UP Board Class 12 History Model Papers Paper 1

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Model Paper Paper 1
Category UP Board Model Papers

UP Board Class 12 History Model Papers Paper 1

समय: 3 घण्टे 15 मिनट
पूणक: 100
निर्देश
प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्न-पत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं।
नोट

  • सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
  • इस प्रश्न-पत्र में पाँच खण्ड हैं।
  • खण्ड ‘क’ में 10 बहुविकल्पीय प्रश्न हैं, खण्ड ‘ख’ में 05 अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (लगभग 50 शब्द) हैं।
  • खण्ड ‘ग’ में 06 लघु उत्तरीय प्रश्न (लगभग 100 शब्द) हैं।
  • खण्ड ‘घ’ में 03 विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (लगभग 500 शब्द) हैं।
  • खण्ड ‘ङ’ में ऐतिहासिक तिथियों व मानचित्र से सम्बन्धित 05 प्रश्न हैं। शब्द सीमा में (कम या ज्यादा) 10% की छूट अनुमन्य है।
  • सभी प्रश्नों के निर्धारित अंक उनके सम्मुख अंकित हैं।

खण्ड-‘क’

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
तुजुक-ए-बाबरी’ को रचयिता था? [1]
(a) बाबर
(b) फैजी
(c) हुमायूँ
(d) फरिश्ता

प्रश्न 2.
औरंगजेब ने शाहजहाँ को कहाँ कैद कर रखा था?  [1]
(a) आगरा में
(b) दिल्ली में
(c) शाहजहानाबाद में
(d) फिरोजाबाद

प्रश्न 3.
मुगल साम्राज्य का अन्तिम सम्राट कौन था?  [1]
(a) बहादुरशाह प्रथम
(b) बहादुरशाह द्वितीय
(c) शाहआलम
(d) मुहम्मदशाह

प्रश्न 4.
शिवाजी की राजधानी थी?  [1]
(a) पुरन्दर
(b) रायगढ़
(c) सिंहगढ़
(d) पुणे

प्रश्न 5.
1833 ई. का चार्टर किस गर्वनर जनरल के समय पास हुआ? [1]
(a) लॉर्ड क्लाइव
(b) लॉर्ड वेलेजली
(c) लॉर्ड-कॉर्नवालिस
(d) लॉर्ड विलियम बैंण्टिक

प्रश्न 6.
ब्रह्म समाज के संस्थापक कौन थे  [1]
(a) राजाराम मोहन राय
(b) स्वामी विवेकानन्द
(c) स्वामी दयानन्द सरस्वती
(d) रामकृष्ण परमहंस

प्रश्न 7.
बंगाल विभाजन के समय भारत का वायसराय था   [1]
(a) लॉर्ड कर्जन
(b) लॉर्ड मिन्टो
(c) लॉर्ड रिपन,
(d) लॉर्ड डफरिन

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से गरम दल के नेता थे  [1]
(a) दादा भाई नौरोजी
(b) फिरोज शाह मेहता।
(c) बाल गंगाधर तिलक
(d) ए.ओ. ह्युम

प्रश्न 9.
निम्न में से कौन-सा आन्दोलन गाँधी जी से सम्बन्धित नहीं था? [1]
(a) असहयोग आन्दोलन
(b) होमरूल आन्दोलन
(c) सविनय अवज्ञा आन्दोलन
(d) भारत छोड़ो आन्दोलन

प्रश्न 10.
गाँधी जी ने डाण्डी मार्च प्रारम्भ किया था   [1]
(a) अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए कहने हेतु
(b) नमक कानून तोड़ने हेतु
(c) विदेशी सामानों के बहिष्कार हेतु
(d) हिन्दू मुस्लिम एकता हेतु

खण्ड-‘ख’

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 
प्रश्न 11.
राणा सांगा की पराजय के क्या परिणाम हुए? [2]

प्रश्न 12.
शेरशाह को ‘शेर खाँ’ की उपाधि क्यों दी गई?  [2]

प्रश्न 13.
पुरन्दर की सन्धि किस-किस के मध्य हुई? [2]

प्रश्न 14.
फ्रांसीसियों के विरुद्ध अंग्रेजों की सफलता के किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिए? [2]

प्रश्न 15.
वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट क्या था? [2]

खण्ड-‘ग’

लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 16.
“हुमायूँ स्वयं अपना शत्रु था” स्पष्ट कीजिए?   [5]

प्रश्न 17.
‘अष्ट्र प्रधान के विषय में आप क्या जानते हैं?  [5]

प्रश्न 18.
1857 ई. की क्रान्ति का तात्कालिक कारण क्या था? [5]

प्रश्न 19.
खिलाफत आन्दोलन के उद्देश्यों की विवेचना कीजिए? [5]

प्रश्न 20.
1947 के अधिनियम की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए? [5]

प्रश्न 21.
गुटनिरपेक्षता का क्या महत्त्व है? [5]

खण्ड-‘घ’

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 22.
“अकबर मुगल साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक था, इस कथन की विवेचना कीजिए। [10]
अथवा
“शाहजहाँ का काल मुगल साम्राज्य का स्वर्ण युग था’ क्या आप सहमत हैं? विवेचना कीजिए। [10]

प्रश्न 23.
(i) बक्सर के युद्ध के कारण तथा परिणामों पर प्रकाश डालिए [10]
अथवा
(ii) बंगाल के द्वैध-शासन के पक्ष-विपक्ष पर प्रकाश डालिए? [10]

प्रश्न 24.
‘भारत सरकार अधिनियम 1935’ की प्रमुख धाराओं का वर्णन कीजिए?  [10]
अथवा
1919′ के अधिनियम की प्रमुख धाराओं का उल्लेख कीजिए। [10]

खण्ड-‘ङ’

प्रश्न 25.
निम्नलिखित ऐतिहासिक तिथियों से सम्बन्धित घटनाओं का उल्लेख कीजिए। [10]
1. 1658 ई.
2. 1659 ई.
3. 1742 ई.
4. 1798 ई.
5. 1856 ई.
6. 1875 ई.
7. 1885 ई.
8. 1798 ई.
9. 1932 ई.
10. 1956 ई.

प्रश्न 26.
मानचित्र सम्बन्धी प्रश्न
दिए गए भारत के रेखा-मानचित्र में निम्नलिखित स्थानों का अंकन
(अ) चिह्न द्वारा दर्शाइए तथा उनके नाम भी लिखिए। सही नाम तथा सही स्थान दर्शाने के लिए 1+ 1 अंक निर्धारित है। |
(i) वह स्थान जहाँ से 1857 ई. की क्रान्ति की शुरुआत हुई। । [2]
(ii) वह स्थान जहाँ कांग्रेस का पहला अधिवेशन हुआ। । [2]
(iii) वह स्थान जहाँ जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ। । [2]
(iv) ‘राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956′ द्वारा 1 मई 1960 में किए गए परिवर्तन द्वारा गठित नया राज्य। [2]
(v) ‘2000 ई. में संसद द्वारा पारित विधेयक द्वारा गठित कोई एक राज्य। [2]

Answers

उत्तर 1.
(a) बाबर

उत्तर 2.
(b) दिल्ली में

उत्तर 3.
(c) शाहआलम

उत्तर 4.
(b) रायगढ़

उत्तर 5.
(d) लॉर्ड विलियम बैंण्टिक

उत्तर 6.
(a) राजाराम मोहन राय

उत्तर 7.
(a) लॉर्ड कर्जन

उत्तर 8.
(c) बाल गंगाधर तिलक

उत्तर 9.
(b) होमरूल आन्दोलन

उत्तर 10.
(b) नमक कानून तोड़ने हेतु

उत्तर 11.
राणा सांगा मेवाड़ के राजपूत शासक थे। 17 मार्च 1527 ई. को हुए खानवा के युद्ध में वे मुगल शासक बाबर से पराजित हो गए। इस | पराजय के निम्नलिखित परिणाम हुए।

  •  भारत पर मुगल साम्राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।
  •  राजपूत सत्ता की पकड़ कमजोर हुई।

उत्तर 12.
शेरशाह को ‘शेर खाँ’ की उपाधि दक्षिण बिहार के सूबेदार बहार खाँ लोहानी के द्वारा एक शेर को मारने के उपलक्ष्य में प्रदान की गई थी। शेरशाह की बहादुरी से प्रभावित होकर लोहानी ने शेरशाह को अपने पुत्र जलाल खाँ का संरक्षक भी नियुक्त किया था।

उत्तर 13.
पुरन्दर की सन्धि शिवाजी और मुगल शासक औरंगजेब के मध्य 24 जून, 1665 को हुई। इस सन्धि के अनुसार, शिवाजी को अपने 33 में से 23 किले मुगलों को देने पड़े। उनके पुत्र शम्भाजी को मुगल दरबार में 5000 का मनसब दिया गया तथा शिवाजी ने मुगलों की तरफ से बीजापुर के विरुद्ध युद्ध एवं सेवा करने का वचन दिया। इस सन्धि के समय मनूची भी उपस्थित था।

उत्तर 14.
फ्रांसीसियों एवं अग्रेजों के मध्य तीन कर्नाटक युद्ध हुए। जिनमें फ्रांसीसियों की पराजय हुई। इन युद्धों में अंग्रेजों की सफलता के दो कारण निम्नलिखित थे।

(i) फ्रांसीसी सेनापति डुप्ले, बुसी, लाली की तुलना में अंग्रेज सेनापति क्लाइव, लॉरेन्स तथा आयरकूट की कुशलता।
(ii) इंग्लैण्ड की नौ-सेना की सर्वोच्चता।

उत्तर 15.
लॉर्ड लिटन के समय वर्ष 1878 में लागू वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट भारतीय भाषाओं में छपने वाले समाचार-पत्रों की स्वतन्त्रता को प्रतिबन्धित करने वाला एक कानून था। यह राष्ट्रवादी विचारों के प्रसार को रोकने के लिए लाया गया था। लॉर्ड रिपन ने 1882 ई. में इस एक्ट को रद्द कर दिया।

उत्तर 20.
1947 को अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अधिनियम है, जिसके आधार पर भारत एवं पाकिस्तान में विभाजन किया गया। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउण्ट बेटन की योजना पर आधारित यह विधेयक 4 जुलाई, 1947 को ब्रिटिश संसद में पेश किया गया और 18 जुलाई 1947 को शाही संस्तुति मिलने के बाद अधिनियम बना। इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं।

(i) भारतीय रियासतों को यह अधिकार दिया गया की वे अपनी इच्छानुसार भारत या पाकिस्तान में रह सकती हैं।
(ii) जब तक नया संविधान नहीं बन जाता, तब तक दोनों राज्यों का शासन भारत सरकार अधिनियम 1935 के द्वारा ही चलाया जाएगा।
(iii) भारत का विभाजन उसके स्थान पर भारत तथा पाकिस्तान नामक दो अधिराज्यों में होगा।
(iv) दोनों अधिराज्यों के पास अधिकार सुरक्षित होगा की वे इच्छानुसार राष्ट्रमण्डल में बने रहें या अलग हो जाएँ।
(v) ब्रिटेन में भारत ने मन्त्री के पद को समाप्त कर दिया गया।
(vi) 15 अगस्त, 1947 से भारत और पाकिस्तान में अलग-अलग गवर्नर जनरल कार्य करेंगे।
(vii) जब तक नए प्रान्तों में चुनाव नहीं हो जाते, उस समय तक प्रान्तों में पुराने विधानमण्डल कार्य कर सकेंगे।

उत्तर 23.
(ii) भारत में 17वीं शताब्दी तक ईस्ट-इण्डिया कम्पनी अपनी व्यापारिक स्थिति मजबूत कर चुकी थी। इसके बाद कम्पनी ने भारत के राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर दिया। कम्पनी के राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण ही बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला तथा कम्पनी के मध्य सम्बन्ध कटु हो गए। जिसके कारण 1757 ई. में इनके मध्य प्लासी का युद्ध हुआ और सिराजुद्दौला की हार हुई। इस जीत के बाद कम्पनी ने अपनी इच्छानुसार बंगाल में नवाब बदलने प्रारम्भ कर दिए।

सिराजुद्दौला के पश्चात् मीर जाफर बंगाल का शासक बना था, जो अंग्रेजों और इस कम्पनी के फायदे के लिए कार्य करता रहता था। तीन वर्ष पश्चात् कम्पनी ने मीर जाफर को पदच्युत करके मीर कासिम को नवाब बनाया जो मीर जाफर का दामाद था।

मीर कासिम एक योग्य व्यक्ति था, इसने बंगाल का नवाब बनते ही अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए प्रशासनिक कदम उठाए। जिसके कारण मीर कासिम और कम्पनी के सम्बन्ध बिगड़ गए, जिसके कारण 1764 ई. में बक्सर का युद्ध हुआ, जिसमें ब्रिटिशों ने मुगल सम्राट शाह आलम बंगाल के नवाब मीर कासिम एवं अवध के नवाब सिजाउद्दौला को पराजित किया। इसके बाद भारत में ब्रिटेन की ताकत और बढ़ गई एवं इस जानकारी के बाद ब्रिटेन ने दुबारा लार्ड क्लाइव को बंगाल का गवर्नर बनाकर भारत भेजा।

लॉर्ड क्लाइव ने यहाँ प्रशासनिक सुधारों के अतिरिक्त 12 अगस्त 1765 ई. में मुगल सम्राटशाह आलम ने इलाहाबाद की सन्धि की इस सन्धि के द्वारा बंगाल में दोहरी सरकार अथवा द्वैध-शासन की स्थापना हुई। इससे कम्पनी को दीवानी और निजामत के अधिकार मिल गए थे, परन्तु कर्मचारी को मालगुजारी वसूल करने तथा | शासन चलाने का अनुभव नहीं था, इसलिए उन्होंने अधिकारों का विभाजन कर दिया। क्लाइव द्वारा स्थापित दोहरी शासन प्रणाली जटिल थी इस व्यवस्था में बंगाल का समस्त कार्य नवाब के नाम से चलता था, परन्तु उसके पास शक्ति नाममात्र की थी। नवाब कम्पनी के पेंशनर थे, परन्तु कम्पनी उन्हें खर्च के लिए निश्चित राशि देती थी। कम्पनी शासन कार्य में नवाब का निर्देशन करती थी, परन्तु रक्षा के लिए जिम्मेदार नहीं थी। कम्पनी एक तरफ बंगाल के नवाब के अधीन होने का दिखावा करती थी तो दूसरी तरफ वास्तविक शक्ति ही कम्पनी के हाथों में थी।

क्लाइव की इस प्रणाली को द्वैध-शासन प्रणाली कहा जाता है। इसके पक्ष एवं विपक्ष में प्रमुख बातें निम्न प्रकार हैं।

पक्ष

(i) कम्पनी के कार्यों के लिए ऐसे कर्मचारियों की कमी थी, जो भारतीय भाषाओं तथा रीति-रिवाजों से परिचित हो, ऐसी स्थिति में कम्पनी ने शासन का उत्तरदायित्व भारतीयों पर डाल दिया, जिससे कम्पनी का शासन सुव्यवस्थित ढंग से चलने लगा एवं भारतीय खुश हो गए।
(ii) उस समय भारत के साथ युरोपीय, पुर्तगाली एवं फ्रांसीसी भी व्यापार करते थे, जो ईस्ट-इण्डिया कम्पनी के विरोधी थे, परन्तु क्लाइव ने द्वैध-शासन की सहायता से बंगाल के नवाब को समक्ष रखकर इन सभी से व्यापार किया और अपनी स्थिति भी मजबूत
की जिसके कारण संघर्ष की स्थिति उत्पन्न न हो सकी। |
(iii) द्घ-शासन के कारण ही कम्पनी मराठों की शक्ति से बच गई एवं इसे मराठों का सामना नहीं करना पड़ा। |
(iv) द्वैध-शासन के पूर्व कम्पनी तथा बंगाल नवाब के बीच परस्पर झगड़े होते रहते थे। जिससे जनता भी नाराज थी इस शासन व्यवस्था के बाद यह राजनीतिक संघर्ष बन्द हो गए। इसके बदले बंगाल नवाब को 53 लाख रुपए पेन्श्न के रूप में नवाब को दिए जाते थे, जो शासन चलाने के लिए काफी न थे।
(v) द्वैध-शासन के कारण भारतीय देशी राजाओं में किसी सन्देह की स्थिति उत्पन्न नहीं हो सकी जिससे कम्पनी एवं जनता को संघर्ष की अग्नि में नहीं जलना पड़ा।

विपक्ष

(i) कम्पनी के पास वास्तविक शक्ति एवं नवाब के पास नाममात्र की शक्ति के कारण कम्पनी नवाबों को कठपुतली की तरह इस्तेमाल करती थी, जिससे बंगाल की जनता के कल्याण सम्बन्धी कार्यों में बाधा उत्पन्न हुई।
(ii) द्वैध-शासन के कारण कम्पनी शासन प्रबन्ध की जिम्मेदार नहीं थी।
(iii) कम्पनी ने अपनी आय में वृद्धि के लिए करों की मात्रा में वृद्धि की जिससे कम्पनी के प्रति अराजकता एवं बंगाल में अव्यवस्था एवं अष्टाचार में वृद्धि हुई।
(iv) द्वैध-शासन के कारण कम्पनी ने सैन्य प्रशासन अपने हाथों में ले । लिया जिससे ब्राह्य युद्ध और शान्ति के लिए नवाब कम्पनी की प्रतिक्षा करता था।
(v) बंगाल में वैष-शासन के कारण न्याय व्यवस्था भंग हो गई, क्योंकि कम्पनी न्याय व्यवस्था में भी हस्तक्षेप करने लगी।
(vi) द्वेष-शासन के उद्योग एवं व्यापार को बहुत हानि हुई तथा बंगाल का सूती-वस्त्र उद्योग बर्बाद हो गया।
(vii) भूमि कर वसूली का कार्य ठेकेदार को सौंप दिया गया, जिससे बचत करने के लिए ठेकेदार कार्य करते थे, इसके कारण ही कृषि व्यवस्था भी बन्द हो गई।

उत्तर 25.
महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तिथियाँ एवं उनका घटनाक्रम

1. 1658  ई. औरंगजेब एवं मुराद द्वारा सामूगद के युद्ध में दारा की सेना पर निर्णायक विजया औरंगजेब को सिंहासनारोहण/शाहजहाँ का बन्दी बनाया जाना।
2. 1659  ई. शिवाजी द्वारा अफजल खाँ का बधा। औरंगजेब का द्वितीय (औपचारिक) राज्याभिषेक|
3. 1742  ई. व्यापारिक हित हेतु फ्रांसीसियों का भारत के | राजनीतिक क्षेत्र में हस्तक्षेप|
4. 1798  ई. हैदराबाद के निजाम द्वारा सहायक सन्धि को स्वीकार करना।
5. 1856  ई. विधवा पुनर्निवाह अधिनियम पारित किया गया।
6. 1875  ई. बम्बई में स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा आर्य समाज की स्थापना, अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो ऑरिएण्टल कॉलेज की सर सैयद अहमद खाँ द्वारा स्थापना, न्यूयॉर्क में थियोसॉफिकल सोसायटी की स्थापना।
7. 1885  ई. अवकाश प्राप्त अंग्रेज अधिकारी एलन अक्टोवियन ह्यूम (ए. ओ. ह्यूम) द्वारा मुम्बई (बम्बई) में कांग्रेस की स्थापना
8. 1929  ई. दिसम्बर 1929 में कांग्रेस के लाहौर | अधिवेशन में पूर्ण स्वराज की माँग की गई।
9. 1932  ई. साम्प्रदायिक निर्णय के विरुद्ध गाँधीजी का | अनशन। गाँधीजी तथा बी. आर. अम्बेडकर के बीच पूना समझौता
10. 1956  ई. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम 1956 पारित किया गया।

उत्तर 26.
(i) मेरठ
(ii) बम्बई (मुम्बई)
(iii) अमृतसर
(iv) गुजरात
(v) झारखण्ड
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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 22 Mental Health and Mental Hygiene

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 22 Mental Health and Mental Hygiene (मानसिक स्वास्थ्य एवं मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान) are part of UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 22 Mental Health and Mental Hygiene (मानसिक स्वास्थ्य एवं मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान).

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Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 22
Chapter Name  Mental Health and Mental Hygiene
(मानसिक स्वास्थ्य एवं मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान)
Number of Questions Solved 55
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 22 Mental Health and Mental Hygiene (मानसिक स्वास्थ्य एवं मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
मानसिक स्वास्थ्य से क्या आशय है? मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति के मुख्य लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
या
मानसिक स्वास्थ्य से क्या तात्पर्य है? अध्यापकों को अपने विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य की जानकारी क्यों होनी चाहिए? [2010, 11, 13]
या
मानसिक स्वास्थ्य से आप क्या समझते हैं? अच्छी शिक्षा के लिए मानसिक स्वास्थ्य की जानकारी क्यों आवश्यक है? [2011]
या
मानसिक स्वास्थ्य से आप क्या समझते हैं? मानसिक स्वास्थ्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए। (2016)
या
मानसिक स्वास्थ्य से आप क्या समझते हैं? (2015)
या
मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति की किन्हीं दो विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (2015)
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ
मानसिक स्वास्थ्य से तात्पर्य व्यक्ति की उस योग्यता से है जिसके माध्यम से वह अपनी कठिनाइयों को दूर कर हर परिस्थिति में अपने को समायोजित कर लेता है। सुखी जीवन के लिए जितना शारीरिक स्वास्थ्य आवश्यक है, उतना ही मानसिक स्वास्थ्य भी। चिकित्साशास्त्रियों के अनुसार, सामान्य शारीरिक व्याधियाँ; जैसे-रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग आदि मानसिक कारकों से उत्पन्न होती हैं।

मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति चिन्तारहित, पूर्णतः समायोजित, आत्मनियन्त्रित, आत्मविश्वासी तथा संवेगात्मक रूप से स्थिर होता है। उसके व्यवहार में सन्तुलन रहता है तथा वह अधिक समय तक मानसिक तनाव की स्थिति में नहीं रहता। वह प्रत्येक परिस्थिति में स्वयं को शीघ्र ही समायोजित कर लेता है। वर्तमान परिस्थितियों में, सम्पूर्ण समाज में, उसके विभिन्न अंगों में तथा उसके नागरिकों के बीच अच्छे-से-अच्छा समायोजन व्यापक कल्याण का द्योतक है जिसके लिए मानसिक स्वास्थ्य एक पूर्ण आवश्यकता है।

मानसिक स्वास्थ्य की परिभाषा
विभिन्न विद्वानों ने मानसिक स्वास्थ्य की अनेक परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं।

  1. हैडफील्ड के अनुसार, “साधारण शब्दों में हम कह सकते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य सम्पूर्ण व्यक्तित्व का पूर्ण सामंजस्य के साथ कार्य करना है।”
  2. लैडेल के मतानुसार, “मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ है–वास्तविकता के धरातल पर वातावरण से पर्याप्त सामंजस्य करने की योग्यता।”
  3. प्रो० भाटिया के शब्दों में, “मानसिक स्वास्थ्य यह बताता है कि कोई व्यक्ति जीवन की माँगों और अंवसरों के प्रति कितनी अच्छी तरह समायोजित है।”

मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति के लक्षण
जिस प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य को कुछ विशिष्ट लक्षणों के आधार पर पहचाना जा सकता है, उसी प्रकार मानसिक स्वास्थ्य की भी कुछ लक्षणों के आधार पर पहचान सम्भव है। कुछ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार पूर्ण मानसिक स्वास्थ्य एक कल्पना मात्र है और कोई भी व्यक्ति मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ नहीं होता, तथापि मानसिक स्वास्थ्य से सम्पन्न व्यक्ति के कुछ विशिष्ट लक्षण अवश्य हैं। इनमें सर्वप्रथम हैडफील्ड के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य की नितान्त आवश्यकताओं का उल्लेख किया जाएगा और इसके बाद अन्य प्रमुख लक्षणों का विवेचन किया जाएगा। ये निम्न प्रकार हैं।

1.पूर्ण :
अभिव्यक्ति पर निर्भर है। इसके अवद्मन से वृत्तियाँ दमित वे कुण्ठित होकर व्यक्तित्व में मानसिक विकारों तथा कुसमायोजन का कारण बनती हैं, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।

2. सन्तुलन :
व्यक्ति को भावना ग्रन्थियों के निर्माण, प्रतिरोध व मानसिक द्वन्द्व जैसे दोषों से बचाने के लिए आवश्यक है कि उसकी मूल-प्रवृत्तियों, आकांक्षाओं तथा समस्त क्षमताओं के बीच आपसी सन्तुलन व वातावरण से समायोजन बना रहे। मानसिक स्वास्थ्य के लिए सन्तुलन और समायोजन परमावश्यक है।

3. सामान्य लक्षण :
विभिन्नताओं, क्षमताओं, इच्छाओं वे प्रवृत्तियों के बीच सन्तुलन व समन्वय तथा उनकी पूर्ण अभिव्यक्ति सिर्फ तभी सम्भव है, जब वे एक सामान्य एवं
व्यापक लक्ष्य की ओर उन्मुख हों। ये लक्ष्य मानसिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से निर्धारित किये जाने चाहिए।

मानसिक स्वास्थ्य व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व से सम्बन्धित है जिसके लिए व्यक्तित्व के गुणों की पूर्ण अभिव्यक्ति, उनकी सन्तुलित क्रियाशीलता तथा सामान्य एवं व्यापक लक्ष्य आवश्यक हैं।

I. अन्य प्रमुख लक्षण
मानसिक स्वास्थ्य को कुछ अन्य प्रमुख लक्षणों के आधार पर भी पहचाना जाता है, जो अग्र प्रकार वर्णित हैं।

