UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 8 गीत

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 8
Chapter Name गीत
Number of Questions Solved 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 8 गीत

गीत – जीवन/साहित्यिक परिचय

(2018, 17, 16, 14, 13, 11)

प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार कवियों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। जिनमें से एक का उत्तर देना होता है। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ
महादेवी वर्मा का जन्म फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश) के एक प्रतिष्ठित शिक्षित कायस्थ परिवार में वर्ष 1907 में हुआ था। इनकी माता हेमरानी हिन्दी व संस्कृत की ज्ञाता तथा साधारण कवयित्री थीं। नाना व माता के गुणों का प्रभाव ही महादेवी जी पर पड़ा। नौ वर्ष की छोटी आयु में ही विवाह हो जाने के बावजूद इन्होंने अपना अध्ययन जारी रखा। महादेवी वर्मा का दाम्पत्य जीवन सफल नहीं रहा। विवाह के बाद उन्होंने अपनी परीक्षाएँ सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की। उन्होंने घर पर ही चित्रकला एवं संगीत की शिक्षा अर्जित की। इनकी उच्च शिक्षा प्रयाग में हुई। कुछ समय तक इन्होंने ‘चाँद” पत्रिका का सम्पादन भी किया।

इन्होंने शिक्षा समाप्ति के बाद वर्ष 1933 से प्रयाग महिला विद्यापीठ के प्रधानाचार्या पद को सुशोभित किया। इनकी काव्यात्मक प्रतिभा के लिए इन्हें हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा ‘सैकसरिया’ एवं ‘मंगला प्रसाद’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वर्ष 1983 में ‘भारत-भारती’ तथा ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ (‘यामा’ नामक कृति पर) द्वारा सम्मानित किया गया।

भारत सरकार द्वारा ‘पद्मभूषण’ सम्मान से सम्मानित इस महान् लेखिका का स्वर्गवास 11 सितम्बर, 1987 को हो गया।

साहित्यिक गतिविधियाँ
छायावाद की प्रमुख प्रतिनिधि महादेवी वर्मा का नारी के प्रति विशेष दृष्टिकोण एवं भावुकता होने के कारण उनके काव्य में रहस्यवाद, वेदना भाव, आलौकिक प्रेम आदि की अभिव्यक्ति हुई है। महादेवी वर्मा की ‘चाँद’ पत्रिका में रचनाओं के प्रकाशन के पश्चात् उन्हें विशेष प्रसिद्धि प्राप्त हुई।।

कृतियाँ
इनका प्रथम प्रकाशित काव्य संग्रह ‘नीहार’ है। ‘रश्मि’ संग्रह में आत्मा-परमात्मा के मधुर सम्बन्धों पर आधारित गीत संकलित हैं। ‘नीरजा’ में प्रकृति प्रधान गीत संकलित हैं। ‘सान्ध्यगीत’ के गीतों में परमात्मा से मिलन का आनन्दमय चित्रण हैं। ‘दीपशिखा’ में रहस्यभावना प्रधान गीतों को संकलित किया गया है। इसके अतिरिक्त ‘अतीत के चलचित्र’, ‘स्मृति की रेखाएँ, ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ आदि इनकी गद्य रचनाएँ हैं। ‘यामा’ में इनके विशिष्ट गीतों का संग्रह प्रकाशित हुआ है।

काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष

  1. अलौकिक प्रेम का चित्रण महादेवी वर्मा के सम्पूर्ण काव्य में अलौकिक ब्रह्म के प्रति प्रेम का चित्रण हुआ है। वहीं प्रेम आगे चलकर इनकी साधना बन गया। इस अलौकिक ब्रह्म के विषय में कभी इनके मन में मिलने की प्रबल भावना जाग्रत हुई है, तो कभी रहस्यमयी प्रबल जिज्ञासा प्रकट हुई है।
  2. रहस्यात्मकता आत्मा के परमात्मा से मिलन के लिए बेचैनी इनके काव्य में प्रकट हुई है। आत्मा से परमात्मा के मिलन के सभी सोपानों का वर्णन , महादेवी वर्मा के काव्य में मिलता है। मनुष्य का प्रकृति से तादात्म्य, प्रकृति पर चेतनता का आरोप, प्रकृति में रहस्यों की अनुभूति, असीम सत्ता और उसके प्रति समर्पण तथा सार्वभौमिक करुणा आदि विशेषताएँ इनके रहस्यवाद से जुड़ी हैं। इन्होंने प्रकृति पर मानवीय भावनाओं का आरोपण करके उससे आत्मीयता स्थापित की।
  3. वेदना भाव महादेवी वर्मा के काव्य में मौजूद वेदना में साधना, संकल्प एवं लोक कल्याण की भावना निहित है। वेदना इन्हें अत्यन्त प्रिय है। इनकी इच्छा है कि इनके जीवन में सदैव अतृप्ति बनी रहे। इन्होंने कहा भी है-“मैं नीर भरी दुःख की बदली।” इन्हें ‘आधुनिक मीरा’ की संज्ञा भी दी गई है।
  4. प्रकृति का मानवीकरण महादेवीं के काव्य में प्रकृति आलम्बन, उद्दीपन, उपदेशक, पूर्वपीठिका आदि रूपों में प्रस्तुत हुई है। इन्होंने प्रकृति में विराट की छाया देखी है। छायावादी कवियों के समान ही इन्होंने प्रकृति का मानवीकरण किया है। सुन्दर रूपकों द्वारा प्रकृति के सुन्दर चित्र खींचने में महादेवी जी की समानता कोई नहीं कर सकता। 5. रस महादेवी जी के काव्यों में श्रृंगार के दोनों पक्षों वियोग और संयोग के साथ करुण एवं शान्त रसों का सुन्दर परिपाक हुआ है।

कला पक्ष

  1. भाषा महादेवी जी की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हैं। इनकी भाषा का स्निग्ध एवं प्रांजल प्रवाह अन्यत्र देखने को नहीं मिलते हैं। कोमलकान्त पदावली ने भाषा को अपूर्व सरसता प्रदान की है।
  2. शैली इनकी शैली मुक्तक गीतिकाव्य की प्रवाहमयी सुव्यवस्थित शैली है। ये शब्दों को पंक्तियों में पिरोकर कुछ ऐसे ढंग से प्रस्तुत करती हैं कि उनकी मौक्तिक आभा एवं संगीतात्मक पूँज सहज ही पाठकों को आकर्षित कर लेती है।
  3. सूक्ष्म प्रतीक एवं उपमान महादेव जी के काव्य में मौजूद प्रतीकों, रूपकों एवं उपमानों की गहराई तक पहुँचने के लिए आस्तिकता, आध्यात्मिकता एवं अद्वैत दर्शन की एक डुबकी अपेक्षित होगी, अन्यथा हमें इनकी अभिव्यंजना के बाह्य रूप को तो देख पाएँगे, किन्तु इनकी सूक्ष्म आकर्षण शक्ति तक पहुँच पाना कठिन होगा।
  4. लाक्षणिकता लााणिकता की दृष्टि से महादेवी जी का काव्य बहुत प्रभावशाली हैं। इन्होंने अपने गीतों के सुन्दर चित्र अंकित किए हैं। कुशल चित्रकार की भाँति इन्होंने थोड़े शब्दों से ही सुन्दर चित्र प्रस्तुत किए हैं।
  5. छन्द एवं अलंकार महादेवी जी ने मात्रिक छन्दों में अपनी कुछ कविताएँ लिखी हैं, परन्तु सामान्यतया विविध गीत-छन्दों का प्रयोग किया है, जो इनकी मौलिक देन है। इन्होंने अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग किया है। इनके यहाँ उपमा, रूपक, श्लेष, मानवीकरण, सांगरूपक, रूपकातिशयोक्ति, ध्वन्यर्थ-व्यंजना, विरोधाभास, विशेषण विपर्यय आदि अलंकारों का सहज रूप में प्रयोग हुआ है।

हिन्दी साहित्य में स्थान
महादेवी वर्मा छायावादी युग की एक महान् कवयित्री समझी जाती हैं। इनके भावपक्ष और कलापक्ष दोनों ही अद्वितीय हैं। सरस कल्पना, भावुकता एवं वेदनापूर्ण भावों को अभिव्यक्त करने की दृष्टि से इन्हें अपूर्व सफलता प्राप्त हुई है। कल्पना के अलौकिक हिण्डोले पर बैठकर इन्होंने जिस काव्य का सृजन किया, वह हिन्दी साहित्याकाशं में ध्रुवतारे की भाँति चमकता रहेगा।

पद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्य भाग से दो पद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे।

गीत-1

प्रश्न 1.
चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!
जाग तुझको दूर जाना!
अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कम्प हो ले,
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;
आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया,
जाग या विद्युत-शिखाओं में निठुर तूफान बोले!
पर तुझे है नाश-पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना!
जाग तुझको दूर जाना!
बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बन्धन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रँगीले?
विश्व का क्रन्दन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्या डुबा देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?
तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना
जाग तुझको दूर जाना!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) पद्यांश की कवयित्री व शीर्षक का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
पद्यांश की कवयित्री छायावादी रचनाकार महादेवी वर्मा हैं तथा काव्यांश का शीर्षक ‘गीत’ हैं।

(ii) कवयित्री आँखों से क्या प्रश्न करती हैं?
उत्तर:
कवयित्री आँखों से प्रश्न करती हैं कि है! निरन्तर जागरूक रहने वाली आँखें आज नींद से भरी अर्थात् आलस्ययुक्त क्यों हों? तुम्हारा वैश आज इतना अव्यवस्थित क्यों है? आज अलसार्ने का समय नहीं है, इसलिए आलस्य एवं प्रमाद को छोड़कर अब तुम जाग जाओ, क्योंकि तुम्हें बहुत दूर जाना है।

(iii) कवयित्री साधना पथ पर चलते हुए कौन-कौन सी कठिनाइयों के आने की बात कहती हैं?
उत्तर:
कवयित्री कहती है कि साधना-पथ पर चलते हुए दृढ़ हिमालय कम्पित हो जाए, आकाश से प्रलयकारी वर्षा होने लगे, घोर अन्धकार प्रकाश को निगल जाए या चाहे चमकती और कड़कती हुई बिजली से तूफार आने लगे, लेकिन तुम अपने पथ से विचलित मत होना और आगे बढ़ते रहना।

(iv) “बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बन्धन सजीले” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से कवयित्री अपने प्रिय से प्रश्न करती है कि क्या मोम के समान शीघ्र नष्ट हो जाने वाले अरिथर, अस्थायी, परन्तु सुन्दर एवं अपनी ओर आकर्षित करने वाले ये सांसारिक बन्धन तुम्हें तुम्हारे पथ से विश्वलित कर देंगे?

(v) कवयित्री अपने प्रिय को प्रेरित करते हुए क्या कहती है?
उत्तर:
कयित्री अपने प्रिय को साधन-पथ पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करने के लिए कहती है कि तुम्हारे मार्ग में अनेक कठिनाइयाँ आएँगी, विभिन्न सांसारिक आकर्षण तुम्हें अपनी ओर आकर्षित करेंगे, तुम्हें भावनात्मक रूप से कमजोर करेंगे, लेकिन इनसे विचलित न होना और आगे बढ़ते रहना।

प्रश्न 2.
कह न ठण्डी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,
आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;
हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका,
राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी!
है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना!
जाग तुझको दूर जाना!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) मनुष्य को अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर:
कवयित्री कहती है कि मनुष्य के समक्ष अकर्मण्यता एवं आलस्य जैसे अवगुण शत्रु बनकर खड़े हो जाते हैं। वस्तुतः मनुष्य को जीवन में आने वाले दुखों एवं कठिन परिस्थितियों आदि को भूलकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में निरन्तर आगे बढ़ते रहना चाहिए।

(ii) लक्ष्य या परमात्मा को प्राप्त करने का साधन क्या बनता है?
उत्तर:
कवयित्री का मानना है कि जब तक हृदय में किसी लक्ष्य को पाने की इच्छा नहीं होती, तब तक मनुष्य की आँखों से टपकतै आँसुओं का कोई मूल्य नहीं होता। लक्ष्य को प्राप्त करने की तड़प ही मनुष्य को प्रेरित करती हैं और परमात्मा को पाने का साधन या माध्यम बनती हैं।

(iii) कवयित्री ने पतंगे का उदाहरण क्यों दिया है?
उत्तर:
पतंगा अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अथक प्रयास करता है और उसे प्राप्त करने के क्रम में समाप्त हो जाता है। कवयित्री पतंगे के इसी गुण से मनुष्य को अवगत कराने के लिए उसका उदाहरण देती हैं, ताकि मनुष्य भी अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अथक प्रयास करें।

(iv) कवयित्री “अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाने के माध्यम से क्या कहना चाहती हैं?
उत्तर:
“अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाने” के माध्यम से कवयित्री यह कहना चाहती हैं कि साधक तुझे अपनी तपस्या से संसार रूपी इस अंगार-शय्या अर्थात् कष्टों से भरे इस संसार में फूलों की कोमल कलियों जैसी आनन्दमय परिस्थितियों का निर्माण करना है।

