Class 9 Sanskrit Chapter 9 UP Board Solutions पण्डितमूढयोर्लक्षणम् Question Answer

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Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 9
Chapter Name पण्डितमूढयोर्लक्षणम् (पद्य-पीयूषम्)
Category UP Board Solutions

UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 9 Pandit Amudhayor Lakshanam Question Answer (पद्य-पीयूषम्)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 9 हिंदी अनुवाद पण्डितमूढयोर्लक्षणम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

परिचय-भारतीय वाङमय में वेदों के पश्चात् प्राचीन और सर्वमान्य ग्रन्थों में वेदव्यास अथवा कृष्णद्वैपायन व्यास द्वारा रचित महाभारत का सर्वोच्च स्थान है। धार्मिक, राजनीतिक, व्यावहारिक, भौगोलिक, ऐतिहासिक तथा साहित्यिक दृष्टि से यह ग्रन्थ अत्यधिक गौरवपूर्ण है। भारतवर्ष में ही नहीं अपितु विश्व साहित्य में महाकाव्यों में सर्वप्रथम इसी की गणना की जाती है। महत्त्व की दृष्टि से इसे पाँचवाँ वेद भी कहा जाता है। (UPBoardSolutions.com) प्रस्तुत पाठ के श्लोक महाभारत से संगृहीत किये गये हैं। पाठ के प्रथम छः श्लोकों में पण्डित के और बाद के चार श्लोकों में मूर्ख के लक्षण बताये गये हैं।

[संकेत-श्लोकों की ससन्दर्भ व्याख्या’ शीर्षक से सभी श्लोकों के अर्थ संक्षेप में अपने शब्दों में लिखें।]

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(1)
निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते ।
अनास्तिकः श्रद्दधानो ह्येतत्पण्डितलक्षणम् ॥

शब्दार्थ
निषेवते = आचरण करता है।
प्रशस्तानि = प्रशंसा करने योग्य।
निन्दितानि = निन्दित, बुरे कार्य।
सेवते = सेवन करता है।
अनास्तिकः = जो नास्तिक (वेद-निन्दक) न हो।
श्रद्दधानः = श्रद्धा रखता हुआ।
ह्येतत् (हि + एतत्) = यह ही।

सन्दर्य
प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत पद्य-पीयूषम्’ के ‘पण्डितमूढयोर्लक्षणम्’ शीर्षक पाठ से उधृत है।

[संकेत-इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में पण्डित (विद्वान्) के लक्षण बताये गये हैं।

[संकेत-आगे के पाँच श्लोकों के लिए भी यही प्रसंग प्रयुक्त होगा।

अन्वय
(य:) प्रशस्तानि निषेवते, निन्दितानि न सेवते (यः) अनास्तिकः श्रद्दधानः (अस्ति)। एतत् हि पण्डित लक्षणम् (अस्ति)।

व्याँख्या
जो शुभ आचरणों का सेवन करता है, निन्दित आचरणों का सेवन नहीं करता है, जो नास्तिक (वेद-निन्दक-ईश्वर को न मानने वाला) नहीं है और श्रद्धालु है, इन सब गुणों से युक्त (UPBoardSolutions.com) होना ही पण्डित का लक्षण है। तात्पर्य यह है कि उत्तम कर्मों को करने वाला, अशुभ कर्मों को न करने वाला, ईश्वर की सत्ता में विश्वास और उसमें श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति पण्डित होता है।

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(2)
क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च हीः स्तम्भो मान्यमानिता।
यमर्थान्नापर्कषन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥

शब्दार्थ
दर्पः = अहंकार।
हीः = लज्जा।
स्तम्भः= जड़ता।
मान्यमानिता = स्वयं को सम्मान के योग्य मानना।
यम् = जिसको।
अर्थाः = लक्ष्य से।
अपकर्षन्ति = पीछे खींचते हैं।
वै = निश्चय से।
उच्यते = कहा जाता है।

अन्वय
(य:) क्रोधः, हर्षः, दर्पः, हीः, स्तम्भः, मान्यमानिता च यमर्थान् न अपकर्षन्ति, वै स पण्डितः उच्यते।

व्याख्या
जिसको क्रोध, हर्ष, अहंकार, लज्जा, जड़ता, अपने को सम्मान के योग्य मानने की .. भावना ये सब अपने लक्ष्य से पीछे की ओर नहीं खींचते हैं। निश्चय ही पण्डित’कहलाता है। तात्पर्य यह है। 
कि इन सभी मनोविकारों के होने के बावजूद जो अपने उद्देश्य को पूरा करने में पीछे नहीं रहता, वही पण्डित होता है।

(3)
यस्य संसारिणी प्रज्ञा धर्मार्थावनुवर्तते । |
कामादर्थं वृणीते यः सवै पण्डित उच्यते ॥

शब्दार्थ
यस्य = जिसकी।
संसारिणी = व्यावहारिक।
प्रज्ञा = बुद्धि।
धर्मार्थी = धर्म और अर्थ का।
अनुवर्तते = अनुसरण करती है।
कामादर्थं = कार्य की अपेक्षा से अर्थ को।
वृणीते = वरण करता है।

अन्वय
यस्य संसारिणी प्रज्ञा धर्मार्थी अनुवर्तते, य: कामात् अर्थ वृणीते, वै सः पण्डितः उच्यते।।

व्याख्या
जिसकी व्यावहारिक बुद्धि धर्म और अर्थ का अनुसरण करती है, जो काम की अपेक्षा अर्थ का वरण करता है, निश्चय ही वह पण्डित कहा जाता है।

(4)
क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति विज्ञाय चार्थं भजते न कामात् ।
नासम्पृष्टो व्युपयुङ्क्ते परार्थे तत्प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य ॥

शब्दार्थ
क्षिप्रम् = शीघ्र।
विजानाति = विशेष रूप से जानता है।
चिरम् = देरी से।
शृणोति = सुनता है।
विज्ञाय = अच्छी तरह जानकर।
अर्थम् कार्य को, प्रयोजन को।
भजते = स्वीकार करता है।
कामात् = स्वार्थ से, इच्छा से।
असम्पृष्टः = बिना पूछा गया।
व्युपयुङ्क्ते = अपने को लगाता है।
परार्थे = परोपकार में।
प्रज्ञानम् = लक्षण।

अन्वय
क्षिप्रं विजानाति, चिरं शृणोति, अर्थ विज्ञाय च भजते, कामात् न (भजते) असम्पृष्टः परार्थे न व्युपयुङ्क्ते, तत् पण्डितस्य प्रथमं प्रज्ञानम् (अस्ति)।

व्याख्या
जो किसी बात को संकेतमात्र से शीघ्र समझ जाता है, प्रत्येक तथ्य को बहुत देर तक अर्थात् तब तक सुनता रहता है, जब तक कि अच्छी तरह समझ नहीं लेता है, कार्य को अच्छी तरह जानकर ही कार्य करता है, स्वार्थ से नहीं करता है। भली-भाँति न पूछा गया दूसरों के काम में स्वयं को नहीं लगाता है, पण्डित का यही प्रथम लक्षण है।

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(5)
न हृष्यत्यात्मसम्माने नावमानेन तप्यते ।।
गाङ्गो हृद इवाक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते ॥

शब्दार्थ
हृष्यति = प्रसन्न होता है।
आत्मसम्माने = अपने सम्मान में।
अवमानेन = अपमान से।
तप्यते = दु:खी होता है।
गाङ्गः = गंगा का।
हृदः = कुण्ड।
अक्षोभ्यः = क्षुभित (व्याकुल) न होने वाला।

अन्वय
(यः) आत्मसम्माने न हृष्यति, अवमानेन न तप्यते, यः गङ्गाः हृदः इव अक्षोभ्यः भवति सः पण्डितः उच्यते।।

व्याख्या
जो अपने सम्मान पर प्रसन्न नहीं होता है, अपने अपमान से दु:खी नहीं होता है, जो गंगा के निर्मल जलकुण्ड की तरह क्षुभित नहीं होता है, वह पण्डित कहलाता है। तात्पर्य यह है कि बुद्धिमान् व्यक्ति को न तो अपने सम्मान पर प्रसन्न होना चाहिए और ही अपने अपमान पर दु:खी। उसे । तो गंगाजल की तरह शान्त रहना चाहिए।

(6)
तत्त्वज्ञः सर्वभूतानां योगज्ञः सर्वकर्मणाम्।।
उपायज्ञो मनुष्याणां नरः पण्डित उच्यते ॥ 

शब्दार्थ
तत्त्वज्ञः = वास्तविक रूप को जानने वाला।
सर्वभूतानाम् = सब प्राणियों के।
योगज्ञः = योग (समन्वय को जाननेवाला।
सर्व कर्मणाम् = सभी कर्मों के।
उपायज्ञः = हित के उपायों को जानने वाला।

अन्वय
(यः) सर्वभूतानां तत्त्वज्ञः, सर्वकर्मणां योगज्ञः, मनुष्याणाम् उपायज्ञः (भवति सः) नरः पण्डित उच्यते।

व्याख्या
जो मनुष्य सभी प्राणियों के वास्तविक रूप को जानने वाला है, जो सभी कर्मों के समन्वय को जानने वाला है, मनुष्यों के हित के उपायों को जानने वाला होता है, वह मनुष्य पण्डित कहलाता है। तात्पर्य यह है कि जो मनुष्य सभी प्राणियों के वास्तविक स्वरूप को, सभी कर्मों के समन्वय को और मनुष्यों के हित के उपायों को जानता है, वही बुद्धिमान होता है।

(7)
अश्रुतश्च समुन्नद्धो दरिद्रश्च महामनाः।
अर्थाश्चाकर्मणी प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधैः ॥
शब्दार्थ
अश्रुतः = वेद एवं शास्त्र के ज्ञान से रहित।
समुन्नद्धः = (शास्त्रज्ञ होने का) गर्व करने वाला।
महामनाः = उदार मन वाला, अधिक इच्छा रखने वाला।
अर्थान् = धनों को।
अकर्मणा = बिना कर्म किये।
प्रेप्सुः = प्राप्त करने की इच्छा रखने वाला।
बुधैः = विद्वानों के द्वारा।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में मूर्ख व्यक्ति के लक्षण बताये गये हैं।

[संकेत–आगे के तीन श्लोकों के लिए यही प्रसंग प्रयुक्त होगा।]

अन्वय
(यः) अश्रुतः (भूत्वा) (अपि) समुन्नद्धः (भवति यः) दरिद्रः च ( भूत्वा) महामनाः (भवति) (य:) अर्थान् च अकर्मणा प्रेप्सुः (भवति सः) बुधैः मूढः इति उच्यते।

व्याख्या
जो शास्त्रवेत्ता न होते हुए भी, अभिमानपूर्वक स्वयं को पण्डित कहता है, जो दरिद्र होकर भी उदार मन वाला (अधिक इच्छाओं वाला) होता है, जो धन को बिना कर्म किये (UPBoardSolutions.com) प्राप्त करने की इच्छा रखता है, विद्वानों ने उसे मूढ़ (विवेकहीन) पुरुष कहा है। तात्पर्य यह है कि अभिमानपूर्वक स्वयं को पण्डित कहने वाला, धनहीन होते हुए भी उदार मन वाला, बिना कर्म किये धन प्राप्ति की इच्छा करने वाला व्यक्ति मूर्ख होता है।

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(8)
स्वमर्थं यः परित्यज्य परार्थमनुतिष्ठति ।।
मिथ्याचरति मित्रार्थे यश्च मूढः स उच्यते ॥

शब्दार्थ
स्वमर्थं = अपने कार्य को।
परित्यज्य = छोड़कर।
परार्थम् = दूसरे के कार्य को।
अनुतिष्ठति = करता है।
मिथ्याचरति = मिथ्या आचरण करता है।
मित्रार्थे = मित्र के साथ भी।

अन्वेय
यः स्वम् अर्थं परित्यज्य परार्थम् अनुतिष्ठति, यः च मित्रार्थे मिथ्या आचरति, सः मूढः उच्यते।

व्याख्या
जो मनुष्य अपने काम को छोड़कर दूसरों के कार्य को करता है; अर्थात् जो अपने अधिकार से बाहर है उन कार्यों को करता है और जो मित्र के साथ भी मिथ्या आचरण करता है, वह मूढ़ कहलाता है। तात्पर्य यह है कि अपने काम को छोड़कर दूसरों के काम को करने वाला और मित्र के साथ मिथ्या आचरण करने वाला व्यक्ति मूर्ख होता है।

(9)

अमित्रं कुरुते मित्रं मित्रं द्वेष्टि हिनस्ति च।
कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मूढचेतसम्॥

शब्दार्थ
अमित्रम् = शत्रु को।
कुरुते = करता है।
द्वेष्टि = द्वेष करता है।
हिनस्ति = नुकसान पहुँचाता है।
चारभते = आरम्भ करता है।
दुष्टम् = निन्दित।
आहुः = कहते हैं।
मूढचेतसम् = मूढ़ चित्त वाला।

अन्वय
(य:) अमित्रं मित्रं कुरुते, (यः) मित्रं द्वेष्टि हिनस्ति च (यः) दुष्टं कर्म आरभते, तं मूढचेतसम् आहुः।।

व्याख्या
जो शत्रु को मित्र बनाता है, जो मित्र से द्वेष करता है और हानि पहुँचाता है, जो निन्दित कर्म को आरम्भ करता है, उसे (विद्वान्) मूढ़ चित्त वाला (मूर्ख) कहते हैं। तात्पर्य यह है कि जो व्यवहारहीन व्यक्ति शत्रु के साथ मित्रता का और मित्र के साथ शत्रुता का व्यवहार करता है, उसे विद्वानों ने मूर्ख कहा है।

(10)

अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते ।।
विश्वसिति प्रमत्तेषु मूढचेता नराधमः ॥

शब्दार्थ
अनाहूतः = बिना बुलाया गया।
प्रविशति = प्रवेश करता है।
अपृष्टः = बिना पूछा गया।
बहु भाषते = बहुत बोलता है।
विश्वसिति = विश्वास करता है।
प्रमत्तेषु = पागलों पर।
नराधमः = नीच मनुष्य।।

अन्वय
(यः) अनाहूतः (गृह) प्रविशति, (य:) अपृष्टः बहु भाषते, (य:) प्रमत्तेषु विश्वसिति, (स:) नराधमः मूढचेताः (भवति)।

व्याख्या
जो बिना बुलाये घर में प्रवेश करता है; अर्थात् अनाहूत ही सर्वत्र जाने का इच्छुक होता है, जो बिना पूछे बहुत बोलता है, जो पागलों पर विश्वास करता है, वह नीच मनुष्य मूढ़ चित्त वाला होता है। तात्पर्य यह है कि बिना बुलाये किसी के घर जाने वाला, बिना कुछ पूछे बोलने वाला। और पागल पर विश्वास करने वाला व्यक्ति मूर्ख होता है।

श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) निषेवते प्रशस्तानि •••••••••••••••• ह्येतत्पण्डितलक्षणम्॥ (श्लोक 1)
संस्कृतार्थ-
महर्षिव्यासः महाभारते पण्डितस्य लक्षणं कथयति-यः पुरुषः प्रशंसनीयानि कार्याणि कॅरोति, निन्दितानि कर्माणि न करोति, ईश्वरे विश्वसिति वेदानां निन्दकः वा न अस्ति, यश्च श्रद्धां करोति, सः पण्डितः भवति। 

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(2) तत्त्वज्ञः सर्वभूतानां ••••••••••••• पण्डित उच्यते ॥ (श्लोक 6)
संस्कृतार्थः-
य: नरः सर्वेषां प्राणिनां वास्तविकं रूपं जानाति, यः सर्वेषां कर्मणां योगं (समन्वय) जानाति, यः नराणां हितानाम् उपायान् जानाति, सः नरः पण्डितः कथ्यते।।

(3) स्वमर्थम् “••••••••••••••••••••••••••• मूढः स उच्यते ॥ (श्लोक 8 )
संस्कृतार्थः–
महर्षिः वेदव्यासः कथयति यत् यः जनः स्वकीयं कार्यम् उपेक्ष्य परकार्यं कर्तुम् इच्छति, करोति च, स्वमित्रेषु मिथ्याचरणं भजते सः मूर्खः भवति।

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Class 9 Sanskrit Chapter 4 UP Board Solutions दीनबन्धुर्गन्धी Question Answer

UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 4 दीनबन्धुर्गन्धी (पद्य-पीयूषम्) are the part of UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 4 दीनबन्धुर्गन्धी (पद्य-पीयूषम्).