1. अन्तर्दृष्टि एवं आत्म-मूल्यांकन :
जिस व्यक्ति में स्वयं के समायोजन सम्बन्धी समस्याओं की अन्तर्दृष्टि होती है, वह अपनी सामर्थ्य की अधिकतम और निम्नतम दोनों सीमाओं से भली-भाँति परिचित होता है। ऐसा व्यक्ति अपने दोषों को स्वीकार कर या तो उन्हें दूर करने की चेष्टा करता है या उनसे
समझौता कर लेता है। वह आत्म-दर्शन तथा आत्म-विश्लेषण की क्रिया द्वारा अपनी उलझनों, तनावों, पूर्वाग्रहों, अन्तर्द्वन्द्वों तथा विषमताओं का सहज समाधान खोजकर उन्हें समाप्त या कम करने की कोशिश करना है। वह अपनी इच्छाओं, क्षमताओं तथा शक्तियों का वास्तविक मूल्यांकन करके उन्हें सही दिशा प्रदान पर सकता है।

2. समायोजनशीलता :
मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के लचीलेपन के गुण के कारण नवीन एवं परिवर्तित परिस्थितियों से शीघ्र एवं उचित समायोजन स्थापित करने में सफल रहता है। वह विषम परिस्थितियों से भय खाकर या घबराकर उनसे पलायन नहीं करता, अपितु उनको दृढ़ता से सामना करती है और उनके बीच से ही अपना मार्ग खोज लेता है। समायोजनशीलता के अन्तर्गत दोनों ही बातें सम्मिलित हैं

  • परिस्थितियों को अपने अनुसार ढाल लेना या
  • स्वयं परिस्थितियों के अनुसार ढल जाना। स्वस्थ व्यक्ति समाज के परिवर्तनशील नियमों तथा रीति-रिवाजों से परिचित होने के कारण उनसे उचित सामंजस्य स्थापित कर लेता है।

3. बौद्धिक तथा सांवेगिक परिपक्वता :
मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से बौद्धिक एवं सांवेगिक परिपक्वता की नितान्त आवश्यकता है। बौद्धिक परिपक्वता से युक्त मनुष्य अपने ज्ञान का विस्तार करता है, उत्तरदायित्वों का निर्वाह करता है तथा अपना निर्माण स्वयं करने के लिए प्रयत्नशील रहता है। प्रखर बुद्धि से अहम् भाव तथा मन्द बुद्धि से हीनमन्यता का जन्म हो सकता है। अतः बौद्धिक स्वास्थ्य की दृष्टि से इनके प्रति सतर्कता आवश्यक है। सांवेगिक रूप से परिपक्व व्यक्ति अपने संवेगों तथा भावों पर उचित नियन्त्रण रखता है। वह सांवेगिक ग्रन्थियों (यथा-ईष्र्या, उन्माद आदि) से पूर्णतया मुक्त होता है। स्पष्टतः मानसिक तौर पर स्वस्थ व्यक्ति में बौद्धिक एवं सांवेगिक परिपक्वता आवश्यक है।

4. यथार्थदृष्टिकोण एवं स्वस्थ अभिवृत्ति :
मानसिक स्वास्थ्य से युक्त व्यक्ति जीवन के प्रति यथार्थ दृष्टिकोण तथा स्वस्थ अभिवृत्ति अपनाता है। ऐसे व्यक्ति के विचारों, वृत्तियों, आकांक्षाओं तथा कार्य-पद्धति के बीच उचित सन्तुलन रहने से वह कल्पना प्रधान, अतिशयवादी या कोरा स्वप्नदृष्टा नहीं – होता। वह उच्च एवं हीन भावना ग्रन्थियों के विकार से मुक्त होकर स्वविवेक के आधार पर कार्य करता है। उसकी प्रवृत्तियों तथा अभिवृत्तियों के बीच विरोधाभास दिखायी नहीं देता। वह जो कुछ है उसका यथार्थ मूल्यांकन कृरता है और तद्नुसार ही कार्य में रत हो जाता है। उसकी कथनी-करनी में भेद नहीं रहता। इस प्रकार वह अपने जीवन के विषय में वास्तविक दृष्टि एवं श्रेष्ठ अभिवृत्तियाँ अपनाकर सन्तुलित एवं संयमित जीवन व्यतीत करता है।

5. व्यावसायिक सन्तुष्टि :
मानसिक स्वास्थ्य की एक प्रमुख विशेषता अपने व्यवसाय अथवा कार्य के प्रति पूर्ण सन्तुष्टि की अनुभूति भी है। अपने कार्य से सन्तुष्ट व्यक्ति मन लगाकर कार्य करता है और श्रम से पीछे नहीं हटता। उसकी कार्यक्षमता में उत्तरोत्तर वृद्धि उसे अपने व्यावसायिक उद्देश्यों के प्रति सुनिश्चित एवं दृढ़ बनाती है। परिणामतः वह व्यावसायिक सफलता प्राप्त कर श्रीसम्पन्न जीवन बिताता है। इसके विरुद्ध व्यावसायिक दृष्टि से असन्तुष्ट व्यक्ति आर्थिक विपन्नता, निराशा, चिन्ता तथा तनावों से ग्रस्त रहते हैं। वे मानसिक रोगी हो जाते हैं।

6. सामाजिक सामंजस्य :
व्यक्ति अपने समाज का एक अविभाज्य अंग है और उसकी एक इकाई है। उसकी अपूर्ण सत्ता समाज की पूर्णता में समाहित होकर परिपूर्ण होती है। अत: उसका समाज के साथ समायोजन, अनुकूलन तथा संमन्वय सर्वथा प्राकृतिक एवं अनिवार्य कहा जाएगा। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति समाज के साथ सामंजस्य बनाकर रखता है। वह हमेशा समाज की समस्याओं और मर्यादाओं का ध्यान रखता है।

वह केवल अपने सामाजिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए ही प्रचेष्ट नहीं रहता, अपितु समाज के प्रति अपने कर्तव्यों की पूर्ति भी करता है। वह स्व-हित और पर-हित के मध्य सन्तुलन बनाकर चलता है। समाज के साथ प्रतिकूल एवं तनावपूर्ण सम्बन्ध मानसिक अस्वस्थता के परिचायक हैं। उपर्युक्त लक्षणों के अतिरिक्त, मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति नियमित जीवन बिताने वाले आत्मविश्वासी, सहनशील, धैर्यवान एवं सन्तोषी मनुष्य होते हैं। उनकी इच्छाएँ तथा आवश्यकताएँ सामाजिक मान्यताओं की सीमाओं में और उसकी आदतें समाज के लिए हितकर होती हैं।

प्रश्न 2
मानसिक अस्वस्थता से आप क्या समझते हैं ? मानसिक अस्वस्थता के कुछ लक्षणों का वर्णन कीजिए।
या
दो प्रमुख लक्षणों का संक्षेप में विवरण दीजिए जिनके आधार पर यह कहा जाता है कि अमुक व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है। [2017,2010]
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता का आशय
जब कोई मनुष्य अपने कार्य में आने वाली बाधाओं को दूर करने में असमर्थ रहता है, अथवा उने बाधाओं से उचित समायोजन स्थापित नहीं कर पाता तो उसका मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है और उसमें मानसिक-अस्वस्थता’ पैदा हो जाती है। मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति स्वयं को अपने वातावरण की परिस्थितियों के साथ समायोजित न करने के कारण सांवेगिक दृष्टि से अस्थिर हो जाता है, उसके आत्मविश्वास में कमी आ जाती है, मानसिक उलझनों, तनावों, हताशा व चिन्ताओं के कारण उसमें भाव-ग्रन्थियाँ बन जाती हैं तथा वह व्यक्तित्व सम्बन्धी अनेकानेक अव्यवस्थाओं का शिकार हो जाता है।

इस प्रकार से, मानसिक अस्वस्थता वह स्थिति है जिसमें जीवन की आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने में व्यक्ति स्वयं को असमर्थ पाता है तथा संवेगात्मक असन्तुलन का शिकार हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति में बहुत-सी मानसिक विकृतियाँ या व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। और उसे मानसिक रूप से अस्वस्थ कहा जाता है।”

मानसिक अस्वस्थता के लक्षण
मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति में उन सभी लक्षणों का अभाव रहता है जिनका मानसिक स्वास्थ्य के लक्षणों के रूप में अध्ययन किया गया है। व्यक्ति के असामान्य व्यवहार से लेकर उसके पागलपन की स्थिति के बीच में अनेकानेक स्तर या सोपान दृष्टिगोचर होते हैं, तथापि मानसिक अस्वस्थता के प्रमुख लक्षणों का सोदाहरण, किन्तु संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है

1. साधारण समायोजन सम्बन्धी दोष :
साधारण समायोजन सम्बन्धी दोष के लक्षण प्राय: प्रत्येक व्यक्ति में पाये जाते हैं। इसे मानसिक अस्वस्थता का एक सामान्य रूप कहा जा सकता है। अक्सर देखने में आता है कि कोई बावा या अवरोध उत्पन्न होने के कारण अपने कार्य की सम्पन्नता में असफल रहने वाला व्यक्ति अति संवेदनशील, हठी, चिड़चिड़ा या आक्रामक हो जाता है। यह मानसिक अस्वस्थता की शुरुआत है।

2. मनोरुग्णता :
सामान्य जीवन वाले कुछ लोगों में भी मानसिक अस्वस्थता के संकेत दिखाई पड़ते हैं। लिखने-पढ़ने, बोलने या अन्य क्रियाकलापों में अक्सर लोगों से भूल होना स्वाभाविक ही है। और इसे मानसिक अस्वस्थता का नाम नहीं दिया जा सकता, किन्तु यदि इन भूलों की आवृत्ति बढ़ जाए और असामान्य-सी प्रतीत हो तो इसे मनोविकृति कहा जाएगा। तुतलाना, हकलाना, क्रम बिगाड़ कर वाक्य बोलना, बेढंगे तथा अप्रचलित वस्त्र धारण करना, चलने-फिरने में असामान्य लगना, अजीब-अजीब हरकतें करना, चोरी करना, धोखा देना आदि मानसिक अस्वस्थता के लक्षण हैं।

3. मनोदैहिक रोग :
मनोदैहिक रोगों का कारण व्यक्ति के शरीर में निहित होता है। उदाहरण के लिए-शरीर के किसी संवेदनशील भाग में चोट या आघात के कारण स्थायी दोष पैदा हो जाते हैं और व्यक्ति को जीवनभर कष्ट देते हैं। सिगरेट, तम्बाकू, अफीम, चरस, गाँजा या शराब आदि पीने से भी अनेक मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं। दमा-खाँसी से चिड़चिड़ापन, निम्न या उच्च रक्तचाप के कारण मानसिक असन्तुलन तथा यकृत एवं पाचन सम्बन्धी व्याधियों से बहुत-से मानसिक विकारों का जन्म होता है। इसी के साथ-साथ किसी प्रवृत्ति का बलपूर्वक दमन करने से रक्त की संरचना, साँस की प्रक्रिया तथा हृदय की धड़कनों में परिवर्तन आता है, जिसके परिणामत: व्यक्ति का शरीर हमेशा के लिए रोगी हो जाता है। इस प्रकार शरीर और मन दोनों ही मानसिक अस्वस्थता से प्रभावित होते हैं।

4. मनस्ताप :
मनस्ताप (Psychoneuroses) का जन्म समायोजन-दोषों की गम्भीरता के परिणामस्वरूप होता है। ये व्यक्तित्व के ऐसे आंशिक दोष हैं जिनमें यथार्थता से सम्बन्ध-विच्छेद नहीं हो पाता। इसमें

  1. स्नायु दौर्बल्य तथा
  2. मनोदौर्बल्य रोग सम्मिलित हैं।

1. स्नायु दौर्बल्य
इसमें व्यक्ति अकारण ही थकावट अनुभव करता है। इससे उसमें अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, विभिन्न अंगों में दर्द, काम के प्रति अनिच्छा, मंदाग्नि, दिल धड़कना तथा हमेशा अपने स्वास्थ्य की चिन्ता के लक्षण दिखायी पड़ते हैं। ऐसा व्यक्ति किसी एक डॉक्टर के पास नहीं टिकता और अपनी व्यथा कहने के लिए बेचैन रहता है।

2. मनोदौर्बल्य
मनोदौर्बल्य में निम्नलिखित मानसिक विकार आते हैं

  • कल्पना गृह या विश्वासबाध्यता के रोगी के मन में निराधार वे असंगत विचार, विश्वास और कल्पनाएँ आती रहती हैं।
  • हठप्रवृत्ति से पीड़ित व्यक्ति कामों की निरर्थकता से परिचित होते हुए भी उन्हें हठपूर्वक करता : रहता है और बाद में दु:ख भी पाता है।।
  • भीतियाँ के अन्तर्गत व्यक्ति विशेष प्रकार की चीजों, दृश्यों तथा विचारों से अकारण ही भयभीत रहता है; जैसे-खुली हवा से डरना, भीड़, पानी आदि से डरना।
  • शरीरोन्माद में व्यक्ति के अहम् द्वारा दमित कामवासनाओं को शारीरिक दोषों के रूप में प्रकटीकरण होना; जैसे-हँसना, रोना, हाथ-पैर पटकना, मांसपेशियों का जकड़ना, मूच्छ आदि।
  • चिन्ता रोग में अकारण ही भविष्य सम्बन्धी चिन्ताएँ लगी रहती हैं।
  • क्षति क्रमबाध्यता से ग्रस्त व्यक्ति अकारण ही ऐसे काम कर बैठता है जिससे अन्य व्यक्तियों को, हानि हो; जैसे—मारना-पीटना, हत्या या दूसरे के घर में आग लगा देना। इस रोग का सबसे अच्छा उदाहरण ‘कनपटीमार व्यक्ति का आतंक है जो कनपटी पर मारकर अकारण ही लोगों की हत्या कर देता था।

5. मनोविकृतिये :
गम्भीर मानसिक रोग हैं, जिनके उपचार हेतु मानसिक चिकित्सालय में दाखिल होना पड़ता है। मनोविकृति से पीड़ित व्यक्तियों का यथार्थ से पूरी तरह सम्बन्ध टूट जाता है। वे अनेक प्रकार के भ्रमों व भ्रान्तियों के शिकार हो जाते हैं और उन्हें सत्य समझने लगते हैं। मनोविकृति के अन्तर्गत ये रोग आते हैं—स्थिर भ्रम (Parangia) से ग्रसित किसी व्यक्ति को पीड़ा भ्रम (Delusions ofPersecution) रहने के कारण वह स्वयं को पीड़िते समझ बैठता है, तो किसी व्यक्ति में ऐश्वर्य भ्रम (Delusion of Prosperity) पैदा होने के कारण वह स्वयं को ऐश्वर्यशाली या महान् समझता है। उत्साह-विषाद चक्र, मनोदशा (Manic Depressive Psychosis) का रोगी कभी अत्यधिक प्रसन्न दिखाई पड़ता है तो कभी उदास।

6. यौन विकृतियाँ :
मानसिक रोगी का यौन सम्बन्धी या लैंगिक जीवन सामान्य नहीं होता। यौन विकृतियाँ मानसिक अस्वस्थता की परिचायक हैं और अस्वस्थता में वृद्धि करती हैं। इनके प्रमुख लक्षण ये हैं–विपरीत लिंग के वस्त्र पहनना, स्पर्श से यौन सुख प्राप्त करना, स्वयं को या दूसरे को पीड़ा पहुँचाकर काम सुख प्राप्त करना, बालकों, पशुओं, समलिगियों तथा शव से यौन क्रियाएँ करना, हस्तमैथुन तथा गुदामैथुन आदि।

उपर्युक्त वर्णित विभिन्न मनोरोगों का उनके सम्बन्धित लक्षणों के साथ वर्णन किया गया है। यह आवश्यक नहीं है कि किसी व्यक्ति में ये सभी लक्षण दिखायी पड़े, इनमें से कोई एक लक्षण भी मानसिक अस्वस्थता का संकेत देता है। व्यक्ति में इन लक्षणों के प्रकट होते ही उसका मानसिक उपचार किया जाना चाहिए।

प्रश्न 3
मानसिक अस्वस्थता के कारणों अथवा मानसिक स्वास्थ्य में बाधक कारणों का उल्लेख कीजिए।
या
मानसिक स्वास्थ्य से आप क्या समझते हैं? बालक के मानसिक स्वास्थ्य के विकास में बाधा डालने वाले तत्त्वों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य के अर्थ एवं परिभाषा के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 2 का उत्तर देखें। मानसिक अस्वस्थता के कारण
अथवा
मानसिक स्वास्थ्य में बाधक कारक मानसिक अस्वस्थता के कारण ही वास्तव में मानसिक स्वास्थ्य में बाधक कारक होते हैं। इस वर्ग के मुख्य कारकों का विवरण निम्नलिखित है

1. शारीरिक कारण :
कभी-कभी मानसिक अस्वस्थता के मूल में शारीरिक कारण निहित होते हैं। प्रायः क्षय, संग्रहणी, कैंसर आदि असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्तियों की शारीरिक शक्ति काफी घट जाती है, जिसकी वजह से उन्हें शीघ्र ही थकान का अनुभव होने लगता है। ऐसे व्यक्ति स्वभाव से चिड़चिड़े और दुःखी होते हैं, क्योंकि उनमें जीवन के प्रति निराशा छा जाती है।

2. वंशानुगत देन :
कुछ मनुष्य वंशानुक्रम से ऐसी विशेषताएं लेकर उत्पन्न होते हैं जिनकी वजह से वे सामान्य प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मानसिक विकारों से ग्रस्त हो जाते हैं। वंशानुक्रमणीय विशेषताओं के कारण ही मनोविकृति का रोग एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संक्रमित होता रहता है।

3. संवेगात्मक कारण :
मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि संवेग मानसिक रोगों के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। व्यक्ति की। विभिन्न मूल-प्रवृत्तियाँ किसी-न-किसी संवेग से सम्बन्धित हैं। इनमें से क्रोध, भय तथा कामवासना की प्रवृत्तियाँ और संवेग अत्यधिक प्रबल हैं, जिनके दमन से या केन्द्रीकरण से असन्तुलन पैदा होता है। वस्तुतः मानसिक स्वस्थ्य की समस्या मूल-प्रवृत्ति संवेग (Instinct emotion) की समस्या है। जब व्यक्ति में कोई प्रवृत्ति जाग्रत होती है। तो उससे सम्बन्धित संवेग भी जाग जाता है

उदाहरणार्थ :
आत्म-स्थापन के साथ गर्व का, पलायन के साथ भय का तथा कामवृत्ति के साथ वासना का संवेग जाग्रत होता है। जाग्रत संवेग की असन्तुष्टि ही मानसिक रोग को जन्म देती है।

4. पारिवारिक कारण :
कुछ घरों में माता या पिता अथवा दोनों के अभाव से अथवा विमाता या विपिता के होने से बच्चे को पूरा पालन-पोषण, सुरक्षापूर्ण बरताव या स्नेह नहीं मिलता। ऐसे बच्चों की आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो पातीं और वे अभावग्रस्त बने रहते हैं। कहीं-कहीं माता-पिता के लड़ाई-झगड़े के कारण कलह का वातावरणं रहता है, जिसकी वजह से बालक को मानसिक घुटन अनुभव होती है और वह घर से दूर भागता है। इस प्रकार ‘भग्न परिवार (Broken House) मानसिक अस्वस्थता का मुख्य कारण बनता है।

5. विद्यालयी कारण :
बालकों का मानसिक स्वास्थ्य खराब रहने का एक प्रमुख कारण विद्यालय भी हैं। जिन विद्यालयों में बच्चों पर कठोरतम अनुशासन थोपा जाता है, बच्चों को अकारण डाँट-फटकार या कठोर दण्ड सहने पड़ते हैं, अध्यापकों का स्नेह नहीं मिल पाता, पाठ्य विषय अनुपयुक्त होते हैं तथा बालकों को अमनोवैज्ञानिक विधियों से पढ़ाया जाता है, अध्यापक यो प्रबन्धक बच्चों को अपनी स्वार्थसिद्धि में भड़काकर आपस में या अध्यापकों से लड़ा देते हैं। ऐसे विद्यालयों में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और उनका मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है।

6. सामाजिक कारण :
कभी-कभी कुछ समाज-विरोधी तत्त्व व्यक्ति के मन पर भारी आघात पहुँचाकर उसे मानसिक दृष्टि से असन्तुलित कर देते हैं। यदि व्यक्ति के कार्यों व विचारों का व्यर्थ ही विरोध किया जाए तो उसके मित्रों, पड़ोसियों तथा अन्य लोगों द्वारा उसे समाज में उचित मान्यता, स्थान या प्रतिष्ठान प्राप्त हो, तो उसमें प्रायः हीनता की ग्रन्थियाँ पड़ जाती हैं। उसका व्यक्तित्व कुण्ठा और तनाव का शिकार हो जाता है। आत्म-स्थापन की प्रवृत्ति के सन्तुष्ट न होने की वजह से भी व्यक्ति दुःखीं और खिन्न हो जाते हैं।

7. जीवन की विषम परिस्थितियाँ :
हूर एक व्यक्ति को अपने जीवन में कभी-न-कभी विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। ये परिस्थितियाँ निराशा और असफलताओं के कारण जन्म ले सकती हैं। आर्थिक संकट, व्यवसाय या परीक्षा या प्रेम में असफलता तथा सामजिक स्थिति के प्रति असन्तोष—इनसे सम्बन्धित प्रतिकूल एवं विषम परिस्थितियाँ मानव मन पर बुरा असर छोड़ती हैं। विषम परिस्थितियों के कारण समायोजन के दोष उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे मानसिक अस्वस्थता सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते हैं।

8. आर्थिक कारण :
“आर्थिक तंगी के कारण व्यक्ति की आवश्यकताएँ तथा इच्छाएँ अतृप्त रह जाती हैं और उसे अपनी इच्छाओं का दमन करना पड़ता है। दमित इच्छाएँ नाना प्रकार के अपराध तथा समाज-विरोधी व्यवहार को जन्म देती हैं। धन की कमी से बाध्य होकर व्यक्ति को अधिक एवं अतिरिक्त परिश्रम करना पड़ता है, जिससे उसका मन दु:खी रहता है। दुःखी मन मानसिक विकारों को पैदा करते हैं। अत्यधिक धन के कारण भी जुआ, शराब तथा वेश्यागमन की लत पड़ जाती है, जिससे मानसिक असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है।

9. भौगोलिक कारण :
भौगोलिक कारण अप्रत्यक्ष रूप से मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालते हैं। अधिक गर्मी या सर्दी के कारण लोगों का समायोजन बिगड़ जाता है, शारीरिक दशा गिरने लगती है, उनके स्वभाव में चिड़चिड़ापन या तनाव पैदा होता है, जिससे मानसिक असन्तुलन उत्पन्न होता है।

10. सांस्कृतिक कारण :
यदा-कदा सांस्कृतिक परम्पराएँ व्यक्ति की भावनाओं तथा इच्छाओं की पूर्ति के मार्ग में बाधक बनती हैं। प्रायः व्यक्ति को अपनी प्रवृत्तियों का दमन कर कुछ कार्य विवशतावश करने पड़ते हैं, जिससे मानसिक असन्तोष तथा कुण्ठा उत्पन्न होती है। एक संस्कृति में जन्मा तथा पलता। हुआ व्यक्ति जब किसी दूसरी संस्कृति में कदम रखता है तो उसे मानसिक संघर्ष का सामना करना पड़ता है, जिससे असमायोजन के दोष उत्पन्न होते हैं। अतः सांस्कृतिक कारणों से भी मनोविकार उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 4
मानसिके अस्वस्थता की रोकथाम के उपायों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता की रोकथाम
यदि तटस्थ भाव से देखा जाए तो हम कह सकते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य शारीरिक स्वास्थ्य से अधिक महत्त्वपूर्ण है। अतः बलिक के मानसिक स्वास्थ्य को उत्तम बनाये रखने के सभी सम्भव उपाय किये जाने चाहिए। मानसिक अस्वस्थता से बचाव तथा मानसिक स्वास्थ्य बढ़ाने की दृष्टि से परिवार और पाठशाला की विशेष भूमिका है। इनका उल्लेख बारी-बारी से निम्न प्रकार किया गया है

(अ) परिवार और मानसिक स्वास्थ्य 
परिवार के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा और वृद्धि सर्वोत्तम ढंग से की जा सकती है। इसे निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत अंकित किया गया।

1. प्रारम्भिक विकास और सुरक्षा :
मानव जीवन के प्रारम्भिक 5-6 वर्षों में बालक का सर्वाधिक विकास हो जाता है। यह बालक की कलिकावस्था है, जिसे उचित सुरक्षा प्राप्त होनी चाहिए। परिवार का इसमें विशेष दायित्व है, उसे शिशु की देख-रेख तथा रोगों से रक्षा करनी चाहिए। शिशु को सन्तुलित आहार दिया जाना चाहिए तथा उसकी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जानी चाहिए। कुपोषण और असुरक्षा की भावना से बालक के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

2. माता-पिता का स्नेह :
बालक के मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए उसे माता-पिता का प्रेम, स्नेह तथा लगाव मिलना चाहिए। प्रायः देखा गया है कि जिन बच्चों को माता-पिता का भरपूर स्नेह नहीं मिलता, वे स्वयं को अकेला महसूस करते हैं तथा असुरक्षा की भावना से भय खाकर मानसिक ग्रन्थियों के शिकार हो जाते हैं। ये ग्रन्थियाँ स्थायी हो जाती हैं और उसे जीवन-पर्यन्त असन्तुलित रखती हैं।

3. परिवार के सदस्यों का व्यवहार :
परिवार के सदस्यों, खासतौर से माता-पिता का व्यवहार, सभी बालकों के साथ एकसमान होना चाहिए। उनके बीच पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाना अनुचित है। उनकी असफलताओं के लिए भी बार-बार दोषारोपण नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे उनका मानसिक सन्तुलन बिगड़ता है और वे कुसमायोजन के शिकार हो जाते हैं।

4. उत्तम वातावरण :
परिवार का उत्तम एवं मधुर वातावरण बालक के मानसिक स्वास्थ्य में वृद्धि करता है। परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्यार, सहयोग की भावना, सम्मान की भावना व प्रतिष्ठा, एकमत्य, माता-पिता के मधुर सम्बन्ध तथा परिवार को स्वतन्त्र वातावरण मानसिक स्वास्थ्य को अच्छा रखने में योग देते हैं। इसके अलावा बालक की भावनाओं व विचारों को उचित आदर, मान्यता व स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए।

