UP Board Solutions for Class 12 Civics भारत की विदेश नीति

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Civics
Chapter 22 c
Chapter Name भारत की विदेश नीति
Number of Questions Solved 31
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Civics भारत की विदेश नीति

विस्तृत उत्तीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1.
भारत की विदेश नीति की विवेचना कीजिए। भारत की विदेशी नीति का सबसे प्रमुख लक्षण क्या है?
या
भारत की विदेश नीति के निर्माता के रूप में पं० जवाहरलाल नेहरू के योगदान का परीक्षण कीजिए।
या
पंचशील के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। [2013, 14]
उत्तर :
भारत की विदेश नीति 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतन्त्र हो गया और 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू हो जाने के बाद से भारत प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य बन गया। पण्डित जवाहरलाल नेहरू स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री बने और डॉ० राजेन्द्र प्रसाद प्रथम राष्ट्रपति। अब तक भारत की विदेश नीति के मूलाधार पण्डित जवाहरलाल नेहरू द्वारा स्थापित आदर्श रहे हैं। भारत की विदेश नीति उनके द्वारा दिखाये गये अहिंसा, मैत्री, मानवता, सहयोग और स्नेह के सद्गुणों पर आधारित रही है। पण्डित नेहरू ने बुद्ध के पंचशील जैसे महान् शब्द को लेकर अपनी विदेश नीति में पंचशील को मुख्य आधार बनाया था। भारत की विदेश नीति विश्व के सभी राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने में सहायक रही है। इस विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्य और आधार निम्नलिखित हैं –

1. शान्ति का पोषक – भारत का सदैव से यही प्रयास रहा है कि विश्व से युद्धों की समाप्ति हो, विस्फोटक वातावरण के स्थान पर शान्ति का वातावरण स्थापित हो। विश्व में शान्ति स्थापित करने के उद्देश्य से भारत ने सदैव ही विश्व के सभी राष्ट्रों से मैत्री बनाये रखने का प्रयत्न किया है। पण्डित नेहरू और अमेरिका के राष्ट्रपति कैनेडी ने मिलकर विश्व शान्ति का पोषण करने में सक्रिय कार्य किये। पण्डित नेहरू ने सोवियत संघ के साथ भी मधुर सम्बन्ध बनाये रखे। श्रीमती इन्दिरा गाँधी और श्री राजीव गाँधी ने भी विश्व में शान्ति स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।

2. संयुक्त राष्ट्र संघ में विश्वास – विश्व के अन्तर्राष्ट्रीय संघ संयुक्त राष्ट्र संघ में भी भारत ने सदैव पूरी रुचि ली है तथा इसके द्वारा आयोजित कार्यक्रमों और निर्देशों का सदा तत्परता से पालन किया है। कश्मीर के मामले को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्देश पर भारत ने तुरन्त युद्ध-विराम कर लिया था। इसके अतिरिक्त विश्व के विभिन्न देशों-कोरिया, कांगो, वियतनाम, बांग्लादेश, इजरायल, अफगानिस्तान, हंगरी और स्वेज नहर आदि की समस्या सुलझाने में भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ को पूर्ण सहयोग दिया।

3. गुट-निरपेक्षता की नीति – पं० जवाहरलाल नेहरू ने एक नीति विकसित की थी कि हम किसी एक गुट के साथ न तो विशेष मित्रता रखेंगे और न ही शत्रुता। हम तटस्थ रहेंगे। हमारा उद्देश्य विश्व के दोनों गुटों के मध्य मधुर सम्बन्ध बनाना रहेगा। यह गुट-निरपेक्षता की नीति बहुत लोकप्रिय हुई थी। विश्व के बहुत-से राष्ट्र इस गुट-निरपेक्षता की नीति का पालन करते हैं। अब तो गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों का एक प्रबल संगठन बन गया है। श्रीमती इन्दिरा गाँधी के शासनकाल में यह गुट-निरपेक्षता का कार्य बहुत तेजी से हुआ। वे 1983 ई० में इस संगठन की अध्यक्षा थीं और उनके नेतृत्व में ही सातवाँ गुट-निरपेक्ष सम्मेलन दिल्ली में 7 मार्च से 12 मार्च, 1983 तक हुआ जिसमें 101 देशों ने भाग लिया। स्व० प्रधानमन्त्री श्री राजीव गाँधी ने भी गुट-निरपेक्ष नीति का ही पालन किया है। 16वाँ गुट-निरपेक्ष सम्मेलन 26 अगस्त से 31 अगस्त तक तेहरान (ईरान) में सम्पन्न हुआ था। भारत की ओर से हमारे प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने इस सम्मेलन में सक्रिय भूमिका निभाई तथा गुट-निरपेक्ष आन्दोलन (NAM) को और अधिक प्रभावी बनाने हेतु विभिन्न सुझाव प्रस्तुत किये।

4. पंचशील : विदेश नीति की आत्मा – पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने जब भारत की विदेश नीति के आदर्श और व्यवहार निर्धारित किये, तब उन्होंने पाँच मुख्य ध्येय निर्धारित किये। भगवान् बुद्ध के पंचशील शब्द से प्रेरणा पाकर नेहरू जी ने इन्हें पंचशील की संज्ञा दी। ये पंचशील यथार्थ में भारत की विदेश नीति की आत्मा बन गये। इसलिए इन पर ही भारत की विदेश नीति आधारित थी। ये पंचशील के सिद्धान्त निम्नलिखित हैं –

  1. अखण्डता की रक्षा – सभी राष्ट्रों को एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता की रक्षा करनी चाहिए। एक-दूसरे की स्वतन्त्रता और राष्ट्रीय सीमा का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। यह मैत्री और सार्वभौमिकता का महान् सिद्धान्त है।
  2. युद्ध को टालना – भारत कभी भी निरुद्देश्य युद्ध नहीं करेगा और दूसरे देशों के साथ भी यही प्रयास करेगा कि वे युद्ध न करें।
  3. गृह-नीति में हस्तक्षेप न करना – सभी राष्ट्रों को एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
  4. सहयोग की नीति – सभी राष्ट्रों को मानवता के आदर्श का पालन करते हुए एक-दूसरे का सहयोग करना चाहिए और एक-दूसरे से सहयोग प्राप्त करना चाहिए।
  5. स्वतन्त्रता की रक्षा – कोई भी राष्ट्र कभी-भी ऐसा प्रयास न करे, जिससे किसी भी राष्ट्र का अस्तित्व खतरे में पड़ जाए।

भारत की विदेश नीति का एक लक्ष्य धीरे-धीरे यह बनता गया कि सोवियत रूस को अपना परम मित्र मानकर भारत उनकी ओर विशेष रूप से झुकता चला गया। यह प्रक्रिया पण्डित नेहरू के समय में ही प्रारम्भ हो गयी थी। लालबहादुर शास्त्री, श्रीमती इन्दिरा गाँधी और राजीव गाँधी ने भी सोवियत रूस से अत्यधिक मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध अपनाये। इस सन्दर्भ में भारत और सोवियत रूस के प्रमुख नेताओं की क्रमश: सोवियत और भारत यात्रा बहुत महत्त्वपूर्ण रही।

हाल ही में अमेरिका तथा भारत के सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आयी है।

इस तरह उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारत की विदेश नीति पंचशील आदर्शों पर आधारित रही है। सभी राष्ट्रों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध और पंचशील के महान् आदर्श इस विदेश नीति के प्रमुख आधार हैं। पं० जवाहरलाल नेहरू के अनुसार, “विश्व में शान्ति स्थापित करना ही हमारी वैदेशिक नीति का प्रमुख उद्देश्य है।”

प्रश्न 2.
भारतीय विदेश नीति की विशेषताएँ बताइए। [2009, 12, 13]
या
भारतीय विदेश नीति के प्रमुख लक्षणों को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए। [2010]
या
भारत की विदेश नीति के मूल (आधारभूत) सिद्धान्तों की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए। [2008, 13]
या
भारत की विदेशी नीति के प्रमुख तत्त्वों का परीक्षण कीजिए। [2009]
या
भारत की विदेशी नति के चार सिद्धान्तों को बताइए एवं पंचशील की व्याख्या कीजिए। भारतीय विदेश नीति के प्रमुख मूल सिद्धान्त क्या हैं? [2010, 11]
या
भारत की विदेश नीति के आधारभूत तत्त्वों (लक्षणों) का वर्णन कीजिए। [2017]
उत्तर :
भारतीय विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ (लक्षण) निम्नलिखित हैं –

1. राष्ट्रीय हित – किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति का प्रमुख आधार राष्ट्रीय हित होता है। भारतीय विदेश नीति के निर्धारण में भी इस तत्त्व का विशेष महत्त्व है। भारतीय विदेश नीति में राष्ट्रीय हित के महत्व को स्पष्ट करते हुए विदेश नीति के सृजनकर्ता कहे जाने वाले भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री नेहरू का मत था कि “हम चाहे कोई भी नीति निर्धारित करें, देश की वैदेशिक नीति से सम्बन्धित की गयी चतुरता राष्ट्रीय हित को सुरक्षित रखने में ही निहित है। भारत की प्रत्येक सरकार अपने राष्ट्रीय हितों को ही प्राथमिकता और सर्वोपरिता देगी। कोई भी सरकार ऐसे आचरण का खतरा नहीं उठा सकती जो राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल हो।’

2. गुट-निरपेक्षता की नीति – गुट-निरपेक्षता अथवा असंलग्नता की नीति भारतीय विदेश नीति की प्रमुख विशेषता है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय सम्पूर्ण विश्व को दो गुटों में बँटा देख भारतीय प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने नव स्वतन्त्र राष्ट्रों के लिए एक पृथक् सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, जिसके अन्तर्गत नवे स्वतन्त्र राष्ट्रों द्वारा दोनों गुटों से पृथक् रहने की नीति को अपनाया गया। गुटों से पृथक् रहने की इसी नीति को गुट-निरपेक्षता की नीति के नाम से जाना जाता है।

3. मैत्री और सह-अस्तित्व की नीति – भारतीय विदेश नीति की एक अन्य प्रमुख विशेषता मैत्री और शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व पर बल देती है। भारत विश्व के सभी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों को बनाने में विश्वास रखता है।

4. विरोधी गुटों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने पर बल – भारतीय विदेश नीति द्वारा विश्व के दोनों विरोधी गुटों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने के महत्त्वपूर्ण प्रयास किये गये हैं। इस सम्बन्ध में भारत ने विश्व राजनीति में शक्ति का सन्तुलन बनाये रखने में दोनों गुटों के मध्य कड़ी का कार्य किया है।

5. साधनों की पवित्रता की नीति – भारतीय विदेश नीति साधनों की पवित्रता पर विशेष बल देती है। यह नैतिकता व आदर्शवादिता का समर्थन करती है तथा अनैतिकता व अवसरवादिता का घोरें विरोध करती है।

6. पंचशील – भारत शान्ति का पुजारी है, इसलिए उसने विश्व शान्ति स्थापित करने की नीति अपनायी है। 1954 ई० में उसने पंचशील को अपनी विदेश नीति का अंग बनाया। पंचशील का सिद्धान्त महात्मा बुद्ध के उन पाँच सिद्धान्तों पर आधारित है जो उन्होंने व्यक्तिगत आचरण के लिए निर्धारित किये थे। पंचशील के सिद्धान्तों का सूत्रपात पं० जवाहरलाल नेहरू व चीन के प्रधानमन्त्री चाऊ-एन-लाई के मध्य तिब्बत समझौते के समय हुआ था। पंचशील के पाँच सिद्धान्त निम्नलिखित हैं –

  1. सभी राष्ट्र एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता और प्रभुसत्ता का सम्मान करें।
  2. कोई राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण न करे और सभी राष्ट्र एक-दूसरे की स्वतन्त्रता का आदर करें।
  3. एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न किया जाए।
  4. प्रत्येक राष्ट्र एक-दूसरे के साथ समानता का व्यवहार करे तथा पारस्परिक हित में सहयोग करे।
  5. शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का सभी राष्ट्र पालन करें।

7. निःशस्त्रीकरण में आस्था – भारत हमेशा विश्व-शान्ति का समर्थक रहा है, इसलिए भारत ने सदैव नि:शस्त्रीकरण की प्रक्रिया का समर्थन किया है। भारत का मत है विश्व-शान्ति तभी स्थापित की जा सकती है जब भय और आतंक का वातावरण उत्पन्न करने वाली शस्त्रों की दौड़ से दूर रहा जाए और सभी राष्ट्र संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिज्ञा-पत्र का पूर्ण ईमानदारी एवं सच्चाई से पालन करें।

8. संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ सहयोग – भारत ने सदा ही विश्व-हितों को प्रमुखता दी है। प्रारम्भ से ही भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ सहयोग किया है। इसके महत्त्व के विषय में पं० नेहरू ने कहा था कि, “हम संयुक्त राष्ट्र संघ के बिना आधुनिक विश्व की कल्पना नहीं कर सकते।’ कोरिया, हिन्दचीन, साइप्रस एवं कांगो की समस्याओं के समाधान में भारत ने अपनी रुचि दिखलाई थी और संयुक्त राष्ट्र संघ के आदेश पर भारत ने यहाँ अपनी सेनाएँ भेजकर शान्ति-स्थापना में महत्त्वपूर्ण योग दिया था। भारत ने कभी अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं किया और संयुक्त राष्ट्र संघ के आदेशों का यथोचित सम्मान किया। भारत के यथोचित सम्मान दिये जाने के कारण ही भारत चार बार सुरक्षा परिषद् का अस्थायी सदस्य चुना गया। डॉ० राधाकृष्णन यूनेस्को के सर्वोच्च पद पर रहे। श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित साधारण सभा की सभापति रह चुकी हैं। प्रो० बी० ए० राव ने अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्य किया।

9. साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध – साम्राज्यवादी शोषण से त्रस्त भारत ने अपनी विदेश नीति में साम्राज्यवाद के प्रत्येक रूप का कटु विरोध किया है। भारत इस प्रकार की प्रवृत्तियों को विश्व-शान्ति एवं विश्व-व्यवस्था के लिए घातक एवं कलंकमय मानता है। 1956 ई० में जब इंग्लैण्ड व फ्रांस मिलकर मिस्र पर आक्रमण कर स्वेज नहर को हड़पना चाहते थे तो भारत ने इसे नवीन साम्राज्यवाद का घोर विरोध किया। भारत ने लीबिया, ट्यूनीशिया, मोरक्को, मलाया, अल्जीरिया आदि देशों के स्वतन्त्रता संग्राम का पूरा समर्थन किया। दक्षिणी अफ्रीका व रोडेशिया के प्रजातीय विभेद का भारत ने जोरदार विरोध किया और संयुक्त राष्ट्र संघ में यह प्रश्न उठाता रहा। के० एम० पणिक्कर के अनुसार, “भारत की नीति हमेशा से यही रही है कि यह पराधीन लोगों की स्वतन्त्रता के प्रति आवाज उठाता रहा है एवं भारत का दृढ़ विश्वास रहा है कि साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद हमेशा से आधुनिक युद्धों का कारण रहा है।”

इस प्रकार भारत की विदेश नीति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ सिद्धान्त का पालन कर रही है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (शब्द सीमा : 150 शब्द) (4 अंक)

प्रश्न 1.
भारत की विदेश नीति का सबसे मुख्य लक्षण क्या है?
उत्तर :
असंलग्नता या गुट-निरपेक्षता भारत की विदेश नीति का सबसे प्रमुख लक्षण है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद ही भारत के द्वारा निश्चित कर लिया गया कि भारत इन दोनों विरोधी गुटों में से किसी में भी शामिल न होते हुए विश्व के सभी देशों के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयत्न करेगा और इस दृष्टि से भारत के द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में असंलग्नता या गुट-निरपेक्षता की विदेश नीति का पालन किया जाएगा। वास्तव में भारत के द्वारा असंलग्नता की विदेश नीति को अपनाने के कुछ विशेष कारण थे। प्रथमतः यदि भारत किसी गुट की सदस्यता को स्वीकार कर लेता तो अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में उसकी स्वतन्त्रता समाप्त हो जाती। वह विश्व राजनीति में स्वतन्त्र रूप से भाग नहीं ले सकता था। दूसरे पक्ष के अनुसार ही अपनी विदेश नीति तय करनी पड़ती, अत: अपने सम्मान को बनाए रखने के लिए असंलग्नता की नीति ही श्रेयस्कर थी। द्वितीयतः सैकड़ों वर्षों के साम्राज्यवादी शोषण से मुक्ति के बाद भारत के सम्मुख सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न आर्थिक पुनर्निर्माण का था और आर्थिक पुनर्निर्माण का यह कार्य विश्व शान्ति के वातावरण में ही सम्भव था। अत: भारत के लिए यही स्वाभाविक था कि वह सैनिक गुटों से अलग रहते हुए अन्तर्राष्ट्रीय तनाव को कम करने का प्रयत्न करे। इस प्रकार राष्ट्रीय हितों और विश्व शान्ति के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए गुट-निरपेक्षता की विदेश नीति अपनायी गयी है।

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प्रश्न 2.
भारत की लुक ईस्ट (पूरब की ओर देखो) की नीति क्या है?
उत्तर :
‘पूरब की ओर देखो’ की नीति

वर्ष 1991 में रूस के विघटन तथा अमेरिका के नेतृत्व में उभरती एक ध्रुवीय व्यवस्था व वैश्वीकरण के आलोक में भारत ने अपनी विदेश नीति को नया आयाम दिया तथा उसे व्यावहारिकता प्रदान की। 1991 में भारत ने ‘लुक ईस्ट’ नीति का आरम्भ किया जिसमें ‘एशियान’ (ASEAN) सहित पूर्वी एशिया के देशों के साथ घनिष्ठ आर्थिक व व्यापारिक सम्बन्धों का विस्तार करना था। शीत युद्ध के युग में भारत व पूर्वी एशिया के देशों के पारस्परिक सम्बन्धों को अधिक महत्त्व नहीं दिया गया।

1996 में भारत को ‘एशियान’ संगठन में पूर्ण वार्ताकार का दर्जा प्राप्त हुआ तथा तब से भारत लगातार इसकी शिखर-वार्ताओं में भाग लेता रहा है। वर्ष 2002 में एशियान-भारत शिखरवार्ताओं की शुरुआत हुई। इसी प्रकार सातवीं शिखर-वार्ता अक्टूबर, 2009 में चोम हुआ हिन (थाईलैण्ड) में तथा आठवीं शिखर-वार्ता 2 अक्टूबर, 2010 में हनोई में सम्पन्न हुई, जिसमें भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भाग लिया। भारत व एशियन के मध्य नौवीं शिखर-वार्ता 2011 में जकार्ता में तथा 10वीं शिखर-वार्ता 2012 में दिल्ली में सम्पन्न हुई। इसमें आतंकवाद के विरुद्ध संयुक्त लड़ाई हेतु सहमति बनी। एशियान देशों के साथ बढ़ते सम्बन्धों के कारण द्विपक्षीय व्यापार 1990 में 22.2 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2009 में 40 बिलियन डॉलर हो गया। भारत व एशियान देशों के मध्य अगस्त, 2009 में मुक्त व्यापार समझौता सम्पन्न हुआ, जिसमें 4,000 वस्तुओं पर सीमा कर में कटौती की जाएगी। इससे व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। यह समझौता 1 जनवरी, 2010 को लागू हो गया है। भारत ने 2005 से ही पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में प्रतिवर्ष भाग लेना आरम्भ किया है। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य यूरोपीय संघ की तर्ज पर पूर्वी एशिया में एक आर्थिक समुदाय का विकास करना है।

भारत ने 1996 में एशियान क्षेत्रीय मंच (ARF) की सदस्यता प्राप्त की थी। यह मंच एशियान क्षेत्र में सुरक्षा सम्बन्धी सहयोग का एक मंच है। भारत तथा पूर्वी एशिया के देशों ने यूरोपियन कम्युनिटी की तर्ज पर पूर्वी एशिया कम्युनिटी की स्थापना का लक्ष्य रखा है। भारत ने पूर्व की ओर देखो नीति की सफलता को देखते हुए इसके दूसरे चरण की शुरुआत 2001 में की, जहाँ इसके प्रथम चरण (1991-2001) में एशियान देशों के साथ आर्थिक व व्यापारिक सम्बन्धों को बढ़ावा दिया गया था। वहीं दूसरे चरण में एशियान के अतिरिक्त पूर्वी एशिया के अन्य देशों-दक्षिण कोरिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया आदि के साथ सम्बन्धों को बढ़ाता जा रहा है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (शब्द सीमा : 50 शब्द) (2 अंक)

प्रश्न 1.
भारत की विदेश नीति के उददेश्य बताइए। [2013]
उत्तर :
भारत की विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

  1. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाये रखना।
  2. सभी राज्यों और राष्ट्रों के बीच शान्तिपूर्ण और सम्मानपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखना।
  3. अन्तर्राष्ट्रीय कानून के प्रति और विभिन्न राष्ट्रों के पारस्परिक सम्बन्धों में सन्धियों के पालन के प्रति आस्था बनाये रखना।
  4. सैनिक गुटबन्दियों और समझौते से अपने आपको अलग रखना तथा ऐसी गुटबन्दियों को निरुत्साहित करना।
  5. उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का विरोध करना।

प्रश्न 2.
पंचशील के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। [2013]
उत्तर :
पंचशील के सिद्धान्त

भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख तत्त्व पंचशील या शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व के पाँच सिद्धान्त रहे। ये पाँच सिद्धान्त निम्नलिखित हैं –

  1. एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता और सर्वोच्च सत्ता के प्रति पारस्परिक सम्मान की भावना।
  2. एक-दूसरे के क्षेत्र पर आक्रमण का परित्याग।
  3. एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का संकल्प।
  4. समानती और पारस्परिक लाभ के सिद्धान्तों के आधार पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना। .
  5. शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व।

भारत इस बात के लिए प्रयत्नशील है कि विश्व के विभिन्न राज्यों के द्वारा अपने पारस्परिक व्यवहार में पंचशील के इन पाँचों सिद्धान्तों को स्वीकार कर लिया जाए। पंचशील के सिद्धान्तों को सबसे पहले अपनाने वाले देश चीन के द्वारा इन सिद्धान्तों का खुला उल्लंघन किया गया, किन्तु इससे पंचशील के सिद्धान्तों का महत्त्व कम नहीं हो जाता।

प्रश्न 3.
उत्तर-नेहरू युग में भारत की विदेश नीति की विवेचना कीजिए। [2010]
उत्तर :
उत्तर-नेहरू युग में भारत की विदेश नीति

1962 के पूर्व तक भारतीय विदेश नीति को सामान्यतया सफल समझा जाता था, लेकिन 1962 में चीन के बड़े पैमाने पर आक्रमण और भारतीय सेना की पराजय ने भारतीय विदेश नीति की सफलता के भ्रम को समाप्त कर दिया। अत: नेहरू युग में ही भारतीय विदेश नीति पर पुनर्विचार प्रारम्भ हो गया और इस पुनर्विचार के आधार पर उत्तर-नेहरू युग में भारतीय विदेश नीति ने आदर्शवादिता के स्थान पर राष्ट्रीय हितों के अनुरूप एक यथार्थवादी मोड़ ले लिया। शीतयुद्ध की समाप्ति के उपरान्त भारत ने अमेरिका के साथ अपने सम्बन्धों को सुधारा है। यह व्यावहारिकता का प्रतीक है। 2008 में अमेरिका के साथ भारत ने सिविल परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसी प्रकार राष्ट्रहित के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए भारत में पूर्वी एशिया, अफ्रीका सेण्ट्रल एशिया आदि के प्रति नीतियों में परिवर्तन किया है। भारतीय विदेश नीति की यह यथार्थवादिता जिन घटनाओं के रूप में देखी जा सकती है, उनमें दो-तीन निश्चित रूप से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

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प्रश्न 4.
भारत ने विश्व के विभिन्न देशों के साथ अपने सम्बन्धों के निर्धारण के लिए किन सिद्धान्तों का अनुसरण किया है?
उत्तर :
भारत ने विश्व के विभिन्न देशों के साथ अपने सम्बन्धों के निर्धारण के लिए निम्नलिखित सिद्धान्तों के अनुसरण का सदैव ध्यान रखा है –

  1. सम्पूर्ण विश्व में शान्ति और सुरक्षा का वातावरण बनाये रखने में हर सम्भव सहयोग देना।
  2. विश्व के सभी देशों से सम्मानजनक सम्बन्ध न्यायसंगत आधार पर बनाये रखना।
  3. विश्व के सभी देशों से मित्रतापूर्ण सम्बन्ध बनाये रखने के साथ अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों और सन्धियों का पूर्ण निष्ठा से पालन करने की दिशा में प्रयासरत रहना।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
किसी भी देश की विदेश नीति की मूल आधारशिला क्या होती है?
उत्तर :
किसी भी देश की विदेश नीति का सबसे प्रमुख आधार होता है-‘राष्ट्रीय हित’।

प्रश्न 2.
भारत व एशियान के मध्य मुक्त व्यापार समझौता कब लागू हुआ? (2012)
उत्तर :
भारत व एशियान मुक्त व्यापार समझौता वर्ष 2010 में लागू हुआ। इस समझौते पर हस्ताक्षर वर्ष 2009 में किए गए थे।

प्रश्न 3.
भारत ने प्रथम अणु परीक्षण कब किया व अन्तरिक्ष में पहला चरण कब आगे बढ़ाया?
उत्तर :
प्रथम अणु परीक्षण 18 मई, 1974 को पोखरण में किया गया और प्रथम भू-उपग्रह ‘आर्यभट्ट प्रथम’ 19 अप्रैल, 1975 को अन्तरिक्ष में भेजा गया।

प्रश्न 4.
1996 में आणविक निःशस्त्रीकरण के क्षेत्र में कौन-सी सन्धि सम्पन्न हुई है?
उत्तर :
1996 में व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध सन्धि’ सम्पन्न हुई है। यह सन्धि भेदभावपूर्ण है, इसलिए भारत ने इस सन्धि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं?

