Class 9 Sanskrit Chapter 3 UP Board Solutions न गङ्गदतः पुनरेति कूपम् Question Answer

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 3
Chapter Name न गङ्गदतः पुनरेति कूपम् (कथा – नाटक कौमुदी)
Number of Questions Solved 24
Category UP Board Solutions

UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 3 Na Gangadatta Punareti Kuppam Question Answer (कथा – नाटक कौमुदी)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 3 हिंदी अनुवाद न गङ्गदतः पुनरेति कूपम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

पाठ-सारांश

परिचय-संस्कृत साहित्य में कथा-लेखन की परम्परा अत्यधिक प्राचीन है। तत्कालीन समय में इन कथाओं की रचना का उद्देश्य धर्म, अर्थ एवं काम की प्राप्ति हुआ करता था। इनके अतिरिक्त संस्कृत वाङ्मय में नीति और उपदेशात्मक कथाओं की भी एक दीर्घ श्रृंखला प्राप्त होती है जिनमें ‘पञ्चतन्त्रम्, ‘हितोपदेशः’, ‘बृहत्कथामञ्जरी’, ‘कथासरित्सागर’, ‘वेतालपञ्चविंशतिका’, ‘भोजप्रबन्ध’, ‘भट्टकद्वात्रिंशतिका’ आदि उल्लेखनीय हैं। इस सभी कथा-श्रृंखलाओं में ‘पञ्चतन्त्रम्’ नामक कथा-संग्रह सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसके रचयिता (UPBoardSolutions.com) विष्णुशर्मा नाम के एक ब्राह्मण थे। इन्होंने महिलारोप्य नगर के राजा अमरशक्ति के अयोग्य एवं विवेकशून्य पुत्रों को शिक्षित करने के लिए इस ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ. में शिष्टाचार, सदाचार, राजनीति एवं लोक-नीति से सम्बद्ध विषयों का कथाओं के माध्यम से अच्छा प्रतिपादन किया गया है। इसकी कथाओं के माध्यम से प्राप्त ज्ञान के द्वारा राजा अमरशक्ति के पुत्र अत्यधिक ज्ञानी और विवेकशील हो गये।

इस ग्रन्थ में पशु-पक्षियों, मानवों आदि के माध्यम से प्रत्येक कथा को विस्तार दिया गया है। इस ग्रन्थ के पाँच तन्त्र (भाग) हैं-‘मित्रभेदः’, ‘मित्र-सम्प्राप्तिः’, ‘काकोलूकीयम्’, ‘लब्धप्रणाशम् तथा ‘अपरीक्षितकारकम्’। इस ग्रन्थ का रचनाकाल 300 ईस्वी के आसपास माना जाता है। प्रस्तुत कथा इसी ग्रन्थ के चतुर्थ तन्त्र ‘लब्धप्रणाशम्’ से ली गयी है।

भागीदारों से बदला लेने का उपाय- किसी कुएँ में गंगदत्त नाम को मेढकों का राजा रहता था। वह अपने भागीदारों से अत्यधिक परेशान होकर एक दिन रहट की बाल्टी में चढ़कर कुएँ से बाहर निकल आया। उसने अपने भागीदारों से बदला लेने का विचार करके बिल में प्रवेश करते हुए एक काले सर्प को देखा और उसकी सहायता से अपने भागीदारों के विनाश करने का निश्चय किया। उसने बिल के द्वार पर जाकर सर्प को बुलाया और उससे मैत्री करने का प्रस्ताव किया। पहले तो सर्प (प्रियदर्शन) इसके लिए तैयार न हुआ, किन्तु बाद में (UPBoardSolutions.com) गंगदत्त की करुण कहानी सुनकर और उसके द्वारा भोज्य को सुलभतापूर्वक प्राप्त होता देककर उसके मैत्री प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। गंगदत्त ने उसे पक्के कुएँ में रहट के मार्ग से ले जाकर जल के पास स्थित कोटर (वह खोखला अंश, जिसमें पक्षी, साँप आदि रहते हैं।) में बैठकर सुख से भागीदारों का विनाश करने के लिए कहा और अपने परिवार वालों के भक्षण का निषेध कर दिया।

मेढकों का समूल विनाश- गंगदत्त ने सर्प को अपने भागीदार दिखा दिये। सर्प धीरे-धीरे उसके ‘समस्त भागीदारों को, कुछ को उसकी उपस्थिति में और कुछ को उसकी अनुपस्थिति में; चट कर गया। मेढकों के समाप्त हो जाने पर सर्प ने गंगदत्त से कहा कि मैंने तुम्हारे शत्रुओं को खा लिया है, अब मुझे दूसरा भोजन लाकर दो। इसके बाद गंगदत्त ने उसे अपने परिवार का एक मेढक प्रतिदिन देना प्रारम्भ कर दिया। सर्प उसे खाकर उसके पीछे दूसरों को भी खा लेता था। इसी प्रकार एक दिन उसने दूसरे मेढकों को खाकर गंगदत्त के पुत्र यमुनादत्त को भी खा लिया। कुछ दिनों बाद केवल गंगदत्त शेष रह गया।

गंगदत्त को कुएँ से बाहर जाना- एक दिन सर्प प्रियदर्शन ने गंगदत्त से कहा कि मैं भूखा हूँ, मुझे कुछ भोजन दो। गंगदत्त ने कहा कि तुम चिन्ता मत करो, मैं दूसरे कुएँ से मेंढक लाकर तुम्हें दूंगा और वह रहट की बाल्टी में चढ़कर कुएँ से बाहर आ गया। बहुत दिनों तक गंगदत्त के न आने पर प्रियदर्शन ने (UPBoardSolutions.com) अन्य कोटर में रहने वाली गोध्रा से कहा कि तुम गंगदत्त को खोजकर मेरा सन्देश उससे कहो कि यदि दूसरे मेढक नहीं आते हैं तो तुम अकेले ही आ जाओ, मैं (प्रियदर्शन) तुम्हारे बिना नहीं रह सकता।

गंगदत्त का न लौटना- गोधा ने सर्प के कहने से गंगदत्त को खोजकर कहा कि तुम्हारा मित्र (प्रियदर्शन) तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है, तुम वहाँ शीघ्र चलो। तब गंगादत्त ने गोधा से कहा कि “भूखा  कौन-सा पाप नहीं करता; अतः हे भद्रे! प्रियदर्शन से कहो कि गंगदत्त पुनः कुएँ में वापस नहीं जाएगा।’ ऐसा कहकर उसने गोधा को वापस भेज दिया।

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चरित्र-चित्रण

गंगदत्त 
परिचय- मेढकों का राजा गंगदत्त कुएँ में रहता है। वह अपने वंश के मेढकों से बहुत परेशान है। और उनसे बदला लेने की बात सोचकर कुएँ से बाहर आता है। वह मेढक जाति के जन्मजात शत्रु काले सर्प से मित्रता करके अपने वंश का समूल विनाश कर देता है। उसके चरित्र में निम्नांकित । विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं

(1) अविवेकी व्यक्ति का प्रतीक- गंगदत्त एक ऐसे अविवेकी व्यक्ति का प्रतीक है, जो अपने वंश के सगे-सम्बन्धियों का विनाश करने के लिए अपने जन्मजात शत्रु से सहायता लेता है और उनके साथ अपने परिवार के भी समूह विनाश को देखकर पश्चात्ताप की अग्नि में जलता रहता है। (UPBoardSolutions.com) उसे तभी सद्बुद्धि आती है, जब उसका परिवार भी समूल नष्ट हो जाता है। बिना बिचारे जो करै, सो पाछे पछिताय।’ जैसी कहावतें वास्तव में गंगदत्त जैसे अविवेकी व्यक्ति पर ही चरितार्थ होती हैं।

(2) मूर्ख- गंगदत्त इतना मूर्ख मेढक है कि वह अपने जन्मजात शत्रु को अपने परिवार वालों के पास शरण देता है। अन्ततः उसे अपनी मूर्खता का दुष्परिणाम भुगतना ही पड़ता है।

(3) भीरु– गंगदत्त भीरु प्रकृति का है। वह कायरों की भाँति अपने प्राण बचाकर अन्य मेढकों को लाने के बहाने कुएँ से बाहर चला जाता है। गोधा द्वारा बुलाये जाने पर भी वह नहीं आता। उसे डर है। कि सर्प भूखा होने के कारण उसे भी खा जाएगा। उसकी यही दुर्बलता उसमें प्रारम्भ में भी देखने को मिलती है। यदि ऐसा न होता तो वह अपने भागीदारों का सामना करता और उनसे डरकर न भागता। उसकी भीरुता ही उसे पश्चात्तापमय जीवन व्यतीत करने को बाध्य करती है। |

(4) घोर स्वार्थी–गंगदत्त घोर स्वार्थी है। स्वार्थ-साधन के लिए वह औचित्य-अनौचित्य का भी ध्यान नहीं रखता। उसकी स्वार्थपरता का अन्त वंश के संमूलोच्छेद से होता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि गंगदत्तं प्रतिशोधी स्वभाव का अविवेकी, भीरु और वज्रमूर्ख मेढक है, जो अपने वंशोच्छेद के बाद पश्चात्ताप की अग्नि में जलने के लिए बच जाता है।

प्रियदर्शन 

परिचय- प्रियदर्शन एक काला साँप है। गंगदत्त उससे मित्रता र्करके अपने सगे-सम्बन्धियों के विनाश के लिए उसे कुएँ में ले जाता है। वहाँ प्रियदर्शन गंगदत्त के सम्बन्धियों के साथ-साथ उसके परिवार का भी भक्षण कर जाता है। उसके चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

(1) नीतिज्ञ— प्रियदर्शन नीति को जानने वाला है। गंगदत्त के पुकारने पर वह तुरन्त बिल से बाहर नहीं आता। उसे शंका है कि वह किसी मन्त्र, वाद्य, औषध से आकृष्ट करके उसे बन्धन में डालना चाहता है। वह गंगदत्त के मित्र बनने के प्रस्ताव पर भी सहसा विश्वास नहीं करता है। अन्ततः वह गंगदत्त (UPBoardSolutions.com) को कुलांगार जानकर उससे मित्रता करता है। वह सोचता है कि मैं कुएँ में आराम से रहूँगा और मेंढकों को खा जाऊँगा। अब अपने भोजन की चिन्ता मुझे नहीं करनी होगी।

(2) कपटी- मित्र-प्रियदर्शन गंगदत्त से मित्रता कर कपट करता है। वह वंशद्रोही गंगदत्त से इसलिए मित्रता करता है कि उसे आराम से भोजन मिलेगा। वह गंगदत्त के वंश-के साथ उसके पुत्र और पत्नी को भी खा जाता है और अन्त में गंगदत्त को भी अपनी मीठी बातों में फंसाकर खा जाना चाहता

(3) कृतघ्न- प्रियदर्शन कृतघ्न है। गंगदत्त की मूर्खता से उसे मेढकों के भक्षण का अवसर मिल जाता है, लेकिन उसकी लालसा बढ़ती ही जाती है। वह गंगदत्त के परिवार के मेढकों को खाकर अपनी कृतघ्नता का परिचय देता है। उसे मित्र के साथ विश्वासघात के दोष से मुक्त नहीं किया जा सकता।

(4) मूर्ख- प्रियदर्शन नीतिज्ञ होते हुए भी मूर्ख है। वह गंगदत्त की इस बात पर विश्वास कर लेता है कि वह उसे और मेढक लाकर देगा। अपनी मूर्खता के कारण ही उसे कुएँ में अकेले रहने के लिए विवश होना पड़ता है।

(5) दूरदर्शी- प्रियदर्शन एक दूरदर्शी सर्प है। वह प्रत्येक कार्य को करने से पहले उसके दूरगामी . परिणाम को सोचता है। जब वह इस निष्कर्ष पर पहुँच जाता है कि गंगदत्त के साथ कुएँ में जाने से उसे कोई हानि नहीं है, तब ही वह उसके साथ कुएँ में जाता है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है (UPBoardSolutions.com) कि सर्प प्रियदर्शन के चरित्र में उपर्युल्लिखित समस्त विशेषताएँ पूर्णरूपेण विद्यमान हैं। इन विशेषताओं के सन्दर्भ में उसे बुरे-से-बुरे पात्र का प्रतीक माना जा सकती है।

लघु-उत्तरीय संस्कृत प्रश्‍नोत्तर

अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखिए

प्रश्‍न 1
गङ्गदत्तः कुत्रे प्रतिवसति स्म?
उत्तर
गङ्गदत्तः एकस्मिन् कुपे प्रतिवसति स्म।

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प्रश्‍न 2
गङ्गदत्तः किं कर्तुं प्रियदर्शनमाहूतवान्?
उत्तर
गङ्गदत्तः स्व दायादानां विनाशं कर्तुं प्रियदर्शनम् आहूतवान्।

प्रश्‍न 3
मण्डूकोभावे सर्पेण गङ्गदत्तः किमभिहितः?
उत्तर
मण्डूकाभावे सर्प: गङ्गदत्तम् अवदत्–भद्र! प्रयच्छ मे किञ्चिद् भोजनम्।

प्रश्‍न 5
गङ्गदत्तः स्वपल्या कथं निन्दितः?.,
उत्तर
गङ्गदत्त: स्वपल्या स्वपक्षक्षयकारणात् निन्दितः।

प्रश्‍न 5
गोधा प्रियदर्शनस्य कं सन्देशं गङ्गदत्तमकथयत्?
उत्तर
गोधा प्रियदर्शनस्य आगम्यतामेकाकिनापि भवता द्रुततरं, यदन्ये मण्डूकाः नागच्छन्ति। इति सन्देशं गङ्गदत्तमकथयत्।

प्रश्‍न 6
का निष्करुणा भवन्ति?
उत्तर
क्षीणाः नराः निष्करुणा भवन्ति।

वस्तुनिष्ठ  प्रश्‍नोत्तर

अधोलिखित प्रश्नों में से प्रत्येक प्रश्न के उत्तर रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। इनमें से एक विकल्प शुद्ध है। शुद्ध विकल्प का चयन कर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए

1. ‘न गङ्गदत्तः पुनरेति कूपम्’ नामक पाठ किस ग्रन्थ से लिया गया है?
(क) बृहत्कथामञ्जरी से
(ख) पञ्चतन्त्रम् से 
(ग) हितोपदेश से
(घ) कथासरित्सागर से

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2. ‘पञ्चतन्त्रम्’ के रचयिता कौन हैं?
(क) महाकवि भास
(ख) पण्डित विष्णु शर्मा
(ग) गुणाढ्य ।
(घ) शर्ववर्मा

3. पंण्डित विष्णु शर्मा ने पञ्चतन्त्रम् की रचना किसलिए की थी?
(क) अपने पुत्रों को शिक्षा देने के लिए।
(ख) सातवाहन के पुत्रों को शिक्षा देने के लिए
(ग) अमरशक्ति के पुत्रों को शिक्षा देने के लिए।
(घ) अमरशक्ति को शिक्षा देने के लिए

4. गंगदत्त कौन है?
(क) एक मगरमच्छ
(ख) एक सर्प
(ग) एक कछुआ
(घ) एक मेंढक

5. गंगदत्त कहाँ रहता था? 
(क) सरोवर में
(ख) कूप में,
(ग) बिल में
(घ) कोटर में

6. प्रियदर्शन किसका नाम है? 
(क) गंगदत्त के पुत्र का
(ख) यमुनादत्त के पिता का
(ग) एक मगरमच्छ का
(घ) एक सर्प का 

7. गंगदत्त प्रियदर्शन को कुएँ में क्यों लाया था? …………।
(क) वह प्रियदर्शन को अपना घर दिखाना चाहता था ,
(ख) प्रियदर्शन गंगदत्त का सम्बन्धी था ।
(ग) गंगदत्त प्रियदर्शन को दिखाकर अपने बन्धुओं को डराना चाहता था ।
(घ) गंगदत्त प्रियदर्शन के द्वारा अपने भागीदारों का विनाश कराना चाहता था।

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8. गंगदत्त की पत्नी ने गंगदत्त की निन्दा क्यों की?
(क) गंगदत्त द्वारा लाये गये सर्प ने उसके पुत्र यमुनादत्त को खा लिया था
(ख) गंगदत्त अपने बन्धुओं के साथ मित्रता से नहीं रह रहा था।
(ग) गंगदत्त की पत्नी को प्रियदर्शन से भय लगता था ।
(घ) प्रियदर्शन सर्प ने गंगदत्त की पत्नी को खाना चाहा था।

9. ‘स्वभाववैरी त्वमस्माकम्’ में किसको किसका वैरी कहा गया है?
(क) मेढक को गोधा का
(ख) गोधा को मेढक का
(ग) मेढक को साँप का
(घ) साँप को मेढक का

10. प्रियदर्शन सर्प ने गंगदत्त मेढक को कुएँ से बाहर क्यों जाने दिया?
(क) प्रियदर्शन कुएँ में अकेला रहना चाहता था,
(ख) प्रियदर्शन ने गंगदत्त के द्वारा अपने घर सन्देश भेजा था।
(ग) गंगदत्त ने बाहर से मेढकों को लाने का आश्वासन दिया था
(घ) गंगदत्त के शरीर से बहुत दुर्गन्ध आती थी।

11. गंगदत्त लौटकर कुएँ में क्यों नहीं गया?
(क) उसको कुएँ से अच्छा निवासस्थान मिल गया था।
(ख) उसको कुएँ में शीत सताती थी।
(ग) उसको प्रियदर्शन द्वारा खाये जाने का भय था
(घ) वह कुएँ में उतरने में असमर्थ था

12. ‘बुभुक्षितः किं न करोति पापं’ इस पंक्ति में बुभुक्षित किसको कहा गया है?
(क) गंगदत्त को
(ख) यमुनादत्त को
(ग) प्रियदर्शन को
(घ) गोधा को

13. ‘न गङ्गदत्तः पुनरेति कूपम्’, पाठ में कपटी मित्र कौन है?
(क) गोधा
(ख) यमुनादत्त
(ग) गंगदत्त
(घ) प्रियदर्शन

14. ‘भो गङ्गदत्त, बुभुक्षितोऽहम्। निःशेषिताः सर्वे मण्डूकाः।’ वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?
(क) गोधा ।
(ख) यमुनादत्तः
(ग) प्रियदर्शनः
(घ) मण्डूक

15. ‘अथ मण्डूकाभावे सर्पणाभिहितम्-भद्र, निःशेषितास्ते •••••••••••।’ में वाक्यपूर्ति होगी–
(क) परिजनाः
(ख) रिपवः
(ग) सुहृदाः
(घ) मित्राणि

16. ‘भो! अश्रद्धेयमेतत् यत्तृणानाम् अग्निना सह सङ्गमः।’ वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?
(क) गोधा
(ख) यमुनादत्त
(ग) प्रियदर्शनः
(घ) मण्डूकः

17. ‘तस्य मध्ये जलोपान्ते रम्यतरं कोटरम् अस्ति।’ वाक्यस्य वक्ता कोऽस्ति?
(क) गोधा
(ख) यमुनादत्तः
(ग) गङ्गदत्तः
(घ) प्रियदर्शन:

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18. ‘अथान्यदिने सर्पेणगङ्गदत्तसुतो •••••••••• भक्षितः।’ वाक्य में रिक्त-स्थान में जाएगी
(क) प्रियदर्शनो
(ख) सरयूदत्तो
(ग) भगीरथो,
(घ) यमुनादत्तो

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Class 9 Sanskrit Chapter 2 UP Board Solutions रामस्य पितृभक्तिः Question Answer

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Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 2
Chapter Name रामस्य पितृभक्तिः (पद्य-पीयूषम्)
Category UP Board Solutions

UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 2 Ramasya Pitribhakti Question Answer (पद्य-पीयूषम्)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 2 हिंदी अनुवाद रामस्य पितृभक्तिः के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

परिचय-‘रामस्य पितृभक्तिः
‘ शीर्षक पाठ महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित ‘रामायण’ के अयोध्याकाण्ड के अठारहवें और उन्नीसवें सर्ग से संकलित किया गया है। इन सर्गों में उस समय की कथा का वर्णन है जब कैकेयी स्वयं को दिये गये वरदानों की पूर्ति के लिए दशरथ से दुराग्रह करती है। तब सुमन्त्र को भेजकर राम को वहाँ (UPBoardSolutions.com) बुलवाया जाता है। जब राम दशरथ और कैकेयी के पास पहुँचकर कैकेयी से अपने पिता की दुरवस्था के विषय में पूछते हैं, तब कैकेयी उनके प्रश्न का जो उत्तर देती है, उसी समय की घटना का वर्णन प्रस्तुत पाठ में किया गया है।

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पाठ-सारांश

राम का कैकेयी से पिता के दुःख का कारण पूछना-राम ने कैकेयी के साथ आसन पर बैठे हुए दु:खी पिता को देखा। उन्होंने पहले पिता के चरणों में अभिवादन किया और तत्पश्चात् कैकेयी के चरण स्पर्श किये। पिता दशरथ ‘राम’ शब्द कहकर आँसुओं के कारण न उन्हें देख सके और न बोल सके। पिता को आशीर्वाद न देते देखकर, राम सोचने लगे कि आज पिताजी मुझे देखकर प्रसन्न क्यों नहीं हो रहे हैं। शोकयुक्त राम ने कैकेयी से पूछा कि “आज पिताजी मुझ पर क्यों कुपित हैं? मैं पिता को सन्तुष्ट न करके और उनके वचन का पालन न करता हुआ एक क्षण भी नहीं जीना चाहता हूँ।”

कैकेयी का राम से पिता का वचन पूर्ण करने को कहना-कैकेयी ने राम के वचन सुनकर : स्वार्थ से भरकर कहा कि तुम इन्हें अत्यन्त प्रिय हो। यही कारण है कि तुम्हें अप्रिय बात कहने के लिए इनकी वाणी नहीं निकल रही है। इन्होंने मुझे जो वचन दिया है, वह तुम्हें अवश्य पूरा करना है। तुम्हारे पिता ने मुझे वर देकर मेरा सम्मान किया था, लेकिन अब उस वर को पूरा करते समय ये साधारणजन की तरह दु:खी हो रहे हैं। महाराज तुमसे जो शुभ या अशुभ कहेंगे, वह सब मैं तुमसे कहती हूँ।

राम द्वारा कैकेयी को विश्वास दिलाना-कैकेयी के वचन सुनकर दु:खी राम ने उससे कहा कि, “मैं राजा के कहने से आग में कूद सकता हूँ, भयंकर विष खा सकता हूँ और समुद्र में भी कूद सकता हूँ; अतः हे देवी! आप राजा को अभिलषित मुझे बताइए, मैं उसे अवश्य पूरा करूंगा।’ कैकेयी का वरदानों के विषय में बताना–कैकेयी ने सरल और सत्यवादी राम से अत्यन्त कठोर शब्दों में कहा कि “प्राचीन समय में हुए (UPBoardSolutions.com) देवासुर संग्राम में तुम्हारे पिता की रक्षा करने पर उन्होंने मुझे दो वर प्रदान किये थे। उन दो वरों में से मैंने प्रथम वर भरत के राज्याभिषेक को तथा द्वितीय वर तुम्हारे वन में जाने का माँगा है। यदि तुम पिता का वचन और अपनी प्रतिज्ञा को सत्य करना चाहते हो तो चौदह वर्ष तक वन में रहने के लिए जाओ, जिससे भरत पिता के इस राज्य का शासन कर सके।”

राम द्वारा वन जाने की स्वीकारोक्ति-कैकेयी के वचन को सुनकर राम दु:खी हुए और बोले कि “मैं पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए जटा और वल्कल वस्त्र धारण करके वन में चला जाऊँगा। भरत को राज्य की तो बात ही क्या, उसे मैं सीता, प्रिय प्राणों और धन को भी प्रसन्नतापूर्वक दे सकता हूँ। संसार में पिता की सेवा और उसकी आज्ञापालन से बढ़कर श्रेष्ठ धर्म कोई नहीं है।

पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या

(1)
स ददर्शासने रामो निषण्णं पितरं शुभे।
कैकेय्या सहितं दीनं मुखेन परिशुष्यता ॥

शब्दार्थ
निषण्णं = बैठे हुए।
परिशुष्यता = सूखते हुए। |

सन्दर्भ
प्रस्तुत श्लोक महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित ‘वाल्मीकि रामायण’ से संकलित और हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत पद्य-पीयूषम्’ के ‘रामस्य पितृभक्तिः ‘ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

प्रसंग
कैकेयी के द्वारा राजा दशरथ से दो वरदान माँग लेने पर दशरथ द्वारा श्रीराम को सुमन्त्र से बुलवाया जाता है। राम महल में पहुँचकर जो कुछ देखते हैं, उसी का वर्णन यहाँ किया गया है।।

[संकेत-इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही

सन्दर्भ
प्रसंग प्रयुक्त होगा।]

अन्वय
सः रामः परिशुष्यता मुखेन दीनं पितरं कैकेय्या सहितं शुभे आसने निषण्णं ददर्श।

व्याख्या
उन राम ने सूखे हुए मुख वाले, दीन पिता को कैकेयी के साथ आसन पर बैठे देखा; अर्थात् राम ने अपने पिता दशरथ को अत्यन्त दीन-हीन अवस्था में देखा। मानसिक कष्ट से उनका मुख सूख रहा था और वे कैकेयी के साथ सुन्दर आसन पर विराजमान थे।

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(2)
स पितुश्चरणौ पूर्वमभिवाद्य विनीतवत् ।।
ततो ववन्दे चरणौ कैकेय्याः सुसमाहितः ॥

शब्दार्थ
अभिवाद्य = अभिवादन करके।
विनीतवत् = विनम्र भाव से।
ततः = उसके बाद।
ववन्दे = प्रणाम किया।
सुसमाहितः = अत्यन्त।।

अन्वय
सुसमाहितः (भूत्वा) सः पूर्वं विनीतवत् पितुः चरणौ अभिवाद्य ततः कैकेय्याः चरणौ ववन्दै।

व्याख्या
अत्यधिक एकनिष्ठ होकर उन श्रीराम ने पहले अत्यन्त विनीत भाव के साथ पिता (दशरथ) के चरणों में प्रणाम करके, उसके बाद कैकेयी के चरणों में प्रणाम किया।

(3)
रामेत्युक्त्वा तु वचनं वाष्पपर्याकुलेक्षणः ।।
शशाक नृपतिर्दीनो नेक्षितुं नाभिभाषितुम् ॥

शब्दार्थ
वाष्पपर्याकुलेक्षणः = आँसुओं से व्याकुल नेत्रों वाले।
ईक्षितुम् = देखने के लिए।
अभिभाषितुम् = बोलने के लिए।

अन्वय
वाष्पपर्याकुलेक्षण: दीनः नृपतिः ‘राम’ इति वचनम् उक्त्वा न ईक्षितुं न (च) अभिभाषितुं शशाक।।

व्याख्या
आँसुओं से व्याकुल नेत्रों वाले, अत्यन्त दु:खी राजा राम’ इस वचन को कहकर न तो देख सके और न बोल सके; अर्थात् अत्यधिक दु:खी राजा दशरथ के नेत्र आँसुओ से भरे हुए थे। वे
केवल ‘राम’ इस शब्द को ही कह सके। नेत्रों के अश्रुपूरित होने के कारण न तो वे कुछ देख ही सके और अत्यधिक दु:ख के कारण न कुछ कह ही सके।

(4)
चिन्तयामास चतुरो रामः पितृहिते रतः।
किंस्विदचैव नृपतिर्न मां प्रत्यभिनन्दति ॥

