UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 7 नौका विहार / परिवर्तन / बापू के प्रति

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 7
Chapter Name नौका विहार / परिवर्तन / बापू के प्रति
Number of Questions Solved 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 7 नौका विहार / परिवर्तन / बापू के प्रति

नौका विहार / परिवर्तन / बापू के प्रति – जीवन/साहित्यिक परिचय

(2018, 17, 16, 15, 14, 13, 11, 10)

प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार कवियों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। जिनमें से एक का उत्तर देना होता है। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ
सुकुमार भावनाओं के कवि सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म हिमालय के सुरम्य प्रदेश कुर्माचल (कुमाऊँ) के कौसानी नामक ग्राम में 20 मई, 1900 को हुआ था। हाईस्कूल में अध्ययन के लिए वे अल्मोड़ा के राजकीय हाईस्कूल में प्रविष्ट हुए। यहीं पर उन्होंने अपना नाम गुसाईं दत्त से बदलकर सुमित्रानन्दन पन्त रखा। इलाहाबाद के म्योर सेण्ट्रल कॉलेज में प्रवेश लेने के बाद गाँधीजी के आह्वान पर उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया। फिर स्वाध्याय से ही अंग्रेजी, संस्कृत और बांग्ला साहित्य का गहन अध्ययन किया।

उपनिषद्, दर्शन तथा आध्यात्मिक साहित्य की ओर उनकी रुचि प्रारम्भ से ही थी। इलाहाबाद (प्रयाग) वापस आकर ‘रुपाभा’ पत्रिका का प्रकाशन करने लगे। बीच में प्रसिद्ध नर्तक उदयशंकर के सम्पर्क में आए और फिर उनका परिचय अरविन्द घोष से हुआ। इनके दर्शन से प्रभावित पन्त जी ने अनेक काव्य संकलन स्वर्ण किरण, स्वर्ण धूलि, उत्तरा आदि प्रकाशित किए। वर्ष 1961 में उन्हें पद्मभूषण सम्मान, ‘कला एवं बूढ़ा चाँद’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार, ‘लोकायतन’ पर सोवियत भूमि पुरस्कार तथा ‘चिदम्बरा’ पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। 28 दिसम्बर, 1977 को प्रकृति के सुकुमार कवि पन्त जी प्रकृति की गोद में ही विलीन हो गए।

साहित्यिक गतिविधियाँ
छायावादी युग के प्रतिनिधि कवि सुमित्रानन्दन पन्त ने सात वर्ष की आयु में ही कविता लेखन करना प्रारम्भ कर दिया था। उनकी प्रथम रचना वर्ष 1916 में आई, उसके बाद वर्ष 1919 में उनकी काव्य के प्रति रुचि और बढ़ गई। पन्त जी के काव्य में कोमल एवं मृदुल भावों की अभिव्यक्ति होने के कारण इन्हें प्रकृति का सुकुमार कवि’ कहा जाता है। इनकी निम्नलिखित रचनाएँ उल्लेखनीय हैं।

कृतियाँ
काव्य रचनाएँ यीणा (1919), ग्रन्थि (1920), पल्लव (1926), गुंजन (1932), युगान्त (1987), युगवाणी (1938), ग्राम्या (1940), स्वर्ण-किरण (1947), युगान्तर (1948), उत्तरा (1949), चिदम्बरा (1958), कला और बूढ़ा चाँद (1959), लोकायतन आदि।
गीति-नाट्य ज्योत्स्ना, रजत शिखर, अतिमा (1955)
उपन्यास हार (1960)
कहानी संग्रह पाँच कहानियाँ (1938)

काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष

  1. सौन्दर्य के कवि सौन्दर्य के उपासक पन्त की सौन्दर्यानुभूति के तीन मुख्य केन्द्र प्रकृति, नारी एवं कला हैं। उनका सौन्दर्य प्रेमी मन प्रकृति को देखकर विभोर हो उठता है। वीणा, ग्रन्थि, पल्लव आदि प्रारम्भिक कृतियों में प्रकृति का कोमल रूप परिलक्षित हुआ है। आगे चलकर ‘गुंजन’ आदि काव्य रचनाओं में कवियर पन्त का प्रकृति-प्रेम मांसल बन जाती है और नारी सौन्दर्य का चित्रण करने लगता हैं। ‘पल्लव’, एवं ‘गुंजन’ में प्रकृति और नारी मिलकर एक हो गए हैं।
  2. कल्पना के विविध रूप व्यक्तिवादी कलाकार के समान अन्तर्मुखी बनकर अपनी कल्पना को असीम गगन में खुलकर विचरण करने देते हैं।
  3. रस चित्रण पन्त जी का प्रिय रस गार है, परन्तु उनके काव्य में शान्त, अद्भुत, करुण, रौद्र आदि रसों का भी सुन्दर परिपाक हुआ है।

कला पक्ष

  1. भाषा पन्त जी की भाषा चित्रात्मक है। साथ ही उसमें संगीतात्मकता के गुण भी विद्यमान हैं। उन्होंने कविता की भाषा एवं भावों में पूर्ण सामंजस्य पर बल दिया है। उनकी प्रकृति सम्बन्धी कविताओं में चित्रात्मकता अपनी चरम सीमा पर दिखाई देती है।कोमलकान्त पदावली से युक्त सहज खड़ी बोली में पद-लालित्य का गुण विद्यमान है। उन्होंने अनेक नए शब्दों का निर्माण भी किया; जैसे-टलमल, रलमल आदि। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ एवं परिमार्जित है, जिसमें एक सहज प्रवाह एवं अलंकृति देखने को मिलती है।
  2. शैली पन्त जी की शैली में छायावादी काव्य शैली की समस्त विशेषताएँ: जैसे—लाक्षणिकता, प्रतीकात्मकता, ध्वन्यात्मकता, चित्रात्मकता, सजीव एवं मनोरम बिम्ब-विधान आदि पर्याप्त रूप से विद्यमान हैं।
  3. छन्द एवं अलंकार पन्त जी ने नवीन छन्दों का प्रयोग किया। मुक छन्दों का विरोध किया, क्योंकि वे उसकी अपेक्षा तुकान्त छन्दों को अधिक सक्षम मानते थे। उन्होंने छन्द के बन्धनों का विरोध किया। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अन्योक्ति जैसे अलंकार उन्हें विशेष प्रिय थे। वे उपमाओं की लड़ी बाँधने में अत्यन्त सक्षम थे। उन्होंने मानवीकरण एवं ध्वन्यर्थ-व्यंजना जैसे पाश्चात्य अलंकारों के भी प्रयोग किए।

हिन्दी साहित्य में स्थान
सुमित्रानन्दन पन्त के काव्य में कल्पना एवं भावों की सुकुमार कोमलता के दर्शन होते हैं। पन्त जी सौन्दर्य के उपासक थे। वे युगद्रष्टा व युगस्रष्टा दोनों हीं थे। वे असाधारण प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार थे। छायावाद के युग प्रवर्तक कवि के रूप में उनकी सेवाओं को सदा याद किया जाता रहेगा।

पद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्य भाग से दो पद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे।

नौका विहार

प्रश्न 1.
शान्त, स्निग्ध ज्योत्स्ना उज्ज्वल!
अपलक अनन्त नीरव भूतल!
सैकत शय्या पर दुग्ध धवल, तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म विरल,
लेटी है श्रान्त, क्लान्त, निश्चल!
तापस-बाला गंगा निर्मल, शशिमुख से दीपित मृदु करतल,
लहरें उर पर कोमल कुन्तल!
गोरे अंगों पर सिहर-सिहर, लहराता तार-तरल सुन्दर
चंचल अंचल-सा नीलाम्बर!
साड़ी की सिकुड़न-सी जिस पर, शशि की रेशमी विभा से भर
सिमटी हैं वर्तुल, मृदुल लहर!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश किस कविता से उद्धत है तथा इसके कवि कौन हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत पशि ‘नौका विहार’ कविता से उदधत है तथा इसके कवि प्रकृति के सुकुमार कवि ‘सुमित्रानन्दन पन्त’ हैं।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने किसका उल्लेख किया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने चाँदनी रात में किए गए भौका विहार का चित्रण किया है। इसमें कवि ने गंगा की कल्पना का उल्लेख नायिका के रूप में किया है।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने अपने आसपास कैसे वातावरण का वर्णन किया हैं?
उत्तर:
कवि के अनुसार चारों ओर शान्त, तरल एवं उज्वल चाँदनी छिटकी हुई है। आकाश टकटकी बोधे पृथ्वी को देख रहा है। पृथ्वी अत्यधिक शान्त एवं शब्दरहित है। ऐसे मनोहर एवं शान्त वातावरण में क्षीण धार वाली गंगा बालू के बीच मन्द-मन्द बह रही है।

(iv) गंगा बालू के बीच बहती हुई कैसी प्रतीत हो रही हैं?
उत्तर:
गंगा बालू के बीच बहती हुई ऐसी प्रतीत हो रही है, मानो कोई छरहरे, दुबले-पतले शरीर वाली सुन्दर युवती दूध जैसी सफेद शय्या पर गर्मी से व्याकुल होकर थकी, मुरझाई एवं शान्त लेटी हुई हो।

(v) ‘नीलाम्बर’ का समास-विग्रह करते हुए भेद बताएँ।
उत्तर:
नीलाम्बर-नीला है जो अम्बर (कर्मधारय समास)।।

प्रश्न 2.
जब पहुँची चपला बीच धार
छिप गया चाँदनी का कगार!
दो बाँहों से दूरस्थ तीर धारा का कृश कोमल शरीर
आलिंगन करने को अधीर!
अति दूर, क्षितिज पर विटप-माल लगती भू-रेखा-सी अराल,
अपलक नभ, नील-नयन विशाल,
माँ के उर पर शिशु-सा, समीप, सोया धारा में एक द्वीप,
उर्मिल प्रवाह को कर प्रतीप,
वह कौन विहग? क्या विकल कोक, उड़ता हरने निज विरह शोक?
छाया को कोकी का विलोक!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने प्राकृतिक दृश्यों का चित्र किस प्रकार किया हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने नौका-विहार करते हुए दोनों तटों के प्राकृतिक दृश्यों एवं द्वीप और समुद्र का अपनी सूक्ष्म कल्पनाओं द्वारा वर्णन किया है। साथ-ही-साथ गंगा नदी के सौन्दर्य को अति रंजित करने का प्रयास किया है।

(ii) नौका-विहार के समय कवि को दूर से दिखने वाले तट कैसे प्रतीत हो रहे हैं?
उत्तर:
जब कवि की नाव गंगा के मध्य धार में पहुँचती है, तो वहाँ से चन्द्रमा की चाँदनी में चमकते हुए रेतीले तट स्पष्ट दिखाई नहीं देते हैं। कवि को दूर से दिखते दोनों किनारे ऐसे प्रतीत हो रहे हैं जैसे वे व्याकुल होकर गंगा की धारासपी नायिका के पतले कोमल शरीर का आलिंगन करना चाहते हों।

(iii) कवि को वृक्षों को देखकर कैसा प्रतीत हुआ?
उत्तर:
कवि को दूर क्षितिज पर कतारबद्ध वृक्षों को देख ऐसा लग रहा है, मानो वे नीले आकाश के विशाल नेत्रों की तिरछी भौहें हैं और धरती को एकटक निहार रही हैं।

