UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 18 अस्थियों की टूट और मोच

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 18 अस्थियों की टूट और मोच

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Home Science . Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 18 अस्थियों की टूट और मोच.

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
अस्थि-भंजन से आप क्या समझती हैं? अस्थि-भंजन के कारणों एवं प्रकारों का उल्लेख कीजिए। [2008, 09, 10, 11]
या
अस्थि-भंग या फ्रेक्चर किसे कहते हैं? इनके विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 17]
या
हड्डी की टूट कितने प्रकार की होती है? चित्र द्वारा स्पष्ट कीजिए। [2011]
या
हड्डियों की टूट कितने प्रकार की होती है ? संक्षेप में लिखिए। [2009, 11]
उत्तर:
अस्थि-भंजन का अर्थ

शरीर के किसी भी अंग की अस्थि के टूट जाने को अस्थि-भंजन कहते (UPBoardSolutions.com) हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यदि कोई अस्थि पूरी तरह से टूटे नहीं, परन्तु उसमें साधारण-सी दरार भी आ जाए तो उसे भी अस्थि-भंजन की ही श्रेणी में रखा जाता है।

अस्थि-भंजन के कारण
आकस्मिक दुर्घटना के कारण किसी अस्थि (हड्डी) के टूट जाने को अस्थि-भंजन कहते हैं। अस्थि-भंजन होने के सामान्य कारण निम्नलिखित हैं

(1) गिरना:
अचानक गिरने अथवा फलों आदि के छिलकों से फिसलने पर प्रायः अस्थि-भंजन की सम्भावना रहती है। ठोकर खाना, छत अथवा सीढ़ियों से गिरना तथा फलों के छिलकों द्वारा फिसलना आदि इस प्रकार की सामान्य दुर्घटनाएँ हैं, जोकि अधिकांशतया अस्थि-भंजन का कारण होती हैं।

UP Board Solutions

(2) टक्कर लगना:
किसी वाहन (साइकिल, कार, बस व ट्रक आदि) अथवी दीवार इत्यादि से टक्कर होने पर अस्थि-भंजन की अत्यधिक सम्भावना रहती है।

(3) दब जाना अथवा गोली लगना:
अधिक भार वाली वस्तुओं; जैसे-मशीन, पत्थर तथा वाहन आदि) के नीचे दब जाने पर अथवा गोली लगने पर भी अस्थि-भंजन की अत्यधिक सम्भावना रहती है।

अस्थि-भंजन के विभिन्न प्रकार

सामान्य रूप से अस्थियाँ प्रत्यक्ष भंजन; जैसे—किसी अंग में गोली लगने से अस्थि टूटना व अप्रत्यक्ष भंजन; जैसे-खेलते हुए यदि कोई व्यक्ति हाथों के बल गिर जाए तथा झटके से कन्धे की अस्थि का टूटना; से टूटती हैं।
अस्थि-भंजन के मुख्य प्रकारों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है

(1) साधारण अस्थि-भंजन:
इस प्रकार के अस्थि-भंजन में केवल अस्थि ही टूटती है तथा आस-पास के ऊतकों को कोई विशेष क्षति नहीं होने पाती है।

(2) संयुक्त अस्थि:
भंजन–इस प्रकार के अस्थि-भंजन में टूटने वाली अस्थि का एक सिरा मांस तथा त्वचा को फाड़कर बाहर निकल जाता है, जिसके फलस्वरूप प्रभावित अंग विकृत हो जाता है तथा रोगाणुओं द्वारा घाव के संक्रमित होने की आशंका रहती है।

(3) जटिल अस्थि-भंजन:
इसमें अस्थि टूटने पर आस-पास की रुधिर-वाहिनियों तथा अन्य कोमल अंगों; फेफड़े व मस्तिष्क आदि; को घायल कर देती हैं। जटिल टूट अनेक बार घातक भी सिद्धरो पकती है; अत: इसका तत्काल उपचार आवश्यक है। अनेक बार असावधानी के कारण अथवा (UPBoardSolutions.com) अनुपयुक्त विधि से पीड़ित व्यक्ति को हिलाने-डुलाने पर अथवा स्थानान्तरित करने पर साधारण अस्थि-भंजन भी जटिल अवस्था में परिवर्तित हो जाता है। इसलिए अस्थि-भंजन के रोगी की भाल नियम एवं विधिपूर्वक की जानी चाहिए।

(4) बहुखण्डी अस्थि-भंजन:
इसमें प्रभावित स्थान पर अस्थि के एक से अधिक टुक जाते हैं।

(5) पच्चड़ी अस्थि-भंजन:
इसमें टूटी हुई अस्थि के सिरे पच्चड़ की तरह एक-दूसरे में घुस जाते हैं।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 18 अस्थियों की टूट और मोच

6) कच्ची अस्थि-भंजन:
इंस प्रकार की अस्थि-भंजन प्रायः बच्चों की लचीली अस्थियों में होती है। ये अस्थियाँ चोट लगने पर या तो झुक जाती हैं या उनमें दरारें पड़ जाती हैं।

प्रश्न 2:
अस्थि-भंजन के मुख्य लक्षण क्या हैं? अस्थि-भंजन की सामान्य प्राथमिक चिकित्सा आप किस प्रकार करेंगी? [2007, 08, 09, 10, 11, 12, 14, 15, 16]
या
हड्डी टूटने पर आप रोगी को क्या प्राथमिक उपचार देंगी? [2007, 08, 09, 10, 17]
या
हड्डी की टूट के लक्षण क्या हैं? हड्डी टूटने पर क्या प्राथमिक सहायता देनी चाहिए? हड्डियों के लिए किस पोषक तत्त्व की अधिक आवश्यकता होती है ? [2009]
उत्तर:
अस्थि -भंजन

अस्थियाँ शरीर के अन्दर अर्थात् त्वचा एवं मांसपेशियों के नीचे होती हैं; अत: इन्हें बाहर से देखा नहीं जा सकता। इस स्थिति में अस्थि-भंजन की जानकारी कुछ सामान्य लक्षणों के माध्यम से ही प्राप्त की जाती है। अस्थि-भंजन होने पर पीड़ित व्यक्ति दर्द के साथ अनेक प्रकार की कठिनाइयों की भी अनुभूति करता है, जिनके आधार पर प्राथमिक चिकित्सक अस्थि-भंजन की वास्तविकता का अनुमान लगा सकता है।

लक्षण: अस्थि-भंजन के सामान्य लक्षणों का विवरण निम्नलिखित है

  1. हड्डी टूटने के स्थान के निकट असहनीय पीड़ा होती है, जिससे कि पीड़ित व्यक्ति दर्द से तड़पने लगता है।
  2.  हड्डी टूटने वाले अंग की शक्ति नष्ट हो जाती है।
  3.  हड्डी टूटने पर आस-पास के स्थान पर सूजन आ जाती है।
  4. अस्थि-भंजन होने पर ऊतकों के नीचे रक्त प्रवाह के प्रभावित होने के कारण त्वचा का रंग नीला पड़ जाता है।
  5. अस्थि-भंजन के कारण प्रभावित अंग की आकृति बिगड़ जाती है।
  6. प्रभावित अंग को स्वाभाविक ढंग से हिलाने-डुलाने में पीड़ा होती है।
  7. कई बार टूटी हुई अस्थि के सिरे एक-दूसरे के ऊपर चढ़े हुए प्रतीत होते हैं।
  8.  प्रभावित अंग स्वाभाविक ढंग से हिलता-डुलारा नहीं है।
  9. त्वचा के पास हड्डी टूटने पर रोगी स्वयं इसका अनुभव कर सकता है।
  10. टूटी हुई हड्डी के टुकड़े परस्पर रगड़ खाने पर ‘कर-कर’ की ध्वनि उत्पन्न (UPBoardSolutions.com) करते हैं। ऐसी अवस्था में अस्थि-भंजन का निर्णय लेने के लिए किसी योग्य चिकित्सक से भी परामर्श कर लें।
  11.  संयुक्त अथवा जटिल अस्थि-भंजन में पीड़ित व्यक्ति भारी दुर्बलता का अनुभव करता है। तथा वह मूर्च्छित भी हो सकता है।
  12. कभी-कभी टूटी हुई हड्डी मांस व खाल को फाड़कर बाहर आ जाती है।

UP Board Solutions

उपर्युक्त लक्षणों के दिखाई देने पर अस्थि-भंजन की निश्चित जानकारी के लिए एक्स-रे परीक्षण आवश्यक होता है।

सामान्य प्राथमिक चिकित्सा

अस्थि-भंजन की अवस्था में पीड़ित व्यक्ति की निम्नलिखित विधियों द्वारा प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध करानी चाहिए

(1) उपयुक्त चिकित्सा सहायता:
इसके लिए अविलम्ब किसी योग्य चिकित्सक को बुलाना चाहिए। योग्य चिकित्सक के उपलब्ध न होने पर प्राथमिक चिकित्सा के आवश्यक उपाय करने चाहिए।

(2) रक्त-स्राव को रोकना:
अनेक बार अस्थि-भंजन के कारण पीड़ित व्यक्ति की रुधिर वाहिनियाँ फट जाती हैं, जिसके कारण रक्तस्राव होने लगता है। किसी स्वच्छ कपड़े के द्वारा दबाव डालकर रक्त-स्राव को रोकने का प्रयास करना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो टूर्नीकेट का प्रयोग भी किया जा सकता है।

(3) टूटी हड्डी की देखभाल:
अस्थि-भंजन का प्राथमिक उपचार दुर्घटनास्थल पर किया जाना ही उचित रहता है। रोगी की टूटी हुई हड्डी को खपच्ची, कार्ड-बोर्ड के टुकड़े, छड़ी अथवा अन्य किसी लकड़ी की सहायता से बाँधकर अचल बना देना चाहिए।

(4) घायल अंग की देखभाल:
रोगी के घावों को नि:संक्रामक घोल द्वारा साफ कर ऐन्टीसेप्टिक क्रीम लगाकर घायल अंग को स्वच्छ रूई अथवा कपड़े से ढक देना चाहिए।

(5) झोल का प्रयोग:
यदि बाहु की हड्डियाँ टूटी हों, तो रोगी को आराम देने के लिए उपयुक्त झोल का प्रयोग करना चाहिए।

(6) घायल का स्थानान्तरण:
घायल व्यक्ति को प्राथमिक उपचार देने के पश्चात् किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाना चाहिए।

(7) गर्म पेय पदार्थ देना:
यदि रोगी होश में है, तो उसे पीने के लिए गर्म दूध, चाय व कॉफी देना लाभप्रद रहता है।

UP Board Solutions

(8) सान्त्वना देना एवं धैर्य बँधाना:
दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति सदमे की स्थिति में होता है, जोकि अर्धिक होने पर घातक भी हो सकता है। प्राथमिक चिकित्सक का यह दायित्व है कि वह रोगी की घबराहट दूर कर उसे धैर्य बँधाए।।

प्रश्न 3
मोच आने से क्या अभिप्राय है? मोच आने के लक्षण और उपचार लिखिए। [2007, 09, 12, 14, 15, 18]
या
मोच के सामान्य उपचार क्या हैं? [2016]
उत्तर:
मोच आना

हड्डियाँ जोड़ के स्थान पर एक-दूसरे से बन्धक-सूत्रों अथवा तन्तुओं से जुड़ी होती हैं। अचानक चलते-चलते फिसलने, ऊँचे-नीचे स्थानों पर पैर पड़ने अथवा गिर जाने के कारण बन्धक-सूत्र या तो अधिक खिंच जाते हैं अथवा टूट जाते हैं। इसे मोच आंना कहते हैं। प्राय: (UPBoardSolutions.com) कलाई, गर्दन, कमर व टखने में मोच आने की भी अधिक सम्भावना रहती है।

लक्षण:
सामान्यतः मोंच आने पर पीड़ित व्यक्ति निम्नखित कठिनाइयाँ अनुभव करता है

  1. मोच से प्रभावित स्थान पर असहनीय पीड़ा होती है।
  2. जोड़ में सूजन आ जाती है और वह कमजोर हो जाता है।
  3.  मोच के स्थान पर त्वचा का रंग नीला अथवा काला पड़ जाता है।
  4.  मोच से प्रभावित अंग शिथिल हो जाता है। हिलाने-डुलाने पर मोच आए अंग में भयंकर दर्द होता है।

UP Board Solutions

प्राथमिक चिकित्सा

  1.  मोच आए अंग को आरामदायक स्थिति में रखना चाहिए तथा उसे अनावश्यक हिलानाडुलाना नहीं चाहिए।
  2. यदि मोच आते समय रोगी ने जूता अथवा सैण्डिल आदि पहने हों, तो उन्हें तत्काल उतार देना चाहिए। सूजन बढ़ने पर इनका उतारना कठिन एवं कष्टदायक होता है।
  3. मोच से प्रभावित जोड़ के स्थान पर कसकर पट्टी बाँध देनी चाहिए।
  4. मोच खाए स्थान पर ठण्डे पानी की पट्टी बाँधने से लाभ होता है। पट्टी को लगातार गीला रखना चाहिए।
  5.  यदि ठण्डे पानी की पट्टी से लाभ न हो, तो गर्म पानी की पट्टी बाँधनी चाहिए अथवा एक चिलमची में गर्म पानी तथा दूसरी चिलमची में ठण्डा पानी
    लेकर मोच आए अंग को पाँच मिनट तक
    क्रमशः गर्म व ठण्डे पानी में रखने पर काफी लाभ होता है।
  6. जब उपर्युक्त पट्टियाँ लाभ देना बन्द कर दें, तो उनका प्रयोग (UPBoardSolutions.com) रोक दें तथा कुछ घण्टे पश्चात् इनका फिर से प्रयोग करें।
  7. मोच खाए अंग पर धीरे-धीरे मालिश या मसाज करने से भी आराम मिलता है।
  8. मोच खाए अंग पर आयोडेक्स व मैडीक्रीम आदि मलने पर दर्द व सूजन में लाभ होता है।
  9.  मोच खाए अंग को दिन में तीन-चार बार गर्म पानी में थोड़ा नमक डालकर सेंकने से दर्द व सूजन में कमी आती है।।
  10.  प्रभावित अंग के दोनों ओर थोड़ी दूर तक कसकर पट्टी बाँधने से मोच खाया अंग अचल हो जाता है। इससे घायले बन्धक-सूत्रों को आराम मिलता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
खोपड़ी में अस्थि-भंजन होने पर आप क्या करेंगी?
उत्तर:
सिर के बल गिरने अथवा अन्य किन्हीं कारणों से सिर में चोट लगने पर सिर की कोई अस्थि टूट सकती है। सिर की अस्थि के टूटने से प्रायः व्यक्ति मूर्च्छित हो जाता है। इसके अलावा उसके मस्तिष्क को भी हानि हो सकती है। ऐसी स्थिति में सामान्यतः निम्नलिखित प्राथमिक उपचार करने चाहिए

  1. घायल व्यक्ति को कुर्सी पर सीधा बैठाना चाहिए, ताकि सिर ऊपर की ओर उठा रहे।
  2.  किसी साफ कपड़े की तह करके ठण्डे पानी में भिगोकर घायल व्यक्ति के सिर पर रखना चाहिए।
  3. घायल व्यक्ति के कपड़े ढीले कर देने चाहिए।
  4. अस्थि विशेषज्ञ से तुरन्त सम्पर्क करना चाहिए।
  5. यदि रुधिर बह रहा हो तो उसे रोकने का यथासम्भव प्रबन्ध करना चाहिए।
  6. यदि वह मूर्च्छित है, तो उसकी मूच्र्छा दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए।
  7.  चिकित्सक की सलाह लेना अत्यन्त आवश्यक है।

प्रश्न 2:
पसलियाँ टूटने पर आप क्या करेंगी?
उत्तर:
अनेक बार सीने के बल गिरने या पसलियों पर सीधा आघात पहुँचने पर पसलियाँ टूट जाती हैं। पसलियों का अस्थि-भंजन साधारण, जटिल, संयुक्त या किसी अन्य प्रकार का भी हो सकता है।
घायल व्यक्ति को हिलने-डुलने में पीड़ा होती है तथा श्वास लेने में कठिनाई होती है। इस प्रकार के रोगी को प्रारम्भिक उपचार निम्न प्रकार किया जा सकता है

  1. घायल व्यक्ति को इस प्रकार लिटाना चाहिए कि प्रभावित अंग पर कम-से-कम दबाव पड़े।
  2.  पीठ के नीचे सुविधानुसार तकिया व कम्बल आदि लगाएँ।
  3. घायल व्यक्ति को बर्फ चूसने के लिए देनी चाहिए।
  4. घायल अंग से सम्बन्धित बाँह को झोली की सहायता से सहारा (UPBoardSolutions.com) देकर पट्टी द्वारा बाँध देना चाहिए।
  5. अस्थि विशेषज्ञ से तत्काल परामर्श लेना चाहिए।

UP Board Solutions

प्रश्न 3:
हड्डी की टूट और मोच में क्या अन्तर है? [2009, 10, 11, 12, 13, 14]
या
अस्थि-भंग तथा मोच के अन्तर को स्पष्ट कीजिए। [2007, 08, 09, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 18]
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 18 अस्थियों की टूट और मोच

प्रश्न 4:
जबड़ों एवं हँसली का अस्थि-भंजन होने पर क्या करना चाहिए?
उत्तर:
जबड़ों का अस्थि-भंजन-जबड़ों का अस्थि-भंजन होने पर जबड़ों की आकृति विकृत हो जाती है तथा मुंह से खून आता है। ऐसे व्यक्ति को बोलने में कष्ट होता है। प्राथमिक उपचार के लिए

  1. हथेली की सहायता से निचले जबड़े को ऊपर वाले से मिला देना चाहिए। यह कार्य धीरे-धीरे सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
  2.  जबड़ों को तिकोनी, सँकरी पट्टी की सहायता से सही अवस्था में रखकर सिर के ऊपर बाँध देना चाहिए और एक अन्य पट्टी के द्वारा जबड़े से कान के पीछे होकर बाँध देना चाहिए।
  3. घायल व्यक्ति को बोलने नहीं देना चाहिए।
  4.  यदि उल्टी इत्यादि हो रही हो तो पट्टी खोली जा सकती है, (UPBoardSolutions.com) किन्तु बाद में बाँध देनी चाहिए।
  5. अस्थि विशेषज्ञ से तुरन्त सम्पर्क करना चाहिए।
  6. रोगी के साथ सहानुभूति का प्रदर्शन करना चाहिए।

UP Board Solutions

हॅसली का अस्थि-भंजन:
इस अस्थि के टूटने का मुख्य कारण हाथ या कन्धे के बल गिरना है या सामने से हँसली की अस्थि में सीधे चोट लगे, तो यह अस्थि टूट सकती है। इस अस्थि के अस्थि-भंजन से जिस ओर की अस्थि टूटती है उसी ओर की भुजा कार्य नहीं करती और कन्धा ऊपर नहीं उठाया जा सकता तथा सिर भी उसी ओर झुक जाता है जिधर की अस्थि टूटी हुई होती है। इस प्रकार के अस्थि-भंजन में निम्नलिखित उपचार करने चाहिए

  1. घायल व्यक्ति के कपड़े उतार दिए जाएँ।
  2.  पट्टी या कपड़े की तह बनाकर एक गद्दी 4-5 सेमी मोटी बनाई जाए और उसको घायल अंग की ओर वाले बाहु की बगल में रख दिया जाए।
  3.  सेण्ट जॉन झोली के द्वारा उस बाहु को छाती के साथ बाँध देना चाहिए। एक और पट्टी द्वारा कोहनी के मध्य से छाती तथा पेट की ओर घुमाकर बाँध देना चाहिए।
  4. अस्थि विशेषज्ञ से तुरन्त सलाह लेनी चाहिए।

प्रश्न 5:
जाँघ अथवा टाँग की हड्डी (अस्थि) टूटने पर आप क्या प्राथमिक उपचार करेंगी?
उत्तर:
जाँघ की हड्डी की टूट-जाँघ की हड्डी काफी लम्बी और मजबूत होती है, किन्तु अनेक कारणों से यह टूट सकती है। इसे हड्डी के टूटने से सामान्यत: घायल टाँग, स्वस्थ टाँग से छोटी हो जाती है। काफी सूजन आ जाती है तथा असह्य पीड़ा होती है। इस हड्डी के टूटने का उपचार (UPBoardSolutions.com) बहुत सावधानीपूर्वक करना चाहिए और निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए

    1. घायल व्यक्ति की, पीठ को आधार मानकर लिटाना चाहिए। जिस टाँग में चोट लगी हो उसे खींचकर स्वस्थ टाँग के साथ रूई या कपड़े की गद्दी रखकर बाँध देना चाहिए।

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 18 अस्थियों की टूट और मोच

 

 

 

 

 

  1.  लम्बी खपच्चियाँ यदि उपलब्ध हों तो उन्हें टाँगों के साथ बाँध देना चाहिए। यदि ये उपलब्ध न हों, तो लाठी, बाँस इत्यादि बाँध देना उचित है, ताकि यह अपने स्थान से हिले-डुले नहीं।
  2. अस्थि विशेषज्ञ से तुरन्त सम्पर्क स्थापित करना चाहिए तथा उसके परामर्श के अनुसार शेष उपचार होना चाहिए।

टाँग की हड्डी की टूट:
टॉग में भी दो हड्डियाँ होती हैं। ये दोनों ही अथवा एक हड्डी टूट सकती है। इसके प्रमुख उपचार जाँघ की हड्डी की तरह किए जाने चाहिए अर्थात् लम्बी खपच्चियाँ, लाठी आदि की सहायता से दोनों पैरों को सीधा करके, खींचकर कसकर बाँध देना चाहिए। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पैर हिले-डुले नहीं।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 18 अस्थियों की टूट और मोच

UP Board Solutions

प्रश्न 6:
जोड़ उतरने के क्या लक्षण हैं? कन्धे की हड्डी उतरने पर प्राथमिक उपचार आप किस प्रकार करेंगी? [2018]
या
अस्थि का खिसकना किसे कहते हैं? अस्थि के खिसकने के लक्षण एवं उपचार क्या हैं? [2007]
उत्तर:
जोड़ उतरने के लक्षण:

शरीर को गतिशील बनाये रखने के लिए शरीर के कई स्थानों; जैसे—जबड़ा, कन्धा, कोहनी, कूल्हे एवं टखने आदि पर हड्डियों के बीच में सन्धियाँ अथवा जोड़ होते हैं। हड्डियों के अपने स्थान से हट जाने को जोड़ उतरना कहते हैं। इसके मुख्य लक्षण अग्रलिखित हैं

  1. जोड़ के पास भयानक पीड़ा होती है तथा जोड़ अचल हो जाता है।
  2.  जोड़ वाला अंग विकृत हो जाता है तथा इसे हिलाने-डुलाने पर बहुत पीड़ा होती है।
  3.  जोड़ के आस-पास सूजन आ जाती है।

कन्धे की हड्डी उतरने पर प्राथमिक उपचार

  1. रोगी को बिस्तर पर आरामदायक स्थिति में लिटाना चाहिए।
  2.  प्रभावित भाग पर बर्फ की थैली रखनी चाहिए। यदि इनसे लाभ न हो तो गरम सेंक करना चाहिए।
  3. रोगी को गर्म कम्बल से ढककर रखनी चाहिए।
  4. रोगी को पीने के लिए गर्म दूध व चाय देनी चाहिए।
  5. जोड़ को चढ़ाने के लिए अस्थि-रोग विशेषज्ञ से सम्पर्क करना चाहिए। (UPBoardSolutions.com) किसी नीम-हकीम को जोड़ चढ़ाने से रोकना चाहिए।

UP Board Solutions

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
हड्डी की टूट (अस्थि-भंग) को अर्थ स्पष्ट कीजिए। [2016]
उत्तर:
शरीर की किसी भी हड्डी के टूटने अथवा उसमें दरार पड़े जाने को हड्डी की टूट (अस्थि -भंग) कहते हैं।

प्रश्न 2:
अस्थि-भंजन के मुख्य प्रकार बताइए। [2011, 12, 13, 14]
उत्तर:
अस्थि-भंजन के मुख्य प्रकार हैं

  1. साधारण अस्थि-भंजन,
  2. बहुखण्डी अस्थिभंजन,
  3.  पच्चड़ी अस्थि-भंजन,
  4. संयुक्त अस्थि-भंजन,
  5. जटिल अस्थि-भंजन तथा
  6.  कच्चा अस्थि -भंजन।

प्रश्न 3:
अस्थि-भंजन में खपच्चियों का प्रयोग क्यों किया जाता है? [2008, 11]
उत्तर:
टूटी हुई अस्थि को सहारा देने व स्थिर रखने के लिए अस्थि-भंजन में खपच्चियाँ प्रयुक्त की जाती हैं।

प्रश्न 4:
कौन-से अस्थि-भंजन में खपच्चियों का प्रयोग नहीं किया जाता?
उत्तर:
खोपड़ी, मेरुदण्ड, पसलियों व जबड़ों के अस्थि-भंजन में खपच्चियों का प्रयोग नहीं किया जाता।

प्रश्न 5:
दुर्घटनास्थल पर खपच्चियाँ उपलब्ध न होने पर आप क्या करेंगी?
उत्तर:
ऐसे अवसर पर खपच्चियों के स्थान पर लकड़ी के टुकड़ों, (UPBoardSolutions.com) चप्पल व छतरी आदि का प्रयोग किया जा सकता है।

UP Board Solutions

प्रश्न 6:
किस प्रकार के अस्थि-भंजन में रोगी को बर्फ चूसने के लिए दी जाती है?
उत्तर:
पसलियाँ टूटने पर रोगी को बर्फ चूसने के लिए देते हैं।

प्रश्न 7:
कच्चे अस्थि-भंजन से क्या अभिप्राय है? [2007]
उत्तर:
इस प्रकार के अस्थि-भंजन में अस्थि टूटती नहीं है, बल्कि उसमें दरार पड़ जाती है।

प्रश्न 8:
घायलों को किस प्रकार स्थानान्तरित किया जाता है?
या
स्ट्रेचर की उपयोगिता लिखिए। [2009]
उत्तर:
आवश्यक प्राथमिक चिकित्सा देने के पश्चात् घायलों को आरामदायक स्थिति में स्ट्रेचर पर डालकर किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाया जाता है।

प्रश्न 9:
मोच आ जाने से आप क्या समझती हैं?
उत्तर:
शरीर के किसी भी अस्थि सन्धि स्थल के बन्धन-सूत्रों में खिंचाव आ जाने अथवा उनके टूट जाने की दशा को मोच आ जाना कहते हैं।

प्रश्न 10:
मोच के दो लक्षण लिखिए। [2008, 10, 11, 13, 14, 16]
उत्तर:
मोच के दो मुख्य लक्षण हैं

  1. सम्बन्धित अंग में दर्द का होना तथा
  2. मोच के स्थान का रंग नीला या काला हो जाना।
    का रंग नीला या काला हो जाना।

UP Board Solutions

प्रश्न 11:
जोड़ उतरने से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जोड़ के स्थान से हड्डी के खिसकने अथवा हट जाने को जोड़ उतरना कहते हैं।

प्रश्न 12:
कपाल की हड्डी टूटने की क्या पहचान है?
उत्तर:
कपाल के अस्थि-भंजन में चेहरा विकृत हो जाता है तथा इस पर सूजन (UPBoardSolutions.com) आ जाती है। नाक, मुँह व कान इत्यादि से रक्त-स्रार होने लगता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न-निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. अस्थियों के टूट जाने को कहते हैं [2007]
(क) अस्थि विस्थापन
(ख) अस्थि -भंग
(ग) मोच
(घ) अस्थि-संक्रमण

2. अस्थि-भंजन में होती है
(क) कम पीड़ा
(ख) असहनीय पीड़ा
(ग) सहनीय पीड़ा
(घ) कोई पीड़ा नहीं

3. अस्थि-भंजन में यदि अस्थि टूटकर खाल के बाहर आ जाए, तो उसे कहते हैं
(क) साधारण अस्थि-भंजन
(ख) कच्चा अस्थि-भंजन
(ग) पच्चड़ी अस्थि-भंजन
(घ) संयुक्त अस्थि-भंजन

4. यदि अस्थि एक से अधिक स्थान पर टूटती है, तो अस्थि-भंजन कहलाता है
(क) बहुखण्डी
(ख) कच्चा
(ग) संयुक्त
(घ) साधारण

5. मोच आने पर प्रयोग करते हैं [2008, 13]
(क) डेटॉल
(ख) आयोडेक्स
(ग) सैवलॉन
(घ) कोल्ड क्रीम

UP Board Solutions

6. झटके के साथ बोझ उठाने से अधिक सम्भावना रहती है
(क) मोच आने की
(ख) जोड़ उतरने की
(ग) पेशियों के खिंचाव की
(घ) अस्थि -भंजन की

7. पसलियाँ टूट जाने पर कठिनाई होती है
(क) बैठने में
(ख) लेटने में
(ग) साँस लेने में
(घ) कोई कठिनाई नहीं होती

8. मोच आने का लक्षण है [2012, 13, 16]
(क) पीड़ा होना
(ख) सूजन होना
(ग) मांसपेशियों में खिंचाव
(घ) ये सभी

9. कौन-सी वस्तु का प्रयोग अस्थि-भंग में अधिक रक्तस्राव रोकने के लिए किया जाता है? [2016]
(क) बर्फ का प्रयोग
(ख) टूर्नीकेट का प्रयोग
(ग) रूई से दबाना
(घ) इनमें से कोई नहीं

10. अस्थि -भंग के लक्षण हैं [2016, 17]
(क) सूजन आ जाती है
(ख) दर्द होता है
(ग) अंग निष्क्रिय हो जाता है
(घ) ये सभी

UP Board Solutions

उत्तर:
1. (ख) अस्थि-भंग,
2. (ख) असहनीय पीड़ा,
3. (घ) संयुक्त अस्थि-भंजन,
4. (क) बहुखण्डी,
5. (ख) आयोडेक्स,
6. (ख) जोड़ उतरने की,
7. (ग) साँस लेने में,
8. (घ) ये सभी,
9. (ख) दूनीकेट का प्रयोग,
10. (घ) ये सभी।

We hope the UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 18 अस्थियों की टूट और मोच help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 18 अस्थियों की टूट और मोच, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 21 घायल का स्थानान्तरण

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 21 घायल का स्थानान्तरण

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Home Science . Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 21 घायल का स्थानान्तरण.

