UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 2 Shershah Suri: Rule and Achievements

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Chapter Chapter 2
Chapter Name Shershah Suri: Rule and Achievements (शेरशाह सूरी- शासन एवं उपलब्धियाँ)
Number of Questions Solved 22
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 2 Shershah Suri: Rule and Achievements (शेरशाह सूरी- शासन एवं उपलब्धियाँ)

अभ्यास

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तिथियों के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख कीजिए
1. 1540 ई०
2. 1542 ई०
3. 1543 ई० से मई 1544 ई०
4. 1545 ई०
5. 1556 ई०
उतर.
दी गई तिथियों के ऐतिहासिक महत्व के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 36 पर ‘तिथि सार’ का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 2.
सत्य या असत्य बताइए
उतर.
सत्य-असत्य प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 36 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 3.
बहुविकल्पीय
उतर.
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या-37 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 4.
अतिलघु उत्तरीय
उतर.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या-37 का अवलोकन कीजिए। लघु

उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शेरशाह की प्रमुख विजयों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उतर.
शेरशाह सूरी की प्रमुख विजयों का संक्षिप्त विवरण निम्नवत् हैं

  1. गक्खर प्रदेश की विजय – सन् 1541 ई० में शेरशाह ने गक्खर सरदारों पर चढ़ाई कर उनके प्रदेश को बुरी तरक से रोंद डाला।
  2. बंगाल का विद्रोह और नई व्यवस्था – सन् 1541 ई० में शेरशाह ने खिज्र खाँ को कैद करके बंगाल को जिलों में बाँटकर प्रत्येक को एक छोटी सेना के साथ शिकदारों के नियंत्रण में दे दिया।
  3. मालवा की विजय – सन् 1542 ई० में शेरशाह ने मालवा के शासक कादिरशाह को हराकर वहाँ अपना अधिकार जमा लिया।।
  4. रायसीना की विजय – सन् 1542 ई० में शेरशाह ने रायसीना के शासक पूरनमल को हराया।
  5. मुल्तान व सिंध की विजय – सन् 1543 ई० में शेरशाह के सूबेदार हैबत खाँ ने फतह खाँ जाट को परास्त कर मुल्तान एवं सिंध पर अधिकार कर लिया।
  6. मारवाड़ पर विजय – सन् 1544 ई० में शेरशाह ने मालदेव के सेनापति नैता और कैंपा को हराया।
  7. मेवाड विजय – सन् 1544 ई० में मारवाड़ पर विजय प्राप्त करके वापस लौटते समय शेरशाह ने मेवाड़ को अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया।
  8. कालिंजर की विजय – सन् 1544 ई० में शेरशाह ने शासक कीरत सिंह को हराकर कालिंजर पर विजय प्राप्त की।

प्रश्न 2.
शेरशाह की सफलता के चार कारण लिखिए।
उतर.
शेरशाह की सफलता के चार प्रमुख कारण निम्न प्रकार हैं

  1. दृढ़-संकल्पी – शेरशाह दृढ़-संकल्पी व्यक्ति था। हुमायूँ को भारत की सीमा से बाहर निकालकर ही उसने चैन की साँस ली।
  2. हुमायूँ की चारित्रिक दुर्बलताएँ – हुमायूँ की चारित्रिक दुर्बलताओं का लाभ उठाकर, शेरशाह दिल्ली का सिंहासन अपनी योग्यता के द्वारा छीनने में सफल रहा।।
  3. सैनिक प्रतिभा – शेरशाह ने एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया, जिसमें उसकी सैनिक योग्यता की प्रमुख भूमिका थी।
  4. कूटनीतिज्ञ – चौसा और बिलग्राम के युद्धों में सैनिक प्रतिभा से अधिक शेरशाह ने अपनी कूटनीति से विजय प्राप्त की।

प्रश्न 3.
शेरशाह के शासन-प्रबन्ध की दो प्रमुख विशेषाएँ लिखिए।
उतर.
शेरशाह के शासन-प्रबन्ध की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. न्यायप्रियता – शेरशाह न्याय प्रिय सुल्तान था। उसके राज्य में न्याय निष्पक्ष था तथा नियम भंग करने वाले अपराधी को | कठोर दण्ड मिलता था, चाहे वह कितना ही बड़ा अधिकारी क्यों न हो।
  2. प्रजा का भौतिक एवं नैतिक विकास – शेरशाह हालाँकि निरकुंश सुल्तान था तदापि उसने अपने सम्मुख प्रजाहित का आदर्श रखा। उसका विश्वास था कि सुल्तान को भगवान ने प्रजा का प्रधान बनाकर भेजा है तथा प्रजा का सर्वांगीण विकास करने का भार सुल्तान पर है।

प्रश्न 4.
शेरशाह के द्वारा भू-राजस्व के क्षेत्र में किए गए सुधारों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उतर.
शेरशाह राज्य के किसानों की भलाई में ही राज्य की भलाई मानता था। उसकी लगान-व्यवस्था अच्छी मानी जाती थी। शेरशाह की लगान-व्यवस्था मुख्यतया रैवतवाडी थी, जिसमें किसानों से प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित किया जाता था। उत्पादन के आधार पर ही भूमि को तीन श्रेणियों- उत्तम, मध्यम और निम्न में बाँटा गया। लगान निश्चित करने की प्रणालियाँ निर्धारित की गई थीं। किसान लगान नकद या जिन्स के रूप में दे सकते थे। यदि युद्ध के अवसर पर कृषि की कोई हानि हो जाती थी तो उसकी पूर्ति कर दी जाती थी।

प्रश्न 5.
शेरशाह के चरित्र पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उतर.
शेरशाह को भारत के इतिहास में उच्चतम् सम्राटों में स्थान दिया जाता है और चन्द्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त तथा अकबर महान् के साथ तुलना की जाती है। शेरशाह एक प्रजावत्सल सम्राट था। प्रजा के साथ वह उदारता एवं दयालुता पूर्ण व्यवहार करता था। उसके राज्य में प्रतिदिन भिखारियों का दान दिया जाता था। शेरशाह में उच्चकोटि की धार्मिक सहिष्णुता विद्यमान थी। शेरशाह मुस्लिम सम्राट था तदापि उसने हिन्दू व मुसलमानों के साथ समानता का व्यवहार किया। शेरशाह कर्तव्यपरायण सुल्तान था। वह अपने कर्तव्य को भली-भाँति जानता था तथा समुचित रूप से उनका पालन करता था। शेरशाह कठोर परिश्रमी था। वह शासन के समस्त विभागों पर नियत्रंण रखता था।

शेरशाह विद्यानुरागी था। सुल्तान बनने के बाद उसने विद्या प्रसार के लिए अनेक पाठशालाएँ एवं मकतब निर्मित करवाए। वह एक कुशल सेनापति एवं कूटनीतिज्ञ था। हुमायूं के साथ उसने उच्चकोटि के सेनापति की तरह युद्ध लड़े। चुनार, रोहतास तथा रायसीन पर उसने कूटनीति द्वारा विजय प्राप्त की। शेरशाह न्यायप्रिय सुल्तान था। न्याय के सम्मुख वह सबको समान समझता था तथा अपने पुत्र तक को साधारण व्यक्ति के समान दण्ड देता था। शेरशाह एक महत्वकांक्षी सुल्तान था, मुगलों को भारत से निकालकर ही उसने चैन की साँस ली।

प्रश्न 6.
शेरशाह को राष्ट्रीय सम्राट कहना कहाँ तक उचित है?
उतर.
शेरशाह को धार्मिक सहिष्णुता का सिद्धान्त अपनाया था। वह ऐसा प्रथम मुस्लिम शासक था, जिसकी दृष्टि में सम्पूर्ण प्रजा एक समान थी, चाहे वह किसी भी धर्म की अनुयायी क्यों न हो। एक दूरदर्शी राजनीतिज्ञ होने के नाते वह इस बात को भली-भाँति समझ चुका था कि हिन्दुओं के देश भारत में, जहाँ की अधिकांश जनता हिन्दू है, धार्मिक अत्याचारों के आधार पर राज्य को
स्थायी नहीं किया जा सकता इस नीति के आधार पर शेरशाह को राष्ट्रीय सम्राट कहना उचित है।

प्रश्न 7.
अकबर के अग्रगामी के रूप में शेरशाह का स्थान निर्धारित कीजिए।
उतर.
शेरशाह एक प्रजावत्सल सम्राट था। वह प्रजा के साथ उदारता एवं दयालुतापूर्ण व्यवहार करता था। यद्यपि दण्ड देने में वह कठोर एवं अनुदार था। अपनी दरिद्र जनता एवं कृषकों के प्रति वह अत्यन्त उदार था। शेरशाह में उच्चकोटि की धार्मिक सहिष्णुता विद्यमान थी। यद्यपि कुरान की आयतों का पाठ करता था तथा नमाज अदा करता था, तदापि भारत में हिन्दुओं व मुसलमानों के साथ उसने समानता का व्यवहार किया और उच्च पदों पर हिन्दुओं को भी आसीन किया तथा उनके बच्चों के पढ़ने की व्यवस्था की और एक सीमा तक उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की। इस दृष्टिकोण से हम उसे अकबर का अग्रगामी मान सकते हैं।

प्रश्न 8.
सूर-साम्राज्य के पतन के चार कारणों का उल्लेख कीजिए।
उतर.
भारत में दिल्ली पर प्रथम सूर (अफगान) साम्राज्य को लोदी वंश ने स्थापित किया था, किन्तु बाबर ने 1526 ई० में इब्राहीम लोदी को हराकर दिल्ली में मुगल साम्राज्य की स्थापना की। शेरशाह सूरी ने 1540 ई० में हुमायूँ को परास्त कर पुनः सूर साम्राज्य स्थापित किया। अफगानों का यह द्वितीय साम्राज्य लगभग 15 वर्षों तक रहा। सन् 1555 ई० में हुमायूँ ने मच्छीवाड़ा और सरहिन्द के युद्धों को जीतकर द्वितीय सूर साम्राज्य का पतन कर दिया। इस प्रकार सूर-साम्राज्य के पतन के चार प्रमुख कारण निम्नवत् हैं

  1. इस्लामशाह के उत्तराधिकारियों को अयोग्य होना।
  2. अफगानों का एक केन्द्रीय शासन-व्यवस्था को स्वीकार न करना।
  3. इस्लामशाह की मृत्यु के पश्चात शासन-व्यवस्था का नष्ट होना।
  4. अफगान सरदारों की महत्वकाक्षाएँ एवं स्वतन्त्र प्रवृत्ति।

प्रश्न 9.
शेरशाह सूरी द्वारा बनवाए गए दो प्रमुख राजमार्गों का वर्णन कीजिए।
उतर.
शेरशाह सूरी का नाम सड़कों और सरायों के निर्माण के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उसने व्यापार की सुविधा के लिए लम्बी-लम्बी सड़कों का निर्माण कराया तथा देश के प्रमुख नगरों को सड़कों के द्वारा जोड़ दिया। शेरशाह सूरी द्वारा बनवाए गए दो प्रमुख राजमार्ग अग्रलिखित हैं

  1. ग्रांड-ट्रंक रोड़ जो बंगाल के सोनारगाँव से आगरा, दिल्ली और लाहौर होती हुई सिंध प्रांत तक जाती है।
  2. आगरा से बुरहानपुर तक।

प्रश्न 10.
शेरशाह और हुमायूँ के बीच हुए दो प्रमुख युद्धों का उल्लेख कीजिए।
उतर.
शेरशाह और हुमायूं के बीच हुए दो प्रमुख युद्ध निम्न प्रकार हैं

  1. चौसा का युद्ध- सन् 1539 ई० में शेरशाह ने हुमायूँ को तोपखाने का प्रयोग करने का अवसर दिए बिना ही रणक्षेत्र से भागने को विवश कर दिया।
  2. कन्नौज ( बिलग्राम ) का युद्ध- सन् 1540 ई० में शेरशाह ने कन्नौज के युद्ध में हुमायूँ को पराजित कर उसे भारत से बाहर खदेड़ दिया।

प्रश्न 11.
शेरशाह ने जन-साधारण के लिए क्या-क्या कार्य किए?
उतर.
शेरशाह ने जन-साधारण के लिए निम्नलिखित कार्य किए

  1. उत्तम न्याय व्यवस्था
  2. भूमिकर अथवा लगान में सुधार
  3. जन साधारण के जीवन एवं सम्मान की रक्षा के लिए पुलिस प्रशासन की व्यवस्था
  4. शिक्षा के लिए पाठशालाओं एवं मकतबों का निर्माण
  5. जन साधारण को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करना
  6. सड़क एवं सरायों को निर्माण।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘शेरशाह की गणना मध्यकाल के महान् शासकों में की जाती है। इस कथन का विश्लेषण कीजिए।
उतर.
शेरशाह महान् विजेता था। जूलियस सीजर, आगस्टस, हेनरी द्वितीय, एडवर्ड प्रथम, लुई चतुर्दश, अकबर महान् तथा चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ उसकी तुलना की जा सकती है। वह एक महान् साम्राज्य का निर्माता था जिसे उसने अपनी योग्यता से प्राप्त किया था तथा जिसकी सुव्यवस्था के लिए उसने उच्च कोटि की शासन-व्यवस्था स्थापित की थी। पाँच वर्ष के अल्पकाल में उसने अराजकतापूर्ण एवं अव्यवस्थित देश को सुव्यवस्था एवं सुरक्षा प्रदान की थी।

मध्यकाल भारत के इतिहास में शेरशाह का अपना एक स्थान है। वह एक वीर सैनिक, चतुर सेनानायक और कुशल कूटनीतिज्ञ था। वह केवल विजय प्राप्त करने में विश्वास करता था और उसका मानना था कि अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भले-बुरे सभी साधनों का व्यवहार में लाना उचित है। वह एक सफल शासक था। उसे प्रजा के सुख का पूरा ध्यान था और उसकी भलाई के लिए यथाशक्ति प्रयत्न करता था। शासन-व्यवस्था के पुनर्गठन, भूमि का बन्दोबस्त, लगान, मुद्रा और व्यापार वाणिज्य में उसके द्वारा किए गये सुधारों के कारण मध्यकाल के महान् शासन-प्रबन्धकों में उसकी गणना की जाती है। शेरशाह 68 वर्ष की आयु में राजा बना था किन्तु यह वृद्धावस्था भी उसके उत्साह और आकाँक्षाओं को ठण्डा नहीं कर सकी। इस राय पर सभी इतिहासकार एकमत हैं कि शेरशाह सोलह घण्टे प्रतिदिन राजकाज में लगाता था।

अशोक, चन्द्रगुप्त मौर्य अथवा अकबर की भाँति उसकी भी यही आदर्श वाक्य था कि महान् व्यक्ति को सदैव चैतन्य रहना आवश्यक है। शेरशाह में एक सैनिक और सेनापति के गुणों का अभाव न था। वह सभी यद्धों में शौर्य के साथ चालाकी का प्रयोग भी करता था। एक धार्मिक मुसलमान की दृष्टि से वह अपने धार्मिक कृत्यों को विषमपूर्वक करता था। डॉ० आर०पी० त्रिपाठी ने ठीक ही लिखा है “कोई भी इतिहासकार अकबर के पहले के मुस्लिम शासकों के मध्य महानता, बुद्धिमानी और कार्यक्षमता के नाते शेरशाह को सर्वोच्च पद से वंचित नही रख सकता।”

प्रश्न 2.
शेरशाह के प्रशासन की विवेचना कीजिए।
उतर.
शेरशाह का शासन-प्रबन्ध- इतिहासकारों ने शेरशाह को अकबर से भी श्रेष्ठ रचनात्मक बुद्धि वाला और राष्ट्र-निर्माता बताया है। सैनिक और असैनिक दोनों ही मामलो में शेरशाह ने संगठनकर्ता की दृष्टि से शानदार योग्यता का परिचय दिया। नि:सन्देह शेरशाह मध्य युग के महान् शासन-प्रबन्धकों में से एक था। उसने किसी नई शासन-व्यवस्था को जन्म नहीं दिया बल्कि उसने पुराने सिद्धान्तों और संस्थाओं को ऐसी कुशलता से लागू किया कि उनका स्वरूप नया दिखाई दिया। इस प्रकार योग्य शासन-प्रबन्ध की दृष्टि से इतिहास में शेरशाह का स्थान महत्वपूर्ण माना जाता है। शेरशाह का शासन-प्रबन्ध निम्न प्रकार व्यक्त किया जा सकता है
(i) प्रान्तीय शासन-प्रबन्ध
(क) इक्ता या सूबा – शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए शेरशाह ने साम्राज्य को अनेक भागों में बाँट रखा था। उस समय राज्य में ‘सरकार’ सबसे बड़ा खण्ड कहलाता था। सरकार ऐसे प्रशासकीय खण्ड थे जो कि प्रान्तों से मिलते-जुलते थे और जो इक्ता कहलाते थे और प्रमुख अधिकारियों के अधीन थे। शेरशाह के समय फौजी गवर्नरों की नियुक्तियाँ भी होती थीं। जिन राज्यों को शासन करने की स्वतन्त्रता दे दी गई थी, उन्हें सूबा या इक्ता कहा जाता था। सूबे का प्रमुख हाकिम अथवा फौजदार होता था। फिर भी शेरशाह के प्रान्तीय प्रशासन का विवरण स्पष्ट नहीं है।

(ख) सरकारें (जिले ) – प्रत्येक इक्ता या सूबा सरकारों में बँटा होता था। शेरशाह की सल्तनत में 66 सरकारें थीं। प्रत्येक सरकार में दो प्रमुख अधिकारी होते थे- ‘शिकदार-ए-शिकदारान’ और ‘मुन्सिफ-ए-मुनसिफान’। शिकदार-ए-शिकदारान सरकार के प्रशासन का अध्यक्ष होता था तथा विभिन्न परगनों के शिकदारों पर प्रशासनिक अधिकारी होता था। अपनी सरकार में शान्ति और व्यवस्था की स्थापना करना तथा विद्रोही जमींदारों का दमन करना उसका प्रमुख कर्तव्य था। मुन्सिफ-ए-मुन्सिफान मुख्यतया न्याय-अधिकारी था। दीवानी मुकदमों का फैसला करना और अपने अधीन मुन्सिफों के कार्यों की देखभाल करना उसका दायित्व था।

(ग) परगने – प्रत्येक सरकार में कई परगने होते थे। शेरशाह ने प्रत्येक परगने में एक शिकदार, एक अमीन (मुन्सिफ), एक फोतदार (खजांची) और दो कारकून (लिपिक) नियुक्त किए गए थे। शिकदार के साथ एक सैनिक दस्ता होता था और उसका कर्तव्य परगने में शान्ति स्थापित करना था। मुन्सिफ का कार्य दीवानी मुकदमों का निर्णय करना और भूमि की नाप एवं लगान-व्यवस्था की देखभाल करना था। फोतदार परगने का खजांची था और कारकूनों का कार्य हिसाब-किताब लिखना था।

(घ) गाँव – शासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी। प्रत्येक गाँव में मुखिया, पंचायतें और पटवारी होते थे, जो स्थानीय प्रशासन की व्यवस्था करते थे। गाँव की अपनी पंचायत होती थी, जो गाँव में सुरक्षा, शिक्षा, सफाई आदि का प्रबन्ध करती थी। शेरशाह ने गाँव की परम्परागत व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं किया था परन्तु गाँव के इन अधिकारियों को अपने कर्तव्यों का पालन करना पड़ता था। अन्यथा इन्हें दण्ड दिया जाता था।

(ii) भू-राजस्व व्यवस्था – राज्य की आय का प्रमुख साधन भूमिकर अथवा लगान था। इसके अतिरिक्त लावारिस सम्पत्ति, व्यापारिक कर, टकसाल, नमक-कर, अधीनस्थ राजाओं, सरदारों एवं व्यापारियों द्वारा दिए गए उपहार, युद्ध में लूटे गए माल का 1/5 भाग, जजिया इत्यादि आय के साधन थे। शेरशाह किसानों की भलाई में ही राज्य की भलाई मानता था। उसकी लगान-व्यवस्था बहुत अच्छी मानी जाती है, उसकी लगान-व्यवस्था निम्न प्रकार थी

(क) शेरशाह की लगान – व्यवस्था मुख्यतया रैयतवाड़ी थी, जिसमें किसानों से प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित किया जाता था। इस कार्य में शेरशाह को पूर्ण सफलता नहीं मिली और जागीरदारी प्रथा भी चलती रही। मालवा और राजस्थान में यह व्यवस्था लागू नहीं की जा सकी।

(ख) उत्पादन के आधार पर ही भूमि को तीन श्रेणियों में बाँटा गया था- उत्तम, मध्यम और निम्न।

(ग) खेती योग्य सभी भूमि की नाप की जाती थी और पता लगाया जाता था कि किस किसान के पास कितनी और किस श्रेणी की भूमि है। उस आधार पर पैदावार का औसत निकाला जाता था।

(घ) लगान निश्चित करने की उस समय तीन प्रणालियाँ थीं – (अ) गल्ला बक्सी अथवा बँटाई (खेत बँटाई, लँक बँटाई और रास बँटाई), (ब) नश्क या कनकूत तथा (स) नकद अथवा जब्ती। सामान्यत: किसान बँटाई प्रणाली को ही पसन्द करता था।

(ड.) किसानों को सरकार की ओर से पट्टे दिए जाते थे, जिनमें स्पष्ट किया गया होता था कि उस वर्ष उन्हें कितना लगान देना है। किसान ‘कबूलियत-पत्र के द्वारा इन्हें स्वीकार करते थे।

(च) लगान के अलावा किसानों को जमीन की पैमाइश और लगान वसूल करने में संलग्न अधिकारियों के वेतन आदि के लिए सरकार को ‘जरीबाना’ और ‘महासीलाना’ नामक कर देने पड़ते थे जो पैदावार का 2.5% से 5% तक होता था। किसान को 2.5% अन्य कर भी देना पड़ता था, जिससे अकाल अथवा बाढ़ की दशा में जनता को सहायता मिलती थी।

(छ) शेरशाह का स्पष्ट आदेश था कि लगान लगाते समय किसानों के साथ सहानुभूति का बर्ताव किया जाए लेकिन लगान वसूल करते समय कोई नरमी न बरती जाए।

(ज) किसानों को यह सुविधा थी कि वे लगान नकद या जिन्स के रूप में दे सकते थे, लकिन सरकार नकद के रूप में लेना ज्यादा पसन्द करती थी।

(झ) शेरशाह यह ध्यान रखता था कि युद्ध के अवसर पर कृषि की कोई हानि न हो और जो हानि हो जाती थी, उसकी पूर्ति कर दी जाती थी।

(iii) केन्द्रीय शासन-प्रबन्ध – सुल्तान- दिल्ली सल्तनत के शासकों की भाँति शेरशाह भी एक निरंकुश शासक था और उसकी शक्ति एवं सत्ता अपरिमित थी। शासन नीति और दीवानी तथा फौजदारी मामलों के संचालन की शक्तियाँ उसी के हाथों में केन्द्रित थीं। उसके मन्त्री स्वयं निर्णय नहीं लेते थे बल्कि केवल उसकी आज्ञा का पालन और उसके द्वारा दिए गए कार्यों की पूर्ति करते थे।

इस कारण शासन की सुविधा की दृष्टि से शेरशाह को सल्तनतकाल की व्यवस्था के आधार पर चार मन्त्री विभाग बनाने पड़े थे। ये निम्नलिखित थे
(क) दीवाने वजारत – यह लगान और अर्थव्यवस्था का प्रधान था। राज्य की आय और व्यय की देखभाल करना इसका दायित्व था। इसे मन्त्रियों के कार्यों की देखभाल का भी अधिकार था।

(ख) दीवाने-आरिज – यह सेना के संगठन, भर्ती, रसद, शिक्षा और नियन्त्रण की देखभाल करता था, परन्तु यह सेना का सेनापति न था। शेरशाह स्वयं ही सेना का सेनापति था और स्वयं सेना के संगठन और सैनिकों की भर्ती आदि में रुचि रखता था।

(ग) दीवाने-रसालत – यह विदेश मन्त्री की भाँति कार्य करता था। अन्य राज्यों से पत्र-व्यवहार करना और उनसे सम्पर्क रखना इसका दायित्व था। कूटनीतिक पत्र-व्यवहार भी इसे ही सम्भालना होता था।

(घ) दीवाने – इंशा- इसका कार्य सुल्तान के आदेशों को लिखना, उनका लेखा रखना, राज्य के विभिन्न भागों में उनकी सूचना पहुँचाना और उनसे पत्र-व्यवहार करना था। इनके अतिरिक्त दो अन्य मन्त्रालय भी थे, ‘दीवाने-काजी’ और ‘दीवाने-बरीद’। दीवाने-काजी सुल्तान के पश्चात् राज्य के मुख्य न्यायाधीश की भॉति कार्य करता था और दीवाने-बरीद राज्य की गुप्तचर व्यवस्था और डाकव्यवस्था की देखभाल करता था। इसके अतिरिक्त बादशाह के महलों तथा नौकर-चाकरों की व्यवस्था के लिए एक अलग अधिकारी होता था।

(iv) सड़कें और सरायें – शेरशाह ने अपने समय में कई सड़कों का निर्माण कराया और पुरानी सड़कों की मरम्मत कराईं। शेरशाह ने मुख्यतया चार प्राचीन सड़कों की मरम्मत और निर्माण कराया। ये सड़कें निम्नलिखित थीं
(क) एक सड़क बंगाल के सोनारगाँव, आगरा, दिल्ली, लाहौर होती हुई पंजाब में अटक तक जाती थी अर्थात् (ग्रांड ट्रंक रोड), जिसे ‘सड़के-आजम’ के नाम से पुकारा जाता था।

(ख) दूसरी, आगरा से बुरहानपुर तक।

(ग) तीसरी, आगरा से जोधपुर और चित्तौड़ तक और

(घ) चौथी, लाहौर से मुल्तान तक जाती थी। शेरशाह ने इन सड़कों के दोनों ओर छायादार और फलों के वृक्ष लगवाए थे। उसने इन सभी सड़कों पर प्राय: दोदो कोस की दूरी पर सरायें बनवाई थीं। उसने अपने समय में करीब 1,700 सरायों का निर्माण कराया। इन सभी सरायों में हिन्दू और मुसलमानों के ठहरने के लिए अलग-अलग प्रबन्ध था। व्यापारी, यात्री, डाक-कर्मचारी आदि सभी यहाँ संरक्षण और भोजन प्राप्त करते थे।

(v) मुद्रा व्यवस्था – शेरशाह ने पुराने और घिसे हुए, पूर्व शासकों के प्रचलित सिक्के बन्द करके उनके स्थान पर सोने, चाँदी और ताँबे के नये सिक्के चलाए और उनका अनुपात निश्चित किया। उसके चाँदी के रुपए का वजन 180 ग्रेन था, जिसमें 175 ग्रेन शुद्ध चाँदी होती थी। सोने के सिक्के 166.4 ग्रेन और 168.5 ग्रेन के ढाले गए थे। ताँबे का सिक्का दाम कहलाता था। सिक्कों पर शेरशाह का नाम, उसकी पदवी और टकसाल का स्थान अरबी या देवनागरी लिपि में अंकित रहता था। शेरशाह के रुपए के बारे में इतिहासकार स्मिथ ने लिखा है “यह रुपया वर्तमान ब्रिटिश मुद्रा-प्रणाली का आधार है।”

(vi) पुलिस प्रशासन – शेरशाह के शासनकाल में सेना ही पुलिस का कार्य करती थी। इस विषय में शेरशाह ने स्थानीय उत्तरदायित्व के सिद्धान्त पर कार्य किया था। जिस क्षेत्र में जो अधिकारी था, उसी का उत्तरदायित्व उस क्षेत्र में शान्ति एवं व्यवस्था स्थापित रखना था। विभिन्न सैनिक अपने-अपने क्षेत्रों में शान्ति स्थापित करते थे, चोरों एवं लुटेरों को पकड़ते थे तथा जनसाधारण के जीवन और सम्मान की रक्षा करते थे।

(vii) व्यापार-वाणिज्य – शेरशाह ने स्थान-स्थान पर दिए जाने वाले करों को समाप्त कर दिया। उसने केवल आयात कर और ‘बिक्री कर लेने के आदेश दिए थे। उसके सभी अधिकारियों को यह भी आदेश था कि व्यापारियों की सुरक्षा की जाए और उनके साथ सद्व्यवहार किया जाए।

(viii) न्याय व्यवस्था – शेरशाह स्वयं राज्य का बड़ा न्यायाधीश था और प्रत्येक बुधवार की शाम को स्वयं न्याय के लिए बैठता था। वह न्यायप्रिय शासक था। शेरशाह कहा करता था कि “न्याय करना सभी धार्मिक क्रियाओं में सर्वोत्तम है। इस बात को मुसलमान और काफिर दोनों के बादशाह मानते हैं।” उसने अत्याचारियों का कभी पक्ष नहीं लिया, चाहे वे उसके रिश्तेदार हों, प्रिय पुत्र हों या उसके प्रमुख सरदार हों। अपराध की गम्भीरता के अनुसार कैद, कोड़े, हाथ-पैर काटना, जुर्माना, फाँसी आदि दण्ड दिए जाते थे। शेरशाह के न्याय का आदर्श था- इंसान से इंसान का बर्ताव। शेरशाह के नीचे काजी होता था, जो न्याय विभाग का प्रमुख होता था। प्रत्येक सरकार में मुख्य शिकदार फौजदारी मुकदमे तथा मुख्य मुन्सिफ दीवानी मुकदमों की सुनवाई करते थे। परगनों में यह कार्य अमीन करते थे।

(ix) शेरशाह की इमारतें – इमारतें बनवाने का शेरशाह को बहुत शौक था। उसने अपनी उत्तर-पश्चिम सीमा की सुरक्षा के लिए ‘रोहतासगढ़’ नाम का एक दुर्ग बनवाया। दिल्ली का पुराना किला शेरशाह का बनवाया हुआ ही माना जाता है। इसी किले में उसने एक ऊँची मस्जिद का निर्माण करवाया, जो भारतीय और इस्लामी कला का मिला-जुला एक अच्छा उदाहरण है। परन्तु शेरशाह की सर्वश्रेष्ठ कृति सासाराम (बिहार) में स्थित उसका स्वयं का मकबरा है। सहसराम (सासाराम) में झील के बीचोंबीच एक चबूतरे पर बना हुआ शेरशाह का यह मकबरा नि:सन्देह भारत की श्रेष्ठतम इमारतों में से एक है।

(x) गुप्तचर और सूचना विभाग – शेरशाह का गुप्तचर और सूचना विभाग बहुत श्रेष्ठ था। प्रजा की रक्षा के लिए वह अपने अमीरों की प्रत्येक टुकड़ी के साथ विश्वासपात्र गुप्तचर भेजता था। प्रत्येक नगर और राज्य के दूर-दूर भागों में भी गुप्तचर एवं समाचार भेजने वालों की नियुक्ति की गई थी। यह विभाग ऐसी कुशलता से कार्य करता था कि उस क्षेत्र में रहने वाले लोगों को घटना का पता लगने से पहले ही शेरशाह को उसका पता चल जाता था। शेरशाह अपने गुप्तचरों और तेज चलने वाले सन्देशवाहकों के माध्यम से अपने सम्पूर्ण राज्य के शासन पर नियन्त्रण रखता था और यह काफी हद तक उनकी शासन-व्यवस्था की सफलता का आधार था।

(xi) शेरशाह का सैनिक-प्रबन्ध – शेरशाह ने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया था। अलाउद्दीन की भाँति उसने केन्द्र पर एक शक्तिशाली सेना रखी, जो सुल्तान की सेना थी। केन्द्र की सेना में 1,50,000 घुड़सवार, 25,000 पैदल और 5,000 हाथी थे। उसकी घुड़सवार सेना में मुख्यतया अफगान थे। बाकी अन्य वर्गों के मुसलमान और हिन्दू भी उसकी सेना में थे। सैनिकों को वेतन नकद दिया जाता था यद्यपि सरदारों को जागीरें दी जाती थी। बेईमानी रोकने के लिए उसने घोड़ों को दागने और सैनिकों का हुलिया लिखे जाने की प्रथाओं को अपनाया। शेरशाह के पास एक अच्छा तोपखाना भी था। इस प्रकार हम देखते हैं कि शेरशाह ने कम समय में एक अच्छी व्यवस्था की स्थापना की। जो इतिहासकार बाबर की प्रशासकीय अयोग्यता को समय की कमी कहकर माफ कर देते हैं, शेरशाह उनके लिए एक श्रेष्ठ उदाहरण है। इस प्रकार शेरशाह ने अकबर के कार्य को भी सरल कर दिया क्योंकि अपने थोड़े समय में ही शेरशाह ने एक श्रेष्ठ शासन की पृष्ठभूमि का निर्माण किया, जिससे अकबर के लिए एक स्पष्ट रास्ता बन गया।

प्रश्न 3.
शेरशाह के प्रारम्भिक जीवन का उल्लेख कीजिए। वह भारत का शासक कैसे बना?
उतर.
शेरशाह का जन्म सासाराम शहर में हुआ था, जो अब बिहार के रोहतास जिले में है। शेरशाह सूरी के बचपन का नाम फरीद था उसे शेर खाँ के नाम से जाना जाता था क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर कम उम्र में अकेले ही एक शेर को मारा था। उनका कुलनाम ‘सूरी’ उनके गृहनगर ‘सुर’ से लिया गया था। कन्नौज युद्ध में विजय के बाद शेर खाँ ने आगरा पर अधिकार किया ओर तभी से वह शेरशाह सूरी के नाम से भारत का सम्राट बना। शेरशाह सूरी के दादा इब्राहीम खान सूरी नारनौल क्षेत्र में एक जागीरदार थे, जो उस समय के दिल्ली के शासकों का प्रतिनिधित्व करते थे। उनके पिता हसन पंजाब में एक अफगान रईस जमाल खान की सेवा में थे।

शेरशाह के पिता की चार पत्नियाँ और आठ बच्चे थे। हसन अपनी चौथी पत्नी से अधिक प्रभावित था। शेरशाह को बचपन के दिनों में उसकी सौतेली माँ बहुत सताती थी, जिससे अप्रसन्न होकर उन्होंने घर छोड़ दिया और जौनपुर आकर अपनी पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी कर शेरशाह 1522 ई० में जमाल खान की सेवा में चले गए, पर उनकी विमाता को यह पसंद नहीं आया। इसलिए उन्होंने जमाल खान की सेवा छोड़ दी और बिहार के स्वघोषित स्वतन्त्र शासक बहार खान लोहानी के दरबार में चले गए।

अपने पिता की मृत्यु के उपरान्त उनकी जागीर का उत्तराधिकारी बनकर वे पुन: सासाराम वापस आ गए। परन्तु अपने सौतेले भाई के षड्यन्त्र के कारण उन्हें अपनी जागीर पुनः त्यागनी पड़ी। शेर खाँ ने पहले बाबर के लिए एक सैनिक के रूप में काम किया था तथा पूर्व में उसने अफगानों के विरुद्ध बाबर की सहायता भी की थी, जिस कारण से अफगान शेर खाँ से अप्रसन्न हो गए थे। किन्तु इसी समय बहार खाँ की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र जलाल खाँ अभी अल्पव्यस्क था। जलाल खाँ की माता ने शेर खाँ को जलाल खाँ का संरक्षक नियुक्त कर दिया।

(i) जलाल खाँ के विरुद्ध विजय – शेर खाँ ने बिहार की इतनी अच्छी व्यवस्था की कि वहाँ की दरिद्र जनता पूर्ण रूप से शेर खाँ की समर्थक बन गई थी, परन्तु उसकी इस प्रसिद्धि से चिढ़कर कुछ सरदारों ने युवक जलाल खाँ के कान शेर खाँ के विरुद्ध भरने आरम्भ कर दिए अतः जलाल खा ने शेर खाँ से सत्ता वापस लेने का निश्चय किया, परन्त शेर खाँ वास्तविक शासक था और उसको सरलतापूर्वक दबाया नहीं जा सकता था। जलाल खाँ ने शेर खाँ से बिहार का राज्य प्राप्त करने के लिए उस पर आक्रमण कर दिया, परन्तु सूरजगढ़ के युद्ध (1534 ई०) में शेर खाँ ने जलाल खाँ को पराजित करके बिहार को पूर्णतया अपने अधिकार में ले लिया।