(iv) गंगा नदी के ऊपर पक्षी को उड़ता देख कवि ने क्या कल्पना की?
उत्तर:
गंगा नदी के ऊपर एक पक्षी को उड़ते देख कवि ने कल्पना की कि कहीं यह चकवा तो नहीं है, जो भ्रमवश जल में अपनी ही छाया को चकमी समझ उसे पाने की चाह लिए विरह-वेदना को मिटाने हेतु व्याकुल होकर आकाश में उड़ता जा रहा है।

(v) ‘नयन’ का सन्धि-विच्छेद करते हुए भेद बताइए।
उत्तर:
नयन–ने + अन (अयादि सन्धि)।।

परिवर्तन

प्रश्न 3.
कहाँ आज वह पूर्ण पुरातन, वह सुवर्ण का काल?
भूतियों का दिगन्त छवि जाल, ज्योति चुम्बित जगती का भाल?
राशि-राशि विकसित वसुधा का वह यौवन-विस्तार?
स्वर्ग की सुषमा जब साभार। धरा पर करती थी अभिसार!
प्रसूनों के शाश्वत श्रृंगार, (स्वर्ण भूगों के गन्ध विहार)
गूंज उठते थे बारम्बार सृष्टि के प्रथमोद्गार।
नग्न सुन्दरता थी सुकुमार ऋद्धि औं सिद्धि अपार।
अये, विश्व का स्वर्ण स्वप्न, संसृति का प्रथम प्रभात,
कहाँ वह सत्य, वेद विख्यात?
दुरित, दुःख दैन्य न थे जब ज्ञात,
अपरिचित जरा-मरण भू-पात।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के शीर्षक तथा कवि का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश ‘परिवर्तन’ नामक कविता से उदधृत है तथा इसके रचयिता प्रकृति के सुकुमार कवि ‘सुमित्रानन्दन पन्त’ जी हैं।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि ने किस ओर संकेत किया हैं?
उत्तर:
कवि ने भारतवर्ष के वैभवपूर्ण और समृद्ध अतीत का उल्लेख करते हुए समय के साथ-साथ देश की भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों में होने वाले परिवर्तनों की ओर संकेत किया है।

(iii) कवि ने अतीत के वैभवपूर्ण व समृद्धशाली भारत की तुलना वर्तमान से किस प्रकार की हैं।
उत्तर:
कवि के अनुसार आज हमारी समृद्धि और ऐश्वर्य विलुप्त हो चुके हैं, जो हमारे स्वर्णिम अतीत की पहचान थी। कभी हमारा देश सोने की चिड़िया कहलाता था, आज वह स्वर्ण युग विलुप्त सा हो गया है। इस प्रकार हमारे देश से ज्ञान, हरियाली इत्यादि भी समय-समय पर कम होती जा रही हैं।

(iv) कवि ने स्वर्णिम भारत का चित्रण किस रूप में किया है?
उत्तर:
स्वर्णिम भारत में धरती के चारों और छाया हुआ सौन्दर्य उन्मुक्त और सुकुमार था। धरती अपूर्व वैभव और सुख-समृद्धि से पूर्ण थी। सचमुच वह वैभवशाली युग विश्व के स्वर्णिम स्वप्न का युग था। वह युग सृष्टि के प्रथम प्रभाव के समान आशा, उल्लास, सौन्दर्य व जीवन से परिपूर्ण था।

(v) “विश्व का स्वर्ण स्वप्न संसृति का प्रथम प्रभात” पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
इस पंक्ति में ‘स’ और ‘प्र’ वर्ण की आवृत्ति होने के कारण अनुप्रास अलंकार है।

प्रश्न 4.
आज बचपन का कोमल गात। जरा का पीला पात।
चार दिन सुखद चाँदनी रात और फिर अन्धकार, अज्ञात!
शिशिर-सा झर नयनों का नीर झुलस देता गालों के फूल!
प्रणय का चुम्बन छोड़ अधीर अधर जाते अधरों को भूल!
मृदुल होठों का हिमजल हास उड़ा जाता नि:श्वास समीर;
सरल भौंहों का शरदाकाश घेर लेते घन, घिर गम्भीर।
शून्य साँसों का विधुर वियोग छुड़ाता अधर मधुर संयोग!
मिलन के पल केवल दो चार, विरह के कल्प अपार!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवि द्वारा परिवर्तनशीलता को किस प्रकार स्पष्ट किया गया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि द्वारा विविध उदाहरणों के माध्यम से समय की परिवर्तनशीलता को स्पष्ट करते हुए उसकी शक्ति के प्रभाव को समझाने का प्रयास किया गया है।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में प्रेमी-प्रेमिका के माध्यम से दुःख के समय का वर्णन किस प्रकार किया गया है?
उत्तर:
समय की परिवर्तनशीलता को स्पष्ट करते हुए कवि ने आँख से गिरते हुए आँसू की समानता पतझड़ के पीले पत्तों से की है। दुःख के क्षणों में गिरते रहने वाले आँसू, पुष्पों के समान गालों को इस प्रकार झुलसा देते हैं जैसे शिशिर की ओस फूल एवं पत्तों को झुलसा देती है। उस समय प्रेमी के अधर प्रणय के चुम्बनों को भूलकर अपने प्रिय के अधरों को भी भूल जाता है।

(iii) पद्यांश में कवि ने समय की परिवर्तनशीलता को स्पष्ट करने के लिए युवावस्था और वृद्धावस्था के समय का उल्लेख किस रूप में किया है?
उत्तर:
कवि के अनुसार युवावस्था में जिन होंठों पर हमेशा ओस कणों-सी निर्मल और आकर्षण हँसी विद्यमान रहती है, वृद्धावस्था में वही होंठ गहरी साँसों को छोड़ने से मलिन पड़ जाते हैं और उनकी हँसी गायब हों। जाती है।

(iv) “मिलन का समय अल्प, जबकि वियोग का दीर्घ होता है-स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में स्पष्ट है कि मिलन के सुखद समय में प्रेमी-प्रेमिका के जो होंठ आपस में जुड़े होते हैं, वियोग के विकट समय में वही होंठ विरह-वेदना से व्याकुल हो उठते हैं। इस प्रकार मिलन का समय तो अल्प होता है, परन्तु वियोग दीर्घकालीन होता है अर्थात् सुख कुछ समय साथ रहकर चला जाता है, जबकि दुःख का प्रभाव देर तक बना रहता है।

(v) ‘समीर’ के चार पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर:
पवन, हवा, अनिल और वायु ‘समीर’ के पर्यायवाची हैं।

प्रश्न 5.
खोलता इधर जन्म लोचन मूदती उधर मृत्यु क्षण-क्षण
अभी उत्सव औ हास हुलास अभी अवसाद, अश्रु, उच्छ्वास!
अचरिता देख जगत् की आप शून्य भरता समीर नि:श्वास,
डालता पातों पर चुपचाप ओस के आँसू नीलाकाश,
सिसक उठता समुद्र का मन, सिहर उठते उहुगन!
अहे निष्ठुर परिवर्तन! तुम्हारा ही ताण्डव नर्तन
विश्व का करुण विवर्तन! तुम्हारा ही नयनोन्मीलन,
निखिल उत्थान, पतन! अहे वासुकि सहस्रफन!
लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे चिह्न निरन्तर
छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षःस्थल पर!
शत शत फेनोच्छ्वसित, स्फीत फूत्कार भयंकर
घुमा रहे हैं घनाकार जगती को अम्बर
मृत्यु तुम्हारा गरल दन्त, कंचुक कल्पान्तर
अखिल विश्व ही विवर, वक्र-कुण्डल दिमण्डल।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश द्वारा कवि ने संसार की परिवर्तनशीलता को किस प्रकार स्पष्ट किया है?
उत्तर:
कवि संसार की परिवर्तनशीलता को स्पष्ट करते हुए कहता है कि इस मृत्युलोक में जन्म-मरण का चक्र सदा चलता ही रहता है।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में परिवर्तन को किसके समान बताया गया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में परिवर्तन को विनाशक तथा सप के राजा वासुकि के समान बताया गया है, क्योंकि इन सर्यों के विष के झागों से भरी हुई और सारे विश्व को अपनी लपेट में ले लेने वाली सैकड़ों भयंकर फैंकारें इस संसार के मेघों के आकार से परिपूर्ण आकार को निरन्तर घुमाती रहती हैं।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश में एक और सुख का वर्णन है तो दूसरी ओर दुःख का। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि ने सुख के क्षण का वर्णन मानव धरती पर जन्म लेने से किया है, तो दुःख का वर्णन मृत्यु को प्राप्त होने वाले कितने ही लोगों द्वारा आँख मूंद लेने से किया है। इस प्रकार एक ओर जन्म पर हर्षोल्लास का उत्सव है तो वहीं दूसरी ओर मृत्यु के शोक में आँसू बहाए जाते हैं।

(iv) अचरिता देख जगत् की आप’, ‘शून्य भरता समीर निःश्वास” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति से आशय यह है कि जैसे संसार की क्षणिकता देख पवन दु:खी होकर आहे भरने लगी हैं तथा नीले आकाश से भी यह सब नहीं देखा जाता और वह व्यथित होकर अनुरूप में पेड़ की शाखा पर ओस की बूंदें टपकाने लगा है।

(v) “शत-शत फेनोवसित, स्फीत फूत्कार भयंकर’ में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति में ‘शत’ शब्द की पुनरावृत्ति होने के कारण यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।

बापू के प्रति

प्रश्न 1.
तुम मांसहीन, तुम रक्तहीन           हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीन,
तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल          हे चिर पुराण! हे चिर नवीन!
तुम पूर्ण इकाई जीवन की,           जिसमें असार भव-शून्य लीन,
आधार अमर, होगी जिस पर        भावी की संस्कृति समासीन।।
तुम मांस, तुम्हीं हो रक्त-अस्थि      निर्मित जिनसे नवयुग का तन,
तुम धन्य! तुम्हारा नि:स्व त्याग        हे विश्व भोग का वर साधन;
इस भस्म-काम तन की रज से,        जग पूर्ण काम नव जगजीवन,
बीनेगा सत्य-अहिंसा के                  ताने-बानों से मानवपन!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश किस कविता से अवतरित है तथा इसके रचयिता कौन हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश ‘बापू के प्रति’ नामक कविता से अवतरित है तथा इसके रचयिता प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त’ जी हैं।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के आदर्शों को भारतीय संस्कृति का वाहक बताया हैं तथा कवि ने गाँधी जी को सत्य और अहिंसा की प्रतिमूर्ति मानकर उनके बताए गए आदर्शों पर चलने की कामना व्यक्त की है।