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
घायल के स्थानान्तरण से क्या तात्पर्य है? घायल व्यक्ति के स्थानान्तरण की क्यों आवश्यकता होती है? इसके लिए एक अकेले व्यक्ति द्वारा ले जाने की विधि का वर्णन कीजिए
या
घायल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने की कितनी विधियाँ हैं? उनका वर्णन कीजिए। [2008]
या
घायल के स्थानान्तरण से क्या तात्पर्य है? स्थानान्तरण की विधियाँ बताइये। [2017]
या
घायल के स्थानान्तरण से क्या समझती हैं? [2018]
उत्तर:
घायल का स्थानान्तरण

दुर्घटनास्थल पर प्रायः चिकित्सा-साधनों का अभाव होता है। इसलिए घायल व्यक्ति को किसी सुरक्षित एवं सुविधाजनक स्थान पर ले जाना हितकर रहता है, परन्तु यह कार्य इतना सरल नहीं है, क्योंकि इसके लिए स्थानान्तरण की विशिष्ट विधियों का ज्ञान होना (UPBoardSolutions.com) अति आवश्यक है। घायल व्यक्ति के स्थानान्तरण के लिए स्ट्रेचर का प्रयोग सर्वोत्तम रहता है, परन्तु सामान्यतः दुर्घटनास्थल पर इनकी उपलब्धि बहुत कम हो पाती है। अतः इसके लिए अन्य विधियों की जानकारी प्राप्त कर लेना भी आवश्यक हो जाता है। इनमें से एक अकेले व्यक्ति द्वारा घायल के स्थानान्तरण की विधि निम्नवर्णित है

UP Board Solutions

एक व्यक्ति द्वारा घायल का स्थानान्तरण

एक अकेला व्यक्ति घायल की अवस्था के अनुसार उसे स्थानान्तरित करने के लिए निम्नलिखित में से कोई भी एक विधि अपना सकता है

(1) सहारा देकर ले जाना:
दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति यदि होश में हो तथा चल सकता हो, तो उस व्यक्ति को सहारा देकर किसी सुरक्षित स्थान तक ले जाया जा सकता है। इसके लिए घायल की बगल में खड़े होकर उसके एक हाथ को अपने विपरीत कन्धे पर गर्दन के पीछे से रखवा लेना चाहिए। घायल के इस हाथ (UPBoardSolutions.com) को अपने उसी ओर के हाथ से पकड़ लेना चाहिए। रोगी की ओर के अपने दूसरे हाथ को रोगी की कमर में पीठ की ओर से घुमाकर बगल से सहारा देना चाहिए। अब रोगी को धीरे-धीरे चलाकर वांछित स्थान तक ले जाया जा सकता है।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 21 घायल का स्थानान्तरण

(2) गोद में ले जाना:
मूर्च्छित घायल व्यक्ति को दुर्घटनास्थल पर पीठ के बल सीधा लिटाकर हाथ से उसकी दोनों टाँगों के घुटनों से ऊपर, नीचे र हाथ डालकर तथा दूसरे हाथ से कमर से बैठाकर पीठ की ओर हाथ डालकर चित्रं की भाँति उठाया जाता है। यह विधि बच्चों तथा हल्के भार वाले घायल व्यक्तियों को स्थानान्तरित करने के लिए उपयुक्त रहती है।

(3) पीठ पर लादकर ले जाना:
दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति यदि होश में है और उसे दूर तक ले जाना है, तो उसे पीठ पर लादकर ले जाया जा सकता है। इसके लिए रोगी को अपने दोनों हाथ वाहक की गर्दन के दोनों ओर डालकर सीने पर मजबूती से पकड़ लेना चाहिए। वाहक को अपने दोनों हाथों से, अपने कूल्हे से नीचे से घायल को सँभालना चाहिए। इस अवस्था में घायल के दोनों पैर वाहक की कमर से नीचे आगे की ओर होते हैं।

UP Board Solutions

(4) कन्धे पर लादकर ले जाना:
मूर्च्छित व्यक्ति को स्थानान्तरित करने की यह एक उत्तम विधि है। किसी स्थान पर आग लग जाने पर आग बुझाने वाले व्यक्ति, आग में घिरे लोगों को इसी विधि से बाहर निकाल कर लाते हैं। इसलिए इस विधि को फायरमैन लिफ्ट भी कहते हैं। इस कार्य के लिए घायल व्यक्ति को पेट के सहारे लिटाकर, उसके सिर के पास खड़े होकर रोगी को दोनों हाथों से इस प्रकार उठाया जाता है कि रोगी के दोनों हाथ वाहक के दूसरे कन्धे के इधर-उधर रहें, जबकि रोगी (UPBoardSolutions.com) का अधिकतर भाग, विशेषकर कमर के स्थान से, उल्टी अवस्था में (पेट के बल) वाहक के दाहिने कन्धे पर चित्रानुसार रहे। इस समय वाहक अपने दाहिने हाथ से रोगी का दाहिना हाथ, कोहनी से नीचे पकड़कर अपने सीने के आर-पार सँभाले रहता है।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 21 घायल का स्थानान्तरण
इस प्रकार घायल का सारा भार वाहक के कन्धे पर रहता है। कन्धे पर लादकर घायल को और बाएँ कन्धे पर घायल होने के कारण वाहक सहज ही स्थानान्तरित की विधि ऊँचे-नीचे स्थान पर भी चढ़-उतर सकता है। इस प्रक्रिया में घायल का सिर तथा बायाँ हाथ नीचे की तरफ लटके रहते हैं। यह एक सुविधाजनक विधि है जिसमें एक ही व्यक्ति मूर्च्छित व्यक्ति को सरलतापूर्वक स्थानान्तरित कर सकता है।

UP Board Solutions

प्रश्न 2:
हस्त-आसन द्वारा किसी घायल व्यक्ति को किस प्रकार स्थानान्तरित किया जाता है? [2015, 16]
या
दो व्यक्ति मिलकर हस्त-आसन विधियों द्वारा घायल व्यक्ति का स्थानान्तरण किस प्रकार कर सकते हैं?
उत्तर:
घायल के स्थानान्तरण के हस्त-आसन

यदि दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति अधिक घायल तथा भारी है, तो एक व्यक्ति वाहक के रूप में (UPBoardSolutions.com) उसका स्थानान्तरण ठीक प्रकारे से नहीं कर सकता है। इस प्रकार के घायलों का स्थानान्तरण करने के लिए कम-से-कम दो व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। दो व्यक्ति वाहक के रूप में घायलों का स्थानान्तरण करने के लिए निम्नलिखित प्रकार के हस्त-आसनों का उपयोग कर सकते हैं
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 21 घायल का स्थानान्तरण

(1) दोहत्थी आसन:
इस विधि में दोनों वाहक व्यक्ति एक-दूसरे के सामने खड़े होते हैं और एक व्यक्ति अपना दायाँ हाथ तथा दूसरा व्यक्ति अपना बायाँ हाथ आपस में पकड़कर बैठकी बनाते हैं। बैठकी बनाने में दोनों व्यक्तियों की उँगलियाँ एक-दूसरे में फंसी रहेंगी जिससे कि दोनों हाथों का जोड़ मजबूत । बन सके। इस आसन को बनाते समय हाथों में दस्ताने पहनना। अथवा उँगलियों के मध्य कोई . कपड़ा या रूमाल रखना सुविधाजनक रहता है। घायल को इस प्रकार के दोहत्थी आसन पर बैठाकर ले जाने के लिए घायल को अपने बीच में खड़ा कर लिया जाता है तथा दोनों हाथों से इस आसन पर धीरे से बैठा लिया जाता है। इस समय वाहकों के (UPBoardSolutions.com) खाली हाथ घायल की पीठ पर क्रॉस बनाए रहते हैं। इसमें घायल को अपने दोनों हाथ वाहकों को गर्दन में लिपटाकर रखने चाहिए। इस विधि में वाहक छोटे-छोटे कदम रखते हैं तथा चलते समय दाहिनी ओर वाला वाहक अप दायाँ पैर तथा बाईं ओर वाला वाहक अपना बायाँ पैर बाहर निकालता है तथा इसके बाद इसके विपरीत क्रिया दोहराई जाती है।

UP Board Solutions

(2) तिहत्थी आसन:
इस प्रकार के आसन का प्रयोग भी घायल व्यक्ति के मूर्च्छित न होने की अवस्था में किया जाता है। दोनों वाहक घायल के पीछे आमने-सामने मुँह करके खड़े हो जाते हैं। दाहिनी ओर वाला व्यक्ति अपने दाएँ हाथ से अपने बाएँ हाथ की कलाई पकड़ता है तथा दूसरे वाहक को इसो कलाई को पहला वाहक अपने बाएँ हाथ से पकड़ लेता है। इस प्रकार से तिहत्थी आसन बन जाता है। अब बाईं ओर वाला सहायक अपने बाएँ खाली हाथ से घायल के पैरों को सहारा देता है और आसन पर बैठा लेता है। इस प्रकार के आसन पर कपड़े की गद्दी रखकर घायल व्यक्ति को सुविधाजनक स्थिति में बैठाया जा सकता है। इस विधि में घायल व्यक्ति को अपने दोनों हाथों को दोनों वाहकों की गर्दन में घुमाकर डालना चाहिए, ताकि वह तिहत्थी आसन पर ठीक प्रकार से सँभल कर बैठ सके। इस विधि में दाहिने वाहक को दाहिना पैर तथा बाएँ वाहक को बायाँ पैर एक साथ आगे निकालना चाहिए तथा दोनों को धीरे-धीरे चलना चाहिए।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 21 घायल का स्थानान्तरण

(3) चौहत्थी आसन:
इस विधि में भी दोनों वाहक एक-दूसरे की कलाइयाँ पकड़ते हैं। दोनों वाहक आमने-सामने मुँह करके खड़े हो जाते हैं। प्रत्येक वाहक अपने दाहिने हाथ से अपनी बाईं कलाई को पकड़ता है। अब दोनों वाहक अपनेअपने खाली बाएँ हाथ से एक-दूसरे की दाहिनी कलाई को । (UPBoardSolutions.com) पकड़ लेते हैं। इस प्रकार चौहत्थी आसन बन जाता है। इस पर कपड़े की गद्दी डालकर घायल को आराम से बैठाया जाता है। घायल व्यक्ति अपने दोनों हाथ वाहकों के गले में डालकर रखता है।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 21 घायल का स्थानान्तरण

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
स्ट्रेचर न मिलने पर रोगी को उठाकर सुविधापूर्वक कैसे ले जा सकते हैं?
या
रोगियों को ले जाने के लिए किन-किन विधियों का प्रयोग किया जाता है? किसी एक का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
या
घायल के स्थानान्तरण की कौन-कौन सी विधियाँ हैं? किसी एक विधि का वर्णन कीजिए। [2014, 15, 16]
उत्तर:
रोगी को अभीष्ट स्थान पर ले जाने का सर्वोत्तम साधन स्ट्रे
उपलब्ध न होने पर रोगी को स्थानान्तरित करने की विधियाँ निम्नलिखित हैं –

UP Board Solutions

(1) अकेले व्यक्ति द्वारा: इसकी निम्नलिखित उपविधियाँ हैं

  1. सहारा देकर ले जाना,
  2.  गोद में ले जाना,
  3. पीठ पर लादकर ले जाना,
  4.  कन्धे पर लादकर ले जाना।

(2) दो व्यक्तियों द्वारा: इसकी उपविधियाँ निम्नलिखित हैं

(क) हस्त-आसन विधि:
इस विधि में घायल के स्थानान्तरण के लिए दोहत्थी, तिहत्थी व चौहत्थी आसन प्रयोग में लाए जाते हैं।

(ख) अग्र-पृष्ठ विधि:
यह कूल्हे पर चोट लगे व्यक्ति के स्थानान्तरण में प्रयोग में लाई जाती है।

प्रश्न 2:
घायल व्यक्ति को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और क्यों? [2007]
या
घायल व्यक्ति को स्थानान्तरित करते समय किन-किन सावधानियों को ध्यान में रखना चाहिए।
उत्तर:
रोगी के स्थानान्तरण में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1.  ऊँचे-नीचे स्थानों से ले जाने पर घायल व्यक्ति को कष्ट होता है; अत: उसे सदैव सुगम मार्ग से ले जाने का प्रयास करना चाहिए।
  2. दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के घायल अंगों का विशेष ध्यान रखकर ही उसका (UPBoardSolutions.com) स्थानान्तरण करना चाहिए।
  3. स्थानान्तरण करते समय घायल की अवस्था देखनी चाहिए। होश में होने पर अथवा मूच्छित होने पर घायल के स्थानान्तरण के लिए उपयुक्त विधि का चयन करना चाहिए।
  4. स्ट्रेचर पर घायल को ले जाते समय गड्ढे या नालों को सावधानीपूर्वक पार करना चाहिए।

UP Board Solutions

प्रश्न 3:
रोगी के स्थानान्तरण की अग्र-पृष्ठ विधि क्या है?
उत्तर:
स्थानान्तरण की अग्र-पृष्ठ विधि–यह विधि ऐसे घायल व्यक्तियों के स्थानान्तरण के लिए प्रयोग में लाई जाती है जिनके कूल्हे पर चोट लगी हो। एक वाहक घायल व्यक्ति के दोनों पैरों के बीच में उसके पैरों की ओर मुंह करके खड़ा हो जाता है तथा घायल के दोनों घुटने पकड़ लेता है। दूसरा वाहक घायल व्यक्ति के पीछे खड़ा होता है तथा अपने दोनों हाथों को घायल व्यक्ति की दोनों बाँहों के नीचे से निकालकर अपनी कलाई पकड़ लेता है। इस प्रकार घायल को ऊँचा उठा लिया जाता है और दोनों वाहक अपने-अपने कदमों को मिलाकर चलते हैं।

प्रश्न 4:
घायल के स्थानान्तरण की स्ट्रेचर विधि की विशेषताएँ बताइए।
या
स्ट्रेचर की क्या उपयोगिता है? आपातकालीन स्ट्रेचर कैसे बनाएँगे?
उत्तर:
स्ट्रेचर विधि:

घायलों के स्थानान्तरण की यह सर्वोत्तम विधि है। इसके द्वारा घायल व्यक्ति को स्थानान्तरित करना सरल भी होता है तथा सुविधाजनक भी। इस विधि द्वारा घायल को स्थानान्तरित करने की स्थिति में उसे किसी प्रकार का कष्ट भी नहीं होता। स्ट्रेचर लकड़ी अथवा लोहे का, एक विशेष प्रकार का फ्रेम होता है जिसके दोनों ओर दो-दो हत्थे लगे होते हैं। फ्रेम के मध्य में दरी, कैनवैस या अन्य किसी मजबूत कपड़े का आधार होता है। घायल को इस आधार पर लिटाकर दोनों वाहक फ्रेम के दोनों ओर खड़े होकर अपने हाथों से फ्रेम के हत्थे को पकड़कर सुरक्षित स्थान तक ले जाते हैं। स्ट्रेचर उपलब्ध न होने पर किसी कुर्सी अथवा चारपाई के दोनों ओर (UPBoardSolutions.com) हत्थियों के समान लकड़ी अथवा लाठियों को बाँधकर कामचलाऊ स्ट्रेचर बनाया जा सकता है। अस्पतालों में ट्रॉलीनुमा स्ट्रेचर भी प्रयोग में लाये जाते हैं। इन्हें ढकेलना सरल होता है। स्ट्रेचर विधि का प्रयोग करने पर वाहकों को अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ता तथा रोगी सुविधाजनक स्थिति में रहता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
घायल व्यक्ति को कहाँ स्थानान्तरित किया जाता है?
उत्तर:
घायल व्यक्ति को सुरक्षित तथा आरामदायक स्थान पर स्थानान्तरित किया जाता है।

प्रश्न 2:
किसी दुर्घटना का शिकार हुए व्यक्ति को दुर्घटनास्थल से स्थानान्तरित करना क्यों आवश्यक होता है?
उत्तर:
किसी दुर्घटना का शिकार हुए व्यक्ति को धूप, गर्मी तथा पुनः दुर्घटनाग्रस्त होने से बचाने के लिए तथा सुरक्षा एवं आराम प्रदान करने के लिए दुर्घटनास्थल से स्थानान्तरित करना आवश्यक होता है।

UP Board Solutions

प्रश्न 3:
अस्पतालों में घायलों के स्थानान्तरण के लिए कौन- नी विधि प्रयोग में लायी जाती है?
या
स्ट्रेचर की क्या उपयोगिता है? [2008]
उत्तर:
अस्पतालों में घायलों के स्थानान्तरण के लिए प्राय: स्ट्रेचर विधि प्रयोग में लायी जाती है। यह भारत के स्थानान्तरण की सर्वोत्तम विधि है। इस विधि द्वारा घायल व्यक्ति को स्थानान्तरित करना सरल एवं सुविधाजनक होता है।

प्रश्न 4:
हस्त-आसन विधि कब प्रयुक्त की जाती है?
उत्तर:
दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के पैर घुटनों अथवा जाँघ में यदि चोट लगी हो, तो प्रायः हस्त आसन विधि का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 5:
हस्त-आसन विधि में कितने वाहकों की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
हस्त-आसन विधि में प्राय: दो वाहकों की (UPBoardSolutions.com) आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6:
हस्त-आसन से क्या अभिप्राय है?
या
हैण्ड स्ट्रेचर क्या है ? [2009, 12, 13, 18]
उत्तर:
हाथों द्वारा बनाई गई बैठक को हस्त-आसन कहते हैं।

UP Board Solutions

प्रश्न 7:
घायल का स्थानान्तरण हस्त-आसन द्वारा कैसे किया जाता है?
या
रोगी को हस्त-आसन द्वारा स्थानान्तरित करने की कौन-कौन सी विधियाँ हैं?
उत्तर:
हाथों से बनी बैठक द्वारा घायल व्यक्ति के स्थानान्तरण की विधि हस्त-आसन विधि कहलाती है। हस्त-आसन प्राय: तीन प्रकार का होता है

  1. दोहत्थी,
  2. तिहत्थी तथा
  3.  चौहत्थी।

प्रश्न 8:
तिहत्थी बैठकी में क्या मुख्य सावधानी बरतनी चाहिए?
उत्तर:
तिहत्थी बैठकी. में रोगी की दोनों भुजाएँ वाहकों के गले में पड़ी होनी चाहिए तथा एक वाहक को, जिसका एक हाथ खाली है, रोगी के पैरों को सहारा देना चाहिए।

प्रश्न 9:
यदि रोगी को ले जाने के लिए स्ट्रेचर न हो, तो क्या करना चाहिए?
उत्तर:
सावधानीपूर्वक हाथ की बैठकी पर रोगी का स्थानान्तरण किया जाना चाहिए।

प्रश्न 10:
मूर्च्छित व्यक्ति के स्थानान्तरण की दो विधियाँ लिखिए।
उत्तर:
मूर्च्छित व्यक्ति को कन्धे पर लादकर या स्ट्रेचर द्वारा स्थानान्तरित किया जा सकता है। (UPBoardSolutions.com) यदि बच्चा हो, तो उसे गोद में उठाकर भी स्थानान्तरित किया जा सकता है।

प्रश्न 11:
आपातकालीन स्ट्रेचर कैसे बनाया जा सकता है?
उत्तर:
आपातकालीन स्टेचर बनाने के लिए दो बॉस लेकर उनके बीच किसी दरी, टाट या कोट आदि को कसकर बाँध लिया जाता है।

प्रश्न 12:
छोटे बच्चे को दुर्घटनास्थल से कैसे स्थानान्तरित किया जाता है?
उत्तर:
छोटे बच्चे को गोद में उठाकर घटनास्थल से स्थानान्तरित किया (UPBoardSolutions.com) जा सकता है।

UP Board Solutions

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न:
निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के स्थानान्तरण का उद्देश्य है
(क) धूप से बचाना
(ख) सुरक्षित स्थान पर पहुँचाना
(ग) पुन: दुर्घटना से बचाना
(घ) ये सभी

2. आग लग जाने पर दुर्घटनाग्रस्त व्यक्तियों का स्थानान्तरण किया जाता है
(क) कन्धे पर लादकर
(ख) गोद में उठाकर
(ग) सहारा देकर
(घ) दोहत्थी आसन द्वारा

3. घायल को दुर्घटनास्थल से स्थानान्तरित करने की आवश्यकता कब होती है?
(क) आग में घिर जाने पर
(ख) किसी वाहन से टकराने पर
(ग) किसी इमारत से गिरने पर
(घ) तीनों अवस्थाओं में

4. मूर्च्छित अवस्था में घायल को स्थानान्तरित करने की विधि है
(क) हस्त-आसन विधि
(ख) कन्धे पर लादकर ले जाना
(ग) सहारा देकर ले जाना
(घ) ये सभी

UP Board Solutions

5. घायल बच्चों के स्थानान्तरण की सुविधाजनक विधि है
(क) हस्त-आसन विधि
(ख) सहारा देकर ले जाना
(ग) गोद में उठाकर ले जाना
(घ) पीठ-पृष्ठ विधि

6. घायल व्यक्ति के स्थानान्तरण की सर्वोत्तम विधि है
(क) हस्त-आसन द्वारा
(ख) गोद में उठाकर
(ग) कन्धे पर लादकर
(घ) स्ट्रेचर द्वारा

7. स्ट्रेचर का प्रयोग कब किया जाता है? [ 2017]
(क) खेलने के लिए
(ख) बाजार जाने के लिए
(ग) रोगी को ले जाने के लिए
(घ) घूमने के लिए

8. गाँव में दुर्घटनाग्रस्त हुए व्यक्ति को चिकित्सा केन्द्र तक पहुँचाने के लिए आप कौन-सी विधि अफ्नाएँगी?
(क) चारपाई पर लिटाकर
(ख) तिहत्थी आसन द्वारा
(ग) गोद में उठाकर
(घ) पीठ पर लादकर

UP Board Solutions

उत्तर:
1. (घ) ये सभी,
2. (क) कन्धे पर लादकर,
3. (घ) तीनों अवस्थाओं में;
4. (ख) कन्धे पर लादकर ले जाना,
5. (ग) गोद में उठाकर ले जाना,
6. (घ) स्ट्रेचर द्वारा,
7. (ग) रोगी को ले जाने के लिए,
8. (क) चारपाई पर लिटाकर।

We hope the UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 21 घायल का स्थानान्तरण help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 21 घायल का स्थानान्तरण, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 15 भोजन पकाना और परोसना तथा तत्त्वों की सुरक्षा

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 15 भोजन पकाना और परोसना तथा तत्त्वों की सुरक्षा

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Home Science . Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 15 भोजन पकाना और परोसना तथा तत्त्वों की सुरक्षा.

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
भोजन पकाने के मुख्य उद्देश्य क्या हैं? आप भोजन पकाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखेंगी? [2009, 10, 11, 13, 14]
या
भोजन पकाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए जिससे कि भोजन के तत्त्व नष्ट न हो सकें ? [2008]
या
भोजन पकाकर खाना क्यों आवश्यक है ? [2016, 37, 18]
या
भोजन पकाने के क्या उद्देश्य हैं ? पौष्टिक तत्त्वों की उन पकाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ? [2016]
या
पाक-क्रिया के लाभ या उद्देश्य स्पष्ट कीजिए। [2018]
उत्तर:
भोजन पकाने के मुख्य उद्देश्य

आदि-मानव क्षुधापूर्ति के लिए तत्कालीन भोज्य-पदार्थों का प्राकृतिक रूप में ही उपयोग करता था। उसकी खोजी प्रवृत्ति ने उसे शिकार करने के लिए अस्त्रों, अग्नि तथा नाना प्रकार के भोज्य-पदार्थों का ज्ञान प्राप्त कराया। वह धीरे-धीरे अग्नि का प्रयोग भोजन पकाने में करने लगा। आहार एवं पोषण-विज्ञान के विकास एवं अध्ययन ने आधुनिक मानव को भोजन को पकाने के महत्त्व तथा इसकी वैज्ञानिक विधियों की उपयोगिता की शिक्षा दी है। भोजन पकाने के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं

(1) भोज्य-पदार्थों को सुपाच्य बनाना:
आहार को ग्रहण करने से पूर्ण लाभ तभी प्राप्त होता है जबकि उसका अच्छी प्रकार से पाचन हो जाए। पाक-क्रिया या भोजन को पकाने का एक मुख्य उद्देश्य भोज्य-पदार्थों को सुपाच्य बनाना होता है। बिना पकाए भोज्य-पदार्थों को यदि (UPBoardSolutions.com) ग्रहण किया जाता है, तो इस दशा में उनका पाचन प्रायः असम्भव ही होता है। अतः भोज्य-पदार्थों को सुपाच्य बनाने के उद्देश्य से उन्हें अनिवार्य रूप से पकाया जाता है।

(2) आहार को अधिकाधिक स्वादिष्ट बनाना:
पाक-क्रिया का एक उल्लेखनीय उद्देश्य खाद्य सामग्री को अधिकाधिक स्वादिष्ट बनाना भी है। विभिन्न खाद्य-सामग्रियाँ कच्ची अवस्था में स्वादिष्ट नहीं होतीं, बल्कि उनका स्वाद अरुचिकर ही होता है। इन खाद्य-सामग्रियों को यदि सही पाक-क्रिया द्वारा तैयार किया जाता है, तो ये स्वादिष्ट बन जाती हैं तथा रुचिपूर्वक खाई जा सकती हैं।

UP Board Solutions

(3) आकर्षक बनाना:
खाद्य-सामग्री को पकाने का एक उद्देश्य उसे आकर्षक बनाना भी होता है। पकने पर आहार का स्वाद अच्छा हो जाता है, उसका रूप आकर्षक हो जाता है तथा उसमें एक प्रकार की मनभावन सुगन्ध उत्पन्न हो जाती है। अनेक खाद्य व्यंजनों को मसालों एवं रंगों से विशेष आकर्षक बना दिया जाता है। उदाहरण के लिए-चावल से जब पुलाव या बिरयानी तैयार की जाती है, तो उसमें एक मनोहारी सुगन्ध उत्पन्न हो जाती है तथा उसका रूप भी आकर्षक हो जाता है।

(4) आहार को विविधता प्रदान करना:
पाक-क्रिया का एक उद्देश्य खाद्य-सामग्री को विविधता प्रदान करना भी है। पाक-क्रिया के माध्यम से एक ही खाद्य सामग्री को भिन्न-भिन्न व्यंजनों के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। आहार की विविधता व्यक्ति को अधिक सन्तोष प्रदान करती है। तथा आहार के प्रति रुचि बनी रहती है।

(5) खाद्य-सामग्री को कीटाणुरहित बनाना:
विभिन्न शाक-सब्जियों तथा भोज्य-पदार्थों पर नाना प्रकार के फफूद एवं जीवाणु होते हैं। वर्षा ऋतु में तो इनकी संख्या अत्यधिक होती है। बिना पके भोज्य-पदार्थों का सेवन करने से ये कीटाणु शरीर में प्रवेश करके अनेक रोगों की उत्पत्ति का कारण बन सकते हैं। भोज्य-पदार्थों को पकाते समय उच्च ताप पर ये कीटाणु लगभग समूल नष्ट हो जाते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि भोज्य-पदार्थों को पकाने का एक उद्देश्य आहार को कीटाणुरहित बनाना भी होता है। जीव जगत से प्राप्त भोज्य सामग्री (दूध, मांस-मछली एवं अण्डे) में कीटाणुओं की अधिक आशंका रही है अतः इन्हे आहार के रूप में ग्रहण करने से पूर्व उच्च ताप पर पकाना अति आवश्यक होता है।

(6) आहार का संरक्षण:
खाद्य-सामग्री को पकाने का एक उद्देश्य उसे अधिक समय तक सुरक्षित रखना भी है। कच्ची खाद्य-सामग्री शीघ्र ही सड़ने लगती है, परन्तु समुचित पाक-क्रिया द्वारा तैयार खाद्य-सामग्री बहुत समय तक सुरक्षित रह सकती है। उदाहरण के लिए-अचार, मुरब्बे, जैम, सॉस आदि के रूप में खाद्य-सामग्री (UPBoardSolutions.com) को बहुत अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इसी प्रकार कच्चा दूध शीघ्र ही फट जाता है, परन्तु यदि उसे पका लिया जाए, तो काफी समय तक ठीक हालत में रखा जा सकता है।

भोजन पकाते समय ध्यान देने योग्य बातें

भोजन पकाने से जहाँ एक ओर अनेक ल हैं, वहीं दूसरी ओर लापरवाही व असावधानीपूर्वक भोजन पकाने से अनेक हानियाँ भी सम्भव हैं। उदाहरण के लिए-गलत विधि से भोजन पकाने पर उसके पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। अतः भोजन पकाते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए

(1) स्वच्छ एवं कीटाणुरहित भोजन:
भोजन पकाते समय स्वच्छता का सर्वाधिक ध्यान रखना चाहिए। इसके लिए ध्यान रखें कि

(क) गन्दे बर्तनों में कीटाणु उपस्थित रहते हैं; अतः भोजन सदैव स्वच्छ बर्तनों में पकाना चाहिए।
(ख) भोजन बनाने में प्रयुक्त पीतल के बर्तन कलई किए हुए होने चाहिए, अन्यथा भोजन के विषैला होने का भय रहता है।
(ग) भोजन बनाते समय गृहिणी के नाखून साफ-स्वच्छ होने चाहिए, क्योंकि नाखूनों की गन्दगी में अनेक कीटाणु होते हैं, जोकि अनेक रोगों को कारण बन सकते हैं।
(घ) खाना पकाते समय गृहिणी को अपने बाल बँधे व कसे हुए रखने चाहिए, ताकि उनके भोजन में गिरने की सम्भावना ही न रहे।
(ङ) रसोईघर में बर्तन पोंछते समय स्वच्छ कपड़ा प्रयुक्त करना चाहिए।

(2) स्वादिष्ट एवं पोषक तत्वों से युक्त भोजन:
भोजन पकाने का मुख्य उद्देश्य स्वादिष्ट एवं पौष्टिक भोजन तैयार करना होता है; अत:

(क) भोजन को पकाते समय बर्तन को खुला नहीं रखना चाहिए। खुला रहने से भोजन वायु के सम्पर्क में आता है, जिससे इसमें कीटाणुओं व धूल गिरने की सम्भावना बनी रहती है तथा भोजन की सुगन्ध भी कम हो जाती है।
(ख) निश्चित अवधि से अधिक देर तक पकाने से भोजन का स्वाद नष्ट हो जाता है तथा उसके पोषकतत्त्वों के नष्ट होने की भी सम्भावना रहती है। अत: खाद्य-सामग्री को केवल उतने ही समय तक पकाना चाहिए जितना आवश्यक हो।।
(ग) भोजन को बार-बार गर्म करने से उसके पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।
(घ) खाने का सोडा विटामिन ‘बी’ को नष्ट करता है; अत: इसका उपयोग सोच-समझकर करना चाहिए।
(ङ) चावल व शाक-सब्जियों को पकाते समय उनमें अधिक पानी नहीं डालना चाहिए। इनके पानी में पोषक तत्त्व होते हैं; अतः इसे फेंकना नहीं चाहिए।
(च) आवश्यकता से अधिक मसालों का उपयोग करने से भोजन का स्वाभाविक स्वाद नष्ट हो जाता है तथा स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
(छ) सब्जियों को अच्छी तरह से धोकर ही काटना चाहिए। छीलने एवं काटने के बाद नहीं । धोना चाहिए। इससे कुछ पोषक तत्त्व पानी में बह जाते हैं।

UP Board Solutions

प्रश्न 2:
जल, भाप, चिकनाई तथा वायु के माध्यम से की जाने वाली पाक-क्रिया की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए।
या
भोजन बनाने की कौन-कौन सी विधियाँ हैं? भोजन बनाने की सर्वोत्तम विधि का वर्णन कीजिए। [2007, 11, 12, 13, 14, 15, 16]
या
भोजन पकाने की विभिन्न विधियों का वर्णन संक्षेप में कीजिए। [2010, 11, 16, 17, 18]
या
भोजन के पोषक तत्वों की सुरक्षा को ध्यान रखते हुए भोजन पकाने की विधियाँ लिखिए। [2007, 09, 10, 13, 16]
या
भोजन पकाना क्यों आवश्यक है? भोजन पकाने की प्रमुख विधियाँ कौन-कौन सी हैं? स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम विधि कौन-सी है? वर्णन कीजिए। [2008, 10, 11, 12, 14]
या
भोजन पकाने की मुख्य विधियों का वर्णन कीजिए। इनके गुण व दोष लिखिए। [2007, 09]
या
जल के माध्यम से भोजन पकाने की दो विधियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।[2016]
या
भाप से पकाया गया भोजन पौष्टिक और सुपाच्य क्यों होता है? [2018]
या
तलने की किन्हीं दो विधियों का वर्णन कीजिए। [2018]
उत्तर:
भोजन पकाना

भोजन को स्वादिष्ट, कीटाणुरहित व सुपाच्य बनाने की दृष्टि से भोजन को पकाने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है। आहार को अधिक समय तक संरक्षित रखने के लिए भी उसे पकाकर रखना जरूरी है। कच्ची खाद्य-सामग्री जल्दी ही सड़ने या गलने लगती है।

भोजन पकाने की विभिन्न विधियाँ

सभ्यता एवं आहार सम्बन्धी ज्ञान के विकास के साथ-साथ मनुष्य ने पाक-क्रिया अर्थात् भोज्यपदार्थों को पकाने की विभिन्न विधियों को भी खोज लिया है। अब भिन्न-भिन्न भोज्य पदार्थों से भिन्नभिन्न स्वादिष्ट व्यंजन तैयार किए जाते हैं। इसके लिए भिन्न-भिन्न विधियों को भी अपनाया जाता है। यह सत्य है कि भोजन पकाने की प्रत्येक विधि में ताप की आवश्यकता होती है। ताप प्रत्येक पाक-क्रिया का एक आवश्यक कारक होता है, परन्तु (UPBoardSolutions.com) पाक-क्रिया में ताप के अतिरिक्त एक अन्य कारक भी आवश्यक होता है। यह कारक होता है-पाक-क्रिया का माध्यम अर्थात् खाद्य-सामग्री को किस माध्यम से पकाया जाता है। यह माध्यम जल, वाष्प, चिकनाई (तेल या घी) तथा वायु में से कोई भी एक हो सकता है। इन माध्यमों के आधार पर ही पाक-क्रिया की विभिन्न विधियों का निर्धारण होता है। इस प्रकार भोज्य सामग्री को पकाने की विधियों को मुख्य रूप से निम्नलिखित चार वर्गों में विभक्त किया जाता है

UP Board Solutions

  1. जल के माध्यम से पकाना,
  2. वाष्प के माध्यम से पकाना,
  3. चिकनाई के माध्यम से पकाना तथा
  4. वायु के माध्यम से पकाना।
    पाक-क्रिया की इन चारों विधियों का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है

(1) जल के माध्यम से पकाना:
इस विधि में गर्म जल में भोजन को पकाया जाता है। इसे दो प्रकार से पकाया जा सकता है-..

(क) उबालकर पकाना:
यह भोजन पकाने की अत्यन्त प्राचीन एवं सरल विधि है। पकाये जाने वाले भोज्य-पदार्थों को किसी भगोने अथवा डेगची में पानी डालकर चूल्हे अ थवा अँगीठी पर चढ़ा दिया जाता है। उबलने पर पानी का ताप लगभग 100° सेण्टीग्रेड रहता है। कुछ समय बाद भोजन पकाना और परोसना तथा तत्त्वों की सुरक्षा 211 भोज्य पदार्थ भली प्रकार गल जाते हैं। इस विधि द्वारा प्राय: दालें व चावल तथा आलू, अरवी व इसी प्रकार की अन्य सब्जियाँ पकाई जाती हैं। सब्जियों को छिलके सहित उबालकर पानी फेंक देने से इनके पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते, परन्तु चावल पकाते समय पानी का कम प्रयोग करना चाहिए तथा पकने के बाद पानी को फेंकना नहीं (UPBoardSolutions.com) चाहिए क्योंकि इसमें पोषक तत्त्व विद्यमान रहते । हैं। उबालकर पकाया गया भोजन हल्का, सुपाच्य व गुणवत्तापूर्ण होता है।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 15 भोजन पकाना और परोसना तथा तत्त्वों की सुरक्षा 1

(ख) धीमी आँच पर पकाना:
इसमें भोज्य-पदार्थों को मसालों सहित थोड़े पानी में डालकर मन्द आँच (लगभग 82° सेण्टीग्रेड) पर पकाया जाता है साबुत दाल, सब्जियाँ व मांस आदि पकाने की यह एक उत्तम विधि है। जिनमें भोजन के पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते तथा भोजन भी सुपाच्य एवं स्वादिष्ट बनती है।

(2) वाष्प के माध्यम से पकाना:
भोजन पकाने की यह एक आधुनिक विधि है जिसमें भोजन के अधिकांश पौष्टिक तत्त्व सुरक्षित रहते हैं। भाप द्वारा भोजन पकाने के लिए प्रेशर कुकर नामक उपकरण का प्रयोग किया जाता है। यह भगोने के आकार का होता है जिसमें थोड़े से पानी के साथ भोज्य-पदार्थ डालकर वायु अवरोधक ढक्कन लगा दिया जाता है। इसे अँगीठी अथवा गैस बर्नर पर रखने से पानी गर्म होकर भाप में परिवर्तित हो जाता है। भाप के दबाव व ताप के द्वारा अपेक्षाकृत कम समय में भोजन पक जाता है। विभिन्न प्रकार की दालें, सब्जियाँ व मांस आदि पकाने की यह सर्वोत्तम विधि है। इस विधि में ईंधन व समय की बचत होती है, भोजन के पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते तथा भोजन स्वादिष्ट एवं सुपाच्य बनता है।

(3) चिकनाई के माध्यम से पकाना:
इस विधि में भोजन पकाने के लिए तेल व घी को माध्यम के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। तेल (UPBoardSolutions.com) अथवा घी में भोज्य पदार्थों को पकाने की विधि को तलना कहते हैं। भोज्य-पदार्थों को तलने की निम्नलिखित तीन विधियाँ प्रचलित हैं।

UP Board Solutions

(क) उथली विधि:
इस विधि में चौड़ी व उथली कड़ाही अथवा तवे को प्रयोग में लाया जाता है। कड़ाही में थोड़ा तेल अथंवा घी डालकर उसे आग पर चढ़ा दिया जाता है। घी अथवा तेल के अच्छी तरह गर्म हो जाने पर इसमें भोज्य पदार्थों को तला जाता है। आलू की टिकिया, कटलेट्स, पराँठे, चीले, आमलेट इत्यादि इसी विधि से बनाए जाते हैं। कई बार इस विधि से मसाला डोसा जैसे व्यंजन तलने के लिए कड़ाही के स्थान पर सपाट तवे का प्रयोग किया जाता है।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 15 भोजन पकाना और परोसना तथा तत्त्वों की सुरक्षा 2

(ख) गहरी विधि:
इस विधि में गहरी कड़ाही प्रयोग में लाई जाती है। कड़ाही में तेल अथवा घी पर्याप्त मात्रा में डालकर उसे खौलने तक गर्म (लगभग 175°सेण्टीग्रेड ताप) किया जाता है। अब भोज्य-पदार्थों को इसमें अच्छी प्रकार तला जाता है। इस विधि से प्रायः सभी प्रकार के पकवान; जैसे-पूड़ी-कचौड़ी, समोसे, पकौड़ियाँ तथा विभिन्न प्रकार की मिठाइयाँ इत्यादि बनाए जाते हैं। तलने की विधि द्वारा भोजन (पकवान) पकाने की विधि अत्यन्त प्राचीन है। इसकी अपनी लोकप्रियता (UPBoardSolutions.com) अलग ही प्रकार की है। इस विधि से भोजन स्वादिष्ट तो बनता है, परन्तु गरिष्ठ होने के कारण सुपाच्य नहीं होता।

(ग) शुष्क विधि:
इस विधि द्वारा केवल कुछ विशेष प्रकार की खाद्य सामग्री को ही पकाया जा सकता है। कुछ खाद्य-सामग्री ऐसी होती है जिनमें से ताप पाकर स्वतः ही चिकनाई निकलती है। उदाहरण के लिए-चर्बीयुक्त सूअर का मांस या बेकन आदि। इन खाद्य-सामग्रियों को तलने के लिए अतिरिक्त चिकनाई की आवश्यकता नहीं होती।

ध्यान रखने योग्य बातें:
चिकनाई के माध्यम से भोजन पकाने या तलने के समय कुछ बातों को अनिवार्य रूप से ध्यान में रखना चाहिए। कड़ाही में घी या तेल डालकर तब तक गर्म करना चाहिए, जब तक उसमें से कुछ-कुछ धुआँ-सा न उठने लगे तब उसमें तलने वाली सामग्री डालनी चाहिए। इस सामग्री को हिलाते तथा उलटते-पलटते रहना चाहिए। समुचित ढंग से पक जाने पर सामग्री को निकाल लेना चाहिए। निकालकर कुछ समय तक उसे पोनी में ही रखना चाहिए, जिससे कि फालतू घी या तेल निकल जाए। तलते समय सामग्री के छोटे-छोटे टुकड़े टूट-टूटकर घी में गिरते रहते हैं। इन्हें मुख्य सामग्री के साथ-साथ निकालते रहना चाहिए अन्यथा ये जल कर अप्रिय गन्ध छोड़ देते हैं। इसके अतिरिक्त तलते समय इस बात की विशेष सावधानी रखनी चाहिए कि गर्म घी या तेल में पानी के छींटे न पड़े। इससे गर्म घी छिटक कर, तलने वाले के शरीर पर पड़ सकता है।

(4) वायु के माध्यम से पकाना:
वायु अग्नि प्रज्वलित करती है तथा अग्नि के सम्पर्क में आकर स्वयं भी गर्म हो जाती है। वायु का यह गुण ही भोजन पकाने की इस विधि का आधार है। वायु द्वारा भोजन पकाने की प्रचलित विधियाँ निम्नलिखित हैं

UP Board Solutions

(क) भूनना (रोस्टिग):
इस विधि के अन्तर्गत बालू या राख को गर्म करके उसमें सम्बन्धित वस्तु को भून कर पकाया जाता है। इस विधि से बैंगन आदि का भुर्ता बनाया जा सकता है। आलू, शंकरकन्द, मक्का, बाजरा या चने आदि भूने जा सकते हैं। इस प्रकार से भूनी हुई वस्तुएँ काफी स्वादिष्ट व पाचक होती हैं। किसी प्रकार की चिकनाई आदि का प्रयोग न होने के कारण ये सामग्री सुपाच्य होती है।

(ख) सेंकना:
सामान्य रूप से भूनना एवं सेंकना एक ही समझा जाता है, परन्तु वास्तव में इन दोनों क्रियाओं में पर्याप्त । अन्तर है। सेंकने की क्रिया के अन्तर्गत सम्बन्धित खाद्य-सामग्री को आग के सम्पर्क में लाया जाता है। सामान्य रूप से धुआँरहित, जलते हुए अंगारों पर वस्तुओं (UPBoardSolutions.com) को सेंका जाता है। भुट्टे, कबाब
आदि इसी विधि से सेंके जाते हैं।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 15 भोजन पकाना और परोसना तथा तत्त्वों की सुरक्षा 3

(ग) तन्दूर अथवा भट्टी में पकाना (बेकिंग):
रोटी, डबलरोटी, बन व बिस्कुट आदि इस विधि द्वारा ही पकाये जाते हैं। चित्र 15.4-सेंकना मिट्टी का बना हुआ तन्दूर रोटी सेंकने के लिए तथा ओवन अथवा विशिष्ट भट्टी में बिस्कुट, डबल रोटी, बन, पेस्टी, नानखताई आदि पकाए जाते हैं।

पाक-क्रिया की सर्वोत्तम विधि

भाप देकर भोजन पकाने की कुकर्स की विधि बहुत अच्छी है। इस रीति से भोजन पकाने में पौष्टिक तत्त्व नष्ट नहीं होने पाते तथा हल्के व सरलता से पंचने योग्य हो जाते हैं। इस रीति से कार्य करने में समय कम लगता है। जलने का भय नहीं रहता और ईंधन भी कम मात्रा में व्यय होता है। अतः मितव्ययिता तथा समय की बचत–सभी दृष्टियों से यह विधि श्रेष्ठ है।

प्रश्न 3:
भोजन परोसने की शैलियों का वर्णन करते हुए अपनी दृष्टि में उपयुक्त शैली का उल्लेख कीजिए। [ 2007, 08,10,11]
या
भोजन परोसने की विभिन्न शैलियों का संक्षेप में वर्णन कीजिए। आवश्यक हो तो चित्र भी बनाइए।
या
“भोजन परोसना एक-कला है।” स्पष्ट कीजिए। भोजन परोसने की देशी, विदेशी विधियों के बारे में भी लिखिए। [2018, 10, 11]
या
भोजन परोसने की देशी व विदेशी शैली में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2016]
या
भोजन परोसना एक कला है। क्यों ? [2011, 14]
या
भोजन परोसने की कौन-सी विधियाँ हैं? भारतीय ढंग से भोजन परोसने की विधि लिखिए। [2015, 16 ]
उत्तर:
भोजन परोसना

पौष्टिक भोजन तैयार करना गृहिणी का एक महत्त्वपूर्ण दायित्व है, परन्तु परिवार के सदस्यों एवं अतिथियों की भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न करना भी गृहिणी का उतना ही महत्त्वपूर्ण दायित्व है। अतः भोजन परोसना पौष्टिक व स्वादिष्ट भोजन तैयार करने के समान (UPBoardSolutions.com) ही महत्त्व रखता है। इसके लिए गृहिणी को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए-

UP Board Solutions

  1. भोजन परोसने वाले का व्यवहार विनम्र, मनोहारी तथा कुशल होना चाहिए।
  2. भोजन परोसने का स्थान व बर्तन स्वच्छ होने चाहिए।
  3. भोज्य-पदार्थों को विधि के अनुसार उपयुक्त स्थान पर ही रखना चाहिए।
  4. भोजन परोसने के स्थान अथवा मेज पर फूलदान व अन्य अनेक प्रकार की कलात्मक सजावट करने से भोजन के आकर्षण में कई गुना वृद्धि हो जाती है। । उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट हो जाता है कि भोजन परोसना एक कला है, जो कि भोजन के प्रति रुचि एवं आकर्षण में वृद्धि करती है।

भोजन परोसने की विभिन्न शैलियाँ (विधियाँ)

प्रायः भोजन परोसने की तीन निम्नलिखित शैलियाँ (विधियाँ) प्रचलित हैं
(क) देशी शैली,
(ख) विदेशी अथवा पाश्चात्य शैली तथा
(ग) बुफे शैली।

(क) देशी शैली :
यह अति प्राचीन भारतीय शैली है जिसमें भोजन ग्रहण करने वालों के लिए भूमि पर आसन बिछाए जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को अलग थाली में भोजन परोसा जाता है। थाली में शुष्क भोज्य-पदार्थ तथा कटोरियों में तरल भोज्य-पदार्थ परोसे जाते हैं। प्रारम्भ में थोड़ी मात्रा में भोजन परोसा जाता है तथा फिर भोजन ग्रहण करने वाले की आवश्यकतानुसार और भोजन परोसा जाता है।

विशेषताएँ:
देशी शैली में भोजन परोसने की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. भोजन परोसते समय प्रत्येक खाद्य-पदार्थ के लिए अलग-अलग चम्मच, चमचा व कल्छी आदि होने चाहिए।
  2. प्रथम बार कम भोजन परोसना चाहिए तथा फिर खाने वालों से पूछ-पूछ कर विभिन्न खाद्य पदार्थ परोसने चाहिए। इससे भोजन व्यर्थ नहीं जाता।
  3. तरल पदार्थों को कटोरियों में ही परोसना चाहिए।
  4. थाली में चपातियाँ, पूड़ी व चावल आदि अलग-अलग परोसे जाने चाहिए।
  5. भोजन का स्थान व बर्तन स्वच्छ होने चाहिए।
  6. भोजन परोसने से पूर्व गृहिणी को स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहन लेने चाहिए।

(ख) विदेशी अथवा पाश्चात्य शैली:
यह शैली परम्परागत शैली से सर्वथा विपरीत है। इस शैली में भोजन एक विशिष्ट मेज (डाइनिंग टेबल) पर परोसा जाता है तथा खाने वाले कुर्सियों (डाइनिंग चेयर्स) पर बैठते हैं। इस शैली में भोजन एक ही बार में परोस दिया जाता है। इस शैली की अन्य विशिष्ट बातें हैं

  1. मेज के केन्द्र में प्लेट में चपातियाँ, एक विशिष्ट रचना की प्लेट (राइस प्लेट) में चावल तथा डोंगों में सब्जियाँ प्रायः एक ही बार में परोस दी जाती हैं।
  2. प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक बड़ी प्लेट, एक छोटी प्लेट, छुरी, काँटा तथा चम्मच रखी जाती है।
  3.  तरल पदार्थों के लिए बाउल प्रयुक्त किए जाते हैं। बाउल को प्लेट के दाईं (UPBoardSolutions.com) ओर रखना चाहिए।
  4. छुरी, प्लेट के दाईं ओर तथा उसकी धार प्लेट की ओर होनी चाहिए। काँटा प्लेट के बाईं ओर रखा जाना चाहिए।
  5. मेज पर आवश्यकतानुसार मसालेदानियाँ, अचार वे मुरब्बे आदि केन्द्रीय भाग में रखे जा सकते हैं।
  6. प्रत्येक व्यक्ति के लिए इस विधि में गिलास में सजाकर एक नेपकिन भी रखा जाता है।

UP Board Solutions

(ग) बुफे शैली:
भोजन करने वालों की संख्या अधिक होने पर प्रायः इस शैली को प्रयोग में लाया जाता है। सामाजिक आयोजनों, विवाह आदि बड़ी दावतों के लिए यह एक सर्वोत्तम आदर्श विधि है। इस विधि में. एक बड़े हॉल अथवा पंडाल में एक ओर लम्बी मेजें लगा दी जाती हैं। इन्हें विधिपूर्वक सजाया जाता है। मेजों पर निश्चित दूरियों पर प्लेटें, छुरियाँ, काँटे व चम्मच आदि सेट कर रख दिए जाते हैं। प्रत्येक सेट के पास में डोंगों में सब्जियाँ तथा अलग-अलग प्लेट में चपातियाँ, पूड़ियाँ, चावल आदि रख दिए जाते हैं। पंडाल के एक कोने में जल की व्यवस्था कर दी जाती है। बुफे शैली में भोजन औपचारिक, अर्द्ध-औपचारिक तथा अनौपचारिक विधि से परोसा जाता है। औपचारिक ढंग में अतिथि स्वयं खाना परोसकर एक ओर खड़े होकर खाते हैं। अर्द्ध-औपचारिक विधि में मेजबान अपने मित्रों अथवा रिश्तेदारों के सहयोग से अतिथियों को भोजन परोसता है। (UPBoardSolutions.com) अनौपचारिक विधि में वेटर अतिथियों को
भोजन परोसते हैं।

विशेषताएँ: इस प्रकार इस शैली में

(1) अतिथि खड़े होकर भोजन करते हैं।
(2) अतिथियों की संख्या अधिक होती है।
(3) मेजों की एक लम्बी कतार की व्यवस्था में भोजन प्रायः एक से अ सेटों में सजाकर एक साथ परोसा जाता है।
(4) सामान्यतः अतिथि अपने लिए स्वयं ही भोजन परोसते हैं।

प्रश्न 4:
खाद्य-पदार्थों के संरक्षण से आप क्या समझते हैं? खाद्य-पदार्थों के संरक्षण के कतिपय उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
खाद्य-पदार्थों का संरक्षण व उसके लाभ

खाद्य-पदार्थों को एक लम्बी अवधि तक फफूदी एवं जीवाणुओं से सुरक्षित रखने की विधियों को खाद्य-पदार्थों का संरक्षण कहते हैं। इससे होने वाले लाभ निम्नलिखित हैं

  1. प्रायः गृहिणियाँ फसल के समय पूरे वर्ष के लिए सस्ता अनाज खरीदकर रख लेती हैं। यदि यह अनाज संग्रह काल में सुरक्षित रहे, तो गृहिणी को धन की पर्याप्त बचत होती है तथा उसे अनाज खरीदने के लिए बार-बार बाजार जाने की परेशानी नहीं उठानी पड़ती।
  2. मौसम की सब्जियों को यदि सुरक्षित रूप से संगृहीत कर लिया जाए, तो उन्हें विपरीत मौसम में उपयोग में लाया जा सकता है।
  3.  महँगे भोज्य-पदार्थों के शेष बचकर व्यर्थ होने पर पर्याप्त आर्थिक हानि होती है जिसका निराकरण खाद्य-संरक्षण के उपाय अपनाकर किया जा सकता है। संरक्षण की विधियाँ

प्रमुख खाद्य-पदार्थों के संरक्षण की प्रचलित विधियाँ निम्नलिखित हैं

(1) स्वच्छता से संग्रह करके:
प्रायः गन्दे स्थानों व बर्तन आदि में फफूदी व जीवाणुओं की उपस्थिति की सम्भावना अधिक रहती है; अत: भोज्य पदार्थों का संग्रह स्वच्छ स्थान एवं स्वच्छ बर्तनों में करना चाहिए।

(2) सुखाकर:
नमी व सीलन में फफूदी व जीवाणु आसानी से पनपते हैं। अतः खाद्य-पदार्थों को शुष्क स्थान में रखना चाहिए। कुछ खाद्य-पदार्थ; जैसे- आलू, मेथी, गाजर, पोदीना, मटर, चना, फल व मेवे आदि; शुष्क अवस्था में हर प्रकार से सुरक्षित रहते हैं। मटर, चना, गोभी आदि को तो सामान्यतः शुष्कीकरण या निर्जलीकरण (डी-हाइड्रेशन) द्वारा पूर्णरूप से जलरहित कर डिब्बों आदि में बन्द कर संगृहीत कर लिया जाता है तथा विपरीत मौसम में इन सब्जियों का आनन्द लिया जाता है।

(3) उबालकर:
अनेक खाद्य-पदार्थों को उबालकर जीवाणुरहित कर लिया जाता है। अब इन्हें वायुरोधक डिब्बों में भरकर काफी समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

(4) चाशनी में रखकर:
अनेक फलों को शक्कर की चाशनी में पकाकर मुरब्बों के रूप में सुरक्षित रखा जा सकता है।

(5) अचार, सॉस आदि बनाकर:
प्रायः सभी घरों में आम, गोभी, गाजर, मिर्च आदि का अचार डाला जाता है, जो कि एक लम्बी अवधि तक सुरक्षित रहता है। इसका कारण है नमक व सरसों के तेल का प्रयोग जो फफूदी व जीवाणुओं से अचार को सुरक्षित रखते हैं। टमाटर की चटनी व सॉस को सुरक्षित रखने के लिए इनमें उपयुक्त मात्रा में सोडियम बेन्जोएट तथा साइट्रिक अम्ल मिलाना सर्वोत्तम रहता है।

(6) ठण्डा रखकर:
आलू व अन्य अनेक प्रकार की सब्जियों को शीतगृह में सुरक्षित रखना एक लोकप्रिय (UPBoardSolutions.com) व्यापारिक विधि है। इस विधि का प्रयोग घरों में रेफ्रिजेरेटर के रूप में किया जाता है। रेफ्रिजेरेटर में विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ, भोज्य सामग्री, दूध, अण्डे व मांस आदि को काफी समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

(7) विकिरण विधि द्वारा:
अनेक खाद्य-पदार्थों को विकिरण उपचार द्वारा जीवाणुरहित कर सुरक्षित रखा जाता है।

(8) अनाजों के संरक्षण की विधि:
अनाजों को प्रायः शुष्क स्थानों पर टंकियों में भरकर रखा जाता है। विभिन्न कीटनाशकों का प्रयोग कर इन्हें घुन जैसे हानिकारक कीड़ों से सुरक्षित रखा जाता है। अनाज को सुरक्षित रखने के लिए विभिन्न विधियों द्वारा इसे चूहों से बचाना चाहिए।

UP Board Solutions

(9) दुध को सुरक्षित रखने की विधि:
कम ताप पर दूध प्राय: सुरक्षित रहता है। अधिक समय तक दूध को सुरक्षित रखने के लिए पाश्चुरीकरण की विधि अपनाई जाती है। इसमें दूध को 65° सेण्टीग्रेड ताप पर आधा घण्टा रखकर उसे किसी बोतल अथवा बन्द बर्तन में शीतल स्थान पर रख दिया जाता है।

(10) अण्डा, मांस व मछली को सुरक्षित रखनी:
अण्डे को अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए कम तापक्रम ही एकमात्र उपाय है। मांस को मक्खियों से बचाना चाहिए। इसे सुरक्षित रखने के लिए बर्फ के तापक्रम पर रखना चाहिए। मछली को सुरक्षित रखना कठिन कार्य है। कम ताप पर भी मछली केवल कुछ समय तक ही सुरक्षित रहती है। व्यापारिक स्तर पर मछलियों को शुष्क अवस्था में डिब्बों में बन्द कर सुरक्षित रखा जाता है।

प्रश्न 5:
भोजन में मिलावट से क्या अभिप्राय है? शुद्ध भोजन को किन पदार्थों की मिलावट से अशुद्ध किया जाता है?
या
मिलावटी खाद्य-पदार्थों से क्या हानियाँ होती हैं? मिलावटी पदार्थों से बचने के उपाय बताइए।
उत्तर:
भोजन में मिलावट का अर्थ