प्रश्न 5.
भारत ने दूसरी बार अणु परीक्षण कब किया?
उत्तर :
भारत ने दूसरी बार आणविक परीक्षण मई, 1998 में पाँच आणविक परीक्षण के रूप में किये।

प्रश्न 6.
भारत की विदेश नीति की दो मुख्य विशेषताएँ बताइए। [2007]
या
पंचशील के कोई दो मुख्य सिद्धान्त बताइए। [2016]
उत्तर :

  1. गुट-निरपेक्षता की नीति तथा
  2. विश्वशान्ति।

प्रश्न 7.
पंचशील के किसी एक सिद्धान्त का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
अहस्तक्षेप।

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प्रश्न 8.
इण्डिया, ब्राजील, साउथ अफ्रीका (IBSA) ‘इब्सा’ की स्थापना किस वर्ष हुई थी?
उतर :
इब्सा’ की स्थापना वर्ष 2003 में हुई थी।

प्रश्न 9.
पंचशील के दो सिद्धान्तों के नाम लिखिए। [2012, 14, 15, 16]
उतर :

  1. प्रादेशिक अखण्डता और प्रभुसत्ता का पारस्परिक सम्मान एवं
  2. समानता और पारस्परिक हित में सहयोग।

प्रश्न 10.
भारत की विदेश नीति का प्रमुख लक्षण लिखिए। [2007]
उत्तर :
गुट-निरपेक्षता की नीति भारत की विदेश नीति का प्रमुख लक्षण है।

प्रश्न 11.
भारतीय विदेश नीति का मुख्य लक्ष्य क्या है?
उत्तर :
भारत की विदेश नीति का मुख्य लक्ष्य अपने राष्ट्रीय हितों में अभिवृद्धि करना है।

प्रश्न 12.
शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व का अर्थ क्या है?
उत्तर :
शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व का अर्थ है-जिस व्यक्ति या देश के साथ मतभेद हों, उसके साथ भी शान्तिपूर्वक रहना।

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प्रश्न 13.
शिमला समझौता कब एवं किनके बीच हुआ था?
उत्तर :
शिमला समझौता जुलाई, 1972 ई० में भारत की प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति श्री जैड० ए० भुट्टो के बीच हुआ था।

प्रश्न 14.
पंचशील सिद्धान्त के प्रवर्तक कौन थे?
उत्तर :
स्व० पण्डित जवाहरलाल नेहरू।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
भारत की विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य है
(क) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाए रखना
(ख) सभी राज्यों और राष्ट्रों के बीच शान्तिपूर्ण और सम्मानपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखना
(ग) उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का विरोध करना
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 2.
भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषता है
(क) गुट-निरपेक्षता की नीति
(ख) विश्वशान्ति
(ग) साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध
(घ) ये सभी

प्रश्न 3.
‘परमाणु परीक्षण रोक सन्धि’ कब हुई थी?
(क) 1960 में
(ख)1962 में
(ग) 1963 में
(घ) 1965 में

प्रश्न 4.
‘भारत-सोवियत संघ मैत्री सन्धि’ कब सम्पन्न हुई?
(क) 8 अगस्त, 1970 को
(ख) 9 अगस्त, 1971 को
(ग) 9 सितम्बर, 1972 को
(घ) 11 अगस्त, 1975 को

प्रश्न 5.
भारत ने अपना प्रथम अणु परीक्षण कब किया?
(क) 10 मई, 1972 को
(ख) 10 अगस्त, 1973 को
(ग) 18 मई, 1974 को
(घ) 9 सितम्बर, 1975 को।

प्रश्न 6.
भारत ने पूरब की ओर देखो’ की नीति की शुरुआत कब की? [2012]
(क) 1990
(ख) 1991
(ग) 1992
(घ) 1993

प्रश्न 7.
स्वतन्त्र भारत का पहला विदेश मन्त्री कौन था?
(क) अम्बेडकर
(ख) सरदार पटेल
(ग) जवाहरलाल नेहरू
(घ) सरदार स्वर्ण सिंह

प्रश्न 8.
भारत की विदेशी नीति के निर्माता हैं [2014]
(क) महात्मा गांधी
(ख) विनोबा भावे
(ग) जवाहरलाल नेहरू
(घ) डॉ० अम्बेडकर

प्रश्न 9.
पंचशील सिद्धान्त के प्रवर्तक थे [2014]
(क) सरदार वल्लभभाई पटेल
(ख) पं० जवाहरलाल नेहरू
(ग) महात्मा गाँधी
(घ) दलाई लामा

उत्तर :

  1. (घ) उपर्युक्त सभी
  2. (घ) ये सभी
  3. (ग) 1963 में
  4. (ख) 9 अगस्त, 1971 को
  5. (ग) 18 मई, 1974 को
  6. (ख) 1991
  7. (क) अम्बेडकर
  8. (ग) जवाहरलाल नेहरू
  9. (ख) पं० जवाहरलाल नेहरू।

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UP Board Solutions for Class 12 Civics संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य के रूप में भारत

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Civics
Chapter 22 b
Chapter Name संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य के रूप में भारत
Number of Questions Solved 39
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Civics संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य के रूप में भारत

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र के मुख्य अंगों का विवरण दीजिए। उनमें से सुरक्षा परिषद् के संगठन तथा कार्यों की विवेचना कीजिए। [2007, 11]
या
संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् के स्थायी एवं अस्थायी सदस्यों की संख्या लिखिए। [2013]
या
संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रमुख अंगों का वर्णन कीजिए तथा विश्व शान्ति की स्थापना में इसकी भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। [2013]
उतर :
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् ‘सेनफ्रांसिस्को सम्मेलन के आधार पर 24 अक्टूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई। संयुक्त राष्ट्र के छः मुख्य अंग हैं, जो निम्नलिखित हैं –

1. साधारण सभा या महासभा – साधारण सभा संयुक्त राष्ट्र संघ का सबसे प्रमुख अंग है। संघ के सभी सदस्य साधारण सभा के सदस्य होते हैं। प्रत्येक सदस्य राज्य को इसमें 5 प्रतिनिधि भेजने का अधिकार होता है।

2. सुरक्षा परिषद् – यह संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यकारिणी है। इसका स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। 1 जनवरी, 1966 से परिषद् में 15 सदस्य हैं जिनमें 5 स्थायी तथा 10 अस्थायी सदस्य हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ का ‘हृदय’ व ‘दुनिया की पुलिसमैन’ कही जाने वाली सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यपालिका है। सुरक्षा परिषद् में कुल 15 सदस्य होते हैं, जिनमें से 5 स्थायी सदस्य व 10 अस्थायी सदस्य हैं। पाँच स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस तथा ब्रिटेन हैं। इसके अतिरिक्त अस्थायी सदस्यों का निर्वाचन महासभा द्वारा दो वर्षों के लिए किया जाता है। सुरक्षा परिषद् में किसी भी विषय पर निर्णय 15 में से 9 सदस्य राष्ट्रों की स्वीकृति द्वारा होता है। इसमें भी 5 स्थायी सदस्य राष्ट्रों का स्वीकारात्मक मत होना अनिवार्य होता है। यदि पाँचों में से एक भी स्थायी सदस्य प्रस्ताव पर विरोध प्रकट करता है तो प्रस्ताव को रद्द समझा जाता है। इस अधिकार को स्थायी राष्ट्रों का निषेधाधिकार (वीटो) कहा जाता है।

3. आर्थिक व सामाजिक परिषद् – इस परिषद् का उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र की आर्थिक व सामाजिक समस्याओं के समाधान हेतु सहयोग प्राप्त करना है। इसमें इस समय 54 सदस्य हैं।

4. प्रन्यास परिषद् – इस परिषद् का मुख्य कार्य अविकसित और पिछड़े हुए प्रदेशों के हितों की रक्षा करना है। यह कार्य उन्नत व विकसित सदस्यों के द्वारा किया जाता है।

5. अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय – यह संयुक्त राष्ट्र संघ का न्यायिक अंग है। न्यायालय में 15 न्यायाधीश होते हैं जो साधारण सभा व सुरक्षा परिषद् द्वारा 9 वर्ष की अवधि के लिए निर्वाचित होते हैं। न्यायालय में सभी निर्णय बहुमत से होते हैं। न्यायालय केवल ऐसे ही विवादों पर विचार कर सकता है जिनसे सम्बन्धित सभी पक्ष विवादों को न्यायालय के सम्मुख विचारार्थ प्रस्तुत करें।

6. सचिवालय – इसके सचिवालय का प्रधान महामन्त्री और संघ की आवश्यकतानुसार कर्मचारी वर्ग होता है। महामन्त्री की नियुक्ति सुरक्षा परिषद् की सिफारिश पर साधारण सभा द्वारा 5 वर्ष के लिए की जाती है।

सुरक्षा परिषद् के कार्य

संयुक्त राष्ट्र संघ घोषणा-पत्र की धारा 24, 25 व 26 के अन्तर्गत उल्लिखित सुरक्षा परिषद् के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं –

  1. विश्व-शान्ति व सुरक्षा बनाये रखना तथा इसके भंग होने की स्थिति में कारणों की जाँच करना व विचार-विमर्श कर समझौता, अपील या बाध्यकारी आदेश देकर उसका समाधान करना।
  2. किसी राष्ट्र द्वारा निर्णय व नियमों का उल्लंघन किये जाने पर उसके विरुद्ध कड़ी कार्यवाही (कूटनीतिक, आर्थिक या सैनिक) करना।
  3. महासभा में नये सदस्य राष्ट्रों के आवेदन-पत्रों पर विचार करना व सुझाव देना।
  4. संयुक्त राष्ट्र संघ का महासचिव सुरक्षा परिषद् की सिफारिश पर ही महासभा द्वारा नियुक्त किया जाता है।
  5. सुरक्षा परिषद् को एक अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य अपनी वार्षिक रिपोर्ट महासभा को प्रेषित करने से सम्बन्धित है।
  6. विश्व में प्राणघातक अस्त्रों के नियमन का प्रयत्न करना।

[ संकेत – विश्व शान्ति की स्थापना में संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका के अध्ययन हेतु विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 2 का अध्ययन करें। ]

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र संघ की सफलता तथा असफलता के कारण उदाहरण सहित बताइए। [2007]
या
संयुक्त राष्ट्र संघ की उपलब्धियों का वर्णन कीजिए। [2013]
या
संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व-शान्ति स्थापित करने में किस प्रकार सहायक है?
या
विश्व शान्ति स्थापित करने में संयुक्त राष्ट्र का क्या योगदान है? [2011]
उत्तर :
सन् 1920 में स्थापित राष्ट्र संघ की असफलता के कारण सन् 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गयी। संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन से विश्व के राष्ट्रों को यह आशा बँधी कि यह अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं तथा विवादों का निराकरण शान्तिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराकर विश्व-शान्ति एवं सुरक्षा को बनाये रखने में पूर्ण सफल होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति में अत्यधिक सीमा तक सफल रहा है, परन्तु यह अन्तर्राष्ट्रीय संगठन महाशक्तियों की स्वार्थपरता के कारण अनेक अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के निराकरण में असफल भी रहा है। खाड़ी युद्ध, कुर्द समस्या, रूस का चेचेन्या पर आक्रमण, पूर्वी तिमोर की समस्या, परमाणु शस्त्रों के परिसीमन में अवरोध आदि अनेक अन्तर्राष्ट्रीय समस्याएँ इस तथ्य की पुष्टि करती हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ की उपलब्धियाँ (सफलताएँ)

विश्व-शान्ति को बनाये रखने के लिए संघ की सुरक्षा परिषद् तथा महासभा ने निम्नलिखित प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का समाधान करने में एक बड़ी सीमा तक सफलता प्राप्त की है –

1. रूस-ईरान विवाद (1946 ई०) – संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रयासों से ईरान के अजरबैजान क्षेत्र में सोवियत संघ की सेनाओं के द्वारा प्रवेश करने की समस्या को दोनों देशों में सीधी वार्ता कराकर 21 मई, 1946 तक रूसी सेनाओं से ईरानी प्रदेश को खाली करा दिया गया।

2. यूनान विवाद (1946-47 ई०) – 3 दिसम्बर, 1946 को यूनान ने संयुक्त राष्ट्र संघ से शिकायत की कि उनकी सीमाओं पर साम्यवादी राज्य आक्रामक कार्यवाहियाँ कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र ने यूनान तथा साम्यवादी राज्यों में समझौता कराकर इस विवाद को सुलझाने में सफलता प्राप्त की।

3. हॉलैण्ड-इण्डोनेशिया विवाद (1947-48 ई०) – द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त 1947 ई० में हॉलैण्ड तथा इण्डोनेशिया के मध्य युद्ध छिड़ गया। 20 जुलाई, 1947 को ऑस्ट्रेलिया तथा भारत ने इस मामले को सुरक्षा परिषद् में उठाया। समिति के प्रयत्नों के फलस्वरूप 17 जनवरी, 1948 को दोनों पक्षों में एक अस्थायी समझौता हो गया।

4. बर्लिन का घेरा (1948 ई०) – 23 सितम्बर, 1948 को मित्र-राष्ट्रों ने रूस के द्वारा बर्लिन की घेरेबन्दी का मामला सुरक्षा परिषद् में उठाया। परिणामस्वरूप 4 मई, 1949 के एक समझौते के द्वारा रूस ने 12 मई, 1949 को बर्लिन की घेराबन्दी समाप्त कर दी।

5. फिलिस्तीन की समस्या (1948 ई०) – संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रयासों से 13 सितम्बर, 1993 को फिलिस्तीन को सीमित स्वतन्त्रता प्रदान करने वाले एक समझौते पर यासिर अराफात और इजराइली प्रधानमन्त्री रॉबिन ने हस्ताक्षर कर दिये। 25 जुलाई, 1994 को जॉर्डन के शाह हुसैन और रॉबिन ने एक समझौते पर हस्ताक्षर करके अपनी शत्रुता का अन्तं कर दिया।

6. सीरिया और लेबनान की समस्या (1946 ई०) – 4 फरवरी, 1946 को सीरिया और लेबनान ने अपने प्रदेश से फ्रांसीसी सेनाओं को हटाने की माँग की। सुरक्षा परिषद् में विश्व जनमत के दबाव को देखते हुए ब्रिटेन और फ्रांस ने सीरिया तथा लेबनान से अपनी सेनाएँ वापस बुला लीं। इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र इस समस्या को हल करने में सफल रहा।

7. स्पेन की समस्या (1946 ई०) – 1946 ई० में पोलैण्ड ने सुरक्षा परिषद् से यह शिकायत की कि स्पेन में फ्रांको के तानाशाही शासन के कारण अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को खतरा हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने इस सम्बन्ध में यह सिफारिश की कि फ्रांको की सरकार को संयुक्त राष्ट्र और उसकी सहायक संस्थाओं की सदस्यता से वंचित कर दिया जाए, किन्तु बाद में यह सिफारिश रद्द कर दी गयी और 1955 ई० में स्पेन को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता भी प्रदान कर दी गयी।

8. कोरिया की समस्या (1950-51 ई०) – द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त कोरिया; उत्तरी कोरिया और दक्षिणी कोरिया के मध्य विभक्त हो गया था। महाशक्तियों के आपसी मतभेदों के फलस्वरूप 1950 ई० में उत्तरी कोरिया ने दक्षिणी कोरिया पर भीषण आक्रमण कर दिया। सुरक्षा परिषद् ने उत्तरी कोरिया को आक्रमणकारी घोषित कर दिया। जुलाई, 1951 ई० में दोनों पक्षों में समझौता हो गया और युद्ध भी बन्द हो गया। यह संयुक्त राष्ट्र की एक उल्लेखनीय सफलती थी, क्योंकि उसी के प्रयासों के कारण ही कोरिया युद्ध विश्व युद्ध का रूप धारण नहीं कर सका था।

9. कश्मीर समस्या – पाकिस्तान ने 22 अक्टूबर, 1947 को उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त के कबाइलियों द्वारा कश्मीर पर आक्रमण करा दिया। 1 जनवरी, 1948 को भारत ने सुरक्षा परिषद् से इस विषय में शिकायत की। 17 जनवरी, 1948 को सुरक्षा परिषद् ने दोनों पक्षों को युद्ध बन्द करने का आदेश दिया, परन्तु युद्ध समाप्त नहीं हुआ। समस्या के समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा गठित आयोग ने दोनों पक्षों से बातचीत की। पर्याप्त विचार-विमर्श के बाद दोनों पक्षों ने 1 जनवरी, 1949 को युद्ध-विराम मान लिया।

10. स्वेज नहर की समस्या (1956 ई०) – 26 जुलाई, 1956 को कर्नल नासिर द्वारा स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर मिस्र में स्वेज नहर कम्पनी’ की सम्पत्ति को जब्त (Freeze) कर लिया गया। ब्रिटेन और फ्रांस के आग्रह पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने 22 राष्ट्रों का एक सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन में अमेरिकी प्रतिनिधि डलेस ने यह प्रस्ताव रखा कि स्वेज नहर को निरस्त अधिकार-क्षेत्र में रखा जाए और उसकी देखभाल का उत्तरदायित्व अन्तर्राष्ट्रीय स्वेज नहर बोर्ड’ को सौंप दिया जाए जो कि अपनी रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के समक्ष प्रस्तुत करे तथा स्वेज नहर को सभी देशों के लिए खोल दिया जाए। 15 नवम्बर, 1956 को संयुक्त राष्ट्र की सेना की एक टुकड़ी कर्नल नासिर की अनुमति से मिस्र पहुँच गयी। अप्रैल, 1957 ई० में स्वेज नहर पुनः जहाजों के आवागमन के लिए खोल दी गयी। इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ स्वेज नहर की समस्या को हल करने में सफल हुआ।

11. कांगो की समस्या (1960 ई०) – कांगो की भीषण समस्या को भी हल करने में संयुक्त राष्ट्र संघ को सफलता प्राप्त हुई। कांगो का एकीकरण करके संयुक्त राष्ट्र ने अपना काम पूरा कर दिया, परन्तु आज भी कांगो की समस्या पूरी तरह सुलझ नहीं पायी है।

12. साइप्रस की समस्या (1964 ई०) – 16 अगस्त, 1960 को साइप्रस ब्रिटिश अधीनता से मुक्त होकर एक स्वतन्त्र गणराज्य बन गया। तत्पश्चात् साइप्रस में उत्पन्न गृहयुद्ध की समस्या को समाप्त करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वहाँ शान्ति सेना भेजी गयी व सेना द्वारा वहाँ शान्ति स्थापित की गयी।

13. डोमिनिकन गणराज्य विवाद (1965 ई०) – 1964 ई० के अन्त में वेस्टइण्डीज के हेटी टापू के एक भाग में स्थित डोमिनिकन गणराज्य में गृहयुद्ध छिड़ गया। संयुक्त राष्ट्र संघ और अमेरिकी राज्यों के प्रयत्नों के कारण दोनों पक्षों में एक समझौते के बाद वहाँ शान्ति स्थापित हो गयी।

14. अरब-इजराइल युद्ध (1967 ई०) – 7 जून, 1967 को सुरक्षा परिषद् ने एक प्रस्ताव पारित करके अरबों तथा इजराइल को तत्काल ही युद्ध बन्द करने का आदेश दिया। फलस्वरूप 8 जून, 1967 को दोनों पक्षों ने युद्ध बन्द कर दिया।

15. अरब-इजराइल युद्ध (1973 ई०) – अक्टूबर, 1973 ई० में अरब-इजराईल के बीच पुनः युद्ध प्रारम्भ हो गया। लेकिन महाशक्तियों की स्वार्थप्रियता के कारण तत्काल ही सुरक्षा परिषद् ने इस युद्ध को रोकने की कोई कार्यवाही नहीं की। जब युद्ध उग्र रूप धारण करने लगा तब संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप से 11 नवम्बर, 1973 को इज़राइल तथा मिस्र के मध्य एक छः सूत्रीय समझौता हो गया।

16. वियतनाम की समस्या (1974 ई०) – 1964 ई० में अमेरिका ने वियतनाम संघर्ष में खुलकर हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। महाशक्तियों की स्वार्थप्रियता के कारण उत्तरी और दक्षिणी वियतनाम के मध्य संघर्ष 1974 ई० तक चलता रहा। विश्व जनमत के दबाव के कारण अमेरिका को वियतनाम से अपनी सेनाएँ हटानी पड़ीं और अन्ततः उत्तरी तथा दक्षिणी वियतनाम का एकीकरण हो गया।

17. दक्षिणी रोडेशिया की समस्या (1980 ई०) – संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव के फलस्वरूप 17 अप्रैल, 1980 को भीषण छापामार युद्ध के पश्चात् रोडेशिया को स्वाधीनता प्राप्त हो गयी और ‘जिम्बाब्वे’ के नाम से उसे संघ की सदस्यता भी दे दी गयी।

18. अमेरिकी बन्धकों की समस्या – 4 नवम्बर, 1979 को ईरान की राजधानी तेहरान में स्थित अमेरिकी दूतावास की घेराबन्दी करके कुछ कट्टर इस्लामी छात्रों ने 52 अमेरिकी राजनयिकों को बन्दी बना लिया। संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रयासों से अमेरिकी बन्धकों को मुक्ति मिल सकी।

19. फाकलैण्ड की समस्या (1982 ई०) – 12 अप्रैल, 1982 को अर्जेण्टाइना की सेनाओं ने अचानक ही फाकलैण्ड द्वीपसमूह पर आक्रमण करके उस पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रयासों से 14 जून, 1982 को अर्जेण्टाइना की सेनाओं ने आत्मसमर्पण कर दिया और फाकलैण्ड पर पुन: ब्रिटेन का प्रभुत्व स्थापित हो गया।

20. ईरान-इराक युद्ध (1988 ई०) – सीमा विवाद को लेकर 22 सितम्बर, 1980 को ईरान व इराक के मध्य उत्पन्न युद्ध संयुक्त राष्ट्र द्वारा मध्यस्थता करने पर अगस्त, 1988 ई० में समाप्त हुआ।

21. नामीबिया की समस्या (1990 ई०) – नामीबिया एक लम्बे समय से अपनी स्वतन्त्रता के लिए प्रयत्नशील था। संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्त्वावधान में 13 दिसम्बर, 1988 को कांगो की राजधानी ब्रांजविले में दक्षिण अफ्रीका, क्यूबा और अंगोला के प्रतिनिधियों ने समझौते पर हस्ताक्षर किये। इस समझौते के बाद 21 मार्च, 1990 को नामीबिया एक स्वतन्त्र राष्ट्र बन गया।

22. कुवैत की समस्या (खाड़ी युद्ध 1991 ई०) – इराक ने अपनी साम्राज्यवादी लिप्सा की पूर्ति के लिए अपने पड़ोसी देश कुवैत पर अधिकार कर लिया। सुरक्षा परिषद् के आदेश से संयुक्त राज्य अमेरिका व मित्र-राष्ट्रों की सेना ने खाड़ी युद्ध में इराक को नतमस्तक करके कुवैत को मुक्त कराया।

23. यूगोस्लाविया की समस्या (1992 ई०) – 1992 ई० में यूगोस्लाविया में भीषण जातीय संघर्ष छिड़ गया, जिसमें बीस हजार से अधिक लोग मारे गये। संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्त्वावधान में भारत के लेफ्टीनेण्ट जनरल सतीश नाम्बियार के नेतृत्व में 25 हजार सैनिकों की एक सेना यूगोस्लाविया में शान्ति स्थापना हेतु भेजी गयी। इस सेना ने यूगोस्लाविया (वर्तमान बोसनिया) में शान्ति की स्थापना की।

24. सोमालिया की समस्या (1993 ई०) – 1991 ई० को राष्ट्रपति मोहम्मद सैयद की पदच्युति के बाद गृहयुद्ध और अधिक तेज हो गया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1992 ई० में अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति सेना की सहायता से सोमालिया में शान्ति स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व के अनेक राष्ट्रों की गम्भीर समस्याओं को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाने में सफलता प्राप्त की है। यदि इस सम्बन्ध में संयुक्त राष्ट्र संघ की सकारात्मक भूमिका नहीं होती तो तीसरे विश्व युद्ध की सम्भावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकती थी।

संयुक्त राष्ट्र संघ की विफलताएँ।

आधुनिक अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की कुछ जटिल समस्याएँ ऐसी भी हैं जिनका समाधान करने में संयुक्त राष्ट्र संघ विफल रहा है; जैसे –

  1. कम्पूचिया की समस्या।
  2. रूस का चेचेन्या पर आक्रमण (1996 ई०)।
  3. खाड़ी क्षेत्र की समस्या (दिसम्बर, 1996 ई०)।
  4. अफगानिस्तान में गृहयुद्ध (अक्टूबर, 1996 ई०)।
  5. कोसोवो की समस्या (1999 ई०) जिसमें NATO संगठन के देशों ने अमेरिका तथा ब्रिटेन के नेतृत्व में कोसोवो पर सैनिक हमला किया।
  6. इराक के सैनिक ठिकानों की खोज का कार्यक्रम (1998 ई०), जहाँ रासायनिक अस्त्रों के भण्डार को छुपाया गया था। कुछ स्थानों की तलाशी न दिये जाने के कारण अमेरिका ने इराक पर (1999 ई०) सैनिक आक्रमण कर दिया।
  7. पाकिस्तान (जून, 1999 ई०) द्वारा भारतीय सीमा पर अन्तर्राष्ट्रीय नियन्त्रण रेखा का उल्लंघन कर भाड़े के घुसपैठियों द्वारा कारगिल क्षेत्र में युद्ध जैसी कार्यवाही करना।
  8. 1999 ई० में उत्पन्न पूर्वी तिमोर की समस्या।
  9. अफगानिस्तान में अकवाद की समस्या (2001 ई०), इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष (मार्च 2002 ई०) तथा अमेरिका द्वारा इराक पर आक्रमण (मार्च 2003 ई०), रूस का चेचेन्या में हस्तक्षेप (दिसम्बर 2004 ई०), इराक में आतंकी विस्फोट (अप्रैल 2005 ई०), रूस व जापान के बीच द्वीपों का विवाद (जनवरी 2006 ई०), ईराने की परमाणु नीति (मार्च 2006 ई०) आदि।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा को बनाये रखने में संयुक्त राष्ट्र संघ ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है, फिर भी हम संयुक्त राष्ट्र को एक आदर्श संस्था के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि इस संस्था में महाशक्तियों के प्रभुत्व का बोलबाला है। कुछ विद्वानों ने तो यहाँ तक टिप्पणी की है कि संयुक्त राष्ट्र संघ को अमेरिका ने खरीद लिया है। आधुनिक अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में संयुक्त राष्ट्र संघ की अपेक्षा विश्व राजनीति पर अमेरिका का प्रभुत्व स्थापित हो गया है।