(iii) कवि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को नमन करते हुए क्या कह रहे हैं?
उत्तर:
कवि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को नमन करते हुए कहते हैं कि हे महात्मन! तुम्हारे शरीर में मांस और रक्त का अभाव है। तुम हड्डियों का ढाँचा मात्र हो। तुम्हें देख ऐसा आभास होता है कि तुम पवित्रता एवं उत्तम ज्ञान से परिपूर्ण केवल आत्मा हो। हे प्राचीन संस्कृतियों के पोषक! तुम्हारे विचारों में प्राचीन व नवीन दोनों आदर्शों का सार विद्यमान है।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने राष्ट्रपिता को नवयुग के रूप में किस प्रकार प्रस्तुत किया हैं?
उत्तर:
कवि राष्ट्रपिता को नवयुग के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि हे बापू! तुम नवयुग के आदर्श हो, जिस प्रकार शरीर के निर्माण में मांस, रक्त और अरिथ की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, उसी प्रकार नवयुग के निर्माण में तुम्हारे सआदशों की अमूल्य योगदान है।।

(v) ‘तन’ शब्द के चार पर्याय लिखिए।
उत्तर::
देह, अंग, काया, गात तन के पर्यायवाची शब्द हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 10 पञ्चशील-सिद्धान्ताः

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Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 10
Chapter Name पञ्चशील-सिद्धान्ताः
Number of Questions Solved 6
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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 10 पञ्चशील-सिद्धान्ताः

गद्यांशों का सन्दर्भ-सहित हिन्दी अनुवाद

गद्यांश 1
पञ्चशीलमिति शिष्टाचारविषयकाः सिद्धान्ताः। महात्मा गौतमबुद्धः एतान् पञ्चापि सिद्धान्तान् पञ्चशीलमिति नाम्ना स्वशिष्यान् शास्ति स्म। अत एवायं शब्दः अधुनापि तथैव स्वीकृतः। इमे सिद्धान्ताः क्रमेण एवं सन्ति-

  1. अहिंसा
  2. सत्यम्
  3. अस्तेयम्
  4. अप्रमादः
  5. ब्रह्मचर्यम् इति।।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘पञ्चशील-सिद्धान्ताः’ नामक पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद पंचशील शिष्टाचार से सम्बन्धित सिद्धान्त है। महात्मा गौतम बुद्ध पंचशील नामक इन पाँचों सिद्धान्तों का अपने शिष्यों को उपदेश देते थे, इसलिए यह शब्द आज भी उसी रूप में स्वीकारा गया है। ये सिद्धान्त क्रमशः इस प्रकार हैं-

  1. अहिंसा
  2. सत्य
  3. चोरी न करना
  4. प्रमाद न करना
  5. ब्रह्मचर्य

गद्यांश 2
बौद्धयुगे इमे सिद्धान्ताः वैयक्तिकजीवनस्य अभ्युत्थानाय प्रयुक्ता आसन्। परमद्य इमे सिद्धान्ताः राष्ट्राणां परस्परमैत्रीसहयोगकारणानि, विश्वबन्धुत्वस्य, विश्वशान्तेश्च साधनानि सन्ति। राष्ट्रनायकस्य श्रीजवाहरलालनेहरूमहोदयस्य प्रधानमन्त्रित्वकाले चीनदेशेन सह भारतस्य मैत्री पञ्चशीलसिद्धान्तानधिकृत्यु एवाभवत्। यतो हि उभावपि देशौ बौद्धधमें निष्ठावन्तौ। आधुनिके जगति पञ्चशीलसिद्धान्ताः नवीनं राजनैतिकं स्वरूपं गृहीतवन्तः। एवं च व्यवस्थिताः (2017, 14, 11, 10)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद बौद्धकाल में ये सिद्धान्त व्यक्तिगत जीवन के उत्थान के लिए प्रयुक्त किए जाते थे, किन्तु आज ये सिद्धान्त राष्ट्रों की परस्पर मैत्री एवं सहयोग के कारण तथा विश्वबन्धुत्व एवं विश्वशान्ति के साधन हैं। राष्ट्र के नायक श्री जवाहरलाल नेहरू महोदय के प्रधानमन्त्रित्व काल में पंचशील के सिद्धान्तों को स्वीकार करके ही चीन देश के साथ भारत की मित्रता हुई थी, क्योंकि दोनों ही राष्ट्र बौद्ध धर्म में निष्ठा रखने वाले हैं। आधुनिक जगत् में पंचशील के सिद्धान्तों ने नर्थ राजनीतिक स्वरूप धारण कर लिया है तथा वे इस प्रकार निश्चित किए गए हैं।

गद्यांश 3

  1. किमपि राष्ट्र कस्यचनान्यस्य राष्ट्रस्य आन्तरिकेषु विषयेषु कीदृशमपि व्याघातं न करिष्यति।।
  2. प्रत्येकराष्ट्र परस्परं प्रभुसत्तां प्रादेशिकीमखण्डताञ्च सम्मानयिष्यति।
  3. प्रत्येकराष्ट्र पुरस्परं समानतां व्यवहरिष्यति।।
  4. किमपि राष्ट्रमपरेण नाक्र्स्यते।
  5. सर्वाण्यपि राष्ट्राणि मिथ: स्वां स्वां प्रभुसत्तां शान्त्या रक्षिष्यन्ति। विश्वस्य यानि राष्ट्राणि शान्तिमिच्छन्ति तानि इमान् नियमानङ्गीकृत्य परराष्ट्रस्सार्द्ध स्वमैत्रीभावं दृढ़ीकुर्वन्ति।

सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद

  1. कोई भी राष्ट्र किसी दूसरे राष्ट्र के आन्तरिक विषयों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगा।
  2. प्रत्येक राष्ट्र परस्पर प्रभुसत्ता तथा प्रादेशिक अखण्डता का सम्मान करेगा।
  3. प्रत्येक राष्ट्र परस्पर समानता का व्यवहार करेगा।
  4. कोई भी राष्ट्र दूसरे (राष्ट्र) से आक्रान्त नहीं होगा।
  5. सभी राष्ट्र अपनी-अपनी प्रभुसत्ता की शान्तिपूर्वक रक्षा करेंगे। विश्व के जो भी राष्ट्र शान्ति की इच्छा रखते हैं, वे इन नियमों को अंगीकार (स्वीकार करके दूसरे राष्ट्रों के साथ अपने मैत्री-भाव को दृढ़ करते हैं।

प्रश्न – उत्तर

प्रश्न-पत्र में संस्कृत दिग्दर्शिका के पाठों (गद्य व पद्य) से चार अतिलघु उत्तरीय प्रश्न दिए जाएंगे, जिनमें से किन्हीं दो के उत्तर संस्कृत में लिखने होंगे, प्रत्येक प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित है।

प्रश्न 1.
गौतमबुद्धः कान् सिद्धान्तान् अशिक्षयत्? (2018, 17, 16, 10)
उत्तर:
गौतमबुद्धः पञ्चशीलमिति नाम्नां सिद्धान्तान् स्वशिष्यान शिक्षयत्।।

प्रश्न 2.
महात्मनः गौतमबुद्धस्य पञ्चशीलसिद्धान्ताः के सन्ति? (2011, 10)
अथवा
गौतमबुद्धस्य सिद्धान्ताः के आसन्? (2010)
अथवा
पञ्चशीलसिद्धान्ताः के आसन्? (2011, 10)
उत्तर:
अहिंसा, सत्यम्, अस्तेयम्, अप्रमादः, ब्रह्मचर्यम् इति पञ्चशीलसिद्धान्ताः सन्ति ।।

प्रश्न 3.
क्रमेण के पञ्चशीलसिद्धान्ताः भवन्ति? (2011)
उत्तर:
पञ्चशीलसिद्धान्ताः क्रमेण अहिंसा, सत्यम्, अस्तेयम्, अप्रमादः, ब्रह्मचर्यम् इति भवन्ति।।

प्रश्न 4.
बौद्ध युगे इमे सिद्धान्ताः कस्य हेतोः प्रयुक्ताः आसन्? (2016)
उत्तर:
बौद्ध युगे इमे सिद्धान्ता: वैयक्तिकजीवनस्य अभ्युत्थानाय प्रयुक्ताः आसन्।

प्रश्न 5.
भारत-चीन-देशौ कस्मिन् धर्मे निष्ठावन्तौ? (2017)
उत्तर:
भारत-चीन-देशौ बौद्ध धर्मे निष्ठावन्तौ।।

प्रश्न 6.
पञ्चशीलमिति कीदृशाः सिद्धान्ता सन्ति? (2018, 17)
उत्तर:
पञ्चशीलमिति शिष्टाचार विषयकाः सिद्धान्ता सन्ति।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 9 महामना मालवीय:

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 9
Chapter Name महामना मालवीय:
Number of Questions Solved 7
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 9 महामना मालवीय:

गद्यांशों का सन्दर्भ-सहित हिन्दी अनुवाद

गंद्यांश 1
महामनस्विनः मदनमोहनमालवीयस्य जन्म प्रयागे प्रतिष्ठित-परिवारेऽभवत्। अस्य पिता पण्डितवजनाथमालवीयः संस्कृतस्य सम्मान्यः विद्वान् आसीत्। अयं प्रयागे एव संस्कृतपाठशालायां राजकीयविद्यालये म्योर-सेण्ट्रल महाविद्यालये च शिक्षा प्राप्य अत्रैव राजकीय विद्यालये अध्यापनम् आरब्धवान्। युवक: मालवीयः स्वकीयेन प्रभावपूर्णभाषणेन जनानां मनांसि अमोहयत्। अतः अस्य सुहदः तं । प्राविधाकपदवी प्राप्य देशस्य श्रेष्ठतरां सेवां कर्तुं प्रेरितवन्तः। तद्नुसारम् अयं विधिपरीक्षामुत्तीर्य प्रसागस्थे उच्चन्यायालये प्राविवाककर्म कर्तुमारभत्। विधेः । प्रकृष्टज्ञानेन, मधुरालापेन, उदारव्यवहारेण चायं शीघ्रमेव मित्राणां न्यायाधीशांनाञ्च सम्मानभाजनमभवत्। (2014, 13)
सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘महामना मालवीयः’ नामक पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद महामना मदनमोहन मालवीय का जन्म प्रयाग (इलाहाबाद) के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। इनके पिता पण्डित व्रजनाथ मालवीय संस्कृत के माननीय विद्वान् थे। इन्होंने प्रयाग में ही संस्कृत पाठशाला, राजकीय विद्यालय तथा म्योर-सेण्ट्रल महाविद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर यहीं राजकीय विद्यालय में अध्यापन प्रारम्भ किया। युवा मालवीय ने अपने प्रभावपूर्ण (ओजस्वी) भाषण से लोगों का मन मोह लिया। अतः इनके शुभचिन्तकों ने इन्हें अधिवक्ता (वकील) की पदवी प्राप्त कर राष्ट्र की श्रेष्ठतम (उच्चतम) सेवा करने के लिए प्रेरित किया।

उसी के अनुसार इन्होंने विधि (कानून) की परीक्षा उत्तीर्ण कर प्रयाग रिथत उच्च न्यायालय में वकालत प्रारम्भ कर दी। विधि के उकृष्ट ज्ञान, मृदु वार्तालाप तथा अपने उदार व्यवहार से शीघ्र ही ये मित्रों एवं न्यायाधीशों के सम्मान के पात्र बन गए।