5. संवेगात्मक विकास :
बालक को संवेगात्मक विकास भी ठीक ढंग से होना चाहिए। परिवार में यथोचित सुरक्षा, स्वतन्त्रता, स्वीकृति, मान्यता तथा स्नेह रहने से संवेगात्मक विकास स्वस्थ रूप से होता है तथा नये विश्वासों और आशाओं का जन्म होता है। बालक के स्वस्थ सांवेगिक विकास के लिए परिवार में पाँच मुख्य बातों का होना आवश्यक बताया गया है—आनन्द, खिलौने, खेल, पशु-पक्षी और उदाहरण (Joy, Tby, Play, Pet and Example) अधिक नियन्त्रण से भी संवेग विकसित नहीं हो पाते।

6. खेलकूदं और घूमना :
मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के साथ गहरा सम्बन्ध है। परिवार को चाहिए कि बालकों के लिए खेलकूद का पर्याप्त प्रबन्ध किया जाए। उन्हें दर्शनीय स्थल दिखाने, पिकनिक सर ले जाने, ऐतिहासिक स्थलों पर घुमाने तथा भाँति-भाँति की वस्तुओं का निरीक्षण कराने का प्रयास भी किया जाना चाहिए।

7. अनुशासन और अनुकरण :
बालक अधिकांश बातें अनुकरण के माध्यम से सीखते हैं। अनुकरण आदर्श वस्तु या विचार का होता है। अत: माता-पिता का जीवन अनुशासित एवं आदर्श जीवन होना चाहिए। परिवार से आत्मानुशासन की शिक्षा प्रदान की जाए।

(ब) पाठशाला और मानसिक स्वास्थ्य 
बालक की दिनचर्या का अधिक समय परिवार में ही व्यतीत होता है। परिवार के बाद पाठशाला या विद्यालय की बारी है। बालक का मानसिक स्वास्थ्य बनाये रखने, मानसिक अस्वस्थता रोकने तथा मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन के लिए पाठशाला महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। इसका निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत अध्ययन किया जा सकता है

1. पाठशाला का वातावरण :
पाठशाला को सम्पूर्ण वातावरण शान्ति, सहयोग और प्रेम पर आधारित होना चाहिए। अध्यापक का विद्यार्थी के प्रति प्रेम एवं सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार, विद्यार्थी के मन में अध्यापक के प्रति रुचि और आदर उत्पन्न करता है। इससे बालक स्वतन्त्रता का अनुभव करते हैं जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य ठीक बना रहता है। विद्यार्थियों के प्रति अध्यापक का भेदभावपूर्ण बरताव बालकों के मन में अनादर और खीझ को जन्म देता है, जिसके परिणामस्वरूप अध्यापक के निर्देशों की अवहेलना हो जाती है और परस्पर कुसमायोजन पैदा हो सकता है। इसके अतिरिक्त, पाठशाला में किसी प्रकार की राजनीति, गुटबाजी व साम्प्रदायिक भेदभाव नहीं रहना चाहिए। इनसे मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

2. श्रेष्ठ अनुशासन :
पाठशाला में अनुशासन को उद्देश्य बालकों में उत्तरदायित्व की भावना पैदा करना है न कि उनके मन और जीवन को पीड़ा देना। अनुशासन सम्बन्धी नियम कठोर ने हों, उनसे बालकों में विरोध की भावना उत्पन्न न हो तथा उनका पालन सुगमता से कराया जा सके। बालकों को आत्मानुशासन के महत्त्व से परिचित कराया जाए, उन्हें अनुशासन समिति में स्थान देकर कार्य सौंपे जाएँ ताकि उनमें उत्तरदायित्व की भावना का विकास हो सके। इससे बालक का व्यक्तित्व विकसित व समायोजित होता है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य में योगदान मिलता है।

3. सन्तुलित पाठ्यक्रम :
बालकों के ज्ञान में अपेक्षित वृद्धि तथा उनके बौद्धिक उन्नयन के लिए पाठ्यक्रम का सन्तुलित होना आवश्यक है। पाठ्यक्रम लचीला और बच्चों की रुचि के अनुरूप होजा चाहिए। रुचिजन्य अध्ययन से विद्यार्थियों को मानसिक थकान नहीं होती और उनका मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहता है। इसके विपरीत असन्तुलित पाठ्यक्रम के बोझ से बालक मानसिक थकान महसूस करते हैं, अध्ययन में कम रुचि लेते हैं तथा पढ़ने-लिखने से जी चुराते हैं। अतः सन्तुलित पाठ्यक्रम मानसिक सन्तुलन एवं स्वास्थ्य में सहायक है।

4. पाठ्य सहगामी क्रियाएँ :
पाठशाला में समय-समय पर पाठ्य सहगामी गतिविधियाँ आयोजित की जानी चाहिए। इनसे बालक के व्यक्तित्व का विकास होता है तथा उसकी रुचियों का उचित अभिप्रकाशन होता है। खेलकूद और मनोरंजन द्वारा मस्तिष्क में दमित भावनाओं को मार्ग मिलता है तथा मानसिक स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

5. उपयुक्त शिक्षण विधियाँ :
पाठशाला में अध्यापक को चाहिए कि वह विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए उपयुक्त शिक्षण विधियों का प्रयोग करे। नीरस शिक्षण से बालकों में अरुचि तथा थकान पैदा होती है, जिससे उनमें कक्षा से पलायन की प्रवृत्ति उभरती है तथा अनुशासनहीनता के अंकुर विकसित होते हैं।

6. शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन :
विद्यार्थियों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को ध्यान में रखकर उनकी मानसिक योग्यता तथा रुचि के अनुसार ही विषय दिये जाने चाहिए। इसके लिए कुशल मनोवैज्ञानिक द्वारा शैक्षिक निर्देशन की व्यवस्था की जानी चाहिए। इसके अलावा उनके भावी जीवन को ध्यान में रखकर उन्हें उचित व्यवसाय चुनने हेतु भी परामर्श व दिशा-निर्देशन दिये जाएँ। व्यक्तिगत निर्देशन की सहायता से उनकी व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाया जा सकता है, जिससे मानसिक ग्रन्थियाँ समाप्त हो जाती हैं तथा मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहता है। इस प्रकार परिवार और पाठशाला अपने उत्तरदायित्वों का समुचित निर्वाह करके बालक की मानसिक उलझनों व तनावों को समाप्त या कम कर सकते हैं। इससे मानसिक अस्वस्थता की रोकथाम सम्भव है। तथा मानसिक स्वास्थ्य का उचित संवर्धन सम्भव होता है।

प्रश्न 5
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के महत्त्व एवं उपयोगिता का भी उल्लेख कीजिए।
या
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के अर्थ और महत्त्व को ध्यान में रखते हुए इसके विषय में अपने विचार व्यक्त कीजिए। [2008]
या
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान से आप क्या समझते हैं? इसके महत्त्व पर प्रकाश डालिए। [2010]
या
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इसके कार्यों का वर्णन कीजिए। [2007, 13, 15]
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का अर्थ व परिभाषा
सामान्य रूप से शारीरिक स्वास्थ्य तथा शारीरिक स्वास्थ्य विज्ञान या चिकित्साशास्त्र की बात की। जाती है, परन्तु आधुनिक युग में मानसिक स्वास्थ्य तथा मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान को भी समान रूप से आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान को जन्म देने का श्रेय सी० डब्ल्यू० बीयर्स (C. W. Bears) को प्राप्त है। सन् 1908 में उन्होंने एक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें मानसिक रोगों से ग्रस्त बस्तियों की दशा सुधारने के विषय में अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया था।

इसी वर्ष ‘मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान समिति (Association of Mental Hygiene) की स्थापना हुई। कुछ समय बाद इसी सम्बन्ध में एक राष्ट्रीय परिषद् स्थापित की गयी। धीरे-धीरे सम्पूर्ण यूरोप में मानसिक स्वास्थ्य का प्रचार हो गया। सन् 1930 में मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान सम्बन्धी प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन वाशिंगटन (अमेरिका) में हुआ। कालान्तर में विश्व के सभी प्रगतिशील देशों में मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का प्रचार व प्रसार होने लगा। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का शाब्दिक अर्थ है, मन के रोगों का निदान करने वाला विज्ञान, अर्थात् वह विज्ञान जो मस्तिष्क को स्वस्थ रखने में सहायता देता है।

शारीरिक स्वास्थ्य विज्ञान का सम्बन्ध हमारे शारीरिक स्वास्थ्य से है, तो मानसिक वास्थ्य विज्ञान को सम्बन्ध मस्तिष्क से। इस प्रकार मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान वह विज्ञान है, जो मानसिक स्वास्थ्य को बनाये रखने तथा मानसिक रोगों का निदान और नियन्त्रण करने के उपाय बताता है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि “मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान वह विज्ञान है, जो व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करता है, उसे मानसिक रोगों से मुक्त रखता है तथा यदि व्यक्ति मानसिक रोग या समायोजन के दोषों से ग्रस्त हो जाता है, तो उसके कारणों का निदान करके समुचित उपचार की व्यवस्था का प्रयास करता है।”

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

  1. ड्रेवर के अनुसार, “मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का अर्थ है–मानसिक स्वास्थ्य के नियमों का अनुसन्धान करना और उनकी सुरक्षा के उपाय करना।”
  2. क्रो एवं क्रो के अनुसार, “मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान वह विज्ञान है, जो मानव कल्याण से सम्बन्धित है और मानव सम्बन्धों के समस्त क्षेत्रों को प्रभावित करता है।”
  3. रोजानक के अनुसार, “मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान व्यक्ति की मानसिक कठिनाइयों को दूर करने में सहायता देता है तथा कठिनाइयों के समाधान के लिए साधन प्रस्तुत करता है।”
  4. हैडफील्ड के अनुसार, “मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का अर्थ है-मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा और मानसिक रोगों की रोकथाम।”
  5. भाटिया के अनुसार, “मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान मानसिक रोगों से बचने और मानसिक स्वास्थ्य को कायम रखने का विज्ञान तथा कला है। यह कुसमायोजनाओं के सुधारों से सम्बन्धित है। इस कार्य में यह आवश्यक खेप से कारणों के निर्धारण का कार्य भी करता है।

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का महत्त्व या उपयोगिता या कार्य
मानसिक स्वास्थ्य एक लक्ष्य है जिसकी पूर्ति के लिए मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की सहायता लेनी पड़ती है। यह विज्ञानं मानसिक रोगियों की समस्याओं का समाधान तथा उनका उपचार करने की दिशा में एक वैज्ञानिक प्रयास है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का आधुनिक दृष्टिकोण सहानुभूति, सहृदयतापूर्ण और सुधारवादी है। पेरिस (फ्रांस) के प्रसिद्ध कारागार चिकित्सक फिलिप पिने (Phillipe Pinel) ने सर्वप्रथम इन रोगियों को सुधारने के लिए सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार तथा नैतिक उपचार का मार्ग सुझाया। उसने मानसिक रोगियों की जंजीरें खुलवा दीं और उन्हें घूमने-फिरने की स्वतन्त्रता प्रदान की। इसके परिणामस्वरूप बहुत-से रोगी अधिक सहयोगी व आज्ञाकारी बन गये और दूसरों के बेहतर उपचार का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसका समस्त श्रेय मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की विचारधारा को ही जाता है। वर्तमान समय में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का। महत्त्व निम्नलिखित है।

1. सन्तुलित व्यक्तित्व का विकास :
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान हमारे व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों-सामाजिक, शारीरिक, मानसिक तथा सांवेगिक आदि–को सन्तुलित रूप से विकसित होने के स्वस्थ सामाजिक जीवन का अवसर प्रदान करता है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की मदद से मानसिक संघर्ष कम होता है तथा भावना ग्रन्थियाँ नहीं पनपने पातीं।

2. सुसमायोजित जीवन :
मनुष्य का सन्तुलित व्यक्तित्व उसे सन्तुलित जीवन जीने में मदद देता है। इससे व्यक्ति को सम-विषम परिस्थितियों को अनुकूलन स्थापित करने में सहायता मिलती है। सन्तुलित जीवन के अवसर मिलने का अर्थ है–सुखी और सुसमायोजित जीवन-यापन का सौभाग्य प्राप्त होना।

3. स्वस्थ सामाजिक जीवन :
व्यक्ति समाज की इकाई है। सामागको एक और व्यक्तियों के समूह से समाज बनता है। समाज के सभी व्यक्तियों का सन्तुलित व्यक्तित्व तथा समायोजित जीवन सामाजिक जन को सौम्य एवं स्वस्थ बनाता है। ऐसे सन्तुलित समाज में सामाजिक विषमता और संघर्ष नहीं होंगे। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान, सामाजिक जीवन को स्वस्थ और सुन्दर बनाता है।

4. स्वस्थ पारिवारिक वातावरण :
स्वस्थ व्यक्तित्व के निर्माण से पारिवारिक सन्तुलन सुसमायोजन, शान्ति-व्यवस्था और सुख में वृद्धि होती है। परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम और सौहार्दपूर्ण व्यवहार से हर प्रकार के आनन्द तथा स्वस्थ वातावरण का सृजन होता है।

5. शिशुओं का समुचित पालन :
पोषण-मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के माध्यम से शिशुओं के माता-पिता एवं परिवारजन भली प्रकार यह समझ सकते हैं कि नवजात शिशुओं की देखभाल किस प्रकार की जाए। इससे शिशुओं की उचित सेवा-सुश्रूषा हो सकेगी तथा उनका विकास भी सुचारु रूप से हो सकेगा। यह पारिवारिक सन्तुलन की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है।

6. शैक्षिक प्रगति :
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के नियम और सिद्धान्त बालकों के स्वस्थ संवेगात्मक विकास में सहायक होते हैं। भावना ग्रन्थियों तथा मानसिक संघर्ष से मुक्त रहकर वे पास-पड़ोस तथा विद्यालय में समायोजन स्थापित कर सकते हैं। शिक्षा के मार्ग में बाधक मानसिक रोग ग्रन्थियाँ हटने से शैक्षिक प्रगति सम्भव होती है।

7. उपचारात्मक महत्त्व :
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान मात्र स्वस्थ रहने और समायोजित जीवन व्यतीत करने सम्बन्धी नियम और सिद्धान्त ही निर्धारित नहीं करता, अपितु उपचार लेकर मानव-समाज की सेवा में उपस्थित होता है। रोकथाम और बचाव के साधन प्रयोग में लाने पर भी यदि कोई व्यक्ति मानसिक रोगों से ग्रस्त हो जाता है तो मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान उसके प्रारम्भिक उपचार की व्यवस्था करता है।

8. व्यावसायिक सफलता :
व्यावसायिक सफलता के लिए व्यक्ति का जीवन सन्तुलित एवं समायोजित होना चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान सन्तुलित व्यक्तित्व का सृजन करके व्यक्ति की व्यावसायिक क्षमता में वृद्धि करता है।

9. राष्ट्रीयता की भावना एवं सांवेगिक एकता :
विषमता और विघटनकारी प्रवृत्तियों के प्रभाव से वर्तमान परिस्थितियों में हमारा राष्ट्र सम्प्रदायवाद, भाषावाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद आदि दूषित विचारधाराओं से जूझ रहा है। इससे राष्ट्रीय एकता भंग होती है तथा देश की शक्ति कमजोर पड़ती जाती है। इससे बचाव के लिए देश के नागरिकों में संवेगात्मक एकता का संचार करना होगा। यह कार्य मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की सक्रियता के अभाव में नहीं हो सकता।

10. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सहयोग :
अन्तर्राष्ट्रीय (या विश्व शान्ति के लिए आवश्यक है कि दुनिया के सभी देशों के नेतागण, चिन्तक, विचारक, समाज-सुधारक तथा नागरिक सन्तुलित और समायोजित व्यक्तित्व वाले हों। यदि देश के कर्णधारों का मानसिक स्वास्थ्य खराब होगा तो विभिन्न देशों के बीच तनाव और संघर्ष निश्चित रूप से होगा। प्रायः एक ही व्यक्ति का असन्तुलित मस्तिष्क समूची मानव-संस्कृति को युद्ध एवं विनाश की अग्नि में झोंक देगा। उस असन्तुलिते मस्तिष्क के उपचार का दायित्व मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान पर है। इससे विश्व-स्तर पर उत्पन्न तनाव और संघर्ष समाप्त होगा और विरोधी विचारधारा वाले देश निकट आकर मित्रता में बँध जाएँगे।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
मानसिक स्वास्थ्य का क्या अर्थ है? इसका महत्त्व लिखिए। [2007, 08, 11, 12, 14]
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य से आशय ‘मानव को अपने व्यवहार में सन्तुलन से है। यह सन्तुलन प्रत्येक अवस्था में बना रहना चाहिए। इस प्रकार मानसिक स्वास्थ्य व्यक्ति की एक दशा एवं लक्षण है। किसी भी व्यक्ति के स्वस्थ एवं सफल जीवन के लिए उसके मन का स्वस्थ होना अतिआवश्यक है, क्योंकि मन द्वारा ही शरीर की समस्त क्रियाओं को संचालन किया जाता है। मन ही हमारे शरीर की बाह्य एवं आन्तरिक क्रियाओं को संचालित एवं नियन्त्रित करता है। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति ही परिवार, कार्यस्थल तथा अपने आस-पास के वातावरण से समायोजन स्थापित कर सुखी रहता है।

मानसिक स्वास्थ्य का महत्त्व
सामान्य रूप से माना जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक रूप से स्वस्थ होना चाहिए, परन्तु यह मान्यता केवल आंशिक रूप से सत्य है। वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण रूप से स्वस्थ होना चाहिए। सम्पूर्ण स्वास्थ्य का प्रत्येक व्यक्ति के लिए विशेष महत्त्व है। हम उस व्यक्ति को पूर्ण रूप से स्वस्थ कह सकते हैं जो शारीरिक, मानसिक तथा संवेगात्मक रूप से स्वस्थ होता है। वास्तव में शारीरिक स्वास्थ्य भी बहुत अधिक हद तक मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर करता है तथा उससे प्रभावित होता है।

यदि व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य ठीक न हो, तो वह शारीरिक रूप से भी स्वस्थ नहीं रह पाता। इसके अतिरिक्त जीवन में प्रगति करने तथा समुचित आनन्द प्राप्त करने के लिए भी व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य ठीक होना आवश्यक है। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति ही भौतिक, दैहिक तथा आत्मिक रूप से सन्तुष्ट हो सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य ठीक होना। आवश्यक है। शैक्षिक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य अति आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है। वास्तव में मानसिक स्वास्थ्य तथा सीखने में सफलता के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।

वास्तव में सीखने की प्रक्रिया को सुचारू रूप से सम्पन्न करने के लिए शिक्षार्थी तथा शिक्षक दोनों का मानसिक रूप से स्वस्थ होना अति आवश्यक है। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति को दृष्टिकोण सामान्य तथा सकारात्मक होता है। वह सभी कार्यों को पूर्ण उत्साह एवं लगन से सीखने को तत्पर रहता है। ऐसी परिस्थितियों में नि:सन्देह सीखने की प्रक्रिया तीव्र तथा सुचारू होती है। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अपनी त्रुटियों के प्रति जागरूक होता है तथा उन्हें सुधारने का भी प्रयास करता है। इससे उसकी सीखने की प्रक्रिया अच्छे ढंग से चलती है। इन समस्त तथ्यों को ही ध्यान में रखते हुए क्रेन्डसन ने कहा है, “मानसिक स्वास्थ्य । और सीखने में सफलता का बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है।”

उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति भी समान रूप से जागरूक रहना चाहिए तथा मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए हर सम्भव उपाय एवं प्रयास करना चाहिए। वास्तव में कोई भी व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की मौलिक मान्यताओं एवं नियमों तथा निर्देशों का पालन करके अपना मानसिक सन्तुलन बनाये रख सकता है तथा मानसिक रूप से स्वस्थ रह सकता है। यह भी कहा जा सकता है कि नियमित जीवन, समुचित व्यायाम तथा योगाभ्यास एवं जीवन के प्रति सर्वांगीण दृष्टिकोण अपनाकर व्यक्ति अपना मानसिक सन्तुलन बनाये रख सकता है तथा मानसिक रूप से स्वस्थ रह सकता है।

प्रश्न 2
मानसिक अस्वस्थता के क्या कारण हैं?
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता उत्पन्न करने में विभिन्न कारकों का योगदान हो सकता है, जिनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है।

1. मानसिक दुर्बलता :
ऐसे व्यक्ति जो मानसिक रूप से दुर्बल होते हैं, उनमें पर्याप्त ज्ञानात्मक योग्यता का अभाव पाया जाता है, ये व्यक्ति अक्सर मानसिक रोगों का शिकार हो जाते हैं।

2. संवेगात्मक असन्तुलन :
संवेगात्मक असन्तुलन की स्थिति में व्यक्ति क्षुब्ध हो जाता है। यदि यह अवस्था निरन्तर बनी रहती है, तो व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ हो जाता है।

3. मानसिक संघर्ष :
स्थायी मानसिक संघर्ष अनेक बारे भयंकर रूप धारण कर लेते हैं तथा इनके कारण व्यक्ति असामान्य तथा गम्भीर मानसिक रोगी बन जाता है।

4. अत्यधिक थकान एवं काम का बोझ :
काम के अधिक बोझ एवं परिश्रम से व्यक्ति थक जाता है। निरन्तर बनी रहने वाली थकान मानसिक अस्वस्थता उत्पन्न करती है।

5. हीन भावना :
व्यक्ति में विभिन्न कारणों से उत्पन्न हीन भावनाएँ जब एक ग्रन्थि का रूप धारण कर लेती हैं, तो ये ग्रन्थियाँ अनेक मानसिक विकारों को उत्पन्न करती हैं।

6. यौन-हताशाएँ :
यौन इच्छा की तृप्ति न हो पाने पर व्यक्ति प्राय: हताश हो जाते हैं। यह हताशा व्यक्ति को असामान्य बना देती है तथा व्यक्ति मानसिक रोगी, बन जाता है।

7. भावनाओं का दमन :
भावनाओं का दमन भी मानसिक अस्वस्थता का एक प्रमुख कारण है। प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर विभिन्न प्रकार की भावनाएँ होती हैं, अनेक बार हर प्रकार की भावना को प्रदर्शित कर पाना सम्भव नहीं होता। दमित भावनाएँ अन्दर-ही-अन्दर सक्रिय रहती हैं, तथा भयंकर मानसिक अस्वस्थता का कारण बनती हैं।

प्रश्न 3
मानसिक अस्वस्थता के निदान के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता के निदान के अन्तर्गत मानसिक अस्वस्थता के कारणों का पता लगाने के लिए रोगी के व्यक्तित्व सम्बन्धी कुछ महत्त्वपूर्ण सूचनाओं का प्राप्त करना आवश्यक है। ये सूचनाएँ इन बिन्दुओं से सम्बन्धित होती हैं।

  1. शारीरिक दशा
  2. पारिवारिक दशा
  3. शैक्षणिक दशा
  4. सामाजिक दशा
  5. आर्थिक दशा
  6. व्यावसायिक दशा
  7. व्यक्तित्व सम्बन्धी लक्षण तथा
  8. मानसिक तत्त्व।

इन सूचनाओं को निम्नलिखित विधियों की सहायता से उपलब्ध कराया जाता है

  1. प्रश्नावली
  2. साक्षात्कार
  3. निरीक्षण
  4. जीवनवृत्त
  5. व्यक्तित्व परिसूची
  6. डॉक्टरी जाँच
  7. विभिन्न मनोवैज्ञानिक (बुद्धि, रुचि, अभिरुचि तथा मानसिक योग्यता सम्बन्धी) परीक्षण
  8. विद्यालय का संचित आलेख
  9. प्रक्षेपण विधियाँ तथा
  10. प्रयोगात्मक एवं अन्वेषणात्मक विधियाँ।

प्रश्न 4
साधारण मानसिक अस्वस्थता के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली सामान्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
सार्धारण मानसिक अस्वस्थता के उपचार में आवश्यकतानुसार निम्नलिखित विधियों का प्रयोग किया जाता है

1. सुझाव :
मानसिक रोगी को सीधे-सीधे सुझाव देकर समझाया जाए कि उसे अपनी अस्वस्थता के विषय में क्या सोचना व करना है। उसके भ्रम व भ्रान्तियों का भी निवारण किया जाए।

2. उन्नयन :
इस विधि में यह जाँच की जाती है कि मानसिक रोग का किस प्रवृत्ति या संवेग से सम्बन्ध है। फिर उसी प्रवृत्ति/संवेग का स्तर उन्नत करके उसे किसी उच्च लक्ष्य के साथ जोड़ दिया जाता

3. निद्रा :
अचानक आघात या दुर्घटना के कारण यदि कोई व्यक्ति अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठा है तो रोगी को ओषधि देकर कई दिनों तक निद्रा में रखा जाता है। शरीर की ताकत को बनाये रखने की दृष्टि से ताकत के इंजेक्शन दिये जाते हैं।

4. विश्राम :
अधिक कार्यभार, थकावट, तनाव तथा मानसिक उलझनों और कुपोषण के कारणं अक्सर मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। ऐसे रोगियों को शान्त वातावरण में विश्राम करने हेतु रखा जाता है और उन्हें पौष्टिक भोजनं खिलाया जाता है।

5. पुनर्शिक्षण :
इसके अन्तर्गत मानसिक रोगी में व्यावहारिक शिक्षा, संसूचन तथा उपदेश के माध्यम से आत्मविश्वास व आत्म-नियन्त्रण पैदा किया जाता है। इसके लिए अन्य व्यक्ति, समूह या दैवी-शक्तियों में विश्वास के लिए भी उसे प्रेरित किया जा सकता है। इस विधि की सफलता रोगी द्वारा दिये गये सहयोग पर निर्भर करती है। कमजोर तथा कोमल भावनाओं वाले व्यक्तियों की इस विधि से चिकित्सा की जा सकती है।

