UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 11 सामान्य संक्रामक रोगों का परिचय

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
संक्रामक रोग किसे कहते हैं? संक्रामक रोग किस प्रकार से फैलते हैं? इनसे बचाव के उपायों का वर्णन कीजिए।
या
संक्रामक रोग किसे कहते हैं? कुछ संक्रामक रोगों के नाम लिखिए। [2009, 10, 13, 15, 17, 18]
या
छूत के रोग (संक्रामक रोग) कैसे फैलते हैं। किन्हीं तीन छूत के रोगों के नाम लिखिए। इन्हें फैलने से कैसे रोका जा सकता है?
या
संक्रामक रोग क्या हैं? दो संक्रामक रोगों के लक्षण एवं उपचार बताइए। [2008]
या
वायु द्वारा रोग कैसे फैलते हैं? वर्णन कीजिए। [2013, 15]
या
संक्रामक रोग किन-किन माध्यमों से फैलते हैं? [2007, 09, 11, 15]
या
संक्रामक रोगों की रोकथाम के मुख्य उपाय लिखिए। [2015]
उत्तर:
संक्रामक रोग का अर्थ
रोग अनेक प्रकार के होते हैं। कुछ रोग शरीर के विभिन्न अंगों के सही कार्य न करने के कारण उत्पन्न होते हैं तथा कुछ रोग पोषक तत्वों के अभाव के कारण हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य विशेष प्रकार के रोग भी होते हैं जो विभिन्न प्रकार (UPBoardSolutions.com) के बैक्टीरिया या रोग के जीवाणुओं द्वारा ही पनपते हैं। ऐसे रोग एक व्यक्ति अथवा प्राणी से दूसरे व्यक्ति या प्राणी को लग जाते हैं। इस प्रकार के रोगों को संक्रामक रोग (Infectious diseases) कहा जाता है। इस प्रकार वे रोग जो जीवाणुओं के माध्यम से एक व्यक्ति अथवा प्राणी से दूसरे व्यक्ति अथवा प्राणी को लग जाते हैं, संक्रामक रोग कहलाते हैं। साधारण बोलचाल की भाषा में इन रोगों को छूत के रोग भी कहा जाता है। एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक इस प्रकार के रोगों के फैलने को रोग का संक्रमण कहा जाता है।

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संक्रामक रोगों को फैलाने के माध्यम
संक्रामक रोग बड़ी तेजी से व्यापक क्षेत्र में फैल जाते हैं। वास्तव में संक्रामक रोगों को उत्पन्न करने वाले रोगाणु या जीवाणु विभिन्न माध्यमों द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैल जाते हैं। संक्रामक रोग मुख्य रूप से निम्नलिखित माध्यमों के द्वारा फैलते हैं|

(1) वायु द्वारा:
धूल के कणों के साथ-साथ वायु रोगाणुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाती रहती है। इसके अतिरिक्त अनेक रोगाणु व बीजाणु एक लम्बी अवधि तक वायु में निलम्बित रहते हैं। इस प्रकार की अशुद्ध वायु में साँस लेने से अनेक रोग हो जाते हैं। वायु द्वारा फैलने वाले रोग हैं- चेचक, इन्फ्लुएन्जा, खसरा, काली खाँसी, क्षय रोग इत्यादि।

(2) भोजन तथा जल द्वारा:
जल में संक्रमित होने से, मक्खियों व अन्य कीट-पतंगों द्वारा रोगाणु जल तथा भोजन में पहुँचकर पनप जाते हैं। रोगाणुयुक्त भोजन अथवा जल का सेवन करने से अनेक प्रकार के संक्रामक रोग फैलते हैं। उदाहरण-हैजा, मोतीझरा, पेचिश, अतिसार आदि।

(3) सम्पर्क द्वारा:
कुछ संक्रामक रोग एवं उनके रोगाणु प्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा भी फैलते हैं। जब कोई स्वस्थ व्यक्ति किसी रोगी व्यक्ति के सीधे सम्पर्क में आता है तो रोग के कीटाणु स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में भी प्रवेश कर जाते हैं। सामान्य रूप से त्वचा सम्बन्धी रोग सम्पर्क द्वारा ही फैलते हैं। दाद, खारिश, खुजली तथा एग्जीमा रोग सम्पर्क द्वारा ही फैलते हैं। वर्तमान समय में एड्स तथा हेपेटाइटिस ‘बी’ जैसे गम्भीर एवं घातक रोग भी प्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा ही फैल रहे हैं।

(4) रक्त द्वारा या कीड़ों के काटने के द्वारा:
कुछ संक्रामक रोगों के कीटाणु व्यक्ति के शरीर में सीधे रक्त में प्रवेश करके पहुँचते हैं। ये कीटाणु विभिन्न प्रकार के मच्छरों, पिस्सुओं, मक्खियों अथवा पशुओं के माध्यम से फैलते हैं। सामान्य रूप से ये कीट या मच्छर आदि किसी रोगी व्यक्ति के शरीर का खून चूसते हैं। इस स्थिति में रोग के कीटाणु इनके शरीर में पहुँच जाते हैं। इसके उपरान्त ये कीट जब किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटते हैं, तो इनके शरीर से सम्बन्धित रोग के कीटाणु स्वस्थ व्यक्ति के रक्त में पहुँच जाते हैं तथा वहाँ पहुँचकर बड़ी तेजी से बढ़ने लगते हैं तथा व्यक्ति रोग का शिकार हो जाता है। मलेरिया, डेंगू, प्लेग तथा पीत-ज्वर इसी प्रकार से फैलने वाले (UPBoardSolutions.com) रोग हैं। इनसे भिन्न हाइड्रोफोबिया नामक भयंकर रोग कुत्ते आदि पशुओं द्वारा काटे जाने पर रक्त में रोगाणु मिल जाने से ही उत्पन्न होता है।

बचाव के उपाय:
संक्रामक रोगों को फैलने से रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जाने चाहिए

  1. संक्रांमक रोग से ग्रसित रोगियों को अविलम्ब अस्पताल में ले जाना चाहिए और यदि यह सम्भव न हो, तो उन्हें अन्य व्यक्तियों से पृथक् किसी स्वच्छ कमरे में रखना चाहिए।
  2.  रोग परिचर्या से सम्बन्धित व्यक्तियों को रोग प्रतिरोधक टीके आवश्यक रूप से तत्काल लगवाने चाहिए।
  3. आवासीय स्थानों पर मक्खियों, मच्छरों एवं अन्य कीटों को समय-समय पर नष्ट करने के उपाय करते रहना चाहिए।
  4. ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में रोगाणुमुक्त पेय जल की उपयुक्त व्यवस्था होनी चाहिए।
  5. राष्ट्रीय स्तर पर रोग-प्रतिरोधक टीकों की व्यवस्था की जानी चाहिए तथा जन-सामान्य में इसके प्रति अभिरुचि जाग्रत करने के प्रयास किए जाने चाहिए।
  6. संक्रामक रोग के फैलने की सूचना तुरन्त निकटतम स्वास्थ्य (UPBoardSolutions.com) अधिकारी को दी जानी चाहिए।
  7. विभिन्न उपायों द्वारा रोगाणुनाशन का कार्य यथासम्भव व्यापक स्तर पर किया जाना चाहिए।
  8. सभी बच्चों को विभिन्न संक्रामक रोगों से बचाव के सभी टीके निर्धारित समय पर अवश्य लगवाए जाने चाहिए।

प्रश्न 2:
चेचक (Smallpox) नामक संक्रामक रोग के लक्षणों, फैलने के कारणों, बचाव के उपायों एवं उपचार का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए। [2011]
या
चेचक रोग के कारण, लक्षण और बचाव के उपाय लिखिए। [2011, 13, 15]
उत्तर:
चेचक

संक्रामक रोगों में चेचक एक अत्यधिक भयंकर एवं घातक रोग है। अब से कुछ वर्ष पूर्व तक भारतवर्ष में इस संक्रामक रोग को काफी अधिक प्रकोप रहता था। प्रतिवर्ष लाखों व्यक्ति इस रोग से पीड़ित हुआ करते थे तथा हजारों की मृत्यु हो जाती थी, परन्तु अब सरकार के व्यवस्थित प्रयास से हमारे देश में चेचक पर काफी हद तक नियन्त्रण पा लिया गया है। चेचक को जड़ से ही समाप्त करना हमारा उद्देश्य है। चेचक को स्थानीय बोलचाल की भाषा में बड़ी माता भी कहा जाता है।

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लक्षण:

  1.  शरीर में चेचक के रोगाणु सक्रिय होते ही व्यक्ति को तेज ज्वर होता है। सारे शरीर में पीड़ा होती है तथा नाक से पानी बहने लगता है।
  2.  इस काल में ही कभी-कभी जी मिचलाने लगता है और उल्टी भी आ जाती है।
  3. चेचक के लक्षण प्रकट होते ही आँखें लाल हो जाती हैं तथा बहुत अधिक बेचैनी अनुभव की जाती है।
  4. इसके बाद चेचक के दाने निकलने लगते हैं। सबसे पहले चेहरे पर लाल रंग के दाने दिखाई देते हैं। धीरे-धीरे ये दाने हाथ-पाँव, पेट तथा सारे ही शरीर पर निकल आते हैं।
  5. चेचक के दाने प्रारम्भ में लाल रंग के होते हैं। धीरे-धीरे ये फूलने लगते हैं तथा इनमें एक प्रकार का तरल पदार्थ भर जाता है जो धीरे-धीरे मवाद में बदल जाता है। दानों का यह भयंकर प्रकोप लगभग एक सप्ताह तक रहता है।
  6. एक सप्ताह बाद चेचक का प्रकोप घटने लगता है, ज्वर भी घट जाता है तथा दाने धीरे-धीरे सूखने लगते हैं, परन्तु शरीर में असह्य पीड़ा, खुजलाहट तथा जलन होती है। कभी-कभी शरीर पर सूजन भी आ जाती है।
  7. इसके बाद चेचक के दानों का मवाद सूखने लगता है तथा दानों पर पपड़ी-सी बन जाती है। जो बाद में सूखकर गिरने लगती है। पूरे शरीर से यह पपड़ी सूखकर गिर जाने के बाद ही रोगी स्वस्थ हो पाता है। |

चेचक का फैलना:
चेचक वायु के माध्यम से फैलने वाला संक्रामक रोग है। यह रोग एक विषाणु (Virus) द्वारा फैलता है, जिसे वरियोला वायरस कहते हैं। रोगी व्यक्ति के साँस, खाँसी, बलगम के अतिरिक्त उसके दानों की मवाद, खुरण्ड, कै, मल एवं मूत्र से भी चेचक के विषाणु वायु में व्याप्त हो जाते हैं तथा शीघ्र ही सब ओर फैल जाते हैं जिससे अनेक व्यक्ति प्रभावित होने लगते हैं। रोगी के सीधे सम्पर्क द्वारा भी चेचक फैल सकती है। चेचक के फैलने का मुख्य काल (UPBoardSolutions.com) नवम्बर से मई तक होता है। चेचक नामक रोग का सम्प्राप्ति काल या उद्भवन अवधि सामान्य रूप से 10 से 12 दिन होती है।

बचाव के उपाय:
यह सत्य है कि चेचक का उपचार नहीं हो सकता, परन्तु इस रोग से बचाव के उपाय किए जा सकते हैं। इस रोग से बचाव के पर्याप्त उपाय कर लिए जाएँ तो इस संक्रामक रोग को फैलने से रोका जा सकता है। चेचक से बचाव तथा इसको फैलने से रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं—-

  1. चेचक के रोग से बचने के लिए चेचक का टीका अवश्य लगवा लेना चाहिए। इस बात का प्रयास करना चाहिए कि हर व्यक्ति को समय पर चेचक का टीका लग जाए।
  2. चेचक के रोगी को बिल्कुल अलग रखना चाहिए, अन्य व्यक्तियों विशेष रूप से बच्चों को उसके सम्पर्क में नहीं आना चाहिए।
  3. चेचक के लक्षण दिखाई देते ही किसी अच्छे चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए तथा चिकित्सक के निर्देश के अनुसार ही परिचर्या करनी चाहिए।
  4. चेचक के रोगी द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले बर्तनों एवं अन्य वस्तुओं को बिल्कुल अलग रखना चाहिए।
  5. चेचक के रोगी के मल-मूत्र, थूक तथा कै आदि को अलग रखना चाहिए तथा उसमें कोई तेज विसंक्रामक तत्त्व डालकर या तो जमीन में गाड़ देना चाहिए अथवा जला देना चाहिए।
  6. रोगी की सेवा का कार्य करने वाले व्यक्ति को पहले से ही चेचक का टीका लगवा देना चाहिए। इस व्यक्ति को भी अन्य व्यक्तियों के सम्पर्क से बचना चाहिए।
  7. रोगी के दानों पर से उतरने वाली पपड़ियों को सावधानी से एकत्र करके जला देना चाहिए।

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उपचार:
सामान्य रूप से चेचक के रोग के निवारण के लिए कोई भी औषधि नहीं दी जाती। यह रोग निश्चित अवधि के उपरान्त अपने आप ही समाप्त होता है, परन्तु कुछ उपचारों द्वारा इस रोग की भयंकरता से बचा जा सकता है तथा रोग से होने वाले अन्य कष्टों को कम किया जा सकता है। चेचक के रोगी को हर प्रकार से अलग रखना अनिवार्य है। उसे हर प्रकार की सुविधा दी जानी चाहिए। रोगी के कमरे में अधिक प्रकाश नहीं होना चाहिए, क्योंकि रोशनी से (UPBoardSolutions.com) आँखों में चौंध लगती है जिसका नजर पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। चेचक के रोगी को पीने के लिए उबला हुआ पानी तथा हल्का आहार ही देना चाहिए। रोगी से सहानुभूतिमय व्यवहार करना चाहिए। किसी, चिकित्सक की राय से कोई अच्छी मरहम भी दानों पर लगाई जा सकती है। रोगी को सुझाव देना चाहिए कि वह दानों को खुजलाए नहीं।

प्रश्न 3:
डिफ्थीरिया (Liphtheria) नामक रोग के लक्षणों, संक्रमण, उपचार एवं बचाव के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
डिफ्थीरिया

डिफ्थीरिया भी एक भयंकर रोग है। इस रोग को भी वायु द्वारा संक्रमित होने वाले रोगों की श्रेणी में रखा जाता है। यह रोग प्रायः बच्चों को ही होता है। इस रोग के विषय में विस्तृत जानकारी निम्नलिखित है

कारण:
यह रोग जीवाणु जनित है। कोरीनीबैक्टीरियम डिफ्थीरी नामक जीवाणु इस रोग की उत्पत्ति का कारण है। यह एक भयानक संक्रामक रोग है जोकि प्राय: 2-5 वर्ष की आयु के बच्चों में अधिक होता है। यह रोग बहुधा शीत ऋतु में होता है। इस रोग का उद्भवन काल प्राय: 2-3 दिन तक होता है।

लक्षण:
इस रोग का प्रारम्भ रोगी की नाक व गले से होता है। इसके प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं

  1. प्रारम्भ में गले में दर्द होता है और फिर सूजन आ जाती है तथा घाव बन जाते हैं।
  2. शरीर का तापक्रम 101°-104° फारेनहाइट तक हो जाता है, परन्तु रोग बढ़ने पर यह कम हो जाता है।
  3. टॉन्सिल व कोमल तालू पर झिल्ली बन जाती (UPBoardSolutions.com) है, जोकि श्वसन-क्रिया में अवरोधक होती है। इसके कारण रोगी दम घुटने का अनुभव करता है।
  4.  रोगी को बोलने तथा खाने-पीने में कठिनाई होती है।
  5.  रोगी के शरीर के अंगों को लकवा मार जाता है।
  6. जीवाणुओं का अतिक्रमण फेफड़ों तथा हृदय तक होता है, जिससे बहुधा रोगी की मृत्यु हो जाती है।

संक्रमण:
इस रोग की संवाहक वायु है। रोगी के बोलने, खाँसने एवं छींकने से जीवाणु वायु में मिलकर अन्य व्यक्तियों तक पहुंचते हैं। रोगी द्वारा प्रयुक्त वस्त्रों, जूठे बचे पेय एवं खाद्य पदार्थों के
माध्यम से भी यह रोग स्वस्थ व्यक्तियों में संक्रमित हो सकता है।

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बचाव एवं उपचार:
रोग के लक्षण प्रकट होते ही रोगी को तुरन्त पास के अस्पताल में ले जाना चाहिए। रोग से बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय करना सदैव लाभप्रद रहता है

  1. स्वस्थ व्यक्तियों विशेष रूप से छोटे बच्चों को रोगी से दूर रहना चाहिए।
  2. रोगी द्वारा प्रयुक्त वस्तुओं को सावधानीपूर्वक नष्ट कर देना चाहिए।
  3.  रोगी की परिचर्या करने वाले व्यक्ति को तथा घर के अन्य बच्चों को डिफ्थीरियाएण्टीटॉक्सिन इन्जेक्शन लगवाने चाहिए।
  4. स्वच्छ एवं स्वस्थ रहन-सहन द्वारा रोग-प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है; अतः वातावरण की स्वच्छता एवं निद्रा व विश्राम का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
  5. रोगी को उबालकर ठण्डा किया हुआ जल देना चाहिए।
  6. नमक मिले जल से नाक, गले व मुंह को साफ करना चाहिए।
  7. सिरदर्द एवं अधिक तापक्रम होने पर माथे व सिर पर शीतल जल की पट्टी रखना लाभकारी रहता है।
  8. रोगी को पर्याप्त मात्रा में द्रव (Liquid) पिलाना चाहिए।
  9. मधु में लहसुन का रस मिलाकरे रोगी के गले पर लेप करना उचित रहता है।
  10. रोगमुक्त होने के पश्चात् भी रोगी को कम-से-कम दस दिन तक पूर्ण विश्राम करना चाहिए।
  11. रोगी के प्रभावित अंगों की मालिश करना प्रायः लाभप्रद रहता है।

प्रश्न 4:
तपेदिक (Tuberculosis) नामक रोग के फैलने के कारणों, लक्षणों तथा उपचार के उपायों का वर्णन कीजिए। [2007, 09, 10, 13]
या
क्षय रोग के सामान्य लक्षण एवं रोकथाम के उपाय लिखिए। [2007, 09, 10, 11, 12, 16]
या
क्षय रोग के कारण, लक्षण और बचाव के उपाय लिखिए। क्षय रोग के रोगी को क्या विशेष भोजन देना चाहिए?
या
किसी एक संक्रामक रोग के कारण, लक्षण एवं बचने के उपाय लिखिए। [2007, 12, 13, 14, 18]
उत्तर:
तपेदिक (क्षय रोग)

यह अत्यन्त दुष्कर विश्वव्यापी संक्रामक रोग है जो आधुनिक वैज्ञानिक अनुसन्धानों के बावजूद भी नियन्त्रण में नहीं आ रहा है तथा उत्तरोत्तर वृद्धि कर रहा है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, तपेदिक के विश्व के सम्पूर्ण रोगियों के एक-तिहाई भारत में हैं। इस रोग को ‘Captain of Death’ कहते हैं। इस रोग में मनुष्य के शरीर का शनैः-शनैः क्षय होता रहता है तथा इसमें घुल-घुलकर मनुष्य अन्ततोगत्वा मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। (UPBoardSolutions.com) इसी कारण से इसे क्षय रोग भी कहते हैं। वैसे अब यह रोग असाध्य नहीं रहा। इसका पूर्ण उपचार सम्भव है। नियमित रूप से निर्धारित अवधि तक उचित औषधियाँ लेने तथा आहार-विहार को नियमित करके रोग से छुटकारा पाया जा सकता है। |

इस रोग के कई रूप हैं: फेफड़ों की तपेदिक, आँतों की तपेदिक, अस्थियों की तपेदिक तथा ग्रन्थियों की तपेदिक। इनमें सर्वाधिक प्रचलित फेफड़ों की तपेदिक है, जिसे पल्मोनरी टी० बी० (Pulmonary TB.) भी कहते हैं।

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फैलने के कारण: इस रोग का जीवाणु ट्युबरकल बैसिलस (Tubercle bacillus) कहलाता है। इसका आकार मुड़े हुए दण्ड के समान होता है। सन् 1882 में सर्वप्रथम रॉबर्ट कॉक ने रोगियों के बलगम में इसे देखा तथा इसी जीवाणु को रोग का कारण बताया। ये जीवाणु सीलन वाले तथा अँधेरे स्थानों में बहुत दिन तक जीवित रह सकते हैं, किन्तु धूप लगने से ये शीघ्रता से नष्ट हो जाते हैं। साधारणत: यह रोग वायु या श्वास द्वारा ही फैलता है। रोगी के जूठे भोजन, जूठे सिगरेट-हुक्के, उसके वस्त्रों तथा बर्तनों में भी रोग के कीटाणु आकर रोग को फैला देते हैं। मक्खियाँ भी इस रोग के जीवाणुओं को अपने साथ उड़ाकर ले जाती हैं और साफ भोजन को दूषित कर इस रोग को फैला देती हैं।

तंग स्थानों व बस्तियों में जहाँ प्रकाश की उचित मात्रा नहीं पहुँचती, रहने वाले नागरिक शीघ्रता से इस बीमारी के शिकार बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, निर्धनता, परदा-प्रथा, बाल-विवाह, अपौष्टिक भोजन और वंश-परम्परा भी इस रोग को फैलाने में सहायक होते हैं। सड़कों पर पत्थर तोड़ने वाले मजदूरों, चमड़े तथा टिन का कार्य करने वाले श्रमिकों तथा भरपेट भोजन न प्राप्त कर सकने वाले व्यक्तियों को भी यह रोग शीघ्रता से ग्रस्त कर लेता है। बहुत अधिक मानसिक क्लेशों के व्याप्त रहने तथा मादक द्रव्यों का अत्यधिक सेवन करने से भी यह रोग जन्म लेता है। गायों को यह रोग शीघ्रता से लता है तथा इस रोग से ग्रस्त गायों का दूध पीने से भी यह रोग हो सकता है।

उदभवन-काल:
इस रोग के जीवाणु शरीर में पहुँचकर धीरे-धीरे बढ़ते तथा अपना प्रभाव जमाते हैं। रोग के काफी बढ़ जाने पर ही इसका पता लगता है।

रूप और लक्षण:
प्रारम्भ में शरीर में हर समय हल्का ज्वर रहता है। शरीर के अंग शिथिल रहते हैं। हल्की खाँसी रहती है। रोगी का भार धीरे-धीरे कम हो जाता है और उसे भूख भी कम लगती है। किसी शारीरिक अथवा मानसिक कार्य को करने से अत्यधिक थकान हो जाती है। रोगी को हर समय आलस्य का अनुभव होता है। कभी-कभी मुख से बलगम के साथ रक्त आता है। फेफड़ों का एक्स-रे (X-Ray) चित्र स्पष्ट रूप से रोग का प्रभाव बतलाता है। (UPBoardSolutions.com) अस्थियों की तपेदिक में रोगी की अस्थियाँ निर्जीव हो जाती हैं तथा उनकी वृद्धि रुक जाती है। आँतों की तपेदिक में आरम्भ में दस्त बहत होते हैं। रोग काफी बढ़ जाने पर ही पहचान में आता है।

उपचार तथा बचाव

  1. (1) इस रोग वाले व्यक्ति को तुरन्त किसी क्षय-चिकित्सालय (T:B. sanatorium) में भेजना चाहिए, परन्तु यदि रोगी को घर में ही रखना पड़े, तो उसके सम्पर्क से दूर रहना चाहिए।
  2. (2) रोगी को शुद्ध वायु तथा धूप से युक्त कमरे में रखना चाहिए। उसके खाने-पीने के बर्तन पृथक् होने चाहिए। रोगी के परिचारकों को अपना मुंह तथा नाक ढककर रोगी के पास जाना चाहिए।
  3. (3) रोगी के आस-पास का वातावरण बिल्कुल स्वच्छ रखना चाहिए। उसका थूक, बलगम आदि ऐसे बर्तन में पड़ना चाहिए जो नि:संक्रामक विलयन से भरा हुआ हो। उसके कपड़ों को भी नि:संक्रामकों से धो देना चाहिए।
  4. (4) B.C.G. का टीका लगवाना चाहिए। इस टीके को लगवाकर सामान्य रूप से क्षय रोग से बचा जा सकता हैं। स्वच्छ वातावरण, सन्तुलित पौष्टिक आहार तथा साधारण व्यायाम भी इस रोग से बचाव में सहायक होते हैं।
  5. (5) रोगी को शुद्ध एवं नियमित जीवन व्यतीत करते हुए ताजे फल तथा उत्तम स्वास्थ्यप्रद एवं सुपाच्य भोजन देना चाहिए।

प्रश्न 5:
टिटनेस (Tetanus) रोग के कारण, लक्षण और इससे बचाव के उपाय बताइए। [2011, 12, 14]
या
टिटनेस होने के क्या कारण हैं? टिटनेस के लक्षण, रोकथाम और उपचार लिखिए। [2011, 12]
उत्तर:
टिटनेस या धनु रोग अथवा हनुस्तम्भ रोग

कारण: यह रोग क्लॉस्ट्रीडियम टिटेनाइ नामक जीवाणु द्वारा होता है। ये जीवाणु घोड़ों की लीद, गोबर, मिट्टी व जंग खाए लोहे पर पनपते हैं। शरीर में कहीं भी चोट लगने, त्वचा के छिलने अथवा फटने पर तथा उपर्युक्त वस्तुओं के सम्पर्क में आने पर (UPBoardSolutions.com) जीवाणु शरीर के अन्दर प्रवेश कर जाते

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सम्प्राप्ति काल: 2 से 14 दिन तक।
लक्षण: इस रोग के निम्नलिखित लक्षण हैं

  1.  रीढ़ की हड्डी धनुष के आकार की हो जाती है। इसी कारण से इसका नाम धनु रोग अथवा हनुस्तम्भ रोग रखा गया है।
  2. मांसपेशियों के फैलने व सिकुड़ने की क्षमता शून्य हो जाती है तथा ये अकड़ जाती हैं।
  3. गर्दन की मांसपेशियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं तथा जबड़ा जकड़ जाता है। इस अवस्था को बन्द जबड़ा (लॉक्ड-जॉ) कहते हैं।
  4. अन्तिम अवस्था में रोगी के फेफड़े व हृदय काम करना बन्द कर देते हैं तथा रोगी की मृत्यु हो जाती है।
  5. यह रोग इतना भयानक है कि थोड़ी-सी भी असावधानी होने पर प्रसव के समय माँ व शिशु दोनों को अपना शिकार बना लेता है।

उपचार एवं बचाव: इस रोग के उपचार निम्नलिखित हैं

  1. रोग के प्रथम लक्षण प्रकट होते ही रोगी को तुरन्त पास के अस्पताल में ले जाना चाहिए।
  2.  प्रसव के समय माँ को तथा इसके बाद 3 से 5 माह के बच्चे को टिटनेस का टीका लगवा देना चाहिए।
  3. त्वचा फटने, छिलने व घाव होने पर 24 घण्टों के अन्दर टैटवैक का इन्जेक्शन लगवा लेना चाहिए। इस इन्जेक्शन का प्रभाव लगभग 6 माह तक रहता है।
  4. किसी भी स्थिति में घाव खुला नहीं रहना चाहिए।
  5.  घाव अथवा त्वचा के फटने के स्थान को मिट्टी, लोहे व गोबर आदि के सम्पर्क से सुरक्षित । रखना चाहिए।
  6. घाव अथवा त्वच के फटने अथवा छिलने के स्थान एवं इसके (UPBoardSolutions.com) आस-पास के भाग को सैवलॉन अथवा डेटॉल से अच्छी तरह से साफ करना चाहिए। जीवाणुमुक्त रुई से घाव को ढककर पट्टी बाँध देनी चाहिए।
  7. किसी भी रोग में इन्जेक्शन लगवाते समय इस बात को निश्चित कर लें कि इन्जेक्शन लगाने वाले चिकित्सक अथवा उसके परिचारक ने इन्जेक्शन-निडिल को भली प्रकार जीवाणुरहित (स्टेरीलाइज) कर लिया है।

प्रश्न 6:
विषाक्त भोजन (Food poisoning) से क्या तात्पर्य है? भोजन के विषाक्त होने के कारण, लक्षण एवं उपचार की विधियाँ लिखिए। [2011]
या
भोजन विषैला होने के कारण, लक्षण तथा इससे बचाव के उपाय बताइए। [2007, 10, 11, 12]
या
भोजन दूषित होने के विभिन्न कारणों को लिखिए । मनुष्य में भोज्य विषाक्तता के लक्षण भी लिखिए। [2007]
या
विषाक्त भोजन से आप क्या समझती हैं? विषाक्त भोजन से मानव शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है? [2008, 10, 11, 13, 15, 16]
या
भोजन विषाक्तता से आप क्या समझती हैं? भोजन विषाक्तता के लक्षण बताइए। भोजन विषाक्तता से बचने के लिए क्या उपाय करने चाहिए? [2007, 10, 11, 12, 13]
या
विषाक्त भोजन की हानियाँ लिखिए [2016]
उत्तर:

विषाक्त भोजन:
अर्थपूर्ण रूप से स्वच्छ, पौष्टिक तथा उपयुक्त दिखायी देने वाले भोज्य पदार्थ भी कभी-कभी व्यक्ति को रोगी बना सकते हैं। सामान्यतः ऐसे भोजन में कोई-न-कोई पदार्थ व्यक्ति को ग्राह्य नहीं होता। इसका मुख्य कारण होता है, भोजन के अन्दर उपस्थित ऐसे पदार्थ (UPBoardSolutions.com) जो व्यक्ति के शरीर में जाने के बाद विषैले प्रभाव उत्पन्न करते हैं। यही विषाक्त भोजन है। वास्तव में कुछ जीवाणु आहार में मिलकर उसे विषाक्त बना देते हैं। आहार को विषाक्त बनाने वाले मुख्य जीवाणुओं का सामान्य परिचय निम्नवर्णित है

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(1) साल्मोनेला समूह:
इस समूह के जीवाणु पशु-पक्षियों के शरीर में पाए जाते हैं। मनुष्य जब इनका मांस खाते हैं अथवा दूध पीते हैं, तो जीवाणु उनके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। संक्रमण के छह घण्टों से दो दिन तक के समय में जीवाणु विषाक्तता के लक्षण प्रकट कर देते हैं। भोजन की यह विषाक्तता प्रायः मांस, अण्डे, क्रीम तथा कस्टर्ड आदि द्वारा उत्पन्न होती है। मक्खियाँ भी इन जीवाणुओं के संवाहन में महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं।

लक्षण :
मितली, वमन, पेट में पीड़ा तथा दस्त होते हैं, जिनके कारण रोगी निर्जलीकरण अथवा डी-हाइड्रेशन का शिकार भी हो सकता है। उचित उपचार न मिलने पर रोगी की मृत्यु भी हो सकती है।

बचाव एवं उपचार

  1. भोजन को मक्खियों से सुरक्षित रखना चाहिए।
  2. भोजन बनाने व करने से पूर्व हाथों को साबुन से भली प्रकार से धो लेना चाहिए।
  3. भोजन को उच्च ताप पर पकाना चाहिए तथा संरक्षित भोजन को खाने से पूर्व लगभग 72° सेण्टीग्रेड तक गर्म कर लेना चाहिए। इससे भोजन के सभी जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।
  4. डी-हाइड्रेशन होने पर किसी योग्य चिकित्सक द्वारा ग्लूकोज एवं सैलाइन जल चढ़वा देना चाहिए।

(2) स्टैफाइलोकोकाई समूह:
इस समूह के जीवाणु प्राय: वायु में, मनुष्यों की नाक, गले, फोड़े-फुन्सियों व घावों में पाए जाते हैं। ये भोजन बनाते समय खाँसने व छींकने तथा गन्दे हाथों के माध्यम से भोजन में प्रवेश करते हैं। भोजन के विषाक्त होने का मुख्य कारण भोजन के पकाने के पश्चात् इसे अधिक समय तक गर्म रख छोड़ना है। इस प्रकार का विषाक्त भोजन खाने के एक से छह घण्टों के अन्दर विषाक्तता के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

लक्षण:
रोगी शिथिल हो जाता है। यह विषाक्तता अधिक भयानक परिणाम नहीं दिखाती है।

बचाव एवं उपचार:

  1. भोजन बनाते समय सावधानी से छींकना अथवा खाँसना चाहिए।
  2. भोजन बनाने से पूर्व हाथों को भली प्रकार साबुन से धोना चाहिए।
  3. भोजन पकाने के बाद ठण्डा कर उसे रेफ्रिजेरेटर में रखने से जीवाणुओं के पनपने की सम्भावना कम रहती है।
  4. अत्यधिक ताप पर देर तक भोजन पकाने पर भोजन का विषैलापन नष्ट हो जाता है।
  5. रोगी को उपवास रखना चाहिए तथा हल्का सुपाच्य भोजन लेना चाहिए।
  6. अधिक विषाक्तता होने पर योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना विवेकपूर्ण रहता है।

(3) क्लॉस्ट्रीडियम समूह-क्लॉस्ट्रीडियम परफ्रिजेन्स :
नामक इस समूह का जीवाणु प्रायः डिब्बा बन्द भोज्य पदार्थों को विषाक्त करता है। यह जीवाणु एक प्रकार का हानिकारक टॉक्सिन अथवा विष उत्पन्न करता है।

लक्षण: मानव शरीर में प्रवेश करने पर पेट में पीड़ा व डायरिया के लक्षण (UPBoardSolutions.com) पैदा करता है, परन्तु इस जीवाणु द्वारा उत्पन्न विषाक्तता के कारण मृत्यु की सम्भावना बहुत कम रहती है।

उपचार:
एण्टीटॉक्सिन अथवा विषनाशक तथा पेनीसिलीन का प्रयोग करने से रोगी शीघ्र ही स्वस्थ हो जाता है।

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(4) क्लॉस्ट्रीडियम बौटूलिनम:
इस जीवाणु द्वारा उत्पन्न भोजन की विषाक्तता को बौटूलिज्म कहते हैं। यह जीवाणु भयानक टॉक्सिन उत्पन्न करता है। इसकी भयानकता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि एक औंस टॉक्सिन करोड़ों लोगों की मृत्यु के लिए पर्याप्त है। ये जीवाणु अपनी बीजाणु अवस्था में मछलियों, पक्षियों, गाय व घोड़े जैसे पशुओं व मनुष्यों की आँतों में पाए जाते हैं। जीवाणुओं के ये बीजाणु खाद तथा मल-मूत्र जैसी गन्दगियों के माध्यम से भूमि में पहुँचकर कृषि द्वारा प्राप्त खाद्य पदार्थों से चिपक जाते हैं। ऑक्सीजनविहीन परिस्थितियों में तथा असावधानियों से तैयार किए गए डिब्बा-बन्द खाद्य पदार्थों में ये बीजाणु अंकुरित हो असंख्य को जन्म देते हैं। सेम, मक्का, मटर व चना इत्यादि इस प्रकार के डिब्बा-बन्द खाद्य पदार्थों के उदाहरण हैं। इस अवस्था में जीवाणु टॉक्सिन उत्पन्न करते हैं, जिसके मनुष्यों में होने वाले प्रभाव निम्नलिखित हैं–

प्रभाव:

  1. विषाक्त भोजन के सेवन के केवल कुछ ही घण्टों में रोगी पैरालिसिस अथवा लकवे का अनुभव करने लगता है।
  2. आँखों में धुंधलापन, भोजन चबाने व सटकने में तथा साँस लेने में कठिनाई विषाक्त भोजन के अन्य प्रभाव हैं।।
  3. बोलने में अस्पष्टता के साथ ही भुजाएँ लकवे की स्थिति में हो जाती हैं।
  4. हृदय तथा फेफड़ों तक टॉक्सिन का प्रभाव पहुँचने पर रोगी की मृत्यु निश्चित है।

बचाव एवं उपचार:

  1. एण्टीबायोटिक औषधियों के उपयोग का इस विषाक्तता में कोई लाभ नहीं है।
  2. रोगी को तुरन्त अस्पताल ले जाना चाहिए।
  3. एण्टीटॉक्सिन अथवा विषनाशक की पर्याप्त मात्रा से ही रोग पर नियन्त्रण सम्भव है। यह उपचार भी समय पर उपलब्ध होने पर ही लाभकारी है अन्यथा मृत्यु निश्चित है।
  4. यह विषाक्तता इतनी भयानक है कि ठीक उपचार होने पर भी पीड़ित मनुष्य 6-7 महीनों में पूर्ण स्वस्थ हो पाता है।
  5. अप्राकृतिक लगने वाले दुर्गन्धयुक्त भोजन को जलाकर नष्ट कर देना चाहिए, क्योंकि विषाक्त भोजन पशु-पक्षियों में भी विषाक्तता उत्पन्न कर सकता है।
  6.  डिब्बों में भोजन बन्द करते समय भाप के दबावयुक्त ताप से डिब्बों व भोजन को । विसंक्रमित करना चाहिए।
  7.  डिब्बा-बन्द भोजन को खाने से पूर्व उच्च ताप पर लगभग दस मिनट तक पकाना चाहिए।

प्रश्न 7:
डेंगू (Dengue) नामक रोग का सामान्य परिचय दें। इस रोग के कारण, लक्षणों, गम्भीरता तथा बचने के उपाय भी लिखिए। [2018]
उत्तर:
डेंगू एक संक्रामक रोग है जो मादा एडीज (Female Aedes) मच्छर के काटने से होता है। यह मच्छर प्रायः दिन में ही सक्रिय होता है तथा मनुष्यों को काटता है। डेंगू का अधिक प्रकोप कुछ वर्षों से अधिक हुआ है। हर वर्ष अनेक व्यक्ति इसके शिकार होते हैं। समुचित उपचार न होने की दशा में यह रोग घातक भी सिद्ध होता है। यह रोग उस समय अधिक गम्भीर हो जाता है, जब रोगी के रक्त के प्लेटलेट्स तेजी से घटने लगते हैं।
डेंगू के लक्षण-डेंगू के लक्षण निम्नलिखित हैं

  1. इस रोग में तेज बुखार होता है।
  2. रोगी को सिरदर्द, कमरदर्द तथा जोड़ों में दर्द होता है।
  3. हल्की खाँसी तथा गले में खरास की भी शिकायत होती है।
  4. रोगी को काफी थकावट तथा कमजोरी महसूस होती है।
  5. रोग के बढ़ने के साथ-साथ उल्टियाँ होती हैं तथा शरीर पर लाल-लाल दाने निकल आते हैं।
  6. इस रोग में रोगी की नाड़ी कभी तेज तथा कभी धीमी चलने लगती है (UPBoardSolutions.com) तथा प्रायः रक्तचाप भी बहुत घट जाता है।
  7. डेंगू शॉक सिंड्रोम (D.S.S.) के रोगियों में साधारण डेंगू बुखार तथा डेंगू हेमोरेजिक बुखार के लक्षणों के साथ-साथ बेचैनी महसूस होती है।
  8. डेंगू हेमोरेजिक बुखार में अन्य लक्षणों के साथ-ही-साथ रक्त में प्लेटलेट्स की अत्यधिक कमी होने लगती है। इस स्थिति में शरीर में कहीं से भी रक्तस्राव होने लगता है। यह रक्तस्राव दाँतों, मसूड़ों से भी हो सकता है तथा नाक, मुँह या मल से भी हो सकता है।

