UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 (Section 2)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय (अनुभाग – दो)

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सर्वोच्च न्यायालय के संगठन तथा कार्यों का वर्णन कीजिए। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को अपदस्थ करने की क्या प्रक्रिया है ? [2015]
या

सर्वोच्च न्यायालय प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत किन-किन मुकदमों की सुनवाई कर सकता है? किन्हीं दो प्रकार के मुकदमों का वर्णन कीजिए। [2014]
              या
भारत के उच्चतम न्यायालय की शक्तियों एवं कार्यों का वर्णन कीजिए। [2012, 14]
              या
सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का रक्षक क्यों कहा जाता है ? [2010]
              या
सर्वोच्च न्यायालय किस प्रकार के मुकदमों की सीधी सुनवाई कर सकता है? इसे संविधान का संरक्षक क्यों कहा जाता है? [2015]
              या
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के संगठन पर प्रकाश डालिए। [2015]
              या
सर्वोच्च न्यायालय के संगठन पर एक विस्तृत टिप्पणी लिखिए। [2010, 11]
              या
सर्वोच्च न्यायालय क्षेत्राधिकार में आने वाले किन्हीं दो बिन्दुओं का वर्णन कीजिए। [2009]
              या
सर्वोच्च न्यायालय नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा किस प्रकार करता है? [2010]
              या
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य कार्य क्या हैं? [2010]
              या
अभिलेख न्यायालय के रूप में उच्चतम न्यायालय के क्या अधिकार हैं? स्पष्ट कीजिए। [2009]
              या
अभिलेख न्यायालय पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [2009]
              या
सर्वोच्च न्यायालय के प्रारम्भिक एवं अपीलीय क्षेत्राधिकार का वर्णन कीजिए। [2017]
              या
भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति कौन करता है? उसकी दो अर्हताएँ लिखिए। [2018]
उत्तर :
संरचना अथवा संगठन- संविधान की धारा 224 के अनुसार, भारतीय संघ में एक सर्वोच्च न्यायालय होगा। सर्वोच्च न्यायालय का संगठन इन सन्दर्भो में समझा जा सकता है। मूल संविधान में सर्वोच्च न्यायालय के लिए एक मुख्य न्यायाधीश तथा 7 अन्य न्यायाधीशों की व्यवस्था की गयी थी। सन् 2008 से संसद ने न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर 31 कर दी है। अब सर्वोच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और 30 अन्य न्यायाधीश  हैं। मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते समय सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के उन न्यायाधीशों से (UPBoardSolutions.com) परामर्श करता है, जिन्हें वह आवश्यक समझे। सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के समय राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश से मन्त्रणा कर लेता है। संवैधानिक अध्यक्ष होने के कारण राष्ट्रपति मन्त्रिपरिषद् के परामर्श से ही नियुक्तियाँ करता है। तदर्थ न्यायाधीश की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति की स्वीकृति से करता है। सर्वोच्च न्यायालय भारत की राजधानी दिल्ली में स्थित है। वर्तमान में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री दीपक मिश्रा हैं।

न्यायाधीशों की योग्यताएँ– संविधान द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की निम्नलिखित योग्यताएँ (अर्हताएँ) निश्चित की गयी हैं

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • उसकी आयु 65 वर्ष से कम हो।
  • वह किसी उच्च न्यायालय में या ऐसे दो अथवा दो से अधिक न्यायालयों में लगातार 5 वर्ष तक । न्यायाधीश रह चुका हो।
  • वह किसी उच्च न्यायालय में अथवा अन्य न्यायालयों में लगातार 10 वर्ष तक अधिवक्ता (एडवोकेट) रह चुका हो।
  • राष्ट्रपति के मत से वह कोई पारंगत एवं प्रतिष्ठित विधिवेत्ता रहा हो।

शपथ-ग्रहण- न्यायाधीश को पद पर आसीन होने से पहले राष्ट्रपति के समक्ष संविधान के प्रति निष्ठा एवं निष्पक्ष रूप से कार्य करने की शपथ लेनी पड़ती है।

वेतन और भत्ते- सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को १ 2,80,000 मासिक वेतन तथा अन्य न्यायाधीशों को १ 2,50,000 मासिक वेतन मिलता है। इसके अतिरिक्त उन्हें नि:शुल्क आवास तथा यात्रा-भत्ता मिलता है। इनके वेतन-भत्ते भारत की संचित निधि से दिये जाते हैं। ये वेतन-भत्ते संसद द्वारा निश्चित किये जाते हैं। इनके कार्यकाल में ये घटाये नहीं जा सकते। सेवानिवृत्त होने पर मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों को वार्षिक पेंशन प्राप्त होती है। इन सभी सुविधाओं के उपरान्त उन पर एक प्रतिबन्ध यह है। कि वे सेवानिवृत्त होने के पश्चात् किसी न्यायालय में वकालत नहीं कर सकते। यदि राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश को न्याय से सम्बन्धित कोई विशेष कार्य सौंपता है तो उस कार्य के लिए न्यायाधीश को पारिश्रमिक प्रदान किया जाता है।

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कार्यकाल तथा महाभियोग- सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की अवधि तक अपने पद पर कार्य करते हैं। पैंसठ वर्ष की आयु पूर्ण होने पर उन्हें सेवानिवृत्त कर दिया जाता है। इस अवधि से पूर्व वे स्वेच्छा से त्याग-पत्र दे सकते हैं अथवा संसद महाभियोग लगाकर उन्हें पदच्युत कर सकती है। न्यायाधीशों को अयोग्यता तथा कदाचार के आधार पर भी पदच्युत किया जा सकता है। इसके लिए व्यवस्था की गयी है। कि संसद के दोनों सदनों के उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत और समस्त संख्या के बहुमत से उक्त न्यायाधीश पर कदाचार अथवा असमर्थता का आरोप लगाकर (UPBoardSolutions.com) राष्ट्रपति के पास विचारार्थ भेजें और राष्ट्रपति उस प्रस्ताव पर अपने हस्ताक्षर कर दे। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि महाभियोग का प्रस्ताव संसद के एक ही सत्र में स्वीकृत हो जाना चाहिए। सम्बन्धित न्यायाधीश को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का पूर्ण अवसर दिया जाता है।

अभिलेख न्यायालय- उच्चतम न्यायालय को अभिलेख न्यायालय इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उच्चतम न्यायालय अभिलेख (रिकॉर्ड) न्यायालय के रूप में भी कार्य करता है। अभिलेख न्यायालय का अर्थ यह है कि न्यायालय के समस्त निर्णयों को अभिलेख के रूप में सुरक्षित रखा जाता है। इन अभिलेखों को भविष्य में किसी भी न्यायालय के निर्णय, अन्य अधीनस्थ न्यायालयों में आवश्यकता पड़ने पर नजीर (केस लॉ) के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

भारत के उच्चतम या सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार/कार्य

भारत के सर्वोच्च या उच्चतम न्यायालय को व्यापक क्षेत्राधिकार प्राप्त हैं। इसके क्षेत्राधिकार का अध्ययन चार रूपों में किया जा सकता है–

  1. प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार,
  2. अपीलीय क्षेत्राधिकार,
  3. परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार तथा
  4. अन्य अधिकार।

1. प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार- कुछ विवाद ऐसे होते हैं जिन्हें केवल उच्चतम न्यायालय को ही सुनने तथा सुलझाने का अधिकार होता है। ये विवाद निम्नलिखित प्रकार के होते हैं

  • जब कोई विवाद भारत सरकार और एक या एक से अधिक राज्यों के बीच हो।
  • जब किसी विवाद में एक ओर भारत सरकार और एक या एक से अधिक राज्य सरकारें हों तथा दूसरी ओर एक अथवा अधिक राज्य सरकारें हों।
  • जब विवाद दो या दो से अधिक राज्यों के मध्य हो।
  • जब विवाद राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से सम्बन्धित हो।

2. अपीलीय क्षेत्राधिकार- सर्वोच्च न्यायालय को राज्यों के उच्च न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार प्राप्त है। सर्वोच्च न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार को अग्रलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है

  1. संवैधानिक अपीलें- संविधान के अनुच्छेद 132 के अनुसार, जब कोई उच्च न्यायालय किसी मुकदमे के सम्बन्ध में यह प्रमाण-पत्र दे देता है कि उसमें संविधान की किसी धारा की व्याख्या का प्रश्न निहित है तो उस मुकदमे की अपील उच्चतम न्यायालय में होती है। यदि उच्च न्यायालय प्रमाण-पत्र नहीं देता है तो उच्चतम न्यायालय स्वयं भी ऐसे मामलों में अपील की आज्ञा दे सकता
  2. दीवानी अपीलें- उच्च न्यायालय के प्रमाण-पत्र देने पर किसी भी दीवानी मुकदमे की अपील सर्वोच्च न्यायालय में की जा सकती है।
  3. फौजदारी की अपीलें- निम्नलिखित स्थितियों में फौजदारी मुकदमों की अपीलें उच्चतम न्यायालय में की जा सकती हैं
  • जब उच्च न्यायालय ने किसी मुकदमे को अपने अधीन न्यायालय से मँगवाकर अपराधी को मृत्यु-दण्ड दे दिया हो।
  • यदि किसी अपराधी को उच्च न्यायालय ने अपने (UPBoardSolutions.com) अधीन न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध मृत्यु दण्ड दे दिया हो।
  • ऐसे मुकदमों की अपील उच्चतम न्यायालय में की जा सकती है जिनके सम्बन्ध में उच्च न्यायालय इस आशय का प्रमाण-पत्र दे दे कि वह उच्चतम न्यायालय में सुनने योग्य है।
  • यदि सर्वोच्च न्यायालय किसी मुकदमे में यह अनुभव करता है कि किसी व्यक्ति के साथ वास्तव में अन्याय हुआ है तो वह सैनिक न्यायालयों के अतिरिक्त किसी भी न्यायाधिकरण के विरुद्ध अपील करने की आज्ञा प्रदान कर सकता है।

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सर्वोच्च न्यायालय भारत के किसी भी उच्च न्यायालय या न्यायाधिकरण के निर्णय, दण्ड या आदेश के विरुद्ध संरक्षण प्रदान कर सकता है, चाहे भले ही उच्च न्यायालय ने अपील की आज्ञा से इन्कार ही क्यों न किया हो।

3. परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार-अनुच्छेद 143 –
के अन्तर्गत, राष्ट्रपति द्वारा किसी कानूनी प्रश्न या विषय पर परामर्श माँगने पर सर्वोच्च न्यायालय उसे परामर्श देता है, किन्तु राष्ट्रपति ऐसे किसी भी परामर्श को मानने के लिए बाध्य नहीं है।

4. अन्य अधिकार :

