Class 10 Sanskrit Chapter 2 UP Board Solutions कारुणिको जीमूतवाहनः Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 2 Karuniko Jimutvahan Question Answer (कथा – नाटक कौमुदी)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 2 हिंदी अनुवाद कारुणिको जीमूतवाहनः के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 2 कारुणिको जीमूतवाहनः (कथा – नाटक कौमुदी)

परिचय

प्रस्तुत पाठ महाकवि हर्ष द्वारा विरचित ‘नागानन्द’ नामक नाटक से संगृहीत है। इसमें जीमूतवाहन नामक विद्याधर-राजकुमार के द्वारा आत्मोत्सर्ग करके शंखचूड़ नामक सर्प को गरुड़ से बचाने का वर्णन है। नाटक में पाँच अंक हैं। इस नाटक पर बौद्ध धर्म का (UPBoardSolutions.com) प्रभाव परिलक्षित होता हैं। बौद्ध धर्म में अहिंसा का बहुत अधिक महत्त्व है। यह नाटक भी अहिंसा, आत्म-बलिदान और परोपकार का उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस नाटक की भाषा अत्यधिक सरल और सुबोध है तथा भाव-सौन्दर्य की दृष्टि से भी यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। इस नाटक में शान्त और करुण रस की प्रधानता है।

UP Board Solutions

पाठ-सारांश

जीमूतवाहन की खोज – जीमूतवाहनं समुद्र-तट को देखने के कुतूहल से समुद्र-तट पर गया हुआ था। वह बहुत देर तक लौटकर नहीं आता है; अतः महाराज विश्वावसु द्वारपाल को उसके घर यह पता करने के लिए भेजते हैं कि जीमूतवाहन वहाँ पहुँचा या नहीं। द्वारपाल वहाँ जाकर देखता है कि जीमूतवाहन के पिता जीमूतकेतु की सेवा उनकी पत्नी और पुत्रवधू द्वारा की जा रही है। वह जाकर कहता है कि महाराज विश्वावसु ने जीमूतवाहन का समाचार न मिल पाने के कारण उसे जानने के लिए आपके पास भेजा है। यह सुनकर जीमूतकेतु, उसकी पत्नी और पुत्रवधू अत्यन्त चिन्तित होते हैं कि जीमूतवाहन कहाँ गया? कहीं उसका कोई अमंगल तो नहीं हो गया? इसी समय अमंगलसूचक उनका बायाँ नेत्र भी फड़कता है।

चूड़ामणि की प्राप्ति – उसी समय गीले मांस और बालों से युक्त एक चूड़ामणि उनके पैरों पर आकर गिरती है।इस मणि को वे जीमूतवाहन का ही समझकर दुःखी हो जाते हैं। लेकिन द्वारपाल उन्हें सान्त्वना देते हुए कहता है कि ऐसे चूड़ामणि तो गरुड़ के द्वारा खाये गये सर्यों के गिरते हैं। (UPBoardSolutions.com)  इसके बाद जीमूतकेतु अपने पुत्र जीमूतवाहन का पता लगाने के लिए प्रतिहार को उसके ससुर के घर भेज देते हैं।

शंखचूड़ का आगमन – द्वारपाल के चले जाने के बाद रक्तवस्त्र पहने शंखचूड़ नामक सर्प वहाँ आता है। उसे देखकर और चूड़ामणि को उसी का समझकर सब निश्चिन्त हो जाते हैं। तब शंखचूड़ उनसे कहता है कि यह चूड़ामणि मेरा नहीं है। मुझे वासुकि ने पूर्व निश्चित शर्त के अनुसार गरुड़ के भोजन के लिए उसके पास भेजा था। किन्तु किसी दयालु विद्याधर ने गरुड़ को अपने प्राण देकर मेरी रक्षा की है। दूसरों का उपकार करने वाला वह जीमूतवाहन ही है, ऐसा सोचकर जीमूतवाहन के माता-पिता एवं पत्नी तीनों मूर्च्छित हो जाते हैं।

उन्हें ऐसी अवस्था में देखकर शंखचूड़ रोता हुआ सोचता है कि ये दोनों निश्चित ही उसे महाभाग के माता-पिता हैं। मैंने अप्रिय वचन कहकर इनके हृदय को दुःखी किया है। अब मेरा यह कर्तव्य हो जाता है कि मैं अपने प्राण दे ६ या इन दोनों को धैर्य दिलाऊँ? अन्ततः वह उन्हें धैर्य दिलाने का निश्चय करता है।

गरुड़ के पास जाना – इसके बाद शंखचूड़ उन्हें सान्त्वना देता हुआ कहता है कि उसे नाग न जानकर सम्भव है कि गरुड़ उसे न खाये। अत: हम खून की धारा का अनुसरण करते हुए गरुड़ के पास चलते हैं। शंखचूड़ के पीछे-पीछे जीमूतवाहन के माता-पिता भी गरुड़ के पास जाते हैं।

UP Board Solutions

अपने सम्मुख पड़े हुए जीमूतवाहन के पास गरुड़ बैठा हुआ है और सोच रहा है कि जन्म के बाद से मैंने अभी तक केवल नागों को ही खाया है, परन्तु यह महान् प्राणी कौन है, जो मेरे द्वारा खाया जाता हुआ भी प्रसन्न दिखाई दे रहा है। तब गरुड़ उसको खाना छोड़कर उससे पूछता है कि वह कौन है? जीमूतवाहन कहता है कि पहले तुम मेरे मांस और रक्त से अपनी भूख मिटा लो, परन्तु गरुड़ उसका मांस खाने का विचार छोड़ देता है।

इसके बाद गरुड़ के पास जाकर शंखचूड़ उससे कहता है कि यह नाग नहीं है; अत: तुम इसे छोड़कर मुझे ही खाओ, क्योंकि पूर्व शर्त के अनुसार वासुकि ने तुम्हारे खाने के लिए मुझे ही भेजा है।

जीमूतकेतु का आगमन – उसी समय जीमूतवाहन के पिता उसकी माता और पत्नी समेत वध-स्थल पर पहुँच जाते हैं। जीमूतवाहन उन्हें देखकर शंखचूड़ से चादर द्वारा अपने शरीर को ढकने के लिए कहता है, क्योंकि उसे आशंका है कि उसके माता-पिता उसे इस अवस्था में देखकर निश्चित ही अपने प्राण त्याग देंगे।

जीमूतवाहन की मृत्यु – इसके बाद जीमूतकेतु पत्नी व पुत्रवधू के साथ वहाँ आते हैं। गरुड़ जीमूतकेतु को आया हुआ देखकर अत्यधिक दु:खी और लज्जित होता है। पहले तो जीमूतवाहन को देखकर उसके माता-पिता प्रसन्न होते हैं परन्तु जब (UPBoardSolutions.com) जीमूतवाहन के उठने पर उसकी चादर गिर जाती है और जीमूतवाहन स्वयं मूच्छित हो जाता है तब उसकी उस अवस्था को देखकर उसके माता-पिता व पत्नी भी मूच्छित हो जाते हैं। जीमूतवाहन की माता लोकपालों से अमृत की वर्षा करने के लिए प्रार्थना करती है। गरुड़ इन्द्र की प्रार्थना करके अमृत को लाने तथा जीमूतवाहन और पहले खाये गये नागों को जीवित करने के लिए चला जाता है।

UP Board Solutions

जीमूतवाहन का जीवित होना इसके बाद पार्वती आकर जीमूतवाहन पर जल छिड़ककर उसे जीवित करती हैं। सभी पार्वती के चरणों में गिरते हैं। उसी समय गरुड़ के द्वारा जीमूतवाहन और सभी नागों को जीवित करने के लिए अमृत की वर्षा की जाती है। सभी नाग जीवित हो जाते हैं।

इस नाटक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि दूसरे के प्राणों की रक्षा के लिए हमें अपने प्राणों की बाजी लगा देने में भी संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि परोपकार सबका कल्याण करने वाला होता है। हमें किसी भी कार्य को करने से पूर्व भली-भाँति विचार लेना चाहिए तथा किये हुए अशुभ कार्य का प्रायश्चित्त अवश्य करना चाहिए।

चरित्र-चित्रण

जीमूतवाहन [2006,07,08, 10, 11, 12, 13, 15]

परिचय जीमूतवाहन विद्याधर जाति का और गन्धर्वराज जीमूतकेतु का पुत्र है। उसकी पत्नी का नाम मलयवती है। वह परोपकारी, दयालु, मातृ-पितृभक्त और असाधारण व्यक्तित्व का प्राणी है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1.त्यागमय जीवन – जीमूतवाहन का जीवन त्यागमय है। गरुड़ के साथ वासुकि की यह शर्त थी कि वह गरुड़के भोजन के लिए प्रतिदिन एक सर्प को भेज दिया करेगा। क्रमशः शंखचूड़ नामक सर्प की बारी आती है। शंखचूड़ की माता की करुण-क्रन्दन सुनकर जीमूतवाहन शंखचूड़ के प्राणों की रक्षा करने हेतु वध के लिए निश्चित लाल वस्त्रों को पहनकर गरुड़ के पास वधस्थल पर चली जाती है और गरुड़ के द्वारा रक्त पिये जाते हुए भी तनिक विचलित नहीं होता, यह उसके महान् त्याग का परिचायक है।

2. निर्भीक – जीमूतवाहन निर्भीक व्यक्ति है। गरुड़ के भक्षणार्थ जाने के लिए वह तनिक भी विचलित नहीं होता। गरुड़ के द्वारा पेट फाड़ डालने पर भी उसकी मुखकान्ति मलिन नहीं होती। वह गरुड़ को अपने रक्तऔर मांस से तृप्त हो जाने के लिए कहता है। इससे उसकी निर्भीकता सिद्ध होती है।

UP Board Solutions

3. मातृ-पितृभक्त – जीमूतवाहन अपने माता-पिता का भक्त है। वह उन्हें दु:खी नहीं देखना चाहता। इसीलिए उनको वध-स्थल पर आया हुआ देखकर शंखचूड़ से अपने शरीर पर चादर डालने के लिए कहता है, क्योंकि वह नहीं चाहता है कि वे उसकी विपन्न दशा देखें। घायल होने पर भी (UPBoardSolutions.com) वह उनका अभिवादन करने के लिए उठता है। उसकी यह गुण उसके मातृ-पितृभक्त होने का परिचायक है।

4. दयालु – जीमूतवाहन स्वभाव से दयालु है। वह किसी के कष्ट को नहीं देख पाता। शंखचूड़ की माँ को विलाप सुनकर वह गरुड़ का भोजन बनने के लिए स्वयं वधस्थल पर पहुँच जाता है और उसे आसन्न मृत्यु से बचा लेता है।

5. प्रभावशाली – जीमूतवाहन एक प्रभावशाली युवक है। शंखचूड़ उसके अनुपम त्याग से तो प्रभावित होता ही है; गरुड़ के ऊपर भी उसका ऐसा प्रभाव पड़ता है कि वह सदा के लिए हिंसा करना छोड़ अहिंसक बन जाता है तथा सभी नागों को जीवित करने के लिए अमृत की वर्षा करता है।

6. विनयशील – जीमूतवाहन विनम्र और विनयशील है। वह सभी के साथ विनम्रता का व्यवहार करता है। तथा अपने व्यवहार से किसी को भी कष्ट देना नहीं चाहता। उसके इसी गुण के कारण उसके पिता तथा श्वसुर दोनों ही उससे अपार स्नेह करते हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि जीमूतवाहन त्यागी, परोपकारी, मातृ-पितृभक्त, दयालु और प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी है।

गरुड़ [2010, 1]

परिचय गरुड़ पक्षीराज तथा विष्णु का वाहन है, ऐसी पौराणिक मान्यता है। गरुड़ का सर्वप्रिय खाद्य सर्प है। प्रस्तुत नाट्यांश में भी उसका इसी रूप में वर्णन आया है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. दयालु – यद्यपि गरुड़ मांसाहारी जीव है, तथापि उसमें दया का अभाव नहीं है। अपने भक्ष्य के रूप में आये जीमूतवाहन को देखकर उसके हृदय में दया-भाव जाग्रत होता है और वह उसे खाना छोड़कर उसका परिचय पूछता है। जीमूतवाहन की मृत्यु से उसके माता-पिता-पत्नी (UPBoardSolutions.com) को मूर्च्छित होते देखकर वह दु:खी हो जाता है। इन्द्र से अमृत वर्षा कराकर समस्त सर्यों को जीवित कराने के पुनीत कार्य से भी उसकी दयालुता को भान होता है।

2. बलशाली – गरुड़ बलशाली पक्षी है। भगवान् विष्णु का वाहन होने के कारण उसके बलशाली होने का संकेत भी मिलता है। दूसरे सर्प जाति का विनाश करने और सर्पराज वासुकि द्वारा उससे समझौता कर स्वयं उसका भोज्य पदार्थ उसे उपलब्ध कराने के प्रसंग से भी उसके बलशाली होने की पुष्टि होती है।

3. प्रायश्चित्त करने वाला – सर्यों के राजा वासुकि के प्रार्थना करने पर वह सर्यों के अन्धाधुन्ध विनाश को रोक देता है और अपने भोजन हेतु प्रतिदिन एक सर्प देने के लिए वासुकि से कहता है। जीमूतवाहन के प्रसंग मे भी उसे अपने किये पर पश्चात्ताप होता है और वह उसके प्रायश्चित्त के लिए इन्द्र से अमृत वर्षा कराकर सभी सर्यों को पुनर्जीवित तो करता ही है, साथ ही प्रायश्चित्तस्वरूप सदैव के लिए अहिंसक भी बन जाता है।

UP Board Solutions

4. गुणग्राही और विवेकशील – गरुड़ गुणग्राही पक्षी है। जीमूतवाहन के त्याग, परोपकार एवं आत्म-बलिदान के गुणों को देखकर उसका हृदय द्रवित हो उठता है। उसके गुणों से प्रभावित होकर वह उसे खाना त्यागकर उसका परिचय पूछता है और अन्ततः अपने कर्म के अनौचित्य पर पश्चात्ताप करता हुआ सभी सर्यों को जीवित करा देता है। यह तथ्य उसके गुणग्राही और विवेकशील होने को इंगित करता है। निष्कर्ष रूमें कहा जा सकता है कि गरुड़ समझौतावादी, सिद्धान्तवादी, विवेकशील, गुणग्राही, क्षमाशील, दयालु और पराक्रमी पक्षी है।

शंखचूड़ [2009,10, 12, 15]

परिचय शंखचूड़ एक गुणग्राही सर्प है, जिसको सर्पराज वासुकि के समझौतानुसार गरुड़ का भोजन बनने के लिए उसके पास भेजा गया है। उसके माता-पिता का उस पर विशेष स्नेह है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. दयावान् – शंखचूड़ एक दयावान् सर्प है। वह दूसरे के दुःखों को सहन नहीं कर (UPBoardSolutions.com) पाता है। जीमूतवाहन के माता-पिता एवं उसकी पत्नी की दीनदशा को देखकर उसका हृदय दया से भर जाता है। वह अपने को धिक्कारने लगता है कि यह मैंने क्या कर दिया।

2. बुद्धिमान् – जीमूतवाहन के माता-पिता जब उसके द्वारा सुनाये गये वृत्तान्त को सुनकर मूर्च्छित हो जाते हैं तो वह यह जान लेता है कि ये दोनों उस उपकारी के ही माता-पिता हैं। उसकी चेतना लौट आने पर वह उनसे कहता है कि गरुड़ ने जीमूतवाहन को सर्प न होने के कारण शायद न खाया हो और वह जीवित हो। हमें रक्त के चिह्नों का अनुसरण करते हुए उसकी खोज करनी चाहिए। अन्तत: वह उसे खोजने में सफल भी हो जाता है। ये दोनों ही घटनाएँ उसके बुद्धिमान् होने का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं।

3. सत्यवादी – शंखचूड़ सत्यवादी सर्प है। वह जीमूतवाहन के माता-पिता से सम्पूर्ण वृत्तान्त सही-सही बता देता है। इसके उपरान्त वह गरुड़ के पास पहुँचकर अपने प्राणों की चिन्ता न करते हुए उससे सच-सच बता देता है कि तुम्हारा भक्ष्य जीमूतवाहन नहीं, मैं हूँ। तुम मुझे खाकर अपनी क्षुधा शान्त करो।

4. आशावादी – शंखचूड़ एक आशावादी नाग है। उसे आशा है कि नाग न होने के कारण गरुड़ ने जीमूतवाहन को छोड़ दिया होगा। इसी आशा से वह जीमूतवाहन के शरीर से टपकते हुए रक्त के सहारे गरुड़ तक पहुँच जाता है।

5. निर्भीक – शंखचूड़ एक निर्भीक सर्प है। उसे मृत्यु का भय नहीं है। इसीलिए वह जीमूतवाहन को (UPBoardSolutions.com) बचाने के लिए गरुड़ के पास जाता है और उससे कहता है कि उसका (गरुड़ का) भोजन बनने की आज उसकी (शंखचूड़ की) बारी है। अतः वह जीमूतवाहन को छोड़कर उसे खा ले।

निष्कर्ष रूप में हमें कह सकते हैं कि शंखचूड़ एक दयावान्, निर्भीक, आशावादी, सत्यवादी और बुद्धिमत्ता से परिपूर्ण चरित्र वाला एक नाग है, जो अन्तत: जीमूतवाहन के प्राण बचाने में सफल होता है।

UP Board Solutions

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जीमूतवाहनस्य वार्तामन्चेष्टुं महाराजविश्वावसुना प्रतीहारः कुत्र प्रेषितः ?
उत्तर :
जीमूतवाहनस्य वार्ताम् अन्वेष्टुं महाराजविश्वावसुनी प्रतीहारः जीमूतकेतोः समीपं प्रेषितः।

प्रश्न 2.
जीमूतवाहनः कस्य पुत्रः आसीत् ? [2008, 09, 11]
उत्तर :
जीमूतवाहन: जीमूतकेतोः पुत्रः आसीत्।

प्रश्न 3.
शङ्खचूडः कः आसीत् ? [2006,09, 11, 12, 13, 14, 15]
उत्तर :
शङ्खचूड: एकः नागः आसीत्।

प्रश्न 4.
जीमूतवाहनः फणिनः प्राणान् परिरक्षितं किमकरोत् ?
उत्तर :
जीमूतवाहनः फणिनः प्राणान् रक्षितुं गरुडाय स्वदेहं समर्पयत्।

प्रश्न 5.
गरुडेनकः व्यापादितः ? [2006,07,09, 10]
उत्तर :
गरुडेन जीमूतवाहन: व्यापादितः।

UP Board Solutions

प्रश्न 6.
जीमूतवाहनः कथं प्रत्युज्जीवितः कृतः ? [2008]
उत्तर :
जीमूतवाहनः गौर्या कमण्डलु-उदकेन अभिषिच्य (UPBoardSolutions.com) प्रत्युज्जीवितः अभवत्।

प्रश्न 7.
अनभ्रा वृष्टिः कथम् अभवत् ? [2009, 15]
उत्तर : 
जीमूतवाहनम् अस्थिशेषान् उरगपतीन् च प्रत्युज्जीवयितुम् अनभ्रा वृष्टिः अभवत्।

प्रश्न 8.
जीमूतवाहनस्य पिता कः आसीत् ? [2006,07,08,09]
या
जीमूतवाहनः पितुः किं नाम? [2011]
उत्तर :
जीमूतवाहनस्य पिता जीमूतकेतुः आसीत्।

प्रश्न 9.
जीमूतवाहनः केन व्यापादितः ?
उत्तर :
जीमूतवाहनः गरुडेन व्यापादितः।

प्रश्न 10.
नागानन्दनाटकस्य प्रणेतुः किं नाम आसीत् ? [2011]
उत्तर :
नागानन्दनीटेकस्य प्रणेतुः नाम महाकवि हर्षः आसीत्।

प्रश्न 11.
जीमूतवाहनः कः आसीत् ? [2013]
उत्तर :
जीमूतवाहनः गन्धर्वराज जीमूतकेतोः पुत्रः विद्याधर-वंशतिलकः च आसीत्।

UP Board Solutions

प्रश्न 12.
नागानन्दस्य नाटकस्य रचयिता कः आसीत् ? [2014]
उत्तर :
नागानन्दस्य नाटकस्य रचयिता महाकविः (UPBoardSolutions.com) हर्षः आसीत्।

बहुविकल्पीय प्रश्न

अधोलिखित प्रश्नों में प्रत्येक प्रश्न के उत्तर-रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। इनमें से एक विकल्प शुद्ध है। शुद्ध विकल्प का चयन कर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए –
[संकेत – काले अक्षरों में छपे शब्द शुद्ध विकल्प हैं।]

1. ‘कारुणिको जीमूतवाहनः’ शीर्षक पाठ किस कृति से संकलित है?

(क) “पुरुष-परीक्षा से
(ख)‘नागानन्दम्’ से
(ग) “बुद्धचरितम्’ से
(घ) “जातकमाला’ से

2. जीमूतवाहन के अनुपम त्याग को दर्शाने वाला नाटक ‘कारुणिको जीमूतवाहनः’ किस धर्म से सम्बद्ध है?

(क) बौद्ध धर्म
(ख) सिक्ख धर्म
(ग) जैन धर्म
(घ) पारसी धर्म

3. परोपकारी विद्याधर राजकुमार का क्या नाम है?

(क) विश्वावसु
(ख) शंखचूड़
(ग) जीमूतवाहन
(घ) जीमूतकेतु

UP Board Solutions

4. जीमूतवाहन और जीमूतकेतु का परस्पर क्या सम्बन्ध है ?

(क) पुत्र-पिता
(ख) पिता-पुत्र
(ग) भाई-भाई
(घ) स्वामी-सेवक

5. मलयवती जीमूतवाहन की कौन थी ?

(क) माता
(ख) पत्नी
(ग) पुत्री
(घ) दासी

6. जीमूतवाहन किसकी रक्षा करता है ?

(क) शंखचूड़ की
(ख) वासुकि की
(ग) गरुड़ की
(घ) विश्वावसु की

7. ‘कारुणिको जीमूतवाहनः’पाठ में सर्पराज किसे कहा गया है?

(क) वासुकि को
(ख) गरुड़ को
(ग) शंखचूड़ को
(घ) विश्वावसु को

UP Board Solutions

8. गरुड़ ने जीमूतवाहन का मांस क्यों खाया?

(क) उसकी जीमूतवाहन से शत्रुता थी
(ख) उसको जीमूतवाहन का मांस प्रिय था
(ग) उसने जीमूतवाहन को नाग समझा था
(घ) इनमें से कोई नहीं

9. ‘कारुणिको जीमूतवाहनः’ शीर्षक पाठ में ‘नायिका’ कौन है?

(क) शंखचूड़ की माता
(ख) जीमूतवाहन की सास
(ग) जीमूतवाहन की माता
(घ) जीमूतवाहन की पत्नी

10. ‘कारुणिको जीमूतवाहनः’ पाठ में ‘देवी’ के रूप में किसको प्रस्तुत किया गया है ?

(क) शंखचूड़ की माँ को
(ख) जीमूतवाहन की माँ को
(ग) पार्वती को।
(घ) जीमूतवाहन की पत्नी को

11. “वत्स! अवितथैषा तव भारती भवतु। वयमपि त्वरितमेवानुगच्छामः।’ वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति ?

(क) शंखचूडः
(ख) जीमूतवाहनः
(ग) गरुडः
(घ) जीमूतकेतुः

UP Board Solutions

12. जीमूतवाहन को किसने जीवित किया?

(क) अमृत वर्षा ने
(ख) गौरी ने
(ग) गरुड़ ने
(घ) इन्द्र ने

13. अमृत लेने के लिए इन्द्र के पास कौन जाता है ?

(क) शंखचूड़
(ख) गरुड़
(ग) वासुकि
(घ) जीमूतकेतु

14. “सुनन्द! यावदनया वेलया ………………… सदनमेव गतो मे पुत्रको भविष्यति।” वाक्य में रिक्त स्थान की पूर्ति होगी –

(क) ‘वधू’ से
(ख) मातु से
(ग) श्वशुर’ से
(घ) “पितु से

15. “शङ्खचूडः नाम नागः खल्वहं वैनतेयस्याहारार्थमवसरप्राप्तो वासुकिना प्रेषितः। वाक्यस्य वक्ता कोऽस्ति?

