Class 10 Sanskrit Chapter 8 UP Board Solutions सिद्धार्थस्य निर्वेदः Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 8 Siddharthasya Nirvedah Question Answer (पद्य – पीयूषम्)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 8 हिंदी अनुवाद सिद्धार्थस्य निर्वेदः के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

महाकवि अश्वघोष मूलत: बौद्ध दार्शनिक थे। बौद्ध भिक्षु होने के कारण इन्हें आर्य भदन्त भी कहा जाता है। ये कनिष्क के समकालीन और साकेत के निवासी थे। इनकी माता का नाम सुवर्णाक्षी था। अश्वघोष के दो महाकाव्यों—बुद्धचरितम् और सौन्दरनन्द के साथ खण्डित अवस्था में एक (UPBoardSolutions.com) नाटक-शारिपुत्रप्रकरण–भी प्राप्त होता है। इनके वर्णन स्वाभाविक हैं। इनके काव्यों की भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण है तथा शैली वैदर्भी है।

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प्रस्तुत पाठ के श्लोक महाकवि अश्वघोष द्वारा विचित ‘बुद्धचरितम्’ महाकाव्य के तृतीय और पञ्चम सर्ग से संगृहीत हैं। इनमें विहार के लिए निकले हुए सिद्धार्थ के मन में दृढ़ वैराग्य के उदय होने का संक्षिप्त वर्णन है।

पाठ-सारांश

एक बार कुमार सिद्धार्थ अपने पिता से आज्ञा लेकर रथ पर बैठकर नगर-भ्रमण के लिए निकले। उन्होंने मार्ग में श्वेत केशों वाले, लाठी का सहारा लेकर चलने वाले, ढीले और इसे अंगों वाले एक वृद्ध पुरुष को देखा। सारथी से पूछने पर उसने बताया कि बुढ़ापा समयानुसार सभी को अता है, आपको भी आएगा। इसके बाद सिद्धार्थ ने मोटे पेट वाले, साँस चलने के कारण काँपते, झुके कन्धे और कृश शरीर वाले तथा दूसरे को सहारा लेकर चलते हुए एक रोगी को देखा। पूछने पर सारथी ने बताया कि इसको धातु विकार से उत्पन्न रोग बढ़ गया है। यह रोग इन्द्र को भी शक्तिहीन बना सकता है। इसके बाद सिद्धार्थ ने बुद्धि, इन्द्रिय, प्राण और गुणों द्वारा वियुक्त हुए, महानिद्रा में सोये हुए, चेतनारहित, कफन ढककर चार पुरुषों के द्वारा ले जाए जाते हुए एक मृत मनुष्य को देखा। उनकी जिज्ञासा को शान्त करते हुए सारथी ने बताया कि यह मृत्यु सभी मनुष्यों का विनाश करने वाली है। अधम, मध्यम या उत्तम सभी मनुष्यों की मृत्यु निश्चित ही होती है।

वृद्ध, रोगी और मृतक को देखकर सिद्धार्थ का मद तत्क्षण लुप्त हो गया। इसके बाद सिद्धार्थ को एक अदृश्य पुरुष भिक्षु वेश में दिखाई पड़ा। पूछने पर उसने बताया कि मैंने जन्म-मृत्यु पर विजय प्राप्त करने और मोक्ष प्राप्त करने के लिए संन्यास ग्रहण कर लिया है और इसे क्षणिक संसार में मैं अक्षय पद को ढूंढ़ रहा हूँ। भिक्षु के पक्षी के समान आकाश-मार्ग में चले जाने पर सिद्धार्थ ने भी अभिनिष्क्रमण के लिए निश्चय कर लिया।

पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1)
ततः कुमारो जरयाभिभूतं, दृष्ट्वा नरेभ्यः पृथगाकृतिं तम्।
उवाच सङ्ग्राहकमागतास्थस्तत्रैव निष्कम्पनिविष्टदृष्टिः॥

शब्दार्थ ततः = तदनन्तर इसके बाद। कुमारः = राजकुमार सिद्धार्थ ने। जरयाभिभूतम् = बुढ़ापे से आक्रान्त। दृष्ट्वा = देखकर पृथगाकृतिम् = भिन्न आकृति वाले को। तम् = उस वृद्ध को। उवाचे = कहा। सङ्ग्राहकम् = घोड़े की लगाम पकड़ने वाले से, सारथी से। आगतास्थः = (UPBoardSolutions.com) उत्पन्न विचारों वाला। तत्र = उस (वृद्ध) पर। निष्कम्पनिविष्टदृष्टिः = दृष्टि को बिना हिलाये अर्थात् गड़ाये हुए।

सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के सिद्धार्थस्य निर्वेदः’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

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[ संकेत इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा। ]

प्रसंग इस श्लोक में पिता की आज्ञा से नगर-विहार को निकले हुए सिद्धार्थ द्वारा एक वृद्ध पुरुष को देखकर सारथी से प्रश्न पूछने का वर्णन है।

अन्वय ततः कुमारः जरयाभिभूतं नरेभ्यः पृथगाकृतिं तं दृष्ट्वा आगतास्थः तत्र एव निष्कम्पनिविष्टदृष्टिः (सन्) सङ्ग्राहकम् उवाच।।

व्याख्या (रथ पर चढ़कर नगर-विहार के लिए निकलने के बाद) कुमार सिद्धार्थ ने बुढ़ापे से आक्रान्त, अन्य मनुष्यों से भिन्न आकार वाले उस वृद्ध पुरुष को देखकर उत्पन्न विचारों वाले, उसी वृद्ध पुरुष पर एकटक दृष्टि लगाये हुए अपने सारथी से कहा। तात्पर्य यह है कि नगर-विहार पर निकलने से पूर्व तक कुमार सिद्धार्थ ने केवल युवा पुरुष और युवतियों को ही देखा था। इसीलिए उस वृद्ध पुरुष को देखकर उनके नेत्र उस पर स्थिर हो गये।

(2)
क एष भोः सूत नरोऽभ्युपेतः, केशैः सितैर्यष्टिविषक्तहस्तः
भूसंवृताक्षः शिथिलानताङ्गः किं विक्रियैषा प्रकृतिर्यदृच्छा ॥

शब्दर्थ कः = कौन। एषः = यह। भोः सूत = हे सारथि!| नरः = मनुष्य, आदमी। अभ्युपेतः = सामने आया हुआ। केशैः = बालों वाला। सितैः = सफेद। यष्टिविषक्तहस्तः = लाठी पर हाथ टिकाये हुए। भूसंवृताक्षः = भौंहों से ढकी हुई आँखों वाला। शिथिलानताङ्ग = ढीले और झुके हुए अंगों वाला। किं = क्या। विक्रिया एषा= यह परिवर्तन| प्रकृतिः = स्वाभाविक स्थिति। यदृच्छा = संयोग।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सिद्धार्थ द्वारा वृद्ध पुरुष को देखकर सारथी से पूछे जाने का वर्णन है।

अन्वये भोः सूत! सितैः केशैः (युक्तः), यष्टिविषक्तहस्तः, भूसंवृताक्षः, शिथिलानताङ्ग अभ्युपेतः एषः नरः कः (अस्ति)। किम् एषा विक्रिया (अस्ति) (वा) प्रकृतिः यदृच्छा (अस्ति)।

व्याख्या हे सारथि! सफेद बालों से युक्त, लाठी पर टिके हुए हाथ वाला, भौंहों से ढके हुए नेत्रों (UPBoardSolutions.com) वाला, ढीले और झुके हुए अंगों वाला, सामने आया हुआ यह मनुष्य कौन है? क्या यह विकार है अथवा स्वाभाविक रूप है अथवा यह कोई संयोग है?

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(3)
रूपस्य हर्जी व्यसनं बलस्य, शोकस्य योनिर्निधनं रतीनाम्।
नाशः स्मृतीनां रिपुरिन्द्रियाणामेषा जरा नाम ययैष भग्नः ॥ [2009, 13]

शब्दार्थ रूपस्य = रूप का। हर्जी = हरण या विनाश करने वाली। व्यसनम् = संकट या विनाश। बलस्य = बल का। शोकस्य = शोक का। योनिः = जन्म देने वाली मूल कारण निधनम् = विनाशका रतीनाम् = काम-सुखों को। स्मृतीनां = स्मृति को। रिपुः = शत्रु। इन्द्रियाणां = इन्द्रियों को। जरा = बुढापा। यया= जिससे एषः = यह। भग्नः = टूट गया है। प्रसंग सिद्धार्थ के वृद्ध पुरुष के बारे में प्रश्न करने पर सारथी उत्तर देता है।

अन्वय (सारथिः उवाच) एषा रूपस्य हर्जी, बलस्य व्यसनम्, शोकस्य योनिः, रतीनां निधनं, स्मृतीनां नाशः, इन्द्रियाणां रिपुः जरा नाम (अस्ति)। यया एष (नरः) भग्नः।

व्याख्या सारथी ने उत्तर दिया कि यह रूप का विनाश करने वाला, बल के लिए संकटस्वरूप, दु:ख की उत्पत्ति का मूल कारण, काम-सुखों को समाप्त करने वाला, स्मृति को नष्ट करने वाला, इन्द्रियों का शत्रु बुढ़ापा है, जिसके द्वारा यह पुरुष टूट गया है।

(4)
पीतं ह्यनेनापि पयः शिशुत्वे, कालेन भूयः परिमृष्टमुव्र्याम् ।
क्रमेण भूत्वा च युवा वपुष्मान्, क्रमेण तेनैव जरामुपेतः ॥

शब्दार्थ पीतं = पिया गया है। हि = निश्चय ही। अनेन अपि = इसके द्वारा भी। पयः = दूध। शिशुत्वे = बचपन में। कालेन = समय के अनुसार। भूयः = फिर। परिमृष्टम् = लोट लगायी है। उम् = भूमि पर, पृथ्वी पर। क्रमेण = क्रम के अनुसार। भूत्वा = होकर, बनकर। वपुष्मान् = सुन्दर शरीर वाला। तेन = उस। एव = ही। जराम् उपेतः = बुढ़ापे को प्राप्त हुआ।

प्रसंग सारथी राजकुमार को समझा रहा है कि इस वृद्ध ने एक निश्चित क्रम के अनुसार ही यह अवस्था प्राप्त की है।

अन्वय हि अनेन अपि शिशुत्वे पयः पीतम्, कालेन उ भूयः परिमृष्टं क्रमेण च युवा वपुष्मान् भूत्वा तेन एवं क्रमेण जराम् उपेतः।

व्याख्या निश्चय ही इसने भी बचपन में दूध पीया है, समय के अनुसार पृथ्वी पर लोट लगायी है और क्रम से सुन्दर शरीर वाला युवा होकर उसी क्रम में बुढ़ापे को प्राप्त किया है। तात्पर्य यह है कि इस (वृद्ध) की ऐसी अवस्था अकस्मात् ही नहीं हो गयी है, वरन् एक निश्चित क्रम-जन्म, बाल्यावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, अधेड़ावस्था, वृद्धावस्था के अनुसार हुई है।

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(5)
आयुष्मतोऽप्येष वयोऽपकर्षों, नि:संशयं कालवशेन भावी।
श्रुत्वा जरामुविविजे महात्मा महाशनेर्दोषमिवान्तिके गौः ॥

शब्दार्थ आयुष्मतः = चिरञ्जीवी आपको। अपि = भी। एष = यह। वयः अपकर्षः = अवस्था का हास। निःसंशयम्= निःसन्देह, निश्चित रूप से कालवशेन= समय के अनुसार भावी = होगा। श्रुत्वा = सुनकर। जराम् = वृद्धावस्था को। उद्विविजे = उद्विग्न हो गये। महाशनेः = महान् वज्र के। घोषम् = शब्द को। इव = समान, तरह। अन्तिके = पास में।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में वृद्धावस्था की निश्चितता के बारे में जानने पर सिद्धार्थ की उद्विग्नता का वर्णन किया गया है।

अन्वय एषः वयोऽपकर्षः कालवशेन आयुष्मतः अपि नि:संशयं भावी। महात्मा जरां श्रुत्वा अन्तिके महाशनेः घोषं (श्रुत्वा) गौः इव उद्विविजे।

व्याख्या सारथि कुमार सिद्धार्थ से कहता है कि यह अवस्था का ह्रास भी समय के कारण दीर्घ आयु वाले (UPBoardSolutions.com) आपको भी नि:सन्देह होगा। इस प्रकार वह महान् आत्मा वाले कुमार सिद्धार्थ बुढ़ापे के विषय में सुनकर; पास में महान् वज्र की ध्वनि को सुनने वाली; गाय के समान उद्विग्न हो गये।

(6)
अथापरं व्याधिपरीतदेहं, त एव देवाः ससृजुर्मनुष्यम्।
दृष्ट्वा च तं सारथिमाबभाषे, शौद्धोदनिस्तद्गतदृष्टिरेव॥

शब्दार्थ अथ = इसके बाद। अपरम्= दूसरे व्याधिपरीतदेहम् = रोग से व्याप्त शरीर वाले। ते एव देवाः = उन देवताओं ने ही। ससृजुः = रचना कर दी। दृष्ट्वा = देखकर। च= और म्= उसको। सारथिम् = सारथी से। आबभाषे = बोला। शौद्धोदनिः = शुद्धोदन की पुत्र, सिद्धार्थ। तद्गत दृष्टिः = उसी पर दृष्टि लगाये हुए।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सिद्धार्थ के द्वारा एक रोगी को देखकर उसके बारे में सारथी से प्रश्न पूछने का वर्णन है।

अन्वय अथ ते एव देवाः अपरं मनुष्यं व्याधिपरीतदेहं ससृजुः। तं च दृष्ट्वा शौद्धोदनि: तद्गतदृष्टिः एव सारथिम् आबभाषे।।

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व्याख्या इसके बाद उन्हीं देवताओं ने दूसरे मनुष्य को रोग से व्याप्त शरीर वाला रच दिया। उस (रोगी) को देखकर राजा शुद्धोदन के पुत्र सिद्धार्थ ने उसी पर टकटकी लगाये हुए ही सारथी से कहा।

(7)
स्थूलोदर-श्वासचलच्छरीरः, स्वस्तांसबाहुः कृशपाण्डुगात्रः।
अम्बेति वाचं करुणं बुवाणः, परं समाश्लिष्य नरः क एषः ॥

शब्दार्थ स्थूलोदरः = मोटे पेट वाला; निकले हुए पेट वाला। श्वासचलच्छरीरः = साँस लेने से हिलते (काँपते) हुए शरीर वाला। स्वस्तांसबाहुः = ढीले कन्धे और भुजा वाला| कृशपाण्डुगात्रः = दुर्बल और पीले शरीर वाला। अम्बेति वाचं =’हाय माता’ इस प्रकार के वचन को। करुणम् = करुणापूर्वका बुवाणः = बोलता हुआ। परं = दूसरे से। समाश्लिष्य = लिपटकर, सहारा लेकर

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में रोगी के सम्बन्ध में जिज्ञासु सिद्धार्थ द्वारा सारथी से प्रश्न पूछा गया है।

अन्वय (सिद्धार्थः सारथिम् अपृच्छत्) स्थूलोदरः, श्वासचलच्छरीरः, स्रस्तांसबाहुः, कृश-पाण्डुगात्रः, परं समाश्लिष्य ‘अम्ब’ इति करुणं वाचं ब्रुवाणः एषः नरः कः (अस्ति)?

व्याख्या सिद्धार्थ ने सारथी से पूछा कि मोटे पेट वाला, साँस लेने से काँपते हुए शरीर वाला, झुके हुए ढीले कन्धे और भुजा वाला, दुर्बल और पीले शरीर वाला, दूसरे का सहारा लेकर ‘हाय माता!’ इस प्रकार के करुणापूर्ण वचन कहता हुआ यह मनुष्य कौन है?

(8)
ततोऽब्रवीत् सारथिरस्य सौम्य!, धातुप्रकोपप्रभवः प्रवृद्धः।
रोगाभिधानः सुमहाननर्थः, शक्रोऽपि येनैष कृतोऽस्वतन्त्रः॥

शब्दार्थ ततः = इसके बाद अब्रवीत् = कहा। सारथिरस्य (सारथिः + अस्य) = इसके (सिद्धार्थ) सारथी ने। सौम्यः = हे सौम्य!, हे भद्र!| धातुप्रकोपप्रभवः = वात, पित्त, कफ आदि धातुओं की विषमता के कारण उत्पन्न।प्रवृद्धः = बढ़ा हुआ। रोगाभिधानः = रोग नामका सुमहान् (UPBoardSolutions.com) अनर्थः = बहुत बड़ा अनिष्ट शक्रोऽपि = इन्द्र भी। येन = जिस रोग से। एष = यहा कृत = किया गया। अस्वतन्त्रः = पराधीन।

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प्रसग प्रस्तुत श्लोक में सारथी सिद्धार्थ को रोगी के विषय में बता रही है।

अन्वय ततः सारथिः अब्रवीत्-सौम्य! अस्य धातुप्रकोपप्रभवः रोगाभिधानः (नाम) सुमहान् अनर्थः प्रवृद्धः येन एष शक्रः अपि अस्वतन्त्रः कृतः।।

व्याख्या इसके बाद सारथी ने कहा–हे सौम्य इसका वात, पित्त, कफ आदि धातुओं की विषमता के कारण उत्पन्न हुआ रोग नाम का अत्यन्त बड़ा संकट बढ़ गया है, जिसने इस इन्द्र को भी पराधीन कर दिया है। तात्पर्य यह है कि धातुओं (वात-पित्त-कफ) की विषमता या सामंजस्य बिगड़ जाने के कारण रोग के उत्पन्न हो जाने पर इन्द्र जैसे महान् बलशाली को भी दूसरों का सहारा लेने के लिए विवश होना पड़ता है।

(9)
अथाब्रवीद् राजसुतः स सूतं, नरैश्चतुर्भिर्हियते क एषः ?
दीनैर्मनुष्यैरनुगम्यमानो, यो भूषितोऽश्वास्यवरुध्यते च ॥

शब्दार्थ अथ = इसके बाद। अब्रवीत् = कहा। राजसुतः = राजकुमार (सिद्धार्थ) ने। सः = वह, उस। सूतं = सारथी को। नरैश्चतुर्भिः = चार मनुष्यों के द्वारा। ह्रियते = ले जाया जा रहा है। दीनैः मनुष्यैः = दीन-हीन या दुःखी मनुष्यों के द्वारा। अनुगम्यमानः = अनुगमन किया जाता है। यः = जो भूषितः = फूलमालाओं और चन्दन आदि से सजाया गया। अश्वासी = श्वास-विहीन अवरुध्यते च = और (कफन से) ढका जा रहा है, बाँधा गया

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सिद्धार्थ एक अरथी को ले जाये जाते हुए देखकर उसके विषय में सारथि से पूछते हैं।

अन्वय अथ स: राजसुतः सूतम् अब्रवीत्-(हे सूत!) यः भूषितः अश्वासी अवरुध्यते च। दीनै: मनुष्यैः अनुगम्यमाने एषः कः चतुर्भिः नरैः हियते।

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व्याख्या इसके पश्चात् उस राजकुमार ने सारथि से कहा–हे सारथि! जो चन्दन और फूलमालाओं आदि से सजाया गया, श्वासविहीन और (कफन से) ढका हुआ है, दीन-दु:खी लोगों के द्वारा अनुगमन किया जाता हुआ यह कौन चार आदमियों के द्वारा ले जाया जा रहा है?