(ii) बंगाल पर आक्रमण – सूरजगढ़ की विजय से उत्साहित होकर शेर खाँ ने 1535 ई० में बंगाल के सुल्तान महमूद खाँ पर
आक्रमण कर दिया। इस बार महमूद खाँ ने शेर खाँ को धन देकर अपनी प्राण रक्षा की। परन्तु दो वर्ष के उपरान्त 1537 ई० में शेर खाँ ने पुनः बंगाल की राजधानी गौड़ पर घेरा डाल दिया तथा गौड़ पर विजय प्राप्त कर उसने सुल्तान महमूद को हुमायूं की शरण में जाने के लिए बाध्य कर दिया।

(iii) रोहतास के दुर्ग पर अधिकार – गौड़ को अधिकार में लेने के उपरान्त शेर खाँ ने रोहतास दुर्ग पर अधिकार किया। रोहतास दुर्ग उसने विश्वासघात के द्वारा प्राप्त किया। रोहतास दुर्ग के शासक हिन्दू राजा के साथ शेर खाँ के मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे, परन्तु रोहतास का राजनीतिक महत्व होने के कारण शेर खाँ उस पर अधिकार करना चाहता था। जब हुमायूँ ने गौड़ का घेरा डाला तब शेर खाँ ने राजा से रोहतास का दुर्ग उधार देने की प्रार्थना की। राजा ने शेर खाँ की शक्ति से भयभीत होकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। शेर खाँ ने दुर्ग में पहुँचकर किले के सरंक्षकों की हत्या करवा दी और सम्पूर्ण राजकोष पर अधिकार कर लिया।

(iv) हुमायूँ के साथ संघर्ष – शेर खाँ तथा हुमायूँ का संघर्ष 1531 ई० से प्रारम्भ हुआ। 1531 ई० में दक्षिण बिहार पर शेर खाँ ने अधिकार करके सुप्रसिद्ध दुर्ग चुनार पर भी अधिकार कर लिया। जब हुमायूँ को यह सूचना मिली तो उसने शेर खाँ से चुनार त्यागने को कहा। लेकिन शेर खाँ ने चुनार दुर्ग का परित्याग नहीं किया, अतः अवज्ञा के कारण उसे दण्ड देने के लिए हुमायूं स्वयं सेना लेकर बिहार पहुँचा। शेर खाँ ने खुशामद के द्वारा हुमायूँ को राजी कर लिया और हुमायूँ ने चुनार उसी को सौंप दिया। ऐसा करने का कारण यह था कि हुमायूँ इस समय बहादुरशाह के साथ संघर्ष में संलग्न था। जब शेर खाँ ने सूरजगढ़ के युद्ध के द्वारा बिहार को पूर्णतया जीत लिया तथा 1537 ई० तक बंगाल पर भी उसका अधिकार हो गया तब हुमायूँ को उससे संघर्ष करना अनिवार्य हो गया। हुमायूँ ने चुनार पर घेरा डालकर उसे जीत लिया, किन्तु इसी बीच शेर खाँ ने गौड़ तथा रोहतास के दुर्गों को अपने अधिकार में ले लिया तथा वह दुर्ग में सुरक्षित पहुँच गया।

(v) चौसा और कन्नौज के युद्धों में विजय – अन्त में चौसा के युद्ध (1539 ई०) में शेर खाँ ने हुमायूँ को तोपखाने का प्रयोग करने का अवसर दिए बिना ही रणक्षेत्र से भागने को विवश कर दिया। चौसा का युद्ध शेर खाँ की शक्ति तथा प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए पर्याप्त था। इस युद्ध में विजय प्राप्त करके उसने ‘शेरशाह’ की उपाधि धारण की तथा अगले वर्ष 1540 ई० में कन्नौज के युद्ध में हुमायूँ को पराजित कर उसे भारत से बाहर खदेड़ दिया।

(vi) सूर वंश की स्थापना – 1540 ई० में हुमायूँ को देश निकाला देकर शेरशाह भारत का सम्राट बन गया और भारत में मुगल वंश के स्थान पर उसने सूर वंश की स्थापना की।

प्रश्न 4.
शेरशाह के चरित्र और उपलब्धियों का मूल्याकंन कीजिए तथा सूर-साम्राज्य के पतन के जिम्मेदार महत्वपूर्ण कारणों का भी उल्लेख कीजिए।
उतर.
शेरशाह को भारत के इतिहास में उच्चतम सम्राटों में स्थान दिया जाता है और चन्द्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त तथा अकबर महान् के साथ उसकी तुलना की जाती है। शेरशाह के चरित्र की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(i) उदारता एवं दयालुता – शेरशाह एक प्रजावत्सल सम्राट था। वह प्रजा के साथ उदारता एवं दयालुतापूर्ण व्यवहार करता था। वह दण्ड देने में यद्यपि कठोर एवं अनुदार था, किन्तु उस युग में कठोरता के बिना अपराध समाप्त नहीं किए जा सकते थे। अपनी दरिद्र जनता के लिए उसका व्यवहार बड़ा ही दयापूर्ण था। कृषकों के प्रति वह अत्यन्त उदार था तथा उसके | राज्य में प्रतिदिन भिखारियों को दान दिया जाता था।

(ii) धार्मिक सहिष्णुता – शेरशाह प्रथम मुस्लिम सम्राट था, जिसमें उच्चकोटि की धार्मिक सहिष्णुता विद्यमान थी। यद्यपि वह प्रतिदिन कुरान की आयतों का पाठ करता था तथा नमाज अदा करता था. तथापि उसने भारत में हिन्दुओं व मसलमानों के साथ समानता का व्यवहार किया और उच्च पदों पर हिन्दुओं को भी आसीन किया तथा उनके बच्चों के पढ़ने की व्यवस्था की और एक सीमा तक उन्हें धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की। इस दृष्टिकोण से हम उसे अकबर महान् का अग्रज मान सकते हैं।

(iii) कर्तव्यपरायण – शेरशाह कर्तव्यपरायण सुल्तान था। वह अपने कर्तव्यों को भली-भाँति जानता था तथा समुचित रूप से उनका पालन भी करता था। बाल्यकाल से ही उसमें यह गुण विद्यमान था। सुल्तान बनने के उपरान्त भी वह अपने कर्तव्यों के प्रति हमेशा सजग रहता था। वह दिन में 16 घण्टे कठोर परिश्रम करता था तथा अपने साम्राज्य की सुरक्षा के लिए सतत प्रयत्नशील रहता था।

(iv) कठोर परिश्रमी – शेरशाह कठोर परिश्रमी था। वह दिन-रात परिश्रम करता था। इसी कारण वह अपने विलासी शत्रु हुमायूँ को पराजित कर सका। जिस समय को हुमायूं ने उत्सव और विलासिता में व्यतीत किया, उसी समय का सदुपयोग करके शेरशाह अपनी शक्ति बढ़ाने में सफल हुआ। वह छोटे-से-छोटे राज-काज की स्वयं देखभाल करता था। शासन के समस्त विभागों पर नियन्त्रण रखता था। इसी कारण वह अपने राज्य में सुव्यवस्था बनाए रखने में सफल रहा।

(v) विद्यानुरागी – शेरशाह को अधिक समय विद्याध्ययन के लिए नहीं मिल सका था तथापि उसे अध्ययन का बड़ा शौक था। जौनपुर में रहकर उसने स्वयं अनेक पुस्तकों का अध्ययन किया तथा अनेक ऐतिहासिक एवं दार्शनिक पुस्तकों के विषय में उसे पर्याप्त ज्ञान था। सुल्तान बनने के उपरान्त उसने विद्या प्रसार के लिए अनेक पाठशालाएँ एवं मकतब निर्मित करवाए। उसके दरबार में अनेक विद्वानों को भी आश्रय प्राप्त था।

(vi) कुशल सेनापति एवं कूटनीतिज्ञ – वह एक कुशल सेनापति था। हुमायूं के साथ लड़े गए युद्धों में हमें उसके उच्चकोटि के सेनापति होने के गुण दृष्टिगोचर होते हैं। अपनी कूटनीति के कारण चौसा के युद्ध में कौशल प्रदर्शित किए बिना ही वह विजयी बना। बंगाल एवं बिहार के यद्धों में भी उसने अपने रण-कौशल का परिचय दिया। दिल्ली का सल्तान बनने के उपरान्त भी वह निरन्तर युद्धों में संलग्न रहा तथा अनेक छोटे-छोटे राज्यों पर उसने विजय प्राप्त की। युद्ध में वह छल एवं बल दोनों का उचित प्रयोग जानता था। चुनार, रोहतास तथा रायसीन पर उसने कूटनीति द्वारा ही विजय प्राप्त की थी।

(vii) न्यायप्रिय – शेरशाह न्यायप्रिय सुल्तान था। उसके राज्य में न्याय की समुचित व्यवस्था थी। न्याय के सम्मुख वह सबको समान समझता था तथा अपने पुत्र तक को साधारण व्यक्ति के समान दण्ड देता था। वह कठोर दण्ड में विश्वास करता था, जिससे अपराध सदा के लिए समाप्त हो जाएँ।

सूर साम्राज्य के पतन के कारण – भारत में दिल्ली पर प्रथम अफगान सत्ता को लोदी वंश ने स्थापित किया था, किन्तु बाबर ने 1526 ई० में इब्राहीम लोदी को परास्त करके दिल्ली में मुगल वंश की स्थापना की। शेरशाह सूरी ने 1540 ई० में बाबर के उत्तराधिकारी बादशाह हुमायूँ को दो युद्धों में परास्त करके दिल्ली में पुनः द्वितीय अफगान सत्ता स्थापित की। परन्तु अफगानों का यह द्वितीय साम्राज्य लगभग 15 वर्षों तक ही रहा। 1555 ई० में हुमायूँ ने क्रमश: ‘मच्छीवाड़ा’ और ‘सरहिन्द’ के युद्धों को जीतकर द्वितीय अफगान सत्ता को समाप्त कर दिया। इस प्रकार द्वितीय अफगान (सूर) साम्राज्य के पतन के निम्नलिखित कारण हैं

(i) इस्लामशाह के अयोग्य उत्तराधिकारी – इस्लामशाह का उत्तराधिकारी उसका अल्पायु पुत्र फीरोज था, जिसको तीन दिन पश्चात् ही उसके मामा मुबारिज खाँ ने मरवा डाला और आदिलशाह के नाम से स्वयं सुल्तान बन गया। परन्तु वह अयोग्य सिद्ध हुआ। इसी प्रकार इब्राहीम शाह और सिकन्दरशाह भी अयोग्य सिद्ध हुए। इनमें से कोई भी सूर साम्राज्य के विघटन को रोकने में सफल नहीं हुआ और सूर साम्राज्य खण्डित हो गया।

(ii) अफगानों की स्वतन्त्रता की प्रवृत्ति – सूर साम्राज्य की असफलता का मूल कारण अफगानों का एक केन्द्रीय शासन व्यवस्था को स्वीकार न करना था। अफगान आवश्यकता से अधिक अपने अधिकारों की स्वतन्त्रता पर बल देते थे, जिसके कारण वे एक सुल्तान के शासन के अधीन रहना पसन्द नहीं करते थे। इस कारण सुल्तान के दुर्बल या अयोग्य होते ही उनकी स्वतन्त्रता की महत्वाकाँक्षाएँ सम्मुख आ जाती थीं और वे पारस्परिक संघर्ष में फँस जाते थे। इससे साम्राज्य की एकता को क्षति पहुँचती थी, जो किसी भी साम्राज्य के पतन के लिए जिम्मेदार होती हैं।

(iii) प्रशासकीय कठिनाइयाँ – शेरशाह ने अपने शासनकाल में ही अपने विशाल साम्राज्य में श्रेष्ठ शासन-व्यवस्था स्थापित करने में सफलता प्राप्त की थी। किन्त उसकी और उसके उत्तराधिकारी इस्लामशाह की मृत्यु के पश्चात् अफगानों में सिंहासन को प्राप्त करने के लिए पारस्परिक संघर्ष आरम्भ हुआ, जिससे यह व्यवस्था नष्ट हो गई। इसके अतिरिक्त आर्थिक कठिनाइयाँ भी उत्पन्न हो गई थीं। अफगान साम्राज्य के विभाजित हो जाने के कारण दिल्ली के शासक सिकन्दर लोदी के पास पर्याप्त सैनिक साधन भी उलपब्ध नहीं हो सके। फलत: मुगल सेना अफगान सेना से श्रेष्ठ सिद्ध हुई तथा हुमायूँ ने सिकन्दर लोदी को सरलता से परास्त करके दिल्ली पर अधिकार कर लिया।

(iv) इस्लामशाह का उत्तरदायित्व – इस्लामशाह नि:सन्देह शेरशाह का योग्य उत्तराधिकारी था, परन्तु उसी के शासनकाल में अफगानों में आपस में तीव्र विभाजन हो गया। वह अपने सरदारों के प्रति शंकालु हो गया था और उसने अपने कई सरदारों को मरवा भी दिया। इसी कारण उसके विरुद्ध विद्रोह हो गया। वह विद्रोह को दबाने में तो सफल रहा किन्तु अफगान सरदारों की वफादारी पाने में असफल रहा। उसकी मृत्यु होते ही अफगान सरदारों की व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाएँ और स्वतन्त्र प्रवृत्ति स्पष्ट रूप में सामने आ गई, जिनकी परिणति सूर साम्राज्य के पतन के रूप में हुई।

प्रश्न 5.
शेरशाह एक कुशल विजेता एवं प्रशासक था।प्रस्तुत कथन के आलोक में उसकी उपलब्धियों की समीक्षा कीजिए।
उतर.
कुशल विजेता एवं प्रशासक के रूप में शेरशाह की उपलब्धियाँ निम्नलिखित थीं
(i) गक्खर प्रदेश की विजय (1541 ई०) – शेरशाह का उद्देश्य बोलन दरें और पेशावर से आने वाले मार्गों को मुगलों के आक्रमण से सुरक्षित करना था। अत: झेलम और सिन्धु नदी के उत्तर में स्थित गक्खर प्रदेश पर अधिकार करना आवश्यक था क्योंकि इसकी स्थिति बड़ी ही महत्वपूर्ण थी। शेरशाह ने गक्खर सरदारों पर चढ़ाई की और उनके प्रदेश को बुरी तरह रौंद डाला, परन्तु उनकी शक्ति को समाप्त न कर सका। अनेक गक्खर सरदार इसके बाद भी शेरशाह का विरोध करते रहे। शेरशाह ने वहाँ रोहतासगढ़ नामक एक विशाल दुर्ग बनाया, जिससे उत्तरी सीमा की रक्षा और गक्खों की रोकथाम कर सके। शेरशाह ने वहाँ हैबत खाँ और खवास खाँ के नेतृत्व में 50,000 अफगान सैनिकों की एक शक्तिशाली सेना तैनात की।

(ii) बंगाल का विद्रोह और नई व्यवस्था (1541 ई०) – शेरशाह की एक वर्ष से अधिक की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर बंगाल का गवर्नर खिज्र खाँ स्वतन्त्र शासक बनने के स्वप्न देखने लगा। उसने बंगाल के मृत सुल्तान महमूद की लड़की से शादी कर ली और एक स्वतन्त्र शासक की तरह व्यवहार करने लगा। शेरशाह शीघ्रता से बंगाल आया और गौड़ पहुँचकर उसने खिज्र खाँ को कैद कर लिया। बंगाल जैसे दूरस्थ और धनवान सूबे में विद्रोह की आशंकाओं को समाप्त करने के लिए शेरशाह ने वहाँ एक अन्य प्रकार की शासन-व्यवस्था स्थापित की। उसने बंगाल को सरकारों (जिलों) में बाँटकर उनमें से प्रत्येक को एक छोटी सेना के साथ शिकदारों के नियन्त्रण में दे दिया। इन शिकदारों की नियुक्ति बादशाह ही करता था। इन शिकदारों की देखभाल के लिए फजीलत नामक व्यक्ति को प्रान्त के प्रमुख के रूप में नियुक्त किया। इस व्यवस्था के अन्तर्गत बंगाल में किसी भी अधिकारी के पास एक बड़ी सेना न रही, जिससे उनमें से कोई भी विद्रोह की स्थिति में न रहा।

(iii) मालवा की विजय( 1542 ई०) – बहादुरशाह की मृत्यु के पश्चात् मालवा के सूबेदार मल्लू खाँ ने 1537 ई० में स्वयं को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और मालवा पर अधिकार करके कादिरशाह की उपाधि प्राप्त की। सारंगपुर, माण्डू उज्जैन और रणथम्भौर के मजबूत किले उसके अधिकार में थे। उसने शेरशाह के आधिपत्य को मानने से इन्कार कर दिया। शेरशाह ने अपने राज्य की सुरक्षा और एकता के लिए मालवा पर आक्रमण कर दिया। 1542 ई० में कादिरशाह ने डरकर सारंगपुर में आत्मसमर्पण कर दिया। शेरशाह ने मालवा पर अधिकार करके शुजात खाँ को मालवा का सूबेदार नियुक्त किया और कादिरशाह को लखनौती व कालपी की जागीरें दीं। परन्तु कादिरशाह अपनी जान बचाकर गुजरात भाग गया। वापस आते समय शेरशाह ने रणथम्भौर पर आक्रमण कर उसे अपनी अधीनता में ले लिया। अतः ग्वालियर, माण्डू, उज्जैन, सारंगपुर, रणथम्भौर आदि शेरशाह के अधिकार में आ गए।

(iv) रायसीन की विजय (1543 ई०) – 1542 ई० में रायसीन के शासक पूरनमल ने शेरशाह की अधीनता स्वीकार कर ली थी किन्तु शेरशाह को सूचना मिली कि पूरनमल मुस्लिम लोगों से अच्छा व्यवहार नहीं करता। अत: 1543 ई० में शेरशाह ने रायसीन को घेरे में ले लिया। कई माह तक रायसीन के किले का घेरा पड़ा रहा परन्तु शेरशाह को सफलता न मिली। अन्त । में शेरशाह ने चालाकी से काम लिया। उसने कुरान पर हाथ रखकर शपथ ली कि यदि किला उसे सौंप दिया जाए तो वह पूरनमल, उसके आत्मसम्मान एवं जीवन को हानि नहीं पहुंचाएगा। इस पर पूरनमल ने आत्मसमर्पण कर दिया। किन्तु मुस्लिम जनता के आग्रह पर शेरशाह ने राजपूतों के खेमों को चारों ओर से घेर लिया। राजपूत जी-जान से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। अनेक राजपूत स्त्रियों ने जौहर (आत्मदाह) कर लिया किन्तु दुर्भाग्य से थोड़ी-सी राजपूत स्त्रियाँ और बच्चे जीवित रह गए, उन्हें गुलाम बना लिया गया। डा० ए०एल० श्रीवास्तव के अनुसार- पूरनमल के साथ शेरशाह का यह विश्वासघात उसके नाम पर बहुत बड़ा कलंक है।

(v) मुल्तान व सिन्धविजय(1543 ई०) – शेरशाह ने खवास खाँ को पंजाब से वापस बुलाकर वहाँ हैबत खाँ को सूबेदार के रूप में नियुक्त किया। हैबत खाँ ने फतह खाँ जाट को परास्त कर मुल्तान पर अधिकार कर लिया। शेरशाह ने हुमायूँ का पीछा करने के दौरान (1541ई०) ही सिन्ध पर अधिकार कर लिया था। इस प्रकार उत्तर-पश्चिम में शेरशाह के राज्य के अन्तर्गत पंजाब प्रान्त के अतिरिक्त मुल्तान और सिन्ध भी सम्मिलित हो गए।

(vi) मारवाड़ विजय( नवम्बर (1543 से मई 1544 ई० ) – मारवाड़ का शासक इस समय राजा मालदेव था। ईष्र्यांवश कुछ राजपूतों ने शेरशाह को मारवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भड़काया तथा इस युद्ध में उसकी सहायता करने का भी वचन दिया। शेरशाह ने तुरंत ही एक सेना लेकर मारवाड़ की ओर कूच किया तथा 1544 ई० में मारवाड़ की राजधानी जोधपुर को घेर लिया। दोनों पक्षों में भयंकर युद्ध हुआ, किन्तु मालदेव के वीर सैनिकों के सम्मुख शेरशाह की एक न चली।। अन्त में बल से विजय प्राप्त करने में असमर्थ शेरशाह ने छल-कपट का आश्रय लिया। शेरशाह अन्त में विजयी रहा। लेकिन इस युद्ध के बाद शेरशाह को यह कहना पड़ा कि मैंने केवल दो मुट्ठी बाजरे के लिए अपना सम्पूर्ण साम्राज्य ही दाँव पर लगा दिया था।

(vii) मेवाड़ विजय (1544 ई०) – मेवाड़ के वीर सम्राट राणा साँगा इस समय मर चुके थे और उनके अल्पव्यस्क पुत्र उदयसिहं मेवाड़ के राजा थे, जिनकी अल्पायु से लाभ उठाकर बनबीर मेवाड़ का सर्वेसर्वा बन बैठा था। ऐसे समय में शेरशाह ने मेवाड़ पर आक्रमण कर उस पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

(viii) कालिंजर विजय (1545 ई०) – शेरशाह की अन्तिम विजय कालिंजर पर हुई। कालिंजर का दुर्ग बड़ा सुदृढ़ एवं अभेद्य माना जाता है। नवम्बर 1544 ई० में उसने दुर्ग के चारों ओर घेरा डाल दिया, लेकिन एक वर्ष तक घेरा डाले रखने पर भी शेरशाह उस पर अधिकार न कर सका। तब उसने दुर्ग की दीवारों को गोला-बारूद से उड़ाने का निश्चय किया तथा दुर्ग के चारों ओर मिट्टी एवं बालू के ऊँचे-ऊँचे ढेर लगवा दिए। जब ढेर दुर्ग की दीवारों से भी ऊँचे हो गए तब शेरशाह सूरी की आज्ञानुसार 22 मई, 1545 ई० को अफगान सैनिकों ने इन पर चढ़कर दुर्ग में स्थित राजपूतों का संहार करना आरम्भ कर दिया। इसी समय शेरशाह नीचे से तोपखाने का निरीक्षण कर रहा था, तभी एक गोला फटने से उसे बहुत चोट आई; तथापि उसने आक्रमण को निरन्तर जारी रखने की आज्ञा दी तथा शाम तक दुर्ग पर उसका अधिकार हो गया।

(ix) साम्राज्य का विस्तार – शेरशाह ने अपनी मृत्यु के समय तक असोम, कश्मीर और गुजरात को छोड़कर उत्तर-भारत के प्रायः सम्पूर्ण भू-प्रदेश पर अपनी सत्ता को स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। शेरशाह एक विस्तृत साम्राज्य के संस्थापक के अतिरिक्त एक महान शासन-प्रबन्धक भी था, जिसके कारण उसकी गिनती मध्य युग के श्रेष्ठ शासकों में होती है।

प्रश्न 6.
शेरशाह की शासन-व्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए। उसे अकबर का पथ-प्रदर्शक क्यों कहा गया?
उतर.
शेरशाह की शासन-व्यवस्था – शेरशाह की शासन-व्यवस्था के लिए विस्तृत उत्तरी प्रश्न संख्या-2 का अवलोकन कीजिए। शेरशाह अकबर का पथ-प्रदर्शक- एक शासन-व्यवस्था की दष्टि से शेरशाह को अकबर का अग्रणी (पथ-प्रदर्शक) माना गया है। शेरशाह के सैनिक प्रबन्ध, सरदारों पर उसके नियन्त्रण, उसकी न्याय की भावना, उसकी प्रजा के हित की भावना और शासन के मूल सिद्धान्त आदि सभी का अकबर ने पूर्ण लाभ उठाया। शेरशाह ने राजपूतों से अधीनता स्वीकार कराकर उनके राज्य उन्हें वापस कर दिये थे। अकबर ने इसको और विस्तार से अपनाया।

शेरशाह की लगान व्यवस्था भी अकबर के लिए मार्गदर्शक बनी। शेरशाह के किसानों, व्यापारियों और जन-हित के कार्यों को अकबर ने यथावत् रूप से स्वीकार कर लिया। नि:सन्देह शेरशाह ने अकबर के शासन की आधारशिला का निर्माण किया और उसका अग्रणी अथवा पथ-प्रदर्शक बना। डॉ० आर०पी० त्रिपाठी ने लिखा है “यदि शेरशाह अधिक समय तक जीवित रहता तो सम्भवतया वह अकबर से महान् हो जाता। नि:सन्देह, वह दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ सुल्तान-राजनीतिज्ञों में से एक था। निश्चय ही उसने अकबर की महान् उदार नीति के मार्ग का निर्माण किया और वह सही अर्थों में उसका अग्रणी था।”

प्रश्न 7.
शेरशाह सूरी के शासन-प्रबन्ध की प्रमुख विशेषताओं का विवेचन कीजिए।
उतर.
शेरशाह का शासन-प्रबन्ध- इतिहासकारों ने शेरशाह को अकबर से भी श्रेष्ठ रचनात्मक बुद्धि वाला और राष्ट्र-निर्माता बताया है। सैनिक और असैनिक दोनों ही मामलो में शेरशाह ने संगठनकर्ता की दृष्टि से शानदार योग्यता का परिचय दिया। नि:सन्देह शेरशाह मध्य युग के महान् शासन-प्रबन्धकों में से एक था। उसने किसी नई शासन-व्यवस्था को जन्म नहीं दिया बल्कि उसने पुराने सिद्धान्तों और संस्थाओं को ऐसी कुशलता से लागू किया कि उनका स्वरूप नया दिखाई दिया। इस प्रकार योग्य शासन-प्रबन्ध की दृष्टि से इतिहास में शेरशाह का स्थान महत्वपूर्ण माना जाता है। शेरशाह का शासन-प्रबन्ध निम्न प्रकार व्यक्त किया जा सकता है
(i) प्रान्तीय शासन-प्रबन्ध
(क) इक्ता या सूबा – शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए शेरशाह ने साम्राज्य को अनेक भागों में बाँट रखा था। उस समय राज्य में ‘सरकार’ सबसे बड़ा खण्ड कहलाता था। सरकार ऐसे प्रशासकीय खण्ड थे जो कि प्रान्तों से मिलते-जुलते थे और जो इक्ता कहलाते थे और प्रमुख अधिकारियों के अधीन थे। शेरशाह के समय फौजी गवर्नरों की नियुक्तियाँ भी होती थीं। जिन राज्यों को शासन करने की स्वतन्त्रता दे दी गई थी, उन्हें सूबा या इक्ता कहा जाता था। सूबे का प्रमुख हाकिम अथवा फौजदार होता था। फिर भी शेरशाह के प्रान्तीय प्रशासन का विवरण स्पष्ट नहीं है।

(ख) सरकारें (जिले ) – प्रत्येक इक्ता या सूबा सरकारों में बँटा होता था। शेरशाह की सल्तनत में 66 सरकारें थीं। प्रत्येक सरकार में दो प्रमुख अधिकारी होते थे- ‘शिकदार-ए-शिकदारान’ और ‘मुन्सिफ-ए-मुनसिफान’। शिकदार-ए-शिकदारान सरकार के प्रशासन का अध्यक्ष होता था तथा विभिन्न परगनों के शिकदारों पर प्रशासनिक अधिकारी होता था। अपनी सरकार में शान्ति और व्यवस्था की स्थापना करना तथा विद्रोही जमींदारों का दमन करना उसका प्रमुख कर्तव्य था। मुन्सिफ-ए-मुन्सिफान मुख्यतया न्याय-अधिकारी था। दीवानी मुकदमों का फैसला करना और अपने अधीन मुन्सिफों के कार्यों की देखभाल करना उसका दायित्व था।

(ग) परगने – प्रत्येक सरकार में कई परगने होते थे। शेरशाह ने प्रत्येक परगने में एक शिकदार, एक अमीन (मुन्सिफ), एक फोतदार (खजांची) और दो कारकून (लिपिक) नियुक्त किए गए थे। शिकदार के साथ एक सैनिक दस्ता होता था और उसका कर्तव्य परगने में शान्ति स्थापित करना था। मुन्सिफ का कार्य दीवानी मुकदमों का निर्णय करना और भूमि की नाप एवं लगान-व्यवस्था की देखभाल करना था। फोतदार परगने का खजांची था और कारकूनों का कार्य हिसाब-किताब लिखना था।

(घ) गाँव – शासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी। प्रत्येक गाँव में मुखिया, पंचायतें और पटवारी होते थे, जो स्थानीय प्रशासन की व्यवस्था करते थे। गाँव की अपनी पंचायत होती थी, जो गाँव में सुरक्षा, शिक्षा, सफाई आदि का प्रबन्ध करती थी। शेरशाह ने गाँव की परम्परागत व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं किया था परन्तु गाँव के इन अधिकारियों को अपने कर्तव्यों का पालन करना पड़ता था। अन्यथा इन्हें दण्ड दिया जाता था।

(ii) भू-राजस्व व्यवस्था – राज्य की आय का प्रमुख साधन भूमिकर अथवा लगान था। इसके अतिरिक्त लावारिस सम्पत्ति, व्यापारिक कर, टकसाल, नमक-कर, अधीनस्थ राजाओं, सरदारों एवं व्यापारियों द्वारा दिए गए उपहार, युद्ध में लूटे गए माल का 1/5 भाग, जजिया इत्यादि आय के साधन थे। शेरशाह किसानों की भलाई में ही राज्य की भलाई मानता था। उसकी लगान-व्यवस्था बहुत अच्छी मानी जाती है, उसकी लगान-व्यवस्था निम्न प्रकार थी

(क) शेरशाह की लगान – व्यवस्था मुख्यतया रैयतवाड़ी थी, जिसमें किसानों से प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित किया जाता था। इस कार्य में शेरशाह को पूर्ण सफलता नहीं मिली और जागीरदारी प्रथा भी चलती रही। मालवा और राजस्थान में यह व्यवस्था लागू नहीं की जा सकी।

(ख) उत्पादन के आधार पर ही भूमि को तीन श्रेणियों में बाँटा गया था- उत्तम, मध्यम और निम्न।

(ग) खेती योग्य सभी भूमि की नाप की जाती थी और पता लगाया जाता था कि किस किसान के पास कितनी और किस श्रेणी की भूमि है। उस आधार पर पैदावार का औसत निकाला जाता था।

(घ) लगान निश्चित करने की उस समय तीन प्रणालियाँ थीं – (अ) गल्ला बक्सी अथवा बँटाई (खेत बँटाई, लँक बँटाई और रास बँटाई), (ब) नश्क या कनकूत तथा (स) नकद अथवा जब्ती। सामान्यत: किसान बँटाई प्रणाली को ही पसन्द करता था।

(ड.) किसानों को सरकार की ओर से पट्टे दिए जाते थे, जिनमें स्पष्ट किया गया होता था कि उस वर्ष उन्हें कितना लगान देना है। किसान ‘कबूलियत-पत्र के द्वारा इन्हें स्वीकार करते थे।

(च) लगान के अलावा किसानों को जमीन की पैमाइश और लगान वसूल करने में संलग्न अधिकारियों के वेतन आदि के लिए सरकार को ‘जरीबाना’ और ‘महासीलाना’ नामक कर देने पड़ते थे जो पैदावार का 2.5% से 5% तक होता था। किसान को 2.5% अन्य कर भी देना पड़ता था, जिससे अकाल अथवा बाढ़ की दशा में जनता को सहायता मिलती थी।

(छ) शेरशाह का स्पष्ट आदेश था कि लगान लगाते समय किसानों के साथ सहानुभूति का बर्ताव किया जाए लेकिन लगान वसूल करते समय कोई नरमी न बरती जाए।

(ज) किसानों को यह सुविधा थी कि वे लगान नकद या जिन्स के रूप में दे सकते थे, लकिन सरकार नकद के रूप में लेना ज्यादा पसन्द करती थी।

(झ) शेरशाह यह ध्यान रखता था कि युद्ध के अवसर पर कृषि की कोई हानि न हो और जो हानि हो जाती थी, उसकी पूर्ति कर दी जाती थी।

(iii) केन्द्रीय शासन-प्रबन्ध – सुल्तान- दिल्ली सल्तनत के शासकों की भाँति शेरशाह भी एक निरंकुश शासक था और उसकी शक्ति एवं सत्ता अपरिमित थी। शासन नीति और दीवानी तथा फौजदारी मामलों के संचालन की शक्तियाँ उसी के हाथों में केन्द्रित थीं। उसके मन्त्री स्वयं निर्णय नहीं लेते थे बल्कि केवल उसकी आज्ञा का पालन और उसके द्वारा दिए गए कार्यों की पूर्ति करते थे।

इस कारण शासन की सुविधा की दृष्टि से शेरशाह को सल्तनतकाल की व्यवस्था के आधार पर चार मन्त्री विभाग बनाने पड़े थे। ये निम्नलिखित थे
(क) दीवाने वजारत – यह लगान और अर्थव्यवस्था का प्रधान था। राज्य की आय और व्यय की देखभाल करना इसका दायित्व था। इसे मन्त्रियों के कार्यों की देखभाल का भी अधिकार था।

(ख) दीवाने-आरिज – यह सेना के संगठन, भर्ती, रसद, शिक्षा और नियन्त्रण की देखभाल करता था, परन्तु यह सेना का सेनापति न था। शेरशाह स्वयं ही सेना का सेनापति था और स्वयं सेना के संगठन और सैनिकों की भर्ती आदि में रुचि रखता था।

(ग) दीवाने-रसालत – यह विदेश मन्त्री की भाँति कार्य करता था। अन्य राज्यों से पत्र-व्यवहार करना और उनसे सम्पर्क रखना इसका दायित्व था। कूटनीतिक पत्र-व्यवहार भी इसे ही सम्भालना होता था।

(घ) दीवाने – इंशा- इसका कार्य सुल्तान के आदेशों को लिखना, उनका लेखा रखना, राज्य के विभिन्न भागों में उनकी सूचना पहुँचाना और उनसे पत्र-व्यवहार करना था। इनके अतिरिक्त दो अन्य मन्त्रालय भी थे, ‘दीवाने-काजी’ और ‘दीवाने-बरीद’। दीवाने-काजी सुल्तान के पश्चात् राज्य के मुख्य न्यायाधीश की भॉति कार्य करता था और दीवाने-बरीद राज्य की गुप्तचर व्यवस्था और डाकव्यवस्था की देखभाल करता था। इसके अतिरिक्त बादशाह के महलों तथा नौकर-चाकरों की व्यवस्था के लिए एक अलग अधिकारी होता था।

(iv) सड़कें और सरायें – शेरशाह ने अपने समय में कई सड़कों का निर्माण कराया और पुरानी सड़कों की मरम्मत कराईं। शेरशाह ने मुख्यतया चार प्राचीन सड़कों की मरम्मत और निर्माण कराया। ये सड़कें निम्नलिखित थीं
(क) एक सड़क बंगाल के सोनारगाँव, आगरा, दिल्ली, लाहौर होती हुई पंजाब में अटक तक जाती थी अर्थात् (ग्रांड ट्रंक रोड), जिसे ‘सड़के-आजम’ के नाम से पुकारा जाता था।

(ख) दूसरी, आगरा से बुरहानपुर तक।

(ग) तीसरी, आगरा से जोधपुर और चित्तौड़ तक और

(घ) चौथी, लाहौर से मुल्तान तक जाती थी। शेरशाह ने इन सड़कों के दोनों ओर छायादार और फलों के वृक्ष लगवाए थे। उसने इन सभी सड़कों पर प्राय: दोदो कोस की दूरी पर सरायें बनवाई थीं। उसने अपने समय में करीब 1,700 सरायों का निर्माण कराया। इन सभी सरायों में हिन्दू और मुसलमानों के ठहरने के लिए अलग-अलग प्रबन्ध था। व्यापारी, यात्री, डाक-कर्मचारी आदि सभी यहाँ संरक्षण और भोजन प्राप्त करते थे।