खाद्य-पदार्थों में मिलावट का अर्थ है “शुद्ध भोज्य-पदार्थों में अन्य सस्ते खाने या न खाने योग्य पदार्थों को मिलाकर उनके गुणों में कमी करना या उन्हें हानिकारक बनाना।”
आजकल अधिकांश वस्तुएँ मिलावटयुक्त ही मिल रही हैं। दूध में पानी तथा अनाजों, मसालों में कुछ रासायनिक या वनस्पति पद के छिलके, धूल-गर्द मिलना साधारण-सी बात है। अब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि भोज्य-पदार्थों में इतनी मिलावट का कारण क्या है? (UPBoardSolutions.com) इसका एक स्पष्ट कारण विक्रेता द्वारा धन-लाभ को प्राथमिकता दिया जाना है।
मुख्य वस्तुओं के ही दाम पर असली पदार्थों के समान रूप-गुण वाली सस्ती या खराब वस्तुएँ बेचने के लिए उन्हें मुख्य पदार्थों के साथ मिलाकर बेचा जाता है, अज्ञानतावश लोग उन वस्तुओं को खरीद लेते हैं, जिससे उसके धन एवं स्वास्थ्य दोनों की हानि होती है। अत: मिलावटी वस्तुओं से बहुत सावधान रहना चाहिए।
मिलावटी वस्तुओं को लोग बड़ी चालाकी से बेचते हैं। फिलहाल तो ब्राण्डेड पैक वस्तुएँ भी बाजार में मिलावटी उपलब्ध हैं। अत: इससे बचने के लिए आपको इस बात का भी ज्ञान होना चाहिए कि किन-किन वस्तुओं में प्रायः मिलावट की जाती है।

विभिन्न भोज्य-पदार्थों में मिलावट:
व्यापारी भिन्न-भिन्न खाद्य-पदार्थों में निम्न प्रकार की सस्ती व हानिकारक वस्तुओं की मिलावट करते हैं

  1. अनाज: सस्ते व सड़े-गले अनाज, कंकड़, मिट्टी तथा टूटे हुए अनाज।
  2. आटा, मैदा: पुराना सड़ा आटा या मैदा कभी-कभी खड़िया मिट्टी।
  3.  घी: वनस्पति घी, चर्बी।
  4.  दूध: पानी, अरारोट, अन्य पशुओं का दूध मिलाना अथवा उसमें से वसा निकाल लेना। अब तो यूरिया, रिफाइण्ड तेल आदि से सिन्थेटिक दूध भी तैयार किया जाने लगा है, जिसे दूध में मिलाकर बेचा जा रहा है।
  5.  तेल: अखाद्य-पदार्थों; जैसे–अरण्डी आदि का तेल मिलाना।
  6. टमाटर की चटनी (Sauce) में कद्दू या अन्य सड़ी सब्जी का प्रयोग।
  7. काली मिर्च: पपीते के बीज।
  8. लौंग: तेल निकाल कर सुकड़ी हुई छोटी-छोटी लौग मिलाना।
  9. जीरा: जीरे के पौधे का बीज, कंकड़, मिट्टी या सीके मिलाना।
  10.  पिसा धनिया: धनिये की भूसी, राँगा हुआ लकड़ी का बुरादा, घोड़े की सूखी हुई लीद।
  11. पिसी लाल मिर्च: गेरु, लाल ईंट का चूरा, सूखी (UPBoardSolutions.com) लाले बेर के छिलके का बुरादा।
  12. पिसी हल्दी: पीली मिट्टी या रंगा हुआ अरारोट।
  13.  पिसी खटाई: पीली आम की गुठली।
  14.  चाय: प्रयोग की हुई चाय की पत्ती, पुरानी या खराब पत्तियाँ, चाय की पत्ती का चूरा तथा मिट्टी।
  15. मिठाइयाँ: मैदा, अरारोट, मिलावटी खोया व वर्जित रंग।
  16. शर्बत: चीनी के बजाय सैक्रीन (एक रासायनिक मीठा पदार्थ)।
  17. शहद: गुड़ की चाशनी।।
  18.  केसर: पीली रँगी मुँज या भुट्टे के रंगे हुए छोटे-छोटे रेशे।

इस प्रकार उपर्युक्त तरीकों से अनाजों व मसालों में मिलावट करके अपनी अशुद्ध वस्तुओं को बेचकर लोगों को बेवकूफ बनाया जाता है।

UP Board Solutions

मिलावटी खाद्य-पदार्थों से हानियाँ

मिलावटी खाद्य-पदार्थों के सेवन से निम्नलिखित हानियाँ होने की प्रबल सम्भावना होती है

  1. मिलावटी खाद्य पदार्थों का प्रयोग करते रहने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है।
  2. मिलावटी व अशुद्ध भोजन से हैजा, पेचिश, गले की खराबियाँ आदि रोग हो सकते हैं।
  3. खाने वाले रंग कैन्सरं का. कारण भी बन जाते हैं।
  4. ऐसे भोजन से कभी-कभी ‘फुड प्वायजनिंग’ से लोगों की मृत्यु तक होती देखी जाती है।
  5.  मिलावटी वस्तुएँ खरीदने से क्रेता को निश्चित रूप से आर्थिक लाभ के स्थान पर हानि होती है।

मिलावट से बचाव के उपाय
मिलावट से बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय काम में लाए जाते हैं

  1.  बाजार के पिसे मसालों की अपेक्षा घर में पिसे मसाले प्रयुक्त कीजिए अथवा चक्की पर पिसवा लीजिए।
  2. सदैव कम्पनी संस्तुत विश्वसनीय दुकान से ही स्टैण्डर्ड कम्पनी का माल खरीदिए।
  3.  दूध को अपने सामने ही दुहकर लीजिए अथवा विश्वसनीय डेरी से खरीदिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
पाक-क्रिया का अर्थ स्पष्ट कीजिए। [2008, 10]
उत्तर:
प्राकृतिक अवस्था में उपलब्ध खाद्य-सामग्री को आहार के रूप में ग्रहण करने के लिए कृत्रिम रूप से तैयार करने की व्यवस्थित क्रिया को ही पाक-क्रिया कहते हैं। पाक-क्रिया के अन्तर्गत प्राकृतिक अवस्था में उपलब्ध खाद्य-सामग्री को जल, ताप, चिकनाई तथा भाप एवं वायु आदि द्वारा ऐसा रूप दिया जाता है जो इस सामग्री को अधिक स्वादिष्ट, नर्म एवं सुपाच्य बना देता है। जब हम किसी सब्जी को लेकर उसे धोते, छीलते एवं काटते हैं या उबालते एवं छोंकते हैं, तब इन समस्त क्रियाओं को सम्मिलित रूप से पाक-क्रिया ही कहा जाता है। इसी प्रकार से जब हमें गेहूं को पीसते, आटा गूंथते तथा रोटी बेलकर उसे तवे पर सेंकते हैं, (UPBoardSolutions.com) तो ये समस्त क्रियाएँ भी पाक-क्रिया की ही उप-क्रियाएँ होती हैं। इस प्रकार पाक-क्रिया अपने आप में एक विस्तृत एवं व्यवस्थित क्रिया है। विभिन्न प्रकार के बर्तनों के निर्माण से भी पाक-क्रिया के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान मिला है। इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण प्रेशर कुकर है।

UP Board Solutions

प्रश्न 2:
तलने के लाभ एवं हानियाँ लिखिए।
उत्तर:
तलने के लाभ-तलकर भोजन पकाने के मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं

  1. तलकर पकाया गया भोजन अधिक स्वादिष्ट एवं रुचिकर होता है।
  2. तले हुए भोजन में एक प्रकार की मनमोहक सुगन्ध एवं आकर्षक रंग आ जाता है, जिसका खाने वाले पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
  3. तलकर पकाया गया भोजन खा लेने के बाद काफी समय तक पुनः भूख नहीं लगती।

तलने की हानियाँ:
तलकर भोजन बनाने से निम्नलिखित हानियाँ होती हैं

  1. चिकनाई के माध्यम से तलकर पकाया गया भोजन गरिष्ठ हो जाता है तथा शीघ्र नहीं पचता।
  2. तल कर पकाए गए भोजन के विटामिन तथा कुछ पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।
  3. अधिक तला हुआ भोजन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इससे पेट व गले में जलन हो सकती है।

प्रश्न 3:
पाक-क्रियाओं का पौष्टिक तत्त्वों पर क्या प्रभाव पड़ता है? [2011]
या
प्रोटीन पर पाक-क्रिया का क्या प्रभाव पड़ता है? स्पष्ट कीजिए। [2014]
उत्तर:
प्रोटीन पर पकाने का प्रभाव:
जन्तुजन्य प्रोटीन पकाने पर प्रायः कठोर हो जाने के कारण सुपाच्य नहीं रहती। वनस्पतिजन्य प्रोटीन पकाने पर कोशा-भित्तियों से बाहर आ जाती है; अतः अधिक सुपाच्य हो जाती है। भोज्य-पदार्थों को तलकर पकाने से उनमें उपस्थित प्रोटीन अत्यधिक कड़ी तथा अपाच्य हो जाती है; अत: प्रोटीनयुक्त भोज्य-पदार्थों को तलना नहीं चाहिए।

विटामिन पर पकाने का प्रभाव:
विटामिन ‘ए’ व ‘डी’ अत्यधिक उच्च ताप पर नष्ट हो जाते हैं, परन्तु भोज्य-पदार्थों को सामान्य विधि के अनुसार पकाने पर इन विटामिनों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है। विटामिन ‘बी’ पर भी ताप का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, परन्तु जल में विलेय होने के कारण भोज्य-पदार्थों (UPBoardSolutions.com) को अधिक पकाने पर इसका कुछ भाग जल के साथ ही नष्ट हो जाता है। सब्जी का हरा रंग बनाये रखने के लिए प्रयुक्त सोडा बाइकार्बोनेट विटामिन ‘बी’ को नष्ट कर देता है। इसलिए हरी सब्जियों को पकाते समय खाने के सोडे का प्रयोग नहीं करना चाहिए। विटामिन ‘सी’ भी जल में घुलनशील होता है तथा उच्च ताप पर यह नष्ट हो जाता है।

नोट- अन्य पोषक तत्त्वों पर पाक-क्रियाओं के प्रभाव का विवरण आगामी प्रश्नों में वर्णित है।

UP Board Solutions

प्रश्न 4:
तरकारियों को छीलने से क्या हानि होती है?
उत्तर:
पाक-क्रिया के लिए तरकारियों को छीला तथा काटा भी जाता है। तरकारियों के छिलकों में विटामिन व खनिज लवण पाए जाते हैं। अतः तरकारियों को छीलने से इन पोषक तत्त्वों की हानि होती है, जिनसे बचने के लिए

  1. तरकारियों को भली प्रकार धोकर छिलकायुक्त ही काटकर पकाना चाहिए। इससे छिलके में उपस्थित पोषक तत्त्व सुरक्षित रहते हैं।
  2. मोटे छिलके वाली तरकारियों के छिलके अधिक गहरे नहीं छीलने चाहिए, क्योंकि पोषक तत्त्वों की छिलकों के साथ ही निकल जाने की सम्भावना रहती है।

प्रश्न 5:
पाक-क्रिया का वसा पर क्या प्रभाव पड़ता है? [2008, 11, 12, 14]
उत्तर:
साधारणतः पाक-क्रिया का वसा पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता, परन्तु अधिक ताप पर निरन्तर गर्म करने से वसा का एक नया यौगिक बन जाता है, जिसे एक्रोलीन कहा जाता है। इस यौगिक की एक विशेष गन्ध होती है; अतः इस अवस्था में वसायुक्त भोजन में एक तीखी गन्ध आने लगती है। यह एक्रोलीन नामक यौगिक खाने योग्य नहीं होता। अत: इससे युक्त आहार ग्रहण करने से हानि हो। सकती है। यदि वसायुक्त भोजन को बार-बार गर्म किया जाए तो वह सरलता से पचने योग्य नहीं रह जाता। वसा अधिक ताप के प्रभाव से ग्लिसरॉल तथा स्निग्ध के रूप में विघटित भी हो जाती है।

UP Board Solutions

प्रश्न 6:
पाक-क्रिया का कार्बोहाइड्रेट्स पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
पाक-क्रिया का कार्बोहाइड्रेट्स पर विभिन्न प्रकार से प्रभाव पड़ता है। हम भोजन में सामान्य रूप से स्टार्च एवं शर्करा के रूप में कार्बोहाइड्रेट्स ग्रहण करते हैं। स्टार्च को जब पकाया जाता है तो वे पककर मुलायम हो जाते हैं तथा कुछ फूल जाते हैं। इस अवस्था में इनका पाचन सरल हो जाता है। यदि स्टार्च को क्वथनांक तक उबाला जाए तो इसका सेल्यूलोज वाला भाग फट जाता है। यदि इस प्रकार से पकते हुए स्टार्च में कुछ मात्रा में ठण्डा पानी मिला दिया जाए तो स्टार्च के कण अलग-अलग हो जाते हैं तथा भोज्य-पदार्थ लेई के समान हो जाता है। इससे भिन्न, यदि स्टार्च को जलरहित ही शुष्क विधि से पकाया जाए, तो स्टार्च का रंग हल्का बादामी हो जाता है। यदि कुछ अधिक ताप पर स्टार्च को गर्म किया जाए, तो उसका रंग काला हो जाता है। ताप पाकर यह स्टार्च डैक्स्ट्रीन का रूप ग्रहण कर लेता है। इस रूप में स्टार्च अधिक सुपाच्य हो जाता है। इसी प्रकार, यदि शर्करा को शुष्क अवस्था में गर्म किया जाए, तो उसका रंग भूरा हो जाता है। परन्तु यदि शर्करा को जल के साथ गर्म किया जाए, तो वह घुल जाती है तथा एक प्रकार से शर्बत का रूप ग्रहण कर लेती है।

प्रश्न 7:
पाक-क्रिया का खनिज-लवणों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
पाक-क्रिया का खनिज-लवण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। जब विभिन्न खाद्य-सामग्रियों को जल के साथ पकाया जाता है, तो विभिन्न खनिज-लवण जल में आ जाते हैं। इस अवस्था में यदि पकी हुई खाद्य-सामग्री में से अतिरिक्त पानी बहा दिया जाए तो विभिन्न खनिज लवणों के नष्ट हो जाने की सम्भावना रहती है। अतः इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि खाद्य-सामग्री को केवल उतने ही जल में उबाला जाए जितना पकाने में प्रयुक्त हो जाए। (UPBoardSolutions.com) इसके अतिरिक्त इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि सब्जियों को पकाने से पूर्व अधिक समय तक काटकर नहीं रखना चाहिए। सब्जियों को काटने एवं छीलने से पहले ही अच्छी तरह से धो लेना। चाहिए। छीलकर एवं काटकर धोने से बहुत-से खनिज-लवण नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि यदि खाद्य सामग्री को सावधानीपूर्वक पकाया जाए, तो खनिज लवणों को नष्ट होने से बचाया जा सकता है।

प्रश्न 8:
घर में अनाजों की सुरक्षा आप कैसे करेंगी?
उत्तर:
घर में अनाजों की सुरक्ष: के लिए निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए

  1. खुले हुए अनाज को समय-समय पर सुखाना चाहिए।
  2.  अनाजों को घुन, सुरसुरी आदि से बचाने के लिए उसमें कोई दवा; जैसे-गोलियाँ आदि; रखनी चाहिए।
  3. अनाजों को सीलबन्द बर्तनों में रखना चाहिए विशेषकर धातु के बने ड्रम आदि इस कार्य के लिए अधिक उपयुक्त रहते हैं।
  4. अनाजों में जल की मात्रा कम-से-कम रहनी चाहिए, ताकि उन पर फफूद, घुन आदि न लग सकें। इसके लिए उन्हें पूर्णतः सूखा हुआ रखना चाहिए।

प्रश्न 9:
सब्जियों का हमारे जीवन में क्या महत्त्व है? सब्जियों को काटते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? [2009, 10, 11]
उत्तर:
सब्जियाँ हमारे भोजन का अनिवार्य अंग मानी जाती हैं। सब्जियों को सुरक्षात्मक खाद्यसामग्री माना जाता है। सब्जियाँ विभिन्न विटामिन्स एवं खनिज लवणों की उत्तम स्रोत होती हैं। ये विटामिन एवं खनिज-लवण हमारे स्वास्थ्य में विशेष रूप से सहायक होते हैं। सब्जियों में रेशों की भरपूर मात्रा होती है; अतः सब्जियाँ कब्ज-निवारक होती हैं। सब्जियाँ मल-विसर्जन में सहायक होती हैं। सब्जियाँ शरीर में अम्ल एवं क्षार के सन्तुलन को बनाये रखने में सहायक होती हैं। सब्जियाँ भूख बढ़ाती हैं। सब्जियों के समावेश से हमारा भोजन अधिक रुचिकर एवं विविधतापूर्ण बनता है।
सब्जियों को काटते एवं पकाते समय कुछ बातों को अनिवार्य रूप से ध्यान में रखना चाहिए

  1. सब्जियों को सदैव अच्छी तरह से धोकर एवं साफ करके ही छीलना या काटना चाहिए। यदि आवश्यक न हो तो सब्जियों का छिलका नहीं उतारना चाहिए।
  2. सब्जियों को छीलने एवं काटने के उपरान्त बिल्कुल नहीं धोना चाहिए।
  3.  सब्जियों को सदैव ढककर पकाना चाहिए।
  4. सब्जियों को केवल उतने ही जल में पकाना चाहिए जितना जल उन्हें गलाने के लिए आवश्यक हो।
  5. सब्जियों को अधिक भूनना या तलना नहीं चाहिए। तैयार सब्जियों को बार-बार गरम भी नहीं करना चाहिए।

UP Board Solutions

प्रश्न 10:
भोजन पकाने से पहले, पकाते समय और परोसते समय किस प्रकार की स्वच्छता रखनी चाहिए और क्यों ? [2009, 12, 13, 15, 18]
उत्तर:
भोजन पकाने से पहले हमें देखना चाहिए कि जिस बर्तन में भोजन पकाया जाना है वह अच्छी तरह साफ है या नहीं। अगर किसी प्रकार की गन्दगी उसे बर्तन में लगी हुई हो तो उसे अच्छी तरह साफ कर लेना चाहिए। भोजन पकाते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि (UPBoardSolutions.com) भोजन आवश्यकता से अधिक न गल जाए क्योंकि भोजन पकाते समय अगर अधिक गल जाता है तो उसके पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार भोजन परोसते समय हमारे हाथ एवं बर्तन अच्छी तरह साफ होने चाहिए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
खाद्य सामग्री को क्यों पकाया जाता है? [2011, 13, 14, 15]
या
भोजन पकाने के प्रमुख उद्देश्य क्या हैं? [2007, 10, 11]
उत्तर:
खाद्य-सामग्री को स्वादिष्ट, सुपाच्य एवं रोगाणुमुक्त बनाने हेतु तथा विविधता प्रदान करने के लिए पकाया जाता है।

प्रश्न 2:
भोजन पकाने की विधियों के नाम लिखिए। [2007, 09, 10, 17, 18]
उत्तर:
उबालना, तलना, वाष्प द्वारा पकानां तथा भूनना एवं सेंकना भोजन पकाने की मुख्य विधियाँ हैं।

प्रश्न 3:
भोजन को उबालने से अच्छा भाप द्वारा पकाना होता है क्यों? दो कारण लिखिए।
यो
भोजन पकाने की कौन-सी विधि सर्वोत्तम है और क्यों? [2008]
उत्तर:
भोजन पकाने की सर्वोत्तम विधि उसे भाप द्वारा पकाना होती है। इसके दो मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

  1. भोजन सुपाच्य तथा स्वादिष्ट रहता है।
  2. भोजन के पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते।

UP Board Solutions

प्रश्न 4:
भोजन को बार-बार गर्म करने से क्या हानि होती है?
उत्तर:
बार-बार गर्म करने से भोजन के पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 5:
धीमी आग पर भोजन पकाने से क्या लाभ हैं?
उत्तर:
धीमी आग पर पकाए गए भोजन के पोषक तत्त्व सुरक्षित रहते हैं।

प्रश्न 6:
भाप के दबाव से भोजन कैसे पकता है?
उत्तर:
भाप के दबाव के कारण प्रेशर कुकर में उष्णता का घनत्व बढ़ जाने के कारण (UPBoardSolutions.com) भोजन कम समय में ही भली-भाँति पक जाता है।

प्रश्न 7:
भूनने व सेंकने में क्या अन्तर है? [2015, 16, 17]
उत्तर:
भूनते समय भोज्य वस्तु आग के प्रत्यक्ष सम्पर्क में नहीं आती, जबकि सेंकने में उसे सीधे अंगारों अथवा विद्युत सलाखों के ऊपर सेंका जाता है।

प्रश्न 8:
भाप द्वारा भोजन पकाने से क्या लाभ हैं? [2008]
उत्तर:
भाप द्वारा भोजन पकाने से उसके अधिकांश पौष्टिक तत्त्व सुरक्षित रहते हैं।

प्रश्न 9:
तले हुए भोजन का अधिक सेवन करने से क्या हानि है?
उत्तर:
तला हुआ भोजन गरिष्ठ एवं कुपाच्य होता है। अतः अधिक सेवन करने पर अपच एवं कब्ज़ उत्पन्न करता है।

प्रश्न 10:
दूध को पकाने से क्या लाभ है?
उत्तर:
पकाए जाने पर दूध रोगाणुमुक्त तथा सुपाच्य हो जाता है।

प्रश्न 11:
मक्खन को गर्म करने से क्या हानि सम्भव है?
उत्तर:
गर्म करने पर मक्खन में प्राकृतिक रूप से उपस्थित विटामिन ‘ए’ नष्ट हो जाता है।

प्रश्न 12:
गृहिणी के लिए हाथ व नाखून स्वच्छ रखना क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
हाथ वे नाखूनों की गन्दगी में रोगाणु उपस्थित रहते हैं, जो कि भोजन पकाते एवं  (UPBoardSolutions.com) परोसते समय भोजन में मिल सकते हैं। अत: प्रत्येक गृहिणी को अपने हाथ व नाखून अच्छी तरह साफ रखने चाहिए।

UP Board Solutions

प्रश्न 13:
आलू को बिना छीले पकाने से क्या लाभ हैं?
उत्तर:
आलू के छिलके के कारण उसका विटामिन ‘सी’ सुरक्षित रहता है।

प्रश्न 14:
हरी शाक-सब्जियों को काटने से पूर्व धोना चाहिए। क्यों? [2007, 11, 15, 18]
उत्तर:
यदि सब्जियों को छीलकर एवं काटकर धोया जाता है, तो उनके कुछ विटामिन एवं खनिज-लवण पानी में बह जाते हैं। अतः इन खनिज तत्त्वों की सुरक्षा के लिए सब्जियों को छीलने एवं काटने से पहले उन्हें धो लेना चाहिए।

प्रश्न 15:
कच्चा भोजन खाने से क्या हानि हो सकती है?
उत्तर:
कच्चा भोजन खाने से खाद्य-पदार्थों के साथ आये हुए रोगों के जीवाणु शरीर में पहुँचेंगे।

प्रश्न 16:
खाद्य-सामग्री को पकाते समय ढककर रखना क्यों आवश्यक होता है?
उत्तर:
खाद्य सामग्री के पोषक तत्त्वों एवं सुगन्ध को नष्ट होने से बचाने के लिए तथा शीघ्र पकाने के लिए उसे ढककर रखना आवश्यक होता है।

प्रश्न 17:
भोजन पकाने की प्रक्रिया में पौष्टिक तत्त्वों की सुरक्षा के उपाय लिखिए।
उत्तर:
भोजन पकाने की प्रक्रिया में पौष्टिक तत्त्वों की सुरक्षा हेतु उपाय अग्रलिखित हैं

  1. भोजन पकाते समय बर्तन को खुला न रखें। बर्तन खुला रखने पर भोजन वायु के सम्पर्क में आने से कीटाणु व धूल का प्रवेश होता है।
  2. भोजन देर तक न पकाएँ। इससे भोजन के पौष्टिक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।
  3. आवश्यकता से अधिक मसालों का प्रयोग कदापि न करें।

UP Board Solutions

प्रश्न 18:
गहरी चिकनाई और उथली चिकनाई में तलने की विधियों के बारे में लिखिए। [2007]
उत्तर:
तलने की गहरी चिकनाई विधि:
इस विधि में गहरी कड़ाही प्रयोग में लाई जाती है और काफी मात्रा में घी या तेल में भोज्य-पदार्थ को डालकर तला जाता है; जैसे-पूड़ी-कचौरी, पकौड़ी, समोसे आदि।

तलने की उथली चिकनाई विधि:
इस विधि में चौड़ी व उथली कंड़ाहीं या तवा प्रयोग में लाया जाता है जिसमें (UPBoardSolutions.com) थोड़ी-सी ही चिकनाई डालकर तला जाता है; जैसे—पराँठे, आलू की टिकिया, आमलेट, चीले आदि।

प्रश्न 19:
भोजन परोसने की दो मुख्य शैलियाँ कौन-सी हैं ? [2008, 10]
उत्तर:
भोजन परोसने की दो मुख्य शैलियाँ हैं

  1. देशी शैली तथा
  2. विदेशी या परम्परागत शैली।

प्रश्न 20:
जल में घुलनशील विटामिनों के नाम लिखिए। [2011]
उत्तर:
जल में घुलनशील विटामिन हैं-विटामिन ‘बी’ कॉम्प्लेक्स, विटामिन ‘सी’ तथा विटामिन ‘पी।

प्रश्न 21:
वसा में घुलनशील विटामिनों के नाम लिखिए। [2011, 13]
उत्तर:
जल में घुलनशील विटामिन हैं विटामिन ‘ए’, विटामिन ‘डी’, विटामिन ‘ई’ तथा विटामिन ‘के’।

प्रश्न 22:
किन-किन फलों में विटामिन ‘सी’ प्रचुर मात्रा में पाया जाता है? [2009, 11]
उत्तर:
समस्त खट्टे फलों अर्थात् नींबू, नारंगी, सन्तरा, अमरूद, अनन्नास तथा तरबूज में विटामिन ‘सी’ प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

प्रश्न 23:
कच्ची सब्जियों के खाने से शरीर को कौन-से पोषक तत्त्व अधिक मात्रा में मिलेंगे ? [2009, 13, 15]
उत्तर:
कच्ची सब्जियों के खाने से शरीर को खनिज, विटामिन्स आदि पोषक तत्त्व प्राप्त होते हैं।

UP Board Solutions

प्रश्न 24:
शरीर के लिए भोजन क्यों आवश्यक है? [2015, 17]
उत्तर:
जीवित प्राणियों के लिए भोजन ग्रहण करना अनिवार्य है। शरीर की वृद्धि एवं विकास के लिए, ऊर्जा प्राप्त करने के लिए, रोगों से मुकाबला करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए तथा नियमित रूप से भूख शान्त करने के लिए भोजन ग्रहण करना आवश्यक है।

प्रश्न 25:
भोजन में कौन-से आवश्यक पोषक तत्त्व पाये जाते हैं? [2015]
या
भोजन के पौष्टिक तत्त्वों के नाम बताइए। [2016]
उत्तर:
भोजन के आवश्यक पोषक तत्त्व हैं–प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, (UPBoardSolutions.com) विटामिन, खनिज तथा जल।

प्रश्न 26:
पौष्टिक भोजन से क्या तात्पर्य है? [2016]
उत्तर:
जो भोजन हमारे शरीर को पुष्ट कर रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाता है, पौष्टिक भोजन कहलाता है।

प्रश्न 27:
हमारे शरीर में विटामिन ‘सी’ के दो कार्य लिखिए। [2016]
उत्तर:
1. रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
2. दाँतों तथा मसूड़ों को स्वस्थ रखता है।

UP Board Solutions

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न:
निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. पाक-क्रिया द्वारा खाद्य सामग्री बन जाती है
(क) अपाच्य
(ख) सुपाच्य (ग) कुपाच्य
(घ) कोई प्रभाव नहीं पड़ता

2. भोजन बनाने की सर्वोत्तम विधि है [2015]
(क) उबालना
(ख) भूनना
(ग) तलना
(घ) सिझाना (स्ट्यू करना)

3. दूध को गर्म करने से नष्ट होते हैं [2008]
या
दूध को उबालने पर निम्नलिखित में से क्या नष्ट हो जाते हैं? [2014, 17]
(क) उसके पोषक तत्त्वे
(ख) उसके कीटाणु
(ग) उसका स्वाद
(घ) कुछ भी नहीं

4. दूध बैक्टीरिया रहित हो जाता है
(क) गर्म करने पर
(ख) ठण्डा करने पर
(ग) उबालने पर
(घ) पानी मिलाने पर

5. सब्जियों को लोहे की कड़ाही में पकाने से
(क) लौह तत्त्व की प्राप्ति होती है।
(ख) विषैलापन आ जाता है।
(ग) स्वाद नष्ट हो जाता है।
(घ) पौष्टिक तत्त्वों की प्राप्ति होती है।

UP Board Solutions

6. डबलरोटी व बिस्कुट बनाने की विधि कहलाती है
(क) ग्रिलिंग
(ख) रोस्टिग
(ग) बेकिंग
(घ) टोस्टिंग

7. भोजन को पकाने से नष्ट न होने वाला विटामिन कौन-सा है?
(क) ‘बी’
(ख) ‘सी’
(ग) “के
(घ) ‘ए’

8. सब्जियों को कब धोना चाहिए ?
(क) काटने के बाद
(ख) छीलने के बाद
(ग) छीलने से पहले
(घ) कभी भी

9. सब्जी को बार-बार गर्म करने से नष्ट हो जाता है, उसका
(क) थायमीन
(ख) एस्कॉर्बिक एसिड
(ग) रिबोफ्लेविन
(घ) निकोटिनिक एसिड