(v) प्रस्तुत पद्यांश की भाषा-शैली पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत काव्यांश की भाषा तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है, जो भावों को अभिव्यक्त करने में पूर्णतः सक्षम है। भाषा सहज, सरल, प्रवाहमयी एवं प्रभावमयी है। इस पद्यांश में लयात्मकता एवं तुकान्तता का गुण विद्यमान है, जिसके कारण इसकी शैली गेयात्मक हो गई है।

गीत-2

प्रश्न 3.
पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला!
घेर ले छाया अमा बन, आज कज्जल-अश्रुओं में
रिमझिमा ले वह घिरा घन; और होंगे नयन सूखे,
तिल बुझे औ पलक रूखे, आर्दै चितवन में यहाँ शत
विद्युतों में दीप खेला! अन्य होंगे चरण हारे,
और हैं जो लौटते, दे शूल की संकल्प सारे;
दु:खव्रती निर्माण उन्मद यह अमरता नापते पद,
बाँध देंगे अंक-संसृति से तिमिर में स्वर्ण बेला!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के शीर्षक एवं उसके रचनाकार का नाम लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश गीत-2 कविता से लिया गया है, जो दीपशिखा काव्य संग्रह में संकलित है। इसकी रचनाकार ‘महादेवी वर्मा हैं।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में लेखिका किस पथ पर आगे बढ़ने का आह्वान करती
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में लेखिका साधना के अपरिचित पथ पर बिना घबराहट एवं डगमगाहट के आगे बढ़ने का आह्वान करती है।

(iii) महादेवी के जीवन रूपी दीप का स्वभाव कैंसी नहीं है?
उत्तर:
महादेवी वर्मा के जीवन रूपी दीप का स्वभाव कष्टों एवं कठिनाइयों से घबराकर साधनों पथ से पीछे हट जाना नहीं है, क्योंकि उनके जीवन रूपी दीप ने सैकड़ों विद्युत रूपी कठिनाइयों को झेलते हुए आगे बढ़ना सीखा है।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में लेखिका का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
निराश व हताश न होने का संकल्प करके आत्मा परमात्मा के मिलन के पथ पर निरन्तर आगे बढ़ना ही लेखिका का उद्देश्य है।

(v) अंक संसृति’ एवं ‘तिमिर’ शब्दों का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
अंक संसृति = संसार की गोद
तिमिर = अन्धकार

प्रश्न 4.
दूसरी होगी कहानी, शून्य में जिसके मिटे स्वर,
धूलि में खोई निशानी, आज जिस पर प्रलय विस्मित,
मैं लगाती चल रही नित,
मोतियों की हाट औ चिनगारियों का एक मेला!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) लेखिका के अनुसार दुसरी कहानी क्या हैं?
उत्तर:
लेखिका के अनुसार जिसमें अपने लक्ष्य को प्राप्त किए बिना ही जिस साधक के स्वर क्षीण हो जाते हैं तथा जिनके पद-चिह्नों को समय मिटा देता है, वह कोई दूसरी कहानी होगी।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में किस भाव की अभिव्यक्ति हुई है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में साधक द्वारा अपना सर्वस्व न्यौछावर करके ईश्वर को प्राप्त करने के भाव की अभिव्यक्ति हुई है।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश में लेखिका ने क्या दृढ़ संकल्प लिया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में लेखिका ने आध्यात्मिक शक्ति द्वारा मार्ग की विभिन्न बाधाओं को पार करके ईश्वर रूपी प्रिय को प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प लिया है।

(iv) लेखिका परमात्मा रूपी प्रियतम की प्राप्ति के लिए किसका बाजार लगा रही है ?
उत्तर:
लेखिका परमात्मा रूपी प्रियतम की प्राप्ति के लिए मोतियों रूपी आंसुओं का बाजार लगा रही है, जिसमें वह इन आँसुओं की चमक से अन्य साधकों में भी ईश्वर प्राप्ति की चिंगारियाँ जगाने में सफल रही है।

(v) ‘शून्य एवं आज’ शब्दों के विलोम शब्द लिखिए।
उत्तर:
विस्मित = स्मृति
आज = कला

गीत-3

प्रश्न 5.
पथ को न मलिन करता आना
पद-चिह्न न दे जाता जाना,
मेरे आगम की जग में
सुख की सिरहन हो अन्त खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही
उमड़ी कल थी मिट आज चली!
मैं नीर भरी दुःख की बदली!

उपरोक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) कवयित्री अपने जीवन की तुलना किससे व क्यों करती हैं?
उत्तर:
कवयित्री आकाश में छाए बादलों से तुलना करते हुए कहती हैं कि जिस प्रकार आकाश में बादलों के छाने से वह मलिन नहीं होता और न ही बरसने के पश्चात् उसका कोई पद चिह्न शेष रहता है, उसी प्रकार कवयित्री का जीवन भी निष्कलंक हैं। वह जैसे आई थी वैसे ही लौट रही

(ii) कवयित्री का स्मरण लोगों में खुशियाँ क्यों बिखेर देता है?
उत्तर:
कवयित्री अपने व्यक्तित्व की तुलना आकाश में छाने वाले बादलों से करते हुए स्वयं को निष्कलंक मानती हैं। अपने इसी गुण के कारण जब भी उसका स्मरण लोगों के मस्तिष्क में होता है, तो वह उसमें खुशी की सिहरन पैदा कर देता है।

(iii) विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरी न कभी अपना होना” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति से कवयित्री का आशय यह है कि जिस प्रकार इस विशाल आकाश में बादल घूमता रहता है, वहाँ पर उसे कोई स्थायित्व प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार स्वयं कवयित्री का जीवन भी है, जिसे इस विशाल जगत् में स्थायित्व प्राप्त नहीं हुआ।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश का केन्द्रीय भाव लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत काव्यांश में कवयित्री ने बादल से ही जीवन की साम्यता प्रस्तुत करके उसी क्षण भंगुरता को प्रकट करने का प्रयास किया है, साथ ही वह यह सन्देश देना चाहती हैं कि मनुष्य जीवन निष्कलंक होना चाहिए, ताकि उसका स्मरण होने पर लोगों के चेहरे पर मुस्कान आ जाए।

(v) प्रस्तुत पद्यांश में अलंकार योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
कवयित्री ने सम्पूर्ण पद्यांश में बादल को मनुष्य के रूप में प्रकट करके उसका मानवीकरण कर दिया है, जिस कारण सम्पूर्ण पद्यांश में मानवीकरण अलंकार है। इसके अतिरिक्त पद-चिह्न न दे जाता जाना, में ‘ज’ वर्ण की आवृत्ति, ‘सुख की सिहरन हो’ में ‘स’ वर्ण की आवृत्ति, व ‘परिचय इतना इतिहास यही’ में ‘इ’ वर्ण की आवृत्ति के कारण पद्यांश में अनुप्रास अलंकार भी विद्यमान है।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी निबन्ध

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 7
Chapter Name पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी निबन्ध

1. जीवन में वक्षों का महत्त्व (2018)
अन्य शीर्षक
वृक्ष हमारे जीवन साथी
संकेत बिन्दु भूमिका, हमारे जीवन में वनों की उपयोगिता/लाभ, पर्यावरण को सन्तुलित करना, वृक्षारोपण का महत्त्व, उपसंहार।।

भूमिका पेड़-पौधों के महत्त्व को कभी भी कमतर नहीं आंका जा सकता, क्योंकि ये हमारे जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं। प्रकृति ने घनों ने रूप में हमें एक ऐसा प्राकृतिक सौन्दर्य उपलब्ध कराया है, जो न सिर्फ हमारी प्राकृतिक शोभा को बढ़ाते हैं, अपितु किसी भी देश के आर्थिक विकास व उसकी समृद्धि में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आर्थिक विकास के लिए वन केवल कच्चे माल की पूर्ति ही नहीं करते वरन् बाढ़ को नियन्त्रित करके भूमि के कटाव को भी रोकते हैं।

हमारे जीवन में वनों की उपयोगिता/लाभ वन हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी है, किन्तु सामान्य व्यक्ति इनके महत्त्व को समझ नहीं पाते। वे वनों को प्राकृतिक सीमा मात्र मानते हैं। दैनिक जीवन में वनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वन हमें रमणीक स्थान प्रदान करते हैं। वृक्षों के अभाव में पर्यावरण शुष्क हो जाता है और पर्यावरण का सौन्दर्य नष्ट हो जाता है। वृक्ष स्वयं सौन्दर्य की सृष्टि करते है। गर्मी के दिनों में बहुत से पर्यटक पहाड़ों पर जाकर वनों की शोभा देखते हैं। वनों से हमें विभिन्न प्रकार की लकड़ियाँ; जैसे-इमारती लकड़ी, जलाने की लकड़ी, दवाई में प्रयोग होने वाली लकड़ी आदि प्राप्त होती हैं। वृक्षों की लकड़ियाँ व्यापारिक दृष्टि से भी उपयोगी होती हैं। इनमें सागौन, देवदार, चीड़, शीशम, चंदन, आबनूस इत्यादि। प्रमुख हैं।

वनों से लकड़ी के अतिरिक्त अनेक उपयोगी वस्तुओं की प्राप्ति भी होती है, जिनका अनेक उद्योग में कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है; जैसे—फर्नीचर उद्योग, औषधि उद्योग इत्यादि। वनों से हमें विभिन्न प्रकार के फल प्राप्त होते हैं, जो मनुष्य का पोषण करते हैं। ऋषि-मुनि वनों में रहकर कन्दमूल एवं फलों पर ही अपना जीवन निर्वाह करते थे। वनों से हमें अनेक जड़ी बूटियाँ प्राप्त होती हैं। वनों से प्राप्त जड़ी-बूटियों से कई असाध्य रोगों की दवाई प्राप्त होती है। कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पेड़-पौधों की महत्ता को समझते हुए कहा है।

“पृथ्वी द्वारा स्वर्ग से बोलने का अथक प्रयास हैं ये पेड़

पर्यावरण को सन्तुलित करना वन वायु को शुद्ध करते हैं, क्योंकि वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करके ऑक्सीजन छोड़ते हैं, जिससे पर्यावरण शुद्ध होता है। यह सत्य है कि “वृक्ष धरा के हैं आभूषण, करते हैं ये दूर प्रदूषण।” इस प्रकार वनों से वातावरण का तापक्रम, नमी और वायु प्रवाह नियर्मित होता है, जिससे जलवायु में सन्तुलन बना रहता है। वन जलवायु की भीषण उष्णता को सामान्य बनाए रखते हैं, ये आँधी-तूफानों से हमारी रक्षा करते हैं तथा गर्मी और तेज हवाओं को रोककर देश की जलवायु को समशीतोष्ण बनाए रखते हैं। इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी का पर्यावरण असन्तुलित हो गया है। वृक्षारोपण पर्यावरण को सन्तुलित कर मानव के अस्तित्व की रक्षा करने के लिए आवश्यक है। एक मेज, एक कर्मी, एक कटोरा फल और एक वायलन; भला खुश रहने के लिए और क्या चाहिए।’

2. अन्य पर्यावरण प्रदूषण : समस्या और समाधान (2018, 16, 15, 14, 13, 12, 11, 10)
अन्य शीर्षक औद्योगिक प्रदूषण : समस्या और समाधान (2004), पर्यावरण संरक्षण (2010), वन सम्पदा और पर्यावरण (2012, 11), जीवन रक्षा : पर्यावरण सुरक्षा (2014, 13), पर्यावरण एवं स्वास्थ्य (2013), पर्यावरण की उपयोगिता, पर्यावरण प्रदूषण से हानियाँ (2012), प्रदूषण, पर्यावरण एवं मानव जीवन (2013)
संकेत बिन्दु भूमिका, प्रदूषण का तात्पर्य, प्रदूषण के कारण, प्रदूषण के दुष्परिणाम, प्रदूषण निवारण के उपाय, उपसंहार।

भूमिका प्रदूषण के विभिन्न प्रकारों में पर्यावरणीय प्रदूषण एक गम्भीर समस्या है। यह भारत की ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की भी समस्या है। इस समस्या से निपटने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रयास किए जा रहे हैं।

सम्पूर्ण मानव जाति के अस्तित्व को समाप्त कर सकने में सक्षम इस वैश्विक समस्या पर अब समस्त विश्व समुदाय एकजुट हैं और इसके निवारण के उपायों की खोज में जुटा है। उल्लेखनीय है कि इससे विश्व का पर्यावरण तो प्रदूषित हो हो हो है, साथ ही इसके दुष्ट परिणामस्वरूप कई अन्य जटिल समस्याएँ भी उत्पन्न हो रही हैं।