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डेंगू की गम्भीरता:
डेंगू रोग उस समय गम्भीर रूप ग्रहण कर लेता है जब व्यक्ति के प्लेटलेट्स तेजी से घटने लगते हैं। सामान्य रूप से एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में डेढ़ से दो लाख प्लेटलेट्स होते हैं। यदि ये एक लाख से कम हो जाये तो रोगी को हॉस्पिटल में भर्ती करवाना आवश्यक हो जाता है, क्योंकि इस स्थिति में प्लेटलेट्स चढ़ाने की आवश्यकता होती है। यदि प्लेटलेट्स और घट जाते हैं तो रोगी के शरीर से रक्तस्राव होने लगता है। ऐसे में शरीर के विभिन्न मुख्य अंगों के फेल (Multi-organ Failure) होने की भी आशंका रहती है।

डेंगू से बचने के उपाय:
डेंगू से बचने के लिए आवश्यक है कि मच्छरों से बचाव किया जाये। इसके लिए एक उपाय है कि मच्छरों को पनपने न दिया जाये। डेंगू फैलाने वाले मच्छर साफ पानी में पनपते हैं अतः घरों के अन्दर तथा आस-पास कहीं भी साफ पानी एकत्र न होने दें। पानी के बर्तनों को ढककर रखना चाहिए। फूलदानों आदि का पानी प्रतिदिन बदलते रहें। कूलर, पानी की हौदियों, टायर-ट्यूब, टूटे बर्तन, मटके, डिब्बे आदि में पानी एकत्र न होने दें। पक्षियों के खाने-पीने के बर्तनों को भी साफ करते रहें। मच्छरों की रोकथाम के साथ-ही-साथ स्वयं को मच्छरों से बचायें। इसके लिए मच्छरदानी का प्रयोग करें तथा मच्छरों को दूर रखने के लिए क्रीम या तेल का इस्तेमाल करें।

प्रश्न 8:
चिकनगुनिया (Chikungunya) नामक रोग का सामान्य परिचय दें। इस रोग के लक्षणों तथा उपचार के उपायों का वर्णन करें।
उत्तर:
चिकनगुनिया एक वायरसजनित संक्रामक रोग है। यह रोग भी हमारे देश में कुछ वर्षों से प्रबल हो रहा है। इस रोग को फैलाने में एडीज मच्छर एइजिप्टी की मुख्य भूमिका होती है। इस रोग का नाम स्वाहिली भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है-ऐसा जो मुड़ जाता है। इस रोग के मुख्य लक्षण जोड़ों के दर्द के कारण रोगी को शरीर झुक जाता है, को देखकर यह नाम रखा गया है। यह रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को सीधे तौर पर नहीं होता बल्कि संक्रमित व्यक्ति को मच्छर द्वारा काटने के उपरान्त स्वस्थ व्यक्ति को काटने पर वायरस का संक्रमण हो जाता है।
चिकनगुनिया के लक्षण:
इस रोग में जोड़ों में दर्द होता है तथा साथ ही ज्वर होता है। त्वचा शुष्क हो जाती है तथा प्रायः त्वचा पर लाल चकत्ते पड़ जाते हैं। बच्चों में रोग के संक्रमण से उल्टियाँ भी होने लगती हैं।

चिकनगुनिया का उपचार:
चिकनगुनिया के लक्षण स्पष्ट होते ही योग्य चिकित्सक से तुरन्त सम्पर्क करना चाहिए तथा चिकित्सक के परामर्श से उपचार प्रारम्भ कर देना चाहिए। इसके साथ-ही-साथ निम्नलिखित उपाय भी करने चाहिए

  1. रोगी को अधिक-से-अधिक विश्राम करना चाहिए।
  2. व्यक्ति को अधिक-से-अधिक पानी पीना चाहिए। गुनगुना पानी पीने का भी सुझाव दिया जाता है।
  3. रोग की दशा में व्यक्ति को दूध तथा दूध से बने भोज्य पदार्थों, जैसे कि दही आदि का सेवन करना चाहिए।
  4. रोग को नियन्त्रित करने के लिए नीम के पत्तों का रस दिया जाना चाहिए।
  5. रोग के निवारण में करेला, पपीता और गिलोय के पत्तों के रस के सेवन (UPBoardSolutions.com) से सहायता मिलती
  6. चिकनगुनिया की दशा में रोगी को नारियल पानी का सेवन करना चाहिए। इससे शरीर में पानी की पूर्ति होती है तथा लिवर को भी आराम मिलता है।
  7. रोगी के कपड़ों तथा बिस्तर आदि की सफाई का विशेष ध्यान रखना अति आवश्यक होता है।
  8. चिकनगुनिया के रोगी को जोड़ों का दर्द बहुत अधिक होता है। ऐसे में चिकित्सक के परामर्श से ही दर्द-निवारक दवा लें।
  9. चिकनगुनिया रोग की दशा में ऐस्प्रिन कदापि न लें। इससे समस्या बढ़ सकती है।

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प्रश्न 9:
हाथीपाँव या फाइलेरिया (Elephantiasis or Filaria) नामक रोग का सामान्य परिचय दें। इस रोग के लक्षणों, बचाव के उपायों तथा उपचार का विवरण दीजिए।
उत्तर:
भारत के विभिन्न भागों में पाया जाने वाला एक संक्रामक रोग हाथीपाँव भी है। इस रोग का यह नाम इसके लक्षणों को ध्यान में रखते हुए रखा गया है। वैसे इसे फीलपाँव भी कहा जाता है। इसका चिकित्सीय नाम फाइलेरिया (Filaria) है। इस रोग को हाथीपाँव कहने का मुख्य कारण यह है कि इस , रोग की दशा में व्यक्ति के हाथ या पाँव बहुत अधिक सूज जाते हैं।

फाइलेरिया नामक रोग एक कृमि जनित रोग है। यह कृमि (Worm) व्यक्ति के शरीर के लसिका तन्त्र की नलिकाओं में पहुँचकर उन्हें बन्द कर देते हैं। इस रोग को उत्पन्न करने वाला कृमि फाइलेरिया बैक्रॉफ्टी (Filaria bancrofti) है। इस कृमि को फैलाने का कार्य क्यूलेक्स मच्छर द्वारा किया जाता है। शरीर में ये कृमि स्थायी रूप से लसिका वाहिनियों में रहते हैं, परन्तु ये निश्चित समय पर प्रायः रात के समय रक्त में प्रवेश करके शरीर के अन्य अंगों में भी फैल जाते हैं। ये कृमि शरीर की नसों में सूजन उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार से उत्पन्न सूजन प्रायः घटती-बढ़ती रहती है। परन्तु जब रोग के कृमि लसिका तन्त्र की नलियों के अन्दर मर जाते हैं तब लसिका वाहिनियों का मार्ग सदा के लिए अवरुद्ध हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप शरीर के उस स्थान की त्वचा मोटी तथा कड़ी हो जाती है। इस प्रकार से लसिका वाहिनियों के बन्द हो जाने पर उनके खोलने के लिए कोई औषधि सहायक नहीं होती। ऐसे में शल्य चिकित्सा से ही समस्या को हल किया जा सकता है।

फाइलेरिया रोग का फैलना:
इस रोग को फैलाने का कार्य क्यूलेक्स मच्छर द्वारा किया जाता है। रोग का कारण एक परजीवी माइक्रोफिलारे होता है। सामान्य रूप से जब किसी संक्रमित व्यक्ति को मच्छर काटता है तब मच्छर के शरीर में यह परजीवी प्रवेश कर जाता है तथा वहाँ रहकर बड़ी तेजी से अपनी वृद्धि करता है। इसके उपरान्त जब यह मच्छर किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटता है तब वह व्यक्ति भी संक्रमित होकर रोगग्रस्त हो जाता है। माइक्रोफिलारे के अतिरिक्त एक अन्य (UPBoardSolutions.com) परजीवी भी फाइलेरिया रोग उत्पन्न करता है। इस परजीवी को बूगिया मलाई कहते हैं। यह मानसोनिया (मानसोनियोजित एबूलीफेरा) द्वारा फैलता है। इस प्रकार का संक्रमण ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है।

फाइलेरिया के लक्षण:
फाइलेरिया या हाथीपाँव के कुछ मुख्य लक्षण निम्नवर्णित हैं

  1. ठण्ड या कँपकँपी के साथ ज्वर होना।।
  2. गले में सूजन आ जाना।
  3. रोग के बढ़ने पर एक या अधिक हाथ तथा पैरों में सूजन आ जाना। यह सूजन पैरों में प्रायः अधिक होती है। इसीलिए इस रोग को हाथीपाँव कहा जाता है। ।
  4. इस रोग में गुप्तांग तथा जाँघों के बीच गिल्टी बन जाती है, जिसमें दर्द होता है। पुरुषों में अंडकोष में भी सूजन आ जाती है जिसे हाइड्रोसिल कहते हैं।
  5. रोगी के पैरों तथा हाथों की लसिका वाहिकाओं का रंग लाल होने लगता है।

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बचाव के उपाय:
फाइलेरिया एक गम्भीर रोग है। इस रोग से बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिए

  1. हाथीपाँव या फाइलेरिया से बचाव का सबसे अधिक कारगर उपाय है–स्वयं को मच्छरों से बचाना। ये मच्छर सुबह एवं शाम के समय अधिक सक्रिय होते हैं; अतः इस समय विशेष सचेत रहना
    आवश्यक होता है।
  2.  यदि किसी क्षेत्र में फाइलेरिया का प्रकोप हो तो वहाँ विशेष सावधानी की आवश्यकता होती .
  3. मच्छरों से बचाव के लिए ऐसे वस्त्र धारण करने चाहिए जिनसे हाथ-पाँव अच्छी तरह से ढक जायें।।
  4. मच्छरों से बचाव के लिए सुझाव दिया जाता है कि व्यक्ति को पेमेथ्रिन-युक्त कपड़ों को धारण करना चाहिए। पेर्मेथ्रिने एक सिंथेटिक रासायनिक कीटनाशक होता है। ऐसे वस्त्र बाजार में उपलब्ध होते हैं।
  5. मच्छरों के उन्मूलन के सभी उपाय किये जाने चाहिए।

उपचार के उपाय:
फाइलेरिया या हाथीपाँव एक गम्भीर रोग है। इस रोग के कारण जहाँ एक ओर शारीरिक विकलांगता आती है वहीं साथ-ही-साथ मानसिक स्थिति भी बिगड़ जाती है। इससे व्यक्ति आर्थिक संकट का भी शिकार हो जाता है। रोग के व्यवस्थित या चिकित्सीय उपचार के साथ-ही-साथ निम्नलिखित घरेलू उपचार भी किये जा सकते हैं

(1) लौंग का इस्तेमाल:
लौंग में कुछ ऐसे एंजाइम होते हैं जो फाइलेरिया के परजीवी को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं। अत: लौंग से तैयार चाय का सेवन करना चाहिए।

(2) काले अखरोट का तेल:
अखरोट के तेल में कुछ ऐसे गुण पाये जाते हैं जो रक्त में पाये जाने वाले कृमियों को नष्ट करने की क्षमता रखते हैं। अत: एक कप गर्म पानी में तीन-चार बूंद काले अखरोट का तेल डालकर पीने से इस रोग के निवारण में सहायता मिलती है।

(3) आँवला का उपयोग:
आँवला विटामिन ‘सी’ का सर्वोत्तम स्रोत है। इसमें एन्थेलमिर्थिक भी होता है जो घाव को शीघ्र भरने में सहायक होता है। अतः आँवले के सेवन से फाइलेरिया को नियन्त्रित करने में सहायता मिलती है।

(4) अदरक:
यदि सूखे अदरक के पाउडर अर्थात् सोंठ को गरम पानी में घोलकर प्रतिदिन सेवन (UPBoardSolutions.com) करें तो फाइलेरिया रोग को नियन्त्रित किया जा सकता है। वास्तव में अदरक में फाइलेरिया के पुरजीवी को नष्ट करने की क्षमता होती है।

(5) अश्वगंधा:
अश्वगंधा एक पौधा होता है। इसके इस्तेमाल से भी फाइलेरिया को नियन्त्रित किया जा सकता है।

(6) शंखपुष्पी:
शंखपुष्पी की जड़ को गरम पानी के साथ पीसकर पेस्ट तैयार किया जाता है। इस पेस्ट को शरीर के प्रभावित स्थान पर लगाने से सूजन घट जाती है।

(7) कुल्ठी:
कुल्ठी या हॉर्सग्रास में चींटियों द्वारा निकाली गई मिट्टी तथा अण्डे की सफेदी मिलाकर सूजन वाले अंग पर प्रतिदिन लगाने से सूजन घटती है।

(8) अगर:
अगर को पानी के साथ मिलाकर लेप तैयार किया जाता है। इस लेप को प्रतिदिन प्रभावित स्थान पर लगाने से सूजन कम होती है, रोग के कृमि मर जाते हैं तथा घाव शीघ्र भरने लगते हैं

(9) रॉक साल्ट:
रॉक साल्ट, शंखपुष्पी एवं सोंठ के पाउडर को मिलाकर तैयार किए गए मिश्रण की एक चुटकी को प्रतिदिन गरम पानी के साथ सेवन करने से रोग नियन्त्रित हो जाता है।

(10) ब्राह्मी:
ब्राह्मी को पानी के साथ पीसकर तैयार लेप को प्रतिदिन प्रभावित अंग पर लगाने से सूजन घट जाती है।

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प्रश्न 10:
हेपेटाइटिस (Hepatitis) नामक रोग का सामान्य परिचय दें। इस रोग के प्रकारों, कारणों, लक्षणों तथा बचाव के उपायों का विवरण दीजिए।
उत्तर:
यदि आधुनिक संक्रामक रोगों की चर्चा की जाये तो उनमें हेपेटाइटिस नामक रोग को एक गम्भीर रोग के रूप में देखा जाता है। यह रोग जन स्वास्थ्य के लिए एक खतरा बना हुआ है। यह रोग यकृत से सम्बन्धित है। हेपेटाइटिस एक वायरसजनित रोग है। वर्तमान समय में हेपेटाइटिस रोग का प्रकोप निरन्तर बढ़ रहा है।

हेपेटाइटिस : प्रकार एवं कारण:
हेपेटाइटिस रोग के पाँच प्रकार निर्धारित किये गये हैं जिन्हें क्रमशः A, B, C, D तथा E के रूप में जाना जाता है। इनमें से ‘A’ तथा ‘E’ वर्ग के रोग प्रदूषित खाद्य तथा पेय पदार्थों के सेवन से होते हैं। इनसे भिन्न ‘B’ तथा ‘C’ वर्ग के रोगों का संक्रमण रक्त के माध्यम से होता है। इन वर्गों के रोग प्रायः रक्त तथा रक्त के उत्पाद जैसे प्लाज्मा के माध्यम से संक्रमित होते हैं। प्रदूषित सिरिंज के इस्तेमाल से भी इस रोग के संक्रमण की आशंका रहती है। संक्रमित व्यक्ति द्वारा रक्तदान करने की स्थिति में भी रोग का संक्रमण हो सकता है। टैटू गुदवाने, संक्रमित व्यक्ति के टुथब्रश या रेजर को इस्तेमाल करने तथा असुरक्षित यौन (UPBoardSolutions.com) सम्बन्ध स्थापित करने की दशाओं में हेपेटाइटिस रोग के संक्रमण की सम्भावना बढ़ जाती है। इन दशाओं में ‘B’ तथा ‘C’ के संक्रमण का, अधिक खतरा होता है। इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति लम्बे समय तक मदिरापान या अन्य नशों का सेवन करते रहते हैं वे भी हेपेटाइटिस रोग का शिकार हो सकते हैं।

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यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि संक्रमित व्यक्ति के शरीर से निकलने वाले पसीने या आँखों के आँसुओं के माध्यम से इस रोग के फैलने की आशंका प्रायः नहीं होती।
अधिक खतरे वाले वर्ग:
वैसे तो हेपेटाइटिस रोग से कोई भी व्यक्ति संक्रमित हो सकता है। परन्तु कुछ वर्ग ऐसे हैं जिन्हें इस रोग के होने का अधिक खतरा होता है। इस प्रकार के मुख्य वर्ग हैं

  1. डॉक्टर, नर्स तथा अन्य स्वास्थ्य-रक्षक कार्यकर्ता,
  2. बार-बार रक्त लेने वाले हीमोफीलिया या थेलेसीमिया के रोगी तथा डायलिसिस पर आश्रित रहने वाले रोगी व्यक्ति,
  3.  संक्रमित माताओं से जन्मे नवजात शिशु,
  4.  वेश्यावृत्ति में संलग्न व्यक्ति,
  5. समलिंगी एवं एक से अधिक व्यक्तियों से यौन सम्बन्ध रखने वाले व्यक्ति तथा
  6. नशे के आदी तथा इंजेक्शन द्वारा मादक पदार्थ लेने वाले व्यक्ति।।

हेपेटाइटिस के सामान्य लक्षण:
हेपेटाइटिस नामक रोग यकृत के संक्रमित होने पर होता है। इस रोग के कुछ मुख्य सामान्य लक्षण निम्नलिखित हैं

  1. पीलिया के लक्षण प्रकट होना। इसमें त्वचा तथा आँखों में पीलापन आ जाता है तथा पेशाब का रंग भी पीला होने लगता है।
  2. रोग के बढ़ने के साथ-साथ भूख कम होने लगती है।
  3. हेपेटाइटिस रोग में व्यक्ति को उल्टियाँ होने लगती हैं।
  4. रोगी के पेट में दर्द होता है।
  5.  इस रोग की स्थिति में रोगी के पेट में पानी आ जाता है।

बचाव के उपाय:
हेपेटाइटिस रोग से बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं

  1. हेपेटाइटिस ‘A’ तथा ‘B’ से बचाव के लिए टीके उपलब्ध हैं; अतः निर्धारित रूप में ये टीके लगवाने चाहिए।
  2. पानी की स्वच्छता एवं शुद्धता का विशेष ध्यान रखें। उबालकर अथवा अच्छे फिल्टर से साफ किया गया पानी ही पीयें।
  3. सभी खाद्य-पदार्थों तथा पेय पदार्थों की स्वच्छता का अधिक-से-अधिक ध्यान रखें।

हेपेटाइटिस ‘A’ तथा ‘E’ का उपचार:
हेपेटाइटिस ‘A’ तथा ‘E’ के उपचार के लिए कोई सुनिश्चित औषधि उपलब्ध नहीं है। इस स्थिति में चिकित्सक लक्षणों को ध्यान में रखते हुए ही रोगी का उपचार करते हैं। उदाहरण के लिए, बुखार की अलग से दवा दी जाती है तथा पेटदर्द को नियन्त्रित करने के लिए अलग से उपयुक्त दवा दी जाती है।

हेपेटाइटिस ‘B’ तथा ‘C’ का उपचार:
हेपेटाइटिस ‘B’ तथा ‘C’ नामक रोगों के विकास की चार स्थितियाँ हो सकती हैं, जिनके उपचार का सामान्य विवरण निम्नलिखित है

प्रथम स्थिति :
यह रोग की प्रारम्भिक स्थिति है। इसमें रोग तो होता है परन्तु वह कुछ समय में स्वतः ही ठीक हो जाता है।

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द्वितीय स्थिति:
इस स्थिति में हेपेटाइटिस ‘B’ तथा ‘C’ का वायरस लिवर को लगातार प्रभावित करता है तथा उसमें सूजन पैदा करता रहता है। यदि यह स्थिति लगातार छ: माह तक चलती रहे तो इसे चिकित्सा शास्त्र की भाषा में क्रानिक हेपेटाइटिस कहा जाता है। इस स्थिति में रो नियन्त्रित (UPBoardSolutions.com) करने के लिए दवाओं की आवश्यकता होती है अर्थात् दवाओं से उपचार सम्भव होता है।

तृतीय स्थिति:
इस अवस्था में रोग तो होता है परन्तु व्यक्ति तात्कालिक रूप से उस रोग को महसूस नहीं करता। इस दशा में यदि रोग के वायरस यकृत में लगातार रह जाएँ तो आगे चलकर यह वायरस ही लिवर सिरोसिस तथा लिवर कैंसर का कारण बन जाते हैं।

चतुर्थ स्थिति:
इस स्थिति में अचानक ही लिवर काम करना बन्द कर देता है। चिकित्सा शास्त्र की भाषा में इस स्थिति को ऐक्यूट लिवर फेल्यर कहते हैं। इस स्थिति में कोई उपचार सम्भव नहीं हो पाता। यह स्थिति गम्भीर तथा घातक सिद्ध हो सकती है। केवल लिवर ट्रांसप्लांट द्वारा ही रोगी की जान बचायी जा सकती है।

उपर्युक्त विवरण द्वारा हेपेटाइटिस रोग का सामान्य परिचय प्राप्त हो जाता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि भले ही यह रोग एक संक्रामक रोग है परन्तु यह रोग (‘B’ तथा ‘C’) किसी रोगी व्यक्ति से हाथ मिलाने, खाने के बर्तनों तथा पानी पीने के गिलास का इस्तेमाल करने से नहीं फैलता। यही नहीं इस रोग का संक्रमण छींकने, चूमने तथा गले मिलने से भी नहीं होता।

हेपेटाइटिस रोग में भूख की गम्भीर समस्या होती है। रोगी को भूख नहीं लगती। कुछ भी खाने से पाचन-क्रिया बिगड़ जाती है। इस बात को ध्यान में रखते हुए रोगी को हल्का एवं सुपाच्य आहार ही दिया जाना चाहिए। इससे रोगी की भूख धीरे-धीरे बढ़ती है। रोगी को थोड़े-थोड़े समय बाद हल्का
आहार देते रहने से लाभ होता है।

प्रश्न 11:
रेबीज या हाइड्रोफोबिया नामक रोग के कारणों, लक्षणों तथा बचाव के उपायों का उल्लेख करें। या रेबीज रोग के लक्षण लिखिए। [2018]
उत्तर:
रेबीज या हाइड्रोफोबिया नामक रोग एक अति भयंकर एवं घातक रोग है। इस रोग के हो जाने के बाद इसका अभी तक कोई पूर्णतः सफल उपचार नहीं है। यदि रोगी पशु के काटने के तुरन्त बाद ही एण्टीरेबीज इन्जेक्शन लगवा लिया जाए तो रोग से बचा जा सकता है। एक बार रोग प्रबल हो जाने कैं बाद रोगी को बचा पाना प्रायः असम्भव है।

रोग के कारण:
रेबीज नामक रोग एक विशिष्ट जीवाणु के शरीर में प्रविष्ट होने के परिणामस्वरूप होता है। इस रोग के विषाणु को न्यूरोरिहाइसिटीज हाइड्रोफोबी’ कहते हैं। यह रोग रोगग्रस्त पशु के काटने के परिणामस्वरूप होता है। सामान्य रूप से कुत्ते, गीदड़, लोमड़ी तथा बन्दर आदि पशुओं को यह रोग हुआ करता है। चमगादड़ भी इस रोग के शिकार हुआ करते हैं। रोगग्रस्त पशु की लार में रेबीज के विषाणु रहते हैं, अतः जब कोई रेबीजयुक्त पशु किसी व्यक्ति को (UPBoardSolutions.com) काटता है तब उसकी लार में विद्यमान विषाणु व्यक्ति के शरीर में पहुँच जाते हैं। शरीर में प्रवेश करने के उपरान्त ये विषाणु व्यक्ति की स्नायु-तन्त्रिकाओं के माध्यम से शरीर में फैलने लगते हैं। रोग के विषाणु जब मस्तिष्क में पहुँच जाते हैं तब रोग प्रबल रूप धारण कर लेता है तथा रोग के समस्त लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

रेबीजयुक्त कुत्ते की पहचान:
हम जानते हैं कि हमारे देश में रेबीज का संक्रमण मुख्य रूप से कुत्तों के ही माध्यम से होता है, अतः रेबीजयुक्त कुत्ते की पहचान करनी अति आवश्यक है। प्रथम प्रकार के रेबीजयुक्त कुत्ते शान्त एवं सुस्त बैठे रहते हैं। रोगी कुत्ते की पूँछ प्रायः सीधी हो जाती है। उसके मुँह से झाग-से निकलते रहते हैं, आँखें लाल हो जाती हैं तथा चेहरा असामान्य रूप से भयानक-सा दिखाई देने लगता है। ये कुत्ते खाना-पीना भी बन्द कर देते हैं। ये कुत्ते अकारण ही किसी भी व्यक्ति को काट सकते हैं। दूसरे प्रकार के रेबीजयुक्त कुत्ते अधिक आक्रामक होते हैं। वे अकारण ही भौंकते रहते हैं तथा जहाँ-तहाँ भागते रहते हैं। ये रोगी कुत्ते अकारण ही किसी भी व्यक्ति अथवा पशु को काट लेते हैं। अन्य समस्त लक्षण प्रथम प्रकार के रोगी कुत्तों के ही समान होते हैं। रेबीज के शिकार कुत्ते का जीवन बहुत कम होता है। सामान्य रूप से रोग के लक्षण उत्पन्न होने के उपरान्त 8-10 दिन के अन्दर ही ये कुत्ते अपने आप ही मर जाते हैं।

रोग की उदभवन अवधि:
रेबीज नामक रोग की उद्भवन अवधि कुछ दिन अर्थात् 4-6 दिन से लेकर कुछ वर्ष अर्थात् 4-6 वर्ष तक भी हो सकती है। कुछ व्यक्तियों के विषय में यह काल 10 वर्ष तक भी देखा जा चुका है। वैसे यह सत्य है कि मस्तिष्क से जितना निकट का अंग कुत्ते के द्वारा काटा गया हो उतना ही शीघ्र यह रोग प्रकट होने की आशंका रहती है, क्योंकि रोग के लक्षण तभी प्रकट होते हैं जब रोग के विषाण व्यक्ति के मस्तिष्क में पहुँचकर सक्रिय होते हैं।

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रोग के लक्षण:
रेबीज नामक रोग को प्रभाव व्यक्ति के मस्तिष्क पर होता है। रोग प्रबल होने से पूर्व अन्य संक्रामक रोगों के ही समान व्यक्ति को ज्वर होने लगता है तथा व्याकुलता बढ़ने लगती है। इसके उपरान्त मुख्य रूप से रोगी के गले पर प्रभाव होता है। प्यास अधिक लगती है, किन्तु रोगी किसी भी तरल अथवा ठोस खाद्य-सामग्री को निगलने में नितान्त असमर्थ हो जाता है तथा पानी से दूर भागता है। वह पानी तक नहीं पी सकता और क्रमश: व्याकुलता बढ़ने लगती है तथा गला सूखने लगता है। इस स्थिति में गले से जो आवाज निकलती है वह कुछ असामान्य-सी होने लगती है । जल न पी सकने के कारण शरीर में जल की कमी हो जाती है तथा रोगी की मृत्यु हो जाती है। कुछ लोगों का कहना है कि रेबीज का शिकार व्यक्ति पागल हो जाता है, आक्रामक हो जाता है तथा कुत्ते के समान भौंकने लगता है। ये सब भ्रामक धारणाएँ हैं। (UPBoardSolutions.com) वास्तव में रेबीज का शिकार व्यक्ति अन्त तक चेतन रहता है, वह न तो आक्रामक होता है और न ही पागल, किन्तु वह कुछ असामान्य व्यवहार अवश्य करने लगता है। आवाज में परिवर्तन केवल गले की मांसपेशियों की निष्क्रियता के कारण होता है।

रोग से बचने के उपाय:
यह सत्य है कि रेबीज नामक रोग का कोई उपचार सम्भव नहीं है, परन्तु इस रोग से बचा जा सकता है। इस रोग से बचने के लिए दो प्रकार के उपाय किये जा सकते हैं। प्रथम प्रकार के उपाय के अन्तर्गत इस बात का प्रयास किया जाता है कि रेबीज नामक रोग का संक्रमण ही न हो। इसके लिए कुत्ते को जहाँ तक सम्भव हो एण्टीरेबीज टीके नियमित रूप से लगवाये जाने चाहिए। पालतू कुत्ते के सन्दर्भ में तो यह सम्भव है। द्वितीय प्रकार के उपाय रेबीजयुक्त कुत्ते के काटने के उपरान्त किये जाते हैं। इस प्रकार के मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं

  1. कुत्ते अथवा अन्य रेबीज के जीवाणु से युक्त पशु के काटने की स्थिति में काटे गये स्थान को तुरन्त साफ करना चाहिए। इसके लिए साबुन, पानी तथा पोटेशियम परमैंगनेट भी इस्तेमाल किया जा सकता है। कार्बोलिक अम्ल भी घाव पर लगाया जा सकता है। घाव को खुला रखना चाहिए, उस पर पट्टी नहीं बाँधनी चाहिए।
  2. यदि चिकित्सक की सुविधाएँ उपलब्ध न हों तो काटे गये स्थान पर सरसों का तेल एवं पिसी हुई लाल मिर्च भी लगायी जा सकती हैं। यह एक पारम्परिक उपचार है। चिकित्सा शास्त्र इसका अनुमोदन नहीं करता।
  3. काटने वाले कुत्ते के रेबीजयुक्त होने की आशंका की स्थिति में तुरन्त अनिवार्य रूप से रेबीज से बचने के टीके (Anti-rabies vaccine) लगवाने चाहिए। ये टीके अब बाजार में उपलब्ध हैं। सरकारी जिला अस्पताल में ये टीके नि:शुल्क लगाये जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
रोग-प्रतिरक्षा क्या है? [2008, 10, 12]
उत्तर:
विभिन्न संक्रामक रोगों के कीटाणु हमारे. वायुमण्डल में सदैव व्याप्त रहते हैं, परन्तु सदैव ही ये रोग अधिक जोर नहीं पकड़ते। इसके अतिरिक्त जब ये रोग फैलते हैं, तब भी सभी व्यक्ति इनके शिकार नहीं होते। इसका क्या कारण है? वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में स्वस्थ रहने की इच्छा एवं क्षमता होती है। इसीलिए प्रत्येक रोग के रोगाणुओं से हमारा शरीर संघर्ष भी करता है। जब हमारा शरीर संघर्ष में हार जाता है तभी हम रोग के शिकार हो जाते हैं। (UPBoardSolutions.com) इस प्रकार रोगों से लड़ने की जो क्षमता हमारे शरीर में होती है, उसे ही रोग-प्रतिरक्षा (Immunity power) कहते हैं। इसे रोग-प्रतिरोध क्षमता या रोग-प्रतिबन्धक शक्ति भी कहते हैं। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के शरीर में भिन्न-भिन्न समय पर यह क्षमता भिन्न-भिन्न होती है।

प्रश्न 2:
रोग-प्रतिरोध क्षमता कितने प्रकार की होती है? संक्षेप में परिचय दीजिए।[2014, 16]
या
टीकाकरण क्या है? दो टीकों के नाम लिखिए। [2013, 16]
उत्तर:
रोग-प्रतिरक्षा अथवा रोग-प्रतिरोध क्षमता दो प्रकार की होती है, जिन्हें क्रमशः
(1) प्राकृतिक रोग-प्रतिरोध क्षमता तथा
(2) कृत्रिम या अर्जित रोग-प्रतिरोध क्षमता कहते हैं। इन दोनों प्रकार की रोग-प्रतिरोध क्षमताओं का सामान्य परिचय निम्नलिखित है

(1) प्राकृतिक रोग:
प्रतिरोध क्षमता प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में प्राकृतिक रूप से ही स्वस्थ रहने तथा विभिन्न रोगों का मुकाबला करने की क्षमता होती है। इसे ही प्राकृतिक रोग-प्रतिरोध क्षमता कहते हैं। अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्तियों व स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने वाले व्यक्तियों तथा सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार ग्रहण करने वाले व्यक्तियों की प्राकृतिक रोग-प्रतिरोध क्षमता : होती है। इसके विपरीत दुर्बल, सामान्य से अधिक परिश्रम करने वाले तथा अनियमित जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्तियों की यह क्षमता घट जाती है।

(2) कृत्रिम अथवा अर्जित रोग-प्रतिरोध क्षमता:
कुछ उपायों एवं परिस्थितियोंवश प्राप्त होने वाली रोग-प्रतिरोध क्षमता को कृत्रिम या अर्जित रोग-प्रतिरोध क्षमता कहा जाता है। यह दो प्रकार की होती है तथा इसे दो रूपों में ही अर्जित किया जाता है। एक प्रकार की अर्जित रोग-प्रतिरोध क्षमता केवल कुछ ही रोगों से बचने के लिए होती है। कुछ रोग ऐसे हैं जो यदि व्यक्ति को एक बार हो जाएँ, तो उन रोगों से बचाव के लिए शरीर में अतिरिक्त क्षमता का विकास हो जाता है तथा वे रोग उस : व्यक्ति को पुन: नहीं हुआ करते। ऐसा अर्जित रोग-प्रतिरोध क्षमता के ही कारण होता है। दूसरे प्रकार की कृत्रिम रोग-प्रतिरोध क्षमता कुछ औषधियों द्वारा प्राप्त की जाती है। इसके लिए सम्बन्धित रोग से बचाव के टीके या इन्जेक्शन लगाए जाते हैं। इस पद्धति के अन्तर्गत जिस भी रोग के प्रति रोग-प्रतिबन्धक क्षमता अर्जित करनी होती है, उसी रोग के विष या प्रतिजीव-विष को रुधिर में उत्पन्न किया जाता है। इससे व्यक्ति के शरीर में कृत्रिम रोग-प्रतिरोध क्षमता अर्जित की जाती है।

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इस प्रक्रिया को टीकाकरण कहते हैं। अब प्राय: सभी संक्रामक रोगों से बचाव के टीके खोज लिए गये हैं। जैसे कि क्षय रोग से बचाव का टीका बी०सी०जी० के टीके के नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार डी०पी०टी० का टीका डिफ्थीरिया, काली खाँसी तथा टिटनेस से बचाव करता है। (UPBoardSolutions.com) इसी प्रकार पोलियो, टायफाइड, चेचक, खसरा आदि से बचाव के टीके लगाये जाते हैं।

प्रश्न 3:
टिप्पणी लिखिए-उदभवन अवधि।
उत्तर:
उदभवन अवधि

सभी संक्रामक रोग रोगाणुओं द्वारा फैलते हैं। रोग के कीटाणु व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करने के बाद निरन्तर बढ़ने लगते हैं। शरीर इन्हें समाप्त करने के लिए संघर्ष भी करता है। यदि रोगाणुओं की विजय होती हैं, तो व्यक्ति रोगी हो जाता है, व्यक्ति में रोग के लक्षण स्पष्ट रूप से दिखायी देने लगते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि शरीर में कीटाणु के प्रवेश तथा रोग के लक्षण प्रकट होने के मध्य कुछ काल होता है। यह काल ही रोग की उदभवन अवधि या सम्प्राप्ति काल (Incubation period) कहलाता है। भिन्न-भिन्न रोगों का यह सम्प्राप्ति काल अथवा उद्भवन अवधि भिन्न-भिन्न होती है। कुछ मुख्य संक्रामक रोगों की उद्भवने अवधि निम्नवर्णित है
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 11 सामान्य संक्रामक रोगों का परिचय 1

प्रश्न 4:
निःसंक्रमण से आप क्या समझती हैं? [2008, 10]
उत्तर:
सभी संक्रामक रोग किसी-न-किसी रोगाणु के कारण ही उत्पन्न होते हैं। रोगाणुओं के एक व्यक्ति से अन्य व्यक्तियों तक पहुँचने की प्रक्रिया को ही रोग का संक्रमण या रोग का फैलना कहा जाता है। जैसे-जैसे रोगाणु बढ़ते हैं वैसे-वैसे रोग का विस्तार होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए आवश्यक है कि रोगाणुओं को नष्ट करने के यथा-सम्भव उपाय किए जाएँ। रोगाणुओं को समाप्त करने की प्रक्रिया एवं उपायों को लागू करने को ही निःसंक्रमण या विसंक्रमण (Disinfection) कहा जाता है। नि:संक्रमण के लिए भिन्न-भिन्न उपायों को अपनाया जाता है।

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प्रश्न 5:
निःसंक्रामक तत्त्व से आप क्या समझते हैं? ये कितने प्रकार के होते हैं? [2008, 10]
या
निःसंक्रामक से क्या तात्पर्य है? किन्हीं चार रासायनिक निःसंक्रामकों का वर्णन कीजिए। [ 12013, 14]
या
निःसंक्रामक पदार्थ किसे कहते हैं? किन्हीं तीन निःसंक्रामक पदार्थों के नाम लिखिए। [2008]
उत्तर:
विभिन्न प्रकार के रोगाणुओं को नष्ट करने के लिए अर्थात् नि:संक्रमण के लिए अपनाए जाने वाले उपायों एवं साधनों को ही नि:संक्रामक तत्त्व एवं कारक कहा जाता है। व्यवहार में अनेक प्रकार के नि:संक्रामक तत्त्वों को अपनाया जाता है। अध्ययन की सुविधा के लिए समस्त नि:संक्रामक तत्त्वों को तीन वर्गों में बाँटा जाता है। ये वर्ग हैं:-क्रमशः भौतिक नि:संक्रामक, प्राकृतिक नि:संक्रामक तथा रासायनिक नि:संक्रामक। भौतिक नि:संक्रामक उपायों में मुख्य हैं—जलाना, उबालना, भाप तथा गर्म वायु। ये सभी उपाय उच्च ताप से सम्बन्धित हैं। उच्च ताप पाकर सभी प्रकार के रोगाणु शीघ्र ही मर जाते हैं। प्राकृतिक नि:संक्रामकों में सूर्य के प्रकाश, ताप, वायु तथा ऑक्सीजन का महत्त्वपूर्ण स्थान है। धूप से अधिकांश रोगाणु नष्ट हो जाते हैं। वायु के प्रवाह से भी सीलन से उत्पन्न होने वाले रोगाणु नष्ट हो (UPBoardSolutions.com) जाते हैं। इसी प्रकार वायु की ऑक्सीजन भी एक उत्तम कीटाणुनाशक है। जहाँ तक रासायनिक नि:संक्रामकों का प्रश्न है, इनके अन्तर्गत तीन प्रकार के रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। ये पदार्थ हैं–तरल, गैसीय तथा ठोस रासायनिक नि:संक्रामक पदार्थ। मुख्य तरल नि:संक्रामक हैं—फिनाइल, कार्बोलिक एसिड, फार्मेलिन, लाइजोल आदि। गैसीय रासायनिक पदार्थ हैं-सल्फर डाइऑक्साइड गैस तथा क्लोरीन गैस। ठोस रासायनिक नि:संक्रामकों में मुख्य हैं—चूना, ब्लीचिंग पाउडर, पोटैशियम परमैंगनेट तथा नीला थोथा

प्रश्न 6:
टिप्पणी लिखिए-इन्फ्लुएन्जा।
उत्तर:
इन्फ्लुएन्जा या फ्लू आमतौर पर एक फैलने वाला संक्रामक रोग है। सामान्य रूप से मौसम के बदलते समय यह रोग अधिक होता है। इस रोग का प्रसार बड़ी तेजी से होता है; अतः इससे बचाव के लिए विशेष सावधानी रखनी पड़ती है।

कारण तथा प्रसार:
फ्लू नामक रोग एक अति सूक्ष्म जीवाणु द्वारा फैलता है। यह रोगाणु इन्फ्लुएन्जा वायरस कहलाता है। जुकाम के बिगड़ जाने पर फ्लू बन जाता है। फ्लू का रोग बहुत ही शीघ्र फैलता है। यह कुछ ही घण्टों में फैल जाता है।

फ्लू नामक रोग रोगी के सम्पर्क द्वारा भी फैल जाता है। फ्लू के रोगी की छींक, खाँसी तथा थूक आदि द्वारा भी फ्लू फैलता है। रोगी द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले रूमाल, बर्तन तथा अन्य वस्तुओं के सम्पर्क द्वारा भी यह रोग लग सकता है।

