UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 12 (Section 1)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 12 नवजागरण तथा राष्ट्रीयता का विकास (अनुभाग – एक)

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नवजागरण से क्या तात्पर्य है ? भारत में नवजागरण के कारणों पर प्रकाश डालिए। [2018]
             या
बीसवीं शताब्दी से पूर्व भारत में नवचेतना जाग्रत करने में सहायक कारकों की व्याख्या कीजिए।
             या
उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में समाज-सुधार आन्दोलनों में सहायक किन्हीं दो कारणों को स्पष्ट कीजिए।
             या
भारत में राष्ट्रीय जागरण में सहायक किन्हीं चार कारणों का वर्णन कीजिए। [2016]
उत्तर :

नवजागरण का अर्थ

उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में एक ऐसी नवीन चेतना का उदय हुआ, जिसने देश के सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक जीवन को नवचेतना एवं नवजागरण प्रदान किया, जिसे भारतीय नवजागरण या पुनर्जागरण (Renaissance) के नाम से (UPBoardSolutions.com) पुकारते हैं। “पुनर्जागरण का अर्थ विद्या, कला, विज्ञान, साहित्य और भाषाओं के विकास से लगाया जाता है। भारत में आये जागरण ने पश्चिमी सभ्यता से तर्क, समानता और स्वतन्त्रता की प्रेरणा लेकर भारत के प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। इसने प्राचीन भारतीय सभ्यता में उत्पन्न दोषों को दूर करते हुए उसे प्रगति के लिए नवीन आधार और जीवन प्रदान किया। आधुनिक भारत में इस नवजागरण के फलस्वरूप नये सांस्कृतिक एवं सामाजिक मूल्यों का उदय हुआ। प्रारम्भ में नवजागरण आन्दोलन केवल एक बौद्धिक जागृति थी, किन्तु बाद में इस आन्दोलन के फलस्वरूप देश में अनेक महत्त्वपूर्ण सामाजिक तथा धार्मिक सुधार हुए।

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भारत में नवजागरण के कारण

भारत में नवजागरण के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे –

1. हिन्दू धर्म व समाज के दोष – उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय समाज और हिन्दू धर्म में अनेक दोष उत्पन्न हो गये थे; जैसे-जाति-प्रथा, सती–प्रथा, बाल-विवाह, विधवा-पुनर्विवाह निषेध, मूर्तिपूजा, छुआछूत, अन्धविश्वास आदि। भारतीय समाज और धर्म की रक्षा के लिए समाज-सुधारकों ने प्रत्येक दोषों और कुरीतियों को दूर करना आवश्यक समझा।

2. राष्ट्रीयता की भावना का विकास – सन् 1857 ई० की क्रान्ति ने भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना उत्पन्न कर दी। इसके फलस्वरूप भारतवासी अपने अधिकारों के लिए तथा समाज-धर्म में व्याप्त बुराइयों को। दूर करने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हो गये। इससे देश में नवजागरण की लहर उत्पन्न हो गयी।

3. पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार – भारत के राष्ट्रीय नवजागरण में पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। अंग्रेजी भाषा के माध्यम से भारतीयों का परिचय यूरोप के ऐसे विचारकों से हुआ जो राष्ट्रीयता, लोकतन्त्र तथा स्वतन्त्रता की भावना से परिपूर्ण थे। इससे भारतीयों की मनोवृत्ति में परिवर्तन आने लगा और वे गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए व्याकुल हो उठे।

4. महान् सुधारकों का जन्म – उन्नीसवीं शताब्दी में भारत के सौभाग्य से देश के विभिन्न भागों में राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, सर सैयद अहमद खाँ, गुरु राम सिंह तथा केशवचन्द्र सेन जैसे महापुरुषों ने जन्म लिया। ये उच्चकोटि के विद्वान् तथा सच्चे धर्म-प्रेमी थे। इनमें आत्मविश्वास, दृढ़ निश्चय तथा समाजकल्याण की भावनाएँ प्रबल थीं। इनके प्रयत्नों के फलस्वरूप ब्रह्म समाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, अलीगढ़ आन्दोलन आदि सुधारवादी आन्दोलनों का जन्म हुआ।

5. प्रेस तथा साहित्य का योगदान – उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम अर्द्ध भाग में अंग्रेजी तथा देशी भाषाओं में अनेक समाचार-पत्र तथा पत्रिकाएँ छपने लगी थीं। सुधारों के लेख प्राय: समाचार-पत्रों में छपते रहते थे। लोकमान्य तिलक, बंकिम चन्द्र (UPBoardSolutions.com) चटर्जी, माइकल मधुसूदन दत्त, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आदि ने जनता को राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत साहित्य प्रदान किया। इनके द्वारा लिखी पुस्तकें देश के विभिन्न भागों में पहुँच गयीं, जिनसे सुधारों के विचारों का खूब प्रचार-प्रसार हुआ।

6. यातायात तथा डाक-व्यवस्था का प्रभाव – ब्रिटिश सरकार ने भारत में अपने लाभ के लिए यातायात और संचार के साधनों का विकास किया। देश भर में रेल, डाक व तार व्यवस्था के फैल जाने से देश के एक भाग से दूसरे भाग में जाना या सम्पर्क करना आसान हो गया। इससे देश के विभिन्न भागों के लोग एक-दूसरे के सम्पर्क में आने लगे और परस्पर विचार-विमर्श करने लगे। इससे जनता में राष्ट्रीय चेतना का संचार होने लगा।

7. विदेशी घटनाओं का प्रभाव – इसी समय विदेशों में कुछ ऐसी घटनाएँ घटीं, जिन्होंने भारतीयों पर गहरा प्रभाव डाला। इटली और जर्मनी का राजनीतिक एकीकरण (1870-71 ई०), इंग्लैण्ड के सुधार आन्दोलन (1832-67 ई०), अमेरिका में दासों की मुक्ति (1865 ई०) आदि घटनाओं ने भारतीयों के मन में भी राष्ट्रीयता की भावना का संचार किया।

8. ईसाई धर्म का प्रचार – सन् 1813 ई० के चार्टर ऐक्ट के बाद बहुत अधिक संख्या में ईसाई धर्म के प्रचारक भारत में आये। वे अपने भाषणों में हिन्दू तथा इस्लाम धर्म की कठोर शब्दों में निन्दा करते थे। वे बड़ी संख्या में हिन्दुओं, मुसलमानों तथा सिक्खों को ईसाई बनाने में सफल होने लगे। इन परिस्थितियों में हिन्दू तथा इस्लाम धर्म के शुभचिन्तकों की आँखें खुलीं और उन्होंने अपने धर्म की
बुराइयों को दूर करने के लिए प्रयास प्रारम्भ कर दिये।

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प्रश्न 2.
राजा राममोहन राय के जीवन एवं मुख्य कार्यों का वर्णन कीजिए। [2010, 11, 12]
             या
राजा राममोहन राय के व्यक्तित्व एवं किन्हीं तीन सामाजिक सुधारों का वर्णन कीजिए।
             या
राजा राममोहन राय कौन थे ? उन्हें आधुनिक भारत का जनक क्यों कहा जाता है ? (2018)
             या
ब्रह्म समाज की स्थापना किसने की ? ब्रह्म समाज के योगदान पर प्रकाश डालिए। [2012]
             या
ब्रह्म समाज की स्थापना कब हुई थी ? इसके संस्थापक कौन थे ? ब्रह्म समाज ने किन सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया ? किन्हीं चार का उल्लेख कीजिए। [2014]
             या
ब्रह्म समाज की स्थापना किसने की ? ब्रह्म समाज द्वारा किन सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने का प्रयास किया गया ? [2014]
             या
राजा राममोहन राय के कार्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए। [2015]
             या
भारतीय नवजागरण में राजा राममोहन राय का क्या योगदान था? [2016]
             या
राजा राममोहन राय कौन थे? इनके प्रमुख योगदान का वर्णन कीजिए। [2016, 17]
             या
19 वीं शताब्दी के भारतीय पुनर्जागरण में राजा राममोहन राय के योगदान की विवेचना कीजिए। [2018]
उतर :
राजा राममोहन राय को भारत के नवजागरण का अग्रदूत कहा जाता है। ये पहले भारतीय थे जिन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में सुधारों के युग का श्रीगणेश किया। इन्हीं के कार्यों के परिणामस्वरूप भारत में नवजागरण की शुरुआत हुई तथा भारत आज (UPBoardSolutions.com) आधुनिक रूप में हमारे सामने प्रस्तुत है। इसी कारण उन्हें ‘आधुनिक भारत का जनक’ भी कहा जाता है।

राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई, 1774 ई० को बंगाल के हुगली जिले में हुआ था। ये बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न तथा उच्चकोटि के विद्वान् थे। इन्होंने दस भाषाओं में पाण्डित्य प्राप्त किया था तथा अपना अधिकांश जीवन भारतीय समाज की बुराइयों को दूर करने में लगाया। निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट हो जाएगा कि ये भारत के नवजागरण के अग्रदूत तथा आधुनिक भारत के जनक थे

1. ब्रह्म समाज के संस्थापक – भारतीय समाज एवं धर्म में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के उद्देश्य से राजा राममोहन राय ने 20 अगस्त, 1828 ई० में कलकत्ता (कोलकाता) में एक ‘आत्मीय सभा’ की स्थापना की। यही सभा आगे चलकर ‘ब्रह्म समाज’ कहलायी। शीघ्र ही यह राष्ट्रीय संस्था बन गयी। इस संस्था के माध्यम से इन्होंने ही सर्वप्रथम देश में अनेक सामाजिक-धार्मिक सुधार के कार्य किये अर्थात् ब्रह्म समाज द्वारा उन्होंने देश में नवजागरण का कार्य प्रारम्भ किया।

2. ब्रह्म समाज के आदर्श – ब्रह्म समाज के आदर्श तथा सिद्धान्त उच्चकोटि के थे। इनमें पुराने आदर्शों का समावेश तो था ही, साथ में नवीन तार्किक विचारों को भी समुचित महत्त्व दिया गया था। इन्होंने बहुदेववाद का खण्डन करते हुए एक ईश्वर की पूजा पर बल दिया। मूर्तिपूजा व धार्मिक कर्मकाण्डों तथा आडम्बरों पर इन्होंने तीव्र प्रहार किया। जाति-पाँति और ऊँच-नीच के भेदभाव का विरोध किया और लाखों लोगों को ईसाई होने से बचा लिया।

3. सामाजिक कुप्रथाओं का अन्त – राजा राममोहन राय पहले भारतीय थे जिन्होंने दृढ़ संकल्प, पूर्ण विश्वास तथा गम्भीरता से भारत के पिछड़े अन्धविश्वासी समाज में नयी रोशनी का दीप जलाया। इन्होंने बाल-विवाह, सती–प्रथा, बहु-विवाह, पर्दा-प्रथा, छुआछूत आदि का जोरदार विरोध किया। इन्हीं के विचारों से प्रभावित होकर लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने 1829 ई० में सती–प्रथा को गैर-कानूनी घोषित कर दिया। विधवा-पुनर्विवाह को न्यायसंगत (UPBoardSolutions.com) ठहराते हुए इन्होंने इसके पक्ष में जनमत तैयार किया। पुरुषों के समान ही स्त्रियों के अधिकारों का समर्थन करते हुए इन्होंने स्त्रियों के सामाजिक उत्थान का बीड़ा उठाया।

4. पाश्चात्य शिक्षा का समर्थन – राजा राममोहन राय पाश्चात्य शिक्षा-पद्धति के आधार पर भारत का आधुनिकीकरण करना चाहते थे। इनका मानना था कि भारत में पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार के बिना सामाजिक कुरीतियाँ दूर नहीं हो सकतीं। इन्हीं के विचारों से सहमत होकर लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा लागू की। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन के लिए देश में अनेक शिक्षण-संस्थाएँ खोली गयीं। ये स्त्री-शिक्षा के भी बड़े समर्थक थे।

5. राजनीतिक जागृति लाने में योगदान – यद्यपि राजा राममोहन राय ने प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में भाग नहीं लिया, किन्तु इन्होंने देश में राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया तथा लोगों को एकता के सूत्र में बाँधने के प्रयास किये। इन्होंने विचारों की अभिव्यक्ति तथा प्रेस की स्वतन्त्रता पर बल दिया, जिससे लोगों में जागृति आये।। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि राजा राममोहन राय भारत में नवजागरण के अग्रदूत’ तथा आधुनिक भारत के जनक’ थे। इन्हीं के दृढ़ संकल्प तथा गम्भीर प्रयासों से भारत में सामाजिक व धार्मिक सुधारों के युग का शुभारम्भ हुआ। इसीलिए रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था, “राजा (UPBoardSolutions.com) राममोहन राय ने भारत में नये युग का सूत्रपात किया। वस्तुतः वे आधुनिक भारत के जनक थे।”

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प्रश्न 3.
स्वामी दयानन्द सरस्वती का संक्षिप्त परिचय देते हुए आर्य समाज के सिद्धान्तों का संक्षिप्त परिचय दीजिए। [2012, 13, 15, 16, 17]
             या
आर्य समाज की स्थापना किसने किस मुख्य उद्देश्य से की थी ? इसके धार्मिक एवं सामाजिक सुधारों का वर्णन कीजिए। इसका क्या योगदान रहा ?
             या
आर्य समाज के प्रमुख चार सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए। [2016]
             या
उन्नीसवीं शताब्दी के पुनर्जागरण में स्वामी दयानन्द के योगदान की विवेचना कीजिए। [2010]
             या
स्वामी दयानन्द का जीवन-परिचय दीजिए। [2011]
             या
आर्य समाज की स्थापना किसने की ? इसका मुख्य कार्य क्या है ? [2013]
             या
स्वामी दयानन्द सरस्वती कौन थे ? उनके प्रमुख कार्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए। [2012]
             या
आर्य समाज की स्थापना कब और किसके द्वारा की गयी ? इनके द्वारा किए गए किन्हीं चार समाज-सुधारों का वर्णन कीजिए। (2015)
             या
आर्य समाज की स्थापना किसने की थी ? उनके मुख्य सिद्धान्त व कार्य का वर्णन कीजिए। (2015, 16)
             या
भारतीय नवजागरण में स्वामी दयानन्द का क्या योगदान था? [2016]
उत्तर :
आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती थे। उनका जन्म 1824 ई० में काठियावाड़ के एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके बचपन का नाम मूलशंकर था। अल्प आयु में ही इनमें हिन्दू धर्म में व्याप्त आडम्बरों के प्रति विद्रोह की भावना जाग उठी। 22 वर्ष की आयु में ही इन्होंने संन्यास ले लिया। उसके बाद 15 वर्ष तक वे ज्ञान-प्राप्ति के उद्देश्य से जगह-जगह विद्वानों तथा संन्यासियों से मिलते रहे। सन् 1861 ई० में इन्होंने स्वामी विरजानन्द को अपना गुरु बनाया। तीन वर्ष तक गुरु से शिक्षा ग्रहण की तथा वेदों का गहन अध्ययन किया। वेदों ने उनकी सारी जिज्ञासाओं को शान्त किया। इन्होंने अनुभव किया कि वेदों के आधार पर भारतीय समाज का पुनः निर्माण किया जा सकता है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्यों की गौरवशाली परम्पराओं की श्रेष्ठता को पुन: स्थापित करने के उद्देश्य से 10 अप्रैल, 1875 ई० में बम्बई (मुम्बई) में आर्य समाज की स्थापना की। इन्होंने भारतवासियों में अपने राष्ट्र, संस्कृति, धर्म और भाषा के (UPBoardSolutions.com) प्रति श्रद्धा उत्पन्न करने के अथक प्रयास किये। स्वामी दयानन्द ने हिन्दू धर्म के मूलभूत तत्त्वों पर ‘सत्यार्थ प्रकाश’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना की।

सुधारों पर बल

धर्म-सुधार कार्य – आर्य समाज के धर्म-सुधार सम्बन्धी मूलभूत कार्य निम्नलिखित हैं –

  1. आर्य समाज ने हिन्दुओं में उनके प्राचीन धर्म-ग्रन्थ वेदों के प्रति आस्था उत्पन्न की। वेदों को सत्य और सभी ज्ञान-विज्ञान का स्रोत बताकर हिन्दू धर्म व संस्कृति की श्रेष्ठता को प्रतिपादित किया। परिणामस्वरूप हिन्दुओं में आत्मविश्वास का संचार हुआ।
  2. स्वामी दयानन्द ने हिन्दू धर्म को इस्लाम तथा ईसाई धर्म के खतरे से बचाया।
  3. स्वामी दयानन्द ने हिन्दू धर्म पर ‘सत्यार्थ प्रकाश’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ लिखा।
  4. हिन्दू धर्म को छोड़कर गये हिन्दुओं को (UPBoardSolutions.com) पुनः हिन्दू धर्म में वापस लिया। साथ ही ईसाई और मुसलमानों को भी हिन्दू धर्म स्वीकार करने के लिए आमन्त्रित किया।
  5. मूर्तिपूजा, पाखण्ड तथा अन्धविश्वासों का खण्डन किया।
  6. महँगे और जटिल हिन्दू संस्कारों के स्थान पर सुलभ और सरल संस्कार की विधि अपनायी।

समाज-सुधार कार्य – आर्य समाज के समाज-सुधार सम्बन्धी मूलभूत कार्य निम्नलिखित हैं –

  1. जातीय भेदभाव की समाप्ति के लिए जाति-भेद निवारक संघ की स्थापना की गयी।
  2. वेश्यावृत्ति की समाप्ति हेतु आवश्यक कानून बनाने के लिए प्रस्ताव पेश किये गये।
  3. बहु-विवाह, बाल-विवाह, सती–प्रथा, पर्दा-प्रथा आदि के विरोध के लिए जनमत तैयार किया गया।
  4. आर्यसमाजी पद्धति से सम्पन्न अन्तर्जातीय विवाहों को कानूनसम्मत बनाया गया।

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योगदान

शिक्षा के क्षेत्र में योगदान – आर्य समाज के शिक्षा के क्षेत्र में निम्नलिखित योगदान रहे –

  1. समाज के सर्वांगीण विकास और बौद्धिक जागृति के लिए सम्पूर्ण देश में डी०ए०वी० (दयानन्द ऐंग्लो-वेदिक) शिक्षण केन्द्रों की स्थापना की गयी।
  2. प्राचीन शिक्षा-पद्धति के आधार पर अनेक गुरुकुल (UPBoardSolutions.com) शिक्षा केन्द्रों की स्थापना की गयी।
  3. हरिद्वार में गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी।

राष्ट्रीय भावना का विकास – राष्ट्रीयता की भावना के विकास में आर्य समाज का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वामी दयानन्द ने ही सर्वप्रथम ‘स्वराज्य’ और ‘स्वदेशी’ शब्दों का प्रयोग किया था। हिन्दी को राष्ट्रभाषा स्वीकार करने वाले पहले व्यक्ति भी वही थे।

आर्य समाज के सिद्धान्त

आर्य समाज के मूलभूत सिद्धान्त अथवा शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. ईश्वर ही एकमात्र ज्ञान का प्रमुख कारण है। वह सत्य है। विद्या और वे पदार्थ जो विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका मूल परमेश्वर है।
  2. ईश्वर सत्यं, शिवं, सुन्दरं, शाश्वत, असीमित, दयावान, अजन्मा, सर्वशक्तिमान, अतुलनीय एवं अपरिवर्तनीय है, अत: उसकी उपासना करनी चाहिए। मूर्तिपूजा निरर्थक है।
  3. सत्य को ग्रहण करना चाहिए और असत्य को त्यागने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। सभी कार्य धर्मानुसार अर्थात् उचित-अनुचित और सत्य-असत्य का विचार करके करना चाहिए।
  4. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए, अर्थात् अज्ञान के अन्धकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाना चाहिए।
  5. सबसे प्रेमपूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य व्यवहार करना चाहिए।
  6. आर्यों का ज्ञान वेदों में संकलित है; अत: प्रत्येक आर्य के लिए वेदों का अध्ययन परम धर्म एवं कर्तव्य है, ऐसा मानकर इनका अध्ययन करना चाहिए।
  7. संसार में भलाई का कार्य करना समाज का मुख्य उद्देश्य है; अत: सबको अपनी उन्नति के साथ-साथ अन्य की भी शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।
  8. प्रत्येक व्यक्ति को अपनी उन्नति से ही सन्तुष्ट न होकर सबकी उन्नति को अपनी उन्नति समझना चाहिए।
  9. सार्वजनिक कल्याण के विरुद्ध कोई कार्य नहीं (UPBoardSolutions.com) करना चाहिए। 10. ऊँच-नीच, छुआछूत, जाति-पाँति आदि वेदों की मान्यताओं के विरुद्ध हैं। इनका त्याग करना चाहिए।

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प्रश्न 4.
स्वामी विवेकानन्द के जीवन, कार्यों एवं उपदेशों का विवरण दीजिए। [2010, 14]
             या
स्वामी विवेकानन्द के जीवन की प्रमुख घटनाओं तथा उनके सामाजिक-धार्मिक योगदान का वर्णन कीजिए।
             या
स्वामी विवेकानन्द को हम क्यों याद करते हैं ? दो कारण लिखिए। [2010, 13]
             या
स्वामी विवेकानन्द का परिचय देते हुए उनके द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन के सिद्धान्तों और सेवा-कार्यों पर प्रकाश डालिए।
             या
स्वामी विवेकानन्द पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [2011]
             या
स्वामी विवेकानन्द कौन थे ? उनकी लोकप्रियता के क्या कारण हैं? [2011, 18]
             या
विवेकानन्द के व्यक्तित्व एवं कार्यों पर प्रकाश डालिए। [2013]
             या
रामकृष्ण मिशन की स्थापना के सिद्धान्तों और कार्यों का वर्णन कीजिए। रामकृष्ण मिशन के सेवा कार्यों का वर्णन कीजिए। [2009]
उत्तर :

धार्मिक और सामाजिक योगदान

स्वामी विवेकानन्द ने ज्ञान और दर्शन से समस्त विश्व को आलोकित किया। 12 जनवरी, 1863 ई० में कलकत्ता (कोलकाता) के एक सम्पन्न कायस्थ परिवार में इनका जन्म हुआ। इनका बचपन का नाम नरेन्द्रदत्त था। ये बड़ी ही प्रखर बुद्धि के नवयुवक थे। पहले ये पाश्चात्य संस्कृति को उत्तम मानते थे, परन्तु गुरु रामकृष्ण परमहंस के सम्पर्क में आने पर इनके विचार परिवर्तित हो गये। ये इस निर्णय पर पहुँचे कि सत्य या ईश्वर को जानने का सच्चा मार्ग अनुरागपूर्ण साधना का मार्ग ही है। सन् 1893 ई० में ये शिकागो के सर्वधर्मसम्मेलन में भाग लेने के लिए गये। इनकी ओजस्वी वाणी से जो विचार प्रस्फुटित हुए उसका सम्मोहन वहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति तथा विश्व-जगत् पर छा गया। स्त्री-पुरुष इनकी एक झलक पाने के लिए ही उतावले हो गये। सन् 1897 ई० में इन्होंने धर्म और समाज-सुधार के कार्य (UPBoardSolutions.com) को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से वेल्लूर में रामकृष्ण परमहंस मिशन की स्थापना की। इस संस्था के माध्यम से स्वामी विवेकानन्द ने मानवता की सच्चे अर्थों में सेवा की। इन्होंने धार्मिक पाखण्ड, जाति-प्रथा, अस्पृश्यता, बाल-विवाह तथा देवदासी-प्रथा का घोर विरोध किया, किन्तु ये मूर्ति-पूजा के समर्थक थे और मूर्ति पूजा को आध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया में एक प्रारम्भिक अवस्था मानते थे। ये बुराई का उन्मूलन शिक्षा द्वारा करना चाहते थे। 14 जुलाई, 1902 ई० में 39 वर्ष की अल्पायु में ही इनका स्वर्गवास हो गया। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है कि “यदि कोई भारत को समझना चाहता है तो उसे विवेकानन्द को पढ़ना चाहिए।’

रामकृष्ण मिशन के सिद्धान्त (उपदेश) निम्नलिखित हैं –

  1. ईश्वर निराकार तथा सर्वव्यापक है। वह सभी पर दयालु है। आत्मा ईश्वरीय रूप ही है। ईश्वर की सच्ची उपासना करनी चाहिए। इस ईश्वर की उपासना करते हुए प्रेम-मार्ग में लोक-कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।
  2. हिन्दू धर्म, हिन्दू सभ्यता और हिन्दू रहन-सहन सबसे प्राचीनतम है, श्रेष्ठ है, सुन्दर है, शिव है। इसने दूसरों को भी प्रेरणा दी है और संसार का प्रथम शिक्षक भी यही है।
  3. प्रत्येक हिन्दू को अपनी सभ्यता और अपने धर्म की सुरक्षा में वृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। तथा पाश्चात्य भौतिक चमक-दमक से दूर रहना चाहिए।
  4. प्रत्येक व्यक्ति को सादा, पवित्र व त्यागमय जीवन व्यतीत करना चाहिए तथा मानवता की सेवा करनी चाहिए।
  5. सभी धर्म अच्छे हैं। प्रत्येक मनुष्य को अपने धर्म में आस्था तथा विश्वास रखना चाहिए।

रामकृष्ण मिशन के कार्य – समाज-सुधार को रामकृष्ण मिशन में प्रमुखता दी गयी है। समाज में व्याप्त कुप्रथाओं को दूर करने के लिए सक्रिय प्रयास किये गये हैं। दीन-दुःखियों की सेवा तथा सहायता करने का भी निर्देश दिया गया है। ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन पर भी इस मिशन में बल दिया गया है। इसलिए शिक्षण-संस्थाओं की स्थापना का कार्य यहाँ भी प्रमुख रूप से हुआ। इस मिशन द्वारा विदेशों में भी भारतीय संस्कृति और सभ्यता का (UPBoardSolutions.com) प्रचार किया गया। नवजागरण में यह बहुत ही व्यावहारिक योगदान था। भारत के शिक्षित युवकों पर भी इस मिशन का अच्छा प्रभाव रहा है। देश पर आने वाले संकटों का सामना करने की दशा में भी इस संस्था ने अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

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प्रश्न 5.
किन्हीं दो मुस्लिम-सुधार आन्दोलनों का वर्णन कीजिए। उसका तत्कालीन मुस्लिम समाज पर क्या प्रभाव पड़ा ? (2013)
             या
अलीगढ़ आन्दोलन क्या था ? यह मुस्लिम समुदाय के लिए किस प्रकार लाभकारी था ?
             या
सर सैयद अहमद खाँ ने मुसलमानों में व्याप्त किन कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया ?
             या
अलीगढ़ आन्दोलन के प्रवर्तक कौन थे? इस आन्दोलन ने मुस्लिम समाज को जाग्रत करने में क्या योगदान दिया ?
             या
वहाबी आन्दोलन क्यों प्रारम्भ हुआ ?
             या
अलीगढ़ आन्दोलन का क्या उद्देश्य था? इसके मुख्य प्रवर्तक कौन थे? उनके किसी एक महत्त्वपूर्ण योगदान का उल्लेख कीजिए। (2018)
             या
निम्नलिखित मुस्लिम सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों पर संक्षेप में प्रकाश डालिए (2017)
(क) वहाबी आन्दोलन, (ख) अलीगढ़ आन्दोलन तथा (ग) देवबन्द आन्दोलन।
उत्तर :
प्रारम्भ में जो सुधार आन्दोलन हुए वे प्रायः हिन्दू धर्म और समाज से सम्बन्धित रहे; अत: मुस्लिम समाज उनसे अपेक्षित लाभ न उठा सका। मुस्लिम समाज की सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक स्थिति अच्छी न थी। हिन्दू आन्दोलन की प्रतिक्रियास्वरूप (UPBoardSolutions.com) मुस्लिम समाज के आधुनिकीकरण के लिए भी सुधार आन्दोलन प्रारम्भ हुए। इन आन्दोलनों ने जहाँ सामाजिक बुराइयों को दूर करने में योगदान दिया, वहीं भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना के उत्थान में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। ये आन्दोलन निम्नलिखित थे –

(1) सैयद अहमद बरेलवी : वहाबी आन्दोलन
मुस्लिम समाज में अनेक सुधारात्मक आन्दोलन फले-फूले। इनमें वहाबी आन्दोलन एक प्रमुख आन्दोलन था। यह आन्दोलन अठारहवीं शताब्दी में अरब में मुहम्मद अब्दुल वहाब ने आरम्भ किया। भारत में वहाबी आन्दोलन के जन्मदाता सैयद अहमद बरेलवी (1787-1831 ई०) थे। इन्होंने कुरान को जनसाधारण में सरलता से समझाने के लिए उर्दू भाषा में अनूदित करवाया। वहाबी आन्दोलन का उद्देश्ये मुस्लिम जगत् में चेतना, धर्म-सुधार और संगठन उत्पन्न करना रहा। इन्होंने मुसलमानों के जीवन से अनेक बुराइयों को दूर करके इस्लाम धर्म की वास्तविक पवित्रता को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया तथा पाश्चात्य सभ्यता का विरोध किया। इस आन्दोलन के दो प्रमुख उद्देश्य थे-अपने धर्म का प्रचार एवं मुस्लिम समाज में सुधार।

(2) सर सैयद अहमद खाँ : अलीगढ़ आन्दोलन
मुस्लिम समाज में जागृति उत्पन्न करने में सर सैयद अहमद खाँ का नाम उल्लेखनीय है। इन्होंने इस्लामी शिक्षा का गहन अध्ययन किया तथा पाश्चात्य शिक्षा का ज्ञान भी प्राप्त किया। इन्होंने मुस्लिम समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया तथा मुस्लिमों में नवजागरण का कार्य सम्पन्न किया। इनके द्वारा किये गये प्रमुख सुधार-कार्य इस प्रकार थे

  1. इन्होंने मुस्लिम समाज के आधुनिकीकरण के लिए अंग्रेजी के अध्ययन पर बल दिया। इसी उद्देश्य से इन्होंने 1875 ई० में अलीगढ़ में ‘मोहम्मडन ऐंग्लो ओरियण्टल कॉलेज की स्थापना की, जो बाद में अलीगढ़ विश्वविद्यालय में परिणत हो गया।
  2. इन्होंने मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीतियों, रूढ़ियों और धार्मिक अन्धविश्वासों का खुलकर विरोध किया।
  3. इस्लाम को मानवतावादी स्वरूप देने का प्रयत्न किया।
  4. इन्होंने सभी समुदायों को परस्पर भ्रातृ-भाव से रहने की सलाह दी।
  5. इन्होंने स्त्रियों में पर्दा-प्रथा का विरोध किया तथा स्त्री-शिक्षा का समर्थन किया।

अलीगढ़ आन्दोलन के अन्य प्रमुख नेता चिराग अली, अल्ताफ हुसैन, नज़ीर अहमद तथा मौलाना शिवली नोगानी थे। अलीगढ़ आन्दोलन मुस्लिम जगत् में सुधार का महान् आन्दोलन था। ये हिन्दू और मुसलमानों की एकता के भी पक्षपाती थे।

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(3) मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी : अहमदिया आन्दोलन
मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी (1838-1908 ई०) ने 1889 ई० में अहमदिया आन्दोलन का सूत्रपात किया। इन पर पाश्चात्य विचारधारा, थियोसॉफिकल सोसायटी और हिन्दुओं के सुधार आन्दोलन को पर्याप्त प्रभाव पड़ा। इनसे प्रभावित होकर इन्होंने इस्लाम धर्म को सरल और व्यापक बनाने के लिए यह आन्दोलन चलाया। इनका सब धर्मों की मौलिक एकता में विश्वास था। ये गैर-मुस्लिम लोगों से घृणा करने और जिहाद के विरुद्ध थे। ये सच्चे धर्म-सुधारक थे। ये पर्दा-प्रथा, बहु-विवाह तथा तलाक के समर्थक थे। इनकी पुस्तक का नाम ‘बराहीन-ए-अहमदिया है। इनके समर्थकों की संख्या बहुत कम थी तथा इन्हें ‘नबी’ के नाम से पुकारा जाता था।

(4) देवबन्द आन्दोलन
एक मुसलमान उलेमा, जो प्राचीन मुस्लिम साहित्य के प्रकाण्ड विद्वान थे, ने देवबन्द आन्दोलन चलाया। उन्होंने मुहम्मद कासिम तथा रशीद अहमद गंगोही के नेतृत्व में देवबन्द (सहारनपुर, उत्तर प्रदेश) में शिक्षण-संस्था की स्थापना की। इस आन्दोलन के दो मुख्य उद्देश्य रहे-कुरान तथा हदीस की शिक्षाओं का प्रसार करना और विदेशी शासकों के विरुद्ध जेहाद’ की भावना को बनाये रखना। देवबन्द आन्दोलन ने 1885 (UPBoardSolutions.com) ई० में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का स्वागत किया। इनके अतिरिक्त नदवा-उल-उलूम (लखनऊ, 1894 ई०, मौलाना शिवली नोगानी), महल-ए-हदीस (पंजाब, मौलाना सैयद नज़ीर हुसैन) नामक मुस्लिम संस्थाओं ने भी मुस्लिम समाज को जाग्रत करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

इन मुस्लिम आन्दोलनों ने मुसलमानों में राजनीतिक तथा सामाजिक चेतना की वृद्धि की; जिसके परिणामस्वरूप मुसलमानों की स्थिति में पर्याप्त सुधार हुए। इन्होंने पाश्चात्य रीति-रिवाजों को देखा और उनके प्रभावस्वरूप मुस्लिम समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों को समाप्त कर दिया। इन आन्दोलनों के नेताओं ने नारी-शिक्षा की ओर भी ध्यान देना प्रारम्भ किया। यद्यपि मुसलमानों में इस चेतना के जागने से साम्प्रदायिकता की भावना प्रबल हो गयी और देश में हिन्दू-मुसलमानों के मध्य झगड़े होने लगे, तथापि इन आन्दोलनों के फलस्वरूप ही अनेक देशभक्तों व राष्ट्रीय मुस्लिम नेताओं का उदय भी हुआ।

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प्रश्न 6.
नवजागरण का सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक क्षेत्रों पर क्या प्रभाव पड़ा ?
             या
नवजागरण के तत्कालीन समाज पर पड़ने वाले चार प्रभावों का वर्णन कीजिए।
             या
उन्नीसवीं शताब्दी में भारतवर्ष में हुए धार्मिक एवं समाज सुधार आन्दोलनों ने किस प्रकार सामाजिक उत्थान में योगदान किया? [2016]
उत्तर :
नवजागरण का प्रभाव नवजागरण का भारतीय समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा। इसके प्रभाव से समाज का कोई भी अंग अछूता ने रहा। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए। भारतीय समाज में एक नयी चेतना, स्फूर्ति और शक्ति का संचार हुआ। नवजागरण के भारतीय समाज पर निम्नलिखित प्रमुख प्रभाव पड़े

1. सामाजिक कुरीतियों में कमी – सुधार आन्दोलन से पहले भारतीय समाज में अनेक बुराइयाँ व्याप्त थीं। सभी सुधारों ने एक स्वर से इन कुरीतियों पर तीव्र प्रहार किया। इन आन्दोलनों से प्रभावित होकर अंग्रेजी सरकार ने कुप्रथाओं (UPBoardSolutions.com) को समाप्त करने के लिए कानून बनाये। सन् 1829 ई० में सती–प्रथा के विरुद्ध कानून बनाया गया तथा 1843 ई० में दास-प्रथा को गैर-कानूनी घोषित किया गया तथा 1856 ई० में विधवाओं को पुनर्विवाह की कानूनी अनुमति मिल गयी। इसी प्रकार बहु-विवाह तथा पर्दा-प्रथा में कमी आयी। छुआछूत के विरुद्ध भी भावनाएँ पनपने लगीं। अत: नवजागरण के फलस्वरूप सामाजिक कुप्रथाओं के विरुद्ध एक सशक्त वातावरण तैयार हो गया।

2. प्राचीन भारतीय साहित्य के अध्ययन में वृद्धि – उन्नीसवीं शताब्दी के सुधार आन्दोलनों का एक प्रमुख प्रभाव यह पड़ा कि भारतवासियों में अपने प्राचीन दर्शन, साहित्य, कला तथा विज्ञान के अध्ययन के प्रति रुचि उत्पन्न हुई। देश के प्राचीन इतिहास तथा धार्मिक ग्रन्थों की खोज प्रारम्भ हो गयी, संस्कृत भाषा का तीव्रती से प्रसार हुआ, प्राचीन धार्मिक ग्रन्थों का बड़े पैमाने पर प्रकाशन किया जाने लगा तथा भारतीय अपने देश के प्राचीन ग्रन्थों को बड़ी रुचि से पढ़ने लगे। इस सम्बन्ध में मैक्समूलर जैसे पाश्चात्य विद्वानों का बड़ा योगदान रहा।

3. भारतीय सभ्यता-संस्कृति के प्रति रुझान – पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार के कारण देश के शिक्षित लोग भारतीय सभ्यता-संस्कृति की उपेक्षा करने लगे थे। विभिन्न सुधार आन्दोलनों ने इस प्रवृत्ति पर रोक लगायी तथा भारतीयों में अपने धर्म, संस्कृति तथा जीवन-दर्शन के प्रति प्रेम उत्पन्न किया। आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन और थियोसॉफिकल सोसायटी के प्रयासों के परिणामस्वरूप भारतीय जनमानस फिर से अपने धर्म तथा संस्कृति पर गर्व करने लगा।

4. बुद्धिवादी दृष्टिकोण का विकास – नवजागरण का एक महत्त्वपूर्ण प्रभाव यह हुआ कि शिक्षित लोग धार्मिक, सामाजिक तथा अन्य समस्याओं पर बुद्धि और तर्क के आधार पर विचार करने लगे। अब वे प्राचीन रीति-रिवाजों तथा परम्पराओं के अन्ध-भक्त नहीं रहे वरन् तार्किक दृष्टि तथा अनुभव के आधार पर समस्याओं के हल ढूंढ़ने लगे।

5. पाश्चात्य शिक्षा को बढ़ावा – सर्वप्रथम राजा राममोहन राय के प्रयासों से देश में अंग्रेजी भाषा और पाश्चात्य शिक्षा-पद्धति का प्रारम्भ हुआ। परिणामतः पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान, स्वतन्त्रता, समानता, लोकतन्त्र आदि विचारों से भारतीय परिचित और प्रभावित हुए। पाश्चात्य शिक्षा के कारण भारत में जन-जागरण की शुरुआत हो गयी।

6. धार्मिक आडम्बरों में कमी – नवजागरण के कारण भारतीयों के धार्मिक जीवन में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। सुधार आन्दोलनों ने मूर्तिपूजा तथा धार्मिक कर्मकाण्डों का तीव्र विरोध किया। इससे धार्मिक आडम्बरों में कमी आयी, पुरोहितों का प्रभाव कम हुआ तथा मठों-मन्दिरों में फैले दुराचारों में भी कमी आयी।

7. स्त्रियों की दशा में सुधार – समाज-सुधार आन्दोलनों के परिणामस्वरूप स्त्रियों की दशा में बहुत सुधार हुआ। सती–प्रथा, बाल-विवाह, कन्या-वध आदि पर रोक लगाये जाने तथा विधवाओं को पुनर्विवाह की अनुमति मिलने से स्त्रियों का समाज में (UPBoardSolutions.com) सम्मान बढ़ा। सभी सुधारकों ने स्त्री-शिक्षा पर विशेष बल दिया। इन आन्दोलनों के फलस्वरूप भारतीय स्त्रियों ने आगे चलकर स्वतन्त्रता-संग्राम में पुरुषों के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर योगदान दिया।

8. साहित्य का विकास – साहित्य के क्षेत्र में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने नवजागरण एवं नवोत्थान की भावनाओं का सूत्रपात किया। अपने ‘भारत दुर्दशा’ नामक नाटक में इन्होंने विदेशी शासन से उत्पन्न दुर्दशा का मार्मिक चित्रण किया। बंकिमचन्द्र चटर्जी ने ‘आनन्दमठ’ की रचना करके भारतीय नवजागरण तथा राष्ट्रीय नवचेतना में क्रान्ति उत्पन्न कर दी। इनके द्वारा रचित ‘वन्देमातरम्’ गीत राष्ट्रीय जागृति का महान् प्रेरक बना। अनेकानेक साहित्यकारों ने भारतीय भाषाओं में रचनाएँ करके देश की मान-मर्यादा एवं साहित्य की गरिमा को बढ़ाया।

