Class 10 Sanskrit Chapter 10 UP Board Solutions उपनिषत – सुधा Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 10 Upnishat – Sudha Question Answer (पद्य – पीयूषम्)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 10 हिंदी अनुवाद उपनिषत – सुधा के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

भारतवर्ष के वेद निर्विवाद रूप से विश्व-वाङमय में सर्वाधिक प्राचीन हैं। इन्हें अपौरुषेय और नित्य माना जाता है। यही कारण है कि इनके रचना-काल-निर्धारण के सन्दर्भ में भारतीय विचारक मौन हैं। सम्पूर्ण वैदिक वाङ्मय चार भागों-संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक् और उपनिषद् में विभक्त हैं। इनमें संहिता भाग स्तुति-प्रधान, ब्राह्मण भाग यज्ञादि-कर्मकाण्ड-प्रधान, आरण्यक भाग उपासना-प्रधान और उपनिषद्-भाग ज्ञान-प्रधान हैं। इसीलिए (UPBoardSolutions.com) उपनिषदों को वेद का ज्ञानकाण्ड तथा वेद का अन्तिम भाग होने के कारण वेदान्त भी कहते हैं। उपनिषदों में जिस परम ज्ञानात्मक विद्या का प्रतिपादन किया गया है, उसे ब्रह्म विद्या या आत्म विद्या भी कहा जाता है। उपनिषदों की संख्या यद्यपि शताधिक है, किन्तु इन एकादश-ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, श्वेताश्वतर, छान्दोग्य और बृहदारण्यक-उपनिषदों को अत्यधिक प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है। इनमें से कुछ उपनिषद् गद्य में हैं, कुछ पद्य में और कुछ गद्य-पद्य दोनों में ही निबद्ध हैं।
प्रस्तुत पाठ में दिये गये मन्त्र कुछ प्रसिद्ध उपनिषदों से संगृहीत किये गये हैं।

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पाठ-सारांश

वैदिक ज्ञान की पात्रता जिस पुरुष के हृदय में परमात्मा और अपने गुरु के प्रति उच्चकोटि की भक्ति होती है, वही उपनिषदों के ज्ञानपरक सिद्धान्तों को समझ पाता है। मोक्ष-प्राप्ति का इच्छुक मैं; आदिपुरुष; उस परमात्मा की शरण को प्राप्त करता हूँ, जो सृष्टिकर्ता ब्रह्मा को रचकर उसे वेदों का ज्ञान प्रदान करते हैं।

सम्बन्ध और मोक्ष का कारण मन दो प्रकार का होता है-कामनाओं से पूर्ण अशुद्ध मन और कामनाओं से रहित शुद्ध मन। यह मन ही मनुष्यों के बन्धन-मोक्ष का कारण है। विषयों में लिप्त अशुद्ध मन सांसारिक दु:खों में फँसाता है और वासनाओं से रहित शुद्ध मन मुक्ति प्रदान कराता है।

शुद्ध स्वरूप सत्य रूप परमात्मा पर चमकदार एवं सुनहरे सूर्य के मण्डल का पर्दा पड़ा है, उसके हट जाने पर चैतन्यस्वरूप शुद्ध ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है। जो ज्ञानी पुरुष उस शुद्ध ब्रह्म का अपनी आत्मा से ही साक्षात् दर्शन करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

जगन्नियन्ता सूर्य, चन्द्र, तारे और लौकिक अग्निसहित सम्पूर्ण संसार उसी परमात्मा के दिव्य प्रकाश (UPBoardSolutions.com) से प्रकाशमान हैं। वह परमात्मा अग्नि, जल, सम्पूर्ण जगत्, ओषधियों और वनस्पतियों में व्याप्त है। उसी सर्वशक्तिमान, परमात्मा के भय से ही अग्नि और सूर्य उष्णता धारण करते हैं और उसी परमात्मा के आदेश से इन्द्र, वायु, यम और सभी लोकपाल नियमित रूप से अपने-अपने काम पूरे करते हैं।

निराकार और अज्ञेय वह सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापी ब्रह्म पैररहित होकर भी शीघ्र चलने वाला, हाथरहित होकर भी वस्तुओं को पकड़ने वाला, आँखरहित होकर भी देखने वाला और कर्णरहित होकर भी सब कुछ सुनने वाला है। वह जानने योग्य सभी कुछ जानता है, परन्तु उसे कोई नहीं जानता।

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सृष्टिकर्ता जलती हुई अग्नि से हजारों चिंगारियों के उत्पन्न होने के समान ही अविनाशी ब्रह्म से यह समस्त दृश्य जगत् उत्पन्न होता है।

परमपद की प्राप्ति ब्रह्मज्ञानी पुरुष अपने नाम और रूप के अस्तित्व रूपी अभिमान को छोड़कर उस दिव्य पुरुष में उसी प्रकार विलीन हो जाता है; जैसे-नदियाँ समुद्र में। ब्रह्मज्ञानी सबमें अपने को और अपने में सबको देखता है। अपने हृदय से कामनाओं के छूट जाने पर वह मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।

परम ज्ञानी की स्थिति उपनिषद् के ज्ञान को जानने वाला अर्थात् परम ज्ञानी (UPBoardSolutions.com) (ब्रह्मज्ञानी) अपनी स्थिति को व्यक्त करते हुए कहता है, “मैं अज्ञानरूपी अन्धकार से परे, सूर्य के समान वर्ण वाले, स्वयं प्रकाशस्वरूप इस महान् पुरुष को जानता हूँ।” ब्रह्म के इसी रूप का ज्ञान प्राप्त कर ज्ञानी पुरुष उस लोक में पहुँच जाता है, जहाँ पहुँचने पर मृत्यु का भय नहीं रह जाता। ज्ञान के अतिरिक्त उस परम पद की प्राप्ति के लिए अन्य कोई मार्ग नहीं है।

पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1)
यस्य देवे पराभक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ॥ (2008, 13, 14]

शब्दार्थ यस्य = जिस (मनुष्य) की। देवे = परमात्मा में। पराभक्तिः = उच्चकोटि की भक्ति। यथा = जैसी (भक्ति) तथा = वैसी। गुरौ = गुरु में। तस्य = उस (मनुष्य) की। एते = ये (उपनिषद्)। कथिताः = कहे गये। अर्थाः = अर्थ। प्रकाशन्ते = प्रकट हो जाते हैं। महात्मनः = महान् आत्मा वाले पुरुष के लिए।

सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ (UPBoardSolutions.com) के ‘उपनिषत्सुधा’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में भगवद्भक्ति और गुरुभक्ति की महिमा का वर्णन किया गया है अन्वये यस्य (पुरुषस्य) देवे परा भक्तिः (अस्ति), यथा देवे तथा गुरौ (अपि भक्तिः अस्ति), तस्य महात्मनः (हृदये) हि (उपनिषत्सु) कथिताः एते अर्थाः प्रकाशन्ते।

व्याख्या जिस पुरुष की परमात्मा में उच्चकोटि की भक्ति है, जैसी भक्ति परमात्मा में है, वैसी भक्ति अपने गुरुदेव में भी है, उस महान् अन्त:करण वाले पुरुष के हृदय में उ उषदों में वर्णित आत्मज्ञान सम्बन्धी ये सिद्धान्त (स्वत:) प्रकाशित हो जाते हैं। तात्पर्य यह (UPBoardSolutions.com) है कि आत्मज्ञान सम्बन्धी सिद्धान्तों को साक्षात् अनुभव
होने लगता है। =

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(2)
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं, यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ।
तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं, मुमुक्षुर्वे शरणमहं प्रपद्ये ॥

शब्दार्थ यः = जो (परमात्मा ब्रह्माणं = ब्रह्म को। विदधाति = उत्पन्न करता है। पूर्वम् = सबसे पहले, सृष्टि – के प्रारम्भ में। वेदान् =चारों वेदों को, वेदों के ज्ञान को। प्रहिणोति = भेजता है, प्रदान करता है। तस्मै = उसके लिए। देवं = उसी परमात्मा को। आत्मबुद्धिप्रकाशम् = आत्मज्ञान को प्रकाशित करने वाले मुमुक्षुः = मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले। शरणम् = आश्रय के रूप में। प्रपद्ये = प्राप्त करता हूँ।

प्रसंग प्रस्तुत मन्त्र में परमेश्वर को जानने और प्राप्त करने के लिए उन्हीं की शरण प्राप्त करने को कहा गया है।

अन्वय यः (परमात्मा) पूर्वं ब्रह्माणं विदधाति, यः च वै तस्मै (ब्रह्माणे) वेदान् प्रहिणोति, (UPBoardSolutions.com) तं ह आत्मबुद्धिप्रकाशं देवं मुमुक्षुः अहं वै शरणं प्रपद्ये।।

व्याख्या जो परमात्मा सर्वप्रथम, अर्थात् सृष्टि के प्रारम्भ में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा को रचता है और जो निश्चय ही उस ब्रह्मा के लिए वेदों के ज्ञान को भेजता है, अर्थात् प्रदान करता है, उसी आत्मज्ञान को प्रकाशित करने वाले परमात्मा की मोक्ष की इच्छा करने वाला मैं निश्चय ही उसकी शरण को प्राप्त करता हूँ।

(3)
मनो हि द्विविधं प्रोक्तं शुद्धं चाशुद्धमेव च।
अशुद्धं कामसङ्कल्पं शुद्धं कामविवर्जितम् ॥ [2008, 10, 14]

शब्दार्थ मनः = अन्तःकरण चित्ता द्विविधम् =दो प्रकार का। प्रोक्तम् = कहा गया है। शुद्धम् = पवित्र, निर्मल। अशुद्धम्= अपवित्र, मलिन। कामसङ्कल्पम् = कामनाओं और संकल्पों वाला। काम-विवर्जितम् = कामनाओं से रहित।

प्रसंग प्रस्तुत मन्त्र में मन के भेद लक्षणों सहित बताये गये हैं।

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अन्वये मनः हि द्विविधं प्रोक्तम्। शुद्धं च अशुद्धम् एव च। अशुद्धं (मनः) कामसङ्कल्पं (अस्ति), कामविवर्जितं शुद्धम् (मनः अस्ति)।

व्याख्या मन दो प्रकार का कहा गया है-शुद्ध और अशुद्ध। अशुद्ध मन कामनाओं और (UPBoardSolutions.com) संकल्पों वाला है और शुद्ध मन कामनाओं से रहित है। तात्पर्य यह है कि कामनाओं और इच्छाओं से युक्त मन अशुद्ध होता है तथा कामनाओं से रहित मन शुद्ध।

(4)
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥ [2006,07,12]

शब्दार्थ मनुष्याणां = मनुष्यों में कारणं = कारण बन्धमोक्षयोः = बन्धन और मुक्ति का। बन्धाय =बन्धन के लिए। विषयासक्तम् = इन्द्रियों के विषय; अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध; में लगा हुआ। मुक्त्यै = मुक्ति के लिए, दुःख के बन्धन से छुटकारे के लिए। निर्विषयं = विषय-वासनाओं में न फंसा हुआ। स्मृतम् = बताया गया है।

प्रसंग प्रस्तुत मन्त्र में मन को ही बन्धन और मोक्ष का कारण बताया गया है।

अन्वय मनुष्याणां बन्ध-मोक्षयोः कारणं मन एव (अस्ति)। विषयासक्तं (मनः) बन्धाय (भवति), निर्विषयं (मनः) मुक्त्यै स्मृतम्।।

व्याख्या मनुष्यों के (इतर प्राणियों के नहीं) बन्धन (संसार के दुःखों का) और मोक्ष (दु:ख के बन्धन से छुटकारा) का कारण केवल मन ही है; अर्थात् मन के अतिरिक्त दूसरा कोई कारण नहीं है। इन्द्रियों के विषयों; अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध; में रमा हुआ मन (UPBoardSolutions.com) (सांसारिक दुःख के) बन्धन के लिए होता है और विषय-वासनाओं से रहित मन सांसारिक दुःखों के) मुक्ति के लिए बताया गया है।

(5)
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥

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शब्दार्थ हिरण्मयेन = सोने जैसे चमकीले। पात्रेण = पात्र से। सत्यस्य = सूर्यमण्डल में स्थित सत्य रूप परमात्मा का। अपिहितम् = ढका हुआ है, आच्छादित। मुखम् = मुख। पूषन् = हे सूर्यदेव! अपावृणु = हटा लीजिए। सत्यधर्माय(मह्यम्) = सत्य रूप धर्म वाले मेरे लिए। दृष्टये = आत्मा का दर्शन कराने के लिए।

प्रसंग प्रस्तुत मन्त्र में मोक्षार्थी परमात्मा से सत्य का दर्शन कराने की प्रार्थना करता है।

अन्वय पूषन्! हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्य मुखम् अपिहितम्। सत्यधर्माय (मह्यम्) (आत्मनः) दृष्टये त्वं तत् अपावृणु।।

व्याख्या हे पूषन् (सूर्यदेव)! तुम्हारे मण्डल में स्थित सत्य रूप परमात्मा का मुख सोने जैसे चमकीले (सूर्यमण्डल रूप) पात्र से ढका हुआ है; अर्थात् आच्छादित है। सत्यरूप धर्म वाले मेरे लिए आत्मा का दर्शन करने हेतु आप उस (मण्डल रूप पात्र) को हटा लीजिए।

(6)
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥

शब्दार्थ एकः = अकेला, अद्वितीय वशी = समस्त संसार को अपने वश में रखने वाला। सर्वभूतान्तरात्मा = सभी प्राणियों की भीतरी आत्मा एकं रूपं = एक रूप को। बहुधा = अनेक रूपों में करोति = करता है। आत्मस्थम् = अपनी आत्मा में स्थित। अनुपश्यन्ति = देखते हैं, साक्षात् (UPBoardSolutions.com) अनुभव करते हैं। धीराः = ज्ञानी, विद्वान्। तेषां है उनके लिए। सुखं = सुख। शाश्वतम् = नित्य, सदा रहने वाला। नेतरेषाम् = अन्यों के लिए नहीं।

प्रसंग प्रस्तुत मन्त्र में परमात्मा का स्वरूप और उसके दर्शन का फल बताया गया है।

अन्वय यः सर्वभूतान्तरात्मा एकः वशी एकं रूपं बहुधा करोति। ये धीराः तम् आत्मस्थम् अनुपश्यन्ति, तेषां शाश्वतं सुखम् (भवति) इतरेषां न (भवति)।

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व्याख्या जो परमात्मा समस्त प्राणियों की भीतरी आत्मा, अद्वितीय और समस्त संसार को अपने वश में रखने वाला है, जो अपने एक रूप को अनेक रूपों में व्यक्त करता है, जो धीर पुरुष उसे अपनी आत्मा में स्थित साक्षात् अनुभव करते हैं, उनको ही सदा रहने वाला मोक्षरूप नित्य सुख मिलता है, दूसरों को नहीं मिलता।।

(7)
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ [2010, 12]

शब्दार्थ तत्र = उस परलोक में, जो परमात्मा का सर्वोच्च पद है। सूर्यः भाति = सूर्य प्रकाशित होता है। न चन्द्रतारकम् = न चन्द्रमा और तारे। नेमाः (न + इमाः) = न ही ये। विद्युतः भान्ति = बिजलियाँ चमकती हैं। कुतः = कहाँ से अयम् अग्निः = यह अग्नि तम् एव = वह हीं। भान्तम् = प्रकाशित होते हुए। अनुभाति = पीछे प्रकाशित होता है। सर्वं = सब कुछ। तस्य = उससे। भासा = प्रकाश से, दीप्ति से। सर्वम् इदम् = यह सब कुछ। विभाति = प्रकाशित होता है।

प्रसंग प्रस्तुत मन्त्र में परमात्मा को सूर्य, चन्द्रमा आदि सभी का प्रकाशक बताया गया है।

अन्वय तत्र सूर्यः न भाति, चन्द्रतारकं न (भाति), इमाः विद्युताः न भान्ति, अयम् अग्निः कुतः (UPBoardSolutions.com) (प्रकाशितः भविष्यति)। तम् एव भान्तं सर्वम् अनुभाति। तस्य भासी इदं सर्वं विभाति।।

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व्याख्या वहाँ (उस परमलोक में) सूर्य नहीं चमकता है, चन्द्रमा और तारे नहीं चमकते हैं, न ये बिजलियाँ ही चमकती हैं, यह अग्नि ही कहाँ स्वयं चमक सकती है? उसी प्रकाशित होते हुए (परमात्मा) के पीछे समस्त विश्व प्रकाशित होता है। उसकी चमक से यह सभी कुछ प्रकाशित होता है; अर्थात् ईश्वर स्वयं प्रकाशयुक्त है और उस प्रकाश के समक्ष अन्य सभी प्रकाश नगण्य हैं।

(8)
यो देवोऽग्नौ योऽप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश।।
य ओषधीषु य वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः ॥

शब्दार्थ यः = जो। देवः = परमात्मा। अग्नौ = अग्नि में। अप्सु = जल में। विश्वम् भुवनम् = समस्त लोकों में। आविवेश = प्रवेश कर गया है, व्याप्त है। ओषधीषु = जड़ी-बूटियों में। वनस्पतिषु = वृक्षों-लताओं में। तस्मै देवाय = उस देवता के लिए नमः नमः = प्रणाम है, प्रणाम है।

प्रसग प्रस्तुत मन्त्र में ईश्वर की सर्वव्यापकता बतायी गयी है और उर पुनः-पुनः प्रणाम किया गया है।

अन्वय यः देवः अग्नौ (अस्ति), यः अप्सु (अस्ति), यः विश्वं भुवनम् आविवेश। यः ओषधीषु (अस्ति), यः वनस्पतिषु (अस्ति), तस्मै देवाय नमो नमः (अस्तु)।।

व्याख्या जो ईश्वर अग्नि में है, जो जलों में है, जो समस्त लोकों में व्याप्त है, जो जड़ी-बूटियों में है, (UPBoardSolutions.com) जो वनस्पतियों में है, उस परमात्मा (देवता) को बार-बार नमस्कार हो। तात्पर्य यह कि संसार की कोई वस्तु ऐसी नहीं है, जिसमें परमात्मा का वास न हो।

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(9)
भयादस्याग्निस्तपति भयात् तपति सूर्यः
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥

शब्दार्थ भयात् = भय से। अस्य = इस (सर्वव्यापक परमात्मा) के तपति = तपता है। तपति = चमकता है, प्रकाशित होता है। मृत्युः = मृत्यु के देवता अर्थात् यमराज| धावति = दौड़ता है। पञ्चमः = पाँचवाँ।

प्रसंग प्रस्तुत मन्त्र में बताया गया है कि परमात्मा के भय से सभी इन्द्रादिक लोकपाल अपना-अपना कार्य शीघ्रतापूर्वक नियमित रूप से करते हैं।

अन्वय अस्य (परमात्मनः) भयात् अग्नि: तपति, (अस्य) भयात् सूर्यः तपति, (अस्य) भयात् इन्द्रश्च वायुः च पञ्चमः मृत्युः धावति।