लक्षण: फ्लू प्रारम्भ में जुकाम के रूप में प्रकट होता है। नाक से पानी बहने लगता है। इस रोग के शुरू होते ही शरीर में दर्द होने लगता है। सारे शरीर में बेचैनी होती है तथा कमजोरी महसूस होती है। इसके साथ-ही-साथ तेज ज्वर 102° से 104° फारेनहाइट तक हो जाता है।
उपचार: फ्लू के रोगी को आराम से लिटा देना चाहिए। रोगी को चिकित्सक को दिखाकर दवा देनी चाहिए। फ्लू के रोगी को विटामिन ‘सी’ युक्त भोजन देना चाहिए।
बचाव के उपाय: फ्लू के रोगी को अन्य व्यक्तियों से दूर ही रहना चाहिए। उसे भीड़ भरे स्थानों पर नहीं जाना चाहिए। (UPBoardSolutions.com) रोगी को साफ कमरे में रखना चाहिए। पौष्टिक आहार, उचित विश्राम एवं निद्रा का ध्यान रखना चाहिए।

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प्रश्न 7:
मलेरिया रोग फैलने के कारण, लक्षण और बचाव के उपाय लिखिए। मलेरिया के रोगी को क्या भोजन देना चाहिए? [2009, 10, 13, 15, 16]
या
मलेरिया रोग कैसे फैलता है? इस रोग के लक्षण तथा बचाव के उपाय बताइए। [2008]
या
मलेरिया बुखार से बचने के उपाय लिखिए। [2013]
उत्तर:
मलेरिया (Malaria) एक व्यापक रूप से फैलने वाला संक्रामक रोग है। चिकित्सा सम्बन्धी ज्ञान के भरपूर विकास के उपरान्त भी प्रतिवर्ष हमारे देश में लाखों व्यक्ति इस रोग के शिकार होते हैं। जिनमें से अनेक की इस रोग के कारण मृत्यु तक हो जाती है। मलेरिया फैलाने का कार्य मच्छर करते हैं। ऐनोफेलीज जाति के मादा मच्छर मलेरिया के वाहक होते हैं। इस रोग की उत्पत्ति एक परजीवी या पराश्रयी कीटाणु प्लाज्मोडियम (Plasmodium) से होती है। मलेरिया की उद्भवन अवधि 9 से 12 दिन है। व्यक्ति के रक्त में कीटाणु सक्रिय होकर रोग के लक्षण उत्पन्न करते हैं।

लक्षण:
(1) रोग का संक्रमण होने के साथ-ही-साथ व्यक्ति को कंपकपी के साथ जाड़ा लगता है जिससे शरीर का तापमान बढ़ने लगता है। इस स्थिति में व्यक्ति को 103° से 105° फारेनहाईट तक ज्वर हो सकता है।
(2) संक्रमण के साथ-ही-साथ सिर तथा शरीर के अन्य भागों में तेज दर्द होने लगता है।
(3) कभी-कभी तीव्र संक्रमण की दशा में जी मिचलाने लगता है तथा पित्त के बढ़ जाने से उबकाई या उल्टियाँ भी होने लगती हैं।
(4) जब मलेरिया का ज्वर उतरता है उस समय रोगी को पसीना भी आता है।
(5) छोटे बच्चों में मलेरिया के कारण प्लीहा या तिल्ली भी बढ़ जाती है।

बचाव के उपाय:
मलेरिया से बचाव का प्रमुख उपाय शरीर को मच्छरों से बचाना है। मच्छरों से बचाव के लिए दो प्रकार के उपाय किए जा सकते हैं। प्रथम प्रकार के उपायों के अन्तर्गत मच्छरों को समाप्त करने या भगाने के उपाय किए जाते हैं तथा दूसरे प्रकार के उपायों के अन्तर्गत व्यक्ति स्वयं (UPBoardSolutions.com) को मच्छरों से सुरक्षित करने के प्रयास करता है।

उपचार:
मलेरिया का सन्देह होने पर रक्त की जाँच करवानी चाहिए। मलेरिया का संक्रमण निश्चित हो जाने पर चिकित्सक से उपचार करवाना चाहिए। मलेरिया के उपचार की अनेक औषधियाँ उपलब्ध हैं। रोगी को पूरी तरह से आराम करना चाहिए। रोग पर शीघ्र नियन्त्रण पाया जा सकता है। रोगी को हल्का तथा सुपाच्य आहार दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 8:
काली खाँसी के लक्षण, कारण व बचाव के उपाय लिखिए।
या
कुकुर खाँसी के लक्षण लिखिए। [2015]
उत्तर:
यह रोग साधारणतः 5 वर्ष से कम आयु के शिशुओं को होता है। प्रायः खसरा होने के बाद असावधानी से यह रोग उत्पन्न हो जाता है। इस रोग में बच्चे को रुक-रुककर खाँसी के दौरे पड़ते हैं। जो दिन में पाँच से लेकर बीस बार तक पड़ते हैं। प्रायः खाँसते-खाँसते उल्टी भी हो जाती है। इस रोग का उद्भवन काल 7 से 14 दिन तक होता है।

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रोग फैलने के कारण:
काली खाँसी नामक रोग वायु एवं निकट सम्पर्क द्वारा फैलने वाला एक जीवाणु जनित रोग है। इस रोग की उत्पत्ति का कारण होमोकिट्स परटुसिस बेसिनस नामक रोगाणु होता है। रोगी की साँस में इस रोग के जीवाणु रहते हैं जो उसके सम्पर्क में आने से अथवा वायु (UPBoardSolutions.com) द्वारा स्वस्थ शिशु को लग जाते हैं तथा उसे भी रोगी बना देते हैं। रोगी बच्चे के खिलौनों तथा वस्त्रों से भी यह छूत फैल जाती है। कुत्तों को यह रोग प्रायः होता रहता है; इसलिए इसे कुकुर खाँसी भी कहते हैं।

उपचार: (1) स्वस्थ बच्चों को रोगी बच्चे के सम्पर्क से बचाकर रखना चाहिए,
(2) रोगी के थूक आदि को जला देना चाहिए तथा नि:संक्रामकों से उसके वस्त्रों, खिलौनों व स्थान को साफ कर देना चाहिए,
(3) रोगी को हवादार कक्ष में रखना चाहिए,
(4) किसी अच्छे चिकित्सक के निर्देशानुसार औषधि लेनी चाहिए।

प्रश्न 9:
व्यक्तिगत स्वच्छता क्यों आवश्यक है? आप बच्चों में इसकी आदत कैसे डालेंगी? [2016]
उत्तर:
व्यक्तिगत स्वच्छता का हमारे जीवन में बहुपक्षीय महत्त्व है। सर्वप्रथम शारीरिक स्वास्थ्य के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता अति आवश्यक है। वास्तव में गन्दगी में विभिन्न रोगों के जीवाणु तेजी से पनपते हैं तथा वे हमें रोगग्रस्त बना देते हैं। अधिकांश चर्म रोग तो मुख्य रूप से व्यक्तिगत स्वच्छता के अभाव में ही पनपते हैं। शारीरिक स्वास्थ्य के अतिरिक्त मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी व्यक्तिगत स्वच्छता एक अनिवार्य कारक है। व्यक्तिगत स्वच्छता के अभाव में व्यक्ति को समाज में समुचित स्थान प्राप्त नहीं होता तथा वह अलग-थलग पड़ जाता है। ऐसे में वह हीन भावना का शिकार हो जाता है तथा उसका मानसिक स्वास्थ्य सामान्य नहीं रह पाता। बच्चों को समझा-बुझाकर उनमें इसकी आदत डाली जा सकती है।

प्रश्न 10:
टायफाइड रोग के लक्षण और इससे बचने का उपाय लिखिए। [2016]
उत्तर:

लक्षण:
मियादी बखार के प्रारम्भ होते ही सिर में तेज दर्द होता है तथा व्यक्ति अत्यधिक बेचैनी अनुभव करता है। जैसे-जैसे रोग के कीटाणु व्यक्ति पर अपना असर डालते हैं ज्वर तीव्र होने लगता है। कभी-कभी ज्वर के साथ-ही-साथ सारे शरीर पर छोटे-छोटे सफेद रंग के मोती के समान आकार वाले दाने भी निकल आते हैं। इस लक्षण के ही कारण इस रोग को मोतीझरा भी कहते हैं। मियादी बुखार के कारण आँतों में सूजन तथा अन्य विकार भी आ जाते हैं। रक्त-परीक्षण द्वारा इस रोग की निश्चित रूप से पहचान की जाती है। इस परीक्षण को ही विडाल टेस्ट भी कहते हैं।

रोग से बचाव के उपाय: इस रोग से बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं।

  1.  सभी व्यक्तियों को चिकित्सक की राय से समय-समय पर टी० ए० बी० का टीका लगवाना चाहिए।
  2. जिस व्यक्ति को मियादी बुखार हो जाए, उसे अलग रखना चाहिए तथा अन्य व्यक्तियों को उसके सम्पर्क से बचाना चाहिए।
  3. रोगी के बर्तनों, बिस्तर एवं अन्य वस्तुओं को अलग रखना चाहिए तथा (UPBoardSolutions.com) उन्हें उबलते हुए गर्म पानी में धोना चाहिए।
  4. गाँवों में रोगी के मल-मूत्र को अलग स्थान पर नष्ट करना चाहिए तथा उसमें किसी रोगाणुनाशक तत्त्व को अवश्य डाल देना चाहिए।
  5. सभी व्यक्तियों को चाहिए कि वे दूध उबालकर पियें; क्योकि इस रोग के रोगाणु दूध के माध्यम से भी संक्रमित हो जाते हैं।
  6. रोगी व्यक्ति का पूर्ण उपचार करवाना चाहिए।

प्रश्न 11:
खसरा (Measles) नामक रोग के लक्षण, उपचार तथा बचाव के उपाय बताइए। [2009, 10, 11, 12, 13]
या
खसरा से बचने के उपाय लिखिए। [2011]
उत्तर:
खसरा

खसरा भी मुख्य रूप से बच्चों में फैलने वाला रोग है। यह रोग सामान्यतया छोटी आयु के बच्चों को होता है तथा कभी-कभी गम्भीर रूप धारण कर लेता है। खसरा को फैलाने का कार्य पैरामाइक्सोविरिडेयी वर्ग के मॉरबिलि वायरस ही करते हैं। ये जीवाणु व्यक्ति की नाक तथा गले पर आक्रमण करते हैं। रोगी बच्चे की छींक, खाँसी तथा साँस से यह रोग एक-दूसरे को लगता है।

लक्षण: खसरा के जीवाणुओं के प्रभाव से सर्वप्रथम व्यक्ति को जोड़ा लगता है तथा बुखार हो जाता है। इससे काफी बेचैनी होती है। रोगी की आँखें लाल हो जाती हैं तथा आँखों से पानी भी बहने लगता है। खाँसी एवं छींकें भी आने लगती हैं। इसके साथ-ही-साथ खसरा के दाने भी निकलने लगते हैं। पहले ये दाने कानों के पीछे निकलते हैं तथा धीरे-धीरे पूरे शरीर पर निकल आते हैं। पूरे शरीर पर दाने निकलने के साथ-ही-साथ बुखार हो जाता है। 4-5 दिन में ये दाने भी मुरझाने लगते हैं तथा बुखार भी उतर जाता है। लगभग 8-10 दिन में रोगी के सारे दाने समाप्त हो जाते हैं तथा वह स्वस्थ हो जाता है।

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उपचार: यदि खसरा बिगड़े नहीं तो किसी खास उपचार की आवश्यकता नहीं होती, परन्तु खसरा के रोगी की उचित देखभाल अवश्य करनी चाहिए, क्योंकि कभी-कभी इस बात का डर रहता है कि कहीं निमोनिया न हो जाए। रोगी को अधिक गर्मी एवं अधिक ठण्ड से बचाना चाहिए।

बचाव के उपाय: खसरा से बचाव के लिए गन्दगी एवं अशुद्ध वातावरण से बचना चाहिए। सन्तुलित एवं पौष्टिक भोजन से बच्चों में रोग से बचने की क्षमता विकसित होती है। अब खसरा से बचने का टीका भी विकसित कर लिया गया है जो छोटे शिशुओं को लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त वे सभी उपाय करने चाहिए जो अन्य संक्रामक रोगों को फैलने से रोकने के लिए किए जाते हैं।

प्रश्न 12:
छोटी माता (Chickenpox) नामक रोग का सामान्य परिचय दीजिए। इस रोग के लक्षणों, संक्रमण तथा बचाव एवं उपचार के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
छोटी माता

छोटी माता भी चेचक के समान एक संक्रामक रोग है, परन्तु यह घातक नहीं है। यह शीत ऋतु का रोग है।
लक्षण: (1) रोग का आरम्भ 99° फारेनहाइट तापमान से होता है। कभी-कभी ज्वर नहीं होता है, चेहरा तथा आँखें लाल हो जाती हैं।
(2) सिर, पीठ में दर्द, बेचैनी व कॅपकपी लगती है। शरीर पर छोटे-छोटे सरसों के बराबर दाने निकलने लगते हैं।
(3) 4-5 दिन में दाने सूखने लगते हैं तथा उन पर पपड़ी बन जाती है।
(4) 6-7 दिन बाद पपड़ी सूखकर गिरने लगती है।

संक्रमण: इस रोग के विषाणु नाक और गले के स्राव में होते हैं। इसके अतिरिक्त (UPBoardSolutions.com) फफोले के तरल पदार्थ में भी रहते हैं और यहीं से वायु अथवा सम्पर्क द्वारा स्वस्थ व्यक्तियों तक पहुँचते हैं। अतः दानों की पपड़ी को एकत्र करके जला देना चाहिए।
बचाव एवं उपचार:

  1. त्वचा को स्वच्छ रखना चाहिए। इससे रोग का और अधिक विस्तार नहीं हो पाता।।
  2. रोगी को अलग कमरे में रखना चाहिए।
  3. खुजलाहट दूर करने के लिए मरहम का प्रयोग करना चाहिए।
  4. पपड़ियाँ सूखकर गिर जाने पर रोगी को किसी हल्के नि:संक्रामक विलयन से स्नान करो देना चाहिए।
  5. रोगी के कमरे को रोगाणुनाशक पदार्थ से धो डालना चाहिए।
  6. इस रोग में रोगी को ठण्डी और खट्टी चीजें खाने को नहीं देनी चाहिए। नमक, मिर्च, तेल आदि का परहेज रखना चाहिए।

प्रश्न 13:
डेंगू नामक रोग के घरेलू उपचार बताइये।
उत्तर:
वैसे तो डेंगू का व्यवस्थित उपचार अति आवश्यक होता है परन्तु इससे बचाव तथा रोग नियन्त्रित करने के कुछ घरेलू उपाय भी हैं जिन्हें अपनाया जा सकता है। इस प्रकार के कुछ मुख्य उपाय निम्नवर्णित हैं

  1. धनियापत्ती: डेंगू बुखार में धनिये की पत्ती के रस को एक टॉनिक के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। इससे ज्वर कम हो जाता है।
  2. आँवला: डेंगू बुखारे में आँवले का उपयोग लाभदायक सिद्ध होता है। इसमें विटामिन ‘सी’ की भरपूर मात्रा होती है जो कि लोह खनिज के शोषण में सहायक होता है।
  3. तुलसी: तुलसी के पत्तों को पानी में उबालकर उस पानी का सेवन करने से रोगी को विशेष लाभ होता है।
  4. पपीते के पत्ते: डेंगू रोग के उपचार में पपीते के पत्ते का सेवन विशेष लाभकारी सिद्ध होता है। पपीते के पत्ते के रस के सेवन से प्लेटलेट्स बड़ी तेजी से बढ़ते हैं तथा रोग के नियन्त्रण में सहायता मिलती है।
  5. बकरी का दूध: बकरी का दूध डेंगू रोग को नियन्त्रित करने में बहुत अधिक सहायक होता है। इसके सेवन से प्लेटलेट्स में बड़ी तेजी से वृद्धि होती है। इसके सेवन से जोड़ों के दर्द में भी
    आराम मिलता है।
  6. मेथी के पत्ते: मेथी के पत्तों को उबालकर हर्बल चाय के रूप में सेवन करने से डेंगू बुखार नियन्त्रित हो जाता है।
    उपर्युक्त उपायों के अतिरिक्त अनार, काले अंगूर तथा संतरे का जूस भी डेंगू बुखार में लाभकारी सिद्ध होता है।

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प्रश्न 14:
टिप्पणी लिखिए-पीत ज्वर (Yellow Fever)
उत्तर:
पीत ज्वर तेजी से फैलने वाला एक संक्रामक रोग है। यह एक वायरसजनित रोग है। इस रोग के विषाणु का संक्रमण एडीस ईजिप्टिआई (Aedes Aegypti) जाति के मच्छरों के माध्यम से होता है।
पीत ज्वर एक गम्भीर रोग है। इसके प्रकोप से रोगी के यकृत तथा गुर्दे की कोशिकाओं को क्षति पहुँचती है। जब रोगी का यकृत प्रभावित होने लगता है तब रोगी में पीलिया के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। ऐसे में त्वचा का रंग पीला दिखाई देने लगता है। यही कारण है कि इस रोग को पीत ज्वर नाम दिया गया है। सामान्य रूप से पीत ज्वर दस दिन तक रहता है तथा घातक न हो तो धीरे-धीरे रोगी ठीक होने लगता है।

रोग के लक्षण:
1. रोग के बढ़ते ही व्यक्ति को तेज बुखार होता है।
2. प्रायः रोगी को ठंड लगती है तथा कँपकँपी होती है।
3. पीठ में काफी दर्द होता है।
4. रोगी का शरीर पीला पड़ने लगता है।

बचाव के उपाय:
1. रोग से बचाव का सर्वोत्तम उपाय है-मच्छरों से बचाव का हर सम्भव उपाय करना।
2. इस रोग से बचाव का टीका भी है। एक बार लगवाये गये टीके का प्रभाव लगभग चार वर्ष तक रहता है।

सामान्य उपचार: पीत ज्वर के लक्षण प्रकट होते ही तुरन्त चिकित्सक के परामर्श के अनुसार उपचार किया जाना चाहिए। रोग का कोई कारगर घरेलू उपचार नहीं है।

प्रश्न 15:
इन्सेफेलाइटिस (Encephalitis) नामक रोग के लक्षण, बचाव के उपाय तथा उपचार बतायें।
उत्तर:
वायरस से संक्रमित होने वाला एक गम्भीर संक्रामक रोग इन्सेफेलाइटिस या जापानी इन्सेफेलाइटिस (Japanese Encephalitis) भी है। इसे दिमागी बुखार या मस्तिष्कीय ज्वर भी कहा जाता है। इस रोग के वायरस का संक्रमण एक विशेष प्रकार के मच्छर या सूअर के माध्यम (UPBoardSolutions.com) से होता है। सूअर को ही इस रोग का मुख्य वाहक माना जाता है।
यह रोग मुख्य रूप से छोटे बच्चों (1 से 14 वर्ष) तथा 65 वर्ष से अधिक आयु वाले व्यक्तियों को हुआ करता है। हमारे देश के 19 राज्यों के 171 जिलों में इस रोग का अधिक प्रकोप रहता है। इस रोग से हर वर्ष अनेक बच्चों एवं बड़े व्यक्तियों की मृत्यु हो जाती है। इस रोग का प्रकोप अगस्त, सितम्बर तथा अक्टूबर के महीनों में अधिक होता है।

इन्सेफेलाइटिस रोग के मुख्य लक्षण: इन्सेफेलाइटिस या दिमागी बुखार के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं

  1. रोगी अतिसंवेदनशील हो जाता है।
  2. रोगी को दुर्बलता महसूस होती है तथा उल्टियाँ भी होती हैं।
  3. यदि छोटे बच्चे को यह रोग होता है तो वह निरन्तर रोता है।
  4. तेज ज्वर होता है तथा सिरदर्द होता है। रोग के बढ़ने के साथ-ही-साथ सिरदर्द में बढ़ोतरी होती है।
  5. रोगी की गर्दन अकड़ जाती है।
  6. व्यक्ति को भूख कम लगती है।
  7.  रोगी को लकवा मार जाता है। स्थिति बिगड़ने पर व्यक्ति कोमा में भी जा सकता है।

बचाव के उपाय:

  1. सही समय पर रोग से बचाव के लिए टीकाकरण कराएँ।
  2.  हर प्रकार की सफाई का विशेष ध्यान रखें।
  3. गन्दे पानी के सम्पर्क में आने से बचना आवश्यक है।
  4. मच्छरों से बचाव के हर सम्भव उपाय करने चाहिए।
  5. घरों के आस-पास पानी न जमा होने दें। वर्षा ऋतु में इसका विशेष ध्यान रखना आवश्यक
  6. बच्चों को अच्छा पौष्टिक आहार दें।

उपचार: इन्सेफेलाइटिस रोग का कोई भी लक्षण दिखाई देते ही तुरन्त योग्य चिकित्सक से सम्पर्क करें तथा व्यवस्थित उपचार आरम्भ कर दें।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
संक्रामक रोग किसे कहते हैं? मुख्य संक्रामक रोगों के नाम लिखिए। [2007, 10, 13, 14, 16, 17]
उत्तर:
वे रोग जो जीवाणुओं के माध्यम से एक व्यक्ति अथवा प्राणी से दूसरे व्यक्ति (UPBoardSolutions.com) अथवा प्राणी को लग जाते हैं, उन्हें संक्रामक रोग कहा जाता है। मुख्य संक्रामक रोग हैं-चेचक, तपेदिक, हैजा, मियादी बुखार, डेंगू, चिकनगुनिया, इन्सेफेलाइटिस आदि।

प्रश्न 2:
संक्रामक रोग किन-किन माध्यमों द्वारा फैलते हैं? [2007, 09, 11]
उत्तर:
संक्रामक रोग वायु, जल, भोजन, सम्पर्क तथा रक्त द्वारा या कीड़ों के काटने के द्वारा फैलते हैं।

प्रश्न 3:
वायु द्वारा फैलने वाले रोगों के नाम लिखिए। [2011]
उत्तर:
वायु द्वारा फैलने वाले मुख्य रोग हैं-चेचक, इन्फ्लुएन्जा, खसरा, काली खाँसी, क्षय रोग, डिफ्थीरिया आदि।

प्रश्न 4:
जल एवं भोजन के माध्यम से फैलने वाले मुख्य रोगों के नाम बताइए।
उत्तर:
जल के माध्यम से फैलने वाले मुख्य रोग है हैजा, मोतीझरा या मियादी बुखार, अतिसार, पेचिस तथा पीलिया।

प्रश्न 5:
प्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा फैलने वाले मुख्य रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
प्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा फैलने वाले मुख्य रोग हैं-दाद, खाज, खुजली, एग्जीमा, एड्स तथा हेपेटाइटिस ‘बी’ आदि ।

प्रश्न 6:
रोग-प्रतिरक्षा से आप क्या समझती हैं? [2008, 09, 10, 12, 14, 16, 17, 18]
उत्तर:
शरीर में पाई जाने वाली उस शक्ति को रोग-प्रतिरक्षा या रोग प्रतिरोधक-क्षमता कहा जाता है जो विभिन्न रोगों के रोगाणुओं से लड़ने के लिए होती है।

प्रश्न 7:
रोग-प्रतिरोध क्षमता कितने प्रकार की होती है? [2014, 16]
उत्तर:
रोग-प्रतिरोध क्षमता मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है। ये प्रकार हैं-प्राकृतिक रोगप्रतिरोध क्षमता तथा कृत्रिम अथवा अर्जित रोग-प्रतिरोध क्षमता।

प्रश्न 8:
कृत्रिम अथवा अजित रोग-प्रतिरोध क्षमता को प्राप्त करने का मुख्य उपाय क्या है?
उत्तर:
कृत्रिम अथवा अर्जित रोग-प्रतिरोध क्षमता को प्राप्त करने के लिए सम्बन्धित रोग के टीके या इन्जेक्शन लगवाने पड़ते हैं।

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प्रश्न 9:
रोग के उद्भवन काल से आपका क्या तात्पर्य है? [2016]
उत्तर:
किसी भी संक्रामक रोग के रोगाणुओं के शरीर में प्रवेश करने तथा रोग के लक्षण प्रकट होने के मध्य काल को रोग का उद्भवन काल कहते हैं।

प्रश्न 10:
निःसंक्रमण से आप क्या समझती हैं।
उत्तर:
विभिन्न रोगों के रोगाणुओं को समाप्त करने की प्रक्रिया एवं उपायों (UPBoardSolutions.com) को लागू करने को ही नि:संक्रमण कहा जाता है।

प्रश्न 11:
निःसंक्रामक पदार्थ क्या हैं ? [2009]
उत्तर:
वे पदार्थ जो रोगाणुओं को नष्ट करने में इस्तेमाल किए जाते हैं, उन्हें ही नि:संक्रामक पदार्थ कहा जाता है।

प्रश्न 12:
किन्हीं दो रासायनिक निःसंक्रामक तत्वों का उल्लेख कीजिए। [2011]
उत्तर:
ब्लीचिंग पाउडर तथा क्लोरीन गैस रासायनिक नि:संक्रामक हैं।

प्रश्न 13:
सूर्य के प्रकाश का रोगाणुओं पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
सूर्य के प्रकाश से अनेक रोगाणु नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 14:
चेचक उत्पन्न करने वाले रोगाण का नाम लिखिए।
उत्तर:
चेचक उत्पन्न करने वाले रोगाणु को वरियोला वायरस कहते हैं।

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प्रश्न 15:
डिफ्थीरिया उत्पन्न करने वाले रोगाणु का नाम लिखिए।
उत्तर:
डिफ्थीरिया उत्पन्न करने वाले रोगाणु को कोरीनी बैक्टीरियम डिफ्थीरी कहते हैं।

प्रश्न 16:
डिफ्थीरिया नामक रोग किस आयु-वर्ग के बच्चे को होता है?
उत्तर:
डिफ्थीरिया रोग सामान्यतया 2 से 5 वर्ष की आयु के बच्चों को अधिक होता है।

प्रश्न 17:
डी०पी०टी० के तीन टीके लगाने से किन-किन रोगों से प्रतिरक्षा होती है? [2007]
उत्तर:
डी०पी०टी० के टीके लगाने से डिफ्थीरिया, काली खाँसी तथा टिटनेस नामक रोगों से प्रतिरक्षा होती है।

प्रश्न 18:
क्षय रोग के दो लक्षण लिखिए। क्षय रोग से बचाव के लिए कौन-सा टीका लगाया जाता है? [2007]
या
बी०सी०जी० का टीका किस रोग की रोकथाम के लिए लगाया जाता है? [2008, 18]
उत्तर:
क्षय रोग में व्यक्ति का वजन घटने लगता है, दुर्बलता महसूस होती है तथा उसे हल्का ज्वर रहता है। क्षय रोग से बचाव के लिए बी०सी०जी० का टीका लगवाया जाता है।

प्रश्न 19:
टिटनेस नामक रोग किस जीवाणु से फैलता है? [2018]
या
टिटनेस फैलाने वाले सूक्ष्म जीवाणु का नाम क्या है? इस रोग की रोकथाम के दो उपाय लिखिए।
उत्तर:
टिटनेस नामक रोग क्लॉस्ट्रीडियम टिटेनाइ नामक जीवाणु द्वारा फैलता है।
रोकथाम के उपाय
1. प्रसव के समय माँ को तथा 3 से 5 माह के बच्चे को टिटनेस का टीका लगवा देना चाहिए।
2. त्वचा फटने, छिलने व घाव होने पर, तुरन्त टैटवैक का इन्जेक्शन (UPBoardSolutions.com) लगवाना चाहि

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प्रश्न 20:
विषाक्त भोजन से क्या तात्पर्य है? [2011]
उत्तर:
जिस भोजन में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तत्वों का समावेश हो उसे विषाक्त भोजन कहा जाता है।

प्रश्न 21:
आहार-विषाक्तता के लिए जिम्मेदार जीवाणु समूहों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
आहार-विषाक्तता के लिए जिम्मेदार जीवाणु समूह हैं साल्मोनेला समूह, स्टेफाईलोकोकाई समूह, क्लॉस्ट्रीडियम समूह तथा क्लॉस्ट्रीडियम बौटूलिनम समूह।

प्रश्न 22:
मलेरिया उत्पन्न करने वाले जीवाणु का नाम बताइए। इस रोग को फैलाने में किस जीव का मुख्य योगदान होता है?
उत्तर:
मलेरिया उत्पन्न करने वाले जीवाणु का नाम है-प्लाज्मोडियम। इस रोग को फैलाने में मच्छर का योगदान होता है।

प्रश्न 23:
मलेरिया के लक्षण लिखिए। [2011, 16]
उत्तर:
मलेरिया रोग में तेज ज्वर होता है तथा कैंपकपी होने लगती है। इसके साथ ही साथ सिर में दर्द होना, जी मिचलाना तथा थकान होना भी मलेरिया के लक्षण होते हैं।

प्रथम 24:
मच्छर से बचने के उपाय लिखिए। [2007]
उत्तर:
मच्छर से बचने के उपाय दो प्रकार के हैं। इनमें एक प्रकार के मच्छरों को स्वयं से दूर करने या मारने के लिए किए जाते हैं और दूसरी प्रकार के अन्तर्गत व्यक्ति स्वयं को मच्छरों से बचाने के प्रयास करता है। मच्छरों को मारने के लिए बाजार में मच्छरमार क्वायल या घरों में छिड़कने की दवाएँ उपलब्ध हैं। दूसरे उपाय के तौर पर हमें ऐसे उपाय करने होते हैं जिससे मच्छर हमारे घरों व उसके आसपास जमा न हो सकें।

प्रश्न 25:
क्षय रोग के कारण लिखिए। [2008]
उत्तर:
क्षय रोग फैलने के कारणों में सबसे प्रमुख हैं–इसका जीवाणु ट्यूबरकिल बैसिलस। यह रोग प्रायः वायु या श्वास द्वारा फैलता है। इसके अलावा यह रोग अत्यधिक श्रम व कुपोषण के कारण, लम्बे समय तक दुर्गन्ध व सीलनयुक्त कमरों में रहने से और मादक द्रव्यों का अत्यधिक (UPBoardSolutions.com) सेवन करने से फैलता है। क्षय रोग से ग्रस्त गाय का दूध पीने से भी यह रोग फैलता है।

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प्रश्न 26:
खसरा के लक्षण लिखिए। [2009, 18]
उत्तर:
खसरा के जीवाणुओं से प्रभावित व्यक्ति को सर्वप्रथम ठण्ड लगती है, बुखार आ जाता है, काफी बेचैनी महसूस होती है, आँखें लाल हो जाती हैं तथा आँखों से पानी आने लगती है। खाँसी एवं छींकें भी आती हैं, साथ-ही-साथ खसरा के दाने भी निकलने लगते हैं।

प्रश्न 27:
डेंगू कैसे फैलता है?
उत्तर:
डेंगू मादा एडीज मच्छर के काटने से फैलता है।

प्रश्न 28:
डेंगू रोग के मुख्य लक्षण बतायें।
उत्तर:
डेंगू रोग में तेज बुखार होता है तथा रोगी को सिरदर्द, कमरदर्द तथा जोड़ों में दर्द होता है।

प्रश्न 29:
डेंगू रोग में गम्भीर स्थिति क्या होती है?
उत्तर:
डेंगू हेमोरेजिक बुखार में रक्त में प्लेटलेट्स की अत्यधिक कमी होने लगती है। यह स्थिति रोग की गम्भीर स्थिति होती है।

प्रश्न 30:
चिकनगुनिया के मुख्य लक्षण बतायें।
उत्तर:
चिकनगुनिया रोग में जोड़ों में दर्द होता है तथा साथ ही ज्वर होता है। त्चचा शुष्क हो जाती है तथा प्रायः त्वचा पर लाल चकत्ते पड़ जाते हैं। बच्चों में रोग के संक्रमण से उल्टियाँ भी होने लगती
हैं।

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प्रश्न 31:
पीत ज्वर का संक्रमण कैसे होता है?
उत्तर:
पात ज्वर एक वायरसजनित रोग है। इस रोग के विषाणु का संक्रमण एडीस ईजिप्टिआई जाति के मच्छरों के माध्यम से होता है।

प्रश्न 32:
हाथीपाँव नामक रोग को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
हाथीपाँव नामक रोग को फाइलेरिया नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न 33:
फाइलेरिया रोग कैसे फैलता है?
उत्तर:
फाइलेरिया एक कृमिजनित रोग है। इस कृमि को फाइलेरिया क्रॉफ्टी कहते हैं। इसे कृमि को फैलाने का कार्य क्यूलेक्स मच्छर द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 34:
इन्सेफेलाइटिस रोग का वाहक कौन है?
उत्तर:
इन्सेफेलाइटिस रोग का वाहक सूअर होता है?

प्रश्न 35:
कौन-कौन से हेपेटाइटिस रोग से बचाव के टीके उपलब्ध हैं?
उत्तर:
हेपेटाइटिस ‘A’ तथा ‘B’ से बचाव के लिए टीके उपलब्ध हैं।

प्रश्न 36:
रेबीज या हाइड्रोफोबिया रोग के विषाणु को क्या कहते हैं।
उत्तर:
न्यूरोरिहाइसिटीज हाइड्रोफोबी

प्रश्न 37:
हाइड्रोफोबिया से बचाव का क्या उपाय है?
उत्तर:
संक्रमित कुत्ते आदि के काटने पर ऐण्टीरेबीज इंजेक्शन (UPBoardSolutions.com) लगवाकर हाइड्रोफोबिया नामक रोग
से बचा जा सकता है।

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बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न:
निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. स्वस्थ मनुष्य किससे मुक्त रहता है? [2013]
(क) रोग
(ख) धन
(ग) चिन्ता
(घ) भय

2. रोगाणुओं के शरीर में प्रवेश करने के कारण उत्पन्न होने वाले रोगों को कहते हैं
(क) साधारण रोग
(ख) घातक रोग
(ग) संक्रामक रोग
(घ) गम्भीर रोग

3. सभी संक्रामक फैलते हैं [2012, 16, 17]
(क) गन्दगी द्वारा
(ख) लापरवाही से
(ग) रोगाणुओं द्वारा
(घ) बिना किसी कारण के

4. शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को कहते हैं
(क) नि:संक्रमण क्षमता
(ख) सम्प्राप्ति काल
(ग) शारीरिक क्षमता
(घ) रोग-प्रतिरोध क्षमता

5. सभी व्यक्तियों में रोग-प्रतिरोध क्षमता होती है
(क) समान
(ख) भिन्न-भिन्न
(ग) आवश्यकतानुसार
(घ) नहीं होती।

6. संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए स्वस्थ व्यक्ति को चाहिए कि वह [2010]
(क) टीके लगवाए
(ख) स्वादिष्ट भोजन ग्रहण करे
(ग) धूप में बैठे
(घ) भ्रमण करे

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7. वायु द्वारा फैलने वाले रोग हैं
(क) चेचक
(ख) तपेदिक
(ग) काली खाँसी
(घ) ये सभी

8. कौन-सा रोग जल द्वारा फैलता है?
(क) टिटनेस
(ख) कुकुर खाँसी
(ग) खसरा
(घ) हैजा

9. तपेदिक के रोगाणु को कहते हैं
(क) वरियोला वायरस
(ख) विब्रियो कोलेरी
(ग) ट्यूबरकिल बैसिलस
(घ) बैसिलस टाइफोसिस

10. बी०सी०जी० का टीका किस रोग की रोकथाम के लिए लगाया जाता है? [2007, 08, 13, 17, 18]
(क) कर्णफेर
(ख) तपेदिक
(ग) पोलियो
(घ) पीलिया

11. डिफ्थीरिया नामक रोग में होने वाला विकार है
(क) लार ग्रन्थियों में सूजन
(ख) चेहरे पर लाल दाने निकल आना
(ग) गले में झिल्ली का बन जाना
(घ) टॉन्सिल्स में वृद्धि हो जाना

12. टिटनेस में होने वाला मुख्य विकार है
(क) तेज ज्वर
(ख) शरीर का ऐंठ जाना
(ग) टाँगों का जकड़ जाना
(घ) चेतना का लुप्त हो जाना

13. मच्छरों से कौन-सा रोग फैलता है? [2008, 09, 13, 14, 15, 17, 18]
(क) चेचक
(ख) क्षय रोग
(ग) मलेरिया
(घ) टायफाइड

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14. मक्खी द्वारा फैलता है [2008, 13]
(क) मलेरिया
(ख) प्लेग
(ग) हैजा
(घ) रेबीज

15. कुकुर खाँसी फैलने का कारण है
(क) जीवाणु
(ख) वायु
(ग) जल
(घ) भोजन

16. रेबीपुर की सूई………. काटने पर लगाई जाती है। [2007]
(क) मच्छर के
(ख) खटमल के
(ग) कुत्ते के
(घ) साँप के

17. रोग के रोगाणु शरीर में प्रवेश करने से रोग उत्पन्न होने तक के काल को कहते हैं [2007]
(क) संक्रमण काल
(ख) सम्प्राप्ति काल
(ग) रोग का प्रकोप
(घ) रोग सुधार की अवधि

18. टेटवैक (ए०टी०एस०) का इन्जेक्शन किस रोग से बचाव के लिए लगाया जाता है? [2008, 12, 15, 16]
(क) टिटनेस
(ख) डिफ्थीरिया
(ग) हैजा
(घ) तपेदिक

19. टिटनेस रोग के जीवाणु पाये जाते हैं। [2014]
(क) मिट्टी में
(ख) गोबर में
(ग) जंग लगे लोहे में
(घ) इन सभी में

20. उत्तम स्वास्थ्य का प्रतीक है [2012, 16]
(क) सुन्दर बाल
(ख) चमकती आँखें
(ग) मजबूत मांसपेशियाँ
(घ) ये सभी

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21. क्षय रोग के रोगी को किस प्रकार का भोजन हानि पहुँचाता है? [2015]
(क) मौसमी रस वाले फल
(ख) मिर्च-मसालेदार भोजन
(ग) दूध
(घ) अण्डा

22. डेंगू रोग फैलता है [2018]
(क) दूषित जल से
(ख) दूषित वायु से
(ग) मच्छर के काटने से
(घ) उपरोक्त सभी के द्वारा

23. डेंगू रोग के विषय में सत्य है
(क) यह एक संक्रामक रोग है।
(ख) इसका संक्रमण मादा एडीज मच्छर के काटने से होता है।
(ग) गम्भीर स्थिति में रक्त के प्लेटलेट्स तेजी से घटने लगते हैं।
(घ) उपर्युक्त सभी कथन सत्य हैं।

24. चिकनगुनिया के उपचार के उपाय हैं
(क) रोगी को अधिक से अधिक विश्राम करना चाहिए।
(ख) रोगी को अधिक से अधिक पानी पीना चाहिए
(ग) रोगी को दूध तथा दूध से बने भोज्य-पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
(घ) उपर्युक्त सभी उपाय

25. इन्सेफेलाइटिस रोग का लक्षण है
(क) रोगी अतिसंवेदनशील हो जाता है।
(ख) रोगी को दुर्बलता महसूस होती हैं तथा उल्टियाँ भी होती हैं।
(ग) रोगी की गर्दन अकड़ जाती है।
(घ) उपर्युक्त सभी लक्षण

26. हेपेटाइटिस रोग का मुख्य लक्षण है
(क) पीलिया के लक्षण प्रकट होना।
(ख) अधिक भूख लगना
(ग) वजन बढ़ना
(घ) कोई भी लक्षण

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27. किस रोग में रोगी के गले की मांसपेशियाँ निष्क्रिय हो जाती है तथा वह कुछ भी निगल नहीं पाता?
(क) मलेरिया
(ख) फाइलेरिया
(ग) हाइड्रोफोबिया
(घ) इन्सेफेलाइटिस

उत्तर:
1. (क) रोग,
2. (ग) संक्रामक रोग,
3. (ग) रोगाणुओं द्वारा,
4. (घ) रोग-प्रतिरोध क्षमता,
5. (ख) भिन्न-भिन्न,
6. (क) टीके लगवाए,
7. (घ) ये सभी,
8. (घ) हैजा,
9. (ग) यूवकिल बैसिलस,
10. (ख) तपेदिक,
11. (ग) गले में झिल्ली को बन जाना,
12. (ख) शरीर का रेट जाना,
13. (ग) मलेरिया,
14. (ग) हैजा,
15. (क) जीवाण,
16. (ग) कुत्ते के,
17. (ख) सम्प्राप्ति काल,
18. (क) टिटनेस,
19. (घ) इन सभी में,
20. (घ) ये सभी,
21. (ख) मिर्च-मसालेदार भोजन,
22. (ग) मच्छर के काटने से,
23. (घ) उपर्युक्त सभी कथन सत्य हैं,
24. (घ) उपर्युक्त सभी उपाय
25. (घ) उपर्युक्त सभी लक्षण,
26. (क) पीलिया के लक्षण प्रकट होना,
27. (ग) हाइड्रोफोबिया।

 

We hope the UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 11 सामान्य संक्रामक रोगों का परिचय help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 11 सामान्य संक्रामक रोगों का परिचय, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 8 अशुद्ध जल से फैलने वाले रोग (पेचिश, अतिसार, हैजा)

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 8 अशुद्ध जल से फैलने वाले रोग (पेचिश, अतिसार, हैजा)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Home Science . Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 8 अशुद्ध जल से फैलने वाले रोग (पेचिश, अतिसार, हैजा) .