शब्दार्थ
चिन्तयामास = सोचने लगे।
चतुरः = होशियार, मेधावी, तीक्ष्णबुद्धि।
पितृहिते रतः पिता के हित में लगे हुए।
किंस्विद्= किस कारण से।
प्रत्यभिनन्दति = प्रसन्न होकर आशीष दे रहे हैं।

अन्वय
पितृहिते रतः चतुरः रामः चिन्तयामास। किंस्विद् नृपतिः अद्य एवं मां न प्रत्यभिनन्दति।

व्याख्या
पिता के हित में लगे हुए तीक्ष्ण-बुद्धि राम ने सोचा कि किस कारण से राजा आज ही मुझसे प्रसन्न होकर आशीर्वाद नहीं दे रहे हैं। तात्पर्य यह है कि जब भी राम अपने पिता (UPBoardSolutions.com) (राजा दशरथ) को प्रणाम करते थे, तो वे सदैव उन्हें आशीर्वाद दिया करते थे। केवल आज ही ऐसा नहीं हुआ। यह देखकर मेधावी राम, जो हमेशा पिता की हित-चिन्ता में लगे रहते थे; सोचने के लिए विवश हो गये कि ऐसा क्यों हुआ? |

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(5)
अन्यदा मां पिता दृष्ट्वा कुपितोऽपि प्रसीदति ।  
तस्य मामद्य सम्प्रेक्ष्य किमायासः प्रवर्तते ॥

शब्दार्थ
अन्यदा = किसी दूसरे समय।
दृष्ट्य = देखकर।
कुपितः अपि = क्रोधित होने पर भी।
प्रसीदति = प्रसन्न होते हैं।
सम्प्रेक्ष्य = देखकर
आयासः = चित्त-क्लेश, दु:ख।
प्रवर्तते = प्रारम्भ हो रहा है। ।

अन्वय
अन्यदा कुपितः अपि पिता मां दृष्ट्वा प्रसीदति। अद्य मां सम्प्रेक्ष्य तस्य आयासः किं प्रवर्त्तते।

व्याख्या
अन्य दिनों कुपित हुए होने पर भी पिताजी मुझे देखकर प्रसन्न हो जाते थे। आज मुझे देखकर उनको दुःख क्यों हो रहा है? तात्पर्य यह है कि आज के अतिरिक्त दूसरे दिनों में जब पिता दशरथ क्रोधित भी होते थे, तब भी वह राम को देखकर प्रसन्न हो जाते थे, लेकिन आज राम को देखने के बाद दशरथ और भी दु:खी हो गये। ऐसा क्यों हुआ, यह राम समझ नहीं सके।

(6)
स दीन इव शोकात विषण्णवदनद्युतिः।
कैकेयीमभिवाद्यैवं रामो वचनमब्रवीत् ॥

शब्दार्थ
शोकार्त्तः = शोक से व्याकुल।
विषण्णवदनद्युतिः = विषाद के कारण मलिन मुख-कान्ति वाले।
अभिवाद्यैव (अभिवाद्य + एव) = प्रणाम करते ही।
अब्रवीत् = बोला, कहा।

अन्वय
दीनः इव शोकार्त्तः विषण्णवदनद्युतिः सः रामः कैकेयीम् अभिवाद्य एवं वचनम्। अब्रवीत्।।

व्याख्या
दीन-दु:खी के समान दुःख से पीड़ित, दु:ख के कारण मलिन मुख-कान्ति वाले उस राम ने कैकेयी को प्रणाम करते ही यह वचन कहा। तात्पर्य यह है कि पिता को दीन-हीन अवस्था में मानसिक कष्ट से पीड़ित देखते ही राम की मुख-मुद्रा और मानसिक स्थिति भी वैसी ही (पिता जैसी) हो गयी थी।

(7)
कच्चिन्मयानापराद्धमज्ञानाद् येन मे पिता।
कुपितस्तन्ममाचक्ष्व त्वमेवैनं प्रसादय ॥

शब्दार्थ
कच्चित् = क्या कहीं।
मया = मेरे द्वारा।
अपराद्धम् = अपराध को, दोष को।
आचक्ष्व = बताओ।
प्रसादय = प्रसन्न करो।

अन्वय
कच्चित् मया अज्ञानात् न अपरार्द्धम्, येन मे पिता कुपितः, तत् मम आचक्ष्व। एनं त्वम् एव प्रसादये।

व्याख्या
क्या कहीं मैंने अज्ञान के कारण कोई अपराध तो नहीं कर दिया, जिससे मेरे पिता मुझ पर क्रुद्ध हो गये, उस कारण को मुझे बताइए (और) आप ही इनको (UPBoardSolutions.com) प्रसन्न करें। अर्थात् मेरी जानकारी में तो मुझसे कोई अपराध हुआ नहीं। सम्भव है कि अनजाने में मुझसे कोई अपराध निश्चित हो गया है, जिस कारण पिताजी मेरे ऊपर क्रुद्ध हो गये हैं। अतः आप मुझे मेरा अपराध बताइए और पिताजी को (मेरे ऊपर) प्रसन्न भी कराइए।

(8)
अतोषयन् महाराजमकुर्वन् वा पितुर्वचः।
मुहूर्तमपि नेच्छेयं जीवितुं कुपिते नृपे॥

शब्दार्थ
अतोषयन् = सन्तुष्ट न करता हुआ।
अकुर्वन् (न कुर्वन्) = न करता हुआ।
मुहूर्त्तम् । = एक मुहूर्त अर्थात् दो घटी (48 मिनट)।
इच्छेयम् = चाहो जाना चाहिए। 

अन्वय
नृपे कुपिते महाराजम् अतोषयन् पितुः वचः वा अकुर्वन् मुहूर्तम् अपित जीवितुं न इच्छेयम्।।

व्याख्या
राजा के क्रुद्ध होने पर महाराज को सन्तुष्ट न करता हुआ अथवा पिता के वचन का पालन न करता हुआ मैं एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहता हूँ; अर्थात् राम स्वयं को धिक्कारते हुए कहते हैं कि यदि मैं महाराज दशरथ को अपने कार्यों से सन्तुष्ट न कर सका, अथवा अपने पिता के वचनों का पालन न कर सका तो मेरे लिए एक क्षण भी जीवित रहना उचित न होगा। तात्पर्य है कि किसी भी स्थिति में मैं इनके वचनों का पालन अवश्य करूंगा।।

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(9)
यतोमूलं नरः पश्येत् प्रादुर्भावमिहात्मनः।।
कथं तस्मिन्न वर्तेत प्रत्यक्षे सति दैवते ।।

शब्दार्थ
यतोमूलम् = जिस मूल कारण से।
प्रादुर्भावम् = उत्पत्ति को। इह = यह लोक।
आत्मनः = अपनी।
वर्तेत = व्यवहार करे।
प्रत्यक्षे = साक्षात् उपस्थित, सामने।
दैवते = ईश्वर तुल्य।

अन्वय
नरः इह आत्मन: प्रादुर्भावं यतोमूलं पश्येत् , तस्मिन् प्रत्यक्षे दैवते सति कथं ने वर्तेत।

व्याख्या
मनुष्य इस संसार में अपनी उत्पत्ति को जिसके कारण देखता है, उस देवता स्वरूप पिता के विद्यमान रहने पर क्यों न उसके अनुकूल आचरण करे; अर्थात् इस संसार में मनुष्य कन जन्म पिता के कारण ही होता है। अतः पिता के रहने पर व्यक्ति को हमेशा उसके अनुकूल ही आचरण करना चाहिए; क्योंकि जन्म देने के कारण पिता देवतास्वरूप ही होता है।

(10)
एवमुक्ता तु कैकेयी राघवेण महात्मना।
उवाचेदं सुनिर्लज्जा धृष्टमात्महितं वचः ॥

शब्दार्थ
महात्मना = महान् पुरुष।
उक्ता = कहा।
सुनिर्लज्जा = अत्यधिक लज्जारहित।
धृष्टम् = ढिठाई से भरा, ढिठाई के साथ।
आत्महितं वचः = अपने स्वार्थ का वचन।
उवाच = कहा।

अन्वय
महात्मना राघवेण एवम् उक्ता तु सुनिर्लज्जा कैकेयी धृष्टम् आत्महितम् इदं वचः उवाच।

व्याख्या
महात्मना राम ने जब इस प्रकार कहा तो अत्यधिक निर्लज्ज कैकेयी ने धृष्टता में ही अपनी भलाई समझते हुए इस प्रकार वचन कहे। तात्पर्य यह है विशाल हृदय वाले राम के सम्मुख भी कैकेयी अपने तुच्छ स्वार्थ को त्याग न सकी और अत्यधिक निर्लज्जता और धृष्टता से स्वार्थ से युक्त अपनी बातें कहने लगी।

(11)
प्रियं त्वामप्रियं वक्तुं वाणी नास्य प्रवर्तते।
तदवश्यं त्वया कार्यं यदनेनाश्रुतं मम ॥

शब्दार्थ
त्वाम् = तुमको।
अप्रियं = अप्रिय, कटु।
वस्तुम् = कहने के लिए।
प्रवर्त्तते = प्रवृत्त हो रहे।
कार्यं = करना चाहिए।
आश्रुतम् = दिया गया वचन, की गयी प्रतिज्ञा को।।

अन्वय
प्रियं त्वाम् अप्रियं वक्तुम् अस्य वाणी न प्रवर्तते। अनेन यत् मम आश्रुतम् , तत् त्वया अवश्यं कार्यम्। |

व्याख्या
अत्यन्त प्रिय, तुमसे कटु बात कहने के लिए इनकी वाणी निकल ही नहीं रही है। इन्होंने मुझसे जो प्रतिज्ञा की है उसका पालन तुम्हें अवश्य करना है। तात्पर्य यह है कि हे राम! तुम अपने पिता महाराजा दशरथ को अत्यन्त प्रिय हो। इसलिए तुमसे ये कुछ भी अप्रिय वचन कहना नहीं चाहते। अतः अब ये तुम्हारा कर्तव्य है कि इन्होंने मुझे जो वचन दिया है, उसे तुम अवश्य पूरा करो।

(12)
एष मह्यं वरं दत्त्वा पुरा मामभिपूज्य च।।
स पश्चात् तप्यते राजा यथान्यः प्राकृतस्तथा ॥

शब्दार्थ
एष = इन्होंने।
मह्यं = मुझे।
पुरा = पहले, प्राचीनकाल में।
अभिपूज्य = सम्मान करके।
तप्यते = सन्तप्त हो रहे हैं।
प्राकृतः = साधारण-जन।।

अन्वय
एषः (राजा) पुरा माम् अभिपूज्य मह्यं वरं च दत्त्वा पश्चात् स राजा तथा तप्यते यथा अन्यः प्राकृतः (जनः तप्यते)।

व्याख्या
ये राजा (दशरथ) प्राचीन समय में मेरा सम्मान करके और मुझे वर देकर बाद में उसी प्रकार दु:खी हो रहे हैं, जैसे दूसरा कोई साधारण-जन दुःखी होता है। तप-सेवा आदि से प्रसन्न हुए देवता, गुरु आदि सामर्थ्यसम्पन्न जनों द्वारा जो इच्छित पदार्थ सेवा करने वाले को दिया जाता है,उसे (UPBoardSolutions.com) वर कहते हैं। कैकेयी का भी यही कहना है कि जब इन्होंने मुझ पर प्रसन्न होकर वर दिये थे तब आज वचन का पालन करते समय एक सामान्यजन की तरह क्यों दुःखी हो रहे हैं, अर्थात् इन्हें उसी प्रसन्नता से वचन का पालन भी करना चाहिए।

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(13)
यदि तद् वक्ष्यते राजा शुभं वा यदि वाऽशुभम्। ।
करिष्यसि ततः सर्वामाख्यास्यामि पुनस्त्वहम् ॥

शब्दार्थ
वक्ष्यते = कहेंगे।
वो = अथवा।
आख्यास्यामि = बता देंगी।

अन्वय
यदि राजा शुभं वा अशुभं वा वक्ष्यते, तद् यदि त्वं करिष्यसि, ततः अहं तु पुनः सर्वम् । आख्यास्यामि।

व्याख्या
राजा (दशरथ) प्रिय या अप्रिय जो कुछ भी तुमसे कहेंगे, तुम यदि उसे करोगे, तब फिर मैं सब कुछ तुम्हें बता दूंगी। तात्पर्य यह है कि स्वार्थ की बात कहने से पूर्व कैकेयी राम को भी भली-भाँति वचनबद्ध कर देना चाहती है।

(14)
एतत्तु वचनं श्रुत्वा कैकेय्या समुदाहृतम् ।
उवाच व्यथित रामस्तां देवीं नृपसन्निधौ ॥

शब्दार्थ
श्रुत्वा = सुनकर।
समुदाहृतम् = भली प्रकार से कहे गये।
व्यथितः = दु:खी।
नृपसन्निधौ = राजा के पास।

अन्वय
कैकेय्या समुदाहृतम् एतत् वचनं श्रुत्वा तु रामः व्यथितः (सन्) नृपसन्निधौ तां देवीम् । उवाच।

व्याख्या
कैकेयी द्वारा कहे गये इस वचन को सुनकर तो राम ने दुःखी होते हुए राजा के पास | . उस देवी (माता कैकेयी) से कहा।

(15)
अहो धिङ्नार्हसे देवि वक्तुं मामीदृशं वचः।
अहं हि वचनाद् राज्ञः पतेयमपि पावके ॥

शब्दार्थ
धिङ = धिक्कार है।
अर्हसे = उचित है, योग्य है।
माम् = मुझे।
ईदृशं = इस प्रकार के।
हि = निश्चय ही।
पतेयम् = गिर सकता हूँ।
पावके = अग्नि में।

अन्वय
अहो! धिङ मां। देवि! (त्वं) ईदृशं वचः वक्तुं न अर्हसे। राज्ञः वचनात् हि अहं पावके अपि पतेयम्। •

व्याख्या
अहो, मुझे धिक्कार है! हे देवी! (तुम्हें) मुझको इस प्रकार के वचन कहना उचित : नहीं है। मैं निश्चय ही राजा (पिता) की आज्ञा से अग्नि में भी गिर सकता हूँ। जब राम को अनुभव

