UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 6 संक्रामक रोग : प्रसार तथा नियन्त्रण

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 6 संक्रामक रोग: प्रसार तथा नियन्त्रण are part of UP Board Solutions for Class 12 Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 6 संक्रामक रोग: प्रसार तथा नियन्त्रण.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 6
Chapter Name संक्रामक रोग : प्रसार तथा नियन्त्रण
Number of Questions Solved 50
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 6 संक्रामक रोग : प्रसार तथा नियन्त्रण

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
संक्रामक रोगों का संक्रमण किनके द्वारा होता है? (2010)
(a) वायु द्वारा
(b) भोजन तथा जल द्वारा
(c) कीटों द्वारा
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 2.
डी.पी.टी. का टीका किन-किन रोगों की रोकथाम के लिए लगाया जाता है? (2004,06)
(a) सिर दर्द
(b) पैर में सूजन
(c) डिफ्थीरिया, कुकुर खाँसी, टिटनेस
(d) आँख दुखना
उत्तर:
(c) डिफ्थीरिया, कुकुर खाँसी, टिटनेस

प्रश्न 3.
शरीर की रोगों से संघर्ष करने की शक्ति को कहते हैं?
(a) नि:संक्रमण
(b) रोग-प्रतिरोधक क्षमता
(C) उदभवन अवधि
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) रोग-प्रतिरोधक क्षमता

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन-सा पदार्थ रासायनिक नि:संक्रामक नहीं है? (2006)
(a) चूना
(b) ब्लीचिंग पाउडर
(c) पोटैशियम परमैंगनेट
(d) जलाना
उत्तर:
(d) जलाना

प्रश्न 5.
ठोस नि:संक्रामक है। (2006)
(a) फिनायल
(b) फार्मेलीन
(C) डी.डी.टी.
(d) चूना
उत्तर:
(d) चूना

प्रश्न 6.
छोटी माता का रोगाणु कारक है।
(a) वायरस
(b) जीवाणु
(c) प्रोटोजोआ
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) वायरस

प्रश्न 7 .
किस जीवाणु द्वारा क्षय रोग फैलता है? (2003, 07)
(a) क्यूलेक्स
(b) बैसिलस
(c) वायरस
(d) अमीबा
उत्तर:
(b) बैसिलस

प्रश्न 8.
मक्खियों द्वारा कौन-सा रोग फैलता है? (2004)
(a) चेचक
(b) हैजा
(c) टायफाइड
(d) मलेरिया
उत्तर:
(b) हैजा

प्रश्न 9.
मलेरिया रोग फैलता है। (2006, 11)
(a) चूहे द्वारा
(b) मच्छर द्वारा
(C) मक्खी द्वारा
(d) तिलचट्टा द्वारा
उत्तर:
(b) मच्छर द्वारा

प्रश्न 10.
टायफाइड रोगी को रोग के पश्चात् किस प्रकार का भोजन देना चाहिए? (2018)
(a) तरल
(b) अर्द्धतरल आहार
(c) सामान्य आहार
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(b) सामान्य आहार

प्रश्न 11.
हैजा के जीवाणु का नाम है? (2018)
(a) वायरस
(b) विब्रियो कॉलेरी
(c) कोमा बैसिलस
(d) साल्मोनेका टाइफी
उत्तर:
(b) विब्रियो कॉलेरी

प्रश्न 12.
कौन-सा रोग दूषित जल से फैलता है? (2018)
(a) हैजा
(b) मियादी बुखार
(c) अतिसार
(d) ये सभी
उत्तर:
(b) हैजा

प्रश्न 13.
पागल कुत्ते के काटने से कौन-सा रोग हो जाता है? (2013)
(a) मलेरिया
(b) रेबीज.
(c) फाइलेरिया
(d) प्लेग
उत्तर:
(b) रेबीज

प्रश्न 14.
रेबीज रोग का कौन-सा लक्षण है? (2010, 13)
(a) उल्टी होना।
(b) पानी से डरना
(C) दस्त होना
(d) जाड़े से काँपना
उत्तर:
(b) पानी से डरना

प्रश्न 15.
प्लेग रोग फैलता है। (2007)
(a) चूहे द्वारा
(b) मच्छर द्वारा
(C) मक्खी द्वारा
(d) तिलचट्टे द्वारा
उत्तर:
(a) चूहे द्वारा

प्रश्न 16.
निम्न में से कौन-सा हिपेटाइटिस सर्वाधिक खतरनाक होता है?
(a) B
(b) C
(C) D
(d) G
उत्तर:
(d) B

प्रश्न 17.
निम्न में से मस्तिष्क में सूजन आने का कौन-सा विशिष्ट लक्षण है?
(a) मलेरिया का
(b) डेंगू का
(C) इन्सेफलाइटिस का
(d) पीत ज्वर
उत्तर:
(c) इन्सेफलाइटिस का

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक, 25 शब्द)

प्रश्न 1.
संक्रामक रोग क्या हैं? (2006)
उत्तर:
विभिन्न रोगाणुओं (जीवाणु, विषाणु, कवक तथा प्रोटोजोआ आदि) के कारण होने वाले रोग ‘संक्रामक रोग’ कहलाते हैं। इनको संक्रमण विभिन्न माध्यमों द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में होता है।

प्रश्न 2.
संक्रामक रोगों की उदभवन अवधि से क्या आशय है?
उत्तर:
शरीर में रोगाणुओं के प्रवेश तथा रोग के लक्षण प्रकट होने के मध्य जो अन्तराल होता है, उसे रोग की उद्भवन अवधि अथवा सम्प्राप्ति काल कहते हैं।

प्रश्न 3.
संक्रामक रोग किन-किन माध्यमों द्वारा फैलते हैं? (2006)
उत्तर:
संक्रामक रोग जल एवं भोजन, वायु, रोगवाहक कीटों, चोट अथवा घाव, रोगी के प्रत्यक्ष सम्पर्क अथवा यौन सम्बन्धों के माध्यम से फैलते हैं।

प्रश्न 4.
किन्हीं पाँच संक्रामक रोगों के नाम बताइए। (2016)
उत्तर:
क्षय रोग, हैजा, टाइफाइड, अतिसार, रेबीज आदि संक्रामक रोग हैं।

प्रश्न 5.
जल द्वारा संवाहित होने वाले रोग कौन-कौन-से हैं? (2012)
उत्तर:
जल के माध्यम से फैलने वाले मुख्य रोग हैं-टायफाइड, हैजा, अतिसार, पेचिश, पीलिया आदि।

प्रश्न 6.
निःसंक्रमण एवं निःसंक्रामक शब्दों का अर्थ स्पष्ट कीजिए। (2011,16)
उत्तर:
रोगाणुओं को नष्ट करने की प्रक्रिया को ‘नि:संक्रमण’ कहते हैं। नि:संक्रमण के लिए अपनाए जाने वाले पदार्थों को ‘नि:संक्रामक’ कहा जाता है।

प्रश्न 7.
जीवाणुओं द्वारा फैलने वाले दो रोगों के नाम लिखिए। (2014)
अथवा
उन बीमारियों के नाम लिखिए, जो जीवाणुओं के कारण होती हैं।
उत्तर:
जीवाणुओं द्वारा फैलने वाले रोग हैं-हैजा, क्षय रोग, अतिसार, प्लेग आदि।

प्रश्न 8.
क्षय रोग का कारण लिखिए। (2006)
उत्तर:
क्षय रोग माइक्रोबैसिलस ट्यूबरकुलोसिस नामक जीवाणु के संक्रमण के कारण होता है।

प्रश्न 9.
बी.सी.जी. का टीका किस रोग की रोकथाम के लिए लगाया जाता है?
उत्तर:
बी.सी.जी. का टीका क्षय रोग (टी. बी.) की रोकथाम के लिए लगाया जाता है।

प्रश्न 10.
मलेरिया रोग का कारण लिखिए। (2004)
उत्तर:
मलेरिया नामक रोग ‘प्लाज्मोडियम’ नामक परजीवी प्रोटोजोआ के कारण होता है। इसका संक्रमण मादा ऐनाफ्लीज मच्छर के माध्यम से होता है।

प्रश्न 11.
मलेरिया रोग में किस प्रकार का भोजन देना चाहिए? (2007)
उत्तर:
मलेरिया रोग में हल्का, सुपाच्य तथा पर्याप्त कैलोरीयुक्त भोजन दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 12.
पागल कुत्ते के काटने से उत्पन्न रोग के दो लक्षण लिखिए। (2009)
उत्तर:
पागल कुत्ते के काटने से उत्पन्न रोग (हाइड्रोफोबिया) के लक्षण हैं।

  • तीव्र सिरदर्द, तीव्र ज्वर तथा गले एवं छाती की पेशियों के संकुचन से पीड़ा होती है।
  • गले की नलियों के अवरुद्ध होने से तरल आहार ग्रहण करने में कठिनाई तथा रोगी को जल से भय लगता है।

प्रश्न 13.
कुत्ते के काटने के दो प्राथमिक उपचार लिखिए। (2003)
उत्तर:
कुत्ते के काटने के दो प्राथमिक उपचार हैं।

  • कटे हुए स्थान को कार्बोलिक साबुन एवं स्वच्छ जल से भली प्रकार धोएँ।
  • एण्टीसेप्टिक औषधि का लेप लगाएँ।

प्रश्न 14.
अतिसार के रोगी को कैसा भोजन देना चाहिए? (2009)
उत्तर:
अतिसार के रोगी को तरल, हल्का एवं सुपाच्य भोजन देना चाहिए।

प्रश्न 15.
जोड़ों में दर्द एवं लसीका वाहिनियों में सूजन किन-किन रोगों के प्रमुख लक्षण है?
उत्तर:
जोड़ों में दर्द एवं लसीका वाहिनियों में सूजन क्रमश: डेंगू एवं हाथीपाँव रोग के लक्षण हैं।

प्रश्न 16.
एल्फा विषाणु जनित रोग का नाम बताते हुए इसके संवाहक का नाम भी बताइट
उत्तर:
चिकनगुनिया रोग का कारक एल्फा विषाणु होता है, जिसका संवहन एडीज एजिप्टी एवं एल्बोपिक्टस मच्छर द्वारा होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक, 50 शब्द)

प्रश्न 1.
संक्रामक रोगों की रोकथाम के सामान्य उपाय क्या हैं? (2012)
उत्तर:
संक्रामक रोगों के उपचार की तुलना में नियन्त्रण एवं बचाव के उपाय अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि संक्रामक इसकी रोगों का प्रसार एक साथ असंख्य व्यक्तियों को प्रभावित करता है। इसके अतिरिक्त इसकी रोकथाम के उपायों को व्यापक स्तर पर होना भी अतिआवश्यक है। व्यक्तिगत भागीदारी के साथ-साथ सार्वजनिक प्रयास दोनों ही समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।

संक्रामक रोगों की रोकथाम के सामान्य उपाय

संक्रामक रोगों की रोकथाम के कुछ सामान्य उपाय निम्नलिखित हैं।

  1. स्वास्थ्य विभाग को सूचित करना किसी भी व्यक्ति को संक्रामक रोग होने की स्थिति में उसकी सूचना निकट के स्वास्थ्य अधिकारी अथवा चिकित्सक को अवश्य देनी चाहिए, जिससे समय रहते रोग के प्रसार को रोका जा सके।
  2. रोगग्रस्त (संक्रमित) व्यक्ति को अलग रखना संक्रामक रोगों को फैलने से | रोकने के लिए विशेषकर वायुवाहित (एयर-बॉर्न) रोगों के मामले में, संक्रमित व्यक्तियों के उपचार की अलग से विशेष व्यवस्था की जानी चाहिए, जिससे रोगी का समुचित उपचार भी हो जाए एवं अन्य स्वस्थ व्यक्ति भी संक्रमण से बच जाए।
  3. रोग-प्रतिरक्षा के उपाय संक्रामक रोगों की रोकथाम का महत्त्वपूर्ण उपाय शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को विकसित करना है। नियमित रूप से शुद्ध जल एवं पौष्टिक भोजन का सेवन, विभिन्न रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है। वर्तमान में विभिन्न संक्रामक रोगों से बचने तथा रोग प्रतिरक्षा शक्ति के विकास हेतु टीके भी उपलब्ध हैं। सभी स्वस्थ व्यक्तियों को ऐसे टीके लगाना अतिआवश्यक है।

प्रश्न 2.
रोग-प्रतिरोधक क्षमता से आप क्या समझते हैं? (2011)
अथवा
टिप्पणी लिखिए-रोग-प्रतिरोधक क्षमता (2018, 12)
उत्तर:
रोग-प्रतिरोधक क्षमता
हमारा शरीर अधिकांश बाह्य कारकों से स्वयं अपनी रक्षा कर लेता है। शरीर की विभिन्न रोगकारक जीवों से लड़ने की क्षमता, जो उसे प्रतिरक्षी-तन्त्र के कारण मिली है, रोग-प्रतिरोधक क्षमता कहलाती है। रोग-प्रतिरोधक क्षमता दो प्रकार की सेती है ।

1. सहज प्रतिरक्षा सहज प्रतिरक्षा एक प्रकार की अविशिष्ट रक्षा है, जो जन्म के समय से ही मौजूद होती है। वस्तुतः हमारे शरीर में सभी प्रकार के संक्रमणों के विरुद्ध कुछ अवरोध (बैरियर) कार्य करते हैं, इन्हें ‘अविशिष्ट प्रतिरक्षी तन्त्र’ (Non-Specific Defense Mechanism) कहते हैं। ये अवरोध चार प्रकार के होते हैं ।

  • शारीरिक अवरोध (फीजिकल बैरियर) शरीर पर त्वचा मुख्य अवरोध है, जो बाहर से रोगाणुओं के प्रवेश को रोकती है।
  • कायिकीय अवरोध (फिजियोलॉजिकल बैरियर) आमाशय में अम्ल, मुँह में लार, आँखों के आँसू ये सभी रोगाणुओं की वृद्धि को रोकते हैं।
  • कोशिकीय अवरोध (सेल्युलर बैरियर) रक्त में उपस्थित श्वेत रुधिर कणिकाएँ, न्यूट्रोफिल्स एवं मोनोसाइट्स रोगाणुओं का भक्षण करती हैं।
  • साइटोकाइन अवरोध विषाणु संक्रमित कोशिकाएँ इण्टरफेरॉन नामक प्रोटीनों का स्रावण करती हैं, जो असंक्रमित कोशिकाओं को और आगे विषाणु संक्रमण से बचाती है।

2. उपार्जित प्रतिरक्षा उपार्जित प्रतिरक्षा रोगजनक विशिष्ट रक्षा है। हमारे शरीर का जब पहली बार किसी रोगजनक (रोगाणु) से सामना होता है, तो शरीर निम्न तीव्रता की प्राथमिक अनुक्रिया (रेस्पॉन्स) करता है। बाद में उसी रोग से सामना होने पर बहुत ही उच्च तीव्रता की द्वितीय अनुक्रिया होती है।
उपार्जित प्रतिरक्षा भी दो प्रकार की होती है।

  • सक्रिय प्रतिरक्षण (Active Immunity) हमारे शरीर के रक्त में मौजूद दो विशेष प्रकार के लसीकाणु प्रतिरक्षी अनुक्रियाएँ करते हैं। ये हैं-बी लसीकाणु और टी-लसीकाणु। बी-लसीकाणु हमारे शरीर में एण्टीबॉडीज उत्पन्न करते हैं, जबकि टी-लसीकाणु एण्टीबॉडीज उत्पन्न करने में बी-कोशिकाओं की सहायता करती है।
  • निष्क्रिय प्रतिरक्षण (Passive Immunity) जब शरीर की रक्षा के लिए बने-बनाए प्रतिरक्षी (एण्टीबॉडीज) सीधे ही शरीर को दिए जाते हैं, तो यह निष्क्रिय प्रतिरक्षा कहलाती है।

प्रश्न 3.
चेचक (बड़ी माता) रोग का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
चेचक कारक एवं प्रसार वेरियोला वाइरस नामक विषाणु इस रोग का कारक है। ये विषाणु वायु के माध्यम से व्यक्ति के श्वसन-तन्त्र में प्रवेश करते हैं। परम्परानुसार इसे ‘शीतला रोग’ की संज्ञा भी दी जाती है।
उद्भवन काल सामान्यत: इस रोग के लक्षण संक्रमण से 10 से 12 दिन की अवधि के अन्तराल पर प्रकट होते हैं। लक्षण रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।

  1. तीव्र ज्वर के साथ, सिर व कमर में दर्द होता है।
  2. जी मिचलाना एवं वमन की शिकायत हो सकती है।
  3. लक्षण स्पष्ट होने पर आँखें लाल हो जाती हैं तथा मुँह आदि पर लाल दाने निकल आते हैं। चेचक के दाने लाल रंग के होते हैं, बाद में इनमें तरल द्रव भर जाता है।
  4. रोग के ठीक होने की प्रक्रिया में 9-10 दिन बाद दाने मुरझाने लगते हैं एवं उनके स्थान पर पपड़ी-सी जम जाती है।

बचाव के उपाय इस रोग से बचाव हेतु निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं

  1. प्रत्येक व्यक्ति को समयानुसार चेचक का टीका अवश्य लगवा लेना चाहिए।
  2. रोगी की अलग व्यवस्था करनी चाहिए एवं स्वस्थ व्यक्तियों को उसके सम्पर्क में नहीं आने देना चाहिए।
  3. रोगी के बर्तन, बिस्तर तथा कपड़ों आदि को अलग ही रखना चाहिए तथा रोगी के ठीक होने पर उन्हें भली-भाँति नि:संक्रमित किया जाना चाहिए।
  4. रोगी के मल-मूत्र, थूक तथा उल्टी आदि को खुले में नहीं छोड़ना चाहिए तथा उनके विसर्जन की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।

प्रश्न 4.
खसरा नामक रोग का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
खसरा
कारण एवं प्रसार
यह एक विषाणु जनित रोग है। बच्चे इससे अधिक प्रभावित होते हैं। इसके विषाणु रोगी के गले के श्लेष्म तथा नाक के स्राव में विद्यमान रहते हैं तथा हवा में मिलकर संक्रमण का कारण बन जाते हैं।

उद्भवन काल
विषाणु के शरीर में प्रवेश करने से रोग के लक्षण उत्पन्न होने में सामान्यतः 10-15 दिन लगते हैं। कभी-कभी यह अवधि 20 दिन की भी हो सकती है
लक्षण इस रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।

  • व्यक्ति को ठण्ड के साथ बुखार आता है तथा बेचैनी महसूस होती है।
  • आँखें लाल हो जाती हैं तथा खाँसी, छींक आदि की तीक्ष्णता बढ़ जाती है।
  • धीरे-धीरे पूरे शरीर पर दाने निकल आते हैं तथा बुखार तीव्र हो जाता है।

बचाव के उपाय इस रोग से बचने के उपाय निम्नलिखित हैं।

  • खसरे से पीड़ित बच्चे को एक अलग हवादार कमरे में रखना चाहिए।
  • रोगी की नाक व मुँह से निकले स्राव को पुराने व स्वच्छ कपड़े से पोंछकर उसे जला देना चाहिए।
  • इधर-उधर थूकने की जगह केवल थूकदान का प्रयोग करना चाहिए। थूकने | वाले बर्तन में नि:संक्रामक पदार्थ डालना भी ठीक रहता है।
  • रोगी शिशु के वस्त्रों एवं खिलौनों को भी नि:संक्रामक पदार्थ से साफ करना आवश्यक है।
  • इस रोग से बचाव हेतु व्यक्तिगत स्वच्छता विशेषत: नाक व गले की सफाई विशेष महत्त्व रखती है।

उपचार इस रोग के विरुद्ध स्वाभाविक प्रतिरोधक क्षमता बहुत ही कम शिशुओं में होती है यद्यपि एक बार खसरा होने पर प्रतिरक्षक क्षमता उत्पन्न हो जाती है। तथापि भविष्य में इसके होने की सम्भावना को कम करने के लिए बच्चों को खसरे का टीका लगवाना अनिवार्य होता है। देखभाल में रोगी को अधिक गर्मी तथा अधिक ठण्ड से बचाना आवश्यक होता है, क्योंकि इस रोग के साथ निमोनिया होने का भी भय रहता है।

