UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 7 सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन’ अज्ञेय’

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 7
Chapter Name सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन’ अज्ञेय’
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 7 सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन’ अज्ञेय’

कवि का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
अज्ञेय के जीवन-परिचय और कृतियों पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 11]
या
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। (2012, 13, 14, 15, 16, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय-अज्ञेय जी का जन्म सन् 1911 ई० में करतारपुर (जालन्धर) में हुआ था। इनके पिता पं० हीरानन्द शास्त्री भारत के प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता थे। ये वत्स गोत्र के और सारस्वत ब्राह्मण परिवार के थे। संकीर्ण जातिवाद से ऊपर उठकर वत्स गोत्र के नाम से ये वात्स्यायन कहलाये। अज्ञेय जी का शैशव अपने पिता के साथ वन और पर्वतों में बिखरे पुरातत्त्व अवशेषों के मध्य व्यतीत हुआ। माता और भाइयों से अलग एकान्त में रहने के कारण इनका जीवन और व्यक्तित्व कुछ विशेष प्रकार का बन गया। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा पुराने ढंग से अष्टाध्यायी रटकर संस्कृत में हुई। इसके बाद इन्होंने फारसी और अंग्रेजी सीखी। इनकी आगे की शिक्षा मद्रास (चेन्नई) और लाहौर में हुई। सन् 1929 ई० में बी० एस-सी० उत्तीर्ण करने के उपरान्त ये अंग्रेजी में एम० ए० के अन्तिम वर्ष में ही थे कि क्रान्तिकारी आन्दोलनों में भाग लेने के कारण गिरफ्तार कर लिये गये। चार वर्ष जेल में और एक वर्ष घर में ही नजरबन्द रहकर व्यतीत करना पड़ा। इन्होंने मेरठ के किसान आन्दोलन में भाग लिया था और तीन वर्ष तक सेना में भरती होकर असम-बर्मा सीमा पर और यहाँ युद्ध समाप्त हो जाने पर पंजाब के पश्चिमोत्तर सीमान्त पर सैनिक रूप में सेवा भी की। सन् 1955 ई० में यूनेस्को की वृत्ति पर आप यूरोप गये तथा सन् 1957 ई० में जापान और पूर्वेशिया का भ्रमण किया। कुछ समय तक ये अमेरिका में भारतीय साहित्य और संस्कृति के प्राध्यापक रहे तथा जोधपुर विश्वविद्यालय में तुलनात्मक साहित्य और भाषा अनुशीलन विभाग में निदेशक पद पर भी कार्य किया। ये ‘दिनमान’ और ‘नया प्रतीक’ पत्रों के सम्पादक भी रहे।

साहित्य के अतिरिक्त चित्रकला, मृत्तिका-शिल्प, फोटोग्राफी, बागवानी, पर्वतारोहण आदि में ये विशेष रुचि लेते थे। 4 अप्रैल, 1987 ई० को इनका स्वर्गवास हो गया। इन्हें मरणोपरान्त ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

साहित्यिक सेवाएँ-अज्ञेय जी की रचनाओं में उनका व्यक्तित्व बहुत मुखर रहा है। वे प्रयोगवादी कवि के रूप में विख्यात हैं और उनकी प्रतिभा निरन्तर परिमार्जित होती रही है। प्रगतिवादी काव्य का ही एक रूप प्रयोगवादी काव्य के आन्दोलन में प्रतिफलित हुआ। इसका प्रवर्तन ‘तार सप्तक’ के द्वारा अज्ञेय जी ने ही किया था। इन्होंने अपने कलात्मक बोध, समृद्ध कल्पना-शक्ति और संकेतमयी अभिव्यंजना द्वारा भावना के अनेक नये अनछुए रूपों को उजागर किया।

प्रमुख रचनाएँ—(1) आँगन के पार द्वार, (2) सुनहले शैवाल, (3) पूर्वा, (4) हरी घास पर क्षण भर, (5) बावरा अहेरी, (6) अरी ओ करुणामय प्रभामय, (7) इन्द्रधनु रौंदे हुए ये, (8) कितनी नावों में कितनी बार, (9) पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ, (10) इत्यलम्, (11) चिन्ता, (12) सागरमुद्रा, (13) महावृक्ष के नीचे, (14) भग्नदूत, (15) रूपांवरा, (16) नदी के बॉक पर छाया आदि इनके प्रमुख काव्य ग्रन्थ हैं। ‘प्रिज़न डेज़ ऐण्ड अदर पोयम्स’ नाम से इनकी अंग्रेजी भाषा में रचित एक अन्य काव्य-कृति भी प्रकाशित हुई है।

साहित्य में स्थान–अज्ञेय की सतत प्रयोगशील प्रतिभा किसी एक बँधी-बँधायी लीक पर चलने वाली न थी, फलतः इन्होंने काव्य के भावपक्ष तथा कलापक्ष दोनों में नये-नये प्रयोग करके हिन्दी-कविता के भावक्षेत्र का विस्तार किया तथा अभिव्यक्ति को नूतन व्यंजकता प्रदान की। अत: इनके विषय में यह नि:संकोच कहा जा सकता है कि इन्होंने हिन्दी कविता का नव संस्कार किया। ये प्रयोगवादी काव्यधारा के प्रवर्तक तथा आधुनिक हिन्दी कवियों में उच्च स्थान के अधिकारी हैं।

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोर

मैंने आहुति बनकर देखा

प्रश्न–दिए गए पद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है-
वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन-कारी हाला है।
मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया-
मैंने आहुति बनकर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कवि ने रोगी किसे बताया है?
(iv) किनको संवेदनाहीन मृतक की संज्ञा दी गयी है?
(v) कवि ने यह कैसे सिद्ध किया है कि प्रेम यज्ञ की ज्वाला के समान पवित्र और कल्याणकारी
उत्तर
(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रयोगवाद के प्रवर्तक श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन’अज्ञेय’ द्वारा रचित ‘पूर्वा’ कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘मैंने आहति बनकर देखा’ शीर्षक कविता से उद्धृत हैं।
अथवा
शीर्षक का नाम- मैंने आहुति बनकर देखा।
कवि का नाम–सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कवि अज्ञेय का कहना है कि प्रेम जीवन में माधुर्य और सरसता का संचार करता है तथा व्यक्ति को एक नवीन चेतना और उत्साहित करने वाली नव-प्रेरणा प्रदान करता है। यह निष्प्राण व्यक्ति में भी प्राण डाल देता है। कवि कहता है कि मैंने स्वयं अनुभूत करके प्रेम के सच्चे स्वरूप और उसकी महत्ता को जान लिया है। मुझे प्रेम का यह तत्त्व अथवा रहस्य ज्ञात हो गया है कि प्रेम यज्ञ की उस ज्वाला के समान पवित्र और कल्याणकारी है, जो भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से व्यक्ति के लिए आवश्यक और मंगलकारी है। साथ ही प्रेम के इस मंगलकारी स्वरूप की अनुभूति तथा प्रेमरूपी यज्ञ की ज्वाला के दर्शन उसी समय सम्भव हो पाते हैं, जब व्यक्ति स्वयं प्रेमरूपी यज्ञ में अपनी आहुति देता है। आशय यह है कि कठिनाइयों और बाधाओं को पार करके तथा संघर्ष में तपकर ही हम प्रेम के तत्त्व को पहचान सकते हैं।
(iii) कवि ने उन लोगों को रोगी बताया है जो प्रेम को कटु अनुभवों का प्याला बताते हैं।
(iv) जो लोग प्रेम को अचेतन करने वाली मदिरा कहते हैं उनको संवेदनाहीन मृतक की संज्ञा दी है।
(v) कवि ने स्वयं व्यक्तिगत गहन अनुभूमि के आधार पर यह सिद्ध किया है कि प्रेम यज्ञ की ज्वाला के समान पवित्र और कल्याणकारी है।

हिरोशिमा

प्रश्न 1.
छायाएँ मानव-जन की
नहीं मिटीं लम्बी हो-होकर :
मानव ही सब भाप हो गये।
छायाएँ तो अभी लिखी हैं,
झुलसे हुए पत्थरों पर
उजड़ी सड़कों की गच पर ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रस्तुत अंश में किसका वर्णन हुआ है?
(iv) परमाणु हमले से कहाँ पर तुरन्त ही सब कुछ समाप्त हो गया?
(v) हिरोशिमा की उजड़ी सड़कों पर आज भी कितनी काली छायाएँ देखी जा सकती हैं?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रयोगवाद के प्रवर्तक श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन’अज्ञेय’ द्वारा रचित ‘पूर्वा’ कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘हिरोशिमा’ शीर्षक कविता से उद्धृत हैं।
अथवा
शीर्षक का नाम- हिरोशिमा।
कवि का नाम–सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-‘अज्ञेय’ जी ने कहा है कि परमाणु शक्ति के दुरुपयोग से मानवता त्रस्त होती है। मानव के साथ-साथ प्रकृति और दूसरे जीव-जन्तु भी समूल नष्ट हो जाते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के अन्त में अमेरिका ने जापान देश के हिरोशिमा और नागासाकी नगरों पर परमाणु बमों से हमला किया तो मनुष्य द्वारा रचे गये उस सूर्य की रोशनी में वहाँ की जनता भाप बन कर उड़ गयी थी। लोगों की छायाएँ डूबते सूर्य के प्रकाश में जैसे लम्बी होकर मिटती हैं, वैसी हिरोशिमा में नहीं मिटी थीं, वहाँ तुरन्त ही सब कुछ समाप्त हो गया था। आज तक भी वहाँ की उजड़ी सड़कों और परमाणु बमों की आग से झुलसे पत्थरों पर उस त्रासदी की काली छायाएँ स्पष्ट देखी जा सकती हैं।
(iii) प्रस्तुत अंश में अमेरिका के परमाणु बमों द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासाकी नगरों में हुए भीषण नर-संहार का वर्णन हुआ है।
(iv) हिरोशिमा और नागासाकी नगरों में परमाणु हमले से तुरन्त ही सब-कुछ समाप्त हो गया।
(v) हिरोशिमा की उजड़ी सड़कों पर परमाणु बस की आग से झुलसे पत्थरों पर उस त्रासदी की काली छायाएँ स्पष्ट देखी जा सकती हैं।