  • मूल अधिकारों की रक्षा- अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किये गये मौलिक अधिकारों की रक्षा का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को सौंपा गया है। इसके लिए वह आदेश, निर्देश तथा लेख (Writs) जारी करता है।
  • संविधान की रक्षा एवं व्याख्या- सर्वोच्च न्यायालय संसद द्वारा पारित ऐसे कानूनों को अवैध घोषित कर सकता है, जो संविधान की किसी व्यवस्था के विरुद्ध हैं। संविधान की व्याख्या करने | का अन्तिम अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को ही प्राप्त है।
  • अधीनस्थ न्यायालयों पर नियन्त्रण- सर्वोच्च न्यायालय को अधीनस्थ न्यायालयों के कार्यों की देखभाल करने तथा उन पर नियन्त्रण रखने का अधिकार होता है। यह अधीनस्थ न्यायालय से किसी मुकदमे को मॅगाकर उस पर विचार कर सकता है। यह अधीनस्थ न्यायालयों के नियमों का निर्माण भी करता है।
  • पुनर्विचार का अधिकार– भारत के सर्वोच्च न्यायालय को अपने निर्णय के पुनरावलोकन करने का भी अधिकार प्राप्त है। यदि ऐसा अनुभव हो कि उच्चतम न्यायालय निर्णय में कोई भूल कर बैठा है या उसके निर्णय में कोई कमी रह गयी है तो उस विवाद पर फिर से विचार करने की प्रार्थना की जा सकती है। इस अधिकार के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पहले निर्णयों को बदलकर अनेक बार निर्णय दिये हैं।

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प्रश्न 2.
उच्च न्यायालय के संगठन और शक्तियों का वर्णन कीजिए। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की योग्यता, वेतन, भत्ते तथा सेवा शर्त पर प्रकाश डालिए। [2011, 18]
              या
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यताएँ क्या हैं? उनके अधिकार-क्षेत्रों का वर्णन कीजिए। [2012]
              या
उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए निर्धारित योग्यताओं का उल्लेख कीजिए। [2013]
              या
राज्यों के उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति कौन करता है? इन न्यायालयों के न्यायाधीशों का कार्यकाल कितना होता है? [2010, 11]
              या
उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए निर्धारित कोई तीन योग्यताएँ लिखिए। [2015]
              या
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए निर्धारित अर्हताएँ क्या हैं? उनका कार्यकाल कितना |
              या
होता है? उनका प्रारम्भिक और अपीलीय कार्य क्षेत्र क्या है? [2016]
उत्तर :

उच्च न्यायालय का संगठन

न्यायाधीशों की संख्या– संविधान के अनुसार न्यायाधीशों की संख्या निश्चित नहीं है। यह समय-समय पर बदलती रहती है। राष्ट्रपति इनकी संख्या राज्य के क्षेत्रफल, जनसंख्या तथा कार्यभार के आधार पर निश्चित करता है। उत्तर प्रदेश के उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश है तथा 160 पद न्यायाधीशों के लिए सृजित हैं। वर्तमान समय में 81 न्यायाधीश कार्यरत हैं। अन्य न्यायाधीश हैं, जिनमें 67 स्थायी तथा 14 अस्थायी हैं। राष्ट्रपति अतिरिक्त व अवकाश-प्राप्त न्यायाधीशों की भी नियुक्ति कर सकता है।

न्यायाधीशों की योग्यताएँ– राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए आवश्यक है कि वह भारत का नागरिक हो। वह भारत के किसी भी न्यायालय में कम-से-कम 10 वर्षों तक न्यायाधीश के पद पर कार्य कर चुका हो अथवा भारत के किसी एक या अधिक उच्च न्यायालयों में 10 वर्षों तक लगातार अधिवक्ता रह चुका हो अथवा राष्ट्रपति की दृष्टि में विधिशास्त्र का उच्चकोटि का विद्वान हो तथा उसकी आयु 62 वर्ष से कम हो।

न्यायाधीशों की नियुक्ति– उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। ऊपर उल्लिखित योग्यता वाले किसी व्यक्ति की नियुक्ति उस प्रदेश के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा (UPBoardSolutions.com) न्यायाधीश के पद पर की जा सकती है, परन्तु उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में राष्ट्रपति भारत के उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं उस राज्य के राज्यपाल से परामर्श लेता है।

न्यायाधीशों की शपथ- नियुक्ति के उपरान्त न्यायाधीशों को अपने पद पर निष्ठापूर्वक कार्य करने की शपथ लेनी पड़ती है। कर्तव्यों के परिपालन में योग्यता, निष्पक्षता एवं न्यायप्रियता के प्रति उनको सत्यव्रती एवं निष्ठावान् होना पड़ता है।

वेतन एवं भत्ते- उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को 2,50,000 मासिक वेतन तथा अन्य न्यायाधीशों को १ 2,25,000 मासिक वेतन मिलता है। इसके अतिरिक्त इन्हें मासिक भत्ते तथा प्रत्येक न्यायाधीश को नि:शुल्क निवासस्थान, यात्रा सम्बन्धी सुविधाएँ, सवेतन छुट्टियाँ और अवकाश ग्रहण करने पर पेंशन प्राप्त होती है। किसी न्यायाधीश के कार्यकाल में उसके वेतन, भत्तों आदि की कटौती नहीं की जा सकती है। कार्यकाल-साधारणत: प्रत्येक न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक अपने पद पर कार्य करता रहता है। यदि वह चाहे तो समय से पूर्व भी अपने पद से त्याग-पत्र दे सकता है। इसके अतिरिक्त यदि किसी न्यायाधीश पर भ्रष्टाचार अथवा अयोग्यता का आरोप लगाया जाए तो वह संसद द्वारा पारित एवं राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव द्वारा पदच्युत किया जा सकता है। राष्ट्रपति उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का स्थानान्तरण भारत के किसी भी उच्च न्यायालय में कर सकता है। यह कार्य वह उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से करता है।

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उच्च न्यायालय की शक्तियाँ/कार्य

उच्च न्यायालय को अग्रलिखित शक्तियाँ प्राप्त हैं–
1. न्याय-सम्बन्धी अधिकार- इस अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत उच्च न्यायालय को अग्रलिखित शक्तियाँ प्राप्त हैं

  • प्रारम्भिक अधिकार-उच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों की रक्षा, वसीयत, विवाह| विच्छेद, विवाह-विधि, कम्पनी कानून, उच्च न्यायालय की अवमानना आदि के मुकदमे सुनने का अधिकार प्राप्त है।
  • अपील-सम्बन्धी अधिकार-उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध दीवानी, फौजदारी तथा माल के मुकदमों की अपीलें सुनता है। आयकर, बिक्रीकर तथा अन्य करों से सम्बन्धित अपीलें भी इसी न्यायालय में की जाती हैं।
  • मौलिक अधिकारों की रक्षा-उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है। इस उद्देश्य के लिए वह बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा तथा उत्प्रेक्षण लेख जारी कर सकता है।
  • संविधान की रक्षा एवं व्याख्या-उच्च न्यायालय को संविधान की रक्षा तथा व्यवस्था करने का भी अधिकार प्राप्त है। यदि विधानमण्डल संविधान की किसी धारा के विरुद्ध कोई कानून पारित करता है तो उच्च न्यायालय उसे अवैध घोषित (UPBoardSolutions.com) कर सकता है।
  • मृत्यु-दण्ड की स्वीकृति-सत्र न्यायाधीश किसी व्यक्ति को तब तक मृत्यु-दण्ड नहीं दे सकता, जब तक वह उच्च न्यायालय से इसकी पूर्व स्वीकृति प्राप्त नहीं कर लेता है।
  • अभिलेख न्यायालय का कार्य-उच्च न्यायालय अपने निर्णयों को प्रकाशित करवाता है, जो अधीनस्थ न्यायालयों में मान्य होते हैं। न्यायालय अपनी मान-हानि के लिए भी दण्ड दे सकता है।

2. प्रबन्ध-सम्बन्धी अधिकार- उच्च न्यायालय को अधीनस्थ न्यायालयों के प्रबन्ध एवं देखभाल करने का भी अधिकार प्राप्त है। वह अपने अधीन किसी भी न्यायालय के किसी भी मुकदमे के कागजात मँगवाकर देख सकता है। न्यायालयों की कार्य-पद्धति एवं रिकॉर्ड रखने सम्बन्धी नियम बना सकता है। उच्च न्यायालय मुकदमे को एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय में स्थानान्तरित कर सकता है। उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालयों के अधिकारियों की सेवा-शर्तों को निर्धारित करता है।

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प्रश्न 3.
उत्तर प्रदेश की न्याय-व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
उत्तर प्रदेश की न्याय-व्यवस्था उत्तर प्रदेश में भी अन्य राज्यों की भाँति ही स्वतन्त्र न्यायपालिका की व्यवस्था की गयी है। यहाँ के जिला न्यायालय उच्च न्यायालय की अधीनता एवं संरक्षणता में कार्य करते हैं। उत्तर प्रदेश की न्याय व्यवस्था का स्वरूप निम्नलिखित है

1. उच्च न्यायालये- 
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद नगर में उच्च न्यायालय की स्थापना की गयी है। यह राज्य का सबसे बड़ा न्यायालय है। संविधान के अनुसार न्यायाधीशों की संख्या निश्चित नहीं है। यह समय-समय पर बदलती रहती है। राष्ट्रपति इनकी संख्या राज्य के क्षेत्रफल, जनसंख्या तथा कार्यभार के आधार पर निश्चित करता है। उत्तर प्रदेश के उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश है तथा 160 पद न्यायाधीशों के लिए सृजित हैं। वर्तमान समय में 81 न्यायाधीश कार्यरत हैं। अन्य न्यायाधीश हैं, जिनमें 67 स्थायी तथा 14 अस्थायी हैं। राष्ट्रपति अतिरिक्त व अवकाश-प्राप्त न्यायाधीशों की भी नियुक्ति कर सकता है। (UPBoardSolutions.com) यह न्यायालय न्याय की व्यवस्था करता है; अतः राज्य में न्याय के क्षेत्र में इसे महत्त्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हैं। संविधान की व्याख्या, मूल अधिकारों की रक्षा, अभिलेख आदि के साथ-साथ यह प्रशासन का भी कार्य करता है। उच्च न्यायालय के अधीन प्रत्येक जिले में तीन प्रकार के न्यायालय-दीवानी, फौजदारी, राजस्व कार्यरत हैं।

2. जनपदीय न्यायालय– 
जिले की न्याय-व्यवस्था के लिए उच्च न्यायालय के संरक्षण में निम्नलिखित न्यायालयों की व्यवस्था की गयी है