प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्र संघ में विश्व शान्ति की स्थापना में भारत की भूमिका का परीक्षण कीजिए। [2007]
या
‘भारत की संयुक्त राष्ट्र में सदैव ही पूर्ण आस्था रही है। इस कथन के प्रकाश में, संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की भूमिका की विववेचना कीजिए।
उत्तर :
संयुक्त राष्ट्र संघ में विश्व शान्ति में भारत की भूमिका

भारत संयुक्त राष्ट्र की स्थापना करने वाला एक संस्थापक सदस्य है। भारत संयुक्त राष्ट्र को विश्व-शान्ति स्थापित करने वाला एक आवश्यक उपागम मानता है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न अंगों तथा विशेष अभिकरणों में सक्रिय भाग लेकर महत्त्वपूर्ण कार्य किये है। भारत ने आज तक संयुक्त राष्ट्र के आदेशों का पूर्णतः पालन किया है। कोरिया तथा हिन्द-चीन में शान्ति स्थापित करने के लिए भारत ने संयुक्त राष्ट्र की सहायता की। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के आह्वान पर कांगों में शान्ति स्थापना हेतु अपनी सेनाएं भेजीं जिन्होंने उस देश की एकता को सुरक्षित रखा।

भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र में विश्व शान्ति की स्थापना में भूमिका को निम्न प्रकार समझा जा सकता है।

1. गैर-राष्ट्रों के संघर्षों की समाप्ति में योगदान – भारत ने क्रोशिया तथा बोस्निया-हर्जेगोविना में हुए संघर्षों को समाप्त करने के उद्देश्य से सुरक्षा परिषद् के प्रस्तावों को पूरा समर्थन दिया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा दल के प्रयासों से लेफ्टिनेण्ट जनरल सतीश नाम्बियार की माण्ड में यूगोस्लाविया में संयुक्त राष्ट्र ऑपरेशन के लिए भेजी गई सेना की विश्वभर में प्रशंसा हुई। भारत ने सोमालियों को मानवीय सहायता तत्काल भेजने में संयुक्त राष्ट्र की कार्यवाही का समर्थन किया तथा उसके कार्यों में सहयोग दिया।

2. भारतीय सेनाओं का योगदान – संयुक्त राष्ट्र ने भारतीय सेनाओं के कार्यों की प्रशंसा की है। भारत ने कांगो में शान्ति स्थापना के लिए अपनी सेनाएँ भेजीं। उन्होंने निष्पक्षता के साथ वहाँ शान्ति तथा सुरक्षा की स्थापना करके देश की एकता को बचाया। इसके अतिरिक्त, भारत ने सोमालिया में भी शान्ति स्थापनार्थ अपनी सेवाएँ भेजीं। भारतीय सेनाएँ यूगोस्लाविया, कम्बोडिया, लाइबेरिया, अंगोला तथा मोजाम्बिक में संयुक्त राष्ट्र की शान्ति स्थापनार्थ कार्यवाही में सफलतापूर्वक भाग लेकर सम्मान सहित स्वदेश लौटी हैं। भारत ने एक टुकड़ी संयुक्त राष्ट्र अंगोला वेरीफिकेशन मिशन (U.N. Angola Verification Mission) पर जुलाई, 1995 में भेजी। वर्ष 1996-97 की अवधि में लगभग 1,100 भारतीय सैनिक, स्टाफ अधिकारी तथा सैनिक पर्यवेक्षक अंगोला में तैनात रहे। इतना ही नहीं, भारत ने संयुक्त राष्ट्र रवांडा मिशन पर थल सेना की एक बटालियन भेजी जिसमें 800 सैनिकों की टुकड़ी तथा एक आन्दोलन नियन्त्रण यूनिट सम्मिलित थी। 22 सैन्य पर्यवेक्षक तथा 9 स्टाफ अधिकारियों को भी नियुक्त किया गया था। इस समय 5 सैनिक पर्यवेक्षक संयुक्त राष्ट्र इराक-कुवैत पर्यवेक्षक मिशन में और 6 पर्यवेक्षक लाइबेरिया में तैनात हैं।

सम्पूर्ण विश्व में संयुक्त राष्ट्र की शान्ति मिशन की वर्तमान 17 कार्यवाहियों में इस समय लगभग 80,000 असैनिक तथा सैनिक कार्यरत् हैं, जिनमें भारत के 6,000 कार्मिक हैं।। नवम्बर, 1998 में दक्षिणी लेबनान में भारतीय इन्फैण्ट्री बटालियन के सम्मिलित हो जाने से भारत संयुक्त राष्ट्र शान्ति स्थापना में दूसरा सबसे बड़ा सैनिक सहायता देने वाला देश बन गया है।

3. आर्थिक सहयोग पर महत्त्वपूर्ण कार्य – भारत ने संयुक्त राष्ट्र से सम्बन्धित देशों के आह्वान पर आर्थिक सहयोग पर अधिक-से-अधिक बल दिया है तथा यथायोग्य सहायता भी प्रदान की है। विभिन्न देशों के साथ आर्थिक सहयोग के लिए संयुक्त राष्ट्र के लिए स्थापित संयुक्त । कमीशन तथा तकनीकी कार्यक्रमों के विकास में पूर्ण सहयोग दिया है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों के लिए तथा प्रादेशिक अन्तर्राष्ट्रीय स्तरों पर आर्थिक सहयोग का समर्थन किया है। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि भारत ने आर्थिक विकास के लिए विश्व में अपनी अच्छी साख बनाई है। विभिन्न गुटनिरपेक्ष सम्मेलनों में पारित प्रस्तावों . में, अंकटाड की बैठकों में, संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक समस्याओं पर होने वाले विशेष विचारविमर्श में, विशेषकर कच्चे माल और विकास के विषय में, संयुक्त राष्ट्र महासभा में पर्याप्त बल दिया गया है।

4. लोकतन्त्र के सिद्धान्त पर बल – संयुक्त राष्ट्र में विचार-विमर्श की अवधि में भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के लोकतान्त्रिक स्वरूप और सुरक्षा परिषद् तथा संयुक्त राष्ट्र के अन्य अंगों को बढ़ी । हुई सदस्य संख्या के अनुरूप अधिक प्रतिनिधि बनाने का दृढ़ता के साथ समर्थन किया। भारत ने अपने प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र के अन्तर्गत ही लोकतन्त्र के सिद्धान्त को लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया तथा 1994 ई० में महासभा के 49वें सत्र में सामान्य बहस के समय परिषद् की स्थायी सदस्यता के लिए अपना दावा भी किया। महासभा में भारतीय प्रतिनिधिमण्डल के नेता ने कहा कि जनसंख्या, अर्थव्यवस्था का आकार, अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की स्थापना में भारत को सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य होना अनिवार्य समझा जाना चाहिए।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारत और संयुक्त राष्ट्र के सम्बन्ध संयुक्त राष्ट्र की स्थापना से ही मैत्रीपूर्ण तथा सहयोगी रहे हैं। भारत ने आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा सैन्य क्षेत्रों में सराहनीय कार्य किया है। विशेषतः संयुक्त राष्ट्र की विशिष्ट एजेन्सियों के तत्त्वावधान में एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के पिछड़े हुए देशों को दी गई सहायता तथा मानवीय अधिकारों की घोषणा में भारत ने पूर्ण सहयोग दिया है। आर्थिक दृष्टि से अभावग्रस्त जातियों, समुदायों के सामाजिक स्तर को ऊँचा उठाने में भारत का योगदान प्रशंसनीय रहा है।

लघु उत्तरीय प्रठा (शब्द सीमा : 150 शब्द) (4 अंक)

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद की संगठनात्मक कमियों पर प्रकाश डालिए तथा उसके सुधार के उपाय सुझाइए। [2007]
उत्तर :
सुरक्षा परिषद् की संगठनात्मक कमियों को समझने के लिए सर्वप्रथम उसकी संरचना पर दृष्टिपात करना वांछित होगा।

सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यकारिणी है और इसका स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। 1 जनवरी, 1966 से परिषद् में 15 सदस्य हैं जिनमें 5 स्थायी और 10 अस्थायी सदस्य हैं। परिषद् के 5 स्थायी सदस्य हैं–संयुक्त राज्य अमेरिका, रूसी गणराज्य, ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस और साम्यवादी चीन। शेष 10 अस्थायी सदस्यों का चुनाव साधारण सभा द्वारा 2 वर्ष के लिए होता है। 1965 ई० के संशोधन के अनुसार इन अस्थायी सदस्यों में 5 स्थान अफ्रीकी, एशियाई राज्यों, 2 स्थान लैटिन अमेरिकी राज्यों, 2 स्थान पश्चिमी यूरोपीय देशों और एक स्थान पूर्वी यूरोपीय राज्यों को मिलना चाहिए जिससे सभी क्षेत्रों को परिषद् में प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाए।

संगठनात्मक कमियाँ तथा सुधार के उपाय

सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र संघ का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण अंग है। वर्तमान समय में यह अनुभव किया जा रहा है कि सुरक्षा परिषद् में एशियाई-अफ्रीकी तथा लैटिन अमेरिकी राज्यों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है। अत: परिषद् में अस्थायी और स्थायी विशेषतया स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाकर उन्हें उचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।

सामान्य सुझाव यह है कि परिषद् के स्थायी सदस्यों की संख्या 10 कर दी जानी चाहिए और जापान, जर्मनी, भारत तथा अफ्रीकी और लैटिन अमेरिका के एक-एक देश को परिषद् की स्थायी सदस्यता प्रदान की जानी चाहिए। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत की स्थिति तथा संयुक्त राष्ट्र के प्रति भारत के निरन्तर सहयोग के आधार पर भारत का परिषद् की स्थायी सदस्यता के लिए ठोस दावा बनता है। जापान ने भी भारत को स्थायी सदस्यता प्रदान किए जाने का पुरजोर समर्थन किया है।

परिषद् के 5 स्थायी सदस्यों को निषेधाधिकार (Veto) प्राप्त है। यह अधिकार भी विवादास्पद तथा दोषपूर्ण है। यह भी सुझाव है कि सुरक्षा परिषद् में सभी निर्णय बहुमत के आधार पर किये जाएँ तथा निषेधाधिकार को निरस्त कर दिया जाए।

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प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्यों तथा सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
या
संयुक्त राष्ट्र संघ के दो मुख्य उद्देश्य बताइए। [2014, 15, 16]
या
संयुक्त राष्ट्र संघ के दो प्रमुख उद्देश्य बताइए। [2016]
उत्तर :
संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य

अनुच्छेद 1 में दिए गए उद्देश्यों के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र का सर्वप्रमुख कार्य अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा एवं शान्ति बनाए रखना है। इसके उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

  1. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा की व्यवस्था करना।
  2. पारस्परिक मतभेदों को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाना।
  3. प्रत्येक राष्ट्र को समान समझना और समान अधिकार देना।
  4. अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक एवं मानवीय समस्याओं को सुलझाने में सहयोग देना।
  5. समस्त मानव-जाति के अधिकारों का सम्मान करना।

संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्त

घोषणा-पत्र के अनुच्छेद 2 में संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों का वर्णन है। इसमें वर्णित कुछ सिद्धान्त निम्नलिखित हैं –

  1. सभी सदस्य राष्ट्र एकसमान और सम्प्रभुतासम्पन्न हैं।
  2. सभी सदस्य राष्ट्र संघ के प्रति अपने उत्तरदायित्वों और कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करेंगे।
  3. सदस्य-राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्तिपूर्ण तरीकों से हल करेंगे।
  4. सदस्य-राष्ट्र संयुक्त राष्ट्र के प्रतिकूल न तो बल प्रयोग की धमकी देगे और न ही शक्ति का प्रयोग करेंगे।
  5. सदस्य-राष्ट्र संयुक्त राष्ट्र के कार्यों में सहायता देंगे और उन राष्ट्रों की सहायता नहीं करेंगे, जिनके विरुद्ध संघ ने कोई कार्यवाही की हो।
  6. कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर संयुक्त राष्ट्र किसी राष्ट्र के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।

प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्र संघ (U.N.O.) की स्थापना व सदस्यता पर संक्षिप्त टिपणी लिखिए।
उतर :
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना

प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति पर विश्व में शान्ति स्थापित करने तथा विश्व शान्ति को बनाए रखने के उद्देश्य से राष्ट्र संघ (League of Nations) की स्थापना की गई थी, परन्तु अनेक कारणों से राष्ट्र संघ अपने उद्देश्य में असफल रहा और 1939 ई० में द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारम्भ हो गया; अतः भविष्य में युद्धों को रोकने और विश्व में शान्ति स्थापित करने के उद्देश्य से युद्धकाल में ही किसी ऐसी संस्था की आवश्यकता अनुभव की गई, जो इस उद्देश्य की पूर्ति कर सके। फलतः युद्धकाल में ही अमेरिका के राष्ट्रपति रूजवेल्ट, रूस के राष्ट्रपति जोसेफ स्टालिन और ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल द्वारा अनेक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में नवीन अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की स्थापना पर विचार किया गया और अन्त में इसी सन्दर्भ में मित्र-राष्ट्रों को 26 जून, 1945 को अमेरिका के प्रसिद्ध नगर सैनफ्रांसिस्को में एक सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र’ का गठन किया गया तथा संयुक्त राष्ट्र के कार्यों एवं उद्देश्यों के सन्दर्भ में एक घोषणा-पत्र (Charter) तैयार किया गया। इस घोषणा-पत्र पर 24 अक्टूबर, 1945 को 51 राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए। इस समय संयुक्त राष्ट्र के सदस्य राष्ट्रों की संख्या 193 है। दक्षिणी सूडान इसका नया सदस्य राष्ट्र है, जिसे 2011 में इसमें शामिल किया गया। इसका मुख्यालय न्यूयॉर्क (संयुक्त राज्य अमेरिका) में है।

सदस्यता

विश्व का कोई भी शान्तिप्रिय राष्ट्र जो संयुक्त राष्ट्र की शर्ते या नियम मानने को तैयार हो, इसको सदस्य बन सकता है। सदस्यता प्राप्त करने के लिए आवेदन-पत्र दिया जाता है, जिस पर सुरक्षा परिषद् एवं महासभा विचार करती हैं। दोनों की स्वीकृति पाने पर राष्ट्र को सदस्यता–पत्र दे दिया जाता है। सुरक्षा परिषद् बहुमत से सदस्यता प्रदान करती है, परन्तु इसके लिए परिषद् के स्थायी सदस्यों की सहमति तथा महासभा के 2/3 बहुमत का समर्थन आवश्यक है। सदस्यता प्राप्ति के समय उसे (सदस्यता प्राप्त करने वाले देश को) पारस्परिक झगड़ों को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाने की प्रतिज्ञा करनी पड़ती है। प्रतिज्ञा का उल्लंघन करने की स्थिति में उसके विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र द्वारा कार्यवाही की जाती है।

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र संघ के शान्ति स्थापना कार्यों में भारत की भूमिका बताइए। [2008]
उत्तर :
अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की स्थापना संयुक्त राष्ट्र संघ का सबसे प्रमुख उद्देश्य है। भारत ने इस उद्देश्य की पूर्ति में संयुक्त राष्ट्र संघ को पूरा सहयोग दिया है। 1947 ई० में जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण किया और अगस्त, 1965 ई० में पुनः जब पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया, तब भारत ने राष्ट्र संघ के प्रस्ताव को माना, जब कि वह चाहता तो शक्ति के आधार पर इस प्रश्न को सुलझा सकता था।

1950 ई० में उत्तरी कोरिया द्वारा दक्षिणी कोरिया पर आक्रमण किया गया। इस आक्रमण से ‘कोरियाई युद्ध’ आरम्भ हो गया और ऐसा लगने लगा कि कहीं यह युद्ध विश्व युद्ध का रूप न ले ले। इस युद्ध को रोकने के लिए ही भारत ने प्रस्ताव पारित कराया। इस प्रस्ताव को कार्यान्वित कराने वाले आयोग का अध्यक्ष भी भारत को ही बनाया गया। जनरल थिमैया की अध्यक्षता में भारतीय सैनिकों ने युद्ध-बन्दियों को स्वदेश लौटाने का कार्य बड़ी सावधानी से किया।

कोरियों की तरह ही कांगो में भी भारतीय सैनिक भेजे गये तथा प्रतिनिधि श्री राजेश्वर दयाल ने कांगो में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के व्यक्तिगत प्रतिनिधि के रूप में कार्य किया। इस समस्या को हल कराने में श्री वी० कृष्णामेनन ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया। भारत के प्रयास से ही जेनेवा में सम्मेलन बुलाया गया और यहीं युद्ध-बन्दी तथा अस्थायी सन्धि का प्रस्ताव पास हुआ। युद्धविराम सन्धि को लागू करने के लिए बनाये गये आयोग की अध्यक्ष भी भारत को ही बनाया गया। लाओस और कम्बोडिया में भी भारतीय सेना ने बहुत प्रशंसनीय भूमिका निभायी।

हंगरी एवं स्वेज संकट भी तृतीय विश्व युद्ध को जन्म दे सकते थे। इन संकटों को भी भारत ने राष्ट्र संघ के माध्यम से सुलझाया। भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में अपने दायित्व को भली-भाँति समझते हुए ईरान-इराक युद्ध की समाप्ति, दक्षिण अफ्रीका में रंग-भेद की नीति को समाप्त करने और नामीबिया की स्वतन्त्रता और उपनिवेशवाद के अन्त से सम्बन्धित अनेक कार्यों के लिए निरन्तर प्रयत्न किये। इस प्रकार भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ को शान्ति और सुरक्षा के कार्यों में पूरा-पूरा सहयोग प्रदान किया गया।

लघु उत्तरीय प्रश्न (शब्द सीमा : 50 शब्द) (2 अंक)

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र महासभा के कार्यों का वर्णन कीजिए। [2015, 16]
या
संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के संगठन तथा कार्यों का वर्णन कीजिए। [2010, 15]
उत्तर :
संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा का संगठन

महासभा, संयुक्त राष्ट्र संघ का महत्त्वपूर्ण अंग है। इसे ‘विश्व संसद’ के रूप में भी जाना जाता है। प्रत्येक सदस्य राष्ट्र को इसमें अपने पाँच प्रतिनिधि भेजने का अधिकार है, किन्तु किसी भी निर्णायक मतदान के अवसर पर उन पाँचों का केवल एक ही मत माना जाता है। इस सभा का अधिवेशन वर्ष में एक बार सितम्बर में होता है। यद्यपि इसके बहुमत अथवा सुरक्षा परिषद् के आग्रह पर संघ का महासचिव विशेष अधिवेशन भी बुला सकता है। इसके अतिरिक्त एक निर्वाचित अध्यक्ष तथा सात उपाध्यक्ष संघ के पदाधिकारी होते हैं। महासभा प्रत्येक अन्तर्राष्ट्रीय विषय पर विचार कर सकती है। साधारण विषयों में निर्णय बहुमत से लिया जाता है, किन्तु विशेष विषयों के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। भारत की विजयलक्ष्मी पंडित महासभा के अध्यक्ष पद पर रहने वाली प्रथम भारतीय महिला थीं।

संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के कार्य

संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं –

  • यह अपने अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चुनाव करती है।
  • सुरक्षा परिषद् अपने 10 अस्थायी तथा सामाजिक, आर्थिक परिषद् के 54 सदस्यों तथा अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीशों का निर्वाचन करती है।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ के बजट को स्वीकृति प्रदान करती है।
  • विश्व शान्ति के लिए आवश्यक विषयों पर सुरक्षा परिषद् का ध्यान आकर्षित कराती है।

प्रश्न 2.
निषेधाधिकार (वीटो पावर) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
संयुक्त राष्ट्र संघ के स्थायी सदस्यों को निषेधाधिकार की शक्ति प्रदान की गई है। इसका तात्पर्य यह है कि यदि पाँचों स्थायी सदस्यों में से कोई एक सदस्य सुरक्षा परिषद् में किए गए निर्णय से सहमत नहीं, तो वह इस निर्णय को वीटो पावर के माध्यम से रद्द कर सकता है।

प्रश्न 3.
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के विषय में बताइए।
उत्तर :
संयुक्त राष्ट्र संघ के एक प्रमुख अंग के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय को आविर्भाव सन् 1945 ई० में हुआ जिसे विश्व न्यायालय के रूप में भी जाना जाता है। वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र विश्व न्यायालय नीदरलैण्ड की राजधानी हेग में स्थित है।

अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में 15 न्यायाधीश होते हैं, जिनकी नियुक्ति 9 वर्ष की अवधि के लिए महासभा तथा सुरक्षा परिषद् के बहुमत से की जाती है।

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प्रश्न 4.
सुरक्षा परिषद् के चार महत्त्वपूर्ण कार्य बताइए। [2007, 10]
उत्तर :
सुरक्षा परिषद् के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं –

  1. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा स्थापित करना।
  2. अन्तर्राष्ट्रीय संघर्ष और विवाद के कारणों की जाँच करना और उसके निराकरण के शान्तिपूर्ण समाधान के उपाय खोजना।
  3. युद्ध को तत्काल बन्द करने के लिए आर्थिक सहायता को रोकना और सैन्य शक्ति का प्रयोग करना।
  4. महासभा को नए सदस्यों के सम्बन्ध में सुझाव देना।
  5. अपनी वार्षिक रिपोर्ट तथा अन्य रिपोर्टों को महासभा के पटल पर रखना।

प्रश्न 5.
संयुक्त राष्ट्र महासभा के विषय में बताइए।
उत्तर :
संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य राष्ट्र महासभा के प्रतिनिधि झेते हैं। प्रत्येक राष्ट्र महासभा के लिए 5 प्रतिनिधि, 5 वैकल्पिक प्रतिनिधि तथा अनिश्चित संख्या में अपने सलाहकार भेज सकता है। लेकिन प्रत्येक देश को चाहे वह छोटा हो या बड़ा, महासभा में मात्र एक मत देने का ही अधिकार प्राप्त है। स्थापना के समय संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्य संख्या 51 थी, जो वर्तमान में बढ़कर 193 हो गयी है।

प्रश्न 6.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर :
विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्थापना 7 अप्रैल, 1948 को हुई थी। इसका मुख्यालय जेनेवा में है। यह स्वास्थ्य कार्यों से सम्बन्धित विश्व का सबसे बड़ा अभिकरण है।

स्वास्थ्य से तात्पर्य केवल बीमारी या दुर्बलता की अनुपस्थिति न होकर पूर्ण शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक कल्याण की दशा से है। इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु यह संस्था अनेक कार्य करती है; जैसे-राष्ट्रीय सरकारों की स्वास्थ्य सेवा सुदृढ़ करने में सहायता देना, संकटकाल में तकनीकी सहायता तथा सलाह देना, रोगों को दूर करने की योजनाएँ बनाना तथा उन्हें कार्यान्वित करना, अन्तर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य के मामलों पर अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय तथा करारों को प्रस्तावित करना आदि।

प्रश्न 7.
अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा-कोष (IMF) कब स्थापित किया गया था तथा इसका क्या उद्देश्य था?
उतर :
अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की स्थापना दिसम्बर, 1945 ई० में की गयी थी। इसका मुख्यालय वाशिंगटन डी० सी० में है। इसकी स्थापना का उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग को प्रोत्साहन देना, व्यापार के सन्तुलित विकास को प्रोत्साहित करना, सदस्यों के मध्य विनिमय में स्थिरता को बढ़ाना तथा उस सम्बन्ध में पारस्परिक स्पर्धा को हटाना, विदेशी विनिमय-प्रतिबन्धों को हटाना, सदस्यों को धन उपलब्ध कराकर उनमें विश्वास उत्पन्न करना तथा सदस्यों के मध्य भुगतान से अन्तर्राष्ट्रीय सन्तुलन में असमानताओं को कम करना आदि हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रमुख अंगों के नाम बताइए। [2012]
उत्तर :

  1. महासभा
  2. सुरक्षा परिषद्
  3. सामाजिक और आर्थिक परिषद्
  4. सचिवालय
  5. अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय तथा
  6. संरक्षण परिषद्।

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र संघ के कोई दो प्रमुख उद्देश्य बताइए। [2007, 10]
उत्तर :

  1. विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा की स्थापना करना।
  2. नागरिकों की समानता एवं आत्म-निर्णय के अधिकार के आधार पर राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का विकास करना।

प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्र संघ की उस संस्था का नाम लिखिए जो जन-स्वास्थ्य के लिए कार्य करती है।
उत्तर :
अन्तर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.)।

प्रश्न 4.
सुरक्षा परिषद् में कितने सदस्य होते हैं ? [2009, 11, 12]
उत्तर :
पन्द्रह सदस्य।

प्रश्न 5 :
सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की कुल संख्या बताइए।
या
सुरक्षा परिषद के दो स्थायी सदस्य देशों के नाम लिखिए। [2008, 09, 10, 12]
उत्तर :
सुरक्षा परिषद् में पाँच स्थायी सदस्य, संयुक्त राज्य अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन, रूस, फ्रांस तथा साम्यवादी चीन हैं।

