Class 10 Sanskrit Chapter 3 UP Board Solutions धैर्यधनाः हि साधवः Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 3 Dhairya Dhana hi Sadhava Question Answer (कथा – नाटक कौमुदी)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 3 हिंदी अनुवाद धैर्यधनाः हि साधवः के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

प्रस्तुत पाठ एक जातक-कथा है। जातक-कथाओं का सम्बन्ध सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) के पूर्वजन्म से है। बौद्ध विद्वानों का मानना है कि सिद्धार्थ को एक ही जन्म में बोधि प्राप्त नहीं हुई थी अनेक पूर्व जन्मों में दया, करुणा, परोपकार आदि का अभ्यास करके उन्होंने बोधि प्राप्त की। पिछले जन्मों में उनकी संज्ञा बोधिसत्त्व रूप में उल्लिखित है। जातक-कथाओं की रचना पालि-भाषा में हुई है, जिनका बाद में संस्कृत में अनुवाद किया गया। इनकी संख्या 500 (UPBoardSolutions.com) के लगभग है और ये चीनी भाषा में भी अनूदित हो चुकी हैं। प्रस्तुत कथा “जातकमाला’ से ली गयी है, जिसका संकलन आर्यशूर नामक विद्वान् द्वारा किया गया है। प्रस्तुत कथा के अन्तर्गत बोधित्त्व एक नाविक के रूप में जन्म लेते हैं, जिनकी विशेषताएँ धर्म-पालन और विपत्तियों में धैर्य धारण करना है।

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पाठ-सारांश

बोधिसत्त्व का जन्म – किसी समय बोधिसत्त्व (महात्मा बुद्ध का पूर्व जन्म) ने नाविक के रूप में जन्म लिया। वे इतने प्रतिभासम्पन्न थे कि जिन-जिन विषयों को जानना चाहते थे, उन्हें सहज ही जान लेते थे। वे तीक्ष्ण बुद्धि वाले, अनेक कलाओं के ज्ञाता, दिशा सम्बन्धी ज्ञान वाले, समुद्र-ज्ञाता और भावी संकटों के ज्ञाता थे। उनका नाम सुपारग और उनके नगर का नाम ‘सुपारगम्’ था। वृद्ध होते हुए भी व्यापारी उनका बहुत सम्मान करते थे तथा उन्हें अपने साथ लेकर समुद्री यात्रा करना शुभ मानते थे। उन्होंने अपने नाविक जीवन में समुद्री यात्राएँ करते-करते मछलियों और नाना रत्नों से परिपूर्ण अगाध जल वाले सागरों का अवगाहन कर उनके रहस्य को जान लिया था।

सुपारग का समुद्रयात्रा पर जाना – किसी समय भरुकच्छ से आये हुए कुछ व्यापारियों ने सुपारग से नाव पर बैठकर साथ चलने की प्रार्थना की। अत्यधिक वृद्ध होते हुए भी महात्मा सुपारग ने उनके साथ चलना स्वीकार कर लिया। व्यापारी प्रसन्न होकर अनेक समुद्रों को पार करते हुए उनके साथ यात्रा करते रहे।

मार्ग में बइवामुख समुद्र का आना – मार्ग में भयंकर तूफान आने के कारण वे कई दिन तक समुद्र में इधर-उधर भटकते रहे। उन्हें कहीं भी किनारा नहीं मिला। व्यापारी बहुत घबरा गये। सुपारग ने उन्हें समझाया कि घबराने से काम नहीं चलेगा। धीरज से काम लें। यह ‘खुरमाली’ नाम का समुद्र है। वायु के तीव्र झोंकों के कारण आप लोग इसे पार नहीं कर पा रहे हैं। येन-केन-प्रकारेण उसे समुद्र को पार करके वे ‘क्षीरसागर’ में पहुँचे और उसके बाद ‘अग्निमाली’ समुद्र में पहुँचे। इस प्रकार उन्होंने अनेक कष्टों को सहन करते हुए ‘कुशमाली’ और ‘नलमाली’ नामक भयंकर समुद्रों को पार किया। सुपारग बार-बार व्यापारियों को वापस चलने के लिए कहते रहे, लेकिन पर्याप्त प्रयास करने पर भी वे वापस न लौट सके और अत्यन्त भयानक, हृदयविदारक गर्जना करते हुए अन्ततः ‘बड़वामुख’ नामक समुद्र में (UPBoardSolutions.com) जा पहुँचे। सुपारग ने उस समुद्र का परिचय दिया कि यह वह समुद्र है जिसमें पहुँचकर कोई भी मृत्यु के मुख से नहीं बच पाया है। व्यापारियों ने जीवन से निराश होकर सुपारग से कोई उपाय बताने के लिए कहा, जिससे वे सुरक्षित लौट सकें।

सुपारग द्वारा प्रार्थना करना – जीवन का अन्त निकट जानकर सभी व्यापारी करुणा से रोने लगे। तब सुपारंग ने नाव पर बैठे हुए ही घुटने टेककर तथागतों को प्रणाम करके कहा-मेरे पुण्य और अहिंसा के बल से यह नाव कल्याण सहित लौट जाये।

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सुपारग द्वारा रत्नसहित व्यापारियों की कुशल वापसी – इसके बाद महात्मा सुपारग के पुण्य-बल से वह नाव अनुकूल वायु पाकर लौट पड़ी। नाव को लौटती देखकर सभी व्यापारियों को अत्यन्त प्रसन्नता और आश्चर्य हुआ। लौटते समय सुपारग ने व्यापारियों से कहा कि आप लोग नलमाली समुद्र से बालुका (रेत) और पत्थर नाव में भर लें। ये रेत और पत्थर निश्चय ही आपके लाभ के लिए होंगे। उन व्यापारियों ने सुपारग की बात मानते हुए समुद्री रेत और पत्थर को जहाज में भर लिया। इसके पश्चात् एक ही रात में वह नाव भरुकच्छ पहुँच गयी। प्रात: समय व्यापारियों ने नाव को चाँदी, इन्द्रनील, वैदूर्य, सुवर्ण आदि । (UPBoardSolutions.com) से भरी देखकर हर्षित होकर सुपारग की पूजा की। वास्तव में सत्य बोलना और धर्म का आश्रय लेना कभी दुःखदायी नहीं होता-‘तदेवं धर्माश्रयं सत्यवचनमपि आपदं नुदति।’

चरित्र-चित्रण

सुपारग (बोधिसत्त्व) [2006,07,08, 09, 10, 11, 12, 13, 15]

परिचय प्राचीनकाल में बोधिसत्त्व ने एक नाव के सह-संचालक के रूप में जन्म ग्रहण किया। वे अत्यन्त तीक्ष्ण बुद्धि, कलाओं में निपुण, संकटों में धैर्य रखने वाले, दिशाओं के ज्ञाता और समुद्रविषयक रहस्यों के सूक्ष्म जानकार थे। समुद्रविषयक ज्ञान के कारण उनका नाम ‘सुपारग’ पड़ा। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1.समुद्रयात्रा के ज्ञाता – सुपारग को समुद्रविषयक रहस्यों की सूक्ष्म जानकारी थी। वे कुशल नाविक थे और उन्होंने सुदूर देशों तक समुद्र की यात्रा की थी। उन्हें समुद्रयात्रा का गहन अनुभव, जानकारी तथा इस सम्बन्ध में दूर-दूर तक प्रसिद्धि भी थी। यही कारण था कि अशक्त और वृद्ध होते हुए भी वे व्यापारियों के द्वारा यात्रा पर ले जाये जाते थे और प्रत्येक विपत्ति में उनका साथ देते थे।

2. उदार हृदय – सुपारग उदार हृदय वाले व्यक्ति थे। वह प्रार्थना करने वालों की प्रार्थना अवश्य स्वीकार कर लेते थे। इसीलिए अशक्त और वृद्ध होते हुए भी वे भरुकच्छ से आये हुए व्यापारियों की प्रार्थना स्वीकार करके उनके साथ प्रस्थान करते हैं। इससे सुपारग की उदारता प्रकट होती है।

3. साहसी – सुपारग अत्यन्त साहसी व्यक्ति थे। वे भयंकर-से-भयंकर समुद्र की यात्रा करने में भी साहस को नहीं छोड़ते थे। व्यापारी जब अपने जीवन से पूर्णत: निराश हो चुके थे, तब भी वे साहस का परिचय देते हुए भगवान् से सबको सकुशल लौटाने की प्रार्थना करते हैं तथा अपने पुण्यबल व अहिंसाबल से जहाज को भरुकच्छ लौटा लाते हैं।

4. दयावान् – सुपारग उच्चकोटि के दयावान् हैं। वृद्ध होने पर भी वे व्यापारियों की प्रार्थना पर उनके साथ समुद्री यात्रा करना स्वीकार कर लेते हैं तथा उनको जीवन से निराश देखकर जहाज को सकुशल लौटाने की भगवान् से प्रार्थना करते हैं। यह उनकी दयालुता का परिचायक है।

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5. अहिंसावादी – सुपारगं अंहिंसा सिद्धान्त को मानने वाले थे। वे प्राणिमात्र की रक्षा करना अपना कर्तव्य समझते थे और उसके लिए प्रयत्नशील रहते थे। वे अपने अहिंसा-बल से ईश्वर से प्रार्थना करकें नाव को वापस ले आते हैं और व्यापारियों के प्राणों की रक्षा करते हैं। इस कथा में उनका यह रूप स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

6. हितैषी और मित्र – ‘सुपारग व्यापारी वर्ग के सच्चे हितैषी और मित्र हैं। नलमाली समुद्र को पार करते समय उसके गुणों से परिचित होने के कारण वे उसकी मिट्टी, बालू एवं पत्थरों को व्यापारियों से नाव में भर लेने के लिए कहते हैं, क्योंकि वे यह जानते थे कि ये रेत और पत्थर अन्त में सुवर्ण और रत्न बन जाएँगे। उनका यह कार्य उनके व्यापारी वर्ग के हितैषी और मित्र होने का परिचायक है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि सुपारग समुद्री यात्रा के ज्ञाता, उदार हृदय, साहसी, दयावान्, (UPBoardSolutions.com) अहिंसावादी आदि गुणों से युक्त तो थे ही, उनमें परोपकारपरायणता, जनहित-चिन्तन, कोमल-हृदयता, तपस्विता आदि अन्य बहुत-से गुण भी विद्यमान थे। निश्चय ही सुपारग का चरित्र एक आदर्श पुरुष का चरित्र है।

लघु उत्तटीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कोऽयं सुपारगः ? कस्मात् तस्यायं नाम ? [2009, 15]
उत्तर :
सुपारगः बोधिसत्त्वः एव आसीत्। सः समुद्रपारं गत्वा वणिजाम् ईप्सितं देशं प्रापयिता नाविकः आसीत्, अतः जनाः तं सुपारगनाम्ना कथयन्ति स्म।

प्रश्न 2.
सुपारगः वणिग्साहाय्ये कथमसमर्थो जातः ?
उत्तर :
सुपारगः जराशिथिलशरीरत्वात् वणिग्साहाय्ये असमर्थः जातः

प्रश्न 3.
वणिजः कीदृशं समुद्रम् अवजगाहिरे ? [2006]
उत्तर :
वणिज: विविधमीनकुलविचरितं, बहुविधरत्नैर्युतम् अप्रमेयतोयं, महासमुद्रम् अवजगाहिरे।

प्रश्न 4.
वणिज: कान्कान् समुद्रान् ददृशुः ?
उत्तर :
वणिजः खुरमालिनं, क्षीरार्णवम्, अग्निमालिनं, (UPBoardSolutions.com) कुशमालिनं, नलमालिनं, बडवामुखं च समुद्रान् ददृशुः।

प्रश्न 5.
सायाह्नसमये वणिजः कीदृशीं समुद्रध्वनिम् अश्रौषुः ?
उत्तर :
सायाह्नसमये वणिजः श्रुतिहृदयविदारणं समुद्रध्वनिम् अश्रौषुः।

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प्रश्न 6.
महत्या करुणया उपेतः सुपारगः वणिग्जनान् किमुवाच?
या
सुपारगः वणिग्जनान् किम् उवाच ?
उत्तर :
‘महत्या करुणया उपेतः सुपारगः वणिग्जनान् उवाच-अस्यापि नः कश्चित् प्रतीकारविधिः प्रतिभाति तत्तावत् प्रयोक्ष्ये इति।

प्रश्न 7.
नलमालिसमुद्रेभ्यः प्राप्तबालुकाः पाषाणाश्च प्रभाते कीदृशाः जातः ?
उत्तर :
नलमालिसमुद्रेभ्य: प्राप्तबालुका: पाषाणाश्च प्रभाते रजते, इन्द्रनील, वैदूर्य, हेमरूपाः जाताः।

प्रश्न 8.
धर्माश्रयं सत्यवचनम् आपदं कथं नुदति ?
उत्तर :
धर्माश्रयं सत्यवचनम् आपदम् ईश्वरस्मरणमात्रेणैव नुदति।

प्रश्न 9.
सुपारगः कः आसीत्? [2009,11]
उत्तर :
सुपारगः बोधिसत्त्वः आसीत्।

प्रश्न 10.
कस्य नाम सुपारगः आसीत्?
उत्तर :
बोधिसत्त्वस्य नाम सुपारगः आसीत्?

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प्रश्न 11. 
जातकमालायाः रचयिता कः? [2009, 10, 12, 13, 14, 15]
उत्तर :
जातकमालायाः रचयिता ‘आर्यशूर:’।

बहुविकल्पीय प्रश्न

अधोलिखित प्रश्नों में प्रत्येक प्रश्न के उत्तर-रूप में चार विकल्प दिये (UPBoardSolutions.com) गये हैं। इनमें से एक विकल्प शुद्ध है। शुद्ध विकल्प का चयन कर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए
[संकेत – काले अक्षरों में छपे शब्द शुद्ध विकल्प हैं।]

1. ‘धैर्यधना: हि साधवः’ नामक पाठ किस ग्रन्थ से उधृत है ?

(क) नागानन्दम्’ से
(ख) ‘जातकमाला’ से
(ग) भोजप्रबन्ध’ से
(घ) ‘प्रबोधचन्द्रोदय’ से

2. “धैर्यधनाः हि साधवः’ नामक पाठ किस महान् व्यक्तित्व से सम्बन्धित है ?

(क) ईसा मसीह से
(ख) महावीर स्वामी से
(ग) गौतम बुद्ध से
(घ) भगवान् कृष्ण से

3. ‘जातकमाला’ नामक ग्रन्थ के रचयिता कौन हैं? [2008, 11, 15]

(क) आर्यशूर
(ख) महर्षि वाल्मीकि
(ग) हर्षवर्द्धन
(घ) महर्षि व्यास

4. ‘धैर्यधनाः हि साधवः” नामक पाठ में बोधिसत्त्व का क्या नाम है ?

(क) कुपारग
(ख) अपारग
(ग) सपारग
(घ) सुपारग

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5. सुपारग वणिजों की सहायता करने में क्यों असमर्थ हो गये थे ?

(क) मूढ़ाधिक्य के कारण रिण
(ख) गर्वाधिक्य के कारण
(ग) जराधिक्य के कारण
(घ) धनाधिक्य के कारण

6. व्यापारियों ने सबसे पहले कौन-सा समुद्र देखा?

(क) खुरमाली
(ख) क्षीरार्णव
(ग) कुशमाली
(घ) नलमाली

7. भयानक, दुःखदायी और हृदयविदारक गर्जना करने वाला समुद्र कौन-सा था ?

(क) नलमाली
(ख) बड़वामुख
(ग) अग्निमाली
(घ) कुशमाली

8. बड़वामुख समुद्र से नौका को लौटाने के लिए सुपारग ने क्या उपाय किया?

(क) मन्त्रों का प्रयोग किया।
(ख) ईश्वर से प्रार्थना की
(ग) नौका को वापस मोड़ लिया
(घ) नौका को स्वतन्त्र छोड़ दिया

9. सुपारगनाव को किसके बल से लौटाने में समर्थ हुआ ?

(क) बाहुबल से
(ख) अहिंसा बल से
(ग) सत्याधिष्ठान बल से
(घ) सत्याधिष्ठान और अहिंसा के बल से

10. जल-प्रवाह के विपरीत लौटी नौका किस समुद्र में पहुँच गयी ?

(क) अग्निमाली
(ख) नलमाली
(ग) कुशमाली
(घ) क्षीरार्णव

11. किस समुद्र के रेत और पत्थरों को सुपारग ने व्यापारियों से अपनी नौका में भरने को कहा था?

(क) अग्निमाली के
(ख) नलमाली के
(ग) खुरमाली के
(घ) कुशमाली के

12. व्यापारियों ने नौका में भरे रेत और पत्थरों के स्थान पर क्या वस्तु पायी ?

(क) विभिन्न रत्न
(ख) विभिन्न मोती
(ग) विभिन्न मछलियाँ
(घ) विभिन्न ओषधियाँ

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13. “बोधिसत्त्वभूतः किल महासत्त्वः परमनिपुणमतिः ………………… बभूव।” में रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी –

(क) ‘पोतचालक:’ से
(ख) ‘नौसारथिः’ से
(ग) “सारथिः’ से
(घ) “सांयात्रिकः’ से

14. “यतो न भेतव्यमतः किं तु …………………… अयं समुद्रः तद्यतध्वं निवर्तितुम्।” में रिक्त-स्थान में आएगा –

(क) कुशमाली
(ख) खुरमाली
(ग) अग्निमाली
(घ) नलमाली

15. “अस्माकं काल इवायं नलमाली नाम सागरः।” वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति ?

(क) कुशमाली
(ख) सुपारग
(ग) श्रीमाली
(घ) वनमाली

16. …………………… समुपेतास्थ तदेतद् बडवामुखम्।” श्लोक की चरण-पूर्ति होगी –

(क) ‘शिवम्’ से
(ख) ‘सुन्दरम्’ से
(ग) “सत्यम्’ से
(घ)’अशिवम्’ से

17. “मम पुण्यबलेन अहिंसाबलेन चेयं नौः स्वस्तिविनिवर्त्तताम्।” वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति ?

