UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 4 बिहारी (काव्य-खण्ड)

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कवि-पस्विय

प्रश्न 1.
कविवर बिहारी का जीवन-परिचय देते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए। [2009, 10]
या
बिहारी का जीवन-परिचय देते हुए उनकी किसी एक रचना का नामोल्लेख कीजिए। [2012, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
कविवर बिहारी एक श्रृंगारी कवि हैं। इन्होंने दोहे जैसे लघु आकार वाले छन्द में गागर में सागर भर देने का कार्य किया है। प्रख्यात आलोचक श्री पद्मसिंह शर्मा ने इनकी प्रशंसा में लिखा है कि, “बिहारी के दोहों का अर्थ गंगा की विशाल जल-धारा के समान है, (UPBoardSolutions.com) जो शिव की जटाओं में समा तो गयी थी, परन्तु उसके बाहर निकलते ही वह इतनी असीम और विस्तृत हो गयी कि लम्बी-चौड़ी धरती में भी सीमित न रह सकी। बिहारी के दोहे रस के सागर हैं, कल्पना के इन्द्रधनुष हैं, भाषा के मेघ हैं। उनमें सौन्दर्य के मादक चित्र अंकित हैं।”

जीवन-परिचय-रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि बिहारी श्रृंगार रस के अद्वितीय कवि थे। इनका जन्म सन् 1603 ई० (सं० 1660 वि०) के लगभग ग्वालियर के निकट बसुवा गोविन्दपुर ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम केशवराय था। इन्हें मथुरा का चौबे ब्राह्मण माना जाता है। अनेक विद्वानों ने इनको आचार्य केशवदास { ‘रामचन्द्रिका’ के रचयिता) का पुत्र स्वीकार किया है और तत्सम्बन्धी प्रमाण भी प्रस्तुत किये हैं। इन्होंने निम्बार्क सम्प्रदाय के अनुयायी स्वामी नरहरिदास से संस्कृत, प्राकृत आदि का अध्ययन किया था। इन्होंने युवावस्था अपनी ससुराल मथुरा में बितायी थी। मुगल बादशाह शाहजहाँ के निमन्त्रण पर ये आगरा चले गये और उसके बाद जयपुर के राजा जयसिंह के दरबारी कवि हो गये। राजा जयसिंह अपनी नवविवाहिता पत्नी के प्रेम-पाश में फंसकर जब राजकार्य को चौपट कर बैठे थे, तब बिहारी ने राजा की मोहनिद्रा भंग करने के लिए निम्नलिखित अन्योक्तिपूर्ण दोहा लिखकर उनके पास भेजा—

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नहिं पराग नहि मधुर मधु, नहि बिकासु इहि काल।।
अली कली ही सौं बँध्यो, आगै कौन हवाल॥

इस दोहे को पढ़कर राजा की आँखें खुल गयीं और वे पुनः कर्तव्य-पथ पर अग्रसर हो गये। राजा जयसिंह की प्रेरणा पाकर बिहारी सुन्दर-सुन्दर दोहों की रचना करते थे और पुरस्कारस्वरूप प्रत्येक दोहे पर एक स्वर्ण-मुद्रा प्राप्त करते थे। बाद में पत्नी की मृत्यु के कारण श्रृंगारी कवि बिहारी का मन भक्ति और वैराग्य की ओर मुड़ गया। 723 दोहों की सतसई सन् 1662 ई० में समाप्त हुई मानी जाती है। सन् 1663 ई० (सं० 1720 वि०) में इनकी मृत्यु हो गयी। –

रचनाएँ—बिहारी की एकमात्र रचना ‘बिहारी सतसई’ है। यह श्रृंगार रसप्रधान मुक्तक काव्य-ग्रन्थ है। श्रृंगार की अधिकता होने के कारण बिहारी मुख्य रूप से श्रृंगार रस के कवि माने जाते हैं। इन्होंने छोटे-से . दोहे में प्रेम-लीला के गूढ़-से-गूढ़ प्रसंगों को अंकित किया है। इनके दोहों के विषय में कहा गया है सतसैया के दोहरे, ज्यौं नाविक के तीर। देखने में छोटे लगैं, घाव करै गम्भीर ॥ साहित्य में स्थान-रीतिकालीन कवि बिहारी अपने ढंग के अद्वितीय (UPBoardSolutions.com) कवि हैं। इनकी विलक्षण सृजन-प्रतिभा के कारण काव्य-संसार ने इन्हें महाकवि के पद पर प्रतिष्ठित किया है। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र का कहना है कि, “प्रेम के भीतर उन्होंने सब प्रकार की सामग्री, सब प्रकार के वर्णन प्रस्तुत किये हैं और वह भी इन्हीं सात-सौ दोहों में। यह उनकी एक विशेषता ही है। नायिका-भेद या श्रृंगार का लक्षण-ग्रन्थ लिखने वाले भी किसी नायिका या अलंकारादि का वैसा उदाहरण प्रस्तुत करने में समर्थ नहीं हुए जैसा बिहारी ने किया है। हमें यह भी मान लेने में आनाकानी नहीं करनी चाहिए कि उनके जोड़ का हिन्दी में कोई दूसरा कवि नहीं हुआ।

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पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या भक्ति |

प्रश्न 1.
मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ ।
जा तन की झाई परै, स्यामु हरित-दुति होइ॥ [2014]
उत्तर
[ भव-बाधा = सांसारिक दु:ख। हरौ = दूर करो। नागरि = चतुर। झाई परै = प्रतिबिम्ब, झलक पड़ने पर। स्यामु = श्रीकृष्ण, नीला, पाप। हरित-दुति = (1) हरी कान्ति, (2) प्रसन्न, (3) हरण हो गयी है द्युति । जिसकी; अर्थात् फीका, कान्तिहीन।]

सन्दर्भ–प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी के ‘काव्य-खण्ड’ में (UPBoardSolutions.com) संकलित रीतिकाल के रससिद्ध कवि बिहारी द्वारा रचित ‘बिहारी सतसई’ के ‘भक्ति’ शीर्षक से अवतरित है।

[ विशेष—इस शीर्षक के अन्तर्गत आने वाले सभी दोहों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग-कवि ने अपने ग्रन्थ के प्रारम्भ में राधा जी की वन्दना की है।

व्याख्या-

  1. वह चतुर राधिका जी मेरे सांसारिक कष्टों को दूर करें, जिनके पीली आभा वाले (गोरे).शरीर की झाँई (प्रतिबिम्ब) पड़ने से श्याम वर्ण के श्रीकृष्ण हरित वर्ण की द्युति वाले; अर्थात् हरे रंग के हो जाते हैं।
  2. वे चतुर राधिका जी मेरी सांसारिक बाधाओं को दूर करें, जिनके शरीर की झलक पड़ने से भगवान् कृष्ण भी प्रसन्नमुख (हरित-कान्ति) हो जाते हैं।
  3. हे चतुर राधिका जी! आप मेरे सांसारिक कष्टों को दूर करें, जिनके ज्ञानमय (गौर) शरीर की झलकमात्र से मन की श्यामलता (पाप) नष्ट हो जाती है।
  4. वह चतुर राधिका जी मेरी सांसारिक बाधाओं को दूर करें, जिनके गौरवर्ण (UPBoardSolutions.com) शरीर की चमक पड़ने से श्रीकृष्ण भी फीकी कान्ति वाले हो जाते हैं।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. कवि ने प्रस्तुत दोहे में मंगलाचरण रूप में राधा की वन्दना की है।
  2. नील और पीत वर्ण मिलकर हरा रंग हो जाता है। यहाँ बिहारी का चित्रकला-ज्ञान प्रकट हुआ है।
  3. भाषाब्रज।
  4. शैली-मुक्तक।
  5. रस-श्रृंगार और भक्ति।
  6. छन्द-दोहा।
  7. अलंकार-‘हरौ, राधा नागरि’ में अनुप्रास, ‘भव-बाधा’, ‘झाईं तथा ‘स्यामु हरित-दुति’ के अनेक अर्थ होने से श्लेष अलंकार की छटा मनमोहक बन पड़ी है।
  8. गुण–प्रसाद और माधुर्य।
  9. बिहारी ने निम्नलिखित दोहे में भी अपने रंगों के ज्ञान का परिचय दिया है—

अधर धरत हरि कै परत, ओठ डीठि पट जोति।
हरित बाँस की बाँसुरी, इन्द्रधनुष सँग होति ॥

प्रश्न 2.
मोर-मुकुट की चंद्रिकनु, यौं राजत नंदनंद ।।
मनु संसि सेखर की अकस, किय सेखर सत चंद ॥
उत्तर
[ चंद्रिकनु = चन्द्रिकाएँ। राजत = शोभायमान होना। ससि सेखर = चन्द्रमा जिनके सिर पर है अर्थात् भगवान् शंकर। अकस = प्रतिद्वन्द्वितावश। ]

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प्रसंग-प्रस्तुत दोहे में श्रीकृष्ण के सिर पर लगे मोर-मुकुट की चन्द्रिकाओं का सुन्दर चित्रण किया गया है। |

व्याख्या-कवि कहता है कि भगवान् श्रीकृष्ण के सिर पर मोर पंखों का मुकुट शोभा दे रहा है। उन मोर पंखों के बीच में बनी सुनहरी चन्द्राकार चन्द्रिकाएँ देखकर ऐसा लगता है, जैसे मानो भगवान् शंकर से प्रतिस्पर्धा करने के लिए उन्होंने सैकड़ों चन्द्रमा सिर (UPBoardSolutions.com) पर धारण कर लिये हों।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. यहाँ श्रीकृष्ण के अनुपम सौन्दर्य का मोहक वर्णन हुआ है।
  2. मोर-मुकुट की चन्द्रिकाओं की तुलना भगवान् शंकर के सिर पर विराजमान चन्द्रमा से करके कवि ने अपनी अद्भुत काव्य-कल्पना का परिचय दिया है।
  3. भाषा–ब्रज।
  4. शैली-मुक्तक।
  5. छन्द-दोहा।
  6. रसशृंगार।
  7. अलंकार—‘मोर-मुकुट तथा ‘ससि सेखर’ में अनुप्रास एवं ‘मनु ससि सेखर की अकस’, ‘किय सेखर सत चंद’ में उत्प्रेक्षा तथा ‘ससि सेखर’ और ‘सेखर’ में सभंग श्लेष।
  8. गुण-माधुर्य।

प्रश्न 3.
सोहत ओढ़ पीतु पटु, स्याम सलौने गात ।
मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु पर्यो प्रभात ॥ [2012, 14]
उत्तर
[ सोहत = सुशोभित हो रहे हैं। पीतु पटु = पीले वस्त्र। सलौने = सुन्दर। गात = शरीर। नीलमनिसैल = नीलमणि पर्वत। आतपु = प्रकाश।]

प्रसंग-इस दोहे में पीला वस्त्र ओढ़े हुए श्रीकृष्ण के सौन्दर्य का (UPBoardSolutions.com) वर्णन किया गया है। |

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व्याख्या-श्रीकृष्ण का श्याम शरीर अत्यन्त सुन्दर है। वे अपने शरीर पर पीले वस्त्र पहने इस प्रकार शोभा पा रहे हैं, मानो नीलमणि के पर्वत पर प्रात:काल की पीली-पीली धूप पड़ रही हो। यहाँ श्रीकृष्ण के श्याम वर्ण के उज्ज्वल मुख में नीलमणि शैल की और उनके पीले वस्त्रों में प्रात:कालीन.धूप की सम्भावना की गयी है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. श्रीकृष्ण के श्याम शरीर पर पीले वस्त्रों के सौन्दर्य का अद्भुत वर्णन है।
  2. भाषा–ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक
  4. रस-श्रृंगार और भक्ति।
  5. छन्द-दोहा
  6. अलंकार‘पीतु पटु’, ‘स्याम सलौने’, ‘पयौ प्रभात’ में अनुप्रास तथा ‘मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु पर्यौ प्रभात’ में उत्प्रेक्षा की छटा।
  7. गुण-माधुर्य।

प्रश्न 4.
अधर धरत हरि कै परत, ओठ-डीठि-पट जोति ।।
हरित बाँस की बाँसुरी, इन्द्रधनुष-हँग होति ॥ [2012, 14]
उत्तर
[ अधर = नीचे का होंठ। ओठ-डीठि-पट जोति = होंठों की लाल, दृष्टि की श्वेत, वस्त्र की पीत कान्ति। ]

प्रसंग-प्रस्तुत दोहे में बाँसुरी बजाते हुए कृष्ण की हरे रंग की बाँसुरी का इन्द्रधनुषी रूप वर्णित किया गया है।

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व्याख्या-श्रीकृष्ण अपने रक्त वर्ण के होठों पर हरे रंग की बाँसुरी रखकर बजा रहे हैं। उस समय उनकी दृष्टि के श्वेत वर्ण, वस्त्र के पीत वर्ण तथा शरीर के श्याम वर्ण की कान्ति रक्त वर्ण के होठों पर रखी हुई हरे रंग की बाँसुरी पर पड़ने से वह (बाँसुरी) (UPBoardSolutions.com) इन्द्रधनुष के समान बहुरंगी शोभा वाली हो गयी है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. बिहारी के रंगों के संयोजन का अद्भुत ज्ञान प्रस्तुत दोहे में परिलक्षित होता है।
  2. भाषा-ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. रस-भक्ति।
  5. छन्द-दोहा
  6. अलंकार-दोहे में सर्वत्र अनुप्रास, अधर धरत’ में यमक तथा बाँसुरी के रंगों से इन्द्रधनुष के रंगों की तुलना में उपमा।
  7. गुण–प्रसाद।।

प्रश्न 5.
या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोई ।।
ज्यों-ज्य बूड़े स्याम रँग, त्यों-त्यौं उज्जलु होई ॥ [2009, 18]
उत्तर
[अनुरागी = प्रेम करने वाला, लाल। गति = दशा। बूड़े = डूबता है। स्याम रँग = काले रंग, कृष्ण की भक्ति के रंग में। उज्जलु = पवित्र, सफेद।]

प्रसंग-प्रस्तुत दोहे में कवि ने बताया है कि श्रीकृष्ण के प्रेम से मन की म्लानता एवं कलुषता दूर हो जाती है।