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Subject Sanskrit
Chapter Chapter 4
Chapter Name दीनबन्धुर्गन्धी (पद्य-पीयूषम्)
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UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 4 Dinabandhu Gandhi Question Answer (पद्य-पीयूषम्)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 हिंदी अनुवाद दीनबन्धुर्गन्धी के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

परिचय–प्रस्तुत पाठ पण्डिता क्षमाराव द्वारा रचित ‘सत्याग्रहगीता’ से उद्धृत है। इस पुस्तके में इन्होंने सरस, सरल और रोचक पद्यों में राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम का तथा महात्मा गाँधी के आदर्श चरित्र, का सुचारु रूप से वर्णन किया है। इस ग्रन्थ में गाँधी जी द्वारा संचालित सत्याग्रह का विशद् वर्णन है। प्रस्तुत पाठ में महात्मा गाँधी के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए दोनों के प्रति उनकी उदारता व उनके उद्धार के लिए खादी-वस्त्रों के उत्पादन की शिक्षा का वर्णन किया गया है। पाठ की समाप्ति पर गाँधी जी को प्रणाम निवेदित कर कवयित्री ने उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की है।

पाठ-सारांश

दीनों और कृषकों के मित्र –गाँधी जी ने सदैव समाज के दुर्बल वर्ग की उन्नति करने के लिए उनकी सहायता की है। उन्होंने कृषकों की दीन-हीन दशा को सुधारने के लिए मित्र की भाँति जीवनपर्यन्त महान् प्रयास किये।।

सम्मान-गाँधी जी अपने अपूर्व गुणों के कारण सम्पूर्ण भारत में पूजे जाते थे। विदेशों में भी उनका अत्यधिक सम्मान हुआ। इसीलिए उन्हें विश्ववन्द्य कहा जाता है। | गुणवान्–गाँधी जी महात्मा कहलाते थे। उनमें महात्मा के समान वीतरागिता, अक्रोध, सत्य, अहिंसा, स्थिर-बुद्धि, स्थितप्रज्ञता आदि सभी गुण विद्यमान थे। वे अनेकानेक गुणों की खान थे।

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परम कारुणिक-गाँधी जी ग्रामीणों के भूखे-प्यासे और नग्न रहने के कारण अल्पभोजन और अल्पवस्त्र से शरीर का निर्वाह करते थे। वे भूखे-प्यासे ग्रामीणों के अस्थिपञ्जर मात्र शरीर को देखकर दु:खी हो जाते थे। वे उच्च वर्ग के लोगों द्वारा अपमानित हरिजनों की दीन दशी को देखकर भी द्रवित हो जाते थे।

कृषकों के बन्धु–गाँधी जी ने किसानों की दयनीय स्थिति और उनके कष्ट के कारणों को जानने के लिए भारत के गाँव-गाँव में भ्रमण किया। उन्होंने देखा कि किसान वर्ष में छः महीने बिना काम किये रहते हैं। उन्होंने उनके खाली समयं के उपयोग के लिए सूत कातने और बुनने को सर्वश्रेष्ठ बताया और इस कार्य के माध्यम से धनोपार्जन की शिक्षा दी। ” | जन-जागरण कर्ता-गाँधी जी ने पराधीन भारत में, न केवल ग्रामीण क्षेत्र में जन-जागरण का कार्य किया, अपितु नागरिकों को भी अपने धर्म के पालन के प्रति जाग्रत किया।

खादी के प्रचारक-गाँधी जी ने स्वदेश में स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार पर बल दिया और खादी ग्रामोद्योग की स्थापना की। उन्होंने देश की प्रगति के लिए सूत कातने में श्रम करने की प्रेरणा दी, जिससे वस्त्र बनाने वाले कारीगर लाभ प्राप्त कर सकें और सभी । लोग खादी के वस्त्र प्राप्त कर सकें।

प्रणाम- भारत के रत्न और अपने वंश के दीपकस्वरूप महात्मा गाँधी सदैव प्रणाम किये जाने योग्य हैं।

पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या

(1)
बहुवर्षाणि देशार्थं दीनपक्षावलम्बिना।।
कृषकाणां सुमित्रेण कृतो येन महोद्यमः ॥

शब्दार्थ
बहुवर्षाणि = अनेक वर्षों तक।
देशार्थं = देश के उद्धार के लिए।
दीनपक्षावलम्बिना = दीनों का पक्ष लेने वाले।
कृषकाणां = किसानों के।
सुमित्रेण = अच्छे मित्र।
महोद्यमः = महान् प्रयत्न।।

सन्दर्य
प्रस्तुत श्लोक संस्कृत की परम विदुषी पण्डिता क्षमाराव की प्रसिद्ध कृति ‘सत्याग्रहगीता’ से संगृहीत हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत पद्य-पीयूषम्’ के ‘दीनबन्धुर्गान्धी’ पाठ से उद्धृत है।

[संकेतु-इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा। अन्वय-दीनपक्षावलम्बिना कृषकाणां सुमित्रेण ये देशार्थं बहुवर्षाणि महोद्यमः कृतः। प्रसंग-प्रस्तुत श्लोक में गाँधी जी के गुणों का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-दीन-दुःखियों का पक्ष लेने वाले, कृषकों के सच्चे मित्र जिन (महात्मा गाँधी) ने देश के उद्धार के लिए बहुत वर्षों तक महान् प्रयत्न किया। तात्पर्य यह है कि महात्मा गाँधी जो दीन-दु:खियों को पक्ष लेने वाले और किसानों के अच्छे मित्र थे, ने देश के उद्धार अर्थात् स्वतन्त्रता के लिए बहुत वर्षों तक लगातार प्रयत्न किया।

(2)
यश्चापूर्वगुणैर्युक्तः पूज्यतेऽखिलभारते।
सतां बहुमतो देशे विदेशेष्वपि मानितः ॥

शब्दार्थ

अपूर्वगुणैः = अद्भुत गुणों से।
पूज्यते = पूजे गये।
अखिल भारते = सम्पूर्ण भारतवर्ष में।
सताम् = सज्जन पुरुषों का।
बहुमतः = सम्मानित।
मानितः = सम्मान को प्राप्त हुए।

अन्वय
अपूर्वगुणैः युक्तः यः अखिलभारते पूज्यते। देशे सतां बहुमतः यः विदेशेषु अपि मानितः अस्ति।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में गाँधी जी के गुणों का वर्णन किया गया है।

व्याख्या
अपने अद्भुत गुणों से युक्त जो (गाँधी जी) सम्पूर्ण भारतवर्ष में पूजे जाते हैं, देश के सज्जनों द्वारा सम्मानित वे विदेशों में भी सम्मान को प्राप्त हुए। तात्पर्य यह है कि अपने अद्भुत गुणे के. द्वारा गाँधी जी केवल अपने देश में ही नहीं, वरन् विदेशों में भी अत्यधिक सम्मानित हुए।

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(3)
वीतरागो जितक्रोधः सत्याऽहिंसाव्रती मुनिः।। 
स्थितधीर्नित्यसत्त्वस्थो महात्मा सोऽभिधीयते ॥

शब्दार्थ-
वीतरागः = राग-द्वेष से रहित।
जितक्रोधः = क्रोध को जीतने वाले।
सत्यहिंसाव्रती = सत्य और अहिंसा व्रत वाले।
स्थितधीः = स्थिर बुद्धि वाले।
नित्य सत्त्वस्थः = सदैव आत्मबल में स्थित रहने वाले।
अभिधीयते = कहलाता है।

अन्वय
सः वीतरागः, जितक्रोधः, सत्याहिंसाव्रती, मुनिः, स्थितधीः, नित्यसत्त्वस्थः महात्मा अभिधीयते।।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में गाँधी जी के गुणों का वर्णन किया गया है।

व्याख्या
वे (गाँधी जी) राग-द्वेष से रहित, क्रोध को जीतने वाले, सत्य और अहिंसा का नियमपूर्वक पालन करने वाले, मुनिस्वरूप, स्थिर बुद्धि वाले, अपने आत्मबल में स्थित रहने वाले महात्मा कहलाते हैं। तात्पर्य यह है कि इन (ऊपर उल्लिखित) गुणों से युक्त व्यक्ति महात्मा कहलाते हैं; क्योंकि गाँधी जी भी इन गुणों से युक्त थे, इसलिए वे भी महात्मा कहलाए।

(4)
क्षुत्पिपासाऽभिभूतासु ग्रामीण-जन-कोटिषु ।
अल्पान्नेन निजं देहमस्थिशेषं निनाय सः॥

शब्दार्थ
क्षुत्पिपासाऽभिभूतासु = भूख और प्यास से पीड़ित होने पर।
ग्रामीणजन कोटिषु = करोड़ों ग्रामीण लोगों के।
अल्पान्नेन = थोड़े अन्न से।
अस्थिशेषं निनाय = हड्डीमात्र रूप शेष वाला बना लिया।

अन्वय
स: ग्रामीणजनकोटिषु क्षुत्पिपासाऽभिभूतासु (सतीषु) अल्पान्नेन निज़ देहम् अस्थिशेषं निनाय।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक से गाँधी जी के चरित्र-व्यक्तित्व का ज्ञान होता है।

व्याख्या
वे (महात्मा गाँधी) थोड़े-से अन्न पर ही निर्वाह करते थे; क्योंकि करोड़ों भारतीय ग्रामीण बिना अन्न के ही भूखे-प्यासे रहते थे। इसलिए उनका शरीर हड्डियों का ढाँचामात्र ही रह गया था। तात्पर्य यह है कि अधिकांश भारतीयों को भूखे-प्यासे जीवन व्यतीत करते देखकर गाँधी जी भी बहुत कम अन्न ग्रहण करते थे। इससे उनका शरीर अस्थि-पंजर मात्र रह गया था। |

(5)
ग्रामीणानां क्षुधाऽऽर्तानां क्षेत्रे क्षेत्रेऽपि निर्जले ।।
दृष्ट्वाऽस्थिपञ्जरान् भीमान् विषण्णोऽभू दयाकुलः ॥

शब्दार्थ
ग्रामीणानां = ग्रामवासियों को।
क्षुधाऽऽर्तानां = भूख से पीड़ित।
क्षेत्रे = क्षेत्र में।
निर्जले = जल से रहित।
दृष्ट्वा = देखकर।
अस्थिपञ्जरान् = हड़ियों के ढाँचे रूप शरीर को।
भीमान् = भयंकर रूप से।
विषण्णः = दु:खी।
अभूत = हुए।
दयाकुलः = दया से व्याकुल।

अन्वय
दयाकुलः (स:) निर्जले क्षेत्रे क्षेत्रेऽपि क्षुधार्तानां ग्रामीणानां भीमान् अस्थिपञ्जरान् दृष्ट्वा विषण्णः अभूत्।।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक से गाँधी जी के चरित्र-व्यक्तित्व का ज्ञान होता है।

व्याख्या
वे महात्मा गाँधी अत्यन्त दयालु थे। स्थान-स्थान पर भूखे और प्यासे ग्रामीणों के भयंकर अस्थि-पंजर को देखकर वे अत्यन्त दु:खी हो गये। तात्पर्य यह है कि गाँधी जी ने अनेकानेक स्थानों पर भूख और प्यास से व्याकुल जर्जर शरीर वाले ग्रामीणों को देखा। इससे वे दयालु पुरुष अत्यधिक दु:खी हुए।

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(6)
इतरैरवधूतानामन्त्यजानामवस्थया

द्रवीभूतो महात्माऽसौ दीनानां गौतमो यथा ॥

शब्दार्थ
इतरैः = दूसरों के द्वारा।
अवधूतानां = अपमानित किये हुए।
अन्त्यजानाम् = शूद्रों की।
अवस्थया = स्थिति के द्वारा।
द्रवीभूतः = दयापूर्ण हो गये।
गौतमः = गौतम बुद्ध।

अन्वय
असौ महात्मा इतरैः अवधूतानाम् अन्त्यजानाम् अवस्थया दीनानां (अवस्थया) यथा गौतमः (दीनानाम् अवस्थया) द्रवीभूतः।

प्रसंग
प्रस्तुत पद्यांश में उपेक्षितों और अपमानितों के प्रति गाँधी जी के दयाभाव को दर्शाया गया है।

व्याख्या
वह महात्मा दूसरे (उच्च वर्ग के) लोगों के द्वारा अपमानित किये गये शूद्रों की अवस्था से उसी प्रकार दयापूर्ण हो गये, जैसे महात्मा बुद्ध दीनों की अवस्था से द्रवित हो गये थे। विशेष प्रस्तुत श्लोक में महात्मा गाँधी को महात्मा गौतम बुद्ध के समतुल्य सिद्ध किया गया है।

(7)
स्वबान्धवानसौ पौरान मोहसुप्तानबोधयत् ।
स्वधर्मः परमो धर्मो न त्याज्योऽयं विपद्यपि ॥

शब्दार्थ
स्वबान्धवान् = अपने बन्धु-बान्धवों को।
असौ = उन्होंने।
पौरान् = पुरवासियों को।
मोहसुप्तान् = मोह या अज्ञान में पड़े हुए।
अबोधयत् = जगाया, समझाया।
स्वधर्मः = अपना धर्म।
परमः = श्रेष्ठ।
न त्याज्यः = नहीं त्यागना चाहिए।
विपद्यपि (विपदि + अपि) = विपत्ति में भी।

अन्वय
असौ मोहसुप्तान् स्वबान्धवान् पौरान् अबोधयंत्। स्वधर्मः परम: धर्मः (अस्ति), अयं विपदि अपि न त्याज्य:।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में गाँधी जी द्वारा नगरवासियों को प्रोत्साहित किये जाने का वर्णन है।

व्याख्या
उस महात्मा ने मोह (अज्ञान) में सोये हुए अपने नगरवासी बन्धुओं को समझाया कि अपना धर्म उत्तम धर्म है, इसे विपत्ति में भी नहीं त्यागना चाहिए। तात्पर्य यह है कि गाँधी जी ने अज्ञानावस्था में सुप्त जनों को अपने धर्म की महत्ता बैतलायी। अन्यत्र कहा भी गया है-‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।

(8)
कर्षकाणां स्थितिं तेषां कष्ट-मूलं च वेदितुम् ।
त्यक्तभोगो विपद्बन्धुग्रमे ग्रामे चचार सः॥

शब्दार्थ
कर्षकाणाम् = किसानों की।
कष्ट-मूलम् = कष्टों के मूल कारण को।
वेदितुम् = जानने के लिए।
त्यक्त भोगः = सुख-भोगों का त्याग किया हुआ।
विपद्बन्धुः = विपत्ति में बन्धु के समान सहायता करने वाले।
ग्रामे-ग्रामे = गाँव-गाँव में।
चचार = विचरण किया।

अन्वय
विपद्बन्धुः सः कर्षकाणां स्थितिं तेषां कष्टमूलं च वेदितुं त्यक्तभोगः (सन्) ग्रामे-ग्रामे चचार।।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में कृषकों के उत्थान के लिए गाँधी जी द्वारा किये गये प्रयास का वर्णन किया गया है।

व्याख्या
विपत्ति के समय में बन्धु के समान सहायता करने वाले उसे महात्मा ने किसानों की दशा को और उनके कष्टों के मूल कारणों को जानने के लिए अपने सुखभोगों का त्याग करते हुए गाँव-गाँव में भ्रमण किया।

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(9)
मासषकं निरुद्योगा निवसन्ति कृषीवलाः।
अतएव हि, संवृद्धिर्दारिद्र्यस्य पदे पदे ॥

शब्दार्थ
मासषट्कम् = छः महीने तक।
निरुद्योगाः = बिना काम किये (निठल्ले)।
निवसन्ति = रहते हैं।
कृषीवलाः = कृषि वाले अर्थात् किसान।
संवृद्धिः = बढ़ोत्तरी।
दारिद्र्यस्य = गरीबी की।
पदे-पदे = पग-पग पर।

अन्वय
कृषीवला: मासषट्कं निरुद्योगाः निवसन्ति। अतएव पदे-पदे (तेषां) दारिद्र्यस्य हि संवृद्धिः (भवति)। | प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में गाँधी जी द्वारा कृषकों की निर्धनता के मूल कारण के ज्ञान का वर्णन किया गया है।

व्याख्या
किसान लोग छः महीने तक बिना काम किये निठल्ले रहते हैं। इसी कारण पग-पग पर उनकी दरिद्रता की निश्चय ही बढ़ोत्तरी होती है; क्योंकि बिना कर्म किये धनागम असम्भव है। |

(10)
विधेयं तान्तवं तस्मादल्पलाभमपि ध्रुवम्।।
येन सुषुपयोगः स्यात्कालस्येति जगाद सः ।।

शब्दार्थ
विधेयम् = करना चाहिए।
तान्तवम् = सूत की कताई व बुनाई।
तस्मात् = उससे।
अल्पलाभम् अपि = थोड़े लाभ वाला भी।
धुवं = अवश्य।
सुष्टु = अच्छा, सही।
सत्यात् = होगा।
कालस्य = समय का।
जगाद = कहा।

अन्वय
तस्मात् अल्पलाभम् अपि तान्तवं ध्रुवं विधेयम्। येन कालस्य सुष्ष्ठ उपयोगः । स्यात् इति सः जगाद।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में गाँधी जी ने किसानों को सूत कातने के लिए प्रेरित किया है।

व्याख्या
उन्होंने ग्रामीण कृषकों को समझाया कि थोड़े लाभ वाला होते हुए भी सूत की कताई-बुनाई का कार्य अवश्य करना चाहिए, जिससे उनके समय का उत्तम उपयोग हो सके। तात्पर्य यह है कि गाँधी जी ने किसानों को उनके खाली समय के सदुपयोग हेतु उन्हें कताई-बुनाई की ओर प्रेरित किया।

(11)
उत्तिष्ठत ततः शीघ्रं तान्तवे कुरुतोद्यमम्।
पट-कर्मा जनो येन प्रतिपद्येत तत्फलम् ॥

शाख्दार्थ
उत्तिष्ठत = उठो।
ततः = तब।
शीघ्रम् = शीघ्र।
तान्तवे = सूत कताई-बुनाई के कार्य में।
कुरुत = करो।
उद्यमम् = श्रम।
पटकर्मा = वस्त्र बनाने वाला जुलाहा।
प्रतिपद्येत = प्राप्त करे।

अन्वय
ततः शीघ्रम् उत्तिष्ठत। तान्तवे उद्यमं कुरुत। येन पटकर्मा जनः तत्फलं प्रतिपद्येत।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में गाँधी जी ने किसानों को सूत कातने के लिए प्रेरित किया है।

व्याख्या
इसलिए शीघ्र उठो और सूत की कताई-बुनाई के कार्य में परिश्रम करो, जिससे वस्त्र बनाने वाला कारीगर उसका लाभ प्राप्त कर सके।