6. ग्रन्थ विधि :
पढ़े-लिखे विभिन्न प्रकार के मानसिक रोगियों के लिए ऐसे विशिष्ट ग्रन्थों की रचना की गयी है जिनके पढ़ने से मानसिक तनावे व असन्तुलन घटता है। रोग के अनुसार सम्बन्धित ग्रन्थ पढ़ने के लिए दिया जाता है और इसके पश्चात् उचित निर्देशन प्रदान कर रोग का पूर्व उपचार कर दिया जाता है।

प्रश्न 5
गम्भीर मानसिक अस्वस्थता के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
गम्भीर मानसिक अस्वस्थता का उपचार साधारण विधियों के माध्यम से सम्भव नहीं है। इसके लिए रोगी को दीर्घकाल तक मानसिक रोग चिकित्सालय में किसी अनुभवी चिकित्सक की देख-रेख में रहना पड़ सकता है। इसके लिए अग्रलिखित विधियाँ प्रयुक्त होती हैं

1. आघात विधि :
पहले कार्बन डाइऑक्साइड तथा ऑक्सीजन के मिश्रण को सुंघाकर रोगी के मस्तिष्क को आघात (Shock) दिया जाता था, जिससे क्षणिक लाभ होता था। इसके बाद अधिक मात्रा में इन्सुलिन या कपूर या मेट्राजॉल के द्वारा आघात दिया जाने लगा। रोगी को 15 से 60 तक आघात पहुँचाये जाते हैं। आजकल रोगी के मस्तिष्क पर बिजली के हल्के आघात देकर मानसिक रोग ठीक किये जाते हैं।

2. रासायनिक विधि :
रासायनिक विधि (Chemo Therapy) में कुछ विशेष प्रकार की ओषधियों या रसायनों का प्रयोग करके रोगी की चिन्ता तथा बेचैनी कम की जाती है। भारत में आजकल सर्पगन्धा (Rauwolfia) नामक ओषधि काफी प्रचलित व लाभदायक सिद्ध हुई है।

3. मनोशल्य चिकित्सा :
मनोशल्य चिकित्सा (Psycho-Surgery) के अन्तर्गत मस्तिष्क का ऑपरेशन करके थैलेमस व फ्रण्टल लोब के सम्बन्ध का विच्छेद कर दिया जाता है। इससे मानसिक उन्माद और विकृतियाँ ठीक हो जाती हैं। यह देखा गया है कि ऑपरेशन के बाद दूसरी मानसिक असामान्यताएँ पैदा हो जाती हैं। यह विधि सुधारे की दृष्टि से उपयुक्त कही जा सकती है, किन्तु इससे पूर्ण उपचार नहीं हो सकता।

प्रश्न 6
“अध्यापक का मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं होगा तो वह अपने विद्यार्थियों के साथ न्याय नहीं कर सकता।” यदि आप इस कथन से सहमत हैं, तो क्यों ? मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर :
विद्यालय में अध्यापक की अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका तथा दायित्व होता है। घर में बच्चों के लिए जो स्थान माता-पिता का होता है, विद्यालय में वही स्थान शिक्षक या अध्यापक का होता है। अध्यापक का दायित्व है कि वह अपने विद्यार्थियों को शिक्षित करने के साथ-ही-साथ उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के उत्तम विकास में भी भरपूर योगदान प्रदान करे। इस स्थिति में यह अनिवार्य है कि अध्यापक अपने विषय में पारंगत होने के साथ-ही-साथ मानसिक रूप से भी स्वस्थ हो।

यदि अध्यापक मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं है तो उसका गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव उसके विद्यार्थियों के विकास एवं मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। विद्यार्थी अध्यापक का अनुकरण करते हैं, उससे प्रेरित होते हैं तथा प्रभावित होते हैं। ऐसे में मानसिक रूप से अस्वस्थ अध्यापक के सम्पर्क में आने वाले विद्यार्थी भी मानसिक रूप से अस्वस्थ हो सकते हैं। यही कारण है कि कहा जाता है कि “अध्यापक का मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं होगा तो वह अपने विद्यार्थियों के साथ न्याय नहीं कर सकता।”

प्रश्न 7.
अध्यापक के मानसिक स्वास्थ्य में बाधा डालने वाले कारकों का वर्णन कीजिए। [2010]
उत्तर :
शिक्षा की प्रक्रिया को सुचारु रूप से चलाने के लिए तथा छात्रों के सामान्य एवं उत्तम विकास के लिए अध्यापक का मानसिक स्वास्थ्य सामान्य होना अति आवश्यक है, परन्तु व्यवहार में देखा गया है कि अनेक अध्यापकों का मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं होता। वास्तव में विभिन्न कारक अध्यापकों के मानसिक स्वास्थ्य पर निरन्तर प्रतिकूल प्रभाव डालते रहते हैं। इस प्रकार के मुख्य कारक हैं

  1. वेतन का कम होना
  2. सेवाओं को सुरक्षित न होना
  3. समाज में समुचित प्रतिष्ठा न होना
  4. विद्यालय में आवश्यक शैक्षिक उपकरणों को उपलब्ध न होना
  5. कार्य-भार को अधिक होना
  6. विद्यालय का वातावरण अच्छा न होना
  7. प्रधानाचार्य और प्रबन्धकों से विवाद
  8. स्वस्थ मनोरंजन उपलब्ध न होना
  9. पारिवारिक प्रतिकूल परिस्थितियाँ तथा
  10. आवासीय समस्याएँ।

प्रश्न 8
‘मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान से आप क्या समझते हैं? विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने में अध्यापक (विद्यालय) की भूमिका की विवेचना कीजिए। [2011]
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान’ वह विज्ञान है, जो व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करता है, उसे मानसिक रोगों से मुक्त रखता है तथा यदि व्यक्ति मानसिक विकार, रोग अथवा समायोजन के दोषों से ग्रस्त हो जाता है तो उसके कारणों का निदान करके समुचित उपचार की व्यवस्था का प्रयास करता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान एक उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण विज्ञान है। इस विज्ञान द्वारा मुख्य रूप से तीन प्रकार के कार्य किये जाते हैं। ये कार्य निम्नलिखित हैं

  1. मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा
  2. मानसिक रोगों की रोकथाम तथा
  3. मानसिक रोगों का प्रारम्भिक उपचार।

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की एक सरल एवं स्पष्ट परिभाषा ड्रेवर ने इन शब्दों में प्रतिपादित की है, “मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का अर्थ है-मानसिक स्वास्थ्य के नियमों की खोज करना और उसको सुरक्षित रखने के उपाय करना।” बालकों के मानसिक स्वास्थ्य को ठीक बनाये रखने तथा आवश्यकता पड़ने पर उसमें सुधार करने में विद्यालय एवं शिक्षक द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जाती है। सर्वप्रथम विद्यालय का वातावरण उत्तम, सौहार्दपूर्ण तथा हर प्रकार की राजनीति, गुटबाजी तथा साम्प्रदायिक भेदभाव से मुक्त होना चाहिए। शिक्षकों का दायित्व है कि विद्यालय में श्रेष्ठ अनुशासन बनाये रखें।

उन्हें मूल पाठ्यक्रम के साथ-साथ पाठ्य-सहगामी क्रियाओं का भी आयोजन करना चाहिए। बालकों को मानसिक रूप से स्वस्थ बनाये रखने के लिए शिक्षकों को उपयुक्त शिक्षण विधियों को ही अपनाना चाहिए। इसके अतिरिक्त बालकों के लिए शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन की भी व्यवस्था होनी चाहिए। इससे बालकों की हर प्रकार की समस्याओं का समाधान होता रहेगा तथा वे मानसिक रूप से स्वस्थ रहेंगे।

प्रश्न 9
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान तथा मानसिक स्वास्थ्य में क्या अन्तर है? [2012, 15]
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान और मानसिक स्वास्थ्य दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। मानसिक स्वास्थ्य एक मानसिक दशा है, जब कि मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान उस मानसिक दिशा का अध्ययन करने वाला विज्ञान है। इन दोनों में अन्तर को इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

  1. मानसिक स्वास्थ्य सम्पूर्ण व्यक्तित्व की पूर्ण एवं सन्तुलित क्रियाशीलता को कहते हैं। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान व्यक्तित्व की इस क्रियाशीलता का अध्ययन करता है।
  2. मानसिक स्वास्थ्य व्यक्ति की एक विशिष्ट स्थिति को बताता है। यह स्थिति दो प्रकार की हो सकती है-

मानसिक स्वस्थता तथा मानसिक अस्वस्थता। इन स्थितियों का अध्ययन करने वाला विषय ही मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान कहलाता है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान मानसिक स्वास्थ्य के लक्षणों, मानसिक अस्वस्थता के लक्षणों, मानसिक रोग तथा उनके कारणों और मानसिक अस्वस्थता को दूर करने के उपायों का अध्ययन व विवेचन करता है। इस प्रकार मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान मानसिक स्वास्थ्य का अध्ययन करने वाला विज्ञान है। शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का एक विशिष्ट स्थान है, क्योंकि विद्यार्थी और शिक्षक के मानसिक स्वास्थ्य पर ही शिक्षण प्रक्रिया की गतिशीलता निर्भर करती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
मानसिक स्वास्थ्य के तीन पक्ष कौन-से हैं?
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य के तीन पक्ष निम्नलिखित हैं

  1. प्रत्येक व्यक्ति को उसकी मानसिक प्रवृत्तियों, क्षमताओं, शक्तियों तथा अर्जित क्षमताओं को प्रकट करने का अवसर मिलना चाहिए।
  2. व्यक्ति की क्षमताओं में पारस्परिक समायोजन होना चाहिए।
  3. व्यक्ति की समस्त प्रवृत्तियाँ एवं कार्य किसी उद्देश्य की ओर सक्रिय होने चाहिए।

प्रश्न 2
मानसिक स्वास्थ्य का ठीक होना क्यों आवश्यक है?
या
मानसिक स्वास्थ्य के उद्देश्यों का वर्णन कीजिए। [2007, 15]
उत्तर :
स्वास्थ्य का प्रत्येक व्यक्ति के लिए सर्वाधिक महत्त्व है। हम उसी व्यक्ति को पूर्ण रूप से स्वस्थ कह सकते हैं जो शारीरिक, मानसिक तथा संवेगात्मक रूप से स्वस्थ होता है। वास्तव में शारीरिक स्वास्थ्य भी बहुत अधिक हद तक मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर करता है तथा उससे प्रभावित होता है। यदि व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य ठीक न हो, तो वह शारीरिक रूप से भी स्वस्थ नहीं रह पाता। इसके अतिरिक्त जीवन में प्रगति करने तथा समुचित आनन्द प्राप्त करने के लिए भी व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य ठीक होना। आवश्यक है।

प्रश्न 3
मानसिक स्वास्थ्य और सीखने में सफलता का क्या सम्बन्ध है?
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य तथा सीखने में सफलता के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है। वास्तव में सीखने की प्रक्रिया को सुचारु रूप से सम्पन्न करने के लिए शिक्षार्थी तथा शिक्षक दोनों का मानसिक रूप से स्वस्थ होना अति आवश्यक है। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति का दृष्टिकोण सामान्य तथा सकारात्मक होता है। वह सभी कार्यों को पूर्ण उत्साह एवं लगन से सीखने को तत्पर रहता है। ऐसी परिस्थितियों में नि:संदेह सीखने की प्रक्रिया तीव्र तथा सुचारु होती है। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अपनी त्रुटियों के प्रति जागरूक होता है तथा उन्हें सुधारने का भी प्रयास करता है। इससे उसकी सीखने की प्रक्रिया अच्छे ढंग से चलती है। इन समस्त तथ्यों को ही ध्यान में रखते हुए क्रेन्डसन ने कहा है, “मानसिक स्वास्थ्य और सीखने में सफलता का बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है।”

प्रश्न 4
मानसिक रोगों के उपचार की व्यावसायिक चिकित्सा का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर :
खाली मस्तिष्क शैतान का घर है, किन्तु कार्य में रत व्यक्ति में कई विशिष्ट गुण उत्पन्न होते हैं; जैसे—सहयोग, प्रेम, सहनशीलता, धैर्य और मैत्री। इन गुणों से मानसिक उलझन और तनाव में कमी आती है। इसी सिद्धान्त को आधार बनाकर रोगियों को उनके पसन्द के कार्यों (जैसे—चित्रकारी, चटाई-कपड़ा-निवाड़, बुनना, टोकरी बनाना आदि) में लगा दिया जाता है, जिससे धीरे-धीरे उनका मानसिक सन्तुलन सुधर जाता है।

प्रश्न 5
मानसिक रोगों के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली सामूहिक चिकित्सा का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर :
मानसिक रोगों के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली सामूहिक चिकित्सा विधि में दस से लेकर तीस तक समलिंगी रोगियों की एक साथ चिकित्सा की जाती है। चिकित्सक समूह के सभी रोगियों को इस प्रकार प्रेरित करता है कि वे एक-दूसरे से अपनी समस्याएँ कहें तथा दूसरों की समस्याएँ खुद सुनें। एक-दूसरे को समस्या कहने-सुनने से पारस्परिक सहानुभूति उत्पन्न होती है। रोगी जब अपने जैसे अन्य पीड़ित व्यक्तियों को अपने साथ पाता है तो उसे सन्तोष अनुभव होता है। धीरे-धीरे चिकित्सक के दिशा-निर्देशन में सभी रोगी मिलकर समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करते हैं और मानसिक सन्तुलन की अवस्था प्राप्त करते हैं।

प्रश्न 6
मानसिक रोगियों के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली खेल एवं संगीत विधि का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर :
बालकों तथा दीर्घकाल तक दबाव महसूस क़रने वाले मानसिक रोगी व्यक्तियों के लिए खेल विधि उपयोगी है-रोगी को स्वेच्छा से स्वतन्त्रतापूर्वक नाना प्रकार के खेल खेलने के अवसर प्रदान किये जाते हैं। खेल खेलने से उसकी विचार की दिशा बदलती है तथा खेल जीतने से उसमें आत्मविश्वास बढ़ता है। इसी प्रकार संगीत भी मानसिक उलझनों तथा तनावों को दूर करने की एक महत्त्वपूर्ण कुंजी है। रुचि का संगीत सुनने से उत्तेजित स्नायुओं को आराम मिलता है, संवेगात्मक उत्तेजनाओं का अन्त होता है, पाचन क्रिया तथा रक्तचाप सामान्य हो जाते हैं।

प्रश्न 7
मानसिक रोगों के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली मनो-अभिनय नामक विधि का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर :
मानसिक रोगों के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली एक सफल एवं लोकप्रिय विधि है-मनो-अभिनय विधि। मनो-अभिनय विधि (Psychodrarma), सामूहिक विधि से मिलती-जुलती विधि है। इसमें समूह के रोगी आपस में समस्या की व्याख्या नहीं करते, बल्कि अभिनय के माध्यम से अपनी समस्या का स्वतन्त्र रूप से अभिप्रकाशन करते हैं। इससे समस्या का रेचन हो जाता है। मनो-अभिनय चिकित्सक के निर्देशन में किया जाना चाहिए।

प्रश्न 8
मानसिक रोगों के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली सम्मोहन विधि का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर :
सम्मोहन, अल्पकालीन प्रभाव वाली एक मनोवैज्ञानिक विधि है, जिससे मनोरोग के लक्षण दूर होते हैं, रोग दूर नहीं होता। सम्मोहन क्रिया में चिकित्सक मानसिक रोगी को कुछ समय के लिए अचेत कर देता है और उसे एक आरामकुर्सी पर विश्रामपूर्वक बिठलाता है। अब उसे किसी ध्वन्यात्मक या दृष्टात्मक उत्तेजना पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए कहा जाता है। संसूचनाओं के माध्यम से उसे अचेत ही रखा जाता है। रोगी को निर्देश दिया जाता है कि वह अपनी स्मृति से लुप्त हो चुकी अनुभूतियों को कहे। अनुभूति के स्मरण मात्र से ही रोगी का रोग दूर हो जाती है।

प्रश्न 9
मानसिक रोगों के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली मनोविश्लेषण विधि का सामान्य वर्णन कीजिए।
उत्तर :
फ्रायड (Freud) नामक विख्यात मनोवैज्ञानिक ने सम्मोहन विधि की कमियों को ध्यानावस्थित रखते हुए ‘मनोविश्लेषण विधि (Psychoanalysis) की खोज की। रोगी को एक अर्द्ध-प्रकाशित कक्ष में आरामकुर्सी पर इस प्रकार विश्रामपूर्वक बिठलाया जाता है कि मनोविश्लेषक तो रोगी की क्रियाओं को पूर्णरूपेण अध्ययन व निरीक्षण कर पाये, लेकिन रोगी उसे न देख सके। अब मनोविश्लेषक के व्यवहार से प्रेरित व सन्तुष्ट व्यक्ति उस पर पूरी तरह विश्वास प्रदर्शित करता है। यद्यपि शुरू में प्रतिरोध की अवस्था के कारण रोगी कुछ व्यक्त करना नहीं चाहता, किन्तु उत्तेजके शब्दों के प्रयोग से उसे पूर्व-अनुभव दोहराने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसके बाद स्थानान्तरण की अवस्था के अन्तर्गत दो बातें हैं-

  1. रोगी चिकित्सक को भला-बुरा या गाली बकता है अथवा
  2. रोगी मनोविश्लेषक पर मुग्ध हो जाता है और उसकी हर बात मानता है।

शनैः – शनै: रोगी अपनी समस्त जानकारी मनोविश्लेषक को दे देता है, जिससे उसकी उलझनें समाप्त हो जाती हैं और वह सामान्य व समायोजित हो जाता है।

प्रश्न 10
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के मुख्य उद्देश्य क्या हैं ? [2007, 13, 14, 15]
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के निम्नलिखित उद्देश्य हैं

  1. क्रो एवं क्रो के अनुसार, मानसिक अव्यवस्था एवं अस्वस्थता को नियन्त्रित करना तथा मानसिक रोगों को दूर करने के उपायों की खोज करना।
  2. मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का उद्देश्य ऐसे साधनों को एकत्र करना है, जिससे साधारण मानसिक रोगों को नियन्त्रित किया जा सके।
  3. प्रत्येक व्यक्ति को सामंजस्यपूर्ण और सुखी जीवन व्यतीत करने में सहायता देना।
  4. मानसिक तनाव और चिन्ताओं से मुक्ति दिलाने में सहायता देना।

प्रश्न 11
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के मुख्य पक्षों का उल्लेख कीजिए।
या
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का सकारात्मक पक्ष क्या है?
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के तीन प्रमुख पक्ष हैं

1. सकारात्मक पक्ष :
सकारात्मक पक्ष में उन नियमों तथा परिस्थितियों को उत्पन्न करने का प्रयास किया जाता है जिनके द्वारा मनुष्य व्यक्तित्व का सन्तुलित विकास करते हुए जीवन की विभिन्न परिस्थितियों से सामंजस्य स्थापित करने में सफल हो सके। इनमें मानसिक रोगों की खोज करना तथा उनकी रोकथाम करना आते हैं।

2. नकारात्मक पक्ष :
मानसिक रोगों की सहानुभूतिपूर्ण ढंग से तथा कुशलता से चिकित्सा करना, उन परिस्थितियों से बचने का प्रयास करना जिनके कारण मानसिक संघर्ष तथा भावना-ग्रन्थियों के उत्पन्न होने की सम्भावना होती रहती है।

3. संरक्षणात्मक पक्ष :
व्यक्ति को उन विधियों का ज्ञान कराना, जिनसे मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्ध को कायम रखा जा सकता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की एक उत्तम परिभाषा दीजिए।”
उत्तर :
“मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का अर्थ है – मानसिक स्वास्थ्य के नियमों का अनुसंधान करना और उनकी सुरक्षा के उपाय करना।” [ ड्रेवर ]

प्रटन 2
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के मुख्य कार्य क्या हैं ? [2011]
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान मानसिक स्वास्थ्य के लक्षणों, मानसिक अस्वस्थता के लक्षणों, मानसिक रोग तथा उनके कारणों और मानसिक अस्वस्थता को दूर करने के उपायों का अध्ययन व विवेचन करता है।

प्रश्न 3
मानसिक स्वास्थ्य की एक संक्षिप्त परिभाषा लिखिए। [2008, 14]
उत्तर :
“मानसिक स्वास्थ्य यह बताता है कि कोई व्यक्ति जीवन की माँगों और अवसरों के प्रति कितनी अच्छी तरह से समायोजित है।” -भाटिया

प्रश्न 4
मानसिक स्वास्थ्य और सीखने के बीच कैसा सम्बन्ध है?
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य और सीखने के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है। सामान्य मानसिक स्वास्थ्य की दशा में सीखने की प्रक्रिया सुचारु रूप से चलती है तथा मानसिक स्वास्थ्य के असामान्य हो जाने की दशा में सीखने की प्रक्रिया को सुचारु रूप से चल पाना सम्भव नहीं होता।

5
किस प्रकार आदमी (व्यक्ति) अपना मानसिक सन्तुलन बनाये रख सकता है?
उत्तर :
कोई भी व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य के नियमों का भली-भाँति पालन करके अपना मानसिक सन्तुलन बनाये रख सकता है।

प्रश्न 6
मानसिक अस्वस्थता से क्या आशय है ?
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता वह स्थिति है जिसमें जीवन की आवश्यकताओं को संतुष्ट करने में व्यक्ति स्वयं को असमर्थ पाता है तथा संवेगात्मक असन्तुलन का शिकार हो जाता है।

प्रश्न 7
मानसिक अस्वस्थता का प्रमुख लक्षण क्या है ?
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता का प्रमुख लक्षण है – जीवन में समायोजन का बिगड़ जाना।

इन 8
‘स्वप्न विश्लेषण विधि किस उपचार के लिए प्रयोग में लाई जाती है ?
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता के उपचार के लिए स्वप्न विश्लेषण विधि’ को अपनाया जाता है।

प्रश्न 9
मानसिक रोगियों के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली मनोविश्लेषण विधि को किसने प्रारम्भ किया था ?
उत्तर :
मनोविश्लेषण विधि को फ्रॉयड (Freud) नामक मनोवैज्ञानिक ने प्रारम्भ किया था।

प्रश्न 10
गम्भीर मानसिक अस्वस्थता के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियाँ कौन-कौन-सी हैं ?
उत्तर :
गम्भीर मानसिक अस्वस्थता के उपचार हेतु अपनायी जाने वाली मुख्य विधियाँ हैं।

  1. आघात विधि
  2. रासायनिक विधि तथा
  3. मनोशल्य चिकित्सा।

प्रश्न 11
मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला प्रमुख कारक कौन-सा है? [2015]
उत्तर :
जीवन में सामंजस्य तथा सकारात्मक सोच, मानसिक सोच को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं।

प्रश्न 12
हैडफील्ड के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का सम्बन्ध किससे है? [2013]
उत्तर :
हैडफील्ड के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का सम्बन्ध मुख्य रूप से मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा तथा मानसिक रोगों की रोकथाम है।

प्रश्न 13
मनोग्रन्थियों का निर्माण क्यों होता है? (2013)
उत्तर :
निरन्तर असफलताओं, हताशाओं, कुण्ठाओं तथा भावनाओं की अस्त-व्यस्तता के कारण मनोग्रन्थियों का निर्माण हो जाता है।

प्रश्न 14
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के चार पहलू हैं।
  2. मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान केवल मानसिक रोगियों के लिए उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण है।
  3. मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति जीवन में सुसमायोजित होता है।
  4. बालक के मानसिक स्वास्थ्य में परिवार का कोई योगदान नहीं होता।
  5. मानसिक अस्वस्थता का कोई उपचार सम्भव नहीं है।

उत्तर :

  1. असत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. असत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
“मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ है – वास्तविकता के धरातल पर वातावरण से पर्याप्त सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता।” यह परिभाषा दी है
(क) शेफर ने
(ख) लैण्डेल ने
(ग) मर्फी ने
(घ) ड्रेवर ने
उत्तर :
(ख) लैण्डेल ने

प्रश्न 2
“साधारण शब्दों में हम कह सकते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य सम्पूर्ण व्यक्तित्व का पूर्ण सामंजस्य के साथ कार्य करता है। ऐसा कहा गया है
(क) ड्रेवर द्वारा
(ख) हैडफील्ड द्वारा
(ग) लैडेल द्वारा
(घ) कुप्पू स्वामी द्वारा
उत्तर :
(ख) हैडफील्ड द्वारा

प्रश्न 3
“मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान वह विज्ञान है, जो मानव कल्याण के विषय में बताता है और मानव सम्बन्धों के सब क्षेत्रों को प्रभावित करता है। यह परिभाषा दी है
(क) क्री एवं क्रो ने
(ख) थॉमसन ने
(ग) शेफर ने
(घ) हैडफील्ड ने
उत्तर :
(क) क्रो एवं क्रो ने।

प्रश्न 4
“मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का सम्बन्ध मानसिक स्वास्थ्य को बनाये रखने और मानसिक असन्तुलन को रोकने से है।” ऐसा कहा गया है
(क) हैडफील्ड द्वारा
(ख) क्रो और क्रो द्वारा
(ग) कुल्हन द्वारा
(घ) शेफर द्वारा
उत्तर :
(क) हैडफील्ड द्वारा

प्रश्न 5
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के निम्नलिखित पहलू हैं, सिवाय (2009)
(क) संरक्षणात्मक पहलू
(ख) सांस्कृतिक पहलू
(ग) उपचारांत्मक पहलू
(घ) निरोधात्मक पहलू
उत्तर :
(ख) सांस्कृतिक पहलू

प्रश्न 6
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का निम्नलिखित कार्य नहीं है
(क) मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करना
(ख) संक्रामक रोगों की रोकथाम करना
(ग) मानसिक रोगों की रोकथाम करना
(घ) मानसिक रोगों का उपचार करना
उत्तर :
(ख) संक्रामक रोगों की रोकथाम करना