प्रश्न 6.
सुरक्षा परिषद् के अस्थायी सदस्यों का कार्यकाल कितना होता है?
उत्तर :
सुरक्षा परिषद् के अस्थायी सदस्यों का कार्यकाल 2 वर्ष होता है।

प्रश्न 7.
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या कितनी है?
उत्तर :
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या 15 है।

प्रश्न 8.
संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्तमान महासचिव कौन हैं ? [2011, 14, 16]
उत्तर :
बान-की-मून।

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प्रश्न 9
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों में से किन्हीं दो सदस्य राष्ट्रों के नाम लिखिए। [2016]
उत्तर :
अमेरिका, रूस।

प्रश्न 10.
संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय कहाँ है? [2007, 15, 16]
उत्तर :
संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यूयॉर्क नगर में।

प्रश्न 11.
संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् के दो गैर-यूरोपियन स्थायी सदस्य देशों के नाम लिखिए। [2008, 14]
उत्तर :
चीन तथा संयुक्त राज्य अमेरिका संयुक्त राष्ट्र संघ परिषद् के दो गैर-यूरोपियन स्थायी सदस्य हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई – [2008, 13]
(क) 20 जनवरी, 1946 को
(ख) 24 अक्टूबर, 1945 को
(ग) 13 दिसम्बर, 1945 को
(घ) 1 जनवरी, 1946 को

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय कहाँ है? [2007, 10]
(क) पेरिस में
(ख) लन्दन में
(ग) न्यूयॉर्क में
(घ) मास्को में

प्रश्न 3.
अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष का मुख्यालय कहाँ स्थित है?
(क) न्यूयॉर्क में
(ख) वाशिंगटन डी० सी० में
(ग) पेरिस में
(घ) हेग में

प्रश्न 4.
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का प्रधान कार्यालय कहाँ स्थित है?
(क) हेग में
(ख) पेरिस में
(ग) न्यूयॉर्क में
(घ) लन्दन में

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन-सा देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य नहीं है? [2012]
(क) इंग्लैण्ड
(ख) अमेरिका
(ग) रूस
(घ) भारत

प्रश्न 6.
संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में अस्थायी सदस्यों की संख्या होती है – [2007]
(क) पाँच
(ख) दस
(ग) पन्द्रह
(घ) बारह

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से कौन-सा सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य नहीं है?
(क) ब्रिटेन
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका
(ग) फ्रांस
(घ) जर्मनी

प्रश्न 8.
संयुक्त राष्ट्र संघ की वर्तमान सदस्य संख्या कितनी है?
(क) 181
(ख) 190
(ग) 193
(घ) 201

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन संयुक्त राष्ट्र की विशिष्ट संस्था नहीं है? [2007]
(क) अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन
(ख) खाद्य एवं कृषि संगठन
(ग) विश्व स्वास्थ्य संगठन
(घ) अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय

प्रश्न 10.
किस दिन को प्रतिवर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ दिवस के रूप में मनाया जाता है ? [2008, 10, 14]
(क) 1 मई
(ख) 1 दिसम्बर
(ग) 24 अक्टूबर
(घ) 6 अगस्त

प्रश्न 11.
सुरक्षा परिषद् में कुल कितने सदस्य हैं? [2007, 09, 11, 12, 13]
(क) 5
(ख) 10
(ग) 15
(घ) 20

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में से कौन संयुक्त राष्ट्र संघ का अंग नहीं है [2012]
(क) सुरक्षा परिषद्
(ख) विश्व स्वास्थ्य संगठन
(ग) आर्थिक तथा सामाजिक परिषद्
(घ) अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से कौन-सा देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य नहीं है? [2012]
(क) इंग्लैण्ड
(ख) अमेरिका
(ग) रूस
(घ) भारत

प्रश्न 14.
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना किस वर्ष हुई थी? [2015]
(क) सन् 1942
(ख) सन् 1945
(ग) सन् 1946
(घ) सन् 1947

उत्तर :

  1. (ख) 24 अक्टूबर, 1945 को
  2. (ग) न्यूयॉर्क में
  3. (ख) वाशिंगटन डी० सी० में
  4. (क) हेग में
  5. (घ) भारत
  6. (ख) दस
  7. (घ) जर्मनी
  8. (ग) 193
  9. (ख) खाद्य एवं कृषि संगठन
  10. (ग) 24 अक्टूबर
  11. (ग) 15
  12. (ख) विश्व स्वास्थ्य संगठन
  13. (घ) भारत
  14. (ख) सन् 1945।

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UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency: Median (केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप : माध्यिका)

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Economics
Chapter Chapter 28
Chapter Name Measure of Central Tendency: Median (केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप : माध्यिका)
Number of Questions Solved 18
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency: Median (केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप : माध्यिका)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
मध्यका से आप क्या समझते हैं ? इसको परिभाषित करते हुए इसकी विशेषताओं पर संक्षेप में प्रकाश डालिए। [2011]
उत्तर:
माध्यिका या मध्यका समंक श्रेणी का वह गतिशील मूल्य है जो समंकमाला को दो बराबर भागों में इस प्रकार विभाजित करता है कि एक भाग के सारे मूल्य मध्यका से अधिक तथा दूसरे भाग के सारे मूल्य मध्यका से कम होते हैं। यदि किसी समंकमाला को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाए तो श्रेणी के बीच के मूल्य को माध्यिका कहते हैं।

मध्यका की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं
कॉनर के अनुसार, “मध्यका समंक श्रेणी का वह चर मूल्य है, जो क्रमबद्ध समंकमाला को दो बराबर भागों में इस प्रकार बाँटता है कि एक भाग में सारे मूल्य माध्यिका से अधिक और दूसरे भाग में सारे मुल्य उससे कम होते हैं।”
डॉ० बाउले के अनुसार, “यदि एक समूह के पदों को मूल्यों के आधार पर क्रमबद्ध किया जाए। तो लगभग मध्य पद का मूल्य ही मध्यको होगा।”

मध्यका की विशेषताएँ
मध्यका की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. मध्यका एक स्थिति सम्बन्धी माध्य है।
  2. यह आरोही या अवरोही समंकमाला को दो बराबर भागों में बाँट देती है।
  3. मध्यका के मूल्य पर अति सीमान्त इकाइयों का प्रभाव बहुत कम होता है।
  4. यह समंकमाला का केन्द्रीय मूल्य होता है।
  5. एक भाग के सभी मूल्य मध्यका से कम तथा दूसरे भाग के सभी मूल्य मध्यका से अधिक होते हैं।
  6. अन्य माध्यों की तरह मध्यका का गणितीय विवेचन नहीं करना होता।

प्रश्न 2
माध्यिका के गुण-दोष लिखिए। [2011]
उत्तर:
माध्यिका के गुण
माध्यिका या मध्यका के गुण निम्नलिखित हैं

  1. बुद्धिमत्ता, सुन्दरता आदि गुणात्मक विशेषताओं के अध्ययन के लिए अन्य माध्यों की अपेक्षा मध्यका श्रेष्ठ समझी जाती है।
  2. मध्यका को बिन्दुरेखीय पद्धति से भी ज्ञात किया जा सकता है।
  3. मध्यका की गणना हेतु श्रेणी के सभी मूल्यों का ज्ञान आवश्यक नहीं। केवल मदों की संख्या व मध्यका वर्ग का ज्ञान पर्याप्त है।
  4. मध्यका सीमान्त पदों से प्रभावित नहीं होती।
  5. मध्यको की गणना सरलता से की जा सकती है।
  6. यदि आवृत्तियों की प्रवृत्ति श्रेणी के मध्य समान रूप से विपरीत होने की हो तो मध्यका एक विश्वसनीय माध्य माना जाता है।
  7. मध्यको सदैव निश्चित एवं स्पष्ट होती है। सामान्य ज्ञान रखने वाले व्यक्ति के द्वारा भी इसे आसानी से ज्ञात किया जा सकता है।

माध्यिका के दोष माध्यिका या मध्यका के दोष निम्नलिखित हैं

  1. जब पदों की संख्या सम होती है तो मध्यका का सही मूल्य ज्ञात करना सम्भव नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में मध्यका का मान केवल अनुमानित रूप में ही ज्ञात होता है।
  2. मध्यका ज्ञात करते समय, यदि इकाइयों की संख्या में वृद्धि कर दी जाए तो इसका मूल्य बदल जाता है।
  3. जिन स्थानों पर श्रेणी के सीमान्त पदों का भार देना हो उन स्थानों के लिए मध्यको उपयुक्त नहीं रहती।।
  4. इसका प्रयोग बीजगणितीय क्रियाओं में नहीं किया जा सकता।
  5. इसकी गणना के लिए यह आवश्यक है कि पहले श्रेणी को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाए।
  6. यदि मध्यका तथा पदों की संख्या दी गयी हो तो इनके गुणा करने पर मूल्यों का कुल योग प्राप्त नहीं किया जा सकता। समान्तर माध्य की तरह यह गुण मध्यका में नहीं होता।
  7. यदि मूल्यों का वितरण अनियमित हो तो मध्यका प्रतिनिधि अंक प्रस्तुत नहीं करता; जैसे – एक विद्यार्थी को 5 विषयों में क्रमश: 20, 10, 3, 1, 0 अंक प्राप्त हुए हों। मध्यको अंक 3 होगा जो कि उचित प्रतीत नहीं होता।

प्रश्न 3
मध्यका या माध्यिका की गणना हेतु विभिन्न श्रेणियों में प्रयुक्त रीतियों को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
विभिन्न प्रकार की श्रेणियों में मध्यका की गणना
(क) व्यक्तिगत श्रेणी में  – व्यक्तिगत श्रेणी में मध्यका निम्नलिखित विधि से ज्ञात की जाती है|
(1) सर्वप्रथम श्रेणी के सभी पदों को आरोही (Ascending) या अवरोही (Descending) क्रम में रखते हैं।
(2) पद, सम हो या विषम, मध्यका ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग करते हैं
M = Value of [latex]\frac { N+1 }{ 2 }[/latex] th item
यहाँ पर, M = माध्यिका या मध्यका, N = पदों की संख्या।।

उदाहरण 1
निम्नलिखित समंकों से मध्यका ज्ञात कीजिए [2009]
18,   20,   25,   12,   15,   25,   28,   30,   10.
हल:
पदों को आरोही क्रम में व्यवस्थित करने परसंख्या
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 1
सूत्र – M = [latex]\frac { N+1 }{ 2 }[/latex] वें पद का मूल्य
अतः, M = [latex]\frac { 9+1 }{ 2 }[/latex] = [latex]\frac { 10 }{ 2 }[/latex] = 5वें पद का मूल्य
या, M = 5 वें पद का मूल्य = 20
अतः, मध्यका = 20
विशेष – व्यक्तिगत श्रेणी में यदि संख्या सम है तब [latex]\frac { N+1 }{ 2 }[/latex]th में मध्यका आकार पूर्णांक में नहीं होगा। ऐसी स्थिति में मध्यका की गणना निम्नलिखित उदाहरण में समझायी जा रही है

उदाहरण 2
निम्नलिखित समंकों की माध्यिका ज्ञात कीजिए
50,   10,   7,  5,   18,   22,   25,   36,   12.
हल:
पदों को आरोही क्रम में व्यवस्थित करने पर
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 2
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 3

(ख) खण्डित श्रेणी में – खण्डित श्रेणी में माध्यिका ज्ञात करने के लिए सर्वप्रथम बारम्बारता (आवृत्ति) को संचयी बारम्बारता में बदल देते हैं। इसके पश्चात् व्यक्तिगत श्रेणी में प्रयुक्त किये गये सूत्र [latex]\frac { N+1 }{ 2 }[/latex] द्वारा माध्यिका पद ज्ञात किया जाता है। वह पद जिस संचयी आवृत्ति में समाहित होता है, वही मध्यका होती है।

उदाहरण 3
कुछ परीक्षार्थियों के प्राप्तांक निम्नलिखित हैं। इनकी मध्यका ज्ञात कीजिए [2009, 10]
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 4
हल:
मध्यका की गणना
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 5
यहाँ 16 वाँ पद संचयी बारम्बारता 19 में निहित है और 19वें पद का मूल्य = 38
अतः, मध्यका = 38

विशेष – मध्यका का मूल्य निर्धारित करने के लिए [latex]\frac { N+1 }{ 2 }[/latex] वें पद के मूल्य को सदैव संचयी आवृत्ति के कॉलम में देखा जाता है तथा उस संचयी आवृत्ति के सम्मुख का पद मध्यको होता है। यह आवश्यक नहीं है कि वह पद संचयी आवृत्ति के कॉलम में मिल ही जाए, किन्तु वह पद संचयी आवृत्ति के जिस पद में निहित होता है उसी के सामने का पद मध्यका होता है।

(ग) सतत् श्रेणी – सतत् या अविच्छिन्न श्रेणी में मध्यका अग्रलिखित क्रमिक पद्धति की सहायता से ज्ञात की जाती है

  1. सबसे पहले यदि दी गयी श्रेणी समावेशी (Inclusive) हो तो उसे अपवर्जी (Exclusive) श्रेणी में परिवर्तित करना चाहिए।
  2. इसके बाद साधारण आवृत्तियों को संचयी आवृत्तियों में परिवर्तित करते हैं।
  3. इसके बाद m = [latex]\frac { N}{ 2 }[/latex] की सहायता से मध्यका पद ज्ञात किया जाता है।
  4. मध्यका पद जिस संचयी आवृत्ति में निहित होता है उसका मूल्य उसके सम्मुख के वर्ग–अन्तराल में निहित होता है। मध्यका-मूल्य इस वर्गान्तर की उच्च और निम्न सीमाओं के बीच ही होता है। इसे ज्ञात करने के लिए आन्तरगणन या अन्तर्वेशन (Interpolation) के निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग करते हैं

सूत्र – M = L1 + [latex]\frac { { L }_{ 2 }-{ L }_{ 1 } }{ f }[/latex] (m – c)
यहाँ पर, M = मध्यका,
L1 = मध्यका वर्ग की निम्न सीमा, L2 = मध्यका वर्ग की उच्च सीमा,
f = मध्यका वर्ग की बारम्बारती,
m = मध्य पद,
c = मध्यका वर्ग से पहले वाले वर्ग की संचयी बारम्बारता।

लघु उत्तरीय प्रश्न, (4 अंक)

उदाहरण 1
निम्नलिखित समंकों की सहायता से मध्यका ज्ञात कीजिए
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 6
या
निम्न समंकों की सहायता से माध्यिका ज्ञात कीजिए
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 7
या
निम्न समंकों में माध्यिका ज्ञात कीजिए [2014]
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 8
हल:
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 9
मध्यका का आकार 44.5वें पद का मूल्य 52 संचयी आवृत्ति में निहित है और यह संचयी आवृत्ति 30-40 वर्ग में स्थित है; अतः माध्यिका मूल्य इस वर्ग के अन्तर्गत ही स्थित होगा।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 10

उदाहरण 2
निम्नांकित समंकों से मध्यका ज्ञात कीजिए [2009, 10]
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 11
हल:
सर्वप्रथम समावेशी श्रेणी को अपवर्जी श्रेणी में निम्नलिखित रूप में बदला जाना चाहिए
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 12
स्पष्ट है कि मध्यका का आकार 62.5 वें पद का मूल्य संचयी आवृत्ति 90 में आता है और यह संचयी आवृत्ति 20.5 – 25.5 वर्ग में स्थित है; अतः मध्यका मूल्य इस वर्ग के अन्तर्गत ही स्थित होगा।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 13

उदाहरण 3
निम्नलिखित आवृत्ति वितरण का मध्यमान ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 14
हल:
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 15
मध्यका का आकार 28.5वें पद का मूल्य 33 संचयी आवृत्ति में निहित है और यह संचयी आवृत्ति 35-40 वर्ग में स्थित है, अतः मध्यका मूल्य इस वर्ग के अन्तर्गत ही स्थित होगा।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 16

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
9 छात्रों के अर्थशास्त्र विषय में अंक निम्नलिखित प्रकार से हैं
43,   47,   19,   26,   35,   36,   41,   29,   32.
इन अंकों से मध्यका ज्ञात कीजिए।
हल:
पदों को आरोही क्रम में लिखने पर व्यक्तिगत श्रेणी, संख्या
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 17

प्रश्न 2
माध्यमिक शिक्षा परिषद्, उत्तर प्रदेश की कक्षा 12 अर्थशास्त्र की परीक्षा में परीक्षार्थियों ने निम्नलिखित अंक प्राप्त किये
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 18
प्राप्तांकों की मध्यका ज्ञात कीजिए।
हल:
सर्वप्रथम पदों को आरोही क्रम में निम्नवत् व्यवस्थित कीजिए
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 19
23वें पद को मूल्य संचयी आवृत्ति 27 में है; अत: 27वें पद का मूल्य = 28
अतः, मध्यका =28

प्रश्न 3
निम्नलिखित सारणी से मध्यका ज्ञात कीजिए
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 20
हल:
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 21
मध्यका का आकार 21वें पद का मूल्य संचयी आवृत्ति 27 में निहित है और यह संचयी आवृत्ति 15-20 वर्ग में स्थित है; अत: मध्यका का मूल्य इस वर्ग के अन्तर्गत ही स्थित होगा।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 22

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
‘मध्यका’ (माध्यिका) का अर्थ एवं परिभाषा दीजिए। [2008, 14]
उत्तर:
मध्यका आरोही अथवा अवरोही क्रम में अनुविन्यसित समंकमाला के विभिन्न पदों के मध्य का मूल्य होती है और वह समंकमाला को दो भागों में इस प्रकार बाँटती है कि उसके एक ओर के सब पद उससे कम मूल्य के तथा दूसरी ओर के सब पद उससे अधिक मूल्य के होते हैं।

प्रश्न 2
यदि आँकड़ों की संख्या सम (Even) हो तो मध्यका ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 23

प्रश्न 3
यदि आँकड़ों की संख्या विषम हो तो मध्यका ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
मध्यका = [latex]\frac { N=1 }{ 2 }[/latex] th

प्रश्न 4
एक छात्र के नौ प्रश्न-पत्रों में निम्नलिखित प्राप्तांक थे
65, 36, 58, 62, 42, 40, 72, 82, 25 प्राप्तांकों की मध्यका ज्ञात कीजिए।
हल:
प्राप्तांकों को आरोही क्रम में व्यवस्थित करने पर,
25, 36, 40, 42, 58, 62, 65, 72, 82
यहाँ, N = 9 अर्थात् पदों की संख्या विषम है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 24

प्रश्न 5
एक कार्यालय के दस कर्मचारियों का दैनिक वेतन (₹ में) निम्नलिखित है
10, 13, 22, 25, 8, 11, 19, 17, 31, 36.
हल:
यहाँ, N = 10 अर्थात् पदों की संख्या सम है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 25

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
किसी भी सांख्यिकीय श्रेणी का मध्य मूल्य होता है
(क) समान्तर माध्य
(ख) मध्यका
(ग) बहुलक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) मध्यका।

प्रश्न 2
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप के अन्तर्गत श्रेणी के मूल्यों को क्रमबद्ध करना आवश्यक होता है
(क) समान्तर माध्य में
(ख) मध्यका में
(ग) बहुलक में
(घ) इनमें से किसी में नहीं
उत्तर:
(ख) मध्यका में।

प्रश्न 3
श्रेणी को दो बराबर भागों में बाँटने वाला मूल्य कहलाता है
(क) समान्तर माध्य
(ख) बहुलक
(ग) मध्यका
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) मध्यका।

प्रश्न 4
अविच्छिन्न अथवा सतत् श्रेणी में मध्यका निकालने का सूत्र है
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 28 Measure of Central Tendency Median 26
उत्तर:
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प्रश्न 5
एक परिवार के 8 सदस्यों की आयु (वर्षों में) निम्नवत है
2,   5,   8,   11,   31,   35,   55 तथा  59
(क) 8
(ख) 11
(ग) 21
(घ) 31
उत्तर:
(ग) 21

प्रश्न 6
निम्न समंकों में माध्यिका क्या है? [2015]
8, 10, 12, 13, 15, 17, 20
(क) 10
(ख) 13
(ग) 15
(घ) 20
उत्तर:
(ख) 13

प्रश्न 7
तोरण वक्रों का प्रतिच्छेदन बिन्दु प्रदर्शित करता है [2009]
(क) समान्तर माध्य
(ख) गुणोत्तर माध्य
(ग) माध्यिका
(घ) बहुलक
उत्तर:
(ग) माध्यिका।

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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 7 Indian Educationist: Mrs. Annie Besant

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 7 Indian Educationist: Mrs. Annie Besant (भारतीय शिक्षाशास्त्री-श्रीमती एनी बेसेण्ट) are part of UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 7 Indian Educationist: Mrs. Annie Besant (भारतीय शिक्षाशास्त्री-श्रीमती एनी बेसेण्ट).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 7
Chapter Name Indian Educationist: Mrs. Annie Besant (भारतीय शिक्षाशास्त्री-श्रीमती एनी बेसेण्ट)
Number of Questions Solved 28
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 7 Indian Educationist: Mrs. Annie Besant (भारतीय शिक्षाशास्त्री-श्रीमती एनी बेसेण्ट)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
श्रीमती एनी बेसेण्ट के अनुसार शिक्षा के अर्थ, उद्देश्यों तथा पाठ्यक्रम का उल्लेख कीजिए।
या
एनी बेसेण्ट के शैक्षिक विचारों का उल्लेख कीजिए।
या
डॉ० एनी बेसेण्ट के अनुसार शिक्षा के उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिए।
या
अधोलिखित प्रसंगों के ऊपर एनी बेसेण्ट के शैक्षिक विचारों को लिखिए

  1. शिक्षा का पाठ्यक्रम
  2. शिक्षण पद्धति
  3. शिक्षा के उद्देश्य या एनी बेसेण्ट के अनुसार शिक्षण विधियाँ क्या हैं?

उत्तर
एनी बेसेण्ट भारत की तत्कालीन शिक्षा प्रणाली से बहुत असन्तुष्ट थीं और उन्होंने उसकी कटु आलोचना भी की। उन्होंने प्रचलित शिक्षा को एकांगी और अव्यावहारिक बताते हुए कहा-“आजकल भारत में शिक्षा का उद्देश्य उपाधि प्राप्त करना है। शिक्षा तब असफल होती है, जब कि बहुत से असंयुक्त तथ्यों के द्वारा बालक का मस्तिष्क भर दिया जाता है और इन तथ्यों को उसके मस्तिष्क में इस प्रकार डाला जाता है, मानो रद्दी की टोकरी में फालतू कागज फेंके जा रहे हों और फिर उन्हें परीक्षा के कमरे में उलटकर टोकरी खाली कर देनी है।”

शिक्षा का अर्थ

एनी बेसेण्ट ने शिक्षा की परिभाषा देते हुए कहा है-“शिक्षा का अर्थ है बालक की प्रकृति के प्रत्येक पक्ष में उसकी सभी आन्तरिक क्षमताओं को बाहर प्रकट करना, उसमें प्रत्येक बौद्धिक व नैतिक शक्ति का विकास करना, उसे शारीरिक, संवेगात्मक, मानसिक तथा आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली बनाना ताकि विद्यालय की अवधि के अन्त में वह एक उपयोगी देशभक्त और ऐसा पवित्र व्यक्ति बन सके जो अपना और अपने चारों ओर के लोगों का आदर करता है।”

एनी बेसेण्ट के अनुसार, शिक्षा और संस्कृति में घनिष्ठ सम्बन्ध है। इनके अनुसार जन्मजात शक्तियों या क्षमताओं का बाह्य प्रकाशन एवं प्रशिक्षण ही शिक्षा है। ये शक्तियाँ बालक को पूर्व जन्म से प्राप्त होती हैं। एनी बेसेण्ट के अनुसार, “शिक्षा एक ऐसी सांस्कारिक विधि या क्रिया है, जिसका फल संस्कृति है। व्यक्ति पर शिक्षा का प्रभाव अनवरत रूप से पड़ता रहता है और जैसे-जैसे संस्कारों की ऊर्ध्वगति होती जाती है, वे संस्कृति में बदलते जाते हैं।”

शिक्षा के उद्देश्य

एनी बेसेण्ट ने शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य बताये हैं

  1. शारीरिक विकास–एनी बेसेण्ट के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य शारीरिक विकास करना होना चाहिए, जिससे बालकों के स्वास्थ्य, शक्ति एवं सुन्दरता में वृद्धि हो सके।
  2. मानसिक विकास–शिक्षा व्यक्ति को इसलिए देनी चाहिए जिससे वह अपनी विभिन्न मानसिक शक्तियों—चिन्तन, मनन, विश्लेषण, निर्णय, कल्पना आदि-का उचित विकास और प्रयोग कर सके।
  3. संवेगों का प्रशिक्षण–एनी बेसेण्ट ने शिक्षा के द्वारा बालकों के संवेगात्मकें विकास पर बहुत बल दिया है। उन्होंने कहा है कि शिक्षा द्वारा व्यक्ति में उचित प्रकार के संवेग, अनुभूतियाँ और भाव उत्पन्न किये जाने चाहिए। शिक्षा के द्वारा सुन्दर और उत्तम के प्रति, दूसरों के सुख-दु:ख में सहानुभूति, माता-पिता एवं बड़ों का सम्मान, संमान अवस्था वालों के प्रति भाई-बहनों का-सा भाव और छोटों को बच्चों के समान तथा दूसरों के प्रति भुलाई का भाव उत्पन्न किया जाना चाहिए।
  4. नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास-एनी बेसेण्ट के अनुसार शिक्षा के द्वारा बालकों का नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास भी होना चाहिए।
  5. आदर्श नागरिक का निर्माण करना-शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को आदर्श नागरिक के गुणों से अलंकृत करना है, जिससे वह अपने आगे के सामाजिक, राजनीतिक एवं नागरिक जीवन में सुखी हो सके।