हुआ कि कैकेयी उनके वचन-पालन के प्रति पूर्णरूपेण आश्वस्तं नहीं है, तब उन्होंने उसे विश्वास दिलाने के लिए कहा कि पिता की आज्ञा यदि उनके लिए प्राणघातक भी होगी तब भी वे उसे पूर्ण करने के लिए वचनबद्ध हैं।

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(16)
भक्षयेयं विषं तीक्ष्णं पतेयमपि चार्णवे।
नियुक्तो गुरुणा पित्रा नृपेण च हितेन च ॥

शब्दार्थ
भक्षयेयम् = खा सकता हूँ।
अर्णवे = समुद्र में
नियुक्तः = कहा गया।
गुरुणा = गुरु द्वारा।
पित्रा = पिता द्वारा।
नृपेण = राजा द्वारा।
हितेन = हितैषी द्वारा।

अन्वय
नृपेण गुरुणा हितेन च पित्री नियुक्तः (अहं) तीक्ष्णं विषं भक्षयेयम् , अर्णवे च अपि पतेयम्।।

व्याख्या
यदि राजा, गुरु, पिता और हितैषी मुझे आदेश दें तो मैं तेज विष खा सकता हूँ और समुद्र में भी गिर सकता हूँ। तात्पर्य यह है कि राजा, गुरु और पिता तो श्रेष्ठ होते ही हैं, उनकी आज्ञा का पालन तो आवश्यक है ही, लेकिन राम तो उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए भी तत्पर हैं जो उनका हित चाहते हैं।

(17)
तद् बूहि वचनं देवि! राज्ञो यदभिकाङ्क्षितम्।
करिष्ये प्रतिजाने च रामो द्विर्नाभिभाषते ॥

शब्दार्थ
ब्रूहि = कहो।
अभिकाङ्क्षितम् = अभिलषित को।
प्रतिजाने = प्रतिज्ञा करता हूँ।
द्विः न अभिभाषते = दो तरह की बात नहीं कहता है।

अन्वय
देवि! राज्ञः यद् अभिकाङ्क्षितम् , तद् वचनं (मां) ब्रूहि। (अहं) प्रतिजाने, तत् । (अहं) करिष्ये। रामः द्विः न अभिभाषते।।

व्याख्या
हे देवी! राजा की जो अभिलाषा है, वह आप मुझे बतलाइए, मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि उसका पालन अवश्य करूंगा। राम दो प्रकार की बात नहीं कहता है। तात्पर्य यह है कि राम कभी असत्य-भाषण नहीं करता है। |

(18)
तमार्जवसमायुक्तमनार्या सत्यवादिनम्।।
उवाच रामं कैकेयी वचनं भृशदारुणम् ॥

शब्दार्थ
आर्जवसमायुक्तम् = सरलता से युक्त।
अनार्या = नीचे विचारों वाली।
भृशदारुणम् = अत्यन्त कठोर।

अन्वय
अनार्या कैकेयी आर्जवसमायुक्तं सत्यवादिनं तं रामं भृशदारुणं वचनम् उवाच।।

व्याख्या
नीचे अर्थात् निकृष्ट विचारों वाली कैकेयी ने सरल स्वभाव वाले और सत्यवक्ता राम से अत्यन्त कठोर वाणी से कहा। तात्पर्य यह है कि व्यक्ति के जैसे विचार होते हैं, उसी के अनुरूप उसकी वाणी भी परिवर्तित हो जाती है।

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(19)
पुरा दैवासुरे युद्धे पित्रा ते मम राघव ! 
रक्षितेन वरौ दत्तौ सशल्येन महारणे ॥

शब्दार्थ
पुरा = प्राचीन काल में।
दत्तौ = दिये गये।
सशल्येन = बाण से विद्ध हुए।

अन्वय
हे राघव! पुरा दैवासुरे युद्धे शल्येन (मया) रक्षितेन ते पित्रा महारणे मम वरौ दत्तौ।।

व्याख्या
हे राघव! प्राचीनकाल में देवताओं और असुरों के बीच होने वाले युद्ध में बाण से। विद्ध हुए और मेरे द्वारा रक्षित तुम्हारे पिता ने उसी महान् युद्ध-भूमि में ही मुझे दो वर प्रदान किये थे।

(20)
तत्र मे याचितो राजा भरतस्याभिषेचनम्।
गमनं दण्डकारण्ये तव चाद्यैव राघव! ॥

शब्दार्थ
तत्र = वहाँ।
याचितः = माँगा।
अभिषेचनम् = अभिषेक, राज्याभिषेक।
दण्डकारण्ये = दण्डक वन में।
तव = तुम्हारा।
अध एवं = आज ही।

अन्वय
हे राघव! तत्र (एकेन) में भरतस्य अभिषेचनम्। (द्वितीयेन) अद्यैव तव दण्डकारण्ये गमनं च राजा याचितः।

व्याख्या
हे राघव! उन वरों में से मैंने राजा से एक वर से भरत का राज्याभिषेक और दूसरे वर से आज ही तुम्हारा दण्डक वन में जाना माँगा था।

(21)
यदि सत्यप्रतिज्ञं त्वं पितरं कर्तुमिच्छसि।
आत्मानं च नरश्रेष्ठ! मम वाक्यमिदं शृणु ॥

शब्दार्थ
सत्यप्रतिज्ञम् = सच्ची प्रतिज्ञा वाला।
कर्तुमिच्छसि = करना चाहते हो।
आत्मानं =’ स्वयं को।
नरश्रेष्ठ! = मनुष्यों में श्रेष्ठ।
शृणु = सुनो।..

अन्वय
हे नरश्रेष्ठ! यदि त्वं पितरम् आत्मानं च सत्यप्रतिज्ञं कर्तुम् इच्छसि, (तदा) मम इदं वाक्यं शृणु।।

व्याख्या
मानवों में श्रेष्ठ (हे राम)! यदि तुम पिताजी को और अपने को सच्ची प्रतिज्ञा वाला सिद्ध करना चाहते हो तो मेरे इस वचन को सुनो। कैकेयी का आशय यह है कि यदि राम स्वयं अपने वचनों की तथा अपने पिता के वचनों की रक्षा करना चाहते हैं तो उन्हें कैकेयी की बात मान लेनी चाहिए।

(22)
त्वयारण्यं प्रवेष्टव्यं नव वर्षाणि पञ्च च।
भरतः कोशलपतेः प्रशास्तु वसुंधमिमाम् ॥

शब्दार्थ
त्वया = तुम्हारे द्वारा।
अरण्यम् = वने में।
प्रवेष्टव्यं = प्रवेश करना चाहिए।
नव पञ्च च वर्षाणि = नव और पाँच अर्थात् चौदह वर्ष तक।
प्रशास्तु = शासन करे। वसुधाम् = पृथ्वी का।

अन्वय
त्वया नव पञ्च च वर्षाणि अरण्यं प्रवेष्टव्यम्। भरतः कोशलपतेः इमां वसुधां प्रशास्तु।

व्याख्या
तुम्हें चौदह वर्षों के लिए वन में प्रवेश करना चाहिए और भरत को कोशल नरेश की इस भूमि का शासन करना चाहिए।

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(23)
तदप्रियममित्रघ्नो वचनं मरणोपमम् ।
श्रुत्वा न विव्यथे रामः कैकेयीं चेदमब्रवीत् ॥

शब्दार्थ
अमित्रघ्नः = शत्रुओं का वध करने वाले।
मरणोपमम् = मृत्यु के समान कष्टदायक।
श्रुत्वा = सुनकर।
विव्यथे = पीड़ित हुए।

अन्वय
तद् अप्रियं मरणोपमं वचनं श्रुत्वा अमित्रघ्नः रामः न विव्यथे। कैकेयींच इदम् अब्रवीत्। .

व्याख्या
उस अप्रिय और मृत्यु के समान कष्टदायक वचने को सुनकर शत्रुओं का वध करने । वाले राम पीड़ित नहीं हुए और कैकेयी से यह वचन बोले।

(24)
एवमस्तु गमिष्यामि वनं वस्तुमहं त्वितः। |
जटाचीरधरो राज्ञः प्रतिज्ञामनुपालयन् ॥

शब्दार्थ
एवम् अस्तु = ऐसा ही हो।
वस्तुम् = रहने के लिए।
इतः = यहाँ से।
जटाचीरधरः = जटाएँ और वल्कल वस्त्र धारण करके
अनुपालयन् = पालन करता हुआ।

अन्वय
एवम् अस्तु। अहं तु ज़टाचीरधरः राज्ञः प्रतिज्ञाम् अनुपालयन् वनं स्तुम् इत: गमिष्यामि। व्याख्या-(राम ने कैकेयी से कहा अच्छा ठीक है) ऐसा ही हो। मैं जटाएँ और वल्कल धारण करके राजा (पिता) की आज्ञा का पालन करता हुआ वन में रहने के लिए यहाँ से चला जाऊँगा।

(25)
अहं हि सीतां राज्यं च प्राणानिष्टान् धनानि च। |
हृष्टो भ्रात्रे स्वयं दद्यां भरताय प्रचोदितः ॥

शब्दार्थ
इष्टान् = प्रिय।
हृष्टः = प्रसन्न होकर।
दद्याम् = दे सकता हूँ।
प्रचोदितः = प्रेरित किया गया।

अन्वय
(त्वया) प्रचोदितः अहं हि सीता, राज्यम्, इष्टान् प्राणान् धनानि च हृष्टः भ्रात्रे भरताय स्वयं दद्याम्।

व्याख्या
(राम ने कैकेयी से कहा) आपके द्वारा प्रेरित किया गया मैं निश्चय ही, सीता को, राज्य को, प्रिय प्राणों को और धनों को भी प्रसन्न होकर स्वयं भाई भरत को दे सकता हूँ। तात्पर्य यह है । कि राम अपने भाई भरत के लिए सर्वस्व त्याग हेतु सदैव तत्पर हैं।

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(26)
न ह्यतो धर्माचरणं किञ्चिदस्ति महत्तरम्।
यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिया ॥

शब्दार्थ
अतो महत्तरम् = इससे बढ़कर।
धर्माचरणम् = धर्म का आचरण करना।
किञ्चित् = कोई।
पितरि शुश्रूषा = पिता की सेवा करना।
वचनक्रिया = वचनों का पालन करना।

अन्वय
पितरि शुश्रूषा तस्य वचनक्रिया वा यथा धर्माचरणम्; अत: महत्तरं किञ्चित् (धर्माचरणम्) न हि अस्ति।

व्याख्या
निश्चय ही, पिता की सेवा अथवा उनके वचनों का पालन करने जैसे उत्तम धर्म के आचरण से बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। तात्पर्य यह है कि पिता की सेवा और उनकी आज्ञा के पालन से बढ़कर सर्वोत्तम धर्म और कोई नहीं है।

सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1)
यतोमूलं नरः पश्येत् प्रादुर्भावमिहात्मनः।।
कथं तस्मिन्न वर्तेत प्रत्यक्षे सति दैवते ॥

सन्दर्भ
प्रस्तुत सूक्ति श्लोक महर्षि वाल्मीकिकृत ‘रामायण’ से संकलित हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत पद्य-पीयूषम्’ के ‘रामस्य पितृभक्तिः शीर्षक पाठ से उधृत है।

[संकेत-इस शीर्षक के अन्तर्गत आयी हुई समस्त सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।

प्रसंग
प्रस्तुत सूक्तिपरक श्लोक में राम पिता के महत्त्व को बताते हुए उसकी इच्छानुसार आचरण करने की बात कहते हैं। |

अर्थ
मनुष्य इस संसार में अपनी उत्पत्ति को जिसके कारण देखता है, उस पिता रूप देवता के विद्यमान रहने पर क्यों न उसके अनुकूल आचरण करे।।

व्याख्या
प्रत्येक व्यक्ति के जन्म लेने का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण पिता है। बिना पिता के उसकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है। जिस पिता के कारण व्यक्ति अस्तित्व में आया, वह पिता निश्चित रूप से किसी भी देवता से बढ़कर है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का यह परम कर्तव्य है कि वह अपने प्राण रहते पिता की इच्छा के अनुरूप आचरण करे। हमारे धार्मिक ग्रन्थों में भी सर्वत्र पिता को देवता के समान पूज्य बताया गया है। महाभारत में भी यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में युधिष्ठिर ने पिता को आकाश से ऊँचा बताते हुए कहा है-खात्पितोच्चतरस्तथा।।

(2)
भक्षयेयं विषं तीक्ष्णं पतेयमपि चार्णवे। |
नियुक्तो गुरुणा पित्रा नृपेण च हितेन च ॥

प्रसंग
प्रस्तुत सूक्तिपरक श्लोक में राम के मुख से यह सन्देश दिया गया है.कि यदि व्यक्ति  को पिता तथा राजा की भलाई के लिए अपना सर्वस्व भी त्यागना पड़े तो उसे कोई संकोच नहीं करना चाहिए।

अर्थ
गुरु, पिता, राजा और हितैषी के लिए मैं तेज विष खा सकता हूँ और समुद्र में भी गिर सकता हूँ।

व्याख्या
श्रीराम के कहने का तात्पर्य यह है कि यदि पिता, गुरु, राजा और हितैषी के लिए विष खाकर प्राण देना आवश्यक हो अथवा समुद्र में डूबकर मरने से उनका हित-साधन होता हो तो व्यक्ति को अपने प्राणों की चिन्ता त्यागकर विषपान कर लेना चाहिए तथा समुद्र में डूब जाना चाहिए। वे (UPBoardSolutions.com) यही बात अपनी माता कैकेयी से कह रहे हैं कि यदि पिता और राजा के हित के लिए मुझे भयंकर विषपान करना पड़े अथवा समुद्र में छलाँग लगानी पड़े तो मैं उससे विचलित नहीं होगा। आप निस्संकोच मुझे बताएँ कि पिता दशरथ का दु:ख कैसे दूर हो सकता है।