(v) मुद्रा व्यवस्था – शेरशाह ने पुराने और घिसे हुए, पूर्व शासकों के प्रचलित सिक्के बन्द करके उनके स्थान पर सोने, चाँदी और ताँबे के नये सिक्के चलाए और उनका अनुपात निश्चित किया। उसके चाँदी के रुपए का वजन 180 ग्रेन था, जिसमें 175 ग्रेन शुद्ध चाँदी होती थी। सोने के सिक्के 166.4 ग्रेन और 168.5 ग्रेन के ढाले गए थे। ताँबे का सिक्का दाम कहलाता था। सिक्कों पर शेरशाह का नाम, उसकी पदवी और टकसाल का स्थान अरबी या देवनागरी लिपि में अंकित रहता था। शेरशाह के रुपए के बारे में इतिहासकार स्मिथ ने लिखा है “यह रुपया वर्तमान ब्रिटिश मुद्रा-प्रणाली का आधार है।”

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UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 3 Learning

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 3 Learning (अधिगम या सीखना) are part of UP Board Solutions for Class 12 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12  Psychology Chapter 3 Learning (अधिगम या सीखना).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Psychology
Chapter Chapter 3
Chapter Name Learning
(अधिगम या सीखना)
Number of Questions Solved 70
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 3 Learning (अधिगम या सीखना)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
अधिगम अथवा सीखने (Learning) से आप क्या समझते हैं? सीखने की प्रक्रिया में सहायक कारकों का उल्लेख कीजिए।
या
सीखने (अधिगम) का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। सीखने की अनुकूल परिस्थितियों अथवा सहायक कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
सीखने या अधिगम का अर्थ । सीखना जीवन-पर्यन्त चलने वाली एक सार्वभौम क्रिया है जो हमारे ज्ञान में निरन्तर वृद्धि करती है। मनुष्य शैशवकाल से मृत्यु तक जाने-अनजाने, औपचारिक-अनौपचारिक साधनों से नयी-नयी बातें सीखने की प्रवृत्ति रखता है। सीखने की प्रक्रिया में मानव एवं पशु अपने पूर्व-अनुभवों से लाभ उठाते हैं। वस्तुत: पूर्व-अनुभवों से लाभ उठाने की क्रिया को ही हम सीखना कहते हैं।

दूसरे शब्दों में, अतीत से लाभ उठाना तथा अपनी प्रक्रियाओं को उपयुक्त बनाना ही सीखना (Learning) है। उदाहरण के लिए, आग से जला हुआ बच्चा दोबारा आग के पास नहीं जाता, क्योंकि अनुभव ने उसे सिखा दिया है कि आग उसे जला देगी; अतः वह सीख गया है कि आग से दूर रहना चाहिए। सीखने की क्रिया द्वारा मनुष्य के मूलप्रवृत्यात्मक व्यवहार में इतना परिवर्तन आ जाता है कि आगे चलकर मूल प्रवृत्तियों के असली रूप को पहचानना ही दूभर हो जाता है। इस प्रकार सीखने से हमारा तात्पर्य पर्यावरण के प्रति उपयुक्त प्रतिक्रिया को अपनाने की प्रक्रिया अर्जित करने से है। सीखने का एक नाम ‘अधिगम’ भी है।

सीखने की परिभाषा

अनेक विद्वानों ने सीखने की परिभाषाएँ दी हैं। प्रमुख विद्वानों की परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

  1. क्रो एवं क्रो के अनुसार, “सीखना आदतों, ज्ञान तथा अभिवृत्तियों को अर्जन है।”
  2. गेट्स एवं अन्य के अनुसार, “अनुभव एवं प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार में जो परिवर्तन होता है, उसी को सीखना कहते हैं।”
  3. वुडवर्थ के अनुसार, “सीखना वह कोई भी क्रिया है जो बाद की क्रिया पर अपेक्षाकृत स्थायी प्रभाव डालती है।”
  4. चार्ल्स स्किनर के अनुसार, “सीखना, प्रगतिशील रूप से व्यवहार को ग्रहण करने की प्रक्रिया है।”
  5. कॉलविन के अनुसार, “अनुभव द्वारा पहले से बने बनाये (अर्थात् मौलिक) व्यवहार में परिवर्तन ही सीखना है।”
  6. बर्नहर्ट के अनुसार, “सीखना व्यक्ति के कार्यों में एक स्थायी रूपान्तर लाना है जो निश्चित परिस्थितियों में किसी लक्ष्य को प्राप्त करने या किसी समस्या को सुलझाने के प्रयास में अभ्यास द्वारा किया जाता है।”
  7. बी०एन० झा के शब्दों में, “उपयुक्त अनुक्रिया अर्जित करने की प्रक्रिया ही सीखना है।”
  8. हिलगार्ड के अनुसार, “सीखना वह क्रिया है जिससे कि कोई क्रिया प्रारम्भ होती है अथवा जो किसी परिस्थिति के प्रति प्रतिक्रिया करने के कारण परिवर्तित होती है; शर्त यह है कि इस प्रकार के परिवर्तन की विशेषताओं की व्याख्या जन्मजात प्रतिक्रिया, प्रवृत्तियों, परिपक्वता अथवा प्राणी की अस्थायी अवस्थाओं द्वारा नहीं की जा सके।”

विभिन्न सम्प्रदायों की दृष्टि में सीखना

मानव स्वभाव के व्यापक अध्ययन की दृष्टि से मनोविज्ञान के विभिन्न सम्प्रदायों का विकास हुआ। इन सम्प्रदायों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण के अनुसार सीखने की प्रक्रिया को समझाया है।

व्यवहारवाद के अनुसार, “सीखना मानव-व्यवहार में परिवर्तन की एक प्रक्रिया है।” प्रयोज़ावाद की दृष्टि में, “सीखना मानव-जीवन के लक्ष्य (प्रयोजन) से सम्बन्धित है तथा यह लक्ष्योन्मुख उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है।’ गैस्टाल्टवाद स्वीकार करता है, “मानव सम्पूर्ण परिस्थिति से सम्बन्ध स्थापित करके सीखता है। वह सीखे गये ज्ञान को अपने पूर्व-अनुभव से जोड़कर आत्मसात् करता है।

निष्कर्षतः सीखना या अधिगम मनुष्य द्वारा वातावरण से समायोजन स्थापित करने की, जीवन-पर्यन्त चलने वाली एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है। सीखना वस्तुतः एक प्रकार का मानसिक विकास है जिससे मानव का ज्ञानवर्द्धन होता है तथा उसकी विविध मानसिक प्रक्रियाओं का विकास होता है। विश्व के सभी प्राणी थोड़ी या अधिक, किन्तु हरदम कुछ-न-कुछ सीखते ही रहते हैं।

सीखने की अनुकूल परिस्थितियाँ अथवा सहायक कारक

सीखने की सफलता कुछ विशेष परिस्थितियों अथवा कारकों पर निर्भर करती है जिन्हें हम सीखने की अनुकूल परिस्थितियाँ अथवा सहायक कारक कहते हैं। ये परिस्थितियाँ अथवा कारक निम्नलिखित हैं

(1) शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य- सीखने की तीव्रता व्यक्ति के शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य अच्छा न होने पर ज्ञानेन्द्रियाँ ठीक काम नहीं कर पातीं, व्यक्ति रुचि लेकर कार्य नहीं करता और जल्दी ही थक जाता है। जो व्यक्ति देखने, सुनने, बोलने आदि क्रियाओं में निर्बल होते हैं, वे सीखने में पर्याप्त उन्नति नहीं कर पाते। वस्तुत: सीखने की प्रक्रिया का भौतिक और शारीरिक आधार स्नायु-संस्थान है। स्नायु-संस्थान के अन्तर्गत मस्तिष्क और स्नायु आते हैं जिनके कार्य करने की शक्ति पर सीखने की प्रक्रिया निर्भर करती है। मस्तिष्क और स्नायु की शक्ति, व्यक्ति के स्वास्थ्य पर निर्भर है। स्पष्टतः सीखने की क्रिया शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य से सीधे रूप में प्रभावित होती है।

(2) आयु– आयु का सीखने से गहरा सम्बन्ध है। आयु बढ़ने से सीखने की योग्यता क्यों कम हो। जाती है, इस संम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों के भिन्न-भिन्न विचार हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि आयु वृद्धि के कारण कुछ परिवर्तन आते हैं; जैसे-नाड़ी-मण्डल में विकार आ जाता है, उत्साह फीका पड़ने लगता है, विविध कार्यों में व्यस्तता के कारण अरुचि हो जाती है तथा व्यक्ति पर्याप्त रूप से श्रम नहीं कर पाता। हालाँकि, आयु बढ़ने के साथ-साथ अनुभव बढ़ता है, किन्तु सीखने की योग्यता घटती जाती है। प्रौढ़ों की अपेक्षा बालक जल्दी सीखते हैं। इसका कारण यह है कि बालकों का मस्तिष्क संसार की समस्याओं के बोझ से मुक्त रहता है, उनका नाड़ी-मण्डल अधिक स्वस्थ एवं लचीला होता है और जिज्ञासावश वे अधिक रुचि लेते हैं। सच तो यह है कि सीखना एक प्रगतिशील क्रिया है जिसे जीवन की किसी भी अवस्था में शुरू किया जा सकता है। केवल रुचि, अवधान, निष्ठा एवं श्रम की आवश्यकता है।

(3) उपयुक्त वातावरण– उपयुक्त वातावरण सीखने की प्रक्रिया में सहायक होता है। यदि वातावरण शान्त, सुन्दर, स्वस्थ तथा खुला होगा तो उससे मन को एकाग्र करने में सहायता मिलेगी। शोर-शराबे से युक्त, दूषित, गर्म तथा घुटन-भरे वातावरण में बालक तत्परता से नहीं सीख पाएगा। वह जल्दी थकान अनुभव करेगा और आलस्य के कारण झपकी मारने लगेगा। |

(4) प्रेरणा- सीखने में प्रेरणा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। सीखने में उन्नति लाने की दृष्टि से उसे प्रेरणायुक्त एवं प्रयोजनशील बना देना चाहिए। प्रेरणायुक्त व्यवहार उत्साह के कारण सीखने की प्रक्रिया को तीव्र कर देता है; अतः तीव्र प्रेरणा से सीखने की गति में तीव्रता आती है। प्रेरणा का सम्बन्ध लक्ष्य या प्रयोजन से है। यदि सीखने का लक्ष्य अच्छा है तो व्यक्ति उसे शीघ्र सीखने के लिए प्रेरित होता है। अतएव, सीखने की प्रक्रिया को त्वरित करने के लिए उसे उद्देश्यपूर्ण एवं प्रेरणायुक्त कर देना उचित है।

(5) रुचि- सीखने में रुचि का होना आवश्यक है। कोई कार्य सीखने या सिखाने से पहले व्यक्ति को उस कार्य में रुचि पैदा करनी चाहिए। रुचि लेकर किया गया कार्य शीघ्र होता है। रुचि एक प्रकार की आन्तरिक प्रेरणा है जो व्यक्ति को निर्दिष्ट लक्ष्य तक पहुँचाने में सहायता करती है तथा रुचि  का सम्बन्ध इच्छाओं और उद्देश्यों से है। बालक की सीखने में रुचि तभी होगी जबकि सीखने की सामग्री उसके उद्देश्य एवं इच्छा से सम्बन्धित होगी। अतः बालक में सीखने के प्रति रुचि उत्पन्न करने के लिए इन सभी बातों का ध्यान रखना चाहिए।

(6) अवधान- अवधान सीखने की एक आवश्यक शर्त तथा अनुकूल दशा है। सीखने के दौरान, विविध साधनों के माध्यम से व्यक्ति के अवधान को विषय-सामग्री में केन्द्रित करने का प्रयास करना चाहिए। शान्त भाव से विषय में केन्द्रित अवधान सीखने की प्रक्रिया को तीव्र करता है।

(7) तत्परता- सीखने-सिखाने की प्रक्रिया प्रारम्भ करने से पहले व्यक्ति में तत्परता का गुण होना आवश्यक है। सीखने की तीव्र इच्छा के साथ, सीखने के लिए तत्पर बच्चे शीघ्रतापूर्वक सीखते हैं। इसके विपरीत इच्छा एवं तत्परता के अभाव में सीखने की क्रिया न केवल अधिक समय लेती है बल्कि इस भाँति सीखा गया विषय स्थायी प्रकृति का भी नहीं होता।

(8) समय- किसी कार्य को लगातार लम्बे समय तक करने से थकान तथा ऊब पैदा होती है। थके हुए मस्तिष्क से सीखी गयी बातों का मस्तिष्क पर अच्छा असर नहीं पड़ता है। यही कारण है कि दीर्घ काल के अन्तिम भाग में सीखा गया ज्ञान समझ से बाहर होता जाता है। सीखने की क्रिया को सार्थक बनाने की दृष्टि से शिक्षार्थियों को थोड़ी-थोड़ी देर का अन्तर करके याद करना चाहिए। इससे सीखने की प्रक्रिया प्रभावकारी व उपयोगी बनती है।

(9) सीखने की विधि– सीखने की विधि की उपयुक्तता सीखने की सहायक दशा है। सीखने की अच्छी एवं उपयुक्त विधि मनोवैज्ञानिक एवं अर्थपूर्ण ढंग की तार्किक विधि होती है। यह विधि, विषय-सामग्री और बालक की बुद्धि व सीखने के लिए उपलब्ध समय को ध्यान में रखकर तय की जानी चाहिए।’

(10) करके सीखना– वर्तमान समय में सभी शिक्षा प्रणालियाँ ‘करके सीखना’ (Learning by doing) पर बल देती हैं। स्वयं करके सीखने से बालक का ध्यान सम्बन्धित कार्य में लम्बे समय तक केन्द्रित रहता है और वह द्रुत गति से सीखता है।

(11) सफलता का ज्ञान- सीखने वाले को सफलता का ज्ञान होने से प्रेरणा प्राप्त होती है। यदि सीखने वाले व्यक्ति को समय-समय पर यह अहसास कराया जाता रहे कि उसे कार्य में सफलता मिल रही है तो वह अधिक उत्साह के साथ करने लगता है। अतः सीखने की प्रक्रिया में सफलता का ज्ञान कराते रहना चाहिए।

(12) अभ्यास- सीखने में वांछित उन्नति के लिए विषय का निरन्तर अभ्यास जरूरी है। अभ्यास की अवधि न तो बहुत कम हो और न ही बहुत अधिक। मनोवैज्ञानिकों ने तीस मिनट की अभ्यास अवधि को सभी प्रकार से यथोचित बताया है। सीखी गयी बात को पुष्ट करने के लिए अभ्यास आवश्यक है। अतः पाइल (Pile) का यह कथन उचित ही है कि प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा अभ्यास करना चाहिए।

(13) प्रतिस्पर्धा- सीखने वालों में पारस्परिक प्रतिस्पर्धा की भावना जाग्रत होने पर वे और अधिक सीखने के लिए प्रेरित हो जाते हैं। प्रतिस्पर्धा का विचार व्यक्ति को एक-दूसरे से आगे निकलने के लिए प्रेरित करता है; अतः शिक्षक को शिक्षार्थियों में प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा का भाव पैदा करते। रहना चाहिए।

(14) पुरस्कार और प्रशंसा– पुरस्कृत व्यक्ति सीखने के लिए प्रेरित तथा उत्साहित होता है। समय-समय पर प्रशंसा या पुरस्कार का विचार सीखने में सहायक सिद्ध होता है। हरलॉक (Hurlock) के अनुसार, बड़े लड़कों तथा मन्दबुद्धि बालकों पर प्रशंसा का अधिक प्रभाव पड़ता है, किन्तु लड़कियों पर लड़कों की अपेक्षा प्रशंसा या निन्दा का कम प्रभाव पड़ता है।

(15) दण्ड और निन्दा- यद्यपि दण्ड सीखने की क्रिया में बाधा उत्पन्न करते हैं तथापि बालकों को गलत कार्यों से रोकने के लिए दण्ड का प्रयोग करना ही पड़ता है। बालक के बुरे कार्यों की निन्दा की जानी चाहिए। तीव्र बुद्धि बालक पर निन्दा का अच्छा प्रभाव देखा गया है। कुछ विद्वानों का मत है कि निन्दा, फल की अवहेलना से अधिक उत्साहवर्द्धक होती है।

उपर्युक्त अनुकूल दशाओं को दृष्टिगत रखते हुए यदि सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को । व्यवस्थित किया जाएगा तो निश्चय ही, सीखने की प्रक्रिया तीव्र, प्रभावकारी एवं स्थायी होगी।

प्रश्न 2
सीखने की विभिन्न विधियाँ क्या हैं? सोदाहरण समझाइए।
या
प्रमुख अधिगम विधियों की उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर
सीखने की विधि का अर्थ सीखने की विधि या अधिगम विधि से अभिप्राय उस प्रविधि से है जो किसी भी पाठ्य-सामग्री को सीखने के लिए अपनायी जाती है। सीखने की विधि तथा इससे सम्बन्धित कारक अधिगम (सीखना) को पर्याप्त रूप से प्रभावित करते हैं; क्योंकि सीखने की विधियाँ सिर्फ मानवीय अधिगम क्षेत्र में ही प्रयोग की जाती हैं; अतः इनकी प्रधान एवं विशिष्ट भूमिका मानवीय अधिगम के सम्बन्ध में ही है। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर पता चलता है कि अलग-अलग तरह से सीखने के कार्यों में अलग-अलग प्रकार की अधिगम/सीखने की विधियाँ प्रयुक्त होती हैं।

सीखने की विधियाँ सीखने की अनेक विधियाँ प्रचलित हैं जिनमें से मनोवैज्ञानिकों ने अध्ययन की प्रमुख चार विधियों को अधिक उपयोगी माना है। ये विधियाँ इस प्रकार हैं-

  1. अविराम तथा विराम विधि
  2. पूर्ण तथा अंश विधि
  3. साभिप्राय तथा प्रासंगिक विधि और
  4. सक्रिय सीखना तथा निष्क्रिय सीखना। इन विधियों की व्याख्या निम्नलिखित हैं-

(1) अविराम तथा विराम विधि (Massed Method and Spaced Method)– अविराम विधि, सीखने की एक ऐसी विधि है जिसमें किसी पाठ्य-सामग्री/पाठ को सीखते समय किसी तरह का विश्राम नहीं दिया जाता और सीखने के लिए जो समय तय होता है, व्यक्ति उसमें एक ही सत्र में अविराम (लगातार) कार्य करके सीखता रहता है। इसे संकलित विधि भी कहा जाता है। विराम विधि, जिसे वितरित विधि भी कहते हैं, किसी पाठ्य-सामग्री को विश्राम सहित तथा वितरित प्रयासों के द्वारा अलग-अलग सत्रों में सीखा जाता है। यदि कोई व्यक्ति लगातार दो घण्टे तक बैठकर एक ही सत्र में अपना पाठ याद करता है और इस बीच विश्राम नहीं करता, तो यह अविराम या संकलित विधि कही जाएगी; किन्तु यदि उसे बिना विश्राम किये पढ़ने में थकान या ऊब महसूस हो तो वह विराम या वितरित विधि का सहारा ले सकता है। वह पहले एक घण्टा पढ़ सकता है और पन्द्रह मिनट विश्राम के बाद फिर एक घण्टा पढ़ सकता है। इस भाँति, विश्राम के साथ एक से ज्यादा सत्रों में सीखने की विधि विराम विधि है।।

(2) पूर्ण तथा अंश विधि (Whole Method and Part Method)- अधिगम अर्थात् सीखने को संगठित तथा सुगम बनाने वाली दूसरी विधि पूर्ण तथा अंश विधि है। जब व्यक्ति पूरे कार्य को एक साथ करके सीखता है तो उसे पूर्ण विधि कहते हैं और जब वह पूरे कार्य को कई खण्डों/अंशों में बाँटकर प्रत्येक अंश को एक-दूसरे के बाद सीखता है तो उसे अंश विधि कहा जाता है। पूर्ण विधि में पाठ्य-सामग्री को आरम्भ से अन्त तक एक बार दोहरा लेने के बाद उसे फिर से दोहराकर अधिगम किया जाता है, किन्तु अंश विधि में पहले सम्पूर्ण पाठ्य-सामग्री को कुछ अंशों में बाँट लिया जाता है।

और फिर प्रत्येक अंश का अलग-अलग अधिगम करने के बाद सभी अंशों को एक साथ अधिगम कर लिया जाता है। पूर्ण विधि में 10 पृष्ठों के एक प्रश्नोत्तर को पहली पंक्ति में अन्तिम पंक्ति तक लगातार अनेक बार पढ़कर सीखा जाता है, किन्तु अंश विधि में इन 10 पृष्ठों की पाठ्य-सामग्री को सुविधानुसार कुछ अंशों में बाँटकर याद किया जाता है।

(3) साभिप्राय तथा प्रासंगिक विधि (Intentional Learning Method and Incidental Learning Method)- साभिप्राय विधि के अन्तर्गत व्यक्ति अपनी इच्छा तथा निश्चित उद्देश्य के साथ किसी कार्य या पाठ को सीखता है, जबकि प्रासंगिक विधि में व्यक्ति किसी कार्य या पाठ को स्वयं ही सीख जाता है-उसमें कार्य को सीखने की कोई इच्छा या उद्देश्य नहीं होता। यदि बालक अभिरुचि एवं निश्चित उद्देश्य के साथ पाठ याद करे; जैसे कि उस पाठ की परीक्षा में आने की अत्यधिक सम्भावना है तो इस प्रकार सीख जाना साभिप्राय सीखने की विधि का उदाहरण है; किन्तु निरुद्देश्य एवं बिना अभिरुचि के स्वत: ही सीख जाना प्रासंगिक विधि में आता है; जैसे किसी कैलेण्डर में दिन व दिनांक देखते-देखते व्यक्ति को उसे पर छपा विज्ञापन याद हो जाता है।

प्रयोगात्मक अध्ययन बताते हैं कि साभिप्राय विधि द्वारा सीखना, प्रासंगिक विधि द्वारा सीखने से अधिक अच्छा व उपयोगी है; क्योंकि इस तरह के सीखने में व्यक्ति की अभिरुचि तथा अभिप्रेरणा अधिक रहती है और वह सीखे गये कार्य को अधिक समय तक याद रख सकता है। आमतौर पर हम पाते हैं कि व्यक्ति उद्देश्य एवं अभिरुचि के साथ कार्य जल्दी सीख जाता है और उसका प्रभाव भी देर तक बना रहता है, किन्तु वह निरुद्देश्य तथा बिना रुचि के कार्य ढंग से नहीं सीख पाता। |

(4) सक्रिय सीखना तथा निष्क्रिय सीखना (Active Learning and Passive Learning)- अधिगम की एक विधि सक्रिय एवं निष्क्रिय विधि भी है। जब व्यक्ति किसी कार्य या पाठ को काफी तत्परता तथा सक्रियता के साथ सीखता है, सामग्री को बोल-बोलकर कण्ठस्थ करता है या उसे लिखता है तो इस तरह के सीखने को सक्रिय सीखना कहते हैं। | इस विधि का एक नाम मौखिक आवृत्ति विधि (Recitation Method) भी है। ह्विटेकर (Whittaker) नामक मनोवैज्ञानिक ने सक्रिय सीखने को परिभाषित किया है कि इसमें व्यक्ति

आत्म-परीक्षण (Self-testing) द्वारा या बोलकर या लिखकर किसी पाठ को सीखता है और उसे याद करता है। निष्क्रिय विधि में व्यक्ति किसी कार्य या पाठ को मन-ही-मन पढ़कर कण्ठस्थ करता है। और आराम से लेटकर या आराम कुर्सी पर बैठकर शुरू से आखिर तक पढ़कर सीखता है।

परीक्षा के दिनों में बच्चे प्रश्न के उत्तरों को सिर्फ पढ़ते ही नहीं हैं, बल्कि बीच-बीच में पढ़ना बन्द करके सामग्री को बोलने की कोशिश करते हैं या उसे लिखकर जाँच करते हैं कि वे कार्य या पाठ को अच्छी तरह सीख गये हैं या नहीं-यह सक्रिय विधि द्वारा सीखना है। किन्तु आमतौर पर जब बच्चे बिस्तर पर लेटकर या आरामकुर्सी पर बैठकर किसी प्रश्न का उत्तर पढ़कर सीखने का प्रयास करते हैं। तो यह निष्क्रिय विधि द्वारा सीखने का उदाहरण होगा।

प्रश्न 3
अनुकरण से आप क्या समझते हैं? अनुकरण की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। अनुकरण द्वारा सीखने को प्रभावित करने वाले आधारभूत कारकों का उल्लेख कीजिए।
या
सीखने में अनुकरण की क्या भूमिका है? अनुकरण की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर।
अनुकरण का अर्थ और परिभाषा | अनुकरण (Imitation) सीखने की एक प्रमुख विधि है जिसे मानव-जाति के बालकों व वयस्कों के अतिरिक्त पशु-पक्षियों द्वारा भी बहुतायत से अपनाया जाता है।

अनुकरण का सामान्य अर्थ है देखकर या सुनकर कार्य करने की विधि अथवा ‘नकल के माध्यम से सीखना। जब कोई प्राणी किसी अन्य प्राणी को देखकर या उसकी नकल करके किसी विशिष्ट क्रिया को सीखता है तो उसे अनुकरण द्वारा सीखना कहा जाता है। अनुकरण पशु, पक्षी और नुष्यों की सहज स्वाभाविक प्रवृत्ति है। यह जन्मजात प्रवृत्ति प्रत्येक प्राणी में मिलती है। बच्चों में भी अनुकरण की तीव्र एवं प्रबल प्रवृत्ति मिलती है।

मैक्डूगल ने अनुकरण को इस प्रकार परिभाषित किया है, “अनुकरण एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति की शारीरिक क्रियाओं और शारीरिक व्यवहार की नकल करने को कहते हैं।”

अनुकरण विधि की विशेषताएँ

हम किसी भाषा को बोलना, चलना-फिरना तथा सामान्य जीवन की असंख्य बातें अनुकरण द्वारा ही सीखते हैं। वस्तुतः सीखने की दिशा में मनुष्यों तथा पशुओं द्वारा यही विधि सर्वाधिक अपनाई जाती है।

अनुकरण विधि की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. अनुकरण करते समय अनुकरणकर्ता को प्रायः सोच-विचार की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
  2. अनुकरणकर्ता के लिए अनुकरण की जाने वाली क्रिया सर्वथा नयी होती है, वह उस क्रिया से परिचित नहीं होता।
  3. अनुकरण की विधि के अन्तर्गत क्रिया प्रदर्शन पर आधारित होती है।
  4. अनुकरण करने वाला अनुकरणीय क्रिया को देखते या सुनते ही तत्काल उसकी नकल करना प्रारम्भ कर देता है, वह सीखने की अन्य विधियों का प्रयोग नहीं करता।
  5. अनुकरण के सिद्धान्तानुसार क्रिया का जटिल होना आवश्यक समझा जाता है।
  6. अनुकरण में त्रुटियों की बहुत कम सम्भावनाएँ निहित हैं।
  7. मौलिकता के अभाव के कारण इसके अन्तर्गत क्रिया का स्वरूप अपरिवर्तनीय रहता है।
  8. अनुकरण योग्य कार्य की कठिनाई व्यक्ति की क्षमता एवं योग्यता के अनुरूप होनी चाहिए

निष्कर्षत: अनुकरण आत्माभिव्यक्ति (Self-expression) का सशक्त साधन है। इसका उपयोग नृत्य, संगीत तथा खेल आदि के शिक्षण में महत्त्वपूर्ण है। अच्छी आदतों का निर्माण अनुकरण के माध्यम से होता है। अनुकरण से स्पर्धा की भावना जन्म लेती है और बालक का विकास तीव्र गति से होता है। इसके अतिरिक्त मनुष्य सामाजिक व्यवहार अनुकरण के माध्यम से ही सीखता है।

अनुकरण द्वारा सीखने को प्रभावित करने वाले आधारभूत कारक 

अनुकरण द्वारा सीखने की प्रक्रिया को अनेक आधारभूत कारक प्रभावित करते हैं। इनमें प्रमुख कारकों का विवरण निम्नलिखित है|

(1) अभिप्रेरणा- अधिगम या सीखने पर अभिप्रेरणा का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। यदि अनुकरण द्वारा सीखने वाला व्यक्ति या प्राणी अभिप्रेरित नहीं होगा तो सीखने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। प्रायः बच्चे प्रतिभाशाली बच्चों की उपलब्धियों से प्रेरित होकर उनका अनुकरण करते हैं और परिणामत: अधिक लगन से सीखने में जुट जाते हैं। पशु के सीखने में शारीरिक अभिप्रेरणा तथा मनुष्य के सीखने में मनोवैज्ञानिक अभिप्रेरणा का अधिक महत्त्व होता है। |

(2) अभ्यास तथा सूझ- अभ्यास से सीखने में दृढ़ता प्राप्त होती है। एक बार अनुकरण करके सीख लेने के उपरान्त उसका बार-बार अभ्यास किया जाना आवश्यक है। सीखने में अभ्यास के साथ-साथ सूझ-बूझे का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रयोगों द्वारा सिद्ध हुआ है कि कोई कार्य जितनी ही अधिक बार किया जाता है, कार्यकुशलता और पूर्णता उतनी ही अधिक आती है। अत: अनुकरण द्वारा सीखने की प्रक्रिया में सही अनुक्रियाओं को दोहराकर अभ्यास करना अपरिहार्य है।

(3) अधिगम-धारक- अनुकरण द्वारा सीखना इस बात पर भी निर्भर करता है कि अधिगम-धारक अर्थात् सीखने वाला कैसा है? पशुओं की अपेक्षा मनुष्य अनुकरण द्वारा अधिक अच्छा सीख पाते हैं। अधिगम-धारक की बुद्धि, मानसिक योग्यताएँ, भावनाएँ, इच्छाएँ तथा आकांक्षा-स्तर भी अनुकरण को प्रभावित करते हैं। निर्विवाद रूप से कह सकते हैं कि बुद्धि मानसिक योग्यताएँ तथा आकांक्षा का स्तर आदि अधिक मात्रा में होने पर अनुकरण द्वारा अधिगम में मात्रात्मक एवं गुणात्मक वृद्धि होती है।

(4) अभिरुचि एवं अभिक्षमता- अनुकरण द्वारा सीखने की प्रक्रिया पर सीखने वाले व्यक्ति की अभिरुचि एवं अभिक्षमता का प्रभाव पड़ता है। किसी कार्य को सीखने में अभिरुचि व्यक्त करने तथा उसके लिए विशेष अभिक्षमता होने पर व्यक्ति अधिक अच्छा अनुकरण कर पाता है और इस भाँति कार्य को जल्दी सीख लेता है। यदि किसी व्यक्ति में यान्त्रिक इंजीनियर बनने में अभिरुचि तथा अभिक्षमता है तो वह कार्य-प्रदर्शन के दौरान मशीन के पुर्जा तथा सम्बन्धित कार्यों को आसानी से सीख लेगा।।

(5) अधिगमधारक की बुद्धि– व्यक्ति की बुद्धि का प्रभाव अनुकरण द्वारा सीखने की प्रक्रिया पर सीधा पड़ता है। मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के परिणाम बताते हैं कि अधिक बुद्धि-लब्धि वाले बच्चों का समूह, कम बुद्धि-लब्धि वाले बच्चों के समूह की अपेक्षा कार्य का सही अनुकरण करता है और सीखने में कम त्रुटि करता है। इस प्रकार सीखने वाले की बुद्धि का स्तर अनुकरण द्वारा सीखने की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।

(6) आयु– आयु भी एक ऐसा कारक है जो अनुकरण द्वारा अधिगम को प्रभावित करता है। प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि बच्चे वयस्कों की अपेक्षा अनुकरण द्वारा सबसे ज्यादा सीखते हैं। अनुकरण के दौरान किसी प्रकार के सोच-विचार की आवश्यकता नहीं होती और बच्चे नयी क्रिया को देखते या सुनते ही उसका अनुकरण करने लगते हैं। इसके विपरीत, वयस्क लोग अन्य विधियों के प्रयोग पर विचार कर सकते हैं।

(7) वातावरण- वातावरण से सम्बन्धित अनेक कारक अधिगम की मात्रा तथा गुण को प्रभावित करते हैं। आमतौर पर देखने में आता है कि शान्त और सुखद वातावरण में अनुकरण की क्रिया प्रोत्साहित होती है, जबकि अशान्त और दु:खद वातावरण अनुकरण पर विपरीत प्रभाव डालते हैं।

(8) परिपक्वता– सीखने की प्रक्रिया में अनुकरण के लिए व्यक्ति में परिपक्वता का एक निश्चित स्तर अपरिहार्य है। माना कोई बच्चा ‘अ’ लिखने का अनुकरण कर रहा है तो इसके लिए आवश्यक है कि उसके हाथ की अंगुलियाँ इतनी परिपक्व हों कि वह ठीक ढंग से कलम पकड़ सके। इसके साथ ही, उसमें मानसिक परिपक्वता भी इतनी हो कि वह अनुकरणीय वस्तु या व्यवहार की गुणवत्ता की परख कर सके।

(9) पुरस्कार- दण्ड एवं परिणामों का ज्ञान-किसी भी प्रकार की अधिगम प्रक्रिया में प्रयोज्य को यदि पुरस्कार मिलता है तो वह उस क्रिया को जल्दी सीख लेता है, जबकि दण्ड देने से सीखने सम्बन्धी कार्य में त्रुटियाँ कम होती हैं। वस्तुत: पुरस्कार-दण्ड तथा परिणामों का ज्ञाने एक प्रकार के पुनर्बलक हैं। प्रशंसा की भाँति सकारात्मक परिणामों का ज्ञान अनुकरण द्वारा सीखने को अभिप्रेरित करता है।उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि अनुकरण के माध्यम से सीखने की प्रक्रिया को विभिन्न कारक प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 4
प्रयत्न और भूल द्वारा सीखने का संक्षिप्त विवेचन कीजिए। इसकी पुष्टि थॉर्नडाइक एवं मैक्डूगल के प्रसिद्ध प्रयोगों के माध्यम से कीजिए।
उत्तर
प्रयत्न एवं भूल विधि सीखने की प्रक्रिया अत्यन्त धीमी गति से चलती है। व्यक्ति किसी भी बात या तथ्य को एकाएक ही नहीं सीख जाता। इसके लिए उसे विविध प्रयास करने पड़ते हैं। इन प्रयासों में हुई भूल को वह सुधारता है तथा फिर से प्रयास करती है। इसी विचार पर आधारित प्रयत्न और भूल’ द्वारा सीखने का सिद्धान्त है जिसे प्रयास एवं त्रुटि (Trial and Error) के नाम से भी जाना जाता है। इस सिद्धान्त या विधि को सबसे पहले थॉर्नडाइक (Thorndike) नामक मनोवैज्ञानिक ने प्रतिपादित किया था। प्रयत्न और भूल का सिद्धान्त कहता है कि किसी कार्य को प्रारम्भ करने वाला व्यक्ति शुरू में बहुत-सी भूलें या त्रुटियाँ करता है, किन्तु शनैः-शनैः प्रयत्न करते रहने पर वह अपनी भूलों को सुधार लेता है।

इसका परिणाम यह निकलता है कि गलत कार्य रुक जाता है और अन्तत: सही प्रतिक्रिया अपना ली जाती है। सीखने की प्रक्रिया के दौरान धीरे-धीरे भूलों तथा त्रुटियों की संख्या घटती जाती है और एक स्थिति ऐसी आती है जब कि वह पहले ही प्रयास में सही प्रतिक्रिया अर्थात् सही ढंग से कार्य कर लेता है। गणित की किसी नयी समस्या को हल करने वाला विद्यार्थी अनेक प्रयास और भूल करता है और इस प्रक्रिया द्वारा धीरे-धीरे एक ही बार में शुद्ध हल निकालना सीख जाता है। जब बच्चा पहली बार पैरों पर खड़ा होकर चलना सीखता है तो अनेक बार चलने के प्रयासों में वह गिरता है, पुनः सँभलकर खड़ा होता है और चलने का प्रयास करता है। अन्त में, वह बिना गिरे या लड़खड़ाये चलने लगता है।

प्रयत्न और भूल के सिद्धान्त से सम्बन्धित मनोवैज्ञानिक प्रयोग

अनेकानेक मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रयत्न और भूल के सिद्धान्त से सम्बन्धित बहुत-से प्रयोग किये गये। ऐसे प्रमुख प्रयोग निम्नवत् हैं