प्रश्न 2.
मानव का रचा हुआ सूरज
मानव को भाप बनाकर सोख गया।
पत्थर पर लिखी हुई यह
जली हुई छाया
मानव की साखी है।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) मानव का रचा हुआ सूरज क्या है?
(iv) अणुबमरूपी सूरज किसे और किस प्रकार भाप बनाकर सोख गया?
(v) कौन आज भी महाविनाश के गवाह हैं?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रयोगवाद के प्रवर्तक श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘हिरोशिमा’ द्वारा रचित ‘पूर्वा’ कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित हिरोशिमा’ शीर्षक कविता से उद्धत हैं।
अथवा
शीर्षक का नाम-हिरोशिमा।
कवि का नाम-सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–परमाणु बम के रूप में मनुष्य ने मानो कृत्रिम सूरज की रचना कर ली है। इसके विस्फोट में सूरज के समान ही अत्यधिक ताप उत्पन्न होता है। अमेरिका ने जब हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया तो विस्फोट के समय उससे इतना ताप और प्रकाश उत्पन्न हुआ कि लगा आसमान से टूटकर सूरज ही धरती पर आ गिरा हो। उस समय मनुष्य भाप बनकर उड़ गया और उसकी राख तक शेष न रही। सूर्य में भी इतना ही ताप है कि उसके पास पहुँचकर कोई भी वस्तु ठोस अथवा द्रव अवस्था में नहीं रहती, वरन् वह गैस में परिवर्तित हो जाती है, ऐसा ही हिरोशिमा के परमाणु बम विस्फोट के समय हुआ था। जहाँ पर बम गिरा था, वहाँ की अधिकांश वस्तुएँ विशेषकरे पेड़-पौधे और जीव-जन्तु अत्यधिक ताप के कारण भाप (गैस) बनकर उड़ गये थे। यह वैज्ञानिक प्रगति के महाविनाश का प्रथम प्रमाण था।
(iii) मानव का रचा हुआ सूरज अणुबम है।
(iv) अणुबमरूपी सूरज ने मनुष्यों को उसी प्रकार जलाकार भस्म कर डाला जिस प्रकार सूर्य पानी को भाप बना डालता है।
(v) अणुबम की आग ने मानव तो मानव, पत्थर तक को जलाकर काला कर डाला, जो आज भी उस महाविनाश की गाथा के गवाह हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 6 रामधारी सिंह दिनकर

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Chapter Chapter 6
Chapter Name रामधारी सिंह दिनकर
Number of Questions 6
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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 6 रामधारी सिंह दिनकर

कवि का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जीवन-परिचय और साहित्यिक प्रदेय पर प्रकाश डालिए। [2009]
था
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। [2010, 11]
था
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का साहित्यिक परिचय दीजिए एवं उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। [2012, 14, 15, 16, 17, 18]
उतर
जीवन-परिचय-श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म 30 सितम्बर, 1908 ई० ( संवत् 1965 वि० ) को जिला मुंगेर (बिहार) के सिमरिया नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री रवि सिंह और माता का नाम श्रीमती मनरूपदेवी था। इनकी दो वर्ष की अवस्था में ही पिता का देहावसान हो गया; अत: बड़े भाई वसन्त सिंह और माता की छत्रछाया में ही ये बड़े हुए। इनकी आरम्भिक शिक्षा गाँव की पाठशाला में ही हुई। अपने विद्यार्थी जीवन से ही इन्हें आर्थिक कष्ट झेलने पड़े। विद्यालय के लिए घर से पैदल दस मील रोज आना-जाना इनकी विवशता थी। इन्होंने मैट्रिक (हाईस्कूल) की परीक्षा मोकामा घाट स्थित रेलवे हाईस्कूल से उत्तीर्ण की और हिन्दी में सर्वाधिक अंक प्राप्त करके ‘भूदेव’ स्वर्णपदक जीता। 1932 ई० में पटना से इन्होंने बी० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। ग्रामीण परम्पराओं के कारण दिनकर जी का विवाह किशोरावस्था में ही हो गया। अपने पारिवारिक दायित्वों के प्रति दिनकर जी जीवन भर सचेत रहे और इसी कारण इन्हें कई प्रकार की नौकरी करनी पड़ी। सन् 1932 ई० में बी० ए० करने के बाद ये एक नये स्कूल में अध्यापक बने। सन् 1934 ई० में इस पद को छोड़कर सीतामढ़ी में सब-रजिस्ट्रार बने। सन् 1950 ई० में बिहार सरकार ने इन्हें मुजफ्फरपुर के स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिन्दी-विभागाध्यक्ष के पद पर नियुक्त किया। सन् 1952 ई० से सन् 1963 ई० तक ये राज्यसभा के सदस्य मनोनीत किये गये। इन्हें केन्द्रीय सरकार की हिन्दी-समिति को परामर्शदाता भी बनाया गया। सन् 1964 ई० में ये भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति बने।।

दिनकर जी को कवि-रूप में पर्याप्त सम्मान मिला। ‘पद्मभूषण’ की उपाधि, ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार, द्विवेदी पदक, डी० लिट् की मानद उपाधि, राज्यसभा की सदस्यता आदि इनके कृतित्व की राष्ट्र द्वारा स्वीकृति के प्रमाण । सन् 1972 ई० में इन्हें उर्वशी’ के लिए ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया। इनका स्वर्गवास 24 अप्रैल, 1974 ई०( संवत् 2031 वि०) को मद्रास (चेन्नई) में हुआ।

साहित्यिक सेवाएँ–दिनकर जी की सबसे प्रमुख विशेषता उनकी परिवर्तनकारी सोच रही है। उनकी कविता का उद्भव छायावाद युग में हुआ और वह प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नयी कविता आदि के युगों से होकर गुजरी। इस दीर्घकाल में जो आरम्भ से अन्त तक उनके काव्य में रही, वह है उनका राष्ट्रीय स्वर। ‘दिनकर’ जी राष्ट्रीय भावनाओं के ओजस्वी गायक रहे हैं। इन्होंने देशानुराग की भावना से ओत-प्रोत, पीड़ितों के प्रति सहानुभूति की भावना से परिपूर्ण तथा क्रान्ति की भावना जगाने वाली रचनाएँ लिखी हैं। ये लोक के प्रति निष्ठावान, सामाजिक दायित्व के प्रति सजग तथा जनसाधारण के प्रति समर्पित कवि रहे हैं।

कृतियाँ-दिनकर जी की साहित्य विपुल है, जिसमें काव्य के अतिरिक्त विविध-विषयक गद्य-रचनाएँ भी हैं। इनकी प्रमुख
काव्य-रचनाएँ—(1) रेणुका, (2) हुंकार, (3) कुरुक्षेत्र तथा (4) उर्वशी हैं। इनके अतिरिक्त दिनकर जी के अन्य काव्यग्रन्थ निम्नलिखित हैं(5) खण्डकाव्य-रश्मिरथी, (6) कविता-संग्रह–(i) रसवन्ती, (ii) द्वन्द्वगीत, (iii) सामधेनी, (iv) बापू, (v) इतिहास के आँसू, (vi) धूप और धुआँ, (vii) नीम के पत्ते, (viii) नीलकुसुम, (ix) चक्रवाल, (x) कविश्री, (xi) सीपी और शंख, (xii) परशुराम की प्रतीक्षा, (xiii) स्मृति-तिलक, (xiv) हारे को हरिनाम आदि, (7) बालसाहित्य-धूप-छाँह, मिर्च का मजा, सूरज को ब्याह।
साहित्य में स्थान–दिनकर जी की सबसे बड़ी विशेषता है, उनका समय के साथ निरन्तर गतिशील रहना। यह उनके क्रान्तिकारी व्यक्तित्व और ज्वलन्त प्रतिभा का परिचायक है। फलत: गुप्त जी के बाद ये ही राष्ट्रकवि पद के सच्चे अधिकारी बने और इन्हें ‘युग-चरण’, ‘राष्ट्रीय-चेतना का वैतालिक’ और ‘जनजागरण का अग्रदूत’ जैसे विशेषणों से विभूषित किया गया। ये हिन्दी के गौरव हैं, जिन्हें पाकर सचमुच हिन्दी कविता धन्य हुई।