(क) सुपारगः
(ख) कुशमाली
(ग) श्रीमाली
(घ) वणिकः

18. “तदेव ………………….. आश्रयं सत्यवचनमपि आपदं नुदतीति।” में रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी –

(क) ‘सत्य’ से
(ख) “अहिंसा से
(ग)’धर्म’ से
(घ) “अधर्म’ से

19. सुपारगः ………………. आसीत्।

(क) व्यापारी
(ख) नाविकः
(ग) सैनिक:
(घ) कविः

20. पूर्वजन्मनि सुपारगः …………………… आसीत्। [2006, 10]

(क) ईन्द्रः
(ख) बोधिसत्वः
(ग) नृपः
(घ) अर्जुनः

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21. सुपारगः ……………………… ज्ञाता आसीत्। [2007]

(क) वेदानां शास्त्राणां
(ख) रत्नानाम् समुद्राणां
(ग) वनस्पतीनां फलानाम्
(घ) संगीतशास्त्राणाम्

22. सुपारगः ……………….. नाम बभूव। [2008, 10]

(क) वणिजः
(ख) पत्तनस्य
(ग) ग्रामस्य
(घ) नौसारथेः

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Class 10 Sanskrit Chapter 3 UP Board Solutions वृक्षाणां चेतनत्वम् Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 3 Vrikshanam Chetnatvam Question Answer (पद्य – पीयूषम्)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 3 हिंदी अनुवाद वृक्षाणां चेतनत्वम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

प्रस्तुत पाठ महाभारत से संकलित है। ‘महाभारत’ एक वृहद्काय ग्रन्थ है। इसे पंचम वेद भी माना जाता है। इसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी। इस पाठ में दर्शाया गया है कि वृक्ष भी अन्य प्राणियों
के समान सचेतन हैं और वे भी सुख-दुःख का अनुभव करते हैं। इस तथ्य को; (UPBoardSolutions.com) पौधों में भी हमारे समान जीवन है; हमारा विज्ञान भी आज प्रमाणित कर चुका है, जब कि हमारे ऋषि-मुनियों ने यह बात सहस्राधिक
वर्ष पहले ही प्रमाणित कर दी थी। प्रस्तुत पाठ में यह सन्देश भी दिया गया है कि मनुष्य को वृक्षों-पादपों के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। वार्तालाप शैली में संकलित प्रस्तुत सामग्री में प्रश्नकर्ता महर्षि भारद्वाज हैं और समाधानकर्ता महर्षि भृगु।

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पाठ-सारांश

अपरिमित पदार्थों के लिए ‘महा’ शब्द का प्रयोग होता है; अतः अपरिमित प्राणियों के लिए ‘महाभूत’ शब्द उपयुक्त है। वायु, आकाश, अग्नि, जल और पृथ्वी ये पंचमहाभूत हैं और यह शरीर पाँचभौतिक। सभी स्थावर और जंगम इन पंच महाभूतों से युक्त हैं।

वृक्षों के शरीर में ये पाँच महाभूत दिखाई नहीं पड़ते; क्योंकि वे देखते और सुनते नहीं, स्पर्श का अनुभव, गन्ध और रस का सेवन नहीं करते हैं। ऐसी शंका निर्मूल है। वृक्ष यद्यपि ठोस होते हैं, फिर भी फूलों और फलों की उत्पत्ति होने के कारण इनमें आकाश तत्त्व की विद्यमानता है। गर्मी से उनके पत्ते, फल और फूल कुम्हला जाते हैं; अतः उनमें स्पर्श गुण होने के कारण वायु तत्त्व विद्यमान हैं। वायु, अग्नि और बिजली की कड़क से वृक्षों के फल और फूल बिखर जाते हैं; अतः ‘वृक्ष शब्द सुनते हैं, यह सिद्ध होता है। बेलें वृक्ष को लपेट लेती हैं और चारों ओर फैल जाती हैं; अतः इससे सिद्ध होता है कि ‘वृक्ष देखते भी हैं। अनेक प्रकार की गन्धों और धूपों से वृक्ष नीरोग रहते हैं और पुष्पित हो जाते हैं; अत: निश्चित ही उनमें गन्ध को ग्रहण करने की शक्ति विद्यमान है। अपनी जड़ों से जल पीने और रोगों को दूर करने की क्षमता होने से वृक्षों में (UPBoardSolutions.com) आस्वादन की सामर्थ्य है। सुख और दु:ख का अनुभव करने, काटे जाने पर पुनः अंकुरित होने के कारण वृक्षों में जीव होता है। भोजन पचाने के कारण वृक्षों की वृद्धि देखी जाती है। वृक्षों के सचेतन होने के कारण यज्ञादि विशेष कारणों के बिना उन्हें नहीं काटना चाहिए। पुष्पित और सुगन्धित एक वृक्ष से सम्पूर्ण वन महक उठता है।

पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1)
अमितानां महाशब्दो यान्ति भूतानि सम्भवम्।
ततस्तेषां महाभूतशब्दोऽयमुपपद्यते ॥ [2007]

शब्दार्थ अमितानां = असीमित पदार्थों के लिए। महाशब्दः =’महा’ शब्द का (प्रयोग होता है)। भूतानि = प्राणी। सम्भवं यान्ति = उत्पत्ति को प्राप्त करते हैं। ततः = उस कारण से। तेषाम् = उन (पंचमहाभूतों) के लिए। महाभूतशब्दः = असीमित के लिए वाचक शब्द। अयम् = यह, पंचमहाभूत शब्द उपपद्यते = उपयुक्त होता है।

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सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘वृक्षाणां चेतनत्वम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में महर्षि भृगु पंचभूतों की महत्ता का प्रतिपादन कर रहे हैं।

अन्वय अमितानी (कृते) महाशब्दः (प्रयुज्यते तेभ्यः) भूतानि सम्भवं यान्ति। ततः तेषां (कृते) अयं महाभूतशब्दः उपपद्यते।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि असीमित पदार्थों के लिए ‘महा’ शब्द का प्रयोग होता है। इन (असीमित पदार्थों) से भौतिक पदार्थ उत्पन्न होते हैं। इसीलिए इन (असीमित पदार्थों) के लिए ‘महाभूत’ शब्द का प्रयोग उपयुक्त ही है।

(2)
चेष्टा वायुः खमाकाशमूष्माग्निः सलिलं द्रवः।
पृथिवी चात्र सङ्कातः शरीरं पाञ्चभौतिकम्॥

शब्दार्थ चेष्टा = गतिशीलता। खम् = खोखलापन। आकाशम् = आकाश। ऊष्मा = गर्मी। अग्निः = अग्नि सलिलं = जला द्रवः = तरल पदार्थ पृथिवी = पृथ्वी। चात्र = और यहाँ। सङ्कतिः = ठोसपन। शरीरं पाञ्चभौतिकम् = शरीर पाँच महाभूतों से बना है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में शरीर की पाँच भौतिकताएँ बतायी गयी हैं और स्पष्ट किया गया है कि शरीर पाँच महाभूतों से निर्मित है।

अन्वय अत्रे चेष्टा वायुः (अस्ति), खम् आकाशम् (अस्ति), ऊष्मा अग्निः (अस्ति), द्रवः सलिलम् (अस्ति), सङ्गातः पृथ्वी च (अस्ति)। (एवं) शरीरं पाञ्चभौतिकम् (अस्ति)।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि इन वृक्षों के शरीर में चेष्टा अर्थात् गतिशीलता वायु का रूप है, खोखलापन आकाश का रूप है, गर्मी अग्नि का रूप है, तरल पदार्थ सलिल का रूप है, ठोसपन पृथ्वी का रूप है। इस प्रकार (इन वृक्षों का यह) शरीर पाँच महाभूतों (UPBoardSolutions.com) (वायु, आकाश, अग्नि, जल और पृथ्वी तत्त्वों) से बना है।

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(3)
इत्येतैः पञ्चभिर्भूतैर्युक्तं स्थावर-जङ्गमम्।
श्रोत्रं घ्राणं रसः स्पर्शो दृष्टिश्चेन्द्रियसंज्ञिता ॥

शब्दार्थ इति = इस प्रकार। एतैः पञ्चभिः भूतैः = इन पाँच महाभूतों से युक्तं = युक्त है। स्थावर-जङ्गमम् = जड़ और चेतन रूप संसार। श्रोत्रम् = कर्णेन्द्रिय, कान। घ्राणम् = नासिका, नाका रसः = रसना, जीभा स्पर्शः = त्वगिन्द्रिय, त्वचा। दृष्टिः = चक्षु, आँख। इन्द्रियसंज्ञिता = इन्द्रिय नाम वाली।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में पंचमहाभूतों से उत्पन्न पाँच ज्ञानेन्द्रियों का वर्णन किया गया है। अन्वय इति एतैः पञ्चभिः भूतैः स्थावर-जङ्गमं युक्तं (अस्ति)। श्रोत्रं, घ्राणं, रसः, स्पर्शः, दृष्टिः च इन्द्रिय संज्ञिता (अस्ति)।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि यह सारा संसार इन पाँच महाभूतों (वायु, आकाश, अग्नि, जल और पृथ्वी) से ही निर्मित है, चाहे वह वृक्षादि जड़-पदार्थ हों अथवा चेतन। कान, नासिका, रसना, स्पर्श और दृष्टि; ये पाँचों ‘इन्द्रिय’ नाम वाले; श्रवणेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, स्पर्शेन्द्रिय और दर्शनेन्द्रिय; हैं।

(4)
पञ्चभिर्यदि भूतैस्तु युक्ताः स्थावरजङ्गमाः
स्थावराणां न दृश्यन्ते शरीरे पञ्चधातवः ॥ [2007, 11]

शब्दार्थ पञ्चभिः = पाँच। भूतैः =महाभूतों से। तु = तो। युक्ताः = युक्त हैं। स्थावरजङ्गमाः = जड़ और चेतन पदार्थ। स्थावराणां = स्थिर प्राणियों के न दृश्यन्ते = दिखाई नहीं देते हैं। शरीरे = शरीर में। पञ्चधातवः = पञ्चमहाभूत तत्त्व।

प्रसंग महर्षि भरद्वाज स्थावर (जड़) पदार्थों में पंच महाभूतों की सत्ता में सन्देह प्रकट कर रहे हैं।

अन्वय यदि स्थावर-जङ्गमाः पञ्चभिः भूतैः युक्ताः (सन्ति), (तर्हि) तु स्थावराणां शरीरे पञ्चधातवः (कथं) न दृश्यन्ते।

व्याख्या महर्षि भरद्वाज कहते हैं कि यदि जड़ और चेतन पदार्थ पाँच महाभूतों से युक्त हैं तो स्थावर पदार्थों के शरीर में पाँचों महाभूत तत्त्व क्यों नहीं दिखाई पड़ते?

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(5)
अनूष्माणामचेष्टानां घनानां चैव तत्त्वतः।
वृक्षाणां नोपलभ्यन्ते शरीरे पञ्चधातवः ॥ [2009]

शब्दार्थ अनूष्माणाम् = ऊष्मारहित। अचेष्टानाम् = गतिशीलता से रहिता घनानाम् = ठोस रूप। तत्त्वतः = वास्तविक रूप में वृक्षाणां = वृक्षों में। न उपलभ्यन्ते = नहीं पाये जाते हैं।

प्रसंग महर्षि भरद्वाज वृक्षों के शरीर में पाँच महाभूतों की सत्ता में सन्देह कर रहे हैं।

अन्वय अनूष्माणाम् अचेष्टानां घनानां च वृक्षाणां शरीरे तत्त्वतः पञ्चधातवः न एव उपलभ्यन्ते।

व्याख्या महर्षि भरद्वाज कहते हैं कि ऊष्मारहित, चेष्टाहीन और ठोस रूप वृक्षों के शरीर (UPBoardSolutions.com) में वास्तविक रूप से पाँच भूत तत्त्व नहीं पाये जाते हैं। तात्पर्य यह है कि गर्मी न होने से वृक्षों में अग्नि-तत्त्व का अभाव है, चेष्टा न होने से उनमें वायु तत्त्व भी नहीं है और ठोस होने के कारण वे आकाश-तत्त्व से भी रहित हैं।

(6)
न शृण्वन्ति न पश्यन्ति न गन्धरससेविनः।
न च स्पर्श विजानन्ति ते कथं पाञ्चभौतिकाः ॥

शब्दार्थ गन्धरससेविनः = गन्ध और रस का सेवन करते हैं; अर्थात् न सँघते हैं न स्वाद लेते हैं। विजानन्ति = जानते हैं, अनुभव करते हैं। कथं = कैसे? पाञ्चभौतिकाः = पाँच महाभूतों से युक्त।

प्रसंग महर्षि भरद्वाज वृक्षों के पाँचभौतिक होने में शंका प्रकट कर रहे हैं।

अन्वय (वृक्षाः) न शृण्वन्ति, न पश्यन्ति, न गन्ध रससेविन: (सन्ति), न च स्पर्श विजानन्ति, ते पाञ्चभौतिकाः कथं (भवितुमर्हन्ति)?

व्याख्या महर्षि भरद्वाज कहते हैं कि ये वृक्ष न तो जंगमों की तरह सुनते हैं, न,देखते हैं, गन्ध और रस का सेवन भी नहीं करते हैं, फिर वे पाँच महाभूतों से बने कैसे हो सकते हैं?

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(7)
अद्रवत्वादनग्नित्वादभूमित्वादवायुतः ।।
आकाशस्याप्रमेयत्वाद् वृक्षाणां नास्ति भौतिकम् ॥

शब्दार्थ अद्रवत्वात् = द्रव रूप न होने के कारण। अनग्नित्वात् = अग्नि रूप न होने के कारण। अभूमित्वात् = भूमि का अंश न होने के कारण। अवायुतः = वायु रूप न होने के कारण। आकाशस्य अप्रमेयत्वात् = आकाश के ज्ञेयत्व न होने के कारण। भौतिकम् = पंचभूतों से सम्बन्धित।

प्रसंग वृक्षों में पाँच भूतों का अभाव होने के कारण वे कैसे पाञ्चभौतिक हो सकते हैं, इस प्रकार महर्षि भरद्वाज शंका प्रकट कर रहे हैं।

अन्वये वृक्षाणाम् अद्रवत्वात्, अनग्नित्वात्, अभूमित्वात्, अवायुत: आकाशस्य अप्रमेयत्वात् (च तेषां) भौतिकम् न अस्ति।

व्याख्या महर्षि भरद्वाज कहते हैं कि वृक्षों में द्रव (जल) तत्त्व न होने के कारण, अग्नि तत्त्व न होने के कारण, भूमि तत्त्व के न होने के कारण, वायु का अंश न होने के कारण और आकाश के ज्ञेयत्व न होने के कारण उसको रूप पंचभूतों से नहीं बना है; अर्थात् वृक्षों का पाँच महाभूतों से सम्बन्ध नहीं है।

(8)
घनानामपि वृक्षाणामाकाशोऽस्ति न संशयः
तेषां पुष्पफलव्यक्तिर्नित्यं समुपपाद्यते ॥

शब्दार्थ घनानाम् अपि = ठोस रूप होते हुए भी। वृक्षाणां = वृक्षों में। आकाशः अस्ति = आकाश तत्त्व है। न संशयः = सन्देह नहीं है। तेषां = उन (वृक्षों) के पुष्पफलव्यक्तिः = फूल और फलों की उत्पत्ति। नित्यं = निरन्तर। समुपपाद्यते = सम्भव होती है।

प्रसंग वृक्षों की भौतिकता के सन्देह का समाधान करते हुए महर्षि भृगु आकाश तत्त्व की विद्यमानता सिद्ध कर रहे हैं।

अन्वय घनानाम् अपि वृक्षाणाम् आकाशः अस्ति, (अत्र) संशयः न (अस्ति)। तेषां (UPBoardSolutions.com) पुष्प-फल-व्यक्तिः नित्यं समुपपाद्यते।

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व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि ठोस रूप होते हुए भी वृक्षों में आकाश तत्त्व अवश्य होता है, इसमें सन्देह नहीं है; क्योंकि उनमें फूल और फलों की उत्पत्ति नित्य सम्भव होती है। तात्पर्य यह है कि फलों और फूलों में आकाश तत्त्व होता है। बिना आकाश तत्त्व के उनका अस्तित्व ही नहीं है। अत: वृक्षों में आकाश-तत्त्व के अभाव में फल और फूले उत्पन्न हो ही नहीं सकते थे।

(9)
ऊष्मतो म्लायते पर्णं त्वक् फलं पुष्पमेव च।
म्लायते शीर्यते चापि स्पर्शस्तेनात्र विद्यते ॥

शब्दार्थ ऊष्मतः = गर्मी के कारण। म्लीयते = कुम्हला जाता है। पर्ण = पत्ता। त्वक् = छाला शीर्यते = बिखर जाता है। स्पर्शः = स्पर्श। तेन = इस (कारण) से। अत्र = यहाँ। विद्यते = है।

प्रसंग महर्षि भृगु यह बता रहे हैं कि वृक्षों में स्पर्श का अनुभव करने की शक्ति है।

अन्वय ऊष्मतः पर्णं म्लायते। त्वक् फलं पुष्पम् एव च म्लायते शीर्यते अपि च। तेन अत्र स्पर्शः विद्यते।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि गर्मी के कारण वृक्षों के पत्ते मुरझा जाते हैं। छाल, फल (UPBoardSolutions.com) और फूल भी कुम्हला जाते हैं और बिखर जाते हैं। इस कारण वृक्षों में स्पर्श होता है क्योंकि बिना स्पर्श का अनुभव किये मुरझाना एवं सूखना सम्भव नहीं है। स्पर्श को वायु तत्त्व का गुण माना जाता है, अतः वृक्षों में वायु तत्त्व की विद्यमानता भी सिद्ध होती है।

(10)
वाय्वग्न्यशनिनिर्घोषैः फलं पुष्पं विशीर्यते
श्रोत्रेण गृह्यते शब्दस्तस्माच्छृण्वन्ति पादपाः ॥

शब्दार्थ वाय्वग्न्यशनिनिर्घोषः (वायु + अग्नि + अशनिनिर्घोषः) = वायु, अग्नि और बिजली की कड़के से। विशीर्यते = बिखर जाता है। श्रोत्रेण = कर्णेन्द्रियों के द्वारा। गृह्यते = ग्रहण किया जाता है। शब्दः = शब्द। तस्मात् = इस कारण से। शृण्वन्ति = सुनते हैं।

प्रसंग महर्षि भृगु वृक्षों में श्रवणेन्द्रिय की विद्यमानता बता रहे हैं।

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अन्वय वाय्वग्न्यशनिनिर्घोषैः (वृक्षाणां) फलं पुष्पं (च) विशीर्यते। श्रोत्रेण शब्दः गृह्यते। तस्मात् पादपाः शृण्वन्ति।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि वायु, अग्नि और बिजली की कड़क से फल और फूल बिखर जाते हैं। शब्द कान से ग्रहण किया जाता है। इसलिए वृक्ष सुनते हैं, यह सिद्ध होता है। यह तो सभी जानते हैं कि आकाश का गुण शब्द होता है; अत: इससे वृक्षों में आकाश तत्त्व (UPBoardSolutions.com) की विद्यमानता भी सिद्ध होती है।