(क) गरुडः
(ख) जीमूतकेतुः
(ग) मलयकेतुः
(घ) शंखचूडः

16. “अहं तव” ……………………… “प्रेषितोऽस्मि वासुकिना।” में रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी

(क) ‘रक्षार्थम्’ से
(ख) ‘हन्तुम्’ से
(ग) ‘आहारार्थम्’ से
(घ) “नष्टार्थम्’ से

17. ‘‘शङ्खचूडः समुपविश्यानेनोत्तरीयेण आच्छादितशरीरं कृत्वा धारयमाम्।” वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति ?

(क) जीमूतवाहनः
(ख) जीमूतकेतुः
(ग) मलयकेतुः
(घ) मलयवती

UP Board Solutions

18. जीमूतवाहनस्य पिता …………………. आसीत्। [2008, 09, 10]

(क) शङ्खचूडः
(ख) मलयकेतुः
(ग) जीमूतकेतुः
(घ) सत्यकेतुः

19. नागानन्दस्य नाटकस्य रचयिता …………………… अस्ति। [2007]

(क) कालिदासः
(ख) हर्षवर्धनः
(ग) भवभूतिः
(घ) विशाखदत्तः

UP Board Solutions

20. विद्याधरेण केनानि ………………… आविष्ट चेतसा। [2009]

(क) क्रोध
(ख) भय
(ग) पीड़ा
(घ) करुणा

21. विद्याधरः ……………………… रक्षां करोति। [2009,11]

(क) गरुडस्य
(ख) शङ्खचूडस्य
(ग) वासुकेः
(घ) जीमूतकेतोः

Hope given UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 2 are helpful to complete your homework.
If you have any doubts, please comment below. UP Board Solutions try to provide online tutoring for you

Class 10 Sanskrit Chapter 9 UP Board Solutions गीतामृतम् Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 9 Geetamritam Kalidas Question Answer (पद्य – पीयूषम्)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 9 हिंदी अनुवाद गीतामृतम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 9 गीतामृतम् (पद्य – पीयूषम्)

परिचय

समस्त उपनिषदों की सारभूत ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ भारतीय दर्शन की अमूल्य निधि है। यह महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित अनुपम ग्रन्थ; ‘महाभारत’ जिसे पंचम वेद भी माना जाता है; के अन्तर्गत सात-सौ श्लोकों का संकलन है। श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया; निष्काम कर्म करने का; उपदेश ही इसका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का एक भी वाक्य सदुपदेश से रहित नहीं है। यह भारत के समस्त आध्यात्मिक (UPBoardSolutions.com) ग्रन्थों की चरम परिणति है। प्रस्तुत श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता से ही संगृहीत हैं।

UP Board Solutions

पाठ-सारांश

श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि तुम्हारा अधिकार कर्म करने में है, फल की प्राप्ति में नहीं: अतः तुम निरन्तर कर्म करते रहो। हे अर्जुन! सफलता और असफलता को एक समान मानकर कर्म करो; ऐसा करने की बुद्धि रखने वाला व्यक्ति ही योगी कहलाता है। कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है; क्योंकि बिना कर्म किये तो जीवन ही सम्भव नहीं है। इसलिए अपने निर्धारित कर्मों को करो। हे भरतवंशी अर्जुन! लोक-कल्याण को चाहने वाले विद्वान् तो राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करते हैं। जो ऐसा नहीं करते, वे मूर्ख हैं। प्रकृति से प्राप्त वस्तुओं से सन्तुष्ट, ईर्ष्या से रहित, सफलता-असफलता को एक समान मानकर कार्य करने वाला और सुख-दु:ख में तटस्थ व्यक्ति सांसारिक बन्धनों में नहीं बँधता है। श्रद्धावान्, प्रयत्नशील और इन्द्रियों को संयमित रखने वाला मनुष्य ही ज्ञान को प्राप्त कर परम शान्ति को प्राप्त करता है। इसके विपरीत ज्ञानहीन, श्रद्धाहीन और संशय से युक्त मन वाला व्यक्ति न तो इहलोक में और न ही परलोक में सुख-शान्ति प्राप्त करता है।

पाण्डुपुत्र अर्जुन! जो व्यक्ति मुझे बड़ा मानकर, कुसंगति एवं विद्वेषरहित होकर कर्म करता है, वह मुझे प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति प्रसन्नता, द्वेष, शोक, शुभ-अशुभ में तटस्थ रहकर त्याग एवं भक्ति का जीवन बिताता है, जो शत्रु-मित्र, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी एवं सुख-दु:ख को एकसमान मानता है (UPBoardSolutions.com) और आसक्ति से रहित है; जो निन्दा-प्रशंसा में समान भाव रखता है, प्राप्त वस्तु से सन्तुष्ट रहता है, गृह-त्यागी, स्थिर बुद्धि और भक्ति में लीन रहता है, वह मनुष्य मुझे प्रिय है।

पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1)
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ [2008]

शब्दार्थ कर्मणि एव = कर्म करने में ही। अधिकारः = अधिकार है। ते = तुम्हारा। मा = नहीं है। फलेषु =(कर्म, के) फलों पर। कदाचन = कभी। कर्मफलहेतुः = कर्मफल के निमित्त। मा भूः = मत बनो। सङ्गः = आसक्ति। अस्तु = हो। अकर्मणि = कर्म न करने में।

सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘गीतामृतम्’ पाठ से उद्धृत है।

[संकेत इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

UP Board Solutions

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि तुम्हारी अधिकार केवल कर्म करने में ही है।

अन्वय ते अधिकारः कर्मणि एव (अस्ति), फलेषु कदाचन मा (अस्ति)। कर्मफलहेतुः मा भूः। अकर्मणि ते सङ्गः मा अस्तु।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन! तुम्हारा अधिकार मात्र कर्म करने में ही है, उसके फल की प्राप्ति में कभी नहीं है। इसलिए तुम कर्मफल के हेतु मत बनो तथा कर्म न करने में अर्थात् कर्महीन होकर बैठे रहने में तुम्हारी आसक्ति न हो। तात्पर्य यह (UPBoardSolutions.com) है कि कर्म पर तुम्हारा अधिकार है, इसलिए तुम्हारा कर्महीन हो जाना एक अनुचित प्रवृत्ति है। अतः तुम्हें कर्महीनता की ओर उन्मुख नहीं होना चाहिए।

(2)
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ [2006]

शब्दार्थ योगस्थः = योग में स्थित रहते हुए। कुरु कर्माणि = कर्मों को करो। सङ्गम् = फल के प्रति आसक्ति को। त्यक्त्वा = त्यागकर। धनञ्जय = अर्जुन का एक नाम। सिद्ध्यसिद्ध्योः = सफलता और असफलता को। समः भूत्वा = समान रहकर। समत्वं = सदा समान स्थिति में रहना ही। योगः = योग। उच्यते = कहा जाता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में अर्जुन को योग-भाव से कर्म करने का उपदेश दिया गया है।

अन्वय धनञ्जय! सङ्गं त्यक्त्वा सिद्ध्यसिद्ध्योः समः भूत्वा योगस्थः कर्माणि कुरु। समत्वं योग उच्यते।

UP Board Solutions

व्याख्या श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन! फल के प्रति आसक्ति को छोड़कर सफलता और असफलता को समान समझकर योग में स्थित होकर कर्म करो। सफलता और असफलता को समान समझकर कार्य करना ही योग कहलाता है।

(3)
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥ [2008, 14]

शब्दार्थ नियतम् = निर्धारित कुरु = करो। त्वं = तुम। ज्यायः = श्रेष्ठ है। हि = क्योंकि (UPBoardSolutions.com) अकर्मणः = कर्म न करने से। शरीरयात्रापि = शरीर-निर्वाह भी। प्रसिद्ध्येत् = पूर्ण नहीं हो सकता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में कर्म को जीवन के लिए आवश्यक बताया गया है।

अन्वय त्वं नियतं कर्म कुरु हि अकर्मणः कर्म ज्याय: (अस्ति)। अकर्मण: ते शरीरयात्रा अपि न प्रसिद्ध्येत्।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम निर्धारित कर्म करो अर्थात् अपने कर्तव्यों का पालन करो; क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना अधिक श्रेष्ठ है। कर्म न करने वाले, तुम्हारा जीवन-निर्वाह भी सिद्ध नहीं हो सकता है। तात्पर्य यह है कि कर्म के बिना तो जीवन (जीवित रहना) ही असम्भव है।

(4)
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् ॥

शब्दार्थ सक्ताः = आसक्त रहने वाले कर्मणि = क़र्म में। अविद्वांसः = अज्ञानी लोग। यथा = जैसे। कुर्वन्ति = करते हैं। भारत = भरत-वंश में उत्पन्न होने वाले अर्जुन कुर्यात् = करना चाहिए। विद्वान् = विवेकी। तथा = उसी प्रकार। असक्तः = अनासक्त रहकर चिकीर्षुः = करने की इच्छा रखने वाला। लोकसङ्ग्रहम् = लोक-कल्याण।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि विद्वान् को कर्म का त्याग न करके उसकी (UPBoardSolutions.com) आसक्ति का त्याग करना चाहिए। अन्वय भारत! कर्मणि सक्ताः अविद्वांसः यथा कुर्वन्ति, लोकसङ्ग्रहं चिकीर्षुः विद्वान् असक्तः (सन्) तथा कुर्यात्।।

UP Board Solutions

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे भरतवंशी अर्जुन! कर्म करने में आसक्त अर्थात् राग-द्वेष से लिप्त हुए अज्ञानीजन जैसा कार्य करते हैं, लोक-कल्याण करने की इच्छा रखने वाला विद्वान् अनासक्त रहकर अर्थात् राग-द्वेष में लिप्त न होकर वैसा कार्य करता है। तात्पर्य यह है कि कर्म को विवेकी और अविवेकी दोनों ही करते हैं किन्तु अविवेकी कर्म में आसक्ति के कारण कर्म करता है और विवेकी लोकशिक्षा की दृष्टि से।।

(5)
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥

शब्दार्थ यदृच्छालाभसन्तुष्टः = स्वभावतः प्राप्त होने वाली वस्तुओं से सन्तुष्ट रहने वाला। द्वन्द्वातीतः = सुख और दुःख के द्वन्द्वों से रहित। विमत्सरः = ईष्र्या (मत्सर) से रहित। समः = समान रहने वाला। सिद्धौ असिद्धौ च= सफलता (सिद्धि) और असफलता (असिद्धि) में। कृत्वा अपि = कर्म करके भी। ननिबध्यते =(कर्मबन्धन में) नहीं बँधता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि कर्मफल भोगने के लिए कौन बाध्य नहीं होता।

अन्वय यदृच्छालाभसन्तुष्टः, द्वन्द्वातीतः, विमत्सरः, सिद्धौ असिद्धौ च समः (पुमान्) (कर्म) कृत्वा अपि न निबध्यते।

UP Board Solutions

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो मनुष्य उसी लाभ से सन्तुष्ट होता है, जो उसे मिलता रहता है, जो सुख में प्रसन्न और दुःख में दु:खी नहीं होता है, ईर्ष्या से रहित, सफलता और असफलता में एक-सा रहने वाला पुरुष कर्म करके भी कर्मबन्धन में नहीं बँधता है।

(6)
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ [2009, 11, 12, 13]

शब्दार्थ श्रद्धावान् = श्रद्धावाला, श्रद्धालु। लभते ज्ञानं = ज्ञान को प्राप्त करता है। तत्परः = उसमें लगा हुआ, तल्लीन। संयतेन्द्रियः = इन्द्रियों को वश में रखने वाला, जितेन्द्रिय। ज्ञानं = ज्ञान को। लब्ध्वा = प्राप्त करके। परां शान्ति = अत्यधिक शान्ति (UPBoardSolutions.com) को। अचिरेण = शीघ्र ही। अधिगच्छति = प्राप्त हो जाता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को शीघ्र शान्ति प्राप्त करने का उपाय बता रहे हैं।

अन्वय श्रद्धावान्, तत्परः, संयतेन्द्रियः ज्ञानं लभते। ज्ञानं लब्ध्वा अचिरेण परां शान्तिम् अधिगच्छति।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो मनुष्य श्रद्धालु हो, सदैव ज्ञान प्राप्त करने का इच्छुक हो, अपनी इन्द्रियों को वश में करने वाला अर्थात् जितेन्द्रिय हो, वही पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है और ज्ञान प्राप्त करके शीघ्र ही परम शान्ति अर्थात् लोकोत्तर शान्ति को प्राप्त कर लेता है।

(7)
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति
नायं लोकोऽस्ति नपरोन सुखं संशयात्मनः॥ [2010, 11, 12]

शब्दार्थ अज्ञः = ज्ञानहीना च = और अश्रद्दधानः = श्रद्धा न रखने वाला; अश्रद्धालु। संशयात्मा = संशय से युक्त मन वाला। विनश्यति = नष्ट हो जाता है। न अयं लोकः अस्ति =न यह संसार है। न परः =न परलोक है। न सुखं = न सुख है। संशयात्मनः = संशययुक्त मन वाले का।

UP Board Solutions

प्रसंग प्रस्तुत लोक में संशय में पड़े हुए मनुष्य की दुर्गति के विषय में बताया गया है।

अन्वय अज्ञः च अश्रद्दधानः संशयात्मा च विनश्यति। संशयात्मन: अयं लोकः न अस्ति, परः (लोकः) न अस्ति, सुखं न (अस्ति)।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ज्ञानहीन, श्रद्धा न रखने वाला और संशय से युक्त मनवाला पुरुष नष्ट हो जाता है। संशय में पड़े हुए मनुष्य का न यह लोक है, न परलोक है और न ही सुख है।

(8)
मत्कर्म कृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव! ॥

शब्दार्थ मत्कर्म कृत् = मेरे लिये कर्म करने वाला। मत्परमः = मुझे ही सबसे बड़ा मानने वाला। मद्भक्तः = मेरा भक्त। सङ्गवर्जितः = आसक्तिरहित, दुर्जनों के साथ से रहित। निर्वैरः = शत्रुता से रहित; अर्थात् वैर न करने वाला। सर्वभूतेषु = सभी जीवों में। यः = जो। सः = वह। माम् = मुझको। एति = प्राप्त करता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को मोक्ष-प्राप्ति का उपाय बताया गया है।

अन्वये पाण्डव! यः मत्कर्म कृत्, मत्परमः, मद्भक्त: सङ्गवर्जितः, सर्वभूतेषु (च) निर्वैरः (अस्ति), सः माम् एति।।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे पाण्डुपुत्र अर्जुन! जो मेरे लिए कर्म करने वाला, मुझे ही सबसे बड़ा मानने वाला, मेरा भक्त (किसी भी व्यक्ति या वस्तु की) आसक्ति से रहित और सब जीवों पर शत्रुता-भाव से रहित है, वह पुरुष मुझे प्राप्त कर लेता है अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर (UPBoardSolutions.com) लेता है। यह श्लोक श्रीकृष्ण के परमब्रह्म स्वरूप को दर्शाता है।

(9)
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥ [2009, 12, 13, 14]

शब्दार्थ यः न हृष्यति = जो न प्रसन्न होता है। द्वेष्टि = द्वेष करता है। शोचति = शोक करता है। काङ्क्षति = इच्छा करता है। शुभाशुभपरित्यागी = शुभ और अशुभ का परित्याग करने वाला। भक्तिमान् = भक्त) मे प्रियः = मेरा प्रिय है।

UP Board Solutions

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि भगवान् को कौन प्रिय ?

अन्वय यः न हृष्यति, ने द्वेष्टि, न शोचति, न काङ्क्षति, शुभाशुभ परित्यागी, यः भक्तिमान् (चे अस्ति) स मे प्रियः (अस्ति)।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो पुरुष न प्रसन्न होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न इच्छा करता है, शुभ और अशुभ पदार्थों का त्याग करने वाला और जो भक्तियुक्त है, वह मुझे प्रिय है।।

(10)
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ [2014]

शब्दार्थ समः = समान। शत्रौ = शत्रु में। मित्रे = मित्र से। मानापमानयोः = मान और अपमान में।। शीतोष्णसुखदुःखेषु = सर्दी, गर्मी, सुख और दुःख में भी। सङ्गविवर्जितः = आसक्ति से रहित।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि भगवान् को कौन प्रिय है?

अन्वय (यः जनः) शत्रौ मित्रे च समः (अस्ति), तथा मानापमानयोः (समः अस्ति), शीतोष्ण सुखदुःखेषु समः (अस्ति), सङ्गविवर्जितः (च अस्ति), (स में प्रियः अस्ति)।

UP Board Solutions

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन! जो मनुष्य शत्रु और मित्र में एक समान, सम्मान तथा अपमान में एक समान, सर्दी-गर्मी में एक समान और सुख-दुःख में एक समान आचरण करने वाला और आसक्ति से रहित होता है, वह मुझे प्रिय है। तात्पर्य यह है कि जो मनुष्य शत्रु से घृणा और मित्र से प्रेम नहीं करता, सम्मान से जिसे प्रसन्नता नहीं होती, अपमान से मानसिक कष्ट नहीं होता, गर्मी-सर्दी और सुख-दु:ख में जो समान है तथा इन्द्रियादि विषयों की (UPBoardSolutions.com) आसक्ति से रहित है, वह मुझे प्रिय है।

(11)
तुल्यनिन्दास्तुतिमनी सन्तुष्टो येन केनचित्
अनिकेत: स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ [2008, 10, 12]

शब्दार्थ तुल्यनिन्दास्तुतिः = जो निन्दा और प्रशंसा में समान है। मौनी = मौन रहने वाला अर्थात् मननशील। सन्तुष्टः = सुप्रसन्ना येन केनचित् = जिस-किसी वस्तु से, अर्थात् जो कुछ मिले उसी से। अनिकेतः = गृहरहित। स्थिरमतिः = स्थिर बुद्धि वाला। भक्तिमान् = भक्ति से युक्त। मे = मुझे। प्रियः = प्रिय है। नरः = मनुष्य।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि भगवान् को कौन प्रिय है?

अन्वय (य: नर:) तुल्यनिन्दास्तुतिः, मौनी, येन केनचित् (वस्तुना) सन्तुष्टः, अनिकेतः, स्थिरमतिः, भक्तिमान् (च अस्ति), (सः) नरः मे प्रियः (अस्ति)।

UP Board Solutions

व्याख्या जो मनुष्य निन्दा और स्तुति में समान रहता है, मौन रहता है, जो कुछ मिल जाये उसी में सन्तुष्ट रहता है, गृहविहीन, स्थिर बुद्धि वाला और भक्ति से युक्त मुझे प्रिय है। तात्पर्य यह है कि जो मनुष्य अपनी निन्दा सुनकर दुःखी नहीं होता, प्रशंसा सुनकर आनन्दित नहीं होता, वाणी पर जिसका संयम है, जो कुछ भी उसे प्राप्त हो जाता है, उसी में वह सन्तुष्ट हो जाता है, अपने घर का त्याग कर देता है, स्थिर बुद्धि वाला और भक्तियुक्त है, वह मनुष्य मुझे प्रिय है।

सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1) कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। [2007, 13, 14]

सन्दर्भ प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘गीतामृतम्’ नामक पाठ से अवतरित है।

[संकेत इस पाठ की शेष सभी सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को कर्म करने के लिए प्रेरित किया गया है।

अर्थ तुम्हारा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फल की प्राप्ति में नहीं।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि तुम्हारे अधिकार में केवल कर्म करना है, उसके फल के विषय में सोचना नहीं। कर्म के फल पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है। इसलिए तुम्हें अकर्मण्य भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि बिना कर्म किये तो व्यक्ति वित भी नहीं रह सकता। इसलिए जो (कर्म-फल) तुम्हारे वश में नहीं है, उस पर विचार करना छोड़ दो और कर्म करने में लग जाओ।

UP Board Solutions

(2) ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।। [2009]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में कृष्ण अर्जुन को उपदेश दे रहे हैं कि कर्महीनता में तुम्हारी आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

अर्थ तुम्हारी अकर्म में आसक्ति न हो।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि व्यक्ति को कभी भी आलस्य के वशीभूत होकर, कर्महीन होकर नहीं रहना चाहिए, क्योंकि कर्महीनता की स्थिति में व्यक्ति को जीवित रहना ही सम्भव नहीं। व्यक्ति को कभी इस बात से निराश होकर भी कर्महीन नहीं होना चाहिए कि वह जो कर्म करता है, उसको फल उसे नहीं मिलता। व्यक्ति का अधिकार तो केवल कर्म करने का ही है, अत: उसे अपने कर्तव्य का निर्वाह निरन्तर करते रहना चाहिए। व्यक्ति को उसके (UPBoardSolutions.com) कर्मों का फल कब और कितना मिलना है, यह सोचने का विषय तो केवल परमेश्वर का ही है।

(3) योगस्थः कुरु कर्माणि। [2008, 10, 15]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में कर्म के तरीके पर प्रकाश डाला गया है।

अर्थ योग में स्थित होकर कर्म करो।

व्याख्या, सफलता तथा असफलता में समान भाव रखना ही योग कहलाता है। कार्य करते समय मनुष्य को कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि वह सफल होगा अथवा असफल। सफलता मिलने पर प्रसन्न न होना और असफलता में दुःखी न होना ही समान भाव अर्थात् योग है। अत: व्यक्ति को सदैव योग अर्थात् समान भाव में स्थित होकर ही कोई भी कर्म करना चाहिए।

(4)
समत्वं योग उच्यते।। [2006, 07, 08,09, 10, 12, 14, 15]
सिध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में समत्व-योग को स्पष्ट किया गया है।

अर्थ सिद्धि और असिद्धि में समान रहने वाले समत्व को योग कहा जाता है।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मनुष्य को कर्म करते समय यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि मुझे इस कार्य में सफलता मिलेगी या असफलता। सफलता मिलने पर प्रसन्न न होना और असफलता मिलने पर दु:खी न होना अर्थात् सफलता और असफलता में समान भाव रखनी ही योग कहलाता है। तात्पर्य यह है। कि मनुष्य को आसक्तिरहित होकर अर्थात् सुख और दुःख में समभाव रखते हुए कर्म करना चाहिए।

UP Board Solutions

(5) ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति। [2009, 10, 11, 12]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में भगवान् कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि ज्ञान से चिरशान्ति प्राप्त होती है।

अर्थ व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करके शीघ्र ही परमशान्ति को प्राप्त करता है।

व्याख्या इस संसार में अज्ञान ही दु:खों का कारण है और जब तक व्यक्ति दु:खों का अनुभव करता रहेगा, उसे शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती। व्यक्ति को जैसे ही ज्ञान प्राप्त होता और वह यह जान लेता है कि संसार के सभी सुखोपभोग मिथ्या हैं, उनसे वास्तविक सुख-शान्ति (UPBoardSolutions.com) की प्राप्ति नहीं हो सकती, तब वह परम शान्ति की प्राप्ति के लिए ईश्वर-भक्ति में अपना समय लगाता है। संसार के सुखोपभोगों से उसे विरक्ति होने लगती है। जब व्यक्ति संसार से पूर्णरूपेण विरक्त होकर अपना सर्वस्व ईश्वर को समर्पित कर देता है, तब वह परम शान्ति का अनुभव करता है। इसीलिए उचित ही कहा गया है कि ज्ञान ही परम-शान्ति को प्रदान करने वाला है।

(6) श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् तत्परः संयतेन्द्रियः। [2006, 12]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में कहा गया है कि श्रद्धालु व्यक्ति ही ज्ञानी होता है।

अर्थ, श्रद्धावान्, संलग्न और इन्द्रियों को वश में रखने वाला ही ज्ञान को प्राप्त करता है।

व्याख्या ज्ञान गुरु से प्राप्त होता है और ज्ञान की प्राप्ति के लिए गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना अवश्य होनी चाहिए। श्रद्धा का भाव उसी व्यक्ति में होता है, जो विनयशील होता है। जिस व्यक्ति के हृदय में श्रद्धा का भाव नहीं होता है, वह विनयशील नहीं हो सकता; क्योंकि उसके हृदय में अहंकार का वास होता है और अहंकारी व्यक्ति कभी भी ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। अत: कृष्ण का यह कथन कि श्रद्धा से ही ज्ञान प्राप्त होता है पूर्ण रूप से व्यावहारिक और स्वाभाविक है। विनयशील म य ज्ञान को प्राप्त करके परम शान्ति को प्राप्त करता है।

(7)
संशयात्मा विनश्यति।
न सुखं संशयात्मनः।। [2011, 13, 14]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में संशययुक्त व्यक्ति की दुर्गति के विषय में बताया गया है।

अर्थ संशययुक्त मन वाला विनष्ट हो जाता है। संशययुक्त व्यक्ति को कोई सुख प्राप्त नहीं होता।