प्रश्न 5.
रेबीज नामक संक्रामक रोग के लक्षण, उदभवन काल एवं उपचार के उपायों पर प्रकाश डालिए।
अथवा
टिप्पणी लिखिए- कुत्ते का काटना (2018)
उत्तर:
रेबीज
रेबीज एक विषाणुजनित रोग है। इस रोग के विषाणु रोगी पशु (कुत्ता, गीदड़, बन्दर आदि) की लार में रहते हैं। अतः जब कोई रोगग्रस्त पशु मुख्यतः कुत्ता, गीदड, बन्दर किसी व्यक्ति को काटता है, तो उसकी लार में विद्यमान विषाणु स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं एवं व्यक्ति को रोगग्रस्त कर देते हैं।
लक्षण रेबीज के विषाणु रोगी व्यक्ति के केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र पर प्रभाव डालते हैं। इस स्थिति में निम्नलिखित लक्षण प्रकट होते हैं।

  • तीव्र सिरदर्द, तीव्र ज्वर तथा गले एवं छाती की पेशियों के संकुचन से पीड़ा होती है।
  • गले की नलियों के अवरुद्ध होने से रोगी को तरल आहार ग्रहण करने में – कठिनाई होती है तथा जल से भय लगता है।

उद्भवन काल प्रायः पागल कुत्ते के काटने पर 15 दिन की अवधि में रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं, किन्तु कभी-कभी 7-8 महीने अथवा इससे भी अधिक समय तक इसका प्रभाव बना रह सकता है। सामान्यतः रोगग्रस्त या पागल कुत्ता काटने के बाद अधिकतम 15 दिन की अवधि में मर जाता है। अतः यदि कुत्ता मनुष्य को काटने के बाद भी जीवित रहे अथवा पागल न हो तो उसे रोगग्रस्त नहीं माना जाना चाहिए।
उपचार रोगग्रस्त पशु के काटने पर निम्नलिखित उपचार करने चाहिए

  • काटे गए स्थान को काबलिक साबुन एवं स्वच्छ जल से भली-भाँति धोना चाहिए।
  • घाव पर एण्टीसेप्टिक की औषधि का लेप लगाना चाहिए।
  • घाव पर पट्टी नहीं बाँधनी चाहिए, अपितु उसे खुला रखना चाहिए।
  • कुत्ते के काटने पर एण्टीरेबीज इंजेक्शन लगवाने भी अनिवार्य हैं।

प्रश्न 6.
प्लेग रोग पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
प्लेग
कारण एवं प्रसार यह रोग पाश्च्यूरेला पेस्टिस नामक जीवाणु से होता है। इसका संक्रमण चूहों पर पाए जाने वाले पिस्सुओं से होता है। प्लेग के जीवाणु पिस्सुओं के माध्यम से चूहों को संक्रमित करते हैं, जिससे चूहे मरने लगते हैं। तत्पश्चात् पिस्सुओं द्वारा मनुष्यों को काटने पर, ये जीवाणु व्यक्ति के रक्त परिसंचरण में शामिल हो जाते हैं एवं व्यक्ति को रोगग्रस्त कर देते हैं। इसके बाद व्यक्ति से व्यक्ति में संक्रमित होने वाला यह रोग महामारी का रूप धारण कर लेता है।
लक्षण इस रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।

  • प्लेग के विषाणु के आक्रमण के प्रारम्भ में ही व्यक्ति अति तीव्र ज्वर (107°F | तक) से ग्रस्त हो जाता है।
  • व्यक्ति की आँखें लाल हो जाती हैं एवं अन्दर फँसती हुई प्रतीत होती हैं।
  • कभी-कभी रोगी को दस्त तथा कमजोरी भी होने लगती है।.
  • रोगी की दशा गम्भीर होने पर उसकी बगल तथा जाँघों में कुछ गिल्टियाँ निकल आती हैं। इस दशा में उसकी मृत्यु भी हो सकती है।

बचाव के उपाय इस रोग से बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं।

  • इस रोग से बचाव के लिए घर तथा सार्वजनिक स्थलों को स्वच्छ रखना अत्यन्त आवश्यक है।
  • विषाणु से संक्रमित क्षेत्र में चूहों को समाप्त करके भी महामारी के प्रकोप | को नियन्त्रित किया जा सकता है।
  • प्लेग के प्रकोप के दिनों में नंगे पैर नहीं रहना चाहिए इससे रोगवाहक कीटों के काटने की सम्भावना बढ़ जाती है।
  • प्लेग का टीका लगवाना भी अनिवार्य है।
    उपचार प्लेग के लक्षण प्रकट होते ही रोगी को तुरन्त अस्पताल में भर्ती कर लेना चाहिए। इस रोग में अच्छी चिकित्सकीय सलाह एवं उपचार का विशेष महत्त्व होता है, अन्यथा रोगी की मृत्यु भी हो सकती है।

प्रश्न 7.
कुष्ठ रोग कैसे फैलता है? इस रोग के लक्षण, बचाव तथा उपचार के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कुष्ठ रोग
कारण एवं प्रसार
माइकोबैक्टीरियम लैप्री नामक जीवाणु इस रोग का कारक है। ये जीवाणु रोगी व्यक्ति के शरीर के घावों में विद्यमान रहते हैं। अतः स्वस्थ व्यक्ति के रोगी के घावों के सम्पर्क में आने पर, ये जीवाणु स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर उसे संक्रमित कर सकते हैं।

लक्षण प्रारम्भ में रोगी के शरीर में सफेद रंग के दाग पड़ते हैं, जो क्रमश: घावों में बदल जाते हैं। रोगी में दो प्रकार के लक्षण प्रकट हो सकते हैं।

1. चकत्ते वाली त्वचा संवेदनाहीन हो जाए अथवा स्पर्श करने पर उसमें | असहनीय पीड़ा का अनुभव हो। इन स्थानों पर बने फफोले बाद में घाव में बदल जाते हैं। इन घावों से रक्त व मवाद निकलता है। हाथ-पैरों की अंगुलियाँ गलने लगती हैं। यह अवस्था संक्रमण-योग्य होती है।

2. त्वचा के सूखने पर, पहले लाल दाने बनते हैं, जो धीरे-धीरे सफेद रंग के हो जाते हैं। शरीर के बालों को स्वतः गिरना अन्य प्रमुख लक्षण है। इसके अतिरिक्त गले में गिल्टियाँ बनना, आवाज भारी एवं भद्दी होना, सिरदर्द आदि लक्षण दिखाई दे सकते हैं। यह अवस्था संक्रमण-योग्य नहीं होती।

बचाव के उपाय इस रोग से बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. रोगी को स्वस्थ मनुष्य के सम्पर्क में आने से बचना चाहिए।
  2. व्यक्तिगत स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
  3. रोगी के वस्त्रों को उबालकर धोना चाहिए इससे संक्रमण की आशंका कम | हो जाती है। रोगी द्वारा प्रयोग की गई वस्तुओं; जैसे-बर्तन आदि को नि:संक्रामक से धोना चाहिए।

उपचार कुष्ठ रोग पूर्णतः उपचार योग्य रोग है। सरकार द्वारा अनुदान प्राप्त अनेक अस्पतालों में इसका नि:शुल्क इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है। आवश्यक है कि संक्रमण की प्रारम्भिक अवस्था में ही इसका निदान हो जाए, जिससे इस रोग को समय रहते ठीक किया जा सके। रोगी का सामाजिक समायोजन उपचार-प्रक्रिया का ही महत्त्वपूर्ण चरण है। अत: इस ओर ध्यान देना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 8.
पेचिश एवं अतिसार में क्या अन्तर है? (2007)
उत्तर:
पेचिश एवं अतिसार दोनों ही पाचन तन्त्र से सम्बन्धित संक्रामक रोग हैं। दूषित पेय जल एवं भोजन, संक्रमण के प्रमुख स्रोत हैं। घरेलू मक्खियाँ इन | रोगों को फैलाने में रोगवाहक का कार्य करती हैं।

इन समानताओं के बावजूद पेचिश एवं अतिसार में कुछ स्पष्ट अन्तर भी हैं, जो निम्न प्रकार हैं।

क्र.सं.

 पेचिश  अतिसार

1

पेचिश, मनुष्य की बड़ी आँत में पाए जाने वाले एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका नामक प्रोटोजोआ एवं वैसीलरी  जीवाणु से होती है। अतिसार जीवाणु जनित रोग है। निरन्तर अपच रहने से भी अतिसार का रोग हो सकता है।

2

पेचिश रोग में मल के साथ आँव (श्लेष्म) एवं रक्त आता है। ज्वर, उदरीय पीड़ा एवं ऐंठन, पेचिश के अन्य लक्षण हैं। अतिसार के रोगी को भी निरन्तर जलीय दस्त होते रहते हैं, किन्तु पेचिश के इसमें मल के साथ आँव (श्लेष्म) एवं रक्त नहीं आता है।

3

पेचिश, बच्चों एवं बड़ों सभी को हो सकता है। अतिसार का संक्रमण मुख्य रूप से  प्राय: बच्चों को हुआ करता है।

प्रश्न 9.
अतिसार के कारण, लक्षण एवं उपचार लिखिए। (2007)
अथवा
डायरिया रोग के लक्षण और उपचार लिखिए।(2018)
उत्तर:
अतिसार के कारण
बार-बार दस्त आना अतिसार (Diarrhoea) कहलाता है। कुछ जीवाणु जैसे इश्चेरीचिया कोलाई, शिगेला आदि इसके प्रमुख कारक हैं। यह रोग दूषित जल एवं भोजन के माध्यम से फैलता है। यह रोग मुख्यत: बच्चों को होता है यद्यपि बड़े भी इससे संक्रमित हो सकते हैं। इसके संक्रमण के प्रसार में मक्खियाँ रोगवाहक का कार्य करती हैं।

अतिसार के लक्षण
इस रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।

  1. अत्यधिक दस्त के कारण निर्जलीकरण की स्थिति उत्पन्न होती है।
  2. सामान्यतः निर्जलीकरण की अवस्था में रोगी चिड़चिड़ा हो जाता है, आँखें अन्दर धंस जाती हैं, जीभ तथा गालों का अन्त: भाग सूख जाता है।
  3. शारीरिक भार में अचानक कमी, मन्द नाड़ी, गहरी साँसें इसके प्रमुख लक्षण हैं।

अतिसार के नियन्त्रण एवं उपचार के उपाय
अतिसार को नियन्त्रित करने के लिए निम्न उपाय किए जा सकते हैं।

  1. रोग के पूर्णरूपेण ठीक होने तक बिस्तर पर पूरा आराम आवश्यक है।
  2. निर्जलीकरण से रक्षा के उपाय किए जाने चाहिए। एक अच्छा जीवनरक्षक घोल, एक चम्मच चीनी तथा एक चुटकी नमक को 200 मिली जल में घोलकर बनाया जा सकता है। इसे मुख द्वारा दिया जाने वाला पुनर्जलीकरण विलयन (ORS) कहते हैं।
  3. थोड़ा आराम मिलने पर रोगी को हल्के, तरल एवं सुपाच्य भोज्य पदार्थ दिए जा सकते हैं।
  4. पानी को उबालकर ठण्डा करके रोगी को देना चाहिए।
  5. चिकित्सक की सलाहानुसार प्रतिसूक्ष्मजैविक दवाओं का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 10.
डेंगू के लक्षण व उपचार पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
इस रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।

  1. ठण्ड लगने के बाद अचानक तेज बुखार चढ़ना।
  2. सिर मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द होना।
  3. आँखों के पिछले हिस्से में दर्द होना, जो आँखों को दबाने या हिलाने से और बढ़ जाता है।
  4. बहुत ज्यादा कमजोरी लगना, भूख न लगना और जी मिचलाना और मुँह का स्वाद खराब होना।
  5. गले में हल्का -सा दर्द होना।
  6. शरीर विशेषकर चेहरे, गर्दन और छाती पर लाल-गुलाबी रंग के रैशेज होना।

उपचार इस रोग से बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. यदि रोगी को साधारण डेंगू बुखार है, तो उसका इलाज व देखभाल घर पर की जा सकती है।
  2. डॉक्टर की सलाह लेकर पैरासिटामोल (क्रोसिन आदि) ले सकते हैं।
  3. इनसे प्लेटलेट्स कम हो सकते हैं।
  4. यदि बुखार 102 डिग्री फॉरनेहाइट से ज्यादा है, तो रोगी के शरीर पर ठण्डे पानी की पट्टियाँ रखें।
  5. सामान्य रूप से खाना देना जारी रखें। बुखार की हालत में शरीर कोऔर ज्यादा खाने की जरूरत होती है।
  6. मरीज को आराम करने दें।

किसी भी तरह के डेंगू में रोगी के शरीर में पानी की कम नहीं आने देनी चाहिए। उसे अधिक मात्रा में पानी और तरल पदार्थ (नींबू पानी, छाछ, नारियल पानी आदि) पिलाएँ, ताकि ब्लड गाढ़ा न हो और जमे नहीं। साथ ही मरीज को पूरा आराम करना चाहिए।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक, 100 शब्द)

प्रश्न 1.
संक्रामक रोग किसे कहते हैं? इनके फैलने के कारण बताइट। (2009)
अथवा
संक्रामक रोग किसे कहते हैं? यह किस प्रकार फैलता है? बचाव के लिए क्या उपाय करने चाहिए? (2018)
उत्तर:
जब शरीर के एक या अधिक अंगों या तन्त्रों के प्रकार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और विभिन्न चिह्न एवं लक्षण प्रकट होते हैं, तो इस स्थिति को रोगग्रस्तता कहते हैं। रोगों के मुख्यत: दो प्रकार हैं।

1. संक्रामक रोग यह रोग हानिकारक सूक्ष्म जीवों (रोगाणुओं) के द्वारा होता है; जैसे-जीवाणु, विषाणु कवक एवं प्रोटोजोआ।
इन रोग कारकों का संचरण विभिन्न माध्यमों द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक होता है, इसलिए इन्हें संचरणीय रोग कहा जाता है; जैसे-हैजा, मलेरिया, टायफाइड, क्षय रोग, पोलियो, डिफ्थीरिया आदि।
2. असंक्रामक रोग यह रोग, रोगी से स्वस्थ व्यक्ति में स्थानान्तरिक नहीं होते हैं; जैसे–मधुमेह, कैंसर, हृदय रोग आदि।

संक्रामक रोगों का फैलना
अनेकानेक जीव जिसमें जीवाणु (बैक्टीरिया), विषाणु (वायरस), कवक (फंजाई), प्रोटोजोअन, कृमि (हेल्यिथ) आदि शामिल हैं, जो मनुष्य में रोग पैदा करते हैं। ऐसे रोगकारक जीवों को रोगजनक (पैथोजन) कहते हैं। रोगजनक हमारे शरीर में कई तरह से प्रवेश कर सकते हैं।
इनका संक्रमण मुख्यत: निम्नलिखित छः प्रकार से होता है।

  • जल एवं भोजन के माध्यम से
  • वायु के माध्यम से
  • रोगवाहक कीटों के माध्यम से
  • चोट अथवा घाव के माध्यम से
  • प्रत्यक्ष सम्पर्क के माध्यम से
  • यौन सम्बन्धों के माध्यम से

1. जल एवं भोजन के माध्यम से रोगाणुओं से दूषित जल एवं भोजन को ग्रहण करने से ये रोगाणु व्यक्ति के शरीर में पहुँच जाते हैं; जैसे-हैजा, टायफाइड, पीलिया, अतिसार तथा पेचिश आदि रोगों का संक्रमण मुख्य रूप से संक्रमित जल एवं आहार के माध्यम से होता है। इन रोगों के व्यापक संक्रमण में संक्रामक रोगों का फैलना मक्खियों की सहायक भूमिका होती है। मक्खियों के मल  आदि रोगाणुयुक्त स्थानों पर बैठने से रोगाणु उनके साथ चिपक कर हमारे खाद्य पदार्थों तक पहुँच जाते हैं, जिसे खाने से रोग को संक्रमण हो जाता है।

2. वायु के माध्यम से दूषित अथवा संक्रमित वायु में श्वास लेने से विभिन्न रोगाणु वायु के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश कर रोगग्रस्त बना देते हैं। रोगग्रस्त व्यक्तियों के खाँसने, छींकने अथवा श्वसन क्रिया द्वारा साँस छोड़ने की क्रियाओं द्वारा वायु में रोगाणुओं की सान्द्रता बढ़ती जाती है।

इसी प्रकार रोगी व्यक्तियों के थूक व मल-मूत्र के उचित निस्तारण के अभाव में उनके रोगाणु वायु को दूषित करते हैं। यही दूषित वायु चेचक, छोटी माता, खसरा, तपेदिक (क्षय रोग), डिफ्थीरिया, काली खाँसी जैसे संक्रामक रोगों के प्रसार काकारण बनती है।

3. रोगवाहक कीटों के माध्यम से कुछ रोग विभिन्न कीटों के माध्यम से भी फैलते हैं, जैसे प्लेग का संक्रमण चूहों पर पाए जाने वाले पिस्सुओं के माध्यम से होता है। इसके अतिरिक्त मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, पीत ज्वर, फाइलेरिया एवं पागल कुत्ते तथा कुछ अन्य पशुओं द्वारा काटने के परिणास्वरूप होने वाला हाइड्रोफोबिया नामक रोग इसी श्रेणी में आता है। रोगाणुयुक्त कीटों अथवा अन्य जीवों के काटने पर, रोगाणु रक्त के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और मनुष्य रोगग्रस्त हो जाता है।

4. चोट अथवा घावे के माध्यम से शरीर के किसी भी भाग में चोट लगने पर जब घाव बन जाता है, तब धूल, मिट्टी आदि में उपस्थित रोगाणु, घाव के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। टिटनेस इस प्रकार होने वाला प्रमुख रोग है।

5. प्रत्यक्ष सम्पर्क के माध्यम से कुछ रोग संक्रमित व्यक्तियों के प्रत्यक्ष सम्पर्क में आने से भी होते हैं। छूने अथवा स्पर्श के माध्यम से फैलने वाले मुख्य रोग हैं-दाद, खाज, खुजली तथा कुष्ठ रोग आदि।

6. यौन सम्बन्धों के माध्यम से लैंगिक क्रिया या यौन सम्बन्धों के द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में कई प्रकार के रोग फैलते हैं। सूजाक (Gonorrhoea), सिफिलिस, एड्स (AIDS), इसी प्रकार के यौन संचारित रोगों के उदाहरण हैं।

संक्रामक रोगों की रोकथाम के सामान्य उपाय
संक्रामक रोगों की रोकथाम के कुछ सामान्य उपाय निम्नलिखित हैं।

  1. स्वास्थ्य विभाग को सूचित करना।
  2. रोगग्रस्त व्यक्ति को अलग करना।
  3. रोग-प्रतिरक्षा के उपाय करना; जैसे-टीकाकरण।
  4. रोगवाहकों पर नियन्त्रण करना।
  5. रोगाणुनाशन के उपाय करना

प्रश्न 2.
नि:संक्रमण का क्या आशय है? निःसंक्रमण की भौतिक विधियों का सविस्तार वर्णन कीजिए।(2010)
अथवा
नि:संक्रमण से आप क्या समझते हैं? नि:संक्रमण की प्राकृतिक विधि लिखिए।(2014)
अथवा
निःसंक्रमण से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित समझाइए। (2007)
अथवा
टिप्पणी लिखिए–भौतिक निःसंक्रमण। (2013)
उत्तर:
निःसंक्रमण का अर्थ
संक्रामक रोगों का कारण विभिन्न प्रकार के रोगाणु होते हैं। इन रोगाणुओं द्वारा रोग के प्रसार की प्रक्रिया ‘संक्रामकता’ कहलाती है। रोगों के उद्भवन एवं प्रसार को रोकने का सर्वोत्तम उपाय-सम्बन्धी रोगाणुओं को नष्ट करना तथा इन्हें बढ़ने से रोकना है। रोगाणुओं को नष्ट करने की प्रक्रिया को ही नि:संक्रमण (Disinfection) कहा जाता है। नि:संक्रमण की इस प्रक्रिया में प्रयुक्त पदार्थ नि:संक्रामक पदार्थ’ कहलाते हैं।
निःसंक्रमण की विधियाँ
नि:संक्रमण के लिए सामान्यतः तीन विधियों-भौतिक, प्राकृतिक एवं रासायनिक का प्रयोग किया जाता है। इन विधियों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है।

