UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 6 (Section 1)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 6 रूसी क्रान्ति–कारण तथा परिणाम (अनुभाग – एक)

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रूस की क्रान्ति के पूर्व रूस की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर

क्रान्ति से पूर्व रूस की दशा

क्रान्ति से पूर्व रूस की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दशा बड़ी शोचनीय थी, जिसका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-.

1. रूस की सामाजिक दशा – सन् 1861 ई० से पूर्व रूस में सामन्तवाद का बोलबाला था। सामन्त लोग किसानों (भूमि-दास या अर्द्ध-दास) द्वारा बेगार लेकर अपनी जमीनों पर खेती करवाते थे। इन भूमि-दासों को सामन्तों के अनेक अत्याचारों का सामना करना पड़ता था। रूस में कुछ छोटे किसान भी थे, जिनकी आर्थिक दशा इतनी खराब थी कि उन्हें भरपेट भोजन भी कठिनाई से मिल पाता था। पीटर महान् (UPBoardSolutions.com) के प्रयासों से रूस में औद्योगीकरण का आरम्भ होने से रूसी समाज के कल-कारखानों में काम करने वाला एक नया वर्ग भी उत्पन्न हो गया था।

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इस प्रकार क्रान्ति से पूर्व रूसी समाज में तीन वर्ग थे–पहला वर्ग सामन्तों व कुलीनों का था, जिसमें बड़े-बड़े सामन्त, जारशाही के सदस्य, उच्च पदाधिकारी आदि आते थे। मध्यम वर्ग का उदय औद्योगीकरण के फलस्वरूप हुआ था, जिसमें लेखक, विचारक, डॉक्टर, वकील तथा व्यापारी लोग सम्मिलित थे। तीसरा वर्ग किसानों तथा मजदूरों का था। इस वर्ग के सदस्यों की दशा बहुत खराब थी। समाज में इस वर्ग को कोई स्थान प्राप्त नहीं था। कुलीन और मध्यम वर्ग के लोग इन्हें हीन और घृणा की नज़र से देखते थे। रूस की अधिकांश जनता अशिक्षित और अन्धविश्वासी थी। चर्च की प्रधानता होने के कारण रूसी समाज में पादरियों को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था तथा यह वर्ग भी जनसाधारण का अनेक प्रकार से शोषण करता था।

2. रूस की आर्थिक दशा – औद्योगीकरण से पूर्व रूसी लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। रूस में किसानों की दशा बहुत दयनीय थी। अत्यधिक निर्धन होने के कारण उन्हें दरिद्रता और भुखमरी का जीवन व्यतीत करना पड़ता था। उनके खेत बहुत छोटे-छोटे थे और उन्हें कृषि की नवीन तकनीकों का ज्ञान भी नहीं था। धन के अभाव के कारण वे आधुनिक यन्त्रों को खरीद पाने में असमर्थ थे। कठोर परिश्रम करने पर भी उन्हें भरपेट भोजन नहीं मिल पाता था, क्योंकि उनकी उपज का अधिकांश भाग सामन्त और राजकीय कर्मचारी हड़प जाते थे।

पीटर महान् के काल में रूस में औद्योगीकरण का आरम्भ हुआ। यूरोपीय राष्ट्रों के सम्पर्क में आने से रूस में कल-कारखानों की स्थापना होने लगी। लेकिन इन कारखानों और उद्योगों में विदेशी पूँजी लगी हुई थी तथा विदेशी पूँजीपतियों का एकमात्र लक्ष्य अधिकाधिक लाभ कमाना था। उन्हें गरीब रूसी जनता के प्रति कोई सहानुभूति नहीं थी और न ही वे रूसी श्रमिकों और मजदूरों को सुविधाएँ देते थे। इन परिस्थितियों में रूस में अनाज, वस्त्रे तथा अन्य जीवनोपयोगी वस्तुओं की कमी होने लगी और श्रमिक तथा मजदूरों की दशा पशुओं से भी खराब होने लगी। जारशाही निरंकुश सरकार ने श्रमिकों, मजदूरों तथा किसानों (UPBoardSolutions.com) की आर्थिक दशा सुधारने का कोई प्रयास नहीं किया। सरकारी पदाधिकारियों के भ्रष्टाचार और सैनिकों के अत्याचारों ने स्थिति को दिन-प्रतिदिन गम्भीर बनाना आरम्भ कर दिया।

3. रूस की राजनीतिक दशा – जार निकोलस द्वितीय एक प्रतिक्रियावादी और स्वेच्छाचारी शासक था। उसने संसद के निम्न सदनों (ड्यूमाओं) तक को अपनी स्वेच्छाचारिता का शिकार बनाया। जार के मनमाने आदेश से ड्यूमाओं को स्थगित तथा निलम्बित किया जाता था, उनके सदस्यों को बन्दी बनाया जाता था तथा निर्वासित कर दिया जाता था। इस कारण ड्यूमाएँ मात्र सलाहकार संस्थाएँ बनकर रह गयी थीं।

निकोलस द्वितीय की सैन्य अकुशलता पहले ही क्रीमिया तथा रूस-जापान युद्ध (1905 ई०) में उजागर हो चुकी थी। इसके बावजूद 1915 ई० में विश्व युद्ध में सैनिक पराजयों के पश्चात् उसने सेना की कमान अपने हाथों में ले ली। रूस भले ही युद्ध में जीत गया, पर युद्ध से उसे जो अपूरणीय क्षति हुई, उसका दोष भी जार के सर चढ़ गया।

इस प्रकार क्रान्ति से पूर्व रूस में राजतन्त्र के विघटन के लिए पर्याप्त परिस्थितियाँ तैयार हो चुकी थीं। इसलिए जब रोमानोव शासक ने गद्दी त्यागी तब सामन्तीय तत्त्वों ने कोई प्रतिक्रिया प्रस्तुत नहीं की। रूस की क्रान्ति फ्रांस की क्रान्ति की तरह पूर्णतः स्वत:-स्फूर्त नहीं थी। इसके पास एक कुशल नेतृत्व तथा एक निश्चित कार्यक्रम था।

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प्रश्न 2.
1917 ई० की रूस की क्रान्ति के कारणों का विश्लेषण कीजिए। (2017)
या
अक्टूबर क्रान्ति के पूर्व रूस की जनता में असन्तोष क्यों था ? इस क्रान्ति के बाद राज्यसत्ता किसके हाथ आयी ?
या
रूस में अक्टूबर क्रान्ति क्यों हुई ? दो कारण लिखिए।
या
रूसी क्रान्ति पर अकाल की घटना का क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर
रूस की क्रान्ति के कारण रूस की अक्टूबर क्रान्ति (1917 ई०) के पूर्व रूस की जनता में भारी असन्तोष था जिसके फलस्वरूप क्रान्ति हुई। इसके निम्नलिखित कारण थे –

1. व्यावसायिक क्रान्ति का प्रभाव – व्यावसायिक क्रान्ति के फलस्वरूप रूस में भी बड़े-बड़े कल-कारखानों की स्थापना हो चुकी थी। इनमें काम करने वाले हजारों श्रमिक गाँवों तथा कस्बों से आकर कारखानों के निकट नगरों में निवास करने लगे थे। नगर के आधुनिक वातावरण ने उनकी अज्ञानता का अन्त कर दिया था और वे राजनीतिक मामलों में रुचि लेने लगे थे। उन्होंने अपने क्लब बना लिये थे, जिनमें एकत्र (UPBoardSolutions.com) होकर वे विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श तथा वाद-विवाद किया करते थे। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इन क्लबों में कार्ल माक्र्स के समाजवादी सिद्धान्तों का प्रचार करने के लिए क्रान्तिकारी नेता भी आने लगे और उनके विचारों में रूसी श्रमिकों ने रुचि भी लेनी शुरू कर दी। इस समाजवादी प्रचार ने देश के श्रमिकों में जारशाही के प्रति घोर असन्तोष तथा घृणा उत्पन्न कर दी।

2. राजनीतिक चेतना का उदय – समाजवादी प्रचार के फलस्वरूप रूस में 1883 ई० में रूसी समाजवादी लोकतन्त्र की स्थापना हुई। सन् 1903 ई० में यह दल दो दलों में बँट गया। पहला दल मेनशेविक तथा दूसरा बोल्शेविक कहलाया। मेनशेविक दल; जिसका प्रमुख नेता करेन्स्की था; वैधानिक तरीके से शासन-सत्ता पलटकर देश में समाजवादी शासन स्थापित करना चाहता था, जबकि बोल्शेविक दल; जिसका प्रमुख नेता लेनिन था; खूनी क्रान्ति के द्वारा जारशाही का समूल नाश करके देश में सर्वहारा वर्ग की तानाशाही कायम करना चाहता था।

3. किसानों की हीनदशा – 1861 ई० में सामन्तवादी प्रथा समाप्त होने पर भी किसानों की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ। उनके छोटे-छोटे खेत थे जिन पर वे पुराने ढंग से खेती करते थे। करों का उन पर भारी बोझ था तथा वे सदा कर्ज में डूबे रहते थे। उन्हें दो समय का भोजन भी नहीं मिलता था। उनकी उपज का अधिकांश भाग सामन्त तथा जार हड़प जाते थे।

4. श्रमिकों की दयनीय दशा – 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में औद्योगिक क्रान्ति का प्रारम्भ हुआ। उसके बाद इसकी बड़ी तेजी से विकास हुआ, किन्तु निवेश के लिए पूँजी विदेशों से आई। विदेशी पूँजीपति अधिक लाभ कमाना चाहते थे। उन्होंने मजदूरों की दशा की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। पूँजीपति लोग मजदूरों को कम-से-कम वेतन देकर अधिक-से-अधिक काम लेते थे तथा उनसे बुरा व्यवहार करते थे। उन्हें कोई राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे, जिससे उनमें असन्तोष बढ़ता जा रहा था।

5. जारों की निरंकुशता – रूस के जार (शासक) बहुत अधिक निरंकुश थे। वे जनता पर अत्याचार करके उनका दमन करते रहते थे। निरंकुशता तथा अत्याचारों के कारण जनसाधारण के हृदय में क्रान्ति की ज्वाला भड़क उठी। 1905 ई० की क्रान्ति के बाद भी (UPBoardSolutions.com) जार अपनी दमनकारी नीति में कोई परिवर्तन नहीं कर सके। वे अपने गुप्तचरों की सहायता से जनता का मुंह बन्द करने का प्रयास करते रहे।

6. रूसी विचारकों का योगदान – अनेक रूसी विचारक यूरोप में हो रहे परिवर्तनों से बहुत प्रभावित थे। कार्ल मार्क्स, टॉल्सटॉय, तुर्गनेव दाँस्तोवेस्की आदि विद्वानों ने अपने विचारों से लोगों को बहुत प्रभावित किया। उन्होंने किसानों और मजदूरों में जागृति लाने और संगठित होने की विचारधारा का प्रसार किया।

7. जार निकोलस द्वितीय की अयोग्यता – रूस का अन्तिम जार निकोलस द्वितीय था। वह तथा उसकी पत्नी एलिक्स दोनों विलासी व बुद्धिहीन थे। उन्होंने अपने दरबार में पाखण्डी लोग भरे हुए थे। रासपुटिन नामक साधु का रानी पर बहुत अधिक प्रभाव था। वह बड़ा भ्रष्टाचारी था, किन्तु राजा का विश्वासपात्र बना हुआ था। जार उसके परामर्श पर चलता था। रासपुटिन, राजा को कठोरता तथा दमन से शासन करने की राय देता रहता था। राजा की दमनकारी नीतियों के कारण जनता में असन्तोष बढ़ता गया।

8. सरकार व सेना में भ्रष्टाचार – जार द्वारा नियुक्त उच्च अधिकारी भी अयोग्य, भ्रष्ट तथा विलासी थे। सैनिक भी भ्रष्ट और विलासी हो गये थे। जनता में विद्रोह की आग भड़कने पर ऐसी सरकार और सेना उसे दबा नहीं सकी।

9. प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेना – प्रथम विश्व युद्ध सन् 1914 ई० में प्रारम्भ हुआ था। उन दिनों इटली, ऑस्ट्रिया तथा जर्मनी एक गुट में थे, जबकि इंग्लैण्ड, फ्रांस और रूस दूसरे गुट में। रूस के पास इस युद्ध के लिए कोई विशेष तैयारी नहीं थी, किन्तु उसे विवश होकर इसमें कूदना पड़ा। इस युद्ध में रूस को भारी हानि उठानी पड़ी। उसके 6 लाख सैनिक मारे गये और 20 लाख सैनिक बन्दी बना लिये गये। इससे (UPBoardSolutions.com) सैनिकों में असन्तोष फैल गया। जनता तथा सैनिक दोनों तत्कालीन रूसी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए कटिबद्ध हो गये।

10. जापान से रूस की पराजय – 1904-05 ई० में रूस तथा जापान में युद्ध हुआ। जापान जैसे छोटे देश से भी रूस हार गया। इससे जनता को जारों की अयोग्यता का पता चल गया और वह उनके विरुद्ध हो गयी।

11. अकाल – 1916-17 ई० में रूस में भारी अकाल पड़ा। लोग भूखों मरने लगे। देश में महामारी फैल
गयी। दूसरी ओर जार तथा दरबारी दावतें उड़ा रहे थे तथा देश के धन को पानी की तरह बहा रहे थे। पूँजीपति किसानों और श्रमिकों का शोषण करने में लगे हुए थे। इस अकाल ने आग में घी का काम किया। इसने जनता के असन्तोष तथा आक्रोश को चरम सीमा पर पहुँचा दिया।

इस क्रान्ति के बाद रूस में लेनिन की अध्यक्षता में नयी साम्यवादी सरकार ने देश की बागडोर सँभाली। वही क्रान्ति का नेता भी था।

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प्रश्न 3.
रूस की क्रान्ति के परिणामों का वर्णन कीजिए। [2012, 17]
          या
रूस की क्रान्ति का देश और विदेशों पर क्या प्रभाव पड़ा ?
          या
रूस की क्रान्ति के परिणाम किस प्रकार दूरगामी एवं युगान्तरकारी सिद्ध हुए ? [2010]
          या
रूस की क्रान्ति के किन्हीं चार परिणामों का वर्णन कीजिए। इसे विश्व की महान् घटना क्यों कहते हैं ? [2012]
          या
सन् 1917 ई० की रूसी क्रान्ति के दो परिणाम बताइए। [2009, 14]
          या
रूसी क्रान्ति का विश्व पर क्या प्रभाव पड़ा? किन्हीं दो प्रभावों का उल्लेख कीजिए। (2018)
उत्तर
सन् 1917 ई० की रूसी क्रान्ति विश्व इतिहास की एक अति महत्त्वपूर्ण घटना मानी जाती है। इसने न केवल रूस में निरंकुश रोमानोव वंश के शासन को समाप्त किया, अपितु पूरे विश्व की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित (UPBoardSolutions.com) किया। इसीलिए इसे विश्व की महान् घटना कहते हैं।

रूसी क्रान्ति के रूस पर प्रभाव (परिणाम)

रूसी क्रान्ति के रूस पर अग्रलिखित प्रभाव थे –

1. निरंकुश जारशाही का अन्त – रूसी क्रान्ति की पहली उपलब्धि निरंकुश शासन की समाप्ति थी। इसने अभिजात वर्ग तथा चर्च की शक्ति को भी समाप्त कर दिया।

2. प्रथम समाजवादी समाज का निर्माण – रूस में जार के साम्राज्य को एक नये राज्य ‘सोवियत समाजवादी गणराज्यों के संघ’ का रूप दे दिया गया। इस क्रान्ति के बाद सत्ता में आयी नयी सरकार ने कार्ल मार्क्स के शिद्धान्तों को कार्यरूप में परिणत किया। इस नये राज्य की नीतियों का उद्देश्य था–‘प्रत्येक व्यक्ति से उसकी क्षमता के अनुसार काम लिया जाए और प्रत्येक को उसके काम के अनुसार मजदूरी दी जाए। इस उद्देश्य से उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व समाप्त कर दिया गया; अर्थात् निजी लाभ की भावना को उत्पादन व्यवस्था से निकाल देना ही समाज का उद्देश्य था।

3. आर्थिक नियोजन – नयी सरकार के सामने पहला कार्य तकनीकी दृष्टि से एक उच्च अर्थव्यवस्था का निर्माण करना था। इसके लिए आर्थिक नियोजन की विधि अपनायी गयी। उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप का आर्थिक विकास पूँजीपतियों की पहल का परिणाम था, परन्तु सोवियत संघ में पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा औद्योगीकरण किया गया। इन योजनाओं के अन्तर्गत तीव्र गति से आर्थिक विकास के लिए अर्थव्यवस्था (UPBoardSolutions.com) के सभी साधन जुटाये गये और आर्थिक विकास का उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक समानता प्राप्त करना निश्चित किया गया।

4. सामाजिक असमानता की समाप्ति – क्रान्ति के फलस्वरूप संघ में एक नये प्रकार की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का विकास हुआ। निजी स्वामित्व और मुनाफे की भावना की समाप्ति से समाज में परस्पर विरोधी हितों वाले वर्गों का अस्तित्व भी समाप्त हो गया। इस प्रकार समाज में व्याप्त बड़ी असमानताओं का अन्त हो गया। काम करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक हो गया तथा प्रत्येक व्यक्ति को काम देना समाज और राज्य का कर्तव्य बन गया।

5. शिक्षा एवं संस्कृति के क्षेत्र में विकास – सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के उन्मूलन के साथ-साथ शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में भी विकास हुए। शिक्षा प्रसार द्वारा आर्थिक विकास, अन्धविश्वासों के निराकरण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास में सहायता मिली। विज्ञान और कला के इस विकास ने आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को तेज किया।

6. गैर-रूसी जातियों को लाभ – जार के अधीन रूस में रहने वाली गैर-रूसी जातियों का बुरी तरह दमन किया गया था, परन्तु क्रान्ति के बाद ये जातियाँ गणराज्यों के रूप में सोवियत संघ का अंग बन गयीं। सोवियत संघ में सम्मिलित सभी जातियों की समानता को 1924 ई० और 1936 ई० में बनाये गये संविधान में कानूनी रूप दिया गया। इन जातियों द्वारा स्थापित गणराज्यों को भी पर्याप्त स्वायत्तता दी गयी जिससे उनकी भाषाओं और (UPBoardSolutions.com) संस्कृतियों का विकास हो सके।

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रूस की क्रान्ति के विश्व पर प्रभाव

रूसी क्रान्ति के विश्व पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े –

1. राष्ट्रवाद का उदय – सन् 1917 ई० की रूसी क्रान्ति ने अफ्रीका तथा एशिया के लोगों में जागृति पैदा की। ये लोग साम्राज्यवादी यूरोपीय देशों के शोषण का शिकार हो रहे थे। रूसी क्रान्ति ने उनमें राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत की, जिससे उन्होंने स्वतन्त्रता आन्दोलन आरम्भ किये।

2. समाजवाद का उदय – रूसी क्रान्ति ने यूरोप के अनेक देशों; जैसे-पोलैण्ड, पूर्वी जर्मनी, यूगोस्लाविया, चेकोस्लोवाकिया, बल्गारिया तथा एशियाई देश चीन में समाजवाद की नींव डाली।