व्याख्या ये दोनों ही सूक्तियाँ श्रीमद्भगवद्गीता के निम्नलिखित श्लोक की अंश हैं

UP Board Solutions

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥

अर्थात् अज्ञानी, श्रद्धा से रहित और संशय से युक्त मने वाला व्यक्ति नष्ट हो जाता है। ऐसे व्यक्ति के लिए न तो यह संसार है, न परलोक है और न तो सुख ही है। श्रीकृष्ण ने ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के इस श्लोक में नष्ट होने वाले व्यक्ति के तीन लक्षण बताये हैं—प्रथम लक्षण है-‘ज्ञान का न होना’, दूसरा लक्षण है-“श्रद्धा का न होना और तीसरा लक्षण है-‘संशय से युक्त मन वाला होना। व्यक्ति का अज्ञानी होना उसके लिए। कितना घातक है, यह तो वर्तमान (UPBoardSolutions.com) परिवेश में जीवन व्यतीत करने वाला सामान्य व्यक्ति भी जानता है। श्रद्धा का भाव सदैव अपने से बड़ों के प्रति होता है। जिस व्यक्ति में अपने से बड़ों के प्रति श्रद्धा नहीं होती, निश्चित ही उसके मन में अहंकार का भाव विद्यमान होता है और अहंकारी व्यक्ति का विनाश होना तो अवश्यम्भावी ही है। गीता में ही अन्यत्र कहा गया है कि श्रद्धावान् व्यक्ति को ही ज्ञान की प्राप्ति होती है। संशययुक्त मन वाला अर्थात् द्विविधा में पड़ा हुआ व्यक्ति सदैव करणीय और अकरणीय के द्वन्द्व से ग्रस्त होने के कारण कुछ भी नहीं कर पाता। कहा भी गया है-“दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम।” निश्चित ही ज्ञानहीन के लिए इस लोक में कोई स्थान नहीं, श्रद्धाहीन व्यक्ति के लिए उसे लोक (परलोक) में कोई स्थान नहीं और संशयग्रस्त व्यक्ति को तो कभी सुख प्राप्त हो ही नहीं सकता। श्रीकृष्ण के कहने का आशय यह है कि इहलोक और परलोक में सुख-प्राप्ति के इच्छुक व्यक्ति को इनका-अज्ञान, अश्रद्धा, संशय-त्याग कर देना चाहिए।

(8) निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डवः। [2006]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में प्राणिमात्र से प्रेम को उचित बताया गया है।

अर्थ जो सभी प्राणियों के प्रति वैररहित होता है, वही मुझे प्राप्त करता है।

व्याख्या श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे पाण्डुपुत्र! जो व्यक्ति सभी प्राणियों से प्रेम करता है, किसी से वैरभाव नहीं रखता है, वह व्यक्ति मुझे सबसे अधिक प्रिय है। सभी प्राणियों को ईश्वर ने बनाया है, फिर उसके द्वारा बनायी वस्तु के प्रति बैर अथवा ईष्र्या-द्वेष रखना उचित नहीं है। जो प्राणी ईश्वर द्वारा बनायी गयी वस्तुओं से प्रेम नहीं कर सकता, ईश्वर को वह प्राणी कैसे प्रिय हो सकता है। यदि हम चाहते हैं कि हम पर ईश्वर की कृपा-दृष्टि बनी रहे तो हमें ईष्र्या-द्वेष आदि भावनाओं को अपने हृदय से निकालकर प्राणिमात्र से प्रेम करना चाहिए।

UP Board Solutions

(9) शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः।

प्रसंग प्रस्तुत पंक्ति में भक्ति और समभाव के महत्त्व को बताया गया है।

अर्थ शुभ और अशुभ का परित्याग करने वाला भक्तिमान् व्यक्ति मुझे प्रिय है।

व्याख्या श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति–जो शुभ और अशुभ अर्थात् पवित्र और अपवित्र का विचार किये बिना समस्त भोग्य वस्तुओं का समान भाव से परित्याग करता है; अर्थात् उसे शुभ वस्तुओं के प्रति जरा-भी लगाव और अशुभ के प्रति जरा-भी दुराव नहीं होता; जो मेरी भक्ति; अर्थात् परमात्मा की भक्ति; में मन लगाता है, वही मुझे; अर्थात् परमात्मा को; प्रिय होता है।

श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) कर्मण्येवाधिकारस्ते ……………………………………………….. सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ (श्लोक 1) (2008, 15]
संस्कृतार्थः गीतायां भगवान् कृष्णः अर्जुनं कर्म कर्तुम् उपदिशति यत् भोः अर्जुन! कर्मकरणे एवं तव अधिकारः अस्ति, कर्मणः फले तव अधिकारः न अस्ति। अतः त्वं कर्मणः फलस्य कारणं मी भव। कर्मणां फलस्येच्छां त्यक्त्वा कर्म कर्त्तव्यम्। कर्म न करणे तव आसक्तिः अपि न स्यात्। अत: त्वं कर्म एव कुरु, तस्य फलस्य इच्छां मा करु।

(2) योगस्थः कुरु ……………………………………………….. योग उच्यते ॥ (श्लोक 2) 2011, 12]
संस्कृतार्थः गीतायां भगवान् कृष्णः अर्जुनम् उपदिशति यत् हे अर्जुन! सफलता-असफलतयोः समं भूत्वा, रागं त्यक्त्वा, योगस्थः भूत्वा च कर्माणि कुरु। यः पुरुषः सिद्ध्यसिद्ध्यो: समं मत्वा कार्यं कुरुते तस्य समत्वं योगः उच्यते।

(3) श्रद्धावान् लभते ……………………………………………….. अचिरेणाधिगच्छति ॥ (श्लोक 6) [2007,09, 12]
संस्कृतार्थः गीतायां भगवान् कृष्णः अर्जुनम् उपदिशति यत् यः व्यक्ति श्रद्धावान् भवति, ज्ञानम् (UPBoardSolutions.com) आप्तुं सदैव तत्परः भवति, इन्द्रियाणि संयमते, सः व्यक्तिः सद्ज्ञानं प्राप्य शीघ्रम् एव परां शान्ति प्राप्य सुखी भवति।।

(4) यो न हृष्यति ……………………………………………….. स मे प्रियः ॥ (श्लोक 9) [2007,08, 11, 14]
संस्कृतार्थः गीतायां भगवान् श्रीकृष्णः अर्जुनम् उपदिशति यत् यः पुरुषः सुखे न प्रसन्नं भवति, कस्मै न ईष्र्ण्यति, दु:खे न शोकं करोति, कस्मै न स्पृह्यति, शुभम् अशुभम् च परित्यजति, यः मां भजति, सः पुरुषः मे प्रियः अस्ति।

UP Board Solutions

(5) समः शत्रौ च ……………………………………………….. समः सङ्गविवर्जितः ॥ (श्लोक 10) [2009]
संस्कृतार्थः श्रीकृष्णः अर्जुनं कथयति–यः नर: रिपो सुहृदि च समानं व्यवहरति, आदरे अनादरे च तुल्यरूपः भवति, शीतम् उष्णं सुखं दुःखं च समानं मन्यते, एवेषु किमपि भेदं न करोति, आसक्तिहीनः च भवति, सः नरः मम (भगवत:) प्रियः भवति।

(6) तुल्यनिन्दास्तुतिः ……………………………………………….. प्रियो नरः ॥ (श्लोक 11)
संस्कृतार्थः गीतायां भगवान् श्रीकृष्ण: अर्जुनम् उपदिशति यत् यः पुरुषः निन्दायां स्तुतौ च समः भवति, मौनी तथा सर्वासु अवस्थासु सन्तुष्टः, गृहे ममत्वरहितः, स्थिरमतिः अस्ति, स एव भक्तिमान् पुरुष: मे प्रियः भवति।

Hope given UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 9 are helpful to complete your homework.
If you have any doubts, please comment below. UP Board Solutions try to provide online tutoring for you

Class 10 Sanskrit Chapter 1 UP Board Solutions लक्ष्य-वेध-परीक्षा Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 1 Lakshya Vedh Pariksha Question Answer (पद्य – पीयूषम्)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 1 हिंदी अनुवाद लक्ष्य-वेध-परीक्षा के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 1 लक्ष्य-वेध-परीक्षा (पद्य – पीयूषम्)

परिचय

प्रस्तुत पाठ के ये श्लोक महाभारत (भण्डारकर संस्करण, पुणे) के आदिपर्व के 123वें अध्याय से संगृहीत किये गये हैं। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित ‘महाभारत’ एक विशालकाय ग्रन्थ है। आचार्य द्रोण ने कौरवों और पाण्डवों को धनुर्विद्या की शिक्षा दी थी। एक बार वे (UPBoardSolutions.com) कौरवों-पाण्डवों और अन्य राजकुमारों की निशाना लगाने की कला की परीक्षा लेते हैं। प्रस्तुत पाठ में उसी का वर्णन किया गया है। इस पाठ से छात्रों को यह शिक्षा मिलती है कि उन्हें अपने लक्ष्य के प्रति सदैव एकाग्रचित्त होना चाहिए।

पाठ-सारांश

धनुर्विद्या की परीक्षा का विचार द्रोणाचार्य ने दुर्योधन आदि कौरवों, अर्जुन आदि पाण्डवों तथा अन्य देश के राजकुमारों को अस्त्र-शस्त्र-चालन की शिक्षा दी थी। एक दिन उन्होंने लक्ष्य-वेध कला की परीक्षा लेने के लिए सभी राजकुमारों को एकत्र किया। लक्ष्य-वेध के लिए उन्होंने शिल्पी से एक कृत्रिम गिद्ध पक्षी बनवाया और उसे वृक्ष के शीर्ष पर रखवा दिया तथा सभी शिष्यों को कहा कि मेरी अनुमति मिलते ही इस गिद्ध का सिर बाण से काटकर पृथ्वी पर गिरा दें।।

UP Board Solutions

युधिष्ठिर की परीक्षा सर्वप्रथम द्रोणाचार्य ने राजकुमार युधिष्ठिर को बाण साधने के लिए कहा। जब युधिष्ठिर अपने धनुष पर बाण चढ़ाकर गिद्ध को लक्ष्य करके तैयार हो गये, तब द्रोणाचार्य ने उनसे । पूछा-“हे नरश्रेष्ठ! क्या आप वृक्ष की चोटी पर रखे गिद्ध पक्षी को देख रहे हैं?” उत्तर में युधिष्ठिर ने कहा-“आचार्य! देख रहा हूँ।” सुनकर पुनः उन्होंने पूछा- “क्या आप वृक्ष को, मुझे और अपने सभी भाइयों को भी देख रहे हैं?” युधिष्ठिर ने कहा-“हाँ आचार्य! मैं आपको, सभी भाइयों और गिद्ध को बारम्बार देख रहा हूँ।” उनके उत्तर से अप्रसन्न होकर द्रोण ने कहा- “आप इस लक्ष्य को नहीं बेध सकते और उन्हें लक्ष्य-वेध से विरत कर दिया।

अन्य राजकुमारों की परीक्षा इसके पश्चात् द्रोणाचार्य ने अपने दुर्योधन, भीम आदि अन्य शिष्यों एवं अन्य देश के राजकुमारों को एक-एक करके लक्ष्य-वेध के लिए बुलाया और उन सभी से वही प्रश्न किया। सभी शिष्यों से युधिष्ठिर के समान ही उत्तर पाकर सभी को; लक्ष्य-वेध के अयोग्य सिद्ध करके; हटा दिया।

अर्जुन की परीक्षा अन्त में आचार्य द्रोण ने अर्जुन को लक्ष्य बेधने के लिए बुलाया। गुरु का आदेश सुनते ही अर्जुन अपने धनुष पर बाण चढ़ाकर और गिद्ध को निशाना बनाकर खड़े हो गये। आचार्य द्रोण ने अर्जुन से भी वही प्रश्न किया कि “हे अर्जुन! क्या तुम गिद्ध को, वृक्ष को, मुझको, अन्य राजकुमारों (UPBoardSolutions.com) को और भाइयों को देख रहे हो?” अर्जुन ने उत्तर दिया-“गुरुवर! मैं तो गिद्ध को ही देख रहा हूँ और मुझे तो केवल उसका सिर नजर आ रहा है।” तब गुरु द्रोण ने उसे बाण छोड़ने का आदेश दिया। आदेश पाते ही अर्जुन ने अपने तीक्ष्ण बाण से गिद्ध का सिर काटकर पृथ्वी पर गिरा दिया। आचार्य द्रोण ने हर्ष से रोमाञ्चित होकर उसे अपने गले से लगा लिया।

पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1-2)
तांस्तु सर्वान् समानीय सर्वविद्यास्त्रशिक्षितान्।
द्रोणः प्रहरणज्ञाने जिज्ञासुः पुरुषर्षभः ॥
कृत्रिमं भासमारोप्य वृक्षाग्रे शिल्पिभिः कृतम्।।
अविज्ञातं कुमाराणां लक्ष्यभूतमुपादिशत् ॥ [2015)

शब्दार्थ तान् सर्वान् = उन सभी (राजकुमारों) को। समानीय = लाकर। सर्वविद्यास्त्रशिक्षितान् = सभी विद्याओं और शस्त्रास्त्रों में शिक्षित किये गये। प्रहरणज्ञाने जिज्ञासुः = निशाना लगाने के ज्ञान के बारे में जानने की इच्छा करने वाले पुरुषर्षभः (पुरुष + ऋषभः) = पुरुषों में श्रेष्ठ भासम् = गिद्ध को। आरोप्य = रखकर। वृक्षाग्रे = वृक्ष की चोटी पर। शिल्पिभिः कृतम् = कारीगरों के द्वारा बनाये गये। अविज्ञातं = न जाने गये। लक्ष्यभूतम् = निशाने के रूप में उपादिशत् = बताया।

UP Board Solutions

सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘लक्ष्य-वेध-परीक्षा’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

अन्वय प्रहरणज्ञाने जिज्ञासुः पुरुषर्षभः द्रोणः सर्वविद्यास्त्रशिक्षितान् तान् तु सर्वान् समानीय शिल्पिभिः कृतं कृत्रिमं भासं वृक्षाग्रे आरोप्य कुमाराणाम् अविज्ञातं लक्ष्यभूतम् उपादिशत्।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोकद्वय में द्रोणाचार्य द्वारा शिष्यों की लक्ष्य-वेध की परीक्षा लेने के लिए (UPBoardSolutions.com) लक्ष्य निर्धारित किये जाने का वर्णन है।

व्याख्या निशाना लगाने के ज्ञान के विषय में जानने की इच्छा रखने वाले पुरुष-श्रेष्ठ द्रोणाचार्य ने सभी विद्याओं और अस्त्र चलाने में शिक्षा प्राप्त किये हुए उन सब राजकुमारों को लाकर कारीगरों द्वारा बनाये गये बनावटी गिद्ध पक्षी को वृक्ष की चोटी पर रखकर राजकुमारों के न जानते हुए लक्ष्य के रूप में बेधने को कहा।

(3)
शीघ्रं भवन्तः सर्वेऽपि धनूष्यादाय सत्वराः ।
भासमेतं समुद्दिश्य तिष्ठध्वं सन्धितेषवः ॥

शब्दार्थ शीघ्रम्
= शीघ्रता से। भवन्तः सर्वेऽपि = आप सभी लोग। धनूषि = धनुषों को। आदाय = लेकर सत्वराः = शीघ्रतापूर्वक भासं एतं = इस गिद्ध पर। समुद्दिश्य = निशाना साधकर। तिष्ठध्वम् = खड़े हो जाओ। सन्धितेषवः = धनुष पर बाण चढ़ाये हुए।

अन्वय (द्रोणोऽकथयत्) भवन्तः सर्वे अपि धनूषि आदाय शीघ्रम् (आगच्छन्तु)। (यूयं) एतं भासं समुद्दिश्य सन्धितेषवः सत्वराः तिष्ठध्वम् (तिष्ठत)।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में आचार्य द्रोण शिष्यों को निशाना साधने के लिए आदेश दे रहे हैं।

व्याख्या द्रोणाचार्य ने राजकुमारों से कहा कि आप सभी अपने-अपने धनुष लेकर शीघ्र आ जाएँ। इस गिद्ध पक्षी को लक्ष्य करके धनुष पर बाण चढ़ाये हुए शीघ्र खड़े हो जाएँ।

(4)
मद्वाक्यसमकालं तु शिरोऽस्य विनिपात्यताम्।
एकैकशो नियोक्ष्यामि तथा कुरुत पुत्रकाः ॥

शब्दार्थ मद्वाक्यसमकालम् = मेरे कथन के साथ ही। शिरोऽस्य (शिरः + अस्य) = इसका (UPBoardSolutions.com) (गिद्ध का) सिर। विनिपांत्यताम् = गिरा दिया जाये। एकैकशः = एक-एक करके। नियोक्ष्यामि = नियुक्त करूंगा। तथा कुरुत = वैसा ही करना। पुत्रकाः = हे पुत्रो (शिष्यो)

अन्वय हे पुत्रकोः ! मद्वाक्यसमकालं तु अस्य शिरः (उत्कृत्य) विनिपात्यताम्। (अहं) एकैकशः नियोक्ष्यामि तथा कुरुत।

UP Board Solutions

प्रसंग पूर्ववत्।

व्याख्या द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यों से कहा कि हे पुत्रो (शिष्यो)! मेरे कहने के साथ ही इस पक्षी का सिर काटकर गिरा दो। मैं एक-एक करके लक्ष्य-भेद के लिए तुम्हें बुलाऊँगा, तुम लोग वैसा ही करना। तात्पर्य यह है कि जब मैं तुम्हें अनुमति प्रदान करू तब तुम इस पक्षी का सिर काटकर गिरा देना।

(5)
ततो युधिष्ठिरं पूर्वमुवाचाङ्गिरसां वरः।
सन्धत्स्व बाणं दुर्धर्षं मद्वाक्यान्ते विमुञ्च तम् ॥

शब्दार्थ ततः = तत्पश्चात्। आङ्गिरसां वरः = आंगिरस गोत्र के ब्राह्मणों में श्रेष्ठ (द्रोणाचार्य)। सन्धत्स्व = निशाना लगाओ। दुर्धर्षम् = प्रचण्ड। मवाक्यान्ते = मेरे कथन के अन्त में; अर्थात् मेरे कहते ही। विमुञ्च = छोड़ दो। तं = उस (बाण) को।

अन्वये तत: आङ्गिरसां वरः पूर्वं युधिष्ठिरम् उवाच। (त्वं) दुर्धर्षं बाणं सन्धत्स्व। मद्वाक्यान्ते तं विमुञ्च।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में द्रोणाचार्य युधिष्ठिर को लक्ष्य-वेध के लिए तैयार कर रहे हैं।

व्याख्या इसके बाद आंगिरस गोत्र के ब्राह्मणों में श्रेष्ठ द्रोणाचार्य ने (UPBoardSolutions.com) पहले युधिष्ठिर से कहा—तुम प्रचण्ड बाण का सन्धान करो; अर्थात् उसे धनुष पर चढ़ा लो। मेरे कहने के अन्त में; अर्थात् मेरे कहते ही; उसे छोड़ देना।

(6)
ततो युधिष्ठिरः पूर्वं धनुगृह्य परन्तपः।
तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रणोदितः ॥

शब्दार्थ पूर्वं = सबसे पहले। धनुर्गुह्य = धनुष को लेकर। परन्तपः = शत्रुओं को पीड़ित करने वाले। तस्थौ = खड़ा हो गया। भासं समुद्दिश्य = गिद्ध को लक्ष्य करके। गुरुवाक्यप्रणोदितः = गुरु के वाक्य से प्रेरित हुआ।

अन्वय ततः गुरुवाक्य प्रणोदितः परन्तपः युधिष्ठिरः पूर्वं धनुः गृह्य (गृहीत्वा) भासं समुद्दिश्य तस्थौ।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में युधिष्ठिर को लक्ष्य-वेध के लिए तैयार होने का वर्णन है।

UP Board Solutions

व्याख्या इसके बाद गुरु द्रोणाचार्य के वचन से प्रेरित हुए, शत्रुओं को सन्तप्त करने वाले युधिष्ठिर सबसे पहले धनुष को लेकर और गिद्ध पक्षी को लक्ष्य करके खड़े हो गये।

(7)
ततो विततधन्वानं द्रोणस्तं कुरुनन्दनम्।
स मुहूर्तावाचेदं वचनं भरतर्षभ।

शब्दार्थ विततधन्वानं = चढ़ाये हुए धनुष वाले। कुरुनन्दनम् = कुरु वंश के लोगों को आनन्दित करने वाले।

मुहूर्तात् = थोड़ी देर में। उवाच = कहा। इदं = यह वचनं = कथन। भरतर्षभ = भरतवंशियों में श्रेष्ठ

अन्वय ततः सः द्रोणः विततधन्वानं तं भरतर्षभ कुरुनन्दनं मुहूर्तात् इदं वचनम् उवाच।

प्रसंग पूर्ववत्।

व्याख्या इसके बाद उन द्रोणाचार्य ने धनुष फैलाये हुए, उन भरतवंशियों में श्रेष्ठ (UPBoardSolutions.com) और कुरुवंशियों को आनन्दित करने वाले युधिष्ठिर से यह वचन कहा।।

(8)
पश्यैनं त्वं दुमाग्रस्थं भासं नवरात्मज।।
पश्यामीत्येवमाचार्यं प्रत्युवाच युधिष्ठिरः ॥

शब्दार्थ पश्यैनं (पश्य + एनं) = इसे देखो। हुमाग्रस्थम् = वृक्ष की चोटी पर रखे हुए। नरवरात्मज = हे श्रेष्ठ पुरुष के पुत्र! पश्यामि = देखता हूँ। इति एवं = इस प्रकार प्रत्युवाच = बोले।

अन्वय हे नरवरात्मज! त्वं द्रुमाग्रस्थम् एनं भासं पश्य। युधिष्ठिरः ‘पश्यामि इति’ एवम् आचार्यं प्रत्युवाच।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में द्रोणाचार्य द्वारा लक्ष्य (गिद्ध) को दिखाये जाने पर युधिष्ठिर द्वारा उसे देखने का वर्णन है।

व्याख्या
द्रोणाचार्य युधिष्ठिर से कहते हैं कि हे श्रेष्ठपुरुष के पुत्र! तुम वृक्ष की चोटी पर स्थित; अर्थात् रखे हुए; इस गिद्ध पक्षी को देखो। युधिष्ठिर ने ‘देख रहा हूँ, ऐसा आचार्य को उत्तर दिया।

(9)
स मुहूर्तादिव पुनद्रेणस्तं प्रत्यभाषत।
अथ वृक्षमिमं मां वा भ्रातृन् वाऽपि प्रपश्यसि ।।

शब्दार्थ मुहूर्तादिव (मुहूर्तात् + इव) = थोड़ी ही देर में। पुनः = फिर। प्रत्यभाषत = बोले। अथ = इसके बाद। वृक्षं = वृक्ष को। मां = मुझे। वा = अथवा। भ्रातृन् = भाइयों को। अपि = भी। प्रपश्यसि = अच्छी तरह देख रहे हो।

अन्वय स: द्रोण: मुहूर्तात् इव पुनः तं प्रत्यभाषत। अथ (त्वम्) इमं वृक्षं मां वा भ्रातृन् वा अपि प्रपश्यसि।

UP Board Solutions

प्रसंग पूर्ववत्।

व्याख्या वह द्रोणाचार्य थोड़ी-सी देर में पुन: युधिष्ठिर से बोले—इस समय तुम इस वृक्ष को (UPBoardSolutions.com) अथवा मुझको अथवा अपने भाइयों को भी अच्छी तरह देख रहे हो।

(10)
तमुवाच स कौन्तेयः पश्याम्येनं वनस्पतिम् ।
भवन्तं च तथा भ्रातृ भासं चेति पुनः पुनः॥ [2006, 10]

शब्दार्थ तं = उन (द्रोणाचार्य) से। उवाच = कहा। कौन्तेयः = कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिर ने। पश्यामि = देखता हूँ। एवं वनस्पतिम् = इस वृक्ष को। भवन्तं = आपको। पुनः पुनः = बार-बार।

अन्वय स कौन्तेयः तम् इति उवाच। (अहम्) एनं वनस्पतिं भवन्तं च तथा भ्रातृन् भासं च पुनः पुनः पश्यामि।।

प्रसंग पूर्ववत्।

व्याख्या उस कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिर ने उन द्रोणाचार्य जी से कहा कि मैं इस वृक्ष को, आपको, अपने सभी भाइयों को और गिद्ध पक्षी को बार-बार देख रहा हूँ।