(10)
बुद्धीन्द्रियप्राणगुणैर्वियुक्तः, सुप्तो विसञ्जस्तृणकाष्ठभूतः।
सम्बध्य संरक्ष्य च यत्नवद्भिः , प्रियाप्रियैस्त्यज्यते एष कोऽपि ॥

शब्दार्थ बुद्धीन्द्रियप्राणगुणैः = बुद्धि, इन्द्रिय, प्राणों और गुणों से। वियुक्तः = अलग हुआ। सुप्तः = (सदा के लिए) सोया हुआ। विसञ्जः = संज्ञाहीना तृणकाष्ठभूतः = तिनके और लकड़ी के समान हुआ अर्थात् निर्जीव। सम्बध्य = अच्छी तरह बाँधकर। संरक्ष्य = सुरक्षित करके च = और यत्नवद्भिः = प्रयत्न करने वाले, प्रयत्नशीला प्रियाप्रियैः = प्रिय और अप्रिय सबके द्वारा। त्यज्यते = (सदा के लिए) छोड़ा जा रहा है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सारथि मृतक व्यक्ति के विषय में सिद्धार्थ को बता रहा है।

अन्वय बुद्धीन्द्रियप्राणगुणैः वियुक्तः, सुप्तः, विसञ्ज्ञः, तृणकाष्ठभूतः एष कोऽपि यत्नवद्भिः प्रियाप्रियैः सम्बध्य संरक्ष्य च त्यज्यते।

व्याख्या सारथि ने उत्तर दिया कि हे कुमार! बुद्धि, इन्द्रियों, प्राणों और गुणों से बिछुड़ा हुआ महानिन्द्रा (UPBoardSolutions.com) में सोया हुआ, चेतना से शून्य, तृण और काष्ठ के समान निर्जीव, यह कोई (मृत मनुष्य) यत्न करने वाले प्रिय और अप्रिय लोगों के द्वारा अच्छी तरह बाँधकर और भली-भाँति रक्षा करके (सदा के लिए) छोड़ा जा रहा है।

(11)
ततः प्रणेता वदति स्म तस्मै, सर्वप्रजानामयमन्तकर्ता।
हीनस्य मध्यस्य महात्मनो वा, सर्वस्य लोके नियतो विनाशः ॥ (2012, 14]

शब्दार्थ प्रणेता = रथ हाँकने वाला सारथी। वदति स्म = कहा। तस्मै = उससे (सिद्धार्थ से)। सर्वप्रजानाम् = सभी प्रजाओं का; अर्थात् जो जन्मे हैं उन सबका। अयम् = यह; अर्थात् मृत्यु या काल। अन्तकर्ता = अन्त करने वाला। हीनस्य = छोटे स्तर वाले का। मध्यस्य= मध्यम स्तर वाले का। महात्मनः वा = या उत्तम स्तर वाले का। सर्वस्य लोके = संसार में सभी का। नियतः विनाशः = विनाश या मृत्यु निश्चित है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सारथी मृत्यु की अवश्यम्भाविता के विषय में सिद्धार्थ को बता रहा है।

अन्वय ततः प्रणेता तस्मै वदति स्म–अयं सर्वप्रजानाम् अन्तकर्ता (अस्ति)। लोके हीनस्य मध्यस्य महात्मनः वा सर्वस्य विनाशः नियतः (अस्ति)।

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व्याख्या इसके बाद सारथी ने उन सिद्धार्थ से कहा-यह (मृत्यु) सभी प्रजाओं का अन्त करने वाली है। संसार में अधम, मध्यम या उत्तम सभी मनुष्यों की मृत्यु निश्चित है। तात्पर्य यह है कि इस संसार में जन्म लेने वाले सभी व्यक्तियों की मृत्यु सुनिश्चित है, चाहे जन्म लेने वाला व्यक्ति उत्कृष्ट हो या निकृष्ट।

(12)
इति तस्य विपश्यतो यथावज्जगतोव्याधिजराविपत्तिदोषान्।
बलयौवनजीवितप्रवृत्तौ विजगामात्मगतो मदः क्षणेन ॥

शब्दार्थ इति = इस प्रकार। तस्य = उसका (सिद्धार्थ का)। विपश्यतः = विशेष रूप से देखते या समझते हुए। यथावत् = सही ढंग से। जगतः = संसार के व्याधिजराविपत्तिदोषान्= बीमारी, बुढ़ापा, मृत्युरूप दोषों को। बलयौवनजीवितप्रवृत्तौ = बल, यौवन और जीवन की प्रवृत्ति के सम्बन्ध में। विजगाम = लुप्त हो गया। आत्मगतः = अपने अन्दर स्थित। मदः = मद, अहंकार, उल्लास। क्षणेन = क्षण भर में

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सिद्धार्थ के मन में विरक्ति के उत्पन्न होने का वर्णन किया गया है।

अन्वय इति जगतः व्याधिजराविपत्तिदोषान् यथावत् विपश्यतः तस्य बलयौवनजीवितप्रवृत्तौ आत्मगतः मदः क्षणेन विजगाम।

व्याख्या इस प्रकार संसार के रोग, वृद्धावस्था, मृत्युरूप दोषों को सही ढंग से विशेष रूप से समझते हुए उसका (सिद्धार्थ का) शक्ति, यौवन और जीवन की प्रवृत्ति के सम्बन्ध में अपने अन्दर स्थित अहंकार क्षणभर में लुप्त हो गया। तात्पर्य यह है कि सिद्धार्थ उसी क्षण (UPBoardSolutions.com) यह भूल गये कि वे राजकुमार हैं। उन्हें यह अनुभव हो गया कि वे भी एक सामान्य मनुष्य हैं।

(13)
पुरुषैरपरैरदृश्यमानः पुरुषश्चोपससर्प भिक्षुवेषः ।।
नरदेवसुतस्तमभ्यपृच्छद् वद कोऽसीति शशंस सोऽथ तस्मै ॥

शब्दार्थ पुरुषैः अपरैः = दूसरे मनुष्यों के द्वारा। अदृश्यमानः = न दिखाई पड़ने वाला। पुरुषः = मनुष्य। च= और। उपससर्प = पास आया। भिक्षुवेषः = भिक्षुक वेष वाला। नरदेवसु ..= राजकुमार (सिद्धार्थ) ने। तम् = उससे। अभ्यपृच्छत् = पूछा। वद = बताओ। कोऽसीति (कः + असि + इति) = कौन हो, यहा शशंस = कहा। सोऽथ (सः + अथ) = इसके बाद उसने। तस्मै = उससे (सिद्धार्थ से)।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में एक दिव्य पुरुष को देखकर सिद्धार्थ उससे उसके विषय में पूछते हैं।

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अन्वय अपरैः पुरुषैः अदृश्यमानः भिक्षुवेषः पुरुषः च (एनम्) उपससर्प। नरदेवसुतः तम् अभ्यपृच्छत्-(त्वं) कः असि? इति वद। अथ सः तस्मै शशंस।।

व्याख्या दूसरे लोगों से न देखा गया और भिक्षु का वेश धारण करने वाला कोई पुरुष उसके (सिद्धार्थ के) पास आया। राजकुमार सिद्धार्थ ने उससे पूछा-तुम कौन हो? यह बताओ। इसके बाद उसने उनसे कहा। तात्पर्य यह है कि सिद्धार्थ के मन में जब अहंकार दूर हो जाता है तभी दिव्य पुरुष उनको दिखाई पड़ता है, जिसे उनका सारथी नहीं देख पाता।

(14)
नृपपुङ्गव! जन्ममृत्युभीतः, श्रमणः प्रव्रजितोऽस्मि मोक्षहेतोः।
जगति क्षयधर्मके मुमुक्षुर्मुगयेऽहं शिवमक्षयं पदं तत् ॥

शब्दार्थ नृपपुङ्गव = राजाओं में श्रेष्ठ। जन्ममृत्युभीतः = जन्म और मृत्यु से डरा हुआ। श्रमणः = साधु या संन्यासी। प्रव्रजितः अस्मि = सब कुछ छोड़कर घर से निकला हुआ अर्थात् संन्यासी हूँ। मोक्षहेतोः = मोक्ष अर्थात् मुक्ति के लिए। जगति = संसार से। क्षयधर्मके = नष्ट होना ही जिसका धर्म (स्वभाव) है; अर्थात् नश्वर। मुमुक्षुः = मोक्ष की इच्छा वाला। मृगये= ढूंढ़ रहा हूँ। शिवम् अक्षयं पदम् = विनाशरहित मंगलमय स्थान को।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में संन्यासी अपने परिचय और लक्ष्य के विषय में सिद्धार्थ से कह रहा है।

अन्वय नृपपुङ्गव! जन्ममृत्युभीत: (अहं) मोक्षहेतोः श्रमणः प्रव्रजित: अस्मि। क्षयधर्मके (UPBoardSolutions.com) जगति मुमुक्षुः अहं तत् अक्षयं शिवं पदं मृगये।

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व्याख्या हे राजाओं में श्रेष्ठ! जन्म और मृत्यु के दु:ख से डरा हुआ मैं मोक्ष के लिए संन्यासी होकर घर से निकल पड़ा हूँ। विनाशशील अर्थात् नश्वर संसार में मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा करने वाला मैं उस अविनाशी मंगलमय पद की खोज कर रहा हूँ।

(15)
गगनं खगवद् गते च तस्मिन्, नृवरः सञ्जहृषे विसिपिये च।
उपलभ्य ततश्च धर्मसञ्ज्ञामभिनिर्याणविधौ मतिं चकार ॥

शब्दार्थ गगनं = आकाश में। खगवत् = पक्षी की तरह गते = जाने पर। च = और। तस्मिन् = उस (भिक्षु) के नृवरः = मनुष्यों में श्रेष्ठ, सिद्धार्थ। सञ्जहृषे = हर्षित हुआ। विसिष्मिये = विस्मित हुआ; उपलभ्य = प्राप्त करके धर्मसञ्ज्ञाम् = धर्म के ज्ञान को। अभिनिर्याणविधौ = अभिनिष्क्रमण में। मतिं चकार = विचार किया।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सिद्धार्थ के भी संन्यास-ग्रहण करने के विषय में विचार करने के बारे में बताया गया है।

अन्वय तस्मिन् खगवत् गगनं गते नृवरः सञ्जहषे विसिष्मिये च। ततः धर्मसंज्ञां च उपलभ्य अभिनिर्याणविधौ मतिं चकार।

व्याख्या उस (भिक्षु) के पक्षी के समान आकाश में चले जाने पर अर्थात् उड़ जाने पर मनुष्यों में श्रेष्ठ सिद्धार्थ प्रसन्न हुए और आश्चर्यचकित हुए तथा उससे धर्म का बोध प्राप्त करके अभिनिष्क्रमण करने का विचार किया। तात्पर्य यह है कि उस भिक्षु से सही ज्ञान प्राप्त (UPBoardSolutions.com) हो जाने के कारण सिद्धार्थ अत्यधिक हर्षित हुए और घर त्याग कर संन्यास-ग्रहण करने का संकल्प कर लिया।

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सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1)
नाशः स्मृतीनां रिपुरिन्द्रियाणामेषा जरा नाम ययैष भग्नः।
एषा जरा नाम ययैष भग्नः। [2010, 14]

सन्दर्भ यह सूक्तिपरक पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘सिद्धार्थस्य निर्वेदः’ नामक पाठ से अवतरित है।

[संकेत इस पाठ की शेष सभी सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में वृद्धावस्था के दोषों पर प्रकाश डाला गया है।

अर्थ यह स्मृतियों को नष्ट करने वाला इन्द्रियों का शत्रु वृद्धावस्था ९, जिससे यह व्यक्ति टूट गया है।

व्याख्या वृद्धावस्था में व्यक्ति की स्मरण-शक्ति क्षीण हो जाती है और ज्यों-ज्यों यह अवस्था बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों वह और भी अधिक क्षीण होती जाती है। इसके अतिरिक्त वृद्धावस्था में व्यक्ति की ज्ञानेन्द्रियाँ भी शिथिल हो जाती हैं और उनकी कार्य करने की शक्ति या तो कम हो जाती है अथवा समाप्त हो जाती है। यही कारण है कि वृद्धावस्था में व्यक्ति कम सुनने लगता है, उसे कम दिखाई देने लगता है और उसकी सोचने की शक्ति भी कम (UPBoardSolutions.com) हो जाती है। इसलिए बुढ़ापे को स्मृतियों (याददाश्त) को नष्ट करने वाला तथा इन्द्रियों का शत्रु कहा गया है, जो कि उचित है।

(2) शक्रोऽपि येनैष कृतोऽस्वतन्त्रः। [2006]

प्रसंग प्रत्येक व्यक्ति कभी-न-कभी बीमार अवश्य होता है, इस सूक्ति में इसी सत्य का उद्घाटन किया गया है।

अर्थ इन्द्र भी इस (रोग) के द्वारा स्वतन्त्र नहीं किये गये; अर्थात् उन्हें भी इस रोग ने नहीं छोड़ा।

व्याख्या सिद्धार्थ का सारथी उन्हें रोग के विषय में बता रहा है कि रोग एक ऐसी व्याधि है, जिससे कोई भी प्राणी बच नहीं पाता है। अपने सम्पूर्ण जीवन में प्रत्येक प्राणी कभी-न-कभी बीमार अवश्य पड़ता है। मनुष्यों की तो बात ही क्या, इस रोग ने तो इन्द्र को भी नहीं छोड़ा था। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि बढ़ा हुआ रोग जब व्यक्ति को पूर्णरूपेण असमर्थ बना देता है तब इन्द्र भी चाहने पर उसकी रक्षा नहीं कर सकते। तात्पर्य यह है कि रोग के द्वारा पूरी तरह से पराधीन किया गया मनुष्य इन्द्र द्वारा भी स्वाधीन नहीं किया जा सकता।

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(3) सर्वस्य लोके नियतो विनाशः।। [2006, 08, 09, 10, 11, 13]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति के माध्यम से कवि संसार के शाश्वत नियमों को स्पष्ट कर रहा है।

अर्थ संसार में सबका विनाश निश्चित है।

व्याख्या संसार में जो भी जड़-चेतन पदार्थ हैं, उनमें से कोई भी चिरस्थायी नहीं है। संसार में जो भी वस्तु उत्पन्न होती है, वह अवश्य ही नष्ट होती है। विनाश से कोई भी वस्तु बच नहीं सकती, चाहे वह प्राणियों का शरीर हो या वृक्ष, पर्वत आदि अन्य कुछ। इस संसार में ऐसा कुछ (UPBoardSolutions.com) भी नहीं है, जो उत्पन्न तो हुआ हो लेकिन उसका विनाश न हुआ हो। श्रीमद्भगवद्गीता में भी कहा गया है “जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः धुवं जन्ममृतस्य च।”

श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) ततः कुमारो ……………………………………………… निष्कम्प-निविष्ट-दृष्टिः ॥ (श्लोक 1) :
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महाकविः अश्वघोषः कथयति यत् वृद्धावस्थापीडितं भिन्नाकृति: पुरुषं दृष्ट्वा आगतास्थः कुमार सिद्धार्थः अपलकदृष्ट्या पश्यन् तं वृद्धं स्वसारथिम् अब्रवीत्।।

(2) क एष भोः ………………………………………………प्रकृतिर्यदृच्छा ॥ (श्लोक 2)
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके सिद्धार्थः अवदत्-भोः सूत! मत्समक्षम् उपस्थितः श्वेतकेश-युक्तः, यष्टिविषक्तहस्तः, दीर्घभूसंवृताक्षः, शिथिलाङ्गः पुरुषः कः अस्ति? कथमस्य एषा दशा उत्पन्ना? अस्य एषा दशा स्वाभाविकी अथवा संयोगेन सजातः।

(3) रूपस्य हर्जी ……………………………………………… ययैष भग्नः ॥ (श्लोक 3) [2006]
संस्कृतार्थः सिद्धार्थस्य वचनं श्रुत्वा सारथिः प्रत्यवदत्-कुमार! अस्य पुरुषस्य वृद्धावस्था वर्तते। एषां वृद्धावस्था रूपस्य हरणकर्जी, बलस्य विनाशिनी, शोकस्य कारणं, कामानां निधनं, स्मृतीनां नाशः, इन्द्रियाणां शत्रुः चास्ति। वृद्धावस्था सर्वेषां कष्टानां कारणम् अस्ति।

(4) ततोऽब्रवीत् ……………………………………………… कृतोऽस्वतन्त्रः॥ (श्लोक 8)
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महाकविः अश्वघोषः कथयति यत् कुमार सिद्धार्थस्य वचनं श्रुत्वा सारथिः अब्रवीत्-हे सौम्य! अस्य पुरुषस्य धातवः क्षीणः विकृतः अभवन्। रोगस्य वर्धनात् अयं पुरुषः असमर्थः अभवत्। अतएव इन्द्रः अपि तं रक्षितुं न समर्थः।।

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(5) ततः प्रणेता ……………………………………………… नियतो विनाशः ॥ (श्लोक 11) [2007, 08]
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके सारथिः कथयति-भो राजकुमार! कालः सर्वेषाम् उत्पन्नानाम् अन्तकर्ता (UPBoardSolutions.com) अस्ति। अस्मिन् लोके उत्तम-मध्यम-हीन जनानां सर्वेषां विनाः नियतो वर्तते। य: उत्पन्न: भवति सः अवश्यमेव विनश्यति। न कः अपि सर्वदा एव तिष्ठति।।

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Class 10 Sanskrit Chapter 5 UP Board Solutions विश्वकविः रवीन्द्रः Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 5 Vishwakavi Ravindra Question Answer (गद्य – भारती)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 5 हिंदी अनुवाद विश्वकविः रवीन्द्रः के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

रवीन्द्रनाथ ठाकुर की मातृभाषा बांग्ला थी। ये अनेक वर्षों तक इंग्लैण्ड में रहे थे। इसलिए इन पर वहाँ की भाषा तथा संस्कृति का भी पर्याप्त प्रभाव पड़ा था। इन्होंने बांग्ला और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में साहित्य-रचना की है। ये नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रथम भारतीय थे। इनकी रचना ‘गीताञ्जलि’ पर इनको यह पुरस्कार प्राप्त हुआ था। ‘गीजाञ्जलि’ के पश्चात् इनकी दूसरी कृति या निर्माण ‘विश्वभारती है। इसमें प्राचीन भारतीय पद्धति (UPBoardSolutions.com) अर्थात् आश्रम पद्धति से शिक्षा दी जाती है। इन्होंने भारतीय और पाश्चात्य संगीत का समन्वय करके संगीत की एक नवीन शैली को जन्म दिया, जिसे ‘रवीन्द्र संगीत’ कहा जाता है। प्रस्तुत पाठ में रवीन्द्रनाथ जी के जीवन-परिचय के साथ-साथ इनकी साहित्यिक एवं सामाजिक उपलब्धियों पर भी प्रकाश डाला गया है।

पाठ-सारांश [2006, 07,08, 11, 12, 13, 15]

प्रसिद्ध महाकवि श्री रवीन्द्रनाथ का बांग्ला साहित्य में वही स्थान है जो अंग्रेजी-साहित्य में शेक्सपीयर का, संस्कृत-साहित्य में कविकुलगुरु कालिदास का और हिन्दी-साहित्य में तुलसीदास का। इनका नाम आधुनिक भारतीय कलाकारों में भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। ये केवल आध्यात्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में ही नहीं, वरन् रचनात्मक साहित्यकार के रूप में भी जाने जाते हैं।

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इन्होंने सांस्कृतिक क्षेत्र में संगीत और नृत्य की नवीन रवीन्द्र-संगीत-शैली प्रारम्भ की। शिक्षाविद् के रूप में इनके नवीन प्रयोगात्मक विचारों को प्रतीक ‘विश्वभारती है, जिसमें आश्रम शैली का नवीन शैली के साथ समन्वय है। ये दीन और दलित वर्ग की हीन दशा के महान् सुधारक थे।

वैभव में जन्म रवीन्द्रनाथ का जन्म कलकत्ती नगर में 7 मई, सन् 1861 ईस्वी को एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री देवेन्द्रनाथ एवं माता का नाम श्रीमती शारदा देवी था। इनके पास विपुल अचल सम्पत्ति थी। इनका प्रारम्भिक जीवन नौकर-चाकरों की देख-रेख में बीता। खेल और स्वच्छन्द विहार का समय न मिलने से इनका मन उदास रहता था।

प्रकृति-प्रेम इनके भवन के पीछे एक सुन्दर सरोवर था। उसके दक्षिणी किनारे पर नारियल के पेड़ और पूर्वी तट पर एक बड़ा वट वृक्ष था। रवीन्द्र अपने भवन की खिड़की में बैठकर इस दृश्य को देखकर प्रसन्न होते थे। वे सरोवर में स्नान करने के लिए आने वालों की चेष्टाओं और वेशभूषा को देखते रहते थे। शाम के समय सरोवर के किनारे बैठे बगुलों, हंसों और जलमुर्गों के स्वर को बड़े प्रेम से सुनते थे।

शिक्षा रवीन्द्र की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। इन्होंने घर पर ही बांग्ला के साथ गणित, विज्ञान और संस्कृत का अध्ययन किया। इसके बाद इन्होंने कलकत्ता के ‘ओरियण्टले सेमिनार स्कूल’ और ‘नॉर्मल स्कूल में प्रवेश लिया, लेकिन वहाँ अध्यापकों के स्वेच्छाचरण और सहपाठियों की हीन मनोवृत्तियों तथा अप्रिय स्वभाव को देखकर इनका मन वहाँ नहीं लगा। सन् 1873 ई० में पिता देवेन्द्रनाथ इन्हें अपने साथ हिमालय पर ले गये। वहाँ हिमाच्छादित पर्वत-श्रेणियों और सामने (UPBoardSolutions.com) हरे-भरे खेतों को देखकर इनका मन प्रसन्न हो गया। पिता देवेन्द्रनाथ इन्हें प्रतिदिन नवीन शैली में पढ़ाते थे। कुछ समय बाद हिमालय से लौटकर इन्होंने विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की।

सत्रह वर्ष की आयु में रवीन्द्र अपने भाई सत्येन्द्रनाथ के साथ कानून की शिक्षा प्राप्त करने के लिए लन्दन गये, परन्तु वहाँ वे बैरिस्टर की उपाधि न प्राप्त कर सके और दो वर्ष बाद ही कलकत्ता लौट आये।