3. वर्ग-संघर्ष – रूसी क्रान्ति ने साम्यवादी सिद्धान्तों के आधार पर एक नये समाज को जन्म दिया तथा एक नया सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया।

4. लोकतन्त्र की नयी परिभाषा – रूसी क्रान्ति की सफलता ने लोकतन्त्र की एक नयी परिभाषा दी। पूँजीवादी देश भी यह सोचने को विवश हुए कि वास्तविक लोकतन्त्र की स्थापना के लिए सम्पत्ति, जाति, रंग तथा लिंग के आधार (UPBoardSolutions.com) पर भेदभाव अनुचित है।

5. अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार – रूसी क्रान्ति ने समाजवाद को जन्म दिया। समाजवाद प्रगति के लिए राष्ट्रों में आपसी सहयोग पर बल देता था। इस प्रकार रूसी क्रान्ति ने विश्व के सभी राष्ट्रों के बीच आपसी भाईचारे तथा अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना को विकसित किया।

6. लोक-कल्याणकारी भावनाओं तथा मानव-अधिकारों को सिद्धान्त – रूसी सरकार की देखा-देखी विश्व की अन्य सरकारों ने भी लोक-कल्याणकारी योजनाएँ शुरू कर दीं, जिनमें शिक्षा, चिकित्सा आदि प्रमुख थीं। मानव-अधिकारों के सिद्धान्त की रक्षा के लिए रूस ने अपने अधीन सभी उपनिवेशों को मुक्त कर दिया तथा विश्व में चल रहे स्वतन्त्रता आन्दोलनों को नैतिक समर्थन दिया।

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प्रश्न 4.
रूसी क्रान्तिकारियों के मुख्य उद्देश्य क्या थे ?
उत्तर
सन् 1917 ई० में रूस में सफल क्रान्ति हुई, जो रूसी जनता तथा क्रान्तिकारियों की माँगों का परिणाम थी। क्रान्तिकारियों के प्रमुख उद्देश्य (माँगे) निम्नलिखित थीं

1. शान्ति की इच्छा – जार ने रूस को प्रथम महायुद्ध में झोंका था। रूसी फौज को भारी पराजय को सामना करना पड़ रहा था। फरवरी, 1917 ई० तक 6 लाख सैनिक युद्ध में मारे जा चुके थे। क्रान्तिकारी रूस को युद्ध से अलग रखना चाहते थे। इसलिए देश में शान्ति स्थापित करना उनका मुख्य उद्देश्य था।

2. जोतने वालों की जमीन – क्रान्तिकारी, सामन्तवाद से प्रभावित थे। रूस में भूमि जमींदारों, चर्च तथा जार के पास थी। किसान भूमि पर काम करते थे, परन्तु उनके पास बहुत थोड़ी भूमि थी। वे भूमि से लगभग वंचित ही थे। क्रान्तिकारियों (UPBoardSolutions.com) का नारा था, ‘भूमि पर काम करने वाले भूमि के स्वामी होने चाहिए।’

3. उद्योगों पर मजदूरों का नियन्त्रण – रूस के क्रान्तिकारी, सामन्तवादी व्यवस्था से दु:खी होकर एक ही नारा लगा रहे थे-कारखानों पर मजदूरों का स्वामित्व स्वीकार किया जाए। वे सोचते थे कि कपड़ा बनाने वाले चीथड़े क्यों पहनें, पूँजी अर्जित करने वाला पूँजीपतियों का दास बनकर क्यों रहे।

4. गैर-रूसी राष्ट्रों को समानता का स्तर – रूस में पड़ोसी देशों के ऐसे अनेक भाग थे, जिन्हें जारों ने विजय किया था। इन राष्ट्रों के लोगों को रूसी लोगों के समान अधिकार प्राप्त नहीं थे। इनका दमन किया जाता था। क्रान्तिकारियों का उद्देश्य इन गैर-रूसी राष्ट्रों को भी समानता का दर्जा दिलाना था। वे चाहते थे कि गैर-रूसी राष्ट्रों की जनता, रूसी जनता के समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त करे।

5. कार्ल मार्क्स के विचारों को लागू करना – रूस की क्रान्ति के पीछे मुख्य विचार कार्ल मार्क्स के थे। उसकी कृति ‘दास कैपिटल’ नामक पुस्तक उसके क्रान्तिकारी विचारों का लेखा-जोखा है। वह पूँजीवाद का विरोधी और समाजवाद का प्रबल समर्थक था। उसका कहना था कि उत्पादन के सभी साधनों पर समाज या सरकार का अधिकार होना चाहिए तथा मजदूर स्वयं ही क्रान्ति के द्वारा पूँजीवाद को समाप्त कर समाजवाद की स्थापना कर सकते हैं। मजदूरों को मार्क्स के इन विचारों में आशा की झलक दिखाई देती थी; अत: क्रान्तिकारियों का एक मुख्य उद्देश्य कार्ल मार्क्स के विचारों का समाज बनाना भी था।

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प्रश्न 5.
‘खूनी रविवार की घटना के विषय में आप क्या जानते हैं? क्या यह घटना रूस की क्रान्ति का कारण थी ? अपने विचार लिखिए।
या
रूस में 1905 ई० की घटना ‘खूनी रविवार’ क्यों कही जाती है ?
या
रूस में ‘खूनी रविवार की घटना क्यों हुई? इसका क्या परिणाम हुआ? [2015, 16]
उत्तर
जब किसी देश के शासन, अधिकारी, पूँजीपति आदि (UPBoardSolutions.com) उच्च वर्ग के लोग निरंकुश हो जाते हैं। और गरीब तथा निरीह जनता पर कहर बरपाते हैं तो क्रान्ति का जन्म होता है। रूस की क्रान्ति में भी ऐसे ही कुछ कारणों में से एक प्रमुख कारण ‘खूनी रविवार’ था।

रूस में जारशाही निरंकुशता का बोलबाला था। जार-सम्राट के अधिकारी जनसाधारण वर्ग पर भीषण अत्याचार किया करते थे। वर्ष 1904-05 ई० में रूस, जापान जैसे छोटे देश से ही पराजित हो गया था। इन सभी बातों से क्षुब्ध होकर 22 जनवरी, 1905 ई० को अनेक श्रमिकों ने अपनी माँगें रखीं। माँगें प्रस्तुत करने के लिए ये सभी श्रमिक सेण्ट पीटर्सबर्ग के दुर्ग में एकत्रित हुए। उन्होंने जार के समक्ष अपनी माँगें रखीं, लेकिन जार के आदेश से शाही सैनिकों ने उन पर गोली चला दी, जिसके फलस्वरूप बहुत-से निहत्थे श्रमिकों का खून बह गया। यह घटना रविवार को घटी थी; अत: रूस के इतिहास में इसे ‘खूनी रविवार के नाम से जाना जाता है। यह घटना भारत के अमृतसर नामक नगर में हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड की याद दिलाती है, क्योंकि इस काण्ड में ब्रिटिश सैनिकों द्वारा निहत्थे भारतीयों पर गोलियाँ बरसाकर उनकी सामूहिक हत्या कर दी गयी थी।

22 जनवरी, 1905 ई० का यह दिन रूसी इतिहास में लाल रविवार’ या ‘खुनी रविवार’ के नाम से कुख्यात है। इस घटना से सारे देश में क्रान्ति की लहर दौड़ गयी। सेना तथा नौसेना के एक भाग ने भी क्रान्ति कर दी, लेकिन शीघ्र ही इस क्रान्ति को दबा दिया गया। फिर भी क्रान्ति की चिनगारियाँ अन्दर-ही-अन्दर सुलगती रहीं, जो आगे चलकर 1917 ई० में महान् क्रान्ति के रूप में उभरकर आयीं। इसीलिए 1905 ई० की क्रान्ति को 1917 ई० की क्रान्ति की जननी कहा जाता है।

सन् 1905 ई० की घटना 1917 ई० की रूसी क्रान्ति का पूर्वाभ्यास थी। 7 मार्च, 1917 ई० को भूख, प्यास और सर्दी से काँपते हुए श्रमिकों की भीड़ ने पेट्रोग्राड नगर में जुलूस निकाला। उस समय वहाँ के होटलों और रोटी वालों की दुकान पर गर्मागर्म रोटियों से थाल भरे हुए थे। उन्हें देखकर भूख से तड़पती जनता से न रहा गया और उसने गर्मागर्म रोटियों की लूट मची दी। उच्च अधिकारियों ने सेना को बुलाकर गोली चलाने का आदेश दिया, परन्तु सैनिकों ने भूखी-नंगी जनता पर गोली नहीं चलायी। इस प्रकार सेना के अनुशासन भंग करने से रूस में उस क्रान्ति का आरम्भ हुआ, जिसने जार, उसके (UPBoardSolutions.com) सम्बन्धियों, बड़े-बड़े पदाधिकारियों और अमीर सामन्तों का अन्त कर डाला।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रूस में क्रान्तिकारी आन्दोलन के विकास में लेनिन की क्या देन थी?
या
रूस की क्रान्ति कब हुई ? उसके नायक कौन थे ?
या
रूसी क्रान्ति लेनिन के नाम के साथ क्यों जुड़ी है ? व्याख्या कीजिए।
या
लेनिन के कार्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
लेनिन कौन था ? उसका सम्बन्ध किस क्रान्ति से था ? [2012]
या
रूसी क्रान्ति में लेनिन के योगदान का वर्णन कीजिए। [2015]
उत्तर
लेनिन (1870-1924 ई०) का वास्तविक नाम ब्लादिमीर इलिच यूलियनाव था। उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद 1895 ई० में लेनिन रूस से बाहर चला गया और वहाँ से चोरी-छिपे क्रान्तिकारी साहित्य रूस में भेजने लगा। इस अपराध में पहले उसे 14 माह का कारावास मिला, फिर तीन वर्ष के लिए उसे साइबेरिया में भेज दिया गया। सन् 1898 ई० में लेनिन ने रूसी समाजवादी प्रजातान्त्रिक दल’ की स्थापना की। इसके बाद लगभग 20 वर्षों तक उसने यूरोप के विभिन्न देशों में निर्वासित जीवन व्यतीत किया। सन् 1917 ई० में वह वापस आया और करेन्स्की की सरकार को भंग कर अक्टूबर की (UPBoardSolutions.com) क्रान्ति को सफल बनाया। सन् 1924 ई० तक लेनिन रूस का निर्माता और भाग्य-विधाता बना रहा। उसने एक सक्रिय मार्क्सवादी और जन्मजात क्रान्तिकारी के रूप में अमर ख्याति प्राप्त की।

लेनिन ने रूसी क्रान्ति (1917 ई०) में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। क्रान्ति के पूर्व ही रूस के निरंकुश जार (शासक) का पतन हो चुका था। रूस में करेन्स्की की सरकार जनता की माँगें पूरी करने में असफल रही। थी। ऐसे समय में लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक पार्टी ने युद्ध को समाप्त करने और ‘सारी सत्ता सोवियतों को सौंपने का नारा दिया। लेनिन ने यह घोषणा की कि गैर-रूसी जनगणों को समान अधिकार दिये बिना सच्चा जनतन्त्र स्थापित नहीं हो सकता। यही रूसी क्रान्ति के वास्तविक उद्देश्य थे, जिन्हें लेनिन ने पूरा कर दिखाया। इसीलिए रूसी क्रान्ति लेनिन के नाम के साथ जुड़ी हुई है।

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प्रश्न 2.
कार्ल मार्क्स कौन था ? उसने कौन-सी पुस्तक लिखी ?
या
कार्ल मार्क्स तथा अन्य विचारकों का 1917 ई० में रूसी क्रान्ति लाने में क्या योगदान था ?
या
उन दार्शनिकों व विचारकों के नाम लिखिए जिनके विचारों से प्रभावित होकर जनता ने रूस में क्रान्ति की। [2009]
उत्तर
कार्ल मार्क्स जर्मनी का निवासी और वैज्ञानिक समाजवाद का जनक था। रूसी क्रान्ति लाने में शायद ही किसी और विचारक का इतना हाथ रहा हो जितना कार्ल मार्क्स का। कार्ल मार्क्स की पुस्तक दास कैपिटल सर्वाधिक प्रसिद्ध पुस्तक है। इस पुस्तक में उसने अपने विचारों को सारांश में दिया है। उसने लिखा है

  1. पूँजीवाद मजदूरों और किसानों के लिए शोषण करने का एक ढंग है।
  2. पूँजीवाद को हटाने के लिए मजदूरों को क्रान्तियाँ लानी पड़ेगी।
  3. सभी उत्पादन के साधनों पर मजदूरों तथा किसानों का अधिकार आवश्यक है। यह अधिकार उन्हें छीनना पड़ेगा।
  4. मजदूरों एवं किसानों को अपना अधिनायकवाद (UPBoardSolutions.com) स्थापित करना पड़ेगा, चाहे इसके लिए उन्हें हथियार ही क्यों न उठाने पड़ जाएँ।

कार्ल मार्क्स के अतिरिक्त कई दार्शनिकों ने भी तार्किक विधि से जनसाधारण को प्रभावित किया। इनमें फ्रेडरिक एंजिल्स के विचार माक्र्स से मिलते-जुलते थे। टॉल्सटॉय के विचारों का प्रभाव बुद्धिजीवी वर्ग पर पड़ा। बाकुनिन, क्रोपॉटकिन, दाँस्तोवेस्की और तुर्गनेव ऐसे विचारक थे जो कि जनसाधारण के आदर्श बने।

प्रश्न 3.
रूस की क्रान्ति के सामाजिक एवं आर्थिक कारण क्या थे ? (2018)
उत्तर
रूस की क्रान्ति के सामाजिक एवं आर्थिक कारण निम्नलिखित थे

  1. सामाजिक कारण – क्रान्ति से पूर्व रूसी समाज मुख्यत: तीन वर्गों में विभाजित था। ये वर्ग थे–किसान, मध्यम तथा कुलीन। किसान वर्ग के लोगों की दशा बहुत खराब थी। समाज में इस वर्ग को कोई स्थान प्राप्त नहीं था। कुलीन और मध्यम वर्ग के लोग इन्हें हीन और घृणा की दृष्टि से देखते थे। पादरी वर्ग भी अनेक प्रकार से जनसाधारण वर्ग का शोषण करता था। आगे चलकर यही वर्ग-संघर्ष रूसी क्रान्ति का प्रमुख कारण बना।
  2. आर्थिक कारण – औद्योगीकरण से पूर्व रूसी लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। रूस में किसानों की दशा बहुत दयनीय थी। अत्यधिक निर्धन होने के कारण उन्हें दरिद्रता और भुखमरी का जीवन व्यतीत करना पड़ता था। वे सामाजिक (UPBoardSolutions.com) और आर्थिक परिवर्तन की ओर टकटकी लगाये हुए थे। दूसरी ओर रूसी कारखानों और उद्योगों में विदेशी पूँजी लगी हुई थी तथा विदेशी पूँजीपतियों का एकमात्र लक्ष्य अधिकाधिक लाभ कमाना था। इन परिस्थितियों में रूस में अनाज, वस्त्र तथा अन्य जीवनोपयोगी वस्तुओं की कमी होने लगी। जारशाही ने भी श्रमिकों और किसानों की आर्थिक दशा सुधारने का कोई प्रयास नहीं किया। अन्ततः यह आर्थिक दशा भी रूसी क्रान्ति का कारण बनी।

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प्रश्न 4.
रूस के समाज के दो वर्ग कौन-कौन से थे ? उनका उल्लेख कीजिए।
उत्तर
क्रान्ति से पूर्व रूस के समाज के दो वर्ग निम्नलिखित थे –

  1. उच्च वर्ग – उच्च वर्ग में जारशाही के सदस्य, उच्च सामन्त तथा अत्यधिक धनी लोग थे। ये लोग वैभवपूर्ण तथा ऐश्वर्यमय जीवन व्यतीत करते थे। उनका जीवन विलासिता से परिपूर्ण था। वे अपनी जमीनों पर अर्द्ध-दासों से कृषि करवाते थे तथा शिकार आदि करके मनोरंजन करते थे।
  2. मध्यम वर्ग – इस वर्ग में लेखक, विचारक, छोटे व्यापारी तथा छोटे सामन्त आदि सम्मिलित थे। इनकी स्थिति उच्च वर्ग के लोगों से निम्न थी। इन्हें किसी प्रकार के विशेषाधिकार प्राप्त न होने के कारण इनकी स्थिति बहुत ही दयनीय रहती थी।

अतिलघु उत्तरीय प्रत

प्रश्न 1.
रूस की क्रान्ति कब प्रारम्भ हुई? इसके नायक कौन थे? [2012, 18]
या
रूस में क्रान्ति कब हुई थी? [2016]
उत्तर
रूसी क्रान्ति सन् 1917 ई० में प्रारम्भ हुई। इसके नायक लेनिन थे।

प्रश्न 2.
रूस की संसद का क्या नाम था ?
उत्तर
रूस की संसद का नाम ड्यूमा था।

प्रश्न 3.
1917 ई० की रूसी क्रान्ति सबसे अधिक किस विचारधारा से प्रभावित थी ?
उत्तर
1917 ई० की रूसी क्रान्ति सबसे अधिक (UPBoardSolutions.com) लेनिन की विचारधारा से प्रभावित थी।

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प्रश्न 4.
क्रान्ति के पूर्व रूस में किस प्रकार की शासन व्यवस्था थी ?
उत्तर
क्रान्ति के पूर्व रूस में जारशाही शासन व्यवस्था थी।

प्रश्न 5.
क्रान्ति के पूर्व रूस का समाज कितने वर्गों में बँटा था ?
उत्तर
क्रान्ति के पूर्व रूस को समाज तीन वर्गों में बँटा था।

प्रश्न 6.
इयूमा किसे कहते थे ?
उत्तर
रूस की संसद का नाम ड्यूमा था।

प्रश्न 7.
लेनिन कौन था ? उसका सम्बन्ध किस क्रान्ति से था ? [2012]
उत्तर
लेनिन रूस में बोल्शेविक दल का प्रमुख नेता था। उसका सम्बन्ध रूसी क्रान्ति से था।

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प्रश्न 8.
रूस का अन्तिम जार कौन था ?
उत्तर
रूस को अन्तिम जार (सम्राट) निकोलस द्वितीय था।

प्रश्न 9.
रूस के बोल्शेविक दल के सर्वप्रथम नेता कौन थे ?
उत्तर
रूस के बोल्शेविक दल के सर्वप्रथम नेता लेनिन (UPBoardSolutions.com) थे, जिनका वास्तविक नाम ब्लादिमीर इलिच यूलियनाव था।

प्रश्न 10.
रूसी क्रान्ति को प्रभावित करने वालों के नाम लिखिए।
उत्तर
रूसी क्रान्ति को प्रभावित करने वालों में लेनिन, कार्ल मार्क्स, टॉल्सटॉय, मैक्सिम गोर्की, बाकुनिन, तुर्गनेव, दॉस्तोवेस्की आदि प्रमुख थे।

प्रश्न 11.
रूस में बौद्धिक क्रान्ति लाने वाले दो प्रमुख लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
रूस में बौद्धिक क्रान्ति लाने वाले दो प्रमुख लेखक थे-टॉल्सटॉय तथा दॉस्तोवेस्की।

प्रश्न 12.
फरवरी क्रान्ति का क्या अभिप्राय है ? [2011]
उत्तर
7 मार्च, 1917 ई० की भीषण दुर्घटना ने रूस में क्रान्ति का विस्फोट कर दिया। इस क्रान्ति को ‘फरवरी क्रान्ति’ कहा गया।

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प्रश्न 13.
‘प्रत्येक क्रान्ति में महान विचारकों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। (UPBoardSolutions.com) ” इस कथन की पुष्टि में फ्रांस और रूस की क्रान्ति से सम्बन्धित एक-एक विचारक का नाम लिखिए। [2013]
उत्तर
फ्रांस-रूसो, रूस-कार्ल मार्क्स।

प्रश्न 14.
यूरोप की दो महान राज्य क्रान्तियों के नाम लिखिए। [2014]
उत्तर 

  1. इंग्लैण्ड की क्रान्ति।
  2. फ्रांस की क्रान्ति।

बहुविकल्पीय प्रशन

1. रूस की क्रान्ति के समय रूस के सम्राट को कहा जाता था

(क) एम्परर
(ख) प्रिन्स
(ग) जार।
(घ) ड्यूक

2. 1917 ई० की रूसी क्रान्ति के समय रूस का जार था

(क) निकोलस प्रथम
(ख) निकोलस द्वितीय
(ग) पीटर महान
(घ) लेनिन

3. रूसी क्रान्ति के समय लेनिन किस दल का नेता था?