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(3)
रामो द्विर्नाभिभाषते ।। 

प्रसंग
प्रस्तुत सूक्ति में राम अपनी माता कैकेयी को आश्वस्त करते हुए कहते हैं कि मैं अपने कहे वचनों से पीछे नहीं हटूगा।

अर्थ
राम दो प्रकार की बातें नहीं कहता है।

व्याख्या
संसार में ऐसे अनेक व्यक्ति हैं, जो कोई बात कह तो देते हैं, परन्तु उसे पूरा नहीं करते हैं। वे अवसर आने पर अपनी बात से हट जाने का मौका हूँढ़ा करते हैं। ऐसे व्यक्ति अधम कहलाते हैं। लेकिन महापुरुष जो बात कह देते हैं, वे उसे अवश्य पूरा करते हैं। राम माता कैकेयी से कहते हैं कि राम दो प्रकार की बातें नहीं कहता है। इसका तात्पर्य यह है कि राम जो कहता है, उसे पूरा करता है, उससे पीछे नहीं हटता है अर्थात् राम कभी असत्य-भाषण नहीं करता।

(4)
न ह्यतो धर्माचरणं किञ्चिदस्ति महत्तरम् ।।
यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिया ॥

प्रसंग
पितृभक्ति को संसार को सर्वश्रेष्ठ धर्म बताते हुए राम कैकेयी से यह सूक्तिपरक श्लोक कहते हैं।

अर्थ
निश्चय ही पिता की सेवा, उनके वचनों का पालन करने से बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं

व्याख्या
यह तो सभी जानते हैं कि पिता के कारण ही इस संसार में सभी व्यक्ति अस्तित्व में आये हैं तथा इस संसार में आने के पश्चात् ही ईश्वर और धर्म-कर्म को जान सके हैं। यदि पिता उन्हें उत्पन्न न करता तो वे इन धर्म-कर्मों को नहीं जान सकते थे; अर्थात् पिता के कारण ही हम उनके विषयों में जान सके हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि पिता ही सबसे बड़ा देवता और धर्म होता है और उसकी सेवा-शुश्रूषा करके उसको प्रसन्न करना ही किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा धर्म और पुण्य है।

श्लोक का संस्कृत अर्थ

(1) स दीन इव •••••••••••••••••••••• वचनमब्रवीत् ॥(श्लोक 6)
संस्कृतार्थः–
रामचन्द्रः, कैकेयीम् उपगम्य स्वपितरं दशरथम् एवं मातरं कैकेयीं प्रणम्य पितरम् अवलोक्य दुःखितः अभवत्। मातरं प्रणम्य शोकेन आर्त्तः खिन्न आनन: दीन: इव मातरः कैकेयीं विनम्रो भूत्वा इदम् उवाच।।

(2) यदि सत्यप्रतिज्ञम् ••••••••• इदं शृणु ॥(श्लोक 21)
संस्कृतार्थ:-
कैकेयी रामम् उवाच-हे नरश्रेष्ठ राम! यदि त्वं स्वजनकं सत्यपालकरूपेण जगति विख्यातं कर्तुम् इच्छसि, तु मम कथनं सावधानतया शृणु।।

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(3) न ह्यतो धर्माचरणं ••••••••••••••••••••••••••••••••••• वचनक्रिया ॥ (श्लोक 26 )
संस्कृतार्थ:-
श्रीरामः स्वमातुः कैकेय्याः वचनं श्रुत्वा अकथयत्-संसारेऽस्मिन् स्वपितुः। सेवाकरणं, तस्य च आज्ञायाः पालनं परमः धर्मः अस्ति। अतः महत्तरः मानवस्य कृते कोऽपि धर्में: नास्ति। अतः अहं पितुः आज्ञायाः पालनम् अवश्यं करिष्यामि। एष एव मुम कृते परम: धर्मः अस्ति।।

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Class 9 Sanskrit Chapter 14 UP Board Solutions षड्रिपुविजय Question Answer

UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 14 षड्रिपुविजय (कथा – नाटक कौमुदी) are the part of UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 14 षड्रिपुविजय (कथा – नाटक कौमुदी).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 14
Chapter Name समास-प्रकरण (व्याकरण)
Number of Questions Solved 26
Category UP Board Solutions

UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 14 Shadripu Vijay Question Answer (कथा – नाटक कौमुदी)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 14 हिंदी अनुवाद षड्रिपुविजय के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

परिचय– प्रस्तुत पाठ ‘प्रबोधचन्द्रोदयम्’ नामक नाटक से उद्धृत है। यह एक रूपकात्मक नाटक है और श्रीकृष्ण मिश्र के द्वारा प्रणीत है। कृष्ण मिश्र चन्देल राजा कीर्तिवर्मा के शासनकाल में हुए थे। इनका समय 1050 ईसवी के लगभग माना जाता है। नाटक की प्रस्तावना में यह उल्लिखित है कि राजा कीर्तिवर्मा की उपस्थिति में इसका मंचन किया गया था। इस नाटक में अत्यन्त सरल किन्तु प्रभावपूर्ण ढंग से यह बताया गया (UPBoardSolutions.com) है कि विवेक, श्रद्धा, मति, उपनिषद् आदि के सहयोग से पुरुष अविद्याजन्य अन्धकार को पार करके विष्णु-भक्ति की कृपा से अपने वास्तविक विष्णु पद को प्राप्त होता है। इस नाटक में वेदान्त के ब्रह्मवाद के साथ वैष्णव-भक्ति का सुन्दर समन्वय परिलक्षित होता है।

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पाठ सारांश 

प्रस्तुत नाटक में विवेक, श्रद्धा, मति, उपनिषद्, क्षमा, सन्तोष, वैराग्य, विष्णुभक्ति, महामोह आदि अमूर्त पात्रों के द्वारा दार्शनिक विषयों का अत्यन्त प्रभावोत्पादक एवं सरल शैली में सरसे वर्णन किया गया है। प्रस्तुत पाठ का सारांश इस प्रकार है

सर्वप्रथम मैत्री रंगमंच पर प्रवेश करती है और विष्णुभक्ति के द्वारा महाभैरवी के बन्धन से मुक्त हुई श्रद्धा को देखना चाहती है। उसी समय श्रद्धा प्रवेश करती है। मैत्री उसे गले लगाती है। श्रद्धा विष्णुभक्ति के आदेश से काम, क्रोध आदि छः शत्रुओं पर विजय पाने का प्रयास करने के लिए राजा विवेक के पास जाती है। मैत्री भी विष्णुभक्ति की आज्ञा से विवेक की सफलता के लिए महात्माओं के हृदय में जाकर निवास करती है। इसके बाद प्रतीहारी के साथ राजा विवेक मंच पर आते हैं। वह विष्णुभक्ति की आज्ञा से काम आदि छ: रिपुओं को (UPBoardSolutions.com) जीतने का प्रयास करते हैं। वह सर्वप्रथम वस्तु-विचार को बुलाकर उसे काम को जीतने का आदेश देते हैं। इसके बाद क्षमा को बुलाकर उसे क्रोध पर विजय प्राप्त करने के लिए कहते हैं। क्षमा कहती है कि मैं तो महामोह को भी जीत सकती हूँ और क्रोध तो उसका अनुचरमात्र है। क्रोध को जीत लेने पर हिंसा, कठोरता, मान, ईष्र्या आदि पर स्वतः विजय प्राप्त हो जाएगी।

इसके बाद राजा विवेक लोभ को जीतने के लिए सन्तोष को वाराणसी भेजते हैं। इसके बाद वह शुभ मुहूर्त में सेनापति को सेना के प्रस्थान के लिए आदेश देते हैं और स्वयं रथ पर सवार होकर वाराणसी के लिए प्रस्थान करते हैं। काम, क्रोध, लोभ आदि राजा विवेक के दर्शनमात्र से दूर भाग जाते हैं। राजा विवेक भगवान् शिव को प्रणाम करके वहीं अपनी सेना का पड़ाव डाल देते हैं।

विष्णुभक्ति हिंसाप्रधान युद्ध को देखने में स्वयं को असमर्थ पाकर वाराणसी से शक्तिग्राम चली जाती है और श्रद्धा को युद्ध का सारा वृत्तान्त अवगत कराने के लिए कह जाती है। श्रद्धा विष्णुभक्ति के पास जाती है। विष्णुभक्ति उस समय शान्ति से कुछ मन्त्रणा कर रही होती है। श्रद्धा उसे युद्ध का वृत्तान्त विस्तार से बताती है कि वस्तु-विचार ने काम को मार डाला। क्षमा ने क्रोध, कठोरता, हिंसा

आदि को धराशायी कर दिया। सन्तोष ने लोभ, तृष्णा, दीनता, असत्य, निन्दा, चोरी, असत्परिग्रह आदि को बन्दी बना लिया। अनुसूया ने मात्सर्य को जीत लिया। परोत्कर्ष की सम्भावना ने मद को दबा दिया। दूसरों के गुणों की अधिकता ने मान को नष्ट कर दिया और महामोह भी योग के विघ्नों के साथ डरकर कहीं छिप गया है।

चरित्र चित्रण

राजा
प्रस्तुत रूपक में बताया गया है कि व्यक्ति किस प्रकार से अत्यन्त सरल एवं प्रभावपूर्ण ढंग से विवेक, श्रद्धा, मति, उपनिषद् आदि के सहयोग से अविद्याजन्य अन्धकार को पार करके विष्णुभक्ति की कृपा से अपने वास्तविक स्वरूप विष्णुपद को प्राप्त होता है। ब्रह्मवाद के साथ वैष्णवभक्ति का सुन्दर समन्वय परिलक्षित होता है। राजा की चारित्रिक विशेषताएँ अग्र प्रकार हैं

(1) सुयोग्य राजा- राजा को अत्यन्त योग्य दर्शाया गया है। वह अच्छे-बुरे सभी कार्यों का मता है। उसे इस बात का पता है कि किस बुराई को किस तरह दूर किया जा सकता है।

(2) ज्ञानी- राजा अत्यन्त ज्ञानी है। वह महामोह को धिक्कारता है कि तुम्हारा मूल ही अज्ञान है। , तत्त्व ज्ञान से ही अविद्यादि विकारों से छुटकारा पाया जा सकता है। वह काम के विजय हेतु वस्तु-विचार को, क्रोध के विजय हेतु क्षमा को, लोभ के विजय हेतु सन्तोष आदि को आदेश देता है।

(3) रणनीतिज्ञ- राजा एक कुशल रणनीतिज्ञ है। युद्ध-भूमि की भाँति ही वह समस्त विकारों को जीतने में समर्थ योद्धाओं-वस्तु-विचार, क्षमा, सन्तोष आदि–को लगाकर ही अन्त में सम्पूर्ण सेना को युद्ध के लिए भेजता है। | (4) स्नेही-राजा को अत्यन्त स्नेही रूप में चित्रित किया गया है। वह सभी (UPBoardSolutions.com) लोगोंवस्तु-विचार, क्षमा, सन्तोष आदि–से परामर्श करने के बाद ही युद्ध की पूर्ण तैयारी करता है। शत्रुओं पर विजय पाने के लिए वह सर्वप्रथम अपने पक्ष के महान् योद्धाओं को यथोचित स्थानों पर लगाता है।

(5) विद्वान्- राजा अत्यन्त विद्वान् है। उसे मांगलिक समयों का सही पता है। ज्योतिषी द्वारा प्रस्थान का समय बताने पर वह आदरपूर्वक उसे स्वीकार कर लेता है तथा मांगलिक कार्य सम्पन्न करके ही वह रथ पर चढ़ने का अभिनय करता है। |

(6) आस्तिक- राजा अत्यन्त आस्तिक स्वभाव का है। वह षड्-विकारों को जीतने अर्थात् अभीष्ट की सिद्धि के लिए भगवान् को भी प्रणाम करता है और भगवन्मय नगरी वाराणसी में निवास करने का विचार व्यक्त करके वहीं सेना को पड़ाव डालता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि राजा जो एक योग्य, ज्ञानी एवं संकल्पवान् व्यक्ति है, जटिल दार्शनिक विषयों का सरलता से प्रतिपादन करता है।

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 लघु उत्तरीय संस्कृत प्रश्‍नोत्तर

अधोलिखित  प्रश्नों के संस्कृत में उत्तर लिखिए

प्रश्‍न 1

कामः केन हतः?
उत्तर
वस्तुविचारेण कामः हतः।

प्रश्‍न 2
लोभस्य जेता कः?
उत्तर
सन्तोष: लोभस्य जेता आसीत्।

प्रश्‍न 3
राजा क्रोधस्य विजयाय किम् आदिशति?
उत्तर
राजा क्रोधस्य विजयाय क्षमाम् आदिशति।

प्ररन 4
देव्या विष्णुभक्त्या राजानं किं सन्दिष्टम्?
उत्तर
कामक्रोधादीनां निर्जयाय उद्योगं कर्तुं विष्णुभक्त्या राजानं सन्दिष्टम्।

प्रश्‍न 5
महामोहेन सह विवेकस्य सङ्ग्रामे जाते कस्य विजयः जातः।
उत्तर
महामोहेन सह विवेकस्य सङ्ग्रामे जाते विवेकस्य विजयः जातः।

प्रश्‍न 6
मैत्री देव्याः प्रिय सखी का आसीत्?
उत्तर
मैत्री देव्याः प्रिय सखी श्रद्धा आसीत्।।

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प्रश्‍न 7
राजा रथमारुह्य क्व गतवान्?
उत्तर
राजा रथमारुह्य वाराणसी गतवान्।

प्रश्‍न 8
निलीनः कः तिष्ठति?
उत्तर
महामोह: योगविघ्नैः सह क्वापि निलीनः तिष्ठति।

प्रश्‍न 9
कामादिभिः सङ्ग्रामे कस्य विजयः जातः?
उत्तर
कामादिभिः सङ्ग्रामे राजा विवेकस्य विजयः जातः।