  • दीवानी न्यायालय-धनराशि, चल तथा अचल सम्पत्ति से सम्बन्धित मुकदमों के निपटारों के
    लिए दीवानी न्यायालयों की व्यवस्था प्रत्येक जिले में की गयी है। यह न्यायालय नीचे के दीवानी न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध अपीलें भी सुनता है। जिले में दीवानी का सबसे बड़ा न्यायालय जिला न्यायाधीश का न्यायालय होता है। इसके पश्चात् एक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश होता है। इसके निर्णयों की अपील उच्च न्यायालय में ही की जा सकती है। सिविल जज दीवानी के मामलों में जिला न्यायाधीश के नीचे का न्यायाधीश होता है। सिविल जज न्यायाधीश) के नीचे मुन्सिफ का न्यायालय होता है। मुन्सिफ के न्यायालय के नीचे खफीफा का न्यायालय होता है। दीवानी न्यायालयों में सबसे निचले स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों में न्याय पंचायतें होती हैं। इनके (न्याय पंचायत) निर्णय के विरुद्ध अपील नहीं की जा सकती है।
  • फौजदारी न्यायालय-लड़ाई-झगड़े, हत्या, मारपीट आदि के मुकदमों की सुनवाई के लिए प्रत्येक जिले में एक फौजदारी न्यायालय होता है। जिले में फौजदारी का सबसे बड़ा न्यायालय सत्र न्यायाधीश का न्यायालय होता है। ये मृत्यु-दण्ड या आजीवन कारावास का दण्ड देने का अधिकार रखते हैं। ये न्यायालय निचले स्तर के न्यायालयों के निर्णयों की अपील सुनते हैं। सत्र न्यायालय तथा अतिरिक्त सत्र न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध उच्च न्यायालय में ही अपील की जा सकती है। सत्र न्यायाधीश या सेशन जज जब दीवानी के मुकदमे सुनता है तब उसे जिला जज कहते हैं। इसके अतिरिक्त जिले में सहायक सत्र न्यायाधीश, चीफ जुडीशियल मजिस्ट्रेट प्रथम, द्वितीय व तृतीय श्रेणी के भी न्यायालय होते हैं। जिले में न्याय की सबसे छोटी इकाई न्याय पंचायत होती है। ये जुर्माना तो कर सकती हैं, लेकिन कारावास का दण्ड नहीं दे सकतीं। |
  • राजस्व न्यायालय–जिले में राजस्व का सबसे बड़ा न्यायालय जिलाधीश का न्यायालय होता है। (UPBoardSolutions.com) इसके नीचे उपजिलाधीश, तहसीलदार तथा नायब तहसीलदार के न्यायालय होते हैं। ये न्यायालय भूमि तथा लगान से सम्बन्धित मुकदमों की सुनवाई करते हैं।

उपर्युक्त न्यायालयों के अतिरिक्त कुछ विशेष मुकदमों का फैसला विशेष न्यायालयों में होता है; जैसे-आयकर सम्बन्धी मुकदमों का फैसला आयकर अधिकारी ही कर सकता है। उसके निर्णय के विरुद्ध आयकर आयुक्त और आयकर अधिकरण में अपील की जा सकती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सर्वोच्च न्यायालय के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सर्वोच्च न्यायालय की स्थिति निम्नलिखित कारणों से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है– ..

  • इस न्यायालय के कारण कार्यपालिका की तानाशाही नहीं चल सकती।
  • यह न्यायालय संविधान का रक्षक है।
  • इस न्यायालय द्वारा नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा होती है।
  • यह न्यायालय संसद तथा कार्यपालिका से स्वतन्त्र रहने के कारण दोनों पर नियन्त्रण रखता है।

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प्रश्न 2.
न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review) से क्या तात्पर्य है ? यह शक्ति किसे प्रदान की गयी है ? [2010]
उत्तर :
संविधान के अनुच्छेद 137 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय को यह अधिकार प्राप्त है कि वह स्वयं द्वारा दिये गये आदेश या निर्णय पर पुनर्विचार कर उचित समझे तो उसमें आवश्यक परिवर्तन कर सके। ऐसा उस समय किया जाता है जब सर्वोच्च न्यायालय को यह सन्देह हो कि उसके द्वारा दिये गये निर्णय में किसी पक्ष के प्रति न्याय नहीं हो सका है। यदि उसके सम्बन्ध में कोई नवीन तथ्य प्रकाश में आये हों, तब भी ऐसा किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान में सर्वोच्च न्यायालय की स्वतन्त्रता सुनिश्चित करने हेतु अपनाये गये किन्हीं तीन उपायों का उल्लेख कीजिए। (2015)
उत्तर : सर्वोच्च न्यायालय की स्वतन्त्रता के लिए निम्न प्रावधान किये गये हैं|

  • न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक् रखा गया है। इसके लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार राष्ट्रपति को दिया गया है, लेकिन पदच्युति का अधिकार अकेले राष्ट्रपति को नहीं संसद को भी दिया गया है। संसद द्वारा प्रस्ताव पास करने के बाद ही राष्ट्रपति न्यायाधीश को हटा सकता है।
  • पर्याप्त वेतन की व्यवस्था की गयी है। उनके कार्यकाल में उनके वेतन कम नहीं किये जा सकते हैं।
  • उनके पद की सुरक्षा की व्यवस्था की गयी है। न्यायाधीश (UPBoardSolutions.com) अवकाश ग्रहण करने की आयु तक अपने पद पर कार्य कर सकते हैं। केवल महाभियोग की कठिन प्रक्रिया द्वारा उन्हें हटाया जा सकता है।
  • सेवानिवृत्ति के बाद न्यायाधीश किसी न्यायालय में वकालत नहीं कर सकते।
  • सर्वोच्च न्यायालय को अपने तथा अपने अधीनस्थ न्यायालयों की कार्य प्रणाली को निर्धारित करने के | लिए नियम बनाने का अधिकार है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु क्या है ? [2011]
उत्तर :
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष है।

प्रश्न 2.
सर्वोच्च न्यायालय कहाँ स्थित है ?
उत्तर :
भारत का सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में स्थित है।

प्रश्न 3.
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीशों का वेतन लिखिए।
उतर :
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का वेतन १ 2,80,000 प्रतिमाह तथा अन्य न्यायाधीशों का वेतन १ 2,50,000 प्रतिमाह है।

प्रश्न 4.
सर्वोच्च न्यायालय के कोई दो कार्य अथवा अधिकार लिखिए।
उत्तर :
सर्वोच्च न्यायालय के दो कार्य अथवा अधिकार हैं

  • मूल अधिकारों की रक्षा करना तथा
  • संविधान की व्याख्या करना।

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प्रश्न 5.
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति कौन करता है ?
उत्तर :
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की (UPBoardSolutions.com) नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश से मन्त्रणा लेकर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

प्रश्न 6.
उत्तराखण्ड की राजधानी एवं उच्च न्यायालय कहाँ पर स्थित हैं ?
उत्तर :
उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून तथा उच्च न्यायालय नैनीताल में स्थित है।

प्रश्न 7.
राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति किस प्रकार होती है ?
उत्तर :
राष्ट्रपति उसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह से अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है।

प्रश्न 8.
इलाहाबाद के उच्च न्यायालय की खण्डपीठ कहाँ पर स्थित हैं ?
              या
उत्तर प्रदेश का उच्च न्यायालय कहाँ स्थित है ?
उत्तर :
उत्तर प्रदेश का उच्च न्यायालय इलाहाबाद में स्थित है तथा इलाहाबाद के उच्च न्यायालय की खण्डपीठ (शाखा) लखनऊ में स्थित है।

प्रश्न 9.
उच्च न्यायालय के दो प्रमुख कार्य कौन-कौन से हैं ?
उत्तर :
उच्च न्यायालय के दो प्रमुख कार्य हैं

  • अपील-सम्बन्धी अधिकार (कार्य) तथा
  • अधीनस्थ न्यायालयों पर नियन्त्रण।

प्रश्न 10.
भारत के मुख्य न्यायाधीश को कौन नियुक्त करता है ?
उत्तर :
भारत के मुख्य न्यायाधीश को राष्ट्रपति नियुक्त करता है।

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प्रश्न 11.
भारत के किस उच्च न्यायालय की खण्डपीठ पोर्ट ब्लेयर में है ?
उत्तर :
भारत के कोलकाता उच्च न्यायालय की खण्डपीठ पोर्ट ब्लेयर में है।

प्रश्न 12.
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की अवकाश ग्रहण करने की आयु क्या है ? [2011]
उत्तर : उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की अवकाश ग्रहण करने की आयु 62 वर्ष है।

प्रश्न 13.
लक्षद्वीप समूह किस सागर में स्थित है? यह किस प्रदेश के उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में आता है? [2014]
उत्तर : लक्षद्वीप समूह अरब सागर में स्थित है। यह केरल उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में आता है।

बहुविकल्पीय प्रण का

1. भारत का सर्वोच्च न्यायालय स्थित है
(क) मुम्बई में
(ख) कोलकाता में
(ग) नयी दिल्ली में
(घ) चेन्नई में

2. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से हटाये जा सकते हैं [2011]
(क) राष्ट्रपति द्वारा
(ख) लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा
(ग) संसद द्वारा महाभियोग लगाकर
(घ) कार्यकाल में हटाये नहीं जा सकते हैं

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3. यदि कोई व्यक्ति उच्चतम न्यायालय में 58 वर्ष की आयु में न्यायाधीश नियुक्त हो जाता है तो वह अधिक-से-अधिक कितने वर्ष तक उस पद पर रह सकता है ? [2011]
(क) चार वर्ष
(ख) पाँच वर्ष
(ग) छ: वर्ष
(घ) सात वर्ष

4. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की जाती है- (2012, 13]
(क) राष्ट्रपति द्वारा
(ख) प्रधानमन्त्री द्वारा
(ग) कानून मन्त्री द्वारा
(घ) इनमें से कोई नहीं

5. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति किसकी सलाह पर की जाती है? [2011]
(क) केन्द्रीय वित्त मन्त्री
(ख) प्रधानमन्त्री
(ग) महान्यायवादी
(घ) भारत के मुख्य न्यायाधीश

6. इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खण्डपीठ कहाँ स्थापित है? [2013]
(क) मेरठ में
(ख) इलाहाबाद में
(ग) कानपुर में
(घ) लखनऊ में

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7. राज्य का सबसे बड़ा न्यायालय होता है [2011]
(क) उच्च न्यायालय
(ख) उच्चतम न्यायालय
(ग) राजस्व परिषद्
(घ) जिला न्यायालय

8. उत्तर प्रदेश का उच्च न्यायालय स्थित है [2011]
(क) लखनऊ में
(ख) कानपुर में
(ग) इलाहाबाद में
(घ) वाराणसी में

9. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के सेवानिवृत्त होने की अधिकतम आयु कितनी निर्धारित है? [2014, 17, 18]
(क) 62 वर्ष
(ख) 63 वर्ष
(ग) 64 वर्ष
(घ) 65 वर्ष

10. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्त होने की अधिकतम आयु क्या है? [2014]
(क) 60 वर्ष
(ख) 61 वर्ष
(ग) 62 वर्ष
(घ) 65 वर्ष

11. भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है- [2015, 17, 18]
(क) उपराष्ट्रपति
(ख) प्रधानमन्त्री
(ग) राष्ट्रपति
(घ) मुख्य चुनाव आयुक्त

12. भारत संघ के राज्यों में सबसे बड़ा न्यायालय है (2015, 16]
(क) उच्च न्यायालय
(ख) सर्वोच्च न्यायालय
(ग) जिला न्यायालय
(घ) राजस्व परिषद्

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13. मौलिक अधिकार सम्बन्धी मुकदमे सुनने का अधिकार किसको है? (2017)
(क) केवल उच्चतम न्यायालय को
(ख) केवल उच्च न्यायालय को
(ग) केवल उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों को
(घ) उच्चतम तथा उच्च न्यायालय दोनों को

14. उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश अधिकतम कितनी आयु तक अपने पद पर कार्य । कर सकता है? [2018]
(क) 60 वर्ष
(ख) 62 वर्ष
(ग) 65 वर्ष
(घ) 67 वर्ष

15. सर्वोच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति कौन करता है? [2018]
(क) प्रधान न्यायाधीश
(ख) प्रधान मन्त्री
(ग) न्यायिक आयोग
(घ) राष्ट्रपति