(क) जिरोदिस्त
(ख) बोल्शेविक
(ग) जैकोबिन
(घ) मेनशेविक

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4. रूसी क्रान्ति के समय रूस में भीषण अकाल कब पड़ा?

(क) 1904-05 ई० में
(ख) 1910-11 ई० में
(ग) 1916-17 ई० में
(घ) 1918-19 ई० में

5. रूसे की क्रान्ति का प्रमुख कारण क्या था?

(क) सैनिक दुर्बलता
(ख) रूस की पराजय
(ग) जार की निरंकुशता
(घ) देश का पिछड़ापन

6. रूस की क्रान्ति कब प्रारम्भ हुई थी? [2012]
या
लस में क्रान्ति किस सन में हुई थी? [2014]

(क) 1927 ई० में
(ख) 1917 ई० में
(ग) 1907 ई० में
(घ) 1911 ई० में

7. ‘खूनी रविवार की घटना कहाँ हुई?

(क) पेरिस में
(ख) मास्को में
(ग) लन्दन में
(घ) सेण्ट पीटर्सबर्ग में

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8. समाजवाद का जन्मदाता कौन था?

(क) लेनिन
(ख) कार्ल मार्क्स
(ग) रूसो
(घ) स्टालिन

9. क्रान्ति की सफलता के बाद रूस में कौन-सी व्यवस्था लागू की गई?

(क) पूँजीवादी
(ख) जनतन्त्र
(ग) साम्यवादी
(घ) तानाशाही

10. जार साम्राज्य का पतन कब हुआ?

(क) 15 मार्च, 1917 ई० में
(ख) 27 फरवरी, 1930 ई० में
(ग) 2 अप्रैल, 1930 ई० में।
(घ) 5 जनवरी, 1922 ई० में

11. निम्नलिखित में से कौन रूस की क्रान्ति से सम्बन्धित था? [2011)

(क) लेनिन
(ख) अब्राहम लिंकन
(ग) रूसो
(घ) बिस्मार्क

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12. मेनशेविक दल का प्रमुख नेता था

(क) लेनिन
(ख) करेन्स्की
(ग) रूसो
(घ) कार्ल मार्क्स

उत्तर माला

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 6 रूसी क्रान्ति–कारण तथा परिणाम 1

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UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 15 Our Environment

UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 15 Our Environment (हमारा पर्यावरण)

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पाठगत हल प्रश्न

[NCERT IN-TEXT QUESTIONS SOLVED]

खंड 15.1 ( पृष्ठ संख्या 289)

प्रश्न 1.
क्या कारण है कि कुछ पदार्थ जैव निम्नीकरणीय होते हैं और कुछ अजैव निम्नीकरणीय?
उत्तर
कुछ पदार्थों का जीवाणु अथवा दूसरे मृतजीवियों (saprophytes) द्वारा अपघटन हो जाता है परंतु कुछ पदार्थों का जैविक प्रक्रम द्वारा अपघटन नहीं हो पाता है। अत: सब्ज़ियों के अपशिष्ट, जंतुओं के अपशिष्ट, पत्ते आदि जैव निम्नीकरणीय हैं क्योंकि जीवाणु (UPBoardSolutions.com) और कवक जैसे सूक्ष्मजीव इन्हें जटिल से सरल कार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं। जबकि प्लास्टिक, पॉलीथीन आदि अजैव निम्नीकरणीय हैं क्योंकि इनका अपघटन नहीं हो पाता है।

प्रश्न 2.
ऐसे दो तरीके सुझाइए जिनमें जैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को प्रभावित करते हैं।
उत्तर
जैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को निम्न दो तरीकों से प्रभावित करते हैं

  1. पौधों तथा जंतुओं के अवशेष के अपघटन (decomposition) से वातावरण दूषित होता है तथा दुर्गध (foul | smell) फैलती है, जिससे आस-पास रहने वाले लोगों को परेशानी होती है।
  2. कूड़े-कचरे के ढेर पर अनेक प्रकार की मक्खियाँ, मच्छर आदि पैदा होते हैं, जो कई प्रकार के रोगों के वाहक होते हैं।
  3. मिथेन गैस, हाइड्रोजन सल्फाइड गैस, CO2 गैस अपघटन प्रक्रम (UPBoardSolutions.com) में निकलते हैं, जिससे प्रदूषण बढ़ता है।

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प्रश्न 3.
ऐसे दो तरीके बताइए जिनमें अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को प्रभावित करते हैं।
उत्तर

  1. अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों; जैसे-प्लास्टिक, पॉलीथीन, पीड़कनाशक (DDT) एवं रसायन आदि का अपघटन नहीं होता। ये पदार्थ लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं तथा जल एवं मृदा प्रदूषण फैलाते हैं।
  2. अजैव निम्नीकरणीय रासायनिक उर्वरक के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी या तो अम्लीय या क्षारीय हो जाती है, जिससे उर्वरा शक्ति घट जाती है।
  3. DDT जैसे पीड़कनाशक खाद्यान्न, सब्जियों, फलों आदि के माध्यम से हमारे शरीर में पहुँच जाते हैं तथा हमारे स्वास्थ्य को हानि पहुँचाते हैं।

खंड 15.2 ( पृष्ठ संख्या 294)

प्रश्न 1.
पोषी स्तर क्या है? एक आहार श्रृंखला का उदाहरण दीजिए तथा इसमें विभिन्न पोषी स्तर बताइए।
उत्तर
पोषी स्तर-किसी आहार श्रृंखला के विभिन्न स्तरों (या चरणों) को (UPBoardSolutions.com) पोषी स्तर कहते हैं जिसमें प्रत्येक चरणों पर भोजन का स्थानांतरण होता है।
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प्रश्न 2.
पारितंत्र में अपमार्जकों (Decomposers) की क्या भूमिका है? ।
उत्तर

  1. जीवाणु और कवक जैसे सूक्ष्म जीव मृतजैव अवशेषों का अपमार्जन करके जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल कार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं ताकि पौधों द्वारा पुनः उपयोग में लाए जा सकें।
  2. मृत पौधे और जंतुओं के शरीर में स्थित विभिन्न तत्वों को मिट्टी, जल तथा वायु में पुनः वापस लाते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी बढ़ती है तथा प्रकृति में संतुलन बना रहता है। जैसे—मृत जीव को आमेनिया में बदलना।
  3. अपमार्जक पर्यावरण को साफ़ रखने में सहायता करता है।

खंड 15.3 ( पृष्ठ संख्या 296 )

प्रश्न 1.
ओजोन क्या है तथा यह किसी पारितंत्र को किस प्रकार प्रभावित करती है।
उत्तर
ऑक्सीजन के तीन परमाणु मिलकर ऑजोन (O3) के एक अणु का निर्माण करते हैं। वायुमंडल के उच्चतर स्तर पर पराबैंगनी (UV) विकिरण के कारण ऑक्सीजन (O2) अणुओं से ओजोन बनती है। उच्च ऊर्जा वाले पराबैंगनी विकिरण ऑक्सीजन अणुओं (02) को विघटित कर स्वतंत्र ऑक्सीजन (O) परमाणु मुक्त करते हैं। ऑक्सीजन के ये स्वतंत्र परमाणु संयुक्त होकर ओजोन बनाते हैं जैसा कि समीकरण में दिखाया गया है।
UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 15 Our Environment img-2
वायुमंडल के ऊपरी स्तर पर ओजोन का आवरण सूर्य से आने वाले पराबैंगनी विकिरण से पृथ्वी को सुरक्षा प्रदान करती है। यह विकिरण जीवों के लिए अत्यंत हानिकारक होता है। उदाहरण के लिए, यह विकिरण मानव में त्वचा का कैंसर उत्पन्न (UPBoardSolutions.com) करती है। अतः ओजोन पारितंत्र को नष्ट होने से बचाती है।

प्रश्न 2.
आप कचरा निपटाने की समस्या कम करने में क्या योगदान कर सकते हैं? किन्हीं दो तरीकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
कचरा निपटान की समस्या कम करने के तरीके निम्नलिखित हैं :

  1. कचरा फेंकने के पूर्व जैव निम्नीकरणीय तथा अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों का पृथक (अलग) कर लीजिए।
  2. ऐसे सभी पदार्थों को अलग कर लीजिए जिनका पुनः चक्रण संभव है; जैसे–कागज़, शीशा, धातुएँ, रबर इत्यादि।
  3. हमें जैव निम्नीकरणीय पदार्थों का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करना चाहिए।

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पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न

[NCERT TEXTBOOK QUESTIONS SOLVED]

प्रश्न 1.
निम्न में से कौन-से समूहों में केवल जैव निम्नीकरणीय पदार्थ हैं
(a) घास, पुष्प तथा चमड़ा
(b) घास, लकड़ी तथा प्लास्टिक
(c) फलों के छिलके, केक एवं नींबू का रस
(d) केक, लकड़ी एवं घास
उत्तर
(d), (c) तथा (d)

प्रश्न 2.
निम्न से कौन आहार श्रृंखला का निर्माण करते हैं-
(a) घास, गेहूँ तथा आम
(b) घासे, बकरी तथा मानव
(c) बकरी, गाय तथा हाथी
(d) घास, मछली तथा बकरी
उत्तर
(b) घास, बकरी तथा मानव

प्रश्न 3.
निम्न में से कौन पर्यावरण-मित्र व्यवहार कहलाते हैं
(a) बाज़ार जाते समय सामान के लिए कपड़े का थैला ले जाना।।
(b) कार्य समाप्त हो जाने पर लाइट (बल्ब) तथा पंखे का स्विच बंद करना।
(c) माँ द्वारा स्कूटर से विद्यालय छोड़ने के बजाय तुम्हारा विद्यालय तक पैदल जाना
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर
(d) उपरोक्त सभी

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प्रश्न 4.
क्या होगा यदि हम एक पोषी स्तर के सभी जीवों को समाप्त कर दें (मार डालें)?
उत्तर
यदि एक पोषी स्तर के सभी जीवों को मार दिया जाए, तो इससे पहले वाले स्तर के जीवों की संख्या बहुत अधिक हो जाएगी। जिससे उनका भोजन तीव्रता से खत्म हो जाएगा, जबकि उससे बाद आने वाले पोषी स्तर को भोजन नहीं मिल पाएगा। अत: वे भोजन के अभाव में मर जाएँगे अथवा किसी अन्य स्थान पर चले जाएँगे। इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। यदि सभी शाकाहारी जंतु; जैसे-हिरण, खरगोश आदि मर जाएँगे (UPBoardSolutions.com) तो अगले पोषी स्तर वाले जीव शेर, बाघ आदि को भोजन नहीं मिलेगा और वे या तो मर जाएँगे या गाँवों, शहरों की ओर पलायन करेंगे। इसी प्रकार हिरण, गाय, खरगोश आदि नहीं होने पर घास पौधे बहुत अधिक होंगे क्योंकि इसका भक्षण नहीं होगा।
इस तरह हम कह सकते हैं कि आहार श्रृंखला के टूटने से पारितंत्र में असंतुलन उत्पन्न हो जाएगा।

प्रश्न 5.
क्या किसी पोषी स्तर के सभी सदस्यों को हटाने का प्रभाव भिन्न-भिन्न पोषी स्तरों के लिए अलग-अलग होगा? क्या किसी पोषी स्तर के जीवों को पारितंत्र को प्रभावित किए बिना हटाना संभव है?
उत्तर
(a)
हाँ, किसी पोषी स्तर के सभी सदस्यों को हटाने का प्रभाव भिन्न-भिन्न पोषी स्तर के लिए अलग-अलग होगा। इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है-
UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 15 Our Environment img-3
स्थिति I-यदि सभी हिरणों को हटा दें तो शेर भूख से मर जाएँगे तथा पादप (घास, पेड़, पौधों) की संख्या बढ़ेगी।
स्थिति II-यदि सभी शेरों को हटा दें तो हिरणों की संख्या बढ़ेगी, जिससे जंगल खत्म हो सकते हैं तथा रेगिस्तान में परिवर्तित हो सकते हैं।

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(b) नहीं, किसी पारितंत्र को क्षति पहुँचाए बिना (अर्थात् प्रभावित किए बिना) किसी पोषी स्तर के सभी जीवों को हटाना संभव नहीं है।

प्रश्न 6.
जैविक आवर्धन (biological magnificatation) क्या है? क्या पारितंत्र के विभिन्न स्तरों पर जैविक आवर्धन का प्रभाव भी भिन्न-भिन्न होगा?
उत्तर
फसलों की सुरक्षा के लिए पीड़कनाशक एवं रसायन जैसे अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों का उपयोग किया जाता है। यह प्रत्येक पोषी स्तर पर जीवों एवं पादपों के शरीर में संचित होते हैं, जिसे जैविक आवर्धन कहते हैं। भिन्न स्तरों पर जैविक आवर्धन (UPBoardSolutions.com) भिन्न-भिन्न होता है। स्तरों के ऊपर की तरफ़ बढ़ने पर आवर्धन बढ़ता जाता है। चूंकि आहार श्रृंखला में मनुष्य शीर्षस्थ है। अतः हमारे शरीर में इसकी मात्रा सर्वाधिक होती है।

प्रश्न 7.
हमारे द्वारा उत्पादित अजैव निम्नीकरणीय कचरे से कौन-सी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं?
उत्तर
अजैव निम्नीकरणीय कचरों से उत्पन्न होने वाली समस्याएँ निम्न हैं|

  1. चूँकि इनका विघटन नहीं हो पाता है इसलिए लंबे समय तक बने रहने के कारण काफ़ी मात्रा में एकत्र हो जाते हैं। तथा पारितंत्र में असंतुलन पैदा करते हैं तथा पर्यावरण के अन्य सदस्यों को हानि पहुँचाते हैं।
  2. पॉलीथीन की थैलियाँ कुछ पालतू जानवर खा लेते हैं, जिससे उनकी मृत्यु तक हो जाती है।
  3. नालियाँ जाम हो जाती हैं, जिससे मल-मूत्र आदि गंदे पदार्थों का वहन नहीं हो पाता है तथा गंदगी फैलती है और अनेक प्रकार की बीमारियाँ होती हैं।
  4. प्लास्टिक की बोतलें, डिब्बों आदि में जल जमा होने के कारण डेंगू, मलेरिया जैसे खतरनाक रोगों की संभावनाएँ बढ़ती हैं।
  5. दवाइयों के स्ट्रिप्स बोतलों, कीटनाशी एवं रसायन आदि से जल एवं मृदा प्रदूषण होता है।
  6. मिट्टी के अंदर दबे रहने के कारण फसलों की वृद्धि में रुकावट होती है तथा उर्वरा शक्ति कम हो जाती है।
  7. इससे जैविक आवर्धन भी होता है।
  8. इसे जलाने पर हानिकारक गैसें निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण करता है।

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प्रश्न 8.
यदि हमारे द्वारा उत्पादित सारा कचरा जैव निम्नीकरणीय हो तो क्या इनका हमारे पर्यावरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा?
उत्तर
हाँ, यहाँ तक कि यदि उत्पादित सारा कचरा जैव निम्नीकरणीय हो तब भी इनका हमारे पर्यावरण पर प्रभाव पड़ेगा परंतु लंबे समय के लिए नहीं। अधिक मात्रा में कचरा होने के कारण सूक्ष्म जीव (बैक्टिरिया एवं कवक) सही समय पर इनका (UPBoardSolutions.com) विघटन नहीं कर पाएँगे, जिससे ये कचरा जमा हो जाएगा और मक्खियों, मच्छरों आदि को पनपने का अवसर मिलेगा, दुर्गंध फैलेगी, वायु प्रदूषण होगा, बीमारियाँ फैलेंगी, तथा आसपास के लोगों का रहना मुश्किल हो जाएगा। यदि इसका निपटान सही तरीके से होगा; जैसे-जैविक खाद बनाकर, तो कुछ ही समय में ये दुष्प्रभाव ख़त्म हो जाएँगे तथा पर्यावरण को कोई क्षति नहीं होगा।

प्रश्न 9.
ओजोन परत की क्षति हमारे लिए चिंता का विषय क्यों है? इस क्षति को सीमित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
उत्तर
स्ट्राटोस्फेयर में ओजोन परत होती है, जो सूर्य से आने वाली पराबैंगनी विकिरण (UV) से पृथ्वी पर रहने वाले जीवों
को सुरक्षा प्रदान करती है। UV के कारण त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद (cataract), प्रति रक्षा-तंत्र की क्षति तथा पौधों को क्षति पहुँचाती है, जिसके कारण फसलों की उपज कम जो जाती है। क्लोरोफ्लुओरो कार्बन (CFCs) का प्रयोग अग्निशमन यंत्रों एवं रेफ्रीजरेटर (UPBoardSolutions.com) (शीतलन) में किया जाता है, जो ओजोन परत को क्षति पहुँचाते हैं। 1987 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम [UNEP : United Nations Environment Programme] में सर्वानुमति बनी कि CFC के उत्पादन को 1986 के स्तर पर ही सीमित रखा जाए।

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 10 (Section 2)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 10 देश की सीमाएँ एवं सुरक्षा-व्यवस्था (अनुभाग – दो)

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विस्तृत उत्तरीय प्रज

प्रश्न 1.
भारतीय सेना का विस्तारपूर्वक वर्गीकरण कीजिए। भारतीय सेना के तीनों अंगों का वर्णन कीजिए। [2006]
            या
भारतीय सेना की तीनों शाखाओं का उल्लेख कीजिए। इनके मुख्यालय कहाँ स्थित हैं? [2009]
            या
भारतीय थल सेना का संक्षिप्त विवरण दीजिए। [2010]
            या
भारतीय थल सेना का संक्षिप्त विवरण दीजिए। [2010]
या
भारतीय सैन्य संगठन का संक्षिप्त विवरण दीजिए। [2011]
उत्तर :