‘पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोचर

पुरवा प्रश्न–दिए गए पद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
कौन है अंकुश, इसे मैं भी नहीं पहचानता हूँ ।
पर, सरोवर के किनारे कंठ में जो जल रहा है।
उस तृषा, उस वेदना को जानता हूँ।
सिन्धु-सा उद्द्दाम, अपरम्पार मेरा बल कहाँ है ?
गूंजता जिस शक्ति का सर्वत्र जयजयकारे,
उस अटल संकल्प का सम्बल कहाँ है ?
यह शिला-सा वक्ष, ये चट्टान-सी मेरी भुजाएँ,
सूर्य के आलोक से दीपित, समुन्नत भाल,
मेरे प्राण का सागर अगम, उत्ताल, उच्छल है।
सामने टिकते नहीं वनराज, पर्वत डोलते हैं,
काँपता है कुंडली मारे समय का व्याल,
मेरी बाँह में मारुत, गरुड़, गजराज का बल है।
मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं,
उर्वशी ! अपने समय का सूर्य हूँ मैं ।
अंध तम के भाल पर पावक जलाता हूँ,
बादलों के सीस पर स्यन्दन’चलाता हूँ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) राजा पुरूरवा किससे अपने मन की दुविधाग्रस्त स्थिति का वर्णन कर रहे हैं?
(iv) ऐसा क्या है जो राजा पुरूरवा को उर्वशी जैसी रूपसी के पास होने पर भी कामना पूरी करने पर रोक रहा है?
(v) हे उर्वशी! मैं अपने समय का सूर्य हूँ।” इस बात का क्या आशय है?
उत्तर
(i) ये पंक्तियाँ महाकवि रामधारीसिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित नाटकीय महाकाव्य ‘उर्वशी’ के तृतीय अंक से हमारी पाठ्य-पुस्तक काव्यांजलि’ में संकलित ‘पुरूरवा’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत हैं।
अथवा
शीर्षक का नाम-— उर्वशी।
कवि का नाम-रामधारी सिंह ‘दिनकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-पुरूरवा कहते हैं कि मैं उस अंकुश या प्रतिबन्ध के विषय में नहीं जानता कि वह कौन-सी शक्ति है, जो मुझे अपनी प्यास बुझाने से रोक रही है। मेरी स्थिति उस व्यक्ति की-सी है, जो प्रेम सरोवर के किनारे बैठा है, किन्तु प्यास की पीड़ा से व्याकुल होने पर भी वह अपनी प्यास नहीं बुझा पाता। ऐसा क्यों होता है, यह मैं स्वयं नहीं समझ पाता। पुरूरवा का आशय है कि उर्वशी जैसी अनुपम रूपसी पास होने पर भी और स्वयं कामाग्नि से विह्वल होने पर भी वह अपनी कामना पूरी क्यों नहीं कर पा रहा है। सम्भवतया उसके सत्संस्कार उसे इस समाज विरुद्ध सम्बन्ध बनाने से रोक रहे हैं।
(iii) राजा पुरूरवा अप्सरा उर्वशी से अपने मन की दुविधाग्रस्त स्थिति का वर्णन कर रहे हैं।
(iv) राजा पुरूरवा के सत्संस्कार हैं जो उसे समाज के विरुद्ध सम्बन्ध बनाने से रोक रहे हैं।
(v) ‘हे उर्वशी! मैं अपने समय का सूर्य हूँ इस बात का आशय है कि जैसे सूर्य के तेज के सामने तारे फीके पड़ जाते हैं वैसे ही मेरे दुर्धर्ष तेज के सामने संसार के सारे राजा-गण निस्तेज हो चुके हैं।

उर्वशी

प्रश्न–दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
मैं नहीं गगन की लता
तारकों में पुलकिता फूलती हुई,
मैं नहीं व्योमपुर की बाला,
विधु की तनया, चन्द्रिका-संग,
पूर्णिमा सिन्धु की परमोज्ज्वल आभा-तरंग,
मैं नहीं किरण के तारों पर झूलती हुई भू पर उतरी ।
मैं नाम-गोत्र से रहित पुष्प,
अम्बर में उड़ती हुई मुक्त आनन्द-शिखा
इतिवृत्त हीन,
सौन्दर्य-चेतना की तरंग;
सुर-नर-किन्नर गन्धर्व नहीं,
प्रिय! मैं केवल अप्सरा
विश्वनर के अतृप्त इच्छा-सागर से समुद्भूत ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) इस पद्यांश में उर्वशी ने किसे अपना परिचय दिया है?
(iv) आकाश में उड़ती हुई स्वच्छन्द आनन्द की शिखा कौन है?
(v) ‘मैं नाम-ग्रोत्र से रहित पुष्प’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) यह पद्यांश राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित ‘उर्वशी’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘उर्वशी’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- उर्वशी
कवि का नाम-रामधारी सिंह ‘दिनकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-मैं नक्षत्रों के बीच में रहकर प्रसन्नतापूर्वक फलने-फूलने वाली आकाश की लता नहीं हूँ, न मैं आकाश में स्थित किसी नगर से उतरी युवती हुँ, न ही मैं चन्द्रमा की पुत्री हूँ, जो चाँदनी के साथ चन्द्रकिरणरूपी तारों पर लटककर पृथ्वी पर उतरी हो और न ही मैं पूर्णिमा के चन्द्रमा के उज्ज्वल प्रकाशरूपी सागर की हिलोरें लेती लहर हूँ। मैं तो मानव के हृदय में सुखोपभोग की अतृप्त इच्छाओं का जो सागर लहरा रहा है, उसी से उत्पन्न हुई केवल एक अप्सरा हूँ।
(iii) इस पद्यांश में उर्वशी ने राजा पुरूरवा को अपना परिचय दिया है।
(iv) उर्वशी आकाश में उड़ती हुई स्वच्छन्द आनन्द की शिखा है।
(v) रूपक अलंकार।।

प्रश्न 2.
देवालय में देवता नहीं, केवल मैं हूँ।
मेरी प्रतिमा को घेर उठ रही अगुरु-गन्ध,
बज रहा अर्चना में मेरी मेरा नूपुर ।
भू-नभ को सब संगीत नाद मेरे निस्सीम प्रणय को है,
सारी कविता जयगान एक मेरी त्रयलोक-विजय का है।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि को नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) इन पंक्तियों में नारी की विश्वव्यापी शक्ति का वर्णन कौन कर रहा है?
(iv) उर्वशी ने मन्दिरों में देवताओं के स्थान पर किसका वास बताया है?
(v) संसार का समस्त काव्य किसका गान करता है?
उत्तर
(i) यह पद्यांश राष्ट्रकवि रामधारीसिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित ‘उर्वशी’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘उर्वशी’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- उर्वशी।
कवि का नाम-रामधारी सिंह ‘दिनकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-उर्वशी कह रही है कि मन्दिरों में देवताओं का नहीं, अपितु मेरा ही वास है। आशय यह है कि देव-प्रतिमाएँ मनुष्य की सौन्दर्य चेतना का परिणाम हैं और इस सौन्दर्य चेतना का मूल आधार नारी है। इस प्रकार मन्दिरों में देव-प्रतिमाओं के विभिन्न रूपों में मनुष्य वस्तुतः सौन्दर्य की साकार प्रतिमा नारी को ही अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित करता है। अतः स्पष्ट है कि देवालयों में देव-प्रतिमाओं के स्थान पर मुख्यतः नारी ही अधिष्ठित है।
(iii) इन पंक्तियों में नारी की विश्वव्यापी शक्ति का वर्णन उर्वशी कर रही है।
(iv) उर्वशी ने मन्दिरों में देवताओं के स्थान पर स्वयं का वास बताया है।
(v) संसार का समस्त काव्य नारी के ही त्रैलोक्य-विजय का गान करता है।

अभिनव मनुष्य

प्रश्न–दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
यह मनुज, ब्रह्माण्ड का सबसे सुरम्य प्रकाश,
कुछ छिपा सकते न जिससे भूमि या आकाश ।
यह मनुज जिसकी शिखा उद्द्दाम,
कर रहे जिसको चराचर भक्तियुक्त प्रणाम ।
यह मनुज, जो सृष्टि का श्रृंगार,
ज्ञान का, विज्ञान का, आलोक का आगार ।
‘व्योम से पाताल तक सब कुछ इसे है ज्ञेय’
पर, न यह परिचय मनुज का, यह न उसका श्रेय ।
श्रेय उसका, बुद्धि पर चैतन्य उर की जीत;
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) आकाश और पृथ्वी का कोई भी तत्त्व किससे अज्ञात नहीं रह सकता?
(iv) संसार के सभी जड़-चेतन पदार्थ किस कारण मनुष्य को प्रणाम करते हैं?
(v) ‘आकाश’ शब्द के दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश कविवर रामधारी सिंह दिनकर’ द्वारा रचित ‘कुरुक्षेत्र’ काव्य के छठे सर्ग से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘अभिनव मनुष्य’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- अभिनव मनुष्य।
कवि का नाम-रामधारी सिंह ‘दिनकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–कवि कहता है कि आज मनुष्य ने वैज्ञानिक प्रगति के बल पर इस संसार के विषय में सब कुछ जान लिया है। पृथ्वी के गर्भ से लेकर सुदूर अन्तरिक्ष तक के सभी रहस्यों का उद्घाटन कर दिया है। चाँद-तारे, सूरज आदि की स्थिति को स्पष्ट कर दिया है कि आसमान में कहाँ और कैसे टिके हैं? पृथ्वी के गर्भ में जहाँ शीतल जल का अथाह भण्डार है, वहीं दहकता लावा भी विद्यमान है; उसके द्वारा यह भी ज्ञात किया जा चुका है। किन्तु यह ज्ञान-विज्ञान तो मनुष्यता की पहचान नहीं है और न ही इससे मानवता का कल्याण हो सकता है। संसार का कल्याण तो केवल इस बात में निहित है कि प्रत्येक मनुष्य प्राणिमात्र से स्नेह करे, उसे अपने समान ही समझे, यही मनुष्यता की अथवा मनुष्य होने की पहचान भी है, अन्यथा ज्ञान-विज्ञान की जानकारी तो एक कम्प्यूटर भी रखता है, मगर उसमें मानवीय संवेदनाएँ नहीं होती; अत: उसे मनुष्य नहीं कहा जा सकता।
(iii) आकाश और पृथ्वी का कोई भी तत्त्व अभिनव मनुष्य से अज्ञात नहीं रह सकता।
(iv) आज का यह अभिनव मनुष्य इतना बुद्धिमान हो गया है कि इसके यश की अदम्य-शिखा सर्वत्र शोभित है जिसे संसार के सभी जड़-चेतन पदार्थ शक्तिपूर्वक प्रणाम करते हैं।
(v) आकाश’ शब्द के दो पर्यायवाची शब्द हैं–नभ, शून्य।