व्याख्या-कवि का कहना है कि श्रीकृष्ण से प्रेम करने वाले मेरे मन (UPBoardSolutions.com) की दशा अत्यन्त विचित्र है। . इसकी दशा को कोई नहीं समझ सकता है; क्योंकि प्रत्येक वस्तु काले रंग में डूबने पर काली हो जाती है। श्रीकृष्ण भी श्याम वर्ण के हैं, किन्तु कृष्ण के प्रेम में मग्न यह मेरा मन जैसे-जैसे श्याम रंग (कृष्ण की , भक्ति, ध्यान आदि) में मग्न होता है वैसे-वैसे श्वेत (पवित्र) होता जाता है।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. कृष्ण की भक्ति में लीन होकर मन पवित्र हो जाता है। इस भावना की बड़ी ही उत्कृष्ट अंभिव्यक्ति की गयी है।
  2. भाषा—ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. रस-शान्त।
  5. छन्ददोहा।
  6. अलंकारे-ज्यों-ज्यौं बूड़े स्याम रँग, त्यौं-त्यौं उज्जलु होय’ में श्लेष, पुनरुक्तिप्रकाश तथा विरोधाभास।
  7. गुण-माधुर्य।

प्रश्न 6.
तौ लगु या मन-सदन मैं, हरि आर्दै किहिं बाट ।
विकट जटे जौ लगु निपट, खुटै न कपट-कपाट ॥ [2009]
उत्तर
[मन-सदन = मनरूपी घर। बाट = मार्ग। जटे = जड़े हुए। तौ लगु = तब तक। जौ लगु = जब तक। निपट = अत्यन्त। खुर्दै = खुलेंगे। कपट-कपाट = कपटरूपी किवाड़।]

प्रसंग-इस दोहे में कवि ने ईश्वर को हृदय में बसाने के (UPBoardSolutions.com) लिए कपट का त्याग करना आवश्यक बताया है।

व्याख्या-कविवर बिहारी का कहना है कि इस मनरूपी घर में तब तक ईश्वर किस मार्ग से प्रवेश कर सकता है, जब तक मनरूपी घर में दृढ़ता से बन्द किये हुए कपटरूपी किवाड़ पूरी तरह से नहीं खुल जाते; अर्थात् हृदय से कपट निकाल देने पर ही हृदय में ईश्वर का प्रवेश व निवास सम्भव है।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. ईश्वर की प्राप्ति निर्मल मन से ही सम्भव है। इस भावना की कवि ने यहाँ उचित अभिव्यक्ति की है।
  2. भाषा-ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. रस-भक्ति।
  5. छन्द-दोहा। “
  6. अलंकार–‘मन-सदन’, ‘कपट-कपाट’ में रूपक तथा अनुप्रास।
  7. गुण–प्रसाद।

प्रश्न 7.
जगतु जनायौ जिहिं सकलु, सो हरि जान्यौ नाँहि ।
ज्यौं आँखिनु सबु देखिये, आँखि न देखी जाँहि ॥ [2011]
उत्तर
[ जनायौ = ज्ञान कराया, उत्पन्न किया। सकलु = सम्पूर्ण । जान्यौ नाँहि = नहीं जाना, याद नहीं किया।]

प्रसंग-इस दोहे में कवि बिहारी ने ईश्वर-भक्ति करने की प्रेरणा दी है।

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व्याख्या-कवि का कथन है कि जिस ईश्वर ने तुम्हें (UPBoardSolutions.com) समस्त संसार का ज्ञान कराया है, उसी ईश्वर को तुम नहीं जान पाये। जैसे आँखों से सब कुछ देखा जा सकता है, परन्तु आँखें स्वयं अपने को नहीं देख सकतीं।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. सम्पूर्ण संसार का ज्ञान कराने वाले ईश्वर की स्थिति से अनभिज्ञ मनुष्य का सजीव चित्रण किया गया है।
  2. भाषा-ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. छन्द-दोहा।
  5. रस-शान्त।
  6. गुण–प्रसाद।
  7. अलंकार-अनुप्रास एवं दृष्टान्तः ।

प्रश्न 8.
जप, माला, छापा, तिलक, सरै न एकौ कामु ।
मन-काँचै नाचे वृथा, साँचे राँचे रामु ॥ [2011]
उत्तर
[जप = (मन्त्र) जपना। माला = माला फेरना। छापा = चन्दन का छापा (विशेष प्रकार का टीका) लगाना। तिलक = तिलक लगाना। सरै = पूरा होता है, सिद्ध होता है। एकौ कामु = एक भी कार्य। मन-काँचै = कच्चे मन वाला। नाचे = भटकता रहता है। राँचे = प्रसन्न होते हैं। ]

प्रसंग-कविवर बिहारी द्वारा रचित प्रस्तुत दोहे में बाह्याडम्बरों की निरर्थकता बताकर भगवान् की सच्ची भक्ति पर बल दिया गया है। |

व्याख्या-कवि का कथन है कि जप करने, माला फेरने, चन्दन का तिलक लगाने आदि बाह्य क्रियाओं से कोई काम पूरा नहीं होता। इन बाह्य आचरणों से सच्ची भक्ति नहीं होती है। जिनका मन ईश्वर की भक्ति करने से कतराता है, भक्ति करने (UPBoardSolutions.com) में कच्चा है, वह व्यर्थ ही इधर-उधर की क्रियाओं में मारा-मारा फिरता है। ईश्वर तो केवल सच्चे मन की भक्ति से ही प्रसन्न होते हैं।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. कवि ईश्वर की सच्ची भक्ति पर बल देता है तथा स्पष्ट करता है कि बाह्य आचरणों में भक्ति का सच्चा स्वरूप नहीं है।
  2. भाषा–साहित्यिक ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. रस-शान्त।
  5. छन्द-दोहा।
  6. अलंकार–अनुप्रास।
  7. गुण–प्रसाद।
  8. भावसाम्यकबीर का भी यही मत है

माला तो कर में फिरै, जिह्वा मुख में माँहि।
मनुवा तो दस दिस फिरै, ये तो सुमिरन नाहिं ॥

नीति
प्रश्न 1.
दुसह दुराज प्रजानु कौं, क्यौं न बढ़े दुख-दंदु ।।
अधिक अँधेरी जग करते, मिलि मावस रबि-चंद् ॥ [2016]
उत्तर
[दुसह = असह्य। दुराज = दो राजाओं का शासन, बुरा शासन। दंदु = संघर्ष। मावस = अमावस्या के दिन]

सन्दर्भ-प्रस्तुत दोहा कविवर बिहारी द्वारा रचित ‘बिहारी सतसई’ से (UPBoardSolutions.com) हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘काव्य-खण्ड में संकलित ‘नीति’ शीर्षक से उद्धृत है।।

[ विशेष—इस शीर्षक के अन्तर्गत आने वाले सभी दोहों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग-प्रस्तुत दोहे में दो राजाओं के शासन से उत्पन्न कष्टों का वर्णन किया गया है।

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व्याख्या-कवि का कथन है कि एक ही देश में दो राजाओं के शासन से प्रजा के दु:ख और संघर्ष अत्यधिक बढ़ जाते हैं। दुहरे शासन में प्रजा उसी प्रकार दुःखी हो जाती है, जिस प्रकार अमावस्या की रात्रि में सूर्य और चन्द्रमा एक ही राशि में मिलकर संसार को गहन अन्धकार से पूर्ण कर देते हैं।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. अमावस्या की रात्रि को सूर्य और चन्द्रमा (दो राजा) एक ही राशि में आ जाते हैं। ऐसा सूर्य-ग्रहण के समय में होता है। यह कवि के ज्योतिष-ज्ञान का परिचायक है।
  2. दुहरा शासन प्रजा के लिए कष्टप्रद होता है। इस नीति के (UPBoardSolutions.com) निर्धारण में कवि ने अपने ज्योतिष-ज्ञान का व्यावहारिक । रूप में अच्छा प्रयोग किया है।
  3. भाषा-ब्रज।
  4. शैली-मुक्तक।
  5. छन्द-दोहा।
  6. रस-शान्त।
  7. अलंकार–श्लेष और दृष्टान्त।
  8. गुण–प्रसाद।

प्रश्न 2.
बसै बुराई जासु तन, ताही कौ सनमानु ।
भली-भलौ कहि छोड़िये, खोटें ग्रह जपु दानु ॥ [2016, 18]
उत्तर
[सनमानु = सम्मान। खोर्दै ग्रह = अनिष्टकारी ग्रह (शनि) आदि। ]

प्रसंग-प्रस्तुत दोहे में इस सत्य को उद्घाटित किया गया है कि संसार में दुष्ट व्यक्ति की बहुत आवभगत (आदर) होती है, जिससे उसके अनिष्ट कार्यों से बचा जा सके।

व्याख्या-कवि का मत है कि जिसके पास अनिष्ट करने की शक्ति (बुराई) है, उसका संसार में बहुत आदर होता है। भले को हानि न पहुँचाने वाला समझकर अर्थात् भला कहकर सब छोड़ देते हैं अर्थात् उसकी उपेक्षा करते हैं, लेकिन अनिष्ट ग्रह के आने पर जप-दान (UPBoardSolutions.com) आदि करके उसे शान्त करते हैं। तात्पर्य यह है कि जिसमें बुराई या दुष्टता होती है, लोग उसी का सम्मान करते हैं। |

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. कवि ने अनिष्ट ग्रहों के आने पर जप, दान आदि से उन्हें शान्त करने के कार्यों के माध्यम से इस यथार्थ का सुन्दर चित्रण किया है कि लोग दुष्ट लोगों का सम्मान भयवश करते हैं।
  2. भाषा–ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. छन्द-दोहा।
  5. रस-शान्त।
  6. गुण–प्रसाद; व्यंजना से ओज भी है।
  7. अलंकार-‘बसै बुराई’ में अनुप्रास, ‘भलौ-भलौ’ में पुनरुक्तिप्रकाश तथा खोटे ग्रह का उदाहरण देने के कारण दृष्टान्त।
  8. भावसाम्य-महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने भी ऐसे ही विचार अपने काव्य में व्यक्त किये हैं

टेढ़ जानि सब बंद काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू ॥

प्रश्न 3.
नर की अरु नल-नीर की, गति एकै करि जोड़।
जेतौ नीचो है चले, तेतौ ऊँचौ होइ ॥ [2012, 16]
उत्तर
[ नल-नीर = नल को जल। जोइ = देखो। जेतौ = जितना। तेतौ = उतना।].

प्रसंग-प्रस्तुत दोहे में बताया गया है कि मनुष्य जितना नम्र होता है, उतना ही ऊपर उठता है।

व्याख्या-कविवर बिहारी का कथन है कि मनुष्य की और नल के जल की समान स्थिति होती है। जिस प्रकार नल का जल जितना नीचे होकर बहता है, उतना ही ऊँचा उठता है; उसी प्रकार मनुष्य जितना नम्रता का व्यवहार करता है, उतनी ही अधिक (UPBoardSolutions.com) उन्नति करता है। इस प्रकार मनुष्य और नल का पानी जितना. नीचे होकर चलते हैं, उतना ही ऊँचे उठते हैं।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. मनुष्य नम्रता से उन्नति करता है। यहाँ विनम्रता से महान् बनने का रहस्य । समझाया गया है।
  2. भाषा-ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. रस-शान्त।
  5. छन्द–दोहा
  6. गुणप्रसाद।
  7. अलंकार-‘नर की ………………… करि जोइ’ में उपमा, ‘जेतौ नीचो ……………… ऊँचौ होइ’ में विरोधाभास, दो वस्तुओं (नल-नीर और नर) का एक समान धर्म होने के कारण दीपक तथा ‘गति’, ‘नीचो’, ‘ऊँचौ’ में श्लेष का मंजुल प्रयोग द्रष्टव्य है।

प्रश्न 4.
बढ़त-बढ़त संपति-सलिलु, मन-सरोजु बढ़ि जाई ।
घटत-घटत सु न फिरि घटै, बरु समूल कुम्हिलाई ॥ [2012, 14, 17]
उत्तर
[ संपति-सलिलु = धनरूपी जल। मन-सरोजु = मनरूपी कमल। बरु = चाहे। समूल = जड़सहित। कुम्हिलाइ = मुरझा जाता है।]

प्रसंग-प्रस्तुत दोहे में कवि ने धन के बढ़ने पर मन पर पड़ने वाले प्रभाव का वर्णन किया है।

व्याख्या--कवि का कथन है कि धनरूपी जल के बढ़ जाने के साथ-साथ मनरूपी कमल भी बढ़ता चला जाता है, किन्तु धनरूपी जल के घटने के साथ-साथ मनरूपी कमल नहीं घटता, अपितु समूल नष्ट हो जाता है अर्थात् धन के बढ़ जाने पर मन की (UPBoardSolutions.com) इच्छाएँ भी बढ़ जाती हैं, परन्तु धन के घट जाने पर मन की इच्छाएँ नहीं घटती हैं। तब परिणाम यह होता है कि मनुष्य यह सह नहीं पाता और दुःख से मरे हुए के समान । हो जाता है।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1.  जिस तालाब में कमल होते हैं, जब उस तालाब में पानी बढ़ता है तो उसके साथ-साथ कमल की नाल भी बढ़ती जाती है, किन्तु जब पानी उतरती है तो वह बढ़ी हुई नाल छोटी नहीं होती। पानी के समाप्त होने पर वह स्वयं नष्ट होती है और कमल को भी नष्ट कर देती है। कमल का । उदाहरण देते हुए कवि ने यह स्पष्ट किया है कि धन के बढ़ने पर मन को नियन्त्रित रखना चाहिए अन्यथा धन न रहने पर बहुत कष्ट होता है।
  2. भाषा-ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. छन्द-दोहा।
  5. रस–शान्त।
  6. अलंकार-‘बढ़त-बढ़त’, ‘घटत-घटत’ में पुनरुक्तिप्रकाश और संपति-सलिलु, | मन-सरोज’ में रूपक तथा अनुप्रास काव्यश्री में वृद्धि कर रहे हैं।
  7. गुण–प्रसाद।

प्रश्न 5.
जौ चाहत, चटकन घटे, मैलौ होइ न मित्त।
रज राजसु न छुवाइ तौ, नेह-चीकन चित्त ॥ [2014, 17]
उत्तर
[ चटक = प्रतिष्ठा, चमक। मैलो = दोष से युक्त। मित्त = मित्र। रज = धूल। राजसु = रजोगुण। नेह चीकन = प्रेम से चिकने, तेल से चिकने। चित्त = मन, मनरूपी दर्पण।]

प्रसंग—इस दोहे में कवि ने मित्रता के मध्य धन और वैभव को न आने देने का परामर्श दिया है।