(11)
तमुवाचाऽपसर्पति द्रोणोऽप्रीतमना इव।
नैतच्छक्यं त्वया वेदधुं लक्ष्यमित्येव कुत्सयन् ॥

शब्दार्थ तं = उस (युधिष्ठिर) को। उवाच = कहा। अपसर्प = दूर हट जाओ। अप्रीतमनाः इव = अप्रसन्न से मन वाले। न = नहीं। एतत् = यह। शक्यं = सम्भव, समर्थ। त्वया = तुम्हारे द्वारा| वेधुम् = वेधना। लक्ष्यं = लक्ष्य को। कुत्सयन् = कोसते हुए।

अन्वय ‘त्वया एतत् लक्ष्यं वेधुम् न शक्यम्’ इति कुत्सयन् अप्रीतमनाः इव द्रोणः तम् ‘अपसर्प’ इति उवाच।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में युधिष्ठिर को लक्ष्य-वेध से विरत करने का वर्णन है।

व्याख्या ‘तुम्हारे द्वारा यह लक्ष्य बेधा नहीं जा सकता’ इस प्रकार युधिष्ठिर से कुछ (UPBoardSolutions.com) नाराज होकर अप्रसन्न मन से द्रोणाचार्य ने उनसे दूर हट जाओ’ इस प्रकार कहा। तात्पर्य यह है कि युधिष्ठिर के लिए लक्ष्य-वेध असम्भव जानकर द्रोणाचार्य ने उनसे हट जाने के लिए कहा।

UP Board Solutions

(12-13)
ततो दुर्योधनादींस्तान् धार्तराष्ट्रवान् महायशाः।
तेनैव क्रमयोगेन जिज्ञासुः पर्यपृच्छत ।।
अन्यांश्च शिष्यान् भीमादीन् राज्ञश्चैवान्यदेशजान्।
तेंथा च सर्वे तत्सर्वं पश्याम इति कुत्सिताः ॥

शब्दार्थ दुर्योधनादीन् = दुर्योधन आदि को। तान् = उन| धार्तराष्ट्रवान् = धृतराष्ट्र के पुत्रों को। महायशाः = महान् यशस्वी (द्रोण ने)। तेनैव क्रमयोगेन = उसी प्रकार क्रमबद्धता से। जिज्ञासुः = जानने के इच्छुक पर्यपृच्छत = पूछा। अन्यदेशजान् = अन्य देशों में उत्पन्न हुए। राज्ञः = राजाओं के। तत्सर्वं = वह सब कुछ। इति = इस पर, ऐसा कहने पर। कुत्सिताः = फटकार दिये गये, तिरस्कृत कर दिये गये।

अन्वय ततः जिज्ञासुः महायशाः दुर्योधनादीन् तान् धार्तराष्ट्रान् तेन एव क्रमयोगेन पर्यपृच्छत। सः भीमादीन् अन्यान् च शिष्यान् अन्य देशजान् राज्ञः च तथा (पर्यपृच्छत)। सर्वे ‘तत्सर्वं पश्यामः’ इति कुत्सिताः (अभवन्)।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोकद्वय में यह बताया गया है कि गलत उत्तर दिये जाने के कारण दुर्योधन-भीम अन्य राजादि द्रोणाचार्य द्वारा तिरस्कृत किये गये।

व्याख्या इसके अनन्तर जानने के इच्छुक, महान् यशस्वी द्रोणाचार्य ने दुर्योधन आदि उन धृतराष्ट्र के पुत्रों से; अर्थात् पहले दुर्योधन से और उसके बाद उसके शेष भाइयों से; उसी क्रम से पूछा। इसके बाद उन्होंने भीम आदि अन्य शिष्यों से और अन्य देशों में उत्पन्न राजाओं से भी वैसा ही (UPBoardSolutions.com) प्रश्न पूछा। सभी के द्वारा ‘हम वह सब कुछ देख रहे हैं यही उत्तर देने के कारण गुरु द्रोणाचार्य सभी से नाराज हुए।

(14)
ततो धनञ्जयं द्रोणः स्मयमानोऽभ्यभाषत ।
त्वयेदानीं प्रहर्त्तव्यमेतल्लक्ष्यं विलोक्यताम् ॥

शब्दार्थ धनञ्जयम् = अर्जुन को। स्मयमानः = मुस्कुराते हुए। अभ्यभाषत = बोले। त्वया = तुम्हारे द्वारा। इदानीं = अब। प्रहर्तव्यम् = प्रहार किया जाना चाहिए। एतत् लक्ष्यं = इस लक्ष्य को। विलोक्यताम् = देख लो।

अन्वय ततः स्मयमानः (सन्) द्रोणः धनञ्जयम् अभ्यभाषत। इदानीं त्वया प्रहर्तव्यम्। एतत् लक्ष्यं विलोक्यताम्।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में द्रोणाचार्य अर्जुन से लक्ष्य-सन्धान के लिए कह रहे हैं।

UP Board Solutions

व्याख्या इसके बाद मुस्कुराते हुए द्रोणाचार्य ने धनंजय अर्थात् अर्जुन से कहा-अब तुम्हें प्रहार करना है। तुम इसे लक्ष्य को देख लो।

(15)
एवमुक्तः सव्यसाची मण्डलीकृतकार्मुकः।
तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रणोदितः ॥ [2007]

शब्दार्थ एवम् = इस प्रकार। उक्तः = कहा गया। सव्यसाची = अर्जुन का एक नाम; दाहिने और बाएँ दोनों हाथों से बाण चलाने की कला में निपुण। मण्डलीकृतकार्मुकः = धनुष को गोलाकार किये हुए; अर्थात् धनुष को ताने हुए। तस्थौ = बैठ गया। भासं = गिद्ध को। समुद्दिश्य = निशाना साधकर।

अन्वय (गुरुणा) एवम् उक्तः, गुरुवाक्यप्रणोदितः, मण्डलीकृतकार्मुकः सव्यसाची भासं समुद्दिश्य तस्थौ।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में लक्ष्य-वेध के लिए अर्जुन के तैयार होने का वर्णन है।

व्याख्या गुरु द्रोणाचार्य के द्वारा इस प्रकार आदेश देने पर गुरु के कथन से प्रेरित हुए, धनुष को मण्डलाकार बनाये हुए; अर्थात् धनुष को ताने हुए, दाहिने और बाएँ दोनों हाथों से धनुष पर बाण चलाने में सिद्धहस्त अर्जुन गिद्ध पक्षी को लक्ष्य करके; अर्थात् निशाना साधकर खड़े हो गये।

(16)
मुहूर्तादिव तं द्रोणस्तथैव समभाषत।
पश्यस्येनं स्थितं भासं द्वमं मामपि चार्जुन॥

शब्दार्थ मुहूर्तादिव
= थोड़ी देर बाद तथैव (तथा + एव) = उसी प्रकार समभाषत = पूछा। पश्यसि = देखते हो। स्थितं = स्थित। द्रुमं = वृक्ष को। माम् अपि = मुझे भी।

अन्वय मुहूर्तात् इव द्रोण: तं तथा एव समभाषत-“हे अर्जुन! त्वं (दुमम् अग्रे) स्थितम् (UPBoardSolutions.com) एनं भासं, द्रुमं माम् च अपि पश्यसि।”

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में आचार्य द्रोण द्वारा अर्जुन से प्रश्न पूछे जाने का वर्णन है।

व्याख्या थोड़ी देर में ही द्रोणाचार्य ने अर्जुन से उसी प्रकार प्रश्न किया-“हे अर्जुन! तुम पेड़ की चोटी पर स्थित इस गिद्ध को, वृक्ष को और मुझे भी देख रहे हो।”

(17)
“पश्याम्येकं’ भासमिति द्रोणं पार्थोऽभ्यभाषत।
‘न तु वृक्षं भवन्तं वा पश्यामीति च भारत’ ।। [2009,10,12,14]

शब्दार्थ पार्थः = पृथा (कुन्ती) के पुत्र अर्जुन। अभ्यभाषत = उत्तर दिया, कहा। भारत = भरतवंशी।

अन्वय भारत पार्थः ‘एकं भासं पश्यामि’ इति न तु वृक्षं, भवन्तं वा पश्यामि। इति द्रोणम् अभ्यभाषत।

प्रसग प्रस्तुत श्लोक में अर्जुन द्वारा उत्तर दिये जाने का वर्णन है।

UP Board Solutions

व्याख्या भरतवंशी अर्जुन ने “मैं केवल एक गिद्ध को देख रहा हूँ। मैं न तो वृक्ष को अथवा न आपको देख रही हूँ।” ऐसा द्रोण से कहा।

(18)
ततः प्रीतमना द्रोणो मुहूर्तादिव तं पुनः।
प्रत्यभाषत दुर्धर्षः पाण्डवानां महारथम् ॥

शब्दार्थ प्रीतमनाः = प्रसन्नचित्त। दुर्धर्षः = किसी से न दबने वाला। महारथम् = महारथी। ‘महाभारत’ में कहा गया है कि जो अकेला दस हजार वीरों के साथ लड़ सके तथा अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग में निपुण हो, उसे महारथी कहते हैं।

अन्वय ततः प्रीतमना दुर्धर्षः द्रोणः मुहूर्तात् इव पाण्डवानां महारथं तं पुनः प्रत्यभाषत।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में द्रोणाचार्य द्वारा अर्जुन से पुन: कुछ पूछने का वर्णन है।

व्याख्या इसके बाद प्रसन्न मन वाले और किसी से न दबने वाले द्रोणाचार्य (UPBoardSolutions.com) ने थोड़ी देर बाद ही पाण्डवों में महान् योद्धा उस अर्जुन से पुनः कहा।

(19)
भासं पश्यसि यद्येनं तथा ब्रूहि पुनर्वचः।
शिरः पश्यामि भासस्य न गात्रमिति सोऽब्रवीत् ॥ [2006]

शब्दार्थ ब्रूहि = बताओ। गोत्रम् = शरीर के अब्रवीत् = कहा, बोला।

अन्वय यदि (त्वम्) एनं भासं पश्यसि, (तर्हि) तथा वचः पुन: ब्रूहि। सः ‘भासस्य शिरः पश्यामि, गात्रं न इति अब्रवीत्।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में आचार्य द्रोण के प्रश्न और अर्जुन के उत्तर का वर्णन है।

व्याख्या द्रोणाचार्य ने अर्जुन से कहा कि यदि तुम इस गिद्ध को देख रहे हो तो वैसे ही वचन पुन: कहो। ‘मैं गिद्ध के सिर को देख रहा हूँ, शरीर को नहीं” ऐसा अर्जुन ने कहा।

(20)
अर्जुनेनैवमुक्तस्तु द्रोणो हृष्टतनूरुहः।
मुञ्चस्वेत्यब्रवीत् पार्थं स मुमोचाविचारयन् ॥

शब्दार्थ हृष्टतनूरुहः = हर्षित रोमों वाले; अर्थात् हर्ष से रोमांचित हुए। मुञ्चस्व = (बाण) छोड़ो। मुमोच = (बाण) छोड़ दिया। अविचारयन् = बिना विचार किये।

अन्वय अर्जुनेन एवम् उक्तः तु हृष्टतनूरुहः द्रोणः पार्थं ‘मुञ्चस्व’ इति अब्रवीत्। सः अविचारयन् (बाएं) मुमोच।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में द्रोणाचार्य की स्वीकृति पर अर्जुन के बाण छोड़े जाने का वर्णन है।

UP Board Solutions

व्याख्या अर्जुन के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर हर्ष से रोमांचित हुए द्रोणाचार्य ने (UPBoardSolutions.com) अर्जुन से ‘बाण छोड़ दो’ ऐसा कहा। अर्जुन ने भी बिना विचार किये ही बाण छोड़ दिया।

(21)
ततस्तस्य नगस्थस्य क्षुरेण निशितेन च।
शिर उत्कृत्य तरेसा पातयामास पाण्डवः ।
हर्षाद्रिकेण तं द्रोणः पर्यष्वजत पाण्डवम् ॥

शब्दार्थ ततः = इसके बाद। तस्य = उस गिद्ध के नगस्थस्य = पेड़ पर रखे हुए। क्षुरेण = बाण के द्वारा। निशितेन = पैने। उत्कृत्य = काटकर तरसा = वेग से। पातयामास = (पृथ्वी पर) गिरा दिया। हर्षाद्रिकेण = प्रसन्नता की अधिकता से पर्यष्वजत = गले लगा लिया। तं पाण्डवम् = उस पाण्डव (अर्जुन) को।

अन्वय ततः पाण्डव: नगस्थस्य तस्य शिरः निशितेन क्षुरेण उत्कृत्य तरसा (भूमौ) पातयामास। द्रोण: हर्षोंद्रेकेण पाण्डवं पर्यष्वजत।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में अर्जुन द्वारा लक्ष्य-वेध में सफल होने का वर्णन है।

व्याख्या इसके पश्चात् पाण्डु के पुत्र अर्जुन ने वृक्ष की चोटी पर स्थित उस गिद्ध पक्षी का सिर तीक्ष्ण बाण से। काटकर वेग से भूमि पर गिरा दिया। द्रोणाचार्य ने अत्यधिक प्रसन्नता से उस अर्जुन को गले लगा लिया।

सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1) पाण्डवानां महारथम्।
सन्दर्भ
प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के लक्ष्य-वेध-परीक्षा शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

प्रसंग अर्जुन के उत्तर से प्रसन्न आचार्य द्रोण ने उसे पाण्डवों में महारथी कहा।

अर्थ पाण्डवों (युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव) में महारथी अर्थात् महान् वीर हो।

व्याख्या महाभारत में योद्धाओं की श्रेणियों का वर्गीकरण महारथी, अतिरथी आदि के रूप में किया गया है। इसमें ‘महारथी’ सबसे श्रेष्ठ योद्धा माना जाता था। महारथी को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि

एको दशसहस्राणि योधयेद्यस्तु धन्विनां ।
शस्त्रशास्त्रप्रवीणश्च विज्ञेयः स महारथः ॥

तात्पर्य यह है कि ऐसा योद्धा जो अकेले दस हजार वीरों के साथ युद्ध कर सके तथा अस्त्र-शस्त्र चलाने में कुशल हो, उसे महारथी जानना चाहिए। महारथी होना तत्कालीन योद्धाओं में गौरव की बात मानी जाती थी। द्रौपदी ने भी महाभारत में एक स्थल पर कहा है-“पञ्च मे पतयः सन्ति (UPBoardSolutions.com) भीमाऽर्जुन महारथाः।” द्रोणाचार्य ने अर्जुन में महारथी होने की प्रतिभा उनके अध्ययन-काल में ही पहचान ली थी, इसीलिए उन्हें ‘पाण्डवानां महारथम्’ कहकर सम्बोधित किया।

UP Board Solutions

(2) शिरः पश्यामि भासस्य नगात्रमिति सोऽब्रवीत्। [2014]

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्तिपरक पंक्ति में द्रोणाचार्य के प्रश्न का अर्जुन के द्वारा उत्तर दिया जा रहा है।

अर्थ उसने कहा, “मैं गिद्ध के सिर को देख रहा हूँ, शरीर को नहीं।”

व्याख्या वृक्ष के शीर्ष भाग पर लक्ष्य-वेध के लिए रखे गये कृत्रिम गिद्ध पक्षी के सम्बन्ध में प्रश्न पूछे। जाने पर अर्जुन ने उत्तर दिया था कि वह मात्र गिद्ध के सिर को ही देख रहा था, उसके शरीर को नहीं; क्योंकि लक्ष्य तो गिद्ध के सिर का वेध करना था, शरीर का नहीं। प्रस्तुत सूक्ति का आशय यह है कि व्यक्ति की दृष्टि वहीं केन्द्रित होनी चाहिए जो उसका लक्ष्य है, अन्यत्र नहीं। लक्ष्य पर दृष्टि रखने वाले व्यक्ति ही जीवन-संग्राम में सफल होते हैं। यत्र-तत्र दृष्टि दौड़ाने वाले कभी (UPBoardSolutions.com) जीवन में सफल नहीं होते। जीवन का एक लक्ष्य निर्धारित करने वाले आगे बढ़ जाते हैं, जब कि लक्ष्य से भटकते रहने वाले पीछे छूट जाते हैं। कहा भी गया है “एकै साधे सब सधै, सब साधै सब जाइ।”

श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1)   तांस्तु सर्वान् …………………………………………लक्ष्यभूतम् उपादिशत् ॥ (श्लोक 1-2)
कृत्रिमं भासम् ………………………………………… लक्ष्यभूतम् उपादिशत् ॥ (श्लोक 2)

संस्कृतार्थः इमौ द्वौ श्लोकौ लक्ष्य-वेध-परीक्षा नामकात् पाठात् उद्धृतौ स्तः। अस्मिन् श्लोके कथितम्। अस्ति यत् ते राजकुमाराः सर्वविद्यासु शिक्षिताः आसन् तत् तेषां धनुर्विद्यायां निष्णातान् परीक्षां कर्तुम् ऐच्छत् आचार्यः द्रोणः तान् युधिष्ठिरादीन् राजकुमारान् आहूय शिल्पिभिः निर्मितं कृत्रिमं गृध्र वृक्षाग्रे समारोप्य लक्ष्यवेधार्य आज्ञां दत्तवान्।।

(2) शीघ्रं भवन्तः ………………………………………… तिष्ठध्वं सन्धितेषवः ॥ (श्लोक 3) [2011]

संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके आचार्य: द्रोणः स्वशिष्यान् राजकुमारान् अकथयत् यत् भवन्तः सर्वे अपि स्वधनूंषि आदाय शीघ्रम् अत्र आगच्छन्तु। ततः एतं भासं लक्षयित्वा धनुषि वाणं आरुह्य सत्वरः तिष्ठ।

(3) मद्वाक्यंसमकालं ………………………………………… कुरुत पुत्रकाः॥ (श्लोक 4) [2006]

संस्कृतार्थः आचार्य द्रोण: शिष्या निर्दिशति-मत् वचनकालम् एव अस्य दक्षिणः शिरः क्षित्वा भूमौ निपात्यताम्। आचार्यः कथयति-अहम् एकम् एकम् आहूय उपादिशामि। प्रियाः वत्सा:! यूयं तथैव कुरुत यथा अहम् इच्छामि।

(4) ततो युधिष्ठिरः ………………………………………… गुरुवाक्यप्रणोदितः॥ (श्लोक 6) [2012, 14]

संस्कृतार्थः गुरोः द्रोणाचार्यस्य पूर्वम् उक्तं ‘दुर्धर्ष बाणं सन्धत्स्व मत् वाक्यान्ते तं विमुञ्च’। इति कथनं श्रुत्वा प्रेरयित्वा च शत्रुनाशकः युधिष्ठिरः स्वहस्ते धनुः गृहीत्वा पक्षिणं लक्षयित्वा स्थितः।।

UP Board Solutions

(5) तमुवाचाऽपसपेंति ………………………………………… कुत्सयन् ॥ (श्लोक 11)

संस्कृतार्थः आचार्य द्रोण: युधिष्ठिरस्य उत्तरं श्रुत्वा अप्रसन्न: सन् तं कुत्सयनू अवदत्-त्वं गच्छ। इत्थं प्रकारेण त्वं लक्ष्यं वेद्धं न शक्नोसि। लक्ष्यवेधे परम एकाग्रतायाः आवश्यकता भवति।

(6) एवमुक्तः सव्यसाची ………………………………………… गुरुवाक्यप्रणोदितः ॥ (श्लोक 15) [2008, 11]

संस्कृतार्थः गुरोः द्रोणाचार्यस्य ‘इदानीं त्वया प्रहर्तव्यम् एतत् लक्ष्यं विलोक्यताम्’ इति कथनं श्रुत्वा प्रेरयित्वा (UPBoardSolutions.com) च सव्यसाची अर्जुन: स्वधनुः वृत्ताकारं कृतः। पक्षिणं लक्षयित्वा तं प्रहर्तुं उद्यत्वा सः अर्जुनः स्थितः। |

(7) पश्याम्येकं : ………………………………………… च भारत। (श्लोक 17) [2012]

संस्कृतार्थः आचार्यस्य प्रश्नानन्तरम् अर्जुनः अवदत्-भो भरतश्रेष्ठ गुरुवर! अहं केवलं लक्ष्यं पश्यामि न तु वृक्षं भवन्तं वा अन्यत् किम् अपि पश्यामि।

(8) ततः प्रीतमना ………………………………………… पाण्डवानां महारथम् ॥ (श्लोक 18) [2011, 14]

संस्कृतार्थः ततः आचार्यः द्रोणः प्रीतमना दुर्धर्षः च मुहूर्तात् अनन्तरं पाण्डवानां महान् योद्धा अर्जुनं पुनः अकथयत्।।

UP Board Solutions

(9) भासं पश्यसि ………………………………………… सोऽब्रवीत् ॥ (श्लोक 19) [2006, 11, 12]

संस्कृतार्थः द्रोणाचार्यः अवदत्-वत्स अर्जुन! चेत् त्वं केवलं भासं लक्ष्यम् एव पश्यसि तर्हि मम प्रश्नस्य (UPBoardSolutions.com) उत्तरं देहि किं त्वं सम्पूर्ण भासं पश्यसि?” अर्जुन: प्रत्यवदत्-अहं तु केवलं भासस्य शिरः पश्यामि, न तु शरीरम्।

Hope given UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 1 are helpful to complete your homework.
If you have any doubts, please comment below. UP Board Solutions try to provide online tutoring for you

Class 10 Sanskrit Chapter 10 UP Board Solutions मदनमोहनमालवीयः Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 10 Madan Mohan Malaviya Question Answer (गद्य – भारती)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 10 हिंदी अनुवाद मदनमोहनमालवीयः के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 10 मदनमोहनमालवीयः (गद्य – भारती)

परिचय

पं० मदनमोहन मालवीय एक अच्छे वकील, सफल कथावाचक, कुशल सम्पादक और सच्चे देशभक्त थे। इनकी मानसिक तथा वैचारिक श्रेष्ठता को देखकर ही महात्मा गाँधी इन्हें ‘महामना’ कहकर सम्बोधित करते थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में भी इनका महत्त्वपूर्ण स्थान था। ये शिक्षक बने, सम्पादक रहे और इन्होंने वकालत भी की, परन्तु इनके मन को शान्ति नहीं मिली। अन्ततः ये स्वतन्त्रता संग्राम में कूद पड़े। अशिक्षा को भारतीयों के पिछड़ेपन (UPBoardSolutions.com) का मुख्य कारण मानकर इन्होंने वाराणसी में गंगा के तट पर ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। इस विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए इन्होंने धनी-निर्धन सभी से यथाशक्ति आर्थिक सहायता माँगी। यह विश्वविद्यालय आज शिक्षा के क्षेत्र में अपना अनुपम योगदान देते हुए इनकी धवल कीर्ति को सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित कर रहा है। प्रस्तुत पाठ में मालवीय जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के विषय में विस्तार से प्रकाश डाला गया है।

UP Board Solutions

पाठ-सारांश (2006,07, 08, 09, 10, 11, 12, 13]

वेशभूषा गौरवर्ण एवं कान्तिमय शरीर, श्वेत वस्त्र, गले में दुपट्टा, सिर पर सफेद पगड़ी, मस्तक पर कुंकुम मिश्रित सफेद चन्दन का तिलक और सफेद उपानह; मालवीय जी के भारतीय चरित्र और हृदय की निर्मलता को प्रकट करते थे। वस्तुत: भारतीय संस्कृति ही इनमें सम्पूर्ण रूप में रूपायित थी।

जन्म पण्डित मदनमोहन मालवीय जी का जन्म सन् 1861 ई० में 25 दिसम्बर को प्रयाग के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता ब्रजनाथ चतुर्वेदी संस्कृत भाषा के प्रकाण्ड विद्वान् थे। उनके पूर्वज मालव देश से आकर प्रयाग में रहने लगे थे, इस कारण ये ‘मालवीय’ कहलाये। धन से सम्पन्न न होने पर भी धार्मिक होने के कारण ये समाज में समादृत थे।

शिक्षा मालवीय जी की प्रारम्भिक शिक्षा प्रयाग की एक संस्कृत पाठशाला में हुई थी। संस्कृत के अध्ययन से इनके हृदय में भारतीय आदर्श चरित्रों, भारतीय संस्कृति एवं देश के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो गयी। बाद में इनकी शिक्षा राजकीय हाईस्कूल’ तथा ‘म्योर सेण्ट्रल कॉलेज’ में हुई। पारिवारिक परिस्थितियों के प्रतिकूल होने के कारण इन्होंने अध्यापन-कार्य प्रारम्भ किया और पर्याप्त समय बाद एल-एलबी० की परीक्षा उत्तीर्ण करके उच्च न्यायालय, प्रयाग’ में वकालत प्रारम्भ कर दी।