शिक्षा का पाठ्यक्रम

  1. जन्म से 5 वर्ष तक का पाठ्यक्रम-इस अवस्था में बालक शारीरिक एवं मानसिक रूप से बहुत कोमल होता है और उसका विकास इच्छित दिशा में आसानी से किया जा सकता है। इस अवस्था में बालक के इन्द्रिय विकास पर अधिक ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इसी समय वह चलना-फिरना, बैठना-उठना, बोलना आदि सीखता है। अतः इस अवस्था के पाठ्यक्रम में शारीरिक क्रिया, खेलकूद, गणित, भाषा, गीत, धार्मिक पुरुषों की कहानियों आदि को सम्मिलित करना चाहिए।
  2. 5 से 7 वर्ष तक का पाठ्यक्रम-इस अवस्था के पाठ्यक्रम में गणित, भाषा, खेलकूद, सफाई और स्वास्थ्य की आदतों का निर्माण और प्रकृति निरीक्षण को शामिल किया जाए। इसके अतिरिक्त चित्रों एवं धार्मिक कहानियों की सहायता लेनी चाहिए, जिससे बालक का कलात्मक एवं धार्मिक विकास हो सके।
  3. 7 से 10 वर्ष तक का पाठ्यक्रम-इस अवस्था में बालक की वास्तविक और औपचारिक शिक्षा प्रारम्भ होती है। इसके अन्तर्गत मातृभाषा, संस्कृत, अरबी, फारसी, इतिहास, भूगोल, गणित, शारीरिक व्यायाम आदि विषयों को सम्मिलित करना चाहिए। इस स्तर पर शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए
  4. 10 से 14 वर्ष तक का पाठ्यक्रम-इस अवस्था में बालक माध्यमिक स्तर पर प्रवेश करते हैं। इसके पाठ्यक्रम के अन्तर्गत मातृभाषा, संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी, भूगोल, इतिहास, प्रकृति एवं कौशल आदि विषयों को सम्मिलित करना चाहिए।
  5.  14 वर्ष से 16 वर्ष तक का पाठ्यक्रम-यह हाईस्कूल की शिक्षा की अवस्था होती है। इसके पाठ्यक्रम को एनी बेसेण्ट ने चार भागों में विभाजित किया है

(क) सामान्य हाईस्कूल-
(अ) साहित्यिकसंस्कृत, अरबी, फारसी, अंग्रेजी, मातृभाषा।
(ब) रसायनशास्त्र-भौतिकशास्त्र, गणित, रेखागणित, बीजगणित आदि।
(स) प्रशिक्षण-मनोविज्ञान, शिक्षण कला, विद्यालय व्यवस्था, शिक्षण अभ्यास, गृह विज्ञान आदि।

(ख) तकनीकी हाईस्कूल-मातृभाषा, अंग्रेजी, भौतिक एवं रसायन विज्ञान, व्यावसायिक इतिहास, प्रारम्भिक इंजीनियरी, यन्त्र विद्या, विद्युत ज्ञान आदि।
(ग) वाणिज्य हाईस्कूल-विदेशी भाषाएँ, व्यापारिक व्यवहार, हिसाब-किताब, व्यापारिक कानून, टंकण,व्यापारिक इतिहास, भूगोल एवं शॉर्ट हैण्ड आदि।

(घ) कृषि हाईस्कूल-संस्कृत, अरबी, फारसी या पालि, मातृभाषा, ग्रामीण इतिहास, भूगोल, गणित हिसाब-किताब, कृषि सम्बन्धी प्रयोगात्मक, रासायनिक एवं भौतिक विज्ञान, भूमि की नाप आदि। इसके अतिरिक्त बालकों के शारीरिक विकास के लिए खेलकूद, व्यायाम हस्तकलाएँ, सामाजिक क्रियाएँ वे समाज सेवा के कार्य कराए जाएँ तथा साथ में भावात्मक विकास भी किया जाए।

6. 16 से 21 वर्ष तक का पाठ्यक्रम-उच्च शिक्षा के इस पाठ्यक्रम को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है

  • स्नातकीय पाठ्यक्रम-16 से 19 वर्ष तक की शिक्षा में बालकों को साहित्यिक, वैज्ञानिक, तकनीकी एवं कृषि की शिक्षा प्रदान करनी चाहिए।
  • स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम-19 से 21 वर्ष तक की शिक्षा में भी उपर्युक्त विषयों की शिक्षा दी जानी चाहिए

शिक्षण-पद्धतियाँ

एनी बेसेण्ट ने इन विधियों के द्वारा शिक्षा देने पर अधिक बल दिया है

  1. क्रियाविधि-एनी बेसेण्ट का कहना था कि बालक स्वभाव से क्रियाशील होते हैं और खेलों में उनकी रुचि होती है, इसलिए शिक्षा प्रदान करने के लिए खेल-कूद, कसरतें, कृषि, उद्योग व हस्तकार्यों की सहायता लेनी चाहिए। इससे बालकों का शारीरिक विकास होगा और उन्हें ज्ञानार्जन का अवसर भी प्राप्त होगी।
  2. निरीक्षण विधि-एनी बेसेण्ट का कहना था किं बालकों को उचित वातावरण में शिक्षा प्रदान करने के लिए घर के बाहर वास्तविक क्षेत्र में ले जाकर विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का निरीक्षण कराना चाहिए। इससे उनकी ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों का विकास होगा।
  3. अनुकरण विधि-एनी बेसेण्ट का मत था कि बालकों में अनुकरण की प्रवृत्ति बहुत प्रबल होती है। इसलिए माता-पिता एवं शिक्षकों को चाहिए कि वे बालकों के सामने ऐसे व्यवहार प्रस्तुत करें, जिससे वे उनका अनुकरण कर अच्छे नैतिक आचरण का विकास करें।
  4. स्वाध्याय विधि–उनका कहना था कि प्रत्येक विद्यार्थी को अध्ययन, चिन्तन एवं मनन में लीन रहना चाहिए। उच्च शिक्षा में इस विधि का बहुत महत्त्व है।
  5. निर्देशन विधि-एनी बेसेण्ट का विचार था कि विद्यार्थियों को समय-समय पर शिक्षकों से अच्छे एवं उपयोगी निर्देश मिलते रहने चाहिए, जिससे विद्यार्थियों का आध्यात्मिक और मानसिक विकास होगा।
  6. व्याख्यान विधि-एनी बेसेण्ट के अनुसार, उच्च शिक्षा के स्तर पर छात्रों को व्याख्यान विधि के द्वारा इतिहास, राजनीति, दर्शनशास्त्र, भूगोल, भाषा आदि की शिक्षा दी जानी चाहिए।
  7. प्रायोगिक विधि-इस विधि का प्रयोग सभी क्रियाप्रधान और वैज्ञानिक विषयों के अध्ययन में किया जाना चाहिए; जैसे-भौतिक, रसायन और जीव विज्ञान, कला-कौशल, पाक विज्ञान, गृह-विज्ञान आदि।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न1
एक महान शिक्षाशास्त्री के रूप में एनी बेसेण्ट के जीवन का सामान्य परिचय दीजिए।
उतर
विश्व की महान् महिला शिक्षाशास्त्री, समाज-सुधारक, हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की समर्थक एनी बेसेण्ट का जन्म 1847 ई० में लन्दन के एक सम्भ्रान्त परिवार में हुआ था। इनके माता-पिता मूलतः आयरलैण्ड के निवासी थे। एनी बेसेण्ट बाल्यावस्था से ही बड़ी कुशाग्र बुद्धि वाली, मननशील तथा अध्ययनरत थीं। 19 वर्ष की आयु में उनका विवाह एक पादरी के साथ हो गया। उनका पति संकुचित दृष्टिकोण वाला कट्टर, धार्मिक तथा अनुदार व्यक्ति था। इस कारण एनी बेसेण्ट अधिक समय तक वैवाहिक जीवन व्यतीत न कर सकीं और उन्होंने अपने पति से सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया। वैवाहिक जीवन से मुक्ति पाकर एनी बेसेण्ट समाज-सेवा के कार्य में जुट गईं। उन्होंने अपने व्याख्यानों तथा प्रभावशाली लेखों के कारण शीघ्र ही अपार ख्याति अर्जित कर ली। सन् 1887 ई० में वे इंग्लैण्ड की थियोसोफिकल सोसायटी के सम्पर्क में आई और उन्होंने इस संस्था के प्रचार एवं प्रसार में अपना तन, मन व धन सब कुछ लगा दिया।

1892 ई० में ये थियोसोफिकल सोसायटी के अधिवेशन में आमन्त्रित होकर ‘भारत आयीं और फिर वे भारत-भूमि को छोड़कर स्वदेश कभी नहीं गयीं। भारत को स्वतन्त्र कराने के लिए उन्हें कई बार जेलयात्रा भी करनी पड़ी। भारतीय जन-जीवन को सुखी बनाने के लिए उन्होंने ‘होमरूल सोसायटी की स्थापना की। उन्होंने भारत में रहकर हिन्दू धर्म एवं संस्कृति का गहन अध्ययन किया और इस अध्ययन के आधार पर उन्होंने हिन्दू धर्म एवं संस्कृति को पाश्चात्य धर्म एवं संस्कृति से श्रेष्ठ बताया। उन्होंने यहाँ रहकर भगवद्गीता का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया और वैदिक एवं उपनिषद् सिद्धान्तों का व्यापक प्रचार किया। उनका शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ा योगदान बनारस में ‘सेन्ट्रल हाईस्कूल की स्थापना करना था। भारतीय समाज की सेवा करते हुए सन् 1933 ई० में भारत में ही उनकी मृत्यु हुई।

प्रश्न 2
एनी बेसेण्ट के शैक्षिक योगदान पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
शिक्षा के क्षेत्र में एनी बेसेण्ट के योगदान को निम्नवत् समझा जा सकता है|

  1. शिक्षा और धर्म में समन्वय-एनी बेसेण्ट ने धर्म और शिक्षा में घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित कर धर्मप्रधान शिक्षा योजना का निर्माण करने पर बल दिया। भारतीय धर्मों ने उन्हें बहुत अधिक प्रभावित किया था, इसीलिए उन्होंने भारतीय धर्म-ग्रन्थों के आधार पर अपने शैक्षिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया।
  2. शिक्षा एवं संस्कृति में सम्बन्ध-एनी बेसेण्ट ने शिक्षा और संस्कृति में बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध बताया है। उनका कहना था कि शिक्षा के द्वारा संस्कृति का प्रचार एवं प्रसार होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि शिक्षा के द्वारा भारतीय संस्कृति का पुनरुत्थान करना चाहिए, क्योंकि भारतीय संस्कृति सब संस्कृतियों में सर्वोत्कृष्ट एवं सर्वश्रेष्ठ है।
  3. शिक्षा एवं यथार्थ जीवन में सम्बन्ध-एनी बेसेण्ट ने इस बात पर बल दिया कि शिक्षा एवं यथार्थ जीवन के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा वैयक्तिक एवं सामाजिक विकास का साधन है। अतः शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो युवकों की जीविकोपार्जन की समस्याओं का समाधान करे और देश की समृद्धि एवं रचनात्मक विकास में योग दे।
  4. शिक्षा को सार्वजनिक बनाना-एनी बेसेण्ट की इच्छा थी कि देश के सभी नागरिकों को ये अवसर एवं सुविधाएँ उपलब्ध होनी चाहिए, जिससे वे अपनी योग्यता एवं शक्ति के अनुसार शिक्षा प्राप्त कर सकें। उनका कहना था कि सभी को बिना किसी भेदभाव के शिक्षा देनी चाहिए। शिक्षा को सार्वजनिक बनाने के लिए राज्य को अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए।
  5. सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज की स्थापना-एनी बेसेण्ट ने अपने शैक्षिक विचारों को व्यावहारिक रूप प्रदान करने के लिए सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज की स्थापना की। इससे पाश्चात्य एवं भारतीय शिक्षण विधियों का सुन्दर समन्वय किया गया है।
  6. राष्ट्रीय शिक्षा का प्रयास-एनी बेसेण्ट ने राष्ट्रीय शिक्षा पर बहुत बल दिया। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय विचारकों का पथ-प्रदर्शन किया। उनका विचार था कि जो शिक्षा अपनी संस्कृति, सभ्यता, भाषा एवं उद्योग का संवर्धन नहीं करती, उसे वास्तविक अर्थों में शिक्षा नहीं कहा जा सकता और ऐसी शिक्षा से देश का कल्याण नहीं हो सकता।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
एनी बेसेण्ट के स्त्री-शिक्षा सम्बन्धी विचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
एनी बेसेण्ट ने स्त्री-शिक्षा पर विशेष बल दिया, क्योंकि उनका विचार था कि यदि स्त्रियों को समुचित शिक्षा प्राप्त हो जाए तो वे आदर्श पत्नियाँ एवं माँ बनकर व्यक्ति, परिवार, समाज एवं राष्ट्र का कल्याण करेंगी। एनी बेसेण्ट ने बालिकाओं के लिए नैतिक शिक्षा, शारीरिक शिक्षा, कलात्मक शिक्षा (सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, संगीत, कला), साहित्यिक शिक्षा और वैज्ञानिक शिक्षा का समर्थन किया है।

प्रश्न 2
ग्रामीण शिक्षा के विषय में एनी बेसेण्ट के विचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
एनी बेसेण्ट के समय में भारत के गाँवों में अज्ञानता का अन्धकार फैला हुआ था। अंग्रेज़ों ने भारतीय ग्रामीणों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया था, क्योंकि वे भारतीयों को अज्ञानी ही रखना चाहते थे। एनी बेसेण्ट ने अंग्रेजों की इस नीति की कटु आलोचना करते हुए इस बात पर बल दिया कि राष्ट्रीय-जागृति उत्पन्न करने के लिए गाँवों में शिक्षा का प्रसार होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण शिक्षा में कृषि, उद्योग और कला-कौशल को प्रधानता देनी चाहिए और इसके साथ-ही-साथ लिखने-पढ़ने की शिक्षा भी देनी चाहिए।

प्रश्न 3
पिछड़े वर्गों की शिक्षा के विषय में एनी बेसेण्ट के विचार लिखिए।
उत्तर
भारतीय समाज में एक ऐसा भी वर्ग है, जो सदियों से उपेक्षित होता चला जा रहा है। इस वर्ग में घृणित मनोवृत्तियाँ, पिछड़ा रहन-सहन एवं खानपान तथा अभद्र रीति-रिवाजों का आधिक्य होता है। एनी बेसेण्ट के मतानुसार इस वर्ग के लिए कुछ अधिक सुविधाएँ एवं नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। इनकी शिक्षा में धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा को विशेष स्थान देना चाहिए।

प्रश्न 4
प्रौढ़-शिक्षा के विषय में एनी बेसेण्ट के विचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
एनी बेसेण्ट के अनुसार भारत में प्रौढ़-शिक्षा की व्यवस्था भी अति आवश्यक थी। उनके अनुसार उन प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए जो विभिन्न कारणों से सामान्य विद्यालयी शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाये हों। उनके मतानुसार प्रौढ़ शिक्षा व्यवस्था के लिए रात्रि पाठशालाओं की स्थापना की जानी चाहिए। इन पाठशालाओं के माध्यम से प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों को शिक्षा प्रदान की जा सकती है।

प्रश्न 5
एनी बेसेण्ट के अनुशासन सम्बन्धी विचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
एनी बेसेण्ट एक आदर्शवादी महिला थीं। इसलिए वह प्रेम, सहानुभूति, सद्व्यवहार, आत्म-प्रेरणा तक इच्छा-शक्ति के बल पर अनुशासन स्थापित करना चाहती थीं। वह चाहती थीं कि विद्यार्थियों में इस प्रकार के गुण उत्पन्न हों, जिससे उनमें आत्म-नियन्त्रण के द्वारा आत्म-अनुशासन की स्थापना हो सके। इसके लिए उन्होंने दमनात्मक अनुशासन का विरोध किया है। उनका कहना था कि विद्यर्थियों को अनुशासित करने के लिए उन पर शिक्षक के प्रभाव का भी प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 6
एनी बेसेण्ट के अनुसार विद्यालय का वातावरण तथा शिक्षक-विद्यार्थी सम्बन्ध कैसे होने चाहिए?
उत्तर
एनी बेसेण्ट का विचार था कि विद्यालय का वातावरण अत्यधिक शान्त एवं अध्ययन कार्य में सहायक होना चाहिए। उनके अनुसार विद्यालयों को तपोवन की तरह शान्त वातावरण में स्थापित किया जाना चाहिए, जिससे विद्यार्थियों में समुचित गुणों का विकास हो सके। जहाँ तक शिक्षक-विद्यार्थी सम्बन्धों का प्रश्न है, एनी बेसेण्ट का दृष्टिकोण आदर्शवादी था। उनका मत था कि विद्यार्थियों को शिक्षकों को सम्मान करना चाहिए और शिक्षकों को भी अपने शिष्यों के प्रति पुत्रवत् व्यवहार करना चाहिए। इनसे दोनों के मध्य सौहार्द की भावना का विकास होगा।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री एनी बेसेण्ट का जन्म कब और किस देश में हुआ था?
उत्तर
एनी बेसेण्ट का जन्म सन् 1847 ई० में लन्दन में हुआ था।

प्रश्न 2
एनी बेसेण्ट मूल रूप से किस देश की नागरिक थीं?
उत्तर
एनी बेसेण्ट मूल रूप से आयरलैण्ड की नागरिक थीं।

प्रश्न 3
श्रीमती एनी बेसेण्ट किस महान संस्था की सक्रिय सदस्या थीं?
उत्तर
श्रीमती एनी बेसेण्ट महान् संस्था ‘थियोसोफिकल सोसायटी’ की सक्रिय सदस्या थीं।

प्रश्न 4
एनी बेसेण्ट ने किस सोसायटी की स्थापना की थी?
उत्तर
एनी बेसेण्ट ने ‘होमरूल सोसायटी’ नामक संस्था की स्थापना की थी।

प्रश्न 5
एनी बेसेण्ट ने किस शिक्षा-संस्था की स्थापना की थी?
उत्तर
एनी बेसेण्ट ने बनारस में ‘सेण्ट्रल हाईस्कूल’ नामक शिक्षा-संस्था की स्थापना की थी।

प्रश्न 6
एनी बेसेण्ट के अनुसार शिक्षा के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
एनी बेसेण्ट के अनुसार शिक्षा के मुख्य उद्देश्य हैं-

  1. शारीरिक विकास,
  2. मानसिक विकास
  3. संवेगों का प्रशिक्षण
  4. नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास तथा
  5. आदर्श नागरिकों को निर्माण

प्रश्न 7
जनसाधारण की शिक्षा के विषय में एनी बेसेण्ट की क्या धारणा थी ?
उत्तर
एनी बेसेण्ट जनसाधारण की शिक्षा को अनिवार्य मानती थीं। उनके अनुसार प्रत्येक बालक के लिए नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए।

प्रश्न 8
धार्मिक शिक्षा के विषय में एनी बेसेण्ट का क्या मत था?
उत्तर
एनी बेसेण्ट धार्मिक शिक्षा को अनिवार्य मानती थीं।

प्रश्न 9
एनी बेसेण्ट के अनुसार ग्रामीणों के लिए किस प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए?
उत्तर
एनी बेसेण्ट के अनुसार ग्रामीणों के लिए कृषि, उद्योग एवं कला-कौशल की शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए, साथ ही उन्हें पढ़ने-लिखने की भी शिक्षा दी जानी चाहिए।

प्रश्न 10
डॉ० एनी बेसेण्ट के अनुसार शिक्षा के माध्यम का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
डॉ० एनी बेसेण्ट का विचार था कि बच्चों की प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य रूप से मातृभाषा के माध्यम से होनी चाहिए। उच्च शिक्षा के लिए सुविधानुसार अंग्रेजी भाषा को भी माध्यम के रूप में अपनाया जा सकता है।

प्रश्न 11
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य-

  1. श्रीमती एनी बेसेण्ट के माता-पिता आयरलैण्ड के मूल निवासी थे।
  2. सन् 1892 ई० में श्रीमती एनी बेसेण्ट थियोसोफिकल सोसायटी की अध्यक्षा बनीं।
  3. श्रीमती एनी बेसेण्ट किसी राष्ट्रीय शिक्षा योजना के पक्ष में नहीं थीं।
  4. श्रीमती एनी बेसेण्ट आत्मानुशासन की समर्थक थीं।
  5. श्रीमती एनी बेसेण्ट स्त्री-शिक्षा के विरुद्ध थीं।

उत्तर

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. सत्य
  5. असत्या

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1
श्रीमती एनी बेसेण्ट मूल रूप से भारतीय न होकर
(क) अंग्रेज थीं
(ख) आइरिश थीं
(ग) फ्रेंच थीं
(घ) जापानी थीं।
उत्तर
(ख) आइरिश थीं

प्रश्न 2
एनी बेसेण्ट का जन्म हुआ था-
(क) फ्रांस में
(ख) जर्मनी में
(ग) इटली में
(घ) लन्दन में
उत्तर
(घ) लन्दन में

प्रश्न 3
श्रीमती एनी बेसेण्ट किस संस्था से सम्बद्ध थीं?
(क) आर्य समाज
(ख) ब्रह्म समाज
(ग) थियोसोफिकल सोसायटी
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) थियोसोफिकल सोसायटी

प्रश्न 4
श्रीमती एनी बेसेण्ट को विशेष लगाव था
(क) पाश्चात्य संस्कृति से
(ख) भौतिक संस्कृति से।
(ग) प्राचीन भारतीय संस्कृति से
(घ) अंग्रेजी सभ्यता से
उत्तर
(ग) प्राचीन भारतीय संस्कृति से

प्रश्न 5
“जब तक भारत जीवित रहेगा, तब तक श्रीमती एनी बेसेण्ट की भव्य सेवाओं की स्मृति भी अमर रहेगी।” यह कथन किसका है?
(क) रवीन्द्रनाथ टैगोर
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) डॉ० राधाकृष्णन्
(घ) जवाहरलाल नेहरू
उत्तर
(ख) महात्मा गाँधी

प्रश्न 6
एनी बेसेण्ट के अनुसार शिक्षा से आशय था
(क) विभिन्न विषयों का ज्ञान अर्जित करना
(ख) निर्धारित डिग्री प्राप्त करना
(ग) अन्तर्निहित क्षमताओं के विकास की प्रक्रिया
(घ) विद्यालय में अध्ययन करना
उत्तर
(ग) अन्तर्निहित क्षमताओं के विकास की प्रक्रिया

प्रश्न 7
बनारस में सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज की स्थापना किसने की ?
(क) रवीन्द्रनाथ टैगोर
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) एनी बेसेण्ट
(घ) श्री अरविन्द
उत्तर
(ग) एनी बेसेण्ट

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UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 24 Statistics

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 24 Statistics (सांख्यिकी) are part of UP Board Solutions for Class 12 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 24 Statistics (सांख्यिकी).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Economics
Chapter Chapter 24
Chapter Name Statistics (सांख्यिकी)
Number of Questions Solved 39
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 24 Statistics (सांख्यिकी)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
सांख्यिकी के महत्त्व पर प्रकाश डालिए। [2007, 08, 10, 11]
या
“सांख्यिकी प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित करती है तथा जीवन के अनेक बिन्दुओं को स्पर्श करती है।” समीक्षा कीजिए। [2011]
या
हमारे जीवन में सांख्यिकी की उपयोगिता और महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। [2016]
उत्तर:
सांख्यिकी का महत्त्व
मानव-सभ्यता के विकास के साथ-साथ सांख्यिकी की उपयोगिता बढ़ती जा रही है। आज विज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, नक्षत्र विज्ञान आदि विषयों में इसका प्रयोग होने लगा है। हमारे दैनिक जीवन की प्रत्येक क्रिया सांख्यिकी से प्रभावित है। सांख्यिकी के महत्त्व को निम्नलिखित रूप में स्पष्ट किया जा सकता हैं

1. अर्थशास्त्र में सांख्यिकी – सांख्यिकी अर्थशास्त्र का आधार है। अर्थशास्त्र के सभी विभागों उपभोग, उत्पादन, विनिमय, वितरण एवं राजस्व में इसकी आवश्यकता पड़ती है। प्रो० बाउले के अनुसार, “अर्थशास्त्र का कोई भी विद्यार्थी पूर्णतया सत्यता का दावा नहीं कर सकता, जब तक कि वह सांख्यिकी की रीतियों में निपुण न हो।’ प्रत्येक आर्थिक नीति के निर्माण में सांख्यिकी का प्रयोग आवश्यक होता है। आवश्यकताएँ, रहन-सहन का स्तर, पारिवारिक बजट, माँग की लोच, मुद्रा की मात्रा, बैंक-दर, आयात-निर्यात नीति का अध्ययन तथा निर्माण, राष्ट्रीय लाभांश, करों का निर्धारण आदि सांख्यिकीय आँकड़ों पर ही आधारित होते हैं।

2. आर्थिक नियोजन के क्षेत्र में  – वर्तमान युग नियोजन का युग है। देश का आर्थिक विकास नियोजन के द्वारा ही सम्भव है। सांख्यिकी नियोजन का आधार है। किसी भी आर्थिक योजना के निर्माण तथा उसको सफलतापूर्वक चलाने के लिये सांख्यिकीय विधियों का उपयोग अत्यन्त आवश्यक होता है। जितने सही व सबल आँकड़े प्राप्त होंगे, योजना उतनी ही ठीक बन सकेगी। योजना निर्माण में इस तथ्य का अनुमान आवश्यक होता है कि उसमें कितना धन व्यय होगा, कितने व्यक्तियों को रोजगार उपलब्ध हो सकेगा तथा राष्ट्रीय आय में कितनी वृद्धि होगी; अत: इसमें भी सांख्यिकी की आवश्यकता पड़ती है।