उत्तरमाला

1. (ग), 2. (ग), 3. (घ), 4. (क), 5. (घ), 6. (घ), 7. (क), 8. (ग), 9. (घ), 10. (ग), 11. (ग), 12. (क), 13. (घ), 14. (ग), 15. (घ)

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UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry

UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry

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प्रश्नावली 9.1 (NCERT Page 225)

प्र० 1. सर्कस का एक कलाकार एक 20 मी. लंबी डोर पर चढ़ रहा है जो अच्छी तरह से तनी हुई है और भूमि पर सीधे लगे खंभे के शिखर से बंधा हुआ है। यदि भूमि स्तर के साथ डोर द्वारा बनाया गया कोण 30° का हो तो खंभे (UPBoardSolutions.com) की ऊँचाई ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 1

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प्र० 2. आँधी आने से एक पेड़ टूट जाता है और टूटा हुआ भाग इस तरह मुड़ जाता है कि पेड़ का शिखर जमीन को छूने लगता है और इसके साथ 30° का कोण बनाता है। पेड़ के पाद-बिंदु की दूरी, जहाँ पेड़ का शिखर जमीन को (UPBoardSolutions.com) छूता है, 8 मी. है। पेड़ की ऊँचाई ज्ञात कीजिए।
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UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 2.1

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प्र० 3. एक ठेकेदार बच्चों को खेलने के लिए एक पार्क में दो फिसलनपट्टी लगाना चाहती है। 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए वह एक ऐसी पिसलनपट्टी लगाना चाहती है जिसका शिखर 1.5 मी. की ऊँचाई पर हो और भूमि के (UPBoardSolutions.com) साथ 30° के कोण पर झुका हुआ हो, जबकि इससे अधिक उम्र के बच्चों के लिए वह 3 मी. की ऊँचाई पर एक अधिक ढाल की फिसलनपट्टी लगाना चाहती है, जो भूमि के साथ 60° को कोण बनाती हो। प्रत्येक स्थिति में फिसलनपट्टी की लंबाई क्या होनी चाहिए?
हलः आकृति में, माना
छोटे बच्चों के लिए फिसलनपट्टी DE और बड़े बच्चों के लिए फिसलनपट्टी AC है।
अब, समकोण ΔABC,
AB = 3 मी.
AC = फिसलन पट्टी
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प्र० 4. भूमि के एक बिंद से, जो मीनार के पाद-बिंदु से 30 मी. (UPBoardSolutions.com) की दूरी पर है, मीनार के शिखर का उन्नयन कोण 30° है। मीनार की ऊँचाई ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 4

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प्र० 5. भूमि से 60 मी. की ऊँचाई पर एक पतंग उड़ रही है। पतंग में लगी डोरी को अस्थायी रूप से भूमि के एक बिंदु से बांध दिया गया है। भूमि के साथ डोरी का झुकाव 60° है। यह मानकर कि डोरी में कोई ढील नहीं है, डोरी (UPBoardSolutions.com) की लंबाई ज्ञात कीजिए।
हलः माना, समकोण ΔAOB में,
OB = डोरी की लम्बाई
AB = 60 मी. = पतंग की ऊँचाई
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प्र० 6. 1.5 मी. लंबा एक लड़का 30 मी. ऊँचे एक भवन से कुछ दूरी पर खड़ा है। जब वह ऊँचे भवन की ओर जाता है तब उसकी आँख से भवन के शिखर का उन्नयन कोण 30° से 60° हो जाता है। बताइए कि वह भवन की (UPBoardSolutions.com) ओर कितनी दूरी तक चलकर गया है।
हलः आकृति में, माना भवन की ऊँचाई = OA
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UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 6.1

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प्र० 7. भूमि के एक बिंदु से एक 20 मी. ऊँचे भवन के शिखर पर लगी एक संचार मीनार के तल (UPBoardSolutions.com) और शिखर के उन्नयन कोण क्रमशः 45° और 60° है। मीनार की ऊँचाई ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 7
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 7.1

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प्र० 8. एक पेडस्टल के शिखर पर एक 1.6 मी. ऊँची मूर्ति (UPBoardSolutions.com) लगी है। भूमि के एक बिंदु से मूर्ति के शिखर का उन्नयन कोण 60° है और उसी बिंदु से पेडस्टल के शिखर का उन्नयन कोण 45° है। पेडस्टल की ऊँचाई ज्ञात कीजिए।
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UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 8.1

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प्र० 9. एक मीनार के पाद-बिंदु से एक भवन के शिखर (UPBoardSolutions.com) का उन्नयन कोण 30° है और भवन के पाद-बिंदु से मीनार के शिखर का उन्नयन कोण 60° है। यदि मीनार 50 मी. ऊँची हो, तो भवन की ऊँचाई ज्ञात कीजिए।
हलः आकृति में,
माना भवन की ऊँचाई = AB = h मी.
और मीनार की ऊँचाई = CD = 50 मी.
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 9
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 9.1

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प्र० 10. एक 80 मी. चौड़ी सड़क के दोनों ओर आमने-सामने समान लंबाई वाले दो खंभे लगे हुए हैं। इन दोनों खंभों के बीच सड़क के एक बिंदु से खंभों के शिखर के उन्नयन कोण क्रमशः 60° और 30° है। खंभों की ऊँचाई (UPBoardSolutions.com) और खंभों से बिंदु की दूरी ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 10
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 10.1

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प्र० 11. एक नहर के एक तट पर एक टीवी टॉवर ऊध्र्वाधरतः खड़ा है। टॉवर के ठीक सामने दूसरे तट के एक अन्य बिंदु से टॉवर के शिखर का उन्नयन कोण 60° है। इसी तट पर इस बिंदु से 20 मी. दूर और इस बिंदु को मीनार के (UPBoardSolutions.com) पाद से मिलाने वाली रेखा पर स्थित एक अन्य बिंदु से टॉवर के शिखर का उन्नयन कोण 30° है। टॉवर की ऊँचाई और नहर की चौड़ाई ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 11
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 11.1

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प्र० 12. 7 मी. ऊँचे भवन के शिखर से एक केबल टॉवर के शिखर का (UPBoardSolutions.com) उन्नयन कोण 60° है और इसके पाद का अवनमन कोण 45° है। टॉवर की ऊँचाई ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 12
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 12.1

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प्र० 13. समुद्र-तल से 75 मी. ऊँची लाइट हाउस के शिखर से देखने पर दो समुद्री जहाजों के अवनमन कोण 30° और 45° हैं। यदि लाइट हाउस के एक ही ओर एक जहाज दूसरे जहाज के ठीक पीछे हो तो दो जहाजों के बीच की (UPBoardSolutions.com) दूरी ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 13
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 13.1

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प्र० 14. 1.2 मी. लंबी एक लड़की भूमि से 88.2 मी. की ऊँचाई पर एक क्षैतिज रेखा में हवा में उड़ रहे गुब्बारे को देखती है। किसी भी क्षण लड़की की आँख से गुब्बारे का उन्नयन कोण 60° है। कुछ समय बाद उन्नयन कोण घटकर 30° हो जाता है। (UPBoardSolutions.com) इस अंतराल के दौरान गुब्बारे द्वारा तय की गई दूरी ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 14
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 14.1

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प्र० 15. एक सीधा राजमार्ग एक मीनार के पाद तक जाता है। मीनार के शिखर पर खड़ा एक आदमी एक कार को 30° के अवनमन कोण पर देखता है जो कि मीनार के पाद की ओर एक समान चाल से जाता है। छः सेकेंड बाद कार का (UPBoardSolutions.com) अवनमन कोण 60° हो गया। इस बिंदु से मीनार के पाद तक पहुँचने में कार द्वारा लिया गया समय ज्ञात कीजिए। [CBSE 2009]
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 15
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 15.1

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प्र० 16. मीनार के आधार से और एक सरल रेखा में 4 मी. और 9 मी. की (UPBoardSolutions.com) दूरी पर स्थित दो बिंदुओं से मीनार के शिखर के उन्नयन कोण पूरक कोण हैं। सिद्ध कीजिए कि मीनार की ऊँचाई 6 मी. है।
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 16
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 16.1
UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 9 Some Applications of Trigonometry 16.2

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 11 (Section 2)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 11 देश की आन्तरिक सुरक्षा-व्यवस्था (अनुभाग – दो)

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विस्तृत उत्तरीय प्रत

प्रश्न 1.
आन्तरिक सुरक्षा की चुनौतियों पर सविस्तार प्रकाश डालिए।
              या
भारत की आन्तरिक सुरक्षा को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है? किन्हीं दो का उल्लेख कीजिए। [2018]
उत्तर :
देश की सुरक्षा का आशय केवल बाहरी सुरक्षा से नहीं, बल्कि आन्तरिक सुरक्षा से भी है। यह सत्य है कि यदि किसी देश की सीमा में रहने वालों का जीवन सुरक्षित नहीं है, तो बाहरी हमलों से भी सुरक्षा सम्भव नहीं है।

देश की आन्तरिक सुरक्षा की चुनौतियाँ

भारत को अपनी आन्तरिक सुरक्षा के क्षेत्र में भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जम्मू-कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों में अलगाववाद और धार्मिक कट्टरता की कड़ी चुनौती है, वहीं इनसे पैदा हुआ आतंकवाद भारत के लिए एक गम्भीर समस्या बना हुआ है।

अलगाववाद से पीड़ित राज्यों में असम, जम्मू-कश्मीर, नागालैण्ड आदि प्रमुख हैं। इन राज्यों के उग्रवादी समूहों ने क्षेत्रों में विकास न होने का दायित्व भारत सरकार पर थोप दिया है और अलगाववाद को विकास से। जोड़ दिया है। अलगाववाद (UPBoardSolutions.com) की प्रकृति भारतीय सुरक्षा के लिए एक प्रमुख चुनौती के रूप में उभरकर सामने आई है।

आतंकवाद भारत के लिए एक गम्भीर चुनौती है। आतंकवाद का अर्थ राजनीतिक खून-खराबे से है। आतंकवादी अपनी बातों को मनवाने के लिए जन-साधारण को निशाना बनाते हैं और नागरिकों के असन्तोष का उपयोग सरकार के विरुद्ध करते हैं। 26 नवम्बर, 2008 ई० को मुम्बई में हुआ आतंकवादी हमला इसका प्रमुख उदाहरण है। आतंकवादी गतिविधियों के मुख्य उदाहरण हैं—विमान अपहरणे अथवा भीड़ भरी जगहों; जैसे—रेलगाड़ी, होटल, बाजार या ऐसी ही अन्य जगहों पर बम विस्फोट कराना आदि।।

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देश की आन्तरिक सुरक्षा की रणनीति

देश की आन्तरिक सुरक्षा की रणनीति का प्रमुख कारक है—विकास कार्यों को तेजी से पूरा करना। ऐसे कार्यों में समाज के सभी वर्गों, उपवर्गों, सम्प्रदायों को विकास के लाभ में हिस्सेदारी प्रदान की जाती है। इसके साथ-ही-साथ भारत ने राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए लोकतान्त्रिक व्यवस्था में देश के प्रत्येक व्यक्ति को हिस्सेदार बनाया है। भारत में अर्थव्यवस्था को इस प्रकार से भी विकसित करने का प्रयास किया (UPBoardSolutions.com) गया है कि बहुसंख्यक नागरिकों को गरीबी और अभाव से मुक्ति मिले तथा नागरिकों के बीच आर्थिक समानता पैदा हो। इसके अलावा आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्था को आधुनिकीकरण और अति आधुनिक हथियारों से लैस करना भी एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारक है।