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
अशुद्ध जल से रोग किस प्रकार फैलते हैं? इनके नियन्त्रण के उपाय बताइए।
उत्तर:
अशुद्ध जल से रोगों की उत्पत्ति एवं उनका संवाहन

अशुद्ध जल में अनेक प्रकार के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थ पाए जाते हैं। इनके अतिरिक्त अशुद्ध जल में अनेक प्रकार के जीवाणु, कृमि व उनके अण्डे तथा प्रोटोजोन्स आदि पाए जाते हैं। ये मनुष्यों में अनेक रोगों की उत्पत्ति का कारण होते हैं।
अशुद्ध अथवा दूषित जल प्रायः पेय जल के रूप में रोगों की उत्पत्ति एवं उनके संवाहन का कारण बनता है। अत: दूषित जल पीने से सामान्यत: आहारनाल सम्बन्धी रोग होते हैं, जिससे कि रोग की गम्भीर अवस्था में शरीर के कुछ अन्य अंग या पूर्ण शरीर रोग के अभाव में आ जाता है; जैसे-पेचिश, अतिसार व हैजा आदि में शरीर में पानी में आवश्यक लवणों की कमी हो जाने के कारण रोगी डी-हाइड्रेशन अथवा जल-अल्पता का शिकार होकर  मरने की स्थिति में पहुँच जाता है। जल द्वारा रोगों का संवाहन प्रायः निम्नलिखित अज्ञानताओं एवं असावधानियों के कारण होता है

  1. पेय जल का उपयोग करते समय उसकी शुद्धता पर ध्यान न (UPBoardSolutions.com) देकर हम स्वयं रोगों को आमन्त्रित करते हैं। इसके गम्भीर परिणाम प्रायः वर्षा ऋतु में अधिक होते हैं, क्योंकि वर्षा ऋतु में जल-प्रदूषण अधिक होता है।
  2. रोगी द्वारा प्रयुक्त बर्तनों में बिना उनका उचित नि:संक्रमण किए जल पीने की लापरवाही स्वस्थ व्यक्तियों को भी रोग का शिकार बना देती है।
  3. चिकित्सा के मध्य स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करते हुए रोगी को अज्ञानतावश दूषित जल पिला देना उसे दोबारा से रोगी बना देता है।
  4. दूध में अशुद्ध जल की मिलावट होने पर भी यह जल संवाहित रोगों का माध्यम बन जाता है।
  5. कभी-कभी दूषित जल द्वारा भोजन पकाने तथा उस भोजन को ग्रहण करने से भी रोग का संक्रमण हो जाता है।

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जल संवाहित रोगों से बचने के उपाय
जल संवाहित रोगों का मूल कारण दूषित जल होता है। दूषित जल का सेवन करने पर इसमें उपस्थित जीवाणु तथा प्रोटोजोन्स इत्यादि हमारे शरीर में प्रवेश कर रोगों की उत्पत्ति करते हैं। अतः इन रोगों से बचने का एकमात्र उपाय शुद्ध जल का सेवन करना है, परन्तु यह इतना सरल नहीं है। इसके लिए पेय जल को रोगाणु मुक्त करना आवश्यक है। पेय जल को रोगाणुमुक्त करने की सामान्य विधियाँ निम्नलिखित हैं

(1) उबालना:
जल को उबालने से अधिकांश रोगाणु नष्ट हो जाते हैं। अब इस जल को ठण्डा करके पीने से जल संवाहित रोगों के होने की सम्भावना नहीं रहती है।

(2) आसवन:
यह उबालने की विधि का वैज्ञानिक रूप है। इसमें एक बर्तन में जल को (UPBoardSolutions.com) उबाला जाता है तथा परिणामस्वरूप बनी जल-वाष्प को एक दूसरे बर्तन में ठण्डा करके फिर से जल में परिवर्तित किया जाता है। इसे आसुत जल कहते हैं तथा यह पूर्ण रूप से रोगाणु मुक्त होता है।

(3) जीवाणु अभेद्य निस्यन्दक:
बाजार में विभिन्न क्षमता वाले ,जीवाणु अभेद्य निस्यन्दक लगे उपकरण मिलते हैं। इनमें पेय जल डालने पर जीवाणु व प्रोटोजोन्स निस्यन्दक द्वारा रुक जाते हैं। तथा शुद्ध जल छनकर बर्तन में एकत्रित हो जाता है।

(4) परा-बैंगनी किरणें:
विशिष्ट उपकरणों द्वारा पराबैंगनी अथवा अल्ट्रावॉयलेट किरणें डालने से जल में उपस्थित सभी रोगाणु नष्ट हो जाते हैं। इस विधि का उपयोग प्राय: जल-संस्थान द्वारा किया जाता है।

(5) पोटैशियम परमैंगनेट:
कुएँ, तालाब, पोखर इत्यादि के जल में (पाँच ग्राम प्रति एक हजार लीटर जल में) पोटैशियम परमैंगनेट (लाल दवा) डालने से कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। हैजा जैसे संक्रामक रोग के प्रसार को रोकने का यह एक प्रभावशाली उपाय है।

(6) आयोडीन:
दो हजार लीटर जल में एक ग्राम पोटैशियम आयोडाइड मिलाने से जल के अधिकांश जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।

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(7) ब्लीचिंग पाउडर:
एक लाख गैलन जल में 250 ग्राम ब्लीचिंग पाउडर डालने से जल जीवाणुमुक्त हो जाता है। इसका उपयोग प्रायः जल संस्थानों द्वारा बड़े पैमाने पर जल को जीवाणु मुक्त करने के लिए किया जाता है।

(8) क्लोरीन:
क्लोरीन गैस को जल में प्रवाहित करने से जल जीवाणुरहित हो जाता है। जल संस्थानों द्वारा क्लोरीन गैस का उपयोग जीवाणुरहित पेय जल की आपूर्ति के लिए किया जाता है। दस लाख लीटर जल में प्रायः एक लीटर गैस प्रवाहित की जाती है।

प्रश्न 2:
अशुद्ध जल से फैलने वाले रोगों के नाम लिखिए। किसी एक रोग के लक्षण व बचने के उपाय बताइए। [2011, 13, 15, 17, 18]
या
हैजा किस प्रकार फैलता है? इस रोग के लक्षण तथा बचने के उपायों का वर्णन कीजिए। [2007, 10, 13, 14, 17]
या
हैजा नामक रोग के जीवाणु का नाम लिखकर इसका उपचार बताइए।
या
दूषित जल से फैलने वाले प्रमुख रोग कौन-कौन से हैं? ‘हैजे के लक्षण, उपचार तथा बचाव के उपाय लिखिए। [2011,13]
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 8 अशुद्ध जल से फैलने वाले रोग (पेचिश, अतिसार, हैजा)
जल प्रायः भोजन का एक आवश्यक भाग होता है। अनेक रोग (UPBoardSolutions.com) ऐसे होते हैं कि जिनका संवाहन जल तथा भोजन दोनों से ही होता है।
उदाहरण:  हैजा, टायफाइड आदि।
सामान्यत: निम्नलिखित रोग भोजन के माध्यम से फैलते हैं।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 8 अशुद्ध जल से फैलने वाले रोग (पेचिश, अतिसार, हैजा)

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हैजा (कॉलरा)

कारण:
यह रोग विब्रियो कोलेरी नामक जीवाणु द्वारा होता है। दूषित जल इस रोग का प्राथमिक अथवा मूल वाहक है। हैजा फैलने के विभिन्न कारणों का संक्षिप्त विवरण अग्रलिखित है

  1. शुद्ध पेय जल की समुचित व्यवस्था न होने पर नदियों, तालाबों अथवा ठहरा हुआ जल पीने को विवश होना। इस प्रकार का जल हैजे के कीटाणुओं से दूषित हो सकता है।
  2. भीड़ के स्थानों (मेलों इत्यादि) में मल-मूत्र विसर्जन की उचित व्यवस्था (UPBoardSolutions.com) न होने पर यह रोग फैलकर महामारी का रूप धारण कर लेता है। रोगी व्यक्ति वाहक का कार्य करते हैं तथा दूर-दूर तक रोग के जीवाणुओं को फैला देते हैं।
  3. मक्खियाँ इस रोग के संवाहक का कार्य करती हैं। चारों ओर फैली गन्दगी पर जब मक्खियाँ बैठती हैं, तो इनके पंखों एवं पैरों में गन्दगी चिपक जाती है जिसे ये खुले हुए भोज्य पदार्थों तक पहुँचा देती हैं। इस प्रकार भोज्य पदार्थ जीवाणुयुक्त गन्दगी से दूषित हो जाते हैं तथा रोग को फैलाने का कार्य करते हैं।

लक्षण:
रोगाणुओं के शरीर में प्रवेश करने के कुछ घण्टे उपरान्त से दो-तीन दिन पश्चात् तक रोग के निम्नलिखित लक्षण दिखाई पड़ने लगते हैं

  1. चावल के माँड जैसे दस्तों की पुनरावृत्ति।
  2. अत्यधिक मात्रा में तथा बार-बार वमन।
  3. मूत्र विसर्जन में कमी।
  4. शरीर अत्यन्त दुर्बल तथा ज्वर की शिकायत।
  5.  रोगी जल-अल्पता (डी-हाइड्रेशन) से पीड़ित तथा उचित उपचार न मिलने पर कुछ ही घण्टों में मृत्यु की गोद में जा पहुँचता है।

उपचार एवं बचने के उपाय:

  1. मेलों या भीड़ भरे क्षेत्रों में जाने वाले तथा रोगी के आस-पास रहने वाले व्यक्तियों को हैजे से बचाव का टीका अवश्य लगवाना चाहिए।
  2. रोगी को अस्पताल में भर्ती करा देना चाहिए। यदि यह सम्भव न हो, तो उसे पृथक् कमरे में रखना चाहिए।
  3. दूध व जल को उबालकर पीना चाहिए।
  4. भोजन सामग्री को ढककर रखना चाहिए तथा जिन भोज्य पदार्थों पर मक्खियाँ बैठती हों उन्हें कदापि नहीं खाना चाहिए।
  5. घर के आस-पास, गलियों व सड़कों पर स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इनमें गन्दगी के ढेर कभी नहीं रहने देने चाहिए। नगरपालिका व स्वास्थ्य विभाग को समय-समय पर सचेत करते रहना चाहिए।
  6. रोगी के मल-मूत्र व वमन आदि का विधिपूर्वक तुरन्त नि:संक्रमण करना चाहिए।
  7. रोगी द्वारा प्रयुक्त बर्तनों व वस्त्रों को खौलते पानी में डालकर साबुन से धोना चाहिए।
  8. रोगी को योग्य चिकित्सक के परामर्श के अनुसार ओषधियाँ देना (UPBoardSolutions.com) सदैव विवेकपूर्ण रहता है।
    जल शुद्ध करने की घरेलू विधि-‘उबालना’ जल शुद्ध करने की उत्तम घरेलू विधि है।

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प्रश्न 3:
अतिसार नामक रोग के कारणों, लक्षणों एवं बचने के उपायों का वर्णन कीजिए। [2011, 12, 15, 17]
या
अतिसार रोग के लक्षण लिखिए। अतिसार के रोगी को किस प्रकार को आहार देना चाहिए? [2008, 09, 14]
या
अतिसार और पेचिश में क्या अन्तर है? अतिसार के कारण, लक्षण और उपचार लिखिए। [2008, 17]
या
पेचिश एवं अतिसार में क्या अन्तर है? [2008, 13, 17, 18]
उत्तर:
अतिसार (डायरिया)

कारण-अतिसार जल द्वारा फैलने वाला एक रोग है। इस रोग की उत्पत्ति प्राय: इश्चेरिचिया कोलाई नामक जीवाणु द्वारा होती है। यह रोग प्रायः बच्चों में अधिक पाया जाता है। इस रोग के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

  1. वर्षा-ऋतु में इस रोग के जीवाणु जल में अधिक पाए जाते हैं।
  2. मक्खियों द्वारा इसके जीवाणु दूध में आ जाते हैं जिनके द्वारा यह बच्चों के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।
  3. बार-बार वे आवश्यकता से अधिक भोजन करने से, अपच हो जाने (UPBoardSolutions.com) के कारण यह रोग हो सकता है।
  4. समय-असमय भोजन करने से भी यह रोग हो सकता है।

लक्षण:
इस रोग के निम्नलिखित लक्षण हैं

  1. पतले व हरे रंग के दस्त आते हैं।
  2. दस्त अधिक आने पर कभी-कभी दस्त के साथ रक्त भी आता है।
  3. रोगी को हल्का-सा ज्वर भी रहता है।
  4. दस्तों की संख्या एक दिन में 25-30 तक हो सकती है, जिससे रोगी अत्यधिक दुर्बल हो जाता है।

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बचाव के उपाय:
यह एक भयानक रोग है जिसमें उचित चिकित्सा न होने पर लगभग 1-6 वर्ष की आयु तक के बच्चों के मरने का भय बना रहता है; अत: निम्नलिखित उपायों का पालन किया जाना अति आवश्यक है

  1. रोगी को पूर्ण विश्राम करने देना चाहिए।
  2.  योग्य चिकित्सक से तुरन्त परामर्श करना चाहिए।
  3. रोगी को उबालकर ठण्डा किया जल पीने के लिए देना चाहिए।
  4. बोतल से दूध पीने वाले बच्चों की बोतल को समय-समय पर अच्छी तरह से स्वच्छ करना चाहिए।
  5. रोगी बच्चे को व अन्य स्वस्थ बच्चों को सदैव उबालकर ताज़ा दूध देना चाहिए।
  6. भोज्य पदार्थों को मक्खियों से बचाने के लिए ढककर रखना चाहिए।
  7. रोगी बच्चे को खाने में चूने का पानी, मट्ठा तथा अन्य सुपाच्य व हल्के भोज्य पदार्थ (UPBoardSolutions.com) देने चाहिए। फलों में केला खाने के लिए देना इस रोग में लाभप्रद रहता है।।
  8. अतिसार के रोगी को निर्जलीकरण से बचाने के समस्त उपाय करने चाहिए।

अतिसार और पेचिश में अन्तर
प्रायः अतिसार में पेट में पीड़ा होने के लक्षण नहीं पाए जाते। केवल दस्त ही होते हैं। अतिसार पर नियन्त्रण नहीं किया जाता है, तो इसके बाद पेचिश के लक्षण भी दो-एक दिनों में दिखाई देने लगते हैं, अर्थात् दस्तों के साथ पेट में तेज ऐंठन, दस्त के साथ श्लेष्मा (आँव) व रक्त, भी आने लगता है। रोगी को ज्वर भी हो सकता है।

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प्रश्न 4:
मियादी बुखार या टायफाइड नामक रोग के कारणों, लक्षणों, उपचार एवं बचने के उपायों का वर्णन कीजिए। [2007, 08, 09, 10, 14]
या
टायफाइड के कारण एवं लक्षण लिखिए। [2016]
या
मियादी बुखार के कारण तथा रोकथाम के उपाय लिखिए। [2011]
उत्तर:
मियादी बुखार या टायफाइड अथवा मोतीझरा

मियादी बुखार जल एवं भोजन के माध्यम से फैलने वाला एक संक्रामक रोग है। इसे मोतीझरा या टायफाइड भी कहा जाता है। यह बुखार एक अवधि तक अवश्य रहता है। इसीलिए इसे मियांदी बुखार कहा जाता है।

कारण:
यह रोग साल्मोनेला टाइफी नामक जीवाणु द्वारा होता है। यह एक संक्रामक रोग है, जोकि एक निश्चित अवधि (लगभग 4-6 सप्ताह) तक रहता है, परन्तु. अधिक दुर्बल हो जाने के कारण रोगी अन्य रोगों से ग्रस्त हो सकता है। इस रोग के फैलने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

  1. यह रोग दूषित जल व भोज्य पदार्थों से फैलता है।
  2. रोगी के मल-मूत्र के साथ लाखों जीवाणु शरीर से बाहर निकलते हैं, जोकि रोगी के नाखूनों में भर जाते हैं। इस प्रकार का अर्द्ध-स्वस्थ व्यक्ति जीवाणुओं के वाहक का कार्य करता है तथा जल, दूध व अन्य भोज्य पदार्थों को जीवाणुयुक्त बनाता रहता है।
  3. फल, सलाद व तरकारियाँ शुद्ध पानी से अच्छी प्रकार न धोने पर रोग की उत्पत्ति (UPBoardSolutions.com) का कारण बन सकती हैं।
  4. मक्खियाँ भी भोज्य पदार्थों को जीवाणुयुक्त बनाती हैं।
  5.  रोगी द्वारा प्रयुक्त बर्तन व भोज्य पदार्थ नि:संक्रमित न किये जाने पर रोग के प्रसार में सहायक होते हैं।

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सम्प्राप्ति काल: 4 दिन से 40 दिन तक हो सकता है।
लक्षण:
रोग के संक्रमण के एक से तीन सप्ताह के अन्दर रोगी में निम्नलिखित लक्षण दिखाई पड़ते हैं

  1. सिर में असहनीय तीव्र पीड़ा अनुभव होती है।
  2. प्रथम सप्ताह में ज्वर 101°-105° फारेनहाइट तक बढ़ता है।
  3.  द्वितीय सप्ताह में ज्वर समान रहता है, तृतीय सप्ताह में ज्वर घटने लगता है तथा चौथे सप्ताह में सामान्य हो जाता है, परन्तु लगभग छठे सप्ताह तक दुर्बलता रहती है।
  4. जिह्वा मध्य में सफेद तथा सिरों पर लाल रहती है।
  5. दूसरे सप्ताह के लक्षण अधिक भयंकर रहते हैं; जैसे–पेट फूलना, सन्निपात के समान स्थिति, मल-मूत्र विसर्जन सामान्य न रहना इत्यादि।
  6. गर्दन व शरीर पर मोती जैसे दाने निकल आते हैं।
  7. आँतों में सूजन आ जाती है, जिसके कारण आहारनाल सम्बन्धी अनेक विकार उत्पन्न हो जाते हैं।

उपचार व बचने के उपाय:
इस रोग से बचने के निम्नलिखित उपाय हैं

  1. रोग निरोधक टीका लगवाने से रोम की सम्भावना बहुत कम रह जाती है, इस रोग से बचाव के लिए टी० ए० बी० का टीका लगवाया जाना चाहिए।
  2. रोगी को पृथक् कमरे में रखना चाहिए।
  3. रोगी द्वारा प्रयुक्त वस्तुओं का विधिपूर्वक नि:संक्रमण होना चाहिए।
  4. जल व दूध को उबाल कर पीना चाहिए।
  5. भोज्य पदार्थों को मक्खियों से सुरक्षित रखना चाहिए।
  6. (रोगी को सुपाच्य एवं हल्का भोजन देना चाहिए।
  7. योग्य चिकित्सक की देख-रेख में ही रोगी का इलाज कराना चाहिए।
  8. पूर्ण स्वस्थ होने तक रोगी को एकान्तवास एवं विश्राम करना चाहिए, क्योंकि अर्द्ध-स्वस्थ (UPBoardSolutions.com) रोगी अन्य व्यक्तियों में रोग फैला सकता है।

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प्रश्न 5:
पेचिश नामक रोग के फैलने के कारणों, लक्षणों तथा उपचार एवं रोग से बचने के उपायों का वर्णन कीजिए। [2007, 10, 11, 12, 13, 14]
उत्तर:
पेचिश (डिसेण्ट्री)

कारण:
यह रोग जीवाणुओं एवं प्रजीवाणुओं (प्रोटोजोन्स) दोनों ही से उत्पन्न होता है। जीवाण बैसिलस द्वारा होने वाली पेचिश को बैसिलरी पेचिश तथा प्रजीवाण ( एण्ट हिस्टोलिटिका) द्वारा होने वाली पेचिश को अमीबायोसिस कहते हैं। पेचिश का उद्भवन काल सामान्य रूप से-1 से 2 दिन तक होता है। इस रोग के फैलने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

  1. दूषित जल में (नदी, तालाब, कुएँ व नलकूप आदि) प्रायः जीवाणु व प्रजीवाणु दोनों पाए जाते हैं। अतः यह जल संवाहित रोग है।
  2. मक्खियाँ इस रोग के वाहक का कार्य करती हैं तथा पेय जल एवं खाद्य पदार्थों तक रोगाणुओं को पहुँचाती रहती हैं।
  3. रोगी के मल-मूत्र व अन्य प्रकार की गन्दगी इस रोग को व्यापक स्तर पर फैलाने में पर्याप्त योगदान देती है।

लक्षण:
संक्रमण के एक या दो दिन पश्चात् ही रोगी में निम्नलिखित लक्षण दिखाई पड़ते हैं

  1. पेट में बार-बार पीड़ादायक ऐंठन होती है।
  2. बार-बार दस्त आते हैं तथा कुछ दिनों बाद दस्त के साथ श्लेष्मा अथवा (UPBoardSolutions.com) आँव तथा रक्त भी आने लगता है।
  3. रोगी को कभी-कभी ज्वर भी रहता है।
  4. प्रजीवाणु प्रायः आँतों की झिल्ली में घावे कर देते हैं।
  5. प्रजीवाणु यकृत एवं झिल्ली को भी कुप्रभावित कर सकते हैं।

उपचार एवं रोग से बचने के उपाय:
पेचिश से बचने एवं उपचार के उपायों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित हैं

  1. रोगी को अन्य व्यक्तियों से पृथक् रखना चाहिए।
  2. पेय जल की शुद्धता का ध्यान रखना चाहिए। इसके लिए नदी, तालाबों व कुओं के जल में समय-समय पर पोटैशियम परमैंगनेट अथवा ब्लीचिंग पाउडर डालना चाहिए।
  3. रोगी एवं अन्य स्वस्थ व्यक्तियों को जल उबालकर पीना चाहिए।
  4. पेय एवं खाद्य सामग्रियों को मक्खियों से सुरक्षित रखना चाहिए।
  5. गलियों एवं सड़कों की स्वच्छता के प्रति सचेत रहना चाहिए तथा आवश्यकता पड़ने पर नगरपालिका अथवा स्वास्थ्य विभाग को सूचित भी करना चाहिए।
  6. औषधियों का सेवन किसी योग्य चिकित्सक के परामर्श के अनुसार पूर्णतया रोगमुक्त होने तक करना चाहिए।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
अशुद्ध जल से फैलने वाले रोगों के नाम लिखिए। [2011, 16, 17, 18]
उत्तर:
अशुद्ध जल से अनेक प्रकार के सामान्य से लेकर भयंकर रोग तक फैलते हैं। इनमें
आहारनाल सम्बन्धी, गुर्दे सम्बन्धी तथा ज्वर सम्बन्धी अनेक रोग सम्मिलित हैं। पीलिया, टायफाइड, हैजा, अतिसार, पेचिश, गोलकृमि, सूत्रकृमि आदि महामारियों के रूप में भी फैलते हैं।
अनेक अति सामान्य रोग; जैसे—सिरदर्द, नजला, फ्लू, आँखों के रोग, मितली, उल्टी (वमन), दस्त आदि भी दूषित जल से हो सकते हैं।

प्रश्न 2:
मक्खियाँ किस प्रकार रोगों के वाहक का कार्य करती हैं? मक्खियों द्वारा कौन-कौन से रोग फैलते हैं?
उत्तर:
मक्खियों के पैर रोमयुक्त होते हैं। जब ये कूड़े-करकट, वमन, मल-मूत्र, थूक अथवा अन्य प्रकार की गन्दगी पर बैठती हैं तो गन्दगी के साथ रोगाणु भी इनके पैरों पर चिपक जाते हैं। जब ये मक्खियाँ पेय व खाद्य पदार्थों पर बैठती हैं, तो गन्दगी के साथ चिपके रोगाणु इन भोज्य पदार्थों पर चिपक जाते हैं। इस प्रकार मक्खियों द्वारा भोज्य पदार्थ रोगाणुयुक्त हो जाते हैं तथा स्वस्थ व्यक्ति जब भी इस प्रकार के भोज्य पदार्थों का सेवन करते हैं, तो रोगाणु उनके (UPBoardSolutions.com) शरीर में प्रवेश कर उन्हें रोगी बना देते हैं।
मक्खियाँ प्राय: निम्नलिखित रोगों को फैलाती हैं–
(1) हैजा,
(2) टायफाइड,
(3) पेचिश तथा
(4) अतिसार।

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प्रश्न 3:
जल किस प्रकार रोगाणुयुक्त होता है?
या
किन कारणों से जल प्रदूषित होता है? प्रदूषित जल से फैलने वाले रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
जल में रोगाणु प्रायः निम्नलिखित विधियों अथवा वाहकों द्वारा प्रवेश करते हैं|
(1) मक्खियों द्वारा:
मक्खियाँ गन्दगी के रोगाणुओं को जल में स्थानान्तरित करती रहती हैं।

(2) अर्द्ध अथवा आंशिक रूप से स्वस्थ रोगियों द्वारा:
इस प्रकार के रोगी जब नदी अथवा तालाब के पास मल-मूत्र विसर्जन करते हैं तथा कुओं आदि के किनारों पर स्नान करते हैं अथवा वस्त्रादि धोते हैं, तो रोगाणु जल में प्रवेश कर जाते हैं, जैसे कि टायफाइड अथवा पेचिश के रोगी।

(3) सार्वजनिक स्वच्छता के प्रति उदासीनता एवं लापरवाही:
ग्रामीण क्षेत्रों में प्रायः सार्वजनिक स्वच्छता के प्रति अज्ञानता एवं उदासीनता देखी जा सकती है। गन्दगी को तालाबों वे नदी के किनारों पर डाल दिया जाता है, जहाँ से जीवाणु सरलतापूर्वक जल में पहुँच जाते हैं।

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(4) वायु द्वारा:
वायु गन्दगी, थूक, मल-मूत्र आदि को धूल के साथ उड़ाकर जल तक पहुँचा देती है, (UPBoardSolutions.com) परिणामस्वरूप जल रोगाणुयुक्त हो जाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
जल द्वारा फैलने वाले रोग कौन-से हैं? [2008, 11, 12, 13, 17, 18]
उत्तर:
जल द्वारा फैलने वाले मुख्य रोग हैं-हैजा, टायफाइड, पेचिश एवं अतिसार।

प्रश्न 2:
पाचन-तन्त्र सम्बन्धी दो रोगों के नाम बताइए।
उत्तर:
पाचन-तन्त्र सम्बन्धी दो रोग हैं
(1) पेचिश तथा
(2) अतिसार।

प्रश्न 3:
किस रोग में रोगी अत्यधिक वमन करता है?
उत्तर:
हैजे का रोगी अत्यधिक वमन करता है।

प्रश्न 4:
हैजा नामक रोग किस जीवाणु द्वारा फैलता है?
या
हैजा रोग के कारण लिखिए।
उत्तर:
हैजा नामक रोग विब्रियो कोलेरी नामक जीवाणु द्वारा फैलता है। (UPBoardSolutions.com) अशुद्ध जल के कारण वचारों ओर फैली गन्दगी, उन पर बैठने वाली मक्खियों के द्वारा भोजन पर आकर बैठने से।

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प्रश्न 5:
टायफाइड फैलाने वाले रोगाणु का नाम लिखिए। [2010, 14, 18]
उत्तर:
साल्मोनेला टाइफ

प्रश्न 6:
उबालने से जल किस प्रकार रोगमुक्त हो जाता है?
उत्तर:
उबालने से जल के अन्दर उपस्थित सभी जीवाणु इत्यादि मर जाते हैं, क्योंकि जिस तापक्रम पर जल उबलता है अर्थात् 100° सेण्टीग्रेड पर जीवित रहना सामान्यतः सम्भव नहीं रहता।

प्रश्न 7:
कुम्भ के मेले में ज़ल संवाहित कौन-से रोग के लिए टीका लगाया जाता है?
उत्तर:
हैजे से बचाव के लिए टीका लगाया जाता है।

प्रश्न 8:
पाचन-तन्त्र के रोग प्रायः किन माध्यमों द्वारा फैलते हैं?
उत्तर:
दूषित जल एवं भोजन द्वारा।

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प्रश्न 9:
जल में लाल दवा डालने से क्या लाभ हैं?
या
लाल दवा का वैज्ञानिक नाम क्या है? इसकी क्या उपयोगिता है? [2008]
उत्तर:
लाल दवा का वैज्ञानिक नाम पोटैशियम परमैंगनेट है। जल में लाल (UPBoardSolutions.com) दवा अथवा पोटैशियम परमैंगनेट डालने से जल के जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 10:
बच्चों में होने वाला भीषण संक्रामक रोग कौन-सा है?
उत्तर:
1-6 वर्ष की आयु के बच्चों में होने वाला प्राणघातक जल संवाहित रोग है–अतिसार।

प्रश्न 11:
अतिसार प्रायः किस ऋतु में अधिक फैलता है? [2013]
उत्तर:
वर्षा-ऋतु में।

प्रश्न 12:
डायरिया के कारण बताइए।
उत्तर:
दूषित जल व भोजन इस रोग के मूल कारण हैं। मक्खियाँ इस रोग के वाहक का कार्य करती हैं।

प्रश्न 13:
दूषित जल से फैलने वाली दो बीमारियों के नाम लिखिए। या, अशुद्ध जल से क्या हानियाँ होती हैं? [2009, 11]
उत्तर:
अशुद्ध जल से अनेक प्रकार के साधारण तथा भयंकर रोग हो सकते हैं; जैसे-हैजा एवं टायफाइड।

प्रश्न 14:
हैजा रोग से बचने के दो उपाय लिखिए।
उत्तर:
हैजा रोग से बचने के लिए खाने-पीने की वस्तुओं को मक्खियों से बचाना चाहिए तथा टीकाकरण भी करवाना चाहिए।

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प्रश्न 15:
पेचिश रोग के प्रकार लिखिए। [2007]
उत्तर:
यह रोग दो प्रकार से उत्पन्न होता है। यह रोग जीवाणुओं एवं (UPBoardSolutions.com) प्रजीवाणुओं, दोनों ही प्रकार से होता है। जीवाणु बैसिलस द्वारा होने वाली पेचिश को बैसिलरी पेचिश तथा प्रजीवाणु एण्ट अमीबा हिस्टोलिका द्वारा होने वाली पेचिश को अमीबियोसिस कहते हैं।

प्रश्न 16:
हैजा किन क्षेत्रों में अधिक फैलता है? [2014]
उत्तर:
हैजा भीड़ वाले तथा सफाई की व्यवस्था न होने वाले क्षेत्रों; जैसे–मेलों, तीर्थस्थानों तथा युद्ध-क्षेत्र में अधिक फैलता है। मक्खियों की अधिकता वाले क्षेत्रों में हैजा फैलने की अधिक आशंका रहती है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न:
निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. मक्खियों द्वारा कौन-सा रोग फैलता है? [2008, 15] 
(क) मलेरिया
(ख) अतिसार (डायरिया)
(ग) हैजा
(घ) तपेदिक

2. आन्त्रशोध (मियादी बुखार) फैलाने वाला जीवाणु है
(क) ट्यूबर कुलोसिस बैसिलस
(ख) साल्मोनेला टाइफी
(ग) बैसिलस पर्टयूसिस
(घ) इनमें से कोई नहीं

3. टाइफाइड में कैसा आहार दिया जाना चाहिए?
(क) पौष्टिक तथा गरिष्ठ
(ख) हल्का तथा सुपाच्य
(ग) मिर्च मसालेदार
(घ) कुछ भी आहार नहीं देना चाहिए।

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4. अशुद्ध जल से रोग हो जाता है। [2007, 11, 14, 15, 17, 18]
या
जल द्वारा कौन-सा रोग हो जाता है ? [2009, 16]
(क) क्षय रोग
(ख) चेचक
(ग) हैजा
(घ) मलेरिया

5. हैजा के जीवाणु का नाम है [2008, 17]
(क) टिटैनी
(ख) टाइफी
(ग) विब्रियो कोलेरी
(घ) बैसिलरी

6. पेचिश में निम्नलिखित लक्षण होते हैं
(क) पेट में पीड़ा तथा ऐंठन
(ख) बार-बार शौच होना
(ग) आँव का होना
(घ) ये सभी

7. मक्खियों को नष्ट करने के लिए छिड़काव किया जाता है
(क) डी० डी० टी० का
(ख) ब्लीचिंग पाउडर का
(ग) आयोडीन घोल का
(घ) लाल दवा का

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8. अतिसार के रोगी को किस प्रकार का आहार देना चाहिए ? [2009]
(क) उच्च प्रोटीन युक्त
(ख) उच्च रेशेयुक्त
(ग) नरम व तरल आहार
(घ) इनमें से कोई नहीं

9. निम्नलिखित में से कौन-सा रोग अशुद्ध जल से नहीं फैलता है?
(क) हैजा
(ख) अतिसार
(ग) क्षय रोग (टी० बी०)
(घ) मोतीझरा (टायफाइड)

10. हैजा किसके द्वारा फैलता है ? [2010, 16, 17]
(क) दूषित हवा
(ख) विटामिन
(ग) शुद्ध जल
(घ) दूषित जल

उत्तर:
1. (ग) हैजा,
2. (ख) साल्मोनेला टाइफी,
3. (ख) हल्का तथा सुपाच्य,
4. (ग) हैजा,
5. (ग) विब्रियो कोलेरी,
6. (घ) ये सभी,
7. (क) डी० डी० टी० का,
8. (ग) नरम व तरल आहार,
9. (ग) क्षय रोग (टी०बी०),
10. (घ) दूषित जल।

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UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 10 अपशिष्ट (कचरा) प्रबन्धन

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 10 अपशिष्ट (कचरा) प्रबन्धन

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1:
अपशिष्ट ( कचरा ) प्रबन्धन से क्या आशय है? कचरा प्रबन्धन की प्रक्रिया का विवरण दीजिए।
या
घरेलू कूड़े-कचरे के व्यवस्थित प्रबन्धन के लिए घर में क्या-क्या उपाय किये जाने चाहिए। प्रक्रिया का क्रमिक वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अपशिष्ट (कचरा) प्रबन्धन का अर्थ एवं आवश्यकता

घर को हर प्रकार से साफ एवं स्वच्छ रखना अनिवार्य है। घर पर अनेक कार्य (UPBoardSolutions.com) किए जाते हैं, जिनके परिणामस्वरूप घर में लगातार कूड़ा या कचरा (अपशिष्ट पदार्थ) एकत्र होता रहता है। भोजन बनाने के लिए सब्जी को काटना-छीलना पड़ता है। आटे को छाना जाता है तथा चोकर अलग किया जाता है। पके हुए भोजन की भी जूठन बचती है। इसके अतिरिक्त धूल-मिट्टी भी घर में हवा आने-जाने वालों के पैरों के साथ आती रहती है। इसके साथ-साथ छोटे बच्चों द्वारा घर में जहाँ-तहाँ मल-मूत्र त्याग देने से भी गंदगी में तथा कूड़े में वृद्धि हो जाती है। अतः स्पष्ट है कि घर में विभिन्न प्रकार का कूड़ा नित्य ही एकत्रित होता रहता है। यह कूड़ा हमारे लिए एक समस्या बन जाता है। जहाँ एक ओर इससे गंदगी होती है तथा दुर्गन्ध आती है, वहीं साथ-साथ कूड़े पर मक्खी तथा मच्छर भी पलते रहते हैं। अतः इस कूड़े को घर से प्रतिदिन बाहर निकालना अति आवश्यक है। घर से कूड़े के विसर्जन के उचित ढंग का ज्ञान होना भी अति आवश्यक है। इस प्रकार स्पष्ट है कि अपशिष्ट (कचरा) या कूड़े-करकट का व्यवस्थित प्रबन्धन अति आवश्यक कार्य है।

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अपशिष्ट ( कचरा ) प्रबन्धन की प्रक्रिया

उपर्युक्त वर्णित परिचय से स्पष्ट है कि स्वास्थ्य एवं सफाई के लिए कूड़े-करकट को घर से बाहर निकालने की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। इस उद्देश्य के लिए घर की गृहिणी तथा अन्य सदस्यों को निरंतर ध्यान रखना चाहिए तथा बिलकुल भी लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। सबसे पहले इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि घर में कूड़ा-करकट कम-से-कम फैले। इसके लिए घर में जहाँ-जहाँ आवश्यक हो, वहाँ पर कूड़ेदान रख देने चाहिए। मुख्य रूप से रसोईघर में कोई खाली डिब्बा
अथवा ढक्कनदार बाल्टी अवश्य रखनी चाहिए। रसोईघर का सारा कूड़ा अर्थात् सब्जियों के छिलके, भोजन की जूठन तथा चोकर आदि को हाथ-के-हाथ ही इस डिब्बे में डाल देना चाहिए। रसोईघर के अतिरिक्त बच्चों के पढ़ाई वाले कमरे या स्थान पर भी एक टोकरी या ट्रे रख देनी चाहिए। बच्चों को चाहिए कि वे अपने फटे हुए कागज तथा कतरनें आदि को इसी टोकरी में फेंकें। इस प्रकार
की व्यॆवस्था कर देने से पूरे घर में कूड़ा नहीं फैलेगा।

उपर्युक्त व्यवस्था के अतिरिक्त एक मुख्य कूड़ेदान की भी व्यवस्था होनी चाहिए। यह लोहे का ढोल-सा होता है। इसे मुख्य द्वार के निकट अथवा सीढ़ियों के नीचे कहीं रखना चाहिए। जब घर की सफाई हो तथा झाडू लगाई जाए तो जो कूड़ा निकले उसे सीधे ही इस मुख्य कूड़ेदान में डालना चाहिए। इसके अतिरिक्त घर में अन्य स्थानों पर रखे गए डिब्बों अथवा टोकरी के कूड़े को भी समय-समय पर मुख्य कूड़ेदान में डालते रहना चाहिए। यह मुख्य कूड़ेदान भी ढक्कनदार होना चाहिए। ध्यान रहे कि इस कूड़ेदान में पानी नहीं भरना चाहिए। गंदे पानी के निकास की व्यवस्था अलग से करनी चाहिए। कूड़ेदान में तथा उसके आस-पास (UPBoardSolutions.com) समय-समय पर चूना डालते रहना चाहिए, जिससे गंदगी में उत्पन्न होने वाले कीटाणु भी मरते रहते हैं। आधुनिक मान्यताओं के अनुसार गीले कूड़े तथा सूखे कूड़े को एकत्र करने के लिए अलग-अलग कूड़ेदान रखने चाहिए।