3. राज्य प्रशासन के क्षेत्र में  – सांख्यिकी की उत्पत्ति ही राज्य प्रशासन के रूप में हुई थी। आज के युग में राज्य के कार्य-क्षेत्र बढ़ते ही जा रहे हैं। इस कारण सांख्यिकी का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है। कुशल प्रशासन हेतु अनेक प्रकार की सूचनाएँ एकत्रित करनी होती हैं; जैसे–सैनिक शक्ति, राष्ट्र की आय, व्यय, ऋण, आयात-निर्यात, औद्योगिक स्थिति, बेरोजगारी आदि। इन सूचनाओं के आधार पर ही सरकार अपनी नीति का निर्धारण करती है तथा बजट का निर्माण किया जाता है; अतः राज्य प्रशासन के क्षेत्र में सांख्यिकी का अत्यधिक महत्त्व है।

4. व्यापार व उद्योग के क्षेत्र में –  आज के इस प्रतियोगिता के युग में एक सफल व्यापारी व उद्यमी को इस बात का ज्ञान होना आवश्यक है कि उसकी वस्तु की माँग कहाँ और कितनी है? भविष्य में मूल्य-परिवर्तन की क्या सम्भावनाएँ हैं? सरकार की नीति उद्योग के विषय में क्या है? आदि। इन सभी प्रश्नों के ठीक उत्तर के लिये सांख्यिकी का ज्ञान आवश्यक है। बॉडिंगटन के शब्दों में, “एक सफल व्यापारी वही है जिसके अनुमान यथार्थता के अति निकट हो।’ इसके लिये उसे सांख्यिकीय विधियों का आश्रय लेना पड़ेगा।

5. सार्वभौमिक महत्त्व – आधुनिक समय में सांख्यिकी का महत्त्व सर्वत्र है। शिक्षा एवं मनोविज्ञान के क्षेत्र में छात्रों की रुचि, बुद्धि, योग्यता और उनकी प्रगति का मूल्यांकन, परीक्षा-प्रणाली में सुधार आदि में सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग किया जाता है। चिकित्सा के क्षेत्र में, परिवार नियोजन कार्यक्रम की सफलता, रोग-निवारण में सफलता आदि के ज्ञान के लिए भी सांख्यिकीय विधियाँ प्रयोग में लायी जाती हैं। सांख्यिकी के सार्वभौमिक महत्त्व की ओर संकेत करते हुए टिपेट (Tippett) ने कहा है, सांख्यिकी प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित करती है और जीवन को अनेक बिन्दुओं पर स्पर्श करती है।”

6. अनुसन्धान के क्षेत्र में  – हम जानते हैं कि तीव्र आर्थिक विकास के लिए अनुसन्धान आवश्यक हैं। भौतिक एवं सामाजिक विज्ञानों के सभी क्षेत्रों में अनुसन्धान हेतु सांख्यिकी का प्रयोग अनिवार्य है। सांख्यिकी के बिना अनुसन्धानकर्ता कभी भी सही निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकता।

प्रश्न 2
प्राथमिक एवं द्वितीयक आँकड़ों में अन्तर बताइए तथा प्राथमिक आँकड़ों के संग्रहण की विविध विधियों को समझाइए। [2008, 14, 15]
या
समंकों के संकलन से क्या आशय है ? समंक कितने प्रकार के होते हैं ? प्राथमिक समंकों के संकलन की विधियाँ बताइए तथा उनके गुण व दोषों पर भी प्रकाश डालिए।
या
प्राथमिक समंकों से आप क्या समझते हैं? प्राथमिक समंकों को एकत्र करने की विभिन्न विधियों को समझाइए। [2014, 15]
उत्तर:
समंकों (आँकड़ों) के संकलन से आशय आँकड़ों को एकत्रित करने से हैं। जब आर्थिक विकास के किसी भी क्षेत्र के लिए सांख्यिकीय अनुसन्धान की योजना बनायी जाती है तो प्रथम चरण के रूप में समंकों (आँकड़ों) के संकलन का कार्य आरम्भ किया जाता है। आँकड़े सांख्यिकीय अनुसन्धान के लिए नींव का कार्य करते हैं। संकलन के आधार पर समंक दो प्रकार के होते हैं
(क) प्राथमिक समंक तथा
(ख) द्वितीयक समंक।

(क) प्राथमिक समंक – प्राथमिक समंक वे समंक होते हैं, जिन्हें अनुसन्धानकर्ता अपने उपयोग के लिए स्वयं एकत्रित करता है। ये समंक पूर्णतः मौलिक होते हैं। अनुसन्धानकर्ता अपनी
आवश्यकतानुसार इन समंकों का संग्रहण करता है।

(ख) द्वितीयक समंक – द्वितीयक समंक वे समंक होते हैं, जिन्हें अनुसन्धानकर्ता स्वयं एकत्रित नहीं करता है अपितु उन समंकों का संग्रहण किसी पूर्व अनुसन्धानकर्ता के द्वारा पहले से ही किया हुआ होता है तथा निष्कर्ष भी निकाले हुए होते हैं। ये समंक पूर्व-प्रकाशित यो अप्रकाशित हो सकते हैं। अनुसन्धानकर्ता इन द्वितीयक समंकों के द्वारा ही अपनी आवश्यकतानुसार परिणाम ज्ञात कर लेता है।

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि नवीन आँकड़े (समंक) प्रथम अनुसन्धानकर्ता के द्वारा प्रयुक्त किये जाने पर प्राथमिक होते हैं, किन्तु जब उन्हीं समंकों का प्रयोग किसी अन्य अनुसन्धानकर्ता द्वारा किया जाए तो वे ही समंक द्वितीयक हो जाएँगे।

प्राथमिक समंकों (आँकड़ों) के संकलन की विधियाँ (रीतियाँ)
प्राथमिक समंकों का संकलन करने के लिए अनुसन्धानकर्ता निम्नलिखित विधियों (रीतियों) में से कोई भी विधि (रीति) जो उसके लिए अधिक उपयुक्त व श्रेष्ठ हो, को अपना सकता है

  1.  प्रत्यक्ष व्यक्तिगत समंक संकलन रीतिः
  2. अप्रत्यक्ष मौखिक समंक संकलन रीति।
  3. संवाददाताओं की सूचनाओं के आधार पर समंक संकलन।
  4. प्रश्नावली विधि
    • कम सूचकों द्वारा अनुसूचियाँ भरकर तथा
    • प्रगणकों द्वारा सूचनाएँ प्राप्त करके।

1. प्रत्यक्ष व्यक्तिगत समंक संकलन रीति – इस विधि में अनुसन्धानकर्ता स्वयं अनुसन्धान क्षेत्र में जाकर व्यक्तिगत रूप से सूचनादाताओं से सम्पर्क स्थापित करता है तथा अनुसन्धान से सम्बन्धित समंक एकत्रित करता है। यह रीति बहुत ही सरल है। इस रीति द्वारा विश्वसनीय और आवश्यक समंक एकत्रित किये जाते हैं, किन्तु इस प्रणाली का क्षेत्र सीमित होता है।
गुण – इस रीति में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं

  1. शुद्धता – इस प्रणाली द्वारा समंकों का अनुसन्धानकर्ता स्वयं संग्रह करता है; अतः ये समंक शुद्ध होते हैं तथा इनके परिणाम भी शुद्ध ही निकलते हैं।
  2. विस्तृत सूचनाओं की प्राप्ति – इस विधि में अनुसन्धानकर्ता को समंक एकत्रित करते समय मुख्य सूचनाओं के साथ-साथ अन्य सूचनाएँ भी प्राप्त हो जाती हैं। यदि अनुसन्धानकर्ता परिवार की आर्थिक स्थिति से सम्बन्धित सूचनाएँ प्राप्त कर रहा हो, तब रहन-सहन के स्तर, शिक्षा आदि के विषय में भी जानकारी प्राप्त हो जाती है।
  3.  मौलिकता – प्राथमिक समंक पूर्णत: मौलिक होते हैं, क्योंकि ये अनुसन्धानकर्ता द्वारा स्वयं एक निश्चित उद्देश्य के लिए किये जाते हैं।
  4. लोचकता – इस प्रणाली से प्राप्त समंकों में लोचकता होती है। अनुसन्धानकर्ता समंकों को घटा-बढ़ा सकता है तथा अपनी कार्य-प्रणाली में परिवर्तन कर सकता है।
  5. मितव्ययिता – इस प्रणाली में अनुसन्धानकर्ता समंक स्वयं संगृहीत करता है; अत: वह समंक एकत्रित करते समय होने वाले व्यय पर ध्यान रखता है तथा फिजूलखर्ची पर नियन्त्रण रखता है।

अवगुण – इस विधि में निम्नलिखित अवगुण पाये जाते हैं

  1. सीमित क्षेत्र – प्राथमिक समंकों का संग्रहण स्वयं अनुसन्धानकर्ता द्वारा ही किया जाता है। इस कारण समंकों का क्षेत्र सीमित ही रहता है।
  2. पक्षपातपूर्ण – अनुसन्धानकर्ता क्योंकि स्वयं समंकों का संग्रहण करता है; अतः समंक एकत्रित करते समय पक्षपात की सम्भावना हो सकती है।
  3. परिणामों की अशुद्धता की सम्भावना – अनुसन्धानकर्ता द्वारा समंक एक सीमित क्षेत्र से ही एकत्रित किये जाते हैं; अतः समंकों द्वारा जो परिणाम निकलते हैं उनके विषय में शुद्धता की कोई गारण्टी नहीं होती।
  4. अपव्यय – अनुसन्धानकर्ता स्वयं समंक एकत्रित करता है; अत: समय, शक्ति व धन को अधिक लगाना पड़ता है।

2. अप्रत्यक्ष मौखिक समंक संकलन रीति – अनुसन्धान का क्षेत्र विस्तृत होने की दशा में अनुसन्धानकर्ता स्वयं प्रत्यक्ष रूप से सभी व्यक्तियों से सम्पर्क स्थापित नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति में इस विधि को अपनाया जाता है। इस विधि में अनुसन्धानकर्ता सम्बन्धित व्यक्तियों से प्रश्न न पूछकर, उन व्यक्तियों से उनके विषय में जानकारियाँ प्राप्त करता है, जिनका उनसे घनिष्ठ सम्बन्ध होता है; क्योंकि कभी-कभी ऐसा भी होता है कि सम्बन्धित व्यक्ति अपरिचित लोगों को प्रश्नों का उत्तर नहीं देना चाहता है। इस विधि का प्रयोग अधिकांश रूप में सरकारी आयोगों एवं समितियों द्वारा किया जाता है। जिन व्यक्तियों से अप्रत्यक्ष रूप से सूचना प्राप्त की जाती है उन्हें साक्षी कहते हैं।

गुण – इस पद्धति में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं।

  1. इस पद्धति में अनुसन्धानकर्ता को समय, शक्ति व धन की बचत हो जाती है।
  2. इस पद्धति से अनुसन्धान कार्य शीघ्र और सरलता से हो जाता है।
  3. अनुसन्धानकर्ता को अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ता। समंक सरलता से प्राप्त हो जाते हैं। तथा कभी-कभी विशेषज्ञों का परामर्श भी प्राप्त हो जाता है।
  4. विस्तृत क्षेत्र एवं कठिन परिस्थितियों में यह विधि अधिक उपयोगी होती है।
  5. अनुसन्धानकर्ता द्वारा इसमें किसी प्रकार के पक्षपात की सम्भावना समाप्त हो जाती है।

अवगुण – इस पद्धति में निम्नलिखित अवगुण पाये जाते हैं

  1. अनुसन्धानकर्ता प्रत्यक्ष रूप से उन व्यक्तियों से सम्पर्क नहीं कर पाता, जिनसे सम्बन्धित समस्या का वह अनुसन्धान कर रहा होता है; अत: परिणामों के विषय में निश्चितता का अभाव रहता है।
  2. अनुसन्धानकर्ता को दूसरे के ऊपर आधारित रहना पड़ता है; अतः दूसरे व्यक्ति अनुसन्धानकर्ता को वास्तविकता से दूर रखकर पक्षपातपूर्ण जानकादिर में हैं जिसके कारण अनुसन्धानकर्ता ठीक निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाता है।
  3. प्राप्त समंकों में एकरूपता और गोपनीयता का अभाव रहता है।

3. संवाददाताओं की सूचनाओं के आधार पर समंक संकलन रीति – इस पद्धति में अनुसन्धानकर्ता स्वयं समंकों का संकलन नहीं करता है अपितु स्थानीय स्तर पर व्यक्ति या संवाददाताओं को नियुक्त कर उनके माध्यम से सूचनाएँ प्राप्त करता है। स्थानीय व्यक्ति या संवाददाता भी समंकों का संकलन स्वयं नहीं करते, वरन् अपने अनुभवों एवं अनुमानों के आधार पर ही अनुसन्धानकर्ता को सूचनाएँ उपलब्ध करा देते हैं। प्रायः पत्र-पत्रिकाओं व दूरदर्शन द्वारा इसी विधि का प्रयोग किया जाता है। इस विधि की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि संवाददाता योग्य, निष्पक्ष . एवं प्रतिभावान् हों तथा उनकी संख्या भी पर्याप्त होनी चाहिए।
गुण – इस पद्धति में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं

  1. अनुसन्धानकर्ता को कम परिश्रम करना पड़ता है।
  2. समय, शक्ति व धन की बचत होती है।
  3. विस्तृत क्षेत्र से सूचनाएँ शीघ्र एकत्रित की जा सकती हैं।

अवगुण – इस पद्धति में निम्नलिखित अवगुण पाये जाते हैं

  1. समंकों में विश्वसनीयता का अभाव होता है।
  2. समंक मौलिक नहीं होते हैं।
  3. समंकों में पक्षपात का भय बना रहता है।
  4. निष्कर्षों में अशुद्धियों की सम्भावना रहती है।
  5. समंक संकलनों में एकरूपता का अभाव पाया जाता है।

4. प्रश्नावली विधि द्वारा समंक संकलन

(क) कम सूचकों द्वारा अनुसूचियाँ भरकर – प्रश्नावली विधि में अनुसन्धानकर्ता, अनुसन्धान से सम्बन्धित एक प्रश्नावली अथवा अनुसूची तैयार करता है। सामान्यतया प्रश्नावली छपवायी जाती है। इसमें अनुसन्धान से सम्बन्धित वस्तुनिष्ठ प्रश्न, वैकल्पिक उत्तरों वाले प्रश्न, सत्य/असत्य पर आधारित प्रश्न, रिक्त स्थानों की पूर्ति आदि से सम्बन्धित प्रश्न होते हैं। यह प्रश्नावली सूचकों को उत्तरदाताओं के पास सूचनाएँ व उत्तर प्राप्त करने के लिए डाक द्वारा भेज दी जाती हैं तथा प्रश्नावली की वापसी के लिए टिकटयुक्त लिफाफा भी भेजा जाता है। उत्तरदाता को यह आश्वासन दिया जाता है कि उनके द्वारा प्रेषित सूचनाएँ या उत्तर पूर्ण रूप से गुप्त रखे जाएंगे। इस प्रकार सूचकों द्वारा अनुसूचियाँ भरवाकर समंक संगृहीत किये जाते हैं।

गुण – इस प्रणाली में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं

  1. यह प्रणाली विस्तृत क्षेत्र के लिए उत्तम मानी जाती है। अनुसन्धानकर्ता इस विधि में अनुसूची या प्रश्नावली डाक द्वारा सूचकों या उत्तरदाताओं के पास भेज देता है।
  2. इस विधि द्वारा संगृहीत समंक मौलिक व शुद्ध होते हैं।
  3. इस विधि में समय वे शक्ति की बचत होती है।
  4. कार्य शीघ्र सम्पन्न हो जाता है, क्योंकि अनुसन्धानकर्ता को उत्तरदाताओं के पास स्वयं नहीं जाना पड़ता।
  5. यह विधि पक्षपातरहित होती है।

अवगुण – इस प्रणाली के मुख्य अवगुण निम्नलिखित हैं

  1. समंक संकलन की इस विधि में अनुसूचियों को तैयार करना, उन्हें मुद्रित कराना, फिर सूचनाएँ एकत्रित करने के लिए डाक द्वारा भेजना तथा उनके उत्तर प्राप्त करने में पर्याप्त धन व्यय हो जाता है।
  2. लोचकता का अभाव पाया जाता है, क्योंकि उत्तरदाता अनुसूची या प्रश्नावली से पूर्णतया बँधा होता है।
  3. इस विधि का सबसे बड़ा अवगुण यह है कि उत्तरदाता, उत्तर देने में एवं अनुसूचियों को भेजने में किसी प्रकार की रुचि नहीं लेता है।
  4. अशिक्षित व्यक्तियों के लिए यह विधि अनुपयुक्त होती है।
  5. सूचना देने वाले यदि सूचना देने में पक्षपात कर जाते हैं, तब सम्पूर्ण अनुसन्धान दोषपूर्ण हो जाता है।

(ख) प्रगणकों द्वारा सूचनाएँ प्राप्त करके – यह विधि सूचकों द्वारा अनुसूचियाँ भरकर समंक या सूचनाएँ प्राप्त करने की अपेक्षा उत्तम है। इस विधि में भी प्रश्नावली व अनुसूची तैयार की जाती है, परन्तु डाक द्वारा सूचनादाता के पास नहीं भेजी जाती। इस विधि में कुछ प्रगणकों की नियुक्ति कर दी जाती है, जो अनुसूची या प्रश्नावली को स्वयं लेकर सूचनादाता के पास जाते हैं और प्रश्नोत्तरदाता से प्रश्नों के उत्तर पूछकर स्वयं भरते हैं। सरकार द्वारा व्यापक पैमाने पर कराये जाने वाले सर्वेक्षण इसी विधि द्वारा कराये जाते हैं। जनगणना के समंक इसी विधि द्वारा एकत्रित किये जाते हैं।
गुण – इस विधि में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं

  1. प्रगणकों द्वारा एकत्रित किये गये समंक पूर्णत: शुद्ध होते हैं; क्योंकि प्रगणक घर-घर जाकर व्यक्तिगत रूप से सूचनाएँ एकत्रित करते हैं।
  2. इस प्रणाली के द्वारा विस्तृत क्षेत्रों से सूचनाएँ एकत्रित की जा सकती हैं।
  3. इस रीति में पक्षपात नहीं हो पाता है; क्योंकि प्रगणक निष्पक्ष भाव से सूचनाएँ एकत्रित करता है।
  4. यह प्रणाली पूर्णत: लोचपूर्ण है। आवश्यकता पड़ने पर प्रगणक अन्य सूचनाएँ भी एकत्रित कर सकता है।

अवगुण
इस प्रणाली में निम्नलिखित अवगुण पाए जाते हैं

  1. इस प्रणाली में सूचनाएँ या समंक एकत्रित करने में धन, समय व श्रम का अत्यधिक व्यय होता है।
  2. इस प्रणाली में प्रगणक योग्य, शिक्षित, प्रशिक्षित एवं लगनशील होने चाहिए। योग्य, प्रशिक्षित एवं लगनशील प्रगणक के अभाव में विश्वसनीय सूचनाएँ प्राप्त नहीं हो सकती हैं।
  3. इस प्रणाली में प्रगणक को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है; जैसे-जाने पर भी सूचनादाता से सम्पर्क न हो पाना, प्रश्नों का यथोचित उत्तर न दे पाना आदि।

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि समंक संकलन की सफलता उपर्युक्त रीति के चयन के साथ-साथ अनुसन्धानकर्ता की योग्यता, अनुभव, परिश्रम तथा दक्षता पर निर्भर करती है।

प्रश्न 3
द्वितीयक समंक से क्या अभिप्राय है? द्वितीयक समंकों का प्रयोग करने में क्या-क्या सावधानियाँ बरती जानी चाहिए?
उत्तर:
द्वितीयक समंक वे समंक होते हैं जिन्हें अनुसन्धानकर्ता स्वयं संकलित नहीं करता है। ये समंक किसी पूर्व अनुसन्धानकर्ता द्वारा संगृहीत एवं प्रयुक्त किये हुए होते हैं। इसलिए इन समंकों को पूर्व-प्रकाशित समंक भी कहते हैं।
ब्लेयर के अनुसार, “द्वितीयक समंक वे हैं जो पहले से उपलब्ध हैं, जिन्हें वर्तमान समस्या के समाधान की अपेक्षा किसी अन्य उद्देश्य के लिए संकलित किया गया था।
डॉ० बाउले के अनुसार, “प्रकाशित समंकों को ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लेना कभी भी सुरक्षित नहीं है जब तक कि उनको अर्थ एवं सीमाएँ ज्ञात न हो जाएँ। जो तर्क उन पर आधारित हैं, उनकी आलोचना करना सदैव आवश्यक है।”
उपर्युक्त कथन का अर्थ है कि द्वितीयक समंकों को बिना सोचे-समझे और उनकी सीमाओं को जाने बिना उपयोग में नहीं लाना चाहिए। द्वितीयक समंकों को उपयोग में लाने से पूर्व हमें कुछ सावधानियाँ बरतनी चाहिए, जो निम्नलिखित हैं

(1) द्वितीयक समंकों को उपयोग में लाने से पूर्व वर्तमान अनुसन्धानकर्ता को यह जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए कि इन समंकों को संकलित करने वाले की योग्यती क्या थी ? किन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ये समंक एकत्रित किये गये थे और उस समय के निष्कर्षों की शुद्धता कितनी थी ? संकलनकर्ता यदि योग्य, ईमानदार और परिश्रमी था तब ही इस प्रकार के समंकों पर विश्वास किया जा सकता है अन्यथा नहीं।

(2) अनुसन्धानकर्ता को समंक उपयोग में लाने से पूर्व यह देख लेना चाहिए कि वर्तमान उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ये समंक विश्वसनीय एवं पर्याप्त हैं अथवा नहीं।

(3) द्वितीय समंकों को उपयोग में लाने से पूर्व अनुसन्धानकर्ता को यह भी देखना चाहिए कि ये समंक किस समय तथा किन परिस्थितियों में संकलित किये गये थे। सामान्य परिस्थितियों में एकत्रित समंक असामान्य परिस्थितियों के लिए और असामान्य परिस्थितियों में एकत्रित समंक सामान्य परिस्थितियों के अध्ययन के लिए उपयुक्त नहीं होते। यदि समंकों के संकलन का अन्तराल कम है तो इनकी मदद से दीर्घकालीन पद्धति पर प्रकाश नहीं डाला जा सकता।

(4) द्वितीयक समंकों को उपयोग में लाने से पूर्व अनुसन्धानकर्ता को न्यादर्श विधि से कुछ समंकों को छाँटकर उनकी विश्वसनीयता की परख कर लेनी चाहिए।

(5) अनुसन्धानकर्ता को समंकों के संकलन की विधि के विषय में भी जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। समंकों का संकलन करते समय किस विधि को उपयोग में लाया गया था; वह विधि समय का सही प्रतिनिधित्व करती थी या नहीं अथवा वह विधि विश्वास योग्य थी या नहीं ?