भौतिक नि:संक्रमण

  • जलाना
  • वाष्प या भाप द्वारा
  • सूखी गर्म हवा द्वारा
  • उबालना

1. भौतिक निःसंक्रमण
इसके अन्तर्गत भौतिक उपायों द्वारा वस्तुओं को रोगाणुमुक्त किया जाता है। नि:संक्रमण हेतु निम्नलिखित चार भौतिक विधियों का प्रयोग किया जाता है।
(i) जलाना व्यर्थ एवं अनुपयोगी संक्रमित वस्तुओं को आग में जलाना श्रेयस्कर होता है। इस क्रिया से कीटाणुओं का पूर्ण नाश सम्भव होता है। यद्यपि इसके अन्तर्गत सभी संक्रमित वस्तुओं को जलाना सम्भव नहीं होता है कारण कि कुछ वस्तुओं को जलाने से हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होता है, जो स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

(ii) वाष्प या भाप द्वारा वाष्प द्वारा। नि:संक्रमण भी एक उत्तम विधि है।  इससे वस्त्रों एवं अन्य वस्तुओं को नि:संक्रमित किया जा सकता है। इससे  कुछ ही समय में कीटाणु मर जाते हैं। यह विधि अस्पतालों में प्रयोग में लाई जाती है।

(iii) सूखी गर्म हवा द्वारा यह विधि अत्यधिक प्रभावी नहीं है। अतः यह कम प्रयोग में लाई जाती है यद्यपि चमड़े, शीशे, प्लास्टिक के बर्तन तथा रबड़ की वस्तुओं आदि के नि:संक्रमण में इसका उपयोग किया जाता है, क्योंकि ये वस्तुएँ अन्य प्रकार से नि:संक्रमित नहीं की जा सकती।

(iv) उबालना जिन संक्रमित वस्तुओं को नष्ट करना सम्भव नहीं है, उन्हें खौलते हुए पानी में (100° C पर) 20 से 30 मिनट तक उबालकर कीटाणुमुक्त किया जा सकता है। यदि उबलते जल में 2% सोडियम कार्बोनेट मिला दिया जाए, तो इसकी कीटाणुनाशक क्षमता और अधिक बढ़ जाती है। उबलते हुए जल में धातु के बर्तन भी नि:संक्रमित किए जा सकते हैं।

2. प्राकृतिक निःसंक्रमण
प्राकृतिक रूप से हमारे चारों ओर अनेक नि:संक्रामक कारक मौजूद रहते हैं। उदाहरणत: सूर्य से उत्सर्जित होने वाली पराबैंगनी किरणें बहुत ही सक्रिय कीटाणुनाशक हैं। जल शुद्धि में इनका उपयोग सर्वविदित है। सूर्य के प्रकाश की किरणों की गर्मी से भी अनेक रोगाणु मर जाते हैं। अत: वस्तुओं को समय समय पर धूप दिखाना आवश्यक है। इसी प्रकार शुद्ध वायु का अन्तर्ग्रहण भी शरीर के लिए लाभदायक है, क्योंकि ऑक्सीजन जीवाणुओं को नष्ट करने में सहायक होती है।

प्रश्न 3.
रासायनिक निःसंक्रमण किसे कहते हैं? रासायनिक । विसंक्रामक के नाम लिखिए।(2014)
उत्तर:
रासायनिक निःसंक्रमण
जब नि:संक्रमण की प्रक्रिया रासायनिक पदार्थों के माध्यम से सम्पन्न होती है, तो इसे रासायनिक नि:संक्रमण की संज्ञा दी जाती है। रासायनिक नि:संक्रामकों को अवस्था के आधार पर तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-तरल, गैसीय एवं ठोस नि:संक्रामक। इन तीनों प्रकार के नि:संक्रामकों के उदाहरण निम्नवत् हैं।

रासायनिक नि:संक्रमण

  • तरल रासायनिक नि:संक्राम
  • गैसीय रासायनिक नि:संक्रामक
  • ठोस रासायनिक निःसंक्रामक

1. तरल रासायनिक निःसंक्रामक तरल रासायनिक नि:संक्रामकों का प्रयोग सामान्यत: पानी में घोल बनाकर किया जाता है। इस वर्ग के मुख्य नि:संक्रामक निम्न हैं।

  • फिनॉयल यह कार्बोलिक अम्ल से  बनाया जाता है यद्यपि .  उससे अधिक प्रभावी  होता है। फिनॉयल मिश्रित जल के दूधिया घोल का प्रयोग, घर को कीटाणुमुक्त करने में किया जाता है। स्नानघर व शौचालय की सफाई में भी उपयोगी है।
  • कार्बोलिक एसिड यह कोलतार से निकलता है। सान्द्र कार्बोलिक एसिड त्वचा को जलाने वाला होता है। इसके घोल का प्रयोग वस्त्र आदि को नि:संक्रमित करने में किया जाता है।
  • फार्मेलिन यह एक तीव्र गन्ध वाला नि:संक्रामक है। यह आँखों में लगता है। इसका घोल शौचालय के कीटाणुओं को मारने में सहायक होता है। उपरोक्त के अतिरिक्त लाइजॉल एवं आइजॉल अन्य तरल नि:संक्रामक पदार्थ हैं। इनका इस्तेमाल कपड़ों आदि को रोगाणुमुक्त करने में किया जाता है।

2. गैसीय रासायनिक निःसंक्रामक सल्फर डाइऑक्साइड एवं क्लोरीन गैस प्रमुख रासायनिक नि:संक्रामक है। गन्धक को जलाने से बनने वाली सल्फर डाई-ऑक्साइड गैस से, कमरे की वायु को रोगाणुमुक्त किया जा सकता है। इसी प्रकार क्लोरीन जल तथा वायु को नि:संक्रमित करने में सक्षम है। नगरों में जल आपूर्ति विभाग द्वारा जल शुद्धि में इसका प्रयोग सामान्य है।

3. ठोस रासायनिक निःसंक्रामक ठोस रासायनिक नि:संक्रमिकों में प्रमुख है।

  • चूना यह जीवाणुओं को नष्ट करने वाला एक सस्ता रसायन है। दीवारों पर चूने की सफेदी का प्रयोग कीटाणुओं को नष्ट करने में सहायक है। फर्श, नाली तथा शौच आदि के स्थान पर चूने का छिड़काव उपयोगी होता है। घर के दरवाजे के सामने थोड़ी दूरी तक चूना बिछा देने से प्लेग के वाहक पिस्सू मकान में प्रवेश नहीं कर पाते।
  • ब्लीचिंग पाउडर यह पाउडरे, जल को रोगाणुमुक्त करने में सहायक होता है। इस पाउडर से क्लोरीन गैस निकलती है।
  • पोटैशियम परमैंगनेट यह नि:संक्रामक लाल दवा के नाम से जाना जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कुओं एवं तालाबों के जल को कीटाणुरहित करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। फलों, सब्जियों एवं बर्तनों आदि को रोगाणुमुक्त करने में इसका घोल सहायक है।
  • कॉपर सल्फेट यह एक तीव्र कीटाणुनाशक पदार्थ है। इसे तूतिया या नीला थोथा भी कहा जाता है।

प्रश्न 4.
क्षय रोग के लक्षण व उपचार पर टिप्पणी लिखिए। (2018)
अथवा
क्षय रोग के फैलने के कारण, लक्षण, बचाव के उपाय तथा उपचार का वर्णन कीजिए। (2012, 14)
अथवा
वायु द्वारा कौन कौन-से रोग फैलते हैं? किसी एक रोग के लक्षण तथा रोकथाम के उपाय लिखिए। (2007, 11, 13)
उत्तर:
कुछ संक्रामक रोगों के रोगाणु वायु में व्याप्त रहते हैं तथा स्वस्थ व्यक्तियों के शरीर में श्वसन क्रिया द्वारा प्रवेश करते हैं। वायु के माध्यम से फैलने वाले मुख्य रोग हैं-क्षय रोग या तपेदिक, चेचक, खसरा, काली खाँसी, डिफ्थीरिया तथा इन्फ्लू एंजा आदि।

क्षय रोग (तपेदिक)
यह एक संक्रामक रोग है, जो माइक्रोबैसीलस ट्यूबरकुलोसिस नामक जीवाणु से होता है। इस रोग को ‘यक्ष्मा’ या ‘काक रोग’ भी कहते हैं। यह रोग शरीर के विभिन्न अंगों; जैसे-लसीका ग्रन्थियों, आँत, अस्थियों में प्रकट हो सकता है। यद्यपि इसके सर्वाधिक रोगी फेफड़ों के क्षय से पीड़ित होते हैं।
कारण
इस रोग के फैलने के सम्भावित कारण निम्नलिखित हैं।

  1. यदि रहने के स्थान पर शुद्ध वायु का अभाव हो एवं समुचित संवातन व्यवस्था न हो।
  2. पर्याप्त पौष्टिक भोजन उपलब्ध न हो।
  3. शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलता के कारण प्रतिरोधक क्षमता का क्षीण होजाना।
  4. स्वस्थ व्यक्ति को रोगी के संसर्ग में होना। उल्लेखनीय है कि इस रोग केजीवाणु मुँह से थूकते समय या चूमने से प्रसारित होते हैं।
  5. रोगी द्वारा प्रयुक्त संक्रमित वस्तु का स्वस्थ मनुष्य द्वारा प्रयोग किया जाना।
  6. क्षमता से अधिक कार्य किया जाना।

लक्षण
क्षय रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।

  1. रोग के शुरुआत में ही थकान एवं कमजोरी का अनुभव होने लगता है। साँस जल्दी-जल्दी फूलने लगती है।
  2. हर समय हल्का-हल्का ज्वर रहने लगता है। रात को पसीना आता है।
  3. रोगी को बार-बार जुकाम व खाँसी होती रहती है। खाँसी में कफ (बलगम) | निकलता है। धीरे-धीरे बलगम के साथ रक्त भी आने लगता है।
  4. भूख लगनी बन्द हो जाती है। कमजोरी के कारण व्यक्ति की कार्यक्षमता घट जाती है।
  5. शरीर में खून की कमी से त्वचा पीली पड़ जाती है।
  6. फेफड़ों के प्रभावित होने की स्थिति में, छाती में दर्द रहने लगता है।

बचाव के उपाय
क्षय रोग से बचाव के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं।

  1. बच्चों को बी.सी.जी. (बैसिलस कैलमिटि ग्यूरीन) का टीका अवश्य लगाना चाहिए।
  2. व्यक्ति को नियमित रूप से व्यायाम करा चाहिए।
  3. प्रातः काल टहलना लाभप्रद है, इससे शुद्ध वायु फेफड़ों में प्रवेश करती है।
  4. व्यक्ति को नियमित रूप से शुद्ध जल एवं पौष्टिक आहार लेना चाहिए।
  5. इधर-उधर थूकने की जगह केवल थूकदान का प्रयोग करना चाहिए।
  6. घर, आस-पड़ोस एवं मौहल्ले में सार्वजनिक स्वच्छता के प्रति जागरुकता रहनी चाहिए।
  7. टी. बी. के रोगी के सम्पर्क में आने से बचना चाहिए। रोगी के थूक, वस्त्र, बर्तन, बिस्तर आदि से अलग रहना चाहिए।
  8. रोगी को टी. बी. के अस्पताल में भर्ती करा देना चाहिए।

उपचार
क्षय रोग के उपचार के प्रमुख बिन्दु हैं

  1. रोगी को शुद्ध वायु, जल एवं पौष्टिक आहार की उपलब्धता अत्यन्त आवश्यक है।
  2. चिकित्सक की सलाह से रोगी को ‘डॉट’ (DOTS) प्रणाली के अधीन स्वीकृत दवाओं का सेवन करना चाहिए। इस रोग के उपचार हेतु दवाओं का नियमित सेवन अत्यन्त आवश्यक है, अन्यथा रोग का जीवाणु दवाओं के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर सकता है। ऐसी स्थिति में टी. बी. को इलाज मुश्किल हो जाता है।
  3. गरम जलवायु क्षय रोग के रोगी के लिए ठीक नहीं होती। अतः रोगी को सम जलवायु में रखना चाहिए।

प्रश्न 5.
टायफाइड रोग के कारण, लक्षण एवं रोकथाम के विषय में लिखिए। (2005, 09, 11)
अथवा
जल द्वारा फैलने वाले कौन कौन-से रोग हैं? उनमें से किसी एक रोग के कारण, लक्षण एवं बचने के उपाय लिखिए। (2014)
उत्तर:
टायफाइड (मोतीझरा)
जल के माध्यम से फैलने वाले मुख्य रोग हैं-टायफाइड, हैजा, अतिसार, पेचिश, पीलिया आदि। टायफाइड रोगी को एक निश्चित अवधि तक बुखार अवश्य रहता है, इसलिए इसे मियादी बुखार भी कहा जाता है।
कारण
यह रोग, मनुष्य की आन्त्र (छोटी आँत) में मिलने वाले साल्मोनेला टाइफी नामक जीवाणु से होता है। यह जीवाणु जल तथा भोजन के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश करता है। घरेलू मक्खी के मल पर बैठने से रोगाणु उनके साथ चिपक कर हमारे खाद्य पदार्थों तक पहुँच जाते हैं, जिसे खाने से रोग का संक्रमण हो जाता है। टायफाइड रोग की उद्भवन अवधि 4 से 10 दिन तक होती है।

लक्षण
व्यक्ति के शरीर में जीवाणु के सक्रिय होते ही रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। इस रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।

  1. सिरदर्द तथा बुखार, जो दोपहर बाद अपने चरम पर होता है। संक्रमण के प्रथम सप्ताह के प्रत्येक दिन शारीरिक ताप (ज्वर) में वृद्धि होती जाती है।
  2. दूसरे सप्ताह में तेज ज्वर होता है, जो धीरे-धीरे तीसरे तथा चौथे सप्ताह में कम होता है।
  3. कुछ टायफाइड रोगियों के शरीर पर छोटे-छोटे सफेद रंग के मोती जैसे दाने भी निकल जाते हैं, इसलिए इस रोग को मोतीझरा भी कहते हैं।
  4. इस रोग से आँतें भी प्रभावित होती हैं। आँतों में सूजन तथा घाव हो जाते हैं।

बचाव के उपाय
इस रोग के रोकथाम के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं

  1. TAB-टीकाकरण से प्रतिरक्षण का प्रभाव तीन वर्षों तक रहता है। अतः समय-समय पर टीका लगवाते रहना चाहिए।
  2. व्यक्तिगत स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। कुछ भी खाने से पूर्व हाथों को अवश्य धोना चाहिए।
  3. टायफाइड के रोगी को अन्य व्यक्तियों से अलग रखना चाहिए, जिससे संक्रमण का प्रसार न हो। रोगी के बर्तन, बिस्तर तथा कपड़ों आदि को अलग ही रखना चाहिए तथा रोगी के ठीक होने पर उन्हें भली-भाँति नि:संक्रमित किया जाना चाहिए।
  4. रोगी के मल-मूत्र को खुले में नहीं छोड़ना चाहिए। मल विसर्जन व्यवस्था समुचित होनी चाहिए।
  5. दूध को उबालकर पीना चाहिए तथा पेय जल की शुद्धता सुनिश्चित होनी चाहिए।

उपचार
मियादी बुखार का व्यवस्थित उपचार सम्भव है, इसके लिए समुचित चिकित्सकीय परामर्श लेना आवश्यक है। उपचार के दौरान निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।

  1. रोगी को पूर्ण विश्राम देना चाहिए।
  2. रोगी को उबला हुआ पानी एवं हल्का-सुपाच्य आहार प्राप्त हो।
  3. रोगी को फलों का रस दिया जाना चाहिए।
  4. चिकित्सक द्वारा दी गई औषधियों को नियमित रूप से लिया जाना चाहिए।

प्रश्न 6.
हैजा रोग के उद्गम, फैलने की विधि, लक्षण एवं उपचार लिखिए। (2006)
अथवा
हैजा रोग के कारण, लक्षण व बचने के उपाय लिखिए। (2008, 13, 18)
उत्तर:
हैजा
यह एक अति तीव्र संक्रामक रोग है, जो प्रायः भीड़-भाड़ वाले स्थानों; जैसे-मेलों, तीर्थस्थानों आदि में अथवा बाढ़ जैसी आपदा के उपरान्त फैलता है। कभी कभी तो यह महामारी का रूप लेकर बहुत बड़े जन-समुदाय में फैल जाता है।

कारण एवं प्रसार
विब्रिओकॉलेरी नामक जीवाणु इस रोग का कारक है। ये जीवाणु पानी में अधिक पनपते हैं तथा अधिक गर्मी व अधिक ठण्ड में जीवित नहीं रह पाते। इन जीवाणुओं को संवहन मुख्य रूप से मक्खियों द्वारा होता है। मक्खी के मल, वमन आदि पर बैठने से रोगाणु उनके साथ चिपककर हमारे भोज्य पदार्थों तक पहुँच जाते हैं। ऐसे भोजन को ग्रहण करने से रोग का संक्रमण होता है। स्पष्टतः स्वच्छता में कमी से यह रोग बहुत तेजी से फैलता है। इस रोग का उद्भवन काल बहुत कम होता है। संक्रमण के पश्चात् कुछ ही घण्टों में यह विकराल रूप धारण कर लेता है।
लक्षण
रोग के प्रमुखलक्षण निम्नलिखित हैं

  1. जलीय दस्त जो सामान्तया वेदनामुक्त होता है।
  2. हैजे के रोगी को वमन (उल्टी) होती रहती है।
  3. कुछ ही घण्टों में भारी मात्रा में तरल की हानि जिससे निर्जलीकरण, पेशीय | ऐंठन तथा भार में कमी हो जाती है।
  4. चेहरे की चमक खत्म हो जाती है तथा आँखें अन्दर धंस जाती हैं।
  5. शरीर में जल की कमी से नाड़ी की गति धीमी हो जाती है। समय पर उपचार | न मिलने से रोगी की मृत्यु भी हो सकती है।

बचाव के उपाय
हैजे से बचने के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं।

  1. हैजे के टीके द्वारा प्रतिरक्षीकरण आवश्यक है, इसकी एक खुराक का प्रभाव लगभग छ: माह तक रहता है।
  2. हैजा प्रभावित क्षेत्रों में उबले हुए जल का प्रयोग महत्त्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त भोजन ठीक से पका हुआ एवं शुद्ध होना चाहिए। हैजे के प्रसार की स्थिति में, बाजार में उपलब्ध कटे हुए फल अथवा बिना ढकी मिठाइयों आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।
  3. हैजा प्रभावित क्षेत्रों में तालाब, नदी तथा कुएँ के पानी को नि:संक्रमित किया जाना चाहिए।
  4. व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक स्वच्छता के लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए, | जो हैजा से बचाव के लिए आवश्यक है। रोगी के मल-मूत्र, वमन तथा थूक आदि के निस्तारण की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। स्वच्छता मक्खियों से बचाव का कारगर उपाय है।
  5. हैजे का प्रकोप बढ़ने पर भीड़-भाड़ वाले स्थानों में जाने से बचना चाहिए।
  6. जीवनरक्षक घोल (नमक, चीनी, ग्लूकोज, सोडियम बाइकार्बोनेट तथा पोटैशियम क्लोराइड का जलीय विलयन) का अविलम्ब प्रयोग करना चाहिए। इस विलयन को पीते रहने से निर्जलीकरण रुक जाता है।