प्रदूषण का तात्पर्य नि:सन्देह सौरमण्डल में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है, जहाँ जीवन के होने के पूर्ण प्रमाण विद्यमान हैं। पृथ्वी के वातावरण में 78% नाइट्रोजन, 21% ऑक्सीजन तथा 1% अन्य गैसें शामिल हैं। इन गैसों का पृथ्वी पर समुचित मात्रा में होना जीवन के लिए अनिवार्य है, किन्तु जब इन गैसों का आनुपातिक सन्तुलन बिगड़ जाता है, तो जीवन के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं। विश्व में आई औद्योगिक क्रान्ति के बाद से ही प्राकृतिक संसाधनों का दोन शुरू हो गया था, जो उन्नीसवीं एवं बीसवीं शताब्दी में अपने चरम पर था, कुपरिणामस्वरूप पृथ्वी पर गैसों का आनुपातिक सन्तुलन बिगड़ गया, जिससे विश्व की जलवायु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा एवं प्रदूषण का स्तर इतना अधिक बढ़ गया कि यह अनेक जानलेवा बीमारियों का कारक बन गया। इस तरह पर्यावरण में प्रदूषको (अपशिष्ट पदार्थों) का इस अनुपात में मिलना, जिससे पर्यावरण का सन्तुलन बिगड़ता है, प्रदूषण कहलाता है। प्रदूषण के कई रूप हैं—जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण इत्यादि।

प्रदूषण के कारण उद्योगों से निकलने वाले रासायनिक अपशिष्ट पदार्थ जल एवं मृदा प्रदूषण का तो कारण बनते ही हैं, साथ ही इनके कारण वातावरण में विषैली गैसों के फैलने से वायु भी प्रदूषित होती है। मनुष्य ने अपने लाभ के लिए जंगलों की तेज़ी से कटाई की है। जंगल के पेड़ प्राकृतिक प्रदूषण नियन्त्रक का काम करते हैं। पेड़ों के पर्याप्त संख्या में न होने के कारण भी वातावरण में विषैली गैसें जमा होती रहती हैं और उसका शोधन नहीं हो पाता। मनुष्य सामान ढोने के लिए पॉलिथीन का प्रयोग करता है। प्रयोग के बाद इन पॉलिथीनों को यूं ही फेंक दिया जाता है। ये पॉलिथीने नालियों को अवरुद्ध कर देती हैं, जिसके फलस्वरूप पानी एक जगह जमा होकर प्रदूषित होता रहता है।

इसके अतिरिक्त, ये पॉलिथीन भूमि में मिलकर उसकी उर्वरा शक्ति को कम कर देती हैं। प्रौद्योगिकी में प्रगति के साथ ही मनुष्य की मशीनों पर निर्भरता बढ़ी है। मोटर, रेल, घरेलू मशीनें इसके उदाहरण हैं। इन मशीनों से निकलने वाला धुआं भी पर्यावरण के प्रदूषण के प्रमुख कारकों में से एक है। बढ़ती जनसंख्या को भोजन उपलब्ध करवाने के लिए खेतों में रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग में वृद्धि हुई है।

इसके कारण भूमि की उर्वरा शक्ति का ह्रास हुआ है। रासायनिक एवं चमड़े के उद्योगों के अपशिष्टों को नदियों में बहा दिया जाता है। इस कारण जल प्रदूषित हो  जाता है एवं नदियों में रहने वाले जन्तुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

प्रदूषण के दुष्परिणाम पर्यावरण प्रदूषण के कई दुष्परिणाम सामने आए हैं। इसका सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव मानव के स्वास्थ्य पर पड़ा है। प्रदूषण के कारण आज मनुष्य का शरीर अनेक बीमारियों का घर बनता जा रहा है। खेतों में रासायनिक उर्वरकों के माध्यम से उत्पादित खाद्य-पदार्थ स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सही नहीं है। वातावरण में घुली विषैली गैसों एवं धुएँ के कारण शहरों में मनुष्य का साँस लेना भी दूभर होता जा रहा है।

विश्व की जलवायु में तेजी से हो रहे परिवर्तन का कारण भी पर्यावरणीय असन्तुलन एवं प्रदूषण ही हैं। ओजोन परत में छिद्र की समस्या भी प्रदूषण की ही उपज हैं। वर्ष 2014 के अन्त में यू.एन.ई.पी द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार प्रतिवर्ष वायु प्रदूषण से जुड़ी लगभग एक लाख मौतें भारत सहित अमेरिका, ब्राजील, चीन, यूरोपीय संघ व मैक्सिको में होती हैं। यह रिपोर्ट पर्यावरण प्रदूषण से होने वाली हानियों का जीता-जागता सबूत है।

प्रदूषण निवारण के उपाय पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के लिए हमें कुछ आवश्यक उपाय करने होंगे। मनुष्य स्वाभाविक रूप से प्रकृति पर निर्भर है। प्रकृति पर उसकी निर्भरता तो समाप्त नहीं की जा सकती, किन्तु प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते समय हमें इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा कि इसका प्रतिकूल प्रभाव पर्यावरण पर न पड़ने पाए, इसके लिए हमें उद्योगों की संख्या के अनुपात में बड़ी संख्या में पेड़ों को लगाने की आवश्यकता हैं। इसके अलावा पर्यावरण प्रदूषण को कम करने के लिए हमें जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने की भी आवश्यकता है, क्योंकि जनसंख्या में वृद्धि होने से स्वाभाविक रूप से जीवन के लिए अधिक प्राकृतिक संसाधनों की आवश्यकता पड़ती हैं और इन आवश्यकताओं को पूरा करने के प्रयास में उद्योगों की स्थापना होती है और उद्योग कहीं-न-कहीं प्रदूषण का कारक भी बनते हैं।

यदि हम चाहते हैं कि प्रदूषण कम हो एवं पर्यावरण की सुरक्षा के साथ-साथ सन्तुलित विकास भी हो, तो इसके लिए हमें नवीन प्रौद्योगिकी का प्रयोग करना होगा। प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा तब ही सम्भव है, जब हम इसका उपयुक्त प्रयोग करें। हमें अपने पूर्व राष्ट्रपति श्री ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के इस कथन से सीख लेने की आवश्यकता है- “हम सबको विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग के माध्यम से पानी, ऊर्जा, निवास स्थान, कचरा प्रबन्धन तथा पर्यावरण के क्षेत्रों में पृथ्वी द्वारा झेली जाने वाली समस्याओं को दूर करने के लिए कार्य करने चाहिए।’

उपसंहार वस्तुतः पर्यावरण प्रदूषण एक वैश्विक समस्या है, जिससे निपटना वैश्विक स्तर पर ही सम्भव हैं, किन्तु इसके लिए प्रयास स्थानीय स्तर पर भी किए जाने चाहिए। विकास एवं पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, अपितु एक दूसरे के पूरक हैं। सन्तुलित एवं शुद्ध पर्यावरण के बिना मानव का जीवन कष्टमय हो जाएगा। हमारा अस्तित्व एवं जीवन की गुणवत्ता एक स्वस्थ प्राकृतिक पर्यावरण पर निर्भर है। विकास हमारे लिए आवश्यक है और इसके लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी आवश्यक है, किन्तु ऐसा करते समय हमें सतत् विकास की अवधारणा को अपनाने पर जोर देना होगा तभी हमारा पर्यावरण सुरक्षित रह सकेगा। पृथ्वी के बढ़ते तापक्रम को नियन्त्रित कर, जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए देशी तकनीकों से बने उत्पादों का उत्पादन तथा उपभोग जरूरी है। इसके साथ ही प्रदूषण को कम करने के लिए सामाजिक तथा कृषि वानिकी के माध्यम से अधिक-से-अधिक पेड़ लगाए जाने की भी आवश्यकता है। यदि हम इन बातों पर ध्यान दें, तो पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से काफी हद तक निपटा जा सकता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi सूक्ति आधारित निबन्ध

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name सूक्ति आधारित निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi सूक्ति आधारित निबन्ध

1. जहाँ सुमति तहँ सम्पत्ति नाना/ससंगति (2018)
प्रस्तावना परमात्मा की सम्पूर्ण सृष्टि में मानव ही श्रेष्ठ माना जाता है, क्योकि मानव विवेकशील, विचारशील तथा चिन्तनशील प्राणी हैं। परमात्मा ने केवल मानव को ही बुद्धि अर्थात् चिन्तन शक्ति प्रदान की है। वह बुरा-भला सभी प्रकार का विचार करने में समर्थ है। समाज में उच्च स्थान प्राप्त करने के लिए मानव को नैतिक शिक्षा व सत्संगति की आवश्यकता पड़ती है। मानव को बाल्यावस्था से ही माता-पिता द्वारा अच्छे संस्कार प्राप्त होने चाहिए, क्योंकि बचपन के संस्कारों पर ही मानव का सम्पूर्ण जीवन निर्भर रहता है।

सत्संगति का अर्थ सत् + संगति अर्थात् अच्छे व्यक्तियों के साथ रहना, उनके आचार-विचार एवं व्यवहार का अनुशासन करना ही सत्संगति कहलाता है। सत्संगति मानव को ही नहीं अपितु पशु-पक्षी एवं निरीह जानवरों को भी दुष्प्रवृत्ति छोड़कर सदवृत्ति के लिए प्रेरित करती है।

सत्संगति की आवश्यकता मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह नित्य प्रति भिन्न भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों के सम्पर्क में आता है। वह जिस भी प्रकृति के व्यक्ति के सम्पर्क में आता है, उसी के गुण-दोषों तथा व्यवहार आदि को ग्रहण कर लेता है। अतः मानव को बुरे लोगों की संगति से बचना चाहिए तथा सत्संगति अपनानी चाहिए, क्योकि सत्संगति ही मनुष्य को अच्छे संस्कार, उचित व्यवहार तथा उच्च विचार प्रदान करती है। बुराई के पंजों से बचने के लिए मानव को सत्संग की शरण लेनी चाहिए, तभी उसके विचार एवं व्यवहार श्रेष्ठ बनेंगे तथा उसका समाज में श्रेष्ठ स्थान बनेगा। यदि यह कुसंग में पड़ गया, तो उसका सम्पूर्ण जीवन विनष्ट हो जाएगा। अतः सत्संगति की महती आवश्यकता है।

सत्संगति से लाभ सत्संगति से मानव के आचार-विचार में परिवर्तन आता है और वह बुराई के मार्ग का त्याग कर सच्चे और अच्छे कर्मों में प्रवृत्त हो जाता है। इस निश्चय के उपरान्त उसे अपने मार्ग पर अविचल गति से अग्रसर होना चाहिए। सत्संगति ही उसके सच्चे मार्ग को प्रदर्शित करती है। उस पर चलता हुआ मानव देवताओं की श्रेणी में पहुंच जाता है। इस मार्ग पर चलने वाले के सामने धर्म रोड़ा बनकर नहीं आता है। अतः उसे किसी प्रकार के प्रलोभनों से विचलित नहीं होना चाहिए।

कुसंगति को प्रभाव सत्संगति की भाँति कुसंगति का भी मानव पर विशेष प्रभाव पड़ता है, क्योकि कुसंगति तो काम, क्रोध, लोभ, मोह और बुद्धि भ्रष्ट करने वालों की जननी है। इसकी संतानें सत्संगति का अनुकरण करने वाले को अपने जाल में फंसाने का प्रयत्न करती हैं। महाबली भीष्म, धनुर्धर द्रोण और महारथी शकुनि जैसे महापुरुष भी

इसके मोह जाल में फंस कर पथ विचलित हो गए थे। उनके आदर्शों का तुरन्त ही | हनन हो गया था। कुसंगति मानव के सम्पूर्ण जीवन को विनष्ट कर देती है। अतः प्रत्येक मानव को बुरे लोगों के सम्पर्क से बचना चाहिए।

उपसंहार अत: प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह चन्दन के वृक्ष के समान अटल रहे। जिस प्रकार से विषधर रात-दिन लिपटे रहने पर भी उसे विष से प्रभावित नहीं कर सकते, उसी प्रकार सत्संगति के पथगामी का कुसंगति वाले कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते हैं।

सत्संगति कुन्दन है। इसके मिलने से काँच के समान मानव हीरे के समान चमक उठता है। अतः उन्नति का एकमात्र सोपान सत्संगति ही है। मानव को सज्जन परुषों के सत्संग में ही रहकर अपनी जीवन रूपी नौका समाज रूपी सागर से पार लगानी चाहिए। तभी वह आदर को प्राप्त कर सकता है तथा समस्त ऐश्वर्यों के सुख का उपभोग कर सकता है। इसीलिए कहा गया है कि जहाँ सुमति तहँ सम्पत्ति नाना।।।

2. को न कुसंगति पाई नसाई (2016)
संकेत बिन्दु भूमिका, सूक्ति का अर्थ, कुसंगति का प्रभाव, उपसंहार।।

भूमिका को न कुसंगति पाई नसाई’ सूक्ति को समझने से पूर्व ‘कुसंगति’ शब्द का अर्थ समझना आवश्यक है। कुसंगति का अर्थ है-कुबुद्धि (बुरी संगत), दुर्भाव, कुरुचि आदि। कुबुद्धि के प्रभाव से व्यक्ति सदैव बुरी बाते ही सोचता है। और बुरे कार्यों में ही निमग्न रहता है। व्यक्ति को बुरी संगति मिलने से उसमें बुरी बुद्धि का विकास होता है तथा उसे अपने जीवन में निरन्तर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कुसंगति में फंसे व्यक्तियों का विकास सर्वथा अवरुद्ध हो जाता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं। वह अकेला नहीं रह सकता। बचपन से ही मनुष्य को एक-दूसरे के साथ मिलने-बैठने और बातचीत करने की इच्छा उत्पन्न हो जाती है। इसी को संगति कहा जाता है। बचपन में बालक अबोध होता है। उसे अच्छे बुरे की पहचान नहीं होती यदि वह अच्छी संगति में रहता है, तो उस पर अच्छे संस्कार पड़ते हैं और यदि उसकी संगति बुरी है तो उसकी आदतें भी बुरी हो जाती हैं।