9. राष्ट्रीय एकता तथा देशभक्ति की भावना का उदय – तत्कालीन सुधार आन्दोलन तत्कालीन सामाजिक तथा धार्मिक व्यवस्था को सुधारने के लिए किये गये थे, किन्तु उन्होंने राष्ट्रीयता के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। नवजागरण के फलस्वरूप लोगों में राष्ट्रीय एकता की भावना जाग्रत हुई। वे जाति, भाषा, प्रान्त, सम्प्रदाय आदि के भेदभाव को भुलाकर अपने को भारतवासी मानने लगे। इससे राष्ट्रीय एकता की भावना का संचार हुआ, जिसने धीरे-धीरे देश-प्रेम तथा देश-भक्ति की भावना को जन्म दिया। लोगों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भावनाएँ जोर पकड़ती गयीं। राष्ट्रीयता की यही भावना भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन की आधारशिला बनी। हजारों भारतीय नवयुवक देश की स्वाधीनता हेतु अपने प्राण भी देने के लिए तैयार हो गये। परिणामस्वरूप मई, 1857 ई० में मेरठ में क्रान्ति के प्रारम्भ होने के बाद स्वाधीनता संग्राम धीरे-धीरे समूचे देश में फैल गया।

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प्रश्न 7.
भारत में राष्ट्रीयता के उदय पर एक संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।
उत्तर :

भारत में राष्ट्रीयता का उदय

भारत में चले सुधार आन्दोलनों के द्वारा समाज में चले आ रहे अन्धविश्वासों, कुरीतियों एवं कुप्रथाओं को दूर करने का निरन्तर प्रयास किया गया। नवजागरण ने अंग्रेजों द्वारा शोषित भारतीयों के मन में असन्तोष व क्रोध की भावना का संचार किया। धीरे-धीरे भारतीयों के हृदय में आत्मविश्वास तथा नवचेतना पैदा हुई। इस नवचेतना ने राष्ट्रीयता की भावना को जन्म दिया, जिससे प्रेरणा प्राप्त कर भारतवासी अपने देश की स्वतन्त्रता की माँग करने लगे।

आधुनिक भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन भारत पर अंग्रेजों द्वारा किए गए अधिकार की चुनौती का उत्तर था। विदेशी शासन द्वारा पैदा की गई परिस्थितियों ने भारतीय जनता में राष्ट्रीय भावना का विकास किया। जिसका प्रत्यक्ष एवं परोक्ष परिणाम भारत में राष्ट्रीय (UPBoardSolutions.com) आन्दोलन की परिस्थितियों का निर्माण था।

कारण-अंग्रेजी शासन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर अत्यन्त विनाशकारी प्रभाव पड़ा। अंग्रेजों की आर्थिक शोषण की नीति’ ने भारतीय कुटीर उद्योग, कृषि एवं व्यापार को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। इसके परिणामस्वरूप भारतीय बेरोजगार हो गए एवं उनकी अर्थव्यवस्था खस्ता हाल होने लगी।

वास्तव में प्रशासनिक सुविधाएँ, सैनिक रक्षा के उद्देश्य, आर्थिक व्यापार तथा व्यापारिक शोषण की बालों को ध्यान में रखते हुए ही परिवहन के तीव्र साधनों की अनेक योजनाएँ बनीं। सन् 1853 ई० में लॉर्ड डलहौजी द्वारा शुरू की गई रेल प्रणाली के विकास के साथ-ही-साथ परिवहन के अन्य साधनों ने प्रान्तों को नगरों से तथा नगरों को गाँवों से जोड़ दिया गया। इससे भारतीयों में विचारों का परस्पर आदान-प्रदान होने लगा।

सन् 1850 ई० के बाद शुरू हुई आधुनिक डाक-व्यवस्था तथा बिजली के तार ने देश को एक करने में सहायता की। अन्तर्देशीय-पत्र, समाचार-पत्र तथा पार्सलों को कम दर में भेजने की व्यवस्था ने देश के सामाजिक, शैक्षणिक, बौद्धिक तथा राजनीतिक जीवन में एक भारी परिवर्तन ला दिया। डाकखानों के द्वारा राष्ट्रीय साहित्य पूरे देश में भेजा जा सकता था।

लॉर्ड लिटन के प्रतिक्रियावादी कार्य; जैसे—दिल्ली दरबार, वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट, आर्क्स ऐक्ट, ICS की परीक्षा की आयु 21 वर्ष करना, द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध आदि ने राष्ट्रीयता के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।

भारत के सबसे लोकप्रिय वायसराय लॉर्ड रिपन के समय में इल्बर्ट बिल पारित हुआ। परन्तु इस अधिनियम की यूरोपियों में हुई कटु प्रतिक्रिया के कारण वायसराय द्वारा इसे वापस लेना पड़ा। इसका भारतीय जनता पर बहुत व्यापक प्रभाव पड़ा।

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प्रश्न 8.
भारत में राष्ट्रीयता के उदय के कारणों पर प्रकाश डालिए।
             या
सन् 1857 ई० से 1885 ई० के मध्य भारत में राष्ट्रीय चेतना के विकास के प्रमुख कारणों की व्याख्या कीजिए। [2010]
             या
भारत में राष्ट्रीय जागृति के उद्भव के उत्तरदायी कारणों की विवेचना कीजिए।
             या
राष्ट्रीय जागरण के तीन सामाजिक तथा तीन राजनैतिक कारण लिखिए [2014]
             या
उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में राजनीतिक चेतना के विकास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए। [2016]
उत्तर :
उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशकों में भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना का तेजी से विकास हुआ, जिसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थे –

1. अंग्रेजों द्वारा आर्थिक शोषण – पहले ईस्ट इण्डिया कम्पनी और बाद में ब्रिटिश शासन ने भारतीय लोगों का भरपूर आर्थिक शोषण किया। दोषपूर्ण भूमि-कर व्यवस्था के कारण किसानों को अपनी भूमि-सम्पत्ति से वंचित होना पड़ा। नव-जमींदार र्ग कृषित भूमि का वास्तविक स्वामी बन बैठा। अकाल आदि प्राकृतिक प्रकोपों ने निर्धन जनता पर अत्यधिक बोझ डाल दिया। दस्तकार तथा शिल्पकार बेरोजगार हो गये। उद्योगपति और (UPBoardSolutions.com) व्यापारी वर्ग को भी आर्थिक क्षति हुई। इन भयंकर परिस्थितियों में लोगों में ब्रिटिश शासन के प्रति गहरा आक्रोश पैदा हुआ। वे ब्रिटिश शासन को जड़ से उखाड़ने के लिए कृतसंकल्प हो गये।

2. देश को प्रशासनिक एकीकरण – अंग्रेजों ने प्रशासनिक सुविधा के लिए देश को राजनीतिक एकता के सूत्र में बाँधा। इससे भारत एक राष्ट्र के रूप में उदित हुआ। देश की जनता में अंग्रेजों के प्रशासन तथा शोषण के विरुद्ध एके राष्ट्रीय दृष्टिकोण का उदय तथा विकास हुआ।

3. पाश्चात्य चिन्तन तथा शिक्षा – पाश्चात्य शिक्षा के माध्यम से भारतीय लोग पाश्चात्य चिन्तन से | परिचित हुए, जिससे लोगों में राष्ट्रीय चेतना का उदय हुआ। पाश्चात्य दार्शनिकों, विचारकों तथा लेखकों के विचारों ने भारतीयों में स्वतन्त्रता, समानता, लोकतन्त्र तथा देशभक्ति की भावनाओं का संचार किया।

4. सांस्कृतिक विरासत – अपने अतीत का पुनरीक्षण करके कुछ भारतीयों में अपनी पुरातन सांस्कृतिक विरासत से गर्व तथा त्य-सन्तोष को अन्डी भावना जाग्रत हुई। इस भावना के कारण कुछ ले नवीन विचारधाराओं तथा प्रवृत्ति से विमुख अवश्य हुए, किन्तु साथ ही विदेशियों से स्वयं को मुक्त करने का उत्साह भी उनमें जागा।

5. सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन – राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, केशवचन्द्र सेन, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, सैयद अहमद खाँ आदि हिन्दू तथा मुस्लिम समाज-सुधारकों ने अनेक सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन चलाये। इन आन्दोलनों से भारतीय लोगों में नवजीवन का संचार हुआ, उनमें सामाजिक तथा राजनीतिक चेतना जागी।

6. जातीय भेदभाव तथा ईसाई धर्म में अन्तरण – अंग्रेजों ने जातिभेद की नीति अपनायी तथा भारतीय लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए अनेक प्रलोभन दिये। इस जबरदस्ती धर्मान्तरण के कारण भारतीयों के | हृदय में क्षोभ तथा अपमान की भावनाएँ पैदा हुईं। परिणामस्वरूप वे अंग्रेजों के अन्याय के विरुद्ध जाग्रतहुए।

7. ब्रिटिश प्रशासन –लॉर्ड लिटन के प्रतिक्रियावादी शासनकाल में वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट, आर्स ऐक्ट आदि नये विनियमों ने भारतीयों के हृदय में अंग्रेजों के शासन के प्रति रोष पैदा किया। लॉर्ड रिपन के काल में इल्बर्ट बिल के विरुद्ध यूरोपीय लोगों की जातीय कटुता को देख भारतीय लोग चकित रह गये। इन अनुभवों ने भारतीयों को राष्ट्रीय स्तर पर संगठित होकर आन्दोलन के लिए तैयार किया।

8. प्रेस की भूमिका – उन्नीसवीं शताब्दी में अमृत बाजार पत्रिका, केसरी, हिन्द, ट्रिब्यून आदि समाचार-पत्र और पत्रिकाओं ने जनता में राष्ट्रवादी विचारधारा को फैलाने में बहुत योगदान दिया। प्रेस ने अंग्रेजों की अन्याय तथा भेदभावपूर्ण नीतियों का खण्डन करके भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। तिलक ने ‘केसरी’ के माध्यम से लोगों में अथाह धैर्य और साहस का संचार किया। देश के विभिन्न भागों के नेताओं तथा लोगों को परस्पर एक सूत्र में बाँधते हुए प्रेस ने भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम को गति दी।

9. अन्तर्राष्ट्रीय जागरण का प्रभाव – विश्व के अनेक देशों में स्वतन्त्रता के लिए संग्राम हुए और वे स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सफल भी हुए। इन सभी अन्तर्राष्ट्रीय जागरण की घटनाओं से भारतीयों में भी राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ।

10. भारतीयों के साथ भेदभाव – भारतीयों को अंग्रेजों के समान अधिकार प्रदान नहीं किये गये थे। राज्यों के उच्च पदों पर भारतीयों को अनेक आधारों पर अयोग्य बताते हुए नियुक्त नहीं किया जाता था। ऐसी सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के साथ 1869 ई० में और अरविन्द (UPBoardSolutions.com) घोष के साथ 1877 ई० में हुआ। भारतीयों के साथ इस प्रकार का भेदभाव अपनाये जाने से बुद्धिजीवी वर्ग में अत्यधिक असन्तोष पैदा हुआ और वे राष्ट्रीय जागरण के कार्य में लग गये।

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प्रश्न 9.
भारतीय उदारवादियों के कार्यक्रम तथा उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।
             या
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में ए०ओ० ह्युम नामक अंग्रेज क्यों रुचि ले रहे थे?
             या
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किस प्रकार हुई ? आरम्भ में इसके उद्देश्य, कार्यक्रम तथा कार्य-प्रणाली क्या थी ?
             या
प्रारम्भ में कांग्रेस के क्या उद्देश्य थे ? इसकी प्रारम्भिक नीति को उदारवादी नीति क्यों कहा जाता है ? इसका परित्याग करके उग्र राष्ट्रवाद की नीति क्यों अपनायी गयी ? [2009, 11]
             या
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक चरण में उदारवादियों का आधिपत्य था।” इस कथन की विवेचना कीजिए। [2010]
             या
उदारवादी नेताओं के प्रमुख उद्देश्यों को लिखिए।
             या
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किसने की थी ? आरम्भ में इसके क्या उद्देश्य थे? भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तीन उद्देश्य लिखिए। [2014]
             या
अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब, कहाँ और किसके द्वारा की गयी? इसके तीन मुख्य उद्देश्य लिखिए। [2015, 17]
             या
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब और कहाँ की गयी? इसके प्रमुख उद्देश्य क्या थे? (2016)
             या
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब की गयी? इसके प्रथम अध्यक्ष कौन थे? इसके प्रमुख उद्देश्यों का वर्णन कीजिए। [2016]
उत्तर :
सन् 1885 ई० में भारतीय सिविल सर्विस के रिटायर्ड अधिकारी सर ए०ओ० ह्युम ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की दिशा में पहल की। इन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों को यह प्रेरणा दी कि वे एक ऐसी संस्था का निर्माण करें जो भारतीयों के सामाजिक, राजनीतिक तथा आध्यात्मिक जीवन का उत्थान कर सके। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफरिन ने भी इस दिशा में सहयोग दिया, क्योंकि इस प्रकार की संस्था से भारतीयों की (UPBoardSolutions.com) इच्छा तथा कार्यक्रमों का पता चलता रहता और ब्रिटिश सरकार उचित कार्रवाई करके 1857 ई० की क्रान्ति जैसी अप्रिय घटना की पुनरावृत्ति न होने देती। सन् 1884 ई० में मद्रास (चेन्नई) में दीवान बहादुर रघुनाथ राय के निवास पर एक अखिल भारतीय संस्था की स्थापना की योजना बनी, जिसके फलस्वरूप 1885 ई० में इस संस्था की स्थापना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में हुई। कांग्रेस की स्थापना में दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैयब जी आदि ने भी सहयोग दिया। कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन 1885 ई० में व्योमेशचन्द्र बनर्जी की अध्यक्षता में बम्बई में हुआ था। द्वितीय अधिवेशन 1886 ई० में कलकत्ता (कोलकाता) में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में तथा तीसरा अधिवेशन मद्रास(चेन्नई) में बदरुद्दीन तैयब जी की अध्यक्षता में हुआ था।

सन् 1885-1905 ई० में उदारवादियों के उद्देश्य तथा कार्यक्रम

कांग्रेस के आरम्भिक दौर में नरमपन्थी नेताओं; जैसे-दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, फिरोजशाह मेहता, गोपालकृष्ण गोखले आदि का प्रभुत्व बना रहा। उनके उद्देश्य तथा कार्य निम्नलिखित थे

  1. उन्होंने विधानसभाओं की शक्तियों के विस्तार तथा स्वशासन में प्रशिक्षण की माँग की।
  2. उन्होंने आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत गरीबी को दूर करने के लिए कृषि का विकास करने, भू-राजस्व कम करने तथा उद्योगों के विस्तार की माँग की।
  3. उन्होंने प्रशासकीय सेवाओं के उच्च पदों का भारतीयकरण करने की माँग की।
  4. उन्होंने नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए भाषण तथा प्रेस की स्वतन्त्रता की माँग की।

इस प्रकार भारतीय नेताओं ने राष्ट्रीय जागृति पैदा की तथा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध जनमत तैयार किया। इन मेताओं ने एक राजनीतिक तथा आर्थिक कार्यक्रम देकर देशवासियों को एक ही मंच से राष्ट्रीय संघर्ष करने के लिए तैयार किया।

उदारवादियों की कार्यप्रणाली

  1. अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इन नेताओं ने शान्तिपूर्ण संवैधानिक तरीके अपनाये।
  2. उन्हें ब्रिटिश शासकों की न्यायप्रियता पर पूरा विश्वास था; अत: उन्होंने ब्रिटिश शासकों से मैत्रीपूर्ण व्यवहार रखा।
  3. वे संवैधानिक सुधारों में विश्वास करते थे; अतः वे याचिकाएँ, अपीलें, निवेदन-पत्र आदि ब्रिटिश सरकार को इस आशा से भेजते थे कि वह उन पर सहानुभूतिपूर्ण ढंग से विचार करेगी तथा उनकी माँगों को स्वीकार करेगी। इसी कारण इनकी कार्यप्रणाली तथा नीतियों को उदारवादी नीति कहा जाता है। कुछ अन्य विद्वान इन उदारवादी नेताओं की कार्यप्रणाली को ‘राजनीतिक भिक्षावृत्ति’ की संज्ञा भी देते हैं।

उपलब्धियाँ

ब्रिटिश सरकार ने नरमपन्थियों से कोई सहयोग नहीं किया; अतः ये नेता अपने उद्देश्य की प्राप्ति में विफल रहे। इसलिए 1905 ई० के बाद राष्ट्रीय आन्दोलन की बागडोर गरमपन्थी नेताओं के हाथों में चली गयी, जो क्रान्तिकारी साधनों द्वारा अपना उद्देश्य प्राप्त करना चाहते थे।

उग्र राष्ट्रवाद की नीति अपनाने के कारण – उदारवादी युग की 20 (UPBoardSolutions.com) वर्षों की लम्बी अवधि में भी कांग्रेस लोगों में जागृति पैदा करने में सफल न हो सकी। उदारवादी आन्दोलन की सफलता अंग्रेजों की सहानुभूति और दया पर निर्भर थी। कांग्रेस को आन्दोलन जनता का आन्दोलन न था।

उदारवादियों ने सरकार से रियायतें माँगीं, स्वतन्त्रता नहीं। इसको आधार बलिदान नहीं था। बंकिम चन्द्र चटर्जी ने इस आन्दोलन को भिक्षावृत्ति की संज्ञा दी। लाला लाजपत राय ने लिखा कि 20 वर्षों के आन्दोलन के बाद भी रोटी के स्थान पर अंग्रेजों से पत्थर ही मिले।

उदारवादी अंग्रेजी ताज के प्रति भक्ति-भाव रखते थे। उनकी एक और गलती यह थी कि उनका विश्वास था कि यदि अंग्रेज भारत से चले गये तो भारतीय हितों की हानि होगी। उदारवादी लोगों की आकांक्षाओं को समझ न सके। वे यह भी न समझ सके कि भारतीयों और अंग्रेजों के हित एक-दूसरे के विरोधी हैं। इसलिए बिना लड़े अंग्रेज अपने अधिकारों को छोड़ने को तैयार न थे।

सन् 1915 ई० तक उदारवादी नेताओं का कांग्रेस पर पूरा अधिकार था, परन्तु धीरे-धीरे उग्रवादी नेताओं ने उनके नेतृत्व को चुनौती दी और अन्ततः 1923 ई० में उदारवादी युग पूरी तरह समाप्त हो गया।

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प्रश्न 10.
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में महात्मा गांधी का क्या योगदान था ? [2010]
             या
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में महात्मा गांधी द्वारा चलाये गये आन्दोलनों का मूल्यांकन कीजिए। [2014]
             या
भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान गांधी जी द्वारा चलाये गये तीन प्रमुख आन्दोलनों का वर्णन कीजिए। [2014, 15, 16, 17, 18]
उत्तर :
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में महात्मा गांधी का योगदान प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन ने बहुत जोर पकड़ लिया। इसी समय महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय आन्दोलन में प्रवेश किया और वे शीघ्र ही राष्ट्रवादियों के सर्वप्रिय नेता बन गये। सन् 1920 ई० से 1947 ई० तक इन्होंने अपनी असाधरण योग्यता से स्वतन्त्रता आन्दोलन का नेतृत्व किया। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में महात्मा गांधी की भूमिका अद्वितीय है। इसी कारण 1919 ई० से 1947 ई० तक के काल को ‘गांधी युग’ कहा जाता है। गांधी जी का समस्त आन्दोलन सत्य, अहिंसा, शान्तिपूर्ण विरोध तथा साधने व साध्य के औचित्य पर आधारित था। महात्मा गांधी का भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान निम्नलिखित है

1. असहयोग आन्दोलन – यह महात्मा गांधी द्वारा चलाये गये आन्दोलनों में प्रथम महत्त्वपूर्ण आन्दोलन था। पंजाब में हो रही नृशंस घटनाओं पर रोक लगाने के उद्देश्य से गांधी जी ने 1920 ई० में असहयोग आन्दोलन का आरम्भ किया। इस आन्दोलन का उद्देश्य सरकार से किसी भी प्रकार का सहयोग न करना था। इसका आरम्भ गांधी जी ने अपनी ‘केसरे-हिन्द’ की उपाधि को गवर्नर जनरल को लौटाकर किया। जनता ने भी बड़ा उत्साह दिखाया। सैकड़ों व्यक्तियों ने अपनी-अपनी उपाधियाँ त्याग दीं। हजारों छात्रों ने स्कूल तथा कॉलेज छोड़ दिये। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया तथा विदेशी वस्त्रों की होली जलायी गयी। चुनावों, सरकारी नौकरियों, संस्थाओं तथा उत्सवों का बहिष्कार किया गया। गांधी जी के आह्वान पर प्रिंस ऑफ वेल्स (ब्रिटेन के युवराज) के भारत आगमन पर उनका देश-भर में बहिष्कार किया गया। 5 फरवरी, 1922 ई० को चौरी-चौरा गाँव में हुई हिंसात्मक घटना से दुःखी होकर गांधी जी ने इस आन्दोलन को स्थगित कर दिया। इस आन्दोलन के स्थगित (UPBoardSolutions.com) होने पर सरकार ने राजद्रोह के आरोप में गांधी जी को 6 वर्ष के लिए बन्दी बना लिया।

2. सविनय अवज्ञा आन्दोलन – सन् 1929 ई० में कांग्रेस ने लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य की प्राप्ति’ को अपना लक्ष्य घोषित किया। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए गांधी जी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाया गया। इस आन्दोलन का प्रारम्भ महात्मा गांधी ने गुजरात के डाण्डी नामक स्थान पर नमक बनाकर सरकार के नमक-कानून को तोड़कर किया। सन् 1931 ई० में गांधी-इर्विन समझौता हुआ। गांधी जी ने आन्दोलन स्थगित करके द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेना स्वीकार किया, किन्तु वार्ता के विफल होने पर पुनः आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया गया। यह आन्दोलन 1934 ई० तक चलता रहा।

3. व्यक्तिगत सत्याग्रह – अंग्रेजी सरकार ने भारतीयों को द्वितीय विश्वयुद्ध में नेताओं के साथ कोई परामर्श किये बिना ही धकेल दिया था। परिणामतः 1940-41 ई० में महात्मा गांधी के नेतृत्व में सरकार के इस कदम का विरोध करने हेतु सत्याग्रह आन्दोलन चलाया गया था।

4. भारत छोड़ो आन्दोलन – 8 अगस्त, 1942 ई० को कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन में ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पास किया गया। गांधी जी ने देशवासियों को ‘करो या मरो’ का नारा दिया, किन्तु अगले दिन 9 अगस्त की सुबह ही महात्मा गांधी तथा अन्य महत्त्वपूर्ण नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इन गिरफ्तारियों की जनता में भयंकर प्रतिक्रिया हुई और समस्त भारत में प्रदर्शन, हड़तालें, तोड़फोड़, सरकारी इमारतों को आग लगाना, थानों व पुलिस चौकियों पर हमले आदि घटनाएँ हुईं। अनेक स्थानों पर विद्रोहियों ने अस्थायी नियन्त्रण कायम कर लिया। यद्यपि अंग्रेज सरकार आन्दोलन को कुचलने में सफल हो गयी तथापि पाँच वर्ष बाद ही वह भारत को छोड़ने के लिए विवश हुई। यह एक राष्ट्रव्यापी आन्दोलन था, जिसका श्रेय मुख्यतया महात्मा गांधी को प्राप्त है।

5. भारत का विभाजन तथा स्वतन्त्रता की प्राप्ति – 3 जून, 1947 ई० को लॉर्ड माउण्टबेटन ने घोषणा की कि 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत का विभाजन कर दिया जाएगा। यद्यपि कांग्रेस ने विभाजन को स्वीकार कर लिया, किन्तु गांधी जी ने इसका विरोध किया। भारत के विभाजन के समय महात्मा गांधी ने बंगाल (नोआखाली) में साम्प्रदायिक आधार पर होने वाले रक्तपात को रोका। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय आन्दोलन को जन-आन्दोलन बनाया तथा ब्रिटिश साम्राज्यवादी शिकंजे से भारत को मुक्त कराने में अद्वितीय योगदान दिया। केवल यही नहीं अपितु हिन्दू-मुस्लिम एकता, हरिजनोद्धार, महिलाओं की (UPBoardSolutions.com) स्थिति में सुधार, स्वदेशी भावना का प्रचार आदि महात्मा गांधी की अन्य महत्त्वपूर्ण देन हैं। राष्ट्र को अभूतपूर्व योगदान के कारण ही महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ कहा जाता है।

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प्रश्न 11.
भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के योगदान पर प्रकाश डालिए। उसका क्या परिणाम हुआ ?
             या
भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में सुभाषचन्द्र बोस तथा उनळी आजाद हिन्द फौज की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
             या
सुभाषचन्द्र बोस पर टिप्पणी लिखिए। [2014]
             या
भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में सुभाषचन्द्र बोस के योगदान की विवेचना कीजिए। [2015, 16]
उत्तर :
सुभाषचन्द्र बोस को जन्म 23 जनवरी, 1897 ई० में कटक में हुआ था। वे जन्मजात क्रान्तिकारी थे। भारत के स्वतन्त्रता के इतिहास में सुभाषचन्द्र बोस का बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है। अपनी आई०सी०एस० की नौकरी को छोड़कर सुभाष राष्ट्रीय आन्दोलन में कूद पड़े। असहयोग आन्दोलन को सफल बनाने के लिए उन्होंने गांधी जी को पूरा सहयोग दिया। प्रिंस ऑफ वेल्स के बहिष्कार आन्दोलन में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर भाग लिया, जिस कारण अंग्रेज सरकार ने उन्हें दिसम्बर, 1921 ई० में 6 महीने के लिए जेल भेज दिया।

जब गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया तो सुभाषचन्द्र बोस को बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने गांधी जी का साथ छोड़ दिया। इसके बाद वे स्वराज्य पार्टी की स्थापना के कार्य में लग गये। सन् 1924 ई० में सरकार ने उन पर क्रान्तिकारी षड्यन्त्र का आरोप लगाकर उन्हें बन्दी बना लिया। सन् 1929 ई० में उन्हें रिहा कर दिया गया। सन् 1929 ई० में जब कांग्रेस ने अपना उद्देश्य पूर्ण स्वराज्य घोषित किया तो वे फिर से कांग्रेस में सम्मिलित हो गये।

सुभाषचन्द्र बोस कांग्रेस की उदारवादी नीति से बहुत असन्तुष्ट थे, क्योंकि वे सशस्त्र क्रान्ति के पक्ष में थे। इस बीच वे बीमार पड़ गये और इलाज के लिए यूरोप चले गये। सन् 1936 ई० में भारत लौटने पर उन्होंने पुनः स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेना प्रारम्भ कर दिया। सन् (UPBoardSolutions.com) 1938 ई० में वे कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये, किन्तु कुछ , समय पश्चात् कांग्रेस से अलग हो गये और ‘फारवर्ड ब्लॉक’ नामक एक नया संगठन बनाया।

ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें सरकार विरोधी होने का आरोप लगाकर जेल भेजा गया तथा बाद में घर पर ही नजरबन्द कर दिया गया। सन् 1941 ई० में सुभाष ब्रिटिश सरकार को चकमा देकर भारत से बाहर चले गय और अफगानिस्तान होते हुए जर्मनी पहुँच गये। जापानी सहायता से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए फरवरी, 1943 ई० में वे जापान पहुँचे। जापानी सरकार की सहायता से उन्होंने ‘आजाद हिन्द फौज’ को गठन किया और अपने अनुयायियों को जयहिन्द’ का नारा दिया। भारत को स्वतन्त्रता दिलाने हेतु उनकी सेना ने उत्तर-पूर्व की ओर से भारत पर आक्रमण कर दिया। आजाद हिन्द फौज आगे बढ़ती हुई असम तक आ पहुँची, किन्तु उसी समय द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान हार गया। इसके परिणामस्वरूप आजाद हिन्द फौज को जापान से सहायता मिलनी बन्द हो गयी और उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा। उन्हीं दिनों एक वायुयान दुर्घटना में सुभाष जी की मृत्यु हो गयी।

परिणाम – डॉ० वी०पी० वर्मा के अनुसार, “एक राजनीतिक कार्यकर्ता तथा नेता के रूप में बोस ओजस्वी राष्ट्रवाद के समर्थक थे। देशभक्ति उनके व्यक्तित्व का सार तथा उनकी आत्मा की उच्चतम अभिव्यक्ति थी। ऐसे राष्ट्रवादी नेता के संघर्ष का परिणाम उत्साहवर्धक ही होना था।

उनके द्वारा गठित आजाद हिन्द फौज का नारा–“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा”- युवाओं में स्वाधीनता की भावना तीव्र करने में मील का पत्थर साबित हुआ। सुभाषचन्द्र बोस क्रान्तिकारी और राष्ट्रवादी नेता थे। उनके प्रयासों से भारतीयों में राजनीतिक चेतना तीव्रतम रूप में अभिव्यक्त हुई। वे इतने अच्छे वक्ता थे कि जो भी उनको सुनता राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत हो पक्का देशभक्त बन जाता।

सुभाषचन्द्र बोस और उनकी आजाद हिन्द फौज का भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष में बड़ा (UPBoardSolutions.com) महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारत की आजादी के लिए उन्होंने जो बलिदान किये उन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता।

प्रश्न 12.
गरम दल के प्रमुख नेताओं ‘लाल-बाल-पाल’ के कार्यों एवं योगदान का मूल्यांकन कीजिए।
             या
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक पर टिप्पणी लिखिए।
             या
लाल-बाल-पाल से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
लाल-बाल-पाल कांग्रेस के तीन प्रमुख नेताओं की एक तिकड़ी थी। ये तीनों नेता कांग्रेस की उग्र या गरम विचारधारा के नेता थे। इनका विचार था कि ब्रिटिश सरकार से स्वराज्य या कोई अन्य सुविधा, उग्रवादी विद्रोह करके ही प्राप्त की जा सकती है। इन्होंने 1907 ई० में कांग्रेस की भिक्षावृत्ति की नीति से असन्तुष्ट होकर कांग्रेस का विभाजन करते हुए उग्रवादी दल का निर्माण किया। लाला लाजपत राय (लाल) पंजाब में सक्रिय थे। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (बाल) महाराष्ट्र में तथा बिपिनचन्द्र पाल (पाल) बंगाल में सक्रिय थे। इन सभी ने अपने क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभायी। इनका जीवन-परिचय तथा योगदान निम्नलिखित है –

1. लाला लाजपत राय – पंजाब केसरी लाला लाजपत राय स्वतन्त्रता आन्दोलन के प्रमुख कर्णधार थे। इनका जन्म 28 जनवरी, 1865 ई० को पंजाब के फिरोजपुर जिले में हुआ था। आप एक पत्रकार, वकील, शिक्षाशास्त्री, राजनीतिक नेता, समाज-सुधारक तथा सच्चे देशभक्त थे। इन्होंने लोकमान्य तिलक के साथ मिलकर क्रान्तिकारी आन्दोलन का संचालन किया। पंजाब में सामाजिक सुधारों के कार्यों को भी इन्होंने शुरू किया। सन् 1896 ई० में आपने इंग्लैण्ड जाकर वहाँ की जनता को भारतीयों के कष्टों से अवगत कराया। सन् 1905 ई० में इन्होंने कांग्रेस के माध्यम से स्वतन्त्रता आन्दोलन का कार्य शुरू किया था। ये सक्रिय (UPBoardSolutions.com) आन्दोलन के कारण कई बार जेल भी गये। सन् 1923 ई० में आप केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा के सदस्य चुने गये। सन् 1928 ई० के साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में एक जुलूस का नेतृत्व करते समय इन्हें पुलिस की लाठी से घातक चोट लग गयी थी। 17 नवम्बर, 1928 ई० को इनका देहान्त हो गया।

2. बाल गंगाधर तिलक – बाल गंगाधर तिलक भारत के महान् राष्ट्रीय नेता थे। इनका जन्म 23 जुलाई, 1856 ई० को महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। ये उग्र विचारधारा के समर्थक थे, इसलिए कांग्रेस में गरम दल के जन्मदाता थे। इनका कहना था कि, ‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। और हम उसे लेकर रहेंगे।’ इन्होंने दो समाचार-पत्र ‘मराठा’ और ‘केसरी’ निकाले तथा महाराष्ट्र में ‘शिवाजी उत्सव’ और ‘गणपति उत्सव’ का शुभारम्भ किया। अपने त्याग, तपस्या और देशभक्ति से वे’लोकमान्य’ बन गये। सन् 1893 ई० के अकाल और प्लेग के समय इन्होंने पीड़ितों की बहुत सेवा की। इन्होंने जनता में राष्ट्रीय चेतना जाग्रत की, भिक्षावृत्ति का विरोध किया, भारतीय संस्कृति व जीवन-मूल्यों की पुनः स्थापना की तथा विभिन्न आन्दोलनों में सक्रिय भाग लिया। जन-आन्दोलन चलाने के कारण इन्हें जेल में बन्द कर दिया गया। सन् 1914 ई० में ये जेल से मुक्त होकर बाहर आये। इसके बाद होमरूल आन्दोलन के कर्णधार बन गये। इन्होंने स्वराज्य की महत्ता पर विशेष बल दिया था। तिलक जी 1918 ई० में इंग्लैण्ड भी गये। वहाँ से लौटने के बाद ये अधिकांशतः बीमार रहने लगे और 1 अगस्त, 1920 ई० को इनका स्वर्गवास हो गया।

3. बिपिनचन्द्र पाल – बिपिनचन्द्र पाल का जन्म 7 नवम्बर, 1858 ई० को हबीगंज (वर्तमान में बांग्लादेश) में हुआ था। इन्होंने राष्ट्र के दलों को इस प्रकार संगठित करने की बात कही जिससे कोई भी शक्ति, जो हमारे मुकाबले में आये, हमारी इच्छा के सामने दबने को मजबूर हो जाए। इनका मानना था कि हमें अंग्रेजी सरकार को पूर्ण बहिष्कार करना चाहिए। यदि हम सरकार को नौकरी करने वाले आदमी न दें तो हम सरकार की कार्यप्रणाली को असम्भव बना सकते हैं। इसके अतिरिक्त भी प्रशासन की कार्य-पद्धति को कई तरह से असम्भव बनाया जा सकता है।

सन् 1907 ई० में बिपिनचन्द्र पाल ने मद्रास (चेन्नई) प्रान्त का दौरा किया और स्वराज्य का नारा बुलन्द किया। उन्हें 6 महीने जेल में रखा गया था, क्योंकि उन्होंने अरविन्द घोष के विरुद्ध गवाही देने से मना कर दिया था। जेल से रिहा होते ही उन्होंने एक सार्वजनिक सभा की, स्वराज्य का झण्डा फहराया और प्रत्येक विदेशी वस्तु का बहिष्कार करने का निश्चय किया। वास्तव में, बिपिनचन्द्र पाल खुले आम सरकार की सत्ता की अवहेलना करने के (UPBoardSolutions.com) पक्षधर थे। वे भारतीयों के मन से ब्रिटिश सरकार का भय निकालकर, उनमें स्वदेशी की भावना का संचार करना चाहते थे। 20 मई, 1932 ई० को इनका स्वर्गवास हो गया।

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प्रश्न 13.
मुस्लिम लीग की स्थापना कब हुई ? इसकी नीतियों का वर्णन कीजिए। इसका क्या प्रभाव पड़ा ? (2011)
             या
मुस्लिम लीग के दो मुख्य उद्देश्यों की विवेचना कीजिए। उसकी नीति के किन्हीं तीन परिणामों का वर्णन कीजिए।
             या
मुस्लिम लीग के मुख्य सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिए। भारतीय राजनीति में उसके प्रभाव की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
मुस्लिम लीग की स्थापना 1906 ई० में हुई, जो अंग्रेजों की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति का परिणाम थी। भारत में राष्ट्रवादी आन्दोलन के उदय को ब्रिटिश सरकार ने अपने साम्राज्य के लिए बहुत बड़ा खतरा माना। उन्होंने देश में राष्ट्रीय भावना को रोकने के लिए भारतीयों को धार्मिक आधार पर बाँटने की नीति अपनायी। अंग्रेजों ने मुसलमानों का हिमायती बनकर यह कहना शुरू कर दिया कि कांग्रेस में तो हिन्दुओं का बाहुल्य है और राष्ट्रीय आन्दोलन मुसलमानों के हित में नहीं है। उन्होंने मुसलमानों को अलग प्रतिनिधित्व देने का लालच दिया तथा मुसलमान जमींदारों व नवशिक्षित युवकों को अपने पक्ष में कर लिया (UPBoardSolutions.com) और उन्हीं के द्वारा मुसलमानों में पृथकतावादी भावनाओं का संचार किया। अंग्रेज मुसलमानों को अपना पृथक् राजनीतिक संगठन बनाने के लिए उकसाते रहे। साम्प्रदायिकता तथा पृथकतावादी प्रवृत्तियों के पराकाष्ठा पर पहुँच जाने पर 1906 ई० में ढाका ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग की स्थापना हुई।

दो उद्देश्य-
आगा खाँ के नेतृत्व में स्थापित मुस्लिम लीग के दो प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे –

  1. भारतीय राजनीति में मुसलमानों का पृथक् अस्तित्व कायम करना उनके लिए पृथक् निर्वाचन-प्रणाली की माँग करना और उन्हें अधिक-से-अधिक प्रतिनिधित्व दिलाने का प्रयास करना।
  2. मुसलमानों को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रभाव से बचाना और मुसलमानों में ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा और भ्रातृभाव उत्पन्न करना।

मुस्लिम लीग एक प्रतिक्रियावादी संस्था थी तथा इस पर मुसलमान राजाओं, जमींदारों, उद्योगपतियों तथा ऐसे व्यक्तियों का नियन्त्रण था, जो ब्रिटिश सरकार के पिट्ठू थे। उसका कोई रचनात्मक कार्यक्रम नहीं था तथा उसकी नीति मात्र कांग्रेस को नीचा दिखाने तथा मुसलमानों को हिन्दुओं से पृथक् करने की थी। इस नीति के निम्नलिखित तीन प्रभाव सामने आये

1. स्वतन्त्रता संग्राम पर प्रभाव – भारतीय मुस्लिम लीग की गतिविधियों का देश के स्वतन्त्रता संग्राम पर गहरा प्रभाव पड़ा। मुस्लिम लीग की हठधर्मिता तथा पृथकतावादी प्रवृत्तियों के कारण स्वतन्त्रता प्राप्ति में देर हुई।

2. हिन्दू-मुस्लिम एकता का अहित – सन् 1857 ई० के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में हिन्दू और मुसलमानों ने कन्धे-से-कन्धा मिलाकर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया था। अंग्रेज इस हिन्दू-मुस्लिम एकता को अपने लिए खतरा समझते थे। लीग की नीतियों ने हिन्दू-मुसलमानों को पृथक् करने का निन्दनीय कार्य किया और उनके बीच घृणा के बीज बोये।

3. देश का विभाजन – यद्यपि 1911-13 ई० के दौरान कुछ घटनाओं; जैसे-बंगाल-विभाजन; के कारण मुस्लिम लीग ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध हो गयी और उसके बाद कई वर्षों तक मुस्लिम लीग ने राष्ट्रीय आन्दोलन में कांग्रेस का साथ दिया, किन्तु बाद में मुस्लिम (UPBoardSolutions.com) लीग फिर कांग्रेस के विरुद्ध हो गयी और दोनों में बराबर खींचातानी चलती रही। मुस्लिम लीग की प्रतिक्रियावादी तथा साम्प्रदायिकता की नीति के कारण ही 1947 ई० मे भारत का विभाजन और पाकिस्तान का निर्माण हुआ।

लध उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रार्थना समाज की स्थापना और कार्यों का वर्णन कीजिए।
             या
समाज-सुधार के क्षेत्र में प्रार्थना-समाज के योगदान को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्रार्थना समाज : स्थापना-सन् 1849 ई० में महाराष्ट्र में परमहंस सभा की स्थापना की गयी। लेकिन इसका प्रभाव सीमित था और वह शीघ्र ही टूट गयी। डॉ० आत्माराम पाण्डुरंग ने एक संगठन 1867 ई० में बनाया, जिसका उद्देश्य विचारयुक्त प्रार्थना और समाज-सुधार था। उसका नाम प्रार्थना समाज रखा गया। प्रार्थना समाज ने नामदेव, तुकाराम, रामदास और एकनाथ जैसे मराठी सन्तों से प्रेरणा ली। उनका उद्देश्य हिन्दू समाज में सुधार करना था।
कार्य

  1. इस समाज ने जाति-प्रथा का विरोध किया और अन्तर्जातीय विवाह, विधवा-पुनर्विवाह और स्त्री-शिक्षा पर बल दिया। इसने अछूतों के उद्धार का काम भी किया।
  2. इस समाज ने एक ब्रह्म की उपासना का सन्देश दिया तथा धर्म को जातिवाद-रूढ़िवाद से मुक्त करने का प्रयास किया। समाज ने जाति-व्यवस्था और पुरोहितों के आधिपत्य की आलोचना की।
  3. अछूतों, दलितों और पीड़ितों की दशा सुधारने के लिए कई कल्याणकारी (UPBoardSolutions.com) संस्थाओं का संगठन किया; । जैसे—दलित जाति मण्डल, समाज सेवा संघ और दक्कन शिक्षा सभा।

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प्रश्न 2.
आर्य समाज तथा ब्रह्म समाज के मध्य दो समानताओं और तीन असमानताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
आर्य समाज व ब्रह्म समाज में निम्नलिखित दो समानताएँ एवं तीन असमानताएँ थीं –