प्रश्‍न 10
विष्णुभक्तिः कस्य माता आसीत्? ।
उत्तर
विष्णुभक्तिः राजा विवेकस्य माता आसीत्।

वस्तुनिष्ठ प्रश्‍नोत्तर

अग्रलिखित प्रश्नों में से प्रत्येक प्रश्न के उत्तर रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। इनमें से एक विकल्प शुद्ध है। शुद्ध विकल्प का चयन कर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए|

1. षड्पुिविजयः’ नामक पाठ किस ग्रन्थ से उधृत है?
(क) उत्तर रामचरितम्’ से।
(ख) ‘प्रबोधचन्द्रोदयम्’ से
(ग) “वेणीसंहारम्’ से ।
(घ) “विक्रमोर्वशीयम्’ से

2. ‘प्रबोधचन्द्रोदयम्’ के रचनाकार कौन हैं? 
(क) महाकवि भास
(ख) भट्टनारायण
(ग) विष्णु शर्मा
(घ) कृष्ण मिश्र

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3. ‘पड्रिपुविजयः’ नामक नाट्यांश के पात्र किस प्रकार के हैं?
(क) वास्तविक
(ख) पुरातन
(ग) आधुनिक
(घ) काल्पनिक

4. ‘अये, मे प्रियसखी मैत्री।’ में ‘मे’ पद से किसे संकेतित किया गया है?
(क) ‘महाभैरवी’ को
(ख) ‘श्रद्धा’ को
(ग) ‘विष्णुभक्ति’ को
(घ) ‘मैत्री’ को

5. राजा लोभ को जीतने हेतु सन्तोष को कहाँ जाने के लिए कहता है?
(क) प्रयाग
(ख) देवप्रयाग
(ग) कर्णप्रयाग
(घ) वाराणसी

6. राजा जिस रथ पर बैठकर वाराणसी के लिए चला, वह रथ कैसा था?
(क) सुखप्रद
(ख) सांग्रामिक
(ग) शोभन ।
(घ) स्वर्ण-निर्मित

7. ‘सुरसरित्’ शब्द से नदी का बोध होता है?
(क) वेत्रवती :
(ख) सरस्वती
(ग) गंगा
(घ) यमुना

8. ‘वत्से देव्या विष्णुभक्तेः प्रसादान्मुनिजनचेतः पदं प्राप्नुहि।’ कथन किसका है?
(क) ‘श्रद्धा’ का
(ख) प्रतीहारी’ का
(ग) “क्षमा’ का
(घ) “शान्ति’ का ।

9. निवृत्ति किससे होती है?
(क) ‘भक्ति-भाव से
(ख) “यज्ञ करने से
(ग) “तत्त्व-ज्ञान’ से
(घ) “तीर्थयात्रा’ से

10. ‘मया दृष्टा क्रुद्धशार्दूलमुखद्विभ्रष्टा •••••••••••• क्षेमेण सञ्जीविता प्रियसखी।’ में रिक्त-पद की पूर्ति होगी
(क) ‘मृगीव’ से
(ख) ‘गजेव’ से
(ग) “शृगालीव’ से
(घ) “कोकिलेव’ से

11. ‘लोभं जेतुं वाराणसी प्रति प्रतिष्ठीयताम्।’ वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?
(क) राजा
(ख) सन्तोषः ।
(ग) सूर्तः
(घ) सेनापतिः

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12. ‘अत्र “”””””समुत्सृज्य पुण्यभाजो विशन्ति यम्।’ श्लोक की चरण-पूर्ति होगी
(क) “अहङ्कारम्’ से
(ख) मोहम्’ से
(ग) “देहम्’ से
(घ) “धनम्’ से

13. ‘यत्रासौ संसारसागरोत्तारतरणिकर्णधारो भगवान् हरिः स्वयं प्रतिवसति।’ वाक्यस्य वक्ता 
कः अस्ति?
(क) श्रद्धा

(ख) शान्तिः
(ग) विष्णुभक्तिः
(घ) सन्तोषः ।

14. क्षमा-‘देवस्याज्ञया महामोहमपि •••••••••••• पर्याप्तास्मि।’ वाक्य में रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी- .
(क) ‘पलायितुम्’ से
(ख) “नष्टुम्’ से
(ग) “जेतुम्’ से
(घ) “हन्तुम्’ से

15. ‘तत्र कामः तावत्प्रथमो वीरो वस्तुविचारेणैव जीयते।’ वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?
(क) सन्तोषः
(ख) प्रतीहारिः
(ग) सूतः
(घ) राजा

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16. ‘ततो वस्तुविचारेण कामो ………………।’ वाक्य में रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी
(क) निषूदित:’ से
(ख) ‘निगृहीताः’ से
(ग) “हत:’ से ।
(घ) ‘खण्डितः’ से |

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Class 9 Sanskrit Chapter 10 UP Board Solutions त्याग एवं परो धर्मः Question Answer

UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 10 त्याग एवं परो धर्मः (कथा – नाटक कौमुदी) are the part of UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 10 त्याग एवं परो धर्मः (कथा – नाटक कौमुदी).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 10
Chapter Name त्याग एवं परो धर्मः (कथा – नाटक कौमुदी)
Number of Questions Solved 27
Category UP Board Solutions

UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 10 Tyag Evam Paro Dharmah Question Answer (कथा – नाटक कौमुदी)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 10 हिंदी अनुवाद त्याग एवं परो धर्मः के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

परिचय-हमारे देश की रत्नगर्भा वसुन्धरा में स्थित राजस्थान की धरती सदा से ही वीर-प्रसविणी रही है। विदेशी आक्रमणों के झंझावात को मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश ने जिस अदम्य साहस एवं वीरता से झेला है उसकी मिसाल विश्व-इतिहास में अन्यत्र नहीं मिलती। महाराणा प्रताप इसी राजवंश रूपी गनन के प्रचण्ड मार्तण्ड हैं, जिनकी प्रखर किरणों के समक्ष मुगल सम्राट् अकबर का कान्ति-मण्डल भी निस्तेज प्रतीत होता है। मातृभूमि की रक्षा हेतु राणा प्रताप को अकबर के साथ अनेक युद्ध करने पड़ते हैं, जिसमें उनका सारा राज्य छिन जाता है और उनको पर्वत-कन्दराओं और निर्जन वनों में रहकर कष्टपूर्ण जीवन व्यतीत करना पड़ता है। अकस्मात् घटित एक घटना (UPBoardSolutions.com) से राणा प्रताप विचलित तो होते हैं, परन्तु उनका स्वाभिमान उन्हें अकबर से सन्धि करने से रोकता है। अकबर से निरन्तर युद्ध करते रहने के कारण महाराणा प्रताप सेना और कोष के अभाव से चिन्ताकुल रहते हैं। तब ही उनका वंशानुगत मन्त्री भामाशाह उन्हें अपने जीवन की अर्जित समस्त सम्पत्ति समर्पित क़र देता है। प्रस्तुत पाठ में भामाशाह और प्रताप के त्यागमय जीवन-वृत्तान्त का वर्णन है।

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पाठ सारांश  

प्रताप की विपन्न दशा- अरावली पर्वत के ऊपर की भूमि पर विपन्नावस्था में बैठे हुए महाराणा प्रताप मन्त्रियों के साथ भावी योजना पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। उसी समय उन्हें अपने पुत्र के रोने का करुण स्वर सुनाई देता है। महाराणा प्रताप उसका आलिंगन करके उसे चुप कराते हुए उससे रोने का कारण पूछते हैं। बालक अपने रोने का कारण अपना भूखा होना बताता है। उसी समय राजमहिषी घास की (UPBoardSolutions.com) रोटी का एक टुकड़ा लेकर आती है। बालक रोटी का टुकड़ा लेकर दूर चला जाता है। उसी समय उसकी रोटी का टुकड़ा एक वन-बिलाव लेकर भाग जाता है और बालक फिर रोने लगता है। प्रताप के पूछने पर राजमहिषी बताती है कि और रोटी नहीं है तथा बालक को चुप कराने के लिए वह उसे एक गुफा के भीतर ले जाती है।’

प्रताप की चिन्ता- महाराणा प्रताप एक शिला पर बैठकर अपनी दशा पर दुःखी हो रहे हैं और स्वयं से कह रहे हैं कि मुझे धिक्कार है, जो मेरे जीवित रहते हुए भी मेरा पुत्र भूखा रह जाता है। उनके लिए यह कष्ट असह्य हो जाता है। वे मातृभूमि की रक्षा का व्रत छोड़कर दिल्ली नरेश से सन्धि करने का विचार करने लगते हैं। अचानक नेपथ्य से आने वाली किसी ध्वनि को सुनकर वे विचार-विरत हो जाते हैं। पुनः चिन्ताकुल होकर सोचते हैं कि मेरे पास मातृभूमि की रक्षा के लिए न तो धन है और न ही पर्याप्त सेना।

भामाशाह का अपूर्व त्याग- उसी समय अपने सेवकों के साथ भामाशाह वहाँ पहुँचता है और महाराणा प्रताप को विपन्न और चिन्तित अवस्था में देखता है। प्रताप मातृभूमि की स्वतन्त्रता की चिन्ता से व्याकुल हैं, इस बात को वह पहले से ही जानता है। भामाशाह देश की रक्षा के लिए अपनी सारी पूँजी प्रताप के चरणों में अर्पित कर देता है। महाराणा प्रताप भामाशाह का आलिंगन करके उसकी प्रशंसा करते हैं। दोनों की जय-जयकार होती है।


चरित्र चित्रण

महाराणा प्रताप

परिचय– मेवाड़ केसरी महाराणा प्रताप सिसोदिया कुल के भूषण थे। उन्होंने वीरप्रसविणी भारतभूमि के राजस्थान प्रान्त में जन्म लिया था। वे अदम्य साहसी, शक्तिसम्पन्न और स्वाभिमानी थे। अकबर से निरन्तर युद्ध करते-करते वे अपना सब कुछ आँवा बैठते हैं और पर्वत-कन्दराओं-वनों में रहकरे जीवन-यापन के लिए विवश हो जाते हैं। उनके चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं ।

(1) अदम्य साहसी एवं वीर- महाराणा प्रताप में अद्भुत साहस एवं अतुल पराक्रम था। वे शत्रु-पक्ष से सदा निर्भीक रहे और निरन्तर युद्ध करते रहे। दिल्ली के सम्राट् अकबर से इस वीर ने ही लोहा लिया और उसकी दासता कभी स्वीकार नहीं की। वे अपने सीमित साधनों और सीमित सेना से ही अकबर से लोह्म लेते रहे। वे विपत्ति में कभी नहीं घबराये। अत्याचार, अन्याय और परतन्त्रता को सहन करना ही सबसे बड़ा (UPBoardSolutions.com) पाप है और सबसे बड़ा पुण्य है, इनके निराकरण के लिए संघर्षरत रहना; इसी को इन्होंने अपने जीवन का सिद्धान्त बना लिया था। इन्होंने मातृभूमि के समक्ष अपनी और अपने परिवार की कभी चिन्ता नहीं की। वे विपन्नता में भी मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए प्रयास करते रहे। |

(2) सहृदय- महाराणा प्रताप सहृदय व्यक्ति थे। पुत्र को भूख से बिलखते देखकर उनको हृदय विचलित हो जाता है। संसार में लोग पुत्र के लिए क्या-क्या उचित-अनुचित नहीं करते, परन्तु पुत्र को दु:खी नहीं देख सकते; लेकिन महाराणा प्रताप का पुत्र भूख से बिलख रहा है। वे पुत्र की इस वेदना से विचलित हो जाते हैं और अकबर से सन्धि करने का विचार करने लगते हैं।

(3) असाधारण स्वाभिमानी- महाराणा प्रताप का स्वाभिमान उन्हें अकबर से सन्धि करने से रोकता है। उन्होंने स्वाभिमान की रक्षा के लिए घास की रोटियाँ खाकर जीवनयापन करना अधिक पसन्द किया, परन्तु स्वाभिमान को नहीं छोड़ा। उन्होंने अकबर की दासता कभी स्वीकार नहीं की, सदा अपना सिर ऊँचा रखा। उन्होंने टूटना सीखा था, मगर झुकना नहीं।

(4) त्याग की जीवन्त मूर्ति- महाराणा प्रताप त्याग की जीवन्त प्रतिमा थे। उनके जीवन का व्रत ‘था कि या तो मेवाड़ को स्वतन्त्र बनाऊँगा अन्यथा शरीर का त्याग कर दूंगा।’ उनकी यह दृढ़ प्रतिज्ञा उनके त्याग की मूर्तिमान कहानी है। वे जीवनपर्यन्त भूमि पर-शयन करते रहे और पत्तल पर भोजन करते रहे; क्योंकि उनका मेवाड़ उनके जीवन-काल में स्वतन्त्र नहीं हो पाया था।

(5) देश-प्रेमी– महाराणा प्रताप मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए अनवरत संघर्ष करते रहे। उन्हें केवल चिन्ता थी तो देश की स्वतन्त्रता की। उन्होंने मेवाड़ की स्वतन्त्रता के लिए अनेक कष्ट सहे। भामाशाह से अतुल धनराशि प्राप्त कर सेना को पुनः एकत्र करके देश को स्वतन्त्र करने हेतु लड़ाई लड़ी। आज भी मेवाड़ के कण-कण में महाराणा प्रताप की देशभक्ति और उनका मातृभूमि के प्रति प्रेम समाया हुआ है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि महाराणा प्रताप मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए शहीद होने वाले वीरों की पंक्ति में अग्रिम स्थान के अधिकारी हैं। वे असाधारण वीर, अप्रतिम साहसी, स्वाभिमानी, कष्ट-सहिष्णु, मातृभूमि के अनन्य सेवक तथा त्याग की जीवन्त मूर्ति थे। 