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(12)
हस्तनिर्मितवासांसि प्राप्स्यत्येवं जनोऽखिलः।।
ततो देशोदय-प्राप्तिरिति भूयो न्यवेदयत् ॥

शब्दार्थ
हस्तनिर्मितवासांसि = हाथ से बने हुँए कपड़े।
प्राप्स्यति = प्राप्त करेगा।
अखिलः = समस्त।
ततः = तब।
देशोदय प्राप्तिः = देश की उन्नति की प्राप्ति।
भूयः = बार-बार।
न्यवेदयत् = निवेदन किया।

अन्वय
एवम् अखिलः जनः हस्तनिर्मित वासांसि प्राप्स्यति। ततः देशोदय प्राप्तिः (भविष्यति) इति सः भय: न्यवेदयत्।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में गाँधी जी ने स्वदेशी वस्त्रों के उपयोग के प्रति लोगों को जाग्रत किया है।

व्याख्या
इस प्रकार सभी मनुष्य हाथ से बने कपड़े प्राप्त कर लेंगे। इसके पश्चात् देश को उन्नति की प्राप्ति होगी। ऐसा उन्होंने बार-बार निवेदन किया। तात्पर्य यह है कि स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने से ही देश की उन्नति होगी, ऐसा गाँधी जी का मानना था।

(13)
भारतावनि-रत्नाय सिद्ध-तुल्य-महात्मने ।
गान्धि-वंश-प्रदीपाय प्रणामोऽस्तु महात्मने ।।

शब्दार्थ
भारतावनि-रत्नाय = भारतभूमि के रत्नस्वरूप के लिए।
सिद्धतुल्यमहात्मने = सिद्ध योगी के समान महान् आत्मा वाले।
गान्धिवंशप्रदीपाय = गाँधी वंश को प्रकाशित करने वाले दीपक के समान।
प्रणामः अस्तु = नमस्कार हो।
महात्मने = महात्मा के लिए।

अन्वय
भारतावनि-रत्नाय, सिद्धतुल्यमहात्मने, गान्धिवंशप्रदीपाय महात्मने (अस्माकं) प्रणामः अस्तु।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में कवयित्री ने गाँधी जी को अपना प्रणाम निवेदित किया है।

व्याख्या
भारतभूमि के रत्नस्वरूप, सिद्ध योगी के समान महान् आत्मा वाले, गाँधी कुल को : प्रकाशित करने वाले दीपक के समान उस महात्मा को प्रणाम हो।

सूक्तिपरक वयवस्या

(1)
स्थितधीर्नित्यसत्त्वस्थो महात्मा सोऽभिधीयते।
सन्दर्य
प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत-पद्य-पीयूषम्’ के ‘दीनबन्धुर्गान्धी’ नामक पाठ से ली गयी है।

[संकेत-इस शीर्षक के अन्तर्गत आयी हुई समस्त सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग
प्रस्तुत सूक्ति में महात्माओं के गुणों पर प्रकाश डाला गया है।

अर्थ
स्थिर बुद्धि वाले और अपने आत्मबल में स्थित रहने वाले महात्मा कहलाते हैं।

व्याख्या
महापुरुषों के लक्षण बताती हुई सुप्रसिद्ध कवयित्री पण्डिता क्षमाराव कहती हैं कि महात्मा पुरुष स्थितप्रज्ञ होते हैं। वे महान् संकट आने पर भी विचलित नहीं होते। महात्मा पुरुष सदैव अपने स्वाभाविक रूप में स्थित रहते हैं। उनके ऊपर सुख और दुःख का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। गाँधी जी में भी उपर्युक्त सभी गुण विद्यमान् थे; इसीलिए वे महात्मा कहे जाते थे।

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(2)
द्रवीभूतो महात्माऽसौ दीनानां गौतमो यथा। |

प्रसंग
प्रस्तुत सूक्ति में महात्मा गाँधी के कोमल हृदय की तुलना गौतम बुद्ध से की गयी है।

अर्थ
यह महात्मा (गाँधी) इसी प्रकार दयापूर्ण हो गये जैसे दोनों को देखकर गौतम (द्रवित हो गये 
थे)।

व्याख्या
जिस प्रकार महात्मा गौतम बुद्ध दीन-दुःखियों के दुःखों को देखकर द्रवीभूत हो जाते थे, उसी प्रकार उच्चवर्ग के लोगों से अपमानित शूद्रजनों की अत्यन्त हीन दशा को देखकर उस परम कारुणिक महात्मा गाँधी का हृदय भी दया से भर जाता था। तात्पर्य यह है कि गाँधी जी का हृदय दीन-दुखियों के प्रति अत्यधिक दया से युक्त था।

(3)
स्वधर्मः परमो धर्मो, न त्याज्योऽयं विपद्यपि।

प्रसंग

प्रस्तुत सूक्ति में महात्मा गाँधी द्वारा अपने धर्म को न त्यागने की बात कही गयी है।

अर्थ
अपना धर्म ही श्रेष्ठ धर्म है, उसे विपत्ति में भी नहीं छोड़ना चाहिए।

व्याख्या
जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। धर्म का अर्थ होता है-कर्त्तव्य। व्यक्ति के द्वारा किये जाने वाले सभी कर्तव्यों को धर्म के अन्तर्गत रखा जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के कुछ कर्तव्य होते हैं। अपना कर्तव्य करना ही श्रेष्ठ है, उन्हें विपत्ति आने पर भी नहीं त्यागना चाहिए। गाँधी जी ने अज्ञान में पड़े हुए अपने बन्धुओं को विपत्ति में भी स्वधर्म का पालन करने के लिए समझाया। गीता में भी कहा गया है-‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः।’ अर्थात् अपने धर्म-पालन करने में यदि मृत्यु भी हो जाती है तो श्रेष्ठ है। दूसरे के धर्म का अवलम्ब नहीं लेना चाहिए।

श्लोक का संस्कृतअर्थ

(1) इतरैरवधूतानां  •••••••••• गौतमो यथा ॥ (श्लोक 6)
संस्कृतार्थः-
सवर्णाः जनाः शूद्रान् जनान् तिरस्कुर्वन्ति, तेषाम् अवस्थां दृष्ट्वा असौ महात्मागान्धी तथा परमकारुणिकः अभवत् यथा गौतम बुद्धः दीनानां दशां दृष्ट्वा परम: दयालुः अभवत्।।

(2) विधेयं तान्तवं.•••••••••••••••• जगांद सः ।। (श्लोक 10 )
संस्कृतार्थः–
कृषीवलाः षट्मासान् निरुद्योगा एव यापयन्ति इयमेव तेषां दरिद्रतायाः कारणं महात्मागान्धी अमन्यत। तेषां समयस्य सदुपयोगाय सः तन्तु निष्कासन रूपं कार्यं युक्तम् अमन्यत, अनेन कार्येण अल्पलाभ एव वरम्। अनेन कार्येण तेषां समयस्य सदुपयोगस्तु भविष्यति इति महात्मागान्धिः अकथयत्।

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(3) भारतावनि रत्नाय••••••••••••••••••••••••••••प्रणामोऽस्तु महात्मने ॥ (श्लोक 13 )
संस्कृतार्थः–
भारतदेशस्य रत्नस्वरूपाय, गौतमतुल्यस्वभावाय, गान्धीवंशस्य यशोविस्तारकाय महात्मने पूज्य महात्मागान्धीमहाभागाय भारतीयानां भूयो भूयः प्रणामाः समर्पिताः सन्ति।

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Class 9 Sanskrit Chapter 2 UP Board Solutions अस्माकं राष्ट्रियप्रतीकानि Question Answer

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 2
Chapter Name अस्माकं राष्ट्रियप्रतीकानि (गद्य – भारती)
Category UP Board Solutions

UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 2 Asmakam Rastriypratikani Question Answer (गद्य – भारती)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 2 हिंदी अनुवाद अस्माकं राष्ट्रियप्रतीकानि के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

पाठ का साशंश

राष्ट्रीय प्रतीक-सभी राष्ट्रों में वहाँ के नागरिकों द्वारा उस राष्ट्र की विशेषता बताने वाली कुछ वस्तुएँ राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में स्वीकार की जाती हैं। इन प्रतींकों में उस राष्ट्र का गौरव, चरित्र और गुण झलकता है, इन्हीं को राष्ट्रीय चिह्न कहा जाता है। भारत में भी हमारी संस्कृति, चरित्र और महत्त्व को बताने वाली (UPBoardSolutions.com) ये पाँच वस्तुएँ राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में स्वीकार की गयी हैं- (1) मयूर, (2) चित्रव्याघ्र, (3) कमल, (4) राष्ट्रगान तथा (5) त्रिवर्ण ध्वज।।

(1) मयूर (मोर)–मयूर (मोर) भारत का राष्ट्रीय-पक्षी है। यह बहुत सुन्दर पक्षी है। इसके रंग-बिरंगे पंख और इसका नृत्य अत्यधिक चित्ताकर्षक होता है। यह मधुर ध्वनि करता हुआ भी विषधरों (सर्पो) को खाता है। उसकी इस प्रवृत्ति में हमारा राष्ट्रीय चरित्र झलकता है। हमें भी मोर की तरह मधुरभाषी होना चाहिए और सबके साथ मधुर व्यवहार करते हुए भी राष्ट्रद्रोहियों और राष्ट्रीय एकता के विघातक तत्त्वों को सर्प की तरह नष्ट कर देना चाहिए। |

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(2) चित्रव्याघ्र ( बाघ)–पशुओं में बाघ हमारा राष्ट्रीय पशु है। इनमें चित्रव्याघ्र ओजस्वी, पराक्रमी और स्फूर्ति-सम्पन्न होता है। वह संकट को दूर से ही जानकर उसे दूर करने में सचेष्ट रहता है। हमें , व्याघ्र की तरह देश की सुरक्षा में सावधान तथा संकट आने पर उसे दूर करने का निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए। यह अपनी सीमा में घूमने वाले जंगली जानवर के रूप में संसार में प्रसिद्ध है।

(3) कमल–भारत में कमल को राष्ट्रीय पुष्प के रूप में स्वीकार किया गया है। इसकी कोमलता एवं पवित्रता को देखकर ही इसको काव्य में अत्यधिक महत्त्व दिया गया है। जिस प्रकार से कीचड़ में उत्पन्न होने वाला पंकज (कमल) जल का संसर्ग तथा शरद् ऋतु को प्राप्त कर बढ़ता और शोभित होता है, (UPBoardSolutions.com) उसी प्रकार किसी भी कुल में उत्पन्न होकर व्यक्ति को सुविधा और उपयुक्त अवसर को पाकर उन्नति करते रहना चाहिए, यही कमल का सन्देश है।

(4) राष्ट्रगान–प्रत्येक स्वतन्त्र राष्ट्र का एक अपना राष्ट्रगाने होता है। भारत का भी अपना एक राष्ट्रगान है। इसे महान् अवसरों पर गाया जाता है। अन्य देश के राष्ट्राध्यक्षों के आगमन पर उनके सम्मान में, बड़ी सभाओं के समापन पर तथा विद्यालयों में प्रार्थना के उपरान्त इसे गाया जाता है। इसकी रचना विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने की थी। इस राष्ट्रगान में भारत के प्रान्तों, विन्ध्य-हिमालय पर्वतों, गंगादि नदियों के उल्लेख द्वारा देश की विशालता और अखण्डता का वर्णन है। इसको गाने के लिए 52 सेकण्ड का समय निर्धारित है। इसे सावधान मुद्रा में खड़े होकर बिना किसी अंग-संचालन के श्रद्धापूर्वक गाया जाना चाहिए। इसकी ध्वनि सुनकर भी सावधान हो जाने का विधान है।

(5) त्रिवर्ण ध्वज(राष्ट्रीय ध्वज)–प्रत्येक स्वतन्त्र राष्ट्र का अपना एक राष्ट्रध्वज होता है तथा देश के निवासी प्राणपण से इसके सम्मान की रक्षा करते हैं। हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा है। इसके मध्य में अशोक चक्र है। इसमें हरा रंग, सुख, समृद्धि और विकास का; श्वेत रंग ज्ञान, मैत्री सदाशयता आदि गुणों का तथा केसरिया रंग शौर्य और त्याग का प्रतीक है। ध्वज़ के मध्य में अशोक चक्र धर्म, सत्य और अहिंसा का बोध कराता है। (UPBoardSolutions.com) अशोक चक्र के मध्य में 24 शलाकाएँ पृथक् होती हुई चक्र के मूल में मिली हुई, भारत में विविध भाषा, धर्म, जाति और लिंग का भेद होने पर भी भारत के एक राष्ट्र होने का बोध कराती हैं। राष्ट्रध्वज सदा स्वच्छ, सुन्दर रंगों वाला और बिना कटा-फटी होना चाहिए। राष्ट्रीय शोक के समय इसे झुका दिया जाती है।
ये राष्ट्रीय प्रतीक हमें हमारी स्वतन्त्रता का बोध कराते हैं। हमें इनका आदर और सम्मान तो करना ही चाहिए, इनकी रक्षा भी प्राणपण से करनी चाहिए।

गघांशों का सासन्दर्भ अनुवाद

(1) सर्वेषु राष्ट्रेषु राष्ट्रियवैशिष्ट्ययुक्तानि वस्तूनि प्रतीकरूपेण स्वीक्रियन्ते तत्रत्यैः जनैः। तेषु प्रतीकेषु तद्राष्ट्रस्य गौरवं चारित्र्यं गुणाश्च प्रतिभासन्ते। तान्येव राष्ट्रियप्रतीकानि निगद्यन्ते।।

अस्माकं राष्ट्रे भारतेऽपि कतिपयानि प्रतीकानि स्वीकृतानि सन्ति। तान्यस्माकं चारित्र्यं संस्कृतिं महत्त्वं च व्यञ्जयन्ति। पक्षिषु कतमः पशुषु कतमः पुष्पेषुः कतमत् वाऽस्माकं राष्ट्रियमहिम्नः प्रातिनिध्यं विदधातीति विचार्यैव प्रतीकानि निर्धारितानि सन्ति।

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शब्दार्थ-
वैशिष्ट्ययुक्तानि = विशेषताओं से युक्त।
प्रतीकरूपेण = चिह्न के रूप में।
स्वीक्रियन्ते = स्वीकृत किये जाते हैं।
तत्रत्यैः जनैः = वहाँ के निवासियों के द्वारा।
प्रतिभासन्ते = झलकते हैं।
निगद्यन्ते = कहे जाते हैं।
कतिपयानि = कुछ।
तान्यस्माकम् (तानि + अस्माकम्) = वे हमारे।
व्यञ्जयन्ति = प्रकट करते हैं।
कतमः = कौन-सा।
राष्ट्रियमहिम्नः = राष्ट्रीय महत्त्व का।
विदधातीति (विदधाति + इति) = करता है, ऐसा।
विचार्यैव (विचार्य + एव) = विचार करके ही।
निर्धारितानि सन्ति = निर्धारित (निश्चित) किये गये हैं।

सन्दर्य प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत गद्य-भारती’ के ‘अस्माकं राष्ट्रियप्रतीकानि’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

संकेत
इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में बताया गया है कि प्रत्येक देश की भाँति हमारे देश में भी कुछ राष्ट्रीय प्रतीक निधार्रित किये गये हैं, जिनसे हमारे देश का गौरव और चरित्र झलकता है।।

अनुवाद
सभी राष्ट्रों में वहाँ के निवासियों के द्वारा राष्ट्र की विशेषताओं से युक्त वस्तुएँ प्रतीक रूप में स्वीकार की जाती हैं। उन प्रतीक-वस्तुओं में उस राष्ट्र का गौरव, चरित्र और गुण प्रतिबिम्बित होते हैं। उन्हें ही राष्ट्र के प्रतीक कहा जाता है। | हमारे राष्ट्र भारत में भी कुछ प्रतीक स्वीकार किये गये हैं। वे ही (UPBoardSolutions.com) हमारे देश के चरित्र, संस्कृति और महत्त्व को प्रकट करते हैं। पक्षियों में कौन-सा (पक्षी), पशुओं में कौन-सा (पशु) अथवा फूलों में कौन-सा (फूल) हमारे राष्ट्र की महिमा का प्रतिनिधित्व करता है, ऐसा विचार करके ही प्रतीक निर्धारित किये गये हैं।

(2) मयूरःपक्षिषु मयूरः राष्ट्रियपक्षिरूपेण स्वीकृतोऽस्ति। मयूरोऽतीव मनोहर: पक्षी वर्तते। चन्द्रकवलयसंवलितानि चित्रितानि तस्य पिच्छानि मनांसि हरन्ति। यदा गगनं श्यामलैर्मेधैरोच्छन्नं भवति तदा मयूरो नृत्यति। तस्य तदानीन्तनं नर्त्तनं नयनसुखकरमपि चेतश्चमत्कारकं भवति। मधुमधुरस्वरोऽपि मयूरो विषधरान् भुङ्क्ते। इदमेवास्माकं राष्ट्रियचारित्र्यं विद्यते। सर्वे सह मधुरं वाच्यं मधुरं व्यवहर्तितव्यं मधुरमाचरितव्यं किन्तु ये राष्ट्रद्रोहिणोऽत्याचारपरायणाः राष्ट्रियाखण्डतायाः राष्ट्रियैक्यस्य वा विघातकाः विषमुखाः सर्पतुल्याः मयूरेणैव राष्ट्रेण व्यापादयितव्याः।।