भारतीय सेना के तीनों अंगों का परिचय

विशाल और, शक्तिशाली भारतीय सेना के तीन प्रमुख अंग हैं-

  • थल सेना,
  • जल सेना (नौ-सेना) और
  • वायु सेना। भारतीय सेनाओं का प्रधान सेनापति राष्ट्रपति होता है। इन तीनों अंगों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है|

1. थल सेना- भारत की थल सेना लगभग 15 लाख है। इसका मुख्य कार्यालय नयी दिल्ली में है।
इसके सर्वोच्च अधिकारी को स्थल सेनाध्यक्ष (जनरल) कहते हैं। भारतीय सेना 6 कमाण्डों में बँटी है-पश्चिम, पूर्वी, उत्तरी, दक्षिणी, दक्षिणी-पश्चिमी तथा केन्द्रीय। प्रत्येक कमाण्ड का सर्वोच्च अधिकारी जनरल कमाण्डिग-इन-चीफ (UPBoardSolutions.com) कहलाता है। प्रत्येक कमाण्ड एरिया, इण्डिपेण्डेण्ट सब-एरिया और सेब-एरिया में विभाजित है, जिसका प्रधान क्रमश: एक मेजर, जनरल और ब्रिगेडियर होता है। थल सेना में कई प्रकार की सेनाएँ सम्मिलित हैं। इनमें इन्फेण्ट्री, बख्तरबन्द कोर, तोपखाना रेजीमेण्ट, इंजीनियरिंग कोर, सिग्नल कोर, आर्मी सेना कोर, आर्मी ऑर्डिनेन्स कोर, आर्मी डेण्टल कोर, इलेक्ट्रिकल तथा मेकैनिकल कोर, सेना शिक्षा कोर आदि सम्मिलित हैं। भारतीय थल सेना नवीनतम युद्ध कला तथा आधुनिकतम अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित है और हर समय शत्रु का सामना करने में
सक्षम है।

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2. नौ-सेना- 
भारत की नौ-सेना का सर्वोच्च अधिकारी नौ-सेनाध्यक्ष कहलाता है। इसका मुख्यालय , नयी दिल्ली में है। हमारी नौ-सेना तीन कमानों में विभाजित है। नौ-सेना के पास दो विशाल बेड़े हैं। इसकी तीन प्रमुख कमानें हैं—

  1. पश्चिमी नौ-सेना कमान,
  2. पूर्वी नौ-सेना कमान तथा
  3. दक्षिणी नौ-सेना कमान। पश्चिमी कमान का कार्यालय मुम्बई में, पूर्वी कमान का विशाखापत्तनम् में तथा दक्षिणी कमान को कार्यालय कोचीन में है। प्रत्येक कमान का अधिकारी फ्लैग ऑफिसर कमाण्डिग-इन-चीफ होता है। नौ-सेना के दोनों बेड़ों में वायुयान वाहक विक्रान्त, क्रूजर, राजपूत और लड़ाकू अवरोधक भी हैं। इसके पास आधुनिकतम पनडुब्बियाँ, विमान भेदी रणपोत तथा गश्ती नौकाएँ हैं। इनके अलावा सर्वे वाले पोत, सर्वे वाली नावें, फ्लीट टैंकर तथा मूविंग पोतों जैसे सहायक पोत हैं। बंगाल की खाड़ी के द्वीपों की रक्षा के लिए पोर्ट ब्लेयर में नौ-सेना का संगठन कार्यरत है। तीन मिसाइल वाली पोतों के आ जाने से भारत की नौ-सेना की कार्यकुशलता अत्यधिक बढ़ गयी है।

3. वायु सेना- वायु सेना का सर्वोच्च अधिकारी वायु सेनाध्यक्ष कहलाता है। इसका मुख्यालय नयी दिल्ली में है। वायु सेना के पाँच लड़ाकू और दो समर्थन देने वाले कमाण्ड हैं–पश्चिमी कमाण्ड, पूवी कमाण्ड, दक्षिणी कमाण्ड, मध्य कनाड, दक्षिणी-पश्चिमी कमाण्ड, प्रशिक्षण कमाण्ड और रख-रखाव कमाण्ड अश्रु सेना के बेड़े में 45 स्क्वाड्रन हैं। प्रत्येक स्क्वाड्रन का अधिकारी स्क्वाड्रन लीडर कहलाता है। प्रत्येक स्क्वाड्रन में नाना प्रकार के लड़ाकू विमान, बमवर्षक तथा यातायात के विमान होते हैं। भारतीय वायु सेना कैनबरा, हंटर, नेट, अजीत, चेतकं, मिग-21, मिग-23, मिग-25, मिग-29, एन-7, एन-32, 11-76, एम० (UPBoardSolutions.com) आई०-8 और मिराज-2000 आदि विमानों से सुसज्जित है। इसके पास जगुआर लड़ाकू तथा बमवर्षक व लड़ाकू अवरोधक जैसे विमान भी हैं। भारतीय वायु सेना युद्ध के समय थल सेना के साथ युद्ध भूमि में कार्यरत रहती है।

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भारत सरकार का ध्यान देश की सुरक्षा की ओर विशेष रूप से रहता है। अतः इसके द्वारा मुख्य सेना के तीनों अंगों के अतिरिक्त अन्य अनेक सैनिक व अर्द्ध-सैनिक बलों की भी स्थापना की गयी है; उदाहरणार्थ-सीमा सुरक्षा बल (B.S.F), केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (C.I.S.E), केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल (C.R.PE), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (I.T.B.P), सशस्त्र सीमा बल (S.S.B.) आदि। ये सैनिक संगठन भारतीय सुरक्षा के कार्यों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न 2.
भारत की सुरक्षा तैयारी पर एक निबन्ध लिखिए।
या
“भारतीय सशस्त्र सेना शत्रुओं को पराजित करने में सक्षम है।” इस कथन की पुष्टि में दो तर्क दीजिए।
उत्तर :

भारत की सुरक्षा तैयारी

भारत एक विशाल देश है। इसकी विस्तृत सीमाएँ 22,000 किमी से भी अधिक लम्बी हैं। दुर्भाग्य से सभी सीमाओं के पार शत्रु राष्ट्र भी हैं। विश्व के अन्य बहुत-से राष्ट्र भी भारत से द्वेष रखते हैं; अत: भारत अपनी सुरक्षा की तैयारी में विशेष रूप से संलग्न रहता है। भारत की सुरक्षा की तैयारी के सन्दर्भ में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं

1. राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा की भावना का विकास- भारत की जनता राष्ट्रप्रेम की भावना से ओत-प्रोत है। सरकार और सामाजिक कल्याण से सम्बन्धित संस्थाओं के द्वारा भी जनता में राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा की भावना जगाने के प्रयास किये जाते हैं। (UPBoardSolutions.com) फलस्वरूप भारतीयों में सुरक्षा की भावना का उत्तरोत्तर विकास हुआ है। बाह्य आक्रमण होने पर अब सम्पूर्ण भारतवासी एकजुट होकर शत्रु के दमन में लग जाते हैं।

2. आर्थिक और औद्योगिक विकास– 
सुरक्षा के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है तथा औद्योगिक विकास के आधार पर ही सुरक्षा के संसाधनों को जुटाया जा सकता है। इसलिए सुरक्षा के कार्यों की पूर्ति हेतु हमारी सरकार ने देश के आर्थिक और औद्योगिक विकास पर विशेष ध्यान दिया है। तथा रक्षा-बजट में वृद्धि कर सुरक्षा को सुदृढ़ किया है।

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3. खाद्यान्नों की उपज में वृद्धि और भण्डारण की व्यवस्था- 
युद्धकाल में आवश्यक वस्तुओं, विशेषतः खाद्यान्नों की बहुत अधिक आवश्यकता होती है; अतः खाद्यान्नों और अन्य वस्तुओं के उत्पादन तथा भण्डारण की समुचित व्यवस्था की ओर भारत सरकार ने विशेष ध्यान दिया है। इससे सुरक्षा की तैयारियों में विशेष सहायता मिली है।

4. रक्षा-उत्पादों में आत्मनिर्भरता- 
रक्षा-उत्पादों में भारत सरकार ने आत्मनिर्भर होने के लिए विशेष प्रयास किये हैं। देशभर में लगभग 33 ऑर्डिनेन्स फैक्ट्रियाँ हैं, जो विविध रक्षा-उत्पादों का निर्माण कर रही हैं। इनमें लगभग दो लाख व्यक्ति कार्यरत हैं। अब उन हजारों वस्तुओं का उत्पादन भारत में ही
होने लगा है, जो पहले विदेशों से मँगाई जाती थीं।

5. अनुसन्धान और विकास- 
रक्षा-उत्पादनों में तेजी लाने और उनकी गुणवत्ता में सुधार करने के लिए रक्षा मन्त्रालय के अधीन 7 मई, 1980 ई० को ‘रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन’ के नाम से एक नया विभाग बनाया गया। यह विभाग रक्षा-उत्पादों के लिए नये अनुसन्धान कर सुरक्षा की तैयारी की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

6. सैन्य प्रशिक्षण– 
भारत में सैन्य प्रशिक्षण की ओर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सरकार ने योग्य सैनिकों की भर्ती करने तथा उनको उत्कृष्ट प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए विभिन्न नगरों में सैनिको के समुचित प्रशिक्षण के लिए अनेक सैनिक प्रशिक्षण (UPBoardSolutions.com) केन्द्र और प्रशिक्षणशालाएँ स्थापित की हैं। ये सैनिक प्रशिक्षण केन्द्र योग्य, सक्षम एवं कुशल सैनिक अधिकारियों को तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

7. नागरिक सुरक्षा प्रशिक्षण- 
युद्धकाल में आक्रमण के समय नागरिक किस प्रकार अपनी सुरक्षा करें, इसके लिए सरकार विभिन्न प्रचार केन्द्रों के माध्यम से नागरिकों को प्रशिक्षण देती है। आन्तरिक सुरक्षा की तैयारी की दृष्टि से यह भी एक प्रशंसनीय कार्य है।

8. सेना का विकास और आधुनिकीकरण –
सुरक्षा की तैयारी हेतु दिन-प्रतिदिन सभी प्रकार की सेनाओं का अनवरत रूप से विकास और सभी दृष्टियों से आधुनिकीकरण भी किया जा रहा है। अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्रों और अन्य युद्ध-सामग्री से सेना को सुसज्जित किया जा रहा है। हवाई और समुद्री सेना को भी पहले की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली, सुदृढ़ एवं सक्षम बनाया गया है।

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9. परमाणु शक्तिसम्पन्न– 
भारत पहला परमाणु परीक्षण पोखरन में सन् 1974 ई० में और दूसरा सन् 1998 ई० में कर चुका है। भारतीय सेना के पास पृथ्वी, अग्नि, आकाश, त्रिशूल, नाग, ब्रह्मोस आदि मिसाइलें, अर्जुन टैंक, उन्नत किस्म के राडार, परमाणु पनडुब्बियाँ तथा जंगी जहाज हैं। भारत कई उपग्रह–आर्यभट्ट, भास्कर I व II, रोहिणी आदि–अन्तरिक्ष में भेज चुका है।

उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत सुरक्षा के मामले में पूर्णरूपेण आत्मनिर्भर है। हमारे पास अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित एवं पूर्ण रूप से प्रशिक्षित सेना है तथा भारत एक परमाणु शक्तिसम्पन्न राष्ट्र भी है; अतः अब वह किसी भी प्रकार की चुनौती (UPBoardSolutions.com) का सामना करने की पूर्ण .. क्षमता रखता है तथा शत्रुओं को मुंहतोड़ जवाब देने में पूर्णतया समर्थ है।

लघु उत्तरीय प्रा।

प्रश्न 1.
भारतीय सीमाओं का उल्लेख कीजिए।
या
भारत के किन चार राज्यों की सीमाएँ पाकिस्तान की सीमा को स्पर्श करती हैं? [2015]
या
भारत के उत्तर-पूर्वी तथा उत्तर-पश्चिमी सीमा पर स्थित देशों के नाम लिखिए। [2018]
उत्तर :
भारत की सीमाएँ दो प्रकार की हैं

  1. स्थल सीमाएँ तथा
  2. समुद्री सीमाएँ।

1. स्थल सीमाएँ- हमारी स्थल सीमाएँ 15,200 किमी लम्बी हैं। उत्तरी सीमा पर चीन, नेपाल तथा भूटान देश स्थित हैं। इन देशों के साथ जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पं० बंगाल, सिक्किम तथा अरुणाचल प्रदेश राज्यों की सीमाएँ लगती हैं।

  • उत्तर-पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान देश स्थित हैं। पाकिस्तान के साथ गुजरात, राजस्थान, पंजाब तथा जम्मू-कश्मीर राज्यों की सीमाएँ लगती हैं।

  • उत्तर-पूर्वी सीमा पर चीन, नेपाल, म्यांमार तथा बांग्लादेश स्थित हैं। म्यांमार के साथ अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मणिपुर तथा त्रिपुरा राज्यों की सीमाएँ लगती हैं। बांग्लादेश के साथ प० बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा तथा मिजोरम राज्यों की सीमाएँ लगती हैं।

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2. समुद्री सीमाएँ- भारत की समुद्री सीमो 7516.5 किमी है। भारतीय प्रायद्वीप के पश्चिम में अरब सागर में स्थित लक्षद्वीप, पूर्व में बंगाल की खाड़ी में स्थित अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह तथा दक्षिण । में हिन्द महासागर स्थित है। भारत के (UPBoardSolutions.com) दक्षिण-पूर्व में श्रीलंका स्थित है। पाक स्ट्रेट तथा मन्नार की खाड़ी भारत एवं श्रीलंका को पृथक् करते हैं। । भारत के मुख्य स्थल की तटरेखा 6,100 किमी लम्बी है।

प्रश्न 2.
थल सेना की प्रमुख शाखाएँ लिखिए।
उत्तर :
थल सेना में कई प्रकार की सेनाएँ सम्मिलित हैं। इनमें

  • इन्फेण्ट्री,
  • बख्तरबन्द कोर,
  • तोपखाना रेजीमेण्ट,
  • इंजीनियरिंग कोर,
  • आर्मी सेना कोर,
  • आर्मी मेडिकल कोर,
  • आर्मी डेण्टल कोर,
  • इलेक्ट्रिकल और मेकैनिकल कोर,
  • शिक्षा कोर,
  • सिग्नल कोर,
  • सप्लाई कोर,
  • आर्मी ऑर्डिनेन्स कोर,
  • पशु चिकित्सा कोर आदि सम्मिलित हैं।

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प्रश्न 3.
वायु सेना के मुख्य अधिकारियों के पद (नाम) लिखिए।
उत्तर :
वायु सेना का सर्वोच्च अधिकारी वायु सेनाध्यक्ष कहलाता है। (UPBoardSolutions.com) इसके अधीन सह-सेनाध्यक्ष, उप-सेनाध्यक्ष, एयर ऑफिस-इन-चार्ज (प्रशासन) और ऑफिस इन-चार्ज (रख-रखाव) आदि होते हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत की स्थल सीमा कितनी लम्बी है ?
उत्तर :
भारत की स्थल सीमा की लम्बाई 15,200 किमी है।।

प्रश्न 2.
रक्षा विकास एवं अनुसन्धान विभाग की स्थापना कब की गयी ?
उत्तर:
रक्षा विकास एवं अनुसन्धान विभाग की स्थापना 7 मई, 1980 ई० को हुई थी।

प्रश्न 3.
उन दो देशों के नाम लिखिए जिनकी सीमाएँ भारत की उत्तरी सीमा को स्पर्श करती हैं? [2012]
उत्तर :
नेपाल और भूटान की सीमाएँ भारत की उत्तरी सीमा को स्पर्श करती हैं।

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प्रश्न 4.
भारतीय सेना के विभिन्न अंग क्या हैं ? भारत की सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति कौन होता है ? [2012]
उत्तर :
भारतीय सेना के अंग हैं—जल सेना, थल सेना तथा नौ-सेना। भारतीय सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति भारत का राष्ट्रपति होता है।

प्रश्न 5.
भारत की थल सेना का सर्वोच्च अधिकारी कौन होता है ?
उत्तर :
थल सेनाध्यक्ष (जनरल) भारतीय थल सेना का सर्वोच्च अधिकारी होता है।

प्रश्न 6.
भारत के सीमावर्ती किन्हीं दो राष्ट्रों के नाम लिखिए। या भारत के सीमावर्ती देशों के नाम लिखिए।
उत्तर :
भारत के सीमावर्ती देशों के नाम हैं

  • पाकिस्तान,
  • अफगानिस्तान,
  • चीन,
  • नेपाल,
  • भूटान,
  • म्यांमार तथा
  • बांग्लादेश।

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प्रश्न 7.
वायु सेना के सर्वोच्च अधिकारी का पद नाम (रैंक) क्या है ? [2006]
उत्तर :
वायु सेना के सर्वोच्च अधिकारी का (UPBoardSolutions.com) पद नाम (रैंक) एअर मार्शल (वायु सेना अध्यक्ष) है।

प्रश्न 8.
सीमा सुरक्षा बल की स्थापना कब और कहाँ की गयी थी ?
उत्तर :
सीमा सुरक्षा बल की स्थापना दिल्ली में दिसम्बर, 1965 ई० में की गयी थी।

प्रश्न 9.
भारतीय वायु सेना का मुख्यालय कहाँ स्थित है ?
उत्तर :
भारतीय वायु सेना का मुख्यालय नयी दिल्ली में स्थित है।

प्रश्न 10.
इंण्डियन मिलिट्री अकादमी कहाँ स्थित है ?
उत्तर :
इण्डियन मिलिट्री अकादमी देहरादून में स्थित है।

प्रश्न 11.
भारतीय नौसेना का मुख्यालय कहाँ स्थित है ? उसमें कितनी कमान होती हैं ? [2013]
उत्तर :
भारतीय नौसेना का मुख्यालय नयी दिल्ली (UPBoardSolutions.com) में स्थित है। इसमें तीन कमान होती हैं।

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प्रश्न 12.
सुदूर दक्षिणी सीमा पर कौन-सा देश स्थित है? [2018]
उत्तर :
श्रीलंका।

प्रश्न 13.
उन दो द्वीप-समूहों के नाम लिखिए जो भारत संघ के अभिन्न अंग हैं? [2018]
उत्तर :

  • लक्षद्वीप एवं
  • अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह।

प्रश्न 14.
भारत के दो संस्थानों के नाम लिखिए जहाँ सैन्य अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जाता है। [2018]
उत्तर :

  • नेशनल डिफेन्स अकादमी-खड़गवासला।
  • इण्डिया मिलिट्री अकादमी-देहरादून।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. भारतीय वायु सेना का मुख्यालय कहाँ है ? [2012, 13, 14, 15]

(क) बंगलुरु में
(ख) आगरा में
(ग) नयी दिल्ली में
(घ) कानपुर में

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2. भारत ने प्रथम अणु परीक्षण 1974 ई० में किस स्थान पर किया था ?