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भामाशाह

परिचय– देशभक्तों में जहाँ महाराणा प्रताप का नाम अग्रगण्य है, वहीं भामाशाह का नाम भी बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। भामाशाह एक देशभक्त श्रेष्ठ । वे महाराणा प्रताप के वंशानुगत मन्त्री हैं। उनके पास स्वयं की और पूर्वजों की अर्जित अपार सम्पत्ति है। उनके चरित्र की विशेषताएँ इस प्रकार हैं|

(1) महान् देशभक्त- मातृभूमि की रक्षा करते युद्ध में वीरगति प्राप्त करने वालों की गणना ही देशभक्तों में नहीं की जाती, वरन् देश की रक्षा के लिए संसाधन जुटाने वाले लोगों की गणना भी देशभक्तों में ही का जाती है। ऐसे ही एक देशभक्त वीर थे–भामाशाह। वे मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने सम्पूर्ण (UPBoardSolutions.com) जीवन की सम्पत्ति महाराणा के श्रीचरणों में समर्पित करके निराश राणा को पुनः मातृभूमि की रक्षा के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी देशभक्ति को देखकर राणा स्वयं कह उठते हैं–‘यस्या मातृभूमेः त्वादृक् पुत्ररत्नम् विद्यते, न ताम् कश्चिदपि आक्रान्ता पराधीनां कत्तुं शक्तः ।

(2) स्पष्टवक्ता एवं आदर्श मन्त्री- भामाशाह एक आदर्श मन्त्री हैं। उन्हें छल-कपट अथवा मिथ्यालाप नहीं आता। उनका यह कथन है ‘महाराज! निधिरयं मन्त्रिरूपेण अस्माभिः कुलपरम्परया श्रीमद्भ्यः एवोपार्जितः’ उनके इस गुण को स्पष्ट कर देता है। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि यह विपुल धनराशि मेरे कुल द्वारा आप ही से एकत्रित की गयी है।

(3) त्यागी- देशभक्त होने से पहले त्यागी होना अत्यावश्यक है। भामाशाह में यह गुण विद्यमान है। देश के लिए अपने द्वारा अर्जित की गयी सम्पूर्ण सम्पत्ति का त्याग कर देना उनके त्यागी होने का स्पष्ट प्रमाण है। अपने घर आये हुए याचक को दान देते हुए दानियों को तो सहज की देखा जा सकता है किन्तु ऐसे दानी जो दानार्थी को उसके स्थान पर पहुँचकर सर्वस्व दे दें, विश्व-इतिहास में भामाशाह के अतिरिक्त गिने-चुने ही होंगे।

(4) दूरदर्शी- भामाशाह दूरद्रष्टा हैं। वे सोचते हैं कि यदि देश परतन्त्र हो गया तो उनके द्वारा अर्जित समस्त सम्पत्ति को आक्रान्ता लूट ही ले जाएँगे और वे खाली हाथ रह जाएँगे। अब यदि बिना। सम्पत्ति के रहना ही है तो क्यों न वह सम्पूर्ण सम्पत्ति देश की रक्षा के लिए अर्पित कर दी जाये। इससे उनकी यश:-कीर्ति ही बढ़ेगी। कदाचित् यही सोचकर वे अपनी सम्पूर्ण धनराशि देशहित में दे देते हैं। उनकी इस दूरदर्शिता में मातृभूमि की हित-कामना निहित है। |

(5) वीर पुरुष– युद्धवीर, दानवीर, धर्मवीर, दयावीर–वीर पुरुष के चार प्रकार होते हैं। भामाशाह को युद्धवीर नहीं कहा जा सकता; किन्तु वे दानवीर अवश्य हैं। दानवीर व्यक्ति में धर्म (UPBoardSolutions.com) और दया तो निहित होती ही है; क्योंकि इन दोनों गुणों के अभाव में कोई भी व्यक्ति दानी नहीं हो सकता। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भामाशाह जहाँ देशभक्त व आदर्श मन्त्री हैं, वहीं वे दयालु, परम धार्मिक, राजवंश प्रेमी, वीर पुरुष और भारतीय सन्तान हैं। ऐसे ही महापुरुषों पर देश की स्वाधीनता निर्भर करती है।

लघु उत्तरीय संस्कृत  प्रश्‍नोत्तर

अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखिए

प्रश्‍न 1
कुत्र अवसत्?
उत्तर
प्रतापः अर्बुदपर्वतस्य अधित्यकायाम् अवसत्।

प्रश्‍न 2
प्रतापः बालकाय भक्षणार्थम् किमददात्?
उत्तर
प्रतापः बालकाय भक्षणार्थं घासकरपट्टिकायाः खण्डम् अददात्।

प्रश्‍न 3
बालकस्य करपट्टिका केनापहृता? ।
उत्तर
बालकस्य करपट्टिका वनमार्जारण अपहृता।

प्रश्‍न 4
वनमार्जारेणापहृते करपट्टिकाशकले राजमहिषी प्रतापं किम् अवोचत्?
उत्तर
वनमाजरेण अपहृते करपट्टिकाशकले राजमहिषी प्रतापम् अवोचत् यत्-नाथ! एतदेव करपट्टिकाकाशकलम् आसीत्। इदानीं नास्ति किमपि अन्यभक्षणाय।।

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प्रश्‍न 5
राजमहिषीवचः निशम्य वीक्ष्य च क्रन्दन्तं बालकं प्रतापः किमचिन्तयत्?
उत्तर
राजमहिषीवच: निशम्य वीक्ष्य च क्रन्दन्तं बालकं प्रताप: स्व परिवारस्य दीनां दशाम्। अचिन्तयत्। ।

प्रश्‍न 6
केन नेपथ्यध्वनिना प्रतापः विरमति?
उत्तर
‘त्वयि सन्धौ गते राजन्! कुत्र गता स्वतन्त्रता।’ इत्यनेन नेपथ्यध्वनिना प्रतापः विरमति।

प्रश्‍न 7
नेपथ्यभाषितं श्रुत्वा प्रतापः किं चिन्तयामास?
उत्तर
नेपथ्यभाषितं श्रुत्वा प्रतापः चिन्तयामास यत् मम पाश्वें वराटिकापि नास्ति, अपेक्षिता सेना न विद्यते, कथं करोमि मातृभूमि रक्षाविधानम्।

प्रश्‍न 8
भामाशाहः कः आसीत्?
उत्तर
भामाशाह: प्रतापस्य कुलक्रमागत: मन्त्री आसीत्।

प्रश्‍न 9
चिन्तामग्नं प्रतापं दृष्ट्वा भामाशाहः किम् अकथयत्?
उत्तर
चिन्तामग्नं प्रतापं दृष्ट्वा भामाशाहः अकथयत् यत् कथं श्रीमन्तः चिन्ताहुताशनपरीताः इव आलक्ष्यन्ते।

प्रश्‍न 10
भामाशाहः प्रतापाय किमददात्? उत्तर-भामाशाहः प्रतापाय प्रभूतं धनम् अददात्।

वस्तुनिष्ठ प्रश्‍नोत्तर

अधोलिखित प्रश्नों में से प्रत्येक प्रश्न के उत्तर रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। इनमें से एक विकल्प शुद्ध है। शुद्ध विकल्प का चयन कर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए

1. ‘त्याग एव परो धर्मः’पाठ वर्तमान भारत के किस राज्य से सम्बन्धित है?
(क) राजस्थान से
(ख) उत्तर प्रदेश से
(ग) गुजरात से
(घ) मध्यप्रदेश से

2. ‘त्याग एव परो धर्मः पाठ में किनके त्याग का वर्णन किया गया है?
(क) महाराणा प्रताप और भामाशाह के
(ख) महाराणा प्रताप और अकबर के
(ग) भामाशाह और अकबर के
(घ) इनमें से किसी के नहीं।

3. महाराणा प्रताप का युद्ध किससे और कहाँ हुआ था?
(क) बाबर से, पानीपत में।
(ख) हुमायूँ से, दिल्ली में ।
(ग) अकबर से, हल्दीघाटी में
(घ) औरंगजेब से, पानीपत में।

4.अकबर और महाराणा प्रताप के मध्य हुए युद्धों का अन्ततः क्या परिणाम हुआ?
(क) प्रताप का सम्पूर्ण धन और सेना नष्ट हो गयी |
(ख) प्रताप ने आत्म-समर्पण कर दिया।
(ग) अकबर का कोष खाली हो गया
(घ) अकबर ने हार मान ली

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5. राज्य के हाथ से चले जाने पर महाराणा प्रताप ने किन पहाड़ियों में शरण ली?
(क) सतपुड़ा की पहाड़ियों मे
(ख) अरावली की पहाड़ियों में
(ग) हिमालय की पहाड़ियों में
(घ) विन्ध्य की पहाड़ियों में .

6.महाराणा के पुत्र के रोने का क्या कारण था?
(क) भूख
(ख) प्यास
(ग) वनमार्जारम्
(घ) युद्ध .

7. पुत्र को भूख से व्याकुल देखकर प्रताप ने क्या निश्चय किया?
(क) वहाँ से चले जाने का ।
(ख) भोजन सामग्री लाने का
(ग) अकबर से सन्धि करने का |
(घ) बच्चे को चुप कराने का

8. वनबिलाव बालक के हाथ से क्या छीन ले गया?
(क) रोटी का टुकड़ा
(ख) लड्डू
(ग) खिलौना
(घ) कपड़ा

9. महाराणा प्रताप भामाशाह को अपनी चिन्ता का क्या कारण बताते हैं? |
(क) पत्नी की दीनदशी को
(ख) मातृभूमि की स्वतन्त्रता को
(ग) अपने कुटुम्ब को ।
(घ) अपने पुत्र की भूख को

10. भामाशाह ने प्रताप को धन क्यों दिया?
(क) क्योंकि भामाशाह को उस धन के चोरी जाने का भय था
(ख) भामाशाह के पास धन रखने को स्थान नहीं था।
(ग) क्योंकि भामाशाह मातृभूमि की सेवा करना चाहते थे
(घ) क्योंकि प्रताप ने वह धन मँगाया था ।

11. ‘वत्स! किमर्थम् ………………. ।’ वाक्य में रिक्त-पद की पूर्ति होगी–
(क) ‘रोदिहि’ से
(ख) ‘रोदते’ से
(ग) ‘रोदति’ से
(घ) “रोदिषि’ से

12. ‘त्वया वीरप्रसू गोत्रा त्वयि धर्मः प्रतिष्ठितः।’ वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?
(क) महाराणा प्रताप
(ख) अकबर ।
(ग) मानसिंह
(घ) कश्चित् नास्ति

13. ‘बुभुक्षय मे प्राणाः उत्क्रामन्ति।’ वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?
(क) महाराणा प्रतापः।
(ख) प्रतापस्य बालकः
(ग) प्रतापस्य राजमहिषी
(घ) भामाशाहः

14. ‘क्वेदानीं श्रूयते फेरूणाम् •••••••••• ध्वनिः।’ में रिक्त-पद की पूर्ति होगी
(क) “तीव्रतरो’ से
(ख) ‘कर्णकटुको’ से
(ग) ‘मधुरो’ से
(घ) “कोलाहलो’ से

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15. मयि जीवत्येव ममात्मजः क्षुधार्तः तिष्ठति।’ वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?
(क) महाराणा प्रतापः
(ख) प्रतापस्य बालकः
(ग) प्रतापस्य राजमहिषी
(घ) कश्चित् नास्ति ।

16. ‘ …… रक्षणार्थमपेक्षिता सेनापि न विद्यते।’ में वाक्य-पूर्ति होगी
(क) मातृभूमि’ से ।
(ख) ‘आत्मसम्मान’ से
(ग) “प्रजा’ से ।
(घ) ‘सिंहासन’ से ।

17.’…….. अयं मन्त्रिरूपेण अस्माभिः कुलपरम्परया श्रीमद्भ्यः एवोपार्जितः।’ में रिक्त-पद | की पूर्ति होगी ।
(क) “सम्पत्ति’ से
(ख) ‘धनम्’ से
(ग) “निधि’ से
(घ) “वराटिका’ से

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Class 9 Sanskrit Chapter 4 UP Board Solutions शकुन्तलाया पतिगृहगमनम् Question Answer

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 4
Chapter Name शकुन्तलाया पतिगृहगमनम् (कथा – नाटक कौमुदी)
Number of Questions Solved 6
Category UP Board Solutions

UP Board Class 9 Sanskrit Chapter 4 Shakuntalaya Patigrih Gamanam Question Answer (कथा – नाटक कौमुदी)

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 हिंदी अनुवाद शकुन्तलाया पतिगृहगमनम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

परिचय- संस्कृत वाङ्मय में कालिदास को महाकवि की पदवी प्राप्त है। निम्नलिखित श्लोक इस बात को सूचित करता है कि कालिदास के समान दूसरा कवि संस्कृत साहित्य में नहीं हुआ।

पुरा कवीनां गणना प्रसङ्गे कनिष्ठिकाधिष्ठित कालिदासः।।
अद्यापि तत्तुल्यकवेरभावादनामिको सार्थवती बभूव ॥ 

कालिदास ने ‘रघुवंशम्’ एवं ‘कुमारसम्भवम्’ नाम के महाकाव्यों को ‘ऋतु-संह्मरः’ और ‘मेघदूतम्’ नामक खण्डकाव्यों की तथा ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’, ‘मालविकाग्निमित्रम्’ औरविक्रमोवशीयम्’ नामक नाटकों की रचना की। यदि कालिदास ने केवल ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ र्की ही रचना की होती, तब भी उनका संस्कृत-साहित्य में इतना ही यश होता। इस सन्दर्भ में निम्नलिखित श्लोक प्रसिद्ध है ।

काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला।
तत्रापि चतुर्थोऽङ्कः तत्र श्लोकचतुष्टयम् ॥

प्रस्तुत पाठ ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक का संक्षिप्त रूप है। शकुन्तला की कथा ‘महाभारत’ के ‘आदिपर्व’ (अध्याय 67 से 74) में वर्णित ‘शकुन्तलोपाख्यानम्’ से संकलित है, जिसे कालिदास ने अपनी प्रखर प्रतिभा से निखार दिया है।