व्याख्या–कवि का कथन है कि यदि आप चाहते हैं कि मित्रता की चटक अर्थात् चमक समाप्त न हो तथा मित्रता स्थायी बनी रहे और उसमें दोष उत्पन्न न हों, तो धन-वैभव का इससे सम्बन्ध न होने दें। धन अथवा किसी अन्य वस्तु का लोभ मित्रता को (UPBoardSolutions.com) मलिन कर देता है। मित्र के स्नेह से चिकना मन धनरूपी धूल के स्पर्श से मैला हो जाता है; अत: स्नेह में धन का स्पर्श न होने दें। जिस प्रकार तेल से चिकनी वस्तु धूल के स्पर्श से मैली हो जाती है और उसकी चमक घट जाती है, उसी प्रकार प्रेम से कोमल चित्त; धनरूपी धूल के स्पर्श से दोषयुक्त हो जाता है और मित्रता में कमी आ जाती है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. मित्रता में धन के लेन-देन का व्यवहार कम रखने से ही मित्रता विद्वेष रहित हो सकती है। चित्त की निर्मलता को बनाये रखने के लिए प्रेमरूपी तेल और धनरूपी धूल की जो प्रवृत्तिमूलक उपमा दी गयी है, उसने कवि के कथन को अत्यधिक कलात्मक एवं प्रभावोत्पादक बना दिया ‘ है।
  2. भाषा-ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. रस-शान्त।
  5. छन्द दोहा।
  6. अलंकार-रूपक, अनुप्रास तथा श्लेष।
  7. गुणप्रसाद।

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प्रश्न 6.
बुरी बुराई जौ तजे, तौ चितु खरौ डरातु ।
ज्यौं निकलंकु मयंकु लखि, गनैं लोग उतपातु ॥
उत्तर
[ खरौ = बहुत अधिकानिकलंकु = कलंकरहित। मयंकु = चन्द्रमा। गनै = गिनने लगते हैं। उतपातु = अमंगल।]

प्रसंग-इस दोहे में कवि ने बताया है कि यदि दुष्ट व्यक्ति अचानक अपनी दुष्टता छोड़ दे तो सदा अमंगल की सम्भावना बनी रहती है। |

व्याख्या-कविवर बिहारी का कथन है कि यदि दुष्ट व्यक्ति सहसा अपनी दुष्टता छोड़कर अच्छा व्यवहार करने लगे तो उससे चित्त अधिक भयभीत होने लगता है। जैसे चन्द्रमा को कलंकरहित देखकर लोग अमंगलसूचक मानने लगते हैं। तात्पर्य यह है (UPBoardSolutions.com) कि जिस प्रकार चन्द्रमा का कलंकरहित होना असम्भव है, उसी प्रकार दुष्ट व्यक्ति का एकाएक दुष्टता त्यागना भी असम्भव है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. ज्योतिष सिद्धान्त के अनुसार निष्कलंक चन्द्रमा दिखाई देने से संसार में उपद्रव की आशंका होने लगती है। यह दोहा बिहारी के ज्योतिष-ज्ञान का परिचायक है।
  2. दुष्ट व्यक्ति के अच्छा व्यवहार करने पर भी उससे सावधान रहना चाहिए।
  3. भाषा-ब्रज।
  4. शैली-मुक्तक।
  5. रस–शान्त।
  6.  छन्द–दोहा।
  7.  अलंकार-‘बुरी बुराई’ में अनुप्रास तथा चन्द्रमा का उदाहरण देने में दृष्टान्त।
  8.  गुण–प्रसाद।।

प्रश्न 7.
स्वारथु सुकृतु न श्रम वृथा, देखि बिहंग बिचारि।
बाजि पराए पानि परि, हूँ पच्छीनु न मारि ॥
उत्तर
[स्वारथु = स्वार्थी। सुकृतु = पुण्य कार्य। श्रम वृथा = व्यर्थ को परिश्रम। बिहंग = पक्षी। बाजि = (i) बाज पक्षी तथा (ii) राजा जयसिंह। पानि = हाथ। पच्छीनु = पक्षियों को, अपने पक्ष वालों को।

प्रसंग-इस दोहे में कवि ने अन्योक्ति के माध्यम से अपने आश्रयदाता राजा जयसिंह को समय पर चेतावनी दी है। इस दोहे में उसे हिन्दू राजाओं पर आक्रमण न करने के लिए अन्योक्ति द्वारा सचेत किया .. गया है।

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व्याख्या–

  1. हे बाज! तू अपने मन में अच्छी तरह सोच-विचार कर देख ले कि तू शिकारी के हाथ में पड़कर अपनी जाति के पक्षियों को मारता है। इसमें न तो तेरा स्वार्थ है, न यह अच्छा कार्य ही है, तेरा श्रम भी व्यर्थ ही जाता है; क्योंकि तेरे परिश्रम का फल तुझे न (UPBoardSolutions.com) मिलकर तेरै मालिक को प्राप्त होता है। तू दूसरों के हाथ की कठपुतली बनकर अपनी जाति के पक्षियों का वध कर रहा है। अब तू मेरी सलाह मानकर अपनी जाति के पक्षियों का वध मत कर।
  2. हे राजा जयसिंह! तू विचार कर देख ले कि तू बाजे पक्षी की तरह अपने शासक औरंगजेब के हाथ की कठपुतली बनकर अपने साथी इन हिन्दू राजाओं पर आक्रमैण कॅर रहा है। इस कार्य को करने से तेरे स्वार्थ की पूर्ति नहीं होती है, जीता हुआ राज्य तुझे नहीं मिलता। युद्ध में राजाओं का वध करना कोई पुण्य का कार्य भी नहीं है। तुम्हारे श्रम का फल तुम्हें न मिलने से तुम्हारा श्रेम व्यर्थ हो जाता है। इसलिए तू औरंगजेब के कहने से अपने पक्ष के हिन्दू राजाओं पर आक्रमण करके उनका वध मत कर।। |

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. राजा जयसिंह ने औरंगजेब के कहने से अनेक हिन्दू राजाओं के विरुद्ध युद्ध किया था। उन दोनों में यह तय था कि जीता हुआ राज्य तो औरंगजेब का होगा और विजित राज्य की लूट में मिला हुआ धन जयसिंह का। अत: उसे चेतावनी देना उसके आश्रित कवि (बिहारी) का कर्तव्य है।
  2. यहाँ बाज़ पक्षी-जयसिंह का, शिकारी-औरंगजेब का तथा पक्षी अपने पक्ष के हिन्दू राजाओं का प्रतीक है। यह दोहा इतिहास की वास्तविक घटना पर आधारित होने के कारण विशेष महत्त्व रखता है।
  3. भाषा-ब्रज।
  4. शैली-मुक्तक।
  5.  रस-शान्त।
  6. छन्द-दोहा।
  7. अलंकार-बाज पक्षी के माध्यम से राजा जयसिंह को सावधान किया गया है; अत: अन्योक्ति अलंकार है। ‘पच्छीनु’ के दो अर्थ-पक्षी और पक्ष वाले होने से श्लेष है।
  8. गुण–प्रसाद एवं ओजा
  9. शब्दशक्ति-अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना।

काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध

प्रश्न 1
निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकारों को पहचानकर उनके नाम तथा स्पष्टीकरण : दीजिए-
(क) जा तन की झाईं परै, स्यामु हरित-दुति होइ।।
(ख) ज्य-ज्य बूड़े स्याम सँग, त्य-त्य उज्जलु होइ ।।
(ग) नर की अरु नल-नीर की, गति एकै करि जोइ ।।
जेतौ नीच है चले, तेतौ ऊँचौ होइ ।।।
उत्तर
(क) श्लेष-“झाईं परै, स्यामु हरित-दुति’ के एक से अधिक और भिन्न अर्थ होने के कारण श्लेष अलंकार है।

(ख) पुनरुक्तिप्रकाश, श्लेष और विरोधाभास-ज्यौं’ और ‘त्यौं’ शब्द की पुनरावृत्ति होने के कारण पुनरुक्तिप्रकाश, ‘स्याम रँग’ और ‘उज्जलु’ के दो-दो अर्थ होने के कारण श्लेष तथा काले रंग में । डूबने के बाद सफेद होने के कारण विरोधाभास अलंकार है।

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(ग) उपमा, विरोधाभास, दीपक तथा श्लेष—“नर की अरु नल-नीर की, गति एकै करि जोइ।” में नर’ की समानता नल-नीर’ से किये जाने के कारण उपमा अलंकार है। ‘‘जेतो नीचो है चलै, तेतौ ऊँचौ होइ’ में जितना नीचा होने पर उतना ऊँचा होता है के (UPBoardSolutions.com) कारण विरोधाभास अलंकार है। दो वस्तुओं (नलनीर और नर) का एक ही समान धर्म होने के कारण दीपक अलंकार है। ‘नीचो’ (नीचा तथा पतन) और ऊँचो (ऊँचा तथा उत्थान) के दो-दो अर्थ होने के कारण श्लेष अलंकार है।

प्रश्न 2
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा छन्द है? सोदाहरण समझाइए-
तौ लगु या मन-सदन मैं, हरि आवै किहिं बाट ।
विकट जटे जौ लगु निपट, खुटै न कपट-कपाट ॥
उत्तर
इन पंक्तियों में दोहा छन्द है; क्योंकि इसके प्रथम और तृतीय चरणों में 13-13 तथा द्वितीय और चतुर्थ चरणों में 11-11 मात्राएँ हैं।

प्रश्न 3
कविजन कभी-कभी केवल अप्रस्तुत का वर्णन करते हैं और उसी के द्वारा प्रस्तुत की ओर संकेतमात्र कर देते हैं। इस प्रकार के क्मत्कार को ‘अन्योक्ति अलंकार’ कहते हैं। जैसे-
स्वारथु सुकृतु न श्रम वृथा, देखि बिहंग बिचारि ।
बाजि पराए पानि परि, तूं पच्छीनु न मारि ॥
-बिहारी के दोहों से अन्योक्ति का एक अन्य उदाहरण लिखिए-
उत्तर
कर लै सँघि सराहि हुँ, रहे सबै गहि मौनु ।
गंधी गंध गुलाब कौ, गॅवई (UPBoardSolutions.com) गाहकु कौनु ।।।

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प्रश्न 4
निम्नलिखित पदों में समास-विग्रह कीजिए तथा उनका नाम लिखिए-
पीतु पटु, नीलमनि, मन-सदन, दुपहर, रवि-चन्द, समूल ।।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 4 बिहारी (काव्य-खण्ड) img-1

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UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 7 Control and Coordination

UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 7 Control and Coordination (नियंत्रण एवं समन्वय)

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पाठगत हल प्रश्न

[NCERT IN-TEXT QUESTIONS SOLVED]

खण्ड 7.1 (पृष्ठ संख्या 132)

प्रश्न 1.
प्रतिवर्ती क्रिया तथा टहलने के बीच क्या अंतर है?
उत्तर
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प्रश्न 2.
दो तंत्रिका कोशिकाओं (न्यूरॉन) के मध्य अंतर्ग्रथन (सिनेप्स) में क्या होता है?
उत्तर
दो तंत्रिका कोशिकाओं के मध्य रिक्त स्थान होते हैं, जिसे अंतर्ग्रथन (सिनेप्स) कहते हैं। तंत्रिका कोशिका के द्रुमाकृति पर उत्पन्न विद्युत आवेग तंत्रिकांक्ष (एकसॉन) में होता हुआ अंतिम सिरे तक पहुँचता है। एक्सॉन के अंत में विद्युत आवेग कुछ (UPBoardSolutions.com) रसायनों का विमोचन करता है। यह रसायन रिक्त स्थान या सिनेप्स (सिनोण्टिक दरार) को पार करते हैं और अगली तंत्रिका कोशिका की द्रुमिका में इसी तरह का विद्युत आवेग प्रारंभ करते हैं। अंततः इसी प्रकार का एक अंतर्ग्रथन (सिनेप्स) ऐसे आवेगों को तंत्रिका कोशिका से अन्य कोशिकाओं जैसे कि पेशी कोशिकाओं या ग्रंथि तक ले जाते हैं।

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प्रश्न 3.
मस्तिष्क का कौन-सा भाग शरीर की स्थिति तथा संतुलन का अनुरक्षण करता है?
उत्तर
अनुमस्तिष्क (Cerebellum) शरीर की स्थित तथा संतुलन का अनुरक्षण करता है। यह मस्तिष्क के भाग पश्चमस्तिष्क में होता है।

प्रश्न 4.
हम अगरबत्ती की गंध का पता कैसे लगाते हैं?
उत्तर
हमारे नाक में गंधीय संवेदांग (Olfactory receptors) होते हैं। गंध के कारण रासायनिक क्रिया होती है, जिससे विद्युत आवेग संवेदी तंत्रिका कोशिकाओं (Sensory neurons) द्वारा अग्रमस्तिष्क (fore brain) तक पहुँचता है, जिसमें विद्यमान सँघने के लिए विशिष्टीकृत (UPBoardSolutions.com) क्षेत्र अगरबत्ती की गंध पहचानने की क्रिया संपादित करता है।

प्रश्न 5.
प्रतिवर्ती क्रिया में मस्तिष्क की क्या भूमिका है?
उत्तर
प्रतिवर्ती क्रिया मेरुरज्जु द्वारा संचालित एवं नियंत्रित होती है। ग्राही अंग (त्वचा में ऊष्मा/दर्द) से संवेदना संवेदी तंत्रिका कोशिकाओं द्वारा मेरुरज्जु तक लाई जाती है तथा प्रेरक तंत्रिका कोशिकाओं द्वारा कार्यकर (Effector) (जैसे भुज में पेशी) को संदेश भेजा जाता है। मस्तिष्क की प्रतिवर्ती क्रिया में कोई कार्य नहीं है, केवल संदेश मस्तिष्क तक पहुँचता है।

खण्ड 7.2 ( पृष्ठ संख्या 136)

प्रश्न 1.
पादप हॉर्मोन क्या है?
उत्तर
पादपों में उपस्थित वे रासायनिक पदार्थ जो पौधों की वृधि, (UPBoardSolutions.com) विकास एवं पर्यावरण के प्रति अनुक्रिया के समन्वय में सहायता करते हैं। उदाहरण-ऑक्सिन, जिब्बरेलिन, तथा साइटोकाइनिन।

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प्रश्न 2.
छुई-मुई पादप की पत्तियों की गति, प्रकाश की ओर प्ररोह की गति से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर
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प्रश्न 3.
एक पादप हॉर्मोन का उदाहरण दीजिए जो वृद्धि को बढ़ाता है।
उत्तर
ऑक्सीजन पादप हॉर्मोन है, जो पौधे में वृद्धि करता है।

प्रश्न 4.
किसी सहारे के चारों ओर एक प्रतान की वृद्धि में ऑक्सिन किस प्रकार सहायक है?
उत्तर
हम जानते हैं कि प्रतान के शिखर पर ऑक्सिन बनता है। प्रतान स्पर्श के प्रति संवेदनशील होते हैं। जैसे ही प्रतान किसी आधार के संपर्क में आते हैं, वह भाग उतनी तेज़ी से साथ वृद्धि नहीं करती, जितनी तेजी से आधार से दूर वाला भाग करता है, (UPBoardSolutions.com) क्योंकि ऑक्सिन विसरित होकर उस तरफ़ चला जाता है। इसके कारण कोशिकाएँ लंबी एवं
तन्य हो जाती हैं और प्रतान मुड़ जाता है तथा आधार से लिपट जाती हैं। उदाहरण-मटर के पौधे।