सूक्ति का अर्थ कुसंगति के द्वारा व्यक्ति हीन-भावना से ग्रस्त होकर अपने मार्ग से विचलित हो जाता है। जिस व्यक्ति में कुबुद्धि, दुर्भाव आदि भावनाएँ | व्याप्त होती है उसे स्वयं ही घन, वैभव, यश आदि से हाथ धोना पड़ता है, जो व्यक्ति अपने हित के साथ अन्य लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए संगठित होकर कार्य नहीं करता उसे प्रत्येक क्षेत्र में असफलता ही प्राप्त होती है। सत्संगति में रहकर व्यक्ति योग्य और कुसंगति में पड़कर व्यक्ति अयोग्य बनकर समाज और परिवार दोनों में निरादर प्राप्त करता है। प्रस्तुत सूक्ति को कैकयी व मन्थरा के प्रसंग द्वारा उचित प्रकार से समझा जा सकता है। कैकयी राम को अत्यधिक प्रेम करती थी, किन्तु कैकयी को मंथरा द्वारा उकसाया गया जिससे कैकेयी अपनी दासी मन्थरा की बातों में आकर राजा दशरथ से दो वरदान माँगती हैं और प्रभु श्रीराम को अपने से दूर कर देती हैं। ठीक उसी प्रकार जब इनसान अपने जीवन में कुसंगति में रहता है, तो वह ईश्वर से कोसों दूर हो जाता है। कुसंगति ही इनसान के जीवन में दुःखों का भण्डार लाती है। कैकयी के जीवन में मन्थरा के कुसंग से विपत्तियाँ आई और उसका सब कुछ नष्ट हो गया।

कुसंगति को प्रभाव कुसंगति का मानव जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव प्रड़ता है। कुसंगति से सदा हानि होती है। मनुष्य को सतर्क और सावधान रहना चाहिए, क्योंकि कुसंगति काजल की कोठरी के समान है जिससे बेदाग बाहर निकलना असम्भव है। जीजाबाई की संगति में शिवाजी ‘छत्रपति शिवाजी’ बने, दस्यु रत्नाकर सुसंगति के प्रभाव से महामुनि वाल्मीकि बने, जिन्होंने रामायण नामक अमर काव्य लिखा। डाकू अंगुलिमाल, महात्मा बुद्ध के संगति में आकर उनका शिष्य बन गया और नर्तकी आम्रपाली का उद्धार हुआ। महाभारत के युद्ध में श्रीकृष्ण ने अर्जुन का स्वजनों के प्रति मोह भंग कर युद्ध के लिए तैयार किया। वहीं दूसरी ओर कुसंगति में पड़कर भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन आदि पतन के गर्त में चले गए। ये सभी अपने आप में विद्वान् और वीर थे, लेकिन कुसंगति का प्रभाव इन्हें विनाश की ओर खींच लाया। विद्यार्थी जीवन में सत्संगति का विशेष महत्त्व है। वह जैसी संगति में रहते हैं स्वयं वैसे ही बन जाते हैं जैसे कमल पर पड़ी बूंद नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार कुसंगति व्यक्ति को अन्दर से कलुषित कर उसका सर्वनाश कर देती है। इसलिए कहा गया है कि “दुर्जन यदि विद्वान् भी हो तो उसका संग त्याग देना चाहिए।

उपसंहार मानव जीवन में संगति का प्रभाव अवश्य पड़ता है। कुसंगति उसे पतन के गर्त में ले जाती हैं और वहीं दूसरी ओर सत्संगति उसके उत्थान का मार्ग खोल देती है। सामाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य को दूसरों के साथ किसी न किसी रूप में सम्पर्क करना पड़ता है। अच्छे लोगों की संगति जीवन को उत्थान की ओर ले जाती है, तो बुरी संगति पतन का द्वार खोल देती है।

संगति के प्रभाव से कोई नहीं बच सकता। हम जैसी संगति में रहते हैं, वैसा ही हमारा आचरण बन जाता है। तुलसीदास का कथन है-

‘बिनु सत्संग विवेक न होई।

अतः मनुष्य का प्रयास यही होना चाहिए कि वह कुसंगति से बचे और सुसंगति में रहे। तभी उसका कल्याण हो पाएगा।

3. परहित सरिस धरम नहिं भाई (2018, 12, 11, 10)
अन्य शीर्षक वही मनुष्य है, जो मनुष्य के लिए मरे। (2012)
संकेत बिन्दु भूमिका, सन्देश देती प्रकृति, संस्कृति का आधार परोपकार, जगत-कल्याण के लिए कृत संकल्प, उपसंहार।।

भूमिका ‘परहित’ अर्थात् दूसरों का हित करने की भावना की महत्ता को स्वीकार करते हुए ‘गोस्वामी तुलसीदास’ ने लिखा है

“परहित सरिस धरम नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।”

इन पंक्तियों का अर्थ है-परोपकार से बढ़कर कोई भी उत्तम धर्म यानी कर्म नहीं | है और दूसरों को कष्ट पहुँचाने से बढ़कर कोई नीच कर्म नहीं हैं। हमारे संस्कृत ग्रन्थ भी ‘परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्’ अर्थात् दूसरों को हित पहुंचाना पुण्यकारक तथा दूसरों को कष्ट देना पापकारक है, जैसे वचनों से भरे पड़े हैं। वास्तव में परहित या परोपकार की भावना ही मनुष्य को ‘मनुष्य’ बनाती है। किसी भूखे व्यक्ति को खाना खिलाते समय या किसी विपन्न व्यक्ति की सहायता करते समय हृदय को जिस असीम आनन्द की प्राप्ति होती हैं, वह अवर्णनीय हैं, वह अकथनीय है।

सन्देश देती प्रकृति हमारे चारों ओर प्रकृति का घेरा है और प्रकृति अपने क्रियाकलापों से हमें परहित हेतु जीने का सन्देश देती है, प्रेरणा देती है। सूर्य अपना सारा प्रकाश एवं ऊर्जा जगत के प्राणियों को दे देता है, नदी अपना सारा पानी जन जन के लिए लुटा देती हैं। वृक्ष अपने समग्र फल प्राणियों में बाँट देते हैं, तो वर्षा जगत की तप्तता को शान्त, करती है। प्रकृति की परोपकार भावना को महान् छायावादी कवि पन्तजी’ ने निम्न शब्दों में उकेरा है-

“हँसमुख प्रसून सिखलाते पलभर है-
जो हँस पाओ।
अपने उर सौरभ से
जग का आँगन भर जाओ।”

संस्कृति का आधार परोपकार भारत सदैव से अपनी परोपकारी परम्परा के लिए विश्वप्रसिद्ध रहा है। यहाँ ऐसे लोगों को ही महापुरुष की श्रेणी में शामिल किया गया है, जिन्होंने स्वार्थ को त्यागकर लोकहित को अपनाया। यहाँ ऋषियों एवं तपस्वियों की महिमा का गुणगान इसलिए किया जाता है, क्योंकि उन्होंने ‘स्व’ की अपेक्षा ‘पर’ को अधिक महत्त्व दिया। छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद कामायनी’ में लिखते हैं-

औरों को हँसते देखो मनु, हँसो और सुख पाओ,
अपने सुख को विस्तृत कर लो सब को सुखी बनाओ।”

जगत-कल्याण के लिए कृत संकल्प भारत की भूमि ही वह पावन भूमि है, जहाँ बुद्ध एवं महावीर जैसे सन्तों ने जगत-कल्याण के लिए अपना राजपाट, वैभव, सुख, सब कुछ त्याग दिया। परोपकार की भावना से ओत-प्रोत होने के लिए आवश्यक है कि हम अपने जीवन में प्रेम, करुणा, उदारता, दया जैसे सदगणों को धारण करें। दिखावे के लिए किया गया परोपकार अहंकार को जन्म देती है, जिसमें परोपकारी इसके बदले सम्मान पाने की भावना रखता है। वास्तव में यह, परोपकार नहीं, व्यापार है। परोपकार तो नि:स्वार्थ भावना से प्रकृति के विभिन्न अंगों के समान होना चाहिए। राजा भर्तृहरि ने नीतिशतक में लिखा है-‘महान् आत्माएँ अर्थात् श्रेष्ठ जन उसी प्रकार स्वतः दूसरों का भला करते हैं; जैसे- सूर्य कमल को खिलाता है, चन्द्रमा मुदिनी को विकसित करता है तथा बादल बिना किसी के कहे जल देता है।

उपसंहार परोपकार करने से व्यक्ति की आत्मा तृप्त होती है और विस्तृत भी। उसका हृदय एवं मस्तिष्क अपने-पराये की भावना से बहुत ऊपर उठ जाता है। इस आत्मिक आनन्द की तुलना भौतिक सुखों से नहीं की जा सकती। परोपकार व्यक्ति को अलौकिक आनन्द प्रदान करता है। उसमें मानवीयता का विस्तार होता है और वह सही अर्थों में मनुष्य कहलाने का अधिकारी बनता है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने ठीक ही लिखा है-

मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे,
यही पशु प्रवृत्ति है कि आप-आप ही चरे।”

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name रश्मिरथी
Number of Questions Solved 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी

कथावस्तु पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1.
“रश्मिरथी’ के कथानक में ऐतिहासिकता और धार्मिकता दोनों हैं।” इस कथन के आधार पर इस खंडकाव्य की विशेषताएँ लिखिए। (2018)
अथवा
“रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में उदान्त मानव मूल्यों का उदघाटन हुआ है।” स्पष्ट कीजिए। (2018)
अथवा
रश्मिरथी खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए। (2018)
अथवा
रश्मिरथी काव्य की कथावस्तु/कथासार अपने शब्दों में लिखिए। (2016)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु /कथासार (विषय-वस्तु) संक्षेप में लिखिए। (2018, 16, 12, 11)
अथवा

‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए। (2018, 17, 14)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के कथानक की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2014)
अथवा
‘रश्मिरथी’ के कथानक में ऐतिहासिकता और धार्मिकता दोनों हैं। तर्कसहित उत्तर दीजिए। (2014)
अथवा
रश्मिथी खण्डकाव्य की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। (2016)
उत्तर:
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित है। सर्गानुसार संक्षिप्त कथावस्तु इस प्रकार है।

प्रथम सर्ग : कर्ण का शौर्य प्रदर्शन

कर्ण का जन्म कुन्ती के गर्भ से हुआ था और उसके पिता सूर्य थे। लोकलाज के भय से कुन्ती ने नवजात शिशु को नदी में बहा दिया, जिसे सूत (सारथि) ने बचाया और उसे पुत्र रूप में स्वीकार कर उसका पालन-पोषण किया। सूत के घर पलकर भी कर्ण महान् धनुर्धर, शूरवीर, शीलवान, पुरुषार्थी और दानवीर बना। एक बार द्रोणाचार्य ने कौरव व पाण्डव राजकुमारों के शस्त्र कौशल का सार्वजनिक प्रदर्शन किया।

सभी दर्शक अर्जुन की धनुर्विद्या के प्रदर्शन को देखकर आश्चर्यचकित रह गए, किन्तु तभी कर्ण ने सभा में उपस्थित होकर अर्जुन को द्वन्द्वयुद्ध के लिए ललकारा। कृपाचार्य ने कर्ण से उसकी जाति और गोत्र के विषय में पूछा। इस पर कर्ण ने स्वयं को सूत-पुत्र बताया, तब निम्न जाति का कहकर उसका अपमान किया गया। उसे अर्जुन से द्वन्द्वयुद्ध करने के अयोग्य समझा गया, परन्तु दुर्योधन कर्ण की वीरता एवं तेजस्विता से अत्यन्त प्रभावित हुआ और उसे अंगदेश का राजा घोषित कर दिया। साथ ही उसे अपना अभिन्न मित्र बना लिया। गुरु द्रोणाचार्य भी कर्ण की वीरता को देखकर चिन्तित हो उठे और कुन्ती भी कर्ण के प्रति किए गए बुरे व्यवहार के लिए उदास हुई।

द्वितीय सर्ग: आश्रमवास

रश्मिरथी खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग का कथानक अपने शब्दों में लिखिए।  (2018, 17, 16)

राजपुत्रों के विरोध से दु:खी होकर कर्ण ब्राह्मण रूप में परशुराम जी के पास धनुर्विद्या सीखने के लिए गया। परशुराम जी ने बड़े प्रेम के साथ कर्ण को धनुर्विद्या सिखाई। एक दिन परशुराम जी कर्ण की जंघा पर सिर रखकर सो रहे थे, तभी एक कीड़ा कर्ण की जंघा पर चढ़कर खून चूसता-चूसता उसकी जंघा में प्रविष्ट हो गया। रक्त बहने लगा, पर कर्ण इस असहनीय पीड़ा को चुपचाप सहन करता रहा, और शान्त रहा। क्योकि कहीं गुरुदेव को निद्रा में विघ्न न पड़ जाए। जंघा से निकले रक्त के स्पर्श से गुरुदेव को निद्रा भंग हो गई। अब परशुराम को कर्ण के ब्राह्मण होने पर सन्देह हुआ। अन्त में कर्ण ने अपनी वास्तविकता बताई। इस पर परशुराम ने कर्ण से ब्रह्मास्त्र के प्रयोग का अधिकार छीन लिया और उसे श्राप दे दिया। कर्ण गुरु के चरणों का स्पर्श कर वहाँ से चला आया।