प्रश्न 2.
सावधान, मनुष्य ! यदि विज्ञान है तलवार,
तो इसे दे फेंक, तजकर मोह, स्मृति के पार ।
हो चुका है सिद्ध, है तू शिशु अभी अज्ञान;
फूल काँटों की तुझे कुछ भी नहीं पहचान ।
खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार,
काट लेगा अंग, तीखी है बड़ी यह धार ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कवि ने भौतिकवादी और वैज्ञानिक युग के मानव को क्या चेतावनी दी है?
(iv) कवि ने तलवार किसे बताया है और इसका इस्तेमाल करने से मनुष्य को क्यों मना किया
(v) ‘तलवार’ शब्द के दो पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश कविवर रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित ‘कुरुक्षेत्र’ काव्य के छठे सर्ग से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘अभिनव मनुष्य’ शीर्षक काव्यांश से उद्धत है।।
अथवा
शीर्षक का नाम- अभिनव मनुष्य।।
कवि का नाम-रामधारी सिंह ‘दिनकर’।।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ मनुष्य को सचेत करते हुए कहते हैं। कि हे मनुष्य! यह सिद्ध हो चुका है कि तुम अभी एक शिशु के समान अज्ञानी हो। तुम अपने ही हाथों अपना सर्वनाश करने पर तुले हुए हो। तुम्हें फूल और काँटों की कुछ भी पहचान नहीं है; अर्थात् तुम्हें यह पहचान नहीं है कि तुम्हारे लिए क्या लाभदायक है और क्या हानिकारक। अणुबम का प्रयोग करके विज्ञान पर गर्व करने वाले मनुष्य ने अपनी अबोधता और विवेकहीनता को सिद्ध कर दिया है।
(iii) कवि ने भौतिकवादी और वैज्ञानिक युग के मानव को यह चेतावनी दी है कि यदि तू अभी सावधान नहीं हुआ तो तुझे विज्ञान के दुष्परिणाम भोगने पड़ेंगे।
(iv) कवि ने विज्ञान को तलवार बताया है और इसे मनमानी क्रीड़ा का माध्यम बना लेना स्वयं का नुकसान करना है। इसलिए इसके प्रचण्ड प्रभाव वे बचने के लिए मनुष्य को मना किया है।
(v) तलवार’ शब्द के दो पर्यायवाची हैं-खड्ग तथा कृपाण।।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 5 महादेवी वर्मा

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name महादेवी वर्मा
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 5 महादेवी वर्मा

कवयित्री का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
महादेवी वर्मा के जीवन-परिचय एवं कृतियों (साहित्यिक योगदान) पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 11]
था
महादेवी वर्मा का साहित्यिक परिचय दीजिए एवं उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। [2012, 13, 14, 16, 17, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय–महादेवी वर्मा का जन्म फखाबाद के एक शिक्षित कायस्थ परिवार में सन् 1907 ई०( संवत् 1963 वि०) में होलिका दहन के दिन हुआ था। इनके पिता श्री गोविन्दप्रसाद वर्मा, भागलपुर के एक कॉलेज में प्रधानाचार्य थे। इनकी माता हेमरानी परम विदुषी धार्मिक महिला थीं एवं नाना ब्रजभाषा के एक अच्छे कवि थे। महादेवी जी पर इन सभी का प्रभाव पड़ा और अन्ततः वे एक प्रसिद्ध कवयित्री, प्रकृति एवं परमात्मा की निष्ठावान् उपासिका और सफल प्रधानाचार्या के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा इन्दौर में और उच्च शिक्षा प्रयाग में हुई। संस्कृत से एम० ए० उत्तीर्ण करने के बाद ये प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्रधानाचार्या हो गयीं। इनका विवाह 9 वर्ष की अल्पायु में ही हो गया था। इनके पति श्री रूपनारायण सिंह एक डॉक्टर थे, परन्तु इनका दाम्पत्य जीवन सफल नहीं था। विवाहोपरान्त ही इन्होंने एफ०ए०, बी०ए० और एम०ए० परीक्षाएँ सम्मानसहित उत्तीर्ण कीं। महादेवी जी ने घर पर ही चित्रकला तथा संगीत की शिक्षा भी प्राप्त की।

इन्होंने नारी-स्वातन्त्र्य के लिए संघर्ष किया, परन्तु अपने अधिकारों की रक्षा के लिए नारियों का शिक्षित होना भी आवश्यक बताया। कुछ वर्षों तक ये उत्तर प्रदेश विधान-परिषद् की मनोनीत सदस्या भी रहीं। भारत के राष्ट्रपति से इन्होंने ‘पद्मभूषण’ की उपाधि प्राप्त की। हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से इन्हें ‘सेकसरिया पुरस्कार’ तथा ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ मिला। मई 1983 ई० में ‘भारत-भारती’ तथा नवम्बर 1983 ई० में यामा पर ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से इन्हें सम्मानित किया गया। 11 सितम्बर, 1987 ई० (संवत् 2044 वि०) को इस महान् लेखिका का स्वर्गवास हो गया।

साहित्यिक सेवाएँ–श्रीमती महादेवी वर्मा का मुख्य रचना क्षेत्र काव्य है। इनकी गणना छायावादी कवियों की वृहत् चतुष्टयी (प्रसाद, पन्त, निराला और महादेवी) में होती है। इनके काव्य में वेदना की प्रधानता है। काव्य के अतिरिक्त इनकी बहुत-सी श्रेष्ठ गद्य-रचनाएँ भी हैं। इन्होंने प्रयाग में ‘साहित्यकार संसद’ की स्थापना करके साहित्यकारों का मार्गदर्शन भी किया। ‘चाँद’ पत्रिका का सम्पादन करके इन्होंने नारी को अपनी स्वतन्त्रता और अधिकारों के प्रति सजग किया है।

महादेवी वर्मा जी के जीवन पर महात्मा गाँधी का तथा कला-साहित्य साधना पर कवीन्द्र रवीन्द्र का प्रभाव पड़ा। इनका हृदय अत्यन्त करुणापूर्ण, संवेदनायुक्त एवं भावुक था। इसलिए इनके साहित्य में भी वेदना की गहरी टीस है।

रचनाएँ-महादेवी जी का प्रमुख कृतित्व इस प्रकार है-

  1. नीहार-यह इनका प्रथम प्रकाशित काव्य-संग्रह है।
  2. रश्मि-इसमें आत्मा-परमात्मा विषयक आध्यात्मिक गीत हैं।
  3. नीरजा-इस संग्रह के गीतों में इनकी जीवन-दृष्टि का विकसित रूप दृष्टिगोचर होता है।
  4. सान्ध्यगीत-इसमें इनके श्रृंगारपरक गीतों को संकलित किया गया है।
  5. दीपशिखा-इसमें इनके रहस्य-भावना-प्रधान गीतों का संग्रह है।
  6. यामा-यह महादेवी जी के भाव-प्रधान गीतों का संग्रह है।

इसके अतिरिक्त ‘सन्धिनी’, ‘आधुनिक कवि’ तथा ‘सप्तपर्णा’ इनके अन्य काव्य-संग्रह हैं। ‘अतीत के चलचित्र’, ‘स्मृति की रेखाएँ’, ‘श्रृंखला की कड़ियाँ इनकी महत्त्वपूर्ण गद्य रचनाएँ हैं।
साहित्य में स्थान–निष्कर्ष रूप में महादेवी जी वर्तमान हिन्दी-कविता की सर्वश्रेष्ठ गीतकार हैं। इनके भावपक्ष और कलापक्ष दोनों ही अतीव पुष्ट हैं। अपने साहित्यिक व्यक्तित्व एवं अद्वितीय कृतित्व के आधार पर, हिन्दी साहित्याकाश में महादेवी जी का गरिमामय पद ध्रुव तारे की भाँति अटल है।

‘पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोचर

गीत 1

प्रश्न–दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना !
जाग तुझको दूर जाना !
अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कम्प हो ले,
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;
आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया,
जाग या विद्युत-शिखाओं में निठुर तूफान बोले ! पर तुझे है नाश-पथ पर, चिह्न अपने छोड़ आना !
जाग तुझको दूर जाना !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवयित्री ने पथिक को क्या प्रेरणा दी है?
(iv) मार्ग में आने वाली अनेकानेक कठिनाइयों के बावजूद भी पथिक को विनाश और विध्वंश के बीच क्या छोड़ जाना है?
(v) ‘हिमगिरि’ शब्द के दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्रीमती महादेवी वर्मा द्वारा रचित सान्ध्यगीत नामक कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘गीत 1′ शीर्षक कविता से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम– गीत 1
कवयित्री का नाम-महादेवी वर्मा।।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कवयित्री महादेवी वर्मा कहती हैं कि हे पथिक! तुम्हारी सदा सचेत रहने वाली आँखों में यह खुमारी कैसी है और तुम्हारी वेशभूषा इतनी अस्त-व्यस्त क्यों हो रही है? ऐसा प्रतीत हो रहा है कि तुम अपने घर पर ही विश्राम कर रहे हो। सम्भवतः तुम यह भूल गये हो कि तुम्हें लम्बी यात्रा पर जाना है। इसीलिए तुम जाग जाओ, क्योंकि तुम्हारा प्राप्य या लक्ष्य बहुत दूर है। इसीलिए तुम्हें आलस्य में पड़े न रहकर तुरन्त निकल जाना चाहिए। आशय यह है कि साधक को साधना-मार्ग में अनेक कठिनाइयों-बाधाओं का सामना करना पड़ता है। जो साधक इनसे घबराकर या हताश होकर बैठ जाता है, वह अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुँच पाता। इसलिए साधक को आगे बढ़ते रहने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवयित्री ने पथिक को निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते जाने की प्रेरणा दी है।
(iv) मार्ग में आने वाली अनेकानेक कठिनाइयों के बावजूद भी पथिक को विनाश और विध्वंस के बीच नव-निर्माण के चित्र छोड़ जाना है।
(v) ‘हिमगिरि’ शब्द के दो पर्यायवाची हैं–हिमालय, गिरिराज।