(11)
वल्ली वेष्टयते वृक्षं सर्वतश्चैव गच्छति
न ह्यदृष्टेश्च मार्गोऽस्ति तस्मात् पश्यन्ति पादपाः ॥ [2008]

शब्दार्थ वल्ली = लता, बेल। वेष्टयते = लपेट लेती है। वृक्षं = वृक्ष को। सर्वतः = चारों ओर। अदृष्टेः = बिना दृष्टि वाले को मार्गोऽस्ति (मार्गः + अस्ति) = मार्ग है।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सिद्ध किया गया है कि वृक्षों में देखने की शक्ति होती है।

अन्वय वल्ली वृक्षं वेष्टयते, सर्वतः गच्छति च। अदृष्टे: च मार्गः न अस्ति। तस्माद् (सिध्यति यत्) पादपाः पश्यन्ति।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि बेल वृक्ष को लपेट लेती है और चारों ओर फैल जाती है; अर्थात् जिधर मार्ग मिल जाता है उधर निकल जाती है। बिना दृष्टि वाले का कोई मार्ग नहीं होता। इस कारण सिद्ध होता है। कि वृक्ष देखते भी हैं।

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(12)
पुण्यापुण्यैस्तथा गन्धैर्भूपैश्च विविधैरपि।
अरोगाः पुष्पिताः सन्ति तस्माज्जिघ्रन्ति पादपाः

शब्दार्थ पुण्यापुण्यैः = पुण्य और अपुण्य से, अच्छा बुरा, शुभ-अशुभ। गन्धैः = गन्धों से। धूपैः = धूपों (ओषधियों का धुआँ) से। अरोगाः = रोगरहित। पुष्पिता: = पुष्पयुक्त। जिघ्रन्ति = सँघते हैं। पादपाः = वृक्ष।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में वृक्षों का सँघना अर्थात् घ्राणेन्द्रिय की विद्यमानता सिद्ध की गयी है।

अन्वय (वृक्षाः) पुण्यापुण्यैः तथा गन्धैः विविधैः धूपैः अपि च अरोगाः पुष्पिताः सन्ति। तस्मात् पादपाः जिघ्रन्ति (इति सिध्यति)।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि वृक्ष पुण्यों और अपुण्यों से तथा अनेक प्रकार की गन्धों और धूपों से रोगमुक्त और पुष्पित होते हैं। इस कारण वृक्ष सँघते हैं, यह सिद्ध होता है।

(13)
पादैः सलिलपानाच्च व्याधीनां चापि दर्शनात्।
व्याधिप्रतिक्रियत्वाच्च विद्यते रसनं द्रुमे॥

शब्दार्थ पादैः = जड़ों से, पैरों से। सलिलपानात् = जल पीने से। व्याधीनां = रोगों के चापि (च + अपि) = और भी। दर्शनात् = दिखाई पड़ने से। व्याधिप्रतिक्रियत्वात् = रोगों की प्रतिक्रिया (चिकित्सा) होने के कारण। विद्यते = है। रसनम् = स्वाद लेने की सामर्थ्य।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में महर्षि भृगु द्वारा वृक्षों में रसनेन्द्रिय का होना सिद्ध किया गया है।

अन्वये पादैः सलिलपानात् व्याधीनां च अपि दर्शनात् व्याधि प्रतिक्रियत्वात् च द्रुमे रसनं विद्यते (इति सिध्यति)।

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व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि अपनी जड़ों के द्वारा जल पीने के कारण और रोगों के दिखाई पड़ने के कारण और रोगों का उपचार सम्भव होने के कारण वृक्षों में स्वाद लेने की सामर्थ्य सिद्ध होती है। तात्पर्य यह है कि रसनेन्द्रिय के अभाव में जल पीना और रोगों की दवा पीना सम्भव नहीं है और बिना स्वाद के दवा का प्रभाव हो ही नहीं सकता।

(14)
वक्त्रेणोत्पलनालेन यथोर्ध्वं जलमाददेत्
यथा पवनसंयुक्तः पादैः पिबति पादपः ॥

शब्दार्थ वक्त्रेण = मुख द्वारा। उत्पलनालेन = कमल की डण्डी से। यथा = जैसे, जिस प्रकार। ऊर्ध्वम् = ऊपर की ओर। आददेत् = ग्रहण करता है। तथा = उसी प्रकार पवनसंयुक्तः = पवन से युक्त।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में वृक्षों में चेतना का होना सिद्ध किया गया है।

अन्वय यथा उत्पलनालेन वक्त्रेण जलम् ऊर्ध्वम् आददेत्। तथा पवनसंयुक्तः पादपः पादैः (जलं)। पिबति।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि जैसे कमल डण्ठल के द्वारा ऊपर की ओर जल ग्रहण करता है, अर्थात् खींचता है, उसी प्रकार वृक्ष वायु से युक्त होकर अपनी जड़ों से पानी पीता है।

(15)
सुखदुःखयोश्च ग्रहणाच्छिन्नस्य च विरोहणात्।
जीवं पश्यामि वृक्षाणामचैतन्यं न विद्यते ॥ [2008]

शब्दार्थ सुख-दुःखयोः = सुख और दुःख का। ग्रहणात् = अनुभव करने के कारण। छिन्नस्य = कटे हुए का। विरोहणात् = पुनः उगने के कारण। जीवं = जीवन को। पश्यामि = देखता हूँ, अनुभव करता हूँ। अचैतन्यम् = चेतना का अभाव।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में वृक्षों में चेतनता की विद्यमानता को सिद्ध किया गया है।

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अन्वय (वृक्षाणां) सुखदुःखयोः ग्रहणात्, छिन्नस्य विरोहणात् च (अहं) वृक्षाणां जीवं पश्यामि। (तेषाम्) अचैतन्यं न विद्यते।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि सुख और दुःख का अनुभव करने के कारण तथा कटे हुए वृक्ष (UPBoardSolutions.com) के पुनः उगने के कारण मैं वृक्षों में जीवन देखता हूँ। उनमें चेतना का अभाव नहीं है।

(16)
तेन तज्जलमादत्तं जरयत्यग्नि-मारुतौ ।
आहारपरिणामाच्च स्नेहो वृद्धिश्च जायते ॥

शब्दार्थ तेन = उसके (वृक्ष के) द्वारा। आदत्तम् = ग्रहण किया जाता है। तत् = वह (जल)। जरयति = पचाता है। अग्नि-मारुतौ = अग्नि और वायु को। आहारपरिणामात् = भोजन पच जाने के कारण। स्नेहः = चिकनापन, स्निग्धता। वृद्धिः = बढ़ावा।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में वृक्षों में चेतना का होना सिद्ध किया गया है।

अन्वय तेन तत् जलम् आदत्तम्। अग्निमारुतौ जरयति। आहार-परिणामात् च स्नेह: वृद्धिश्च जायते।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि उस वृक्ष के द्वारा जल ग्रहण किया जाता है। वह अग्नि और हवा को पचाता है। भोजन के पच जाने के कारण उसमें स्नेह उत्पन्न होता है और उसकी वृद्धि होती है। तात्पर्य यह है कि वृक्षों में चेतना होती है, क्योंकि जीवों में वृद्धि प्राप्त करना चेतना का द्योतक है।

(17)
एतेषां सर्ववृक्षाणां छेदनं नैव कारयेत्
चातुर्मासे विशेषेण विना यज्ञादिकारणम् ॥ [2007,12]

शब्दार्थ सर्ववृक्षाणां = सभी वृक्षों की। छेदनम् = कटाई। ‘कारयेत्’ = करना चाहिए। चातुर्मासे = वर्षा के चार महीनों में। विशेषेण = विशेष रूप से। विना यज्ञादिकारणम् = यज्ञ आदि किसी पवित्र उद्देश्य के बिना।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में बिना किसी विशेष प्रयोजन के वृक्षों को न काटने का परामर्श दिया गया है।

अन्वय एतेषां सर्ववृक्षाणां यज्ञादिकारणं विना छेदनं न कारयेत्। विशेषेण चातुर्मासे एव (एतेषां छेदनं न कारयेत्)।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि इन सभी वृक्षों की यज्ञादि विशेष कारण के बिना कटायी नहीं करनी चाहिए; अर्थात् यज्ञादि के समय आवश्यकता पड़ने पर ही वृक्षों को काटना चाहिए। विशेष रूप से वर्षा के चार महीनों में इन्हें नहीं काटना चाहिए।

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(18)
एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना।
वासितं वै वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा ॥ [2008, 10, 11, 14, 15]

शब्दार्थ एकेनापि = एक भी। सुवृक्षेण = सुन्दर वृक्ष के द्वारा। पुष्पितेन = फूलों से युक्त। सुगन्धिना = सुन्दर महक (गन्ध) वाले। वासितम् = सुगन्धित हो जाता है। वनं सर्वं = सम्पूर्ण वन|

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में पुष्पित और पल्लवित वृक्ष के माध्यम से सुपुत्र के गुणों पर प्रकाश डाला गया है।

अन्वय पुष्पितेन सुगन्धिना एकेन अपि सुवृक्षेण सर्वं वै वनं वासितं सुपुत्रेण कुलं (भवति)।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि फूलों से युक्त तथा सुन्दर गन्ध से युक्त एक भी सुन्दर वृक्ष के द्वारा सारा वन उसी प्रकार सुगन्धित हो जाता है, जैसे एक ही सुपुत्र के द्वारा वंश प्रतिष्ठित हो जाता है।

सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1) अमितानां महाशब्दो यान्ति भूतानि सम्भवम्। [2007]

सन्दर्भ प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘वृक्षाणां चेतनत्वम्’ पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ की शेष समस्त सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा। ]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में महर्षि भृगु पंचभूतों और उसके लिए प्रयुक्त शब्द का वर्णन कर रहे हैं।

अर्थ असीमित पदार्थों के लिए ‘महा’ शब्द से भौतिक पदार्थ उत्पन्न होते हैं।

व्याख्या महर्षि भरद्वाज से महर्षि भृगु कहते हैं कि असीमित पदार्थों के लिए ‘महा’ शब्द का प्रयोग होता है। यह शब्द के पूर्व जुड़कर उसके अर्थ में; बहुत अधिक, सर्वश्रेष्ठ, सबसे बड़ा, बहुत बड़ा आदि अर्थों का बोध कराता है; यथा-महात्मा, महाकाव्य, महादेव, महापुरुष, महाभियोग, महायज्ञ, महामारी आदि। अतः स्पष्ट है कि ‘महा’ शब्द का प्रयोग असीमित पदार्थों के लिए होता है। इन असीमित पदार्थों से ही समस्त प्राणी/भौतिक पदार्थ उत्पन्न होते हैं। इसीलिए इनके लिए प्रयुक्त ‘महाभूत’ शब्द सार्थक और उपयुक्त है।

(2) शरीरं पाञ्चभौतिकम्। [2012]

प्रसंग इस सूक्ति में बताया गया है कि संसार में जितने भी प्राणी हैं उनके शरीर पाँच तत्त्वों से मिलकर बने

अर्थ शरीर पाँच भौतिक तत्त्वों से निर्मित है।

व्याख्या महर्षि भृगु वृक्षों में चेतना के होने को प्रमाणित करते हुए उनकी तुलना मनुष्य के शरीर से करते हैं। वे बताते हैं कि हमारा शरीर आकाश, वायु, जल, पृथ्वी और अग्नि-इन पाँच तत्त्वों से मिलकर बना है। हमारे शरीर की चेतना के कारण ये पाँच तत्त्व ही हैं। जिस प्रकार (UPBoardSolutions.com) शरीर की गति वायु तत्त्व के कारण, खोखलापन आकाश तत्त्व के कारण, ऊष्मा अग्नि तत्त्व के कारण, रुधिर आदि का प्रवाह जल तत्त्व के कारण और ठोसपन पृथ्वी तत्त्व के कारण है, उसी प्रकार वृक्षों में भी ये पाँचों तत्त्व और लक्षण विद्यमान हैं। इसीलिए ये भी हमारी तरह ही प्राणवान हैं।

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(3)
शरीरे पञ्चधातवः।
ते कथं पाञ्चभौतिकाः।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में वृक्षों में पाँच धातुओं अर्थात् पाँच महाभूतों की विद्यमानता में सन्देह व्यक्त किया गया है।

अर्थ शरीर में पाँच धातुएँ अर्थात् पाँच महाभूत तत्त्व कैसे (हो सकते हैं)?

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि सभी स्थावर (एक ही स्थान पर स्थित रहने वाले) और जंगम (चलने-फिरने वाले) पदार्थों में पाँच धातुओं अर्थात् पाँच महाभूतों की विद्यमानता है। इन्हीं पाँच महाभूतों से चर-अचर समस्त विश्व युक्त हैं। पाँच इन्द्रिय संज्ञक-श्रवणेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, स्पर्शेन्द्रिय और दर्शनेन्द्रिय सूक्ष्म महाभूत हैं। महर्षि भरद्वाज इन पाँच महाभूतों की विद्यमानता जंगम पदार्थों में तो स्वीकार करते हैं, लेकिन स्थावर पदार्थों में नहीं। अपने सन्देह को व्यक्त करते हुए वे विभिन्न तर्को के द्वारा अपनी बात को रखते हैं।

(4)
तथा पवनसंयुक्तः पादैः पिबति पादपः।
पादैः पिबति पादपः।। [2015]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में जीवधारियों और वृक्ष द्वारा जल-ग्रहण करने की विधि का वर्णन किया गया है।

अर्थ जैसे पवन से युक्त होकर वृक्ष जड़ों से जल पीते हैं।

व्याख्या जीवधारी वायु के सहयोग से चूषण-पद्धति द्वारा जल आदि पेय पदार्थों को ग्रहण करते हैं। यह क्रिया केवल जीवधारियों में पायी जाती है। वृक्ष भी इस पद्धति के द्वारा वायु के योग से अपनी जड़ों द्वारा पृथ्वी से जल चूसकर अपना पोषण करते हैं; अतः उनमें भी जीवन है। जिस प्रकार कमल अपनी नाल के द्वारा पानी को ऊपर पहुँचाता (खींचता) है, उसी प्रकार वृक्ष वायु की सहायता से अपने जड़रूपी पैरों से पानी पीकर वृक्ष की शाखाओं-उपशाखाओं तक ले जाते हैं। इसीलिए उनको पादप कहा जाता है। भाव यह है कि मूल ही सबका कारण होता है।

(5) एतेषां सर्ववृक्षाणां छेदनं नैव कारयेत्। [2006,07,09, 10, 12]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में महर्षि भृगु वृक्षों में चेतना होने के कारण उन्हें न काटने की ओर संकेत कर रहे हैं।

अर्थ इन सभी वृक्षों को नहीं काटना चाहिए।

व्याख्या सभी वृक्षों में जीवधारियों की तरह ही चेतना होती है। इसी कारण से वे भी हमारी तरह ही सुख और दु:ख का अनुभव करते हैं। अतः व्यर्थ काटकर उन्हें पीड़ा नहीं पहुँचानी चाहिए। वर्षा ऋतु में सभी पेड़-पौधों में नवजीवन और नवचेतना का संचार होता है। इसी समय (UPBoardSolutions.com) वे सर्वाधिक वृद्धि करते हैं। अतः वर्षा ऋतु में तो उन्हें कदापि नहीं काटना चाहिए। वर्तमान समय में पर्यावरण का सन्तुलन बिगड़ रहा है, इसलिए उनकी रक्षा करना तो और भी आवश्यक हो जाता है।

(6)
वासितं वै वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा। [2006, 08,09, 10, 14]
सुपुत्रेण कुलं यथा। [2009, 14]

प्रसंग इस सूक्ति में सुपुत्र के महत्त्व को बताया गया है।

अर्थ एक ही पुष्पित एवं गन्ध वाले वृक्ष से पूरा वन सुवासित हो जाता है, जिस प्रकार एक योग्य पुत्र से कुल का यश बढ़ जाता है।

व्याख्या जब किसी वन में सुगन्धित पुष्पों वाला एक वृक्ष भली प्रकार से सुगन्धित हो उठता है, तो उसकी सुगन्ध से सारा वन महकने लगता है। ठीक इसी प्रकार से एक सुपुत्र अपने सम्पूर्ण कुल को अपने सकर्मों की सुगन्ध से महका देता है। तात्पर्य यह है कि पुत्र के सद्कर्मों से उसके सम्पूर्ण कुल की …. यश-कीर्ति चारों ओर फैल जाती है। उसके नाम से उसके कुल का नाम जाना जाने लगता है। यहाँ पर सुपुत्र की तुलना सुवृक्ष से की गयी है और यह बताया गया है कि दोनों को अपने-अपने कुल समूह के लिए महत्त्व है। भाव यह है कि एक भी अच्छा गुण व्यक्ति के विकास में सहायक होता है।

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श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) अमितानां महाशब्दो ……………………………… शब्दोऽयमुपपद्यते ॥ (श्लोक 1)
संस्कृतार्थः महर्षिः भृगुः उवाच-वृक्षाः असीमितपदार्थान् यच्छन्ति, अतएव एभ्यः ‘महा’ शब्दस्य प्रयोगः भवति। अस्मात् कारणात् एव इमान् ‘महाभूत’ संज्ञया अभिहितः।

(2) चेष्टा वायुः ……………………………… शरीरं पाञ्चभौतिकम् ॥ (श्लोक 2)
संस्कृतार्थः महर्षिः भृगुः उवाच–अस्मिन् वृक्षे शरीरे गतिशीलता वायोः रूपम् अस्ति, खम् आकाशस्य रूपम् अस्ति, उष्णत्वम् अग्निरूपम् अस्ति, रुधिरादयः तरलाः पदार्थाः सलिलरूपम् अस्ति, सङ्गातः पृथ्वीरूपम् अस्ति; अतः इदं शरीरं पाञ्चभौतिकम् अस्ति।

(3) पञ्चभिर्यदि भूतैस्तु ……………………………… पञ्चधातवः ॥ (श्लोक 4) [2006]
संस्कृतार्थः महर्षिः भरद्वाजः कथयति यत् यदि स्थावर-जङ्गमाः पदार्थाः पञ्चमहाभूतैः युक्ताः सन्ति तर्हि स्थावराणां पदार्थानां शरीरे पञ्चधातवः पञ्चमहाभूततत्त्व: वा कथं न दृश्यन्ते?