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शब्दार्थ-
मयूरोऽतीव (मयूरः + अति + इव), = मोर बहुत अधिक।
चन्द्रकवलयसंवलितानि = चन्द्रमा के आकार के वृत्त (गोलाकार चिह्न) से युक्त।
पिच्छानि = पूँछ के पंख।
श्यामलैमेघराच्छन्नं, (श्यामलैः + मेघेः + आच्छन्नम्) = काले बादलों से घिरे हुए।
तदानीन्तनम् = उस समय का।
नयनसुखकरम् = आँखों को सुख देने वाला, सुन्दर।
चेतः = मन।
विषधरान् = सर्पो को।
भुङ्क्ते = खाता है।
इदमेवास्माकं (इदं + एव + अस्माकं) = यह ही हमारा।
वाच्यं = बोलना चाहिए।
व्यवहर्तितव्यम् = व्यवहार करना चाहिए।
मधुरमाचरितव्यं (मधुरं + आचरितव्यम्) = मधुर आचरण करना चाहिए।
अत्याचारपरायणाः = अत्याचार में लगे हुए।
विघातकाः = नाशक।
विषमुखाः = विष से भरे मुख वाले।
मयूरेणेव (मयूरेण+ इव) = मोर के समान।
व्यापादयितव्याः = मारने योग्य।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में राष्ट्रीय चिह्न के रूप में स्वीकृत राष्ट्रय पक्षी मोर का वर्णन किया बंया है।

अनुवाद
मोर-पक्षियों में मोर को राष्ट्रीय पक्षी के रूप में स्वीकार किया गया है। मोर अत्यन्त सुन्दर पक्षी है। चन्द्राकार वृत्त (गोलाकार चिह्नों) से चित्रित उसकी पूँछ के पंख मन को हरते हैं, अर्थात् उसके रंग-बिरंगे पंखों को देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। जब आकाश काले बादलों से ढक जाता है, तब मोर नाचता है। उस समय का उसका नृत्य नेत्रों को सुख देने वाला और चित्त को आह्लादित करने वाला होता है। मधु के समान मीठे स्वर वाला होता हुआ भी मोर सर्पो को खाता है। यही हमारा राष्ट्रीय चरित्र है। सबके साथ मधुर बोलना (UPBoardSolutions.com) चाहिए, सौहार्दपूर्ण व्यवहार करना चाहिए, शिष्ट आचरण करना चाहिए, किन्तु जो राष्ट्रद्रोही, अत्याचारी, राष्ट्र की अखण्डता या राष्ट्र की एकता के नाशक सर्प के समान विष से भरे हुए हैं, उन्हें उस राष्ट्र के नागरिकों द्वारा उसी प्रकार नष्ट कर देना चाहिए, जिस प्रकार मोर विषैले सर्यों को नष्ट कर देता है।

(3) व्याघ्रःपशुषु व्याघ्रः भारतस्य राष्ट्रियप्रतीकम्। व्याघ्षु चित्रव्याघ्रः बहुवैशिष्ट्य विशिष्टो विद्यते। को न जानाति चित्रव्याघ्रस्यौजः पराक्रमं स्फूर्तिञ्च? एतज्जातीयाः व्याघ्राः अस्मद्देशस्य वनेषुपलभ्यन्ते। एतेषां शरीरे स्थूलकृष्णरेखाः भवन्ति। व्याघोऽसावतीव तीव्रधावकः सततसा- वहितः सङ्कटं विदूरादेव जिघ्न् तदपनेतुं सचेष्टः स्वलक्ष्यमवाप्तुं कृतिरतः स्वसीम्नि एवं पर्यटन् वन्यो जन्तुर्विश्रुतो जगति।। |

शब्दार्थ-
चित्रव्याघ्रः = चितकबरा बाघ।
ओज = बल।
स्फूर्तिञ्च (स्फूर्तिम् + च) = और फूर्ती।
एताज्जातीयाः (एतद् + जातीयाः) = इस जाति के।
अस्मद्देशस्य (अस्मत् + देशस्य) = इस देश के।
वनेषुपलभ्यन्ते (वनेषु + उपलभ्यन्ते) = वनों में प्राप्त होते हैं।
व्याघ्रोऽसावतीव (व्याघ्रः + असौ + अति + इव) = यह बाघ बहुत अधिक।
सावहितः = सावधान।
विदूरादेव = अधिक दूर से ही।
जिघ्रन् = सँघता है।
अपनेतुम् = दूर करने के लिए।
अवाप्तुम् = प्राप्त करने के लिए।
कृतिरतः = कार्यशील।
स्वसीम्नि = अपनी सीमा में विश्रुतः = प्रसिद्ध।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में राष्ट्रीय पशु के प्रतीक के रूप में स्वीकृत बाघ का वर्णन किया गया है।

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अनुवाद-बाघ
पशुओं में बाघ भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है। बाघों में चितकबरा बाघ बहुत विशेषताओं से युक्त होता है। चितकबरे बाघ के बल, वीरता और स्फूर्ति को कौन नहीं जानता है; अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति जानता है। इस जाति के बाघ हमारे देश के वनों में मिलते हैं। इनके शरीर पर मोटी काली रेखाएँ होती हैं। यह बाघ अत्यधिक तेज दौड़ने वाला, सदा सावधान रहने वाला, संकट को दूर से ही सूंघने वाला और उसको दूर करने के (UPBoardSolutions.com) लिए प्रयत्नशील, अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कार्यशील अपनी सीमा में ही घूमने वाला संसार में प्रसिद्ध जंगली जानवर है।

(4) कमलम्कमलं सरसिज पद्मं पङ्कजं शतदलमित्यादिनामभिः प्रथितं पुष्पमस्माकं राष्ट्रियप्रतीकत्वेन स्वीकृतं राष्ट्रियपुष्पस्य यशो विधते। तस्य कोमलत्वं मनोहरत्वं विकासशीलत्वं पवित्रत्वञ्चाभिलक्ष्यैव कविभिः तस्य बहुशः वर्णनं कृतम्। न कश्चिन्महाकविः संस्कृतभाषायां, हिन्दीभाषायां वा विद्यते येनैतस्य पुष्पस्य माहात्म्यं न गीतम्। देवानां स्तुतिप्रसङ्गे दिव्यकरचरणादीनामङ्गानां मानवहृदयस्य चोपमानीकृतं सत्सांस्कृतिकं महत्त्वं विभर्ति पुष्पमिदम्।

शब्दार्थ-
प्रथितम् = प्रसिद्ध।
पुष्पमस्माकम् (पुष्पम् + अस्माकम्) = हमारे फूल।
यशो विधत्ते = यश धारण करता है।
पवित्रत्वञ्चाभिलक्ष्यैव (पवित्रत्वं + च + अभिलक्षि + एव) = और पवित्रता का विचार करके ही।
बहुशः = अत्यधिक।
येनैतस्य (येन + एतस्य) = जिसने इसका।
चोपमानीकृतम् (च + उपमानीकृतम्) = और उपमान के रूप में प्रयुक्त किया गया।
बिभर्ति = धारण करता है।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में राष्ट्रीय पुष्प के रूप में चयनित ‘कमल’ के फूल का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
कमले-कमल, सरसिज, पद्म, पंकज, शतदल इत्यादि नामों से प्रसिद्ध फूल हमारे राष्ट्र के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया गया, राष्ट्रीय पुष्प के यश को धारण करता है। उसकी कोमलता, सुन्दरता, विकासशीलता और पवित्रता को लक्ष्य करके ही कवियों ने उसका बहुत प्रकार से वर्णन किया है। संस्कृत भाषा या हिन्दी भाषा में ऐसा कोई महाकवि नहीं है, जिसने इस पुष्प के महत्त्व का गान न किया हो। देवताओं की स्तुति के (UPBoardSolutions.com) अवसर पर, सुन्दर हाथ-पैर आदि अंगों के और मानव हृदय के उपमान के रूप में प्रयोग किया गया यह फूल सुन्दर सांस्कृतिक महत्त्व को धारण करता है। |

(5) शरदत मनोहरं पुष्पमिदं यत्र तत्र जलसङ्कुलेषु तड़ागेषु सरसु चानायासेनोत्पद्यते वर्धते . रविकनिकरसंसर्गात् प्रस्फुटित। पङ्के जायते पङ्कजं जलसंयोगं शरत्कालञ्चावाप्य वर्धते शोभते । च तथैव कस्मिश्चित् कुले जातः जनः सौविध्यमुपयुक्तावसरञ्च लब्ध्वा वर्धितुं क्षमत इति तत्पुष्पस्य राष्ट्रकृते सन्देशः।।

शब्दार्थ-
शरद (शरद् + ऋर्ती) = शरद् ऋतु में।
चानायासेनोत्पद्यते (च + अनायासेन + उत्पद्यते) = और अनायास उत्पन्न होता है।
रविकरनिकरसंसर्गात् = सूर्य की किरणों के सम्पर्क से।
प्रस्फुटित = विकसित होता है।
सौविध्यमुपयुक्तोवसरञ्च (सौविध्यम् + उपयुक्त + अवसरं + च) = सुविधा और उपयुक्त अवसर को।

प्रसंग
पूर्ववत्।

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अनुवाद
शरद् ऋतु में यह सुन्दर फूल जहाँ-तहाँ जल से भरे तालाबों और पोखरों में सरलता से उत्पन्न होता है और बढ़ता है। सूर्य की किरणों के समूह के सम्पर्क से खिलता है। कीचड़ में (UPBoardSolutions.com) उत्पन्न होता है, उसी प्रकार किसी भी कुल में उत्पन्न हुआ मनुष्य सुविधा और उपयुक्त (अनुकूल) अवसर पाकर बढ़ने में समर्थ होता है। यही इस पुष्प की राष्ट्र के लिए सन्देश है। |

(6) राष्ट्रगानम्-सर्वेषां स्वतन्त्रदेशानां स्वकीयमेकं गानं भवति तदैव राष्ट्रगानसंज्ञयाऽवबुध्यते। प्रत्येकं राष्ट्रं स्वराष्ट्रगानस्य सम्मानं करोति। महत्स्ववसरेषु तद्गानं गीयते। मंदि कश्चिदन्यराष्ट्राध्यक्षोऽस्माकं देशमागच्छति तदा तस्य सम्मानाय तस्य राष्ट्रगानमस्मद्राष्ट्रगानं च वादकैः वाद्येते। महतीनां सभानां समापने तस्य गानमावश्यकम्। विद्यालयेषु प्रार्थनानन्तरं प्रतिदिनं राष्ट्रगानं गीयते।।

शब्दार्थ-
अवबुध्यते = जाना जाता है।
वाद्येते = बजाये जाते हैं।
समापने = समाप्ति पर।
अनन्तरं = बाद में।।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में राष्ट्रगान का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
राष्ट्रगान–सभी स्वतन्त्र देशों का अपना एक गान होता है, वही राष्ट्रगान’ इसे नाम से जाना जाता है। प्रत्येक राष्ट्र अपने राष्ट्रगान का सम्मान करता है। बड़े महत्त्वपूर्ण अवसरों पर उस गान। को गाया जाता है। यदि किसी दूसरे देश का राष्ट्राध्यक्ष (राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री) हमारे देश में आता है, तब (UPBoardSolutions.com) उसके सम्मान के लिए उसके देश का राष्ट्रगान और हमारा राष्ट्रगान वादकों के द्वारा बजाया जाता है। बड़ी सभाओं के समापन पर राष्ट्रगान का गायन ओवश्यक है। विद्यालयों में प्रार्थना के बाद प्रतिदिन राष्ट्रगान गाया जाता है।

(7) अस्माकं राष्ट्रगानं विश्वकविना कवीन्द्रेण रवीन्द्रेण रचितं ‘जनगणमन’ इति संज्ञया विश्वस्मिन् विश्वे विश्रुतं वर्तते। अस्माकं राष्ट्रगाने भारताङ्गभूतानामनेकप्रान्तानां विन्ध्यहिमालय-पर्वतयोः गङ्गायमुनाप्रभृतिनदी नाञ्चोल्लेखं कृत्वा देशस्य विशालत्वं राष्ट्रस्याखण्डत्वं संस्कृतेः गौरवञ्च विश्वकविना वर्णितम्।।

शब्दार्थ-
संज्ञया = नाम से विश्वस्मिन्
विश्वे = पूरे संसार में।
विश्रुतं = प्रसिद्ध।
प्रभृति = आदि।
अखण्डत्वं = अखण्डता।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में राष्ट्रगान के स्वरूप का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
हमारा राष्ट्रगान विश्वकवि कवीन्द्र रवीन्द्र द्वारा रचा गया ‘जन-गण-मन’ इस नाम से सारे संसार में प्रसिद्ध है। हमारे राष्ट्रगान में भारत के अंगस्वरूप अनेक प्रान्तों का, विन्ध्याचल और हिमालय पर्वतों का, गंगा-यमुना आदि नदियों का उल्लेख करके विश्वकवि ने देश की विशालता, राष्ट्र की अखण्डता और संस्कृति के गौरव का वर्णन किया है। |

(8) राष्ट्रगानमिदं द्वापञ्चाशत्पलात्मकं भवति। तस्य गाने द्वापञ्चाशत्पलात्मकः-समयोऽपेक्ष्यते। न ततोऽधिको न वा ततो न्यूनः। तस्यारोहावरोहापि निश्चितौ। तत्र विपर्ययः कर्तुं न (UPBoardSolutions.com) शक्यते। राष्ट्रगाने सदोत्थितैः जनैः सावधानमुद्रया गेयम्। राष्ट्रगानावसरेऽङ्गसञ्चालनं निषिद्धम्। चलतोऽपि कस्यचित्कर्णकुहरे गीयमानस्य राष्ट्रगानस्य ध्वनिः दूरादप्यापतति चेत्तदा तत्रैव सावधानमुद्रया तेनाविचलं स्थातव्यम्।राष्ट्रगानं श्रद्धास्पदं भवति।श्रद्धयैवेदं गेयम्। |

शब्दार्थ-
द्वापञ्चाशत्पलात्मकं (द्वांपञ्चाशत् + पल + आत्मकम्) = बावन पल (52 सेकन्ड) वाला।
अपेक्ष्यते = अपेक्षा होती है।
तस्यारोहावरोहापि (तस्य + आरोह + अवरोहौ + अपि) = उसके चढ़ाव और उतार भी।
विपर्ययः = परिवर्तन, विपरीत।
सावधानमुद्रया = सावधान की मुद्रा में।
निषिद्धम् = निषिद्ध, विपरीत।
कर्णकुहरे = कर्ण-छिद्र में।
आपतति = गिरती है, पड़ती है।
चेत् = यदि।
स्थातव्यम् = स्थित होना चाहिए।
श्रद्धास्पदं = श्रद्धा के योग्य।
श्रद्धयैवेदम् (श्रद्धया + एवं+ इदम्) = श्रद्धा से ही इसे। ।

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प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में राष्ट्रगान के गाने का समय, गाने की मुद्रा तथा इसके महत्त्व को बताया गया है।

अनुवाद
यह राष्ट्रगान बावन सेकण्ड का होता है। उसके गाने में बोवन सेकण्ड के समय की आवश्यकता होती है। न उससे अधिक की और न ही उससे कम की। उसके स्वरों का आरोह-अवरोह (चढ़ाव और उतार) भी निश्चित है। उसमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। राष्ट्रगान को सदा खड़े हुए लोगों के द्वारा (UPBoardSolutions.com) सावधान मुद्रा में गाया जाना चाहिए। राष्ट्रगान के अवसर पर अंग हिलाना भी वर्जित । है। यदि चलते हुए भी किसी व्यक्ति के कान के छेद में गाये जाते हुए राष्ट्रगान की ध्वनि दूर से भी आ पड़ती है, तब वहीं पर सावधान मुद्रा में उसे स्थिर खड़े हो जाना चाहिए। राष्ट्रगान श्रद्धायोग्य होता है।. श्रद्धापूर्वक ही इसे गाना चाहिए।

(9) राष्ट्रध्वजः सर्वेषु राष्ट्रप्रतीकेषु राष्ट्रध्वजस्य सर्वाधिक महत्त्वं वर्तते। सर्वस्य स्वतन्त्रराष्ट्रस्य स्वकीयो ध्वजो भवति। तद्देशवासिनो जनाः नराः नार्यश्च स्वराष्ट्रध्वजस्य सम्मानं प्राणपणेन रक्षन्ति।।
त्रिवर्णात्मको मध्येऽशोकचक्राङ्कितोऽस्माकं राष्ट्रध्वजः ‘तिरङ्गा’ शब्देन विश्वे विश्रुतो विद्यते।।

शब्दार्थ
सर्वाधिकम् = सबसे अधिक।
वर्तते = है।
प्राणपणेन = प्राणों के मूल्य से अर्थात् प्राणों की बाजी लगाकर।
त्रिवर्णात्मकः = तीन रंगों वाला।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में हमारे राष्ट्रीय प्रतीकों में राष्ट्रध्वज के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है।

अनुवाद
राष्ट्रध्वज-सभी राष्ट्रीय-प्रतीकों में राष्ट्रध्वज का सबसे अधिक महत्त्व है। सभी स्वतन्त्र राष्ट्रों का अपना राष्ट्रध्वज होता है। उस देश के रहने वाले स्त्री और पुरुष अपने राष्ट्रध्वज के (UPBoardSolutions.com) सम्मान की रक्षा प्राणों की बाजी लगाकर करते हैं। तीन रंगों वाला, मध्य में अशोक चक्र से चिह्नित हमारा राष्ट्रध्वज तिरंगा’ शब्द से संसार में प्रसिद्ध है।

