हैं। ये परते प्रायः चिकनी होती हैं। चूंकि चब बाहरी ताप का ग्राहक है, इसलिए चर्म को यह चिकनाई या वसा (Fat) शरीर को बाहरी सर्दी के प्रभाव से बचाती है और शरीर के ताप को नियन्त्रित रखती हैं।

त्वचा के कार्य
त्वचा के कार्य निम्नलिखित हैं
1. शरीर की सुरक्षा (Protection of Body) त्वचा शरीर के भीतर स्थित सभी ऊतकों, अंगों, आदि को पूर्णतया ढककर उनकी सुरक्षा करती है। यह रोगाणुओं तथा रसायनों को शरीर के अन्दर प्रवेश करने से रोकती है। साथ ही शरीर के कोमल आन्तरिक अंगों को रगड़ व चोट से बचाती है। त्वचा में उपस्थित मिलेनिन नामक वर्णक सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से शरीर की रक्षा करती है।

2. ताप नियन्त्रण एवं उत्सर्जन (Temperature Control and Excretion) मानव समतापी प्राणी (Homeothermous) है। शरीर के ताप नियमन में त्वचा का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। मानव त्वचा मौसम अनुसार ताप नियमन में सहायक होती है। ग्रीष्म ऋतु में त्वचा में उपस्थित स्वेद ग्रन्थियों के कारण हमारे शरीर से पसीना ज्यादा निकलता है, जिसके वाष्पीकरण से शरीर का तापमान नियन्त्रित रहता है। पसीने में यूरिया, यूरिक अम्ल, अमोनिया, फॉस्फेट्स तथा क्लोराइड्स, आदि उत्सर्जी पदार्थों के रूप में होते हैं।
शीत प्रातु में त्वचा की अधिकतर रुधिर केशिकाएँ सिकुड़कर बन्द हो जाती हैं। ताकि त्वचा द्वारा ऊष्मा की हानि को कम किया जा सके।

3. त्वक् संवेदांग (Cutaneous Sense Receptors) त्वचा के चर्म स्तर में | पाई जाने वाली संवेदी कोशिकाएँ हमें स्पर्श, दाब, पीड़ा, ताप, आदि उद्दीपनों का अनुभव कराती है।
4. अवशोषण (Absorption) त्वचा जल एवं हानिकारक पदार्थों को शरीर के अन्दर नहीं जाने देती है, परन्तु कुछ उपयोगी पदार्थों जैसे दवाइयों का अवशोषण भी करती है।

5. तेल ग्रन्थियाँ (Sebaceous Glands) त्वचा में उपस्थित तेल ग्रन्थियों त्वचा को चिकना एवं जलरोधी बनाने हेतु तेलीय द्रव्य का लावण करती है।.
6. स्तन ग्रन्थियाँ (Mammary Glands) मादाओं को स्तन प्रन्थियाँ शिशु जन्म के बाद दुग्ध स्रावण करती हैं, जो नवजात का मुख्य पोषण होता हैं।
7. बाल या रोम (Hair) त्वचा पर उपस्थित बाल शरीर पर तापरोधी के समान कार्य करते हैं। साथ ही पलकों तथा बरोनियों के रूप में ये नेत्र की सुरक्षा करते हैं। ठण्ड लगने या उत्तेजना के कारण ये खड़े हो जाते हैं तथा शरीर की रक्षा करते हैं। साथ ही इनकी पेशियों के संकुचन से उत्पन्न ऊर्जा मानव शरीर को तत्काल ऊष्मा देती है, इसीलिए ठण्ड लगने पर कपकपी आती हैं।

8. विटामिन -D का संश्लेषण (Synthesis of Vitamin-D) सूर्य के प्रकाश की पराबैंगनी किरणों का अवशोषण करके त्वचा में विटामिन-D का संश्लेषण होता रहता है। यह विटामिन हमारी अस्थियों से सम्बन्धित मुख्य विटामिन हैं।
9. समस्थापन (HormeOstasia) त्वचा ताप नियमन, जल नियमन, आदि द्वारा शरीर के अन्त:वातावरण को सन्तुलित रखती है।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 4 7

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UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग

UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग are part of UP Board Solutions for Class 12 Computer. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Computer
Chapter Chapter 8
Chapter Name ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग
Number of Questions Solved 22
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
निम्न में से कौन-सी OOP पर आधारित भाषा है?
(a) FORTRAN
(b) C++
(c) PASCAL
(d) BASIC
उत्तर:
(b) C++

प्रश्न 2
OOPa किस प्रक्रिया पर कार्य करती है?
(a) Top – to – bottom
(b) Bottom – to – top
(c) Left – to – right
(d) Right – to – left
उत्तर:
(b) Bottom – to – top

प्रश्न 3
किसके द्वारा हम दूसरी क्लास के डाटा को एक्सेस कर सकते हैं?
(a) ऑब्जेक्ट
(b) पॉलीमॉरफिज्म
(c) क्लास
(d) डाटा एब्सट्रैक्शन
उत्तर:
(d) ऑब्जेक्ट

प्रश्न 4
क्लास किसका संयोजन रूप है?
(a) केवल डाटा
(b) केवल फंक्शन
(c) डाटा एवं फंक्शन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) डाटा एवं फंक्शन