तृतीय सर्ग : कृष्ण सन्देश (2017, 15)

बारह वर्ष का वनवास और अज्ञातवास की एक वर्ष की अवधि समाप्त हो जाने पर पाण्डव अपने नगर इन्द्रप्रस्थ लौट आते हैं और दुर्योधन से अपना राज्य वापस माँगते हैं, लेकिन दुर्योधन पाण्डवों को एक सूई की नोंक के बराबर भूमि देने से भी मना कर देता है। श्रीकृष्ण सन्धि प्रस्ताव लेकर कौरवों के पास आते हैं। दुर्योधन इस सन्धि प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करता और श्रीकृष्ण को ही बन्दी बनाने का प्रयास करता है। श्रीकृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाकर उसे भयभीत कर दिया। दुर्योधन के न मानने पर श्रीकृष्ण ने कर्ण को समझाया। श्रीकृष्ण ने कर्ण को उसके जन्म का इतिहास बताते हुए उसे पाण्डवों का बड़ा भाई बताया और युद्ध के दुष्परिणाम भी समझाए, लेकिन कर्ण ने श्रीकृष्ण की बातों को नहीं माना और कहा कि वह युद्ध में पाण्डवों की ओर से सम्मिलित नहीं होगा। दुर्योधन ने उसे जो सम्मान और स्नेह दिया है, वह उसका आभारी है।

चतुर्थ सर्ग : कर्ण के महादान की कथा

‘रश्मिरथी’ खंडकाव्य के चतुर्थ सर्ग का कथानक अपने शब्दों में लिखिए। (2008, 12)
जय कर्ण ने पाण्डवों के पक्ष में जाने से मना कर दिया, तो इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण कर कर्ण के पास आए। वह कर्ण को दानवीरता की परीक्षा लेना चाहते थे। कर्ण इन्द्र के इस छल-प्रपंच को पहचान गया, परन्तु फिर भी उसने इन्द्र को सूर्य के द्वारा दिए गए कवच और कुण्डल दान में दे दिए। इन्द्र कर्ण की इस दानवीरता को देखकर अत्यन्त लज्जित हुए। उन्होंने स्वयं को प्रवंचक, कुटिल और पापी कहा तथा प्रसन्न होकर कर्ण को ‘एकनी’ नामक अमोघ शक्ति प्रदान की।

पंचम सर्ग : माता की विनती (2013 10)

अथवा
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती-कर्ण के संवाद की घटना का सारांश लिखिए। (2018)
अथवा
‘रश्मिरथी’ के पंचम सर्ग की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए। (2016)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के पंचम सर्ग में कुन्ती और कर्ण के संवाद का सारांश अपने शब्दों में लिखिए। (2010)

कुन्ती को चिन्ता है कि रणभूमि में मेरे ही दोनों पुत्र कर्ण और अर्जुन परस्पर युद्ध करेंगे। इससे चिन्तित हो वह कर्ण के पास जाती है और उसे उसके जन्म के विषय में सब बताती है। कर्ण कुन्ती की बातें सुनकर भी दुर्योधन का साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता है, किन्तु अर्जुन को छोड़कर अन्य किसी पाण्डव को न मारने का वचन कुन्ती को दे देता है। कर्ण कहता है कि तुम प्रत्येक दशा में पाँच पाण्डवों की माता बनी रहोगी। कुन्ती निराश हो जाती है। कर्ण ने युद्ध समाप्त होने के पश्चात् कुन्ती की सेवा करने की बात कही। कुन्ती निराश मन से लौट आती है।

षष्ठ सर्ग : शक्ति परीक्षण

श्रीकृष्ण इस बात से भली-भाँति परिचित थे कि कर्ण के पास इन्द्र द्वारा दी गई ‘एकघ्नी शक्ति है। जब कर्ण को सेनापति बनाकर युद्ध में भेजा गया तो श्रीकृष्ण ने घटोत्कच को कर्ण से लड़ने के लिए भेज दिया।

दुर्योधन के कहने पर कर्ण ने घटोत्कच को एकनी शक्ति से मार दिया। इस, विजय से कर्ण अत्यन्त दुःखी हुए, पर पाण्डव अत्यन्त प्रसन्न हुए। श्रीकृष्ण ने अपनी नीति से अर्जुन को अमोघशक्ति से बचा लिया था, परन्तु कर्ण ने फिर भी छल से दूर रहकर अपने व्रत का पालन किया।

सप्तम सर्ग : कर्ण के बलिदान की कथा (2011)

रश्मिरथी खण्डकाव्य के सप्तम सर्ग की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए। (2016)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के अन्तिम सर्ग की विवेचना कीजिए। (2014, 13)
कर्ण को पाण्डवों से भयंकर युद्ध होता है। वह युद्ध में अन्य सभी पाण्डवों को पराजित कर देता है, पर माता कुन्ती को दिए गए वचन का स्मरण कर सबको छोड़ देता है। कर्ण और अर्जुन आमने-सामने हैं। दोनों ओर से घमासान युद्ध होता है। अर्जुन कर्ण के बाणों से विचलित हो उठते हैं। एक बार तो वह मूर्छित भी हो जाते हैं। तभी कर्ण के रथ का पहिया कीचड़ में फंस जाता है। कर्ण रथ से उतरकर पहिया निकालने लगता है, तभी श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्ण पर बाण चलाने की आज्ञा देते हैं।

श्रीकृष्ण के संकेत करने पर अर्जुन निहत्थे कर्ण पर प्रहार कर देते हैं। कर्ण की मृत्यु हो जाती है, पर वास्तव में नैतिकता की दृष्टि से तो कर्ण ही विजयी रहता है। श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि विजय तो अवश्य मिली, पर मर्यादा खोकर।

प्रश्न 2.
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की सामान्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2018)
अथवा

‘रश्मिरथी’ में प्राचीन पृष्ठभूमि पर आधुनिक समस्याओं का निरूपण किया गया है। स्पष्ट कीजिए। (2016)
अथवा
‘रश्मिरथी’ की भाषा की स्वाभाविक सहजता पर अपने विचार प्रकट कीजिए। (2012)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए। (2017)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2014, 13)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए। (2013)
अथवा
किन विशेषताओं के आधार पर ‘रश्मिरथी’ को उच्च कोटि का काव्य माना जाता है? (2013)
अथवा
“रश्मिरथी’ काव्य खण्ड में व्यक्ति की उदात्त एवं आदर्श भावनाओं की अभिव्यक्ति हुई है। इस कथन की सार्थकता पर प्रकाश डालिए। (2011)
अथवा
‘रश्मिरथी में कवि का मन्तव्य कर्ण के चरित्र के शीलपक्ष, मैत्री भाव तथा शौर्य का चित्रण करना है।” सिद्ध कीजिए। (2014, 11)
उत्तर:
राष्ट्रकवि रामधारीसिंह ‘दिनकर’ सदैव देशप्रेम एवं मानवतावादी दृष्टिकोण के समर्थक रहे हैं। रश्मिरथी’ खण्डकाव्य इसका अपवाद नहीं है। इस खण्डकाव्य की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

कथानक

‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य का कथानक ‘महाभारत’ के प्रसिद्ध पात्र कर्ण के जीवन प्रसंग पर आधारित हैं। इन प्रसंगों ने कर्ण के व्यक्तित्व को एक नई छवि प्रदान की है। कथानक का संगठन सुनियोजित प्रकार से किया गया है।

प्रसंगों का समय भिन्न-भिन्न है, लेकिन उन्हें इस प्रकार श्रृंखलाबद्ध किया गया हैं। कि कथा के प्रवाह में बाधा नहीं पड़ती और उसका क्रमबद्ध विकास होता है। कथा का अन्त इस प्रकार किया गया है कि वह कर्ण की विशेषताओं को विभूषित करते हुए समाप्त हो जाती है।

पात्र एवं चरित्र-चित्रण

इस खण्डकाव्य में कर्ण के उपेक्षित जीवन और उसकी चारित्रिक विशेषताओं पर ही प्रकाश डालना कवि का उद्देश्य रहा है। अन्य पात्रों का चुनाव इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया गया है।

कथानक में एक भी अनावश्यक पात्र को स्थान नहीं दिया गया है। कर्ण के चरित्र में वर्तमान युग के सामाजिक स्तर पर उपेक्षित व्यक्तियों एवं कुन्ती के रूप में समाज के नियमों से प्रताड़ित नारियों की व्यथा को स्वर दिया गया है। इस प्रकार इस खण्डकाव्य में पात्रों का चरित्र-चित्रण अत्यन्त स्वाभाविक ढंग से हुआ है।

कर्ण जैसे महान् गुणों से सम्पन्न. नायक को कवि ने मुख्य पात्र बनाया है। अन्य पात्रों का चित्रण कर्ण की चारित्रिक विशेषताओं को प्रकाशित करने के लिए किया गया है। सम्पूर्ण काव्य में वीर रस को ही प्रधानता दी गई है। छन्दों में अवश्य विभिन्नता है। आदर्शोन्मुख उद्देश्य के लिए लिखी गई इस रचना को सफल खण्डकाव्ये कहा जा सकता हैं।

‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य का उद्देश्य (2013)

‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के माध्यम से कवि ने उपेक्षित, लेकिन प्रतिभावान मनुष्यों के स्वर को वाणी दी है। यदि कर्ण को बचपन से समुचित सम्मान प्राप्त हुआ होता, जन्म, जाति और कुल आदि के नाम पर उसे अपमानित न किया गया होता तो वह कौरवों का साथ कभी भी नहीं देता। शायद तब महाभारत का युद्ध भी नहीं हुआ होता। कवि ने यह स्पष्ट किया है कि प्रतिभाएँ कुण्ठित होकर समाज को पतन की ओर अग्रसर कर देती हैं।

इस खण्डकाव्य में प्राचीन पृष्ठभूमि पर आधुनिक समस्याओं का निरूपण किया गया है। इसमें समाज में नारियों की मनोदशा का भी यथार्थ वर्णन किया गया है, साथ ही समाज में उनकी स्थिति पर भी प्रकाश डाला गया है। इस प्रकारे उद्देश्य की दृष्टि से भी यह एक सफल खण्डकाव्य है।

इस खण्डकाव्य में प्राचीन पृष्ठभूमि पर आधुनिक समस्याओं का निरूपण किया गया है। इसमें समाज में नारियों की मनोदशा का भी यथार्थ वर्णन किया गया है, साथ ही समाज में उनकी स्थिति पर भी प्रकाश डाला गया है। इस प्रकारे उद्देश्य की दृष्टि से भी यह एक सफल खण्डकाव्य है।

काव्यगत विशेषताएँ

प्रस्तुत खण्डकाव्य ‘रश्मिरथी’ की काव्यगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।
भावपक्षीय विशेषताएँ

1. वण्र्य विषय खण्डकाव्य की दृष्टि से यह एक सफल खण्डकाव्य है। इसके कथानक की रचना में कवि ने अपनी सूझबूझ का अच्छा परिचय दिया है। दिनकर जी की इस रचना का प्रमुख पात्र कर्ण है। वह समाज के उन व्यक्तियों का प्रतीक है, जो वर्ण-व्यवस्था पर आधारित अमानवीय क्रूरता एवं जड़ नैतिक मान्यताओं की विभीषिका के शिकार हैं।

वर्ण व्यवस्था, जाति-प्रथा, एवं ऊँच-नीच की भावना वर्तमान युग की ज्वलन्त समस्याएँ हैं। इन्हीं के कारण भारतीय समाज में योग्य एवं कर्मठ व्यक्तियों की उपेक्षा एक सामान्य बात है। कर्ण ऐसे ही पीड़ित एवं उपेक्षित जनों को आदर्श प्रतीक है।

2. प्रकृति चित्रण यद्यपि रश्मिरथी काव्य में प्रकृति चित्रण कवि का विषय नहीं है, तथापि पात्रों के चित्रण-वर्णन के दौरान यत्र-तत्र प्रकृति का चित्रण हुआ है, जो अत्यन्त सशक्त है; जैसे|

  • अम्बुधि में आकटक निमज्जित, कनक खचित पर्वत-सा।
  • हँसती थीं रश्मियाँ रजत से भरकर वारि विमले को।।
  • कदली के चिकने पातों पर पारद चमक रहा था।

3. रस निरूपण प्रस्तुत खण्डकाव्य में वीर रस की प्रधानता है। साथ ही करुण एवं वात्सल्य रस को भी स्थान दिया गया है। जहाँ कर्ण और कुन्ती का वार्तालाप हैं, वहाँ वात्सल्य रस देखने को मिलता है-

“मेरे ही सुत मेरे सुत को ही मारें,
हो क्रुद्ध परस्पर ही प्रतिशोध उतारें।’