व्याख्या इस सर्वव्यापक जगन्नियन्ता परमात्मा के भय से अग्नि तपती है अर्थात् उष्णता को (UPBoardSolutions.com) धारण करती है। इसके भय से सूर्य तपता है अर्थात् चमकता है। इसके भय से ही इन्द्र-वायु तथा पाँचवें मृत्यु के देवता यमराज दौड़ते हैं; अर्थात् अपना-अपना कार्य शीघ्रतापूर्वक करते हैं। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार स्वामी के भय से सेवक अपना-अपना काम नियमित रूप से करते हैं, उसी प्रकार उस नियन्ता परमात्मा के भय से सभी लोकपाल अपने-अपने काम में नियमपूर्वक प्रवृत्त होते हैं।

(10)
अपाणिपादो जवनो ग्रहीतापश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्तातमाहुरग्रयं पुरुषं महान्तम् ॥

शब्दार्थ अपाणिपादः = बिना हाथ-पैर वाला। जवनः = वेगपूर्वक चलने वाला ग्रहीता = पकड़ने वाला। पश्यति = देखता है। अचक्षुः = नेत्ररहित। शृणोति =सुनता है। अकर्णः = बिना कान वाला। वेत्ति = जानता है। वेद्यम् = जानने योग्य को। वेत्ता = जानने वाला। तं = उस। आहुः = कहते हैं। अग्रयं पुरुषं = श्रेष्ठ पुरुष।

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प्रसंग प्रस्तुत मन्त्र में निर्विकार शुद्ध चैतन्यस्वरूप ब्रह्म का निरूपण किया गया है।

अन्वय सः अपाणिपादः (अपि) जवन: ग्रहीता च (अस्ति)। (सः) अचक्षुः (सन् अपि) पश्यति, (स:) अकर्णः (अपि) शृणोति। सः वेद्यं वेत्ति, तस्य च वेत्ता न अस्ति। तम् अग्यं महान्तं पुरुषम् आहुः।।

व्याख्या वह; अर्थात् सर्वव्यापी चैतन्यस्वरूप शुद्ध परमात्मा; पैररहित होता हुआ भी शीघ्रतापूर्वक चलने वाला है, वह हाथरहित होता हुआ भी वस्तुओं को पकड़ने वाला है, वह नेत्ररहित होता हुआ भी देखता है, वह कानों से रहित होकर भी सुनता है। वह जानने योग्य को जानता है, उसका जानने वाला कोई नहीं है। तात्पर्य यह है कि वह सभी इन्द्रियों से रहित होते हुए भी सभी कार्यों को करता है। उसे सर्वप्रथम उत्पन्न हुआ और महान् आदिपुरुष कहा जाता है।

(11)
तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात् पावकाद्, विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।।
तथाक्षराद् विविधाः सौम्य भावाः, प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति

शब्दार्थ तत् एतत् सत्यम् = यह सच्चाई है, यह वास्तविकता है। यथा = जैसे। सुदीप्तात् = अच्छी तरह प्रज्वलित। पावकात् = अग्नि से। विस्फुलिङ्गाः = अग्नि-कण, चिंगारियाँ। सहस्रशः = हजारों की संख्या में। प्रभवन्ते = निकलते हैं। सरूपाः = उसी के समान रूप वाली। तथा = वैसे ही। (UPBoardSolutions.com) अक्षरात् = अविनाशी ब्रह्म से। विविधाः = विभिन्न प्रकार के सौम्य = हे प्रियदर्शन!| भावाः = पदार्थ। प्रजायन्ते = उत्पन्न होते हैं। तत्र च एव = और उसमें ही। अपियन्ति = विलीन हो जाते हैं।

प्रसंग प्रस्तुत मन्त्र में अविनाशी ब्रह्म से संसार की उत्पत्ति का वर्णन दृष्टान्तसहित किया गया है।

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अन्वय सौम्य! तत् एतत् सत्यं यथा सुदीप्तात् पावकात् सरूपाः सहस्रशः विस्फुलिङ्गाः प्रभवन्ते, तथा अक्षरात् विविधाः भावाः प्रजायन्ते, तत्र च एव अपियन्ति।।

व्याख्या हे प्रियदर्शन! यह सत्य है कि जिस प्रकार अच्छी तरह ये जली हुई अग्नि से उसी के समान रूप वाली हजारों अग्नि की चिंगारियाँ निकलती हैं, उसी प्रकार अविनाश ब्रह्म से अनेक प्रकार के अस्तित्व वाले पदार्थ उत्पन्न होते हैं और उसी में विलीन हो जाते हैं।

(12)
यथा नद्यः स्यन्दमाना समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय
तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ [2013]

शब्दार्थ यथा = जैसे। नद्यः = नदियाँ। स्यन्दमानः = बहती हुई। समुद्रे = समुद्र में। अस्तं गच्छन्ति = विलीन हो जाती हैं। नामरूपे = नाम और रूप को। विहाय = छोड़कर तथा = वैसे ही। विद्वान् = ब्रह्मज्ञानी, आत्मज्ञानी। नामरूपाद् विमुक्तः = नाम और रूप से छूटा हुआ। (UPBoardSolutions.com) परात्परम् = श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ। पुरुषं = पुरुष को। उपैति = प्राप्त कर लेता है। दिव्यं = दिव्य

प्रसंगे प्रस्तुत मन्त्र में ब्रह्मवेत्ता विद्वान् द्वारा अविनाशी ब्रह्म की प्राप्ति का दृष्टान्तसहित वर्णन किया गया है।

अन्वय यथा स्यन्दमाना: नद्यः नामरूपे विहाय समुद्रे अस्तं गच्छन्ति, तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं दिव्यं पुरुषम् उपैति।

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व्याख्या जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपने नाम और रूप को छोड़कर समुद्र में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार ब्रह्मज्ञानी विद्वान् अपने नाम और रूप से विमुक्त होकर श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ दिव्य पुरुष को प्राप्त करता है अर्थात् परमात्मा में विलीन हो जाता है।

(13)
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥

शब्दार्थ यस्तु (यः + तु) = और जो। सर्वाणि भूतानि = सभी प्राणियों को। आत्मनि एव = आत्मा में ही। अनुपश्यति = देखता है। सर्वभूतेषु = सभी प्राणियों में। च आत्मानं = और स्वयं को। ततः = उन सबसे। विजुगुप्सते = घृणा करता है।

प्रसंग प्रस्तुत मन्त्र में ब्रह्मज्ञानी महापुरुष की स्थिति का वर्णन किया गया है।

अन्वय य: तु सर्वाणि भूतानि आत्मनि एव अनुपश्यति, आत्मानं च सर्वभूतेषु (पश्यति), (स:) ततः न विजुगुप्सते।।

व्याख्या जो (ब्रह्मज्ञानी पुरुष) सभी प्राणियों को अपनी आत्मा में ही देखता है और अपनी आत्मा को सभी प्राणियों में देखता है, वह उससे घृणा नहीं करता है। तात्पर्य यह है कि जो आत्मा मुझमें है वही आत्मा दूसरे में भी है और जो आत्मा दूसरे में है वही मुझमें भी है; (UPBoardSolutions.com) अर्थात् मुझमें और अन्य में भेद नहीं है। यह रहस्य ब्रह्मज्ञानी जान लेता है, इसलिए वह किसी से घृणा नहीं करता।

(14)
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।
अथ मत्र्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ [2010]

शब्दार्थ यदा = जब। सर्वे = सभी (इच्छाएँ)। प्रमुच्यन्ते = छूट जाती हैं। कामाः = इच्छाएँ, कामनाएँ। ये = जो। अस्य = इसके अर्थात् मरणशील मनुष्य के। हृदि = हृदय में। श्रिताः = आश्रित। अथ = तबे, इसके बाद। मर्त्यः = मरणशील भी। अमृतेः भवति = अमर हो जाता है। अत्र = यहाँ, इस स्थिति में। समश्नुते = प्राप्त करता है, भली-भाँति अनुभव कर लेता है।

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प्रसंग प्रस्तुत मन्त्र में ब्रह्म की उपलब्धि के श्रेष्ठ साधन का वर्णन किया गया है।

अन्वय यदा सर्वे कामाः, ये अस्य हृदि श्रिताः (सन्ति), प्रमुच्यन्ते। अथ मर्त्यः अमृतः भवति। अत्र ब्रह्म समश्नुते।

व्याख्या जब सभी कामनाएँ, जो इसके अर्थात् ब्रह्मज्ञानी के हृदय में आश्रित हैं, छूट जाती हैं, अर्थात् ब्रह्मज्ञानी के हृदय की सभी इच्छाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब मनुष्य अमृत (न मरने वाला) हो जाता है। इस स्थिति में वह ब्रह्म का भली-भाँति अनुभव कर लेता है।

(15)
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥

शब्दार्थ वेद= जानता हूँ। अहं = मैं। एतं = इस पुरुषं महान्तं = महापुरुष को। आदित्यवर्णम् = सूर्य के समान वर्ण वाले, स्वयं प्रकाशस्वरूप। तमसः = अज्ञानरूपी अन्धकार से। परस्तात् = परे। तम् एव = उसको ही। विदित्वा = जानकर) अति मृत्युम् एति = मृत्यु का अतिक्रमण कर जाता है, पार कर जाता है। न = नहीं है। अन्यः = दूसरा| पन्थाः = मार्ग। विद्यते = विद्यमान अयनाय = जाने के लिए, परम पद पर पहुँचने के लिए।

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प्रसंग प्रस्तुत मन्त्र में ब्रह्मज्ञानी पुरुष के स्वानुभव का वर्णन किया गया है।

अन्वय अहम् तमसः परस्तात् आदित्यवर्णम् एतं महान्तं पुरुषं ६, तम् एव विदित्वा मृत्युम् अति एति। अयनाय अन्यः पन्थाः न विद्यते।

व्याख्या मैं (ब्रह्मज्ञानी) अज्ञानरूपी अन्धकार से परे सूर्य के समान वर्ण वाले अर्थात् स्वयं प्रकाशस्वरूप इस महान् पुरुष को जानता हूँ। उसी को जानकर ज्ञानी पुरुष मृत्यु को पार कर जाता है अर्थात् उस लोक में पहुँच जाता है, जहाँ मृत्यु नहीं है। (परमपद पर) (UPBoardSolutions.com) जाने के लिए अन्य कोई दूसरा मार्ग नहीं है। तात्पर्य यह है कि ज्ञानी लोग उस स्वयं प्रकाशस्वरूप ब्रह्म को जानकर ही मृत्यु को पारकर उस लोक में पहुँच जाते हैं, जहाँ मृत्यु होती ही नहीं। मुक्ति पाने का ब्रह्मज्ञान के अतिरिक्त दूसरा कोई मार्ग ही नहीं है।

सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1) यथा देवे तथा गुरौ। [2008, 10, 11, 12, 13, 15)

सन्दर्भ
यह सूक्तिपरक पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘उपनिषत्-सुधा’ नामक पाठ से उद्धृत है।।

[ संकेत इस पाठ की शेष सभी सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा। ]

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प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में भगवद्भक्ति और गुरुभक्ति की महिमा का वर्णन किया गया है।

अर्थ जैसी भक्ति परमात्मा में हो वैसी ही गुरु में भी होनी चाहिए।

व्याख्या भगवान् में उच्चकोटि की भक्ति रखने वाले ज्ञानी पुरुष की यदि भगवान् (UPBoardSolutions.com) के समान ही उच्चकोटि की भक्ति गुरु में भी हो तो वेदों और उपनिषदों का ज्ञान उसे स्वयं ही स्वाभाविक रूप से हो जाता है। तात्पर्य यह है कि देवता के तुल्य गुरु में भी श्रद्धा रखें बिना ज्ञान की प्राप्ति सम्भव नहीं है। इसीलिए सन्त कबीर गुरु को देवता से भी श्रेष्ठ मानते हुए कहते हैं

गुरु गोबिन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोबिन्द दियो बताय॥

(2), अशुद्धं कामसङ्कल्पम्।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में मन के एक प्रकार का उल्लेख किया गया है।

अर्थ कामनाओं से युक्त मन अशुद्ध होता है।

व्याख्या शास्त्रकारों ने दो प्रकार के मन बताये हैं-शुद्ध और अशुद्ध। कामनाओं से रहित मन को शुद्ध और कामनाओं से युक्त मन को अशुद्ध बताया गया है। यहाँ पर मन से आशय मानसिक स्थिति के साथ-साथ हृदय से भी है। सामान्य अनुभव के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि जब कोई भी सामग्री किसी पात्र में भरकर रख दी जाती है तो उसके दूषित हो जाने की सम्भावना बन जाती है। दूषित होने की यह प्रक्रिया एक मास में हो सकती है, एक वर्ष में भी और दस वर्ष में भी। आशय यह है कि संगृहीत अर्थात् रखी हुई का एक-न-एक दिन दूषित होना अवश्यम्भावी है। इसीलिए कामनाओं और इच्छाओं से युक्त मन को अशुद्ध बताया (UPBoardSolutions.com) गया है। कामनाएँ चाहे अच्छी हों या बुरी, मन में इनकी दीर्घकालीन उपस्थिति निश्चित ही विकृति उत्पन्न करती है। यही कारण है कि कामनाओं से युक्त मन बन्धन को और कामनाओं से रहित मन मोक्ष का कारण होता है।

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(3) मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। [2006,08,09, 10, 11, 12, 13, 15]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में उपनिषद्कार ने मन को बन्धन और मोक्ष का कारण बताया है।

अर्थ मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है।

व्याख्या सांसारिक आवागमन तथा विषयों में आसक्ति को बन्धन कहा जाता है और इन सबसे छुटकारा पाने को मोक्ष। मनुष्य में इस बन्धन और मोक्ष का एकमात्र कारण मन ही है; क्योंकि मन ही इन्द्रियों को विषयों की ओर ले जाता है और वही उसे विषयों से पृथक् भी करता है। यदि व्यक्ति का मन सांसारिक विषयों में रमण करता है तो वह आवागमन के बन्धन में बँधा रहता है और यदि उसका मन विषयों में न रमकर भगवद्-भक्ति में रमता है तो उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है। इसीलिए कहा गया है कि मन ही मोक्ष और बन्धन का कारण है।

(4) हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। [2010, 12, 13]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में बताया गया है कि सूर्य के रूप में चमकने गतेज वस्तुत: परमेश्वर का ही तेज है।

अर्थ (हे पूषन् अर्थात् सूर्यदेव! तुम्हारे) चमकीले आभामण्डल में स्थित सत्य (परमेश्वर) का मुख सोने जैसे चमकते हुए पात्र से आच्छादित है।

व्याख्या सूर्य की उपासना करता हुआ आराधक कहता है कि हे सूर्यदेव! आपका यह जो सुनहरा आभा-मण्डल है वह सत्य-स्वरूप परमेश्वर का ही तेज है। यह आपके अन्दर से इस प्रकार चमक रहा है, जैसे वह सोने के चमकीले मुंह वाले बर्तन के भीतर रखा हो और उस बर्तन के मुख से बाहर अपनी आभा चमक बिखेर रहा हो।

(5) न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं। [2011]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में परमात्मा के स्वरूप का वर्णन किया गया है।

अर्थ न वहाँ सूर्य चमकता है, न चन्द्रमा-तारे।

व्याख्या परमपिता परमात्मा ही सर्वशक्तिमान है और प्रकाश के एकमात्र स्रोत भी। (UPBoardSolutions.com) उनके बिनाः न तो इस लोक में और न ही परलोक में; न तो सूर्य चमकता है न ही चन्द्रमा और न तारे ही चमकते हैं। उनके प्रकाश से ही संसार की सभी वस्तुएँ चमकती हैं अर्थात् प्रकाशित होती हैं। आशय यह है कि परमेश्वर की कृपा प्रसाद के बने रहने तक ही इस संसार का अस्तित्व है। उनकी कृपा के न रहने पर सब कुछ समाप्त हो जाता है।

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(6) तस्य भासा सर्वमिदं विभाति। [2008, 10, 11]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में परमात्मा की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है।

अर्थ “यह सब कुछ उसकी दीप्ति से प्रकाशित होता है।

व्याख्या प्रस्तुत सूक्ति का आशय है कि ईश्वर स्वयं प्रकाशयुक्त है और सब कुछ उसके प्रकाश से ही प्रकाशित होता है। इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है वह सब कुछ उसी परमात्मा, परमब्रह्म, ईश्वर का ही लीला-विलास है। विश्व के सभी धर्मों में इसी बात को अपने-अपने ढंग से बताया गया है। किसी विद्वान् ने तो यहाँ तक कह दिया है कि यह सम्पूर्ण चराचर जगत् एक रंगमंच के समान है और हम सब उस रंगमंच की कठपुतलियाँ मात्र हैं। हम सभी की डोर परमात्मा के हाथ में है। वह जब तक चाहता है और जैसे चाहता है, हमें नचाता है; अर्थात् सभी कार्य उसी के पूर्ण नियन्त्रण में संचालित होते हैं। उसकी इच्छा के बिना कुछ भी सम्भव नहीं है। प्रस्तुत सूक्ति को यह कथन कि सब कुछ उसकी दीप्ति से ही दीपित है, पूर्णतया सत्य है।

(7) तस्मै देवाय नमो नमः। [2007]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में परमात्मा को बार-बार प्रणाम किया गया है।

अर्थ उस देवता को बार-बार प्रणाम है।

व्याख्या संस्कृत वाङमय के अनुसार ‘देव’ शब्द के अनेक अर्थ है; उदाहरणार्थ-देवता अर्थात् स्वर्ग में रहने वाले, अमर, सुर, राजा, मेघ, पूज्य व्यक्ति, पारद या पारा, ब्राह्मणों की एक उपाधि, देवदार, तेजोमय व्यक्ति, ज्ञानेन्द्रिय आदि। प्रस्तुत सूक्ति जो कि श्लोक-“यो देवौग्नो योऽप्सु, (UPBoardSolutions.com) यो विश्वं भुवनमा विवेश। य ओषधीषु य वनस्पतिषु, तस्मै देवाय नमो नमः॥”-का अंश है, में ऐसे ईश्वर को बार-बार प्रणाम किया गया है जो अग्नि, जल, समस्त जीवलोक, ओषधियों और वनस्पतियों में समाया हुआ है। ऐसे सर्वव्यापी जगन्नियन्ती परमेश्वर के लिए कहा गया है कि वह एक है—एको देवः केशवो वा शिवो वा।

(8) नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय। [2006]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में बताया गया है कि मोक्ष-प्राप्ति के लिए ब्रह्म-ज्ञान के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है।

अर्थ परमपद पर पहुँचने के लिए ब्रह्मज्ञान के अतिरिक्त दूसरा मार्ग नहीं है।

व्याख्या मनुष्य का सबसे बड़ा पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति है। मोक्ष-प्राप्ति के लिए विभिन्न धर्मों में अनेक मार्ग बताये गये हैं। ऋषियों ने ब्रह्मज्ञान को मोक्ष-प्राप्ति का सुगम साधन बताया है। ब्रह्म को जानकर ही जीवात्मा मृत्यु को पार करके मुक्त हो जाती है। ब्रह्मज्ञान को छोड़कर मुक्ति-प्राप्ति का अन्य कोई मार्ग नहीं है। अत: उस प्रकाशस्वरूप परमात्मा को ही जानने का प्रयास करना चाहिए।