प्रश्न 5.
जलानुवर्तन दर्शाने के लिए एक प्रयोग की अभिकल्पना कीजिए।
उत्तर
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UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 7 Control and Coordination img-4
निष्कर्ष – अंकुरित बीजों की जड़ें गीले बुरादे की ओर मुड़ जाती हैं, जिसे जलानुवर्तन कहा जाता है।
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खण्ड 7.3 ( पृष्ठ संख्या 138)

प्रश्न 1.
जंतुओं में रासायनिक समन्वय कैसे होता है?
उत्तर
जंतुओं में रासायनिक समन्वय हॉर्मोन के द्वारा होता है। ये जंतु हार्मोन अंत:स्रावी ग्रंथियों द्वारा स्रावित होते हैं तथा रक्त के माध्यम से शरीर के उन अंगों तक पहुँच जाते हैं, जहाँ इसकी आवश्यकता होती है।

प्रश्न 2.
आयोडीन युक्त नमक के उपयोग की सलाह क्यों दी जाती है?
उत्तर
अवटुग्रंथि (Thyroid gland) को थायरॉक्सिन हॉर्मोन बनाने के लिए आयोडीन आवश्यक होता है। थायरॉक्सिन कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन तथा वसा के उपापचय का हमारे शरीर में नियंत्रण करता है। हमारे आहार में आयोडीन की कमी से हमें घंघा रोग (UPBoardSolutions.com) (गॉयटर) हो जाता है। अत: थायरॉक्सिन की उचित मात्रा शरीर में बनाए रखने के लिए आयोडीन युक्त नमक भोजन के साथ खाने की सलाह दी जाती है।

प्रश्न 3.
जब एड्रीनलीन रुधिर में स्रावित होती है, तो हमारे शरीर में क्या अनुक्रिया होती है?
उत्तर

  1. एड्रीनली हृदय की धड़कन को बढ़ा देता है, ताकि हमारी मांसपेशियों को अधिक ऑक्सीजन की आपूर्ति हो सके।
  2. पाचन तंत्र तथा त्वचा में रुधिर की आपूर्ति कम हो जाती है, क्योंकि इन अंगों की छोटी धमनियों के आस-पास की पेशियाँ सिकुड़ जाती हैं।
  3. इससे डायाफ्राम तथा पसलियों के सिकुड़ने से श्वसन दर बढ़ जाती है। ये सभी अनुक्रियाएँ मिलकर जंतु शरीर को स्थिति से निपटने के लिए तैयार करती हैं।

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प्रश्न 4.
मधुमेह के कुछ रोगियों की चिकित्सा इंसुलिन का इंजेक्शन देकर क्यों की जाती है?
उत्तर
मधुमेह रोग अग्न्याशय द्वारा स्रावित हॉर्मोन इन्सुलिन की कमी के कारण होता है, यह हॉर्मोन रुधिर में शर्करा स्तर को नियंत्रित करने में सहायता करता है। अतः डॉक्टर रोगी को इन्सुलिन के इंजेक्शन लगवाने की सलाह देता है ताकि (UPBoardSolutions.com) रुधिर में शर्करा का स्तर कम किया जा सके।

पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न

[NCERT TEXTBOOK QUESTIONS SOLVED]

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा पादप हार्मोन है?
(a) इंसुलिन
(b) थायरॉक्सिन
(C) एस्ट्रोजन
(d) साइटोकाइनिन
उत्तर
(d) साइटोकाइनिन।

प्रश्न 2.
दो तंत्रिका कोशिका के मध्य खाली स्थान को कहते हैं-
(a) द्रुमिका
(b) सिनेप्स।
(C) एक्सॉन
(d) आवेग
उत्तर
(b) सिनेप्स।

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प्रश्न 3.
मस्तिष्क उत्तरदायी है
(a) सोचने के लिए
(b) हृदय स्पंदन के लिए
(C) शरीर का संतुलन बनाने के लिए
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर
(d) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 4.
हमारे शरीर में ग्राही का क्या कार्य है? ऐसी स्थिति पर विचार कीजिए जहाँ ग्राही उचित प्रकार से कार्य नहीं कर रहा हो। क्या समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं?
उत्तर
ग्राही, हमारी ज्ञानेन्द्रियों में स्थित एक खास कोशिकाएँ होती हैं, जो वातावरण से सभी सूचनाएँ ढूंढ निकालती हैं और उन्हें केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (मेरुरज्जू तथा मस्तिष्क) में पहुँचाती हैं। मस्तिष्क के भाग अग्रमस्तिष्क में विभिन्न ग्राही से संवेदी (UPBoardSolutions.com) आवेग (सूचनाएँ) प्राप्त करने के लिए क्षेत्र होते हैं। इसके अलग-अलग क्षेत्र सुनने, सँघने, देखने आदि के लिए विशिष्टीकृत होते हैं। यदि कोई ग्राही उचित प्रकार कार्य नहीं करेगी तो उस ग्राही द्वारा एकत्र की गई सूचना मस्तिष्क तक नहीं पहुँचेगी।

उदाहरण-

  1. यदि रेटिना की कोशिका अच्छी तरह कार्य नहीं करेंगी, तो हम देख नहीं पाएँगे तथा अंधे भी हो सकते हैं।
  2. जिह्वा द्वार मीठा, नमकीन आदि स्वाद का पता लगाना संभव नहीं हो पाएगा।

प्रश्न 5.
एक तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) की संरचना बनाइए तथा इसके कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
न्यूरॉन के कार्य-
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  1. सूचना या उद्दीपन एक तंत्रिका कोशिका के दुमिका के सिरे द्वारा प्राप्त की जाती है।
  2. रासायनिक क्रिया द्वारा विद्युत आवेग पैदा होती है, जो कोशिकाय तक जाता है तथा तंत्रिकाक्ष (एक्सॉन) में होता हुआ इसके अंतिम सिरे तक पहुँचता है।
  3. एक्सॉन के अंत में विद्युत आवेग कुछ। रसायनों का विमोचन करता है। ये रसायन रिक्त स्थान या सिनेप्स को पार करते हैं। और अगली तंत्रिका कोशिका की दुमिका में इसी तरह का विद्युत आवेग प्रारंभ करते हैं।
  4. इसी तरह का एक सिनेप्स अंतत: ऐसे आवेगों को तंत्रिका कोशिका से अन्य कोशिकाओं, जैसे कि पेशी कोशिकाओं या ग्रंथि तक ले जाते हैं। अतः न्यूरॉन एक संगठित जाल का बना होता है, जो सूचनाओं को विद्युत आवेग के द्वारा शरीर के एक भाग से दूसरे भाग तक संवहन करता है।
  5. उदाहरण के लिए ग्राही संवेदी तंत्रिका कोशिका (Sensory neurons) सूचना ग्रहण कर केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुँचाते हैं तथा यह  आवेग को वापस प्रेरक तंत्रिका कोशिका (Motor neurons) द्वारा पेशी कोशिकाओं या कार्यकर (effectors) तक पहुँचाती है।

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प्रश्न 6.
पादप में प्रकाशानुवर्तन किस प्रकार होता है?
उत्तर
पादपों में प्ररोह प्रकाश की ओर मुड़कर तथा जड़े इससे दूर मुड़कर अनुक्रिया करती हैं, जिसे प्रकाशानुवर्तन कहा जाता है। प्रकाश जब पादप की वृद्धि वाले भाग पर पड़ता है, तो वृद्धि हॉर्मोन ऑक्सिन छाया वाले भाग में अधिक (UPBoardSolutions.com) मात्रा में एकत्र होकर उसे प्रकाश की आने की दिशा में मोड़ देता है अर्थात् पौधे का तने वाला भाग तथा पत्तियाँ प्रकाश की ओर मुड़ जाती हैं। इससे पत्तियों को प्रकाश संश्लेषण क्रिया के लिए अधिक से अधिक प्रकाश मिलने लगता है।

प्रश्न 7.
मेरुरज्जु आघात से किन संकेतों के आने में व्यवधान होगा?
उत्तर
मेरुरज्जु आघात से निम्न क्रियाओं में व्यवधान होगा

  1. हम जानते हैं कि प्रतिवर्ती क्रिया मेरुरज्जु के द्वारा नियंत्रित होती है। अत: प्रतिवर्ती क्रिया नहीं होगी।
  2. ज्ञानेंद्रियों से आने वाली सूचना (आवेग) मस्तिष्क तक नहीं पहुँचेगी।
  3. मस्तिष्क से सूचना शरीर के विभिन्न कार्यकर अंगों तक नहीं पहुँचेगी।

प्रश्न 8.
पादपों में रासायनिक समन्वय किस प्रकार होता है? ।
उत्तर
पादपों में रासायनिक समन्वय पादप हॉर्मोन द्वारा होते हैं। ये हॉर्मोन पौधों की वृद्धि, विकास एवं पर्यावरण के प्रति अनुक्रिया के समन्वयन में सहायता प्रदान करते हैं। इनके संश्लेषण का स्थान इनके क्रिया क्षेत्र से दूर होता है और वे साधारण विसरण द्वारा क्रिया क्षेत्र तक पहुँच जाते हैं।
उदाहरण के लिए

  1. ऑक्सिन का सांद्रण कोशिकाओं की लंबाई में वृद्धि के लिए उद्दीप्त करता है।
  2. जिब्बेरेलिन —तने की वृद्धि में सहायता करते हैं।
  3. साइटोकाइनिन कोशिका विभाजन को प्रेरित करता है।
  4. एब्सिसिक अम्ल वृद्धि का संदमन करते हैं, जैसे पत्तियों का मुरझाना।

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प्रश्न 9.
एक जीव में नियंत्रण एवं समन्वय के तंत्र की क्या आवश्यकता है?
उत्तर
सजीवों में अनेक अंग तंत्र पाए जाते हैं, जो एक खास कार्य करते हैं। जंतुओं में नियंत्रण एवं समन्वय को कार्य तंत्रिका पेशी ऊतक तथा हॉर्मोन द्वारा किया जाता है तथा पादपों में हॉर्मोन द्वारा नियंत्रण एवं समन्वय होते हैं। यदि जीवों में (UPBoardSolutions.com) समन्वय तंत्र नहीं होगा, तो सभी अंग एवं कोशिकाएँ स्वतंत्र रूप से कार्य करेंगी तथा हमें इच्छित परिणाम नहीं मिलेंगे।

प्रश्न 10.
अनैच्छिक क्रियाएँ तथा प्रतिवर्ती क्रियाएँ एक-दूसरे से किस प्रकार भिन्न हैं?
उत्तर
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प्रश्न 11.
जंतुओं में नियंत्रण एवं समन्वय के लिए तंत्रिका तथा हॉर्मोने क्रियाविधि की तुलना तथा व्यतिरेक (contrast) कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 12.
छुई-मुई पादप में गति तथा हमारी टाँग में होने वाली गति के तरीके में क्या अंतर है?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 7 Control and Coordination img-9

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UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 6 Life Processes

UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 6 Life Processes (जैव-प्रक्रम)

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पाठगत हल प्रश्न

[NCERT IN-TEXT QUESTIONS SOLVED]

खंड 6.1 ( पृष्ठ संख्या 105)

प्रश्न 1.
हमारे जैसे बहुकोशिकीय जीवों में ऑक्सीजन की आवश्यकता पूरी करने में विसरण क्यों अपर्याप्त है?
उत्तर
हम जानते हैं कि बहुकोशिकीय जीवों में सभी कोशिकाएँ अपने आसपास के पर्यावरण के सीधे संपर्क में नहीं रह सकती हैं। अतः साधारण विसरण द्वारा सभी कोशिकाओं और ऊतकों तक ऑक्सीजन की पूर्ति नहीं हो पाती है, क्योंकि यह अत्यंत (UPBoardSolutions.com) धीमी प्रक्रिया है। इसलिए वहन तंत्र द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन पहुँचाई जाती है।

प्रश्न 2.
कोई वस्तु सजीव है, इसका निर्धारण करने के लिए हम किस मापदंड का उपयोग करेंगे?
उत्तर
कोई वस्तु सजीव है इसका निर्धारण हम निम्न मापदंडों द्वारा कर सकते हैं|

  1. गति
  2. वृद्धि
  3. श्वसन
  4. उत्तेजनशीलता
  5. पोषण इत्यादि।

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प्रश्न 3.
किसी जीव द्वारा किन कच्ची सामग्रियों का उपयोग किया जाता है?
उत्तर
किसी जीव द्वारा निम्न कच्ची सामग्रियों के उपयोग किए जाते हैं

  1. खाद्य पदार्थ (कार्बन आधारित)-यह जीवों के लिए ऊर्जा प्राप्त करने के लिए।
  2. ऑक्सीजन श्वसन तथा ATP के रूप में ऊर्जा प्राप्त करने के लिए।
  3. जल-भोजन के पाचन तथा शरीर के (UPBoardSolutions.com) अंदर अन्य कार्यों के लिए।
  4. कार्बन डाइऑक्साइड [CO,]-पौधों में प्रकाश संश्लेषण का एक आवश्यक घटक।।

प्रश्न 4.
जीवन के अनुरक्षण के लिए आप किन-किन प्रक्रमों को आवश्यक मानेंगे?
उत्तर
जीवन के अनुरक्षण के लिए सभी जैव क्रियाएँ आवश्यक होती हैं; जैसे-पोषण, श्वसन, परिवहन, उत्सर्जन, वृद्धि आदि।

खंड 6.2 ( पृष्ठ संख्या 111)

प्रश्न 1.
स्वयंपोषी पोषण तथा विषमपोषी पोषण में क्या अंतर है?
उत्तर
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प्रश्न 2.
प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री पौधे कहाँ से प्राप्त करते हैं?
उत्तर
प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री तथा उनके स्रोत निम्न हैं:

  1. जल-पौधों की जड़े भूमि से जल प्राप्त करती हैं।
  2. कार्बन-डाइऑक्साइड (CO)-पौधे इसे वायुमंडल से रंध्रों (Stomata) द्वारा प्राप्त करते हैं।
  3. क्लोरोफिले-हरे पत्तों में क्लोरोप्लास्ट (UPBoardSolutions.com) होता है, जिसमें क्लोरोफिल मौजूद होते हैं।
  4. सूर्य का प्रकाश-सूर्य से प्राप्त करते हैं।

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प्रश्न 3.
हमारे आमाशय में अम्ल की भूमिका क्या है?
उत्तर
हमारे आमाशय में अम्ल की निम्नलिखित भूमिका है