प्रश्न 7
मानसिक अस्वस्थता का कारण नहीं है [2008, 12, 13]
(क) चिन्ता
(ख) निद्रा
(ग) तनाव
(घ) भग्नाशा
उत्तर :
(ख) निद्रा

प्रश्न 8
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का महत्व है
(क) जीवन के कुछ क्षेत्रों में
(ख) जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में
(ग) जीवन के असामान्य क्षेत्र में
(घ) जीवन के किसी भी क्षेत्र में नहीं
उत्तर :
(ख) जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में

प्रश्न 9
व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है
(क) उसके सौन्दर्य का
(ख) उत्तम पोषण का
(ग) शारीरिक विकलांगता को
(घ) उच्च शिक्षा का
उत्तर :
(ग) शारीरिक विकलांगता का

प्रश्न 10
निम्नलिखित में से कौन-सा मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति का लक्षण नहीं है?
(क) स्व-मूल्यांकन की योग्यता
(ख) समायोजनशीलता
(ग) आत्मविश्वास
(घ) संवेगात्मक अस्थिरता
उत्तर :
(घ) संवेगात्मक अस्थिरता

प्रश्न 11
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का उद्देश्य है [2007, 09, 11, 18]
(क) सामाजिक विकास करना
(ख) सांस्कृतिक विकास करना
(ग) मानसिक रोगों का उपचार करना
(घ) भावात्मक विकास करना
उत्तर :
(ग) मानसिक रोगों का उपचार करना

प्रश्न 12
निम्नलिखित में से कौन-सा मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति का लक्षण हैं? [2008]
(क) स्व-मूल्यांकन की योग्यता
(ख) समायोजनशीलता
(ग) आत्मविश्वास
(घ) ये सभी
उत्तर :
(घ) ये सभी

प्रश्न 13
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के उद्देश्यों का एकमात्र पहलू है [2013]
(क) उपचारात्मक पहलू
(ख) निरोधात्मक पहलू
(ग) संरक्षणात्मक पहलू
(घ) ये सभी
उत्तर :
(घ) ये सभी

प्रश्न 14
निम्नलिखित में से कौन-सा उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का नहीं है? [2010, 13]
(क) अधिकतम प्रभावोत्पादक और सन्तुष्टि
(ख) जीवन की वास्तविकताओं को स्वीकार करना
(ग) व्यक्तियों का आपसी सामंजस्य
(घ) तेज गति से आर्थिक समृद्धि
उत्तर :
(घ) तेज गति से आर्थिक समृद्धि

प्रश्न 15
‘ए माइन्ड दैट फाउण्ड इटसेल्फ’ पुस्तक का सम्बन्ध है [2014]
(क) गणित से
(ख) मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान से
(ग) दर्शनशास्त्र से
(घ) विज्ञान से
उत्तर :
(ख) मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान से

प्रश्न 16
मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति में निम्न में से क्या पाया जाता है। [2016]
(क) आत्मविश्वास की अधिकता
(ख) तनाव की अधिकता
(ग) क्रोध की अधिकता
(घ) हर्ष की अधिकता
उत्तर :
(क) आत्मविश्वास की अधिकता

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UP Board Solutions for Class 12 Civics गुट-निरपेक्ष आन्दोलन

UP Board Solutions for Class 12 Civics गुट-निरपेक्ष आन्दोलन are part of UP Board Solutions for Class 12 Civics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Civics गुट-निरपेक्ष आन्दोलन.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Civics
Chapter 22 d
Chapter Name गुट-निरपेक्ष आन्दोलन
Number of Questions Solved 21
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Civics गुट-निरपेक्ष आन्दोलन

विस्तृत उत्तीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
गुट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? गुट-निरपेक्षता के प्रमुख लक्षणों का वर्णन कीजिए।
या
गुट-निरपेक्षता के प्रमुख लक्षण बताइए। [2008, 10]
उत्तर :
गुट-निरपेक्षता

गुट-निरपेक्षता को अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में ‘तटस्थता’ के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है, लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय कानून और व्यवहार में तटस्थता का जो अर्थ लिया जाता है, गुट-निरपेक्षता उससे नितान्त भिन्न स्थिति है। तटस्थता और गुट-निरपेक्षता में भेद स्पष्ट करते हुए जॉर्ज लिस्का लिखते हैं –

“किसी विवाद के सन्दर्भ में यह जानते हुए कि कौन सही है और कौन गलत है किसी का पक्ष नहीं लेना तटस्थता है किन्तु गुट-निरपेक्षता का आशय सही और गलत में विभेद करते हुए सदैव सही का समर्थन करना है।”

गुट-निरपेक्षता की नीति के प्रणेता पं० नेहरू ने 1949 ई० में अमेरिकी जनता के सम्मुख कहा था –

जब स्वतन्त्रता के लिए संकट उत्पन्न हो, न्याय पर आघात पहुँचे या आक्रमण की घटना घटित हो, तब हम तटस्थ नहीं रह सकते और न ही हम तटस्थ रहेंगे।” गुट-निरपेक्षता को स्पष्ट करते हुए उन्होंने आगे कहा, “हमारी तटस्थता का अर्थ है निष्पक्षता, जिसके अनुसार हम उन शक्तियों और कार्यों का समर्थन करते हैं जिन्हें हम उचित समझते हैं और उनकी निन्दा करते हैं जिन्हें हम अनुचित समझते हैं, चाहे वे किसी भी विचारधारा की पोषक हों।”

गुट-निरपेक्षता की नीति के प्रमुख लक्षण

गुट-निरपेक्षता के अर्थ और प्रकृति को स्पष्ट करने के लिए इस नीति के लक्षणों का अध्ययन किया जा सकता है, जो निम्न प्रकार हैं –

1. शक्ति गुटों से पृथक रहने और महाशक्तियों के साथ सैनिक समझौता न करने की नीति – गुट-निरपेक्षता का सबसे प्रमुख लक्षण है-शक्ति गुटों से पृथक् रहने की नीति। इसमें यह बात भी निहित है कि गुट-निरपेक्ष देश किसी भी महाशक्ति के साथ सैनिक समझौता नहीं करेगा। गुट-निरपेक्षता का मूल विचार है कि विश्व के देशों को परस्पर विरोधी शिविरों में विभक्त करने के प्रयासों या महाशक्तियों के प्रभाव क्षेत्रों के विस्तार के प्रयासों ने विश्व में तनाव की स्थिति को जन्म दिया है और गुट-निरपेक्षता का उद्देश्य इन शक्ति गुटों से अलग रहते हुए तनाव की शक्तियों को निर्बल करना है।

2. स्वतन्त्र विदेश नीति – गुट-निरपेक्षता का आशय यह है कि सम्बद्ध देश अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में किसी शक्ति गुट के साथ बँधा हुआ नहीं है, वरन् उसका अपना स्वतन्त्र मार्ग है। जो सत्य, न्याय, औचित्य और शान्ति पर आधारित है। गुट-निरपेक्ष देश अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में किसी का पिछलग्गू नहीं होता वरन् राष्ट्रीय हित को दृष्टि में रखते हुए सत्य, न्याय, औचित्य और विश्वशान्ति की प्रवृत्तियों का समर्थन करता है। स्वतन्त्र विदेश नीति का पालन गुट-निरपेक्षता की नीति की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है। इस नीति के कारण ही प्रत्येक गुट-निरपेक्ष देश प्रत्येक वैश्विक मामले पर गुण-दोष के आधार पर फैसला करता है।

3. शान्ति की नीति – गुट-निरपेक्षता का उदय विश्वशान्ति की आकांक्षा और उद्देश्य से हुआ है। यह शान्ति के उद्देश्यों और संकल्पों की अभिव्यक्ति है। इसका लक्ष्य है, तनाव की प्रवृत्तियों को कमजोर करते हुए शान्ति का विस्तार। गुट-निरपेक्षता की नीति को अपनाते हुए भारत ने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों (कोरिया, कांगो, साइप्रस) में शान्ति स्थापना के प्रयत्न किये और गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के सातवें शिखर सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए श्रीमती गांधी ने कहा था, ‘गुट-निरपेक्ष आन्दोलन इतिहास का सबसे बड़ा शान्ति आन्दोलन है।’

4. साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, शोषण एवं आधिपत्य विरोधी नीति – गुट-निरपेक्षता साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, नव-उपनिवेशवाद, रंगभेद और शोषण तथा आधिपत्य के सभी रूपों का विरोध करने वाली नीति है। गुट-निरपेक्षता विभिन्न राष्ट्रों के आपसी व्यवहार में राष्ट्रीय प्रभुसत्ता, स्वतन्त्रता, समानता और विकास में विश्वास करती है; संघर्ष, अन्याय, दमन और असहिष्णुता का विरोध करती है एवं भूख तथा अभाव की स्थितियों को दूर करने पर बल देती है। विश्व के अनेक क्षेत्रों यथा एशिया व अफ्रीका में उपनिवेशवाद की समाप्ति में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

5. निरन्तर विकासशील नीति – गुट-निरपेक्षता एक स्थिर नीति नहीं वरन् निरन्तर विकासशील नीति है जिसे अपनाते हुए सम्बद्ध देशों द्वारा राष्ट्रीय हित और विश्व की बदलती हुई परिस्थितियों को दृष्टि में रखते हुए अपने दृष्टिकोण और कार्य-शैली में परिवर्तन किया जा सकता है। 1971 की ‘भारत-सोवियत रूस मैत्री सन्धि’ गुट-निरपेक्षता की विकासशीलता की। परिचायक है। गुट-निरपेक्षता के समस्त सन्दर्भ में भी विकासशीलता का परिचय मिलता है। 1975 के पूर्व गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में राजनीतिक विषयों पर अधिक बल दिया जाता था। पिछले एक दशक में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के अन्तर्गत आर्थिक विषयों और आर्थिक विकास पर अधिक बल दिया जा रहा है।

6. गुट-निरपेक्षता एक आन्दोलन है, गुट नहीं – गुट-निरपेक्षता एक गुट नहीं वरन् एक आन्दोलन है। एक ऐसा आन्दोलन, जो राष्ट्रों के बीच स्वैच्छिक सहयोग चाहता है, प्रतिद्वन्द्विता या टकराव नहीं।

7. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन संयुक्त राष्ट्र का सहायक है, विकल्प नहीं – गुट-निरपेक्षता का विश्वास है कि “संयुक्त राष्ट्र के बिना आज के विश्व की कल्पना नहीं की जा सकती। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन संयुक्त राष्ट्र का विकल्प या उसका प्रतिद्वन्द्वी नहीं वरन् इस संगठन की सहायक प्रवृत्ति है, जिसका उद्देश्य है संयुक्त राष्ट्र को सही दिशा में आगे बढ़ाते हुए उसे शक्तिशाली बनाना।”

UP Board Solutions for Class 12 Civics गुट-निरपेक्ष आन्दोलन

प्रश्न 2.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन को प्रारम्भ करने का क्या उद्देश्य था ? वर्तमान परिस्थितियों में इसका क्या महत्त्व है ? [2007, 12]
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए तथा वर्तमान परिस्थितियों में इसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए।
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए उसमें भारत की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन पर एक निबन्ध लिखिए। [2014]
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन कब और किसके द्वारा प्रारम्भ किया गया? वर्तमान विश्व की परिवर्तनशील परिस्थितियों में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की सार्थकता पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए [2013]
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन को पं० जवाहरलाल नेहरू के योगदान का उल्लेख कीजिए। [2014]
उत्तर :
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन

गुट-निरपेक्षता का आशय है, “अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में सैनिक गुट की सदस्यता या किसी भी महाशक्ति के साथ द्वि-पक्षीय सैनिक समझौते से दूर रहते हुए शान्ति, न्याय और राष्ट्रों की समानता के सिद्धान्त पर आधारित स्वतन्त्र रीति-नीति का अवलम्बन।”

गुट-निरपेक्षता की नीति के प्रमुख लक्षण (विशेषताएँ) – गुट-निरपेक्षता का सबसे प्रमुख लक्षण है-शक्ति गुटों से पृथक् रहने की नीति। गुट-निरपेक्ष देश का स्वतन्त्र मार्ग होता है तथा वह अन्तरष्ट्रिीय राजनीति में किसी का पिछलग्गू नहीं होता। गुट-निरपेक्षता का लक्ष्य है–तनाव की प्रवृत्तियों को कमजोर करते हुए शान्ति का विस्तार। गुट-निरपेक्षता साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, नवउपनिवेशवाद, रंग-भेद और शोषण तथा आधिपत्य के सभी रूपों का विरोध करने वाली नीति है। गुट-निरपेक्षता एक गुट नहीं वरन् एक आन्दोलन है तथा निरन्तर विकासशील नीति है। गुट-निरपेक्षता को यह भी विश्वास है कि संयुक्त राष्ट्र के बिना आज के विश्व की कल्पना नहीं की जा सकती।

गुट-निरपेक्ष आन्दोलन को प्रारम्भ करने का उद्देश्य – वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में गुट-निरपेक्ष अथवा असंलग्नता का सिद्धान्त अत्यन्त प्रभावशाली और लोकप्रिय बन गया है। गुटनिरपेक्षता की नीति को सर्वप्रथम अपनाने का श्रेय भारत को प्राप्त है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि – युद्धोत्तर अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का सबसे प्रमुख और दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य विश्व का दो विरोधी गुटों में बँट जाना था। एक गुट का नेता संयुक्त राज्य अमेरिका था और दूसरे गुट का नेता था सोवियत संघ। इन दोनों गुटों के बीच मतभेदों की एक ऐसी खाई उत्पन्न हो गयी थी और दोनों गुट एक-दूसरे के विरोध में इस प्रकार सक्रिय थे कि इसे शीतयुद्ध का नाम दिया गया। 1947 ई० में जब भारत स्वतन्त्र हुआ, तो एशिया और विश्व में भारत की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थिति को देखते हुए दोनों विरोधी गुटों के देशों द्वारा भारत को अपनी ओर शामिल करने के प्रयत्न प्रारम्भ कर दिये गये और परस्पर विरोधी गुटों के इन प्रयासों ने वैदेशिक नीति के क्षेत्र में भारत के लिए एक समस्या खड़ी कर दी। लेकिन इन कठिन परिस्थितियों में भारत के द्वारा अपने विवेकपूर्ण मार्ग का शीघ्र ही चुनाव कर लिया गया और वह मार्ग था, गुट-निरपेक्षता अर्थात् अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में दोनों ही गुटों से अलग रहते हुए विश्व शान्ति, सत्य और न्याय का समर्थन करने की स्वतन्त्र, विदेश नीति।

प्रारम्भ में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में गुट-निरपेक्षता को सही रूप में नहीं समझा जा सका। केवल दो महाशक्तियों ने इसे ‘अवसरवादी नीति’ बतलाया, वरन् अन्य देशों द्वारा भी यह सोचा गया कि ‘आज की अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में निरपेक्षता का कोई मार्ग नहीं हो सकता। लेकिन समय के साथ भ्रान्तियाँ कमजोर पड़ीं और शीघ्र ही कुछ देश गुट-निरपेक्षता की ओर आकर्षित हुए। ऐसे देशों में सबसे प्रमुख थे—मार्शल टीटो के नेतृत्व में यूगोस्लाविया और कर्नल नासिर के नेतृत्व में मिस्र। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में गुट-निरपेक्षता की एक त्रिमूर्ति बन गयी ‘नेहरू, नासिर और टीटो’। कालान्तर में, एशियाई-अफ्रीकी देशों ने सोचा कि गुट-निरपेक्षता को अपनाना न केवल सम्भव है, वरन् उनके लिए यह लगभग स्वाभाविक और उचित मार्ग है। 1961 ई० में 25 देशों ने इस मार्ग को अपनाया।

लेकिन अब इस आन्दोलन से जुड़े सदस्य देशों की संख्या 120 हो गयी है। ‘गुट-निरपेक्षता’। आज अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की सबसे अधिक लोकप्रिय धारणा बन गयी है और गुट-निरपेक्ष आन्दोलन ने आज अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की एक प्रमुख प्रवृत्ति का स्थान ले लिया है।

वर्तमान में गुट-निरपेक्षता का महत्त्व

बदलती परिस्थितियों में गुट-निरपेक्षता का स्वरूप भी बदला है, किन्तु इसका महत्त्व पहले से अधिक हो गया है। यही कारण है कि आज गुट-निरपेक्षता का पालन करने वाले राष्ट्रों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र में गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों की आवाज प्रबल बन सकी है। विश्व के दो प्रतिस्पर्धी गुटों में सन्तुलन पैदा करने और विश्व-शान्ति बनाये रखने में गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। आज की अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति के सन्दर्भ में ‘निर्गुट आन्दोलन (NAM) पर महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी आ गयी है। आज की परिस्थितियों में निर्गुट देश ही अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में शान्ति स्थापित करने और बनाये रखने में योग दे सकते हैं।

विश्व के परतन्त्र राष्ट्रों को स्वतन्त्र कराने और रंगभेद की नीति का विरोध करने में निर्गुट आन्दोलन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। आज निर्गुट आन्दोलन निर्धन और पिछड़े हुए देशों के आर्थिक विकास पर जोर दे रहा है। गुट-निरपेक्ष देशों की यह बराबर माँग रही है कि विश्व की ऐसी आर्थिक रचना हो, जिसमें विश्व की सम्पत्ति का न्यायपूर्ण ढंग से वितरण हो सके। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की मान्यता है ‘आर्थिक शोषण का अन्त किये बिना’ विश्व-शान्ति सम्भव नहीं है। विश्व में शान्ति, स्वतन्त्रता और न्याय की रक्षा के लिए गुट-निरपेक्ष आन्दोलन ने एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इस आन्दोलन ने विश्व में तनाव, शैथिल्य में पर्याप्त योग दिया है। तीसरी दुनिया के आर्थिक विकास के लिए यह आन्दोलन आशा की किरण है। श्रीमती गाँधी ने निर्गुट आन्दोलन के सातवें शिखर सम्मेलन में ठीक ही कहा था-“गुट-निरपेक्षता का जो रूप था वह बदल गया है, किन्तु गुट-निरपेक्षता का युग नहीं बीता है।” उन्होंने आगे कहा-“गुट- निरपेक्षता मानव-व्यवहार का दर्शन है। इसमें समस्याओं के समाधान के लिए बल-प्रयोग का कोई स्थान नहीं है। गुट-निरपेक्षता का औचित्य कल भी उतना ही रहेगा, जितना आज है।”

[ संकेत – गुट-निरपेक्षता आन्दोलन में भारत की भूमिका हेतु लघु उत्तरीय प्रश्न (150 शब्द) प्रश्न 1 का अध्ययन करें। ]

प्रश्न 3.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की सार्थकता पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [2010, 16]
या
क्या गुट-निरपेक्ष आन्दोलन आज भी प्रासंगिक है? उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए। [2014, 16]
या
आधुनिक विश्व के सन्दर्भ में गुटनिरपेक्षता की सार्थकता पर एक निबन्ध लिखिए। [2012]
उत्तर :
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की उपादेयता (सार्थकता)

वर्तमान समय में बदलती हुई अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में बहुत-से राजनीतिक विचारकों का यह दृष्टिकोण है कि गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की उपादेयता समाप्त हो चुकी है, अर्थात् गुटनिरपेक्ष आन्दोलन महत्त्वहीन हो गया है, अथवा आधुनिक परिस्थितियों में इस आन्दोलन की कोई आवश्यकता नहीं है, जबकि आधुनिक परिस्थितियों में इस आन्दोलन को और भी मजबूत बनाने की आवश्यकता है।

1. पहला दृष्टिकोण – गुट-निरपेक्ष आन्दोलन अपनी उपादेयता खो चुका है-इस परिप्रेक्ष्य में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के विद्वानों ने यह मत प्रकट किया है कि आधुनिक अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का कोई सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक महत्त्व नहीं रह गया है। उनका यह मत इसे धारणा पर आधारित है कि 1991 ई० में सोवियत संघ के विघटन एवं शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के अस्तित्व की कोई आवश्यकता नहीं है। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की स्थापना एवं विकास में शीतयुद्ध की राजनीति ने बहुत अधिक प्रभाव डाला था। एशिया तथा अफ्रीका के नवोदित स्वतन्त्र हुए राष्ट्रों ने इस विचारधारा को इसलिए अपनाया था कि वे दोनों महाशक्तियों की गुटबन्दियों से पृथक् रहकर अपना विकास कर सकें एवं अपनी स्वतन्त्र विदेश नीति का संचालन कर सकें। परन्तु आधुनिक समय में विश्व राजनीति द्वि-ध्रुवीय के स्थान पर एक-ध्रुवीय अथवा बहु-ध्रुवीय रूप में परिवर्तित हो रही है। शक्ति के नये केन्द्र उदय हो रहे हैं। सैनिक शक्ति के स्थान पर आर्थिक शक्ति की महत्ता स्थापित होती जा रही है। क्षेत्रीय सहयोग के नये आयाम स्थापित हो रहे हैं। राज्यों की राजनीतिक व्यवस्था स्थिरता के स्थान पर गतिशील है। अतः ऐसे राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की प्रासंगिकता पर प्रश्न-चिह्न लग गया है। शीतयुद्ध की राजनीति के कारण इस आन्दोलन का जन्म हुआ तथा जब शीतयुद्ध ही समाप्त हो गया है तो इस आन्दोलन का औचित्य निरर्थक है। अतः इसकी उपादेयता समाप्त हो चुकी है।

2. दूसरा दृष्टिकोण : मजबूत बनने की दिशा में सक्रिय – कुछ विचारकों का यह मत है। कि आधुनिक अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में भी गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की उपादेयता है तथा इसको अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है। इसका कारण यह है कि स्वयं गुट-निरपेक्ष राष्ट्र अभी इन परिस्थितियों से हतोत्साहित नहीं हुए हैं, वरन् वे सक्रिय रूप से इसको सुदृढ़ बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं। विश्व के राष्ट्र इसकी भूमिका के प्रति आशावान हैं; क्योंकि गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों की संख्या घटने के स्थान पर बढ़ती जा रही है, जिसका प्रमाण है सोलहवाँ शिखर सम्मेलन, जिसमें सदस्य राष्ट्रों की संख्या 120 हो गयी है। आज भी संयुक्त राष्ट्र संघ एवं अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों पर अमेरिका एवं पश्चिमी राष्ट्रों का आधिपत्य स्थापित है। ऐसे में इन विकासशील राष्ट्रों को संयुक्त संगठन की आवश्यकता है, जो कि अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर इन राष्ट्रों की एकाधिकारवाद की भावना को चुनौती दे सके तथा अपने विकास सम्बन्धी नियमों एवं व्यवस्थाओं की स्थापना करवा सकें। संयुक्त राष्ट्र संघ के 193 राष्ट्रों में 120 निर्गुट राष्ट्रों की स्थिति पर्याप्त महत्त्व रखती है और इन राष्ट्रों की सहमति के बिना संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा कोई निर्णय लेने में असमर्थ है। ये राष्ट्र कुछ सामान्य समस्याओं; जैसे-आतंकवाद, नशीली दवाओं के प्रयोग, जाति भेद, रंग-भेद, गरीबी, बेरोजगारी, पिछड़ापन, निरक्षरता आदि; से पीड़ित हैं। इनका समाधान इन राष्ट्रों के पारस्परिक सहयोग से ही सम्भव है। यदि ये राष्ट्र संगठित होंगे तो ये अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को काफी सीमा तक प्रभावित कर सकते हैं।

3. भविष्य की सम्भावनाएँ – आधुनिक समय में संयुक्त राष्ट्र संघ के लगभग २/३ सदस्य। गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों के हैं तथा इन्होंने इन अन्तर्राष्ट्रीय मंचों से विश्व शान्ति, उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद के अन्त, रंगभेद की समाप्ति, परमाणु शस्त्रों पर रोक, नि:शस्त्रीकरण, हिन्दमहासागर को शान्ति क्षेत्र घोषित करना आदि विषयों को उठाया, विचार-विमर्श किया तथा अनेक मुद्दों पर सफलताएँ भी प्राप्त की।

इस आन्दोलन के जन्म के पश्चात् से ही इसमें विसंगतियाँ आनी प्रारम्भ हो गयी थीं। इस आन्दोलन में धीरे-धीरे ऐसे राष्ट्रों का आगमन प्रारम्भ हो गया जो कि सोवियत संघ एवं अमेरिका से वैचारिक दृष्टिकोण के आधार पर जुड़ गए। क्यूबा साम्यवादी देश होने के बावजूद निर्गुट आन्दोलन से जुड़ गया। 1962 ई० में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो कोई भी गुट-निरपेक्ष राष्ट्र भारत की सहायता के लिए नहीं आया वरन् भारत को ब्रिटेन तथा अमेरिका से सैनिक सहायता प्राप्त हुई। 1965 ई० में पाकिस्तान के साथ युद्ध में भारत का पक्ष सोवियत संघ ने लिया। कश्मीर के मसले पर अनेक बार सोवियत संघ ने वीटो का प्रयोग किया। वियतनाम जैसे गुट-निरपेक्ष राष्ट्र पर 1979 ई० में चीन ने आक्रमण कर दिया और उसे सोवियत संघ से मैत्री करने पर मजबूर होना पड़ा। अफगानिस्तान पर सोवियत आक्रमण तथा गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों का मूकदर्शक बना रहना इसकी सार्थकता को कम करता है। अत: इस आन्दोलन के विकास के साथ इसके अर्थ एवं परिभाषाएँ भी बदलनी प्रारम्भ हो गईं। अब यह स्वीकार किया जाने लगा है कि विदेश नीति की स्वतन्त्रता ही गुट-निरपेक्षता का एकमात्र मापदण्ड है। किसी भी राष्ट्र के साथ किसी भी प्रकार की सन्धि करने पर गुट-निरपेक्षता की स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