(क) पोखरन में
(ख) खड़गवासला में
(ग) नरौरा में
(घ) ट्रॉम्बे में

3. भारतीय सेना के तीनों अंगों का अध्यक्ष कौन होता है ?

(क) राष्ट्रपति
(ख) प्रधानमन्त्री
(ग) रक्षामन्त्री
(घ) स्थल सेनाध्यक्ष

4. भारत में परमाणु विस्फोट के लिए कौन-सा स्थान प्रसिद्ध है?

(क) बॉम्बे हाई
(ख) पोखरन
(ग) हरिकोटा
(घ) बंगलुरु

5. भारतीय थल सेना का मुख्यालय कहाँ है ? [2014]

(क) नयी दिल्ली में
(ख) नागपुर में
(ग) बंगलुरु में
(घ) चेन्नई में

6. नौ-सेना का प्रधान कौन होता है ?

(क) एडमिरल
(ख) जनरल
(ग) ब्रिगेडियर
(घ) मेजर जनरल

7. नेशनल डिफेन्स अकादमी कहाँ है ?

(क) देहरादून में
(ख) चेन्नई में
(ग) मऊ में।
(घ) खड़गवासला में

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8. भारत में रक्षा-मन्त्रालय का प्रधान होता है

(क) राष्ट्रपति
(ख) प्रधानमन्त्री
(ग) रक्षामन्त्री
(घ) थल सेनाध्यक्ष

9. भारत में प्रादेशिक सेना कब प्रारम्भ की गयी ?

(क) 1948 ई० में
(ख) 1949 ई० में
(ग) 1950 ई० में।
(घ) 1951 ई० में

10. प्रथम परमाणु-परीक्षण स्थल पोखरन कहाँ स्थित है ?

(क) हरियाणा में
(ख) पंजाब में
(ग) जम्मू-कश्मीर में
(घ) राजस्थान में

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11. भारतीय नौसेना का मुख्यालय कहाँ स्थित है? [2014, 16]

(क) कोचीन में
(ख) विशाखापत्तनम में
(ग) चेन्नई में
(घ) नई दिल्ली में

उत्तरमाला

1. (ग), 2. (क), 3. (क), 4. (ख), 5. (क), 6. (क), 7. (क), 8. (ग), 9. (ग), 10. (घ), 11. (घ)

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UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 12 Areas Related to Circles

UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 12 Areas Related to Circles (वृतों से सम्बंधित क्षेत्रफल)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Maths. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Maths Chapter 12 Areas Related to Circles.

प्रश्नावली 12.1 (NCERT Page 247)

प्र. 1. दो वृत्तों की त्रिज्या क्रमशः 19 cm और 9 cm हैं| उस वृत्त की त्रिज्या ज्ञात कीजिए जिसकी परिधि इन दोनों वृत्तों की परिधियों के योग के बराबर है|
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प्र. 2. दो वृत्तों की त्रिज्याएँ क्रमशः 8 cm और 6 cm हैं| उस (UPBoardSolutions.com) वृत्त की त्रिज्या ज्ञात कीजिए जिसका क्षेत्रफल इन दोनों वृत्तों के क्षेत्रफलों के योग के बराबर है|
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प्र. 3. आकृति 12.3 एक तीरंदाजी लक्ष्य को दर्शाती है, जिसमें केंद्र से बाहर की ओर पाँच क्षेत्र GOLD, RED, BLUE, BLACK और WHITE चिन्हित हैं, जिनसे अंक अर्जित किए जा सकते हैं | GOLD अंक वाले क्षेत्र का व्यास 21 cm है (UPBoardSolutions.com) तथा प्रत्येक अन्य पट्टी 10.5 cm चौड़ी है | अंक प्राप्त कराने वाले इन पाँचों क्षेत्रों में से प्रत्येक का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए|
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प्र. 4. किसी कार के प्रत्येक पहिये का व्यास 80 cm है| यदि यह (UPBoardSolutions.com) कार 66 km प्रति घंटे की चाल से चाल रही है, तो 10 मिनट में प्रत्येक पहिया कितने चक्कर लगाती है ?
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प्र. 5. निम्नलिखित में सही उत्तर चुनिए तथा अपने उत्तर का औचित्य दीजिए :
यदि एक वृत्त का परिमाप और क्षेत्रफल संख्यात्मक (UPBoardSolutions.com) रूप से बराबर है, तो उस वृत्त की त्रिज्या है:
(A) 2 मात्रक
(B) π मात्रक
(C) 4 मात्रक
(D) 7 मात्रक
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प्रश्नावली 12.2 (NCERT Page 252)

प्र. 1. 6 cm त्रिज्या वाले एक वृत्त के एक त्रिज्यखंड का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए, जिसका कोण 60° है|
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प्र. 2. एक वृत्त, के चतुर्थांश का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए, (UPBoardSolutions.com) जिसकी परिधि 22 cm है|
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प्र. 3. एक घड़ी की मिनट की सुई जिसकी लंबाई 14 cm है| इस सुई द्वारा 5 मिनट में रचित क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए|
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प्र. 4. 10 सेमी त्रिज्या वाले एक वृत्त की कोई जीवा केंद्र (UPBoardSolutions.com) पर समकोण अंतरित करती है| निम्नलिखित के क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए:
(i) संगत लघु वृत्तखंड
(ii) संगत दीर्घ त्रिज्यखंड ( π = 3.14 का प्रयोग कीजिए)
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प्र. 5. त्रिज्या 21 cm वाले वृत्त का एक चाप केंद्र पर 60° का कोण अंतरित करता है| ज्ञात कीजिए :
(i) चाप की लंबाई
(ii) चाप द्वारा बनाए गए त्रिज्यखंड का क्षेत्रफल
(iii) संगत जीवा द्वारा बनाए गए वृत्तखंड (UPBoardSolutions.com) का क्षेत्रफल
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प्र. 6. 15 cm त्रिज्या वाले एक वृत्त की कोई जीवा केंद्र पर 60° (UPBoardSolutions.com) का कोण अंतरित करती है| और दीर्घ वृत्तखंड़ों के क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
(π = 3.14 ओर √3 = 1.73 का प्रयोग कीजिए)
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प्र. 7. त्रिज्या 12 cm वाले एक वृत्त की कोई जीवा (UPBoardSolutions.com) केंद्र पर 120o का कोण अंतरित करती है| संगत वृत्तखंड़ का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए|
(π = 3.14 ओर √3 = 1.73 का प्रयोग कीजिए)
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प्र. 8. 15 cm भुजा वाले एक वर्गाकार घास के मैदान के (UPBoardSolutions.com) एक कोने पर लगे खूँटे से एक घोड़े को 5m लंबी रस्सी से बाँध दिया गया है (देखिए आकृति)| ज्ञात कीजिए :
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(i) मैदान के उस भाग का क्षेत्रफल जहाँ घोडा चार सकता है|
(ii) चरे जा सकने वाले क्षेत्रफल में वृद्धि, यदि घोड़े को 5 m लंबी (UPBoardSolutions.com) रस्सी के स्थान पर 10 m लंबी रस्सी से बाँध दिया जाए| (π = 3.14 का प्रयोग कीजिए)
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प्र. 9. एक वृताकार ब्रुच (brooch) को चाँदी के तार से बनाया जाना है जिसका व्यास 35 mm है| तार को वृत्त के 5 व्यासों को बनाने में भी प्रयुक्त किया गया है जो उसे 10 बराबर त्रिज्यखंडों में विभाजित करता है जैसाकि आकृति 12.12 में दर्शाया गया है| तो ज्ञात कीजिए :
(i) कुल वांछित चाँदी के तार की लंबाई (UPBoardSolutions.com)
(ii) ब्रूच के प्रत्येक त्रिज्यखंड का क्षेत्रफल
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प्र. 10. एक छतरी में आठ ताने हैं, जो बराबर दूरी पर (UPBoardSolutions.com) लगे हुए हैं (देखिए आकृति)| छतरी को 45 cm त्रिज्या वाला एक सपाट वृत्त मानते हुए, इसकी दो क्रमागत तानों के बीच का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए|
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प्र. 11. किसी कार के दो वाइपर (wipers) हैं, परस्पर कभी आच्छादित नहीं होते हैं | प्रत्येक वाइपर की पट्टी की लंबाई 25 cm है और 115° के कोण तक घूम कर सफाई कर सकता है| पट्टियों की प्रत्येक बुहार के साथ जितना (UPBoardSolutions.com) क्षेत्रफल साफ़ हो जाता है, वह ज्ञात कीजिए।
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प्र. 12. जहाजों को समुद्र में जलस्तर के नीचे स्थित चट्टानों की चेतावनी देने के लिए, एक लाइट हाउस (light house ) 80° कोण वाले एक त्रिज्यखंड में 16.5 km की दूरी तक लाल रंग का प्रकाश फैलाता है| समुद्र के उस भाग का क्षेत्रफल (UPBoardSolutions.com) ज्ञात कीजिए जिसमें जहाजों को चेतावनी दी जा सके। (π = 3.14 का प्रयोग कीजिए)
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प्र. 13. एक गोल मेज़पोश पर छः समान डिज़ाइन बने हुए हैं जैसाकि आकृति 12.14 में दर्शाया गया है। यदि मेज़पोश की त्रिज्या 28 cm है, तो 0.35 रू. प्रति वर्ग सेंटीमीटर की दर से इन डिजाइनों को बनाने की लागत ज्ञात कीजिए। (UPBoardSolutions.com) (√3 = 1.73 का प्रयोग कीजिए)
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प्र. 14. निम्नलिखित में सही उत्तर चुनिए :
त्रिज्या R वाले के उस त्रिज्यखंड का क्षेत्रफल जिसका कोण p° है, निम्नलिखित है :
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प्रश्नावली 12.3 (NCERT Page 257)

(जब तक अन्यथा न कहा जाए, π = [latex]\frac { 22 }{ 7 }[/latex] का प्रयोग कीजिए।)
प्र. 1. आकृति में, छायांकित भाग का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए, (UPBoardSolutions.com) यदि PQ = 24 सेमी., PR = 7 सेमी. तथा O वृत्त का केंद्र है।
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प्र. 2. आकृति में, छायांकित भाग का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए, यदि केंद्र O (UPBoardSolutions.com) वाले दोनों सकेंद्रीय वृत्तों की त्रिन्याएँ क्रमशः 7 सेमी. और 14 सेमी. हैं तथा ∠AOC = 40° है।
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प्र. 3. आकृति में, छायांकित भाग का क्षेत्रफल ज्ञात (UPBoardSolutions.com) कीजिए, यदि ABCD भुजा 14 सेमी. का एक वर्ग है तथा APD और BPC दो अर्धवृत्त हैं।
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प्र. 4. आकृति में, छायांकित भाग का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए, जहाँ भुजा 12 सेमी. वाले एक समबाहु त्रिभुज OAB के शीर्ष O को केंद्र मान कर 6 सेमी. त्रिज्या वाला एक वृत्तीय चाप खींचा गया है।
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प्र. 5. भुजा 4 सेमी. वाले एक वर्ग के प्रत्येक कोने से 1 (UPBoardSolutions.com) सेमी. त्रिज्या वाले वृत्त का एक चतुर्थांश काटा गया है तथा बीच में 2 सेमी. व्यास का एक वृत्त भी काटा गया है, जैसाकि आकृति में दर्शाया गया है। वर्ग के शेष भाग का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
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प्र. 6. एक वृत्ताकार मेज़पोश, जिसकी त्रिज्या 32 सेमी. है, में बीच में एक (UPBoardSolutions.com) समबाहु त्रिभुज ABC छोड़ते हुए एक डिज़ाइन बना हुआ है, जैसाकि आकृति में दिखाया गया है। इस डिज़ाइन का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
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प्र. 7. आकृति में, ABCD भुजा 14 सेमी. वाला एक वर्ग है। A, B, C और D (UPBoardSolutions.com) को केंद्र मानकर, चार वृत्त इस प्रकार खींचे गए हैं कि प्रत्येक वृत्त तीन शेष वृत्तों में से दो वृत्तों को बाह्य रूप से स्पर्श करता है। छायांकित भाग का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
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प्र. 8. आकृति एक दौड़ने का पथ (racing track) दर्शाती है, जिसके बाएँ और दाएँ सिरे अर्धवृत्ताकार हैं। दोनों आंतरिक समांतर रेखाखंडों के बीच की दूरी 60 मी. है तथा इनमें से प्रत्येक रेखाखंड 106 मी. लंबा है। यदि यह पथ 10 मी. (UPBoardSolutions.com) चौड़ा है, तो ज्ञात कीजिए।
(i) पथ के आंतरिक किनारों के अनुदिश एक पूरा चक्कर लगाने में चली गई दूरी।
(ii) पथ का क्षेत्रफल।
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प्र. 9. आकृति में, AB और CD केंद्र 0 वाले एक वृत्त के दो परस्पर (UPBoardSolutions.com) लंब व्यास हैं। तथा OD छोटे वृत्त को व्यास है। यदि OA = 7 सेमी. है, तो छायांकित भाग का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
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प्र. 10. एक समबाहु त्रिभुज ABC का क्षेत्रफल 17320.5 सेमी. है। इस त्रिभुज के प्रत्येक शीर्ष को केंद्र मानकर त्रिभुज की भुजा के आधे के बराबर की त्रिज्या लेकर एक वृत्त खींचा जाता है ( देखिए आकृति)। छायांकित भाग का क्षेत्रफल (UPBoardSolutions.com) ज्ञात कीजिए। (π = 3.14 और √3 = 1.73205 लीजिए।)
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प्र. 11. एक वर्गाकार रूमाल पर, नौ वृत्ताकार डिजाइन बने हैं, जिनमें से प्रत्येक की त्रिज्या 7 सेमी. है (देखिए आकृति)। रूमाल के शेष भाग का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
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प्र. 12. आकृति में, OACB केंद्र 0 और त्रिज्या 3.5 सेमी. वाले एक वृत्त को चतुर्थांश है। यदि OD = 2 सेमी. है, तो । निम्नलिखित के क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए:
(i) चतुर्थांश OACB
(ii) छायांकित भाग।
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प्र. 13. आकृति में, एक चतुर्थांश OPBQ के अंतर्गत एक वर्ग (UPBoardSolutions.com) OABC बना हुआ है। यदि OA = 20 सेमी. है, तो छायांकित भाग का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए। (π = 3.14 लीजिए।) [CBSE Sample Paper 2011] C]
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प्र. 14. AB और CD केंद्र 0 तथा त्रिज्याओं 21 सेमी. और 7 सेमी. (UPBoardSolutions.com) वाले दो संकेंद्रीय वृत्तों के क्रमशः दो चाप हैं ( देखिए आकृति)। यदि ∠AOB = 30° है, तो छायांकित भाग को क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
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प्र. 15. आकृति में, ABC त्रिज्या 14 सेमी. वाले एक वृत्त का चतुर्थांश है तथा BC को व्यास मान कर एक अर्धवृत्त खींचा गया है। छायांकित भाग का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
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प्र. 16. आकृति में, छायांकित डिजाइन का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए, (UPBoardSolutions.com) जो 8 सेमी. त्रिज्याओं वाले दो वृत्तों के चतुर्थांशों के बीच उभयनिष्ठ है।
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UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 2 तुलसीदास (काव्य-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 2 तुलसीदास (काव्य-खण्ड)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 2 तुलसीदास (काव्य-खण्ड).

कवि-परिचय

प्रश्न 1.
तुलसीदास की जीवनी पर प्रकाश डालते हुए उनकी कृतियों (रचनाओं) का उल्लेख कीजिए। [2009, 10]
या
कवि तुलसीदास का जीवन-परिचय दीजिए तथा उनकी एक रचना का नाम लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उतर
गोस्वामी तुलसीदास भक्तिकाल की रामभक्ति काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि थे। इनकी भक्ति दास्य भाव की थी। इन्होंने श्रीराम के शील, शक्ति और सौन्दर्य के समन्वित रूप की अवतारणा की। ये एक सिद्ध कवि थे जो देश और काल (UPBoardSolutions.com) की सीमाओं को लाँघ चुके थे। मानव प्रकृति के जितने रूपों का हृदयग्राही वर्णन इनके काव्य में मिलता है, वैसा अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। इनका ‘श्रीरामचरितमानस’ मानव संस्कृति का अमर-काव्य है।

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जीवन-परिचय–गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म सन् 1532 ई० (भाद्रपद, शुक्ल पक्ष, एकादशी, सं० 1589 वि०) में बाँदा जिले के राजापुर ग्राम में हुआ था। कुछ विद्वान् इनका जन्म एटा जिले के ‘सोरो’ ग्राम में मानते हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने राजापुर का ही समर्थन किया है। तुलसी सरयूपारीण ब्राह्मण थे। इनके पिता आत्माराम दुबे और माता हुलसी ने अभुक्त मूल नक्षत्र में उत्पन्न होने के कारण इन्हें त्याग दिया था। इनका बचपन अनेकानेक आपदाओं के बीच व्यतीत हुआ। सौभाग्य से इनको बाबा नरहरिदास जैसे गुरु का वरदहस्त प्राप्त हो गया। इन्हीं की कृपा से इनको शास्त्रों के अध्ययन-अनुशीलन का अवसर मिला। स्वामी जी के साथ ही ये काशी आये थे, जहाँ परम विद्वान् महात्मा शेष सनातन जी ने इन्हें वेद-वेदांग, दर्शन, इतिहास, पुराण आदि में निष्णात कर दिया।

तुलसी का विवाह दीनबन्धु पाठक की सुन्दर और विदुषी कन्या रत्नावली से हुआ था। इन्हें अपनी रूपवती पत्नी से अत्यधिक प्रेम था। एक बार पत्नी द्वारा बिना कहे मायके चले जाने पर अर्द्धरात्रि में आँधी-तूफान का सामना करते हुए ये अपनी ससुराल जा पहुँचे। इस पर पत्नी ने इनकी भर्त्सना की

अस्थि चर्म मय देह मम, तामें ऐसी प्रीति।
तैसी जो श्रीराम महँ, होति न तौ भवभीति॥

अपनी पाली की फटकार से तुलसी को वैराग्य हो गया। अनेक तीर्थों का भ्रमण करते हुए ये राम के पवित्र चरित्र का गायन करने लगे। अपनी अधिकांश रचनाएँ इन्होंने चित्रकूट, काशी और अयोध्या में ही लिखी हैं। काशी के असी घाट पर सन् 1623 ई० (श्रावण, (UPBoardSolutions.com) शुक्ल पक्ष, सप्तमी, सं०1680 वि०) में इनकी पार्थिव लीला का संवरण हुआ। इनकी मृत्यु के सम्बन्ध में निम्नलिखित दोहा प्रसिद्ध है

संवत् सोलह सौ असी, असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर ॥

कृतियाँ (रचनाएँ)—तुलसीदास जी द्वारा रचित बारह ग्रन्थ प्रामाणिक माने जाते हैं, जिनमें श्रीरामचरितमानस प्रमुख है। इनकी रचनाओं का विवरण इस प्रकार है-

