Class 10 Sanskrit Chapter 9 UP Board Solutions संस्कृतभाषायाः गौरवम् Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 9 Sanskrit Bhashaya Gauravam Question Answer (गद्य – भारती)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 9 हिंदी अनुवाद संस्कृतभाषायाः गौरवम् के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

संस्कृत भाषा विश्व की समस्त भाषाओं में सर्वाधिक प्राचीन भाषा है। यह ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न, सरल, मधुर, सरस और मनोहर है। इस बात को सभी पाश्चात्य भाषाविद् भी स्वीकार करते हैं। संस्कृत भाषा के दो रूप हैं—

  • वैदिक और
  • लौकिक।

हमारे प्राचीनतम ग्रन्थों, वेद, उपनिषद् आदि में जो भाषा मिलती है, (UPBoardSolutions.com) वह वैदिक संस्कृत है और जिस भाषा का आजकल अध्ययन किया जाता है वह लौकिक संस्कृत। वैदिक संस्कृत की तुलना में लौकिक संस्कृत अधिक सरल है।

संस्कृत को सभी भारतीय भाषाओं की जननी कहा जाता है। संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश और विभिन्न अपभ्रंशों से वर्तमान समय की विभिन्न प्रान्तीय भाषाओं का विकास माना जाता है। भारत का समस्त प्राचीन साहित्य संस्कृत में ही है। गद्य, पद्य, नाटक, व्याकरण, ज्योतिष, दर्शन, गणित आदि विषयों का विशाल साहित्य इस भाषा को आदरणीय बनाता है। इसीलिए इसका देववाणी, गीर्वाणवाणी, देवभाषा कहकर आदर किया जाता है।

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प्रस्तुत पाठ में संस्कृत भाषा की प्राचीनता, वैज्ञानिकता, ज्ञान-सम्पन्नता, भावात्मकता आदि का परिचय देते हुए इसके महत्त्व को समझाया गया है। साथ ही यह भी बताया गया है कि इसी के द्वारा विश्व-शान्ति की स्थापना की जा सकती है।

पाठ-सारांश [2006, 07,08, 09, 10, 11, 12, 13, 14]

प्राचीनता संस्कृत भाषा विश्व की समस्त भाषाओं में प्राचीनतम, विपुल साहित्य और ज्ञान-सम्पन्न, सरल, मधुर, सरसे और मनोहर है। संस्कृत भाषा को देववाणी या गीर्वाणभारती भी कहा जाता है। इस बात को पाश्चात्य भाषाविद् भी मानते हैं कि यह ग्रीक, लैटिन आदि भाषाओं से भी पुरातन और प्रचुर साहित्य सम्पन्न भाषा है। इस बात को दो सौ वर्ष पहले ही सर विलियम जोन्स ने घोषित कर दिया था। प्राचीन काल में यही भाषा सर्वसाधारण लोगों की और व्यवहार की भाषा थी। इस भाषा की प्राचीनता एवं अन्न- समान्य के भाई होने के विश्व में एक दृ ५५ति है। कल जाता है कि कोई रातकड़ी का गट्ठर सिर पर रखे हुए जा रहा था। (UPBoardSolutions.com) उसे देखकर राजा ने पूछा—-** भो भार धति?” अरे भार परेशान कर रहा है)। तब लकड़हारे ने कहा कि राजन् लकड़ियों का भार इतना परेशान नहीं कर रहा है, जितना कि आपके द्वारा प्रयुक्त ‘बाधति’ शब्द। राजा द्वारा प्रयुक्त ‘बाधति’ परस्मैपदी होने के कारण अशुद्ध था, यहाँ आत्मनेपद का रूप ‘बाधते’ प्रयुक्त होना था। यही बात लकड़हारे ने राजा से अन्योक्ति के माध्यम से कहीं है, जो संस्कृत का लोक-भाषा होना प्रमाणित करती है। इसके अतिरिक्त रामायणकालीन समाज में भी यह भाषा लोकभाषा के रूप में व्यवहृत होती थी। ‘रामायण’ में एक स्थान पर संस्कृत को द्विजाति की भाषा कहा गया है।

विशाल और प्राचीन साहित्य संस्कृत भाषा का साहित्य अत्यन्त समृद्ध है। यह गद्य, पद्य और चम्पू तीन प्रकार का है। संसार का प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद’ इसी भाषा में है। इसी भाषा में वेद, वेदांग, दर्शन, उपनिषद्, स्मृति, पुराण, धर्मशास्त्र, महाभारत, रामायण आदि लिखे गये हैं। इन सभी में साहित्य के विषयानुरूप सरल और क्लिष्ट रूप प्रकट होते हैं। वाल्मीकि, व्यास, भवभूति, कालिदास, अश्वघोष, बाण, सुबन्धु, दण्डी, भारवि, माघ, श्रीहर्ष आदि संस्कृत के महान कवि और लेखक हैं, जो संस्कृत भाषा के गौरव को द्योतित करते हैं। संस्कृत का व्याकरण तो संसार में अद्वितीय है। इसमें सन्धि, समास, अलंकारों आदि का सूक्ष्म विवेचन है। इसके काव्य में ध्वनि-माधुर्य और श्रुति-माधुर्य है।

भाषागत विशिष्टता संस्कृत भाषा के वाक्य-विन्यास में शब्दों का स्थान निर्धारित नहीं होता, अर्थात् वाक्य के अन्तर्गत प्रयुक्त शब्दों को कहीं भी रखा जा सकता है। इससे वाक्य के अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं होता। संस्कृत में व्युत्पत्ति अर्थ के अनुसार और व्युत्पत्ति के अनुसार सार्थक शब्दों की रचना की जाती है।

सामाजिक विशिष्टता संस्कृत भाषा की सामाजिक विशिष्टता भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। इसकी कुछ एक सूक्तियों का अधोलिखित हिन्दी रूपान्तर इसे स्पष्ट करता है–

  • जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से। बढ़कर है।
  • यह अपना है और यह पराया है; यह भावना संकीर्ण विचारकों की हैं।
  • उदार चरित वाले व्यक्तियों के लिए सम्पूर्ण पृथ्वी ही कुटुम्ब के समान हैं।
  • कुत्ते और चाण्डाल के प्रति भी समान भाव रखने वाले पण्डित होते हैं, आदि।

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अध्ययन की आवश्यकता संस्कृत भाषा के ज्ञान के बिना एकता और अखण्डता का पाठ निरर्थक है। प्राचीन भारतीय मनीषियों के उत्तमोत्तम विचार और अन्वेषण इसी भाषा में निबद्ध हैं। अपनी सभ्यता, धर्म और संस्कृति को अच्छी तरह समझने के लिए संस्कृत का अध्ययन परमावश्यक है। (UPBoardSolutions.com) इस भाषा की उन्नति करने के लिए हमें सदैव तत्पर रहना चाहिए। पं० जवाहरलाल नेहरू ने भी अपनी आत्मकथा में संस्कृत भाषा के महत्त्व के विषय में लिखा है कि “संस्कृत भाषी भारत की अमूल्य निधि है। इसकी सुरक्षा का दायित्व स्वतन्त्र भारत पर है।”

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1)
संस्कृतभाषा विश्वस्य सर्वासु भाषासु प्राचीनतमा विपुलज्ञानविज्ञानसम्पन्ना सरला सुमधुरा हृद्या चेति सर्वैरपि प्राच्यपाश्चात्यविद्वद्भिरेकस्वरेणोररीक्रियते। भारतीयविद्याविशारदैस्तु “संस्कृतं नाम दैवी वागन्वाख्याता महर्षिभिः” इति संस्कृतभाषा हि गीर्वाणवाणीति नाम्ना सश्रद्धं समाम्नाता।

शब्दार्थ प्राचीनतमा = सबसे अधिक प्राचीन सम्पन्ना = परिपूर्ण। हृद्या = हृदय को आनन्दित करने वाली। प्राच्य = पूर्वीया उररीक्रियते = स्वीकार किया जाता है। विद्याविशारदैः = विद्या में कुशल वागन्याख्याता = ।वाणी कही गयी। सश्रद्धम् = श्रद्धासहित। समाम्नाता = मानी गयी है। सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती’ में संकलित ‘संस्कृतभाषायाः गौरवम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा ]

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में संस्कृत भाषा की प्राचीनता और उसे देवभाषा होना बताया गया है।

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अनुवाद संस्कृत भाषा विश्व की सभी भाषाओं में सबसे प्राचीन, अत्यधिक ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न, सरल, अत्यन्त मधुर और सभी के मनों को हरने वाली है। ऐसा पूर्वी (भारतीय) और पाश्चात्य विद्वानों द्वारा एक स्वर से स्वीकार किया गया है। भारतीय विद्वानों के द्वारा “संस्कृत महर्षियों द्वारा दैवी वाणी कही गयी है” इस प्रकार (मानी गयी) संस्कृत भाषा देवताओं की वाणी इस नाम से श्रद्धा के साथ मानी गयी।

(2)
ग्रीकलैटिनादि प्राचीनासु भाषासु संस्कृतभाषैव प्राचीनतमा प्रचुरेसाहित्यसम्पन्ना चेति। श्रीसरविलियमजोंसनाम्ना पाश्चात्यसमीक्षकेणापि शतद्वयवर्षेभ्यः प्रागेव समुद्घोषितमिति सर्वत्र विश्रुतम्।।

शब्दार्थ प्रचुरसाहित्यसम्पन्ना = अधिक साहित्य से युक्त। शतद्वयवर्षेभ्यः = दो सौ वर्ष से। प्रागेव = पहले ही। विश्रुतं = प्रसिद्ध है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में संस्कृत भाषा की प्राचीनता और विपुल साहित्य की पुष्टि के लिए पाश्चात्य विद्वान् का सन्दर्भ दिया गया है।

अनुवाद ग्रीक, लैटिन आदि प्राचीन भाषाओं में संस्कृत भाषा ही सबसे प्राचीन और विशाल साहित्य से युक्त है। श्री सर विलियम जोन्स नाम के पाश्चात्य आलोचक ने भी दो सौ वर्ष पहले ही घोषणा कर दी थी, ऐसा सब जगह प्रसिद्ध है।

(3)
संस्कृतभाषा पुराकाले सर्वसाधारणजनानां वाग्व्यवहारभाषा चासीत्। तत्रेदं श्रूयते यत्.पुरा कोऽपि नरः काष्ठभारं स्वशिरसि निधाय काष्ठं विक्रेतुमापणं गच्छति स्म। मार्गे नृपः तेनामिलदपृच्छच्च, भो!भारं बाधति? काष्ठभारवाहको नृपं तत्प्रश्नोत्तरस्य प्रसङ्गेऽवदत्, (UPBoardSolutions.com) भारं न बाधते राजन्! यथा बाधति बाधते। अनेनेदं सुतरामायाति यत्प्राचीनकाले भारतवर्षे संस्कृतभाषा साधारणजनानां भाषा आसीदिति। रामायणे यदा भगवतो रामस्य प्रियसेवको हनूमान् कनकमयीं मुद्रामादाय सीतायै दातुमिच्छति तदा विचारयति स्म [2014]

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वाचं चोदाहरिष्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम्।
रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति ॥

एतेनापि संस्कृतस्य लोकव्यवहारप्रयोज्यता अवगम्यते।

संस्कृतभाषा पुराकाले ………………………………………………… भाषा आसीदिति। [2010]

शब्दार्थ वाग्व्यवहार-भाषा = बोल-चाल के व्यवहार की भाषा। तत्रेदं = इस विषय में यह पुरा = पहले, प्राचीन काल में। निधाय = रखकर विक्रेतुमापणं = बेचने के लिए बाजार को अपृच्छत् = पूछा। बाधते = कष्ट दे रही है। अनेनेदम् = इससे यह कनकमयीम् = सोने की बनी। मुद्राम् = अँगूठी को। द्विजातिरिव = ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों के समान। संस्कृताम् = संस्कार की हुई। मन्यमाना = मानती हुई। भीता = डरी हुई। प्रयोज्यता = प्रयोग में आना। अवगम्यते = जानी जाती है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में उदाहरणों द्वारा बताया गया है कि प्राचीनकाल में संस्कृत सामान्यजन की बोलचाल की भाषा थी।

अनुवाद संस्कृत भाषा प्राचीन काल में सर्वसाधारण लोगों की वाणी और व्यवहार की भाषा थी। इसके विषय में यह सुना जाता है कि प्राचीन काल में कोई मनुष्य लकड़ी का बोझे अपने सिर पर रखकर लकड़ी बेचने के लिए बाजार को जा रहा था। मार्ग में राजा उससे मिला और पूछा-“अरे! क्या बोझ पीड़ा पहुँचा रहा है (भो! भारं बाधति)?” लकड़ी का बोझा ढोने वाले (लकड़हारे) ने राजा से उसके प्रश्न के उत्तर के प्रसंग में कहा-“हे राजन्! बोझ पीड़ा नहीं दे रहा है, (UPBoardSolutions.com) जैसा ‘बाधति’ (का प्रयोग) पीड़ा पहुँचा रहा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन काल में भारतवर्ष में संस्कृत भाषा साधारणजनों की भाषा थी। रामायण में जब भगवान् राम के प्रिय सेवक हनुमान् सोने की अँगूठी को लेकर सीता को देना चाहते हैं, तब वह सोचते हैं मैं ब्राह्मण के समान संस्कृत वाणी बोलूंगा तो सीता मुझे रावण समझते हुए डर जाएँगी। इससे भी संस्कृत का – लोक-व्यवहार में प्रयोग होना माना जाता है।

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(4)
अस्याः भाषायाः साहित्यं सर्वथा सुविशालं विद्यते। तत्र संस्कृतसाहित्यं गद्य-पद्य-चम्पू-प्रकारैः त्रिधा विभज्यते। संस्कृतसाहित्यं नितान्तमुदात्तभावबोधसामर्थ्यसम्पन्नसाधारणं श्रुतिमधुरञ्चेति निर्विवादम्। वस्तुतः साहित्यं खलु निखिलस्यापि समाजस्य प्रत्यक्ष प्रतिबिम्बं प्रस्तौति। अस्मिन् साहित्ये विश्व-प्राचीनतमा ऋग्यजुः सामाथर्वनामधेयाश्चत्वारो वेदाः, शिक्षा-कल्पो, व्याकरणं, निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमित्येतानि वेदानां षडङ्गानि, न्याय-वैशेषिक-साख्य-योग-मीमांसा-वेदान्तेति आस्तिकदर्शन शास्त्राणि; चार्वाक्-जैन-बौद्धेति नास्तिकदर्शनशास्त्राणि, उपनिषदः, स्मृतयः, सूत्राणि, धर्मशास्त्राणि, पुराणानि, रामायणं महाभारतमित्यादयः ग्रन्थाः संस्कृतसाहित्यस्य ज्ञानरत्नप्राचुर्यं समुद्घोषयन्ति। वाल्मीकि-व्यास-भवभूति-दण्डि-सुबन्धु-बाण-कालिदास-अश्वघोष-भारवि-जयदेव-माघ-श्रीहर्षप्रभृतयः कवयः लेखकाश्चास्याः गौरवं वर्धयन्ति। अहो! संस्कृतभाषायाः भण्डारस्य’ निःसीमता, यस्याः शब्दपारायणस्य विषये महाभाष्ये लिखितं वर्तते यद दिव्यं वर्षसहस्रं वृहस्पतिः इन्द्राय शब्दपारायणमिति कोष-प्रक्रिया आसीत्। संस्कृतव्याकरणेन एवंविधा शैली प्रकटिता पाणिनिना, यथा शब्दकोषाः अल्पप्रयोजना एवं जाता। तस्य व्याकरणं विश्वप्रसिद्धम् एव न अपितु अद्वितीयमपि मन्यते।।

अस्याः भाषायाः ………………………………………………… समुदघोषयन्ति । [2015]

शब्दार्थ सर्वथा सुविशालं = अत्यन्त विस्तृत। त्रिधा = तीन प्रकार से। विभज्यते = विभक्त किया जाता है। निर्विवादम् = विवाद से रहित प्रस्तौति = प्रस्तुत करता है। षडङ्गानि = छ: अंग। प्राचुर्यम् = अधिकता को। समुद्घोषयन्ति = उद्घोषित करते हैं। वर्धयन्ति = बढ़ाते हैं। निःसीमता = असीमता, सीमाहीनता। दिव्य वर्षसहस्रम् = हजार दिव्य वर्षों तक पारायणम् = पढ़ना। अल्पप्रयोजना = थोड़े प्रयोजन वाले।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में संस्कृत-साहित्य की विशालता बतायी गयी है तथा उसके ग्रन्थ, कवि, व्याकरण-कोशादि का वर्णन किया गया है।

अनुवाद इस भाषा का साहित्य सब प्रकार से अत्यन्त विशाल है। वहाँ संस्कृत-साहित्य गद्य, पद्य और चम्पू के भेद से तीन प्रकार का विभाजित किया जाता है। संस्कृत-साहित्य अत्यन्त उच्च भावों के ज्ञान की योग्यता से युक्त, असाधारण वे सुनने में मधुर है-यह बात विवादरहित है। वास्तव में साहित्य निश्चय ही सम्पूर्ण समाज का प्रत्यक्ष प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करता है। इस साहित्य में विश्व के सबसे प्राचीन ऋक्, यजुः, साम और अथर्व नाम के चार वेद; शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष—ये वेदों के छ: अंग; न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त-ये आस्तिक दर्शनशास्त्र; चार्वाक, जैन, बौद्ध–ये नास्तिक दर्शनशास्त्र; उपनिषद्, स्मृतियाँ, सूत्र, धर्मशास्त्र, पुराण, रामायण, महाभारत आदि ग्रन्थ संस्कृत-साहित्य के ज्ञान-रत्न की अधिकता को घोषित करते हैं। वाल्मीकि, व्यास, भवभूति, दण्डी, सुबन्धु, बाण, (UPBoardSolutions.com) कालिदास, अश्वघोष, भारवि, जयदेव, माघ, श्रीहर्ष आदि कवि और लेखक इसके गौरव को बढ़ाते हैं। अहो! संस्कृत भाषा के भण्डार का सीमारहित होना आश्चर्यजनक है, जिसके शब्दों के पारायण (व्याख्यान) के विषय में महाभाष्य में लिखा है कि बृहस्पति ने दिव्य हजार वर्ष तक इन्द्र को शब्द का व्याख्यान किया। यह कोश की प्रक्रिया थी। महर्षि पाणिनि ने संस्कृत व्याकरण के द्वारा ऐसी शैली का प्रतिपादन किया, जिससे शब्दकोश कम प्रयोजन वाले ही हो गये। उनका व्याकरण विश्वप्रसिद्ध ही नहीं, अपितु अद्वितीय भी माना जाता है।

(5)
अन्यासु भाषासु वाक्ययोजने प्रथमं कर्तुः प्रयोगः पुनः अन्येषां कारकाणां विन्यासः, पश्चात् क्रियायाः उक्तिः। कस्याञ्चित् भाषायां क्रियायाः विशेषणानां कारकाणाञ्च पश्चात् प्रयोगः, किन्तु संस्कृतव्याकरणे नास्ति एतादृशाः केऽपि नियमाः। यथा–आसीत् पुरा दशरथो नाम राजा अयोध्यायाम्। अस्यैव वाक्यस्य विन्यासः एवमपि भवति-पुरा अयोध्यायां दशरथो नाम राजा आसीत्, अयोध्यायां दशरथो नाम राजा पुरा आसीत्, इति वा। कस्यापि पदस्य कुत्रापि स्थानं भवेत् न कापि क्षतिः। [2008, 10]

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शब्दार्थ वाक्ययोजने = वाक्य की योजना (प्रयोग) में। अन्येषां = दूसरे। विन्यासः = रचना। उक्तिः = कथन। एतादृशाः = इस प्रकार के। अस्यैव = इसका ही। कुत्रापि = कहीं भी। क्षतिः = हानि।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में संस्कृत की वाक्य-योजना के विषय में बताया गया है।

अनुवाद” अन्य भाषाओं में वाक्य-योजना में पहले कर्ता का प्रयोग, फिर दूसरे कारकों का प्रयोग, बाद में क्रिया का कथन होता है। किसी भाषा में क्रिया का प्रयोग विशेषणों और कारकों के बाद होता है, किन्तु संस्कृत व्याकरण में इस प्रकार के कोई नियम नहीं हैं; जैसे—आसीत् पुरा दशरथो नाम राजा अयोध्यायाम्। (प्राचीन काल में अयोध्या में दशरथ नाम का राजा था।) इसी वाक्य की रचना ऐसी भी होती है-पुरा अयोध्यायां दशरथो नाम राजा आसीत्, अथवा अयोध्यायां दशरथो नाम राजा पुरा आसीत्; ऐसी भी। किसी भी पद का कहीं भी स्थान हो, कोई हानि नहीं है।