लघु उत्तरीय प्रत।

प्रश्न 1.
आन्तरिक सुरक्षा के पारम्परिक साधनों को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर :
आन्तरिक सुरक्षा के पारम्परिक साधनों में प्रमुख हैं–पुलिस बल; त्वरित कार्यबल (आर०ए० एफ०); असम राइफल्स; गृहरक्षा वाहिनी (होमगार्ड) आदि। इन सभी बलों पर देश की आन्तरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है। पुलिस के पास आम कानून व्यवस्था बनाये रखने, अपराधों को रोकने एवं उनकी

जाँच करने का दायित्व है। संविधान के तहत आम कानून व्यवस्था और पुलिस राज्य सरकार का विषय है। इसलिए पुलिस पर राज्य सरकार का नियन्त्रण होता है। राज्य में पुलिस बल पर प्रमुख पुलिस महानिदेशक या पुलिस महानिरीक्षक होता है। राज्य को सुविधानुसार कई खण्डों में बाँटा जाता है, जिन्हें ‘क्षेत्र’ कहा जाता है और हर पुलिस क्षेत्र उपमहानिरीक्षक के प्रशासनिक नियन्त्रण में होता है। एक क्षेत्र में कई जिले होते हैं। जिला (UPBoardSolutions.com) पुलिस का विभाजन पुलिस डिवीजनों, अंचलों और पुलिस थानों में किया गया है। राज्यों के पास नागरिक पुलिस के अलावा अपनी सशस्त्र पुलिस, अलग खुफिया शाखा, अपराध शाखा आदि होती हैं।

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प्रश्न 2.
‘असम राइफल्स’ पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
पूर्वोत्तर राज्यों में ‘असम राइफल्स’ सबसे पुराना पुलिस बल है। ‘असम राइफल्स’ का गठन सन् 1835 ई० में ‘कछार लेवी’ के नाम से किया गया था। इस पर पूर्वोत्तर क्षेत्र की आन्तरिक सुरक्षा और भारत-म्यांमार सीमा की सुरक्षा को दोहरा उत्तरदायित्व है। पूर्वोत्तर क्षेत्र के लोगों को राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाने में असम राइफल्स की भूमिका सराहनीय रही है। इस बल को प्यार से पूर्वोत्तर का प्रहरी’ और ‘पर्वतीय लोगों का मित्र’ कहा जाता है।

प्रश्न 3.
‘होमगाई’ पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
यह एक स्वयंसेवी बल है, जिसका गठन दिसम्बर, 1946 ई० में नागरिक अशान्ति और साम्प्रदायिक दंगों के नियन्त्रण में पुलिस को सहयोग देने के उद्देश्य से किया गया था। इसका काम हवाई हमले, अग्निकाण्ड, चक्रवात, भूकम्प, महामारी आदि आपात स्थितियों में पुलिस की सहायता करना, आवश्यक सेवाएँ बहाल कराना, साम्प्रदायिक सौहार्द बनाना, कमजोर वर्ग के लोगों की रक्षा में प्रशासन का साथ देना, सामाजिक-आर्थिक और कल्याण के कार्यों में हिस्सा लेना तथा नागरिक सुरक्षा का ध्यान रखना है।

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आन्तरिक सुरक्षा के इन पारम्परिक साधनों के अलावा अपारम्परिक साधनों का प्रयोग भी आवश्यक है। अपारम्परिक साधनों से तात्पर्य वंचित, अपेक्षित लोगों को विकास की मुख्यधारा में सम्मिलित करने वाले उपायों से है। अल्पसंख्यकों, महिलाओं, (UPBoardSolutions.com) विकलांगों, पिछड़े क्षेत्रों के लिए सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा हेतु रोजगार, व्यापार आदि पर बल देना चाहिए।

प्रश्न 4.
नेशनल कैडेट कोर (एनसीसी) के विषय में आप क्या जानते हैं? [2011, 12]
              या
नेशनलं कैडेट कोर का संक्षिप्त विवरण दीजिए। [2011, 12]
उत्तर :
नेशनल कैडेट कोर

यह एक महत्त्वपूर्ण युवा संगठन है। इसमें विद्यार्थियों व स्कूली छात्र-छात्राओं को सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता है। एन०सी०सी० में तीन डिवीजन हैं—सीनियर, जूनियर व लड़कियाँ। सीनियर डिवीजन में हाईस्कूल से ऊपर के छात्र प्रशिक्षण लेते हैं। जूनियर डिवीजन में नवीं व हाईस्कूल कक्षा में पढ़ने वाले छात्र भाग लेते हैं। एन०सी०सी० के छात्रों के लिए अनेक प्रकार की परीक्षाओं का आयोजन किया जाता है; जैसे-ए, बी, सी, जी प्रमाण-पत्र आदि की परीक्षाएँ। एन०सी०सी० का उद्देश्य देश के प्रत्येक नवयुवक को सैन्य दृष्टि से प्रशिक्षित करना है। आवश्यकता पड़ने पर ऐसे नवयुवकों को शीघ्र ही पूर्ण सैनिक बनाया (UPBoardSolutions.com) जा सकता है। आज एन०सी०सी० के माध्यम से भारतीय सेना को निरन्तर बहुत अच्छे सैनिक अधिकारी प्राप्त हो रहे हैं। इस प्रकार एन०सी०सी० बहुत महत्त्वपूर्ण संगठन है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि “एन०सी०सी० सुरक्षा सेवाओं की नर्सरी है।”

प्रश्न 5.
भारत की आन्तरिक सुरक्षा से सम्बन्धित किन्हीं तीन समस्याओं का वर्णन कीजिए। [2015, 16]
उत्तर : कोई भी राष्ट्र विकास के पथ पर तभी अग्रसर हो सकता है जब वहाँ की आन्तरिक सुरक्षा-व्यवस्था सुदृढ़ हो। आन्तरिक सुरक्षा-व्यवस्था को सुदृढ़ बनाये रखने के लिए प्रत्येक सरकार को सतर्क रहना चाहिए जिससे विध्वंसकारी गतिविधियाँ सक्रिय न हो सकें। ये विध्वंसकारी गतिविधियाँ राष्ट्र के अन्दर गतिरोध उत्पन्न करती हैं और विकास में बाधक सिद्ध होती हैं।  देश में आन्तरिक सुरक्षा के वर्तमान समय में निम्नलिखित खतरे हैं

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1. आतंकवाद– देश में आतंकवाद गम्भीर समस्या है। पड़ोसी देश पाकिस्तान का राष्ट्रीय लक्ष्य भारत को प्रगति के मार्ग पर रोकने, आर्थिक क्षति पहुँचाने, सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने एवं नागरिकों में भय एवं असुरक्षा की भावना पैदा करने के लिए गोलाबारी, बन्दूक, आत्मघाती हमले, सार्वजनिक बम विस्फोट आदि हैं। देश के भीतर सार्वजनिक स्थानों पर बम विस्फोट आन्तरिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करना है। पंजाब एवं (UPBoardSolutions.com) जम्मू-कश्मीर में लगी आतंकवादी आग देश के भीतर अन्य प्रान्तों में भी फैलती जा रही है। इन्दिरा गाँधी, राजीव गाँधी की हत्या आतंकवादी घटनाएँ हैं।

2. नक्सली आतंकवाद- 
नक्सली आतंकवादी राजनीतिक नकाब पहनकर गरीबों का मसीहा बनकर उन्हें बरगलाकर या भयभीत करके उन्हीं की आड़ में आपराधिक गतिविधियाँ चलाते हैं। इनका लक्ष्य आन्तरिक सुरक्षा-व्यवस्था को नष्ट-भ्रष्ट करना होता है। क्षेत्रीय विकास को रोकने के लिए वे आतंकवादी घटनाओं में लिप्त रहते हैं। ऐसा करने के लिए विदेशी शक्तियाँ उन्हें धन एवं शस्त्र उपलब्ध कराती हैं।

3. साम्प्रदायिक दंगे एवं आन्दोलन– 
स्वाधीनता के बाद विशेष सम्प्रदाय की तुष्टीकरण की भयानक परम्परा स्थापित हो गयी है। यह परम्परा सत्तालोलुप तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनेताओं ने डाली है। इनकी धर्मनिरपेक्षता का अर्थ विशेष सम्प्रदायों को खुश करना हो गया है। अब वे दबाव समूह बन गये हैं। उन्हें संवेदनशील सम्बोधित किया जा रहा है। मामूली हस्तक्षेप भी उनके भड़काने का कारण और दंगा का मूल कारण हो गया है, अत: तुष्टीकरण की नीति त्यागकर राष्ट्रीयता की भावना को उभारकर साम्प्रदायिकता का मुकाबला करना चाहिए।

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प्रश्न 6.
भारत की रक्षा तैयारी पर एक लेख लिखिए। [2016]
              या
देश की आन्तरिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए सरकार को क्या उपाय करने चाहिए? उनमें से किन्हीं दो का उल्लेख कीजिए। [2016, 18]
उत्तर :
भारत अपनी विस्तृत सीमा की सुरक्षा के लिए सजग एवं सावधान है। स्वाधीनता के बाद से ही भारत ने इस दिशा में सराहनीय कार्य किये हैं। प्रत्येक वर्ष राष्ट्रीय बजट में रक्षा के लिए पर्याप्त धनराशि की व्यवस्था की जाती रही है। वर्तमान सरकार (UPBoardSolutions.com) ने बजट में रक्षा सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त धनराशि की व्यवस्था की है।

रक्षा बजट

भारत ने अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए निम्न तैयारियाँ की हैं

  1. स्वाधीनता के बाद भारत ने रक्षा उत्पादों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए महत्त्वपूर्ण प्रयास | किये हैं। भारत के इस प्रयास के फलस्वरूप आज 39 आर्डिनेन्स फैक्ट्रियाँ विविध रक्षा सामग्रियाँ का उत्पादन कर रही हैं।
  2. युद्ध-काल में खाद्यान्न आदि की बहुत अधिक आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए सरकार ने खाद्यान्न उत्पादन एवं भण्डारण की समुचित व्यवस्था की है।
  3. सरकार ने केन्द्रीय वार्षिक बजट में प्रतिवर्ष रक्षा आवश्यकताओं (UPBoardSolutions.com) की पूर्ति के लिए पर्याप्त धन की व्यवस्था की है।
  4. रक्षा उत्पादनों में गुणवत्ता और तेजी लाने के लिए सरकार ने 7 मई, 1980 को रक्षा अनुसन्धान और विकास नामक एक नये विभाग की स्थापना की है।
  5. भारत सरकार ने सेना को आधुनिकतम तकनीक एवं अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित करने का प्रयास किया है। उल्लेखनीय है कि भारत 1998 में दूसरा परमाणु विस्फोट करके संसार के परमाणु शक्ति सम्पन्न ।
    देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है।
  6. भारत ने अपने सैनिकों को युद्ध-कला में और दक्ष बनाने, नये सैनिकों की भर्ती करने एवं उनके प्रशिक्षण के लिए देश में कई प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना की है।
  7. अपने प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम के अन्तर्गत भारत त्रिशूल, पृथ्वी, अग्नि, आकाश, नाग आदि प्रक्षेपास्त्रों के निर्माण में सफल रहा है।