(1) श्रीरामचरितमानस-तुलसीदास जी का यह सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ है। इसमें मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पावन चरित्र के द्वारा हिन्दू जीवन के सभी महान् आदर्शों की प्रतिष्ठा हुई है।
(2) विनयपत्रिका-इसमें तुलसीदास जी ने कलिकाल के विरुद्ध रामचन्द्र जी के दरबार में पत्रिका प्रस्तुत की है। यह काव्य तुलसी के भक्त हृदय का प्रत्यक्ष दर्शन है।
(3) कवितावली—यह कवित्त-सवैया में रचित श्रेष्ठ मुक्तक काव्य है। इसमें रामचरित के मुख्य प्रसंगों का मुक्तकों में क्रमपूर्वक वर्णन है। यह ब्रजभाषा में रचित ग्रन्थ है।
(4) गीतावली-यह गेय पदों में ब्रजभाषा में रचित सुन्दर काव्य है। इसमें प्राय: सभी रसों का सुन्दर परिपाक हुआ है तथा अनेक राग-रागिनियों का प्रयोग मिलता है। यह रचना 230 पदों में निबद्ध है।
(5) कृष्ण गीतावली—यह कृष्ण की महिमा को लेकर 61 पदों में लिखा गया ब्रजभाषा का काव्य है।
(6) बरवै रामायण-बरवै छन्दों में रामचरित का वर्णन करने वाला यह एक लघु काव्य है। इसमें अवधी भाषा का प्रयोग किया गया है।
(7) रामलला नहछू–संहलोकगीत शैली में सोहर छन्दों को लघु पुस्तिका है, जो इनकी प्रारम्भिक रचना मानी जाती है।
(8) वैराग्य संदीपनी-इसमें सन्तों के लक्षण दिये गये हैं। इसमें तीन प्रकाश हैं। पहले प्रकाश के 6 छन्दों में मंगलाचरण है। दूसरे प्रकाश में संत-महिमा का वर्णन और तीसरे में शान्तिभाव का वर्णन है।
(9) जानकी-मंगल-इसमें सीताजी और श्रीराम के शुभविवाह के उत्सव का वर्णन है।
(10) पार्वती-मंगल—इसमें पूर्वी अवधी में शिव-पार्वती के (UPBoardSolutions.com) विवाह का काव्यमय वर्णन है।
(11) दोहावली-इसमें दोहा शैली में नीति, भक्ति, नाम-माहात्म्य और राम-महिमा का वर्णन है।
(12) रामाज्ञा प्रश्न-यह शकुन-विचार की उत्तम पुस्तक है। इसमें सात सर्ग हैं।

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साहित्य में स्थान–गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी-साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। इनके द्वारा हिन्दी कविता की सर्वतोमुखी उन्नति हुई। इन्होंने अपने काल के समाज की विसंगतियों पर प्रकाश डालते हुए उनके निराकरण के उपाय सुझाये। साथ ही अनेक मतों और (UPBoardSolutions.com) विचारधाराओं में समन्वय स्थापित करके समाज में पुनर्जागरण का मन्त्र फेंका। इसीलिए इन्हें समाज का पथ-प्रदर्शक कवि कहा जाता है। इनके सम्बन्ध में अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध’ जी ने उचित ही लिखा है

कविता करके तुलसी न लसे । कविता लसी पा तुलसी की कला ॥

पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या

धनुष-भंग

प्रश्न 1.
उदित उदयगिरि मंच पर, रघुबर बालपतंग।
बिकसे संत सरोज सब, हरषे लोचन शृंग ॥ [2017]
उतर
[ उदयगिरि = उदयाचल पर्वत। बालपतंग = बाल सूर्य, प्रात:कालीन सूर्य। सरोज = कमल। लोचन = नेत्र। भुंग = भंवरे।]

सन्दर्भ-प्रस्तुत काव्य-पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘काव्य-खण्ड’ के ‘धनुष-भंग’ कविता शीर्षक से अवतरित हैं। यह अंश हमारी पाठ्य-पुस्तक में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाएड से संकलित है।

[विशेष—-इस शोक के शेष सभी पद्यांशों के लिए (UPBoardSolutions.com) यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग-प्रस्तुत पद्य में धनुष-भंग के लिए बने हुए मंच पर रामचन्द्र जी के चढ़ने का वर्णन किया गया है।

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व्याख्या-श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि उदयाचल पर्वत के समान बने हुए विशाल मंच पर श्रीरामचन्द्र जी के रूप में बाल सूर्य के उदित होते ही सभी सन्त रूपी कमल खिल उठे और नेत्ररूपी भंवरे हर्षित हो उठे। आशय यह है कि श्रीराम के मंच पर चढ़ते ही सभा में उपस्थित सभी सज्जन पुरुष अत्यधिक प्रसन्न हो गये।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. यहाँ पर मंच की विशालता और श्रीरामचन्द्र जी के सौन्दर्य का वर्णन किया गया है।
  2. भाषा–अवधी।
  3. शैली–प्रबन्ध और चित्रात्मक।
  4. रस-अद्भुत।
  5. छन्द-दोहा।।
  6. अलंकार-उपमा, रूपक और अनुप्रास अलंकार का मंजुल प्रयोग।
  7. गुण-माधुर्य।
  8. भावसाम्य–कविवर बिहारी ने भी श्रीकृष्ण के सौन्दर्य का चित्रण करते हुए लिखा है-“मनौ नीलमनि सैल पर, आतपु पर्यौ प्रभात।”

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प्रश्न 2.
नृपन्ह केरि आसा निसि नासी । बचन नखत अवलीन प्रकासी ॥
मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने ॥
भए बिसोक कोक मुनि देवा। बरसहिं सुमन जनावहिं सेवा ॥
गुर पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु मागा॥
सहजहिं चले सकल जग स्वामी । मत्त मंजु बर कुंजर गामी ॥
चलत राम सब पुर नर नारी । पुलक पूरि तन भए सुखारी ॥
बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे । जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे ॥
तौं सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ रामु गनेस गोसाईं ॥
उतर
[ निसि = रात्रि। नखते = नक्षत्र, तारे। अवली = पंक्ति, समूह। मानी = (UPBoardSolutions.com) अभिमानी। लुकाने = छिपना। कोक = चकवा, कोयल। आयसु – आज्ञा। बर = श्रेष्ठ। कुंजर = हाथी। पुलक = रोमांच। पितर = पूर्वज। मृनाल = कमल की नाल।]।

प्रसंग—प्रस्तुत पद्य में सभा में उपस्थित कतिपय राजाओं की स्थिति, राम की विनम्रता तथा सम्पूर्ण नगरवासियों की मनोवृत्ति का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्र जी के मंच पर चढ़ते ही सभा में उपस्थित अन्य राजाओं की आशारूपी रात्रि नष्ट हो गयी और उनके वचनरूपी तारों के समूह का चमकना बन्द हो गया, अर्थात् वे मौन हो गये। अभिमानी राजारूपी कुमुद संकुचित हो गये और कपटी राजारूपी उल्लू छिप गये। मुनि और देवतारूपी चकवे शोकरहित अर्थात् प्रसन्न हो गये। वे फूलों की वर्षा करके अपनी सेवा-अनुग्रह प्रकट करने लगे। इसके पश्चात् श्रीरामचन्द्र जी ने अत्यधिक स्नेह के साथ अपने गुरु विश्वामित्र के चरणों की वन्दना करने के बाद वहाँ उपस्थित अन्य मुनियों से भी आज्ञा माँगी।

पुनः गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि समस्त चराचर जगत के स्वामी श्रीरामचन्द्र जी सुन्दर, मतवाले और श्रेष्ठ हाथी की चाल से चले जो कि उनकी स्वाभाविक चाल थी। श्रीरामचन्द्र जी के चलते ही सभा में उपस्थित नगर के सभी स्त्री-पुरुष प्रसन्न हो गये और उनके शरीर रोमांच से पुलकित हो गये। समस्त स्त्री-पुरुषों ने अपने पूर्वजों की वन्दना की और अपने पुण्य कर्मों का स्मरण करते हुए कहा कि हे गणेश जी! यदि हमारे किये हुए पुण्य कर्मों का किंचित् भी फल मिलता हो तो श्रीरामचन्द्र जी शिवजी के इस प्रचण्ड धनुष को कमल की नाल (दण्ड) के समान तोड़ डालें। आय यह है कि सभा में उपस्थित कुटिल और अभिमानी राजाओं के अतिरिक्त सभी व्यक्ति यह चाहते थे कि श्रीराम इस धनुष को तोड़ दें।

काव्यगत सौन्दर्य–

  1. प्रस्तुत पद्यांश में इस बात का स्पष्ट वर्णन किया गया है कि नगर के समस्त नर-नारी चाहते थे कि सीता को वर रूप में राम ही प्राप्त हों।
  2. भाषा-अवधी।
  3. शैली–प्रबन्ध और वर्णनात्मक।
  4. रस-भक्ति।
  5. छन्द–दोहा।
  6. अलंकार-रूपक और अनुप्रास (UPBoardSolutions.com) अलंकार का मनमोहक प्रयोग।
  7. गुण–प्रसाद।
  8. शब्दशक्ति-अभिधा और व्यंजना।

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प्रश्न 3.
रामहि प्रेम समेत लखि, सखिन्ह समीप बोलाइ।
सीता मातु सनेह बस, बचन कहइ बिलखाइ ।
उतर
[ लखि = देवकर। खस = वशीभूत होकर। बिलखाइ = विलाप करते हुए!]

प्रसंग-प्रस्तुत पद्य में सीताजी की माता का श्रीरामचन्द्र जी के प्रनि अन्दिय स्नेह व्यक्त हुआ है।

व्याख्या-गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि मंच पर अवतरित हुए श्रीरामचन्द्र जी को अत्यधिक वात्सल्य भाव के साथ देखकर जनकनन्दिनी सीताजी की माता ने अपनी सभी सखियों-सहेलियों को अपने समीप बुला लिया और स्नेहवश (UPBoardSolutions.com) विलाप करते हुए के सदृश उनसे कहने लगीं।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. प्रस्तुत पद में सीताजी की माता का राम के प्रति वात्सल्य भाव का वर्णन हुआ है।
  2. भाषा-अवधी
  3. शैली–प्रबन्ध।
  4. रसवात्सल्य।
  5. छन्द-दोहा।
  6. अलंकार– अनुप्रास।
  7. गुण–प्रसाद।।

प्रश्न 4.
सखि सब कौतुकु देखनिहारे । जेउ कहावत हितू हमारे ॥
कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं । ए बालक असि हठ भलि नाहीं ॥
रावन बान छुआ नहिं चापा। हारे सकल भूप करि दापा ॥
सो धनु राजकुर कर देहीं। बाल मराल कि मंदर लेहीं ।
भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी ॥
बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी ॥
कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा॥
रबि मंडल देखत लघु लागा। उदय तासु तिभुवन तम भागा ॥ [2015]
उतर
[ कौतुकु = तमाशा। हितू = हित की चिन्ता करने वाले। गुर = गुरु। भलि = अच्छा। चापा = धनुष। दापा = घमण्ड। कर = हाथ। मराल = हंस। मंदर = मन्दराचल पर्वत। सिरानी = समाप्त हो जाना। बिधि = भाग्य। तेजवंत = तेज से युक्त। कुंभज = कुम्भ से उत्पन्न, अगस्त्य ऋषि। सुजसु = सुयश। ]

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प्रसंग-प्रस्तुत पद्य में सीताजी की माता का राम के प्रति चिन्ता तथा उनकी सखी के द्वारा उन्हें समझाये जाने का वर्णन किया गया है। |

व्याख्या–गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि सीताजी की माता अपनी सखी से कह रही हैं कि हे सखी! ये जो हमारे हित की चिन्ता करने वाले लोग हैं, वे सब भी तमाशा ही देखने वाले हैं। कोई भी इनके गुरु (विश्वामित्र) को समझाकर यह नहीं कहता है कि ये श्रीराम बालक हैं और इनके लिए ऐसा हठ करना उचित नहीं है। रावण और बाण जैसे असुरों ने भी जिस धनुष को छुआ तक नहीं और यहाँ उपस्थित सभी राजा घमण्ड (UPBoardSolutions.com) करके पराजित हो गये, वही धनुष इस सुकुमार रामचन्द्र के हाथ में दे रहे हैं। कोई इन्हें यह क्यों नहीं समझाता कि हंस के बच्चे भी कहीं मन्दराचल पर्वत को उठा सकते हैं। आशय यह है कि महादेव के जिस धनुष को रावण और बाण जैसे जगद्विजयी वीरों ने छुआ तक नहीं और दूर से ही प्रणाम करके चल दिये, उसे तोड़ने के लिए विश्वामित्र का श्रीराम को आज्ञा देना और उनका उसे तोड़ने के लिए आगे बढ़ना उनका बोल-हठ जान पड़ा। इसीलिए वे कहती हैं कि गुरु विश्वामित्र को कोई समझाता क्यों नहीं है।

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि सीताजी की माता कहती हैं कि दूसरों की क्या कही जाये, राजा जनक तो स्वयं बड़े समझदार और ज्ञानी हैं, उन्हें तो गुरु विश्वामित्र को समझाने की चेष्टा करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि उनका भी समस्त ज्ञान और सयानापन समाप्त हो गया है। हे सखी ! क्या करू, विधाता (ब्रह्मा) की गति; अर्थात् वे क्या चाहते हैं; कुछ समझ में नहीं आ रही है। इतना कहकर जब वे चुप । हो जाती हैं तब उनकी एक चतुर; अर्थात् श्रीरामचन्द्र जी के महत्त्व को जानने वाली; सखी कोमल वाणी में उनसे कहती है कि “हे रानी ! देखने में छोटा होने पर भी तेज से युक्त मनुष्य को छोटा नहीं मानना चाहिए। कहाँ कुम्भज अर्थात् घड़े से उत्पन्न होने वाले छोटे से मुनि अगस्त्य और कहाँ विशाल समुद्र। लेकिन उन्होंने उस समुद्र को सोख लिया। इस कारण से उनका सुयश सम्पूर्ण संसार में छाया हुआ है। पुनः सूर्यमण्डल भी देखने में कितना छोटा लगता है, लेकिन उसके उदय होते ही तीनों लोकों (भूलोक, भुवक और स्वलोंक) का अन्धकार भाग जाता है।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. छोटो जानकर योग्यता पर सन्देह नहीं किया जाना चाहिए, इसकी कवि ने तर्कयुक्त अभिव्यक्ति की है।
  2. भाषा-अवधी
  3. शैली-प्रबन्ध और विवेचनात्मक।
  4. रसवात्सल्य।
  5. छन्द-चौपाई।
  6. अलंकार-अनुप्रास।
  7. गुण–प्रसाद।।

प्रश्न 5.
मंत्र परम लघु जासु बस, बिधि हरि हर सुर सर्ब ।
महामत्त गजराज कहुँ, बस कर अंकुस खर्ब ।।। [2015, 16]
उतर
[ बस = वशीभूत। बिधि = ब्रह्मा। हरि = विष्णु। हर = शंकर। सुर = देवता। अंकुस = अंकुश। खर्ब = छोटा।]

प्रसंग—प्रस्तुत पद्य में मन्त्र और अंकुश के द्वारा सभी देवताओं और हाथी को नियन्त्रित किये जाने । का वर्णन है। |

व्याख्या-गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि धनुष-भंग के समय जब सीताजी की माता श्रीराम को छोटा समझकर, धनुष तोड़ने में असमर्थ मानकर अपनी सखी से शंका प्रकट करती हैं, तब उनकी सखी विभिन्न उदाहरणों के द्वारा उनको (UPBoardSolutions.com) समझाती हुई कहती हैं कि, “जिस मन्त्र के वश में सभी देवता, ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि भी रहने को विवश होते हैं, वह मन्त्र भी अत्यधिक छोटा ही होता है।” अत्यधिक विशाल और मदमत्त गजराज को भी महावत छोटे से अंकुश के द्वारा अपने वश में कर लेता है। |

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. भाषा-अवधी।
  2. शैली–प्रबन्ध और उद्धरण।
  3. छन्द-दोहा।
  4. अलंकार-अनुप्रास।
  5. शब्द-शक्ति-अभिधा और लक्षणा।।

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प्रश्न 6.
काम कुसुम धनु सायक लीन्हे । सकल भुवन अपने बस कीन्हे ॥
देबि तजिअ संसउ अस जानी। भंजब धनुषु राम सुनु रानी ॥
सखी बचन सुनि भै परतीती । मिटा बिषादु बढी अति प्रीती ॥[2016]
तब रामहि बिलोकि बैदेही । सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही ॥
मनहीं मन मनाव अकुलानी । होहु प्रसन्न महेस भवानी ॥
करहु सफल आपनि सेवकाई । करि हितु हरहु चाप गरुआई ॥
गननायक बरदायक देवा । आजु लगें कीन्हिउँ तुझे सेवा ॥
बार बार बिनती सुनि मोरी । करहु चाप गुरुता अति थोरी ॥
उतर
[ कुसुम = पुष्प। सायक = बाण। संसउ = संशय। भंजब = तोड़ेंगे। बिषाद् = उदासी, निराशा। बिलोकि = देखकर। जेहि तेही = जिस किसी की। अकुलानी = व्याकुल होकर। सेवकाई = सेवा। हरहु = हरण कर लीजिए। गरुआई = गुरुता, भारीपन।]

प्रसंग-प्रस्तुत पद में सीताजी की माताजी का राम की क्षमता के सम्बन्ध में विश्वास और सीता द्वारा विभिन्न देवताओं की प्रार्थना किये जाने का वर्णन किया गया है। |

व्याख्या-गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि पुनः सीताजी की माताजी की सहेली उनको समझाती हुई कहती है कि कामदेव ने फूलों का ही धनुष-बाण लेकर समस्त लोकों को अपने वशीभूत कर रखा है। हे देवी ! इस बात को अच्छी तरह से समझकर आप अपने सन्देह का त्याग कर दीजिए। हे रानी !