श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) यस्य देवे …………………………………………………….. ” महात्मनः ॥ (श्लोक 1) (2009)
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके ऋषिः कथयति यत् यस्य पुरुषस्य दे पराभक्तिः तथा च देवे गुरौ अपि च भक्ति: विद्यते, तस्य महापुरुषस्य हृदये उपनिषत्सु वर्णितः विषयाः सर्वे अर्था: प्रकाशन्ते।

(2) मनो हि द्विविधं …………………………………………………….. कामविवर्जितम् ॥ (श्लोक 3) [2009, 10, 11]
संस्कृतार्थः अस्मिन् मन्त्रे ऋषिः कथयति यत् मनः द्विविधं प्रोक्तम्–शुद्धं च अशुद्धं च। अशुद्धं मनः सकामं सङ्कल्पं च भवति एवमेव शुद्धं मन: कामरहितं भवति।

(3) मन एव मनुष्याणां …………………………………………………….. निर्विषयं स्मृतम्॥ (श्लोक 4) [2006, 07]
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके कविः अकथयत् यत् मनुष्याणां दु:खबन्धयोः एकमात्रकारणं मन एवं अस्ति। (UPBoardSolutions.com) विषयवासनासुरमण: मनः दु:खबन्धाय भवति, विषयवासनारहितः मनः मुक्त्यै (मोक्षाय) स्मृतम् (कथितम्)।।

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(4) एको वशी …………………………………………………….. शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ (श्लोक 6)
संस्कृतार्थः अस्मिन् मन्त्रे ऋषिः कथयति यः परमात्मा सर्वेषां भूतानाम् अन्तरात्मा, अद्वितीयः, अखिलं संसारं स्ववशी कर्तुं समर्थः, यः स्व एकं रूपं विविधरूपेण अभिव्यक्ति; ये धीराः तम् आत्मस्थं साक्षात् अनुभवन्ति, शाश्वतं सुखं भवति, इतरेषां न भवति।

(5) न तत्र सूर्यो …………………………………………………….. सर्वमिदं विभाति ॥ (श्लोक 7) [2009]
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके मुनिः कथयति यत् तत्र परलोके न सूर्यः भाति, न चन्द्रतारकं भाति, न इमाः विद्युताः भान्ति। तर्हि अयम् अग्नि कुतः प्रकाशितः भविष्यति। तं परमेश्वरम् एव भान्तम् अखिलं विश्वम् अनुभाति, तस्य परमेश्वरस्य भासा इदं सर्वं विभाति।

(6) यो देवोऽग्नौ …………………………………………………….. देवाय नमो नमः ॥ (श्लोक 8) [2014]
संस्कृतार्थः अस्मिन् मन्त्रे ऋषिः कथयति-य: ईश्वर: अग्नौ अस्ति, य: अप्सु अस्ति, य: विश्वं लोकम् आविवेश, यः ओषधीषु अस्ति, य: वनस्पतिषु अस्ति, तस्मै देवाय नमो नमः अस्तु।

(7) भयादस्याग्निस्तपति …………………………………………………….. मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ (श्लोक 9)
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके ऋषिः कथयति यत् अस्य सर्वव्यापकस्य परमात्मनः भयात् अग्निः, अस्य भयात् सूर्यः तपति, अस्य भयात् इन्द्रः च वायुः च पञ्चमः मृत्युः धावति। अस्मिन् संसारे गतिशीलता ईश्वरेण . एव अस्ति इति भावः।

(8) अपाणिपादो जवनो …………………………………………………….. पुरुषं महान्तम् ॥ (श्लोक 10) (2015)
संस्कृतार्थः अस्मिन् मन्त्रे ऋषिः कथयति यत् सः परमात्मा सर्वं वेत्ति। तस्य कोऽपि वेत्ता नास्ति। तं महान्तं (UPBoardSolutions.com) पुरुषं आहुः। सः आत्मा इन्द्रियैः रहित: अपि जनां गृह्णाति, चक्षुर्विना पश्यति, कर्ण विना श्रृंणोति। स एवं परमः पुरुषः। तस्य महत्तमं किञ्चिद् नास्ति। …

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(9) यथा नद्यः स्यन्दमानाः …………………………………………………….. पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ (श्लोक 12)
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महर्षिः कथयति-यथा पर्वतात् निर्गताः नद्यः स्वकीय नामरूपे त्यक्त्वा समुद्रं गत्वा विलीयन्ते तथा एव विद्वान् पुरुष: नामरूपात् विमुक्ताः सन् परात्परं दिव्यं पुरुषं परमेश्वरं प्राप्नोति।

(10) यस्तु सर्वाणि …………………………………………………….. न विजुगुप्सते ॥ (श्लोक 13)
संस्कृतार्थः अस्मिन् मन्त्रे महर्षिः कथयति-य: पुरुष: सर्वाणि भूतानि आत्मनि एव अनुपश्यति तथा च सर्वभूतेषु आत्मानम् एव मन्यते, सः पुरुषः तान् प्रति घृणां न करोति।

(11) यदा सर्वे …………………………………………………….. ब्रह्म समश्नुते ॥ (श्लोक 14)
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महर्षिः कथयति—अस्य पुरुषस्य हृदये ये कामभावाः सन्ति, ते सर्वे भावाः यदा हृदयात् बहिः निर्गच्छन्ति तदा सः मर्त्यः पुरुषः अमरः भवति। अनन्तरं ब्रह्मानन्दं प्राप्नोति।

(12) वेदाहमेतं …………………………………………………….. विद्यतेऽयनाय ॥ (श्लोक 15)
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महर्षिः कथयति—यः पुरुषः अज्ञानान्धकारात् बहिः वर्तते, यस्य स्वरूपं प्रकाशस्वरूपं (UPBoardSolutions.com) भवति तथाविधं महान्तं पुरुषं अहं जानामि। तं प्रकाशस्वरूपं ज्ञात्वा एवं जनाः मृत्युपाशात् मुक्तो भवति। मोक्ष प्राप्तये न अन्यः कश्चित् पन्थाः विद्यते।

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Class 10 Sanskrit Chapter 4 UP Board Solutions यौतुकः पापसञ्चयः Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 4 Yautuk Pap Sanchay Question Answer (कथा – नाटक कौमुदी)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 4 हिंदी अनुवाद यौतुकः पापसञ्चयः के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

यौतुक शब्द का हिन्दी पर्याय दहेज है। आज यह भारतीय समाज का कोढ़ बना हुआ है। आज वधू को उसके गुणों के आधार पर नहीं, अपितु उसके द्वारा लाये गये दहेज के आधार पर सम्मान दिया जाता है।

प्रस्तुत नाटक में दहेज पर कुठाराघात किया गया है तथा यह प्रतिष्ठित (UPBoardSolutions.com) किया गया है कि विपत्ति के समय संस्कारवान् बहू ही परिवार के लिए सहायक होती है, अधिक दहेज लाने वाली बहू नहीं।

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पाठ-सारांश

रमानाथ और विनय बचपन के मित्र हैं। विनय की पुत्री सुमेधा का रमानाथ के बड़े पुत्र से विवाह हुआ था। विनय निर्धन था; अत: वह पर्याप्त दहेज नहीं दे सका था। रमानाथ के कनिष्ठ पुत्र का विवाह सेठ दुर्गादास की पुत्री चपला से हुआ था, जिसने विवाह में बहुत दहेज दिया था और घरेलू कार्य के लिए दो सेविकाएँ भी दी थीं। रमानाथ अधिक दहेज मिलने से सेठ दुर्गादास व उसकी पुत्री चपला से प्रसन्न थे और दहेज न मिलने के कारण विनय और उसकी गुणवती पुत्री सुमेधा से अप्रसन्न।

प्रथम दृश्य – रमानाथ विनय को बुलाकर कहते हैं कि सेठ दुर्गादास के द्वारा चपला के साथ भेजी गयी दो नौकरानियाँ घर का सब कामकाज करती हैं; अतः अब हमें तुम्हारी पुत्री सुमेधा की आवश्यकता नहीं है, इसे तुम ले जाओ। विनय ने रमानाथ से कहा–मित्र! ऐसा मत कहो। (UPBoardSolutions.com) मैं निर्धन हूँ और घर पर रखकर उसके पालने का भार वहन करने में भी असमर्थ हूँ। मेरी पुत्री विदुषी, सुशिक्षित, सुसंस्कृत एवं सहनशील है; क्योंकि मैंने उसे बहुत कष्टों से पाला है।

इसी बीच सुमेधा पात्र में जल लेकर आती है। विनय ने उससे कहा कि मुझे जल नहीं चाहिए, तुम्हारे ससुर ने मुझे पर्याप्त जल पहले ही पिला दिया है। सुमेधा ने उससे कहा कि वह अपने श्रद्धेय ससुर के विषय में कोई निन्दा नहीं सुनना चाहती है। विनय ने सुमेधा से कहा कि जाओ, सबका अभिवादन करके आओ। मैं तुम्हें लेने आया हूँ।

रमानाथ सुमेधा से अपने व अपने मित्र हेतु भोजन की व्यवस्था करने के लिए कहकर बाहर चला जाता है। विनय वहीं चिन्तित बैठा हुआ है। इसी समय टेलीफोन की घण्टी बजती है। रमानाथ की पत्नी रम्भा टेलीफोन उठाकर सुनती है। उसे फोन से ज्ञात होता है कि उसके पति रमानाथ दुर्घटना में घायल हो गये हैं और मिशन अस्पताल में भर्ती हैं।

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इसी समय रमानाथ की छोटी पुत्रवधू सजधज कर आती है। वह पिता के घर किसी उत्सव में जाने को तैयार है। रम्भा कहती है कि तुम्हारे ससुर दुर्घटना में घायल होकर अस्पताल में भर्ती हैं, उन्हें सेवा-शुश्रूषा की आवश्यकता हो सकती है, परन्तु चपला यह कहती हुई–“रुग्ण की चिकित्सा के लिए अस्पताल और सेवा के लिए वहाँ अनेक परिचारिकाएँ हैं तथा सुमेधा सेवा में दक्ष है उसे ले जाइए।’-उत्सव में चली जाती है।

द्वितीय दृश्य – रमानाथ को विनय का पत्र मिलता है। उसमें उसने लिखा है कि वह अपनी पुत्री सुमेधा को लेने आ रहा है। तब रम्भा कहती है कि सुमेधा नहीं जाएगी। मेरी ही बुद्धि भ्रमित हो गयी थी। उसके ही रक्त-दान से मेरे सौभाग्य की लालिमा; अर्थात् पति के प्राण बचे हैं। (UPBoardSolutions.com) रमानाथ को अधिक रक्तस्राव हो जाने के कारण रक्त की आवश्यकता थी। सुमेधा के रक्त का वर्ग ही उनके रक्त से मिलता था। उसने ही सहर्ष रक्त दिया था। रम्भा ने कहा कि सुमेधा निर्धन है तो क्या हुआ, वह सुसभ्य, सुशिक्षित है और चपला भले ही धनवान् हो, किन्तु वह स्वार्थिनी, असंस्कृत और अशिक्षित है।

उसी समय विनय आ जाता है। रमानाथ अपने पुनर्जीवन लाभ के लिए उसे मिठाई खाने के लिए कहता है। रम्भा कहती है कि यह मिठाई मुझे सद्बुद्धि मिलने के लिए भी है तथा विनय से कहती है कि हम सुमेधा को पाकर धन्य हैं। उसके ही रक्तदान से ये (रमानाथ) जीवित बचे हैं। रमानाथ विनय को बताता है कि उसे समय सुमेधा का जीवन दु:खमय था। मैं उसके दु:ख को सहन करने में असमर्थ था; अत: पुत्र के लौटने तक मैंने उसे तुम्हारे पास धरोहर के रूप में रखने का निश्चय किया था। अब मैं उसे कदापि नहीं भेजूंगा। विनय भी क्रोध में अपने द्वारा कही गयी बातों के लिए रमानाथ से क्षमा माँगता है।

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प्रस्तुत नाटक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि विवाह-सम्बन्ध सदैव समान स्तर के परिवार में ही स्थापित करने चाहिए तथा व्यक्ति को अनेक प्रलोभनों में फंसकर मानवीय गुणों का अनादर नहीं करना चाहिए। मनुष्य को दहेज की अपेक्षा करने के स्थान पर सुसभ्य, सुसंस्कृत, लज्जाशील एवं मर्यादाशील वधू की अपेक्षा करनी चाहिए। वही सर्वश्रेष्ठ दहेज है।

चरित्र-चित्रण

रमानाथ [2006, 08, 09, 10, 13, 14]

परिचय प्रस्तुत नाट्यांश के पुरुष पात्रों में रमानाथ का प्रमुख स्थान है। विनय उसका मित्र है, जिसकी पुत्री का विवाह रमानाथ के ज्येष्ठ पुत्र के साथ हुआ है। दूसरे पुत्र के विवाह में अत्यधिक दहेज प्राप्त हो जाने पर रमानाथ की धनलोलुपता बढ़ जाती है और वह अपने मित्र विनय का दहेज न देने के कारण अपमान भी करता है। उसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. धनलोलुप – रमानाथ अपने कनिष्ठ पुत्र के विवाह में वधू पक्ष के द्वारा अत्यधिक दहेज तथा घर पर कार्य करने के लिए दो नौकरानियाँ दिये जाने पर स्वार्थी एवं लोभी बन जाता है तथा सुमेधा की ओर से उसका मने परिवर्तित होने लगता है।

2. त्रुटियों को सुधारने वाला – रमानाथ स्वार्थवश (UPBoardSolutions.com) अपने समधी तथा मित्र विनय का अपमान भी करता है, किन्तु दुर्घटनाग्रस्त होने के पश्चात् वह बहुत पश्चात्ताप करता है। अन्ततः अपने मित्र विनय से अपनत्वपूर्ण मृदु व्यवहार करता है।

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3. निर्दयी – धन के लोभ में रमानाथ अपने मित्र विनय के यह प्रार्थना करने पर भी कि वह निर्धन होने के कारण अपनी पुत्री का पालन नहीं कर पाएगा, उससे अपनी पुत्री को अपने घर ले जाने के लिए कहता है।

4. गुणग्राही तथा शान्ति का इच्छुक – रमानाथ गुणग्राही है। वह सुमेधा के गुणों को पहचानकर उसका आदर भी करता है। घर की शान्ति बनाये रखने के लिए ही सुमेधा का अपमान करने वाली अपनी पत्नी रम्भा को वह कुछ नहीं कहता। वह सुमेधा को अपमान-अत्याचार से सुरक्षित रखने के लिए ही; अपने पुत्र के लौट आने तक; सुमेधा को उसके पिता के घर पहुँचवाना चाहता है।

5. परिवर्तित विचारधारा वाला – किसी समय रमानाथ धन को ही सब कुछ समझता है और उसके सामने मानवीय गुणों-शील, सुसंस्कारिता, सुसभ्यता–को तुच्छ। किन्तु कालान्तर में उसकी विचारधारा में परिवर्तन हो जाता है और तब वह मानवीय गुणों को ही श्रेष्ठ मानने लगता है। उसकी परिवर्तित विचारधारा का ही यह परिणाम है कि वह किसी समय अनादृत पुत्रवधू एवं समधी को अपने सिर-आँखों पर बैठा लेता है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि रमानाथ जहाँ निर्दयी, (UPBoardSolutions.com) धनलोलुप इत्यादि दुर्गुणों का वाहक है, वहीं वह गुणग्राही और अपनी त्रुटियों में सुधार करने वाला भी है। विचारशीलता से वह इन दुर्गुणों से मुक्त हो जाता है। तथा पश्चात्ताप भी करता है। अन्तत: वह समझ लेता है कि दहेजरूपी धन पापों का संग्रह ही है।

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रम्भा [2006, 08,11]

परिचय रम्भा रमानाथ की पत्नी तथा सुमेधा एवं चपला की सास है। प्रस्तुत नाट्यांश में उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण है। वह धनलोलुप, अत्याचारी, स्वार्थी और हृदयहीन सासों का प्रतिनिधित्व करती हुई-सी प्रतीत होती है। उसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. स्वार्थी और धनलोलुप – रम्भा स्वार्थी और धनलोलुप स्वभाव की स्त्री है। वह अपनी पुत्रवधू सुमेधा पर दहेज न लाने के लिए अत्याचार करती है। वह धन को ही सर्वस्व समझती है अपनी बड़ी बहू सुमेधा का अपमान वह केवल इसलिए करती है कि वह छोटी बहू चपला के समान अधिक दहेज लेकर नहीं आयी थी। ‘ममैव बुद्धिः भ्रमिता’ कथन उसकी इसी स्वार्थी और धनलोलुप प्रवृत्ति की स्वीकारोक्ति का सूचक है।

2. पति को चाहने वाली – रम्भा अपने पति को चाहने वाली एक पतिव्रता स्त्री है। जब वह दूरभाष पर अपने पति के दुर्घटनाग्रस्त होने का समाचार सुनती है तो रोने लगती है। पति को ही वह अपना सौभाग्य मानती है, यह उसके इस वाक्य-“तस्या एव रक्तेन (UPBoardSolutions.com) मम सौभाग्यलालिमा सुरक्षीकृता।”-से स्पष्ट होता है। वह चपला को भी इसीलिए रोकना चाहती है कि घायलावस्था में पति की सेवा-शुश्रूषा के लिए उसे उसकी आबश्यकता पड़ सकती है।

3. कृतज्ञा – रम्भा स्वार्थी और धनलोलुप तो अवश्य है, किन्तु कृतघ्न नहीं है। वह अपने ऊपर किये गये उपकार को मानने वाली है। सुमेधा द्वारा रक्तदान और सेवा करके उसके पति की प्राणरक्षा करने पर उसकी आँखें खुल जाती हैं और वह उसके उपकार का गुणगान अपने पति तथा अपने समधी से करती है। अपनी गलती को मानती हुई वह सुमेधा को घर में उचित सम्मान देती है।

4. दुष्कर्म पर लज्जित होने वाली – लोभ के वशीभूत होकर रम्भा अपनी ज्येष्ठ पुत्रवधू पर अत्याचार करती अवश्य है, किन्तु उसकी शीलता, सुसभ्यता, सुसंस्कारिता तथा कनिष्ठा पुत्रवधू की निर्लज्जता, अहंकारवादिता से जब उसके ज्ञानचक्षु खुलते हैं तो वह अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मों पर लज्जित होती है। वह स्वयं कहती है कि “ममैव बुद्धिः भ्रमिता अहं लज्जितास्मि।”