समानताएँ –

  • दोनों ही मानते हैं कि ईश्वर एक है और उसकी पूजा आध्यात्मिक रूप से होनी चाहिए। दोनों ही मूर्तिपूजा को नहीं मानते।
  • दोनों की मान्यता है कि ईश्वर निराकार, सर्वशक्तिमान व सर्वव्यापक है।

असमानताएँ –

  • आर्य समाज वेदों को ही ज्ञान का स्रोत मानता है और उनके अध्ययन को आवश्यक मानता है; जबकि ब्रह्म समाज वेदों की बात नहीं करता, वह प्रार्थना और मनुष्य के कर्म को अधिक महत्त्व देता है।
  • ब्रह्म समाज सभी धर्मों की शिक्षाओं और उपदेशों को सत्य मानकर सभी धर्मों का आदर करने की बात कहता है; जबकि आर्य समाज हिन्दू धर्म को महत्त्व देता है। यह हिन्दू धर्म को इस्लाम तथा ईसाई धर्म के खतरे से बचाता है तथा धर्म-परिवर्तन कर बने ईसाइयों व मुसलमानों को पुनः हिन्दू धर्म अपनाने को आमन्त्रित करता है।
  • आर्य समाज सत्य और ज्ञान पर अधिक बल देता है तथा ज्ञान का स्रोत वेदों को मानता है। ब्रह्म समाज सत्य और प्रेम पर अधिक बल देता है।

प्रश्न 3.
गोपालकृष्ण गोखले और बाल गंगाधर तिलक ने समाज-सेवा के क्षेत्र में क्यों प्रसिद्धि पायी ?
उत्तर :
गोपालकृष्ण गोखले – गोपालकृष्ण गोखले में दिल और दिमाग की अद्भुत योग्यताएँ थीं और इन्होंने जीवन में बड़ी तेजी से उन्नति की। सन् 1905 ई० में गोखले ने मातृभूमि की सेवा करने के लिए सार्वजनिक कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग देने हेतु ‘सर्वेण्ट्स ऑफ इण्डिया सोसायटी की स्थापना की। .. गोखले को सदा उन भूखे, दुर्बल किसानों का ध्यान रहता था, जो दो रोटियों के लिए सुबह से शाम तक मेहनत करते थे, परन्तु निःसहाय थे। उनका विचार (UPBoardSolutions.com) था कि घृणा करने से भारत तथा ब्रिटेन दोनों को हानि है। उनका यही प्रयत्न रहा कि दोनों पक्षों में मेल-मिलाप हो तथा टकराव को टाला जाए। मिण्टो-मालें सुधारों को पास कराने में गोखले ने जो कुछ किया, वह प्रशंसनीय है। गोखले एक रचनात्मक व्यक्ति थे। वे अन्तर्जातीय सद्भावना और सहयोग के नवीन युग के पैगम्बर सदृश थे।

बाल गंगाधर तिलक – बाल गंगाधर तिलक राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय रहते हुए भी भारतीय समाज के सुधार एवं उत्थान के लिए प्रयत्नशील रहे। ये सामाजिक शोषण, प्रतिरोध, आडम्बर, कुरीतियों और भेदभाव से समाज को मुक्त करना चाहते थे। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए इन्होंने होमरूल आन्दोलन प्रारम्भ किया तथा समाज को जगाने में अपनी सम्पूर्ण क्षमता लगा दी। इसके लिए इन्होंने ‘केसरी’ व ‘मराठा’ समाचार-पत्रों का सहारा लिया। ‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे’, इस घोषणा ने भारतीय समाज को झकझोर दिया।

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प्रश्न 4.
भारतीय समाज के उत्थान में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की भूमिका की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
सती–प्रथा के बन्द होने से विधवाओं की समस्या पहले से भी अधिक गम्भीर रूप में सामने आयी। सती–प्रथा के प्रचलन के कारण विधवाओं की संख्या उतनी अधिक नहीं थी, लेकिन जब यह प्रथा अवैध घोषित हो गयी तो विधवाओं की संख्या में काफी वृद्धि हुई। 19वीं सदी के समाज-सुधारक विधवा-विवाह के लिए आन्दोलन करने लगे। संस्कृत के महान् विद्वान् पंडित ईश्वरचन्द विद्यासागर ने. विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए प्रबल आन्दोलन किया। उन्होंने शास्त्रों से उदाहरण देकर यह प्रमाणित कर दिया कि हिन्दू शास्त्रों के द्वारा विधवा पुनर्विवाह निषिद्ध नहीं है। बड़ी संख्या में हस्ताक्षर इकट्ठे करके सरकार के (UPBoardSolutions.com) पास एक प्रार्थना-पत्र भेजा गया। उनके प्रयत्नों से 1856 ई० में विधवा-विवाह जायज घोषित कर दिया गया। सामाजिक संस्थाओं के द्वारा अनेक विधवा-आश्रम भी देश में कायम किये गये।

प्रश्न 5.
थियोसॉफिकल सोसायटी पर एक निबन्य लिखिए। (2010)
             या
थियोसॉफिकल सोसायटी का संक्षिप्त परिचय देते हुए भारत में एनी बेसेण्ट के योगदान पर प्रकाश डालिए। (2010)
             या
एनीबेसेण्ट के जीवन-वृत्त एवं कार्यों (उपलब्धियों) पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
एनीबेसेण्ट का जन्म 1847 ई० में इंग्लैण्ड में हुआ था। इनकी माता आयरलैण्ड की रहने वाली थीं। ये प्रगतिशील विचारों की महिला थीं। सन् 1893 ई० में ये थियोसॉफिकल सोसायटी का कार्य करने के लिए भारत आयीं। कालान्तर में इन्होंने हिन्दू धर्म को स्वीकार किया और इसकी श्रेष्ठता के प्रति सम्भाषण किया। ये शोषण, प्रतिरोध, आडम्बर, कुरीतियों और भेदभाव से मुक्त समाज की स्थापना में रुचि रखती थीं। ये राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन से भी जुड़ गयी थीं। इन्होंने अपनी सम्पूर्ण क्षमता राष्ट्रीय जागरण में लगा दी। इन्होंने बाल गंगाधर तिलक के साथ 1916 ई० में होमरूल आन्दोलन शुरू किया। एनीबेसेण्ट ब्रिटिश साम्राज्य की शत्रु नहीं थीं। वे केवल भारतीयों को निद्रा से जगाना तथा झिंझोड़ना चाहती थीं। उन्होंने कहा था, मैं भारत की लम्बी बन्दूक हूँ, जो सब सोने वालों को जगाये, जिससे वे जाग सकें और अपनी मातृभूमि के लिए कार्य कर सकें।”

एनीबेसेण्ट की योजना राष्ट्रीय उग्रवादियों को क्रान्तिकारियों के साथ समझौतापूर्ण सन्धि से अलग रखने के लिए, साम्राज्य के अन्तर्गत किसी भी स्थिति में सन्तुष्ट बनाये रखने के लिए तथा संयुक्त कांग्रेस में उन्हें नरम दल वालों के साथ एक ही पंक्ति में लाने की थी। (UPBoardSolutions.com) उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया था कि अपना राज्य भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार है तथा भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य के लिए अपनी सेवाओं के उपलक्ष्य में तथा ब्रिटिश राजगद्दी के लिए आज्ञाकारिता के पुरस्कार के रूप में इसे लेने को तैयार न थे।

होमरूल आन्दोलन 1917 ई० में अपने शिखर पर पहुंचा। उस वर्ष भारत सरकार ने आन्दोलन के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की। एनीबेसेण्ट को बन्दी बना लिया गया। उनकी मुक्ति के लिए आन्दोलन हुआ। तिलक जी ने निष्क्रिय संघर्ष करने की धमकी दी। भारत का सम्पूर्ण वातावरण उत्साह से भर उठा। किन्तु उसी समय अगस्त, 1917 ई० में राज्य सचिव ने एक प्रसिद्ध घोषणा की, जिसके द्वारा भारतीयों को क्रमशः उत्तरदायी सरकार देने का वचन दिया गया, परिणामस्वरूप होमरूल आन्दोलन ठण्डा पड़ गया।

एनी बेसेण्ट 1917 ई० में कांग्रेस की प्रधान निर्वाचित हुईं। इसी वर्ष मि० मॉण्टेस्क्यू भारत आये। उन्होंने भारत का भ्रमण किया तथा जनप्रतिनिधियों से भेंट की। सन् 1919 ई० में भारत सरकार का अधिनियम स्वीकृत हुआ। 20 सितम्बर, 1933 ई० में अड्यार में एनीबेसेण्ट का निधन हो गया।

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प्रश्न 6.
सत्यशोधक समाज के चार सिद्धान्तों को लिखिए।
उत्तर :
सत्यशोधक समाज के प्रमुख चार सिद्धान्त अग्रलिखित हैं –

  1. सर्वधर्म समभाव एवं पारस्परिक सहनशीलता की प्रेरणा देना।
  2. जाति-पाँति, छुआछूत तथा वर्गीय भेदभाव का विरोध करना।
  3. स्त्रियों को समाज में ऊँचा स्थान दिलाने की प्रेरणा देना तथा पर्दा-प्रथा एवं सती–प्रथा का विरोध करना।
  4. शिक्षा के क्षेत्र में भी सुधार एवं प्रचार करना।

प्रश्न 7.
अनुदारवादियों के विचार उदारवादियों से किस प्रकार भिन्न थे ?
             या
नरमपंथी एवं गरमपंथी कांग्रेसियों की नीतियों एवं कार्यक्रमों का अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2014]
             या
नरमपन्थियों और गरमपन्थियों के बीच क्या अन्तर थे ? [2015]
उत्तर :
प्रारम्भ में कांग्रेस पर उदारवादियों का ही अधिक प्रभाव रहा, परन्तु बाद में कांग्रेस के सदस्यों में वैचारिक मतभेद उत्पन्न होने लगा। सन् 1907 ई० के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस दो दलों ‘उदारवादी’ एवं ‘अनुदारवादी’ में विभाजित हो गई। इसका प्रमुख कारण इन दोनों गुटों की विचारधारा में अन्तर होना था। उदारवादी नेता अहिंसात्मक और वैधानिक तरीके से ही स्वतन्त्रता की माँग करने में विश्वास करते थे। अनुदारवादी नेताओं को, उदारवादी (UPBoardSolutions.com) नेताओं का यह तरीका पसन्द नहीं था। उनका विचार था कि एक प्रकार से, अंग्रेजों से आजादी के लिए भीख माँगने के समान है। वे स्वतन्त्रता-प्राप्ति के लिए उग्रवादी तरीकों को अपनाना चाहते थे। इसी प्रकार यद्यपि दोनों दलों के नेताओं का लक्ष्य एक ही था, परन्तु उस लक्ष्य अर्थात् स्वतन्त्रता प्राप्त करने के तरीकों के सम्बन्ध में दोनों की विचारधाराएँ भिन्न थीं।

उदारवादी नेताओं में दादाभाई नौरोजी, गोपालकृष्ण गोखले, मदनमोहन मालवीय, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी आदि प्रमुख थे, जबकि लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, विपिनचन्द्र पाल आदि अनुदारवादी नेता थे।

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प्रश्न 8.
भारत-विभाजन के लिए उत्तरदायी कारकों का उल्लेख कीजिए।
             या
सन् 1947 ई० में भारत के विभाजन के लिए उत्तरदायी कारकों की समीक्षा कीजिए।
उत्तर :
सन् 1947 ई० में भारत के विभाजन के लिए निम्नलिखित कारक मुख्यत: उत्तरदायी थे –

  1. अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज्य करो’ नीति – यह नीति भारत के विभाजन का मूल कारण थी। इस नीति ने साम्प्रदायिकता का जहर घोला तथा मुस्लिम लीग को मुसलमानों के लिए पृथक् राज्य की माँग करने के लिए उकसाया।
  2. मुस्लिम लीग की भूमिका – जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने ब्रिटिश सरकार से द्वि-राष्ट सिद्धान्त के आधार पर मुसलमानों के लिए पृथक् राज्य बनाने की माँग की।
  3. हिन्दू महासभा की भूमिका – हिन्दू महासभा के नेताओं ने अपने भड़काने वाले भाषणों द्वारा मुसलमानों को पृथक् राज्य की माँग करने के लिए उकसाया। मुसलमानों को यह डर था कि स्वतन्त्रता के बाद हिन्दू बहुमत वाले देश में उनके हितों की रक्षा न हो (UPBoardSolutions.com) सकेगी।
  4. साम्प्रदायिक दंगे – देश-भर में व्यापक रूप से साम्प्रदायिक दंगे हुए। इन दु:खद घटनाओं के फलस्वरूप अन्तत: देश का विभाजन हो ही गया।

प्रश्न 9.
दादाभाई नौरोजी को ‘ग्रैण्ड ओल्ड मैन ऑफ इण्डिया’ क्यों कहा जाता है ? राष्ट्रीय आन्दोलन में उनका क्या योगदान था ?
             या
दादाभाई नौरोजी की प्रसिद्धि के क्या कारण थे ? (2011)
उत्तर :
दादाभाई नौरोजी को निम्नलिखित कारणों से ‘ग्रैण्ड ओल्ड मैन ऑफ इण्डिया’ कहा जाता है –

1. दादाभाई नौरोजी (1825-1917) ने 61 वर्ष भारत की सेवा की (40 वर्ष कांग्रेस की स्थापना के पहले और 21 वर्ष उसके बाद)। बाद में आप स्थायी रूप से इंग्लैण्ड में बस गये थे और वहाँ हाउस ऑफ कॉमन्स के सदस्य चुने गये थे। आप तीन बार 1886, 1893 और 1906 ई० में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये।

2. कांग्रेस के मंच से सबसे पहले स्वराज्य माँगने का श्रेय दादाभाई नौरोजी को ही है। कलकत्ता अधिवेशन में उनके अध्यक्षीय भाषण में स्वराज्य पर ही बल दिया गया था। आपने कहा था कि हमें मेहरबानी नहीं, इंसाफ चाहिए।

3. दादाभाई नौरोजी पहले भारतीय नेता थे, जिन्होंने भारतीय जनता का ध्यान उस ओर खींचा कि देश पर ब्रिटिश शासन होने के कारण भारत की सम्पत्ति बड़ी तेजी से ब्रिटेने जा रही है। आपने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘पावर्टी एण्ड ब्रिटिश रूल इन इण्डिया’ में अपने ये विचार प्रकट किये थे।

4. डॉ० पट्टाभि सीतारमैया के अनुसार, दादाभाई नौरोजी का नाम भारतीय देशभक्तों की सूची में सबसे पहले आता है। इनका सम्बन्ध कांग्रेस की स्थापना के समय से ही इससे रहा और अपने जीवन के अन्तिम दिनों तक ये इसकी सेवा करते रहे। इन्होंने कांग्रेस को शिकायतें दूर करने वाली एक मामूली संस्था से उठाकर स्वराज्य-प्राप्ति के एक निश्चित उद्देश्य के लिए काम करने वाली एक राष्ट्रीय सभा बना दिया।

5. सी०वाई० चिन्तामणि के अनुसार, “वर्षों तक इंग्लैण्ड में और भारत में दिन-रात प्रतिकूल और अनुकूल परिस्थितियों में और ऐसी निराशाजनक दशाओं में भी, जिनमें किसी आदमी का दिल टूट जाता है, दादाभाई ने अटल भाव से पूर्ण नि:स्वार्थ भाव और शक्ति से मातृभूमि की सेवा की। गोखले के अनुसार, “अगर मनुष्य में कहीं दिव्यता हो सकती है तो वह दादाभाई नौरोजी में थी।”

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प्रश्न 10.
सूरत के अधिवेशन में कांग्रेस में फूट क्यों हो गई ? दोनों गुटों के एक-एक नेता का नाम लिखिए। (2012)
             या
सूरत के अधिवेशन में इण्डियन नेशनल कांग्रेस किन दो दलों में विभाजित हो गई और क्यों? दोनों दलों में से प्रत्येक के एक-एक नेता का नाम लिखिए। (2018)
उत्तर :
ब्रिटिश सरकार के प्रति चलने वाले राष्ट्रीय आन्दोलन में उदारवादियों और उग्रवादियों के मतभेद चरम सीमा पर पहुँच गये। दोनों ही दलों के आन्दोलन के तरीके भिन्न-भिन्न थे। उग्र राष्ट्रवादी, स्वदेशी तथा बहिष्कार आन्दोलन को देशव्यापी बनाने के लिए कांग्रेस पर अपना आधिपत्य जमाना चाहते थे। इन्हीं परिस्थितियों में 1907 ई० में सूरत में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ जिसमें दोनों दलों की शक्तियों का परीक्षण हुआ। सूरत अधिवेशन में नरम (UPBoardSolutions.com) दल ने अध्यक्ष पद के लिए डॉ० रासबिहारी घोष तथा उग्र राष्ट्रवादियों ने लाला लाजपत राय का नाम प्रस्तावित किया। उस समय नरम दल बहुमत में था। इस प्रकार 1907 ई० में सूरत का कांग्रेस अधिवेशन (जो गोखले का गढ़ था) उदारवादियों और उग्र राष्ट्रवादियों के मध्य रणस्थल बन गया। इस अधिवेशन में दोनों दिन अव्यवस्था बनी रही और पुलिस बुलानी पड़ी। परिणामस्वरूप कांग्रेस का औपचारिक रूप से विभाजन हो गया। उग्र राष्ट्रवादी एक संवैधानिक संशोधन द्वारा कांग्रेस से निष्कासित कर दिए गए।

सूरत में कांग्रेस विभाजन के पश्चात् ब्रिटिश सरकार का उग्र राष्ट्रवादियों के विरुद्ध आतंक का ताण्डव शुरू हो गया। सरदार अजीत सिंह और लाला लाजपत राय को देश निकाला दे दिया गया। तिलक को बर्मा में माण्डले भेज दिया गया। विपिनचन्द्र पाल को जेल में बन्द कर दिया गया। उनका अपराध यह था कि उन्होंने अरविन्द घोष के विरुद्ध चलाये गये मुकदमे में उन्हें बचाने का प्रयास किया था। ब्रिटिश सरकार ने अलीपुर बम काण्ड (1908 ई०) के सम्बन्ध में अरविन्द घोष और उनके भाई वारिन्द्र घोष सहित बड़ी संख्या में क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। इन लोगों के मुकदमे को ‘अलीपुर बम काण्ड’ कहा जाता है। अधिकांश अभियुक्तों को दोषी पाया गया और उनमें से वारिन्द्र सहित कुछ को आजीवन कारावास दिया गया।

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प्रश्न 11.
लाला लाजपतराय क्यों प्रसिद्ध हैं ? [2011]
उत्तर :
सच्चे राष्ट्रवादी लाला जी ने ‘पंजाबी’ तथा ‘वन्देमातरम्’ नामक दैनिक समाचार-पत्रों का प्रकाशन आरम्भ किया तथा अंग्रेजी साप्ताहिक-पत्र ‘द पिपुल’ का सम्पादन कार्य भी किया। वे 1905 ई० से राजनीति में पूर्ण सक्रिय हो गये। 1905 ई० के बंगाल विभाजन के समय इन्होंने इंग्लैण्ड जाकर जनमत को कर्जन के विरुद्ध करने का प्रयत्न किया था। 1907 ई० में उन्होंने सरदार अजीतसिंह के साथ ‘कोलोनाइजेशन बिल’ के खिलाफ एक बड़ा आन्दोलन चलाया। आन्दोलन को कुचलने के लिए सरकार ने उन्हें पकड़कर बर्मा की माण्डले जेल में बन्द कर दिया। 1914 ई० में लाला जी ने अमेरिका प्रवास के दौरान दो संस्थाओं ‘इण्डियन होमरूल’ (UPBoardSolutions.com) एवं ‘इन्फॉरमेशन ब्यूरो’ की स्थापना की। साथ ही ‘यंग इण्डिया’ नामक समाचार-पत्र का भी सम्पादन किया। लालाजी ने आर्य समाज, भारत में इंग्लैण्ड का ऋण, मैजिनी की जीवनी, शिवाजी की जीवनी आदि पुस्तकों की रचना कर प्रबुद्ध वर्ग को जाग्रत किया और प्रसिद्धि पायी।

प्रश्न 12.
गोपालकृष्ण गोखले और बाल गंगाधर तिलक के विचारों में क्या अन्तर था ? किन्हीं दो बिन्दुओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
तिलक और गोखले दोनों उच्च श्रेणी के देशभक्त थे। दोनों ने अपने जीवन में बड़ी कुर्बानियाँ की थीं, परन्तु उनके विचारों में अन्तर था। उनके विचारों के दो बिन्दु अग्रवत् हैं –

  1. गोखले नरम विचारों के थे और तिलक गरम विचारों के। गोखले का लक्ष्य मौजूदा संविधान को सुधारना था, तिलक उसे नये सिरे से बनाना चाहते थे। गोखले को आवश्यक रूप से नौकरशाही के साथ मिलकर काम करना था, तिलक को उससे आवश्यक रूप से लड़ना था।
  2. गोखले जहाँ हो सके वहाँ सहयोग और जहाँ जरूरी हो विरोध के पक्षधर थे। तिलक रुकावट डालने की नीति को पसन्द करते थे। गोखले को प्रशासन और उसके सुधार की मुख्य चिन्ता थी, तिलक का राष्ट्र और उसकी उन्नति का विचार था।

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प्रश्न 13.
सरदार वल्लभभाई पटेल का जीवन-परिचय देते हुए स्वतन्त्रता आन्दोलन में उनका योगदान लिखिए। [2010]
उत्तर :
जीवन परिचय-सरदार वल्लभभाई पटेल को लौह-पुरुष के नाम से भी जाना जाता है। इनका जन्म 21 अक्टूबर, 1875 ई० को गुजरात के एक धनी परिवार में हुआ था। ये एक प्रतिष्ठित वकील थे। सन् 1918 ई० में गांधी जी द्वारा चलाये गये किसान आन्दोलन में ये उनके साथ मिल गये। सन् 1918-19 ई० से पटेल पूर्णत: कांग्रेस के साथ जुड़ गये और सन् 1927 ई० के स्वतन्त्रता संग्राम में अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया। स्वतन्त्र भारत के ये प्रथम उपप्रधानमन्त्री बने। 15 दिसम्बर, 1950 ई० को आपका निधन हो गया।

स्वतन्त्रता आन्दोलन में योगदान

बारदोली सत्याग्रह – सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम बारदोली सत्याग्रह से जुड़ा हुआ है। महात्मा गांधी के कहने पर पटेल ने बारदोली के किसानों के सत्याग्रह का आयोजन किया। किसानों ने सत्याग्रह इसलिए किया, क्योंकि सरकार ने लगान बहुत बढ़ा दिया था। सत्याग्रह के दौरान किसानों को बहुत-सी यातनाएँ सहनी पड़ीं। उनकी फसलें नीलाम कर दी गयीं। उनके मवेशियों को सरकार उठाकर ले गयी और बेच डाला। परन्तु सरदार पटेल के नेतृत्व में किसान सत्याग्रह पर डटे रहे। अन्त में सरकार को उनकी माँगें माननी पड़ी।

रियासतों का भारत संघ में विलय – रियासतों के भारत में विलय के बिना सरदार पटेल भारत की स्वतन्त्रता को अधूरा समझते थे। अपने विशाल हृदय, दूरदर्शिता और उदारता परन्तु कठोर निर्णय-शक्ति का उपयोग करते हुए इन्होंने प्रत्येक बाधा को दूर किया। पहले रक्षा, विदेश मामलों और संचार के विषयों में देशी रियासतों को सम्मिलित किया, फिर उनका संगठन करके अन्त में पूरी तरह से केन्द्र में विलय करके समस्त देश को विधान की दृष्टि से एक बना दिया।

सरदार पटेल ने रियासती विभाग के अन्तर्गत एक उपसमिति का गठन भी किया। इनके सुझाव पर रियासती मन्त्रालय बनाया गया और वे स्वयं उसके अध्यक्ष हुए। सरदार पटेल के प्रयत्नों का यह परिणाम हुआ कि 15 अगस्त, 1947 ई० तक जूनागढ़, हैदराबाद (UPBoardSolutions.com) और कश्मीर को छोड़कर सभी रियासतें भारतीय संघ में सम्मिलित हो गयीं।

फरवरी, 1948 ई० में एक रेफरेण्डम के द्वारा जूनागढ़ का विलय 20 जनवरी, 1949 ई० को काठियावाड़ के संयुक्त राज्य में हो गया। हैदराबाद के विलय को सुनिश्चित करने के लिए सरदार पटेल ने पुलिस कार्रवाई करने का निश्चय किया। पुलिस कार्रवाई 13 सितम्बर, 1948 ई० को शुरू हुई और तीन दिन के भीतर निजाम ने हथियार डाल दिये। 1 नवम्बर, 1948 ई० को हैदराबाद भारतीय संघ में सम्मिलित हो गया। जब कबायली लोग, जिन्हें पाकिस्तान मदद दे रहा था, श्रीनगर पर कब्जा करने वाले थे, तब महाराजा कश्मीर ने भारत सरकार से सहायता माँगी और 26 अक्टूबर, 1947 ई० को भारत संघ में विलय के प्रवेश पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये।

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प्रश्न 14.
सन् 1857 ई० की क्रान्तिकारी घटना के बाद भारतीयों में असन्तोष उत्पन्न होने की कई घटनाएँ हुईं। उनमें से निम्नलिखित दो पर प्रकाश डालिए [2010]
(क) वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट तथा
(ख) इल्बर्ट बिल (विधेयक)। इन पर भारतीयों की क्या प्रतिक्रिया हुई ?
उत्तर :
(क) वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट – उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में अनेक अंग्रेजी दैनिक पत्रों की स्थापना हुई। भारतीय भाषाओं में भी समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं को आरम्भ हुआ। धीरे-धीरे भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के लगभग 500 पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन होने लगा। इन पत्र-पत्रिकाओं ने जनता में राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। बाल गंगाधर तिलक द्वारा स्थापित मराठी पाक्षिक पत्र तथा केसरी ऐसा ही पत्र था।

भारतीय प्रेस पर सेंसर लगाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने समय-समय पर अनेक (UPBoardSolutions.com) कानून बनाये। ऐसा ही एक कानून 1878 ई० में लिटन ने ‘वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट’ पास करवे रतीय भाषाओं में प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्रों पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

भारतीयों की प्रतिक्रिया-समाचार-पत्रों पर कठोर प्रतिबन्ध लगाने से बुद्धिजीवी वर्ग में ब्रिटिश शासन के प्रति आक्रोश और स्वराष्ट्र के प्रति अनुराग बढ़ा। लोकमान्य तिलक के केसरी व मराठा समाचार-पत्र अब अंग्रेजों के प्रति आग उगलने लगे।

(ख) इल्बर्ट बिल (विधेयक) – सन् 1873 ई० के फौजदारी दण्ड संहिता के अन्तर्गत किसी भी भारतीय न्यायाधीश को यूरोपीय अपराधियों के मुकदमे सुनने का अधिकार नहीं था। यह पूर्ण रूप से अन्याय था तथा उच्च पदों पर आसीन भारतीयों को असहनीय था। रिपन ने इस अन्याय को दूर करने के उद्देश्य से अपनी परिषद् के विधि सदस्य इल्बर्ट की सहायता के लिए एक बिल पारित कराने का प्रयास किया। अत: 2 फरवरी, 1883 ई० को एक बिल प्रस्तुत किया गया। विधेयक का उद्देश्य था कि जाति-भेद पर आधारित सभी न्यायिक अयोग्यताएँ तुरन्त समाप्त कर दी जाएँ और भारतीय तथा यूरोपीय न्यायाधीशों की शक्तियाँ समान कर दी जाएँ। परन्तु जैसे ही बिल प्रस्तुत हुआ, उसका घोर विरोध किया गया। यूरोपियनों के कड़े विरोध के सम्मुख रिपन को झुकना पड़ा और यह बिल पास नहीं हो सका।

भारतीयों की प्रतिक्रिया – इस बिल के पास न होने से भारतीयों में निराशा की लहर दौड़ गयी। उन्हें अब अंग्रेजों से किसी प्रकार के न्याय की उम्मीद न रही, लेकिन इससे भारतीयों में राजनीतिक चेतना का संचार हुआ। इस विधेयक और इसके विरोध में किये गये आन्दोलन ने भारतीय राष्ट्रीयता पर जो प्रभाव डाला, वह प्रभाव विधेयक के मूल रूप में पास होने पर कभी नहीं हो सकता था।

यद्यपि आजाद हिन्द फौज भारत को स्वतन्त्र कराने में सफल न हो सकी, फिर भी सुभाषचन्द्र बोस और आजाद हिन्द फौज की गतिविधियों ने देश में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष को शक्ति अवश्य प्रदान की।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ब्रह्म समाज की स्थापना कब और किसने की ? [2011]
उतर :
ब्रह्म समाज की स्थापना राजा राममोहन राय ने सन् 1828 ई० में की।

प्रश्न 2.
आर्य समाज की स्थापना कब और किसके द्वारा की गयी ? [2011, 13, 16]
             या
स्वामी दयानन्द ने किस संस्था की प्रतिष्ठा की थी ? [2011]
उत्तर :
आर्य समाज की स्थापना 1875 ई० में स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा बम्बई (मुम्बई) में की गयी।

प्रश्न 3.
रामकृष्ण मिशन की स्थापना कब और किसने की थी ? [2009, 17]
उत्तर :
रामकृष्ण मिशन की स्थापना स्वामी विवेकानन्द ने 1897 ई० में की थी।

प्रश्न 4.
रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय कहाँ स्थापित किया गया ? [2010]
उत्तर :
रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय वेलूरमठ, कलकत्ता (कोलकाता) में स्थापित किया गया।

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प्रश्न 5.
सर सैयद अहमद खाँ ने किस शिक्षा केन्द्र की स्थापना तथा कब की ?
उत्तर :
सर सैयद अहमद खाँ ने 1875 ई० में ‘मोहम्मडन एंग्लो ओरियण्टल (UPBoardSolutions.com) कॉलेज की स्थापना की, जिसे 1920 ई० में ‘अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में परिवर्तित कर दिया गया।

प्रश्न 6.
थियोसॉफिकल सोसायटी का मुख्यालय भारत में कहाँ खोला गया ?
उत्तर :
थियोसॉफिकल सोसायटी का मुख्यालय 1882 ई० में भारत में अड्यार (वर्तमान चेन्नई के निकट) खोला गया।

प्रश्न 7.
भारत में थियोसॉफिकल आन्दोलन कहाँ से प्रारम्भ हुआ ?
उत्तर :
भारत में थियोसॉफिकल आन्दोलन अड्यारे (चेन्नई) से प्रारम्भ हुआ।

प्रश्न 8.
प्रार्थना समाज का संस्थापक कौन था ?
उत्तर :
प्रार्थना समाज के संस्थापक डॉ० आत्माराम पाण्डुरंग थे।

प्रश्न 9.
आर्य समाज के प्रमुख ग्रन्थ का नाम लिखिए। इसकी रचना किसने की थी ? (2009, 10, 11)
उत्तर :
आर्य समाज के प्रमुख ग्रन्थ का नाम ‘सत्यार्थप्रकाश’ है। (UPBoardSolutions.com) इसकी रचना स्वामी दयानन्द सरस्वती ने की थी।

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प्रश्न 10.
शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किसने किया था ?
उत्तर :
स्वामी विवेकानन्द ने।

प्रश्न 11.
सत्यार्थ प्रकाश के लेखक कौन थे ?
उत्तर :
स्वामी दयानन्द सरस्वती।

प्रश्न 12.
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का प्रारम्भिक नाम क्या था ?
उत्तर :
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का प्रारम्भिक नाम ‘मोहम्मडन एंग्लो ओरियण्टल कॉलेज’ था।

प्रश्न 13.
किन्हीं दो उदारवादी नेताओं के नाम लिखिए।
             या
उदारवादी नेताओं के नाम लिखिए।
उत्तर :
दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, गोपालकृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता आदि कांग्रेस के उदारवादी नेता थे।

प्रश्न 14.
भारतीय राष्ट्रवादी आन्दोलन के दो प्रमुख नेताओं के नाम लिखिए। [2011, 18]
उत्तर :
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दो प्रमुख नेता दादाभाई नौरोजी तथा सुरेन्द्रनाथ बनर्जी थे।

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प्रश्न 15.
भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन के गरम दल के दो नेताओं के नाम लिखिए। [2014]
उत्तर :

  1. बाल गंगाधर तिलक।
  2. विपिन चन्द्र पाल।

प्रश्न 16.
कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन कहाँ हुआ था ?
उत्तर :
कांग्रेस को प्रथम अधिवेशन 1885 ई० में बम्बई (UPBoardSolutions.com) (मुम्बई) में हुआ था।

प्रश्न 17.
पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव कब और कहाँ स्वीकार किया गया ?
उत्तर :
दिसम्बर, 1929 ई० के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव स्वीकार किया गया।

प्रश्न 18.
गरम दल के अधिष्ठाता कौन थे ?
उत्तर :
गरम दल के अधिष्ठाता बाल गंगाधर तिलक थे।

प्रश्न 19.
होमरूल लीग के दो नेताओं के नाम लिखिए।
उत्तर :
होमरूल लीग के दो नेता थे –

  1. श्रीमती एनीबेसेण्ट तथा
  2. मोतीलाल नेहरू।

प्रश्न 20.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष कौन थे ?
उत्तर :
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष व्योमेशचन्द्र बनर्जी थे।

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प्रश्न 21.
जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर :
जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड 13 अप्रैल, 1919 ई० को अमृतसर में हुआ।

प्रश्न 22.
जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड का मुख्य कारण लिखिए।
उत्तर :
इस हत्याकाण्ड का मुख्य कारण 1919 ई० का रॉलेट ऐक्ट था। इसका विरोध करने पर डॉ० सत्यपाल और डॉ० किचलू को गिरफ्तार कर लिया गया। इन गिरफ्तारियों के विरुद्ध विरोध प्रकट करने के लिए लोग 13 अप्रैल, 1919 ई० को अमृतसर (UPBoardSolutions.com) के जलियाँवाला बाग में एकत्रित हुए। तत्कालीन गवर्नर जनरल डायर के आदेश पर इन निहत्थे लोगों पर सैनिकों ने गोलियाँ बरसायीं।

प्रश्न 23.
भारत विभाजन का मुख्य कारण क्या था ?
उत्तर :
भारत विभाजन का मुख्य कारण मुस्लिम लीग की अपनी माँगों को लेकर हठधर्मिता और कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति थी।

प्रश्न 24.
काकोरी षड्यन्त्र काण्ड में शहीद होने वाले क्रान्तिकारियों में से किसी एक का नाम लिखिए।
उत्तर :
काकोरी षड्यन्त्र काण्ड में शहीद होने वाले एक क्रान्तिकारी थे—रामप्रसाद बिस्मिल। इनके दूसरे साथी का नाम था-अशफाक उल्ला खाँ।

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प्रश्न 25.
“स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।” यह नारा किसने दिया था ? [2011, 18]
उत्तर :
बाल गंगाधर तिलक ने।

प्रश्न 26.
सुभाषचन्द्र बोस के सैन्य संगठन का क्या नाम था ? उनका नारा क्या था ? [2013]
उत्तर :
Indian National Army. (आजाद हिन्द फौज)। इसका नारा था-‘दिल्ली चलो।

प्रश्न 27.
1893 ई० में विश्वधर्म सम्मेलन किस स्थान पर आयोजित किया गया था ? इसमें भारत की ओर से किसने भाग लिया ? [2013]
उत्तर :
1893 ई० में विश्वधर्म सम्मेलन शिकागो में आयोजित किया गया था। इसमें भारत की ओर से स्वामी विवेकानन्द ने भाग लिया था।

प्रश्न 28.
राजा राममोहन राय और स्वामी दयानन्द द्वारा स्थापित संस्थाओं के सिद्धान्तों में क्या , समानताएँ थीं? [2016]
उत्तर :
आर्य समाज व ब्रह्म समाज में निम्नलिखित समानताएँ थीं –

  1. दोनों ही मानते हैं कि ईश्वर एक ही है और उसकी पूजा आध्यात्मिक रूप से होनी चाहिए। दोनों ही मूर्तिपूजा को नहीं मानते।
  2. दोनों की मान्यता है कि ईश्वर निराकार, सर्वशक्तिमान (UPBoardSolutions.com) व सर्वव्यापक है।

प्रश्न 29.
सर सैयद अहमद खाँ ने मुस्लिम समाज के उत्थान के लिए क्या किया? कोई दो बिन्दु लिखिए। [2016]
उत्तर :

  1. इन्होंने मुस्लिम समाज में अपेक्षित सुधारों पर बल दिया तथा उन्हें शिक्षित करने का भरसक प्रयास किया।
  2. इन्होंने मुसलमानों को रूढ़िवादिता में न रहकर युग के साथ चलने की प्रेरणा दी।

प्रश्न 30.
उन्नीसवीं सदी के दो ऐसे समाचार-पत्रों का नाम बताइट जो अब भी प्रकाशित होते हैं। [2013]
उत्तर :
उन्नीसवीं सदी के दो प्रमुख समाचार-पत्रों के नाम इस प्रकार हैं –

  1. टाइम्स ऑफ इण्डिया (1861 ई०)।
  2. अमृत बाजार पत्रिका (1868 ई०)।

ये दोनों समाचार-पत्र अब भी प्रकाशित हो रहे हैं।

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बहुविकल्पीय प्रश्न

1. ब्रह्म समाज की स्थापना कब हुई ? [2012]

(क) 1828 ई० में
(ख) 1875 ई० में
(ग) 1906 ई० में
(घ) 1919 ई० में

2. ब्रह्म समाज की स्थापना किसने की? [2018]

(क) राजा राममोहन राय
(ख) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
(ग) केशवचन्द्र सेन
(घ) महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर

3. आर्य समाज के संस्थापक कौन थे ? [2012]

(क) विवेकानन्द ।
(ख) श्रद्धानन्द
(ग) सहजानन्द
(घ) दयानन्द सरस्वती

4. आर्य समाज की स्थापना किस वर्ष हुई ?

(क) 1882 ई० में
(ख) 1857 ई० में
(ग) 1875 ई० में
(घ) 1885 ई० में

5. रामकृष्ण मिशन की स्थापना किसके द्वारा की गयी ?

(क) स्वामी रामकृष्ण
(ख) स्वामी विवेकानन्द
(ग) स्वामी दयानन्द
(घ) राजा राममोहन राय

6. दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना कब और कहाँ की थी ?

(क) 1824 ई० में हरिद्वार में
(ख) 1875 ई० में मुम्बई में
(ग) 1857 ई० में दिल्ली में
(घ) 1867 ई० में कन्याकुमारी में

7. थियोसॉफिकल सोसाइटी की स्थापना किसने की ?

(क) एनीबेसेण्ट ने
(ख) सर सैयद अहमद खाँ ने
(ग) मैडम ब्लावेट्स्की ने
(घ) राजा राममोहन राय ने।

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8. अहमदिया आन्दोलन का संस्थापक कौन था ? [2013]

(क) शिब्ली नूमानी
(ख) मिर्जा गुलाम अहमद
(ग) वली उल्लाह
(घ) मुहम्मद कासिम ननौतवी

9. थियोसॉफिकल सोसायटी का मुख्यालय कहाँ है ?

(क) अड्यार में
(ख) बंगलुरु में
(ग) नयी दिल्ली में
(घ) कोलकाता में

10. मोहम्मडन ऐंग्लो इण्डियन ओरियण्टल कॉलेज की स्थापना कब हुई ?

(क) 1857 ई० में
(ख) 1875 ई० में
(ग) 1885 ई० में
(घ) 1890 ई० में

11. मुस्लिम एंग्लो ओरियण्टल कॉलेज की स्थापना किस नगर में की गयी थी ? [2012]

(क) आगरा
(ख) अलीगढ़
(ग) अजमेर
(घ) अहमदाबाद

12. अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का प्रथम वार्षिक अधिवेशन हुआ था (2013)

(क) कराची में
(ख) लखनऊ में
(ग) अलीगढ़ में
(घ) लाहौर में

13. ‘सत्यार्थप्रकाश’ का सम्बन्ध किससे है ? [2011, 18]

(क) ब्रह्म समाज से
(ख) आर्य समाज से
(ग) रामकृष्ण मिशन से
(घ) थियोसॉफिकल सोसायटी से

14. ‘भारत सेवक समाज’ नामक संस्था की स्थापना किसने की थी ? [2011]
             या
सर्वेण्ट्स ऑफ इण्डिया सोसायटी के संस्थापक थे [2011]

(क) गोपालकृष्ण गोखले ने
(ख) सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने
(ग) ज्योतिबा फुले ने
(घ) आत्माराम पाण्डुरंग ने

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15. बंगाल का विभाजन कब हुआ ? [2011]

(क) सन् 1907 में
(ख) सन् 1904 में
(ग) सन् 1905 में
(घ) सन् 1906 में

16. ‘वन्देमातरम्’ गीत के रचयिता कौन थे ? [2011]

(क) रवीन्द्रनाथ टैगोर
(ख) सोहनलाल द्विवेदी
(ग) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(घ) बंकिमचन्द्र चटर्जी

17. निम्नलिखित में कौन इण्डियन नेशनल कांग्रेस के उदार दल से सम्बन्धित था ?