आप सुनिए, श्रीरामचन्द्र जी धनुष को अवश्य ही तोड़ देंगे। सखी के मुख से इस प्रकार के सान्त्वनादायक वचनों को सुनकर जनक-भामिनी को श्रीरामचन्द्र जी की सामर्थ्य के सम्बन्ध में विश्वास हो गया, उनकी उदासी समाप्त हो गयी और श्रीराम के (UPBoardSolutions.com) प्रति उनके मन में स्नेह और भी अधिक बढ़ गया। इसी समय श्रीरामजी को देखकर; अर्थात् उनके सुकोमल बाह्य व्यक्तित्व का अवलोकन कर; सीताजी जो भी देवता उनके ध्यान में आया, उससे रामजी की सहायता हेतु विनती करने लगीं।

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि जनकनन्दिनी सीताजी व्याकुलचित्त होकर मन-ही-मन में प्रार्थना कर रही हैं कि “हे भगवान् शंकर ! हे माता पार्वती ! मुझ पर प्रसन्न हो जाइए और मैंने आपकी जो कुछ भी सेवा-आराधना की है उसका सुफल प्रदान करते हुए और मुझ पर कृपा करके धनुष की गुरुता अर्थात् भारीपन को बहुत ही कम कर दीजिए।” पुन: गणेश जी की प्रार्थना करती हुई कहती हैं कि “हे गणों के नायक और मन-वांछित वर देने वाले गणेश जी ! मैंने आज ही के दिन के लिए; अर्थात् श्रीराम जैसे पुरुष को पति-रूप में प्राप्त करने की इच्छा से; आपकी पूजा-अर्चना की थी। आप बार-बार की जा रही मेरी विनती को सुनिए और धनुष के भारीपन को बहुत ही कम कर दीजिए।”

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. मनवांछित प्राप्ति के लिए विभिन्न देवताओं की प्रार्थना करने की भारतीय परम्परा को स्पष्ट किया गया है।
  2. भाषा-अवधी।
  3. शैली-प्रबन्ध और वर्णनात्मक।
  4. रस— भक्ति।
  5. छन्द-चौपाई।
  6. अलंकार-अनुप्रास और पुनरुक्तिप्रकाश।
  7. गुण–प्रसाद।
  8. शब्दशक्ति-अभिधा और लक्षणा।

प्रश्न 7.
देखि देखि रघुबीर तन, सुर मनाव धरि धीर।
भरे बिलोचन प्रेम जल, पुलकावली सरीर ॥
उतर
[रघुबीर = रामचन्द्र जी। सुर = देवता। धीर = धैर्य। बिलोचन = नेत्रों में। पुलकावली = प्रेम और हर्ष से उत्पन्न रोमांच।]

प्रसंग-प्रस्तुत पद में सीताजी की श्रीराम के प्रति प्रेमानुरक्ति का वर्णन हुआ है।

व्याख्या-गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि सीताजी बार-बार श्रीरामचन्द्र जी की ओर देख रही हैं और धैर्य धारण करके देवताओं को मनोवांछित वर प्रदान करने के लिए मनाती जा रही हैं; अर्थात् अनुनय-विनय कर रही हैं। उनके नेत्रों में (UPBoardSolutions.com) प्रेम के आँसू भरे हुए हैं और शरीर में रोमांच हो रहा है।

काव्यगत सौन्दर्य

  1. सीताजी का श्रीराम के प्रति प्रेम का सजीव चित्रण हुआ है।
  2. भाषाअवधी।
  3. शैली–प्रबन्ध और वर्णनात्मक।.
  4. रस-श्रृंगार।
  5. छन्द-दोहा
  6. अलंकारपुनरुक्तिप्रकाश, रूपक और अनुप्रास।
  7. गुण-माधुर्य।।

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प्रश्न 8.
नीके निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा ॥
अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी ॥
सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई ॥
कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा । कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा ।।
बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा ॥
सकल सभा कै मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी॥
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी । होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी॥
अति परिताप सीय मन माहीं । लव निमेष जुर्ग सय सम जाहीं।।
उतर
[ नीके = अच्छी तरह। निरखि = देखकर। पनु := प्रण। छोभा = क्षोभ, दु:ख। दारुनि = कठोर। कुलिसहु = हीरे के समान। उर = हृदय। सिरस = शिरीष। भोरी = भ्रम में पड़ना। जड़ता = कठोरता, मूर्खता। परिताप = सन्ताप, दु:ख। निमेष = पलक झपकने में लगने वाला समय।]

प्रसंग-प्रस्तुत पद में श्रीराम के प्रति सीताजी की अनुरक्ति का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया गया है। |,

व्याख्या-गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्र जी की शोभा-सौन्दर्य को जी भरकर देख लेने के पश्चात् और पिताश्री के प्रण का स्मरण करके सीताजी का मन दु:खी हो जाता है। वे मन-हीमन विचार करने लगती हैं; अर्थात् स्वयं से ही कहने लगती हैं कि “ओह ! पिताजी ने बहुत ही कठोर हठ ठान ली है और वे इसको कुछ भी लाभ-हानि समझ नहीं पा रहे हैं। भयभीत होने के कारण (राजपद से) कोई भी मन्त्री उन्हें उचित सलाह नहीं दे रहा है। वस्तुतः विद्वानों की सभा में यह बड़ा ही अनुचित कार्य हो रहा है। यह धनुष तो वज्र से भी अधिक कठोर है, जिसके समक्ष ये कोमल शरीर वाले श्याम वर्ण किशोर की क्या तुलना; (UPBoardSolutions.com) अर्थात् कोई समानता ही नहीं है। | गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि, जनकनन्दिनी सीताजी ब्रह्मा से कहती हैं कि “भाग्य को लिखने वाले हे विधाता ! मैं अपने हृदय में किस तरह से धैर्य धारण करू, अर्थात् मैं धैर्य भी धारण नहीं कर सकती, क्योंकि सारी सभा की बुद्धि ही फिर गयी है। वे यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि कहीं शिरीष के फूल के कण से हीरे को छेदा जा सकता है। अत: सब ओर से निराश होकर हे शिवजी के धनुष ! अब मुझे केवल तुम्हारा ही सहारा है। अब तुम अपनी कठोरता लोगों पर डाल दो और श्रीरामचन्द्र जी के सुकुमार शरीर को देखकर उतने ही हल्के हो जाओ। इस प्रकार विचार करते-करते सीताजी के मन में इतना सन्ताप हो रहा है कि पलक झपकने में लगने वाले समय (निमेष) का एक अंश भी सौ युगों (समये-मापन का अत्यधिक दीर्घ परिमाण) के समान व्यतीत हो रहा है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. राम के शरीर की कोमलता का अनुभव कर ईश्वर से उन पर अनुग्रह करने की प्रार्थना की गयी है।
  2. भाषा-अवधी
  3. शैली–प्रबन्ध।
  4. रस-शृंगार और भक्ति।
  5. छन्द– दोहा।
  6. अलंकार-अनुप्रास और उपमा।
  7. गुण–माधुर्य और प्रसाद।।

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प्रश्न 9.
प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि, राजत लोचन लोल।
खेलत मनसिज मीन जुग, जनु बिधु मंडल डोल ।।
उतर
[ चितइ व चितव = देखकर। महि = पृथ्वी। राजत = सुशोभित। लोचन = नेत्र। मनसिज = कामदेव। मीन = मछली। बिधु = चन्द्रमा। ]

प्रसंग-प्रस्तुत पद में सीता जी के सौन्दर्य का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-गोस्वामी तुलसीदास जी सीता जी की वाणी की असमर्थता को व्यक्त करते हुए आलंकारिक रूप में कह रहे हैं कि पहले प्रभु श्रीरामचन्द्र जी की ओर देखकर और तत्पश्चात् लज्जा से पृथ्वी की ओर देखती हुई सीताजी के चंचल नेत्र इस प्रकार (UPBoardSolutions.com) सुशोभित हो रहे हैं मानो चन्द्रमण्डल रूपी डोल में कामदेव की दो मछलियाँ क्रीड़ा कर रही हों।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. नेत्रों की चंचलता की तुलना मछलियों से की गयी है।
  2. भाषा-अवधी।
  3. शैली-प्रबन्ध और वर्णनात्मक।
  4. रस-शृंगार।
  5. छन्द- दोहा
  6. अलंकार-उत्प्रेक्षा और अनुप्रसि।
  7. गुण-माधुर्य।

प्रश्न 10.
गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी ॥
लोचन जल रह लोचन कोना। जैसे परम कृपन कर सोना ॥
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रीतिति उर आनी ॥
तन मन बचन मोर पनु साचा । रघुपति पद सरोज चितु राचा ॥
तौ भगवानु सकल उर बासी । करिहि मोहि रघुबर कै दासी ॥
जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू । सो तेहि (UPBoardSolutions.com) मिलइ न कछु संदेहू ॥
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सब जाना॥
सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसे । चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसे ॥ (2015)
उतर
[ गिरा = वाणी। अलिनि = भ्रमर का स्त्रीलिंग। कृपन = कंजूस। साचा = सच्चा। राचा = अनुरक्त। तकेउ = देखकर। गरुरु = गरुड़ पक्षी। ब्यालहिं = सर्प।]

प्रसंग-प्रस्तुत पद में सीताजी की राम के प्रति प्रगाढ़ प्रेमानुरक्ति का अत्यधिक सजीव वर्णन किया गया है। |

व्याख्या-गोस्वामी तुलसीदास जी सीताजी की वाणी की असमर्थता को व्यक्त करते हुए आलंकारिक रूप में कह रहे हैं कि सीताजी की वाणी रूपी भ्रमरी को उनके मुख रूपी कमल ने रोक रखा है। आशय यह है कि उनके मुख से आवाज ही नहीं निकल पा रही है। लज्जा रूपी रात्रि को सम्मुख देखकर भी वह प्रकट नहीं हो पा रही है। नेत्रों का जल नेत्रों के कोने में उसी प्रकार रुक गया है जैसे अत्यधिक कंजूस का गड़ा हुआ सोना गड़ा ही रह जाता है। आशय यह है कि सीता जी अपनी असमर्थता को आँसुओं के द्वारा प्रकट करने में भी अक्षम हैं। अपनी इस बढ़ी हुई व्याकुलता को समझकर सीताजी प्रीतिपूर्वक संकोच करने लगीं। तत्पश्चात् उन्होंने हृदय में धैर्य धारण करके मन में विश्वास किया कि यदि तन, मन और वन से मेरा प्रण सच्चा है और श्रीरामचन्द्र जी के चरण-कमलों में मेरा हृदय वास्तव में अनुरक्त है तो सभी के हृदय में निवास करने वाले ईश्वर मुझे उन रघुकुल श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्र जी की दासी अवश्य ही बनाएँगे; क्योंकि जिस किसी पर भी जिस किसी का सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है।

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि प्रभु श्रीरामचन्द्र जी की ओर देखकर सीताजी ने शरीर के द्वारा अपने प्रेम का निश्चय कर लिया; अर्थात् इस बात का निश्चय कर लिया कि अब यह शरीर या तो इन्हीं (श्रीराम) का होकर रहेगा या रहेगा ही नहीं। उनके इस (UPBoardSolutions.com) निश्चय को कृपानिधान श्रीरामचन्द्र जी तुरन्त जान गये। इसके पश्चात् उन्होंने सीताजी की ओर देखकर धनुष की ओर इस प्रकार देखा जैसे गरुड़ छोटे से सर्प की ओर देखता है। |

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काव्यगत सौन्दर्य

  1. राम के प्रति सीता की अनुरक्ति का आलंकारिक वर्णन है।
  2. भाषाअवधी
  3. शैली–प्रबन्ध और चित्रात्मक।
  4. रस-शृंगार व भक्ति।
  5. छन्द-दोहा।
  6. अलंकार-सर्वत्र अनुप्रास, रूपक व उपमा का मंजुल प्रयोग।
  7. गुण-माधुर्य और प्रसाद।
  8. शब्द-शक्ति-अभिधा और लक्षणा।।

प्रश्न 11.
लखन लखेउ रघुबंसमनि, ताकेउ हर कोदंडु। पुलकि गात बोले बचन, चरने चापि ब्रह्मांडु॥ [2018]
उतर
[ लखेउ = देखा। ताकेउ = देखा। कोदंडु = धनुष। गात = शरीर। चरन = चरण, पैर। चापि = दबाकर। ब्रह्मांडु = ब्रह्माण्ड।]

प्रसंग-प्रस्तुत पद में लक्ष्मण का श्रीराम के प्रति स्नेह और उनकी स्वयं की बलवत्ता का वर्णन किया गया है। |

व्याख्या–-गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि जब लक्ष्मण (UPBoardSolutions.com) जी ने देखा कि रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्र जी ने शिवजी के धनुष की ओर देखा है तो उनका शरीर अत्यधिक पुलकित हो उठा और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने दोनों चरणों से दबाकर वे इस प्रकार बोले।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. लक्ष्मण की सामर्थ्य का वर्णन किया गया है।
  2. भाषा-अवधी।
  3. शैली-प्रबन्ध।
  4. रस-वीर।
  5. छन्द-दोहा।
  6. अलंकार-अनुप्रास का मोहक प्रयोग और अतिशयोक्ति।
  7. गुण-ओज।।

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प्रश्न 12.
दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला ॥
राम चहहिं संकर धनु तोरा । होहु सजग सुनि आयसु मोरा ॥
चाप समीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए॥
सब कर संसउ अरु अग्यानू । मंद महीपन्ह कर अभिमानू ॥
भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदाई ॥
सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिह कर दारुन दुख दावा ॥
संभुचाप बड़ बोहितु पाई। चढे जाइ सब संगु बनाई ॥
राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू॥ [2018]
उतर
[ दिसिकुंजरहु = दिशाओं के रक्षक हाथी। कमठ = कच्छप। अहि = सर्प यहाँ शेषनाग। कोला = वाराह, सूअर। सजग = सचेत। आयसु = आदेश। चाप = धनुष। सुकृत = पुण्य कर्म। भृगुपति = परशुराम। कदराई = कायरता। कड़हारू = केवट।].

प्रसंग-प्रस्तुत पद में लक्ष्मण की सामर्थ्य और राम के ईश्वरत्व गुणों से युक्त होने का वर्णन किया गया है। |

व्याख्या-गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे हैं कि लक्ष्मण जी ने कहा-हे दिग्गजो ! हे कच्छप ! हे शेषनाग ! हे वाराह ! धैर्य धारण करके इस पृथ्वी को इस प्रकार पकड़े रखो, जिससे यह हिलने न पाये। श्रीरामचन्द्र जी शंकर जी के धनुष को तोड़ना चाहते हैं, इसलिए आप सभी लोग मेरी इस आज्ञा को सुनकर सावधान हो जाइए। श्रीरामचन्द्र जी जब शंकर जी के धनुष के समीप आये तब सभी उपस्थित स्त्री-पुरुषों ने देवताओं और (UPBoardSolutions.com) अपने पुण्यों को मनाया; अर्थात् उनका स्मरण किया। सभी का सन्देह और अज्ञान, मामूली । अर्थात् तुच्छ राजाओं का अभिमान, परशुराम जी के गर्व की गुरुता, देवताओं और श्रेष्ठ मुनियों की भय कातरता, सीता जी का विचार, जनक का पश्चात्ताप और समस्त रानियों के दारुण दु:ख का दावानल; ये सभी शिवजी के धनुष रूपी बड़े जहाज को प्राप्त करके समूह बनाकर उसके ऊपर चढ़कर और श्रीरामचन्द्र जी की भुजाओं के बले रूपी अपारे समुद्र के पार जाना चाहते हैं, लेकिन उनके साथ कोई नाविक नहीं है। |

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काव्यगत सौन्दर्य

  1. राम-लक्ष्मण देवत्व के गुणों से युक्त थे, इसका आभास कराया गया है।
  2. भाषा-अवधी।
  3. शैली–प्रबन्ध।
  4. रस-वीर और शान्त।
  5. छन्द-चौपाई।
  6. अलंकारअनुप्रास।
  7. शब्दशक्ति-अभिधा और लक्षणा।
  8. गुण-ओज और प्रसाद।

प्रश्न 13.
राम बिलोके लोग सब, चित्र लिखे से देखि।।
चितई सीय कृपायतन, जानी बिकल बिसेषि ॥
उतर
[ बिलोके = देखे। चित्र लिखे = चित्र के समान, मूर्तिवत्। सीय = सीता। बिकल= व्याकुल। बिसेषि = विशेष।]

प्रसंग–प्रस्तुत पद में समस्त सभा के साथ-साथ सीताजी की स्थिति का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्र जी ने सभा में उपस्थित सभी लोगों की ओर देखा। ये सभी लोग उन्हें चित्र में लिखे हुए के समान अर्थात् मूर्तिवत दिखाई पड़े। इसके पश्चात् कृपानिधान श्रीरामचन्द्र जी ने सीताजी की (UPBoardSolutions.com) ओर देखा और उनको इन सबसे अधिक अर्थात् विशेष रूप से व्याकुल अनुभव किया।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. भाषा-अवधी।
  2. शैली–प्रबन्ध व चित्रात्मक।
  3. रस—शान्त और श्रृंगार।
  4. छन्द-दोहा।
  5. अलंकार-उपमा और अनुप्रास।
  6. शब्दशक्ति–अभिधा और लक्षणा।
  7. गुण–प्रसाद और माधुर्य।

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प्रश्न 14.
देखी बिपुल बिकल बैदेही । निमिष बिहात कलप सम तेही ॥
तृषित बारि बिन जो तनु त्यागा। मुएँ करइ को सुधा तड़ागा ॥
का बरषा जब कृषी सुखाने । समय चुके पुनि का पछिताने ॥
असे जियें जानि जानकी देखी । प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी ।।
गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा। अति लाघव उठाइ धनु लीन्हा॥
दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ ।
लेत चढ़ावत बँचत गाढे। काहुँ न लखा देख सबु ठाढे ॥
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा ॥
उतर
[ निमिष = पलक झपकने का समय। तृषित = प्यासा। तड़ागा = तालाब। जिय = हृदय में। लखि = देखकर। लाघव = शीघ्रता से। दामिनि = बिजली। ठाढ़े = खड़े हुए। भुवन = संसार। धुनि = ध्वनि।]

प्रसंग-प्रस्तुत पद में सीता जी का राम के प्रति प्रेम (UPBoardSolutions.com) और शिव-धनुष के टूटने का वर्णन किया गया है। |

व्याख्या—गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्र जी ने सीताजी को बहुत ही व्याकुल देखा। उन्होंने अनुभव किया कि उनका एक-एक क्षण एक-एक कल्प (चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष : 4,32,00,00,000) के समान व्यतीत हो रहा था। यदि प्यासा व्यक्ति पानी न मिलने पर अपना शरीर छोड़ दे, तो उसके चले जाने पर अमृत का तालाब भी क्या करेगा, सारी खेती के सूख जाने पर वर्षा किस काम की, समय के बीत जाने पर फिर पछताने से क्या लाभ। आशय यह है कि समय के व्यतीत होने पर सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। अपने हृदय में ऐसा विचार करके श्रीरामचन्द्र जी ने सीताजी की ओर देखा और उनका अपने प्रति विशेष प्रेम देखकर वे हर्ष से विह्वल हो उठे। मन-ही-मन उन्होंने गुरु विश्वामित्र को प्रणाम किया और अत्यधिक स्फूर्ति के साथ धनुष को उठा लिया। जैसे ही उन्होंने धनुष को अपने हाथ में उठाया, वह उनके हाथ में बिजली की तरह चमका और आकाश में मण्डलाकार हो गया। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि सभा में उपस्थित लोगों में से किसी ने (UPBoardSolutions.com) भी श्रीरामचन्द्र जी को धनुष उठाते, चढ़ाते और जोर से खींचते हुए नहीं देखा; अर्थात् ये तीनों ही काम इतनी शीघ्रता से हुए कि इसका किसी को पता ही नहीं लगा। सभी ने श्रीरामचन्द्र जी को मात्र खड़े देखा और उसी क्षण उन्होंने धनुष को बीच से तोड़ डाला। धनुष के टूटने की ध्वनि इतनी भयंकर हुई कि वह तीनों लोकों में व्याप्त हो गयी। |

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. राम-सीता के पारस्परिक प्रेम की सार्थक अभिव्यक्ति हुई है।
  2. भाषाअवधी।
  3. शैली–प्रबन्ध और सूक्तिपरक।
  4. रस-शृंगार और अद्भुत।
  5. छन्द-दोहा।
  6. अलंकार-अनुप्रास और उत्प्रेक्षा।
  7. गुण-माधुर्य।
  8. शब्दशक्ति–अभिधा और लक्षणा।