(1) थॉर्नडाइक का बिल्ली पर प्रयोग- प्रयत्न और भूल के सिद्धान्त के प्रतिपादक थॉर्नडाइक ने भ्रान्ति-सन्दूक या पिंजरे में एक भूखी बिल्ली को बन्द कर दिया। पिंजरे के बाहर बिल्ली को लुभाने के लिए एक मछली रख दी गयी। पिंजरे की बनावट इस प्रकार की थी कि भीतर स्थित एक बटन के दबाने पर पिंजरे का दरवाजा खुल जाता था। मछली को प्राप्त करने के लिए भूखी बिल्ली बाहर निकलने के लिए व्याकुल हो उठी। बिल्ली ने पिंजरे में उछलकूद मचाई, कई स्थानों पर धक्के मारे, किन्तु बाहर निकलने में सफल न हो 

सकी। इसी प्रकार बार-बार प्रयत्न एवं भूल करने की क्रियाओं के कारण थोड़ी देर बाद किसी एक प्रयत्न से अनायास ही बटन दब गया और दरवाजा खुलने पर बिल्ली ने बाहर आकर मछली को ग्रहण कर लिया। अगले दिन फिर यही क्रिया दोहराई गयी जिसके विभिन्न प्रयत्नों में भूलों की कम संख्या से ही दरवाजा खुल गया। कई दिनों तक इस प्रक्रिया को दोहराया जाता रहा। देखने में आया कि हर दिन भूलों की संख्या कम और कम होती जा रही है। आखिर में एक दिन ऐसा भी आया जब बिल्ली ने एक-ही प्रयत्न में बटन दबाकर मछली ग्रहण कर ली और उसने कोई भूल नहीं की। थॉर्नडाइक ने इस प्रयोग के निष्कर्षों के आधार पर सीखने के नियम बनाकर प्रस्तुत किये।

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(2) मैक्डूगल का चूहों पर प्रयोग– विख्यात मनोवैज्ञानिक मैक्डूगल ने चूहों पर प्रयोग करके प्रयत्न एवं भूल विधि का सत्यापन किया। उसने एक ऐसी नाँद में चूहे बन्द किये जिसमें बाहर जाने के दो रास्ते थे। एक रास्ता अन्धकारमय और दूसरा प्रकाशमान था। प्रकाशमान रास्ते से गुजरते समय चूहों को बिजली का झटका लगता था, किन्तु अन्धकारमय रास्ते से नहीं लगता था। चूहे प्रारम्भ में प्रकाशयुक्त मार्ग को ही चुनते थे, लेकिन बिजली का झटका लगते ही वापस मुड़ जाते थे। प्रयोग के दौरान चूहों ने शुरू में अनेक बार भूलें कीं, किन्तु आखिर में अन्धकारयुक्त मार्ग से निकलना सीख लिया। इस प्रयोग को बहुत बार दोहराया गया। नाँद से बाहर आने के प्रयास में चूहों द्वारा की गयी भूलों की संख्या कम और कम होती गयी। अन्तत: वे पहले ही प्रयास में अन्धकारमय मार्ग का चयन करना सीख गये और बिना किसी कष्ट के बाहर निकल आये।।

उपर्युक्त विवरण द्वारा अधिगम की प्रयत्न एवं भूल विधि का सामान्य परिचय प्राप्त हो जाता है। वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति एवं प्राणी अनेक विषयों को सीखने के लिए इस विधि को अपनाता है, परन्तु बच्चों तथा पशुओं द्वारा इस विधि को अधिक अपनाया जाता है।

प्रश्न 5
सूझ या अन्तर्दृष्टि विधि द्वारा सीखने के सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिए। अधिगम के इस सिद्धान्त की मुख्य विशेषताओं का भी उल्लेख कीजिए।
या
कोहलर द्वारा किये गये प्रयोग का विवरण प्रस्तुत करते हुए अधिगम के अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त का उल्लेख कीजिए।
या
अधिगम की अवधारणा को गैस्टाल्टवाद के अनुसार स्पष्ट कीजिए।
या
अन्तर्दृष्टि द्वारा सीखने के सम्बन्ध में कोहलर के प्रयोग का वर्णन कीजिए। (2016)
या
अन्तर्दृष्टि द्वारा अधिगम सम्बन्धी प्रयोग एवं प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए। (2010)
उत्तर
सूझ या अन्तर्दृष्टि का सिद्धान्त । गैस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, प्राणी अपनी सूझ या अन्तर्दृष्टि (Insight) के द्वारा ही सीख पाता है और सूझ के अभाव में वह सीखने में असफल रहता है। उविकास की प्रक्रिया के अन्तर्गत सूझ निम्नस्तर के प्राणियों से उच्च स्तर के प्राणियों की ओर वृद्धि करती है। चूहे, बिल्ली, कुत्ते  की अपेक्षा वनमानुष में तथा इन सबसे ज्यादा मनुष्य में सूझ पायी जाती है। सूझ के कारण ही उच्च स्तर के प्राणी जटिल कार्य करने में समर्थ होते हैं। गैस्टाल्टवादियों का कहना है कि सीखने की प्रक्रिया प्रयत्न एवं भूल अथवा सम्बद्ध प्रत्यावर्तन के अनुसार न होकर सूझ द्वारा होती है। इस विचारधारा के प्रवर्तक कोहलरे (Kohler) तथा कोफ्का (Koffka) थे।

सूझ या अन्तर्दृष्टि द्वारा सीखना

सूझ या अन्तर्दृष्टि मनुष्य जैसे विकसित प्राणी का प्रमुख लक्षण है। मानव के निकटवर्ती विकसित प्राणियों तथा वनमानुष और चिम्पैंजी में भी सूझ की क्षमता निहित होती है। कोहलर तथा कोफ्का के अनुसार, हमारा सीखना सूझ के द्वारा होता है और सीखने की लगभग सभी प्रतिक्रियाओं में सूझ की आवश्यकता पड़ती है। इस सिद्धान्त की प्रमुख विशेषता यह है कि सीखने की प्रत्येक क्रिया का कुछ-न-कुछ उद्देश्य अवश्य होता है तथा सीखने के समस्त प्रयास लक्ष्य द्वारा निर्देशित होते हैं। लक्ष्य में विविध बाधाएँ उत्पन्न होने पर सूझ की आवश्यकता होती है।

प्रत्येक बाधा व्यक्ति को नवीन परिस्थिति से अवगत कराती है और वह उस परिस्थिति के विभिन्न अंगों में परस्पर सम्बन्ध स्थापित करता है उन्हें समझने की कोशिश करता है। तत्पश्चात् व्यक्ति समूची परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए उसके अनुसार प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। किसी परिस्थिति-विशेष को समझकर उसके अनुसार प्रतिक्रिया करना ही व्यक्ति की सूझ का द्योतक है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप व्यक्ति जो व्यवहार सीखता है—उसे सूझ या अन्तर्दृष्टि द्वारा सीखना कहते हैं
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कोहलर का प्रयोग– कोहलर ने एक पिंजरे की छत में कुछ केलों को इस प्रकार टाँग दिया कि वे उस पिंजरे में बन्द भूखे चिम्पैंजी की पहुँच से बिल्कुल बाहर थे। पिंजरे में दो-तीन खाली सन्दूक रख दिये गये थे जिन्हें एक के ऊपर एक रखकर चिम्पैंजी केलों तक पहुँच सकता था। प्रेक्षण के दौरान पाया गया कि चिम्पैंजी ने केलों को पाने की कोशिश में खूब उछल-कूद मचायी लेकिन वह केलों को प्राप्त नहीं कर सका। थोड़ी देर तक वह पिंजरे में चारों ओर दृष्टि डालता रहा और हर चीज को ध्यानपूर्वक देखता रहा। उसने सन्दूकों को बहुत ध्यान से निरीक्षण किया। कुछ देर बाद, उसने पहले एक सन्दूक को केलों के नीचे रखकर उन तक पहुँचने का प्रयास किया। असफल रहने पर उसने दूसरा, फिर तीसरा सन्दूक भी एक के ऊपर एक रख दिया और इस भाँति केलों को प्राप्त कर लिया। प्रयोग से निष्कर्ष निकलता है कि चिम्पैंजी ने सम्पूर्ण परिस्थिति को पूरी तरह समझने के बाद सूझ के माध्यम से यह प्रतिक्रिया सीखी।।

सूझ विधि की विशेषताएँ

सूझ विधि की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं

  1. इस विधि में समझ का प्रयोग होता है और यह उच्च स्तरीय बौद्धिक जीवों में ही मिलती है।
  2. इसके अन्तर्गत समझ की सर्वाधिक भूमिका रहती है, न कि हस्त-कौशल की।
  3. यह प्रक्रिया आयु वृद्धि से प्रभावित होती है तथा कम आयु के लोगों की अपेक्षा अधिक.आयु के लोगों में सफल रहती है।
  4. यह एक आकस्मिक (अचानक होने वाली) घटना है।
  5. सूझ या अन्तर्दृष्टि में पूर्व के अनुभव सहायता करते हैं। |
  6. सूझ द्वारा सीखना प्रत्यक्षीकरण का परिणाम है और प्रत्यक्षीकरण के माध्यम से किसी परिस्थिति विशेष के तत्त्वों को नवीन संगठन प्रदान किया जाता है।
  7. सूझ द्वारा सीखने के किसी भी उदाहरण में प्रयत्न एवं भूल का अंश निहित है।

प्रश्न 6
सम्बद्ध प्रत्यावर्तन द्वारा सीखने के सिद्धान्त का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए। या प्राचीन अनुबन्धन सम्बन्धी पैवलोव के प्रयोग
या
एवं अधिगम प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए। (2010)
या
अधिगम के प्राचीन अनुबन्धन सम्बन्धी पैवलोव का प्रयोग लिखिए। (2014)
उत्तर
सम्बद्ध प्रत्यावर्तन सिद्धान्त सम्बद्ध प्रत्यावर्तन सिद्धान्त (Conditioned Reflexed Theory) को कई नामों से जाना जाता है; यथा-अनुबन्धित प्रतिक्रिया सिद्धान्त, प्रतिबद्ध अनुक्रिया द्वारा सीखने का सिद्धान्त, सम्बद्ध सहज क्रिया सीखना अथवा साहचर्यात्मक सीखना। व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, यह सिद्धान्त मानवीय सीखने की क्रिया को अभिव्यक्त करता है। सिद्धान्त का केन्द्रीय विचार है कि उत्तेजना एवं प्रतिक्रिया का सम्बन्ध होना ही सीखना है।।

सम्बद्ध प्रत्यावर्तन द्वारा सीखने का सिद्धान्त

व्यक्ति के चारों तरफ के वातावरण में अनेक उत्तेजक हैं। उचित उत्तेजक के सम्मुख आने पर साधारणत: व्यक्ति में कोई विशिष्ट उत्तेजना होती है जिसके परिणामस्वरूप एक विशेष प्रकार की अनुक्रिया होती है। यह अनुक्रिया प्राकृतिक (Natural) अनुक्रिया है और इसे सीखने की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि ये प्राकृतिक अनुक्रियाएँ वातावरण के कृत्रिम (अप्राकृतिक) उत्तेजकों (Artificial Stimulus) से सम्बद्ध हो जाती हैं। ऐसी दशा में यदि कोई कृत्रिम उत्तेजक उत्पन्न कर दिया जाता है और प्राकृतिक उत्तेजक के बाद तत्काल ही इस उत्तेजक को यदि अनेक बार दोहराया जाता है तो सिर्फ कृत्रिम उत्तेजक की उपस्थिति ही प्राकृतिक अनुक्रिया को उत्पन्न कर देती है।

इस भाँति प्राकृतिक उत्तेजक को हम कृत्रिम उत्तेजक से प्रतिस्थापित कर देते हैं। जब अभ्यास के बाद मनुष्य की प्राकृतिक अनुक्रिया वातावरण के अन्य कृत्रिम उत्तेजकों से प्राकृतिक रूप से सम्बद्ध हो जाती है तो इस प्रकार के सीखने को हम सम्बद्ध प्रत्यावर्तन द्वारा सीखना कहते हैं। उदाहरण के लिए-मान लीजिए, विज्ञान का अध्यापक विद्यार्थियों को कठोर दण्ड देता है जिसके फलस्वरूप विद्यार्थी उससे अत्यधिक भय खाने लगते हैं। कुछ समय के उपरान्त दण्डित होने वाले बच्चे विज्ञान विषय से भी भय खाने लगते हैं और रुचि लेना बन्द कर देते हैं। धीरे-धीरे विज्ञान के घण्टे का नाम सुनकर ही विद्यार्थियों में भय व्याप्त हो जाता है। स्पष्टत: विज्ञान विषय या उसके घण्टे से बच्चों में जो भय की अप्राकृतिक अनुक्रिया पैदा होती है, वह विज्ञान के उस अध्यापक से सम्बन्धित होने के कारण है।

पैवलोव का प्रयोग– सम्बद्ध प्रत्यावर्तन के सिद्धान्त को समझने के लिए हम पैवलोव (Pavlov) का कुत्ते के साथ किये गये प्रयोग का अध्ययन करेंगे। अपने प्रयोग में पैवलोव ने भोजन के सामने आने पर लार बहने की प्राकृतिक अनुक्रिया को घण्टी बजने के कृत्रिम उत्तेजक से सम्बन्धित कर दिया। भूखे कुत्ते के सामने भोजन लाने पर उसके मुंह में लार आना एक प्राकृतिक अनुक्रिया है जो प्राकृतिक उत्तेजक के द्वारा उत्पन्न हुई है। अब पैवलोव ने भूखे कुत्ते के सामने भोजन लाने से एकदम पहले एक घण्टी बजानी शुरू की।
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 3 Learning 3
घण्टी द्वारा भोजन आने की सूचना कुत्ते को मिल जाती है। पैवलोव ने देखा कि कुत्ते के सामने चाहे भोजन लाया जाए या नहीं, सिर्फ घण्टी बजने पर उसके मुँह में लार आ जाती है। प्रयोगकर्ता द्वारा कुत्ते के मुँह से निकली लार को एक नली द्वारा बाहर एक बर्तन में एकत्र करने का प्रबन्ध किया गया था। प्रयोग में लार का प्रकट होना और उसकी एकत्र मात्रा की माप करना पूरी तरह सम्भव था, जिससे आवश्यक निष्कर्ष निकाले जा सके। इस प्रयोग में घण्टी बजने पर कुत्ते के मुँह में लार आना एक ऐसी अनुक्रिया है जो एक अप्राकृतिक उत्तेजक द्वारा उत्पन्न होती है और यही सम्बद्ध प्रत्यावर्तन सिद्धान्त कहलाता है।
1. भोजन (US);
– लार (UR)
2. घण्टी (CS) 
– लार (UR) (कई बार दोहराने या प्रशिक्षण के बाद)
3. घण्टी (cs)
– लारे (CR)
यहाँ, स्वाभाविक उत्तेजना-भोजन (US = Natural or Unconditioned Stimulus); अस्वाभाविक उत्तेजना–घण्टी
(CS =Conditioned Stimulus) स्वाभाविक प्रत्युत्तर-लार UR = Natural or Unconditioned Response, अस्वाभाविक प्रत्युत्तर–घण्टी फलस्वरूप लार CR = Conditioned Response.

प्रतिबद्धता को प्रभावित करने वाले कारक

प्रतिबद्धता (Conditioning) को प्रभावित करने वाली प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं

  1. प्राकृतिक और अप्राकृतिक उद्दीपकों के बीच सम्बन्ध स्थापित करने की दृष्टि से उनमें बीस सेकण्ड से अधिक को अन्तर नहीं होना चाहिए, अन्यथा दोनों में सम्बन्ध स्थापित न हो सकेगा।
  2. दोनों उद्दीपकों के बीच में कोई अवरोधक (विघ्न पैदा करने वाला तत्त्व) भी नहीं होना चाहिए।
  3. नवीन उद्दीपक को पुराने उद्दीपक से पहले उपस्थित किया जाए।
  4. नवीन या अप्राकृतिक उत्तेजना अन्य उत्तेजनाओं से अधिक प्रबल हो।
  5. इस विधि से सीखने वाला पात्र सामान्य मस्तिष्क का व स्वस्थ व्यक्ति हो।
    सम्बद्ध प्रत्यावर्तन सिद्धान्त जीवन के प्रारम्भ से ही सीखने की प्रक्रिया में मनुष्य की पर्याप्त रूप से सहायता करता है। इसके अलावा विभिन्न आदतों, रुचियों, अरुचियों तथा तर्कहीन भय (फोबिया) का निर्माण इस विधि द्वारा होता है।

प्रश्न 7
नैमित्तिक अनुबन्धन से आप क्या समझते हैं? इसके प्रकारों का वर्णन कीजिए। या नैमित्तिक अनुबन्धन के अधिगम से सम्बन्धित स्किनर के प्रयोग का वर्णन कीजिए।
उत्तर
मनोविज्ञान में अनुबन्धन (Conditioning) प्रयोगों के माध्यम से यह तथ्य प्रकाशित हुआ है कि अधिगम (Learning); सरलतम रूप में उत्तेजना तथा अनुक्रिया के मध्य साहचर्य स्थापित होने का नाम है। सर्वप्रथम यह जानना आवश्यक है कि अनुबन्धन क्या है? अनुबन्धन वह प्रक्रिया है। जिसमें एक प्रभावहीन उत्तेजना (अर्थात् वस्तु या परिस्थिति) इतनी प्रभावशाली हो जाती है कि वांछित । या गुप्त प्रत्युत्तर को प्रकट कर देती है। इसे उत्तेजना के अभाव में वांछित प्रत्युत्तर एक प्राकृतिक या सामान्य प्रत्युत्तर होता है। अनुबन्धन के प्रमुख रूप से दो प्रकार हैं-

  1. प्राचीन अनुबन्धन (Classical Conditioning) तथा
  2. नैमित्तिक अनुबन्धन (Instrumental Conditioning)

प्राचीन अनुबन्धन के जनक एवं मुख्य योगदानकर्ता सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक पैवलोव (Pavlov) हैं, जिन्होंने प्राचीन अनुबन्धन के सम्बन्ध में उल्लेखनीय प्रयोग और शोधकार्य किये, किन्तु कुछ परिसीमाओं के कारण इस सिद्धान्त की आलोचना हुई। यहाँ हम नैमित्तिक अनुबन्धन (Instrumental Conditioning) का उल्लेख करेंगे।

नैमित्तिक अनुबन्धन का अर्थ व परिभाषा

नैमित्तिक अनुबन्धन; उत्तेजना एवं उसकी अनुक्रिया के मध्य साहचर्य स्थापित करने की एक विधि है। इस विधि के अनुसार-प्रयोज्य के लिए पुनर्बलन (Reinforcement) या पुरस्कार (Reward)’ की उपलब्धि प्रयोज्य की अनुक्रियाओं पर निर्भर करती है। दूसरे शब्दों में, प्रयोज्य की अनुक्रियाएँ पुनर्बलन का निमित्त (Instrument) बन जाती हैं।

डी’ अमेटो (D’ Amato) के अनुसार, “नैमित्तिक अनुबन्धन वह कोई भी अधिगम (सीखना) है जिसमें अनुक्रिया अवलम्बित पुनर्बलन पर आधारित हो तथा जिसमें प्रयोगात्मक रूप से परिभाषित विकल्पों का चयन सम्मिलित न किया हो। नैमित्तिक अनुबन्धन के प्रकार

(A) नैमित्तिक अनुबन्धन के अन्तर्गत पुनर्बलन या पुरस्कार धनात्मक या निषेधात्मक किसी भी प्रकृति का हो सकता है। इस आधार पर अनुबन्धन के दो प्रकार हैं

  1. प्रवृत्यात्मक अनुबन्धन (Appetitive Conditioning)- यह ऐसा अनुबन्धन है जिसमें धनात्मक पुनर्बलन (Positive Reinforcement) का उपयोग होता है। धनात्मक पुनर्बलन वह उत्तेजना है, जिसे प्राप्त करने के लिए प्रयोज्य प्रयास एवं कार्य करता है।
  2. विमुखी अनुबन्धन (Aversive Conditioning)- इस अनुबन्धन में निषेधात्मक पुनर्बलन (Negative Reinforcement) का उपयोग होता है। निषेधात्मक पुनर्बलन वह उत्तेजना है। जिससे बचने के लिए प्रयोज्य कार्य करता है।

(B) कोनोस्क नामक विद्वान् ने नैमित्तिक अनुबन्धन को निम्नलिखित चार प्रकारों में विभाजित किया है

  1. पुरस्कार नैमित्तिक अनुबन्धन (Reward Instrumental Conditioning)- पुरस्कार नैमित्तिक अनुबन्धन को अभिभेदक अनुबन्धन (Non-discriminative Conditioning) भी कहा जाता है। इसमें पुरस्कार (पुनर्बलन) प्रयोज्य को कुछ प्रयास या क्रियाएँ करने हेतु प्रेरित करता है और ये बारम्बार प्रयास पुरस्कार के कारण होते हैं।
  2. परिहार नैमित्तिक अनुबन्धन (Avoidance Instrumental Conditioning)- परिहार नैमित्तिक अनुबन्धन के अन्तर्गत प्रयोज्य संकेत (Cue or Sign) के प्रति प्रतिक्रिया करके पीड़ादायक या दुःखद उत्तेजना का परिहार अर्थात् परित्याग (Avoid),कर देता है। इस अनुबन्धन का ही एक प्रकार पलायन अनुबन्धन (Escape Conditioning) भी है जिसमें प्रयोज्य पीड़ादायी उत्तेजना से पलायन (बचना या भागना) सीख जाता है।
  3. अकर्म नैमित्तिक अनुबन्धन (Omission Instrumental Conditioning)- अकर्म अनुबन्धन का एक नाम निष्क्रिय अनुबन्धन (Inactive Conditioning) भी है जिसमें प्रयोज्य किसी अनुक्रिया का अकर्म (Omission) करना सीख जाता है।
  4. दण्ड नैमित्तिक अनुबन्धन (Punishment Instrumental Conditioning)- इसे निषेधात्मक (Prohibitory) अनुबन्धन भी कहा जाता है जिसमें प्रयोज्य की अनुक्रिया पर दण्ड या पीड़ादायक उत्तेजना दी जाती है। यह दण्ड अनुक्रिया को विलुप्त करने या छुड़ाये जाने के लिए दिया जाता है।

नैमित्तिक अनुबन्धन सम्बन्धी स्किनर का प्रयोग

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक बी ० एफ ० स्किनर ने 1938 ई० में नैमित्तिक अनुबन्धन के सम्बन्ध में एक प्रयोग किया। स्किनर ने चित्र के अनुसार एक पेटी (Box) तैयार की जिसमें छड़रूपी लीवर लगा हुआ था। इस उपकरण में लीवर को दबाने से घण्टी की आवाज होती थी और रखा हुआ भोजन एक प्लेट में गिरता था। उपकरण में प्रयोज्य लीवर को दबाने के लिए पूरी तरह स्वतन्त्र है। जितनी बार भी लीवर दबेगा उतनी ही बार घण्टी की आवाज के साथ प्लेट में भोजन आ गिरेगा। स्किनर ने एक भूखे चूहे को उपकरण में बन्द कर दिया और उसकी गतिविधियों की जाँच की। शुरू में चूहा पेटी में इधर-उधर चक्कर लगाता रहा और जब-तब पेटी में लगी छड़ियों पर भी खड़ा हुआ। ऐसे अनेक प्रयासों में एक प्रयास में छड़ वाला लीवर दब गया और उसकी गतिविधियाँ यथावत् चलती रहीं, किन्तु थोड़ी देर बाद उसे भोजन दिखाई पड़ गया और भूखे चूहे ने भोजन को देखते ही उसे खा लिया। चूहे ने इस तरह के बहुत-से प्रयास किये। |

इन प्रयासों में यह पाया गया कि चूहे ने छड़रूपी लीवर के पास ज्यादा समय बिताया और अनेक बार अपनी पिछली टाँगों की सहायता से खड़ा हो गया। अगले कुछ प्रयासों में चूहे ने लीवर दबाकर भोजन प्राप्त करना सीख लिया। स्किनर के इस प्रयोग में अधिगम का मापन समयान्तर के माध्यन से किया जाता है और जाँच की जाती है कि एक निश्चित अवधि में चूहा कितनी बार लीवर को दबाकर भोजन के टुकड़े गिरासा है। प्रयोग में जैसे-ही-जैसे प्रयास बढ़ते हैं, वैसे-ही-वैसे चूहे की लीवर दबाने की आवृत्ति भी बढ़ती जाती है। इस भाँति, प्रयोग के परिणामों से निष्कर्ष निकलता है कि पूनर्बलन या पुरस्कार ने चूहे को कुछ क्रियाएँ करने हेतु प्रेरित किया और चूहे के एक के बाद एक प्रयास पुनर्बलन या पुरस्कार की वजह से हुए।
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यह प्रयोग अधिगम को एक क्रमिक प्रक्रिया सिद्ध करता है। इस प्रक्रिया में प्रयासों के साथ-साथ वृद्धि होती है और साथ ही यह अधिक मजबूत भी होती है। स्किनर के इस प्रयोग में चूहा पुरस्कार 

(भोजन) पाने के लिए छड़रूपी लीवर को दबाता है। अत: इस प्रकार के अधिगम को ।। नैमित्तिक अधिगम कहा जाता है।

प्रश्न 8
सीखने के विभिन्न नियमों का वर्णन कीजिए। इसके द्वारा शिक्षण को किस प्रकार प्रभावी बनाया जा सकता है?
या
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के नियमों को स्पष्ट कीजिए।
या
थॉर्नडाइक की तैयारी के नियम (तत्परता का नियम) से आप क्या समझते हैं? (2018)
उत्तर
थॉर्नडाइक के सीखने के नियम सीखना एक उद्देश्यपूर्ण सार्वभौमिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से प्राणी के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाये जाते हैं। सीखने की यह प्रक्रिया किन्हीं नियमों द्वारा संचालित होती है। थॉर्नडाइक (Thorndike) नामक मनोवैज्ञानिक ने सीखने के नियमों को सुव्यवस्थित किया और इन्हें निर्धारित करने के लिए पशुओं पर प्रयोग किये।
उसके द्वारा प्रतिपादित नियमों की आलोचना हुई, जिसके परिणामतः उसने मनुष्यों पर परीक्षण करके नियमों को सत्यापित करने का पुनः प्रयास किया। थॉर्नडाइक के अनुसार, सिद्धान्त तथा व्यवहार दोनों को स्पष्टतया एवं बार-बार यह बताने की आवश्यकता है कि मनुष्य का शिक्षण प्रायः तैयारी, अभ्यास तथा परिणाम के नियमों का कार्य है।
थॉर्नडाइक ने सीखने के तीन प्रधान नियम प्रतिपादित किये। इन नियमों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है

(1) तत्परता का नियम (Law of Readiness)– तत्परता का नियम बताता है कि जब कोई भी व्यक्ति सीखने के लिए मानसिक रूप से तत्पर होता है (अर्थात् तैयार रहता है) तो सीखने की क्रिया सरलता और शीघ्रता से सम्पन्न होती है। व्यक्ति जिस समय किसी कार्य को सीखने की धुन में रहता है तो वह सीखने में आनन्द का अनुभव करता है। बालक में किसी नवीन ज्ञान या क्रिया को सीखने की तत्परता तभी आती है जब उसमें रुचि होती है और उसके अन्दर सीखने के लिए प्रेरणा उत्पन्न कर दी जाए; अत: शिक्षक को पाठ शुरू करने से पूर्व बालक की रुचि और जिज्ञासा पर ध्यान देना चाहिए तथा उन्हें सीखने के लिए प्रेरित करना चाहिए। कुछ विद्यार्थियों की किसी विशेष विषय में रुचि नहीं होती जिसकी वजह से तत्परता के नियम की अवहेलना हो सकती है। तत्परता का नियम कुछ निष्कर्षों को महत्त्व देता है—प्रथम, इस नियम के अनुसार सीखने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहने

की दशा में विद्यार्थी को अधिक प्रयास नहीं करना पड़ता और सीखने की प्रक्रिया सन्तोषजनक रहती है। द्वितीय, यदि व्यक्ति सीखने के लिए विवश नहीं है और पूर्ण रूप से भी तत्पर है तो सीखने में अत्यधिक सन्तुष्टि प्राप्त होगी। तृतीय, सीखने के लिए बलपूर्वक विवश किये जाने पर अरुचि के कारण कार्य असन्तोषजनक होगा। इस भाँति कहा जा सकता है-“जब कोई बन्धन किसी कार्य को करने के लिए होता है तो वह प्रक्रिया आनन्द देती है और जब सीखने की इच्छा नहीं होती और व्यक्ति सीखने को तैयार नहीं होता तथा उसे बाध्य किया जाता है, तब क्रोध उत्पन्न होता है।”

(2) अभ्यास का नियम (Law of Exercise)— इसे उपयोग–अनुपयोग का नियम (Law of Use-Disuse) भी कहते हैं। थॉर्नडाइक का विचार है कि अन्य बातें समान रहने पर सीखने की प्रक्रिया में अभ्यास के द्वारा शक्ति में वृद्धि होती है, जबकि अभ्यास की कमी स्थिति और प्रतिक्रिया के सम्बन्ध को कमजोर बना देती है। हमारी बहुत-सी प्रतिक्रियाओं में उपयोग तथा अनुपयोग के नियम साथ-साथ कार्य करते हैं। हम स्वतन्त्र भाव से उन्हीं उपयोगी क्रियाओं को दोहराते हैं जिनसे हमें आनन्द मिलता है तथा उन अनुपयोगी क्रियाओं को नहीं दोहराते जिनसे हमें दुःख होता है।

अभ्यास के नियम से स्पष्ट है कि जिस काम को जितना अधिक दोहराया जाएगा, जितनी ही उसकी पुनरावृत्ति की जाएगी, उतनी ही दृढ़ता से वह हमारे मन में बैठ जाता है और उसके करने में उतनी ही कुशलता आ जाती है। गायन, खेल, कविता, पहाड़े तथा गणित आदि से सम्बन्धित नियम सिखाने के उपरान्त बालकों को उनका अभ्यास अवश्य करा देना चाहिए।

(3) प्रभाव का नियम (Law of Effect)- प्रभाव के नियम को सन्तोष और असन्तोष का नियम भी कहते हैं। थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित इस नियम में प्रभाव से तात्पर्य ‘परिणाम’ से है। जिन कार्यों का परिणाम व्यक्ति को सन्तोष प्रदान करता है तथा उसे सुखद अनुभव देता है, उन कार्यों को मनुष्य सरलता से एवं शीघ्र ही सीख जाता है। इसके विपरीत जिन कार्यों का परिणाम असन्तोषजनक तथा दु:खद अनुभव वाला होता है, उन्हें व्यक्ति भुला देना चाहता है और बार-बार दोहराना नहीं चाहता।

इसी सन्दर्भ में जिस कार्य को करने से व्यक्ति को प्रशंसा एवं पुरस्कार मिले अर्थात् जिस कार्य का अच्छा प्रभाव (परिणाम) निकले, उसे बालक शीघ्रतापूर्वक सीख जाता है। इसी कारण से शिक्षा में दण्ड एवं पुरस्कार का बहुत अधिक महत्त्व है। बुरा कार्य करने पर बालक दण्ड पाता है, किन्तु अच्छे कार्य के लिए उसे पुरस्कृत किया जाता है। प्रभाव का नियम विद्यालय तथा परिवार में पर्याप्त रूप से प्रयोग किया जाता है।

सीखने के अन्य नियम 

सीखने के उपर्युक्त मुख्य नियमों के अतिरिक्त कुछ अन्य नियम भी हैं। इन्हें सीखने के गौण । नियम भी कहा जाता है। इन नियमों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

  1. पुनरावृत्ति का नियम (Law of Frequency)- इस नियम के अनुसार, जिस कार्य की व्यक्ति अनेक बार पुनरावृत्ति करता है, उसे वह जल्दी ही सीख जाता है।
  2. नवीनता का नियम (Law of Recency)- अभ्यास जितना नवीन या ताजा होता है, उतना ही जल्दी व्यक्ति उसे सीख लेता है।
  3. प्राथमिकता का नियम (Law of Primacy)- सर्वप्रथम होने वाला अनुभव या क्रियाएँ मस्तिष्क पर एक गहरी छाप छोड़ देती हैं। ये शीघ्र ही सीख लिये जाते हैं।
    विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रतिपादित तथा उपर्युक्त वर्णित ये समस्त नियम-तत्परता, अभ्यास, प्रभाव, पुनरावृत्ति, नवीनता तथा प्राथमिकता का नियम–सीखने की प्रक्रिया को निर्धारित एवं प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 9
सीखने के वक्र से आप क्या समझते हैं? सीखने में पठार को वक्र रेखा की सहायता से स्पष्ट कीजिए। 
(2012, 15)
या
सीखने की वक्र रेखा की क्या विशेषताएँ हैं? 
(2018)  
या
सीखने का पठार क्या है? सीखने के पठार के उत्तरदायी कारक कौन-कौन से हैं? 
(2009)
या
चित्र की सहायता से सीखने का वक्र स्पष्ट कीजिए। (2014)
या
सीखने के पठार को कैसे दूर किया जा सकता है? (2007)
या
सीखने के पठार को रेखाचित्र की सहायता से स्पष्ट कीजिए। (2017)
उत्तर

सीखने का वक्र 

सीखने की प्रक्रिया में किसी नवीन क्रिया का ज्ञान या अनुभव को ग्रहण किया जाता है। सीखने के कार्य और उसकी प्रगति को समझने के लिए सीखने के अंकों के आधार पर सीखने की वक्र रेखा (Learning Curve) का निर्माण किया जाता है। ये वक्र रेखाएँ तीन प्रकार की होती हैं—सकारात्मक वक्र रेखा, नकारात्मक वक्र रेखा और एस (S) आकार की वक्र रेखा। सीखने की सकारात्मक वक्र रेखा उस समय बनती है जब सीखने के साथ-साथ उन्नति की गति धीमी होने लगती है।

इस रेखा की उन्नति तेज गति से शुरू होती है। कार्य के सरल होने या व्यक्ति के अधिक प्रेरित होने के कारण ऐसा सम्भव होता है। नकारात्मक वक्र रेखा प्रेरणा की कमी तथा कठिन कार्यों के सीखने से बनती है। इसी प्रकार एस (S) के आकार की वक्र रेखा उस समय बनती है जब सीखने की क्रियाओं में एक समान उन्नति न हो रही हो अथवा सीखने की क्रियाएँ पुरानी होने लगती हों। अध्ययनों से ज्ञात होता है कि प्रत्येक सीखने की वक्र रेखा धीरे-धीरे क्रमशः समतल होती जाती है।
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सीखने का पठार

किसी व्यक्ति के सीखने की प्रगति को ग्राफ पर प्रदर्शित किया जा सकता है। नि:सन्देह अभ्यास के फलस्वरूप सीखने की क्रिया में तीव्रता आती है और सीखने वाला व्यक्ति शुरू में तीव्र गति से सीखता है, किन्तु यह तीव्रता अनवरत रूप से वृद्धि नहीं करती। कुछ समय उपरान्त एक दशा ऐसी आ जाती है जब प्रगति कम हो जाती है। इस दशा को ग्राफ में आधार रेखा के लगभग समानान्तर रेखाओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। शुरू में ऊपर जाती हुई रेखा प्रारम्भिक तीव्रता दिखाती है तथा आधार के समानान्तर रेखा ‘सीखने का पठार’ प्रदर्शित करती है। उन्नति की स्थिति कुछ समय तक रुकी रहती है। तथा पठार की स्थिति कहलाती है। इस भाँति, सीखने के उस समय को, जिसमें सीखने की गति एक समान बनी रहती है, अर्थात् उसमें वृद्धि नहीं होती या सीखने की प्रगति अल्प होती है, ‘सीखने को पठार’ (Plateau of Learning) कहते हैं।
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सीखने के पठार संगीत, चित्रकला, टाइप, मोबाइल पर लम्बे मैसेज देना आदि सीखने की क्रियाओं में प्रकट होते हैं। पठार के दौरान उन्नति रुक जाने से विद्यार्थी का निराश होना स्वाभाविक, किन्तु अमनोवैज्ञानिक है। शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में भाग लेने वाले लोगों को सीखने के इन पठारों से हतोत्साहित नहीं होना चाहिए, क्योंकि उन्नति में पठार का आना प्राकृतिक और अनिवार्य है। जिस प्रकार से भोजन ग्रहण करने के उपरान्त उसे पचाये बिना पुनः दूसरा भोजन ग्रहण नहीं किया जा सकता, ठीक उसी प्रकार से हमारा मस्तिष्क बिना एक बात को ठीक से सीखे आगे बढ़ना नहीं चाहता।। सत्यता तो यह है कि पठार का काल एक प्रकार का ‘पाचन-काल’ (Consolidation Period) है।