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प्रश्न 7.
राष्ट्रीय अखण्डता बनाये रखने के लिए कौन-से कदम उठाने चाहिए? विवेचना कीजिए। [2011, 16]
उत्तर :

देश की एकता व अखण्डता बनाए रखने के उपाय

देश की एकता व अखण्डता बनाए रखने के लिए अग्रलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं

  • हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्य; जैसे—शिक्षण संस्थानों की स्थापना, रोजगार के अवसरों का सृजन तथा यातायात की सुविधाएँ आदि विकसित किए जाने चाहिए।
  • संचार के साधनों का विकास किया जाना चाहिए।
  • तार्किक तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रचार-प्रसार के लिए अभियान चलाया जाना चाहिए।
  • धार्मिक कट्टरती को फैलने से रोकना चाहिए तथा इस प्रकार के संगठनों को उन्मूलन किया जाना चाहिए।
  • धार्मिक, प्रादेशिक, क्षेत्रीयता पर आधारित राजनीति को समाप्त किया जाना (UPBoardSolutions.com) चाहिए।
  • साम्प्रदायिक सौहार्द उत्पन्न करने वाले कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। एक-दूसरे के धर्म के विचारों को जानने के प्रयत्न किए जाने चाहिए।
  • देश में उद्यमशीलता का विकास किया जाना चाहिए, ताकि अधिक-से-अधिक लोग रोजगारत् रहें और उन्हें आर्थिक लाभ का लालच देकर उकसाया न जा सके।
  • सशस्त्र बलों को सुदृढ़ करना चाहिए तथा उनके प्रशिक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पुलिस किस सूची का विषय है ?
उत्तर :
पुलिस राज्य-सूची का विषय है।

प्रश्न 2.
‘पूर्वोत्तर का प्रहरी किसे कहा जाता है ?
उत्तर :
असम राइफल्स’ को पूर्वोत्तर का प्रहरी कहा जाता है।

प्रश्न 3.
होमगाई का कोई एक कार्य लिखिए।
उत्तर :
आपात स्थितियों में पुलिस की सहायता करना।

प्रश्न 4.
राज्य पुलिस का सबसे बड़ा अधिकारी कौन होता है ?
उत्तर :
पुलिस महानिदेशक या (UPBoardSolutions.com) पुलिस महानिरीक्षक (D.G.P)।

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प्रश्न 5.
जिले का सबसे बड़ा पुलिस अधिकारी कौन होता है ?
उत्तर :
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (Senior Superintendent of Police : S.S.P)।

प्रश्न 6.
भारत की आन्तरिक सुरक्षा से सम्बन्धित किन्हीं दो समस्याओं के नाम लिखिए। [2015]
उत्तर :
अलगाववाद तथा आतंकवाद।

‘बहुविकल्पीय

प्रश्न 1. आर०ए०एफ० का गठन किया गया

(क) 1991 ई० में
(ख) 1992 ई० में
(ग) 1993 ई० में
(घ) 1994 ई० में

2. असम राइफल्स का गठन हुआ

(क) 1835 ई० में
(ख) 1935 ई० में
(ग) 1951 ई० में
(घ) 1953 ई० में

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3. होमगार्ड का गठन हुआ

(क) 1946 ई० में
(ख) 1948 ई० में
(ग) 1949 ई० में
(घ) 1950 ई० में

उत्तरमाला

1. (ख), 2. (क), 3. (क)

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 5 (Section 2)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 5 जनपदीय न्यायालय एवं लोक अदालत (अनुभाग – दो)

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विस्तृत उत्तरीय प्रशा

प्रश्न 1.
जिले के दीवानी न्यायालय का सविस्तार वर्णन कीजिए।
            या
जिला स्तर की अदालतों के गठन पर प्रकाश डालिए और उनके किन्हीं दो कार्यों का उल्लेख कीजिए। [2010]
उत्तर :
दीवानी न्यायालय जनपद में दीवानी या व्यवहार के मामलों से सम्बन्धित निम्नलिखित न्यायाधीशों के न्यायालय होते हैं

1. जिला न्यायाधीश का न्यायालय –
जिला न्यायाधीश दीवानी के मामले में सबसे बड़ा न्यायाधीश होता है। जिला न्यायाधीश सभी प्रकार के दीवानी के मामलों की प्रारम्भिक सुनवाई करता है तथा पाँच लाख रुपये मूल्य तक के विवादों की (UPBoardSolutions.com) अपील सुनता है। इस प्रकार इस न्यायालय में मुकदमों का निर्णय भी होता है और निचली अदालतों के निर्णय के विरुद्ध अपील भी सुनी जाती है। यह जिले के न्यायालयों पर नियन्त्रण रखती है।

2. सिविल जज का न्यायालय- 
सिविल जज दीवानी के मामलों में जिला न्यायाधीश के नीचे का न्यायाधीश होता है। सिविल जज को एक लाख रुपये मूल्य तक के विवादों की प्रारम्भिक सुनवाई का अधिकार प्राप्त है। आवश्यकता पड़ने पर उच्च न्यायालय के निर्देशों पर यह राशि पाँच लाख रुपये तक बढ़ाई जा सकती है। सिविल जज मुन्सिफ के निर्णयों के विरुद्ध उन अपीलों को भी सुनता है, जिन्हें जिला जज सुनवाई हेतु हस्तान्तरित करके उसके पास भिजवाता है।

3. मुन्सिफ का न्यायालय- 
सिविल जज के नीचे मुन्सिफ की अदालत होती है। इन अदालतों में साधारणतः दस हजार रुपये तक के तथा विशेष अधिकार मिलने पर 25,000 की मिल्कियते तक के मामले सुने जाते हैं एवं उन पर निर्णय सुनाये जाते हैं। इनके फैसले के विरुद्ध जिला न्यायाधीश की अदालत में अपील की जा सकती है।

4. खफीफा जज का न्यायालय- 
कहीं-कहीं छोटे मामलों में जल्दी तथा कम खर्च में निर्णय सुनाने के लिए खफीफा जज के न्यायालय होते हैं। मुन्सिफ के न्यायालय के नीचे खफीफा का न्यायालय होता है। इस न्यायालय में पाँच हजार रुपये तक के धन वसूली मामलों तथा १ 25,000 तक के मकानों व दुकानों के बेदखली विवादों की सुनवाई होती है। इनके निर्णयों के विरुद्ध अपील नहीं होती है। जिला न्यायाधीश के न्यायालय में पुनर्विचार (Revision) हो सकता है। इन न्यायालयों की स्थापना इसलिए की गयी है, जिससे बड़े-बड़े नगरों में छोटे-छोटे मुकदमों का शीघ्रतापूर्वक निर्णय किया जा सके।

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5. न्याय पंचायत- 
दीवानी विवादों में सबसे निचले स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों में न्याय पंचायतें हैं। इन्हें 500 तक के धन-विवादों को सुनने को अधिकार है। इनके निर्णय के विरुद्ध अपील नहीं की जा सकती। इसकी एक विशेषता यह भी है कि कोई भी वकील (UPBoardSolutions.com) इसमें मुकदमे की पैरवी नहीं कर सकता। ऐसा इसलिए किया गया है, जिससे ग्रामीण जनता को निष्पक्ष और सस्ता न्याय मिल सके।

प्रश्न 2.
जिले के राजस्व न्यायालय पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :

राजस्व न्यायालय

राजस्व न्यायालय लगान (मालगुजारी) सम्बन्धी मुकदमों की सुनवाई करते हैं। प्रदेश स्तर पर उच्च न्यायालय के अधीन इनकी निम्न व्यबस्था है
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 5 जनपदीय न्यायालय एवं लोक अदालत 1
राजस्व परिषद्- प्रत्येक राज्य में मालगुजारी सम्बन्धी मुकदमों के निस्तारण हेतु उच्च न्यायालय के बाद एक राजस्व परिषद् होती है। मालगुजारी से सम्बन्धित मुकदमों की यह राज्य स्तरीय सबसे बड़ी अदालत है। इसके निर्णय के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है।

आयुक्त- प्रशासन की सुविधा के लिए राज्य को कई कमिश्नरियों (मण्डलों) में विभक्त कर दिया जाता है और प्रत्येक कमिश्नरी का प्रधान अधिकारी कमिश्नर या आयुक्त कहलाता है। आयुक्त मालगुजारी सम्बन्धी मामलों में जिलाधीश के फैसले के विरुद्ध (UPBoardSolutions.com) अपीलें सुनता है। आयुक्त के फैसले के विरुद्ध अपीलें राजस्व परिषद् में सुनी जाती हैं।

जिलाधिकारी- यह जिले में सबसे बड़ा अधिकारी होता है, जो उपजिलाधिकारी (S.D.M.) व तहसीलदार के निर्णयों के विरुद्ध अपीलें सुनता है। इसके नीचे अपर जिलाधिकारी होता है। उपजिलाधिकारी जिला कई सब-डिवीजनों में विभक्त होता है। प्रत्येक सब-डिवीजन में एक उपजिलाधिकारी की नियुक्ति होती है जो राजस्व के साथ-साथ अपने क्षेत्र में कानून और व्यवस्था को बनाये रखती है।

तहसीलदार– प्रत्येक तहसील में एक तहसीलदार होता है, जो अपने क्षेत्र में राजस्व की वसूली की व्यवस्था करता है तथा इससे सम्बन्धित वादों की सुनवाई भी करता है। नायब तहसीलदार-तहसीलदार की सहायता के लिए नायब तहसीलदारों को नियुक्त किया जाता है। ये तहसीलदार के कार्यों में सहयोग प्रदान करते हैं।

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प्रश्न 3.
लोक अदालतं पर एक लेख लिखिए। [2013]
या

लोक अदालत की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [2015, 16, 18]
या

लोक अदालत का क्या अभिप्राय है ? इसके किन्हीं दो कार्यों का उल्लेख कीजिए। [2012]
या

लोक अदालत क्या है? लोक अदालतों की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। क्या इसके निर्णय के विरुद्ध अपील हो सकती है ? [2010, 11]
या

लोक अदालतों की स्थापना क्यों की गई थी ? [2007]
या

लोक अदालत गठित करने का उद्देश्य क्या है ? इसकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [2015]
            या
लोक अदालतों की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2015]
या
लोक अदालतों के गठन एवं उसकी कार्यप्रणाली पर प्रकाश डालिए। [2016]
या

भारतीय न्याय-व्यवस्था में लोक अदालतों के महत्व का वर्णन कीजिए। [2015]
या

भारतीय न्याय-व्यवस्था में लोक अदालतों की भूमिका का परीक्षण कीजिए। [2015]
उत्तर :