प्रश्न 5
एक क्लास के गुणों को दूसरी क्लास में प्रयोग करना क्या कहलाता है?
(a) डाटा एब्सट्रैक्शन
(b) डाटा हाइडिंग
(c) इनहेरिटेन्स
(d) एनकैप्सूलेशन
उत्तर:
(c) इनहेरिटेन्स

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
OOP को समझाइए।
उत्तर:
यह ऑब्जेक्ट पर आधारित है, जिसकी सहायता से हम किसी क्लास के डाटा को क्लास के बाहर भी एक्सेस कर सकते हैं।

प्रश्न 2
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग भाषा के कोई दो उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
C++ तथा JAVA

प्रश्न 3
ऑब्जेक्ट की एक वाक्य में व्याख्या कीजिए। [2017, 16]
उत्तर:
किसी भी क्लास के डाटा तथा फंक्शन्स को एक्सेस करने के लिए ऑब्जेक्ट का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 4
क्लास की व्याख्या केवल एक वाक्य में कीजिए। [2018]
उत्तर:
क्लास, डाटा तथा फंक्शन्स का संयोजन रूप है। क्लास एक यूजर डिफाइन डेटा टाइप है।

प्रश्न 5
इनहेरिटेन्स क्या है?
उत्तर:
वह प्रक्रिया, जिसके द्वारा एक क्लास के ऑब्जेक्ट, दूसरी क्लास के ऑब्जेक्ट को प्राप्त कर सकते हैं, इनहेरिटेन्स कहलाता है।

प्रश्न 6
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग भाषा के कोई दो उपयोग लिखिए।
उत्तर:
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग भाषा के निम्न दो उपयोग हैं।

  • एक्सपर्ट सिस्टम में
  • रियल टाइम सिस्टम में

लघु उत्तरीय प्रश्न I (2 अंक)

प्रश्न 1
उदाहरण सहित ऑब्जेक्ट का अर्थ समझाइए। [2009,07]
उत्तर:
कोई ऑब्जेक्ट, ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग का मुख्य आधार होता है। किसी भी क्लास में डाटा व फंक्शन को घोषित करने के लिए ऑब्जेक्ट को ध्यान में रखा जाता है। वास्तव में, ऑब्जेक्ट क्लास के वैरिएबल होते हैं। ऑब्जेक्ट के बिना क्लास में किसी भी डाटा का कोई मान नहीं होता। ऑब्जेक्ट मेमोरी में स्थान घेरते हैं, जिनका मेमोरी में एक निश्चित एड्रेस होता है। उदाहरण-टी.वी., कम्प्यूटर आदि सभी ऑब्जेक्ट्स हैं।

प्रश्न 2
क्लास से क्या तात्पर्य है? [2014]
उत्तर:
डाटा तथा उससे सम्बन्धित फंक्शनों के समूह को क्लास कहते हैं। क्लास एक यूजर-डिफाइण्ड डाटा टाइप है। एक बार क्लास बनाने के पश्चात् हम उस क्लास के अनेक ऑब्जेक्ट्स बना सकते हैं। समान गुणों के आधार पर ऑब्जेक्ट को समान वर्ग में रखा जा सकता है तथा यह वर्ग ऑब्जेक्ट क्लास कहलाता है। एक क्लास अपने अन्तर्गत विभिन्न क्लासेस को रख सकती है।

प्रश्न 3
एब्सट्रैक्शन तथा एनकैप्सूलेशन में अन्तर बताइए।
उत्तर:
एब्सट्रेक्शन तथा एनकैप्सूलेशन में अन्तर इस प्रकार हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग img-1

प्रश्न 4
कोड के पुनः प्रयोग से आप क्या समझते हैं? OOPs में इसे किस प्रकार किया जा सकता है? समझाइए। [2010]
उत्तर:
कोड को पुनः प्रयोग करने से समय की बचत होती है OOPs में यह सुविधा इनहेरिटेन्स उपलब्ध कराता है, जिसके प्रयोग से कोड को बार-बार लिखने की आवश्यकता नहीं होती। कोड को एक बार लिखने के बाद उसे आवश्यकतानुसार पूरे प्रोग्राम में कहीं भी प्रयोग कर सकते हैं। इसमें जिस क्लास के गुणों को इनहेरिट किया जाता है, उसे बेस या पेरे! क्लास कहा जाता है और जिसमें इनहेरिट किया जाता है, उसे डिराइव या चाइल्ड क्लास कहा जाता है।

प्रश्न 5
ऑपरेटर ओवरलोडिंग को उदाहरण सहित संक्षेप में लिखिए। [2017]
उत्तर:
ऑपरेटर ओवरलोडिंग ऑपरेटर को पॉलीमॉरफिज्म का गुण प्रदान करना अर्थात् एक ही ऑपरेटर का विभिन्न प्रकार से प्रयोग करना ही ‘ऑपरेटर ओवरलोडिंग’ कहलाता है। जब किसी ऑपरेटर को ओवरलोड किया जाता है, तब उसका वास्तविक अर्थ एवं कार्य नष्ट नहीं होता है, वे ओवरलोडिंग के कारण छिप जाते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग img-2