  1. आमाशय में HCl अम्ल की भूमिका आमाशय रस को अम्लीय बनाना है, क्योंकि एन्जाइम पेप्सिन केवल अम्लीय माध्यम में ही प्रभावशाली ढंग से प्रोटीनों का पाचन कर सकता है।
  2. अम्ल का एक अन्य कार्य यह भी है कि ये भोजन में मौजूद हानिकारक जीवाणुओं को मार देते हैं।
  3. यह अधपचे भोजन का किण्वन नहीं होने देता है।

प्रश्न 4.
पाचक एंजाइमों का क्या कार्य है?
उत्तर
पाचक एंजाइम अघुलनशील जटिल कार्बनिक अणुओं को सरल घुलनशील अणुओं में परिवर्तित कर देते हैं, ताकि क्षुद्रांत की भित्ति द्वारा सरलतापूर्वक अवशोषित कर लिए जाएँ।

प्रश्न 5.
पचे हुए भोजन को अवशोषित करने के लिए क्षुद्रांत्र को कैसे अभिकल्पित किया गया है?
उत्तर
क्षुद्रांत्र के आंतरिक आस्तर पर अनेक अँगुली जैसे प्रवर्ध होते हैं, जिन्हें दीर्घरोम कहते हैं, ये अवशोषण का सतही क्षेत्रफल बढ़ा देते हैं। दीर्घरोम में रुधिर वाहिकाओं की बहुतायत होती है, जो भोजन को अवशोषित करके शरीर की प्रत्येक (UPBoardSolutions.com) कोशिका तक पहुँचाती हैं।

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खंड 6.3 (पृष्ठ संख्या 116)

प्रश्न 1.
श्वसन के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करने की दिशा में एक जलीय जीव की अपेक्षा स्थलीय जीव किस प्रकार लाभप्रद है?
उत्तर

  1. जलीय जीव जल में विलेय ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं। क्योंकि जल में विलेय ऑक्सीजन की मात्रा वायु में ऑक्सजीन की मात्रा की तुलना में बहुत कम है, इसलिए जलीय जीवों की श्वास दर स्थलीय जीवों की अपेक्षा द्रुत गति से होती है।
  2. स्थलीय जीवों में ऑक्सीजन भिन्न-भिन्न अंगों द्वारा अवशोषित की जाती है। इन सभी अंगों में एक रचना होती है, जो उस सतही क्षेत्रफल को बढ़ाती है जो ऑक्सीजन बाहुल्य वायुमंडल के संपर्क में रहता है।

प्रश्न 2.
ग्लूकोज़ के ऑक्सीकरण से भिन्न जीवों में ऊर्जा प्राप्त करने के विभिन्न पर्थ क्या हैं?
उत्तर
ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से भिन्न जीवों में ऊर्जा प्राप्त करने के विभिन्न पथ इस प्रकार हैं:
UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 6 Life Processes img-2

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प्रश्न 3.
मनुष्यों में ऑक्सीजन तथा कार्बन-डाइऑक्साइड का परिवहन कैसे होता है?
उत्तर
ऑक्सीजन का परिवहन-मानव शरीर के फुफ्फुस कूपिकाओं की रुधिर वाहिकाओं में RBC होते हैं, जिसमें मौजूद हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन से संयुक्त होकर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाता है तथा सभी ऊतकों एवं अंगों तक पहुँच जाता है। कार्बन-डाइऑक्साइड (co2) का परिवहन-ऑक्सीजन की अपेक्षा CO2 जल में अधिक विलेय है, इसलिए ऊतकों से फुफ्फुस तक परिवहन हमारे रुधिर (प्लाज्मा) में विलेय अवस्था में होता है।

प्रश्न 4.
गैसों के विनिमय के लिए मानव-फुफ्फुस में अधिकतम क्षेत्रफल को कैसे अभिकल्पित किया है?
उत्तर
फुफ्फुस के अंदर मार्ग छोटी और छोटी नलिकाओं में विभाजित हो जाता है, जो अंत में गुब्बारे जैसी रचना में अंतकृत हो जाता है, जिसे कूपिका कहते हैं। कूपिका एक सतह उपलब्ध कराती है। जिसमें गैसों का विनिमय हो सकता है। यदि (UPBoardSolutions.com) कूपिकाओं की सतह को फैला दिया जाए तो यह लगभग 80 से 100 वर्ग मीटर क्षेत्र ढक लेगी। इस तरह हमारे फुफ्फुस गैसों के विनिमय के लिए अधिकतम क्षेत्रफल बनाती है।

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खंड 6.4 ( पृष्ठ संख्या 122)

प्रश्न 1.
मानव में वहन तंत्र के घटक कौन से हैं? इन घटकों के क्या कार्य हैं?
उत्तर
मानव में वहन तंत्र के घटक हैं-हृदय, रुधिर वाहिकाएँ और रुधिर। उनके कार्य इस प्रकार हैं :
1. हृदय (Heart)–यह एक पंप की तरह कार्य करता है।

2. रुधिर वाहिकाएँ (Blood Vessels):

  1. धमनियाँ (Arteries)-हृदय से शरीर के सभी अंगों तक ऑक्सीजन युक्त रक्त (Oxygenated blood) | ले जाती हैं।
  2. शिराएँ (Veins)-विभिन्न अंगों से हृदय तक वापस डीऑक्सीजनेटेड (De-Oxygenated) रक्त शुद्धिकरण के लिए लाती हैं।
  3. कोशिकाएँ (capillaries)-धमनी छोटी-छोटी वाहिकाओं में विभाजित हो जाती है, जिसे कोशिकाएँ कहते हैं। रुधिर एवं आसपास की कोशिकाओं के मध्य पदार्थों का विनिमय होता है।

3. रुधिर या रक्त (Blood)-यह परिवहन का माध्यम है जो निम्नलिखित से बने हैं:

  1. प्लाज्मा (Plasma)-भोजन के अणुओं, CO2नाइट्रोजनी वर्त्य (nitrogenous wastes), लवण, हार्मोन, प्रोटीन आदि का विलीन रूप में वहन करता है।
  2. RBC-इसमें हीमोग्लोबीन होता है, जो ऑक्सीजन को ले जाती है।
  3. WBC-संक्रमण से लड़ने में सहायता करता है। यह शरीर में आए रोगाणुओं को मारकर शरीर को स्वस्थ बनाए रखता है।
  4. प्लेटलेट्स (Plateletes)-रक्तस्राव के स्थान पर रुधिर का थक्का बनाकर मार्ग अवरुद्ध कर देती है।

प्रश्न 2.
स्तनधारी तथा पक्षियों में ऑक्सीजनित तथा विऑक्सीजनित रुधिर को अलग करना क्यों आवश्यक है?
उत्तर
हृदय का दायाँ व बायाँ बँटवारा ऑक्सीजनित तथा विऑक्सीजनित रुधिर को मिलने से रोकता है तथा शरीर को उच्च दक्षतापूर्ण ऑक्सीजन की पूर्ति करता है, क्योंकि पक्षी और स्तनधारी जंतुओं को अपने शरीर का तापक्रम बनाए रखने के (UPBoardSolutions.com) लिए निरंतर उच्च ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिसके लिए यह बहुत लाभदायक होता है।

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प्रश्न 3.
उच्च संगठित पादप में वहन तंत्र के घटक क्या हैं?
उत्तर
उच्च संगठित पादप में निम्नलिखित वहन तंत्र होते हैं :

  1. जाइलम ऊतक (Xylem tissue)-जाइलम ऊतक पादप के जड़ से खनिज लवण तथा जल इसके सभी अंगों तक पहुँचाता है। जाइलम ऊतक में जड़ों, तनों और पत्तियों की वाहिनिकाएँ तथा वाहिकाएँ आपस में जुड़कर जल संवहन वाहिकाओं का एक जाल बनाती हैं, जो पादप के सभी भागों से संबद्ध होता है।
  2. फ्लोएम ऊतक (Phloem tissue)-भोजन तथा अन्य पदार्थों का संवहन (Translocation) पत्तियों से अन्य सभी अंगों तक फ्लोएम ऊतक द्वारा होता है।

प्रश्न 4.
पादप में जल और खनिज लवण का वहन कैसे होता है?
उत्तर
पापों में जल और खनिज लवण का वहन जाइलम ऊतक द्वारा होता है।

जड़ों की कोशिकाएँ मृदा के संपर्क में हैं तथा वे सक्रिय रूप से आयन प्राप्त करती हैं। यह जड़ और मृदा के मध्य आयन सांद्रण में एक अंतर उत्पन्न करता है। इस अंतर को समाप्त करने के लिए जल अनवरत गति से जड़ के जाइलम में जाता है और जल के स्तंभ का निर्माण करता है, जो लगातार ऊपर की ओर धकेला जाता है। यह दाब जल को ऊँचाई तक पहुँचाने में पर्याप्त नहीं होता है। पत्तियों के द्वारा वाष्पोत्सर्जन क्रिया द्वारा (UPBoardSolutions.com) रंध्र से जल की हानि होती है, जो एक चूषण उत्पन्न करता है, जो जल को जड़ों में उपस्थित जाइलम कोशिकाओं द्वारा खींचता है। अतः वाष्पोत्सर्जन कर्षण जल की गति के लिए एक मुख्य प्रेरक बल होता है।

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प्रश्न 5.
पादप में भोजन का स्थानांतरण कैसे होता है?
उत्तर
पादप में भोजन का स्थानांतरण फ्लोएम ऊतक द्वारा होता है। प्रकाश संश्लेषण के उत्पादों के अलावा फ्लोएम अमीनो अम्ल तथा अन्य पदार्थों का परिवहन भी करता है। ये पदार्थ विशेष रूप से जड़ के भंडारण अंगों, फलों, बीजों तथा वृद्धि वाले अंगों में ले जाए जाते हैं। भोजन तथा अन्य पदार्थों का स्थानांतरण संलग्न साथी कोशिका की सहायता से चालनी नलिका में उपरिमुखी तथा अधोमुखी दोनों दिशाओं में होता है। सुक्रोज सरीखे पदार्थ फ्लोएम ऊतक में ए०टी०पी० से प्राप्त ऊर्जा से ही स्थानांतरित होते हैं।

खंड 6.5 ( पृष्ठ संख्या 124)

प्रश्न 1.
वृक्काणु (नेफ्रॉन) की रचना तथा क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर
संरचना (Structure)-मानव शरीर में दो वृक्क होते हैं। प्रत्येक वृक्क नेफ्रॉन की अनेक इकाइयों से बना होता है। वृक्काणु (नेफॉन) वृक्क की क्रियात्मक इकाई होती है। नेफॉन में कप के आकार का बोमन संपुट (Bowman’s Capsule) होता है, जिसमें कोशिका गुच्छ (Glomerulus) होते हैं। यह रुधिर कोशिकाओं का एक गुच्छ होता है जो एफेरेन्ट कोशिकाओं द्वारा बने होते हैं। एफेरेन्ट धमनियाँ अशुद्ध रक्त नेफ्रॉन तक लाते हैं। कप के आकार का बोमन संपुट वृक्काणु के निलिकाकार भाग (Tubular part of rephron) का निर्माण करती है। जो संग्राहक वाहिनी (collecting duct) से जुड़ा होता है।

क्रियाविधि (Working)–वृक्क धमनी (Renal artery) ऑक्सीजनित रुधिर लाती है, जिसमें नाइट्रोजनी वर्त्य होते हैं। मूत्र बोमन संपुट में स्थित कोशिका गुच्छ (ग्लामेरूलस) में फिल्टर होकर कुंडली के आकार में नेफ्रॉन के नलिकाकार भाग में पहुँचता है। मूत्र में कुछ उपयोगी पदार्थ; जैसे-ग्लूकोज, अमीनों अम्ल, लवण तथा जले रह जाते हैं जो पुनः इस नलिकाकार भाग में अवशोषित कर लिए जाते हैं। इसके बाद मूत्र (UPBoardSolutions.com) संग्राहक वाहिनी में एकत्र हो जाती है तथा मूत्रवाहिनी; में प्रवेश करता है जहाँ से मूत्राशय में चली जाती है। अतः प्रत्येक वृक्क में बनने वाला मूत्र एक लंबी नलिका, मूत्रवाहिनी में प्रवेश करता है, जो वृक्क को मूत्राशय से जोड़ती है।

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प्रश्न 2.
उत्सर्जी उत्पाद से छुटकारा पाने के लिए पादप किन विधियों का उपयोग करते हैं?
उत्तर
उत्सर्जी उत्पाद से छुटकारा पाने के लिए पादप निम्न विधियों को उपयोग करते हैं

  1. प्रकाश संश्लेषण में O2 उत्पाद के रूप में तथा CO2 श्वसन क्रिया में रंध्रों द्वारा निष्कासित किए जाते हैं।
  2. पौधे अतिरिक्त जल से वाष्पोत्सर्जन क्रिया द्वारा छुटकारा पा सकते हैं।
  3. पौधों में निष्क्रिय पत्तियाँ समय-समय पर अलग होती रहती हैं, जिनमें अपशिष्ट उत्पाद संचित रहते हैं।
  4. पादपों में अन्य अपशिष्ट उत्पाद रेजिन तथा गोंद के रूप में विशेष रूप से पुराने जाइलम में संचित रहते हैं।
  5. पादप कुछ अपशिष्ट पदार्थों को अपने आसपास की मृदा में उत्सर्जित करते हैं।
  6. बहुत से पादप अपशिष्ट उत्पाद कोशकीय रिक्तिका में संचित रहते हैं।

प्रश्न 3.
मूत्र’ बनने की मात्रा का नियमन किस प्रकार होता है?
उत्तर

  1. जल की मात्रा पुनरवशोषण (Reabsorption) शरीर में उपलब्ध अतिरिक्त जल की मात्रा पर तथा कितना जल की मात्रा पर तथा कितना विलेय वयं उत्सर्जित करना है, पर निर्भर करती है।
  2. जैसे गर्मी के दिनों में शरीर से अत्यधिक पसीने के द्वारा जल एवं लवण निष्कासित होते हैं। इसलिए वृक्क के द्वारा छने (filterate) हुए मूत्र में विद्यमान जल एवं लवण की अधिकांश मात्रा पुनः अवशोषित कर ली जाती है। अतः मूत्र (UPBoardSolutions.com) कम मात्रा में उत्सर्जित होते हैं इसके विपरीत सर्दियों में कम पसीना आता है, इसलिए मूत्र अधिक बनता है। जल एवं लवण पुनरवशोषण हार्मोन के द्वारा नियंत्रित होते हैं।
  3. अत: मूत्र निर्माण पर नियंत्रण रक्त के ऑसमोटिक (osmotic) संतुलन को भी बनाए रखता है।

पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न

[NCERT TEXTBOOK QUESTIONS SOLVED]