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प्रश्न 15.
भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले।
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले ॥
सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं।
कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं ॥ [2011, 13]
उतर
[ रव = ध्वनि। बाजि = घोड़ा। महि = पृथ्वी। अहि = शेषनाग, सर्प। कोल = वाराह। कूरुम = कच्छप। कोदंड = धनुष। खंडेउ = तोड़ दिया।]

प्रसंग-प्रस्तुत पदे में तुलसीदास जी ने धनुष टूटने के बाद उत्पन्न हुई स्थिति का अत्यधिक आलंकारिक वर्णन किया है। |

व्याख्या—गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि धनुष टूटने का घोर-कठोर शब्द त्रैलोक्य में व्याप्त हो गया जिससे सूर्य के घोड़े अपना नियत मार्ग छोड़कर चलने लगे, आठों दिशाओं में स्थित आठ दिग्गज अर्थात् दिशाओं की रक्षा करने वाले (UPBoardSolutions.com) आठ हाथी चिंघाड़ने लगे, सम्पूर्ण पृथ्वी डोलने लगी; शेषनाग, वाराह और कछुआ भी बेचैन हो उठे; देवता, राक्षसगण और मुनिजन कानों पर हाथ रखकर (जिससे ध्वनि सुनाई न पड़े) व्याकुल होकर विचार करने लगे कि यह क्या हो रहा है। अन्तत: जब सभी को इस बात का निश्चय हो गया कि श्रीरामचन्द्र जी ने शंकर जी के धनुष को तोड़ दिया है तब सब उनकी जय-जयकार करने लगे।

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काव्यगत सौन्दर्य

  1. धनुष टूटने के बाद की स्थिति का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया गया है।
  2. भाषा-अवधी
  3. शैली–प्रबन्ध व चित्रात्मक।
  4. रसे—अद्भुत।
  5. छन्द-सवैया।
  6. अलंकार-अनुप्रास और अतिशयोक्ति।
  7. गुण-ओज।
  8. शब्दशक्ति-अभिधा और लक्षणा।।

वन-पथ पर
प्रश्न 1.
पुर ते निकसी रघुबीर-बधू, धरि धीर दये मर्ग में डग है ।
झलक भरि भाल कनी जल की, पुट सूखि गये मधुराधर वै ॥
फिरि बूझति हैं-”चलनो अब केतिक, पर्णकुटी करिहौ कित है?”
तिय की लखि आतुरता पिय की अँखिया अति चारु चलीं जल च्वै॥ (2016)
उतर
[ पुर = शृंगवेरपुर। रघुबीर-बधू = सीता जी। धरि धीर = धैर्य धारण करके। मग = रास्ता। द्वै = दोनों। मधुराधर = सुन्दर होंठ। केतिक = कितना। पर्णकुटी = पत्तों से निर्मित झोंपड़ी। तिय = पत्नी। चारु = सुन्दर। च्वै = चूने लगा। ]

सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘कवितावली’ (UPBoardSolutions.com) से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘काव्य-खण्ड’ में संकलित ‘वन-पथ पर’ शीर्षक कविता से अवतरित है।

[ विशेष—इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए भी यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग-कवि ने इन पंक्तियों में अयोध्या से पैदल ही वन को जाती हुई सीताजी की थकावट का मार्मिक वर्णन किया है।

व्याख्या-राम, लक्ष्मण और सीता बड़े धीरज के साथ श्रृंगवेरपुर से आगे दो कदम ही चले थे कि सीताजी के माथे पर पसीने की बूंदें झलकने लगीं और उनके सुन्दर होंठ थकान के कारण सूख गये। तब सीताजी ने अपने प्रियतम राम से पूछा–अभी (UPBoardSolutions.com) हमें कितनी दूर और चलना पड़ेगा? कितनी दूरी पर पत्तों की कुटिया बनाकर रहेंगे? अन्तर्यामी श्रीराम, सीताजी की व्याकुलता का कारण तुरन्त समझ गये कि वे बहुत थक चुकी हैं और विश्राम करना चाहती हैं। राजमहल का सुख भोगने वाली अपनी पत्नी की ऐसी दशा देखकर श्रीराम के सुन्दर नेत्रों से आँसू टपकने लगे।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. प्रस्तुत पद में सीताजी की सुकुमारता का मार्मिक वर्णन किया गया है।
  2. सीता के प्रति राम के प्रेम की सुन्दर अभिव्यक्ति हुई है।
  3. भाषा–सरस एवं मधुर ब्रज। ‘दये मग में डग द्वै’ मुहावरे का उत्कृष्ट प्रयोग है। इसी के कारण अत्युक्ति अलंकार भी है।
  4. शैली-चित्रात्मक और मुक्तक।
  5. छन्द-सवैया।
  6. लंकार-माथे पर पसीने की बूंदों के आने, होंठों (UPBoardSolutions.com) के सूख जाने में स्वभावोक्ति तथा ‘केतिक पर्णकुटी करिहौ कित’ में अनुप्रास।
  7. शब्दशक्ति–लक्षण एवं व्यंजना।
  8. रस-शृंगार।
  9. गुण–प्रसाद एवं माधुर्य।

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प्रश्न 2.
“जल को गए लक्खन हैं लरिका, परिखौ, पिय ! छाँह घरीक है ठाढ़े।
पछि पसेउ बयारि करौं, अरु पार्दै पखरिहौं भूभुरि डाढ़े ॥
तुलसी रघुबीर प्रिया स्रम जानि कै बैठि बिलंब ल कंटक काढ़े ।
जानकी नाह को नेह लख्यौ, पुलको तनु बारि बिलोचन बाढे ॥ [2016]
उतर
[ परिखौ = प्रतीक्षा करो। घरीक = एक घड़ी के लिए। ठाढ़े = खड़े होकर। पसेउ = पसीना। बयारि = हवा। भूभुरि = रेत (धूल)। डाढ़े = तपे हुए। बिलंब लौं = देर तक। काढ़े = निकाले। नाह = नाथ, स्वामी। पुलको तनु = शरीर रोमांचित हो गया। बिलोचन := नेत्र।

प्रसंग-इन पंक्तियों में गोस्वामी जी ने सीताजी की सुकुमारता और उनके प्रति राम के असीम प्रेम का सहज चित्रण किया है।

व्याख्या–सीताजी श्रृंगवेरपुर से आगे चलने पर थक जाती हैं। वे विश्राम करने की इच्छा करती हैं। वे श्रीराम से कहती हैं कि लक्ष्मण पानी लेने गये हैं, इसलिए घड़ी भर किसी पेड़ की छाया में खड़े होकर उनकी प्रतीक्षा कर लेनी चाहिए। इतनी देर मैं आपका पसीना पोंछकर हवा कर देंगी तथा गर्म रेत पर चलने से आपके पाँव जल गये होंगे, उन्हें मैं धो देंगी। श्री रामचन्द्र जी यह सुनकर समझ गये कि सीताजी थक चुकी हैं। और (UPBoardSolutions.com) स्वयं विश्राम करने के लिए कहने में सकुची रही हैं। इसलिए वे बैठ गये और बड़ी देर तक (सीताजी को अधिक समय विश्राम देने के उद्देश्य से) बैठकर उनके पैरों में चुभे हुए काँटे निकालते रहे। अपने प्रति पति का ऐसा प्रेम देखकर सीताजी पुलकित हो गयीं और उनकी आँखों से प्रेम के आँसू टपकने लगे। |

काव्यगत सौन्दर्य–

  1. तुलसीदास जी ने विपत्ति के समय श्रीराम और सीता के एक-दूसरे के प्रति प्रेम और समर्पित भाव का बड़ा ही सुन्दर चित्रण किया है, जो कि दाम्पत्य जीवन का एक आदर्श उपस्थित करता है।
  2. गोस्वामी जी ने सीताजी और श्रीराम की भावनाओं का पारस्परिक आदान-प्रदान बहुत दक्षता से प्रस्तुत किया है।
  3. भाषा-ब्रज।
  4. शैली-मुक्तक।
  5. छन्द-सवैया।
  6. रस-शृंगार।
  7. अलंकार-अनुप्रास।
  8.  गुण-माधुर्य।
  9. शब्दशक्ति–लक्षणा एवं व्यंजना।

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प्रश्न 3.
रानी मैं जानी अजानी महा, पबि पाहन हूँ ते कठोर हियो है ।
राजहु काज अकाज न जान्यो, कह्यो तिय को जिन कान कियो है।
ऐसी मनोहर मूरति ये, बिछुरे कैसे प्रीतम लोग जियो है ?
आँखिन में, सखि ! राखिबे जोग, इन्हें किमि कै बनबास दियो है ?॥ [2010, 12, 15]
उतर
[ अजानी = अज्ञानी। पबि = वज्र। पाहन = पत्थर। (UPBoardSolutions.com) हियो = हृदय। काज अकाज = कार्य-अकार्य या उचित-अनुचित कार्य। तिय = स्त्री। कान कियो है = मान लिया है। प्रीतम = स्नेह करने वाले। जोग = योग्य। किमि = क्यों।]

प्रसंग-इन पंक्तियों में कवि ने ग्रामीण स्त्रियों के द्वारा कैकेयी और राजा दशरथ की निष्ठुरता पर व्यक्त प्रतिक्रिया को चित्रित किया है।

व्याख्या-वन-गमन के समय रास्ते में स्थित एक गाँव की स्त्रियाँ राम, लक्ष्मण और सीता के सौन्दर्य तथा कोमलता को देखकर रानी कैकेयी को अज्ञानी और वज्र तथा पत्थर से भी कठोर हृदय वाली नारी बताती हैं; क्योंकि उसे सुकुमार राजकुमारों को वनवास देते समय तनिक भी दया न आयी। वे राजा दशरथ को भी विवेकहीन समझकर पत्नी के कहे अनुसार कार्य करने वाला ही समझती हैं और राजा में उचित-अनुचित के ज्ञान की कमी मानती हैं। उन्हें आश्चर्य है कि इन सुन्दर मूर्तियों से बिछुड़कर इनके प्रियजन कैसे जीवित रहेंगे ? हे सखी! ये तीनों तो आँखों में बसाने योग्य हैं, तब इन्हें किस कारण वनवास दिया गया है ?

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. यहाँ कवि ने ग्रामीण बालाओं की श्रीराम के प्रति सहृदयता का सुन्दर चित्रण किया है।
  2. भाषा-ब्रज।
  3. ‘कान भरना’ और ‘आँखों में रखना’ जैसे मुहावरों का समावेश।
  4. शैली-मुक्तक।
  5. छन्द-सवैया।
  6. रस–करुण एवं श्रृंगार।
  7. अलंकार-‘जानी अजानी महा’ में अनुप्रास,काज अकोज’ में सभंगपद यमक।
  8. गुण-माधुर्य।
  9. शब्दशक्ति—अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना।।

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प्रश्न 4.
सीस जटा, उर बाहु बिसाल, बिलोचन लाल, तिरीछी सी भौंहैं।
तून सरासन बान धरे, तुलसी बन-मारग में सुठि सोहैं ॥
सादर बारहिं बार सुभाय चितै, तुम त्यों हमरो मन मोहैं ।
पूछति ग्राम बधूसिय सों’कहौ साँवरे से, सखि रावरे को हैं?’ ॥ [2012, 14, 18]
उतर
[ बिलोचन = नेत्र। तून = तरकस। सरासन = धनुष। सुठि = सुन्दर। सुभाय = स्वाभाविक रूप से। तुम त्यों = तुम्हारी ओर। रावरे = तुम्हारे।]

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में ग्रामवधुएँ सीता जी को घेरकर (UPBoardSolutions.com) एक ओर बैठे हुए श्रीराम के विषय में विनोद करती हुई उनसे प्रश्न पूछ रही हैं।

व्याख्या-ग्रामवधुएँ सीताजी से पूछ रही हैं कि जो सिर पर जटा धारण किये हुए हैं, जिनके वक्षस्थल और भुजाएँ विशाल हैं, नेत्र लाल हैं तथा भौंहें तिरछी-सी हैं। जो तरकस, धनुष और बाण धारण किये हुए इस वन-मार्ग में बहुत शोभायमान हो रहे हैं, जो सहज-स्वाभाविक रूप में बड़े सम्मान के साथ बार-बार तुम्हारी ओर देखते हुए हमारी मन भी आकर्षित कर रहे हैं। हे सखी! तुम हमें यह बताओ कि ये ” सुन्दर साँवले रूप वाले (राम) तुम्हारे कौन लगते हैं?

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. ग्रामवधुओं ने सीताजी से बहुत सात्विक विनोद से परिपूर्ण स्वाभाविक प्रश्न किया है। ग्राम-वधूटियों का वाक्-चातुर्य दर्शनीय है। स्त्रियों की बातों में जो स्वाभाविक व्यंजना होती है, उसका बड़ा ही मनोवैज्ञानिक चित्रण है।
  2. यहाँ श्रीराम के रूप और मुद्रा का सुन्दर वर्णन हुआ है।
  3. भाषा-सुकोमल ब्रज।
  4. शैली-मुक्तक।
  5. छन्द-सवैया।
  6. रस-शृंगार।
  7. अलंकार– सर्वत्र अनुप्रास।
  8. गुण-माधुर्य।
  9. शब्दशक्ति-व्यंजना।

प्रश्न 5.
सुनि सुन्दर बैन सुधारस-साने, सयानी हैं जानकी जानी भली।
तिरछे करि नैन दै सैन तिन्हें, समुझाइ कछू मुसकाइ चली ॥
तुलसी तेहि औसर सोहै सबै, अवलोकति लोचन-लाहु अली।
अनुराग-तड़ाग में भानु उदै, बिगसीं मनो मंजुल कंज-कली ॥ [2009, 11, 13, 15, 17]
उतर
[ बैन = शब्द। सुधारस-साने = अमृत-रस में सने हुए। सयानी = चतुर। भली = अच्छी तरह से। सैन = संकेत। अवलोकति = देखती है। लाहु = लाभ। अली = सखी। अनुराग-तड़ाग = प्रेम रूपी सरोवर। बिगसीं = खिल रही हैं। मंजुल = सुन्दर। कंज (UPBoardSolutions.com) = कमल।]

प्रसंग-इन पंक्तियों में ग्रामवधुओं के प्रश्न का उत्तर देती हुई सीताजी अपने हाव-भावों से ही राम के विषय में सब कुछ बता देती हैं।

व्याख्या-ग्रामवधुओं ने राम के विषय में सीताजी से पूछा कि ये साँवले और सुन्दर रूप वाले तुम्हारे क्या लगते हैं?’ ग्रामवधुओं के अमृत जैसे मधुर वचनों को सुनकर चतुर सीताजी उनके मनोभाव को समझ गयीं। सीताजी ने उनके प्रश्न का उत्तर अपनी मुस्कराहट तथा संकेत भरी दृष्टि से ही दे दिया, उन्हें मुख से कुछ बोलने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। उन्होंने स्त्रियोचित लज्जा के कारण केवल संकेत से ही राम के विषय (UPBoardSolutions.com) में यह समझा दिया कि ये मेरे पति हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि सीताजी के संकेत को समझकर सभी सखियाँ राम के सौन्दर्य को एकटक देखती हुई अपने नेत्रों का लाभ प्राप्त करने लगीं। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो प्रेम के सरोवर में रामरूपी सूर्य का उदय हो गया हो और ग्रामवधुओं के नेत्ररूपी कमल की सुन्दर कलियाँ खिल गयी हों।

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काव्यगत सौन्दर्य

  1. सीता जी का संकेतपूर्ण उत्तर भारतीय नारी की मर्यादा तथा ‘लब्धः नेत्र . निर्वाण:’ की भावना के अनुरूप है।
  2. प्रस्तुत पद में ‘नाटकीयता और काव्य’ का सुन्दर योग है।
  3. भाषा-सुललित ब्रज।
  4. शैली—चित्रात्मक व मुक्तक।
  5. छन्द-सवैया।
  6. रस-श्रृंगार।
  7. अलंकार–‘सुनि सुन्दर बैन सुधारस साने, सयानी हैं (UPBoardSolutions.com) जानकी जानी भली में अनुप्रास, ‘अनुराग-तड़ाग में भानु उदै बिगसीं मनो मंजुल कंज कली’ में रूपक, उत्प्रेक्षा और अनुप्रास की छटा है।
  8. गुणमाधुर्य।
  9. शब्दशक्ति–व्यंजना।।

काव्य-सौदर्य एवं व्याकरण-बोध

प्रश्न 1
निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकारों का नाम लिखकर उनका स्पष्टीकरण भी दीजिए-
(क)
भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले।
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कुरुम कलमले ॥
सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं।
कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं ॥
(ख)
सुनि सुन्दर बैन सुधारस-साने, सयानी हैं जानकी जानी भली ।
तिरछे करि नैन दै सैन तिन्हें, समुझाई कछू मुसकाइ चली ॥
तुलसी तेहि औसर सोहैं, सबै अवलोकति लोचन-लाहु अली ।।
अनुराग-तड़ाग में भानु उदै, बिगसीं मनो मंजुल कंज-कली ॥ ॥
उत्तर
(क) विभिन्न वर्गों; यथा—भ, र, ज, ह, क, ल आदि; की आवृत्ति होने के कारण इस पद में सर्वत्र अनुप्रास अलंकार है। मात्र धनुष टूटने के कारण त्रैलोक्य में खलबली मच गयी। इस वर्णन को अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने के कारण अतिशयोक्ति अलंकार है।

(ख) विभिन्न वर्गों; यथा-स, न, ज, ल, त आदि; की (UPBoardSolutions.com) आवृत्ति होने के कारण इस पद में सर्वत्र अनुप्रास अलंकार है। “अनुराग-तड़ाग में भानु उदै’ में उपमेय और उपमान की अभिन्नता के कारण रूपक तथा ‘‘बिगसीं मनो मंजुल’ में उपमेय की उपमान के रूप में सम्भावना के कारण उत्प्रेक्षा अलंकार है।

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प्रश्न 2
निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त रस और उसका स्थायी भाव लिखिए
(क)
देखि देखि रघुबीर तन सुर मराव धरि, धीर।
भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर ॥
(ख)
भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले।
चिक्करहिं दिग्गज डोले महि अहि कोल कुरुम कलमले ॥
सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं।
कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं ॥
उत्तर
(क) रस-शृंगार, स्थायी भाव–रति।
(ख) रस–अद्भुत, स्थायी भाव-आश्चर्य।

प्रश्न 3
‘वन-पथ पर’ कविता किस छन्द में लिखी गयी है, सलक्षण लिखिए।
उत्तर
यह कविता सवैया छन्द में लिखी गयी है। बाइस से (UPBoardSolutions.com) छब्बीस तक के वर्णवृत्त ‘सवैया’ कहलाते हैं। मत्तगयन्द तथा सुन्दरी इसके भेद हैं।

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प्रश्न 4
निम्नलिखित पदों में सनाम समास-विग्रह कीजिए-
पद कमल, चारिभुज, सुलोचनि, मखशाला, त्रिभुवन, दस बदन, राम-लषन।
उतर
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