प्रश्न 6
स्ट्रक्चर्ड प्रोग्रामिंग व ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग में तुलना [2013, 09, 07]
उत्तर:
स्ट्रक्चर्ड प्रोग्रामिंग और ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग में अन्तर निम्न हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग img-3

लघु उत्तरीय प्रश्न II (3 अंक)

प्रश्न 1
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। [2016, 12]
उत्तर:
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग तकनीक को संक्षिप्त में OOP भी कहा जाता है। इस तकनीक का मुख्य तत्त्व ऑब्जेक्ट होता है। C++, JAVA आदि भाषाओं के द्वारा इस तकनीक पर आधारित प्रोग्राम तैयार किए जाते हैं। ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग में विभिन्न प्रोग्रामिंग भाषाओं के सभी उत्तम गुणों का समावेश किया जाता है। इसके अतिरिक्त इसमें अनेक नए गुणों का समावेश भी किया जाता है। पुरानी सभी भाषाओं में फंक्शन की क्रियाविधि पर विशेष महत्त्व दिया जाता था। 00P में ऑब्जेक्ट्स को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इस प्रोग्रामिंग में डाटा को सीधे प्रयोग नहीं किया जाता है और न ही बाह्य फंक्शनों द्वारा बदला जा सकता है। 00P में समस्या के हल के लिए ऑब्जेक्ट का निर्माण करते हैं तथा इन्हीं ऑब्जेक्ट के अनुरूप डाटा व फंक्शन बनाए जाते हैं।

प्रश्न 2
क्लास और ऑब्जेक्ट में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2014, 10]
उत्तर:
क्लास और ऑब्जेक्ट में अन्तर इस प्रकार हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग img-4

प्रश्न 3
इनहेरिटेन्स क्या है? इसके विभिन्न रूपों का वर्णन कीजिए। [2016, 12]
उत्तर:
इनहेरिटेन्स, ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग भाषा का प्रमुख गुण है, एक क्लास के गुणों को दूसरी क्लास में प्रयोग करना इनहेरिटेन्स कहलाता है। जिस क्लास से गुण इनहेरिट होते हैं, वह बेस क्लास या पेरेण्ट क्लास कहलाती है तथा जिस क्लास में ये गुण इनहेरिट होते हैं वो सब क्लास या चाइल्ड क्लास कहलाती है। इससे एक कोड को पुनः लिखने की आवश्यकता नहीं होती।

उदाहरण
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग img-5
इसके विभिन्न रूप निम्न हैं।

  1. सिंगल लेवल इनहेरिटेन्स
  2. मल्टीलेवल इनहेरिटेन्स
  3. मल्टीपल इनहेरिटेन्स
  4. हाइब्रिड इनहेरिटेन्स
  5. हाइरारकिकल इनहेरिटेन्स

प्रश्न 4
OOP के लाभ बताइए। [2015, 08]
अथवा
OOP की विशेषताओं की व्याख्या संक्षेप में कीजिए।
उत्तर:
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग (OOP) के लाभ निम्नलिखित हैं

  1. OOP द्वारा बड़े प्रोग्रामों को बनाना आसान होता है।
  2. इनहेरिटेन्स के द्वारा कोड को दोबारा लिखने की आवश्यकता नहीं होती अर्थात् हम ऑब्जेक्ट के द्वारा एक क्लास को दूसरी क्लास में डिराइव कर सकते हैं।
  3. OOP में प्रोग्राम बनाने से समय की बचत होती है।
  4. OOP में बने प्रोग्रामों को सरलता से अपग्रेड किया जा सकता है।
  5. यह सॉफ्टवेयर डेवलपमेण्ट की प्रोडेक्टिविटी को बढ़ाता है।
  6. किसी प्रोजेक्ट के कार्य का ऑब्जेक्ट के रूप में विभाजन करता है।
  7. प्रोग्राम को फंक्शन के स्थान पर ऑब्जेक्ट के द्वारा, विभाजित किया जाता है।
  8. प्रोग्राम में bottom-up approach का प्रयोग किया जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)

प्रश्न 1
OOP (Object Oriented Programming) को समझाइए तथा इसके विभिन्न तत्त्व भी लिखिए।
अथवा
क्लासेस तथा ऑब्जेक्ट्स का वर्णन कीजिए। [2009]
अथवा
निम्नलिखित को उदाहरण देकर समझाइए [2018, 12, 06]
(i) ऑब्जेक्ट
(ii) क्लास
(iii) इनहेरिटेन्स
(iv) ऑपरेटर ओवरलोडिंग
उत्तर:
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग में विभिन्न प्रोग्रामिंग भाषाओं के सभी उत्तम गुणों का समावेश किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें अनेक नए गुण भी हैं। पुरानी सभी भाषाओं में फंक्शन की क्रियाविधि पर विशेष महत्त्व दिया जाता था, लेकिन OOP में ऑब्जेक्ट को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इस प्रोग्रामिंग में डाटा को सीधे प्रयोग नहीं किया जाता। OOP में समस्या के हल के लिए ऑब्जेक्ट का निर्माण करते हैं तथा इन्हीं ऑब्जेक्ट्स के अनुरूप डाटा व फंक्शन बनाए जाते हैं।

निम्न चित्र में डाटा, फंक्शन तथा ऑब्जेक्ट का सम्बन्ध दिखाया गया है।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग img-6

ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग के तत्त्व
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग के तत्त्व निम्न हैं।

(i) ऑब्जेक्ट्स ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग का मुख्य आधार ऑब्जेक्ट होता है। किसी भी क्लास में डाटा व फंक्शन को घोषित करने के लिए ऑब्जेक्ट को ध्यान में रखा जाता है। ऑब्जेक्ट के बिना क्लास में किसी भी डाटा का कोई मान नहीं होता। ऑब्जेक्ट मैमोरी में स्थान घेरते हैं, जिनको मैमोरी में एक निश्चित एड्स होता है। किसी भी क्लास के एक से ज्यादा ऑब्जेक्ट्स बनाए जा सकते हैं, जो यूजर की आवश्यकता पर निर्भर करते हैं। यह हमारे सामान्य जीवन का एक हिस्सा होते हैं। हमारे चारों ओर प्रत्येक जगह अनेक प्रकार के ऑब्जेक्ट्स हैं-टी.वी., कम्प्युटर आदि सभी ऑब्जेक्ट्स हैं। हमेशा डाटा तथा फंक्शन को हमेशा क्लास के अन्तर्गत घोषित करते हैं, लेकिन वास्तविक डाटा, ऑब्जेक्ट पर ही निर्भर करता है। ऑब्जेक्ट की सहायता से क्लास के सदस्यों का प्रयोग करने के लिए डॉट (.) ऑपरेटर का प्रयोग किया जाता है।

(ii) क्लास क्लास, डाटा तथा फंक्शन का संयोजन रूप है। डाटा तथा उस पर प्रयोग होने वाले फंक्शन्स को एक इकाई में घोषित किया जाता है, यह इकाई ही क्लास कहलाती है। वास्तव में, ऑब्जेक्ट क्लास के वैरिएबल होते हैं। एक बार क्लास बनाने के बाद उस क्लास के अनेक ऑब्जेक्ट्स बनाए जा सकते हैं। किसी भी ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग में कम-से-कम एक क्लास का घोषित किया जाना आवश्यक होता है, जिसके द्वारा प्रोग्रामिंग भाषा C में तैयार किए गए प्रोग्राम को C++ में भी चलाया जा सकता है।
उदाहरण:
Car क्लास के दो ऑब्जेक्ट्स Ford तथा Toyota का चित्रण इस प्रकार हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग img-7

(iii) इनहेरिटेन्स वह प्रक्रिया जिसके द्वारा एक क्लास के ऑब्जेक्ट, दूसरी क्लास के ऑब्जेक्ट के गुण प्राप्त कर सकते हैं, इनहेरिटेन्स कहलाते हैं। इस प्रक्रिया में हम एक क्लास से दूसरी क्लास को डिराइव (Derive) कर सकते हैं। डिराइव हुई क्लास में प्रथम क्लास के सभी गुण होते हैं तथा इसके अतिरिक्त उसमें स्वयं के भी कुछ गुण हो सकते हैं। इस प्रकार प्रथम क्लास जिससे दूसरी क्लास डिराइव हुई है, उसे वह पेरेण्ट क्लास यो सुपर क्लास कहते हैं बेस क्लास तथा दूसरी क्लास जो डिराइव्ड हुई है, सब क्लास, चाइल्ड क्लास या डिराइब्ड क्लास कहलाती है।
उदाहरण
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 8 ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग img-8

डिराइल्ड क्लास Dog अपने बेस क्लास Animal की प्रोपर्टी इनहेरिट करेगा।

(iv) पॉलीमॉरफिज्म Polymorphism, poly तथा morphous दो शब्दों से मिलकर बना है। Poly का अर्थ है ‘अनेक’ तथा morphous का अर्थ है। ‘रूप’। अतः पॉलीमॉरफिज्म का अर्थ है एक ही तत्त्व के अनेक रूप’।
पॉलीमॉरफिज्म दो प्रकार के होते हैं।

ऑपरेटर ओवरलोडिंग ऑपरेटर को पॉलीमॉरफिज्म का गुण प्रदान करना अर्थात् एक ही ऑपरेटर का विभिन्न प्रकार से प्रयोग करना ही ‘ऑपरेटर ओवरलोडिंग’ कहलाता है। जब किसी ऑपरेटर को ओवरलोड़ किया जाता है, तब उसका वास्तविक अर्थ एवं कार्य नष्ट नहीं होता है, वे
ओवरलोडिंग के कारण छिप जाते हैं।

उदाहरण + ऑपरेटर का प्रयोग दो इण्टीजर को जोड़ने के लिए किया जा सकता है; जैसे- int a=5, b=2; ints = a + b; cout << s;

आउटपुट 7 इस प्रकार, + ऑपरेटर का प्रयोग दो स्ट्रिग्स को कॉनकोटेनेट (Concatenate) करने के लिए भी किया जा सकता है; जैसे
str = “Hello”;
str 1 = “World”;
str 2 = str + strl;
आउटपुट Helloworld

फंक्शन ओवरलोडिंग फंक्शन ओवरलोडिंग का अर्थ है कि किसी एक फंक्शन नाम से विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न कार्य कराना, जिससे एक फंक्शन के कोड को पुन: नहीं लिखना पड़ता और समय की बचत होती है। इसका प्रयोग करके हम फंक्शन को समान नाम से किन्तु अलग-अलग argument list से डिक्लेयर तथा परिभाषित कर सकते हैं।