प्रतिभा मालवीय जी ने अखिल भारतीय कांग्रेस दल के कलकत्ता अधिवेशन में व्यवस्थापिका सभा विषय पर विचारपूर्ण और गम्भीर भाषण दिया। उस समय इनकी आयु मात्र पच्चीस वर्ष की थी। इनके विशद् विचारों को सुनकर उच्चकोटि के नेता और देशसेवक स्तब्ध रह गये (UPBoardSolutions.com) और इन्होंने राष्ट्रीय नेताओं की अग्रिम पंक्ति में अपना स्थान बना लिया। इनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह ने इनसे ‘हिन्दुस्तान’ दैनिक के सम्पादन का अनुरोध किया।

हिन्दी-सेवा और राष्ट्र-सेवा ‘हिन्दुस्तान’ पत्र का सम्पादन करते हुए मालवीय जी ने राष्ट्रीय भावना और हिन्दी भाषा का प्रचार किया। ‘हिन्दुस्तान’ के अतिरिक्त अन्य पत्रों का सम्पादन करते समय भी राष्ट्र-सेवा और हिन्दी भाषा की सेवा ही इनका प्रमुख लक्ष्य था। न्यायालयों में भी हिन्दी भाषा का प्रयोग हो, इसके लिए मालवीय जी ने पर्याप्त प्रयास किया।

वकालत मालवीय जी के विचार स्पष्ट, गम्भीर और युक्तिसंगत होते थे। अंग्रेजों की आलोचना करते हुए भी ये भयभीत नहीं होते थे। पत्र-सम्पादन में मन न लगने के कारण इन्होंने कानून की शिक्षा प्राप्त की और एल-एल०बी० की परीक्षा उत्तीर्ण करके प्रयाग के उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। थोड़े ही दिनों में इन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर न्याय के क्षेत्र में पर्याप्त ख्याति अर्जित कर ली। ये कभी झूठे मुकदमों की पैरवी नहीं करते थे।

देश की स्वतन्त्रता में योगदान अध्यापक रहते हुए और पत्रों का सम्पादन करते हुए भी मालवीय जी को शान्ति नहीं मिली। देश की परतन्त्रता से इनका मन बहुत खिन्न रहा करता था। ये देश को स्वतन्त्र कराने की चिन्ता में लग गये। तीन बार ये अखिल भारतीय कांग्रेस दल के सभापति बने। सन् 1931 ई० में अंग्रेजों के साथ सन्धि वार्ता करने के लिए गाँधी जी के साथ इंग्लैण्ड गये। आंग्लभाषा में व्यक्त किये गये इनके विचारों से अंग्रेज बहुत प्रभावित हुए।

UP Board Solutions

रचनात्मक कार्य मालवीय जी ने राष्ट्र-सेवा में लगे रहकर प्रयाग में ‘मैक्डॉनल हिन्दू छात्रावास और ‘मिण्टो पार्क का निर्माण कराया। देश की उन्नति के लिए शिक्षा को विशेष साधन मानकर वाराणसी में गंगा के तट पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। इस विश्वविद्यालय के परिसर में अनेक महाविद्यालय हैं, जिनमें विदेशी भाषा, विज्ञान, कला आदि का ज्ञान कराते हुए भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन और इतिहास की भी शिक्षा दी जाती है। मालवीय जी विभिन्न पर्वो के अवसरों पर भागवत् और पुराणों की कथा सुललित और मधुर भाषा में छात्रों और अध्यापकों को स्वयं सुनाते थे। भारतीय आचार-विचारों से छात्रों को परिचित कराना ही इनका उद्देश्य था। विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद से ही ये उसके कुलपति रहे। ये छात्रों को अपने प्रिय पुत्र-सा मानते थे। किसी छात्र के बीमार पड़ने पर पितृवत् वात्सल्य प्रदान करते थे और आर्थिक संकट पड़ने पर सहायता करते थे।

मालवीय जी देश के असहायजनों के कष्टों को देखकर अत्यन्त दु:खी रहते थे। इन्होंने देश की एकता और अखण्डता के लिए महान् प्रयास किये। सन् 1944 ई० में भारत में साम्प्रदायिक झगड़े हुए जिसमें हजारों लोग मारे गये। मालवीय जी का हृदय इसको देखकर बहुत दुःखी हुआ (UPBoardSolutions.com) और उन्होंने प्राण त्याग दिये। उनका यश आज भी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के रूप में स्थित है।

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1)
गौरं कान्तिमयं वपुः, धवलं परिधानं, गले लम्बितमुत्तरीयं, शिरसि धवलोष्णीषं, ललाटे कुङ्कुमगर्भितधवलचन्दनतिलकं, धवले चोपानहौ एतत्सर्वं मदनमोहनमालवीयस्य भारतीयचारित्र्यं हृदयस्य च विमलत्वं निदर्शयति स्म। वस्तुतस्तु, भारतीयसंस्कृतिस्तस्मिन् रूपायिता जाता।

शब्दार्थ कान्तिमयम् = कान्ति से युक्त। वपुः = शरीर। परिधानम् = वस्त्र। लम्बितमुत्तरीयम्= लटकता हुआ दुपट्टा। धवलोष्णीषम् = सफेद पगड़ी। कुङ्कुमगर्भित = केसर मिश्रित। उपानही = जूते। चारित्र्यम् = चरित्र को। विमलत्वं = विमलता को। निदर्शयति स्म = बतलाते थे। वस्तुतस्तु = वास्तव में। रूपायिता जाता = साकार हो गयी थी। सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती’ में संकलित ‘मदनमोहनमालवीयः’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में मालवीय जी की वेशभूषा एवं व्यक्तित्व के विषय में बताया गया है।

अनुवाद गौरवर्ण कान्तियुक्त शरीर, श्वेत वस्त्र, गले में लटकता हुआ दुपट्टा, सिर पर सफेद पगड़ी, मस्तक पर कुमकुम मिला सफेद चन्दन का तिलक, सफेद जूते; ये सभी मदनमोहन मालवीय के भारतीय चरित्र और हृदय की पवित्रता को बतलाते थे। वास्तव में भारतीय संस्कृति इनमें साकार हो गयी थी।

(2)
पण्डितमदनमोहनमालवीयस्य जन्म एकषष्ट्युत्तराष्टादशशततमे खीष्टाब्दे दिसम्बरमासस्य पञ्चविंशति दिनाङ्के (25-12-1861) तीर्थराजे प्रयागे एकस्मिन् ब्राह्मणकुलेऽभवत्। अस्य जनकः। पण्डितव्रजनाथचतुर्वेदः संस्कृतभाषायाः विश्रुतो विद्वानासीत्। निर्धनोऽपि धर्मकर्मणि सततरतोऽयं विद्वान् समाजे समादृत आसीत्। एतस्य पूर्वजा मालवदेशादागत्योत्तरभारते न्यवसन्नतस्ते ‘मालवीय’ इति पदेन सम्बोध्या अभवन्।

UP Board Solutions

शब्दार्थ एकषष्ट्युत्तराष्टादशशततमे = अठारह सौ इकसठ में। विश्रुतः = प्रसिद्ध, जाने-माने। एतस्य = इनके। न्यवसन्नतस्ते = बसे, इसलिए वे। सम्बोध्याः = सम्बोधन करने योग्य।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में मालवीय जी के जन्म का वर्णन किया गया है।

अनुवाद पण्डित मदनमोहन मालवीय का जन्म सन् 1861 ई० में दिसम्बर महीने की 25 तारीख को तीर्थराज प्रयाग के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता पण्डित ब्रजनाथ चतुर्वेदी संस्कृत भाषा के प्रसिद्ध विद्वान् थे। निर्धन होते हुए भी धर्म के कार्य में निरन्तर लगा हुआ यह (UPBoardSolutions.com) विद्वान् समाज में सम्माननीय था। इनके पूर्वज मालव देश से आकर उत्तर भारत में रहते थे; अत: लोग उनको ‘मालवीय’ कहकर पुकारते थे।

(3)
मदनमोहनमालवीयस्य प्रारम्भिक शिक्षा प्रयागे एवैकस्यां संस्कृतपाठशालायां जाता। संस्कृताध्ययनेन बाल्य एव तस्य मनसि भारतीयादर्शचरितानां कृते भारतीयसंस्कृतेश्च कृते बह्लादरः समजायत। स्मृतिपुराणमहाभारतभागवतादिभारतीयग्रन्थानामनुशीलनेन भारतदेशं प्रति तस्य हृदि श्रद्धा समुत्पन्ना। दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनं स कामयते स्म। अतः बाल्यकाले एव तस्य हृदि देशभक्तेः मानवसेवायाः मानवजीवनस्याभ्युदयस्य बीजान्युप्तानि जातानि यानि काले विकसितभूतानि फलितानि।

मदनमोहनमालवीयस्य ……………………………………………… कामयते स्म। [2007]

शब्दार्थ बह्लादरः = अत्यधिक आदर। समजायत = उत्पन्न हो गया था। भारतीयादर्शचरितानां = भारत के आदर्श पुरुषों के चरित्रों के अनुशीलनेन = अध्ययन और मनन से। प्राणिनाम् = प्राणियों के। आर्तिनाशनम् = दुःख दूर करना। कामयते स्म = चाहते थे। बीजान्युप्तानि = बीज बोये गये थे।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में मालवीय जी की भारतीय संस्कृति के प्रति आदर-भावना का वर्णन किया गया है।

अनुवाद मदनमोहन मालवीय जी की प्रारम्भिक शिक्षा प्रयाग में ही एक संस्कृत पाठशाला में हुई। संस्कृत के अध्ययन से बचपन में ही उनके मन में भारत के आदर्श चरित्रों के लिए और भारतीय संस्कृति के लिए बहुत आदर उत्पन्न हो गया था। स्मृति, पुराण, महाभारत, भागवत् आदि भारतीय ग्रन्थों के अध्ययन-मनन से भारत देश के प्रति उनके हृदय में श्रद्धा उत्पन्न हो गयी। वे दुःख से पीड़ित प्राणियों के दुःख का नाश करना। चाहते थे; अत: बचपन में ही उनके हृदय में देश-भक्ति, मानव-सेवा और मानव-जीवन की उन्नति के बीज बोये गये थे, जो समय आने पर विकसित और फलित हो गये।

UP Board Solutions

(4)
कालान्तरे सः प्रयागे प्रथमसंस्थापिते राजकीय हाईस्कूल नाम्नि विद्यालये पठन् ‘इण्ट्रेन्स परीक्षामुदतरत्। ततः म्योर सेण्ट्रल कालेजेऽधीयानः बी0ए0 परीक्षायाः पारं गतः। अग्रे पठितुमिच्छन्तमप्यर्थकोयँ तमबाधत। कर्त्तव्यसङ्घाते किं पूर्वं करणीयमिति विशिष्टकर्तव्यनिर्धारणमेव विवेकशालिनां वैशिष्ट्यम्। अतः जीवननिर्वाहार्थं तेनाध्यापनवृत्तिः स्वीकृता।

शब्दार्थ परीक्षामुदतरत् = परीक्षा उत्तीर्ण की। अधीयानः = पढ़ते हुए। पारं गतः = पार गया, उत्तीर्ण की। पठितुमिच्छन्तमप्यर्थकार्यम् (पठितुम् + इच्छन्तम् + अपि + अर्थकार्यम्) = पढ़ने की इच्छा करने वाले को भी। धन की कमी। तम् = उनको। अबाधत = बाधा पहुँचायी। कर्त्तव्यसङ्घाते = बहुत-से कर्तव्य होने पर निर्धारणम् एव = निश्चय करना ही।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में मालवीय जी की शिक्षा और जीविकोपार्जन प्रारम्भ करने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद कुछ समय बाद उन्होंने प्रयाग में सबसे पहले स्थापित राजकीय हाईस्कूल नाम के विद्यालय में पढ़ते हुए इण्ट्रेन्स परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद म्योर सेण्ट्रल कॉलेज में पढ़ते हुए बी०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे पढ़ना चाहते हुए भी उन्हें आर्थिक कमी ने बाधा पहुँचाई। अनेक कर्तव्य (UPBoardSolutions.com) होने पर पहले क्या करना है’ इस विशेष कर्तव्य का निश्चय करना ही विवेकशील पुरुषों की विशेषता है। अत: जीवन-निर्वाह के लिए उन्होंने अध्यापन की जीविका स्वीकार की।

(5)
तदैव कलिकातानगरे अखिलभारतीयकॉग्रेसदलस्य अधिवेशनमभूत्। मालवीय महोदयस्तत्र गतः। व्यवस्थापिकासभाविषयमवलम्ब्यातीव गम्भीरं विचारपूर्ण भाषणं चाकरोत्। पञ्चविंशतिवर्षीयस्य यूनः मालवीयस्य मनोहारिण्या शैल्या विशदविचारान् संश्रुत्य नेतार इतरे चोपस्थिता जनाः देशसेवकाश्च चकिता अभवन्। एकेनैव भाषणेनासौ राष्ट्रमञ्चस्थानां पङ्क्तौ स्वमुपावेशयत्। तस्याध्ययनस्य तस्य सदाशयतादिगुणानां तस्य च विनयस्येदं प्रतिफलमासीत्। तत्रैव प्रतापगढस्थकालाकाङ्करस्य देशभक्तो राजारामपालसिंहस्तस्य वैशिष्ट्येनाकृष्टः ‘हिन्दुस्तान’ दैनिकपत्रस्य सम्पादनायानुरोधं कृतवान्।

शब्दार्थ अधिवेशनमभूत् = अधिवेशन हुआ। विषयमवलम्ब्य = विषय का सहारा लेकर। पञ्चविंशति = पच्चीस। विशदविचारान् = स्पष्ट विचारों को। संश्रुत्य = सुनकर। एकेनैव = एक से ही। उपावेशयत् = प्रवेश करा लिया। सदाशयता = उच्च विचारों वाले भाव। वैशिष्ट्येनाकृष्टः = विशेषता से आकर्षित। कृतवान् = किया।

प्रसग प्रस्तुत पद्यांश में मालवीय जी के तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व को प्रभावित करने और कांग्रेस में सम्मिलित होने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद तभी (उसी समय) कलकत्ता नगर में अखिल भारतीय कांग्रेस दल का अधिवेशन हुआ। मालवीय जी वहाँ गये। व्यवस्थापिका सभा के विषय को लेकर (उन्होंने) अत्यन्त गम्भीर और विचारपूर्ण भाषण किया। पचीस वर्षीय युवा मालवीय जी की मनोहर शैली में स्पष्ट विचारों को सुनकर नेता और दूसरे उपस्थित लोग और देशसेवक चकित हो गये। एक ही भाषण से उन्होंने राष्ट्रीय मंच पर बैठने वाले नेताओं की श्रेणी में अपने को बैठा दिया। यह उनके अध्ययन का, उनकी सदाशयता आदि गुणों का और उनकी विनय का परिणाम था। वहीं पर प्रतापगढ़ के कालाकाँकर के देशभक्त राजा रामपाल सिंह ने उनकी विशेषता से आकर्षित होकर ‘हिन्दुस्तान’ दैनिक पत्र के सम्पादन के लिए उनसे अनुरोध किया।

UP Board Solutions

(6)
‘हिन्दुस्तान’ पत्रस्य सम्पादनं कुर्वता मालवीयमहोदयेन तदानीम् आङ्ग्लशासकैराक्रान्ते देशे चाङ्ग्लभाषायाऽऽक्रान्तायां शिक्षायां राष्ट्रियभावस्य हिन्दी-भाषायाश्च दृढतया प्रचारः कृतः। हिन्दुस्तानपत्रमतिरिच्येतरेषामनेकपत्राणामपि सम्पादनं तेन कृतं परं सर्वत्र राष्ट्रसेवा हिन्दीभाषासेवा (UPBoardSolutions.com) च तस्य मुख्यलक्ष्ये आस्ताम्। न्यायालयेषु हिन्दीभाषायाः प्रयोगनिर्णये मालवीयमहोदयस्य विशिष्टमवदानं विद्यते।

शब्दार्थ कुर्वता = करते हुए। तदानीम् = उस समय। आक्रान्ते = दबाये जाने पर। अतिरिच्य = अतिरिक्त आस्ताम् = थे। अवदानम् = योगदान।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में मालवीय जी की हिन्दी-सेवा करने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद ‘हिन्दुस्तान’ पत्र का सम्पादन करते हुए मालवीय जी ने उस समय देश को अंग्रेज शासकों द्वारा दबाये जाने पर और शिक्षा के अंग्रेजी भाषा के द्वारा दबाये जाने पर राष्ट्रीय भावना का और हिन्दी भाषा का दृढ़ता से प्रचार किया। ‘हिन्दुस्तान’ पत्र के अतिरिक्त उन्होंने दूसरे अनेक पत्रों का भी सम्पादन किया, परन्तु सभी जगह राष्ट्र की सेवा और हिन्दी भाषा की सेवा उनके मुख्य लक्ष्य थे। न्यायालयों में हिन्दी भाषा के प्रयोग के निर्णय में मालवीय जी का विशेष योगदान है।

(7)
पुत्राणां सम्पादनावसरे प्रकटिता अस्य विचाराः सुस्पष्टा, गम्भीरा, युक्तियुक्ताश्चाभवन्। अतः विरोधिनोऽपि तं प्रशंसन्ति स्म। आङ्ग्लशासनस्यालोचनां कुर्वन् मालवीयमहोदयो न भयमनुभूतवान् नाऽपि संकोचं कृतवान्। न दैन्यं, न पलायनमिति तस्य जीवनसूत्रामासीत्। पत्रसम्पादनकर्मणि तस्य मनो नारमत। गुरुजनानां परामर्शमनुसृत्यासौ एल-एल०बी० कक्षायां पठितुमारब्धवान् ससम्मानं च तां परीक्षामुदतरत्। एल-एल०बी० पदव्या विभूषितः सन् प्रयागस्थोच्चन्यायालये अधिवक्तृकर्म कर्तुं प्रारभत। स्वल्पैरेवाहोभिः न्यायालये न्यायक्षेत्रे च परां ख्यातिमवाप। मृषावादानसौ न स्वीकरोति स्म, अतः सत्यं प्रति तस्य दृढो विश्वासः अधिवक्तृकर्मनिरतानां कृतेऽद्यापि आदर्शभूतः सन्तिष्ठते।

शब्दार्थ युक्तियुक्ताश्चाभवन् = और युक्तियुक्त थे। प्रशंसन्ति स्म = प्रशंसा करते थे। अनुभूतवान् = अनुभव किया। दैन्यम् = दीनता। पलायनम् = पलायन, भागना। जीवनसूत्रम् = जीवन के मुख्य उद्देश्य नारमत (न + अरमत) = नहीं लगा। परामर्श = सलाह। अनुसृत्यासौ = अनुसरण करके इन्होंने। अधिवक्तृकर्म = वकालतं का कार्य। स्वल्पैरेवाहोभिः (स्वल्पैः + एव + अहोभिः) = थोड़े ही दिनों में। ख्यातिम् अवाप = प्रसिद्धि को प्राप्त किया। मृषावादानसौ = झूठे मुकदमों को ये। सन्तिष्ठते = स्थित है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में मालवीय जी द्वारा राष्ट्र-सेवा और वकालत किये जाने का वर्णन किया गया है।

UP Board Solutions

अनुवाद पत्रों के सम्पादन के अवसर पर प्रकट किये गये इनके विचार अत्यन्त स्पष्ट, गम्भीर और युक्तिसंगत होते थे; अत: विरोधी भी उनकी प्रशंसा करते थे। अंग्रेजी शासन की आलोचना करते हुए मालवीय जी ने न भय का अनुभव किया, न ही संकोच किया। ने दीनता (दिखाना), न (कर्तव्य-पथ) पलायन करना उनके जीवन का सत्र था। पत्रों के सम्पादन के काम में उनका मन नहीं लगा। गरुजनों की सलाह के अनुसार उन्होंने एल-एल०बी० की (UPBoardSolutions.com) कक्षा में पढ़ना आरम्भ किया और सम्मानसहित परीक्षा उत्तीर्ण की। एल-एल०बी० की उपाधि से विभूषित होते ही उन्होंने प्रयाग के उच्च न्यायालय में वकालत करना प्रारम्भ कर दिया। थोड़े ही दिनों में न्यायालय में और न्याय के क्षेत्र में अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त कर ली। ये झूठे मुकदमे स्वीकार नहीं करते थे; अत: सत्य के प्रति उनका दृढ़ विश्वास वकालत के काम में लगे हुए लोगों के लिए आज भी आदर्श रूप में स्थित है।

(8)
मदनमोहनमालवीयोऽध्यापकोऽभवत्, पत्रकारकर्म चानुष्ठितवान् परं सः सन्तुष्टि शान्ति च नालभत। देशस्य पारतन्त्र्येण तस्य मनः भृशमदूयत। कथं वा देशः पारतन्त्रशृङ्खलामुच्छिद्य स्वतन्त्रो भविष्यतीति चिन्ताचिन्तितः सन् मालवीयः अखिलभारतीयकॉग्रेसदलमाध्यमेन पृथक्रूपेण मातृभूमेः मुक्तिकर्मणि संलग्नो जातः। स्वकार्येण स्वविचारेण चासौ कॉग्रेसदलस्य त्रिवारं सभापतिपदमलङ्कृतवान्। हिमगिरिमिव तस्योत्तुङ्गं मनो दृष्ट्वा महात्मा गान्धी तं ‘महामना’ इत्यवोचत्। एकत्रिंशदुत्तरैकोनविंशतिशततमे वर्षे (1931) आङ्ग्लशासकैः सह सन्धिवार्ता कर्ती महात्मना गान्धिना सह अयमपि इङ्ग्लैण्डे-देशं जगाम्। आङ्ग्लभाषायां व्यक्तान् तस्य विचारान् संश्रुत्य इङ्ग्लैण्डवासिनः अपि मुग्धा अभवन्।

मदनमोहनमालवीयो ……………………………………………… संलग्नो जातः।

शब्दार्थ अनुष्ठितवान् = किया। नालभत = प्राप्त नहीं हुई। पारतन्त्र्येण = परतन्त्रता से। भृशंम् = अत्यधिक अदूयते = दुःखी हुआ। शृङ्खलां = जंजीर को। उच्छिद्य = तोड़कर। मुक्तिकर्मणि = स्वतन्त्रता के काम में। त्रिवारं = तीन बार। सभापतिपदमङ्कृतवान् = सभापति का पद सुशोभित किया। उत्तुङ्गम् = ऊँचा। इत्यवोचत् = ऐसा बोले। एकत्रिंशदुत्तरैकोनविंशतिशततमे = उन्नीस सौ इकतीस में। सन्धिवार्ताम् = समझौते की बात को। मुग्धाः = प्रभावित, प्रसन्न।

UP Board Solutions

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में मालवीय जी द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्त कराने में किये गये योगदान का वर्णन किया गया है।

अनुवाद मदनमोहन मालवीय जी अंध्यापक हुए और पत्रकार का कार्य किया, परन्तु उन्हें सन्तोष और शान्ति प्राप्त न हुई। देश की परतन्त्रता से उनका मन बहुत दुःखी हुआ। हमारा देश परतन्त्रता की श्रृंखला को तोड़कर कैसे स्वतन्त्र होगा, इस चिन्ता से चिन्तित होते हुए मालवीय जी अखिल भारतीय कांग्रेस दल के माध्यम से पृथक् रूप से मातृभूमि की स्वतन्त्रता के कार्य में लग गये। अपने कार्य से और अपने विचार से इन्होंने कांग्रेस दल के सभापति पद को तीन बार सुशोभित किया। हिमालय के समान ऊँचे उनके मन को देखकर महात्मा गाँधी ने उन्हें ‘महामना’ कहा। सन् 1931 ई० में अंग्रेज शासकों के साथ सन्धि-वार्ता करने के लिए मुहात्मा गाँधी के साथ ये भी इंग्लैण्ड देश गये। अंग्रेजी भाषा में प्रकट किये गये उनके विचारों को सुनकर इंग्लैण्डवासी (अंग्रेज) भी प्रभावित हुए।