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साहित्यिक प्रतिभा के धनी रवीन्द्रनाथ में साहित्य-रचना की स्वाभाविक प्रतिभा थी। उनके परिवार में घर पर प्रतिदिन गोष्ठियाँ, चित्रकला की प्रदर्शनी, नाटक-अभिनय और देश-सेवा के कार्य होते रहते थे। इन्होंने अनेक कथाएँ और निबन्ध लिखकर उनको ‘भारती’, ‘साधना’, ‘तत्त्वबोधिनी’ आदि पारिवारिक पत्रिकाओं में प्रकाशित कराया।

रचनाएँ इन्होंने शैशव संगीत, प्रभात संगीत, सान्ध्य संगीत, नाटकों में रुद्रचण्ड, वाल्मीकि प्रतिभा (गीतिनाट्य), विसर्जन, राजर्षि, चोखेरबाली, चित्रांगदा, कौड़ी ओकमल, गीताञ्जलि आदि अनेक रचनाएँ लिखीं। इनकी प्रतिभा कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, निबन्ध आदि में समान रूप से उत्कृष्ट थी। गीताञ्जलि पर इन्हें साहित्य का ‘नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

महात्मा गाँधी जी के प्रेरक गुरु सन् 1932 ई० में गाँधी जी पूना की जेल में थे। अंग्रेजों की हिन्दू-जाति के विभाजन की नीति के विरुद्ध वे जेल में ही आमरण अनशन करना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए रवीन्द्र जी से ही अनुमति माँगी और उनको समर्थन प्राप्त करके आमरण अनशन किया। रवीन्द्रनाथ (UPBoardSolutions.com) का जीवन उनके काव्य के समान मनोहारी और लोक-कल्याणकारी था। उनकी मृत्यु 7 अगस्त, 1941 ई० को हो गयी थी, लेकिन उनकी वाणी आज भी काव्य रूप में प्रवाहित है।

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1)
आङ्ग्लवाङ्मये काव्यधनः शेक्सपियर इव, संस्कृतसाहित्ये कविकुलगुरुः कालिदास इव, हिन्दीसाहित्ये महाकवि तुलसीदास इव, बङ्गसाहित्ये कवीन्द्रो रवीन्द्रः केनाविदितः स्यात्। आधुनिक भारतीयशिल्पिषु रवीन्द्रस्य स्थानं महत्त्वपूर्णमास्ते इति सर्वैः ज्ञायत एव। तस्य बहूनि योगदानानि पार्थक्येन वैशिष्ट्यं लभन्ते। न केवलमाध्यात्मिकसांस्कृतिकक्षेत्रेषु तस्य योगदान महत्त्वपूर्णमपितु रचनात्मकसाहित्यकारतयापि तस्य नाम लोकेषु सुविदितमेव सर्वैः।।

शब्दार्थ वाङ्मये = साहित्य में। काव्यधनः = काव्य के धनी। कवीन्द्रः = कवियों में श्रेष्ठ। केनाविदितः = किसके द्वारा विदित नहीं हैं, अर्थात् सभी जानते हैं। आस्ते = है। पार्थक्येन = अलग से। लोकेषु = लोकों में। सुविदितमेव = भली प्रकार ज्ञात है।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती’ में संकलित ‘विश्वकविः रवीन्द्रः’ शीर्षक पाठ से उधृत है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में कवीन्द्र रवीन्द्र के महत्त्वपूर्ण योगदानों का उल्लेख किया गया है।

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अनुवाद अंग्रेजी-साहित्य में काव्य के धनी शेक्सपियर के समान, संस्कृत-साहित्य में कविकुलगुरु कालिदास के समान, हिन्दी-साहित्य में महाकवि तुलसीदास के समान बांग्ला-साहित्य में कवीन्द्र रवीन्द्र किससे अपरिचित हैं अर्थात् सभी लोगों ने उनका नाम सुना है। आधुनिक (UPBoardSolutions.com) भारतीय कलाकारों में रवीन्द्र का स्थान महत्त्वपूर्ण है, यह सभी जानते हैं। उनके बहुत-से योगदान अलग से विशेषता प्राप्त करते हैं। केवल आध्यात्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में ही उनका योगदान महत्त्वपूर्ण नहीं है, अपितु रचनात्मक साहित्यकार के रूप में भी उनका नाम संसार में सबको विदित ही है।

(2)
सांस्कृतिकक्षेत्रे सङ्गीतविधासु नृत्यविधासु च सः नूतनां शैली प्राकटयत्। सा शैली ‘रवीन्द्र सङ्गीत’ नाम्ना ख्यातिं लभते। एवं नृत्यविधासु परम्परागतशैलीमनुसरताऽनेन शिल्पिना नवीना नृत्यशैली आविष्कृता। अन्यक्षेत्रेष्वपि शिक्षाविद्रूपेण तेन नवीनानां विचाराणां सूत्रपातो विहितः। तेषां प्रयोगात्मकविचाराणां पुजीभूतः निरुपमः प्रासादः ‘विश्वभारती’ रूपेण सुसज्जितशिरस्कः राजते। यत्र आश्रमशैल्याः नवीनशैल्या साकं समन्वयो वर्तते। दीनानां दलितवर्गाणां दशासमुद्धर्तृरूपेणाऽसौ अस्माकं भारतीयानां पुरः प्रस्तुतोऽभवत्।

शब्दार्थ सांस्कृतिकक्षेत्रे = संस्कृति से सम्बद्ध क्षेत्र में विधासु = विधाओं में, प्रकारों में। प्राकटयत् = प्रकट की। ख्याति = प्रसिद्धि को। अनुसरता = अनुसरण करते हुए। आविष्कृता = खोज की। शिक्षाविद्रूपेण = शिक्षाशास्त्र के ज्ञाता के रूप में। पुञ्जीभूतः = एकत्र, समूह बना हुआ। प्रासादः = महला सुसज्जितशिरस्कः = भली-भाँति सजे हुए सिर वाला। साकं = हाथा समन्वयः = ताल-मेल। समुद्धर्तृरूपेण असौ = उद्धार करने वाले के रूप में यह पुरः = सामने।

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प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश-द्वय में रवीन्द्र जी के सांस्कृतिक और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान का उल्लेख किया गया है।

अनुवाद सांस्कृतिक क्षेत्र में संगीत-विधा और नृत्य-विधाओं में उन्होंने नवीन शैली प्रकट की। वह शैली ‘रवीन्द्र-संगीत’ के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त है। इस प्रकार नृत्य-विधाओं में परम्परागत शैली का अनुसरण करते हुए इस कलाकार ने नवीन नृत्य शैली का आविष्कार किया। दूसरे क्षेत्रों में भी शिक्षाविद् के रूप में नवीन विचारों का सूत्रपात किया। उनके प्रयोगात्मक विचारों का एकत्रीभूत स्वरूप अनुपम भवन ‘विश्वभारती के रूप में सजे हुए सिर वाला होकर सुशोभित है, जहाँ पर आश्रम शैली का नवीन शैली के साथ समन्वय है। दीनों और दलित वर्गों की दशा के सुधारक के रूप में वे हम भारतीयों के सामने प्रस्तुत थे।

(3)
रवीन्द्रनाथस्य जन्म कलिकातानगरे एकषष्ट्यधिकाष्टादशशततमे खीष्टाब्दे मईमासस्य सप्तमे दिवसे (7 मई, 1861) अभवत्। अस्य जनकः देवेन्द्रनाथः, जननी शारदा देवी चास्ताम्। रवीन्द्रस्य जन्म एकस्मिन् सम्भ्रान्ते समृद्धे ब्राह्मणकुले जातम्। यस्य सविधे अचला विशाला सम्पत्तिरासीत्। अतो भृत्यबहुलं भृत्यैः परिपुष्टं संरक्षितं जीवनं बन्धनपूर्णमन्वभवत्। अतः स्वच्छन्दविचरणाय, क्रीडनाय सुलभोऽवकाशः नासीत्तेन मनः खिन्नमेवास्त।

रवीन्द्रनाथस्य जन्म ………………………………………………….. बन्धनपूर्णमन्वभवत्।।

शब्दार्थ एकषष्ट्यधिकोष्टादशशततमे = अठारह सौ इकसठ में। ख्रीष्टाब्दे = ईस्वी में। आस्ताम् = थे। सम्भ्रान्ते = सम्भ्रान्त। धनिके = धनी। सविधे = पास में। अचला = जो न चल सके। भृत्यबहुलं = नौकरों की अधिकता वाले। परिपुष्टं = सभी प्रकार से पुष्ट हुए। (UPBoardSolutions.com) बन्धनपूर्णमन्वभवत् = बन्धनपूर्ण अनुभव हुआ। नासीत्तेन = नहीं था, इस कारण से। खिन्नमेवास्त = दुःखी ही था।

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प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में रवीन्द्र के वैभवसम्पन्न प्रारम्भिक जीवन का वर्णन किया गया है।

अनुवाद रवीन्द्रनाथ का जन्म कलकत्ता नगर में सन् 1861 ईस्वी में मई मास की 7 तारीख को हुआ था। इनके पिता देवेन्द्रनाथ और माता शारदा देवी थीं। रवीन्द्र का जन्म एक सम्भ्रान्त और समृद्ध ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पास विशाल अचल सम्पत्ति थी; अतः उन्होंने नौकरों की अधिकता से पूर्ण, सेवकों से पुष्टे किये गये, देखभाल किये गये जीवन को बन्धनपूर्ण अनुभव किया। इसलिए स्वच्छन्द विचरण के लिए, खेलने के लिए उनके पास इच्छित समय नहीं था, इस कारण से उनका मन दुःखी रहता था। (4) वैभवशालिभवनस्य पृष्ठभागे एकं कमनीयं सरः आसीत्। यस्य दक्षिणतटे नारिकेलतरूणां पङ्क्ति राजते स्म। पूर्वस्मिन् तटे जटिलस्तपस्वी इव महान् जीर्णः पुरातनः एकः वटवृक्षोऽनेकशाखासम्पन्नोऽन्तरिक्षं परिमातुमिव समुद्यतः आसीत्।। भवनस्य वातायने समुपविष्टः बालकः दृश्यमिदं दशैं दशैं परां मुदमलभत। अस्मिन्नेव सरसि तत्रत्याः निवासिनः यथासमयं स्नातुमागत्य स्नानञ्च कृत्वा यान्ति स्म। तेषां परिधानानि विविधाः क्रियाश्च दृष्ट्वा बालः किञ्चित्कालं प्रसन्नः अजायत। मध्याह्वात् पश्चात् सरोवरेः शून्यतां भजति स्म। सायं पुनः बकाः हंसाः जलकृकवाकवः विहंगाः कोलहलं कुर्वाणाः स्थानानि लभन्ते स्म। तस्मिन् काले इदमेव कम्न सरः बालकस्य मनोरञ्जनमकरोत् । [2015]

वैभवशालिभवनस्य ………………………………………………….. समुद्यतः आसीत् ।।
भवनस्य वातायने ………………………………………………….. शून्यतां भजति स्म
भवनस्य वातायने ………………………………………………….. मनोरञ्जनमकरोत् । [2012]

शब्दार्थ वैभवशालिभवनस्य = ऐश्वर्य सामग्री से परिपूर्ण भवन के पृष्ठभागे = पिछले भाग में। कमनीयम् = सुन्दर। राजते स्म = सुशोभित थी। जटिलस्तपस्वी = जटाधारी तपस्वी। जीर्णः = पुराना। वटवृक्षः = बरगद का पेड़। परिमातुम् = मापने के लिए। समुद्यतः = तत्पर। वातायने = खिड़की में। समुपविष्टः = बैठा हुआ। परां मुदम् = अत्यन्त प्रसन्नता को। स्नातुं आगत्य = नहाने के लिए आकर। कृत्वा = करके। परिधानानि = वस्त्र। दृष्ट्वा = देखकर। शून्यतां भजति स्म = सूना हो जाता था। जलकृकवाकवः = जल के मुर्गे। कम्रम् =सुन्दर।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में रवीन्द्र के प्रकृति-प्रेम का मनोहारी वर्णन किया गया है।

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अनुवाद वैभवपूर्ण भवन के पिछले भाग में एक सुन्दर तालाब था। जिसके दक्षिण किनारे पर नारियल के वृक्षों की पंक्ति सुशोभित थी। पूर्वी किनारे पर जटाधारी तपस्वी के समान बड़ा, बहुत पुराना एक वट का वृक्ष था। अनेक शाखाओं से सम्पन्न वह (वृक्ष) मानो आकाश को मापने के लिए तैयार था। भवन की खिड़की में बैठा हुआ बालक (रवीन्द्र) इस दृश्य को देख-देखकर अत्यन्त प्रसन्नता प्राप्त करता था। इसी सरोवर में वहाँ के निवासी समयानुसार स्नान के लिए आते और स्नान करके जाते थे। उनके वस्त्रों और विविध क्रियाओं को देखकर बालक कुछ समय के लिए प्रसन्न हो जाता था। दोपहर के बाद सरोवर निर्जन (जन-शून्य) हो जाता था। शाम को फिर बगुले, हंस, जलमुर्गे, पक्षी कोलाहल करते हुए (अपना-अपना) स्थान प्राप्त कर लेते थे। उस समय यही सुन्दर सरोवर बालक (रवीन्द्र) का मनोरंजन करता था।

(5)
शिक्षा-रवीन्द्रस्य प्राथमिकी शिक्षा गृहे एव जाता। शिक्षणं बङ्गभाषायं प्रारभत। प्रारम्भिकं विज्ञानं, संस्कृतं, गणितमिति त्रयो पाठ्यविषयाः अभूवन्। प्रारम्भिकगृहशिक्षायां समाप्तायां बालकः उत्तरकलिकातानगरस्य ओरियण्टल सेमिनार विद्यालये प्रवेशमलभत्। तदनन्तरं नार्मलविद्यालयं गतवान् परं कुत्रापि मनो न रमते स्म। सर्वत्र अध्यापकानां स्वेच्छाचरणं सहपाठिनां तुच्छारुचीः अप्रियान् स्वभावांश्च विलोक्य मनो न रेमे। अतः शून्यायां घटिकायां मध्यावकाशेऽपि च ऐकान्तिकं जीवनं बालकाय रोचते स्म। बालकस्य मनः विद्यालयेषु न रमते इति विचिन्त्य जनको देवेन्द्रनाथः त्रिसप्तत्यधिकाष्टादशशततमे खीष्टाब्दे (1873) सूनोरुपनयनसंस्कारं विधाय तं स्वेन सार्धमेव हिमालयमनयत्। तत्र पितुः सम्पर्केण बालकस्य मनः स्वच्छतामभजत्। तत्रत्यस्य भवनस्य पृष्ठभागे हिमाच्छादिताः पर्वतश्रेणयः आसन्। भवनाभिमुखं शोभनानि (UPBoardSolutions.com) सुशाद्वलानि क्षेत्राणि राजन्ते स्म। अत्रत्यं प्राकृतिकं जीवनं बालकस्य मनो नितरामरमयत्। जनको देवेन्द्रनाथः प्रतिदिवसं नवीनया पद्धत्या पाठयति स्म। पितुः पाठनशैली बालकाय रोचते स्म। कालान्तरं हिमालयात् प्रतिनिवृत्य पुनः विद्यालयीयां शिक्षा लेभे।

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प्रारम्भिक गृहशिक्षायां ………………………………………………….. रोचते स्म। [2006]

शब्दार्थ प्रारभत = प्रारम्भ हुआ। प्रवेशमलेभत्=प्रवेश प्राप्त किया। कुत्रापि= कहीं भी। नरमते स्म = नहीं लगता था। स्वेच्छाचरणं = अपनी इच्छा के अनुकूल (स्वतन्त्र) आचरण। तुच्छारुचीः = खराब आदतें। रेमे =रमा, लगा। शून्यायां घटिकायां = खाली घेण्टे में। ऐकान्तिकं = एकान्त से सम्बन्धित। त्रिसप्तत्यधिकाष्टादशशततमे = अठारह सौ तिहत्तर में। सूनोरुपनयनसंस्कारं (सूनोः + उपनयन संस्कारं)= पुत्र का यज्ञोपवीत संस्कार। विधाय= करके। स्वेन सार्धम्=अपने साथ। तत्रत्यस्य= वहाँ के। सुशाद्वलानि=सुन्दर घास से युक्त। राजन्ते स्म = सुशोभित थे। नितराम् = अत्यधिक। अरमयत् = रम गया। प्रतिनिवृत्य = वापस लौटकर। लेभे = प्राप्त किया।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में बालक रवीन्द्र का पढ़ने में मन न लगने एवं पिता के साथ हिमालय पर जाकर पढ़ने का वर्णन है।

अनुवाद रवीन्द्र की प्राथमिक शिक्षा घर पर ही हुई। पढ़ाई बांग्ला भाषा में प्रारम्भ हुई। प्रारम्भ में विज्ञान, संस्कृत और गणित ये तीन पाठ्य-विषय थे। प्रारम्भिक गृह-शिक्षा समाप्त होने पर बालक ने उत्तरी कलकत्ता नगर के ‘ओरियण्टल सेमिनार स्कूल में प्रवेश लिया। इसके बाद नॉर्मल विद्यालय में गया, परन्तु कहीं भी (उसका) मन नहीं लगता था। सब जगह अध्यापकों के स्वेच्छाचरण, सहपाठियों की तुच्छ इच्छाओं और बुरे स्वभावों को देखकर (इनका) मन नहीं लगा। इसलिए खाली घण्टे और मध्य अवकाश में भी बालक को एकान्त का जीवन अच्छा लगता था। बालक का मन विद्यालयों में नहीं लगता है-ऐसा सोचकर पिता देवेन्द्रनाथ सन् 1873 ईस्वी में पुत्र का उपनयन संस्कार कराके उसे अपने साथ ही हिमालय पर ले गये। वहाँ पिता के सम्पर्क से बालक का मन स्वस्थ हो गया। वहाँ के भवन के पिछले भाग में बर्फ से ढकी पर्वत-श्रेणियाँ थीं। भवन के सामने सुन्दर हरी घास से युक्त खेत सुशोभित थे। यहाँ के प्राकृतिक जीवन ने बालक के मन को बहुत प्रसन्न कर दिया। पिता देवेन्द्रनाथ प्रतिदिन नवीन पद्धति द्वारा पढ़ाते थे। पिता की पाठन-शैली बालक को अच्छी लगती थी। कुछ समय पश्चात् हिमालय से लौटकर पुन: विद्यालयीय शिक्षा प्राप्त की।

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(6)
सप्तदशवर्षदेशीयो रवीन्द्रनाथः अष्टसप्तत्यधिकाष्टादशशततमे ख्रीष्टाब्दे सितम्बरमासे भ्रात्रा न्यायाधीशेन सत्येन्द्रनाथेन सार्धं विधिशास्त्रमध्येतुं लन्दननगरं गतवान्। दैवयोगाद् रवीन्द्रस्य बैरिस्टरपदवी पूर्णतां नागात्। सः पितुराज्ञया भ्रात्रा सत्येन्द्रनाथेन साकम् अशीत्यधिकाष्टादशशततमे (UPBoardSolutions.com) खीष्टाब्दे (1880) फरवरीमासे लन्दननगरात् कलिकातानगरमायातः। इङ्ग्लैण्डदेशस्य वर्षद्वयावासे पाश्चात्यसङ्गीतस्य सम्यक् परिचयस्तेन लब्धः।

शब्दार्थ सप्तदशवर्षदेशीयो = सत्रह वर्षीय। अष्टसप्तत्यधिकोष्टादशशततमे = अठारह सौ अठहत्तर में। विधिशास्त्रम् = न्याय-शास्त्र, कानून शास्त्र। अध्येतुम् = पढ़ने के लिए। पूर्णतां नागात् = पूर्णता को प्राप्त नहीं हुई। सम्यक् = अच्छी तरह।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में रवीन्द्रनाथ द्वारा लन्दन जाने और वकालत की शिक्षा प्राप्त न करने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद सत्रह वर्ष की अवस्था में रवीन्द्रनाथ सन् 1878 ईस्वी में सितम्बर महीने में भाई न्यायाधीश सत्येन्द्रनाथ के साथ न्याय-शास्त्र (वकालत) पढ़ने के लिए लन्दन नगर गये। दैवयोग से रवीन्द्र की बैरिस्टर की उपाधि पूर्ण नहीं हुई। वे पिता की आज्ञा से भाई सत्येन्द्रनाथ के साथ सन् 1880 ईस्वी में फरवरी के महीने में लन्दन नगर से कलकत्ता नगर आ गये। इंग्लैण्ड देश के दो वर्ष के निवास में उन्होंने पाश्चात्य संगीत का अच्छी तरह ज्ञान प्राप्त कर लिया।