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पाठ-सारांश

कण्व का गला भर आना- शकुन्तला के पतिगृह-गमन की बात सोचकर कण्व का गला भर आता है। वे सोचते हैं कि जब पुत्री की विदाई के समय मुझ जैसा तपस्वी अपने आँसू नहीं रोक पा रहा है, तब इस अवसर पर सद्गृहस्थों की क्या दशा होती होगी। शकुन्तला कण्व के चरण-स्पर्श करती है। (UPBoardSolutions.com) कण्व उसें चक्रवर्ती पुत्र की प्राप्ति का वरदान देकर अपने शिष्य शाङ्गरव और शारवत् से शकुन्तला को लेकर चलने को कहते हैं। दोनों शकुन्तला को लेकर चलते हैं।

कण्व का वन- वृक्षों से शकुन्तला को विदाई देने के लिए कहना-महर्षि कण्व वन के वृक्षों से कहते हैं कि हे वन-वृक्षों! पहले तुम्हें जल देकर स्वयं जल पीने वाली, अलंकरण-प्रिया होने पर भी तुम्हारे फूल-पत्ते न तोड़ने वाली शकुन्तला आज अपने पति के घर जा रही है। अतः तुम उसे उसके अपने घर जाने की आज्ञा दो। तभी कोयल के रूप में वन-वृक्ष उसे अपने पति के घर जाने की आज्ञा देते हैं।

शकुन्तला के विरह में सभी जीव-जन्तुओं का दुःखी होना- शकुन्तला बड़े भारी मन से कदम आगे बढ़ा रही है। उसके विरह में वृक्ष और दूसरे जीव-जन्तु भी दुःखी हैं। उसके पतिगृह-गमन की बात सुनकर हरिणी ने घास खाना छोड़ दिया है, मयूरों ने नाचना छोड़ दिया है तथा लताएँ पीले पत्तों के रूप में (UPBoardSolutions.com) मानो आँसू बहा रही हैं। शकुन्तला वनज्योत्सना नामक लता को बाँहों में भरकर उसका आलिंगन करती है तथा अपनी सखियों से उसकी देखभाल करने को कहती है।

मृगशावक का शकुन्तला को रोकना- कण्व शकुन्तला को सान्त्वना दे रहे होते हैं; तभी एक मृगशावक शकुन्तला का आँचल मुँह में दबाकर खींचता हुआ, उसे रोकने का प्रयत्न करता है। इस मृगशावक को शकुन्तला ने घायलावस्था में पाया था और उसका उपचार करके उसका पुत्रवत् लालन-पालन किया था। शकुन्तला उसे सान्त्वना देती है कि मेरे बाद पिता मेरे समान ही तेरी देखभाल करेंगे।

शाङ्गरव का सबको लौट जाने के लिए कहना- पतिगृह जाती शकुन्तला के साथ सभी लोग आश्रम से दूर एक जलाशय तक आ जाते हैं। यहाँ पर शाङ्गुरव कण्व से कहता है कि गुरुवर विदाई के समय परिजनों को जलाशय के मिलने पर लौट जाना चाहिए, ऐसा सुना जाता है। अब आप इस जलाशय के तट पर से आश्रम वापसे जा सकते हैं।

कण्व का शकुन्तला को गृहस्थ- जीवन की शिक्षा देना-महर्षि कण्व शकुन्तला को सफल गृहस्थ-जीवन का रहस्य समझाते हुए कहते हैं कि तुम पतिगृह में सभी बड़े लोगों की सेवा करना, सपत्नीजनों (सौतनों) के साथ सखियों जैसा व्यवहार करना, पति को कभी अपमान न करना, सेवकों से उदारता का व्यवहार करना। जो कन्याएँ ऐसा करती हैं, वे पतिगृह में सम्मान पाने के साथ-साथ अपने पिता के कुल (UPBoardSolutions.com) की कीर्ति को भी बढ़ाती हैं। गौतमी भी उससे कण्व के इन उपदेशों को न भूलने के लिए कहती है।शकुन्तला का सबसे विदा लेना-शकुन्तला अधीर होती हुई अपनी सखियों प्रियंवदा और अनसूया से लिपटती है। कण्व उसे सान्त्वना देते हैं। शकुन्तला उनके पैरों में गिरती है। कण्व उसे उसकी इच्छाएँ पूरी होने का आशीर्वाद देते हैं।

शकुन्तला की विदाई पर कण्व का सन्तोष व्यक्त करना- शकुन्तला की दोनों सखियाँ जहाँ भारी मन से आश्रम लौटती हैं, वहीं महर्षि कण्व शकुन्तला की सकुशल विदाई पर सन्तोष व्यक्त करते हुए मन-ही-मन कहते हैं कि कन्या तो माता-पिता के पास धरोहर रूप में रखे गये पराये धन के समान होती है। मैं उसे योग्य पति के पास भेजकर अपने उत्तरदायित्व से मुक्त हो गया हूँ।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि शकुन्तला का पतिगृह- गमन, उसे कण्व द्वारा दिया गया उपदेश तथा शकुन्तला की विदाई का करुण एवं भावपूर्ण मार्मिक वर्णन प्रस्तुत अंश की महत्ता को बढ़ाने वाले हैं।

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चरित्र – चित्रण

शकुन्तला

परिचय- शकुन्तला  ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ नाटक की मुग्धा नायिका है। वह महर्षि विश्वामित्र और अप्सरा मेनका की पुत्री है। उसका लालन-पालन महर्षि कण्व ने पुत्रीवत् किया है। शकुन्तला भी उनको अपना पिता ही मानती है। उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं|

(1) प्रकृति प्रेमिका- शकुन्तला प्रकृति की गोद में पली है; अतः उसके हृदय में सभी चेतन-अचेतन के लिए प्रेम का अथाह सागर तरंगायित होता है। हरिणशावक को वह अपने शिशु-सदृश मानती है। वृक्षों एवं लताओं के प्रति भी उसका अनुराग उसी प्रकार का है। पशु-पक्षी, लता, पत्ते सभी उसके सगे-सम्बन्धी हैं। उसके इसी प्रकृति-प्रेम के विषय में महर्षि कण्व के उसे कथन से पर्याप्त प्रकाश पड़ता है, जिसमें वे वनवृक्षों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि जो तुमको सींचे बिना पहले जल नहीं पीती थी, जो अलंकारप्रिय होने पर भी (UPBoardSolutions.com) स्नेह के कारण तुम्हारे फूल-पत्तों को नहीं तोड़ती थी, जो तुम्हारे पहले-पहल फूलने पर उत्सव मनाती थी, वही शकुन्तला अब अपने पति के घर जा रही है। अपने प्रति शकुन्तला के स्नेह को देखकर मानो वृक्षों और लताओं को भी उससे प्रेम हो गया है, इसीलिए तो उसके पतिगृह-गमन के समय लताएँ अपने पीले पत्तों के रूप में आँसू गिराती हुई विलाप कर रही हैं।

(2) दयालु और परोपकारिणी- प्रकृति के प्रति तो शकुन्तला को अपार स्नेह है ही, वन्य जीव-जन्तुओं के प्रति भी उसके मन में दया और प्रेम का अथाह सागर हिलोरें लेता है। यही कारण है। कि वह सभी जीवों पर परोपकार करती रहती है। घायलावस्था में उपचार किया गया और बाद में पुत्रवत् पाला गया मृगशावक उसके इसी स्नेह से अभिभूत होकर पतिगृह जाते समय उसका मार्ग रोकता है। उसकी इसी दयालु और परोपकारिणी प्रवृत्ति से प्रभावित होकर सभी जीव भी उसको अत्यधिक स्नेह करते हैं। यही कारण है कि उसके पतिगृह-गमने का समाचार सुनकर हरिणी ने कुशग्रास को उगल दिया है और मयूरों ने नाचना छोड़ दिया है।

(3) सच्ची सखी- शकुन्तला एक सच्ची सखी के रूप में यहाँ चित्रित की गयी है। वह अपनी सखियों प्रियंवदा एवं अनसूया से अगाध प्रेम रखती है। पतिगृह-गमन के समय प्रियंवृदा, अनसूया एवं नवमालिका के छूट जाने का उसे अत्यधिक दुःख है।

(4) सरल स्वभाव वाली- शकुन्तला का स्वभाव सरल है। शकुन्तला की सरलता के सम्बन्ध में रवीन्द्रनाथ टैगोर का कथन है कि “शकुन्तला की सरलता अपराध में, दुःख में, धैर्य में और क्षमा में परिपक्व है, गम्भीर है और स्थायी है।” ज्योत्स्ना लता से चेतन प्राणियों की तरह बाँहों में भरकर मिलना, फिर (UPBoardSolutions.com) नवमालिका लता को धरोहर के रूप में अपनी सखियों प्रियंवदा और अनसूया को सौंपना उसके सरल स्वभाव को प्रमाणित करते हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि प्रस्तुत नाट्यांश में शकुन्तलाको भावुक, परोपकारिणी, दयालु और प्रकृति-संरक्षिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

महर्षि कण्व 

“परिचय–महर्षि कण्व भी कालिदासकृत ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ नाटक के प्रमुख पात्र हैं। शकुन्तला उन्हीं की पालिता पुत्री है। उनकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं

(1) सरल और उदारहृदय- महर्षि कण्व का हृदय महर्षियोचित सरल एवं उदार है। वन-देवताओं एवं वृक्षों से शकुन्तला को पतिगृह-गमन की आज्ञा प्रदान करने के लिए कहना उनके सरल और उदार हृदय होने का प्रमाण ही है।

(2) मानव-भावों के पारखी– महर्षि कण्व यद्यपि ऋषि हैं, तथापि वे सामान्यजनों के भावों को परखने की विद्या में निपुण हैं। तभी तो वे वनज्योत्स्ना से लिपटती हुई भावुक शकुन्तला से कहते हैं कि मैं इस पर तुम्हारे सहोदर प्रेम को भली प्रकार जानता हूँ।।

(3) मानवोचित गुणों से सम्पन्न- दैवी सम्पत्ति से सम्पन्न महर्षि भी तो मानव ही हैं, उन्हें भी पिता का कोमल हृदय मिला है। इसीलिए वे शकुन्तला के विदा होते समय करुणा से आप्लावित हो जाते हैं। मुनि को हृदय शकुन्तला के भावी गमनमात्र की चिन्ता से भर जाता है। दूसरों को धीरज बँधाने (UPBoardSolutions.com) वाले गम्भीर मुनि स्वयं कह उठते हैं-‘यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया’ और वे दु:खभरी लम्बी साँस लेकर अन्तत: उसे आशीर्वाद देते हुए कहते हैं–‘गच्छ शिवास्ते पन्थानः सन्तु।’

(4) लोकाचार के ज्ञाता- यद्यपि कण्व ऋषि हैं, तथापि वे गृहस्थों के लोकाचार को भली-भाँति समझते हैं। इस सन्दर्भ में वे स्वयं शकुन्तला से कहते हैं-“वत्से! इस समय तुम्हें शिक्षा देनी है। वनवासी होते हुए भी हम लोकाचार समझते हैं। इसी लोकाचार का पालन करते हुए वे शकुन्तला को शिक्षा देते हैं-“तुम पतिकुल में पहुँचकर गुरुजनों की सेवा करना, उनकी सपनियों के साथ प्रिय सखी के सदृश व्यवहार करना। यदि स्वामी अपमान भी कर दें तो भी क्रोध से उनके विरुद्ध आचरण न करना। दास-दासी आदि सेवकजनों से उदारता का व्यवहार करना। भाग्य के अनुकूल होने पर भी कभी अभिमान न करना। इस प्रकार का आचरण करने वाली युवतियाँ गृहिणी पद को प्राप्त कर लेती हैं। इसके विपरीत चलने वाली तो कुल के लिए विपत्ति हैं।”

(5) श्रेष्ठ पिता- जब शकुन्तला चली जाती है, तब महर्षि कण्व शान्ति की साँस लेते हैं और अपने को परम शान्त एवं भारमुक्त पाते हैं। वे जानते हैं कि कन्या-धन परकीय धन होता है। वह पिता के पास एक धरोहर के रूप में रहता है और वह तब तक उस भार से मुक्त नहीं होता, जब तक वह (UPBoardSolutions.com) उसे धनी के पास लौटा नहीं देता। आज महर्षि कण्व भी अपनी पुत्री को उसके परिगृहीता के पास भेजकर विशदान्तरात्म होकर प्रसन्नता का अनुभव कर रहे हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि महर्षि कण्व समस्त श्रेष्ठ गुणों से ओत-प्रोत हैं। उनका चरित्र-चित्रण सामान्य मानव एवं महर्षियोचित गुणों का उत्कृष्ट संगम है।

लघु-उत्तरीय संस्कृत प्रश्‍नोत्तर

अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखिए

प्रश्‍न 1
शकुन्तला का आसीत्?
उत्तर
शकुन्तला कण्वस्य औरसपुत्री आसीत्। .

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प्रश्‍न 2
गृहिणः कथं पीड्यन्ते?
उत्तर
गृहिणः तनयाविश्लेषदुःखैर्नवैः पीड्यन्ते।

प्रश्‍न 3
शकुन्तलायाः उत्सवः कदा भवति?
उत्तर
वृक्षाणां कुसुमप्रसूतिसमये शकुन्तलायाः उत्सवः भवति।

प्रश्‍न 4
प्रियंवदा का आसीत्?
उत्तर
प्रियंवदा शकुन्तलायाः सखी आसीत्।

प्रश्‍न 5
कीदृशः युवतयः गृहिणीपदं यान्ति
उत्तर
याः युवतयः गुरुन् शुश्रूषन्ति, सपत्नीजने प्रियसखीवृत्तिं कुर्वन्ति, पतिं प्रति क्रोधं न कुर्वन्ति, ता: गृहिणीपदं यान्ति।

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प्रश्‍न 6
कन्या कीदृशः अर्थः अस्ति?
उत्तर
कन्या परकीया अर्थः अस्ति।

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