गद्यांश 2
महापुरुषाः लौकिक-प्रलोभनेषु बद्धाः नियतलक्ष्यान्न कदापि अश्यन्ति। देशसेवानुरक्तोऽयं युवा उच्चन्यायालयस्य परिधौ स्थातुं नाशक्नोत्। पण्डितमोतीलाल नेहरू-लालालाजपतरायप्रभृतिभिः अन्यैः राष्ट्रनायकैः सह सोऽपि देशस्य स्वतन्त्रतासङ्ग्रामेऽवतीर्णः। देहल्यां त्रयोविंशतितमे काङ्ग्रेसस्याधिवेशनेऽयम् अध्यक्षपदमलङ्कृतवान्। ‘रॉलेट एक्ट’ इत्याख्यस्य विरोधेऽस्य ओजस्विभाषणं श्रुत्वा आङ्ग्लशासकाः भीताः जाताः। बहुवार कारागारे निक्षिप्तोऽपि अयं वीरः देशसेवाव्रतं नात्यजत्। (2018, 16, 14, 12, 10)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद महापुरुष सांसारिक प्रलोभनों में फंसकर निश्चित लक्ष्य से कदापि विचलित नहीं होते। राष्ट्रसेवा में लीन यह युवक उच्च न्यायालय की सीमा में नहीं बैंध सका। पण्डित मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपतराय जैसे अन्य राष्ट्रनायकों सहित ये भी देश के स्वतन्त्रता संग्राम में कूद पड़े। दिल्ली में कांग्रेस के 23वें अधिवेशन में इन्होंने अध्यक्ष पद को सुशोभित किया। ‘रौलेट एक्ट’ के विरोध में इनके ओजस्वी भाषण को सुनकर अंग्रेज शासक भयभीत हो उठे। कई बार जेल जाने के पश्चात् भी इस वीर ने राष्ट्रसेवा-व्रत का त्याग नहीं किया।

गद्यांश 3
हिन्दी-संस्कृताङ्ग्लभाषासु अस्य समानः अधिकारः आसीत्। हिन्दी-हिन्दुहिन्दुस्थानानामुत्थानाय अयं निरन्तर प्रयत्नामकरोत्। शिक्षयैव देशे समाजे च नवीनः प्रकाशः उदेति अतः श्रीमालवीयः वाराणस्यां काशीविश्वविद्यालयस्य संस्थापनमकरोत्। अस्य निर्माणाय अयं जनान् धनम् अयाचर जनाश्च महत्यस्मिन् शान्यज्ञे प्रभूतं धनमस्मै प्रायच्छन्, तेन निर्मितोऽयं विशालः विश्वविद्यालयः भारतीयानां दानशीलतायाः श्रीमालवीयस्य यशसः च प्रतिमूर्तिरित विभाति। साधारणस्थितिकोऽपि जुनः महतोत्साहेन, मनस्वित्या, पौरुषेण च असाधारणमपि कार्यं कर्तुं क्षमः इत्यदर्शयत् मनीषिमूर्धन्यः मालवीयः। एतदर्थमेव जनास्तं महामनी इत्युपाधिना अभिधातुमारब्धवन्तः। (2017, 14, 13, 11, 10)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद इनका हिन्दी, संस्कृत एवं अंग्रेजी भाषाओं पर समान अधिकार था। इन्होंने हिन्दी, हिन्दू एवं हिन्दुस्तान के उत्थान के लिए निरन्तर प्रयन किया। शिक्षा से ही राष्ट्र तथा समाज में नव-प्रकाश का उदय होता है, इसलिए भी मालवीय जी ने वाराणसी (बनारस) में ‘काशी विश्वविद्यालय की स्थापना की। इसके निर्माण के लिए इन्होंने लोगों से धन माँगा। इस महाज्ञान-यज्ञ में लोगों ने इन्हें पर्याप्त धन दिया।

उससे निर्मित यह विशाल विश्वविद्यालय भारतीयों की दानशीलता तथा श्री मालवीय जी के यश (ख्याति) की प्रतिमूर्ति के रूप में शोभायमान है।

विद्वानों में श्रेष्ठ मालवीय जी ने यह दिखा दिया कि साधारण स्थिति वाला भी महान् उत्साह, विचारशीलता तथा पुरुषार्थ से असाधारण कार्य करने में सक्षम होता है, इसलिए लोगों ने इन्हें ‘महामना’ उपाधि से सम्बोधित करना आरम्भ कर दिया।

गद्यांश 4
महामना विद्वान् वक्ता, धार्मिको नेता, पटुः पत्रकारश्चासीत्। परमस्य सर्वोच्चगुणः जनसेवैव आसीत्। यत्र कुत्रापि अयं जनान् दु:खितान् पीड्यमानांश्चापश्यत् तत्रैव सः शीघ्रमेव उपस्थितः, सर्वविधं साहाय्यञ्च अकरोत्। प्राणिसेवा अस्य स्वभाव एवासीत्।।
अद्यास्माकं मध्येऽनुपस्थितोऽपि महामना मालवीयः स्वयशसोऽमूर्तरूपेण प्रकाश वितरन् अन्धे तमसि निमग्नान् जनान् सन्मार्ग दर्शयन् स्थाने-स्थाने, जने-जने उपस्थित एव।। (2018, 11)
सन्दर्भ पूर्ववत्
अनुवाद महामना विद्वान् वक्ता, धार्मिक नेता एवं कुशल पत्रकार थे, किन्तु जनसेवा ही इनका सर्वोच्च गुण था। ये जहाँ कहीं भी लोगों को दुःखी और पीड़ित देखते, वहाँ शीघ्र उपस्थित होकर सब प्रकार की सहायता करते थे। प्राणियों की सेवा ही इनका स्वभाव था। आज हमारे बीच अनुपस्थित होकर भी महामना मालवीय अमूर्त रूप से अपने यश का प्रकाश बाँटते हुए गहन अन्धकार में पूर्व हुए लोगों को सन्मार्ग दिखाते हुए स्थान-स्थान पर जन-जन में उपस्थित हैं।

श्लोकों का सन्दर्भ-सहित हिन्दी अनुवाद

श्लोक 1
जयन्ति ते महाभागा जुन-सेवा-परायणाः।
जरामृत्युभयं नास्ति येषां कीर्तितनोः क्वचित् ।। (2014, 13, 12, 10)
सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘महामना मालवीयः’ नामक पाठ से उद्धृत हैं।
अनुवाद जन सेवा में परायण (तत्पर) वे व्यक्ति जयशील होते हैं, जिनके यशरूपी शरीर को कहीं भी बुढ़ापे तथा मृत्यु का भय नहीं है।

यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि जो लोग अपना जीवन जनकल्याण के लिए समर्पित कर देते हैं, उनकी कीर्ति मृत्यु के बाद भी जीवित रहती हैं।

प्रश्न – उत्तर

प्रश्न-पत्र में संस्कृत दिग्दर्शिका के पाठों (गद्य व पद्य) में से चार अतिलघु उत्तरीय प्रश्न दिए जाएंगे, जिनमें से किन्हीं दो के उत्तर संस्कृत में लिखने होंगे, प्रत्येक प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

प्रश्न 1.
महामनस्विनः मदनमोहनमालवीयस्य जन्म कुत्र अभवत् ? (2016, 14)
अथवा
मदनमोहनमालवीयस्य जन्म कुत्र अभवत्? (2016)
उत्तर:
मदनमोहनमालवीयस्य जन्म प्रयागनगरे अभवत्।।

प्रश्न 2.
श्रीमालवीयस्य पितुः किं नाम आसीत्? (2013)
अथवा
महामना मालवीयः कस्य पुत्रः आसीत्? (2015)
उत्तर:
श्रीमालवीयस्य पितुः नाम पण्डितव्रजनाथमालवीयः इति आसीत्।।

प्रश्न 3.
मालवीयः कुत्र प्राविवाककर्म कर्तुमारभत्?
उत्तर:
मालवीयः प्रयागस्थे उच्चन्यायालये प्राविवाककर्म कर्तुमार भत्।।

प्रश्न 4.
कासु भाषासु मालवीयमहोदयस्य समानः अधिकारः आसीत् (2017)
उत्तर:
हिन्दी-संस्कृत-आङ्ग्ल-भाषासु मालवीय महोदयस्य समानः अधिकारः आसीत्।

प्रश्न 5.
महामना मालवीयः वाराणसी-नगरे कस्य विश्वविद्यालयस्य संस्थापनमकरोत्? (2018)
अथवा
काशी हिन्दू विश्वविद्यालयस्य संस्थापकः कः आसीत? (2014, 13, 12)
अथवा
श्रीमालवीयः कस्य विश्वविद्यालयस्य स्थापनम् अकरोत्? (2016, 14)
उत्तर:
महामना मालवीयः वाराणसी-नगरे काशी विश्वविद्यालयस्य संस्थापनमकरोत्।।

प्रश्न 6.
शिक्षायाः क्षेत्रे श्रीमालवीयः किमकरोत्? (2014)
उत्तर:
शिक्षायाः कृते श्रीमालवीयः काशीहिन्दूविश्वविद्यालयस्य संस्थापनमकरोत्।

प्रश्न 7.
श्रीमालवीयस्य चरित्रे कः सर्वोच्चगुणः आसीत्? (2011)
उत्तर:
श्रीमालवीयस्य चरित्रे सर्वोच्चगुण: जन-सेवा आसीत्।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 6 बादल-राग / सन्ध्या सुन्दरी

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Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name बादल-राग / सन्ध्या सुन्दरी
Number of Questions Solved 2
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 6 बादल-राग / सन्ध्या सुन्दरी

बादल-राग / सन्ध्या सुन्दरी – जीवन/साहित्यिक परिचय

(2018, 17)

प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार कवियों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। जिनमें से एक का उत्तर: देना होता है। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ
महाकवि निराला का जन्म बंगाल के महिषादल राज्य के मेदिनीपुर जिले में 1899 ई. में हुआ था। माँ द्वारा सूर्य का व्रत रखने तथा निराला के रविवार के दिन जन्म लेने के कारण इनका नाम सूर्यकान्त रखा गया, परन्तु बाद में साहित्य के क्षेत्र में आने के कारण इनका उपनाम ‘निराला’ हो गया।

इनके पिता पण्डित रामसहाय त्रिपाठी उत्तर: प्रदेश के बैसवाड़ा क्षेत्र के जिला उन्नाव के गोला ग्राम के निवासी थे था महिषादल राज्य में रहकर राजकीय सेवा में कार्य कर रहे थे। माता-पिता के असामयिक निधन, फिर पत्नी की अचानक मृत्यु, पुत्री सरोज की अकाल मृत्यु आदि ने निराला के जीवन को करुणा से भर दिया। बेटी की असामयिक मृत्यु की अवसादपूर्ण घटना से व्यथित होकर ही इन्होंने ‘सरोज स्मृति’ नामक कविता लिखी। कबीर का फक्कड़पन एवं निर्भीकता, सूफियों का सादापन, सूर-तुलसी की प्रतिभा और प्रसाद की सौन्दर्य-चेतना का मिश्रित रूप निराला के व्यक्तित्व में झलकता है।