(6)
सन्धीनां विधानेन वाक्यस्य विन्यासे सौकर्यं जायते। एकस्यां पङ्क्त समासेन बहूनां शब्दानां योजना भवितुं शक्या, यथा-कविकुलगुरुकालिदासः। एकस्याः क्रियायाः विभिन्नार्थद्योतनाय दशलकारा वर्णिताः। लकाराणां प्रयोगज्ञानेन इत्थं ज्ञायते इयं घटना कियत्कालिकी, किंकालिकी, यथा—हरिश्चन्द्रो राजा बभूव। रामो लक्ष्मणेन सीतया च सह वनं जगाम अत्र लिट्प्रयोगेण ज्ञायते इयं घटना पुरा-कालिकी सहस्रवर्षात्मिका लक्षात्मिका वा स्यात्। गन्तास्मि वाराणसी (UPBoardSolutions.com) कथनेनैव ज्ञायते श्वः गन्तास्मि। सामान्यभविष्यत्काले लुट् प्रयोगो भवति, एवं भूतकालेऽपि अद्यतनस्य अनद्यतनस्य च भूतकालस्य कृते पृथक् पृथक् लकारस्य प्रयोगोऽस्ति।

शब्दार्थ सौकर्यम् = सरलता। विभिन्नार्थ = भिन्न-भिन्न अर्थ। द्योतनाय = बताने के लिए। कियत्कालिकी = कितने समय की। किंकालिकी = किस समय की। सहस्रवर्षात्मिका = हजार वर्ष की। लक्षात्मिका = एक लाख वर्ष की। गन्तास्मि = जाने वाला हूँ। अद्यतनस्य = आज का। अनद्यतनस्य = आज से भिन्न का।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में संस्कृत में सन्धि, समास तथा लकारों के प्रयोग के महत्त्व को बताते हुए इस भाषा की लोकप्रियता बतायी गयी है।

अनुवाद सन्धियों के करने में वाक्य की रचना में सरलता हो जाती है। समास के द्वारा एक पंक्ति में बहुत-से शब्दों का प्रयोग हो सकता है; जैसे-कविकुलगुरुकालिदासः (कवियों के समूह के गुरु कालिदास)। एक क्रिया के विभिन्न अर्थों को बताने के लिए दस लकारों का वर्णन किया गया है। लकारों के प्रयोग के ज्ञान से इस प्रकार ज्ञात हो जाता है कि यह घटना कितने समय की और किस समय की है; जैसे—हरिश्चन्द्रो राजा बभूव (हरिश्चन्द्र राजा थे)। रामो लक्ष्मणेन सीतया च सह वनं जगाम (राम, लक्ष्मण और सीता के साथ वन गये)। यहाँ (बभूव और जगाम में) लिट् लकार का प्रयोग करने से ज्ञात होता है कि यह घटना प्राचीन समय की-हजार वर्ष की या लाख वर्ष की-है। गन्तास्मि वाराणसीम् (वाराणसी जाऊँगा) कहने से ही ज्ञात हो जाता है—कल जाऊँगा। सामान्य भविष्यकाल में लुट् लकार का प्रयोग होता है। इसी प्रकार भूतकाल में भी अद्यतन, अनद्यतन और भूतकाल के लिए अलग-अलग लकार का प्रयोग है।

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(7)
संस्कृते अर्थान् गुणांश्च क्रोडीकृत्य शब्दानां निष्पत्तिः, यथा-पुत्रः कस्मात् पुत्रः? पुं नरकात् त्रायतेऽसौ पुत्रः, आत्मजः कस्मादात्मजः? आत्मनो जायतेऽसौ आत्मजः, सूर्यः कस्मात् सूर्यः? सुवति कर्मणि लोकं प्रेरयति अतः सूर्यः। सूर्यः यदा नभोमण्डलमारोहति प्रेरयति लोकं, कस्मात् शेषे? उत्तिष्ठ, वाति वातः, स्वास्थ्यप्रदायकं प्राणवायुं गृहाण, नैत्त्यिकानि कर्माणि कुरु, इत्थं प्रेरयन्, आकाशमागच्छति अतः सूर्य इति। खगः कस्मात्? खे (आकाशे) गच्छति अस्मात् खगः? एवमर्थज्ञानाय व्यवस्थान्यासु भाषासु नास्ति। अव्युत्पन्नाः शब्दाः तेषामपि निरुक्तिः अर्थानुसन्धानिकी भवत्येव इति नैरुक्ताः। सर्वं नाम च धातुजमाह इति शाकटायनः, उणादिसूत्रेषु एषैव प्रक्रिया वर्तते।।

शब्दार्थ क्रोडीकृत्य = मिलाकर, क्रोड में लेकर। निष्पत्तिः = निर्माण, व्युत्पत्तिा पुं नरकात् त्रायते =’पुम्’ नामक नरक से रक्षा करता है। सुवति = प्रेरित करता है। नभोमण्डलमारोहति = आकाश-मण्डल पर चढ़ता है। प्रेरयति = प्रेरित करता है। नैत्यिकानि = नित्य करने योग्य। इत्थं प्रेरयन् = इस प्रकार प्रेरणा करता हुआ। खे = आकाश में। अव्युत्पन्नाः = बिना व्युत्पत्ति के अर्थानुसन्धानिकी = अर्थ की खोज से होने वाली। नैरुक्ताः = निरुक्त शास्त्र के आचार्य। धातुजमाह = धातु से उत्पन्न कहा है। एषैव = यह ही।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में शब्दों की निष्पत्ति के बारे में बताया गया है।

अनुवाद संस्कृत में अर्थ और गुणों को मिलाकर शब्दों की व्युत्पत्ति होती है; जैसे-‘पुत्र’ किस कारण से पुत्र है? (पुम् नाम्नः नरकात् त्रायते इति पुत्रः) पुम्’ नामक नरक से बचाता है; अत: वह ‘पुत्र’ है। ‘आत्मज’ किस कारण से आत्मज (पुत्र) है? अपने से उत्पन्न होता है; अतः वह ‘आत्मज’ (आत्मनः जायते) है। ‘सूर्य’ किस कारण से सूर्य हैं? संसार को कर्म में प्रेरित करता है; अत: वह ‘सूर्य’ (सुवति कर्मणि लोकम्) है। सूर्य जब आकाशमण्डल में चढ़ता है, संसार को प्रेरित करता है। (UPBoardSolutions.com) किस कारण सो रहे हो? उठो, हवा चल रही है, स्वास्थ्यप्रद प्राणवायु को ग्रहण करो। नित्य के कर्मों को करो-इस प्रकार प्रेरित करता हुआ आकाश में आता है; अतः वह सूर्य (सुवति कर्मणि लोकम्) है। ‘खग’ (पक्षी) किस कारण खग है? आकाश में जाता है, इस कारण से ‘खग’ (खे गच्छति) है। इस प्रकार अर्थ को जानने की व्यवस्था अन्य भाषाओं में नहीं है। जो व्युत्पत्तिरहित शब्द हैं, उनकी भी व्याख्या अर्थ की खोज से ही होती है; ऐसा निरुक्त में कहा गया है। सभी संज्ञाशब्द धातु से बनते हैं-ऐसा शाकटायन ने कहा है। उणे आदि सूत्रों में भी यही प्रक्रिया है।।

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(8)
इयं वाणी गुणतोऽनणीयसी, अर्थतो गरीयसी, एकस्य श्लोकस्य षषडर्थाः प्रदर्शिताः नैषधे, वाङ्मयदृष्ट्या महीयसी, भावतो भूयसी, अलङ्कारतो वरीयसी, सुधातोऽपि स्वादीयसी, सुधाशनानामपि प्रेयसी, अत एव जातकलेखकाः बौद्धाः सर्वात्मना पालिं प्रयोक्तुं कृतप्रतिज्ञा अपि संस्कृतेऽपि स्वीयान् ग्रन्थान् व्यरीरचन्। एवं जैनाः कवयः दार्शनिका अपि संस्कृतभाषामपि स्वीकृतवन्तः यद्यपि ते विचारेषु विपक्षधरा एवं आसन्।

शब्दार्थ गुणतोऽनणीयसी = गुणों के कारण अधिक विस्तृता गरीयसी = गौरवशालिनी। वाङमयदृष्ट्या = साहित्य की दृष्टि से। महीयसी = महत्त्वपूर्ण भूयसी = श्रेष्ठ। वरीयसी = वरिष्ठ। सुधांतोऽपि = अमृत से भी। स्वादीयसी = अधिक स्वादिष्ट सुधाशनानाम् = अमृत का भोजन (UPBoardSolutions.com) करने वालों की। स्वीयान् = अपनों को। व्यरीरचन् = रचना की। स्वीकृतवन्तः = स्वीकार किया। विपक्षधराः = विरोधी पक्ष धारण करने वाले।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में संस्कृत भाषा का महत्त्व बताते हुए इसकी लोकप्रियता बतायी गयी है।

अनुवाद यह वाणी गुण से भी बड़ी है, अर्थ से महान् है, नैषध (श्रीहर्ष द्वारा रचित ग्रन्थ) में एक श्लोक के छः-छः अर्थ दिखाये हैं। वाङ्मय (साहित्य) की दृष्टि से महान् है। भाव से भी अधिक (धनी) है, अलंकार से श्रेष्ठ है, अमृत से भी स्वादिष्ट है। अमृतपान करने वालों को भी प्रिय है। अतएव जातक’ (बौद्ध ग्रन्थ) के लेखक बौद्धों ने सब प्रकार से पालि का प्रयोग करने की प्रतिज्ञा करते हुए संस्कृत में भी अपने ग्रन्थों की रचना की। इसी प्रकार जैन दार्शनिकों और कवियों ने भी संस्कृत भाषा को स्वीकार किया। यद्यपि वे विचारों में विरोधी पक्ष को धारण करने वाले थे।

(9)
अस्याः काव्यभाषायाः शब्दगतमर्थगतञ्च ध्वनिमाधुर्यं श्रावं आवं सुराङ्गनापदनूपुरध्वनिमाधुर्यं धिक्कुर्वन्ति वाङ्मयाध्वनीनाः, काव्यक्षेत्रे शब्दगतानर्थगतांश्च विस्फुरतोऽलङ्कारान् विलोक्य पुनर्नावलोकयन्ति मणिमयानलङ्कारान्।।

अस्याः काव्यभाषायाः ………………………………………………… मणिमयानलङ्कारान् [2011]

शब्दार्थ ध्वनिमाधुर्यं आवं आवं = ध्वनि की मधुरता को सुन-सुनकर। सुराङ्गनापदनूपुरध्वनिमाधुर्यम् = देवांगनाओं के पैरों के नूपुरों की ध्वनि की मधुरता को। धिक्-कुर्वन्ति = अपमानित करते हैं। विस्फुरतः = स्फुरित होते हुए। मणिमयान् = मणि के बने।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में संस्कृत भाषा की मधुरता का वर्णन किया गया है।

अनुवाद इसके काव्य की भाषा की शब्दगत और अर्थगत ध्वनि की मधुरता को सुन-सुनकर संस्कृत-साहित्य का अध्ययन करने वाले विद्वान् देवांगनाओं की पायलों की ध्वनि की मधुरता की भी निन्दा करते हैं। काव्य के क्षेत्र में शब्दगत और अर्थगत अलंकारों को स्फुरित होते हुए देखकर फिर मणि के बने आभूषणों को नहीं देखते हैं।

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(10)
भारतीय धर्म इव संस्कृतभाषापि भारतीयानां वरिष्ठः शेवधिः। इयमेव भाषा शाखाप्रशाखारूपेण प्रान्तीयासु तासु-तासु भाषासु तिरोहिता वर्तते। अद्य केचन धर्मान्धाः राजनीतिभावनाभाविताः भारतस्य खण्डनमभिलषन्ति। कारणं तेषां संस्कृतभाषायाः अज्ञानम्। “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”, “अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्”, “उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्”, “शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः”, “मा हिस्स र्वभूतानि”;”मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव” इमे उपदेशाः यदि भारतीयानां संमक्षं समीक्ष्यन्तां तदा सकलं भारतं स्वयमेव एकसूत्रे अखण्डतासूत्रे च निबध्येत| “अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः”, “मानसं यान्ति हंसाः न पुरुषा एव?” इति सडिण्डिमं घोषयति इयं भाषा। [2006]

भारतीय धर्म इव ………………………………………………… निबध्येत [2009,11]
भारतीय धर्म इव ………………………………………………… तिरोहिता वर्तते [2011]

शब्दार्थ वरिष्ठः = उत्तम शेवधिः = निधि, खजाना। तासु-तासु = उन-उन। तिरोहिता = छिपी हुई। खण्डनमभिलषन्ति = टुकड़े करना चाहते हैं। परोवेति = अथवा पराया है, ऐसी| वसुधैव = धरती ही। शुनि = कुत्ते में। श्वपाके = चाण्डाल में प्रोतं = पिरोया हुआ है। निबध्येत = बँध जाएगा।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने संस्कृत भाषा के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।

अनुवाद भारतीय धर्म के समान संस्कृत भाषा भी भारतीयों की सर्वश्रेष्ठ निधि है। यही भाषा शाखा-प्रशाखा के रूप में प्रान्तों की उन-उन भाषाओं में छिपी हुई है। आज कुछ धर्मान्ध राजनीतिक भावना से युक्त होकर भारत के टुकड़े करना चाहते हैं। इसमें उनका संस्कृत को न जानना कारण है। “माता और जन्मभूमि स्वर्ग से बढ़कर है’, “यह अपना अथवा यह पराया है, यह तुच्छ चित्तवृत्ति वालों का विचार है, “उदार चरित्र वाले मनुष्यों के लिए तो सारी पृथ्वी (UPBoardSolutions.com) ही कुटुम्ब के समान है”, “पण्डित कुत्ते और चाण्डाल में समान दृष्टि रखने वाले होते हैं”, “सब प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए”, “मुझ (कृष्ण) में यह सारा संसार धागे में मणियों के समान पिरोया हुआ है, ये उपदेश यदि भारतीयों के समक्ष समीक्षा करके देखे जाएँ तो सारा भारत स्वयं अखण्डता के एक सूत्र में बँध जाए। “उत्तर दिशा में देवात्मस्वरूप हिमालय नाम को पर्वतराज है”, “क्या मानसरोवर पर हंस ही जाते हैं, पुरुष नहीं यह भाषा इस प्रकार ढिंढोरा पीटकर घोषणा करती है।

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(11)
संस्कृतं विना एकताया अखण्डतायाः पाठः निरर्थक एव प्रतीयते। नेहरूमहाभागेनापि स्वकीयायाम् आत्मकथायां लिखितं यत् संस्कृतभाषा भारतस्य निधिस्तस्याः सुरक्षाया उत्तरदायित्वं स्वतन्त्रे भारते आपतितम्। अस्माकं पूर्वजानां विचाराः अनुसन्धानानि चास्यामेव भाषायां सन्ति। स्वसभ्यतायाः धर्मस्य राष्ट्रियेतिहासस्य, संस्कृतेश्च सम्यग्बोधाय संस्कृतस्य ज्ञानं परमावश्यकमस्ति। केनापि कविना मधुरमुक्तम्
भवति भारतसंस्कृतिरक्षणं प्रतिदिनं हि यया सुरभाषया। सकलवाग्जननी भुवि सा श्रुता बुधजनैः सततं हि समादृती ॥ तथा भूतायाः अस्याः भाषायाः पुनरभ्युदयाय भारतीयैः पुनरपि सततं यतनीयम्।

अस्माकं पूर्वजानां ………………………………………………… सततं यतनीयम्। [2010]
संस्कृतं विना ………………………………………………… परमावश्यकमस्ति
संस्कृतं विना ………………………………………………… भाषायां सन्ति।

शब्दार्थ निरर्थक = व्यर्थ, बेकार प्रतीयते = प्रतीत होती है। निधिः = खजाना। आपतितम् = आ पड़ा है। अनुसन्धानानि = खोजें। सम्यग्बोधाय = अच्छी तरह से ज्ञान के लिए। भारतसंस्कृतिरक्षणम् = भारत की संस्कृति की रक्षा। सुरभाषया = देवभाषा संस्कृत के द्वारा। सकलवाग्जननी = सभी भाषाओं की माता। सततं = सदा। समादृता = आदर के योग्य| यतनीयम् = प्रयत्न करना चाहिए।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में भाषा की सुरक्षा, उसका ज्ञान और उसका अभ्युदय करने के लिए भारतीयों को प्रेरित किया गया है।

अनुवाद संस्कृत के बिना एकता और अखण्डता का पाठ व्यर्थ ही प्रतीत होता है। नेहरू जी ने भी अपनी आत्मकथा में लिखा है कि संस्कृत भाषा भारत की निधि है, उसकी सुरक्षा का उत्तरदायित्व स्वतन्त्र भारत पर आ पड़ा है। हमारे पूर्वजों के विचार और खोजें इसी भाषा में हैं। अपनी सभ्यता, धर्म, राष्ट्रीय इतिहास और संस्कृति के अच्छी तरह से ज्ञान के लिए संस्कृत का ज्ञान परम आवश्यक है। किसी कवि ने अपनी मधुर वाणी में कहा हैजिस संस्कृत भाषा के द्वारा प्रतिदिन भारत की संस्कृति की रक्षा होती है, पृथ्वी पर वह सभी भाषाओं की जननी है, ऐसा विद्वानों ने सुना है। निश्चय ही, वह निरन्तर आदर के योग्य है। ऐसी इस भाषा के पुनरुत्थान (UPBoardSolutions.com) के लिए भारतीयों को फिर से निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए।

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लघु उत्तटीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संस्कृत भाषा में निबद्ध वेदांगों की संख्या तथा नाम लिखिए। [2009]
या
वेदांगों के नाम लिखिए। [2006, 08,09, 10, 11, 12, 13, 14]
उत्तर :
संस्कृत भाषा में निबद्ध वेदांगों की संख्या छः है। इनके नाम हैं—

  • शिक्षा,
  • कल्प,
  • व्याकरण,
  • निरुक्त,
  • छन्द तथा
  • ज्योतिषः

प्रश्न 2.
चार वेदों के नाम लिखिए। [2007, 15]
उत्तर :
चार वेदों के नाम हैं-

  • ऋग्वेद,
  • यजुर्वेद,
  • सामवेद और
  • अथर्ववेद।

प्रश्न 3.
संस्कृत भाषा का महत्त्व समझाइए। [2006,07]
उत्तर :
संस्कृत भाषा विश्व की सभी भाषाओं में सबसे प्राचीन, अत्यधिक ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न, सरल, अत्यन्त मधुर और सभी के मन को हरने वाली है। यह बात पूर्वी (भारतीय) और पाश्चात्य विद्वानों द्वारा एक स्वर से स्वीकार की गयी है। ग्रीक, लैटिन आदि प्राचीन भाषाओं में संस्कृत (UPBoardSolutions.com) भाषा ही सबसे प्राचीन और विशाल साहित्य से युक्त है।

प्रश्न 4.
दर्शन मुख्य रूप से कितने भागों में विभक्त हैं?
उत्तर :
दर्शन मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त हैं-
(क) आस्तिक दर्शन और
(ख) नास्तिक दर्शन। आस्तिक दर्शन के अन्तर्गत छ: दर्शन आते हैं-

  • न्याय,
  • वैशेषिक,
  • सांख्य,
  • योग,
  • मीमांसा तथा
  • वेदान्त।

नास्तिक दर्शन के अन्तर्गत तीन दर्शन आते हैं—

  • चार्वाक,
  • जैन और
  • बौद्ध।

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प्रश्न 5.
संस्कृत भाषा की विपुल साहित्य-राशि का संक्षेप में परिचय दीजिए।
उत्तर :
संस्कृत साहित्य में विश्व के सबसे प्राचीन ऋक्, यजुः, साम और अथर्व नाम के चार वेद; शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष-ये वेदों के छ: अंग; न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त-ये छः आस्तिक दर्शन; चार्वाक, जैन, बौद्ध-ये तीन नास्तिक दर्शन; उपनिषद्, स्मृतियाँ, सूत्र, धर्मशास्त्र, पुराण, रामायण, महाभारत आदि ग्रन्थ संस्कृत साहित्य की विपुल राशि के परिचायक हैं।

प्रश्न 6.
संस्कृत साहित्य किन तीन प्रकारों में से विभाजित है? इसके कुछ प्रमुख कवियों-लेखकों के नाम बताइए। [2006,09]
या
सुप्रसिद्ध संस्कृत कवियों में से पाँच के नाम लिखिए। [2006, 09, 12]
या
सुप्रसिद्ध संस्कृत कवियों के नाम बताइए। [2014]
उत्तर :
संस्कृत साहित्य-गद्य, पद्य और चम्पू-तीन प्रकारों में विभाजित है। वाल्मीकि, व्यास, भवभूति, दण्डी, सुबन्धु, बाण, कालिदास, अश्वघोष, भारवि, जयदेव, माघ, श्रीहर्ष आदि कवि और लेखक इसके गौरव को बढ़ाते हैं।

प्रश्न 7.
राजा ने लकड़हारे से किस शब्द का गलत प्रयोग किया था? सही शब्दक्या होना चाहिए था?
उत्तर :
राजा ने लकड़हारे से ‘बाधति’ क्रिया का प्रयोग किया था, जो कि परस्मैपदी होने के कारण अशुद्ध था। इसके स्थान पर क्रिया को आत्मनेपदी प्रयोग ‘बाधते’ होना चाहिए था।