(v) डाटा एब्सट्रैक्शन इसका प्रयोग क्लास में डाटा को छिपाने के लिए किया जाता है। इस प्रक्रिया को डाटा हाइडिंग (Data hiding) भी कहते हैं। डाटा हाइडिंग का अर्थ है कि हम class में घोषित प्राइवेट डाटा को सीधे प्रोग्राम में प्रयोग नहीं कर सकते।

(vii) एनकैप्सूलेशन एनकैप्सूलेशन, 00P का मुख्य गुण है। यह डाटा तथा फंक्शन को एक यूनिट में एकत्रित कर नया ऑब्जेक्ट बनाने की सुविधा प्रदान करता है। एनकैप्सूलेशन का मुख्य उद्देश्य क्लास को इस प्रकार स्वतन्त्र रूप देना है, जिससे उन्हें अन्य प्रोग्रामों को संशोधित किए बिना पुन: उपयोग में लाया जा सकें।

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UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 19 शिशु मृत्यु की समस्या

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 19 शिशु मृत्यु की समस्या are part of UP Board Solutions for Class 12 Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 19 शिशु मृत्यु की समस्या.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 19
Chapter Name  शिशु मृत्यु की समस्या
Number of Questions Solved 16
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 19 शिशु मृत्यु की समस्या

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
शिशु मृत्यु का आशय है। (2014)
(a) जन्म लेते ही मृत्यु हो जाना
(b) स्कूल जाने से पूर्व मृत्यु हो जाना।
(c) जन्म से शैशवावस्था तक की अवधि में होने वाली मृत्यु
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) जन्म से शैशवावस्था तक की अवधि में होने वाली मृत्यु

प्रश्न 2.
शिशु मृत्यु-दर की गणना की जाती है।
(a) जन्म लेने वाले प्रति 100 शिशुओं के आधार पर
(b) जन्म लेने वाले प्रति हजार शिशुओं के आधार पर
(c) विभिन्न रोगों के संक्रमण के आधार पर
(d) जन्म एवं मृत्यु संख्या के अन्तर के आधार पर
उत्तर:
(b) जन्म लेने वाले प्रति हजार शिशुओं के आधार पर

प्रश्न 3.
शिशु मृत्यु-दर सबसे अधिक है।
(a) भारत में
(b) जापान में
(c) इंग्लैण्ड में
(b) अमेरिका में
उत्तर:
(a) भारत में

प्रश्न 4.
बाल मृत्यु को कारण है। (2006,17)
(a) स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी एवं सुविधाओं का अभाव
(b) यौन शिक्षा का अभाव
(c) बाल विवाह
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 5.
बाल मृत्यु को कम किया जा सकता है। (2010)
(a) शिक्षा एवं ज्ञान के प्रसार के द्वारा
(b) उपयुक्त प्रसव एवं स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थापना करके
(c) संक्रामक रोगों की रोकथाम करके
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 6.
उचित समय पर टीकाकरण (2009)
(a) बालक में रोग क्षमता को कम करता है।
(b) बाल मृत्यु की दर कम होती है।
(c) बच्चे की जान को खतरा रहता है।
(b) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(b) बाल मृत्यु की दर कम होती है।

प्रश्न 7.
परिवार नियोजन द्वारा किस समस्या का समाधान हो सकता है? (2017)
(a) जनसंख्या नियन्त्रण
(b) देश के विकास की वृद्धि
(c) माँ तथा शिशु की मृत्यु में कमी
(b) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 8.
गर्भावस्था में महिला को मिलना चाहिए। (2007, 16)
(a) केवल फल
(b) केवल दूध
(C) सन्तुलित आहार
(b) जो भी उपलब्ध हो
उत्तर:
(c) सन्तुलित आहार

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक, 25 शब्द)

प्रश्न 1.
शिशु मृत्यु से क्या आशय है?
उत्तर:
जन्म लेते ही अथवा जन्म लेने से एक वर्ष की आयु तक होने वाली मृत्यु को ‘शिशु मृत्यु’ कहते हैं।

प्रश्न 2.
बाल मृत्यु के प्रमुख कारण क्या हैं? (2006, 13)
उत्तर:
शिक्षा का अभाव, निर्धनता, गर्भावस्था में असावधानी, अव्यवस्थित प्रसूतिका गृह, बाल विवाह, चिकित्सा सुविधाओं की कमी आदि शिशु मृत्यु के प्रमुख कारण हैं।

प्रश्न 3.
शिशु मृत्यु-दर को रोकने के दो उपाय बताएँ। (2005, 10, 11)
उत्तर:
शिक्षा का प्रसार एवं लोगों में जागरूकता फैलाकर तथा प्रसव एवं स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थापना करके बाल मृत्यु-दर को रोका जा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक, 50 शब्द)