(क) बाल गंगाधर तिलक
(ख) विपिनचन्द्र पाल
(ग) लाला लाजपत राय
(घ) फिरोजशाह मेहता

18. श्रीमती एनीबेसेण्ट निवासी थीं

(क) भारत की
(ख) इंग्लैण्ड की
(ग) फ्रांस की
(घ) आयरलैण्ड की

19. कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज्य’ का प्रस्ताव किस वर्ष पारित किया गया था ? (2017)

(क) 1929 ई० में
(ख) 1940 ई० में
(ग) 1942 ई० में
(घ) 1945 ई० में

20. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक कौन थे ?

(क) सुरेन्द्रनाथ बनर्जी
(ख) गोपालकृष्ण गोखले
(ग) एलन ऑक्टेवियन ह्यूम
(घ) महात्मा गांधी

21. भारत में मुस्लिम लीग की स्थापना कब हुई ? (2013)

(क) 1905 ई० में।
(ख) 1906 ई० में
(ग) 1916 ई० में
(घ) 1919 ई० में

22. नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज’ की स्थापना कहाँ की थी ? (2010)

(क) टोकियो में
(ख) हांगकांग में
(ग) जकार्ता में
(घ) सिंगापुर में

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23. जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड किस वर्ष हुआ था ?

(क) 1917 ई० में
(ख) 1918 ई० में
(ग) 1919 ई० में
(घ) 1920 ई० में

24. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई थी (2015)

(क) 1857 ई० में
(ख) 1885 ई० में
(ग) 1895 ई० में
(घ) 1905 ई० में

25. पूर्ण स्वराज्य दिवस प्रथम बार कब आयोजित किया गया था ? या भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज’ प्राप्त करने का लक्ष्य कब घोषित किया ? (2013)

(क) 26 जनवरी, 1920 ई० में
(ख) 26 जनवरी, 1930 ई० में
(ग) 26 जनवरी, 1935 ई० में।
(घ) 26 जनवरी, 1950 ई० में

26. अलीगढ़ आन्दोलन का संस्थापक था (2014)
             या
अलीगढ़ आन्दोलन के प्रवर्तक थे (2015)

(क) मिर्जा गुलाम अहमद
(ख) सैयद अहमद बरेलवी
(ग) सर सैयद अहमद खान
(घ) शौकत अली

27. आधुनिक भारत का निर्माता किसे माना जाता है? [2015, 17]

(क) स्वामी विवेकानन्द को
(ख) रामकृष्ण परमहंस को
(ग) स्वामी दयानन्द सरस्वती को
(घ) राजा राममोहन राय को

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28. निम्नलिखित में से किसने होम रूल लीग की स्थापना की थी? (2015, 16)

(क) लाला लाजपत राय
(ख) मोहम्मद अली जिन्ना
(ग) विपिन चन्द्र पाल
(घ) बाल गंगाधर तिलक

29. ‘ग्रेट ओल्ड मैन ऑफ इण्डिया’ कहा जाता था (2012)

(क) गोपाल कृष्ण गोखले को
(ख) सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को
(ग) दादा भाई नौरोजी को
(घ) फिरोजशाह मेहता को

30. कूका आन्दोलन किसने प्रारम्भ किया था? (2017)

(क) सन्त गुरु राम सिंह
(ख) लाला हरदयाल
(ग) सरदार भगत सिंह
(घ) बाल गंगाधर तिलक

उत्तरमाला

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 12 नवजागरण तथा राष्ट्रीयता का विकास 1

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 4 भारतीय संस्कृति (गद्य खंड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 4 भारतीय संस्कृति (गद्य खंड)

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जीवन-परिचय एवं कृतियाँ

प्रश्न 1.
डॉ० राजेन्द्र प्रसाद के जीवन-परिचय एवं रचनाओं पर प्रकाश डालिए। [2009, 10]
या
डॉ० राजेन्द्र प्रसाद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालिए। [2009]
या
डॉ० राजेन्द्र प्रसाद का जीवन-परिचय दीजिए तथा उनकी रचनाओं के नाम लिखिए। [2011, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ० राजेन्द्र प्रसाद एक सादगीपसन्द कृषक पुत्र थे। जहाँ वे एक देशभक्त राजनेता थे, वहीं कुशल वक्ता एवं श्रेष्ठ लेखक भी थे। सत्यनिष्ठा, ईमानदारी और निर्भीकता इनके रोम-रोम में बसी हुई थी। साहित्य के क्षेत्र में भी इनका योगदान बहुत स्पृहणीय रहा है। अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से इन्होंने हिन्दी-साहित्य को समृद्ध किया है। सांस्कृतिक, शैक्षिक, सामाजिक आदि विषयों पर लिखे गये इनके लेख हिन्दी-साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।

जीवन-परिचय-देशरत्न डॉ० राजेन्द्र प्रसाद का जन्म सन् 1884 ई० में बिहार राज्य के छपरा जिले के जीरादेई नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम महादेव सहाय था। इनका परिवार गाँव के सम्पन्न और प्रतिष्ठित कृषक परिवारों में से धा। इन्होंने कलकत (कोलकाता) विश्वविद्यालय से एम० ए०: t!ल-एल० बी० की परीक्षा उतीर्ण की थी। ये प्रतिभासम्पन्न और मेधावी छात्र थे और परीक्षा में सदैव प्रथम आते थे। (UPBoardSolutions.com) कुछ समय तक मुजफ्फरपुर कॉलेज में अध्यापन कार्य करने के पश्चात् ये.पटना और कलकत्ता हाईकोर्ट में वकील भी रहे। इनका झुकाव प्रारम्भ से ही राष्ट्रसेवा की ओर था। सन् 1917 ई० में गाँधी जी के आदर्शों और सिद्धान्तों से प्रभावित होकर इन्होंने चम्पारन के आन्दोलन में सक्रिय भाग लिया और वकालत छोड़कर पूर्णरूप से राष्ट्रीय स्वतन्त्रता-संग्राम में कूद पड़े। अनेक बार जेल की यातनाएँ भी भोगीं। इन्होंने विदेश जाकर भारत के पक्ष को विश्व के सम्मुख रखा। ये तीन बार अखिल भारतीय कांग्रेस के सभापति तथा भारत के संविधान का निर्माण करने वाली सभा के सभापति चुने गये।।

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राजनीतिक जीवन के अतिरिक्त बंगाल और बिहार में बाढ़ और भूकम्प के समय की गयी इनकी सामाजिक सेवाओं को भुलाया नहीं जा सकता। ‘सादा जीवन उच्च-विचार’ इनके जीवन को पूर्ण आदर्श था। इनकी प्रतिभा, कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी और निष्पक्षता से प्रभावित होकर इनको भारत गणराज्य का प्रथम राष्ट्रपति बनाया गया। इस पद को ये संन् 1952 से सन् 1962 ई० तक सुशोभित करते रहे। भारत सरकार ने इनकी महानताओं के सम्मान-स्वरूप देश की सर्वोच्च उपाधि ‘भारतरत्न’ से सन् 1962 ई० में इनको अलंकृत किया। जीवन भर राष्ट्र की नि:स्वार्थ सेवा करते हुए ये 28 फरवरी, 1963 ई० को दिवंगत हो गये।
रचनाएँ-राजेन्द्र बाबू की प्रमुख रचनाओं का विवरण निम्नवत् है

(1) ‘चम्पारन में महात्मा गाँधी’—इसमें किसानों के शोषण और अंग्रेजों के विरुद्ध गाँधीजी के . आन्दोलन का बड़ा मार्मिक वर्णन है। (2) ‘बापू के कदमों में-इसमें महात्मा गाँधी के प्रति श्रद्धा-भावना व्यक्त की गयी है। (3)‘मेरी आत्मकथा’—यह राजेन्द्र बाबू द्वारा सन् 1943 ई० में जेल में लिखी गयी थी। इसमें तत्कालीन भारत की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति का लेखा-जोखा है। (4) ‘मेरे यूरोप के अनुभव’-इसमें इनकी यूरोप की यात्रा का वर्णन है। इनके भाषणों के भी कई संग्रह प्रकाशित हुए हैं। इसके अतिरिक्त (5) शिक्षा और संस्कृति, (6) भारतीय शिक्षा, (7) गाँधीजी की देन, (8), साहित्य, (9) संस्कृति का अध्ययन, (10) खादी का अर्थशास्त्र आदि इनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं। |

साहित्य में स्थान–डॉ० राजेन्द्र प्रसाद सुलझे हुए राजनेता होने के साथ-साथ उच्चकोटि के विचारक, साहित्य-साधक और कुशल वक्ता थे। ये ‘सादी भाषा और गहन विचारक’ के रूप में सदैव स्मरण किये जाएँगे। हिन्दी की आत्मकथा विधा में इनकी पुस्तक मेरी आत्मकथा’ का उल्लेखनीय स्थान है। ये हिन्दी के अनन्य सेवक और प्रबल प्रचारक थे। राजनेता के रूप में अति-सम्मानित स्थान पर विराजमान होने के साथ-साथ (UPBoardSolutions.com) हिन्दी-साहित्य में भी इनका अति विशिष्ट स्थान है।

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गुद्यांशों पर आधारित प्रश्न

प्रश्न-पत्र में केवल 3 प्रश्न (अ, ब, स) ही पूछे जाएँगे। अतिरिक्त प्रश्न अभ्यास एवं परीक्षोपयोगी दृष्टि से |महत्त्वपूर्ण होने के कारण दिए गये हैं।
प्रश्न 1.

अगर असम की पहाड़ियों में वर्ष में तीन सौ इंच वर्षा मिलेगी तो जैसलमेर की तप्तभूमि भी मिलेगी, जहाँ साल में दो-चार इंच भी वर्षा नहीं होती। कोई ऐसा अन्न नहीं, जो यहाँ उत्पन्न न किया जाता हो। कोई ऐसा फल नहीं, जो यहाँ पैदा नहीं किया जा सके। कोई ऐसा खनिज पदार्थ नहीं, जो यहाँ के भू-गर्भ : में न पाया जाता हो और न कोई ऐसा वृक्ष अथवा जानवर है, जो यहाँ फैले हुए जंगलों में न मिले। यदि इस सिद्धान्त को देखना हो कि आबहवा का असर इंसान के रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा, शरीर और मस्तिष्क पर पड़ता है तो उसका जीता-जागता सबूत भारत में बसने वाले भिन्न-भिन्न प्रान्तों के लोग देते हैं।
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. भारत के भिन्न-भिन्न प्रान्तों के लोग क्या प्रमाण देते हैं ?
  2. भारत की भूमि की क्या विशेषता है ?

[खनिज पदार्थ = पृथ्वी को खोदकर निकाले गये पदार्थ; जैसे-लोहा, चाँदी, पीतल आदि। भू-गर्भ = पृथ्वी के अन्दर। आबहवा = वातावरण।]
उत्तर
(अ) प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘गद्य-खण्ड’ में संकलित डॉ० राजेन्द्र प्रसाद द्वारा लिखित ‘भारतीय संस्कृति’ नामक निध से उद्धृत है। अथवा निम्नवत् लिखेंपाठ का नाम-भारतीय संस्कृति। लेखक का नाम–डॉ० राजेन्द्र (UPBoardSolutions.com) प्रसाद
[विशेष—इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए इस प्रश्न का यही उत्तर इसी रूप में प्रयुक्त होगा।]

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(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या-भारतीय संस्कृति में निहित विभिन्नता में एकता का चित्रण करते हुए लेखक कहते हैं कि भारतीय वसुन्धरा धन-धान्य से परिपूर्ण है। इसी कारण कोई ऐसा अन्न या फल नहीं है जिसे यहाँ पैदा न किया जा सकता हो। भारतीय वसुन्धरा के गर्भ में अनेक खनिज पदार्थ पाये जाते हैं। हर प्रकार की वनस्पति और हर प्रकार के जानवर यहाँ पाये जाते हैं। लेखक के कहने का आशय यह है कि यहाँ बहुत-सी ऐसी बातें हैं जो भारत की एकता में भी अनेकता के दर्शन कराने में सत्य प्रतीत होती हैं।
द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को इस सिद्धान्त को देखना है कि वातावरण का असर व्यक्ति के रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा, शरीर और मस्तिष्क पर कितना अधिक पड़ता है तो उसका जीता-जागता प्रमाण भारत में बसने वाले भिन्नभिन्न प्रान्तों के लोग हैं क्योंकि उन सभी का खान-पान, रहन-सहन और वेश-भूषा भिन्न-भिन्न ही है।
(स)

  1. भारत के भिन्न-भिन्न प्रान्तों में रहने वाले लोग यह प्रमाणित करते हैं कि यहाँ के वातावरण का प्रभाव यहाँ के निवासियों, उनके रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा, शरीर और मस्तिष्क पर पड़ता है।
  2. भारत की भूमि की विशेषता यह है कि यहाँ सभी प्रकार के अन्न और फल उत्पन्न किये जा सकते हैं। सभी खनिज पदार्थ यहाँ की भूमि में पाये जाते हैं और इसकी भूमि पर उगे जंगलों में सभी प्रकार के वृक्ष और जानवर पाये जाते हैं।
  3. भारत में वर्षा की विशेषता यह है कि एक तरफ तो यहाँ की (UPBoardSolutions.com) असम की पहाड़ियों में तीन सौ इंच तक वर्षी होती है और दूसरी तरफ जैसलमेर (राजस्थान) की भूमि पर तीन इंच भी नहीं होती।

प्रश्न 2.
भिन्न-भिन्न धर्मों के मानने वाले भी, जो सारी दुनिया के सभी देशों में बसे हुए हैं, यहाँ भी थोड़ी-बहुत संख्या में पाये जाते हैं और जिस तरह यहाँ की बोलियों की गिनती आसान नहीं, उसी तरह यहाँ भिन्न-भिन्न धर्मों के सम्प्रदायों की भी गिनती आसान नहीं। इन विभिन्नताओं को देखकर अगर अपरिचित आदमी घबड़ाकर कह उठे कि यह एक देश नहीं, अनेक देशों का एक समूह है, यह एक जाति नहीं, अनेक जातियों का समूह है तो इसमें आश्चर्य की बात नहीं; क्योंकि ऊपर देखने वाले को, जो गहराई में नहीं जाता, विभिन्नता ही देखने में आएगी।
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. भारत के सम्बन्ध में कौन-सी बात आश्चर्य की नहीं मानी जाती ?
  2. भिन्न-भिन्न धर्मावलम्बी किस देश में बसे हुए हैं ? भारत के जल और वाणी की विशेषता
    को एक पंक्ति में व्यक्त कीजिए।
  3. सतही दृष्टि से देखने पर किसी व्यक्ति को  भारत के सम्बन्ध में क्या दिखाई पड़ता है ?
  4. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?

उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या-डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी कहते हैं कि यह विश्व अनेक देशों में विभक्त है और इन सभी देशों के भिन्न-भिन्न रीति-रिवाज, संस्कृति और धर्म हैं। पूरे विश्व में इन धर्मों को मानने वाले लोग भी अलग-अलग हैं। भारत की एक अपनी विशिष्टता है कि यहाँ पर विश्व के सभी देशों के निवासी अथवा किसी भी धर्म को मानने वाले व्यक्ति कम संख्या में ही सही, लेकिन मिल अवश्य जाएँगे। जिस प्रकार भारत के विभिन्न प्रान्तों, जनपदों और ग्रामों में बोली जाने वाली बोलियों की गणना करना अत्यधिक कठिन है, उसी प्रकार इस भारतभूमि पर निवास करने वाले लोगों के भिन्न-भिन्न धर्म और इन धर्मों के भी कई-कई सम्प्रदायों की गणना करना भी निश्चित ही आसान कार्य नहीं है।

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द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी कहते हैं कि भारतभूमि की इतनी विभिन्नताओं को देखकर दूसरे देशवासी या ऐसे व्यक्ति जो यहाँ के मौलिक स्वरूप से अनभिज्ञ हैं, घबरा जाते हैं और कह बैठते हैं कि भारत तो एक देश है ही नहीं, वरना (UPBoardSolutions.com) यह तो अनेक देशों का समूह है। यहाँ के निवासी भी किसी एक जाति के नहीं हैं, वरन् अनेकानेक जातियों के हैं। दूसरे देशवासियों की इस प्रकार की बातों में आश्चर्य करने योग्य कुछ भी नहीं है; क्योंकि वे इस देश को ऊपर-ही-ऊपर अर्थात् सतही दृष्टि से देखते हैं, वे इस बात की गहराई में नहीं उतरते। निश्चित ही ऐसे लोगों को भारत में विभिन्नता अर्थात् अनेकता ही नजर आएगी।
(स)

  1. “भारत एक देश नहीं वरन् अनेक देशों का समूह है, यहाँ एक जाति के लोग नहीं रहते वरन् अनेकानेक जातियों के लोग निवास करते हैं,” भारत के सम्बन्ध में यही बात आश्चर्य की नहीं मानी जाती।
  2. भिन्न-भिन्न धर्मों को मानने वाले; भले ही कम संख्या में हों; लेकिन भारत में विश्व के सभी धर्मों को मानने वाले पाये जाते हैं। भारत के जल और वाणी की विशेषता को व्यक्त करते हुए एक पंक्ति कही जा सकती है-“कोस-कोस पर बेदले पानी, चार कोस पर बानी।।
  3. सतही दृष्टि से देखने वालों को भारत में विभिन्नता अर्थात् अनेकता ही नजर आती है।
  4. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक भारतभूमि की विविधता का (UPBoardSolutions.com) बहुत ही सार्थक और धनात्मक रूप में वर्णन करता है। इससे लेखक का अपने देश और उसकी संस्कृति के प्रति प्रेम झलकता है।

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प्रश्न 3.
पर विचार करके देखा जाए तो इन विभिन्नताओं की तह में एक ऐसी समता और एकता फैली हुई है, जो अन्य विभिन्नताओं को ठीक उसी तरह पिरो लेती है और पिरोकर एक सुन्दर समूह बना देती है—जैसे रेशमी धागा भिन्न-भिन्न प्रकार की और विभिन्न रंग की सुन्दर मणियों अथवा फूलों को पिरोकर एक सुन्दर हार तैयार कर देता है, जिसकी प्रत्येक मणि या फूल दूसरों से न तो अलग है और न हो सकता है और केवल अपनी ही सुन्दरता से लोगों को मोहता नहीं, बल्कि दूसरों की सुन्दरता से वह स्वयं सुशोभित होता है और इसी तरह अपनी सुन्दरता से दूसरों को भी सुशोभित करता है।
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में मणि या फूल की क्या विशेषता बतायी गयी है ?
  2. विभिन्नताओं की तह में फैली एकता किस प्रकार की है ?
  3. भारतीय संस्कृति के विषय में कुछ पंक्तियाँ लिखिए।

[ तह में = जड़ में । मोहता = मोहित करता।]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या-डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी कहते हैं कि हमारे देश की संस्कृति में अनेक विविधताएँ तो हैं, पर ये सभी विविधताएँ बाहरी दृष्टि से देखने पर ही प्रतीत होती हैं। भीतर से देखने पर सबमें एक अनोखी एकता और समानता (UPBoardSolutions.com) व्याप्त है। जिस प्रकार मोतियों और रंग-बिरंगे फूलों को एक रेशमी धागा एक साथ एक हार के रूप में जोड़े रखता है, उसी प्रकार हमारी संस्कृति भी अनेक धर्मों, जातियों, भाषाओं तथा दूसरी भिन्नताओं को एक साथ जोड़े रखती है। एकता के इस धरातल पर हम सब केवल भारतीय रह जाते हैं।

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द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी कहते हैं कि इस हार की प्रत्येक मणि या पुष्प अन्य मणि या पुष्पों से न तो भिन्न है और न ही हो सकती है। ये हार या पुष्प.अपनी सुन्दरता से ही । दूसरों को नहीं लुभाते, वरन् दूसरों की सुन्दरता से खुद सुशोभित भी होते हैं। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार माला के फूल अपने सौन्दर्य से दूसरों को मोहित ही नहीं करते अपितु दूसरों के गले में डाले जाने पर उनको सुशोभित भी करते हैं, इसी प्रकार हमारे देश की धार्मिक, भाषायी और जातिगत विभिन्नता स्वयं तो सुशोभित होती ही है, हमारे देश को भी सुशोभित करती है।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में मणि या फूल की विशेषता के रूप में कहा गया है कि ये केवल अपनी सुन्दरता से ही लोगों को मोहित नहीं करते वरन् दूसरों की सुन्दरता से स्वयं भी सुशोभित होते हैं।
    विभिन्नताओं की तह में फैली एकता उस रेशमी धागे के समान है जो विभिन्न प्रकार की मणिमुक्ताओं और फूलों को अपने में गूंथकर एक होर बना देता है।
  2. भारत और भारतीय संस्कृति के विषय में कहा जा सकता है-“हिन्दू, मुसलमान, पारसी, सिख, ईसाई आदि सभी इसी देश में रहने वाले हैं। उनके मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे आदि अलग-अलग हो सकते हैं, परन्तु भारतरूपी जो बड़ा मन्दिर है, (UPBoardSolutions.com) वह सबका है। सब मजहबों के लोग एक ही ईश्वर की इबादत करते हैं।” कविवर द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ने भी ऐसे ही भाव व्यक्त किये हैं-‘हम सब सुमन एक उपवन के।’

प्रश्न 4.
यह केवल एक काव्य की भावना नहीं है, बल्कि एक ऐतिहासिक सत्य है, जो हजारों वर्षों से अलग-अलग अस्तित्व रखते हुए अनेकानेक जल-प्रपातों और प्रवाहों का संगमस्थल बनकर एक प्रकाण्ड और प्रगाढ़ समुद्र के रूप में भारत में व्याप्त है, जिसे भारतीय संस्कृति का नाम दे सकते हैं। इन अलग-अलग नदियों के उद्गम भिन्न-भिन्न हो सकते हैं और रहे हैं। इनकी धाराएँ भी अलग-अलग बहती हैं और प्रदेश के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के अन्न और फल-फूल पैदा करती रहती हैं; पर सबमें एक ही शुद्ध, सुन्दर, स्वस्थ और शीतल जल बहता रहा है, जो उद्गम और संगम में एक ही हो जाता है। [2010]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. भारतीय संस्कृति का नाम किसे दिया जा सकता है ? स्पष्ट कीजिए।
  2. भारत की नदियों में कैसी भिन्नता और कैसी एकता है ? स्पष्ट कीजिए।

[ अस्तित्व = सत्ता। प्रपात = झरना। प्रकाण्ड = बहुत बड़ा। प्रगाढ़ = गहरा। उद्गम = निकलने का स्थान।]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक का कथन है कि भारतीय संस्कृति की समता फूलों की माला से करना तथा यहाँ की भाषाओं और जातियों को रंग-बिरंगे फूल कहना केवल काव्य की कल्पना नहीं है, वरन् यह एक यथार्थ है, एक ऐतिहासिक सत्य है। जिस प्रकार हजारों वर्षों से प्रवाहित होते आ रहे झरने और नदियों के उद्गम अलग-अलग होने पर भी उनका जल दूर-दूर से आकर सागर में समा जाता है, जो उनका (UPBoardSolutions.com) मिलन-स्थल होता है; उसी प्रकार भारत में भी विभिन्न धर्म, विचारधारा और जाति रूपी झरने हजारों वर्षों से आकर मिल रहे हैं, जिससे एक विस्तृत और सागर के समान ही एक गहन गम्भीर भारतीय संस्कृति का निर्माण हुआ है।

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द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी कहते हैं कि हर एक नदी का उद्गम स्थल अलग-अलग होता है। उसका मार्ग भी दूसरे से भिन्न होता है और हर नदी के किनारे की भूमि में प्रदेश की जलवायु और मिट्टी के अनुसार अलग-अलग प्रकार की फसलें पैदा होती हैं, पर इन सभी नदियों में एक ही पानी है, जो सागर में एक साथ मिलता है और फिर बादल के रूप में एक जैसा बरसता है। जिस प्रकार नदियों का जल अपने उद्गम (बादल) और संगम (सागर) पर एक जैसा हो जाता है, उसी प्रकार विभिन्न स्थानों से आयी हुई संस्कृतियाँ अपने संगम-स्थल भारतीय संस्कृति में एक-सी सुखद और कल्याणकारी हो गयी हैं।
(स)

  1. भारत के विभिन्न धर्म, विचारधारा और जाति रूपी जल-प्रपात और प्रवाह हजारों वर्षों से आकर भारत में व्याप्त हैं। इसे ही विस्तृत और सागर के समान गहन और गम्भीर भारतीय संस्कृति का नाम दिया जा सकता है।
  2. भारत की नदियों के उद्गम स्थल भिन्न-भिन्न हैं। ये अलग-अलग स्थानों से होकर बहती हैं और विभिन्न प्रकार की उपज करती हैं। लेकिन इन सभी नदियों में एक ही शुद्ध, शीतल, स्वच्छ और स्वास्थ्यवर्द्धक जल प्रवाहित होता रहता है, जो अपने उद्गम और संगम में एक हो जाता है।

प्रश्न 5.
आज हम इसी निर्मल, शुद्ध, शीतल और स्वस्थ अमृत की तलाश में हैं और हमारी इच्छा, अभिलाषा और प्रयत्न यह है कि वह इन सभी अलग-अलग बहती हुई नदियों में अभी भी उसी तरह बहता रहे और इनको वह अमर तत्त्व देता रहे, जो जमाने के हजारों थपेड़ों को बरदाश्त करता हुआ भी आज हमारे अस्तित्व को कायम रखे हुए है और रखेगा। [2016]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. कवि इकबाल की उक्ति का अपने शब्दों में अर्थ लिखिए।
  2. लेखक ने प्रस्तुत गद्यांश में किस अमर-तत्त्व की ओर संकेत किया है ?
  3. हमारे अस्तित्व को कौन कायम रखे हुए है? ।

[ निर्मल = स्वच्छ। अभिलाषा = चाह। बरदाश्त करना = सहना। अस्तित्व = विद्यमान होना। ]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या–भारतीय संस्कृतिरूपी विशाल सागर में आकर गिरने वाली इन नदियों में, एक ही भाव से शुद्ध, स्वच्छ, शीतल तथा स्वास्थ्यप्रद जल, अमृत के समान प्रवाहित होता रहता है। इस जल में एक ही उदात्त भाव का समावेश है, जो भारतीय संस्कृति को अमरता और स्थिरता प्रदान करता है। लेखक की हार्दिक इच्छा है कि विभिन्न विचारधाराओं के रूप में प्रवाहित इन नदियों में वह अमृत (UPBoardSolutions.com) तत्त्व सदैव बना रहे, जिससे सभी लोगों में प्रेम और राष्ट्रीयता की भावना का संचार हो। इस भावना का विस्तृत रूप ही सनातन धर्म है और यही भारतीय संस्कृति की उदात्त परम्परा भी है। यद्यपि इस देश ने तरह-तरह के संकट झेले हैं, तथापि भारतीय संस्कृति में विद्यमान विभिन्नता में एकता एक ऐसा तत्त्व है, जो आज तक मिटाया नहीं जा सका है।

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(स)

  1. प्रसिद्ध शायर इकबाल का कहना है कि “न जाने कितनी बार इस देश पर बाहरी लोगों द्वारा आक्रमण किये गये और अनगिनत बार यह देश आक्रमणकारियों की धर्मान्धता का शिकार हुआ; किन्तु यहाँ एक ऐसा तत्त्व अवश्य विद्यमान रहा, जिसके बल पर भारतीय संस्कृति का अस्तित्व आज तक बना हुआ है।”
  2. लेखक ने प्रस्तुत गद्यांश में ‘अनेकता में एकता’ नामक (UPBoardSolutions.com) अमर-तत्त्व की ओर संकेत किया है और यह स्पष्ट किया है कि इस शक्ति के द्वारा भारतीय संस्कृति भविष्य में भी जीवित और स्थायी बनी रहेगी।
  3. हमारे अस्तित्व को जल कायम रखे हुए है।

प्रश्न 6.
यह एक नैतिक और आध्यात्मिक स्रोत है, जो अनन्त काल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण देश में बहता रहा है और कभी-कभी मूर्त रूप होकर हमारे सामने आता रहा है। यह हमारा सौभाग्य रहा है। कि हमने ऐसे ही एक मूर्त रूप को अपने बीच चलते-फिरते, हँसते-रोते भी देखा है और जिसने अमरत्व की याद दिलाकर हमारी सूखी हड्डियों में नयी मज्जा डाल हमारे मृतप्राय शरीर में नये प्राण फेंके और मुरझाये हुए दिलों को फिर खिला दिया। वह अमरत्व सत्य और अहिंसा का है, जो केवल इसी देश के लिए नहीं, आज मानवमात्र के जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक हो गया है। [2013, 15]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. मानव-मात्र के जीवन के लिए क्या आवश्यक है ? इसका मूर्त रूप कौन है, जिसका
    गद्यांश में वर्णन किया गया है ? या लेखक ने गद्यांश में क्या सन्देश देना चाहा है ?
  2. भारतीय संस्कृति में विद्यमान अमर-तत्त्व का स्रोत बताइए। यह हमारे सम्मुख किस रूप | में आता रहा है ?
  3. लेखक ने अमर-तत्त्व का स्रोत किसे बताया है ?

[ नैतिक = नीति और चरित्र सम्बन्धी। आध्यात्मिक = आत्मा से सम्बन्धित। स्रोत = प्रवाह। मूर्त = साकार। मज्जा = चर्बी। मृतप्राय = लगभग मरा हुआ।]
उत्तर
(अ) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने यह बताया है कि हमारी संस्कृति में निहित अमृत-तत्त्व का स्रोत नैतिक और आध्यात्मिक है, जो आदिकाल से ही प्रत्यक्ष (दृष्टिगोचर) तथा अप्रत्यक्ष (अगोचर) रूप में सम्पूर्ण (UPBoardSolutions.com) देश में बहता चला आ रहा है। यह कभी-कभी स्थूल रूप में अर्थात् मूर्त रूप में किसी महापुरुष के रूप में भी जन्म लेता रहा है।

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(ब)द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत गद्यांश में लेखक यह बता रहे हैं कि हम बड़े ही भाग्यवान् हैं कि इसी प्रकार के एक स्थूल रूप को (महात्मा गाँधी के रूप में) हमने अपने बीच चलतेफिरते और हँसते-रोते हुए देखा है। इसी मूर्त रूप ने परतन्त्रता के परिणामस्वरूप सूख चुकी हमारी हड्डियों को अमृत-तत्त्व की स्मृति दिलाकर नयी मज्जा प्रदान की। मरे हुए से हमारे शरीर में प्राणों का संचार किया, निराश एवं मुरझाये हुए दिलों को प्राणदान देकर पुनः खिला दिया और उनमें नूतन ऊर्जा का संचार किया। उस मूर्त रूप ने जो अमर-तत्त्व प्रदान किया वह सत्य और अहिंसा का है।
(स)

  1. मानव-मात्र के जीवन के लिए सत्य और अहिंसा नामक अमर-तत्त्व की आवश्यकता है। आज की बढ़ती हुई हिंसात्मक वृत्ति में इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ गयी है। सत्य और अहिंसा के मूर्तिमान स्वरूप राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी हैं, जिनका प्रस्तुत गद्यांश में सांकेतिक रूप से वर्णन किया गया है।
  2. भारतीय संस्कृति में विद्यमान अमर-तत्त्व का स्रोत नैतिक और आध्यात्मिक है जो कि अनन्त काल से कभी प्रत्यक्ष, कभी अप्रत्यक्ष और कभी मूर्त रूप में हम सभी के सम्मुख आता रहा है।
  3. लेखक ने अमर-तत्त्व को स्रोत भारतीय संस्कृति को बताया है।

प्रश्न 7.
हम इस देश में प्रजातन्त्र की स्थापना कर चुके हैं, जिसका अर्थ है व्यक्ति की पूर्ण स्वतन्त्रता, जिसमें वह अपना पूरा विकास कर सके और साथ ही सामूहिक और सामाजिक एकता भी। व्यक्ति और समाज के बीच में विरोध का आभास होता है। व्यक्ति अपनी उन्नति और विकास चाहता है और यदि एक की उन्नति और विकास दूसरे की उन्नति और विकास में बाधक हो तो संघर्ष पैदा होता है और यह संघर्ष तभी दूर हो सकता है, जब सबके विकास के पथ अहिंसा के हों। हमारी सारी संस्कृति का मूलाधार इसी अहिंसा-तत्त्व पर स्थापित रहा है। जहाँ-जहाँ हमारे नैतिक सिद्धान्तों का वर्णन आया है, अहिंसा को ही उनमें मुख्य स्थान दिया गया है।
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. प्रजातन्त्र का क्या अर्थ है ? यहाँ किस देश में प्रजातन्त्र की बात की जा रही है ?
  2. नैतिक सिद्धान्तों में किस तत्त्व को प्रमुख स्थान दिया गया है ?
  3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?

[आभास = प्रतीति। पथ = मार्ग।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या–विद्वान् लेखक का कहना है कि हमें अपनी स्वतन्त्रता का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। हम कोई भी कार्य करने के लिए स्वतन्त्र हैं, किन्तु हमारा यह नैतिक कर्तव्य भी है कि हम अपने कार्य को इस प्रकार सम्पन्न करें, जिससे किसी दूसरे को उससे किसी प्रकार की असुविधा न हो। यदि हम ऐसा सोचकर कार्य करेंगे तो हमारी सामाजिक एकता बनी रहेगी और सभी को उन्नति करने के एक (UPBoardSolutions.com) समान अवसर मिलेंगे। संघर्ष तब होता है, जब एक के स्वार्थ दूसरे के स्वार्थ में बाधा पहुँचाते हैं। इस संघर्ष को टालने का एकमात्र उपाय अहिंसा या त्याग-भावना का अनुसरण करना है। इसी अहिंसा-तत्त्व पर हमारी संस्कृति टिकी हुई है। जब भी हम मानवीय मूल्यों की बात करते हैं, तब अहिंसा को मुख्य स्थान देते हैं।

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(स)

  1. प्रजातन्त्र का अर्थ है–व्यक्ति की पूर्ण स्वतन्त्रता, जिसमें वह स्वयं के साथ-साथ अपने समूह और समाज का भी विकास कर सके। इस गद्यांश में भारत में प्रजातन्त्र की बात की जा रही है।
  2. नैतिक सिद्धान्तों में अहिंसा-तत्त्व को ही प्रमुख स्थान दिया गया है; क्योंकि व्यक्तिगत और सामूहिक उन्नति के विकास में आड़े आने वाला संघर्ष तभी दूर हो सकता है; जब सबके विकास के पथ अहिंसा के हों।
  3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक के द्वारा अहिंसा-तत्त्व के महत्त्व को उद्घाटित किया गया है। उसका कहना है कि व्यक्ति-व्यक्ति के मध्य संघर्ष तभी दूर हो सकेगा, जब सभी लोग अहिंसा के मार्ग पर चलें और हिंसा की भावना का त्याग कर दें।

प्रश्न 8.
अहिंसा का दूसरा नाम या दूसरा रूप त्याग है और हिंसा का दूसरा रूप या नाम स्वार्थ है, जो प्राय: भोग के रूप में हमारे सामने आता है। पर हमारी सभ्यता ने तो भोग भी त्याग से ही निकाला है और भोग भी त्याग में ही पाया है। श्रुति कहती है-‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः। इसी के द्वारा हम व्यक्ति-व्यक्ति के बीच का विरोध, व्यक्ति और समाज के बीच का विरोध, समाज और समाज के बीच का विरोध, देश और देश के बीच के विरोध को मिटाना चाहते हैं। हमारी सारी नैतिक चेतना इसी तत्त्व से ओत-प्रोत है। [2015)
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. हिंसा और अहिंसा के लिए प्रस्तुत गद्यांश में क्या कहा गया है ?
  2. श्रुति क्या कहती है ? स्पष्ट कीजिए।
  3. विभिन्न प्रकार के विरोध क्या हैं ? इन्हें किस प्रकार समाप्त किया जा सकता है ?
  4. हमारे नैतिक सिद्धान्तों में किस चीज को प्रमुख स्थान दिया गया है ? इसका दूसरा रूप
    क्या है?

[ भोग = सांसारिक वस्तुओं का उपयोग। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः = इसलिए त्याग की भावना से भोग करो। श्रुति = वेद, उपनिषद्।]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश कीयाख्या–प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने बताया है कि भारतीय संस्कृति में अहिंसा की अवधारणा का विशेष महत्त्व है। वास्तव में हमारी संस्कृति अहिंसा के मूल तत्त्व पर ही आधारित है। संस्कृति में नैतिक मान्यताओं का विशेष महत्त्व होता है। भारतीय संस्कृति में स्वीकृत अधिकांश नैतिक मान्यताएँ भी अहिंसा के तत्त्व पर ही आधारित हैं। अहिंसा का दूसरा नाम ही त्याग है। इसी प्रकार हिंसा का दूसरा (UPBoardSolutions.com) नाम स्वार्थ है। हिंसा का रूप पदार्थों के भोग के रूप में हमारे सामने आता है। मनुष्य स्वार्थ के कारण जब पदार्थों का अकेले ही उपभोग करता है, तभी हिंसा का जन्म होता है। भारतीय संस्कृति में त्याग और भोग का समन्वय है। जब तक हम किसी वस्तु का त्याग नहीं करेंगे, तब तक दूसरा उसका उपभोग नहीं कर सकता। इस प्रकार त्याग से ही भोग की प्राप्ति होती है।

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द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी कहते हैं कि वेद और उपनिषदों में भी त्यागपूर्वक भोग को महत्त्व दिया गया है। हम जिन पदार्थों का भोग करें, त्याग (अनासक्ति) की भावना से करें। त्याग की भावना से सभी आपसी संघर्ष समाप्त हो जाते हैं। इसी भावना से व्यक्ति का व्यक्ति से, व्यक्ति का समाज से, समाज का समाज से और देश का देश से संघर्ष समाप्त हो सकता है। सभी संघर्ष स्वार्थ या भोग को लेकर होते हैं। यदि हम सभी विरोधों या संघर्षों को समाप्त करना चाहते हैं तो हमें अपनी नैतिक चेतना को इसी तत्त्व त्याग से ओत-प्रोत करना होगा।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में कहा गया है कि हिंसा का ही दूसरा रूप ‘स्वार्थ’ है, जो भोग के रूप में व्यक्तियों के सम्मुख आता है और अहिंसा का दूसरा रूप त्याग है। भारतीय संस्कृति में भोग को भी त्याग से ही निकाला गया है।
  2. श्रुति कहती है कि “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः’ अर्थात् त्याग की भावना से ही भोग करना चाहिए; क्योंकि त्यागं की भावना से ही सभी आपसी संघर्ष समाप्त हो जाते हैं।
  3. विभिन्न प्रकार के विरोध हैं—व्यक्ति-व्यक्ति का विरोध, (UPBoardSolutions.com) व्यक्ति-समाज का विरोध, समाजसमाज का विरोध, समाज-देश का विरोध, देश-देश का विरोध आदि। इन सभी प्रकार के विरोधों को त्याग की भावना के प्रस्फुटन के द्वारा समाप्त किया जा सकता है।
  4. हमारे नैतिक सिद्धान्तों में अहिंसा को प्रमुख स्थान दिया गया है। इसका दूसरा रूप त्याग है।

प्रश्न 9.
इसलिए हमने भिन्न-भिन्न विचारधाराओं को स्वतन्त्रतापूर्वक पनपने और भिन्न-भिन्न भाषाओं को विकसित और प्रस्फुटित होने दिया। भिन्न-भिन्न देशों के लोगों को अपने में अभिन्न भावे से मिल जाने दिया। भिन्न-भिन्न देशों की संस्कृतियों को अपने में मिलाया और अपने को उनमें मिलने दिया और देश और विदेश में एकसूत्रता तलवार के जोर से नहीं, बल्कि प्रेम और सौहार्द से स्थापित की। दूसरों के हाथों और पैरों पर, घर और सम्पत्ति पर जबरदस्ती कब्जा नहीं किया, उनके हृदयों को जीता और इसी वजह से प्रभुत्व, जो चरित्र और चेतना का प्रभुत्व है, आज भी बहुत अंशों में कायम है, जबकि हम स्वयं उस चेतना को बहुत अंशों में भूल गये हैं और भूलते जा रहे हैं।
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. भारतीयों ने विभिन्न धर्मों और विचारधाराओं के लिए क्या किया ?
  2. भारतीय लोगों ने विभिन्न देशों के व्यक्तियों और संस्कृतियों के साथ क्या किया?
  3. भारतीयों ने किस प्रकार एकता स्थापित की ?
  4. भारतीयों का प्रभुत्व अभी भी दूसरों पर क्यों कायम है ?
  5. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?