प्रश्न 8.
रामायण के अनुसार हनुमान ने सीताजी से किस भाषा में बातचीत की थी? उद्धरणपूर्वक लिखिए।
उत्तर :
रामायण के अनुसार हनुमान ने सीताजी से सामान्य लोगों में प्रचलित संस्कृत भाषा में निम्नवत् विचार करते हुए बातचीत की थी–

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वाचं चोदाहरिष्यामि, द्विजातिरिव संस्कृताम्।
रावणं मन्यमानां मां, सीता भीता भविष्यति ॥

प्रश्न 9.
भारतीय संस्कृति को प्रतिबिम्बित करने वाली भाषा कौन-सी है? [2010, 12]
उत्तर :
भारतीय संस्कृति को प्रतिबिम्बित करने वाली भाषा संस्कृत है, क्योंकि इस भाषा में (UPBoardSolutions.com) रचित सम्पूर्ण साहित्य भारतीय समाज को प्रत्यक्ष प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करता है।

प्रश्न 10.
संस्कृत भाषा के सम्बन्ध में नेहरू जी ने अपनी आत्मकथा में क्या लिखा था?
उत्तर :
पं० जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्म-कथा में संस्कृत के महत्त्व के विषय में लिखा है कि, संस्कृत भाषा»भारत की अमूल्य निधि है। उसकी सुरक्षा का दायित्व स्वतन्त्र भारत पर है।”

प्रश्न 11.
हनुमान् ने सीता को मुद्रिका देते समय सीता से संस्कृत में वार्तालाप क्यों नहीं किया? [2010]
उत्तर :
सीता को मुद्रिका देते समय हनुमान ने उनसे ब्राह्मणों के द्वारा बोली जाने वाली संस्कृत में वार्तालाप इसलिए नहीं किया, क्योंकि उन्हें भय था कि सीता उनको रावण समझते हुए डर जाएँगी।

प्रश्न 12.
भारत की अखण्डता को बनाये रखने वाली दो सूक्तियाँ लिखिए। [2012]
उत्तर :
भारत की अखण्डता को बनाये रखने वाली दो सूक्तियाँ निम्नलिखित हैं

  • अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्।
  • मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।

प्रश्न 13.
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ कथन का अभिप्राय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्रस्तुत कथन का अर्थ है-माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान् हैं। वास्तव में स्वर्ग को किसी ने देखा नहीं है कि वह है भी या नहीं और वहाँ वास्तव में परम सुख मिलता भी है अथवा नहीं । लेकिन माता
और जन्मभूमि हमारे समक्ष प्रत्यक्ष उपस्थित हैं। माता हमें जन्म देती है और अनेकानेक दुःख-कष्ट सहनकर हमें हर सम्भव सुख प्रदान करती है। इसी प्रकार हमारी मातृभूमि हमारे भरण-पोषण के लिए अन्न-जल और विविध प्रकार के धन-धान्य उपलब्ध कराकर हमें स्वर्ग (UPBoardSolutions.com) का-सा सुख प्रदान करती है। इसीलिए यह कहना उचित ही है कि “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।”

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प्रश्न 14.
“शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः” का अभिप्राय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर  :
ण्डाल और कुत्ते दोनों का स्वभाव एक जैसा होता है, क्योंकि ये दोनों अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी कर सकते हैं। अपना पेट भरने के लिए ये अपने परिजनों, माता-पिता, पुत्र-पुत्री आदि किसी को भी मारने के लिए तैयार हो जाते हैं। इसलिए विद्वान् लोग चाण्डाल और कुत्ते को एक समान दृष्टि से देखते हैं।

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Class 10 Sanskrit Chapter 4 UP Board Solutions सूक्ति – सुधा Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 4 Sukti Sudha Question Answer (पद्य – पीयूषम्)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 4 हिंदी अनुवाद सूक्ति – सुधा के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

प्रस्तुत पाठ के अन्तर्गत कुछ सूक्तियों का संकलन किया गया है। ‘सूक्ति’ का अर्थ ‘सुन्दर कथन है। सूक्तियाँ प्रत्येक देश और प्रत्येक काल में प्रत्येक मनुष्य के लिए समान रूप से उपयोगी होती हैं। जिस प्रकार सुन्दर वचन बोलने से बोलने वाले और सुनने वाले दोनों का (UPBoardSolutions.com) ही हित होता है, उसी प्रकार काव्यों में लिखित सूक्तियाँ आनन्ददायिनी होने के साथ-साथ जीवन में नैतिकता और सामाजिकता भी लाती हैं। ये मनुष्यं को अमृत-तत्त्व की प्राप्ति की ओर बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करती हैं।

पाठ-सारांश

प्रस्तुत पाठ में नौ सूक्तियाँ संकलित हैं। उनका संक्षिप्त सार इस प्रकार है

  1. संसार की समस्त भाषाओं में देववाणी कही जाने वाली भाषा संस्कृत सर्वश्रेष्ठ है। इसका काव्य सुन्दर है। और इसके सुन्दर एवं मधुर वचन (सूक्तियाँ) तो अद्वितीय हैं।
  2. मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न मानते हैं, जब कि इस पृथ्वी पर रत्न तो अन्न, जल एवं मधुरं वचन हैं।
  3. बुद्धिमान् लोग अपना समय ज्ञानार्जन में लगाते हैं, जब कि मूर्ख लोग अपने समय को सोने अथवा निन्दित कार्यों में व्यर्थ गॅवाते हैं।
  4. जहाँ सज्जन निवास करते हैं, वहाँ संस्कृत के मधुर श्लोक सर्वत्र आनन्द का प्रसार करते हैं। इसके विपरीत जहाँ दुर्जन निवास करते हैं, वहाँ ‘श्लोक’ के ‘ल’ का लोप होकर केवल ‘शोक’ ही शेष रह जाता है, अर्थात् वहाँ पर आनन्द का अभाव हो जाता है।
  5. व्यक्ति को सदैव समयानुसार ही बात करनी चाहिए। समय के विपरीत बात करने पर तो बृहस्पति भी उपहास के पात्र बने थे।
  6. श्रद्धा के साथ कही गयी तथा पूछी गयी बात सर्वत्र आदरणीय होती है और बिना श्रद्धा के वह वन में रोने के समान व्यर्थ होती है।
  7. विद्या सर्वश्रेष्ठ धन है; क्योंकि यह राजा द्वारा छीनी नहीं जा सकती, भाइयों द्वारा विभाजित नहीं की जा सकती। इसीलिए देवताओं और विद्वानों द्वारा इसकी उपासना की जाती है।
  8. याचकों के दु:खों को दूर न करने वाली लक्ष्मी, विष्णु की भक्ति में मन को न लगाने (UPBoardSolutions.com) वाली विद्या, विद्वानों में प्रतिष्ठा प्राप्त न करने वाला पुत्र, ये तीनों न होने के बराबर ही हैं।
  9. व्यक्ति की शोभा स्नान, सुगन्ध-लेपन एवं आभूषणों से नहीं होती है, वरन् उसकी शोभा तो एकमात्र सुन्दर मधुर वाणी से ही होती है।

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पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1)
भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती।
तस्माद्धि काव्यं मधुरं तस्मादपि सुभाषितम् ॥ [2009, 10, 12, 13]

शब्दार्थ भाषासु = भाषाओं में मुख्या = प्रमुख। मधुरा = मधुर गुणों से युक्त। दिव्या = अलौकिक गीर्वाणभारती = देवताओं की वाणी, संस्कृत। तस्मात् = उससे। हि = निश्चयपूर्वका अपि = भी। सुभाषितम् = सुन्दर या उपदेशपरक वचन। सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ में संकलित ‘सूक्ति-सुधा’ शीर्षक पाठ से अवतरित है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा। ]

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में संस्कृत भाषा और सुभाषित की विशेषता बतायी गयी है।

अन्वय भाषासु गीर्वाणभारती मुख्या, मधुरा दिव्या (च अस्ति)। तस्मात् हि काव्यं मधुरम् (अस्ति), तस्मात् अपि सुभाषितम् (मधुरम् अस्ति)।।

व्याख्या विश्व की समस्त भाषाओं में देवताओं की वाणी अर्थात् संस्कृत प्रमुख, मधुर गुण से युक्त (UPBoardSolutions.com) और अलौकिक है। इसलिए उसका काव्य भी मधुर है। उससे भी मधुर उसके सुन्दर उपदेशपरक वचन अर्थात् सुभाषित हैं। तात्पर्य यह है कि संस्कृतभाषा सर्वविध गुणों से युक्त है।

(2)
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।
मूढः पाषाण-खण्डेषु रत्न-संज्ञा विधीयते ॥ [2006,07,08,09, 10,12]

शब्दार्थ पृथिव्यां = भूतल पर, पृथ्वी पर त्रीणि रत्नानि = तीन रत्न। सुभाषितम् =अच्छी वाणी। मूढः = मूर्ख लोगों के द्वारा पाषाणखण्डेषु = पत्थर के टुकड़ों में। रत्नसंज्ञा = रत्न का नाम विधीयते = किया जाता है।

प्रसग प्रस्तुत श्लोक में जल, अन्न और सुन्दर वचन को ही वास्तविक रत्न बताया गया है।

अन्वय पृथिव्यां जलम्, अन्नं, सुभाषितम् (इति) त्रीणि रत्नानि (सन्ति)। मूढ: पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।

व्याख्या पृथ्वी पर जल, अन्न और सुन्दर (उपदेशपरक) वचन–ये तीन रत्न अर्थात् श्रेष्ठ पदार्थ हैं। मूर्ख लोगों ने पत्थर के टुकड़ों को रत्न का नाम दे दिया है। तात्पर्य यह है कि जल, अन्न और मधुर वचनों का प्रभाव समस्त संसार के कल्याण के लिए होता है, जब कि रल जिनके पास होते हैं, केवल उन्हीं का कल्याण करते हैं। अत: जल, अन्न और मधुर वचन ही वास्तविक रत्न हैं।

(3) काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्। व्यँसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥ [2007,08, 10]

शब्दार्थ काव्यशास्त्रविनोदेन = काव्य और शास्त्रों के अध्ययन द्वारा मनोरंजन से। कालः = समय। गच्छति = बीतता है। धीमताम् = बुद्धिमानों का। व्यसनेन = निन्दनीय कर्मों के करने से। निद्रया = निद्रा द्वारा कलहेन = झगड़ा करने से। वा = अथवा।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में मूर्खा और बुद्धिमानों के समय बिताने के साधन में अन्तर बताया गया है।

अन्वय धीमतां कालः काव्यशास्त्रविनोदेन गच्छति, मूर्खाणां (कालः) च व्यसनेन, निद्रया कलहेन वा (गच्छति)।

व्याख्या बुद्धिमानों का समय काव्य और शास्त्रों के अध्ययन द्वारा मनोरंजन (आनन्द प्राप्त करने) और पठन-पाठन में व्यतीत होता है। मूर्खा का समय निन्दित कार्यों के करने में, सोने में अथवा झगड़ने में व्यतीत होता है।

(4)
श्लोकस्तु श्लोकतां याति यत्र तिष्ठन्ति साधवः।
लकारो लुप्यते यत्र तत्र तिष्ठन्त्यसाधवः ॥ [2006,08,09, 10]

शब्दार्थ श्लोकस्तु = यश तो। लोकताम् याति = कीर्ति की प्राप्ति करता है। यत्र = जहाँ। (UPBoardSolutions.com) तिष्ठन्ति = रहते हैं। साधवः = सज्जन पुरुष लकारो लुप्यते = श्लोक का ‘ल’ वर्ण लुप्त हो जाता है अर्थात् श्लोक ‘शोक’ बन जाता है। तत्र = वहाँ। असाधवः = दुर्जन पुरुष।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सज्जनों और दुर्जनों की संगति का प्रभाव दर्शाया गया है।

अन्वय यत्र साधवः तिष्ठन्ति, श्लोकः तु श्लोकताम् याति। यत्र असाधवः तिष्ठन्ति, तत्र लकारो लुप्यते (अर्थात् श्लोकः शोकतां याति)।

व्याख्या जहाँ सज्जन रहते हैं, वहाँ श्लोक (संस्कृत का छन्द) कीर्ति की प्राप्ति करता है। जहाँ दुर्जन रहते हैं, वहाँ श्लोक का ‘लु’ लुप्त हो जाता है अर्थात् श्लोक ‘शोक’ की प्राप्ति कराता है। तात्पर्य यह है कि अच्छी बातों, उपदेशों या सूक्तियों का प्रभाव सज्जनों पर ही पड़ता है; दुष्टों पर तो उसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। यह भी कहा जा सकता है कि सज्जनों की उपस्थिति वातावरण को आनन्दयुक्त कर देती है और दुर्जनों की उपस्थिति दुःखपूर्ण बना देती है।

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(5)
अप्राप्तकालं वचनं बृहस्पतिरपि ब्रुवन्।
प्राप्नुयाद् बुद्ध्यवज्ञानमपमानञ्च-शाश्वतम् ॥ [2011]

शब्दार्थ अप्राप्तकालम् = समय के प्रतिकूल वचन = बात। बृहस्पतिः = देवताओं के गुरु बृहस्पति अर्थात् अत्यधिक ज्ञानवान् व्यक्ति। अपि = भी। बुवन् = बोलता हुआ। प्राप्नुयात् = प्राप्त करता है। बुद्ध्यवज्ञानम् = बुद्धि की उपेक्षा; बुद्धि की अवमानना। शाश्वतम् = निरन्तर।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में समय के प्रतिकूल बात न कहने की शिक्षा दी गयी है।

अन्वय अप्राप्तकालं वचनं ब्रुवन् बृहस्पतिः अपि बुद्ध्यवज्ञानं शाश्वतम् अपमानं च प्राप्नुयात्।

व्याख्या समय के विपरीत बात को कहते हुए देवताओं के गुरु बृहस्पति भी बुद्धि की अवज्ञा और सदा रहने वाले अपमान को प्राप्त करते हैं। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को समय के अनुकूल बात ही करनी चाहिए।

(6)
वाच्यं श्रद्धासमेतस्य पृच्छतश्च विशेषतः
प्रोक्तं श्रद्धाविहीनस्याप्यरण्यरुदितोपमम् ॥

शब्दार्थ वाच्यम् = कहने योग्य। श्रद्धासमेतस्य = श्रद्धा से युक्त का। पृच्छतः = (UPBoardSolutions.com) पूछने वाले का। प्रोक्तं = कहा हुआ। श्रद्धाविहीनस्य = श्रद्धारहित के लिए। अरण्य-रुदितोपमम् = अरण्यरोदन के समान निरर्थक है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में श्रद्धा के महत्त्व का प्रतिपादन किया गया है।

अन्वये श्रद्धासमेतस्य विशेषतः पृच्छतः च वाच्यम्। श्रद्धाविहीनस्य प्रोक्तम् अपि अरण्यरुदितोपमम् (अस्ति )।

व्याख्या श्रद्धा से युक्त अर्थात् श्रद्धालु व्यक्ति की और विशेष रूप से पूछने वाले की बात कहने योग्य होती है। श्रद्धा से रहित अर्थात् अश्रद्धालु व्यक्ति का कहा हुआ भी अरण्यरोदन अर्थात् जंगल में रोने के समान निरर्थक है। तात्पर्य यह है कि ऐसे ही व्यक्ति या शिष्य को ज्ञान देना चाहिए, जो श्रद्धालु होने के साथ-साथ जिज्ञासु भी हो।

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(7)
वसुमतीपतिना नु सरस्वती, बलवता रिपुणा न च नीयते
समविभागहरैर्न विभज्यते, विबुधबोधबुधैरपि सेव्यते ॥ [2006, 10]

शब्दार्थ वसुमतीपतिना = राजा के द्वारा| सरस्वती = विद्या| बलवता रिपुणी = बलवान् शत्रु के द्वारा न नीयते = नहीं ले जायी जाती है। समविभागहरैः = समान हिस्सा लेने वाले भाई-बहनों के द्वारा। न विभज्यते = नहीं विभक्त की जाती है। विबुधबोधबुधैः = ऊँचे से ऊँचे विद्वानों के द्वारा। सेव्यते = सेवित होती है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में विद्या को अमूल्य धन बताया गया है।

अन्वय सरस्वती वसुमतीपतिना बलवता रिपुणा च न नीयते। समविभागहरैः न विभज्यते, विबुधबोधबुधैः अपि सेव्यते।।

व्याख्या विद्या राजा के द्वारा और बलवान् शत्रु के द्वारा (हरण करके) नहीं ले जायी जाती है। यह समान हिस्सा लेने वाले भाइयों के द्वारा भी बाँटी नहीं जाती है तथा देवताओं के ज्ञान के समान ज्ञान वाले विद्वानों के द्वारा भी सेवित होती है। तात्पर्य यह है कि विद्या को न तो राजा ले सकता है और न ही बलवान् शत्रु। इसे भाई-बन्धु भी नहीं बाँटते अपितु यह तो ज्ञानी-विद्वानों द्वारा भी सेवित है।

(8)
लक्ष्मीनं या याचकदुः खहारिणी, विद्या नयाऽप्यच्युतभक्तिकारिणी।
पुत्रो न यः पण्डितमण्डलाग्रणीः, सा नैव सा नैव स नैव नैव ॥ [2012]

शब्दार्थ या = जो लक्ष्मी। याचकदुःखहारिणी = याचकों के दुःख को दूर करने वाली। अच्युतभक्तिकारिणी = विष्णु की भक्ति उत्पन्न करने वाली। पण्डितमण्डलाग्रणीः = पण्डितों के समूह में आगे रहने वाला, श्रेष्ठ। सानैव = वह नहीं है।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में वास्तविक लक्ष्मी, विद्या तथा पुत्र के विषय में बताया गया है।

अन्वय या लक्ष्मीः याचकदु:खहारिणी न (अस्ति) सा (लक्ष्मीः) नैव (अस्ति)। या विद्या अपि अच्युतभक्तिकारिणी न (अस्ति) सा (विद्या) नैव (अस्ति)। यः पुत्रः पण्डितमण्डलाग्रणी: न (अस्ति) सः (पुत्र) एव न (अस्ति), नैव (अस्ति)।

व्याख्या जो लक्ष्मी याचकों अर्थात् माँगने वालों के दु:खों को दूर करने वाली नहीं है, वह लक्ष्मी ही नहीं है, जो विद्या भी भगवान् विष्णु में भक्ति उत्पन्न करने वाली नहीं है, वह विद्या ही नहीं है, जो पुत्र पण्डितों के समूह में आगे रहने वाला (श्रेष्ठ) नहीं है; वह पुत्र ही नहीं है। (UPBoardSolutions.com) तात्पर्य यह है कि वास्तविक धन वही है, जो परोपकार में प्रयुक्त होता है; विद्या वही है, जिससे आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है और पुत्र वही है जो विद्वान् होता है।

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(9)
केयूराः न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः।
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्द्धजाः ॥ [2012]
वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम् ॥ [2009]

शब्दार्थ केयूराः = बाजूबन्द (भुजाओं में पहना जाने वाला सोने का आभूषण)। हाराः = हार। विभूषयन्ति = सजाते हैं। चन्द्रोज्ज्वलाः = चन्द्रमा के समान उज्ज्वला विलेपनम् = शरीर में किया जाने वाला चन्दन आदि का लेप। कुसुमं = फूल। अलङ्कृताः = सजे हुए। मूर्द्धजाः = बाल। वाण्येका (वाणि + एका) = एकमात्र वाणी। समलङ्करोति = सजाती है। संस्कृती = संस्कार की गयी, भली-भाँति अध्ययन आदि के द्वारा शुद्ध की गयी। धार्यते = धारण की जाती है। क्षीयन्ते = नष्ट हो जाते हैं। खलु = निश्चित ही। भूषणानि = समस्त आभूषण। सततं = सदा| वाग्भूषणम् = वाणीरूपी आभूषण। भूषणं = आभूषण।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में संस्कारयुक्त वाणी का महत्त्व बताया गया है।

अन्वय केयूराः पुरुषं न विभूषयन्ति, चन्द्रोज्ज्वला: हाराः न (विभूषयन्ति)। न स्नानं, न विलेपनं, न कुसुमं, न अलङ्कृताः मूर्द्धजाः पुरुषं (विभूषयन्ति)। एकावाणी, या संस्कृता धार्यते, पुरुषं समलङ्करोति। भूषणानि खलु क्षीयन्ते। वाग्भूषणं (वास्तविकं) सततं भूषणम् (अस्ति)।

व्याख्या पुरुष को सुवर्ण के बने बाजूबन्द सुशोभित नहीं करते हैं। चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हार शोभित नहीं करते हैं। स्नान, चन्दनादि का लेप, फूल, सुसज्जित बाल पुरुष को शोभित नहीं करते हैं। एकमात्र वाणी, जो अध्ययनादि द्वारा संस्कार करके धारण की गयी है, पुरुष को सुशोभित करती है। अन्य आभूषण तो निश्चित ही नष्ट हो जाते हैं। वाणीरूपी आभूषण ही सदा आभूषण है। तात्पर्य यह है कि वाणी-रूपी आभूषण ही सच्चा आभूषण है, जो कभी नष्ट नहीं होता।