उपचार
अनुभवी चिकित्सक की सलाह के साथ निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं।

  1. प्रारम्भिक अवस्था में रोगी को प्याज का अर्क (रस) तथा अमृतधारा जैसी दवा दी जा सकती है।
  2. रोगी को पर्याप्त आराम मिलना चाहिए।
  3. निर्जलीकरण से बचने के उपाय करने चाहिए।
  4. रोगी को ठोस भोज्य पदार्थ नहीं देना चाहिए। थोड़ा आराम होने पर सन्तरे | का रस, जौ- का पानी तथा थोड़ा पानी मिलाकर गाय का दूध दिया जा सकता है।

प्रश्न 7.
मलेरिया रोग फैलने के कारण, लक्षण, बचने के उपाय एवं उपचार लिखिए।(2010)
अथवा
मलेरिया किस मच्छर से फैलता है? कोई चार लक्षण लिखिए। (2018)
अथवा
मलेरिया रोग के कारण, लक्षण व रोकथाम के उपाय लिखिए। (2016)
अथवा
टिप्पणी लिखिए-मलेरिया रोग के कारण व लक्षण। (2018)
उत्तर:
मलेरियो मलेरिया मच्छर द्वारा फैलने वाला संक्रामक रोग है। गर्म देशों (Tropical Countries) तथा नमी वाले क्षेत्रों में इसका प्रकोप अधिक होता है। कारण
मलेरिया का कारक प्लाज्मोडियम नामक परजीवी प्रोटोजोआ है। प्लाज्मोडियम की विभिन्न जातियाँ (वाइवैक्स, मेलिरिआई और फैल्सीपेरम) विभिन्न प्रकार के मलेरिया के लिए उत्तरदायी हैं। इनमें से प्लाज्मोडियम फैल्सीपेरम द्वारा होने वाला रोग सबसे गम्भीर है और यह घातक भी हो सकता है।

यह रोगवाहक मादा ऐनाफ्लीज मच्छर के काटने से होता है, जो मनुष्य का खून चूसती है। जब मादा ऐनाफ्लीज मच्छर किसी संक्रमित व्यक्ति को काटती है, तब परजीवी उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और आगे का परिवर्धन वहाँ होता है। ये परजीवी मच्छर में बहुसंख्यात्मक रूप से बढ़ते रहते हैं और जीवाणुज (स्पोरोजाइट्स) बन जाते हैं। जीवाणुज, परजीवी का संक्रामक रूप है।

जब मच्छर किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटता है, तो जीवाणुज मच्छर की लार ग्रन्थियों से व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाता है। प्रारम्भ में परजीवी यकृत में अपनी संख्या बढ़ाते रहते हैं और फिर लाल रुधिर कणिकाओं पर आक्रमण करते हैं। विभिन्न जाति के परजीवी, मनुष्य के यकृत तथा रक्त में भिन्न-भिन्न जीवन चक्र चलाते हैं। ये चक्र 24, 48 तथा 72 घण्टों में समाप्त होते हैं। इन्हीं के अनुसार रोग भी कई रूपों में होता है।

लक्षण
जब परजीवी लाल रुधिर कणिकाओं पर आक्रमण करते हैं, तो लाल रक्त कणिकाओं के फटने के साथ ही एक टॉक्सिक पदार्थ हीमोजोइन निकलता है, जो ठिठुरन एवं प्रत्येक तीन से चार दिन के अन्तराल पर आने वाले तीव्र ज्वर के लिए उत्तरदायी होता है। सिरदर्द, मिचली, पेशीय वेदना तथा तीव्र ज्वर मलेरिया के प्रमुख लक्षण हैं। मलेरिया के प्रत्येक आक्रमण के तीन चरण होते हैं।
1. शीत चरण सर्दी तथा कपकपी महसूस होती है।
2. उष्ण चरण तीव्र ज्वर, हृदय की धड़कन तथा श्वास की गति में वृद्धि होती है।
3. स्वेदन चरण पसीना आता है तथा ताप ज्वर सामान्य स्तर तक कम हो जाता है। मलेरिया के प्रकोप से मुक्त होने के बाद व्यक्ति कमजोर हो जाता है रुधिर की कमी हो जाती है। यकृत तथा प्लीहा का बढ़ जाना मलेरिया के अन्य प्रभाव हैं।

बचाव अथवा रोकथाम के उपाय

मलेरिया मच्छर के काटने से संक्रमित व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति तक फैलता है, इसलिए मच्छर के काटने से बचाव ही मलेरिया की रोकथाम का एकमात्र उपाय है। इसके लिए कुछ उपाय निम्नलिखित हैं।

  1. खिड़की व दरवाजों पर महीन जाली लगवाएँ, जिससे घरों में मच्छरों का प्रवेश रोका जा सके।
  2. मच्छर भगाने या मारने वाले रसायन का प्रयोग किया जा सकता है।
  3. मच्छरदानी में सोएँ।
  4. ठहरे हुए पानी पर मिट्टी के तेल का छिड़काव करना चाहिए, जिससे मच्छरों के लार्वा मर जाएँ अथवा लार्वाभक्षक मछली (उदाहरणतः गेम्बुसिया, ट्राउट, मिनोस) और बत्तख इत्यादि के प्रयोग से भी लार्वा नियन्त्रण किया जा सकता है।
  5. कीटनाशक दवाओं के छिड़काव से मच्छरों को मारना।
  6. मच्छरों के प्रजनन स्थानों को नष्ट करना।

उपचार
मलेरिया से पीड़ित व्यक्ति के उपचार के लिए कुनैन (सिनकोना वृक्ष की छाल से प्राप्त) नामक औषधि का प्रयोग किया जाता है। चिकित्सक की सलाह से कुछ अन्य औषधियाँ भी ली जा सकती हैं; जैसे-पैल्युड्रिना।
मलेरिया के रोगी को पूर्ण विश्राम एवं हल्का व सुपाच्य भोजन दिया जाना चाहिए।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 6 संक्रामक रोग: प्रसार तथा नियन्त्रण help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 6 संक्रामक रोग: प्रसार तथा नियन्त्रण, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 7 गन्दी बस्तियाँ तथा उनसे उत्पन्न खतरे

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 7 गन्दी बस्तियाँ तथा उनसे उत्पन्न खतरे are part of UP Board Solutions for Class 12  Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 7 गन्दी बस्तियाँ तथा उनसे उत्पन्न खतरे.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 7
Chapter Name गन्दी बस्तियाँ तथा उनसे उत्पन्न खतरे
Number of Questions Solved 18
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 7 गन्दी बस्तियाँ तथा उनसे उत्पन्न खतरे

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
गन्दी बस्तियों की उत्पत्ति का उत्तरदायी कारण
(a) निर्धनता
(b) औद्योगीकरण
(c) शहरी मकानों का अभाव
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 2.
भौतिक साधनों का अभाव सर्वाधिक होता है।
(a) बड़े मुहल्लों में
(b) बड़े उद्योगों में
(c) गन्दी बस्तियों में
(d) बड़े नगरों में
उत्तर:
(c) गन्दी बस्तियों में

प्रश्न 3.
गन्दी बस्तियों में रहने वाले व्यक्ति वंचित रहते हैं।
(a) धन से
(b) अच्छे घर से
(c) स्वास्थ्य सुविधाओं से
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 4.
गन्दी बस्तियों की मुख्य समस्याएँ
(a) सुविधाओं का न होना
(b) नैतिकता का ह्रास
(c) कुपोषण
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 5.
गन्दी बस्तियों की समस्या का समाधान है।
(a) इन्हें नष्ट कर देना चाहिए।
(b) इनको विकसित ही नहीं होने देना चाहिए
(c) इनके सुधार के अधिक उपाय किए जाने चाहिए
(d) समस्या का समाधान जरूरी नहीं
उत्तर:
(e) इनके सुधार के अधिक उपाय किए जाने चाहिए

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक, 25 शब्द)

प्रश्न 1.
गन्दी बस्तियों से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
गन्दी बस्तियों (स्लम) से आशय ऐसे लोगों के निवास स्थान से है जिनकी आर्थिक स्थिति दयनीय होती है। यहाँ गरीबी, भूखमरी तथा दरिद्रता का वास होता है, जो केवल यहाँ के रहने वाले लोगों के लिए ही नहीं वरन् सम्पूर्ण मानव जाति के स्वास्थ्य, सामाजिक एवं नैतिक विकास में अवरोध उत्पन्न करती है।

प्रश्न 2.
गन्दी बस्तियों की उत्पत्ति का कोई एक मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:
गन्दी बस्तियों की उत्पत्ति को एक प्रमुख कारण दरिद्रता अथवा निर्धनता है। इन बस्तियों में रहने वाले लोग श्रमिक वर्ग तथा निम्न आय वर्ग समूह के होते हैं। इनके पास भौतिक साधनों का सर्वथा अभाव होता है।

प्रश्न 3.
क्या औद्योगीकरण स्लम एरिया के लिए उत्तरदायी कारण है?
उत्तर:
गन्दी बस्तियों की उत्पत्ति का एक प्रमुख कारण औद्योगीकरण एवं नगरीकरण भी है। शहरों में प्रायः बड़ी इमारतों के निर्माण तथा औद्योगिक कारखानों में काम करने होते हैं, जिसके कारण वहाँ काम करने वाले मजदूर इन शहरों के आस-पास ही झोपड़ियाँ बना लेते हैं। जहाँ किसी भी तरह की आवश्यक सुविधाएँ नहीं होतीं, केवल गन्दगी ही होती है। यहाँ पानी, बिजली, शुद्ध वायु आदि की कोई व्यवस्था नहीं होती।

प्रश्न 4.
मलिन बस्तियों (Slums) की प्रमुख समस्याएँ क्या हैं? (2018)
उत्तर:
मलिन बस्तियों में सुविधाओं का अभाव, रोगों का प्रसार, कुपोषण एवं नैतिक आचरण का ध्यान सदैव रहता है।

प्रश्न 5.
गन्दी बस्तियों में सर्वाधिक कुपोषण से ग्रसित लोग रहते हैं? संक्षेप में बताइट।
उत्तर:
इन बस्तियों में स्वच्छ व सन्तुलित आहार के अभाव में यहाँ कुपोषण के शिकार लोगों की संख्या भी अधिक होती है। जन्म से ही बच्चों को स्वच्छ वातावरण न मिलने से वह कुपोषित हो जाते हैं। पीलिया, घेघा, पतलापन तथा पोलियो जैसी घातक बीमारियों से ग्रसित होते हैं।

प्रश्न 6.
राष्ट्रीय विघटन को कौन प्रोत्साहित करता है?
उत्तर:
जब समाज में शराब पीने वाले, जुआ खेलने वाले लोगों को तथा पारिवारिक विघटन को प्रोत्साहन मिलने लगता है तब यही सामाजिक विघटन राष्ट्रीय विघटन को प्रोत्साहित करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक, 50 शब्द)

प्रश्न 1.
गन्दी बस्तियों से होने वाली कोई दो हानियाँ बताइए।
उत्तर:
गन्दी बस्तियों में गन्दगी का ही साम्राज्य होता है, जिससे रोगों का विस्तार ही नहीं होता है बल्कि इससे समाज को निम्नलिखित हानियाँ पहुँचती हैं।
1. पारिवारिक विघटन आवास की समस्या के कारण जो भी व्यक्ति (श्रमिक) इन गन्दी बस्तियों में रहता है उसे अपने परिवार से दूर रहना पड़ता है, क्योंकि आर्थिक तंगी के कारण वह अपने परिवार को साथ नहीं रख सकता। अतः धीरे-धीरे वह अपने परिवार से दूर हो जाता है।

2. सामाजिक विघटन गन्दी बस्तियों से व्यक्ति व परिवार ही नहीं, अपितु समाज की संरचना भी प्रभावित होती है तथा अनेक सामाजिक समस्याओं का जन्म होता है। व्यक्तिगत कार्यों की असफलता ही व्यक्ति के मस्तिष्क में निराशा उत्पन्न करती है। जहाँ वह स्वयं को उपेक्षित महसूस करता है। और समाज की अपेक्षा स्वयं को अधिक महत्त्व प्रदान करता है। जब समाज में सामाजिक मूल्यों एवं मान्यताओं की उपेक्षा की जाती है तो परम्परागत समाज का ढाँचा भी असन्तुलित हो जाता है, जिससे सामाजिक विघटन को प्रोत्साहन मिलता है।

प्रश्न 2.
गन्दी बस्तियों से व्याप्त समस्याओं को दूर करने हेतु कोई दो उपाय लिखिए।
उत्तर:
गन्दी बस्तियों का वातावरण अत्यधिक दूषित होता है, जिसके कारण वहाँ अनेक प्रकार की आर्थिक, सामाजिक एवं पारिवारिक समस्याएँ होती हैं, जिनका समाधान अत्यन्त आवश्यक है। इन बस्तियों की समस्याओं का समाधान निम्नलिखित उपायों द्वारा सम्भव है।
1. रोजगार सुविधाओं में वृद्धि गन्दी बस्तियों की समस्या का एक समाधान यह भी है कि गाँवों में जहाँ कृषि के अतिरिक्त अन्य कोई रोजगार नहीं है, रोजगार के अवसरों में वृद्धि की जाए। जो रोजगार नगरों में स्थापित किए जाते हैं, उन्हें गाँवों में स्थापित किया जाए। इससे ग्रामीण जनता को साधारण प्रयासों से ही रोजगार मिल जाएगा और वे रोजगार की तलाश में नगरों की ओर नहीं भागेंगे। इससे भी गन्दी बस्तियों की समस्या का समाधान करने में मदद मिल सकती है।

2. सामाजिक सुरक्षाओं का विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक सुरक्षा और सुविधाओं की कमी है, इससे ग्रामीण व्यक्ति नगरों की ओर पलायन करते हैं। अत: यह आवश्यक है कि ग्रामीण जीवन को नगरों में प्राप्त होने वाली सुविधाओं से युक्त किया जाए। इन सुविधाओं में आवागमन और संचार के साधन, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ, सुरक्षा, मनोरंजन, पानी, प्रकाश आदि प्रमुख हैं। जब गाँव में ही व्यक्ति को उपरोक्त सुविधाएँ प्राप्त होने लगेगी तो वे नगरों की ओर आकर्षित नहीं होंगे और इस प्रकार गन्दी बस्तियों में रहने की समस्या का समाधान भी स्वतः हो जाएगा।

प्रश्न 3.
कृषि के विकास से गन्दी बस्तियों को और बढ़ने से रोका जा सकता है? इसके कौन-कौन से सुझाव दिए जा सकते हैं?
उत्तर:
कृषि में पर्याप्त पैदावार न होने के कारण ग्रामीण जनसंख्या नगरों की ओर पलायन करती है, जिससे गन्दी बस्तियों का विकास होता है। अत: इस समस्या के समाधान के लिए आवश्यक है कि कृषि व्यवसाय की उन्नति की जाए। भारत में कृषि-व्यवसाय की उन्नति के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं।

  1. कृषि की नई और कुशल रीतियों को अपनाया जाए।
  2. कृषि की भूमि के विभाजन और अपखण्डन पर रोक लगाई जाए।
  3. कृषि शिक्षा का प्रसार किया जाए।
  4. सिंचाई सुविधाओं में विस्तार किया जाए।
  5. कृषि अनुसन्धान कार्यों को प्रोत्साहित किया जाए।
  6. शासकीय कृषि फार्मों की स्थापना की जाए और इनकी सहायता में कृषकों में जागरूकता का प्रसार किया जाए।
  7. अच्छी किस्म के बीज और खाद तथा अच्छी नस्ल के बैलों का कृषि में प्रयोग किया जाए।
  8. विनाशकारी कीड़े-मकोड़ों पर रोक लगाई जाए।
  9. भूमि के कटाव को रोका जाए।
  10. फसलों की पद्धति में आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन किया  जाए।

प्रश्न 4.
गन्दी बस्तियों में सुधार लाने के लिए कुछ पंचवर्षीय योजनाओं में कौन-से कार्यक्रम संचालित किए गए थे?
उत्तर:
भारत में आजादी के पश्चात् शहरों के चारों ओर या बीच में स्थिति इन बस्तियों में आन्तरिक सुधार लाने हेतु कुछ कार्यक्रम संचालित किए, जो इस प्रकार हैं।

  1. द्वितीय पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत 204 योजनाएँ बनाई गईं जिन पर 19 करोड़ की धनराशि का अनुदान दिया गया। यह अनुदान लगभग 58,000 परिवारों के लिए आवासीय सुविधा प्रदान करने हेतु दिए गए थे।
  2. तीसरी पंचवर्षीय योजना में गन्दी बस्तियों को हटाकर नए आवास बनाने का प्रावधान किया गया।
  3. कुपोषण तथा अन्धेपन को दूर करने तथा गर्भवती महिलाओं एवं शिशुओं को सन्तुलित आहार देने का भी प्रावधान बनाया गया।
  4. चौथी एवं पाँचवीं पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत गन्दी बस्तियों में मुख्य रूप से कलकत्ता की एक गन्दी बस्ती के सुधार के लिए धनराशि का प्रावधान किया गया था।

प्रश्न 5.
गन्दी बस्तियों से कौन-कौन सी समस्याएँ होती हैं? अथवी गन्दी बस्तियों की समस्याओं पर संक्षेप में टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
गन्दी बस्तियाँ समस्याओं की जननी होती हैं, वहाँ के लोग आजीवन समस्याओं से ही जूझते रहते हैं। इन बस्तियों की समस्याएँ निम्नलिखित हैं।
1. रोगों का प्रसार गन्दी बस्तियों में शुद्ध वायु एवं शुद्ध पेयजल न मिल पाने के कारण यहाँ रोगों का प्रसार रहता है। यहाँ के दूषित वातावरण के कारण मक्खी, मच्छर उत्पन्न होते हैं, जो भोजन को दूषित कर देते हैं। इस भोजन को ग्रहण करने वाला व्यक्ति हमेशा अस्वस्थ रहता है। हैजा, पेचिश, टी.बी. इत्यादि रोगों से पीड़ित यहाँ बहुत से लोग रहते हैं।

2. कुपोषण स्वच्छ व सन्तुलित आहार के अभाव में यहाँ कुपोषण के शिकार लोगों की संख्या भी अधिक होती है। जन्म से ही बच्चों को स्वच्छ वातावरण न मिलने से वह कुपोषित हो जाते हैं। पीलिया, घेघा पतलापन तथा पोलियो जैसी घातक | बीमारियों से ग्रसित होते हैं।

3. नैतिक आचरण का ह्रास बढ़ती बेरोजगारी एवं महँगाई के कारण इन बस्तियों के लोगों को भोजन नहीं मिल पाती। फलतः चोरी, डकैती, जेब काटना, गुण्डागर्दी इत्यादि अनैतिक आचरणों में वृद्धि होती है तथा नैतिक आचरण का पतन हो जाती है।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक, 100 शब्द)

प्रश्न 1.
गन्दी बस्तियों से क्या आशय है? इसकी उत्पत्ति के लिए कौन-कौन से कारक उत्तरदायी है?
अथवा
गन्दी बस्तियों के विस्तार के लिए कौन-कौन से कारण जिम्मेदार है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
गन्दी बस्तियों से आशय
गन्दी बस्तियों (स्लम) से आशय ऐसे लोगों के निवास स्थान से है जिनकी आर्थिक स्थिति दयनीय होती है। यहाँ गरीबी, भूखमारी तथा दरिद्रता का वास होता है, जो केवल यहाँ के रहने वाले लोगों के लिए ही नहीं वरन् सम्पूर्ण मानव जाति के स्वास्थ्य, सामाजिक एवं नैतिक विकास में अवरोध उत्पन्न करती हैं।

उत्पत्ति के कारण
गन्दी बस्तियों की उत्पत्ति के निम्नलिखित कारण है।
1. दरिद्रता/निर्धनता यह गन्दी बस्तियों की उत्पत्ति और विकास का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है। इन गन्दी बस्तियों में श्रमिक (मजदूर) और निम्न आय समूह वाले व्यक्ति रहते हैं। इनके पास भौतिक साधनों का सर्वथा अभाव होता है तथा इनके पास भरपेट भोजन का भी अभाव होता है।