प्रश्न 1.
शिशु मृत्यु-दर को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
किसी देश में एक वर्ष में जन्म लेने वाले प्रति हजार बच्चों में से जितने बच्चे जन्म लेने के समय या अपने जन्म के एक वर्ष के अन्दर मर जाते हैं, उसे शिशु मृत्यु दर’ कहते हैं। उदाहरण माना कि किसी देश में एक वर्ष के अन्दर एक लाख बच्चों ने जन्म लिया और 500 बच्चे जन्म लेने के तुरन्त बाद या 1 वर्ष की आयु पूर्ण होने से पूर्व ही मर गए, तो उस देश की शिशु मृत्यु-दर की गणना इस प्रकार करेंगे
[latex]\frac { 500 } { 100000 } \times 1000 = 5[/latex]
अर्थात् शिशु मृत्यु दर = 5/हजार है

प्रश्न 2.
बाल मृत्यु-दर पर निर्धनता को प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बाल मृत्यु-दर पर निर्धनता का प्रभाव तीन स्तरों पर देख सकते हैं।
प्रसव से पूर्व (गर्भावस्था के दौरान) गर्भावस्था में निर्धनता के कारण गर्भवती महिलाएँ सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार नहीं ले पाती हैं, जिससे शिशु की मृत्यु होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

प्रसव के दौरान धन की कमी के कारण अनेक महिलाएँ प्रसव कराने के लिए। चिकित्सक के पास न जाकर घर पर ही दाइयों की सहायता से बच्चे को जन्म दे देती हैं, अत: प्रसव की समुचित व्यवस्था उपलब्ध न होने के कारण शिशु की मृत्यु की सम्भावना अधिक होती है।

प्रसव के बाद धन की कमी के कारण नवजात शिशु को सन्तुलित व पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता है। अतः वे विभिन्न प्रकार की बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं। निर्धनता के कारण इन बच्चों का समुचित उपचार भी नहीं हो पाता है, जो शिशु मृत्यु का एक प्रमुख कारण है।

प्रश्न 3.
शिशु के जीवन में माता-पिता के स्वास्थ्य का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
एक स्वस्थ शिशु को, एक स्वस्थ माता ही जन्म दे सकती है। आनुवंशिकी के कारण माता-पिता में व्याप्त रोगों का शिशु में भी हस्तान्तरण हो जाता है। गर्भावस्था में शिशु माता के रक्त से ही पोषक तत्त्वों को प्राप्त करता है। यदि माता पहले से ही कमजोर एवं अस्वस्थ है, तो वह कदापि एक स्वस्थ बच्चे को जन्म नहीं दे सकती है। जन्म के बाद भी माँ को संक्रमित दूध पीकर शिशु अस्वस्थ हो जाता है। अत: यह स्पष्ट है कि रोग-प्रतिरोधक क्षमता के अभाव के कारण रोगी माता-पिता की सन्तान भी रोगग्रस्त होगी। इस तरह से शिशु के माता-पिता के स्वास्थ्य का शिशु के जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक, 100 शब्द)

प्रश्न 1.
बाल मृत्यु की समस्या का वर्णन करें एवं इसके मुख्य कारणों को स्पष्ट (2004, 06)
उत्तर:
किसी देश में एक वर्ष के भीतर जन्म लेने वाले प्रति हजार शिशुओं में मृत शिशुओं की गणना ‘शिशु मृत्यु-दर’ कहलाती है। शिशु मृत्यु-दर की गणना में 0 से 1 वर्ष की आयु तक के बच्चों को सम्मिलित किया जाता है। बाल मृत्यु दर की गणना पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मौत के मामलों के आधार पर की जाती है। अर्थात् बाल मृत्यु-दर नवजात शिशुओं के साथ-साथ पाँच वर्ष तक की आयु के बच्चों की मौत को इंगित करती है। आज का बोलके कल को नागरिक होता है और यदि नागरिक न रहे, तो राष्ट्र कैसा, इसलिए बाल मृत्यु को किसी भी देश की प्रगति का शुभ संकेत नहीं माना जाता है। आज भारत में बाल मृत्यु दर बहुत अधिक है।

भारत में बाल मृत्यु की ऊँची दर के कारण
भारत में उच्च बाल मृत्यु दर के कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।

  • शिक्षा का अभाव
  • निर्धनता
  • गर्भावस्था में असावधानी
  • बाल-विवाह
  • अनुचित प्रसूति-गृह
  • रोगी माता-पिता
  • परिवार नियोजन का पालन न करना
  • मातृ-शिशु कल्याणकारी संस्थाओं की कमी
  • चिकित्सा एवं नि:संक्रमण सम्बन्धी सुविधा की कमी

1. शिक्षा का अभाव बाल मृत्यु-दर के अधिक होने के कारणों में अशिक्षा एक महत्त्वपूर्ण कारक है। शिक्षा के अभाव में महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों की जानकारी नहीं होती है। शिक्षा के अभाव में महिलाओं को शिशु सुरक्षा, प्रसव पूर्व एवं प्रसव के बाद की जाने वाली परिचर्या की जानकारी नहीं हो पाती है, जो बाल मृत्यु-दर को बढ़ावा देती है। शिक्षा के अभाव में महिलाएँ सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं का भी लाभ नहीं उठा पा रही हैं।

2. निर्धनता बाल मत्य-दर पर निर्धनता का प्रभाव तीनों स्तर पर देखा जा सकता है, जन्म के पूर्व, जन्म के दौरान एवं जन्म के बाद।