कलापक्षीय विशेषताएँ। (2010)
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की कलापक्षीय विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं।

  1. भाषा-शैली रश्मिरथी खण्डकाव्य में अधिकतर संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है। तद्भव शब्दों का भी प्रयोग दृष्टिगत होता है। वास्तव में, यह काव्य शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली में रचित काव्य है। कवि ने अपनी काव्यात्मक भाषा को कहीं भी बोझिल नहीं होने दिया है। सूक्तिपरकता का भी प्रयोग किया गया है। प्राचीन शब्दावली का प्रयोग किया है, जहाँ युद्ध, घटनाओं एवं परिस्थितियों को स्वाभाविक रूप देने का प्रयास किया गया है।
  2. छन्द एवं अलंकार कवि ने प्रत्येक सर्ग में अलग-अलग छन्द प्रयोग किए हैं। विषय, मानसिक परिस्थितियों तथा घटनाओं के संवेदनात्मक पक्ष को दृष्टि में रखते हुए इनका आयोजन किया गया है। अलंकारों में सहजता और संक्षिप्तता है, वे स्वाभाविक रूप से ही प्रयुक्त हुए हैं। वस्तुतः अलंकारों के प्रदर्शन के प्रति कवि की रुचि नहीं है। इस प्रकार भावात्मक एवं कलात्मक दृष्टि से रश्मिरथी’ खण्डकाव्य एक उत्कृष्ट रचना है। यह रचना वर्तमान युग के लिए अत्यन्त उपयोगी है, जो आधुनिक युग के
    समाज की बुराइयों को दूर करने का सन्देश देती है।
  3. उद्देश्य ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के माध्यम से कवि ने उपेक्षित, लेकिन प्रतिभावान मनुष्यों के स्वर को वाणी दी है। यदि कर्ण को बचपन से समुचित सम्मान प्राप्त हुआ होता तथा जन्म, जाति और कुल आदि के नाम पर उसे अपमानित न किया गया होता, तो वह कौरवों का साथ कभी भी नहीं देता। शायद तब महाभारत का युद्ध भी नहीं हुआ होता। कवि ने यह स्पष्ट किया है कि प्रतिभाएँ कुण्ठित होकर समाज को पतन की ओर अग्रसर कर देती हैं।

प्रश्न 3.
“रश्मिरथी’ के प्रत्येक सर्ग में संवादात्मक स्थल ही सबसे प्रमुख है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए। (2011)
अथवा
“रश्मिरथी खण्डकाव्य की संवाद योजना बड़ी सशक्त है।” इस कथन पर अपने विचार व्यक्त कीजिए। (2012)
उत्तर:
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के संवादों में नाटकीयता के गुण विद्यमान हैं। यह नाटकीयता सर्वत्र देखी जा सकती है। इसमें सरलता, सुबोधता, स्वाभाविकता के साथ-साथ प्रभावशीलता भी देखने को मिलती है|

“उड़ती वितर्क-धागे पर चंग-सरीखी,
सुधियों की सहती चोट प्राण पर तीखी।
आशा-अभिलाषा भरी, डरी, भरमाई,
कुन्ती ज्यों-ज्यों जाह्नवी तीर पर आई।

कवि ने प्रभावशाली संवाद शैली का अनुसरण करते हुए वर्णनात्मक शैली की कमियों का निराकरण कर दिया है-

“पाकर प्रसन्न आलोक नया, कौरवसेना का शोक गया।
आशा की नवल तरंग उठी, जन-जन में नई उमंग उठी।”

सर्गों का क्रम भी कवि की रचनात्मक विशेषताओं को व्यक्त करता है। छन्द एवं अलंकार कवि ने प्रत्येक सर्ग में अलग-अलग छन्द प्रयोग किए हैं। विषय, मानसिक परिस्थितियों तथा घटनाओं के संवेदनात्मक पक्ष को दृष्टि में रखते हुए इनका आयोजन किया गया हैं। अलंकारों में सहजता और संक्षिप्तता हैं, वे स्वाभाविक रूप से ही प्रयुक्त हुए हैं। वस्तुतः अलंकारों के प्रदर्शन के प्रति कवि की रुचि नहीं हैं। इस प्रकार भावात्मक एवं कलात्मक दृष्टि से ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य एक उत्कृष्ट रचना है। यह रचना वर्तमान युग के लिए अत्यन्त उपयोगी है, जो आधुनिक युग के समाज की बुराइयों को दूर करने का सन्देश देती है।

चरित्र-चित्रण पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 4.
“कर्ण महान् योद्धा के साथ-साथ दानवीर भी है।” इस कथन के आधार पर कर्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2018)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के नायक के चरित्र की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (2018)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र की चरित्रिक विशेषताओं को अपने शब्दों में प्रस्तुत कीजिए। (2018)
अथवा
रश्मिरथी के माध्यम से कवि दिनकर ने महारथी कर्ण के किन गुणों पर प्रकाश डाला है? अपने शब्दों में लिखिए। (2017)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण के चरित्र की विशेषताएँ बताइट।
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2017)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण के चरित्र पर प्रकाश डालिए। (2018, 16)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (2016)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा
‘रश्मिरथी’ के कर्ण के व्यक्तित्व की उल्लेखनीय विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (2016)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर प्रमुख पात्र कर्ण के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र (नायक कर्ण) का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन/चारित्रिक मूल्यांकन) कीजिए। (2018, 17, 15, 14, 13, 12, 11)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के कर्ण दानवीर थे, परन्तु वह मानसिक अन्तर्द्वन्द्व से भी ग्रस्त थे। ऐसा क्यों? स्पष्ट कीजिए। (2011)
अथवा
कर्ण के चरित्र में ऐसे कौन-से गुण हैं, जो उसे महामानव की कोटि तक उठा देते हैं? (2012, 11)
अथवा
“रश्मिरथी खण्डकाव्य में उदात्त मानवीय चरित्र का उद्घाटन किया गया है। इस कथन की समीक्षा कीजिए। (2013)
उत्तर:
प्रस्तुत खण्डकाव्य ‘रश्मिरथी’ के आधार पर कर्ण के चरित्र की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

1. महान् धनुर्धर कर्ण की माता कुन्ती और पिता सूर्य थे। लोकलाज के भय से कुन्ती अपने पुत्र को नदी में बहा देती है, तब एक सूत उसका लालन-पालन करता है। सूत के घर पलकर भी कर्ण महादानी एवं महान् धनुर्धर बनता है। एक दिन अर्जुन रंगभूमि में अपनी बाणविद्या का प्रदर्शन करता है, तभी वहाँ आकर कर्ण भी अपनी धनुर्विद्या का प्रभावपूर्ण प्रदर्शन करता है। कर्ण के इस प्रभावपूर्ण प्रदर्शन को देखकर द्रोणाचार्य एवं पाण्डव उदास हो जाते हैं।

2. सामाजिक विडम्बना का शिकार कर्ण क्षत्रिय कुल से सम्बन्धित था, लेकिन उसका पालन-पोषण एक सूत के द्वारा हुआ, जिस कारण वह सूतपुत्र कहलाया और इसी कारण उसे पग-पग पर अपमान का बूंट पीना पड़ा। शस्त्र विद्या प्रदर्शन के समय प्रदर्शन स्थल पर उपस्थित होकर वह अर्जुन को ललकारता है, तो सब स्तब्ध रह जाते हैं। यहाँ पर कर्ण को कृपाचार्य की कूटनीतियों का शिकार होना पड़ता है। द्रौपदी के स्वयंवर में भी उसे अपमानित होना पड़ा था।

3. सच्चा मित्र कर्ण दुर्योधन का सच्चा मित्र है। दुर्योधन कर्ण की वीरता से प्रसन्न होकर उसे अंगदेश का राजा बना देता है। इस उपकार के बदले भावविह्वल कर्ण सदैव के लिए दुर्योधन का मित्र बन जाता है। वह श्रीकृष्ण और कुन्ती के प्रलोभनों को ठुकरा देता है। वह श्रीकृष्ण से कहता है कि मुझे स्नेह और सम्मान दुर्योधन ने ही दिया। अतः मेरा तो रोम-रोम दुर्योधन का ऋणी है। वह तो सब कुछ दुर्योधन पर न्योछावर करने को तत्पर रहता है।

4. गुरुभक्त कर्ण सच्चा गुरुभक्त हैं। वह अपने गुरु के प्रति विनयी एवं श्रद्धालु है। एक दिन परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर सोए हुए थे तभी एक कीट कर्ण की जंघा में घुस जाता है, रक्त की धारा बहने लगती है, वह चुपचाप पीड़ा को सहता है, क्योकि पैर हिलाने से गुरु की नींद खुल सकती थी, लेकिन आँखें खुलने पर वह गुरु को अपने बारे में सब कुछ बता देता है। गुरु क्रोधित होकर उसे आश्रम से निकाल देते हैं, लेकिन वह अपनी विनय नहीं छोड़ता और गुरु के चरण स्पर्श कर वहाँ से चल देता है।

5. महादानी कर्ण महादानी है। प्रतिदिन प्रात:काल सन्ध्या वन्दना करने के पश्चात् वह याचकों को दान देता है। उसके द्वार से कभी कोई याचक खाली नहीं लौटा। कर्ण की दानशीलता का वर्णन कवि ने इस प्रकार किया है।

“रवि पूजन के समय सामने, जो भी याचक आता था,
मुँह माँगा वह दान कर्ण से, अनायास ही पाता था।”

इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण कर कर्ण के पास आते हैं। यद्यपि कर्ण इन्द्र के छल को पहचान लेता है तथापि वह इन्द्र को सूर्य द्वारा दिए गए कवच और कुण्डल दान में दे देता है।

6. महान् सेनानी कौरवों की ओर से कर्ण सेनापति बनकर युद्धभूमि में प्रवेश करता है। युद्ध में अपने रण कौशल से वह पाण्डवों की सेना में हाहाकार मचा देता है। अर्जुन भी कर्ण के बाणों से विचलित हो उठते हैं। श्रीकृष्ण भी उसकी वीरता की प्रशंसा करते हैं। भीष्म उसके विषय में कहते हैं

“अर्जुन को मिले कृष्ण जैसे,
तुम मिले कौरवों को वैसे।”

इस प्रकार कहा जा सकता है कि कर्ण का चरित्र दिव्य एवं उच्च संस्कारों से युक्त है। वह शक्ति का स्रोत है, सच्चा मित्र है, महादानी और त्यागी है। वस्तुतः उसकी यही विशेषताएँ उसे खण्डकाव्य का महान् नायक बना देती हैं।

प्रश्न 5.
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्रांकन कीजिए। (2018, 17, 10)
अथवा
‘रश्मिरथी’ के आधार पर श्रीकृष्ण के विराट व्यक्तित्व को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
‘दिनकर’ जी द्वारा रचित ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण की चारित्रिक विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं।

1. युद्ध विरोधी एवं मानवता का पक्षधर ‘रश्मिरथी’ के श्रीकृष्ण युद्ध के प्रबल विरोधी हैं और मानवता के प्रति संवेदनशील हैं। उन्हें यह ज्ञात है कि युद्ध की विभीषिका मानवता के लिए कितनी दुखदायी होती है। पाण्डवों के वनवास से लौटने के पश्चात् श्रीकृष्ण कौरवों को समझाने के लिए हस्तिनापुर जाते हैं और युद्ध को टालने का भरसक प्रयत्न करते हैं, किन्तु हठी दुर्योधन नहीं मानता। कौरवों से पाण्डवों के लिए वे पाँच गाँव ही माँगते हैं। दुर्योधन के द्वारा अस्वीकार करने पर वे सोचते हैं कि वह कर्ण की शक्ति प्राप्त कर ही युद्ध में अपनी जीत की कल्पना कर रहा है। यदि कर्ण उसका साथ छोड़ दे तो यह युद्ध रोका जा सकता है। इस युद्ध को रोकने के लिए उन्होंने कर्ण से कहा-

यह मुकुट मान सिंहासन ले,
बस एक भीख मुझको दे दे।
कौरव को तेज रण रोक सखे,
भु का हर भावी शोक सखे।

2. निडर एवं स्फुटवक्ता श्रीकृष्ण निडर एवं स्फुटवक्ता अर्थात् बात को स्पष्ट कहने वाले हैं। वे युद्ध नहीं चाहते हैं। वे चाहते हैं कि कौरवों और पाण्डवों के मध्य सुलह हो जाए। इसके आधार पर उन्हें कायर नहीं कहा जा सकता। वे दुर्योधन को अनेक प्रकार से समझाने का प्रयास करते हैं, लेकिन वह मानने के लिए तैयार नहीं है, अपनी जिद पर अड़ा है, लेकिन जब वह उनके हित की दृष्टि से दी गई सलाह को नहीं मानती है तो वे कहते हैं कि-

तो ले अब मैं भी जाता है,
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।

3. सदाचारी एवं व्यावहारिक श्रीकृष्ण सदाचारी एवं व्यावहारिक हैं। उनके सभी कार्य सदाचार एवं शील के परिचायक हैं। उनका उद्देश्य सदाचारपूर्ण समाज की स्थापना करना है और वे यही चाहते हैं कि सभी सदाचरण करें। वे सदाचार को ही जीवन का सार मानते हुए कहते हैं कि-