2. मकानों का अभाव गन्दी बस्तियों में मकानों का सर्वथा अभाव होता है। यहाँ छोटी-छोटी कोठरियों या झुग्गियों में एक साथ कई-कई परिवार रहते हैं। इस तरह की बस्तियाँ नगरों के आस-पास अधिक पाई जाती है। नगरों में व्यवसाय एवं उद्योगों के कारण जनसंख्या का आकार बड़ा एवं भूमि छोटी हो जाती है। अत: यहाँ मकान बनाना आसान नहीं होता। मकान के अभाव में ही अधिकांश लोग विवश होकर गन्दे मकानों में रहने को मजबूर हो जाते हैं।

3. अज्ञानता गन्दी बस्तियों के उत्पन्न होने का एक प्रमुख कारण अज्ञानता भी है। यहाँ रहने वाले व्यक्तियों को स्वास्थ्य सुविधाओं, सफाई, बीमारियों और उनके विकास आदि के विषय में कोई ज्ञान ही नहीं होता।

4. औद्योगीकरण गन्दी बस्तियों की उत्पत्ति का एक प्रमुख कारण औद्योगीकरण एवं नगरीकरण भी है। शहरों में प्रायः बड़ी इमारतों के निर्माण होते हैं, जिसके कारण वहाँ काम करने वाले मजदूर इनके आस-पास ही झोपड़ियाँ बना लेते हैं। साथ-ही-साथ औद्योगिक कारखानों में काम करने वाले मजदूर भी इन कारखानों से सटे जगहों पर झोपड़ियाँ बनाते हैं। जहाँ किसी भी तरह की आवश्यक सुविधाएँ नहीं होतीं, केवल गन्दगी ही होती है। यहाँ पानी, बिजली, शुद्ध वायु आदि की कोई व्यवस्था नहीं होती।

5. जनसंख्या में वृद्धि जनसंख्या में होने वाले निरन्तर वृद्धि के कारण भी इन गन्दी बस्तियों का विकास होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती बेरोजगारी ने लोगों को शहरों की ओर पलायन करने को विवश कर दिया है जिसके कारण शहरी जनसंख्या में वृद्धि हुई। आर्थिक संसाधनों की कमी तथा रोजगार न होने की स्थिति में ज्यादातर लोगों को इन्हीं गन्दी बस्तियों में शरण लेनी पड़ती है। अतः शहरी जनसंख्या में वृद्धि हो रही है।
अन्य कारण उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त कुछ ऐसे कारण भी हैं, जो इन बस्तियों की उत्पत्ति के लिए उत्तरदायी हैं; जैसे

  1. ग्रामीण रोजगार का अभाव
  2. गतिशीलता (देशान्तर गमन)
  3. प्राकृतिक आपदाएँ
  4. नगरों में सामाजिक सुरक्षा
  5. पारिवारिक कलह एवं सामाजिक बहिष्कार
  6. नगर नियोजन का आभाव

प्रश्न 2.
गन्दी बस्तियों से क्या हानियाँ हैं? इनके सुधार हेतु कौन-कौन से समाधान किए गए हैं? विस्तार से समझाइए।
अथवा
स्लम एरिया से कौन-कौन सी हानियाँ होती हैं? विस्तार से समझाइए।
उत्तर:
गन्दी बस्तियों में गन्दगी का ही साम्राज्य होता है, जिससे रोगों का विस्तार ही नहीं होता, बल्कि इससे समाज को हानि पहुँचती है; जैसे
1. व्यक्तिगत विघटन यह बस्तियाँ व्यक्तिगत जीवन को विघटित कर देती है, | क्योंकि यहाँ रहकर व्यक्ति सामान्य जीवनयापन नहीं कर सकता। मद्यपान, मादक द्रव्यों का सेवन, जुआ खेलना तथा आत्महत्या जैसी व्यक्तिगत विघटन की प्रमुख घटनाएँ यहाँ सर्वाधिक होती हैं।

2. पारिवारिक विघटन आवास की समस्या के कारण जो भी व्यक्ति (श्रमिक) इन गन्दी बस्तियों में रहता है, उसे अपने परिवार से दूर रहना पड़ता है, क्योंकि आर्थिक तंगी के कारण वह अपने परिवार को साथ नहीं रख सकता। अतः धीरे-धीरे वह अपने परिर से दूर हो जाता है।

3. सामाजिक विघटन गन्दी बस्तियों से व्यक्ति व परिवार ही नहीं, अपितु समाज की संरचना भी प्रभावित होती है तथा अनेक प्रकार की सामाजिक समस्याओं का जन्म होता है। व्यक्तिगत कार्यों की असफलता ही व्यक्ति के मस्तिष्क में निराशा उत्पन्न करती है। जहाँ वह स्वयं को उपेक्षित महसूस करता है और समाज की अपेक्षा स्वयं को अधिक महत्त्व प्रदान करता है। जब समाज में सामाजिक मूल्यों एवं मान्यताओं की उपेक्षा की जाती है तो परम्परागत समाज का ढाँचा भी असन्तुलित हो जाता है, जिससे सामाजिक विघटन को प्रोत्साहन मिलता है।

4. राष्ट्रीय विघटन जब समाज में शराब पीने वाले, जुआ खेलने वाले लोगों को तथा पारिवारिक विघटन को प्रोत्साहन मिलने लगता है, तब यही सामाजिक विघटन राष्ट्रीय विघटन को प्रोत्साहित करता है।

5. अज्ञानता को प्रोत्साहन अज्ञानता भी गन्दी बस्तियों का दुष्परिणाम है। यहाँ रहने वाले व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं, जिससे उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं मिल पाती। यह बच्चे दिनभर बस्ती की गन्दी गलियों में घूमते रहते हैं, जिससे उनमें अज्ञानता का ही विकास होता है।

6. नैतिकता का ह्रास गन्दी बस्तियाँ नैतिकता को प्रभावित करती हैं। यहाँ रहने वाले व्यक्ति के समक्ष आर्थिक परेशानियाँ ही इतनी प्रबल होती हैं कि वे अन्य किसी बात पर नैतिक या अनैतिकता में भेद नहीं कर पाते। चोरी करनी, जुआ खेलना, शराब व सिगरेट पीना जैसी बुरी आदतें इनके लिए सामान्य बातें हैं। इन सबका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति नैतिक पतन की ओर अग्रसर होता है।

7. स्वास्थ्य पर प्रभाव गन्दी बस्तियाँ लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव ही डालती हैं। यहाँ का वातावरण शुद्ध न होने के कारण अनेक प्रकार की भयंकर बीमारियाँ फैलती हैं, जो स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं।

गन्दी बस्तियों की समस्या के समाधान हेतु उपाय

गन्दी बस्तियों में व्याप्त समस्याओं के समाधान हेतु निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं।

1. जनसंख्या वृद्धि पर रोक इस समस्या के समाधान का सर्वप्रथम उपाय यह है कि बढ़ती हुई जनसंख्या पर रोक लगाई जाए। जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगा देने से ग्रामीण जनसंख्या में वृद्धि होगी। इससे गाँवों से नगरों की ओर भागने वाले व्यक्तियों की संख्या कम हो जाएगी।

2. रोजगार सुविधाओं में वृद्धि गन्दी बस्तियों की समस्या का एक समाधान यह भी है कि गाँवों में जहाँ कृषि के अतिरिक्त अन्य कोई रोजगार नहीं है, रोजगार के अवसरों में वृद्धि की जाए। जो रोजगार नगरों में स्थापित किए। जाते हैं, उन्हें गाँवों में स्थापित किया जाए। इससे ग्रामीण जनता को साधारण प्रयासों से ही रोजगार मिल जाएगा और वे रोजगार की तलाश में नगरों की ओर नहीं भागेंगे। इससे भी गन्दी बस्तियों की समस्या का समाधान करने में मदद मिल सकती है।

3. सामाजिक सुरक्षाओं का विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक सुरक्षा और सुविधाओं की कमी है, इससे ग्रामीण व्यक्ति नगरों की ओर पलायन करते हैं, इसलिए ग्रामीण जीवन को नगरों में प्राप्त होने वाली सुविधाओं से युक्त किया जाए। इन सुविधाओं में आवागमन और संचार के साधन, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ, सुरक्षा, मनोरंजन, पानी, प्रकाश आदि प्रमुख हैं। जब गाँव में ही व्यक्ति को उपयुक्त सारी सुविधाएँ प्राप्त होने लगेंगी तो वे नगरों की ओर आकर्षित नहीं होंगे और इस प्रकार गन्दी बस्तियों में रहने की समस्या का समाधान भी स्वतः हो जाएगा।

4. कृषि की उन्नति कृषि में पर्याप्त पैदावार न होने के कारण ग्रामीण जनसंख्या नगरों की ओर पलायन करती है, जिससे गन्दी बस्तियों का विकास होता है। अत: इस समस्या के समाधान के लिए आवश्यक है कि कृषि व्यवसाय की उन्नति की जाए। भारत में कृषि व्यवसाय की उन्नति के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं ।

  1. कृषि की नई और कुशल रीतियों को अपनाया जाए।
  2. कृषि की भूमि के विभाजन और अपखण्डन पर रोक लगाई जाए।
  3. कृषि शिक्षा का प्रसार किया जाए।
  4. सिंचाई सुविधाओं को विस्तार किया जाए।
  5. कृषि अनुसन्धान कार्यों को प्रोत्साहित किया जाए।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 7 गन्दी बस्तियाँ तथा उनसे उत्पन्न खतरे  help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 7 गन्दी बस्तियाँ तथा उनसे उत्पन्न खतरे, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 17 सामाजिक विषमताओं तथा विछेदनों का निराकरण

UP Board Solutions for Class 12  Home Science Chapter 17 सामाजिक विषमताओं तथा विछेदनों का निराकरण are part of UP Board Solutions for Class 12  Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12  Home Science Chapter 17 सामाजिक विषमताओं तथा विछेदनों का निराकरण.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 17
Chapter Name सामाजिक विषमताओं तथा विछेदनों का निराकरण
Number of Questions Solved 22
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 17 सामाजिक विषमताओं तथा विछेदनों का निराकरण

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
विषमता को आशय है।
(a) जीवन स्तर एवं जीवन-शैली में मिन्नता
(b) शिक्षा में अन्तर
(c) आयु में असमानता
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(a) जीवन-शर एवं जीवन-शैली में भिन्नता

प्रश्न 2.
सामाजिक विषमता की उत्पत्ति के विषय में प्रचलित व्याख्याओं में 
शामिल हैं।
(a) प्राकृतिक विभेद
(b) शम्न विभाजन एवं वर्ग निर्माण
(c) प्रकार्यात्मक आवश्यकता
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन विषमता के कारणों में सम्मिलित नहीं है?
(a) अर्जित आय
(b) व्यवसाय
(c) जन्म, जाति एवं प्रजाति
(d) बटाईदार
उत्तर:
(d) बटाईदार

प्रश्न 4.
भारत में किस तरह की समाज्ञ यवस्था पाई जाती है?
(a) मुली समज व्यवस्था
(b) द समाज व्यवस्था
(c) अर्ब बुली समाज व्यवस्था
(d) इनमें से कोई नहीं ।
उत्तर:
(b) बन्द अमात्र ब्यवस्था

प्रश्न 5,
समाज विछेदन का तात्पर्य हैं।
(a) सन्या दूट जाना
(b) सम्बन्धों में अलगाव
(c) ” और ” दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) ‘a’ और ‘b’ दोनों

प्रश्न 6.
सामाजिक विजेदन के कारणों में सम्मिलित हैं
(a) जातिवाद
(b) जनसंख्या वृमि
(c) सामाजिक कुरीतियों
(d) में सनी
उत्तर:
(d) ये सभी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
विषमता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
विषमता का तात्पर्य एक समाज के लोगों के जीवन स्तर तथा जीवन-शैली 
को भिताओं में है।

प्रश्न 2. विषमता की उत्पत्ति को लेकर कितने मत प्रचलित हैं?
उत्तर:
विषमता की उत्पत्ति को लेकर प्रमुख रूप से दो प्रकार के मत प्रचलित हैं।

प्रश्न 3.
समाज में सामाजिक विषमता कैसे उत्पन्न होती है? (2018)
अक्षा सामाजिक विषमता के दो कारणों को लिखिए।
उत्तर:
सामाजिक विषमता उत्पन्न होने के दो मुख्य कारण इस प्रकार हैं।

  • अर्जित आय
  • व्यवसाय

प्रश्न 4.
भारत किस तरह की समाज व्यवस्था का उदाहरण प्रस्तुत 
करता है?
उत्तर:
भारत परम्परावादी खेतिहर समाज का उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहाँ जाति के साथ साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि सुधार होने तक कृषि व्यवस्था में छः स्तर देखने को मिलते हैं।

  • गैर-खेतिहर भूस्वामी
  • गैर खेतिहर पट्टेदार
  • खेतिहर भूस्वामी
  • खेतिहर रैय्यत
  • बटाईदार
  • भूमिहीन खेतिहर मजदूर

प्रश्न 5.
सामाजिक विछेदन कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
सामाजिक विच्छेदन दो प्रकार के होते हैं, जो निम्नलिखित है।

  • भक्तिगत विच्छेदन
  • सामाजिक विच्छेदन

प्रश्न 6.
सामाजिक विच्छेदन के किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक विछेदन के दो कारण निम्नलिखित हैं।

  • आतिवाद
  • जनसंख्या वृद्धि

प्रश्न 7.
सामाजिक विषमता एवं विच्छेदन को दूर करने के लिए किन्हीं दो पाय को बताए।
उत्तर:
समाज में विषमता एवं विच्छेदन को दूर करने के उपाय हैं।

  • पूंजी एवं आय का पुनर्वितरण
  • आधुनिकीकरण

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1.
सामाजिक विषमता का क्या अर्थ है: समझाए।
उत्तर:
सामाजिक विषमता से आशय एक समाज के लोगों के जीवन स्तर तथा जीवन-शैली को भिन्नताओं से है, जो सामाजिक परिस्थितियों में इनकी विषम स्थिति में रहने के कारण होती हैं। उदाहरण के रूप में पूरयामो तथा भूमिहीन श्रमिक या ब्राह्मण व इरिजन को सामाजिक परिस्थितियों में पाए जाने वाले अनार के कारण उन्हें प्राप्त जीवन-स्तरों तथा जोवन-शैलियों में भी अन्तर देखने को मिलता है। सामाजिक विषमता की उत्पत्ति के विषय में निम्न माएँ प्रनित हैं।

  • प्राकृतिक विभेद
  • व्यझिागत सम्पत्ति
  • श्रम विभाजन एवं वर्ग निर्माण
  • युद्ध एवं विजय
  • प्रकार्यात्मक आवश्यकता
  • अभिमत एवं शक्ति

विषमता की उत्पत्ति को लेकर प्रमुख रूप से दो प्रकार के मत प्रतित हैं। एक मत के अनुसार विषमता एक ऐतिहासिक तथ्य है, जो समय के साथ-साथ अपने आप समाप्त हो जाएगी, लेकिन सो मतानुसार विषमता को समाज में समाप्त नहीं किया जा सकता, यह शाश्वत र निरन्तर बेनी रहेगी।

प्रश्न 2.
विषमता के कारणों में शिक्षा किस प्रकार उत्तरदायी है? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा सम्बन्धी अन्तर विषमता को जन्म देते हैं। जहाँ सिद्धान्त रूप में शिक्षा की समान मुविधा की बात की जाती है, वहीं व्यवहुप्त रूप में अनेक अन्तर देखने को मिलते हैं जहाँ मापन सम्पन्न लोगों के बच्चों को निजी रसों में पढ़ने की सुविधा उपलब्ध है, वहीं गरीब लोगों के बच्चों अभावमय स्थिति में पड़ना पड़ता है। जहाँ एक और कुछ गिने-चुने लोगों को उच्च एवं आवसायिक शिश प्राप्त करने तथा प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से उच्च पदों पर आसीन होने के अवसर प्राप्त है, वहीं दूसरी और अधिकांश लोगों को इस तरह के अवसर समान रूप में उपलब्ध नहीं है, जहाँ एक और आर्थिक विषमता शिक्षा को असमान सुविधाओं के लिए उत्तरदायी है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा सम्बन्धी असमान सुपिधाएँ विषमता की खाई और अधिक बढ़ाने में योगदान देती हैं। अदि शिक्षा सम्बन्धी अवसर सभी वर्गों एवं व्यक्तियों के लिए उपलब्ध हो जाए, तो समाज में व्याप्त सामाजिक विषमता को पनपने से रोका जा सकता है। इस प्रकार शिक्षा की असमनता के कारण भी समाज में विषमता पनपती हैं, जोकि स्वस्थ 
समाज के विकास हेतु उपयुक्त नहीं है।

प्रश्न 3.
भारत में सामाजिक विषमता पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भारत परम्परावादी खेतिहर समाज का उदाहरण है, जहां बन्द समाज व्यवस्था पाई जाती हैं। यहाँ जाति के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि सुधार होने तक कृषि-व्यवस्था के दिन छः स्तर देखने को मिलते हैं, जिनमें एक संतरण व्यवस्था है।

  • गैर-खेतिहर भूस्वामी
  • गैर खेतिहर पट्टेदार
  • तर भूस्वामी
  • खेतिहर रैय्यत
  • बटाईदार
  • भूमिहीन खेतिहर मजदूर

इन छ: स्तरों के बीच सामाजिक विषमता के कई रूप देखने को मिलते हैं। उदाहरण के रूप में ब्रेतिहर भूस्वामी तथा भूमिहीन खेतिहर मजदूर के जीवन-स्तर तथा जीवन शैली में पर्याप्त अन्तर पाए जाते हैं। परम्परागत कृषि उत्पादन संगठन के दो प्रमुख पक्ष ऐसे हैं, जिनका सामाजिक विषमता को समस्या पर विशेष प्रभाव पड़ता है। पहला, भूस्वामिण एवं नियन्त्रण तथा शारारिक भ्रम के बीच विपरीत सम्बन्ध है। और दुसरा, मध्यम वर्ग को प्रपुर मात्रा में विकास। अधिकांश परम्परागत कृषि समाजों में से दो प्रवृत्तियों पाई जाती हैं। इसका तात्पर्य यह है कि परम्परागत भारतीय समाज में भूमि के नियन्त्रण एवं उपयोग में विषमताएँ केवल व्यवहार रूप में व्याप्त ही नहीं थीं, बल्कि इसे न्यायसंगत रूप में स्वीकार भी किया गया था।

प्रश्न 4.
सामाजिक विचदिन का क्या तात्पर्य है? विचम्दन के दो कारणों को 
स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक विच्छेदन का पर्य यह है कि किसी समूह या परिवार के सदस्यों के मध्य सम्बन्ध टूट जाना या अलगाव उत्पन्न हो जाना। सामाजिक विच्छेदन व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों प्रकार का होता है। इस सम्बन्ध में पी.एच, लेडिस ने अपनी पुस्तक ऐन इण्ट्रोडक्शन दू सोशियोलॉजी’ में बताया है कि सामाजिक नियन्त्रण की व्यवस्था का भंग होना और विश्रृंखला उत्पन्न होना ही सामाजिक विपटन है। सामाजिक विच्छेदन के कारण सामाजिक दिन के कारण निम्नलिखित है।

  1. जातिवाद .के. एन.शर्मा के अनुसार, जातिवाद या जाति शक्ति एक ही जाति के व्यक्तियों की उस भावना को कहा जाता है, जो देश व समाज के सामान्य हितों का ध्यान न रखते हुए केवल अपनी जाति के सदस्यों के उत्थान, जातीय एकता और जाति को सामाजिक परिस्थिति को दृढ़ रखने के लिए प्रेरित करती हैं।
  2. जनसंख्या वृद्धि जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है, जिससे रोजगार के अवसरों में कमी आ रही है। प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार उपलब्ध कराना एक चुनौती बन गया है। बेरोजगारी की स्थिति में कोई भी व्यक्ति परिवार के अन्य सदस्यों के लिए साधन सुविधाएँ जुटाने में असमर्थ होता है, जिसके कारण विच्छेदन होने लगता है।