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सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1) भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती। [2011]

सन्दर्भ प्रस्तुत सूक्तिपरक पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के . ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ की शेष सभी सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग इस सूक्ति में संस्कृत भाषा के महत्त्व को बताया गया है।

अर्थ सभी भाषाओं में संस्कृत सबसे प्रमुख, मधुर और अलौकिक है।

व्याख्या विश्व की समस्त भाषाओं में संस्कृत भाषा को ‘गीर्वाणवाणी’ अर्थात् देवताओं की भाषा बताया गया है। यह भाषा शब्द-रचना की दृष्टि से दिव्य, भाषाओं की दृष्टि से मधुर तथा विश्व की भाषाओं में प्रमुख है। इस भाषा में उत्तम काव्य, सरस नाटक और चम्पू पाये जाते हैं। (UPBoardSolutions.com) इस भाषा में धर्म, दर्शन, इतिहास, चिकित्सा आदि सभी विषयों पर प्रचुर सामग्री उपलब्ध है। इतनी सम्पूर्ण भाषा विश्व में कोई और नहीं है।

(2) भाषासु काव्यं मधुरं तस्मादपि सुभाषितम्। [2005]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में सुभाषित के महत्त्व को बताया गया है।

अर्थ (संस्कृत) भाषा में काव्य मधुर है तथा उससे भी अधिक सुभाषित।

व्याख्या भाषाओं में संस्कृत भाषा सबसे दिव्य, मुख्य और मधुर है। इससे भी अधिक मधुर इस भाषा के काव्य हैं और काव्यों से भी अधिक मधुर हैं इस भाषा के सुभाषित। सुभाषित से आशय ऐसी उक्ति या कथन से होता है जो बहुत ही अच्छी हो। इसे सूक्ति भी कहते हैं। सूक्तियाँ प्रत्येक देश और प्रत्येक काल में प्रत्येक मनुष्य के लिए समान रूप से उपयोगी होती हैं। जिस प्रकार सुन्दर वचन बोलने से वक्ता और श्रोता दोनों का ही हित होता है, उसी प्रकार काव्यों में निहित सूक्तियाँ आनन्ददायिनी होने के साथ-साथ जीवन में नैतिकता का समावेश कराती हैं तथा अमृत-तत्त्व की प्राप्ति में प्रेरणा प्रदान करती हैं। यही कारण है कि (संस्कृत) भाषा में सूक्ति को सर्वोपरि मान्यता प्रदान की गयी है।

(3)
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि, जलमन्नं सुभाषितम्। [2006,07, 08, 11, 12, 14]
मूढः पाषाणखण्डेषु, रत्नसंज्ञाविधीयते ॥ [2007,08, 11, 15]

प्रसंग इन सूक्तियों में जल, अन्न और अच्छे वचनों को ही सर्वोत्कृष्ट रत्न की संज्ञा प्रदान की गयी है।

अर्थ पृथ्वी पर जल, अन्न और सुभाषित ये तीन रत्न हैं। मूर्ख व्यक्ति ही पत्थरों को रत्न मानते हैं।

व्याख्या मानव ही नहीं पशु-पक्षी भी अन्न-जल और सुन्दरवाणी के महत्त्व को भली प्रकार पहचानते हैं। अन्न से भूख शान्त होती है, जल से प्यास बुझती है और सुन्दर वचनों से मन को सन्तोष मिलता है। बिना अन्न और जल के तो जीवधारियों का जीवित रहना कठिन ही नहीं वरन् असम्भव ही है। इसीलिए इन्हें सच्चे रत्न कहा गया है। सांसारिक मनुष्य अपनी अल्पज्ञता के कारण सभी प्रकार से धन-संग्रह की प्रवृत्ति में लगा रहता है। वह हीरे, रत्न, जवाहरात, मणियों का संचय करके धनी एवं वैभवशाली बनना चाहता है। वह इन्हें ही अमूल्य एवं महत्त्वपूर्ण मानता है, परन्तु वास्तविकता कुछ और ही है। ये तो पत्थर के टुकड़े मात्र हैं। वास्तव में जल, अन्न और सुवाणी (अच्छे वचन) ही सच्चे रत्न हैं।

(4) काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्। [2006,07,08, 09, 10, 11, 14, 15]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में सज्जनों के समय व्यतीत करने के विषय में बताया गया है।

अर्थ बुद्धिमानों का समय काव्य-शास्त्र के पठन-पाठन में ही बीत जाता है।

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व्याख्या विद्वान् और सज्जन अपने समय को शास्त्रों और काव्यों का अध्ययन करने में लगाते हैं। वे यदि अपना मनोरंजन भी करते हैं तो इसी प्रकार के अच्छे कार्यों से करते हैं और सदैव लोकोपकार की बात सोचते हैं, क्योंकि वे समय के महत्त्व को जानते हैं। वे समझते हैं कि “आयुषः क्षण एकोऽपि न लभ्यः स्वर्णकोटिकैः । सचेन्निरर्थकं नीतः का नु हानिस्ततोऽधिकाः ।।”; अर्थात् आयुष्य का एक भी क्षण सोने की करोड़ों मुद्राओं के द्वारा नहीं खरीदा जा (UPBoardSolutions.com) सकता। यदि इसे व्यर्थ बिता दिया गया तो इससे बड़ी हानि और क्या हो सकती है? इसीलिए वे अपना समय काव्य-शास्त्रों के अध्ययन में व्यतीत करते हैं क्योंकि आत्म-उद्धार के लिए भी ज्ञान परम आवश्यक है।

(5) व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रयाकलहेन वा। [2010]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में मूर्ख लोगों के समय व्यतीत करने के विषय में बताया गया है।

अर्थ मूख का समय बुरी आदतों, निद्रा व झगड़ने में व्यतीत होता है।

व्याख्या मूर्ख लोग अपना समय सदैव ही व्यर्थ के कार्यों में बिताते हैं। समय बिताने के लिए वे जुआ, शराब आदि के व्यसन करते हैं और स्वयं को नरक में धकेलते हैं। कुछ लोग अपना समय सोकर बिता देते हैं। और कुछ लड़ाई-झगड़े में अपना समय लगाकर दूसरों को पीड़ा पहुँचाते हैं। इनके किसी भी कार्य से किसी को कोई लाभ अथवा सुख नहीं मिलता है; क्योंकि परोपकार करना इनको आता ही नहीं है। इन्हें तो दूसरों को पीड़ा पहुँचाने में ही सुख की प्राप्ति होती है।

(6), श्लोकस्तु श्लोकतां याति यत्र तिष्ठन्ति साधवः। [2012]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में सज्जनों की उपस्थिति का महत्त्व समझाया गया है।

अर्थ जहाँ सज्जन निवास करते हैं, वहाँ श्लोक तो यश को प्राप्त करता है।

व्याख्या सज्जन अच्छी और सुन्दर बातों को बढ़ावा देकर उनके संवर्द्धन में अपना योगदान देते हैं। इसीलिए सज्जनों के मध्य विकसित श्लोक; अर्थात् संस्कृत कविता का छन्द; कवि की कीर्ति या यश को चतुर्दिक फैलाता है। आशय यह है कि कविता सज्जनों के मध्य ही आनन्ददायक होती है तथा कवि को यश व कीर्ति प्रदान करती है। दुर्जनों के मध्य तो यह विवाद उत्पन्न कराती है तथा शोक (दुःख) का कारण बनती है।

(2) वसुमतीपतिना नु सरस्वती।। [2011]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में विद्या के विषय में वर्णन किया गया है।

अर्थ राजा के द्वारा भी विद्या (नहीं छीनी जा सकती है)।

व्याख्या विद्या न तो राजा के द्वारा अथवा न ही किसी बलवान् शत्रु के द्वारा बलपूर्वक छीनी जी सकती है। यह विद्यारूपी धन किसी के द्वारा बाँटा भी नहीं जा सकता, अपितु यह तो जितनी भी बाँटी जाए, उसमें उतनी ही वृद्धि होती है। यह धन तो बाँटे जाने पर बढ़ता ही रहता है। प्रस्तुत सूक्ति विद्या की महत्ता को परिभाषित करती है।

(8) लक्ष्मीनं या याचकदुःखहारिणी। [2012]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में लक्ष्मी की सार्थकता पर प्रकाश डाला गया है।

अर्थ जो याचक (माँगने वालों) के दु:खों को दूर करने वाली नहीं है, (वह) लक्ष्मी (नहीं है)।

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व्याख्या किसी भी व्यक्ति के पास लक्ष्मी अर्थात् धन है तो उस लक्ष्मी की सार्थकता इसी में है कि वह उसके द्वारा याचकों अर्थात् माँगने वालों के दु:खों को दूर करे। आशय यह है कि धनसम्पन्न होने पर भी कोई व्यक्ति यदि किसी की सहायता करके उसके कष्टों को दूर नहीं करता है तो उसका धनसम्पन्न होना व्यर्थ ही है। व्यक्ति का धनी होना तभी सार्थक है जब वह याचक बनकर अपने पास आये लोगों को निराश न करके अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनकी सहायता करे। (UPBoardSolutions.com) कविवर रहीम ने सामर्थ्यवान् लेकिन याचक की मदद न करने वाले लोगों को मृतक के समान बताया है रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाय। उनते पहले वे मुए, जिन मुख निकसत नाय ॥

(9) विद्या न याऽप्यच्युतभक्तिकारिणी।। [2008, 1]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में विद्या की सार्थकता पर प्रकाश डाला गया है।

अर्थ जो विद्या भगवान विष्णु की भक्ति में प्रवृत्त करने वाली नहीं है, (वह विद्या नहीं है)।

व्याख्या वही विद्या सार्थक है, जो व्यक्ति को भगवान विष्णु अर्थात् ईश्वर की भक्ति में प्रवृत्त करती है। जो विद्या व्यक्ति को ईश्वर की भक्ति से विरत करती है, वह किसी भी प्रकार से विद्या कहलाने की अधिकारिणी ही नहीं है। विद्या वही है, जो व्यक्ति को जीवन और मरण के बन्धन से मुक्त करके मोक्ष-पद प्रदान करे। मोक्ष-पद को भक्ति के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। व्यक्ति को भक्ति में विद्या ही अनुरक्त कर सकती है। इसीलिए विद्या को प्रदान करने (UPBoardSolutions.com) वाले गुरु को कबीरदास जी ने ईश्वर से भी श्रेष्ठ बताया है गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाँय।। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

(10) पुत्रो न यः पण्डितमण्डलाग्रणीः। [2006,09]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में सच्चे पुत्र की विशेषता बतायी गयी है।

अर्थ जो पुत्र विद्वानों की मण्डली में अग्रणी नहीं, वह पुत्र ही नहीं है।

व्याख्या सूक्तिकार का तात्पर्य यह है प्रत्येक व्यक्ति पुत्र की कामना इसीलिए करता है कि वह उसके कुल के नाम को चलाएगा; अर्थात् अपने सद्कर्मों से अपने कुल के यश में वृद्धि करेगा और यह कार्य महान् पुत्र ही कर सकता है। मूर्ख पुत्र के होने का कोई लाभ नहीं होता; क्योंकि उससे कुल के यश में वृद्धि नहीं होती। ऐसा पुत्र होने से तो नि:सन्तान रह जाना ही श्रेयस्कर है। वस्तुतः पुत्र कहलाने का अधिकारी वही है, जो विद्वानों की सभा में अपनी विद्वत्ता का लोहा मनवाकर अपने माता-पिता तथा कुल के सम्मान को बढ़ाता है।

(11) वाण्येको समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते [2006, 11]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में वाणी को ही वास्तविक आभूषण कहा गया है।

अर्थ मात्र वाणी ही, जो शुद्ध रूप से धारण की जाती है, मनुष्य को सुशोभित करती है।

व्याख्या संसार का प्रत्येक प्राणी सांसारिक प्रवृत्तियों में उलझा रहता है और उन्हीं प्रवृत्तियों में वह (भौतिक) सुख का अनुभव करता है। इसीलिए वह अपने आपको सजाकर रखना चाहता है और दूसरों के समक्ष स्वयं को आकर्षक सिद्ध करना चाहता है, अर्थात् आत्मा की अपेक्षा वह शरीर को अधिक महत्त्व देता है। वह विभिन्न आभूषणों को धारण करता है, परन्तु ऐसे आभूषण तो समय बीतने के साथ-साथ नष्ट हो जाते हैं। सच्चा आभूषण तो मधुर वाणी है, जो कभी भी नष्ट नहीं होती। मधुर वाणी मनुष्य का एक ऐसा गुण है। जिसके कारण उसकी शोभा तो बढ़ती ही है, साथ ही वह समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा को भी अर्जित करता है तथा इससे (UPBoardSolutions.com) उसको आत्मिक आनन्द की भी अनुभूति होती है।

(12)
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं, वाग्भूषणं भूषणम् ॥ [2009, 12, 13]
वाग्भूषणं भूषणम्।। [2007,08,09, 10, 12]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में सुसंस्कारित वाणी को ही मनुष्य का एकमात्र आभूषण बताया गया है।

अर्थ सभी आभूषण धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं, सच्चा आभूषण वाणी ही है।

व्याख्या मनुष्य अपने सौन्दर्य को बढ़ाने के लिए अनेक प्रकार के आभूषणों और सुगन्धित द्रव्यों का उपयोग करता है। ये आभूषण और सुगन्धित द्रव्य तो नष्ट हो जाने वाले हैं; अत: बहुत समय तक मनुष्य के सौन्दर्य को बढ़ाने में असमर्थ होते हैं। मनुष्य की संस्कारित मधुर वाणी सदा उसे आभूषित करने वाली है; क्योंकि वह सदा मनुष्य के साथ रहती है, वह कभी नष्ट नहीं होती। उसका प्रभाव तो मनुष्य के मरने के बाद भी बना रहता है। मनुष्य अपनी प्रभावशालिनी वाणी से ही दुष्टों और अपराधियों को भी बुराई से अच्छाई के मार्ग पर ले जाता है; अत: वाणी ही सच्चा आभूषण है।

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श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) भाषासु मुख्या …………………………………………………….. तस्मादपि सुभाषितम् ॥ (श्लोक 1) [2009, 10, 14, 15]

संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके संस्कृतभाषायाः महत्त्वं प्रतिपादयन् कविः कथयति-संस्कृतभाषा सर्वासु भाषासु श्रेष्ठतमा अस्ति। इयं भाषा अलौकिका मधुरगुणयुक्ता च अस्ति। तस्मात् हि तस्य काव्यं मधुरम् अस्ति। तस्मात् अपि रम्यं मधुरं च तस्य सुभाषितम् अस्ति। अस्मात् कारणात् इयं गीर्वाणभारती कथ्यते। |

(2) पृथिव्यां त्रीणि …………………………………………………….. रत्नसंज्ञा विधीयते ॥ (श्लोक 2) [2006, 09, 14]

संस्कृतार्थः कविः कथयति-भूतले जलम् अन्नं सुभाषितं च इति त्रीणि रत्नानि सन्ति। मूर्खः पाषाणखण्डेषु रत्नस्य संज्ञा विधीयते। वस्तुत: जलम् अन्नं सुभाषितञ्च अखिलं विश्वं कल्याणार्थं भवन्ति।

(3) काव्यशास्त्रविनोदेन …………………………………………………….. निद्रया कलहेन वा ॥ (श्लोक 3) [2008, 10, 12, 13, 14, 15]

संस्कृतार्थः
कवि मूर्खाणां बुद्धिमतां च समययापनस्य अन्तरं वर्णयति यत् बुद्धिमन्तः जनाः स्वसमयं काव्यशास्त्राणां पठनेन यापयन्ति, एतद् विपरीतं मूर्खाः जनाः स्वसमयं दुराचारेण, शयनेन, विवादेन वा यापयन्ति।

(4) श्लोकस्तु श्लोंकता …………………………………………………….. “यत्र तिष्ठन्त्यसाधवः॥ (श्लोक 4) [2006, 08, 15]

संस्कृतार्थः
अस्मिन् श्लोके कविः कथयति-यत्र सज्जनाः निवसन्ति, तत्र श्लोकः तु कीर्ति याति। यत्र दुर्जना: निवसन्ति, तत्र श्लोकस्य लकारः लुप्यते। एवं श्लोकः शोकं भवति। सदुपदेशैः सज्जना प्रभाविताः दुष्टाः न इति भावः।

(5) अप्राप्तकालं वचनं …………………………………………………….. अपमानञ्च शाश्वतम् ॥ (श्लोक 5) [2009]

संस्कृतार्थः
अस्मिन् श्लोके कविः कथयति यत् बृहस्पतिः अपि असामयिकं वचनं ब्रुवन् बुद्धेः अधोगति शाश्वतम् अपमानञ्च प्राप्नोति। अतएव असामयिकं वचनं कदापि न ब्रूयात्।।

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(6) वाच्यं श्रद्धासमेतस्य …………………………………………………….. रुदितोपमम् ॥ (श्लोक 6) [2011]

संस्कृतार्थः
अस्मिन् श्लोके कविः कथयति-श्रद्धायुक्तस्य पुरुषस्य पृच्छतः सन् विशेषरूपेण वक्तव्यम्। श्रद्धाहीनस्य पुरुषस्य पृच्छतः वचनम् अरण्ये रुदितम् इव भवति।

(7) वसुमतिपतिना नु …………………………………………………….. बुधैरपि सेव्यते ॥ (श्लोक 7) [2010]

संस्कृतार्थः
अस्मिन् श्लोके सरस्वत्याः विशेषता वर्णिता अस्ति। सरस्वती राज्ञा तथा बलवता रिपुणा न नेतुं शक्यते न च भ्रातृबन्धुभिः विभक्तुं शक्यते अपितु विद्वद्भिः सेव्यते।

(8) लक्ष्मीनं या …………………………………………………….. स नैव नैव॥ (श्लोक 8) [2007]

संस्कृतार्थः
अस्मिन् श्लोके कविः कथयति-या लक्ष्मी याचक दुःखहारिणी न भवति, सा (UPBoardSolutions.com) लक्ष्मीति कथितुं न शक्यते। या विद्या विष्णुभक्तिकारिणी न भवति सापि विद्या कथितुं न शक्यते। यः पुत्रः पण्डितमण्डलाग्रणीः न भवति सः पुत्रः कथितुं न शक्यते।।

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(9)
केयूराः न विभूषयन्ति …………………………………………………….. वाग्भूषण भूषणं ॥ (श्लोक 9) [2002]
केयूराः न विभूषयन्ति …………………………………………………….. नालङ्कृता मूर्द्धजाः॥ [2005]

संस्कृतार्थः
अस्मिनु श्लोके वाणीम् एव सर्वश्रेष्ठं भूषणं कथितम् अस्ति। कर्णाभूषणानि चन्द्रोपमः रमणीयः हारः स्नान-विलेपनादि पुष्पाणि विभूषिता मूर्द्धजा: पुरुषं न भूषयन्ति परन्तु संस्कृता वाणी एव (या अमृतोपमा मधुरावाणी) सा एव वास्तविकम् आभूषणम्। अन्यानि आभूषणानि कालक्रमेण क्षीयन्ते परन्तु वाग्भूषणं कदापि न क्षीयते।

(10) वाण्येका समलङ्करोति …………………………………………………….. वाग्भूषण भूषणम् ॥ (श्लोक 9) [2007]

संस्कृतार्थः
अस्मिन् श्लोकाद्धे कविः कथयति–अस्मिन् संसारे एकावाणी, या अध्ययनेन विनयेन च संस्कृता धार्यते, सर्वोत्तमं भूषणं अस्ति। सा पुरुषं विभूषयन्ति। अन्यानि भूषणानि खलु नष्टाः भवन्ति। वाग्भूषणं वास्तविक भूषणम् अस्ति, यः कदापि न विनश्यति।।

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Class 10 Sanskrit Chapter 7 UP Board Solutions भरते जनसंख्या – समस्या Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 7 Bharat Jansankhya – Samasya Question Answer (गद्य – भारती)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 7 हिंदी अनुवाद भरते जनसंख्या – समस्या के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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परिचय

आज हमारा देश भारत जनसंख्या-वृद्धि की भयंकर समस्या से ग्रसित है जिससे ‘बढ़ता मानव घटता अन्न’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है, क्योंकि भूमि तो बढ़ाई नहीं जा सकती। मकान, दुकान, सड़क, कारखाने, विद्यालय, अस्पताल आदि सभी का निर्माण भूमि (UPBoardSolutions.com) पर ही होता है; अत: कृषि-योग्य भूमि दिनों-दिन कम होती जा रही है। सरकार के पास साधन सीमित हैं, फलतः असीमित जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति सम्भव नहीं हो सकती। आज भारत की जनसंख्या लगभग एक सौ बीस करोड़ से भी अधिक हो गयी है, जिससे जनता को लगभग सभी आवश्यक स्थानों पर स्थानाभाव की समस्या झेलनी पड़ रही है। इन सभी समस्याओं का निदान परिवार नियोजन से ही सम्भव है। यदि एक परिवार में मात्र एक-दो बच्चे जन्म लेंगे, तभी यह समस्या सुलझ सकती है।

प्रस्तुत पाठ जनसंख्या वृद्धि की विकराल समस्या के परिप्रेक्ष्य में परिवार नियोजन की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से सामने रखता है।

पाठ-सारांश [2006, 08, 09, 10, 12, 14]

प्रस्तावना स्वतन्त्रता-प्राप्ति के 67 वर्ष (पाठ में उल्लिखित है ‘40 वर्ष) बाद भी भारत में दरिद्रता की समस्या हल नहीं हुई है। आज भी करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें भोजन के लिए मुट्ठीभर अनाज और शरीर ढकने के लिए दो हाथ कपड़ा भी नहीं मिल पाता है। खाद्य और उपभोग की वस्तुओं में उत्पादन-वृद्धि के अनुपात में जनसंख्या की वृद्धि अधिक हो रही है। यहाँ पर प्रतिवर्ष सवा करोड़ बच्चे पैदा होते हैं; अत: सुरसा के मुँह के समान निरन्तर वृद्धिमान जनसंख्या की वृद्धि से अधिक बढ़ा हुआ उत्पादन भी ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ के समान सिद्ध हो रहा है।

जनसंख्या-वृद्धि के दुष्परिणाम :
(क) वर्ग-संघर्ष जनसंख्या की अबाधगति से वृद्धि से नगरों, ग्रामों, बाजारों, स्कूलों, अस्पतालों में सभी स्थानों पर भीड़-ही-भीड़ दिखाई देती है। योग्य व शिक्षित युवक भी रोजगार न मिलने से दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। ऐसी विकट स्थिति में सब जगह मैं-मैं के कारण अव्यवस्था और भ्रष्टाचार व्याप्त है जिसके परिणामस्वरूप गलत सिफारिश, रिश्वत, भाई-भतीजावाद, जाति और वर्ग-संघर्ष समाज को दूषित कर रहे हैं।.