(4) अनूष्माणामचेष्टानां ……………………………… पञ्चधातवः ॥ (श्लोक 5)
संस्कृतार्थः महर्षिः भरद्वाजः उवाच-ऊष्मारहिताणां क्रियाशीलतारहिताणाम् अवकाशरहिताणां चे वृक्षाणां शरीरे वस्तुतः पञ्चधातवः न एव उपलभ्यन्ते।

(5) न शृण्व न्ति नं ……………………………… कथं पाञ्चभौतिकाः ॥ (श्लोक 6) (2010].
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महर्षिः भरद्वाजः शङ्कां करोति यत् ते वृक्षाः न शृण्वन्ति, न पश्यन्ति, (UPBoardSolutions.com) न गन्ध-रस सेविन: न च स्पर्श विजानन्ति, अतएव ते कथं पाञ्चभौतिकाः सन्ति।

(6) ऊष्मतो म्लायते ……………………………… तेनात्र विद्यते॥ (श्लोक 9) [2009]
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महर्षिः भृगुः कथयति उष्मतः अर्थात् तापकारणेन पर्णानि म्लायन्ते। एतत् अतिरिक्तं त्वक् फलं-पुष्पं च अपि म्लायते शीर्यते च। एतेन कारणेन स्पष्टः अस्ति यत् वृक्षेषु स्पर्शगुणस्य विद्यमानता अवश्यमेव भवति।

(7) वल्ली वेष्टयते ……………………………… पश्यन्ति पादपाः ॥ (श्लोक}l) [2010]
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महर्षिः भृगुः कथयति यत् वृक्षेषु चक्षु-इन्द्रियम् अपि विद्यते, लता वृक्षम् आरोहति यत्र अलम्बनं मिलति तत्र सर्वत्र गच्छति। अदृष्टे मार्गे लतानाम् आरोहणे गमनं नैव सम्भवतः। तस्मात् पादपाः पश्यन्ति अपि।

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(8) पुण्यापुण्यैस्तथा ……………………………… जिघ्रन्ति पादपाः ॥ (श्लोक 12)
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महर्षिः भृगुः वृक्षाणां घ्राणेन्द्रियस्य सिद्धिः करोति। वृक्षः सुगन्धं दुर्गन्धं च विचारयन्ति। गन्धैः युक्तैः धूपैः पादपाः अरोगाः पुष्पिता: सन्ति। तस्मात् कारणात् पादपाः जिघ्रन्ति।

(9) सुखदुःखयोश्य ……………………………… न विद्यते ॥ (श्लोक 15) [2010, 1]
संस्कृतार्थः महर्षिः भृगुः उवाच-अहं सुखदुःखयोः अनुभवकरणात् छिन्नस्य शरीरस्य पुनः अङ्कुरणात् च वृक्षाणां जीवं पश्यामि। तेषां निर्जीवत्वं न विद्यते। वृक्षा अपि सचेतना नैव जडाः इति भावः।।

(10) एतेषां सर्ववृक्षाणां ……………………………… यज्ञादिकारणम्॥ (श्लोक 17)
संस्कृतार्थः महर्षिः भृगुः कथयति यत् कदापि वृक्षाणाम् अकारणं कर्त्तनं न कुर्यात्। यज्ञादि कारणाय एव छेदनं कारयेत्। विशेषेण चातुर्मासे वृक्षं कर्त्तनं न कुर्यात्। शास्त्रेषु अपि वृक्षाणां कर्त्तनं निषिद्धम् अस्ति।

(11) एकेनापि सुवृक्षेण ……………………………… सुपुत्रेण कुलं यथा ॥ (श्लोक 18) [2007,08,09, 10, 11, 12, 15]
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महर्षिः भृगु कथयति यत् यथा एकः सुपुष्पितः सुगन्धित: वृक्षः सर्वं (UPBoardSolutions.com) वनं सुगन्धितं करोति तथैव एकः सुपुत्रः अपि समस्तं कुलं स्वगुणैविभूषितं करोति। अतएव वृक्षाणां समृद्धिः आवश्यकी अस्ति।

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Class 10 Sanskrit Chapter 11 UP Board Solutions जीव्याद् भारतवर्षम् Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 11 Jivyad Bharatvarsham Question Answer (पद्य – पीयूषम्)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 11 हिंदी अनुवाद जीव्याद् भारतवर्षम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

डॉ० चन्द्रभानु त्रिपाठी संस्कृत के उत्कृष्ट कवि एवं नाटककार हैं। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जनपद में सन् 1925 ई० में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर तथा उच्च शिक्षा प्रयाग में हुई। प्रयाग विश्वविद्यालय के द्वारा “व्याकरण-दर्शन के विशिष्ट अध्ययन” पर आपको डी० फिल्० की उपाधि प्रदान की गयी। इन्होंने अनेक आलोचनात्मक ग्रन्थ, शोध-लेख, कविताएँ, गीत तथा नाटक लिखे हैं। इनकी रचनाओं में सर्वत्र सरलता, सरसता, लालित्य (UPBoardSolutions.com) एवं स्वाभाविकता परिलक्षित होती है। प्रस्तुत गीत डॉ० चन्द्रभानु त्रिपाठी द्वारा रचित ‘गीताली’ नामक काव्य-संकलन से संकलित है। कवि ने प्रस्तुत गीत के तीन पदों में भारत को मनोरमता और भव्यता का तथा भारतीय समाज को एकजुट होकर देश की उन्नति करने का सन्देश दिया है। इनमें कवि की भारतीय संस्कृति के प्रति पूर्ण आस्था अभिव्यक्त हुई है।

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पाठ-सारांश

हमारा देश भारतवर्ष चिरकाल तक स्वाधीन राष्ट्र के रूप में विद्यमान रहे।
भारत की मनोरमता हिमालय भारत के सिर का मुकुट है। इस पर पड़ती हुई उदीयमान सूर्य की लाल-लाल किरणें मणियों की भ्रान्ति उत्पन्न करती हैं। समुद्र अपनी लहरों से सदैव इसके चरणों को धोता रहता है। नदियाँ इसके वक्षःस्थल पर पड़े हुए हार हैं, विन्ध्यपर्वत इसकी करधनी है तो सघन वनराशि इसके नवीन वस्त्र हैं।

समाज के नव-निर्माण की आवश्यकता सभी ज्ञानी, विद्वान्, सम्मानित लोग, पूँजीपति, श्रेष्ठ व्यापारी, (UPBoardSolutions.com) श्रमिक एवं वीर सभी वर्गों के लोग एक साथ मिलकर नये समाज का निर्माण करें। पुराने धर्म का परिष्कार करके मानवधर्म का यत्र-तत्र सर्वत्र प्रसार करें। भारत का प्रत्येक निवासी आत्म-बल से युक्त होकर उन्नति एवं प्रगति के नये-नये पाठों को पढ़ता रहे।

भारतीय संस्कृति में आस्था पवित्र लहरों वाली गंगा हमारे देश की महिमा को प्रसृत करती हुई सदैव प्रवाहित होती रहे। महावीर की अहिंसा, गौतम की करुणा और सत्य का सन्देश सर्वत्र फैले। भारतवासी गीता के कर्म के महत्त्व पर आस्था रखें और भारत के वीर सपूतों की गाथाओं का सर्वत्र गान हो। हमारे देश के लोग सुखी, स्वस्थ और दीन भाव से रहित हों तथा भारत एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में चिरकाल तक जीवित रहे।

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पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1)
भारतवर्ष राष्ट्रं जीव्याच्चिरकालं स्वाधीनम्।
सन्मित्रं भूयाच्च समृद्धं जीयाच्छत्रु-विहीनम् ॥

हिमगिरिरस्य किरीटो मौलेररुण-किरण-मणि-माली।
कर-कल्लोलैर्जलधिविलसति पादान्त-प्रक्षाली
सरितो वक्षसि हारा विन्ध्यो भाति मेखला-मानम्।
पल्लव-लसिता निबिड-वनाली रुचिरं नव-परिधानम् ॥
आस्ते कविकुलमस्य मनोरम-रूप-वर्णने लीनम्। [2006]

शब्दार्थ जीव्यात् = अमर रहे। चिरकालम् = चिरकाल तका स्वाधीनम् = स्वतन्त्र सन्मित्रं = सच्चा मित्र। समृद्धं = समृद्धिशाली। जीयात् = विजयी हो। शत्रु-विहीनम् = शत्रुरहित। हिमगिरिः = हिमालय पर्वत। अस्य = इसके। किरीटः = मुकुट। मौलेः = मस्तक का। (UPBoardSolutions.com) अरुण-किरण-मणि-| (सूर्य की) किरणरूपी मणियों की माला वाला। कर-कल्लोलैः = विशाल लहरोंरूपी हाथों से। जलधिः = समुद्रा विलसति = शोभित होता है। पादान्त प्रक्षाली = पैरों के अग्रभाग को धोने वाला। सरितः = नदियाँ। वक्षसि = वक्षःस्थल पर, छाती पर हारा = हार हैं। विन्ध्य = विन्ध्याचल। भाति = शोभित होता है, सुशोभित है। मेखलामानम् = करधनी की भाँति। पल्लव-लसिता = पत्तों से सुसज्जित। निबिडवनाली = घनी वनपंक्ति रुचिरम् = सुन्दर। परिधानम् = वस्त्र। आस्ते = है। कविकुलम् = कवियों का समूह। मनोरम-रूप-वर्णने = मनोहर सुन्दरता का वर्णन करने में। लीनम् = तल्लीन।

सन्दर्भ प्रस्तुत गीत-पद हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘जीव्याद् भारतवर्षम्’ शीर्षक गीत से लिया गया है।

[संकेत इस पाठ के शेष सभी पद्यों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत पद में भारत की मनोरमता और भव्यता का सुन्दर चित्र अंकित किया गया है।

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अन्वय भारतवर्ष राष्ट्रं चिरकालं स्वाधीनं जीव्यात्, (इदं) सन्मित्रं समृद्धं भूयात्, (इदं) शत्रुविहीनं जीयात्। अरुण-किरण-मणि-माली हिमगिरिः अस्य किरीटः (अस्ति)। जलधिः कर-कल्लोलैः (अस्य) पादान्त प्रक्षाली (सन्) विलसति। (अस्य) वक्षसि सरितः हाराः (सन्ति)। विन्ध्यः (अस्य) मेखलामानं भाति। पल्लवलसिता निबिडवनाली (अस्य) रुचिरं नवपरिधानम् अस्ति। कविकुलम् अस्य मनोरमरूपवर्णने लीनम् आस्ते।

व्याख्या हमारी राष्ट्र भारतवर्ष चिरकाल तक स्वाधीन होकर अमर रहे। यह अच्छे मित्रों वाला और वैभवपूर्ण हो, यह शत्रुरहित होकर विजयी रहे। सूर्य की लाल किरणों की मणियों की माला वाला हिमालय इसका ( भारतवर्ष का) मुकुट है। समुद्र अपने विशाल लहरोंरूपी हाथों से इसके पैरों के अग्रभाग को धोने वाला सुशोभित होता है। इसके वक्षस्थल पर नदियाँ हार के समान हैं। विन्ध्य पर्वत इसकी मेखला अर्थात् करधनी के समान शोभित होता है। कोमल पत्तों से शोभित घनी (UPBoardSolutions.com) वनपंक्ति इसका सुन्दर नया वस्त्र है। कवियों का समूह इसके सौन्दर्य के वर्णन में लीन हो रहा है।

(2)
सर्वे ज्ञान-धना बुध-वर्या मान-धना रण-धीराः ।।
स्वर्ण-धना व्यवसायि-धुरीणास्तथा श्रम-धना वीराः ॥

कुर्वन्त्वेकीभूय समेता नव-समाज-निर्माणम्।
मान्यो मानव-धर्मः प्रसरतु सम्परिशोध्य पुराणम् ॥
आत्मशक्ति-संवलित-मानवः पाठं पठेन्नवीनम् ॥

शब्दार्थ ज्ञान-धनाः = ज्ञानरूपी धन वाले। बुध-वर्याः = श्रेष्ठ विद्वान्। मानधनाः = यशरूपी धन वाले। रणधीराः = युद्ध में विचलित न होने वाले स्वर्ण-धनाः = स्वर्णरूपी धन वाले व्यवसायि-धुरीणाः = व्यापारियों में अग्रणी, श्रेष्ठ व्यवसायी। श्रमधनाः = परिश्रमरूपी धन वाले। एकीभूय = एक होकर समेताः = एक साथ मिलकर। मान्यः = सबके मानने योग्य मानव-धर्मः = मानवता के मूल्यों को सुरक्षित रखने वाला धर्म। प्रसरतु = फैले। सम्परिशोध्य = परिष्कार करके, सुधार करके। पुराणम् = पुराना। आत्मशक्ति-संवलित-मानवः = आत्मा की शक्ति से युक्त मनुष्य। पाठं पठेत् नवीनम् = नया पाठ पढ़े।

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प्रसंग प्रस्तुत पद में भारतीय समाज के प्रत्येक वर्ग को एकजुट होकर देश की उन्नति करने की सलाह दी गयी है।

अन्वय सर्वे ज्ञानधनाः, बुध-वर्याः, मानधनाः, रणधीराः, स्वर्णधनाः, व्यवसायिधुरीणाः तथा श्रमधंनाः वीराः समेताः एकीभूय नवसमाज-निर्माणः कुर्वन्तु। पुराणं सम्परिशोध्य मान्यः मानव-धर्मः प्रसरतु। आत्मशक्ति-संवलित-मानव: नवीनं पाठं पठेत्।।

व्याख्या सभी ज्ञान को धन समझने वाले (बौद्धिक वर्ग), श्रेष्ठ विद्वान्, प्रतिष्ठा को धन समझने वाले, युद्ध में विचलित न होने वाले, स्वर्णरूपी धन वाले, व्यापारियों में श्रेष्ठ तथा श्रम को धन समझने वाले (श्रमिक वर्ग), वीर लोग एक साथ मिलकर एकजुट होकर नये समाज का निर्माण करें। (UPBoardSolutions.com) (धर्म के) पुराने रूप का परिष्कार करके मानवता के मूल्यों को सुरक्षित रखने वाला धर्म (सर्वत्र) फैले। आत्मशक्ति से युक्त मानव नया पाठ पढ़े।

(3)
प्रवहतु गङ्गा पूततरङ्गा प्रथयन्ती महिमानम्।            [2007]
गायतु गीता कर्ममहत्त्वं योग-क्षेम-विधानम्॥           
भवेदहिंसा करुणासिक्ता तथा सूनृती वाणी।।
प्रसरे भारत-सद्वीराणां गाथा भुवि कल्याणी।।
देशे स्वस्थः सुखितो लोको भावं भजेन्न दीनम्।
भारतवर्षं राष्ट्रं जीव्याच्चिरकालं स्वाधीनम् ॥

शब्दार्थ प्रवहतु = बहे। पूततरङ्गा = पवित्र लहरों वाली। प्रथयन्ती = फैलाती हुई। महिमानम् = महिमा को। गायतु = गाये, गान करे। कर्ममहत्त्वं = कर्म के महत्त्व का। योगक्षेम-विधानम् = योग (अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा) की व्यवस्था वाले। अहिंसा = जीवों को न सताना। करुणासिक्ता = करुणा से युक्त। सूनृता = सत्य और मनोरम प्रसरेत् = फैल जाए। सद्वीराणाम् = श्रेष्ठ वीरों की। गाथा = कथा। भुवि = पृथ्वी पर कल्याणी = मंगलमयी। देशे = देश में। (UPBoardSolutions.com) सुखितः = सुखी। लोकः = जनता। भावं = भाव को। दीनं = दीनता को। न भजेत् = प्राप्त न हो।

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प्रसंग प्रस्तुत पद में कवि ने भारतीय संस्कृति में अपनी पूर्ण आस्था व्यक्त की है।

अन्वय पूततरङ्गा गङ्गा (भारतवर्षस्य) महिमानं प्रथयन्ती प्रवहतु। गीता योग-क्षेमविधानं कर्ममहत्त्वं गायतु। अहिंसा करुणासिक्ता तथा वाणी सूनृता भवेत्। भारत-सद्वीराणां कल्याणी गाथा भुवि प्रसरेत्। देशे स्वस्थ: सुखितः लोकः दीनं भावं न भजेत्। भारतवर्ष चिरकालस्वाधीनं राष्ट्रं जीव्यात्।।

व्याख्या पवित्र लहरों वाली गंगा (भारतवर्ष की) महिमा को फैलाती हुई प्रवाहित हो। गीता, योग और क्षेम की व्यवस्था वाले कर्म के महत्त्व का गान करे। (देशवासियों के हृदय में) अहिंसा की भावना करुणा से सिंचित हो तथा वाणी सत्य और मनोरम हो। भारत के श्रेष्ठ वीरों की कल्याणमयी कथा पृथ्वी पर फैल जाए। देश में स्वस्थ और सुखी लोग दीनता को प्राप्त न करें। भारतवर्ष एक स्वाधीन राष्ट्र के रूप में चिरकाल तक जीवित रहे।

सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1) भारतवर्षं राष्ट्रं जीव्याच्चिरकालं स्वाधीनम्। [2008,09, 11, 14]

सन्दर्भ प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के जीव्याद् भारतवर्षम्’ नामक पाठ से अवतरित है।

प्रसंग इस सूक्ति में स्वतन्त्र भारत राष्ट्र के बहुमुखी विकास की कामना की गयी है।

अर्थ भारतवर्ष एक स्वाधीन राष्ट्र के रूप में चिरकाल तक जीवित रहे।

व्याख्या संसार का प्रत्येक व्यक्ति यही चाहता है कि वह और उसका देश बहुमुखी विकास करके अपनी कीर्ति सभी दिशाओं में फैलाये। अपनी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता चाहने के साथ-साथ वह यह भी चाहता है। कि वह जिस देश अथवा जाति का सदस्य है, वह भी स्वतन्त्र हो; अर्थात् उस पर किसी (UPBoardSolutions.com) का अंकुश न हो। उसका नाम सदैव के लिए संसार में अमर हो जाए। प्रस्तुत सूक्ति में भी कवि यही कामना कर रहा है कि हमारा देश भारत कभी किसी के अधीन न हो। वह सदैव स्वतन्त्र रहे और चिरकाल तक विश्व का सिरमौर बना रहे।