प्रश्न 5.
विषमता एवं विच्छेदन के निराकरण में नवीन औद्योगिकी का 
समुचित विकास किस प्रकार किया जाना चाहिए?
उत्तर:
वर्तमान युग । कृषि क्षेत्र में नवीन प्रौद्योगिकी के विकास ने भूमि के साथ-साथ पूँजी के मित्र को भी विषमता का प्रमुख आधार बना दिया है, जो पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उदाहरणों में स्पष्ट है। इन क्षेत्रों में जिन शु स्वामियों के पास पूँजी थी, उन्होंने अपने खेतों के पास ही ऊंची कीमतों पर भूमि को खरीदकर बड़े बड़े फार्म बना लिए हैं। अब ये पैगी की सहायता से ट्रैक्टर, पम्पिंग सैट, पावर भैसर तथा अन्य मशीनों को कृषि के लिए काफी प्रयोग करने लगे हैं। ऐसे में वो किन गरी ए -साकारी दोनों ही सोते से अधिक ऋण लेने में सफल रहे हैं। परिणामस्वरूप विषमता कम होने के अतिरिक्त और बने लगी है। इसी प्रकार पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से चलाए गए विकास कार्यक्रमों से देश की आर्थिक प्रगति तो हुई है, लेकिन इनका लाभ भी कुछ गिने-चुने शक्ति सम्पन्न लोगों को ही मिल पाया है। अतः विषमता दूर करने के लिए हमें वास्तविकत के धरातल पर आना होगा और सही दिशा में कारगर उपाय अपनाने होंगे।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अक)

प्रश्न 1.
सामाजिक विषमता से आप क्या समझते हैं। भारत में सामाजिक 
विषमता के स्तर को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक विषमता से आशय एक समाज के लोगों के जीवन-स्तर तथा जीवन-सी की भिन्नताओं से है, जो सामाजिक परिस्थितियों में इनकी विषम स्थिति में रहने के कारण होती हैं। उदाहरण के रूप में भूस्वामी तद्दा भूमिहीन श्रमिक या ब्राह्मण व हरिजन की सामाजिक परिस्थितियों में पाए आने वाले अनार के कारण उन्हें प्राप्त जीवन-स्तरों तथा जीवन-शैलियों में मो अन्तर देखने को मिलता है।

सामाजिक विषमता की उत्पत्ति के विषय में निम्नलिखित व्याख्याएँ प्रचलित हैं।

  • प्राकृतिक विभेद
  • व्यक्तिगत सम्पत्ति
  • श्रम विभाजन एवं वर्ग निर्माण
  • सुद्ध एवं विजय
  • प्रकार्यात्मक आवश्यकता है
  • अभिमत एवं शक्ति

विषमता की उन को लेकर प्रमुख रूप से दो प्रकार के मत प्रचलित हैं। एक मत के अनुसार, विषमता एक ऐतिहासिक तथ्य है, जो समय के साथ-साथ अपने आप समाप्त हो जाएगी, लेकिन दूसरे मतानुसार, विषमता को समाज से समाप्त नहीं किया जा सकता, यह शाश्वत और निरन्तर बनी रहेगी।

भारत में सामाजिक विषमता
भारत परम्परावादी खेतिहर समाज का उदाहरण हैं, जहाँ बन्द समाज-व्यवस्था पाई जाती रही हैं। यहाँ जाति के साथ-साथ शामीण क्षेत्रों में भूमि सुधार होने तक कृषि-व्यवस्था के निम्न छः स्तर देखने को मिलते हैं, जिनमें एक अंतरण व्यवस्था है ।

  • गैर-खेतिहर भूस्वामी
  • गैर-खेतिहर पट्टेदार
  • खेतिहर भूस्वामी
  • खेतिहर रैय्यत
  • बटाईदार
  • भूमिहीन खेतिहर मजदूर

उपरोक्त छ: स्तरों के बीच सामाजिक विषमता के कई कप देखने को मिलते हैं। उदाहरण के रूप में खेतिहर भूस्वामी तथा भूमिहीन खेतिहर मजदूर के जीवन-स्तर तथा जीवन-शैली में पर्याप्त अन्तर पाए जाते हैं। परम्परागत कृषि उत्पादन संगठन के दो प्रमुख पक्ष ऐसे हैं, जिनका सामाजिक विषमता को समस्या पर विशेष प्रभाव पड़ता है। पहला, भूस्वामित्व एवं नियन्त्रण तथा शारीरिक श्रम के बीच विपरीत सम्बन्ध है और दूसरा, मध्यवर्ती वर्गों को प्रचुर मात्रा में विकास अधिकांश परम्परागत कृषि समाजों में ये दो प्रवृत्तियां हई जाती हैं। भारतीय कृषि व्यवस्था अपने लम्बे इतिहास की अवधि में प्रमुखतः संस्तरजात्मक रही हैं। सामान्यतः अध्ययनों के आधार पर पाया गया है कि बड़े शू स्वामी ऊँची जाति के, भूमिहीन मजदूर निम्न या किसी अस्पृश्य जाति के सदस्य थे। इन दोनों के बीच मध्य स्तरीय किसान थे, जो खेतिहर जातियों के अन्तर्गत आते थे। इसका तात्पर्य यह है कि परम्परागत भारतीय समाज में भूमि के नियन्त्रण एवं उपयोग में विषमताएँ केवल पहार रूप में प्राप्त हो नहीं दी, बल्कि इसे न्यायसंगत रूप में स्वीकार भी किया गया था।

प्रश्न 2.
सामाजिक विषमता के कारणों की विस्तारपूर्वक विवेचना 
कीजिए।
उत्तर:
विभिन्न समाजों में विषमता के भिन्न-भिन्न कारण देखने को मिलते हैं। यद्यपि कुछ कारण सभी समाजों में समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। विषमता के प्रमुख कारण इस प्रकार है

  1. अर्जित आय एक ही समाज के लोगों की आय में पर्याप्त भिन्नता देखने को मिलती हैं। आथ सम्बन्धी इस भिन्नता के परिणामस्वरूप व्यक्तियों के भोजन, वस्त्र, मकान, आभूषण तथा जीवन-स्तर में अन्तर पाए जाते हैं। इन अन्तरों के कारण विषमताएं उत्पन्न होती हैं।
  2. व्यवसाय विषमता का एक प्रमुख कारण मसाय सम्बन्धी भेद भी हैं। व्यवसायों में ऊंच-नीच का एक संस्मरण पाया जाता है। जहां किसी व्यवसाय को अधिक प्रतिष्ठित माना जाता है, वहीं किसी व्यवसाय को होनता की दृष्टि से भी देखा जाता है। विभिन्न व्यवसायों का इस प्रकार का मूल्यांकन इनमें लगे हुए व्यकियों में विषमता को बढ़ावा देता है।
  3. शिक्षा जहाँ एक और आर्थिक विषमता शिक्षा को असमान सुविधाओं के लिए उत्तरदायी है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा सम्बन्धी असमान सुविधाएँ विषमता की खाई को और अधिक बढ़ाने में योगदान देती हैं।
  4. पद पद का सम्बन्ध सम्पति एवं शक्ति में नहीं वरन् आदर और प्रतिष्ठा से है। विभिन्न समाज भिन्न-भिन्न गुणों का आदर भिनभिन्न रूप से करते हैं। पद सम्बन्धी अन्तर के आधार अलग-अलग होने के कारण विषमता पनपती है।
  5. सम्पत्ति सम्मान के आधार पर सभी समाजों में स्तरीकरण किया जाता है। आदिम समाजों में भी सम्पत्ति के आधार पर ऊँच-नीच का भेद पाया जाता है। समाज में वे लोग ऊँचे माने जाते हैं, जिनके पास अधिक सम्पति होती है तथा जो सभी प्रकार की सुख-सुविधाओं को जुटाने में सक्षम होते हैं।
  6. शमित शक्ति एवं सत्ता के वितरण में असमानता भी विषमता के लिए उत्तरदायी है। जिन लोगों के पास सैनिक शक्ति, सना शासन की बागडोर होती है, उनको स्थिति उन लोगों से ऊँची होती हैं, जो सत्ता एवं शक्तिविहीन होते हैं।
  7. जन्म, जाति एवं प्रजाति जो लोग उच्च समझे जाने माने कुल, मंत्र, राति एवं प्रजाति में जन्म लेते हैं, वे स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानते हैं और इस आधार पर विषमता पनपती हैं। ग्रामीण भारत में जति समस्या सामाजिक विषमता का एक प्रमुख आधार है।

प्रत्येक समाज में एक संस्कृति या सामूहिक प्रतिनिधानों का एक पुत्र होता हैं, मूल्यांकन जिसका एक महत्वपुर्ण लक्षण है और यह विषमता के मौलिक स्रोत को प्रस्तुत करता है। आन्द्रे येतेई ने अपने अध्ययनों के आधार पर बताया है कि मूल्यांकन विषमता का एक सार्वभौमिक स्रोत है। इसका दूसरा झोत बल, शकित तथा प्रभुत्व है।

प्रश्न 3.
सामाजिक विच्छेदन के कारणों पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डालिए।
उत्तर:
सामाजिक विच्छेदन के कारण निम्नलिखित हैं
1. जातिवाद डॉ. के. एन. शर्मा के अनुसार, जातिवाद या जाति-शक्ति एक ही 
जाति के प्रतियों को उस सामना को कहा जाता है, जो देश में समाज के सामान्य हितों का ख्याल न रखते हुए केवल अपनी जाति के सदस्यों के उत्थान, जातीय एकता और जाति की सामाजिक परिस्थिति को छ रखने के लिए प्रेरित करती है।

2. जनसंख्या वृद्धि जनसंख्या
में जौन गति से वृद्धि हो रही है, जिससे रोजगार 
के अवसरों में कमी आ रही है। प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार उपलब्ध कराना एक चुनौती बन गया है। बेरोजगारी पात में कोई भी व्यक्ति परिवार के अन्य सदस्यों के लिए साधन सुविधाएँ जुटाने में असमर्थ होता है, जिसके कारण विछेदन हुने लगता है।

3. राजनैतिक भ्रष्टाचार
राजनैतिक ग्वार्थों के चलते विभिन्न जाति के लोगों में 
आपस में तय उत्पन्न कर अनेक वर्गों में विभाजित कर दिया जाता है। इससे किसी एक वर्ग को विशेष सुविधा उपलब्ध कराकर आकर्षित किया ता है। इससे उनमें राष्ट्रीयता की भावना रागापत होकर अपने वर्ग को ही भावना रह जाती है, जिसके कारण सामाजिक विच्छेदन होने लगता है।

4. सामाजिक कुरीतियों
मारतीय समाज में अनेक तरह की कुरीतियों व्याप्त है, जिने चाल विवाह या हि पर रोक, बेमेल विवाह, विवाह-विद 
आदि हैं। इन कुरीतियों के कारण परिवार के सभी सदस्यों में सामंजस्य नहीं बन पाता और सम्बन्ध–विच्छेद होने लगते हैं। यहां तक कि परिवार टूट जाते

5. धार्मिक दृष्टिकोण
भारतीय समाज अनेक वर्षों में विभाजित हैं, जिनमें अस्पृश्य वर्ग को जोवन-स्तर अत्यन्त निम्न है। सवर्णों द्वारा इन पर अनेक प्रकार के फतव्यों का बोझ डाला जाता है, जिससे इनमें तीन भावना आ जाती हैं और कता पनपने लगती हैं।

6. साम्प्रदायिकता
की भावना वर्तमान समाज में धर्म, जाति तथा भाषा आदि के आधार पर अनेक वर्ग बन गए हैं, जिनमें एक-दूसरे के प्रति विरोध उत्पन्न हो गया है। आपस में संघर्ष और तनाव की स्थिति के कारण सामाजिक सम्बन्धों में विच्छेदन होने लगा है।

7. नए-पुराने में संघर्ष
नई और पुरानी पड़ी में तनाव उत्पन्न होने से विच्छेदन 
को स्थिति बनती है, क्योकि युवा वर्ग और पुराने लोगों के विचारों में टकराहट होने से संघर्ष पैदा हो जाता है, जो विच्छेदन तक पहुँच जाता है। है,

8. दोषप्रद शिक्षा प्रणाली
अव के शिक्षित युवा पुरानी मर्यादाओं तथा 
मापदों का मूल्य नहीं समझ पाते हैं। उनके लिए इनका कोई औचित्य नहीं हैं, लेकिन पुरानी पीढ़ी इन पर जोर देती है, जिसके कारण दोनों वर्षों में विच्छेदन उत्पन्न हो जाता है।

9, नैतिक मूल्यों का हास
धनी वर्ग सम्पन्न और समृद्ध होता है, इसलिए उसके 
पास पैसा और समय दोनों प्रचुर मात्रा में होते हैं। यही कारण है कि इस वर्ग को जीवन-शैली और जीवन-स्तर पर पाश्चात्य प्रभाव अधिक रहता है। पाश्चात्य जीवन-शैली परिवार के उन सदस्यों को उचित नहीं लगती, जो परम्पराओं और नैतिक मूल्यों का निर्वहन करते हैं। इस स्थिति में परिवार में तनाव और संघर्ष उत्पन्न हो जाता है, जो विच्छेदन के रूप में परित होता है।

प्रश्न 4.
विषमता एवं विच्छेदन के निराकरण पर एक निवन्ध्र लिखिए।
उत्तर:
समाज में विषमता एवं विच्छेदन को दूर करने के उपाय निम्नलिखित हैं।
1. पूँजी एवं आय का पुनर्वितरण विषमता एवं विच्छेदन दूर करने के लिए 
जहां भूमि एवं पूँजी का पुनर्वितरण आवश्यक है, वहीं आय का पुनर्वितरण भी जरूरी हैं। जिन क्षेत्रों में नवीन प्रौद्योगिकी का सफलतापूर्वक प्रयोग किया जा सकता है, वहीं भू-स्वामियों का मुनाफा अवश्य बढ़ा है, परन्तु साथ ही कृषि श्रमिकों की मजदूरी भी बढ़ी है और कई शानों पर तो तेजी से तथा पर्याप्त मात्रा में, लेकिन कृषि मजदूरों की सुरक्षा के लिए इन आर्थिक स्थायी आर प्रदान किया जाना चाहिए और इस हेतु कुटीर योग-धन्धों को तेजी से विकास किया जाए।

2. आधुनिकीकरण
आधुनिकीकरण की दिशा में तेजी से आगे बने से विषमता को दूर किया जा सकता है। आधुनिकीकरण से समाज का दृष्टिकोण विकसित तथा एक नए माहौल में समरसता का भाव पनव 
सकेगा, जोकि स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए आवश्यक हैं।

3. प्रजातान्त्रिक मूल्यों एवं मानवतावादी दृष्टिकोण
विषमता के आधारों पर चोट करने के लिए प्रजातान्त्रिक मूल्यों एवं मानवतावादी दृष्टिकोण का व्यापक प्रचार-प्रसार करना चाहिए, क्योंकि समाजीकरण की प्रक्रिया के दौरान ही प्रजातान्त्रिक एवं मानवतावादी मूल्यों के प्रति आस्था पैदा की जा सकती है।

4. जनैतिक परिवर्तन
विषमता एवं विच्छेदन को दूर करने के लिए कानूनी 
एवं राजनैतिक परिवर्तन भी आवश्यक हैं। टी.एच.मार्शल ने इंग्लैण्ड़ में पहले कानुनी समता, फिर राजनौतिक समता और अन्त में नागरिक समता के विकास का विस्तार से वर्णन किया है। अतः राजनैतिक तथा प्रशासनिक कार्यक्रमों द्वारा विषमता को कम किया जा सकता है।

5. आर्थिक विकास
पूर्व यूरोपीय विद्वानों द्वारा बिषमता को समाप्त करने के लिए आर्थिक विकास को आवश्यक माना गया है। आन्द्रे बेतेई के अनुसार, अषक विकास के माध्यम से गरीबों, दरिद्रता एवं बेरोजगारी की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। यदि आर्थिक क्षेत्र में विषमता को कम किया जा सका तो अन्य क्षेत्रों में विषमता धीरे-धीरे कम होने लगेगी। इसका प्रमुख कारण यह है कि आज आय, सम्पत्ति, भौतिक साधन अर्थात् 
आर्थिक शक्ति व्यक्ति को सामाजिक प्रस्थिति के निर्धारण में प्रमुख रूप से महत्त्वपूर्ण है।

6. नवीन प्रौद्योगिकी का समुचित विकास
नौन प्रौद्योगिकी विकास से इन 
भू-स्वामियों को अधिक लाभ मिल पाया, जिनके पास पर्याप्त मात्रा में पूँजी थी। इसी प्रकार पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से चलाए गए विकास कार्यक्रम से देश को आर्थिक प्रगति तो हुई है, लेकिन इनका लाभ भी कुछ गिने-चुने शक्ति-सम्पन्न लोगों को ही मिला है। अतः विषमता दूर करने के लिए सही दिशा में कारगर उपाय अपनाने होंगे, जो निम्न हैं।

  • जनसंख्या नियन्त्रण जनसंख्या नियन्त्रण से आवास तथा भोजन जैसी मूलभूत समस्याओं से छुटकारा पाया जाता है। जनसंख्या वृद्धि से इन सुविधाओं का अभाव हो जाता है, जिसमें तनाव और संघर्ष होता है, इसलिए जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण से विषमता और विच्छेद को रोका जा सकता है।
  • साम्प्रदायिक सद्भावना समाज सामाजिक समता स्थापित करने तथा विच्छेदन को रोकने के लिए आपसी सौहार्दू एवं सद्भावना को बनाए रखना आवश्यक है, जो लोग अपने-अपने धर्मों की सर्वश्रेष्ठता स्थापित करने के उद्देश्य से आपसी तनाव पैदा करते हैं, उन्हें आपस में मिल-जुलकर रहना चाहिए, ताकि सद्भावना बनी रहे।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 17 सामाजिक विषमताओं तथा विछेदनों का निराकरण help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12  Home Science Chapter 17 सामाजिक विषमताओं तथा विछेदनों का निराकरण, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 10 प्राकृतिक आपदाएँ

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 10 प्राकृतिक आपदाएँ are part of UP Board Solutions for Class 12 Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 10 प्राकृतिक आपदाएँ.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 10
Chapter Name प्राकृतिक आपदाएँ
Number of Questions Solved 25
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 10 प्राकृतिक आपदाएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
बाढ़, भूकम्प, चक्रवात, सूखा आदि आपदाओं के पीछे निहित कारक होते हैं।
(a) दैवी प्रकोप सम्बन्धी कारक
(b) पाप में वृद्धि सम्बन्धी कारक
(C) प्राकृतिक कारक
(d) मानव द्वारा पर्यावरण-प्रदूषण में वृद्धि सम्बन्धी कारक
उत्तर:
(c) प्राकृतिक कारक

प्रश्न 2.
निम्न में से कौन-सी भूकम्प की स्थिति है?
(a) मकान गिरने से भूमि का हिलना
(b) रेलगाड़ी की धमक से भूमि में कम्पन
(C) पृथ्वी की आन्तरिक शक्तियों की उथल-पुथल से भूमि में कम्पन
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(c) पृथ्वी की आन्तरिक शक्तियों की उथल-पुथल से भूमि में कम्पन

प्रश्न 3.
भूकम्प किन कारणों से आ सकता है?
(a) विवर्तनिक हलचल
(b) ज्वालामुखी विस्फोट
(c) अत्यधिक खनन (d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 4.
16 व 17 जून, 2013 में भारत के किस राज्य को भयंकर प्राकृतिक आपदा का सामना करना पड़ा था? (2014)
(a) बिहार
(b) उत्तर प्रदेश
(c) उत्तराखण्ड
(d) केरल
उत्तर:
(c) उत्तराखण्ड