नहीं पुरुषार्थ केवल जाति में है,
विभा का सार शील पुनीत में है।

4. गुणवानों के पक्षधर ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के श्रीकृष्ण गुणवान व्यक्तियों के प्रबल समर्थक एवं प्रशंसक हैं। इस कारण वे अपने विरोधी के गुणों का भी सम्मान करते हैं। यद्यपि कर्ण कौरव पक्ष का योद्धा था फिर भी श्रीकण के मन में उसके गुणों के प्रति बहुत आदर है। वे उसका गुणगान करते नहीं थकते। उसकी मृत्यु के उपरान्त वे अर्जुन से उसके बारे में कहते हैं कि-

मगर, जो हो, मनुज सुवरिष्ठ था वह,
घनुर्धर ही नहीं, घमिष्ठ था वह।
वीर शत बार धन्य
तुझ-सा न मित्र कोई अनन्य।

5. कूटनीतिज्ञ ‘दिनकर’ द्वारा रचित ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के श्रीकृष्ण कूटनीतिज्ञ हैं। महाभारत के श्रीकृष्ण के चरित्र से उनके चरित्र की विशेषताएँ मिलती हैं, किन्तु इस खण्डकाव्य में उनके कूटनीतिज्ञ स्वरूप का ही चित्रण हुआ है। पाण्डवों की जीत का आधार उनकी कूटनीति ही थी। वे पाण्डवों की ओर से कूटनीति की चाल चलकर दुर्योधन की सबसे बड़ी शक्ति कर्ण को उससे अलग करने का प्रयास करते हैं। उनकी कूटनीतिज्ञता का पता इन पंक्तियों में उनके द्वारा कहा गया यह कथन स्पष्ट करता है–

कुन्ती का तू ही तनय श्रेष्ठ,
बलशील में परम श्रेष्ठ।
मस्तक पर मुकुट धरेंगे हम,
तेरा अभिषेक करेंगे हम,

6. अलौकिक गुणों से युक्त ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के श्रीकृष्ण महाभारत के श्रीकृष्ण की ही तरह अलौकिक गुणों से युक्त हैं। वे लीलामय पुरुष हैं, क्योंकि उनमें अलौकिक शक्ति विद्यमान है। जब वे दुर्योधन के दरबार में पाण्डवों के दूत बनकर जाते हैं, तो दुर्योधन उन्हें बाँधना चाहता है और कैद करना चाहता है, तो उस समय वे अपना लीलामय विराट स्वरूप दिखाते है-

हरि ने भीषण हुँकार किया,
अपना स्वरूप विस्तार किया,
डगमग-इगमग दिग्गज डोले,
भगवान, कुपित होकर बोले
जंजीर बढ़ाकर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

इस प्रकार उपरोक्त बिन्दुओं को दृष्टिगत रखते हुए हम कह सकते हैं कि श्रीकृष्ण निडर एवं स्फुटवक्ता, अलौकिक गुणों से युक्त होते हुए महाभारत के श्रीकृष्ण के चरित्र के समस्त गुणों को अपने अन्दर समाहित किए हुए हैं। इसके साथ-ही-साथ उनका चरित्र लोकमंगल की भावना से युक्त है। श्रीकृष्ण का यह स्वरूप कवि ने इस खण्डकाव्य में युग के अनुसार ही प्रकट किया है। इसके कारण उनके महाभारतकालीन चरित्र पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है-

प्रश्न 6.
“रश्मिरथी खण्डकाव्य के नारी-पात्र कुन्ती के चरित्र में कवि ने मातृत्व के भीषण अन्तर्द्वन्द्व की पुष्टि की है।” इस कथन की सार्थकता कीजिए। (2018)
अथवा
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती के चरित्र की विशेषताएँ बताइए। (2016)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के प्रधान नारी (कुन्ती) पात्र का चरित्रांकन कीजिए। (2018, 16)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर कुन्ती के चरित्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2013, 12, 11)
अथवा
“कुन्ती के चरित्र में कवि ने मातृत्व के भीषण अन्तर्द्वन्द्व की सृष्टि की है।” इस कथन के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2010)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में प्रस्तुत कुन्ती के मन की घुटन का विवेचन कीजिए। (2011)
उत्तर:
कुन्ती पाण्डवों की माता है। सूर्यपुत्र कर्ण का जन्म कुन्ती के गर्भ से ही हुआ था। इस प्रकार कुन्ती के पाँच नहीं वरन् छः पुत्र थे। कुन्ती की चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं।

  1. समाज भीरू कुन्ती लोकलाज के भय से अपने नवजात शिशु को गंगा में बहा देती है। वह कभी भी उसे स्वीकार नहीं कर पाती। उसे युवा और धीरत्व की मूर्ति बने देखकर भी अपना पुत्र कहने का साहस नहीं कर पाती। जब युद्ध की विभीषिका सामने आती है, तो वह कर्ण से एकान्त में मिलती है और अपनी दयनीय स्थिति को व्यक्त करती है।
  2. एक ममतामयी माँ कुन्ती ममता की साक्षात् मूर्ति है। कुन्ती को जब पता चलता है कि कर्ण का उनके अन्य पाँच पुत्रों से युद्ध होने वाला है, तो वह कर्ण को मनाने उसके पास जाती है और उसके प्रति अपना ममत्व एवं वात्सल्य प्रेम प्रकट करती है। वह नहीं चाहती कि उनके पुत्र युद्धभूमि में एक-दूसरे के साथ संघर्ष करें। यद्यपि कर्ण उनकी बातें स्वीकार नहीं करता, पर वह उसे आशीर्वाद देती है, उसे अंक में भरकर अपनी वात्सल्य भावना को सन्तुष्ट करती है।
  3. अन्तर्द्वन्द्व ग्रस्त कुन्ती के पुत्र परस्पर शत्रु बने हुए थे, तब कुन्ती के मन में भीषण अन्तर्द्वन्द्व मचा हुआ था, वह बड़ी उलझन में पड़ी हुई थी कि पाँचों पाण्डवों और कर्ण में से किसी की भी हानि हो, पर वह हानि तो मेरी ही होगी। वह इस स्थिति को रोकना चाहती थीं, परन्तु कर्ण के अस्वीकार कर देने पर वह इस नियति को सहने के लिए विवश हो जाती है। इस प्रकार कवि ने ‘रश्मिरथी’ में कुन्ती के चरित्र में अनेक उच्च गुणों का समावेश किया है। और इस विवश माँ की ममता को महान् बना दिया है।

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UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 9 स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम पर्यावरण का प्रभावएवं 

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Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 9
Chapter Name  स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम पर्यावरण का प्रभावएवं
Number of Questions Solved 15
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 9 स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम पर्यावरण का प्रभावएवं

बहुविकल्पीय प्रश्न  (1 अंक)

प्रश्न 1.
लोगों को स्वास्थ्य के सभी पहलुओं से अवगत करना कहलाती है
(a) जन शिक्षा
(b) स्वास्थ्य शिक्षा
(c) भौतिक शिक्षा
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) स्वास्थ्य शिक्षा|

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य शिक्षा में सम्मिलित हैं
(a) पर्यावरण
(b) शारीरिक स्वास्थ्य
(c) सामाजिक स्वास्थ्य
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 3.
स्वास्थ्य शिक्षा में सहायक संस्थाएँ मानी जाती हैं
(a) परिवार
(b) विद्यालय
(c) नगर निगम
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 4.
परिवार नियोजन केन्द्रों में किस सन्दर्भ में जानकारी दी जाती
(a) बाल शिशु सुरक्षा
(b) प्राथमिक चिकित्सा
(c) जनसंख्या वृद्धि
(d) मातृ शिशु सुरक्षा
उत्तर:
(c) जनसंख्या वृद्धि

प्रश्न 5.
यूनिसेफ का मुख्य कार्यालय है   (2018)
(a) पेरिस में
(b) न्यूयार्क में
(C) टोकियो
(d) हनोई में
उत्तर:
(b) न्यूयार्क में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 1 अंक, 25 शब्द

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य शिक्षा किसे कहते हैं?
उत्तर:
जन सामान्य को स्वास्थ्य के सभी पहलुओं से अवगत कराना ही स्वास्थ्य शिक्षा कहलाती है। यह एक ऐसा साधन है, जिससे कुछ विशेष शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों की सहायता से लोगों को स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान तथा व्याधियों से बचने के उपायों का प्रसार किया जा सकता है।

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य शिक्षा का मुख्य उद्देश्य क्या है? (2018)
उत्तर:
लोगों के स्वास्थ्य को उत्तम बनाना एवं स्वास्थ्य नियमों से अवगत कराना। स्वास्थ्य शिक्षा मुख्य उद्देश्य है। इसके तहत, राज्य, जिलों व अन्य स्तरों पर स्वास्थ्य शिक्षा इकाइयों की संगठनात्मक व्यवस्था और प्रचालन हेतु दिशा-निर्देश प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 3.
व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए किन नियमों का पालन करना चाहिए? (2018)
उत्तर:
व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ परिवेश के साथ प्रतिदिन स्नान, शरीर के वस्त्रों की सफाई, दाँतों, आखों की सफाई तथा नाखूनों आदि को काटना चाहिए।

प्रश्न 4.
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र क्या है? (2018)
उत्तर:
यह स्वास्थ्य केन्द्र ग्रामीण जनता को स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों की जानकारी देने, रोगों से बचाव, स्वच्छता, शिशु की देखभाल तथा गर्भवती स्त्रियों को पोषण से सम्बन्धी जानकारी प्रदान करते हैं। यह केन्द्र निःशुल्क होते हैं।

प्रश्न 5.
राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के नाम बताइए, जो जनस्वास्थ्य के कार्यक्रमों में सहायक हैं।
उत्तर:
जनस्वास्थ्य से सम्बन्धित संस्थाए निम्नलिखित हैं- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), यूनीसेफ (UNICEF), केयर (CARE) तथा रेडक्रॉस सोसायटी (Red Cross Society) आदि।

प्रश्न 6.
केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो की स्थापना कब की गई?
उत्तर देश में स्वास्थ्य शिक्षा से सम्बन्धित जागरूकता लाने के लिए सरकार द्वारा वर्ष 1956 में केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय के अन्तर्गत केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो की स्थापना की गई।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक, 50 शब्द)

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य शिक्षा को विकसित करने के लिए केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो द्वारा कौन-कौन से उद्देश्य बताए गए हैं?
उत्तर:
देश में स्वास्थ्य शिक्षा को विकसित करने और बढ़ावा देने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो ने निम्नलिखित उद्देश्य बताए हैं।

  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मन्त्रालय की योजनाओं, कार्यक्रमों और उपलब्धियों की व्याख्या करना।
  • स्वास्थ्य व्यवहार, स्वास्थ्य शिक्षा प्रक्रियाओं और साधनों के लिए सन्दर्शिका तैयार करना और शोध आयोजित करना।
  • विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं और कार्यक्रमों से सम्बन्धित स्वास्थ्य शिक्षा सामग्री को तैयार करके टाइप कराकर वितरित करना।।
  • प्रमुख स्वास्थ्य और समुदाय कल्याण कर्मियों को स्वास्थ्य शिक्षा और शोध की विधियों में प्रशिक्षित करना, प्रशिक्षण के लिए प्रभावशाली विधि और प्रशिक्षण के साधन विकसित करना।
  • विद्यालय के छात्रों हेतु स्वास्थ्य शिक्षा के लिए विद्यालयों और शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों की सहायता करना।
  • राज्य, जिला और अन्य स्तरों पर स्वास्थ्य शिक्षा इकाइयों की संगठनात्मक व्यवस्था और प्रचालन हेतु दिशा निर्देश प्रदान करना।
  • स्वास्थ्य शिक्षा कार्य में लगी आधिकारिक और गैर-आधिकारिक एजेन्सियों को तकनीकी सहायता प्रदान करना और उनके कार्यक्रमों को समन्वित करना।

प्रश्न 2.
सरकारी स्वास्थ्य विभाग द्वारा कौन-कौन सी संस्थाएँ संचालित होती हैं? संक्षेप में समझाइए।
उत्तरे:
देश में स्वास्थ्य शिक्षा से सम्बन्धित जागरूकता लाने के लिए सरकार द्वारा वर्ष | 1956 में केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय के अन्तर्गत केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो की स्थापना की गई, अन्य संस्थाएँ निम्नलिखित हैं।

1. केन्द्रीय स्वास्थ्य संगठन केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो का गठन वर्ष 1957 में किया गया, जिसमें स्वास्थ्य शिक्षा का प्रचार करने के लिए तीन अलग-अलग विभाग बनाए गए।

  1. प्राथमिक स्कूलों के लिए कार्य करने वाले
  2. माध्यमिक विद्यालयों के लिए।
  3. शिक्षा प्रशिक्षण विद्यालयों के लिए

2. राज्य स्वास्थ्य विभाग वर्ष 1959 में केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय के प्रस्ताव से 13 राज्यों में राज्य स्वास्थ्य ब्यूरो स्थापित किए गए, जिनके मुख्य कार्य हैं।