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निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि रम्भा में जहाँ स्त्री स्वभावोचित धनलोलुपता, स्वार्थीपन जैसे दुर्गुण मिलते हैं, वहीं उसमें पतिव्रता, लज्जाशीलता इत्यादि सद्गुणों का समावेश भी है। निश्चित ही विषम परिस्थितियाँ मनुष्य को वास्तविकता की ओर मोड़ देती हैं। रम्भा जो (UPBoardSolutions.com) दहेज की चकाचौंध से भ्रमित थी वह विषम परिस्थितियों में वास्तविकता को समझकर दहेज को पाप का संचय कहने लगती है।

सुमेधा [2006, 08, 09, 10, 11, 12, 13, 15]

परिचय प्रस्तुत नाट्यांश का ताना-बाना सुमेधा को लेकर ही बुना गया है। वह ही नाटक की मुख्य पात्र भी है। सम्पूर्ण कथा उसके चारों ओर ही घूमती है। वह विनय की पुत्री एवं रमानाथ की ज्येष्ठ पुत्रवधू है। वह भारतीय नारी के सद्गुणों की वाहक आदर्श नारी है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. सेवापरायणा – भारतीय नारी को सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठापित करने वाला गुण उसकी सेवा-परायणता ही है। वह अपनी ससुराल को ही स्वर्ग मानती है तथा सास-ससुर को देवता मानकर उनकी पूजा करती है। सुमेधा अनेक कष्टों के होते हुए भी अपने पति का गृह त्यागकर अपने पिता के घर नहीं जाना चाहती। साथ-ही अपने पिता के मुख से अपने निर्दयी ससुर की निन्दा भी नहीं सुनना चाहती। अपने ससुर की प्राणरक्षा वह अपना रक्त देकर करती है। यह उसके सेवापरायण होने का प्रबल प्रमाण है।

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2. सुसंस्कृत एवं विनम्र – सुमेधा का सम्पूर्ण व्यक्तित्व उसकी नम्रता के पावन जल से स्नानकर कान्तिमान हो उठा है। वह प्रताड़ित किये जाने पर भी अपनी विनम्रता को नहीं त्यागती। उसकी विनम्रता का उत्कृष्ट उदाहरण देखने को तब मिलता है, जब वह अपने पिता को अपने ससुर की निन्दा करने से यह कहकर रोकती है-“कृपया मम श्रद्धेयश्वसुरमाधिक्षिपतु भवान्।” उसके सुसंस्कृत होने का प्रमाण तो कदम-कदम पर मिलता है। किसी समय उससे दुर्व्यवहार करने वाली सास रम्भा उसकी सुसंस्कारिता, सुसभ्यता इत्यादि से प्रभावित होकर स्वयं कह उठती है-“स्पष्टीकरोमि सुमेधां प्राप्य वयं धन्याः।”

3. विचारशीला – सुमेधा प्रगतिशील विचारधारा वाली भारतीय नवयुवती है। उसका मानना है कि सम्मान के इच्छुक माता-पिता को अपने समान स्तर के परिवार में ही पुत्र-पुत्री का विवाह करना चाहिए। अपने पिता से कहा गया उसका यह वाक्य इस बात की पुष्टि करता है-“सम्मानेच्छुकैः समानस्तरपरिवार एव कन्या प्रदेया।”

4. धैर्यधृता एवं उदारमना – धैर्य ही व्यक्ति को विपत्तियों से उबारने में सक्षम होता है, यह उक्ति सुमेधा पर अक्षरश: सत्य बैठती है। वह धैर्यपूर्वक प्रत्येक कष्ट को सहन करती है और अपनी उदारता का परित्याग नहीं करती। अन्ततः अपनी उदारता से वह अपने सास-ससुर का (UPBoardSolutions.com) मन जीत लेती है और उनकी आँखों का तारा बन जाती है। अपना रक्त देकर अपने ससुर की प्राणरक्षा करना उसके उदार हृदय होने का प्रमाण है।

5. विदुषी एवं गुणवती – सुमेधा निर्धन परिवार की कन्या तो अवश्य है किन्तु वह विदुषी और गुणवती है। उसके इन्हीं गुणों से प्रभावित होकर ही रमानाथ के ज्येष्ठ पुत्र ने उससे प्रेम-विवाह किया था। नाटक के अन्त में रमानाथ ने विनय से वास्तविक स्थिति को स्वीकार करते हुए ठीक ही कहा था-“उस समय सुमेधा का जीवन दुःखमय हो गया था। उसके त्याग, विनम्रता आदि गुण उसके लिए शत्रुवत् हो गये थे। उसका दुःख मेरे लिए असहनीय था, इसलिए मैंने अपने पुत्र के प्रवास से आगमनं तक अपनी पुत्रवधू को धरोहर के रूप में तुम्हें समर्पित करने का निश्चय किया था।

इस प्रकार हम देखते हैं कि सुमेधा पूर्णतया आदर्श भारतीय नारी है। प्रस्तुत नाट्यांश में वह सर्वगुणसम्पन्न एवं सर्वप्रिया वधू के रूप में चित्रित की गयी है। समाजोत्थान के लिए सुमेधा जैसी ही सुयोग्य वधुओं एवं माताओं की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आवश्यकता है।

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विनय [2010]

परिचय विनय नाटक की नायिका सुमेधा के पिता, रमानाथ के मित्र एवं सम्बन्धी हैं। ये सामान्य आर्थिक स्थिति के व्यक्ति हैं। पाठ के अन्तर्गत इनके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं –

1. योग्य पिता – विनय एक योग्य पिता हैं। (UPBoardSolutions.com) इन्होंने अपनी पुत्री सुमेधा को अच्छी शिक्षा व संस्कार दिए हैं। यही कारण है कि वधू बन जाने पर वह अपनी ससुराल में प्रतिष्ठा प्राप्त करती है। कन्या को योग्य बनाना एक योग्य पिता का ही कार्य है।

2. मित्र-मित्रता के प्रति विश्वासी – विनय का मित्र-मित्रता के प्रति अत्यधिक विश्वास है। वे यह मानते हैं कि मित्र कितनी भी सम्पन्न क्यों न हो, वह अपने धनहीन मित्र का कभी अपमान नहीं करेगा। इसी कारण ये सामान्य आर्थिक स्थिति के होते हुए भी अपनी पुत्री सुमेधा का विवाह अपने सम्पन्न मित्र रमानाथ के पुत्र के साथ कर देते हैं। रमानाथ जब सुमेधा को वापस इनके घर भेजना चाहते हैं तो ये कहते हैं कि ‘‘बालमित्रस्य असम्मानं त्वत्तः नापेक्ष्यते।”

3. कुलीनता में विश्वास रखने वाले – विनय का पारिवारिक कुलीनता में पूर्ण विश्वास है। इसीलिए जब रमानाथ सुमेधा को इनके साथ भेजना चाहते हैं तब ये मित्र को कुलीनता की याद दिलाते हुए कहते हैं। कि “त्वं कुलीनोऽसि। स्वपरिवारस्य मर्यादां विचिन्त्य। किं कथयिष्यन्ति जनाः?”

4. स्पष्टवक्ता – विनय को स्पष्ट बात कहने में तनिक भी संकोच नहीं है। जब रमानाथ सुमेधा को इनके साथ भेजना चाहते हैं, तब ये अपनी धनहीनता की अवस्था को स्पष्ट रूप से व्यक्त करते हुए कहते हैं कि ‘विचारय मित्र! सम्प्रदत्तायाः भारं वोढुं कथं समक्षोऽस्ति एकोऽकिञ्चनः?

5. स्वाभिमानी – विनय स्वाभिमानी भी हैं। जब रमानाथ इनकी विनम्रता से प्रभावित नहीं होते और न ही इनकी प्रार्थना सुनते हैं, बल्कि अपनी पुत्रवधू का पालन करने में अपनी असमर्थता प्रकट करते हैं तो विनय का स्वाभिमान जाग उठता है। वे रोषपूर्वक कहते हैं कि “यदि तुम्हारे जैसे कुबेर सदृश (UPBoardSolutions.com) धनवान् अपनी पुत्रवधू के जीवन-निर्वाह में असमर्थ हैं तो मुझ जैसे श्रमजीवी के घर में भोजन का अभाव नहीं है। मैं अपनी पुत्री का पालन करने में समर्थ हूँ।”

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6. आधुनिक और ईश्वर-विश्वासी – विनय विचारों से आधुनिक होने के साथ-साथ ईश्वर की सत्ता पर विश्वास रखने वाले भी हैं। उनके कथन ‘अस्मिन् युगे दुहिता भाररूपा नास्ति।” तथा ”बलीयसी ईश्वरेच्छा।” इसकी पुष्टि करते हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि विनय अनेक सद्गुणों से युक्त है जो अपने मित्र रमानाथ से श्रेष्ठ सिद्ध होता है।

लघु उत्तटीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सुमेधा कस्य तनया ( पुत्री ) आसीत् ? [2006,07,08, 10, 12, 13, 15]
उत्तर :
सुमेधा विनयस्य तनया आसीत्।

प्रश्न 2.
सुमेधायां के गुणाः आसन् ? [2007,11]
उत्तर :
सुमेधा विदुषी, सुसंस्कृता, सहनशीला, सेवाभाविनी च इत्यादयः गुणयुक्ताः आसन्।

प्रश्न 3.
रमानाथस्य गृहे कलहमूलं किम् आसीत् ?
उत्तर :
रमानाथस्य गृहे यौतुकम् एव कलहमूलम् आसीत्।

प्रश्न 4.
रम्भायाः सुमेधया सह दुर्व्यवहारस्य किं कारणम् ?
उत्तर :
रम्भायाः सुमेधया सह दुर्व्यवहारस्य कारणम् एकमेव (UPBoardSolutions.com) आसीत् यत् सा आत्मना सह यौतुकं प्रभूतं नानीतवती।

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प्रश्न 5.
रमानाथस्य गृहे सर्वगृहकार्यं कः अकरोत् ?
या
रमानाथस्य गृहे सर्वाणि गृहकार्याणि कः अकरोत् ? [2015]
उत्तर :
रमानाथस्य गृहे सर्वगृहकार्यं सुमेधा अकरोत्।

प्रश्न 6.
चपलायाः स्वभावे का विशेषता आसीत् ? [2007]
उत्तर :
चपला चञ्चला, कटुभाषिणी, स्वेच्छाचारिणी, गर्वशीला च आसीत्।

प्रश्न 7.
रमानाथाय रक्तं का अदात् ? [2006,07,08, 10]
उत्तर :
रमानाथाय रक्तं सुमेधा अदात्।

प्रश्न 8.
रम्भा कथं स्वार्थिनी अभूत् ? [2010]
उत्तर :
चपलायाः धनाढ्यतया प्रभावेण रम्भा धनलोलुपा स्वार्थिनी च अभूत्।

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प्रश्न 9.
सुमेधा चपला च के आस्ताम् ? [2013]
उत्तर :
सुमेधा चपला च द्वे एवं रमानाथस्य पुत्रवध्वौ आस्ताम्।

प्रश्न 10.
सुमेधा का आसीत् ?
उत्तर :
सुमेधा रमानाथस्य ज्येष्ठपुत्रवधूः (UPBoardSolutions.com) आसीत्।

प्रश्न 11.
चपला का आसीत् ?[2009]
उत्तर :
चपला रमानाथस्य कनिष्ठा पुत्रवधूः आसीत्।

प्रश्न 12.
रमानाथः कः ? सुमेधायाः व्यवहारेण तस्य हृदयपरिवर्तनं कथं जातम् ?
उत्तर :
रमानाथः सुमेधायाः लुब्धकः श्वशुरः अस्ति। सुमेधायाः मृदुव्यवहारेण विपत्तिसमये रक्तदानेन च तस्य हृदयपरिवर्तनं जातम्।

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प्रश्न 13.
रम्भा कस्य भार्या? [2007,08, 09, 10, 11, 12, 13, 14]
उत्तर :
रम्भा रमानाथस्य भार्या।

प्रश्न 14.
चपलायाः पितुः किं नाम आसीत्? [2011, 15]
उत्तर :
चपलायाः पितुः नाम श्रेष्ठ दुर्गादासः आसीत्?

बहुविकल्पीय प्रश्न

अधोलिखित प्रश्नों में प्रत्येक प्रश्न के उत्तर-रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। (UPBoardSolutions.com) इनमें से एक विकल्प शुद्ध है। शुद्ध विकल्प का चयन कर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए –
[संकेत – काले अक्षरों में छपे शब्द शुद्ध विकल्प हैं।]

1. ‘यौतुकः पापसञ्चयः’ नामक पाठ में वर्तमान समय में भी प्रचलित किस समस्या को उठाया गया है ?

(क) सांस्कृतिक पतन की समस्या को
(ख) दहेज की समस्या को
(ग) निर्धनता की समस्या को
(घ) अशिक्षा की समस्या को

2. रमानाथ की धनी पुत्रवधू कौन है?

(क) सुमेधा
(ख) चपला
(ग) रम्भा
(घ) तीनों में कोई नहीं

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3. सुमेधा और रम्भा आपस में क्या थीं ?

(क) बहू-सास
(ख) देवरानी-जिठानी
(ग) पुत्री-माता
(घ) पड़ोसिने

4. सुमेधा में कौन-सा गुण नहीं है ?

(क) उदारहृदयता
(ख) सेवापरायणता
(ग) सुसंस्कृतता
(घ) स्वार्थान्धता

5. सुमेधा के रक्तदान और सेवा-शुश्रूषा से किनका हृदय-परिवर्तन होता है ?

(क) विनय और रमानाथ को
(ख) रम्भा और रमानाथ को
(ग) चपला और रम्भा का
(घ) रम्भा और विनय का

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6. “साविदुषी सुसंस्कृता सहनशीलापि।”इस कथन में ‘सा’ शब्द से किसकी ओर संकेत किया गया है?

(क) ‘चपला’ की ओर
(ख) ‘सुमेधा’ की ओर
(ग) रम्भा की ओर
(घ) “चपला’ और ‘सुमेधा’ की ओर

7. “नहि सुमेधे! तव धनिश्वशुरेण पूर्वमेव पर्याप्त जलं पायितम्।” इस संवाद में निहित भाव है

(क) व्यंग्य का
(ख) विद्वेष का
(ग) करुणा का
(घ) तृप्ति का

8. रमानाथ अपने मित्र विनय को मिष्टान्न क्यों खिलाता है ?

(क) सुमेधा की सेवापरायणता का
(ख) अपने पुनर्जीवन-प्राप्ति का
(ग) रम्भा के हृदय-परिवर्तन का
(घ) अपने हृदय-परिवर्तन का

9. “मम कनिष्ठपुत्रवधूचपलायाः पित्रा श्रेष्ठ …………………… प्रेषिते सेविके सर्वगृहकार्यं कुरुतः।” वाक्य के रिक्त-स्थान में आएगा –

(क) शम्भूदासेन
(ख) दुर्गादासेन
(ग) चन्दनदासेन
(घ) रत्नदासेन

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10. ‘अस्मिन् युगे दुहिता …………………. नास्ति।” वाक्य की पूर्ति होगी । [2005,08]

(क) लक्ष्मीरूपा’ से
(ख) ‘सेविकारूपा’ से
(ग) ‘भाररूपा’ से
(घ) “धनरूपा से

11. “हितैषिणः आपत्काल एव परीक्ष्यन्ते।” वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति ?

(क) रमानाथः
(ख) रम्भा
(ग) चपला
(घ) विनयः

12. “दुर्घटनया मम नेत्राभ्यां काञ्चनकान्तिसमुत्पन्नम् …………………. अपनीतम्।” वाक्य में रिक्त| स्थान की पूर्ति होगी

(क) ‘अज्ञानम्’ से
(ख) मोहत्वम्’ से
(ग) लोभम्’ से
(घ) ‘अन्धत्वम्’ से

13. “तस्याः त्यागः श्लाघ्यः सुमेधायाः रक्तदानेनैव एष:।”वाक्य में रिक्त-स्थान में आएगा

(क) उपकृतः
(ख) प्रसन्नः
(ग) जीवितः
(घ) मरणः

14. “रक्तदानं जीवनं ददाति, रक्तपातम् अपहरत्येव।” वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति ?

(क) रम्भा
(ख) विनयः
(ग) रमानाथः
(घ) सुमेधा

15. “अहं स्वपुत्रवधू तुभ्यं …………………. समर्पयितुं निश्चितवान्।” के रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी –

(क) आभूषणरूपेण
(ख) न्यासरूपेण
(ग) धनरूपेण
(घ) कोषरूपेण

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16. “क्रोधानलः यथार्थचित्तदाहकः परमधुनान्तं सुखदं तु सर्वं सुखदम्।” वाक्यस्य वक्ता कः अस्ति?