अब प्रश्न उठता है कि इस मुख्य कूड़ेदाने का कूड़ा घर से बाहर कैसे विसर्जित किया जाए? सामान्य रूप से नगरों में घरों पर नित्य ही मेहतर आया करते हैं। मेहतर इस कूड़े को अपनी ठेली द्वारा अथवा टोकरी द्वारा उठाकर ले जाते हैं तथा सार्वजनिक खत्ते पर पहुँचा देते हैं। यदि किसी स्थान पर मेहतर की सुविधा न हो तो स्वयं ही कूड़े को घर से बाहर निकालना पड़ता है। इस स्थिति में ध्यान देना पड़ता है कि यदि गली अथवा सड़क की सफाई नित्य होती है तथा वहाँ से कूड़ा उठा ले जाने की सही व्यवस्था है तो उस स्थिति में हम अपने घर का कूड़ा घर से बाहर निर्धारित स्थान पर डाल सकते हैं। ऐसी स्थिति में ध्यान रखने योग्य मुख्य बात यह है कि हम अपने घर को कूड़ा समय से पहले ही घर से बाहर निकाल दें, जब सड़क की सफाई होती है। यदि हम सड़क की सफाई होने के बाद घर का कूड़ा बाहर फेंकते हैं तो वह अगले दिन सुबह तक वहीं पड़ा रहेगा तथा हवा आदि से फैलता रहेगा। यह . अनुचित है। यदि सड़क पर किसी सार्वजनिक कूड़ेदान की व्यवस्था है तो हमें चाहिए कि हम अपने घर का कूड़ा अनिवार्य रूप से उसी सार्वजनिक कूड़ेदान में ही डालें। गली अथवा सड़क को स्वच्छ रखना भी हमारा कर्तव्य है। कहीं-कहीं नगरपालिका की गाड़ियाँ कूड़ा ढोने का कार्य करती हैं। ऐसी स्थिति में हमें ध्यान रखना चाहिए कि जब कूड़े की गाड़ी आये, तभी अपने घर का कूड़ा उसमें डाल दें।

उपर्युक्त विवरण द्वारा घर के साधारण कूड़े को घर से बाहर निकालने का उपाय स्पष्ट होता है। इसके अतिरिक्त कुछ घरों में गाय, भैंस अथवा मुर्गियाँ भी पाली जाती हैं। इन पशुओं के कारण घर में अतिरिक्त कूड़ा भी एकत्रित होता रहता है, जिसे बाहर निकालने की व्यवस्था अनिवार्य है। गाय के गोबर के उपले आदि पथवा देने चाहिए। अन्य अवशेषों को घर से दूर खाली स्थान पर गड्ढे में डालते रहना चाहिए, जहाँ इससे खाद बनती रहती है। घर पर पशु होने (UPBoardSolutions.com) पर घर की सफाई का सामान्य से अधिक ध्यान रखना चाहिए तथा सफाई पर अधिक मेहनत करनी चाहिए। पशुओं के स्थान को समय-समय पर किसी कीटनाशक दवा से धुलवाते रहना चाहिए। इस प्रकार स्पष्ट है कि घर की सफाई हेतु कूड़ा-करकट के विसर्जन के लिए निरन्तर प्रयास करने चाहिए तथा इस ओर कभी भी लापरवाही नहीं दिखानी चाहिए।

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कचरा प्रबन्धन के लिए कचरा प्रबन्धन अधिनियम है। जिसके अन्तर्गत स्थानीय संस्थाओं के साथ-ही-साथ कचरा उत्पन्न करने वालों की भी जिम्मेदारी निर्धारित की गयी है। जो संस्थान कचरा जेनेरेट करते हैं उन्हें भी अपना कचरा वापस लेकर रिसाइकिल करना होगा।

प्रश्न 2:
घरों से एकत्र कूड़े-करकट या कचरे को नष्ट या समाप्त करने के लिए विभिन्न उपायों का विवरण दीजिए।
या
घरेलू कूड़े-करकट को घर से बाहर निकालना ही अनिवार्य नहीं है बल्कि उसे सही ढंग से ठिकाने लगाना अनिवार्य है।” इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कचरे को ठिकाने लगाने के विभिन्न उपायों का उल्लेख करें तथा बतायें कि कौन-से उपाय उपयुक्त हैं?
या
कचरे को नष्ट करने के लिए कौन-कौन सी विधियाँ अपनाई जाती हैं?
या
कचरे के निस्तारण की सर्वोत्तम विधि कौन-सी है? कारण भी समझाइए।
उत्तर:
कचरा या कूड़े-करकट को नष्ट करना या समाप्त करना

घरेलू कूड़े-करकट को घर से बाहर निकालने की व्यवस्था ही अपने आप में पर्याप्त तथा अंतिम व्यवस्था नहीं है। वास्तव में पूरे क्षेत्र से एकत्र हुए कूड़े को नष्ट करना या ठिकाने लगाना भी अति
आवश्यक है। यह अपने आप में एक गम्भीर नगरीय समस्या है। कूड़े-करकट को नष्ट करने या ठिकाने (UPBoardSolutions.com) लगाने के मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं

(1) जलाकर:
स्वास्थ्य की दृष्टि से कूड़े को नष्ट करने का यह सर्वश्रेष्ठ उपाय है। कूड़े को जलाने के लिए शहर की बस्ती से दूर, ईंटों की एक गोलाकार चिमनी बनी होती है, जिसके ऊपर की ओर धुआँ तथा गैसों के निकलने के लिए 3 छेद होते हैं। बीच में एक जाली होती है जिसके नीचे कूड़ा रखने और नीचे से आग जलाने का प्रबन्ध होता है। चिमनी में आग लगाकर कूड़ा जला दिया जाता है। तथा बची हुई राख से सड़क या सीमेंट बनाने का काम लिया जाता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि कूड़े को इस प्रकार से जलाने से अनेक विषैली गैसें बनती हैं, जो वायु प्रदूषण में वृद्धि करती हैं। आज़कल कूड़े में प्लास्टिक या पॉलिथीन की थैलियों की काफी अधिक मात्रा होती है। इन वस्तुओं के जलने से अत्यधिक वायु प्रदूषण होता है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अब हर
को जलाने का समर्थन नहीं किया जा सकता।

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(2) जलस्रोतों में प्रवाहित करना:
पारम्परिक रूप से प्रायः सभी क्षेत्रों में कूड़े-कचरे को जलस्रोतों अर्थात् नदियों आदि में विसर्जित कर दिया जाता थी परन्तु अब यह अनुभव किया गया कि कूड़े-कचरे को जलस्रोतों में प्रवाहित करना भी अनुचित है। इससे जल-प्रदूषण का गम्भीर खतरा उत्पन्न होने लगा है। हमारे देश की प्रायः सभी नदियों का जल काफी अधिक प्रदूषित हो चुका है। अतः कूड़े-कचरे को जल में प्रवाहित करने का समर्थन भी नहीं किया जा सकता।

(3) कूड़े से गड्ढों को पाटना:
यह विधि अधिक उपयुक्त नहीं है। इस विधि में कूड़े को नीची जमीनों को पाटने के काम में ले लिया जाता है। कूड़ा खुला पड़ा रहता है तथा मक्खी, मच्छर और हानिकारक जीवाणु इसमें इकट्ठे होते रहते हैं, जो यहाँ से उड़कर दूसरे स्थानों पर गंदगी फैलाते हैं। इससे पर्यावरण-प्रदूषण (UPBoardSolutions.com) में बहुत अधिक वृद्धि होती है। अतः इस उपाय का भी समर्थन नहीं किया जा सकता।

(4) छंटाई द्वारा कूड़े का उपयोग:
पाश्चात्य देशों में प्रचलित इस विधि में कूड़े को तीन भागों में छाँट लिया जाता है

  1. कोयले व मिट्टी के टुकड़े,
  2. मुलायम कूड़ा (घास, पत्ती, कागज व कपड़ों के टुकड़े),
  3.  कड़ा-कूड़ा (हड्डी, काँच, टूटी चीजें)। पहले प्रकार के कूड़े से ईंट व दूसरे प्रकार के कूड़े से खाद बना ली जाती है। तीसरे प्रकार के कूड़े को सड़कों के गड्ढे आदि पाटने के लिए उपयोग में लाया जाता है।

(5) खाद बनाना:
कूड़े से खाद बनाना उसको ठिकाने लगाने की सर्वोत्तम विधि है। बड़े-बड़े गड्ढों में घेरलू कूड़ा भरकर उसे मिट्टी से दबा दिया जाता है। कुछ समय में कूड़ा सड़कर उत्तम कार्बनिक खाद के रूप में परिवर्तित हो जाता है। यह खाद कृषि-कार्य के लिए उपयोगी एवं लाभदायक होती है। अब कम्पोस्ट प्लांट बनाये गये हैं। इन प्लांटों में ‘आर्गेनिक वेस्ट कम्पोस्ट मशीन की व्यवस्था है। यह मशीन कचरे को महीन बना देती है तथा इससे केवल 15 दिन में ही अच्छी कम्पोस्ट खाद बनकर तैयार हो जाती है। अब विद्यालयों की कैण्टीन आदि में भी तथा आवासीय सोसाइटियों में भी इस प्रकार की व्यवस्था करने का सुझाव दिया जा रहा है।

उपर्युक्त विवरण द्वारा कूड़े-कचरे को नष्ट करने या ठिकाने लगाने के विभिन्न उपायों का सामान्य परिचय प्राप्त (UPBoardSolutions.com) हो जाता है। इस विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि कूड़े-करकट को ठिकाने लगाने के उपयुक्त उपाय हैं

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  1. छंटाई द्वारा कूड़े का उपयोग तथा
  2. कूड़े से खाद बनाना।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
घर की सफाई एवं सजावट के लिए कचरा प्रबन्धन की आवश्यकता को स्पष्ट करें।
उत्तर:
घर की सफाई तथा कचरा प्रबन्धन

प्रत्येक परिवार उत्तम स्वास्थ्य एवं गृह सज्जा के लिए नियमित सफाई को अति आवश्यक मानता है। घर की सफाई का अर्थ है-घर में गन्दगी तथा कूड़े-करकट का अभाव होना। उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अति आवश्यक है कि घर में कूड़ा-करकट अधिक फैले ही नहीं तथा हमें पूरे (UPBoardSolutions.com) घर में जहाँ-तहाँ बिखरने वाले कूड़े-कचरे को साथ ही साथ कूड़ेदानों या डिब्बों आदि में डालते रहना चाहिए। विभिन्न कूड़ेदानों एवं डिब्बों में एकत्र हुए कूड़े-कचरे को एक मुख्य कूड़ेदान में डाल देना चाहिए तथा वहाँ से घर से बाहर निकालने की समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए। इस प्रक्रिया द्वारा घर की सफाई तथा सजावट के लिए कूड़े-कचरे का उचित प्रबन्धन हो जाता है।

प्रश्न 2:
कचरे का घर में संग्रह कैसे करेंगी?
उत्तर:
घर में कचरे का संग्रह करने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. घर में सूखे व गीले कचरे को संग्रह करने के लिए अलग-अलग पात्र होने चाहिए। पात्र ऐसे स्थानों पर रखने चाहिए जहाँ परिवार के सदस्यों को उनमें कचरा डालने में सुविधा रहे।
  2. परिवार के सभी सदस्यों को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि वे फटे कागज, खाने के टुकड़े व अन्य निरर्थक वस्तुओं को इधर-उधर न फेंके वरन् उनको कचरापात्रों में ही डालें। इस विषय में बालकों को प्रारम्भ से ही शिक्षा मिलनी चाहिए।
  3.  कचरापात्रों को ढकने की व्यवस्था होनी आवश्यक है जिससे मक्खियाँ उस पर न बैठ सकें।
    वर्तमान में एक विशेष प्रकार के कचरापात्र बनाए जा रहे हैं जिनका ढक्कन खड़े-खड़े पैर से एक लोहे के टुकड़े को दबाने से खुल जाता है। इससे बहुत सुविधा रहती है। कचरापात्रों से प्रतिदिन कचरा हटाया जाना चाहिए और साथ ही यह भी आवश्यक है कि कचरापात्रों को अन्दर व बाहर से समय-समय पर धोकर साफ किया जाए, नहीं तो ये कचरापात्र स्वयं एक समस्या बन जाएँगे
    तथा ये जहाँ भी रखे जाएँगे इन पर मक्खियाँ भिनभिनाएँगी।

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प्रश्न 3:
कचरे के संवहन की कौन-सी विधि है?
उत्तर:
कचरे के संवहन की निम्नलिखित विधि है

घरों से कचरा बाल्टियों व टोकरियों से भरकर बाहर ले जाया जाता है और गली व (UPBoardSolutions.com) मुहल्ले के बड़े कचरापात्रों में डाला जाता है। फिर वहाँ से कचरे को नगर महापालिकाओं की गाड़ियों में भरकर नगर के बाहर निस्तारण हेतु भेजा जाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
घरेलू कचरे से क्या आशय है?
उत्तर:
घर की सफाई के दौरान निकलने वाले व्यर्थ एवं दूषित पदार्थों को घरेलू कचरा कहा जाता हैं

प्रश्न 2:
घर में कचरा रहने से क्या हानियाँ हो सकती हैं?
उत्तर:
घर में कचरा रहने से गन्दगी बढ़ती है तथा विभिन्न रोगाणु पनपते हैं। इससे गृहसज्जा धूमिल पड़ जाती है।

प्रश्न 3:
कचरा प्रबन्धन के लिए सर्वप्रथम क्या उपाय किया जाना चाहिए?
उत्तर:
कचरा प्रबन्धन के लिए सर्वप्रथम कूड़े-करकट को घर से बाहर निकालने की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।

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प्रश्न 4:
कूड़े-करकट के निस्तारण की मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(i) कूड़े को जलाकर नष्ट करना,
(ii) जलस्रोतों में प्रवाहित करना,
(iii) कूड़े से गड्ढों को पाटना,
(iv) छंटाई द्वारा कूड़े का उपयोग तथा
(v) खाद बनाना।

प्रश्न 5:
कूड़े को जलाने का क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
कूड़े को जलाने से वायु प्रदूषण में वृद्धि होती है।

प्रश्न 6:
कूड़े-कचरे को जलस्रोतों में प्रवाहित करने से क्या हानियाँ होती हैं?
उत्तर:
कूड़े-कचरे को जलस्रोतों में प्रवाहित करने से जल-प्रदूषण का गम्भीर खतरा बना हुआ है।

प्रश्न 7:
कूड़े-कचरे के निस्तारण के हानि-रहित उपाय कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
कूड़े-कचरे के निस्तारण के हानि-रहित उपाय हैं

(i) छंटाई द्वारा कूड़े का उपयोग तथा
(ii) कूड़े से खाद बनाना।

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प्रश्न 8:
गोबर का सर्वोत्तम उपयोग क्या है?
उत्तर:
गोबर से बायो गैस बनाना गोबर का सर्वोत्तम उपयोग है। इस प्रक्रिया (UPBoardSolutions.com) में अवशिष्ट पदार्थ को । खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

प्रश्न 9:
कचरा-प्रबन्धन में ध्यान में रखने योग्य मुख्य बात क्या है?
उत्तर:
कचरा-प्रबन्धन में ध्यान में रखने योग्य मुख्य बात यह है कि कचरे से पर्यावरण-प्रदूषण में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं होनी चाहिए तथा जहाँ तक सम्भव हो कचरे का सदुपयोग हो।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न-निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. घर में जहाँ-तहाँ कचरान फैला रहे, इसके लिए निम्नलिखित में से क्या आवश्यक है?
(क) घर में कचरा उत्पन्न ही न हो।
(ख) कचरे को जलाते रहें।
(ग) घर पर विभिन्न स्थानों पर कचरापात्र रखें
(घ) कोई भी उपाय सफल नहीं होता।

2. घरेलू कचरे की समस्या के पूर्ण समाधान का उपाये क्या है?
(क) घर में कचरा न फैलने दें।
(ख) कचरे को घर से निकालने की समुचित व्यवस्था करें
(ग) सभी घरों से निकलने वाले कचरे को नष्ट करने के उपाय करें
(घ) उपर्युक्त सभी उपाय आवश्यक हैं।

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3. घर के समस्त कचरे को किस स्थान पर एकत्र करना चाहिए?
(क) घर के किसी कोने में
(ख) कचरापात्र में
(ग) सड़क पर
(घ) पड़ोसियों के घर के सामने।

4. नगर के कचरे को ठिकाने लगाने का हानिरहित उपाय निम्नलिखित में से क्या है?
(क) कचरे को जला देना।
(ख) कचरे को जल-स्रोत में बहा देना
(ग) कचरे को खुले मैदान में डाल देना
(घ) कचरे से खाद बना लेना।

उत्तर:
1. (ग) घर पर विभिन्न स्थानों (UPBoardSolutions.com) पर कचरापात्र रखे,
2. (घ) उपर्युक्त सभी उपाय आवश्यक हैं,
3. (ख) कचरापात्र में,
4. (घ) कचरे से खाद बना लेना।

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UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 9 पर्यावरण और जनजीवन पर उसका प्रभाव

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 9 पर्यावरण और जनजीवन पर उसका प्रभाव

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Home Science . Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 9 पर्यावरण और जनजीवन पर उसका प्रभाव.

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
पर्यावरण का अर्थ और परिभाषा निर्धारित कीजिए तथा पर्यावरण के विभिन्न वर्गों का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:
पर्यावरण का अर्थ एवं परिभाषाएँ

मनष्य ही क्या प्रत्येक प्राणी एवं वनस्पति जगत भी पर्यावरण से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है तथा ये सभी अपने पर्यावरण से प्रभावित भी होते हैं। पर्यावरण की अवधारणा को स्पष्ट करने से पूर्व ‘पर्यावरण के शाब्दिक अर्थ को स्पष्ट करना आवश्यक है।
पर्यावरण शब्द दो शब्दों अर्थात् ‘परि’ तथा ‘आवरण’ के संयोग या मेल से बना है। ‘परि’ का अर्थ है चारों ओर’ तथा आवरण का अर्थ है ‘घेरा। इस प्रकार पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ हुआ चारों ओर का घेरा’। इस प्रकार व्यक्ति के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि (UPBoardSolutions.com) व्यक्ति के चारों ओर जो प्राकृतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक शक्तियाँ और परिस्थितियाँ विद्यमान हैं, इनके प्रभावी रूप को ही पर्यावरण कहा जाता है। पर्यावरण का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत है। पर्यावरण उन समस्त शक्तियों, वस्तुओं और दशाओं का योग है, जो मानव को चारों ओर से आवृत किए हुए हैं। मानवे से लेकर वनस्पति तथा सूक्ष्म जीव तक सभी पर्यावरण के अभिन्न अंग हैं। पर्यावरण उन सभी बाह्य दशाओं एवं प्रभावों का योग है, जो जीव के कार्य-कलापों एवं जीवन को प्रभावित करता है। मानव जीवन पर्यावरण से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है।

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पर्यावरण के शाब्दिक अर्थ एवं सामान्य परिचय को जान लेने के उपरान्त इस अवधारणा की व्यवस्थित परिभाषा प्रस्तुत करना भी आवश्यक है। कुछ मुख्य समाज वैज्ञानिकों द्वारा प्रतिपादित परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

  1.  जिस्बर्ट के अनुसार पर्यावरण से आशय उन समस्त कारकों से है जो किसी व्यक्ति या जीव को चारों ओर से घेरे रहते हैं तथा उसे प्रभावित करते हैं एवं जीव अपने पर्यावरण के प्रभाव से बच नहीं सकता। उनके शब्दों में, “पर्यावरण वह है जो किसी वस्तु को चारों ओर से घेरे हुए है तथा उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है।”
  2.  रॉस ने पर्यावरण के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए एक संक्षिप्त परिभाषा इन शब्दों में प्रस्तुत की है, “पर्यावरण हमें प्रभावित करने वाली कोई बाहरी शक्ति है।”

उपर्युक्त विवरण द्वारा पर्यावरण का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है। कि व्यक्ति के सन्दर्भ में स्वयं व्यक्ति को छोड़कर इस जगत् में जो कुछ भी है वह सब कुछ सम्मिलित रूप से व्यक्ति का पर्यावरण है।

पर्यावरण का वर्गीकरण
पर्यावरण के अर्थ एवं परिभाषा सम्बन्धी विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि पर्यावरण की धारणा अपने आप में एक विस्तृत अवधारणा है। इस स्थिति में पर्यावरण के व्यवस्थित अध्ययन के लिए पर्यावरण को समुचित वर्गीकरण प्रस्तुत करना आवश्यक है। सम्पूर्ण पर्यावरण को मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है

(1) प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण:
प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण के अन्तर्गत समस्त प्राकृतिक शक्तियों एवं कारकों को सम्मिलित किया जाता है। पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, पर्यावरण और जनजीवन पर उसका प्रभाव 113 वनस्पति जगत् तथा जीव-जन्तु तो प्राकृतिक पर्यावरण के घटक ही हैं। इनके अतिरिक्त प्राकृतिक शक्तियों एवं घटनाओं को भी प्राकृतिक पर्यावरण ही माना जाएगा। सामान्य रूप से कहा जा सकता है। कि प्राकृतिक पर्यावरण न तो मनुष्य द्वारा निर्मित है और (UPBoardSolutions.com) न यह मनुष्य द्वारा नियन्त्रित ही है। प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव मनुष्य के जीवन के सभी पक्षों पर पड़ता है। जब हम पर्यावरण-प्रदूषण की बात करते हैं तब पर्यावरण से आशय सामान्य रूप से प्राकृतिक पर्यावरण से ही होता है।

(2) सामाजिक पर्यावरण:
सामाजिक पर्यावरण भी पर्यावरण का एक रूप या पक्ष है। सम्पूर्ण सामाजिक ढाँचा ही सामाजिक पर्यावरण कहलाता है। इसे सामाजिक सम्बन्धों का पर्यावरण भी कहा जा सकता है। परिवार, पड़ोस, खेल के साथी, समाज, समुदाय, विद्यालय आदि सभी सामाजिक पर्यावरण के ही घटक हैं। सामाजिक पर्यावरण भी व्यक्ति को गम्भीर रूप से प्रभावित करता है, परन्तु यह सत्य है कि व्यक्ति सामाजिक पर्यावरण के निर्माण एवं विकास में अपना योगदान प्रदान करता है।

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(3) सांस्कृतिक पर्यावरण:
पर्यावरण का एक रूप या पक्ष सांस्कृतिक पर्यावरण भी है। सांस्कृतिक पर्यावरण प्रकृति-प्रदत्त नहीं है, बल्कि इसका निर्माण स्वयं मनुष्य ने ही किया है। मनुष्य के अतिरिक्त अन्य सभी प्राणियों के सन्दर्भ में सांस्कृतिक पर्यावरण का कोई महत्त्व नहीं है। वास्तव में मनुष्य द्वारा निर्मित वस्तुओं का समग्र रूप तथा परिवेश सांस्कृतिक पर्यावरण कहलाता है। सांस्कृतिक पर्यावरण भौतिक तथा अभौतिक दो प्रकार का होता है। सभी प्रकार के मानव-निर्मित उपकरण एवं साधन सांस्कृतिक पर्यावरण के भौतिक पक्ष में सम्मिलित हैं। इससे भिन्न मनुष्य द्वारा विकसित किए गए मूल्य, संस्कृति, धर्म, भाषा, रूढ़ियाँ, परम्पराएँ आदि सम्मिलित रूप से सांस्कृतिक पर्यावरण के अभौतिक पक्ष का निर्माण करते हैं।

प्रश्न 2:
पर्यावरण के जनजीवन पर पड़ने वाले प्रत्यक्ष प्रभावों का वर्णन कीजिए। [2010]
या
प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण जनजीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।” इस कथन को स्पष्ट करते हुए पर्यावरण के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
या
पर्यावरण मानव के लिए किस प्रकार उपयोगी है?
उत्तर:
जब पर्यावरण के प्रभावों का अध्ययन किया जाता है, तब सर्वप्रथम प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण के प्रभावों को ही अध्ययन किया जाता है। वास्तव में पर्यावरण का यही रूप प्रकृति प्रदत्त है तथा मनुष्य के नियन्त्रण से बाहर है। भौगोलिक पर्यावरण के अर्थ को डॉ० डेविस ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “मनुष्य के सन्दर्भ में भौगोलिक पर्यावरण से अभिप्राय भूमि या मानव के चारों ओर फैले उन सभी भौतिक स्वरूपों से है जिनमें वह रहता है, जिनका उसकी आदतों एवं क्रियाओं पर प्रभाव पड़ता है। इस कथन से स्पष्ट है कि प्राकृतिक पर्यावरण के समस्त कारक मनुष्य
के नियन्त्रण से मुक्त हैं।

पर्यावरण के जनजीवन पर प्रत्यक्ष प्रभाव
पर्यावरण जनजीवन के सभी पक्षों को गम्भीर रूप से प्रभावित करता है। पर्यावरण के जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को सामान्य रूप से दो वर्गों में बाँटा जाता है। प्रथम वर्ग में जनजीवन पर पर्यावरण के प्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों को सम्मिलित किया जाता (UPBoardSolutions.com) है तथा द्वितीय वर्ग में जनजीवन पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों को सम्मिलित किया जाता है। पर्यावरण के जनजीवन पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है|

(1) पर्यावरण का जनसंख्या पर प्रभाव:
किसी भी क्षेत्र की जनसंख्या के स्वरूप के निर्धारण में वहाँ के प्राकृतिक पर्यावरण की सर्वाधिक भूमिका होती है। अनुकूल प्राकृतिक पर्यावरण होने पर सम्बन्धित क्षेत्र की जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है तथा प्रतिकूल प्राकृतिक पर्यावरण होने की स्थिति में सम्बन्धित क्षेत्र की जनसंख्या का घनत्व कम होता है। यही कारण है कि उपजाऊ भूमि वाले मैदानी क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है, जबकि रेगिस्तानी क्षेत्रों, बंजर भूमि वाले क्षेत्रों तथा दुर्गम पहाड़ी-क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व कम होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण जनसंख्या के घनत्व को प्रभावित करता है।

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(2) पर्यावरण का खान-पान पर प्रभाव:
मनुष्य को अपनी खाद्य-सामग्री अपने पर्यावरण से ही प्राप्त होती है। इस स्थिति में जिस क्षेत्र में जो खाद्य-सामग्री बहुतायत में उपलब्ध होती है, वही उस क्षेत्र के निवासियों का मुख्य आहार होती है। उदाहरण के लिए–उपजाऊ मैदानी क्षेत्रों में लोगों का , मुख्य आहार वहाँ उगने वाले अनाज तथा सब्जियाँ एवं दालें आदि ही होते हैं। इससे भिन्न समुद्रतटीय क्षेत्रों में लोग अपने आहार में मछली एवं जलीय जीवों के मांस को अधिक स्थान देते हैं। इसी प्रकार ठण्डे एवं अति ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश व्यक्ति मांसाहारी होते हैं, जबकि गर्म क्षेत्रों के अधिकांश निवासी शाकाहारी होते हैं।

(3) पर्यावरण का वेशभूषा पर प्रभाव:
प्राकृतिक पर्यावरण को वहाँ के निवासियों की वेशभूषा पर भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्ति बारीक, ढीले तथा सूती वस्त्र धारण करते हैं। इससे भिन्न ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्ति गर्म एवं चुस्त वस्त्र धारण किया करते हैं। अनेक ठण्डे प्रदेशों में जानवरों की खाले से भी कोट इत्यादि बनाकर पहने जाते हैं।

(4) पर्यावरण का आवासीय स्वरूप पर प्रभाव:
प्राकृतिक पर्यावरण मनुष्य के निवास हेतु प्रयुक्त मकानों तथा इनकी सामग्री को भी प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए—पर्वतीय पर्यावरण में पत्थर तथा लकड़ी सरलता से उपलब्ध होती है। अत: इन क्षेत्रों में मकान बनाने के लिए पत्थर तथा लकड़ी को ही अधिक इस्तेमाल किया जाता है। जिन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है वहाँ मकानों की छतें ढलावदार बनाई जाती हैं। मैदानी क्षेत्रों में प्रायः ईंट, सीमेण्ट, लोहे आदि से मकान बनाए जाते हैं। कुछ क्षेत्रों में, प्रायः भूकम्प आते रहते हैं। इन क्षेत्रों को अधिक क्षति से बचाने के दृष्टिकोण से लकड़ी के मकान ही बनाए जाते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण जन-सामान्य के आवासीय स्वरूप को भी प्रभावित करता है।

(5) पर्यावरण का आवागमन के साधनों पर प्रभाव:
प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण का आवागमन के साधनों के विकास पर भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। समुद्र तथा नदियों के निकटवर्ती क्षेत्रों में स्टीमर एवं नौकाएँ आवागमन का साधन होती हैं। मैदानी क्षेत्रों में सड़कें बनाना तथा रेल की पटरियाँ बिछाना सरल होता है। अतः इन क्षेत्रों में रेलगाड़ियाँ, मोटर कारें, बसें आदि वाहन अधिक होते हैं। ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में खच्चर ही आवागमन एवं माल ढोने के साधन माने जाते हैं।

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(6) पर्यावरण का शारीरिक लक्षणों पर प्रभाव:
जन-सामान्य के शारीरिक लक्षणों पर भौगोलिक पर्यावरण का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति की त्वचा के रंग पर जलवायु एवं स्थानीय तापमान का अनिवार्य रूप से प्रभाव पड़ता है। गर्म क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का रंग बहुधा काला तथा ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का रंग (UPBoardSolutions.com) गोरा होता है। भूमध्यरेखीय जलवायु में रहने वाले व्यक्ति वहाँ की अतिरिक्त उष्णता के कारण नाटे कद के और काले रंग के होते हैं, जबकि भूमध्यसागरीय जलवायु के निवासी प्रायः गोरे तथा लम्बे कद के होते हैं।

(7) पर्यावरण का व्यावसायिक जीवन पर प्रभाव:
प्राकृतिक पर्यावरण सम्बन्धित क्षेत्र के निवासियों के मूल व्यवसायों को भी प्रभावित करता है। यह सर्वविदित तथ्य है कि समुद्र एवं जुल-स्रोतों के निकट रहने वाले लोगों का मुख्य व्यवसाय मछली पकड़ना होता है। नदियों से सिंचित मैदानी क्षेत्रों में कृषि-कार्य ही मुख्य व्यवसाय होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में भेड़-बकरियाँ पालना एक मूले व्यवसाय माना जाता है, जब कि अधिक वन वाले क्षेत्रों में लकड़ी काटना मूल व्यवसाय माना जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण अनिवार्य रूप से व्यावसायिक जीवन को भी प्रभावित करता है।

प्रश्न 3:
पर्यावरण-प्रदूषण से आप क्या समझती हैं? पर्यावरण-प्रदूषण के सामान्य कारणों काभी वर्णन कीजिए। [2007, 08, 16, 18]
या
पर्यावरण प्रदूषण की परिभाषा लिखिए। प्रदूषण के कारण बताइए। पर्यावरण-प्रदुषण नियन्त्रण के लिए सरकार द्वारा क्या उपाय किए गए हैं? [2008, 09, 11, 12]
या
पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य कारण क्या हैं? [2017]
या
जनजीवन पर पर्यावरण के हानिकारक प्रभाव को रोकने के बारे में लिखिए। [2013]
उत्तर:
पर्यावरण-प्रदूषण का अर्थ

पर्यावरण-प्रदूषण का सामान्य अर्थ है-हमारे पर्यावरण का दूषित हो जाना। पर्यावरण को निर्माण प्रकृति ने किया है। प्रकृति-प्रदत्त पर्यावरण में जब किन्ही तत्त्वों का अनुपात इस रूप में बदलने जगती है जिसका जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना होती है, तब कहा जाता है कि यावरण प्रदूषित हो रहा है। उदाहरण के लिए-यदि पर्यावरण के मुख्य भाग वायु में ऑक्सीजन के स्थान पर अन्य विषैली गैसों का अनुपात बढ़ जाये तो कहा जाएगा कि वायु-प्रदूषण हो गया है। ण के किसी भी भाग के दूषित हो जाने को पर्यावरण-प्रदूषण कहा जाएगा। यह प्रदूषण जल-प्रदूषण, मृदा-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण तथा ध्वनि-प्रदूषण के रूप में हो सकता है।

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पर्यावरण-प्रदूषण के सामान्य कारण
पर्यावरण प्रदूषण अपने आप में एक गम्भीर तथा व्यापक समस्या है। इस समस्या को उत्पन्न करने तथा बढ़ावा देने वाले वैसे तो असंख्य कारण हैं, परन्तु कुछ सामान्य कारण ऐसे हैं जो अधिक प्रबल तथा
अति स्पष्ट हैं। इस वर्ग के कारणों को ही पर्यावरण-प्रदूषण के सामान्य लक्षण कहा जाता है। इस वर्ग के मुख्य कारणों का सामान्य परिचय निम्नवर्णित है

(1) जल-मल का अनियमित निष्कासन:
आवासीय क्षेत्रों से जल-मल का अनियमित निष्कासन पर्यावरण-प्रदूषण का एक मुख्य (UPBoardSolutions.com) कारण है। खुले शौचालयों से उत्पन्न होने वाली दुर्गन्ध वायु प्रदूषण में सर्वाधिक योगदान देती है। इसके अतिरिक्त वाहित मल जल के स्रोतों को प्रदूषित करता है। घरों में इस्तेमाल होने वाला जल भी विभिन्न कारणों से अत्यधिक प्रदूषित हो जाता है तथा नाले-नालियों के माध्यम से यह दूषित जल नदियों के जल को भी प्रदूषित कर देता है।

(2) घरेलू अवशिष्ट पदार्थ:
घरों में इस्तेमाल होने वाले असंख्य पदार्थों के अवशिष्ट भाग भी पर्यावरण-प्रदूषण में उल्लेखनीय योगदान प्रदान करते हैं। फिनाइल, मच्छर मारने वाले घोल, डिब्बाबन्दी में इस्तेमाल डिब्बे, डिटर्जेण्ट, शैम्पू, साबुन आदि सभी के अवशेष जल, वायु तथा मिट्टी को गम्भीर रूप से प्रदूषित करते हैं।

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(3) औद्योगिकीकरण:
तीव्र गति से होने वाला औद्योगिकीकरण भी पर्यावरण-प्रदूषण के लिए जिम्मेदार एक मुख्य कारण है। औद्योगिक संस्थानों में जहाँ ईंधन जलने से वायु-प्रदूषण होता है। वहीं उनमें इस्तेमाल होने वाली रासायनिक सामग्री के अवशेष आदि वायु, जल तथा मिट्टी को निरन्तर प्रदूषित करते हैं। औद्योगिक संस्थानों में चलने वाली मशीनों, सायरनों तथा अन्य कारणों से ध्वनि-प्रदूषण में भी वृद्धि होती है।

(4) दहन तथा धुआँ:
आधुनिक-उन्नत समाज में मानव ने दहन का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत कर लिया है। घरेलू रसोईघर से लेकर असंख्य वाहनों तथा औद्योगिक संस्थानों में सर्वत्र दहन का ही बोलबाला है, लकड़ी, कोयला, गैस, पेट्रोल तथा डीजल आदि के दहन से जहाँ अनेक विषैली गैसें तथा धुआँ उत्पन्न होता है, वहीं अप्राकृतिक स्रोतों से भी हानिकारक गैसें उत्पन्न होती हैं। ये सब सामूहिक रूप से वायु के प्राकृतिक स्वरूप को परिवर्तित करते हैं। परिणामस्वरूप वायु प्रदूषण में निरन्तर वृद्धि हो रही है।

(5) कीटनाशकों का बढ़ता प्रयोग:
जैसे-जैसे कृषि एवं उद्यान-क्षेत्र में विस्तार हुआ है, वैसे-वैसे कीटनाशकों को प्रयोग भी निरन्तर बढ़ा है। विभिन्न कीटनाशक अत्यधिक विषैले हैं तथा इनका प्रभाव दूरगामी है। फसलों पर तथा घरों में होने वाले कीटनाशकों के छिड़काव से वायु, जल तथा मिट्टी का अत्यधिक प्रदूषण हो रहा है। इस प्रदूषण का प्रतिकूल प्रभाव मनुष्यों तथा पशु-पक्षियों पर
निरन्तर पड़ रहा है।

(6) नदियों में कूड़ा-करकट तथा मृत शरीर बहाना:
जैसे-जैसे जनसंख्या तथा नगरीकरण में वृद्धि हो रही है; वैसे-वैसे कूड़े-करकट की समस्या भी बढ़ रही है। अज्ञानता तथा प्रचलन के अनुसार कूड़े-करकट तथा मनुष्यों एवं पशुओं के मृत-शरीरों को नदियों में बहा दिया जाता है। इस प्रकार का विसर्जन सुविधाजनक तो (UPBoardSolutions.com) प्रतीत होता है, परन्तु इस प्रचलन के परिणामस्वरूप जल-प्रदूषण में अत्यधिक वृद्धि होती है। इस जल-प्रदूषण से कुछ अंशों में वायु तथा मिट्टी के प्रदूषण में भी वृद्धि होती है।

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(7) वृक्षों की अत्यधिक कटाई:
पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि करने वाला एक मुख्य उल्लेखनीय कारण वृक्षों की अत्यधिक कटाई भी है। वृक्ष वे प्रकृति-प्रदत्त कारक हैं जो वायु के प्राकृतिक स्वरूप को सन्तुलित बनाये रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वृक्ष सूर्य के प्रकाश से कार्बन डाइ-ऑक्साइड ग्रहण करके ऑक्सीजन छोड़ते हैं। वृक्षों के अत्यधिक संख्या में कट जाने के परिणामस्वरूप वायु का प्राकृतिक स्वरूप विकृत होने लगती है और वायु-प्रदूषण की स्थिति को बढ़ावा मिलता है।

(8) रेडियोधर्मी पदार्थ:
पर्यावरण प्रदूषण के लिए उत्तरदायी कारकों में रेडियोधर्मी पदार्थों का भी उल्लेखनीय योगदान है। विभिन्न आणविक परीक्षणों के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले रेडियोधर्मी पदार्थों ने भी पर्यावरण को गम्भीर रूप से प्रदूषित किया है। प्रदूषण के इस कारक के गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव सभी प्राणियों तथा पेड़-पौधों पर भी पड़ रहे हैं। विभिन्न प्रकार के कैन्सर तथा
आनुवंशिक रोग इसी प्रकार के प्रदूषण के परिणाम हैं।

पर्यावरण-प्रदूषण पर नियन्त्रण

पर्यावरण-प्रदूषण अपने आप में एक गम्भीर समस्या है तथा सम्पूर्ण मानव-जगत के लिए एक चुनौती है। इस समस्या के समाधान के लिए मानव-मात्रं चिन्तित है। विश्व के प्रायः सभी देशों में पर्यावरण-प्रदूषण पर प्रभावी नियन्त्रण के लिए अनेक उपाय किए जा रहे हैं। हमारे देश में भी इस समस्या से मुकाबला करने के लिए अनेक उपाय किए जा रहे हैं। कुछ उपायों का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है