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(ख) प्रदूषण की समस्या मनुष्य के पास व्यक्तिगत साधन और राष्ट्र के पास साधन सीमित ही हैं, अतः जनसंख्या वृद्धि पर रोकथाम की आवश्यकता है। बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए प्रतिवर्ष लाखों भवनों, हजारों विद्यालयों और सैकड़ों अस्पतालों की आवश्यकता पड़ती है। छोटे-छोटे घरों में रहने वाले अधिक लोग पशुओं के बाड़े में रहने वाली भेड़ों की तरह रह रहे हैं और चारों ओर गन्दगी फैला रहे हैं। रोजगार की तलाश में गाँव के लोग (UPBoardSolutions.com) नगरों की ओर भाग रहे हैं, जिससे नगरों में भी आवास की समस्या जटिल होती जा रही है। वहाँ फुटपाथों पर, सार्वजनिक उपवनों और झोपड़ियों में रहकर लोग नारकीय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उनके यत्र-तत्र मल-मूत्र त्याग के द्वारा वातावरण दूषित हो रहा है और जन-सामान्य को पेयजल भी शुद्ध रूप में उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।

(ग) शान्ति-व्यवस्था की समस्या विभिन्न प्रकार के अभावों के कारण उन वस्तुओं की प्राप्ति और जीविका के लिए आपाधापी मची हुई है। आपसी सौहार्द समाप्त हो गया है और हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ रही है। जीविका के अभाव में युवक असामाजिक हो रहे हैं, जिससे अपराध बढ़ रहे हैं और बिना कारण के झगड़े हो रहे हैं। शान्ति-व्यवस्था की समस्या भी उत्पन्न होती जा रही है और परिवारों में अधिक बच्चे होने से उनका पालन-पोषण भी ठीक ढंग से नहीं हो पा रहा है।

(घ) बाढ़ एवं भूक्षरण की समस्या जनसंख्या की निरन्तर वृद्धि के कारण वन काट डाले गये हैं और अब पर्वतों को नग्न किया जा रहा है अर्थात् पर्वतों पर उगी वनस्पतियाँ भी काटी जा रही हैं। वृक्षों और वनों को अन्धाधुन्ध काटने से भूमि का क्षय हो रहा है। बाढ़े आती हैं जिससे खेतों की उपजाऊ मिट्टी बह जाती है। और अरबों की सम्पत्ति नष्ट हो जाती है। नदियों के किनारे स्थित नगरों की गन्दगी नदियों में बहा दी जाती है, जिससे गंगा जैसी पवित्र नदियों का जल भी अपेय हो गया है।

समस्याओं का निदान : परिवार-नियोजन जनसंख्या के विस्फोट के कारण सभी तरह का विकास होने पर भी जन-जीवन संघर्षमय, जीने की इच्छा से व्याकुल, निराश और क्षुब्ध हो गया है। हत्या जैसी पाप-कथाओं को सुनकर अब मन उद्विग्न नहीं होता। यद्यपि विचारक, विद्वान्, नेता और प्रशासक इस समस्या के समाधान में लगे हुए हैं तथापि इसका एकमात्र हल परिवार नियोजन है; अर्थात् परिवार सीमित रहे और एक परिवार में दो से अधिक बच्चे पैदा न हों। बच्चों का पालन-पोषण ठीक प्रकार से हो। अधिक बच्चों के होने पर भोजन, वस्त्र आदि की आवश्यकता भी अधिक होती है। सीमित आय में उनकी शिक्षा-दीक्षा सही ढंग से नहीं हो सकती है। परिवार नियोजन से आर्थिक, सामाजिक, पर्यावरणिक आदि समस्त प्रकार के असन्तुलन समाप्त हो जाएँगे और मानव-जीवन में सुख-समृद्धि का संचार हो जाएगा।

सरकारी प्रयास एवं परिणाम राष्ट्रसंघ, भारत सरकार और राज्य सरकारें जनसंख्या की वृद्धि को रोकने के लिए विविध योजनाएँ बना रही हैं और उनको लागू कर रही हैं। इसके लिए उनके द्वारा अनेक साधन सुलभ कराये जा रहे हैं। लेकिन सभी वर्गों के सहयोग के अभाव में अपेक्षित परिणाम नजर नहीं आ रहे हैं। सरकार तो साधन जुटा सकती है और वह यथाशक्ति जुटा भी रही है। परिवार नियोजन तो सबको अपने देश के, कुल के, समाज के विकास और कल्याण के लिए करना चाहिए। हम सभी का यह परम कर्तव्य होना चाहिए कि वह अपने परिवार को संयमित तथा सीमित रखे।

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गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1)
स्वतन्त्रताप्राप्तेश्चत्वारिंशद्वर्षपश्चादपि अस्माकं देशे दरिद्रतायाः समस्या नैव समाहिता। अद्यापि कोटिशो जना निर्धनतायाः स्तरादपि अधस्ताद वर्तमाना उदरपूरणाय मुष्टिपरिमितं धान्यं शरीराच्छादनाय च हस्तद्वयं यावत् कर्पटं च नो लभन्ते, अन्येषां सौविध्यानां तु कथैव का। नास्त्येतद् यद् अस्मिन् काले साधनानां विकासो, भोज्यानां भोग्यानां च वस्तूनां परिवृद्धिर्न जातेति। वस्तुतः सत्यप्यनेकगुणिते धान्यादीनामुत्पादने तस्य लाभो नैव दृश्यते यतो हि जनसङ्ख्यापि तदनुपातेन ततोऽप्यधिकं वा वर्धते। सम्प्रति तु दशेयं जाता सपादैककोटिसख्यका बालकाः प्रतिवर्षमुत्पद्यन्ते। एवं वक्तव्यं यद् आस्ट्रेलियामहाद्वीपे यावन्तो जनाः निवसन्ति तावन्तः प्रतिवर्षमत्र भारते जन्म लभन्ते। एवं सुरसाया मुखस्येव जनस्य वृद्धिरत्र भवति येन सर्वात्मना प्रभूतवृद्धि गतमपि उत्पादनम् उष्ट्रस्य मुखे जीरकमिव एकपदे एव विलीयते।।

शब्दार्थ पश्चादपि = बाद भी। दरिद्रतायाः = निर्धनता की। नैव = नहीं ही। समाहिता = हल हुई। अधस्तात् = नीचे। मुष्टिपरिमितम् = मुट्ठीभरा शरीराच्छादनाय = शरीर ढकने के लिए। हस्तद्वयम् = दो हाथ| कर्पटम् = कपड़ा। सौविध्यानाम् = सुविधाओं की। कथैव = बात ही। नास्त्येतद् = नहीं है, (UPBoardSolutions.com) ऐसा। सत्यप्यनेकगुणिते = वस्तुतः अनेक गुना होने पर भी न दृश्यते = दिखाई नहीं देता। तदनुपातेन = उसके अनुपात से। ततोऽप्यधिकम् (ततः +,अपि + अधिक) = उससे भी अधिक। सम्प्रति = आजकल। सपादैककोटिसङ्ख्य काः = सवा करोड़ की संख्या में उत्पद्यन्ते = जन्म लेते हैं। यावन्तः = जितने। तावन्तः = उतने। सुरसायाः मुखस्येव = सुरसा के मुख के समान। सर्वात्मना = सभी प्रकार से। प्रभूतवृद्धि गतमपि = अधिक वृद्धि होने पर भी। उष्ट्रस्य मुखे जीरकम् इवे = ऊँट के मुँह में जीरे के समान। एकपदे = एक साथ ही। विलीयते = समा जाता है, विलीन हो जाता है।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती’ में संकलित ‘भारते जनसंख्या-समस्या’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में भारत में जनसंख्या-वृद्धि की समस्या पर प्रकाश डाला गया है।

अनुवाद स्वतन्त्रता-प्राप्ति के सड़सठ वर्ष पश्चात् भी (मूल पाठ में उल्लिखित है 40 वर्ष) हमारे देश में गरीबी की समस्या हल नहीं हुई है। आज भी करोड़ों लोग गरीबी के स्तर से भी नीचे रहते हुए पेट भरने के लिए मुट्ठीभर धान्य (अन्न) और शरीर ढकने के लिए दो हाथ जितना वस्त्र नहीं प्राप्त करते हैं। दूसरी सुविधाओं का तो कहना ही क्या? ऐसी बात नहीं है कि इस समय साधनों का विकास, खाने योग्य और उपयोग के योग्य वस्तुओं की वृद्धि नहीं हुई है। वास्तव में अनेक गुना धन-धान्यादि का उत्पादन होने पर भी उसका लाभ नहीं दिखाई देता है; क्योंकि जनसंख्या भी उस अनुपात से या उससे भी अधिक बढ़ जाती है। इस समय तो यह दशा हो (UPBoardSolutions.com) गयी है कि सवा करोड़ बच्चे प्रतिवर्ष पैदा होते हैं। ऐसा कहना चाहिए कि ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में जितने लोग रहते हैं, उतने प्रतिवर्ष यहाँ भारत में जन्म लेते हैं। इस प्रकार सुरसा के मुख के समान लोगों की वृद्धि यहाँ पर हो रही है, जिससे बहुत बढ़ा हुआ उत्पादन भी ‘ऊँट के मुंह में जीरा के समान एक बार में ही समाप्त हो जाता है।

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(2)
जनसङ्ख्याया अनिरुद्धवृद्धेः परिणामोऽयं जातो यत् नगरेषु, ग्रामेषु, आपणेषु, चिकित्सालयेषु, विद्यालयेषु, न्यायालयेषु किं बहुना, यत्र तत्र सर्वत्रापि जनानां महान्तः सम्मर्दाः दृश्यन्ते। यात्रिणो यानेषु, छात्राः विद्यालयेषु, रोगिणः चिकित्सालयेषु च स्थानं न लभन्ते। योग्याः प्रशिक्षिताः शिक्षिता अपि युवानो जीविकामलभमाना द्वाराद् द्वारं भृशम् अटन्ति। ‘एकं दाडिमं, शतं रोगिणाम्’ एवंविधे व्यतिकरे सर्वत्रापि अहमहमिकाकारणात् न केवलम् अव्यवस्था अपितु भ्रष्टाचारोऽपि अलर्कविषमिव प्रसरति। कुसंस्तुतिः, उत्कोचः, भ्रातृ-भ्रातृजवादः, जातिदलसङ्घर्ष इत्यादयो विकाराः समाजशरीरं दूषयन्ति। येन सर्वोऽपि समाजो मनोरोगीव सजायते।

जनसङ्ख्याया अनिरुद्धवृद्धेः ………………………………………………………….. स्थानं न लभन्ते।

शब्दार्थ अनिरुद्धवृद्धेः = बेरोक-टोक वृद्धि से। आपणेषु = बाजारों में। किंबहुना = अधिक क्या। सम्मर्दाः = भीड़। प्रशिक्षिताः = प्रशिक्षित लोग। युवानः = युवा लोग। जीविकामलभमानाः = जीविका न प्राप्त करते हुए। द्वाराद्वारम् = द्वार से द्वार तक। भृशम् = अधिक अटन्ति = घूमते हैं। दाडिमम् = अनार। व्यतिकरे = कठिन परिस्थिति में अहमहमिकाकारणात् = पहले मैं, पहले मैं के कारण। अलर्कविषमिव = पागल कुत्ते के विष के समान। प्रसरति = फैल रहा है। कुसंस्तुतिः = गलत सिफारिश। उत्कोचः = घूस भ्रातृ-भ्रातृजवादः = भाई-भतीजावाद। मनोरोगीव = मानसिक रोगी के समान। सञ्जायते = हो रहा है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में जनसंख्या की बेरोक-टोक वृद्धि के दुष्परिणाम के विषय में बताया गया है।

अनुवाद जनसंख्या की बेरोक-टोक वृद्धि का परिणाम यह हुआ कि नगरों, ग्रामों, बाजारों, अस्पतालों, विद्यालयों, न्यायालयों में अधिक क्या, जहाँ-तहाँ सभी जगह लोगों की बहुत भीड़ दिखाई देती है। गाड़ियों में यात्री, विद्यालयों में छात्र और चिकित्सालयों में रोगी स्थान नहीं प्राप्त करते हैं। (UPBoardSolutions.com) योग्य, प्रशिक्षित, पढ़े-लिखे युवक भी रोजगार न प्राप्त करते हुए द्वार-द्वार पर अधिकता से घूम रहे हैं। एक अनार सौ बीमार’ इस प्रकार की कठिन परिस्थिति में सभी जगह पहले मैं पहले मैं’ के कारण केवल अव्यवस्था ही नहीं, अपितु भ्रष्टाचार भी पागल कुत्ते के विष के समान फैल रहा है। गलत सिफारिश, घूस, भाई-भतीजावाद, जाति और वर्ग को संघर्ष इत्यादि विकार समाज के शरीर को दूषित कर रहे हैं, जिससे सारा समाज ही मानसिक रोगी के समान हो रहा है।

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(3)
मनुष्याणां व्यक्तिगतसाधनानि राष्ट्रस्य च साधनानि तु सीमितान्येव, आवश्यकता तु जनवृद्धेः वारणान्महती आपद्यते। प्रतिवर्षी लक्षशः आवासाः, सहस्रशो विद्यालयाः, शतशश्चिकित्सालयाः, बहूनि चान्यानि साधनान्यपेक्ष्यन्ते न सीमितसाधनैः सम्पादयितुं शक्यन्ते। फलतो लघिष्ठेष्वपि गृहेषु अतिसङ्ख्यकाः जना पशुवाटेषु अजा मेषा इव निवसन्ति परितश्च मालिन्यं प्रसारयन्ति। जीविकां मृगयमाणाः ग्रामीणाः जनाः नगरं धावन्ति। तत्रे च सहस्रशो लक्षशो जनाः पद्धतिमभितः, सार्वजनिकेषु उद्यानादिस्थानेषु, अनधिकारनिर्मितेषु पर्पोटजेषु निवसन्तः निषिद्धस्थान एव यत्र तत्र मलमूत्रादित्यागेन वातावरणं मलिनयन्ति रोगग्रस्ताश्च जायन्ते। चिकित्साशिक्षादि सौविध्यस्य तु दूर एवास्तां कथा शुद्ध पेयं जलमपि नोपलभ्यते। एतादृशं जीवनमपि किं जीवनमू? [2013]

शब्दार्थ व्यक्तिगतसाधनानि = व्यक्तिगत साधन। सीमितान्येव = सीमित ही हैं। आपद्यते = आ पड़ी है। लक्षशः = लाखों। सहस्रशः = हजारों। शतशः = सैकड़ों। अपेक्ष्यन्ते = अपेक्षित हैं। सम्पादयितुं शक्यन्ते = बनाये जा सकते हैं। लघिष्ठेषु = अत्यन्त छोटे। पशुवाटेषु = पशुओं के बाड़े में। (UPBoardSolutions.com) अजा मेषा इव = भेड़-बकरियों के समान/ परितश्च = और चारों ओर। मालिन्यं = गन्दगी। प्रसारयन्ति = फैलाते हैं। मृगयमाणाः = ढूंढ़ते हुए। पद्धतिमभितः = मार्ग के दोनों ओर। पर्पोटजेषु = झोपड़ियों में। मलिनयन्ति,= मलिन (दूषित) करते हैं। सौविध्यस्य = सुविधा की। दूर एवास्तां कथा = दूर ही रहे बात। नोपलभ्यते = नहीं प्राप्त होता है।।

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प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में जनसंख्या-वृद्धि के दुष्परिणामों के विषय में बताया गया है।

अनुवाद मनुष्यों के व्यक्तिगत साधन और राष्ट्र के साधन तो सीमित ही हैं, तो जनवृद्धि को रोकने की बड़ी आवश्यकता आ पड़ी है। प्रतिवर्ष लाखों आवास, हजारों विद्यालय, सैकड़ों अस्पताल और बहुत-से दूसरे साधनों की आवश्यकता है, किन्तु सीमित साधनों से वे सम्पादित (बनाये) नहीं किये जा सकते हैं। फलस्वरूप अत्यन्त छोटे घरों में अधिक संख्या में लोग पशुओं के बाड़ों में भेड़-बकरियों की तरह रहते हैं।
और चारों ओर गन्दगी फैलाते हैं। जीविका को ढूंढ़ते हुए गाँव के लोग नगर की ओर दौड़ते हैं और वहाँ हजारों-लाखों लोग मार्ग के दोनों ओर, सार्वजनिक उपवन आदि स्थानों में, अनधिकार रूप से बनी हुई। झोपड़ियों में रहते हुए, गलत स्थान पर इधर-उधर मल-मूत्र आदि के त्याग द्वारा वातावरण को गन्दा करते हैं। और बीमार हो जाते हैं। चिकित्सा, शिक्षा आदि की सुविधा की बात तो दूर रहे, उनको पीने का शुद्ध जल भी प्राप्त नहीं होता है। इस प्रकार का जीना भी क्या जीना है?