10. बेकिंग पाउडर अथवा खाने का सोडा मिलाकर पकाने से तरकारियों का नष्ट होने वाला पोषक तत्त्व है
(क) विटामिन ‘बी’
(ख) प्रोटीन
(ग) कार्बोज
(घ) खनिज-लवण

11. भोजन पकाने में किसका प्रयोग हानिकारक होता है? [2007, 16, 18]
(क) घी
(ख) मसाले
(ग) सोडा
(घ) इनमें से किसी को नहीं

12. भोजन परोसने की किस शैली में खड़े-खड़े भोजन किया जाता है?
(क) पाश्चात्य शैली
(ख) भारतीय शैली
(ग) बुफे शैली
(घ) इनमें से कोई नहीं

13. भोजन को स्वास्थ्यवर्द्धक बनाने के लिए गृहिणी को विशेष जानकारी होनी चाहिए
(क) भोजन को पकाने की
(ख) भोजन को तलने की
(ग) भोजन में पाए जाने वाले तत्त्वों की
(घ) भोजन परोसने की

UP Board Solutions

14. किस प्रकार भोजन पकाने से पोषक तत्त्व सुरक्षित रहते हैं ? [2009, 10, 15, 18]
(क) उबालकर
(ख) भूनकर
(ग) तलकर
(घ) भाप द्वारा

15. विटामिन ‘डी’ का स्रोत है [2008]
(क) दालें
(ख) सूर्य किरणें
(ग) खट्टे फल
(घ) सब्जियाँ

16. स्कर्वी रोग किस विटामिन की कमी से होता है? [2008]
(क) विटामिन ‘ए’
(ख) विटामिन ‘डी’
(ग) विटामिन ‘सी’
(घ) विटामिन ‘बी’

17. दूध में किस विटामिन का अभाव रहता है? [2008, 16]
(क) ‘ए’
(ख) ‘डी’
(ग) ‘सी’
(घ) ‘के’

18. विटामिन डी की कमी से बच्चों में कौन-सा रोग हो जाता है ? [2009, 17]
(क) खुजली
(ख) पेचिस
(ग) रतौंधी
(घ) रिकेट्स

UP Board Solutions

19. खट्टे फलों में कौन-सा विटामिन अधिक मात्रा में पाया जाता है? [2009, 10, 13, 14]
(क) विटामिन ‘ए’
(ख) विटामिन ‘बी’
(ग) विटामिन ‘सी’
(घ) विटामिन ‘डी’

20. प्रोटीन का मुख्य स्रोत है [2009, 12]
(क) चावल
(ख) चीनी
(ग) दूध
(घ) अंगूर

21. रतौंधी किस विटामिन की कमी से होता है ? [2009, 17]
(क) विटामिन ‘ए’
(ख) विटामिन ‘बी’
(ग) विटामिन ‘सी’ ।
(घ) विटामिन ‘डी’

22. विटामिन का कौन-सा समूह वसा में घुलनशील है ? [2009]
(क) ए, बी, सी, डी
(ख) ए, बी, ई, के
(ग) ए, सी, ई, के
(घ) ए, डी, ई, के

23. भोजन पकाने में समय की बचत होती है [2009]
(क) तलकर
(ख) उबालकर
(ग) प्रेशर कुकरे द्वारा
(घ) भूनकर

24. विटामिन ‘ए’ को उत्तम स्रोत है [2011, 13, 16]
(क) दाल
(ख) दूध
(ग) खट्टे फल
(घ) पीली और हरी सब्जियाँ

25. भोज्य पदार्थों में ऊर्जा का प्रमुख साधन है [2011]
(क) प्रोटीन
(ख) विटामिन
(ग) कार्बोहाइड्रेट
(घ) खनिज लवण

26. लौह तत्त्व की कमी से कौन-सा रोग हो जाता है? [2011, 12, 15 ]
(क) बेरी-बेरी
(ख) एनीमिया
(ग) मरास्मस
(घ) तपेदिक

27. भोजन पकाने की विधि है [2014]
(क) उबालना
(ख) तलनी
(ग) भाप द्वारा
(घ) ये सभी

28. जल में घुलनशील विटामिन हैं [2013, 15, 16, 17]
(क) विटामिन A, B, C
(ख) विटामिन B, C
(ग) विटामिन A, D.
(घ) विटामिन E, K

29. वसा में कौन-सा विटामिन घुलनशील नहीं है? [2013]
(क) विटामिन-ए
(ख) विटामिन-ई
(ग) विटामिन-बी
(घ) विटामिन-के

30. शरीर-निर्माण में सहायक है [2014, 16]
(क) प्रोटीन
(ख) वसा
(ग) विटामिन
(घ) कार्बोहाइड्रेट

31. प्रोटीन पाया जाता है [2012, 14]
(क) मिठाई में
(ख) दालों/सोयाबीन में
(ग) सन्तरा में
(घ) आलू में

32. प्रोटीन का मुख्य कार्य है [2018]
(क) शरीर की वृद्धि तथा विकास
(ख) ऊर्जा प्रदान करना
(ग) अस्थि-निर्माण करना
(घ) हृदय गति सामान्य रखना

33. प्रोटीन की कमी से कौन-सा रोग हो जाता है? [2018]
(क) बेरी-बेरी
(ख) एनीमिया
(ग) मरास्मस
(घ) तपेदिक

UP Board Solutions

34. खाना खाने से पहले हाथ धोने चाहिए [2013]
(क) राख से
(ख) अपमार्जक से
(ग) पानी से
(घ) साबुन एवं पानी से

35. किस प्रकार के भोज्य पदार्थ हमें रोगों से बचाते हैं? [2009, 16, 17]
(क) बिस्कुट
(ख) चावल
(ग) ताजे मौसमी फल एवं हरी सब्जियाँ
(घ) चीनी

36. सूर्य की रोशनी हमें देती है [2016]
(क) विटामिन ‘सी’
(ख) विटामिन ‘डी’
(ग) विटामिन ‘ए’
(घ) इनमें से कोई नहीं

37. विटामिन ‘सी’ का सबसे अच्छा स्रोत है [2015, 15, 17, 18]
(क) मूंग दाल
(ख) आँवला
(ग) दही
(घ) चावल

38. गाजर, पपीता और आम से मिलता है [2016, 17]
(क) कैल्सियम
(ख) प्रोटीन
(ग) विटामिन ‘ए’
(घ) लौह तत्त्व

39. किसके प्रयोग से तुरन्त ऊर्जा मिलती है? [2016, 17, 18]
(क) विटामिन
(ख) प्रोटीन
(ग) ग्लूकोज
(घ) खनिज लवण

40. खाद्य-पदार्थों का संरक्षण किया जा सकता है [2016]
(क) सुखाकर
(ख) चाशनी में रखकर
(ग) तेल व नमक द्वारा
(घ) इन सभी के द्वारा

UP Board Solutions

उत्तर:
1. (ख) सुपाच्य,
2. (क) उबालना,
3. (ख) उसके कीटाणु,
4. (ग) उबालने पर,
5. (क) लौह तत्व की प्राप्ति होती है,
6. (ग) बेकिंग,
7, (ख) ‘सी’,
8. (ग) छीलने से पहले,
9. (ख) एस्कॉर्बिक एसिड,
10. (क) विटामिन ‘बी’,
11. (ग) सोडा,
12. (ग) बुफे शैली,
13. (ग) भोजन में पाये जाने वाले तत्वों की,
14. (घ) भाप द्वारा,
15. (ख) सूर्य किरणें,
16. (ग) विटामिन ‘सी’,
17. (ग) ‘सी’,
18. (घ) रिकेट्स,
19. (ग) विटामिन ‘सी’,
20. (ग) दूध,
21. (क) विटामिन ‘ए’,
22. (घ) ए, डी, ई, के,
23. (ग) प्रेशर कुकर द्वारा,
24. (ख) दूध,
25. (ग) कार्बोहाइड्रेट,
28 (ख) एनीमिया,
27. (घ) ये सभी,
28. (ख) विटामिन B,C.
29. (ग) विटामिन-बी,
30. (क) प्रोटीन,
31. (ख) दालों/सोयाबीन में,
32. (क) शरीर की वृद्धि तथा विकास,
33. (ग) मरास्मस,
34. (घ) साबुन एवं पानी से,
35. (ग) ताजे मौसमी फल एवं हरी सब्जियां,
36. (ख) विटामिन डी’,
37. (ख) आँवला,
38. (ग) विटामिन ‘ए’,
39. (ग) ग्लूकोज,
40. (घ) इन सभी के द्वारा।

We hope the UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 15 भोजन पकाना और परोसना तथा तत्त्वों की सुरक्षा help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 15 भोजन पकाना और परोसना तथा तत्त्वों की सुरक्षा, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 16 विभिन्न रोगों में रोगी का भोजन

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 16 विभिन्न रोगों में रोगी का भोजन

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Home Science . Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 16 विभिन्न रोगों में रोगी का भोजन.

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
रोगी के भोजन से क्या तात्पर्य है? रोगी को भोजन देते समय आप किन-किन बातों का ध्यान रखेंगी?
या
रोगी के स्वास्थ्य-लाभ के समय दिये जाने वाले भोजन का विशेष चुनाव करना चाहिए। क्यों?
या
रोगी के आहार कितने प्रकार के होते हैं? रोगी के आहार को तैयार करते समय किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए? [2008]
उत्तर:
रुग्णावस्था में आहार

रुग्णावस्था के परिणाम हैं
(1) शारीरिक दुर्बलता,
(2) पाचन शक्ति का ह्रास,
(3) पोषक तत्त्वों की कमी तथा
(4) शरीर के विभिन्न अंगों में शिथिलता। इन विशेष परिस्थितियों में रोगी को तला, भुना अथवा मसालों युक्त भोजन दिया जाना अनुपयुक्त रहता है। उसे एक विशिष्ट प्रकार के आहार की आवश्यकता होती है। रोगी को दिया जाने वाला भोजन हल्का, (UPBoardSolutions.com) सन्तुलित, ताजा, आवश्यक पोषक तत्वों से युक्त तथा पर्याप्त ऊर्जा एवं ऊष्मा प्रदान करने वाला होना चाहिए। इसके अतिरिक्त रुग्णावस्था में दिया जाने वाला भोजन रोगों पर भी आधारित होता है। सामान्यतः रोगी के आहार में निम्नलिखित

परिवर्तन किए जाने चाहिए

  1. शुद्ध व गाढ़े दूध के स्थान पर पानी मिला अथवा सप्रेटा दूध उपयोग में लाया जाना चाहिए।
  2. आहार में वसा कम होनी चाहिए।
  3.  खाद्यान्नों, आलू व अरवी आदि की मात्रा कम-से-कम होनी चाहिए।
  4. विटामिन व खनिज-लवणयुक्त तरकारियाँ अधिक प्रयोग में लाई जानी चाहिए।
  5. (फलों का सेवन अधिक कराया जाना चाहिए।
  6. आहार हर प्रकार से सुपाच्य होना चाहिए।

UP Board Solutions

इस प्रकार रुग्णावस्था में आहार को उतना ही महत्त्व है जितना कि रोगोपचार के लिए दी जाने वाली औषधियों का, क्योंकि औषधियाँ यदि रोगी को रोगमुक्त करती हैं, तो उपयुक्त आहार उसे स्वास्थ्य एवं शक्ति प्रदान करता है।

रोगी को भोजन देते समय ध्यान रखने योग्य बातें

रोगी का भोजन क्या और कैसा हो? इसके लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना अत्यधिक आवश्यक है–
(1) सुपाच्य एवं हल्का भोजन:
रोगी को सहज ही पचने वाला भोजन दिया जाना चाहिए जिससे कि उसका (UPBoardSolutions.com) अवशोषण जल्द हो सके। रोगी को सामान्यत: बिस्कुट, साबूदाना, सूजी, दलिया, कस्टर्ड, फल तथा उबली हुई सब्जियाँ दी जानी चाहिए।

(2) उच्च कैलोरीयुक्त आहार:
प्रायः ज्वर की अवस्था में शरीर के तापमान में वृद्धि होती है, जिसके कारण शारीरिक उष्णता एवं शक्ति की हानि होती है; अत: रोगी को 3000-4000 कैलोरी ऊर्जा प्रदान करने वाला आहार देना चाहिए। लम्बी अवधि के रोगी को 2000-3000 कैलोरी ऊर्जा देने वाला भोजन दिया जाना चाहिए। नियमानुसार रोगी को शारीरिक भार की दृष्टि से 80 कैलोरी/किलोग्राम के हिसाब से ऊर्जायुक्त आहार मिलना चाहिए।

(3) अतिरिक्त प्रोटीनयुक्त आहार:
सामान्यत: सभी रोगों में दुर्बलता उत्पन्न होती है तथा आन्तरिक ऊतकों की क्षति होती है जिसका एकमात्र विकल्प प्रोटीनयुक्त आहार है। साधारणत: रोगी को 100-150 ग्राम प्रोटीन प्रतिदिन मिलनी चाहिए। रोगी को भोजन में 300-350 कैलोरी प्रोटीन भोज्यपदार्थों से प्राप्त होनी चाहिए। प्रोटीन-प्राप्त करने के लिए दूध सर्वोत्तम आहार है। यदि वसा की मात्रा कम करनी है तो सप्रेटा दूध प्रयुक्त करना चाहिए। बच्चों को फटे दूध का पानी देना लाभप्रद रहता है। दूध के अतिरिक्त सरलता से पाचनशील दालों के सूप, मटन सूप, अण्डे आदि भी रोगी को दिए जाने । चाहिए। कुछ रोग ऐसे भी होते हैं जिनमें रोगी को बहुत कम प्रोटीनयुक्त आहार ही दिया जाता है।

(4) कार्बोजयुक्त आहार:
सामान्यतः रोगी को वसायुक्त भोज्य-पदार्थ कम-से-कम दिए जाते हैं। अत: रोगी की ऊर्जा पूर्ति के लिए उसके आहार में पर्याप्त कार्बोजयुक्त भोज्य-पदार्थों का होना बहुत आवश्यक है। इसके लिए रोगी को ग्लूकोज वे लैक्टोज के रूप में शक्कर दी जा सकती है। इसका अतिरिक्त लाभ यह है कि यह एन्जाइम क्रिया के बिना ही रक्त प्रवाह में सरलता से अवशोषित
हो जाती है।

(5) विटामिनयुक्त भोजन:
लगभग सभी रोगों में रोगी की पाचन शक्ति कुप्रभावित होती है। चयापचय की क्रिया को प्रोत्साहित करने के लिए विटामिन ‘ए’, ‘बी’ कॉम्पलैक्स तथा एस्कॉर्बिक एसिडयुक्त भोज्य-पदार्थों का सेवन रोगी के लिए आवश्यक होता है। इसके लिए उसे दूध, अण्डा तथा (UPBoardSolutions.com) हरी शाक-सब्जियों का दिया जाना लाभप्रद रहता है।

UP Board Solutions

(6) खनिज-लवणयुक्त आहार:
नमकीन सूप व रस तथा नमकीन भोज्य-पदार्थों का सेवन कराकर रोगी की नमक की आवश्यकता की पूर्ति की जा सकती है। दूध, हरी शाक-सब्जियों, दालों व अण्डा आदि को देने से रोगी को कैल्सियम, लोहा तथा फॉस्फोरस आदि प्राप्त हो सकते हैं। पोटैशियम की कमी को दूर करने के लिए फलों के रस तथा दूध उत्तम स्रोत हैं। उच्च रक्त चाप जैसे कुछ रोगों में व्यक्ति को नमक बहुत कम दिया जाता है।

(7) तरल पदार्थ:
पेय पदार्थ; जैसे फलों के रस, सूप, चाय इत्यादि; रोगी को 2500 से 5000 मिलीलीटर तक प्रतिदिन दिए जाने चाहिए। ज्वर आदि के कारण रोगी के शरीर से पसीने के द्वारा तथा अन्य उत्सर्जन क्रियाओं के द्वारा पानी की बहुत हानि होती है। इसके लिए रोगी को उबालकर ठण्डा किया हुआ पानी अथवा जीवाणु-रोधक फिल्टर द्वारा छाना हुआ पानी पर्याप्त मात्रा में देना चाहिए।

प्रश्न 2:
रोगी को दिए जाने वाले तरल भोजन कौन-कौन से होते हैं? इन्हें तैयार करने की विधियों का भी वर्णन कीजिए। [2011]
या
फटे दूध का पानी किस रोगी को देते हैं? इसे बनाने की क्या विधि है? [2011, 12, 13, 15, 16]
या
फटे दूध का पानी (whey-water) क्यों उपयोगी है तथा इसे किस रोगी को देंगी?
या
चार तरल आहारों के नाम बताइए।
या
तरल आहार से आप क्या समझते हैं? [2009, 12, 15]
उत्तर:
रोगी के लिए आदर्श तरल आहार

तरल भोजन रोगियों का महत्त्वपूर्ण आहार है। यह हल्का एवं सुपाच्य होता है तथा (UPBoardSolutions.com) रोगी में जलअल्पता (डी-हाइड्रेशन) की स्थिति उत्पन्न नहीं होने देता। तरल भोजन के कुछ मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं

  1. फटे दूध का पानी,
  2.  टोस्ट का पानी,
  3. जौ का पानी,
  4. चावल का पानी,
  5. दाल का सूप,
  6. टमाटर का सूप,
  7. फलों का रस,
  8. आम का पना,
  9.  मांस का सूप तथा
  10.  अण्डे का फ्लिप।

इन तरल आहारों को तैयार करने की विधि तथा उनके उपयोग का विवरण निम्नलिखित है
(1) फटे दूध का पानी:
यह प्रायः बच्चों तथा मोतीझरा अथवा मियादी ज्वर के रोगियों के लिए उपयुक्त रहता है। लगभग 1/2 लीटर दूध साफ बर्तन में उबालें तथा उबाल आते ही उसमें टाटरी अथवा नींबू के रस की कुछ बूंदें डाल दें। दूध के फटने से पानी व छेना अलग-अलग हो जाता है। बर्तन (UPBoardSolutions.com) को अधिक हिलाये बिना पानी को किसी दूसरे साफ बर्तन में छान लेना चाहिए। इसमें स्वाद के अनुसार नमक मिलाया जा सकता है। इसे दिन में 2-3 बार रोगी को देना चाहिए।’

UP Board Solutions

(2) टोस्ट का पानी:
हल्का एवं कार्बोजयुक्त होने के कारण टोस्ट का पानी लगभग सभी प्रकार के रोगियों को दिया जा सकता है। डबल रोटी के टुकड़ों को धीमी आग पर अच्छी तरह सेकिए। अब इन्हें एक बर्तन में रखकर खोलता हुआ पानी इतना डालिए कि टोस्ट पूरी तरह से डूब जाएँ तथा पानी ऊपर रहे। अब लगभग 15-20 मिनट तक इन्हें पानी में पड़ा रहने दीजिए। अब एक स्वच्छ कपड़े में से पानी छान लें। स्वादानुसार नमक अथवा चीनी मिलाकर रोगी को दीजिए।

(3) जौ का पानी:
एक बड़ी चम्मच पिसी हुई जो लेकर अच्छी तरह साफ कर लें। आधा लीटर पानी एक पतीली में लेकर आग पर चढ़ा दें। पानी उबल जाने पर उसमें जौ डालकर धीमी आग पर अच्छी तरह से पकाएँ। अब एक स्वच्छ कपड़े में पानी को छानकर उसमें नींबू का रस, नमक तथा पिसी हुई काली मिर्च डालकर रोगी को दें। जौ का पानी पेचिश तथा गुर्दे के रोगियों को देना लाभप्रद रहता है।

(4) चावल का पानी:
एक बड़ी चम्मच चावल लेकर अच्छी तरह धोकर साफ कर लें। अब इन्हें आधा लीटर पानी में डालकर आग पर चढ़ा दें। चावलों के गलने पर बर्तन को आग पर से उतार लें। एक स्वच्छ कपड़े में से शेष पानी को छान लें। अब इसमें स्वादानुसार नमक व नींबू का रस डालकर रोगी को दें। चावल का पानी पेचिश, अतिसार तथा टायफाइड के रोगियों को देना अत्यन्त लाभप्रद रहता है।

(5) दाल का सूप:
एक बड़ी चम्मच मूंग की दाल को बीनकर व धोकर साफ कर लें। अब इसे किसी बर्तन में आधा लीटर पानी डालकर आग पर चढ़ा दें। धीमी आग पर इसे 15-20 मिनट तक पकाएँ। दाल के अच्छी तरह गल जाने पर शेष पानी को किसी स्वच्छ कपड़े में छान लें। अब इसमें स्वादानुसार नमक डालकर रोगी को दें। मोतीझरा अथवा मियादी ज्वर के रोगी के लिए दाल का सूप सर्वोत्तम रहता है।

(6) टमाटर का सूप:
250 ग्राम पके टमाटर पानी में अच्छी तरह धोकर किसी बर्तन में आधा लीटर पानी डालकर आग पर चढ़ा दें। जब टमाटर गल जाएँ तो उन्हें कुचल व मसलकर किसी बर्तन में छान लें। यदि रोगी को घी लेने की अनुमति हो, तो घी व जीरे का छौंक लगाएँ। अब स्वादानुसार (UPBoardSolutions.com) नमक व पिसी हुई काली मिर्च डाल दें। यदि रोगी को घी लेना मना हो, तो बिना छौंक लगाए ही सुप देना उचित रहता है। इसी प्रकार अन्य सब्जियों; जैसे–पालक, गाजर, लौकी आदि; का भी सूप तैयार किया जा सकता है। इस प्रकार के सूप विटामिन तथा खनिज लवणों से भरपूर होते हैं।

(7) फलों का रस:
मौसमी, सन्तरा, अनार व अँगुर आदि के रस रोगियों के लिए अत्यधिक उपयोगी रहते हैं। रोगी को सदैव अच्छे व ताजे फलों का रस देना चाहिए, क्योंकि सड़े-गले फलों का रस बेस्वाद तथा हानिकारक होता है। रस निकालने से पूर्व फलों को अच्छी प्रकार पानी में धो लेना चाहिए। हाथ की अथवा बिजली की मशीन द्वारा फलों का रस निकालकर उसे एक स्वच्छ कपड़े में छन लेना चाहिए। अब इसमें स्वादानुसार नमक एवं पिसी हुई काली मिर्च डालकर रोगी को देना चाहिए।

UP Board Solutions

(8) आम का पना:
कच्चे आम को राख में भूनकर तथा ठण्डा करके उसका छिलका उतार लेते हैं। अब छिले हुए आम को अच्छी तरह मथकर उसका गूदा अलग कर लेते हैं। गूदे को ठण्डे पानी में घोलकर तथा रोगी की रुचि के अनुसार इसमें नमक, पिसी काली मिर्च, भुना हुआ जीरा, हरे पुदीने का रस व चीनी आदि मिला देते हैं। आम का पनी लू से पीड़ित व्यक्तियों के लिए अत्यन्त लाभप्रद रहता है।

(9) मांस (मटन) का सूप:
250 ग्राम बकरे अथवा मुर्गी का मांस अच्छी प्रकार पानी में साफ कर किसी बर्तन में एक लीटर पानी में डालकर धीमी आग पर निरन्तर उबालें। जब यह भली प्रकार न जे.ए, तो बर्तन को ठण्डा करने के लिए रख दें। ठण्डा होने पर पानी की सतह पर आई चिकनाई को दूर कर देना चाहिए। अब इसे ठीक प्रकार से छान लें। इसे रोगी को देने से पूर्व हल्का-सा. गर्म कर लें तथा स्वादानुसार नमक व पिसी काली मिर्च डाल दें।

(10) अण्डे का फ्लिप:
“अण्डे को तोड़कर किसी प्याले में अच्छी तरह से फेंटें। अब एक गिलास दूध गरम करें। (UPBoardSolutions.com) दूध में रोगी की रुचि के अनुसार चीनी मिलाकर फेंटा हुआ अण्डा अच्छी तरह से घोल दें। अण्डा मिला गरम दूध रोगी के लिए अत्यन्त लाभप्रद रहता है।

प्रश्न 3:
निम्नलिखित की उपयोगिता एवं बनाने की विधि लिखिए
(क) कस्टर्ड,
(ख) अरारोट,
(ग) खिचड़ी,
(घ) दलिया तथा
(ङ) साबूदाना
या
रोगी के लिए खिचड़ी बनाने की विधि लिखिए। [2015, 17]
उत्तर:
(क) कस्टर्ड:
यह कम तरल भोजन की श्रेणी में आता है। यह रोगी के लिए सुपाच्य एवं शक्तिवर्द्धक होता है। इसे बनाने के लिए एक ताजे अण्डे को तोड़कर उसकी जर्दी को अच्छी तरह से फेटते हैं। अब इसमें आवश्यकतानुसार चीनी व 250 मिलीलीटर दूध मिलाकर एक कटोरे में डाल देते हैं। एक भगोने में खौलता हुआ पानी लेकर उसके बीच में उपर्युक्त कटोरा रखकर घोल को चम्मच से | तब तक हिलाते हैं जब तक यह गाढ़ा न हो जाए। गाढ़े घोल को हल्का गर्म अथवा ठण्डा करके रोगी
को दिया जाता है।

(ख) अरारोट:
दो छोटे चम्मच अरारोट पाउडर को 50 मिलीलीटर पानी में डालकर घोल बनाएँ। अब इस घोल को 250 मिलीलीटर खौलते दूध में थोड़ा-थोड़ा डालें तथा चम्मच से लगातार चलाते रहें जिससे कि इसमें गाँठे न पड़े। गाढ़ा होने पर उतारकर चीनी मिला दें। इसे रोगी को (UPBoardSolutions.com) गर्म-गर्म परोसा जाता है। पेचिश एवं अतिसार के रोगी को यह नमक मिलाकर देना चाहिए।

(ग) खिचड़ी:
यह एक सुपाच्य हल्का भोजन है। मूंग की दाल की खिचड़ी मलेरिया व पेचिश के रोगियों के लिए अति उपयोगी रहती है। एक भाग चावल व दो भाग मूंग की दाल लेकर दोनों को बीन कर साफ कर लें तथा स्वच्छ पानी में इन्हें दो-तीन बार धो लें। एक भगोने में पानी उबालें तथा उबलते पानी में उपर्युक्त दाल-चावल डालकर आग पर चढ़ा दें। आवश्यकतानुसार इसमें नमक वे हल्दी डाल दें। जब दाल व चावल अच्छी तरह पक जाए तथा खिचड़ी थोड़ी गाढ़ी हो जाए, तो इसे ठण्डा करके रोगी को दिया जा सकता है।

UP Board Solutions

(घ) दलिया:
दलिये में प्रोटीन, कार्बोज तथा लवण होते हैं। यह हल्का, सुपाच्य तथा पौष्टिक होता है तथा प्रायः सभी प्रकार के रोगियों के लिए उपयोगी रहती है। इसे बनाने के लिए एक बड़ी चम्मच दलिये को दो प्याले पानी में डाल कर उबालें। हल्का गाढ़ा हो जाने पर इसे रोगी की रुचि के अनुसार नमक डालकर परोसे अथवा इसमें चीनी व दूध मिलाकर दें।

(ङ) साबूदाना:
विभिन्न रोगों में पाचन शक्ति कमजोर होने पर साबूदाने का सेवन रोगी के लिए अत्यन्त लाभप्रद रहता है। इसे बनाने के लिए एक बड़ी चम्मच साबूदाना लेकर उसे अच्छी प्रकार से साफ कर लें। अब एक भगोने में 250 मिलीलीटर पानी उबालें। पानी के उबलने पर उसमें साबूदाना डाल दें। थोड़ी देर पकने पर उसमें आवश्यकतानुसार दूध व चीनी डाल दें। इसे रोगी की रुचि के अनुसार गर्म अथवा हल्का गर्म परोसें। यह मलेरिया व टायफाइड के रोगी को दिया जाता है। पेचिश के रोगी को साबूदाना बिना चीनी व दूध डाले देना चाहिए।

प्रश्न 4:
निम्न रोगों के रोगियों के रोग की अवधि तथा स्वास्थ्य लाभ के समय का भोजन क्या होगा और वह कैसे बनेगा
(क)गैस्ट्रोएण्ट्राइटिस तथा
(ख) मियादी बुखार
या
मियादी बुखार के लक्षण लिखिए। किसी एक रोग से ग्रसित रोगी को क्या भोजन देंगे?
या
मियादी बुखार में रोगी को क्या आहार दिया जाना चाहिए? [2018]
उत्तर:

(क) गैस्ट्रोएण्ट्राइटिस:
यह दूषित आहार के कारण होने वाला पेट का रोग है जिसमें आँतों में सूजन आ जाने के फलस्वरूप पेट में दर्द अनुभव होता है तथा अम्लीयता बढ़ जाती है; अतः इस रोग की अवधि में शीघ्र पचने वाले तरल भोज्य-पदार्थों का सेवन अधिक कराया जाता है। इस बात का (UPBoardSolutions.com) विशेष ध्यान रखा जाता है कि आहार में अम्लीय पदार्थ न हों। उदाहरण-टोस्ट का पानी, नींबू रहित चावल का पानी तथा पालक, गाजर वे लौकी आदि सब्जियों का सूप।
स्वास्थ्य लाभ के समय रोगी को हल्के एवं सुपाच्य भोजन; जैसे-खिचड़ी, साबूदाना तथा दलिया; देना चाहिए।