(7)
साहित्यिक प्रतिभायाः विकासः-रवीन्द्रस्य साहित्यिकरचनायां नैसर्गिकी नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा तु प्रधानकारणमासीदेव। परं तत्रत्या पारिवारिकपरिस्थितिरपि विशिष्टं कारणमभूत्। यथा—गृहे। प्रतिदिनं साहित्यिकं वातावरणं, कलासाधनायाः गतिविधयः, नाटकानां मञ्चनानि, सङ्गीतगोष्ठ्यः, चित्रकलानां प्रदर्शनानि, देशसेवाकर्माणि सदैव भवन्ति स्म। किशोरावस्थायामेव रवीन्द्रः अनेकाः कथाः निबन्धाश्च लिखित्वा पारिवारिकपत्रिकासु भारती-साधना-तत्त्वबोधिनीषु मुद्रयति स्म। [2013]

शब्दार्थ नैसर्गिकी = स्वाभाविक नवनवोन्मेषशालिनी = नये-नये विकास वाली प्रतिभा = रचनाबुद्धि। कलासाधनायाः = कला-साधना की। गोष्ठ्यः = गोष्ठियाँ। मुद्रयति स्म = छपवाते थे।

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प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में रवीन्द्रनाथ की साहित्यिक रुचि एवं रचनात्मक प्रवृत्ति का वर्णन किया गया है।

अनुवाद रवीन्द्र की साहित्यिक रचना में स्वाभाविक नये-नये विकास वाली प्रतिभा तो प्रधान कारण थी ही, परन्तु वहाँ की पारिवारिक परिस्थिति भी विशेष कारण थी; जैसे—घर में प्रतिदिन साहित्यिक वातावरण, कला–साधना की गतिविधियाँ, नाटकों का अभिनय, संगीत-गोष्ठियाँ, (UPBoardSolutions.com) चित्रकलाओं का प्रदर्शन, देश-सेवा के कार्य सदा होते थे। किशोर अवस्था में ही रवीन्द्र अनेक कथाओं और निबन्धों को लिखकर पारिवारिक पत्रिकाओं ‘भारती’, ‘साधना’, ‘तत्त्वबोधिनी’ में छपवाते थे।

(8)
तेन च शैशवसङ्गीतम्, सान्ध्यसङ्गीतम्, प्रभातसङ्गीतम्, नाटकेषु रुद्रचण्डम्, वाल्मीकि-प्रतिभा गीतिनाट्यम्, विसर्जनम्, राजर्षिः, चोखेरबाली, चित्राङ्गदा, कौडी ओकमल, गीताञ्जलिः इत्यादयो बहवः ग्रन्थाः विरचिताः। गीताञ्जलिः वैदेशिकैः नोबलपुरस्कारेण पुरस्कृतश्च। एवं बहूनि प्रशस्तानि पुस्तकानि बङ्गसाहित्याय प्रदत्तानि। कवीन्द्ररवीन्द्रस्य प्रतिभा कथासु, कवितासु, नाटकेषु, उपन्यासेषु, निबन्धेषु समानरूपेण उत्कृष्टा दृश्यते। सत्यमेव गीताञ्जलिः चित्राङ्गदा च कलादृष्ट्या महाकवेरुभेऽपि रचने वैशिष्ट्यमावहतः।।

शब्दार्थ विरचिताः = लिखे। पुरस्कृतः = पुरस्कृत, पुरस्कार प्राप्त, सम्मानित किया। प्रशस्तानि = प्रशंसनीय। प्रदत्तानि = दिये। उत्कृष्टा = श्रेष्ठ, उन्नत उभेऽपि = दोनों ही। वैशिष्ट्यमावहतः = विशेषता धारण करते हैं।

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प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में रवीन्द्रनाथ की साहित्यिक कृतियों का विवरण दिया गया है।

अनुवाद उन्होंने (रवीन्द्रनाथ ने) शैशव संगीत, सान्ध्य संगीत, प्रभात संगीत, नाटकों में रुद्रचण्ड, वाल्मीकि-प्रतिभा (गीतिनाट्य), विसर्जन, राजर्षि, चोखेरबाली, चित्रांगदा, कौड़ी ओकमल, गीताञ्जलि इत्यादि बहुत-से ग्रन्थों की रचना की। गीताञ्जलि को विदेशियों ने नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत किया है। इस प्रकार बहुत-सी सुन्दर पुस्तकें उन्होंने बांग्ला-साहित्य को प्रदान कीं। कवीन्द्र रवीन्द्र की प्रतिभा कथाओं में, कविताओं में, नाटकों में, उपन्यासों और निबन्धों में समान रूप से उत्कृष्ट दिखाई देती है। वास्तव में महाकवि की दोनों ही रचनाएँ गीताञ्जलि और चित्रांगदा कला की दृष्टि से विशिष्टता को धारण करती हैं।

(9)
द्वात्रिंशदधिकैकोनविंशे शततमे खीष्टाब्दे महात्मागान्धी पुणे कारागारेऽवरुद्धः आसीत्। ब्रिटिशशासकाः अनुसूचितजातीयानां सवर्णहिन्दूजातीयेभ्यः पृथक् निर्वाचनाय प्रयत्नशीलाः आसन्।

यस्य स्पष्टमुद्देश्यं हिन्दूजातीयानां परस्परं विभाजनमासीत्। बहुविरोधे कृतेऽपि ब्रिटिशशासकाः शान्ति ने लेभिरे विभाजयितुं च प्रयतमाना एवासन्। तदा महात्मागान्धी हिन्दूजातिवैक्यं स्थापयितुं कारागारे आमरणम् अनशनं प्रारभत। गुरुदेवस्य रवीन्द्रनाथस्य चानुमोदनमैच्छत्। यतश्च महात्मागान्धी गुरुदेवस्य रवीन्द्रस्य केवलमादरमेव नाकरोत्, अपि तु यथाकालं समीचीनसम्मत्यै मुखमपि ईक्षते स्म। महात्मा एनं कवीन्द्र रवीन्द्र गुरुममन्यता रवीन्द्रनाथः तन्त्रीपत्रे ‘भारतस्य एकतायै सामाजिकाखण्डतायै च अमूल्य-जीवनस्य बलिदानं सर्वथा समीचीनं, परं जनाः दारुणायाः विपत्तेः गान्धिनः जीवनमभिरक्षेयुः इति लिखित्वा प्रत्युदतरत्। रवीन्द्रः आमरणस्य अनशनस्य समर्थनमेव न कृतवानपि तु प्रायोपवेशने प्रारब्धे पुणे कारागारञ्चागतवान्।

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शब्दार्थ द्वात्रिंशदधिकैकोनविंशे शततमे = उन्नीस सौ बत्तीस में अवरुद्धः = बन्दा स्पष्टमुद्देश्यं = स्पष्ट उद्देश्य। लेभिरे = प्राप्त कर रहे थे। समीचीनम् = उचित| मुखमपि ईक्षते स्म = मुख की ओर देखते थे, अपेक्षा करते थे। तन्त्रीपत्रे = तार (टेलीग्राम) में। अभिरक्षेयुः = रक्षा करें। प्रत्युदतरत् = उत्तर दिया। प्रायोपवेशने = अनशन के समय।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में महात्मा गाँधी द्वारा कवीन्द्र रवीन्द्र को गुरु मानने एवं उनसे सम्मति लेने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद सन् 1932 ईस्वी में महात्मा गाँधी पुणे में जेल में बन्द थे। ब्रिटिश शासक अनुसूचित जाति वालों का सवर्ण हिन्दू जाति वालों से अलग निर्वाचन कराने के लिए प्रयत्न में लगे थे, जिसका स्पष्ट उद्देश्य हिन्दू जाति वालों का आपस में बँटवारा करना था। बहुत विरोध करने पर भी अंग्रेजी शासक शान्ति को प्राप्त न हुए। अर्थात् अपने प्रयासों को बन्द नहीं किया और (देश एवं हिन्दू जाति को) विभाजित करने के लिए प्रयत्नशील रहे। तब महात्मा गाँधी ने हिन्दू जातियों (UPBoardSolutions.com) में एकता स्थापित करने के लिए जेल में आमरण अनशन प्रारम्भ कर दिया और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के अनुमोदन की इच्छा की; क्योंकि महात्मा गाँधी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ का केवल आदर ही नहीं करते थे, अपितु समयानुसार सही सलाह के लिए उनसे अपेक्षा भी करते थे। महात्मा इन कवीन्द्र रवीन्द्र को गुरु मानते थे। रवीन्द्रनाथ ने तार में भारत की एकता और सामाजिक अखण्डता के लिए अमूल्य जीवन का बलिदान सभी प्रकार से सही है, परन्तु लोग भयानक विपत्ति से गाँधी जी के जीवन की रक्षा करें” लिखकर उत्तर दे दिया। रवीन्द्र ने आमरण अनशन का समर्थन ही नहीं किया, अपितु उपवास के प्रारम्भ होने पर पुणे जेल में आ गये।

(10)
एवं बहुवर्णिकं, गरिमामण्डितं साहित्यिक, सामाजिकं, दार्शनिकं, लोकतान्त्रिकं जीवनं तस्य काव्यमिव मनोहारि सर्वेभ्यः कल्याणकारि प्रेरणादायि चाभूत्। एकचत्वारिंशदधिकैकोनविंशे शततमे खीष्टाब्देऽगस्तमासस्य सप्तमे दिनाङ्के (7 अगस्त, 1941) रवीन्द्रस्य पार्थिव शरीरं वैश्वानरं प्राविशत्। अद्यापि गुरुदेवस्य रवीन्द्रस्य वाक् काव्यरूपेण अस्माकं समक्षं स्रोतस्विनी इव सततं प्रवहत्येव। अधुनापि करालस्य कालस्य करोऽपि वाचं मूकीकर्तुं नाशकत्।

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जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः ।
नास्ति येषां यशःकाये जरामरणजं भयम् ॥

शब्दार्थ बहुवर्णिकम् = बहुरंगी, अनेक प्रकार का। गरिमामण्डितम् = गरिमा (गौरव) से युक्त। एकचत्वारिंशदधिकैकोनविंशे शततमे = उन्नीस सौ इकतालिस में। पार्थिवम् = मिट्टी से बना, भौतिक वैश्वानरम् = अग्नि में। प्राविशत = प्रविष्ट हुआ। वाक् = वाणी। स्रोतस्विनी इव = नदी के समान। प्रवहत्येव = बहती ही है। वाचं मूकीकर्तुम् = वाणी को मौन करने के लिए। नाशकत् = समर्थ नहीं हुआ। सुकृतिनः = सुन्दर कार्य करने वाले रससिद्धाः = रस है सिद्ध जिनको। कवीश्वराः = कवियों में ईश्वर अर्थात् कवि श्रेष्ठ| यशःकाये = यशरूपी शरीर में जरामरणजे = वृद्धावस्था और मृत्यु से उत्पन्न।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में कवीन्द्र रवीन्द्र के जीवन का मूल्यांकन किया गया है, उनके देहान्त की बात कही गयी है और सुन्दर रचनाकार के रूप में उनके यश का गान किया गया है।

अनुवाद इस प्रकार उनका बहुरंगी, गरिमा से मण्डित, साहित्यिक, सामाजिक, दार्शनिक, लोकतान्त्रिक जीवन उनके काव्य के समान सुन्दर, सबके लिए कल्याणकारी और प्रेरणाप्रद था। सन् 1941 ईस्वी में अगस्त महीने की 7 तारीख को रवीन्द्र का पार्थिव शरीर अग्नि में प्रविष्ट हो गया। आज भी गुरुदेव रवीन्द्र की वाणी काव्य के रूप में हमारे सामने नदी के समान निरन्तर बह रही है। आज भी भयानक मृत्यु का हाथ भी (उनकी) वाणी को चुप करने में समर्थ नहीं हो सका। पुण्यात्मा, (UPBoardSolutions.com) रससिद्ध वे कवीश्वर जयवन्त होते हैं, जिनके यशरूपी शरीर में बुढ़ापे और मृत्यु से उत्पन्न भय नहीं है। इसलिए कविगण हमेशा यशरूपी शरीर से ही जीवित रहते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचना ‘गीताञ्जलि’ पर प्रकाश डालिए।
या
‘गीताञ्जलि’ के रचयिता का नाम लिखिए। [2006,07,14]
या
विश्वकवि रवीन्द्र की सबसे प्रसिद्ध रचना कौन-सी है? [2011]
या
रवीन्द्रनाथ को नोबेल पुरस्कार किस रचना पर मिला? [2007]
या
रवीन्द्रनाथ को किस पुस्तक पर कौन-सा पुरस्कार दिया गया था? [2010]
उत्तर :
गीताञ्जलि महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा बांग्ला भाषा में लिखे गये गीतों का संकलन है। यह महाकवि की एक अत्यधिक विशिष्ट रचना है। इसका अंग्रेजी अनुवाद; जो कि स्वयं रवीन्द्रनाथ के द्वारा ही। किया गया; को सन् 1913 ईस्वी में विदेशियों द्वारा ‘नोबेल पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गया।

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प्रश्न 2.
विश्वकवि रवीन्द्र का संक्षिप्त जीवन-परिचय दीजिए।
या
विश्वकवि रवीन्द्र का परिचय दीजिए। या कविवर रवीन्द्र का जन्म कब और कहाँ हुआ था? [2008]
या
विश्वकवि रवीन्द्र के माता-पिता का नाम लिखिए। [2010, 12, 13]
या
कवीन्द्ररवीन्द्र की प्रमुख रचनाओं/कृतियों के नाम लिखिए। [2006,08, 10]
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, सन् 1861 ईस्वी में कलकत्ता नगर के एक सम्भ्रान्त और समृद्ध ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम देवेन्द्रनाथ तथा माता का नाम शारदा देवी था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। बाद में इन्होंने स्कूल में प्रवेश ले लिया, लेकिन वहाँ इनका मन नहीं लगा। 17 वर्ष की अवस्था में ये अपने बड़े भाई के साथ इंग्लैण्ड गये। वहाँ इन्होंने दो वर्ष के निवास में पाश्चात्य संगीत का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया। इन्होंने शैशव संगीत, प्रभात संगीत, (UPBoardSolutions.com) सान्ध्य संगीत (गीति काव्य); रुद्रचण्ड, वाल्मीकि-प्रतिभा (गीति नाट्य), विसर्जन, राजर्षि, चोखेरबाली, चित्रांगदा, कौड़ी ओकमल, गीताञ्जलि इत्यादि बहुत-से ग्रन्थों की रचना की। महात्मा गाँधी इन्हें अपना गुरु मानते थे। सन् 1941 ईस्वी में 7 अगस्त को इनका पार्थिव शरीर पंचतत्त्व में विलीन हो गया।

प्रश्न 3.
रवीन्द्रनाथ टैगोर के सांस्कृतिक और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने सांस्कृतिक क्षेत्र में संगीत और नृत्य विधाओं में एक नवीन शैली का प्रचलन किया, जिसे रवीन्द्र-शैली के नाम से जाना जाता है। एक शिक्षाविद् के रूप में भी इन्होंने नवीन विचारों का प्रारम्भ किया। इनके विचारों का पुंजस्वरूप भवन ‘विश्वभारती के रूप में हमारे समक्ष विद्यमान है। यहाँ पर शिक्षा की आश्रम शैली, नवीन शैली के साथ समन्वित रूप में विद्यमान है।

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प्रश्न 4.
विश्वकवि रवीन्द्र के बाल्य-जीवन का उल्लेख कीजिए। या* * बचपन में बालक रवीन्द्रनाथ का मेन क्यों खिन्न रहता था? [2009]
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ का जन्म अतुल धनराशि तथा वैभव से सम्पन्न एक अत्यधिक धनाढ्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सेवकों द्वारा पालित, पोषित और रक्षित होने के कारण ये अपने जीवन को बन्धनपूर्ण मानते थे। स्वतन्त्रतापूर्वक घूमने और खेलने का अवसर न मिलने के कारण ये पर्याप्त खिन्नता का अनुभव करते थे। इनके वैभवशाली भवन के पीछे एक सुन्दर सरोवर था जिसके एक ओर नारियल के वन और दूसरी ओर बरगद का वृक्ष था। भवन के झरोखे में बैठकर रवीन्द्रनाथ इस प्राकृतिक दृश्य को देखकर बहुत प्रसन्न होते थे। प्रात:काल के समय सरोवर में स्त्री-पुरुष स्नान के लिए आते थे। उनकी विविध रंग-बिरंगी पोशाकों को देखकर बालक रवीन्द्रनाथ प्रसन्न हो जाते थे। सायंकाल में यह सरोवर पक्षियों की चहचहाहट से गुंजित हो उठता था। यह सब कुछ बालक रवीन्द्रनाथ को बहुत सुखद प्रतीत होता था।

प्रश्न 5.
‘विश्वकवि’ संज्ञा किस आधुनिक कवि को दी गयी है? [2010,11]
उत्तर :
‘विश्वकवि’ संज्ञा आधुनिक कवि श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर को दी गयी है।

प्रश्न 6.
विधिशास्त्र का अध्ययन करने के लिए रवीन्द्रनाथ किसके साथ और कहाँ गये? [2006]
उत्तर :
विधिशास्त्र का अध्ययन करने के लिए रवीन्द्रनाथ अपने बड़े भाई न्यायाधीश सत्येन्द्रनाथ के साथ सन् 1878 ई० में लन्दन गये।

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प्रश्न 7.
विश्वकवि रवीन्द्र की तुलना किन-किन कवियों से की गयी है? [2010]
उत्तर :
विश्वकवि रवीन्द्र की तुलना अंग्रेजी कवि शेक्सपियर, संस्कृत कवि कालिदास और हिन्दी कवि गोस्वामी तुलसीदास से की गयी है।

प्रश्न 8.
‘विश्वभारती’ का परिचय दीजिए। [2009]
उत्तर :
एक शिक्षाविद् के रूप में रवीन्द्रनाथ ने नवीन विचारों का सूत्रपात किया था। उनके प्रयोगात्मकशिक्षात्मक विचारों का प्रतिफल विश्वभारती के रूप में अपना मस्तक उन्नत किये हुए आज भी सुशोभित हो रहा है। इस संस्था में अध्ययन-अध्यापन की आश्रम-व्यवस्था तथा नवीन (UPBoardSolutions.com) शैली का समन्वय है।।

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प्रश्न 9.
विश्वकवि रवीन्द्र की साहित्यिक प्रतिभा का परिचय दीजिए।
उत्तर :
[
संकेत ‘पाठ-सारांश’ के उपशीर्षकों’ ‘साहित्यिक प्रतिभा के धनी’ एवं ‘रचनाएँ की सामग्री को संक्षेप में लिखें।]

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Class 10 Sanskrit Chapter 14 UP Board Solutions योजना – महत्वम् Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 14 Yojana – Mahatvam Question Answer (गद्य – भारती)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 14 हिंदी अनुवाद योजना – महत्वम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

भारत में शताधिक वर्षों तक चले अंग्रेजी शासन ने देश के कल्याण और उन्नति की बात नहीं सोची, वरन् मात्र अपनी स्वार्थ-पूर्ति पर ध्यान दिया। इसी कारण भारत के स्वतन्त्र होने पर भारतीय नेतृत्व के सामने अनेक समस्याएँ खड़ी हो गयीं। स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू रूस की समाजवादी व्यवस्था से बहुत प्रभावित थे। कम्युनिस्टों का शासन प्रारम्भ होने के बाद रूस में पंचवर्षीय योजना-महत्त्वम् योजनाएँ बनायी गयी थीं और (UPBoardSolutions.com) यह निश्चित किया गया था कि पाँच वर्षों में उन्हें कौन-कौन से काम करने हैं। रूस के ढंग पर ही नेहरू जी ने भी भारत में पंचवर्षीय योजनाएँ प्रारम्भ कीं और उसके लिए एक समिति बना दी। समिति यह निश्चय करती थी कि किस पंचवर्षीय योजना में कौन-से कार्य किये जाएँगे और किन पर कितना व्यय किया जाएगा। इन्हीं पंचवर्षीय योजनाओं ने भारत का कायाकल्प कर दिया। यहाँ हवाई जहाजों तक का निर्माण होने लगा और कृषि के क्षेत्र में भी हरित क्रान्ति आयी। प्रस्तुत पाठ पंचवर्षीय योजना के महत्त्व और उनसे होने वाले लाभों का परिचय देता है।

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पाठ-सारांश (2006,07,08, 9, 10, 11, 12, 14]

उन्नति का अवसर संसार के इतिहास में कितने ही राष्ट्रों ने उन्नति की है और कितने ही अवनति के गर्त में गिर गये हैं। हमारा देश भारत भी दीर्घकाल तक परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़ा रहा। लोकमान्य तिलक, महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, सुभाषचन्द्र बोस और जनता के सहयोग तथा बलिदान के परिणामस्वरूप यह 15 अगस्त, 1947 ई० को स्वतन्त्र हुआ। इसके स्वतन्त्र होने तथा संविधान बन जाने पर यहाँ के नेतृत्व ने इसकी उन्नति के लिए योजनाएँ बनायीं। इन योजनाओं के लागू होने पर भारत को सामाजिक और आर्थिक उन्नति का अवसर प्राप्त हुआ।

पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा प्रगति हमारे नेताओं ने देश की प्रगति के लिए एक योजना-समिति बनायी, जिसने पाँच वर्षों में हो सकने योग्य कार्यों का विवरण तैयार किया। प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया तथा कृषि के आश्रित साधनों के विकास के लिए रूपरेखा बनायी गयी। दूसरी पंचवर्षीय योजना में बड़े-बड़े उद्योगों को महत्त्व दिया गया। इन योजनाओं के अन्तर्गत अनेक छोटी-बड़ी योजनाएँ थीं, जिनमें भाखड़ा, हीराकुड, दामोदर, तुंगभद्रा, मयूराक्षी और रिहन्द बाँधों की योजनाएँ प्रमुख थीं। इन योजनाओं से कृषि की सिंचाई, जल-प्रवाह के नियन्त्रण से बाढ़ की रोकथाम तथा विद्युत-शक्ति का उत्पादन (UPBoardSolutions.com) आदि लाभ थे। विद्युत् से बड़ी-बड़ी मशीनें चलती हैं और प्रकाश प्राप्त होता है। चौथी, पाँचवीं, छठी योजनाएँ भी यथासमय चलती रहीं और आज भी प्रचलित हैं।

योजनाओं से लाभ इन योजनाओं से हमारे देश की राष्ट्रीय आय में वृद्धि, महँगाई की रोकथाम, दैनिक उपयोग की वस्तुओं की प्राप्ति में सुगमता, छोटे-बड़े उद्योगों की ओर ध्यानाकर्षण, खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता, परिवार नियोज़न, नहरों का निर्माण और नलकूप लगाना, गाँवों में बिजली का प्रबन्ध, वृक्षारोपण आदि अनेक लाभ हुए। चिकित्सा के क्षेत्र में यक्ष्मा, चेचक, मलेरिया आदि संक्रामक और भयानक रोगों से पूर्णतया छुटकारा मिला। एक्स-रे से भीतरी रोगों का पता लगाना सम्भव हुआ। नहरों के निर्माण से भूमि उर्वरा, धान्यसम्पन्न हुई और मानवों व पशु-पक्षियों को पेयजल प्राप्त हुआ। रेलमार्गों के विस्तार, उनकी गति में वृद्धि तथा डीजल इंजनों के प्रयोग से यात्रा तथा माल के लाने और भेजने में समय की ११ बचत हुई।

जनसंख्या की समस्या इन योजनाओं के क्रियान्वयन से प्रति व्यक्ति जितना लाभ अपेक्षित समझा गया था, जनसंख्या की वृद्धि के कारण उतना लाभ नहीं मिला। चिकित्सा-साधनों में वृद्धि होने पर भी मृत्यु का प्रतिशत जितना कम हुआ, जन्म का प्रतिशत उससे कहीं अधिक बढ़ गया। जनसंख्या में वृद्धि को शिक्षा के प्रसार से ही रोका जा सकता है। सरकार जनसंख्या पर नियन्त्रण करने हेतु शिक्षा के प्रसार के लिए सतत प्रयासरत है।

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शिक्षा से लाभ शिक्षा से केवल व्यक्ति का ही विकास नहीं होता, वरन् सामाजिक चेतना भी जाग्रत होती है। बालकों और वृद्धों के आचार-विचार और व्यवहार में परिवर्तन आता है। निरक्षर और गरीब लोग बच्चे उत्पन्न करना ही अपना लक्ष्य समझते हैं, उनके भरण-पोषण पर ध्यान नहीं देते। सामान्य जनता में शिक्षा के प्रसार से ही हमारी योजनाएँ सफल हो सकती हैं।

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1)
कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा’ इतीयं सुशोभना सूक्तिः, यावच्चे प्रतिजनं चरितार्था भवति, तथैव तावदेव राष्ट्रजीवनेष्वपि सङ्घटते। संसारस्येतिहासे पुराकालादारभ्य अद्यावधि कियन्ति राष्ट्राणि, प्रोन्नतिशृङ्गमारूढानि, कालान्तरेऽवनतिगर्ते पतितानि। कियन्ति’ चान्यानि अवनति गर्तान्निष्क्रम्य, उन्नतिशिखरमारूढानि, इति गदितुं निरवद्यमशक्यम्। प्रायेण सर्वेषां राष्ट्राणां विषये तथ्यमिदम्। भारतवर्षमपि, अस्य तथ्यस्यापवादो भवितुं नाशकत्। बहोः कालात् अस्माकं (UPBoardSolutions.com) देशः पारतन्त्रिकशृङ्खलया निगडितः आसीत्। तिलक-गान्धी-नेहरू-पटेल-सुभाषमहोदयानां जनतायाश्च सहयोगेन, बलिदानेन सप्तचत्वारिंशदधिकैकोनविंशतिशततमे (1947) खीष्टाब्दे स्वतन्त्रो जातः।

शब्दार्थ कस्यात्यन्तं = किसका अत्यधिक उपनतम् = प्राप्त। एकान्ततः = पूर्णरूप से। तावदेव = उतना ही। सङ्कटते = घटित होती है। पुराकालादारभ्य = प्राचीनकाल से प्रारम्भ करके। अद्यावधि =आज तक कियन्ति = कितने ही। प्रोन्नतिशृङ्गमारूढानि = उन्नति के शिखर पर पहुँचे। गर्ते = गड्डे में। निष्क्रम्य = निकलकर। गदितुम् = कहना। निरवद्यम् = निश्चय ही। अशक्यम् = नहीं कहा जा सकता, असम्भव। पारतन्त्रिकशृङ्खलया = परतन्त्रतारूपी श्रृंखला से। निगडितः = जकड़ा हुआ, बँधा हुआ। सप्तचत्वारिंशदधिकैकोनविंशतिशततमे = उन्नीस सौ सैंतालीस में।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती’ में संकलित ‘योजना-महत्त्वम्’ शीर्षक पाठ से लिया गया है।

[ संकेत, इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा। ]

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प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में बहुत समय तक परतन्त्र रहने के बाद भारत के स्वतन्त्र होने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद “किसको अत्यन्त सुख प्राप्त है अथवा किसको पूर्णरूप से दुःख प्राप्त है। यह सुन्दर उक्ति जितनी प्रत्येक मनुष्य के विषय में चरितार्थ होती है, उसी प्रकार उतनी ही राष्ट्र के जीवन में भी घटित होती है। संसार के इतिहास में प्राचीन काल से लेकर आज तक कितने राष्ट्र उन्नति के शिखर पर पहुँच गये, कुछ समय बाद अवनति के गड्ढे में गिर गये और कितने ही अवनति के गड्डे से निकलकर उन्नति के शिखर पर चढ़ (पहुँच) गये, यह कहना निश्चित ही असम्भव है। प्रायः सभी राष्ट्रों के विषय में यह वास्तविक बात है। भारतवर्ष भी इस वास्तविकता का अपवाद नहीं हो सका। बहुत समय से हमारा देश परतन्त्रता की बेड़ी में जकड़ा हुआ था। तिलक, गाँधी, नेहरू, पटेल, सुभाष आदि नेताओं और जनता के सहयोग और बलिदान से सन् 1947 ईस्वी में स्वतन्त्र हो गया।

(2)
वैदेशिकाः समस्तानि कार्याणि स्वहितदृष्ट्यैव कृतवन्तः, नास्य देशस्य उन्नतेः समृद्धेर्वा दृष्टया। जाते स्वतन्त्रे देशे, सम्पन्ने सार्वभौमिके सत्तासम्पन्ने राष्ट्र, विरचिते च विधाने, आर्थिक-सामाजिकप्रोन्नत्योः मिलिते सुवर्णावसरे, अस्माकं नेतृभिः नेहरूमहाभागैः एतदर्थं समितिरेका निर्मिता या (UPBoardSolutions.com) योजनासमितिरभ्यधीयत। इयमेव समितिः सर्वं विचार्य प्रथमं पञ्चभिः वर्षेः सम्पादयितुं योग्यानां कार्याणां यद् विवरणं प्रकाशितवती सैव प्रथमा पाञ्चवर्षिकी योजनेति नाम्ना प्रसिद्धा। स्वदेशे जीविकासाधनेषु कृषेरेव सर्वमुख्यत्वाद् अस्यां योजनायां तस्या एव सर्वाधिक महत्त्वं स्वीकृतम्। कृष्याश्रितानां ग्रामोद्योगानामपि विकासोऽपेक्षितः, एतदपेक्षितानि साधनान्यपि यथासम्भवं साधितानि। द्वितीयपाञ्चवर्षियां योजनायां महोद्योगेभ्यः प्राधान्यमदीयत। अतः औद्योगिक विकासः प्रसारश्च द्वितीययोजनायाः प्रधानलक्ष्यमासीत्।।

शब्दार्थ वैदेशिकाः = विदेशियों ने। स्वहितदृष्ट्यैव = अपने हित की दृष्टि से ही। सार्वभौमिके सत्तासम्पन्ने = सार्वभौमिक सत्तासम्पन्न होने पर आर्थिक-सामाजिक प्रोन्नत्योः = आर्थिक और सामाजिक उन्नतियों के। एतदर्थं = इसके लिए। समितिरेको = एक समिति। अभ्यधीयत = कही गयी, कहलायी। सम्पादयितुम् = पूरा करने के लिए। कृष्याश्रितानाम् = खेती पर आधारित। अदीयत = दिया गया।

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प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में स्वतन्त्र भारत की पंचवर्षीय योजनाओं के लक्ष्य के विषय में बताया गया है।

अनुवाद विदेशी लोग समस्त कार्य अपने हित की दृष्टि से ही करते थे, इस देश की उन्नति या समृद्धि की दृष्टि से नहीं। देश के स्वतन्त्र होने पर, राष्ट्र के सार्वभौमिक सत्ता से सम्पन्न होने पर और संविधान के बनने पर, आर्थिक और सामाजिक उन्नति का स्वर्णावसर मिलने पर, हमारे नेहरू जी आदि नेताओं ने इसके लिए समिति बनायी, जो ‘योजना-समिति’ कहलायी। इसी समिति ने सब कुछ विचारकर प्रथम पाँच वर्षों में हो सकने योग्य कार्यों को जो विवरण प्रकाशित किया, वही ‘प्रथम पंचवर्षीय योजना’ इस नाम से प्रसिद्ध हुई। अपने देश में जीविका के साधनों में खेती के ही सबसे प्रमुख होने के कारण इस योजना में उसी का सबसे अधिक महत्त्व स्वीकार किया गया। खेती पर आधारित ग्रामोद्योग का विकास भी आवश्यक है; अतः इसके लिए आवश्यक साधनों को भी यथासम्भव पूरा (प्राप्त) किया गया। द्वितीय पंचवर्षीय योजना में बड़े उद्योगों को (UPBoardSolutions.com) प्रधानता दी गयी; अत: उद्योगों का विकास और प्रसार द्वितीय योजना का प्रधान लक्ष्य था।

(3)
प्रथमपाञ्चवर्षिकयोजनान्तर्गतपञ्चत्रिंशदधिकं शतं (135) योजनाः आसन्। आसु एकादश बहुप्रयोजनाः तासु मुख्याः भाखरा-हीराकुड-दामोदर-तुङ्गभद्रा-मयूराक्षी-रिहन्दबन्धयोजनाः। एभ्यो बहुप्रयोजनेभ्यो बन्धेभ्योऽनेके लाभाः। कृषिसेचनं तावत् प्रथमो लाभः। द्वितीयश्च पुनः जलप्रवाहनियन्त्रणेन प्लावनभयान्निवृत्तिः। तृतीयो लाभः विद्युच्छक्त्युत्पादनं येनोद्योगशालासु सुमहन्ति यन्त्राणि परिचालितानि। विद्युत्प्रकाशस्तु अलभतैव। एवं चतुर्थ-पञ्चम-षष्ठ-इत्यादयः योजनाः यथासमयमद्यावधि प्रचलिताः सन्ति।

शब्दार्थ पञ्चत्रिंशदधिकं शतं = एक सौ पैंतीस। बहुप्रयोजनाः = बहुउद्देशीय। कृषिसेचनम् = खेती की सिंचाई। प्लावनभयात् = बाढ़ के डर से निवृत्तिः = छुटकारा। विद्युच्छक्त्युत्पादनम् (विद्युत् + शक्ति + उत्पादनम्) = बिजली की शक्ति का उत्पन्न होना। सुमहान्ति = बड़ी-बड़ी। यन्त्राणि = मशीनें। अलभतैव = प्राप्त किया ही जाता है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में प्रथम पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत हुए लाभों का वर्णन किया गया है।

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अनुवाद प्रथम पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत 135 योजनाएँ थीं। इनमें ग्यारह बहुउद्देशीय थीं। उनमें मुख्य भाखड़ा, हीराकुड, दामोदर, तुंगभद्रा, मयूराक्षी, रिहन्द बाँध योजनाएँ थीं। इन बहुउद्देशीय बाँधों से अनेक लाभ हैं। खेती की सिंचाई तो पहला लाभ है और दूसरा लाभ जल के प्रवाह को रोकने से बाढ़ के भय से मुक्ति है। तीसरा लाभ विद्युत शक्ति का उत्पादन है, जिससे उद्योगशालाओं में बड़े-बड़े यन्त्र चलाये जाते हैं। बिजली का प्रकाश तो प्राप्त हुआ ही है। इस प्रकार चतुर्थ, पञ्चम, षष्ठ इत्यादि योजनाएँ समय-समय पर
आज तक प्रचलित हैं।

(4)
आसु योजनासु अनेकाः अन्तर्गर्भिताः योजनाः सन्ति। आसां योजनानां फलानि-राष्ट्रियायेषु वृद्धिः महर्घतायाः नियन्त्रणम्, उपयोगिनां नैत्यिकानां वस्तूनां न्यूनतायाः दूरीकरणं, लघुषु विशालेषु, चोद्योगेषु अवधानं खाद्यान्नेषु स्वावलम्बनानयनं, परिवारनियोजनं, सर्वत्र कुल्यानां प्रवाहणं, नलकूपानां स्थापनं, प्रतिग्रामं विद्युत्प्रकाशः, वृक्षारोपणम्। आभिः योजनाभिः फलन्त्विदमवश्यं जातं यत् अस्माकं देशः खाद्यान्नेषु स्वावलम्बी सुसम्पन्नः।।

आसु योजनासु ………………………………………. विद्युत्प्रकाशः वृक्षारोपणम् । [2011]

शब्दार्थ अन्तर्गर्भिताः = भीतर छिपी हुई। राष्ट्रियायेषु = राष्ट्र की आयों में। महर्घतायाः = महँगाई का। नैत्यिकानाम् = प्रतिदिन की। अवधानम् = ध्यान देना। स्वावलम्बनानयनम् = स्वावलम्बन ले आना। कुल्यानाम् = नहरों का। नलकूपानाम् = ट्यूबवेलों का। आभिः (UPBoardSolutions.com) योजनाभिः = इन योजनाओं के द्वारा। फलन्त्विदमवश्यं (फलं + तु + इदम् + अवश्यं) = फल तो यह अवश्य है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा देश का जो विकास हुआ है, उसके बारे में प्रकाश डाला गया है।

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अनुवाद इन योजनाओं में अनेक योजनाएँ अन्तर्निहित हैं। इन योजनाओं के परिणाम हैं-राष्ट्रीय आय में वृद्धि, महँगाई की रोकथाम, उपयोग में आने वाली दिन-प्रतिदिन की वस्तुओं की कमी को दूर करना, छोटे और बड़े उद्योगों पर ध्यान देना, खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता लाना, परिवार नियोजन, सभी जगह नहरें प्रवाहित करना, ट्यूबवेल (नलकूप) लगाना, प्रत्येक गाँव में बिजली का प्रकाश, वृक्ष लगाना। इन योजनाओं से यह फल तो अवश्य हुआ कि हमारा देश खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर और भली-भाँति सम्पन्न हो गया है।

(5)
इत्थं चिकित्साक्षेत्रेष्वपि महती प्रगतिः सम्पन्ना। यक्ष्माशीतलामलेरियादिरोगाणां प्रायः देशात् निष्क्रमणमेव जातम्। क्ष-किरणात् (एक्स-रे) आन्तरिकाणां रोगाणां स्थानां चित्रं समक्षमायातं, येन चिकित्सासु महत्सौकर्यं सम्पन्नम्। सर्वत्र बन्धानां निर्माणेन, कुल्यानां प्रवाहणेन भूमिः उर्वरा जाता, ऊषरभूमिरपि सस्यसम्पन्ना भवति। जलसाधनेन प्रतिग्रामं, प्रत्युद्यानं प्रतिक्षेत्रं जलमेव दृश्यते। सर्वत्र जलपक्षिणः अन्ये च विहङ्गाः कलरवं कुर्वन्तः उड्डीयन्ते। वन्याः प्राणिनः ये ग्रीष्मकालेषु जिह्वां प्रसार्य तोयार्थमितस्ततः धावन्ति स्म तेऽद्योदकं पायं पायं नदन्तः कूर्दमानाः परिभ्रमन्ति।।

शब्दार्थ इत्थम् = इस प्रकार। यक्ष्माशीतलामलेरियादिरोगाणाम् = टी० बी०, चेचक, मलेरिया आदि रोगों का। निष्क्रमणमेव = निकलना ही। आन्तरिकाणाम् = भीतरी। समक्षमायातम् = सामने आया। सौकर्यम् = सुविधा, सरलता। बन्धानां = बाँधों के। उर्वरा = उपजाऊ। ऊषर = बंजर। सस्य = फसला उड्डीयन्ते = उड़ते हैं। प्रसार्य = फैलाकर। तोयार्थम् = पानी के लिए। इतस्ततः = इधर-उधर उदकं = जल के पायं-पायं = पी-पीकर। नदन्तः = शब्द करते हुए। कूर्दमानाः = कूदते हुए, दौड़ते हुए। परिभ्रमन्ति = चारों ओर घूमते हैं।

प्रसग प्रस्तुत गद्यांश में पंचवर्षीय योजनाओं से हुए कुल लाभों का वर्णन किया गया है।

अनुवाद इस प्रकार चिकित्सा के क्षेत्र में भी बड़ी प्रगति हुई है। तपेदिक, चेचक, मलेरिया आदि रोगों का देश से प्रायः बहिष्कार हो गया है। एक्स-रे (शरीर के) से भीतरी रोगों के स्थानों का चित्र सामने आ जाता है, जिससे चिकित्सा में अत्यधिक सुविधा हो गयी है। सब जगह (UPBoardSolutions.com) बाँधों के बनाने से, नहरों के प्रवाहित करने से भूमि उपजाऊ हो गयी है। बंजर भूमि भी धान्य-सम्पन्न हो गयी है। जल के साधनों से प्रत्येक गाँव में, प्रत्येक उद्यान में, प्रत्येक खेत में जल ही दिखाई देता है। सब जगह जल-पक्षी और दूसरे पक्षी कलरव करते हुए उड़ते हैं। जंगली जीव, जो गर्मी के दिनों में जीभ फैलाकर जल के लिए इधर-उधर दौड़ते-फिरते थे, वे
आज जल पी-पीकर शोर करते कूदते हुए चारों ओर घूमते हैं।

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(6)
प्रतिग्रामं विद्युत प्रकाशेन, तारकितं नभः निशि भूतलोपरि आयातमिव प्रतीयते। अद्य रेलगन्त्रीणां गतिषु कियती वृद्धिः जाता। रेलमार्गाणां विस्तारः, रेलगन्त्रीणां सङ्ख्यासु वृद्धिः, धूम्रजनानां स्थानेषु डीजलतैलेजनानां विस्तारः, विद्युतच्चालितानां रेलगन्त्रीणां सञ्चारेण समयस्य दुरुपयोगात् संरक्षणं दृष्ट्वा मनः अतीव प्रसन्नं भवति। अस्तु आसु योजनासु विद्यमानासु सत्स्वपि प्रतिजनं यावान् लाभः अपेक्षितः आसीत् तावांल्लाभो न जातः। कारणं जनसङ्ख्यायाः तीव्रगत्या वृद्धिरेव। चिकित्सासुविधासु वृद्धि गतीसु यत्र मरणप्रतिशते हासः तावान् जन्मप्रतिशते हासो न जातः। जननप्रतिरोधज्ञानं विना जनसङ्ख्यासु न्यूनता नायास्यति। एतत् तदैव सम्भाव्यते यदा शिक्षायाः प्रसारो भवेत्, साक्षरता वर्धेत एतदर्थं सर्वकारः जनसङ्ख्याशिक्षायाः प्रसाराय शिक्षणं चालयति। इयं शिक्षा परिवारनियोजनात् भिन्नैव।