(4)
विभिन्नानामभावानां कारणात् तत्तद्वस्तुप्राप्तये जीविकार्थं च महती प्रतिद्वन्द्विता प्रवर्तते। मिथः सौमनस्यं विलीयते, हिंसायाः भावः प्रादुर्भवति यतो हि क्षीणा जनाः निष्करुणा भवन्ति। क्षुधाहतः किं न कुरुते। अवृत्तिका युवानः असामाजिका जायन्ते। अपराधा वर्धन्ते। स्थाने स्थाने (UPBoardSolutions.com) अकारणादेव कलहा जायन्ते शान्तिव्यवस्थायाः महती समस्या उत्पद्यते। परिवारेषु बालकानामधिकताय तेषां पालनं सुष्ठ न भवति। ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ इति नीतिवाक्यानुसारेण सम्प्रति बालकानामपि सङ्ख्यावृद्धिर्वर्जनीया एव। [2007]

शब्दार्थ विभिन्नानामभावानां = विभिन्न प्रकार के अभावों का। जीविकार्थम् = रोजगार के लिए। प्रतिद्वन्द्विता = होड़। प्रवर्त्तते = बढ़ रही है। मिथः = आपस में। सौमनस्यम् = सद्भाव। विलीयते = नष्ट हो रहा है। यतो हि = क्योंकि निष्करुणाः = निर्दयी, करुणाहीन। क्षुधाहतः = भूख से पीड़िता अवृत्तिकाः = बेरोजगार। कलहाः = झगड़े। उत्पद्यते = उत्पन्न होती है। सुष्टुः = भली प्रकार वर्जयेत् = त्यागनी चाहिए। वर्जनीया एव = वर्जनीय; अर्थात् त्याज्य ही है।

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प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में जनसंख्या की वृद्धि को रोकने के लिए बल दिया गया है।

अनुवाद अनेक प्रकार के अभावों के कारण उस-उस वस्तु की प्राप्ति के लिए और जीविका के लिए अत्यधिक होड़ बढ़ती जाती है। आपसी सद्भाव नष्ट हो जाता है, हिंसा का भाव उत्पन्न होता है; क्योंकि कमजोर मनुष्य निर्दयी होते हैं। भूख से पीड़ित क्या नहीं करता? बेरोजगार युवक असामाजिक हो जाते हैं। अपराध बढ़ जाते हैं। जगह-जगह बिना कारण ही झगड़े हो जाते हैं। शान्ति-व्यवस्था की बड़ी समस्या उत्पन्न हो जाती है। परिवारों में बच्चों की अधिकता से उनका पालन भी ठीक नहीं हो पाता है। अति सब जगह छोड़ देनी चाहिए’ इस नीति-वाक्य के अनुसार इस समय बच्चों की भी संख्या की वृद्धि को रोकना चाहिए।

(5)
निरन्तरं वर्धमानया जनसङ्ख्यया बहूनि वनान्यपि निगिलितानि। पर्वताः नग्ना कृताः। वृक्षेषु प्रतिक्षणं कुठाराघातः क्रियते। वृक्षाणां वनानां च अन्धान्धकर्तनेन वर्षासु भूक्षरणं जायते। उर्वरकां मृत्स्नां वर्षाजलम् अपवाहयति, नदीनां तलानि उत्थलानि भवन्ति। येन जलप्लावनानि भवन्ति अर्बुदानां च सम्पत् प्रतिवर्ष नश्यति। नदीतटे स्थितानां नगराणाम् उत्तरोत्तरं विवर्धमानं मालिन्यं महाप्रणालैनंदीषु पात्यते येन गङ्गासदृश्योऽपि सुधास्वादुजला नद्यो स्थाने स्थाने अपेया अस्नानीया च जायन्ते। [2006, 07 08]

शब्दार्थ वनान्यपि = वन भी। निगिलितानि = नष्ट हो गये हैं। अन्धान्धकर्तनेन = अन्धाधुन्ध काटने से। भूक्षरणम् = भूमि का कटाव उर्वरकां = उपजाऊ। मृत्स्नाम् = मिट्टी को। अपवाहयति = बहा ले जाता है। उत्थलानि = उथले, कम गहरे। जलप्लावनानि = बाढे। अर्बुदानां (UPBoardSolutions.com) च सम्पत् = अरबों की सम्पत्ति। उत्तरोत्तरं = दिन-प्रतिदिन विवर्धमानं = बढ़ता हुआ। महाप्रणालैः = बड़े नालों के द्वारा पात्यते = गिराया जाता है। सुधास्वादुजला = अमृत के समान स्वादयुक्त जल वाली। अपेया = न पीने योग्य अस्नानीया = स्नान के अयोग्य।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में जनसंख्या की वृद्धि के दुष्परिणामों पर प्रकाश डाला गया है।

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अनुवाद निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या से बहुत-से वन भी नष्ट कर दिये गये। पर्वत नग्न कर दिये गये। वृक्षों पर प्रत्येक क्षण कुल्हाड़ी से प्रहार किया जा रहा है। वृक्षों और वनों के अन्धाधुन्ध काटने से वर्षा-ऋतु में भूमि का कटाव हो जाता है। उपजाऊ मिट्टी को वर्षा का जल बहा ले जाता है। नदियों के तल उथले (कम गहरे) हो जाते हैं, जिससे बाढ़े आती हैं और अरबों की सम्पत्ति प्रतिवर्ष नष्ट हो जाती है। नदी के किनारे पर स्थित नगरों की लगातार बढ़ती हुई गन्दगी बड़े नालों से नदियों में गिरायी जाती है, जिससे गंगा जैसी अमृत के समान स्वादिष्ट जल वाली नदियाँ भी जगह-जगह न पीने योग्य और स्नान न करने योग्य हो गयी हैं।

(6)
अभिप्रायोऽयं यज्जनसङ्ख्याविस्फोटकारणात् सर्वविध विकासे सत्यपि राष्ट्रे जन-जीवनं सङ्घर्षमयं जिजीविषाकुलं, नैराश्यपीडितं मनःक्षोभकरं च जातम्। मानवीयगुणानां हासो भवति। अत एव तु हत्यादिमहापातकानां श्रवणं न मनुष्यान् पुरेव उद्वेजयाति। यद्यपि सर्वेऽपि विचारकाः, मनीषिणः, नेतारः, प्रशासकाश्च समस्यामेनां समाधातुं प्रयतमानाः सन्ति। अस्या एकमात्र समाधानं परिवार नियोजनम्। परिवारः सीमितो भवेत्। तच्च तदैव सम्भवति यदा परिवारे बालकानाम् उत्पत्तिरधिका न भवेत्, एक एव द्वौ वा बालकौ स्यातां, येन तत्पालनं पोषणं च सुष्ठ भवेत्। अधिकानां कृते अधिकानि भोजनवस्त्रादिवस्तूनि अपेक्ष्यन्ते, परिवारस्य आयस्तु सीमितो भवति।।

शब्दार्थ अभिप्रायोऽयम् = अभिप्राय यह है। यज्जनसङ्ख्याविस्फोटकारणात् = जनसंख्या की अधिक वृद्धि के कारण से। सत्यपि = हो जाने पर भी। जिजीविषाकुलम् = जीवित रहने की इच्छा से व्याकुला मनः क्षोभकरं = मन में दुःख उत्पन्न करने वाला। ह्रासः = घटती। पुरेव (पुरा + इव) = पहले की तरह उद्वेजयति = पीड़ित करता है। समाधातुम् = समाधान करने के लिए। प्रयतमानाः = प्रयत्नशील। उत्पत्तिरधिका = अधिक उत्पत्ति। सुष्टुं भवेत् = अच्छी प्रकार से हो जाए। अपेक्ष्यन्ते = अपेक्षित होती है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में जनसंख्या की वृद्धि को रोकने का उपाय परिवार नियोजन को बताया गया है।

अनुवाद अभिप्राय यह है कि जनसंख्या के विस्फोट के कारण से सभी प्रकार का विकास होने पर भी राष्ट्र में लोगों का जीवन संघर्षों से भरा, जीने की इच्छा से व्याकुल, निराशा से पीड़ित तथा मन को क्षुब्ध करने वाला हो गया है। मानवीय गुणों का ह्रास होता जा रहा है। इसीलिए हत्या आदि बड़े पापों का सुनना मनुष्यों को पहले की तरह दु:खी नहीं करता है। यद्यपि सभी विचारक, विद्वान्, नेता, प्रशासक इस समस्या का समाधान करने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं, तथापि इसका एकमात्र समाधान परिवार नियोजन है। परिवार सीमित होना चाहिए। वह तभी हो सकता है, जब परिवार में बच्चों की उत्पत्ति अधिक न हो, एक या दो ही बालक (UPBoardSolutions.com) होवें, जिससे उनका पालन-पोषण अच्छी तरह से हो सके। अधिक के लिए अधिक भोजन, वस्त्र आदि वस्तुओं की आवश्यकता होती है। परिवार की आय तो सीमित होती है।

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(7)
अधिका बालका भविष्यन्ति चेत् तेषां शिक्षा-दीक्षाऽपि चारुतया न भविष्यति। एकः द्वौ वा बालको दम्पत्योः स्यातां यथाकाले शिक्षाविवाहादयः करणीयाः। एतदेव परिवार नियोजनम्। राष्ट्रसङ्घन भारतसर्वकारेण राज्यशासनेन च जनसङ्ख्यां नियन्तुं विविधाः परिवारकल्याणयोजनाः प्रवर्तिताः अनेकानि साधनानि च प्रापितानि तथापि अपेक्षितः परिणामो नाद्यापि दृश्यते। कारणं त्विदं यद्देशवासिनां सर्वेषां वर्गाणां सहयोगो नैव प्राप्यते।

शब्दार्थ चारुतया = ठीक से, भली प्रकार से। भारतसर्वकारेण = भारत सरकार ने। प्रवर्तिताः = आरम्भ की है। प्रापितानि = प्राप्त करा दिये हैं। अपेक्षितः = मनचाहा। नाद्यापि = आज भी नहीं। त्विदम् (तु + इदम्) = तो यह है। प्राप्यते = प्राप्त होता है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में जनसंख्या की वृद्धि को रोकने के लिए किये गये शासकीय प्रयासों की चर्चा की गयी है।

अनुवाद यदि अधिक बच्चे होंगे तो उनकी शिक्षा-दीक्षा भी ठीक प्रकार से नहीं होगी। पति-पत्नी के एक या दो बच्चे ही हों तो उचित समय पर शिक्षा, विवाह आदि करना चाहिए। यही परिवार-नियोजन है। राष्ट्रसंघ, भारत सरकार और राज्य सरकार द्वारा जनसंख्या को रोकने के लिए अनेक प्रकार की परिवार कल्याण की योजनाएँ प्रारम्भ की गयी हैं और अनेक साधन उपलब्ध कराये गये हैं तो भी अपेक्षित परिणाम आज भी नहीं दिखाई दे रहे हैं। इसका कारण यह है कि देशवासियों के सभी वर्गों का सहयोग प्राप्त नहीं हो रहा है।

(8)
एषा समस्या तु न केवलं राष्ट्रस्यैव अपितु सर्वस्यापि परिवारस्यैव मुख्यतया विद्यते। नियोजित एव परिवारः प्रत्येकपरिवारजनस्य सुखशान्तिकारको भविष्यति। सर्वकारस्तु यथाशक्ति साधनानि दातुं शक्नोति तच्चासौ करोत्येव। सन्ततिनिरोधस्तु प्रत्येक मनुष्येण स्वस्य, स्वकुलस्य, समाजस्य, राष्ट्रस्य, विश्वस्य च उन्नतये शान्तये च धर्मानुष्ठानमिव स्वत एव सर्वात्मना विधेयस्तदैव समस्यायाः समाधानं भवेत्, मातृकल्याणं बालकल्याणं च स्यात्। [2015]

शब्दार्थ प्रत्येकपरिवारजनस्य = परिवार के प्रत्येक जन का। करोत्येव = करती ही है। सन्ततिनिरोधस्तु = परिवार नियोजन, सन्तानोत्पत्ति का रोकना तो। उन्नतये = उन्नति के लिए। धर्मानुष्ठानमिव = धार्मिक अनुष्ठान की तरह। सर्वात्मना = पूरी तरह से। विधेयः = करना चाहिए।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में बताया गया है कि नियोजित परिवार ही सुख और शान्ति का मूल कारण है।

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अनुवाद यह समस्या तो केवल राष्ट्र की नहीं है, अपितु मुख्य रूप से सभी परिवारों की ही है। नियोजित परिवार ही परिवार के प्रत्येक व्यक्ति की सुख-शान्ति का करने वाला अर्थात् कारक होगा। सरकार तो यथाशक्ति साधनों को दे सकती है, यह तो वह करती ही है। सन्तति-निरोध (UPBoardSolutions.com) तो प्रत्येक मनुष्य को अपनी, अपने कुल की, समाज की, राष्ट्र की और विश्व की उन्नति और शान्ति के लिए धर्मानुष्ठान की तरह स्वयं ही पूरी तरह से करना चाहिए, तभी समस्या का समाधान हो सकेगा, (इसी से) माता का कल्याण और बच्चों का कल्याण होगा।

लघु उत्तटीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में जनसंख्या-वृद्धि को रोकने के उपाय बताइए। या जनसंख्या वृद्धि के समाधान क्या हैं? [2006,07]
उत्तर :
भारत में जनसंख्या वृद्धि को रोकने का एकमात्र उपाय परिवार-नियोजन है। परिवार-नियोजन का तात्पर्य है-सीमित परिवार, अर्थात् किसी दम्पति के एक या दो बच्चे होना ही परिवार नियोजन है। नियोजित परिवार ही परिवार के प्रत्येक व्यक्ति को सुख-शान्ति प्रदान कर सकता है। सरकार तो केवल साधनों की उपलब्धता ही सुनिश्चित कर सकती है लेकिन इसके लिए प्रयास तो प्रत्येक व्यक्ति को इसे एक धर्मानुष्ठान मानकर करना होगा। तभी इस समस्या का समाधान हो सकता है।

प्रश्न 2.
जनसंख्या विस्फोट का क्या अर्थ है? इसका राष्ट्र के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? [2006,07,08, 11]
या
यो जनसंख्या विस्फोट से क्या तात्पर्य है? [2011]
उत्तर :
जनसंख्या विस्फोट का अर्थ है-जनसंख्या को उपलब्ध साधनों की तुलना में तीव्र गति से बढ़ना। जनसंख्या का विस्फोट होने पर सभी प्रकार के साधनों के रहने पर भी राष्ट्र में जन-जीवन संघर्षपूर्ण हो जाता है, जीने की इच्छा व्याकुल करने लगती है, मन में निराशा-क्षोभ उत्पन्न हो जाता है तथा मानवीय गुणों की हानि होती है।

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प्रश्न 3.
भारत में जनसंख्या-वृद्धि को रोकने में सबसे बड़ी बाधा क्या है? [2006]
उत्तर :
भारत में जनसंख्या-वृद्धि को रोकने में सबसे बड़ी बाधा देशवासियों का अल्पशिक्षित होना है। यही वह प्रमुख बाधा है, जिसके चलते सरकार द्वारा चलाये जा रहे परिवार कल्याण कार्यक्रम को जनता का अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाता, क्योंकि भारतवासी यह नहीं समझते कि यह मुख्य रूप से राष्ट्र की समस्या है। वे यह समझते हैं कि यह परिवारों की समस्या है, राष्ट्र की नहीं।

प्रश्न 4.
जनसंख्या-वृद्धि से होने वाली किन्हीं दो समस्याओं का उल्लेख कीजिए। [2006]
उत्तर जनसंख्या वृद्धि से होने वाली दो समस्याएँ निम्नलिखित हैं

(क) जनसंख्या की अत्यधिक वृद्धि होने के कारण योग्य, प्रशिक्षित और पढ़े-लिखे युवकों को भी रोजगार नहीं मिल पा रहा है।
(ख) जनसंख्या-वृद्धि से उत्पन्न होने वाली दूसरी महत्त्वपूर्ण समस्या है–भूमि की सीमितता की समस्या।

प्रश्न 5.
जनसंख्या-वृद्धि में ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ उक्ति की समीक्षा कीजिए।
या
राष्ट्र की उन्नति के लिए जनसंख्या-वृद्धि किस प्रकार घातक है?
या
प्रत्येक व्यक्ति को सन्तति-निरोध क्यों करना चाहिए? [2007]
उत्तर :
“अति सर्वत्र वर्जयेत्” उक्ति का तात्पर्य यह है कि किसी भी वस्तु की अति सर्वथा वर्जना योग्य अर्थात् त्यागने योग्य होती है। भारत के पास विश्व में उपलब्ध भू-भाग का मात्र 2% ही है, लेकिन जनसंख्या विश्व की कुल जनसंख्या का 1/6 भाग (लगभग 17%) से अधिक है। भारत में प्रतिवर्ष उतने (UPBoardSolutions.com) लोग जन्म ले लेते हैं, जितनी ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप की कुल जनसंख्या है। इसके चलते खाद्यान्नों के उत्पादन में हो रही अत्यधिक वृद्धि भी ऊँट के मुँह में जीरा’ के समान व्यर्थ सिद्ध हो रही है। निश्चित ही यह जनसंख्या-वृद्धि या की अति है। अतः जनसंख्या-वृद्धि से उत्पन्न समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक व्यक्ति को सन्तति-निरोध करना चाहिए।

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प्रश्न 6.
भारत में जनसंख्या-वृद्धि को रोकने के उपाय बताइए। [2011]
या
हमारे देश में जनसंख्या समस्या का समाधान कैसे हो सकता है? [2006,07, 11, 12]
उत्तर :
भारत में जनसंख्या-वृद्धि को रोकने का एकमात्र उपाय परिवार-नियोजन है। परिवार-नियोजन को तात्पर्य है-सीमित परिवार अर्थात् किसी दम्पति के एक या दो बच्चों का होना । देश और राज्य की सरकारें तो केवल साधनों की उपलब्धता ही सुनिश्चित कर सकती हैं, लेकिन इसके (UPBoardSolutions.com) लिए प्रयास तो प्रत्येक व्यक्ति को करना होगा। जब प्रत्येक व्यक्ति परिवार के नियोजन को एक धर्मानुष्ठान मानकर प्रयास करेगा, तभी जनसंख्या की समस्या का समाधान हो सकता है।

प्रश्न 7. प्राकृतिक वातावरण पर जनसंख्या-वृद्धि का क्या प्रभाव पड़ रहा है? [2009]
उत्तर :
जनसंख्या वृद्धि के कारण वन काटे जा रहे हैं और पर्वतों को नंगा किया जा रहा है। वनों और वृक्षों के कट जाने से भूमि का कटाव बढ़ता जा रहा है, बाढ़ आ रही है, खेतों की उपजाऊ मिट्टी समाप्त होती जा रही है। नगरों के मल-मूत्र नदियों में बहाये जाने से इनका जल प्रदूषित हो रहा है। गंगा जैसी पवित्र और सदानीरा नदी का जल अपेय; अर्थात् न पीने योग्य; हो गया है।

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परिचय

आज विश्व में मुख्य रूप से तीन शासन-प्रणालियाँ–राजतन्त्र, कुलीनतन्त्र एवं जनतन्त्र प्रचलित हैं। इसमें जनतन्त्र शासन-प्रणाली सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। हमारे देश में जनतान्त्रिक शासन-प्रणाली ही प्रचलित है। इस प्रणाली के अन्तर्गत देश का शासन जनता (UPBoardSolutions.com) द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथों में रहता है। जनतन्त्र को ही ‘प्रजातन्त्र’ अथवा ‘गणतन्त्र’ के नाम से जाना जाता है। भारत में शासन की यह प्रणाली 26 जनवरी, सन् 1950 ई० से लागू हुई थी। प्रस्तुत पाठ में राजतन्त्र और कुलीनतन्त्र के दोषों का निदर्शन करके उनकी निन्दा तथा जनतन्त्र की प्रशंसा की। गयी है। यह पाठ जनतन्त्र से होने वाले लाभों को भी इंगित करता है।

पाठ-सारांश     [2006,07,08, 10, 11, 13, 14]

शासन-प्रणाली के भेद राजनीतिशास्त्र के विद्वानों ने शासन-प्रणाली के तीन भेद बताये हैं—

  • राजतन्त्र में राजा का शासन होता है।
  • कुलीनतन्त्र में कुलीन (विशिष्ट) लोगों का शासन होता है।
  • जनतन्त्र में जनता का शासन होता है। भारतवर्ष में जनतन्त्र प्रणाली प्रचलित है।

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प्रत्येक प्रकार के शासन को संक्षिप्त वर्णन निम्नवत् है—
(1) राजतन्त्र राजतन्त्र में व्यक्ति विशेष का शासन होता है और वह सर्वोच्च शासक राजा कहलाता है। वह जीवनपर्यन्त शासन करता है। उसकी मृत्यु के बाद उसका वरिष्ठ पुत्र या पुत्र के न रहने पर पुत्री सिंहासन पर बैठकर शासन करते हैं। राजतन्त्र के पक्षधर विद्वान् राजा को ईश्वरं का प्रतिनिधि मानकर उसके उचित या अनुचित आदेश का पालन करना अनिवार्य मानते हैं। प्राचीन काल में प्रजा को सन्तान के समान मानने वाले अनेक राजा हुए। वे दयालु, न्यायी और प्रजा के कल्याण के लिए राजकोष का व्यय करने वाले होते थे, परन्तु इसके विपरीत ऐसे भी राजा हुए, जो क्रूर, कृपण, प्रजा-पीड़क और अपने स्वार्थ के लिए राजकोष का व्यय करते थे; अत: लोगों के मन में राजतन्त्र के प्रति अरुचि उत्पन्न हो गयी।

(2) कुलीनतन्त्र
कुलीन अथवा विशिष्ट लोगों का शासन भी प्रजा के लिए हितकर नहीं होता। समाज में धनी और बलवान ही विशिष्टजनों की श्रेणी में आते हैं। इनके शासन में इन्हीं वर्गों का हित सम्भव है। निर्धन और निर्बल लोग इनके शासन में अत्यन्त पीड़ित रहते हैं। इस शासन-प्रणाली में सामान्यजनों के कल्याण की कल्पना भी नहीं की जा सकती।।

(3) जनतन्त्र
जनता के शासन को जनतन्त्र या प्रजातन्त्र कहते हैं। इसमें प्रभुत्वशक्ति जनता में निहित होती है। इस प्रणाली में जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि शासन करते हैं। जनता अपने मतों से अपना प्रतिनिधि स्वयं चुनती है। ये जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। जो प्रतिनिधि जनता के विरुद्ध (UPBoardSolutions.com) आचरण करते हैं, वे जनता द्वारा पुनः निर्वाचित नहीं किये जाते। अतः इस शासन में जनहित के विपरीत कार्यों की सम्भावना नहीं रहती है। अधिकांश देशों में यही जनतन्त्र प्रणाली प्रचलित है।

अनेक प्रजातान्त्रिक देशों में अब भी राजा होते हैं, परन्तु वे जन-प्रतिनिधियों की सलाह से ही कार्य करते हैं। वहाँ भी प्रजातन्त्र जैसा ही शासन चलता है। राजा उन्हीं अधिकारों को उपभोग करता है, जो प्रतिनिधि उसे देते हैं।