लोक अदालत

आज न्यायालयों में लाखों की संख्या में विचाराधीन मुकदमे पड़े हैं। कार्य-भार के कारण दीवानी, फौजदारी और राजस्व न्यायालयों से न्याय पाने में बहुत अधिक समय लगता है तथा इस प्रक्रिया में धन भी अधिक व्यय होता है और अनेक अन्य परेशानियाँ भी उठानी पड़ती हैं। (UPBoardSolutions.com) ऐसी स्थिति में न्याय-प्रक्रिया को और सरल बनाने के उद्देश्य से एक प्रस्ताव द्वारा भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री पी० एन० भगवती की अध्यक्षता में कानूनी सहायता योजना कार्यान्वयन समिति’ की नियुक्ति की। इस समिति द्वारा प्रस्तावित कार्यक्रम के अन्तर्गत उत्तर प्रदेश राज्य के विभिन्न भागों और देश के अन्य राज्यों के विभिन्न भागों में शिविर’ (Camp) के रूप में लोक अदालतें लगायी जा रही हैं। इन लोक अदालतों की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • इन अदालतों में मुकदमों का निपटारा आपसी समझौतों के आधार पर किया जाता है और | समझौता ‘कोर्ट फाइल’ में दर्ज कर लिया जाता है।
  • इनमें वादी और प्रतिवादी अपना वकील नहीं कर सकते वरन् दोनों पक्ष न्यायाधीश के सामने
    आपस में बातचीत करते हैं।
  • इनमें वैवाहिक, पारिवारिक व सामाजिक झगड़े, किराया, बेदखली, वाहनों का चालान, बीमा आदि के सामान्य मुकदमों पर दोनों पक्षों को समझाकर समझौता करा दिया जाता है।
  • इन अदालतों में सेवानिवृत्त जज, राजपत्रित अधिकारी तथा समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति परामर्शदाता के रूप में बैठते हैं।
  • ये अदालतें ऐसे किसी व्यक्ति को रिहा नहीं कर सकतीं, जिसे शासन ने बन्दी बनाया है। ये अदालतें केवल समझौता करा सकती हैं, जुर्माना कर सकती हैं या चेतावनी देकर छोड़ सकती हैं।
  • लोक अदालत को सिविल कोर्ट के समकक्ष मान्यता प्राप्त है। इसके द्वारा दिया गया फैसला अन्तिम होता है, जिसे सभी पक्षों को मानना पड़ता है। इस फैसले के विरुद्ध किसी भी अदालत में अपील नहीं की जा सकती।

भारत में सर्वप्रथम लोक अदालतें 1982 ई० में गुजरात राज्य में लगायी गयीं। तब से लेकर दिसम्बर, 1999 ई० तक देश के विभिन्न भागों में 40,000 से अधिक लोक अदालतें लगायी गयीं, जिनमें 92 लाख से अधिक मामले निबटाये गये। इससे लोक अदालतों की लोकप्रियता का पता चलता है। अब केन्द्र तथा राज्य सरकारें स्थायी एवं निरन्तर लोक अदालतें स्थापित करने का विचार कर रही हैं। सरकार के विभिन्न विभागों एवं सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों के (UPBoardSolutions.com) लिए अलग-अलग लोक अदालतें स्थापित करने के प्रयास किये जा रहे हैं। लोक अदालतों को कानूनी रूप देने के लिए केन्द्र सरकार शीघ्र ही संसद में एक विधेयक पास करने जा रही है।

जनपदीय स्तर पर सरकार ने परिवार न्यायालयों, उपभोक्ता संरक्षण न्यायालयों तथा विशेष महिला अदालतों की भी स्थापना की है। उत्तर प्रदेश में 2 अक्टूबर, 1986 ई० से परिवार न्यायालय कानून लागू किया गया है। अब तक 10 परिवार न्यायालय उत्तर प्रदेश व उत्तराखण्ड राज्यों में कार्यरत हैं। इन न्यायालयों का उद्देश्य पारिवारिक विवादों (विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, भरण-पोषण, सम्पत्ति आदि) को शीघ्रता के साथ हल करना है। विशेष महिला अदालत महिलाओं से सम्बन्धित विवादों की सुनवाई करती है। 10 फरवरी, 1996 ई० से इलाहाबाद में पहली विशेष महिला अदालत ने कार्य आरम्भ किया है। अब तक मथुरा, सहारनपुर आदि जनपदों में विशेष महिला अदालतें स्थापित हो चुकी हैं। इसी प्रकार जनपदों में उपभोक्ता संरक्षण न्यायालय भी उपभोक्ताओं के हितों को संरक्षण देने के लिए सफलतापूर्वक कार्य कर रहे हैं।

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प्रश्न 4.
परिवार न्यायालय पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [2011]
            या
परिवार न्यायालय के पक्ष में अपने तर्क दीजिए। [2015, 17]
उत्तर :
जनपदीय स्तर पर सरकार द्वारा परिवार न्यायालयों की स्थापना की गयी है। उत्तर प्रदेश में 2 अक्टूबर, 1986 ई० से परिवार न्यायालय कानून लागू किया गया है। अब तक दस परिवार न्यायालय उत्तर प्रदेश व उत्तराखण्ड राज्य में कार्य कर रहे हैं। इन न्यायालयों का उद्देश्य पारिवारिक विवादों (विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, भरण-पोषण, सम्पत्ति आदि) को शीघ्रता के साथ हल करना है। इस न्यायालय में मुकदमों का निपटारा आपसी समझौतों के (UPBoardSolutions.com) आधार पर किया जाता है तथा दोनों पक्ष न्यायाधीश के सम्मुख आपस में बातचीत करते हैं। इन न्यायालयों की आज भारत में अत्यधिक आवश्यकता है। क्योंकि आज सामान्य न्यायालयों में करोड़ों की संख्या में वर्षों से लम्बित मुकदमे पड़े हैं। इसलिए अनेक पारिवारिक विवाद; जिन्हें शीघ्रातिशीघ्र हल हो जाना चाहिए था; वे भी वर्षों से लम्बित हैं। यही कारण है कि ऐसे न्यायालयों की हमारे देश में आवश्यकता है।

लघु उत्तरीय प्रा

प्रश्न 1.
जिले के फौजदारी न्यायालय की रचना का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

फौजदारी न्यायालय

सत्र (सेशन) न्यायालय- उच्च न्यायालय की अधीनता में फौजदारी न्यायालय का कार्य करने वाले सबसे बड़े न्यायालय को ‘सत्र न्यायालय’ कहते हैं। इसके मुख्य न्यायाधीश को सत्र न्यायाधीश कहते हैं। इसे फौजदारी के साथ ही दीवानी के मुकदमों के निर्णय का भी अधिकार प्राप्त है। जब यह फौजदारी के मुकदमे सुनता है तो सेशन जज कहलाता है और जब दीवानी के मुकदमे सुनता है तो जिला जज कहलाता है। इसकी नियुक्ति (UPBoardSolutions.com) उच्च न्यायालय की सम्मति से राज्यपाल द्वारा की जाती है। इस पद पर प्रायः दो भिन्न कोटि के व्यक्ति नियुक्त किये जा सकते हैं-प्रथम तो वे जो राजकीय जुडीशियल सर्विस के सदस्य हों, इसके अलावा सात वर्ष तक अधिवक्ता (वकील) का कार्य करने वाला व्यक्ति भी न्यायाधीश बनाया जा सकता है। न्यायिक पदों के लिए लोक सेवा आयोग द्वारा खुली प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं। इन प्रतियोगिताओं में पास होने वाले योग्य व्यक्ति सर्वप्रथम मुन्सिफ के पद पर नियुक्त किये जाते हैं। कुछ समय बाद अपनी योग्यता, कार्यक्षमता एवं निष्पक्षता के बल पर आगे उन्नति करते हुए वे सत्र न्यायाधीश के पद पर पहुँच जाते हैं।

सत्र न्यायाधीश को अपने अधीनस्थ मजिस्ट्रेटों द्वारा दिये गये निर्णय के विरुद्ध अपील भी सुनने का अधिकार है। ये न्यायालय मृत्यु-दण्ड दे सकते हैं, परन्तु मृत्युदण्ड पर उच्च न्यायालय की पुष्टि होनी आवश्यक है। यह जिले के अन्य न्यायाधीशों के कार्यों की देखभाल भी करता है। बड़े जिलों में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एवं सहायक सत्र न्यायाधीश होते हैं।

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प्रश्न 2.
जिला न्यायालय पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [2013]
उत्तर :

जनपदीय (जिला) न्यायालय

जनपदीय (जिला) न्यायालय राज्य के उच्च न्यायालय के अधीन होते हैं। प्रत्येक जनपद (जिले) में निम्नलिखित प्रकार के न्यायालय होते हैं

  1. दीवानी न्यायालय–विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 1 के अन्तर्गत देखें।
  2. फौजदारी न्यायालये-लघु उत्तरीय प्रश्न 1 का उत्तर देखें।
  3. न्याय पंचायत–फौजदारी क्षेत्र में सबसे निम्न स्तर पर न्याय पंचायतें होती हैं। न्याय पंचायतें है 250 तक जुर्माना कर सकती हैं, परन्तु वे कारावास का दण्ड नहीं दे सकतीं। 73वें संविधान संशोधन के बाद बनाए गए पंचायती राज अधिनियम में न्याय पंचायत की कोई व्यवस्था नहीं की गई है।
  4. राजस्व न्यायालय–वर्तमान में उच्च न्यायालय के अधीन राजस्व परिषद्, कमिश्नर, जिलाधीश, परगनाधिकारी (S.D.M.), तहसीलदार और नायब तहसीलदार की अदालतें होती हैं। इन अदालतों में लगान, मालगुजारी आदि के मुकदमों की (UPBoardSolutions.com) सुनवाई की जाती है।
  5. अन्य न्यायालय-उपर्युक्त न्यायालयों के अतिरिक्त कुछ विशेष मुकदमों का फैसला विशेष न्यायालयों में होता है; जैसे—आयकर सम्बन्धी मुकदमों का फैसला आयकर अधिकारी ही कर सकता है। उसके निर्णय के विरुद्ध आयकर आयुक्त और आयकर अधिकरण (Income Tax Tribunal) में अपील की जाती है।

प्रश्न 3.
लोक अदालतें क्यों महत्त्वपूर्ण हैं ? दो कारण बताइए। [2013]
            या
लोक अदालतों की स्थापना के दो कारण बताइट। [2016]
उत्तर :
भारत की वर्तमान न्याय-व्यवस्था इस प्रकार की है कि उसमें न्याय प्राप्त करने में अधिक समय लगता है तथा धन की अधिक आवश्यकता होती है। वर्तमान में भारत के समस्त न्यायालयों में लाखों की संख्या में मुकदमे विचाराधीन पड़े हैं। इस (UPBoardSolutions.com) समस्या का समाधान करने तथा शीघ्र न्याय प्राप्त करने के लिए लोक अदालतें महत्त्वपूर्ण हैं। ये अदालतें देश के विभिन्न भागों में शिविर के रूप में लगाई जाती हैं। इनकी महत्त्वता के दो कारण निम्नलिखित हैं

  • न्यायिक व्यवस्था को सरल तथा सुविधाजनक बनाए जाने की आवश्यकता है। इसमें वकील करने की आवश्यकता नहीं है।
  • मुकदमे का निर्णय उसी दिन हो जाता है जिस दिन यह अदालत लगाई जाती है। इसके निर्णय । सामान्यतया आर्थिक दण्ड के रूप में होते हैं।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जिले का सबसे बड़ा न्यायालय कौन-सा है ?
उत्तर :
जिले का सबसे बड़ा न्यायालय जनपद न्यायालय है।

प्रश्न 2.
न्याय पंचायत कितने रुपये तक का विवाद सुन सकती है ?
उत्तर :
न्याय पंचायत १ 500 तक के धन-विवाद को सुन सकती है।