(10) ध्वजस्याधोभागः हरितवर्णात्मकः सुखसमृद्धिविकासानां सूचकः, मध्यभागे श्वेतवर्णः ज्ञान-सौहार्द-सदाशयादिसद्गुणानां द्योतकः, ऊर्श्वभागे च स्थितः गैरिकवर्णः त्यागस्य शौर्यस्य च बोधकः। ध्वजस्य मध्यभागस्थितश्वेतवर्णमध्येऽवस्थितमशोकचक्रं धर्मस्य सत्यस्याहिंसायाश्च प्रत्यायकम्। चक्रे चतु:विंशतिशलाकाः पृथगपि चक्रमूले एकत्र सम्बद्धाः भारते भाषाधर्मजातिवर्णालिङ्गभेदेषु सत्स्वपि भारतमेकं राष्ट्रमिति द्योतयन्ति। |

शब्दार्थ-
अधोभागः = निचला भाग।
सौहार्द = बन्धुत्व।
द्योतकः = बतलाने वाला।
गैरिकवर्णः = गेरुआ रंग।
प्रत्यायकम् = विश्वास दिलाने वाला।
चतुःविंशतिशलाकाः = चौबीस तीलियाँ।
सत्स्वपि (सत्सु + अपि) = होने पर भी।
द्योतयन्ति = सूचित करते हैं।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में राष्ट्रध्वज के रंगों के वास्तविक अर्थ का बोध कराया गया है। |

अनुवाद
ध्वज के हरे रंग का नीचे का भाग सुख, समृद्धि और विकास का सूचक है। बीच में सफेद रंग ज्ञान, मैत्री, सदाशयता आदि उत्तम गुणों का बोधक है। ध्वज के ऊपरी भाग पर स्थित केसरिया रंग त्याग और शौर्य (वीरता) को सूचक है। ध्वज के मध्य भाग में सफेद रंग के बीच में स्थित अशोक चक्र धर्म, सत्य (UPBoardSolutions.com) और अहिंसा का विश्वास दिलाने वाला है। चक्र में चौबीस रेखाएँ अलग होती हुई भी चक्र के मूल में एक जगह जुड़ी हुई भारत में भाषा, धर्म, जाति, वर्ण, लिंग के भेदों के होते हुए भी ‘भारत एक राष्ट्र है’ ऐसा सूचित करती हैं।

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(11) राष्ट्रध्वजो निर्धारितदीर्घविस्तारपरिमितो भवितव्यः। एषः सदा स्वच्छोऽविकृतवर्णः तिष्ठेत्। जीर्णः शीर्णो विदीर्णो वा ध्वजो नोपयोगयोग्यः। समुच्छ्यिमाणः ध्वजोऽस्तङ्गते सूर्ये समंवतार्य सुरक्षितः संरक्षितव्यः।राष्ट्रियशोकावसरेध्वजोऽर्धमुच्छ्रीयते।।
इत्येतानि राष्ट्रियप्रतीकान्यस्माकं स्वातन्त्र्यस्य प्रत्यायकानि समादृतव्यानि तु सन्त्येव प्राणपणैः रक्षितव्यानि च। |

शब्दार्थ-
परिमितः = निश्चित परिमाण वाला।.
अविकृतवर्णः = शुद्ध रंगों वाला; अर्थात् बिना बिगड़े रंग वाला।
जीर्णः = पुराना।
विदीर्णः = फटा हुआ।
नोपयोगयोग्यः (न + उपयोगयोग्यः) = उपयोग न करने योग्य।
समुच्छ्यिमाणः (सम् + उत् + श्रियमाण:) = ऊपर फहराता हुआ।
समवतार्य = ठीक से उतारकर।
संरक्षितव्य = सुरक्षित रख लेना चाहिए।
इत्येतानि = इस प्रकार ये।
समादृतव्यानि = अधिक आदर करने योग्य। सन्त्येव (सन्ति + एव) = हैं ही।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में राष्ट्रध्वज के स्वरूप एवं उसके फहराये जाने के नियम का उल्लेख है।

अनुवाद
राष्ट्रध्वज निश्चित विस्तार वाला होना चहिए। यह सदा साफ, भद्दे न हुए रंगों वाला होना चाहिए। पुराना, कटा-फटा ध्वज उपयोग के योग्य नहीं है। फहराता हुआ ध्वज सूर्य के छिपने पर उतारकर सुरक्षित रख लेना चाहिए। राष्ट्रीय शोक के अवसर पर ध्वज आधा (UPBoardSolutions.com) फहराया जाता है।
ये राष्ट्रीय प्रतीक हमारी स्वतन्त्रता का विश्वास दिलाने वाले हैं। ये आदर के योग्य तो हैं ही, साथ ही प्राणपण से रक्षा के योग्य भी हैं।

लघु उत्तरीय प्ररन

प्ररन 1
भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों की गणना कीजिए।
उत्तर
भारत के पाँच राष्ट्रीय प्रतीक हैं, जिनमें ‘मोर’ राष्ट्रीय पक्षी, ‘बाघ’ राष्ट्रीय पशु, ‘कमल’ राष्ट्रीय पुष्प, ‘जन गण मन’ राष्ट्रीय गान और तिरंगा राष्ट्रध्वज के रूप में स्वीकृत हैं। |

प्ररन 2
राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में स्वीकृत ‘मोर’ की विशेषता लिखिए। यह राष्ट्रवासियों को क्या सन्देश देता है?
उत्तर
मोर अत्यन्त सुन्दर पक्षी है और इसकी बोली भी अत्यधिक मधुर है। इसका भोजन विषैले सर्प हैं। यह हमें सन्देश देता है कि हमें भी सभी से मधुर वाणी में बोलना चाहिए, (UPBoardSolutions.com) अच्छा व्यवहार करना चाहिए और राष्ट्रीय एकता-अखण्डता को नष्ट करने वाले सर्प के समान दुष्ट व्यक्तियों को मार देना चाहिए।

प्ररन 3
राष्ट्रीय पुष्पकमल’ का राष्ट्र के लिए क्या सन्देश है? |
उत्तर
कमल’ कीचड़ में उत्पन्न होता है, शरद् ऋतु में बढ़ता है और खिलकर शोभा पाता है। यह राष्ट्रवासियों को सन्देश देता है कि प्रतिकूल परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर भी उन्हें अपना धैर्य बनाये रखना चाहिए और अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा करते रहना चाहिए।

प्ररन4
राष्ट्रीय ध्वज में प्रयुक्त अशोक चक्र का क्या महत्त्व है?
उत्तर
राष्ट्रीय ध्वज में प्रयुक्त अशोक चक्र सत्य, धर्म और अहिंसा का बोध कराता है। जिस प्रकार चक्र की शलाकाएँ अलग-अलग होते हुए भी केन्द्र में मिली होती हैं, उसी प्रकार हमें भी भाषा, धर्म, जाति आदि की भिन्नताओं के बाद भी एकजुट होकर रहना चाहिए। यही भावना अशोक चक्र के द्वारा प्रकट होती है।

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प्ररन 5
अपने राष्ट्र-गान और राष्ट्रध्वज की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
हमारा राष्ट्र-गान कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित है। इसमें कवि ने भारत के प्रान्तों, पर्वतों और नदियों का उल्लेख किया है, जो राष्ट्र की विशालता, अखण्डता, संस्कृति तथा गौरव को ध्वनित करता है। हमारा राष्ट्रध्वज तीन रंगों वाला है और ‘तिरंगा’ नाम से जाना जाता है। इसका हरा रंग सुख, (UPBoardSolutions.com) समृद्धि और विकास का सूचक है, सफेद रंग ज्ञान, भाईचारा, उच्च विचार जैसे सदगुणों का द्योतक है। और केसरिया रंग त्याग और शूरता का बोधक है। सफेद रंग के मध्य में स्थित चक्र ‘अनेकता में एकता’ को प्रकट करता है।

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Class 9 Sanskrit Chapter 16 UP Board Solutions अन्तरिक्ष-विज्ञानम् Question Answer

UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 16 अन्तरिक्ष-विज्ञानम् (गद्य – भारती) are the part of UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 16 अन्तरिक्ष-विज्ञानम् (गद्य – भारती).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 16
Chapter Name अन्तरिक्ष-विज्ञानम् (गद्य – भारती)
Number of Questions Solved 3
Category UP Board Solutions

UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 16 Antariksh – Vigyanam Question Answer (गद्य – भारती)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 16 हिंदी अनुवाद अन्तरिक्ष-विज्ञानम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

पाठ-सारांश

अन्तरिक्ष–प्रकृति के विधान में बहुवर्णी शाटिका को पहने पृथ्वी जिस प्रकार मानवों को नदी-नद-पर्वत-रत्नरूपमयी अपनी विशाल सम्पत्ति से मोह लेती है, उसी प्रकार विशाल, अनन्त, नि:सीम और ब्रह्मस्वरूपात्मक अन्तरिक्ष भी मानवों को आकृष्ट करता है। अनन्त आकाश में असंख्य नक्षत्र, पुच्छल तारे, नीहारिकाएँ, ग्रह, उपग्रह, सूर्य, चन्द्रमा, सप्तर्षि, 27 नक्षत्र और राशियाँ हैं, जो इसकी चकाचौंध को स्पष्ट करती हैं।

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सौर-साम्राज्य–आकाश में स्थित सौर-साम्राज्य में एक सूर्य, नौ ग्रह, 28 उपग्रह, अनेक ग्रहकणिकाएँ, हजारों धूमकेतु और अनेक उल्काएँ हैं। ये ग्रह-कणिकाएँ मंगल और बृहस्पति नक्षत्र के बीच बिखरी हुई हैं। धूमकेतु ग्रहों और उपग्रहों से भिन्न होते हैं। छोटे-छोटे टिमटिमाते हुए प्रकाशबिन्दु तारा हैं। भीषण गर्मी और जलाभाव के कारण प्राणियों का यहाँ रहना असम्भव है।

सूर्य-सूर्य थाली के आकार का दिखाई देता हुआ भी वैसा नहीं है। यह पृथ्वी से तेरह लाख गुना बड़ा है तथा पृथ्वी से इसकी दूरी नौ करोड़ तीस लाख मील है। चन्द्रमा भी सूर्य जैसा ही दिखाई पड़ता है किन्तु वह पृथ्वी से भी बहुत छोटा है। नक्षत्र सूर्य की अपेक्षा बड़े होते हैं, परन्तु छोटे-छोटे दिखाई देते हैं। इसका कारण यह है कि जो वस्तु जितनी दूर होती है वह उतनी ही छोटी दिखाई देती है। सूर्य यदि क्षणभर के (UPBoardSolutions.com) लिए भी अपने आकर्षण को रोक ले तो सभी ग्रह और उपग्रह आपस में टकराकर गिर पड़ेगे और पृथ्वी तो चूर्ण-चूर्ण हो जाएगी। यदि सूर्य अपना प्रकाश और ताप देना बन्द कर दे तो सभी जड़-चेतन का विनाश हो जाये। यही कारण है कि सूर्य हमारा महान् उपकारक है।

सप्तर्षि और ध्रुव की स्थिति-उत्तरी दिशा में सप्तर्षि तारे हल के आकार में चमकते हैं। तीन तारे ऊपर पूँछ के रूप में तथा शेष चार नीचे चमकते हैं। इन्हीं के पास ध्रुव तारा भी चमकता है।

धूमकेतु-1908 ई० में एक फुच्छल तारा (धूमकेतु) उत्तर की ओर देखा गया था। दूसरा धूमकेतु 1910 ई० में दिखाई दिया। धूमकेतु की पूँछ अत्यन्त विशाल और भाप से बनी होती है। यह सौर-साम्राज्यँ के परिवार का नहीं है। यदि यह कभी सौर-साम्राज्य की सीमा में प्रवेश कर जाता है तो सूर्य इसे बलात् खींचकर घुमा देता है। इसे अपशकुन का द्योतक माना जाता है।

उल्काएँ–गहन रात्रि में जब आकाश स्वच्छ होता है, उस समय बाण के आकार का चकाचौंध करने वाला प्रकाश आकाश को चीरता हुआ वेग से दूर तक दौड़कर लुप्त हो जाता है। लोग इसे लूक टूटना’ कहते हैं और इसे देखने पर फूलों का नाम लेकर या थूककर सम्भावित अनिष्ट का निवारण करते हैं। वास्तव में उल्काएँ इकट्ठी होकर इधर-उधर घूमती हैं। जब ये पृथ्वी की सीमा में पहुँचती हैं। तब वायुमण्डल से घर्षण (UPBoardSolutions.com) करके जलती हुई फैलती हैं और फिर नष्ट हो जाती हैं। कुछ अधजली अवस्था में भूमि पर भी गिर जाती हैं। ऐसी उल्काएँ.कलकत्ता के संग्रहालय में रखी हुई हैं।

चन्द्रमा-चन्द्रमा सभी नक्षत्रों में पृथ्वी के अधिक समीप है। इसकी कलाएँ घटती-बढ़ती रहती हैं। चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर चक्कर काटता रहता है और 28 दिन में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा कर लेता है। चन्द्रमा की कलाओं से तिथियों और महीनों का निर्माण होता है। चन्द्रमा सूर्य से प्रकाशित होता है। जब वह सूर्य और पृथ्वी के मध्य में आ जाता है, तब ग्रहण होता है। चन्द्रमा के जिस भाग पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है, वह कला रूप में दिखाई देता है और वही प्रकाश क्रम से घटता-बढ़ता रहता है। (UPBoardSolutions.com) अमावस्या के दिन चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वी के मध्य में होता है। उसका जो भाग सूर्य के सामने होता है, वह प्रकाशमान होता है और वह भाग पृथ्वी पर दिखाई नहीं देता। पूर्णिमा के दिन पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा के मध्य में होती है, उस समय सम्पूर्ण चन्द्रमा प्रकाशमान दिखाई देता है।

नीहारिकाएँ-आकाश में विशाल आकार के वाष्पीय पदार्थों के जो समूह दिखाई देते हैं, वे नीहारिकाएँ हैं। रात के समय आकाश के बीच से सड़क बनाता हुआ-सा प्रकाश दिखाई पड़ता है। आकाश में बहुत-सी नीहारिकाएँ हैं, ये ऊँची-नीची बड़े आकार की, गोल आकार की और कुण्डली के आकार की होती हैं। एक नीहारिका सूर्य से दस खरब गुनी बड़ी होती है। बड़ी नीहारिका स्वयं में एक बड़ा ब्रह्माण्ड होती है। नीहारिका में असंख्य तारे होते हैं। इसे आकाश-गंगा भी कहते हैं। |

नौ ग्रह-आधुनिक वैज्ञानिक सूर्य के बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, वरुण, वारुणी और यम ये नौ ग्रह बताते हैं। भारतीय ज्योतिषी सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु को नौ ग्रह कहते हैं।

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शोंगद्यां का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) प्रकृतेः विधाने यत्र इयं वसुन्धरा विभिन्नेषु रूपेषु बहुवर्णिकां शाटिकां परिधाय स्वकीयया विशालया नदी-वन-पर्वत-रत्न-रूपया सम्पत्तया मानवानां मनो मोहयति, तथैव विशालमिदमन्तरिक्षं नि:सीमकमनन्तं हिरण्यगर्भात्मकं चास्ति। अस्मिन्ननन्ते आकाशे अनन्तानि नक्षत्राणि, पुच्छलताराः, नीहारिकाः, ग्रहाः, उपग्रहाः, आदित्याः, चन्द्रमाः, सप्तर्षयः, सप्तविंशतिनक्षत्राणि संवत्सरप्रवर्तकाः राशयः विलीनाः चाकचिक्यं प्रकटयन्ति।

शब्दार्थ
बहुवर्णिकां = अनेक रंगों की।
शाटिकां = साड़ी।
परिधाय = पहनकर।
निः सीमकम् = सीमारहित।
हिरण्यगर्भात्मकम् = ब्रह्मस्वरूपात्मक।
आदित्याः = सूर्य।
सप्तविंशति = सत्ताइस।
विलीनाः = समायी हुई।
चाकचिक्यम् = चकाचौंधं।
प्रकटयन्ति = प्रकट करती है। |

सन्दर्भ
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत गद्य-भारती’ में संकलित। ‘अन्तरिक्ष-विज्ञानम्’ पाठ से उद्धृत किया गया है
[संकेत-इस पाठ के शेष गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।] । प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में अन्तरिक्ष की विशालता एवं पृथ्वी की विचित्रता बतायी गयी है।

अनुवाद
प्रकृति के विधान में जहाँ यह पृथ्वी विभिन्न रूपों में बहुरंगी साड़ी पहनकर नदी, वन, पर्वत, रत्नरूप अपनी विशाल सम्पत्ति से मानवों के मन को मोह लेती है, उसी प्रकार यह विशाल अन्तरिक्ष असीम, अनन्त और ब्रह्मस्वरूप वाला है। इस अनन्त आकाश में असंख्य नक्षत्र, पुच्छल तारे, (UPBoardSolutions.com) आकाश-गंगाएँ, ग्रह, उपग्रह, सूर्य, चन्द्रमा, सप्तर्षि, तारे, सत्ताइस नक्षत्र, संवत्सरों की प्रवर्तक राशियाँ विलीन होकर चकाचौंध प्रकट करती हैं।