प्रतिग्रामं विद्युतां ………………………………………. तीव्रगत्या वृद्धिरेव। [2011, 14]

शब्दार्थ तारकितम् =तारों से भरा। भूतलोपरि =धरती पर कियती = कितनी। धूमेजनानां = धुएँ के इंजनों का। रेलगन्त्रीणां = रेलगाड़ियों की। सत्स्वपि = होने पर भी। तावांल्लाभः = उतना लाभ। ह्रासः = कमी। जननप्रतिरोधज्ञानम् = जन्म की रोकथाम का ज्ञान नायास्यति = नहीं आएगी। सर्वकारः = सरकार

प्रसंग. प्रस्तुत गद्यांश में बताया गया है कि योजनाओं से अनेक लाभों के होते हुए भी जनसंख्या की वृद्धि के कारण उतना लाभ नहीं हो पाया है।

अनुवाद प्रत्येक ग्राम में बिजलियों के प्रकाश से तारों से भरा आकाश रात्रि में पृथ्वी के ऊपर आया-सा प्रतीत होता है। आज रेलगाड़ियों की गति में कितनी वृद्धि हो गयी है। रेलमार्गों के विस्तार, रेलगाड़ियों की । संख्या में वृद्धि, धुएँ के इंजनों के स्थान पर डीजल-तेल से चलने (UPBoardSolutions.com) वाले इंजनों के विस्तार, बिजली से चलने वाली रेलगाड़ियों के चलने से समय के दुरुपयोग से बचत को देखकर मन अत्यन्त प्रसन्न होता है। फिर भी, इन योजनाओं के होने पर भी प्रत्येक व्यक्ति को जितने लाभ की अपेक्षा थी, उतना लाभ नहीं हुआ। (इसमें)। जनसंख्या की तीव्रगति से वृद्धि ही कारण है। चिकित्सा की सुविधाओं के बढ़ जाने पर जहाँ मृत्यु के प्रतिशत में कमी हुई है, उतनी जन्म के प्रतिशत में कमी नहीं हुई। जन्म की रोकथाम के ज्ञान के बिना जनसंख्या में कमी नहीं आएगी। यह तभी हो सकता है, जब शिक्षा का प्रसार हो, साक्षरता बढ़े। इसके लिए सरकार जनसंख्या की शिक्षा के प्रसार के लिए शिक्षण चला रही है। यह शिक्षा परिवार-नियोजन से भिन्न ही है।

(7)
शिक्षया न केवलं व्यक्तेः विकासः, वरं सामाजिकी चेतनापि जागर्ति। परिस्थितिवशात् आचारविचारव्यवहारेषु अपि बालकेषु, प्रौढेषु परिवर्तनमायाति। शिक्षितसमुदाये जनसङ्ख्यावर्धनावरोधेषु जागर्तिः दृश्यते। दीनेषु, निरक्षरेषु शिशूत्पादनमेव लक्ष्यं प्रतीयते। तेषां भरणे पोषणे च ध्यानं नास्ति। प्रतिविद्यालयमस्याः जनशिक्षायोजनायाः प्रसारेण सर्वासां योजनानां साफल्यमवश्यं भविष्यति नात्र सन्देहः।

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शब्दार्थ जागर्ति = जागती है। जनसङ्ख्यावर्धनावरोधेषु = जनसंख्या की वृद्धि को रोकने में। शिशूत्पादनम् एव = बच्चे पैदा करना ही। प्रतीयते = प्रतीत होता है। नात्र = नहीं, इसमें।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में जनसंख्या की शिक्षा देने के लाभ को बताया गया है।

अनुवाद शिक्षा से केवल व्यक्ति का विकास ही नहीं होता है, वरन् सामाजिक चेतना भी जागती है। परिस्थितियों के कारण बालकों और प्रौढ़ों में आचार, विचार और व्यवहार में परिवर्तन आता है। शिक्षित वर्ग में जनसंख्या को बढ़ने से रोकने में जागरूकता दिखाई पड़ती है। दोनों और अनपढ़ों में बच्चे उत्पन्न करना ही लक्ष्य प्रतीत होता है। उनके भरण-पोषण पर ध्यान नहीं है। प्रत्येक विद्यालय में इस जनशिक्षा की योजना के प्रसार से सभी योजनाओं की सफलता अवश्य होगी, इसमें सन्देह नहीं है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पंचवर्षीय योजना का उद्देश्य बताइए। [2006,08, 12]
उत्तर :
सन् 1947 ई० में देश के स्वतन्त्र होने और सार्वभौमिक सत्ता से सम्पन्न होने के बाद देश के आर्थिक और सामाजिक रूप से उत्थान के लिए एक योजना-समिति बनायी गयी। इस योजना-समिति द्वारा देश के सर्वाधिक उन्नयन हेतु पाँच वर्षों में हो सकने योग्य कार्यों को जो (UPBoardSolutions.com)  विवरण प्रकाशित किया गया, वही पंचवर्षीय योजना के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

प्रश्न 2.
पंचवर्षीय योजनाओं से होने वाले लाभों (महत्त्व) को संक्षेप में लिखिए। [2006,07,09]
उत्तर :
चवर्षीय योजनाओं से हमारे देश की राष्ट्रीय आय में वृद्धि, महँगाई की रोकथाम, दैनिक उपयोग की वस्तुओं की प्राप्ति में सुगमता, छोटे-बड़े उद्योगों की ओर ध्यानाकर्षण, खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता, परिवार नियोजन, नहरों का निर्माण और नलकूप लगाना, गाँवों में बिजली का प्रबन्ध, वृक्षारोपण आदि अनेक लाभ हुए। चिकित्सा के क्षेत्र में यक्ष्मा, चेचक, मलेरिया आदि संक्रामक और भयानक रोगों से पूर्णतया छुटकारा मिला। एक्स-रे से भीतरी रोगों का पता लगाना सम्भव हुआ। नहरों के निर्माण से भूमि उर्वरा व धान्यसम्पन्न हुई और मानवों व पशु-पक्षियों को पेयजल प्राप्त हुआ। रेलमार्गों के विस्तार, उनकी गति में वृद्धि तथा डीजल इंजनों के प्रयोग से आवागमन में लगने वाले समय की बचत हुई।

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प्रश्न 3.
प्रथम पंचवर्षीय योजना में किसका सर्वाधिक महत्त्व स्वीकार किया गया? [2008]
उत्तर :
प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि की उन्नति को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया। इसके अन्तर्गत 135 योजनाएँ निहित थीं, जिनमें भाखड़ा-नांगल, हीराकुड, दामोदर, तुंगभद्रा, मयूराक्षी और रिहन्द बाँधों की योजनाएँ बनाई गयीं। इन योजनाओं में कृषि-सिंचन, जल-प्रवाह नियन्त्रण (UPBoardSolutions.com) तथा विद्युत-शक्ति के उत्पादन के क्षेत्र में पर्याप्त लाभ हुए।

प्रश्न 4.
बाँधों के निर्माण से देश को क्या लाभ हुए? [2008, 10]
उत्तरं :
बाँधों के निर्माण से देश को खेतों की सिंचाई के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध हुआ, जल के प्रवाह पर नियन्त्रण स्थापित किया गया तथा विद्युत-शक्ति के उत्पादन के क्षेत्र में अत्यधिक वृद्धि हुई। इन सभी से देश को अनेक लाभ हुए।

प्रश्न 5.
प्रथम पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल लिखिए। [2007,15]
उत्तर :
प्रथम पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल है-1951-56

प्रश्न 6.
परतन्त्रता काल में विदेशियों द्वारा भारत में किस प्रयोजन के लिए कार्य किये गये? [2009]
उत्तर :
परतन्त्रता काल में विदेशियों द्वारा भारत में समस्त कार्य अपने हित की दृष्टि से किये गये। भारत के हित की दृष्टि से कोई कार्य नहीं किया गया।

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प्रश्न 7.
क्या पंचवर्षीय योजनाओं से देश को अपेक्षित लाभ हुआ?
या
योजनाओं के क्रियान्वयन से जितना लाभ अपेक्षित था, उतना क्यों नहीं प्राप्त हो सका?
उत्तर :
पंचवर्षीय योजनाओं से देश और प्रत्येक व्यक्ति को जितने लाभ की अपेक्षा थी, उतना लाभ नहीं हुआ। इसका कारण जनसंख्या में हुई तीव्रगति से वृद्धि है। जब तक जनसंख्या में अपेक्षित कमी नहीं आएगी तब तक पंचवर्षीय योजनाओं से उल्लेखनीय सफलता नहीं मिल सकती। सरकार इसके लिए सतत प्रयत्नशील है।

प्रश्न 8.
भारत में पंचवर्षीय योजनाएँ किस प्रकार आरम्भ हुईं? या भारत में पंचवर्षीय योजनाओं की आवश्यकता क्यों पड़ीं?
उत्तर :
भारत में शताधिक वर्षों तक चले अंग्रेजी शासन ने भारत के कल्याण और उन्नति की बात नहीं सोची। उन्होंने भारत में जितने भी कार्य किये, वे अपनी ही भलाई के लिए किये न कि भारतीयों की भलाई के लिए। इसी कारण 15 अगस्त, 1947 को भारत के स्वतन्त्र होने पर तत्कालीन भारतीय नेतृत्व के सामने अनेक समस्याएँ खड़ी हो गयीं। स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू रूस की साम्यवादी व्यवस्था से बहुत प्रभावित थे। वे यह जानते (UPBoardSolutions.com) थे कि रूस में कम्युनिस्टों को शासन प्रारम्भ होने के बाद पंचवर्षीय योजनाएँ बनायी गयी थीं और यह निश्चित किया गया था कि पाँच वर्षों में उन्हें कौन-कौन से काम करने हैं। रूस के ढंग पर ही नेहरू जी ने भी भारत में पंचवर्षीय योजनाएँ प्रारम्भ कीं और इन योजनाओं के लिए एक समिति बना दी गयी। समिति यह निश्चय करती थी कि किस पंचवर्षीय योजना में कौन-से कार्य किये जाएँ और किन पर कितना व्यय किया जाए। इन्हीं पंचवर्षीय योजनाओं ने भारत की कायाकल्प करे। दिया।

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प्रश्न 9.
शिक्षा के क्या लाभ हैं?
उत्तर :
[ संकेत ‘पाठ-सारांश’ के उपशीर्षक “शिक्षा से लाभ” को अपने शब्दों में लिखें।]

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Class 10 Sanskrit Chapter 7 UP Board Solutions विद्यार्थिचर्या Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 7 Vidyarthi Charya Question Answer (पद्य – पीयूषम्)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 7 हिंदी अनुवाद विद्यार्थिचर्या के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

स्मृति-ग्रन्थों में जीवन की रीति-नीति, करणीय-अकरणीय कर्म, इनके औचित्य-अनौचित्य एवं विधि-दण्ड का विशेष रूप से वर्णन किया गया है। प्रमुख स्मृति-ग्रन्थों की संख्या अठारह मानी जाती है। इनमें जो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्मृति-ग्रन्थ है, उसका नाम है-‘मनुस्मृति’। इसके रचयिता (UPBoardSolutions.com) आदिपुरुष मनु को माना जाता है।

प्रस्तुत पाठ के श्लोक इसी मनुस्मृति से संगृहीत हैं। यह सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन के विविध पक्षों पर प्रकाश डालने वाला श्रेष्ठ ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ की उपयोगिता, प्रामाणिकता एवं तार्किकता को इस बात से समझा जा सकता है कि आजकल न्यायालयों में भी मनुस्मृति को प्रमाण मानकर व्यवहार-निर्वाह किया जाता है। इसी ग्रन्थ से विद्यार्थियों के लिए व्यवहार से सम्बन्धित नियम संकलित किये गये हैं।

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पाठ-सारांश

विद्यार्थी को सूर्योदय से पूर्व ब्राह्म-मुहूर्त में उठकर धर्म, अर्थ, शरीर के कष्टों एवं वेदों के तत्त्वों पर विचार करना चाहिए। भोजन करने के उपरान्त स्नान नहीं करना चाहिए। रुग्णावस्था में, रात्रि में, वस्त्रों को पहने हुए, निरन्तर तथा अपरिचित जलाशय में कभी भी स्नान नहीं करना चाहिए। विद्यार्थी को अपना जूठा भोजन किसी को नहीं देना चाहिए। भोजन को समय पर एवं उचित मात्रा में ग्रहण करना चाहिए। भोजनोपरान्त मुँह अवश्य साफ करना चाहिए।

प्रणाम करने की आदत वाले तथा बड़ों की सेवा-शुश्रुषा करने वाले विद्यार्थी की आयु, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं। विद्यार्थी को गीले पाँव भोजन करना चाहिए, किन्तु गीले पाँव सोना नहीं चाहिए। गीले पाँव भोजन करने से आयु बढ़ती है। विद्यार्थी को सदैव प्रिय सत्य ही बोलना चाहिए। अप्रिय सत्य और प्रिय असत्य को कभी नहीं बोलना चाहिए, यही उत्तम धर्म है। उसे चंचल हाथ-पैर, चंचल नेत्र, कठोर स्वभाव, चंचल वाणी, दूसरों से द्रोह करने वाला नहीं होना चाहिए।

सभी शुभ लक्षणों से हीन होने पर भी सदाचारी, श्रद्धावान् और दूसरों की निन्दा न करने वाला व्यक्ति सौ (UPBoardSolutions.com) वर्ष तक जीवित रहता है। स्वतन्त्रता ही सुख है और परतन्त्रता दुःख है, रि.धार्थी को सुख-दु:ख को इसी परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। एकान्त चिन्तने ही कल्याणकारी होता है; अतः विद्यार्थी को अपना हितचिन्तन एकान्त में बैठकर करना चाहिए।

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पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1)
ब्राह्म मुहूर्ते बुध्येत्, धर्मार्थी चानुचिन्तयेत्
कायक्लेशांश्च तन्मूलान्, वेदतत्त्वार्थमेव च ॥ [2006]

शब्दार्थ ब्राह्म मुहूर्ते = ब्राह्म-मुहूर्त में, सूर्योदय से पूर्व 48 मिनट तक के समय को ब्राह्म-मुहूर्त कहते हैं। बुध्येत = जागना चाहिए। धर्मार्थी = धर्म और अर्थ (धन) के बारे में। अनुचिन्तयेत् = विचार करना चाहिए। कायक्लेशान् = शरीर के कष्टों को। तन्मूलान् = उनके (शारीरिक कष्ट के कारणों को। वेदतत्त्वार्थम् = वेदों के वास्तविक अर्थ को।

सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड‘पद्य-पीयूषम्’ के विद्यार्थिचर्या शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा। ]

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में विद्यार्थी के प्रात: उठने के उचित समय को बताया गया है।

अन्वय, (छात्रः) ब्राह्म मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थी च अनुचिन्तयेत्, कायक्लेशान् तन्मूलान्, वेद-तत्त्वार्थम् एव च (चिन्तयेत्)।

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व्याख्या मनु का कथन है कि छात्र को ब्राह्म-मुहूर्त में अर्थात् सूर्योदय से 1 घण्टे पूर्व जागना चाहिए और धर्म तथा अर्थ के बारे में चिन्तन करना चाहिए। तात्पर्य यह है कि लोक-कल्याण के लिए जितना आवश्यक धन है, परलोक कल्याण के लिए उतना ही आवश्यक धर्म भी है। साथ (UPBoardSolutions.com) ही उसे अपने शारीरिक कष्टों, उनके कारणों व निवारण के उपायों तथा वेदों के सारतत्त्व के विषय में भी विचार करना चाहिए।

(2)
न स्नानमाचरेद भुक्त्वा , नातुरो न महानिशि।
न वासोभिः सहाजस्त्रं, नाविज्ञाते जलाशये ॥ [2006, 09]

शब्दार्थ आचरेत् = करना चाहिए। भुक्त्वा = भोजन करके। आतुरः = रोगी। महानिशि = अधिक रात में। वासोभिः सह = कपड़ों के साथ। अजस्त्रम् = निरन्तर, बहुत समय तक अविज्ञाते = अपरिचिता जलाशये = तालाब में।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि विद्यार्थी को कब, कहाँ और कैसे स्नान नहीं करना चाहिए।

अन्वय (छात्रः) भुक्त्वा स्नानं न आचरेत्, न आतुरः, न महानिशि, न वासोभिः सह अजस्रं, न अविज्ञाते जलाशये (स्नानम् आचरेत्)।

व्याख्या मनु का कथन है कि विद्यार्थी को भोजन करके स्नान नहीं करना चाहिए; न रोगी (बीमार) होने पर, न मध्य रात्रि में, न कपड़ों के साथ बहुत समय तक और न अपरिचित जलाशय में स्नान करना चाहिए।

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(3)
नोच्छिष्टं कस्यचिद् दद्यान्नाद्याच्चैव तथान्तरा।
न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्टः क्वचिद् व्रजेत् ॥

शब्दार्थ उच्छिष्टम् = जूठा भोजन। कस्यचित् = किसी के लिए। दद्यात् = देना चाहिए। न अद्यात् = भोजन नहीं करना चाहिए। अन्तरा = बीच में, अर्थात् भोजन के दो समयों के मध्य में या बहुत-से लोगों के मध्य। अत्यशनम् = अधिक भोजन। कुर्यात् = करना चाहिए। उच्छिष्टः = जूठे मुँहा क्वचित् = कहीं पर। व्रजेत् = जाना चाहिए।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में भोजन की उचित प्रक्रिया पर प्रकाश डाला गया है।

अन्वय (छात्रः) कस्यचित् उच्छिष्टं न दद्यात् अन्तरा च न एव अद्यात्। न च अति अशनं एव कुर्यात्। उच्छिष्ट: च क्वचित् न व्रजेत्।

व्याख्या मनु का कथन है कि विद्यार्थी को किसी को अपना जूठा भोजन नहीं देना चाहिए तथा (UPBoardSolutions.com) भोजन के दो समयों के बीच में (अर्थात् बार-बार) या बहुत-से लोगों के बीच में भोजन नहीं करना चाहिए। उचित मात्रा से अधिक भोजन नहीं करना चाहिए। जूठे मुंह (बिना मुँह धोये) कहीं नहीं जाना चाहिए।

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(4)
अभिवादनशीलस्य, नित्यं वृद्धोपसेविनः।।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते, आयुर्विद्या यशो बलम् ॥ [2006, 08,09, 10, 11, 15]

शब्दार्थ अभिवादनशीलस्य = प्रणाम करने के स्वभाव वाले की। नित्यं = प्रतिदिन। वृद्धोपसेविनः = बड़े-बूढों की सेवा करने वाले की। चत्वारि = चार चीजें। तस्य = उस (विद्यार्थी) के वर्धन्ते = बढ़ते रहते हैं।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में व्यावहारिक सदाचरण पर प्रकाश डालते हुए उसके महत्त्व को स्पष्ट किया गया है।

अन्वय अभिवादनशीलस्य, नित्यं वृद्धोपसेविन: तस्य आयुः विद्या यश: बलम् (एतानि) चत्वारि वर्धन्ते।

व्याख्या मनु का कथन है कि जो छात्र अपने से बड़ों को अभिवादन कर उनका आशीर्वाद लेता है, नित्य अपने बड़े-बूढ़ों की सेवा करता है, उस छात्र की आयु, विद्या, यश और बल ये चार बढ़ते रहते हैं।

(5)
आर्द्रपादस्तु भुञ्जीत, नार्दपादस्तु संविशेत्।
आर्द्रपादस्तु भुञ्जानो, दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥ [2008, 12]

शब्दार्थ आर्द्रपादः = गीले पाँव वाला, धोने के पश्चात् बिना पोंछे। (UPBoardSolutions.com) भुञ्जीत = भोजन करना चाहिए। संविशेत् = सोना चाहिए। भुञ्जानः = भोजन करता हुआ। अवाप्नुयात् = प्राप्त करता है।

प्रसग प्रस्तुत श्लोक में दीर्घायु होने का उपाय बताया गया है।

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अन्वय आर्द्रपादः तु भुजीत। आईपादः तु ने संविशेत्। आर्द्रपादः तु भुञ्जानः दीर्घम् आयुः अवाप्नुयात्।।

व्याख्या मनु का कथन है कि गीले पाँव (धोने के बाद बिना पोंछे) भोजन करना चाहिए। गीले पैर नहीं सोना चाहिए। गीले पाँव भोजन करता हुआ दीर्घ आयु को प्राप्त करता है। तात्पर्य यह है कि जहाँ भीगे हुए पैरों से भोजन करना आयुवर्द्धक होता है, वहीं भीगे पैरों शयन करना हानिकारक।

(6)
सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न बूयोत्सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं बूयादेष धर्मः सनातनः ।। [2009)