  1. औद्योगिक संस्थानों के लिए कड़े निर्देश जारी किए गए हैं कि वे पर्यावरण-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के हर सम्भव उपाय करें। इसके लिए आवश्यक है कि पर्याप्त ऊँची चिमनियाँ लगाई. जाएँ तथा उनमें उच्च कोटि के छन्ने लगाए जाएँ। औद्योगिक संस्थानों से विसर्जित होने वाले जल को पूर्ण रूप से उपचारित करके ही पर्यावरण में छोड़ा जाना चाहिए। यही नहीं, ध्वनि-प्रदूषण को रोकने के लिए जहाँ तक सम्भव हो ध्वनि अवरोधक लगाये जाने चाहिए। औद्योगिक संस्थानों के आस-पास अधिक-से-अधिक वृक्ष लगाए जाने चाहिए।
  2. वाहन पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य कारण हैं; अत: वाहनों द्वारा होने वाले प्रदूषण को भी नियन्त्रित करना आवश्यक है। इसके लिए वाहनों के इंजन की समय-समय पर जाँच करवाई जानी
    चाहिए। ईंधन में होने वाली मिलावट को भी रोका जाना चाहिए।
  3. जन-सामान्य को पर्यावरण-प्रदूषण के प्रति सचेत होना चाहिए तथा जीवन के हर क्षेत्र में प्रदूषण पर प्रभावी रोक लगाने के हर सम्भव उपाय किए जाने चाहिए।
    पर्यावरण-प्रदूषण वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति की समस्या है; अतः इसे नियन्त्रित (UPBoardSolutions.com) करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को जागरूक होना चाहिए। पर्यावरण प्रदूषण के प्रत्येक कारण को जानने का प्रयास किया जाना चाहिए तथा प्रत्येक कारण के निवारण का भी उपाय किया जाना चाहिए।

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प्रश्न 4:
पर्यावरण-प्रदूषण का जनजीवन पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए। [2008, 09, 11, 12, 13, 17, 18]
या
पर्यावरण के दूषित होने से मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
या
विस्तारपूर्वक समझाइए। प्रदूषण किसे कहते हैं? प्रदूषण का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? [2011]
या
व्यक्ति के स्वास्थ्य पर पर्यावरण-प्रदूषण का क्या प्रभाव पड़ता है? [2011]
या
मानव जीवन पर पर्यावरण-प्रदूषण का क्या दुष्प्रभाव पड़ता है? संक्षेप में लिखिए। [2017]
उत्तर:
पर्यावरण-प्रदूषण का जनजीवन पर प्रभाव
पर्यावरण का जनजीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है और यह जनजीवन, के सभी पक्षों को प्रभावित करता है। सामान्य स्थितियों में जनजीवन पर्यावरण के अनुरूप निर्धारित हो जाता है तथा उस स्थिति में पर्यावरण से कोई हानि नहीं होती, परन्तु जब पर्यावरण प्रदूषित हो जाता है अर्थात् प्रदूषण की दर बढ़ जाती है तो जन-सामान्य के जीवन पर प्रतिकूल तथा हानिकारक प्रभाव पड़ने लगता है। पर्यावरण-प्रदूषण का अर्थ है-पर्यावरण के किसी एक या सभी पक्षों का दूषित हो जाना। पर्यावरण-प्रदूषण के परिणामस्वरूप विभिन्न साधारण, गम्भीर तथा अति गम्भीर रोग पनपने लगते हैं। जिनसे जन-स्वास्थ्य को गम्भीर खतरा उत्पन्न हो जाता है, परन्तु (UPBoardSolutions.com) पर्यावरण-प्रदूषण का अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिकूल प्रभाव जनसाधारण के आर्थिक जीवन पर भी पड़ता है। रोगों की वृद्धि तथा स्वास्थ्य के निम्न स्तर के कारण जनसाधारण की उत्पादक-क्षमता घटती है तथा रोग निवारण के लिए अतिरिक्त धन व्यय करना पड़ता है। इससे जनसाधारण का जीवन आर्थिक संकट का शिकार हो जाता है। जनजीवन पर पर्यावरण-प्रदूषण के पड़ने वाले प्रभावों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

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(1) जन-स्वास्थ्य पर प्रभाव:
पर्यावरण-प्रदूषण का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव जन-स्वास्थ्य पर पड़ता है। जैसे-जैसे पर्यावरण का अधिक प्रदूषण होने लगता है, वैसे-वैसे प्रदूषण जनित रोगों की दर एवं गम्भीरता में वृद्धि होने लगती है। पर्यावरण के भिन्न-भिन्न पक्षों में होने वाले प्रदूषण से भिन्न-भिन्न प्रकार के रोग बढ़ते हैं। हम जानते हैं कि वायु प्रदूषण के परिणामस्वरूप श्वसन-तन्त्र से सम्बन्धित रोग अधिक प्रबल होते हैं। जल-प्रदूषण के परिणामस्वरूप पाचन-तन्त्र से सम्बन्धित रोग अधिक फैलते हैं। ध्वनि-प्रदूषण भी तन्त्रिकी-तन्त्र, हृदय एवं रक्तचाप सम्बन्धी विकारों को जन्म देता है। इसके साथ-ही- साथ मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यवहारगत सामान्यता को ध्वनि-प्रदूषण विकृत कर देता है। अन्य प्रकार के प्रदूषण भी जन-सामान्य को विभिन्न सामान्य एवं गम्भीर रोगों का शिकार बनाते हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि पर्यावरण-प्रदूषण अनिवार्य रूप से जन-स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। प्रदूषित पर्यावरण में रहने वाले व्यक्तियों की औसत आयु भी घटती है तथा स्वास्थ्य का सामान्य स्तर भी निम्न रहता है।

(2) व्यक्तिगत कार्यक्षमता पर प्रभाव:
व्यक्ति एवं समाज की प्रगति में सम्बन्धित व्यक्तियों की कार्यक्षमता का विशेष महत्त्व होता है। यदि व्यक्ति की कार्यक्षमता सामान्य या सामान्य से अधिक हो, तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होता है तथा समृद्ध बन सकता है। जहाँ तक पर्यावरण-प्रदूषण का प्रश्न है, इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति की कार्यक्षमता अनिवार्य रूप से घटती है। हम जानते हैं कि पर्यावरण-प्रदूषण के परिणामस्वरूप जन-स्वास्थ्य का स्तर निम्न होता है। निम्न स्वास्थ्य स्तर वाला व्यक्ति न तो अपने कार्य को कुशलतापूर्वक कर सकती है और न ही उसकी उत्पादन-क्षमता सामान्य रह पाती है। ये दोनों ही स्थितियाँ व्यक्ति एवं समाज के लिए हानिकारक सिद्ध होती हैं। वास्तव में प्रदूषित वातावरण में भले ही व्यक्ति अस्वस्थ न भी हो, तो भी उसकी चुस्ती
एवं स्फूर्ति तो घट ही जाती है। यही कारक व्यक्ति की कार्यक्षमता को घटाने के लिए पर्याप्त होता है।

(3) आर्थिक जीवन पर प्रभाव:
व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर भी पर्यावरण प्रदूषण का उल्लेखनीय प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वास्तव में यदि व्यक्ति के स्वास्थ्य का स्तर निम्न हो तथा उसकी कार्यक्षमता भी कम हो, तो वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समुचित धन कदापि अर्जित नहीं कर सकता। पर्यावरण-प्रदूषण के परिणामस्वरूप व्यक्ति की उत्पादन क्षमता घट जाती है। इसके साथ-ही-साथ यह भी सत्य है कि यदि व्यक्ति अथवा उसके परिवार का कोई सदस्य प्रदूषण का शिकार होकर किन्हीं साधारण या गम्भीर रोगों से ग्रस्त रहता है तो उसके उपचार पर भी पर्याप्त व्यय करना पड़ सकता है। इससे भी व्यक्ति एवं परिवार का बजट बिगड़ (UPBoardSolutions.com) जाता है तथा व्यक्ति एवं परिवार की आर्थिक स्थिति निम्न हो जाती है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण-प्रदूषण के प्रभाव से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों ही रूपों में कुप्रभावित होती है। इस कारक के प्रबल तथा विस्तृत हो जाने पर समाज एवं
राष्ट्र की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित होती है।
उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि पर्यावरण प्रदूषण का जनजीवन पर बहुपक्षीय, गम्भीर तथा प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए पर्यावरण-प्रदूषण को आज गम्भीरतम विश्वस्तरीय समस्या माना जाने लगा है।

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प्रश्न 5:
जल-प्रदूषण क्या है? जल-प्रदूषण के कारण और इसकी रोकथाम के उपाय लिखिए।
मानव जीवन पर पड़ने वाले जल-प्रदूषण के प्रभावों का वर्णन कीजिए। [2012]
या
मानव-जीवन पर वायु-प्रदूषण के प्रभाव लिखिए। [2009, 12, 14]
या
वायु-प्रदूषण किसे कहते हैं ? वायु प्रदूषण के क्या कारण हैं ? वायु-प्रदूषण की रोकथाम के उपायों के लिए अपने सुझाव दीजिए। [2007, 09, 10, 11, 14, 15, 16]
या
वायु-प्रदूषण के कारण, मानव जीवन पर प्रभाव एवं बचाव के उपाय संक्षेप में लिखिए। [2013, 12]
या
जल-प्रदूषित होने से कैसे बचाया जा सकता है? [2014]
या
जल-प्रदूषण से होने वाली हानियों का वर्णन कीजिए। [2013]
या
पयार्वरण-प्रदूषण से आप क्या समझती हैं? यह कितने प्रकार का होता है? [2012, 13, 15, 16]
या
कोई चार उपाय लिखिए जिनके द्वारा आप वायु प्रदूषण को नियन्त्रित करने में सहायता कर सकते हैं। [2016]
उत्तर:
पर्यावरण-प्रदूषण की अवधारणा
पर्यावरण प्रदूषण की नवीनतम अवधारणा वर्तमान विज्ञान, औद्योगीकरण और नगरीकरण की देन है। प्रदूषण शब्द अंग्रेजी भाषा के ‘Pollute’ शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। ‘पोल्यूट’ का अर्थ होता है। ‘दूषित’ या ‘खराब हो जाना। प्रदूषण शब्द भ्रष्ट या खराब होने का भी सूचक है। इस प्रकार प्रदूषण का शाब्दिक अर्थ हुआ दूषित हो जाना। प्राकृतिक पर्यावरण हमारे लिए अत्यन्त लाभदायक है। जब यह प्रदूषकों के कारण अपना उपयोगी स्वरूप खोकर विकृत होने लगता है, (UPBoardSolutions.com) तब उसे पर्यावरण-प्रदूषण कहा जाता है। दूषित तत्त्व तथा गन्दगियाँ कल्याणकारी पर्यावरण को धीरे-धीरे हानिकारक बना रही हैं। पर्यावरण जब अपना मूल लाभकारी गुण खोकर दूषित हो जाता है, तब उसे पर्यावरण-प्रदूषण की संज्ञा दी जाती है। प्रदूषण उत्पन्न होने से पर्यावरण के गुणकारी तत्त्वों का सन्तुलन बिगड़ जाता है। वह लाभ के स्थान पर हानि पहुँचाने लगता है। पर्यावरण में असन्तुलन आ जाने तथा पारिस्थितिकी-तन्त्र में विकृति की स्थिति को प्रदूषण कहा जाता है।

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प्रदूषण की परिभाषा
प्रदूषण की विशेष जानकारी ज्ञात करने के लिए हमें उसकी विभिन्न परिभाषाओं पर दृष्टिपाते करना होगा। विभिन्न पर्यावरणविदों ने प्रदूषण को निम्नवत् परिभाषित किया है
विज्ञान सलाहकार समिति के अनुसार, “पर्यावरण प्रदूषण मनुष्यों की गतिविधियों द्वारा, ऊर्जा, स्वरूपों, विकिरण स्तरों, रासायनिक तथा भौतिक संगठन, जीवों की संख्या में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से परिवर्तन के परिणामस्वरूप उत्पन्न उप-उत्पाद हैं जो हमारे परिवेश में पूर्ण अर्थवा अधिकतम प्रतिकूल परिवर्तन उत्पन्न करता है।”
ओडम के अनुसार, “प्रदूषण हमारी हवा, मृदा एवं जल के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक लक्षणों में अवांछनीय परिवर्तन है जो मानव जीवन तथा अन्य जीवों, हमारी औद्योगिक प्रक्रिया, जीवनदशाओं तथा सांस्कृतिक विरासतों को हानिकारक रूप में प्रभावित करता है अथवा जो कच्चे पदार्थों के स्रोतों को नष्ट कर सकता है, करेगा।”

पर्यावरण-प्रदूषण के रूप
पर्यावरण प्रदूषण के मुख्य रूप हैं-जल-प्रदूषण, वायु प्रदूषण, मृदा-प्रदूषण तथा ध्वनि-प्रदूषण।
जल-प्रदूषण
जल में जीव रासायनिक पदार्थों तथा विषैले रसायन, खनिज ताँबा, सीसा, अरगजी, बेरियम, फॉस्फेट, सायनाइड, पारद आदि की मात्रा में वृद्धि होना ही जल-प्रदूषण है। प्रदूषकों के कारण जब जीवनदायी जल अपनी उपयोगिता खो देता है और उसका गुणकारी तत्त्व घातक बन जाता है तब उसे
जल-प्रदूषण की संज्ञा दी जाती है। जल-प्रदूषण दो प्रकार का होता है
(1) दृश्य प्रदूषण तथा
(2) अदृश्य प्रदूषण।

कारण: जल-प्रदूषण निम्नलिखित कारणों से होता है

  1. औद्योगीकरण जल-प्रदूषण के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी है। चमड़े के कारखाने, चीनी एवं ऐल्कोहल के कारखाने, कागज की मिलें तथा अन्य अनेकानेक उद्योग नदियों के जल को प्रदूषित करते हैं।
  2. नगरीकरण भी जल-प्रदूषण के लिए उत्तरदायी है। नगरों की गन्दगी, मल व औद्योगिक अवशिष्टों के विषैले तत्त्व भी जल को प्रदूषित करते हैं।
  3.  समुद्रों में जहाजरानी एवं परमाणु अस्त्रों के परीक्षण से भी जल प्रदूषित होता है।
  4. नदियों के प्रति परम्परागत भक्ति-भाव होते हुए भी तमाम गन्दगी; जैसे-अधजले शव और जानवरों के मृत शरीर तथा अस्थि-विसर्जन आदि; भी नदियों में ही किया जाता है, जो नदियों के जल के प्रदूषित होने का एक प्रमुख कारण है। |
  5.  जल में अनेक रोगों के हानिकारक कीटाणु मिल जाते हैं, जिससे प्रदूषण उत्पन्न हो जाता है।
  6.  भूमि-क्षरण के कारण मिट्टी के साथ रासायनिक उर्वरक तथा कीटनाशक पदार्थों के नदियों
    में पहुँच जाने से नदियों का जल प्रदूषित हो जाता है।
  7. घरों से बहकर निकलने वाला फिनाइल, साबुन, सर्फ आदि से युक्त गन्दा पानी तथा शौचालय (UPBoardSolutions.com) का दूषित मल नालियों में प्रवाहित होता हुआ नदियों और झील के जल में मिलकर उसे प्रदूषित कर देता है।
  8. नदियों और झीलों के जल में पशुओं को नहलाना, मनुष्यों द्वारा स्नान करना व साबुन आदि से गन्दे वस्त्र धोना भी जल-प्रदूषण का मुख्य कारण है।

नियन्त्रण के उपाय:
जल की शुद्धता और उसकी उपयोगिता को बनाए रखने के लिए प्रदूषण को नियन्त्रित किया जाना आवश्र प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए निम्नलिखित उपाय काम में लाए जा सकते हैं

  1. नगरों के दूषित जल और मल को नदियों और झीलों के स्वच्छ जल में सीधे मिलने से रोका जाए।
  2. कल-कारखानों के दूषित और विषैले जल को नदियों और झीलों के जल में न गिरने दिया जाए।
  3. मल-मूत्र एवं गन्दगीयुक्त जल का उपयोग बायोगैस निर्माण या सिंचाई के लिए करके प्रदूषण को रोकने का प्रयास किया जाए।
  4. सागरों के जल में आणविक परीक्षण न कराए जाएँ।
  5.  नदियों के तटों पर दिवंगतों का अन्तिम संस्कार विधि-विधान से करके उनकी राख को प्रवाहित करने के स्थान पर दबा दिया जाए।
  6. पशुओं के मृत शरीर तथा मानव शवों को स्वच्छ जल में प्रवाहित न करने दिया जाए।
  7. जल-प्रदूषण नियन्त्रण के ध्येय से नियम बनाये जाएँ तथा उनका कठोरता से पालन कराया जाए।
  8. नदियों, कुओं, तालाबों और झीलों के जल को शुद्ध बनाये रखने के लिए प्रभावी उपाय काम में लाये जाएँ।
  9. जल-प्रदूषण के कुप्रभाव तथा उनके रोकने के उपायों का जनसामान्य में प्रचार-प्रसार कराया जाए।
  10. जल उपयोग तथा जल संसाधन संरक्षण के लिए राष्ट्रीय नीति बनायी जाए।

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मानव जीवन पर प्रभाव
जल-प्रदूषण के प्रतिकूल प्रभावों अथवा हानियों का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है

  1. प्रदूषित जल के सेवन से जीवों को अनेक प्रकार के खतरों का सामना करना पड़ता है।
  2. जल-प्रदूषण अनेक बीमारियों; जैसे-हैजा, पीलिया, पेट में कीड़े, यहाँ तक कि टायफाइड; का भी जनक है। राजस्थान के दक्षिणी भाग के आदिवासी गाँवों के तालाबों का दूषित पानी पीने से ‘नारू’ नाम का भयंकर रोग होता है। इन सुविधाविहीन गाँवों के 6 लाख 90 हजार लोगों में से 1 लाख 90 हजार लोगों को यह रोग है।
  3.  प्रदूषित जल का प्रभाव जल में रहने वाले जन्तुओं और जलीय पौधों पर भी पड़ रहा है। (UPBoardSolutions.com) जल-प्रदूषण के कारण ही मछली और जलीय पौधों में 30 से 50 प्रतिशत तक की कमी हो गई है। जो खाद्य पदार्थ के रूप में मछली आदि का उपयोग करते हैं उनके स्वास्थ्य को भी हानि पहुँचती है।
  4. प्रदूषित जल का प्रभाव कृषि उपजों पर भी पड़ता है। कृषि से उत्पन्न खाद्य पदार्थों को मानव व पशुओं द्वारा उपयोग में लाया जाता है, जिससे मानव व पशुओं के स्वास्थ्य को हानि होती है।
  5. जल जन्तुओं के विनाश से पर्यावरण असन्तुलित होकर विभिन्न प्रकार के कुप्रभाव उत्पन्न करता है।

वायु-प्रदूषण :
वायु में विजातीय तत्त्वों की उपस्थिति चाहे गैसीय हो या पार्थक्य या दोनों का मिश्रण, जोकि मानव के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए हानिकारक हो, वायु-प्रदूषण कहलाता है। वायु-प्रदूषण मुख्य रूप से धूल-कण, धुआँ, कार्बन-कण, सल्फर डाइऑक्साइड, कुहासा, सीसा, कैडमियम आदि घातक पदार्थों के वायु में विलय से होता है। ये सब उद्योगों एवं परिवहन के साधनों के माध्यम से वायुमण्डल में मिलते हैं। वायु के कल्याणकारी रूप का विनाशकारी रूप में परिवर्तन ही वायु-प्रदूषण है। वर्तमान समय में मानव को प्राणवायु के रूप में वायु प्रदूषण के कारण शुद्ध ऑक्सीजन भी उपलब्ध नहीं हो पा रही है।
कारण: वायु-प्रदूषण निम्नलिखित कारणों से होता है

  1. नगरीकरण, औद्योगीकरण एवं अनियन्त्रित भवन-निर्माण से वायु प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो रही है।।
  2. परिवहन के साधनों (ऑटोमोबाइलों) से निकलता धुआँ वायु-प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है।
  3. नगरीकरण के निमित्त नगरों की बढ़ती गन्दगी भी वायु को प्रदूषित कर रही है।
  4. वनों की अनियमित एवं अनियन्त्रित कटाई से भी वायु-प्रदूषण बढ़ रहा है।
  5. रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशक ओषधियों के कृषि में अधिकाधिक उपयोग से भी वायु-प्रदूषण बढ़ रहा है।
  6. रसोईघरों तथा कारखानों की चिमनियों से निकलते धुएँ के कारण वायु-प्रदूषण बढ़ रहा है।
  7. विभिन्न प्रदूषकों के अनियन्त्रित निस्तारण से वायु-प्रदूषण उत्पन्न हो रहा है।
  8. दूषित जल-मल के एकत्र होकर दुर्गन्ध फैलाने से वायु प्रदूषित हो रही है।
  9.  युद्ध, आणविक विस्फोट तथा दहन की क्रियाएँ भी वायु को प्रदूषित करती हैं।
  10. कीटनाशक दवाओं के छिड़काव के कारण वायुमण्डल प्रदूषित हो जाता है।

नियन्त्रण के उपाय:
वायु मानव जीवन का मुख्य आधार है। वायु-प्रदूषण मानव जीवन के अस्तित्व के लिए खतरा बनता जा रहा है। वायु-प्रदूषण रोकने के लिए प्रभावी उपाय ढूँढ़ना आवश्यक है। वायु-प्रदूषण रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय काम में लाए जा सकते हैं

  1. कल-कारखानों को नगरों से दूर स्थापित करना तथा उनसे निकलने वाले धुएँ, गैस तथा राख पर नियन्त्रण करना। इसके लिए ऊँची चिमनियाँ लगाई जानी चाहिए तथा चिमनियों में उत्तम प्रकार के छन्ने लगाए जाएँ।
  2. परिवहन के साधनों पर धुआँरहित यन्त्र लगाए जाएँ।
  3. नगरों में हरित पट्टी के रूप में युद्ध स्तर पर वृक्षारोपण किया जाए।
  4. नगरों में स्वच्छता, जल-मले निकास तथा अवशिष्ट पदार्थों के विसर्जन की उचित व्यवस्था की जाए।
  5. वन रोपण तथा वृक्ष संरक्षण पर बल दिया जाए।
  6. रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों के प्रयोग को नियन्त्रित किया जाए।
  7. घरों में बायोगैस, पेट्रोलियम गैस या धुआँरहित चूल्हों का प्रयोग किया जाए।
  8. खुले में मैला, कूड़ा-करकट तथा अवशिष्ट पदार्थ सड़ने के लिए न फेंके जाएँ।
  9. गन्दा जल एकत्र न होने दिया जाए।
  10. वायु-प्रदूषण रोकने के लिए कठोर नियम बनाए जाएँ और दृढ़ता से उनका पालन कराया जाए।

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मानव जीवन पर प्रभाव

वायु-प्रदूषण के मानव जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं

  1. वायु प्रदूषण से जानलेवा बीमारियाँ; जैसे छाती और साँस की बीमारियाँ यथा ब्रॉन्काइटिस, तपेदिक, फेफड़ों का कैन्सर आदि; उत्पन्न होती हैं।
  2. वायु प्रदूषण मानव शरीर, मानव की खुशियों और मानव की सभ्यता के लिए खतरा बना हुआ है। परिवहन के विभिन्न साधनों द्वारा उत्सर्जित धुआँ नागरिकों पर विभिन्न प्रकार के कुप्रभाव डालता है।
  3. वायु-प्रदूषण चारों ओर फैले खेतों, हरे-भरे पेड़ों व रमणीक दृश्यों को भी धुंधला कर देता है व उन पर झीनी चादर डाल देता है, बल्कि खेतों, तालाबों व जलाशयों को भी अपने कृमिकणों से विषाक्त करता रहता है, जिसका सीधा प्रभाव मानव के स्वास्थ्य पर पड़ता है।
  4. चिकित्साशास्त्रियों ने पाया है कि जहाँ वायु-प्रदूषण अधिक है वहाँ बच्चों की हड्डियों (UPBoardSolutions.com) का विकास कम होता है, हड्डियों की उम्र घट जाती है तथा बच्चों में खाँसी और साँस फूलना तो प्रायः देखा जाता है।
  5.  वायु-प्रदूषण का प्रभाव वृक्षों पर भी देखा जा सकता है। चण्डीगढ़ के पेड़ों और लखनऊ के दशहरी आमों पर वायु प्रदूषण के बढ़ते हुए खतरे को सहज ही देखा जा सकता है, जहाँ मानव को फल कम मात्रा में मिल रहे हैं और उनकी विषाक्तता का सीधा प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।
  6. दिल्ली के वायुमण्डल में व्याप्त प्रदूषण का प्रभाव आम नागरिकों के स्वास्थ्य पर तो पड़ा ही, दिल्ली की परिवहन पुलिस पर भी पड़ा है और यही दशा कोलकाता और मुम्बई की भी है, अर्थात् इससे मानव का जीवन (आयु) घट रहा है। दिल्ली नगर में वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों को देखते हुए ही सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषिद्ध कर दिया गया है।
  7. वायु-प्रदूषण के कारण ओजोन की परत में छिद्र होने की सम्भावना व्यक्त होने से सम्पूर्ण विश्व भयाक्रान्त हो उठा है।
  8.  शुद्ध वायु न मिलने से शारीरिक विकास रुकने के साथ-साथ शारीरिक क्षमता घटती जा रही है।
  9. वायु-प्रदूषण मानव अस्तित्व के सम्मुख एक गम्भीर समस्या बनकर खड़ा हो गया है, जिसे रोकने में भारी व्यय करना पड़ रहा है।

प्रश्न 6:
‘ध्वनि प्रदूषण क्या है? इसके उत्तरदायी कारकों को बताते हुए मानव-जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए। [2008]
या
ध्वनि-प्रदूषण का मानव-जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? [2011, 17]
या
ध्वनि-प्रदूषण के दो कारण लिखिए। [2013]
उत्तर:
ध्वनि-प्रदूषण का अर्थ
वायुमण्डल में परिवहन के साधनों, कल-कारखानों, रेडियो, लाउडस्पीकर, ग्रामोफोन आदि के तीव्र ध्वनि से उत्पन्न शोर को ध्वनि-प्रदूषण कहते हैं। कानों को ने भाने वाला वह कर्कश स्वर, जो मानसिक तनाव का कारण बनता है, ध्वनि-प्रदूषण कहलाता है। ध्वनि की तीव्रता के मापन की इकाई डेसीबल है। सामान्य रूप से 80-85 डेसीबल तीव्रता वाली ध्वनियों को प्रदूषण की श्रेणी में रखा जाता है तथा इनका प्रतिकूल प्रभाव मानव-स्वास्थ्य पर पड़ता है। वर्तमान युग में ध्वनि-प्रदूषण सुरसा के मुँह की भाँति बढ़ता जा रहा है। ध्वनि-प्रदूषण के लिए निम्नलिखित कारक उत्तरदायी है

  1. सर्वाधिक ध्वनि-प्रदषण परिवहन के साधनों; जैसे बसों, ट्रकों, रेलों, वायुयानों, स्कुटरों आदि; के द्वारा होता है। धड़धड़ाते हुए असंख्य वाहन कर्कश स्वर देकर शोर उत्पन्न करते हैं, जिससे ध्वनि-प्रदूषण उत्पन्न होता है।
  2. कारखानों की विशालकाय मशीनें, कल-पुर्जे, इंजन आदि भयंकर शोर उत्पन्न करके ध्वनिप्रदूषण के स्रोत बने हुए हैं।
  3. विभिन्न प्रकार के विस्फोटक भी ध्वनि-प्रदूषण के जन्मदाता हैं।
  4. घरों पर जोर से बजने वाले रेडियो, दूरदर्शन, कैसेट्स तथा बच्चों की चिल्ल-पौं की ध्वनि (UPBoardSolutions.com) भी प्रदूषण उत्पन्न करने के मुख्य साधन हैं।
  5. वायुयान, सुपरसोनिक विमान व अन्तरिक्ष यान भी ध्वनि-प्रदूषण फैलाते हैं।
  6. मानव एवं पशु-पक्षियों द्वारा उत्पन्न शोर भी ध्वनि-प्रदूषण का मुख्य कारण है।
  7. आँधी, तूफान तथा ज्वालामुखी के उद्गार के फलस्वरूप भी ध्वनि-प्रदूषण उत्पन्न होता है।

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नियन्त्रण के उपाय

  1. ध्वनि-प्रदूषण को नियन्त्रित करने हेतु हमें स्वयं पर ही नियन्त्रण करना सीखना होगा; जैसे कि ध्वनि विस्तारक यन्त्रों की ध्वनि को विभिन्न शुभ अवसरों पर कम-से-कम रखा जाए।
  2. सड़क पर आवागमन के दौरान अपने वाहनों के हॉर्न बहुत तीव्र ध्वनि वाले न रखें और उनका यथासम्भव कम-से-कम प्रयोग करें।
  3. कारखानों में तीव्र शोर वाली मशीनों के लिए साइलेन्सर या ऐसे ही कुछ अन्य उपाय किए जाएँ।
  4.  समय-समय पर मशीनों की मस्म्मत कराते रहना चाहिए जिससे वे अनावश्यक शोर न करें।
  5. सड़क पर खड़े करने वाले अपने वाहनों को चालू अवस्था में कदापि न छोड़े।

मानव जीवन पर प्रभाव
ध्वनि-प्रदूषण का मानव जीवन पर निम्नलिखित कुप्रभाव पड़ता है

  1. ध्वनि-प्रदूषण मानव के कानों के परदों पर, मस्तिष्क और शरीर पर इतना घातक आक्रमण करता है कि संसार के सारे वैज्ञानिक तथा डॉक्टर इससे चिन्तित हो रहे हैं।
  2. ध्वनि-प्रदूषण वायुमण्डल में अनेक समस्याएँ उत्पन्न करता है और मानव के लिए एक गम्भीर खतरा बन गया है। नोबेल पुरस्कार विजेता रॉबर्ट कोच ने कहा है कि वह दिन दूर नहीं जब आदमी को अपने स्वास्थ्य के इस सबसे बड़े नृशंस शत्रु ‘शोर’ से पूरे जी-जान से लड़ना पड़ेगा।
  3. ध्वनि-प्रदूषण के कारण व्यक्ति की नींद में बाधा उत्पन्न होती है। इससे चिड़चिड़ापन बढ़ता है तथा स्वास्थ्य खराब होने लगता है।
  4. शोर के कारण श्रवण शक्ति कम होती है। बढ़ते हुए शोर के कारण मानव समुदाय निरन्तर बहरेपन की ओर बढ़ रहा है।
  5. ध्वनि-प्रदूषण के कारण मानसिक तनाव बढ़ने से स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ता है। इससे व्यक्ति के रक्तचाप में वृद्धि हो सकती है तथा हृदय-रोग होने की आशंका बढ़ जाती है। निरन्तर अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण से व्यक्ति के सुनने की क्षमता भी समाप्त हो सकती है।
  6. ध्वनि-प्रदूषण मनुष्य के आराम में बाधक बनता जा रहा है।
    ध्वनि-प्रदूषण की समस्या दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही है। इस अदृश्य समस्या का निश्चित समाधान खोजना नितान्त आवश्यक है।
    वास्तव में जल, वायु और ध्वनि-प्रदूषण आज के सामाजिक जीवन की एक गम्भीर चुनौती हैं। यह एक अन्तर्राष्ट्रीय समस्या बनकर उभरा है। बढ़ते प्रदूषण ने मानव सभ्यता, संस्कृति तथा अस्तित्व पर प्रश्न-चिह्न लगा दिया है। भावी पीढ़ी को इस विष वृक्ष से बचाए रखने के लिए प्रदूषण का निश्चित समाधान खोजना आवश्यक है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
पर्यावरण का सामाजिक संगठन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
यह सत्य है कि पर्यावरण (प्राकृतिक पर्यावरण) सामाजिक संगठन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित नहीं करता, परन्तु पर्यावरण सामाजिक संगठन को अप्रत्यक्ष रूप से अवश्य प्रभावित करता है। इस प्रभाव को लीप्ले ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “ऐसे पहाड़ी व पठारी देशों में जहाँ खाद्यान्न की कमी होती है, वहाँ जनसंख्या की वृद्धि अभिशाप मानी जाती है और इस प्रकार की विवाह संस्थाएँ स्थापित की जाती हैं जिनसे जनसंख्या में वृद्धि न हो। जौनसार भाभर क्षेत्र (UPBoardSolutions.com) में खस जनजाति में सभी भाइयों की एक ही पत्नी होती है। इससे जनसंख्या-वृद्धि प्रभावी तरीके से नियन्त्रित होती है। विवाह की आयु, परिवार को आकार तथा प्रकार भी अप्रत्यक्ष रूप से भौगोलिक परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं। इसके विपरीत मानसूनी प्रदेश, जो कि विभिन्न सुविधाओं से सम्पन्न हैं, सदैव अधिक जनसंख्या की समस्या से घिरे रहते हैं।

प्रश्न 2:
पर्यावरण का राजनीतिक संगठन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
पर्यावरण के जनजीवन पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों के अन्तर्गत राजनीतिक संगठन पर पड़ने वाले प्रभावों का उल्लेख किया जाता है। विभिन्न अध्ययनों द्वारा स्पष्ट है कि पर्यावरण का प्रभाव राज्य तथा राजनीतिक संस्थाओं पर भी पड़ता है। प्रतिकूल पर्यावरण में जनजीवन प्रायः घुमन्तू होता है तथा इस स्थिति में स्थायी राजनीतिक संगठनों का विकास नहीं हो पाता। अनुकूल पर्यावरण आर्थिक विकास में सहायता प्रदान करता है तथा समाज की राजनीति को स्थायी रूप प्रदान करता है। इस प्रकार की परिस्थितियों में प्रजातन्त्र या साम्यवाद जैसी राजनीतिक व्यवस्थाएँ विकसित होती हैं। यही नहीं, प्राकृतिक पर्यावरण का प्रभाव सरकार के स्वरूप तथा राज्य के संगठन पर भी पड़ता है।

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प्रश्न 3:
पर्यावरण का जन-सामान्य के धार्मिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
प्राकृतिक पर्यावरण अनिवार्य रूप से जन-सामान्य के धार्मिक जीवन को प्रभावित करता है। पर्यावरण के प्रभाव को अधिक महत्त्व देने वाले विद्वानों का मत है कि प्राकृतिक शक्तियाँ धर्म के विकास को प्रभावित करती हैं। मैक्समूलर ने धर्म की उत्पत्ति का सिद्धान्त ही प्राकृतिक शक्तियों के भय से इनकी पूजा करने के रूप में प्रतिपादित किया है। विश्व के जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक प्रकोप अधिक है, वहाँ पर धर्म का विकास तथा धर्म के प्रति आस्था रखने वाले व्यक्तियों की संख्या अधिक होती है। एशिया की मानसूनी जलवायु के कारण ही यहाँ के लोग भाग्यवादी बने हैं। कृषिप्रधान देशों में इन्द्र की पूजा होना सामान्य बात है। स्पष्ट है कि धर्म विकास तथा धर्म के स्वरूप के निर्धारण में भी पर्यावरण की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

प्रश्न 4:
पर्यावरण का जनसाधारण की कलाओं पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
जन-सामान्य के जीवन में विभिन्न कलाओं का भी महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। विद्वानों का मत है कि वास्तुकला, चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, नृत्य तथा नाटकों पर भौगोलिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है। सुन्दर प्राकृतिक पर्यावरण में चित्रकारी तथा नीरस पर्यावरण में होने वाली चित्रकारी में स्पष्ट रूप से अन्तर देखा जा सकता है। वास्तव में सभी कलाकार अपनी कला के लिए विषयों का चुनाव अपने पर्यावरण से ही करते हैं। यही कारण है कि विभिन्न प्राकृतिक पर्यावरण में विकसित होने वाली कलाओं के स्वरूप में स्पष्ट अन्तर देखा जा सकता है।

प्रश्न 5:
पर्यावरण संरक्षण के लिए जनता को कैसे जागरूक किया जा सकता है? [2011, 13, 18]
उत्तर:
पर्यावरण प्रदूषण अपने आप में एक अति गम्भीर एवं विश्वव्यापी समस्या है। इस समस्या को नियन्त्रित करने के लिए पर्यावरण संरक्षण के लिए जनता को जागरूक करना अति आवश्यक है। इसके लिए व्यापक स्तर पर पर्यावरण-प्रदूषण के कारणों तथा उससे होने वाली हानियों की विस्तृत जानकारी जन-साधारण को दी जानी चाहिए। इसके लिए जन-संचार के समस्त माध्यमों (रेडियो, दूरदर्शन तथा पत्र-पत्रिकाओं आदि) को इस्तेमाल किया जाना चाहिए। (UPBoardSolutions.com) शिक्षा के क्षेत्र में प्रत्येक स्तर पर पर्यावरण-शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को पर्यावरण-संरक्षण में योगदान के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों में प्रत्येक व्यक्ति को पेड़-पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए तथा पॉलीथीन के बहिष्कार के लिए तैयार करना चाहिए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
‘पर्यावरण की एक परिभाषा लिखिए। [2013, 14, 15, 16]
या
पर्यावरण से आप क्या समझती हैं? (2010)
उत्तर:
“पर्यावरण वह है जो किसी वस्तु को चारों ओर से घेरे हुए है तथा उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है।” -जिस्बर्ट

प्रश्न 2:
पर्यावरण के कौन-कौन से वर्ग माने जाते हैं?
उत्तर:
पर्यावरण के मुख्य रूप से तीन वर्ग माने जाते हैं। इन्हें क्रमशः प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण, सामाजिक पर्यावरण तथा सांस्कृतिक पर्यावरण कहते हैं।

प्रश्न 3:
अनुकूल पर्यावरण वाले क्षेत्र में जनसंख्या का घनत्व कैसा होता है?
उत्तर:
अनुकूल पर्यावरण वाले क्षेत्र में जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है।

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प्रश्न 4:
गर्म जलवायु वाले पर्यावरण में लोगों की वेशभूषा कैसी होती है?
उत्तर:
गर्म जलवायु वाले पर्यावरण में लोगों की वेशभूषा बारीक सूती कपड़े की बनी तथा ढीली-ढाली होती है।

प्रश्न 5:
मैदानी क्षेत्रों में लोगों का आहार कैसा होता है?
उत्तर:
मैदानी क्षेत्रों में लोगों के आहार में अनाज तथा दालों एवं सब्जियों का अधिक समावेश होता है।

प्रश्न 6:
पर्यावरण-प्रदूषण किसे कहते हैं? [2007, 14, 15]
उत्तर:
पर्यावरण-प्रदूषण का अर्थ है-पर्यावरण का दूषित हो जाना। प्रकृति-प्रदत्त पर्यावरण (UPBoardSolutions.com) में जब किन्हीं तत्त्वों का अनुपात इस रूप में बदलने लगता है जिसका जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तब कहा जाता है कि पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है।

प्रश्न 7:
पर्यावरण प्रदूषित होने के कोई दो कारण लिखिए। [2011, 13]
उत्तर:
औद्योगीकरण तथा वृक्षों की अत्यधिक कटाई पर्यावरण-प्रदूषण के दो मुख्य कारण हैं।

प्रश्न 8:
वृक्षारोपण से क्या लाभ हैं? [2009, 11, 14, 16, 17, 18]
उत्तर:
वृक्षारोपण से पर्यावरण में ऑक्सीजन की मात्रा सामान्य बनी रहती है तथा वायु-प्रदूषण को नियन्त्रित करने में सहायता मिलती है।

प्रश्न 9:
वृक्ष (पेड़-पौधे) पर्यावरण (वातावरण) को कैसे शुद्ध करते हैं? [2011, 12, 13, 17, 18]
उत्तर:
वृक्ष पर्यावरण से कार्बन डाई-ऑक्साइड को ग्रहण करके तथा ऑक्सीजन विसर्जित करके पर्यावरण को शुद्ध करते हैं।