(2) कैवले सौरसाम्राज्ये एकः आदित्यः, तस्य नवग्रहाः अष्टाविंशत्युपग्रहान सन्ति। अनेकाः ग्रहकणिकाः सहस्रं धूम्रकेतवः तथैव अनन्ता उल्काश्च समुपलभ्यन्ते। ग्रहकणिकाः, मङ्गलबृहस्पतिनक्षत्रयोरन्तरले विकीर्णाः सन्ति। ताः लघ्व्यः सन्ति, उल्काश्च ततोऽपि अतिलघ्व्यः। धूम्रकेतवः ग्रहेभ्यः उपग्रहेभ्यश्च भिन्नाः भवन्ति। ते परिमाणेन लघवः आकाशे इतस्ततः विकीर्णाः सन्ति। अल्पीयांसं प्रकाशबिन्दु ध्रियमाणाः टिमटिमायन्ते तास्तास्ताराः। तत्र भीषणमौष्ण्यं जलाभावश्चातः प्राणिनां निःश्वसनमसम्भवम्।

शाब्दार्थ
अष्टाविंशत्युपग्रहाः = अट्ठाइस उपग्रह।
ग्रहकणिकाः = छोटे-छोटे ग्रह के कण (टुकड़े)।
समुपलभ्यन्ते = प्राप्त होती हैं।
अन्तराले = मध्य में।
विकीर्णाः = फैली हुई।
लघ्व्यः = छोटी-छोटी।
इतस्ततः = इधर-उधर।
अल्पीयांसम् = थोड़ी-सी।
श्रियमाणाः = धारण करते हुए।
औष्ण्यम् = गर्मी।
निवसनम् = रहना।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में सौर-मण्डल का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
केवल सौर-मण्डल में एक सूर्य, उसके नौ ग्रह, अट्ठाइस उपग्रह हैं। अनेक छोटे-छोटे ग्रह, हजारों धूमकेतु और उसी प्रकार अनन्त उल्काएँ पायी जाती हैं। ग्रह-कणिकाएँ मंगल और बृहस्पति नक्षत्रों के मध्य में फैली हैं। वे बहुत छोटी हैं और उल्काएँ उनसे भी अधिक छोटी होती हैं। धूमकेतु ग्रहों और उपग्रहों से भिन्न होते हैं। वे परिमाण में छोटे, आकाश में इधर-उधर फैले हुए हैं।

थोड़े-से प्रकाश के बिन्दु को धारण करते हुए अनेक तारे टिमटिमाते रहते हैं। वहाँ भीषण गर्मी है एवं जल का अभाव है; अत: प्राणियों का वहाँ रहना असम्भव है।

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(3) सूर्यः स्थाल्याकारः प्रतीयते परम् एवं नास्ति। अयं पृथिव्याः त्रयोदशलक्षात्मको गुणितो अतीव महान् वेविद्यते। चन्द्रोऽपि प्रायः सूर्य इव वीक्षते। परन्तु पृथिव्या अपि लघुरस्ति। नक्षत्राणामाकारं आवं-श्रावं पाठे-पाठं मनोऽतीव विमुग्धतां भजते। तानि सूर्यापेक्षया अतीव महान्ति प्रतिभान्ति, परं लघूनि दृश्यन्ते। कारणमिदं यद्वस्तु यावदूरं भवति, तद्वस्तु लघु दृश्यते। सूर्यो यदि ऐक क्षणमपि नैजमाकर्षणमवरुन्धीत् तदा सर्वे (UPBoardSolutions.com) ग्रहाः उपग्रहाश्च परस्परं संघर्षणं, परिघट्टनञ्च कुर्वाणाः स्वस्थानात् च्यवीरन्। वराकी पृथिवी तु सर्वथैव चूर्णतां गच्छेत्। इत्थमेकमपि मुहूर्तं तापं प्रकाशञ्च यदि सूर्योऽवरुन्ध्यात् तदा अस्माकं समेषां जडचेतनानां सर्वनाशो जायेत। सौरसाम्राज्ये यानि पिण्डानि सन्ति तेषां गतिः सुनिश्चिता, तानि एकस्यामेव दिशि गतिं प्रकुर्वते, तस्यामेव धुरि परिचलन्ति। द्वौ त्रयो वा उपग्रहा एवंविधाः सन्ति ये विपरीत दिशं वहन्ति। ते सर्वे सौरसाम्राज्ये नियमं व्यवस्थामेवावलम्बन्ते। पृथिवीतः सूर्यः त्रिंशल्लक्षाधिकनवकोटिमीलापरिमिते दूरेऽस्ति। चन्द्रोऽपि पृथिवीतः लक्षद्वयात्मके दूरे वसति।

शब्दार्थ
स्थाल्याकारः = थाली के आकार वाला।
प्रतीयते = प्रतीत होता है।
वेविद्यते = विद्यमान है।
वीक्षते = दिखाई पड़ता है।
आवं-आवम् = सुन-सुनकर।
पाठे-पाठम् = पढ़-पढ़कर।
विमुग्धतां भजते = मुग्ध हो जाता है।
प्रतिभान्ति = प्रतीत होते हैं।
यावत् दूरं = जितनी दूर।
नैजम् = स्वयं से सम्बन्धित।
अवरुन्धीत = रोक ले।
च्यवीरन् = गिर पड़े।
वराकी = बेचारी।
चूर्णता गच्छेत् = चूर्ण हो जाये।
अवरुन्ध्यात् = रोक ले।
समेषाम् = सभी का।
प्रकुर्वते = करते हैं।
धुरि = धुरी पर।
वहन्ति = चलते हैं।
अवलम्बन्ते = सहारा लेते हैं।
त्रिंशल्लक्षाधिकनवकोटिमील = नौ करोड़ तीस लाख मील।।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में सौर-मण्डल में सूर्य के आकार, उसके पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव तथा उसकी स्थिति बतायी गयी है।

अनुवाद
सूर्य थाली के आकार को मालूम पड़ता है, परन्तु ऐसा नहीं है। यह पृथ्वी से तेरह लाख गुना अधिक बड़ा विद्यमान है। चन्द्रमा भी प्रायः सूर्य के समान दिखाई देता है, परन्तु यह पृथ्वी से भी छोटा है। नक्षत्रों के आकार को सुन-सुनकर, पढ़-पढ़कर मन अत्यन्त मुग्ध हो जाता है, वे सूर्य की अपेक्षा अत्यन्त विशाल होते हैं, परन्तु छोटे दिखाई देते हैं। इसका यह कारण है कि जो वस्तु जितनी दूर होती है, वह वस्तु उतनी छोटी दिखाई देती है। यदि सूर्य एक क्षण को भी अपना आकर्षण रोक दे, तब सब ग्रह और उपग्रह आपस में रगड़ते हुए और टकराते हुए अपने स्थान से गिर पड़े। बेचारी पृथ्वी तो पूरी तरह से चूर्ण-चूर्ण हो जाये। इसी प्रकार यदि सूर्य एक (UPBoardSolutions.com) मुहूर्त (थोड़े समय) को भी ताप और प्रकाश बन्द कर दे, तब हम सभी जड़-चेतन प्राणियों का सर्वनाश हो जाये। सौर-साम्राज्य में जो पिण्ड हैं, उनकी गति सुनिश्चित है और वे एक ही दिशा में गमन करते हैं और उसी धुरी पर घूमते हैं। दो या तीन उपग्रह इस तरह के हैं, जो विपरीत दिशा में चलते हैं। वे सब सौर-साम्राज्य में नियम और व्यवस्था का ही सहारा लेते हैं। सूर्य पृथ्वी से नौ करोड़ तीस लाख मील दूरी पर है। चन्द्रमा भी पृथ्वी से दो लाख मील दूरी पर रहता है।”

(4) सप्तर्षयः ध्रुवं च-उत्तरस्यां दिशि सप्तर्षयः हलाकारं प्रतिभासन्ते। तिस्राः ताराः उपरि एकस्यां पुङ्क्तौ पुच्छरूपेण, चतस्रः चतुरस्रतयाधः प्रतिभासन्ते। समीपे धुवं भं भासते।

शब्दार्थ
हलाकारम् = हल के आकार के
प्रतिभासन्ते = चमकते हैं।
पुच्छरूपेण = पूँछ के रूप में।
चतुरस्रतयाधः (चतुरस्रतया + अधः) = चौकोर तथा नीचे।
भम् = तारा।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में सप्तर्षि तारों और ध्रुव के विषय में बताया गया है।

अनुवाद
सप्तर्षि तारे और धुव-उत्तर दिशा में सप्तर्षि तारे हल के आकार में चमकते हैं। तीन तारे ऊपर एक पंक्ति में पूँछ रूप में, चार चौकोर होने से नीचे की ओर चमकते हैं। पास में ध्रुव तारा चमकता है। ”

(5) धूम्रकेतुः-अष्टाधिकैकोनविंशतिशततमेऽब्दे एको महान् धूम्रकेतुः रात्रेरन्तिमे प्रहरे गगने उत्तरस्यां दिशि दृष्टः। इत्थम् द्वितीयो धूम्रकेतुः दशाधिकैकोनविंशे शततमें ख्रीष्टाब्देऽपि वीक्षितो जनैः। धूम्रकेतोः पुच्छमतिविशालमल्पीयसा वाष्पेण निर्मितं भवति। एककिलोग्राम-भारात्मकं परिमाणं प्रायः भवति। धूम्रकेतुः सौरसाम्राज्धस्य परिवारो नास्ति। अयं सौरजगतः बहिरेव इतस्ततः परिभ्रमति। यदा सौरसाम्राज्यस्य (UPBoardSolutions.com) परिवारो नास्ति। अयं सौरजगतः बहिरेव इतस्ततः परिभ्रमति। यदा सौरसाम्राज्यस्य सीमानं प्रविशति तदा सूर्यः बलादार्कषति। यावत् न परिक्रमते | तावत् मुक्तो न भवति। अयम् अतिथिः दैवयोगात् सौरसाम्राज्यमाविशति। यः शक्तिहीनः धूम्रकेतुर्भवति च सततं परिभ्रमन्नेव तिष्ठति। कश्चन नश्यत्येव। एनमपशकुनस्यापि द्योतकं मन्यन्ते।।

शब्दार्थ
अष्टाधिकैकोनविंशतिशततमेऽब्दे = सन् 1908 में।
रात्रेः अन्तिमे = रात के अन्तिम में।
दशाधिकैकोनविंशे = 1910 में।
वीक्षितः = देखा गया।
अल्पीयसा वाष्पेण = थोड़ी-सी भाप से।
बहिरेव = बाहर ही।
इतस्ततः = इधर-उधर।
परिभ्रमति = चारों ओर घूमता है।
सीमानम् = सीमा को।
प्रविशति = प्रवेश करता है।
बलादाकर्षति = बल से खींचता है।
परिक्रमते = घूमता है।
आविशति = प्रवेश करता है।
परिभ्रमन्नेव तिष्ठति = घूमता ही रहता है।
कश्चन = कोई।
नश्यत्येव = नष्ट हो जाता है।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में धूमकेतु (पुच्छल तारा) का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
धूम्रकेतु-सन् 1908 ईसवी में एक बड़ा धूमकेतु रात्रि के अन्तिम प्रहर में आकाश में उत्तर दिशा में दिखाई दिया था। इसी प्रकार दूसरा धूमकेतु सन् 1910 ईसवी में लोगों ने देखा। धूमकेतु की अत्यन्त विशाल पूँछ थोड़ी-सी भाप से बनी होती है। प्रायः इसका भार एक किलोग्राम के बराबर होता है। धूमकेतु सौर-साम्राज्य परिवार का नहीं है। यह सौर-जगत् के बाहर की इधर-उधर घूमता है। जब वह सौर-साम्राज्य की (UPBoardSolutions.com) सीमा में प्रवेश करता है, तब सूर्य इसे बलपूर्वक अपनी ओर खींचता है। यह जब तक नहीं घूमता है, तब तक मुक्त नहीं होता है। यह अतिथि दैवयोग से ही सौर-साम्राज्य में प्रवेश करता है। जो धूमकेतु बलहीन (कमजोर) होता है, वह निरन्तर घूमता ही रहता है। कोई नष्ट हो जाता है। इसे अपशकुन का भी सूचक मानते हैं। |

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(6) उल्काः–गहने निशीथे यदा गगनमतिस्वच्छं भवति। तदा एकः शराकारः विभ्राजिष्णुः चाकचिक्यं ध्रियमाणः पुञ्जीभूतः प्रकाशः सकलं नभः द्विधा विभजन् महता वेगेन धावन्दूरं गत्वा लुप्तोऽपि भवति।जनाः लूकः त्रुटित इति कथयन्ति। तं दृष्ट्वा पञ्चपुष्पाणां नामोच्चारणेन, केचन षष्ठीवनेन अशुभनिवारणं कुर्वते। साधारणाः जनाः यत् किमपि बुवन्तु किन्तु नक्षत्रपतने धारायाः विनाशः अवश्यम्भावी। वस्तुतः उल्काः पिण्डीभूताः इतस्तत: परिभ्रमन्ति। यदा पृथिव्याः सीमानमाश्रयन्ते, घनीभूतेन वायुमण्डलेन सङ्कर्षणं कृत्वा निष्क्रामन्ति तदा ज्वलन्तः अग्रे प्रसरन्ति पुनश्च नश्यन्ति। कदापि अर्धज्वलनावस्थायां पतित्वा भूमिमा-विशन्ति। एवंविधाः उल्काः कलिकातानगरस्य सङ्ग्रहालये संस्थापिताः सन्ति।

शब्दार्थ
गहने निशीथे = घनी रात में।
शराकारः = बाण के आकार वाला।
विभ्राजिष्णुः = विशेष चमकीला।
ध्रियमाणः = रहता हुआ।
पुञ्जीभूतः = एकत्र हुआ।
द्विधा = दो भागों में।
त्रुटितः = टूटा हुआ।
ष्ठीवनेन = थूकने से।
परिभ्रमन्ति = घूमती हैं।
सीमानमाश्रयन्ते = सीमा का आश्रय लेती हैं।
निष्क्रामन्ति = निकलती हैं।
भूमिमाविशन्ति = पृथ्वी में घुस जाती हैं।
अर्धज्वलनावस्थायां = आधी जली हुई अवस्था में।
संस्थापिताः सन्ति = रखी हैं।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में उल्काओं का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
उल्काएँ-घनी रात में जब आकाश अत्यन्त स्वच्छ होता है, तब एक बाण के आकार का, चमकता हुआ, चकाचौंध करता हुआ, पुंजीभूत (एकत्रित) प्रकाश सारे आकाश को दो भगों में विभाजित करता हुआ बड़े वेग से दूर जाकर लुप्त हो जाता है। इसे लोग ‘लूक टूट गया’ कहते हैं। उसे देखकर कुछ लोग पाँच फूलों के नाम के उच्चारण के द्वारा और कुछ थूककर अशुभ निवारण करते हैं। साधारण लोग जो कुछ भी कहें, किन्तु नक्षत्र के गिरने में पृथ्वी का विनाश अवश्य होता है। वास्तव में उल्काएँ एकत्रित होकर इधर-उधर घूमती हैं। (UPBoardSolutions.com) जब ये पृथ्वी की सीमा में पहुँचती हैं, घने वायुमण्डल से रगड़ (संघर्ष) करके निकल जाती हैं, तब (उल्काएँ) जलते हुए आगे फैल जाती हैं। और फिर नष्ट हो जाती हैं। कभी आधी जली अवस्था में गिरकर पृथ्वी में प्रवेश कर जाती हैं। इस प्रकार की उल्काएँ कलकत्ती नगर के संग्रहालय में रखी हुई हैं।

(7) चन्द्रमाः–चन्द्रमाः पृथिव्या एव निर्गत्य गतः एवं वैज्ञानिका अपि भाषन्ते। सर्वेष्वपि नक्षत्रेषु एकः चन्द्रमा एव धरायाः समीपवर्ती वर्तते। चन्द्रमसः कलाः क्षीणा भवन्ति, परिवर्धन्ते। चन्द्रे कलङ्कः अस्ति, राहुरेनं ग्रस्ते इत्यादिकाः वार्ताः प्राचीनकालतः प्रचलन्ति। अधुना सर्वा अपि गल्पीभूता जाताः। चन्द्रः पृथिवीं परितः अण्डाकारं भ्रमति। पृथिवी स्वयं सूर्यं परितः भ्रमति। चन्द्रमास्तु पृथिवीं परितः चलति। प्रायः अष्टाविंशतितमे दिवसे परिक्रमा पूरयति। गर्तिलान् पर्वतान् कलङ्कान् कथयन्ति वैज्ञानिकाः। चन्द्रस्य कलाभिः तिथीनां मासानाञ्च निर्माणं भवति। चन्द्रः सूर्यप्रकाशात् प्रकाशितो भवति। यदा चन्द्रः सूर्यपृथिव्योरन्तराले जायते, तदा ग्रहणं भवति एवं वदन्ति वैज्ञानिकाः। चन्द्रोपरि सूर्यस्य प्रकाशः यस्मिन् भागे पतति सः भागः प्रकाशितः कलारूपेण दृष्टिपथमायाति। स एव प्रकाशः तेनैव क्रमेण वर्धते, ह्रसति च।।

अमावस्यायां चन्द्रः सूर्यपृथिव्योः मध्ये भवति, चन्द्रस्य यः अर्धभागः सूर्याभिमुखं भवति स भागः प्रकाशमानो भवति। प्रकाशितः स भागः पृथिव्या न दृष्टो जायते। केवलः अप्रकाशितोऽर्धभागः पृथिवीस्थैः जनैः दृश्यते। प्रकाशाभावे चन्द्रस्य दर्शनं न जायते। अयं कालः अमानाम्नाभिधीयते।।

पूर्णिमायां पृथिवी सूर्यचन्द्रमसोः मध्ये भवति। सूर्येण प्रकाशितं सकलं चन्द्रमण्डलं दृष्टिगोचरं भवति।।