इस आन्दोलन के जन्म के पश्चात् से ही इसमें विसंगतियाँ आनी प्रारम्भ हो गयी थीं। इस आन्दोलन में धीरे-धीरे ऐसे राष्ट्रों का आगमन प्रारम्भ हो गया जो कि सोवियत संघ एवं अमेरिका से वैचारिक दृष्टिकोण के आधार पर जुड़ गए। क्यूबा साम्यवादी देश होने के बावजूद निर्गुट आन्दोलन से जुड़ गया। 1962 ई० में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो कोई भी गुट-निरपेक्ष राष्ट्र भारत की सहायता के लिए नहीं आया वरन् भारत को ब्रिटेन तथा अमेरिका से सैनिक सहायता प्राप्त हुई। 1965 ई० में पाकिस्तान के साथ युद्ध में भारत का पक्ष सोवियत संघ ने लिया। कश्मीर के मसले पर अनेक बार सोवियत संघ ने वीटो का प्रयोग किया। वियतनाम जैसे गुट-निरपेक्ष राष्ट्र पर 1979 ई० में चीन ने आक्रमण कर दिया और उसे सोवियत संघ से मैत्री करने पर मजबूर होना पड़ा। अफगानिस्तान पर सोवियत आक्रमण तथा गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों का मूकदर्शक बना रहना इसकी सार्थकता को कम करता है। अत: इस आन्दोलन के विकास के साथ इसके अर्थ एवं परिभाषाएँ भी बदलनी प्रारम्भ हो गईं। अब यह स्वीकार किया जाने लगा है कि विदेश नीति की स्वतन्त्रता ही गुट-निरपेक्षता का एकमात्र मापदण्ड है। किसी भी राष्ट्र के साथ किसी भी प्रकार की सन्धि करने पर गुट-निरपेक्षता की स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की कमजोरी के लिए कुछ तो संरचनात्मक कमियाँ हैं; जैसे-स्थायी सचिवालय का न होना और इसके स्थान पर औपचारिक संगठनों; जैसे-समन्वय ब्यूरो तथा सम्मेलन; की स्थापना आदि उत्तरदायी हैं, तो दूसरी ओर सदस्य-राष्ट्रों के पारस्परिक मतभेद, विवाद एवं संघर्ष इसकी संगठित शक्ति को कमजोर कर रहे हैं। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के सदस्य होने पर भी भारत तथा पाकिस्तान के मध्य अनेक सैनिक युद्ध हो चुके हैं और अभी भी अघोषित युद्ध की स्थिति बनी हुई है। पाकिस्तान की परमाणु बम बनाने की क्षमता तथा अमेरिका एवं चीन से अत्याधुनिक हथियारों को खरीदने से भारत की शान्ति एवं सुरक्षा को गम्भीर खतरा पैदा हो गया है और यह सम्भव है कि भारत और पाकिस्तान का किसी भी समय भयंकर युद्ध प्रारम्भ हो सकता है। भारत-चीन सीमा-विवाद, वियतनाम-कम्पूचिया विवाद, अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप, ईरान-इराक विवाद, इराक द्वारा कुवैत पर आक्रमण आदि अनेक समस्याएँ हैं जिनका कोई निश्चित समाधान गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के पास नहीं है। इस प्रकार स्पष्ट है कि ऐसे क्षेत्र स्पष्ट रूप से दिखायी देते हैं जहाँ इस आन्दोलन की आज भी प्रासंगिकता, उपादेयता एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका है; जैसे –

  1. नयी अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना के लिए प्रयास करना।
  2. उत्तर-दक्षिण संवाद के लिए पृष्ठभूमि तैयार करना।
  3. निरस्त्रीकरण के लिए प्रयास करना।
  4. मादक द्रव्यों की तस्करी एवं आतंकवाद को रोकने में पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा देना।
  5. पर्यावरण की सुरक्षा के लिए प्रयास करना।
  6. दक्षिण-दक्षिण संवाद को प्रोत्साहन प्रदान करना।
  7. एक-ध्रुवीय व्यवस्था में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका के बढ़ते हुए वर्चस्व को रोकने के लिए सामूहिक प्रयास करना।

UP Board Solutions for Class 12 Civics गुट-निरपेक्ष आन्दोलन

प्रश्न 4.
गुट-निरपेक्षता की उपलब्धियों तथा विफलताओं का विवरण दीजिए। [2009, 10]
उत्तर :
गुट-निरपेक्षता की उपलब्धियाँ

गुट-निरपेक्षता विदेश-नीति का वह मूल सिद्धान्त है, जिसमें कोई भी राष्ट्र सम्मिलित हो सकता है। इस प्रकार गुट-निरपेक्षता का प्रादुर्भाव तथा विकास वर्तमान समय की सर्वाधिक लोकप्रिय तथा प्रभावशाली नीति है। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की प्रमुख उपलब्धियों को अध्ययन निम्नलिखित रूपों में किया जा सकता है –

1. गुट-निरपेक्षता की नीति को मान्यता – विश्व के दोनों राष्ट्र-अमेरिका तथा सोवियत संघ यह समझते थे कि भुट-निरपेक्ष आन्दोलन सिवाय एक ‘धोखे’ के और कुछ नहीं है। अतः विश्व के राष्ट्रों को किसी एक गुट में अवश्य सम्मिलित हो जाना चाहिए, परन्तु गुट-निरपेक्ष आन्दोलन अपनी नीतियों पर दृढ़ रहा। समय व्यतीत होने के साथ-साथ विश्व के दोनों गुटों के दृष्टिकोण में भी परिवर्तन आया। साम्यवादी देशों का विश्वास साम्यवादी विचारधारा से हटकर एक नवीन स्वतन्त्र विचारधारा की ओर आकर्षित होने लगा। उन्होंने विश्व में पहली बार इस बात को स्वीकार किया कि गुट-निरपेक्ष देश वास्तव में स्वतन्त्र हैं। उन्होंने यह भी अनुभव किया कि सोवियत संघ तथा गुट-निरपेक्ष देशों के समक्ष मूलभूत समस्याएँ समान हैं। पश्चिमी गुटों ने तो सातवें दशक में गुट-निरपेक्ष नीति को मान्यता प्रदान की। इस प्रकार गुटनिरपेक्ष देशों के प्रति सद्भावना तथा सम्मान का वातावरण उत्पन्न करने में आन्दोलनकारियों को जो सफलता प्राप्त हुई उसकी सराहना की जानी चाहिए।

2. शीत-युद्ध के भय को दूर करना – शीत-युद्ध के कारण अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में तनाव का वातावरण व्याप्त था। परन्तु गुट-निरपेक्षता की नीति ने इस तनाव को शिथिलता की दशा में लाने के लिए भरसक प्रयत्न किया तथा इसमें सफलता भी प्राप्त की।

3. शीत-युद्ध को सक्रिय करना – अनेक गुट-निरपेक्ष देश चाहते थे कि विश्व के दोनों गुटों के मध्य शान्ति तथा सद्भावना का वातावरण बने। शीत-युद्ध के कारण अनेक देशों में भ्रम व्याप्त था कि यह शान्ति किसी भी समय युद्ध के रूप में भड़क सकती है। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन ने शीत युद्ध को हथियारों के युद्ध में बदलने से रोका तथा अन्तर्राष्ट्रीय जगत में व्याप्त भ्रम को दूर किया। सर्वोच्च शक्तियाँ समझ गईं कि व्यर्थ में रक्त बहाने से कोई लाभ नहीं है।

4. विश्व के संघर्षों को दूर करना – गुट-निरपेक्षता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने विश्व में होने वाले कुछ भयंकर संघर्षों को टाल दिया। धीरे-धीरे उनके निदान ढूंढ़ लिये गये। गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों ने आणविक अस्त्र के खतरों को दूर करके अन्तर्राष्ट्रीय जगत में शान्ति तथा सुरक्षा को बनाए रखने में योगदान दिया। विश्व के छोटे-छोटे विकासशील तथा विकसित राष्ट्रों को दो भागों में विभाजित होने से रोका। गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों ने सर्वोच्च शक्तियों को सदैव यही प्रेरणा दी कि “संघर्ष अपने हृदय में सर्वनाश लेकर चलता है इसलिए इससे बचकर चलने में विश्व का कल्याण है। इसके स्थान पर यदि सर्वोच्च शक्तियाँ विकासशील राष्ट्रों के कल्याण के लिए कुछ कार्य करती हैं तो इससे अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को बल मिलेगा।

5. अपनी प्रकृति के अनुसार पद्धतियों का आविष्कार करना – गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों की एक उपलब्धि यह भी है कि इसने संयुक्त राज्य अमेरिका तथा सोवियत संघ जैसे देशों की नीतियों को नकराते हुए अपनी प्रकृति के अनुकूल पद्धतियों का विकास किया। इस प्रकार भारत ने विश्व-बन्धुत्व, समाज-कल्याण तथा समाज के समाजवादी ढाँचे के अनुसार गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों को चलने के लिए प्रेरित किया।

6. आर्थिक सहयोग का वातावरण बनाना – गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों ने विकासशील राष्ट्रों के बीच अपनी विश्वसनीयता का ठोस परिचय दिया जिसके कारण विकासशील राष्ट्रों को समय-समय पर आर्थिक सहायता प्राप्त हो सकी। कोलम्बो शिखर सम्मेलन में तो आर्थिक घोषणा-पत्रे तैयार किया गया जिससे गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों के मध्य अधिक-से-अधिक आर्थिक सहयोग की स्थिति निर्मित हो सके। एक प्रकार से गुट-निरपेक्षता का आन्दोलन आर्थिक सहयोग का एक संयुक्त मोर्चा है।

7. नयी अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था की अपील – वर्तमान में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति ने नयी करवट बदली है। अत: नयी अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के सम्बन्ध में गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों की यह अपील तथा माँग है कि विश्व मंच पर ‘आर्थिक विकास सम्मेलन का आयोजन किया जाए जो विश्व में व्यापार की स्थिति सुधारे, विकासशील राष्ट्रों को व्यापार करने के अवसर प्रदान करे, ‘सामान्य पहल’ के अनुसार गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों की तकनीकी तथा प्रौद्योगिकी दोनों प्रकार का अनुदान प्राप्त हो। गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों की पहल के परिणामस्वरूप 1974 ई० में संयुक्त राष्ट्र संघ ने छठा विशेष अधिवेशन आयोजित किया जिसमें नयी अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था स्थापित करने की घोषणा का प्रस्ताव पारित किया गया। कुछ समय बाद इस घोषणा-पत्र के विषय पर विकसित राष्ट्रों ने भी विचार-विमर्श किया, जो गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।

8. निःशस्त्रीकरण तथा अस्त्र-नियन्त्रण की दिशा में भूमिका – गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के देशों ने नि:शस्त्रीकरण तथा अस्त्र-नियन्त्रण के लिए विश्व में अवसर तैयार किया। यद्यपि इस क्षेत्र में गुट-निरपेक्ष देशों को तुरन्त सफलता नहीं मिली, तथापि विश्व के राष्ट्रों को यह विश्वास होने लगा कि हथियारों को बढ़ावा देने से विश्व-शान्ति संकट में पड़ सकती है। यह गुट-निरपेक्षता का ही परिणाम है कि 1954 ई० में आणविक अस्त्र के परीक्षण पर प्रतिबन्ध लगा तथा 1963 ई० में आंशिक परीक्षण पर प्रतिबन्ध स्वीकार किए गए।

9. संयुक्त राष्ट्र संघ का सम्मान – गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों ने विश्व संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ का भी सदैव सम्मान किया, साथ ही संगठन के वास्तविक रूप को रूपान्तरित करने में भी सहयोग दिया। पहली बात तो यह है कि गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों की संख्या इतनी है कि शीत-युद्ध के वातावरण को तटस्थता की नीति के रूप में परिवर्तन करने में राष्ट्रों के संगठन की बात सुनी गई। इससे छोटे राष्ट्रों पर संयुक्त राष्ट्र संघ का नियन्त्रण सरलतापूर्वक लागू हो सका। गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के महत्त्व की वृद्धि करने में भी सहायता दी।

गुट-निरपेक्षता की विफलताएँ

गुट-निरपेक्षता की विफलताओं का अध्ययन निम्नलिखित रूपों में किया जा सकता है –

1. सिद्धान्तहीन नीति – पश्चिमी आलोचकों का कहना है कि गुट-निरपेक्षता की नीति अवसरवादी तथा सिद्धान्तहीन है। ये देश साम्यवादी तथा पूँजीवादी देशों के साथ अवसरानुकूल ‘कार्य सम्पन्न करने में निपुण हैं। अत: ये देश दोहरी चाल चलते रहते हैं। इनका कोई निश्चित ध्येय नहीं है। ये देश अधिकाधिक लाभ प्राप्त करने की गतिविधियों से नहीं चूकते हैं।

2. बाहरी आर्थिक तथा रक्षा सहायता पर निर्भरता – गुट-निरपेक्ष देशों पर विफलता का यह आरोप भी लगाया जाता है कि उन्होंने बाहरी सहायता का आवरण पूर्ण रूप से ग्रहण कर लिया है। चूंकि वे हर प्रकार की सहायता चाहते थे, इसलिए उन्होंने एक मार्ग निकालकर अपना कार्य सिद्ध करने की नीति अपना ली है। आलोचकों का कहना है कि यदि गुट-निरपेक्षता की भावना सत्य पर आधारित होती तो ये देश आत्म-निर्भरता की नीति को मानकर चलते। अतः गुट-निरेपक्ष राष्ट्रों ने स्वतन्त्रता के मार्ग में कील ठोंक दी है।

3. गुट-निरपेक्षता की नीति में सुरक्षा का अभाव – आलोचकों ने इस बात पर भी टीका टिप्पणी की है कि गुट-निरपेक्ष देश आर्थिक स्थिति सुधारने की ओर संलग्न रहते हैं। ये देश सुरक्षा को पर्याप्त नहीं मानते हैं। ऐसी दशा में यदि वे बाहरी सैनिक सहायता स्वीकार करते हैं तो उनकी गुट-निरपेक्षता धरी की धरी रह जाएगी। सन् 1962 में चीन से आक्रमण के समय भारत को यह विदित हो गया कि बाहरी शक्ति के समक्ष गुट-निरपेक्ष राष्ट्र मुँह ताकते रह जाते हैं। इस प्रकार बाहरी शक्ति का सामना करने के लिए बाहर से सैनिक सहायता पर निर्भर नहीं रहा जा सकता।

4. अव्यावहारिक सिद्धान्तों की नीति – आलोचकों के कथनानुसार गुट-निरपेक्षता के सिद्धान्त अव्यावहारिक हैं। ये व्यवहार में विफल हुए हैं। सिद्धान्तों के अनुसार गुट-निरपेक्ष देशों को स्वतन्त्रता की नीतियों को सुदृढ़ करना था, परन्तु वे अपने दायित्व को निभाने में असफल रहे। पश्चिमी राष्ट्रों का तो यहाँ तक कहना है कि गुट-निरपेक्षता साम्यवाद के प्रति सहानुभूति रखती है परन्तु विश्व राजनीति में उसे गुप्त रखना चाहती है। पं० नेहरू ने सदा साम्यवादी रूस की प्रशंसा की तथा भारत में पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण सोवियत संघ की नीतियों से प्रेरित होकर किया गया।

5. संकुचित नीति का पोषक – विदेश नीति का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत है। इस सम्बन्ध में आलोचकों का कहना है कि गुट-निरपेक्षता का सीमित वृत्त इतने व्यापक वृत्त को कैसे अपने में समेट सकता है। अतः गुट-निरपेक्ष आन्दोलन एक प्रकार से अफसल है। गुटों से बाहर रहकर विश्व राजनीति में क्रियाशीलता का प्रदर्शन करना अत्यधिक कठिन है। विश्व की सम्पूर्ण नीति गुटों के चतुर्दिक घूमती है। अतः गुटों से पृथक् रहकर कोई भी राष्ट्र विकास के पथ पर नहीं पहुँच सकता।

6. राष्ट्रहित के स्थान पर नेतागिरी की नीति – कुछ आलोचकों का मानना है कि गुट निरपेक्षता की भावना ऊर्ध्वगामी है, जबकि विश्व राजनीति की जड़ें अधोगामी हैं। ऐसी स्थिति में इस नीति के केन्द्र में राष्ट्रहित की भावना नहीं दिखाई देती है।

7. गुट-निरपेक्षता एक दिशाहीन आन्दोलन – कुछ आलोचकों का मानना है कि विश्व की नवीन मुक्त व्यापार की नीति के अन्तर्गत गुटे-निरपेक्षता का आन्दोलन निरर्थक सिद्ध हो रहा है। आज अन्तर्राष्ट्रीय रंगमंच पर सद्भावना की आवश्यकता है, अलगावाद की नहीं। गुट-र्निरपेक्षता का आन्दोलन इस दृष्टि से दिशाहीनता का प्रदर्शन मात्र बनकर रह गया है।

8. गुट-निरपेक्षता की नीति से अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं – आलोचकों का कहना है कि गुट-निरपेक्षता की नीति ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था में अभी तक कोई ठोस परिवर्तन नहीं किया है। शीत-युद्ध के समय में सारा विश्व प्रमुख शिविरों में विभक्त रहा। इन शिविरों ने गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के नेताओं के कहने में अपनी नीति में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं किया। भारत के विरोध करने के पश्चात् भी अमेरिका ने कोरिया में अभियान चलाया, चीन ने तिब्बत पर अधिकार कर लिया तथा लेबनान में अमेरिकी सेनाएँ। प्रविष्ट हो गईं। पश्चिमी एशिया में अरब-इजराइल युद्ध हुए। इस प्रकार गुट-निरपेक्षता की नीति निरर्थक सिद्ध हुई।

इस प्रकार गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का कोई ठोस आधार नहीं है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (शब्द सीमा : 150 शब्द) (4 अंक)

प्रश्न 1.
‘गुट-निरपेक्ष आन्दोलन एवं भारत पर एक टिप्पणी लिखिए।
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में भारत की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में भारत की भूमिका सदैव केन्द्रीय रही है। भारत के प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू को इस आन्दोलन का संस्थापक माना जाता है। 1947 से 1950 ई० तक पं० नेहरू के नेतृत्व में गुट-निरपेक्षता को सकारात्मक तटस्थता” के रूप में स्वीकार किया गया था। तत्पश्चात् 1977 से 1979 ई० तक मोरारजी देसाई के नेतृत्व में भारत ने अमेरिका व रूस दोनों के साथ अपने सम्बन्धों को सुधारों व= उनमें समन्वय स्थापित किया। इस काल को वास्तविक गुट-निरपेक्षता का काल कहा जाता है। 1980 ई० में भारत का नेतृत्व प्रधानमन्त्री इन्दिरा गाँधी के हाथों में सौंपा गया। इन्दिरा गाँधी के नेतृत्व में भारत ने 1983 ई० में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में भाग लिया। इस काल में इन्दिरा गाँधी द्वारा दो समस्याओं पर प्रमुख रूप से ध्यान केन्द्रित किया गया, जिसमें प्रथम, शीतयुद्ध को समाप्त करने तथा द्वितीय, परमाणु अस्त्रों की होड़ को समाप्त करने से सम्बन्धित थी। आठवाँ शिखर सम्मेलन जो जिम्बाब्वे की राजधानी हरारे में सम्पन्न हुआ, में भारत का नेतृत्व प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी द्वारा किया गया था।

इस सम्मेलन में राजीव गाँधी द्वारा विकासशील राष्ट्रों के मध्य स्वतन्त्र संचार-प्रणाली’ की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया। इसके अतिरिक्त 1989 ई० में नवें शिखर सम्मेलन के समय भारत में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार थी जिसके नेतृत्व में भारत द्वारा “पर्यावरण की सुरक्षा पर बल देते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में “पृथ्वी संरक्षण कोष’ की स्थापना का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। 1992 ई० में होने वाले दसवें शिखर सम्मेलन में भारत द्वारा विश्व की प्रमुख समस्या परमाणु नि:शस्त्रीकरण वे राष्ट्रों के मध्य आर्थिक समानता कायम करने के प्रश्न को उठाया गया। इस सम्मेलन के अन्तर्गत दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मण्डेला ने अपने अध्यक्षीय भाषण में जम्मू-कश्मीर जैसे भारत के द्विपक्षीय मसले पर बोलकर भारतीय भावनाओं के आन्दोलन की मूल भावनाओं को ठेस पहुँचायी। यद्यपि तत्कालीन भारतीय प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा नेल्सन मण्डेला के अध्यक्षीय भाषण की आलोचना की गयी व अपने कूटनीतिक चातुर्य के द्वारा उन्होंने सम्मेलन में भारत की साख को बचा लिया, परन्तु इस घटना ने भारत को भविष्य के लिए सतर्क रहने की शिक्षा दी।

प्रश्न 2.
गुटनिरपेक्षता का महत्त्व बताइए।
उत्तर :
गुटनिरपेक्षता का महत्त्व

वर्तमान विश्व के सन्दर्भ में गुटनिरपेक्षता का व्यापक महत्त्व है, जिसे निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है –

  1. गुटनिरपेक्षता ने तृतीय विश्वयुद्ध की सम्भावना को समाप्त करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
  2. गुटनिरपेक्षता राष्ट्रों ने साम्राज्यवाद का अन्त करने और विश्व में शान्ति व सुरक्षा बनाए रखने के लिए महत्त्वपूर्ण प्रयास किए हैं।
  3. गुटनिरपेक्ष के कारण ही विश्व की महाशक्तियों के मध्य शक्ति-सन्तुलन बना रही।
  4. गुटनिरपेक्ष सम्मेलनों ने सदस्य-राष्ट्रों के मध्य होने वाले युद्धों एवं विवादों का शान्तिपूर्ण ढंग से समाधान किया है।
  5. गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों ने विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में एक-दूसरे को पर्याप्त सहयोग दिया है।
  6. गुटनिरपेक्षता ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को व्यापक रूप से प्रभावित किया है।
  7. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन ने विश्व के परतन्त्र राष्ट्रों को स्वतन्त्र कराने और रंग-भेद की नीति का विरोध करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  8. यह आन्दोलन निर्धन तथा पिछड़े हुए देशों के आर्थिक विकास पर बहुत बल दे रहा है।
  9. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन राष्ट्रवाद को अन्तर्राष्ट्रवाद में परिवर्तित करने तथा द्विध्रुवीकरण को बहु-केन्द्रवाद में परिवर्तित करने का उपकरण बना।
  10. इसने सफलतापूर्वक यह दावा किया कि मानव जाति की आवश्यकता पूँजीवाद तथा साम्यवाद के मध्य विचारधारा सम्बन्धी विरोध से दूर है।
  11. इसने सार्वभौमिक व्यवस्था की तरफ ध्यान आकर्षित किया तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में शीत-युद्ध की भूमिका को कम करने तथा इसकी समाप्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  12. गुटनिरपेक्षता नए राष्ट्रों के सम्बन्धों में स्वतन्त्रतापूर्वक विदेशों से सम्बन्ध स्थापित करके तथा सदस्यता प्रदान करके उनकी सम्प्रभुता की सुरक्षा का साधन बनी है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (शब्द सीमा : 50 शब्द) (2 अंक)

प्रश्न 1.
‘गुट-निरपेक्षता की नीति के आवश्यक तत्त्व बताइए।
उत्तर :
गुट-निरपेक्षता की नीति के आवश्यक तत्त्व

सन् 1961 में बेलग्रेड में आयोजित गुट-निरपेक्ष देशों के प्रथम शिखर सम्मेलन में असंलग्नता की नीति के कर्णधारों-नेहरू, नासिर और टीटो ने इस नीति के 5 आवश्यक तत्त्व माने हैं, जो निम्नलिखित हैं

  1. सम्बद्ध देश स्वतन्त्र नीति का अनुसरण करता हो।
  2. वह उपनिवेशवाद का विरोध करता हो।
  3. वह किसी भी सैनिक गुट का सदस्य न हो।
  4. उसने किसी भी महाशक्ति के साथ द्विपक्षीय सैनिक समझौता नहीं किया हो।
  5. उसने किसी भी महाशक्ति को अपने क्षेत्र में सैनिक अड्डा बनाने की स्वीकृति न दी हो।

उपर्युक्त आवश्यक तत्त्वों के अनुसार गुट-निरपेक्षता का आशय ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में सैनिक गुट की सदस्यता या किसी भी महाशक्ति के साथ द्विपक्षीय सैनिक समझौते से दूर रहते हुए शान्ति, न्याय और राष्ट्रों की समानता के सिद्धान्त पर आधारित रीति-नीति का अवलम्बन है।

प्रश्न 2.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के उद्देश्यों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :

  1. स्वतन्त्र राष्ट्रों के मध्य पारस्परिक एकता व शान्तिपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना हेतु।
  2. नवस्वतन्त्र राष्ट्रों के मध्य व्यापारिक व तकनीकी सम्बन्धों की स्थापना करना।
  3. पर्यावरण प्रदूषण पर नियन्त्रण करना।
  4. स्वतन्त्रता की रक्षा करना।
  5. साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद व रंगभेद जैसी नीतियों का विरोध करना।
  6. मानव अधिकारों का समर्थन करना।
  7. निरस्त्रीकरण का समर्थन व युद्धों का विरोध करना।
  8. अन्तर्राष्ट्रीय तनाव को कम करने हेतु प्रयत्न करना।
  9. सैनिक गुटबन्दी से दूर रहना।
  10. परस्पर सहयोग द्वारा विकास की गति में वृद्धि करना।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
गुट-निरपेक्षता की त्रिमूर्ति से क्या आशय है?
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के दो संस्थापकों के नाम लिखिए। [2011, 13]
उत्तर :
गुट-निरपेक्षता की त्रिमूर्ति से आशय पं० जवाहरलाल (प्रधानमन्त्री भारत), कर्नल नासिर (राष्ट्रपति मिस्र) तथा मार्शल टीटो (राष्ट्रपति यूगोस्लाविया) से है।

प्रश्न 2.
गुट-निरपेक्ष देशों का प्रथम शिखर सम्मेलन कहाँ और कब सम्पन्न हुआ था? [2011]
उत्तर :
गुट-निरपेक्ष देशों का प्रथम शिखर सम्मेलन यूगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में 1961 ई० में हुआ था।