(क) विनयः
(ख) दुर्गादासः
(ग) रमानाथः
(घ) रम्भा

17. सुमेधा …………………. पुत्री आसीत्। [2007,08,09, 11, 12, 15]

(क) रमानाथस्य
(ख) विनयस्य
(ग) रम्भायाः
(घ) चपलायाः

18. चपला …………………. “पुत्री आसीत्।

(क) विनयस्य
(ख) रम्भायाः
(ग) दुर्गादासस्य
(घ) रमानाथस्य

19. यौतुक शब्दस्य अर्थ …………………. अस्ति।

(क) खेलः
(ख) दहेजः
(ग) नृत्यः
(घ) मेला

20. ‘यौतुकः पापसञ्चयः’ नाटकस्य नायिका …………………. अस्ति। [2007]

(क) चपला
(ख) सुमेधा
(ग) रम्भा
(घ) कमला

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21. समाजे …………………. निन्दनीयः [2006]

(क) यौतुकः
(ख) परोपकारः
(ग) अध्ययन:
(घ) सदाचारः

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Class 10 Sanskrit Chapter 6 UP Board Solutions नागाधीरजः Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 6 Nagadhiraja Question Answer (पद्य – पीयूषम्)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 6 हिंदी अनुवाद नागाधीरजः के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

महाकवि कालिदास संस्कृत-साहित्य में ‘कविकुलगुरु’ की उपाधि से समलंकृत तथा विश्व के कवि-समाज में सुप्रतिष्ठित हैं। इनकी जन्मभूमि भारतवर्ष थी। इन्होंने निष्पक्ष होकर भारतभूमि व उसके प्रदेशों के वैशिष्ट्य का वर्णन किया है। इनके काव्यों व नाटकों में हिमालय से लेकर समुद्रतटपर्यन्त भारत का दर्शन होता है। प्रस्तुत पाठ महाकवि कालिदास द्वारा विरचित ‘कुमारसम्भवम्’ नामक महाकाव्य से संगृहीत है। इस महाकाव्य (UPBoardSolutions.com) में सत्रह सर्ग हैं और इसका प्रारम्भ हिमालय-वर्णन से होता है। प्रस्तुत पाठ के आठ श्लोक उसी हिमालय-वर्णन से संगृहीत हैं।

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पाठ-सारांश

भारतवर्ष के उत्तर में नगाधिराज हिमालय, पूर्वी और पश्चिमी समुद्रों का अवगाहन करके पृथ्वी के मानदण्ड के समान स्थित है। सभी पर्वतों ने इसे बछड़ा और सुमेरु पर्वत को ग्वाला बनाकर पृथ्वीरूपी गाय से रत्नों और महौषधियों को प्राप्त किया। अनन्त रत्नों को उत्पन्न करने वाले हिमालय के सौन्दर्य को बर्फ कम नहीं कर सकी; क्योंकि गुणों के समूह में एक दोष चन्द्रमा की किरणों में उसके कलंक के समान ही छिप जाता है। सिद्धगण हिमालय के मध्यभाग में घूमने वाले मेघों की छाया में बैठकर वर्षा से पीड़ित होकर उसके धूप वाले शिखरों पर पहुँच जाते हैं। हाथियों को मारने से पंजों में लगे हुए रक्त के पिघली हुई बर्फ द्वारा धुल जाने पर यहाँ रहने वाले भील लोग सिंहों के नखों में से गिरे हुए गज-मोतियों से सिंहों के जाने के मार्ग को जान लेते हैं। हाथियों के द्वारा (UPBoardSolutions.com) अपने गालों की खाज को खुजाने के लिए चीड़ के वृक्षों से रगड़ने पर उनसे बहते दूध से हिमालय के शिखर सुगन्धित हो जाते हैं। हिमालय दिन में डरे हुए और अपनी शरण में आये हुए अन्धकार
को अपनी गुफाओं में शरण देकर सूर्य से उसकी रक्षा करता है। चमरी गायें, अपनी पूँछ को इधर-उधर हिलाने के कारण अपनी पूँछ के बालों के चँवरों से हिमालय के ‘गिरिराज’ शब्द को सार्थक करती हैं।

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पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1)
स्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।
पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः ॥ [2007,11, 14, 15]

शब्दार्थ अस्ति = है। उत्तरस्यां दिशि = उत्तर दिशा में। देवतात्मा = देवगण हैं आत्मा जिसकी। हिमालयः नाम = हिमालय नामका नगाधिराजः = पर्वतों का राजा। पूर्वापरौ = पूर्व और पश्चिम तोयनिधी = समुद्रों को। वगा= अवगाहन करके; प्रविष्ट होकर। स्थितः = स्थित है। पृथिव्याः = पृथ्वी के मानदण्डः इवे = मापने के दण्ड के समान

सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘नगाधिराजः’ शीर्षक पाठ से लिया गया है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में हिमालय की स्थिति और उसके भौगोलिक महत्त्व का वर्णन किया गया है।

अन्वय उत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयः नाम नगाधिराजः अस्ति, (यः) पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य पृथिव्याः (UPBoardSolutions.com) मानदण्डः इव स्थितः (अस्ति)।

व्याख्या महाकवि कालिदास कहते हैं कि (भारतवर्ष की) उत्तर दिशा में देवताओं की आत्मा वाला पर्वतों का राजा हिमालय है, जो पूर्व और पश्चिम दोनों समुद्रों का अवगाहन करके पृथ्वी के मापने के दण्ड के समान स्थित है। तात्पर्य यह है कि हिमालय का विस्तार ऐसा है कि वह पूर्व और पश्चिम दोनों दिशाओं के समुद्रों को छू रहा है।

(2)
यं सर्वशैलाः परिकल्प्य वत्सं मेरौ स्थिते दोग्धरि दोहदक्षे
भास्वन्ति रत्नानि महौषधींश्च पृथूपदिष्टां दुदुहुर्धरित्रीम् ॥ [2006]

शब्दार्थ यं = जिस हिमालय को। सर्वशैलाः = सभी पर्वतों ने परिकल्प्य = बनाकर। वत्सम् = बछड़ा। मेरी = सुमेरु पर्वत के स्थिते = स्थित होने पर दोग्धरि = दुहने वाला। दोहदक्षे = दुहने में निपुण। भास्वन्ति = देदीप्यमाना रत्नानि = रत्नों को। महौषधी (महा + ओषधी) = उत्तम जड़ी-बूटियों को। पृथूपदिष्टाम् = राजा पृथु के द्वारा आदेश दी गयी। दुदुहुः = दुहा। धरित्रीम् = पृथ्वी को।।

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प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में हिमालय को बछड़ा, सुमेरु को दुहने वाला तथा पृथ्वी को गाय का प्रतीक मानकर उसके दोहन की कल्पना की गयी है।

अन्वय सर्वशैलाः यं वत्सं परिकल्प्य दोहदक्षे मेरौ दोग्धरि स्थिते पृथूपदिष्टां धरित्रीं भास्वन्ति रत्नानि महौषधीन् च दुदुहुः।।

व्याख्या महाकवि कालिदास कहते हैं कि सभी पर्वतों ने जिस हिमालय को बछड़ा बनाकर दुहने (UPBoardSolutions.com) में निपुण सुमेरु पर्वत के दुहने वाले के रूप में स्थित रहने पर पृथु के द्वारा आदेश दी गयी पृथ्वीरूपी गाय से देदीप्यमान रत्नों और संजीवनी आदि महान् ओषधियों को दुहा।

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(3)
अनन्तरत्नप्रभवस्य यस्य हिमं न सौभाग्यविलोपि जातम्
एको हि दोषो गुणसन्निपाते निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवाङ्कः॥ [2007, 11]

शब्दार्थ अनन्तरत्नप्रभवस्य = अनन्त रत्नों को उत्पन्न करने वाले। यस्य = जिस (हिमालय) के। हिमम् = बर्फ। न = नहीं। सौभाग्यविलोपि = सौन्दर्य का विनाश करने वाली। जातम् = हुई। एकः = एक हि = निश्चित ही, क्योंकि दोषः = दोष। गुणसन्निपाते = गुणों के समूह में। निमज्जति = डूब जाता है, विलीन हो जाता है। इन्दोः = चन्द्रमा की। किरणेषु = किरणों में। इव = समान। अङ्कः = कलंक।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में हिमालय के महान् यश का वर्णन किया गया है।

अन्वय हिमम् अनन्तरत्नप्रभवस्य यस्य सौभाग्यविलोपि न जातम्। हि एकः दोषः गुणसन्निपाते इन्दोः किरणेषु अङ्कः इव निमज्जति।

व्याख्या अनन्त रत्नों को उत्पन्न करने वाले जिस पर्वत की शोभा को उस पर सदा जमी रहने वाली बर्फ मिटा नहीं पायी है, क्योंकि गुणों के समूह में एक दोष उसी प्रकार छिप जाता है, जिस प्रकार चन्द्रमा की किरणों में कलंका तात्पर्य यह है कि हिमालय से अनन्त रत्नों की उत्पत्ति (UPBoardSolutions.com) होती है किन्तु उसके अन्दर एक ही दोष है कि वह सदैव हिमाच्छादित रहता है। उसके इस दोष से भी उसका महत्त्व कम नहीं होता; क्योंकि चन्द्रमा में स्थित कलंक उसके गुणों को कम नहीं करता।।

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(4)
आमेखलं सञ्चरतां घनानां छायामधः सानुगतां निषेव्य।
उद्वेजिता वृष्टिभिराश्रयन्ते शृङ्गाणि यस्यातपवन्ति सिद्धाः ॥ [2007]

शब्दार्थ आमेखलम् = पर्वत के मध्य भाग तक। सञ्चरताम् = घूमने वाले। घनानां = बादलों के छायां = छाया का। अधः = नीचे। सानुगताम् = नीचे के शिखरों पर पड़ती हुई। निषेव्य = सेवन करके। उद्वेजिताः = पीड़ित किये गये। वृष्टिभिः = वर्षा द्वारा आश्रयन्ते = आश्रय करते हैं। शृङ्गाणि = शिखरों का। आतपवन्ति = धूप से युक्त। सिद्धाः = सिँद्ध नामक देवता अथवा तपस्वी साधक।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में हिमालय पर तपस्या करने वाले सिद्धगणों के क्रिया-कलापों का वर्णन किया गया

अन्वय सिद्धाः आमेखलं सञ्चरतां घनानाम् अधः सानुगतां छायां निषेव्य वृष्टिभिः उद्वेजिताः (सन्तः) यस्य आतपवन्ति शृङ्गाणि आश्रयन्ते।

व्याख्या महाकवि कालिदास कहते हैं कि सिद्धगण (तपस्वी या साधक या सिद्ध नामक देव जाति के) हिमालय पर्वत के मध्य भाग तक घूमने वाले बादलों के नीचे शिखरों पर पड़ती हुई छाया का सेवन करके वर्षा के द्वारा पीड़ित किये जाते हुए हिमालय के धूप वाले शिखरों का आश्रय लेते हैं। तात्पर्य यह है कि बादलों की पहुँच हिमालय के मध्य भाग तक ही है। जब वे वर्षा करने लगते हैं, तब सिद्धगण धूप वाले ऊपर के शिखरों पर चले जाते हैं; अर्थात् उनकी पहुँच बादलों से भी ऊपर है।

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(5)
पदं तुषारसुतिधौतरक्तं यस्मिन्नदृष्ट्वाऽपि हतद्विपानाम्।
विदन्ति मार्गे नखरन्ध्रमुक्तैर्मुक्ताफलैः केसरिणां किराताः॥

शब्दार्थ पदम् = पैर (के निशान) को। तुषारसुतिधौतरक्तम् = बर्फ के पिघलकर बहने से धुले हुए रक्त वाले। यस्मिन्नदृष्ट्वाऽपि (यस्मिन् + अदृष्ट्वा + अपि) = जिस (हिमालय) पर बिना देखे भी। हतद्विपानां = हाथियों को मारने वाले। विदन्ति = जान जाते हैं। मार्गं = मार्ग को। नखरन्ध्रमुक्तैः = नखों के छिद्रों से गिरे हुए। मुक्ताफलैः = मोतियों के दानों जैसे। केसरिणाम् =सिंहों के। किराताः =(पहाड़ों पर रहने वाली) भील जाति के लोग।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में किरातों द्वारा हिमालय के बर्फीले भाग में भी मार्ग ढूँढ़ने के संकेतों का वर्णन किया गया है।

अन्वय किराताः यस्मिन् तुषारसुतिधौतरक्तं हतद्विपानां (सिंहानां) पदम् अदृष्ट्वा अपि नखरन्ध्रमुक्तैः मुक्ताफलैः केसरिणां मार्गं विदन्ति।

व्याख्या महाकवि कालिदास कहते हैं कि भील जाति के लोग जिस हिमालय पर पिघली हुई बर्फ के बहने से धुले हुए रक्त वाले, हाथियों को मार डालने वाले सिंहों के पदचिह्नों को न देखकर भी उनके नाखूनों के मध्य भाग के छिद्रों से गिरते हुए मोतियों से सिंहों के (जाने के) मार्ग को जाने जाते हैं। तात्पर्य यह है कि हाथियों के मस्तक में मोती होते हैं। जब सिंह अपने पैरों से हाथी के मस्तक को विदीर्ण करता है तो उसके पंजे में मोती फँस जाते हैं और चलते समय वे (UPBoardSolutions.com) मार्ग में गिर जाते हैं। ऐसी स्थिति में उन सिंहों का शिकार करने वाले किरात उन गज-मुक्ताओं को देखकर ही उनके जाने के मार्ग का पता लगा लेते हैं क्योंकि रक्त के निशान तो बहती हुई बर्फ से धुल जाते हैं।

(6)
कपोलकण्डूः करिभिर्विनेतुं विघट्टितानां सरलद्माणाम्।
यत्र खुतक्षीरतया प्रसूतः सानूनि गन्धः सुरभीकरोति ॥

शब्दार्थ कपोलकण्डूः = गोलों की खुजली को। करिभिः = हाथियों के द्वारा। विनेतुम् = मिटाने के लिए। विघट्टितानाम् = रगड़े गये। सरलद्माणाम् = सरल (चीड़) के वृक्षों केा ‘तुतक्षीरतया = दूध के बहने के कारण। प्रसूतः = उत्पन्न। सानूनि = शिखरों को। गन्धः = गन्धा सुरभीकरोति = सुगन्धित करती है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में हाथियों की रगड़ से छिले चीड़ के वृक्षों की गन्ध से पर्वत शिखरों के सुवासित होने का वर्णन है।

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अन्वय यत्र कपोलकंण्डू: विनेतुं करिभिः विघट्टितानां सरलद्माणां सुतक्षीरतया प्रसूतः गन्धः सानूनि सुरभीकरोति।।

व्याख्या महाकवि कालिदास कहते हैं कि जहाँ गालों की खोज को मिटाने के लिए हाथियों के द्वारा रगड़े गये चीड़ के वृक्षों से दूध के बहने के कारण उत्पन्न हुई गन्ध हिमालय के शिखरों को सुगन्धित करती रहती है।

(7)
दिवाकराद्रक्षति सो गुहासु लीनं दिवा भीतमिवान्धकारम्।
क्षुद्रेऽपि नूनं शरणं प्रपन्ने ममत्वमुच्चैः शिरसां सतीव ॥ [2006, 09]

शब्दार्थ दिवाकरात् = सूर्य से। रक्षति = बचाता है। सः = वह। गुहासु = गुफाओं में लीनं = छिपे हुए। दिवा भीतम् इव = दिन में डरे हुए के समान| अन्धकारम् = अँधेरे को। क्षुद्रेऽपि = नीच मनुष्य के भी। नूनं = निश्चय ही। शरणं प्रपन्ने = शरण में पहुँचने पर। ममत्वम् = आत्मीयता, अपनापन। उच्चैः शिरसाम् = ऊँचे मस्तक वालों का, महापुरुषों का। सतीव = श्रेष्ठ पुरुष की तरह।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में हिमालय को शरणागतवत्सल के रूप में प्रदर्शित किया गया है।

अन्वये यः दिवा दिवाकरात् भीतम् इव गुहासु लीनम् अन्धकारम् रक्षति। नूनं क्षुद्रे अपि शरणं प्रपन्ने सतीव उच्चैः शिरसां ममत्वं (भवति एव)।

व्याख्या महाकवि कालिदास कहते हैं कि जो (हिमालय) दिन में सूर्य से डरे हुए की तरह गुफाओं में छिपे (UPBoardSolutions.com) अन्धकार की रक्षा करता है। निश्चय ही नीच व्यक्ति के शरण में आने पर भी श्रेष्ठ पुरुष की तरह उच्चाशय वाले महापुरुषों का अपनापन होता ही है।

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(8)
लाङगूलविक्षेपविसर्पिशोभैरितस्ततश्चन्द्रमरीचिगौरैः ।।
यस्यार्थयुक्तं गिरिराजशब्दं कुर्वन्ति बालव्यजनैश्चमर्यः॥

शब्दार्थ लागूलविक्षेपविसर्पिशोभैः = पूँछ को हिलाने से फैलने वाली शोभा वाली। इतस्ततः = इधर-उधर। चन्द्रमरीचिगौरैः = चन्द्रमा की किरणों के समान उजले। यस्य = जिसके अर्थात् हिमालय के अर्थयुक्तं = अर्थ से युक्त सार्थका गिरिराजशब्दम् = गिरिराज शब्द को। कुर्वन्ति = कर रही हैं। बाल-व्यजनैः = बालों के पंखों अर्थात् चँवरों से। चमर्यः = चमरी गायें, सुरा गायें (इनके पूँछ के बालों की चँवर बनती है)।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में हिमालय के पर्वतों का राजा होने की कल्पना को सार्थक अभिव्यक्ति प्रदान की गयी है।

अन्वय चमर्यः इतस्तत: लागूलविक्षेपविसर्पिशोभैः चन्द्रमरीचिगौरै: बालव्यजनैः यस्य गिरिराजशब्दम् अर्थयुक्तं कुर्वन्ति।

व्याख्या महाकवि कालिदास कहते हैं कि चमरी गायें; जिनकी शोभा पूँछों के हिलाने से इधर-उधर फैलती रहती है तथा जो चन्द्रमा की किरणों के समान श्वेत बालों के चँवरों से जिस हिमालय के ‘गिरिराज शब्द को सार्थक करती हैं। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार सिंहासन पर बैठे हुए राजा पर चँवर डुलाये जाते हैं, उसी प्रकार हिमालय पर ‘गिरिराज’ होने के कारण चमरी गायें अपने पूँछों के बालों के चँवर डुलाती रहती हैं।

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सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1) अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयों नाम नगाधिराजः।

सन्दर्भ प्रस्तुत सूक्तिपरक पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘नगाधिराजः’ नामक पाठ से ली गयी है।

[ संकेत इस पाठ की शेष सभी सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा। ]

प्रसग प्रस्तुत सूक्ति में हिमालय की महानता पर प्रकाश डाला गया है। अर्थ उत्तर दिशा में देवताओं की आत्मास्वरूप हिमालय नाम का पर्वतों का राजा स्थित है।

व्याख्या भारत की उत्तर दिशा में देवताओं की आत्मास्वरूप पर्वतों का राजा हिमालय नाम का पर्वत स्थित है। (UPBoardSolutions.com) हिमालय को क्योकि भगवान् शिव का निवासस्थान माना जाता है और भगवान् शिव समस्त देवताओं के आराध्य हैं; इसीलिए उसे देवताओं की आत्मा कहा गया है।

(2) स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः।। [2010, 12, 13, 15]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में हिमालय की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है।

अर्थ पृथ्वी पर स्थित मानदण्ड के समान है।

व्याख्या भारत की उत्तरी सीमा पर स्थित हिमालय पर्वत अत्यन्त महान् और सुविस्तृत है। इसको देखकर ऐसा लगता है कि यह पृथ्वी के एक छोर से आरम्भ होकर दूसरे छोर (किनारा) तक फैला हुआ है। हिमालय की इसी विशालता और सुविस्तार को व्यक्त करने के लिए कवि कल्पना करता है कि यह धरती की विशालता को मापने के लिए मापदण्ड (पैमाना) के रूप में पृथ्वी पर स्थित है। मापदण्ड के रूप में इसकी विशालता और महत्ता के आधार पर ही पृथ्वी की भी विशालता और महत्ता का अनुमान भली-भाँति लगाया जा सकता है।

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(3) एको हि दोषो गुणसन्निपाते, निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवाङ्कः। [2007, 11, 12, 14]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में कहा गया है कि किसी व्यक्ति के एकाध दोष उसके गुणों में ही छिप जाते हैं।

अर्थ गुणों के समूह में एक दोष उसी प्रकार छिप जाता है, जिस प्रकार चन्द्रमा की किरणों में उसका काला धब्बा।।

व्याख्या कविकुलगुरु कालिदास ने प्रस्तुत सूक्ति में बताया है कि यदि किसी व्यक्ति में बहुत-से गुण हों तो उसके एकाध दोष का पता भी नहीं लग पाता है; क्योंकि लोगों का ध्यान उसके गुणों की ओर होता है, उसके दोष पर उनका ध्यान ही नहीं जाता है। जैसे चन्द्रमा की किरणों के जाल में उसका काला धब्बा छिप जाता है; क्योंकि लोग चन्द्रमा की किरणों के सौन्दर्य में ही लीन हो जाते हैं। उसके काले धब्बे की ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता है। जहाँ हिमालय में अनन्त रत्न और ओषधियाँ पायी जाती हैं, वहाँ उसके शिखरों पर सदैव भारी मात्रा में बर्फ का जमा रहना बड़ा दोष भी है, लेकिन अनन्त रत्नों को उत्पन्न करने वाले हिमालय पर गिरने (UPBoardSolutions.com) वाली बर्फ उसके महत्त्व को कम नहीं करती; क्योंकि गुणों के समूह में एक दोष नगण्य होता है।