[संकेत: बनाने की विधि हेतु विस्तृत उत्तरीय प्रश्न सं० 3 का उत्तर देखें।)
(ख) मियादी बुखार:
मियादी बुखार या टायफाइड नामक रोग में आहार का विशेष महत्त्व होता है। यह रोग आहार-नाल में जीवाणुओं के संक्रमण से उत्पन्न होता है। इस रोग में आँतों में सूजन एवं घाव हो जाते हैं तथा पाचन शक्ति अत्यधिक क्षीण हो जाती है। इस रोग की अवधि तथा स्वास्थ्य लाभ की अवधि में दिये जाने वाले क्विरण निम्नलिखित हैं

रोग की अवधि में आहार:
मियादी बुखार या टायफाइड रोग की स्थिति में रोगी के शरीर में प्रोटीन की काफी कमी हो जाती है। इसके अतिरिक्त विभिन्न खनिज लवणों तथा ग्लाइकोजन के संग्रह में भी कमी आ जाती है। इस स्थिति में रोगी को ऐसा आहार दिया जाना चाहिए, जिससे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, जल, सोडियम तथा पोटैशियम क्लोराइड की समुचित मात्रा मिलती रहे। इस रोग में ऊर्जा की आवश्यकता भी अधिक होती है। दिन में लगभग 3500 कैलोरी ऊर्जा आवश्यक होती है। (UPBoardSolutions.com) इसके साथ ही प्रतिदिन लगभग 100 ग्राम प्रोटीन भी आवश्यक होती है।

UP Board Solutions

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए टायफाइड के रोगी के लिए नियोजित खाद्य-सामग्री में विभिन्न भोज्य-पदार्थों का समावेश होना चाहिए। रोगी को दूध, आधा उबला हुआ अण्डा, ब्रेड, मक्खन तथा सूजी की खीर या कॉर्नफ्लैक्स आदि दिया जा सकता है। फलों का रस, भुना हुआ आलू, हल्की चपाती तथा मसूर की दाल भी दी जा सकती है। टायफाइड के रोगी को दिन में तीन बार मुख्य आहार दिया
जाना चाहिए तथा साथ ही अल्प-मात्रा में मध्य-आहार भी दिए जा सकते हैं। ।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
पेचिश के रोगी के रोग की अवधि और स्वास्थ्य लाभ के समय का भोजन कैसा होना चाहिए?
या
पेचिश के रोगी को कैसा भोजन दिया जाना चाहिए और क्यों? [2008, 11, 12, 13, 16]
उत्तर:
पेचिश की स्थिति में आहार

पेचिश में बार-बार दस्त लगते हैं तथा पेट में ऐंठन होती है। मल के साथ श्लेष्मा तथा कभी-कभी रक्त भी विसर्जित होता है। पेचिश दो प्रकार की होती है-एक एमीबिक (Amoebic) जो अमीबा नामक सूक्ष्म रोगाणु द्वारा उत्पन्न होती है और दूसरी बैसिलरी। यह पहले प्रकार की पेचिश से अधिक घातक होती है।

इस रोग का उद्भवन काल 1 से 2 दिन होता है। बैसिलरी पेचिश में दस्तों के साथ ज्वर भी (UPBoardSolutions.com) रहता है, परन्तु अमीबिक में ज्वर नहीं होता है। ऐंठन के साथ लाल या सफेद आँव वाले दस्त दोनों में
ही लगते हैं।

रोगी को दही, उबला चावल, मूंग की दाल की खिचड़ी, पानी में पका साबूदाना या अरारोट, केला दिया जा सकता है। गम्भीर अवस्था में केवल चावल का माँड ही दिया जाना चाहिए। ईसबगोल
की भूसी दही में मिलाकर दिन में दो या तीन बार खिलानी चाहिए।
जैसे-जैसे पाचन शक्ति ठीक हो जाए रोटी, फल, तरकारी भी खाने को दे सकते हैं।

प्रश्न 2:
स्वस्थ व्यक्ति और रोगी के भोजन में क्या अन्तर होता है? [2008, 11, 12, 13]
उत्तर:
आहार मनुष्य का सर्वोत्तम डॉक्टर है। यदि स्वस्थ अवस्था में सही, सुपाच्य तथा उचित मात्रा में सन्तुलित भोजन मनुष्य को मिलता रहे तो उसका स्वास्थ्य, संक्रामक रोगों को छोड़कर, सामान्यतः ठीक रहता है। इसी प्रकार, रुग्णावस्था में थोड़ा-सा भी अनियमित भोजन लेने पर रोग की गम्भीरता अत्यधिक बढ़ सकती है।
रुग्णावस्था में भोजन ऐसा होना चाहिए जिसमें आवश्यक पोषक-तत्त्व, जिनकी शरीर में कमी हो सकती है, अधिक मात्रा में हों। रोगी के भोजन में सभी पौष्टिक तत्त्व आवश्यक हैं, किन्त यह सरलत ग्राह्य, सुपाच्य तथा शीघ्र पचने वाला होना चाहिए।

UP Board Solutions

प्रश्न 3:
विभिन्न रोगियों को दिए जाने वाले भोजन की तालिका बनाइए।
या।
निम्न रोगों के रोगियों का भोजन कैसा होना चाहिए ? ज्वर, अतिसार, टायफाइड। [2009]
उत्तर:
विभिन्न रोगों के रोगियों को दिए जाने वाले भोजन की तालिका (UPBoardSolutions.com) निम्नलिखित है
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 16 विभिन्न रोगों में रोगी का भोजन

प्रश्न 4:
रोगी के भोजन की व्यवस्था करते समय किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए? [2008, 11, 17]
उत्तर:
रोगी के भोजन की व्यवस्था करते समय निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए

  1. भोजन सफाई से स्टील या कलई के बर्तनों में बनाया जाना चाहिए।
  2. भोजन इस प्रकार तैयार होना चाहिए कि उसके पौष्टिक तत्त्व; जैसे—प्रोटीन, खनिज-लवण व विटामिन आदि; नष्ट न होने पाये।।
  3. भोजन डॉक्टर के निर्देशानुसार तैयार करना चाहिए।
  4. रोगी के भोजन में चटपटे मसाले, घी व तेल का कम-से-कम प्रयोग करना चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो, उबली हुई सब्जी ही देनी चाहिए।
  5. भोजन को स्वादिष्ट बनाने के लिए आवश्यकतानुसार काला नमक व काली मिर्च का प्रयोग करना चाहिए।
  6.  भोजन के साथ सब्जी में नींबू का प्रयोग आवश्यकतानुसार करना चाहिए।
  7. (रोगी को अधिकतर हल्का भोजन; जैसे-खिचड़ी, डबलरोटी, हल्की-हल्की (UPBoardSolutions.com) फुलकियाँ, पालक की सब्जी इत्यादि; देना चाहिए।
  8. रोगी को जो भी भोजन दिया जा रहा है, वह उन तत्त्वों से परिपूर्ण होना चाहिए जिनकी कमी से वह रोग उत्पन्न हुआ है।

UP Board Solutions

प्रश्न 5:
रोगी को भोजन कराते समय आप किन-किन बातों का ध्यान रखेंगी? [2011, 13, 14]
उत्तर:
रोगी को भोजन कराते समय ध्यान रखने योग्य मुख्य बातें निम्नलिखित हैं

  1. भोजन सुपाच्य एवं हल्का तथा डॉक्टर की सलाह पर आधारित होना चाहिए।
  2. रोगी को प्रायः दिन में भोजन कराना उपयुक्त रहता है।
  3. रोगी को नींद से जगाकर भोजन न कराएँ।
  4. रोगी को निश्चित कार्यक्रम व समय के अनुसार भोजन कराना चाहिए।
  5.  भोजन सदैव स्वच्छ बर्तनों में देना चाहिए तथा प्रयुक्त बर्तनों को नि:संक्रमित कर साफ करना चाहिए।
  6. रोगी से सदैव प्रेमपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

प्रश्न 6:
क्षय रोग से ग्रस्त व्यक्ति को रोग की अवधि तथा स्वास्थ्य लाभ के समय क्या आहार दिया जाना चाहिए? [2014]
उत्तर:
क्षय रोग से ग्रस्त व्यक्ति के फेफड़े कुप्रभावित होते हैं जिससे खाँसी व स्थायी ज्वर बना रहता है। इसके अतिरिक्त रोगी को भूख कम लगती है तथा उसका भार नित्यप्रति कम होता रहता है। अतः उसे अतिरिक्त कैलोरीयुक्त भोजन की आवश्यकता होती है। रोग की अवस्था में उसे हल्का, सुपाच्य एवं पौष्टिक भोजन देना चाहिए। इसके लिए उसे दाल, टमाटर व मांस के सूप दिए जाने चाहिए। शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए रोगी को मूंग की दाल की खिचड़ी, दूध का दलिया, दूध, अण्डा, हरी शाक- सब्जियाँ तथा फलों का सेवन कराना उपयुक्त रहता है।

प्रश्न 7:
मलेरिया रोग में दिए जाने वाले आहार का विवरण प्रस्तुत कीजिए। [2010]
उत्तर:
मलेरिया नामक रोग में व्यक्ति को कॅपकपी से तीव्र ज्वर होता है। इस रोग में व्यक्ति का यकृत भी प्रभावित होता है परन्तु व्यक्ति का पाचन क्रिया पर अधिक प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। सामान्य दशाओं में मलेरिया के रोगी को सामान्य पौष्टिक एवं सन्तुलित आहार (UPBoardSolutions.com) दिया जा सकता है, परन्तु यदि ज्वर तीव्र है, तो भोजन देना उचित नहीं होता। इस दशा में रोगी को दूध दिया जाना चाहिए। ज्वर उतर जाने के बाद स्वास्थ्य लाभ के समय सुपाच्य किन्तु पौष्टिक हल्का भोजन देना चाहिए। रोगी को उसकी रुचि के अनुसार खिचड़ी, दलिया, साबूदाना, हरी सब्जियाँ दी जा सकती हैं। रोगी को उबला अण्डा तथा मक्खन भी दिया जा सकता है।

प्रश्न 8:
रोगी के आहार में ग्लूकोज का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
ग्लूकोज अन्य शर्कराओं की अपेक्षा अधिक घुलनशील होती है तथा एन्जाइम क्रिया के बिना ही अवशोषित होकर रक्त प्रवाह में पहुँच जाती है। अत: ग्लूकोज तुरन्त ऊर्जा प्रदान करती है। इस प्रकार ग्लूकोज लेने पर रोगी दुर्बलता से शीघ्र मुक्त होने का अनुभव करता है। हमारे शरीर में ग्लूकोज शर्करा ग्लाइकोजन के रूप में संचित रहती है तथा आवश्यकतानुसार ग्लाइकोजन ग्लूकोज में परिवर्तित होकर रुधिर प्रवाह में मिलती रहती है। रुग्णावस्था में ग्लाइकोजने के संचय में कमी आ जाती है, जिसकी पूर्ति करने के लिए रोगी को ग्लूकोज देना आवश्यक हो जाता है।

प्रश्न 9:
टमाटर सूप कैसे तैयार करेंगी? [2015, 17]
उत्तर:
टमाटर सूप बनाने के लिए सही पके हुए टमाटरों को पहले स्टील या कलई किये बर्तन में उबालते हैं। जब टमाटर भली-भाँति उबल जायें तो इन्हें बड़े चम्मच या कलछी से घोट लिया जाता है। तत्पश्चात् इसका पानी छानकर रोगी की इच्छानुसार नमक, काली मिर्च डालकर ही रोगी को दिया जा सकता है। स्वाद के अनुसार इसमें थोड़ी चीनी भी मिलाई जा सकती है।

प्रश्न 10:
टोस्ट वाटर तैयार करने की विधि लिखिए। [2016]
उत्तर:
सामग्री डबलरोटी का टुकड़ा व पानी।

बनाने की विधि डबलरोटी के टुकड़े को आग पर सेंक लेते हैं। जब वह गुलाबी रंग का हो जाता है तो उसे किसी बर्तन (कटोरा) में रख देते हैं। अब एक बड़े बर्तन में पानी उबालते हैं। जब पानी खूब उबल जाता है तो उसे सिके टोस्ट वाले बर्तन में डाल देते हैं तथा उस पानी (UPBoardSolutions.com) को छान लेते हैं, यही टोस्ट वाटर (टोस्ट का पानी) कहलाता है। इसमें काला नमक तथा काली मिर्च मिलाकर रोगी को देते हैं।
टोस्ट वाटर अधिकतर टायफाइड के रोगी को ज्वर उतरने के पश्चात् दिया जाता है।

UP Board Solutions

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
किसी व्यक्ति को रोग की दशा में दिए जाने वाले आहार को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
किसी व्यक्ति को रोग की दशा में दिए जाने वाले आहार को उपचारार्थ आहार कहा जाता है।

प्रश्न 2:
रोगी के भोजन को कितनी श्रेणियों में विभालि किया जा सकता है?
उत्तर:
रोगी के भोजन को क्रमश: तरल आहार तथा कम हार के। श्रणियों में बाँटा जा सकता है। तरल आहार को पुन: पूर्ण-तरल तथा अर्द्ध-तरल आहार में बाँटा जाता है।

प्रश्न 3:
रोगी के लिए कार्बोज का सर्वाधिक उपयोगी स्रोत कौन-सा है?
या
फलों का आहार में क्यमहत्त्व है? [2008]
उत्तर:
सेब, अंगर, केला, अमरूद वे आम आदि फल रोगी के लिए कार्बोज प्राप्ति के मुख्य साधन हैं। इनसे रक्त में शर्करा की आवश्यकता की तुरन्त पूर्ति हो जाती है और शारीरिक अंगों को विशेष श्रम नहीं करना पड़ता।

प्रश्न 4:
जौ का पानी किस रोग में दिया जाता है? [2015, 16]
उत्तर:
जौ का पानी गुर्दो के रोग तथा पेचिश में दिया जाना लाभप्रद रहता है।

प्रश्न 5:
‘फटे दूध का पानी में भोजन के कौन-कौन से तत्त्व पाए जाते हैं?
या
फटे दूध के पानी की पौष्टिकता के विषय में लिखिए।
उत्तर:
फटे दूध को पानी में खनिज-लवण, विटामिन, शर्करा तथा प्रोटीन आदि भोजन के पौष्टिक तत्त्व पाए जाते हैं।

प्रश्न 6:
फटे दूध के पानी में कौन-सा तत्त्व नहीं पाया जाता?
उत्तर:
फटे दूध के पानी में वसा नामक तत्त्व नहीं पाया जाता।

UP Board Solutions

प्रश्न 7:
टोस्ट का पानी’ किस रोगी को दिया जाता है?
उत्तर:
तीव्र ज्वर से पीड़ित रोगी को टोस्ट का पानी दिया (UPBoardSolutions.com) जाता है।

प्रश्न 8:
रुग्णावस्था में रोगी को किस प्रकार का आहार दिया जाना चाहिए?
उत्तर:
साधारणत: रुग्णावस्था में रोगी को हल्का, सुपाच्य एवं पौष्टिक आहार दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 9:
क्षय रोग से पीड़ित व्यक्ति को कैसा आहार देना चाहिए?
उत्तर:
क्षय रोगी को अधिक कैलोरी बाला, प्रोटीनयुक्त, सुपाच्य भोजन देना चाहिए।

प्रश्न 10:
रोगी को उबालकर ठण्डा किया हुआ जल देने का क्या लाभ है?
उत्तर:
उबालकर ठण्डा किया हुआ जल रोगाणुमुक्त हो जाता है; अतः यह रोगी को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाता।

प्रश्न 11:
टायफाइड में ठोस भोजन खिलाना क्यों उपयुक्त नहीं है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
टायफाइड के रोगी की आँते अत्यधिक कमजोर हो जाती हैं। अतः उसे ठोस भोजन न देकर तरल भोजन देना ही उपयुक्त रहता है।

UP Board Solutions

प्रश्न 12:
मियादी बुखार के रोगी को आप कैसा आहार देंगी? [2010, 14]
उत्तर:
मियादी बुखार के रोगी को वसारहित, प्रोटीनयुक्त तथा तरल अथवा कम तरल भोजन देना लाभप्रद रहता है।

प्रश्न 13:
एक व्यक्ति के लिए दलिया बनाने में पदार्थों का क्या अनुपात होना चाहिए?
उत्तर:
एक बड़ी चम्मच दलिया, दो प्याले पानी, एक प्याला दूध व दो छोटी चम्मच चीनी एक व्यक्ति के लिए दलिया तैयार करने के लिए पर्याप्त रहते हैं।

प्रश्न 14:
तरल भोजन रोगी के लिए क्यों उपयुक्त रहता है? [2018]
उत्तर:
रोगी को यह सुविधापूर्वक दिया जा सकता है तथा अधिक सुपाच्य होने के कारण शीघ्र ही शरीर में अवशोषित हो जाता है।

प्रश्न 15:
रोगी को देने के लिए नरम आहार के कुछ उदाहरण बताइए।
उत्तर:
दूध, गला हुआ मांस, मछली, अण्डा, कीमा, कस्टर्ड, दही, दलिया, खिचड़ी आदि नरम आहार हैं।

UP Board Solutions

प्रश्न 16:
पूर्ण-तरल तथा अर्द्ध-तरल भोजन कौन-से हैं?
उत्तर:
नींबू, मांस, जौ आदि का पानी पूर्ण-तरल, जबकि टमाटर, मांस, दाल, सब्जी का सूप, (UPBoardSolutions.com) चाय, दूध आदि अर्द्ध-तरल भोजन हैं। इनसे भी अधिक ठोस दलिया, साग-सब्जियाँ, खट्टे फल, आधा उबला अण्डा आदि कम-तरल भोजन हैं।

प्रश्न 17:
हल्के भोजन से क्या तात्पर्य है? यह कब दिया जाता है?
उत्तर:
हल्के भोजन का अर्थ है अर्द्ध-तरल शीघ्र पचने वाला सुपाच्य भोजन। यह कम तरल पदार्थ देने के पश्चात् तथा ठोस पदार्थ से पूर्व दिया जाता है।

प्रश्न 18:
कब्ज के रोगी के आहार में मुख्यतः किन भोज्य-पदार्थों का समावेश करना चाहिए? [2009, 12, 13, 18]
उत्तर:
कब्ज के रोगी के आहार में मुख्यतः अधिक रेशे युक्त भोज्य पदार्थों का समावेश करना चाहिए जैसे कि सम्पूर्ण अनाज, छिलकायुक्त दालें, सब्जियाँ तथा फल। जल की मात्रा भी अधिक होनी चाहिए।

प्रश्न 19:
लू लगने के लक्षण लिखिए। इस रोगी को किस प्रकार का आहार देना चाहिए? [2007, 18]
उत्तर:
लू लग जाने पर व्यक्ति को तेज ज्वर हो जाता है। चेहरा लाल हो जाता है, होंठ सूखने लगते हैं तथा शरीर में पानी की कमी हो जाती है। इस दशा में रोगी को ठण्डे पेय-पदार्थ अधिक मात्रा में दिए जाने चाहिए। कच्चे आम का पना तथा पुदीने का रस भी दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 20:
अतिसार के रोगी को क्या भोजन देते हैं और क्यों ? [2011]
उत्तर:
अतिसार के रोगी को केवल तरल पदार्थ देने चाहिए, यह भी तब जब मल त्याग बार-बार हो रहा हो। रेशे वाले पदार्थ, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, अचार, मुरब्बे आदि न दें; क्योंकि इससे रोग की गम्भीरता बढ़ सकती है। रोगी में जल की कमी हो जाती है; अतः जल दें। चाय, (UPBoardSolutions.com) कॉफी दी जा सकती है। क्योंकि यह मल का निर्माण नहीं करती।

UP Board Solutions

प्रश्न 21:
अतिसार के रोगी के आहार में दही या मटठे का क्या महत्त्व है?
या
अतिसार के रोगी को कैसा आहार देना चाहिए? [2007, 10, 11, 14]
उत्तर:
अतिसार के रोगी के आहार में दही या मट्ठे का विशेष महत्त्व होता है। यदि इसमें ईसबगोल मिला लिया जाए, तो अधिक लाभ होता है।

प्रश्न 22:
मधुमेह के रोगी को कैसा भोजन देना चाहिए? [2008, 12]
उत्तर:
मधुमेह के रोगी को शर्करायुक्त भोजन देना बन्द कर देना चाहिए। ठोस हो या द्रव किसी भी प्रकार का मीठा पदार्थ ऐसे रोगी को न दें। इसके अतिरिक्त अधिक कार्बोहाइड्रेट्स वाले भोजन; चावल, आलू, शकरकन्द आदि; न देकर प्रोटीनयुक्त भोजन; दालें, दाने वाली, फलियों वाली सब्जियां व खट्टे पदार्थ; दिए जाने चाहिए।

प्रश्न 23:
कच्ची सब्जियों को खाने से शरीर को कौन-से पोषक तत्त्व अधिक मात्रा में मिलते हैं? [2009, 13, 14]
उत्तर:
कच्ची सब्जियों को खाने से शरीर को लोहा तथा विटामिन्स भरपूर मात्रा में मिलते हैं।

प्रश्न 24:
जीवन-रक्षक घोल क्या है? इसे कैसे तैयार करते हैं? [2016]
उत्तर:
हमारे शरीर में पानी की कमी की पूर्ति करने के लिए जो पेय तैयार किया जाता है उसे ‘जीवन-रक्षक घोल’ कहते हैं। (UPBoardSolutions.com) विधि इसे तैयार करने की विधि बड़ी आसान है-जल को उबालकर उसमें थोड़ा-सा नमक तथा चीनी मिलाकर एवं इसके साथ में दो-चार बूंद नींबू का रस डालकर इसे तैयार किया जाता है।

UP Board Solutions

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न:
निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. रोग की अवस्था में कमजोर हो जाती है
(क) स्मरण शक्ति
(ख) नजर
(ग) पाचन शक्ति
(घ) श्रवण शक्ति

2. सामान्य रूप से रोगी को दिया जाना चाहिए
या रोगी का भोजन होना चाहिए
(क) गरिष्ठ आहार
(ख) स्वादिष्ट आहार
(ग) सुपाच्य आहार
(घ) चाहे जैसा आहार

3. लू से पीड़ित व्यक्ति को देना चाहिए [2010, 12, 14, 15]
(क) आम का पना
(ख) प्याज
(ग) हरे पुदीने का रस
(घ) ये सभी

4. मलेरिया के रोगी को देना चाहिए
(क) दूध
(ख) दही
(ग) भोजन
(घ) चाहे कुछ भी हो

5. पेचिश के रोगी को भोजन कैसा होना चाहिए?
(क) केवल फल
(ख) केवल दूध
(ग) दही-चावल
(घ) रोटी-सब्जी

6. रोगी को अधिकतर कैसा भोजन देना चाहिए?
(क) तरल
(ख) गरिष्ठ
(ग) ठोस
(घ) चाहे जैसा

7. निमोनिया के रोगी को कौन-सा पेय पदार्थ देंगी?
(क) लस्सी
(ख) शर्बत
(ग) चाय
(घ) शीतल पेय

8. तरल पदार्थ किस रोग के रोगी को दिया जाता है?
(क) मियादी बुखार
(ख) तपेदिक
(ग) रक्ताल्पता
(घ) सिरदर्द.

UP Board Solutions

9. क्षय रोग के रोगी को कौन-सी वस्तु हानि पहुँचाती है? [2013]
(क) मौसमी
(ख) रस वाले फल
(ग) मिर्च-मसालेदार भोजन
(घ) दूध

10. अतिसार में क्या देना चाहिए?
(क) रोटी
(ख) द्वे वाटर
(ग) मीट
(घ) पुलाव

11. रुग्णावस्था में पाचन शक्ति हो जाती है
(क) अत्यधिक तीव्र
(ख) कमजोर
(ग) कोई अन्तर नहीं होता
(घ) इनमें से कोई नहीं

12. कब्ज के रोगी को कौन-सा आहार अधिक मात्रा में देना चाहिए? [2012]
(क) वसायुक्त
(ख) ठोस
(ग) पौष्टिक
(घ) रेशेदार

13. क्षय रोग के रोगी को कौन-सा भोजन देना चाहिए?
(क) मिर्च-मसालेदार
(ख) दूध
(ग) उबला हुआ
(घ) स्वादिष्ट

14. कौन-सा पदार्थ लेने से तुरन्त ऊर्जा मिलती है? [2013, 14, 17]
(क) विटामिन
(ख) ग्लूकोज
ग) प्रोटीन
(घ) खनिज-लवण

15. किसी भी भोज्य-पदार्थ से प्राप्त ऊर्जा को नापने की इकाई है [2017]
(क) ग्राम
(ख) आंस
(ग) डिग्री
(घ) कैलोरी

16. आहार में कार्बोहाइड्रेट का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए [2007]
(क) बेरीबेरी में
(ख) मधुमेह में
(ग) तपेदिक में
(घ) एनीमिया में

17. मधुमेह किस तत्त्व की अधिकता से होता है? [2011, 16]
क) प्रोटीन
(ख) वसा
(ग) शर्करा
(घ) विटामिन

18. किस प्रकार के भोजन रोगों से बचाते हैं ? [2009]
(क) बिस्कुट
(ख) चावल
(ग) ताजे मौसमी फल एवं हरी सब्जियाँ
(घ) चीनी

19. अतिसार के रोगी को कैसा भोजन देना चाहिए ? [2010, 11, 12]
(क) तला भोजन
(ख) तरल भोजन
(ग) गरिष्ठ भोजन
(घ) कुछ नहीं

20. नेत्रों के लिए कौन-सा पौष्टिक तत्त्व आवश्यक है? [2014, 17, 18]
(क) कैल्सियम
(ख) विटामिन ‘बी’
(ग) ग्लूकोज
(घ) विटामिन ‘ए’

UP Board Solutions

उत्तर:
1. (ग) याचन शक्ति,
2. (ग) सुपाच्य आहार,
3. (घ) ये सभी,
4. (क) दूध,
5. (ग) दही-चावल,
6. (क) तरल,
7. (ग) चाय,
8. (क) मियादी बुखार,
9. (ग) मिर्च-मसालेदार भोजन,
10. (ख) हे कटर,
11. (ख) कमजोर,
12. (घ) रेशेदार,
13. (ख) दूध,
14. (ख) ग्लूकोज,
15. (घ) कैलोरी,
16. (ख) मधुमेह में,
17. (ग) शर्करा,
18. (ग) ताजे मौसमी फल (UPBoardSolutions.com) एवं हरी सब्जियाँ,
19. (ख) तरल भोजन,
20. (घ) विटामिन ‘ए

We hope the UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 16 विभिन्न रोगों में रोगी का भोजन help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 16 विभिन्न रोगों में रोगी का भोजन, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 17 मानव अस्थि-संस्थान तथा सन्धियाँ

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 17 मानव अस्थि-संस्थान तथा सन्धियाँ

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Home Science . Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 17 मानव अस्थि-संस्थान तथा सन्धियाँ.