प्रश्न 3.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के प्रणेता कौन थे? [2013]
उत्तर :
गुट-निरपेक्ष की नीति के प्रणेता पं० जवाहरलाल नेहरू थे।

UP Board Solutions for Class 12 Civics गुट-निरपेक्ष आन्दोलन

प्रश्न 4.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का 12वाँ शिखर सम्मेलन कहाँ आयोजित हुआ था?
उत्तर :
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का 12वाँ शिखर सम्मेलन डरबन (दक्षिण अफ्रीका) में 1998 ई० में आयोजित हुआ था। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का 12वाँ विदेश मन्त्री सम्मेलन 1997 ई० में नयी दिल्ली में सम्पन्न हुआ था।

प्रश्न 5.
किन्हीं चार गुट-निरपेक्ष देशों के नाम अंकित कीजिए। [2007, 10, 11]
उत्तर :
भारत, मिस्र, मलेशिया एवं यूगोस्लाविया

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
गुट-निरपेक्षता की नीति का प्रतिपादन किसने किया था ?
(क) इन्दिरा गाँधी ने
(ख) पं० जवाहरलाल नेहरू ने
(ग) लाल बहादुर शास्त्री ने
(घ) राजीव गाँधी ने

प्रश्न 2.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम शिखर सम्मेलन कहाँ हुआ था ? [2013]
(क) काठमाण्डू
(ख) कोलम्बो
(ग) बेलग्रेड
(घ) नयी दिल्ली

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन-सा एक गुट-निरपेक्ष देश नहीं है ? [2011, 14]
(क) ब्रिटेन
(ख) श्रीलंका
(ग) मिस्र
(घ) इण्डोनेशिया

प्रश्न 4.
गुट निरपेक्ष आन्दोलन नरम पड़ता जा रहा है क्योंकि [2012]
(क) इसके नेतृत्व में दूरदर्शिता का अभाव है।
(ख) इसके सदस्य राष्ट्रों की सभी समस्याओं का समाधान हो गया है।
(ग) विश्व में अब एक ही गुट प्रभावशाली रह गया है।
(घ) गुट-निरपेक्षता का विचार वैश्वीकरण के कारण अप्रासंगिक हो गया है।

प्रश्न 5.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की नींव कब पड़ी? [2013]
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रारम्भ हुआ था। [2016]
(क) 1960
(ख) 1961
(ग) 1962
(घ) 1965

प्रश्न 6.
वर्ष 2012 में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का शिखर सम्मेलन कहाँ आयोजित हुआ था? [2013]
(क) इराक
(ख) ईरान
(ग) चीन
(घ) अमेरिका

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से कौन गुट-निरपेक्ष आन्दोलन से सम्बन्धित नहीं है? [2012]
(क) मिस्र के कर्नल नासिर
(ख) यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो
(ग) भारत के पं० जवाहरलाल नेहरू
(घ) चीन के चाऊ-एनलाई

प्रश्न 8.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के संस्थापक नेता कौन थे? [2015]
(क) पं० मोतीलाल नेहरू, सुहात, यासर अराफात
(ख) इंदिरा गांधी, फिडेल कास्त्रो, कैनिथ कौन्डा
(ग) नासिर, जवाहरलाल नेहरू, टीटो।
(घ) श्रीमावो भण्डारनाईके, अनवर सदात, जुलियस नायरेरे

उत्तर :

  1. (ख) पं० जवाहरलाल नेहरू ने
  2. (ग) बेलग्रेड
  3. (क) ब्रिटेन
  4. (घ) गुटनिरपेक्षता का विचार वैश्वीकरण के कारण अप्रासंगिक हो गया है
  5. (ख) 1961
  6. (ख) ईरान
  7. (घ) चीन के चाऊ-एनलाई
  8. (ग) नासिर, जवाहरलाल नेहरू, टीटो।

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UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 10 Non-Alignment

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Civics
Chapter Chapter 10
Chapter Name Non-Alignment (गुट-निरपेक्षता)
Number of Questions Solved 29
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 10 Non-Alignment (गुट-निरपेक्षता)

विस्तृत उत्तीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1.
गुट-निरपेक्षता की नीति के प्रमुख तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
या
गुट-निरपेक्षता का महत्त्व स्पष्ट कीजिए। [2010, 16]
या
गुट-निरपेक्षता का क्या अर्थ है? वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के सन्दर्भ में उसकी प्रासंगिकता का परीक्षण कीजिए। [2015]
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की प्रासंगिकता पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [ 2012, 13, 15]
या
गुट-निरपेक्षता की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। वर्तमान समय में यह कहाँ तक प्रासंगिक [2010, 11]
या
गुट-निरपेक्षता पर एक निबन्ध लिखिए। [2008]
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए [2016]
उत्तर
गुट-निरपेक्षता
द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् सम्पूर्ण विश्व दो गुटों में बँट गया। एक गुट का नेतृत्व अमेरिका ने किया और दूसरे गुट का सोवियत संघ (रूस) ने। दोनों गुटों में अनेक कारणों को लेकर भीषण शीतयुद्ध प्रारम्भ हो गया। यूरोप और एशिया के अधिकांश देश इस गुटबन्दी में फंस गये और वे किसी-न-किसी गुट में सम्मिलित हो गये। 15 अगस्त, 1947 को जब भारत स्वतन्त्रं हुआ तो भारत के नेताओं को अपनी विदेश नीति का निर्माण करने का अवसर प्राप्त हुआ। भारत की विदेश नीति के निर्माता पं० जवाहरलाल नेहरू थे। उन्होंने अपनी विदेश-नीति का आधार गुट-निरपेक्षता (NonAlignment) को बनाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि “हम किसी गुट में सम्मिलित नहीं हो सकते, क्योकि हमारे देश में आन्तरिक समस्याएँ इतनी अधिक हैं कि हम दोनों गुटों से सम्बन्ध बनाये बिना उन्हें सुलझा नहीं सकते। धीरे-धीरे गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने वाले देशों की संख्या में वृद्धि होती गयी। सन् 1961 में बेलग्रेड में हुए गुट-निरपेक्ष देशों के प्रथम शिखर सम्मेलन में केवल 25 देशों ने भाग लिया था, किन्तु अब इनकी संख्या 120 हो गयी है।

गुट-निरपेक्षता का अर्थ व परिभाषा
गुट-निरपेक्षता की कोई सर्वमान्य व सर्वसम्मत परिभाषा उपलब्ध नहीं है, फिर भी गुटनिरपेक्षता की प्रकृति, तत्त्व तथा अर्थ के आधार पर इसकी परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है-“किसी भी राजनीतिक अथवा सैनिक गुट से संलग्न हुए बिना स्वतन्त्रता, शान्ति तथा सामाजिक न्याय के कार्य में योगदान देना ही गुट-निरपेक्षता है।” गुट-निरपेक्षता की नीति से अभिप्राय है। विभिन्न शक्तियों या गुटों से अप्रभावित रहते हुए अपनी स्वतन्त्र नीति अपनाना और राष्ट्रीय हितों के अनुसार न्याय का समर्थन देना।

कुछ लोग गुट-निरपेक्षता की नीति को, ‘तटस्थता’ की संज्ञा देते हैं, जो उचित नहीं है। इस सम्बन्ध में 1949 ई० में पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने अमेरिकी जनता के समक्ष स्पष्ट रूप से कहा था-“जब स्वतन्त्रता के लिए संकट उत्पन्न हो, न्याय पर आघात पहुँचे या आक्रमण की घटना घटित हो, तब हम तटस्थ नहीं रह सकते और न ही हम तटस्थ रहेंगे।”
जॉर्ज लिस्का ने लिखा है कि “किसी विवाद के सन्दर्भ में यह जानते हुए कि कौन सही है। और कौन गलत, किसी का पक्ष न लेना ‘तटस्थता’ है, किन्तु गुट-निरपेक्षता का अर्थ है सही और गलत में भेद करना तथा सदैव सही नीति का समर्थन करना।

गुट-निरपेक्षता की नीति के प्रमुख तत्त्व
गुट-निरपेक्षता की नीति के प्रमुख तत्त्व निम्नवत् हैं-

1. राष्ट्रवाद की भावना – एशियाई-अफ्रीकी देशों ने राष्ट्रवाद की भावना के आधार पर एक लम्बे संघर्ष के बाद यूरोपियन साम्राज्यवाद से मुक्ति प्राप्त की थी। ऐसी स्थिति में सबसे पहले भारत और बाद में अन्य देशों ने स्वाभाविक रूप से सोचा कि किसी शक्ति गुट की सदस्यता को स्वीकार कर लेने पर अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में वे उसके पिछलग्गू बन जायेंगे, जिससे उनके आत्म-सम्मान, राष्ट्रवाद और सम्प्रभुता को आघात पहुँचेगा। इस प्रकार राष्ट्रवाद की भावना ने उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में स्वतन्त्र मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया।

2. साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध – भारत और अन्य एशियाई-अफ्रीकी देशों ने लम्बे समय तक साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के अत्याचार भोगे थे और साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद के प्रति उनकी विरोध भावना बहुत अधिक तीव्र थी। उन्होंने सही रूप में यह महसूस किया कि दोनों ही शक्ति गुटों के प्रमुख नव-साम्राज्यवादी हैं। तथा साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध करने के लिए शक्ति गुटों से अलग रहना बहुत अधिक आवश्यक है।

3. शान्ति के लिए तीव्र इच्छा – लम्बे संघर्ष के बाद स्वतन्त्रता प्राप्त करने वाले एशियाई अफ्रीकी देशों ने सत्य रूप में महसूस किया कि यूरोपीय देशों की तुलना में उनके लिए शान्ति बहुत अधिक आवश्यक है। उन्होंने यह भी सोचा कि उनके लिए युद्ध और तनाव की सम्भावना बहुत कम हो जायेगी, यदि वे अपने आपको शक्ति गुटों से अलग रखें।

4. आर्थिक विकास की लालसा – नवोदित राज्य शस्त्रास्त्रों की प्रतियोगिता से बचकर अपने देश का आर्थिक पुनर्निर्माण करना चाहते हैं। आर्थिक पुनर्निर्माण तीव्र गति से हो सके, इसके लिए विकसित राष्ट्रों से आर्थिक और तकनीकी सहयोग प्राप्त करना जरूरी है। गुट-निरपेक्षता का मार्ग अपनाकर ही कोई राष्ट्र बिना शर्त विश्व की दोनों महाशक्तियों-साम्यवादी और पूँजीवादी गुटों से आर्थिक एवं तकनीकी सहायता प्राप्त कर सकता था।

5. जातीय एवं सांस्कृतिक पक्ष – गुट-निरपेक्षता की नीति की एक प्रेरक तत्त्व जातीय एवं सांस्कृतिक पक्ष’ भी है। गुट-निरपेक्षता की नीति के अधिकांश समर्थक यूरोपियन राष्ट्रों का शोषण भुगत चुके हैं और अश्वेत जाति के हैं। इनमें सांस्कृतिक एवं जातीय समानताएँ भी विद्यमान हैं और कमजोर ही सही, लेकिन समानताओं ने उन्हें शक्ति गुटों से अलग रहने के लिए प्रेरित किया है।

गुट-निरपेक्षता का महत्त्व
वर्तमान विश्व के सन्दर्भ में गुट-निरपेक्षता का व्यापक महत्त्व है, जिसे निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. गुट-निरपेक्षता ने तृतीय विश्वयुद्ध की सम्भावना को समाप्त करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया
  2. गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों ने साम्राज्यवाद का अन्त करने और विश्व में शान्ति व सुरक्षा बनाए रखने के लिए महत्त्वपूर्ण प्रयास किए हैं।
  3. गुट-निरपेक्षता के कारण ही विश्व की महाशक्तियों के मध्य शक्ति सन्तुलन बना रहा।
  4. गुट-निरपेक्ष सम्मेलनों ने सदस्य राष्ट्रों के मध्य होने वाले युद्धों एवं विवादों का शान्तिपूर्ण ढंग से समाधान किया है।
  5. गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों ने विज्ञान व तकनीकी के क्षेत्र में एक-दूसरे को पर्याप्त सहयोग दिया है।
  6. गुट निरपेक्षता ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को व्यापक रूप से प्रभावित किया है।
  7. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन ने विश्व के परतन्त्र राष्ट्रों को स्वतन्त्र कराने और रंग-भेद की नीति का विरोध करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  8. यह आन्दोलन निर्धन तथा पिछड़े हुए देशों के आर्थिक विकास पर बहुत बल दे रहा है।
  9. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन राष्ट्रवाद को अन्तर्राष्ट्रवाद में परिवर्तित करने तथा द्विध्रुवीकरण को बहु-केन्द्रवाद में परिवर्तित करने का उपकरण बना।
  10. इसने सफलतापूर्वक यह दावा किया कि मानव जाति की आवश्यकता पूँजीवाद तथा साम्यवाद के मध्य विचारधारा सम्बन्धी विरोध से दूर है।
  11. इसने सार्वभौमिक व्यवस्था की तरफ ध्यान आकर्षित किया तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में शीत युद्ध की भूमिका को कम करने तथा इसकी समाप्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  12. गुट-निरपेक्षता नए राष्ट्रों के सम्बन्धों में स्वतन्त्रापूर्वक विदेशों से सम्बन्ध स्थापित करके तथा सदस्यता प्रदान करके उनकी सम्प्रभुता की सुरक्षा का साधन बनी है।

गुट-निरपेक्षता का मूल्यांकन
गुटनिरपेक्षता पर आधारित विचारधारा का उदय उन परिस्थितियों में हुआ जब सम्पूर्ण विश्व दो गुटों में विभक्त हो गया था। इस प्रकार की स्थिति, सम्पूर्ण विश्व के लिए किसी भी समय खतरनाक सिद्ध हो सकती थी। यह गुटनिरपेक्षता पर आधारित नीति का ही परिणाम है कि वर्तमान विश्व तीसरे विश्वयुद्ध की आशंका को कम करने में काफी सीमा तक सफल हो सका है। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के माध्यम से, विश्वयुद्ध को आमन्त्रित करने वाली प्रत्येक स्थिति की प्रबल विरोध किया जाता रहा है और विश्व-शान्ति की दिशा में अनेक सराहनीय प्रयास किए गए हैं। साम्राज्यवादी प्रवृत्ति के उन्मूलन, विभिन्न देशों में स्वतन्त्रता के लिए किए गए संघर्ष को सफल बनाने, रंगभेद की नीति का अन्त करने, विश्व में शक्ति सन्तुलन बनाए रखने तथा पिछड़े देशों की प्रगति हेतु समन्वित रूप से प्रयास करने की दिशा में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की अनेक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ रही हैं। यही नहीं, पारस्परिक निर्भरता के आधुनिक युग में एक-दूसरे की प्रगति हेतु सहयोग प्राप्त करने तथा विश्व को भावी उपनिवेशवादी शक्तियों के ध्रुवीकरण से बचाए रखने की दृष्टि से भी गुटनिरपेक्षता का अस्तित्व बने रहना परम आवश्यक है। सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् यद्यपि गुटनिरपेक्षता की नीति पर प्रश्न-चिह्न लग गया है परन्तु वर्तमान समय में भी इसके सदस्य राष्ट्रों में सहयोगात्मक की भावना प्रफुल्लित हो रही है। इसके सदस्य राष्ट्रों की संख्या कम होने के स्थान पर निरन्तर बढ़ती जा रही है।

प्रश्न 2.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में भारत के योगदान का परीक्षण कीजिए।
उत्तर
गुट-निरपेक्षता में भारत का योगदान
गुट-निरपेक्षता के विकास में भारत का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत की विदेश नीति का प्रमुख सिद्धान्त ही गुट-निरपेक्षता है। सर्वप्रथम भारत ने ही एशिया तथा अफ्रीका के नवोदित स्वतन्त्र राष्ट्रों को परस्पर एकता और सहयोग के सूत्र में बाँधने का प्रयास किया था। ‘बांडुंग सम्मेलन’ में भारत के प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस प्रकार भारत गुट-निरपेक्षता का अग्रणी रहा है। पं० जवाहरलाल नेहरू का कथन था कि “चाहे कुछ भी हो जाए, हम किसी भी देश के साथ सैनिक सन्धि नहीं करेंगे। जब हम गुट-निरपेक्षता का विचार छोड़ते हैं तो हम अपना संसार छोड़कर हटने लगते हैं। किसी देश से बँधना-आत्म-सम्मान का खोना तथा अपनी बहुमूल्य नीति का अनादर करना है।’ पं० नेहरू के बाद श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने गुट-निरपेक्षता के विकास को अग्रसरित किया। प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने सातवें सम्मेलन (1983) में नई दिल्ली में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की अध्यक्षता ग्रहण की थी। श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने अपने एक भाषण में कहा था कि “गुट-निरपेक्षता अपने आप में एक नीति है। यह केवल एक लक्ष्य ही नहीं, इसके पीछे उद्देश्य यह है कि निर्णयकारी स्वतन्त्रता और राष्ट्र की सच्ची भक्ति तथा बुनियादी हितों की रक्षा की जाए।

प्रधानमन्त्री श्री राजीव गाँधी भी गुट-निरपेक्ष आन्दोलन को प्रभावशाली बनाने के लिए कृतसंकल्प थे। 15 अगस्त, 1986 को श्री राजीव गाँधी ने कहा था कि “भारत की गुट-निरपेक्षता की नीति के कारण ही भारत का विश्व में आदर है। भारत बोलता है तो वह आवाज सौ करोड़ लोगों की होती है। गुट-निरपेक्षता के मार्ग पर चलकर भारत आज बिना किसी दबाव के बोलता है। उसके साथ संसार के दो-तिहाई गुट-निरपेक्ष देशों की आवाज होती है।”

नवे शिखर सम्मेलन (सितम्बर 1989 ई०) में प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी ने कहा था कि गुटनिरपेक्ष आन्दोलन तभी गतिशील रह सकता है, जब यह उन्हीं सिद्धान्तों पर चले, जिन पर चलने का वायदा यहाँ 1961 ई० में प्रथम सम्मेलन में सदस्यों ने किया था। ग्यारहवें शिखर सम्मेलन में भारत ने दो बातों के प्रसंग में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की। भारत ने आणविक शस्त्रों पर आणविक शाक्तियों के एकाधिकार का विरोध किया। बारहवें सम्मेलन में भारत और पाकिस्तान की आणविक विस्फोट के लिए आलोचना की गयी। सम्मेलन में सम्मेलन के अध्यक्ष नेल्सन मण्डेला द्वारा कश्मीर समस्या का उल्लेख किये जाने पर भारत द्वारा कड़ी आपत्ति की गयी। भारत की आपत्ति को दृष्टि में रखते हुए नेल्सन मण्डेला ने अपना वक्तव्य वापस ले लिया। तेरहवें शिखर सम्मेलन में प्रधानमन्त्री वाजपेयी ने सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता हेतु भी पहल की। प्रधानमन्त्री वी०पी० सिंह भी गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के प्रबल समर्थक रहे हैं और तत्पश्चात् प्रधानमन्त्री चन्द्रशेखर भी। इस आन्दोलन को सफल बनाने के लिए प्रयत्नशील थे। प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव ने भी इसी नीति को जारी रखा। इसके बाद प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार देश की सुरक्षा और अखण्डता के मुद्दे पर समयानुसार विदेश नीति निर्धारित करने के लिए दृढ़ संकल्प थी। वर्तमान में प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी भी इसी नीति को जारी रखे हुए हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न (शब्द सीमा : 150 शब्द) (4 अंक)

प्रश्न 1.
गुट-निरपेक्षता की प्रेरक शक्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
गुटनिरपेक्षता की प्रेरक शक्तियाँ
गुट निरपेक्षता की प्रेरक शक्तियाँ निम्नलिखित हैं-

  1. गुट निरपेक्षता की प्रमुख प्रेरक-शक्ति राष्ट्रवाद की भावना है। राष्ट्रवाद तथा गुट-निरपेक्षता के मध्य सहयोग से स्पष्ट है कि नवोदित राष्ट्रों के नेता अपनी गुट-निरपेक्षता के समर्थन में राष्ट्रवाद का सहारा लेते रहे हैं।
  2. गुट-निरपेक्षता की दूसरी प्रेरक-शक्ति उपनिवेशवाद का विरोध करना है। बाण्डंग सम्मेलन में इस तथ्य को स्वीकार किया गया था कि यदि किसी राष्ट्र को सैनिक-संगठन में सम्मिलित होने को बाध्य करने वाली कोई स्थिति नहीं है, तो उपनिवेश विरोधी भावना उसे गुट-निरपेक्षता की दिशा में प्रेरित करेगी।
  3. गुट-निरपेक्षता की तीसरी प्रेरक-शक्ति नवोदित राज्यों की अर्द्ध-विकसित अवस्था है। इन राष्ट्रों की रुचि शास्त्रों की प्रतियोगिता से बचकर आर्थिक पुनर्निर्माण में अधिक है और केवल गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाकर ही ये राष्ट्र शक्तिशाली गुटों से आर्थिक सहायता प्राप्त कर सकते हैं। गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों का तर्क है कि उन्हें जो भी सहायता विकसित राष्ट्रों से प्राप्त हो रही है वह उनका अधिकार है, न कि उन पर कोई अहसान।
  4. गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने का एक कारण जातीय तथा सांस्कृतिक पहलू भी है। इस नीति के समर्थक मुख्यत: अफ्रीकी तथा एशियाई देश हैं, जिनका यूरोपीय राष्ट्रों द्वारा आर्थिक शोषण किया गया था और इन पर राजनीतिक प्रभुत्व रहा। ये गुट-निरपेक्ष राष्ट्र अश्वेत हैं और जातीय तथा सांस्कृतिक दृष्टि से उनमें बहुत कुछ समानता है। वे समान रूप से किसी बड़ी शक्ति के अधीन नहीं रहना चाहते हैं।

प्रश्न 2.
आज के विश्व की बदलती हुई परिस्थितियों में गुट-निरपेक्षता के भविष्य का आकलन कीजिए।
उत्तर
विश्व की बदलती हुई परिस्थितियों में गुट-निरपेक्षता का स्वरूप भी बदला है और इसका महत्त्व पहले से अधिक हो गया है। गुट-निरपेक्षता विश्व राजनीति में राष्ट्रों के लिए एक नये विकल्प के रूप में निश्चय ही स्थायी रूप धारण कर चुकी है। इसने विशेषतया राष्ट्र-समाज के छोटे-छोटे और अपेक्षाकृत कमजोर सदस्यों के सन्दर्भ में राष्ट्रों की स्वतन्त्रता और समता बनाये रखने में योग दिया है। यही कारण है कि आज गुट-निरपेक्षता का पालन करने वाले राष्ट्रों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र में गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों की आवाज प्रबल बन सकी है।
कहा जाता है कि गुट-निरपेक्षता को प्रादुर्भाव शीतयुद्ध के परिप्रेक्ष्य में हुआ था और शीतयुद्ध की समाप्ति के साथ गुट-निरपेक्ष आन्दोलन अप्रासंगिक हो गया है तथा इसको औचित्य नहीं रह गया है।

वास्तव में, वर्तमान समय में शीतयुद्ध का तो अन्त हो गया है, लेकिन बदलती हुई अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के अनेक क्षेत्रों में तनाव की स्थितियाँ बनी हुई हैं। महाशक्ति के रूप में अमेरिका तथा विश्व के अन्य कुछ शक्तिशाली देश आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में ‘नव-साम्राज्यवाद की नीति अपनाने की ओर उन्मुख हैं। इस स्थिति में आर्थिक रूप से पिछड़े हुए गुट-निरपेक्ष देशों को बचाने के लिए यह आवश्यक है कि विकसित और विकासशील देशों के बीच सार्थक वार्ता के लिए दबाव डाला जाए और विकासशील देशों के साथ पारस्परिक सहयोग सुदृढ़ और सक्रिय बनाया जाए। इसके लिए निर्गुट आन्दोलन एक अपरिहार्य मंच है।

UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 10 Non-Alignment

प्रश्न 3.
गुट-निरपेक्षता तथा तटस्थता के मध्य अन्तर बताइए।
उत्तर
कुछ विद्वान गुट-निरपेक्षता को तटस्थता की स्थिति मानते हैं, परन्तु यह तटस्थता से बिल्कुल पृथक् नीति है। तटस्थता तथा गुट-निरपेक्षता की यदि गम्भीरता से तुलना की जाए तो निम्नलिखित अन्तर सामने आते हैं-

  1. तटस्थता दो आक्रामकों तथा उनके मध्य संघर्ष के प्रति उदासीनता के दृष्टिकोण का दावा करता है। गुट-निरपेक्षता ऐसा कुछ नहीं करती है। इसके विपरीत, यह प्रत्येक समस्या का उसके गुण के आधार पर न्याय करती है तथा अपने स्वतन्त्र मत की घोषणा करती है।
  2. तटस्थता से आशय एकाकीपन की अवस्था से है, जबकि गुट-निरपेक्षता विकासशील देशों की जनता को अपना भविष्य निर्मित करने में सहायता देती है। न तो वह स्विट्जरलैण्ड या स्वीडन की स्थायी तटस्थता है और न अमेरिका का सकारात्मक एकाकीपन है।
  3. गुट-निरपेक्षता तटस्थता नहीं है, क्योंकि वह अपने दृष्टिकोणों तथा विचारों में सकारात्मक है। गुट-निरपेक्षता से आशय अन्तर्ग्रस्त होने से मुक्ति नहीं है, बल्कि यह अन्तर्ग्रस्त होने की अपरिहार्यता से उत्पन्न होती है।
  4. स्विस सरकार के लिए विपरीत गुट-निरपेक्ष राष्ट्र बिना गुट का निर्माण किए हुए विश्व की समस्याओं पर सहयोग करते हैं। उदाहरण के लिए, कांगो, स्वेज, क्यूबा, खाड़ी युद्ध संकट आदि।
  5. तटस्थता में जहाँ नकारात्मक प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होती है और यह केवल एक वास्तविक युद्ध की अवधि तक ही सीमित है, वहाँ गुट-निरपेक्षता का विचार सक्रिय, सकारात्मक तथा निश्चित है।