इन्होंने कलकता में अपनी रुचि के अनुरूप रामकृष्ण मिशन के पत्र ‘समन्वय’ का सम्पादन-भार सँभाला। इसके बाद ‘मतवाला’ के सम्पादक मण्डल में भी सम्मिलित हुए। इसके बाद लखनऊ में ‘गंगा पुस्तकमाला’ का सम्पादन तथा ‘सुधा’ पत्रिका के लिए सम्पादकीय भी लिखने लगे। जीवन के उत्तर:ार्द्ध में ये इलाहाबाद चले आए। इनकी आर्थिक स्थिति अत्यन्त विषम हो गई। आर्थिक विपन्नता भोगते हुए 15 अक्टूबर, 1961 को ये चिरनिद्रा में लीन हो गए।

साहित्यिक गतिविधियाँ
छायावाद के प्रमुख स्तम्भों में से एक कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की उपन्यास, कहानी, आलोचना, निबन्ध आदि सभी क्षेत्रों में ही रचनाएँ मिलती हैं, तथापि यह कवि के रूप में अधिक विख्यात हुए।

कृतियाँ
प्रमुख काव्य-ग्रन्थों में अनामिका, परिमल, गीतिका, अणिमा, नए पत्ते, आराधना आदि उल्लेखनीय हैं।
लम्बी कविताएँ तुलसीदास, राम की शक्ति पूजा, सरोज-स्मृति आदि।
गद्य रचनाएँ चतुरी-चमार, बिल्लेसुर बकरिहा, प्रभावती, निरूपमा आदि उल्लेखनीय हैं।

काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष
विद्रोहशील व्यक्तित्व वाले निराला ने जब मन की प्रबल भावनाओं को वाणी दी, तो छन्द के बन्धन सहज ही विच्छिन्न हो गए तथा मुक्त छन्द का आविर्भाव हुआ। इनकी कविताओं में छायावादी, रहस्यवादी और प्रगतिवादी विचारधाओं का भरपूर समावेश हुआ है। इनके काव्य में क्रान्ति की आग एवं पौरुष के दर्शन होते हैं।

  1. मानवतावाद निराला मानवतावाद के घोर समर्थक थे। समाज के हाशिये पर खड़ा समुदाय हमेशा इनकी सहानुभूति का पात्र रहा। समानता एवं बन्धुत्व की भावना इनकी रचनाओं में सर्वत्र बिखरी पड़ी है।
  2. रस योजना निराला जी की कविताओं में श्रृंगार, वीर, रौद्र, करुण आदि रसों का सुन्दर परिपाक हुआ है, लेकिन प्रधानता पौरुष एवं ओज की है। राम की शक्ति पूजा में वीर और रौद्र रस की प्रधानता है तो सरोजस्मृति में कण रस प्रधान हैं।
  3. प्रकृति चित्रण निराला जी का प्रकृति से विशेष अनुराग होने के कारण उनके काव्य में स्थान-स्थान पर प्रकृति के मनोहारी चित्र मिलते हैं; जैसे
    दिवावसान का समय,
    मेघमय आसमान से उतर रही है,
    वह सन्ध्या-सुन्दरी परी-सी
    धीरे-धीरे-धीरे।
  4. रहस्यवाद अद्वैतवादी सिद्धान्त के समर्थक निराला के स्वस्थ चिन्तन में रहस्यवाद प्रस्तुत हुआ है। ये सर्वत्र आभासित होने वाली चेतन सत्ता में विश्वास रखते थे।
  5. नारी चित्रण इनके काव्य में नारी का नित्य नया एवं उदात्त रूप चित्रित हुआ हैं। इन्होंने नारी का उज्वल, सात्विक एवं शक्तिमय रूप प्रस्तुत किया है।
  6. शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति प्रगतिवादी कवि निराला स्वभाव से ही विद्रोही एवं सामाजिक असमानता के घोर विरोधी थे। इनके काव्य में शोषित वर्ग के प्रति अथाह करुणा एवं सहानुभूति थी।

कला पक्ष

  1. भाषा निराला जी की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है। कोमल कल्पना के अनुरूप इनकी भाषा की पदावली भी कोमलकान्त है। भाषा में खड़ी बोली की नीरसता नहीं, बल्कि उसमें संगीत की मधुरिमा विद्यमान है। इन्होंने मुहावरों के प्रयोग द्वारा भाषा को नई व्यंजनाशक्ति प्रदान की है। जहाँ दर्शन, चिन्तन एवं विचार-तत्त्व की प्रधानता हैं, वहीं इनकी भाषा दुरूह भी हो गई है। इन्होंने उर्दू, अंग्रेजी आदि के शब्दों का बेधड़क प्रयोग किया है।
  2. शैली निराला जी एक और कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति में सिद्धहस्त हैं, तो दूसरी ओर कतर एवं प्रचण्ड भावों की व्यंजना में भी। दार्शनिक एवं राष्ट्रीय विचारों की अभिव्यक्ति सरल एवं मुहावरेदार शैली में हुई है। शैली में प्रयोगधर्मिता अनेक जगह दिखती है।।
  3. छन्द योजना अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए निराला जी ने प्रायः मुक्त छन्द का प्रयोग किया। इन्होंने अपनी रचना क्षमता से यह सिद्ध कर दिया कि छन्दों का बन्धन व्यर्थ है। इन्होंने मुक्त छन्द की नूतन परम्परा को स्थापित किया।
  4. अलंकार योजना अलंकारों को काव्य का साधन मानते हुए इन्होंने अनुपास, यमक, उपमा, रूपक, सन्देह आदि अलंकारों का सफल प्रयोग किया। नवीन अलंकारों में मानवीकरण, ध्वन्यर्थ-व्यंजना, विशेषण-विपर्यय आदि की सार्थक योजना प्रस्तुत की।

हिन्दी साहित्य में स्थान
निराला जी बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न कलाकार थे। ये छायावाद के प्रतिनिधि कवि हैं। इन्होंने देश के सांस्कृतिक पतन की और खुलकर संकेत किया। हिन्दी काव्य को नूतन पदावली और नूतन छन्द देकर इन्होंने बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इनके द्वारा रचित छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता की रचनाएँ हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

पद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्य भाग से दो पद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर: देने होंगे।

बादल राग

प्रश्न 1.
झूम-झूम मृदु गरज-गरज घन घोर!
राग-अमर! अम्बर में भर निज रोर!
झर झर झर निर्झर-गिरि-सर में,
घर, मरु तरु-मर्मर, सागर में,
सरित-तड़ित-गति-चकित पवन में
मन में, विजन-गहन कानन में,
आनन-आनन में, रव घोर कठोर—
राग–अमर! अम्बर में भर निज रोर!
अरे वर्ष के हर्ष!
बरस तू बरस-बरस रसधार!
पार ले चल तू मुझको
बहा, दिखा मुझको भी निज
गर्जन-भैरव-संसार!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के शीर्षक तथा कवि का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश ‘बादल-रोग’ कविता से उद्धृत है तथा इसके कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ हैं।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने बादल के किस रूप का वर्णन किया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने बादल के लोक कल्याणकारी रूप का वर्णन किया है। कवि ने बादलों से बरसकर सम्पूर्ण प्रकृति को कोमलता एवं गम्भीरता से भर देने का आग्रह किया है तथा उनसे सृष्टि को नवीन शक्ति प्रदान करने की अपेक्षा की हैं।

(iii) “पार ले चल तू मुझको’, ‘बहा दिखा मुझको भी निज” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि बादलों से इतना अधिक बरसने के लिए कह रहा है कि वह भी उसके साथ बह चले। फलस्वरूप इस भीषण संसार में जगत् के उस पार पहुँचकर मैं भी तुम्हारे गर्जना भरे उस संसार को देखें जिसे भयावह कहा गया है। तुम बरसकर मेरे अस्तित्व को अपने में विलीन कर दो।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने बादलों से क्या आह्वान किया हैं?
उत्तर:
कवि ने बादलों से आह्वान करते हुए कहा है कि तुम मन्द मन्द झूमते हुए अपनी घनघोर गर्जना से सम्पूर्ण वातावरण को भर दो। अपने शौर से आकाश में एक ऐसा संगीत छोड़ दो, जो अमर हो जाए।

(v) ‘निर्भर’ और ‘संसार’ शब्द में से उपसर्ग शब्दांश छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
निर्झर-निर् (उपसर्ग)
संसार–सम् (उपसर्ग)

सन्ध्या सुन्दरी

प्रश्न 2.
दिवसावसान का समय मेघमय आसमान से उतर रही है
वह सन्ध्या -सुन्दरी परी-सी धीरे धीरे धीरे।
तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास,
मधुर-मधुर हैं दोनों उसके अधर,
किन्तु जरा गम्भीर, नहीं है उनमें हास-विलास।
हँसता है तो केवल तारा एक
गुंथा हुआ उन घंघराले काले काले बालों से
हृदयराज्य की रानी का वह करता हैं अभिषेक।
अलसता की-सी लता किन्तु कोमलती की वह कली
सखी नीरवता के कन्धे पर डाले बाँह,
छाँह-सी अम्बर पथ से चली।
नहीं बजती उसके हाथों से कोई वीणा,
नहीं होता कोई अनुराग-रोग-आलाप,
नूपुरों में भी रुनझुन-रुनझुन नहीं,
सिर्फ एक अव्यक्त शब्द-सा “चुप, चुप, चुप
है गूंज रहा सब कहीं—

उपरोक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के शीर्ष तथा कवि का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश ‘सन्ध्या-सुन्दरी’ कविता से उद्धृत है तथा इसके कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’ हैं।

(ii) सन्ध्यारूपी सुन्दरी का चित्रण कवि ने कैसे किया हैं?
उत्तर:
सन्ध्यारुपी सुन्दरी का चित्रण कवि ने इस प्रकार किया है कि सन्यारूपी सुन्दरी के अधराधरं मधुर हैं, किन्तु उसकी मुखमुद्रा गम्भीर है। उसमें प्रसन्नता को व्यक्त करने वाली चेष्टाओं का अभाव है। सन्ध्या के समय सुन्दरी के काले होते बालों में गुँथा एक तारा है। वह उसके सौन्दर्य को और अधिक बढ़ा देता है। इसी प्रकार कवि ने सन्ध्यारूपी सुन्दरी का मनोहारी चित्रण किया हैं।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश में गूंथा हुआ तारा’ किसका प्रतीक है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में ‘गूंथा हुआ तारा’ सन्ध्या सुन्दरी के बालों में सुशोभित है जो ऐसा प्रतीत हो रहा है, मानो वह अपने हृदय-राज्य की रानी का अभिषेक कर रहा हो।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने सन्ध्या सुन्दरी को किसके समान बताया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने सन्ध्या-सुन्दरी को आलस्य के समान बताया है, फिर भी वह कोमलता की कली है अर्थात् आलस्य विद्यमान होते हुए भी उसमें कोमलता का गुण विद्यमान है।

(v) “किन्तु कोमलता की वह कली।” पंक्ति में कौन सा अलंकार है?
उत्तर:
“किन्तु कोमलता की वह कली’ पंक्ति में ‘क’ वर्ण की आवृत्ति होने के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है।

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UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी are the part of UP Board Solutions for Class 10 Commerce. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी.