[ प्रस्फुटित = फलने-फूलने। एकसूत्रता = एकता। सौहार्द = मित्रता का भाव। कब्जा = अधिकार। प्रभुत्व = वैभव।]
उत्तर
(अ) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने यह बताया है कि भारतीय संस्कृति ने कभी-भी उन संस्कृतियों-सभ्यताओं को विकसित होने में बाधा नहीं पहुँचाई, जो उसकी अपनी नहीं थीं। उसका कहना है कि भारतवासियों ने सदैव (UPBoardSolutions.com) अलग-अलग विचारधाराओं को; जो कि धर्म, आदि विभिन्न रूपों में होती हैं; सदैव विकसित होने और उनके अपने ही ढंग से उन्हें पल्लवित-पुष्पित होने दिया। विभिन्न देशों के लोगों को इस प्रकार अपने में मिल जाने दिया जैसे कि वे उनके अपने ही हों। भारतवासियों ने विभिन्न देशों की संस्कृतियों को स्वयं में मिला लिया और स्वयं को उनकी संस्कृतियों में मिल जाने दिया।

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द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत गद्यांश में डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी कहते हैं कि भारतीय संस्कृति ने एकता और समरसता का यह कार्य बलपूर्वक नहीं किया, वरन् प्रेम और मित्रता की भावना से किया। उन्होंने कभी-भी विदेशियों के शारीरिक अंगों पर, चल-अचल सम्पत्ति पर बलपूर्वक अधिकार करने का प्रयास नहीं किया, वरन् सदैव उनके हृदय पर अधिकार जमाने का प्रयास किया; क्योंकि किसी के शरीर पर तो बलपूर्वक अधिकार किया जा सकता है, लेकिन हृदय पर नहीं। यही कारण है कि आज भी भारतीयों का जो प्रभाव दूसरों पर बना हुआ है, वह उनके चरित्र और चेतना का है। अन्तिम पंक्ति में लेखक भारतीयों की वर्तमान स्थिति पर अफसोस प्रकट करते हुए कह रहे हैं कि आज भारतीय अपने उस गुण को; जिसके बल पर वे दूसरों पर कायम थे; स्वयं भूल चुके हैं और भूलते ही जा रहे हैं।
(स)

  1. भारतवासियों ने विभिन्न धर्मों को स्वतंन्त्रतापूर्वक पल्लवित-पुष्पित होने और भिन्न-भिन्न वैचारिक धाराओं को बिना किसी रोक-टोक के अपने-अपने मार्ग पर प्रवाहित होने दिया।
  2. भारतीय लोगों ने भिन्न-भिन्न देश के व्यक्तियों को अपने में मिल जाने दिया तथा विभिन्न देशों की संस्कृतियों को अपने में तथा अपने देश की संस्कृति को उनमें मिल जाने दिया।
  3. भारतीयों ने स्वदेश और विदेश में एकता प्रेम और सौहार्द से (UPBoardSolutions.com) स्थापित की, बलपूर्वक नहीं।
  4. भारतीयों का प्रभुत्व दूसरों पर अभी भी मात्र इसीलिए कायम है क्योंकि उन्होंने उनके हृदयों को जीत लिया, उनके घर, धन, सम्पत्ति और बाह्य व्यक्तित्व को कभी अपने अधीन नहीं किया।
  5. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने भारतीयों के उच्च आदर्श को स्पष्ट किया है जो दूसरों पर अपना प्रभुत्व प्रेम और सौहार्द से स्थापित करता है तथा यह भी बताया है कि वर्तमान समय में भारतीय स्वयं उससे विमुख होते जा रहे हैं।

प्रश्न 10.
हर प्रकार की प्रकृतिजन्य और मानवकृत विपदाओं के पड़ने पर भी हम लोगों की सृजनात्मक शक्ति कम नहीं हुई। हमारे देश में साम्राज्य बने और मिटे, विभिन्न सम्प्रदायों का उत्थान-पतन हुआ, हम विदेशियों से आक्रान्त और पददलित हुए, हम पर प्रकृति और मानवों ने अनेक बार मुसीबतों के पहाड़ ढा दिये, पर फिर भी हम लोग बने रहे, हमारी संस्कृति बनी रही और हमारा जीवन एवं सृजनात्मक शक्ति बनी [2009]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक क्या कहना चाहता है ? स्पष्ट कीजिए।
  2. किस-किस प्रकार की विपत्तियों के पड़ने पर भी भारतवासियों की सृजनात्मकता कम नहीं हुई ?

[प्रकृतिजन्य = प्रकृति द्वारा उत्पन्न। मानवकृत = मनुष्यों द्वारा उत्पन्न। विपदा = आपदा, आपत्ति, विपत्ति। सृजनात्मक शक्ति = नवीन निर्माण की शक्ति।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या इतिहास को साक्षी बनाते हुए लेखक कहता है कि : भारतवर्ष में साम्राज्य बने, समाप्त हुए; विभिन्न सम्प्रदाय विकसित हुए और उनका पतन भी हुआ तथा विदेशियों ने हम पर आक्रमण किये और हमें अपमानित भी किया। (UPBoardSolutions.com) प्रकृति और मनुष्यों ने एक बार नहीं अनेक बार हमारे ऊपर मुसीबतों के पहाड़ ढाये लेकिन हमारी संस्कृति इतनी महान् है कि उसने सभी को अपने में समाविष्ट कर लिया। इसी कारण हमारी संस्कृति, हमारा जीवन और हमारी सृजनात्मक शक्ति आज तक बनी हुई है। निश्चित रूप से हमारी संस्कृति सभी संस्कृतियों से श्रेष्ठ एवं महान् है।

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(स)

  1. प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक ने भारतीय संस्कृति के महान् आध्यात्मिक-नैतिक आधार तथा । विपरीत परिस्थितियों में भी स्वयं को उच्च बनाये रखने के आधार को स्पष्ट किया है। संक्षेप में, लेखक ने भारतीय संस्कृति की महानता को स्पष्ट किया है।
  2. प्रत्येक प्रकार की प्रकृतिजन्य (यथा-भूकम्प, बाढ़, सूखा आदि) और मानवजन्य विपत्तियों के पड़ने पर भी भारतवासियों की सृजनात्मक शक्ति में कभी कमी नहीं आयी।
    रही।

प्रश्न 11.
हम अपने दुर्दिनों में भी ऐसे मनीषियों और कर्मयोगियों को पैदा कर सके, जो संसार के इतिहास के किसी युग में अत्यन्त उच्च आसन के अधिकारी होते। अपनी दासता के दिनों में हमने गाँधी जैसे कर्मठधर्मनिष्ठ क्रान्तिकारी को, रवीन्द्र जैसे मनीषी कवि को और अरविन्द तथा रमण महर्षि जैसे योगियों को पैदा किया और उन्हीं दिनों में हमने ऐसे अनेक उद्भट विद्वान् और वैज्ञानिक पैदा किये, जिनका सिक्का संसार मानता है। जिन हालातों में पड़कर संसार की प्रसिद्ध जातियाँ मिट गयीं, उनमें हम न केवल जीवित ही रहे, वरन् अपने आध्यात्मिक और बौद्धिक गौरव को बनाये रख सके। उसका कारण यही है कि हमारी सामूहिक चेतना ऐसे नैतिक आधार पर ठहरी हुई है, जो पहाड़ों से भी मजबूत, समुद्रों से भी गहरी और आकाश से भी अधिक व्यापक है।
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. कैसे दुर्दिनों में भारत ने किन उच्च आसन के अधिकारी व्यक्तियों को जन्म दिया है ?
  2. किन परिस्थितियों में पड़कर संसार की प्रसिद्ध जातियाँ मिट गयीं ?
  3. भारतवासियों की सामूहिक चेतना कैसे आधार पर स्थित है ?

[दुर्दिन = बुरे दिन। मनीषी = बुद्धिमान। आसन = स्थान। उद्भट = श्रेष्ठ, असाधारण!]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या इतिहास को साक्षी बनाते हुए लेखक राजेन्द्र प्रसाद जी कहते हैं कि भारत देश को भी बुरे दिन देखने पड़े थे, परन्तु यह भी सत्य है कि इन बुरे दिनों में भी भारत ने अनेक विद्वानों एवं कर्मयोगियों को जन्म दिया। ये महान् भारतीय सपूत इतने योग्य थे कि उन्हें संसार के किसी भी भाग में, किसी भी युग में अनिवार्य रूप से सम्मान एवं उच्च पद के योग्य ही समझा जाता। जब हमारा देश परतन्त्र था तब भी (UPBoardSolutions.com) हमारे देश में महात्मा गाँधी जैसे कर्मठ और धर्म में रत रहने वाले क्रान्तिकारी, रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे विचारशील कवि, योगिराज अरविन्द घोष तथा रमण महर्षि जैसे महान् योगी व्यक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। इसी काल में हमारे देश में अनेक वैज्ञानिक एवं महान् विद्वान भी उद्भूत हुए जिनकी योग्यता को आज भी सारा संसार स्वीकार करता है।

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द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी का कहना है कि जिस प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों में विश्व की अनेक जातियाँ प्रायः समाप्त हो गयीं, उसी प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों में हम भारतीय हर प्रकार से अपने आपको कुशल बनाये रखने में सफल तो रहे ही, हमने अपने आध्यात्मिक एवं बौद्धिक गौरव को भी बनाये रखा। इस विशिष्टता का मुख्य कारण यह है कि हमारी सामूहिक चेतना का आधार सुदृढ़ नैतिकता है। हमारी नैतिक चेतना पहाड़ों के समान मजबूत, समुद्र से भी गहन तथा आकाश से भी अधिक व्यापक है। इन्हीं गुणों के कारण भारतीय संस्कृति महान् है, जिसके कारण हमारे देश ने अपने बुरे दिनों में भी विश्वविख्यात महान् व्यक्तियों को जन्म दिया।
(स)

  1. परतन्त्रता/दासता के दिनों में भारत ने महात्मा गाँधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, महर्षि अरविन्द आदि के साथ-साथ अनेक वैज्ञानिक और विद्वानों को, जो उच्च आसन के अधिकारी थे, जन्म दिया।
  2. दासता अथवा परतन्त्रता की परिस्थितियों में पड़कर संसार की अनेक प्रसिद्ध जातियों का अस्तित्व ही समाप्त हो गया।
  3. भारतवासियों की सामूहिक चेतना पर्वतों से भी दृढ़, समुद्रों से भी गहरी और आकाश से भी अधिक व्यापक नैतिक आधार पर स्थित है।

प्रश्न 12.
दूसरी बात जो इस सम्बन्ध में विचारणीय है, वह यह है कि संस्कृति अथवा सामूहिक चेतना ही हमारे देश का प्राण है। इसी नैतिक चेतना के सूत्र से हमारे नगर और ग्राम, हमारे प्रदेश और सम्प्रदाय, हमारे विभिन्न वर्ग और जातियाँ आपस में बँधी हुई हैं। जहाँ उनमें और सब तरह की विभिन्नताएँ हैं, वहाँ उन सब में यह एकता है। इसी बात को ठीक तरह से पहचान लेने से बापू ने जनसाधारण को बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में क्रान्ति करने के लिए तत्पर करने के लिए इसी नैतिक चेतना का सहारा लिया था। [2011, 17]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. क्रान्ति के लिए बापू ने किसका सहारा लिया था ?
  2. लेखक ने भारतीय संस्कृति की एकता और उसके बल का क्या महत्त्व बताया है ?

[विचारणीय = विचार करने योग्य बुद्धिजीवी = समाज का प्रबुद्ध वर्ग।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या-डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी कहते हैं कि हमें सर्वप्रथम वैज्ञानिक और औद्योगिक विकास के अनुचित परिणामों को ध्यान में रखना चाहिए। विचार करने योग्य दूसरी बात यह है कि भारतीय संस्कृति अथवा भारतवासियों की सम्पूर्ण व एकीकृत चेतन शक्ति ही इस देश का जीवन है। बिना इसके देश का जीवन ही सम्भव नहीं है। ऐसी चेतन शक्ति; जो नैतिकता पर आश्रित है; से हमारे देश के सभी शहर, गाँव और (UPBoardSolutions.com) सभी प्रदेश, सभी धर्म और उनको मानने वाले विभिन्न सम्प्रदाय, इन सम्प्रदायों के विभिन्न वर्ग और इनसे सम्बद्ध जातियाँ आपस में बँधी हुई हैं। जहाँ इनमें सभी तरह की विभिन्नताएँ और विषमताएँ फैली हुई हैं, वहीं उन सबमें एक एकता है, जिसे ध्यान से देखने, समझने और पहचानने की आवश्यकता है।
(स)

  1. क्रान्ति के लिए बापू ने सामान्य जनता को बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में क्रान्ति करने के लिए तैयार किया था और गद्यांश के रेखांकित अंश में उल्लिखित नैतिक चेतना का सहारा लिया था।
  2. लेखक ने भारतीय संस्कृति की एकता और उसके बल का यह महत्त्व बताया है कि इसी के कारण सम्पूर्ण भारत के सभी शहर, गाँव, प्रदेश, विभिन्न जातियाँ, सम्प्रदाय, वर्ग आदि एक सूत्र में बँधे हुए हैं, जिसके कारण गाँधीजी ने देश की जनता को क्रान्ति के लिए तत्पर किया।

प्रश्न 13.
मैं तो यही समझता हूँ कि यदि हमें अपने समाज और देश में उन सब अन्यायों और अत्याचारों की पुनरावृत्ति नहीं करनी है, जिनके द्वारा आज के सारे संघर्ष उत्पन्न होते हैं तो हमें अपनी ऐतिहासिक, नैतिक चेतना या संस्कृति के आधार पर ही अपनी आर्थिक व्यवस्था बनानी चाहिए अर्थात् उसके पीछे वैयक्तिक लाभ और भोग की भावना प्रधान न होकर वैयक्तिक त्याग और सामाजिक कल्याण की भावना ही प्रधान होनी चाहिए। हमारे प्रत्येक देशवासी को अपने सारे आर्थिक व्यापार उसी भावना से प्रेरित होकर करने चाहिए। वैयक्तिक स्वार्थों और स्वत्वों पर जोर न देकर वैयक्तिक कर्तव्य और सेवा-निष्ठा पर जोर देना चाहिए और हमारी प्रत्येक कार्यवाही इसी तराजू पर तौली जानी चाहिए। [2012, 15]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. भारतवासियों को अपनी आर्थिक व्यवस्था किस प्रकार बनानी चाहिए ?
  2. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
  3. प्रस्तुत गद्यांश के भाव पर आधारित एक पंक्ति लिखिए।
  4. आर्थिक व्यापार करने में किस भावना की प्रधानता होनी चाहिए ?

[ पुनरावृत्ति = फिर से दोहराना। आर्थिक व्यवस्था = धन का वितरण और उपभोग। स्वत्व = अधिकार। सेवा-निष्ठा = सेवा-भावना में विश्वास।]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक कहता है कि हमें समाज और देश में अन्यायों और अत्याचारों को फिर से न दोहराये जाने के लिए अपनी आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन करना चाहिए। आर्थिक व्यवस्था के दूषित होने के कारण ही सारे संघर्ष उत्पन्न होते हैं। हमारी आर्थिक व्यवस्था का आधार नैतिक चेतना या संस्कृति द्वारा निर्धारित होना चाहिए। धन से सम्बन्धित जितने भी कार्य किये जाएँ, उनमें सदैव नैतिकता का ध्यान रखा जाना चाहिए। ऐसा करने से अन्याय, अत्याचार और संघर्ष समाप्त हो जाएँगे।

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द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत गद्यांश में डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी कहते हैं कि किसी भी कार्य को करते समय हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कहीं स्वार्थ को बढ़ावा तो नहीं मिल रहा है। प्रत्येक कार्य कर्तव्य और सेवा की भावना से करना चाहिए। हमें अपने स्वार्थों और अधिकारों की पूर्ति का कर्म तथा कर्तव्य और सेवा की भावना का अधिक ध्यान रखना चाहिए, अर्थात् जिस प्रकार तराजू दो पदार्थों के परिमाण में (UPBoardSolutions.com) समन्वय बनाकर दोनों के साथ न्याय करती हैं, उसी प्रकार हमें प्रत्येक कार्य में भोग तथा स्वार्थ का कर्तव्य और सेवा-भावना के साथ समन्वय स्थापित करना चाहिए। इससे संघर्ष होने की सम्भावना नहीं रहेगी।
(स)

  1. भारतवासियों को अपनी आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार से बनानी चाहिए कि उसमें व्यक्तिगत स्वार्थ और भोग की भावना की प्रधानता न हो; क्योंकि स्वार्थों के टकराने से संघर्ष उत्पन्न होता है। अतः स्वार्थ की भावना को त्यागकर सामाजिक हित का ध्यान रखते हुए अपनी आर्थिक व्यवस्था बनानी चाहिए।
  2. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने बताया है कि मनुष्य को अपने समस्त आर्थिक कार्य वैयक्तिक त्याग, सामाजिक कल्याण, सेवा और कर्तव्य-भावना से प्रेरित होकर करने चाहिए। हमें अपनी नैतिक चेतना या संस्कृति के आधार पर ही अपने कार्य करने चाहिए। लेखक की यह भावना गाँधी जी के ट्रस्टीशिप के सिद्धान्त के समान है।
  3. प्रस्तुत गद्यांश के भाव पर आधारित एक पंक्ति हो सकती है-“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।”
  4. आर्थिक व्यापार करने में वैयक्तिक त्याग, सामाजिक कल्याण, सेवा और कर्तव्य-भावना की प्रधानता होनी चाहिए।

प्रश्न 14.
आज विज्ञान मनुष्यों के हाथों में अद्भुत और अतुल शक्ति दे रहा है, उसका उपयोग एक व्यक्ति और समूह के उत्कर्ष और दूसरे व्यक्ति और समूह के गिराने में होता ही रहेगा। इसलिए हमें उस भावना को जाग्रत रखना है और उसे जाग्रत रखने के लिए कुछ ऐसे साधनों को भी हाथ में रखना होगा, जो उस अहिंसात्मक त्याग-भावना को प्रोत्साहित करें और भोग-भावना को दबाये रखें। नैतिक अंकुश के बिना शक्ति मानव के लिए हितकर नहीं होती। वह नैतिक अंकुश यह चेतना या भावना ही दे सकती है। वही उंस शक्ति को परिमित भी कर सकती है और उसके उपयोग को नियन्त्रित भी। [2011, 14, 16, 18]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. विज्ञान द्वारा प्रदत्त शक्ति को प्रयोग किस प्रकार से हो सकता है ? इस शक्ति का प्रयोग किस भावना से किया जाना चाहिए?
  2. किसके बिना प्राप्त शक्ति मानव-मानवता के लिए हितकर नहीं होती ? या उपर्युक्त अवतरण में लेखक ने मानव को क्या सन्देश दिया है ?
  3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने क्या सुझाव दिया है? क्या आप इससे सहमत हैं?
  4. विज्ञान के सम्बन्ध में लेखक का क्या विचार है? स्पष्ट कीजिए। या आज विज्ञान मनुष्य को क्या दे रहा है?

[अतुल = जिसकी तुलना न हो सके। उत्कर्ष = उत्थान। प्रोत्साहित करना = उत्साहित करना, प्रेरणा देना। अंकुश == नियन्त्रण। परिमित = सीमित।।
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत गद्य-अंश में लेखक कह रहा है कि वर्तमान युग विज्ञान की उन्नति का युग है। विज्ञान की उन्नति से मनुष्य को असीमित शंक्ति प्राप्त हो गयी है, किन्तु विज्ञान से प्राप्त शक्ति का सही उपयोग नहीं हो रहा है। इस शक्ति का उपयोग एक व्यक्ति अथवा समूह के उत्थान के लिए तथा दूसरे व्यक्ति और समूह को गिराने में हो रहा है। लेखक का कहना है कि समाज में या राष्ट्र में ऐसी भावना उत्पन्न होनी चाहिए, (UPBoardSolutions.com) जिससे विज्ञान की शक्ति के इस दुरुपयोग को रोकने के लिए अहिंसात्मके त्याग की भावना को बढ़ावा दिया जा सके।

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द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश में डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी कहते हैं कि यदि विज्ञान की शक्ति पर प्रेम और अहिंसा जैसे नैतिक मूल्यों का नियन्त्रण नहीं लगाया गया तो यह मानव का हित नहीं कर सकती। नैतिक बन्धन से विज्ञान की असीमित शक्ति सीमित हो सकती है और उसका उपयोग विनाश के लिए न कर निर्माण के लिए किया जा सकता है। आज विज्ञान की शक्ति को कल्याण की दिशा में प्रेरित करना अत्यन्त आवश्यक हो गया है। |
(स)

  1. विज्ञान के द्वारा प्रदत्त अतुलनीय शक्ति का उपयोग एक समूह और व्यक्ति के उत्थान तथा दूसरे समूह और व्यक्ति का पतन करने के लिए हो सकता है। इस शक्ति का प्रयोग अहिंसात्मक त्याग की भावना से किया जाना चाहिए।
  2. नैतिकता के अंकुश के बिना प्राप्त शक्ति मानव और मानवता के लिए हितकारी नहीं होती। यही उस असीमित शक्ति को सीमित कर सकती है और उसके दुरुपयोग को नियन्त्रित भी कर सकती है।
  3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने विज्ञान की संहारक नीति को नियन्त्रित करने का सुझाव दिया है तथा इसके नियन्त्रण के लिए अहिंसा से परिपूर्ण त्याग की भावना को आवश्यक बताया है। मैं लेखक के इस कथन से शत-प्रतिशत सहमत हूँ।
  4. विज्ञान के सम्बन्ध में लेखक का विचार है कि उसने मनुष्य के हाथों में अद्भुत और अतुल शक्ति दी है। इस शक्ति का उपयोग व्यक्ति और समूह के उत्कर्ष के लिए किया जाना चाहिए। इसके लिए व्यक्ति को अपने अन्दर अहिंसा-त्याग की भावना को प्रोत्साहित करना चाहिए।

प्रश्न 15.
वर्तमान युग में भारतीय संस्कृति के समन्वय के प्रश्न के अतिरिक्त यह बात भी विचारणीय है। कि भारत की प्रत्येक प्रादेशिक भाषा की सुन्दर और आनन्दप्रद कृतियों का स्वाद भारत के अन्य प्रदेशों के लोगों को कैसे चखाया जाए। मैं समझता हूँ कि इस बारे में दो बातें विचारणीय हैं। क्या इस सम्बन्ध में यह उचित नहीं होगा कि प्रत्येक भाषा की साहित्यिक संस्थाएँ उस भाषा की कृतियों को संघ-लिपि; अर्थात् । देवनागरी में भी छपवाने का आयोजन करें।
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स) लेखक के अनुसार भारतीय संस्कृति के समन्वय के लिए क्या किया जाना चाहिए ?
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक डॉ० राजेन्द्र प्रसाद कहते हैं कि वर्तमान में हमें अपने पुराने सांस्कृतिक मूल्यों को अपनाकर भारतीय संस्कृति के समन्वयात्मक स्वरूप को अक्षुण्ण बनाये रखना होगा। विभिन्न भाषावाद भी हमारी संस्कृति के समन्वयात्मक स्वरूप को आघात पहुँचा रहे हैं। इसका समाधान सुझाते हुए लेखक कहते हैं कि भारत में अनेकानेक प्रादेशिक भाषाएँ हैं और प्रत्येक भाषा में अनेक सुन्दर और आनन्द प्रदान करने (UPBoardSolutions.com) वाली साहित्यिक कृतियाँ हैं। यदि हम इन कृतियों के सारतत्त्व से अन्य भाषा-भाषियों को परिचित करा सकें तो हमारी समस्या का बहुत कुछ समाधान हो सकता है।

(स) लेखक के अनुसार भारतीय संस्कृति के समन्वय के लिए प्रत्येक प्रादेशिक भाषा की साहित्यिक कृतियों का अनुवाद कराके उसे भारत की संघलिपि; अर्थात् हिन्दी; में छपवाना चाहिए।

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प्रश्न 16.
दूसरी बात यह है, ऐसी संस्था की स्थापना की जाए, जो इन सब भाषाओं में आदान-प्रदान का सिलसिला अनुवाद द्वारा आरम्भ करे। यदि सब भारतीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला सांस्कृतिक संगम स्थापित हो जाता है तो इस बारे में बड़ी सहूलियत होगी। साथ ही, वह संगम साहित्यिकों को प्रोत्साहन भी प्रदान कर सकेगा और अच्छे साहित्य के स्तर के निर्धारण और सृजन करने में भी पर्याप्त अच्छा कार्य कर सकेगा। साहित्य संस्कृति का एक व्यक्त रूप है। उसके दूसरे रूप-गान, नृत्य, चित्रकला, वास्तुकला, मूर्तिकला इत्यादि में देखे जाते हैं। भारत अपनी एकसूत्रता इन सब कलाओं द्वारा प्रदर्शित करता आया है। [2013] |,
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक को नाम (सन्दर्भ) लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स) भारत अपनी एकसूत्रता किन-किन कलाओं द्वारा प्रदर्शित करता आया है ?
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या-डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी का कहना है कि भारतवर्ष में विद्यमान विभिन्न संस्कृतियों के समन्वय के लिए यह आवश्यक है कि हम सब मिलकर एक ऐसी संस्था की स्थापना करें जो सभी भारतीय भाषाओं की कृतियों में पारस्परिक आदान-प्रदान का सिलसिला अनुवाद द्वारा प्रारम्भ करे। लेखक के कहने का आशय है कि संस्था ऐसी होनी चाहिए जो किसी एक भारतीय भाषा की कृति का अन्य सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर सके।

द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी का कहना है कि भारतवर्ष में विद्यमान विभिन्न संस्कृतियों में समन्वय के लिए आवश्यक है कि विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों का समन्वय हो जाये। यदि कोई इस प्रकार का संगम स्थापित हो जाता है तो यह विभिन्न भाषा के साहित्यकारों को साहित्य-सृजन के लिए प्रोत्साहित कर सकेगा। इसके साथ ही यह संगम साहित्य के स्तर के उत्थान तथा उत्तमोत्तम साहित्य की रचना (UPBoardSolutions.com) करने में भी पर्याप्त रूप से सहायक सिद्ध होगा।
(स) भारत अपनी एकसूत्रता को गान, नृत्य, चित्रकला, वास्तुकला, मूर्तिकला इत्यादि कलाओं के द्वारा प्रदर्शित करता आया है।

प्रश्न 17.
यदि पृथ्वी पर स्वर्ग कहीं है तो यहाँ ही है, यहाँ ही है, यहाँ ही है। यह स्वप्न तभी सत्य होगा और पृथ्वी पर स्वर्ग तो तभी स्थापित होगा, जब अहिंसा, सत्य और सेवा का आदर्श सारे भूमण्डल में मानवजीवन का मुख्य आधार और प्रधान प्रेरकशक्ति हो गया होगा। |
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. “यदि पृथ्वी पर स्वर्ग कहीं है तो यहाँ ही है, यहाँ ही है, यहाँ ही है’ के लिए पाठ में आयी काव्य-पंक्ति लिखिए।
  2. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने किस बात पर बल दिया है ?

उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या-डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी कहते हैं कि भारत की सुन्दर धरती को पृथ्वी का स्वर्ग कहा जाता है। परन्तु आज समाज में जैसा वातावरण व्याप्त है, उसे देखते हुए इसे पृथ्वी को स्वर्ग नहीं कहा जा सकता। स्वर्ग की स्थापना तो सत्य, अहिंसा और नि:स्वार्थ सेवा की भावना से होती है। यदि हम वास्तव में इस धरती पर स्वर्ग उतारना चाहते हैं तो हमें इस बात का प्रयास करना चाहिए कि मनुष्य के जीवन की प्रत्येक गतिविधि सत्य, अहिंसा और सेवाभाव से प्रेरित हो। ऐसा होने पर संघर्ष, द्वेष, घृणा और युद्ध की समस्या स्वत: ही समाप्त हो जाएगी तथा मानव-जीवन सुखमय और आनन्दमय हो जाएगा।
(स)

  1. प्रश्न में उल्लिखित अंश के लिए पाठ में आयी काव्य-पंक्ति है
    गर फिरदौस बर रुए जमींनस्त,
    हमींअस्तो, हमींअस्तो, हमींअस्त।
  2.  प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने पृथ्वी पर स्वर्ग की कल्पना को साकार करने (UPBoardSolutions.com) के लिए सत्य, अहिंसा, कर्तव्य-पालन और सेवा-भाव की भावना पर बल दिया है।

व्याकरण एवं रचा-बोध ।

प्रश्न 1
निम्नलिखित शब्दों में एक ही प्रत्यय लगा है। प्रत्यय को मूल शब्दों से अलग कीजिए और उन्हें देखकर प्रत्यय लगने के बाद शब्द में होने वाले परिवर्तन के विषय में एक नियम का प्रतिपादन कीजिए नैतिक, वैज्ञानिक, औद्योगिक, बौद्धिक, ऐतिहासिक, सामूहिक, प्रादेशिक, साहित्यिक
उत्तर
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प्रश्न 2
निम्नलिखित शब्दों में उपसर्ग को मूल शब्दों से अलग कीजिए अत्याचार, उपार्जन, उपयोग, प्रत्येक, परिश्रम, आदान।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 4 भारतीय संस्कृति (गद्य खंड) img-2

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प्रश्न 3
निम्नलिखित शब्द उपसर्ग और प्रत्यय दोनों के योग से बने हैं। उपसर्ग और प्रत्यय दोनों को मूल शब्दों से पृथक् कीजिए विभिन्नता, सुशोभित, प्रस्फुटित, प्रोत्साहित, अहिंसात्मक, प्रतिनिधित्व, प्रदर्शित।
उत्तर
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प्रश्न 4
निम्नलिखित प्रत्ययों से पाँच-पाँच शब्दों की रचना कीजिए- पूर्वक, त्व, प्रद, ईय, आत्मक, जन्य।
उत्तर
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UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 3 क्या लिखें? (गद्य खंड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 3 क्या लिखें? (गद्य खंड)

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जीवन-परिचय एवं कृतियाँ

प्रश्न 1.
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के जीवन-परिचय एवं रचनाओं पर प्रकाश डालिए। [2009]
या
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जीवन-परिचय दीजिए तथा उनकी एक रचना का नाम लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 16, 17]
उत्तर
प्रचार से दूर हिन्दी के मौन साधक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हिन्दी के प्रतिष्ठित निबन्धकार, कवि, सम्पादक तथा साहित्य मर्मज्ञ थे। साहित्य-सृजन की प्रेरणा आपको विरासत में मिली थी, जिसके कारण आपने विद्यार्थी जीवन से ही लिखना प्रारम्भ कर दिया था। ललित निबन्धों के लेखन के लिए आपको प्रभूत यश प्राप्त हुआ। एक गम्भीर विचारक, शिष्ट हास्य-व्यंग्यकार और कुशल आलोचक के रूप में आप हिन्दी-साहित्य में विख्यात हैं।

जीवन-परिचय-श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म सन् 1894 ई० में मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के खैरागढ़ नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता श्री उमराव बख्शी तथा बाबा पुन्नालाल बख्शी साहित्य-प्रेमी और कवि थे। इनकी माताजी को भी साहित्य से प्रेम था। अतः परिवार के साहित्यिक वातावरण का प्रभाव इनके मन पर भी गहरा पड़ा और ये विद्यार्थी जीवन से ही कविताएँ लिखने लगे। बी०ए० उत्तीर्ण करने के बाद (UPBoardSolutions.com) बख्शी जी ने साहित्य-सेवा को अपना लक्ष्य बनाया तथा कहानियाँ और कविताएँ लिखने लगे। द्विवेदी जी बख्शी जी की रचनाओं और योग्यताओं से इतने अधिक प्रभावित थे कि अपने बाद उन्होंने ‘सरस्वती’ की बागडोर बख्शी जी को ही सौंपी। द्विवेदी जी के बाद 1920 से 1927 ई० तक इन्होंने कुशलतापूर्वक ‘सरस्वती’ के सम्पादन का कार्य किया। ये नम्र स्वभाव के व्यक्ति थे और ख्याति से दूर रहते थे। खैरागढ़ के हाईस्कूल में अध्यापन कार्य करने के पश्चात् इन्होंने पुनः ‘सरस्वती’ का सम्पादन-भार सँभाला। सन् 1971 ई० में 77 वर्ष की आयु में निरन्तर साहित्य-सेवा करते हुए आप गोलोकवासी हो गये।

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कृतियाँ-बख्शी जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। इन्होंने निबन्ध, काव्य, कहानी, आलोचना, नाटक आदि पर अपनी लेखनी चलायी। निबन्ध और आलोचना के क्षेत्र में तो ये प्रसिद्ध हैं ही, अपने ललित निबन्धों के कारण भी ये विशेष रूप से स्मरण किये जाते हैं। इनकी रचनाओं का विवरण अग्रलिखित है

  1. निबन्ध-संग्रह-‘पंचपात्र’, ‘पद्मवन’, ‘तीर्थरेणु’, ‘प्रबन्ध-पारिजात’, ‘कुछ बिखरे पन्ने, ‘मकरन्द बिन्दु’, ‘यात्री’, ‘तुम्हारे लिए’, ‘तीर्थ-सलिल’ आदि। इनके निबन्ध जीवन, समाज, धर्म, संस्कृति और साहित्य के विषयों पर लिखे गये हैं। |
  2. काव्य-संग्रह-‘शतदल’ और ‘अश्रुदल’ इनके दो काव्य-संग्रह हैं। इनकी कविताएँ प्रकृति और प्रेमविषयक हैं।
  3. कहानी-संग्रह-‘झलमला’ और ‘अञ्जलि’, इनके दो कहानी-संग्रह हैं। इन कहानियों में मानव-जीवन की विषमताओं का चित्रण है।
  4. आलोचना-‘हिन्दी-साहित्य विमर्श’, ‘विश्व-साहित्य’, ‘हिन्दी उपन्यास साहित्य’, ‘हिन्दी कहानी साहित्य, साहित्य शिक्षा’ आदि इनकी श्रेष्ठ आलोचनात्मक पुस्तकें हैं।
  5. अनूदित रचनाएँ–जर्मनी के मॉरिस मेटरलिंक के दो नाटकों (UPBoardSolutions.com) का ‘प्रायश्चित्त’ और ‘उन्मुक्ति का बन्धन’ शीर्षक से अनुवाद।
  6. सम्पादन-‘सरस्वती’ और ‘छाया’। इन्होंने सरस्वती के सम्पादन से विशेष यश अर्जित किया।
    साहित्य में स्थान-बख्शी जी भावुक कवि, श्रेष्ठ निबन्धकार, निष्पक्ष आलोचक, कुशल पत्रकार एवं कहानीकार हैं। आलोचना और निबन्ध के क्षेत्र में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। विश्व-साहित्य में इनकी गहरी पैठ है। अपने ललित निबन्धों के लिए ये सदैव स्मरण किये जाएँगे। विचारों की मौलिकता और शैली की नूतनता के कारण हिन्दी-साहित्य में शुक्ल युग के निबन्धकारों में इनके निबन्धों को विशिष्ट स्थान है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्न,

प्रश्न-पत्र में केवल 3 प्रश्न (अ, ब, स) ही पूछे जाएँगे। अतिरिक्त प्रश्न अभ्यास एवं परीक्षोपयोगी दृष्टि से |महत्त्वपूर्ण होने के कारण दिए गये हैं।
प्रश्न 1.
अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबन्ध-लेखक ए० जी० गार्डिनर का कथन है कि लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है। उस समय मन में कुछ ऐसी उमंग-सी उठती है, हृदय में कुछ ऐसी स्फूर्ति-सी आती है, मस्तिष्क में कुछ ऐसा आवेग-सा उत्पन्न होता है कि लेख लिखना ही पड़ता है। उस समय विषय की चिन्ता नहीं रहती। कोई भी विषय हो, उसमें हम अपने हृदय के आवेग को भर ही देते हैं। हैट टाँगने के लिए कोई भी ख़ुटी काम दे सकती है।  उसी तरह अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त है। असली वस्तु है हैट, खूटी नहीं। इसी तरह मन के भाव ही तो यथार्थ वस्तु हैं, विषय नहीं।
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. ‘हैट’ और ‘ख़ुटी’ का उदाहरण इस गद्यांश में क्यों दिया गया हैं ? स्पष्ट कीजिए।
  2. विशेष मानसिक स्थिति में क्या होता है ?
  3. मनोभावों को व्यक्त करने के लिए किसकी आवश्यकता होती है ?

[ उमंग = उल्लास, उत्साह अथवा आनन्द की स्थिति। स्फूर्ति = (शारीरिक एवं मानसिक) ताजगी।, आवेग = मानसिक उत्तेजना या उत्कट भावना।]
उत्तर
(अ) प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘गद्य-खण्ड में संकलित तथा श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा लिखित ‘क्या लिखें ?’ शीर्षक ललित निबन्ध से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखें-
पाठ का नाम क्या लिखें? लेखक का नाम-श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी।
[ विशेष—इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए इस (UPBoardSolutions.com) प्रश्न का यही उत्तर इसी रूप में प्रयुक्त होगा।]

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( ब ) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या–ए० जी० गार्डिनर अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबन्धकार हुए हैं। उन्होंने कहा है कि मन की विशेष स्थिति में ही निबन्ध लिखा जाता है। उसके लिए मन के भाव ही यथार्थ होते हैं, विषय नहीं। मनोभावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त हो सकता है। निबन्ध लिखने की विशेष मनोदशा के सम्बन्ध में उनका कहना है कि उस समय मन में एक विशेष प्रकार का उत्साह और स्फूर्ति आती है और मस्तिष्क में एक विशेष प्रकार की आवेगपूर्ण स्थिति बनती है और उस आवेग को उमंग के कारण विषय की चिन्ता किये बिना निबन्ध लिखने को बाध्य होना ही पड़ता है।

द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या–श्री ए० जी० गार्डिनर के कथन को विस्तार देते हुए पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी कहते हैं कि कोई भी विषय हो लेखक उसमें अपने हृदय के आवेग को भर ही देता है। सामान्य से सामान्य विषय भी लेखक और उसके मानसिक आवेग द्वारा विशिष्ट बना दिया जाता है। उदाहरण के लिए जिस प्रकार एक हैट को टॉगने के लिए किसी भी खूटी का प्रयोग किया जा सकता है, उसी प्रकार हृदय (UPBoardSolutions.com) के अनेक भाव किसी भी विषय पर व्यवस्थित रूप में व्यक्त किये जा सकते हैं। अतः असली वस्तु हैट है न कि ख़ुटी। यही अवस्था साहित्य-रचना में भी होती है; अर्थात् मन के भावे ही असली वस्तु हैं, विषय अथवा शीर्षक नहीं। तात्पर्य यह है कि यदि हृदय में भाव एवं विचार हों तो किसी भी विषय पर लिखा जा सकता है।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में हैट का उदाहरण मनोभावों के लिए दिया गया है और ख़ुटी का विषय के लिए। गार्डिनर महोदय के अनुसार जिस प्रकार मुख्य वस्तु हैट होती है, ख़ुटी नहीं उसी प्रकार मन के भावविचार मुख्य हैं, विषय नहीं। आशय यह है कि यदि मन में भाव एवं विचार हों तो किसी भी विषय पर लिखा जा सकता है।
  2. विशेष मानसिक स्थिति में व्यक्ति के मन में उमंग उठती है, हृदय में स्फूर्ति आती है और मस्तिष्क में कुछ ऐसा आवेग उत्पन्न होता है कि व्यक्ति उसे अभिव्यक्ति देने के लिए लिखने बैठ जाता है।
  3. मनोभावों को व्यक्त करने के लिए उपयुक्त विषय की आवश्यकता होती है।

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प्रश्न 2.
उन्होंने स्वयं जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबन्धों में लिपिबद्ध कर दिया। ऐसे निबन्धों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे मन की स्वच्छन्द रचनाएँ हैं। उनमें न कवि की उदात्त कल्पना रहती है, न आख्यायिका-लेखक की सूक्ष्म दृष्टि और न विज्ञों की गम्भीर तर्कपूर्ण विवेचना। उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है। उनमें उसके सच्चे भावों की सच्ची अभिव्यक्ति होती है, उनमें उसका उल्लास रहता है। ये निबन्ध तो उस  मानसिक स्थिति में लिखे जाते हैं, जिसमें न ज्ञान की गरिमा रहती है और न कल्पना की महिमा, जिसमें हम संसार को अपनी ही दृष्टि से देखते हैं और अपने ही भाव से ग्रहण करते हैं। [2017]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. निबन्ध किस मानसिक स्थिति में लिखे जाते हैं ?
  2. मॉनटेन की शैली के निबन्धों की विशेषता क्या है ?
  3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने किस शैली के निबन्धों की विशेषता बतायी है ?

उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या-श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी लिखते हैं कि मॉनटेन के अनुसार स्वच्छन्दतावादी शैली में लिखे गये निबन्धों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि ऐसे निबन्ध लेखक के हृदय की बन्धनमुक्त रचनाएँ होते हैं। इसमें कवि के समान उच्च कल्पनाएँ और किसी कहानी लेखक के समान सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता नहीं होती और न ही विद्वानों के समान गम्भीर तर्कपूर्ण विवेचना की आवश्यकता होती है। (UPBoardSolutions.com) इसमें लेखक अपने मन की सच्ची भावनाओं को स्वतन्त्रता और प्रसन्नता के साथ व्यक्त करता है। इन निबन्धों को लिखते समय लेखक पाण्डित्य-प्रदर्शन की अवस्था से भी दूर रहता है। वह अपने भावों को जिस रूप में चाहता है, उसी रूप में अभिव्यक्त करता है।

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द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या–श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी लिखते हैं कि स्वच्छन्दतावादी शैली में लिखे गये निबन्धों में लेखक अपने मन में उठने वाले भावों को ज्यों-का-त्यों व्यक्त कर देता है। इन निबन्धों में न ही ज्ञान की गुरुता निहित होती है और न ही कल्पना की उड़ान। ये निबन्ध लेखक के मन के सच्चे उद्गार होते हैं। वह संसार का जैसा अनुभव करता है और जिस रूप में देखता है। बिना उसमें आलंकारिकता व पाण्डित्य-प्रदर्शन के उसी रूप में व्यक्त कर देता है। |
(स)

  1. निबन्ध ऐसी मानसिक स्थिति में लिखे जाते हैं जिसमें न तो ज्ञान का गौरव निहित होता है। और न ही कल्पना की ऊँची उड़ान। निबन्ध में लेखक अपने ही विचारों की अभिव्यक्ति करता है।
  2. नटेन की शैली के निबन्धों की विशेषता है कि वे लेखक के हृदय की बन्धनमुक्त रचनाएँ हैं। जिनमें लेखक की वास्तविक अनुभूति और उसके भावों का वास्तविक प्रकटीकरण होता है।
  3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने स्वच्छन्दतावादी (बन्धनमुक्त) शैली के निबन्धों की विशेषता बतायी है। और स्पष्ट किया है कि इन निबन्धों में बनावट, ऊँची कल्पना और तर्कपूर्ण विवेचना नहीं होती।

प्रश्न 3.
दूर के ढोल सुहावने होते हैं; क्योंकि उनकी कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती। जब ढोल के पास बैठे। हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर, संध्या समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं। ढोल के उन्हीं शब्दों को सुनकर वह अपने हृदय में किसी के विवाहोत्सव का चित्र अंकित कर लेता है। कोलाहल से पूर्ण घर के एक कोने में बैठी हुई किसी लज्जाशीला ‘नव-वधू की कल्पना वह अपने मन में कर लेता है। उस नव-वधू के प्रेम, उल्लास, संकोच, आशंका और विषाद से युक्त हृदय के कम्पन ढोल की कर्कश ध्वनि को मधुर बना देते हैं; क्योंकि उसके साथ आनन्द का कलरव, उत्सव व प्रमोद और प्रेम का संगीत ये तीनों मिले रहते हैं। तभी उसकी कर्कशता समीपस्थ लोगों को भी कटु नहीं प्रतीत होती और दूरस्थ लोगों के लिए तो वह अत्यन्त मधुर बन जाती है। [2010, 13]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. प्रस्तुत अंश में ‘दूर के ढोल’ और ‘नव-वधू’ में साम्य और वैषम्य बताइए।
  2. ढोल की आवाज किसके लिए कर्कश होती है और किसके लिए मधुर ?
  3. ढोल की कर्कश ध्वनि को कौन मधुर बना देता है और क्यों ?
  4. दूर के ढोल सुहावने क्यों होते हैं ?

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[ ढोल = एक प्रकार का वाद्य। सुहावना = अच्छा लगने वाला। कर्कशता = कर्णकटुता। कोलाहल = शोरगुल। आशंका = सन्देह। कलरव = (चिड़ियों की) मधुर ध्वनि।]
उत्तर.
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का कथन है कि दूर के ढोल इसलिए अच्छे लगते हैं क्योंकि उनकी कर्णकटु ध्वनि बहुत दूर तक नहीं पहुँचती है। जब वे बज रहे होते हैं तो समीप बैठे हुए लोगों के कान (UPBoardSolutions.com) के पर्दे फाड़ रहे होते हैं जब कि दूर किसी भी नदी के किनारे सन्ध्याकालीन समय के शान्त वातावरण में बैठे हुए लोगों को अपने मधुर स्वर से प्रसन्न कर रहे होते हैं।

द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का कथन है कि ढोल की कर्कश ध्वनि दूर बैठे किसी व्यक्ति को प्रसन्न इसलिए करती है; क्योंकि वह अपने मन में कोलाहल से पूर्ण किसी घर के कोने में शादी के कारण लज्जाशील युवती की भी कल्पना करने लगता है। शादी की मधुर कल्पना, प्रेम, उल्लास (हर्ष), संकोच, सन्देह और दुःख से युक्त हृदय के कम्पन उस ढोल के कर्णकटु शब्दों को मधुर बना देते हैं। इसका कारण यह है कि उस नव-विवाहिता के हृदय में आनन्द का मधुर राग, उत्सव, विशेष प्रसन्नता और प्रेम का संगीत-ये तीनों तत्त्व एक साथ अवस्थित रहते हैं। कहने का भावे यह है कि यदि विवाह होने की प्रसन्नता, जीवन की मधुर कल्पनाएँ और प्रिय के प्रति प्रेम की भावना न हो तो नव-विवाहिता को भी विवाहोत्सव में बजने वाला ढोल सुहावना न लगे।
(स)

  1. ढोल की ध्वनि जब दूर से आती सुनाई देती है, उसी समय वह कानों में मधुरता का संचार करती है, लेकिन पास से सुनाई देने पर वह कानों के पर्दे भी फाड़ सकती है। लेकिन नव-वधू की कल्पना ” दोनों ही स्थितियों में–विवाहोत्सव में उपस्थित अथवा दूर बैठे विवाहोत्सव की कल्पना कर रहे–व्यक्ति के मन में मधुरता का संचार करती है और समीप बैठे रहने पर भी उसे ढोल की ध्वनि मधुर ही लगती है।
  2. ढोल की ध्वनि समीप बैठे व्यक्ति के लिए कर्कश होती है और दूर बैठे व्यक्ति के लिए मधुर। लेकिन जब समीप में बैठा व्यक्ति विवाहोत्सव में उपस्थित किसी नव-वधू की कल्पना अपने मन में कर लेता है, उस समय उसे ढोल की कर्कश ध्वनि (UPBoardSolutions.com) भी मधुर ही सुनाई पड़ती है।
  3. ढोल की कर्कश ध्वनि को किसी नव-वधू के प्रेम, उल्लास, संकोच आदि भावों से युक्त हृदय के कम्पन मधुर बना देते हैं, क्योंकि उसके साथ आनन्द की मधुर ध्वनि, उत्सव का आनन्द और प्रेम का संगीत तीनों ही मिले-जुले रहते हैं।
  4. दूर के ढोल सुहावने इसलिए होते हैं क्योंकि कानों को कठोर लगने वाली उनकी कर्कश ध्वनि दूर तक नहीं पहुँचती।

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प्रश्न 4.
जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है, जो वृद्ध हो गये हैं, जो अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आये हैं, उन्हें अपने अतीतकाल की स्मृति बड़ी सुखद लगती है। वे अतीत का ही स्वप्न देखते हैं। तरुणों के लिए जैसे भविष्य उज्ज्वल होता है, वैसे ही वृद्धों के लिए अतीत। वर्तमान से दोनों को असन्तोष होता है। तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं। तरुण क्रान्ति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक। इन्हीं दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है और इसी से वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है।
[2009, 12, 15, 17]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. वर्तमान समय सदैव सुधारों का समय क्यों बना रहता है ?
  2. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
  3. युवा और वृद्ध व्यक्तियों के वैचारिक अन्तर को स्पष्ट कीजिए। या तरुण और वृद्ध दोनों क्या चाहते हैं?
  4. संसार का चित्र किसे बड़ा मनमोहक प्रतीत होता है ?
  5. तरुण और वृद्ध दोनों क्या चाहते हैं ?

[ तरुण = युवक। अतीत = बीता समय। संरक्षक = रक्षा करने वाला। क्षुब्ध = दु:खी। ]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या--लेखक श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी का कहना है कि जिन नौजवानों ने संसार के कष्टों, समस्याओं और कठिनाइयों का सामना नहीं किया, उन्हें यह संसार बड़ा आकर्षक और सुन्दर प्रतीत होता है; क्योंकि वे अपने उज्ज्वल भविष्य के स्वप्न देखते हैं, जीवन-संघर्षों से बहुत दूर रहते हैं और दूर के ढोल तो सभी को सुहावने लगते हैं। जो अपनी बाल्यावस्था और जवानी को पार करके (UPBoardSolutions.com) अब वृद्ध हो गये हैं, वे बीते समय के गीत गाकर प्रसन्न होते हैं। नवयुवकों से भविष्य दूर होता है और वृद्धों से उनका बचपन बहुत दूर हो गया होता है। इसीलिए नवयुवकों को भविष्य तथा वृद्धों को अतीत प्रिय लगता है।

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द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक श्री बख्शी जी का कहना है कि नवयुवक उत्साह और साहस के साथ वर्तमान को बदलना चाहते हैं और वृद्ध बीते हुए समय और उच्च सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करना चाहते हैं। इसी संघर्ष में दोनों का जीवन सदैव तनावपूर्ण रहता है। पर इससे लाभ यह है कि युवकों के प्रयास से वर्तमान काल में सुधार होते हैं और वृद्धों के प्रयास से गौरवपूर्ण संस्कृति की रक्षा होती है।
(स)

  1. वर्तमान समय सदैव सुधारों का समय इसलिए बना रहता है; क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह युवा हो अथवा वृद्ध, अपने वर्तमान से दुःखी होता है। युवा अपने भविष्य के सुखद स्वप्न देखते हैं और वृद्ध अपने अतीत के सुखों का गान करते हैं। वर्तमान किसी को अच्छा नहीं लगता; क्योंकि वह उनके सामने होता है। वस्तुत: जो भी हमें प्राप्त होता रहता है, हम प्राय: उससे असन्तुष्ट ही रहते हैं, इसलिए उसमें परिवर्तन करते रहते हैं। यही कारण है कि वर्तमान समय सदैव सुधारों का समय बना रहता है।
  2. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक कहना चाहता है कि वृद्धों की सोच से हमारी संस्कॅति सुरक्षित रहती है। और युवाओं की सोच से वर्तमान में सुधार होते रहते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो आगे आने वाली पीढ़ियाँ सदैव एक ही अतीत को ढोती रहतीं।
  3. युवाओं को भविष्य की स्मृति मनमोहक प्रतीत होती है और वृद्धों (UPBoardSolutions.com) को अतीत की। युवाओं के लिए भविष्य उज्ज्वल होता है और वृद्धों के लिए अतीत। युवा भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को। युवा क्रान्ति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अंतीत-गौरव के संरक्षक।
  4. संसार का चित्र ऐसे युवाओं को बड़ा ही आकर्षक प्रतीत होता है, जो जीवन रूपी संग्राम से बहुत दूर हैं; अर्थात् जिन्होंने संसार के कष्टों, समस्याओं और कठिनाइयों का सामना नहीं किया है।
  5. तरुण और वृद्ध दोनों ही वर्तमान से असन्तुष्ट होते हैं। तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं। और वृद्ध अतीत को। तरुण क्रान्ति का समर्थन करते हैं और वृद्ध अतीत के गौरव का संरक्षण।

प्रश्न 5.
मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो। तभी तो आज तक कितने ही सुधारक हो गये हैं। पर सुधारों का अन्त कब हुआ? भारत के इतिहास में बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द और महात्मा गाँधी में ही सुधारकों की गणना समाप्त नहीं होती। सुधारकों का दल नगर-नगर और गाँव-गाँव में होता है। यह सच है कि जीवन में नये-नये क्षेत्र उत्पन्न होते जाते हैं और नये-नये सुधार हो जाते हैं। न दोषों का अन्त है और न सुधारों का। जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गये हैं और उन सुधारों का फिर नव सुधार किया जाता है। तभी तो यह जीवन प्रगतिशील माना गया है। [2016]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. मनुष्य जाति के इतिहास में कब सुधारों की आवश्यकता नहीं हुई? कुछ प्रमुख सुधारकों के नाम लिखिए।
  2. “प्रत्येक वस्तु, पदार्थ, विचार परिवर्तनशील हैं’, इस सत्य का वर्णन करते हुए एक वाक्य लिखिए।
  3. जीवन प्रगतिशील क्यों माना गया है?

उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक का कथन है कि मानव-समाज विस्तृत है। इसमें सदैव सुधार होते रहते हैं। बुद्ध से गाँधी तक सुधारकों के एक बड़े समूह का जन्म इस देश में हुआ है। जीवन में दोषों की श्रृंखला बहुत लम्बी होती है। इसीलिए सुधारों का क्रम सदैव चलता रहता है। सुधारकों के दल प्रत्येक नगर और ग्राम में होते हैं। जीवन में अनेकानेक क्षेत्र होते हैं और नित नवीन उत्पन्न भी होते जाते हैं। प्रत्येक में कुछ दोष होते हैं, जिनमें सुधार अवश्यम्भावी होता है। सुधार किये जाने पर इनमें तात्कालिक सुधार तो हो जाता है परन्तु आगे चलकर कालक्रम में वे ही सुधार फिर दोष माने जाने लगते हैं और (UPBoardSolutions.com) उनमें फिर से सुधार किये जाने की आवश्यकता प्रतीत होने लगती है। इसी सुधारक्रम और परिवर्तनशीलता से जीवन प्रगतिशील मना गया है।

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(स)

  1. मनुष्य जाति के इतिहास में ऐसा कोई समय ही नहीं आया, जब सुधारों की आवश्यकता नहीं हुई। आशय यह है कि मनुष्य जाति के इतिहास में सदैव ही सुधारों की आवश्यकता होती रही है और होती रहेगी। कुछ प्रमुख समाज-सुधारकों के नाम हैं—गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, नागार्जुन आदि शंकराचार्य, कबीरदास, गुरु नानकदेव, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गाँधी, विनोबा भावे आदि।।
  2. “प्रत्येक वस्तु, पदार्थ, विचार परिवर्तनशील हैं’, इस सत्य का वर्णन करते हुए हम एक वाक्य लिख सकते हैं कि, “परिवर्तन प्रकृति का नियम है। मात्र परिवर्तन के अतिरिक्त सम्पूर्ण सृष्टि परिवर्तनशील है।”
  3. न दोषों का अन्त है और न सुधारों का। जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गये हैं और उन सुधारों को फिर नव सुधार किया जाता है। तभी तो यह जीवन प्रगतिशील माना गया है।

प्रश्न 6.
हिन्दी में प्रगतिशील साहित्य का निर्माण हो रहा है। उसके निर्माता यह समझ रहे हैं कि उनके साहित्य में भविष्य का गौरव निहित है। पर कुछ ही समय के बाद उनका यह साहित्य भी अतीत का स्मारक हो जाएगा और आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे। उनके स्थान में तरुणों । का फिर दूसरा दल आ जाएगा, जो भविष्य का स्वप्न देखेगा। दोनों के ही स्वप्न सुखद होते हैं; क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।
[2010, 11, 14, 16, 18]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. “दूर के ढोल सुहावने क्यों होते हैं ?” स्पष्ट कीजिए।
  2. प्रस्तुत अवतरण में लेखक क्या कहना चाहता है ?
  3. प्रगतिशील साहित्य को अतीत का स्मारक क्यों कहा गया है।
  4. लेखक ने साहित्य के निर्माण में किन विशेषताओं का उल्लेख किया है?
  5. प्रगतिशील साहित्य-निर्माता क्या समझकर साहित्य-निर्माण कर रहे हैं?

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[ निर्माण = रचना। निर्माता = बनाने वाला। निहित = छिपा हुआ। अतीत = भूतकाल। स्मारक = यादगार।]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या-विद्वान् लेखक श्री बख्शी जी साहित्यिक सुधार की प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि युवा साहित्यकार वर्तमान में भूत और भविष्य का समन्वय करते हुए यह सोचकर प्रगतिवादी साहित्य की रचना कर रहे हैं क्योंकि उनके साहित्य में भविष्य के गौरव का वर्णन किया गया है; अत: भविष्य में उसमें सुधार की आवश्यकता नहीं होगी, किन्तु कुछ समय पश्चात् ही उनके सोचे की यह भव्य इमारत धराशायी हो जाएगी और आज के ये युवा लेखक भी एक दिन वृद्ध होकर अतीत का गुणगान करेंगे।

द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या–साहित्यिक सुधार की प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए विद्वान लेखक श्री बख्शी जी कहते हैं कि आज के युवा लेखक भी एक दिन वृद्ध होकर अतीत का गुणगान करेंगे। और उस समय के जो युवा साहित्यकार होंगे वे वर्तमान से असन्तुष्ट होकर कोई और नया साहित्य रचने लगेंगे। वे भी भविष्य के लिए चिन्तित होंगे। यह क्रम सनातन है। युवाओं से भविष्य दूर है और वृद्धों से अतीत; इसीलिए (UPBoardSolutions.com) दोनों को ये सुखद लगते हैं। यह मानव स्वभाव है कि जो वस्तु उसकी पहुँच से दूर होती है, वह उसे अच्छी लगती है और वह उसे पाने का प्रयत्न करती रहता है। इसीलिए ‘दूर के ढोल सुहावने वाली कहावत चरितार्थ हुई है।
(स)

  1. युवाओं से भविष्य दूर है और वृद्धों से अतीत। इसीलिए दोनों को ये ही सुखद लगते हैं। यह मानव स्वभाव है कि जो वस्तु उसकी पहुँच से दूर होती है, वही उसे अच्छी लगती है और वह उसी को पाने का प्रयत्न भी करती है। इसीलिए कहा जाता है कि ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं।’
  2. प्रस्तुत अवतरण में लेखक का कहना है कि जो कुछ भी आज प्रासंगिक है, कल वही अप्रासंगिक हो जाएगा और उसमें सुधार की अपेक्षा की जाने लगेगी। यह अप्रासंगिकता और सुधार का क्रम जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में और साहित्य में भी निरन्तर चलता रहता है।
  3. प्रगतिशील साहित्य को अतीत का स्मारक इसलिए कहा गया है कि वह भी कुछ समय बाद अतीत (बीती हुई) की वस्तु हो जाता है।
  4.  लेखक ने साहित्य के निर्माण में निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया है
    • हिन्दी भाषा के अन्तर्गत प्रगतिशील साहित्य का निर्माण हो रहा है।
    • साहित्य में भविष्य का गौरव निहित होता है। |
  5.  प्रगतिशील साहित्य-निर्माण यह समझकर साहित्य-निर्माण कर रहे हैं कि उनके साहित्य में भविष्य का गौरव निहित है।

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व्याकरण एवं रचना-बोध

प्रश्न 1
निम्नलिखित शब्दों से उपसर्ग पृथक् कीजिए तथा उस उपसर्ग से बनने वाले दो अन्य शब्द भी लिखिए
सम्मति, निबन्ध, विज्ञ, दुर्बोध, अभिव्यक्ति।
उत्तर
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प्रश्न 2
निम्नलिखित शब्दों से प्रत्यय अलग करके लिखिए तथा उस प्रत्यय से बने दो अन्य शब्द बताइए-
शीर्षक, विद्वत्ता, प्रतिभावान्, लज्जाशील, समीपस्थ, सुखद। शब्द
उत्तर
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UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 3 क्या लिखें? (गद्य खंड) img-3

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प्रश्न 3
निम्नलिखित शब्दों का इस प्रकार से वाक्यों में प्रयोग कीजिए कि उनका अर्थ स्पष्ट हो जाए-आवेग, विश्वकोश, गाम्भीर्य, कर्कशता, विषाद, दूरस्थ
उत्तर
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प्रश्न 4
प्रस्तुत पाठ में निम्नलिखित साहित्यकारों की जिन विशेषताओं का उल्लेख हुआ है, उन्हें लिखिए-श्रीहर्ष, बाणभट्ट, अमीर खुसरो, सेनापति।
उत्तर
श्रीहर्ष–श्रीहर्ष की भाषा-शैली बड़ी क्लिष्ट है, जिसे केवल विषय-विशेषज्ञ ही समझ सकते हैं। अस्पष्टता अथवा दुर्बोधता उनकी शैली का दोष है।
बाणभट्ट–बाणभट्ट की भाषा-शैली सामासिक पदावली से युक्त है, जिसमें वाक्य अत्यधिक लम्बे हो गये हैं।
अमीर खुसरो—विभिन्न विषयों का एक सूत्र में समन्वय (UPBoardSolutions.com) कर देना अमीर खुसरो के साहित्य की महती विशेषता है। यही विशेषता उन्हें अन्य साहित्यकारों से पृथक् करती है।
सेनापति-श्रीहर्ष की भाँति सेनापति की भाषा-शैली भी दुर्बोध है।

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UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 5 गृह-गणित

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 5 गृह-गणित

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
गृह-गणित से आप क्या समझती हैं? अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा गृह-व्यवस्था के सन्दर्भ में गृहिणियों के लिए गृह-गणित के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
[2009]
या
गृह-गणित का ज्ञान होना गृहिणी के लिए क्यों आवश्यक है? [2011, 13, 14, 17, 18]
या
गृह विज्ञान की छात्राओं के लिए गृह-गणित के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। [2013] .
उत्तर:
गणित मूल रूप से अंकों का विज्ञान है। जब हम किसी भी रूप में संख्याओं का प्रयोग करते हैं तो हम गणित का ही प्रयोग करते हैं। उदाहरण के लिए – यदि हम कहते हैं कि “घर में दो किलोग्राम आम हैं।” तो यह कथन गणित पर ही आधारित माना जाएगा।

गृह – गणित का अर्थ

गणित अर्थात् संख्याओं के विज्ञान को जब गृह-कार्यों तथा गृह-व्यवस्था सम्बन्धी क्रिया-कलापों में इस्तेमाल किया जाता है, तब उसे गृह-गणित कहा जाता है। उदाहरण के लिए-बाजार से घरेलू वस्तुएँ खरीदते समय दाम को जोड़ना, नौकरों को पैसे गिनकर देना, धोबी (UPBoardSolutions.com) को कपड़े गिनकर देना तथा लेना, नित्य आने वाले दूध की मात्रा लिखते रहना तथा पूरे महीने में आए दूध को जोड़कर उसका हिसाब तैयार कर लेना गृह-गणित का ही रूप है। कपड़े सिलते समय नाप लेना तथा लिखना तथा उसी के अनुकूल कपड़ा काटना आदि क्रियाएँ गृह-गणित पर ही आधारित हैं। अत: स्पष्ट है कि घर पर प्रत्येक क्रिया-कलाप में किसी-न-किसी रूप में गृह-गणित का इस्तेमाल अवश्य होता है।

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गृह-गणित का महत्त्व

गृह-विज्ञान की छात्राओं के लिए सामान्य गणित का ज्ञान अति आवश्यक होता है। आहार एवं पोषण-विज्ञान, वस्त्र-विज्ञान आदि का व्यवस्थित अध्ययन करने के लिए कुछ गणनाएँ अवश्य ही करनी पड़ती हैं। गृह-प्रबन्ध तथा पारिवारिक बजट के सैद्धान्तिक अध्ययन एवं व्यावहारिक उपयोग के लिए भी गणित का ज्ञान आवश्यक होता है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही गृह-विज्ञान की छात्राओं को गृह- गणित के रूप में सामान्य गणित का ज्ञान प्रदान किया जाता है। इसी प्रकार गृहिणियों के लिए भी गृह- गणित का ज्ञान विशेष रूप से उपयोगी तथा आवश्यक होता है। गृह-गणित का समुचित ज्ञान होने की स्थिति में गृहिणियों को विभिन्न कार्य करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहना पड़ता, वे स्वयं ही रुपए-पैसे का लेन-देन कर सकती हैं तथा गृह-बजट तैयार कर (UPBoardSolutions.com) सकती हैं। अतः स्पष्ट है कि गृह-प्रबन्ध की सफलता के लिए प्रत्येक गृहिणी के लिए गृह-गणित का ज्ञान आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है।

माप व तौल की सामान्य इकाइयाँ

मीट्रिक प्रणाली में माप व तौल की इकाइयाँ निम्न प्रकार की होती हैं

तौल की इकाइयाँ
1 किलोग्राम = 10 हेक्टोग्राम
1 हेक्टोग्राम = 10 डेकाग्राम
1 डेकाग्राम = 10 ग्राम
1 ग्राम | = 10 डेसीग्राम
1 डेसीग्राम = 10 सेण्टीग्राम
1 सेण्टीग्राम = 10 मिलीग्राम
नोट: तौल की मुख्य इकाइयाँ ग्राम तथा किलोग्राम ही हैं। एक किलोग्राम में 1000 ग्राम होते हैं।

लम्बाई की इकाइयाँ :
1 किलोमीटर = 10 हेक्टोमीटर
1 हेक्टोमीटर = 10 डेकामीटर
1 डेकामीटर = 10 मीटर
1 मीटर = 10 डेसीमीटर
1 डेसीमीटर = 10 सेण्टीमीटर
1 सेण्टीमीटर = 10
नोट: लम्बाई की मुख्य व्यवहार में आने वाली इकाइयाँ मीटर तथा किलोमीटर ही हैं। एक किलोमीटर में 1000 मीटर होते हैं तथा एक मीटर में 100 सेण्टीमीटर होते हैं।

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मात्रा अथवा आयतन की इकाइयाँ
1 किलोलीटर = 10 हेक्टोलीटर
1 हेक्टोलीटर = 10 डेकालीटर
1 डेकालीटर = 10 लीटर
1 लीटर = 10 डेसीलीटर
1 डेसीलीटर = 10 सेण्टीलीटर
1 सेण्टीलीटर = 10 मिलीलीटर।
नोट: मात्रा की मुख्य इकाइयां लीटर तथा मिलीलीटर ही हैं। एक लीटर में 1000 मिलीलीटर होते हैं।

सम्बन्धित प्रश्न

उदाहरण :
5 किलोग्राम 2 हेक्टोग्राम 5 डेकाग्राम को ग्राम में बदलिए।
हल : 5 किलोग्राम +2 हेक्टोग्राम + 5 डेकोग्राम
था       5 x 1 किलोग्राम + 2 x 1 हेक्टोग्राम (UPBoardSolutions.com) + 5 x 1 डेकाग्राम
5 x 1000 + 2 x 100 + 5 x 10
5000+ 200 + 50 = 5250 ग्राम

अभ्यास 1

प्रश्न 1:
10 किलोग्राम 5 हेक्टोग्राम 2 डेकाग्राम को ग्राम में परिवर्तित कीजिए।

प्रश्न 2:
1 डेकाग्राम 2 ग्राम 5 सेण्टीग्राम को मिलीग्राम में बदलिए।

प्रश्न 3:
5 हेक्टोलीटर 20 डेकालीटर को लीटर में बदलिए।

प्रश्न 4:
1 किलोमीटर 5 हेक्टोमीटर 10 डेकामीटर को मीटर में परिवर्तित कीजिए।

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प्रश्न 5:
एक गृहिणी ने 2 किलोग्राम आलू, 25 डेकाग्राम भिण्डी व 250 ग्राम टमाटर खरीदे। उसने कुल कितने ग्राम सब्जी खरीदी?
उत्तर:
1. 10520 ग्राम,
2. 12050 मिलीग्राम,
3. 700 लीटर,
4. 1600 मीटर,
5. 2500 ग्राम।

दशमलव प्रणाली
दशमलव वह बिन्दु है जिसे इकाई के दाहिनी ओर लगाकर इकाई का स्थान दर्शाया जाता है। दशमलव (UPBoardSolutions.com) बिन्दु के दाहिनी ओर की संख्याएँ दशमलव संख्याएँ कहलाती हैं। इसे निम्नलिखित उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया गया है
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 5 गृह-गणित 1

दशमलव संख्याओं को जोड़ना

दशमलव संख्याओं को सामान्य पूर्ण संख्याओं के समान ही जोड़ते हैं। यह कार्य कुछ कठिन अवश्य है, परन्तु यदि निम्नलिखित सामान्य नियमों का पालन किया जाए तो त्रुटि होने की सम्भावनाएँ बहुत कम हो जाती हैं ।

  1. संख्याओं के अंकों को थोड़ा दूर-दूर व स्पष्ट लिखें।
  2. संख्याओं को एक-दूसरे के नीचे इस प्रकार लिखें कि इनके दशमलव बिन्दु एक-दूसरे के ठीक नीचे रहें।
  3. सामान्य संख्याओं के अंकों की तरह इनके अंक भी सम्बन्धित स्तम्भों में लिखे (UPBoardSolutions.com) जाने चाहिए। उदाहरण के लिए इकाई के स्तम्भ में इकाई अंक तथा दहाई व सैकड़े के स्तम्भ में दहाई व सैकड़े
    के अंक लिखें। इससे योग करने में सुविधा रहती है।
  4. यदि किसी संख्या के दाहिनी ओर के कुछ स्तम्भ खाली रह जाएँ तो इनमें शून्य अंकित कर दें। अब इन्हें सामान्य संख्याओं की तरह जोड़ दें।

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सम्बन्धित प्रश्न

उदाहरण 1:
115.5, 10.1 व 5.7 का योगफल ज्ञात कीजिए।
हल:
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 5 गृह-गणित 2
उत्तर: 31.3

उदाहरण 2:
पुष्पा ने परिवार के लिए 38.67 मीटर पापलीन, 60.58 मीटर लट्ठा, 75.40 मीटर जीन और 10.30 मीटर मारकीन का कपड़ा खरीदा, तो उसने कुल कितना कपड़ा खरीदा?
हल: पुष्पा द्वारा खरीदे गए कपड़े का विवरण
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 5 गृह-गणित 3
अतः पुष्पा ने कुल 184.95 मीटर कपड़ा खरीदा। उत्तर

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अभ्यास 2

प्रश्न 1:
योगफल ज्ञात कीजिए।
(क) 242.34, 23.12 तथा 11.14 (ख) 171.09, 131.12 तथा 1.09

प्रश्न 2:

एक गृहिणी ने 14.35 मीटर कपड़ा कमीजों के लिए, 16.36 मीटर कपड़ा पेटीकोटों के लिए तथा 9.24 मीटर कपड़ा पैन्टों के लिए खरीदा। उसने कुल कितना कपड़ा खरीदा?

प्रश्न 3:

उषा ने 20.75 के अंगूर, ₹ 10.20 के सेब, ₹ 33.50 के आम तथा ₹ 5.85 के अमरूद खरीदे। उसने कुल कितने रुपये के फल खरीदे?

प्रश्न 4:

मीरा ने 5 जनवरी को 139.054 मीटर कपड़ा परदों के लिए, 15 जनवरी को 89.950 मीटर कपड़ा बच्चों की ड्रेस के लिए तथा 30 जनवरी को 20.920 मीटर कपड़ा अपने लिए खरीदा। मीरा ने जनवरी माह में कुल कितना कपड़ा खरीदा? ।

प्रश्न 5:

एक गृहिणी द्वारा बेची गयी रद्दी का विवरण है-हिन्दी समाचार-पत्र 8.50 किग्रा, अंग्रेज़ी समाचार-पत्र 8.75 किग्रा, मैगजीन 3.25 किग्रा तथा पुरानी कापियाँ 2.80 किग्रा। उसने कुल कितनी रद्दी बेची?

प्रश्न 6:

मोहन ने अपने परिवार के लिए 40.60 मीटर लटठा, 50.40 मीटर जीन, 12.50 मीटर मारकीन तथा 15.50 मीटर मोटा कपड़ा खरीदा। उसने कुल कितना कपड़ा खरीदा?

प्रश्न 7:

एक मोटरकार पहले घण्टे में 44.3 किलोमीटर, दूसरे घण्टे में 53.6 किलोमीटर, तीसरे घण्टे में 58.87 किलोमीटर तथा चौथे घण्टे में 61.78 किलोमीटर चली। चार घण्टों में मोटरकार ने कुल कितनी दूरी तय की?

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प्रश्न 8:

रूपा ने परिवार के लिए 40.67 मीटर लट्ठा, 80.58 मीटर पापलीन, 75.40 मीटर जीन और 20.30 मीटर मारकीन खरीदा। उसने कुल कितना कपड़ा खरीदा?

प्रश्न 9:

कारखाने में एक मजदूर ने एक दिन में ₹52.75 मजदूरी प्राप्त की, दूसरे दिन उसने ₹48.50 तथा तीसरे दिन के ₹51.25 मजदूरी प्राप्त की। इन तीन दिनों में उसने कुल कितनी मजदूरी प्राप्त की?
उत्तर:
1. (क) 276.60, (ख) 303.30,
2. 39.95 मीटर,
3. ₹ 70.30,
4. 249.924 मीटर,
5. 23.30 किग्रा,
6. 119.00 मीटर,
7. 218.55 किमी,
8. 216.95 मीटर,
9. ₹ 152.50

दशमलव संख्याओं को घटाना

दशमलव संख्याओं को घटाते समय निम्नलिखित नियमों का पालन करना आवश्यक है

  1. अंकों के मध्य पर्याप्त अन्तर रखिए।
  2.  संख्याओं को इस प्रकार लिखिए कि दशमलव बिन्दु एक-दूसरे के ठीक नीचे रहें। |
  3. किसी भी संख्या के दाहिनी ओर यदि रिक्त स्थान हो तो इनमें शून्य (UPBoardSolutions.com) लिखिए। इससे त्रुटियों की सम्भावना कम हो जाती है। |
  4. यदि किसी संख्या में दशमलव नहीं है तो इसके इकाई के अंक के बाद दशमलव बिन्दु लगाकर दूसरी संख्या के, दशमलव अंकों के बराबर स्थानों पर शून्य लिखिए। उदाहरण के
    लिए: 295.25 में से 105 को घटाना है। इसे निम्नवत् लिखकर घटाइए

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 5 गृह-गणित 4

सम्बन्धित प्रश्न

उदाहरण:
पुष्पा के पास ₹ 198.50 थे। उसने बाजार से ₹94,75 का सामान खरीदा। पुष्पा के पास कितने रुपये शेष बचने चाहिए?
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 5 गृह-गणित 5

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अभ्यास 3

प्रश्न 1:
घटाइए (क) 44.24 में से 11.234 (ख) 932.780 में से 900.265

प्रश्न 2:
सुमन के घर में 150 किग्रा गेहूँ था। दो माह पश्चात् 71 किग्रा 4 हेग्रा 3 डेग्रा गेहूँ शेष बचा। बताइए कि कुल कितना गेहूँ प्रयोग में आया?

प्रश्न 3:

रमा ने परदों के लिए 30 मीटर कपड़ा खरीदा। परदे बनाने के बाद 2.70 मीटर कपड़ा शेष बचा। परदों में कुल कितने मीटर कपड़ा लगा?

प्रश्न 4:

यदि किसी गृहिणी की मासिक आय ₹3540 तथा व्यय ₹ 2980.75 है तो वह प्रतिमाह कितनी बचत कर सकती है? ।

प्रश्न 5:

एक गृहिणी ₹85 लेकर बाजार गई। उसने ₹30 का गेहूँ, ₹20.25 की दाल, ₹18 के चावल तथा ₹ 10 का मसाला खरीदा तो कुल कितना व्यय हुआ और कितना उसके पास शेष बचा?

प्रश्न 6:

विभा के पास कुल ₹8520 थे जिनमें से ₹439.87 उसने जलसे में खर्च किए, तो बताइए अब उसके पास कितना धन शेष बचा?

प्रश्न 7:
एक परिवार में तीन पढ़ने वाले बच्चे हैं। कुल ₹375.00 उनकी फीस पर व्यय होते हैं। एक बच्चे की फीस हैं ₹120.00 है, दूसरे की फीस ₹150.00 है, तो बताइए कि तीसरे बच्चे की
फीस क्या होगी?

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प्रश्न 8:
रेखा ₹75 लेकर बाजार गई। उसने ₹25 की पुस्तकें, ₹20 की दवा, ₹11.75 की कलम खरीदी तथा र9 के फल खरीदे, तो बताइए उसने कुल कितना व्यय किया तथा शेष क्या बचाया?

प्रश्न 9:

एक गृहिणी ₹60 लेकर बाजार गई। उसने ₹20 के गेहूँ, ₹15 के मसाले औरं ₹5.25 की सब्जी खरीदी, तो कुल कितना व्यय हुआ और कितना उसके पास शेष बचा?
उत्तर:
1. (क) 33,006, (ख) 32,515,
2. 78.57 किग्रा,
3. 27.30 मीटर,
4. ₹ 559.25,
5. व्यय ₹ 78.25, शेष ₹ 6.75,
6. ₹ 8088.13,
7. ₹ 105.00,
8. व्यय ₹ 85.75, शेष ₹ 9.25,
9. व्यय ₹ 40.25, शेष ₹19.75

दशमलव संख्याओं को गुणा करना

दशमलव संख्याओं की गुणा के महत्त्वपूर्ण नियम निम्नलिखित हैं

  1. दशमलव संख्या को यदि पूर्णांक से गुणा करना है, तो पहले दशमलव बिन्दु पर ध्यान न देकर पूर्णांक संख्याओं की तरह गुणा कीजिए।
  2. गुणा में जितने भी दशमलव अंक हों उतने ही अंक गुणनफल में दाहिनी ओर से गिनकर दशमलव बिन्दु लगाइए।
  3. यदि ऐसा करते समय कुछ अंशों की कमी पड़े, तो उतने ही शून्य (UPBoardSolutions.com) बाईं ओर बढ़ाकर दशमलव बिन्दु लगाइए।
  4. निकटतम मान ज्ञात करने के लिए दशमलव के प्रथम स्थान के लिए द्वितीय अंक देखिए। यदि यह अंक 5 से कम है, तो इसे छोड़ देते हैं और यदि यह 5 अथवा 5 से अधिक है, तो प्रथम अंक में 1 (एक) जोड़कर निकटतम मान लिखा जाता है; जैसे-3.24 का निकटतंम मान’ 3.2 तथा 3.25 का निकटतम मान 3.3 लिखा जाता है।

सम्बन्धित प्रश्न
उदाहरण 1
रिचा 2.5 किलोमीटर प्रति घण्टा की गति से चलकर 2 घण्टे में स्कूल से घर पहुँची, तो स्कूल से घर की दूरी बताइए।
हल :
रिचा एक घण्टे में चलती है = 2.5 किमी
∴ रिचा दो घण्टे में चलेगी = 2.5 x 2 = 5.0 किमी      उत्तर

उदाहरण 2
शोभा एक लीटर पेट्रोल से अपनी मोटर 8.35 किलोमीटर दूर ले गई, तो बताइए कि 9 लीटर पेट्रोल से वह कितनी दूर तक जाएगी?
हल: एक लीटर पेट्रोल से मोटर जाती है = 8.35 किलोमीटर
∴ नौ लीटर पेट्रोल से मोटर जाएगी = 8.35 x 9 किलोमीटर = 75.15 किमी     उत्तर

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उदाहरण 3
1 किलोग्राम चीनी का मूल्य ₹ 17.50 है, तो 12 किलोग्राम चीनी का मूल्य क्या होगा? [2008]
हल :
एक किलोग्राम चीनी का मूल्य = ₹ 17.50
∴ 12 किलोग्राम चीनी का मूल्य = ₹ 17.50 x 12 = ₹ 210.00    उत्तर

अभ्यास 4

प्रश्न 1:
यदि आलू का मूल्य ₹ 2.75 प्रति किलोग्राम है, तो 10 किलोग्राम आलू का मूल्य कितना होगा?

प्रश्न 2:
रामू यदि ₹0.75 प्रति कपड़ा धुलाई लेता है, तो 80 कपड़ों की धुलाई के लिए वह कुल कितने रुपये लेगा?

प्रश्न 3:
रमा ने यदि एक किलोग्राम चावल का मूल्य ₹ 6.70 दिया, तो बताइए कि 4 किलोग्राम चावल की मूल्ये क्या होगा?

प्रश्न 4:
एक कुन्तल चावल का मूल्य ₹180 है, तो 18 किलोग्राम चावल का मूल्य बताइए।

प्रश्न 5:
कमला एक लीटर डीजल से 10 किलोमीटर दूर अपनी जीप ले गई, तो बताइए 7 लीटर डीजल से वह कितनी दूर जाएगी?

प्रश्न 6:
एक मीटर कपड़े का मूल्य ₹12 है, तो 80 मीटर कपड़े का मूल्य बताइए।

प्रश्न 7:
एक मोपेड एक लीटर पेट्रोल में 70.15 किलोमीटर दूर जाती है, तो 9 लीटर पेट्रोल में वह कितनी दूर तक जाएगी?

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प्रश्न 8:
एक मीटर कपड़े का मूल्य ₹22 है, तो 145 मीटर कपड़े का मूल्य बताइए।

प्रश्न 9:
सोने की एक चूड़ी की तौल 25.675 ग्राम है। ऐसी 15 चूड़ियाँ बनाने के लिए कितने सोने की आवश्यकता होगी?

प्रश्न 10:
राधा ने अपने परिवार के लिए ₹22.30 प्रति मीटर के हिसाब से 6 मीटर मारकीन खरीदा, उसका कुल कितना रुपया व्यय हुआ?