(6) समंक एकत्रित करने वाले व्यक्ति अथवा संस्था के उद्देश्य और क्षेत्र की जानकारी कर लेनी चाहिए। यदि वर्तमान अनुसन्धानकर्ता का उद्देश्य और क्षेत्र वही है जो पूर्व अनुसन्धानकर्ता का था, तभी पूर्व एकत्रित समंक उपयोगी हो सकते हैं।

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि यदि अनुसन्धानकर्ता द्वितीयक समंकों का उपयोग सावधानीपूर्वक करता है तब ही अनुसन्धान का निष्कर्ष व परिणाम शुद्ध व वैज्ञानिक होगा। सावधानी के अभाव में अनुसन्धानकर्ता अपने उद्देश्य से भटक जाएगा तथा उसका श्रम, शक्ति व धन व्यर्थ हो जाएगा।

प्रश्न 4
द्वितीयक समंक संकलन के मुख्य स्रोतों को बताइए। [2008, 12]
या
द्वितीयक समंकों के कोई दो स्रोतों का उल्लेख कीजिए। [2015]
या
द्वितीयक आँकड़ों के विभिन्न स्रोतों का वर्णन कीजिए। [2014]
उत्तर:
द्वितीयक समंक संकलन के प्रमुख दो स्रोत हैं
(क) प्रकाशित तथा
(ख) अप्रकाशित।

(क) प्रकाशित स्रोत
1. सरकारी प्रकाशन –
प्रत्येक सरकार को अपने देश के आर्थिक विकास की जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रति वर्ष आर्थिक समीक्षा करनी होती है। इसके लिए सरकार प्रति वर्ष राष्ट्रीय आय, प्रति व्यक्ति आय, निर्धनता का स्तर, बेरोजगारी, सकल घरेलू उत्पाद, कृषि उत्पाद, खनन व औद्योगिक उत्पाद, देश की जनसंख्या आदि से सम्बन्धित समंकों का संकलन और उनका प्रकाशन कराती है। यह केन्द्र व राज्य सरकारों का दायित्व है।
अनुसन्धानकर्ता इन समंकों का उपयोग अपने अनुसन्धान-कार्य में द्वितीयक समंकों के रूप में कर लेता है। इस प्रकार द्वितीयक समंकों के मूल स्रोत सरकारी प्रकाशन ही हैं।

2. आयोग एवं समितियों के प्रकाशन – सरकार समय-समय पर विभिन्न प्रकार के आयोगों एवं समितियों का गठन करती रहती है; जैसे—योजना आयोग, वेतन आयोग आदि। ये आयोग व समितियाँ देश के आर्थिक विकास व उससे सम्बद्ध अनेकों समस्याओं से सम्बन्धित समंकों को संगृहीत कराते हैं तथा उनका प्रकाशन भी कराते हैं। इस प्रकाशित सामग्री का उपयोग भी अनुसन्धानकर्ता द्वितीयक सामग्री के रूप में करते हैं।

3. अर्द्ध-सरकारी प्रकाशन – नगर निगम, नगर पंचायत, जिला पंचायत आदि अपने कार्य-क्षेत्र से सम्बन्धित जन्म, मृत्यु, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि से सम्बन्धित समंकों का संकलन कराती हैं। और उन्हें प्रकाशित कराती हैं। अनुसन्धानकर्ता द्वितीयक समंकों के रूप में इस सामग्री को अपने उपयोग में लाता है।

4. शोधकर्ताओं व अनुसन्धान संस्थाओं के प्रकाशन – विभिन्न विश्वविद्यालयों में विभिन्न विषयों पर शोध-कार्य होते रहते हैं। शोधकर्ता अपने शोध-कार्य को प्रकाशित कराते हैं। इसके साथ-साथ अनेक शोध संस्थाएँ; जैसे-भारतीय सांख्यिकीय संगठन, नेशनल काउन्सिल ऑफ ऐप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च आदि संस्थाएँ भी शोध-कार्यों के परिणामों को प्रकाशित कराती हैं। इस प्रकाशित सामग्री को अन्य अनुसन्धानकर्ता द्वितीयक सामग्री के रूप में उपयोग में लाते हैं।

5. समाचार पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन – देश की उत्तम श्रेणी के समाचार पत्र-पत्रिकाएँ भी समंकों का संकलन करके उन्हें प्रकाशित करती हैं। यह सामग्री भी द्वितीयक सामग्री के रूप में उपयोग में लायी जाती है।

6. अन्तर्राष्ट्रीय प्रकाशन – अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा विश्व के कई देशों के तुलनात्मक आँकड़े समय-समय पर प्रकाशित किए जाते हैं; जैसे – संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रकाशित प्रति व्यक्ति आय सम्बन्धी आँकड़े, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा-कोष की वार्षिक रिपोर्ट, डेमोग्राफिक इयर बुक, अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा प्रकाशित श्रम सम्बन्धी आँकड़े आदि।।

7. गैर-सरकारी अथवा व्यापारिक संस्थाओं के प्रकाशन – कुछ गैर-सरकारी प्रकाशन अथवा बड़ी-बड़ी व्यापारिक संस्थाएँ अनेक प्रकार के समंकों का संकलन कर उन्हें प्रकाशित करते हैं; जैसे – मनोरमा इयर बुक, जागरण वार्षिकी, प्रतियोगिता दर्पण आदि।

(ख) अप्रकाशित स्रोत
सरकार, संस्थाएँ, संगठन अथवा व्यक्तियों द्वारा कुछ सामग्री संगृहीत की जाती है, परन्तु ये इनका प्रकाशन नहीं करा पाते हैं। किसी अनुसन्धानकर्ता को यदि इस प्रकार की सामग्री या समंक उपलब्ध हो जाते हैं; तो वह इस सामग्री का उपयोग द्वितीयक सामग्री के रूप में कर लेता है।

प्रश्न 5
सांख्यिकीय अनुसन्धान की संगणना विधि तथा प्रतिदर्श या न्यादर्श विधि को समझाइए। इनके गुण व दोषों को भी स्पष्ट कीजिए।
या
संगणना विधि और ‘निदर्शन विधि को समझाइए। [2014]
उत्तर:
अनुसन्धानकर्ता को अनुसन्धान कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व यह निश्चय करना पड़ता है कि समंकों का संकलन समग्र में से किया जाएगा या न्यादर्श के द्वारा। दूसरे शब्दों में अनुसन्धान से सम्बन्धित प्रत्येक इकाई का अध्ययन किया जाएगा अथवा सम्पूर्ण इकाइयों में से कुछ को चुनकर ही उनका अध्ययन किया जाएगा।
अध्ययन की इन दो विधियों को ही पूर्ण गणना या संगणना विधि (Census Method) और प्रतिदर्श या न्यादर्श विधि (Sampling Method) कहा जाता है।

संगणना या पूर्ण गणना विधि
संगणना विधि  में अनुसन्धानकर्ता को अनुसन्धान से सम्बन्धित समग्र की प्रत्येक इकाई से सूचना एकत्रित करनी होती है। इसमें सम्पूर्ण समूह की समस्या से सम्बन्धित किसी इकाई को नहीं छोड़ा जाता। भारत में जनसंख्या की गणना, उत्पादन गणना, आयात-निर्यात गणना इत्यादि गणनाएँ इसी विधि के द्वारा होती हैं।

गुण या लाभ – संगणना या पूर्ण गणना विधि में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं

  1. संगणना विधि द्वारा प्राप्त समंक अत्यधिक शुद्ध और विश्वसनीय होते हैं; क्योंकि इस विधि । में अनुसन्धान की प्रत्येक इकाई का व्यक्तिगत सर्वेक्षण किया जाता है।
  2. इसी विधि के द्वारा समस्या से सम्बन्धित प्रत्येक इकाई का गहन अध्ययन सम्भव होता है; अत: समंकों के संग्रहण के दौरान विस्तृत सूचनाएँ प्राप्त हो जाती हैं। प्रत्येक इकाई के सम्पर्क में आने के कारण अनेकों बातों की जानकारी मिलती है।
  3. यह विधि ऐसे अध्ययनों के लिए अधिक उपयुक्त है, जहाँ पर इकाइयाँ एक-दूसरे से भिन्न होती हैं।
  4. यदि अध्ययन अथवा अनुसन्धान की प्रकृति ऐसी है कि जाँच में सभी इकाइयों का समावेश आवश्यक है तो इस विधि द्वारा अनुसन्धान आवश्यक होता है; जैसे-जनगणना।

अवगुण या दोष – इस प्रणाली में निम्नलिखित अवगुण होते हैं

  1. संगणना प्रणाली बहुत अधिक असुविधाजनक है; क्योंकि इसमें समय, श्रम व धन अधिक व्यय होती है। इस विधि से समंक संग्रहण के लिए एक पूरा विभाग बनाना पड़ता है, जिससे प्रबन्धन सम्बन्धी अनेक कठिनाइयाँ उपस्थित हो जाती हैं।
  2. संगणना प्रणाली सभी प्रकार की परिस्थितियों में उपयुक्त सिद्ध नहीं होती। यदि अनुसन्धान का क्षेत्र विस्तृत है, समयावधि कम है, धन का अभाव है तब यह प्रणाली उचित नहीं रहती है।
  3. इस विधि का प्रयोग सीमित क्षेत्र में ही सम्भव है। अन्य परिस्थितियों में, अर्थात् जहाँ क्षेत्र विशाल व जटिल हों अथवा सभी इकाइयों की जाँच से उनके समाप्त हो जाने की सम्भावना हो, वहाँ | पर इस विधि को अपनाना असम्भव होता है।
  4. इस विधि का एक दोष यह भी है कि इसके द्वारा सांख्यिकीय विभ्रम का पता नहीं लगाया जा सकता।

निदर्शन विधि
निदर्शन अनुसन्धान विधि में समग्र से सूचनाएँ प्राप्त नहीं की जाती हैं, वरन् समग्र में से कुछ इकाइयों को छाँट लेते हैं। छाँटी हुई इकाइयों की ही जाँच की जाती है तथा उनके आधार पर निष्कर्ष निकाले जाते हैं। छाँटी हुई इकाई को प्रतिनिधि इकाई, प्रतिदर्श, न्यादर्श, नमूना या बानगी कहते हैं। यह इकाई सम्पूर्ण का प्रतिनिधित्व करती है। सांख्यिकीय अनुसन्धानों में अधिकांश रूप से इसी विधि को उपयोग में लाया जाता है।

रक्त की एक बूंद की जाँच करके शरीर के पूर्ण रक्त की रिपोर्ट इसी विधि का एक उदाहरण है।
निदर्शन की विधियाँ – न्यादर्श चुनने की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं

(क) सविचार निदर्शन – सविचार निदर्शन (Purposive Sampling) में अनुसन्धानकर्ता स्वेच्छा से समग्र में से ऐसी इकाइयाँ छाँट लेता है जो उसके विचार से समग्र का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन इकाइयों द्वारा निकाले गये निष्कर्ष समग्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस प्रणाली का प्रमुख दोष यह है। कि अनुसन्धानकर्ता पक्षपात कर सकता है, क्योंकि न्यादर्श छाँटने में वह स्वतन्त्र होता है।
अत: इस विधि की सफलता न्यादर्श छाँटने वाले की योग्यता, ज्ञान एवं अनुभव पर निर्भर करती है।

(ख) दैव-निदर्शन – दैव-निदर्शन (Random Sampling) विधि में समग्र में से इकाइयाँ इस प्रकार छाँटी जाती हैं कि प्रत्येक इकाई के न्यादर्श में सम्मिलित होने की सम्भावना बनी रहती है। अनुसन्धानकर्ता स्वेच्छा से किसी भी इकाई को नहीं छाँटता है। दैवयोग पर यह निर्भर रहता है कि कौन-सी इकाई का चयन किया जाएगा। न्यादर्श की यह विधि उत्तम है, क्योंकि इसमें किसी प्रकार के पक्षपात की सम्भावना नहीं होती। प्रत्येक इकाई की अनुसन्धान में छंटने की सम्भावना रहती है।

गुण या लाभ – इस विधि में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं

  1. इस विधि का प्रयोग करने पर धन, समय व परिश्रम की अत्यधिक बचत होती है।
  2. समय कम लगने के कारण यह प्रणाली शीघ्रता से बदलती हुई परिस्थितियों से सम्बन्धित अनुसन्धानों के लिए उपयुक्त है।
  3. यदि न्यादर्श समुचित आधार पर और यथेष्ट मात्रा में छाँटे जाएँ तो इस विधि के द्वारा भी प्राप्त निष्कर्ष वही होंगे, जो संगणना विधि के माध्यम से प्राप्त होते हैं।
  4. चुनी हुई सामग्री बहुत थोड़ी होती है इसलिए उसकी विस्तृत रूप से जाँच की जा सकती है।
  5. अनुसन्धान करने वाला केवल न्यादर्श के आकार से ही अपने अनुसन्धान में सांख्यिकीय विभ्रम ज्ञात कर सकता है तथा उसकी सार्थकता एवं निरर्थकता की जाँच भी कर सकता है।
  6. संगणना विधि की तुलना में यह विधि अधिक वैज्ञानिक है, क्योंकि उपलब्ध समंकों की जाँच दूसरे न्यादर्शों द्वारा की जा सकती है।

दोष या हानि–इस विधि में निम्नलिखित दोष पाये जाते हैं

  1. यह रीति वहाँ के लिए उपयुक्त नहीं होती, जहाँ पर सम्मिलित इकाइयों में विविधता हो अर्थात् सजातीयता का अभाव हो। इकाइयों के स्वरूप व गुण में परिवर्तन होते रहने के कारण न्यादर्श सम्पूर्ण समूह का सही प्रतिनिधित्व नहीं कर पाते।
  2. यह विधि उन अनुसन्धानों के लिए उपयुक्त नहीं है, जहाँ बहुत उच्च स्तर की शुद्धता ” अपेक्षित हो; क्योंकि न्यादर्श में समूह के शत-प्रतिशत गुणों का समावेश नहीं हो सकता।।
  3. यदि न्यादर्श का चुनाव अवैज्ञानिक या पक्षपातपूर्ण तरीकों से किया गया हो तो इस विधि से प्राप्त निष्कर्ष भ्रमात्मक एवं असन्तोषप्रद होगे।।
  4. कुशल एवं प्रशिक्षित प्रगणकों के अभाव में इस विधि की सफलता सन्दिग्ध होती है; क्योंकि इस विधि द्वारा न्यादर्श का चयन करने में, उसका आकार निश्चित करने में तथा प्राप्त परिणामों की शुद्धता निर्धारित करने में विशिष्ट ज्ञान एवं अनुभव की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6
सांख्यिकी के प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है, अविश्वास के कारण तथा इसके निवारण के उपाय बताइए।
उत्तर:
सांख्यिकी एक ऐसा यन्त्र है जो आज प्रत्येक क्षेत्र में होने वाली समस्याओं के समाधान में उपयोगी है; परन्तु आजकल सांख्यिकीय आँकड़ों के प्रति अविश्वास की भावना बढ़ती जा रही है। इसका प्रमुख कारण समंकों के प्रति अविश्वास का होना है। समंकों के अभाव में आज के युग में हम किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्य को सम्पादित नहीं कर सकते। सामान्य रूप में यह धारणा है कि ‘आँकड़े झूठ नहीं हो सकते’, यदि आँकड़े हमें इस प्रकार का निष्कर्ष दे रहे हैं तब यह निष्कर्ष असत्य नहीं हो सकता, परन्तु अधिकतर लोग आँकड़ों को शक की दृष्टि से देखते हैं और उन्हें अविश्वसनीय भी मानते हैं।

अविश्वास के कारण
सांख्यिकीय आँकड़ों के प्रति अविश्वास के निम्नलिखित कारण हैं

  1. सांख्यिकी के विषय से अनभिज्ञता – अधिकांश व्यक्तियों को सांख्यिकीय नियमों, सिद्धान्तों, समंकों के संकलन की विधियों, वर्गीकरण और निकाले गये निष्कर्षों के विषय में कोई जानकारी नहीं होती। वे निष्कर्षों को बिना सोचे-समझे सत्य मान लेते हैं और जब उन्हें वास्तविक स्थिति की जानकारी होती है तब वे समंकों पर विश्वास करना छोड़ देते हैं।
  2. सांख्यिकी की सीमाओं की उपेक्षा  – प्रत्येक शास्त्र की अपनी सीमाएँ होती हैं, इसी प्रकार सांख्यिकी की भी अपनी सीमाएँ हैं। सांख्यिकी व्यक्तिगत समस्याओं की अपेक्षा सामूहिक समस्याओं के समाधान के लिए तत्पर रहता है। अनुसन्धानकर्ता यदि सांख्यिकी की सीमाओं की उपेक्षा करके समंकों को उपयोग में लाता है तब समंकों के निष्कर्ष शुद्ध हो ही नहीं सकते।
  3. परस्पर विपरीत समंकों द्वारा निष्कर्ष निकालना – एक ही समस्या परे सरकारी समंक जो निष्कर्ष जनता के सम्मुख प्रस्तुत करते हैं, विरोधी पक्ष इन समंकों के विपरीत अपने निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। ऐसी स्थिति में जनता किस प्रकार समंकों पर विश्वास कर सकती है।
  4. स्वार्थी व्यक्तियों द्वारा समंकों का दुरुपयोग – कुछ स्वार्थी लोग पूर्व भावनाओं से ग्रस्त होने के कारण समंकों का दुरुपयोग करते हैं, जिसके कारण समंकों के प्रति जनता में अविश्वास उत्पन्न हो जाता है।
  5. समंकों की शुद्धता का अभाव – समंकों की शुद्धता की जाँच करना एक कठिन कार्य है। कोई भी व्यक्ति चुनौतीपूर्वक यह नहीं कह सकता कि उसके द्वारा संकलित समंक सत्य, मौलिक एवं शुद्ध हैं। इस कारण समंकों के प्रति जनता में अविश्वास बढ़ता जा रहा है।

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि समंक झूठ नहीं बोलते, बल्कि समंकों को उपयोग में लाने वाले व्यक्तियों में अज्ञानता व अनुभव न होने के कारण समंकों के प्रति अविश्वसनीयता रहती है। समंक तो गीली मिट्टी के समान हैं, जिसे हम देवता या दानव जो भी बनाना चाहें बना सकते हैं। किसी दवा का सदुपयोग करके योग्य चिकित्सक कोई रोग दूर कर सकता है, किन्तु अयोग्य चिकित्सक के द्वारा वही दवा किसी रोगी के लिए जहर का काम भी कर सकती है। इसी प्रकार यदि समंकों के प्रयोग में जरा-सी भूल या लापरवाही हो जाती है तो ये समंक भयंकर परिणाम भी दे सकते हैं; अतः समंकों से उत्पन्न अविश्वास के लिए, जो अधिकतर उसके दुरुपयोग से ही उत्पन्न होते हैं, उसके प्रयोगकर्ता ही उत्तरदायी हैं। इसमें समंकों का कोई दोष नहीं है। सांख्यिकी ऐसे विज्ञानों में से एक है जिसका प्रयोग करने वालों में एक कलाकार के समान आत्म-संयम होना चाहिए।

अविश्वसनीयता के निवारण के उपाय
निम्नलिखित उपायों द्वारा समंकों की अविश्वसनीयता को दूर किया जा सकता है

  1. सांख्यिकी विषय की जानकारी रखने वाले व्यक्ति ही समंकों का उपयोग करें।
  2. समंकों का निष्पक्ष एवं स्वतन्त्र उपयोग किया जाए।
  3. समंकों का प्रयोग करते समय सांख्यिकी की सीमाओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
  4. समंकों को उपयोग में लाने से पूर्व उनकी शुद्धता की जाँच कर लेनी चाहिए।
  5. समंक स्वार्थी व्यक्तियों के हाथों में नहीं पहुँचने चाहिए जो इसका उपयोग मनमाने ढंग से कर सकें।

प्रश्न 7
प्रतिदर्श आँकड़ों की विश्वसनीयता से सम्बन्धित नियमों पर संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।
या
टिप्पणी लिखिए
(क) सांख्यिकीय नियमितता नियम तथा
(ख) महांक जड़ता नियम।
उत्तर:
निदर्शन पद्धति सांख्यिकी के दो आधारभूत नियमों पर आधारित है। ये नियम ही प्रतिदर्श आँकड़ों की विश्वसनीयता एवं उपयोगिता के आधार हैं। ये आधारभूत नियम निम्नलिखित हैं
(क) सांख्यिकीय नियमितता नियम तथा
(ख) महांक जड़ता नियम।

(क) सांख्यिकीय नियमितता नियम
यह नियम सम्भावना सिद्धान्त का उपप्रमेय है। यह प्रतिपादित करता है कि यदि समग्र में से दैव-निदर्शन द्वारा न्यादर्श लिया जाए तो वह समग्र का ठीक प्रकार से प्रतिनिधित्व कर सकेगा अर्थात् इस न्यादर्श में उन्हीं गुणों की सम्भावना होगी जो समग्र में है। किंग के अनुसार, “गणित के सम्भावना सिद्धान्त के आधार पर बना सांख्यिकीय नियमितता नियम यह बताता है कि यदि किसी बहुत बड़े समूह में से दैव-निदर्शन द्वारा बड़ी संख्या में पदों को चुन लिया जाए तो यह लगभग निश्चित है कि इन पदों में औसत रूप में बड़े समूह के गुण होंगे।” यही प्रवृत्ति सांख्यिकीय नियमितता नियम कहलाती है।
इस नियम का आधार यह है कि प्रकृति ऊपर से भिन्नता दिखाते हुए भी उसमें अन्तर्निहित एकरूपता या नियमितता होती है। इसी कारण प्रकृति के सभी कार्य व्यवस्थित ढंग से चलते रहते हैं।
नियम की सीमाएँ-इस

नियम की सीमाएँ निम्नलिखित हैं

  1. यह नियम तभी लागू होगा जब न्यादर्श दैव-निदर्शन रीति से लिया जाए।
  2. जब न्यादर्श का आकार पर्याप्त होगा तभी यह नियम लागू होगा अन्यथा नहीं।
  3. यदि न्यादर्श की इकाइयों में विशेष प्रकार की भिन्नता व विषमता होगी तो यह नियम लागू नहीं होगा।
  4. यह नियम औसत रूप से सत्य होता है। यह आवश्यक नहीं है कि सभी स्थानों पर तथा सभी अवस्थाओं में यह सत्य हो।

नियम की उपयोगिताएँ-इस नियम की प्रमुख उपयोगिताएँ निम्नलिखित हैं

  1. इस नियम के आधार पर ही निदर्शन प्रणाली का प्रतिपादन हुआ है। निदर्शन प्रणाली के प्रयोग ने बहुत-से समय, धन एवं श्रम को बचा दिया है।
  2. इस नियम के प्रयोग के आधार पर ही श्रेणी के आन्तरिक एवं बाह्य अज्ञात मूल्यों को ज्ञात किया जा सकता है।
  3. इस नियम के आधार पर ही बीमा कम्पनियाँ भावी जोखिमों का पूर्वानुमान कर बीमा की किस्त निर्धारित करती हैं।
  4. इस नियम का प्रयोग ज्ञान-विज्ञान के लगभग सभी क्षेत्रों में किया जाता है। रेलवे दुर्घटनाओं, जुए के खेल, अपराधों, आत्महत्याओं, तूफानों व बाढ़ों आदि पर यह नियम क्रियाशील होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि इस नियम की व्यापारिक उपयोगिता बहुत ही अधिक है।

(ख) महांक जड़ता नियम
यह नियम सांख्यिकीय नियमितता नियम का उप-प्रमेय है। इसका आशय इसके नाम से ही स्पष्ट है। महा अंक से अर्थ है बड़े अंक तक, जड़ता से अर्थ है स्थिरता, अर्थात् बड़ी संख्याओं में स्थिरता होती है। दूसरे शब्दों में, बड़ी संख्याएँ छोटी संख्याओं की तुलना में कम परिवर्तित होती हैं। बड़ी संख्याओं के अधिक स्थिर तथा अपरिवर्तनशील रहने का कारण यह है कि बड़े समग्र में कुछ इकाइयों में परिवर्तन यदि एक दिशा में होता है तो कुछ इकाइयों में परिवर्तन दूसरी दिशा में और कदाचित कुछ इकाइयों में परिवर्तन होता ही नहीं है। प्रो० किंग ने इस नियम के आधार को स्पष्ट करते हुए कहा है एक बड़े समूह के एक भाग में एक दिशा में परिवर्तन होता है, तो सम्भावना होती है कि उसी समूह के बराबर के अन्य भाग में उसके विपरीत दिशा में परिवर्तन होगा, इस प्रकार कुल परिवर्तन बहुत कम होगा।” सारांश यह है कि बड़ी संख्याएँ छोटी संख्यौओं की अपेक्षा अधिक स्थिर तथा अपरिवर्तनशील होती हैं।

नियम का आधार – यह नियम इस बात पर आधारित है कि बड़े समग्र की पक्ष तथा विपक्ष की इकाइयाँ एक-दूसरे को प्रभावहीन कर देती है।
नियम की सीमाएँ – नियम की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं

  1. समग्र जितना बड़ा होगा यह नियम उतनी ही अधिक सत्यता के साथ लागू होगा।
  2. दीर्घकालीन तथ्यों में अल्पकालीन तथ्यों की अपेक्षा अधिक शुद्धता व स्थिरता होती है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि दीर्घकाल में परिवर्तन होता ही नहीं है। परिवर्तन तो होते हैं, परन्तु अचानक नहीं।

नियम की उपयोगिता – व्यावहारिक जीवन के प्रायः प्रत्येक क्षेत्र में इस नियम का महत्त्व है। दैव-निदर्शन में यह नियम अत्यधिक उपयोगी है। इस नियम के कारण ही बड़ी मात्रा के दैव न्यादर्शों में शुद्धता एवं विश्वसनीयता की मात्रा अधिक होती है। समंकों की स्थिर प्रवृत्ति के कारण ही पूर्वानुमान सम्भव हो पाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
सांख्यिकी की विभिन्न परिभाषाएँ दीजिए। [2007, 10]
या
सांख्यिकी का क्या अर्थ है?
उत्तर:
सांख्यिकी का शाब्दिक अर्थ ‘संख्या से सम्बन्धित शास्त्र’ है। अतः सांख्यिकी ज्ञान की वह शाखा है जिसका सम्बन्ध संख्याओं या संख्यात्मक आँकड़ों से है। अंग्रेजी का ‘Statistics’ शब्द लैटिन भाषा के ‘status’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ ‘राज्य’ है। इससे पता लगता है कि इस विषय की उत्पत्ति राज्य विज्ञान के रूप में हुई। शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए राजा, सेना की संख्या, रसद की मात्रा, कर्मचारियों का वेतन, भूमि-कर आदि से सम्बन्धित आँकड़े एकत्र कराते थे। इन संख्यात्मक आँकड़ों की सहायता से ही राज्य के बजट का निर्माण किया जाता था।

कुछ विद्वानों द्वारा दी गयी सांख्यिकी की परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं
डॉ० बाउले (Dr. Bowley) के अनुसार,

  1. “सांख्यिकी गणना का विज्ञान है।”
  2. “सांख्यिकी को उचित रूप से औसतों का विज्ञान कहा जा सकता है।”
  3. “सांख्यिकी वह विज्ञान है जो सामाजिक व्यवस्था को सम्पूर्ण मानकर सभी रूप में उसका मापन करती है।”

बॉडिंगटन (Boddington) के अनुसार, “सांख्यिकी अनुमानों और सम्भाविताओं का विज्ञान है।”
प्रो० किंग (King) के अनुसार, “गणना अथवा अनुमानों के संग्रह को विश्लेषण के आधार पर प्राप्त परिणामों से सामूहिक, प्राकृतिक अथवा सामाजिक घटनाओं पर निर्णय करने की रीति को सांख्यिकी विज्ञान कहते हैं।’
सेलिगमैन (Seligman) के अनुसार, “सांख्यिकी वह विज्ञान है जो किसी विषय पर प्रकाश डालने के उद्देश्य से संग्रह किये गये आँकड़ों के संग्रह, वर्गीकरण, प्रदर्शन, तुलना और व्याख्या करने की रीतियों की विवेचना करता है।”
संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि सांख्यिकी वह विज्ञान है; जो आँकड़ों के संग्रहण, प्रस्तुतीकरण, वर्गीकरण, विश्लेषण, सारणीयन एवं आलेखी निरूपण की विधियों का वर्णन करता है।”

प्रश्न 2
सांख्यिकी की सीमाएँ बताइए। [2006, 07, 09, 10]
उत्तर:
सांख्यिकी की सीमाएँ
टिपेट के शब्दों में, “किसी भी क्षेत्र में सांख्यिकीय नियमों का उपयोग कुछ मान्यताओं पर आधारित तथा कुछ सीमाओं से प्रभावित होता है। इसलिए प्रायः अनिश्चित निष्कर्ष निकलते हैं।” प्रो० न्यूजहोम के शब्दों में, ‘‘सांख्यिकी को अनुसन्धान का एक अत्यन्त मूल्यवान् साधन समझा जाना चाहिए। अतः सांख्यिकी की सीमाओं को ध्यान में रखकर ही सांख्यिकी का प्रयोग किया जाना चाहिए। सांख्यिकी की कुछ प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं

  1. सांख्यिकी समूहों का अध्ययन करती है, व्यक्तिगत इकाइयों का नहीं। उदाहरण के लिए, सांख्यिकी के अन्तर्गत किसी संस्थान में कार्य करने वाले कर्मियों के वेतन-स्तर का अध्ययन किया जाएगा न कि किसी एक कर्मचारी के वेतन को।
  2. सांख्यिकी सदैव संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन करती है, गुणात्मक तथ्यों का नहीं। दूसरे शब्दों में, सांख्यिकी के अन्तर्गत केवल उन्हीं समस्याओं का अध्ययन किया जाता है, जिनका संख्यात्मक वर्णन सम्भव हो; जैसे-आय, आयु, ऊँचाई, लम्बाई, उत्पादन आदि। इसमें ऐसी समस्याओं का अध्ययन नहीं होता जिनका स्वरूप गुणात्मक हो; जैसे – सुन्दरता, चरित्र, बौद्धिक स्तर आदि।
  3. सांख्यिकीय निष्कर्ष असत्य व भ्रमात्मक सिद्ध हो सकते हैं, यदि उनका अध्ययन बिना सन्दर्भ के किया जाए। सही निष्कर्ष प्राप्त करने के लिए समस्या के प्रत्येक पहलू का अध्ययन आवश्यक होता है। बिना सन्दर्भ व परिस्थितियों को समझते हुए जो निष्कर्ष निकाले जाते हैं, वे यद्यपि सत्य जान पड़ते हैं, परन्तु वास्तव में वे निष्कर्ष सत्य नहीं होते।
  4. सांख्यिकीय समंकों का सजातीय होना आवश्यक है। सांख्यिकीय निष्कर्षों के लिए यह आवश्यक है कि जिन समंकों से निष्कर्ष निकाले जाएँ वे एकरूप एवं सजातीय हों। विजातीय समंकों से निकाले गये निष्कर्ष सदैव भ्रमात्मक होंगे; उदाहरणार्थ-हाथी की ऊँचाई से मनुष्यों की ऊँचाई की तुलना नहीं की जा सकती।
  5. सांख्यिकीय निष्कर्ष दीर्घकाल में तथा औसत रूप में ही सत्य होते हैं। सांख्यिकीय निष्कर्ष अन्य विज्ञान के नियमों की भाँति दृढ़, सार्वभौमिक तथा सर्वमान्य नहीं होते।
  6. सांख्यिकीय रीति किसी समस्या के अध्ययन की विभिन्न रीतियों में से एक है, एकमात्र रीति नहीं।।
  7. सांख्यिकी का प्रयोग वही व्यक्ति कर सकता है जिसे सांख्यिकीय रीतियों को पूर्ण ज्ञान हो। बिना पूर्ण जानकारी के समंकों का प्रयोग करना एवं उनसे निष्कर्ष निकालना निरर्थक सिद्ध होता है। यूल एवं केण्डल के शब्दों में, “अयोग्य व्यक्तियों के हाथ में सांख्यिकीय रीतियाँ अत्यन्त खतरनाक यन्त्र हैं।”
  8. सांख्यिकी किसी समस्या के अध्ययन का केवल साधन प्रस्तुत करती है, समाधान नहीं।

प्रश्न 3
सांख्यिकी के प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सांख्यिकी के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं।

1. आँकड़ों को व्यवस्थित और सरल बनाना – सांख्यिकी का प्रथम कार्य संगृहीत आँकड़ों को वर्गीकरण व सारणीयन द्वारा सरल बनाना है। आँकड़ों के व्यवस्थित हो जाने से बहुत-से निष्कर्ष आँकड़ों को देखकर ही ज्ञात हो पाते हैं। अव्यवस्थित आँकड़ों से हमारा कोई भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।

2. सांख्यिकी तथ्यों को निश्चयात्मक बनाती है –
प्राय: संगृहीत आँकड़ों की संख्या अत्यधिक होती है; अतः उनको समझना और उनसे निष्कर्ष निकालना कठिन होता है। सांख्यिकी उनको इस प्रकार प्रस्तुत करती है कि वे सरलतापूर्वक समझ में आ जाते हैं।

3. तथ्यों का तुलनात्मक अध्ययन –
आँकड़ों का तब तक कोई महत्त्व नहीं होता जब तक कि दूसरे आँकड़ों से उनकी तुलना न की जाए और उनमें सम्बन्ध स्थापित न किया जाए। सांख्यिकी माध्य, सह-सम्बन्ध आदि के द्वारा तथ्यों का तुलनात्मक अध्ययन कराती है।

4. निर्वचन या व्याख्या करना –
सांख्यिकीय तथ्यों का वर्गीकरण, सारणीयन, चित्रण, विश्लेषण करने के उपरान्त समस्या के हल की व्याख्या करती है, जिसके आधार पर निष्कर्ष निकाले जाते हैं।

5. विभिन्न आर्थिक नियमों व सिद्धान्तों की जाँच –
सम्बंख्यिकीय गणना के आधार पर सिद्धान्तों व नियमों का सत्यापन किया जाता है, क्योकि सांख्यिकी की सहायता से निर्मित नियम स्थिर और सार्वभौमिक रहते हैं। उदाहरण के लिए माल्थस का जनसंख्या सिद्धान्त आदि नियमों का सत्यापन सांख्यिकी के द्वारा ही सम्भव है।

6. नीति निर्धारण में सहायता करना –
सांख्यिकी का कार्य है कि वह तथ्यों के आधार पर शुद्ध निष्कर्ष निकाले, जिससे आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक नीति निर्धारित हो सके। विभिन्न सरकारें जनमत के आधार पर ही महत्त्वपूर्ण निर्णय लेती हैं।

7. पूर्वकथन या अनुभव –
सांख्यिकी का महत्त्वपूर्ण कार्य निष्कर्षों के आधार पर भविष्य में, आने वाली परिस्थितियों के सम्बन्ध में अनुमान लगाकर भविष्यवाणी करना होता है। इस सम्बन्ध में डॉ० बाउले का कथन है-“एक सांख्यिकीयं अंनुमानं अच्छा हो या बुरा, ठीक हो या गलत, परन्तु प्रायः प्रत्येक देशों में वह एक आकस्मिक प्रेक्षक के अनुमान से अधिक ठीक होगा।”

प्रश्न 4
प्राथमिक और द्वितीयक समंकों में अन्तर बताइए।
उत्तर:
प्राथमिक और द्वितीयक समंकों में अन्तर को निम्नवत् स्पष्ट किया जा सकता है
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 24 Statistics 1

प्रश्न 5
सांख्यिकीय अनुसन्धान में प्रयुक्त उत्तम प्रश्नावली के गुण (विशेषताएँ) बताइए।
उत्तर:
एक उत्तम प्रश्नावली के निम्नलिखित गुण (विशेषताएँ) होने चाहिए
1. सरल व स्पष्ट – प्रश्नावली तैयार करते समय इस बात का ध्यान रखा जाए कि प्रश्न सरल, स्पष्ट एवं सीधी भाषा में हों, जिससे उत्तरदाता प्रश्न को समझकर उनका ठीक और शीघ्र उत्तर दे सके।

2. प्रश्नों की कम संख्या – एक उत्तम प्रश्नावली में यह गुण होता है कि प्रश्नों की संख्या न तो बहुत अधिक हो और न ही बहुत कम। प्रश्नों की संख्या इतनी अवश्य होनी चाहिए जिससे कि अनुसन्धानकर्ता के उद्देश्यों की पूर्ति हो जाए और उत्तरदाता को उत्तर देते समय अपने ऊपर किसी प्रकार के भार का अनुभव न हो।

3. वस्तुनिष्ठ, संक्षिप्त एवं उद्देश्यमूलक प्रश्न – प्रश्नावली के प्रश्न वस्तुनिष्ठ, संक्षिप्त व उद्देश्यमूलक होने चाहिए। बहुविकल्पीय, सत्य/असत्य, रिक्त स्थानों की पूर्ति, हाँ अथवा नहीं आदि में प्रश्नोत्तरी होनी चाहिए। इससे उत्तरदाता सरलता से उत्तर दे देता है तथा समय व श्रम की भी बचत होती है।

4. व्यक्तिगत प्रश्न न हों – प्रश्नावली के प्रश्न उत्तरदाता के व्यक्तिगत जीवन से सम्बन्धित नहीं होने चाहिए अर्थात् प्रश्न इस प्रकार के हों जिससे उत्तरदाता प्रश्नों के उत्तर देते समय मन में किसी प्रकार की शंका या उत्तेजना का अनुभव न करे। जाति, धर्म, सम्प्रदाय आदि से सम्बन्धित प्रश्न अथवा इस प्रकार के प्रश्न नहीं होने चाहिए; जिससे राष्ट्रीय भावना को ठेस पहुँचती हो।

5. प्रश्नों के उत्तरों में अनेकता हो – एक प्रश्न में अनेक उत्तरों का समावेश होना चाहिए; जैसे भारत में शिक्षा का उद्देश्य है

  • नागरिकों को साक्षर करना,
  • बेरोजगारी दूर करना,
  • निरक्षरता को कम करना,
  • नागरिकों में उत्तम नागरिक गुणों का विकास करना,
  • उपर्युक्त सभी।।इस प्रकार के प्रश्नों से अनुसन्धानकर्ता को अनेक सूचनाएँ प्राप्त हो जाती हैं।

6. आवश्यक निर्देश – अनुसन्धानकर्ता को प्रश्नावली के साथ-साथ उत्तरदाता के पास आवश्यक निर्देश भी भेजने चाहिए। ये निर्देश संक्षेप में देने चाहिए, जिससे उत्तरदाता स्पष्ट और शीघ्र उत्तर दे सके।

7. प्रश्नों का क्रम – प्रश्नावली में एक प्रकार के प्रश्न एक ही क्रम में होने चाहिए तथा दूसरे प्रकार के प्रश्न भी क्रम में एक साथ ही होने चाहिए; जैसे—यदि प्रश्नावली में बहुविकल्पीय, सत्य/असत्य, हाँ/नहीं आदि प्रश्न दिये गये हैं तो वे क्रमानुसार होने चाहिए, जिससे उत्तरदाता को उत्तर देते समय किसी प्रकार की कोई कठिनाई न हो।

प्रश्न 6
दैव-निदर्शन में न्यादर्श चुनने की विधियाँ बताइए।
उत्तर:
दैव-निदर्शन द्वारा न्यादर्श चुनने के लिए निम्नलिखित विधियाँ प्रयुक्त होती हैं

1. लॉटरी रीति – लॉटरी विधि में सभी इकाइयों की पर्चियाँ या गोलियाँ बनाकर रख ली जाती हैं और किसी निष्पक्ष व्यक्ति या अनभिज्ञ बालक के द्वारा उतनी पर्चियाँ उठवा ली जाती हैं जितनी न्यादर्श में सम्मिलित करनी होती हैं। पर्चियाँ बनाते समय यह सावधानी रखनी चाहिए कि पर्चियाँ समान आकार-प्रकार की हों। पर्चियों को हिलाकर परस्पर मिला लेना चाहिए।

2. ढोल घुमाकर – इस रीति में समान आकार-प्रकार के नम्बर लिखे हुए लकड़ी या अन्य प्रकार के टुकड़े ढोल में डाल दिये जाते हैं। ढोल को हाथ या बिजली से घुमाकर उन अंकों को अच्छी तरह मिला लिया जाता है। इसके बाद निष्पक्ष व्यक्ति द्वारा क्रमशः नम्बर निकलवा लिये जाते हैं और उन अंकों को अलग लिख लिया जाता है।

3. निश्चित क्रम द्वारा –
इस विधि में समग्र इकाइयों को संख्यात्मक या वर्णात्मक क्रम में लिख लिया जाता है। इसके बाद उनमें से सुविधानुसार क्रम से आवश्यक संख्या को न्यादर्श में सम्मिलित कर लिया जाता है। उदाहरण के लिए–यदि 50 छात्रों में से 10 छात्र छाँटने हैं तब क्रमानुसार संख्या लिखकर उनमें से 5, 10, 15, 20, 25, 30, 35, 40, 45, 50वें छात्र को न्यादर्श में सम्मिलित कर लिया जाता है।

दैव-निदर्शन विधि से न्यादर्श चुनने के निम्नलिखित लाभ होते है।

  1. दैव-निदर्शन विधि में किसी प्रकार का कोई पक्षपात सम्भव नहीं होता।
  2. इस रीति में समय, श्रम व धन की बचत होती है।
  3. इस विधि द्वारा छाँटी गयी प्रतिदर्श इकाइयाँ समग्र का प्रतिनिधित्व करती हैं।

प्रश्न 7
पूर्ण गणना विधि तथा प्रतिदर्श विधि में अन्तर बताइए।
उत्तर:
पूर्ण गणना या प्रतिदर्श दोनों विधियाँ सांख्यिकीय अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण विधियाँ हैं। दोनों में निम्नलिखित अन्तर होते हैं।

  1. पूर्ण गणना विधि में समूह की प्रत्येक इकाई के विषय में जाँच की जाती है, जबकि प्रतिदर्श विधि में कुछ ही इकाइयों की जाँच की जाती है।
  2. पूर्ण गणना पद्धति में व्यापक संगठन की आवश्यकता होती है, परन्तु प्रतिदर्श पद्धति में छोटे-से संगठन से भी काम चलाया जा सकता है।
  3. पूर्ण गणना विधि में विभ्रम का अनुमान नहीं लगाया जाता, परन्तु प्रतिदर्श विधि में विभ्रम का अनुमान पर्याप्त सीमा तक लगाया जा सकता है।
  4. जहाँ अनुसन्धान का क्षेत्र सीमित हो वहाँ पूर्ण गणना विधि तथा जहाँ अनुसन्धान का क्षेत्र अनन्त हो वहाँ प्रतिदर्श विधि अधिक उपयुक्त रहती है।
  5. जहाँ इकाइयों की संख्या बहुत ही कम हो वहाँ पूर्ण गणना विधि और जहाँ इकाइयाँ नाशवान् हों या अनन्त हों वहाँ अनुसन्धान की प्रतिदर्श विधि ही अपनायी जा सकती है।
  6. पूर्ण गणना विधि में ऊँचे स्तर की शुद्धता होती है, जबकि प्रतिदर्श विधि में सामान्य स्तर की है।
  7. यदि अनुसन्धान की प्रकृति ऐसी हो जहाँ सभी इकाइयों का अध्ययन आवश्यक हो तो पूर्ण गणना विधि उपयुक्त रहती है, परन्तु जहाँ सभी इकाइयों का अध्ययन महत्त्वपूर्ण न हो वहाँ निदर्शन या प्रतिदर्श विधि उपयुक्त रहती है।
  8. पूर्ण गणना विधि में अधिक धन, समय एवं श्रम की आवश्यकता होती है, परन्तु निदर्शन विधि में कम श्रम, समय एवं धन की आवश्यकता होती है।
  9. पूर्ण गणना विधि में विविध गुणों वाली विजातीय इकाइयों का अध्ययन किया जा सकता है, परन्तु निदर्शन या प्रतिदर्श विधि में सजातीय एवं एक-सी इकाइयों का अध्ययन उपयुक्त रहता है।

वास्तव में, पूर्ण गणना एवं प्रतिदर्श, दोनों ही महत्त्वपूर्ण विधियाँ हैं जो अलग-अलग परिस्थितियों में अपना स्थान रखती है। कई बार दोनों ही विधियों को एक साथ भी काम में लाया जाता है; अत: दोनों ही विधियों का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है और पृथक्-पृथक् परिस्थितियों में दोनों ही उपयोगी हैं।

प्रश्न 8
समग्र एवं न्यादर्श पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
समग्र-किसी भी अनुसन्धान क्षेत्र की सम्पूर्ण इकाइयाँ सामूहिक रूप में समग्र कहलाती हैं। दूसरे शब्दों में, अवलोकनों का सम्पूर्ण समूह जिनका अनुसन्धान किया जा रहा है, समग्र कहलाता है। अनुसन्धान इकाई की परिभाषा के अन्तर्गत आने वाले समस्त पदों का समूह समग्र कहा जाता है। तथा समग्र की इकाइयाँ व्यक्तिगत रूप में ‘इकाई’ कही जाती हैं। समग्र में निहित इकाइयों के आधार पर यह दो प्रकार का होता है

1. निश्चित या अनन्त समग्र – निश्चित समग्र में इकाइयों की संख्या निश्चित होती है; जैसे-किसी कॉलेज में छात्र या कारखाने में श्रमिक। इसे परिमित समग्र भी कहते हैं। अनन्त या अपरिमित समग्र में इकाइयों की संख्या निश्चित न होकर अनन्त होती है। आकाश के तारागण, वृक्ष की पत्तियाँ आदि अनन्त समग्र के ही उदाहरण हैं।

2. वास्तविक या काल्पनिक समग्र – अस्तित्व की दृष्टि से ठोस विषय वाले समग्र को वास्तविक अथवा विद्यमान समग्र कहते हैं; जैसे—विद्यालय के छात्र, कारखाने के श्रमिक आदि। वह सामग्री जो ठोस नहीं होती, काल्पनिक समग्र के अन्तर्गत आती है। सिक्कों के उछालों की संख्या काल्पनिक समग्र का ही उदाहरण है।

न्यादर्श – जब सम्पूर्ण समग्र में से किसी विशिष्ट आधार या थोड़ा-सा भाग जाँच के लिए लिया जाता है तो उसे नमूना, बानगी, प्रतिनिधि अंश अथवा न्यादर्श कहते हैं। न्यादर्श का अध्ययन करके समग्र के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
सांख्यिकी की दो सीमाएँ बताइए। [2009]
उत्तर:
सांख्यिकी की सीमाएँ निम्नलिखित हैं

  1. सांख्यिकी में समूहों का अध्ययन किया जाता है न कि इकाइयों को।
  2. सांख्यिकी में केवल संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन होता है।

प्रश्न 2
आधुनिक युग में सांख्यिकी का महत्त्व लिखिए।
उत्तर:
आधुनिक युग में सांख्यिकी का महत्त्व उत्पादन, उपभोग विनिमय, वितरण, लोकवित्त के क्षेत्र में बढ़ता जा रहा है। देश का आर्थिक विकास, नियोजन के माध्यम से किया जा रहा है; अतः सांख्यिकी का महत्त्व और भी अधिक बढ़ गया है।

प्रश्न 3
प्राथमिक समंक और द्वितीयक समंक में क्या सूक्ष्म अन्तर है?
उत्तर:
प्राथमिक समंक अनुसंधानकर्ता अपनी आवश्यकतानुसार स्वयं संगृहीत करता है, जबकि द्वितीयक समंक अनुसंधानकर्ता द्वारा स्वयं एकत्रित नहीं किये जाते हैं। समंकों का संग्रहण किसी पूर्वअनुसंधानकर्ता के द्वारा पहले से ही किया होता है।

प्रश्न 4
विस्तृत प्रतिदर्श क्या है? इसके गुण बताइए।
उत्तर:
विस्तृत प्रतिदर्श बड़ा प्रतिदर्श लिया जाता है तथा लगभग 80 या 90% इकाइयाँ प्रतिदर्श में सम्मिलित की जाती हैं।

विस्तृत प्रतिदर्श के गुण

  1. परिणाम अधिक शुद्ध होते हैं।
  2. परिणाम पक्षपातरहित होते हैं।
  3. जाँच विस्तृत होती है

किश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
सांख्यिकी किसे कहते हैं? [2008, 16]
या
“सांख्यिकी गणना का विज्ञान है।” यह परिभाषा किसकी है? [2013]
उत्तर:
डॉ० बाउले के अनुसार, “सांख्यिकी गणना का विज्ञान है।”

प्रश्न 2
प्रशासन तथा व्यवसाय में सांख्यिकी का महत्त्व लिखिए।
उत्तर:
(1) कुशल प्रशासन हेतु अनेक प्रकार की सूचनाएँ एकत्र करनी होती हैं जिसके लिए। सांख्यिकी की आवश्यकता पड़ती है।
(2) एक व्यापारी को वस्तु की माँग एवं पूर्ति तथा मूल्य सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करने के लिए सांख्यिकी के सहयोग की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 3
सांख्यिकी के कोई दो उपयोग लिखिए। [2012]
उत्तर:
(1) इसका उपयोग तथ्यों को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करने में होता है।
(2) इसका उपयोग वैज्ञानिक नियमों की सत्यता जाँचने में होता है।

प्रश्न 4
सांख्यिकी के दो कार्य बताइए।
उत्तर:
सांख्यिकी के दो कार्य हैं

  1. समंकों को संगृहीत करना तथा
  2. समंकों के द्वारा निष्कर्ष निकालना।

प्रश्न 5
समंकों के संकलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
समंकों के संकलन से आशय आँकड़ों को एकत्रित करने से है।

प्रश्न 6
संकलन के आधार पर समंक कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
संकलन के आधार पर समंक निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं

  1. प्राथमिक समंक तथा
  2. द्वितीयक समंक।

प्रश्न 7
प्राथमिक समंक (आँकड़े) क्या होते हैं? [2007, 08, 13, 14, 16]
उत्तर:
प्राथमिक समंक वे समंक होते हैं, जिन्हें अनुसन्धानकर्ता अपने उपयोग के लिए स्वयं एकत्रित करता है।

प्रश्न 8
प्राथमिक समंक की दो विशेषताएँ लिखिए। [2007, 08, 13, 14, 15]
उत्तर:
(1) अनुसन्धानकर्ता अपनी आवश्यकतानुसार इन समंकों का संग्रहण करता है।
(2) प्राथमिक समंक पूर्णतः मौलिक होते हैं।

प्रश्न 9
द्वितीयक समंक क्या होते हैं?
उत्तर:
द्वितीयक समंक वे समंक होते हैं जिन्हें अनुसन्धानकर्ता स्वयं एकत्रित नहीं करता अपितु उन समंकों का संग्रहण किसी पूर्व अनुसन्धानकर्ता के द्वारा पहले से ही किया होता है तथा निष्कर्ष भी निकाले हुए होते हैं।

प्रश्न 10
प्रतिदर्श अनुसन्धान विधि क्या है?
उत्तर:
प्रतिदर्श अनुसंधान विधि में समग्र सूचनाएँ प्राप्त नहीं की जाती हैं, वरन् समग्र में से कुछ इकाइयों को छाँट लेते हैं। छाँटी हुई इकाइयों की भी जाँच की जाती है तथा उनके आधार पर निष्कर्ष निकाले जाते हैं।

प्रश्न 11
“सांख्यिकी प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित करती है और जीवन को अनेक बिन्दुओं पर स्पर्श करती है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
टिपेट (Tippett) का।

प्रश्न 12
सांख्यिकी के प्रति अविश्वास के दो कारण बताइए।
उत्तर:
(1) सांख्यिकी के विषय में ज्ञान न होना तथा
(2) सांख्यिकी की सीमाओं की उपेक्षा।

प्रश्न 13
सांख्यिकी के प्रति विश्वास उत्पन्न करने हेतु दो उपाय बताइए।
उत्तर:
(1) समंकों का निष्पक्ष एवं स्वतन्त्र उपयोग किया जाए।
(2) समंकों का उपयोग करते समय सांख्यिकी सीमाओं को ध्यान में रखा जाए।

प्रश्न 14
द्वितीयक समंक संकलन के दो मुख्य प्रकाशित स्रोत लिखिए। या द्वितीयक आँकड़ों के क्या स्रोत हैं? [2003]
उत्तर:
(1) समाचार-पत्र-पत्रिकाएँ तथा
(2) सरकारी प्रकाशन।

प्रश्न 15
केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन का मुख्य कार्य क्या है?
उत्तर:
केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन का मुख्य कार्य राष्ट्रीय आय के आँकड़ों का संकलन करना व प्रकाशन कराना है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
“सांख्यिकी अनुमानों और सम्भावनाओं का विज्ञान है। यह परिभाषा है
(क) डॉ० बाउले की
(ख) बॉडिंगटन की
(ग) प्रो० किंग की।
(घ) सेलिगमैन की
उत्तर:
(ख) बॉडिंगटन की।

प्रश्न 2
सांख्यिकी के जन्मदाता हैं
(क) प्रो० किंग
(ख) क्रॉक्सटन व काउडन
(ग) गॉटफ्रिड ऐकेनवाल
(घ) सेलिगमैन
उत्तर:
(ग) गॉटफ्रिड ऐकेनवाल।

प्रश्न 3
आँकडे कितने प्रकार के होते हैं?
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(ख) दो।

प्रश्न 4
निम्न में से कौन-सा कथन सही है? [2011]
(क) सांख्यिकी केवल औसत का विज्ञान है।
(ख) सांख्यिकी को गलत उपयोग नहीं हो सकता है।
(ग) सांख्यिकी केवल गणना का विज्ञान है।
(घ) निरंकुश व्यक्ति के हाथ में सांख्यिकी विधियाँ बहुत खतरनाक औजार है।
उत्तर:
(घ) निरंकुश व्यक्ति के हाथ में सांख्यिकी विधियाँ बहुत खतरनाक औजार है।

प्रश्न 5
सांख्यिकी को सर्वाधिक माना जा सकता है [2010]
(क) कला
(ख) विज्ञान
(ग) कला एवं विज्ञान दोनों
(घ) इनमें कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) कला एवं विज्ञान दोनों।

प्रश्न 6
सांख्यिकी के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है? [2012]
(क) यह संख्या का विज्ञान है।
(ख) यह गुणात्मक तथ्यों का अध्ययन करता है।
(ग) यह ज्ञान का व्यवस्थित समूह है।
(घ) यह कारण और परिणाम सम्बन्ध का अध्ययन करता है।
उत्तर:
(ख) यह गुणात्मक तथ्यों का अध्ययन करता है।

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