Board UP Board
Class Class 10
Subject Commerce
Chapter Chapter 5
Chapter Name विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी
Number of Questions Solved 41
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी

बहुविकल्पीय प्रश्न ( 1 अंक)
                   

प्रश्न 1.
विनिमय-तिपत्र का लेखक होता है। (2016)
अथवा
विनिमय-विपत्र “………….” द्वारा तिखा जाता है। (2018)
(a) आहर्ती
(b) लेनदार
(c) स्वीकर्ता
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) लेनदार

प्रक्न 2.
विनिमय-विपत्र में …………… पक्ष होते हैं।
(a) तीन
(b) दो
(c) पॉम
(d) चार
उत्तर:
(a) तीन

प्रश्न 3.
विनिमय-वपत्र …………… द्वारा स्वीकार किया जाता है। (2013)
(a) आहत के
(b) अदाकत के
(c) आदाता के
(d) बैंकर के
उत्तर:
(b) अदाकत के

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प्रश्न 4.
विनिमय-विपत्र के भुगतान में अनुग्रह दिवस होते हैं (2016)
(a) 2
(b) 3
(c) 5
(d) 6
उत्तर:
(b) 3

प्रश्न 5.
हुण्डी की भाषा होती है। (2014)
(a) हिन्दी
(b) अंग्रेजी
(c) मुड़िया
(d) संस्कृत
उत्तर:
(c) मुड़िया

निश्चित उत्तारीय प्रश्न ( 1 अंक)

प्रश्न 1.
विनिमय-विपत्र की कोई एक विशेषता लिखिए।
उत्तर:
विनिमय-विपत्र एक शर्तरहित लिखित (UPBoardSolutions.com) आज्ञा-पत्र होता है।

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प्रश्न 2.
विनिमय-विपत्र कब अनादृत होता है? (2013)
उत्तर:
जब भुगतान तिथि पर विपत्र को भुगतान नहीं होता है।

प्रश्न 3.
विनिमय-विपत्र का बेचान किया जा सकता है। (सत्य/असत्य) (2010)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 4.
अनुग्रह विनिमय-विपत्र व्यापारिक सौदों के लिए लिखा जाता है। (सत्य/असत्य) (2012)
उत्तर:
असत्य

प्रश्न 5.
क्या प्रतिज्ञा-पत्र में मूल्यानुसार टिकट लगाया जाता है?
उत्तर:
हाँ

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प्रश्न 6.
प्रतिज्ञा-पत्र लेनदार द्वारा लिखा जाता है। (सत्य/असत्य)
उत्तर:
असत्य

प्रश्न 7.
हुण्डी कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
दो

अतिलघु उत्तारीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1.
विनिमय-विपत्र को परिभाषित कीजिए। (2014)
उत्तर:
भारतीय विनिमय साध्य विलेख अधिनियम, 1881 की धारा 5 के अनुसार, “विनिमय-विपत्र (Bill of Exchange) एक लिखित एवं शर्तरहित आज्ञा-पत्र है, जिस पर लिखने वाले के हस्ताक्षर होते हैं तथा जिसमें लिखने वाला किसी व्यक्ति अथवा (UPBoardSolutions.com) संस्था को यह आज्ञा देता है कि वह निश्चित धनराशि का भुगतान उसे अथवा किसी व्यक्ति को उसकी आज्ञानुसार या विपत्र के वाहक को माँगने पर अथवा एक निश्चित अवधि के समाप्त होने पर कर दे।”

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प्रश्न 2.
विनिमय-विपत्र क्या है? इसकी दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2017, 15)
उत्तर:
विनिमय-विपत्र का अर्थ इसके लिए अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 1 देखें। विनिमय-विपत्र की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 1
उत्तर:
भारतीय विनिमय साध्य विलेख अधिनियम, 1881 की धारा 5 के अनुसार, “विनिमय-विपत्र (Bill of Exchange) एक लिखित एवं शर्तरहित आज्ञा-पत्र है, जिस पर लिखने वाले के हस्ताक्षर होते हैं तथा जिसमें लिखने वाला किसी व्यक्ति अथवा संस्था को यह आज्ञा देता है कि वह निश्चित धनराशि का भुगतान उसे अथवा किसी व्यक्ति को उसकी आज्ञानुसार या विपत्र के वाहक को माँगने पर अथवा एक निश्चित अवधि के समाप्त होने पर कर दे।”

प्रश्न 2.

  1. लिखित आज्ञा-पत्र विनिमय-विपत्र एक लिखित आज्ञा-पत्र होता है।
  2. लेखक के हस्ताक्षर विनिमय-विपत्र में लेखक के हस्ताक्षर होते हैं।

प्रश्न 3.
विनिमय-विपत्र क्या है? विनिमय-विपत्र के दो पक्षकारों के नाम लिखिए। (2015)
उत्तर:
विनिमय-विपत्र का अर्थ इसके लिए अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 1 देखें। विनिमय-विपत्र के दो पक्षकार निम्नलिखित हैं
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 1
उत्तर:
भारतीय विनिमय साध्य विलेख अधिनियम, 1881 की धारा 5 के अनुसार, “विनिमय-विपत्र (Bill of Exchange) एक लिखित एवं शर्तरहित आज्ञा-पत्र है, जिस पर लिखने वाले के हस्ताक्षर होते हैं तथा जिसमें लिखने वाला किसी व्यक्ति अथवा संस्था को (UPBoardSolutions.com) यह आज्ञा देता है कि वह निश्चित धनराशि का भुगतान उसे अथवा किसी व्यक्ति को उसकी आज्ञानुसार या विपत्र के वाहक को माँगने पर अथवा एक निश्चित अवधि के समाप्त होने पर कर दे।”

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प्रश्न 4.
विनिमय-विपत्र कब अनादृत होता है? (2013)
उत्तर:
जब विनिमय-विपत्र का स्वीकर्ता बिल की भुगतान तिथि पर विपत्रे का भुगतान करने से इन्कार कर देता है अथवा उसे स्वीकार करने में असमर्थता प्रकट करता है, तो उसे विनिमय-विपत्र का अनादरण या तिरस्कृत (Dishonour) होना कहते हैं।

प्रश्न 5.
प्रतिज्ञा-पत्र को परिभाषित कीजिए। इसके पक्षकारों के नाम लिखिए। (2016)
अथवा
प्रतिज्ञा-पत्र क्या है? इसके दो पक्षों के नाम बताइए।
अथवा
प्रतिज्ञा-पत्र को परिभाषित कीजिए। (2013)
अथवा
प्रतिज्ञा-पत्र से आप क्या समझते हैं? (2012)
उत्तर:
भारतीय विनिमय साध्य विलेख अधिनियम, 1881 की धारा 4 के अनुसार, “प्रतिज्ञा-पत्र (Promissory Note) एक लिखित एवं शर्तरहित विलेख (Document) है, जिस पर लिखने वाले के हस्ताक्षर होते हैं तथा लेखक की ओर से यह प्रतिज्ञा होती है कि वह किसी विशेष व्यक्ति को या उसके आदेशानुसार किसी अन्य व्यक्ति को या वाहक को एक निश्चित धनराशि का भुगतान कर देगा। प्रतिज्ञा-पत्र के पक्षकार इसके निम्नलिखित दो पक्षकार होते हैं

  1. लेखक यह व्यक्ति देनदार के रूप में भुगतान करने की प्रतिज्ञा करता है।
  2. प्राप्तकर्ता या आदाता इस व्यक्ति द्वारा प्रतिज्ञा-पत्र का भुगतान प्राप्त किया जाता है।

प्रश्न 6.
प्रतिज्ञा-पत्र को परिभाषित कीजिए और इसके महत्त्व का वर्णन कीजिए। (2016)
उत्तर:
प्रतिज्ञा-पत्र से आशय इसके लिए अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 5 देखें। प्रतिज्ञा-पत्र का महत्त्व प्रतिज्ञा-पत्र का महत्त्व निम्न प्रकार है

  1. प्रतिज्ञा-पत्र एक लिखित आज्ञा-पत्र होता है।
  2. प्रतिज्ञा-पत्र की धनराशि तथा भुगतान का समय निश्चित होता है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1.
विनिमय-विपत्र और चैक में अन्तर कीजिए। (2014)
उत्तर:
विनिमय-विपत्र और चैक में अन्तर अन्तर
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी

प्रश्न 2.
विनिमय-विपत्र और चैक में अन्तर कीजिए। विनिमय-विपत्र का नमूना भी प्रस्तुत कीजिए। (2008)
उत्तर:
विनिमय-विपत्र और चैक में अन्तर अन्तर
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी

विनिमय-विपत्र का नमूना
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 1

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प्रश्न 3.
विनिमय-विपत्र और चैक में क्या अन्तर है? विनिमय-विपत्र और चैक के नमूने बनाइए। (2007)
उत्तर:
विनिमय-विपत्र और चैक में अन्तर अन्तर
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 2

विनिमय-विपत्र का नमूना
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 3

चैक का नमूना
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 4

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प्रश्न 4.
विनिमय-विपत्र (बिल) के अनादरण पर क्या कदम उठाए जाते हैं? (2007)
उत्तर:
विनिमय-विपत्र या बिल के अनादरण पर उठाए जाने वाले कदम या प्रक्रिया जब विनिमय-विपत्र का अनादरण हो जाता है, तब लेखक इसके प्रमाण के लिए विपत्रालोकी द्वारा प्रमाणित कराता है। विपत्रालोकी द्वारा इसे स्वीकर्ता के पास भुगतान के लिए भेजा जाता है। यदि स्वीकर्ता पुनः भुगतान करने से मना कर देता है, तो विपत्रलोकी विनिमय-विपत्र की पीठ पर अनादरण का कारण लिखकर अपने हस्ताक्षर तथा दिनांक अंकित करके विनिमय-विपत्र (UPBoardSolutions.com) लेखक को वापस करे देता है।

विपत्रालोकी के इस कार्य को नोटिंग का कार्य’ कहते हैं। इस कार्य हेतु विपत्रालोकी को जो शुल्क दिया जाता है, उसे ‘निकराई व्यय’ कहते हैं। यह शुल्क प्रारम्भ में विनिमय-विपत्र के धारक द्वारा अदा किया जाता है तथा बाद में स्वीकर्ता से वसूल कर लिया जाता है।

बिल का नवीनीकरण जब विपत्र के स्वीकर्ता को यह विश्वास हो जाता है कि वह भुगतान तिथि पर नहीं कर सकेगा, तो वह विपत्र के लेखक से नया विपत्र लिखने का आग्रह करता है और यदि लेखक द्वारा उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली जाती है, तो लेखक नया बिल लिखता है।

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प्रश्न 5.
व्यापारिक बिल से क्या आशय है? सावधि बिल एवं दर्शनी बिल का प्रारूप प्रस्तुत कीजिए। (2009)
उत्तर:
व्यापारिक बिल से आशय व्यापारिक बिल वह विपत्र है, जिसका प्रयोग दैनिक रूप से किए जाने वाले क्रय-विक्रय के सम्बन्ध में किया जाता है। व्यापार के ऋणों और उधार सौदों के भुगतान के लिए इन बिलों का ही प्रयोग किया जाता है। विक्रेता द्वारा लिखे गए विपत्र को क्रेता स्वीकार करता है और निश्चित समय के पश्चात् बिल का भुगतान कर देता है। अतः माल के क्रय-विक्रय से हुई देनदारी के आधार पर जो बिल लिखे जाते हैं, उन्हें व्यापारिक बिल कहा जाता है।