प्रश्न 11:
शान्ति ने ₹8.50 प्रति मीटर की दर से 1 [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] मीटर पापलीन, ₹18.40 प्रति मीटर की दर से 2 मीटर छींट का कपड़ा और ₹10.20 प्रति मीटर की दर से 2 [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] मीटर लट्ठा खरीदा, तो बताइए उसने कुल कितने मीटर कपड़ा खरीदा और कितना रुपया दिया?

प्रश्न 12:
वसु ने एक किलोग्राम चीनी का मूल्य ₹ 8.60 पैसे दिया, तो बताइए 5 किलोग्राम चीनी का मूल्य क्या होगा?

प्रश्न 13:
नितिका की कार एक लीटर पेट्रोल में 30 किमी दूर जा सकती है। 12.5 लीटर पेट्रोल में वह कितना लम्बा रास्ता तय कर सकती है?

प्रश्न 14:
नीतू एक लीटर पेट्रोल से अपनी कार 9.25 किलोमीटर दूर ले गई। 15 लीटर पेट्रोल से उसकी कार कितनी दूर तक जाएगी?

प्रश्न 15:
सोने की एक चूड़ी का भार 7.635 ग्राम है। ऐसी 18 चूड़ियों का भार कितना होगा?
उतर:
1. ₹ 27.50,
2.₹ 60,
3. ₹ 26.80,
4. ₹ 32.40,
5. 70 किलोमीटर,
6. ₹ 960,
7. 63135 किमी,
8. ₹ 3190,
9. 385,125 ग्राम,
10. ₹ 133.80,
11. 6 मीटर, व्यय (UPBoardSolutions.com) ₹ 75.05,
12. ₹ 43.00,
13. 375 किलोमीटर,
14. 138.75 किलोमीटर,
15. 137,43 ग्राम।

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दशमलव संख्याओं में भाग करना

इन प्रश्नों को हल करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन कीजिए

  1. सामान्य संख्याओं के समान भाग की क्रिया आरम्भ कीजिए।
  2. भागफल प्रायः दशमलव के एक, दो अथवा तीन अंकों तक ज्ञात किया जाता है।
  3. यदि भाजक दशमलव संख्या है, तो भाज्य में 10, 100 अथवा 1000 से गुणा कर इसे पूर्णांक बना लेते हैं।
  4. यदि भाज्य दशमलव संख्या है, तो भाजक में 10, 100 या 1000 की गुणा कर इसे पूर्णांक बना देते हैं।
  5. यदि भाजक व भाज्य दोनों ही दशमलव संख्याएँ हैं, तो दोनों (UPBoardSolutions.com) में ही 10, 100 अथवा 1000 की गुणा कर दोनों को पूर्णांक बना देते हैं।
    इए उपर्युक्त नियमों को उदाहरणों द्वारा समझने का प्रयत्न करें।

सम्बन्धित प्रश्न

उदाहरण 1:
135 को 10.2 से भाग दीजिए।
हल:
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 5 गृह-गणित 6
यहाँ भाजक दशमलव संख्या है; अत: इसे पूर्णांक बनाने के लिए भाज्य में 10 की गुणा करनी होगी
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अब साधारण विधि से भाग किया जा सकता है।
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उदाहरण 2:
एक पैन्ट बनाने में 2.25 मीटर कपड़ा लगता है। 20.25 मीटर कपड़े में कितनी पैन्टें बनेंगी?
हल :
∵ 2.25 मीटर कपड़े में बनती है = 1 पैन्ट
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 5 गृह-गणित 9

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अभ्यास 5

प्रश्न 1:
पुष्पा ने 10.80 मीटर कपड़ा ₹90.80 में खरीदा। कपड़े का प्रति मीटर मूल्य बताइए।

प्रश्न 2:
100 मीटर लम्बी डोरी के 2.5 मीटर डोरी वाले कितने टुकड़े किए जा सकते हैं?

प्रश्न 3:
यदि 5 कुर्सियों का मूल्य ₹650.75 है, तो एक कुर्सी की कीमत कितनी होगी?

प्रश्न 4:
एक गृहिणी ने बाजार से 27.8 मीटर कपड़ा नियन्त्रित मूल्य पर खरीदा। यदि एक कमीज में 2.65 मीटर कपड़ा लगता है, तो कुल कपड़े में से कितनी कमीजें बनेंगी और कितना कपड़ा शेष बचेगा?

प्रश्न 5:
4 कुर्सियों एवं 5 मेजों का मूल्य ₹1024.80 है। यदि एक कुर्सी का मूल्य ₹100 है तो एक मेज का मूल्य बताइए।

प्रश्न 6:
10 किलोग्राम चीनी का मूल्य ₹58.00 है। एक किलोग्राम चीनी का मूल्य ज्ञात कीजिए।

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प्रश्न 7 :
एक ट्रेन 6 घण्टे में 312.24 किलोमीटर की दूरी तय करती है। वही ट्रेन एक घण्टे में कितने किलोमीटर की दूरी तय करेगी?

उत्तर:
1. ₹8.40,
2. 40 टुकड़े,
3. ₹130.15
4. 10, शेष 1.3 मीटर,
5. ₹12496
6. ₹5.80
7. 52.04 किलोमीटर।

प्रतिशत की गणना

प्रतिशत का अर्थ 100 के परिप्रेक्ष्य में मात्रा अथवा संख्या प्रदर्शित करना है। इसे गणित में % चिह्न से दर्शाया जाता है। प्रतिशत गणना सम्बन्धी कुछ जानने योग्य नियम निम्नलिखित हैं

  1. प्रतिशत को दशमलव भिन्न में बदलने के लिए उसे 100 से भाग कर देते हैं; जैसे
    5%= [latex]\frac { 5 }{ 100 }[/latex] =.05.
    इसी प्रकार दशमलव भिन्न को प्रतिशत में बदलने के लिए उसे 100 से गुणा करेंना होगा; जैसे .05 =.05 x 100 = 5%
  2.  साधारण भिन्न को प्रतिशत में बदलने के लिए 100 से गुणा किया जाता है; जैसे
    [latex]\frac { 1 }{ 4 }[/latex] = [latex]\frac { 1 }{ 4 }[/latex] x 100 = 25%. इसके विपरीत प्रतिशत को भिन्न में बदलने के लिए 100 से भाग देना होगा; जैसे 25% = [latex]\frac { 25 }{ 100 }[/latex] =[latex]\frac { 1 }{ 4 }[/latex]
  3. किसी संख्या की अभीष्ट प्रतिशत संख्या निकालने के लिए उसे अभीष्ट प्रतिशत (UPBoardSolutions.com) से गुणा करते हैं; जैसे–1000 की 25% संख्या होगी।
    1000 x [latex]\frac { 25 }{ 100 }[/latex] = 250

सम्बन्धित प्रश्न

उदाहरण 1
एक गाँव की जनसंख्या 6000 है। इसमें 35% पुरुष व 40% स्त्रियाँ हैं, शेष बच्चे हैं। बच्चों की संख्या ज्ञात कीजिए। [2008, 11]
हल:
गाँव की कुल जनसंख्या = 6000
पुरुषों का प्रतिशत = 35%
पुरुषों की संख्या = 6000 x [latex]\frac { 35 }{ 100 }[/latex]= 35 x 60 = 2100
स्त्रियों का प्रतिशत = 40%
स्त्रियों की संख्या = 6000 x [latex]\frac { 40 }{ 100 }[/latex]= 60 x 40 = 2400
पुरुषों व स्त्रियों को मिलाकर जनसंख्या = 2100 + 2400 = 4500
अतः बच्चों की संख्या = कुल जनसंख्या – पुरुषों व स्त्रियों की जनसंख्या का योग
6000 – 4500 = 1500 उत्तर

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उदाहरण 2
एक गाँव की जनसंख्या 4500 है। इस गाँव में 35% पुरुष, 36% स्त्रियाँ और शेष बच्चे हैं। बच्चों की संख्या ज्ञात कीजिए। [2009]
हल:
कुल जनसंख्या = 4500
पुरुषों का प्रतिशत = 35%
पुरुषों की संख्या = 4500 x [latex]\frac { 35 }{ 100 }[/latex] = 45x 35 = 1575
स्त्रियों का प्रतिशत = 36%
स्त्रियों की संख्या = 4500 x [latex]\frac { 36 }{ 100 }[/latex] = 45x 36 = 1620
पुरुषों व स्त्रियों को मिलाकर जनसंख्या = 1575 +1620 = 3195
बच्चों की संख्या = कुल जनसंख्या – पुरुष (UPBoardSolutions.com) व स्त्रियों की जनसंख्या का योग
4500 – 3195 = 1305 उत्तर

उदाहरण 3
एक महिला ने 10% की छूट से खरीदे गए सामान पर ₹50 की कुल छूट प्राप्त की। उसने कुल कितने रुपये का सामान खरीदा?
हल :
खरीदे गए सामान के मूल्य का 10% = ₹ 50
खरीदे गए सामान के मूल्य का 100% = 50 x [latex]\frac { 100 }{ 10 }[/latex]= ₹ 500
अतः
सामान का कुल मूल्य = ₹ 500 उत्तर

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उदाहरण 4
रमा ने दूध वाले से जो दूध लिया उसमें [latex]\frac { 3 }{ 4 }[/latex] भाग दूध व शेष पानी था। दूध में मिले पानी को प्रतिशत ज्ञात कीजिए।
हल :
यदि दूध की मात्रा = 1 लीटर है।
इसमें दूध की मात्रा =1 – [latex]\frac { 3 }{ 4 }[/latex] = [latex]\frac { 1 }{ 4 }[/latex]
अतः दूध में पानी का प्रतिशत = [latex]\frac { 1 }{ 4 }[/latex]x 100= 25% उत्तर

उदाहरण 5
कमला ने बैंक में ₹2000 जमा किए। 11.5 प्रतिशत ब्याज प्रतिवर्ष की दर से एक वर्ष पश्चात बैंक में उसकी जमा की गई धनराशि कुल कितनी होगी?
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 5 गृह-गणित 10

अभ्यास 6

प्रश्न 1:
₹ 2500 मासिक आय वाला व्यक्ति यदि बच्चों की शिक्षा पर 20% व्यय करना चाहे, तो उसे कुल कितना रुपया प्रतिमाह व्यय करना होगा?

प्रश्न 2:
एक नगर की जनसंख्या 50000 है। यदि नगर में 30% पुरुष, 35% महिलाएँ व 35% बच्चे हैं, तो इनकी अलग-अलग संख्या बताइए

प्रश्न 3:
रामपुर गाँव की जनसंख्या 2000 है। इसमें 45% पुरुष, 40% स्त्रियाँ तथा शेष बच्चे हैं। बच्चों की कुल संख्या बताइए।

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प्रश्न 4:
एक दुकानदार ने पुस्तक पर मुद्रित मूल्य पर 15% की छूट दी। यदि यह छूट ₹3.75 है, तो पुस्तक का छपा हुआ मूल्य बताइए।

प्रश्न 5:
एक व्यक्ति अपनी आय की 15% मासिक बचत करता है। यदि वर्ष में कुल ₹5400 की बचत करता है, तो उसकी वार्षिक आय बताइए।

प्रश्न 6:
एक पशु मेले में 25% गाय, 20% भैंस, 25% बैल तथा 15% बकरी बिकने के लिए आए, शेष अन्य पशु थे। मेले में कुल 10000 पशु एकत्रित हुए थे। अन्य पशुओं की संख्या ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 7:
आर्य समाज कन्या पाठशाला की 40 में से 32 छात्राएँ उत्तीर्ण हुई, जबकि राजकीय कन्या विद्यालय की 35 में से 31 छात्राएँ ही उत्तीर्ण हुईं। किस स्कूल का परिणाम अच्छा रहा?

प्रश्न 8:
एक गृहिणी अपनी आय का 45% भोजन पर, 20% वस्त्रों पर तथा 25% शिक्षा पर व्यय करती है। यदि वह 200 रुपये मासिक बचत करती है, तो उसकी कुल आय कितनी है?

प्रश्न 9:
एक पाठशाला में 500 छात्र हैं जिनमें से 60% विज्ञान वर्ग के और शेष साहित्यिक वर्ग के हैं। विज्ञान वर्ग और साहित्यिक वर्ग के छात्रों की संख्या बताइए।

प्रश्न 10:
रामपुर की जनसंख्या 10000 है। इसमें 40% पुरुष, 35% स्त्रियाँ तथा शेष बच्चे हैं। बच्चों की कुल संख्या बूताइए। [2009]

प्रश्न 11:
ऍक स्थान की जनसंख्या 25560 है, जिसमें 40% पुरुष एवं 40% स्त्रियाँ हैं, शेष बच्चे हैं। पुरुषों, स्त्रियों एवं बच्चों की अलग-अलग संख्या लिखिए।

प्रश्न 12:
शीला की प्रतिमाह की आय ₹ 1500 है जिसमें से वह 90% गृह-व्यवस्था में व्यय करती है। शेष बचत करती है। वह आय में से कुल कितना व्यग्र और बचत करती है?
उत्तर:
1. ₹ 500,
2. 15000 पुरुष, 17500 महिलाएँ, 17500 बच्चे,
3. 300 बच्चे,
4. ₹ 25
5. ₹ 36000
6. 1500,
7. राजकीय कन्या विद्यालय 88.5%,
8. 2000
9. विज्ञान वर्ग के छात्र = 300 तथा साहित्यिक वर्ग के छात्र-200
10. 2500 बच्चे,
11. पुरुष = 10224, स्त्रियां =10224 बच्चे = 5112
12. व्यय = ₹ 1350, बचत = ₹ 150

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लाभ-हानि का मूल्यांकन

प्रायः दुकानदार वस्तुओं को कम मूल्य पर खरीदकर कुछ अधिक मूल्य पर बेचते हैं। मूल्यों का यह अन्तर लाभ कहलाता है। परन्तु कभी-कभी खरीदी हुई वस्तुओं के मूल्य में गिरावट भी आ जाती है। अथवा अन्य किसी मजबूरी के कारण दुकानदार को वस्तुएँ खरीदे हुए मूल्य से कम मूल्य पर बेचनी पड़ती हैं, तो मूल्यों को यह अन्तर हानि कहलाता है। लाभ-हानि की गणना का ज्ञान प्रत्येक गृहिणी के लिए आवश्यक है। इसके द्वारा (UPBoardSolutions.com) न केवल घर की अर्थव्यवस्था में सन्तुलन बनाए रखने में सहायता मिलती है, बल्कि अतिरिक्त आय भी की जा सकती है। लाभ-हानि की गणना के लिए अग्रलिखित बातों का ज्ञान होना आवश्यक है

  1. किसी वस्तु के खरीदने को क्रय कहते हैं तथा खरीदते समय दिए जाने वाला मूल्य क्रय मूल्य कहलाता है।
  2.  किसी वस्तु के बेचने को विक्रय कहते हैं तथा वस्तु को बेचते समय मिलने वाला मूल्य विक्रय मूल्य कहलाता है।
  3.  यदि किसी वस्तु का क्रय मूल्य कम तथा विक्रय मूल्य अधिक होता है, तो लाभ की प्राप्ति होती है; अतः
    लाभ = विक्रय मूल्य – क्रय मूल्य।
  4. यदि वस्तु का क्रय मूल्य अधिक व विक्रय मूल्य कम है, तो हानि होती है।
    हानि = क्रय-मूल्य – विक्रय मूल्य।।
  5. लाभ तथा हानि का मूल आधार सदैव क्रय मूल्य ही होता है क्योंकि इसके कम अथवा अधिक होने पर ही लाभ व हानि होती है।
  6. लाभ-हानि की गणना प्रायः प्रतिशत में की जाती है।

सम्बन्धित प्रश्न

उदाहरण 1
अशोक ने ₹1200 में एक साइकिल खरीदी और उसे ₹1104 में बेच दिया। उसे कितने रुपये का नुकसान हुआ एवं उसका प्रतिशत ज्ञात कीजिए।
हल :
साइकिल का क्रय मूल्य = ₹1200
साइकिल का विक्रये मूल्य = ₹1104
हानि = 1200 – 1104 = ₹96
₹ 1200 पर हानि = ₹96
₹ 100 पर हानि = [latex]\frac { 96 x 100 }{ 1200 }[/latex] = [latex]\frac { 96 }{ 12 }[/latex] = 8
अतः अशोक को 8% हानि हुई। उत्तर

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उदाहरण 2
एक परिवार की मासिक आय ₹40000 है। वे भोजन पर ₹15000, घर पर ₹10000, स्कूल फीस पर ₹5000 और अन्य मदों पर ₹5000 व्यय करते हैं। उनकी प्रति माह बचत क्या होगी ? [2009, 10, 13]
हल:
परिवार की आय = ₹ 40000
परिवार का खर्चा
भोजन का व्यय = ₹ 15000
घर का व्यय = ₹10000
स्कूल फीस = ₹5000
अन्य मदों पर व्यय = १ 5000
कुल व्यय = ₹ 5000
मासिक बचत = मासिक आय (UPBoardSolutions.com) – मासिक खर्च
= 40000-35000
परिवार की मासिक बचत = ₹5000 उत्तर

उदाहरण 3
एक गाय दो हजार (2000) रुपये में खरीदी। वह एक हजार आठ सौ (1800) रुपये में बेची गई। लाभ अथवा हानि का प्रतिशत होगा? [2011]
हल:
क्योंकि गाय खरीद से कम दाम पर बेची गई, अतः गाय बेचने में हानि हुई
कुल हानि = 2,000 – 1800 = ₹200
∵ ₹ 2000 पर हानि हुई = ₹ 200
∴ 100 रुपये पर हानि = [latex]\frac { 200 }{ 2000 }[/latex] x 100 = 10
गाय बेचने पर 10% हानि हुई। उत्तर

उदाहरण 4
एक मनुष्य अपनी आय का 90% व्यय करके ₹250 बचाता है। उसकी मासिक आय क्या है? [2007]
हल:
उस मनुष्य ने आय में से 90% व्यय करके ₹250 की बचत की अर्थात् 10% बचत की।
अतः
बचत का प्रतिशत = 100 – 90 = 10%
∵ आय में बचत का 10% = ₹250
∴ आय में से व्यय किया गया 90% हुआ =[latex]\frac { 250 }{ 10 }[/latex] x 90 = ₹2250
कुल मासिक आय = कुल व्यय + बचत
= 2250 + 250 = ₹ 2500
उस मनुष्य की मासिक आय ₹ 2500 है। उत्तर

उदाहरण 5
सोनू ने एक टेलीविजन ₹ 2000 में खरीदा, परन्तु बाद में पसन्द न आने के कारण ₹1800 में बेच दिया। सोनू को कितने प्रतिशत हानि हुई?
हल:
टेलीविजन को क्रय मूल्य = ₹ 2000
टेलीविजन का विक्रय मूल्य = ₹ 1800
हानि = क्रय मूल्य – विक्रय मूल्य
= 2000 – 1800 = ₹ 200
∵ ₹ 2000 क्रय मूल्य पर हानि = ₹ 200
∴ ₹100 क्रय मूल्य पर हानि = [latex]\frac { 200x 100 }{ 2000 }[/latex] = 10%
अत: सोनू को 10% हानि हुई। उत्तर

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उदाहरण 6
रमेश की मासिक आय ₹ 12000 है। वह प्रति माह ₹ 9575 व्यय करता है। उसकी वार्षिक बचत क्या होगी ? [2010]
हल:
रमेश की मासिक आय = ₹ 12000
रमेश को मासिक व्यय = ₹ 9575
रमेश की मासिक बचत = ₹ 2425
रमेश की वार्षिक बचत = ₹ 2425×12
= ₹ 29100 उत्तर

उदाहरण 7
एक साइकिल का मूल्य ₹ 1800 है, उसे कितने में बेचा जाए कि 20% लाभ हो?
हल:
यदि साइकिल का मूल्य ₹ 100 हो तथा 20% लाभ अर्जित करना हो, तो उसे बेचना होगा- ₹ 120 में
यदि साइकिल का मूल्य ₹1800 हो तो 20% (UPBoardSolutions.com) लाभ अर्जित करने के लिए उसे बेचना होगा
= [latex]\frac { 120 }{ 100 }[/latex] x 1800 = ₹ 2160
अत: साइकिल को ₹2160 में बेचा जाना चाहिए। उत्तर

अभ्यास 7

प्रश्न 1:
एक व्यक्ति ने एक गाय ₹500 में खरीदी तथा बाद में उसे ₹ 625 में बेच दिया। उसे कितना लाभ हुआ?

प्रश्न 2:
एक व्यक्ति ने एक घड़ी ₹400 में खरीदकर ₹500 में बेच दी। उसे कितने प्रतिशत लाभ हुआ?

प्रश्न 3:
रामू ने एक साइकिल ₹400 में खरीदी। 20% लाभ पाने के लिए रामू को साइकिल कितने रुपये में बेचनी चाहिए?

प्रश्न 4:
एक गृहिणी ने सिल्क की एक साड़ी ₹400 में खरीदी। एक अन्य गृहिणी ने गाँधी जयन्ती की अवधि में उसी प्रकार की साड़ी के ₹320 में खरीदी। उसे कितने प्रतिशत की छूट मिली?

प्रश्न 5:
प्रेशर कुकर का मूल्य ₹300 है। 20% लाभ अर्जित करने के लिए उसे कितने रुपये में बेचना चाहिए?

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प्रश्न 6:
एक दुकानदार ने 10 कुर्सियाँर ₹300 में खरीदकर ₹400 में बेचीं। प्रतिशत लाभ की गणना कीजिए।

प्रश्न 7:
कमला ने अपनी ₹130 मूल्य की पुस्तकें परीक्षोपरान्त 30% हानि उठाकर बेचीं। उसे पुस्तकों के कितने रुपये मिले?

प्रश्न 8:
एक वस्तु ₹ 200 में खरीदकर 10% की हानि पर बेची गई। वस्तु का विक्रय मूल्य बताइए।

उत्तर :
1. ₹ 125,
2. 25%,
3. ₹ 480,
4. 20%,
5. ₹360,
6. 33.3%,
7. ₹91,
8. ₹180

साधारण ब्याज की गणना

प्रत्येक गृहिणी को घर के आकस्मिक कार्यों के लिए प्रायः भविष्य निधि योजना से, बैंक से अथवा अन्य किसी स्रोत से रुपये उधार लेने की आवश्यकता पड़ जाती है। प्रायः सभी गृहिणियाँ बचत करती हैं तथा बचत किए गए धन को विभिन्न (UPBoardSolutions.com) योजनाओं में लगाती हैं। प्रथम स्थिति में गृहिणी को ब्याज देना होता है तथा द्वितीय स्थिति में उसे ब्याज की प्राप्ति होती है। अतः प्रत्येक गृहिणी को परिवार के हित में ब्याज की गणना का ज्ञान होना आवश्यक है। ब्याज की गणना की सरल विधि निम्न प्रकार है

  1. (1) उधार दी अथवा ली जाने वाली धनराशि मूलधन कहलाती है।
  2. (2) एक निश्चित समय के लिए (माह अथवा वर्ष) धनराशि उधार ली अथवा दी जाती है। इसे अवधि अथवा समय कहते हैं।
  3. (3) उधार धनराशि के लिए देय अतिरिक्त धनराशि ब्याज कहलाती है।।
  4. (4) ब्याज प्रायः एक निश्चित मात्रा में प्रतिमाह अथवा प्रतिवर्ष प्रति ₹100 देय होता है। इसे ब्याज की दर कहते हैं। यह प्रायः प्रतिशत में होती है।
  5. (5) मूलधन + कुल ब्याज को मिश्रधन कहते हैं।
  6. (6) ब्याज की गणना का आवश्यक सूत्र है

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 5 गृह-गणित 11
(विशेष–अवधि प्रायः वर्षों में तथा दर प्रतिशत में होती है।]

सम्बन्धित प्रश्न

उदाहरण 1:
₹500 पर 6% वार्षिक ब्याज की दर से 3 वर्ष में कुल कितना ब्याज होगा? [2010, 12 ]
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उदाहरण 2:
यदि 6% वार्षिक ब्याज की दर से तीन वर्षों में कुल ब्याज ₹180 देना पड़ा, तो उधार ली गई धनराशि अथवा मूलधन कितना है?
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उदाहरण 3:
₹ 1000 के 6 वर्ष में ₹2000 हो जाते हैं। साधारण ब्याज की वार्षिक दर की गणना कीजिए।
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उदाहरण 4:
रमा ने 10% वार्षिक ब्याज की दर से ₹5000 बैंक में जमा किए। यह धन कितने वर्षों में दोगुना हो जाएगा?
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अभ्यास 8

प्रश्न 1:
₹600 पर 10% वार्षिक ब्याज की दर से पाँच वर्षों का साधारण ब्याज ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 2:
किस प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से ₹144 12 वर्षों में दोगुने हो जाएँगे?

प्रश्न 3:
रमा ने ₹400 उधार लिए। 3 वर्ष बाद उसने ₹544 वापस दिए। रमा ने कितने प्रतिशत ब्याज दिया?

प्रश्न 4:
एक गृहिणी ने 10% वार्षिक ब्याज की दर से ₹3000 उधार लिए। तीन वर्ष पश्चात् उसे कितना रुपया वापस देना होगा?

प्रश्न 5:
सुषमा ने बैंक से 10% वार्षिक ब्याज की दर से ₹10000 उधार लिए। उसने बैंक को ₹14000 कितने वर्षों बाद वापस किये?

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प्रश्न 6:
8% वार्षिक ब्याज की दर से ₹5600 का तीन साल का साधारण ब्याज क्या होगा? [2009, 18]
उत्तर :
1. ₹300,
2. ₹8.33%,
3. ₹12%,
4. ₹3900,
5. 4 वर्ष,
6. ₹1344

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
एक गृह-विज्ञान की छात्रा के लिए गृह-गणित का ज्ञान होना क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
इससे छात्र को अनेक लाभ हैं, जिनमें से कुछ लाभ निम्नलिखित हैं
(1) व्यावहारिक ज्ञान की प्राप्ति।
(2) घर का हिसाब-किताब रखने में सुविधा।
(3) बजट बनाने में आसानी।
(4) सिलाई-बुनाई की कुशलता में वृद्धि।
(5) बचत का सही विनिमय करने में सहायता।
(6) बच्चों को पढ़ाने-लिखाने में आसानी।

प्रश्न 2:
लीला ₹75 लेकर बाजार गई। उसने ₹25 की दवा, ₹20 की पुस्तकें, ₹11.75 की कलम व स्याही तथा ₹9 का सजावट का सामान खरीदा। उसने कुल कितना व्यय किया तथा शेष क्या बचा?
या
रेखा ₹75 लेकर बाजार गई। उसने ₹25 की पुस्तकें, ₹20 की दवा, ₹11.75 की कलम खरीदीं तथा ₹9 के फल खरीदे, तो बताइए उसने कुल कितना व्यय किया तथा शेष क्या बचा ?
हल:
यह जोड़ने व घटाने का मिश्रित प्रश्न है।
कुल व्यय = 25 + 20 + 11.75 + 9 = ₹ 65.75
शेष धन = 75 – 65.75 = ₹ 9.25 उत्तर

प्रश्न 3:
शान्ति ने ₹ 8.50 प्रति मीटर की दर से 11/2 मीटर पापलीन, ₹18.40 प्रति मीटर की दर से 2 मीटर कपड़ा और ₹10.20 प्रति मीटर की दर से 21/2 मीटर लट्ठा खरीदा, तो बताइए उसने कुल कितने मीटर कपड़ा खरीदा और कितना पैसा दिया?
हल:
यह योग एवं गुणा का मिश्रित प्रश्न है।।
शान्ति द्वारा खरीदा गया कुल कपड़ा = 1.5 + 2 + 2.5 मी =6 मी
₹ 8.50 की दर से 1.5 मी पापलीन का मूल्य = 8.50 x 1.5 = ₹ 12.75
₹ 18.40 की दर से 2 मी कपड़े का मूल्य = (UPBoardSolutions.com) 18.40 x 2 = ₹ 36.80
₹ 10.20 की दर से 2.5 मी लट्ठे का मूल्य = 10.20 x 2.5 = ₹ 25.50
शान्ति द्वारा व्यय किए गए कुल ₹ =12.75 + 36.80 + 25.50 = ₹75.05 उत्तर

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प्रश्न 4:
राधा ने अपने परिवार के लिए ₹22.30 प्रति मीटर की दर से 12 मीटर मलमल तथा ₹ 15.10 प्रति मीटर की दर से 6 मीटर मारकीन खरीदा, उसका कुल कितना रुपया व्यय हुआ?
हल:
यह गुणा एवं योग का मिश्रित प्रश्न है।
₹ 22.30 की दर से 12 मीटर मलमले का मूल्य = 22.30 x 12 = ₹ 267.60
₹ 15.10 की दर से 6 मीटर मारकीन का मूल्य (UPBoardSolutions.com) = 15.10 x 6 = ₹ 90.60
राधा द्वारा व्यय किए गए कुल रुपये = 267.60 + 90.60 = ₹ 358.20

प्रश्न 5:
सोहन ने ₹1825 मोहन से लिए। उस पर 12% वार्षिक ब्याज दिया। उसने तीन वर्ष बाद एक घड़ी और ₹20,000 वापिस किए। घड़ी का मूल्य बताइए। [2011]
हल:
₹ 1825 का 12% की दर से तीन वर्ष का ब्याज
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 5 गृह-गणित 12
कुल देनदारी = मूलधन + ब्याज
= 1825 + 657 = 2482
∵ सोहन ने दिया = 2000 + घड़ी
∴ घड़ी की कीमत = 2482 – 2000 = 482
घड़ी की कीमत = ₹482 उत्तर

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
दशमलव बिन्दु से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
संख्या में अंक के साथ लगाए गए उस बिन्दु को जो पूरी इकाई को इसके दसवें, सौवें, हजारवें आदि भागों में अलग करता है, दशमलव बिन्दु कहते हैं।

प्रश्न 2:
हानि को आप किस प्रकार परिभाषित करेंगी?
उत्तर:
जब किसी वस्तु का क्रय मूल्य अधिक तथा विक्रय मूल्य कम होता है, तो इन दोनों का अन्तर हानि कहलाता है।

प्रश्न 3:
ब्याज का क्या अर्थ है?
उत्तर:
उधार लिए गए मूलधन पर निश्चित अवधि में देय अतिरिक्त धनराशि ब्याज कहलाती है।

प्रश्न 4:
4% वार्षिक ब्याज की दर से ₹ 600 को तीन साल का साधारण ब्याज क्या होगा? [2011]
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 5 गृह-गणित 13

प्रश्न 5:
मिश्रधन से आप क्या समझती हैं?
उत्तर:
मूलधन + ब्याज की सम्मिलित धनराशि मिश्रधन कहलाती है।

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प्रश्न 6:
प्रतिशत का क्या अर्थ है?
उत्तर:
100 में से अभीष्ट संख्या को प्रतिशत कहते हैं; जैसे 200 का 10 प्रतिशत 20 होगा।

प्रश्न 7:
यदि एक फ्रॉक में 2.75 मीटर कपड़ा लगता है, तो छः फ्रॉकों में कितना कपड़ा लगेगा? [2009]
उत्तर:
छ: फ्रॉकों में कुल 16.50 मीटर कपड़ा लगेगा।

प्रश्न 8:
सीता के पास ₹984 थे। उसने ₹325.50 अपने छोटे भाई को दे दिए। उसके पास कितने रुपये शेष बचे? । [2008]
उत्तर:
सीता के पास कुल ₹658.50 बचे।

प्रश्न 9:
यदि 6.50 पैसे में एक किलो गेहूँ मिलता है, तो 5 किलो गेहूँ कितने रुपयों में मिलेगा?
उत्तर:
5 किलो गेहूँ 32.50 का मिलेगा।

प्रश्न 10:
एक लीटर पेट्रोल का मूल्य ₹30.25 है, तो 15 लीटर पेट्रोल का मूल्य क्या होगा?
उत्तर:
15 लीटर पेट्रोल का मूल्य ₹453.75 होगा।

प्रश्न 11:
नेहा ने एक दर्जन पेन्सिल ₹3 प्रति पेन्सिल की दर से खरीदी। उसने दुकानदार को एक दर्जन पेन्सिल के लिए कितने रुपये दिए? [2011]
उत्तर:
3x 12 = ₹36

प्रश्न 12:
एक बोतल का भार 26 ग्राम है, तो ऐसी 45 बोतलों का भार कितना होगा?
उत्तर:
45 बोतलों का भार 1170 ग्राम अर्थात् 1 (UPBoardSolutions.com) किलो 170 ग्राम होगा।

प्रश्न 13:
एक कलम का मूल्य ₹ 12 है, तो ऐसी 6 कलमों का मूल्य क्या होगा?
उत्तर:
6 कलमों का मूल्य ₹ 72 होगा।

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प्रश्न 14:
यदि एक किलो चीनी का मूल्य ₹8 है, तो 7 किलो चीनी का मूल्य क्या होगा?
उत्तर: ₹ 56

प्रश्न 15:
यदि एक लीटर पेट्रोल की कीमत ₹38 है, तो 28 लीटर पेट्रोल की कीमत क्या होगी?
उत्तर:
₹ 1064

प्रश्न 16:
यदि 20 किलो चावल का मूल्य ₹ 320 है, तो एक किलो चावल का मूल्य ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
1 किलो चावल का मूल्य ₹ 16 होगा।

प्रश्न 17:
12 कुर्सियों का मूल्य ₹504 है, एक कुर्सी का मूल्य ज्ञात कीजिए। [2013, 14]
उत्तर :
1 कुर्सी का मूल्य ₹42 है।

प्रश्न 18:
एक लीटर दूध का मूल्य ₹35 है तो 5.5 लीटर दूध का मूल्य कितना होगा? [2016]
उत्तर:
5.5 लीटर दूध का मूल्य ₹192.50 होगा।

प्रश्न 19:
8% साधारण वार्षिक ब्याज की दर में ₹2,500 का 3 वर्ष का कितना ब्याज होगा? [2015]
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 5 गृह-गणित 14

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बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न – निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. चार कलमों (पेनों) का मूल्य ₹ 12 है, तो 20 कलमों का मूल्य होगा | [2008]
(क) ₹48
(ख) ₹ 60
(ग) ₹72
(घ) ₹ 80

2. 6.06 + 9.84 + 78.93 का योग होगा
(क) 98.4
(ख) 82.3
(ग) 78.6
(घ) 94.83

3. 4.09 +5.54 + 6.73 का योग होगा
(क) 16.36
(ख) 13.85
(ग) 15.93
(घ) 20.84

4. 1 लीटर 400 मिली लीटर +3 लीटर 700 मिली लीटर का योग होगा [2011]
(क) 9.100 लीटर
(ख) 5.100 लीटर
(ग) 4.900 लीटर
(घ) 6.300 लीटर

5. एक लीटर बराबर होता है [2013]
(क) 100 मिली के
(ख) 1000 मिली के
(ग) 1000 डेली के
(घ) 10 सेली के

6. 20 मीटर कपड़े का दाम र 300 है, तो एक मीटर कपड़े का मूल्य होगा
(क) ₹ 150
(ख) ₹ 15
(ग) ₹1.50
(घ) ₹ 40

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7. एक कलम का मूल्य ₹ 12 है, तो 6 कलमों का मूल्य कितना होगा? [2013]
(क) ₹ 45
(ख) ₹ 50
(ग) 72
(घ) ₹60.

8. राजू ने 5 मीटर कपड़े का दाम ₹ 140.00 दिया, तो बताइए एक मीटर कपड़े का मूल्य क्या होगा?
(क) ₹ 25
(ख) ₹ 28
(ग) ₹38
(घ) ₹ 48

9. 20.84 + 19.36 + 59.80 का योग होगा
(क) 95
(ख) 105
(ग) 100
(घ) 110

10. एक साड़ी का मूल्य ₹ 80 है, तो 3 साड़ियों का मूल्य क्या होगा?
(क) ₹ 140
(ख) ₹ 150
(ग) ₹ 210
(घ) ₹ 240

11. एक किलो सेब का दाम ₹ 32 है। 250 ग्राम सेब का दाम होगा
(क) ₹ 8
(ख) ₹ 12
(ग) ₹ 16
(घ) ₹ 20

12. एक बोतल शर्बत का मूल्य ₹ 39.40 है, तो 3 बोतल शर्बत का मूल्य होगा
(क) ₹ 116.50
(ख) ₹ 117.30
(ग) ₹ 118.20
(घ) ₹ 119.00

13. एक परिवार की आय ₹ 5000 प्रतिमाह है। इस आय का 45% व्यय भोजन पर होता है, तो बताइए कितने रुपये प्रतिमाह भोजन पर व्यय होता है?
(क) ₹ 2500
(ख) ₹ 1500
(ग) ₹ 2750
(घ) ₹ 2250

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14. एक किलो चावल का मूल्य ₹ 35.75 है, तो 5 किलो चावल का मूल्य होगा [2007, 10, 11, 13]
(क) ₹ 205.25
(ख) ₹ 178.25
(ग) ₹ 150.50
(घ) ₹ 102.25

15. एक किलोग्राम में कितने ग्राम होते हैं? [2007, 11, 12, 13, 14]
(क) 500 ग्राम
(ख) 1000 ग्राम
(ग) 1500 ग्राम
(घ) 2000 ग्राम

16. एक किलोग्राम बराबर है। [2011]
(क) 100 ग्राम
(ख) 1000 ग्राम
(ग) 100 डेका मीटर
(घ) 100 डेको लीटर

17. लम्बाई नापने की इकाई है [2008, 15, 17)]
(क) सेण्टीमीटर, मीटर
(ख) ग्राम, किलोग्राम
(ग) लीटर, मिलीलीटर
(घ) इनमें से कोई नहीं

18. दूध मापने की इकाई क्या है? [2009]
(क) मिलीलीटर, लीटर
(ख) सेण्टीमीटर, मीटर
(ग) किलोग्राम, ग्राम
(घ) इनमें से कोई नहीं

19. एक गिलास दूध का मूल्य ₹ 3.75 है, तो 7 गिलास दूध का मूल्य क्या होगा ? [2009, 10]
(क) ₹ 25.26
(ख) ₹ 26.25
(ग) ₹ 26.35
(घ) ₹ 25.25

20. एक गिलास का दाम ₹ 15 है, तो 4 गिलास का दाम होगा [2013]
(क) ₹ 45
(ख) ₹ 50
(ग) ₹ 60
(घ) ₹ 72

21. एक ग्राम में होते हैं। [2014]
(क) 10 डेकोग्राम
(ख) 10 सेण्टीग्राम
(ग) 10 डेसीग्राम
(घ) 10 मिग्री

22. एक गिलास जूस का दाम ₹ 12.50 है तो सात गिलास जूस का मूल्य क्या होगा ? [2014]
(क) 75.50
(ख) 80.50
(ग) 90.50
(घ) 87.50

23. 4 सेबों का दाम ₹ 60 है, तो 1 दर्जन सेबों का दाम कितना होगा? [2016]
(क) ₹ 200
(ख) ₹ 250
(ग) ₹ 150
(घ) ₹ 180

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24. दो किलोग्राम में कितने ग्राम होते हैं? [2015, 16]
(क) 1000 ग्राम
(ख) 2000 ग्राम
(ग) 500 ग्राम
(घ) 1500 ग्राम

25. 4 पेन का दाम ₹ 40 है तो 15 पेन का दाम क्या होगा? [2015]
(क) ₹ 250
(ख) ₹ 350
(ग) ₹ 150
(घ) ₹ 600

26. एक दर्जन अनार का मूल्य ₹ 48 है तो एक अनार का मूल्य क्या होगा ? [2015, 17, 18]
(क) ₹ 1.50
(ख) ₹ 2.00
(ग) ₹ 3.00
(घ) ₹4.00

27. एक लीटर पेट्रोल का दाम ₹ 70.75 है, तो 15 लीटर पेट्रोल का दाम क्या होगा? [2016, 17]
(क) ₹ 1040.50
(ख) ₹ 1250.00
(ग) ₹ 1061.25
(घ) ₹ 2000.00

28. भार मापने की इकाई है। [2016] 
(क) सेमी, मीटर
(ख) ग्राम, किलोग्राम
(ग) मिली, लीटर
(घ) इनमें से कोई नहीं

29. 5 किलोग्राम में कितने ग्राम होते हैं? [2016]
(क) 500 ग्राम
(ख) 5000 ग्राम
(ग) 2000 ग्राम
(घ) 7000 ग्राम

30. दो किलोग्राम चीनी का दाम ₹ 90 है, तो 5 किग्रा चीनी का मूल्य क्या होगा? [2016]
(क) ₹ 225
(ख) ₹ 200
(ग) ₹ 250
(घ) ₹ 275

31. आधा किलोग्राम में कितने ग्राम होते हैं? [2016]
(क) 200 ग्राम
(ख) 500 ग्राम
(ग) 700 ग्राम
(घ) 1000 ग्राम

उत्तर:
1. (ख) ₹ 60,
2. (घ) ₹94,83,
3. (क) ₹ 16.36,
4. (ख) 5.100 लीटर,
5. (ख) 1000 मिली के,
6. (ख) ₹ 15,
7. (ग) ₹ 72,
8. (ख) ₹ 28,
9. (ग) 100,
10. (घ) ₹ 240,
11. (क) ₹ 8,
12. (ग) ₹118.20,
13. (घ) ₹ 2250,
14. (ख) ₹ 178.75,
15. (ख) 1000 ग्राम,
16. (ख) 1000 ग्राम,
17. (क) सेण्टीमीटर, मीटर,
18. (क) मिलीलीटर, लीटर,
19. (ख) ₹ 26.25,
20. (ग) ₹ 60,
21. (ग) 10 डेसीग्राम,
22. (घ) ₹ 87.50,
23. (घ) ₹180,
24. (ख) 2000 ग्राम,
25. (ग) ₹ 150,
26. (घ) ₹4.00,
27. (ग) 1061 25,
28. (ख) ग्राम, किलोग्राम,
29. (ख) 5000 ग्राम,
30. (क) 1225,
31. (ख) 500 ग्राम

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UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 6 जल : स्रोत तथा उपयोग

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 6 जल : स्रोत तथा उपयोग

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Home Science . Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 6 जल : स्रोत तथा उपयोग .