जनतन्त्र का आविर्भाव जनतन्त्र प्रणाली का आविर्भाव सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में हुआ था, वहीं से वह अन्य देशों में भी फैली। प्राचीन भारत में गणतन्त्र शासन-प्रणाली के होने का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में गण शब्द तथा जैन और बौद्ध ग्रन्थों में गणराज्यों की चर्चा मिलती है। नीति-विशारद चाणक्य ने भी अपने ‘अर्थशास्त्र में गणराज्यों का उल्लेख किया है। गुप्तकाल में भारत में अनेक गणराज्य थे।

जनतन्त्र की विशेषता राजतन्त्र में लोग राजदण्ड के भय से ही कार्य करते थे, परन्तु जनतन्त्र में लोग कर्तव्य-भावना से प्रेरित होकर कार्य करते हैं। कर्तव्य करने के लिए सदा तत्पर रहने वाले परिश्रमी देशवासी नागरिक ही देश की उन्नति करने में समर्थ होते हैं। हमारा देश भारतवर्ष 15 अगस्त, सन् 1947 ई० को स्वतन्त्र हुआ था। विदेशी शासन में फैले हुए गरीबी, अशिक्षा, बीमारी आदि दोषों को दूर करता हुआ भारत सतत उन्नति के मार्ग पर अग्रसर है। भारत की उन्नति को देखकर विश्व के अन्य राष्ट्र दाँतों तले अँगुली दबा लेते हैं।

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भारत के बालक-बालिकाएँ ही देश के स्वामी और सेवक हैं। वे जैसा आचरण (UPBoardSolutions.com) करेंगे, देश का स्वरूप वैसा ही होगा; अत: उन्हें अनुशासित और सावधान रहकर, राष्ट्रहित के लिए स्वार्थ का त्याग करते हुए, राष्ट्र की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहकर देश की उन्नति करनी चाहिए।

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1)
जनतन्त्राभिधाना शासनप्रणाली अस्माकं देशे प्रवर्तमानाऽस्ति। राजनयशास्त्रज्ञैः विद्वद्भिः राजतन्त्रं कुलीनतन्त्रं प्रजातन्त्रमिति शासनप्रणाल्यास्त्रयो भेदाः प्रतिपादिताः। राजतन्त्रम्-राज्ञः शासनम् कुलीनतन्त्रम्-कुलीनानां विशिष्टजनानां शासनं, जनतन्त्रम्-जनानां शासनमिति तैराधुनिकैः व्याख्यातम्।

शब्दार्थ जनतन्त्राभिधाना = जनतन्त्र नाम वाली। अस्माकं = हमारे प्रवर्तमाना = प्रचलित, लागू राजनयशास्त्रज्ञैः = राजनीतिशास्त्र के विद्वानों के द्वारा प्रतिपादिताः = प्रतिपादित किये गये हैं। तैराधुनिकैः (तैः + आधुनिकैः) = उन आधुनिकों ने। व्याख्यातम् = व्याख्या की है।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती’ में संकलित ‘भारतीय-जनतन्त्रम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[संकेत इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में शासन-प्रणालियों के तीन भेद बताये गये हैं।

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अनुवाद हमारे देश में जनतन्त्र’ नाम की शासन-प्रणाली प्रचलित है। राजनीतिशास्त्र को जानने वाले विद्वानों ने राजतन्त्र, कुलीनतन्त्र, प्रजातन्त्र—ये शासन-प्रणाली के तीन भेद बताये हैं। राजतन्त्र’ का अर्थ राजा का,शासन, ‘कुलीनतन्त्र’ का अर्थ कुलीन अर्थात् विशिष्ट लोगों का शासन, ‘जनतन्त्र’ (UPBoardSolutions.com) का अर्थ जनता को शासन है; इस प्रकार सभी आधुनिक विद्वानों के द्वारा व्याख्या की गयी है।

(2)
राजतन्त्रम्-राजतन्त्रं व्यक्तिविशेषस्य शासनं भवति। स एव सर्वोच्चशासकः राजा भवति। यावज्जीवनं सः राजसिंहासने तिष्ठति शासनञ्च कुरुते। तस्य मृत्योः परं तस्य ज्येष्ठः पुत्रः, पुत्राभावे तस्य ज्येष्ठा पुत्री तत्पदमलङकुरुते। राजतन्त्रपक्षग्रहाः विपश्चितः राजानमीश्वरप्रतिनिधिभूतमेवाङ्गीकुर्वन्ति। तस्योचितोऽनुचितो वा आदेशः नोल्लङ्घनीयः इति तेषां मतम्।

शब्दार्थ सर्वोच्चशासकः = सबसे ऊपर शासन करने वाला। यावज्जीवनम् = समस्त जीवन, जीवनभर पुत्राभावे = पुत्र के अभाव में। तत्पदमलङकुरुते = उसके पद को सुशोभित करता है। राजतन्त्रपक्षग्रहाः = राजतन्त्र के पक्षधर। विपश्चितः = विद्वान्। राजानमीश्वरप्रतिनिधिभूतमेवाङ्गीकुर्वन्ति = राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि समझकर स्वीकार करते हैं। नोल्लङ्घनीयः = उल्लंघन करने योग्य नहीं।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में राजतन्त्र के विषय में बताया गया है।

अनुवाद राजतन्त्र–राजतन्त्र व्यक्ति विशेष का शासन होता है। वही सर्वोच्च शासक राजा होता है। वह जीवनपर्यन्त राज-सिंहासन पर बैठती है और शासन करता है। उसकी मृत्यु के बाद उसका सबसे बड़ा पुत्रे, पुत्र न होने पर उसकी सबसे बड़ी पुत्री उसके पद को सुशोभित करते हैं। राजतन्त्र का पक्ष लेने वाले विद्वान् राजा को ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में ही स्वीकार करते हैं। “उसका उचित या अनुचित आदेश उल्लंघन करने योग्य नहीं है, अर्थात् सर्वथा मान्य है, ऐसा उनका मत है।

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(3)
पुरा बहवो राजानः प्रजां सन्ततिमिव मन्यमानाः शासनमकुर्वन यशोभागिनश्चाभूवन्। ते दयार्दहृदयाः न्यायरताः प्रजाकल्याणतत्पराः राज्यकोषस्य प्रजाहिताय प्रयोक्तारोऽभवन् परं बहवश्चेतरे क्रूाः, कृपणाः प्रजोत्पीडकाः राज्यकोषस्य स्वगर्हितमनोरथस्य पूर्तये व्ययशीलाः (UPBoardSolutions.com) स्वमनोवृत्तानुसारिणश्चासन्। एतादृशानां निरङकुशानां नृपतीनां शासने जनानां कीदृशी दशा स्यादिति सहज कल्पयितुं शक्यते। अतः शनैः शनैः कालेऽतीते राजतन्त्रं प्रति जनमानसेऽरुचिरुत्पन्ना।

शब्दार्थ सन्ततिमिव = सन्तान के समान। अभूवन् = होते थे। प्रयोक्तारः = प्रयोग करने वाले। अभवन् = हुए। बहवश्चेतरे (बहवः + च + इतरे) = और बहुत-से अन्य। प्रजोत्पीडकाः = प्रजा को पीड़ित करने वाले स्वगर्हितमनोरथस्य = अपने निन्दनीय मनोरथ की। स्वमनोवृत्तानुसारिणः = अपनी मनोवृत्ति के अनुसार चलने वाले। निरङ्कुशानां = अनियन्त्रितों का। स्यादिति = हो सकती है, यहा कालेऽतीते = समय बीतने पर। अरुचिः उत्पन्ना = अरुचि उत्पन्न हो गयी।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में बताया गया है कि जनता की राजतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली में कैसे अरुचि हुई।

अनुवाद प्राचीनकाल में बहुत-से राजा प्रजा को सन्तान के समान मानते हुए शासन करते थे और उनका यश फैला हुआ था। वे अत्यन्त दयालु, न्यायशील, प्रजा के कल्याण में तत्पर, राजकोष (खजाने) का प्रजा के हित के लिए प्रयोग करते थे, परन्तु बहुत-से दूसरे क्रूर, कंजूस, प्रजा को सताने वाले, राजकोष को अपने निन्दित मनोरथ की पूर्ति के लिए व्यय करने वाले और अपने मन के अनुसार आचरण करने वाले थे। इस प्रकार के निरंकुश राजाओं के शासन में लोगों की क्या दशा होगी, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। अतः धीरे-धीरे समय बीतने पर राजतन्त्र के प्रति लोगों के मन में अरुचि पैदा हो गयी।

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(4)
कुलीनतन्त्रम्-कुलीनानां विशिष्टजनानां शासनमपि जनानां कृते श्रेयस्करं न सम्भाव्यते। समाजे विशिष्टजनाः बहुधा धनिनो बलिनो वा भवन्ति। धनिनां शासनं धनिनां कृते। बलवतां शासनं बलवतामेव कृते कल्याणकृत् सम्पत्स्यते। एवंविधे शासने निर्धनाः दुर्बलाश्च भृशमुत्पीडिता (UPBoardSolutions.com) भवेयुर्नात्र संशयलेशः। तन्त्रेऽस्मिन् सामान्यजनानां कल्याणस्य कल्पनाऽपि खपुष्पमिव भवेत्। अतएवेदं तन्त्रं कदापि जनहृदि हृद्यं पदं नाऽलभत्।

शब्दार्थ कुलीनतन्त्रम् = विशिष्ट लोगों का शासन। विशिष्टजनानां = विशिष्ट मनुष्यों का। श्रेयस्करम् = लाभकारी, कल्याणकारी। न सम्भाव्यते = नहीं सम्भव होता है। बलिनः = बलशाली। कल्याणकृत् = कल्याण करने वाला। सम्पत्स्यते = होगा। भृशम् = अत्यधिक संशयलेशः = जरा भी संशय। खपुष्पमिव = आकाश-कुसुम के समान अर्थात् असम्भव हृद्यम् = हृदय को आनन्दित करने वाला। नाऽलभत् = नहीं प्राप्त किया।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में कुलीनतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली का वर्णन किया गया है।

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अनुवद्ध कलीनतन्त्र-कुलीनों विशिष्टजनों का शासन भी लोगों के लिए कल्याणकारी सम्भव नहीं हो सकता है। समाज में विशेष लोग प्रायः धनी या बलवान् होते हैं। धनिकों का शासन धनियों के लिए, बलवानों का शासन बलवान् लोगों के लिए कल्याणकारी होगा। इस प्रकार के शासन में निर्धन और कमजोर अत्यधिक सताये जाते रहेंगे, इसमें थोड़ा भी सन्देह नहीं है। इस शासन में सामान्य लोगों के कल्याण की कर पना भी आकाश के फूल के समान अर्थात् असम्भव हो जाएगी। अतएव इस शासन ने कभी भी लोगों के हृदय में अच्छा स्थान प्राप्त नहीं किया।

(5)
जनतन्त्रम्-जनानां तन्त्रं जनानां शासनं जनतन्त्रं प्रजातन्त्रं वोच्यते। अस्मिन् तन्त्रे राज्ञः स्थानं जनाः गृह्णन्ति। राजतन्त्रे राजनि स्थिता प्रभुत्वशक्तिः जनतन्त्रे जनेषु सन्निहिता जायते। अतोऽस्यां पद्धतौ न कश्चिज्जनः शासकोऽपितु जनैः निर्वाचिताः प्रतिनिधयः शासनकार्यं कुर्वते। जनाः स्वप्रतिनिधीन् भारते पञ्चवर्षेभ्यश्चिन्वन्ति। निर्वाचनप्रसङ्ग न कश्चिच्छ्रेष्ठः, न वा कश्चिद्धीनः, न च बलवान्, न वा दुर्बलः विगण्यते। जातिधर्मवर्णलिङ्गनिर्विशेषाः सर्वे जनाः अष्टादशवर्षवयस्काः नराः नार्यश्च निर्वाचने

मताधिकृताः सन्ति। सर्वेषां मतमूल्यं तुल्यमेव भवति। एवंविधाः जननिर्वाचिताः प्रतिनिधयः जनताम्प्रत्येवोत्तरदायिनो भवन्ति। अतः ये प्रतिनिधयः जनविरोधिकार्यं कुर्वन्ति जनमतविरुद्धाचरणं वाऽऽचरन्ति ते पुनर्निर्वाचने साफल्यं न लभन्ते। एतदेव जनभयं तेषां पथच्युतिं रुणद्धि। निर्वाचनात्प्रागपि क्रियमाणजनहितविरुद्धकार्याणां विरोधाय जनाः संविधानप्रदत्तैरधिकारैः शासनं विरुन्धन्ति। शासनकार्ये रताः प्रतिनिधयस्तदा तथाविधस्य विचारस्य नीतेर्वा परित्यागाय परिवर्तनाय वा विवशाः सजायन्ते। अतएवास्यां शासनसरण्यां जनहितविपरीतनीतेः कार्यस्य च सम्भावनाऽल्पीयसी वर्तते इति सर्वेषां मतम्। स्ववैशिष्ट्यैः जनतन्त्रमिदानीं जगति सर्वेषामितरतन्त्राणां मूर्धानमधिशेते।।

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शब्दार्थ उच्यते = कहा जाता है। गृह्णन्ति = ग्रहण करते हैं। प्रभुत्वशक्तिः = सर्वोच्च राजत्व शक्ति, सत्ताधिकार सन्निहिता = स्थित, छिपी हुई, रखी हुई। पञ्चवर्षेभ्यः = पाँच वर्षों के लिए। चिन्वन्ति = चुनते हैं। निर्वाचनप्रसङ्गे = चुनाव के समय। कश्चिच्छेष्ठः = कोई श्रेष्ठ कश्चित् हीनः = कोई हीना विगण्यते = गिना जाता है। जातिधर्मवर्णलिङ्गनिर्विशेषाः = जाति, धर्म, वर्ण, लिंग आदि से रहित। अष्टादशवर्षवयस्कोः = अठारह वर्ष की आयु वाले। मताधिकृताः = मत के (UPBoardSolutions.com) अधिकारी जनताम्प्रत्येवोत्तरदायिनः (जनताम् + प्रति + एव + उत्तरदायिनः) = जनता के प्रति ही उत्तरदायी। साफल्य = सफलता को। पथच्युतिम् = पथभ्रष्ट होने को। रुणद्धि = रोकता है। प्रागपि = पहले-भी। विरुन्धन्ति = रोकते हैं, विरोध करते हैं। सञ्जायन्ते = हो जाते हैं। अल्पीयसी = बहुत कम| स्ववैशिष्ट्यैः = अपनी विशेषताओं से। इतरतन्त्रणां = दूसरे तन्त्रों का। मूर्धानमधिशेते = शीश पर सोता है, अर्थात् श्रेष्ठ है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में जनतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली की अच्छाइयों का वर्णन किया गया है।

अनुवाद जनतन्त्र–जनता के शासन को जनतन्त्र या प्रजातन्त्र कहा जाता है। इस शासन में राजा के स्थान को जनता ले लेती है। राजतन्त्र में राजा में स्थित प्रभुत्वशक्ति, जनतन्त्र में लोगों में स्थित हो जाती है। अत: इस प्रणाली में कोई व्यक्ति शासक नहीं होता है, अपितु जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधि शासन का कार्य करते हैं। भारत में लोग पाँच वर्ष के लिए अपने प्रतिनिधि चुनते हैं। निर्वाचन के सम्बन्ध में कोई बड़ा या छोटा नहीं होता है, न कोई बलवान् अथवा न कोई दुर्बल समझा जाता है। जाति, धर्म, वर्ण, लिंग के अन्तर के बिना सभी अठारह वर्ष के स्त्री या पुरुष चुनाव में मत के अधिकारी होते हैं। सबके मत का मूल्य समान ही होता है। इस प्रकार से जनता के द्वारा चुने गये प्रतिनिधि जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। अतः जो प्रतिनिधि जन-विरोधी कार्य करते हैं अथवा जनमत के विरुद्ध आचरण करते हैं, वे पुनः चुनाव में सफलता प्राप्त नहीं करते हैं। लोगों का यही भय उनको पथभ्रष्ट होने से रोकता है। चुनाव से पूर्व भी किये गये जनहित के विरुद्ध कार्यों के विरोध के लिए लोग संविधान के द्वारा दिये गये अधिकारों से शासन का विरोध करते हैं। सब लोगों का ऐसा मत है कि शासन के कार्य में लगे हुए प्रतिनिधि तब उस प्रकार के विचार अथवा नीति को त्यागने के लिए या बदलने के लिए विवश हो जाते हैं। (UPBoardSolutions.com) इसलिए इस शासन-प्रणाली में जनहित के विपरीत नीति और कार्य की सम्भावना बहुत कम रह जाती है, यह सभी का मत है। अपनी विशेषताओं से जनतन्त्र इस समय संसार में सब दूसरे शासनों में श्रेष्ठ है।

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(6)
अनेकेषु प्रजातन्त्रीयेषु देशेष्वधुनाऽपि राजानः सन्ति, किन्तु ते तत्रालङ्कारमात्रभूताः जनप्रतिनिधिभिः नियमिताधिकाराः वर्तन्ते। सत्स्वपि राजसु तत्रापि च प्रजातन्त्ररीत्या एव शासन सञ्चरते। तत्रापि शासनस्य सर्वेऽधिकाराः जननिर्वाचितप्रतिनिधिसदसि सन्निहितास्तिष्ठन्ति। ते. एवाधिकारा राज्ञोपभुज्यन्ते ये प्रतिनिधिभिः तस्मै प्रदत्ताः। [2006]

शब्दार्थ अधुनापि = आज भी। अलङ्कारमात्रभूताः = मात्र अलंकार स्वरूप। नियमिताधिकाराः = निर्धारित अधिकारों वाले। सञ्चरते = चलता है। सदसि = सदन में या सभा में। सन्निहिताः = निहित। राज्ञोपभुज्यन्ते = राजा के द्वारा भोगे जाते हैं।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में बताया गया है कि अनेक प्रजातान्त्रिक देशों में राजा जनता का ही प्रतिनिधि होता है।

अनुवाद आज भी अनेक प्रजातन्त्र प्रणाली वाले देशों में राजा हैं, किन्तु वे वहाँ की शोभास्वरूप हैं, उनके अधिकार जन-प्रतिनिधियों द्वारा नियमित या निर्धारित हैं। राजाओं के रहने पर भी वहाँ भी प्रजातन्त्र की रीति से ही शासन चलता है। वहाँ भी शासन के सभी अधिकार जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि सभा में निहित हैं। राजा उन्हीं अधिकारों का उपभोग करता है, जो प्रतिनिधियों ने उसे दिये हैं।

(7)
जनतन्त्रशासनप्रणाल्याः आविर्भावादिविषये सुनिश्चिततरमिदं यदस्याः जन्म इङ्ग्लैण्डदेशेऽभवत्। तस्मादेव देशादेषाऽन्येदेशेषु प्रसृता तत्र तत्र देशेषु च प्रचलिता वर्तते।।

प्राचीनभारते गणतन्त्राभिधाना शासनपद्धतिः राजतन्त्रभिन्ना प्रचलिताऽभूदितीतिहासग्रन्थेषु तथाविधोल्लेखो दरीदृश्यते। विश्वस्य सर्वातिशायिप्राचीनग्रन्थे ऋग्वेदे ‘गण’ शब्दस्य बहुबारं प्रयोगो विहितः। जैनग्रन्थेषु बौद्धग्रन्थेषु गणाधीनराज्यानां चर्चा समुपलभ्यते। इतरेतरराज्यनामभिः विभक्तां (UPBoardSolutions.com) भारतभुवमेकसूत्रे आबद्धं बद्धपरिकरो, राजनयविचक्षणो विलक्षण आचार्यः कौटिल्यः स्वरचिते अर्थशास्त्राभिधाने ग्रन्थे गणराज्यानामुल्लेखं कृतवान्। गुप्तकालिकेतिहासे हिमगिरिविन्ध्ययोर्मध्येऽनेकेषां गणराज्यानामुपवर्णनं कृतमितिहासज्ञैः। यत्र तत्र प्रयुक्तो गणशब्दः बहुसङ्ख्यकान् जनानेव बोधयति। अनेन प्राचीनभारते राजतन्त्रेतरा शासनप्रणाली गणतन्त्ररूपा प्रचलिता आसीदिति सिद्ध्यति।

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(2013)
प्राचीनभारते गणतन्त्रा …………………………………. कृतमिति इतिहासज्ञैः। [2008, 14]