(9)
राष्ट्रसेवाकर्मणि निरतोऽपि महामना मालवीयोऽन्येष्वपि रचनात्मककर्मसु प्रवृत्त आसीत्। प्रयागे जनान् धनं याचित्वा मैक्डॉनलहिन्दूछात्रावासस्य निर्माणमसौ अकारयत्। तस्यैवोद्योगेन प्रयागस्य प्रख्यातस्य मिण्टोपार्क इत्यस्यापि निर्माणं जातम्। समग्रे च देशे शिक्षायाः ह्रासदशामवलोक्य अशिक्षैवास्माकं पारतन्त्र्यस्य हेतुरिति सोऽमन्यत। अतो देशस्योन्नत्यै क्रियमाणैरन्यैरुद्योगैः सह शिक्षायाः विकासायापि प्रयत्नो विधेय इति तस्य दृढा मतिरासीत्। सततं चिन्तयन् सः काशीहिन्दूविश्वविद्यालयस्य संस्थापनायाः सङ्कल्पं हृदि निदधौ। षोडशोत्तरैकोनविंशतिशततमे वर्षे (1916) वसन्तपञ्चमीपर्वदिने काश्यां पुण्यसलिलायाः गङ्गायास्तटे लोकोत्तरमिदं कार्यं संवृत्तम्। भिक्षावृत्या जनान्, श्रेष्ठिनो, राज्ञो, महाराजान्, वैदेशिकशासनमपि धनं याचित्वा विश्वविद्यालयस्य संस्थापनं तस्यापूर्वमनोबलस्य सङ्कल्पदृढतायाश्च (UPBoardSolutions.com) द्योतकं वर्तते। पञ्चक्रोशपरिमिते क्षेत्रेऽभिव्याप्ते विश्वविद्यालयपरिसरे निर्मितानि विविधविद्यामहाविद्यालयभवनानि दृष्ट्वा कस्य वा भारतीयस्य मनो नाऽऽह्लादते को वा वैदेशिको विस्मितो न जायते। इयति विस्तृते भूखण्डे कस्यचिदपि विश्वविद्यालयस्य जगति स्थितिः न श्रूयते।

राष्ट्रसेवाकर्मणि ……………………………………………… सोऽमन्यत।

शब्दार्थ निरतोऽपि = लगे हुए भी। प्रवृत्तः = लगा हुआ। याचित्वा = माँगकर। अकारयेत् = कराया। प्रख्यातस्य = प्रख्याता ह्रासदशाम् = घटने की हालत को। अवलोक्य = देखकर। अशिक्षेवास्माकम्=अशिक्षा ही हमारी। अमन्यत = मानते थे। देशस्योन्नत्यै = देश की उन्नति के लिए। क्रियमाणैरन्यैरुद्योगैः सह = किये जाते हुए अन्य उद्योगों के साथ। विधेय = करना चाहिए। मतिरासीत् = बुद्धि थी, विचार था। निदधौ = धारण किया। षोडशोत्तरैकोनविंशतिशततमे = उन्नीस सौ सोलह में। पुंण्यसलिलायाः = पवित्र जल वाली। लोकोत्तरमिदम् = लोक से श्रेष्ठ यह। संवृत्तम् = पूरा हुआ। द्योतकं = सूचका अभिव्याप्ते = फैले हुए। परिसरे = चहारदीवारी में। आह्लादते = प्रसन्न होता है। इयति = इतने। न श्रूयते = नहीं सुनी जाती है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में देश की उन्नति के लिए मालवीय जी द्वारा विशाल विश्वविद्यालय की स्थापना किये जाने का वर्णन है।

UP Board Solutions

अनुवाद राष्ट्र-सेवा के कार्य में लगे हुए महामना मालवीय जी दूसरे रचनात्मक कार्यों में भी लगे रहते थे। उन्होंने प्रयाग के लोगों से धन माँगकर मैक्डॉनल हिन्दू छात्रावास का निर्माण कराया। उन्हीं के परिश्रम से प्रयाग के प्रसिद्ध मिण्टो पार्क का भी निर्माण हुआ। सम्पूर्ण देश में शिक्षा की हीन दशा देखकर ‘अशिक्षा ही हमारी परतन्त्रता का कारण है ऐसा उन्होंने माना। इसलिए देश की उन्नति के लिए किये गये अन्य प्रयत्नों के साथ शिक्षा के विकास के लिए भी प्रयत्न करना चाहिए, यह उनका दृढ़ विचार था। निरन्तर चिन्तन करते हुए उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का संकल्प हृदय में धारण किया। सन् 1916 ई० में वसन्तपंचमी के त्योहार के दिन काशी के पवित्र जल वाली गंगा के तट पर यह अलौकिक कार्य सम्पन्न हुआ। भिक्षावृत्ति से, लोगों से, सेठों से, राजाओं से, महाराजाओं से, विदेशी सरकार से भी धन माँगकर (UPBoardSolutions.com) विश्वविद्यालय की स्थापना करना उनके अद्भुत मनोबल और संकल्प की दृढ़ता का सूचक है। पाँच कोस की सीमा-क्षेत्र में फैले हुए विश्वविद्यालय के अहाते में बने हुए विभिन्न विद्या के महाविद्यालय भवनों को देखकर किसे भारतीय का मन प्रसन्न नहीं हो जाता है अथवा कौन विदेशी आश्चर्यचकित नहीं हो जाता है। इतने विशाल क्षेत्र में संसार में किसी भी विश्वविद्यालय की स्थिति नहीं सुनी जाती है।

(10)
अस्मिन् विश्वविद्यालयेऽध्ययनरताछात्राः वैदेशिक भाषा-विज्ञान-कला-कौशल-प्रभृतिविषयेषु निष्णाताः सन्तः भारतीय संस्कृतिं धर्मदर्शनमितिहासं च न विस्मरेयुरिति तस्य प्रयासोऽभूत्। अतोऽध्यापनावसरे भारतीयाचारान् स छात्रानशिक्षयत्। विभिन्नपर्वावसरेषु च भारतस्य प्राणभूतभागवतमहापुराणस्य कथां सुललितभाषया मधुरेण च स्वरेण छात्रान् प्राध्यापकांश्चाश्रावयत्। विविधविषयज्ञानसम्पादनसममेव छात्रा भारतीयाचारविचारेण च परिचितास्तिष्ठेयुरिति तस्य लक्ष्यमासीत्। स भारतीयस्वातन्त्र्यमपि भारतीयतामधिकृत्यैव भवेदिति कामयते स्म। सः पूर्णभारतीय आसीत्। [2015]

शब्दार्थ निष्णाताः = निपुण, विद्वान्। विस्मरेयुः = भूलना चाहिए। छात्रानशिक्षयत् = छात्रों को सिखाया। प्राणभूतभागवतमहापुराणस्य = मन में बसे भागवत महापुराण की। सुललितभाषया = अत्यन्त सुन्दर भाषा द्वारा प्राध्यापकान् = प्राध्यापकों को। अश्रावयत् = सुनाते थे। सममेव = साथ ही। अधिकृत्य = ग्रहण करके। कामयते स्म = कामना करता था।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में मालवीय जी द्वारा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में भारतीयता की शिक्षा देने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद इस विश्वविद्यालय में अध्ययन में लगे हुए छात्र विदेशी भाषा, विज्ञान, कला-कौशल आदि में विद्वान् होते हुए भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन और इतिहास को न भूलें, यह उनका प्रयास था; अत: अध्यापन के समय वे छात्रों को भारतीय आचारों की शिक्षा देते थे। विभिन्न त्योहारों के अवसरों पर भारत के प्राणस्वरूप भागवत् महापुराण की कथा को सुन्दर भाषा में और मधुर स्वर में छात्रों और प्राध्यापकों को सुनाते थे। विविध विषयों के ज्ञान की प्राप्ति के साथ ही छात्र भारतीय आचार और विचार से भी परिचित रहें, यह उनका लक्ष्य था। भारत की स्वतन्त्रता भी भारतीयता को ग्रहण करके ही हो, ऐसा वे चाहते थे। वे पूर्ण रूप से भारतीय थे।

UP Board Solutions

(11)
विश्वविद्यालयस्य संस्थापनानन्तरमेव स कुलपतिपदमलङ्कृतवान्। कुलपतिपदमलङ्कुर्वन् स छात्रान् प्रियपुत्रानिवामन्यत। अर्थसङ्कटे देहसङ्कटे ग्रस्तः कश्चित् छात्र इति ज्ञात्वा तस्य सङ्कटमचिरमसौ पितृवदपानयत्। कुलपतिस्तु स पदेनासीत् व्यवहारेण च कुलपिता अभवत्। [2006, 12]

शब्दार्थ अलङ्कुर्वन्=अलंकृत करते हुए। अमन्यत=मानते थे। अचिरम्=तुरन्त अपानयत्=दूर करते थे।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में मालवीय जी के द्वारा विश्वविद्यालय के कुलपति रूप में किये गये कार्यों का वर्णन किया गया है।

अनुवाद विश्वविद्यालय की स्थापना करने के बाद ही उन्होंने कुलपति के पद को सुशोभित किया। कुलपति के पद को सुशोभित करते हुए, वे छात्रों को प्रिय पुत्रों के समान मानते थे। धन के संकट या शारीरिक कष्ट में कोई छात्र ग्रस्त है, यह जानकर वे उसके संकट को पिता की तरह तुरन्त दूर करते थे। वे पद से कुलपति थे और व्यवहार से कुलपिता थे।

(12)
काशीहिन्दूविश्वविद्यालयस्य विकासाय सततं प्रयत्नरतोऽपि मालवीयमहोदयः देशस्य असहायजनानां महान्तं क्लेशं दशैं दशैं परमः खिन्नो अभवत्। भारतस्याखण्डतायाः तस्यैकत्वस्य च निदर्शनं विश्वविद्यालयरूपेण तेन पुरःकृतम्। तन्निमित्तं तेन गुरुः प्रयासो विहितः। चतुश्चत्वारिंशदुत्तरैकोनविंशतितमे वर्षे (UPBoardSolutions.com) (1944) साम्प्रदायिको झञ्झावातः समुत्थितः। देशस्यानेकेषु भागेषु प्रज्वलितः साम्प्रदायिकताग्निः भारतस्य सांस्कृतिकं प्रासादं भस्मसादकरोत्। ब्रिटिशशासनप्रयुक्तकुटिलनयेनोत्थितो झञ्झावातो मालवीयमहोदयस्य मनः स्थितं भारतस्य चित्रं विकृतमकरोत्। कुटिलराजनीतिमुग्धा धर्मम्प्रति भ्रान्ताः नेतारो यथा ताण्डवमरचयन् तत्स्मृत्वाऽद्यपि हृदयं प्रकामं प्रकम्पते। सहस्रशः प्राणास्तदनले हुताः। सहस्रशोजना गृहहीनाः जाताः। लक्षाधिकाः शरणार्थिनोऽभवन्। मालवीयमहोदयस्य चित्तमतयँ तद्दुःखं सोढुं नाशक्नोत्। विश्वविद्यालयस्थे कुलपतिभवने स प्राणानत्यजत्। मालवीयमहोदयस्य विपुलं यशः विश्वविद्यालयरूपेण जगति शाश्वतं स्थास्यति।

UP Board Solutions

शब्दार्थ असहायजनानां = निस्सहाय लोगों की। दशैं दर्शम् = देख-देखकर) खिन्नः = दुःखी। तस्यैकत्वस्य = उसकी एकता का निदर्शनम् = उदाहरण, दृष्टान्त पुरः = सामने। गुरुः = महान्। चतुश्चत्वारिंशदुत्तरैकोनविंशतितमे = उन्नीस सौ चवालीस में। झञ्झावातः = तूफान। समुत्थितः = उठा। प्रज्वलितः = जली हुई। साम्प्रदायिकताग्निः = जातिगत और वर्गगत-भेद की अग्निा प्रासादम् = महल को। भस्मसादकरोत् = जलाकर खाक कर दिया। विकृतमकरोत् (विकृतम् + अकरोत्) = बिगाड़ दिया। प्रकामम् = अत्यधिक प्रकम्पते = काँप उठा। तदनले (तत् + अनले) = उस अग्नि में। हुताः = जल गये। शरणार्थिनः अभवन् = शरणार्थी (शरण पाने के इच्छुक) हो गये। अतर्व्यम् = तर्क न किया जाने योग्य सोढुं = सहने के लिए। विपुलं = अत्यधिक शाश्वतं = सदैव, हमेशा। स्थास्यति = स्थित रहेगा।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में मालवीय जी की संवेदनशीलता के बारे में बताया गया है कि मालवीय जी ने देश में उठे हुए साम्प्रदायिकता के तूफान से अत्यधिक दुःखी होकर प्राण त्याग दिये।

अनुवाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विकास के लिए निरन्तर प्रयत्न में लगे हुए भी मालवीय जी देश के असहायसनों के अत्यन्त कष्ट को देख-देखकर अत्यधिक दु:खी होते थे। भारत की अखण्डता का और उसकी एकता का उदाहरण उन्होंने विश्वविद्यालय के रूप में सामने रख दिया। उसके लिए उन्होंने महान् प्रयास किया। सन् 1944 ई० में साम्प्रदायिक तूफान उठा। देश के अनेक भागों में जलती हुई साम्प्रदायिकता की आग ने भारत के सांस्कृतिक महल को भस्मीभूत कर दिया। ब्रिटिश सरकार की कुटिल नीति से उठे हुए तूफान ने मालवीय जी के मन में स्थित भारत के चित्र को बिगाड़ दिया। कुटिल राजनीति पर मुग्ध हुए, धर्म के प्रति भटके हुए नेताओं ने जैसा ताण्डव रचा,उसे याद करके आज भी हृदय अत्यधिक काँप उठता है। हजारों प्राण उस आग में जल गये। हजारों लोग बेघर हो गये। लाखों से अधिक शरणार्थी हो गये। मालवीय जी का मन अचिन्तनीय उस दु:ख को सहन नहीं कर सका। उन्होंने विश्वविद्यालय में स्थित कुलपति भवन में प्राण त्याग दिये। मालवीय जी का अत्यधिक यश विश्वविद्यालय के रूप में संसार में सदैव स्थित रहेगा, ‘अर्थात् अमर रहेगा।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मदनमोहन मालवीय जी के सम्बन्ध में संस्कृत में पाँच वाक्य लिखिए।
उत्तर :

  • मदनमोहनमालवीयस्य जन्म प्रयागे एकस्मिन् ब्राह्मणकुले अभवत्।
  • मालवीयः कलिकातानगरे अखिलभारतीयकॉग्रेसदलस्य अधिवेशने गम्भीरं विचारपूर्णं भाषणम् अकरोत्।।
  • मालवीय: राजा रामपालसिंहस्य अनुरोधेन हिन्दुस्तान’ पत्रस्य सम्पादनम् अकरोत्।
  • एल-एल०बी० परीक्षामुत्तीर्य सः प्रयागस्थे उच्चन्यायालये अधिवक्तृकर्म कर्तुं प्रारभत।
  • मालवीयः 1916 वर्षे काश्यां गङ्गायास्तटे काशीहिन्दूविश्वविद्यालयस्य स्थापनामकरोत्।
  • मालवीय: काशी हिन्दू विश्वविद्यालयस्य कुलपतिः आसीत्।

UP Board Solutions

प्रश्न 2. मदनमोहन मालवीय का जन्म कब और कहाँ हुआ था? [2009]
उत्तर :
पण्डित मदनमोहन मालवीय जी का जन्म सन् 1861 ई० में 25 दिसम्बर को प्रयाग के (UPBoardSolutions.com) एक प्रसिद्ध ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता ब्रजनाथ चतुर्वेदी संस्कृत भाषा के विद्वान् थे। उनके पूर्वज मालव देश के मूल निवासी थे और वहाँ से आने के कारण ‘मालवीय’ कहलाये।

प्रश्न 3.
मदनमोहन मालवीय द्वारा किये गये रचनात्मक कार्यों का वर्णन कीजिए। [2007]
या
मैक्डॉनल हिन्दू छात्रावास, मिण्टो पार्क और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का निर्माण किसके प्रयास से हुआ?
उत्तर :
मालवीय जी ने राष्ट्र-सेवा में लगे रहकर प्रयाग में मैक्डॉनल हिन्दू छात्रावास’ और ‘मिण्टो पार्क का निर्माण कराया। देश की उन्नति के लिए शिक्षा को विशेष साधन मानकर काशी में गंगा के तट पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की।

प्रश्न 4.
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना कब, कहाँ और किसने की? [2008, 10, 11, 12]
या
मदनमोहन मालवीय के द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय का नाम लिखिए। [2006,11]
या
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई? [2010, 11]
उत्तर :
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना श्री मदनमोहन मालवीय ने सन् 1916 ई० में वसन्तपंचमी के दिन काशी में पवित्र जल वाली गंगा के तट पर की।

UP Board Solutions

प्रश्न 5.
मदनमोहन मालवीय के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालिए। [2008]
या
मालवीय जी के दो महत्त्वपूर्ण कार्य लिखिए। [2007, 09, 13, 14]
उत्तर :
मदनमोहन मालवीय जी का व्यक्तित्व गौरवर्ण एवं कान्तिमय शरीर, श्वेत वस्त्र, गले में उत्तरीय, (UPBoardSolutions.com) सिर पर श्वेत पगड़ी, मस्तक पर श्वेत चन्दन-तिलक और श्वेत उपानह आदि से युक्त था। वस्तुतः इनके व्यक्तित्व में भारतीय संस्कृति पूर्णरूपेण रूपायित थी। मालवीय जी के कर्तृत्व में निहित हैं–

  • ‘हिन्दुस्तान दैनिक पत्र का सम्पादन,
  • वकालत करना किन्तु असत्य पर आधारित मुकदमे स्वीकार न करना,
  • अखिल भारतीय कांग्रेस दल का सभापति बनना और गाँधी जी के साथ अंग्रेजों से सन्धि-वार्ता के लिए इंग्लैण्ड जाना,
  • प्रयाग में मैक्डॉनल हिन्दू छात्रावास’ तथा ‘मिण्टो पार्क’ का निर्माण कराना,
  • काशी में ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना करना; जिसके कारण उनकी कीर्ति चिरकाल तक अमर रहेगी।

प्रश्न 6.
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति कौन थे? [2007,11]
उत्तर :
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति महामना मदनमोहन मालवीय थे।

UP Board Solutions

प्रश्न 7. मालवीय जी द्वारा सम्पादित समाचार-पत्र का नाम लिखिए। [2008, 12, 13]
या
पत्र के सम्पादन का उद्देश्य बताइए। [2010]
उत्तर :
मालवीय जी द्वारा मुख्य रूप से सम्पादित समाचार-पत्र का नाम ‘हिन्दुस्तान’ है। इसके अतिरिक्त भी इन्होंने अनेक पत्रों का सम्पादन किया। पत्र को सम्पादन करते हुए मालवीय जी ने राष्ट्रीय भावनाओं और हिन्दी का प्रचार किया। इनका प्रमुख उद्देश्य हिन्दी को न्यायालयों में स्थान दिलाना था।

प्रश्न 8.
मदनमोहन मालवीय का जीवन-परिचय दीजिए। [2006]
उत्तर :
[संकेत प्रश्न 2 व 5 के उत्तर को मिलाकर अपने शब्दों में लिखिए।]

UP Board Solutions

प्रश्न 9.
अंग्रेज शासकों के साथ सन्धि-वार्ता हेतु मालवीय जी किसके साथ इंग्लैण्ड गये? [2010]
उत्तर :
अंग्रेज शासकों के साथ सन्धि-वार्ता हेतु मालवीय जी सन् 1931 में (UPBoardSolutions.com) महात्मा गाँधी के साथ इंग्लैण्ड गये।

Hope given UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 10 are helpful to complete your homework.
If you have any doubts, please comment below. UP Board Solutions try to provide online tutoring for you

Class 10 Sanskrit Chapter 1 UP Board Solutions कविकुलगुरु कालिदास Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 1 Kavikulguru Kalidas Question Answer (गद्य – भारती)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 1 हिंदी अनुवाद कविकुलगुरु कालिदास के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 1 कविकुलगुरुः कालिदासः (गद्य – भारती)

परिचय

संस्कृत भाषा का साहित्य इतना समृद्ध है कि उसे विश्व की किसी भी भाषा के समक्ष प्रतिस्पर्धी रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। इस भाषा में महाकाव्यों, खण्डकाव्यों तथा नाटकों की परम्परा सहस्राब्दियों से प्रचलित है। संस्कृत भाषा के अनेक कवि और महाकवि हुए हैं, जिनमें कालिदास को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। इनकी धवल-कीर्ति देश-देशान्तर तक फैली हुई है। इनके अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ नाटक के अध्ययनोपरान्त ही पाश्चात्य (UPBoardSolutions.com) विद्वानों की अभिरुचि संस्कृत साहित्य के अध्ययन की ओर हुई थी। प्रस्तुत पाठ महाकवि कालिदास के जीवन, व्यक्तित्व एवं उनकी रचनाओं से संस्कृत के छात्रों को परिचित कराता है।

पाठ-सारांश [2007,08,09, 12, 13, 14, 15]

कविकुलगुरु : महाकवि कालिदास संस्कृत के कवियों में सर्वश्रेष्ठ हैं। उनकी कीर्ति-कौमुदी विदेशों तक फैली हुई है। वे भारत के ही नहीं, अपितु विश्व के श्रेष्ठ कवि के रूप में भी जाने जाते हैं। इस महान् कवि के कुल, काल एवं जन्म-स्थान के विषय में अनेक मतभेद हैं। इन्होंने अपनी कृतियों में भी अपने जीवन के विषय में कुछ भी नहीं लिखा। समीक्षकों ने अन्त: और बाह्य साक्ष्यों के आधार पर इनका परिचय प्रस्तुत किया है।

जन्म, समय एवं स्थान : कालिदास विक्रमादित्य के सभारत्न थे। कोई विद्वान् इन्हें चन्द्रगुप्त द्वितीय का समकालीन मानता है तो कोई उज्जैन के राजा विक्रमादित्य का समकालीन। इस महान् कवि को सभी अपने-अपने देश में उत्पन्न हुआ सिद्ध करते हैं। कुछ विद्वान् इन्हें कश्मीर में उत्पन्न हुआ मानते हैं तो कुछ बंगाल में अनेक आलोचक इनका जन्म-स्थान उज्जैन भी मानते हैं।

UP Board Solutions

कुल : कालिदास की कृतियों में वर्ण-व्यवस्था के प्रतिपादन को देखकर इन्हें ब्राह्मण कुलोत्पन्न माना जाता है। ये शिवोपासक थे, फिर भी राम के प्रति इनकी अपार श्रद्धा थी। ‘रघुवंशम् महाकाव्य की रचना से यह बात स्पष्ट हो जाती है।

रचनाएँ : कालिदास ने ‘रघुवंशम्’ और ‘कुमारसम्भवम्’ नामक दो महाकाव्य, ‘मेघदूतम्’ और ‘ऋतुसंहार:’ नामक दो गीतिकाव्य तथा ‘मालविकाग्निमित्रम्’, ‘विक्रमोर्वशीयम्’ एवं ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ नामक तीन नाटकों की रचना की। रघुवंशम् में राजा दिलीप से लेकर अग्निवर्ण तक के समस्त इक्ष्वाकुवंशी राजाओं की उदारता का उन्नीस सर्गों में वर्णन किया गया है। कुमारसम्भवम् में स्वामी कार्तिकेय के जन्म का अठारह सर्गों में वर्णन है। मेघदूतम् में यक्ष और यक्षिणी के वियोग को लेकर विप्रलम्भ श्रृंगार का पूर्ण परिपाक हुआ है। ऋतुसंहारः में छः ऋतुओं का काव्यात्मक वर्णन है। मालविकाग्निमित्रम् नाटक में अग्निमित्र और मालविका (UPBoardSolutions.com) के प्रेम की कथा है। विक्रमोर्वशीयम् नाटक में पुरूरवा और उर्वशी का प्रेम पाँच अंकों में वर्णित है। अभिज्ञानशाकुन्तलम् कालिदास का सर्वश्रेष्ठ नाटक है। इसके सात अंकों में मेनका के द्वारा जन्म देकर परित्यक्ता, पक्षियों द्वारा पोषित एवं कण्व महर्षि के द्वारा पालित पुत्री शकुन्तला के दुष्यन्त के साथ विवाह की कथा वर्णित है।

काव्य-सौन्दर्य : कालिदास ने अपनी रचनाओं में काव्योचित गुणों का समावेश करते हुए भारतीय जीवन-पद्धति का सर्वांगीण चित्रण किया है। उनके काव्यों में जड़ प्रकृति भी मानव की सहचरी के रूप में चित्रित की गयी है। ‘रघुवंशम्’ में दिग्विजय के लिए प्रस्थान करते समय रघु का वन के वृक्ष पुष्पवर्षा करके सम्मान करते हैं। ‘मेघदूतम्’ में बाह्य प्रकृति तथा अन्त:-प्रकृति का मर्मस्पर्शी वर्णन हुआ है। कवि के विचार में मेघ धूम, ज्योति, जलवायु का समूह ही नहीं, वरन् वह मानव के समान संवेदनशील प्राणी हैं। ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ नाटक में वन के वृक्ष शकुन्तला को आभूषण प्रदान करते हैं तथा हरिण-शावक उसका मार्ग रोककर अपना निश्छल प्रेम प्रदर्शित करता है।