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
अस्थि-संस्थान या अस्थि-तन्त्र से आप क्या समझती हैं? अस्थि-संस्थान (कंकाल) का क्या कार्य है? [2007, 09, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17]
या
मनुष्य के शरीर में अस्थि-संस्थान (कंकाल-तन्त्र) की क्या उपयोगिता है? [2007, 09, 10, 11, 13, 14, 15, 17, 18]
या
कंकाल-तन्त्र (अस्थि-संस्थान) या अस्थि-पंजर की हमारे शरीर में क्या उपयोगिता है? मानव शरीर में कुल कितनी अस्थियाँ होती हैं? [2008, 09, 10 ]
या
यदि शरीर में हड्डियाँ न होतीं तो क्या हानि होती? [2013]
उत्तर:
अस्थि-संस्थान का अर्थ एवं कार्य

यह सत्य है कि बाहर से देखने पर शरीर की हड्डियाँ या अस्थियाँ दिखाई नहीं देतीं, परन्तु यदि शरीर की त्वचा तथा मांसपेशियाँ आदि हटा दी जाएँ, तो अन्दर केवल अस्थियों का ढाँचा मात्र रह जाएगा। इसके अतिरिक्त यदि ऊपर से ही शरीर के किसी भाग को हाथ से टटोला जाए, तो त्वचा के नीचे मांस और मांस के नीचे एक प्रकार की कठोर रचना महसूस होती है। ये कठोर रचना अस्थियाँ ही हैं। शरीर में विभिन्न अस्थियाँ आपस में व्यवस्थित रूप (UPBoardSolutions.com) से सम्बद्ध रहती हैं। शरीर की सभी अस्थियाँ परस्पर सम्बद्ध होकर ही कार्य करती हैं। शरीर में अस्थियों की इस व्यवस्था को ही अस्थि-संस्थान या कंकाल-तन्त्र (Skeletal system) कहते हैं। अस्थि-संस्थान ही शरीर को दृढ़ता, आकृति तथा गति प्रदान करता है। अस्थि-संस्थान में अनेक अस्थियाँ तथा अस्थि-सन्धियाँ पाई जाती हैं।

UP Board Solutions

कंकाल अथवा अस्थि-संस्थान की उपयोगिता

हमारे शरीर में उपस्थित लगभग 206 अस्थियाँ सम्मिलित रूप से कंकाल अथवा अस्थि-संस्थान का निर्माण करती हैं। अस्थि-संस्थान हमारे शरीर का एक निश्चित ढाँचा है, जिसकी उपयोगिता निम्नवर्णित हैं

(1) निश्चित आकार प्रदान करना:
कंकाल अथवा अस्थि-संस्थाने हमारे शरीर को एक निश्चित आकार प्रदान करता है। अस्थियों के अभाव में मानव-शरीर मांस के एक लोथड़े के समान ही होता, जो न तो सीधा खड़ा हो सकता और न ही इसका कोई स्थिर आकार ही होता। वास्तव में अस्थि-संस्थान के द्वारा ही व्यक्ति के शरीर की लम्बाई एवं चौड़ाई का निर्धारण होता है।

(2) दृढता प्रदान करना:
अस्थि-संस्थान शरीर को भली-भाँति साधे रहता है। शरीर के लगभग सभी भागों को सुदृढ़ रखने में अस्थियों का भरपूर योगदान रहता है। अस्थि-संस्थान के ही कारण हमारा शरीर बाहरी आघातों को सहन कर लेता है। अस्थि-संस्थान के माध्यम से ही हम भारी-से-भारी बोझ को भी उठा लिया करते हैं।

(3) कोमल अंगों को सुरक्षा प्रदान करना:
भिन्न-भिन्न स्थानों पर अस्थियाँ कोमल अंगों को कवच प्रदान करती हैं; जैसे–पसलियाँ फेफड़ों व (UPBoardSolutions.com) हृदय को, मेरुदण्ड सुषुम्ना नाड़ी को तथा कपाल मस्तिष्क को सुरक्षा प्रदान करता है।

(4) पेशियों को संयुक्त होने का स्थान प्रदान करना:
विभिन्न स्थानों पर पेशियाँ अस्थियों से जुड़ी रहती हैं। पेशियाँ अस्थियों को सबल एवं सचल बनाती हैं।

(5) शरीर को गतिशीलता प्रदान करना:
अस्थि-संस्थान में अनेक महत्त्वपूर्ण स्थानों पर सन्धियाँ होती हैं। अस्थियों, सन्धियों एवं पेशियों के पारस्परिक सहयोग से शरीर व इसके अन् गतिशील होते हैं।

UP Board Solutions

(6) लाल एवं श्वेत रक्त कणिकाओं का निर्माण:
प्रत्येक अस्थि के मध्य भाग में अस्थि-मज्जा होती है। अस्थि-मज्जा में रुधिर की लाल एवं श्वेत कणिकाओं का निर्माण होता है।

(7) श्वसन में सहयोग देना:
ट्रैकिया अथवा वायुनलिका के छल्ले एवं पसलियाँ फेफड़ों को फूलने के संकुचन करने में सहायता प्रदान करती हैं।

(8) श्रवण में सहयोग देना:
कान की कॉर्टिलेज अस्थियाँ श्रवण क्रिया में सहयोग प्रदान करती हैं।

(9) नेत्रों को सहयोग देना:
हमारे नेत्र कपाल में बने अस्थि गड्ढों में सुरक्षित रहते हैं। इनमें उपस्थित पेशियाँ नेत्रों की गति को नियन्त्रित करती हैं।

(10) उत्तोलक का कार्य करना:
बोझा ढोते एवं सामान उठाते समय मेरुदण्ड एक उत्तम उत्तोलक का कार्य करता है।

अस्थियों (हड्डियों) की बनावट (रचना)

अस्थियाँ मानव शरीर का सबसे कठोर भाग होती हैं। मुख्य अस्थियों से भिन्न कुछ उपास्थियाँ मुलायम भी होती हैं जिन्हें कार्टिलेज कहते हैं। अस्थियों का निर्माण जीवित कोशिकाओं से होता है। अस्थियाँ सफेद रंग की तथा छूने में कठोर होती हैं। अस्थियाँ भीतर (UPBoardSolutions.com) से खोखली होने के कारण कठोर होते हुए भी हल्की होती हैं। अस्थियों में एक नली होती है जिसके अन्दर एक गूदेदार पदार्थ भरा होता है, जिसे अस्थिमज्जा (Bone marrow) कहते हैं। जिस खोखले स्थान पर यह अस्थि-मज्जा होती है, उसे अस्थि-गुहा कहते हैं। अस्थि-मज्जा में लाल और श्वेत रक्त कण बनते हैं। नली के चारों ओर असंख्य अस्थि-कोशिकाएँ होती हैं। ये कोशिकाएँ टूटी हुई अस्थि को जोड़ने में भी सहायक होती हैं। अस्थि-नली में रक्तवाहिनी और नाड़ी सूत्र होते हैं। इसी कारण जीवित मनुष्य की अस्थि का रंग कुछ गुलाबीपन लिए होता है और मृत अवस्था में उसका रंग श्वेत हो जाता है। अस्थियां एक आवरण से ढकी रहती हैं, जिसे अस्थिच्छद कहते हैं। यह आवरण बहुत बड़ा होता है तथा मांसपेशियों से जुड़ा रहता है। अस्थियों का निर्माण विभिन्न खनिजों से होता है। इनमें मुख्य हैं-कैल्सियम फॉस्फेट, कैल्सियम कार्बोनेट तथा मैग्नीशियम फॉस्फेट। इनमें सर्वाधिक मात्रा कैल्सियम फॉस्फेट की ही होती है।

UP Board Solutions

अस्थियों का विकास जीवन के आरम्भ से ही होना शुरू हो जाता है। भ्रूणावस्था में पूरा-का-पूरा कंकाल उपास्थि का ही होता है, परन्तु जन्म के उपरान्त इसका अधिकांश भाग हड्डी में परिवर्तित हो जाता है। यह परिवर्तन उपास्थि के मैट्रिक्स (Matrix) में चूने तथा फॉस्फोरस के लवणों के जमने या निक्षेपण (Deposition) से होता है और इस क्रिया को अस्थि-भवन कहते हैं।

अस्थि-संस्थान के भाग

मानव अस्थि-संस्थान को निम्नलिखित तीन मुख्य भागों में विभक्त किया जा सकता है
(1) सिर अथवा खोपड़ी:
खोपड़ी में कपाल (जिसमें मस्तिष्क सुरक्षित रहता है) तथा आनन (चेहरा) सम्मिलित रहते हैं।

(2) धड़:
वक्ष एवं उदर धड़ के दो भाग होते हैं। वक्ष में रीढ़ की अस्थि, उरोस्थि, हॅसली की अस्थियाँ, कन्धे की अस्थियाँ, पसलियाँ तथा नितम्ब की अस्थियाँ आदि होती हैं, जबकि उदर . अस्थिविहीन होता है।

(3) शाखाएँ:
शाखाओं में दो जोड़े होते हैं-ऊर्ध्व शाखाएँ (भुजाएँ) तथा अधोशाखाएँ (डाँगें)।

प्रश्न 2:
मानव कपाल की संरचना का सचित्र एवं संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
या
सिर की अस्थियों की बनावट और कार्य का चित्र सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सिर अथवा खोपड़ी

मानव खोपड़ी में कुल 22 अस्थियाँ होती हैं जिनमें से 14 चेहरे में तथा शेष ऊपरी भाग में स्थित होती हैं। खोपड़ी के दो प्रमुख भाग होते हैं
(1) कपाल (क्रेनियम) तथा
(2) चेहरा (फेस)

कपाल की अस्थियाँ

कपाल ब्रेन बॉक्स की तरह है। यह हमारे शरीर में सिर के ऊपरी भाग में स्थित होता है। यह अन्दर से खोखला तथा गुम्बद की तरह होता है। इसमें हमारा मस्तिष्क सुरक्षित रहता है। कपाल की रचना 8 चपटी हड्डियों के द्वारा होती है। ये हड्डियाँ आपस (UPBoardSolutions.com) में मजबूती से तथा न हिलने-डुलने वाली
सन्धियों अर्थात् अचल सन्धियों से जुड़ी होती हैं। कपाल में निम्नलिखित 8 हड्डियाँ होती हैं

(क) ललाटास्थि (Frontal Bone):
यह माथा बनाती है और सामने वाले भाग में अकेली ही स्थित होती है। इसी में हमारी आँखों के दो गड्ढे भी होते हैं।

(ख) पार्शिवकास्थि (Parietal Bones):
ये संख्या में दो तथा ललाटास्थियों के ठीक नीचे मध्य में आपस में जुड़ी हुई अस्थियाँ होती हैं और कपाल का बीच का ऊपरी भाग बनाती हैं, जोकि गुम्बद की तरह होता है। ये दोनों कानों की तरफ फैली होती हैं तथा ये बड़ी हड्डियाँ होती हैं।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 17 मानव अस्थि-संस्थान तथा सन्धियाँ

UP Board Solutions

(ग) पाश्चादास्थि (Occipital Bones):
यह हड्डी भी पार्शिवकास्थि से जुड़ी हुई उसके ठीक पीछे स्थित होती है और खोपड़ी का पश्च भाग बनाती है। इस हड्डी में खोपड़ी का एक बड़ा छिद्र होता है, जिसे महाछिद्र कहते हैं। रीढ़ की हड्डी के अन्दर स्थित सुषुम्ना इसी छिद्र से होकर मस्तिष्क के साथ जुड़ी (UPBoardSolutions.com) होती है। इसमें महाछिद्र के दोनों ओर इधर-उधर दो महत्त्वपूर्ण उभार होते हैं जो खोपड़ी को रीढ़ की हड्डी के साथ जोड़ने में सहायक होते हैं। वास्तव में इन्हीं उभारों पर खोपड़ी टिकी रहती है।

(घ) शंखास्थियाँ (Temporal Bones):
ये हड्डियाँ संख्या में दो होती हैं और सिर के दोनों ओर कनपटियों को बनाती हैं। कान भी इन्हीं अस्थियों पर स्थित होते हैं। प्रत्येक कान का छिद्र भी इन्हीं अस्थियों पर होता है।

(ङ) जतुकास्थि (Sphenoid Bones):
यह दोनों शंखास्थियों के बीच कपाल का निचला तल बनाती है। यह आगे की तरफ ललाट से जुड़ी होती है और पंख की तरह होती है। सम्पूर्ण रूप में इसका आकार एक तितली की तरह दिखाई पड़ता है।

(च) झरझरास्थि या बहु छिद्रिकास्थि (Ethmoid Bone):
यह संख्या में एक होती है और कपाल का निचला तल बनाती है। यह दोनों आँखों के कोटरों के बीच स्थित होती है। इस हड्डी में अनेक छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। इन छिद्रों से होकर मस्तिष्क से निकलने वाली तन्त्रिका-तन्त्र की नाड़ियाँ, रक्त की नलिकाएँ आदि निकलती हैं। इस हड्डी से नाक के अन्दर के भीतरी भाग की संरचना भी बनती है।

UP Board Solutions

चेहरे की अस्थियाँ

मानव का चेहरा निम्नलिखित 14 हड्डियों से निर्मित होता है

(क) अधोहनु या निचले जबड़े की अस्थियाँ (Lower Jaw Bones):
यह जबड़ा चेहरे का सबसे निचला भाग हैं। यह अत्यधिक मजबूत तथा काफी बड़ी हड्डी का बना होता है। इसका आधार घोड़े की नाल की तरह होता है। इसको मेण्डिबल भी कहते हैं। ठोढ़ी भी इसी हड्डी के द्वारा बनती है। यह हड्डी निचले जबड़े को हिला-डुला सकती है; जिसके द्वारा भोजन का भक्षण, पीसना-चबाना इत्यादि कार्य होते हैं। इस हड्डी में ऊपर की ओर 16 गड्ढे होते हैं, जिनमें 16 दाँत फिट रहते हैं।।

(ख) ऊर्ध्व-हनु या ऊपरी जबड़े की अस्थियाँ (Upper Jaw Bones):
यह दो हड्डियों से मिलकर बनता है। दोनों हड्डियों में से एक दाहिनी तथा एक बाईं ओर होती है तथा नाक के ठीक नीचे मध्य में जुड़ी रहती है। इसी हड्डी के द्वारा मुँह के अन्दर तालु का अगला भाग भी बनता है। इन दोनों हड्डियों को मैक्सिलरी अस्थियाँ कहते हैं। प्रत्येक हड्डी में नीचे तथा आगे की ओर 8-8 गड्ढे होते हैं, जिनमें दाँत लगे रहते हैं।

(ग) कपालास्थि (Check Bones):
ये संख्या में दो होती हैं तथा कान से लेकर आँख के नीचे, नाक तक फैली रहती हैं (UPBoardSolutions.com) और आकार में चपटी होती हैं। ये गाल के ऊपरी भाग का आकार बनाती हैं, इसलिए इन्हें कपोलास्थियाँ कहते हैं।

(घ) तालुकास्थियाँ (Palate Bones):
इनकी संख्या भी दो होती है। ये छोटी हड्डियाँ हैं और तालु के पिछले हिस्से में लगी होती हैं व आगे की ओर मैक्सिलरी हड्डी से जुड़ी रहती हैं अर्थात् तालु का अगला भाग मैक्सिलरी हड्डी से तथा पिछला भाग तालुकास्थि से बनता है।

(ङ) नासास्थियाँ (Nasal Bones):
इनकी संख्या भी दो होती है। ये हड्डियों भी चपटी होती हैं। इनका आकार लगभग चौकोर होता है और ये नाक के ऊपरी भाग का कठोर कंकाल बनाती हैं।

(च) स्पंजी या टरबाइनल अस्थियाँ (Spongy Bones):
ये संख्या में दो होती हैं। ये हड्डियाँ विशेष सलवटदार तथा ऐठी हुई होती हैं जो नाक के भीतरी भाग में स्थित होती हैं। इसी मार्ग से होकर वायु आती-जाती है; अतः ये श्वसन मार्ग का निर्माण करती हैं। नाक के अन्दर इन्हें उँगलियों से टटोलकर देखा जा सकता है।

(छ) अश्रु अस्थियाँ (Lachrymal Bones):
इनकी संख्या भी दो होती है। ये हड्डियाँ छोटी तथा छिद्रयुक्त होती हैं। इनकी स्थिति नाक के ऊपरी भाग में नेत्र कोटरों के बीच में होती है। इन्हीं से होकर, छिद्र के द्वारा आँख से आँसू नाक के अन्दर पहुँचते हैं; इसीलिए इनको अश्रु अस्थियाँ भी कहते हैं।

UP Board Solutions

(ज) सीरिकास्थि (Vomer Bone):
यह संख्या में एक होती है तथा नाके के अन्दर का परदा बनाती है और इसको दो भागों में बाँटती है।

प्रश्न 3:
मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) की रचना और उसके कार्य का वर्णन कीजिए। यो मेरुदण्ड दण्ड की क्या उपयोगिता है? [2013, 15]
उत्तर :
मेरुदण्ड की रचना और कार्य

मेरुदण्ड (Vertebral Column) पीठ की त्वचा के ठीक नीचे मांसपेशियों से घिरा हुआ पृष्ठ-मध्य रेखा पर स्थित होता है। यह गर्दन तथा धड़ दोनों को साधने का महत्त्वपूर्ण कार्य करता है। इसे कशेरुक दण्ड भी कहते हैं। |

रचना:
मेरुदण्ड हमारी खोपड़ी के निचले भाग से लेकर शरीर के पिछले छोर तक स्थित छोटे-छोटे टुकड़ों के जुड़ने से बनी एक विशिष्ट रचना है। इन टुकड़ों या भागों को कशेरुकाएँ कहते हैं। छोटे बच्चे के मेरुदण्ड में कुल 33 कशेरुकाएँ होती हैं, युवावस्था में नीचे की नौ कशेरुकाओं में से पिछली पाँच मिलकर एक और अन्तिम चार मिलकर एक अस्थि बन जाती है। इस प्रकार कुल 26
कशेरुकाएँ रह जाती हैं। इनके मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं

(1) ग्रीवा कशेरुकाएँ (Cervical vertebrae):
इनकी संख्या 7 होती है और ये गर्दन के पिछले हिस्से में स्थित होती हैं। गर्दन को (UPBoardSolutions.com) घुमाने, सीधा करने, झुकाने इत्यादि में ये कशेरुकाएँ मजबूती के साथ लचीलापन पैदा करती हैं, साथ-ही-साथ सम्पूर्ण कशेरुक दण्ड में स्थित सुषुम्ना का अग्रभाग इन्हीं कशेरुकाओं के अन्दर स्थित होता है।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 17 मानव अस्थि-संस्थान तथा सन्धियाँ

(2) वक्षीय कशेरुकाएँ (Thoracic Vertebrae):
इनकी संख्या 12 होती है और ये वक्षीय प्रदेश में पृष्ठ भाग में ग्रीवा कशेरुकाएँ स्थित होती हैं। ये वक्षीय कंकालं का पिछला तथा मजबूत हिस्सा बनाती हैं। सामने की ओर अन्य हड्डियाँ स्थित होने के कारण वक्षीय स्थल बहुत अधिक लचीला नहीं होता है, फिर भी वक्ष कशेरुकाएँ आवश्यकतानुसार यह झुक सकता है।

UP Board Solutions

(3) कटि कशेरुकाएँ (Lumber Vertebrae):
इनकी संख्या 5 होती है। ये प्रमुखत: उदर तथा कमर के भाग में स्थित कटि कशेरुकाएँ होती हैं। इस भाग में आगे सामने की ओर कोई हड्डी न होने के कारण, उदर का यह भाग प्रमुखतः अत्यन्त लचीला होता है। कूल्हे की कशेरुकाएँ

(4) त्रिक कशेरुकाएँ (Sacral Vertebrae):
इनकी । संख्या 5 होती है। कमर के निचले भाग में ये शरीर का लगभग निचला छोर बनाती हैं। 5 कशेरुकाएँ वयस्क होने तक आपस में पूर्णतः समेकित हो जाती हैं और त्रिभुजाकार हड्डी त्रिकास्थि करती हैं। त्रिकास्थि कूल्हे की हड्डी व श्रोणि- इसकी विभिन्न कशेरुकाएँ तथा सम्पूर्ण मेखला के मध्य में स्थित होती है। इसके कारण ही कुल्हे की कशेरुक दण्ड के झुकाव हड्डी के साथ मिलकर मनुष्य सीधा खड़ा हो सकता है।

(5) अनुत्रिक कशेरुकाएँ (Coccycal Vertebrae):
इनकी संख्या 4 होती है। यद्यपि मनुष्य में पूँछ दिखायी नहीं पड़ती, किन्तु पूँछ के अवशेष के रूप में यहाँ 4 कशेरुकाएँ उपस्थित होती हैं। ऐसा समझा जाता है कि मानव का विकास किसी पूंछ वाले जन्तु से हुआ है और उसके अवशेषों के रूप में कुछ कशेरुकाएँ रह (UPBoardSolutions.com) गयी हैं। ये चार अस्थियाँ वयस्क अवस्था प्राप्त करते-करते आपस में समेकित होकर एक छोटी-सी संरचना अनुत्रिक बनाती हैं, जो श्रोणि-मेखला के मध्य से पीछे की ओर वास्तविक अन्तिम भाग बनाती है।

मेरुदण्ड के कार्य:
मेरुदण्ड मानव अस्थि-संस्थान का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं

  1. मेरुदण्ड में फिसलने वाली सन्धि पाई जाती है, जिसके फलस्वरूप हम उठ-बैठ व चल पाते हैं।
  2. मेरुदण्ड की कशेरुकाओं के बीच में उपास्थि (Cartilage) की गद्दियाँ होती हैं, जिनके कारण कूदते समय मेरुदण्ड के टूटने का भय नहीं रहता है।
  3.  मेरुदण्ड की प्रथम कशेरुका सिर के लिए आधारशिला का कार्य करती है।
  4. मेरुदण्ड के अन्दर सुषुम्ना नाड़ी सुरक्षित रहती है।
  5. मेरुदण्ड पीठ की ओर पसलियों को जुड़ने का स्थान प्रदान करती है।
  6. मेरुदण्ड सिर से धड़ तक सारे शरीर को साधे रखती है।

UP Board Solutions

प्रश्न 4:
वक्ष-स्थल के अस्थि-संस्थान की संरचना का संक्षेप में परिचय दीजिए।
या
वक्ष तथा पसलियों का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर :
वक्षीय कटहरा

गर्दन से लेकर जाँघ तक का भाग धड़ कहलाता है। मध्यपट द्वारा इसके दो स्पष्ट भाग हो जाते हैं
(1) वक्ष (Thorax) तथा
(2) उदर (Abdomen)

वक्षीय भाग में शरीर के अति कोमल एवं महत्त्वपूर्ण अंग (फेफड़े, हृदय आदि) स्थित होते हैं। कंकाल का वक्षीय भाग, जिसे वक्षीय कटहरा कहते हैं, इन अंगों को पूर्ण रूप से सुरक्षित रखता है। इसमें मेरुदण्ड, उरोस्थि तथा पसलियाँ आदि सम्मिलित हैं। इनका (UPBoardSolutions.com) संक्षिप्त परिचय अग्रलिखित है

(1) रीढ़ की हड्डी या मेरुदण्ड (Vertebral Column):
वक्षीय कंकाल का पृष्ठ भाग अर्थात् पीठ का भाग इसी हड्डी के द्वारा बनता है। यह हड्डी, जो कई छोटी-छोटी छल्ले जैसी हड्डियों के पास-पास लगी होने से बनती है, अन्य हड्डियों को साधने, उन्हें उरोस्थिका स्थान देने आदि का कार्य करने के साथ ही अनेक पेशियों को भी स्थान देती है। यह हड्डी इस कंकाल का मजबूत पृष्ठ बनाती है। बनाती है।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 17 मानव अस्थि-संस्थान तथा सन्धियाँ

(2) उरोस्थि (Sternum):
यदि हम अपने वक्ष में मध्य रेखा पसलियाँ पर अपनी उँगलियों से टटोलकर देखें तो एक दबा हुआ स्थान महसूस होता है। इसके नीचे छाती की हड्डी या उरोस्थि होती है। यह हड्डी प्रमुख रूप से 3 महत्त्वपूर्ण भागों से मिलकर बनती है

(क) उग्र-उरोस्थि (Manubrium):
यह उरोस्थि का अगला, चौड़ा तथा चपटा भाग है, जिसका आधार लगभग तिकोना । चलायमान पसलियाँ तथा नीचे की ओर लगभग सँकरा होता जाता है। दोनों ओर की । त्रिविम दृश्य हँसली की हड्डी अर्थात् जत्रुकास्थि (Collar Bone) इन हड्डियों से जुड़ी होती है। पसलियों को (UPBoardSolutions.com) पहला जोड़ भी इसी भाग से जुड़ा होता है।

UP Board Solutions

(ख) मध्य-उरोस्थि (Mesosternum):
यह भाग काफी लम्बा और सँकरा होता है। यह भाग एक संयुक्त हड्डी के रूप में होता है, जिसमें भ्रूणावस्था में ही चार हड्डियों के टुकड़े पूरी तरह जुड़कर एक हो जाते हैं। पसलियों के छह जोड़े (दूसरी से सातवीं पसली तक) इसी भाग पर दोनों ओर जुड़े होते हैं।

(ग) पश्च-उरोस्थि या जिंफीस्टर्नम (Giphisternum):
यह छोटा भाग है। प्रारम्भिक अवस्था में तो बच्चों में यह उपास्थियों का बना होता है, किन्तु बाद में यह कड़ा हो जाता है। इस भाग में कोई पसली जुड़ी न होने के कारण यह भाग पसलियों से अलग रहता है।

पसलियाँ या पर्शकाएँ

इनकी कुल संख्या 12 जोड़े अर्थात् 24 होती है। ये विशेष रूप से धनुष-कमान की तरह झुककर वक्षीय कटहरा या पिंजरा बनाती हैं। सभी पसलियाँ पृष्ठ भाग में अपने क्रमांक से कशेरुकाओं से जुड़ी होती हैं। इस प्रकार प्रत्येक कशेरुका से दोनों ओर एक-एक पसली उसी क्रमांक में जुड़ी होती है। दूसरी ओर अर्थात् जन्तु के प्रतिपृष्ठ तल की ओर यह पसली उरोस्थि से जुड़ी रहती है, जिसमें से पहला जोड़ा उग्र उरोस्थि से तथा दूसरे से सातवें तक मध्य-उरोस्थि से जुड़े रहते हैं। आठवीं पसली अपनी ओर की सातवीं पसली से मध्य में जुड़ जाती है। नवीं व दसवीं पसली आपस में जुड़ी रहती हैं। इसके अतिरिक्त, ग्यारहवीं व बारहवीं पसली केवल कशेरुकाओं से जुड़ी रहती हैं, जिसके फलस्वरूप इनके दूसरे सिरे बिल्कुल स्वतन्त्र रहते हैं। इसलिए इन्हें मुक्त पर्शकाएँ या तैरती हुई पसलियाँ (Floating ribs) कहते हैं। इनमें से पहले से लेकर सातवें जोड़े तक तो सत्य पसलियाँ तथा शेष मिथ्या पसलियाँ होती हैं। पसलियाँ वक्षीय कटहरे का मुख्य भाग बनाती हैं तथा साथ ही ये कटहरे के भीतरी स्थान को घटा-बढ़ा भी सकती हैं। कटहरे के बीच की मांसपेशियाँ फैलकर पसलियों को झुकाती एवं सौंधा करती रहती हैं, जिससे कि कटहरे का भीतरी स्थान घटता-बढ़ता रहता है। इससे फेफड़ों की संकुचन व फैलने की गति में सहायता मिलती है।

UP Board Solutions

प्रश्न 5:
पैर की हड्डियों का वर्णन कीजिए। [2015]
या
पैर की अस्थियों का चित्र बनाकर नामांकित कीजिए। [2008]
उत्तर:
प्रत्येक पश्च-पाद के

  1. जाँघ,
  2. टाँग,
  3. टखना,
  4. तलवा तथा
  5. उँगलियाँ; पाँच भाग होते हैं। इनका संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है

(1) जाँघ की हड्डी अथवा उर्विका (Femur):
यह एक लम्बी वे अत्यधिक मजबूत हड्डी होती है। इसका सिरा गोल एवं चिकना होता है तथा श्रोणि उलूखल में फंसा रहता है, जिससे कि यह सहज ही कई दिशाओं में घूम सकती है। इसका दूसरा सिरा घुटने का जोड़ बनाता है तथा अपेक्षाकृत चौड़ा होता है।

(2) पगदड़ या टाँग:
घुटने से आगे टखने तक यह श्रेणिफलक भाग दी हड्डियों से मिलकर बना होता है। इनमें से भीतरी त्रिकास्थि हड्डी, जिसे अन्त:जंघिका (Tibia) कहते हैं, मोटी तथा आसनास्थि अधिक लम्बी होती है; जबकि बाहरी हड्डी, जिसे उर्विका बहि:जंधिका (Fibula) कहते हैं, अपेक्षाकृत छोटी (UPBoardSolutions.com) तथा सँकरी होती है। घुटने को मुख्य रूप से अन्त:जंघिका ही बनाती है। इस स्थान पर एक ओर अन्त:जंघिका तथा दूसरी ओर उर्विका के तल आपस में चिपके रहते हैं। बहि:जंघिका का इस ओर जानुका । का सिरा अन्त:जंघिका से जुड़ा होता है। घुटने पर सामने की क चपटी तिकोनी हड्डी और होती है, जिसे जानुका अन्तःजंघिको बहि:जंघिको (पटेला) कहते हैं। यह हड्डी घुटने को आगे की ओर मुड़ने से रोकती है, किन्तु पीछे की ओर मोड़ने में रुकावट नहीं डालती। गुल्फ की अस्थि

(3) टखना:
टखने में 7 हड्डियाँ होती हैं। ये कलाई की तरह स्थित होती हैं, किन्तु अपेक्षाकृत ज्यादा मजबूत और अंगुलास्थियाँ बड़ी भी होती हैं; अतः इनसे एड़ी को कुछ भाग भी बनता है। शरीर का सम्पूर्ण भार इन्हीं को सँभालना अस्थियों का आपसी सम्बन्ध तथा पड़ता है।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 17 मानव अस्थि-संस्थान तथा सन्धियाँ

(4) तलवा या प्रपाद:
इस भाग को बनाने के लिए 5 लम्बी हड्डियाँ होती हैं। ये सीधी होती हैं। तथा लगभग सम्पूर्ण तलवे को बनाती हैं। इन्हें प्रपादास्थियाँ कहते हैं। पीछे की ओर ये टखने की हड्डी से जुड़ी होती हैं, जबकि आगे की ओर इनसे उँगलियों की अस्थियाँ जुड़ती हैं।

UP Board Solutions

(5) उँगलियाँ:
प्रत्येक उँगली में 3 किन्तु अँगूठे में केवल 2 हड्डियाँ होती हैं। ये हड्डियाँ सीधी व हाथ की हड्डियों की अपेक्षा छोटी होती हैं। यहाँ अँगूठा भी उँगलियों की ही दिशा में लगा रहता है।

प्रश्न 6:
बाहु की अस्थियों का सचित्र वर्णन कीजिए।
या
बाहु की अस्थियों के नाम लिखिए। कोहनी में किस प्रकार का जोड़ पाया जाता है?
या
चित्र की सहायता से अग्रबाह की अस्थियों का वर्णन कीजिए।
या
बाह में पाई जाने वाली अस्थियों के नाम लिखिए। [2011, 13, 14, 16]
उत्तर:
बाह की अस्थियाँ

सम्पूर्ण बाहु की अस्थियों को 5 भागों में बाँट सकते हैं; जैसे-ऊपर से क्रमशः ऊपरी बाहु, अध:बाह या अग्रबाहु, कलाई, हथेली तथा उँगलियाँ। प्रत्येक भाग को बनाने के लिए एक या कुछ अस्थियाँ होती हैं; जैसे