शब्दार्थ
निर्गत्य = निकलकर।
भाषन्ते = कहते हैं।
परिवर्धन्ते = बढ़ती हैं।
राहुः एनम् = राहु इसको।
ग्रसते = निगल लेता है।
गल्पीभूताः = गप बनकर, असत्य।
परितः = चारों ओर।
पूरयति = पूरी करता है।
गर्तिलान् = गड्डेदार।
सूर्यपृथिव्योः अन्तराले = सूर्य और पृथ्वी के मध्य में।
जायते = होता है।
दृष्टिपथम् आयाति = दिखाई देता है।
हसति = घटता है।
सूर्याभिमुखम् = सूर्य के सम्मुख।
पृथिवीस्थैः जनैः = धरती पर रहने वाले लोगों के द्वारा।
अमानाम्नाभिधीयते = अमा (अमावस्या) के नाम से कहा जाता है।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में चन्द्रमा की स्थिति का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
चन्द्रमा-चन्द्रमा पृथ्वी से निकलकर ही (आकाश में) गया है, ऐसा वैज्ञानिक भी कहते हैं। सभी नक्षत्रों में अकेला चन्द्रमा ही पृथ्वी के समीप स्थित है। चन्द्रमा की कलाएँ घटती और बढ़ती हैं। चन्द्रमा में कलंक होता है, राहु इसे ग्रसता है, इत्यादि बातें प्राचीनकाल से चली आ रही हैं। अब ये सभी असत्य बनकर रह गयी हैं। चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर अण्डे के आकार में घूमता है। पृथ्वी स्वयं सूर्य के चारों ओर घूमती है। चन्द्रमा तो पृथ्वी के चारों ओर चलता है। प्रायः अट्ठाइसवें दिन चक्कर पूरा कर लेता है। गड्डेदार पर्वतों को वैज्ञानिक कलंक (UPBoardSolutions.com) कहते हैं। चन्द्रमा की कलाओं से तिथि और महीनों का निर्माण होता है। चन्द्रमा सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है। जब चन्द्रमा सूर्य और पृथ्वी के मध्य में आ जाता है, तब ग्रहण होता है, ऐसा वैज्ञानिक कहते हैं। चन्द्रमा के ऊपर जिस भाग पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है, वह प्रकाशित भाग कला के रूप में दृष्टि में आता है। वही प्रकाश उसी क्रम से बढ़ता और घटता है।

अमावस्या के दिन चन्द्रमा सूर्य और पृथ्वी के मध्य में होता है। चन्द्रमा का जो आधा भाग सूर्य की ओर होता है, वह भाग प्रकाशमान होता है। वह प्रकाशित भाग पृथ्वी से नहीं दिखाई देता। केवल अप्रकाशित आधा भाग पृथ्वी पर स्थित लोगों को दिखाई देता है। प्रकाश के अभाव में चन्द्रमा का दर्शन नहीं होता है। यह समय ‘अमावस्या के नाम से पुकारा जाता है। । पूर्णिमा के दिन पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा के मध्य में होती है। सूर्य से प्रकाशित सम्पूर्ण चन्द्रमण्डल दिखाई पड़ता है।

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(8) नीहारिकाः—विशालतमानाकाराणां वाष्पीयपदार्थानां समूहो, नीहारिका।रात्रौ आकाशं द्विधा कुर्वन् विशालो राजमार्ग इव यः प्रकाशः मध्येऽवलोक्यते, सः नीहारिका नाम्ना घुष्यते। आकाशे बहव्यः नीहारिकाः भवन्ति। इमानतावनताः, बृहदाकाराः, दीर्घवृत्ताकाराः, कुण्डलिताः वा भवन्ति। नीहारिकायाः परिमाणं सूर्यतः दशखर्वगुणितं भवति। दीर्घा नीहारिका एकं पृथक् ब्रह्माण्डं भवति। नीहारिकामध्ये अगणिताः (UPBoardSolutions.com) ताराः, तारां परितः वाष्पीयपदार्थाः भवन्ति। रात्रौ निर्मला गङ्गा इवे दृष्टिपथमायाति। अतः आकाशगङ्गा नाम्नाभिधीयते। अस्यां दशसहस्रकोटयः गुम्फिताः परस्परमाकृष्टाः ताराः भवन्ति।

आधुनिका वैज्ञानिकाः (सूर्यग्रहेषु ) बुध-शुक्र-पृथ्वी-मङ्गल-बृहस्पति-शनि-यूरेनस (वरुण)-नेपच्यून (वारुणी )-प्लेटो ( यम) इति नवग्रहान् वर्णयन्ति। चन्द्रं पृथिवी-ग्रह कथयन्ति। भारतीयां ज्योतिर्विदः सूर्य-चन्द्र-मंगल-बुध-बृहस्पति-शुक्र-शनि-राहु-केतून् नवग्रहान् निर्दिशन्ति।

एवमेन्तरिक्षं विभुः, अनन्तं नि:सीमात्मकं चास्ते। अत्रत्यमेकमपि नक्षत्रं वर्णनातीतमस्ति।

शब्दार्थ
विशालतमानाम् आकाराणाम् = अत्यन्त विशाल आकार का।
वाष्पीयपदार्थानाम् = भाप के पदार्थों का।
द्विधा = दो भागों में।
अवलोक्यते = देखा जाता है।
घुष्यंते = पुकारा जाता है।
नतावनता = ऊँची-नीची।
कुण्डलिताः = कुण्डली (गोल) के आकार की।
दशखर्वगुणितं = दसे खरब गुना।
दृष्टिपथमायाति = दिखाई देती है।
दशसहस्त्रकोटयः = दस हजार करोड़।
गुम्फिताः = गॅथी हुई।
ज्योतिर्विदः = ज्योतिषी।
निर्दिशन्ति = निर्दिष्ट करते हैं।
विभुः = व्यापक।
निः सीमात्मकम् = सीमारहित।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में नीहारिकाओं का वर्णन और नवग्रहों का नाम-निर्देश किया गया है।

अनुवाद
नीहारिकाएँ—अत्यन्त विशाल आकार का वाष्पीय पदार्थों का समूह नीहारिका है। रात्रि में आकाश को दो भागों में करता हुआ, विशाल राजमार्ग के समान जो प्रकाश मध्य में दिखाई देता है, वह नीहारिका’ के नाम से पुकारा जाता है। आकाश में बहुत-सी नीहारिकाएँ होती हैं। ये ऊँची-नीची, बड़े आकार की, बड़े घेरे के आकार की अथवा कुण्डली के आकार की होती हैं। नीहारिका का परिमाण (माप) सूर्य से दस खरब गुना होता है। एक बड़ी नीहारिका एक अलग ब्रह्माण्ड होती है। नीहारिका के मध्य में अगणित तारे और तारों के चारों ओर वाष्पीय पदार्थ होते हैं। रात्रि में स्वच्छ गंगा के समान दिखाई पड़ती हैं; अतः ‘आकाश गंगा’ के नाम से पुकारी जाती हैं। (UPBoardSolutions.com) इसमें दस हजार करोड़ परस्पर आकृष्ट हुए गुंथे हुए तारे होते हैं। | आधुनिक वैज्ञानिक (सूर्य के ग्रहों में) बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, वरुण, वारुणी और यम इन नौ ग्रहों का वर्णन करते हैं। चन्द्रमा को पृथ्वी का ग्रह कहते हैं। भारतीय ज्योतिषी सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु को नौ ग्रह कहते हैं। इस प्रकार अन्तरिक्ष सर्वशक्तिमान, अनन्त और नि:सीम है। इसका एक भी नक्षत्र वर्णन से परे है।

लघु उत्तरीय प्ररन

प्ररन 1
‘अन्तरिक्ष-विज्ञानम्’ पाठ का सारांश लिखिए। या सौरमण्डल के सदस्यों का परिचय’ अन्तरिक्ष-विज्ञानम्’ पाठ के आधार पर दीजिए।
उत्तर
[संकेत-‘पाठ-सारांश’ मुख्य शीर्षकं की सामग्री को अपने शब्दों में लिखिए।]

प्ररन 2
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए(क) धूमकेतु,(ख) उल्का, (ग) चन्द्रमा,(घ) नीहारिका और (ङ) सूर्य।
उत्तर
(संकेत-“पाठ-सारांश’ मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत सम्बद्ध शीर्षकों की सामग्री को अपने शब्दों में लिखें।

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प्ररन 3
अन्तरिक्ष के विस्तार और शोभा का वर्णन कीजिए।
उत्तर
[संकेत-‘पाठ-सारांश’ मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत दिये गये शीर्षकों ‘सौर- साम्राज्य और ‘अन्तरिक्ष’ से सम्बद्ध सामग्री को संक्षेप में अपने शब्दों में लिखें]

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Class 9 Sanskrit Chapter 11 UP Board Solutions नीति-नवनीतम् Question Answer

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 11
Chapter Name नीति-नवनीतम् (पद्य-पीयूषम्)
Category UP Board Solutions

UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 11 Neetinavneetam Question Answer (पद्य-पीयूषम्)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 11 हिंदी अनुवाद माङ्गलिकम्नीति-नवनीतम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

परिचय–महर्षि वेदव्यास कृत महाभारत नामक विशाल ग्रन्थ विचारों का एक महान् कोश है। इसमें कौरव-पाण्डव-युद्ध की कथा के माध्यम से अनेक विषयों पर व्यापक महत्त्व के विचार व्यक्त किये गये हैं। महाभारत के प्रमुख पात्रों में विदुर का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। ये धृतराष्ट्र के भाई, सच्चे उपदेशक एवं नीति-शास्त्र के श्रेष्ठ ज्ञाता-पालनकर्ता थे। इसीलिए इन्हें महात्मा विदुर कहा जाता था। महाभारत की विस्तृत कथा में कई स्थलों पर धृतराष्ट्र को दिया गया उपदेश संस्कृत साहित्य में विदुर-नीति’ के नाम से प्रसिद्ध है। ‘विदुर-नीति’ के श्लोक अन्य (UPBoardSolutions.com) आचार्यों-शुक्र, शंख, भर्तृहरि के नीति-ग्रन्थों में भी पाठान्तर से प्राप्त होते हैं। प्रस्तुत पाठ के नीति श्लोक महाभारत के पंचम पर्व ‘उद्योग-पर्व के अन्तर्गत ‘प्रजागर’ ‘नामक उपपर्व से संगृहीत किये गये हैं। इसमें मानसिक क्षोभ से ग्रस्त तथा भविष्य की भयावह स्थिति से त्रस्त धृतराष्ट्र को महात्मा विदुर के द्वारा नीति के उपदेश दिये – जाने का वर्णन है। प्रस्तुत पाठ में व्यावहारिक अनुभव के एकादश श्लोकों का संग्रह है।

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पाठ-सारांश

प्रत्येक श्लोक को संक्षिप्त भाव इस प्रकार है

  1. प्रिय बोलने वाले पुरुष तो मिलते हैं, परन्तु अप्रिय हितकर बात कहने वाले दुर्लभ हैं।
  2. मनुष्य को बहुजन हिताय एक के हित का त्याग करना चाहिए।
  3. समस्त धर्मों का सार यही है कि अन्यों के साथ ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए, जो स्वयं को बुरा लगे।
  4. किसी पर भी अधिक विश्वास नहीं करना चाहिए।
  5. शान्ति से क्रोधी, सदाचार से दुराचारी, दान से कृपण तथा सत्य से झूठे व्यक्ति को जीता जा सकता है।
  6. चरित्र की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए। चरित्रहीन व्यक्ति का नाश अवश्यम्भावी है। धन तो आता-जाता रहता है।
  7. मनुष्य में चरित्र की प्रधानता होती है। उसके न होने पर धन, मित्र एवं जीवन की कोई उपयोगिता नहीं होती है।
  8. प्रत्येक कार्य को दूरदर्शिता से करना चाहिए।
  9. मनुष्य को ऐसा कर्म करना चाहिए, जिससे अन्त में सुख मिले।
  10. वीर, विद्वान् तथा कुशल सेवक, ये तीन ही पृथ्वी के अन्दर सुखों को प्राप्त करते हैं।
  11. इस भूलोक के छः सुख हैं-प्रतिदिन धन की प्राप्ति, आरोग्य, प्यारी तथा प्रिय बोलने वाली स्त्री, आज्ञाकारी पुत्र तथा धन देने वाली विद्या।।

पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या

(1)
सुलभाःपुरुषाः राजन् सततं प्रियवादिनः।।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥

शब्दार्थ
सुलभाः = सरलता से प्राप्त हो जाने वाले।
सततं = संदा।
प्रियवादिनः = प्रिय वचन बोलने वाले।
पथ्यस्य = हितकर वचन को।
वक्ता = कहने चोला।
श्रोता = सुनने वाला।
दुर्लभः = कठिनाई से प्राप्त होने वाला।

सन्दर्भ
प्रस्तुत नीति-श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत पद्य-पीयूषम्’ के नीतिनवनीतम्’ पाठ से उधृते है।

[संकेत-इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में सुलभ और दुर्लभ व्यक्तियों के विषय में बताया गया है।

अन्वय
हे राजन्! सततं प्रियवादिनः पुरुषाः सुलभाः (सन्ति); अप्रियस्य पथ्यस्य (वचनस्य) तु वक्ता श्रोता च दुर्लभः (अस्ति)।

व्याख्या
हे राजन्! निरन्तर प्रियवचन बोलने वाले पुरुष तो सरलता से प्राप्त हो जाते हैं, परन्तु कटु और हितकारी वचनों को कहने वाले और सुनकर सहन करने वाले श्रोता कठिनाई से ही मिलते

(2)
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्येजत् ॥

राख्दार्थ
त्यजेत् = छोड़ देना चाहिए।
कुलस्यर्थे = कुल की भलाई के लिए।
ग्रामस्या= ग्राम की भलाई के लिए।
जनपदस्यार्थे = जनपद की भलाई के लिए
आत्मार्थे= अपने कल्याण के लिए।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि व्यक्ति को अपने हित के लिए सब कुछ छोड़ देना चाहिए। |

अन्वय
कुलस्यार्थे एकं त्यजेत्, ग्रामस्यायें कुलं त्यजेत्, जनपदस्यार्थे ग्रामं (त्यजेत्), आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्।।

व्याख्या
मनुष्य को परिवार की भलाई के लिए एक व्यक्ति को छोड़ देना चाहिए, गाँव के हित के लिए अपने परिवार को त्याग देना चाहिए, जनपद की भलाई के लिए गाँव को छोड़ देना चाहिए और अपने कल्याण के लिए पृथ्वी को त्याग देना चाहिए।

(3)
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥

शब्दार्थ
श्रूयताम् = सुनिए।
सर्वस्वं = सब कुछ, प्रत्येक वस्तु।
श्रुत्वा = सुनकर।
अवधार्यताम् = धारण कीजिए।
आत्मनः = अपने।
प्रतिकूलानि = विरुद्ध आचरण।
परेषां = दूसरों । के लिए।
समाचरेत् = करना चाहिए।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में व्यक्ति के सर्वश्रेष्ठ धर्म को बताया गया है। |

अन्वय
धर्मसर्वस्वं श्रूयतां, श्रुत्वा च अपि अवधार्यताम् (यत्) आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्। |

व्याख्या
धर्म का सब कुछ अर्थात् सार सुनिए और सुनकर उसको धारण कीजिए। वह सारे यह है कि जो भी आचरण आप अपने लिए अनुकूल नहीं समझते हों, वैसा आचरण आपको दूसरों के प्रति भी नहीं करना चाहिए।

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(4)
न चिश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नीतिविश्वसेत् ।
विश्वासाद् भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ।

शब्दार्थ
न विश्वसेत् = विश्वास नहीं करना चाहिए।
अविश्वस्ते = विश्वास न करने योग्य पर।
न अतिविश्वसेत् = अधिक विश्वास नहीं करना चाहिए।
मूलानि अपि = जड़ों को भी।
निकृन्तति = काट डालता है।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि व्यक्ति को किसी पर भी अत्यधिक विश्वास नहीं करना चाहिए। |

अन्वय
अविश्वस्ते न विश्वसेत्, विश्व न अतिविश्वसेत्। विश्वासात् उत्पन्न भयं मूलानि अपि निकृन्तति।

व्याख्या
जो विश्वास के योग्य नहीं है, उस पर विश्वास नहीं करनी चाहिए। जो विश्वसनीय हो, उसके ऊपर भी अधिक विश्वास नहीं करना चाहिए। विश्वास से इतना भय उत्पन्न हो जाता है कि

वह जड़ों को भी काट देता है। तात्पर्य यह है कि किसी भी व्यक्ति पर अत्यधिक विश्वास करने से .. उसके द्वारा समूल नाश किये जाने की सम्भावना बन जाती है।

(5)
अक्रोधेन जयेत् क्रोधमसाधु साधुना जयेत् ।।
जयेत् कदर्यं दानेन जयेत् सत्येन चानृतम् ॥

शब्दार्थ
अक्रोधेन = क्रोध के अभाव से, शान्ति से।
जयेत् = जीतना चाहिए।
असाधं = असाधु को, दुष्ट को।
साधुना = सदाचार से।
कदर्यम् = कंजूसी को।
अनृतम् = असत्य को या असत्यवादी को।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में क्रोधी को, दुष्ट व्यक्ति को तथा कंजूस को कैसे जीता जाए, इसके विषय में बताया गया है।

अन्वय
अक्रोधेन क्रोधं जयेत्। साधुना असाधुम् जयेत्। दानेन कदर्यम् जयेत्। सत्येन च अनृतम् जयेत्।।