प्रश्न 10:
जल-प्रदूषण के दो कारण लिखकर उनके निवारण के उपाय लिखिए। [2011, 12, 13, 14]
उत्तर:
जल-प्रदूषण के दो मुख्य कारण माने जाते हैं (अ) औद्योगीकरण तथा (ब) नगरीकरण। इन कारणों के निवारण के लिए औद्योगीकरण अवशेषों एवं व्यर्थ पदार्थों को जल स्रोतों में मिलने से रोका जाना चाहिए तथा नगरीय कूड़े-करकट को भी जल-स्रोतों में मिलने से रोकना चाहिए।

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प्रश्न 11:
वायु-प्रदूषण से क्या तात्पर्य है? इससे क्या हानि होती है? [2015]
उत्तर:
वायु में किसी भी प्रकार की अशुद्धियों का व्याप्त हो जान्। वायु-प्रदूषण कहलाता है। वायु-प्रदूषण से श्वसन-तन्त्र के विभिन्न रोग हो जाते हैं।

प्रश्न 12:
वायु-प्रदूषण के दो कारण लिखिए। [2018]
उत्तर:
(1) नगरीकरण, औद्योगीकरण एवं अनियन्त्रित भवन-निर्माण से वायु बान्त्रत (UPBoardSolutions.com) भवन-निमोण से वायु प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो रही है।
(2) विभिन्न परिवहन साधनों (वाहनों) से निकलता धुआँ तथा कारखानों की चिमनियों से निकलता धुआँ वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी कर रहा है।

प्रश्न 13:
मिल व कारखाने वातावरण को कैसे दूषित करते हैं? [2010, 11]
या
कल-कारखानों से वातावरण कैसे प्रदूषित होता है? [2010, 11, 14, 15]
उत्तर:
मिल तथा कारखानों से निकलने वाली दूषित गैसें तथा विभिन्न व्यर्थ पदार्थ वातावरण को दूषित करते हैं। इनसे वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण तथा मृदा-प्रदूषण में वृद्धि होती है। मिल तथा कारखानों में होने वाली ध्वनियों से ध्वनि-प्रदूषण में भी वृद्धि होती है।

प्रश्न 14:
ध्वनि-प्रदूषण किसे कहते हैं? [2008, 12]
उत्तर:
वायुमण्डल में परिवहन के साधनों; कल-कारखानों, रेडियो, लाउडस्पीकरों; के शोर को ध्वनि-प्रदूषण कहते हैं।

प्रश्न 15:
वायु-प्रदूषण से फैलने वाले चार रोगों के नाम लिखिए। [2008, 12, 17]
उत्तर:
वायु-प्रदूषण से जानलेवा बीमारियाँ; जैसे-छाती और साँस की बीमारियाँ यथा ब्रॉन्काइटिस, (UPBoardSolutions.com) तपेदिक, फेफड़ों का कैन्सर, हड्डियों को विकास रुक जाना आदि; फैलती हैं।

प्रश्न 16:
पौधे कार्बन डाइऑक्साइड किस समय छोड़ते हैं? [2010]
उत्तर:
सभी पेड़-पौधे रात के समय कार्बन डाइऑक्साइड विसर्जित करते हैं।

प्रश्न 17:
ध्वनि-प्रदूषण तथा वायु-प्रदूषण में क्या अन्तर होता है? [2007]
उत्तर:
ध्वनि-प्रदूषण की दशा में पर्यावरण में शोर बढ़ जाता है जबकि वायु-प्रदूषण की दशा में वायु दूषित हो जाती है तथा उसमें हानिकारक तत्त्वों की मात्रा बढ़ जाती है।

प्रश्न 18:
मृदा-प्रदूषण का जन-जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? [2008]
उत्तर:
मृदा-प्रदूषण में होने वाली वृद्धि का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव फसलों पर पड़ता है। कृषि-उत्पादन घटते हैं। इसके अतिरिक्त प्रदूषित मिट्टी में उत्पन्न होने वाले भोज्य-पदार्थों को ग्रहण करने से हमारे स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।

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बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न:
निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. पर्यावरण में सम्मिलित हैं
(क) जड़ पदार्थ
(ख) चेतन पदार्थ
(ग) प्राकृतिक कारक
(घ) ये सभी

2. सम्पूर्ण पर्यावरण का गठन होता है
(क) प्राकृतिक पर्यावरण से
(ख) सामाजिक पर्यावरण से
(ग) सांस्कृतिक पर्यावरण से
(घ) इन सभी से

3. पर्यावरण का अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है
(क) जन-सामान्य के धार्मिक जीवन पर
(ख) जन-सामान्य की कलाओं पर
(ग) जन-सामान्य के साहित्य पर
(घ) इन सभी पर

4. आधुनिक युग की गम्भीर समस्या है
(क) बेरोजगारी
(ख) निरक्षरता
(ग) पर्यावरण-प्रदूषण
(घ) भिक्षावृत्ति

5. पर्यावरण-प्रदूषण का प्रभाव पड़ता है
(क) जन-स्वास्थ्य पर
(ख) व्यक्तिगत कार्यक्षमता पर
(ग) आर्थिक जीवन पर
(घ) इन सभी पर

6. पर्यावरण-प्रदूषण में वृद्धि करने वाले कारक हैं
(क) औद्योगीकरण
(ख) नगरीकरण
(ग) यातायात के शक्ति-चालित साधने
(घ) ये सभी

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7. पौधे वायुमण्डल का शुद्धिकरण करते हैं [2016]
या
पौधे भोजन बनाते समय वायुमण्डल का शुद्धिकरण करते हैं [2007]
(क) नाइट्रोजन द्वारा
(ख) ऑक्सीजन द्वारा
(ग) कार्बन डाइऑक्साइड द्वारा
(घ) जल द्वारा

8. प्रदूषण से बचने के लिए किस प्रकार का ईंधन उत्तम होता है? [2017]
(क) लकड़ी
(ख) कोयला
(ग) गैस
(घ) कंडी (उपला)

9. चौबीसों घण्टे ऑक्सीजन प्रदान करने वाला पौधा कौन-सा है?
(क) आम का पेड़
(ख) आँवला का पेड़
(ग) पीपल और नीम का पेड़
(घ) गुलाब का पेड़

10. वस्तु के जलने से गैस बनती है [2009, 11, 17]
(क) कार्बन डाइऑक्साइड
(ख) नाइट्रोजन
(ग) ऑक्सीजन
(घ) ओजोन

11. जल-प्रदूषण को रोकने के लिए कौन-से रासायनिक पदार्थ का प्रयोग किया जाता है?
(क) सोडियम क्लोराइड
(ख) कैल्सियम क्लोराइड
(ग) ब्लीचिंग पाउडर
(घ) पोटैशियम मेटाबोइसल्फाइट

12. ध्वनि मापक इकाई को कहते हैं
(क) कैलोरी
(ख) फारेनहाइट
(ग) डेसीबल
(घ) इनमें से कोई नहीं

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13. ध्वनि प्रदूषण का कारण है [2016, 17, 18]
(क) साइकिल
(ख) लाउडस्पीकर
(ग) रिक्शा
(घ) इनमें से सभी

14. ध्वनि प्रदूषण प्रभावित करता है। [2017]
(क) आमाशय को
(ख) वृक्क को
(ग) कान को
(घ) यकृत को

15. लाउडस्पीकर की आवाज से किस प्रकार का प्रदूषण फैलता है? [2015]
(क) वायु-प्रदूषण
(ख) ध्वनि प्रदूषण
(ग) मृदा-प्रदूषण
(घ) जल-प्रदूषण

16. प्रकृति में ऑक्सीजन का सन्तुलन बनाए रखते हैं [2008, 09, 12, 15]
(क) मनुष्य
(ख) कीट-पतंगे
(ग) वन्य-जीव
(घ) पेड़-पौधे

17. पौधों से ऑक्सीजन प्राप्त होती है [2009, 14, 15 ]
(क) रात में
(ख) सवेरे में
(ग) दिन में
(घ) शाम को

18. पौधे कार्बन डाइऑक्साइड गैस किस समय छोड़ते हैं ? [2010]
(क) दिन में
(ख) रात में
(ग) दोपहर के समय
(घ) इनमें से कोई नहीं

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19. हमारे स्वास्थ्य के लिए किस प्रकार का प्रदूषण हानिकारक है? [2011, 13, 14, 15]
(क) जल-प्रदूषण
(ख) ध्वनि प्रदूषण
(ग) वायु-प्रदूषण
(घ) ये सभी

20. पर्यावरण कहते हैं। [2013]
(क) प्रदूषण को
(ख) वातावरण को
(ग) पृथ्वी के चारों ओर के वातावरण को
(घ) इनमें से कोई नहीं

21. वायु-प्रदूषण का कारण है। [2014]
(क) औद्योगीकीकरण
(ख) वनों की अनियमित कटाई
(ग) नगरीकरण
(घ) ये सभी

22. पर्यावरण दिवस किस दिन मनाया जाता है ? [2011, 12, 13, 15, 16]
(क) 1 जून
(ख) 5 जून
(ग) 12 जून
(घ) 18 जून

23. ऑक्सीजन कहाँ से प्राप्त होती है? [2013]
(क) बन्द कमरे से
(ख) पेड़-पौधों से
(ग) नालियों से
(घ) खनिज से

24. कार्बनिक यौगिकों (वस्तुओं के जलने से कौन-सी गैस बनती है ? [2015, 16, 17]
(क) ऑक्सीजन
(ख) कार्बन डाइऑक्साइड
(ग) नाइट्रोजन
(घ) अमोनिया

25. ‘अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस’ किस दिन मनाया जाता है ? [2018]
(क) 21 जून
(ख) 20 जून
(ग) 25 जून
(घ) 28 जून

उत्तर:
1. (घ) ये सभी,
2. (घ) इन सभी से,
3. (घ) इन सभी पर,
4. (ग) पर्यावरण-प्रदूषण,
5. (घ) इन सभी पर,
6. (घ) ये सभी,
7. (ख) ऑक्सीजन द्वारा,
8. (ग) गैस,
9. (ग) पीपल और नीम का पेड़,
10. (क) कार्बन डाइऑक्साइड,
11. (ग) ब्लीचिंग पाउडर,
12. (ग) डेसीबल,
13. (ख) लाउडस्पीकर,
14. (ग) कान,
15. (ख) ध्वनि प्रदूषण,
16. (घ) पेड़-पौधे,
17. (ग) दिन में,
18. (ख) रात में,
19. (घ) ये सभी,
20. (ग) पृथ्वी के चारों ओर के वातावरण को,
21. (घ) ये सभी,
22. (ख) 5 जून,
23. (ख) पेड़-पौधों से,
24. (ख) कार्बन डाइ-ऑक्साइड,
25. (क) 21 जून

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UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 13 वस्त्रों की धुलाई तथा रख-रखाव

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 13 वस्त्रों की धुलाई तथा रख-रखाव

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
वस्त्रों की धुलाई से आप क्या समझती हैं? वस्त्रों की धुलाई की आवश्यकता भी स्पष्ट कीजिए।
या
वस्त्रों की धुलाई क्यों आवश्यक होती है? [2011,17,18]
उत्तर:
वस्त्रों की धुलाई का अर्थ

सभ्य मनुष्य के जीवन में वस्त्रों का अत्यन्त महत्त्व है। प्रत्येक व्यक्ति समय-समय पर जो वस्त्र धारण करता है, उन वस्त्रों से जहाँ एक ओर उसके शरीर को विभिन्न प्रकार की सुरक्षा प्राप्त होती है, वहीं दूसरी ओर वे वस्त्र व्यक्ति के व्यक्तित्व को (UPBoardSolutions.com) निखारने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करते हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि केवल साफ-सुथरे तथा धुले हुए वस्त्र ही उत्तम माने जाते हैं।
नियमित रूप से धारण किए जाने वाले तथा घर पर अन्य प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल होने वाले वस्त्र शीघ्र ही गन्दे एवं मैले हो जाते हैं। वस्त्रों के गन्दे एवं मैले होने में जहाँ बाहरी धूल-मिट्टी एवं गन्दगी की विशेष भूमिका होती है, वहीं वस्त्रों को धारण करने वाले व्यक्ति के शरीर से निकलने वाले पसीने का भी विशेष प्रभाव होता है। पसीने से गीले हुए वस्त्रों में बाहरी धूल-मिट्टी जम जाती है। यही नहीं पसीना वस्त्रों में ही सूखकर उन्हें दुर्गन्धयुक्त भी बनाता है। इस प्रकार विभिन्न कारणों से गन्दे एवं मैले हुए वस्त्रों को पुनः गन्दगी एवं दुर्गन्धरहित साफ-सुथरा बनाने की प्रक्रिया को ही वस्त्रों की धुलाई कहते हैं। वस्त्रों की धुलाई के अन्तर्गत विभिन्न साधनों एवं उपायों द्वारा वस्त्रों की मैल, गन्दगी, दुर्गन्ध
आदि को समाप्त किया जाता है तथा पुनः वस्त्रों को साफ-सुथरा बनाया जाता है। वस्त्रों की धुलाई के लिए जल तथा शोधक पदार्थ (साबुन, डिटर्जेण्ट आदि) आवश्यक होते हैं तथा इसके लिए वस्त्रों को मलना, रगड़ना, पीटना एवं खंगालना आदि आवश्यक उपाय होते हैं।

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वस्त्रों की धुलाई की आवश्यकता

प्रश्न उठता है कि वस्त्रों को धुलाई की आवश्यकता क्यों होती है? या यह कहा जाए कि वस्त्रों की धुलाई का उद्देश्य क्या होता है? इस विषय में निम्नलिखित तथ्यों को जानना अभीष्ट होगा

(1) वस्त्रों की सफाई के लिए:
शरीर की नियमित सफाई जिस प्रकार अति आवश्यक होती है, ठीक उसी प्रकार शरीर पर धारण करने वाले तथा अन्य प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल होने वाले वस्त्रों की भी नियमित सफाई आवश्यक होती है। शारीरिक सफाई के लिए स्नान आवश्यक होता है तथा की सफाई के लिए वस्त्रों की धुलाई को आवश्यक माना जाता है।

(2) वस्त्रों की दुर्गन्ध समाप्त करने के लिए:
कपड़ों को पहनने, बिछाने तथा ओढ़ने आदि के दौरान शरीर से निकलने वाला पसीना उनमें व्याप्त हो जाता है। इस पसीने से वस्त्रों में दुर्गन्ध आ जाती है। इस दुर्गन्ध को समाप्त करने के लिए भी वस्त्रों की धुलाई आवश्यक हो जाती है।

(3) कपड़ों की सुरक्षा के लिए:
कपड़ों की सुरक्षा के लिए भी इनकी नियमित धुलाई आवश्यक मानी जाती है। गन्दे एवं मैले वस्त्रों को विभिन्न प्रकार के कीड़ों, फफूदी तथा बैक्टीरिया आदि द्वारा नष्ट कर देने की आशंका बनी रहती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए वस्त्रों की सुरक्षा के लिए भी वस्त्रों की धुलाई को आवश्यक माना जाता है।

(4) व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए:
मैले एवं गन्दे वस्त्र व्यक्तिगत स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव डालते हैं। मैले एवं गन्दे वस्त्र निरन्तर धारण किए रहने की स्थिति में विभिन्न चर्म रोग हो जाने की आशंका रहती है। यही नहीं गन्दे वस्त्र धारण करने से व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव (UPBoardSolutions.com) पड़ सकता है। ऐसा व्यक्ति प्रायः हीन-भावना का शिकार हो जाता है। इस स्थिति में व्यक्तिगत, शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को रम्नाए रखने के लिए भी वस्त्रों की नियमित धुलाई आवश्यक मानी जाती है।

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(5) कपड़ों की सुन्दरता के लिए:
गन्दे एवं मैले वस्त्र भद्दे एवं बुरे लगते हैं। वस्त्रों को सुन्दर एवं आकर्षक बनाने के लिए उनकी नियमित धुलाई आवश्यक होती है।

(6) व्यक्तित्व के निखार के लिए:
नि:सन्देह कहा जा सकता है कि साफ-सुथरे एवं धुले हुए तथा अच्छी तरह से प्रेस किए हुए वस्त्र धारण करने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में निखार आ जाता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए भी वस्त्रों की धुलाई को आवश्यक माना जाता है।

(7) बचत के लिए:
वस्त्रों की धुलाई का एक उद्देश्य समुचित बचत करना भी होता है। वास्तव में गन्दे वस्त्र शीघ्र फट जाते हैं, जबकि नियमित रूप से धोये जाने वाले वस्त्र अधिक दिन तक ठीक बने रहते हैं। इस प्रकार कपड़ों पर होने वाले व्यय की भी बचत होती है।

प्रश्न 2:
वस्त्रों को घर पर धोने से क्या लाभ है? [2009, 10, 11]
या
वस्त्रों की धुलाई करते समय कौन-कौन सी मुख्य बातों को ध्यान में रखेंगी?
या
कपड़े धोते समय ध्यान रखने योग्य पाँच सावधानियाँ लिखिए। [2009, 11]
या
घर पर वस्त्र धोने के क्या लाभ हैं? वस्त्रों को धोने से पहले क्या-क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए? [2008, 09, 10, 11, 18]
या
वस्त्रों की घर पर धुलाई के लाभ बताइए। [2007, 09, 10, 11, 13, 14]
या
वस्त्रों को धोने से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? [2015, 16]

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उत्तर:
घर पर वस्त्र धोने से लाभ

व्यावसायिक स्तर पर कपड़ों की धुलाई का कार्य धोबियों द्वारा अथवा नगरों में स्थापित लॉण्ड्रियों द्वारा किया जाता है, परन्तु परिवार के सदस्यों के दैनिक इस्तेमाल के वस्त्रों की धुलाई का कार्य घर पर ही किया जाता है। वास्तव में घर पर वस्त्रों की धुलाई करना (UPBoardSolutions.com) अधिक सुविधाजनक एवं लाभदायक भी होता है। घर पर वस्त्रों की धुलाई के मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं

(1) समय की बचत:
धोबी अथवी लॉण्ड्री से वस्त्र धुलवाने में कई दिन का समय लगता है, जबकि स्वयं वस्त्र धोने पर उन्हें केवल कुछ घण्टों बाद ही प्रयोग में लाया जा सकता है। इस प्रकार घर पर वस्त्र धोने से समय की पर्याप्त बचत होती है।

(2) धन की बचत:
घर पर वस्त्र धोने से बहुत कम धन व्यय होता है। धोबी अथवा लॉण्ड्री की धुलाई में प्रति वस्त्र काफी धन व्यय करना पड़ता है, जबकि एक ही अच्छे साबुन अथवा डिटर्जेण्ट पाउडुर के प्रयोग से अनेक वस्त्रों की धुलाई की जा सकती है तथा धन की पर्याप्त बचत भी की जा सकती है। इसके अतिरिक्त घर पर वस्त्र धोने पर वस्त्रों की कम संख्या में ही कामे चलाया जा सकता है।

(3) वस्त्रों की आयु में वृद्धि:
वस्त्रों को धोते समय धोबी प्राय: अम्ल एवं कास्टिक सोडा अधिक मात्रा में प्रयोग करते हैं, जिससे तन्तु कमजोर हो जाने के फलस्वरूप वस्त्र शीघ्र फट जाते हैं। घर पर वस्त्रों की धुलाई ठीक प्रकार से होती है। अतः ये अधिक समय तक चलते हैं।

(4) रोगों से बचाव:
धोबी प्रायः अनेक घरों वस्त्र एकत्रित कर एक साथ उनकी धुलाई करते हैं। इस प्रकार रोगी एवं स्वस्थ मनुष्यों के वस्त्र साथ-साथ धुलते हैं। अधिकांश धोबी नगर के निकट के किसी तालाब या पोखर के पानी से कपड़े धोया करते हैं। यह पानी काफी गन्दा होता है। (UPBoardSolutions.com) इससे अनेक संक्रामक रोगों के फैलने की सम्भावना रहती है। घर पर रोगी के वस्त्र अलग से विधिपूर्वक धोए जाते हैं, जिससे रोगों से बचाव की पूर्ण सम्भावना रहती है।

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(5) अन्य लाभ:
घर पर वस्त्रों की धुलाई से होने वाले कुछ अन्य लाभ हैं|

  1. वर्षा ऋतु में कपड़े धोकर लाने में धोबी अधिक एवं अनिश्चित समय लगाता है, जबकि घर पर आवश्यक वस्त्र धोने से इस कठिनाई से बचा जा सकता है।
  2. धोबी प्रायः धोए जाने वाले वस्त्रों का स्वयं भी प्रयोग करते हैं। उनकी लापरवाही के कारण कई बार वस्त्र या तो खो जाते हैं अथवा दूसरे व्यक्तियों से बदल जाते हैं। घर पर वस्त्रों को धोने से इस प्रकार की कठिनाइयाँ नहीं होतीं।
  3. धोबी कई बार सफेद व रंगीन वस्त्रों को एक साथ धो देते हैं, जिससे सफेद वस्त्रों में रंगीन धब्बों के लगने की आशंका रहती है। घर पर वस्त्रों को धोने से इस प्रकार की आशंका से बचा जा सकता है। घर पर वस्त्र धोते समय वस्त्रों में इच्छानुसार केलफ लगाया जा सकता है।

वस्त्र धोने से पूर्व ध्यान देने योग्य बातें

वस्त्र धोने की तैयारी अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। वस्त्रों की धुलाई से पूर्व कुछ सावधानियों का पालन करने से तथा विधिपूर्वक वस्त्र धोने से न केवल वस्त्र ठीक प्रकार से धुलते हैं, बल्कि कई अन्य लाभ भी होते हैं। वस्त्रों की धुलाई से पूर्व निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. धोने से पहले वस्त्रों की जेबों को सावधानीपूर्वक देख लेना चाहिए। इससे कई बार जेबों में रखी मुद्रा अथवा महत्त्वपूर्ण कागज नष्ट होने से बच जाते हैं।
  2. वस्त्रों में लगे लोहे के बकसुए, बैचेज़, बकल एवं अन्य इस प्रकार के सामान धुलाई से पूर्व अलग कर देने चाहिए। इससे वस्त्र जंग लगने से सुरक्षित रहते हैं।
  3. फटे वस्त्रों की धुलाई से पूर्व ही मरम्मत कर लेनी चाहिए। यदि वस्त्रों के बटन आदि टूट गये हों तो उनमें भी प्रारम्भ में ही टाँके लगा देने चाहिए।
  4. वस्त्रों में यदि दाग अथवा धब्बे लगे हों, तो उन्हें धुलाई से पूर्व ही साफ करना चाहिए।
  5. रोगी के वस्त्रों को अलग करके व उन्हें उबलते पानी में कुछ समय तक डालकर (UPBoardSolutions.com) उनका नि:संक्रमण करना चाहिए। इससे अन्य व्यक्तियों में रोग फैलने की आशंका समाप्त हो जाती है।
  6. रेशमी, ऊनी व सूती वस्त्रों को अलग-अलग कर लेना चाहिए। (7) रेशमी वस्त्रों को धोते समय कास्टिक सोडे का न्यूनतम प्रयोग करना चाहिए।
  7.  रेशमी व ऊनी कपड़ों को अधिक गर्म पानी में नहीं धोना चाहिए और इन्हें अधिक कसकर नहीं निचोड़ना चाहिए।
  8. सूती वस्त्र धोते समय गर्म पानी व कास्टिक सोडे का प्रयोग किया जा सकता है। सफेद सूती वस्त्रों को धोते समय रानीपाल व नील का भी प्रयोग करते हैं। सूती वस्त्रों में इच्छानुसार कलफ भी लगाया जा सकता है।
  9. सफेद व रंगीन कपड़ों को अलग-अलग धोना चाहिए। पहले सफेद कपड़ों को तथा बाद में रंगीन कपड़ों को धोना चाहिए। इससे सफेद कपड़ों पर रंगों के धब्बे पड़ने की आशंका नहीं रहती है।

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प्रश्न 3:
रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों की धुलाई की सम्पूर्ण विधि का वर्णन कीजिए। [2007, 11, 12]
या
ऊनी वस्त्रों को धोते समय क्या-क्या सावधानियाँ रखेंगी? [2011, 12, 14, 15]
या
ऊनी वस्त्र धोने एवं सुखाने की विधि लिखिए। [2010, 12]
या
रेशमी वस्त्रों की धुलाई की विधि लिखिए। [2007, 09, 10, 11, 13, 15]
उत्तर:
रेशमी वस्त्रों की धुलाई

तीव्र क्षार, रगड़ एवं अधिक ताप के उपयोग से रेशम के तन्तु दुर्बल व बेकार हो जाते हैं। अत: मूल्यवान् रेशमी वस्त्रों की या तो ड्राइक्लीनिंग करानी चाहिए अथवा उन्हें विधिपूर्वक धोना चाहिए। रेशमी वस्त्रों को क्षारहीन साबुन से अथवा उत्तम गुणवत्ता वाले डिटर्जेण्टों से गुनगुने पानी में धोनी चाहिए। ईजी अथवा रीठों का सत रेशमी वस्त्रों को धोने के लिए प्रयुक्त करना चाहिए। सफेद एवं रंगीन रेशमी वस्त्रों को अलग-अलग धोना चाहिए।

धोने की विधि:
एक प्लास्टिक के टब अथवा बाल्टी में हल्का गर्म पानी लेकर उसमें डिटर्जेण्ट पाउडर घोलकर झाग बना लेते हैं। रीठे का प्रयोग करते समय बीज निकालकर रीठों को पानी में उबाल लेते हैं। अब इस पानी को ठण्डा कर झाग उत्पन्न कर लेते हैं। रेशमी वस्त्रों को उपर्युक्त (UPBoardSolutions.com) किसी भी प्रकार के झागदार पानी में डुबो देते हैं। अब इन्हें हाथों से हल्के-हल्के मलकर एवं दबाकर इनका मैल निकाल देते हैं। यह प्रक्रिया दो या तीन बार दोहराते हैं। अन्तिम बार हल्के रंग के वस्त्रों के लिए एक चम्मच मेथिलेटिड स्प्रिट व गहरे र के वस्त्रों के लिए एक चम्मच सिरका एक लीटर पानी में मिलाकर खंगालने से इन वस्त्रों में स्वाभाविक चमक आ जाती है।

निचोड़ना एवं सुखाना:
रेशमी वस्त्रों को या तो हल्के-हल्के दबाकर उनका पानी निकालना चाहिए अथवा तौलिये में लपेटकर निचोड़ना चाहिए। अब इन्हें सावधानीपूर्वक फैलाकर छाँव में सुखाना चाहिए। हल्के से नम रहने पर मध्यम गर्म इस्त्री से इनकी सलवटें दूर की जा सकती हैं।

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ऊनी वस्त्रों की धुलाई

धोने की विधि:
ऊनी वस्त्रों को धोने से पूर्व अच्छी प्रकार झाड़कर उनकी धूल-मिट्टी दूर कर देनी चाहिए। ऊनी वस्त्रों को रीठे के झागदार पानी अथवा पानी में डिटर्जेण्ट पाउडर डालकर रेशमी वस्त्रों के समान धोना चाहिए। रंगीन व हल्के रंगों के ऊनी वस्त्रों को अलग-अलग धोना चाहिए। ऊनी वस्त्रों को हल्के हाथों से मलकर उनका मैल दूर करना चाहिए।

खंगालना व निचोड़ना:
ऊनी वस्त्रों को धीरे से हाथ का नीचे की ओर से सहारा देकर जल से बाहर निकालना चाहिए। हल्का-सा दबाव देकर इनका शोषित जल निकाल दें। साफ जल का प्रयोग कर इस प्रक्रिया को 2-3 बार दोहराएँ जिससे कि वस्त्रों से साबुन पूर्ण रूप से दूर हो जाए। अन्तिम बार एक लीटर जल में आधा चम्मच सिरका डालने से इन वस्त्रों में स्वाभाविक चमक आ जाती है। अब हाथों से दबाकर अथवा तौलिये में लपेटकर इन्हें निचोड़ना चाहिए।

सुखाना:
ऊनी वस्त्रों को सुखाना एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। इन्हें सूती वस्त्रों के समान लटका कर नहीं सुखाना चाहिए। इससे जल के भार के कारण इनकी आकृति विकृत हो जाती है। इनको पुराने समाचार-पत्र पर इनकी आकृति के अनुसार फैला देना चाहिए। समाचार-पत्र के नीचे मोटा (UPBoardSolutions.com) तौलिया बिछाकर टॉकों अथवा पिनों की सहायता से इनकी आकृति को स्थायित्व दिया जाना चाहिए। अब इन्हें लटकाकर अथवा फैलाकर सुखाया जा सकता है। ऊनी वस्त्रों पर गीला कपड़ा फैलाकर पर्याप्त गर्म इस्त्री द्वारा प्रेस की जाती है।

प्रश्न 4:
सफेद सूती वस्त्रों की धुलाई की विधि लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 16, 17]
उत्तर:
सूती वस्त्रों की धुलाई

सूती वस्त्रों को धोते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. सफेद व रंगीन वस्त्रों को अलग-अलग कर देना चाहिए।
  2.  टूटे बटन वाले व फटे वस्त्रों की मरम्मत कर लेने चाहिए।
  3. वस्त्रों पर लगे दाग-धब्बे छुड़ा लेने चाहिए।
  4. वस्त्रं धोने की सामग्री; जैस – टब, बाल्टी, मग, साबुन, स्टार्च, नील आदि; (UPBoardSolutions.com) को सुविधाजनक स्थान पर एकत्रित कर लेना चाहिए।
  5. सूती वस्त्रों को ठण्डे गुनगुने पानी में 4-5 घण्टे तक भिगो देने से उनका मैल गल जाता है।

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धोने की विधि:
मजबूत सूती वस्त्रों पर साबुन लगाकर दबाव के साथ रगड़ा जाता है। एक बाल्टी में पानी भरकर साबुन के फ्लेक्स अथवा पाउडर घोलकर झाग उत्पन्न कर लेने चाहिए। अब सूती वस्त्रों को इसमें भिगोकर कसकर रगड़े। अधिक मैले स्थानों पर अतिरिक्त साबुन लगाकर दोबारा रगड़ना चहिए। अब इन्हें निचोड़कर 3-4 बार साफ पानी में खंगालें।

कई बार धोने पर सफेद वस्त्रों में पीलापन आने लगता है। इस प्रकार के वस्त्रों को धोने के लिए खौलते हुए पानी को प्रयोग में लाना चाहिए। एक बड़े भगौने में पानी व साबुन का घोल बनाकर वस्त्र भिगोकर उन्हें 15-20 मिनट तक उबालना चाहिए तथा वस्त्रों को लकड़ी की थपकी से चलाते रहना चाहिए। अब जल को ठण्डा होने दें। वस्त्रों को अच्छी प्रकार से रगड़कर निचोड़ लें तथा साफ पानी में 3-4 बार खंगालकर इनसे साबुन के अंश दूर करें। इस विधि द्वारा वस्त्रों का नि:संक्रमण हो जाता है। तथा चिकनाई एवं प्रोटीन के धब्बे भी दूर हो जाते हैं।

सूती वस्त्रों में धुलाई के पश्चात् नील व कलफ लगाया जाता है। इसके लिए एक टब में एक लीटर पानी लेकर उपयुक्त मात्रा में नील व कलफ (स्टार्च) घोल लिया जाता है। अब इसमें धुले वस्त्रों को भिगोकर तथा हल्के दबाव से निचोड़कर सुखा देना चाहिए। ध्यान रहे कि रंगीन कपड़ों को धूप में नहीं सुखाना चाहिए। सफेद वस्त्रों में अतिरिक्त चमक-दमक लाने के लिए रानीपाल का प्रयोग भी किया जाता है।

प्रश्न 5:
सूती वस्त्रों को कलफ क्यों लगाया जाता है? कलफ बनाने की मुख्य विधियों का वर्णन कीजिए।
या
कलफ किन-किन वस्तुओं से तैयार किया जाता है ? विस्तार से समझाइए। [2007, 08, 09, 10, 11, 16, 17, 18]
या
मैदा या अरारोट का कलफ बनाने की विधि लिखिए। [2008, 09, 10, 11, 12, 13, 15]
या
कलफ कितने प्रकार के होते हैं? रेशमी वस्त्र पर किस चीज का कलफ लगाया जाता है ? इसे बनाने की विधि बताइए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16]
या
वस्त्रों पर कलफ क्यों लगाया जाता है ? विभिन्न प्रकार के वस्त्रों पर कौन-कौन से कलफ लगाने चाहिए ? किसी प्रकार के कलफ बनाने और प्रयोग करने की विधि लिखिए। [2008, 09, 16]
या
अरारोट/चावल का कलफ बनाने की विधि लिखिए। [2011, 16]
उत्तर:
सूती वस्त्रों में कलफ

माँडी (स्टार्च) अथवा कलफ के प्रयोग से सूती वस्त्रों में कड़ापन उत्पन्न हो जाता है। कलफ धागों के मध्य के रिक्त स्थानों को भर देता है, जिससे वस्त्रों में धूल व गन्दगी आसानी से नहीं लग पाती। कलफ लगे वस्त्रों पर इस्त्री करने से उनमें झोल नहीं पड़ता तथा उनमें (UPBoardSolutions.com) चमक व नवीनता की जाती है।
कलफ बनाने की विधियाँ वस्त्रों को कलफ लगाने के लिए स्टार्च युक्त भिन्न-भिन्न पदार्थों से कलफ तैयार किया जाता है। कलफ बनाने की कुछ विधियों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

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(1) मैदा या अरारोट का कलफ:
इसे बनाने के लिए एक बड़ी चम्मच मैदा या अरारोट, तीनचौथाई चम्मच सुहागा, चौथाई चम्मच मोम लेकर ठण्डे पानी में गाढ़ा घोल तैयार करते हैं। अब धीरेधीरे गर्म पानी डालकर तथा किसी बड़े चमचे से हिलाते हुए घोल को पतला कर लेते हैं। इसके उपरान्त हल्की आँच पर इसे पका लेते हैं। पकाते समय इसे निरन्तर चलाते रहना चाहिए अन्यथा गाँठे पड़ जाने की आशंका रहती है। अच्छी तरह पक जाने पर कलफ तैयार हो जाता है।

(2) चावल का कलफ:
चावल को पीसकर महीन छलनी में छान लें। अब चावल का आटा दो चम्मच, सुहागा आधा चम्मच एवं मोम चौथाई चम्मच लेकर तथा इन्हें पानी में घोलकर धीमी आँच पर पकाकर कलफ बनाया जाता है। एक अन्य विधि में चावल बनाते समय शेष बची माँडी में सुहागा व मोम (UPBoardSolutions.com) मिलाकर भी चावल का कलफ बनाया जाता है, परन्तु यह विधि उत्तम नहीं मानी जाती है, क्योंकि इस स्थिति में खाने के लिए शेष बचे चावलों में पोषक तत्वों की न्यूनता हो जाती है। |

(3) साबूदाने का कलफ:
50 ग्राम साबूदाने को आधा लीटर पानी में भिगो दें। 10-15 मिनट बाद थोड़ा पानी डालकर उबाल लें। दानों के भली प्रकार गलकर घुल जाने पर इसे एक महीन कपड़े में छान लें तथा इसमें आधा चम्मच सुहागा मिलाकर कलफ तैयार कर लें।

(4) चोकर का कलफ:
मक्का के चोकर को चार गुने पानी में डालकर लगभग आधा घण्टे तक उबालते हैं। अब इस घोल को महीन कपड़े में छानकर प्रयोग में लाते हैं।

(5) गोंद का कलफ:
125 ग्राम गोंद को लगभग एक लीटर पानी में घोल लें। अब इसे हिलाते हुए गर्म करें। जब यह पूर्णरूप से घुल जाए, तो इसे महीन कपड़े से छान लें। अब इसमें आवश्यकतानुसार पानी मिलाकर प्रयोग में ला सकते हैं। गोंद का कलफ प्रायः ऐसे वस्त्रों में लगाया जाता है जिनमें कि अधिक शक्ति की आवश्यकता नहीं होती है। गोंद का कलफ साधारणतः रेशमी वस्त्रों, झालर तथा लेस आदि में ल्याया जाता है।

प्रश्न 6:
दाग व धब्बे छुड़ाने की प्रमुख विधियाँ कौन-कौन सी हैं? वस्त्रों पर साधारणतः पड़ने वाले दाग-धब्बों को आप किस प्रकार दूर करेंगी? [2012, 13, 15, 16]
या
धब्बे कितने प्रकार के होते हैं? किन्हीं पाँच धब्बों को छुड़ाने की विधि लिखिए। [2007, 12]
या
चाय/वार्निश और हल्दी का धब्बा कैसे छुड़ाएँगी? [2010, 11, 12, 13, 14, 16]
या
दाग-धब्बे छुड़ाने की विधियाँ लिखिए। चिकनाई व हल्दी के धब्बे आप कैसे छुड़ाएँगी? [2007, 11]
या
नेल पॉलिश और हल्दी के धब्बे छुड़ाने की विधि लिखिए। [2011]
या
किन्हीं पाँच धब्बों को छुड़ाने की विधि लिखिए। चाय और स्याही के दाग छुड़ाने की विधि लिखिए। [2007, 12, 13]
या
चाय, स्याही और हल्दी के धब्बे छुड़ाने की विधियाँ लिखिए। [2007, 08, 09, 10, 12, 16, 17, 18]
उत्तर:
दाग-धब्बे छुड़ाने की मुख्य विधियाँ

दाग-धब्बे वस्त्रों की स्वाभाविक सुन्दरता को नष्ट कर देते हैं। थोड़ी-सी भी लापरवाही से दागधब्बे वस्त्रों पर लग जाते हैं और यदि समय रहते इन्हें न छुड़ाया जाए, तो ये स्थायी बनकर रह जाते हैं। इन्हें छुड़ाने की मुख्य विधियाँ निम्नलिखित हैं|

(1) विलायकों द्वारा:
विलायकों; जैसे – कार्बन टेट्राक्लोराइड, पेट्रोल, तारपीन का तेल इत्यादि का प्रयोग कर घुलनशीन धब्बों को छुड़ाया जाता है। विलायक को ब्लॉटिंग पेपर या रुई पर लगाकर धब्बे के पीछे मल देते हैं। धब्बा विलायक में घुलकर वस्त्र से अलग हो जाता है।

(2) रासायनिक पदार्थों द्वारा:
सुहागा, ऑक्जेलिक एसिड, नींबू का रस आदि ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं जिनके तनु घोल में वस्त्र भिगोने पर उसके धब्बे दूर हो जाते हैं। विशेष प्रकार के धब्बे के लिए विशिष्ट रासायनिक पदार्थ का उपयोग किया जाता है।

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(3) अवशोषक विधि द्वारा:
इस विधि में धब्बों के ऊपर टेल्कम पाउडर, खड़िया, मैदा व नमक आदि डाले जाते हैं तथा फिर इन्हें ब्रश द्वारा झाड़ दिया जाता है। इस प्रक्रिया को कई बार दोहराने से धब्बे दूर हो जाते हैं।

वस्त्रों से विभिन्न प्रकार के धब्बे दूर करना

वस्त्रों पर प्रायः चाय, कॉफी, फलों के रस, चिकनाई, हल्दी, पेण्ट व स्याही इत्यादि के धब्बे लग जाते हैं। वस्त्रों पर लगने वाले सामान्य धब्बों को निम्नलिखित विधियों से दूर किया जा सकता है

(1) चाय के धब्बे:
ठण्डे पानी व साबुन से चाय का ताजा धब्बा सहज ही दूर हो जाता है। गर्म पानी में सुहागा घोलकर चाय के पुराने धब्बों को दूर किया जा सकता है।

(2) कॉफी व चॉकलेट के धब्बे:
सुहागा व जल के गुनगुने घोल में भिगोकर धोने से कॉफी व चॉकलेट के धब्बे दूर हो जाते हैं।

(3) दूध के धब्बे:
चिकनाई के विलायक लगाकर गुनगुने पानी से धोने पर ये सहज ही दूर हो जाते हैं।