(2) आत्मशक्ति-संवलित-मानवः-पाठं-पठेन्नवीनम्। [2007, 14]

सन्दर्भ पूर्ववत्।।

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प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में आत्मा की शक्ति से युक्त मनुष्य को कुछ नया करने के लिए प्रेरित किया गया है।

अर्थ आत्मशक्ति से युक्त मानव नया पाठ पढ़े।

व्याख्या भारतीय समाज के प्रत्येक वर्ग के व्यक्तियों को एक साथ मिलकर नये समाज का निर्माण करना चाहिए। उन्हें धर्म के पुराने स्वरूप को परिष्कार करके मानवीय मूल्यों को संरक्षित करने वाले धर्म का प्रसार करना चाहिए। इसके लिए भारतीय समाज के प्रत्येक मनुष्य को आत्मशक्ति से युक्त होना आवश्यक है। साथ ही उसे प्रगति और समृद्धि के नित नवीन क्षेत्रों का ज्ञान करने के लिए अध्ययन करते रहना भी आवश्यक है, क्योंकि ज्ञान की नवीनता के बिना परिष्कार सम्भव नहीं है और परिष्कार के लिए व्यक्ति का आत्म-शक्ति से युक्त होना भी अत्यावश्यक है।

(3) गायतु गीता कर्ममहत्त्वं योगक्षेमविधानम्। [2014]

सन्दर्भ पूर्ववत्।।

प्रसंग प्रस्तुत पंक्ति में श्रीमद्भगवद्गीता के महत्त्व का प्रतिपादन .कया गया है।

अर्थ गीता योग और क्षेम की व्यवस्था वाले कर्म के महत्त्व का गान करे।

व्याख्या प्राचीन भारतीय वाङ्मय के समस्त ग्रन्थों में गीता अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान सर्वोपरि है और इसे पूजनीय ग्रन्थ माना जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता मुख्य रूप से कर्म के महत्त्व और योग-क्षेम की व्यवस्था का प्रतिपादन करती है। श्रीमद्भगवद्गीता का कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति को उचित-अनुचित और कर्मफल की भावना को छोड़कर सतत कर्म करते रहना चाहिए। व्यक्ति को कभी भी अकर्म अथवा कर्महीनता की स्थिति में नहीं रहना चाहिए। कर्महीनता की स्थिति व्यक्ति (UPBoardSolutions.com) के लिए अत्यधिक घातक है। योग और क्षेम के अनेकानेक अर्थों को समाहित करते हुए भी गीता कर्म की श्रेष्ठता को ही सिद्ध करती है। स्वाभाविक है कि जब तक व्यक्ति कर्म में तत्पर नहीं होगा, तब तक स्वयं उसकी उन्नति सम्भव नहीं होगी। व्यक्ति की उन्नति में ही राष्ट्र की उन्नति निहित होती है। एक स्वाधीन राष्ट्र के रूप में भारत चिरकाल तक जीवित रहे, इसके लिए प्रत्येक भारतवासी को योग-क्षेम और कार्य की महत्ता का ज्ञान आवश्यक है।

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श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) भारतवर्ष राष्टं ………………………………………………………. जीयाच्छत्रुविहीनम् ॥ (श्लोक 1)
संस्कृतार्थः अस्मिन् पद्ये कविः कामनां करोति यत् अस्माकं भारतराष्ट्रं चिरकालं स्वाधीनं जीवेत्। अस्य राष्ट्रस्य सम्मित्राणि भवेयुः। राष्ट्रं शत्रुविहीनं समृद्धं च भूयात्।।

(2)
प्रवहतु गङ्गा”………………………………………………………. कालं स्वाधीनम् ॥ (श्लोक 3)
प्रवहतु गङ्गा”………………………………………………………. योगक्षेमविधानम् ॥ [2008, 12, 13]
संस्कृतार्थः अस्मिन् पद्ये कविः श्री चन्द्रभानु त्रिपाठी कामनां करोति यत् भारतवर्षे भारत महिमानं वर्धन्ति, पवित्र गङ्गा नदी प्रवहतु, योग-क्षेम-विधान कर्म-महत्त्वं प्रतिपादिका गीता भवतु, करुणायुक्ता पवित्रा अहिंसा वाणी सर्वत्र प्रसरतु, भारतस्य वीराणां कल्याणकारी पवित्रा गाथा सर्वत्र प्रसरेत्। (UPBoardSolutions.com) भारतदेशे सर्वे जना: सुखिना: भवन्तु, कोऽपि दीनभावं न प्राप्नुयात्। एतादृशाः अस्माकं भारतवर्ष: स्वाधीन: सन् चिरञ्जीवी भूयात्।

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Class 10 Sanskrit Chapter 5 UP Board Solutions भोजस्य शल्यचिकित्सा Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 5 Bhojasya Shalya Chikitsa Question Answer (कथा – नाटक कौमुदी)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 5 हिंदी अनुवाद भोजस्य शल्यचिकित्सा के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

प्रस्तुत पाठ बल्लालसेन द्वारा रचित ‘भोज-प्रबन्ध’ नामक कृति से संगृहीत है। इस ग्रन्थ को ऐतिहासिक दृष्टि से कोई खास महत्त्व नहीं है, किन्तु साहित्यिक दृष्टि से इसे ग्रन्थ की महत्ता स्वीकार की गयी है। इस ग्रन्थ में संस्कृत के सभी प्रसिद्ध कवियों को राजा भोज (UPBoardSolutions.com) की सभा में उपस्थित दिखाया गया है। इसीलिए इतिहासकारों ने इसे अप्रामाणिक माना है। प्रस्तुत कथा में राजा भोज से मस्तिष्क की शल्य-चिकित्सा का परिचय दिया जाना यह प्रमाणित करता है कि भारत में प्राचीन काल में भी मस्तिष्क जैसे जटिल अंग की सफल शल्य-क्रिया किया जाना सम्भव था।

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पाठ-सारांश

भोज के सिर में पीड़ा – किसी समय राजा भोज अपने नगर से बाहर गये। वहाँ उन्होंने जल से कपाल-शोधन क्रिया की। उस समय कोई अत्यधिक छोटी मछली का बच्चा राजा के कपाल में घुस गया। तब से राजा के सिर में पीड़ा रहने लगी। श्रेष्ठ वैद्यों की चिकित्सा से भी वह पीड़ा किंचित् ठीक नहीं हुई। इस प्रकार राजा भयंकर बीमारी से पीड़ित हो गये।

रोग का ठीक न होना – एक वर्ष बीतने पर भी राजा भोज का रोग ठीक नहीं हुआ। वे अनेक ओषधियों के सेवन से तंग आ गये थे। तब उन्होंने अपने मन्त्री बुद्धिसागर से कहा कि आज के बाद कोई भी वैद्य नगर में न रहे। उनकी सभी ओषधियों की शीशियों को नदी में डलवा दिया जाये। अब मेरा मृत्यु-समय निकट आ गया है। यह सुनकर सभी नगरवासी अत्यधिक दुःखी हुए।

नारद-कथन – इसके बाद कभी देवसभा में गये हुए नारदमुनि से इन्द्र ने पृथ्वीलोक का समाचार पूछा। नारद ने कहा कि महाराज भोज किसी रोग से बहुत पीड़ित हैं। उनका रोग किसी भी चिकित्सक की चिकित्सा से ठीक नहीं हुआ; अतः राजा ने सभी वैद्यों को देश से निकाल दिया है और वैद्यकशास्त्र भी झूठा है, ऐसा कहकर उसे भी निरस्त कर दिया है।

इन्द्र द्वारा अश्विनीकुमारों से प्रश्न – तब इन्द्र ने पास बैठे हुए अश्विनीकुमारों (देवताओं के वैद्य या चिकित्सक) से कहा कि यह धन्वन्तरिशास्त्र कैसे झूठा है ? तब अश्विनीकुमारों ने कहा कि देवेश! धन्वन्तरिशास्त्र झूठा नहीं है, किन्तु इस रोग की चिकित्सा तो देवता ही कर सकते हैं। (UPBoardSolutions.com) कपाल-शोधन के समय भोज के कपाल में एक अत्यधिक छोटी मछली का बच्चा घुस गया था, उसी के कारण यह रोग है।

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अश्विनीकुमारों द्वारा राजा भोज की शल्य-चिकित्सा – तब इन्द्र के आदेश से वे दोनों अश्विनीकुमार ब्राह्मण का वेश बनाकर धारानगरी में गये और वहाँ अपना परिचय काशी नगरी से आये वैद्यों के रूप में दिया। वैद्यों का नगर में प्रवेश निषिद्ध है, यह जानकर वे दोनों बुद्धिसागर के साथ राजा के पास गये। राजा ने मुख के तेज से उन्हें देवता रूप में पहचानकर उनका सम्मान किया। राजा से दोनों ने कहा–राजन्, डरो मत, रोग को गया हुआ समझो। राजा को एकान्त (UPBoardSolutions.com) में ले जाकर और बेहोश करके राजा के कपाल से मछली निकालकर, पात्र में रखकर, उनके कपाल को ज्यों-का-त्यों जोड़कर राजा को होश में लाकर उन्हें मछली दिखा दी और बताया कि कपाल-शोधन के समय यह मछली कपाल में चली गयी थी। राजा के पथ्य पूछने पर, उन्होंने गर्म जल से स्नान, दुग्धपान और श्रेष्ठ स्त्रियों को ही मानवों का पथ्य बताया।

अश्विनीकुमारों का प्रस्थान – राजा ने बीच में ‘मानवों का वाक्यांश सुनकर पूछा कि आप कौन हैं ? राजा ने उनको हाथों से पकड़ा, लेकिन वे कालिदास अपना श्लोक का चौथा चरण ‘स्निग्धमुष्णञ्च भोजनम्’ पूरा करें कहकर अन्तर्धान हो गये। राजा ने भी कालिदास को लीला-मानुष मानकर उनका अत्यधिक सम्मान किया।

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चरित्र-चित्रण

भोज [2007,08,09, 10, 12, 13, 14, 15)

परिचय महाराज भोज ऐतिहासिक महापुरुष के रूप में भारतीय विद्वत् समाज में प्रतिष्ठित हैं। ये वीर, साहसी एवं महादानी थे। एक बार कपालकशोधन (मस्तिष्क की वह क्रिया, जिसमें पानी के द्वारा मस्तिष्क को साफ किया जाता है) क्रिया करते समय एक अत्यधिक छोटी मछली का बच्चा इनके मस्तिष्क में प्रवेश कर गया, जिससे उनके मस्तिष्क में निरन्तर पीड़ा रहने लगी। मर्त्यलोक के वैद्यों के रोग-निदान में असफल रहने पर अश्विनीकुमार शल्य-चिकित्सा से पीड़ा का निवारण कर देते हैं। यहाँ भोज को देव-प्रिय राजा के रूप में भी चित्रित किया गया है। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. निराशावादी – इतिहास में राजा भोज को अधिकांश स्थानों पर धैर्यशाली एवं आशावादी के रूप में चित्रित किया गया है, किन्तु यहाँ पर उन्हें सामान्य मानव की भाँति निराशाबादी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। बैद्यों द्वारा अपने मस्तिष्क की पीड़ा का कोई निदाम न पाकर वह जीवन (UPBoardSolutions.com) से निराश हो जाते है उनके “मम देवसमागमसमयः समागतः इति” (मेरा देवताओं के पास जाने का समय हो गया है) वाक्य से उनका निराशावादी दृष्टिकोण स्पष्ट हो जाता है। इतना ही नहीं उनका वैद्यकशास्त्र से भी विश्वास उठ जाता है और वह अपने मन्त्री को समस्त वैद्यों को राज्य से निष्कासित करने तथा सम्पूर्ण ओषधियों को नदी में फिंकवाने का आदेश देते हैं।

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2. बुद्धिमान् एवं तत्त्वद्रष्टा – महाराज भोज यहाँ पर तत्त्वद्रष्टा के रूप में भी चित्रित किये गये हैं। अश्विनीकुमारों के मुख-मण्डल के तेज को देखकर ही वे समझ जाते हैं कि वैद्य के रूप में ये देव-पुरुष हैं। तथा देवता मानकर ही वे उनका सत्कार भी करते हैं। अपने बुद्धि-चातुर्य से वे अश्विनीकुमारों के एतदवो मानुषापथ्यमिति’ कथन से उनका देवलोकवासी होना जान लेते हैं और अन्तत: उनसे पूछ ही लेते हैं कि यदि हम मनुष्य हैं तो आप दोनों कौन हैं? यह तथ्य उनके बुद्धिमान् एवं तत्त्वद्रष्टा होने की पुष्टि करते हैं।

3. सर्वलोकप्रिय राजा – महाराजा भोज इस लोक में ही प्रसिद्ध नहीं हैं, वरन् देवलोक में भी उनकी प्रसिद्धि है। प्रजा तो उन्हें चाहती ही है, देवता भी पृथ्वी पर उनकी सकुशल उपस्थिति चाहते हैं। नारद से उनकी मस्तिष्क-पीड़ा की बात सुनकर इन्द्र स्वयं अश्विनीकुमारों को भूलोक में जाकर भोज की चिकित्सा करने का आदेश देते हैं।

4. कपाल-स्वच्छता के ज्ञाता – राजा भोज कपल-स्वच्छता की विधि से परिचित हैं। वे कपाल की आन्तरिक स्वच्छता का भी पूर्ण ज्ञान रखते हैं। कपाल की स्वच्छता करते समय ही एक अत्यधिक छोटी मछली का बच्चा कपाल में प्रवेश कर जाता है।

5. गुणग्राही – गुणवान् ही गुणवानों का सम्मान करता है। यह बात राजा भोज पर चरितार्थ होती है। मानवों के लिए पथ्य बताते समय अश्विनीकुमार श्लोक के तीन चरण ही कह पाते हैं कि राजा भोज ‘मानुषाः’ शब्द सुनकर उनका हाथ पकड़ लेते हैं और उनसे पूछते हैं कि आप दोनों कौन हैं ?’ तब चौथे चरण की पूर्ति कालिदास करेंगे, यह कहकर अश्विनीकुमार अन्तर्धान हो जाते हैं। तब कालिदास द्वारा स्निग्धमुष्णञ्च भोजनम्’ कहकर चरण-पूर्ति करने पर (UPBoardSolutions.com) और अश्विनीकुमारों द्वारा कालिदास की विद्वत्ता की ओर संकेतमात्र करने से वह कालिदास को लीला-पुरुष मानकर उनका भी अत्यधिक सम्मान करते हैं।

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निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि राजा भोज प्रजावत्सल, सर्वगुणसम्पन्न, बुद्धिमान् और सर्वलोकप्रिय राजा हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजः कः आसीत् ? [2006, 07, 10, 12, 15]
या
भोजः कस्याः नगर्याः राजा आसीत्? [2011, 13]
उत्तर :
भोज: धारानगर्याः राजा आसीत्।

प्रश्न 2.
द्वारस्थौः भिषजौ किमाहुः ?
उत्तर :
द्वारस्थौ भिषजौ आहु–भो विप्रौ ? न कोऽपि भिषग्प्रवरः प्रवेष्टव्यः इति राज्ञोक्तम्।

प्रश्न 3.
सः कुत्र अगच्छत् ?
उत्तर :
स: नगरात् बहिरगच्छत्।

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प्रश्न 4.
मानुषा पथ्यं किम् अस्ति ?
या
मानुषाणां पथ्यं किमस्ति ? [2015]
उत्तर :
उष्णजलेन स्नानं, पयः पानं, वरास्त्रियः, स्निग्धम् उष्णं च भोजनम् एतद् मानुषां पथ्यम्।

प्रश्न 5.
भोजस्य चिकित्सा काभ्यां कृता कुतः चतौ समागतौ ? [2010]
उत्तर :
भोजस्य चिकित्सा अश्विनीकुमाराभ्यां कृता, (UPBoardSolutions.com) तौ च स्वर्गात् समागतौ।

प्रश्न 6.
श्लोकस्य तुरीयं चरणं केन पूरितम् ?
उत्तर :
श्लोकस्य तुरीयं चरणं कालिदासेन पूरितम्।

प्रश्न 7.
राज्ञः कपाले वेदना किमर्थम् जाता ? [2008]
उत्तर :
कपालशोधनकाले राज्ञः कपाले एकः शफरशाव: प्रविष्टः। अत: कपाले वेदना अभवत्।

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प्रश्न 8.
पुरन्दरः नारदं किमाह ?
उत्तर :
पुरन्दर: नारदम् आह—भो मुने! इदानीं भूलोके का नाम वार्ता ? इति।

प्रश्न 9.
कालिदासः चतुर्थ चरणं केन रूपेण पूरितवान् ? [2006]
उत्तर :
कालिदास चतुर्थ चरणं “स्निग्धम् उष्णं च भोजनम्” इति रूपेण पूरितवान्।

प्रश्न 10.
भोजः कालिदासं कं मत्वा परं सम्मानितवान् ? [2013]
उत्तर :
भोजः कालिदासं लीलामानुषं मत्वा (UPBoardSolutions.com) परं सम्मानितवान्।

प्रश्न 11.
भोजस्य कस्मिन् स्थाने वेदना जाता? [2009, 15]
उत्तर :
भोजस्य कपाले वेदना जाता।

प्रश्न 12.
भोजस्य मन्त्री कः आसीत्? [2012, 13, 14]
उत्तर :
भोजस्य मन्त्री बुद्धिसागरः आसीत्।

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प्रश्न 13. 
राजा बुद्धिसागरं किम् अकथयत्? [2014]
उत्तर :
राजा बुद्धिसागरं अकथयत् “मम देवसमागम समय: समागतः।”

बहुविकल्पीय प्रश्न

अधोलिखित प्रश्नों में प्रत्येक प्रश्न के उत्तर-रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। (UPBoardSolutions.com) इनमें से एक विकल्प शुद्ध है। शुद्ध विकल्प का चयन कर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए
[संकेत – काले अक्षरों में छपे शब्द शुद्ध विकल्प हैं।]

1. ‘भोजस्य शल्यचिकित्सा’ शीर्षक पाठ किस संस्कृत ग्रन्थ से उधृत है?

(क) ‘महाभारत’ से
(ख) ‘हितोपदेश’ से
(ग) ‘पञ्चतन्त्रम्’ से
(घ) ‘भोज-प्रबन्ध’ से

2. राजा भोज ने अपने कपाल का शोधन किस जल से किया था ?