निर्धनता के कारण गर्भावस्था के दौरान,महिलाएँ स्वयं को सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार नहीं दे पाती हैं, जिससे माता और शिशु दोनों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। वहीं चिकित्सा सम्बन्धी विभिन्न सुविधाएँ होते हुए भी निर्धन जनता उसका लाभ नहीं उठा पाती है। ऐसी स्थिति में गरीब लोग घर पर ही दाइयों से प्रसव करा लेते हैं। इस मजबूरी के कारण अनेक बार जन्म के समय ही शिशु की मृत्यु हो जाती है। जन्म के बाद भी शिशु को निर्धनता के कारण पौष्टिक और सन्तुलित आहार नहीं मिल पाता है। इस स्थिति में इन नवजात शिशुओं को स्वास्थ्य खराब हो जाता है, लेकिन धन के अभाव के कारण बच्चों का समुचित उपचार नहीं हो पाता है।

3. गर्भावस्था में असावधानी गर्भावस्था के दौरान यदि माता अपने स्वास्थ्य, पोषण एवं अन्य आवश्यक देखभाल का ध्यान रखती है, तो जन्म लेने वाला बच्चा भी स्वस्थ होता है। इसके विपरीत यदि माता अपने स्वास्थ्य एवं पोषण का ध्यान नहीं रखती है, तो नवजात शिशु भी दुर्बल तथा अस्वस्थ हो जाता है। प्रायः इन दशाओं में जन्म लेने वाले बच्चे रोगों से संक्रमित हो जाते हैं, जो शिशु-मृत्यु का कारण बनते हैं।

4. बाल-विवाह आज भी अशिक्षा और अज्ञानता के कारण भारत में बहुत सारी लड़कियों की शादी 14-15 वर्ष की आयु में कर दी जाती है। इस आयु में लड़कियों का शारीरिक विकास पूर्णरूप से नहीं होता है तथा रज-वीर्य अपरिपक्व अवस्था में होता है। ऐसी स्थिति में इन लड़कियों से जन्म लेने वाला बच्चा दुर्बल एवं अपरिपक्व होता है, जो शिशु मृत्यु का कारण होता है।.

5. अनुचित प्रसूति-गृह प्रसूति-गृह ही वह स्थान होता है, जहाँ गर्भ से बाहर आने के बाद बच्चा पहली बार साँस लेता है। अतः किसी भी जन्म लेने वाले बच्चे के लिए प्रसूति-गृह का विशेष महत्त्व है। भारत में आज भी अधिकांश क्षेत्रों में व्यवस्थित एवं उचित प्रसूति-गृह का अभाव है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्राय: घर पर ही प्रसव कराए जाते हैं।

6. रोगी माता-पिता आज भारत में असंख्य माता-पिता रोगग्रस्त हैं। ऐसे में जब इन माता-पिता से बच्चे का जन्म होता है, तो बच्चे में भी रोग का , संक्रमण हो जाता है, इसलिए संक्रमित सन्तान का प्रायः जीवित रह पाना कठिन हो पाता है। इस स्थिति में कुछ शिशुओं की मृत्यु प्रसव के दौरान हो जाती है तथा कुछ की अल्पायु में मृत्यु हो जाती है।

7. परिवार नियोजन का पालन न करना परिवार नियोजन का पालन न करने | से अनेक परिवारों में बच्चों की संख्या अधिक हो जाती है। ऐसे परिवार में जन्म लेने वाले बच्चों का समुचित ध्यान रख पाना कठिन होता है तथा बच्चों की मृत्यु की सम्भावना अधिक रहती है।

8. मातृ-शिशु कल्याणकारी संस्थाओं की कमी हमारे देश में जनसंख्या के अनुपात में मातृ-शिशु कल्याणकारी संस्थाओं की काफी कमी है। इस कारण से गर्भवती महिलाओं एवं नवजात शिशुओं को अनेक आवश्यक ‘सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। इन सुविधाओं के अभाव में अनेक माताओं एवं नवजात शिशुओं की मृत्यु हो जाती है।

9. चिकित्सा एवं निःसंक्रमण सम्बन्धी सुविधा की कमी आज भी हमारे देश में जनसंख्या के अनुपात में चिकित्सा सुविधाओं की पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। अप्रशिक्षित नीम-हकीमों के पास अशिक्षित जनता जाने के लिए मजबूर हो जाती है। अनेक लोग तन्त्र-मन्त्र एवं झाड़-फूक के द्वारा उपचार में विश्वास करते हैं। इस तरह अव्यवस्थित चिकित्सा एवं योग्य प्रशिक्षित चिकित्सकों की कमी से हजारों बच्चे रोगग्रस्त होने पर स्वस्थ नहीं हो पाते और उनकी मृत्यु हो जाती है।

प्रश्न 2.
बाल मृत्यु-दर कम करने के मुख्य उपायों पर चर्चा करें। (2005)
अथवा
शिशु मृत्यु-दर कम करने हेतु अपने सुझाव दीजिए। (2016)
उत्तर:
बाल मृत्यु दर का अधिक होना देश की प्रगति में बाधक होता है। आज हमारे देश में जनसंख्या काफी अधिक है, जिसे नियन्त्रित करना अतिआवश्यक है। इस समस्या के समाधान के लिए जन्म दर को कम किया जाना चाहिए न कि मृत्यु-दर को बढ़ाया जाए।