पठार के कारण

वैसे तो सीखने के पठार के अनेकानेक कारण हो सकते हैं, परन्तु सामान्यतया सीखने के पठार के निम्नलिखित तीन प्रमुख कारण हैं

(1) ज्ञानावरोध– ज्ञानावरोध से अभिप्राय है-एक विधि द्वारा अधिक ज्ञान के विकास न होने की सीमा आ पहुँचना या ज्ञान के विकास में अवरोध आना। प्राय: देखने में आता है कि सीखने के अन्तर्गत किसी एक विधि का अनुसरण करने के उपरान्त एक ऐसी सीमा आ जाती है कि उस विधि से ज्ञान के विकास की अधिक सम्भावना नहीं रह जाती और व्यक्ति सीखने में अधिक उन्नति नहीं कर पाता।

(2) उत्साहावरोध— यह स्वाभाविक ही है कि सीखने की सफलता के साथ-साथ प्रारम्भिक उत्साह, जोश, लगन तथा रुचि आदि ठण्डे पड़ने लगते हैं। इस प्रकार उत्साहावरोध के कारण सीखने में पठार आ जाता है। इसे रोकने के लिए सीखने वाले को लगातार उत्साहित करते रहना चाहिए।

(3) शारीरिक क्षमतावरोध/शारीरिक सीमा- हर व्यक्ति के सीखने की योग्यता उसके शरीर एवं मस्तिष्क की कार्यक्षमता पर निर्भर करती है। प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक क्षमता सीमित होती है। यद्यपि किसी व्यक्ति की शारीरिक सीमा (Physiological Limit) को दृढ़ता से सुनिश्चित नहीं किया जा सकता तथापि यह वह सीमा है जब कि सीखने की क्रिया की गति आगे बढ़ने से रुक जाती है। वस्तुत: व्यक्ति अपनी शारीरिक-मानसिक कार्यक्षमता की सीमा तक तो शीघ्र उन्नति कर लेता है। लेकिन तत्पश्चात् उसकी प्रगति तब तक अवरुद्ध रहती है जब तक कि सीखने का उतना कार्य करने की उसे आदत न हो जाए। अपनी प्रकृति के अनुसार व्यक्ति को कष्टों से भय लगता है। प्रायः वह अपनी शारीरिक क्षमता की सीमा तक पहुँचे बिना ही अभ्यास छोड़ बैठता है। अतः पठार के कारण को ठीक-ठीक समझना परमावश्यक है।

(4) पठार के अन्य कारण– पठार निर्मित होने के अन्य कारण इस प्रकार हैं-

  1. अवधान का अभाव
  2. ध्यान परिवर्तन
  3. विषय-वस्तु को सीखने की अधिक मात्रा
  4. सीखने की दोषपूर्ण एवं अनुपयुक्त विधियाँ
  5. स्नायुमण्डल सम्बन्धी दोष
  6. मानसिक एवं संवेगात्मक तनाव
  7. जिज्ञासा, रुचि और उत्साह में कमी आना
  8. निराशाजनक मन:स्थिति
  9. दूषित वातावरण
  10. प्रेरणा एवं उत्साह का अभाव तथा
  11. शारीरिक-मानसिक थकान।।

‘सीखने के पठार’ को दूर करने के उपाय

कुछ मनोवैज्ञानिके सीखने में पठारों के बनने की क्रिया को पूर्णतया स्वाभाविक मानते हैं। उनके मतानुसार इन पठारों को समाप्त करना हानिकारक हो सकता है; क्योंकि कुछ समय बाद निरन्तर अभ्यास एवं अपनी अस्थायी प्रकृति के कारण ये स्वत: ही समाप्त हो जाते हैं। फिर भी, किसी व्यक्ति की सीखने की उन्नति के लिए प्रगति में आने वाले पठार की अवस्था को दूर किया जाना आवश्यक है। सीखने के पठार की अवस्था का निराकरण निम्नलिखित उपायों द्वारा सम्भव है

(1) पठार का ज्ञान एवं क़ारण की खोज- यदि कोई व्यक्ति नवीन कला या कौशल सीख रहा है। तो उसके शिक्षक या प्रशिक्षक को ध्यान रखना होगा कि उसके सीखने की प्रगति में कहीं पठार की अवस्था तो नहीं आ गयी है। यदि ऐसा है तो पठार के कारण की खोज करके उसका पता लगाना चाहिए।

(2) प्रेरणा द्वारा रुचि में वृद्धि– शिक्षक को चाहिए कि वह विद्यार्थी को समय-समय पर प्रेरित करता रहे। इससे रुचि में आने वाली कमी पूरी होगी और विद्यार्थी उसी गति से सीखता रहेगा।

(3) शिक्षण विधि— कभी-कभी पुरानी शिक्षण विधि के कारण भी पठार की अवस्था आ जाती है। उस दशा में शिक्षक को पुरानी व अनुपयुक्त विधि को आवश्यकतानुसार परिवर्तित या संशोधित कर लेना चाहिए।

(4) सहायक सामग्री- सहायक सामग्री के प्रयोग से शिक्षण कार्य में प्रभावकारिता आती है। अतः आवश्यकतानुसार दृश्य-श्रव्य सामग्री और शिक्षण-अधिगम सम्बन्धी समुचित उपकरण प्रयोग किये जाने चाहिए।

(5) शारीरिक क्षमता वृद्धि– सीखने वाले की सीखने की शारीरिक सीमा आने पर पौष्टिक आहार तथा व्यायाम द्वारा उसकी शारीरिक क्षमता में वृद्धि लायी जाए। उसे शारीरिक श्रम के लिए भी प्रेरित किया जाए।

(6) उत्साहवर्द्धन- सीखने वाले व्यक्ति के उत्साह में कमी आने पर विभिन्न उपायों एवं विधियों से उसका उत्साह बढ़ाया जाए।

निष्कर्षतः सीखने के पठारों को वक्र रेखा में से हटाने या दूर करने के लिए पठार के उ कारणों का विश्लेषण आवश्यक समझा जाता है जिनके कारण से इन पठारों की उत्पत्ति हुई थी। कारण जानने के पश्चात् उसका समुचित निराकरण किया जाना चाहिए।

प्रश्न 10
अधिगम के स्थानान्तरण से आप क्या समझते हैं? अधिगम के स्थानान्तरणमें सहायक कारकों का उल्लेख कीजिए।
या
सीखने के स्थानान्तरण को स्पष्ट कीजिए। (2013)
उत्तर

अधिगम का स्थानान्तरण

अधिगम- स्थानान्तरण या ‘शिक्षण का स्थानान्तरण (Transfer of Learning) अधिगम (सीखने) की प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। अधिगम-स्थानान्तरण के क्षेत्र में अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि एक परिस्थिति से दूसरी परिस्थिति में और एक अंग से दूसरे अंग में ‘अधिगम का स्थानान्तरण हो सकता है। विभिन्न स्तरों पर शैक्षिक पाठ्यक्रम निर्मित करते समय स्थानान्तरण के नियम एवं सिद्धान्त उपयोगी सिद्ध होते हैं; अतः शिक्षा के क्षेत्र में अधिगम-स्थानान्तरण का विशेष महत्त्व तथा योगदान है।

अधिगम-स्थानान्तरण का अर्थ एवं परिभाषा

अर्थ- अधिगम की प्रक्रिया में जब किसी पाठ्य-सामग्री को सीखा जाता है तो उस पर उससे पहले सीखी गयी सामग्री या पाठ का प्रभाव पड़ता है। हो सकता है कि पहले सीखा गया पाठ, तत्काल सीखे जा रहे पाठ में सहायता करे और यह भी सम्भव है कि वह इसमें कठिनाई पैदा करे। इस भाँति, वर्तमान में सीखने पर पहले सीखी गयी सामग्री के प्रभाव को अधिगम-स्थानान्तरण या शिक्षण-अन्तरण का नाम दिया जाता है।

मनोवैज्ञानिकों ने अधिगम- स्थानान्तरण से सम्बन्धित अध्ययनों के दौरान अनुभव किया कि एक कार्य का प्रभाव दूसरे कार्य पर अवश्य पड़ता है और अधिगम की प्रक्रिया में पूर्व ज्ञान (Previous Knowledge), वर्तमान समय में ग्रहण किये जा रहे ज्ञान को प्रभावित करता है। यदि किसी व्यक्ति को सीखने के लिए कुछ स्मरण करता है। उदाहरण के लिए-यदि दो व्यक्तियों जिनमें से पहले व्यक्ति को कई भाषाओं का ज्ञान है और दूसरे व्यक्ति को केवल एक ही भाषा का ज्ञान है, को कोई नयी भाषा सीखने के लिए दी जाए तो अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि पहला व्यक्ति नयी भाषा को दूसरे व्यक्ति से जल्दी सीख जाता है।

कई भाषाओं का ज्ञान रखने वाले व्यक्ति को एक भाषा के ज्ञाता की अपेक्षा नयी भाषा के अधिगम में कम कठिनाई अनुभव होती है। वस्तुत: पहले से सीखा गया ज्ञान, वर्तमान की अधिगम प्रक्रिया में सहायता करता है। दूसरे शब्दों में, अधिगम एक परिस्थिति से दूसरी परिस्थिति में स्थानान्तरित हो गया। यही अधिगम का स्थानान्तरण है।

परिभाषा- अधिगम-स्थानान्तरण को विभिन्न विद्वानों द्वारा निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है|

  1. हिलगार्ड एवं एटकिन्सन के मतानुसार, “अधिगम-स्थानान्तरण में एक क्रिया का प्रभाव दूसरी क्रिया पर पड़ता है।
  2. अण्डरवुड के अनुसार, “अधिगम-स्थानान्तरण का अर्थ वर्तमान क्रिया पर पूर्व-अनुभवों का प्रभाव होता है।
  3. कैण्डलैण्ड की राय में, “स्थानान्तरण का अर्थ वर्तमान में सीखे गये व्यवहार पर पूर्व में सीखे गये व्यवहार के प्रभाव से है।”
  4. क्रो तथा क्रो के अनुसार, “जब शिक्षण के एक क्षेत्र में प्राप्त विचार, अनुभव या कार्य की आदत, ज्ञान या निपुणता की दूसरी परिस्थिति में प्रयोग किया जाता है तो वह शिक्षण का स्थानान्तरण कहलाता है।”

उपर्युक्त विवरण द्वारा अधिगम के स्थानान्तरण की अवधारणा स्पष्ट हो जाती है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि किसी व्यक्ति द्वारा किसी एक परिस्थिति में सीखे गये कार्य को किसी अन्य परिस्थिति में उपयोग में लाना ही अधिगम का स्थानान्तरण है। उदाहरण के लिए-गणित का ज्ञान अर्जित करने | के उपरान्त जब कोई बालक बाजार में सामान खरीदकर रुपये-पैसे का लेन-देन सफलतापूर्वक कर लेता है तो यह अधिगम का स्थानान्तरण ही होता है।

अधिगम के स्थानान्तरण में सहायक कारक

अधिगम का स्थानान्तरण व्यक्ति के जीवन का एक स्वाभाविक पक्ष है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में अधिगम का स्थानान्तरण कम या अधिक मात्रा में अवश्य होता है। यह सत्य है कि अधिगम का स्थानान्तरण जितना अधिक तथा प्रबल होगा, व्यक्ति को उतना ही अधिक लाभ होगा। वास्तव में, कुछ कारक ऐसे भी हैं जो अधिगम के स्थानान्तरण को प्रबल बनाते हैं। इन कारकों को अधिगम के स्थानान्तरण में सहायक कारक माना जाता है। अधिगम के स्थानान्तरण में सहायक कारकों का सामान्य परिचय निम्नलिखित है

(1) सीखने के लिए अपनायी गयी उत्तम विधि- यदि कोई व्यक्ति किसी कार्य को सीखने के लिए किसी उत्तम विधि को अपनाता है तो उस स्थिति में व्यक्ति के मस्तिष्क में सम्बन्धित कार्य को स्पष्ट एवं स्थायी संस्कार अंकित हो जाते हैं। इस प्रकार के स्पष्ट एवं स्थायी संस्कार बन जाने के उपरान्त अन्य सम्बन्धित कार्य को सरलता से सीखा जा सकता है अर्थात् अधिगम का स्थानान्तरण सुगम हो जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सीखने की उत्तम विधि अधिगम के स्थानान्तरण में एक सहायक कारक है।

(2) पहले सीखे गये विषय की शिक्षण-मात्रा- यह एक सत्यापित तथ्य है कि यदि किसी विषय को पर्याप्त मात्रा में तथा भली-भाँति सीख लिया जाता है तो उस विषय के स्पष्ट एवं गहरे संस्कार व्यक्ति के मस्तिष्क पर अंकित हो जाते हैं। इस दशा में अधिगम का स्थानान्तरण सुगम भी होता है तथा प्रबलं भी।

(3) सम्बन्धित विषय के प्रति अनुकूल मनोवृत्ति- यदि कोई व्यक्ति किसी विषय को सीखने के लिए पूरी तरह से तत्पर हो तो उस स्थिति में उसके गत अनुभव भी सहायक कारक के रूप में कार्य करते हैं अर्थात् व्यक्ति की मनोवृत्ति का भी अधिगम के स्थानान्तरण पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सीखे जाने वाले कार्य या विषय के प्रति व्यक्ति की अनुकूल मनोवृत्ति भी अधिगम के स्थानान्तरण में एक सहायक कारक है।

(4) सामान्यीकरण की क्रिया- अधिगम के स्थानान्तरण में सहायक एक अन्य कारक है-‘सामान्यीकरण की क्रिया’। सामान्यीकरण की क्रिया से आशय है-अधिगम की प्रक्रिया के आधार पर क्रिया सम्बन्धी कुछ सामान्य सिद्धान्तों को निगमित कर लेना। यदि व्यक्ति द्वारा किसी कार्य या विषय के अधिगम के समय सामान्यीकरण कर लिया जाए तो सम्बन्धित विषय या कार्य का अधिगम-स्थानान्तरण उत्तम एवं प्रबल होता है।

(5) व्यक्ति की अन्तर्दृष्टि एवं समझ- अधिगम के स्थानान्तरण में सहायक कारकों में व्यक्ति की कुछ अपनी विशेषताएँ एवं क्षमताएँ भी सहायक सिद्ध होती हैं। यदि किसी व्यक्ति की अन्तर्दृष्टि एवं समझे पर्याप्त विकसित हो तो वह व्यक्ति अधिगम के स्थानान्तरण में अधिक सफल होता है। गहन अन्तर्दृष्टि वाला व्यक्ति अपने गत अनुभवों को नये विषयों को सीखने में सरलता से उपयोग में ला सकता है।

(6) अधिगम के स्थानान्तरण के लिए किये जाने वाले प्रयास- यदि कोई व्यक्ति किसी कार्य को सीखने के उपरान्त अर्जित ज्ञान को अन्य परिस्थितियों में उपयोग में लाने का भरपूर प्रयास करता है। तो निश्चित रूप से अधिगम का स्थानान्तरण सुगम एवं प्रबल होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि व्यक्ति के अभीष्ट प्रयास भी अधिगम के स्थानान्तरण में सहायक कारक होते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
‘सीखने’ या ‘अधिगम की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
सीखने या अधिगम की विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं

  1. किसी भी नवीन परिस्थिति के उत्पन्न होने पर आवश्यकता पूर्ति के लिए क्रियाशील होना अधिगम की एक अनिवार्य विशेषता है।
  2. यह एक समायोजन करने की प्रक्रिया है। अधिगम के अन्तर्गत किसी भी परिस्थिति में मायोजन किया जाता है।
  3. समायोजन की प्रक्रिया में पुराने अनुभव एवं क्रिया असफल हो जाते हैं।
  4. अधिगम में समायोजन के लिए नये मार्ग को खोजा जाता है।
  5. सफल खोज के फलस्वरूप समायोजन होता है।
  6. समायोजन से पूर्व व्यवहार में परिवर्तन होता है।
  7. सफल अनुभव को समान परिस्थिति में दोहराया जाता है।
  8. सफल अनुभव के परिणामस्वरूप नवीन व्यवहार में स्थायित्व आना ही सीखना है।
    उपर्युक्त विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि अधिगम एक विशिष्ट मानसिक प्रक्रिया । निससे व्यक्ति के स्वाभाविक व्यवहार में उन्नतिशील परिवर्तन अथवा परिमार्जन होता है।

प्रश्न 2
परिपक्वता से क्या आशय है?
उत्तर
सीख़ने की प्रक्रिया के सन्दर्भ में परिपक्वता (Maturation) का उल्लेख करना अनिवार्य है। परिपक्वता सीखने की प्रक्रिया का एक अनिवार्य कारक है।

परिपक्वतो, से अभिप्राय है ‘समुचित शारीरिक विकास’, जिसके कारण मानव-शरीर के अंग-प्रत्यंग का समानुपातिक विकास होता है तथा उसकी देहदृष्टि सुसंगठित होकर बढ़ती है। एक नवजात शिशु शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था को पार कर युवावस्था में कदम रखता है। विकास को यह प्रक्रिया व्यक्ति के शरीरांगों को पुष्ट तथा सबल बनाती है और उसकी कार्यक्षमता में

अभिवृद्धि होती है। मनुष्य के शरीरांगों के आधार पर उसकी शारीरिक क्रियाएँ तथा मस्तिष्क के आधार र मानसिक क्रियाएँ संचालित होती हैं। इस प्रकार परिपक्वता व्यक्ति की स्वाभाविक अभिवृद्धि है जो बिना किन्हीं विशिष्ट परिस्थितियों; जैसे–शिक्षा एवं अभ्यास आदि के अनवरत रूप से चलती रहती है। उदाहरण के लिए सभी बच्चे अपनी एक निश्चित अवस्था में बैठना, पैरों पर खड़े होना, चलना, बोलना तथा अनेकानेक दूसरे कार्य करना सीखते हैं। एक नन्हें से बच्चे को चाहे कितनी ही शिक्षा या अभ्यास क्यों न प्रदान किया जाए’ वह कम्प्यूटर चलाना नहीं सीख सकता। एक निश्चित उम्र पर पहुंचकर वह इसके लिए परिपक्व हो जाता है तथा इसे सुगमता से सीख लेता है। बोरिंग ने परिपक्वता को इस प्रकार परिभाषित किया है, “हम परिपक्वता शब्द का प्रयोग उस बुद्धि और विकास के लिए करेंगे जो किसी बिना सीखे हुए व्यवहार से या किसी विशिष्ट व्यवहार के सोखने से पहले आवश्यक होता है।”

प्रश्न 3
परिपक्वता तथा सीखने में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर
हमें ज्ञात है कि सीखना, व्यवहार परिवर्तन या व्यवहार अर्जन की एक प्रक्रिया है। किसी व्यक्ति का व्यवहार परिवर्तन या तो परिपक्वता के कारण होता है या किसी नयी बात को ग्रहण करने के कारण। परिवर्तन की प्रक्रिया में नयी-नयी क्रियाएँ और व्यवहार प्रदर्शित तथा विकसित होते रहते हैं। परिपक्वता शारीरिक विकास की प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत बढ़ती हुई आयु के साथ, शरीर व स्नायुमण्डल का विकास सीखने की सामर्थ्य को जन्म देता है। स्पष्टतः सीखने के परिणामस्वरूप व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन आता है। परिपक्वता की प्रक्रिया सीखने से पूर्व की स्थिति है तथा यह सीखने का आधार है। परिपक्वता के अभाव में किसी क्रिया का सीखना न केवल दुष्कर पेतु असम्भव है। वस्तुत: परिपक्वता किसी व्यवहार को अर्जित करने (सीखने) की एक पूर्व आवश्यकता है। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से ज्ञात होता है कि मानव के विकास की प्रक्रिया में परिपक्वता और सीखना दोनों की सशक्त भूमिका है। यदि परिपक्वता के अभाव में सीखना सम्भव नहीं है तो सीखने के अभाव में व्यक्ति की परिपक्वता भी निरर्थक है। समुचित परिपक्वता ग्रहण कर यदि कोई मनुष्य व्यक्तिगत या सामाजिक जीवन के लिए उपयोगी व्यवहार या क्रियाएँ सीखता है तो इसे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समझा जाएगा। इस भाँति परिपक्वता और सीखने में गहरी सम्बन्ध है।

प्रश्न 4
परिपक्वता तथा सीखने में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2017)
उत्तर
परिपक्वता और सीखने में निम्नलिखित अन्तर हैं
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 3 Learning 7

प्रश्न 5
टिप्पणी लिखिए–“अर्जित निस्सहायता” या “अधिगमित विवशता’। (2017)
उतर
अधिगम की प्रक्रिया के अध्ययन के सन्दर्भ में अर्जित निस्सहायता का भी अध्ययन किया जाता है। इसे ‘अधिगमित विवशता’ भी कहा जाता है। इस विषय में सर्वप्रथम सन् 1967 ई० में सैलिगमैन एवं मायर ने व्यवस्थित अध्ययन किया। इस अध्ययन के निष्कर्ष में स्पष्ट किया गया कि जब कोई प्राणी अनियन्त्रित विकर्णात्मक घटनाओं का सामना करता है तो उसमें प्रारम्भिक अनुभव अनेक बार यह भावना उत्पन्न कर देते हैं कि उसके कार्यों या व्यवहार का सम्बन्धित परिस्थितियों या वातावरण पर किसी प्रकार का नियन्त्रण नहीं है।

इस स्थिति में प्राणी या व्यक्ति में एक प्रकार की विवशता या बेबसी की भावना विकसित हो जाती है। इस स्थिति को ही मनोवैज्ञानिक भाषा में ‘अर्जित निस्सहायता’ या अधिगमित विवशता कहा जाता है। जिन परिस्थितियों या वातावरण के कारण प्राणी में इस प्रकार की विवशता की भावना विकसित होती है तथा सम्बन्धित परिस्थितियों में प्राणी को यदि कोई विषय सिखाया जाता है तो प्रायः व्यक्ति के अधिगम पर ऋणात्मक प्रभाव ही पड़ता है। सामान्य रूप से

अर्जित निस्सहायता के शिकार प्राणी या व्यक्तियों में समुचित प्रेरणा का अभाव होता है। यह भी पाया गया कि अधिगमित विवशता के लिए संवेगात्मक कारक जिम्मेदार होते हैं। वास्तव में, अधिगमित विवशता की स्थिति कुछ हद तक अवसाद की स्थिति के समान होती है। अधिगमित विवशता की निम्नलिखित तीन मुख्य विशेषताओं का उल्लेख किया जा सकता है

  1. अर्जित निस्सहायता या अधिगमित विवशता की भावना सम्बन्धित परिस्थिति के प्रति विशिष्ट होती है।
  2. अनेक बार व्यक्ति अपनी अधिगमित विवशता को स्थायी समझ लेता है।
  3. प्रायः व्यक्ति अपनी अर्जित निस्सहायता के सम्बन्ध को आन्तरिक तथा कुछ बाहरी कारकों से जोड़ लेता है।

प्रश्न 6
सीखने की अविराम तथा विराम विधि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
अविराम तथा विराम विधि में निम्नलिखित अन्तर हैं
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 3 Learning 8

प्रश्न 7
सीखने की अविराम तथा विराम विधि में कौन-सी श्रेष्ठ है?
उत्तर
कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर सीखने की विराम विधि, अविराम विधि से अच्छी होती है। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर श्रेष्ठता के मानदण्ड निम्न प्रकार बताये जा सकते हैं

  1. जब कार्य कठिन हो, उसमें सूझ-बूझे व बुद्धिमत्ता की आवश्यकता हो और साथ ही वह लम्बा भी हो तो ऐसी परिस्थिति में विराम विधि, अविराम विधि से उत्तम है।
  2. जब कार्य सामान्य, छोटा एवं यान्त्रिक प्रकार का हो और उसे रटकर सीखा जा सके तो अविराम विधि, विराम विधि से अच्छी है।
  3. विराम विधि में विश्राम का मूल उद्देश्य किसी कार्य को सीखने से उत्पन्न थकान को दूर करना है; अतः विश्राम के लिए इतना समय अवश्य दिया जाना चाहिए कि इससे व्यक्ति में उत्पन्न थकान दूर हो जाए। विश्राम की अवधि अलग-अलग व्यक्तियों तथा अलग-अलग तरह के कार्यों के लिए अलग-अलग हो सकती है; जैसे–भारी पेशीय कार्य करने में सामान्यतः विश्राम की अवधि लम्बी होनी चाहिए।
  4. कार्य के दौरान, दूसरी कितनी बार अभ्यास के उपरान्त विश्राम देना चाहिए अर्थात् कितने प्रयासों के उपरान्त विश्राम उपयुक्त है, इसके विषय में विद्वानों का मत है कि जब सीखने के वक्र में  गिरने की प्रवृत्ति दृष्टिगोचर हो तो वहाँ अास को रोक देना चाहिए और व्यक्ति को विश्राम देना चाहिए। सीखने की प्रक्रिया में कमी आना या वक्र में गिरने की प्रवृत्ति कार्य की प्रकृति तथा सीखने वाले व्यक्ति की अभिरुचि व अभिप्रेरणा पर निर्भर होती है।
  5. हिलगार्ड नामक विद्वान् ने बताया है कि विराम विधि का एक खास दोष यह है कि अधिक विश्राम की स्थिति में व्यक्ति के मन में अनेक पुरानी बातें या घटनाएँ स्वयं ताजा हो जाती हैं। यक्ति उनमें खो जाता है जिससे पुनः कार्य शुरू करने या पाठ सीखने में बाधा उत्पन्न होती है। उपर्युक्त विवरण द्वारा यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सीखने की विराम विधि सर्वश्रेष्ठ है तथा अविराम विधि व्यर्थ। वास्तविकता यह है कि जब कोई कार्य या पाठ छोटा, सामान्य, रटने लायक होता है। जिसमें समझ की अधिक आवश्यकता नहीं होती तो अविराम विधि विराम विधि से अच्छी होती है, किन्तु जब कार्य या पाठ कठिन व लम्बा हो और उसमें समझदारी की आवश्यकता हो तो ऐसी दशा में विराम विधि की सहायता लेनी चाहिए।

प्रश्न 8
अधिगम की पूर्ण तथा अंश विधि में से कौन-सी विधि अधिक उपयोगी है?
उत्तर
पूर्ण तथा अंश विधि की उपयोगिता के सम्बन्ध में अनेक मनोवैज्ञानिकों ने प्रयोग किये तथा तुलनात्मक अध्ययन के बाद निष्कर्ष निकाला कि दोनों ही विधियाँ स्वयं में गुणकारी व लाभदायक हैं, किन्तु कुछ विशेष परिस्थितियों में कोई एक विधि अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती है। होवलैण्ड नामक विद्वान् ने पूर्ण तथा अंश विधि की उपयोगिता के मूल्यांकन हेतु कुछ कारक बताये, जो निम्नलिखित हैं-

(1) कार्य की प्रकृति- यदि कार्य का स्वरूप ऐसा है कि कार्य सरल है, उसमें तार्किक क्रम है। और वह ज्यादा लम्बा नहीं है तो पूर्ण विधि बेहतर सिद्ध होती है, किन्तु यदि कार्य अधिक जटिल व लम्बा है तथा उसमें तार्किक क्रम बना रहना जरूरी नहीं है तो ऐसी दशा में अंश विधि द्वारा अधिक अच्छे ढंग से सीखा जा सकता है।

(2) आयु- अधिक आयु के व्यक्ति पूर्ण विधि से तथा कम-से-कम आयु के व्यक्ति अंश विधि से अच्छा सीख सकते हैं। अध्ययनों के आधार पर निष्कर्ष निकलता है कि वयस्क व्यक्ति पूर्ण विधि से तथा कम आयु के व्यक्ति अंश विधि से ज्यादा सीख पाते हैं।

(3) बुद्धि- जिन व्यक्तियों की बुद्धि-लब्धि अधिक होती है वे पूर्ण विधि से सीखते हैं, जबकि सामान्य या कम बुद्धि-लब्धि के व्यक्ति अंश विधि से अधिक सीखते हैं।

(4) अधिगम- अवस्था साधारणतयाः सीखने की प्रारम्भिक अवस्था में व्यक्ति अंश विधि से सीखने में सफल रहता है, किन्तु पर्याप्त रूप से सीखने के बाद वह सीखने की अन्तिम अवस्था में होता है तो वैसी परिस्थिति में सीखने की पूर्ण विधि से अधिक सफलता प्राप्त होती है।

(5) अभिप्रेरणा– यदि कार्य को सीखने की प्रेरणा व्यक्ति में अधिक है तो पूर्ण विधि, अंश विधि से अधिक अच्छी समझी जाती है। इस भाँति स्पष्ट है कि पूर्ण विधि तथा अंश विधि अलग-अलग एवं विशिष्ट परिस्थितियों में उपयोगी सिद्ध होती हैं। जब कार्य अधिक लम्बा नहीं है, छोटा है और उसमें तार्किक क्रम आवश्यक है। तो ऐसी परिस्थिति में पूर्ण विधि, अंश विधि से अधिक लाभप्रद है, किन्तु जब कार्य बहुत लम्बा होता है। तथा उसमें कोई तार्किक क्रम भी नहीं होता है तो ऐसी परिस्थिति में अंश विधि, पूर्ण विधि से अधिक गुणकारी सिद्ध होती है।

अंश विधि एक अन्य प्रकार से भी लाभकारी है। अंश विधि द्वारा कार्य सीखने में व्यक्ति में अभिरुचि तथा उत्साह बना रहता है। वस्तुत: एक अंश या एक भाग को सीख लेने पर व्यक्ति को प्रसन्नता का अनुभव होता है और यह अनुभूति व्यक्ति में अगले भाग को सीखने में अभिरुचि तथा उत्साह बनाये रखती है। निष्कर्ष यह निकलता है कि परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए व्यक्ति को पूर्ण विधि तथा अंश विधि दोनों का समुचित उपयोग सीखने के लिए करना चाहिए।

प्रश्न 9
‘प्रयत्न एवं भूल विधि तथा सूझ विधि में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2018)
उत्तर
प्रयत्न एवं भूल विधि’ तथा ‘सूझ विधि’ में अग्रलिखित अन्तर हैं
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 3 Learning 9

प्रश्न 10
अधिगम-स्थानान्तरण के मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
अधिगम-स्थानान्तरण की प्रक्रिया कुछ सिद्धान्तों पर आधारित है। इस विषय में निम्नलिखित दो प्रमुख सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं
(1) औपचारिक अनुशासन का सिद्धान्त (Theory of Formal Discipline)- उन्नीसवीं शताब्दी तक,प्रचलित ‘औपचारिक अनुशासन का सिद्धान्त’, ‘सामान्य अन्तरण का सिद्धान्त या विजय का सिद्धान्त के नाम से भी जाना जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार, कठिन सामग्री के अधिगम से व्यक्ति के मस्तिष्क का उचित प्रशिक्षण होता है और इससे उसे अपने दिन-प्रतिदिन की दूसरी क्रियाओं को सीखने में भी सहायता मिलती है। यह सिद्धान्त स्वीकार करता है कि व्यक्ति की विभिन्न मानसिक शक्तियों; जैसे-तर्क, निर्णय, कल्पना एवं स्मृति को शिक्षण के माध्यम से विकसित तथा शक्तिशाली बनाया जा सकता है। इस भाँति विकसित तथा प्रबल हुई मानसिक शक्तियाँ व्यक्ति के अन्य कार्यों को भी प्रभावित करती हैं। |

(2) प्रविधियों की समानता का सिद्धान्त (Theory of Indentical Techniques)— इसे अंशों का सिद्धान्त या थॉर्नडाइक का सिद्धान्त भी कहते हैं जिसके अनुसार अधिगम-स्थानान्तरण का कारण प्रविधियों की समानता है तथा दोनों परिस्थितियों में उद्दीपन तथा अनुक्रियाएँ भी एक समान होती हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार, एक कार्य का दूसरे कार्य पर स्थानान्तरण कितना होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि दोनों कार्यों में साहचर्यपरक तत्त्वों में कितनी समानता है। कम समानता में कम स्थानान्तरण तथा अधिक समानता में अधिक स्थानान्तरण होगा।

प्रश्न 11
अधिगम-स्थानान्तरण के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए। (2013)
उत्तर
मनोवैज्ञानिकों ने अधिगम-स्थानान्तरण के तीन प्रमुख प्रकार बताये हैं

(1) धनात्मक अधिगम-स्थानान्तरण (Positive Transfer of Learning)- यदि पहले से सीखा हुआ व्यवहार, वर्तमान में सीखे जा रहे व्यवहार में सहायता देता है तो इस तरह का स्थानान्तरण, धनात्मक अधिगम-स्थानान्तरण कहलाता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति कार चलाना जानता है और अब बस चलाना सीख रहा है तो उसे पहले सीखे गये व्यवहार से (अर्थात् कार चलाना से) दूसरी परिस्थिति (अर्थात् बस चलाने) में सहायता मिलती है। इसका अर्थ है कि धनात्मक

अधिगम-स्थानान्तरण में उद्दीपक तो बदल जाते हैं किन्तु अनुक्रिया समान होती है। उद्दीपक कार (N1) से बदलकर बस (N2) हो जाती है, किन्तु अनुक्रिया दोनों ही परिस्थितियों में एक जैसी रहती है। धनात्मक अधिगम-स्थानान्तरण को निम्नलिखित रूप में प्रदर्शित किया जा सकता है–

प्रथम परिस्थिति S1-R1 दूसरी परिस्थिति S2 – R1

धनात्मक अधिगम-स्थानान्तरण का एक प्रकार द्विपाश्विक अधिगम-स्थानान्तरण । (Bi-lateral Transfer of Learning) भी है जिसमें धनात्मक स्थानान्तरण व्यक्ति के शरीर के एक अंग से दूसरे अंग में पाया जाता है। उदाहरण के लिए–कभी-कभी देखने में आता है कि व्यक्ति किसी कार्य को किसी एक हाथ से करना सीखता है और उसके बाद उसी कार्य को दूसरे हाथ से करना सीखता है तो पहली परिस्थिति में अधिगम की वजह से उसे दूसरी परिस्थिति में तीखने में सहायता मिलती है।

(2) ऋणात्मक अधिगम-स्थानान्तरण (Negative Transfer of Learning)– यदि पहले से सीखा हुआ व्यवहार वर्तमान में सीखे जा रहे व्यवहार में बाधा उत्पन्न करता है तो इस प्रकार के स्थानान्तरण को ऋणात्मक अधिगम-स्थानान्तरण कहते हैं। उदाहरण के लिए हमेशा बायें हाथ की। कलाई में घड़ी पहनने वाला व्यक्ति यदि संयोगवश किसी दिन दायें हाथ की कलाई में घड़ी पहन ले तो समय देखने के लिए उसका ध्यान प्रायः बायें हाथ की तरफ हो जाएगा, यद्यपि घड़ी इस समय व्यक्ति । की दायें हाथ की कलाई में बँधी है। स्पष्ट होता है कि इस तरह के अधिगम-स्थानान्तरण में उद्दीपक (S) हो तो दोनों परिस्थितियों में एक जैसा रहता है, किन्तु अनुक्रिया (R) भिन्न हो जाती है। ऋणात्मक अधिगम-स्थानान्तरण के लिए निम्नलिखित सूत्र है

प्रथम परिस्थिति S1-R1 दूसरी परिस्थिति S2 – R1

(3) शून्य अधिगम-स्थानान्तरण (Zero Transfer of Learning)- जिन अधिगम परिस्थितियों में पहले से सीखे हुए व्यवहार का वर्तमान में सीखे जा रहे व्यवहार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, उसे शून्य अधिगम-स्थानान्तरण केहो जाता है। यह स्थानान्तरण तब होता है जब स्थानान्तरण सम्बन्धी परिस्थितियाँ स्थानान्तरण के अनुकूल नहीं होतीं। यह उस समय भी होता है जब धनात्मक व ऋणात्मक दोनों ही प्रकार की परिस्थितियाँ एक ही साथ उपस्थित हो जाएँ। इसका सूत्र निम्नलिखित है।