सावधि बिल का प्रारूप
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 5

दर्शनी बिल का प्रारूप
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 6

प्रश्न 6.
अनुग्रह बिल से क्या आशय है? व्यापारिक बिल और अनुग्रह बिल में क्या अन्तर है?
उत्तर:
अनुग्रह बिल वे विनिमय-विपत्र या बिल, जो एक-दूसरे की सहायतार्थ लिखे जाते हैं, उन्हें सहायतार्थ या अनुग्रह-विपत्र कहा जाता है। इसमें धन का भुगतान करने वाले को बदले में कोई मूल्य प्राप्त नहीं होता है। स्वीकृति के उपरान्त उस विपत्र को बैंक से बट्टे पर भुना (UPBoardSolutions.com) लिया जाता है तथा प्राप्त धनराशि को आपस में पूर्व तय की गई शर्तों के अनुसार बाँट लिया जाता है। व्यापारिक बिल और अनुग्रह बिल में अन्तर इसके लिए दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 3 देखें।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 3
उत्तर:
चैक का नमूना
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 7

प्रश्न 7.
हुण्डी एवं प्रतिज्ञापत्र से आप क्या समझते हैं? प्रतिज्ञा-पत्र का नमूना दीजिए। (2010, 08)
अथवा
प्रतिज्ञा-पत्र से आप क्या समझते हैं? प्रतिज्ञा-पत्र का नमूना दीजिए। (2010)
उत्तर:
हुण्डी से आशय हुण्डी एक लिखित एवं हस्ताक्षरयुक्त प्रपत्र होता है, जिसमें किसी व्यक्ति को यह आज्ञा दी जाती है कि वह हुण्डी में उल्लिखित व्यक्ति को या उसके आदेशानुसार किसी अन्य व्यक्ति को या उसके वाहक को उसमें उल्लिखित धनराशि का भुगतान कर दे। डॉ. गणतन्त्र कुमार गुप्ता के अनुसार, “हुण्डी भारतीय भाषा में लिखा गया एक साख-पत्र होता है, जिसमें लिखने वाला किसी निश्चित व्यक्ति को आदेश देता है कि वह उसमें लिखित (UPBoardSolutions.com) धनराशि का भुगतान स्वयं को, किसी आदेशित व्यक्ति को अथवा उसके आदेशानुसार व्यक्ति या धारक को कर दे।”

प्रतिज्ञा-पत्र से आशय प्रतिज्ञापत्र एक ऐसा महत्त्वपूर्ण साख-पत्र है, जिसका प्रयोग सामान्यतया ऋणों के लेन-देनों में किया जाता है। भारतीय विनिमय साध्य विलेख अधिनियम, 1881 की धारा 4 के अनुसार, प्रतिज्ञा-पत्र एक लिखित एवं शर्तरहित विलेख है, जिस पर लिखने वाले के हस्ताक्षर होते हैं तथा लेखक की ओर से यह प्रतिज्ञा होती है कि वह किसी व्यक्ति विशेष को या उसके आदेशानुसार किसी अन्य व्यक्ति को या वाहक को एक निश्चित धनराशि का भुगतान कर देगा।

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प्रतिज्ञा-पत्र का नमूना
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 8

प्रश्न 8.
विनिमय-विपत्र और प्रतिज्ञा-पत्र में क्या अन्तर है? विनिमय-विपत्र और प्रतिज्ञा-पत्र के नमूने भी बनाइए। (2016)
उत्तर:
हुण्डी से आशय हुण्डी एक लिखित एवं हस्ताक्षरयुक्त प्रपत्र होता है, जिसमें किसी व्यक्ति को यह आज्ञा दी जाती है कि वह हुण्डी में उल्लिखित व्यक्ति को या उसके आदेशानुसार किसी अन्य व्यक्ति को या उसके वाहक को उसमें उल्लिखित धनराशि का भुगतान कर दे। डॉ. गणतन्त्र कुमार गुप्ता के अनुसार, “हुण्डी भारतीय भाषा में लिखा गया एक साख-पत्र होता है, जिसमें लिखने वाला किसी निश्चित व्यक्ति को आदेश देता है कि वह उसमें लिखित धनराशि (UPBoardSolutions.com) का भुगतान स्वयं को, किसी आदेशित व्यक्ति को अथवा उसके आदेशानुसार व्यक्ति या धारक को कर दे।”

प्रतिज्ञा-पत्र से आशय प्रतिज्ञापत्र एक ऐसा महत्त्वपूर्ण साख-पत्र है, जिसका प्रयोग सामान्यतया ऋणों के लेन-देनों में किया जाता है। भारतीय विनिमय साध्य विलेख अधिनियम, 1881 की धारा 4 के अनुसार, प्रतिज्ञा-पत्र एक लिखित एवं शर्तरहित विलेख है, जिस पर लिखने वाले के हस्ताक्षर होते हैं तथा लेखक की ओर से यह प्रतिज्ञा होती है कि वह किसी व्यक्ति विशेष को या उसके आदेशानुसार किसी अन्य व्यक्ति को या वाहक को एक निश्चित धनराशि का भुगतान कर देगा।

प्रतिज्ञा-पत्र का नमूना
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 9

प्रश्न 9.
हुण्डी से क्या आशय है? इसका नमूना दीजिए। (2013)
अथवा
हुण्डी किसे कहते हैं? (2012)
उत्तर:
हुण्डी से आशय
हुण्डी से आशय हुण्डी एक लिखित एवं हस्ताक्षरयुक्त प्रपत्र होता है, जिसमें किसी व्यक्ति को यह आज्ञा दी जाती है कि वह हुण्डी में उल्लिखित व्यक्ति को या उसके आदेशानुसार किसी अन्य व्यक्ति को या उसके वाहक को उसमें उल्लिखित धनराशि का भुगतान कर दे। डॉ. गणतन्त्र कुमार गुप्ता के अनुसार, “हुण्डी भारतीय भाषा में लिखा गया एक साख-पत्र होता है, जिसमें लिखने वाला किसी निश्चित व्यक्ति को आदेश देता है कि वह उसमें लिखित धनराशि का भुगतान स्वयं को, किसी आदेशित व्यक्ति को अथवा उसके आदेशानुसार व्यक्ति या धारक को कर दे।”

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प्रतिज्ञा-पत्र से आशय प्रतिज्ञापत्र एक ऐसा महत्त्वपूर्ण साख-पत्र है, जिसका प्रयोग सामान्यतया ऋणों के लेन-देनों में किया जाता है। भारतीय विनिमय साध्य विलेख अधिनियम, 1881 की धारा 4 के अनुसार, प्रतिज्ञा-पत्र एक लिखित एवं शर्तरहित विलेख है, जिस पर लिखने वाले के (UPBoardSolutions.com) हस्ताक्षर होते हैं तथा लेखक की ओर से यह प्रतिज्ञा होती है कि वह किसी व्यक्ति विशेष को या उसके आदेशानुसार किसी अन्य व्यक्ति को या वाहक को एक निश्चित धनराशि का भुगतान कर देगा।

हुण्डी का नमूना
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 10

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (8 अंक)

प्रश्न 1.
विनिमय-विपत्र को परिभाषित कीजिए। यह प्रतिज्ञा-पत्र से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
विनिमय-विपत्र तथा प्रतिज्ञा-पत्र में अन्तर
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 11
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 12

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प्रश्न 2.
‘विनिमय-विपत्र की तिरस्कृति’ से आप क्या समझते हैं? आहर्ता और आहर्ती की पुस्तकों में विनिमय-विपत्र के तिरस्कृत सम्बन्धी जर्नल लेखे दीजिए। (2011)
उत्तर:
विनिमय-विपत्र का अनादरण या तिरस्कृत होना जब किसी विपत्र का स्वीकर्ता बिल की (UPBoardSolutions.com) भुगतान तिथि पर विपत्र का भुगतान करने से इन्कार अथवा उसे स्वीकार करने में असमर्थता प्रकट करता है, तो उसे ‘विनिमय-विपत्र की अप्रतिष्ठा’, ‘अनादरण’ या ‘तिरस्कृत होना’ कहते हैं। विनिमय-विपत्र का अनादरण या तिरस्कृत निम्नलिखित परिस्थितियों में हो सकता है-

  1. जब विनिमय-विपत्र को बैंक से बट्टे पर भुना लिया जाता है।
  2. जब संग्रह के लिए विनिमय-विपत्र को बैंक में जमा करा दिया जाता है।
  3. जब विनिमय-विपत्र लेखक के पास रखा हुआ होता है।
  4. जब भुगतान तिथि से पूर्व विनिमय-विपत्र का बेचान कर दिया गया हो।

विनिमय-विपत्र के अनादरण या तिरस्कृत के सम्बन्ध में जर्नल लेखे

1. लेखक या आहर्ता की पुस्तकों में लेखे

(i) विनिमय-विपत्र लेखक के पास होने पर
स्वीकर्ता का व्यक्तिगत खाता                   ऋणी
प्राप्य विपत्र (UPBoardSolutions.com) खाते का
(विनिमय-विपत्र तिरस्कृत हुआ)

(ii) विनिमय-विपत्र को बैंक से बट्टे पर भुनाने पर
स्वीकर्ता का व्यक्तिगत खाता                   ऋणी
बैंक खाते का
(विनिमय-विपत्र तिरस्कृत हुआ)

(iii) विनिमय-विपत्र बेचानपात्र के पास होने पर
स्वीकर्ता का व्यक्तिगत खाता                  ऋणी
लेनदार के खाते का
(विनिमय-विपत्र तिरस्कृत हुआ)

(iv) विनिमय-विपत्र संग्रह के लिए बैंक के पास होने पर
स्वीकर्ता का व्यक्तिगत खाता                 ऋणी
बैंक में संग्रह के लिए विपत्रे खाते का
(विनिमय-विपत्र तिरस्कृत हुआ)

2. स्वीकर्ता या आहर्ती की पुस्तकों में लेखे
बिल का अनादरण उपरोक्त किसी भी परिस्थिति में हो, प्रत्येक दशा में निम्नांकित लेखा किया जाता है-
देय विपत्र खाता                                   ऋणी
लेनदार/लेखक के व्यक्तिगत खाते का
(विनिमय-विपत्र तिरस्कृत हुआ)

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प्रश्न 3.
व्यापारिक बिल और अनुग्रह बिल में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
विनिमय-विपत्र के विभिन्न लाभों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
व्यापारिक बिल और अनुग्रह बिल में अन्तर
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी

विनिमय-विपत्र के विभिन्न लाभ

विनिमय-विपत्र से विभिन्न वर्गों को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं
1. लेखक वर्ग को लाभ

  1. विपत्र के बेचने की सुविधा यदि लेखक चाहे तो अपने किसी लेनदार को ऋण के भुगतान में विपत्र का बेचान कर सकता है।
  2. बकाए से छुटकारा व्यापारी को समय-समय पर अपने देनदारों (UPBoardSolutions.com) के पास बकाया भुगतान की माँग करने के लिए तकादा नहीं करना पड़ता है।
  3. ऋण का लिखित प्रमाण इस विपत्र के आधार पर विक्रेता व्यापारी उधार माल बेचकर अपनी बिक्री की वृद्धि कर सकता है, क्योंकि यह बिक्री का लिखित प्रमाण भी होता है।
  4. विदेशी भुगतान में सरलता इस विपत्र द्वारा विदेशी भुगतान भी सरलतापूर्वक किए जा सकते हैं।
  5. बैंक से बट्टे पर भुनाने की सुविधा यदि विनिमय-विपत्र के लेखक को शीघ्र रुपये की आवश्यकता हो, तो वह विपत्र को बैंक से बट्टे पर , भुनाकर सरलता से धनराशि प्राप्त कर सकता है।