(क) कुएँ के जल से
(ख) तालाब के जल से
(ग) घड़े के जल से
(घ) नदी के जल से

3. राजा भोज के सिर की पीड़ा का मुख्य कारण क्या था ?

(क) अयोग्य वैद्य
(ख) कपाले में प्रविष्ट शफरशाव
(ग) कार्य का दबाव
(घ) गलत ओषधि का प्रयोग

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4. पुरन्दर की सभा में भोज की पीड़ा के विषय में किस मुनि ने बताया ?

(क) वीणामुनि ने
(ख) भरद्वाज मुनि ने
(ग) विश्वामित्र ने
(घ) अगस्त्य मुनि ने

5. “भोजस्य शल्यचिकित्सा” पाठ में ‘वीणामुनि’ के द्वारा किस मुनि का संकेत किया गया है?

(क) वाल्मीकि का
(ख) नारद को
(ग) व्यास का
(घ) वशिष्ठ का

6. पुरन्दर (इन्द्र) ने अश्विनीकुमारों को राजा भोज की चिकित्सा के लिए भेजा था, क्योंकि –

(क) राजा भोज इन्द्र के मित्र थे
(ख) भोज ने उन्हें बुलाया था
(ग) भोज से प्रभूत धन मिलने की आशा थी
(घ) भिषक् शास्त्र की असिद्धि हो रही थी

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7. अश्विनीकुमारों ने भोज की शिरो-वेदना की चिकित्सा कहाँ की ?

(क) राजदरबार में
(ख) राजमहल में
(ग) एकान्त स्थल पर
(घ) देवता के मन्दिर में

8. …………………….. वरास्त्रियः एतद्वो मानुषापथ्यमिति” को सुनकर भोज ने अश्विनीकुमारों –

(क) को मरवा दिया
(ख) के हाथों को अपने हाथों में पकड़ लिया
(ग) को भगा दिया।
(घ) को बन्दी बना लिया।

9. अश्विनीकुमारों के कथनानुसार कालिदास श्लोक का कौन-सा चरण पूरा करेंगे ?

(क) चतुर्थ
(ख) तृतीय
(ग) द्वितीय
(घ) प्रथम

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10. …………………….. “वासी श्री भोजभूपालरोगपीडितो नितरामस्वस्थो वर्तते।”वाक्य में रिक्त-स्थान में आएगा –

(क) मिथिलानगर
(ख) चित्रपूरनगर
(ग) उज्जयिनी
(घ) धारानगर

11. ‘भो स्वर्वैद्यौ! कथमनृतं धन्वन्तरीयं शास्त्रम् ?” वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति ?

(क) राजा भोज:
(ख) पुरन्दरः
(ग) नारदः
(घ) कालिदासः

12. …………………….. अम्भसा स्नानं, पयःपानं, वरास्त्रियः एतद्वो मानुषापथ्यमिति।” वाक्य में रिक्त-स्थान की पूर्ति के लिए उपयुक्त पद है –

(क) शीतेन
(ख) तटाका
(ग) कूपेन
(घ) अशीतेन

13. स्निग्धमुष्णञ्च भोजनम् इति।” वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?

(क) अश्विनीकुमारः
(ख) कालिदासः
(ग) राजा भोजः
(घ) पुरन्दरः

14. “ततो भोजोऽपि …………………….. लीलामानुषं मत्वा परं सम्मानितवान्।” वाक्य में रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी –

(क) अश्विनीकुमारौ’ से
(ख) कालिदासम्’ से
(ग) “वीणामुनिम्’ से
(घ) “बुद्धिसागरम्’ से

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15. हर्षचरितस्य रचयिता …………………….. अस्ति।

(क) भट्टनारायणः
(ख) बाणभट्टः
(ग) आर्यशूरः
(घ) बल्लालसेनः

16. ‘भोजप्रबन्धस्य’ प्रणेता (रचयिता) …………………….. आसीत्। [2008,09, 12, 13, 14]

(क) बल्लालसेनः
(ख) चरकः
(ग) भोजः
(घ) कालिदासः

17. भोजः …………………….. नृपः आसीत्।

(क) धारानगर्याः
(ख) मथुरानगर्याः
(ग) काशीनगर्याः
(घ) अलकानगर्याः

18. मोजस्य चिकित्सकः …………………….. आसीत्। [2007,08]

(क) चरकः
(ख) अश्विनीकुमारः
(ग) धन्वन्तरिः
(घ) हरिहरः

19. भोजस्य …………………….. वेदना जाता। [2007,08,09]

(क) उदरे
(ख) कपाले
(ग) वक्षस्थले
(घ) पृष्ठभागे

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20. अथ कदाचित् …………………….. नगराद बहिः निर्गतः। [2009]

(क) भोजो
(ख) श्रीहर्षों
(ग) जनको
(घ) शिववीरः

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Class 10 Sanskrit Chapter 8 UP Board Solutions आदिशङ्कराचार्यः Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 8 Adi Shankaracharya Question Answer (गद्य – भारती)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 8 हिंदी अनुवाद आदिशङ्कराचार्यः के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

आदि शंकराचार्य ‘जगद्गुरु’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। ये अद्भुत प्रतिभा के धनी थे। इन्होंने आठ वर्ष की अल्पायु में ही वेद-शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। मात्र 32 वर्ष की पूर्ण आयु में इन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की, पूरे भारत का भ्रमण किया, विद्वानों से शास्त्रार्थ किये और भारत के चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना की। जिस समय इनका जन्म हुआ उस समय भारत-भूमि बौद्ध धर्म के विकृत हो चुके स्वरूप से पीड़ित थी। इन्होंने बौद्धों को शास्त्रार्थ में पराजित (UPBoardSolutions.com) किया और पुन: वैदिक धर्म की स्थापना की। इन्होंने छठे दर्शन; वेदान्त दर्शन; को अद्वैत दर्शन का रूप प्रदान किया और अपने मत की पुष्टि के लिए उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता से प्रमाण प्रस्तुत किये। इन्हें ‘मायावाद’ का जनक माना जाता है। प्रस्तुत पाठ में शंकराचार्य के जन्म और उनके द्वारा किये गये कार्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है।

पाठ-सारांश [2006, 07, 08, 09, 10, 11, 12, 13, 14, 15]

परमात्मा के अवतार मान्यता है कि धर्म की हानि होने पर साधुजनों की रक्षा करने और पापियों का विनाश करने के लिए भगवान् भारतभूमि पर किसी-न-किसी महापुरुष के रूप में अवश्य अवतार लेते हैं। जिस प्रकार त्रेता युग में राक्षसों का संहार करने के लिए राम के रूप में, द्वापर युग में कुनृपतियों के विनाश के लिए। कृष्ण के रूप में जन्म धारण किया था, उसी प्रकार कलियुग में भगवान् शिव ने देश में व्याप्त मोह-मालिन्यं को दूर करने और वैदिक धर्म की स्थापना के लिए शंकर के रूप में जन्म लिया।

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जन्म एवं वैराग्य शंकर का जन्म मालाबार प्रान्त में पूर्णा नदी के तट पर शलक ग्राम में सन् 788 ई० में हुआ था। इनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम सुभद्रा था। इन्होंने 8 वर्ष की आयु में ही समस्त वेद-वेदांगों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। बचपन में ही इनके पिता की मृत्यु हो गयी थी। पूर्वजन्म के संस्कार के कारण संसार को माया से पूर्ण जानकर इनके मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। इनका मन तत्त्व की खोज के लिए लालायित हो गया और इन्होंने संन्यास लेने की इच्छा की। माता के मना करने पर इन्होंने संन्यास नहीं लिया।

संन्यास-ग्रहण एक बार शंकर पूर्णा नदी में स्नान कर रहे थे कि एक शक्तिशाली ग्राह ने इनका पैर पकड़ लिया और तब तक इनके पैर को नहीं छोड़ा, जब तक माता ने इन्हें संन्यास लेने की आज्ञा न दे दी। माता की आज्ञा और ग्राह से मुक्ति पाकर ये योग्य गुरु की खोज में वन-वन भटकते रहे। वन में घूमते हुए एक दिन एक गुफा में बैठे हुए गौड़पाद के शिष्य गोविन्दपाद के पास गये। शंकर की अलौकिक प्रतिभा से प्रभावित होकर गोविन्दपाद ने इन्हें संन्यास की दीक्षा दी और विधिवत् वेदान्त के तत्त्वों का अध्ययन कराया।

भाष्य-रचना वैदिक धर्म के पुनरुद्धार के लिए शंकर गाँव-गाँव और नगर-नगर घूमते हुए अन्ततः काशी पहुंचे। (UPBoardSolutions.com) यहाँ उन्होंने व्याससूत्रों, उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता के भाष्यों की रचना की।

शास्त्रार्थ में विजय एक दिन शंकर के मन में महान् विद्वान् मण्डन मिश्र से मिलने की इच्छा हुई। मण्डन मिश्र के घर जाकर शंकर ने उनसे शास्त्रार्थ करके उन्हें पराजित किया। बाद में मण्डन मिश्र की पत्नी शारदा के कामशास्त्र के प्रश्नों का उत्तर देकर उसे भी पराजित कर दिया। अन्त में मण्डन मिश्र ने आचार्य शंकर का शिष्यत्व स्वीकार कर लिया।

वैदिक धर्म का प्रचार प्रयाग में शंकर ने वैदिक धर्म के उद्धार के लिए प्रयत्नशील कुमारिल भट्ट के दर्शन किये। कुमारिल भट्ट ने वैदिक धर्म के कर्मकाण्ड को लेकर सम्प्रदायवादियों को परास्त कर दिया था, लेकिन शंकर ने कर्मकाण्ड की मोक्ष में व्यर्थता प्रतिपादित कर कुमारिल के मत का खण्डन करके ज्ञान की महिमा का प्रतिपादन किया। इन्होंने ज्ञान को ही मोक्ष प्रदायक बताते हुए ज्ञानकाण्ड को ही वेद का सार बताया। इस प्रकार शंकर ने सेतुबन्ध से लेकर कश्मीर तक भ्रमण किया और अपनी अलौकिक प्रतिभा द्वारा विरोधियों को परास्त किया। अन्त में 32 वर्ष की अल्पायु में ही इन्होंने अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया।

शंकर के सिद्धान्त शंकर ने महर्षि व्यास प्रणीत ब्रह्मसूत्र पर भाष्य की रचना की और व्यास के मत के आधार पर ही वैदिक धर्म को पुनरुज्जीवित किया। इन्होंने वेद और उपनिषदों के तत्त्व का ही निरूपण किया। इनके मत के अनुसार संसार में सुख-दु:ख भोगता हुआ जीव ब्रह्म ही है। मायाजन्य अज्ञान के कारण व्यापक ब्रह्म सुख-दुःख का अनुभव करता है। इन्होंने जीव और ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन किया और बताया कि अनेक रूपात्मक सृष्टि का आधार ब्रह्म ही है।

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विश्व-बन्धुत्व की भावना शंकर का अद्वैत ब्रह्म विश्व-बन्धुत्व की भावना का मूल है। इस भावना के विकास से राष्ट्रीयता का उदय होता है और जाति, क्षेत्र आदि की संकीर्णता समूल नष्ट हो जाती है। शंकर ने राष्ट्रीय भावना को पुष्ट करने के लिए भारत के चारों कोनों में चार वेदान्त पीठों ( शृंगेरी पीठ, गोवर्धन पीठ, ज्योतिष्पीठ और शारदापीठ) की स्थापना की। ये चारों पीठ इस समय राष्ट्र की उन्नति, लोक-कल्याण और वैदिक मत के प्रचार में प्रयत्नशील हैं। शंकर यद्यपि अल्पायु थे, लेकिन उनके कार्य-उत्कृष्ट भाष्यग्रन्थ, अनेक मौलिक ग्रन्थ और उनका अद्वैत सिद्धान्त–हमेशा उनकी याद दिलाते रहेंगे।

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1)
धन्येयं भारतभूमिर्यत्र साधुजनानां परित्राणाय दुष्कृताञ्च विनाशाय सृष्टिस्थितिलयकर्ता परमात्मा स्वमेव कदाचित्, रामः कदाचित् कृष्णश्च भूत्वा आविर्बभूव। त्रेतायुगे रामो धनुर्वृत्वा विपथगामिनां रक्षसां संहारं कृत्वा वर्णाश्रमव्यवस्थामरक्षत्। द्वापरे कृष्णो धर्मध्वंसिनः कुनृपतीन् उत्पाट्य (UPBoardSolutions.com) धर्ममत्रायत। सैषा स्थिति यदा कलौ समुत्पन्ना बभूव तदा नीललोहितः भगवान् शिवः शङ्कररूपेण पुनः प्रकटीबभूव। भगवतः शङ्करस्य जन्मकाले वैदिकधर्मस्य ह्रासः अवैदिकस्य प्राबल्यञ्चासीत्। अशोकादि नृपतीनां राजबलमाश्रित्य पण्डितम्मन्याः सम्प्रदायिकाः वेदमूलं धर्मं तिरश्चक्रुः। लोकजीवनमन्धतमिस्रायां तस्यां । मुहर्मुहुर्मुह्यमानं क्षणमपि शर्म न लेभे। तस्यां विषमस्थित भगवान् शङ्करः प्रचण्डभास्कर इव उदियाय, देशव्यापिमोहमालिन्यमुज्झित्वा वैदिकधर्मस्य पुनः प्रतिष्ठां चकार।

धन्येयं भारतभूमि ………………………………………… प्राबल्यञ्चासीत्। [2010]
भगवतः शङ्करस्य ………………………………………… प्रतिष्ठां चकार। [2010]

शब्दार्थ परित्राणाय = रक्षा करने के लिए। दुष्कृताम् = पापियों के कदाचित् = कभी। भूत्वा = होकर आविर्बभूव = प्रकट हुए। विपथगामिनां रक्षसाम् = कुमार्ग पर चलने वाले राक्षसों का। कुनृपतीन् = दुष्ट राजाओं को। उत्पाद्य = उखाड़कर। अत्रायत = रक्षा की। कलौ = कलियुग में। शङ्कररूपेण’= शंकराचार्य के रूप में। अवैदिकस्य = अवैदिक धर्म का। प्राबल्यञ्चासीत् = प्रबलता थी। पण्डितम्मन्याः = पण्डित माने जाने वाले। तिरश्चक्रुः = तिरस्कार करते थे। अन्धतमिस्रायाम् = अँधेरी रात्रि में अर्थात् अन्धविश्वासों के अन्धकार में। मुहुर्मुहुर्मुह्यमानम् (मुहुः + मुहुः + मुह्यमानम्) = बार-बार मुग्ध होता हुआ। शर्म = कल्याण, सुख, शान्ति। लेभे = पा रहा था। प्रचण्डभास्करः = प्रचण्ड सूर्य। उदियाय = उदित हुए। उज्झित्वा = छोड़कर, नष्ट करके।

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सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती’ में संकलित ‘आदिशङ्कराचार्यः’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[संकेत इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसग प्रस्तुत गद्यांश में परमात्मा के राम, कृष्ण, शंकराचार्य आदि के रूप में अवतार लेने और उस समय की भारत की परिस्थिति का वर्णन किया गया है।

अनुवाद यह भारतभूमि धन्य है, जहाँ साधु पुरुषों की रक्षा के लिए और पापियों के विनाश के लिए सृष्टि, स्थिति और प्रलय के करने वाले भगवान् स्वयं ही कभी राम और कभी कृष्ण होकर प्रकट हुए। त्रेतायुग में राम ने धनुष धारण करके कुमार्ग पर चलने वाले राक्षसों को मारकर वर्ण और आश्रम व्यवस्था की रक्षा की। द्वापर में कृष्ण ने धर्म को नष्ट करने वाले दुष्ट राजाओं को उखाड़कर धर्म की रक्षा की। वही स्थिति जब कलियुग में उत्पन्न हुई, तब नील-रक्तवर्ण भगवान् शिव शंकर रूप में फिर से प्रकट हुए। भगवान् शंकर के जन्म के समय वैदिक धर्म की हानि और वेद को न मानने वाले धर्म अर्थात् अवैदिकों की प्रबलता थी। अशोक आदि राजाओं की राजशक्ति का सहारा लेकर स्वयं को पण्डित मानने वाले सम्प्रदाय के लोगों ने वेदमूलक धर्म का तिरस्कार किया। लोक-जीवन (संसार) अन्धविश्वास के अन्धकार पर बार-बार मुग्ध होता हुआ क्षणभर भी सुख को प्राप्त नहीं कर रहा था। उस विषम परिस्थिति में भगवान् शंकर तेजस्वी सूर्य के समान उदित हुए और देश में फैली मोह की मलिनता को नष्ट करके वैदिक धर्म की पुनः स्थापना (प्रतिष्ठा) की।

(2)
शङ्करः केरलप्रदेशे मालावारप्रान्ते पूर्णाख्यायाः नद्यास्तटे स्थिते शलकग्रामे अष्टाशीत्यधिके सप्तशततमे खीष्टाब्दे नम्बूद्रकुले जन्म लेभे। तस्य पितुर्नाम शिवगुरुरासीत् मातुश्च सुभद्रा। शैशवादेव शङ्करः अलौकिकप्रतिभासम्पन्न आसीत्। अष्टवर्षदेशीयः सन्नपि परममेधावी असौ वेदवेदाङ्गेषु (UPBoardSolutions.com) प्रावीण्यमवाप। दुर्दैवात् बाल्यकाले एव तस्य पिता श्रीमान् शिवगुरुः पञ्चत्वमवाप। पितृवात्सल्यविरहितः मात्रैव लालितश्चासौ प्राक्तनसंस्कारवशात् जगतः मायामयत्वमाकलय्य तत्त्वसन्धाने मनश्चकार।। प्ररूढवैराग्यप्रभावात् स प्रव्रजितुमियेष, परञ्च परमस्नेहनिर्भरा तदेकतनयाम्बा नानुज्ञां ददौ। लोकरीतिपरः शङ्करः मातुरनुज्ञां विना प्रव्रज्यामङ्गीकर्तुं न शशाक।।

शङ्करः केरलप्रदेशे ………………………………………… पञ्चत्वमवाप। [2009]