कालिदास के काव्यों में प्रधान रस श्रृंगार है। शेष करुण आदि रस उसके सहायक होकर आये हैं। रस के अनुरूप प्रसाद और माधुर्य गुणों की सृष्टि की गयी है। कालिदास वैदर्भी रीति के श्रेष्ठ कवि हैं। वे अलंकारों के विशेषकर उपमा के प्रयोग में सिद्धहस्त हैं। उनके नाटकों में वस्तु-विन्यास अनुपम, चरित्र-चित्रण निर्दोष और शैली में सम्प्रेषणीयता है। उनके काव्यों में मानव-मूल्यों की प्रतिष्ठा की गयी है। दुष्यन्त शकुन्तला को देखने के पश्चात् क्षत्रिय द्वारा विवाह करने योग्य होने पर ही उससे विवाह करते हैं। कण्व की आज्ञा के बिना गान्धर्व विवाह करके दोनों तब तक दु:खी रहते हैं, जब तक तपस्या और प्रायश्चित्त से आत्मा को शुद्ध नहीं कर लेते।

‘रघुवंशम्’ में रघुवंशी राजाओं में भारतीय जन-जीवन का आदर्श रूप निरूपित किया गया है। रघुवंशी राजा प्रजा की भलाई के लिए ही प्रजा से कर लेते थे, सत्य वचन बोलते थे, यश के लिए प्राणत्याग हेतु सदा तैयार रहते थे तथा सन्तानोत्पत्ति के लिए गृहस्थ बनते थे।

UP Board Solutions

कालिदास ने हिमालय से सागरपर्यन्त भारत की यशोगाथा को अपने काव्य में निरूपित किया है। ‘रघुवंशम्’, ‘मेघदूतम्’ और ‘कुमारसम्भवम्’ में भारत के विविध प्रदेशों का सुन्दर और स्वाभाविक वर्णन मिलता है। संस्कृत के कवियों में कोई भी कवि कालिदास की तुलना नहीं कर पाया है।

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) महाकविकालिदासः संस्कृतकवीनां मुकुटमणिरस्ति। न केवलं भारतदेशस्य, अपितु समग्रविश्वस्योत्कृष्टकविषु स एकतमोऽस्ति। तस्यानवद्या कीर्तिकौमुदी देशदेशान्तरेषु प्रसृतास्ति। भारतदेशे जन्म लब्ध्वा स्वकविकर्मणा देववाणीमलङ्कुर्वाणः स न केवलं भारतीयः (UPBoardSolutions.com) कविः अपि तु विश्वकविरिति सर्वैराद्रियते। [2007,09,13]

शब्दार्थ मुकुटमणिः = मुकुट की मणि, श्रेष्ठ। उत्कृष्टकविषु = उच्च या श्रेष्ठ कवियों में। एकतमः = एकमात्र, अकेले। अनवद्या = निर्दोष, निर्मला कीर्तिकौमुदी = यश की चाँदनी। प्रसृतास्ति = फैली हुई है। लब्ध्वा = प्राप्त कर। देववाणीमलङ्कुर्वाणः (देववाणीम् + अलम् + कुर्वाणः) = देववाणी अर्थात् संस्कृत भाषा को अलंकृत करते हुए। सर्वैराद्रियते (सर्वैः + आद्रियते) = सबके द्वारा आदर पाते हैं।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के गद्य खण्ड ‘गद्य-भारती’ में संकलित ‘कविकुलगुरुः कालिदासः’ शीर्षक पाठ से उधृत है।

[संकेत इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में कालिदास की प्रशंसा की गयी है।

अनुवाद महाकवि कालिदास संस्कृत के कवियों की मुकुटमणि हैं अर्थात् श्रेष्ठ केवल भारत देश के ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण संसार के उत्कृष्ट कवियों में वे अद्वितीय हैं। उनकी निर्मल कीर्ति-चन्द्रिका देश-देशान्तरों में फैली हुई है। भारत देश में जन्म प्राप्त करके अपने कवि-कर्म (कविता) से देववाणी अर्थात् संस्कृत भाषा को अलंकृत करते हुए वे केवल भारत के कवि ही नहीं हैं, अपितु ‘विश्वकवि’ के रूप में सभी के द्वारा आदर किये जाते हैं।

UP Board Solutions

(2) वाग्देवताभरणभूतस्य प्रथितयशसः कालिदासस्य जन्म कस्मिन् प्रदेशे, काले, कुले, चाभवत्, किञ्चासीत् तज्जन्मवृत्तम् इति सर्वमधुनापि विवादकोटिं नातिक्रामति। इतरकवयः इव कालिदासः आत्मज्ञापने स्वकृतिषु प्रायः धृतमौन एवास्ति। अन्येऽपि कवयस्तन्नामसङकीर्तनमात्रादेव स्वीयां वाचं धन्यां मत्वा मौनमवलम्बन्ते। तथापि अन्तर्बहिस्साक्ष्यमनुसृत्य समीक्षकाः कविपरिचयं यावच्छक्यं प्रस्तुवन्ति। [2006]

वाग्देवताभरणभूतस्य ………………………………….. मौनमवलम्बन्ते। [2013]

शब्दार्थ वाग्देवताभरणभूतस्य = वाणी के देवता के आभूषणस्वरूप। प्रथितयशसः = प्रसिद्ध यश वाले। वृत्तम् = वृत्तान्त विवादकोटिम् = विवाद की श्रेणी को। नातिक्रामति = नहीं लाँघता है। इतर = दूसरे। आत्मज्ञापने = अपना परिचय देने में। धृतमौन = मौन (UPBoardSolutions.com) धारण किये हुए हैं। स्वीयां वाचं = अपनी वाणी को। अवलम्बन्ते = सहारा लेते हैं। अन्तर्बहिः साक्ष्यम् = अन्तः और बाहरी साक्ष्य। यावच्छक्यम् (यावत् + शक्यम्) = जितना सम्भव है। प्रस्तुवन्ति = प्रस्तुत करते हैं।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में कालिदास के जन्म-वृत्तान्त की अनभिज्ञता के बारे में बताया गया है।

अनुवाद सरस्वती देवी के अलंकारस्वरूप, प्रसिद्ध यश वाले कालिदास का जन्म किस प्रदेश में, काल में और कुल में हुआ तथा उनके जन्म का वृत्तान्त क्या था, यह अभी भी विवाद की सीमा से परे नहीं है अर्थात् विवादास्पद है। दूसरे कवियों के समान कालिदास अपना परिचय देने में अपनी रचनाओं में प्रायः मौन ही धारण किये हुए हैं। दूसरे कवि भी उनका नाम लेनेमात्र से ही अपनी वाणी को धन्य मानकर मौन हो जाते हैं; अर्थात् दूसरे कवियों द्वारा भी उनके बारे में कुछ नहीं लिखा गया है। इतने पर भी आन्तरिक और बाहरी साक्ष्यों का अनुसरण करके समीक्षक यथासम्भव कवि का परिचय प्रस्तुत करते हैं।

(3) एका जनश्रुतिः अतिप्रसिद्धास्ति यया कविकालिदासः विक्रमादित्यस्य सभारत्नेषु मुख्यतमः इति ख्यापितः। परन्तु अत्रापरा विडम्बना समुत्पद्यते। विक्रमादित्यस्यापि स्थितिकालः सुतरां स्पष्टो नास्ति। केचिन्मन्यन्ते यत् विक्रमादित्योपाधिधारिणो द्वितीयचन्द्रगुप्तस्य समकालिक आसीत् कविरसौ। कालिदासस्य मालविकाग्निमित्रनाटकस्य नायकोग्निमित्रः शुङ्गवंशीय आसीत् स एव विक्रमादित्योपाधि धृतवान् यस्य सभारत्नेष्वेकः कालिदासः आसीत्। तस्य राज्ञः स्थितिकालः खीष्टाब्दात्प्रागासीत्। स एव स्थितिकालः कवेरपि सिध्यति। कविकालिदासस्य जन्मस्थानविषयेऽपि नैकमत्यमस्ति। एतावान् कवेरस्य महिमास्ति यत् सर्वे एव तं स्व-स्वदेशीयं साधयितुं तत्परा भवन्ति। कश्मीरवासिविद्वांसः कश्मीरोदभवं तं मन्यन्ते, बङ्गवासिनश्च बङ्गदेशीयम्। अस्ति तावदन्योऽपि समीक्षकवर्गः यस्य मतेन कालिदास उज्जयिन्यां (UPBoardSolutions.com) लब्धजन्मासीत्। उज्जयिनीं प्रति कवेः सातिशयोऽनुराग एतन्मतं पुष्णाति।

UP Board Solutions

कविकालिदासस्य ………………………………….. एतन्मतं पुष्णाति।
एका जनश्रुतिः ………………………………….. कवेरपि सिध्यति। [2011, 12, 15]

शब्दार्थ जनश्रुतिः = लोकोक्ति, किंवदन्ती। ख्यापितः = बताया गया। अत्रापरा (अत्र + अपरा) = यहाँ दूसरी। समुत्पद्यते = उत्पन्न होती है। सुतरां = भली प्रकार विक्रमादित्योपाधिम् = विक्रमादित्य की उपाधि का। सभारलेष्वेकः (सभारत्नेषु + एकः) = सभारत्नों में से एक। ख्रीष्टाब्दात् = ईस्वी वर्ष से। प्राक् = पहले। सिध्यति = सिद्ध होता है। नैकमत्यमस्ति = एकमत नहीं हैं। एतावान् = इतनी। साधयितुम् = सिद्ध करने के लिए। लब्धजन्मासीत् = जन्म हुआ था। सातिशयः = अत्यधिक पुष्णाति = पुष्टि करता है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में कालिदास के जन्म और स्थितिकाल के विषय में प्रचलित विभिन्न मत दिये गये हैं।

अनुवाद एक लोकोक्ति (किंवदन्ती) अत्यन्त प्रसिद्ध है, जिसके द्वारा कवि कालिदास विक्रमादित्य के सभारत्नों में प्रमुख बताये गये हैं, परन्तु इस विषय में दूसरी शंका उत्पन्न होती है। विक्रमादित्य का भी स्थितिकाल अच्छी तरह स्पष्ट नहीं है। कुछ लोग मानते हैं कि यह कवि ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण करने वाले चन्द्रगुप्त द्वितीय के समकालीन थे। कालिदास के ‘मालविकाग्निमित्रम्’ नाटक का नायक अग्निमित्र शुंग वंश का था। उसी ने विक्रमादित्य की उपाधि को धारण किया, जिसकी सभा के रत्नों में कालिदास एक थे। उस राजा का स्थितिकोल ईस्वी सन् से पूर्व था। वही स्थितिकाल कवि का भी सिद्ध होता है। कवि कालिदास (UPBoardSolutions.com) के जन्म-स्थान के विषय में भी एक मत नहीं है। इस कवि की ऐसी महिमा है कि सभी इसे अपने-अपने देश का सिद्ध करने में लगे हुए हैं। कश्मीर के निवासी विद्वान् उन्हें कश्मीर में उत्पन्न हुआ मानते हैं और बंगाल के निवासी बंगाल देश में उत्पन्न हुआ। दूसरा भी समीक्षकों का वर्ग है, जिसके मत से कालिदास का जन्म उज्जैन में हुआ था। उज्जयिनी के प्रति कवि का अत्यधिक प्रेम इस मत की पुष्टि करता है।

(4) देशकालवदेव कालिदासकुलस्यापि स्पष्टः परिचयो नोपलभ्यते। तस्य कृतिषु वर्णाश्रमधर्मव्यव्यवस्थायाः यथातथ्येन प्रतिपादनेन एतदनुमीयते यत् तस्य जन्म विप्रकुलेऽभवत्। भावनया स शिवानुरक्तश्चासीत् तथापि तस्य धर्मभावनायां मनागपि सङ्कीर्णता नासीत्। शिवभक्तोऽपि सन् रघुवंशे स रामं प्रति स्वभक्तिभावमुदारमनसा प्रकटयति। कालिदासस्य जीवनवृत्तं सर्वथा अज्ञानान्धकाराच्छन्नमस्ति। तद्विषयकाः अनेकाः जनश्रुतयः लब्धप्रसस्सन्ति किन्तु ताः सर्वाः ईष्र्याकलुषकषायितचित्तानां कल्पनाप्ररोहा एव, अत एवं सर्वथा चिन्त्याः सन्ति

शब्दार्थ नोपलभ्यते (न + उपलभ्यते) = प्राप्त नहीं होता है। यथातथ्येन = तथ्यों के अनुसार, वास्तविक रूप से। एतदनुमीयते = यह अनुमान किया जाता है। मनागपि = थोड़ा भी। अज्ञानान्धकाराच्छन्नम् (अज्ञान + अन्धकार + आच्छन्नम्) = अज्ञानरूपी अन्धकार से ढका हुआ। तद्विषयका = (UPBoardSolutions.com) उससे सम्बन्धित ईष्र्याकलुष-कषायितचित्तानां = ईष्र्या के कलुष से कसैले (कलुषित) चित्त वालों का। कल्पनाप्ररोहाः = कल्पना के अंकुर। चिन्त्याः = विचार करने योग्य।

UP Board Solutions

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में कालिदास के कुल के विषय में विचार व्यक्त किया गया है।

अनुवाद देश और काल की तरह ही कालिदास के कुल का भी स्पष्ट परिचय प्राप्त नहीं होता है। उनकी रचनाओं में वर्ण, आश्रम और धर्म की व्यवस्था का उचित प्रतिपादन होने से यह अनुमान किया जाता है कि उनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। विचार से वे शिव में अनुरक्त थे तो भी उनकी धर्म-भावना में थोड़ी-सी भी संकीर्णता नहीं थी। शिव के भक्त होते हुए भी ‘रघुवंशम्’ में उन्होंने राम के प्रति अपनी भक्ति-भावना को उदार मन से प्रकट किया है। कालिदास का जीवन-वृत्त सभी प्रकार से अज्ञान के अन्धकार में छिपा हुआ है। उनके विषय में अनेक जनश्रुतियाँ फैली हुई हैं, किन्तु वे सभी ईर्ष्या और कालुष्य से कलुषित मन वालों की कल्पना के अंकुर ही हैं, अतएव सभी प्रकार से विचार करने योग्य हैं।

(5) कालिदासस्य नवनवोन्मेषशालिन्याः प्रज्ञायाः उन्मीलनं तस्य कृतिषु नास्ति कस्यचित्सुधियः परोक्षम्। संस्कृतकाव्यस्य विविधेषु प्रमुखप्रकारेषु स्वकौशलं प्रदर्य स सर्वानतीतानागतान कवीनतिशिश्ये। रघुवंशं कुमारसम्भवञ्च तस्य महाकाव्यद्वयम्, मेघदूतम्, ऋतुसंहारश्च खण्डकाव्ये, (UPBoardSolutions.com) मालविकाग्निमित्रं विक्रमोर्वशीयम् अभिज्ञानशाकुन्तलञ्च नाटकानि सन्ति। तत्र रघुवंशं नाम महाकाव्यं कविकुलगुरोः सर्वातिशायिनी कृतिरस्ति। अस्मिन् महाकाव्ये दिलीपादारभ्य अग्निवर्णपर्यन्तम् इक्ष्वाकुवंशावतंसभूतानां नृपतीनामवदाननिरूपणमस्ति। [2006,11]

शब्दार्थ नवनवोन्मेषशालिन्याः = नये-नये विकास से युक्त। प्रज्ञायाः = बुद्धि की। उन्मीलनम् = खोलने वाली। प्रदर्य = दिखाकर। सर्वान् = सभी। अतीतानागतान् = अतीत और भविष्य। अतिशिश्ये = अतिक्रमण कर गये। सर्वातिशायिनी = सर्वश्रेष्ठ। अवदाननिरूपणम् = उदारता का वर्णन।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में कालिदास की रचनाओं का संक्षिप्त वर्णन किया गया है।

अनुवाद कालिदास की नये-नये विकास से युक्त बुद्धि का उद्घाटन उनकी रचनाओं में नहीं है, ऐसा किसी विद्वान् का परोक्ष (अप्रसिद्ध) कथन है। संस्कृत-काव्य के अनेक प्रमुख प्रकारों में अपना कौशल दिखाकर वे अतीत और भविष्य के सभी कवियों में श्रेष्ठ हैं। उनके रघुवंशम्’ और ‘कुमारसम्भवम्’ दो महाकाव्य; ‘मेघदूतम् और ऋतुसंहार: दो खण्डकाव्य; ‘मालविकाग्निमित्रम्’, ‘विक्रमोर्वशीयम्’ और ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ नाटक हैं। इनमें ‘रघुवंशम्’ नाम का महाकाव्य कविकुलगुरु की सर्वश्रेष्ठ रचना है। इस महाकाव्य में दिलीप से आरम्भ करके अग्निवर्ण तक के इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न राजाओं की उदारता का वर्णन है।

UP Board Solutions

(6) एकोनविंशसर्गात्मकमिदं महाकाव्यं रमणीयार्थप्रतिपादकं सत् सचेतसां हृदयं सततमाह्लादयति। कुमारसम्भवे स्वामिकार्तिकेयस्य जन्मोपवर्णितम्। इदमपि काव्यम् अष्टादशसर्गात्मकमस्ति। केचन समीक्षका अष्टमसर्गपर्यन्तमेव काव्यमिदं (UPBoardSolutions.com) कालिदासप्रणीतमिति मन्यन्ते। मेघदूते यक्षयक्षिण्योः वियोगमाश्रित्य विप्रलम्भशृङ्गारस्य पूर्णपरिपाको दृश्यते। ऋतुसंहारे अन्वर्थतया षण्णामृतूणां वर्णनमस्ति। मालविकाग्निमित्रनाटके अग्निमित्रस्य मालविकायाश्च प्रेमाख्यानमस्ति। पञ्चाङ्कात्मके विक्रमोर्वशीये

पुरूरवसः उर्वश्याश्च प्रेमकथा वर्णिता। अभिज्ञानशाकुन्तलं स्वनामधन्यस्य अस्य कवेः सर्वश्रेष्ठा नाट्यकृतिरस्ति। नाटकेऽस्मिन् सप्ताङ्काः सन्ति। मेनकया प्रसूतोज्झितायाः शकुन्तैश्च पोषितायाः तदनु कण्वेन परिपालितायाः शकुन्तलायाः दुष्यन्तेन सहोद्वाहस्य कथा वर्णितास्ति।,शाकुन्तलविषये प्रथितैषा भणितिः

‘काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला’

एतन्नाटकं प्राच्यपौरस्त्यैः समीक्षकैः बहु प्रशंसितम् ।

एकोनविंशसर्गात्मकमिदं …………………………… नाट्य कृतिरस्ति। [2010]
कुमारसम्भवे स्वामि- …………………………… रम्या शकुन्तला। [2013]

शब्दार्थ सचेतसाम् = रसिकों के सततमाह्लादयति = नित्य प्रसन्न करता है। केचन = कुछ। अन्वर्थतया = अर्थ के अनुसार। प्रेमाख्यानम् = प्रेम कथा प्रसूतोज्झितायाः (प्रसूता + उज्झितायाः) = जन्म दे करके छोड़ी गयी। शकुन्तैः = पक्षियों के द्वारा उद्वाहस्य = विवाह की। प्रथिता = प्रसिद्ध भणितिः = कथन, उक्ति। प्राच्यपौरस्त्यैः = पूर्वी और पश्चिमी।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में कालिदास की रचनाओं का संक्षिप्त परिचय दिया गया है।

अनुवाद उन्नीस सर्गों वाला यह (रघुवंशम्) महाकाव्य सुन्दर (रमणीय) अर्थ का प्रतिपादक होने के कारण रसिकों के हृदय को निरन्तर प्रसन्न करता है। ‘कुमारसम्भवम्’ काव्य में स्वामी कार्तिकेय के जन्म का वर्णन है। यह काव्य भी अठारह सर्गों वाला है। कुछ आलोचक आठ सर्ग तक ही इस काव्य को कालिदास के द्वारा रचा हुआ मानते हैं। ‘मेघदूतम्’ में यक्ष-यक्षिणी के वियोग को आधार बनाकर विप्रलम्भ श्रृंगार का पूर्ण परिपाक दिखाई देता है। ‘ऋतुसंहारः’ में (UPBoardSolutions.com) अर्थ के अनुसार छः ऋतुओं का वर्णन है। ‘मालविकाग्निमित्रम् नाटक में अग्निमित्र और मालविका के प्रेम की कथा है। पाँच अंकों वाले ‘विक्रमोर्वशीयम्’ नाटक में पुरूरवा और उर्वशी के प्रेम की कथा वर्णित है। ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ स्वनामधन्य इस कवि की सर्वश्रेष्ठ नाट्य-रचना है। इस नाटक में सात अंक हैं। मेनका के द्वारा जन्म देकर त्यागी गयी, पक्षियों के द्वारा पोषण की गयी और उसके बाद कण्व के द्वारा पालन की गयी शकुन्तला के दुष्यन्त के साथ विवाह की कथा वर्णित है। ‘शाकुन्तलम्’ (नाटक) के विषय में यह उक्ति प्रसिद्ध है–काव्यों में नाटक सुन्दर होता है, उसमें शकुन्तला (अभिज्ञानशाकुन्तलम् ) सुन्दर है। इस नाटक की पूर्वी और पश्चिमी आलोचकों ने बहुत प्रशंसा की है।

UP Board Solutions

(7) वस्तुतः कालिदासः मूर्धन्यतमः भारतीयः कविरस्ति। एकतस्तस्य कृतिषु काव्योचितगुणानां समाहारः दृश्यते अपरतश्च भारतीयजीवनपद्धतेः सर्वाङ्गीणतो तत्र राराजते। काव्योत्कर्षदृष्ट्या तस्य काव्येषु मानवमनसः सूक्ष्मानुभूतीनामिन्द्रधनुः कस्यापि सहृदयस्य चित्तमावर्जयितुं पारयति। प्रकृतिरपि स्वजडत्वं विहाय सर्वत्र मानवसहचरीवाचरति। रघुवंशे दिग्विजयार्थं प्रस्थितस्य रघोः सभाजनं वनवृक्षाः प्रसूनवृष्टिभिः सम्पादयन्ति। मेघे विरहोत्कण्ठितस्य यक्षस्य प्रेमविह्वलतायाः अद्वितीय सृष्टिः परिलक्ष्यते। तत्र बाह्यान्तः प्रकृत्योः मर्मस्पृग्वर्णनमस्ति। कविदृष्ट्या मेघः धूमज्योतिस्सलिलमरुतां सन्निपातो न भूत्वा एकः संवेदनशीलः मानवोपमः प्राणी अस्ति। स रामगिरेः आरभ्यालकां यावत् यस्य कस्यापि सन्निधि लभते तस्मै हर्षोल्लासौ वितरति। शाकुन्तलनाटके पतिगृहगमनकाले आश्रमपादपाः स्वभगिन्यै शकुन्तलायै आभरणानि समर्पयन्ति। हरिणार्भकः तस्याः मार्गावरोधं कृत्वा स्वकीयं निश्छलं प्रेम प्रकटयति। एवमेव नद्यः प्रेयस्य इवाचरन्ति। सूर्यः अरुणोदयवेलायां स्वप्रियतमायाः नलिन्याः तुषारबिन्दुरूपाणि अश्रूणि स्वकरैः परिमृजति।

रघुवंशे दिग्विजयांर्थं ……………………………………….. हर्षोल्लासौ वितरति। [2006, 08]
वस्तुतः कालिदासः ………………………………………………… सम्पादयन्ति। [2008, 11]
शाकुन्तलनाटके …………………………………….. स्वकरैः परिमृजति।