प्रश्न 2.
कह न ठंडी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,
आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;
हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका,
राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी !
है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना !
जाग तुझको दूर जाना !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) इस पद्यांश से कवयित्री का आशय स्पष्ट कीजिए।
(iv) किसकी राख अमर दीपक की भाग बनकर अमर हो जाती है?
(v) ‘क्षणिक’ शब्द से मूल शब्द और प्रत्यय अलग करके लिखिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्रीमती महादेवी वर्मा द्वारा रचित सान्ध्यगीत नामक कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘गीत 1′ शीर्षक कविता से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- गीत 1
कवयित्री का नाम-महादेवी वर्मा।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कवयित्री का कहना है कि यदि किसी के हृदय में अज्ञात प्रियतम के प्रति सच्चा प्रेम है तथा उसके हृदय में अपने प्रियतम से मिलने की एकनिष्ठ छटपटाहट विद्यमान है तो इस स्थिति में उसको मिलने वाली हार भी जीत ही मानी जाएगी। भाव यह है कि प्रेम की सफलता इसी में है कि हम एकनिष्ठ भाव से अपने प्रेम को प्रदर्शित करते रहें, चाहे हमारा अपने प्रियतम से मिलन हो या न हो। आशय यह है कि जीवात्मा अविनाशी परमात्मा पर अपने को मिटाकर भी अक्षय पुण्य एवं गौरव की अधिकारिणी बनती है।
(iii) इस पद्यांश से कवयित्री का आशय है कि साधना के कष्टों से घबराकर साधक को हार नहीं माननी चाहिए। साधना-पथ पर मिली असफलता भी गौरव का ही कारण बनती है।।
(iv) पतंगा दीपक पर जलकर राख बन जाता है। उसकी राख अमर दीपक का भाग बनकर अमर हो जाती
(v) क्षणिक = क्षण + इक।

गीत 2

प्रश्न 1.
पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला !
घेर ले छाया अमा बन,
आज कज्जल-अश्रुओं में रिमझिमा ले यह घिरा घन !
और होंगे नयन सूखे, तिल बुझे औ’ पलक रूखे,
आर्द्र चितवन में यहाँ
शत विद्युतों में दीप खेला !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कवयित्री को साधना-पथ पर आगे बढ़ने से कौन नहीं रोक सकता?
(iv) कवयित्री के साधनारूपी दीपक पर किनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता?
(v) ‘प्राण’ तथा ‘अश्रु’ शब्दों के वचन बताइए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्रीमती महादेवी वर्मा द्वारा लिखित ‘दीपशिखा’ नामक कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘गीत 2’ नामक कविता से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- गीत 2
कवयित्री का नाम–महादेवी वर्मा।
(ii) महादेवी जी कह रही हैं कि लक्ष्य-पथ पर यदि कोई साथ न भी चले, अकेला ही चलना पड़े, तब भी वे निरन्तर आगे बढ़ती रहेंगी और अपरिचित मार्ग के समस्त संकटों को सहर्ष झेलकर अज्ञात प्रियतम के पास पहुँच जाएँगी। ऐसा उनका दृढ़विश्वास है।
(iii) कवयित्री को मार्ग में आने वाली बाधाएँ साधना-पथ पर आगे बढ़ने से नहीं रोक सकतीं।
(iv) कवयित्री के साधनारूपी दीपक पर घनघोर वर्षा और कौंधती बिजलियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
(v) ‘प्राण’ तथा ‘अश्रु’ सदा बहुवचन में रहने वाले शब्द हैं।

गीत 3

प्रश्न 1.
मैं नीर भरी दुख की बदली !
स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसो,
क्रन्दन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक से जलते
पलकों में निर्झरिणी मचली ।।
मेरा पग पग संगीत-भरा,
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,
नभ के नव रँग बुनते दुकूल,
छाया में मलय-बयार पली !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री ने स्वयं को क्या बताया है?
(iv) कवयित्री के निरन्तर रुदन का क्या कारण है?
(v) कवयित्री आकाश से अपने हृदय की समानता करते हुए क्या कहती है?
उत्तर
(i) यह पद्यांश श्रीमती महादेवी वर्मा द्वारा रचित ‘सान्ध्य-गीत’ नामक काव्य-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘गीत 3’ शीर्षक कविता से उद्धत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- गीत 3
कवयित्री का नाम–महादेवी वर्मा।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कवयित्री महादेवी वर्मा का कहना है कि मैं नीर-भरी दु:ख की बदली हूँ; अर्थात् मेरा जीवन दु:ख की बदलियों से घिरा हुआ है। जिस प्रकार बदली आकाश में रहती है; किन्तु दूर-दूर तक फैले हुए आकाश का कोई भी कोना उसका स्थायी निवास नहीं होता, वह तो इधर-उधर भ्रमण करती रहती है। उसी प्रकार इस विस्तृत संसार में भी ‘मेरा’ कहने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है। मेरा तो इतना ही परिचय और इतना ही इतिहास है कि मैं कल आई थी और आज जा रही हूँ। कवयित्री का आशय यह है कि मानव-जीवन क्षणिक है; अर्थात् जो आज है, वह कल नहीं होगा। समग्र मानव-जीवन का मात्र इतना ही परिचय है और इतना ही इतिहास है।
(iii) प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री ने स्वयं को दुःख की बदली बताया है।
(iv) प्रीतम से मिलने की व्याकुलता कवयित्री के निरन्तर रुदन का कारण है।
(v) कवयित्री आकाश से अपने हृदय की समानता करते हुए कहती हैं कि जिस प्रकार आकाश बहुरंगी मेघरूपी दुपट्टे से सुशोभित है उसी प्रकार मेरा हृदय भी बहुरंगी नाना अभिलाषाओं से राँगा हुआ है।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 4 सुमित्रानन्दन पन्त

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name सुमित्रानन्दन पन्त
Number of Questions 7
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 4 सुमित्रानन्दन पन्त

कवि का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
सुमित्रानन्दन पन्त का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए। [2009, 10]
या
सुमित्रानन्दन पन्त का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए।[2013, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
जीवन-पारचय–प्रकृति के सुकुमार कवि पं० सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म 20 मई, 1900 ई० ( संवत् 1957 वि० ) को प्रकृति की सुरम्य क्रीड़ास्थली कूर्माचल प्रदेश के अन्तर्गत अल्मोड़ा जिले के कौसानी नामक गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम गंगादत्त पन्त तथा माता का नाम श्रीमती सरस्वती देवी था। ये अपने माता-पिता की सबसे छोटी सन्तान थे। पन्त जी की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की ही पाठशाला में हुई। इसके पश्चात् ये अल्मोड़ा गवर्नमेण्ट हाईस्कूल में प्रविष्ट हुए। तत्पश्चात् काशी के जयनारायण हाईस्कूल से इन्होंने स्कूल लीविंग की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1916 ई० में आपने प्रयाग के म्योर सेण्ट्रल कॉलेज से एफ० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद ये स्वतन्त्र रूप से अध्ययन करने लगे। इन्होंने संस्कृत, अंग्रेजी तथा बँगला का गम्भीर अध्ययन किया। उपनिषद्, दर्शन तथा आध्यात्मिक साहित्य की ओर भी इनकी रुचि रही। संगीत से इन्हें पर्याप्त प्रेम था। सन् 1950 ई० में ये ऑल इण्डिया रेडियो के परामर्शदाता पद पर नियुक्त हुए और सन् 1957 ई० तक इससे सम्बद्ध रहे। इन्हें ‘कला और बूढ़ा चाँद’ नामक काव्य-ग्रन्थ पर ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’, ‘लोकायतन’ पर ‘सोवियत भूमि पुरस्कार’ और ‘चिदम्बरा’ पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। भारत सरकार ने पन्त जी को ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से विभूषित किया। पन्त जी 28 दिसम्बर, 1977 ई० ( संवत् 2034 वि०) को परलोकवासी हो गये।

साहित्यिक सेवाएँ–पन्त जी गम्भीर विचारक, उत्कृष्ट कवि और मानवता के प्रति आस्थावान एक ऐसे सहज कुशल शिल्पी थे, जिन्होंने नवीन सृष्टि के अभ्युदय के नवम्वप्नों को मजना की। इन्होंने सौन्दर्य को व्यापक अर्थ में ग्रहण किया है, इसीलिए इन्हें सौन्दर्य का कवि भी कहा जाता है।। रचनाएँ-पन्त जी ने अनेक काव्यग्रन्थ लिखे हैं। कविताओं के अतिरिक्त इन्होंने कहानियाँ, उपन्यास और नाटक भी लिखे हैं, किन्तु कवि रूप में ये अधिक प्रसिद्ध है। पन्त जी के कवि रूप के विकास के तीन सोपान हैं—(1) छायावाद और मानवतावाद, (2) प्रगतिवाद या माक्संवाद तथा (3) नवचेतनावाद।।