प्रश्न 1.
मनुष्य में वृक्क एक तंत्र का भाग है, जो संबंधित है
(a) पोषण
(b) श्वसन
(C) उत्सर्जन
(d) परिवहन
उत्तर
(c) उत्सर्जन।।

प्रश्न 2.
पादप में जाइलम उत्तरदायी है
(a) जल का वहन
(b) भोजन का वहन
(C) अमीनो अम्ल का वहन
(d) ऑक्सीजन का वहन
उत्तर
(a) जल का वहन।।

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प्रश्न 3.
स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक है
(a) कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल
(b) क्लोरोफिल
(C) सूर्य का प्रकाश
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 4.
पायरुवेट के विखण्डन से यह कार्बन-डाइऑक्साइड, जल तथा ऊर्जा देता है और यह क्रिया होती है
(a) कोशिका द्रव्य
(b) माइटोकॉन्ड्रिया
(C) हरित लवक
(d) केन्द्रक
उत्तर
(b) माइटोकॉन्ड्रिया।

प्रश्न 5.
हमारे शरीर में वसा का पाचन कैसे होता है? यह प्रक्रम कहाँ होता है?
उत्तर

  • वसा का पाचन छोटी आँत में होता है।
  • क्षुद्रांत में वसा बड़ी गोलिकाओं के रूप में होता है, जिससे उस पर एंजाइम का कार्य करना मुश्किल हो जाता है।
  • लीवर द्वारा स्रावित पित्त लवण उन्हें छोटी (UPBoardSolutions.com) गोलिकाओं में खंडित कर देता है, जिससे एंजाइम की क्रियाशीलता बढ़ जाती है। यह इमल्सीकृत क्रिया कहलाती है।
  • पित्त रस अम्लीय माध्यम को क्षारीय बनाता है, ताकि अग्न्याशय से स्रावित लाइपेज एंजाइम क्रियाशील हो सके।
  • लाइपेज एंजाइम वसा को वसा अम्ल तथा ग्लिसरॉल में परिवर्तित कर देता है।
  • पाचित वसा अंत में आंत्र की भित्रि अवशोषित कर लेती है।

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प्रश्न 6.
भोजन के पाचन में लार की क्या भूमिका है?
उत्तर
भोजन के पाचन में लार की भूमिका निम्नलिखित है

  1. लार भोजन को गीला करता है जिससे निगलने में आसानी होती है।
  2. लार में एमिलेस (amylase) एंजाइम होता है, जो मंड (स्टार्च) के जटिल अणु को शर्करा में खंडित करता | है। (जटिल कार्बोहाइड्रेट को सरल कार्बोहाइड्रेड में बदलना)
  3. इसमें मौजूद लाइसोजाइम हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट कर देता है।

प्रश्न 7.
स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ कौन-सी हैं और उसके उपोत्पाद क्या हैं?
उत्तर
हरे पौधे स्वपोषी कहलाते हैं, क्योंकि प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा वे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ निम्नलिखित हैं

    1. क्लोरोफिल-पौधों के हरे भाग में क्लोरोफिल होते हैं, जो प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करता है।
    2. सूर्य का प्रकाश-सूर्य के (UPBoardSolutions.com) प्रकाश से
    3. कार्बन डाइऑक्साइड-वायुमंडल से
    4. जल-पौधे जड़ों द्वारा भूमि से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया को निम्न रासायनिक समीकरण द्वारा बनाया जाता है।
      UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 6 Life Processes img-3
      अत: कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज़), ऑक्सीजन तथा जल उपोत्पाद के रूप में प्राप्त होते हैं।

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प्रश्न 8.
वायवीय श्वसन तथा अवायवीय श्वसन में क्या अंतर है? कुछ जीवों के नाम लिखिए जिनमें अवायवीय श्वसन होता है।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 6 Life Processes img-4
प्रश्न 9.
गैसों के अधिकतम विनिमय के लिए कूपिकाएँ किस प्रकार अभिकल्पित हैं?
उत्तर
कूपिका एक सतह उपलब्ध कराती है, जिससे गैसों का विनिमय हो सके। कूपिकाओं की भित्ति में रुधिर वाहिकाओं का विस्तीर्ण जाल होता है, जो वायु से ऑक्सीजन लेकर हमारे शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचाता है तथा रुधिर में विलेय Co2 को कूपिकाओं में छोड़ने के लिए लाता है ताकि CO2 हमारे शरीर से बाहर निकल जाए।

प्रश्न 10.
हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी के क्या परिणाम हो सकते हैं?
उत्तर
हम जानते हैं कि मानव में श्वसन वर्णक हीमोग्लोबिन है, जो ऑक्सीजन के लिए उच्च बंधुता रखता है। इसकी कमी के कारण हमारे शरीर के विभिन्न अंगों में ऑक्सीजन की कमी हो जाएगी, जिससे ऊर्जा कम मात्रा में निर्मित होगी (UPBoardSolutions.com) और हम थकान का अनुभव करेंगे। हमारी श्वास गति भी बढ़ जाएगी। अतः हीमोग्लोबिन की कमी से एनीमिया
(anaeamia) होता है।

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प्रश्न 11.
मनुष्य में दोहरा परिसंचरण की व्याख्या कीजिए। यह क्यों आवश्यक है?
उत्तर
मनुष्य के परिसंचरण तंत्र को दोहरा परिसंचरण इसलिए कहते हैं, क्योंकि प्रत्येक चक्र में रुधिर दो बार हृदय में जाती है। हृदय का दायाँ और बायाँ बँटवारा ऑक्सीजनित तथा विऑक्सीजनित रुधिर को मिलने से रोकता है। चूंकि हमारे । शरीर में उच्च ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिसके लिए उच्च दक्षतापूर्ण ऑक्सीजन जरूरी होता है। अतः शरीर का तापक्रम बनाए रखने तथा निरंतर ऊर्जा की पूर्ति के लिए यह (UPBoardSolutions.com) परिसंचरण लाभदायक होता है।

प्रश्न 12.
जाइलम तथा फ्लोएम में पदार्थों के वहन में क्या अंतर है?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 6 Life Processes img-5

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प्रश्न 13.
फुफ्फुस में कूपिकाओं तथा वृक्क में वृक्काणु (नेफ्रॉन) की रचना तथा क्रियाविधि की तुलना कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 6 Life Processes img-6

Hope given UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 6 are helpful to complete your homework.

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 3 रसखान (काव्य-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 3 रसखान (काव्य-खण्ड)

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कवि-परिचय

प्रश्न 1.
रसखान का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी रचनाओं को स्पष्ट कीजिए। [2010]
या
कवि रसखान का जीवन-परिचय दीजिए तथा उनकी एक रचना का नाम लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 17]
उत्तर
हिन्दी काव्य की श्रीवृद्धि न जाने कितने ही मुसलमान कवियों के द्वारा की गयी, किन्तु इन सभी कवियों में रसखान जैसा सुकोमल, सरस और ललित काव्य किसी का भी नहीं है। इन्हें अत्यधिक भावुक कवि-हृदय मिला था, जिसके कारण ये श्रीकृष्ण के दीवाने हो गये थे। इनके हृदय से निकला हुआ समस्त काव्य रस और भाव से आकुल कर देने वाला है। कृष्ण-भक्ति शाखा के ये अद्वितीय कवि माने जाते हैं।

जीवन-परिचय—-रसखान दिल्ली के पठान सरदार थे। इनका पूरा नाम सैयद इब्राहीम रसखान था। इनके द्वारा रचित ‘प्रेम वाटिका’ ग्रन्थ से यह संकेत प्राप्त होता है कि ये दिल्ली के राजवंश में उत्पन्न हुए थे और इनका रचना-काल जहाँगीर का राज्य-काल था। इनका जन्म सन् 1558 ई० (सं० 1615 वि०) के लगभग दिल्ली में हुआ था। ‘हिन्दी-साहित्य का प्रथम इतिहास के अनुसार इनका जन्म सन् 1533 ई० में पिहानी, जिला हरदोई (उ०प्र०) में हुआ था। हरदोई में सैयदों की बस्ती भी है। डॉ० नगेन्द्र ने भी अपने ‘हिन्दी-साहित्य के इतिहास में इनका जन्म सन् 1533 ई० के आस-पास ही स्वीकार किया है। (UPBoardSolutions.com) ऐसा माना जाता है कि इन्होंने दिल्ली में कोई विप्लव होता देखा, जिससे व्यथित होकर ये गोवर्धन चले आये और यहाँ आकर श्रीनाथ की शरणागत हुए। इनकी रचनाओं से यह प्रमाणित होता है कि ये पहले रसिक-प्रेमी थे, बाद में अलौकिक प्रेम की ओर आकृष्ट हुए और कृष्णभक्त बन गये। गोस्वामी बिट्ठलनाथ ने पुष्टिमार्ग में इन्हें दीक्षा प्रदान की थी। इनका अधिकांश जीवन ब्रजभूमि में व्यतीत हुआ। यही कारण है कि ये कंचन धाम को भी वृन्दावन के करील-कुंजों पर न्योछावर करने और अपने अगले जन्मों में ब्रज में शरीर धारण करने की कामना करते थे। कृष्णभक्त कवि रसखान की मृत्यु सन् 1618 ई० (सं० 1675 वि०) के लगभग हुई।

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कृतियाँ (रचनाएँ)–रसखान की निम्नलिखित दो रचनाएँ प्रसिद्ध हैं—

(1) सुजान रसखान-इसकी रचना कवित्त और सवैया छन्दों में की गयी है। यह भक्ति और प्रेम-विषयक मुक्तक काव्य है। इसमें 139 भावपूर्ण छन्द हैं।
(2) प्रेमवाटिका—इसमें 25 दोहों में प्रेम के त्यागमय और निष्काम स्वरूप का काव्यात्मक वर्णन है। तथा प्रेम का पूर्ण परिपाक हुआ है।

साहित्य में स्थान-रसखान का स्थान भक्त-कवियों में विशेष महत्त्वपूर्ण है। इनके बारे में डॉ० विजयेन्द्र स्नातक ने लिखा है कि “इनकी भक्ति हृदय की मुक्त साधना है और इनका श्रृंगार वर्णन भावुक हृदय की उन्मुक्त अभिव्यक्ति है। इनके काव्य इनके स्वच्छन्द मन के (UPBoardSolutions.com) सहज उद्गार हैं। यही कारण है कि इन्हें स्वच्छन्द काव्य-धारा का प्रवर्तक भी कहा जाता है। इनके काव्य में भावनाओं की तीव्रता, गहनता और तन्मयता को देखकर भारतेन्दु जी ने कहा था-‘इन मुसलमान हरिजनन पैकोटिन हिन्दू वारिये।।

पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या सवैये

प्रश्न 1.
मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं बज गोकुल गाँव के ग्वारन ।
जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन ॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यौ कर छत्र पुरंदर-धारन ।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल कदंब की डारन ॥ [2009, 11, 18]
उत्तर
[ मानुष = मनुष्य। ग्वारन = ग्वाले। धेनु = गाय। मॅझारन = मध्य में। पाहन = पाषाण, पत्थर। पुरंदर = इन्द्रा खग = पक्षी। बसेरो करौं = निवास करू। कालिंदी-कूल = यमुना का किनारा। डारन = डाल पर, शाखा पर।]
सन्दर्भ-प्रस्तुत पद्य रसखान कवि द्वारा रचित ‘सुजान-रसखान’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी के ‘काव्य-खण्ड में संकलित ‘सवैये’ शीर्षक से अवतरित है।

[ विशेष—इस शीर्षक के शेष सभी पद्यों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा। ]

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प्रसंग-इस पद्य में रसखान ने पुनर्जन्म में विश्वास व्यक्त किया है और अगले जन्म में श्रीकृष्ण की जन्म-भूमि (ब्रज) में जन्म लेने एवं उनके समीप ही रहने की कामना की है।

व्याख्या-रसखान कवि कहते हैं कि हे भगवान्! मैं मृत्यु के बाद अगले जन्म में यदि मनुष्य के रूप में जन्म प्राप्त करू तो मेरी इच्छा है कि मैं ब्रजभूमि में गोकुल के ग्वालों के मध्य निवास करूं। यदि मैं पशु योनि में जन्म ग्रहण करू, जिसमें मेरा कोई वश (UPBoardSolutions.com) नहीं है, फिर भी मेरी इच्छा है कि मैं नन्द जी की गायों के बीच विचरण करता रहूँ। यदि मैं अगले जन्म में पत्थर ही बना तो भी मेरी इच्छा है कि मैं उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनें, जिसे आपने इन्द्र का घमण्ड चूर करने के लिए और जलमग्न होने से गोकुल ग्राम की रक्षा करने के लिए अपनी अँगुली पर छाते के समान उठा लिया था। यदि मुझे पक्षी योनि में भी जन्म लेना पड़ा तो भी मेरी इच्छा है कि मैं यमुना नदी के किनारे स्थित कदम्ब वृक्ष की शाखाओं पर ही निवास करू।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. रसखान कवि की कृष्ण के प्रति असीम भक्ति को प्रदर्शित किया गया है। उनकी भक्ति इतनी उत्कट है कि वह अगले जन्म में भी श्रीकृष्ण के समीप ही रहना चाहते हैं।
  2. भाषा– ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक
  4. रस-शान्त एवं भक्ति।
  5. छन्द-सवैया।
  6. अलंकार-‘कालिंदी-कुल कदंब की डारन’ में अनुप्रास।
  7. गुण–प्रसाद।

प्रश्न 2.
आजु गयी हुती भोर ही हौं, रसखानि रई बहि नंद के भौनहिं ।।
वाको जियौ जुग लाख करोर, जसोमति को सूख जात कह्यौ नहिं॥
तेल लगाइ लगाई कै अँजन, भौंहैं बनाई बनाई डिठौनहिं ।
डारि हमेलनि हार निहारत बारत ज्यौं पुचकारत छौनहिं ॥
उत्तर
[ हुती = थी। भोर = प्रात:काल। हौं = मैं। रई बहि = प्रेम में डूब गयी। भौनहिं = भवन में। वाको = उसका, यशोदा का। जुग = युग। डिठौनहिं == काला टीका। हमेलनि = हमेल (सोने का एक आभूषण) को। निहारत = देख रही थी। बारत = न्योछावर करते हुए। पुचकारत = पुचकार रही थी। छौनहिं = पुत्र को।]

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प्रसंग-इसे पद्य में कवि ने श्रीकृष्ण के प्रति यशोदा के वात्सल्य भाव का चित्रण किया है।