2. स्वीकारक वर्ग को लाभ

  1. साख में वृद्धि भुगतान तिथि पर भुगतान हो जाने से स्वीकर्ता की साख में वृद्धि होती है। सम्बन्ध
  2. पूँजी की कमी महसूस न होना इस विपत्र के द्वारा उधार माल खरीदने में सहायता मिलती है, जिससे पूँजी की कमी महसूस नहीं होती है।
  3. भुगतान के लिए समय मिलना विनिमय-विपत्र के प्रयोग से क्रेता को इतना समय मिल जाता है कि वह सरलता से माल बेचकर उस अवधि में विक्रेता को भुगतान कर दे।

3. राष्ट्र को लाभ

  1. बैंकों को लाभ इन विपत्रों को बैंक से भुनाया जा सकता है तथा बैंक देय तिथि पर स्वीकर्ता से इनकी राशि वसूल कर सकता है।
  2. धातुओं की घिसावट से बचत विनिमय-विपत्र का अधिकं प्रयोग होने के कारण धातु मुद्रा घिसने से बच जाती है। इस प्रकार धातुओं की घिसावट से होने वाली हानि से राष्ट्र को बचाया जा सकता है।
  3. उत्पादन बढ़ने से लागत मूल्य में कमी विनिमय-विपत्रों के द्वारा माल की बिक्री में वृद्धि होने से उत्पादन में वृद्धि होती है तथा उत्पादन में वृद्धि से लागत मूल्य में कमी आती है, जिससे राष्ट्र की आय में वृद्धि होती है।

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क्रियात्मक प्रश्न (8 अंक)

प्रश्न 1.
1 जनवरी, 2011 को सुकेश ने ₹ 25,000 का माल नीलेश को बेचा।
सुकेश ने दो माह की अवधि का एक विपत्र लिखा। नीलेश द्वारा विपत्र स्वीकार (UPBoardSolutions.com) कर लिया गया। 16 जनवरी, 2011 को सुकेश ने अपने बैंक से 15% वार्षिक की दर से विनिमय-विपत्र को भुना लिया। देय तिथि पर नीलेश ने विनिमय-विपत्र का भुगतान कर दिया। सुकेश और नीलेश की पुस्तकों में जर्नल लेखे कीजिए। (2011)
हल
सुकेश की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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नीलेश की पुस्तकों में जर्नल लेखे
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 13

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 14

नोट    छूट = [latex]\frac { 25,000\times 15\times 1.5 }{ 100\times 12 } =469[/latex]

प्रश्न 2.
1 जनवरी, 2010 को आनन्द ने सुनील द्वारा लिखा हुआ एक तीन माह का ₹ 20,000 का विनिमय-विपत्र स्वीकार कर लिया। सुनील ने इसे उसी दिन अपने बैंक से 5% वार्षिक कटौती पर भुना लिया।

देय तिथि से एक दिन पूर्व सुनील ने सम्पूर्ण राशि आनन्द को चुकता कर दी। देय तिथि पर आनन्द ने विनिमय-विपत्र का भुगतान कर दिया। (2010)
हल
आनन्द की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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सुनील की पुस्तकों में जर्नल लेखे
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 16

प्रश्न 3.
1 सितम्बर, 2001 को राहुल ने सौमित्र को ₹ 20,000 का माल बेचा औरतीन माह का विपत्र प्राप्त किया। उसी दिन राहुल ने इस विपत्र को अपने लेनदार सचिन के नाम बेचान कर दिया। भुगतान की तिथि पर विपत्र अनादृत हो गया और सचिन ने ₹ 100 देकर नोटिंग कराया। राहुल, सौमित्र तथा सचिन की पुस्तकों में जर्नल लेखे कीजिए। (2008)
हल
राहुल की पुस्तकों में जर्नल लेखे
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी

सौमित्र की पुस्तकों में जर्नल लेखे
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 17

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सचिन की पुस्तकों में जर्नल लेखे
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 18

प्रश्न 4.
1 मार्च, 2007 को संजीव ने अमित को ₹ 2,000 का माल बेचा और तीन माह का विपत्र प्राप्त किया। उसी दिन संजीव ने इस विपत्र को अपने लेनदार प्रकाश के नाम बेचान कर दिया। भुगतान की तिथि पर विपत्र अस्वीकृत हो गया और प्रकाश ने ₹ 50 देकर नोटिंग कराया। संजीव, अमित तथा प्रकाश की पुस्तकों में जर्नल लेखे कीजिए। (2008)
हल
संजीव की पुस्तकों में जर्नल लेखे
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी

अमित की पुस्तकों में जर्नल लेखे
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 5 विनिमय-विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र व हुण्डी 19

प्रकाश की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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प्रश्न 5.
1 जनवरी, 2007 को भवेश ने राजेन्द्र से ₹ 30,000 का माल क्रय किया। उसी तिथि पर भवेश ने राजेन्द्र द्वारा उसी राशि से लिए गए चार माह की अवधि के विनिमय-विपत्र को स्वीकार करके लौटा दिया। 1 फरवरी, 2007 को राजेन्द्र ने उसे अपने बैंक से 6% वार्षिक दर से भुना लिया। देय तिथि पर विनिमय-विपत्र का नियमानुसार भुगतान हो गया। दोनों पक्षों की पुस्तकों में जर्नल लेखे कीजिए। (2007)
हल
राजेन्द्र की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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भवेश की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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नोट प्राप्य बिल = ₹ 30,000
छूट =[latex]\frac { 30,000\times 6\times 3 }{ 100\times 12 } =450[/latex]
(बैंक द्वारा ब्याज तीन महीने का लिया जाएगा।)

प्रश्न 6.
1 जनवरी, 2006 को सुधीर ने 1,500 का एक तीन माह का बिल स्वीकार किया, जिसे सुनील ने लिखा था। सुनील ने इस बिल को बैंक से 5% वार्षिक दर पर कटौती करा लिया तथा सम्पूर्ण रकम सुधीर को देय तिथि से एक दिन पूर्व भेज दी। सुधीर ने देय तिथि पर बिल का भुगतान कर दिया। सुनील और सुधीर की पुस्तकों में आवश्यक जर्नल लेखे कीजिए। (2007)
हल
सुधीर की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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सुनील की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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प्रश्न 7.
1 मार्च, 2005 को तुषार ने बादल को ₹ 22,000 का माल बेचा और उसी धनराशि का एक बिल लिखा, जो तीन माह के पश्चात् देय था। बादल ने उसी दिन बिल स्वीकार करके तुषार को लौटा दिया। अगले दिन तुषार ने बिल को अपने लेनदार प्रतीक के नाम बेचान कर दिया। भुगतान की तिथि पर बिल का भुगतान हो गया। तुषार, बादल और प्रतीक की पुस्तकों में आवश्यक जर्नल लेखे कीजिए। (2006)
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तुषार की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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बादल की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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प्रतीक की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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प्रश्न 8.
1 जनवरी, 2006 को मोहन ने सोहन को ₹ 15,000 का माल बेचा। सोहन ने मोहन द्वारा उसी राशि से लिखे गए एक चार माह के बिल को उसी दिन स्वीकार करके लौटा दिया और मोहन ने उसे अपने बैंक से ₹ 14,600 में भुना लिया। देय तिथि पर विपत्र का नियमानुसार भुगतान कर दिया गया। दोनों पक्षों के जर्नल में आवश्यक लेखे कीजिए। (2006)
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मोहन की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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सोहन की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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प्रश्न 9.
1 मार्च, 2016 को आर्यन ने ₹ 6,000 का माल देव को उधार बेचा आर्यन ने देव के ऊपर 3 माह का एक विपत्र लिखा, जिसे देव ने स्वीकार कर आर्यन को वापिस कर दिया। देय तिथि पर विपत्र प्रतिष्ठित हो गया। निम्नलिखित प्रत्येक परिस्थिति में आर्यन की पुस्तकों में जर्नल के लेखे कीजिए

  1. जब आर्यन विपत्र को अपने पास रखता है और देय तिथि पर भुगतान प्राप्त करता है।
  2. जब आर्यन 4 मार्च, 2016 को विपत्र को अपने बैंक से है ₹ 5,850 में भुना लेता है।
  3. जब आर्यन 10 मार्च, 2016 को अपने लेनदार सागर को ₹ 6,100 के ऋण के पूर्ण भुगतान में विपत्र का बेचान कर देता है। (2017)

हल
आर्यन की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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प्रश्न 10.
1 मार्च, 2000 को श्यामल ने राम को ₹ 4,000 का माल बेचा और उसके भुगतान में तीन माह की अवधि का एक विपत्र प्राप्त किया। उसी दिन श्यामल ने 6% की वार्षिक दर से विपत्र को बैंक से भुना लिया। भुगतान की तिथि पर विपत्र अस्वीकृत हो गया और बैंक ने ₹ 25 नोटिंग का भुगतान किया। श्यामल और राम की पुस्तकों में आवश्यक जर्नल लेखे कीजिए। (2006)
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श्यामल की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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राम की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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प्रश्न 11.
श्री अग्रवाल ने श्री गुप्ता को ₹ 4,000 का माल 1 जनवरी, 2003 को बेचा और बदले में दो माह की अवधि का एक विपत्र प्राप्त किया। भुगतान की तिथि को गुप्ता ने विपत्र का भुगतान करना अस्वीकार कर दिया। अग्रवाल ने विपत्र का नोटिंग कराया और ₹ 5 नोटिंग व्यय दिया। श्री अग्रवाल और श्री गुप्ता की पुस्तकों में आवश्यक जर्नल लेखे कीजिए। (2006)
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श्री अग्रवाल की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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श्री अग्रवाल की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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प्रश्न 12.
1 फरवरी, 2004 को अशोक ने विवेक से ₹ 15,000 के भुगतान के बदले दो माह का एक बिल प्राप्त किया। 13 फरवरी को अशोक ने इस बिल का अपने लेनदार नरेश के पक्ष में बेचान कर दिया। नियत भुगतान तिथि पर विवेक ने बिल का भुगतान नहीं किया। अशोक तथा विवेक की पुस्तकों में प्रविष्टियाँ कीजिए।
हल
अशोक की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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विवेक की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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प्रश्न 13.
रीतिका ने ₹ 6,000 का माल मौली को बेचा और एक विनिमय विपत्र 3 माह का उससे स्वीकार कराया। उसने तीन दिन बाद ₹ 200 छूट देकर बिल बैंक से भुना लिया। देय तिथि पर बिल तिरस्कृत हो गया तथा बैंक को ₹ 50 नोटिंग व्यय देने पड़े। दोनों पक्षों की पुस्तकों में आवश्यक जर्नल के लेखे कीजिए। (2018)
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रीतिका की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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मौली की पुस्तकों में जर्नल लेखे
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