शब्दार्थ पूर्णाख्यायाः = पूर्णा नाम की। अष्टाशीत्यधिके सप्तशततमे = सात सौ अठासी में। नम्बूद्रकुले = नम्बूदरी कुल में। अष्टवर्षदेशीयः = आठ वर्ष के। वेदवेदाङ्गेषु = वेद और वेद के अंगों (शास्त्रों) में। प्रावीण्यमवाप (प्राणीण्यम् + अवाप) = प्रवीणता प्राप्त कर ली। दुर्दैवात् = दुर्भाग्यवश। पञ्चत्वमवाप = मृत्यु को प्राप्त हुए, स्वर्गवासी हो गये। मात्रैव (माता + एव) = माता के द्वारा ही। प्राक्तनसंस्कारवशात् = पुराने संस्कारों के कारण। मायामयत्वमाकलय्य = माया से पूर्ण होना समझकर। तत्त्वसन्धाने = तत्त्वों की खोज में। मनः चकार = विचार बना लिया। प्ररूढवैराग्यप्रभावात् = उत्पन्न हुए वैराग्य के प्रभाव से प्रव्रजितुमियेषु (प्रव्रजितुम् +इयेषु) = संन्यास लेने की इच्छा की। तदेकतनयाम्बा (तद् + एकतनय + अम्बा) = उस एकमात्र पुत्रवती माता ने। नानुज्ञां = आज्ञा नहीं। प्रव्रज्यामङ्गीकर्तुम् (प्रव्रज्याम् + अङ्गीकर्तुम्) = संन्यास लेने के लिए। न शशाक = समर्थ नहीं हो सके।

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प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में शंकर के जन्म एवं उनके मन में वैराग्य उत्पन्न होने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद शंकर ने केरल प्रदेश में मालाबार प्रान्त में पूर्णा नाम की नदी के किनारे स्थित शलक ग्राम में सन् 788 ईस्वी में नम्बूदरी कुल में जन्म लिया। उनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम सुभद्रा था। बचपन से ही शंकर असाधारण प्रतिभा से सम्पन्न थे। आठ वर्ष की आयु के होते हुए भी ये अत्यन्त मेधावी थे और इन्होंने वेद और वेदांगों में प्रवीणता प्राप्त कर ली थी। दुर्भाग्य से बेचपन में ही उनके पिता श्रीमान् शिवगुरु मृत्यु को प्राप्त हुए। पिता के प्रेम से वियुक्त माता के (UPBoardSolutions.com) ही द्वारा पालन किये गये उन्होंने पूर्व जन्म के संस्कार के कारण संसार को माया से पूर्ण जान करके तत्त्व की खोज में (अपमा) मन लगाया। वैराग्य के उत्पन्न होने के कारण उन्होंने संन्यास लेने की इच्छा की, परन्तु अत्यन्त स्नेह से पूर्ण एकमात्र पुत्र वाली माता ने आज्ञा नहीं दी। लोक की रीति पर चलने वाले शंकर माता की आज्ञा के बिना संन्यास स्वीकार करने में समर्थ नहीं हो सके।

(3)
एवं गच्छत्सु दिवसेषु एकदा शङ्करः पूर्णायां सरिति स्नातं गतः। यावत् स सरितोऽन्तः प्रविष्टः तावदेव बलिना ग्राहेण गृहीतः। शङ्करः आसन्नं मृत्युमवेक्ष्य आर्तस्वरेण चुक्रोश। तस्य वत्सला जननी स्वपुत्रस्य स्वरं परिचीय भृशं विललाप। तस्याः तादृशीं विपन्नामवस्थामनुभूय स तस्यै न्यवेदयत्-अम्ब! यदि (UPBoardSolutions.com) ते मम जीवितेऽनुरागः स्यात् तर्हि संन्यासाय मामनुजानीह तेनैव मे ग्राहान्मुक्तिर्भविष्यति। अनन्यगतिः माता तथेत्युवाच। सद्यस्तद्ग्राहग्रहात् मुक्तः स संन्यासमालम्ब्य पुत्रविरहसन्तप्तां मातरं सान्त्वयित्वा तया बान्धवैश्चानुज्ञातः यतिवेषधरः स्वजन्मभूमिं त्यक्त्वा देशानटितुं प्रवृत्तः। [2007, 10]

एवं गच्छत्सु ………………………………………… आर्तस्वरेण चुक्रोश।
एवं गच्छत्सु ………………………………………… ग्राहान्मुक्तिर्भविष्यति। [2006]

शब्दर्थ सरिति = नदी में स्नातुम् = स्नान के लिए। बलिना = शक्तिशाली। आसन्नं = समीप में आये। मृत्युमवेक्ष्य = मृत्यु को देखकर चुक्रोश = चिल्लाया। परिचीय = पहचानकर। विललाप = रोने लगी। विपन्नामवस्थामनुभूय = दुःखपूर्ण दशा का अनुभव करके। अनुजानीहि = आज्ञा दो। अनन्यगतिः = अन्य उपाय न देखकर। सद्यः = तुरन्त, उसी समय। ग्राहग्रहात् = मगर की पकड़ से। सान्त्वयित्वा = सान्त्वना देकर अटितुं प्रवृत्तः = घूमने लगा।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में शंकर को ग्राह द्वारा पकड़े जाने एवं माता द्वारा संन्यास लेने की आज्ञा देने पर उससे मुक्ति का वर्णन किया गया है।

अनुवाद इस प्रकार कुछ दिनों के बीतने पर एक बार शंकर पूर्णा नदी में स्नान करने के लिए गये। ज्यों ही वे नदी के अन्दर प्रविष्ट हुए, त्यों ही शक्तिशाली ग्राह (घड़ियाल) के द्वारा पकड़ लिये गये। मृत्यु को निकट देखकर शंकर दु:ख-भरी आवाज में चिल्लाये। उनकी प्यारी माता अपने पुत्र की आवाज पहचानकर अत्यधिक रोने लगीं। उनकी उस तरह की दु:खी अवस्था का अनुभव करके उन्होंने उससे (माता से) निवेदन किया-हे माता! यदि तुम्हारा मेरे जीवन पर प्रेम है, तो मुझे संन्यास के लिए अनुमति दो। उससे ही मेरी ग्राह से मुक्ति होगी। अन्य उपायरहित माता ने ‘अच्छा’ ऐसा कहा। उसी समय उस ग्राह की पकड़ से मुक्त हुए उन्होंने संन्यास लेकर पुत्र के विरह से दु:खी माता को धैर्य देकर, उस (माता) के और अन्य बन्धुओं के द्वारा आज्ञा दिये जाने पर साधु का वेश धारण करके अपनी जन्मभूमि को छोड़कर अन्य देशों में भ्रमण के लिए निकल पड़े।

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(4)
वनवीथिकासु परिभ्रमन् स क्वचित् गृहान्तर्वर्तिनं गौडपादशिष्यं गोविन्दापादान्तिकं जगाम। यतिवेषधारिणं तं गोविन्दपादः पप्रच्छ—कोऽसि त्वं भोः? शङ्करः प्राह

मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानि नाहं श्रोत्रं न जिह्वा न च प्राणनेत्रम्
न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥

एतामलौकिकीं वाचमुपश्रुत्य गोविन्दपादः तमसाधारणं जनं मत्वा तस्मै संन्यासदीक्षां ददौ। गुरोः गोविन्दपादादेव वेदान्ततत्त्वं विधिवदधीत्य स तत्त्वज्ञो बभूव। सृष्टिरहस्यमधिगम्य गुरोराज्ञया स वैदिकधर्मोद्धरणार्थं दिग्विजयाय प्रस्थितः। ग्रामाद ग्रामं नगरान्नगरमटन् विद्वद्भिश्च सह शास्त्रचर्चा कुर्वन् स काशीं प्राप्तः। (UPBoardSolutions.com) काशीवासकाले स व्याससूत्राणामुपनिषदां श्रीमद्भगवद्गीतायाश्च भाष्याणि प्रणीतवान्।

एताम् अलौकिकीं ………………………………………… भाष्याणि प्रणीतवान् [2008, 14]

शब्दार्थ वनवीथिकासु = वन के मार्गों में परिभ्रमन् = घूमते हुए। गुहान्तर्वर्तिनम् (गुहा + अन्तर्वर्तिनम्) = गुफा के अन्दर रहने वाले। अन्तिकं = पास, समीप। जगाम = पहुँच गये। यतिवेषधारिणः = संन्यासी का वेश धारण करने वाले पप्रच्छ = पूछा। वाचम् = वाणी को। उपश्रुत्य = सुनकर। संन्यासदीक्षां = संन्यास धर्म की दीक्षा। अधीत्य = पढ़कर। तत्त्वज्ञः = तत्त्ववेत्ता। अधिगम्य = जानकर। दिग्विजयाय = दिग्विजय के लिए। प्रस्थितः = प्रस्थान किया। प्रणीतवान् = रचना की।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में शंकर द्वारा घर त्यागने, गोविन्दपाद के पास जाकर दीक्षा लेने, वेदान्त के तत्त्वों का अच्छी तरह से अध्ययन करने और अनेक भाष्यों की रचना करने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद वन के मार्गों में भ्रमण करते हुए वे कहीं पर गुफा के अन्दर रहने वाले, गौड़पाद के शिष्य गोविन्दपाद के पास गये। संन्यासी के वेश को धारण करने वाले उनसे गोविन्दपाद ने पूछा–तुम कौन हो? शंकर बोलेमैं न मन हूँ, न बुद्धि हूँ, न अहंकार हूँ, न चित्त हूँ, न मैं कान हूँ, ने जीभ हूँ, न प्राण हूँ, न नेत्र हूँ, न आकाश हूँ, न भूमि हूँ, न तेज हूँ, न वायु हूँ। मैं चिद् व आनन्दस्वरूप शिव हूँ, शंकर हूँ। इस अलौकिक वाणी को सुनकर गोविन्दपाद ने उन्हें असाधारण मनुष्य समझकर संन्यास की दीक्षा दे दी। गुरु गोविन्दपाद से ही वेदान्त के तत्त्व का विधिपूर्वक अध्ययन करके वे तत्त्वज्ञाता हो गये। सृष्टि के रहस्य को जानकर गुरु की आज्ञा से उन्होंने वैदिक धर्म के उद्धार हेतु दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया। गाँव से गाँव में, नगर से नगर में घूमते हुए, विद्वानों के साथ शास्त्रे-चर्चा करते हुए वे काशी पहुँचे। काशी में निवास के समय उन्होंने व्यास सूत्रों, उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता के भाष्यों की रचना की।

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(5)
अथ कदाचित् काश्यां प्रथितयशसः विद्वद्धौरेयस्य मण्डनमिश्रस्य दर्शनलाभाय स मनश्चकार। तद्गृहमन्वेष्टुकामः काञ्चिद् धीवरीमपृच्छत् क्वास्ति मण्डनमिश्रस्य धामेति। सा धीवरी प्रत्यवदत्

स्वत: प्रमाणं परतः प्रमाणं

कीराङ्गना यत्र गिरो गिरन्ति ।

द्वारस्य नीडान्तरसन्निबद्धाः

अवेहि तद्धाम हि मण्डनस्य ॥

इति धीवरीवचनं श्रुत्वा शङ्करः मण्डनमिश्रस्य भवनं गतः। तयोर्मध्ये तत्र शास्त्रार्थोऽभवत्।

स्व तः प्रमाणं ………………………………………… शास्त्रार्थोऽभवत्। [2012]

शब्दार्थ प्रथितयशसः = प्रसिद्ध यश वाले विद्वद्धौरेयस्य = विद्वानों में श्रेष्ठ, अन्वेष्टुकामः = ढूंढने की इच्छा करता हुआ। धाम = घर। कीराङ्गना = मादा तोता। गिरः गिरन्ति = वाणी बोलते हैं। नीडान्तरसन्निबद्धा = घोंसले के अन्दर बैठे हुए। अवेहि = जानो।।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में शंकर का काशी में मण्डन मिश्र के साथ शास्त्रार्थ करने का वर्णन है।

अनुवाद इसके बाद उन्होंने (शंकर ने) कभी काशी में प्रसिद्ध यश वाले, विद्वानों में श्रेष्ठ मण्डन मिश्र के दर्शन-लाभ प्राप्त करने की इच्छा की। उनका घर ढूँढ़ने की इच्छा वाले उन्होंने किसी धीवरी (केवट या मल्लाह की स्त्री) से पूछा-“मण्डन मिश्र का घर कहाँ है?” उस धीवरी ने उत्तर दिया-“जहाँ (UPBoardSolutions.com) द्वार पर स्थित घोसलों के भीतर पड़े हुए तोता और मैना स्वत: प्रमाण और परत: प्रमाण (शास्त्रीय प्रमाण के रूप में) की वाणी बोलते हैं, वही मण्डन मिश्र को घर समझिए।’ इस प्रकार धीवरी के वचन को सुनकर शंकर मण्डन मिश्र के घर गये। वहाँ उन दोनों के मध्य में शास्त्रार्थ हुआ।

(6)
निर्णायकपदे मण्डनमिश्रस्य सुमेधासम्पन्ना भार्या शारदा प्रतिष्ठापितासीत्। शास्त्रार्थे स्वस्वामिनः पराजयमसहमाना सा स्वयं तेन सह शास्त्रार्थं कर्तुं समुद्यताभवत्। सा शङ्करं कामशास्त्रीयान् प्रश्नान् पप्रच्छ| तान् दुरुत्तरान् प्रश्नान् श्रुत्वा स तूष्णीं बभूव। कियत्कालानन्तरं स परकायप्रवेशविद्यया कामशास्त्रज्ञो बभूवे पुनश्च मण्डनपत्नी शास्त्रार्थे पराजितवान्। जनश्रुतिरस्ति यत् स एव मण्डनमिश्रः आचार्यशङ्करस्य शिष्यत्वं स्वीचकार, सुरेश्वर इति नाम्ना प्रसिद्धिं च लेभे। [2012]

शब्दार्थ सुमेधासम्पन्ना = बुद्धिसम्पन्न प्रतिष्ठापितासीत् = स्थापित की गयी। असहमाना = सहन न करती हुई। कामशास्त्रीयान् = कामशास्त्र सम्बन्धी दुरुत्तरान् = कठिन उत्तर वाले। तूष्णीम् = मौन, चुप। कियत्कालानन्तरम् = कुछ समय के बाद। परकायप्रवेशविद्यया = दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की विद्या से। पराजितवान् = पराजित किया। जनश्रुतिः अस्ति = जनश्रुति है, लोगों द्वारा कहा जाता है।

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प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में शंकर द्वारा मण्डन मिश्र और उनकी पत्नी को शास्त्रार्थ में पराजित करने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद निर्णायक के पद पर मण्डन मिश्र की अत्यन्त बुद्धिमती पत्नी शारदा बैठायी गयी थी। शास्त्रार्थ में अपने स्वामी की हार को सहन न करती हुई वह स्वयं उनके साथ शास्त्रार्थ करने के लिए तैयार हो गयी। उसने शंकर से कामशास्त्र-सम्बन्धी प्रश्न पूछे। उन कठिन उत्तर वाले प्रश्नों को सुनकर वे चुप हो गये। कुछ समय (दिन या महीने) के पश्चात् दूसरों के शरीर में प्रवेश करने की विद्या से वे कामशास्त्र के ज्ञाता हो गये। और फिर मण्डन मिश्र की पत्नी को शास्त्रार्थ में पराजित किया। यह जनश्रुति है कि उन्हीं मण्डन मिश्र ने आचार्य शंकर की शिष्यता स्वीकार की और ‘सुरेश्वर’ नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त किया।

(7)
दिग्विजययात्राप्रसङ्गेनैव आचार्यप्रवरः प्रयागं प्राप्तः। तत्र वैदिकधर्मोद्धरणाय सततं यतमानं कुमारिलभई ददर्श। एकतः कुमारिलभट्टः वैदिकधर्मस्य कर्मकाण्डपक्षमाश्रित्य साम्प्रदायिकान्। पराजितवान् अपरतश्च श्रीमच्छङ्करः कर्मकाण्डस्य चित्तशुद्धिमात्रपर्यवसायिमाहात्म्यं स्वीकृत्यापि मोक्षे तस्य वैयर्थ्यं प्रतिपादयामास। एवं कुमारिलसम्मतमपि खण्डयित्वा स अज्ञाननिवृत्तये ज्ञानस्य महिमानं ख्यापयामास। तद् ज्ञानमेव मोक्षदायकम् भवति इति ज्ञानकाण्डमेव वेदस्य निष्कृष्टार्थं इति शङ्करः अमन्यत्। एवं शङ्करः आसेतोः कश्मीरपर्यन्तं समग्रदेशे परिबभ्राम, स्वकीययालौकिक्या बुद्धया च न केवलं विरोधिमतं समूलमुत्पाटयामास वरञ्च वैदिकधर्मानुयायिनां मध्ये तत्त्वस्वरूपमुद्दिश्य यद्वैमत्यमासीत् तस्यापि समन्वयः तेन समुपस्थापितः। अल्पीयस्येव वयसि महापुरुषोऽसौ चतुर्दिक्षु स्वकीर्तिकौमुदीं प्रसार्य द्वात्रिंशत्परमायुस्ते केदारखण्डे स्वपार्थिवशरीरं त्यक्त्वा पुनः कैलासवासी बभूव।

दिग्विजययात्राप्रसङ्गेनैव ………………………………………… प्रतिपादयामास

शब्दार्थ दिग्विजययात्राप्रसङ्गेनैव = दिग्विजय यात्रा के प्रसंग में ही। वैदिकधर्मोद्धरणाय = वैदिक धर्म के उद्धार के लिए। यतमानं = प्रयत्न करने वाले। एकतः = एक ओर पक्षमाश्रित्य = पक्ष का आश्रय लेकर अपरतश्च = और दूसरी ओर श्रीमच्छङ्करः (श्रीमत् + शंकरः) = श्रीमान् शंकर। चित्तशुद्धिमात्रपर्यवसायि = चित्त की शुद्धिमात्र उद्देश्य वाला। वैयर्थ्यम् = व्यर्थता। प्रतिपादयामास = सिद्ध की। ख्यापयामास = प्रसिद्ध किया। निष्कृष्टार्थम् = निष्कर्ष के लिए। आसेतोः = सेतुबन्ध (रामेश्वरम्) (UPBoardSolutions.com) से लेकर परिबभ्राम = भ्रमण किया। उत्पाटयामास = उखाड़ फेंका। तत्त्वस्वरूपमुद्दिश्य = तत्त्व के स्वरूप को समझाकर। यद्वैमत्यमासीत् (यत् + वैमत्यम् + आसीत्) = जो मत-विभिन्नता थी। समुपस्थापितः = उपस्थित किया। अल्पीयसी = थोड़ी-सी। चतुर्दिक्षु = चारों दिशाओं में प्रसार्य = फैलाकर।