प्रथम परिस्थिति S1-R1 दूसरी परिस्थिति S2 – R1

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सीखने की सक्रिय तथा निष्क्रिय विधि की तुलना कीजिए।
उत्तर
सीखने के लिए अपनायी जाने वाली दो विधियाँ हैं क्रमशः सीखने की सक्रिय विधि तथा सीखने की निष्क्रिय विधि। इन दोनों विधियों का सापेक्ष महत्त्व है। सक्रिय तथा निष्क्रिय विधि द्वारा सीखने के तुलनात्मक अध्ययन के दौरान गेट्स (Gates) नामक मनोवैज्ञानिक ने निष्कर्ष निकाला कि सक्रिय विधि, निष्क्रिय विधि से तीन बातों में अधिक अच्छी है-

  1. सक्रिय विधि द्वारा सीखने में व्यक्ति की अभिप्रेरणा तथा अभिरुचि अधिक होती है।
  2. व्यक्ति को सीखे गये कार्य के परिणाम का ज्ञान होता रहता है जिससे उसे यह बोध होता है। कि अगले प्रयास में पाठ के किस अंश पर ज्यादा बल दिया जाना चाहिए।
  3. सक्रिय सीखने की शुरुआत कार्य को सीखने के प्रारम्भ से ही होनी चाहिए, क्योंकि इससे अधिगम अधिक प्रबल तथा दक्ष होता है। 

अध्ययन से पता चलता है कि सक्रिय विधि उस समय अधिक उपयोगी है जबकि बाह्य वातावरण में ध्यान को विचलित करने वाले कारक उपस्थित होते हैं। निष्क्रिय विधि तब अधिक उपयोगी है जबकि अधिगम सामग्री कठिन हो और उसके लिए अधिक ध्यान की आवश्यकता हो।

प्रश्न 2
शाब्दिक सीखना का अर्थ स्पष्ट कीजिए। (2018)
उत्तर
सुन कर तथा बोलकर भाषा के माध्यम से सीखने की सम्पन्न होने वाली प्रक्रिया को ‘शाब्दिक सीखना’ कहते हैं। मनुष्यों में अधिकांश सीखना ‘शाब्दिक सीखना ही होता है।

प्रश्न 3
प्राचीन अनुबन्धन के चार अवयवों के नाम लिखिए।
उत्तर
प्राचीन अनुबन्धन के चार अवयव इस प्रकार हैं-

  1. प्रबल ‘प्रेरक का विद्यमान होना
  2. विभिन्न उद्दीपनों में समय का सम्बन्ध
  3. उद्दीपन अनुक्रिया का बार-बार दोहराना तथा
  4. ध्यान बँटाने वाले उद्दीपनों का अभाव।

प्रश्न 4
अनुकरण के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
सीखने की एक मुख्य विधि अनुकरण है। अनुकरण के विभिन्न प्रकार हैं जिनका सामान्य परिचय निम्नलिखित है|
(1) सप्रयास अनुकरण- जब हम किसी व्यक्ति-विशेष के क्रियाकलापों की यत्नपूर्वक तथा जानबूझकर नकल करते हैं तो इसे सप्रयास अनुकरण कहते हैं।

(2) सहज अनुकरण- इस प्रकार के अनुकरण में कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता; बल्कि यह स्वतः ही हो जाता है। विद्वानों का मत है कि अधिक संवेदनशील व्यक्ति ही सहज अनुकरण करने में समर्थ होते हैं। आमतौर पर, हँसी के माहौल में एक व्यक्ति दूसरों के साथ सम्मिलित होकर स्वत: ही हँसने लगता है और शोकाकुल लोगों के मध्य व्यक्ति स्वतः ही शोकमग्न भी हो जाता है।

(3) विचारात्मक अनुकरण- विचारात्मक अनुकरण का सम्बन्ध व्यक्ति-विशेष के विचारों की नकल से है। |

(4) विचाररहित अनुकरण- जिसे अनुकरण की प्रक्रिया में किसी विचार का अनुगमन न किया जाता हो और यह विचारविहीन अवस्था से उत्पन्न होता हो, उसे विचाररहित अनुकरण का नाम दिया जाएगा।

(5) निरर्थक अनुकरण- निरर्थक क्रियाओं, जिनका कुछ भी अभिप्राय न हो, की नकल निरर्थक अनुकरण है। इसे प्रायः बच्चों द्वारा अपनाया जाता है।

प्रश्न 5
अनुकरण के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। उत्तर यद्यपि सीखने की अनेकानेक विधियाँ हैं, किन्तु मनुष्य अपने जीवन में अनुकरण के माध्यम से बहुत अधिक सीखता है। मानव जाति में अनुकरण द्वारा सीखने का महत्त्व बालकों के लिए सर्वाधिक है। बालक खेल-खेल में अनुकरण द्वारा नवीन क्रियाओं को अल्पकाल में ही सीख जाते हैं। उदाहरणार्थ– व्यवहार के तरीके, अच्छी-बुरी आदतें, शब्दों का उच्चारण, वाचन तथा लेखन की कला एवं बहुत-सी सृजनात्मक क्रियाएँ अनुकरण के माध्यम से जल्दी सीखी जाती हैं। बोल्टन नामक मनोवैज्ञानिक का विचार है कि जिस बालक में अनुकरण करने की सर्वाधिक शक्ति होती है, उसमें सीखने की सर्वाधिक शक्ति होती है। बच्चे जाने-अनजाने अपने बुजुर्गों से अनेकानेक बातें सीख लेते हैं। बच्चों को सिखाने की प्रक्रिया में वातावरण की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। अच्छे वातावरण से बच्चों का अच्छा आचरण होता है और वे बुरे वातावरण से भी जल्दी ही प्रभावित हो जाते हैं। वस्तुत: अनुकरण द्वारा सीखने से मनुष्य में चतुराई आती है।

प्रश्न 6
प्रयत्न एवं भूल विधि से सीखने की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
सीखने की ‘प्रयत्न एवं भूल’ विधि की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1.  इस विधि के अन्तर्गत किसी नयी परिस्थिति (समय) का जन्म होता है।
  2. इसे नयी परिस्थिति के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए एक स्वाभाविक प्रक्रिया विकसित होती है।
  3. प्रयासों के परिणामस्वरूप अनायास ही सफलता मिलती है।
  4. शनैः शनैः होने वाली भूलों की संख्या घटती जाती है।
  5. सफल प्रतिक्रिया को बार-बार दोहराने से उसका स्थायीकरण हो जाता है और इस प्रकार प्राणी नये विषय सीखता है।

प्रश्न 7
सीखने की सूझ विधि के महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
विश्व के समस्त उच्च स्तर के बुद्धिप्रधान जीवों में सीखने की क्रिया सूझ या अन्तर्दृष्टि की सहायता से सम्पन्न होती है। व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में नयी-नयी परिस्थितियों तथा बाधाओं को पातां है और उनका अभीष्ट समाधान खोजने में सूझ की सहायता लेता है। शिक्षार्थी भी सूझ की विधि का सहारा लेकर गणित, ज्यामिति, सांख्यिकीय तथा वैज्ञानिक समस्याओं को हल करते हैं। ज्ञान-विज्ञान के लगभग सभी क्षेत्रों में होने वाले आविष्कार एवं खोजों में अन्तर्दृष्टि की प्रमुख भूमिका रही है। घर-परिवार, स्कूल, कार्यालय, कारखाने, व्यापार आदि जीवन के विविध क्षेत्रों से सम्बन्धित समस्याओं का समाधान, सूझ के द्वारा ही सम्भव होता है। निष्कर्षत: मनुष्य के जीवन में सूझ यो अन्तर्दृष्टि का अत्यधिक महत्त्व है।

प्रश्न 8
अधिगम-स्थानान्तरण के मापन की विधि का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
अधिगम-स्थानान्तरण के मापन के लिए दो बातों का ज्ञान आवश्यक है-एक, प्रयोगात्मक समूह की सही अनुक्रियाओं का मध्यमान (E = Experimental Groups Mean) तथा दो, नियन्त्रित समूह की सही अनुक्रियाओं का अध्ययन (C = Control Groups Mean)। प्रयोगात्मक समूह की अनुक्रियाओं के मध्यमान तथा नियन्त्रित समूह की अनुक्रियाओं के मध्यमान के अन्तर को नियन्त्रित समूह की अनुक्रियाओं के मध्यमान से विभाजित कर प्राप्त अंक को 100 से गुणा करने पर स्थानान्तरण प्रतिशत ज्ञात हो जाता है। इसके लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग करते हैं
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 3 Learning 10

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I : निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए

  1. अनुभव एवं प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार में जो परिवर्तन होता है, उसे…………..कहते हैं।
  2. अनुभव और प्रशिक्षण के फलस्वरूप व्यवहार को अपेक्षाकृत स्थायी और प्रगतिपूर्ण परिवर्तन ही……..”है।
  3. वुडवर्थ के अनुसार अपने पूर्व व्यवहार में ……………. करना ही ‘सीखना’ कहलाती है।
  4. अधिगम की प्रक्रिया ………..चलती है।
  5. अधिगम की प्रक्रिया पर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का ………….
  6.  प्रतिकूल वातावरण सीखने की प्रक्रिया में ………….. होता है।
  7. दण्ड एवं निन्दा का सीखने की प्रक्रिया पर ………… प्रभाव पड़ता है।
  8. पुरस्कार और प्रशंसा का सीखने की प्रक्रिया पर………… प्रभाव पड़ता है।
  9. परिपक्वता के लिए …………आवश्यक नहीं है। (2008)
  10. परिपक्वता के अभाव में सीखने की प्रक्रिया…….।
  11. परिपक्वता के अभाव में सीखना सम्भव नहीं तथा सीखने के अभाव में परिपक्वता ….. है।
  12. किसी व्यक्ति की शारीरिक क्रियाओं और शारीरिक व्यवहार को देखकर सीखने की विधि को………..कहते हैं।
  13. अनुकरण विधि द्वारा सीखने में ……….की अधिक आवश्यकता नहीं होती।
  14.  सीखने की प्रयास एवं भूल विधि का सर्वप्रथम प्रतिपादन ने किया था।
  15. प्रयास एवं भूल विधि को सत्यापित करने के लिए थॉर्नडाइक ने अपना प्रयोग …… पर किया था।
  16. मैक्डूगल ने प्रयास एवं भूल विधि को दर्शाने के लिए अपना प्रयोग………पर किया था।
  17. गैस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों के अनुसार सीखने की प्रक्रिया ………. द्वारा सम्पन्न होती है।
  18. कोहलर तथा कोफ्का ………….. मनोवैज्ञानिक थे।
  19. कोहलर ने चिम्पैंजी पर प्रयोग करके सीखने के……….. सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
  20. कोहलर ने ‘अन्तर्दृष्टि द्वारा सीखने’ विषयक प्रयोग………..पर किया था। (2011, 17)
  21. व्यवहारवादियों द्वारा प्रतिपादित सीखने के सिद्धान्त को ………………कहते हैं।
  22. प्राचीन अनुबन्धन के सिद्धान्त का प्रतिपादन……….. ने किया। (2016)
  23. प्राचीन अनुबन्धन पर प्रयोग किया था (2013)
  24. प्राचीन अनुबन्धन के स्थापित होने में ………..तथा  का महत्त्व है। (2013)
  25. पैवलोव ने अपने सीखने के सिद्धान्त को प्रतिपादित करने के लिए…………पर प्रयोग किया था।
  26. किसी उद्दीपक से होने वाली प्राकृतिक या स्वाभाविक अनुक्रिया जब उससे भिन्न किसी अन्य उद्दीपक वस्तु या परिस्थिति से उत्पन्न होने लगे तो उस प्रक्रिया को …………….कहते हैं।(2018)
  27. सीखने के नैमित्तिक अनुबन्धन सिद्धान्त का प्रतिपादन…………… ने किया है।
  28.  सीखने के नियमों के प्रमुख प्रतिपादक………… माने जाते हैं।
  29. थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के प्राथमिक नियमों की संख्या ………….हैं। (2012)
  30. सीखने की प्रक्रिया में वह अवस्था जब सीखने में प्रगति नहीं होती है कहलाती है। (2008)
  31. यदि सीखने के वक्र में सीखने की प्रगति कुछ दूर तक रुकी हुई दिखाई देती है तो इससे ………का पता चलता है(2011)
  32. किसी व्यक्ति द्वारा किसी एक परिस्थिति में सीखे गये कार्य को किसी अन्य परिस्थिति में
    उपयोग में लाना ………… कहलाता है। ।
  33. यदि पूर्व में किया गया अधिगम बाद में किये जा रहे अधिगम अन्तरण में बाधक हो रहा हो, तो इस प्रकार के अधिगम अन्तरण को कहा जाता है।
  34. ……………ऋणात्मक और शून्य स्थानान्तरण अधिगम स्थानान्तरण के प्रकार हैं। (2017)
  35. पशुओं का अधिकांश सीखना…………प्रकार का होता है, जबकि मानव का अधिकांश सीखना वाचिक प्रकार का होता है। (2017)

उत्तर
1. सीखना या अधिगम, 2. अधिगम, 3. परिवर्तन, 4. जीवन-पर्यन्त, 5. प्रभाव पड़ता है, 6. बाधक, 7. प्रतिकूल, 8. अनुकूल, 9. अधिगम, 10. सुचारु रूप से नहीं चल सकती, 11. व्यर्थ, 12. अनुकरण,  13. सूझ-बूझ, 14. थॉर्नडाइक, 15. बिल्ली, 16. चूहों, 17. सूझ या अन्तर्दृष्टि, 18. गैस्टाल्टवादी, 19. सूझ या अन्तर्दृष्टि, 20. चिम्पैंजी, 21. सम्बद्ध प्रत्यावर्तन, 22. पैवलोव, 23. पैवलोव ने, 24. उद्दीपन, अनुक्रिया, 25. कुत्ते, 26. सम्बद्धता, 27. स्किनर, 28. थॉर्नडाइक, 29. तीन, 30. पठार, 31. सीखने के पठार, 32. अधिगम का स्थानान्तरण, 33. ऋणात्मक अधिगम-स्थानान्तरण, 34. धनात्मक, 35. क्रियात्मक।

प्रश्न II. निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए

प्रश्न 1.
वुडवर्थ द्वारा प्रतिपादित सीखने की परिभाषा लिखिए।
उत्तर
वुडवर्थ के अनुसार, “सीखना वह कोई भी क्रिया है जो बाद की क्रिया पर अपेक्षाकृत स्थायी प्रभाव डालती है।”

प्रश्न 2.
व्यवहारवाद के अनुसार सीखना क्या है?
उत्तर
व्यवहारवाद के अनुसार, सीखना मानव-व्यवहार में परिवर्तन की एक प्रक्रिया है।

प्रश्न 3.
प्रयोजनवाद के अनुसार सीखना क्या है?
उत्तर
प्रयोजनवाद के अनुसार, सीखना मानव-जीवन के लक्ष्य अथवा प्रयोजन से। सम्बन्धित है तथा यह लक्ष्योन्मुख उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है।

प्रश्न 4.
परिपक्वता की एक सरल परिभाषा लिखिए।
उत्तर
बोरिंग के अनुसार, हम परिपक्वता शब्द का प्रयोग उस वृद्धि और विकास के लिए करते हैं जो किसी बिना सीखे हुए व्यवहार से या किसी विशिष्ट व्यवहार के सीखने से पहले आवश्यक होता है।”

प्रश्न 5.
परिपक्वता तथा सीखने में क्या सम्बन्ध है? एक वाक्य में लिखिए।
उत्तर
परिपक्वता की प्रक्रिया सीखने से पूर्व की स्थिति है तथा यह सीखने का आधार है, परिपक्वता के अभाव में सम्बन्धित कार्य को सीखना सम्भव नहीं है।

प्रश्न 6.
परिपक्वता तथा सीखने में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर
परिपक्वता एक जन्मजात और स्वाभाविक प्रक्रिया है। यह स्वतः संचालित होती है। इससे भिन्न सीखना एक अर्जित प्रक्रिया है। यह व्यक्ति के अर्जित व्यवहार से सम्बन्ध रखती है।

प्रश्न 7.
अनुकरण की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर
मेक्डूगल के अनुसार, “अनुकरण एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति की शारीरिक क्रियाओं और शारीरिक व्यवहार की नकल करने को कहते हैं।”

प्रश्न 8.
अनुकरण के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर

  1. सप्रयास अनुकरण,
  2. सहज अनुकरण,
  3. विचारात्मक अनुकरण
  4. विचाररहित अनुकरण तथा
  5. निरर्थक अनुकरण।

प्रश्न 9.
कोहलर तथा कोफ्का नामक मनोवैज्ञानिकों ने सीखने के किस सिद्धान्त का प्रतिपादन | किया है?
उत्तर
कोहलर तथा कोफ्को नामक मनोवैज्ञानिकों ने सीखने के सूझ या अन्तर्दृष्टि के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है।

प्रश्न 10.
सीखने के सम्बद्ध प्रत्यावर्तन सिद्धान्त के प्रतिपादक का नाम लिखिए।
उत्तर
पैवलोव (I.P Pavlov)।

प्रश्न 11.
नैमित्तिक अनुबन्धन के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
कोनोस् नामक विद्वान् ने नैमित्तिक अनुबन्धन के चार प्रकारों का उल्लेख किया है–

  1. पुरस्कार नैमित्तिक अनुबन्धन
  2. परिहार नैमित्तिक अनुबन्धन
  3. अकर्म नैमित्तिक अनुबन्धन तथा
  4. दण्ड नैमित्तिक अनुबन्धन।।

प्रश्न 12.
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के मुख्य नियम कौन-कौन से हैं?
उत्तर
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के मुख्य नियम हैं—

  1. तत्परता का नियम
  2. अभ्यास का नियम तथा
  3. प्रभाव का नियम।

प्रश्न 13.
सीखने के पठार से क्या आशय है?
उत्तर
जब व्यक्ति के सीखने की गति की वृद्धि रुक जाती है, तो उस स्थिति को सीखने का पठार कहा जाता है।

प्रश्न 14.
सीखने के पठार को समाप्त करने का एक मुख्य उपाय बताइए।
उत्तर
सीखने के पठार को समाप्त करने का एक मुख्य उपाय है-प्रबल प्रेरक उपलब्ध कराना।।

प्रश्न 15.
अधिगम के स्थानान्तरण की एक सरल परिभाषा लिखिए।
उत्तर
क्रो तथा क्रो के अनुसार, “जब शिक्षण के एक क्षेत्र में प्राप्त विचार, अनुभव या कार्य की आदत, ज्ञान या निपुणता का दूसरी परिस्थिति में प्रयोग किया जाता है तो वह अधिगम का स्थानान्तरण कहलाता है।

प्रश्न 16.
अधिगम के स्थानान्तरण के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर

  1. धनात्मक अधिगम-स्थानान्तरण,
  2. ऋणात्मक, अधिगम-स्थानान्तरण तथा ।
  3. शून्य अधिगम-स्थानान्तरण।।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
अनुभव और प्रशिक्षण द्वारा व्यक्ति के व्यवहार में अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन कहलाता है  (2017)
(क) सीखना
(ख) व्यक्तित्व
(ग) प्रत्यक्षीकरण
(घ) स्मृति
उत्तर
(क) सीखना

प्रश्न 2.
सीखने की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप किसमें परिवर्तन होता है?
(क) व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन में
(ख) व्यक्ति के व्यवहार में
(ग) व्यक्ति के सौन्दर्य एवं हाव-भाव में
(घ) व्यक्ति की मूलप्रवृत्तियों में
उत्तर
(ख) व्यक्ति के व्यवहार में

प्रश्न 3.
सीखने की प्रक्रिया में सहायक कारक है
(क) व्यक्ति का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य
(ख) आयु एवं परिपक्वता
(ग) प्रशंसा एवं पुरस्कार
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 4.
परिपक्वता तथा सीखने में सम्बन्ध है
(क) सीखने के लिए परिपक्वता का कोई महत्त्व नहीं है।
(ख) सीखने के लिए समुचित परिपक्वता अनिवार्य है।
(ग) सीखने से परिपक्वता की जाती है।
(घ) उपर्युक्त सभी कथन असत्य हैं।
उत्तर
(ख) सीखने के लिए समुचित परिपक्वता अनिवार्य है।

प्रश्न 5.
परिपक्वता तथा अधिगम में अन्तर है
(क) परिपक्वता एक जन्मजात प्रक्रिया है जब कि अधिगम एक अर्जित प्रक्रिया
(ख) परिपक्वता पर अभ्यास का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, जबकि अधिगम पर अभ्यास का 
प्रभाव पड़ता है।
(ग) परिपक्वता एक आन्तरिक एवं अचेतन प्रक्रिया है, जबकि अधिगम एक सचेतन प्रक्रिया है, 
जिसे मनुष्य जानबूझकर चलाता है।
(घ) उपर्युक्त सभी अन्तर
उत्तर
(घ) उपर्युक्त सभी अन्तर

प्रश्न 6.
बच्चों द्वारा सीखने के लिए सर्वाधिक किस विधि को अपनाया जाता है?
(क) सूझ अथवा अन्तर्दृष्टि विधि को
(ख) प्रयास एवं भूल विधि को
(ग) अनुकरण विधि को
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) अनुकरण विधि को

प्रश्न 7.
अनुकरण द्वारा सीखने का उदाहरण है
(क) परीक्षा में नकल करना ।
(ख) किसी नेता के चलने व बोलने के ढंग को अपनाना
(ग) भीड़ में जाकर क्रुद्ध होना
(घ) परिवार के सदस्यों को अच्छी-अच्छी बातें सिखाना
उत्तर
(ख) किसी नेता के चलने व बोलने के ढंग को अपनाना

प्रश्न
8.
प्रयास तथा त्रुटि द्वारा अधिगम प्रस्तावित किया (2013, 17)
(क) एबिंगहॉस ने
(ख) थॉर्नडाइक ने
(ग) कोहलर ने
(घ) पैवलोव ने
उत्तर
(ख) थॉर्नडाइक ने

प्रश्न 9.
थॉर्नडाइक के अधिगम सिद्धान्त का नाम नहीं है
(क) नैमित्तिक अनुबंधन सिद्धान्त
(ख) प्रयत्न एवं भूल सिद्धान्त
(ग) उद्दीपक-अनुक्रिया सिद्धान्त |
(घ) उद्दीपक-अनुक्रिया सम्बन्ध सिद्धान्त
उत्तर
(क) नैमित्तिक अनुबंधन सिद्धान्त

प्रश्न 10.
कोहलर तथा कोफ्का के अनुसर अधिगम
(क) प्रयत्न एवं भूल द्वारा होता है।
(ख) सूझ या अन्तर्दृष्टि द्वारा होता है।
(ग) अनुकरण द्वारा होता है।
(घ) अभ्यास द्वारा होता है।
उत्तर
(ख) सूझ या अन्तर्दृष्टि द्वारा होता है।

प्रश्न 11.
सीखने के अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था ।
(क) थॉर्नडाइक ने
(ख) पैवलॉव ने
(ग) कोहलर ने
(घ) स्किनर ने
उत्तर
(ग) कोहलर ने

प्रश्न 12.
अन्तर्दृष्टि द्वारा सीखने के सिद्धान्त से सम्बन्धित प्रयोग किसने किया है? (2010, 12)
(क) गुंग ने
(ख) वुण्ट ने
(ग) कोहलर ने
(घ) वाटसन ने
उत्तर
(ग) कोहलर ने

प्रश्न 13.
प्राचीन अनुबन्धन सिद्धान्त’ से सम्बन्धित है (2008, 12, 15)
(क) स्किनर
(ख) आलपोर्ट
(ग) थॉर्नडाइक
(घ) पैवलोव
उत्तर
(ग) थॉर्नडाइक

प्रश्न 14.
सम्बद्ध प्रत्यावर्तन सिद्धान्त के मुख्य प्रतिपादक हैं
(क) पैवलोव
(ख) कोहलर
(ग) थॉर्नडाइक
(घ) मैक्डूगल
उत्तर
(क) पैवलोव

प्रश्न 15.
नैमित्तिक अनुबन्धन सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं (2009, 16, 18)
(क) बी०एफ०स्किनर
(ख) थॉर्नडाइक
(ग) पैवलोव
(घ) कोहलर
उत्तर
(क) बी०एफ०स्किनर

प्रश्न 16.
सीखने के नियम दिये गये हैं (2015)
(क) थॉर्नडाइक द्वारा
(ख) मैक्डूगल द्वारा
(ग) फ्रॉयड द्वारा
(घ) वुण्ट द्वारा
उत्तर
(क) थॉर्नडाइक द्वारा

प्रश्न 17.
निम्नलिखित में कौन सीखने का प्राथमिक नियम नहीं है?
(क) प्रभाव का नियम
(ख) तत्परता का नियम
(ग) आंशिक क्रिया का नियम
(घ) अभ्यास का नियम
उत्तर
(ग) आंशिक क्रिया का नियम

प्रश्न 18.
थॉर्नडाइक के अनुसार सीखने के लिए आवश्यक नहीं है|
(क) अभ्यास ।
(ख) प्रभाव या परिणाम
(ग) तैयारी ।
(घ) सूझ
उत्तर
(घ) सूझ

प्रश्न 19.
सीखने की गति में होने वाली वृद्धि की दर रुक जाने की स्थिति कहलाती है
(क) सीखने का पठार
(ख) कुशलता की क्षति
(ग) विस्मरण
(घ) अयोग्यता
उत्तर
(क) सीखने का पठार

प्रश्न 20.
सीखने के पठार में सीखने का स्तर (2014)
(क) कुछ कम हो जाता है।
(ख) उसी स्तर पर रुक जाता है।
(ग) लगातार कम होता जाता है।
(घ) तेजी से बढ़ता है।
उत्तर
(ख) उसी स्तर पर रुक जाता है।

प्रश्न 21.
अधिगम के स्थानान्तरण में सहायक कारक है
(क) सीखने के लिए अपनायी गयी उत्तम विधि
(ख) पहले सीखे गये विषय की शिक्षण-मात्री
(ग) अधिगम के स्थानान्तरण के लिए किये जाने वाले प्रयास
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर
(घ) उपर्युक्त सभी

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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 1 Ancient Indian Education

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 1 Ancient Indian Education (प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा) are part of UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 1 Ancient Indian Education (प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 1
Chapter Name Ancient Indian Education (प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा)
Number of Questions Solved 46
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 1 Ancient Indian Education (प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा का सामान्य परिचय दीजिए। इस शिक्षा प्रणाली के
उद्देश्यों तथा आदर्शों का भी उल्लेख कीजिए।
प्राचीन काल में शिक्षा के क्या उद्देश्य थे? वर्तमान में इसकी प्रासंगिकता की समीक्षा कीजिए।
उत्तर
प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा–सामान्य-परिचय

प्राचीन काल में हमारे देश में शिक्षा का सुव्यवस्थित रूप उपलब्ध था। वैदिककाल में भी भारतवासी शिक्षा के महत्त्व से भली-भाँति परिचित थे तथा शिक्षा-प्रणाली का समुचित विकास हो चुका था। उस काल में भी व्यक्ति के सर्वांगीण विकास, समाज की उन्नति एवं प्रगति तथा सभ्यता के बहुपक्षीय विकास के लिए शिक्षा को आवश्यक माना जाता था। शिक्षा के प्रति प्राचीन भारतीय दृष्टिकोण को डॉ० अल्तेकर ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “शिक्षा को प्रकाश और शक्ति का ऐसा स्रोत माना जाता था जो हमारी शारीरिक, मानसिक, भौतिक और आध्यात्मिक शक्तियों तथा क्षमताओं का निरन्तर एवं सामंजस्यपूर्ण विकास करके हमारे स्वभाव को परिवर्तित करता है और उसे उत्कृष्ट बनाता है।

प्राचीनकालीन भारतीय समाज ने अपने मौलिक चिन्तन के आधार पर ही एक उन्नत तथा व्यवस्थित शिक्षा-प्रणाली को जन्म दिया था। इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए एफडब्ल्यू० थॉमस ने लिखा है, “भारत में शिक्षा, विदेशी पौधा नहीं है। संसार का कोई भी ऐसा देश नहीं है जहाँ ज्ञान के प्रति प्रेम का इतने प्राचीन समय में आविर्भाव हुआ हो, या जिसने इतना चिरस्थायी और शक्तिशाली प्रभाव डाला हो।’ प्राचीन भारतीय समाज ने शिक्षा की अवधारणा के प्रति एक मौलिक तथा सन्तुलित दृष्टिकोण विकसित कर लिया था। उस काल में शिक्षा को क्रमशः ‘विद्या’, ‘ज्ञान’, ‘बोध’ तथा ‘विनय’ के रूप में स्वीकार किया गया था। शिक्षा की प्रक्रिया को व्यापक तथा सीमित दोनों ही रूपों में प्रस्तुत किया गया था। इस तथ्य को डॉ० अल्तेकर ने इस शब्दों में प्रस्तुत किया है, “व्यापक अर्थ में शिक्षा का तात्पर्य है-व्यक्ति को सभ्य और उन्नत बनाना।

इस दृष्टि से शिक्षा आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है। सीमित अर्थ में, शिक्षा का अभिप्राय उस औपचारिक शिक्षा से है जो व्यक्ति को गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने से पूर्व छात्र के रूप से प्राप्त होती है। प्राचीन काल में शिक्षा को उत्तम जीवन व्यतीत करने का साधन तथा मोक्ष-प्राप्ति में सहायक माना जाता था। प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा या वैदिक शिक्षा के अर्थ को अल्तेकर ने अपने दृष्टिकोण से इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “वैदिक युग से आज तक शिक्षा के सम्बन्ध में भारतीयों की मुख्य धारणा यह रही है कि शिक्षा प्रकाश का वह स्रोत है जो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हमारा सच्चा पथ-प्रदर्शन करता है।”

प्राचीनकाल में शिक्षा को अन्तर्दृष्टि तथा अन्तर्योति प्रदान करने वाली, ज्ञान-चक्षु तथा तीसरे नेत्र के तुल्य माना जाता था। शिक्षा के महत्त्व को स्पष्ट करने के लिए कहा गया है कि शिक्षा व्यक्ति के लिए बुद्धि, विवेक तथा कुशलता प्राप्त करने का साधन है। इसके माध्यम से व्यक्ति सुख, आनन्द, यश तथा समृद्धि प्राप्त कर सकता है।

प्राचीन भारतीय शिक्षा के उद्देश्य तथा आदर्श

प्राचीनकालीन भारतीय समाज में आध्यात्मिकता पर अधिक बल दिया जाता था। व्यक्ति तथा समा की प्राय: समस्त गतिविधियों का निर्धारण आध्यात्मिकता दृष्टिकोण से ही होता था। प्राचीनकाल में उच्च आदर्शों की प्राप्ति ही शिक्षा का उद्देश्य था। प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा के उद्देश्यों एवं आदर्शों का सामान्य परिचय डॉ० अल्तेकर ने इन शुब्दों में स्पष्ट किया है, “ईश्वर-भक्ति एवं धार्मिकता का समावेश, चरित्र का निर्माण, व्यक्तित्व का विकास, नागरिक एवं सामाजिक कुशलता की उन्नति और राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण एवं प्रसार।” इस कथने को ध्यान में रखते हुए प्राचीन भारतीय शिक्षा के उद्देश्य तथा आदर्शों का सामान्य विवरण निम्नवर्णित है
1. ज्ञान तथा अनुभव अर्जित करना–प्राचीनकालीन भारतीय आदर्शवादी समाज में शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य ज्ञान तथा अनुभव को अर्जित करना था। इस तथ्य को डॉ० मुखर्जी ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “शिक्षा का उद्देश्य पढ़ना नहीं था अपितु ज्ञान और अनुभव को आत्मसात् करना था।” सामान्य रूप से अध्ययन, मनन, स्मरण तथा स्वाध्याय द्वारा ज्ञान अर्जित किया जाता था तथा उसे जीवन में आत्मसात् किया जाता था। छात्रों द्वारा अर्जित किये गये ज्ञान का मूल्यांकन शास्त्रार्थ के माध्यम से किया जाता था।

2. धार्मिक प्रवृत्ति तथा ईश्वरभक्ति विकसित करना–प्राचीन भारतीय समाज धर्मप्रधान समाज था अतः शिक्षा भी धार्मिकता के प्रति उन्मुख थी। शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य छात्रों में धार्मिक प्रवृत्ति तथा ईश्वरभक्ति को विकसित करना भी था। डॉ० अल्तेकर ने स्पष्ट कहा है, “सब प्रकार की शिक्षा का प्रत्यक्ष उद्देश्य-छात्र को समाज को धार्मिक सदस्य बनाना था। छात्रों में धार्मिक प्रवृत्ति तथा ईश्वरभक्ति को विकसित करने के लिए शिक्षा के व्रत, यज्ञ, उपासना तथा धार्मिक गतिविधियों में सम्मिलित होने को आवश्यक माना जाता था।

3. मन की चित्तवृत्तियों का समुचित निरोध–प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए डॉ० मुखर्जी ने लिखा है, “शिक्षा का उद्देश्य-चित्तवृत्ति-निरोध’ अर्थात् मन से उन कार्यों का निषेध था, जिनके कारण वह भौतिक संसार में उलझ जाता है। वास्तव में आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख होने के लिए चित्तवृत्तियों का समुचित निरोध आवश्यक होता है। शिक्षा की प्रक्रिया के अन्तर्गत छात्रों की चित्तवृत्तियों के निरोध के लिए आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाता था।
प्राचीनकालीन शैक्षिक मान्यता के अनुसार, चित्तवृत्तियों का निरोध व्यक्ति के जीवन के परम लक्ष्य अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति में सहायक सिद्ध होता है।

4. चरित्र-निर्माण सम्बन्धी उद्देश्य–प्राचीनकालीन आदर्शवादी भारतीय समाज में शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य छात्रों का चरित्र-निर्माण करना भी था। डॉ० वेदमित्र ने इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए लिखा है, “छात्रों के चरित्र का निर्माण करना, शिक्षा का एक अनिवार्य उद्देश्य माना जाता था। छात्रों के चरित्र-निर्माण सम्बन्धी शिक्षा के उद्देश्य की सुचारु पूर्ति के लिए विभिन्न उपाय किये जाते थे। सामान्य रूप से गुरुकुलों तथा गुरु-आश्रमों का सम्पूर्ण वातावरण उत्तम तथा अनुकरणीय होता था। इसके अतिरिक्त सभी गुरु भी इस दिशा में विभिन्न प्रयास किया करते थे। वे अपने शिष्यों के सदाचरण के लिए आवश्यक शिक्षा देते थे तथा उन्हें व्यावहारिक जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित किया करते थे।

5. व्यक्तित्व के समुचित विकास सम्बन्धी उद्देश्य–प्राचीनकालीन शिक्षा का एक उद्देश्य छात्रों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना भी निर्धारित किया गया था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए गुरुजनों द्वारा विशेष प्रयास किये जाते थे। वे अपने छात्रों को विभिन्न सद्गुणों एवं शिष्टाचार के लिए विशिष्ट शिक्षा देते थे। छात्रों को अपने जीवन में आत्मसंयम, आत्मविश्वास तथा आत्मसम्मान जैसे सद्गुणों को विकसित करने के लिए समुचित उपाय बनाया करते थे तथा साथ ही विवेक, न्याय तथा निष्पक्षता के दृष्टिकोण को विकसित करने के लिए प्रेरित किया जाता था। छात्रों के व्यक्तित्व के समुचित विकास क्रे लिए गुरुकुलों में प्राय: उपयोगी सभाएँ, गोष्ठियाँ तथा वाद-विवाद आदि को आयोजित किया जाता था।

6. छात्रों को सामाजिक एवं नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनाना–प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा का एक उद्देश्य छात्रों को सामाजिक एवं नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनाना भी स्वीकार किया गया था। इसके लिए गुरुजन अपने शिष्यों को उपयोगी उपदेश दिया करते थे। सामान्य रूप से अतिथि-सत्कार, दीन-दु:खियों की सहायता तथा समाज के अन्य व्यक्तियों को सहयोग प्रदान करने का, उपदेश दिया जाता था तथा इन सद्गुणों को जीवन में आत्मसात् करने के लिए प्रेरित किया जाता था। इसके अतिरिक्त घर-परिवार तथा समाज में रहते हुए विभिन्न कर्त्तव्यों के पालन की शिक्षा दी जाती थी। ।