(4) क्षुद्रेऽपि नूनं शरणं प्रपन्ने, ममत्वमुच्चैः शिरसां सतीव। [2010]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में कहा गया है कि यदि कोई क्षुद्र व्यक्ति उच्च आशय वाले व्यक्ति के पास जाता है। तो वे उसके प्रति भी श्रेष्ठ पुरुष की तरह ही आत्मीयता प्रकट करते हैं।

अर्थ क्षुद्र व्यक्ति के शरण में आने पर महान् व्यक्ति उन पर भी सज्जनों के समान ही स्नेह करते हैं।

व्याख्या महापुरुषों की शरण में छोटा-बड़ा या सज्जन-दुर्जन जो भी आता है, वे उस पर अत्यधिक ममता दिखलाते हैं। यदि उनकी शरण में कोई तुच्छ व्यक्ति भी जाता है तो वे उस पर भी उतनी ही ममता दिखाते हैं, जितनी शरण में आये हुए सज्जन व्यक्ति के प्रति उनके मन में छोटे-बड़े, अपने-पराये और सज्जन-दुर्जन का भेदभाव नहीं होता है। नगाधिराज हिमालय इसका आदर्श उदाहरण है। दिन के समय अन्धकार उसकी चोटियों पर नहीं रहता है, वरन् उसकी गुफाओं के भीतर रहता है। कवि की कल्पना है कि अन्धकार ने सूर्य के भय से हिमालय की चोटियों से भागकर उसकी गुफाओं में शरण प्राप्त की है और उन्नत शिखरों वाले हिमालय ने भी तुच्छ अन्धकार को अपनी गुफाओं में शरण देकर उसकी सूर्य से रक्षा की है। यहाँ हिमालय को महान् तथा अन्धकार को क्षुद्र बताया गया है। प्रस्तुत सूक्ति शरणागत की रक्षा के महत्त्व को भी प्रतिपादित करती है।

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श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) अस्त्युत्तरस्यां ………………………………………. इव मानदण्डः ॥ (श्लोक 1) (2010]
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महाकविः कालिदासः कथयति यत् भारतस्य उत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयः नाम पर्वतानां नृपः अस्ति, यः पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य पृथिव्याः मानदण्डः इव स्थितः अस्ति अर्थात् तस्य विस्तारं इदृशं अस्ति यत् पूर्वस्य पश्चिमस्य च तोयनिधीः स्पर्शयति।

(2) अनन्तरत्नप्रभवस्य ………………………………………. किरणेष्विवाङ्कः॥ (श्लोक 3)
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महाकविः कालिदासः हिमालयस्य सौन्दर्यं वर्णयन् कथयति यत् हिमालये बहूनि रत्नानि उत्पन्नं भवन्ति, तस्य शिखरेषु हिमम् अपि भवति, परम् तत् हिमं तस्य सौन्दर्यं क्षीणं न अकरोत्। तस्य हिमस्य अयं दोष: रत्नानां गुणेषु प्रभावरहितः अभवत्। गुणेषु एकः दोष: तथैव प्रभावहीनं भवति यथा चन्द्रस्य किरणेषु तस्य कलङ्क अदृश्यः भवति।।

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(3) दिवाकराद्रक्षति ………………………………………. शिरसां सतीव॥ (श्लोक 7)
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महाकविः कालिदासः कथयति यत् हिमालयस्य गुहासु अन्धकारं वर्तते। अत्र कविः (UPBoardSolutions.com) उत्प्रेक्षां करोति यत्र दिवाकरात् भीत: अन्धकारः हिमालये शरणं प्राप्तवान्, अतएव हिमालयः अन्धकारस्य रक्षां करोति। इदं सत्यमेव यदि क्षुद्रः अपि महात्मनां शरणं प्राप्नोति तदा महात्मनां ममत्वं नूनम् एव उत्पन्नं भवति।

(4) लाङ्गूलविक्षेपविसर्पिशोभैः ………………………………………. बालव्यजनैश्चमर्यः ॥ (श्लोक 8)
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महाकवि कालिदासः कथयति—-हिमालयः पर्वतानां राजा अस्ति, अतएव स: गिरिराजः इति कथ्यते। तत्र स्थिताः चमर्यः धेनवः स्वपुच्छविक्षेपविसर्पिशोमैः चन्द्रधवलगौरे: बालव्यजनैः तस्योपरि व्यजनं कृत्वा ‘गिरिराज’ शब्दं अर्थयुक्तं कुर्वन्ति।

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Class 10 Sanskrit Chapter 5 UP Board Solutions क्षान्ति – सौख्यम् Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 5 Kshanti Saukhyam Question Answer (पद्य – पीयूषम्)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 5 हिंदी अनुवाद क्षान्ति – सौख्यम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

प्रस्तुत पाठ महर्षि व्यास द्वारा प्रणीत महाभारत से संगृहीत है। धृतराष्ट्र के सारथी संजय को दिव्य-दृष्टि व्यास जी ने ही दी थी जिसके द्वारा उसने महाभारत के युद्ध का आँखों देखा वर्णन धृतराष्ट्र को सुनाया था। प्रस्तुत पाठ में महाभारत के युद्ध के अन्त में शर-शय्या पर (UPBoardSolutions.com) लेटे हुए भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर को दिये गये उपदेश का अंश है। इस अंश में क्षमा गुण का महत्त्व वर्णित है। क्षमा द्वारा ही मनुष्य को जीवन की सार्थकता प्राप्त होती है और यही उसका सर्वोपरि गुण भी है।

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पाठ-सारांश

युद्धभूमि में घायलावस्था में शर-शय्या पर पड़े हुए, भीष्म पितामह युधिष्ठिर को नैतिकता का उपदेश देते हुए कहते हैं कि मानव-जन्म संसार के समस्त जन्मों में श्रेष्ठ है। जो व्यक्ति इसे पाकर भी प्राणियों से द्वेष करता है, धर्म का अनादर करता है और वासनाओं में डूबा रहता है, वह अपने आपको धोखा देता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति दूसरों के दुःखों को समझकर उन्हें सान्त्वना देता है, दान इत्यादि कर्म करता हुआ सबसे मीठे वचन बोलता है, वह परलोक में भी प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।

क्षमाशील व्यक्ति गाली के प्रत्युत्तर में गाली नहीं देते, वरन् सहिष्णुता का परिचय देते हुए गाली देने वाले को भी क्षमा कर देते हैं। ऐसा करने पर गाली देने वाले का क्रोध स्वयं उसे ही जला डालता है। संसार के माया-मोह में फँसे व्यक्ति की चंचल बुद्धि उसे माया-मोह में और अधिक (UPBoardSolutions.com) लिप्त करती है और वह व्यक्ति इहलोक एवं परलोक में दुःख प्राप्त करता है।

सहनशील एवं क्षमाशील व्यक्ति कभी अभिमान नहीं करते। क्रोध दिलाये जाने पर व गाली दिये जाने पर भी मधुर और प्रिय वचन ही कहते हैं।

दु:ख से छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय यह है कि व्यक्ति दु:ख की चिन्ता ही न करे; क्योंकि चिन्ता करने पर दु:ख घटता नहीं, वरन् बढ़ जाता है। संसार की प्रत्येक वस्तु नाशवान् है। संचय क्षय के द्वारा, ऊँचाई (उन्नति) पतन के द्वारा, संयोग वियोग के द्वारा और जीवन मृत्यु के द्वारा सभी नष्ट हो जाते हैं। इन्द्रियों को वश में रखना, क्षमा, धैर्य, तेज, सन्तोष, सत्य बोलना, लज्जा, हिंसा न करना, व्यसनरहित होना और कार्य में कुशल होना ही सुख के साधन हैं। क्रोध पर नियन्त्रण रखने वाले व्यक्ति समस्त विपत्तियों पर सरलता से विजय प्राप्त करते हैं। ऐसे अक्रोधी व्यक्ति क्रोधी को भी शान्त करने में समर्थ होते हैं। क्षमाशील एवं देहाभिमान से रहित व्यक्ति को संसार की किसी भी वस्तु से डर नहीं रहता।

पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1)
यो दुर्लभतरं प्राप्य मानुषं द्विषते नरः।
धर्मावमन्ता कामात्मा भवेत् स खलु वञ्चते ॥

शब्दार्थ यः = जो। दुर्लभतरं = कठिनाई से प्राप्त होने वाला प्राप्य = प्राप्त करके। मानुषम् = मनुष्य जन्म को। द्विषते = द्वेष करता है। धर्मावमन्ता = धर्म का अनादर करने वाला। कामात्मा = वासनाओं में आसक्त रहने वाला। खलु = निश्चय ही। वञ्चते = अपने को धोखा देता है।

सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तके ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘क्षान्ति-सौख्यम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा। ]

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प्रसग प्रस्तुत श्लोक में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को उपदेश देते हैं कि इस संसार में मनुष्य जन्म पाकर व्यक्ति को धर्म का निरादर नहीं करना चाहिए।

अन्वय यः नरः दुर्लभतरं मानुषं (जन्म) प्राप्य द्विषते, धर्मावमन्ता कामात्मा (च) भवेत्, सः खलु (आत्मनं) वञ्चते।।

व्याख्या जो मनुष्य अन्य जन्मों से अधिक दुर्लभ मनुष्य के जन्म को पाकर प्राणियों (UPBoardSolutions.com) से द्वेष करता है, धर्म का अनादर करने वाला और वासनाओं में आसक्ति रखने वाला होता है, वह निश्चय ही अपने आप को धोखा देता है।

(2)
सान्त्वेनानप्रदानेन प्रियवादेन चाप्युत।
समदुःखसुखो भूत्वा स परत्र महीयते ॥ [2013, 14]

शब्दार्थ सान्त्वेन = सान्त्वना के द्वारा। अन्नप्रदानेन = अन्न (भोजन) देकर। प्रियवादेन = प्रिय वचन बोलकर। समदुःखसुखःभूत्वा = दुःख और सुख में समान भाव रखने वाला होकर। परत्र = परलोक में। महीयते = प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में भीष्म पितामह इहलोक और परलोक में प्रतिष्ठा-प्राप्ति के साधनों के विषय में बता रहे हैं।

अन्वय सः सान्त्वेन अन्न प्रदानेन उत प्रियवादेन च अपि समदु:खसुख: भूत्वा परत्र महीयते।

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व्याख्या वृह मनुष्य सान्त्वना (तसल्ली बँधाने वाले शब्दों) से, अन्न (भोजन) के दान से अथवा प्रिय वचन के बोलने से भी सुख और दुःख को समान समझने वाला होकर परलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति सांसारिक प्राणियों के कष्ट दूर करके स्वयं समभाव में स्थित हो जाता है, (UPBoardSolutions.com) उसे परलोक में भी सम्मान मिलता है।

(3)
आक्रुश्यमानो नाक्रुश्येन्मन्युरेनं तितिक्षतः।
आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं च तितिक्षतः॥

शब्दार्थ आक्रुश्यमानः = गाली दिया (अपशब्द कहा) जाता हुआ। न आक्रुश्येत् = गाली नहीं देनी चाहिए। मन्युः = दबा हुआ क्रोध। एनं = इस। तितिक्षतः = क्षमाशील व्यक्ति का। आक्रोष्टारम् = गाली देने वाले को। निर्दहति = जला देता है। सुकृतम् = पुण्य च = और।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में भीष्म पितामह द्वारा क्षमाशील व्यक्ति के पुण्य-संचय का उल्लेख किया गया है।

अन्वय आक्रुश्यमानः न आक्रुश्येत्। तितिक्षत: मन्युः एनम् आक्रोष्टारं निर्दहति, तितिक्षत: च सुकृतम् (भवति)।

व्याख्या दूसरों के द्वारा गाली दिये जाने पर भी व्यक्ति को बदले में गाली नहीं देनी चाहिए। (गाली को) क्षमा (सहन) केर देने वाले व्यक्ति को क्रोध उस गाली देने वाले को पूर्णतया जला देता है और क्षमा करने वाले का पुण्य होता है। तात्पर्य यह है कि गाली देने वाला व्यक्ति नष्ट हो जाता है और गाली सह लेने वाले को पुण्य होता है।

(4)
सक्तस्य बुद्धिश्चलति मोहजालविवर्धिनी।
मोहजालावृतो दुःखमिह चामुत्र चाश्नुते ॥

शब्दार्थ सक्तस्य = संसार के प्रति आसक्ति रखने वाले का। बुद्धिः = बुद्धि। चलति = चलायमान रहती है, अस्थिर रहती है, भटकती रहती है। मोहजालविवर्धिनी = मोहजाल को बढ़ाने वाली। मोहजालावृतः = मोहरूपी जाल में फँसकर यह व्यक्ति। इह = इस लोक में। (UPBoardSolutions.com) अमुत्र = परलोक में। अश्नुते = प्राप्त करता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में भीष्म पितामह द्वारा सुख-दु:ख प्राप्ति के कारणों पर प्रकाश डाला गया है।

अन्वय सक्तस्य मोहजालविवर्धिनी बुद्धिः चलति। मोहजालावृतः (सह) इह च अमुत्र च दु:खम् अश्नुते।

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व्याख्या संसार से अत्यधिक लगाव (आसक्ति) रखने वाले व्यक्ति की मोहजाल को बढ़ाने वाली बुद्धि गतिशील रहती है, अर्थात् भटकती रहती है। मोहजाल में फंसा हुआ व्यक्ति इसे लोक में और परलोक में भी दुःख प्राप्त करता है। तात्पर्य यह है कि सुख चाहने वाले व्यक्ति को संसार में आसक्त नहीं होना चाहिए।

(5)
अतिवादस्तितिक्षेत नाभिमन्येत कञ्चन।
क्रोध्यमानः प्रियं ब्रूयादाक्रुष्टः कुशलं वदेत्॥

शब्दार्थ अतिवादान् = कटु वचनों को। तितिक्षेत = सहन करना चाहिए। न अभिमन्येत = अभिमान प्रकट नहीं करना चाहिए। कञ्चन = किसी के प्रति क्रोध्यमानः = क्रोध का शिकार होने पर भी अर्थात् किसी के द्वारा क्रोध दिलाये जाने पर भी। प्रियं ब्रूयात् = प्रिय बोलना चाहिए। आक्रुष्टः =गाली दिये जाने पर कुशलं वदेत् =हितकर वचन बोलना चाहिए।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सज्जनों के स्वभाव का उल्लेख किया गया है।

अन्वय अतिवादान् तितिक्षेत। कञ्चन न अभिमन्येत। क्रोध्यमानः प्रियं ब्रूयात्। आक्रुष्टः कुशलं वदेत्।।

व्याख्या सज्जनों को कटु वचनों को सहन करना चाहिए। किसी के प्रति अभिमान प्रकट नहीं करना चाहिए; अर्थात् स्वयं को बड़ा और अन्य को छोटा मानकर व्यवहार नहीं करना चाहिए। क्रोध दिलाये जाने पर भी प्रिय वचन बोलना चाहिए; अर्थात् दूसरों के द्वारा उत्तेजित किये जाने (UPBoardSolutions.com) पर भी मधुर वचन ही बोलना चाहिए। गाली दिये जाने पर; अर्थात् अपशब्द कहे जाने पर भी कुशल वचन बोलना चाहिए।

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(6)
भैषज्यमेतद् दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तयेत्।
चिन्त्यमानं हि नव्येति भूयश्चापि प्रवर्धते ॥ [2007]

शब्दार्थ भैषज्यम् = औषध। एतत् = यह दुःखस्य = दुःख की। यत् = कि। एतत् = इसके बारे में। न अनुचिन्तयेत् = चिन्तन नहीं करना चाहिए। चिन्त्यमानम् = सोचा जाता हुआ। हि = क्योंकि नव्येति = कम नहीं होता है, घटता नहीं है। भूयश्चापि (भूयः + च + अपि) = वरन् और भी (अधिक)। प्रवर्धते = बढ़ता है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में दु:ख-निवारण के उपाय के विषय में बताया गया है।

अन्वय एतद् दुःखस्य भैषज्यम् (अस्ति) यत् एतत् न अनुचिन्तयेत् हि चिन्त्यमानम् (दुःखम्) न व्येति, भूयः च अपि प्रवर्धते।।

व्याख्या यह दुःख की औषध है कि इसकी (इसके बारे में) चिन्ता (सोचना) नहीं करनी चाहिए: क्योंकि चिन्तन किया गया दु:खे कम नहीं होता है, अपितु और भी बढ़ जाता है। तात्पर्य यह है कि दुःख को भूलने का प्रयास करना चाहिए।

(7)
सर्वे क्षयान्ताः निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्याः।
संयोगाः विप्रयोगान्ताः मरणान्तं हि जीवितम् ॥ [2009, 10]

शब्दार्थ सर्वे = सभी। क्षयान्ताः = क्षय में अन्त वाले; अर्थात् अन्त में नष्ट हो जाने वाले। निचयाः = संग्रह। पतनान्ताः = पतन में अन्त वाले; अर्थात् अन्त में नीचे गिरने वाले। समुच्छ्याः = ऊँचाइयाँ, उत्थान, उन्नति। संयोगाः = संयोग, मिलन। विप्रयोगान्ताः = वियोग में अन्त वाले; अर्थात् अन्त में बिछुड़ जाने वाले मरणान्तम् = मरण में अन्त वाला; अर्थात् अन्त में मर जाने वाला हि = निश्चय ही। जीवितम् = जीवित, जन्म।

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प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में जीवन में सुख-दुःख से सम्बन्धित स्थितियों के साथ-साथ रहने तथा अन्तत: सभी स्थितियों का पर्यवसान होने की बात कही गयी है।

अन्वय सर्वे निचयाः क्षयान्ताः (सन्ति); (सर्वे) समुच्छुयाः पतनान्ताः (सन्ति)। (सर्वे) संयोगा: विप्रयोगान्ताः (सन्ति)। (सर्वेषां) जीवितं हि मरणान्तम् (अस्ति)।

व्याख्या सभी संग्रह क्षय में अन्त वाले हैं; अर्थात् नष्ट हो जाने वाले हैं। सभी ऊँचाइयाँ पतन में अन्त वाली हैं; अर्थात् सभी पतन को प्राप्त हो जाने वाले हैं। सभी संयोग वियोग में अन्त वाले हैं; अर्थात् सभी मिलने वाले अन्त में बिछुड़ जाने वाले हैं। सभी जीवन निश्चित ही मृत्यु में अन्त वाले हैं; (UPBoardSolutions.com) अर्थात् सभी जीवधारी अन्ततः मृत्यु को प्राप्त हो जाएँगे। तात्पर्य यह है कि जब सब कुछ एक दिन समाप्त हो ही जाने वाला है तब इसके लिए व्यक्ति को नाना प्रकार के कुकर्म नहीं करने चाहिए।