  1. पन्त जी के विकास के प्रथम सोपान (जिसमें छायावादी प्रवृत्ति प्रमुख थी) की सूचक रचनाएँ हैं वीणा, ग्रन्थि, पल्लव और गुंजन। ‘वीणा’ में प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रति कवि का अनन्य अनुराग व्यक्त हुआ है। ‘ग्रन्थि’ से वह प्रेम की भूमिका में प्रवेश करता है और नारी-सौन्दर्य उसे आकृष्ट करने लगता है। ‘पल्लव’ छायावादी पन्त का चरमविन्दु है। अब तक कवि अपने ही सुख-दु:ख में केन्द्रित था, किन्तु ‘गुंजन’ से वह अपने में ही केन्द्रित न रहकर विस्तृत मानव-जीवन (मानवतावाद) की ओर उन्मुख होता है।
  2. द्वितीय सोपान के अन्तर्गत तीन रचनाएँ आती हैं-युगान्त, युगवाणी और ग्राम्या। इस काल में कवि पहले ‘गाँधीवाद’ और बाद में ‘मार्क्सवाद’ से प्रभावित होकर फिर प्रगतिवादी बन जाता है।
  3. मार्क्सवाद की भौतिक स्थूलता पन्त जी के मूल संस्कारी कोमल स्वभाव के विपरीत थी। इस कारण वह तृतीय सोपान में वे पुनः अन्तर्जगत् की ओर मुड़े। इस काल की प्रमुख रचनाएँ हैंस्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, उत्तरा, अतिमा, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, किरण, पतझर-एक भाव क्रान्ति और गीतहंसः इस काल में कवि पहले विवेकानन्द और रामतीर्थ से तथा बाद में अरविन्द-दर्शन से प्रभावित होता है।

सन् 1955 ई० के बाद की पन्त जी की कुछ रचनाओं (कौए, मेंढक आदि) पर प्रयोगवादी कविता का प्रभाव है, पर कवि का यह रूप भी सहज न होने से वह इसे भी छोड़कर अपने प्राकृत (वास्तविक) रूप पर लौट आया।

साहित्य में स्थान-पन्त जी निर्विवाद रूप से एक सजग प्रतिभाशाली कलाकार थे। इनकी काव्य-साधना सतत विकासोन्मुखी रही है। ये अपने काव्य के बाह्य और आन्तरिक दोनों पक्षों को सँवारने में सदैव सचेष्ट रहे हैं। प्रकृति के सर्वाधिक सशक्त चितेरे के रूप में आधुनिक हिन्दी-काव्य में ये सर्वोपरि हैं। पन्त जी निश्चित ही हिन्दी-कविता के श्रृंगार हैं, जिन्हें पाकर माँ भारती कृतार्थ हुई है।

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोचर

नौका-विहार

प्रश्न–दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
जब पहँची चपला बीच धार,
छिप गया चाँदनी का कगार !
दो बाहों से दूरस्थ तीर धारा का कृश कोमल शरीर
आलिंगन करने को अधीर !
अति दूर, क्षितिज पर विटप-माल लगती भू-रेखा-सी अराल,
अपलक नभ नील-नयन विशाल;
माँ के उर पर शिशु-सा, समीप, सोया धारा में एक द्वीप,
उर्मिल प्रवाह को कर प्रतीप,
वह कौन विहग? क्या विकल कोक, उड़ता हरने निज विरह शोक?
छाया की कोकी को विलोक !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कब चाँद-सा चमकता हुआ रेत का कगार कवि की आँखों से ओझल हो गया?
(iv) धारा के बीच से देखने पर गंगा के दोनों तट किसके समान लगते हैं?
(v) धारा के बीच स्थित द्वीप कैसा दिखाई पड़ता है?
उत्तर
(i) यह पद्यांश कविवर सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘नौका-विहार’ शीर्षक कविता से उद्धत है। और हमारी पाठ्यपुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित है।
अथवा
शीर्षक नाम- नौका-विहार।।
कवि का नाम–सुमित्रानन्दन पन्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-जब नौका गंगा की बीच धारा में पहुँची तो हमने देखा कि चाँदनी में चाँद-सा चमकता हुआ रेतीला कगार हमारी दृष्टि से ओझल हो गया। गंगा के दूर-दूर स्थित दोनों तट फैली हुई दो बाँहों के समान लग रहे थे, जो गंगा-धारा के दुबले-पतले कोमल नारी शरीर का आलिंगन करने के लिए अधीर थे; अर्थात् अपने में कस लेना चाहते थे।
(iii) जब नाव बीच धारा में पहुंची तब कवि ने देखा कि चाँदनी रात में चाँद-सा चमकता हुआ रेतीला कगार आँखों से ओझल हो गया।
(iv) धारा के बीच में देखने पर गंगा के दोनों तट फैली हुई दो भुजाओं के समान लग रहे हैं, जो गंगा के दुबले-पतले शरीर का आलिंगन करने के लिए अधीर हैं।
(v) धारा के बीच स्थित द्वीप ऐसा दिखाई पड़ता है जैसे माँ की छाती से चिपककर कोई नन्हा बालक सोया हुआ हो।

प्रश्न 2.
ज्यों-ज्यों लगती है नाव पार
उर में आलोकित शत विचार ।
इस धारा-सा ही जग का क्रम, शाश्वत इस जीवन का उद्गम,
शाश्वत है गति, शाश्वत संगम !
शाश्वत नभ का नीला विकास, शाश्वत शशि का यह रजत हास,
शाश्वत लघु लहरों का विलास !
हे जग-जीवन के कर्णधार ! चिर जन्म-मरण के आर-पार,
शाश्वत जीवन-नौका-विहार?
मैं भूल गया अस्तित्व ज्ञान, जीवन का यह शाश्वत प्रमाण,
करता मुझको मरत्व दान !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) इस संसार की गति कवि को किसके समान लगती है?
(iv) गंगा के दोनों किनारे कवि को किसके समान लगते हैं?
(v) कवि क्या भूल गया था?
उत्तर
(i) यह पद्यांश कविवर सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘नौका-विहार’ शीर्षक कविता से उद्धत है। और हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित है।
अथवा
शीर्षक का नाम- नौका-विहार।
कवि का नाम–सुमित्रानन्दन पन्त।।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-जिस प्रकार गंगा की धारा अनादि काल से प्रवाहित होती चली आ रही है, उसी प्रकार यह जगत् (संसार) भी अनादि काल से चला आ रहा है। जिस प्रकार गंगा के जल का उद्गम, प्रवाह एवं सागर में मिलना शाश्वत (निश्चित) है उसी प्रकार जीवन का उत्पन्न होना, गतिशील होना और अन्त में विराट तत्त्व में विलीन हो जाना भी सनातन ही है।
(iii) इस संसार की गति कवि को धारा के समान ही लगती है।
(iv) गंगा के दोनों किनारे जन्म और मृत्यु के समान सनातन लगते हैं।
(v) कवि जीवन का वास्तविकस्वरूप भूल गया था।

परिवर्तन

प्रश्न 1.
आज बचपन का कोमल गात
जरा को पीला पात !
चार दिन सुखदै चाँदनी रात
और फिर अन्धकार, अज्ञात !
शिशिर-सा झर नयनों का नीर
झुलस देता गालों के फूल ।
प्रणय का चुम्बन छोड़ अधीर
अधर जाते अधरों को भूल !
मृदुल होठों का हिमजले हास
उड़ा जाता नि:श्वास समीर,
सरल भौंहों का शरदाकाश
घेर लेते घन, घिर गम्भीर !
शून्य साँसों का विधुर वियोग
छुड़ाता अधर मधुर संयोग,
मिलन के पल केवल दो चार,
विरह के कल्प अपार !
अरे, वे अपलक चार नयन,
आठ आँसू रोते निरुपाय,
उठे रोओं के आलिंगन
कसक उठते काँटों-से हाय !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) बचपन का कोमल और सुन्दर शरीर वृद्धावस्था आने पर कैसा हो जाता है।
(iv) वृद्धावस्था की गहरी साँसें किसे उड़ा देती हैं?
(v) कवि ने सुःख और दुःख की क्या समयावधि बतायी है?
उत्तर
(i) यह पद्यांश श्री सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘परिवर्तन’ शीर्षक कविता से उद्धत है। यह कविता हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित है।
अथवा
शीर्षक का नाम— परिवर्तन।
कवि का नाम–सुमित्रानन्दन पन्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-मनुष्य को इस संसार में प्रियजनों से मिलने का सुख बहुधा कुछ ही पल मिल पाता है। अभी वह उन क्षणों को पूर्ण आनन्द भी नहीं ले पाता कि वियोग का क्षण आ पहुँचता है, जो अनन्त काल तक खिंचता चला जाता है। वस्तुत: समय की गति संयोग में अत्यधिक अल्पकालिक और वियोग में अत्यन्त दीर्घकालिक हो जाती है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता। मिलन-विरह समकालिक है। मिलन के क्षण आनन्द की अनुभूति कराते हैं इसलिए वे शीघ्र बीत गये प्रतीत होते हैं, जबकि विरह के क्षण दु:खपूर्ण होते हैं। कष्ट से व्यतीत होने के कारण वे स्थायी रूप से रुक गये प्रतीत होते हैं।
(iii) बचपन का कोमल शरीर वृद्धावस्था आने पर पीले, सूखे, खुरदरे पत्ते के समान हो जाता है।
(iv) वृद्धावस्था की गहरी साँसें बचपन की होंठों पर ओस की बूंद के समान निर्मल और मोहक हँसी को उड़ा देती हैं।
(v) कवि ने सु:ख के क्षणों को दो-चार दिन यानी बहुत कम तथा दु:ख के समय को कल्पों के समान लम्बा (लगभग सम्पूर्ण जीवन) बताया है।