शब्दार्थ मूर्धन्यतमः = सर्वश्रेष्ठ। एकतः = एक ओर। समाहारः = समावेश। अपरतः = दूसरी ओर। राराजते = अत्यन्त सुशोभित हो रही है। सूक्ष्मानुभूतीनामिन्द्रधनुः (सूक्ष्म + अनुभूतीनां + इन्द्रधनुः) = सूक्ष्म अनुभूतियों का इन्द्रधनुष। आवर्जयितुम् = प्रभावित करने में पारयति = समर्थ होता है। विहाय = त्यागकर। सहचरीव = साथ रहने वाली के समान। आचरति = आचरण करती है। सम्पादयन्ति = पूर्ण करते हैं। परिलक्ष्यते = दिखाई देती है। बाह्यान्तः प्रकृत्योः = बाहरी और आन्तरिक प्रकृतियों का। मर्मस्पृक् = मर्मस्पर्शी, हृदय को छूने वाला। धूमज्योतिस्सलिलमरुतां = धुआँ, प्रकाश, पानी और वायु सन्निपातः = समूह। न भूत्वा = न होकर। (UPBoardSolutions.com) आरभ्य-अलकां = आरम्भ करके अलका को। सन्निधिम् = समीपता को। स्वभगिन्यै = अपनी बहन के लिए। आभरणानि = आभूषणों को। अर्भकः = बच्चा। मार्गावरोधं कृत्वा = मार्ग को रोककर। प्रकटयति = प्रकट करता है। नलिन्याः = कमलिनी के। स्वकरैः = अपनी किरणों (हाथों) से। परिमृजति = पोंछता है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में यह कहा गया है कि कालिदास की रचनाएँ कितनी माधुर्यपूर्ण हैं।

अनुवाद वास्तव में कालिदास सर्वश्रेष्ठ भारतीय कवि हैं। एक ओर (जहाँ) उनकी रचनाओं में काव्य के लिए उचित गुणों का समावेश दिखाई देता है तो दूसरी ओर उनमें भारतीय जीवन-पद्धति की सर्वांगीणता भी सुशोभित होती है। काव्य की श्रेष्ठता की दृष्टि से उनके काव्यों में मानव-मन की सूक्ष्म अनुभूतियों का इन्द्रधनुष किसी भी सहृदय को प्रभावित करने में समर्थ है। प्रकृति भी अपनी जड़ता को छोड़कर सभी जगह (काव्यों में) मानव की सहचरी के समान आचरण करती है। रघुवंशम्’ में दिग्विजय के लिए प्रस्थान किये हुए रघु का सम्मान वन के वृक्ष पुष्पों की वर्षा से सम्पादित करते हैं। ‘मेघदूतम्’ में विरह से उत्कण्ठित यक्ष की प्रेम-विह्वलता की अद्वितीय सृष्टि परिलक्षित होती है। उसमें बाह्यप्रकृति और अन्त:प्रकृति का मर्मस्पर्शी वर्णन है। कवि की दृष्टि में मेघ धुआँ, प्रकाश, जल, वायु का समूह न होकर एक संवेदनशील (UPBoardSolutions.com) मानव के समान प्राणी है। वह रामगिरि से लेकर अलका तक जिस किसी की समीपता प्राप्त करता है, उसे हर्ष और उल्लास प्रदान करता है। ‘शाकुन्तलम्’ नाटक में पति के घर जाते समय आश्रम के वृक्ष अपनी बहन शकुन्तला को आभूषण प्रदान करते हैं। हिरन का बच्चा (शावक) उसका रास्ता रोककर अपने निष्कपट प्रेम को प्रकट करता है। इसी प्रकार नदियाँ भी प्रेमिका की तरह आचरण करती हैं। सूर्य अरुणोदय (प्रथम किरण निकलने) के समय अपनी प्रियतमा कमलिनी के ओस की बूंदरूपी आँसुओं को अपनी किरणों (हाथों) से पोंछता है।

(8) कालिदासकाव्येषु अङ्गीरसः शृङ्गारोऽस्ति। तस्य पुष्ट्यर्थं करुणादयोऽन्ये रसाः अङ्गभूताः। रसानुरूपं क्वचित प्रसादः क्वचिच्च माधुर्यं तस्य काव्योत्कर्षेः साहाय्यं कुरुतः। वैदर्भीरीतिः कालिदासस्य वाग्वश्येव सर्वत्रानुवर्तते। अलङ्कारयोजनायां कालिदासोऽद्वितीयः। यद्यपि उपमाकालिदासस्येत्युक्तिः उपमायोजनायामेव कालिदासस्य वैशिष्ट्यमाख्याति तथापि उत्प्रेक्षार्थान्तरन्यासादीनामलङ्काराणां विनियोगः तेनातीव सहजतया कृतः। कालिदासस्य नाट्यकृतिषु विशेषतः शाकुन्तले वस्तुविन्यासः अनुपमः, चरित्रचित्रणं सर्वथानवद्यं संवादशैली सम्प्रेषणीयास्ति। सममेव भारतीयसंस्कृत्यनुमतानां धर्मार्थकाममोक्षमूलानां मानवमूल्यानां प्रकाशनं कालिदासस्य वैशिष्ट्यमस्ति। आश्रमवासिनीं शकुन्तला निर्वयँ मनसि कामप्ररोहमनुभूय दुष्यन्तः तावच्छान्ति न लभते यावत्तां क्षत्रियपरिग्रहक्षमा विश्वामित्रस्य दुहितेयमिति नार्वेति। (UPBoardSolutions.com) कण्वस्यानुज्ञां विना गन्धर्वविधिना कृतः विवाहः उभावपि तावत्प्रताडयति यावदेकतः शकुन्तला मारीचाश्रमे तपश्चरणेन अवज्ञाजनितं कलुषं न क्षालयति, अपरतः दुष्यन्तः अङ्गुलीयलाभेन लब्धस्मृतिः सन् भृशं पीयमानः प्रायश्चित्ताग्नौ आत्मशुद्धि न कुरुते। तदनन्तरमेव तयोः दाम्पत्यप्रेम निष्कलुषं भवति पुत्रोपलब्धौ च परिणमते।

UP Board Solutions

कालिदासस्य नाट्यकृतिषु …………………………. च परिणमते। [2007]
कालिदासकाव्येषु …………………………………. सहजतया कृतः। [2007,11]
कालिदासस्य नाटयकृतिषु …………………………….. इति नावैति। [2009]

शब्दार्थ अङ्गीरसः = प्रधान रस। अङ्गभूताः = सहायक, गौण रूप में। क्वचित् = कहीं। काव्योत्कर्षेः = काव्य की उन्नति में। वाग्वश्येव (वाक् + वश्या + इव) = वाणी के वश में होने वाली के समान। अनुवर्तते = अनुसरण करती है। आख्याति = बताती है। विनियोगः = प्रयोग। तेनातीव = उसने अधिकता से। सहजतया = सरलता से। वस्तुविन्यासः = कथावस्तु का संघटन। अनवद्यम् = निर्दोष सम्प्रेषणीया = प्रेषण गुण से युक्त। सममेव = साथ ही। निर्वण्र्य = देखकर। कामप्ररोहमनुभूय (UPBoardSolutions.com) (काम + प्ररोहम् + अनुभूय) = काम-भाव की उत्पत्ति का अनुभव करके। क्षत्रियपरिग्रहक्षमाम् = क्षत्रिय द्वारा विवाह के योग्य। दुहितेयमिति (दुहिता + इति + इयम्) = पुत्री है यह ऐसा। नावैति = नहीं जान लेता है। कण्वस्यानुज्ञाम् = कण्व की अनुमति के उभावपि (उभौ + अपि) = दोनों को। अवज्ञाजनितम् = अपमान से उत्पन्न। कलुषम् = पाप। क्षालयति = धो देती है। लब्धस्मृतिः = स्मृति पाकर (याद करके)। भृशं = अधिक। प्रायश्चित्ताग्नौ = प्रायश्चित्त रूपी अग्नि में। तदनन्तरमेव = इसके बाद ही। निष्कलुषम् = निर्मल, पापरहित परिणमते = फलित होता है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में कालिदास के काव्यों की भावपक्षीय व कलापक्षीय विशेषताओं; यथा–रस, शैली, अलंकार आदि का वर्णन किया गया है।

अनुवाद कालिदास के काव्यों में मुख्य रस श्रृंगार है। उसकी पुष्टि के लिए करुण आदि अन्य रस सहायक रूप में हैं। रस के अनुरूप कहीं प्रसाद गुण और कहीं माधुर्य गुण उनके काव्य के विकास में सहायता प्रदान करते हैं। वैदर्भी रीति कालिदास की वाणी के वश में हुई-सी सभी जगह अनुसरण (वाणी का) करती है। अलंकारों की योजना में कालिदास अद्वितीय हैं। यद्यपि ‘उपमा कालिदासस्य’ यह कथन उपमा की योजना में कालिदास की विशेषता बताता है, फिर भी उत्प्रेक्षा, अर्थान्तरन्यास आदि अलंकारों का प्रयोग उन्होंने अत्यधिक स्वाभाविक ढंग से किया है। कालिदास की नाट्य रचनाओं में, विशेषकर ‘शाकुन्तलम्’ नाटक में, कथावस्तु (UPBoardSolutions.com) की योजना अनुपम है; चरित्र-चित्रण सभी प्रकार से निर्दोष और संवाद-शैली प्रेषण गुण से समन्वित है। साथ ही भारतीय संस्कृति के मतानुसार धर्म, अर्थ, काम, मोक्षस्वरूप मानव-मूल्यों का प्रकाशन कालिदास की विशेषता है। आश्रम में निवास करने वाली शकुन्तला को देखकर, मन में काम के अंकुर की अनुभूति करके दुष्यन्त तब तक शान्ति प्राप्त नहीं करते हैं, जब तक उसे क्षत्रिय के द्वारा विवाह के योग्य विश्वामित्र की पुत्री नहीं जान लेते हैं। कण्व की आज्ञा के बिना गन्धर्व विधि से किया गया विवाह दोनों को ही तब तक सताता रहता है, जब तक एक ओर शकुन्तला मारीच ऋषि के आश्रम में तपस्या के आचरण से (दुर्वासा के) अपमान से उत्पन्न पाप को नहीं धो डालती, दूसरी ओर दुष्यन्त अँगूठी के मिलने से स्मृति (याद) पाकर अत्यन्त पीड़ित होते हुए प्रायश्चित्त की अग्नि में आत्मशुद्धि नहीं कर लेते हैं। इसके बाद ही उन दोनों का दाम्पत्य-प्रेम निष्पाप (शुद्ध) होता है और पुत्र की प्राप्ति में प्रतिफलित होता है।

UP Board Solutions

(9) रघुवंशे कालिदासः रघुवंशिनां चित्रणं तथा करोति यथा भारतीयजनजीवनस्योदात्तादर्शानां सम्यग् दिग्दर्शनं भवेत्। रघुकुलजाः राजानः प्रजाक्षेमाय बलिमाहरन्। मितसंयतभाषिणस्ते सदा सत्यनिष्ठाः आसन्। यशस्कामास्ते तदर्थं प्राणानपि त्यक्तं सदैवोद्यता अभवन्। केवल सन्तत्यर्थे ते गृहमेधिनो बभूवुः। शैशवे विद्यार्जनं यौवने रञ्जनम्। वार्द्धक्ये मुक्त्यर्थं मुनिवदाचरणं तेषां व्रतमासीत्। बाल वृद्धवनितादीनां यदाचरणं कालिदासकाव्ये निरूपितं तत्सर्वथा भारतीयसंस्कृतिगौरवानुरूपमेव। [2009,14]

शब्दर्थ उदात्तादर्शानाम् = श्रेष्ठ आदर्शों का सम्यग् = भली प्रकार दिग्दर्शनम् = वर्णन। क्षेमाय = भलाई के लिए। बलिम् = टैक्स, कर। आहरन् = लेते थे। मितसंयतभाषिणस्ते = सीमित और संयमपूर्ण वचन बोलने वाले वे। यशस्कामास्ते = यश चाहने वाले वे| उद्यताः = तैयार। सन्तत्यर्थे = सन्तानोत्पत्ति के लिए। गृहमेधिनः = गृहस्थ धर्म वाले। रञ्जनम् = भोग। वार्धक्ये = वृद्धावस्था में। मुनिवदाचरणम् (मुनिवत् + आचरणम्) = मुनियों के समान आचरण। वनिता = स्त्री। निरूपितम् = वर्णन किया गया है, वर्णित है। अनुरूपम् = समान।

प्रसग प्रस्तुत गद्यांश में रघुवंशी राजाओं के आचरण का वर्णन किया गया है।

अनुवाद ‘रघुवंशम्’ में कालिदास रघुवंशी राजाओं का चित्रण उस प्रकार करते हैं, जिससे भारतीय जनजीवन के श्रेष्ठ आदर्शों का अच्छी तरह वर्णन हो सके। रघुकुल में उत्पन्न हुए राजा लोग प्रजा की भलाई के लिए कर (टैक्स) लेते थे। परिमित और सधी हुई वाणी बोलने वाले वे सदा सत्यनिष्ठ होते थे। (UPBoardSolutions.com) यश की इच्छा करने वाले वे उसके लिए प्राणों को भी छोड़ने हेतु सदैव तैयार रहते थे। केवल सन्तान के लिए ही वे गृहस्थ धर्म वाले होते थे। बचपन में विद्या-प्राप्ति, युवावस्था में भोग और वृद्धावस्था में मुक्ति के लिए मुनियों के समान आचरण करना उनका व्रत था। बालक, वृद्ध, स्त्री आदि का जो आचरण कालिदास के काव्य में निरूपित हुआ है, वह सभी तरह से भारतीय संस्कृति के गौरव के अनुरूप ही है।

(10) आहिमवतः सिन्धुवेलां यावत् विकीर्णाः भारतगौरवगाथाः कालिदासेन स्वकृतिषुपनिबद्धाः। रघुवंशे, मेघे, कुमारसम्भवे च भारतदेशस्य विविधभूभागानां गिरिकाननादीनां यादृक्स्वा भाविकं मनोहारि च चित्रणं लभ्यते, स्वचक्षुषाऽनक्लोक्य तदसम्भवमस्ति। तथाविधं तस्य देशप्रेम तस्य काव्योत्कर्ष समुद्रढयति। सन्तु तत्रानल्पा संस्कृतकवयः किन्तु कस्यापि कालिदासेन साम्यं नास्ति। साधूक्तम् केनचित् कालिदासानुरागिणा –

UP Board Solutions

पुरा कवीनां गणनाप्रसङ्गे कनिष्ठिकाधिष्ठितकालिदासः।
अद्यापि तत्तुल्यकवेरभावादनामिका सार्थवती बभूव [2005]

आहिमवतः …………………………………… साम्यं नास्ति। [2006, 11, 15]

शब्दार्थ आहिमवतः = हिमालय से लेकर। सिन्धुवेलां यावत् = समुद्र तट तक। विकीर्णाः = बिखरी हुई, फैली हुई। स्वकृतिषुपनिबद्धाः (स्वकृतिषु + उपनिबद्धाः) = अपनी रचनाओं में सम्मिलित की है। यादृक् = जैसा। लभ्यते = प्राप्त होता है। अनवलोक्य = देखे बिना। तदसम्भवमस्ति (तत् + असम्भवम् + अस्ति) = असम्भव है।

समुद्रढयति = अच्छी तरह दृढ करता है। अनल्पाः = बहुत-से। साम्यम् = समानता, बराबरी। साधूक्तम् = ठीक कहा है। अनुरागिणा = प्रेमी ने। गणनाप्रसङ्गे = गणना के अवसर पर। कनिष्ठिकाधिष्ठित = कनिष्ठिका (छोटी) अँगुली पर रखा गया। अद्यापि = आज भी। अनामिका = अँगूठे की ओर से चौथी अँगुली, बिना नाम वाली। सार्थवती = सार्थक, अर्थात् अर्थ साथ रखने वाली। बभूव = हो गयी।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में संस्कृत के कवियों में कालिदास की सर्वश्रेष्ठता बतायी गयी है।

अनुवाद हिमालय से लेकर समुद्रपर्यन्त भारत के गौरव की जितनी गाथाएँ फैली हैं, वे कालिदास ने अपनी रचनाओं में निबद्ध की हैं। रघुवंशम्’, ‘मेघदूतम्’ और ‘कुमारसम्भवम्’ में भारत देश के विविध भू-भागों, पर्वत और वनों का जैसा स्वाभाविक और मनोहर चित्रण मिलता है, अपनी (UPBoardSolutions.com) आँख से देखे बिना वह (ऐसा वर्णन) असम्भव है। उस प्रकार का उनका देश-प्रेम उनके काव्य की श्रेष्ठता को दृढ़ करता है। भले ही संस्कृत में बहुत-से कवि हों, किन्तु किसी की भी कालिदास के साथ समानता नहीं है। कालिदास के किसी प्रेमी ने ठीक कहा है –

प्राचीनकाल में, कवियों की गणना करने के प्रसंग में कालिदास का नाम कनिष्ठिका (सबसे छोटी) अँगुली पर रखा गया, अर्थात् सर्वप्रथम गिना गया। आज भी उनके बराबर (समान स्तर) के कवि के न होने से अनामिका (बिना नाम वाली) अँगुली सार्थक हो गयी है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कालिदास की काव्य-शैली का परिचय दीजिए।
उत्तर :
कालिदास के काव्यों में प्रधान रस ‘श्रृंगार’ है। शेष करुण आदि रस उसके सहायक होकर आये हैं। रस के अनुरूप प्रसाद और माधुर्य गुणों की सृष्टि की गयी है। कालिदास वैदर्भी रीति के श्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। ये अलंकारों के, विशेषकर उपमा के प्रयोग में सिद्धहस्त हैं। इनके नाटकों में वस्तुविन्यास अनुपम, चरित्र-चित्रण निर्दोष और शैली में सम्प्रेषणीयता है। इनके काव्यों में मानव-मूल्यों की प्रतिष्ठा की गयी है।

UP Board Solutions

प्रश्न 2.
महाकवि कालिदास के ग्रन्थों ( रचनाओं) के नाम लिखिए। [2007,08, 10, 11]
या
महाकवि कालिदास के नाटकों के नाम लिखिए। [2012, 13]
या
महाकवि कालिदास रचित दो महाकाव्यों के नाम लिखिए। [2007, 08, 14]
या
कालिदास रचित विविध ग्रन्थों के नाम लिखिए। [2015]
या
‘रघुवंशम्’ महाकाव्य किसकी रचना है? [2007]
उत्तर :
कालिदास को देववाणी का विलास कहा जाता है। संस्कृत भाषा को समस्त सौन्दर्य इनकी रचनाओं में साकार हो गया है। इन्होंने ‘रघुवंशम्’ और ‘कुमारसम्भवम्’ दो महाकाव्य, ‘मेघदूतम्’ और ‘ऋतुसंहार: दो गीतिकाव्य तथा ‘मालविकाग्निमित्रम्’, ‘विक्रमोर्वशीयम्’ एवं (UPBoardSolutions.com) ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ तीन नाटकों की रचना की है।

प्रश्न 3.
महाकवि कालिदास के विषय में क्या जनश्रुति प्रसिद्ध है? [2006]
उत्तर :
कालिदास के विषय में यह जनश्रुति प्रसिद्ध है कि ये विक्रमादित्य के सभारत्न थे, किन्तु विडम्बना यह है कि कोई विद्वान् इन्हें चन्द्रगुप्त द्वितीय का समकालीन मानता है तो कोई उज्जैन के राजा विक्रमादित्य का समकालीन। इस महान् कवि को सभी अपने-अपने देश में उत्पन्न हुआ सिद्ध करते हैं। कुछ विद्वान् इन्हें कश्मीर में उत्पन्न हुआ मानते हैं तो कुछ बंगाल में उत्पन्न हुआ।

प्रश्न 4.
कालिदास को सर्वश्रेष्ठ कवि कहे जाने का कारण बताइए।
या
कालिदास को ‘कविकुलगुरु’ क्यों कहा जाता है? [2012]
उत्तर :
कालिदास की रचनाओं में काव्योचित गुणों के साथ-साथ भारतीय जीवन पद्धति की सर्वांगीणता भी सुशोभित होती है। उनका काव्य सहृदय-जनों को प्रभावित करने में समर्थ है। हिमालय से लेकर समुद्रपर्यन्त तक जितनी भी भारत के गौरव की गाथाएँ हैं, उन सभी को कालिदास ने अपनी (UPBoardSolutions.com) रचनाओं में निबद्ध किया है। बालक, वृद्ध, स्त्री आदि का आचरण इनके काव्य में भारतीय संस्कृति के गौरव के अनुरूप ही निरूपित हुआ है। ये सभी कारण कालिदास की सर्वश्रेष्ठता को प्रमाणित करते हैं। इसीलिए कालिदास को ‘कविकुलगुरु’ कहा जाता है।

UP Board Solutions

प्रश्न 5.
महाकवि कालिदास की रचनाओं का परिचय दीजिए।
उत्तर :
[ संकेत ‘पाठ-सारांश’ के उपशीर्षक ‘रचनाएँ’ शीर्षक की सामग्री अपने शब्दों में लिखें। ]

प्रश्न 6.
‘मेघदूत’ में कवि ने किसका वर्णन किया है? [2010, 11, 12]
उत्तर :
‘मेघदूत’ में महाकवि कालिदास ने विरह से उत्कण्ठित यक्ष की प्रेमविह्वलता तथा बाह्य-प्रकृति व अन्त:-प्रकृति का मर्मस्पर्शी वर्णन किया है।

प्रश्न 7.
कालिदास का जीवन-परिचय लिखिए। [2006,07]
उत्तर :
महाकवि कालिदास संस्कृत के कवियों में मूर्धन्य तथा विश्व के महानतम कवियों में से एक हैं। इनका जन्म कब और कहाँ हुआ, इस विषय में विद्वान् एकमत नहीं हैं। एक जनश्रुति के अनुसार ये विक्रमादित्य के सभारत्न थे तो कुछ विद्वान् इन्हें चन्द्रगुप्त द्वितीय का समकालीन मानते हैं। (UPBoardSolutions.com) कुछ विद्वान् इन्हें कश्मीर में उत्पन्न हुआ मानते हैं तो कुछ बंगाल में। इनकी रचनाओं में वर्णित तथ्यों के आधार पर इन्हें ब्राह्मण कुल में जन्म लिया हुआ तथा शिव व राम का भक्त माना जाता है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है। कि इनका जीवन-वृत्त सभी प्रकार से अज्ञान के अन्धकार में छिपा हुआ है।

प्रश्न 8.
कालिदास का जन्म किस कुल में हुआ था? [2009]
उत्तर :
कालिदास के कुल का स्पष्ट परिचय प्राप्त नहीं होता है। इनकी रचनाओं में वर्ण, आश्रम और धर्म की व्यवस्था का उचित प्रतिपादन होने के कारण विद्वानों का अनुमान है कि इनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था।

प्रश्न 9.
कवि-गणना में कनिष्ठिका पर किस कवि को गिना गया है? [2010]
उत्तर :
कवि-गणना में कनिष्ठिका अर्थात् सबसे छोटी अँगुली पर कालिदास को गिना गया है, अर्थात् सर्वप्रथम गिना गया है।

प्रश्न 10.
अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ कथा के नायक-नायिका का क्या नाम है? [2013]
उत्तर :
‘अभिज्ञानशाकुन्तलम् कथा के नायक हस्तिनापुर के राजा दुष्यन्त’ और नायिका अप्सरा मेनका की पुत्री ‘शकुन्तला’ है।

UP Board Solutions

प्रश्न 11
‘मेघदूतम्’ में कवि ने किसको दूत बनाकर कहाँ भेजा है? [2013]
उत्तर :
‘मेघदूतम्’ में कवि कालिदास ने मेघ (बादल) को यक्ष का दूत बनाकर यक्षिणी अलका के पास सन्देश भेजा है।

प्रश्न 12.
कालिदास के नाटकों का संक्षिप्त परिचय दीजिए। [2013]
उत्तर :
महाकवि कालिदास ने ‘मालविकाग्निमित्रम्’, ‘विक्रमोर्वशीयम्’ एवं ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ नामक तीन नाटकों की रचना की है। ‘मालविकाग्निमित्रम्’ नाटक में अग्निमित्र और मालविका के प्रेम की कथा है। पाँच अंकों वाले ‘विक्रमोर्वशीयम्’ नाटक में पुरूरवा और उर्वशी के प्रेम की कथा वर्णित है। (UPBoardSolutions.com) ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम् कालिदास की सर्वश्रेष्ठ रचना है, जिसमें सात अंक हैं। इसमें मेनका नामक अप्सरा के द्वारा जन्म देकर त्यागी गयी और कण्व के द्वारा पालन की गयी शकुन्तला के दुष्यन्त के साथ प्रेम और विवाह तत्पश्चात् वियोग और पुनर्मिलन की कथा वर्णित है।

Hope given UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 1 are helpful to complete your homework.

If you have any doubts, please comment below. UP Board Solutions try to provide online tutoring for you.