बाल मृत्यु-दर कम करने के उपाय

देश के विकास के लिए बाल मृत्यु-दर को नियन्त्रित करने के लिए निम्न उपाय किए जा सकते हैं

  • शिक्षा का प्रसार
  • यौन शिक्षा
  • जीवन-स्तर में उन्नयन
  • स्वास्थ्य केन्द्र एवं प्रसूति-गृह की स्थापना
  • बाल कल्याण योजनाएँ
  • बाल चिकित्सालय
  • बाल-विवाह पर रोक
  • परिवार नियोजन
  • माता एवं शिशु का पोषण

1. शिक्षा का प्रसार देश के नागरिकों में रूढ़िवादिता और अज्ञानता को कम करने के लिए शिक्षा का प्रसार जरूरी है। शिक्षा का प्रसार होने से नागरिकों में नए-नए विचार आएँगे और जाग्रति उत्पन्न होगी। अतः बाल मृत्यु को रोकने के लिए स्त्रियों का शिक्षित होना अतिआवश्यक है।

2. यौन शिक्षा भारत में यौन शिक्षा का अभाव है। प्रत्येक बच्चे को यौनसम्बन्धी प्रत्येक बात की लाभ-हानि की शिक्षा दी जानी चाहिए, ताकि वे पति-पत्नी के रूप में विवकेपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकें। ऐसे माँ-बाप अपने बच्चों के पालन-पोषण के प्रति जागरूक होते हैं, इससे बाल मृत्यु दर में गिरावट आती है। भारत सरकार ने इस दिशा में एक कदम आगे बढ़ाते हुए स्कूल के पाठ्यक्रमों में यौन शिक्षा को भी जोड़ दिया है।

3. जीवन-स्तर में उन्नयन जीवन-स्तर के सुधार में निर्धनता बड़ी बाधक है। सभी के पास रोजगार होगा, तो निर्धनता दूर होगी। फलस्वरूप गर्भवती महिलाओं को पौष्टिक एवं सन्तुलित आहार के साथ-साथ उपयुक्त वातावरण भी प्राप्त होगा, इससे बाल मृत्यु दर में कमी आएगी।

4. स्वास्थ्य केन्द्र एवं प्रसूति-गृह की स्थापना देश के शहरों में जहाँ अस्पतालों की अधिकता है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में स्तरीय स्वास्थ्य केन्द्रों का काफी अभाव है। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार नए स्वास्थ्य केन्द्र एवं प्रसूति-गृह की व्यवस्था कर रही है, साथ ही योग्य डॉक्टर, नर्से आदि की नियुक्ति भी कर रही है। इन सभी सुविधाओं के साथ-साथ सरकार गरीबों को नि:शुल्क दवाइयाँ तथा उचित समय पर नि:शुल्क टीकाकरण की भी सुविधाएँ प्रदान कर रही है।

5. बाल कल्याण योजनाएँ शिशु देश का भविष्य होते हैं, इसलिए सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार की बाल-कल्याण योजनाएँ चलाई जा रही हैं, लेकिन हमारे देश की ग्रामीण जनता इन सरकारी कार्यक्रमों से अनभिज्ञ रहती है। अत: कुछ नि:स्वार्थ नागरिकों को आगे आकर इन योजनाओं के बारे में लोगों को बताना चाहिए, ताकि इसका अधिक-से-अधिक लाभ लेकर शिशु मृत्यु-दर को कम किया जा सके।

6. बाल चिकित्सालय देश के प्रत्येक क्षेत्र में एक बाल चिकित्सालय की व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें जन्म के बाद बच्चों की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का समाधान अतिशीघ्र किया जा सके, जिससे बाल मृत्यु-दर में कमी आ सके।

7. बाल विवाह पर रोक बाल विवाह में 14.15 वर्ष की उम्र में बच्चों का विवाह कर दिया जाता है, ऐसी स्थिति में स्वस्थ बच्चा पैदा होने की सम्भावना न के बराबर होती है। अत: सरकार ने शादी की उम्र लड़कों के लिए 21 वर्ष तथा लड़कियों के लिए 18 वर्ष निश्चित कर दी है, इससे शिशु मृत्यु-दर में काफी कमी आई है।

8. परिवार नियोजन परिवार नियोजन ने शिशु मृत्यु-दर में कमी लाने में काफी सहायता की है। ‘छोटा परिवार सुखी परिवार’ एवं ‘बच्चे दो या तीन ही अच्छे का नारा भी लोगों की मानसिकता बदलने में कारगर सिद्ध हुआ। अतः परिवार नियोजन के बारे में लोगों को और जागरूक होने की तथा समाज में व्याप्त कुप्रथाओं को समाप्त करने की आवश्यकता है।

9. माता एवं शिशु का पोषण बाल मृत्यु-दर को कम करने के लिए गर्भावस्था एवं प्रसव के बाद भी शिशु एवं माता को पौष्टिक एवं सन्तुलित भोजन मिलना आवश्यक है। इसके लिए सरकार विभिन्न योजनाएँ चलाती है; जैसे-‘जननी सुरक्षा योजना’ इत्यादि।

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