शब्दार्थ बूयात् = बोलना चाहिए। सत्यम् अप्रियम् = बुरा लगने वाला सत्य। अनृतम् = झूठ। सनातनः = सदा रहने वाला, शाश्वत।

प्रसंग इस श्लोक में अप्रिय सत्य और प्रिय असत्य न बोलने का परामर्श दिया गया है।

अन्वय सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्, अप्रियं सत्यं न ब्रूयात्, प्रियं च अनृतं न ब्रूयात् एष सनातन: धर्मः (अस्ति)।

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व्याख्या मनु का कहना है कि सत्य बोलना चाहिए। प्रिय बोलना चाहिए। अप्रिय अर्थात् बुरा लगने वाला सत्य नहीं बोलना चाहिए तथा प्रिय अर्थात् अच्छा लगने वाला झूठ नहीं बोलना चाहिए। यही शाश्वत धर्म है।

(7)
न पाणिपादचपलो, न नेत्रचपलोऽनृजुः ।।
न स्याद्वाक्चपलश्चैव, न परद्रोहकर्मधीः ॥

शब्दार्थ पाणिपादचपलः = चंचल हाथ-पैर वाला। नेत्रचपलः = नेत्रों से चंचल। अनृजुः = कठोर स्वभाव वाला, कुटिल। वाक्चपलः = वाणी से चंचल। परद्रोहकर्मधीः = दूसरों के साथ द्रोह करने में बुद्धि रखने वाला।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में विद्यार्थी को चंचल न होने का परामर्श दिया गया है।

अन्वय (छात्रः) पाणिपादचपल: न (स्यात्)। नेत्रचपलः न (स्यात्), अनृणुः न (स्यात्), वाक्चपल: न (स्यात्), च न एवं परद्रोहकर्मधीः न स्यात्।।

व्याख्या मनु का कथन है कि छात्र को हाथ-पैरों से चंचल नहीं होना चाहिए; अर्थात् उसे अपने हाथ-पैर व्यर्थ में नहीं हिलाने चाहिए। चंचल नेत्रों वाला नहीं होना चाहिए, कुटिल स्वभाव वाला नहीं होना चाहिए, चंचल वाणी वाला नहीं होना चाहिए और न ही दूसरों से द्रोहकर्म में बुद्धि रखने वाला होना चाहिए। तात्पर्य यह है कि विद्यार्थी को कुछ भी करने, कहीं भी जाने, सब कुछ देखने और कुछ भी कहने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना चाहिए।

(8)
सर्वलक्षणहीनोऽपि, यः सदाचारवान्नरः
श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ [2008, 11, 14]

शब्दार्थ सर्वलक्षणहीनोऽपि = सभी शुभ लक्षणों से हीन होता हुआ भी। यः (UPBoardSolutions.com) सदाचारवान्नरः = जो सदाचारी व्यक्ति। श्रद्दधानः = श्रद्धा रखने वाला, श्रद्धालु। अनसूयः = निन्दा न करने वाला, ईष्र्यारहित। शतं वर्षाणि जीवति = सौ वर्षों तक जीवित रहता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सदाचारी व्यक्ति की उपलब्धि पर प्रकाश डाला गया है।

अन्वय सर्वलक्षणहीनः अपि यः नरः सदाचारवान्, श्रद्दधानः, नसूयः च (अस्ति), (स:) शतं वर्षाणि जीवति।

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व्याख्या मनु का कथन है कि सभी शुभ लक्षणों से हीन होता हुआ भी जो मनुष्य सदाचारी, श्रद्धा रखने वाला और दूसरों की निन्दा न करने वाला होता है, वह सौ वर्ष तक जीवित रहता है। तात्पर्य यह है कि सदाचारी, श्रद्धालु और ईर्ष्यारहित व्यक्ति ही दीर्घायुष्य को प्राप्त करते हैं।

(9)
सर्वं परवशं दुःखं, सर्वमात्मवशं सुखम्।।
एतद्विद्यात् समासेन, लक्षणं सुख-दुःखयोः ॥ [2008, 10, 12, 14, 15]

शब्दार्थ परवशं = पराधीनता। आत्मवशम् = स्वाधीनता। विद्यात् = जानना चाहिए। समासेन = संक्षेप में। लक्षणं = पहचान। सुख-दुःखयोः = सुख और दुःख की।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सुख-दु:ख के लक्षणों पर प्रकाश डाला गया है।

अन्वय परवशं सर्वं दु:खम् (अस्ति)। आत्मवशं सर्वं सुखम् (अस्ति)। एतद् समासेन सुख-दु:खयोः लक्षणं विद्यात्।।

व्याख्या मनु का कथन है कि जो दूसरे के अधीन है, वह सब दुःख है। जो अपने अधीन है, वह सब सुख है। इसे संक्षेप में सुख-दु:ख का लक्षण समझना चाहिए। तात्पर्य यह है कि स्वाधीनता सबसे बड़ा सुख और पराधीनता सबसे बड़ा दुःख है।

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(10)
एकाकी चिन्तयेन्नित्यं, विविक्ते हितमात्मनः।
एकाकी चिन्तयानो हि, परं श्रेयोऽधिगच्छति ॥ [2006,07, 15]

शब्दार्थ एकाकी = अकेला| चिन्तयेत् = विचार करना चाहिए। विविक्ते = एकान्त में। हितम् आत्मनः = अपनी भलाई। चिन्तयानो = विचार करने वाला। परं श्रेयः = परम कल्याण को। अधिगच्छति = प्राप्त करता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में एकान्त के महत्त्व का प्रतिपादन किया गया है।

अन्वय विविक्ते एकाकी (सन्) नित्यम् आत्मनः हितं चिन्तयेत्। हि एकाकी चिन्तयान: (पुरुष:) परं श्रेयः अधिगच्छति।।

व्याख्या मनु का कथन है कि एकान्त में अकेला होते हुए सदा अपने हित के विषय (UPBoardSolutions.com) में विचार करना चाहिए; क्योंकि अकेले ही (अपने हित का) चिन्तन करने वाला पुरुष परम कल्याण की प्राप्त करता है। तात्पर्य यह है कि आत्म-कल्याण के इच्छुक व्यक्ति को चाहिए कि वह एकान्त में यह सोचे कि मेरा हित किसमें है।

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सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1) ब्राह्म मुहूर्ते बुध्येत, धर्माचानुचिन्तयेत्।। [2010]

सन्दर्भ प्रस्तुत सूक्तिपरक पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘विद्यार्थिचर्या’ नामक पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ की शेष सभी सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में विद्यार्थी के कर्तव्य का वर्णन किया गया है।

अर्थ ब्राह्म-मुहूर्त में जागना चाहिए तथा धर्म-अर्थ के बारे में चिन्तन करना चाहिए।

व्याख्या सूर्योदय के एक घण्टे पूर्व से लेकर सूर्योदय तक का समय ब्राह्म-मुहूर्त कहलाता है। अत: इस अन्तराल में विद्यार्थी को अवश्य ही निद्रा से जाग जाना चाहिए तथा धर्म और अर्थ के बारे में विचार करना चाहिए। अर्थ से आशय धन से होता है। विद्यार्थी का धन तो विद्या ही है। अतः विद्यार्थी को प्रात:काल विद्याध्ययन या स्वाध्याय करना चाहिए। सभी विद्वान् और शिक्षाशास्त्री मानते हैं कि ब्राह्म-मुहूर्त में किया गया अध्ययन मस्तिष्क में स्थायी रूप से बस जाता है अर्थात् याद हो जाता है। विद्यार्थी के लिए धर्म का तात्पर्य नित्य-नैमित्तिक कार्य तथा ईश्वर की यथासम्भव आराधना से है। अत: प्रत्येक विद्यार्थी को सूर्योदय से पूर्व उठकर अपने धर्म-अर्थ का चिन्तन करना चाहिए।

(2) न स्नानमाचरेद् भुक्त्वा नातुरो न महानिशि। [2008, 10, 15]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में विद्यार्थियों के लिए स्नान सम्बन्धी कति ‘ नियमों का वर्णन किया गया है।

अर्थ भोजन करके, रुग्णावस्था में और आधी रात में स्नान नहीं करना चाहिए।

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व्याख्या स्वस्थ और नीरोग रहने के लिए व्यक्ति को भोजन करके स्नान नहीं करना चाहिए। इसका कारण यह है कि भोजन को पचाने के लिए जिस पाचन-अग्नि की आवश्यकता होती है, वह स्नान करने के उपरान्त मन्द पड़ जाती है, जिससे भोजन ठीक से नहीं पच पाता और व्यक्ति क्रमश: अस्वस्थ होता जाता है। रुग्णावस्था में स्नान करने पर व्यक्ति की बीमारी और अधिक भयंकर स्थिति में पहुँचकर उसके लिए प्राणघातक हो सकती है। इसी कारण अर्द्ध-रात्रि या मध्यरात्रि में किया गया स्नान भी व्यक्ति के लिए हानिकारक ही होता है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि विद्यार्थी को सदैव भोजन से पूर्व स्नान करना चाहिए, रोगग्रस्त होने पर रोग की (UPBoardSolutions.com) अवस्था के अनुसार ही स्नान करना चाहिए और अर्द्ध-रात्रि में स्नान से बचना चाहिए।

(3) अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में व्यक्ति को अभिवादनशील एवं वृद्ध-सेवी होने का परामर्श दिया गया है।

अर्थ अभिवादनशील और प्रतिदिन वृद्धों की सेवा करने वाले की आयु, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं।

व्याख्या जो लोग अपने से बड़ों का नम्रतापूर्वक अभिवादन करते हैं और वृद्धों की नियमित रूप से सेवा करते हैं, उन लोगों की आयु, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं। इसका कारण यह है कि जो लोग ऐसा करते हैं, उनके साथ बड़ों के आशीर्वाद और शुभकामनाएँ सम्मिलित होती हैं और सच्चे मन से दिये गये आशीर्वाद अवश्य फलीभूत होते हैं; अतः व्यक्ति को अपने से बड़ों का अभिवादन और वृद्धों की सेवा तन-मन से करनी चाहिए।

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(4)
चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्। [2006,07] |
आयुर्विद्या यशो बलम्। [2012, 14, 15]

प्रसंग यहाँ अभिवादनशीलता और बड़े-बूढ़ों की सेवा को सर्वांगीण उन्नति का साधन बताया गया है।

अर्थ उसकी (अभिवादनशील और प्रतिदिन वृद्धों की सेवा करने वाले की) आयु, विद्या, यश और बल चारों बढ़ते हैं।

व्याख्या बड़ों का आदर-सत्कार करने और नित्य-प्रति सेवा करने वाले व्यक्ति की आयु, विद्या, यश और बल ये चारों बढ़ते हैं; क्योंकि इन गुणों से युक्त व्यक्ति की सर्वत्र प्रशंसा होती है, जिससे वह मरकर भी जीवित रहता है। गुरुजनों की कृपा होने पर व्यक्ति विद्या में निपुण हो जाता है (UPBoardSolutions.com) और गुरुजनों; अर्थात् अपने से बड़ों का आदर करना विनम्रता का द्योतक है। विपत्ति में ऐसे व्यक्ति की सभी सहायता करते हैं। वस्तुतः हम महानता के समीप तभी होते हैं जब हम विनम्र होते हैं। विनम्रता बड़ों के प्रति कर्तव्य है, बराबर वालों के प्रति विनयसूचक है और छोटों के प्रति कुलीनता की द्योतक है।

(5)
सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात्सत्यमप्रियम्। [2006]

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् ।। [2007, 11, 12]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में प्रिय सत्य बोलने पर बल दिया गया है।

अर्थ सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए परन्तु अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए।

व्याख्या मनुष्य को सदा सत्य बोलना चाहिए। सत्य बोलने के साथ-साथ उसे ऐसा वचन भी बोलना चाहिए, जो सुनने वालों को प्रिय लगे। यदि कोई बात सत्य है, लेकिन सुनने वाले को वह बुरी लगती है तो उसे भी नहीं बोलना चाहिए; जैसे किसी काने व्यक्ति को ‘काना’ कहकर पुकारा जाए तो यह बात सत्य तो है, लेकिन उसके लिए अप्रिय है। अतः सत्य होते हुए भी अप्रिय होने के कारण ऐसा नहीं कहना चाहिए।

(6), श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति [2007]

प्रसग प्रस्तुत सूक्ति में मनुष्य के दीर्घायु होने के कारणों पर प्रकाश डाला गया है।

अर्थ श्रद्धा रखने वाला, निन्दा न करने वाला व्यक्ति सौ वर्षों तक जीवित रहता है।

व्याख्या मनु जी कहते हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धेय लोगों और वस्तुओं के प्रति श्रद्धा रखता है और दूसरे लोगों की निन्दा नहीं करता है, वह संसार में कम-से-कम सौ वर्ष तक जीवित रहता है। यहाँ पर जीवित रहने से आशय उसका यश निरन्तर चलते रहने से है; क्योंकि व्यक्ति के जीवन (UPBoardSolutions.com) का उद्देश्य सद्कर्मों के द्वारा युगों-युगों तक चलते रहने वाले यश की प्राप्ति करना है। श्रद्धावान् और दूसरों की निन्दा न करने वाला व्यक्ति उस यश को प्राप्त कर लेता है; क्योंकि इन गुणों से युक व्यक्ति का लोग मरने के पश्चात् भी युगों-युगों तक स्मरण करते हैं। इस प्रकार व्यक्ति मरणोपरान्त भी जीवित रहता है।

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(7)
सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।। [2006,09, 11, 12, 14]
सर्वं परवशं दुःखं। [2013]
एतद् विद्यात् समासेन, लक्षणं सुखदुःखयोः ॥

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में स्वतन्त्रता के महत्त्व को बताया गया है।

अर्थ पराधीनता सबसे बड़ा दु:ख है तथा स्वाधीनता सबसे बड़ा सुख।

व्याख्या महर्षि मनु ने संक्षेप में सुख और दुःख का लक्षण बताते हुए कहा है कि पराधीनता से बढ़कर दुःख नहीं है और स्वाधीनता से बढ़कर सुख नहीं है। तोता सोने के पिंजरे में रहकर भी परवश होने से दुःखी रहता है और मुक्त हो जाने पर सुखी हो जाता है। पराधीनता में मनुष्य मन के अनुकूल कार्य नहीं कर पाता; जिससे वह दुःखी रहता है। स्वाधीनता में वह अपने मन के अनुकूल कार्य करके सुखी रहता है। निश्चित ही बन्धन में कोई सुख नहीं है। स्वाधीन रहने पर ही सुख की प्राप्ति हो सकती है। तुलसीदास जी ने भी कहा है-‘पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।’ इसी को संक्षेप में सुख और दुःख का लक्षण जानना चाहिए अर्थात् सुख को स्वाधीनता का तथा दुःख को पराधीनता का।

(8)
एकाकी चिन्तयानो हि परं श्रेयोऽधिगच्छति। [2007,08,09, 10, 14]
पॅरं श्रेयोधिगच्छति।।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में एकान्त के महत्त्व का प्रतिपादन किया गया है।

अर्थ निश्चय ही अकेला मनुष्य चिन्तन करने पर परम कल्याण को प्राप्त करता है।

व्याख्या मनुष्य को एकान्त में बैठकर अपना हित सोचना चाहिए। जो व्यक्ति एकान्त में बैठकर अपना हित सोचता है, वह परम कल्याण को प्राप्त करता है; क्योंकि एकान्त में बैठने से एकाग्रता होती है और एकाग्र होकर ही कोई व्यक्ति ध्यानपूर्वक सोच सकता है। एकान्त में बैठने से व्यक्ति के ऊपर बाहरी वातावरण का प्रभाव नहीं पड़ता, जिससे उसे किसी प्रकार के दबाव का सामना नहीं करना पड़ता; फलतः उचित निर्णय लेना आसान हो जाता है। इसीलिए कहा गया है कि व्यक्ति को अपने सम्बन्ध में चिन्तन एकान्त में ही करना चाहिए।

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श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) ब्राह्म मुहूर्ते …………………………………………… वेदतत्त्वार्थमेव च ॥ [2014]
संस्कृतार्थः स्मृतिकारः मनुः कथयति यत् छात्र: प्रात:काले ब्राह्म मुहूर्ते बुध्येत्, धर्मान् अर्थान् च अनुचिन्तयेत्। कायस्य क्लेशान् तन्मूलान्, तत् निवारणोपायान्, वेदस्य तत्त्वानाम् अर्थस्य च चिन्तयेत्।।

(2) न स्नानमाचरेद …………………………………………… नाविज्ञाते जलाशये॥ [2006, 10, 13]
संस्कृतार्थः स्मृतिकारः मनुः कथयति यत् छात्र: भोजनं कृत्वा कदापि स्नानं ने आचरेत्। आतुरोऽपि, दीर्घ निशायाम् अपि, वस्त्राणि परिधायापि, अविज्ञाते सरोवरे स्नानं कदापि न आचरेत्।

(3) नोच्छिष्टं कस्यचिद् …………………………………………… क्वचिद् व्रजेत् ॥ [2007, 09]
संस्कृतार्थः स्मृतिकारः मनुः कथयति यत् विद्यार्थी कस्यचित् उच्छिष्टं भोजनं न दद्यात्, नैव द्वौ भोजनस्य मध्ये भोजनं कुर्यात्, अत्यधिक भोजनं न कुर्यात्, नापि उच्छिष्टः मुखात् क्वचित् गच्छेत्।।

(4) अभिवादनशीलस्य …………………………………………… यशो बलम् ॥ [2010, 11, 12, 13, 14, 15]
संस्कृतार्थः स्मृतिकारः अभिवादनशीलतायाः वृद्ध-सेवायाः च लाभं वर्णयति यत् यस्य स्वभाव: स्वपूज्यानाम् अभिवादनम् अस्ति, यः सदा वृद्धानां सेवां करोति, तस्य जनस्य आयुः, विद्या, यशः शक्तिः च इति चत्वारि वस्तूनि वृद्धि लभन्ते।

(5) आर्दपादस्तु भुञ्जीत …………………………………………… दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥ (2006, 11]
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके चरण-प्रक्षालनस्य नियमानां र्णनम् : प्त–जलेन चरणौ प्रक्षाल्य आर्द्रपाद एव भोजनं (UPBoardSolutions.com) कुर्यात्, परम् आर्द्राभ्यां पादाभ्यां शयनं न कुर्यात्। यः जनः जलेन चरणौ प्रक्षाल्य आर्द्रपादः भोजनं करोति सः दीर्घम् आयुः प्राप्नोति।।

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(6) सत्यं ब्रूयात्प्रियं …………………………………………… धर्मः सनातनः ॥ [2006, 13]
संस्कृतार्थः महर्षिः मनुः सत्यभाषणस्य विषये नियमं कथयति यत् मनुष्यः सदा सत्यं वदेत्। सदा प्रियं वदेत्। तादृशं सत्यं न वदेत् यत् कस्यापि अप्रियं कटु च अस्ति। तादृशं प्रियम् अपि न वदेत् यत् सत्यं न अस्ति। इत्थं प्रकारेण सत्यं-प्रियं-भाषणं सर्वेषां समीचीनः धर्मः अस्ति।

(7) न पाणिपादचपलो …………………………………………… परद्रोहकर्मधीः ॥
संस्कृतार्थः स्मृतिकारः मनुः कथयति यत् विद्यार्थी हस्त–पादयोः चापल्यं न कुर्यात्, इत्यमेव अनृजुः सन् वाक्चापल्यमपि न कुर्यात्। परेषां द्रोहकर्मणि बुद्धिः अपि न कुर्यात्।

(8) सर्वलक्षणहीनोऽपि …………………………………………… वर्षाणि जीवति॥ [2008, 09, 10, 12, 13]
संस्कृतार्थः मनुः महाराजः कथयति यत् यः नरः सर्वलक्षणैः हीनः अस्ति, परञ्च सदाचारयुक्तः, श्रद्धायुक्तः, ईष्र्यारहितः च अस्ति, सः शतं संवत्सराणि जीवति।।

(9) सर्वं परवशं दुःखं, …………………………………………… सुखदुःखयोः ॥ [2006, 08, 10, 12, 14]
संस्कृतार्थः स्मृतिकारः मनुः कथयति-अस्मिन् संसारे यदपि (UPBoardSolutions.com) पराधीनम् अस्ति, तत्सर्वं दु:खस्वरूपम् अस्ति। यत् स्वाधीनम् अस्ति, तत्सर्वं सुखस्वरूपम् अस्ति। पराधीनतां दुःखस्य स्वाधीनतां च सुखस्य सङ्क्षेपेणलक्षणं जानीयात्।।

(10) एकाकी चिन्तयेन्नित्यं …………………………………………… श्रेयोऽधिगच्छति। [2006, 09, 14]
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके एकान्तचिन्तनस्य महत्त्वं प्रदर्शितम् यत् प्रत्येक मानवा: एकान्तस्थले स्थित्वा प्रतिदिनं स्वहिताय चिन्तनं कुर्यात्। य: मानव: नित्यप्रति एकाकी भूत्वा स्वहितकारिणं विषयं प्रति चिन्तयति.य: सर्वथा स्वकल्याणं प्राप्नोति।