प्रश्न 5.
बाढ़ से नष्ट होता है। (2017)
(a) फसल
(b) मकान
(c) सड़के और रेलमार्ग
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 6.
बाढ़ से क्षति होती है। (2018)
(a) मनुष्य एवं पालतू जानवर की
(b) मकान की
(C) फसलों की
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 7.
सूखा आपदा का कारण है। (2014)
(a) वन-विनाश
(b) भूमिगत जल का अधिक दोहन
(c) नदी मार्गों में परिवर्तन
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 8.
सुनामी का सबसे अधिक प्रभाव कहाँ होता है? (2013)
(a) पहाड़ी क्षेत्रों में
(b) तटवर्ती क्षेत्रों में
(C) समुद्र के मध्यवर्ती क्षेत्रों में
(d) मैदानी भागों में
उत्तर:
(b) तटवर्ती क्षेत्रों में

प्रश्न 9.
अकस्मात् उत्पन्न होने वाली आपदा है।
(a) पर्यावरण प्रदूषण
(b) भूमि का मरुस्थलीकरण
(C) सूखा
(d) भूस्खलन
उत्तर:
(d) भूस्खलन

प्रश्न 10.
आग लगने का कारण है। (2016)
(a) पानी
(b) सूरज की किरण
(c) कीचड़
(d) लघु परिपथ
उत्तर:
(d) लघु परिपथ

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक, 25 शब्द)

प्रश्न 1.
प्राकृतिक आपदा से क्या तात्पर्य है? (2009, 18)
उत्तर:
जिन आपदाओं के पीछे उत्तरदायी कारक मानवे नहीं, वरन् प्रकृति होती है, उन्हें प्राकृतिक आपदा’ कहते हैं।

प्रश्न 2.
प्राकृतिक आपदाएँ कौन-कौन सी हैं? (2009, 13)
उत्तर:
बाढ़, सूखा, भूकम्प, भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट, चक्रवात, बादल फटना, सुनामी, ओलावृष्टिं आदि प्राकृतिक आपदाएँ हैं।

प्रश्न 3.
बाढ़ की उत्पत्ति में मानवीय क्रियाकलापों की भूमिका स्पष्ट करें।
उत्तर:
अन्धाधुन्ध वन कटाव, अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ, अनियोजित निर्माण कार्य आदि मानवीय क्रियाकलापों से प्राकृतिक अपवाह तन्त्र अवरुद्ध हो जाता है। तथा बाढ़ की विध्वंसता बढ़ जाती है।

प्रश्न 4.
सुनामी की उत्पत्ति किस अन्य आपदा से सम्बन्धित है?
उत्तर:
सुनामी की उत्पत्ति भूकम्पीय तरंगों से होती है। अत: यह भूकम्प का एक प्रभाव है।

प्रश्न 5.
सुनामी लहरें तटवर्ती क्षेत्रों पर क्यों अधिक प्रभावी होती हैं?
उत्तर:
जल तरंगों की गति उथले समुद्र में अधिक एवं गहरे समुद्र में कम होती है। इसके अतिरिक्त तरंगों की ऊँचाई तट के निकट अत्यधिक बढ़ जाती है, इन्हीं कारणों से सुनामी लहरें तटवर्ती क्षेत्रों पर अधिक प्रभावी होती हैं।

प्रश्न 6.
सुनामी लहरों से बचाव के कोई दो उपाय बताइए।
उत्तर:
सुनामी लहरों से बचाव के सुरक्षात्मक उपाय के रूप में समुद्रतटवर्ती भागों में पूर्वसूचना केन्द्रों का विकास एवं विस्तार किया जाना चाहिए, इसके अतिरिक्त समुद्री लहरों के प्राकृतिक अवरोधक के रूप में मैंग्रोव वनों को संरक्षित किया जाना आवश्यक है।

प्रश्न 7.
राष्ट्रीय आपदा से आप क्या समझते हैं? राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन की क्या आवश्यकता है? (2014)
उत्तर:
जिस आपदा से पूरा राष्ट्र प्रभावित वे चिन्तित हो, उसे ‘राष्ट्रीय आपदा कहते हैं। किसी भी राष्ट्रीय आपदा को रोकने, उसके प्रभाव को सीमित करने व उससे बचाव के लिए व्यापक उपाय करने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन की आवश्यकता होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक, 50 शब्द)

प्रश्न 1.
प्राकृतिक आपदा पर चार बिन्दु लिखिए। (2008, 10, 13)
उत्तर:
ऐसी आपदाएँ जिनका सम्बन्ध प्रकृति से होता है, ‘प्राकृतिक आपदाएँ कहलाती हैं। प्राकृतिक आपदा से सम्बन्धित चार बिन्दु निम्नलिखित हैं।

  • प्राकृतिक आपदा से जान-माल को बहुत नुकसान होता है।
  • इससे समाज में गरीबी एवं बेरोजगारी की समस्याएँ बढ़ती हैं।
  • प्राकृतिक आपदाओं को रोकना सम्भव नहीं है, लेकिन इनके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
  • प्राकृतिक आपदा के समय जनता को धैर्य से काम लेना चाहिए व मिलकर कार्य करना चाहिए।

प्रश्न 2.
सूखा आपदा के प्रमुख कारण लिखिए। (2012)
उत्तर:
‘सूखा आपदा’ का सीधा सम्बन्ध वर्षा से है, जब किसी क्षेत्र में लम्बे समय तक वर्षा का अभाव होता है और पृथ्वी में नमी की कमी हो जाती है, तो उस स्थिति को ‘सूखा’ कहते हैं। सूखे की स्थिति में कृषि की पैदावार नहीं हो पाती है, प्राकृतिक घास आदि पेड़-पौधे भी नहीं उग पाते हैं, जिससे मानव, पशु व अन्य जीव-जन्तुओं के लिए ‘अकाल’ की स्थिति पैदा हो जाती है।

सूखा आपदा के कारण
सूखा आपदा के निम्नलिखित कारण हैं।

  • किसी क्षेत्र में वर्षा का बिल्कुल न होना या बहुत कम होना।
  • भूमिगत जल को अनियोजित व अनावश्यक रूप में खर्च करना, जिससे पेयजल की कमी हो जाती है।
  • वनों की अन्धाधुन्ध कटाई करना। वन वर्षा को नियमित रूप देने में प्रमुख | भूमिका निभाते हैं। वनों की कमी से वर्षा में भी कमी आ जाती है, जिससे सूखे की समस्या उत्पन्न हो जाती है।
  • अवैज्ञानिक ढंग से खनन कार्य करने से भी सम्बन्धित क्षेत्र में सूखे की समस्या हो जाती है।
  • नदी के मार्ग परिवर्तन से पुरातन नदी तटीय क्षेत्र में सूखे की समस्या उत्पन्न हो जाती है।
  • मिट्टी की संरचना में परिवर्तन होने से भी सम्बन्धित क्षेत्र में जल की कमी हो जाती है तथा पेड़-पौधे सूखने लगते हैं।

प्रश्न 3.
सूखे के परिणामस्वरूप क्या हानियाँ होती हैं? (2016, 18)
उत्तर:
सूखे के परिणामस्वरूप होने वाली हानियों/प्रभावों को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत वर्णित किया जा सकता है।

  • सूखा पड़ने पर फसलें बर्बाद हो जाती हैं, जिससे अन्न की कमी हो जाती है। इस स्थिति को अकाल कहा जाता है।
  • सूखा प्रभावित क्षेत्रों में चारे की कमी होने से मवेशियों की मृत्यु होने लगती है। कृषि कर्म में उपयोगी पशुओं की मौत से सर्वाधिक छोटे एवं सीमान्त किसान प्रभावित होते हैं, इसके अतिरिक्त दूध, मांस आदि की आपूर्ति भी प्रभावित होती है।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि कर्म पर आधारित होती है। अतः सूखे की स्थिति में बेरोजगारी वृद्धि दर में तेजी आती है। लोग रोजगार के अवसरों की तलाश में पलायन करने लगते हैं। अत: जनसंख्या असन्तुलन की समस्या उत्पन्न होने लगती है।
  • सूखे की स्थिति में लोगों की क्रयक्षमता कम हो जाती है, जबकि महँगाई में तेजी से वृद्धि होती है, इसका प्रभाव सम्पूर्ण वाणिज्य व्यवस्था पर पड़ता है।
  • कृषि आधारित कच्चे माल के उत्पादन में गिरावट आने से देश के औद्योगिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • सरकार को सूखे की स्थिति से निपटने के लिए विभिन्न उपायों पर धन व्यय करना पड़ता है। उदाहरणत: सरकार की सब्सिडी एवं आयात आदि पर व्यय बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय बचत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है एवं विकास कार्यों में ठहराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  • पानी की कमी के कारण लोग दूषित जल पीने को बाध्य होते हैं। इसके परिणामस्वरूप पेयजल सम्बन्धी बीमारियाँ; जैसे-आन्त्रशोथ, हैजा और हेपेटाइटिस हो जाती हैं।

प्रश्न 4.
सूखे के प्रभावों का उल्लेख करते हुए उसके निवारण के उपाय लिखिए।
उत्तर:
सूखा आपदा निवारण के उपाय
सूखे से बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय सम्भव हैं।

  • वर्षाजल का संरक्षण-संवर्द्धन, नदियों एवं नहरों के जल का समुचित उपयोग आदि माध्यमों से जल-प्रबन्धन आवश्यक है।
  • वृक्षारोपण के माध्यम से हरित पट्टी को विस्तार किया जाए।
  • कुओं, पोखरों एवं तालाबों को स्थानीय जन-सहयोग से पुनर्जीवित किया जाए।
  • नदी-जोड़ो परियोजना के माध्यम से बाढ़ एवं सूखा दोनों आपदाओं पर नियन्त्रण किया जा सकता है।
  • भूमि उपयोग नियोजन प्रणाली का निर्धारण क्षेत्र विशेष की आवश्यकताओं के अनुरूप किया जाना चाहिए।

प्रश्न 5.
भूस्खलन आपदा पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
भूस्खलन के कारण
भूस्खलन की घटना को प्रभावित करने वाले कारकों में भूआकृतिक कारक, ढाल, भूमि उपयोग, वनस्पति आवरण और मनव क्रियाकलाप प्रमुख भूमिका निभाते हैं। भूस्खलने की घटना प्रायः असंघटित चट्टानों एवं तीव्र ढालों पर अधिक होती है। भूमि का कटाव भी इसमें योगदान देता है।

भूस्खलन के प्रभाव

  • इसका प्रभाव स्थानीय होता है, किन्तु सड़क मार्ग में अवरोध, रेलपटरियों का टूटना और जल वाहिकाओं में चट्टानें गिरने से पैदा हुई रुकावटों के गम्भीर परिणाम हो सकते हैं।
  • भूस्खलन के कारण नदी मार्गों में बदलाव, बाढ़ का कारण बनता है।
  • विकास कार्यों की गति धीमी पड़ जाती है।

भूस्खलन आपदा के निवारण के उपाय
भूसखलन आपदा के निवारण के लिए निम्न उपाय लिए जा सकते हैं

  • भूस्खलन सम्भावी क्षेत्रों में बड़े बाँध बनाने जैसे निर्माण कार्यों पर प्रतिबन्ध होना चाहिए।
  • कृषि कार्य, नदी घाटी तथा कम ढाल वले क्षेत्रों तक सीमित होना चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर कृषि करनी चाहिए।
  • वनीकरण को बढ़ावा देना चाहिए।
  • जल बहाव को कम करने के लिए छोटे अवरोधक बाँधों का निर्माण करना
    चाहिए।

प्रश्न 6.
आग लगने के सम्भावित कारणों का वर्णन करते हुए आग की घटनाओं से बचाव हेतु व्यवहार्य उपायों का सुझाव कीजिए।
उत्तर:
आग लगने के कारण
आग लगने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं।

  • ज्वलनशील पदार्थ एवं उपकरणों से आग लगने की सम्भावना अधिक रहती है। विद्युत हीटर, विद्युत प्रेस आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
  • रसोईघर में चूल्हे के बर्नर का खुला रह जाना, स्टोव अथवा सिलेण्डर का फटना आदि घटनाएँ भी आग लगने का प्रमुख कारण होते हैं।
  • विद्युत धारा के प्रवाह में अनियमितता, बिजली की कमजोर वायरिंग अथवा बहुकेन्द्रीय एडाप्टर शॉर्ट सर्किट (लघु परिपथ) का कारण बनकर आग लगा सकते हैं।
  • शीघ्र आग पकड़ने वाले पैकिंग पेपर, पटाखे आदि में भी आग लगने की सम्भावना विद्यमान रहती है। असावधानीपूर्वक धूम्रपान का व्यवहार भी आग लगने का प्रमुख कारण माना जाता है।

आग से बचाव
आग की घटनाओं से बचाव हेतु निम्नलिखित उपायों को अपनाया जा सकता है।

  • घर के अन्दर ज्वलनशील पदार्थ रखने से बचना चाहिए यदि रखना आवश्यक ‘: हो तो पूरी सावधानी अपनानी चाहिए।
  • घर में आग बुझाने वाले सिलिण्डर को आवश्यक रूप से रखना चाहिए एवं सभी सदस्यों को इसका प्रयोग करना आना चाहिए।
  • घर से बाहर निकलते समय विद्युत तथा गैस उपकरणों को ध्यान से बन्द कर देना चाहिए एवं घर में प्रवेश करने पर सर्वप्रथम गैस आदि के रिसाव की जाँच कर लेनी चाहिए।
  • बिजली के एक सॉकिट से अनेक विद्युत उपकरणों को नहीं जोड़ना चाहिए अन्यथा शॉर्ट सर्किट होने की सम्भावना हो सकती है।
  • आग लगने के कारण को जानकर, तद्नुसार तत्काल आवश्यक कदम उठाना चाहिए। यदि बिजली के शॉर्ट सर्किट से आग लगी हैं, तो आग बुझाने में पानी का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • आग लगने की घटना की सूचना तत्काल ही फायर बिग्रेड को दी जानी चाहिए।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक, 100 शब्द)

प्रश्न 1.
भूकम्प आपदा द्वारा कौन-कौन सी हानियाँ होती हैं? (2017)
अथवा
प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव व उनसे बचने का उपाय लिखिए। (2017)
अथवा
हमारे समाज में भूकम्प का क्या प्रभाव पड़ता है? इससे बचने के उपायों को समझाइए। (2010)
अथवा
टिप्पणी कीजिए भूकम्प के प्रभाव तथा उससे बचने के उपाय। (2010)
उत्तर:
भूकम्प
पृथ्वी की आन्तरिक शक्तियों के प्रभाव के कारण से पृथ्वी के किसी भी भाग में होने वाले धीमे या भयंकर कम्पन को भूकम्प कहते हैं। जब पृथ्वी की आन्तरिक परतों में हलचल होती है, तो इसका प्रभाव पृथ्वी की सतह पर खड़ी इमारतों, सड़कों, पुलों, बाँधों आदि पर होता है, जिससे प्रभावित मानवों का जीवन भी अस्त-व्यस्त हो जाता है।

समाज में भूकम्प का प्रभाव
भूकम्प उन प्राकृतिक आपदाओं में से एक है, जिन्होंने हमारे समाज को सबसे अधिक दुष्प्रभावित किया है। वास्तव में, भूकम्प अनेक प्रकार की तबाही का कारण बनता है। भूकम्प से पृथ्वी की बाह्य परत पर भी कम्पन होता है, जिससे प्रभावित क्षेत्र के मकान, सड़कें, टावर, पुल, वन-क्षेत्र इत्यादि को क्षति पहुँचती है। बाँध टूटने से नदियों में बाढ़ आ जाती है, जिससे आस-पास के क्षेत्र भी डूबने लगते हैं।

इन सभी स्थितियों से जन-जीवन बुरी तरह प्रभावित होता है। बहुत-से लोग काल का ग्रास बन जाते हैं, तो बहुत-से जीवनभर के लिए अवसादग्रस्त हो जाते हैं। बहुत-से परिवार बिखर जाते हैं, बच्चे अनाथ हो जाते हैं। इसका सम्पूर्ण सामाजिक जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

प्रभावित क्षेत्रों में सुधार के प्रयासों में देरी होने पर महामारियाँ फैलने लगती हैं, जिसका प्रभाव जन-सामान्य पर पड़ता है। इस प्रकार भूकम्प से प्रभावित समाज के पुनर्वास में बहुत समय लग जाता है।

भूकम्प से बचाव के उपाय
यद्यपि भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदा को टाला नहीं जा सकता है, किन्तु इसके प्रभावों को शीघ्रता से कम अवश्य ही किया जा सकता है। इसके लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं।

  1. भूकम्प की आशंका होने पर, इसकी चेतावनी जारी कर देनी चाहिए, ताकि प्रभावित क्षेत्रों से लोगों को हटाया जा सके, इससे जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकेगी।
  2. भूकम्प आने पर शीशे की खिड़की आदि नुकीली चीजों से दूर हट जाना चाहिए।
  3. भूकम्प आते ही घरों से बाहर आकर किसी खुले भाग में चले जाना चाहिए।
  4. खुला स्थान न मिलने पर मेज या पलंग के नीचे बैठ जाना चाहिए।
  5. मकान की दीवारों या भारी सामान से दूर हट जाना चाहिए।
  6. दरवाजों के पास खड़े होकर चौखट को पकड़ लेना चाहिए।
  7. भूकम्प आने पर खुले स्थान पर भी बिजली के तारों इत्यादि से दूर हट जाना चाहिए।
  8. भूकम्प से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में मकान लकड़ी के बनाए जाने चाहिए।

प्रश्न 2.
बाढ़ के प्रभाव तथा उससे बचने के उपाय लिखिए। (2011)
उत्तर:
बाढ़
जब नदी का पानी अपने प्रवाह क्षेत्र से बाहर निकलकर आस-पास के क्षेत्रों में फैल जाती है, तो उस स्थिति को ‘बाढ़’ कहते हैं। सामान्यत: वर्षा ऋतु में अधिक वर्षा के कारण नदियों में बाढ़ की स्थिति देखी जाती है। इसके अलावा बाँधों के टूटने से, नदी के मार्ग परिवर्तित करने आदि स्थितियों के कारण भी बाढ़ की स्थिति देखी जाती है।

बाढ़ के प्रभाव
बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है। यह अपने प्रभाव क्षेत्र में आने वाले क्षेत्रों को बुरी तरह प्रभावित कर देती है। बाढ़ के निम्नलिखित प्रभाव होते हैं।

  1. बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र में चारों ओर पानी-ही-पानी भरा होता है। पानी इमारतों, घरों, दफ्तरों, स्कूलों में भर जाता है, जिससे लोगों का जीवन अस्त व्यस्त हो जाता है।
  2. बाढ़ में डूबने से बड़ी संख्या में मानव जीवने व पशुओं की क्षति होती है।
  3. बाढ़ का सर्वाधिक प्रभाव बुजुर्गों व अपाहिज लोगों पर पड़ता है, जो अपना बचाव करने में सक्षम नहीं होते हैं।
  4. बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में भोजन, पेयजल आदि दिन-प्रतिदिन की आवश्यक वस्तुओं की कमी हो जाती है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों की शिक्षा भी कुप्रभावित होती है।
  5. अधिक समय तक पानी भरे रहने से सम्बन्धित क्षेत्रों में महामारी फैलने का डर बना रहता है। इसके अलावा मच्छर आदि का भी प्रकोप बढ़ जाता है।

बाढ़ आपदा निवारण के उपाय
बाढ़ आपदा निवारण के उपाय सामान्यत: तीन स्तरों में बाँटे जा सकते हैं, इनका विवरण निम्नलिखित है।

1. बाढ़ आपदा से पूर्व उपाय
बाढ़ सम्भावित क्षेत्रों में निम्नलिखित उपायों पर ध्यान देकर बाढ़ जैसी प्राकृतिक घटना को आपदा बनने से रोका जा सकता है।