व्याख्या-एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है कि हे सखी ! आज प्रात:काल के समय श्रीकृष्ण के प्रेम में मग्न हुई मैं नन्द जी के घर गयी थी। मेरी कामना है कि उनका पुत्र श्रीकृष्ण लाखों-करोड़ों युगों तक जीवित रहे। यशोदा के सुख के बारे में (UPBoardSolutions.com) कुछ कहते नहीं बनता है; अर्थात् उनको अवर्णनीय सुख की प्राप्ति हो रही है। वे अपने पुत्र का श्रृंगार कर रही थीं। वे श्रीकृष्ण के शरीर में तेल लगाकर आँखों में काजल लगा रही थीं। उन्होंने उनकी सुन्दर-सी भौंहें सँवारकर बुरी नजर से बचाने के लिए माथे पर टीका (डिठौना) लगा दिया था। वे उनके गले में सोने का हार डालकर और एकाग्रता से उनके रूप को निहारकर अपने जीवन को न्योछावर कर रही थीं और प्रेमावेश में बार-बार अपने पुत्र को पुचकार रही थीं।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. प्रस्तुत छन्द में माता यशोदा के वात्सल्य-भाव और श्रीकृष्ण के प्रात:कालीन श्रृंगार का अनुपम वर्णन किया गया है।
  2. भाषा-ब्रज।
  3.  शैली-चित्रात्मक और मुक्तक।
  4. रसवात्सल्य
  5. छन्द-सवैया।
  6. अलंकार-यमक, अनुप्रास और पुनरुक्तिप्रकाश।
  7. गुण–प्रसाद।

प्रश्न 3.
धूरि भरे अति सोभित स्यामजू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी ।
खेलत खात फिरै अँगनी, पग पैंजनी बाजति पीरी कछोटी ॥
वा छबि को रसखानि बिलोकत, वारत काम कला निज कोटी ।
काग के भाग बड़े सजनी हरि-हाथ सों लै गयौ माखन-रोटी ॥ [2012, 15]
उत्तर
[ बनी = सुशोभित। पैंजनी = पायजेब। पीरी = पीला। कछोटी = कच्छा। सजनी = सखी।] |

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प्रसंग–इसे पद्य में कवि ने बालक कृष्ण के मोहक रूप का चित्रण किया है। श्रीकृष्ण के सौन्दर्य को देखकर एक गोपी अपनी सखी से उनके सौन्दर्य का वर्णन करती है।

व्याख्या–हे सखी! श्यामवर्ण के कृष्ण धूल से धूसरित हैं और अत्यधिक शोभायमान हो रहे हैं। वैसे ही उनके सिर पर सुन्दर चोटी सुशोभित हो रही है। वे खेलते और खाते हुए अपने घर के आँगन में विचरण कर रहे हैं। उनके पैरों में पायल बज रही है और (UPBoardSolutions.com) वे पीले रंग की छोटी-सी धोती पहने हुए हैं। रसखान कवि कहते हैं कि उनके उस सौन्दर्य को देखकर कामदेव भी उन पर अपनी कोटि-कोटि कलाओं को न्योछावर करता है। हे सखी! उस कौवे के भाग्य का क्या कहना, जो कृष्ण के हाथ से मक्खन और रोटी छीनकर ले गया। भाव यह है कि कृष्ण की जूठी मक्खन-रोटी खाने का अवसर जिसको प्राप्त हो गया, वह धन्य है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. प्रस्तुत छन्द में श्रीकृष्ण के बाल-सौन्दर्य का बड़ा ही मोहक वर्णन ” किया गया है।
  2. भाषा-ब्रज
  3. शैली—चित्रात्मक और मुक्तक
  4. रसवात्सल्य और भक्ति।
  5. छन्द-सवैया।
  6. अलंकार-पद्य में सर्वत्र अनुप्रास, ‘वारत काम कला निज कोटी’ में प्रतीप।
  7. गुण-माधुर्य।
  8. भावसाम्य-गोस्वामी जी ने भी श्रीराम की धूल से भरी बाल छवि का ऐसा ही चित्र खींचा है-अति सुन्दर सोहत धूरि भरे, छवि भूरि अनंग की दूरि धरें।

प्रश्न 4.
जा दिन तें वह नंद को छोहरा, या बन धेनु चराई गयी है।
मोहिनी ताननि गोधन गावत, बेनु बजाइ रिझाइ गयौ है ॥
वा दिन सो कछु टोना सो कै, रसखानि हियै मैं समाई गयी है।
कोऊ न काहू की कानि करै, सिगरो ब्रज बीर बिकाइ गयौ है ।
उत्तर
[ छोहरा = पुत्र। धेनु = गाय। बेनु = वंशी। टोना = जादू। सिगरो = सम्पूर्ण।] |

प्रसंग-इस पद्य में ब्रज की गोपियों पर श्रीकृष्ण के मनमोहक प्रभाव का सुन्दर चित्रण हुआ है।

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व्याख्या–एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है कि हे सखी! जिस दिन से वह नन्द का लाड़ला बालक इस वन में आकर गायों को चरा गया है तथा अपनी मोहनी तान सुनाकर और वंशी बजाकर हम सबको रिझा गया है, उसी दिन से ऐसा जान पड़ता है (UPBoardSolutions.com) कि वह कोई जादू-सा करके हमारे मन में बस गया है। इसलिए अब कोई भी गोपी किसी की मर्यादा का पालन नहीं करती है, उन्होंने तो अपनी लज्जा एवं संकोच सब कुछ त्याग दिया है। ऐसा मालूम पड़ता है कि सम्पूर्ण ब्रज ही उस कृष्ण के हाथों बिक गया है, अर्थात् उसके वशीभूत हो गया है। ||

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. यहाँ गोपियों पर कृष्ण-प्रेम के जादू का सजीव वर्णन किया गया है।
  2. भाषा-ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. छन्द-सवैया।
  5. रस-शृंगार।
  6. अलंकार-‘कोऊ न काहु की कानि करै’, ‘ब्रज बीर बिकाइ गयौ’, ‘बेनु बजाइ’, ‘गोधन गावत’ में अनुप्रास।
  7. गुण-माधुर्य।
  8. भावसाम्य-रसखान ने अन्यत्र भी इसी प्रकार का वर्णन किया है कोऊ न काहु की कानि करै, कछु चेटक सो जु कियौ जदुरैया।

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प्रश्न 5.
कान्ह भये बस बाँसुरी के, अब कौन सखी, हमकौं चहिहै ।
निसद्यौस रहै सँग-साथ लगी, यह सौतिन तापन क्यौं सहिहै ॥
जिन मोहि लियौ मनमोहन कौं, रसखानि सदा हमकौं दहिहै ।
मिलि आओ सबै सखि, भागि चलें अब तो ब्रज मैं बँसुरी रहिहै ॥
उत्तर
[चहिहै = चाहेगा। निसद्यौस = रात-दिन। तापन = सन्तापों को। सहिहै = सहन करेगी। मोहि लियौ = मोहित कर लिया है। दहिहै = जलाती है।

प्रसंग-इन पंक्तियों में श्रीकृष्ण के वंशी-प्रेम एवं गोपियों के उसके प्रति सौतिया डाह का सजीव वर्णन किया गया है।

व्याख्या–एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखी! श्रीकृष्ण अब बाँसुरी के वश में हो गये हैं, अब हमसे कौन प्रेम करेगा? श्रीकृष्ण हमसे बहुत प्रेम करते थे, किन्तु अब वे इस दुष्ट बाँसुरी से प्रेम करने लगे हैं। यह बाँसुरी रात-दिन उनके साथ लगी रहती है। यह अब गोपीरूपी सौत की ईष्र्या के सन्ताप को क्यों सहन करेगी? जिस बाँसुरी ने हमारे मन को मोहने वाले कृष्ण को अपने प्रेम से मोहित कर लिया है, वह हमें सदी ईर्ष्या से जलाती (UPBoardSolutions.com) रहेगी। हे सखी! आओ हम सब मिलकर ब्रज छोड़कर अन्यत्र चलें; क्योंकि यहाँ अब केवल बाँसुरी ही रह सकेगी अर्थात् कृष्ण के प्रेम से वंचित होकर हमारा अब ब्रज में निर्वाह नहीं हो सकता।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. प्रस्तुत छन्द में गोपियों की मुरली के प्रति स्वाभाविक ईष्र्या का सजीव वर्णन किया गया है।
  2. भाषा-सुललित ब्रज।
  3. शैली—चित्रोपम मुक्तक
  4. रस- श्रृंगार।
  5. छन्द-सवैया
  6. अलंकार-अनुप्रास।
  7. भावसाम्य–महाकवि सूरदास ने भी मुरली के प्रति गोपियों की ऐसी ही ईष्र्या को व्यक्त किया है। उनकी गोपियाँ तो ईवश मुरली को ही चुरा लेना चाहती हैं

 सखी री, मुरली लीजै चोरि ।
जिनि गुपाल कीन्हें अपनें बस, प्रीति सबनि की तोरि॥

प्रश्न 6.
मोर-पखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरें पहिरौंगी।
ओढिपितम्बर लै लकुटी, बन गोधन ग्वारन संग फिरौंगी॥
भावतो वोहि मेरो रसखानि, सो तेरे कहै सब स्वाँग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरींगी ॥
उत्तर
[ मोर-पखा = मोर के पंखों से बना हुआ मुकुट गरें = गले में। पितम्बर = पीताम्बर, पीला वस्त्र। लकुटी = छोटी लाठी। स्वाँग = श्रृंगार अभिनय। अधरान = होंठों पर। अधरा न= होंठों पर नहीं

प्रसंग-प्रस्तुत सवैये में कृष्ण के वियोग में व्याकुल गोपियों की मनोदशा का मोहक वर्णन किया गया है। कृष्ण-प्रेम में मग्न गोपियाँ कृष्ण का वेश धारणकर अपने हृदय को सान्त्वना देती हैं।

व्याख्या-एक गोपी अपनी दूसरी सखी से कहती है कि हे सखी! मैं तुम्हारे कहने से अपने सिर पर मोर के पंखों से बना मुकुट धारण करूंगी, अपने गले में गुंजा की माला पहन लूंगी, कृष्ण की तरह पीले वस्त्र पहनकर और हाथ में लाठी लिये हुए (UPBoardSolutions.com) ग्वालों के साथ गायों को चराती हुई वन-वने घूमती रहूंगी। ये सभी कार्य मुझे अच्छे लगते हैं और तेरे कहने से मैं कृष्ण के सभी वेश भी धारण कर लूंगी, परन्तु उनके होठों पर रखी हुई बाँसुरी का अपने होठों से स्पर्श नहीं करूंगी। तात्पर्य यह है कि कृष्ण गोपियों के प्रेम की परवाह न करके दिनभर बाँसुरी को साथ रखते हैं और उसे अपने होंठों से लगाये रहते हैं; अत: गोपियाँ उसे सौत मानकर उसका स्पर्श भी नहीं करना चाहती हैं; क्योंकि वह श्रीकृष्ण के ज्यादा ही मुँह लगी हुई है।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. प्रस्तुत छन्द में कृष्ण के प्रति गोपियों के अनन्य प्रेम और बाँसुरी के प्रति स्त्रियोचित ईष्र्या का स्वाभाविक चित्रण किया गया है।
  2. भाषा-ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. गुणमाधुर्य।
  5. रस-शृंगार।
  6. छन्द-सवैया।
  7. अलंकार-‘या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी’ में अनुप्रास तथा यमक।

कवित्त

प्रश्न 1.
गोरज बिराजै भाल लहलही बनमाल,
आगे गैयाँ पाछे ग्वाल गावै मृदु बानि री।
तैसी धुनि बाँसुरी की मधुर-मधुर जैसी,
बंक चितवन मंद मंद मुसंकानि री ॥
कदम बिटप के निकट तटिनी के तट,
अटा चढ़ि चाहि पीत पट फहरानि री ।
रस बरसावै तन-तपनि बुझावै नैन,
प्राननि रिझावै वह आवै रसखानि री ॥
उत्तर
[ गोरज = गायों के पैरों से उड़ी हुई धूल। लहलही = शोभायमान हो रही है। बानि = वाणी। बंक = टेढ़ी। तटिनी = (यमुना) नदी। तन-तपनि = शरीर की गर्मी।]

सन्दर्भ-प्रस्तुत पंक्तियाँ रसखान कवि द्वारा रचित ‘सुजान-रसखान’ (UPBoardSolutions.com) से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘काव्य-खण्ड में संकलित ‘कवित्त’ शीर्षक से अवतरित हैं।

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प्रसंग-इन पंक्तियों में सायं के समय वन से गायों के साथ लौटते हुए कृष्ण की अनुपम शोभा का वर्णन एक गोपी अपनी सखी से कर रही है।

व्याख्या-गोपी कहती है कि हे सखी! वन से गायों के साथ लौटते हुए कृष्ण के मस्तक पर गायों के चलने से उड़ी धूल सुशोभित हो रही है। उनके गले में वन के पुष्पों की माला पड़ी हुई है। कृष्ण के आगे-आगे गायें चल रही हैं और पीछे मधुर स्वर में गाते हुए ग्वाल-बाल चल रहे हैं। जितनी मधुर और बाँकी श्रीकृष्ण की चितवन है, उतनी ही बाँकी उनकी धीमी-धीमी मुस्कान हैं। उनकी इस मधुर छवि के अनुरूप ही उनकी वंशी की मधुर-मधुर तान है। हे सखी! कदम्ब वृक्ष के पास यमुना नदी के किनारे खड़े कृष्ण के पीले वस्त्रों का फहराना, जरा अटारी पर चढ़कर तो देख लो। रस की खान वह श्रीकृष्ण चारों ओर सौन्दर्य (UPBoardSolutions.com) और प्रेम-रस की वर्षा करते हुए शरीर और मन की जलन को शान्त कर रहे हैं। उनका सौन्दर्य नेत्रों की प्यास को बुझा रहा है और प्राणों को अपनी ओर खींचकर रिझा रहा है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. प्रस्तुत छन्द में गोचारण से लौटते हुए श्रीकृष्ण के अनुपम सौन्दर्य का मोहक चित्रण हुआ है।
  2. भाषा-सरल, सरस ब्रज।
  3.  शैली—मुक्तक।
  4.  रस-शृंगार।
  5.  छन्द-मनहरण कवित्त।
  6. अलंकार-‘भाल लहलही बनमाल’ में अनुप्रास, ‘मधुर-मधुर, मन्द-मन्द में पुनरुक्तिप्रकाश तथा ‘रसखानि री’ में श्लेष का मंजुल प्रयोग द्रष्टव्य है।
  7. गुण-माधुर्य।

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काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध

प्रश्न 1
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा रस है, उसके स्थायी भाव का नाम लिखिए
(क) तेल लगाइ लगाह के अंजन, भाँहँ बनाइ बनाइ डिठौनहिं ।
(ख) जिन मोहि लियौ मनमोहन , रसखानि सदा हम दहिहै ।
मिलि आओ सबै सखि भागि चलें अब तो ब्रज में बँसुरी रहिहै ।।
उत्तर
(क) रसवात्सल्य, स्थायी भाव-स्नेह (रति)।
(ख) रस-श्रृंगार, स्थायी भाव–रति।