प्रश्न 3.
सिविल जज (जूनियर डिवीजन) कितने रुपये तक का विवाद सुन सकता है ?
उत्तर : सिविल जज एक लाख रुपये मूल्य तक के मुकदमे सुन सकता है।

प्रश्न 4.
भारतीय जनता को सरल तथा सुविधाजनक न्याय प्रदान करने के लिए किस अदालत की स्थापना की गयी है ? [2009]
उत्तर :
भारतीय जनता को सरल तथा सुविधाजनक न्याय प्रदान करने के लिए लोक अदालत की स्थापना की गयी है।

प्रश्न 5.
लोक अदालत का एक लाभ एवं एक हानि लिखिए। [2009]
उत्तर :
लाभ-इन अदालतों में मुकदमों का निपटारा आपसी समझौते द्वारा किया जाता है। इन अदालतों में वकीलों की आवश्यकता नहीं होती, जिससे खर्चा बचता है और मुकदमे की सुनवाई शीघ्रतापूर्वक हो जाती है। हानि-इन अदालतों के द्वारा दिये गये (UPBoardSolutions.com) फैसले के विरुद्ध किसी और अदालत में याचिका दायर नहीं की जा सकती।

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प्रश्न 6.
जिले में राजस्व न्यायालय के रूप में सर्वोच्च अधिकारी कौन होता है ? उसके निर्णय के विरुद्ध अपील कहाँ की जा सकती है ? [2010]
उत्तर :
जिले में राजस्व न्यायालय का प्रमुख जिलाधिकारी होता है, जो जमीन, लगान आदि से सम्बन्धित मुकदमों की सुनवाई करता है। इसके नीचे परगनाधीश, तहसीलदार, नायब तहसीलदार होते हैं, जिनकी अलग-अलग अदालतें होती हैं। उसके निर्णय के विरुद्ध आयकर आयुक्त और आयकर (अधिकरण) ट्रिब्यूनल में अपील की जा सकती है।

बहुविकल्पीय

प्रश्न 1. जिले का सबसे बड़ा दीवानी न्यायालय कौन-सा है?

(क) जिला जज का न्यायालय
(ख) सिविल जज का न्यायालय
(ग) मुन्सिफ का न्यायालय
(घ) न्याय पंचायत

2. जिले का सबसे बड़ा फौजदारी न्यायालय है

(क) सेशन जज का न्यायालय
(ख) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट
(ग) मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ।
(घ) न्याय पंचायत

3. उत्तर प्रदेश में परिवार न्यायालय लागू किया गया

(क) 2 अक्टूबर, 1986 ई० को
(ख) 1988 ई० को
(ग) 1999 ई० को
(घ) 5 जनवरी, 2006 ई० को

4. जनपद न्यायालय का सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी कौन होता है?

(क) जिला न्यायाधीश
(ख) जिलाधिकारी
(ग) सिविल जज
(घ) मुन्सिफ मजिस्ट्रेट

5. लोक अदालतों के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन-सा तथ्य सही नहीं है?

(क) निर्णय आपसी सहमति के आधार पर होते हैं।
(ख) इसमें वकील मुदकमें की पैरवी कर सकते हैं।
(ग) इसमें निर्णय शीघ्र होते हैं।
(घ) ये अदालतें जन-कल्याण हेतु कार्य करती हैं।

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6. दिल्ली में पहली लोक अदालत किस वर्ष गठित की गई थी?

(क) 1985
(ख) 1986
(ग) 1985
(घ) 1988

उत्तरमाला

1. (क), 2. (क), 3. (क), 4. (क), 5. (ख), 6. (ख)

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 6 (Section 2)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 6 न्यायिक सक्रियता (अनुभाग – दो)

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विरत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
न्यायिक सक्रियता से आप क्या समझते हैं ? न्यायिक सक्रियता का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर :

न्यायिक सक्रियता

न्यायपालिका शासन का प्रमुख अंग है। शासन के प्रत्येक अंग की भाँति इसे भी कुछ निश्चित प्रक्रियाओं और कार्यपालिकाओं की सीमा के अन्तर्गत कार्य करना पड़ता है। आजकल न्यायपालिका पर चर्चा के दौरान ‘न्यायिक सक्रियता बहुचर्चित बहस है।।

न्यायिक सक्रियता क्या है ?

न्यायिक सक्रियता से तात्पर्य ऐसी प्रवृत्ति से है जिसमें देश की (UPBoardSolutions.com) न्यायपालिका सामाजिक और प्रशासनिक गतिविधियों को नियमित करने में शासन के अन्य अंगों-व्यवस्थापिका और कार्यपालिका से बढ़-चढ़कर भूमिका निभाने लगती है।

पिछले कुछ वर्षों में भारत के सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों ने देश की राजनीति, प्रशासन और सामाजिक-आर्थिक जीवन में फैली हुई सुस्ती, भ्रष्टाचार और अन्याय के विरुद्ध कार्यपालिका और व्यवस्थापिका को निर्देशात्मक निर्णय दिये हैं। न्यायालय की इसी गतिविधि को न्यायिक सक्रियता कहते हैं।

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जनहित याचिका : आलोचना और मूल्यांकन

न्यायिक सक्रियता के महत्त्वपूर्ण साधन जनहित याचिका की आलोचनाएँ भी बहुत हैं। आलोचकों का मानना है कि जनहित याचिकाएँ सस्ती लोकप्रियता और समाचार-पत्रों में स्थान पाने के लिए प्रस्तुत की गयीं और की जाती हैं। आलोचकों का यह भी मानना है कि जनहित याचिकाओं ने न्यायपालिका के कार्यभार को पहले से ही बोझिल भार को और अधिक बढ़ा दिया है। न्यायालयों में सुनवाई की प्रतीक्षा कर रहे मामलों की संख्या लाखों में है। (UPBoardSolutions.com) आलोचकों का यह भी मानना है कि इन मुकदमों में न्यायालय द्वारा जारी किये गये निर्देश अव्यावहारिक हो सकते हैं, जिनका क्रियान्वयन कराना कार्यपालिका के लिए भी मुश्किल हो सकता है। इन आलोचनाओं के बावजूद जनहित याचिकाओं ने न्याय-व्यवस्था में एक महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है। जनहित याचिकाओं के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय भारतीय राजव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

प्रश्न 2.
जनहित याचिकाओं का अर्थ क्या है ? इनके महत्त्व पर प्रकाश डांलिए।
उत्तर :

जनहित याचिकाएँ : अर्थ

भारत में न्यायिक सक्रियता का मुख्य साधन जनहित याचिका है। कानून की सामान्य प्रक्रिया में कोई भी व्यक्ति तब न्यायालय जा सकता है जब उसका कोई व्यक्तिगत नुकसान हुआ हो। सन् 1979 ई० में इस अवधारणा में बदलाव आया। सन् 1979 ई० में न्यायालय ने ऐसे मुकदमे की (UPBoardSolutions.com) सुनवाई करने का निर्णय लिया जिसे पीड़ित लोगों ने नहीं बल्कि उनकी ओर से दूसरों ने दाखिल किया था। चूंकि इस मामले में जनहित से सम्बन्धित एक मुकदमे पर विचार हो रहा था। अत: इसे और ऐसे ही मुकदमों को जनहित याचिका का नाम दिया गया।

कुछ मामलों में न्यायालय ने स्वयं ही समाचार-पत्र में प्रकाशित समाचार या विवरण आदि के आधार पर कार्यवाही प्रारम्भ कर दी। जैसे-आगरा प्रोटेक्शन होम केस।

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जनहित याचिकाओं का आरम्भ
जनहित अभियोगों की शुरुआत संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने की थी। भारत में इसकी शुरुआत 1981 ई० से हुई। इन अभियोगों की शुरुआत में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश पी० एन० भगवती का विशेष योगदान रहा। इस प्रकार (UPBoardSolutions.com) का पहला वाद भागलपुर (बिहार) जेल में बन्द विचाराधीन कैदियों का था। इसी प्रकार आगरा प्रोटेक्शन होम केस, मुम्बई के पटरीवालों की समस्या, तिलोनिया के श्रमिकों का केस, एशियाड श्रमिक केस प्रमुख जनहित के मुकदमे हैं।

जनहित याचिकाओं का महत्त्व
भारत में जनहित याचिकाओं का निम्नलिखित महत्त्व है

  • समाज के निर्धन व्यक्तियों और कमजोर वर्गों को न्याय दिलाने में सहायक।
  • कानूनी न्याय के साथ-साथ आर्थिक-सामाजिक न्याय पर बल।
  • शासन की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगाने में सहायक।
  • शासन को जनहित के प्रति उत्तरदायित्व निभाने को प्रेरित करने में सहायक।
  • न्यायपालिका को जनोन्मुखी स्वरूप प्रदान करने में सहायक।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
न्यायिक सक्रियता के लाभ लिखिए।
उत्तर :
न्यायिक सक्रियता के लाभ निम्नलिखित हैं

  • इससे न केवल व्यक्तियों बल्कि संस्थाओं, समूहों को भी न्यायालय जाने का अवसर मिला है।
  • न्यायिक सक्रियता ने न्याय व्यवस्था को लोकतान्त्रिक बनाया और कार्यपालिका को जनता के प्रति उत्तरदाये।
  • न्यायिक सक्रियता ने शासन के अन्य अंगों को (UPBoardSolutions.com) अपनी कार्यप्रणाली में सुधार लाने को प्रेरित किया है।
  • न्यायिक सक्रियता ने भारतीय जनमानस का न्यायपालिका में अगाध विश्वास बढ़ाया है।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
न्यायिक सक्रियता का महत्त्वपूर्ण साधन कौन है ?
उत्तर :
न्यायिक सक्रियता का महत्त्वपूर्ण साधन जनहित याचिका है।

प्रश्न 2.
भारत में जनहित अभियोगों को आरम्भ करने का श्रेय किसे प्राप्त है ?
उत्तर :
भारत में जनहित अभियोगों को प्रारम्भ करने का श्रेय सर्वोच्च न्यायालय के माननीय श्री पी० एन० भगवती को प्राप्त है।

प्रश्न 3.
लोकायुक्त किन दो राज्यों में है ?
उत्तर :
लोकायुक्त महाराष्ट्र तथा बिहार राज्यों में है।

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प्रश्न 4.
लोक-आयुक्त की नियुक्ति कौन करता है? उसका कार्यकाल कितना होता है? (2017)
उत्तर :
लोक-आयुक्त की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल (UPBoardSolutions.com) द्वारा की जाती है। अधिकांश राज्यों में लोकायुक्तों का कार्यकाल पाँच वर्ष अथवा 65 वर्ष की उम्र तक, जो भी पहले हो, रखा गया है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. जनहित याचिका का पहला मुकदमा है|

(क) भागलपुर केस
(ख) एशियाड श्रमिक केस
(ग) तिलोनिया श्रमिक केस ।
(घ) मुम्बई के पटरीवालों का केस

2. सर्वप्रथम लोकायुक्त का गठन कहाँ हुआ?

(क) गुजरात में
(ख) महाराष्ट्र में
(ग) आंध्र प्रदेश में
(घ) उत्तर प्रदेश में

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3. जनहित याचिकाओं की शुरुआत हुई

(क) अमेरिका में
(ख) भारत में
(ग) द० अफ्रीका में
(घ) रूस में

उत्तरमाला

1. (क), 2. (ख), 3. (क)

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