प्रश्न 2.
अहे निष्ठुर परिवर्तन !
तुम्हारा ही तांडव नर्तन
विश्व का करुण विवर्तन !
तुम्हारा ही नयनोन्मीलन,
निखिल उत्थान, पतन !
अहे वासुकि सहस्रफन !
लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे चिह्न निरन्तर
छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षःस्थल पर !
शत-शत फेनोच्छ्वसित, स्फीत फूत्कार भयंकर
घुमा रहे हैं घनाकार जगती का अम्बर ।
मृत्यु तुम्हारा गरल दंत, कंचुक कल्पान्तर
अखिल विश्व ही विवर,
वक्र कुण्डल
दिङमंडल !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कवि ने निष्ठुर किसे कहा है?
(iv) नित्यप्रति होने वाले परिवर्तन किसके समान दृष्टिगोचर नहीं होते?
(v) कवि ने मृत्यु को क्या बताया है?
उत्तर
(i) यह पद्यांश श्री सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘परिवर्तन’ शीर्षक कविता से उद्धत है। यह कविता हमारी पाठ्य-पुस्तक काव्यांजलि’ में संकलित है।
अथवा
शीर्षक का नाम – परिवर्तन।
कवि का नाम–सुमित्रानन्दन पन्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कवि ने परिवर्तन को हजार फनों वाले नागराज वासुकि का रूप दिया है। और बताया है कि परिवर्तन रूपी सर्प के रहने का बिल (विवर) सम्पूर्ण विश्व है, क्योंकि परिवर्तन सर्वत्र ही व्याप्त है। सम्पूर्ण दिशाओं का मण्डल ही इसकी गोलाकार कुण्डली है। सभी दिशाओं और सम्पूर्ण संसार में ऐसा कोई भी स्थान नहीं बचा है जहाँ परिवर्तन का प्रभाव न होता हो।
(iii) कवि ने परिवर्तन को निष्ठुर कहा है।
(iv) नित्यप्रति होने वाले परिवर्तन वासुकि सर्प के पैरों के समान दृष्टिगोचर नहीं होते।
(v) कवि ने मृत्यु को वासुकि नाग का विषैला दाँत बताया है।

बापू के प्रति

प्रश्न 1.
तुम मांसहीन, तुम रक्तहीन
हे अस्थिशेष ! तुम अस्थिहीन,
तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल,
हे चिर पुराण ! हे चिर नवीन !
तुम पूर्ण इकाई जीवन की,
जिसमें असार भव-शून्य लीन,
आधार अमर, होगी जिस पर ।
भावी की संस्कृति समासीन ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कौन हइडियों का ढाँचा मात्र प्रतीत होते हैं?
(iv) गाँधी जी को कवि ने चिर पुराण तथा चिर नवीन क्यों कहा है?
(v) गाँधी जी के आदर्शों पर भविष्य में किसे खड़ा होना पड़ेगा?
उत्तर
(i) यह पद्यांश श्री सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘बापू के प्रति’ शीर्षक कविता से उद्धत है। यह कविता हमारी पाठ्य-पुस्तक काव्यांजलि’ में संकलित है।
अथवा
शीर्षक का नाम- बापू के प्रति।।
कवि का नाम–सुमित्रानन्दन पन्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–हे बापू! जैसी जीवन्मुक्त योगियों की दशा होती है, वैसी ही दशा आपकी भी है। तुममें मानव-जीवन की पूर्णता (चरम आदर्श) निहित है, जिसमें (अर्थात् पूर्णता में) विश्व की समस्त असारता लीन हो जाएगी। आशय यह है कि संसार तुम्हारे मार्ग पर चलकर अपना खोखलापन दूर करके मानव-जीवन की चरम सार्थकता को प्राप्त करेगा। तुम जिन सिद्धान्तों के आधार पर खड़े हो, वे अमर हैं, शाश्वत हैं। इसलिए भविष्य की मानव-संस्कृति को तुम्हारे ही आदर्शों पर खड़े
होना पड़ेगा; अर्थात् आपके द्वारा दिये गये विचार और ज्ञान ही मानव-जाति के लिए आधार होंगे।
(iii) गाँधी जी देखने में हड्डियों का ढाँचा मात्र प्रतीत होते हैं।
(iv) गाँधी जी को शुद्ध ज्ञानस्वरूप आत्मा अर्थात् आत्मस्वरूप होने के कारण कवि ने चिर पुराण तथा चिर नवीन कहा है।
(v) गाँधी जी के आदर्शों पर भविष्य की मानव-संस्कृति को खड़ा होना पड़ेगा।

प्रश्न 2.
सुख भोग खोजने आते सब,
आये तुम करने सत्य-खोज,
जग की मिट्टी के पुतले जन,
तुम आत्मा के, मन के मनोज !
जड़ता, हिंसा, स्पर्धा में भर
चेतना, अहिंसा, नम्र ओज,
पशुता का पंकज बना दिया
तुमने मानवता का सरोज ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) अधिकांश मनुष्य संसार में आकर किसकी खोज में लग जाते हैं?
(iv) गाँधी जी का भौतिकवादी मनुष्य पर क्या प्रभाव पड़ा?
(v) ‘तुम आत्मा के, मन के मनोज!’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार होगा?
उत्तर
(i) यह पद्यांश श्री सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘बापू के प्रति’ शीर्षक कविता से उद्धृत है। यह कविता हमारी पाठ्य-पुस्तक काव्यांजलि’ में संकलित है।
अथवा
शीर्षक का नाम- बापू के प्रति।
कवि का नाम–सुमित्रानन्दन पन्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-वह पशुता की कीचड़ से उत्पन्न कमलवत् था। तुमने उसे मानवीयतारूपी निर्मल जल वाले सरोवर से उत्पन्न कमल बना दिया; अर्थात् तुमने भौतिकवादी मनुष्य को अध्यात्मवादी बना दिया।
(iii) अधिकांश मनुष्य संसार में सुख की खोज में लग जाते हैं।
(iv) गाँधी जी ने भौतिकवादी मनुष्य को अध्यात्मवादी बना दिया अर्थात् लोगों को मानवीय गुणों के आधार पर जीना सिखा दिया।
(v) रूपक अलंकार।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 3 जयशंकर प्रसाद

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name जयशंकर प्रसाद
Number of Questions 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 3 जयशंकर प्रसाद

कवि का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
जयशंकर प्रसाद का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए। [2010, 11, 16, 17]
या
जयशंकर प्रसाद को साहित्यिक परिचय लिखते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। [2012, 13, 16, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय-जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में माघ शुक्ल दशमी संवत् 1945 वि० (सन् 1889 ई०) में हुआ था। इनके पिता का नाम देवीप्रसाद था। ये तम्बाकू के एक प्रसिद्ध व्यापारी थे। बचपन में ही पिता की मृत्यु हो जाने से इनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। घर पर ही इन्होंने हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, फारसी का गहन अध्ययन किया। ये बड़े मिलनसार, हँसमुख तथा सरल स्वभाव के थे। इनका बचपन बहुत सुख से बीता, किन्तु उदार प्रकृति तथा दानशीलता के कारण ये ऋणी हो गये। अपनी पैतृक सम्पत्ति का कुछ भाग बेचकर इन्होंने ऋण से छुटकारा पाया। अपने जीवन में इन्होंने कभी अपने व्यवसाय की ओर ध्यान नहीं दिया। परिणामस्वरूप इनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ती गयी और चिन्ताओं ने इन्हें घेर लिया।

बाल्यावस्था से ही इन्हें काव्य के प्रति अनुराग था, जो उत्तरोत्तर बढ़ता ही गया। ये बड़े स्वाभिमानी थे, अपनी कहानी अथवा कविता के लिए पुरस्कारस्वरूप एक पैसा भी नहीं लेते थे। यद्यपि इनका जीवन बड़ा नपा-तुला और संयमशील था, किन्तु दु:खों के निरन्तर आघातों से ये न बच सके और संवत् 1994 वि० ( सन् 1937 ई०) में अल्पावस्था में ही क्षय रोग से ग्रस्त होकर स्वर्ग सिधार गये। साहित्यिक सेवाएँ-श्री जयशंकर प्रसाद छायावाद के प्रवर्तक, उन्नायक तथा प्रतिनिधि कवि होने के साथ-साथ युग प्रवर्तक नाटककार, कथाकार तथा उपन्यासकार भी थे। विशुद्ध मानवतावादी दृष्टिकोण वाले प्रसाद जी ने अपने काव्य में आध्यात्मिक आनन्दवाद की प्रतिष्ठा की है। प्रेम और सौन्दर्य इनके काव्य के प्रमुख विषय रहे हैं, किन्तु मानवीय संवेदना उनकी कविता का प्राण है।