(4) क्रीम के धब्बे:
ग्लिसरीन लगाकर तथा गुनगुने पानी में साबुन से धोकर इन धब्बों को छुड़ाया जा सकता है।

(5) पसीने के धब्बे:
सिरका अथवा अमोनिया के हल्के घोल का प्रयोग करके धब्बों को दूर करें तथा फिर साफ पानी से वस्त्र को धो दें।

(6) पान के धब्बे:
दही, कच्चा आलू, हरी मिर्च आदि से धब्बे को रगड़कर गर्म पानी व साबुन से धोने पर पान के धब्बों को दूर किया जा सकता है।

(7) रक्त के धब्बे:
सूती वस्त्र को नमक के घोल अथवा कपड़े धोने के सोडे में डुबोकर ब्रश (UPBoardSolutions.com) से रगड़ने पर रक्त के धब्बे दूर हो जाते हैं। रेशमी वस्त्रों पर जल में बने स्टार्च का पेस्ट लगाकर तथा सूखने पर ब्रश द्वारा झाड़ने से रक्त के धब्बों को दूर किया जा सकता है।

(8) अण्डे के धब्बे:
ताजे धब्बों को कास्टिक सोडे के घोल से रगड़कर दूर किया जा सकता है। पुराने धब्बों को पिसा हुआ नमक रगड़कर तथा फिर साबुन से धोकर दूर किया जा सकता है।

(9) फलों के रस के धब्बे :
सूती वस्त्रों पर लगे धब्बों को सुहागे के घोल में कुछ घण्टों तक भिगोकर दूर किया जा सकता है। रेशमी वस्त्रों पर लगे धब्बों को पहले ग्लिसरीन लगाकर र नींबू का रस लगाकर धोकर दूर किया जा सकता है।

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(10) हल्दी के धब्बे:
हल्दी के धब्बों को तुरन्त साबुन से धोएँ तथा अब हल्के पड़े धब्बों पर स्प्रिट अथवा हाइड्रोजन-पर-ऑक्साइड का प्रयोग करके इन्हें दूर किया जा सकता है।

(11) पेण्ट व वार्निश के धब्बे:
इन्हें पेट्रोल, तारपीन का तेल अथवा कार्बन टेट्राक्लोराइड जैसे विलायकों का प्रयोग कर दूर किया जा सकता है।

(12) जंग के धब्बे:
नींबू का रस एवं नमक लगाकर धोने से प्रायः ये धब्बे दूर हो जाते हैं, परन्तु ऐसा न होने पर ऑक्जेलिक एसिड लगाकर धोने से ये निश्चित रूप से दूर हो जाते हैं।

(13) स्याही के धब्बे:
मेथिलेटिड स्प्रिट में भिगोकर धोने से बॉलपेन स्याही के धब्बे दूर हो जाते हैं। गर्म दूध व नींबू का रस लगाने तथा फिर साबुन से धोने पर साधारण स्याही के धब्बों को दूर किया जा सकता है।

(14) नेल पॉलिश के धब्बे:
नेल पॉलिश को घोलने के लिए थिनर उपलब्ध होता है। रूई में थिनर लगाकर धब्बे पर रगड़ने से नेल पॉलिश का धब्बा समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 7:
वस्त्रों की सुरक्षा एवं उनके रख-रखाव के उपायों का उल्लेख कीजिए।
या
ऊनी वस्त्रों की आप सुरक्षा कैसे कर सकती हैं? [2010, 11, 14, 15, 16, 17]
उत्तर:
वस्त्रों की सुरक्षा एवं उनका रख-रखाव

मनुष्य की प्रमुख आवश्यकताओं में वस्त्र भी अपना स्थान रखते हैं। मनुष्य वस्त्रे सदैव मौसम एवं अवसर के अनुसार ही पहनता है। गर्मी में सूती एवं रेशमी वस्त्रों का प्रयोग होता है तथा शीतकाल में ऊनी वस्त्रों का प्रयोग किया जाता है। मानवकृत (कृत्रिम) तन्तुओं से निर्मित वस्त्रों का प्रत्येक ऋतु में पहनने का प्रचलन हो गया है। इसीलिए ऐसे वस्त्रों को जो केवल एक विशेष ऋतु; जैसे-ऊनी व कीमती साड़ियाँ; अथवा विशेष अवसरों पर ही प्रयोग किए जाते हैं, फफूदी एवं कीड़ों से सुरक्षा करनी चाहिए।

वस्त्रों की सुरक्षा के उपाय

  1. वस्त्रों को सीलनरहित स्थान (सन्दूक या अलमारी) में ही रखना चाहिए। डी०डी०टी० पाउडर छिड़ककर व अखबार का कागज बिछाकर ही कपड़ों को रखना चाहिए अथवा ओडोनिल या ओडोर की एक टिकिया खोलकर सन्दूक अथवा अलमारी में रख देनी चाहिए।
  2. (रखने से पहले देख लेना चाहिए कि वस्त्रों में नमी तो नहीं है।
  3. ऊनी वस्त्रों को सदैव धोकर ब्रश से साफ करके ही रखना चाहिए। कीमती वस्त्रों (UPBoardSolutions.com) को ड्राइक्लीन करके ही रखना चाहिए। धूल-मिट्टी, गन्दगी की वजह से ही ऊनी वस्त्रों में कीड़ा लगता है।
  4. ऊनी वस्त्रों को यदि अखबार के कागज में लपेटकर रखा जाए, तो उनमें कीड़ा नहीं लगता। .
  5. ऊनी वस्त्रों के सन्दूक में नीम की सूखी पत्तियाँ या नेफ्थलीन की गोलियाँ अथवा ओडोनिल की टिकिया रखने पर कीड़ा कदापि नहीं लगता है। सन्दूक अथवा अलमारी में बरसाती हवा नहीं जानी । चाहिए।
  6. ऊनी वस्त्रों को वर्षा ऋतु के उपरान्त एक-दो बार अवश्य ही तेज धूप में 3-4 घण्टे के लिए सुखाना चाहिए।
  7. जरीदार, रेशमी एवं गोटे-सल्मे के वस्त्रों को अलग से मलमल के कपड़े में बन्द करके रखना चाहिए। इनमें नैफ्थलीन की गोलियाँ कदापि न रखें।

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रख-रखाव

  1. वस्त्रों को यथासम्भव घर पर ही धोना चाहिए। इससे उनका जीवनकाल बढ़ जाता है।
  2. बनियान, अण्डरवियर अदि को प्रतिदिन धोना चाहिए।
  3. वस्त्रों को कभी भी बहुत ज्यादा गन्दा नहीं होने देना चाहिए; क्योंकि बहुत गन्दा होने पर एक वे बिल्कुल साफ नहीं होते हैं तथा धोने के लिए इन्हें काफी रगड़ना व मसलना पड़ता है, जिससे ये क्षीण हो जाते हैं।
  4. पैण्ट, कमीज, कुर्ता, साड़ी इत्यादि को यदि हैंगर पर टाँगकर सुखाएँ, तो उन पर प्रेस आसानी से हो जाती है।
  5. वस्त्रों की समय-समय पर आवश्यक मरम्मत करते रहना चाहिए। यदि कोई वस्त्र उधड़ गया हो या कट-फट गया हो, तो उसकी तुरन्त मरम्मत करनी चाहिए। वस्त्रों के टू न एवं बिगड़ी हुई जिप आदि को भी यथाशीघ्र ठीक कर लेना चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
वस्त्रों की धुलाई के सामान्य सिद्धान्त लिखिए।
उत्तर:
वस्त्रों की धुलाई को कार्य दैनिक पारिवारिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। अतः इस कार्य के व्यावहारिक पक्ष के साथ-ही-साथ सैद्धान्तिक पक्ष को जानना भी आवश्यक है। वस्त्रों की धुलाई के सैद्धान्तिक पक्ष के अन्तर्गत दो तथ्यों की जानकारी आवश्यक है। प्रथम यह कि वस्त्र कैसे गन्दे या मैले हो जाते हैं तथा दूसरा यह कि इन्हें साफ करने का क्या उपाय है? | वस्त्रों की गन्दगी के लिए दो कारक जिम्मेदार होते हैं। प्रथम है धूल या उड़ने वाली गन्दगी। इस प्रकार की गन्दगी वस्त्रों पर चिपकती नहीं है। वस्त्रों से इस प्रकार की गन्दगी को अलग करने के लिए वस्त्रों को ब्रश से अच्छी प्रकार से झाड़ा जाता है। इसके अतिरिक्त सरलता से धोये जाने वाले वस्त्रों को भली-भाँति पानी द्वारा खंगाल लेने से भी धूल-मिट्टी अलग हो जाती है। वस्त्रों को गन्दा करने वाला दूसरा कारक है-स्थिर गन्दगी यो मैल। नमी, चिकनाई या पसीने (UPBoardSolutions.com) में बाहरी धूल मिट्टी पड़ जाने पर वह चिपककर स्थिर गन्दगी या मैल का रूप धारण कर लेती है। इस प्रकार की गन्दगी को वस्त्रों से अलग करने के लिए कुछ अतिरिक्त उपाय करने पड़ते हैं। इसके लिए जिस प्रक्रिया को अपनाया जाता है, उसे ही व्यवस्थित धुलाई कहा जाता है। धुलाई के लिए जल एवं शोधक पदार्थ (साबुन आदि) की आवश्यकता होती है। शोधक पदार्थों द्वारा मैल को घोलकर वस्त्रों से अलग किया जाता है तथा बार-बार साफ पानी में खंगाल कर वस्त्रों को पूरी तरह से साफ कर लिया जाता है।

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प्रश्न 2:
सूती और रेशमी वस्त्र की धुलाई में क्या अन्तर है? [2009]
उत्तर:
सूती एवं रेशमी वस्त्रों के तन्तुओं के भौतिक एवं रासायनिक गुणों में अन्तर होने के कारण इन्हें धोने के लिए भिन्न विधियाँ अपनाई जाती हैं। सूती एवं रेशमी वस्त्रों की धुलाई की विधियों में निम्नलिखित अन्तर होते हैं

  1. तीव्र क्षार, रगड़ एवं अधिक ताप के उपयोग से रेशम के तन्तु दुर्बल एवं बेकार हो जाते हैं। अत: मूल्यवान रेशमी वस्त्रों की या तो ड्राइक्लीनिंग करानी चाहिए अथवा उन्हें विधिपूर्वक सावधानी से धोना चाहिए। इसके विपरीत सूती वस्त्रों को खौलते पानी, तीव्र क्षार एवं रगड़कर धोया जा सकता है।
  2.  रेशमी वस्त्रों को उत्तम गुणवत्ता के डिटर्जेण्टों अथवा रीठों के सत का प्रयोग कर (UPBoardSolutions.com) गुनगुने पानी में हल्के-हल्के मलकर धोना चाहिए। सूती वस्त्रों को कास्टिक सोडायुक्त साबुन लगाकर रगड़-रगड़कर ठण्डे से खौलते पानी तक में धोया जा सकता है।
  3. सूती वस्त्रों में अधिक सफेदी व चमक लाने के लिए नील व रानीपाल लगाया जाता है, जबकि रेशमी वस्त्रों पर इनका प्रयोग नहीं किया जाता।
  4. रेशमी वस्त्रों में कड़ापन उत्पन्न करने के लिए केवल गोंद का कलफ लगाया जाता है, जबकि सूती वस्त्रों में लगभग सभी प्रकार का कलफ लगाया जा सक

प्रश्न 3:
नायलॉन व टेरीलीन वस्त्रों की धुलाई किस प्रकार की जाती है?
उत्तर:
मानवकृत तन्तुओं से निर्मित इन वस्त्रों को धोने के लिए मध्यम तापक्रम के जल का उपयोग किया जाता है। कम क्षार वाले साबुन, सर्फ, जेण्टील तथा रीठों का सत आदि कृत्रिम वस्त्रों को धोने के लिए उपयुक्त रहते हैं। कृत्रिम वस्त्रों को धोते समय उन्हें बलपूर्वक रगड़ना नहीं चाहिए। इन्हें साबुन लगाकर अथवा झागयुक्त साबुन के घोल में डालकर हल्के-हल्के मलकर धोना चाहिए। अधिक मैले भाग पर अतिरिक्त साबुन लगाकर धोना चाहिए। अब वस्त्रों को 2-3 बार साफ पानी में खंगालना चाहिए।
कृत्रिम वस्त्रों को निचोड़ना नहीं चाहिए। इन्हें तौलिए में लपेटकर दबा-दबाकर इनका पानी निकालना चाहिए। अब इन्हें हैंगर पर लटकाकर सुखाना चाहिए। इस प्रकार सुखाने से इनमें सलवटें नहीं पड़ती हैं, जिससे इन पर इस्त्री करने की आवश्यकता नहीं रहती है। रंगीन वस्त्रों को धूप में नहीं सुखाना चाहिए।

प्रश्न 4:
सफेद वस्त्रों पर नील लगाने की विधि का वर्णन कीजिए। या सफेद सूती वस्त्रों में नील का प्रयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर:
सफेद वस्त्रों के पीलेपन को समाप्त करने के लिए तथा अधिक सफेदी एवं चमक लाने के लिए नील का प्रयोग किया जाता है। धुलाई के पश्चात् स्वच्छ पानी में अन्तिम खंगाल के बाद वस्त्रों को नील के घोल में डुबोकर निकाला जाता है। एक साफ कपड़े के टुकड़े में नील की पोटली बनाकर स्वच्छ पानी डालकर हिलाते हैं। इससे नील का साफ घोल बन जाता है। आजकल घुलित नील का उपयोग किया जाता है, जोकि अधिक प्रभावी रहता है। इसकी 8-10 बूंदें एक बाल्टी जल के लिए पर्याप्त रहती हैं। अब धुले हुए सफेद वस्त्रों को नील के घोल में 5-10 मिनट तक डुबोकर निकाल
ग सामान्य धूप में सुखा लिया जाता है। यदि वस्त्रों में अधिक नील लग जाए, तो तनु ऐसीटिक अम्ल का प्रयोग कर नील के रंग को कम किया जा सकता है।

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प्रश्न 5:
सूती वस्त्रों में कलफ लगाने से क्या लाभ हैं? या सफेद सूती कपड़ों में कलफ और नील का प्रयोग क्यों करते हैं? [2009, 12]
उत्तर:
सूती वस्त्रों को धोने के बाद उनमें कलफ व नील लगाकर उन्हें सुखाया जाता है। सूखने पर इन वस्त्रों पर इस्त्री की जाती है। कलफ व नील लगाने से निम्नलिखित लाभ होते है।

  1. वस्त्रों के तन्तुओं के मध्य रिक्त स्थानों की कलफ द्वारा पूर्ति हो जाने से इनमें धूल व गन्दगी प्रवेश नहीं कर पाती है।
  2. कड़ापन आ जाने से वस्त्रों में झोल नहीं पड़ता तथा क्रीज अच्छी बनती है।
  3. सुहागे, मोम वे नील से वस्त्रों में स्वाभाविक चमक आती है।
  4. वस्त्र अधिक समय तक सुन्दर व स्वच्छ रहते हैं।

प्रश्न 6:
सफेद वस्त्रों को धूप में सुखाने से क्या लाभ होता है? [2018]
उत्तर:
सफेद सूती वस्त्रों को जहाँ तक हो सके धूप में ही सुखाना चाहिए। वस्त्रों को धूप में सुखाने से निम्नलिखित लाभ होते हैं

  1. वस्त्र शीघ्र ही सूख जाते हैं।
  2. वस्त्र को धूप में सुखाने से नील एवं कलफ की गन्ध समाप्त हो जाती है।
  3. कपड़ों में व्याप्त सीलन की दुर्गन्ध समाप्त हो जाती है।
  4. धूप में वस्त्रों को सुखाने से उनका समुचित नि:संक्रमण हो जाता है अर्थात् उनमें विद्यमान रोगाणु नष्ट हो जाते हैं।
  5. सफेद सूती वस्त्र धूप में सुखाने पर अधिक सफेद तथा चमकदार हो जाते हैं।
  6. धूप में वस्त्रों को सुखाने से नील एवं कलफ के अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 7:
वस्त्रों पर इस्त्री करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखा जाता है? [2007, 15]
या
वस्त्रों पर इस्त्री करना क्यों आवश्यक है? इस्त्री करते समय क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए? [2007, 08, 09, 10, 14, 15, 16, 18]
उत्तर:
इस्त्री करके कपड़ों की सलवटें दूर कर क्रीज बनाई जाती है, जिससे कपड़े सुन्दर व आकर्षक दिखाई पड़ते हैं, परन्तु अनुपयुक्त विधि अथवा लापरवाही से इस्त्री करने पर कपड़ों की अपार क्षति की सम्भावना रहती है; अतः इस्त्री करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1.  कोयले वाली इस्त्री का खुले वातावरण अथवा पंखे के नीचे कदापि प्रयोग न करें, क्योंकि वायु द्वारा चिंगारी उड़ने से कपड़ों के जलने की सम्भावना रहती है।
  2.  विद्युत-इस्त्री को उसके निर्दिष्ट तापक्रम तक ही गर्म होने दें। विद्युत-इस्त्री प्रयोग (UPBoardSolutions.com) में लाते समय लकड़ी की कुर्सी पर बैठकर लकड़ी की मेज पर वस्त्र फैलाकर इस्त्री करें। इससे विद्युत झटकों से सुरक्षित रहा जा सकता है।
  3. इस्त्री को दाएँ से बाएँ चलाना चाहिए।
  4.  इस्त्री करने से पूर्व वस्त्रों को उनके आकार व क्रीज के अनुरूप व्यवस्थित करें।
  5. पहले कॉलर फिर कफ व झालर, तत्पश्चात् अन्य भागों पर इस्त्री करनी चाहिए।
  6. इस्त्री को वस्त्रों के अनुरूप ही गर्म करना चाहिए।

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प्रश्न 8:
सूती, रेशमी व ऊनी वस्त्रों पर इस्त्री किस प्रकार की जाती है?
या
रेशमी कपड़ों पर इस्त्री करने की विधि लिखिए। [2007, 08, 11]
या
वस्त्रों पर इस्त्री क्यों करते हैं? वस्त्रों पर इस्त्री करने की विधि लिखिए। [2008]
उत्तर:
वस्त्रों पर इस्त्री करने का एक कारण तो कपड़ों की सलवटें दूर करना व उन्हें आकर्षक बनाना है किन्तु इस्त्री करना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि धुलाई के दौरान यदि वस्त्रों में कुछ रोगाणु रह गए हों, तो वे इस्त्री की गरम सेंक से नष्ट हो जाएँ। इसके अलावा इस्त्री करने के बाद कपड़ों को सहेजकर रखने में सरलता होती है, क्योंकि तह किए हुए कपड़े फैले हुए कपड़ों की अपेक्षा कम स्थान घेरते हैं। सूती वस्त्रों को अधिक ताप, दबाव एवं नमी की आवश्यकता होती है; अतः इन वस्त्रों को पहले पानी छिड़ककर नम किया जाता है तथा इसके बाद अत्यधिक गर्म इस्त्री द्वारा अधिक दबाव डालकर इन पर प्रेस की जाती है। रेशमी वस्त्रों को (UPBoardSolutions.com) अपेक्षाकृत कम ताप, दबाव व नमी की आवश्यकता होती है। थोड़े नम रेशमी वस्त्रों को चादर बिछी मेज पर फैलाकर इनकी उल्टी सतह पर मध्यम गर्म इस्त्री की जाती है। ऊनी वस्त्रों पर मोटा व नम सूती कपड़ा बिछाकर इनकी उल्टी सतह पर मध्यम गर्म इस्त्री की जाती है। इसके अतिरिक्त ऊनी कपड़ों पर भाप की प्रेस द्वारा भी इस्त्री की जाती है।

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प्रश्न 9:
शुष्क धुलाई से क्या तात्पर्य है? शुष्क धुलाई के काम आने वाले प्रतिकर्मकों के नाम लिखिए। [2014, 16]
उत्तर:
शाब्दिक रूप से शुष्क धुलाई का अर्थ है–सुखी धुलाई, परन्तु वास्तव में यह सूखी नहीं होती वास्तव में यह धुलाई की वह विधि है जिसमें कपड़े को साफ करने के लिए जल का उपयोग बिल्कुल भी नहीं किया जाता है। जल का इस्तेमाल न होने के कारण ही इसे सूखी धुलाई कहा जाता है। वैसे इस धुलाई में अन्य गीले द्रव विलायक के रूप में अवश्य ही अपनाए जाते हैं। शुष्क धुलाई के मुख्य प्रतिकर्मक हैं–पेट्रोल, डीजल, बेन्जीन तथा कार्बन टेट्राक्लोराइड।

प्रश्न 10:
किन वस्त्रों पर शुष्क धुलाई की जाती है? शुष्क धुलाई के लाभ लिखिए। [2011, 14, 15, 16]
उत्तर:
मूल्यवान वस्त्रों तथा रेशम, ऊन व रेयॉन आदि से निर्मित वस्त्रों की शुष्क धुलाई (ड्राइ-क्लीनिंग) की जाती है। यह भी कहा जा सकता है कि पानी से धोने पर जिन वस्त्रों के खराब होने की
आशंका हो, उन्हें शुष्क धुलाई द्वारा साफ किया जाता है। इससे होने वाले लाभ निम्नलिखित हैं

  1. वस्त्रों की कोमलता, चमक व बुनाई को क्षति पहुँचने की सम्भावना अत्यधिक कम रहती है।
  2.  शुष्क धुलाई द्वारा वस्त्रों को धोने पर वे बिल्कुल भी सिकुड़ते नहीं हैं।
  3. वस्त्रों में सिकुड़न नहीं होती व उनकी स्वाभाविक आकृति भी बनी रहती है।
  4. चिकनाई के कारण वस्त्रों पर जमी धूल आदि दूर हो जाती है।

प्रश्न 11:
शुष्क धुलाई से होने वाली हानियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यह सत्य है कि शुष्क धुलाई को धुलाई की एक उत्तम विधि माना जाता है, परन्तु धुलाई की इस विधि से कुछ हानियाँ भी हैं; जैसे

  1. यह धुलाई साधारण धुलाई की तुलना में बहुत महँगी होती है, क्योंकि पेट्रोल आदि विलायक बहुत महँगे होते हैं तथा शीघ्र ही उड़ने वाले होते हैं।
  2. शुष्क धुलाई में इस्तेमाल होने वाले विलायकों में एक विशेष प्रकार की तीखी गन्ध होती है। कुछ लोगों को यह गन्ध अच्छी नहीं लगती तथा कभी-कभी इससे एलर्जी के कारण जुकाम आदि की शिकायत भी हो जाती है।
  3. शुष्क धुलाई द्वारा कपड़ों की हर प्रकार की गन्दगी को अलग नहीं किया जा सकता। इस विधि द्वारा कपड़ों से केवल उन्हीं धब्बों को हटाया जा सकता है, जो पेट्रोल आदि विलायकों में सरलता से घुल जाते हैं, परन्तु कुछ दाग-धब्बे ऐसे भी हो सकते हैं जो इन विलायकों में नहीं घुलते। इस प्रकार के दाग-धब्बों को शुष्क धुलाई द्वारा साफ नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 12:
रासायनिक पदार्थों के प्रयोग से वस्त्र का धब्बा छुड़ाते समय कौन-सी सावधानियाँ रखनी चाहिए? [2016, 18]
उत्तर:
रासायनिक पदार्थों से वस्त्रों के दाग-धब्बे छुड़ाने के लिए विशेष सावधानी से काम लेना चाहिए तथा निम्नलिखित सावधानियाँ रखनी चाहिए|

  1. रासायनिक विधि द्वारा दाग: धब्बों को छुड़ाना हो तो विशेष सावधानी से काम लेना चाहिए। सामान्य रूप से रासायनिक प्रतिकर्मकों के हल्के घोल को ही प्रयुक्त करना चाहिए। यदि हल्के घोल से धब्बे न छूटें तो क्रमशः अधिक सान्द्र घोल का प्रयोग करना चाहिए। बहुत अधिक सान्द्रित रसायनों से कपड़े खराब भी हो सकते हैं।
  2. रासायनिक प्रतिकर्मकों को अधिक समय तक कपड़ों पर नहीं लगे रहने देना चाहिए। जैसे ही धब्बा हट गया प्रतीत हो, वैसे ही रासायनिक प्रतिकर्मक से युक्त कपड़े को साफ जल से धो लेना चाहिए। इससे कपड़ों का रंग खराब नहीं होता तथा वे क्षतिग्रस्त भी नहीं होते।
  3. रासायनिक विधि से दाग: धब्बे छुड़ाते समय सदैव खुले स्थान पर बैठकर ही इन पदार्थों का प्रयोग करना चाहिए, अन्यथा इन रासायनिक पदार्थों से निकलने वाली या बनने वाली गैसों से व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
  4. अम्लीय रासायनिक पदार्थों को प्रयुक्त करने से कपड़े का रंग भी फीका पड़ जाता है। ऐसे कपड़ों को दाग-धब्बे छुड़ाकर तुरन्त अमोनिया के हल्के घोल में डाल देना चाहिए। इससे कपड़े का रंग नहीं बिगड़ता।
  5. दाग-धब्बों को हटाने वाले कुछ रासायनिक पदार्थ ज्वलनशील होते हैं; उदाहरण के लिए: पेट्रोल, ऐल्कोहल, स्पिरिट आदि। इस प्रकार के रसायनों का प्रयोग करते समय पास में कोई
    जलती हुई मोमबत्ती या अँगीठी नहीं होनी चाहिए।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
वस्त्रों की धुलाई के मुख्य उद्देश्य बताइए। [2011]
उत्तर:
वस्त्रों की सफाई, उनकी दुर्गन्ध समाप्त करना, सुरक्षा, सुन्दर बनाना, व्यक्तिगत स्वास्थ्य तथा बचत करना वस्त्रों की धुलाई के मुख्य उद्देश्य हैं।

प्रश्न 2:
वस्त्रों की धुलाई के मुख्य चरण कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
वस्त्रों की धुलाई के मुख्य चरण हैं
(1) कपड़ों को पानी में भिगोना,
(2) साबुन या कोई शोधक पदार्थ लगाना,
(3) मैल निकालना,
(4) साफ पानी में खंगालना तथा
(5) सुखाना।

प्रश्न 3:
धुलाई के काम आने वाली मुख्य वस्तुएँ बताइए। [2012]
उत्तर:
धुलाई के काम आने वाली मुख्य वस्तुएँ हैं-जल, टब, बाल्टी, मग, ब्रश, साबुन या डिटर्जेण्ट पाउडर, नील, कलफ तथा चाहें तो कपड़े धोने की मशीन।

प्रश्न 4:
सफेद कपड़ों को रंगीन कपड़ों के साथ क्यों नहीं धोना चाहिए? [2018]
उत्तर:
सफेद कपड़ों को यदि रंगीन कपड़ों के साथ धोया जाता है तो सफेद कपड़ों पर रंगीन कपड़ों का रंग लग जाने की आशंका रहती है।

प्रश्न 5:
सफेद सूती वस्त्रों का पीलापन आप कैसे दूर करेंगी? [2008, 09, 12, 13, 14]
उत्तर:
सूती वस्त्रों को साबुन के पानी में उबालने से उनकी चिकनाई व प्रोटीन के धब्बे दूर हो जाते हैं (UPBoardSolutions.com) तथा उनका पीलापन दूर हो जाता है। धोने के उपरान्त किसी अच्छे श्वेतक का प्रयोग भी किया जा सकता है। नील लगाने से भी सूती वस्त्रों की सफेदी खिल उठती है।

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प्रश्न 6:
सूती वस्त्रों को धोने के बाद उन पर की जाने वाली दो प्रक्रियाओं के बारे में लिखिए।
उत्तर:
सूती वस्त्रों को धोने के बाद मुख्य रूप से अपनाई जाने वाली प्रक्रियाएँ हैं
(1) कलफ लगाना तथा
(2) प्रेस करना। कलफ से इन कपड़ों में कड़ापन व स्वाभाविक चमक आ जाती है तथा प्रेस से सलवटें दूर हो जाती हैं और अच्छी क्रीज़ बन जाती है।

प्रश्न 7:
रंगीन वस्त्रों को धोकर धूप में क्यों नहीं सुखाना चाहिए? [2018]
उत्तर:
रंगीन वस्त्रों को धोकर धूप में सुखाने से इन वस्त्रों का रंग बिगड़ जाने की आशंका रहती है।

प्रश्न 8:
गोंद का कलफ बनाने की विधि लिखिए। [2013]
उत्तर:
गोंद को पीसकर गर्म पानी में उबाल लेते हैं। अब इसे छानकर कलफ के रूप में प्रयुक्त करते हैं।

प्रश्न 9:
गोंद का कलफ किस प्रकार के वस्त्रों को दिया जाता है? [2007, 09, 11, 12, 13, 15]
उत्तर:
गोंद का कलफ मुख्य रूप से रेशमी वस्त्रों को दिया जाता है।

प्रश्न 10:
ऊनी वस्त्रों को धोकर रस्सी पर क्यों नहीं सुखाना चाहिए? [2009, 12]
उत्तर:
ऊनी वस्त्रों को धोकर यदि रस्सी पर टाँगकर सुखाया जाए, तो उनका आकार बिगड़ जाता है तथा वे किसी एक दिशा में लटक जाते हैं।

प्रश्न 11:
ऊनी वस्त्र रखते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? [2014]
या
आप अपने ऊनी वस्त्रों को कैसे सुरक्षित रखेंगी? [2011, 14]
या
ऊनी वस्त्रों को बॉक्स में रखते समय क्या सावधानी रखनी चाहिए? [2007, 10, 18]
उत्तर:
ऊनी वस्त्रों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें
(1) सफेद कागज अथवा स्वच्छ समाचार-पत्र में लपेट देना चाहिए।
(2) नमीरहित सन्दूक या अलमारी में रखना चाहिए।
(3)नीम की सूखी पत्तियाँ एवं नेफ्थलीन की गोलियाँ (UPBoardSolutions.com) डालकर रखना चाहिए।

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प्रश्न 12:
रीठे के घोल में कौन-कौन से वस्त्र धोये जाते हैं और क्यों? [2008]
उत्तर:
रीठे के घोल में मुख्य रूप से ऊनी तथा रेशमी वस्त्र धोये जाते हैं। वास्तव में रीठे के घोल में किसी प्रकार का क्षार नहीं होता। इस स्थिति में क्षार से खराब होने वाले ऊनी एवं रेशमी वस्त्र रीठे के घोल में धोने पर खराब नहीं होते।

प्रश्न 13:
रेशमी वस्त्र में चमक लाने के लिए किस पदार्थ का प्रयोग किया जाता है? [2010]
उत्तर:
रेशमी वस्त्र में चमक लाने के लिए मेथिलेटिड स्प्रिट को इस्तेमाल किया जाता है।

प्रश्न 14:
रेशमी वस्त्र को प्रेस करते समय आप क्या सावधानी रखेंगी?
उत्तर:
रेशमी वस्त्र जब कुछ नम हों तभी प्रेस करनी चाहिए। प्रेस अधिक गर्म नहीं होनी चाहिए तथा कपड़े को उल्टा करके प्रेस करनी चाहिए।

प्रश्न 15:
किन वस्त्रों पर इस्त्री करने की विशेष आवश्यकता नहीं होती?
उत्तर:
नाइलॉन, टेरीलीन तथा ‘वाश एण्ड वीयर’ प्रकार के वस्त्रों पर इस्त्री करने की आवश्यकता नहीं होती।

प्रश्न 16:
कपड़ों को इस्त्री करना क्यों आवश्यक है? [2007, 08, 09, 10, 14, 15, 18]
उत्तर:
कपड़ों में आकर्षण, सुन्दरता तथा चमक लाने के लिए इस्त्री करना आवश्यक होता है। इस्त्री करने से कपड़े की सलवटें समाप्त हो जाती हैं।

प्रश्न 17:
कपड़ों से धब्बे छुड़ाने की मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
कपड़ों से धब्बे छुड़ाने की मुख्य विधियाँ हैं-विलायक विधि, रासायनिक विधि तथा अवशोषक विधि।

प्रश्न 18:
नींबू का प्रयोग किन धब्बों को छुड़ाने के लिए किया जाता है?
उत्तर:
नींबू के रस से स्याही, जंग तथा चाय-कॉफी के धब्बों को छुड़ाया जा सकता है।

प्रश्न 19:
धुलाई से पूर्व वस्त्रों की छंटाई करना क्यों आवश्यक है? [2014]
उत्तर:
सफेद एवं रंगीन कपड़ों को अलग-अलग धोना आवश्यक होता है ताकि सफेद वस्त्रों पर रंग न लगे। इसी प्रकार रेशमी, ऊनी तथा सूती वस्त्रों को भिन्न-भिन्न विधियों द्वारा धोना आवश्यक होता है। अतः धुलाई से पूर्व वस्त्रों की छंटाई करनी आवश्यक होता है।

प्रश्न 20:
ऊनी कपड़ों को समतल स्थान पर क्यों सुखाते हैं? [2013]
उत्तर:
ऊनी कपड़ों के आकार को बिगड़ने से बचाने के लिए समतल स्थान पर सुखाते हैं।

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प्रश्न 21:
कीड़ों तथा फफूदी से वस्त्रों की रक्षा आप किस प्रकार करेंगी? [2015, 16]
उत्तर:
वस्त्रों को कीड़ों से बचाने के लिए उन्हें सुरक्षित स्थान पर सँभालकर रखना चाहिए। ऊनी वस्त्रों को बन्द करते समय उनमें नेफ्थलीन की गोलियाँ या नीम की सूखी पत्तियाँ रखनी चाहिए। फफूदी से बचाव के लिए कपड़ों को कभी भी नम या गीली दशा में बन्द (UPBoardSolutions.com) करके नहीं रखना चाहिए। यदि अधिक समय तक बन्द रखना हो तो वस्त्रों में कलफ भी नहीं लगा होना चाहिए।

प्रश्न 22:
चिकनाई का धब्बा किस प्रकार छुड़ाया जा सकता है? [2016]
उत्तर:
चिकनाई का धब्बा छुड़ाने के लिए कपड़े को साबुन तथा गर्म पानी से धोया जाता है।

प्रश्न 23:
वस्त्रों और कालीन को धूप में सुखाना क्यों आवश्यक है? [2014, 16, 17, 18]
उत्तर:
वस्त्रों और कालीन को धूप में सुखाने से उनकी नमी एवं दुर्गन्ध समाप्त हो जाती है तथा विभिन्न जीवाणु भी मर जाते हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न
निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. धूल तथा चिकनाई मिलकर क्या बन जाती है?
(क) गन्दगी
(ख) मिट्टी
(ग) मैल
(घ) हानिकारक पदार्थ

2. नियमित धुलाई से वस्त्र
(क) साफ रहते हैं।
(ख) दुर्गन्ध रहित रहते हैं।
(ग) रोगाणुरहित रहते हैं।
(घ) ये सभी

3. वस्त्र धोने से पूर्व
(क) फटा वस्त्र सिल लेना चाहिए
(ख) शो बटन निकाल लेना चाहिए
(ग) दाग-धब्बे छुड़ा लेना चाहिए
(घ) इनमें से सभी

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4. धुलाई के लिए किस प्रकार को जल उत्तम होता है? [2008, 15, 17, 18]
(क) मृदु जल
(ख) कठोर जल
(ग) ठण्डा जल
(घ) ये सभी

5. घर पर कपड़े धोने से किसकी बचत होती है?[2010, 11, 15]
(क) समय की
(ख) धन की
(ग) साबुन की
(घ) ये सभी

6. तारकोल के दाग को छुड़ाने के लिए प्रयोग किया जाता है
(क) ब्लीचिंग पाउडर
(ख) पेट्रोल
(ग) तारपीन का तेल
(घ) साबुन

7. शुष्क धुलाई में इस्तेमाल किया जाता है
(क) सूखा पाउडर
(ख) गर्म पानी
(ग) रासायनिक विलायक
(घ) कुछ भी नहीं

8. ऊनी वस्त्रों को धोने के लिए किसका प्रयोग किया जाता है? [2011, 12, 13, 15, 16]
(क) मुल्तानी मिट्टी
(ख) रीठे का घोल
(ग) साधारण साबुन
(घ) इनमें से कोई नहीं

9. ऊनी वस्त्रों की सुरक्षा हेतु किसका प्रयोग करते हैं? [2010]
(क) आम की पत्तियाँ
(ख) गुलाब की पत्तियाँ
(ग) नीम की पत्तियाँ
(घ) पीपल की पत्तियाँ

10. ऊनी वस्त्रों को कलफ लगाया जाता है
(क) गोंद का
(ख) अरारोट का
(ग) चावल का
(घ) इनमें से कोई नहीं

11. अरारोट का कलफ किन वस्त्रों में दिया जाता है?
(क) रेशमी
(ख) ऊनी
(ग) सूती
(घ) कृत्रिम

12. चावल का कलफ किन वस्त्रों में दिया जाता है? [2009, 12, 13, 15]
(क) रेशमी
(ख) ऊनी
(ग) सूती
(घ) कृत्रिम

13. कलफ का मुख्य रूप से प्रयोग किया जाता है ।
(क) ऊनी वस्त्रों पर
(ख) रेशमी वस्त्रों पर
(ग) सूती वस्त्रों पर
(घ) कृत्रिम वस्त्रों पर

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14. रेशमी वस्त्रों में चमक के लिए प्रयोग करते हैं
(क) नींबू का रस
(ख) नमक का पानी
(ग) मेथिलेटिड स्प्रिट
(घ) कुछ नहीं

15. रेशमी वस्त्रों पर कलफ लगाया जाता है [2007, 11]
(क) गोंद का
(ख) मैदा का
(ग) अरारोट का
(घ) सभी का

16. किस प्रकार के वस्त्रों में गोंद का कलफ लगाया जाता है? [2007, 09,11,12,13]
(क) रेशमी
(ख) ऊनी
(ग) सूती
(घ) कृत्रिम

17. स्टार्च का कलफ किन वस्त्रों को दिया जाता है?
(क) रेशमी
(ख) ऊनी
(ग) सूती
(घ) बनारसी

18. नील का प्रयोग किस वस्त्र पर करते हैं? [2010, 15, 16, 17]
(क) रेशमी
(ख) ऊनी
(ग) सफेद सूती
(घ) संगीत

19. कच्चे रंग के कपड़े धोते समय पानी में मिलाया जाता है
(क) सिरको
(ख) नींबू का रस
(ग) अमोनिया
(घ) रानीपाल

20. रेशमी वस्त्रों को कैसे धोना चाहिए ? [2013]
(क) वस्त्रों को पीटकर
(ख) वस्त्रों को रगड़कर
(ग) वस्त्रों को पटककर
(घ) इनमें से कोई नहीं

21. रेशमी वस्त्रों को धोने के लिए किसका प्रयोग किया जाता है? [2014]
(क) सोडा
(ख) मिट्टी
(ग) अपमार्जक
(घ) रीठे का सत

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उत्तर:
1. (ग) मैल,
2. (घ) ये सभी
3. (घ) इनमें से सभी,
4. (क) मृदु जल,
5. (ख) धन की,
6. (ग) तारपीन का तेल,
7. (ग) रासायनिक विलायक,
8. (ख) रीठे का घोल,
9. (ग) नीम की पत्तियों,
10. (घ) इनमें से कोई नहीं,
11. (ग) सूती,
12. (ग) सूती,
13. (ग) सूती वस्त्रों पर,
14. (ग) मेथिलेटिड सिट,
15. (क) गोद का,
16. (क) रेशमी,
17. (ग) सूती,
18. (ग) सफेद सूती
19. (क) सिरका,
20. (घ) इनमें से कोई नहीं,
21. (घ) रीठे का सता

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