(8)
दमः क्षमा धृतिस्तेजः सन्तोषः सत्यवादिता ।।
ह्रीरहिंसाऽव्यसनिता दाक्ष्यं चेति सुखावहाः ॥ [2008, 13]

शब्दार्थ दमः = इन्द्रियों को वश में रखना। धृतिः = धैर्य, धीरता। सत्यवादिता = सत्य बोलना। हीः = लज्जा। अव्यसनिता = दुर्व्यसनों से रहित होना। दाक्ष्यम् = कार्य की कुशलता। सुखावहाः = सुख देने वाले।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में मानव-जीवन को सुखी बनाने वाले गुणों पर प्रकाश डाला गया है।

अन्वय दमः, क्षमा, धृतिः, तेजः, सन्तोषः, सत्यवादिता, ह्रीः, अहिंसा, अव्यसनिता दाक्ष्यम् च-इति (दश गुणाः) सुखावहाः (सन्ति)।

व्याख्या मन और इन्द्रियों को वश में रखना, क्षमा, धैर्य, तेज, सन्तोष, सत्य बोलना, लज्जा, हिंसा न करना, व्यसनों से रहित होना और कार्य की कुशलता-ये दस गुण सुख देने वाले हैं। तात्पर्य यह है कि इन गुणों से युक्त व्यक्ति कभी दुःखी नहीं होता।

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(9)
ये क्रोधं सन्नियच्छन्ति क्रुद्धान् संशमयन्ति च।
न कुप्यन्ति च भूतानां दुर्गाण्यति तरन्ति ते ॥

शब्दार्थ ये = जो लोग। क्रोधं = क्रोध को। सन्नियच्छन्ति =नियन्त्रित रखते हैं। क्रुद्धान् = क्रोधित हुए व्यक्तियों को। संशमयन्ति = शान्त करते हैं। न कुप्यन्ति = क्रोध नहीं करते हैं। च = और। भूतानि = प्राणियों पर। ते = वे। दुर्गाणि = दुर्गम स्थानों को, विषम परिस्थितियों को। अति तरन्ति = पार कर जाते हैं।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में क्रोध पर नियन्त्रण करने का सन्देश दिया गया है।

अन्वय ये क्रोधं सन्नियच्छन्ति, क्रुद्धान् च संशमयन्ति, भूतानां च न कुप्यन्ति, ते दुर्गाणि अतितरन्ति।

व्याख्या जो लोग क्रोध को वश में रखते हैं तथा क्रोधित हुओं को शान्त करते हैं और प्राणियों पर क्रोध नहीं करते हैं, वे अत्यधिक कठिनाइयों; अर्थात् विषम परिस्थितियों को पार कर लेते हैं। तात्पर्य यह है कि क्रोध सबसे बड़ा शत्रु होता है। उसे अपने से दूर रखना चाहिए।

(10)
अभयं यस्य भूतेभ्यो भूतानामभयं यतः।
तस्य देहाविमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ॥ [2006,09,14]

शब्दार्थ अभयं = भय नहीं है। यस्य = जिसको भूतेभ्यः = प्राणियों से। भूतानाम् = प्राणियों को। यतः = जिससे। तस्ये = उसका। देहाद् विमुक्तस्य = शरीर से मुक्ति प्राप्त हुए; अर्थात् देह अभिमान से रहित। भयं नास्ति = भय नहीं रहता है। कुतश्चन = कहीं से भी।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में भयमुक्ति का उपाय बताया गया है।

अन्वय यस्य भूतेभ्यः अभयम् (अस्ति), यतः भूतानाम् अभयम् (अस्ति)। देहाद् विमुक्तस्य तस्य कुतश्चन भयं न अस्ति।।

व्याख्या जिसको प्राणियों से भय नहीं है, जिससे प्राणियों को भय नहीं है। शरीर से मुक्ति प्राप्त किये हुए; अर्थात् देह-अभिमान से रहित हुए व्यक्ति को कहीं से या किसी से भय नहीं है।

सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1) यो दुर्लभतरं प्राप्य मानुषं द्विषते नरः। [2009]

सन्दर्भ प्रस्तुत सूक्तिपरक पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘क्षान्ति-सौख्यम्’ पाठ से अवतरित है।

[ संकेत इस पाठ की शेष सभी सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में मनुष्य-जन्म को दुर्लभ बताने के साथ-साथ द्वेषरहित होना भी (UPBoardSolutions.com) आवश्यक बताया गया है। अर्थ जो मनुष्य दुर्लभतर मनुष्य जीवन को प्राप्त करके द्वेष करता है (वह स्वयं को धोखा देता है)।

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व्याख्या भारतीय वाङमय के अनुसार समस्त जीवधारियों की चौरासी लाख (84,00,000) योनियाँ अर्थात् जन्म माने गये हैं, जिनके अण्डज, स्वेदज, उभिज और जरायुज चार विभाग हैं। इन समस्त योनियों अर्थात् जन्मों में मनुष्य-जन्म को दुर्लभतर की श्रेणी में रखा गया है। इस दुर्लभ श्रेणी के व्यक्ति को द्वेष से । रहित होना चाहिए। द्वेष को व्यक्ति का अति सामान्य दुर्गुण माना जाता है। इसीलिए अत्यन्त दुर्लभ मानव शरीर प्राप्त करने वाला लोगों से द्वेष करता रहे और अपने कर्तव्यों के प्रति ध्यान न रखे तो ऐसा जीवन प्राप्त करना व्यर्थ है, क्योंकि ऐसा व्यक्ति स्वयं को ही धोखा देता है।

(2) धर्मावमन्ता कामात्मा भवेत् स खलु वञ्चते। [2006]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में कामनाओं में आसक्त रहने वाले और धर्म की निन्दा करने वाले व्यक्ति की स्थिति पर प्रकाश डाला गया है।

अर्थ धर्म का अनादर करने वाला और वासनाओं में आसक्त रहने वाला स्वयं को ही धोखा देता है।

व्याख्या जो व्यक्ति विषय-वासनाओं अथवा कामनाओं में आसक्त रहकर धर्म की उपेक्षा करता है, उसका अनादर करता है, ऐसा करके वह किसी दूसरे की हानि नहीं करता वरन् स्वयं अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है, अर्थात् अपनी ही हानि करता है। इसका कारण यह है कि धर्म व्यक्ति में कर्तव्य-अकर्तव्य तथा औचित्य-अनौचित्य का विवेक उत्पन्न करता है। इससे व्यक्ति पापकर्मों से विरत रहता है और सदैव पुण्य कर्म करने का प्रयास करता है। इसके परिणामस्वरूप वह (UPBoardSolutions.com) उच्च से उच्चतर और अन्तत: परमपद का अधिकारी बनता है। इसके विपरीत धर्म का अनादर करने वाला और विषयी व्यक्ति केवल पापकर्मों का संचय करता है तथा जीवन-मरण के चक्र में फँसा ही रहता है, उससे कभी निकल नहीं पाता। अत: ऐसा करने वाला व्यक्ति स्वयं को ही धोखा देता है, किसी अन्य को नहीं।

(3) मोहजालावृतो दुःखमिह चामुत्र चाश्नुते।।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में सुख-दु:ख प्राप्ति के कारणों पर प्रकाश डाला गया है।

अर्थ मोह के जाल में फंसा हुआ प्राणी दोनों ही लोकों में दुःख भोगता है।

व्याख्या माया-मोह के जाल में फंसे हुए व्यक्ति को प्रत्येक क्षण और अधिक धन-सम्पत्ति अर्जित करने की चाह बनी रहती है और वह उसकी प्राप्ति के लिए सभी प्रकार के उचित-अनुचित उपायों का प्रयोग करता है। इस प्रकार और अधिक धन प्राप्त करने की चाह में वह अर्जित साधनों और धन-सम्पत्ति का उपयोग करते हुए भी उनसे कोई सुख प्राप्त नहीं कर पाता। परलोक में सुख प्राप्त करने के लिए भी वह कोई सद्कर्म नहीं कर पाता; क्योंकि उसके मन से माया-मोह का जाल नहीं हट पाता। इस प्रकार से माया-मोह में हँसा व्यक्ति ने तो इस लोक में सुख प्राप्त कर सकता है और न परलोक में।

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(4) भैषज्यमेतद् दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तयेत्।।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में दु:ख-निवारण का उपाय बताया गया है।

अर्थ यह दुःख की औषध है कि उसका चिन्तन नहीं करना चाहिए।

व्याख्या सुख और दुःख व्यक्ति के अपने हाथ में नहीं होते और न ही इनको किसी प्रकार से नियन्त्रित किया जा सकता है। दुःख की जितनी अधिक चिन्ता की जाती है, वह बढ़ता ही जाता है। उसे किसी औषध के द्वारा दूर नहीं किया जा सकता। औषध भी तभी कार्य करती है, जब व्यक्ति मानसिक रूप से दुःख से लड़ने के लिए उद्यत हो। इसलिए यदि व्यक्ति अपने दुःख को दूर करना चाहता है तो उसे दु:ख के विषय में सोचना छोड़ देना चाहिए। जब वह दु:ख के विषय में न सोचकर सुख के विषय में सोचेगा और यह अनुभव करेगा कि वह अन्य बहुत-से लोगों से सुखी है तो निश्चित रूप से उसके मन को सुख-शान्ति मिलेगी। वास्तव में सुख-दु:ख कुछ भी नहीं हैं, ये तो केवल मन के विकल्प हैं। व्यक्ति जैसा सोचेगा, उसे वैसा ही अनुभव होगा। यदि वह अपने मन में स्वयं को सुखी मानेगा तो उसे सुख का अनुभव होगा और दुःखी मानेगा तो उसे दु:ख का अनुभव होगा।

(5) सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्याः। [2009, 11, 12, 15]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में संसार की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डाला गया है।

अर्थ सभी संग्रह नाशवान् और सभी ऊँचाइयाँ पतन में अन्त वाली हैं।

व्याख्या इस संसार में जितने भी संग्रह हैं, वे सब एक-न-एक दिन समाप्त अवश्य होंगे, अर्थात् उनका नाश अवश्यम्भावी है। जितनी भी ऊँची-ऊँची वस्तुएँ और भवन आदि हमें दिखाई देते हैं, एक दिन वे सब भी धराशायी हो जाएँगे। हमने उन्नतिरूपी जितनी भी ऊँचाइयाँ प्राप्त की हैं, एक दिन उनका (UPBoardSolutions.com) पतन भी अवश्य होगा। आशय यह है कि यहाँ कुछ भी शाश्वत नहीं है, वरन् क्षणभंगुर है। अतः व्यक्ति को इस संसार में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए।

(6)
संयोगाः विप्रयोगान्ताः मरणान्तं हि जीवितम्। [2006, 08,09,11]
मरणान्तं हि जीवितम्।।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में मृत्यु की शाश्वतता पर प्रकाश डाला गया है।

अर्थ मिलन की अवधि वियोग और जीवन की अवधि मृत्यु है।

व्याख्या यह संसार दुःखप्रधान है। इसमें संयोग के क्षण अत्यल्प हैं, जब कि वियोग चिरकालीन है। प्रत्येक सुख का अन्त::दु:ख है, किन्तु प्रत्येक दुःख का अन्त सुख नहीं है। जो आज है, वह कल नहीं रहेगा और जो कल रहेगा वह आगे नहीं रह जाएगा। जो मिला है, वह बिछुड़ता भी अवश्य है और जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है; अर्थात् जीवन की अन्तिम परिणति मृत्यु है; अत: व्यक्ति को इस संसार में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए।

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श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) यो दुर्लभतरं ……………………………………………………………….. खलु वञ्चते ॥ (श्लोक 1) [2013]
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महापुरुष: भीष्मः युधिष्ठिरम् उपदिशति-य: नरः दुर्लभतरं मनुष्य-जन्म प्राप्य जीवेभ्यः द्वेषं केरोति, स: धर्मस्य अवमन्ता कामात्मा च भवेत्, सः खलु स्व-आत्मानं वञ्चते।

(2) आक्रुश्यमानो ……………………………………………………………….. च तितिक्षतः ॥ (श्लोक 3)
संस्कृतार्थः महात्मा भीष्मः कथयति—यः पुरुषः आक्रुष्यमानः अपि क्रोधं न कुर्वति क्रोधमपि सहते, आक्रुष्टारम् अपि क्षमा करोति; सः क्षमाशील: पुरुष: पुण्यशाली भवति।

(3) भैषज्यमेतद् दुःखस्य ……………………………………………………………….. भूयश्चापि प्रवर्धते ॥ (श्लोक 6) (2009)
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके भीष्मपितामहः युधिष्ठिरम् उपदिशः–अस्मिन् संसारे दुःखस्य निवृत्तेः एकमात्र उपायः अस्ति यत् तस्य चिन्तनं न कुर्यात। एतत् दुःखस्य औषधम् अस्ति। यतः चिन्त्यमानं दुःखम् अल्पतां न प्राप्नोति, अपितु अत्यधिकं वृद्धि प्राप्नोति।

(4) सर्वे क्षयान्ताः ……………………………………………………………….. हि जीवितम् ॥ (श्लोक 7) [201]
संस्कृतार्थः महर्षिः वेदव्यासः कथयति यत् संसारे ये सङ्ग्रहा: सन्ति, अन्ते तेषां विनाशः (UPBoardSolutions.com) भवति, ये चे उत्तुङ्गाः सन्ति, अन्ते तेषां पतनम् अवश्यं भवति। संयोगा: अन्ते वियोगरूपे परिणताः भवन्ति, एवमेव जीवितम् अपि अन्ते मृत्युं प्राप्नोति।।

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(5) दमः क्षमा ……………………………………………………………….. चेति सुखावहाः ॥ (श्लोक 8) [2008, 15]
संस्कृतार्थः महात्मा भीष्मः कथयति यत् जीवने इन्द्रियाणां नियन्त्रणः, क्षमा, धैर्यं, तेजः, सन्तोषः सत्यवादिता, लज्जा, अहिंसा, दुर्व्यसनरहिता, कार्यदक्षता च इति सुखसाधनाः सन्ति।

(6) ये क्रोधं ………………………………………………………………..“तरन्ति ते ॥ (श्लोक 9) [2007, 10, 15)
संस्कृतार्थः महात्मा भीष्मः कथयति यत् ये जनाः क्रोधं सन्नियच्छन्ति, क्रुद्धान् च संशमयन्ति, जीवानां च क्रोधं न कुर्वन्ति, ते जना: दुर्गाणि अतितरन्ति। क्रोध: मनुष्यस्य महद्रिपुः अस्ति; अतः मनुष्यः क्रोधं न कुर्यात् अत्र इति भावः।।

(7) अभयं यस्य ……………………………………………………………….. कुतश्चन ॥ (श्लोक 10) [2006, 08, 12]
संस्कृतार्थः महात्मा भीष्मः कथयति यत् यस्य भूतेभ्यः अभयं भवति, यतः भूतानाम् अभयं प्राप्नोति, (UPBoardSolutions.com) तस्मात् देहात् विमुक्तस्य पुरुषस्य कुतश्चन भयं न भवति।

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Class 10 Sanskrit Chapter 6 UP Board Solutions ज्ञानं पूततरं सदा Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 6 Gyanam Puttaram Sada Question Answer (कथा – नाटक कौमुदी)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 6 हिंदी अनुवाद ज्ञानं पूततरं सदा के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

संस्कृत कथा-साहित्य के शिरोमणि, कश्मीरी पण्डित सोमदेव की अनुपम रचना ‘कथासरित्सागर’ है। इनके स्थिति-काल और परिवार का कोई भी परिचय अद्यावधि उपलब्ध नहीं है। इन्हें कश्मीर के राजा अनन्त का आश्रित माना जाता है तथा उन्हीं के स्थिति-काल से इनके स्थिति-काल का भी अनुमान किया जाता है। ‘कथासरित्सागर’ नाम से ही इस ग्रन्थ में अनेक कथाओं का होना स्पष्ट है। इसकी अधिकांश कथाएँ गुणाढ्य की ‘बृहत्कथा’ (UPBoardSolutions.com) से ली गयी हैं। ‘कथासरित्सागर’ में 18 लम्बक, 124 तरंग और 21,389 पद्य हैं। ‘पञ्चतन्त्र’ और ‘हितोपदेश’ के समान ही इसकी कथाओं में भी मुख्य कथा के भीतर अनेक छोटी-छोटी अन्तर्कथाएँ निहित हैं। इसमें पशु-पक्षियों, भूत-पिशाचों, मायावी कन्याओं, जादू-टोने, राजाओं, राज्यतन्त्र के षड्यन्त्रों इत्यादि विषयों को लेकर अनेकानेक कथाएँ लिखी गयी हैं, जिनमें से कुछ सत्य पर आधारित हैं तो कुछ नितान्त कपोल-कल्पित। रचना की भाषा-शैली के रोचक, सरल और प्रवाहपूर्ण होने के कारण कहानियाँ व तत्सम्बन्धित ज्ञान हृदयग्राही हैं।

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पाठ-सारांश

दीपकर्णि को शंकर द्वारा पुत्र-प्राप्ति का उपाय बताना – प्राचीनकाल में दीपकर्णि नाम के एक पराक्रमी राजा थे। उनकी शक्तिमती नाम की पत्नी थी। एक दिन उपवन में सोते हुए उसको साँप ने काट लिया और उसकी मृत्यु हो गयी। प्राणों से अधिक प्रिय रानी के दु:ख से दु:खी होकर पुत्रहीन होने पर भी दीपकर्ण ने दूसरा विवाह नहीं किया। एक बार स्वप्न में भगवान् शंकर ने उसे आदेश दिया कि “दीपकर्णि वन में घूमते हुए सिंह पर सवार जिस बालक को तुम देखोगे, उसे लेकर घर आ जाना। वही तुम्हारा पुत्र होगा।”

राजा को पुत्र की प्राप्ति – एक दिन वह राजा शिकार खेलने के लिए जंगल में गया। वहाँ उसने सूर्य के समान तेजस्वी एक बालक को सिंह पर आरूढ़ देखा। राजा ने स्वप्न के अनुसार जल पीने के इच्छुक उस सिंह को बाण से मार दिया। तब सिंह उस शरीर को छोड़कर पुरुष की (UPBoardSolutions.com) आकृति का हो गया।

पुरुषाकृति द्वारा राजा को अपना वृत्तान्त सुनाना – राजा के पूछने पर उसने बताया कि मैं कुबेर का मित्र ‘सात’ नाम का यक्ष हूँ। मैंने पहले एक ऋषि कन्या को गंगा के समीप देखा था और उससे गान्धर्व विधि से विवाह कर अपनी पत्नी बना लिया। उसके बन्धुओं ने क्रोध में आकर शाप दिया कि तुम दोनों सिंह हो जाओ। उसके शाप से हम दोनों सिंह हो गये। सिंहनी तो पुत्र को जन्म देते ही मृत्यु को प्राप्त हो गयी। मैंने इस पुत्र का दूसरी सिंहनियों के दूध से पालन किया है। अब आपका बाण लगने से मैं भी शाप-मुक्त हो गया हूँ। अब आप इस पुत्र को स्वीकार कीजिए, यह कहकर वह यक्ष अन्तर्हित हो गया।