7. सामाजिक कुशलता के विकास सम्बन्धी उद्देश्य–प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा के निर्धारित उद्देश्यों में सामाजिक-कुशलता के विकासको समुचित महत्त्व दिया गया था। शिक्षा को कोरा सैद्धान्तिक नहीं बनाया गया था बल्कि उसे जीविकोपार्जनके साधन के रूप में भी स्वीकार किया गया था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए व्यावसायिक शिक्षा का प्रावधान था। सामान्य रूप से कृषि, वाणिज्य शिक्षा, सैन्य शिक्षा, कला-कौशल की शिक्षा तथा चिकित्सा शास्त्र की शिक्षा की व्यवस्था इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए की गयी थी।

8. भारतीय संस्कृति को संरक्षण एवं प्रसार करना–शिक्षा का घनिष्ठ सम्बन्ध संस्कृति से भी होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य भारतीय संस्कृति का संरक्षण तथा प्रसार करना भी निर्धारित किया गया था। इसके लिए सांस्कृतिक मूल्यों की शिक्षा दी जाती थी तथा उनके प्रति सम्मान को विकसित किया जाता था। इन उपायों द्वारा संस्कृति को निरन्तरता प्रदान की जाती थी।

वर्तमान में शिक्षा की प्रासंगिकता

वर्तमान में प्राचीन काल की शिक्षा व्यवस्था की प्रासंगिकता को निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से समझा जा सकता है

  1. प्राचीन काल की शिक्षा व्यवस्था का एक प्रमुख गुण ‘अनुशासन’ किसी भी काल अथवा युग में प्रासंगिक ही रहेगा। वर्तमान सन्दर्भो में एक अनुशासित विद्यार्थी ही एक श्रेष्ठ नागरिक बनकर देश व समाज की सेवा करने में सक्षम होगा।
  2. प्राचीन काल में शिष्य का अपने गुरुओं के प्रति श्रद्धाभाव व सेवाभाव’ विद्यार्थियों में मानवोचित गुणों का समावेश करता है, जिससे वे समाज के प्रति संवेदनशील बनते हैं और अपने कर्तव्यों को पहचानने में सक्षम बन पाते हैं।
  3. आज के तकनीकी युग में व्यक्ति अधिकाधिक मशीनों पर निर्भर होता जा रहा है, जिससे उनका मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है, ऐसे में प्राचीन काल की शिक्षा व्यवस्था में निहित पद्धतियों; जैसे–स्मरण-शक्ति को बढ़ाने वाली कंठस्थ विधि एवं योग इत्यादि की प्रासंगिकता निश्चित रूप से बढ़ी है।
  4. प्राचीन काल में विद्यार्थी अपने समस्त कार्य स्वयं ही करता था, जिससे उसमें स्वतः ही आत्मनिर्भरता की प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती थी। वर्तमान सन्दर्भो में भी यह प्रासंगिक है।
  5. किसी भी देश व समाज की उन्नति के तत्त्व उसकी सांस्कृतिक विरासत से अनन्य रूप से जुड़े | होते हैं, अतएव उन विशिष्ट मूल्यों की रक्षा हेतु अपनी प्राचीन पद्धतियों के सकारात्मक तत्त्वों को ग्रहण करना सदैव ही प्रासंगिक रहता है।

प्रश्न 2
प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था के विविध स्वरूपों का वर्णन कीजिए। या
प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षण संस्थाओं का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर

प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था

प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था के विविध स्वरूप थे, जिनका विवरण निम्नलिखित है
प्राचीन काल में प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था
प्राचीन काल में भारतीय शिक्षा प्रणाली ब्राह्मणों के अधिकार में थी, परन्तु प्राथमिक शिक्षा इनके आधिपत्य से मुक्त थी। प्राथमिक शिक्षा की अवधि 6 वर्ष की थी तथा 5-11 वर्ष के आयु-वर्ग वाले बालक प्राथमिक स्तर की शिक्षा ग्रहण करते थे। प्राथमिक शिक्षा स्तर पर बालकों को वैदिक मन्त्रोच्चारण सिखाया एवं कंठस्थ कराया जाता था। गुरुकुलों में पढ़ने वाले छात्रों को अन्तेवासी कहा जाता था। गुरु तथा शिष्य के बीच सम्बन्ध मधुर एवं पिता-पुत्र खुल्य थे। प्राथमिक शिक्षा मौखिक ही थी।

प्राचीन काल में उच्च शिक्षा व्यवस्था

प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा को विशिष्ट शिक्षा के रूप में जाना जाता था। उच्च शिक्षा व्यवस्था में वेदों का विस्तृत अध्ययन किया जाता था। पाठ्यक्रम में परा तथा अपरा नामक दो विधाएँ थीं। परा विधा में वेद, वेदांत, पुराण, उपनिषद् तथा आध्यात्म विषयों की शिक्षा दी जाती थी। अपरा विधा में भूगर्भशास्त्र, तर्कशास्त्र, इतिहास एवं भौतिकशास्त्र की शिक्षा दी जाती थी। शिक्षा का प्रमुख केन्द्र तक्षशिला एवं पाटलिपुत्र थे। उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए व्याख्यान, प्रवचन शास्त्रार्थ, प्रश्नोत्तर तथा वाद-विवाद जैसी शिक्षण पद्धति को भी अपनाया जाता है।

प्राचीन काल में स्त्री शिक्षा

वैदिक काल में स्त्री शिक्षा प्रतिबन्धित नहीं थी, परन्तु बालिकाओं के लिए अलग से शिक्षण संस्थान नहीं थे। बालिकाएँ अपने पिता-भाई या कुल पुरोहित से शिक्षा प्राप्त करती थी।
प्राचीन काल में उच्च शिक्षा प्राप्त स्त्रियों को ब्रह्मवादिनी कहा जाता था।
इस काल में गार्गी, शकुन्तला, अनुसूया, अपाला,घोषा, मैत्रेयी आदि भारतीय विदुषी स्त्रियाँ थीं।

प्राचीन काल में व्यावसायिक शिक्षा व्यवस्था

प्राचीन शिक्षा आध्यात्मिक थी, परन्तु इसके साथ ही छात्रों को विशेषकर वैश्य वर्ग के छात्रों को व्यावसायिक शिक्षा प्रदान की जाती रही। व्यावसायिक शिक्षा के अन्तर्गत निम्नलिखित विषयों की शिक्षा दी जाती थी

  1. वाणिज्य शिक्षा वैश्य वर्ण के छात्रों को प्रदान की जाती थी। वाणिज्य शिक्षा में व्यापार, कृषि तथा पशुपालन प्रमुख थे।
  2. सैन्य शिक्षा विशेषकर क्षत्रिय वर्ग के छात्रों को प्रदान की जाती थी। इसमें अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान
    व परिचालन, व्यूह-रचना का प्रयोगात्मक रूप प्रदान किया जाता था।
  3. कला कौशल की शिक्षा के अन्तर्गत संगीत कला, चित्रकला, शिल्पकला आदि की शिक्षा प्रदान
    की जाती थी, परन्तु यह शिक्षा संस्थागत न होकर मार्गदर्शन के रूप में होती थी।
  4. चिकित्साशास्त्र की शिक्षा ऐसे योग्य छात्रों को दी जाती थी, जिनमें सेवाभाव एवं मानवीय गुण थे। इस विषय में रोग-निदान, औषधिशास्त्र तथा शल्य क्रिया की शिक्षा प्रदान की जाती थी।

प्राचीन भारतीय शिक्षा संस्थाएँ।

प्राचीन काल में निम्नलिखित शिक्षण संस्थाएँ थीं- .

  1. टोल–प्राचीन काल में स्थापित, इस तरह की संस्थाओं में केवल एक शिक्षक हुआ करता था। यहाँ मुख्य रूप से संस्कृत विषय पढ़ाया जाता था। |
  2. चारण-वेदों के अनुसार, किसी एक अंग की शिक्षा प्रदान करने वाली संस्था चारण कहलाती थी। |
  3. घटिका-दर्शन तथा धर्म की उच्च शिक्षा प्रदान करने वाली संस्था घटिका कहलाती थी।
  4. परिषद्-इस तरह की संस्था में 10 शिक्षक होते थे, जो विभिन्न विषयों से सम्बन्धित शिक्षा प्रदान करते थे।
  5.  गुरुकुल–गुरुकुलों में वेदों, साहित्यों तथा धर्म की शिक्षा मौखिक रूप से प्रदान की जाती थी। प्राचीन काल में छात्रों को गुरुकुल में मौखिक रूप से शिक्षा दी जाती थी। इस पद्धति में छात्रों को गुरुजन मन्त्र, वेद तथा उनके अर्थों को मौखिक रूप से रटा देते थे और इनके गूढ़ अर्थों के द्वारा ही छात्रों की समस्याओं का हल भी हो जाता था। इसके लिए गुरुकुल में शास्त्रार्थ तथा वाद-विवाद का भी प्रयोग किया जाता थी।
  6. विद्यापीठ-व्याकरण एवं तर्कशास्त्र की व्यवस्थित शिक्षा प्रदान करने वाली शिक्षण संस्था थी।
  7. विशिष्ट विद्यालय-इस तरह की संस्था में भी एक ही विषय की विशिष्ट शिक्षा प्रदान की जाती थी।
  8. मन्दिर महाविद्यालय- प्राचीन काल में कुछ मन्दिर शिक्षण संस्थाओं के रूप में कार्य करते थे, जिनमें धर्म, दर्शन, वेद तथा व्याकरण आदि की शिक्षा दी जाती थी।
  9. ब्राह्मणीय महाविद्यालय-इसे प्रकार की संस्था को चतुष्पथी भी कहा जाता था। इन विद्यालयों में दर्शन, पुराण, कानून, व्याकरण आदि विषयों की शिक्षा दी जाती थी।
  10. विश्वविद्यालय-इस प्रकार की शिक्षण संस्थाएँ, जो विभिन्न विषयों की शिक्षा प्रदान करती हैं। विश्वविद्यालय कहलाती हैं। प्राचीनकाल में शिक्षा प्रक्रिया के विकास के लिए इस प्रकार की संस्था की स्थापना की गई।

प्रश्न 3
वैदिक शिक्षा की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए और हमारे देश की वर्तमान
दशाओं के लिए उनकी उपयोगिता पर समालोचना कीजिए। [2013, 14] वैदिककालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। वर्तमान समय में इन्हें कहाँ तक अपनाया जा सकता है?
उत्तर
प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा से आशय वैदिककालीन शिक्षा से है। इस काल में वैदिक संस्कृति का बोलबाला था तथा जीवन के प्रत्येक पक्ष पर उसका प्रभाव था। प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा भी वेदों से प्रभावित थी।
प्राचीन भारत की शिक्षा की अनेक महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ थीं। इस शिक्षा व्यवस्था ने भारत को ही नहीं वरन् सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित किया। डॉ० ए०एस० अल्तेकर के अनुसार, “उस समय के विश्व में भारत का जो सर्वोच्च स्थान था, उसका कारण शिक्षा प्रणाली की सफलता थी।”

प्राचीन ( वैदिककालीन) भारतीय शिक्षा की विशेषताएँ

प्राचीन भारतीय शिक्षा-प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं।
1. चयनात्मकता–प्राचीन काल की शिक्षा की पहली विशेषता उसकी चयनात्मकता थी। कुछ योग्यताओं और नैतिकताओं के आधार पर ही छात्र गुरु के आश्रम में प्रवेश पा सकते थे। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक व्यक्ति के लिए शिक्षा का द्वार नहीं खुला था। चरित्रहीन और भ्रष्ट बालकों को आश्रम में प्रवेश नहीं दिया जाता था। इस प्रकारे शिक्षा केवल सुयोग्य छात्रों के लिए होती थी।

2. विद्यारम्भ संस्कार-अल्तेकर के अनुसार, “विद्यारम्भ । प्राचीन वैदिककालीन)। संस्कार पाँच वर्ष की आयु में होता था और साधारणतया सब | भारतीय शिक्षा की विशेषताएँ जातियों के बालकों के लिए था।” अधिकांश विद्वानों के अनुसार
। चयनात्मकता यह संस्कार उस समय होता था, जब बालक प्राथमिक शिक्षा
विद्यारम्भ संस्कार आरम्भ करता था। इस संस्कार के समय बालक को अक्षर ज्ञान
उपनयन संस्कार कराया जाता था। |

3. उपनयन संस्कार-उपनयन’ का शाब्दिक अर्थ
गुरुकुल प्रणाली हैपास ले जाना’; दूसरे शब्दों में, ज्ञान-प्राप्ति के लिए छात्र का
नियमित दिनचर्या का सिद्धान्त गुरु के पास पहुँचना। उपनयन के बाद बालक का नवीन जीवन
पाठ्य-विषयों की व्यापकता प्रारम्भ होता था। छात्र गुरु के पास जाकर कहता था-“मैं ज्ञानार्जन दण्ड का सिद्धान्त करने और ब्रह्मचारी जीवन व्यतीत करने के लिए आपके निकट  चरित्र-निर्माण का सिद्धान्त आया हूँ। मुझे ज्ञान प्रदान करें।” गुरु उपनीत बालक से प्रश्न करता * गुरु-शिष्य सम्बन्ध था-“तुम किसके ब्रह्मचारी हो?” बालक उत्तर देता छात्र जीवन सम्बन्धी नियम था—“आपका’, तत्पश्चात् गुरु गायत्री मन्त्र का उपदेश देता था और शिक्षा का प्रारम्भ करता था।
9 धर्म और लौकिकता का समावेश

4. गुरुकुल प्रणाली–प्राचीन भारी शिक्षा प्रणाली की प्रमुख विशेषता गुरुकुल प्रणाली थी। इसलिए प्राचीन भारतीय शिक्षा-प्रणाली का ‘गुरुकुल शिक्षा-प्रणाली’ के नाम से भी जाना जाता है। जब बालक सात या आठ वर्ष का हो जाता था तो वह माता-पिता को छोड़कर गुरु के आश्रम में प्रवेश करता था। गुरु के आश्रम को ही गुरुकुल कहा जाता था। अपने सम्पूर्ण अध्ययन काल तक छात्र को गुरुकुल में रहकरे अध्ययन करना पड़ता था। गुरु छात्रों को न केवल शिक्षा प्रदान करता था; वेरन् संरक्षक के रूप में उनके भरण-पोषण, वेशभूषा आदि की व्यवस्था भी करता था।

5. नियमित दिनचर्या का सिद्धांत-प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा-व्यवस्था के अन्तर्गत प्रत्येक छात्र के लिए आवश्यक था कि वह नियमित दिनचर्या को उचित ढंग से पालन करे। प्रत्येक छात्र के लिए सूर्योदय से पूर्व उठना, स्नान करना, यज्ञ, पूजा, वेद पाठ, भिक्षा माँगना तथा गुरु की सेवा करना दिनचर्या के आवश्यक अंग थे।

6. पाठ्य-विषयों की व्यापकता–वैदिककाल में पाठ्य-विषय सीमित थे, लेकिन ब्राह्मण काल में शिक्षा के पाठ्यक्रम में अनेक विषयों का समावेश किया गया था। चारों वेदों के अतिरिक्त उपनिषद्, इतिहास, पुराण, व्याकरण, विधिशास्त्र, देवशास्त्र, भूत विद्या, एकायन, ब्रह्मविद्या आदि विषयों को अध्ययन किया जाता था।

7. दण्ड का सिद्धान्त-प्राचीन शिक्षा में मनोविज्ञान के सिद्धान्तों के अनुकूल शिक्षा प्रदान करने की प्रवृत्ति मिलती है। छात्र को शारीरिक दण्ड प्रदान करना अनुचित अपराध माना जाता था। याज्ञवल्क्य और मनु साधारण दण्ड के पक्ष में थे, परन्तु गौतम नहीं। आचार्य छात्रों की बौद्धिक क्षमता, रुचि तथा प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर ही शिक्षा प्रदान करते थे।

8. चरित्र-निर्माण का सिद्धान्त-चरित्र-निर्माण के लिए छात्रों के स्वभाव और संस्कारों का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता था। इस सिद्धान्त के प्रतिपादन के लिए छात्रों के उचित पालन-पोषण, शिक्षा व अनुकूलन आदि परिस्थितियों की व्यवस्था की जाती थी।

9. गुरु-शिष्यसम्बन्ध–प्राचीन शिक्षा में गुरु-शिष्य के मध्य प्रत्यक्ष सम्बन्ध रहता था। शिष्य गुरु के सीधे सम्पर्क में देहता था। अतः गुरु शिष्य की शारीरिक और मानसिक शक्तियों का भली प्रकार अध्ययन कर लेता था। गुरु अपने शिष्यों के साथ पुत्रवत् स्नेह करते थे तथा उनके रहन-सहन, भोजन, वस्त्र आदि का उत्तरदायित्व उठाते थे। |

10. छात्र जीवन संम्बन्धी नियम-छात्र नियमित जीवन व्यतीत करने के साथ-साथ खान-पान, वेशभूषा व आचार-व्यवहार के नियमों का पालन भी अनिवार्य रूप से करते थे। |
11. निःशुल्क शिक्षा-प्राचीन काल में शिक्षा नि:शुल्क थी। छात्रों से किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता था। शिक्षा की समाप्ति पर वे स्वेच्छा से अपने गुरु को दक्षिणी प्रदान करते थे।
12. धर्म और लौकिकता का समावेश-प्राचीन काल में शिक्षा धर्मप्रधान थी। छात्र निष्ठा के साथ धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करते थे। धार्मिक शिक्षा के साथ लौकिक शिक्षा की भी व्यवस्था थी। अनेक लौकिक विषयों को भी पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया था। [संकेत-‘प्राचीनकालीन शिक्षा की विशेषताओं का वर्तमान में स्थान हेतु लघु उत्तरीय प्रश्न 5 का उत्तर देखें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा के स्वरूप का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
प्राचीनकाल में शिक्षा का तात्पर्य उस अन्तज्यति एवं शक्ति से लगाया जा जाता था, जिसके द्वारा मानव का शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक विकास हो सके। इस काल में न केवल शिक्षा, ‘अपितु जीवन का प्रत्येक क्षेत्र; जैसे–राजनीतिक, सामाजिक तथा अर्थव्यवस्था आदि धर्म से प्रभावित था, इसलिए प्राचीन भारतीय शिक्षा भी धार्मिक भावना से ओत-प्रोत थी। प्राचीन भारतीय शिक्षा के स्वरूप को स्पष्ट करने वाले मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं

  1. प्राचीन काल में शिक्षा धर्मप्रधान थी, इसलिए शिक्षा प्राप्त करना आवश्यक था।
  2. शिक्षा व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास पर आधारित थी।
  3. शिक्षा की प्राप्ति के लिए इन्द्रियों का संयम करना होता था और ब्रह्मचर्य का पालन भी अनिवार्य
    था।
  4. शिक्षा में मनन और स्मरण की बहुत अधिक महत्त्व था।
  5. प्रत्येक वर्ग और वर्ण के बालकं की विद्या का प्रारम्भ 5 से लेकर 8वर्ष की आयु के बीच में हो जाता
    था।
  6. शिक्षा प्राप्त करने के लिए शिष्य को गुरु के आश्रम में जाना होता था और वहाँ परिवार के सदस्य के रूप में उसे रहना पड़ता था।
  7. विद्याध्ययन करने के लिए गुरुजन अपने आश्रम नगर के कोलाहल से दूर बनाते थे।
  8. शिक्षा की प्राप्ति में दैनिक अभ्यास और दिनचर्या का निर्वाह बहुत महत्त्वपूर्ण समझा जाता था।
  9. विद्यार्थियों में अच्छी आदतों का निर्माण करने के लिए अच्छे वातावरण का निर्माण किया जाता
    था।
  10. शिक्षा में लोकतन्त्रीय आदर्श का पालन करने के लिए छात्रों में भेद-भाव नहीं रखा जाता था। राजा और रंक दोनों के बालक साथ-साथ पढ़ते थे।

प्रश्न 2
प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा के पाठ्यक्रम का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा को दो वर्गों में बाँटा गया था–प्राथमिक शिक्षा तथा उच्च शिक्षा। इन दोनों ही स्तरों की शिक्षा के निर्धारित पाठ्यक्रम का सामान्य विवरण निम्नलिखित है
1. प्राथमिक शिक्षा-आज की प्राथमिक शिक्षा और प्राचीन युग की प्राथमिक शिक्षा में अन्तर था। आज की भाँति उस समय क ख ग अथवा गणित के आरम्भिक सिद्धान्त नहीं पढ़ाए जाते थे। उस समय सर्वप्रथम बालक और बालिकाओं को मूल मन्त्रों का उच्चारण करना सिखाया जाता था। इसके बाद छात्र पढ़ना-लिखना सीखते थे और उसके उपरान्त उन्हें व्याकरण की शिक्षा दी जाती थी। प्राचीनकाल के प्राथमिक शिक्षा के पाठ्क्रम में निम्नलिखित विषय सम्मिलित थे|

  1. सामान्य या प्रारम्भिक भाषा विज्ञान,
  2. प्रारम्भिक व्याकरण,
  3. प्रारम्भिक छन्द शास्त्र तथा
  4. प्रारम्भिक गणित। ।

2. उच्च शिक्षा-प्राचीन काल में आर्य लोग उच्च शिक्षा को बहुत अधिक महत्त्व देते थे। उनका विचार था कि उच्च शिक्षा के अभाव में आत्मोन्नति और आत्मकल्याण सम्भव नहीं है। यह शिक्षा वास्तव में विशेष योग्यता की प्राप्ति के लिए की जाती थी। वैदिक काल में उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में निम्नलिखित विषय सम्मिलित थे– |

  1. चारों वेद-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद।
  2. इतिहास, पुराण, व्याकरण, तर्कशास्त्र, ब्रह्म विद्या, देव विद्या, नीतिशास्त्र, ज्योतिष, शिल्प, संगीत आदि।

प्रश्न 3
प्राचीन भारतीय शिक्षा में व्यावसायिक शिक्षा की क्या व्यवस्था थी ?
उत्तर
भारत में प्राचीनकालीन शिक्षा मुख्य रूप से धर्म प्रधान शिक्षा थी तथा शिक्षण का उद्देश्य मुख्य रूप से व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास ही था परन्तु इस काल में भारत में व्यावसायिक शिक्षा का भी प्रचलन था। प्राचीनकालीन व्यावसायिक शिक्षा का सामान्य विवरण निम्नलिखित है–
1. पुरोहित शिक्षा-प्राचीन काल में केवल ब्राह्मण पुत्रों को ही पुरोहितीय शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार था। उन्हें, यज्ञ, हवन, बलि आदि विभिन्न प्रकार के संस्कार सम्पन्न कराने की शिक्षा दी जाती थी। विभिन्न कार्यों के लिए विभिन्न पुरोहितों की आवश्यकता पड़ती थी। प्रत्येक कार्य की शिक्षा के लिए पृथक् प्रशिक्षण केन्द्र की व्यवस्था होती थी। |
2. सैन्य शिक्षा- क्षत्रियों को सैन्य शिक्षा दी जाती थी। इसके अन्तर्गत अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग, रथों, घोड़ों, हाथियों आदि का प्रयोग करने की शिक्षा सम्मिलित थी। उस समय ऐसी शिक्षा संस्थाओं का अभाव था जो कि पूर्णतया सैन्य शिक्षा बालकों को दें। राज्य सेनाओं से अवकाश प्राप्त सैनिकों द्वारा सैन्य शिक्षा दी जाती थी।
3. कृषि और वाणिज्य की शिक्षा-वैश्यों के लिए कृषि एवं वाणिज्य की शिक्षा की व्यवस्था थी। इसके अन्तर्गत कृषि, वाणिज्य, भूगोल, भाषा, गणित, व्यापार आदिका ज्ञान प्रदान किया जाता था। प्रारम्भ में पिता अपने पुत्रों को इस प्रकार की शिक्षा देते थे, लेकिन धीरे-धीरे यह कार्य शिक्षकों द्वारा किया जाने लगा।
4. चिकित्साशास्त्र की शिक्षा- प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा के अन्तर्गत चिकित्साशास्त्र की शिक्षा की भी समुचित व्यवस्था थी। इस काल में कुछ विशेषज्ञों द्वारा चिकित्साशास्त्र तथा ओषधिशास्त्र का व्यवस्थित ज्ञान इच्छुक छात्रों को दिया जाता था। इस वर्ग की शिक्षा के अन्तर्गत मुख्य रूप से रोग-निदान, ओषधि-निदान, शल्य-क्रिया, सर्प-दंश, अस्थि ज्ञान तथा रक्त-परीक्षण आदि की शिक्षा प्रदान की जाती थी।

प्रश्न 4
वैदिककालीन शिक्षा-व्यवस्था में गुरु-शिष्य के सम्बन्ध पर प्रकाश डालिए। [2014]
उत्तर
वैदिककालीन शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत गुरु-शिष्य सम्बन्ध कर्तव्यपरायणता पर आधारित थे तथा गुरु एवं शिष्य दोनों ही अपने कर्तव्यों के प्रति जगरूक होते थे तथा सदैव अपनी इच्छा से उनका पालन करते थे। गुरु-शिष्य के सम्बन्ध पारस्परिक स्नेह, सम्मान, विश्वास तथा कर्त्तव्य की भावना पर आधारित होते थे। गुरु या शिक्षक अपने शिष्य के प्रति सदैव पुत्रवत् व्यवहार करता था। गुरु अपने शिष्य के प्रति बौद्धिक एवं आध्यात्मिक-पिता की भूमिका निभाता था। वह शिष्य के सर्वांगीण विकास के लिए सभी आवश्यक उपाय करता था। वह शिष्य को ज्ञान प्रदान करने के साथ-ही-साथ उसके चरित्र के विकास में भी भरपूर योगदान देता था। गुरु ही अपने शिष्यों के लिए आहार तथा आवश्यकता पड़ने पर औषधि एवं उपचार की भी व्यवस्था करता था। इस प्रकार निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि घर-परिवार में जो कर्तव्य तथा दायित्स्व पिता द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं, गुरुकुल में वे सभी गुरु या शिक्षक द्वारा पूरे किये जाते थे। इस स्थिति में गुरुकुल के सभी छात्रों के लिए गुरु भी पिता-तुल्य ही होते थे। सभी छात्र बहुत ही सम्मानपूर्वक अपने गुरु के प्रत्येक आदेश का पालन करते थे तथा गुरु की सेवा करते थे। छात्र ही गुरुकुल के समस्त कार्यों में गुरुको सहयोग प्रदान करते थे तथा एक परिवार के सदस्य के रूप में रहते थे।

प्रश्न 5
प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा-प्रणाली का वर्तमान परिस्थितियों में क्या महत्त्व है? या प्राचीन काल की शैक्षिक विशेषताओं को वर्तमान समय में कहाँ तक अपनाया जा सकता है ?
उत्तर
प्राचीन भारतीय शिक्षा की अनेकानेक विशेषताओं का वर्तमान शिक्षा के लिए विशेष महत्त्व है। उस समय की शिक्षा की निम्नांकित बातों को वर्तमान शिक्षा में स्थान देकर अधिक उपयोगी और ज्ञानवर्द्धक बनाया जा सकता है|

  1. आज के भौतिकवादी युग में प्राचीन शिक्षा के धर्म और अध्यात्म के शैक्षिक उद्देश्य को वर्तमान शिक्षा का आवश्यक उद्देश्य बनाना चाहिए।
  2. शिक्षा के माध्यम से पारस्परिक एकता के सिद्धान्त को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  3. जीवन की सम्पूर्णता के लिए शिक्षा को माध्यम बनाया जाना चाहिए, यही प्राचीन शिक्षा का प्रमुख आदर्श था।
  4. प्राचीन भारतीय शिक्षा से प्रेरणा लेकर वर्तमान पाठ्यक्रम को बहुमुखी और व्यापक बनाया जाना चाहिए।
  5. प्रत्येक व्यक्ति अपना शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास करे—प्राचीन शिक्षा का यह आदर्श भी ग्रहणीय है।
  6. प्राचीन काल में मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों व विधियों से स्वतन्त्रता, अभ्यास रुचि एवं योग्यता के अनुकूल प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा मिलती थी, जिसे वर्तमान में भी अपनाया जा सकता है।
  7. शिक्षा व्यवस्था में वैयक्तिक स्वतन्त्रता, गुरु-शिष्य सहयोग, परीक्षा प्रणाली का अभाव आदि कुछ विशिष्ट पहलू हैं,जिनको आधुनिक शिक्षा प्रणाली में प्रयोग किया जा सकता है।’
    निष्कर्षत: प्राचीन शिक्षा-प्रणाली आज भी उपयोगी है। इसका हम परित्याग नहीं कर सकते, केवल समय व परिस्थितियों के अनुकूल इसमें कुछ संशोधन करके इसे स्वीकार करना लाभकारी है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
वैदिककालीन शिक्षा के उद्देश्य बताइए।
या प्राचीन काल में शिक्षा के क्यो उद्देश्य थे ?
उत्तर
प्राचीन भारतीय शिक्षा के उद्देश्यों का वर्णन करते हुए अल्तेकर ने लिखा है, “ईश्वर-भक्ति तथा धार्मिकता की भावना, चरित्र-निर्माण, व्यक्तित्व का विकास, नागरिकता तथा सामाजिक कर्तव्यों का पालन, सामाजिक कुशलता की उन्नति तथा राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण और प्रसार-प्राचीन भारत में शिक्षा के उद्देश्य एवं आदर्श थे।” संक्षेप में प्राचीन भारतीय शिक्षा के उद्देश्य एवं आदर्श निम्नलिखित थे

  1. धार्मिक भावना का विकास।
  2. चरित्र का निर्माण और विकास।
  3. व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास।
  4. नागरिकता एवं सामाजिकता का विकास।
  5. युवकों को जीविकोपार्जन के लिए समर्थ बनाना।
  6. संस्कृति एवं ज्ञान का संरक्षण, प्रसार तथा विकास।।

प्रश्न 2
प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा के संगठन का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
प्राचीन भारत में विद्यार्थी गुरु के आश्रम में जाकर रहता था। शिष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति करना गुरु का कर्तव्य था और ब्रह्मचारीगण समाज के बीच गृहस्थों के द्वार पर जाकर भिक्षाटन करते थे और गृहस्थ जन उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में अपना गौरव समझते थे।

प्रश्न 3
प्राचीनकालीन शिक्षण विधि का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
प्राचीन काल में शिक्षा मुख्यत: मौखिक थी। शब्दों के शुद्ध उच्चारण पर विशेष बल दिया। जाता था। अशुद्ध उच्चारुण अहितकर तथा विनाशकारी समझा जाता था। ज्ञान को कण्ठस्थ करना विद्यार्थी की एक विशेषता थी। गुरुं वेद-मन्त्रों का उच्चारण करते थे और शिष्य उनको सुनकर याद कर लेते थे। सम्भवत: इसीलिए श्रुति और स्मृति के नाम से ज्ञान की शाखाओं को सम्बोधित किया जाता था। मन्त्रों को कण्ठस्थ करना, मनन करना तथा अर्थ समझना ही शिक्षण-प्रणाली थी। शिक्षण कार्य की समाप्ति के बाद छात्र गुरु के चरणों को स्पर्श करके विदा लेते थे।

प्रश्न 4
प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति में परीक्षा-प्रणाली का क्या प्रावधान था ?
उत्तर
प्राचीन काल में आज की भाँति परीक्षा-प्रणाली, उपाधियों और प्रमाण-पत्र व्यवस्था का प्रचलन नहीं था। उस समय प्रश्नोत्तर के माध्यम से जब गुरु को यह विश्वास हो जाता था कि उसके शिष्य ने विद्या में दक्षता प्राप्त कर ली है, तो वह उसे दीक्षा देकर विदा कर देता था। आश्रमों में दीक्षान्त समारोह सम्पन्न होते थे। इन्हें समावर्तन संस्कार भी कहा जाता था। इन समारोहों में विद्वान् लोग विद्यार्थी से प्रश्न पूछते थे और वह उनके सन्तोषजनक उत्तर देने पर उत्तीर्ण घोषित कर दिया जाता था। उच्च शिक्षा एवं वैज्ञानिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद छात्रों को उपाधियाँ दी जाती थीं। प्रश्न

प्रश्न 5
प्राचीन काल में भारत में स्त्री-शिक्षा की क्या स्थिति थी ?
उत्तर
प्राचीन काल में भारत में स्त्री-शिक्षा का प्रचलन था। इसका मुख्य प्रमाण हैप्राचीनकालीन विदुषी स्त्रियाँ; जैसे कि–घोषा, गार्गी, मैत्रेई, अपाला, शकुन्तला, अनुसूइया आदि। वैसे इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि उस काल में स्त्रियों के लिए अलग से शिक्षण-संस्थाएँ थीं। ऐसा माना जाता है कि उस काल में बालिकाएँ घर पर ही रह कर विद्या प्राप्त करती थीं। सामान्य रूप से माता-पिता, भाई अथवा कुल पुरोहित द्वारा बालिकाओं को शिक्षा प्रदान की जाती थी। कुछ सम्पन्न परिवारों में बालिकाओं की शिक्षा के लिए घर पर ही शिक्षक भी नियुक्त किए जाते थे।

प्रश्न 6
प्राचीनकालीन शिक्षा-व्यवस्था में उपनयन संस्कार का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या उपनयन संस्कार से आप कुया समझते हैं?
उत्तर
विचारकों का मत है कि ब्राह्मणों को 5वें वर्ष, क्षत्रिय को छठे वर्ष और वैश्य को 8वें वर्ष में विद्याध्ययन प्रारम्भ कर देना चाहिए। शूद्रों को विद्याध्ययन करने का अधिकार नहीं था। शिक्षा प्रारम्भ करने से पूर्व प्रत्येक बालक का उपनयन संस्कार किया जाता था। प्राचीन काल में बिना उपनयन संस्कार के बालक ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता थे। इसके द्वारा बालक को गुरु मन्त्र का उपदेश दिया जाता था।

प्रश्न 7
प्राचीन भारतीय शिक्षा की दो असफलताओं पर प्रकाश डालिए।
या वैदिककालीन शिक्षा के दो दोषों की विवेचना कीजिए।
उत्तर
प्राचीन भारतीय शिक्षा की दो असफलताएँ (दोष) निम्नलिखित हैं|
1. व्यावसायिक शिक्षा का अभाव-उस काल में विद्यार्थियों को अन्य सभी कर्म सिखाये जाते थे, जो उन्हें अनुशासित, धार्मिक, चरित्रवान व अच्छा नागरिक बनाते थे, किन्तु रोजगारोन्मुखी शिक्षा का अभाव ही था। अत: बहुत कम लोग शिक्षा ग्रहण करने में रुचि लेते थे।
2. धार्मिकता व आध्यात्मिकता का अत्यधिक समावेश—उस काल की पूरी शिक्षा गुरु पर आधारित थी और अधिकांशतः गुरु अपने उपदेशों में धार्मिक एवं आध्यात्मिक बातों का ही समावेश रखते थे। भौतिक जीवन में काम आने वाली बातों पर चर्चा करना निकृष्ट माना जाता था।

प्रश्न 8
समावर्तन संस्कार से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर
गुरुकुल शिक्षा-प्रणाली में शिष्य की सामान्य शिक्षा पूर्ण होने पर सम्पन्न होने वाले संस्कार को समावर्तन संस्कार कहते हैं। इस संस्कार के अवसर पर गुरु द्वारा शिष्य को मधुपर्क दिया जाता था तथा सार्वजनिक रूप से गुरु द्वारा ‘समावर्तन उपदेश दिया जाता था। सामान्य रूप से शिष्य की 25 वर्ष की आयु पर ही समावर्तन संस्कार का आयोजन होता था।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा-प्रणाली किस नाम से विश्वविख्यात है ?
उत्तर
प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा प्रणाली ‘गुरुकुल शिक्षा-प्रणाली’ के नाम से विश्वविख्यात है।

प्रश्न 2
प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा-प्रणाली को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर
प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा-प्रणाली को वैदिक शिक्षा-प्रणाली’ के नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न 3
वैदिक काल में शिक्षा का माध्यम कौन-सी भाषा थी ?
उत्तर
वैदिक काल में शिक्षा का माध्यम संस्कृत भाषा थी।