प्रश्न 2
निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार का नाम बताते हुए उसका स्पष्टीकरण दीजिए
(क) वा छबि को रसखानि बिलोकत, वारत काम कला निज कोटी।
(ख) या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धराँगी ।
(ग) रस बरसावे तन-तपनि बुझावै नैन,
प्राननि रिझावै वह आवै रसखानि री ॥
उत्तर
(क) अनुप्रास-‘क’ वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है।

प्रतीप-“वारत काम कला निज कोटी’ यहाँ कृष्ण (UPBoardSolutions.com) के सौन्दर्य को देखकर कामदेव स्वयं अपनी करोड़ों कलाएँ निछावर कर रहा है। उपमान को उपमेय बना देने के कारण यहाँ प्रतीप अलंकार है।

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(ख) अनुप्रास, यमक-‘म’, ‘ध’, ‘र’ वर्गों की आवृत्ति के कारण अनुप्रास तथा एक ‘अधरान का अर्थ ‘होठों पर’ एवं दूसरे ‘अधरा न’ का अर्थ होठों पर नहीं होने के कारण यमक है।

(ग) श्लेष—यहाँ ‘रसखानि री’ के दो अर्थ–रस की खान श्रीकृष्ण तथा कवि रसखान हैं; अतः इसमें श्लेष है।

प्रश्न 3
सवैये और कवित्त का लक्षण लिखते हुए पाठ से एक-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर
सवैया–बाइस से छब्बीस तक के वर्णवृत्त सवैया कहलाते हैं। उदाहरण पाठ से देखें। |

कवित्त—यह दण्डक वृत्त है। इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं। (UPBoardSolutions.com) 16-15 वर्षों पर यति होती है। अन्त में एक गुरु वर्ण होता है। इसे मनहरण कवित्त भी कहते हैं। उदाहरण पाठ से देखें।

प्रश्न 4
निम्नलिखित शब्दों के खड़ी बोली रूप लिखिए-
करोर, सिगरी, दुति, लकुटी, काग, अँगुरी, भाजति, संजम।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 3 रसखान (काव्य-खण्ड) img-1

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CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 11

These Sample papers are part of CBSE Sample Papers for Class 10 Maths. Here we have given CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 11.

CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 11

Board CBSE
Class X
Subject Maths
Sample Paper Set Paper 10
Category CBSE Sample Papers

Students who are going to appear for CBSE Class 10 Examinations are advised to practice the CBSE sample papers given here which is designed as per the latest Syllabus and marking scheme as prescribed by the CBSE is given here. Paper 11 of Solved CBSE Sample Paper for Class 10 Maths is given below with free pdf download solutions.

Time allowed: 3 Hours
Maximum Marks: 80 

 General Instructions

  • All questions are compulsory.
  • The question paper consists of 30 questions divided into four sections A, B, C and D.
  • Section A contains 6 questions of 1 mark each. Section B contains 6 questions of 2 marks each. Section C contains 10 questions of 3 marks each. Section D contains 8 questions of 4 marks each.
  • There is no overall choice. However, an internal choice has been provided in four questions of 3 marks each and three questions of 4 marks each. You have to attempt only one of the alternatives in all such questions.
  • Use of calculators is not permitted.

Section – A

Question 1.
Write whether the rational number [latex]\frac { 7 }{ 75 } [/latex] will have a terminating decimal expansion or a non-terminating repeating decimal expansion.

Question 2.
Find the value (s) of k, if the quadratic equation 3x2 – k √3x + 4 = 0 has equal roots.

Question 3.
Find the eleventh term from the last term of the AP: 27, 23, 19,… ,- 65.

How do you round 214.0822 to the nearest tenth? … Hint: We are given a decimal number.

Question 4.
Find the coordinates of the point on y- axis which is nearest to the point (-2, 5).

Question 5.
In given figure, ST || RQ, PS = 3 cm and SR = 4 cm. Find the ratio of the area of ∆ PST to the area of ∆ PRQ.
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Question 6.
If cos A = [latex]\frac { 2 }{ 5 } [/latex] , find the value of 4 + 4 tan2 A.

Section – B

Question 7.
If two positive integers p and q are written as p = a2 b3 and q = a3 b; a, b are prime numbers, then verily: LCM (p, q) × HCF (p, q) = pq

Question 8.
The sum of first n terms of an AP is given by Sn = 2n2 + 3n. Find the sixteenth term of the A.P.

Question 9.
Find the value (s) of k for which the pair of linear equations kx + y = k2 and x + ky = 1 have infinitely many solutions.

Question 10.
If ( 1, [latex]\frac { p }{ 3 } [/latex] ) is the mid- point of the line segment joining the points (2,0) and ( 0, [latex]\frac { 2 }{ 9 } [/latex] ) then show that the line 5x + 3y + 2 = 0 passes through the point (-1 , 3p)

Question 11.
A box contains cards numbered 11 to 123. A card is drawn at random from the box. Find the probability that the number on the drawn card is

  1. a square number
  2. a multiple of 7.

To convert 10 11/16 to decimal you can use the long division method explained in our article fraction to decimal, which you can find in the header menu.

Question 12.
A box contains 12 balls of which some are red in colour. If 6 more red balls are put in the box and a ball is drawn at random, the probability of drawing a red ball doubles than what it was before. Find the number of red balls in the bag.

Section – C

Question 13.
Show that exactly one of the numbers n, n + 2 or n + 4 is divisible by 3.

Question 14.
Find all the zeroes of the polynomial 3x4 + 6x3 – 2x2 – 10x – 5 if two of its zeroes are √ [latex]\frac { 5 }{ 3 } [/latex] and – √ [latex]\frac { 5 }{ 3 } [/latex]

Question 15.
Seven times a two digit number is equal to four times the number obtained by reversing the order of its digits. Ifthe difference ofthe digits is 3, determine the number.

Question 16.
In what ratio does the x-axis divide the line segment joining the points (-4,-6) and (-1, 7)? Find the co-ordinates of the point of division.
OR
The points A (4, -2), B (7,2), C (0,9) and D (-3,5) form a parallelogram. Find the length of the altitude of the parallelogram on the base AB.

Question 17.
In given figure ∠1 = ∠2 and ∆NSQ = ∆MTR, then prove that ∆ PTS ~ PRQ
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OR
In an equilateral triangle ABC, D is a point on the side BC such that BD = [latex]\frac { 1 }{ 3 } [/latex] BC. Prove that 9 AD2 = 7 AB2
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Question 18.
In given figure XY and X’ Y’ are two parallel tangents to a circle with centre O and another tangent AB with point of contact C intersecting XY at A and X’ Y’ at B. Prove that ∠ AOB = 90°.
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Question 19.
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Question 20.
In given figure ABPC is a quadrant of a circle ofradius 14 cm and a semicircle is drawn with BC as diameter. Find the area of the shaded region
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Question 21.
Water in a canal, 6 m wide and 1.5m deep, is flowing with a speed of 10 km/h. How much area will it irrigate in 30 minutes, if 8 cm of standing water is needed?
OR
A cone of maximum size is carved out from a cube of edge 14 cm. Find the surface area of the remaining solid after the cone is carved out.

Question 22.
Find the mode of the following distribution of marks obtained by the students in an examination :

Marks obtained 0-20 20-40 40-60 60-80 80-100
Number of students 15 18 21 29 17

Given the mean of the above distribution is 53, using empirical relationship estimate the value of its median.

Question 23.
A train travelling at a uniform speed for 360 km would have taken 48 minutes less to travel the same distance if its speed were 5 km/hour more. Find the original speed of the train.
OR
Check whether the equation 5x2 – 6x – 2 = 0 has real roots and if it has, find them by the method of completing the square. Also verify that roots obtained satisfy the given equation.

Question 24.
An AP consists of 3 7 terms. The sum of the three middle most terms is 225 and the sum of the last three terms is 429. Find the AP.

Question 25.
Show that in a right triangle, the square of the hypotenuse is equal to the sum of the squares of the other two sides.
OR
Prove that the ratio of the areas of two similar triangles is equal to the ratio of the squares of their corresponding sides.

Question 26.
Draw a triangle ABC with side BC = 7 cm, ∠B=45°, ∠A= 105°. 1 Then, construct a triangle whose sides are [latex]\frac { 4 }{ 3 } [/latex] times the corresponding sides of ∆ABC.

Question 27.
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Question 28.
The angles of depression of the top and bottom of a building 50 metres high as observed from the top of a tower are 30° and 60°, respectively. Find the height of the tower and also the horizontal distance between the building and the tower.

Question 29.
Two dairy owners A and B sell flavoured milk filled to capacity in mugs of negligible thickness, which are cylindrical in shape with a raised hemispherical bottom. The mugs are 14 cm high and have diameter of 7 cm as shown in given figure. Both A and B sell flavoured milk at the rate of ₹ 80 per litre. The dairy owner A uses the formula nrh to find the volume of milk in the mug and charges ₹ 43.12 for it. The dairy owner B is of the view that the price of actual quantity of milk should be charged. What according to him should be the price of one mug of milk? Which value is exhibited by the dairy owner B ? [ use π = [latex]\frac { 22 }{ 7 } [/latex] )
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Question 30.
The following distribution shows the daily pocket allowance of children of a locality. The mean pocket allowance is ₹ 18. Find the missing frequency k.

Daily pocket allowance (in ₹) 11-13 13-15 15-17 17-19 19-21 21-23 23-25
Number of children 3 6 9 13 k 5 4

The following frequency distribution shows the distance (in metres) thrown by 68 students in a Javelin throw competition.

Distance (in m) 0-10 10-20 20-30 30-40 40-50 50-60 60-70
Number of students 4 5 13 20 14 8 4

Draw a less than type O give for the given data and find the median distance thrown using this curve.

Solutions

Solution 1.
Non terminating repeating decimal expansion.

Solution 2.
k = ± 4

Solution 3.
a11 = -25

Solution 4.
(0,5)

Solution 5.
9 : 49

Solution 6.
4 + tan2 A = 4 sec2 A = 4 ( [latex]\frac { 5 }{ 2 } [/latex] ) 2 = 25

Solution 7.
LCM (p, q) = a3 b3
HC,F (p, q) = a2 b
LCM (p, q) × HCF (p, q) = a5 b4 = (a2 b3)
(a3 b) = pq

Solution 8.
Sn = 2n2 + 3n
S1 = 5 = a1
S2 = a1 + a2 = 14 ⇒ a2 = 9
d= a2 – a1 = 4
a16 = a1 + 15d = 5+ 15(4) = 65

Solution 9.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 11 9

Solution 10.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 11 10

Solution 11.

  1. P (square number) = [latex]\frac { 8 }{ 113 } [/latex]
  2. P (multiple of 7) = [latex]\frac { 16 }{ 113 } [/latex]

Solution 12.
Let number of red balls be = x
∴ P (red ball) = [latex]\frac { x }{ 12 } [/latex]
If 6 more red balls are added: The number of red balls = x + 6 P (red ball) = [latex]\frac { x+6 }{ 18 } [/latex]
Since, [latex]\frac { x+6 }{ 18 } [/latex] = 2 ( [latex]\frac { x }{ 12 } [/latex] ) ⇒ x = 3
There are 3 red balls in the bag.

Solution 13.
Let n = 3k, 3k + 1 or 3k+ 2.
(i) When n = 3k: n is divisible by 3.
n + 2 = 3k + 2 ⇒ n + 2 is not divisible by 3.
n + 4 = 3k + 4 = 3 (k + 1)+ 1 ⇒ n + 4 is not divisible by 3.

(ii) When n = 3k + 1: n is not divisible by 3.
n + 2 = (3k + 1) + 2 = 3k+ 3 = 3 (k+ 1) ⇒ n + 2 is divisible by 3.
n + 4 = (3k+ l) + 4 = 3k + 5 = 3(k+ 1) + 2 ⇒ n + 4isnotdivisibleby3.

(iii) When n = 3k + 2: n is not divisible by 3.
n + 2 = (3k+2) + 2 = 3k + 4 = 3(k+ 1)+ 1 ⇒ n + 2 is not divisible by 3.
n + 4 = (3k + 2)+ 4 = 3k+ 6 = 3(k + 2) ⇒ n + 4 is divisible by 3.
Hence exactly one of the numbers n, n + 2 or n + 4 is divisible by 3.

Solution 14.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 11 11
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 11 12

Solution 15.
Let the ten’s and the units digit be y and x respectively.
So,the number is 10 y + x.
The number when digits are reversed is 10 x + y.
Now, 7(10y+ x) = 4(10x + y) ⇒ 2y = x …( 1)
Also x – y3 …(ii)
Solving (1) and (2),we get y = 3 and x = 6.
Hence the number is 36.

Solution 16.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 11 13

Solution 17.
∠SQN = ∠TRM (CPCT as NSQ ≅ MTR)
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 11 14
Since, ∠P + ∠1 + ∠2 = ∠P + ∠PQR + ∠PRQ (Angle sum property)
⇒ ∠1 + ∠2 = ∠PQR + ∠PRQ
⇒ 2 ∠1 = 2 ∠PQR (as ∠1 = ∠2 and ∠PQR= ∠PRQ) ⇒ ∠1 = ∠PQR
Also ∠2 = ∠PRQ and ∠SPT = ∠QPR (common) ∆PTS ~ ∆PRQ (By AAA similarity criterion)
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Solution 18.
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Solution 19.
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Solution 20.
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Solution 21.
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Solution 22.
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Solution 23.
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Solution 24.
Let the three middle most terms of the AP be a – d, a, a + d
We have, (a – d) +a + (a + d) = 225
⇒ 3 a = 225 ⇒ a = 75
Now, the AP is a – 18d,…,a – 2d, a – d, a, a + d,a + 2d,…,a + 18d
Sum of last three terms :
(a + 18d) + (a + 17d) + (a + 16d) = 429
⇒ 3a + 51 d = 429 ⇒ (a + 17d) = 143
⇒ 75 + 17d = 143 ⇒ d = 4
Now, first term = a – 18d = 75 – 18(4) = 3
∴ The AP is 3,7,11,…, 147.

Solution 25.
Given : A right triangle ABC right angled at B.
To prove : AC2 = AB2 + BC2
Construction : Draw BD ⊥ AC
Proof : In ∆ ADB and ∆ ABC
∠ADB = ∠ABC (each 90°)
∠BAD = ∠CAB (common)
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Solution 26.
Draw ∆ABC in which BC = 7 cm, ∠B = 45°, ∠A = 105° and hence ∠C = 30°.
Construction of similar triangle A’ BC’ as shown below.
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Solution 27.
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Solution 28.
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Solution 29.
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Solution 30.
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