ऊपरी बाहु की अस्थियाँ:
यह केवल एक अस्थि से बनती है जिसे प्रगण्डिकास्थि (Humerus) कहते हैं। यह एक लम्बी अस्थि होती है जो काफी मजबूत व अन्दर से खोखली होती है। लम्बाई में यह पूर्ण ऊपरी बाहु में फैली रहती है। इसकी ऊपरी सिरा गेंद की तरह गोल होता है तथा अंस-फलक के (UPBoardSolutions.com) अंसकूप में फँसा रहता है। यह अपने गोल तथा चिकनेपन के कारण कूट में आसानी से इधर-उधर या किसी भी दिशा में घूम सकता है। इसका दूसरा सिरा अग्रबाहु की अस्थि के साथ एक वि प्रकार की सन्धि बनाता है जो केवल एक ओर को खुलती या बन्द होती है। इस प्रकार की सन्धि
को कब्जा सन्धि कहते हैं। यह भाग कोहनी का जोड़ बनाता है।

अग्रबाहु की अस्थि:
अग्रबाहु या अध:बाहु में दो लम्बी मजबूत अस्थियाँ होती हैं। दोनों एक-दूसरे के पास-पास लगी रहती हैं। इन अस्थियों को बहिःप्रकोष्ठिकास्थि (Radius) तथा अन्तः प्रकोष्ठिकास्थि (UIna) कहते हैं। इनमें से रेडियस अँगूठे की ओर तथा अल्ना छोटी उँगली की ओर होती है। अल्ना अपेक्षाकृत लम्बी अस्थि है। यही अस्थि कोहनी के जत्रुकास्थि भाग में और लम्बी होकर कब्जा सन्धि बनाने में सहायक है। अंर,लङ रेडियस का ऊपरी सिरा सँकरा होता है जो प्रकोष्ठिका के साथ जुड़ा रहता है; किन्तु अगला सिरा, जो कलाई की अस्थि के पास होता है, प्रगण्डिकास्थि काफी चौड़ा होता है। इन दोनों लम्बी अस्थियों का लगाव अग्रबाहु में इस प्रकार होता है कि यदि हम हथेली को सीधा फैलाते हैं, तो ये एक-दूसरे के पास स्थित होती हैं, किन्तु हथेली को घुमाकर अन्दर अन्त:प्रकोष्ठिका की ओर ले जाएँ, तो ये एक-दूसरे के ऊपर स्थित होती हैं।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 17 मानव अस्थि-संस्थान तथा सन्धियाँ

कलाई की अस्थियाँ:
कलाई में 8 काफी छोटी-छोटी मणिबन्धास्थयाँ अस्थियाँ होती हैं, जिन्हें मणिबन्धिकास्थियाँ (कार्पल्स) कहते हैं। ये मणिबन्ध 4-4 की दो पंक्तियों में स्थित होकर कलाई को बाँधती हैं। इन केर भास्थि अस्थियों के छोटी-छोटी और अलग-अलग होने के कारण कलाई पूरी 18- अँगुल्यास्थियाँ तरह लचकदार होती है तथा किसी भी दिशा में आसानी से घुमाई जा जासकती है।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 17 मानव अस्थि-संस्थान तथा सन्धियाँ

हथेली की अस्थि:
हथेलीहथेली को 5 लम्बी और सँकरी अस्थियाँ, उनका आपसी सम्बन्ध व हड्डियाँ बनाती हैं। इन अस्थियों को करभिकाएँ या मेटा-कार्पल्स। अंसमेखला के साथ लगाव कहते हैं। कलाई की ओर ये मणिबन्ध से जुड़ी होती हैं। तथा आगे की ओर अँगुलियों की अस्थि से इनका सम्बन्ध मणिबन्धिकास्थियाँ होता है।

UP Board Solutions

अँगुलियों की अस्थि:
प्रत्येक अँगुली में 3 अस्थियाँ होती हैं। अँगूठे में केवल दो अस्थियाँ होती हैं। ये अँगुलास्थियाँ कहलाती हैं तथा छोटी होती हैं। एक-दूसरे के साथ सपाट जोड़ एक-दूसरे के ऊपर फिसलने में मदद करता है। अँगूठा अन्य अँगुलियों के पीछे हथेली के साथ। समकोण बनाता है। इसकी ऐसी स्थिति के कारण ही हम । छोटी-से-छोटी वस्तु को भी आसानी से पकड़ पाते हैं।

प्रश्न 7:
सन्धि किसे कहते हैं? सन्धि कितने प्रकार की होती हैं? उदाहरण सहित वर्णन कीजिए। [2007, 08, 10, 12, 13, 15, 17, 18]
या
मनुष्य के शरीर में कितने प्रकार की सन्धियाँ होती हैं? किसी एक प्रकार की सन्धि का चित्र बनाइए। [2009, 10, 12]
या
अस्थि सन्धि से आप क्या समझती हैं? अस्थि सन्धि के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उसके प्रकारों का उल्लेख कीजिए। [2007, 08, 9, 10, 16]
या
कन्दुक-खल्लिका सन्धि की रचना लिखिए व चित्र बनाइए  [ 2014, 15, 16]
या
कोहनी में किस प्रकार की सन्धि पायी जाती है? चित्र सहित वर्णन कीजिए। [2013]
या
अस्थि सन्धि से आप क्या समझती हैं? अस्थि सन्धियाँ कितने प्रकार की होती हैं? चल सन्धियों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए। [2008]
या
चल सन्धि क्या है ? चल सन्धि के प्रकार उदाहरण सहित लिखिए। [2009, 13]
या
सन्धियाँ कितने प्रकार की होती हैं? [2010, 13, 14, 16]
या
अस्थियों में ‘अचल सन्धि से आप क्या समझती हैं? [2018]
उत्तर:
अस्थि सन्धियाँ

शरार में दो या दो से अधिक अस्थियों के मिलने के स्थान को अस्थि-सन्धि कहते हैं। शरीर के भिन्न भिन्न अंगों की अस्थियाँ पररपा विद रहती हैं। प्रत्येक सन्धि ‘बन्धक तन्तुओं तथा ‘सौत्रिवः पनों की पट्टियों से बँधी रहती है। ये बन्धक सूत्र डोरे के समान होते हैं तथा अस्थियों को उचित स्थानों पर स्थित रखते हैं। जिन स्थानों पर दो अस्थियों की सन्धियाँ होती हैं, वहाँ पर अस्थियों में कोमल पदार्थ कार्टिलेज अधिक मात्रा में विद्यमान रहता है; अत: जोड़ पर इसके रहने से (UPBoardSolutions.com) जोड़ में सुविधा रहती है। जोड़ पर अस्थियाँ एक-दूसरे पर घूमती हैं। इससे रगड़ होना स्वाभाविक है। इस रगड़ को बचाने के लिए प्रत्येक सन्धि पर ऐसी ग्रन्थियाँ होती हैं, जिनसे एक प्रकार का चिकना द्रव पदार्थ सदैव निकलता रहता है। यह पदार्थ सन्धि को उसी प्रकार से सुरक्षित रखता है, जिस प्रकार से कोई मशीन तेल दे देने से सुरक्षित रहती है।

UP Board Solutions

क्रिया एवं महत्त्व:
सन्धियों पर ही अंगों की गति होती है। यदि हमारी बाहु की अस्थि स्केप्युता से अपने वर्तमान रूप में संयुक्त न होती तो हमारी बाँह बेकार निर्जीव अवस्था में लटकती रहती। हम उसे न तो घुमा-फिरा सकते थे और न ही ऊपर से नीचे उठा सकते थे। जब हम दौड़ते हैं, लड़ते हैं या किसी वस्तु को पकड़ते हैं, तो हमारे अंगु इन सन्धियों पर ही मुड़ते हैं। ये मुड़ने की क्रिया उत्पन्न करने वाली पेशियाँ होती हैं, जो एक सन्धि से उदय होकर दूसरी अस्थि पर एक लम्बी रस्सी के समान कण्डरा द्वारा लगती है। जब पेशी संकुचित होती है, तो जिस अस्थि पर वह लगी होती है, वह ऊपर यो सामने या पीछे की ओर उठ जाती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सन्धियों के द्वारा ही हमारे शरीर की विभिन्न गतियाँ सम्भव होती हैं। यदि हमारे अस्थि-संस्थान में ये समस्त सन्धियाँ न होतीं, तो हमारा शरीर किसी भी प्रकार की गति न कर पाता तथा वह पूर्ण रूप से स्थिर ही रहता।
सन्धियाँ दो प्रकार की होती हैं
(1) अचल तथा
(2) चलः

(1) अचल सन्धियाँ:
जब दो या दो से अधिक अस्थियाँ आपस में मिलकर इस प्रकार जुड़े जाएँ कि वे बिल्कुल हिल-डुल ही न सकें, तो उस सन्धि को अचल सन्धि कहते हैं। इस प्रकार की सन्धियाँ कपाल की अस्थियों में पाई जाती हैं। इस प्रकार के जोड़ के लिए अस्थियों के किनारे इस प्रकार के होने चाहिए कि वे एक-दूसरे में पूर्ण रूप से जमकर बैठ जाएँ।

UP Board Solutions

(2) चल सन्धियाँ:
दो या दो से अधिक अस्थियाँ जब एक-दूसरे के पास इस प्रकार लगी रहती हैं कि वे किसी निश्चित या कई दिशाओं में आसानी से हिल-डुल सकती हों अर्थात् गति कर सकें, तो इस प्रकार के जोड़ को चल सन्धि कहते हैं।
चल सन्धियाँ शरीर में कई प्रकार की होती हैं, जिनसे शरीर के विभिन्न अंगों को मोड़ा, घुमाया या चलाया जा सकता है। हमारे शरीर के विभिन्न अंगों को विभिन्न प्रकार के कार्य करने पड़ते हैं। ये सन्धियाँ निम्न प्रकार की होती हैं

(i) कन्दुक-खल्लिका या गेंद और प्यालेदार सन्धियाँ (Ball and Socket Joint):
यह जोड़ एक प्याले जैसे भाग में किसी दूसरी अस्थि का गोल सिरा फिट रहने से बनता है। ऐसी स्थिति में गेंद जैसा गोल सिरा प्याले जैसे गोल अस्थि में आसानी से चाहे जिधर घूम सकता है। ऐसी सन्धि को कन्दुक-खल्लिका सन्धि कहते हैं। शरीर में इस प्रकार की सन्धि कन्धे पर बाहु का जोड़ (UPBoardSolutions.com) तथा कूल्हे पर टॉग का जोड़ है।

(ii) कब्जा सन्धि (Hinge Joint):
इस प्रकार की सन्धियों में दोनों अस्थियाँ अथवा एक अस्थि एक ही दिशा में खुल या बन्द हो सकती है। इस प्रकार के जोड़ में निश्चय ही कोई एक अस्थि या उसका कोई प्रवर्ध इस प्रकार बढ़ा रहता है कि वह एक निश्चित दिशा के अलावा अन्य दिशा की गति को पूर्णत: रोकता है। इस प्रकार का जोड़ कोहनी, घुटना तथा उँगलियों में मिलता है।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 17 मानव अस्थि-संस्थान तथा सन्धियाँ

(iii) ख़ुटीदार सन्धि (Pivot Joint):
इसे धुराग्र सन्धि भी कहते हैं। इसमें एक अस्थि या उसके प्रवर्ध धुरे की भाँति अथवा बँटे की तरह सीधे होते हैं। इन धुरों पर दूसरी अस्थियाँ या धुरिया इस प्रकार टिकी रहती हैं कि इनको किधर भी घुमाया जा सके। इनमें केवल टिकी हुई अस्थि या अस्थियाँ ही गति करेंगी, बँटे वाली नहीं। रीढ़ की अस्थि की पहली-दूसरी कशेरुका खोपड़ी के साथ इस प्रकार का जोड़ बनाती हैं। वहीं पर इस कशेरुका का एक प्रवर्ध निकला रहता है, जिस पर खोपड़ी रखी रहती है। इस प्रकार खोपड़ी इस पर आसानी से घूमती है।

UP Board Solutions

(iv) फिसलनदार सन्धि (Sliding Joint):
इसे विसप सन्धि भी कहते हैं। ऐसी सन्धि वास्तव में कोई जोड़ नहीं बनाती है, बल्कि इनकी अस्थियाँ एक-दूसरे के ऊपर अपने चपटे तल के पास-पास लगी रहती हैं। इन दोनों की चौड़ाई में कई उपास्थियाँ होती हैं जो इन अस्थियों को गति करने के लिए फिसलने में मदद करती हैं। कलाई की अस्थि के जोड तथा कशेरुका के जोड़ों में इसी प्रकार की सन्धि होती है। यद्यपि हमारी अँगुलियों में कब्जे की तरह के पोरुए होते हैं, जबकि इन अस्थियों का आपसी जोड़ भी फिसलने वाला ही होता है।

(v) पर्याण या सैडिल सन्धि (Saddle Joint):
इस प्रकार की अस्थि सन्धि हमारे हाथ के अँगूठे की मेटाकार्पल्स तथा कार्पल्स के मध्य पाई जाती है। इस सन्धि की विशिष्ट रचना के ही कारण. हाथ को अँगूठा अन्य अँगुलियों की अपेक्षा इधर-उधर अधिक घुमाया जा सकता है। सैडिल सन्धि की रचना कन्दुक-खल्लिका से मिलती-जुलती होती हैं, परन्तु इसे सन्धि में पाए जाने वाले बॉल तथा साकेट कम विकसित होते हैं।

अस्थियों की सन्धियाँ या जोड़ सदैव ही विशेष प्रकार की डोरियों या स्नायुओं (Ligaments) से बँधे रहते हैं। इन्हीं जोड़ों पर मांसपेशियाँ लगी रहती हैं। मांसपेशियाँ गति कराने में सहायक होती हैं, जबकि ये डोरियाँ इन्हें बाँधे रखने में। इस प्रकार के जोड़ों में उपास्थियाँ भी कई बार महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं।

चल सन्धि की रचना

हमारे शरीर की चल-सन्धियों में इनमें कई प्रबन्ध होते हैं, ताकि अस्थियाँ आपस में रगड़ खाकर खराब न हों और वे इस प्रकार बँधी रहें कि वे अपने स्थान से हटें भी नहीं। इसके लिए श्वेत स्नायु की गोल या चौड़ी डोरियाँ होती हैं। ये इोरियाँ ही इन अस्थियों को एक-दूसरे के साथ निश्चित स्थान की ओर निश्चित दिशा में बॉधे रखती हैं। छोटी पेशियाँ इन्हें खींचकर किसी भी दिशा या गन्तव्य दिशा में हटाने की कोशिश करती हैं, किन्तु स्प्रिंग की तरह उल्टी दिशा में ये इन्हें (UPBoardSolutions.com) पूर्व-निर्धारित स्थान पर खींच लेती हैं। अस्थियों को रगड़ से बचाने का विशेष प्रबन्ध होता है। इसके लिए दोनों अस्थियों के बीच एक थैली जैसी वस्तु होती है जिसके अन्दर एक गाढ़ा स्नेहयुक्त तरल पदार्थ होता है। इस तरल पदार्थ के कारण अस्थियों के सिरे सदैव चिकने रहते हैं। चिकने तरल पदार्थ वाले इन थैलों को स्नेहको यो स्राव-सम्पुट (Synovial capsules) कहते हैं। इनके अन्दर भरे चिकने पदार्थ को स्नेहक द्रव (Synovial fluid) कहते हैं।

UP Board Solutions

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
मानव शरीर में पाई जाने वाली अस्थियों के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
यह सत्य है कि प्रायः सभी अस्थियों की आन्तरिक रचना एक समान ही होती है, परन्तु उनके बाहरी आकार में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है। आकार की भिन्नता के आधार पर मानव शरीर की समस्त अस्थियों को निम्नलिखित छ: प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है

  1.  चपटी अस्थियाँ:               कपाल की अस्थियाँ।
  2. लम्बी अस्थियाँ:                 बाँहों तथा टाँगों की अस्थियाँ।
  3. गोल अस्थियाँ:                  कलाई तथा टखने की अस्थियाँ।
  4. विषम अस्थियाँ:                मेरुदण्ड की अस्थियाँ।
  5. छोटी अस्थियाँ:                 अँगुलियों की अस्थियाँ।
  6. कीलाकार अस्थियाँ:         टखने की अस्थियों की दूसरी तह के भीतर की तीन अस्थियाँ।

प्रश्न 2:
सन्धि किसे कहते हैं? सन्धियों के प्रकार लिखिए। कन्धे में किस प्रकार की सन्धि पाई जाती है?
या
अस्थि सन्धियाँ किसे कहते हैं? कब्जेदार जोड़ के बारे में लिखिए। [2007, 16]
या
अस्थि-सन्धि किसे कहते हैं। सन्धियों के नाम उदाहरण सहित लिखिए। [2008]
उत्तर:
शरीर के कंकाल तन्त्र में दो या दो से अधिक अस्थियों के मिलने के स्थान को सन्धि कहते हैं। सन्धियाँ प्रमुखतः दो प्रकार की होती हैं
(1) चल सन्धि तथा
(2) अचल सन्धि।

चल सन्धियाँ पूर्ण या अपूर्ण प्रकार की हो सकती हैं। पूर्ण सन्धियाँ कई प्रकार की होती हैं; जैसे-कन्दुक-खल्लिका सन्धि, कब्जा सन्धि, धुराग्र या कीलक सन्धि, विसप सन्धि आदि। कन्धे के स्थान पर कन्दुक-खल्लिका सन्धि पाई जाती है।

UP Board Solutions

प्रश्न 3:
हमारे मेरुदण्ड में पाई जाने वाली कशेरुकाओं की संख्या एवं स्थिति का उल्लेख कीजिए।
या
मेरुदण्ड में कितनी अस्थियाँ होती हैं?
उत्तर:
एक वयस्क व्यक्ति के मेरुदण्ड में कुल 26 कशेरुकाएँ होती हैं, जिनकी स्थिति के अनुसार संख्या निम्नलिखित है
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 17 मानव अस्थि-संस्थान तथा सन्धियाँ

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
अस्थि-संस्थान से क्या आशय है? [2003, 05]
उतर:
शरीर की समस्त अस्थियों की व्यवस्था को अस्थि-संस्थान या कंकाल-तन्त्र के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 2:
वयस्क मनुष्य में अस्थियों की कुल संख्या कितनी होती है?
या
शरीर में कुल कितनी अस्थियाँ होती है। [ 2011, 15]
उत्तर:
वयस्क मनुष्य के अस्थि-संस्थान में प्राय: 206 (UPBoardSolutions.com) अस्थियाँ होती हैं।

UP Board Solutions

प्रश्न 3:
मानव अस्थि-संस्थान को कितने भागों में विभक्त किया जा सकता है?
उत्तर:
मानव अस्थि-संस्थान को तीन मुख्य भागों में बाँटा जा सकता है
(1) खोपड़ी,
(2) धड़
और
(3) ऊर्ध्व तथा अधोशाखाएँ।

प्रश्न 4:
अस्थियों के विकास के लिए कौन-कौन से पोषक तत्त्व आवश्यक हैं? [2009]
उत्तर:
कैल्सियम तथा फॉस्फोरस अस्थियों के विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्त्व हैं।

प्रश्न 5:
अस्थियों के खोखले भाग को क्या कहते हैं? उसमें क्या भरा रहता है?
उत्तर:
अस्थियों के खोखले भाग को अस्थि-गुहा कहते हैं। उसमें अस्थिमज्जा नामक गूदेदार पदार्थ भरा रहता है।

प्रश्न 6:
लाल रक्त कणिकाओं का निर्माण कहाँ होता है?
उत्तर:
लाल रक्त कणिकाएँ अस्थियों के अस्थिमज्जा भाग में बनती हैं।

प्रश्न 7:
बाल्यावस्था में मेरुदण्ड में कशेरुकाओं की संख्या बताइए।
उत्तर:
बच्चों के मेरुदण्ड में 33 कशेरुकाएँ होती हैं।

प्रश्न 8:
वयस्क व्यक्ति के मेरुदण्ड में कितनी कशेरुकाएँ पाई जाती हैं? [2009]
उत्तर:
वयस्क व्यक्ति के मेरुदण्ड में 26 कशेरुकाएँ पाई जाती हैं।

प्रश्न 9:
सिर के मुख्य भाग कौन-से हैं?
उत्तर:
सिर के दो मुख्य भाग हैं
(1) कपाल तथा
(2)  चेहरा।

प्रश्न 10:
हमारे शरीर में लम्बी अस्थियाँ कहाँ-कहाँ पाई जाती हैं?
उत्तर:
हमारे शरीर में बाँहों तथा टाँगों में लम्बी अस्थियाँ पाई जाती हैं।

UP Board Solutions

प्रश्न 11:
मानव खोपड़ी में कुल कितनी अस्थियाँ होती हैं?
उत्तर:
मानव खोपड़ी में कुल 22 अस्थियाँ होती हैं, जिनमें से 8 कपाल में तथा 14 चेहरे में स्थित होती हैं।

प्रश्न 12:
मानव खोपड़ी में प्रायः किस प्रकार की सन्धियाँ पाई जाती हैं?
उत्तर:
मानव खोपड़ी में प्राय: अचल सन्धियाँ होती हैं।

प्रश्न 13:
अस्थि सन्धि किसे कहते हैं? सन्धियों के प्रकार लिखिए। [2008, 10, 15, 16]
उत्तर:
अस्थि-संस्थान में दो अथवा दो से अधिक अस्थियों के परस्पर सम्बद्ध होने की व्यवस्था एवं स्थल को अस्थि सन्धि कहते हैं। शरीर में चल तथा अचल दो प्रकार की अस्थि सन्धियाँ पायी जाती हैं।

प्रश्न 14:
शरीर में सन्धियों से क्या लाभ हैं?
या
शरीर में कंकाल सन्धियों का क्या महत्त्व है? [2010, 12]
उत्तर:
शरीर की गतिशीलता में सन्धियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है। (UPBoardSolutions.com) इन्हीं के कारण हम अपने हाथ, पैर तथा गर्दन आदि को हिला-डुला पाते हैं। ।

प्रश्न 15:
शरीर में मूल रूप से कितने प्रकार की सन्धियाँ पाई जाती हैं? [2007, 10]
उत्तर:
हमारे शरीर में मूल रूप से दो प्रकार की सन्धि पाई जाती हैं। जिन्हें क्रमश: अचल सन्धि तथा चल सन्धि कहा जाता है।

प्रश्न 16:
अचल सन्धि का क्या अर्थ है? यह शरीर में कहाँ पायी जाती हैं?
उत्तर:
हमारे शरीर की उन अस्थि-सन्धियों को अचल सन्धि कहा जाता है, जिनमें किसी प्रकार की गति नहीं होती तथा सम्बन्धितं अस्थियाँ स्थिर होती हैं। अचल सन्धियाँ कपाल की अस्थियों में पाई : जाती हैं।

UP Board Solutions

प्रश्न 17:
पूर्ण चल सन्धियाँ कितने प्रकार की होती हैं?
उत्तर:
पूर्ण चल सन्धियाँ पाँच प्रकार की होती हैं

  1.  कब्जा सन्धि,
  2. कन्दुक-खल्लिका सन्धि,
  3.  ख़ुटीदार सन्धि,
  4. फिसलनदार या प्रसर सन्धि तथा
  5. सैडिल या पर्याण सन्धि।

प्रश्न 18:
चल तथा अचल सन्धि में क्या अन्तर है? [2007, 13]
उत्तर:
चल सन्धियों में विभिन्न प्रकार की निर्धारित गतियाँ होती हैं, जबकि अचल सन्धियों में किसी प्रकार की गति नहीं होती।

प्रश्न 19:
गेंद-गड्ढा (कन्दुक-खल्लिका) सन्धि के दो उदाहरण बताइए।
उत्तर:
गेंद-गड्ढा या कन्दुक-खल्लिका सन्धि के उदाहरण हैं-कन्धे की अस्थि सन्धि तथा कूल्हे की अस्थि सन्धि।

प्रश्न 20:
कब्जा सन्धि तथा बँटीदार सन्धि का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:
(1) कब्जा सन्धि: इस प्रकार की सन्धियों में दोनों अस्थियों अथवा एक अस्थि कब्जे की तरह एक ही दिशा में खुल या बन्द हो सकती है; जैसे–कुहनी या उँगली।
(2) ख़ुटीदार सन्धि: इसमें एक अस्थि या उसके प्रवर्ध धुरे की भाँति अथवा बँटे की तरह (UPBoardSolutions.com) सीधी होती हैं। इन पर दूसरी अस्थि को किसी भी तरफ घुमाया जा सकता है; जैसे–कशेरुका के एक प्रवर्ध पर रखी खोपड़ी। इस प्रकार खोपड़ी दाएँ या बाएँ, किधर भी घूम सकती है।

UP Board Solutions

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न-निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. कंकाल-तन्त्र के मुख्य कार्य हैं
(क) शरीर को आकृति एवं दृढ़ता प्रदान करना
(ख) रक्त कणों का निर्माण करना
(ग) शरीर को गति प्रदान करना
(घ) ये सभी

2. हड्डी में कड़ापन किस तत्त्व के कारण होता है? [2008, 10, 11, 12, 15, 17]
(क) लौह तत्त्व
(ख) सोडियम
(ग) मैग्नीशियम
(घ) कैल्सियम

3. हड्डियाँ किस तत्त्व से मजबूत होती हैं? [2011]
(क) प्रोटीन
(ख) सोडियम
(ग) कैल्सियम
(घ) वसा

4. खोपड़ी में अस्थियों की कुल संख्या कितनी होती है?
(क) आठ
(ख) चौदह
(ग) बाईस
(घ) चौबीस

UP Board Solutions

5. मानव कंकाल में कितनी अस्थियाँ होती हैं? [2007, 10, 13, 15, 18]
(क) 100
(ख) 206
(ग) 200
(घ) 106

6. बच्चों के मेरुदण्ड में कितनी अस्थियाँ होती हैं? [2013]
(क) 35
(ख) 33
(ग) 30
(घ) 36

7. कन्धे पर किस प्रकार की सन्धि होती है? [2014]
(क) अल्पचल सन्धि
(ख) कब्जेनुमा सन्धि
(ग) अचल सन्धि
(घ) गेंद-गड्ढा सन्धि

8. कोहनी का जोड़ कौन-सा जोड़ कहलाता है? [2015, 16, 17]
(क) धुराग्र
(ख) कब्जेदार
(ग) फिसलने वाला
(घ) ख़ुटीदार

9. चेहरे में कितनी अस्थियाँ पाई जाती हैं? [2007, 14, 17, 18]
(क) अठारह
(ख) बीस
(ग) चौदह
(घ) ये सभी

10. ऊपरी बाह की हडडी होती है
(क) लम्बी
(ख) मोटी
(ग) चपटी
(घ) कैसी भी

11. ऊपरी बाहु की अस्थि है [2018]
(क) अंसफलक
(ख) प्रगण्डिका
(ग) बहिः प्रकोण्ठिकास्थि
(घ) अन्त: प्रकोण्ठिकास्थि

UP Board Solutions

12. गर्दन के भाग में ग्रीवा कशेरुकाओं की संख्या होती है
(क) 4
(ख) 5
(ग) 6
(घ) 7

13. घुटना किस प्रकार की सन्धि का उदाहरण है?
(क) कन्दुक-खल्लिका (गेंद-गड्ढा) जोड़
(ख) कब्जेदार जोड़
(ग) कीलदार जोड़
(घ) फिसलने वाला जोड़

14. रीढ़ की हड्डी में पाया जाता है
(क) कन्दुक-खल्लिका जोड़
(ख) चूलदार जोड़
(ग) कीलदार जोड़।
(घ) फिसलने वाला (विसप) जोड़

15. मानव शरीर में कितने प्रकार के जोड़ होते हैं? [2008, 10]
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच

16. मानव शरीर में कितनी जोड़ी पसलियाँ पाई जाती हैं? [2008, 11, 12, 13, 14, 15]
(क) 5 जोड़ी
(ख) 10 जोड़ी
(ग) 12 जोड़ी
(घ) 20 जोड़ी

17. खूटी (धुराग्र) सन्धि पाई जाती है [2008, 14]
(क) कन्धे में
(ख) घुटने में
(ग) खोपड़ी में
(घ) कोहनी में

18. अचल सन्धि कहाँ पाई जाती है? [2009, 10, 11]
(क) खोपड़ी में
(ख) घुटने में
(ग) कलाई में
(घ) कोहनी में

19. आठ हड्डियाँ पायी जाती हैं [2009, 10, 11]
(क) रीढ़ में
(ख) पेट में
(ग) कपाल में
(घ) हथेली में

20. रीढ़ की हड्डी में कितनी कशेरुकाएँ पायी जाती हैं? [2014, 16]
या
एक वयस्क व्यक्ति के मेरुदण्ड में कितनी कशेरुकाएँ होती हैं? [2014]
(क) 28
(ख) 24
(ग) 26
(घ) 25

UP Board Solutions

उत्तर:
1. (घ) ये सभी,
2. (घ) कैल्सियम,
3. (ग) कैल्सियम,
4. (क) आठ,
5. (ख) 206,
6. (ख) 33,
7. (घ) गेंद-गड्ढा सन्धि,
8. (ख) कब्जेदार,
9. (ग) चौदह,
10. (क) लम्बी,
11. (ख) प्रगण्डिका,
12. (घ) 7,
13. (ख) कब्जेदार जोड़,
14. (ग) कीलदार जोड़,
15. (क) दो,
16, (ग) 12 जोड़ी,
17. (ग) खोपड़ी में,
18. (क) खोपड़ी में,
19. (ग) कपाल में
20. (ग) 28

We hope the UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 17 मानव अस्थि-संस्थान तथा सन्धियाँ help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 17 मानव अस्थि-संस्थान तथा सन्धियाँ, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.