व्याख्या
क्रोधी व्यक्ति को अक्रोध (क्षमाशीलता) से जीतना चाहिए। सद्व्यवहार से दुर्जन पुरुष को जीतना चाहिए। दान देने से कंजूस को जीतना चाहिए और सत्य बोलने से असत्य (बोलने वाले व्यक्ति) को जीतना चाहिए।

(6)
वृत्तं यत्नेन संरक्षेद वित्तमायाति मति च। ।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ॥

शब्दार्थ
वृत्तम् = चरित्र की।
यत्नेन = प्रयत्नपूर्वक।
संरक्षेद् = रक्षा करनी चाहिए।
आयाति याति = आता-जाता है।
अक्षीणः = जो क्षीण नहीं है, वह।
क्षीणः = दुर्बल।
वृत्ततः = चरित्र से।
हतः = भ्रष्ट हुआ।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में चरित्र की प्रधानता पर विशेष बल दिया गया है। ।

अन्य
वृत्तं यत्नेन संरक्षेत्। वित्तम् आयाति याति च। वित्ततः क्षीणः अक्षीणः भवति। वृत्ततः हत: तु हत(एव भवति)।

व्याख्या
(मनुष्य को अपने) चरित्र की प्रयत्न से रक्षा करनी चाहिए। धन तो आता है और चला जाता है। धन की दृष्टि से दुर्बल व्यक्ति निर्धन नहीं होता है, लेकिन चरित्र से भ्रष्ट (गिरा) हुआ व्यक्ति तो मर ही जाता है अर्थात् समाज में उसे जाना ही नहीं जाता है। तात्पर्य यह है कि व्यक्ति को अपने चरित्र की रक्षा करनी चाहिए।

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(7)
शीलं प्रधानं पुरुषे तद्यस्येह प्रणश्यति ।
न तस्य जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभिः ॥

शब्दार्थ
शीलं = चरित्र।
प्रधानम् = मुख्य।
इह = इस लोक में।
प्रणश्यति = नष्ट हो जाता है।
तस्य = उसका।
जीवितेनार्थः = जीवित रहने का प्रयोजन।
धनेन = धन के द्वारा।
बन्धुभिः = बन्धुओं ‘(भाइयों) द्वारा।।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में व्यक्ति के लिए चरित्र का महत्त्व बताया गया है।

अन्वय
इह पुरुषे शीलं प्रधानं (अस्ति) यस्य तद् प्रणश्यति, तस्य न जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभिः।

व्याख्या
इस संसार में पुरुष में चरित्र ही मुख्य गुण होता है। जिसका यह गुण नष्ट हो जाता है, उसके न जीवित रहने का कोई मतलब है, न धनु का। ऐसे व्यक्ति की उसके बन्धु भी कामना नहीं करते। तात्पर्य यह है कि चरित्रहीन व्यक्ति का जीवन ही व्यर्थ हो जाता है।

(8)
दिवसेनैव तत्कुर्याद् येन रात्रौ सुखं वसेत् ।।
अष्टमासेन तत् कुर्याद् येन वर्षाः सुखं वसेत् ॥

शब्दार्थ
दिवसेन = दिनभर में।
कुर्यात् = करना चाहिए।
रात्रौ = रात्रि में।
वसेत् = रहे।
अष्टमासेन = आठ महीनों में।
वर्षाः = वर्षा ऋतु तक। |

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में दिनभर किये गये और आठ महीने किये गये श्रम के लाभ का वर्णन किया गया है।

अन्वय
दिवसेन एव तत् कुर्यात्, ग्रेन रात्रौ सुखं वसेत्। अष्टमासेन तत् कुर्यात्, येन वर्षाः सुखं । वसेत्।

व्याख्या
दिनभर में ही वह कार्य कर लेना चाहिए, जिससे रात्रि में सुखपूर्वक रह सकें। आठ . महीने तक वह कर लेना चाहिए, जिससे वर्षपर्यन्त सुखपूर्वकै रह सकें। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक कार्य । को दूरदर्शिता और श्रमपूर्वक करना चाहिए। |

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(9)
पूर्वे वयसि तत्कुर्याद् येन वृद्धः सुखं वसेत् ।।
यावज्जीवेन तत्कुर्याद् येन प्रेत्य सुखं वसेत् ॥

शब्दार्थ
पूर्वे वयसि = पहली अवस्था में, यौवन में।
वृद्धः = बूढ़ा।
यावज्जीवेन = जीवनभर में।
प्रेत्य = मरकर, परलोक में।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में मनुष्य द्वारा सत्कार्य किये जाने को वर्णन किया गया है।

अन्वय
(मनुष्य:) पूर्वे वयसि तत् कुर्यात्, येन वृद्धः (सन्) सुखं वसेत्। यावज्जीवेन तत् कुर्यात् येन प्रेत्य सुखं वसेत्।

व्याख्या
मनुष्य को पहली अवस्था अर्थात् जवानी में उस कार्य को कर लेना चाहिए अर्थात् युवावस्था में मनुष्य को सन्तानादि के प्रति कर्तव्य-निर्वाह को ध्यानपूर्वक करना चाहिए, जिससे वृद्ध होने पर वह सुखपूर्वक रह सके। जीवनभर में वह कार्य करना चाहिए, जिससे मरकर परलोक में सुखपूर्वक रह सके। मृत्यु के पश्चात् सुखपूर्वक रहने का अर्थ कीर्ति रूप से संसार में रहने तथा आत्मा की शान्ति से है।

(10)
सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुषास्त्रयः।
शूरश्च कृतविद्यश्च यश्च जानाति सेवितुम्॥

शब्दार्थ
सुवर्णपुष्पाम् = सोने के फूलों वाली धनधान्य से पूर्ण।
चिन्वन्ति = चुनते हैं।
पुरुषास्त्रयः = तीन प्रकार के पुरुष।
शूरः = वीर।
कृतविद्यः = विद्या प्राप्त किया हुआ।
सेवितुं जानाति = सेवा करना जानता है।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में पृथ्वी को भोगने की क्षमता रखने वाले व्यक्तियों का वर्णन किया गया

अन्वय
यः शूरः च, कृतविद्यः च, (यः) च सेवितुं जानाति (एते) त्रयः पुरुषाः सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति।

व्याख्या
जो शूरवीर हैं, विद्या प्राप्त किये हुए हैं और दूसरों की सेवा करना जानते हैं, ये तीन प्रकार के पुरुष पृथ्वी से स्वर्णपुष्पों को चुनते हैं। तात्पर्य यह है कि इस पृथ्वी पर सभी प्रकार की सम्पत्तियाँ उपलब्ध हैं। इन सम्पत्तियों को शूरवीर, विद्वान् और परोपकारी ही प्राप्त करते हैं।

(11)
अर्थागमो नित्यमरोगिता च प्रियाश्च भार्या प्रियवादिनी च ।।
वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन् ॥

शब्दार्थ
अर्थागमः = धन का आना।
अरोगिता = रोगरहित होना।
प्रिया = प्रिय।
भार्या = पत्नी।
प्रियवादिनी = मधुर बोलने वाली।
वश्यः = वश में रहने वाला, आज्ञाकारी।
अर्थकरी = धन कमाने वाली।
षड् = छः।

प्रसंग
प्रस्तुत श्लोक में जीवलोक के छ: सुखों के नाम गिनाये गये हैं।

अन्वय
राजन्! नित्यम् अर्थागमः अरोगिता च, प्रिया भार्या प्रियवादिनी च, वश्यः पुत्रः च, अर्थकरी विद्या च, (एतानि) षट् जीवलोकस्य सुखानि (सन्ति)।

व्याख्या
हे राजन्! सदा धन का आगमन (प्राप्ति) होना, रोगरहित होना, प्रिय और मधुरभाषिणी पत्नी, वश में रहने वाला आज्ञाकारी पुत्र और धन कमाने वाली विद्या-ये छः जीवलोक (संसार) के सुख हैं। तात्पर्य यह है कि जिनके पास उपर्युक्त छः की उपलब्धता है, उन्हें ही सुखी मानना चाहिए।

सूक्तिपरक वाक्य की व्याख्या

(1)
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः।
सन्दर्य
प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत पद्य-पीयूषम्’ के नीति-नवनीतम्’ एर से उद्धृत है।

संकेत

इस पाठ की शेष समस्त सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।

प्रसंगर
प्रस्तुत सूक्ति में बताया गया है कि सत्य और हितकारी बात को सुनने और कहने वाले मुश्किल से मिलते हैं।

अर्थ
अप्रिय तथा हितकारी बात को कहने वाला और सुनने वाला दोनों ही दुर्लभ होते हैं।

व्याख्या
संसार में प्रियवचन बोलने वालों की संख्या अधिक होती है; क्योंकि प्रियवचन बोलने में सुनने वाले के हित का ध्यान रखना अनिवार्य नहीं है। हितकारी वचन प्रायः कटु होते हैं; जैसे—गुणकारी औषध। यदि औषध में मिठास का ध्यान रखा जाएगा तो उसके गुणकारी होने की ओर ध्यान कम हो जाता है। इसीलिए पहले तो हितकारी बात कहने वाले ही कम होते हैं; क्योंकि वह सुनने वाले को कड़वी लगती है। अधिकांश श्रोता हितकारी होने पर भी कड़वी बात सुनना पसन्द नहीं करते। यदि कोई कड़वी और हितकारी बात को कहने का साहस भी करे तो सुनने वाला उसको सुनना नहीं चाहेगा। ऐसा व्यक्ति, जो कड़वी तथा हित की बात कहने का साहसी हो और ऐसा व्यक्ति, जो उस कटु तथा हित की बात को सुनकर सहन कर ले तथा भाराज न हो, दोनों ही प्रकार के लोग मुश्किल से मिलते हैं।

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(2)
आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्।
प्रसंग
प्रस्तुत सूक्ति में कल्याण के लिए त्याग करने की बात को समझाया गया है।

अर्थ
अपने कल्याण के लिए पृथ्वी को त्याग देना चाहिए।

व्याख्या
प्रस्तुत सूक्ति में व्यक्ति की त्यागवृत्ति के आदर्श को निरूपित किया गया है। यदि एक को त्यागने से कुल का, कुल को त्यागने से गाँव का, गाँव को त्यागने से जनपद का कल्याण होता हो तो व्यक्ति को इन्हें नि:संकोच त्याग देना चाहिए। इसी प्रकार से यदि व्यक्ति को अपना कल्याण किसी वस्तु को त्यागने से होता हो तो उसे त्याग देना चाहिए, भले ही वह वस्तु कितनी ही बहुमूल्य

क्यों न हो। यहाँ तक कि यदि अपने प्राणों को त्यागने से व्यक्ति का कल्याण हो तो उसे उन्हें भी त्याग देना चाहिए। यहाँ पर अपने कल्याण से तात्पर्य यश, कीर्ति से है; अर्थात् यदि प्राणों को त्यागने से सदैव के लिए व्यक्ति को यश और कीर्ति की प्राप्ति होती हो तो उसे प्राणों को त्यागने में भी संकोच नहीं करना चाहिए।

(3)
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥
प्रसंग
प्रस्तुत सूक्ति में धर्म के सार को बताया गया है। अर्थ-जो आचरण अपने लिए ठीक न हो, उसे दूसरों के लिए नहीं करनी चाहिए।

व्याख्या
व्यक्ति जिस आचरण को अपने लिए उचित नहीं समझता, उसे स्वयं वैसा आचरण दूसरों के लिए भी नहीं करना चाहिए। यही सब धर्मों का सार है, यही शाश्वत धर्म है, यही सबके कल्याण का मूलमन्त्र है।

(4)
अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः।।
प्रसंग
प्रस्तुत सूक्ति में व्यक्ति के जीवन में चरित्र की महत्ता को बताया गया है।

अर्थ
धन का नाश, नाश नहीं होता, किन्तु चरित्र से मरा हुआ तो मर ही जाता है।

व्याख्या
इस संसार में धन का आना-जाना तो लगा ही रहता है। धन का होना या न होना व्यक्ति के जीवन में कोई महत्त्व नहीं रखता। यदि व्यक्ति धनवान् है, किन्तु उसका व्यवहार, आचार-विचार और चरित्र ठीक नहीं है, तो सभी लोग उसे घृणा की दृष्टि से देखते हैं। ऐसे लोग जनसामान्य के सम्मान का पात्र नहीं बन पाते। ऐसे घृणास्पद जीवन से तो मर जाना ही श्रेयस्कर होता है। | इसके विपरीत यदि व्यक्ति के पास धन नहीं है अथवा उसका धन किन्हीं कारणों से नष्ट हो गया है। और उस व्यक्ति का व्यवहार मृदु तथा चरित्र उत्तम बना रहता है, मन-वचन तथा कर्म से वह सदाचरण करता है तो सम्पूर्ण समाज उसे सम्मानपूर्ण दृष्टि से देखता है। उसका आचरण और वचन प्रामाणिक माने जाते हैं। भला ऐसे व्यक्ति के लिए धन का क्या महत्त्व है, उसने तो बिना धन के ही सब कुछ पा लिया है। इसीलिए तो कहा गया है कि धन के नष्ट होने से व्यक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, किन्तु यदि व्यक्ति का चरित्र नष्ट हो गया तो समझो वह व्यक्ति ही मर गया। अंग्रेजी में ऐसी ही एक कहावत है

If wealth is lost, nothing is lost.
If health is lost, something is lost.
If character is lost, everything is lost.

अत: व्यक्ति को अपने चरित्र को अक्षुण्ण रखना चाहिए।

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(5)
यावज्जीवेन तत्कुर्याद् येन प्रेत्य सुखं वसेत्।।
प्रसंग
प्रस्तुत सूक्ति में बुरे कार्यों को न करने की बात पर बल दिया गया है।

अर्थ
व्यक्ति को जीवनभरं उन कार्यों को करना चाहिए, जिससे (वह) मरकर परलोक में सुखपूर्वक रह सके।

व्याख्या
भारतीय दर्शनशास्त्र का मत है कि जो व्यक्ति अच्छे कार्य करके अपने जीवन में पुण्यों का संचय करता है, वह मरकर परलोक में सुखपूर्वक रहता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने जीवन में बुरे कर्म करके पापों का संचय करता है, वह मरकर परलोक में महान् दुःखों को भोगता है। इसलिए व्यक्ति को जीवनभर अच्छे कार्य करके पुण्यों का संचय कर लेना चाहिए, जिससे परलोक में उसे कोई कष्ट न हो।

श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) सुलभाः पुरुषाः ••••••••• ओता च दुर्लभः॥  (श्लोक 1)
संस्कृतार्थः-
महात्मा विदुरः धृतराष्ट्रम् उपदिशति यत् हे नृप! हितकराणि वचनानि अप्रियाणि कटूनि च भवन्ति। संसारे अस्मिन् एतादृशाः पुरूषाः तु बाहुल्येन प्राप्यन्ते ये अनवरतं प्रियं वदन्ति। परम् एतादृशाः जनाः न प्राप्यन्ते ये हितकारकाणि वचनानि वदन्ति, यतः तानि श्रोतुः अप्रियाणि भवन्ति। यदि भाग्येन एतादृशाः पुरुषः प्राप्यते यः अप्रियं कटु हितवचं कथयति, कश्चित् तस्य वचनं श्रोतुं समर्थः न भवति। अप्रियं कटु हितवचनानि श्रोतापि दुर्लभो भवति।।

(2) त्येजेदेकं कुलस्यार्थे ••••••••••••••••••••••••••••••••पृथिवीं त्यजेत्॥ (श्लोक 2) 
संस्कृतार्थः-
विदुरः धृतराष्ट्रं कथयति यत् यदि एकस्य पुरुषस्य परित्यागेन कुलस्य रक्षा भवति तदा एकं त्यजेत्। यदि कुलस्य परित्यागेन ग्रामस्य रक्षा भवति तर्हि स्वकीयं परिवारं त्यजेत्। यदि ग्रामस्य परित्यागेन जनपदस्य रक्षा भवति, तर्हि ग्रामं त्यजेत्। यदि पृथिव्याः परित्यागेन आत्मनः एव कल्याणं भवति, तर्हि पृथिवीं त्यजेत्।

(3) अक्रोधेन जयेत् •••••••••••• चानृतम्॥(श्लोक 5 )
संस्कृतार्थः-
क्रोधस्वभावं पुरुषं शान्त्या स्ववशं कुर्यात्, दुर्जनं पुरुषं सद्व्यवहारेण जयेत्, धनादिकं दत्त्वा कृपणं जयेत्, सत्यवचनेन मिथ्याभाषिणं स्ववशं कुर्यात्।।

(4) वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् •••••••••••••••••••••• हतो हतः॥ (श्लोक 7) 
संस्कृतार्थः-
महाभारते महाराजः विदुरः कथयति यत् नरः स्वचरित्रस्य रक्षां प्रयत्नपूर्वकं कुर्यात्। धन॑स्य रक्षायै विशेष प्रयत्नं न कुर्यात्, धनं तु कदाचित् आगच्छति, कदाचित् च गच्छति। चरित्रे . धने च महदन्तरम् अस्ति। यदि कदाचित् धनं नश्यति तर्हि धनहीनः पुरुषः क्षीणः न मन्यते, किन्तु चरित्रस्य दृष्ट्या पतितः पुरुषः चिराय नष्टः भवति।

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(5) अर्थागमो नित्यमरोगिता •••••••••••••••••••••• सुखानि राजन्॥ (श्लोक 11)
संस्कृतार्थः-
महाराजः विदुरः धृतराष्ट्रं प्रति कथयति यत् हे राजन्! प्राणिनां षट् सुखानि भवन्ति-धनस्य प्राप्तिः, अनवरतं स्वस्थं शरीरं, मधुर

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