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
जल के कार्य लिखिए। मानव-शरीर के लिए जल क्यों उपयोगी है? [2008, 09, 10]
या
जल के कार्यों एवं उपयोगिता का वर्णन कीजिए। [2008, 17]
या
जल मनुष्य के लिए क्यों उपयोगी है? [2013, 17]
या
मानव शरीर के लिए जल क्यों आवश्यक है? [2018]
या
शरीर के लिए जल क्यों उपयोगी है? [2010, 13, 15]
या
जल ही जीवन है, इसका मूल्य पहचानें, इसे बरबाद न करें।” संक्षेप में लिखिए। [2016]
या
मानव जीवन में जल का क्या महत्त्व है? [2017]

उत्तर:
जल की उपयोगिता एवं महत्त्व
जल अथवा पानी का जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राणी-जगत तथा वनस्पति-जगत के अस्तित्व का एक आधार जल ही है। जल के अभाव में व्यक्ति केवल कुछ दिन तक ही कठिनता से जीवित रह सकता है। वास्तव में व्यक्ति के स्वस्थ एवं चुस्त रहने के (UPBoardSolutions.com) लिए जल अति आवश्यक है। जल जीवन की। एक मूल आवश्यकता है जो कि प्यास के रूप में अनुभव की जाती है। शारीरिक आवश्यकता के अतिरिक्त मानव जीवन के सभी कार्य-कलापों में जल की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारे भोजन पकाने, नहाने-धोने, सफाई करने तथा फसलों को उँगाने के लिए एवं अन्य प्रकार के उत्पादनों के लिए जल की अत्यधिक आवश्यकता एवं उपयोगिता होती है। सभ्य जीवन के लिए वरदान स्वरूप विद्युत ऊर्जा का निर्माण भी प्रायः जल से ही होता है। जल की उपयोगिता एवं महत्त्व को बहुपक्षीय विवरण निम्नवर्णित है

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(क) मानव-शरीर सम्बन्धी उपयोग

(1) पीने के लिए:
हमारे शरीर का 70-75% भाग जल से बना है; अत: जल का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपयोग पीने के लिए ही है। अत्यधिक गर्मी या अन्य किसी कारण से शरीर में होने वाली जल की कमी की पूर्ति हमें तुरन्त जल पीकर कर लेनी चाहिए अन्यथा जल की कमी अथवा ही-हाइड्रेशन के भयानक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। जल की शारीरिक आवश्यकता प्यास के रूप में महसूस होती है। प्यास एक अनिवार्य आवश्यकता है तथा इसकी पूर्ति तुरन्त होनी आवश्यक होती है।

(2) आन्तरिक शारीरिक प्रक्रियाएँ:

मानव शरीर की लगभग सभी जैविक एवं जैव-रासायनिक क्रियाओं के संचालन के लिए सर्वाधिक आवश्यक तत्त्व जल ही है। उदाहरण के लिए-पाचन क्रिया का मूल आधार भी जल है। इसी प्रकार उत्सर्जन की क्रिया भी (जैसे—स्वेद एवं मूत्र निष्कासन) जल पर ही आधारित रहती है। इसके अतिरिक्त जितने भी पेय पदार्थ; जैसे कि दूध, फलों का रस आदि; हम लेते हैं उनका अधिकांश भाग जल होता है।

(3) शारीरिक तापमान का नियमन:
हमारे शरीर में उपस्थित जल हमारे शरीर के तापमान को सामान्य रखता है। बाह्य रूप में भी हम ग्रीष्म ऋतु में शीतल तथा शीत ऋतु में गर्म जल से स्नान कर शारीरिक तापमान को सामान्य रखने का प्रयत्न करते हैं।

(4) रक्त संचार व्यवस्था:
हमारे रक्त का अधिकांश भाग (लगभग 80%) जल होता है जो कि रक्त की तरलता का मूल आधार है। तरल अवस्था में ही रक्त शरीर की धमनियों एवं शिराओं में संचार करता है। जल ही रक्त को तरलता प्रदान करता है। रक्त में जल की कमी हो जाने पर रक्त गाढ़ा हो जाता है तथा रक्त के गाढ़ा हो जाने पर न तो रक्त का संचार सुचारु रूप से हो पाता है और न ही शरीर स्वस्थ रह पाता है।

(5) शारीरिक स्वच्छता:
जल शारीरिक स्वच्छता का प्रमुख साधन है। नियमित रूप से किया गया स्नान हमारी त्वचा को स्वच्छ एवं यथासम्भव रोगमुक्त बनाये रखता है। |

(6) चुस्ती-फुर्ती के लिए:
शरीर को चुस्त एवं फुर्तीला बनाए रखने में भी जल का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। जल की कमी होने पर व्यक्ति आलस्य एवं उदासीनता का शिकार रहता है।

(ख) घरेलू उपयोग

शरीर के समान घरेलू दैनिक जीवन के संचालन के लिए भी जल अत्यधिक आवश्यक है। जल के प्रमुख घरेलू उपयोग निम्नलिखित हैं

  1. भोजन पकाने के लिए,
  2. वस्त्रादि की धुलाई के लिए,
  3. रसोईघर व बर्तनों की सफाई के लिए,
  4. फर्श, खिड़कियाँ, दीवारों, स्नानागार व शौचालय इत्यादि की सफाई के लिए,
  5. विभिन्न प्रकार के पेय पदार्थों को बनाने में तथा
  6. घरेलू पेड़-पौधों की सिंचाई करने के लिए।

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(ग) सामुदायिक उपयोग

जल किसी भी समाज, प्रदेश अथवा राष्ट्र की मूल आवश्यकता है। सामुदायिक जनजीवन की विभिन्न सुविधाओं एवं उपलब्धियों की प्राप्ति के लिए जल अत्यधिक आवश्यक है। इसकी पुष्टि में जल के सामुदायिक उपयोग निम्नलिखित हैं

  1. नगर एवं देहात की गलियों, सड़कों व नालियों आदि की सफाई के लिए जल एक प्रमुख साधन है।
  2.  सार्वजनिक पार्को, बाग-बगीचों व वृक्षारोपण जैसे महत्त्वपूर्ण (UPBoardSolutions.com) लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए जल अति आवश्यक है।
  3. कृषि आधारित समाज अथवा राष्ट्र के लिए जल की पर्याप्त उपलब्धि सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।
  4. जल से आज अति महत्त्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत विद्युत की प्राप्ति होती है।
  5. हमारे आधुनिक समाज के अनेक उद्योग जल पर आधारित हैं।
  6. अग्नि को नियन्त्रित करने के लिए भी जल की आवश्यकता पड़ती है। अग्निशामक विभाग जल का मुख्य रूप से उपयोग करके ही अवांछित एवं भयानक अग्निकाण्डों पर नियन्त्रण पाने का प्रयास करता है।

प्रश्न 2:
जल का संघटन बताइए। जल-प्राप्ति के स्रोतों का उल्लेख कीजिए। [2009, 11]
या
जल-प्राप्ति के मुख्य स्रोत बताइए व जल प्रदूषण के कारण बताइए। [2007]
या
जल-प्राप्ति के साधन क्या हैं? जल के अशब्द होने के कारण लिखिए। जल को शब्द करने की दो घरेलू विधियों का वर्णन कीजिए। [2009]
या
जल-प्राप्ति के मुख्य स्रोत बताइए। [2007, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
जल का संघटन क्या है? [2016]
उत्तर:
जल का संघटन
जल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का एक यौगिक है। इसमें दो भाग हाइड्रोजन और एक भाग ऑक्सीजन (H2O) है। यही शुद्ध जल होता है। सामान्यत: जल में कई प्रकार के घुलनशील पदार्थ घुले रहते हैं जिसके कारण यह अशुद्ध हो जाता है। जल एक महत्त्वपूर्ण विलायक होने के कारण अनेक पदार्थों; जैसे—अनेक तत्त्वों के लवण इत्यादि; को आत्मसात् कर लेता है। प्राचीनकाल में जल को एक तत्त्व के रूप में जाना जाता था। वैज्ञानिकों ने बाद में (UPBoardSolutions.com) विभिन्न प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया कि जल हाइड्रोजन (दो भाग) व ऑक्सीजन (एक भाग) का यौगिक है तथा इसे H2O का सूत्र प्रदान किया। जल का वैज्ञानिक विश्लेषण सर्वप्रथम इंग्लैण्ड निवासी वैज्ञानिक केवेन्डिस ने किया था।
प्रकृति में जल तीन निम्नलिखित अवस्थाओं में पाया जाता है

(1) ठोस अवस्था:
हिमाच्छादित पर्वत शिखरों पर पाई जाने वाली हिम अथवा बर्फ जल की ठोस अवस्था है। सामान्य जल को 0°C तक ठण्डा करके बर्फ में परिवर्तित किया जा सकता है।

(2) द्रव अवस्था:
सामान्य जल इस अवस्था का उदाहरण है। अधिक तापमान पर बर्फ तथा ठण्डा करने पर जल-वाष्प सामान्य जल की द्रव अवस्था में परिवर्तित हो जाते हैं।

(3) गैस अवस्था:
आकाश में दिखाई पड़ने वाले मेघ अथवा बादल जल की गैस अवस्था (जल-वाष्प) के उदाहरण हैं। सामान्य जल गर्म करने पर पहले खौलने लगता है तथा धीरे-धीरे जल वाष्प में परिवर्तित हो जाता है। वायु में सदैव जलवाष्प विद्यमान रहती है।

जल-प्राप्ति के स्रोत
मनुष्य हो अथवा पेड़-पौधे या फिर अन्य प्राणी एवं जीवधारी, जल सभी के जीवन का आधार है। प्रकृति ने अपनी इस अमूल्य देन के पृथ्वी पर अनेक स्रोत उपलब्ध किए हैं। इन साधनों अथवा स्रोतों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है
(1) समुद्र का जल,
(2) वर्षा का जल,
(3) धरातलीय जल तथा
(4) भूमिगत जल।

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(1) समुद्र का जल:
पृथ्वी का लगभग 2/3 भाग समुद्र है। यह जल का विशालतम एवं प्रमुख स्रोत है। सूर्य की गर्मी से समुद्र का जल-वाष्प बनकर ऊपर उठता है। यह जल-वाष्प बादलों में परिवर्तित होकर जल के दूसरे स्रोत वर्षा के जल को जन्म देती है। वर्षा का जल पर्वतों एवं घा झीलों, झरनों एवं नदियों के जल में वृद्धि करता है। पृथ्वी के धरातल पर गिरने वाला वर्षा का जल भूमिगत जल-स्रोतों का निर्माण करता है। अन्त में नदियों द्वारा जल पुन: समुद्र में जा मिलता है। समुद्र के जल में लगभग तीन प्रतिशत सामान्य नमक घुला होता है। इस प्रकार समुद्र का जल हमारे लिए नमक का एक अति महत्त्वपूर्ण स्रोत है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है (UPBoardSolutions.com) कि भले ही समुद्र जल के विशालतम स्रोत हैं, परन्तु समुद्र का जल खारा होने के कारण पीने एवं खाना पकाने आदि के काम में नहीं लाया जा सकता। लवण की अधिक मात्रा होने के कारण इसे सिंचाई के कार्य में भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। |

(2) वर्षा का जल:
पृथ्वी पर पाए जाने वाले अन्य जल-स्रोतों का मूल वर्षा का जल है। यह पूर्णतया शुद्ध होता है, परन्तु पृथ्वी पर पहुँचते-पहुँचते इसमें वायुमण्डल की अनेक गैसों; कार्बन डाइ-ऑक्साइड, नाइट्रोजने आदि; धूल कणों एवं पर्यावरणीय अशुद्धियों व रोगाणुओं के मिल जाने के कारण यह अशुद्ध एवं हानिकारक हो जाता है। औद्योगीकरण के कारण वायु-प्रदूषण की दर बढ़ जाने के कारण वर्षा को जल प्राय: प्रदूषित हो जाता है। इस स्थिति में एक-दो बार वर्षा हो जाने पर वर्षा के जल को पीने के लिए एकत्रित करना कम हानिकारक रहता है। वर्षा का जल मृदु होता है तथा घरेलू उपयोगों के लिए उपयुक्त रहता है।

(3) धरातलीय जल:
धरातलीय जल-स्रोत नदियाँ, झीलें, झरने, तालाब इत्यादि हैं। इन सभी स्रोतों की अपनी अलग-अलग विशेषताएँ एवं उपयोग हैं जो निम्नलिखित हैं

(क) नदियाँ:
तीव्र प्रवाह वाली नदियों का जल प्रायः मृद् एवं शुद्ध होता है। प्रायः उद्गम स्थान पर सभी नदियों का जल पीने योग्य होता है, परन्तु बड़े शहरों अथवा औद्योगिक क्षेत्रों के किनारों पर पहुँचकर अनेक सार्वजनिक एवं औद्योगिक अशुद्धियाँ मिल जाने के कारण नदियों का जल पीने के योग्य नहीं रह पाता है। इस स्थिति में नदियों के जल को किसी उपयुक्त उपाय द्वारा शुद्ध एवं साफ करके ही उसे पीने के काम में लाना चाहिए।

(ख) झीलें:
झीलें वर्षा के जल का संगृहीत रूप हैं। ये प्राय: गहरी भूमि में बनती हैं। इनमें बर्फ पिघलने पर पर्वतीय नदियों का तथा वर्षा का जल एकत्रित होता रहता है। इस प्रकार की झील प्राकृतिक होती है; जैसे-कश्मीर की डल झील, तथा नैनीताल की झील। मानव द्वारा निर्मित झील कृत्रिम झील कहलाती है। यह बाँधों द्वारा बनाई जाती है; जैसे–पंजाब में भाखड़ा बाँध की झील। झील के जल को शुद्ध करके पीने योग्य बनाया जा सकता है तथा इससे विद्युत उत्पादन भी किया जा सकता है।

(ग) सोते एवं झरने:
जल प्राप्ति के प्राकृतिक स्रोत सोते एवं झरने भी हैं। जब कहीं कठोर चट्टान को फोड़कर भूमिगत जल बाहर निकलने लगता है, तब उसे जल को सोता या स्रोत कहते हैं। पानी के सोते अनेक प्रकार के होते हैं। कुछ सोतों से तो केवल शुद्ध जल ही निकलता है तथा कुछ सोतों से लवणयुक्त तथा गर्म पानी भी प्राप्त होता है। सोतों का जल भिन्न-भिन्न गुणों से युक्त होता है। सोतों के जल को अनेक बार पेट तथा त्वचा सम्बन्धी रोगों के उपचार के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। कुछ सोतों में गन्धक की पर्याप्त मात्रा घुलित अवस्था में पाई जाती है। यह जल अनेक प्रकार से। स्वास्थ्य-लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सोतों के समान झरने भी जल प्राप्ति के प्राकृतिक स्रोत होते हैं। झरने मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं। झरने का जल ऊँचाई से नीचे गिरता है। झरनों का जल भी सोतों के ही समान होता है। सोतों तथा झरनों के पानी का इस्तेमाल करने से पूर्व उनके गुणों की जाँच कर लेनी चाहिए, क्योंकि इनमें कुछ हानिकारक लवण भी विद्यमान हो सकते हैं।

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(घ) तालाब:
झीलों की तरह तालाबों में भी वर्षा का जल एकत्रित होता है। देहात में जल-प्राप्ति का यह एक प्रमुख प्राकृतिक साधन है। ग्रामीण लोग इसमें स्नान करते हैं एवं वस्त्र आदि धोते हैं। पशुओं के नहाने के पीने के पानी का तालाब एक महत्त्वपूर्ण साधन है। तालाब का (UPBoardSolutions.com) जल ठहरा होने के कारण शीघ्र ही दूषित हो जाता है; अतः इसे ज्यों-का-त्यों पीने के काम में नहीं लाना चाहिए। यदि इसे पीना आवश्यक हो, तो किसी घरेलू उपाय द्वारा इसे शुद्ध करना अति आवश्यक होता है।

(4) भूमिगत जल:
वर्षा का जल जब भूमि पर गिरता है, तो इसका एक बड़ा भाग बह जाता है। इसका शेष भाग भूमि द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। यह अवशोषित जल भूम्याकर्षण शक्ति के कारण नीचे की ओर खिसकता रहता है। मार्ग में अभेद्य चट्टान के आ जाने पर यह एकत्रित हो भूमिगत जल-स्तर का निर्माण करता है। जल के इस स्रोत का उपयोग कर साधारण कुएँ, विद्युत कुएँ भूमिगत जल-स्तर तक भूमि को बेधकर कुओं का निर्माण किया जाता है। कुएँ प्रायः निम्न प्रकार के होते हैं

(क) उथले कुएँ:
भूमि की प्रथम अप्रवेश्य स्तर तक ही खुदाई करके इन कुओं का निर्माण किया जाता है। इनकी गहराई लगभग तीस फीट होती है। भूमि में उपस्थित लवणों के कारण उथले कुओं का जल प्रायः कठोर होता है। गन्दी जगह अथवा नाले के आस-पास स्थित कुओं का जल पीने योग्य नहीं होता है।

(ख) गहरे कुएँ:
इन कुओं की गहराई लगभग सौ फीट तक होती है। इनका जल मृदु तथा अशुद्धियों से मुक्त होता है। इन कुओं से लगभग सभी ऋतुओं में जल प्राप्त होता है।

(ग) आदर्श कुएँ:
देहात क्षेत्र में पीने के पानी का मुख्य स्रोत प्रायः कुएँ ही होते हैं; अत: मृदु एवं शुद्ध जल वाला आदर्श कुआँ प्रत्येक गाँव के लिए आवश्यक है। आदर्श कुएँ का निर्माण करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. आदर्श कुएँ का निर्माण गन्दे स्थानों; नाले, तालाब आदि; से कम-से-कम 100 फीट की दूरी पर किया जाना चाहिए।
  2. कुएँ की भीतरी सतह पक्की ईंटों अथवा पत्थरों की बनी होनी चाहिए तथा कुएँ की दीवार भूमि की सतह से काफी ऊपर तक निर्मित होनी चाहिए। इससे बाहर का गन्दा पानी कुएँ में प्रवेश नहीं कर पाता।
  3. कुआँ अधिकाधिक गहरा होना चाहिए।
  4. कुएँ के ऊपर यदि सम्भव हो, तो चारों ओर खम्भे लगाकर ऊँचाई पर छत डलवा देनी चाहिए। इससे कुएँ में पेड़ों की टहनियाँ व पत्तियाँ आदि नहीं गिरतीं तथा कुआँ पक्षियों की बीट जैसे अवांछनीय तत्त्वों से भी सुरक्षित रहता है।
  5.  कुएँ के चारों ओर न तो स्नान करना चाहिए और न ही वस्त्रादि धोने चाहिए।
  6.  कुएँ से जल खींचते समय गन्दे बर्तन वे गन्दी रस्सी का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  7. कुएँ के जल में माह में कम-से-कम एक बार पोटैशियम परमैंगनेट अथवा लाल दवा अवश्य डालनी चाहिए। इससे जल के कीटाणु मर जाते हैं।

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(घ) आर्टीजन कुएँ:
इने कुओं से जल पृथ्वी के दबाव के कारण स्वत: निकला करता है। फ्रांस के आर्टाइथ स्थान में प्राचीनकाल में इस प्रकार के कुएँ बनाए जाते रहने के कारण इनका नाम
आर्टीजन कुएँ पड़ा। इन्हें ही पाताल-तोड़ कुएँ भी कहते हैं। इनका सिद्धान्त है कि यदि किसी स्थान पर किसी दूसरे स्थान की अपेक्षा भूमिगत जल-स्तर बहुत नीचा हो गया है और पत्थरों की चट्टान के कारण रुका हुआ हो तो यदि चट्टान में छेद कर दिया जाए, तो पानी स्वत: ही ऊपर की ओर दबाव के साथ उतना ही ऊँचा उछलता है जितनी कि ऊँची सतह होती है। आर्टीजन कुओं का जल गहरे कुओं के जल के समान शुद्ध होता है।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 6 जल : स्रोत तथा उपयोग
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(ङ) नलकूप:
भूमि में जल-स्तर को गहराई तक छेदकर लोहे का पाइप डाल दिया जाता है। इस जल को ऊपर खींचने के लिए हाथ के पम्प अथवा विद्युत मशीन का प्रयोग किया जाता है। नलकूपों का प्रयोग सिंचाई एवं पीने के जल की प्राप्ति के लिए किया जाता है। अधिक गहराई वाले (UPBoardSolutions.com) नलकूप का जल प्रायः शुद्ध होता है। 3

प्रश्न 3:
गाँवों में जल-प्राप्ति के मुख्य साधन क्या हैं? वहाँ जल को दूषित होने से किस प्रकार बचाया जा सकता है? .
या
देहात में पेयजल के स्रोत क्या हैं? कुओं और तालाबों का जल किस प्रकार दूषित हो जाता है? इनको दूषित होने से किस प्रकार बचाया जा सकता है?
या
तालाब के जल की अशुद्धियों को रोकने तथा दूर करने के पाँच उपाय लिखिए।
या
नदियों का जल किस प्रकार से दूषित हो जाता है? नदियों के जल को दूषित होने से बचाने के उपायों का भी वर्णन कीजिए।
उत्तर:
गाँवों में जल-प्राप्ति के साधन

नगरों की अपेक्षा गाँवों में पेयजल की व्यवस्था अधिक जटिल है। इसके प्रमुख कारण हैं सुदूर देहात क्षेत्र में नगरपालिका जैसी व्यवस्थित संस्थाओं का न होना तथा उपयुक्त स्वास्थ्य सम्बन्धी शिक्षा का अभाव। अतः ग्रामीण क्षेत्र में न तो गन्दगी के निकास की समुचित व्यवस्था पर कोई विशेष ध्यान दिया जाता है और न ही पेयजल की शुद्धता बनाए रखने के आवश्यक उपाय किए जाते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल के साधन निम्नलिखित हैं –
(1) नदियाँ,
(2) तालाब,
(3) कुएँ,
(4) नलकूप।

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जल-प्राप्ति के इन स्रोतों का जल अशुद्ध होने तथा उसे अशुद्धि से बचाने के उपायों का संक्षिप्त विवरण अग्रलिखित है
(1) नदी का जल:
तीव्र प्रवाह वाली नदियों को जल प्राय: शुद्ध होता है, परन्तु मानवीय क्रियाएँ इसे अशुद्ध कर देती हैं।
जल की अशुद्धि के कारण:

  1. नदी के किनारे बसे नगरों एवं गाँवों की गन्दगी नदी में बहा दिए जाने के कारण इसका जल पीने योग्य नहीं रहता।
  2. नदी के किनारे की जाने वाली खेती से रासायनिक पदार्थ; खाद तथा कीटनाशक ओषधियाँ; नदी के पानी में मिलकर उसे दूषित करते रहते हैं।
  3.  नदी के किनारों पर स्नान करने तथा वस्त्रादि धोने से भी इसका जल अशुद्ध होता रहता है।
  4. पशुओं को नदी में घुसाकर स्नान कराने से जल में गन्दगी की वृद्धि होती है।
  5. नदियों के किनारे पर शवदाह करने तथा अस्थियाँ एवं राख सीधे जल में विसर्जित करने से भी यह जल पीने योग्य नहीं रह जाता।
  6. विभिन्न औद्योगिक संस्थानों द्वारा औद्योगिक अवशेषों तथा व्यर्थ पदार्थों को भी निकटवर्ती नदियों के जल में सीधे प्रवाहित कर दिया जाता है। इससे भी नदियों का जल अशुद्ध एवं दूषित हो जाता है।

बचाव के उपाय:
नदियों के जल को कुछ सामान्य उपाय अपनाकर दूषित होने से बचाया जा सकता है, जो निम्नलिखित हैं

  1. नदियों के जल में मल-मूत्र व अन्य प्रकार की गन्दगी प्रवाहित नहीं करनी चाहिए।
  2. औद्योगिक अवशेषों एवं व्यर्थ पदार्थों से नदियों के जल का बचाव किया जाना चाहिए।
  3.  नदी के किनारे पर स्नान नहीं करना चाहिए तथा नदी के जल में वस्त्रादि धोकर उसकी गन्दगी में वृद्धि नहीं करनी चाहिए।
  4.  पशुओं को नदी में नहीं घुसने देना चाहिए।
  5. नदियों में अस्थियों की राख विसर्जित नहीं करनी चाहिए।
  6.  नदी के किसी साफ तट को छाँटकर वहीं से पेयजल प्राप्त करना चाहिए। नदी के जल को उबालकर पीना स्वास्थ्य के लिए हितकर रहता है।

(2) तालाब का जल:
अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब उपलब्ध होते हैं। तालाबों में मूल रूप से वर्षा का ही जल एकत्र होता है, परन्तु विभिन्न आन्तरिक एवं बाहरी कारणों से तालाबों का जल दूषित हो जाता है; अत: सामान्य रूप से पीने योग्य नहीं रह जाता।
जल की अशुद्धि के कारण:

  1. ग्रामीण इनमें स्नान करते हैं तथा वस्त्रादि धोते हैं।
  2. पशुओं को नहाने व पानी पीने के लिए सीधे ही तालाब में उतार दिया जाता है।
  3. गाँव की नालियों के गन्दे पानी का निकास भी प्राय: तालाब में ही होता है।
  4. पेड़ों की टहनियाँ और पशु-पक्षियों के मल-मूत्र भी (UPBoardSolutions.com) तालाब में सड़ते रहते हैं।
  5. स्थिर अवस्था में रहने के कारण तालाब के जल में मच्छर एवं कुछ कीड़े भी पनपते रहते हैं।

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बचाव के उपाय:
तालाब के जल को कुछ सामान्य उपाय अपनाकर दूषित होने से बचाया जा सकता है। ये महत्त्वपूर्ण उपाय निम्नलिखित हैं

  1. तालाब का निर्माण ऐसे स्थान पर होना चाहिए कि जहाँ पर सार्वजनिक गन्दगियों का निष्कासन क्षेत्र न हो।
  2. तालाब की चहारदीवारी ऊँची होनी चाहिए। इससे आस-पास का गन्दा पानी तालाब में नहीं जा पाता है।
  3. तालाब के चारों ओर काँटेदार बाड़ लगा देनी चाहिए जिससे कि इसमें जानवर न घुस सकें।
  4. नहाने व कपड़े धोने की व्यवस्था तालाब के बाहर इस प्रकार होनी चाहिए कि गन्दा पानी : तालाब में न गिरे।
  5. तालाब से जल प्राप्त करते समय स्वच्छ बर्तनों का प्रयोग करना चाहिए।
  6. तालाब के जल को शुद्ध बनाये रखने के लिए इसमें छोटी-छोटी मछलियाँ छोड़ देनी चाहिए। ये कई प्रकार के हानिकारक कीट-पतंगों को खाकर नष्ट कर देती हैं।
  7. समय-समय पर तालाब की गन्दगी; जैसे–पेड़-पौधों की पत्तियों व टहनियों आदि: को साफ करते रहना चाहिए। इन सभी उपायों को अपनाकर तालाब के पानी को और अधिक अशुद्ध होने से बचाया जा सकता है। वैसे स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह आवश्यक माना जाता है कि तालाब के पानी को किसी घरेलू विधि द्वारा शुद्ध करके ही पीने एवं खाना पकाने के काम में लाना चाहिए।

(3) कुओं का जल:
गहरे कुएँ पेयजल के श्रेष्ठ साधन हैं।
जल की अशुद्धि के कारण:

  1. कुओं के कम गहरे व कच्चे बने होने पर इसके जल के अशुद्ध होने की अधिक सम्भावनाएँ रहती हैं।
  2. ऊपर से ढका न होने के कारण आस-पास के पेड़-पौधों की पत्तियाँ एवं पक्षियों के मल-मूत्र इसके अन्दर सीधे गिरकर सड़ते रहते हैं।
  3.  कुएँ की मेंढ़ पर बैठकर स्नान करने व वस्त्रादि धोने से इनमें गन्दा पानी गिरता रहता है और जल को दूषित करता है।
  4. गन्दे नाले आदि के पास स्थित होने पर कुएँ के पानी में कीड़े व कीटाणु आसानी से पनप जाते हैं।
  5. गन्दे बर्तन व गन्दी रस्सी द्वारा कुएँ से पानी प्राप्त करने से कुएँ के जल की अशुद्धियों में वृद्धि होती है।

बचाव के उपाय:
आदर्श कुएँ का निर्माण कुएँ के जल को पीने योग्य बनाये रखने का एकमात्र उपाय है। आदर्श कुएँ की विशेषताओं का उल्लेख विगत प्रश्न के अन्तर्गत किया जा चुका है।

(4) नलकूप का जल:
नलकूप कुओं का आधुनिकतम एवं सुरक्षित रूप है। नलकूप के जल के अशुद्ध होने के मूल कारण कुएँ से मिलते-जुलते हैं। अतः नलकूप के जल को पीने योग्य बनाए रखने के उपाय भी लगभग उसी प्रकार के हैं; जैसे कि

  1.  नलकूप एक स्वच्छ स्थान (गन्दे नाले व तालाब आदि से दूर) पर निर्मित किए जाने चाहिए।
  2. अधिकाधिक गहराई तक खुदाई करके नलकूप लगाने चाहिए।
  3. नलकूप ऊपर से ढके रहने चाहिए।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
हमें प्रतिदिन कितने जल की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
हमें विभिन्न दैनिक कार्यों को सम्पन्न करने के लिए जले की अनिवार्य रूप से आवश्यकता (UPBoardSolutions.com) होती है। यद्यपि 1-2 लीटर जल जीवित रहने के लिए पर्याप्त है फिर भी प्रति सामान्य व्यक्ति 120-130 लीटर जल प्रतिदिन की निम्नलिखित दैनिक कार्यों के अनुसार आवश्यकता पड़ती है
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प्रश्न 2:
वर्षा के जल की क्या विशेषताएँ हैं? [2008, 15, 16]
उत्तर:
वर्षा को जल नदियों, झीलों तथा कुओं के लिए जल उपलब्धि का महत्त्वपूर्ण स्रोत होता है। कृषि के लिए वर्षा का जल अति महत्त्वपूर्ण स्रोत है। वर्षा का जल आसुत जल के समान होता है। इसकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. वर्षा के जनक बादल हैं जो कि समुद्र, नदियों, तालाबों आदि के जल के वाष्प में परिवर्तित होने से बनते हैं। इस प्रकार वर्षा का जल आसुत जल के समान होता है।
  2. वर्षा का जल रंगहीन, स्वादहीन व शुद्ध होता है।
  3. वर्षा का जल जब वायुमण्डल से गुजर कर पृथ्वी तक पहुँचता है, तो मार्ग में इसमें कार्बन डाइ-ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड्स, अमोनिया इत्यादि गैसों, बीजाणुओं तथा अनेक रोगाणुओं के मिल जाने के कारण यह दुषित व हानिकारक हो जाता है। इसका विकल्प यह है कि एक या होने के पश्चात् इसे पेय जल के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है।
  4. वर्षा का जल कोमल होता है; अतः खाना पकाने, स्नान करने तथा वस्त्रादि धोने के लिए उपयुक्त रहता है।

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प्रश्न 3:
आदर्श कुएँ से क्या तात्पर्य है? [2017, 18]
उत्तर:
गहरे कुएँ से लिया गया जल सभी कार्यों के लिए उपयुक्त होता है और यदि ऐसा उपयुक्त कुआँ हो तो उसे आदर्श कुएँ में बदलने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक है

  1. कुआँ अच्छी भूमि में खुदवाना चाहिए।
  2. कुआँ पक्का होना चाहिए ताकि पानी निकालते समय उसमें मिट्टी न गिरे।
  3. प्रत्येक माह कुएँ के पानी में लाल दवा डालकर सफाई करवानी चाहिए, ताकि कुएँ का जल . दूषित होने से बच सके।
  4. ऐसे कुएँ के ऊपर छतरीनुमा एक छत होनी आवश्यक है, जिससे धूल, मिट्टी, पक्षियों की बीट इत्यादि कुएँ में न गिर सके।
  5. कुएँ के आस-पास का भाग पक्का होना चाहिए जिससे आस-पास का जल कुएँ में गिरकर जल को अशुद्ध न कर सके।

प्रश्न 4:
जल-संभरण से क्या तात्पर्य है? स्वास्थ्य की दृष्टि से इसकी क्या व्यवस्था होनी चाहिए?
उत्तर:
नगरों तथा महानगरों में जल-आपूर्ति की व्यवस्था को जल-संभरण कहते हैं। यहाँ यह व्यवस्था जल निगम द्वारा की जाती है। ये जल निगम स्वायत्त विभाग के रूप में अथवा नगरपालिकाओं के विभाग के अन्तर्गत कार्य करते हैं। छोटे गाँवों और कस्बों में, जहाँ सार्वजनिक जल-वितरण की सुविधा उपलब्ध नहीं है, जल आपूर्ति का मुख्य स्रोत कुएँ, तालाब, झील, पोखर और नदियाँ हैं।
जल निगम सार्वजनिक उपक्रम होते हैं। ये नागरिकों को उनके घरों तक शुद्ध जल (UPBoardSolutions.com) की आपूर्ति की सुचारु व्यवस्था करते हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से ये निम्नलिखित व्यवस्थाएँ बनाए रखते हैं

  1. जल का आवश्यक संग्रह,
  2.  जेल की अघुलित अशुद्धियों को दूर करना,
  3. कीटाणुनाशकों; जैसे – क्लोरीन व ओजोन गैस, पोटैशियम परमैंगनेट तथा पराबैंगनी किरणों आदि; का प्रयोग कर जल को रोगाणुओं से मुक्त रखना।
    दूसरी ओर प्राकृतिक साधनों से प्राप्त जल में अनेक प्रकार की अशुद्धियाँ होती हैं तथा उसमें रोगजनक कीटाणुओं के होने की भी पूरी सम्भावना रहती है। ऐसे जल को उपयुक्त विधि द्वारा शुद्ध करके उसका प्रयोग करना चाहिए तथा पेय जल को ढककर रखना चाहिए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
मनुष्य के लिए जल मुख्य रूप से किस रूप में आवश्यक है।
उत्तर:
मनुष्य की प्यास शान्त करने के साधन के रूप में जल मुख्य रूप से आवश्यक है।

प्रश्न 2:
जल के दो महत्त्वपूर्ण शारीरिक उपयोग बताइए। [2011, 13]
उत्तर:
विभिन्न आन्तरिक शारीरिक क्रियाओं (पाचन, उत्सर्जन, रक्त-संचालन आदि) तथा शरीर की बाहरी स्वच्छता के साधन के रूप में जल उपयोगी है।

प्रश्न 3:
जल का संगठन क्या है? [2011]
उत्तर:
जल एक यौगिक है। इसमें दो भाग हाइड्रोजन तथा एक भाग ऑक्सीजन विद्यमान है।

प्रश्न 4:
H2O किसका रासायनिक सूत्र है? [2013, 14]
उत्तर:
H2O जल का रासायनिक सूत्र है।

प्रश्न 5:
जल की विभिन्न अवस्थाएँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर:
जल की तीन अवस्थाएँ होती हैं – ठोस, द्रव तथा गैस।

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प्रश्न 6:
जल-प्राप्ति के मुख्य स्रोत कौन-कौन से हैं? [2007, 10, 11, 12, 13, 14]
या
प्राकृतिक जल के विभिन्न स्रोत लिखिए। [2008]
उत्तर:
समुद्र, वर्षा, नदियाँ, तालाब, झीलें, कुएँ तथा झरने जल-प्राप्ति के मुख्य स्रोत हैं।

प्रश्न 7:
जल का विशालतम स्रोत क्या है?
उत्तर:
समुद्र भूमण्डले पर जल का विशालतम स्रोत है।

प्रश्न 8:
गन्धकयुक्त जल किसके लिए लाभकारी होता है?
उत्तर:
गन्धकयुक्त जल त्वचा के लिए लाभकारी होता है।

प्रश्न 9:
कुएँ कितने प्रकार के होते हैं? [2018]
उत्तर:
कुएँ के मुख्य प्रकार हैं-उथले कुएँ, गहरे कुएँ, आदर्श कुएँ तथा आर्टीजन कुएँ।

प्रश्न 10:
एक आदर्श कुआँ खोदने के लिए किस स्थान का चुनाव उपयुक्त होगा?
उत्तर:
सामान्य रूप से साफ, ऊँचे एवं गन्दे तथा खत्ते आदि (UPBoardSolutions.com) से दूर स्थित स्थान पर ही आदर्श कुआँ खोदा जा सकता है।

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प्रश्न 11:
नदियों के जल की क्या विशेषताएँ होती हैं? [2011]
उत्तर:
अपने उद्गम स्थल पर नदियों का जल शुद्ध होता है परन्तु बस्तियों एवं औद्योगिक क्षेत्रों से गुजरने पर यह जल प्रदूषित हो जाता है। अतः नदियों के जल को शुद्ध करके ही पीने के काम में लाना चाहिए।

प्रश्न 12:
पाताल-तोड़ कुआँ किसे कहते हैं? [2007]
उत्तर:
पाताल-तोड़ कुएँ आर्टीजन कुएँ ही कहलाते हैं। इन कुओं का जल बहुत गहरे में जाकर होता है। इन कुओं का जल पृथ्वी के नीचे से दबाव के कारण स्वतः ही निकला करता है।

प्रश्न 13:
घरेलू स्तर पर अधिक जल नष्ट होने से बचाने के दो उपाय लिखिए। [2009, 13, 18]
उत्तर:
(1) नल की टोंटियों को अनावश्यक रूप से नहीं खोलना चाहिए।
(2) कपड़े धोने के बाद बचे हुए जल को टॉयलेट में डालना चाहिए जिससे टॉयलेट की सफाई भी हो जाती है और जल की बचत भी हो जाती है।

प्रश्न 14:
विश्व जल दिवस कब मनाया जाता है? [2014]
उत्तर:
विश्व जल दिवस प्रतिवर्ष 22 मार्च को मनाया जाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न:
निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. हमारे लिए जल उपयोगी है
(क) प्यास बुझाने के लिए।
(ख) भोजन पकाने के लिए
(ग) शारीरिक सफाई के लिए
(घ) इन सभी कार्यों के लिए

2. जल अपने आप में क्या है?
(क) तत्त्व
(ख) मिश्रण
(ग) यौगिक
(घ) न मिश्रण न यौगिक

3. जल का रासायनिक सूत्र है [2010, 11, 12, 13, 14, 15]
(क) HO
(ख) HO2
(ग) H2O
(घ) H2O2

4. समुद्र का जल होता है
(क) स्वादिष्ट
(ख) खारा
(ग) मीठा
(घ) खट्टा

5. सर्वोत्तम कुआँ माना जाता है
(क) कच्चा एवं उथला कुआँ
(ख) पक्का एवं गहरा कुआँ
(ग) नाले के निकट स्थित कुआँ
(घ) ये सभी

6. कुएँ के जल को शुद्ध करने के लिए क्या डालते हैं? [2012]
(क) पोटैशियम परमैंगनेट
(ख) ब्लीचिंग पाउडर
(ग) गन्धक
(घ) डी० डी० टी०

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7. तालाब का जल नहीं माना जाता
(क) स्नान करने योग्य
(ख) पीने योग्य
(ग) कपड़े धोने योग्य
(घ) किसी अन्य कार्य को करने योग्य

8. झील का जल पीना चाहिए
(क) ठण्डा करके
(ख) छानकर
(ग) उबालकर
(घ) यूँ ही

9. जल रक्त को बनाए रखता है
(क) ठण्डा
(ख) गर्म
(ग) गाढ़ा
(घ) तरल

10. मानव शरीर में जल का प्रतिशत है [2015, 16]
(क) 50 – 60%
(ख) 70 – 75%
(ग) 80 – 90%
(घ) 100%

उत्तर:
1. (घ) इन सभी कार्यों के लिए,
2. (ग) यौगिक,
3. (ग) H2O
4. (ख) खारा,
5. (ख) पक्का एवं गहरा कुओं,
6. (क). पोटेशियम परमैंगनेट,
7. (ख) पीने योग्य,
8. (ग) उबालकर,
9. (घ) तरल,
10. (ख) 70 – 75%

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