बालक का नामकरण – राजा उस बालक को लेकर घर आ गया और सात नामक यक्ष पर आरूढ़ होने के कारण उसका नाम सातवाहन रख दिया। कालान्तर में दीपकर्णि के वन चले जाने पर अर्थात् वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश करने पर सातवाहन सार्वभौम राजा हो गया।

रानी द्वारा सातवाहन का अपमान – इसके बाद किसी समय सातवाहन देवी के उद्यान में बहुत समय तक घूमता हुआ जल-क्रीड़ा करने के लिए वापी में उतर गया। वहाँ पत्नी के साथ परस्पर जल डालकर क्रीड़ा करता रहा। उसकी एक कोमलांगी रानी जल-क्रीड़ा करती हुई थक गयी और राजा से बोली-राजन्! ‘मोदकै ताडय’ (मुझे जल से मत मारो)। राजा ने इसका अर्थ ‘मुझे लड्डुओं से मारो’ समझकर बहुत-से लड्डू मँगवाये। तब रानी (UPBoardSolutions.com) हँसकर बोली-राजन्! जल में लड्डुओं का क्या काम? मैंने तो मुझे जल से मत मारो’ ऐसा कहा था। तुम कैसे अल्पज्ञ हो, जो ‘मा’ और ‘उदकैः’ की सन्धि और प्रकरण भी नहीं जानते हो। यह सुनकर राजा अत्यधिक लज्जित हुआ और उसी क्षण जल-क्रीड़ा छोड़कर घर आ गया और पूछने पर कुछ भी नहीं बोला। मैं पाण्डित्य या मृत्यु को प्राप्त करूंगा, इस प्रकार सोचते हुए वह दु:खी हो गया।

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गुणाढ्य और शर्ववर्मा का राजा के पास जाना – राजा की ऐसी दशा देखकर सब सेवक घबरा गये। गुणाढ्य और शर्ववर्मा उसकी उस दशा को जान गये। उन्होंने राजहंस नाम के सेवक को भेजकर अन्य रानियों से कारण जान लिया कि विष्णुशक्ति की पुत्री ने उसकी यह दशा की है। यह सुनकर शर्ववर्मा ने सोचते हुए जान लिया कि राजा के सन्ताप का कारण बुद्धिमान न होना है। वह हमेशा पाण्डित्य चाहता रहा है। इसी कारण राजा अपमानित है। इस प्रकार आपस में विचार करते हुए शर्ववर्मा और गुणाढ्य प्रातः होते ही राजा के भवन में गये और उसके पास बैठकर उसकी उदासी का कारण पूछा।

शर्ववर्मा द्वारा प्रतिज्ञा करना – राजा के उत्तर न देने पर शर्ववर्मा ने कहा कि मैंने आज स्वप्न में आकाश से गिरे हुए एक कुसुम में से निकल कर श्वेतवस्त्रधारिणी एक सुन्दर स्त्री को आपके मुख में प्रवेश करते देखी है। मुझे तो वह साक्षात् सरस्वती जान पड़ी। निश्चय ही आप शीघ्र विद्वान् हो जाएँगे। मन्त्री गुणाढ्य ने कहा कि “राजन्! मनुष्य सभी विद्याओं में प्रमुख व्याकरण का बारह वर्षों में ज्ञाता हो जाता है। परन्तु मैं आपको छः वर्षों में ही इसका (UPBoardSolutions.com) ज्ञान करा सकता हूँ।” ऐसा सुनकर वहीं पर खड़े शर्ववर्मा ने छः महीने में ही सिखाने को कहा। यह सुनकर क्रोध से गुणाढ्य ने कहा कि यदि महाराज को तुमने छः महीने में ही शिक्षित कर दिया तो मैं संस्कृत, प्राकृत और देशभाषा तीनों का व्यवहार नहीं करूंगा। शर्ववर्मा ने कहा कि यदि मैं छ: महीने में न सिखा सका तो बारह वर्ष तक आपकी खड़ाऊँ ढोऊँगा। शर्ववर्मा ने अपनी उस कठोर प्रतिज्ञा को अपनी पत्नी से बताया।

राजा का विद्वान् होना – अपनी पत्नी की सलाह पर शर्ववर्मा मौन धारण करके कार्तिकेय के मन्दिर में जाकर कठोर तपस्या करने लगा। कार्तिकेय ने प्रसन्न होकर वरदान दिया। उसने राजा को समस्त विद्याएँ प्रदान कर दीं। राजा विद्वान् हो गया और (UPBoardSolutions.com) उसने प्रसन्न होकर शर्ववर्मा को भरुकच्छ प्रदेश का राज्य दे दिया। विष्णुशक्ति की पुत्री को भी उसने अपनी प्रधान रानी बना लिया।

चरित्र-चित्रण

शर्ववर्मा [2006]

परिचय शर्ववर्मा राजा सातवाहन का विश्वासपात्र मन्त्री है। वह राजा का कल्याण चाहने वाला, विद्याओं में निपुण एवं बुद्धिमान व्यक्ति है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. राजा का शुभचिन्तक – शर्ववर्मा अपने स्वामी राजा सातवाहन का कल्याण चाहने वाला सच्चा शुभचिन्तक मन्त्री है। यही कारण है कि वह राजा की अस्वस्थता का समाचार सुनते ही प्रधान अमात्य गुणाढ्य के साथ राजा के पास पहुँच जाता है। राजा की आन्तरिक (UPBoardSolutions.com) पीड़ा को समझकर कमल में से सरस्वती के निकलने और राजा के मुख में प्रवेश करने का स्वप्न सुनाकर राजा को विद्वान् होने के लिए पूर्ण आश्वस्त कर देता है। उसकी इस सान्त्वना से राजा की चिन्ता दूर हो जाती है।

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2. बुद्धिमान् – शर्ववर्मा अत्यन्त बुद्धिमान है। उसकी बुद्धि दुरूह विषयों को भी सरलता से हल कर देती है। वह मानव-मनोविज्ञान का पारंगत वेत्ता मन्त्री है। वह राजा की चिन्ता का कारण उसका विद्वान् न होना जान लेता है। जैसा कि उसके कथन-“अहं जानाम्यस्य राज्ञः मौख्नु तापतः मन्युः” से स्पष्ट होता है। वह बुद्धि के बल पर राजा को छ: मास में संस्कृत व्याकरण का ज्ञान कराकर उसे श्रेष्ठ विद्वानों की श्रेणी में बिठाता है।

3. तपस्वी एवं कर्मनिष्ठ – राजा को विद्वान् बनाने के लिए शर्ववर्मा कार्तिकेय के मन्दिर में मौन धारण करके निराहार कठोर तपस्या करता है और कार्तिकेय के वरदान से प्राप्त समस्त विद्याओं के ज्ञान को वह राजा सातवाहन को प्रदत्त कर देता है।

4. दृढ़-प्रतिज्ञ – शर्ववर्मा राजा को छ: मास में ही विद्वान् बनाने की कठोर प्रतिज्ञा करता है और अपनी प्रतिज्ञा की पूर्ति के लिए कार्तिकेय के मन्दिर में घोर तपस्या करता है तथा छः माह के अन्दर राजा को समस्त विद्याएँ सिखाकर अपनी प्रतिज्ञा का पालन करता है।

5. साहसी – शर्ववर्मा सारी विद्याएँ राजा को छ: माह में सिखाने की बात कहकर अपूर्व साहस का परिचय देता है। वह नम्रतापूर्वक सारी बात अपनी पत्नी से बताता है और उसके बताये उपाय के अनुसार निराहार रहकर कार्तिकेय के मन्दिर में तपस्या करता है। (UPBoardSolutions.com) उसकी यह घोषणा कि वह राजा को छ: माह में ही विद्वानों की श्रेणी में ला देगा, उसके अपूर्व साहस का ही परिचायक है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि शर्ववर्मा राजा का शुभचिन्तक; योग्य मन्त्री, दृढ़-प्रतिज्ञ, विद्वान्, साहसी और कर्मनिष्ठ व्यक्ति है।

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सातवाहन [2006, 09, 10, 13, 14, 15]

परिचय सात नामक यक्ष को अपना वाहन बनाये जाने के कारण इसका नाम सातवाहन रखा गया था। यह वीर, साहसी और लोक-व्यवहार में निपुण था, किन्तु इसे संस्कृत भाषा का कोई विशेष ज्ञान नहीं था। इसके चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ दृष्टिगत होती हैं

1. वीर और साहसी – बचपन में सिंह आदि वन्यप्राणियों के मध्य पाले जाने के कारण राजा सातवाहन परम वीर और साहसी है। अपने इसी साहस और वीरता के कारण वह आगे चलकर सार्वभौम राजा बनता है। कथा में उसके सार्वभौम राजा होने का वर्णन इस प्रकार किया गया है-”भूपतिः सातवाहनः सार्वभौमो संवृत्तः।”

2. प्राकृत भाषा का ज्ञाता – राजा सातवाहन के राज्य की अधिकांश प्रजा प्राकृत भाषा बोलती है; अत: राजा सातवाहन भी इसी भाषा में पारंगत है। संस्कृत भाषा का उसे बहुत अधिक ज्ञान नहीं है। यही कारण है। कि मोदकैः’ का शुद्ध विच्छेद नहीं कर पाने के कारण वह अपनी रानी के द्वारा अपमानित होता है।

3. प्रेमी – राजा सातवाहन सच्चे प्रेमी हैं। वे अपनी प्रिय रानी की इच्छा को पूर्ण करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। उसके मुख से किसी बात के निकलने के साथ ही राजा उसे पूर्ण करने का उपक्रम कर देते हैं। यही कारण है कि स्नान के समय रानी (UPBoardSolutions.com) के द्वारा ”मौदकै परिताडय” कहते ही राजा तुरन्त लड्डू मँगवाते हैं।

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4. भावुक और मानी – भावुक व्यक्ति को मान-अपमान की बातें अधिक लगती हैं। यही स्थिति राजा सातवाहन की भी है। अपनी रानी द्वारा उपहास का पात्र बनाये जाने पर वे उसी समय प्रतिज्ञा करते हैं कि या तो संस्कृत में पाण्डित्य प्राप्त करूंगा या मृत्यु का वरण कर लूंगा और अन्तत: वे पाण्डित्य प्राप्त करके अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करते हैं। यह घटना उनके भावुक और मानी होने की परिचायक है।

5. कुशाग्रबुद्धि – राजा सातवाहन कुशाग्रबुद्धि हैं, यही कारण है कि वे संस्कृत व्याकरण जैसे कठिन विषय में भी छ: माह में पाण्डित्य प्राप्त कर लेते हैं, जब कि विद्वानों का मानना है कि सतत अध्ययन करने पर व्यक्ति बारह वर्ष में संस्कृत व्याकरण में निपुणता प्राप्त कर लेता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कुशाग्रबुद्धि, वीर, साहसी और स्वाभिमानी होने के साथ-साथ राजा सातवाहन में एक श्रेष्ठ व्यक्ति के समस्त गुण विद्यमान हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वप्ने भगवानिन्दुशेखरः राजानं किमादिदेश?
उत्तर :
भगवान् इन्दुशेखरः स्वप्ने राजानम् आदिदेश यत् अटव्यां (UPBoardSolutions.com) भ्राम्यन् सिंहारूढं कुमारकं द्रक्ष्यसि, तं गृहीत्वा गृहं गच्छे: सः ते पुत्रो भविष्यति।

प्रश्न 2.
सिंहः राजानं किमवदत्? [2006, 15]
उत्तर :
सिंह: राजानम् अवदत् यत् भूपते! अहं धनदस्य सखा सातीनामा यक्षोऽस्मि।

प्रश्न 3.
सिंहारूढं बालकं दृष्ट्वा राजा किमकरोत्। [2009, 13]
उत्तर :
सिंहारूढं बालकं दृष्ट्वा राजा बाणेन सिंहं जघान।

प्रश्न 4.
‘मोदकैर्देव’ इत्यस्य कोऽभिप्रायः?
उत्तर :
‘मोदकैर्देव’ इत्यस्य अभिप्राय: अस्ति–“हे देव! उदकैः मा।”

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प्रश्न 5.
शर्ववर्मणः भार्या स्वपतये किं न्यवेदयत्?
उत्तर :
शर्ववर्मणः भार्या स्वपतये न्यवेदयत् यत् प्रभो! सङ्कटेऽस्मिन् (UPBoardSolutions.com) स्वामिकुमारेण विना तव गतिरन्या न दृश्यते।

प्रश्न 6.
राजा सातवाहनः कथं सर्वाः विद्याः प्राप्तवान्?
उत्तर :
राजा सातवाहनः शर्ववर्मणः माध्यमेन परमेश्वरप्रसादात् सर्वाः विद्याः प्राप्तवान्।

प्रश्न 7.
दीपकर्ण कस्मात् हेतोः अटवीं गतः?
उत्तर :
दीपकर्णि पुत्र प्राप्ति हेतोः अटवीं गतः

प्रश्न 8.
सिंहः कः आसीत्?
उत्तर :
सिंहः धनदस्य सखा ‘सात’ नामकः एकः यक्षः आसीत्।

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प्रश्न 9.
राजानं मूर्ख कथितवती राज्ञी कस्या तनया आसीत्?
उत्तर :
राजानं मूर्ख कथितवती राज्ञी विष्णुशक्त्याः तनया आसीत्।

प्रश्न 10.
कः राजानं सातवाहनं विद्यायुक्तं चकार?
उत्तर :
शर्ववर्मणः राजानं सातवाहनं (UPBoardSolutions.com) विद्यायुक्तं चकार।

प्रश्न 11.
दीपक भार्यायाः किं नाम आसीत्? [2007, 10]
या
‘दीपकणिः’ इति प्राज्यविक्रमस्य राज्ञः भार्यानाम किम्? [2010]
उत्तर :
दीपक भार्यायाः नाम शक्तिमती आसीत्।

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बहुविकल्पीय प्रश्न

अधोलिखित प्रश्नों में प्रत्येक प्रश्न के उत्तर-रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। इनमें से एक विकल्प शुद्ध है। शुद्ध विकल्प का चयन कर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए –
[संकेत – काले अक्षरों में छपे शब्द शुद्ध विकल्प हैं।]

1. ‘ज्ञानं पूततरं सदा’नामक कथा लोककथा साहित्य के किस ग्रन्थ से संकलित है? [2008]

(क) ‘कथासरित्सागर’ से
(ख) ‘जातकमाला’ से
(ग) ‘पञ्चतन्त्रम्’ से
(घ) “हितोपदेशः’ से

2. ‘कथासरित्सागर’ के रचयिता का क्या नाम है? [2007, 09, 12]

(क) बल्लाल सेन
(ख) सोमदेव
(ग) विष्णु शर्मा
(घ) विद्यापति

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3. कश्मीर के निवासी सोमदेव किस राजा के आश्रित कवि थे?

(क) पृथ्वीराज चौहान के
(ख) जयसिंह के
(ग) हर्षवर्द्धन के
(घ) अनन्त के

4. “तं स्वप्ने भगवानन्दुशेखरः इत्यादिदेश।” में भगवानिन्दुशेखरेः’ से कौन संकेतित हैं?

(क) भगवान् इन्द्र
(ख) भगवान् विष्णु
(ग) भगवान् शंकर
(घ) भगवान् ब्रह्मा

5. “तत्रनन्दने महेन्द्रइव सुचिरं विहरन्”:”।”वाक्य में’ महेन्द्र’ से किसका अर्थबोध होता है?

(क) सातवाहन का
(ख) इन्द्रका
(ग) दीपकर्ण का
(घ) शंकर का

6. राजमहिषी द्वारा कहे गये’मौदकैर्देव मां परिताडय।” कथन में ‘मोदकैः’ का क्या अर्थ है?

(क) पानी से नहीं
(ख) पानी द्वारा
(ग) लड्डूओं से
(घ) लड्डूओं से नहीं

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7. गुणाढ्य ने राजा सातवाहन को कितने वर्षों में व्याकरण सिखाने की बात कही?

(क) चार वर्ष में
(ख) पाँच वर्ष में
(ग) छः वर्ष में
(घ) सात वर्ष में

8. शर्ववर्मा ने राजा सातवाहन को कितने मासों में व्याकरण सिखाने की बात कही?

(क) चार मास में
(ख) पाँच मास में
(ग) छः मास में
(घ) सात मास में

9. सातवाहन ने मन्त्री शर्ववर्मा को कहाँ का राजा बनाया?

(क) प्रयाग का
(ख) धारानगरी का
(ग) उज्जयिनी का
(घ) भरुकच्छ का

10. “तं ………………… भगवानिन्दुशेखरः इत्यादिदेश।”वाक्य के रिक्त-स्थान की पूर्ति के लिए उचित शब्द है

(क) उद्याने
(ख) अटव्यां
(ग) प्रासादे
(घ) स्वप्ने

11. ‘अयं मया अन्यासां सिंहीनां ……………………. वर्धितो।”वाक्य में रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी

(क) पयसा’ से
(ख) रक्तेन’ से
(ग) “वयसेन’ से
(घ) “पयसेन’ से

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12. अद्य त्वया बाणाहतोऽहं ……………………. विमुक्तोऽस्मि।

(क) “तापाद्’ से
(ख) “शापाद्’ से
(ग) व्याध्यात्’ से
(घ) ‘पीडात्’ से

13. ‘तत्छुत्वा राजा द्रुतं बहून् ………………. आनयनादिदेश।’ वाक्य में रिक्त-स्थान की पूर्ति होगी –

(क) ‘मिष्टान्न’ से
(ख) ‘पक्वान्न’ से
(ग) मोदकान्’ से
(घ) “मूलान्’ से

14. ‘तस्य राजचेटस्य मुखादेतत् श्रुत्वा ……………… संशयादित्यचिन्तयत्।”वाक्य-पूर्ति के लिए उपयुक्त शब्द है –

(क) दीपकर्ण
(ख) शक्तिमती
(ग) गुणाढ्य
(घ) शर्ववर्मा

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15. “सङ्कटेऽस्मिन् …………………….. विना तव गतिरन्या न दृश्यते।” वाक्य-पूर्ति के लिए उपयुक्त शब्द है|

(क) स्वामिकुमारेण
(ख) स्वामीन्द्रेण
(ग) स्वामिस्कन्देन
(घ) स्वामिलम्बोदरेण

16. पुरा ……………….. इति ख्यातो प्राज्य विक्रमः राजाभूत्। [2006]

(क) गुणाढ्यः
(ख) दीपकणिः
(ग) शर्ववर्मा
(घ) वीरवरः

17. राजा सिंहारूढं ……………….. अपश्यत्। [2015]

(क) पुरुषं
(ख) बालकम्
(ग) नारीम्

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