तटस्थता का परिवर्तनशील सिद्धान्त गुट-निरपेक्षता के विचार को शीतयुद्ध अथवा परमाणु सन्धि की अवधि में ही अपने अन्तर्गत समाहित किए हुए है। संक्षेप में, गुट-निरपेक्षता एक सकारात्मक तटस्थता ही है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (शब्द सीमा : 50 शब्द) (2 अंक)

प्रश्न 1.
गुट-निरपेक्षता की नीति की चार विशेषताएँ लिखिए। [2007, 14]
या
गुट-निरपेक्षता के प्रमुख लक्षण लिखिए।
उत्तर
गुट-निरपेक्षता के प्रमुख लक्षण (विशेषताएँ)
गुट-निरपेक्षता के प्रमुख लक्षण अथवा विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  1. शक्ति गुटों से पृथक् रहना और महाशक्तियों के साथ किसी प्रकार का सैनिक समझौता न करना।
  2. स्वतन्त्र विदेश नीति का निर्धारण करना।
  3. शान्ति एवं सद्भावना की नीति का विस्तार करना।
  4. साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, शोषण एवं आधिपत्य का विरोध करना।
  5. विकासशील नीति का अनुसरण करना।
  6. गुट-निरपेक्षता आन्दोलन संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यों में सहयोगात्मक भूमिका का निर्वाह करता है।
  7. गुट-निरपेक्षता एक सकारात्मक तटस्थता है।

प्रश्न 2.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के चार आधारभूत तत्त्वों का उल्लेख कीजिए। [2010]
या
गुट-निरपेक्षता के आवश्यक तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
सन् 1961 में बेलग्रेड में आयोजित गुट-निरपेक्ष देशों के प्रथम शिखर सम्मेलन में असंलग्नता की नीति के कर्णधारों-नेहरू, नासिर और टीटो ने इस नीति के 5 आवश्यक (आधारभूत) तत्त्व माने हैं, जो निम्नलिखित हैं-

  1. सम्बद्ध देश स्वतन्त्र नीति का अनुसरण करता हो;
  2. वह उपनिवेशवाद का विरोध करता हो;
  3. वह किसी भी सैनिक गुट का सदस्य न हो;
  4. उसने किसी भी महाशक्ति के साथ द्विपक्षीय सैनिक समझौता नहीं किया हो;
  5. उसने किसी भी महाशक्ति को अपने क्षेत्र में सैनिक अड्डा बनाने की स्वीकृति न दी हो।

उपर्युक्त आधारभूत तत्त्वों के अनुसार, “अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में सैनिक गुट की सदस्यता या किसी भी महाशक्ति के साथ द्विपक्षीय सैनिक समझौते से दूर रहते हुए शान्ति, न्याय और राष्ट्रों की समानता के सिद्धान्त पर आधारित स्वतन्त्र रीति-नीति का अवलम्बन करना ही गुट-निरपेक्षता है।”

प्रश्न 3.
गुट-निरपेक्षता की नीति के प्रेरक तत्त्व के रूप में शीतयुद्ध का वर्णन कीजिए।
उत्तर
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् अमेरिका और रूस जैसी महाशक्तियों के बीच मतभेदों की एक ऐसी खाई उत्पन्न हो गयी थी और दोनों गुट एक-दूसरे के विरोध में इस प्रकार सक्रिय थे कि इसे शीतयुद्ध का नाम दिया गया। शीतयुद्ध के इस वातावरण में एशिया और अफ्रीका के नव-स्वतन्त्र राष्ट्रों ने किसी भी पक्ष का समर्थन न करके पृथक् रहने का निर्णय किया। शीतयुद्ध से पृथक् रहने की नीति ही आगे चलकर गुट-निरपेक्षता के नाम से पुकारी जाने लगी।

प्रश्न 4.
गुट-निरपेक्ष नीति का सार है ‘स्वतन्त्र विदेश-नीति’। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
गुट-निरपेक्षता का अभिप्राय यह है कि सम्बद्ध देश अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में किसी शक्ति गुट के साथ बँधा हुआ नहीं है, अपितु उसका स्वतन्त्र पथ है जो न्याय, सत्य, शान्ति और औचित्य पर आश्रित है। जिन देशों ने गुट-निरपेक्षता का मार्ग चुना है वे अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में किसी के पिछलग्गू नहीं होते, वरन् स्वयं अपनी दिशा का निर्धारण करते हैं। अल्जीरिया के प्रधानमन्त्री बिन बिल्लाह ने स्पष्ट कहा था, “हम किसी से बँधे नहीं …….. गुट| निरपेक्षता से भी नहीं।’

प्रश्न 5.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की चार उपलब्धियों का उल्लेख कीजिए।
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के किन्हीं दो लाभों का उल्लेख कीजिए। [2008]
उत्तर
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की चार उपलब्धियाँ निम्नलिखित हैं-

  1. गुट निरपेक्षता को दोनों गुटों द्वारा मान्यता,
  2. निरस्त्रीकरण और अस्त्र-नियन्त्रण की दिशा में प्रगति,
  3. शीतयुद्ध की तीव्रता में कमी तथा
  4. संयुक्त राष्ट्र संघ के स्वरूप को रूपान्तरित करना।

प्रश्न 6.
वर्तमान में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन किन चार क्षेत्रों में बल दे रहा है?
उत्तर
वर्तमान में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन निम्नलिखित चार क्षेत्रों में बल दे रहा है-

  1. नवीन अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था की माँग करना।
  2. आणविक निरस्त्रीकरण के लिए दबाव बनाना।
  3. विकसित और विकासशील देशों के बीच सार्थक वार्ता के लिए दबाव डालना।
  4. सुरक्षा परिषद् का विस्तार, विशेषता या परिषद् के स्थायी सदस्यों की संख्या में वृद्धि।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
गुट-निरपेक्षता के कर्णधार कौन थे?
उत्तर
भारत के प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू गुट-निरपेक्षता के कर्णधार और प्रणेता थे।

प्रश्न 2.
गुट-निरपेक्षता की त्रिमूर्ति में कौन-कौन लोग थे?
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के दो संस्थापक नेताओं के नाम बताइए। [2009, 11, 13]
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के किसी एक संस्थापक का नाम लिखिए। [2013]
उत्तर
भारत के प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू, यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टोटो तथा मिस्र के राष्ट्रपति कर्नल नासिर।

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प्रश्न 3.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर

  1. शक्तिशाली गुटों से पृथक् रहना तथा सैन्य गुटों में सम्मिलित न होना तथा
  2. शान्ति की नीति का पालन करना।

प्रश्न 4.
गुट-निरपेक्षता और तटस्थता में अन्तर बताइए।
उत्तर
किसी विवाद में यह जानते हुए कि कौन सही है तथा कौन गलत, किसी का पक्ष न लेना तटस्थता कहलाती है, किन्तु गलत और सही में भेद करते हुए सदैव सही का पक्ष लेना गुटनिरपेक्षता है।

प्रश्न 5.
गुट-निरपेक्ष से क्या आशय है?
उत्तर
गुट निरपेक्ष से आशय है–सैनिक गुटों से अलग रहते हुए अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में स्वतन्त्र नीति अपनाना।

प्रश्न 6.
NAM से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
NAM का अर्थ है- Non-Aligned Movement अर्थात् गुट-निरपेक्ष आन्दोलन।

प्रश्न 7.
तेरहवाँ गुट-निरपेक्ष शिखर सम्मेलन कहाँ आयोजित किया गया?
उत्तर
तेरहवाँ गुट-निरपेक्ष शिखर सम्मेलन कुआलालम्पुर (मलेशिया–फरवरी, 2003 ई०) में आयोजित किया गया था।

प्रश्न 8.
दो गुट-निरपेक्ष देशों के नाम बताइए। [2010, 11]
उत्तर

  1. भारत तथा
  2. मिस्र।

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प्रश्न 9.
उस भारतीय का नाम लिखिए जो गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का संस्थापक था। [2011]
उत्तर
पं० जवाहरलाल नेहरू।

प्रश्न 10.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम शिखर सम्मेलन किस नगर और किस देश में हुआ?
उत्तर
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम सम्मेलन बेलग्रेड नामक नगर में हुआ, जो यूगोस्लाविया की राजधानी है।

प्रश्न 11.
सन् 2006 में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का शिखर सम्मेलन कहाँ हुआ था? [2016]
उत्तर
हवाना (क्यूबा) में।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

1. प्रथम गुट-निरपेक्ष शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ था- [2008]
या
असंलग्न देशों की प्रथम बैठक हुई थी-
(क) 1945 ई० में
(ख) 1950 ई० में
(ग) 1961 ई० में
(घ) 1962 ई० में

2. प्रथम गुट-निरपेक्ष शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था- [2007, 08, 13, 14]
(क) काहिरा, 1964 में
(ख) हवाना, 1979 में
(ग) बेलग्रेड, 1961 में
(घ) लुसाका, 1970 में

3. दसवाँ गुट-निरपेक्ष शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था-
(क) हरारे में।
(ख) जकार्ता में
(ग) कार्टाजेना में
(घ) डरबन में

4. तेरहवाँ गुट-निरपेक्ष शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था-
(क) नयी दिल्ली में
(ख) कुआलालम्पुर में
(ग) डरबन में
(घ) कोलम्बो में

5. निम्नलिखित नेताओं में से कौन गुट-निरपेक्ष आन्दोलन से सम्बन्धित नहीं है? [2007, 10, 12, 15]
(क) नेहरू
(ख) नासिर
(ग) टीटो
(घ) स्टालिन

6. सोलहवाँ गुट-निरपेक्ष शिखर सम्मेलन कहाँ सम्पन्न हुआ? [2013]
(क) बेलग्रेड
(ख) नई दिल्ली
(ग) डरबन
(घ) तेहरान

7. वर्तमान समय में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में शामिल राष्ट्रों की संख्या कितनी है? [2016]
(क) 114
(ख) 116
(ग) 120
(घ) 124

उत्तर

  1. (ग) 1961 ई० में,
  2. (ग) बेलग्रेड, 1961 में,
  3. (ख) जकार्ता में,
  4. (ख) कुआलालम्पुर में,
  5. (घ) स्टालिन,
  6. (घ) तेहरान,
  7. (ग) 120.

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UP Board Class 12 Biology Model Papers Paper 1

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Biology
Model Paper Paper 1
Category UP Board Model Papers

UP Board Class 12 Biology Model Papers Paper 1

पूर्णाक : 70
समय : 3 : घण्टे 15 मिनट

निर्देश प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्न-पत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं।
नोट

• सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
• आवश्यकतानुसार अपने उत्तरों की पुष्टि नामांकित रेखाचित्रों द्वारा कीजिए।
• सभी प्रश्नों के निर्धारित अंक उनके सम्मुख अंकित हैं।

प्रश्न 1.
सही विकल्प चुनकर अपनी उत्तर पुस्तिका में लिखिए। [1]
(क)अगुणित कोशिका है
(A) टेपीटम
(B) पराग मातृ कोशिका
(C) पराग कण
(D) पराग कोष

(ख) मनुष्य में सन्तान का लिंग निर्धारण होता है। [1]
(A) माँ के लिंग गुणसूत्र से
(B) अण्डाणु के माप से
(C) शुक्राणु के माप से
(D) पिता के लिंग गुणसूत्र से

(ग) निम्नलिखित में कौन वायु प्रदूषक गैस है और अम्लीय वर्षा बनाती है? [1]
(A) सल्फर डाई ऑक्साइड
(B) ऑक्सीजन
(C) नाइट्रोजन
(D) हाइड्रोजन

(घ) जेनेटिक इंजीनियरिंग का उपयोग होता है? [1]
(A) चिकित्सा में
(B) कृषि क्षेत्र में
(C) इन दोनों में
(D) इनमें से किसी में नहीं।

प्रश्न 2.
(क) एक आवृतबीजी पुष्प के उन अंगों के नाम लिखिए जहाँ नर . एवं मादा युग्मकोभिद् का विकास होता है [1]
(ख) उस एन्जाइम का नाम लिखिए जो DNA अणु को खण्डों में तोड़ देता है। [1]
(ग) उन कोशिकाओं को नाम लिखिए जो विकसित हो रहे शुक्राणुओं को पोषण प्रदान करती है [1]
(घ) एक खाद्य श्रृंखला में सर्वाधिक संख्या किसकी होती है? [1]
(ङ) क्लाइनफेल्टर एवं टर्नर सिण्ड्रोम में गुणसूत्रों की संख्या लिखिए [1]

प्रश्न 3.
(क) वाट्सन तथा ‘क्रिक द्वारा प्रस्तुत DNA के द्विकुण्डलित मॉडल का स्वच्छ एवं नामांकित चित्र बनाइए। [2]
(ख) जैव विकास किसे कहते हैं?
(ग) आर्किड पौधा आम के पेड़ की शाखा पर उग रहा है। आर्किड और आम के पेड़ के बीच पारस्परिक क्रिया को आप कैसे स्पष्ट करेंगे? [2]
(घ) एक स्थलीय पारितन्त्र में अपघटन चक्र का आरेखीय निरूपण कीजिए। [2]
(ङ) मौन (मधुमक्खी) पालन का हमारे जीवन में क्या महत्व है?

प्रश्न 4.
(क) एक संकर क्रॉस का प्रयोग करते हुए प्रभाविता नियम की व्याख्या कीजिए। [3]
(ख) कायिक प्रवर्धन से आप क्या समझते हैं? कोई दो उपयुक्त उदाहरण दीजिए। [2 + 4]
(ग) निम्नलिखित में विभेद कीजिए [1/2 +1/2]

  1. सहज जन्मजात और उपार्जित प्रतिरक्षा
  2. सक्रिय और निष्क्रिय प्रतिरक्षा

(घ) वाहित मल हमारे लिए किस प्रकारे हानिप्रद है? [3]

प्रश्न 5.
(क) टिप्पणी लिखिए। [1/2 +1/2].

  1. PCR
  2. प्रतिबन्ध एन्जाइम

(ख) निम्नलिखित में अन्तर कीजिए [1/2 + 1/2]

  1. उत्पादक एवं उपभोक्ता
  2. प्रभाविता एवं अप्रभाविता

(ग) हमारे समाज में लडकियाँ पैदा होने पर, दोष केवल महिलाओं को दिया जाता है? बताइए कि यह क्यों सही नहीं है? [3]
(घ) जैव-प्रौद्योगिकी का कृषि क्षेत्र में क्या उपयोग है? [3]

प्रश्न 6.
(क) मलेरिया परजीवी के जीवन चक्र का स्वच्छ एवं नामांकित चित्र बनाइए। [3]
(ख) उस संवर्धन में जहाँ ई० कोलाई वृद्धि कर रहा हो लैक्टोज डालने पर लैक ओपेरॉन उत्प्रेरित होता है पर कभी संवर्धन में लैक्टोज डालने पर लैक ओपेरॉन कार्य करना बन्द कर देता है, क्यों? स्पष्ट कीजिए।[3]
(ग) जैव प्रबलीकरण का क्या अर्थ है? विवेचना कीजिए। [3]
(घ) क्या सुकेन्द्री कोशिकाओं में प्रतिबन्धन एण्डोन्यूक्लिएज मिलते हैं? स्पष्ट कीजिए। [3]

प्रश्न 7.
मनुष्य के नर जनन तन्त्र का वर्णन कीजिए। इसमें शुक्राणु कहाँ संचित रहते हैं? [4+1]
अथवा
जनन क्या है? जन्तुओं में जनन की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए। [1+4]

प्रश्न 8.
जैव विकास के पक्ष में शारीरिक (तुलनात्मक शरीर रचना) से प्राप्त प्रमाणों का वर्णन कीजिए। [5]
अथवा
आनुवंशिक कूट क्या हैं? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [1+4]

प्रश्न 9.
पारिस्थितिक पिरामिड को परिभाषितं करें तथा जीव भार तथा ऊर्जा के पिरामिडों की उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए। [1+2+2]
अथवा
जल प्रदूषण से क्या तात्पर्य है? जल प्रदूषण के कारणों तथा मानव स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव की विवेचना कीजिए। [1+2+2]

Answers

उत्तर 1.
(क) (C)
(ख) (D)
(ग) (A)
(घ) (C)

उत्तर 2.
(क) नर युग्मकोभिद (पराग कण) → परागकोष (लघुबीजाणुधानी)
मादा युग्मकोद्भिद (भ्रूणकोष) → अण्डाशय (बीजाण्ड)
(ख) प्रतिबन्धन एण्डोन्यूक्लिएज एवं एक्सोन्यूक्लिएज।
(ग) सली या अवलम्बन कोशिकाएँ
(घ) उत्पादक
(ङ) क्लाइनफेल्टर सिण्ड्रोम-46 से अधिक
(44 + XXY, 44 + XXXY, आदि)
टर्नर सिण्ड्रोम-45 (44 + XO)

उत्त्तर 3.
(क) इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 63 पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 देखें।
(ख) इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 69 पर जैव विकास’ को देखें।

(ग) सहभोजिता दो जीवों के मध्य होने वाली ऐसी पारस्परिक क्रिया है। जिसमें एक प्रजाति को तो लाभ होता है, जबकि दूसरी प्रजाति अप्रभावित रहती है अर्थात् उसे न तो कोई लाभ होता है और न कोई हानि; उदाहरण-अधिपादप एवं आम का वृक्ष।। अधिपादप पादप (Epiphytic plants) पादप जगत में अधिपादप वे पादप हैं, जो स्वपोषी हैं, परन्तु दूसरे पादपों पर उगते हैं। ऑर्किड इसका प्रमुख उदाहरण है। अधिपादप पादप स्थान परजीवी (Space parasite) हैं। ये दूसरे पादपों पर उगते हैं, परन्तु अपना भोजन स्वयं बनाते हैं और उस पादप को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाते हैं। ये पादप अपनी आर्द्रताग्राही लटकने वाली जड़ों (Hygroscopic roots) की मदद से वायुमण्डल से नमी का अवशोषण (Absorption) करते हैं। .

(घ)
UP Board Class 12 Biology Model Papers Paper 1 1

(ङ) इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 104 पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 देखें।

उत्तर 4.
(क) प्रभाविता का नियम इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 48 पर लघु उत्तरीय-I का प्रश्न संख्या 3 देखें।’ एकसंकर संकरण इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 50 पर लघु उत्तरीय-II का प्रश्न संख्या 1 देखें।
(ख) इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 10 पर लघु उत्तरीय-I का प्रश्न संख्या 1 देखें।
(ग)

  1. इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 89 पर लघु उत्तरीय-II काप्रश्न संख्या 5 देखें।
  2. इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 87 पर लघु उत्तरीय-I का प्रश्न संख्या 14 देखें।

(घ) इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 113 पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 3 देखें।

उत्तर 5.
(क)

  1. इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 120 पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 2 देखें।
  2. इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 117 पर लघु उत्तरीय-II का प्रश्न संख्या 2 देखें।

(ख)

  1. इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 147 पर लघु उत्तरीय-I का प्रश्न संख्या 2 देखें।
  2. इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 48 परं लघु उत्तरीय-I का प्रश्न संख्या 4 देखें।

(ग) इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 51 पर लघु उत्तरीय-II का प्रश्न संख्या 5 देखें।
(घ) इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 128 पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 2 देखें।

उत्तर 6.
(क) प्लाज्मोडियम नामक परजीवी मलेरिया का रोगजनक या परजीवी है। इसका संक्रमण मादा एनॉफिलीज मच्छर के काटने से होता है। प्लाज्मोडियम का जीवन चक्र के लिए पृष्ठ संख्या 188 पर देखें।
(ख) इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 67 पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 7 देखें।
(ग)इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 101 पर लघु उत्तरीय-I का प्रश्न संख्या 7 देखें।

(घ) नहीं, प्रायः सुकेन्द्रकीय कोशिकाओं में प्रतिबन्धन एण्डोन्यूक्लिएज एन्जाइम नहीं होते हैं। क्योंकि सुकेन्द्रकीय जीवों में, DNA मिथाइलेज नामक एन्जाइम द्वारा मिथाइलीकृत हो जाता है। यह प्रक्रम DNA को प्रतिबन्धन एन्जाइमों से बचाता है। ये एन्जाइम केवल प्राक्केन्द्रकीय जीवों की कोशिका में पाए जाते हैं एवं विषाणु को संक्रमण होने पर उसके DNA को नष्ट कर प्रतिरक्षा तन्त्र की भूमिका निभाते हैं। हालाँकि यीस्ट में प्रतिबन्धन न्यूक्लिएज एन्जाइम पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त DNA द्विगुणन में प्रयुक्त DNA गायरेज़ एन्जाइम भी कुछ सीमा तक प्रतिबन्धन न्यूक्लिएज की भाँति व्यवहार करता है।

उत्तर 7.
इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 33 पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 देखें। मानव में शुक्राणु स्खलन से पूर्व शुक्राशय में संचित रहते हैं।
अथवा
वह प्रक्रिया, जिसके द्वारा जीवधारी अपने जैसे जीव उत्पन्न करते हैं अथवा वह प्रक्रिया, जिसके फलस्वरूप अपने वंश व प्रजाति की निरन्तरता को बनाए रखने के लिए माता-पिता द्वारी सन्तान का जन्म होता है, जनन (Reproduction) कहलाती है। यह एक आवश्यक जैव प्रक्रिया है। जन्तुओं में जनन सामान्यतया दो प्रकार से होता है।

  1. अलैगिक जनन
  2. लैंगिक जनन

जन्तुओं में अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction in Animals) जन्तुओं में ‘अलैंगिक जनने बहुत आम नहीं होता है। यह सिर्फ निम्न स्तर के जन्तुओं जैसे में ही देखने को मिलता है। उच्च जन्तुओं में लैंगिक जनन ही मुख्य जनन होता है तथा अलैंगिक जनन मुख्यतया पुनरुद्भवन तक ही सीमित होता है। जन्तुओं में अलैंगिक जनन की विधियाँ निम्नलिखित हैं।
1. विखण्डन (Fission) इस विधि से प्रायः एककोशिकीय जन्तु प्रजनन करते हैं। एककोशिकीय जन्तुओं में कोशिका विभाजन या विखण्डन (Cell division) द्वारा नए जन्तु की उत्पत्ति होती है। विखण्डन की कुछ प्रमुख विधियाँ निम्न हैं।

  • द्विविखण्डन (Binary fission) कुछ प्रोटोजोआ (Protozoa) की कोशिकाएँ विभाजन द्वारा सामान्यतया दो बराबर भागों में विभक्त हो जाती हैं; उदाहरण-अमीबा, पैरामीशियम, आदि। इस प्रक्रिया में पहले केन्द्रक का विभाजन होता है, तत्पश्चात् कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) का विभाजन होता है, जिससे प्रत्येक कोशिका दो सन्तति कोशिकाओं में बँट जाती है।
  • बहुविखण्डन (Multiple fission) कुछ एककोशिकीय जन्तुओं में कोशिकाद्रव्य विभाजित होकर अनेक विखण्ड बना लेते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में कोशिका आवरण फटने पर ये विखण्ड मुक्त होकर स्वतन्त्र जीवों के रूप में विकसित हो जाते हैं; उदाहरण- प्लाज्मोडियम।

2. बीजाणुजनन (Sporulation) इस विधि में एककोशिकीय जीव की केन्द्रक कला (Nuclear membrane) कभी-कभी टूट जाती है, जिससे उसमें उपस्थित क्रोमैटिन कण कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) में बिखर जाते हैं। यह क्रोमैटिन कण कोशिकाद्रव्ये के साथ मिलकर बीजाणु (Spores) बनाते हैं, जिससे प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवों के चारों ओर एक कठोर आवरण (Cyst wall) बन जाता है। यह आवरण अनुकूल परिस्थितियों में फट जाता है और बीजाणु मुक्त होकर नए जीव का निर्माण करते हैं। इस प्रकार का अलैगिक जनन मुख्यतया अमीबा में होती है।

3. खण्डन (Fragmentation) सरल संरचना वाले बहुकोशिकीय जन्तुओं में जनन की खण्डन विधि कार्य करती है; उदाहरण-हाइड्रा। इस विधि में जन्त का शरीर सामान्य रूप से विकसित होकर छोटे-छोटे टुकड़ों में खण्डित हो जाता है। तत्पश्चात् प्रत्येक टुकड़ा वृद्धि कर नए जीव की उत्पत्ति करता है।

4.मुकुलन (Budding) इस विधि में शरीर पर एक छोटा-सा उभार बाहर की ओर निकलने लगता है, जिसे मुकुल (Bud) कहते हैं। यह मुकुल धीरे-धीरे बड़ा हो जाता है और जनक जीव से अलग हो जाता है; उदाहरण-हाइड्रा, जिसमें नियमित विभाजन के कारण एक स्थान पर उभार विकसित हो जाता है। यही उभार वृद्धि करता हुआ नए जीव में बदल जाता है तथा पूर्ण विकसित होकर जनक से अलग होकर स्वतन्त्र जीव बने जाता है।

5. पुनरुदभवन (Regeneration) किसी जन्तु के किसी भी भाग को काटकर सामान्यतया नए जन्तु की उत्पत्ति को पुनरुद्भवन (पुनर्जनन) कहते हैं; उदाहरण-हाइड्रा तथा प्लेनेरिया, आदि जीवों को यदि अनेक टुकड़ों में काट दिया जाए, तो प्रत्येक भाग वृद्धि एवं विभाजन द्वारा विकसित होकर पूर्ण जीव का निर्माण करता है। जन्तुओं में लैंगिक जनन (Sexual Reproduction in Animals) इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 13 पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 3 देखें।

उत्तर 8.
इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 77 पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 3 देखें।
अथवा
इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 65 पर दीर्घ उत्तरीयप्रश्न संख्या 5 देखें।

उत्तर 9.
इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 153 पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 4 देखें।
अथवा
इसके उत्तर के लिए पृष्ठ संख्या 174 पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ” संख्या 2 देखें।

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