  1. चिकित्सालय परिवार नियोजन केन्द्र तथा स्वास्थ्य केन्द्र स्थापित करना।
  2. स्वास्थ्य शिक्षा हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम चलाना।
  3. क्षेत्र विकास खण्डों में स्वास्थ्य केन्द्र स्थापित करना।

3. जिला स्वास्थ्य विभाग प्रत्येक जिले में एक स्वास्थ्य विभाग होता है तथा नगर के सभी अस्पताल इसी के अन्तर्गत आते हैं

4. नगर परिषद् स्वास्थ्य विभाग इस विभाग का मुख्य कार्य नगर में फैलने वाली बीमारियों को रोकना है। यह विभाग नगर में स्वास्थ्य सुरक्षा के कार्य करता है; जैसे-साफ-सफाई, शुद्ध पेयजल, संक्रामक रोगों की रोकथाम आदि।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक, 100 शब्द)

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य शिक्षा से क्या आशय है? स्वास्थ्य शिक्षा के उददेश्य तथा शिक्षा में सहायक संस्थाओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
स्वास्थ्य शिक्षा क्या है? स्वास्थ्य शिक्षा में कौन-कौन सी सस्थाएँ सहायक हैं?
उत्तर:
जन सामान्य को स्वास्थ्य के सभी पहलुओं से अवगत कराना ही स्वास्थ्य शिक्षा कहलाती है। यह एक ऐसा साधन है, जिससे कुछ विशेष शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों की सहायता से लोगों को स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान तथा व्याधियों से बचने के उपायों का प्रसार किया जा सकता है।
स्वास्थ्य शिक्षा के उद्देश्य
स्वास्थ्य शिक्षा के अन्तर्गत पर्यावरण, शारीरिक स्वास्थ्य, सामाजिक स्वास्थ्य तथा बौद्धिक स्वास्थ्य इत्यादि सभी को सम्मिलित किया जाता है। स्वास्थ्य शिक्षा के द्वारा ही व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह ऐसा बर्ताव करता है, जो स्वास्थ्य की उन्नति, रख-रखाव तथा उसकी पुनर्घाप्ति में सहायक हो।
देश में स्वास्थ्य शिक्षा को विकसित करने और बढ़ावा देने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो ने निम्नलिखित उद्देश्य बताए हैं।

  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मन्त्रालय की योजनाओं, कार्यक्रमों और उपलब्धियों की व्याख्या करना।
  • स्वास्थ्य व्यवहार, स्वास्थ्य शिक्षा प्रक्रियाओं और साधनों के लिए सन्दर्शिका तैयार करना और शोध आयोजित करना।
  • विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं और कार्यक्रमों से सम्बन्धित स्वास्थ्य शिक्षा सामग्री को तैयार करके टाइप कराकर वितरित करना।।
  • प्रमुख स्वास्थ्य और समुदाय कल्याण कर्मियों को स्वास्थ्य शिक्षा और शोध की विधियों में प्रशिक्षित करना, प्रशिक्षण के लिए प्रभावशाली विधि और प्रशिक्षण के साधन विकसित करना।
  • विद्यालय के छात्रों हेतु स्वास्थ्य शिक्षा के लिए विद्यालयों और शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों की सहायता करना।
  • राज्य, जिला और अन्य स्तरों पर स्वास्थ्य शिक्षा इकाइयों की संगठनात्मक व्यवस्था और प्रचालन हेतु दिशा निर्देश प्रदान करना।
  • स्वास्थ्य शिक्षा कार्य में लगी आधिकारिक और गैर-आधिकारिक एजेन्सियों को तकनीकी सहायता प्रदान करना और उनके कार्यक्रमों को समन्वित करना।

स्वास्थ्य शिक्षा में सहायक संस्थाएँ
स्वास्थ्य शिक्षा के सन्दर्भ में निम्नलिखित संस्थाओं का सहयोग है।
1. परिवार इसे बच्चे की प्रथम पाठशाला माना जाता है। परिवार द्वारा बच्चे को स्वास्थ्य की जानकारी तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों का ज्ञान होता है।

2. विद्यालय बालक पारिवारिक वातावरण से निकलकर विद्यालय में प्रवेश करता है, जहाँ उसे स्वस्थ रहने के तरीकों का ज्ञान होता है। विद्यालय में बालक को शारीरिक व्यायाम तथा रोगों से बचाव हेतु शिक्षा दी जानी चाहिए, जिससे स्वास्थ्य की रक्षा होती है।

3. चिकित्सालय नगरों में सामान्य चिकित्सालय खोले गए हैं, जहाँ प्रशिक्षित नर्स तथा डॉक्टर होते हैं, जो विशेष रूप से लोगों को स्वास्थ्य शिक्षा के विषय में जानकारी देते हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ शुद्ध व सन्तुलित भोजन तथा टीका लगवाने की प्रेरणा दी जाती है।

4. प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र यह स्वास्थ्य केन्द्र ग्रामीण जनता को स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों की जानकारी देने, रोगों से बचाव, स्वच्छता, शिशु की देखभाल तथा गर्भवती स्त्रियों को पोषण सम्बन्धी जानकारी देते हैं। यह केन्द्र नि:शुल्क होते हैं।

5. नगर निगम के स्वास्थ्य केन्द्र यह केन्द्र शहर में स्वच्छता का ध्यान रखते हैं। इसका मुख्य कार्य सड़क एवं गलियों के किनारे डी.डी.टी.का छिड़काव व चूना डलवाना, कूड़ा-करकट हटवाना तथा रोगों से बचाव हेतु टीके लगवाना आदि हैं।

6. परिवार नियोजन केन्द्र देश के लगभग सभी गाँव, कस्बे तथा शहरों में परिवार नियोजन केन्द्र बनाए गए हैं, जहाँ जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाने सम्बन्धी जानकारी दी जाती है। अन्य संस्थाएँ स्वास्थ्य संगठनों में अन्य छोटी-बड़ी संस्थाएँ निम्नलिखित हैं।

  1. प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र
  2. मोबाइल अस्पताल
  3. मातृ शिशु कल्याण केन्द्र
  4. प्रसूति रक्षा केन्द्र
  5. बाल शिशु रक्षा केन्द्र
  6. औद्योगिक केन्द्र

राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय एवं गैर-सरकारी स्वास्थ्य संगठन
स्थानीय स्वास्थ्य संगठनों के अतिरिक्त कुछ राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय एवं गैर-सरकारी स्वास्थ्य संगठन भी हैं, जिनका सम्बन्ध स्वास्थ्य शिक्षा से है। इनमें विश्व स्वास्थ्य संगठन,यूनीसेफ, केयर, रेडक्रॉस सोसायटी तथा खाद्य एवं कृषि संगठन प्रमुख हैं, जो निम्न हैं।
1. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) यह संगठन विश्वभर में स्वास्थ्य रक्षा हेतु विशेष लोगों को प्रशिक्षण देता है, जिससे स्वास्थ्य रक्षा के कार्यों में सहायता मिले। यह अपने दस्यदेशों को उनके स्वास्थ्यसेवाओं, शोध व स्वास्थ्य कार्यक्रमों का विकास में प्रोत्साहन देता है।

2.यूनिसेफ (UNICEF) यह संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ के सहयोग सेवर्ष 1946 में स्थापित की गई। इस संस्था के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं।

  1. माताओं व शिशुओं को रोगों से बचाना
  2. बच्चों की शिक्षा, पोषण व स्वास्थ्य सम्बन्धी सहायता देना
  3. विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ मिलकर स्वास्थ्य व सुरक्षा केसन्दर्भ में कार्य करना।

3. केयर (CARE) यह संस्था बालकों की पोषण सम्बन्धी सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करने हेतु समाधान करती है।

4. रेडक्रॉस सोसायटी (Red Cross Society) यह स्वास्थ्य सम्बन्धी एक स्वतन्त्र संगठन है, जो लगातार अपनी सेवाएँ देता है।

5. खाद्य एवं कृषि संगठन यह संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ की एक शाखा है। यह संस्था मनुष्य के सामाजिक स्तर को बढ़ाने का कार्य, पोषण की सुविधा देने तथा ग्रामीण लोगों कीदशा सुधारने का कार्य करती है। इन सभी संगठनों ने स्वास्थ्य के नियमों में सुधार लाने के सुधारात्मक आन्दोलन चलाए हैं, जिससे जनसुरक्षात्मक कार्यों में वृद्धि हुई है।

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य के लिए, स्वास्थ्य शिक्षा के अन्तर्गत मुख्य रूप से क्या सुझाव दिए जा सकते हैं? (2018)
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा से आशय
जन सामान्य को स्वास्थ्य के सभी पहलुओं से अवगत कराना ही स्वास्थ्य शिक्षा कहलाती है। यह एक ऐसा साधन है, जिससे कुछ विशेष शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों की सहायता से लोगों को स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान तथा व्याधियों से बचने के उपायों का प्रसार किया जा सकता है।

स्वास्थ्य शिक्षा के द्वारा जनसाधारण को यह समझने का प्रयास किया जाता है कि उसके लिए क्या स्वास्थ्यप्रद और क्या हानिप्रद है तथा इनसे साधारण बचाव कैसे किया जाए। संक्रामक रोगों; जैसे- चेचक, क्षय और विसूचिका इत्यादि के टीके लगवाकरे हम कैसे अपनी सुरक्षा कर सकते हैं। स्वास्थ्य शिक्षक ही जनता से सम्पर्क स्थापित कर स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा आवश्यक नियमों का उन्हें ज्ञान कराता है।

स्वास्थ्य शिक्षा से सम्बन्धित सुझाव
1.स्कूलों एवं कॉलेजों के स्तर पर

  • व्यक्तिगत स्वास्थ्य एवं पारिवारिक स्वास्थ्य की रक्षा हेतु लोगों को । स्वास्थ्य के नियमों की जानकारी कराने के लिए स्वास्थ्य शिक्षा को स्कूल व कॉलेजों के पाठ्यक्रम में जोड़ना आवश्यक है।
  • संक्रामक रोगों की अधिकता तथा रोग निरोधक के मूल तत्त्वों का ? विद्यार्थियों को बोध कराया जाना चाहिए।
  • स्वास्थ्य रक्षा के सामूहिक उत्तरदायित्व को वहन करने की शिक्षा देना। इस प्रकार से स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र आगे चलकर सामुदायिक स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यों में निपुणता से कार्य कर सकते हैं तथा अपने एवं अपने परिवार के लोगों की स्वास्थ्य रक्षा हेतु उचित उपायों का प्रयोग कर सकते हैं। यह देखा भी गया है कि इस प्रकार से स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा से सम्पूर्ण देश की स्वास्थ्य रक्षा में प्रगति हुई है।

2. सामान्य जनता को स्वास्थ्य सम्बन्धी सूचना देना यह कार्य मुख्य रूप से स्वास्थ्य विभाग का है, परन्तु अनेक ऐच्छिक स्वास्थ्य संस्थाएँ एवं अन्य संस्थाएँ जो इस कार्य में रुचि रखती हैं, सहायक रूप से कार्य कर सकती हैं। इस प्रकार की स्वास्थ्य शिक्षा का कार्य आजकल रेडियो, समाचार-पत्रों, भाषणों, सिनेमा, प्रदर्शनी तथा पुस्तिकाओं की सहायता से यथाशीघ्र सम्पन्न हो रहा है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी उपकरणों का भी प्रयोग करना चाहिए, जिससे अधिक-से-अधिक जनता का ध्यान स्वास्थ्य शिक्षा की ओर आकर्षित हो सके। इसके लिए विशेष प्रकार के व्यवहार कुशल और शिक्षित स्वास्थ्य शिक्षकों की नियुक्ति करना श्रेयस्कर है।

3. स्वास्थ्य शिक्षा सम्बन्धी केन्द्र स्वास्थ्य से सम्बन्धित शिक्षा देने के लिए विभिन्न स्थानों पर केन्द्रों की स्थापना की जानी चाहिए। इन केन्द्रों के माध्यम से स्वास्थ्य विशेषज्ञ निम्नलिखित सहायता प्रदान कर सकते हैं।

  • प्रत्येक रोगी तथा प्रत्येक घर जहाँ चिकित्सक जाता है, वहाँ किसी-न-किसी रूप में उसे स्वास्थ्य शिक्षा देने की हमेशा आवश्यकता पड़ती है।
  • रोग के सम्बन्ध में रोगी के भावात्मक विचार तथा अन्धविश्वास को दूर करना।
  • रोगी का रोगोपचार, स्वास्थ्य रक्षक तथा रोग के समस्त रोगनिरोधात्मक उपायों का ज्ञान कराना।
  • अपने ज्ञान से रोगी को पूरा विश्वास दिलाना, जिससे रोगी अपनी तथा अपने परिवार की स्वास्थ्य रक्षा के हेतु उनसे समय-समय पर सलाह ले सकें।
  • रोग पर असर करने वाले आर्थिक एवं सामाजिक प्रभावों का भी रोगी को बोध कराए तथा एक चिकित्सक, उपचारिका, स्वास्थ्य चर तथा इस क्षेत्र में कार्य करने वाले स्वयंसेवकों की कार्य सीमा कितनी है, इसका भी लोगों को बोध कराना अत्यन्त आवश्यक है।

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