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प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में शंकर द्वारा कर्मकाण्ड की व्यर्थता और ज्ञान की उपयोगिता सिद्ध की गयी है।

अनुवाद दिग्विजय यात्रा के प्रसंग से ही आचार्य-श्रेष्ठ (शंकर) प्रयाग गये। वहाँ वैदिक धर्म के उद्धार के लिए निरन्तर प्रयत्न करते हुए कुमारिल भट्ट को देखा। एक ओर कुमारिल भट्ट ने वैदिक धर्म के कर्मकाण्ड के पक्ष का सहारा लेकर सम्प्रदायवादियों को पराजित किया और दूसरी ओर श्रीमान् शंकर ने कर्मकाण्ड; चित्त की शुद्धि करने मात्र तक उद्देश्य; की महत्ता स्वीकार करके भी मोक्ष में उसकी व्यर्थता प्रतिपादित की। इस प्रकार कुमारिल के द्वारा मान्य मत का खण्डन करके भी उन्होंने अज्ञान को दूर करने के लिए ज्ञान की महिमा बतायी। “वह ज्ञान ही मोक्ष को देने वाला होता है यह ज्ञानकाण्ड ही वेद का निष्कर्ष है, ऐसा शंकर मानते थे। इस प्रकार (UPBoardSolutions.com) शंकर ने सेतुबन्ध (रामेश्वरम्) से लेकर कश्मीर तक सम्पूर्ण देश में भ्रमण किया और अपनी अलौकिक बुद्धि से न केवल विरोधियों के मत को ही समूल नष्ट किया, वरन् वैदिक धर्म के मानने वालों के मध्य में तत्त्व के स्वरूप को लेकर जो मत की भिन्नता थी, उसमें भी उन्होंने समन्वय स्थापित किया। थोड़ी-सी आयु में यह महापुरुष चारों दिशाओं में अपनी कीर्ति फैलाकर 32 वर्ष की आयु में केदारखण्ड में अपने पार्थिव शरीर को छोड़कर पुनः कैलाशवासी हो गये।

(8)
शङ्कराविर्भावात् प्रागपि तत्रासन् व्यासवाल्मीकिप्रभृतयो बहवो मनीषिणः ये स्वप्रज्ञावैशारद्येन वैदिकधर्माभ्युदयाय प्रयतमाना आसन्। तेषु महर्षिव्यास-प्रणीतानि ब्रह्मसूत्राण्यधिकृत्य श्रीमच्छङ्करेण शारीरकाख्यं भाष्यं प्रणीतम्। एवं व्यासमतमेवावलम्ब्य भाष्यकृता तेन वैदिकधर्मः पुनरुज्जीवितः। तस्य दार्शनिक मतमद्वैतमतमिति लोके प्रसिद्धमस्ति। स स्वयं प्रतिज्ञानीते यत् वेदोपनिषत्सु सन्निहितं तत्त्वस्वरूपमेव स निरूपयति नास्ति तत्र किञ्चित् तदबुद्धिसमुद्भवम्। तन्मतेन जगदतीतं सत्यं (UPBoardSolutions.com) ज्ञानमनन्तं यत्तदेव ब्रह्म इति बोद्धव्यम्। ब्रह्माधिष्ठाय मायाविकारः एव एष संसारः अस्ति। संसारसरणौ सुखदुःखप्रवाहे उत्पीइयमानो जीवो ब्रह्मैवास्ति। विभूर्भूत्वापि मायाजन्याज्ञानप्रभावात् स आत्मनः कार्पण्यमनुभवति सन्ततं विषीदति च। एवं जीवब्रह्मैक्यं प्रतिपाद्य स सकलजीवसाम्यं स्थापयामास। “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति, नेह नानास्ति किञ्चन, यो वै भूमा तत्सुखम्” इति श्रुतीः अनुसृत्य शङ्करः वेदान्ततत्त्वस्वरूपं निर्धारयामास।

ब्रह्माधिष्ठाय मायाविकारः ………………………………………… निर्धारयायास [2009]

शब्दार्थ शङ्कराविर्भावात् = शंकर के जन्म लेने से। प्रागपि = पहले भी। मनीषिणः = विद्वान्। वैशारद्येन = निपुणता से। अभ्युदयाय = उन्नति के लिए। शारीरकाख्यम् = शारीरिक नाम वाला। व्यासमतमेवावलम्ब्य = व्यास के मत का सहारा लेकर ही प्रतिजानीते = घोषित करते हैं। सन्निहितं = छिपा हुआ है, निहित है। बुद्धिसमुद्भवम् = बुद्धि से उत्पन्न। जगदतीतं = संसार से परे, संसार से भिन्न। बोद्धव्यम् = जानना चाहिए। ब्रह्माधिष्ठाय = ब्रह्म का अधिष्ठान करके। संसार-सरणौ = संसाररूपी मार्ग पर। उत्पीड्यमानः = दुःखी होता हुआ। विभुर्भूत्वापि = व्यापक होकर भी। मायाजन्याज्ञानप्रभावात् = माया से उत्पन्न अज्ञान के प्रभाव से। कार्पण्यम् = दीनता का विषीदति = दुःखी होता है। विप्रा = विद्वान्। नेह = यहाँ पर नहीं। भूमा = अधिकता।

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प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में शंकर द्वारा प्रतिपादित वैदिक सिद्धान्तों का संक्षिप्त वर्णन करके उनको समझाया गया है।

अनुवाद शंकर के जन्म से पूर्व भी व्यास, वाल्मीकि जैसे बहुत-से विद्वान् थे, जो अपनी बुद्धि की निपुणता से वैदिक धर्म की उन्नति के लिए प्रयत्न कर रहे थे। उनमें महर्षि व्यास के द्वारा रचित ब्रह्मसूत्रों के आधार पर श्रीमान् शंकर ने शारीरक’ नाम का भाष्य रचा। इस प्रकार व्यास के मत का सहारा लेकर ही उस भाष्यकार ने वैदिक धर्म को पुनरुज्जीवित किया। उनका दार्शनिक मत ‘अद्वैत’ इस नाम से संसार में प्रसिद्ध है। वे स्वयं घोषित करते हैं कि वेद और उपनिषदों में सन्निहित तत्त्व के स्वरूप का ही वे वर्णन कर रहे हैं, उसमें कुछ भी उनकी बुद्धि से उत्पन्न नहीं है। उनके मत के अनुसार जो संसार से अतीत और सत्य है, अनन्त ज्ञान है, वही ब्रह्म है, ऐसा समझना (UPBoardSolutions.com) चाहिए। ब्रह्म का आश्रय लेकर माया से उत्पन्न ही यह संसार है। संसार के मार्ग में सुख और दु:ख के प्रवाह में पीड़ित हुआ जीव ब्रह्म ही है। व्यापक होकर भी माया से उत्पन्न अज्ञान के प्रभाव से वह आत्मा की दीनता का ही अनुभव करता है और निरन्तर दु:खी रहता है। इस प्रकार जीव और ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन करके उन्होंने सम्पूर्ण जीवों की समानता स्थापित की। “एक ही ब्रह्म सर्वशक्तिमान् है, इस तत्त्व को ब्राह्मण अनेक प्रकार से कहते हैं, इस संसार में कुछ भी भिन्न नहीं है। जो भूमा है, वही सुख है।” इस प्रकार वेदों का अनुसरण करके शंकर ने तत्त्व के स्वरूप को निर्धारित किया।

(9)
प्रतीयमानानेकरूपायाः सृष्टेः अधिष्ठानं ब्रह्म अद्वैतरूपमस्ति। एतदस्ति विश्वबन्धुत्व भावनायाः बीजम् । अस्याः भावनायाः पल्लवनेन न केवलं एकः राष्ट्रवृक्षः संवर्धते, अपितु जातिक्षेत्रादिमूला उच्चावचभावरूपा सङ्कीर्णता समूलोच्छिन्ना भवति। एतस्याः राष्ट्रियभावनायाः पुष्ट्यर्थं स स्वदेशस्य चतसृषु दिक्षु चतुर्णा वेदान्तपीठान स्थापनाञ्चकार। मैसूरप्रदेशे शृङ्गेरीपीठं, पुर्यां गोवर्धनपीठे, बदरिकाश्रमे ज्योतिष्पीठं, द्वारिकायाञ्च शारदापीठं साम्प्रतमपि राष्ट्रसमुन्नत्यै, लोकहितसाधनाय चाद्वैतमतस्य प्रचारे अहर्निशं प्रयतमानानि सन्ति। [2014]

प्रतीयमानानेकरूपायाः ………………………………………… स्थापनाञ्चकार। [2009]

शब्दार्थ प्रतीयमान = आभासित, कल्पित, दिखाई देती हुई। अधिष्ठानम् = आधार, स्थान। ब्रह्म अद्वैतरूपम् = ब्रह्म अद्वैत अर्थात् एक रूप है। बीजम् = मूल। उच्चावच = ऊँच-नीच। समूलोच्छिन्ना = जड़ से उखड़ी हुई। चतसृषु दिक्षु = चारों दिशाओं में। साम्प्रतमपि = इस समय भी। अहर्निशम् = दिन-रात।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में शंकर के द्वारा अद्वैतवाद सम्बन्धी प्रचार एवं राष्ट्रीय भावना के लिए चार वेदान्त पीठों की स्थापना के उद्देश्य के विषय में बताया गया है।

अनुवाद, आभासित होती हुई, अनेक स्वरूप धारण करती हुई सृष्टि का आश्रयभूत ब्रह्म अद्वैत रूप है। यह विश्व-बन्धुत्व की भावना का मूल है। इस भावना के प्रसार से केवल एक राष्ट्ररूपी वृक्ष ही नहीं बढ़ता है, अपितु जातिमूलक और स्थानमूलक ऊँच-नीच की भावना की संकीर्णता जड़ से नष्ट हो जाती है। इस राष्ट्रीय भावना की पुष्टि के लिए उन्होंने अपने देश की चारों दिशाओं में चार वेदपीठों की स्थापना की। मैसूर प्रदेश में शृंगेरीपीठ, पुरी में गोवर्धनपीठ, बदरिकाश्रम में ज्योतिष्पीठ और द्वारका में शारदापीठ अब भी राष्ट्र की उन्नति के लिए और संसार का कल्याण करने के लिए अद्वैत मत के प्रचार में दिन-रात प्रयत्नशील हैं।

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(10)
निष्कामकर्मयोगी शङ्करः यद्यपि अल्पायुरासीत् किन्तु तस्य कार्याणि, अत्युत्कृष्टभाष्यग्रन्थाः, अनेके मौलिकग्रन्थाः अद्वैतसिद्धान्तश्चैनम् अनुक्षणं स्मारयन्ति। धन्यः खल्वसौ महनीयकीर्तिः जगदगुरुः भगवान् शङ्करः।

शब्दार्थ अल्पायुरासीत् = थोड़ी आयु वाले। अनुक्षणम् = प्रतिक्षण। स्मारयन्ति = याद कराते हैं।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में शंकर की विशेषता का वर्णन किया गया है।

अनुवाद निष्काम कर्मयोगी शंकर यद्यपि कम आयु के ही थे, किन्तु उनके कार्य अत्यन्त उत्तम भाष्य-ग्रन्थ (टीकाएँ), (UPBoardSolutions.com) अनेक मौलिक ग्रन्थ और अद्वैत सिद्धान्त इनकी प्रत्येक क्षण याद दिलाते हैं। वे (पूजनीय) महान् कीर्तिशाली जगद्गुरु भगवान् शंकर निश्चय ही धन्य हैं।

लघु उत्तरीयप्रश्न

प्रश्न 1.
शंकराचार्य का जन्म कब और कहाँ हुआ था? इनके माता-पिता का नाम भी बताइए।
या
शंकराचार्य के जन्म-वंशादि का उल्लेख कीजिए। [2010]
या
आदि शंकराचार्य का जन्म-स्थान लिखिए। [2007,08, 09, 13, 14]
या
आदि शंकराचार्य का जन्म किस प्रदेश में हुआ था? [2007,09]
या
आदि शंकराचार्य के माता-पिता और ग्राम का नाम लिखिए। [2010, 14]
उत्तर :
आदि शंकराचार्य का जन्म केरले प्रदेश के मालाबार प्रान्त में पूर्णा नदी के तट पर स्थित शलक ग्राम में सन् 788 ईस्वी में नम्बूदरी कुल में हुआ था। इनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम सुभद्रा देवी था। 991 2 आचार्य शंकर क्यों प्रसिद्ध हैं? स्पष्ट कीजिए। उत्तर ‘ब्रह्म अद्वैतस्वरूप है।’ आदि शंकराचार्य को यह सिद्धान्त विश्वबन्धुत्व की भावना का मूलाधार है। यह सिद्धान्त क्षेत्रवाद, जातिवाद और ऊँच-नीच की भावनाओं को नष्ट करने वाला है। अज्ञानान्धकार को दूर करने (UPBoardSolutions.com) के लिए आचार्य शंकर ने चार वेदान्तपीठों की स्थापना की तथा व्यास सूत्र, उपनिषदों, भगवद्गीता पर सुन्दर भाष्य लिखे, जो निरन्तर गिरते जीवन-मूल्यों के उत्थान में आज भी सहायक हैं। इसलिए आचार्य शंकर जगत् में प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 3.
गोविन्दपाद ने शंकर से क्या पूछा और शंकर ने क्या उत्तर दिया?
उत्तर :
यति वेश को धारण करने वाले गोविन्दपाद ने शंकर से पूछा “तुम कौन हो?’ शंकर बोले-“मैं न मन हूँ, न बुद्धि हूँ, न अहंकार हूँ, न चित्त हूँ, न कान हूँ, न जीभ हूँ, न प्राण हूँ, न नेत्र हूँ, न आकाश हूँ, न भूमि हूँ, न तेज हूँ, न वायु हूँ। मैं चिद् व आन्दस्वरूप शिव हूँ, शंकर हूँ।”.

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प्रश्न 4.
आदि शंकराचार्य ने चार वेदपीठों की स्थापना कहाँ-कहाँ की और क्यों की ?
या
शंकराचार्य द्वारा स्थापित वेदान्तपीठों के नाम लिखिए। [2006,08,09, 10, 12]
उत्तर :
आचार्य शंकर ने जातिमूलक और स्थानमूलक ऊँच-नीच की संकीर्णता को जड़ से नष्ट करने और राष्ट्रीय भावना की पुष्टि के लिए देश के चारों दिशाओं में चार वेदपीठों-मैसूर प्रदेश में श्रृंगेरीपीठ, पुरी में गोवर्धनपीठ, बदरिकाश्रम में ज्योतिष्पीठ और द्वारका में शारदा पीठ की स्थापना की।

प्रश्न 5.
शंकराचार्य के संन्यास-ग्रहण की घटना का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
एक बार शंकर पूर्णा नदी में स्नान कर रहे थे कि एक शक्तिशाली ग्राह ने इनका पैर पकड़ लिया। ग्राह ने इन्हें तब तक नहीं छोड़ा, जब तक माता ने इन्हें संन्यास लेने की आज्ञा न दे दी। माता की आज्ञा और ग्राह से मुक्ति पाकर इन्होंने संन्यास ले लिया।

प्रश्न 6.
शंकराचार्य ने काशी में किन-किन ग्रन्थों का भाष्य लिखा और किससे शास्त्रार्थ करके पराजित [2009]
या
शंकराचार्य ने किन-किन ग्रन्थों के भाष्य लिखे? [2006, 08,09, 11]
उत्तर :
शंकराचार्य ने व्यास-सूत्रों, उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता के भाष्यों की काशी में रचना की। इन्होंने काशी में मण्डन मिश्र को शास्त्रार्थ में पराजित किया, लेकिन उनकी पत्नी से शास्त्रार्थ में, प्रथम बार, पराजित हुए। कालान्तर में मण्डन मिश्र की पत्नी को भी शास्त्रार्थ में पराजित किया।

प्रश्न 7.
स्वतः प्रमाणं परत: प्रमाणं, कीराङ्गना यत्र गिरो गिरन्ति ।
द्वारस्थनीडान्तरसन्निरुद्धाः, अवेहि तधाम हि मण्डनस्य ॥
उपरिलिखित श्लोक किसने, किससे और क्यों कहा?
उत्तर :
ऊपर उल्लिखित श्लोक धीवरी ने शंकराचार्य से कहा क्योंकि शंकराचार्य ने उससे मण्डन मिश्र के घर का पता पूछा था। हुए?,

प्रश्न 8.
आदि शंकराचार्य का जीवन-परिचय संक्षेप में लिखिए। [2010]
उत्तर :
शंकराचार्य का जन्म मालाबार प्रान्त में पूर्णा नदी के तट पर शलक नामक ग्राम में सन् 788 ईस्वी में हुआ था। इनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम सुभद्रा था। इन्होंने आठ वर्ष की आयु में ही समस्त वेद-वेदांगों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। इनके पिता की मृत्यु बचपन (UPBoardSolutions.com) में ही हो गयी थी। पूर्णा नदी में स्नान करते समय एक शक्तिशाली ग्राह ने इनके पैर को पकड़ लिया और तब तक नहीं छोड़ा, जब तक माता ने संन्यास की अनुमति न दे दी। गौड़पाद के शिष्य गोविन्दपाद ने इन्हें संन्यास की दीक्षा दी और वेदान्त-तत्त्वों का अध्ययन कराया। इन्होंने काशी में मण्डन मिश्र व उनकी पत्नी तथा प्रयाग में कुमारिल भट्ट को शास्त्रार्थ में पराजित किया। इन्होंने व्यास-सूत्रों, उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता के भाष्यों की रचना की तथा राष्ट्रीय भावना को पुष्ट करने के लिए भारत के चारों कोनों में चार वेदान्तपीठों की स्थापना की। मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में ही इन्होंने अपने पार्थिव शरीर का त्याग कर दिया।

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प्रश्न 9.
वह महान् कर्मयोगी कौन थे, जिन्होंने वैदिक धर्म की पुनः स्थापना करायी? [2010, 11]
उत्तर :
आदि शंकराचार्य ही वह महान् कर्मयोगी थे, जिन्होंने वैदिक धर्म की पुन: स्थापना करायी।

प्रश्न 10.
शंकर ने किससे संन्यास-दीक्षा ली एवं वेदान्त-तत्त्व का ज्ञान प्राप्त किया? [2006]
उत्तर :
शंकर ने गौड़पाद के शिष्य गोविन्दपाद से संन्यास-दीक्षा ली और (UPBoardSolutions.com) वेदान्त-तत्त्व का ज्ञान प्राप्त किया।

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