  • बाढ़ सम्भावित क्षेत्रों में नदी जलमार्गों को सीधा रखने पर ध्यान देना चाहिए, नदियों के मार्ग बदलने से बाढ़ आने की आशंका अधिक रहती है।
  • स्थानीय स्तर पर कृत्रिम जलाशय बनाए जाने चाहिए, जिससे बाढ़ की स्थिति में जल को कृत्रिम जलाशय की ओर मोड़ा जा सके।
  • नदियों को आपस में जोड़ने की व्यवस्था की जानी चाहिए, इससे वर्षा के अधिक जल को कम जल क्षेत्र की ओर मोड़ा जा सकता है।
  • तटबन्धों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
  • पर्वतीय क्षेत्रों में बाढ़ आपदा को रोकने के लिए भूस्खलन पर नियन्त्रण आवश्यक है। अतः पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण हेतु विस्फोटों का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे भूस्खलन की आशंकाएँ बढ़ती हैं।
  • नगर नियोजन के दौरान जल निकास व्यवस्था पर पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। किसी भी प्रकार से जलधाराओं का प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध नहीं होना चाहिए।
  • नदियों, तालाबों व झीलों के निकट अतिक्रमण के द्वारा बसाव कार्यों पर पूर्ण रोक लगाई जानी चाहिए, जिससे बाढ़ द्वारा होने वाली क्षति न्यूनतम हो।
  • नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों पर सघन वृक्षारोपण का अभियान चलाया जाना चाहिए तथा वन विनाश को रोकने के लिए हर सम्भव उपाय किए। जाने चाहिए।

2. बाढ़ आपदा के दौरान उपाय
बाढ़ आपदा के दौरान निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए

  • जल बहाव के मार्ग में, सतह पर रेत के थैले रखे जाने चाहिए, जिससे सतह सुरक्षित रहे।
  • कमजोर इमारतों से निकलकर किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाना चाहिए।
  • बाढ़ के दौरान पेड़ों पर चढ़ना खतरनाक साबित हो सकता है। घर की छतों का उपयोग बाढ़ के दौरान उपयुक्त हो सकता है।

3. बाढ़ आपदा के पश्चात् उपाय
बाढ़ आपदा के पश्चात् किए जाने वाले राहत कार्यों के अन्तर्गत निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

  • अपने घर तथा आस-पास के क्षेत्र की सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए एवं कीटनाशक दवाओं का प्रयोग किया जाना चाहिए।
  • युवा पीढ़ी को मिलकर स्थानीय स्तर पर वृक्षारोपण का अभियान चलाया जाना चाहिए, जिससे मिट्टी के कटाव की समस्या का स्थायी समाधान किया जा सके।
  • सरकारी स्तर पर प्राप्त हो रही सुविधाओं का लाभ उठाने हेतु, क्षेत्र के सम्बन्धित प्रशासनिक अधिकारी से अवश्य सम्पर्क स्थापित करना चाहिए।
  • बाढ़ के पश्चात् चारों ओर फैले हुए पानी पर कीटाणुनाशक दवाएँ छिड़कनी चाहिए, जिससे संक्रामक रोगों के प्रसार को रोका जा सके।

उल्लेखनीय है कि वर्तमान समय में बाढ़ के लिए प्राकृतिक कारणों की अपेक्षा मानवीय कारण अधिक प्रभावी होते जा रहे हैं। अतः आवश्यकता है कि हम पर्यावरण व्यवस्था को बनाए रखने पर विशेष ध्यान केन्द्रित करें। इससे बाढ़ प्रकोप की घटनाओं में अवश्य ही कमी आएगी।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 10 प्राकृतिक आपदाएँ  help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 10 प्राकृतिक आपदाएँ, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 16 दहेज समस्या एवं उसका उन्मूलन

UP Board Solutions for Class 12  Home Science Chapter 16 दहेज समस्या एवं उसका उन्मूलन are part of UP Board Solutions for Class 12  Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12  Home Science Chapter 16 दहेज समस्या एवं उसका उन्मूलन.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 16
Chapter Name दहेज समस्या एवं उसका उन्मूलन
Number of Questions Solved 19
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 16 दहेज समस्या एवं उसका उन्मूलन

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
दहेज़ को ई में क्या कहते हैं।
(a) जहेज़
(b) वरदक्षिणा
(c) सौगात
(d) दान
उत्तर:
(a) जहेज़

प्रश्न 2.
दहेज़ वह धन, वस्तु अथवा सम्पत्ति है, जो एक स्त्री विवाह के समय पति के लिए लाती हैं। विवाह की यह परिभाषा विसवे द्वारा दी गई है?
(a) चार्ल्स विनिफ
(b) मैक्श रैडिन्
(c) वैतटर शब्दकोश
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) बेब्सटर शब्दकोश

प्रश्न 3.
निम्न में से कौन-सा एक कारण दहेज प्रथा का नहीं हैं।
(a) अंतर्विवाह
(b) महँगी शिधा प्रणाली
(c) अनुलोम विवाह
(d) शिक्षा का प्रसार
उत्तर:
(d) शिक्षा का प्रसार

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से दहेज प्रथा के उन्मूलन के उपायों में शामिल हैं।
(a) शिक्षा का प्रसार
(b) कानून के प्रति जागरूकता
(c) पानमत तैयार करना
(d) में सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 5.
दहेज रोधक अधिनियम बना था
(a) 1961 में
(b) 1562 में
(c) 1955 में
(d) 164 में
उत्तर:
(a) 1981 में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
दहेज़ से क्या आशय है?
उत्तर:
विवाह के अवसर पर कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष को दिया जाने वाला, सम्पत्ति और सामान इत्यादि को ‘दहेज’ कहा जाता है।

प्रश्न 2.
दहेज़ देने का उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
नवविवाहितों के जीवन निर्वाह में मदद करने के उद्देश्य से ही दहेज दिया

प्रश्न 3.
वर मूल्य किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह निश्चित धन या भेट, जो विवाह से पूर्व वा पक्ष द्वारा निश्चित की जाती है, जिसे विवाह से पहले या विवाह तक कन्या पक्ष को चुकाना होता है, बरमूल्य 
कहलाता है।

प्रश्न 4.
दहेज प्रथा के दोष के अन्तर्गत बेमेल विवाह को अति संक्षेप में 
समझाइए।
उत्तर:
अधिक दहेज न दे पाने के कारण माता-पिता अपनी कन्या का विष अवगुण व अपाहिज पुरुष के साथ कर देते हैं। सामान्य रूप में ये बेमेल विवाह

प्रश्न 5.
दहेज़ सम्बन्धी अपराध की सुनवाई कहीं की जाती है?
उत्तर:
दहेज सम्वन्धी अपराध की सुनवाई प्रदम श्रेणी का मजिस्ट्रेट ही कर सकता है तथा इस तरह की शिकायत लिवित होनी चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1.
दहेज के अर्थ को स्पष्ट करते हुए इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

दहेज का अर्थ

दहेज शब्द अरबी भाषा के बहे शब्द से रुपान्तरित हुआ है, जिसका अर्थ है-सौगात्। विवाह के अवसर पर कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष को दिया जाने वाला इन, सम्पत्ति और सामान ल्यादि को दहेज कहा जाता हैं। दहेज को उर्दू में जहेज़ कहते हैं। इसे हुण्डा या वरदक्षिणा आदि नामों में से भी जाना जाता हैं। वेव्सटर शब्दकोश के अनुसार, “दहेज वह पन, वस्तु अशा सम्पत्ति है, जो एक र विवाह के समय पति के लिए सातो हैं।”

दहेज का उद्देश्य

प्राचीनकाल से ही वधू के माता-पिता द्वारा वस्त्र, गहने एवं गृहस्थी का कुछ सामान भेंट करते थे, जिसका मूल उद्देश्य वर-वधू की नई गृहस्थी को सुचारु रूप से चलाने में सहायता करना था। वर्तमान युग में दहेज नवविवाहितो के वन निर्वाह में मदद करने के उद्देश्य से ही दिया जाता है।

प्रश्न 2.
दहेज प्रथा के कारणों का उलेख कीजिए।
उत्तर:
दहेज प्रथा आज जिस विकृत रूप में व्याप्त है, उसके प्रमुख कारण इस प्रकार हैं।

  1. अनुलोम विवाह अनुलोम विवाह के चलन से उच्च कुलों के घर की माँग बड़ती गई। उच्च कुलो के लड़कों के पिता ऐसी स्थिति में बड़ी धनराशि की मांग करने लगे।
  2. अत्तर्विवाह अन्तविवाह के नियम के कारण किसी भी कन्या का विवाह जुम की जाति अथवा उपति पर। के शाप होना आवश्यक हो गया। इस कारण विवाह का क्षेत्र सीमित हो गया। योग्य वरों की कम संख्या में दहेज को बढ़ावा दिया।
  3. विवाह की अनिवार्यता कन्या विवाह को अनिवार्य मान गया है। इसलिए उनका विवाह करना जरूरी हो गया। धीरे धीरे योग्य वरो की तलाश में धन को खर्च किया जाने लगा।
  4. धन के महत्व में वृद्धि बर्तमान समय में भौतिकदी विचारधारा के कारण पन का महत्व बढ़ गया। इससे दहेज प्रथा और भी सशकत हो गई।
  5. महँगी शिक्षा प्रणाली माता-पिता अपने बच्चों पर काफी पैसा खर्च करते है, फिर माता-पिता विवाह द्वारा इसकी पूरी का प्रयास करते हैं, जिसके फलस्वरूप यह दहेज प्रथा में परिवर्तित हो जाता है।

प्रश्न 3.
दहेज के विकृत रूप को समझाइए।
अथवा
वर्तमान समय में दहेज की प्रथा किस प्रकार विकसित हुई है?
उत्तर:
पुराने समय से प्रारम्भ हुई दहेज की परम्परा आर पूर्णरूप से विकसित हो गई है। अर्थात् आज इस प्रदा ने विकराल रूप धारण कर लिया है, इसलिए अब इसे र मूल्य कहना अधिक उपयुक्त होगा, क्योंकि योग्य, समृद्ध एवं उच्च शिक्षा प्राप्त वर के लिए अधू के माता-पिता को वर मूल्य देना पड़ता है। दूसरे शब्दों में, वर-मूल्य वह निश्चित धन या भेट हैं, जो विवाह के पहले वर पक्ष द्वारा निश्चित किया जाता है, जिसे विवाह से पूर्व या विवाह तक कन्या पश को चुकाना होता है, इसलिए आज विवाह बन्धन पवित्रता का बन्धन नहीं, बल्कि देवानी का सापत्र बन गया है।

प्रश्न 4.
अन्तर्विवाह द्वारा दहेज़ प्रथा को किस प्रकार बढ़ावा मिला हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अन्तर्विवाह के नियम के कारण किसी भी कन्या को मिला उसी की जाति अपवा उपजाति के पुरुष के आप होना आवश्यक हो गया। इस कारण हि का क्षेत्र सीमित हो गा, जिससे विशाह के लिए योग्य वरों की कमी हो गई। अब योग्य वर देने के लिए अधिक धन खर्च करने की आवश्यकता महसूस की गई। इससे दहेज की प्रथा को प्रोत्साहन मिला। योग्य और समय पर भी विवाह के लिए एक निश्चित धनराशि के साथ वस्त्र एवं आभूषणों तथा अन्य उपहारों को माँग करने लगें, ताकि अधिक-से-अधिक धन की प्राप्ति विषाह में मिलने वाले दहेज से हो सके। यदि इस निश्चित धनराशि को कन्या पक्ष देने में असमर्थ होता हैं, तो विवाह सम्म तोड़ दिया जाता है। कई बार तो तलाक जैसी घटनाएं भी देखने को मिल जाती हैं और यदि कन्या पक्ष इस निश्चित धनराशि का भुगतान करता है, तो सड़की के माता पिता या अभिभावक जीवनभर संघर्ष करते रहते हैं, लेकिन प्रत्येक माता-पिता अपनी कन्या के लिए अच्छे-से-अप्डे वर ढूंढना चाहते है, जिसके लिए वधू-मूल्य अधिक देना।

प्रश्न 5.
दहेज प्रथा के प्रमुख दोषों का वर्णन कीजिए। धनी दहेज प्रथा की हानियाँ लिखिए। 
(2018)
उत्तर:
दहेज प्रथा के कारण समाज में अनेक दोष व्याप्त है, जो निम्नलिखित हैं।

  1. पारिवारिक संपर्ष दहेज प्रथा अनेक पारिवारिक संघ से तनालों को जन्म देती हैं। दहेज कम मिलने पर नववधू को तरह-तरह के कष्ट दिए जाते हैं। उन्हें हर समय दहेज का उलाहना दिया जाता है, इससे नववधुओं में हीनता की भावना का जन्म होता है।
  2. ऋणग्रस्तता, आत्महत्या, शिशु हत्या मध्यमवर्गीय परिवारों में कन्या विवाह के लिए व की रकम जुटाना कठिन होता है। इसके लिए उन ची मात्रा में ऋण होना पड़ता है और परिवार अनपस्त हो जाता है। कभी व्यक्ति निन्दा के भय से आमहत्या कर लेता है, तो कभी कन्या शिशु को हत्या भी कर दी जाती है।
  3. बेमेल विवाह अधिक दहेज न दे पाने के कारण माता-पिता अपनी कन्या का विवाह अवगुण, अपाहिज पुरुष के साथ कर देते हैं। ये सामान्य रूप से बेमेल विवाह होते हैं।
  4. अविवाहित लड़कियों की संख्या में वृद्धि दहेज न दे पाने के कारण बहुत-सी सङ्गलियाँ अवाहित हू जाती हैं।
  5. अनेक समस्याओं को जन्म दहेज के कारण हिंसा, हत्या, चोरी आदि होने लगी हैं, क्योंकि व्यक्ति कैसे भी हो इहेव उजुटाना चाहता है, साथ ही दहेज हत्या तथा बहू जला देने की घटनाएँ भी होती हैं।

प्रश्न 6.
दहेज़ निषेद्य अधिनियम, 1961 की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
अधमरा दहेज़ प्रथा को समाप्त करने के लिए वर्ष 1961 के अधिनियम की प्रमुख शर्ते 
क्या थी?
उत्तर:
दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए वर्ष 1961 में एक विधेयक पारित किया गया, जिसे दहेज निरोधक अधिनियम’ के नाम से जाना जाता है। इस अधिनियम के अनुसार दहेज लेना और देना दण्डनीय अपराध है। अधिनियम 1961 में कुछ मुख्य शर्ते में शामिल है, जो इस प्रकार है

  1. विवाह के पूर्व या बाद में जिन वस्तुओं की माँग की जाएगी, वे दहेज के दायरे में आती हैं।
  2. दो हजार रुपये तक के उपहार देने की क्रूट हैं, जिनमें वस्त्र जपा आभूषण शमिल हैं।
  3. विवाह के पहले या बाद में मिली वस्तुओं पर पूर्णरूप से लड़की का अधिकार होगा।
  4. दहेज देने और लेने के लिए 8 माह का कारस और ₹ 5,000 के इण का प्रधान है।
  5. दहेज सम्बन्धी अपराध की सुनवाई प्रथम श्रेणी का मजिस्ट्रेट ही कर सकता है तथा इस तरह की शिकायत लिक्षित होनी चाहिए।

प्रश्न 7.
अधिनियम, 1961 के अन्तर्गत 1844 में पर्याप्त संशोधन 
किए गए, जिनमें प्रमुख बातें क्या थीं? समझाए।
उत्तर:
अधिनियम, 1981 को धारा 2 के अन्तर्गत ‘दहेज निषेध अधिनियम, 1984 और 1988 के तौर पर संशोधित किया, इसमें निम्नलिखित माता को दया गया है।

  1. ‘विवाह निश्चित करने हेतु दहेज के रूप में शर्त रखी जाए’ के स्थान पर विवाह के सम्बन्ध में जो भी कुछ दहेज मिले’ वाक्य जोड़ दिया गया।
  2. अभिभावक या सम्बन्धिों से मिलने वाले उपहार उनकी आर्थिक स्थिति के अनुपात में मिलने चाहिए।
  3. कारावास की सजा अधिकतम 10 वर्ष तथा जुर्माने की राशि ₹ 15000 सी गई या माँगी गई, दोनों रकम में से जो भी अधिक हो, मानी जाएगी।
  4. अपराधी को बिना बारष्ट के भी पकड़ा जा सकता है।
  5. यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो 6 महीने में 2 वर्ष की सजा तथा ₹ 10,000 तक का जुर्माना किया जा सकता है।
  6. यदि वधू नाबालिग हैं, तो उसके बालिग होने के तौन महीने के अन्दर सम्पत्ति को हस्तान्तरित करना होगा।
  7. यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो 6 महीने में 2 वर्ष की सजा तथा ₹ 10,000 तक का जुर्माना किया जा सकता है।
  8. पत्नी की मृत्यु के बाद उसके हिस्से को सम्पत्ति का अधिकार उसके उत्तराहारियों को होगा।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)

प्रश्न 1.
दहेज प्रथा क्या है? इसके कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
हिन्दू विवाह से सम्बन्धित समस्याओं में दहेज प्रथा एक प्रमुख समस्या मान जाती है। यह आजकल गम्भीर रूप धारण करती जा रही हैं। आज यह समस्या तन। गम्भीर हो गई है कि यार के कारण नवविवाहित स्त्रियों को जला देने के सामाधार आए दिन आते रहते हैं। दहेज का अर्थ सामान्यतः उस राशि, वस्तुओं या सम्पत्ति से लगाया जाता है, जिसे कन्या पक्ष विवाह के अवसर पर वर पक्ष को प्रदान करता है। बेसटर शब्दकोश के अनुसार, “दहेज वह धन, वस्तु अशा सम्पत्ति है, जो एक स्त्री विवाह के समय पति के लिए लाती है।”

दहेज प्रथा के कारण

दहेज प्रथा जिस विकृत रूप में आज है, उस रूप में वह हिंदू समाज में कभी नहीं रही। दहेज प्रथा के कारण इसके लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 2 देखें।

 

प्रश्न 2.
दहेज प्रथा के उन्मूलन की विवेचना कीजिए।
अथवा
भारतीय समाज में दहेज प्रथा के दुष्परिणामों पर प्रकाश डालते हुए इसके उन्मूलन हेतु उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दहेज प्रथा के दोष इसके लिए लघु उत्तरीय प्रश्न सं. 5 देखें।

दहेज प्रथा के उन्मूलन के उपाय/सुझाव

दहेज प्रथा के उन्मूलन के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. शिक्षा का प्रसार दहेज प्रथा को समाप्त करने हेतु शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया जाए, ताकि लोग इस बुराई को पहचान कर इसे समाप्त करे।
  2. अन्तर्जातीय तथा प्रेम विवाह को प्रोत्साहन अन्तर्जातीय तथा प्रेम विवाह होने से योग्य वर ढूँढने में आसानी होगी। इससे दहेज प्रथा को समाप्त किया जा सकेगा, क्योंकि इससे विवाह क्षेत्र का विस्तार होगा, जिससे अधिक दहेज नहीं देना पड़ेगा।
  3. लड़की का आत्मनिर्भर बनना लड़कियों को आत्मनिर्भर बनना भी दहेज रोकने का एक अच्छा उपाय हैं। लड़कियों के आत्मनिर्भर बनने से भी दहेज की माँग में कमी आएगी।
  4. कानून के प्रति जागरूकता दहेज उन्मूलन में कानून भी सहायक हो सकता है, इसलिए कानून के प्रति जागरूकता लाना भी आवश्यक है, जिससे दहेज के प्रति झुकाव कम रहे।
  5. जीवनसाथी के चुनाव को स्वतन्त्रता लड़के-लड़कियों को औवन साथी के चुनाव करने की स्वतन्त्रता होना चाहिए, जिससे दहेज और प्रथा का अना हो सका।
  6. जनमत तैयार करना दहेज प्रथा के विरुद्ध जनमत तैयार किया आना चाहिए, जिससे लोग स्वयं इसी बुराई को समझ सके

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 16 दहेज समस्या एवं उसका उन्मूलन help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12  Home Science Chapter 16 दहेज समस्या एवं उसका उन्मूलन, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.