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Class 10 Sanskrit Chapter 7 UP Board Solutions वयं भारतीयाः Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 7 Vayam Bhartiya Question Answer (कथा – नाटक कौमुदी)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 7 हिंदी अनुवाद वयं भारतीयाः के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

सभी धर्म मानव की एकता में विश्वास रखते हैं और सभी धर्मों को प्राप्तव्य भी एक है। सत्य, दया, परोपकार, शुद्धता आदि बातों का उपदेश सभी धर्मों में दिया गया है। कोई भी धर्म सदाचार और नैतिकता का विरोध नहीं करता। धर्म के मूल-तत्त्व को न समझने वाले ही विरोध और द्वेष को जन्म देते हैं। भारत तो “वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना में विश्वास रखता है। हम सभी को यह समझना चाहिए कि हम हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई बाद में हैं, (UPBoardSolutions.com) सर्वप्रथम हम भारतीय हैं। प्रस्तुत नाटक बड़े रोचक ढंग से ‘राष्ट्रीय एकता’ के सन्देश का उद्घोष करते हुए वर्ण-सम्प्रदाय के भेदभाव को मिटाकर एक होकर रहने की प्रेरणा देता है। इसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी धर्मों के पात्र हैं, जिनमें प्रारम्भ में साम्प्रदायिक भेदभाव की भावना व्याप्त है, किन्तु अन्त में सभी एक होकर भाईचारे एवं सद्भाव से रहने का संकल्प लेते हैं।

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पाठ-सारांश

अध्यापक का कक्षा में प्रवेश – नाटक का प्रारम्भ कक्षा में अध्यापक के प्रवेश से होता है। अध्यापक के कक्षा में पहुंचने पर सभी छात्र उनके सम्मान में उठ खड़े होते हैं। तत्पश्चात् अध्यापक़ महोदय सामान्य ज्ञान सम्बन्धी प्रश्न पूछने के लिए कहकर आफताब से गौतम बुद्ध के चरित्र के विषय में प्रश्न पूछते हैं।

आफताब द्वारा उत्तर देना – आफताब उत्तर देता है कि महात्मा बुद्ध बचपन से ही चिन्तनशील और परम दयालु थे। वे सदैव संसार को दु:खों से मुक्त कराने की सोचा करते थे। महात्मा बुद्ध ने सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि का मनुष्यों को उपदेश दिया और समाज में व्याप्त धार्मिक पाखण्डों का खुलकर खण्डन किया।

अध्यापक का जसबिन्दर एवं दीपक से प्रश्न पूछना – इसके बाद अध्यापक जसबिन्दर से ईसा मसीह के उपदेशों के विषय में पूछते हैं। जसबिन्दर उत्तर देता है कि ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसा मसीह ने। दु:खियों के दु:खों को दूर करने, निर्धनों का कल्याण करने और रोगियों की (UPBoardSolutions.com) पीड़ा हरने के लिए संसार को उपदेश दिया। मानव-सेवा के द्वारा ही ईश्वर का साक्षात्कार किया जा सकता है, यही उनके उपदेश का मूल सार है। तत्पश्चात् अध्यापक ने दीपक से गुरु गोविन्द सिंह के विषय में प्रश्न किया।

‘दीपक सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविन्द सिंह के विषय में बताता हुआ कहता है कि गुरु गोविन्द सिंह ने जन्मभूमि की रक्षा के लिए, देशभक्ति की भावना से आत्मोत्सर्ग कर दिया।

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मध्यावकाश में सबका भोजन करना – इसके बाद मध्यावकाश हो जाता है और सभी छात्र एक स्थान पर बैठकर खाना खाते हैं। दीपक कहीं चला जाता है और जसबिन्दर कहता है कि उसके पास भोजन के लिए कुछ भी नहीं है। पीटर अपना भोजन जसबिन्दर को दे देता है। कुछ दिनों के बाद बातचीत के दौरान जसबिन्दर के यह कहने पर कि उसके पास परीक्षा-फीस जमा करने के लिए पैसे नहीं हैं, पीटर उसका परीक्षा शुल्क भी जमा करता है।

आफताब का दीपक को रक्त देना – कुछ दिनों के बाद दीपक पर बम फेंका जाता है। घायलावस्था में चिरंजीव चिकित्सालय में वह मृत्यु से संघर्ष कर रहा होता है। उसके जीवन की रक्षा के लिए रक्त की। आवश्यकता है। दीपक के वर्ग का रक्त न तो अस्पताल से मिल पाता है और न ही उसके घर के किसी सदस्य से। ऐसी विषम परिस्थिति में आफताब स्वेच्छया अपने रक्त का परीक्षण कराता है। उसका रक्त दीपक के रक्त से मिल जाता है और वह रक्तदान करके उसकी प्राणरक्षा करता है।

सद्भाव का उदय – दीपक जो कभी जातिगत भेदभाव में विश्वास करता था, इस दुर्घटना से उसकी आँखें खुल जाती हैं और वह सभी भेदभाव भुलाकर सबको भाई के समान मानने लगता है। सभी लोग ईद, होली इत्यादि त्योहार परस्पर मिलकर बड़े सौहार्द के साथ मनाते हैं। दीपक के पिता के इस सन्देश के साथ नाटक का पटाक्षेप हो जाता है कि विभिन्न धर्मों के मार्ग भिन्न-भिन्न हैं, किन्तु सभी का गन्तव्य एक ही है। सबकी शिराओं में एक समान रक्त (UPBoardSolutions.com) प्रवाहित है। ईश्वर सभी व्यक्तियों के हृदय में निवास करता है।

प्रमुख कथ्य – इस नाटक को प्रमुख कथ्य जात-पाँत के भेदभाव को समाप्त कर मानवीय धर्म की स्थापना करना है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ही नाटक में दीपक को आरम्भ में जात-पाँत का पोषक दिखाया गया है, किन्तु दुर्घटनाग्रस्त होने पर जब आफताब अपने रक्तदान द्वारा उसकी प्राणरक्षा करता है तो उसकी विचारधारा में परिवर्तन हो जाता है और वह सर्वधर्म समभाव में अपनी आस्था व्यक्त करती है।

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चरित्र-चित्रण

आफताब [2009, 10, 14]

परिचय आफताब मुस्लिम छात्र है, किन्तु उसमें धार्मिक कट्टरता नहीं है। उसका दृष्टिकोण बड़ा व्यापक है। वह सभी धर्मों को एकसमान मानने वाली है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. राष्ट्रीय एकता का पोषक – आफताब में जाति-पाँति की भावना लेशमात्र भी नहीं है, उसके हृदय में तो सर्वधर्म समभाव की पवित्र विचारधारा प्रवहमान है। अपने धर्म के अतिरिक्त उसे अन्य धर्मों का भी पर्याप्त ज्ञान है। अध्यापक के पूछने पर वह महात्मा बुद्ध के प्रमुख उपदेशों का उल्लेख करता है। अन्य धर्म का होते हुए भी वह दीपक को अपना रक्त देकर उसकी प्राणरक्षा करता है तथा होली के अवसर पर वह दीपक के घर जाता है।

2. श्रेष्ठ मित्र – आफताब सच्चा मित्र है। उसकी सच्ची मित्रता का उद्घाटन उस समय होता है, जब उसे ज्ञात होता है कि दीपक बम विस्फोट में घायल हो गया है। वह उसे देखने के लिए व्याकुल हो जाता है और चिकित्सालय जाकर रक्तदान करके अपने मित्र दीपक (UPBoardSolutions.com) की प्राणरक्षा करता है। इदानीं प्राणानां मोहः नैव कर्तव्यः।” उसके इस वाक्य से उसकी निश्छल मैत्री की पवित्र धारा निस्सृत हुई प्रतीत होती है।

3. उदारमना – सम्पूर्ण नाट्यांश में आफताब को उदारमना छात्र के रूप में चित्रित किया गया है। सर्वप्रथम वह भूखे जसबिन्दर को सान्त्वना देता हुआ दिखाई देता है, फिर चिकित्सालय में दीपक के माता-पिता को ढाढ़स बँधाता हुआ और दीपक के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता हुआ दिखलाई पड़ता है। वह होली के अवसर पर दीपक के घर जाकर होली की बधाई भी देता है। यह सब क्रिया-कलाप उसकी उदारता का स्वयं व्याख्यान करते प्रतीत होते हैं।

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4. बुद्धिमान् – आफताब बुद्धिमान् छात्र है। महात्मा गौतम बुद्ध के विषय में अध्यापक द्वारा पूछने पर वह सन्तोषजनक उत्तर देता है। सच्ची मित्रता के विषय में दीपक के पिता से कहे गये उसके शब्द तथा होलिकोत्सव पर ईद तथा होली के महत्त्व पर उसके द्वारा डाला गया प्रकाश उसके बुद्धिमान् होने की पुष्टि करते हैं।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि आफताब सभी मानवीय गुणों से समन्वित, राष्ट्रीय एकता का पोषक, उदारवादी छात्र है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रोन्नति के लिए आफताब जैसे नवयुवकों की देश को महती आवश्यकता है।

दीपक [2008, 10, 11, 14, 15]

परिचय दीपक एक हिन्दू छात्र है। गुरु गोविन्द सिंह के गुणों से प्रभावित होते हुए भी उसमें जातिवाद की भावना विद्यमान है। उसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. जातिवाद का पोषक – यद्यपि दीपक सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविन्द सिंह से अत्यधिक प्रभावित है, तथापि उसके हृदय में गोविन्द सिंह के उपदेशों की मानवीय सेवा-भावना विद्यमान नहीं है। वह हिन्दू, मुसलमान को पृथक्-पृथक् रखकर देखता है। मध्यावकाश (UPBoardSolutions.com) में आफताब के साथ बैठकर भोजन न करके वह अपनी जातिगत भावना को सार्वजनिक कर देता है।

2. परिवर्तित विचारधारा वाला – दीपक प्रारम्भ में संकीर्ण जातिगत भावना का पोषक प्रतीत होता है, किन्तु आफताब द्वारा अपनी प्राणरक्षा किये जाने पर उसकी विचारधारा परिवर्तित हो जाती है और वह जातिवाद की संकीर्ण भावना से ऊपर उठकर सभी धर्मों को एक समान मानने लगता है। कभी वह आफताब के साथ बैठकर भोजन नहीं करना चाहता था, किन्तु कालान्तर में वह उसका आलिंगन करता है, ईद के त्योहार पर उसके घर जाकर उसे ईद की बधाई देता है और होली के त्योहार पर आफताब को अपने घर बुलाकर उसका पर्याप्त आदर-सत्कार करता है।

3. शिष्टाचारी – यद्यपि दीपक में जाति-पाँति की हीन भावना विद्यमान है, किन्तु वह अशिष्ट नहीं है। वह किसी के साथ अशिष्टता का व्यवहार नहीं करता। घायलावस्था में भी उठकर वह आफताब का स्वागत करता है। आफताब के रक्तदान द्वारा स्वस्थ होने पर आफताब को साधुवाद देता हुआ वह उसे सच्चा मित्र मान लेता है। होली के अवसर पर अपने घर पर वह आफताब का जोरदार स्वागत करता है।

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4. बुद्धिमान् – दीपक बुद्धिमान् छात्र है। उसे सभी धर्मों का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त है। कक्षा में अध्यापक जी द्वारा पूछने पर वह गुरु गोविन्द सिंह के आत्मोत्सर्ग पर प्रकाश डालता है तथा ईद के अवसर पर आफताब के यहाँ अपने मित्रों के मध्य वह ईद के महत्त्व को बताता हुआ भाईचारे का सन्देश देता है।

प्रस्तुत नाट्यांश में दीपक की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। उसके माध्यम से यह दर्शाने का प्रयत्न किया गया है कि जातिवाद जैसी संकीर्ण मान्यताओं के द्वारा न तो व्यक्ति का कोई उपकार हो सकता है और न ही राष्ट्र का। हमें जातिगत भेदभाव भुलाकर प्रेम से रहना चाहिए, यह सन्देश (UPBoardSolutions.com) भी उसी के माध्यम से सभी लोगों तक पहुँचता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रामः कस्य पुत्रः आसीत्? (2015)
उत्तर :
रामः दशरथस्य पुत्रः आसीत्।

प्रश्न 2.
जनाः दशरथपुत्रं रामं कस्य प्रतीकं मन्यन्ते? (2015)
उत्तर :
जनाः दशरथपुत्रं रामं धर्मस्य मर्यादायाः त्यागस्य च प्रतीकं मन्यन्ते।

प्रश्न 3.
विजयादशमी महोत्सवः किं शिक्षयति?
उत्तर :
विजयादशमी महोत्सव: शिक्षयति यत् सदा धर्मस्य विजय: अधर्मस्य च पराजयः भवति।

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प्रश्न 4.
गुरुगोविन्दसिंहः किमर्थं पूज्यः? [2009, 11, 14]
उत्तर :
गुरुगोविन्दसिंह: जन्मभूमेः रक्षार्थं देशभक्तिभावनया आत्मोत्सर्गम् अकरोत्, अत: पूज्यः।

प्रश्न 5.
ईसामसीहः मानवान् किमुपादिशत्?
उत्तर :
ईसीमसीह: आर्तजनानाम् आर्तिहरणाय, (UPBoardSolutions.com) निर्धनजनानां कल्याणाय, रोग-पीडितानां च परित्राणाय उपादिशत्।

प्रश्न 6.
ईदमहोत्सवे जनाः परस्परं किं कुर्वन्ति? [2006]
उत्तर :
ईदमहोत्सवे जनाः द्वेषभावं विहाय परस्परम् आलिङ्गन्ति।

प्रश्न 7.
सन्मित्रलक्षणं किमस्ति? [2008,09, 10, 15]
उत्तर :
सन्मित्रम् आपद्गतं न जहाति तथा काले साहाय्यं करोति।

प्रश्न 8.
आफताबः दीपकस्य जीवनरक्षार्थं किमकरोत्?
उत्तर :
आफताबः दीपकस्य जीवनरक्षार्थं रक्तदानम् अकरोत्।

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प्रश्न 9.
स्वस्थे सति दीपकः आफताब किम अकथयत्? (2015)
उत्तर :
स्वस्थे सति दीपक: आफताबस्य आचरणं श्लाघयित्वा (UPBoardSolutions.com) साधुवादम् अकथयत्, स्वकीयं सन्मित्रं च अमन्यत्।

प्रश्न 10.
गुरुः गोविन्दसिंहः कः आसीत्
उत्तर :
गुरुः गोविन्दसिंह: सिखानां दशमो गुरुः आसीत्।

प्रश्न 11.
जसविन्दरः किं कथयित्वा रोदिति?
उत्तर :
“मम पाश्वें भोजनाय किञ्चिद् अपि न अस्ति। अहं निर्धनः क्षुत्प्रतीडितः अस्ति।” इति कथयित्वा रोदिति।

प्रश्न 12.
दीपकाय स्वरक्तं कः दत्तवान्?
उत्तर :
दीपकाय स्वरक्तम् आफताब: दत्तवान्।

प्रश्न 13.
कस्य गृहे ईदमहोत्सवः आसीत्?
उत्तर :
आफताबस्य गृहे ईदमहोत्सवः आसीत्।

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प्रश्न 14.
आफताबः होलिकायाः साधुवादं दातुं कस्य गृहं गच्छति?
उत्तर :
आफताब: होलिकायाः साधुवादं दातुं (UPBoardSolutions.com) दीपकस्य गृहं गच्छति।

प्रश्न 15.
ईश्वरः कुत्र तिष्ठति?
उत्तर :
ईश्वरः सर्वभूतानां हृदये तिष्ठति।

प्रश्न 16.
ईदमहोत्सवं जनेषु किं वर्धयति? [2014]
उत्तर :
ईदमहोत्सवं जनेषु भ्रातृभावं वर्धयति।

प्रश्न 17.
होलिकोत्सवः जनेषु किं किं जनयति? [2014]
उत्तर :
होलिकोत्सवः जनेषु प्रेमभावं सद्भावं च जनयति।

बहुविकल्पीय प्रश्न

अधोलिखित प्रश्नों में प्रत्येक प्रश्न के उत्तर-रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। इनमें से एक विकल्प शुद्ध है। शुद्ध विकल्प का चयन कर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए –
[संकेत – काले अक्षरों में छपे शब्द शुद्ध विकल्प हैं।]

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1. ‘वयं भारतीयः’ नामक पाठ की मूल भावना कौन-सी नहीं है?

(क) राष्ट्रीय एकता
(ख) सम्प्रदायवाद
(ग) धार्मिक एकता।
(घ) सर्वधर्म समन्वय

2. पंचशील सिद्धान्त का उपदेश किसने दिया?

(क) गौतम बुद्धने
(ख) श्रीराम ने
(ग) ईसा मसीह ने
(घ) गुरु गोविन्द सिंह ने

3. पंचशील सिद्धान्त में क्या सम्मिलित नहीं किया गया है?

(क) अपरिग्रह
(ख) ब्रह्मचर्य
(ग) अहिंसा
(घ) सर्वधर्म समभाव

4. “विरोधो विरोधं जनयति।”वाक्यस्य वक्ताः कः अस्ति?

(क) पीटरः
(ख) आफताबः
(ग) जसविन्दरः
(घ) दीपकः

5. देशभक्ति की भावना से किसने आत्मोत्सर्ग किया?

(क) मुहम्मद साहब ने
(ख) गुरु गोविन्दसिंह ने
(ग) बुद्ध ने
(घ) ईसा मसीह ने

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6. “अहं तव परीक्षाशुल्कं दास्यामि।” में ‘तव’ शब्द किसके लिए प्रयुक्त है?

(क) पीटर’ के लिए।
(ख) “आफताब’ के लिए
(ग) ‘दीपक’ के लिए
(घ) ‘जसबिन्दर’ के लिए

7. “धैर्यं न त्याज्यं विधुरेऽपि काले।” वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?

(क) आफताबः
(ख) जसविन्दरः
(ग) पीटरः
(घ) अध्यापकः

8. “त्वं वस्तुतः मम सन्मित्रमसि।”कथन में ‘मम’ से संकेतित व्यक्ति कौन है?

(क) आफताब
(ख) दीपक
(ग) पीटर
(घ) जसविन्दर

9. “ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में रहता है।” यह उपदेश किस ग्रन्थ से उधृत है?

(क) ‘रामायण’ से
(ख) ऋग्वेद’ से
(ग) ‘गीता’ से
(घ) ‘महाभारत’

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10. सेईदमहोत्सवे जनाः …………….. ।”वाक्य में रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी [2005,08,09]

(क) न्यूनं खादन्ति’ से
(ख) ‘शोभनभावनया परस्परमालिङ्गन्ति’ से
(ग) “कोलाहलं कुर्वन्ति’ से
(घ) मौनं भवन्ति’ से

11. “परीक्षाशुल्कप्रदानाय मम पाश्र्वे …………….. नास्ति।” वाक्य में रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी –

(क) फलं’ से
(ख) ‘अनं’ से
(ग) “पुस्तकं’ से
(घ) “भोजनं’ से

12. ………………….. ब्राल्यादेवअतिचिन्तनशीलः, परमकारुणिकश्चासीद्?”कथन किससे सम्बन्धित है?

(क) महात्मा बुद्धः
(ख) महाराणा प्रतापः
(ग) गुरुगोविन्दसिंह:
(घ) ईसामसीहः

13. “सिखधर्मस्य दशमो गुरुः ………………. आसीत्।”वाक्य में रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी

(क) “गुरुनानकः’ से
(ख) “गुरुरामदासः’ से
(ग) “गुरुतेगबहादुरः’ से
(घ) “गुरुगोविन्दसिंहः’ से

14. “किमिदम्। हन्त दीपकोपरि बम्बप्रक्षेपः।” वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?

(क) अध्यापकः
(ख) पीटरः
(ग) जसबिन्दरः
(घ) आफताबः

15. “आफताबः होलिकायाः साधुवादं दातुं : गृहं गच्छति।” में रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए उचित पद है –

(क) जसबिन्दरस्य
(ख) अध्यापकस्य
(ग) दीपकस्य
(घ) पीटरस्य।

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16. “संसारस्य सर्वेऽपि मानवाः समानाः।” वाक्यस्य वक्ताः कस्य पिता अस्ति –

(क) आफताबस्य
(ख) दीपकस्य
(ग) जसबिन्दरस्य
(घ) पीटरस्य

17. दीपकस्य जीवनरक्षा ……………… अकरोत्। [2009,10]

(क) जसविन्दरः
(ख) दीपकस्य पिता
(ग) आफताबः
(घ) रमेन्द्रः

Hope given UP Board Solutions for Class 10 Sanskrit Chapter 7 are helpful to complete your homework.
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