रचनाएँ–प्रसाद जी अनेक विषयों एवं भाषाओं के प्रकाण्ड पण्डित और प्रतिभासम्पन्न कवि थे। इन्होंने नाटक, उपन्यास, कहानी, निबन्ध आदि सभी साहित्यिक विधाओं पर अपनी लेखनी चलायी और अपने कृतित्व से इन्हें अलंकृत किया। इनका काव्य हिन्दी-साहित्य की अमूल्य निधि है। इनके प्रमुख काव्यग्रन्थों का विवरण निम्नवत् है-
कामायनी—यह प्रसाद जी की कालजयी रचना है। इसमें मानव को श्रद्धा और मनु के माध्यम से हृदय और बुद्धि के समन्वय का सन्देश दिया गया है। इस रचना पर कवि को मंगलाप्रसाद पारितोषिक भी मिल चुका है।
आँसू-यह प्रसाद जी का वियोग का काव्य है। इसमें वियोगजनित पीड़ा और दु:ख मुखर हो उठा है।
लहर—यह प्रसाद जी का भावात्मक काव्य-संग्रह है।
झरना—इसमें प्रसाद जी की छायावादी कविताएँ संकलित हैं, जिसमें सौन्दर्य और प्रेम की अनुभूति साकार हो उठी है।
कहानी—आकाशदीप, इन्द्रजाल, प्रतिध्वनि, आँधी।
उपन्यास-कंकाल, तितली, इरावती (अपूर्ण)।
निबन्ध-काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध।
चम्पू-प्रेम राज्य। इनके अन्य काव्य-ग्रन्थ चित्राधार, कानन-कुसुम, करुणालय, महाराणा को महत्त्व, प्रेम-पथिक आदि हैं।
साहित्य में स्थान–प्रसाद जी असाधारण प्रतिभाशाली कवि थे। उनके काव्य में एक ऐसा नैसर्गिक आकर्षण एवं चमत्कार है कि सहृदय पाठक उसमें रसमग्न होकर अपनी सुध-बुध खो बैठता है। निस्सन्देह वे आधुनिक हिन्दी-काव्य-गगन के अप्रतिम तेजोमय मार्तण्ड हैं।

‘पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोवर

गीत

प्रश्न-दिए गए पद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
बीती विभावरी जाग री ।
अम्बर-पनघट में डुबो रही-
तारा-घट ऊषा-नागरी ।
खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय को अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लायी—
मधु-मुकुल नवल रस-गागरी ।
अधरों में राग अमन्द पिये,
अलकों में मलयज बन्द किये–
तू अब तक सोयी है आली !
आँखों में भरे विहाग री।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रस्तुत पंक्तियों में किस समय का सुन्दर वर्णन किया गया है?
(iv) कौन आकाशरूपी पनघट पर तारारूपी घड़े को डुबो रहा है? ।
(v) ‘खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गीत महाकवि श्री जयशंकर प्रसाद के ‘लहर’ नामक कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘गीत’ शीर्षक रचना से उद्धत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- गीत।
कवि का नाम-जयशंकर प्रसाद।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-इस गीत में मानवीकरण द्वारा प्रात:काल की शोभा का सुन्दर चित्रण किया गया है। एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि हे सखी! रात बीत चुकी है। अब तू उठ। आकाशरूपी पनघट पर ऊषारूपी चतुर नारी तारारूपी घड़ा डुबो रही है; अर्थात् तारे एक-एक करके छिपते चले जा रहे हैं।
(iii) प्रस्तुत पंक्तियों में प्रात:काल की शोभा का सुन्दर वर्णन किया गया है।
(iv) उषारूपी चतुर नारी आकाशरूपी पनघट पर तारारूपी घड़े को डुबो रही है।
(v) अलंकार-अनुप्रास, रूपक।

श्रद्धा-मनु

प्रश्न–दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
“कौन तुम ? संसृति-जलनिधि तीर
तरंगों से फेंकी मणि एक,
कर रहे निर्जन का चुपचाप
प्रभा की धारा से अभिषेक ?
मधुर विश्रान्त और एकान्त–
जगत का सुलझा हुआ रहस्य
एक करुणामय सुन्दर मौन
और चंचल मन का आलस्य !”
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) उक्त पंक्तियों में कौन किसका परिचय पूछ रहा है?
(iv) कौन अपनी कान्ति से वीराने को शोभायमान कर रहा है?
(v) ‘प्रभा की धारा से अभिषेक?’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री जयशंकर प्रसाद के ‘कामायनी’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘श्रद्धा-मनु’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- श्रद्धा-मेनु।
कवि का नाम-जयशंकर प्रसाद।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत पद्यांश में श्रद्धा मनु से उनका परिचय पूछ रही है कि संसाररूपी सागर के तट पर तरंगों (लहरों) द्वारा फेंकी गयी किसी मणि के सदृश तुम कौन हो, जो चुपचाप बैठे अपनी शोभा की किरणों से इस निर्जन प्रदेश को स्नान करा रहे हो; अर्थात् जिस प्रकार लहरें समुद्र के तल से किसी मणि को उठाकर तट पर पटक देती हैं, उसी प्रकार सांसारिक आघातों से ठुकराये हुए हे भव्य पुरुष! तुम कौन हो?
(iii) उक्त पंक्तियों में श्रद्धा मनु का परिचय पूछ रही हैं।
(iv) मनु भव्य पुरुष की भाँति अपनी कांति से वीराने को शोभायमान कर रहे हैं।
(v) रूपक अलंकार।।

प्रश्न 2.
समर्पण लो सेवा का सार
सजल संसृति का यह पतवार;
आज से यह जीवन उत्सर्ग
इसी पद तल में विगत विकार।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) श्रद्धा किसकी जीवनसंगिनी बनकर सेवा करना चाहती हैं?
(iv) किसका समर्पण मनु की जीवन-नौका के लिए पतवार के समान सिद्ध होगा?
(v) ‘सजल संसृति का यह पतवार।’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री जयशंकर प्रसाद के ‘कामायनी’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘श्रद्धा-मनु’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- श्रद्धा-मनु।
कवि का नाम-जयशंकर प्रसाद।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-श्रद्धा मानवता को सफल और समृद्ध बनाने के लिए मनु के समक्ष आत्मसमर्पण करती है और कहानी है कि यह मेरा आत्मसमर्पण संसार-सागर में निरुद्देश्य भटकने वाली तुम्हारी जीवन-नौका के लिए पतवार के समान सिद्ध होगा अर्थात् तुम्हारे जीवन को निश्चित दिशा देगा। आज से तुम्हारे चरणों में बिना किसी स्वार्थभावना के मैं अपने जीवन को न्योछावर करती हूँ।
(iii) श्रद्धा मनु की जीवनसंगिनी बनकर उनकी सेवा करना चाहती हैं।
(iv) श्रद्धा का समर्पण मनु की जीवन-नौका के लिए पतवार के समान सिद्ध होगा।
(v) अनुप्रास अलंकार।।

प्रश्न 3.
डरो मत अरे अमृत सन्तान
अग्रसर है। मंगलमय वृद्धि
पूर्ण आकर्षण जीवन-केन्द्र
खिंची आवेगी सकल समृद्धि!
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) मनु ने संसार और जीवन को क्या मान लिया था?
(iv) श्रद्धा मनु को किसकी संतान बताकर उत्साहित करती हैं?
(v) कब सकल समृद्धि पास खिंची चली आएगी?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री जयशंकर प्रसाद के ‘कामायनी’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘श्रद्धा-मनु’ शीर्षक कविता से उद्धत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- श्रद्धा-मनु।
कवि का नाम-जयशंकर प्रसाद।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रसाद जी के ‘कामायनी’ महाकाव्य की नायिका श्रद्धा निवृत्ति पथ पर अग्रसर मनु को प्रवृत्ति पथ पर लाने का प्रयास करती है। मनु ने संसार को निराशा से भरा और जीवन को उपायहीन मान लिया था। श्रद्धा उनमें जीवन के प्रति उत्साह भरती हुई कहती है कि तुम कभी न मरने वाले देवताओं की सन्तान हो; अत: भयभीत क्यों होते हो? तुम्हारे सामने मंगलों की भरपूर समृद्धि है। तुम उसे पाने का साहस तो करके देखो।
(iii) मनु ने संसार को निराशा से भरा और जीवन को उपायहीन मान लिया था।
(iv) श्रद्धा मनु को कभी न मरने वाले देवताओं की संतान बताकर उत्साहित करती हैं।
(v) जब भय समाप्त हो जाएगा और मन के अन्दर जीने का उत्साह पैदा हो जाएगा तब सेब सकल समृद्धि पास खिंची चली आएगी।

प्रश्न 4.
शक्ति के विद्युत्कण जो व्यस्त
विकल बिखरे हैं, हो निरुपाय;
समन्वय उसका करे समस्त ।
विजयिनी मानवता हो जाय।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) इन पंक्तियों में श्रद्धा ने मनु को कौन-सी बात बताई है?
(iv) समस्त सृष्टि की रचना किनसे हुई है?
(v) श्रद्धा मनु को किस प्रकार मानवता का साम्राज्य स्थापित करने के लिए प्रेरित करती हैं?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री जयशंकर प्रसाद के ‘कामायनी’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘श्रद्धा-मनु’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- श्रद्धा-मनु।।
कवि का नाम-जयशंकर प्रसाद।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-श्रद्धा मनु से कहती है कि जीवन के प्रति हताशा और निराशा को त्यागकर आपको लोक-मंगल के कार्यों में लगना चाहिए। इसके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण और मुख्य कार्य संसार की विभिन्न शक्तियों में पारस्परिक समन्वय स्थापित करना है। विश्व की विद्युत्-कणों के समान जो भी करोड़ों-करोड़ शक्तियाँ हैं, वे सब बिखरी पड़ी हैं, जिस कारण जीवन में उनका कोई भी उपयोग नहीं हो पा रहा है। उन सब शक्तियों को एकत्रित कीजिए और उनमें आया समन्वय स्थापित कीजिए, जिससे उन शक्तियों का अधिक-से-अधिक उपयोग हो सके। इसी में मानवता का कल्याण निहित है। यदि आप यह समन्वय स्थापित करने में सफल हो गए तो सर्वत्र मानवता का साम्राज्य स्थापित हो जाएगा।
(iii) इन पंक्तियों में श्रद्धा ने मनु को मानवता की विजय का उपाय बताया है।
(iv) समस्त सृष्टि की रचना शक्तिशाली विद्युत्-कणों से हुई है।
(v) श्रद्धा ने मनु को बिखरी पड़ी समस्त शक्तियों को एकत्रित करके उनके उपयोग द्वारा मानवता का साम्राज्य स्थापित करने के लिए प्रेरित किया है।

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