प्रश्न 4
गुरुकुल शिक्षा-प्रणाली में गुरु-शिष्य के सम्बन्ध किस प्रकार के थे ?
उत्तर.
गुरुकुल शिक्षा प्रणाली में गुरु-शिष्य के आपसी सम्बन्ध बहुत ही मधुर तथा पिता-पुत्र तुल्य होते थे। ।

प्रश्न 5.
वैदिककालीन अथवा प्राचीन भारतीय शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत गुरुकुल में बालक के प्रवेश के समय सम्पन्न होने वाले संस्कार को क्या कहा जाता था ?
उत्तर
उपनयन संस्कार।।

प्रश्न 6
गुरुकुल शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत शिष्य की सामान्य शिक्षा पूर्ण होने पर सम्पन्न होने वाले संस्कार को क्या कहा जाता था ?
उत्तर
समावर्तन संस्कार।

प्रश्न 7
समावर्तन संस्कार के समय होने वाले मुख्य समारोह को क्या कहा जाता था?
उत्तर
समावर्तन संस्कार के समय होने वाले मुख्य समारोह को दीक्षान्त समारोह कहा जाता था।

प्रश्न 8
गुरुकुल के शिक्षा-काल को आश्रम-व्यवस्था के अन्तर्गत कौन-सा आश्रम माना जाता था?
उत्तर
आश्रम-व्यवस्था के अन्तर्गत गुरुकुल के शिक्षा-काल को ब्रह्मचर्य आश्रम माना जाता था।

प्रश्न 9
गुरुकुल की शिक्षा को समाप्त करने के उपरान्त युवक किस आश्रम में प्रवेश करता था?
उत्तर
गुरुकुल की शिक्षा को समाप्त करने के उपरान्त युवक गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था।

प्रश्न 10
प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत समाज के किस वर्ण के बालकों को उपनयन संस्कार का अधिकार प्राप्त नहीं था ?
उत्तर
प्राचीन भारतीय शिक्षा-प्रणालीकै अन्तर्गत शूद्र वर्ण के बालकों को उपनयन संस्कार का अधिकार प्राप्त नहीं था।

प्रश्न 11
वैदिक शिक्षा आधार ग्रन्थों अर्थात् वेदों के नाम लिखिए।
उत्तर
वेद चार हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद।

प्रश्न 12
प्राचीनकालीन शिक्षण-संस्थाओं का सामान्य उल्लेख कीजिए।
उत्तर
प्राचीन काल में मुख्य शिक्षण संस्थाएँ थीं—गुरुकुल, वैदिक विद्यालय, चारण विद्यालय, परिषदें, टोल, घटिकाएँ, मठ, विद्यापीठ, वन विद्यालय, मन्दिर विद्यालय, विश्वविद्यालय।

प्रश्न 13
प्राचीन काल में गुरुकुलों में किस पद्धति से शिक्षा दी जाती थी ?
उत्तर
प्राचीन काल में गुरुकुलों में वैयक्तिक शिक्षण-पद्धति को अपनाया जाता था। गुरुजन मुख्य रूप से प्रवचन तथा व्याख्यान के माध्यम से विषयों के समुचित विकास के लिए प्रयास करते थे।

प्रश्न 14
उपनयन संस्कार का सम्बन्ध है—
(i) बौद्धकाल से,
(ii) वैदिक काल से।
उत्तर
उपनयन संस्कार का सम्बन्ध है
(ii) वैदिक काल से।

प्रश्न 15
प्राचीनकाल में उच्च शिक्षा प्राप्त स्त्रियों को क्या कहते थे?
उत्तर
प्राचीन काल में उच्च शिक्षा प्राप्त स्त्रियों को विदुषी कहते थे।

प्रश्न 16
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा-प्रणाली को ‘वैदिक शिक्षा-प्रणाली तथा ‘गुरुकुल शिक्षा-प्रणाली’ भी कहा जाता है।
  2. प्राचीन काल में भारतीय समाज में स्त्री-शिक्षा पर कठोर प्रतिबन्ध था।
  3. वैदिक काल में गुरुकुलों में कठोर दण्ड-व्यवस्था का प्रावधान था।
  4. वैदिक शिक्षा का एक मुख्य उद्देश्य छात्रों का चरित्र-निर्माण करना था।
  5. वैदिक शिक्षा का आरम्भ नामकरण संस्कार के साथ ही हो जाता था।
  6. वैदिक काल में गुरुकुल शिक्षा नि:शुल्क थी। न्ट

उत्तर

  1. सत्य,
  2. असत्य,
  3. असत्य,
  4. सत्य,
  5. असत्य,
  6. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में सेसही विकल्पका चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
वैदिककालीन शिक्षा का स्वरूप था
(क) व्यावसायिक
(ख) आध्यात्मिक
(ग) नैतिक
(घ) धार्मिक
उत्तर
(ख) आध्यात्मिक

प्रश्न 2
वैदिक काल में शिक्षा का आरम्भ किस संस्कार से होता था ?.
(क) उपनयन
ख) प्रवज्जा ।
(ग) बिसमिल्लाह
(घ) यज्ञोपवीत
उत्तर
(क) उपनयन

प्रश्न 3
‘उपनयन शिक्षा संस्कार किस काल में होता था ?
(क) वैदिक काल
(ख) बौद्ध काल ।
(ग) मुस्लिम काल
उत्तर
(क) वैदिक काल

प्रश्न 4
वैदिककालीन शिक्षा कॉमुख्य उद्देश्य था
(क) जीविकोपार्जन
(ख) ज्ञानार्जन
(ग) शारीरिक विकास।
(घ) नैतिकता एवं चरित्र का विकास
उत्तर
(ख) ज्ञानार्जन

प्रश्न 5
प्राचीन काल में शिक्षा का माध्यम कौन-सी भाषा थी ?
(क) पालि
(ख) मागधी
(ग) प्राकृत
(घ) संस्कृत
उत्तर
(घ) संस्कृत

प्रश्न 6
प्राचीनकाल में गुरुकुल होते थे
(क) गाँवों से दूर
(ख) ग्रामों में
(ग) राजधानी में
(घ) नगरों में
उत्तर
(क) गाँवों से दूर

प्रश्न 7
वैदिक काल में गुरु-शिष्य सम्बन्ध धे-
(क) स्वामी और सेवक के समान
(ख) पिता और पुत्र के समान ।
(ग) अधिकारी और लिपिक के समान
(घ) नेता और अनुयायी के समान
उत्तर
(ख) पिता और पुत्र के समान

प्रश्न 8
वैदिक शिक्षा के प्रमुख आधार थे
(क) वैदे
(ख) उपनिषद्
(ग) पुराण
(घ) स्मृतियाँ
उत्तर
(क) वेद

प्रश्न 9
वैदिक काल में शिक्षालयों को कहा जाता था
(क) विद्यापीठ
(ख) गुरुकुल।
(ग) विद्या मन्दिर
(घ) शिशु मन्दिर
उत्तर
(ख) गुरुकुल

प्रश्न 10
वैदिक काल में शिक्षा का स्वरूप था
(क) लिखित ।
(ख) मौखिक
(ग) क्रियात्मक
(घ) अस्त-व्यस्त
उत्तर
(ख) मौखिक

प्रश्न 11
वैदिक काल में शिक्षा का प्रमुख केन्द्र कौन-सा था?
(क) तक्षशिला
(ख) प्रयाग
(ग) मिथिला
(घ) काशी।
उत्तर
(घ) काशी

प्रश्न 12
वैदिक काल में ‘उपनयन संस्कार कब होता था?
(क) शिक्षा प्रारम्भ के समय
(ख) उच्च शिक्षा में प्रवेश लेते समय
(ग) शिक्षा समाप्त पर।
(घ) कभी नहीं|
उत्तर
(क) शिक्षा प्रारम्भ के समय

प्रश्न 13
वैदिक काल में गुरुकुल में पढ़ने वाले को क्या कहा जाता था?
(क) छात्र
(ख) अन्तेवासी
(ग) भिक्षु
(घ) श्रमण
उत्तर
(ख) अन्तेवासी

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UP Board Solutions for Class 12 English Chapter 1 Use of Verb forms and Articles

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject English Translation
Chapter Name Use of Verb forms and
Articles
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 English Chapter 1 Use of Verb forms and Articles

Exercise 1

  1. Are you busy this time?
  2. This knife became sharp.
  3. Are you a college student ?
  4. This is not my father’s car.
  5. I am grateful to you.
  6. These boys became half mad.
  7. His son became angry with me.
  8. My sister is brave.
  9. Whose pen is yours?
  10. Will you be happy today?
  11. Was she a singer?
  12. I am afraid of that cheater.
  13. It will be a holiday on Sunday.
  14. Water becomes hot on fire.
  15. Man is mortal.

Exercise 2

  1. I have four brothers.
  2. These boys have a dog
  3. I have an elephant also.
  4. In winter, I have a bath daily.
  5. Today, we shall talk to the principal.
  6. Tomorrow I shall have this money.
  7. He has a book in his hand.
  8. I have had food twice.
  9. He had a small house.
  10. A cow has four legs.
  11. He has some problem in his heart.
  12. My city has a zoo.
  13. He had a expensive dog.
  14. His voice is very sweet.
  15. Right now, I am having a bath.

Exercise 3

  1. Will she do something in the evening ?
  2. What do you do with your brother?
  3. I do nothing with my brother.
  4. My brother does some work with father.
  5. What are you doing in your garden ?
  6. Is the gardener also doing something there ?
  7. What did that beggar do on the road ?
  8. My servant is doing some work this time.
  9. Mother is doing nothing in the kitchen.
  10. My sister does all work in the absence of mother.

Exercise 4

  1. It is getting dark now.
  2. It is your duty to show pity on the animals.
  3. It is not easy to please all.
  4. It was raining heavily last evening.
  5. It is dangerous for children to play with crackers.
  6. It is no use worrying.
  7. It is five by my watch.
  8. It will be holiday on Monday.
  9. It is not possible for me to sleep late at night.
  10. To invest money in shares is foolishness.
  11. It is the month of March.
  12. It is the truth that he does not live here.
  13. It is our duty to love the country.
  14. It is easy for a cat to see in the dark.
  15. It is good to complete one’s work in time.

Exercise 5

  1. It took many years for Columbus to discover America.
  2. Father took a long time to understand you.
  3. Did he take a very little time in making up his loss?
  4. You will take more than three hours in solving the full question paper.
  5. Will he take very little time in solving your problem ?
  6. You will take only five minutes in reaching the temple.
  7. It took me two hours in reaching the temple to have a glimpse of the idol.
  8. The teacher took ten minutes in solving this sum.
  9. It took many years in freeing India.
  10. It took him several years in improving his condition.

Exercise 6

  1. There was a red pencil in my pocket.
  2. Today there are few students in my classroom.
  3. There are a great number of audience in the visitor’s gallery.
  4. God is present every where.
  5. There is full moon in the sky on the night of purnima.
  6. There were a number of ripe mangoes in this basket.
  7. There is a lot of air in the ment.
  8. There is no beggar in some countries.
  9. There is pleasant weather in the spring.
  10. Are there countless stars in the sky?
  11. Are there so many rats in your house?
  12. There is no dispute between India and Nepal.
  13. There are your books.
  14. How many clerks are absent from the office today?
  15. Now there is no need of soldiers on the border.

Exercise 7

  1. He is jealous but he should not express it.
  2. It is a pity that you are a bachelor.
  3. These chairs are more comfortable than those chairs.
  4. Is this the book that you wanted ?
  5. It is impossible to reach there in time.
  6. I shall see you tomorrow, if it is convenient.
  7. These days I am very busy in writing.
  8. It is accepted that this friend of his is very rich.
  9. He never met me these days.
  10. Can you bear so much expenditure ?
  11. There is only Mohan who is so wise.
  12. It is no use shouting.
  13. This is the thing that I will say.
  14. Hello, Are you Raymond Brown speaking?

Exercise 8

  1. Please help me.
  2. Please do take a cup of tea with me.
  3. Never chase a dog.
  4. Take a little lukewarm water.
  5. Please read the whole of my letter.
  6. Work hard for your progress.
  7. Take care of the children well.
  8. Leave bed early in morning regularly.
  9. Please lend to me a little money for sometime.
  10. Please do not smoke here.
  11. Never make a fun of the poor.
  12. Switch off all the lights before going to sleep.
  13. Do not go into deep water.
  14. Do not make much use of mobile
  15. Drive the vehicle slowly on a busy road.

Exercise 9

(A)

  1. Let the carpenter make my table.
  2. Let the police arrest the thieves.
  3. Let these girls sing a sweet song.
  4. Do not let the boys copy.
  5. Do not let the little children read novels.
  6. Do not let the boys throw stones at frogs.
  7. Let the servant clean the room.
  8. Do not let the small children play in the sunlight.
  9. Let him read the Ramayana.
  10. Do not let any clerk accept bribe.
  11. Let him finish his work.
  12. Let me worship God for two hours.
  13. Do not let him go to the picnic.
  14. Let this girl sing two songs.
  15. Let them say what they want to say.

(B)

  1. Let us bathe in the Ganga this year.
  2. Let us love all the children.
  3. Let us not kill the birds.
  4. Let us sleep now.
  5. Let us respect our elders.
  6. Let us learn our lesson now.
  7. Let us not abuse anybody.
  8. Let us play cricket match.
  9. Let us get up at 5 a.m. the morning
  10. Let us love small children.
  11. Let us serve our country.
  12. Now let us depart in the night.
  13. Let us take part in essay competition.
  14. Certainly let us see the Taj Mahal.
  15. Let us distribute blankets among the poor people.

(C)

  1. The captain does not let these boys play the match.
  2. His mother did not let him go to the cinema.
  3. Why do you not let me have tea?
  4. Our teacher will not let us laugh.
  5. The inspector has not let any milk vendor sell the adul
  6. My dog does not let any stranger come in the house.
  7. My neighbours will not let me fly the kite.
  8. Our principal does not let any student copy.
  9. The hunter has let all the birds fly.
  10. My mother will not let me have coffee.
  11. The police will not let anybody come in.
  12. The government does not let us hold meeting here.
  13. My friend let me pay the bill.
  14. The gardener did not let them walk on the grass.
  15. Will the forest officers not let them cut the trees ?

Exercise 10

  1. Please open the window a little ?
  2. Will you shift/move a little ?
  3. Would you teach me to speak English ?
  4. Could you look after my dog my in absence ?
  5. Will you give me your brief introduction ?
  6. Could you see me day after tomorrow ?
  7. Will you do a work of mine ?
  8. Will you please tell me your telephone number?
  9. Would you have lunch with me today?
  10. Could you meet me today in the evening ?
  11. May I use your telephone ?
  12. Would you remember me again ?
  13. Would you walk with me in the garden for some time please?
  14. Will you tell me the time ?
  15. Would you wait for me till I return ?

Exercise 11

  1. Do take this medicine regularly.
  2. Do put out the candle.
  3. Put my files on my table only.
  4. Doctor, do treat this patient?
  5. Do send him to me tomorrow.
  6. All the boys come to me ?
  7. Do win the watch.
  8. Raju, do bring a cup of coffee for me.
  9. You are not to smoke from today.
  10. Mohan is to make a firm promise.
  11. Do write to me on alternate days.
  12. You have to reach school daily in time.
  13. O God, help this poor man.
  14. You will depart tomorrow by night train.
  15. He is to distribute all invitation cards today.

Exercise 12

  1. Our team could not win the match.
  2. You cannot talk loudly in the library.
  3. Peace loving people may also become violent.
  4. Could you lend me some money?
  5. You may catch cold by going out in the cold.
  6. May he recover soon!
  7. He could lead in the last round of the game.
  8. He fell down from the roof, his leg could be broken too.
  9. We could get pure ghee at a cheaper rate in olden days.
  10. May I come in ?
  11. You may come in after an hour.
  12. Can you examine all the files today?
  13. Our father could face this situation.
  14. May God prosper you a lot!
  15. Can you help me in solving these sums ?

Exercise 13

  1. He can be great.
  2. He is unable to cross the river
  3. Now he cannot sit for a long time.
  4. Now he is unable to sit for a long period.
  5. I am unable to sleep after midnight.
  6. He cannot be dishonest.
  7. He cannot work hard.
  8. Why are you unable to speak loudly?
  9. He is not able to make a long speech.
  10. He cannot speak before a crowd.
  11. He is not able to face the problems.
  12. He is unable to tell a lie.
  13. He is unable to eat anything.
  14. He cannot give so much contribution.
  15. He is unable to walk even a step.

Exercise 14

  1. The leaders should be honest.
  2. He ought to meet the principal today.
  3. He must work hard.
  4. We should not be miser.
  5. We ought to believe in God.
  6. You must reach school in time.
  7. We should not read cheap novels.
  8. The students must read the newspaper daily.
  9. He must be a member of social society.
  10. You should love the country.
  11. The students ought to respect their teachers.
  12. We should be civilized and polite.
  13. Everybody ought to pity the poor.
  14. You should never tell a lie.
  15. You ought not to make your clothes dirty.

Exercise 15

  1. He may have to come here at once.
  2. The patient may have to stay in the hospital for a few days.
  3. You may have to wait for some more days for a job.
  4. You may have to repent on your doing.
  5. You may have to speak in English on many occasions.
  6. He may have to compromise with his joys.
  7. He may have to look after his old grandfather.
  8. The police may have to fire on the crowd.
  9. You may have to beg.
  10. I may have to go to office on Sunday.

Exercise 16

  1. Would you bring me a chair ?
  2. He would go to meet his friends on Sundays.
  3. He would go to church on every Sunday.
  4. If it rains tomorrow morning, the school would be closed.
  5. How nice it would be if you become a minister ?
  6. I would surely accompany you in the marriage procession of your son.
  7. Would you examine me out of turn ?
  8. He would work hard in his youth.
  9. He would surely accept your invitation.
  10. Would you lend me some money ?

Exercise 17

  1. I have to scold him.
  2. Will you have to deposit income tax ?
  3. You will have to pardon him.
  4. Did you have to wash your clothes on your own ?
  5. When did you have to send him to market ?
  6. The students will have to work hard.
  7. They will have to obey me.
  8. I had to speak in English to my friends.
  9. The teacher did not have to teach us some lessons.
  10. He will have to repair his house.

Exercise 18

1.
(a) Do you mind my playing cards here?
(b) Would you mind if I play cards here?
(c) Do you mind if I play cards here ?

2.
(a) Do you mind my smoking here?
(b) Would you mind if I make here?
(c) Do you mind if I smoke here?

3.
(a) Do you mind my having a cup of tea ?
(b) Would you mind if I have a cup of tea ?
(c) Do you mind if I take a cup of tea?

4.
(a) Do you mind my seeing your mobile ?
(b) Would you” mind if I’see your mobile ?
(c) Do you mind if I see your mobile ?

5.
(a) Do you mind my going out for some time?
(b) Would you mind if I go out for some time ?
(c) Do you mind if I go out for some time?

6.
(a) Do you mind my sitting on this chair?
(b) Would you mind if I sit on this chair ?
(c) Do you mind if I sit on this chair?

7.
(a) Do you mind my switching off the T.V. ?
(b) Would you mind if I switch the T.V. off ?
(C) Do you mind if I switch the T.V. off ?

8.
(a) Do you mind me talking to my friend on the telephone ?
(b) Would you mind if I talk to my friend on the telephone ?
(c) Do you mind if I talk to my friend on the telephone ?

9.
(a) Do you mind my interrupting you in the between ?
(b) Would you mind if I interrupt you in between ?
(c) Do you mind if I interrupt you in between ?

10.
(a) Do you mind my sending your servant to the market?
(b) Would you mind if I send your servant to the market ?
(c) Do you mind if I send your servant to the market ?

Exercise 19

  1. I may be allowed/permitted/given permission one week’s time to submit my reply.
    (allowed, permitted या given permission में से किसी भी एक शब्द का प्रयोग करें, इसी प्रकार इस से आगे के वाक्यों में हमने एक शब्द का प्रयोग किया है। आप इन तीनों में से किसी एक शब्द का प्रयोग कर and I)
  2. I may be allowed to withdraw money from my PF account.
  3. I may be permitted to go home during vacations.
  4. I may be given permission to appeal in the Supreme Court.
  5. He may be allowed to take bank loan for buying a new car.
  6. This man may be given permission to submit bail application.
  7. This prisoner may be given permission to meet his wife.
  8. They may not be given permission to correspond in Hindi.
  9. I may be allowed to travel by air.
  10. He may not be permitted to go to his house in Ghaziabad everyday.

Exercise 20

  1. He may win the match.
  2. He may not even give you the money
  3. He might not become a millionaire.
  4. He may not even become a millionaire.
  5. This patient may die.
  6. The doctor might not save this patient.
  7. She may not be the prime minister of the country.
  8. She may be the prime minister of the country.
  9. She might not be the prime minister of the country.
  10. You might not reach on time.

Exercise 21

  1. It is possible that the train may reach late by an hour.
  2. Probably he will pass the examination in first division.
  3. Perhaps he may lend you some money.
  4. Perhaps there will be a duststorm today in the evening.
  5. It is possible that he will win the election.
  6. Probably the government of Delhi will change this year.
  7. It is possible that this patient will recover.
  8. Possibly the share market will improve now.
  9. Perhaps my friend may reach here by the night train.
  10. Possibly our prime minister will go to America next week.

Exercise 22

  1. He is going to take a position in the cabinet. Or He must take a position in the cabinet.
  2. You must have remembered me.
  3. He must be a minister.
  4. The prices must go higher.
  5. You must be a great man.
  6. He must have committed this mistake.
  7. He is going to learn a foreign language.
  8. He must have learnt foreign language.
  9. You are going to win the case.
  10. You must have spent a lot of money for the case.

Exercise 23

  1. He is the Gama of his city.
  2. The sun rises in the east and sets in the west.
  3. The elephant is the biggest animal.
  4. The Tajmahal was built by Shahjahan.
  5. The cost of rice is twenty rupees a kilo.
  6. There is nothing as precious as gold on the earth. 12
  7. Dogs are faithful.
  8. Pt. Nehru was a honourable man.
  9. The Ramayana of Tulsidas is a famous book.
  10. The moon shines in the night.
  11. Is this teacher an N.C.C officer ?
  12. The poor are unfortunate.
  13. I read the Hindustan Times daily.
  14. He will not stay in an hotel.
  15. I have an interesting book.

Exercise 24

Pandu was an ice-cream vendor. Every day he sat taking his ice bag beside a primary school. By the evening Pandu got sold all of his ice-creams. A girl still come to that school. But she purchased the ice-cream only once in a week. She did not have money enough to eat an ice-crem daily. That girl used to come there daily. She would stand by the side of Pandu for some time daily and then go back. Seeing her Pandu used to grow too dejected.

Strong Verbs (भीतर का Vowel बदलने वाली क्रियाएँ)

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान
Number of Questions 41
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान

संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान

नवीनतम पाठ्यक्रम के अनुसार परीक्षा में रेखांकित शब्दों में लगी विभक्ति अथवा दिये गये शब्दों में प्रयुक्त विभक्ति से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। इसके लिए 2 अंक निर्धारित हैं। ये प्रश्न बहुविकल्पीय भी हो सकते हैं। विभक्ति का निर्देश करते समय छात्र से उससे सम्बन्धित सूत्र का उल्लेख करने की अपेक्षा भी की जाती है।

(1) सूत्र-अभितः परितः समया निकषा हा प्रतियोगेऽपि।
अभितः (चारों ओर या सभी ओर), परितः (सभी ओर), समया (समीप), निकषा (समीप), हा (शोक के लिए प्रयुक्त शब्द), प्रति (ओर, तरफ)–शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति होती है।
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(2) सूत्र-येनाङ्गविकारः
जिस अंग में विकार होने से शरीर विकृत दिखाई दे, उस विकारयुक्त अंग में तृतीया विभक्ति होती है।
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(3) सूत्र-सहयुक्तेऽप्रधाने
साथ अर्थ वाले सह, साकम्, सार्धम्, समम् शब्दों के योग में अप्रधान (जिसके साथ जाने वाला जाये) में तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है।
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(4) सूत्र-साधकतमं करणम्
जिसकी सहायता से कार्य पूर्ण होता है, उसमें तृतीया विभक्ति होती है।
उदाहरण–प्रकृत्या साधु। प्रकृति से साधु।।

(5) सूत्र_नमःस्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषट योगाच्च
नमः (नमस्कार), स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा (आहुति), स्वधा (बलि), अलम् (समर्थ, पर्याप्त), वषट् (आहुति)-इन शब्दों के योग में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।
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(6) सूत्र-ध्रुवमपायेऽपादानम्
स्वयं से अलग करने वाले अर्थात् ध्रुव (मूल) में पंचमी विभक्ति होती है; जैसे-वृक्ष से पत्ते गिरते हैं। इस वाक्य में पत्तों को स्वयं से अलग करने वाला वृक्ष है; अतः वृक्ष में पंचमी विभक्ति होगी।
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(7) सूत्र-आख्यातोपयोगे
नियमपूर्वक विद्या ग्रहण करने में जिससे विद्या ग्रहण की जाती है, उसमें पंचमी विभक्ति होती है।
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(8) सूत्र-भीत्रार्थानां भयहेतुः
‘भय’ तथा ‘रक्षा’ अर्थ वाली धातुओं के योग में जिससे डरा जाता है या रक्षा की जाती है, उसमें पंचमी विभक्ति होती है।
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(9) सूत्र-षष्ठी शेषे
छह कारकों के अतिरिक्त सम्बन्ध अर्थ शेष बचता है। सम्बन्ध अर्थ में षष्ठी विभक्ति होती है।
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(10) सूत्र-यतश्च निर्धारणम्
जहाँ बहुतों में से किसी एक को छाँटा जाये, वहाँ जिसमें से छाँटा जाये, उसमें षष्ठी अथवा सप्तमी विभक्ति होती है।
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विशेष-संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान से सम्बन्धित प्रश्नों के चार सम्भावित प्रारूप हो सकते हैं। विभिन्न परीक्षा प्रश्न-पत्रों में इन चारों प्रारूपों के पूछे गये प्रश्न दिये जा रहे हैं-

प्रश्न (क)
निम्नलिखित शब्दों के शुद्ध विभक्ति रूप की पहचान कीजिए-
या
दिये गये विकल्पों में जो सही विकल्प है, उसे बताइए-
प्रश्न 1.
‘राजन्’ शब्द का चतुर्थी विभक्ति एक वचन का रूप होता है
(क) राजानम्
(ख) राजभिः
(ग) राज्ञे।
(घ) राज्ञः

प्रश्न 2.
‘सरित्’ शब्द का पंचमी विभक्ति द्विवचन का रूप होता है
(क) सरिते
(ख) सरित्सु
(ग) सरिभ्याम्
(घ) सरिति

प्रश्न 3.
‘आत्मन्’ शब्द का तृतीया एकवचन का रूप होता है–
(क) आत्मनि
(ख) आत्मने
(ग) आत्मना
(घ) आत्मनः

प्रश्न 4.
‘इदम्’ शब्द का षष्ठी विभक्ति बहुवचन का रूप होता है|
(क) अस्मिन्
(ख) एषाम्
(ग) अस्मै
(घ) अस्य

प्रश्न 5.
‘सर्व’ शब्द (पुं० ) द्वितीया विभक्ति, बहुवचन का रूप होता है
(क) सर्वेभ्यः
(ख) सर्वस्य
(ग) सर्वान्
(घ) सर्वम्

प्रश्न 6.
‘जगत्’ का पंचमी एकवचन में रूप होता है—
(क) जगती
(ख) जगतोः
(ग) जगति
(घ) जगत:

प्रश्न 7.
‘नदी’ का सप्तमी बहुवचन में रूप होता है
(क) नदीभ्यः
(ख) नद्यो:
(ग) नदीषु
(घ) नद्याः

प्रश्न 8.
‘सरित्’ का तृतीया विभक्ति एकवचन में रूप होता है
(क) सरितेन
(ख) सरितौ
(ग) सरितो:
(घ) सरिता

प्रश्न 9.
‘जगत्’ का सप्तमी बहुवचन में रूप होता है
(क) जगति
(ख) जगत्सु
(ग) जगताम्।
(घ) जगद्भिः

प्रश्न 10.
‘पितृ’ का षष्ठी एकवचन में रूप होता है
(क) पितुः
(ख) पित्रे
(ग) पितरः
(घ) पित्रोः

प्रश्न 11.
‘सर्वै’ (पुं० ) तृतीया बहुवचन का रूप है-
(क) सर्वो
(ख) सर्वयोः
(ग) सर्वैः
(घ) सर्वस्य

प्रश्न 12.
‘आत्मन्’ का चतुर्थी, एकवचन का रूप होता है
(क) आत्मनः
(ख) आत्मना
(ग) आत्मने
(घ) आत्मनोः

प्रश्न 13.
पुत्र’ शब्द का तृतीया एकवचन में रूप होता है
(क) पुत्रेषु
(ख) पुत्रान्
(ग) पुत्रेण
(घ) पुत्रैः

प्रश्न 14.
‘राजन्’ शब्द का षष्ठी एकवचन में रूप होता है
(क) राज्ञाम्
(ख) राज्ञः
(ग) राज्ञा
(घ) राज्ञोः

प्रश्न 15.
‘राजन्’ शब्द का तृतीया बहुवचन में रूप होता है
(क) राज्ञः
(ख) राजभिः
(ग) राजान्ः
(घ) राजभ्यः

प्रश्न 16.
‘जगत्’ शब्द का सप्तमी द्विवचन में रूप होता है
(क) जगते
(ख) जगन्ति
(ग) जगतोः
(घ) जगति

उत्तर-
1. (ग), 2. (ग), 3. (क), 4. (ख), 5. (ग), 6. (घ), 7. (ग), 8. (घ), 9. (ख), 10. (ग), 11. (ग), 12. (ग), 13. (ग), 14, (ख), 15. (ख), 16. (ग)।

प्रश्न (ख) निम्नलिखित शब्दों की विभक्ति और वचन के सही विकल्प को चुनकर लिखिए-
प्रश्न 1.
रामाय
(क) चतुर्थी एकवचन
(ख) सप्तमी एकवचन
(ग) तृतीया द्विवचन
(घ) द्वितीया एकवचन

प्रश्न 2.
हस्तेन
(क) प्रथमा बहुवचन
(ख) पञ्चमी एकवचन
(ग) तृतीया एकवचने
(घ) चतुर्थी द्विवचन

प्रश्न 3.
रामानाम्
(क) चतुर्थी एकवचन
(ख) षष्ठी एकवचन
(ग) षष्ठी बहुवचन
(घ) द्वितीया बहुवचन

प्रश्न 4.
शिश्वोः
(क) तृतीया द्विवचन
(ख) द्वितीया द्विवचन
(ग) द्वितीया बहुवचन
(घ) सप्तमी द्विवचन

प्रश्न 5.
नदीषु
(क) सप्तमी बहुवचन
(ख) चतुर्थी बहुवचन
(ग) पञ्चमी एकवचन
(घ) सप्तमी एकवचन

प्रश्न 6.
आत्मने [2011,12,15,17]
(क) द्वितीया बहुवचन
(ख) चतुर्थी एकवचन
(ग) षष्ठी द्विवचन
(घ) सप्तमी द्विवचन

प्रश्न 7.
नामसु [2010,17]
(क) तृतीया एकवचन
(ख) द्वितीया बहुवचन
(ग) पञ्चमी द्विवचन
(घ) सप्तमी बहुवचन

प्रश्न 8.
भानून्|
(क) षष्ठी बहुवचन
(ख) सप्तमी एकवचन
(ग) द्वितीया बहुवचन
(घ) चतुर्थी एकवचन

प्रश्न 9.
राज्ञि [2013]
(क) तृतीया बहुवचन
(ख) सप्तमी एकवचन
(ग) षष्ठी द्विवचन
(घ) पञ्चमी एकवचन

प्रश्न 10.
जगता (2015)
(क) द्वितीया बहुवचन
(ख) चतुर्थी द्विवचन
(ग) तृतीया एकवचन
(घ) षष्ठी एकवचन

प्रश्न 11.
आत्मनि [2011, 13, 15]
(क) सप्तमी एकवचन
(ख) षष्ठी द्विवचन
(ग) पञ्चमी बहुवचन
(घ) प्रथमा द्विवचन

प्रश्न 12.
आत्मनाम् [2015]
(क) द्वितीया एकवचन
(ख) चतुर्थी द्विवचन
(ग) षष्ठी बहुवचन
(घ) सप्तमी एकवचन

प्रश्न 13.
नामभिः
(क) प्रथमा बहुवचन
(ख) तृतीया बहुवचन
(ग) चतुर्थी बहुवचन
(घ) सप्तमी बहुवचने

प्रश्न 14.
रामात्
(क) द्वितीया एकवचन
(ख) पञ्चमी एकवचन
(ग) तृतीया द्विवचन
(घ) सप्तमी एकवचन

प्रश्न 15.
सरिते [2011,17]
(क) चतुर्थी एकवचन
(ख) तृतीया द्विवचन
(ग) प्रथम बहुवचन
(घ) षष्ठी बहुवचन

प्रश्न 16.
मतीनाम्
(क) सप्तमी बहुवचन
(ख) चतुर्थी द्विवचन
(ग) तृतीया एकवचन
(घ) षष्ठी बहुवचन

प्रश्न 17.
नयः
(क) प्रथमा बहुवचन
(ख) षष्ठी एकवचन
(ग) तृतीया एकवचन
(घ) द्वितीया बहुवचन

प्रश्न 18.
वानराः
(क) तृतीया एकवचन
(ख) सप्तमी द्विवचन
(ग) प्रथमा बहुवचन
(घ) द्वितीया एकवचन

प्रश्न 19.
हरिभिः
(क) तृतीया एकवचन
(ख) द्वितीया द्विवचन
(ग) तृतीया बहुवचन
(घ) प्रथमा द्विवचन

प्रश्न 20.
जगत्सु [2010, 11, 12]
(क) पंचमी एकवचन
(ख) षष्ठी एकवचन
(ग) द्वितीया बहुवचन
(घ) सप्तमी, बहुवचन

प्रश्न 21.
आत्मानम् [2010]
(क) षष्ठी बहुवचन
(ख) द्वितीया एकवचन
(ग) सप्तमी द्विवचन
(घ) चतुर्थी एकवचन

प्रश्न 22.
राज्ञाम् [2010,11,12,16]
(क) पंञ्चमी द्विवचन
(ख) द्वितीया एकवचन
(ग) षष्ठी बहुवचन
(घ) चतुर्थी एकवचन

प्रश्न 23.
रमायाम्
(क) पंचमी बहुवचन
(ख) चतुर्थी एकवचन
(ग) षष्ठी द्विवचन
(घ) सप्तमी एकवचन

उत्तर-1. (क), 2. (ग), 3. (ग), 4. (घ), 5. (क), 6. (ख), 7. (घ), 8. (ग), 9. (ख),10. (ग), 11. (क), 12. (ग), 13. (ख), 14. (क), 15. (क), 16. (घ), 17. (क), 18. (ग), 19. (ग), 20. (घ), 21, (ख), 22. (ग), 23. (घ)।

प्रश्न (ग)
इन संस्कृत शब्दों में से काले अक्षरों में छपे शब्दों में विभक्ति को पहचान कर लिखिए-
(1) राज्ञः पुत्रः
(2) पुत्रेण सह
(3) वृक्षात् पतति
(4) पादेन खञ्जः
(5) छात्रेभ्यः स्वस्ति
(6) ग्रामं निकषी
उत्तर
(1) षष्ठी एकवचन,
(2) तृतीया एकवचन,
(3) पञ्चमी एकवचन,
(4) षष्ठी/सप्तमी द्विवचन,
(5) चतुर्थी बहुवचन,
(6) द्वितीया एकवचन।

प्रश्न (घ)
निम्नांकित शब्दों में प्रयुक्त विभक्ति और वचन का उल्लेख कीजिए-
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उत्तर
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ध्यातव्य–यद्यपि पाठ्यक्रम में शब्द-रूप निर्धारित नहीं हैं, फिर भी विद्यार्थियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए विभक्तियों से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर देने के लिए कुछ शब्दों के रूप दिये जा रहे हैं-
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