शब्दार्थ आविर्भावादिविषये = उत्पत्ति आदि के विषय में। प्रसृता = फैली। गणतन्त्राभिधाना= गणतन्त्र नाम की। राजतन्त्रभिन्ना = राजतन्त्र से भिन्न। तथाविधोल्लेखः = उस प्रकार की विधा का उल्लेख। दरीदृश्यते = प्रायः देखा जाता है। विहितः = किया गया है। समुपलभ्यते = प्राप्त होती है, मिलती है। इतरेतर = भिन्न-भिन्न। बद्धपरिकरः = दृढ़ता से तैयार। राजनय-विचक्षणः = राजनीति में कुशल। हिमगिरिविन्ध्ययोर्मध्येऽनेकेषाम् = हिमालय और विन्ध्याचल के बीच में अनेक का। बोधयति = बताता है। राजतन्त्रेतरा = राजतन्त्र से भिन्न| आसीदिति (आसीद् + इति) = थी, ऐसा। सिद्ध्यति = सिद्ध होता है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में जनतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली के आविर्भाव और प्राचीन भारत में इसके प्रचलन के विषय में बताया गया है।

अनुवाद जनतन्त्र शासन-प्रणाली की उत्पत्ति के मत के विषय में यह निश्चित मत है कि इसका जन्म इंग्लैण्ड देश में हुआ था। उसी देश से ही अन्य देशों में फैली हुई यह उन-उन देशों में प्रचलित है। इतिहास के ग्रन्थों में प्रायः इस प्रकार का उल्लेख दिखाई पड़ता है कि प्राचीन भारत में राजतन्त्र से भिन्न ‘गणतन्त्र’ नाम की शासन-प्रणाली प्रचलित थी। विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में ‘गण’ शब्द का बहुत बार प्रयोग किया गया है। जैन और बौद्ध ग्रन्थों में ‘गण’ के अधीन राज्यों की चर्चा प्राप्त होती है। दूसरे-दूसरे अलग-अलग राज्य के नामों से विभक्त भारत-भूमि को एक सूत्र में बाँधने के लिए दृढ़ता से तैयार राजनीति में कुशल आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) ने स्वरचित ‘अर्थशास्त्र’ नाम के ग्रन्थ में गणराज्यों का उल्लेख किया है। गुप्तकाल के इतिहास में इतिहास के जानकारों ने हिमालय और विन्ध्याचल के मध्य में अनेक गणराज्यों का वर्णन किया है। जहाँ-तहाँ प्रयोग किया गया ‘गण’ शब्द बहुत अधिक मनुष्यों को ही ज्ञान कराता है। इससे प्राचीन भारत में राजतन्त्र से भिन्न शासन-प्रणाली ‘गणतन्त्र’ के रूप में प्रचलित थी, ऐसा सिद्ध होता है।

(8)
राजतन्त्रे दण्डभयाद् कार्यं निष्पादयन्ति जनाः। जनतन्त्रे स्वत एव कर्तव्यभावनया स्वकार्दै निष्पादनीयं भवेत्। कर्तव्यबोधः एव जनतन्त्रस्य मूलाधारः। यस्मिन् कस्मिन् वा कार्ये नियुक्ताः कर्तव्यसम्पादनसमुत्सुकाः सततं राष्ट्रविकासनिरताः विहितसाध्यं साधयन्तोऽन्ताः श्रमशीला देशवासिनो मगरिका (UPBoardSolutions.com) एव स्वराष्ट्रमुन्नेतुं क्षमन्ते इति जनतन्त्रपद्धत्याः महद्वैशिष्ट्यम्। [2008, 10, 12, 15]

राजतन्त्रे दण्डभयाद् …………………………………. उन्नेतुं क्षमन्ते।

शब्दार्थ दण्डभयाद्
= दण्ड के भय से। निष्पादयन्ति = सम्पन्न करते हैं। स्वत एव = स्वयं ही। कर्त्तव्यबोधः = कर्तव्य का ज्ञान। मूलाधारः = मूल आधार। कर्त्तव्यसम्पादनसमुत्सुकाः = कर्तव्य पूरा करने के लिए अधिक उत्सुक। निरताः = लगे हुए। विहितसाध्यम् = इच्छित कार्य को। साधयन्तः = सिद्ध करते हुए। अश्रान्ताः = थकावटरहित, उत्साहसम्पन्न| उन्नेतुम् = उन्नति करने के लिए। क्षमन्ते = सफल होते हैं। महवैशिष्ट्यम् = महान् विशेषता।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में जनतन्त्र प्रणाली की विशेषता बतायी गयी है।

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अनुवाद राजतन्त्र में लोग दण्ड के भय से कार्य सम्पन्न करते हैं। जनतन्त्र में स्वयं ही कर्त्तव्य की भावना से अपना काम करने योग्य होता है। कर्तव्य का ज्ञान ही जनतन्त्र का मूल आधार है। जनतन्त्र प्रणाली की यह महान् विशेषता है कि जिस किसी भी कार्य में लगाये गये, देशवासी नागरिक ही अपने कर्तव्य को पूरा करते हुए उत्साहित, लगातार राष्ट्र के विकास में लगे हुए, इच्छित कार्य को पूरा करते हुए, उत्साहयुक्त, परिश्रमी और राष्ट्र की उन्नति करने में समर्थ होते हैं।

(9)
अस्माकं देशो भारतवर्षमपि सप्तचत्वारिंशदुत्तरैकोनविंशतिशततमे खीष्टाब्दे अगस्तमासस्य पञ्चदशदिनाङ्के वैदेशिकक्रूरकरान्मुक्तं सत् जनतन्त्रप्रणालीमूरीचकार। विदेशीयशासनजनितान् दारिद्रयाशिक्षाऽऽमयादिदोषान् अपाकुर्वन् सततं विकासोन्मुखोऽस्माकं देशस्त्वरितगत्याऽग्रेसरन्नस्ति। साश्चर्यमेतस्योन्नतिं विश्वराष्ट्राणि पश्यन्ति। देशवासिनां देशप्रेम्णः परिणामोऽयं विद्यते।।

अस्माकं देशो …………………………………. अग्रेसरन्नस्ति

शब्दार्थ सप्तचत्वारिंशदुत्तरैकोनविंशतशतमे = उन्नीस सौ सैंतालीस में। ख्रीष्टाब्दे = ईस्वी में। वैदेशिकक्रूरकरान्मुक्तम् (वैदेशिक + क्रूरकरात् + मुक्तम्) = विदेशियों के कठोर हाथों से छूटा हुआ। ऊरीचकार = स्वीकार किया। आमयादिदोषान् = बीमारी आदि दोषों को। अपाकुर्वन् = दूर करते हुए। त्वरितगत्या = तीव्र गति से। अग्रेसरन्नस्ति = आगे बढ़ रहा है।

प्रसंग प्रस्तु गद्यांश में वर्तमान जनतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली द्वारा भारत की उन्नति का वर्णन किया गया है।

अनुवाद हमारे देश भारतवर्ष ने भी सन् 1947 ईस्वी में अगस्त मास की 15 तारीख को विदेशियों के क्रूर हाथों से मुक्त होते हुए जनतन्त्र प्रणाली को स्वीकार किया। विदेशी शासन के कारण उत्पन्न हुई गरीबी, अशिक्षा, बीमारी आदि दोषों को दूर करता हुआ निरन्तर विकास के लिए उन्मुख हमारा (UPBoardSolutions.com) देश तीव्रगति से आगे बढ़ रहा है। संसार के राष्ट्र इसकी उन्नति को आश्चर्यपूर्वक देख रहे हैं। यह देशवासियों के देशप्रेम का परिणाम है।

(10)
यूयमेव बालकबालिकाश्चास्य राष्ट्रस्य स्वामिनः सेवकाश्च स्थ। यूयं यथा समाचरिष्यथ तथैव राष्ट्ररूपं भविष्यति। यदि यूयं स्वकर्तव्यानि सदा सावधाना अनुशासिताः सम्पादयन्तः राष्ट्रहिताय स्वहितं परिहरन्तः राष्ट्ररक्षायै राष्ट्रविकासाय तत्पराः स्थास्यथ तदैवास्माकं राष्ट्र भारतवर्षं जगद्गुरुगौरवपदं पुनरुपलप्स्यते।। [2005]

शब्दार्थ समाचरिष्यथ = आचरण करोगे। स्वकर्तव्यानि = अपने कर्तव्य सम्पादयन्तः = सम्पन्न करते हुए। परिहरन्तः = त्यागते हुए। तत्पराः स्थास्यथ = तत्पर रहोगे। जगद्गुरुगौरवपदम् = संसार के गुरु होने का • गौरवशाली पद। उपलप्स्यते = प्राप्त करेगा।

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प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में देशवासी बालक-बालिकाओं को राष्ट्र की उन्नति करने के लिए सम्बोधित किया गया है।

अनुवाद बालक-बालिकाओ! तुम सभी राष्ट्र के स्वामी और सेवक हो। तुम सब जैसा आचरण करोगे, वैसा ही राष्ट्र का स्वरूप होगा। यदि तुम लोग सदा सावधान और अनुशासित रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए, राष्ट्रहित के लिए अपने हितों का त्याग करते हुए राष्ट्र की रक्षा हेतु राष्ट्र के विकास के लिए तैयार रहोगे, तभी हमारा राष्ट्र भारतवर्ष संसार के गुरु होने के गौरवपूर्ण पद को पुनः प्राप्त कर सकेगा।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जनतन्त्र की विशेषता लिखिए। [2006]
या
जनतन्त्र का महत्त्व समझाइए। [2012]
या
जनतन्त्रको परिभाषित कीजिए। [2006,09]
उत्तर :
जनता के शासन को जनतन्त्र या प्रजातन्त्र कहते हैं। इसमें प्रभुत्व-शक्ति जनता के हाथ में निहित होती है। इसमें जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि शासन करते हैं, जो जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। जो प्रतिनिधि जनता के विरुद्ध आचरण करते हैं, वे जनता के द्वारा पुनः (UPBoardSolutions.com) निर्वाचित नहीं किये जाते। इस शासन में जनहित के विपरीत कार्यों के किये जाने की सम्भावना नहीं रहती।

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प्रश्न 2.
शासन-प्रणाली के कितने भेद होते हैं? स्पष्ट कीजिए। [2006]
या
राजतन्त्र, कुलीनतन्त्र और जनतन्त्र का अन्तर बताइए। [2007]
उत्तर :
राजनीतिवेत्ताओं ने शासन-प्रणाली के निम्नलिखित तीन भेद बताये हैं

  • राजतन्त्र – इसमें राजा का शासन होता है।
  • कुलीनतन्त्र – इसमें कुलीन अर्थात् विशिष्ट लोगों का शासन होता है।
  • जनतन्त्र – इसमें जनता का शासन होता है।

प्रश्न 3.
जनतन्त्र का आविर्भाव सर्वप्रथम कहाँ हुआ था? भारत में राजतन्त्र से भिन्न कौन-सी शासन-प्रणाली प्रचलित थी?
उत्तर :
जनतन्त्र प्रणाली का आविर्भाव सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में हुआ था। वहीं से यह प्रणाली विश्व के अन्य देशों में फैली। प्राचीन भारत में राजतन्त्र से कुछ भिन्न ‘गणतन्त्र’ शासन-प्रणाली प्रचलित थी। ऋग्वेद में गणतन्त्र शब्द का प्रयोग बहुत बार हुआ है। जैन और बौद्ध ग्रन्थों में भी ‘गण’ के अधीन राज्यों के उल्लेख मिलते हैं। आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) ने भी ‘अर्थशास्त्र में गणराज्यों का उल्लेख किया है। गुप्तकालीन इतिहास में हिमालय और विन्ध्याचल के मध्य अनेक (UPBoardSolutions.com) गणराज्यों का वर्णन किया गया है।

प्रश्न 4.
राजतन्त्र क्या है? [2006, 08,09]
या
राजतन्त्र किसे कहते हैं? [2010]
या
राजतन्त्र का स्वरूप बताइए। राजतन्त्र में कौन सर्वोच्च शासक होता है? [2006]
या
राजतन्त्र के प्रमुख दोष बताइए। [2011, 12, 13]
या
व्यक्ति-विशेष के शासन को क्या कहते हैं? [2010, 11]
या
जनता में राजतन्त्र के प्रति अरुचि क्यों उत्पन्न हुई। राजतन्त्र में राजा कैसे बनता है? [2006]
उत्तर :
राजतन्त्र में व्यक्ति विशेष का शासन होता है, वह सर्वोच्च शासक राजा कहलाता है। वह जीवनपर्यन्त शासन करता है। उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र या पुत्री (पुत्र न होने की स्थिति में) उसके पद से जनता पर शासन करते हैं। राजतन्त्र के पक्षधर विद्वान् राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर उसके उचित या अनुचित आदेश का पालन करना अनिवार्य मानते हैं। प्राचीन काल में प्रजा को सन्तान के समान मानने वाले दयालु, न्यायी और प्रजा के कल्याण के लिए राजकोष का व्यय करने वाले अनेक राजा हुए। इसके विपरीत ऐसे भी राजा हुए, जो क्रूर, कृपण, प्रजापीड़क, अपने स्वार्थ के लिए राजकोष का व्यय करने वाले और मनोनुकूल आचरण करने वाले थे। साथ ही राजतन्त्र में लोग दण्डों के भय से कार्य सम्पन्न करते थे, कर्तव्य की भावना से नहीं। ऐसे ही दोषों के कारण लोगों के मन में राजतन्त्र के प्रति अरुचि उत्पन्न हो गयी।

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प्रश्न 5.
हमारे देश में कौन-सी शासन-प्रणाली प्रवर्तमान है? [2011, 13]
या
भारतवर्ष ने किस सन्, महीने व दिनांक को जनतन्त्र प्रणाली को स्वीकार किया था? [2009]
उत्तर :
हमारे देश भारतवर्ष में 15 अगस्त, 1947 के बाद से जनतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली प्रवर्तमान है।

प्रश्न 6.
राजतन्त्र और जनतन्त्र का प्रमुख अन्तर स्पष्ट कीजिए [2006,07,13]
उत्तर :
राजतन्त्र में राजा का शासन होता है, जब कि जनतन्त्र में जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों का। (UPBoardSolutions.com) राजतन्त्र में लोग दण्ड के भय से कार्य सम्पन्न करते हैं, जब कि जनतन्त्र में कर्तव्य की भावना से कार्य सम्पन्न किया जाता है।

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प्रश्न 7.
राजनीतिज्ञों ने शासन-प्रणाली के कौन-कौन से तन्त्र स्वीकार किये हैं? किसी एक तन्त्रको संक्षिप्त वर्णन प्रस्तुत कीजिए।
या
राजनीतिज्ञों/विद्वानों द्वारा शासन-तन्त्रों के कौन-कौन से भेद स्वीकृत हैं? [2008, 09, 10]
उत्तर :
[ संकेत प्रश्न सं० 2 और प्रश्न सं० 1 के उत्तर को लिखें।]

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Class 10 Sanskrit Chapter 16 UP Board Solutions दीनबन्धु ज्योतिबाफुले Question Answer

UP Board Class 10 Sanskrit Chapter 16 Deenbandhu Jyotiba Phule Question Answer (गद्य – भारती)

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 16 हिंदी अनुवाद दीनबन्धु ज्योतिबाफुले के प्रश्न उत्तर यूपी बोर्ड

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पाठ का सारांश

ग्यारह अप्रैल, सन् 1827 ई० में पुणे नामक स्थान पर जन्मे ज्योतिबा फुले एक भारतीय विचारक, समाज-सेवक, लेखक, दार्शनिक और क्रान्तिकारी कार्यकर्ता थे। इन्होंने महाराष्ट्र में सत्यशोधक संस्था को संगठित किया था। दलित स्त्रियों के उत्थान के लिए अनेक कार्यों को करने वाले ज्योतिबा फुले का विचार था कि भारतीय समाज में सभी शिक्षित हों।

ज्योतिबा फुले के पूर्वज सतारा से पुणे आकर फूलों की माला बेचकर जीवन-यापन करते थे। इसी कारण से ये ‘फुले’ नाम से विख्यात हुए। आरम्भ काल में मराठी भाषा का अध्ययन करने वाले फुले की शिक्षा बीच में ही रुक गयी। इक्कीस वर्ष की अवस्था में उन्होंने (UPBoardSolutions.com) अंग्रेजी भाषा से सातवीं कक्षा की शिक्षा पूरी की। 1840 में इनका विवाह सावित्री नाम की कन्या के साथ हुआ। पत्नी के साथ मिलकर इन्होंने स्त्री-शिक्षा के लिए कार्य किया। उन्होंने विधवा तथा अन्य स्त्रियों के साथ-साथ कृषकों की दशा को सुधारने का प्रयत्न किया। 1848 में स्त्रियों के लिए प्रथम विद्यालय संचालित किया। इस प्रयत्न में उच्चवर्गीय लोगों ने अवरोध भी उत्पन्न किया किन्तु वे उनके आगे टिक न सके।

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फुले के मन में सन्तों के प्रति अगाध श्रद्धा थी। दलितों की सहायता के लिए ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की। इनके सेवा कार्य को देखकर इन्हें मुम्बई की एक सभा में महात्मा’ की उपाधि दी गई। ज्योतिबा ने बिना ब्राह्मण के विवाह कराने की मान्यता मुम्बई न्यायालय से दिलाई। उन्होंने तृतीय रत्न, छत्रपति शिवाजी आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की। ज्योतिबा फुले क्रान्तिकारी विचारक, समाजसेवक, दार्शनिक और लेखक थे। अस्पृश्यता के दु:ख के उन्मूलन में इनकी भूमिका अकथनीय रही है। इन महापुरुष का स्वर्गवास 28 नवम्बर, 1890 ई० में पुणे में हुआ था। माली समाज के महात्मा ज्योतिबा फुले एक ऐसे महामानव थे जिन्होंने निम्न जाति को समानता का (UPBoardSolutions.com) अधिकार दिलाने के लिए आजीवन कार्य किया। हमारे देश के इतिहास में सावित्री फुले को प्रथम दलित शिक्षिका का गौरव प्राप्त हुआ था।

गद्यांशों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1)
ज्योतिराव गोविन्दराव इत्याख्यस्य जन्म अप्रैलमासस्य एकादशदिनाङ्के सप्तविंशत्याधिके अष्टादशखीष्टाब्दे पुणे नामके स्थानेऽभवत्। अयं महात्मा फुले एवं ज्योतिबा फुले नाम्ना प्रचलितो एको महान् भारतीय विचारकः, समाजसेवकः, लेखकः, दार्शनिकः क्रान्तिकारी कार्यकर्ता चासीत्। त्रयोधिकसप्ततिः अष्टादशशते ख्रीष्टाब्दे अयं महाराष्ट्र ‘सत्यशोधक समाज’ नामक संस्थां संगठितवान्। नारीणां दलितानाञ्चोत्थानायायमनेकानि कार्याण्यकरोत्। ‘भारतीयाः मानवाः सर्वे शिक्षिताः स्युः’, अस्य एतत् चिन्तनमासीत्।।

शब्दार्थ इत्याख्यस्य = इस नाम वाले। स्थानेऽभवत् =स्थान पर हुआ। संगठितवान् = संगठित किया। दलितानाञ्चोत्थानायायमनेकानि = और दलितों के उत्थान के लिए अनेक, सर्वे शिक्षिताः स्युः = सभी शिक्षित हों।।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के गद्य-खण्ड ‘गद्य-भारती’ में संकलित ‘दीनबंधु ज्योतिबा फुले’ शीर्षक पाठ से उधृत है।

प्रसंग इस गद्यांश में ज्योतिबा फुले के जन्म और उनके गुणों के विषय में बताया गया है।

अनुवाद ज्योतिराव गोविन्दराव इस नाम वाले (पुरुष) का जन्म ग्यारह अप्रैल अठारह सौ सत्ताईस ई० में पुणे नामक स्थान पर हुआ। यह महात्मा फुले और ज्योतिबा फुले नामों से प्रचलित एक महान् भारतीय विचारक, समाजसेवक, लेखक, दार्शनिक और क्रान्तिकारी कार्यकर्ता थे। सन् अठारह सौ तिहत्तर ई० में इन्होंने महाराष्ट्र में ‘सत्यशोधक समाज’ नामक संस्था को संगठित किया। नारियों और दलितों के उत्थान के लिए अनेक कार्य किए। सभी भारतीय मानव शिक्षित हों, यह इनका चिन्तन था।

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(2)
तस्य पूर्वजाः पूर्वं सतारातः आगत्य पुणे नगरं प्रत्यागत्य पुष्पमालां गुम्फयन् स्वजीवनं निर्वापयामास। परिणामस्वरूपे मालाकारस्य कार्ये संलग्नाः इमे ‘फुले’ नाम्ना विख्याताः अभवन्। महानुभावोऽयं प्रारम्भिककाले मराठीभाषां अपठत् किन्तु दैववशात् अस्य शिक्षा मध्येऽवरुद्धा संजाता। सः पुनः पठितुं मनसि विचार्य एकविंशतिं वर्षस्यावस्थायां आंग्लभाषायाः सप्तम्याः कक्षायाः शिक्षा पूरितवान्। चत्वारिंशत् अधिकाष्टादशशतमे (1840) खीष्टाब्दे अस्य विवाहः सावित्री नाम्न्याः कन्यया साकमभवत्। अस्य भार्यापि स्वयमपि एका प्रसिद्ध समाजसेविका संजाता। समाजस्योन्नतये स्वभार्यया सह मिलित्वाऽयं दलितोत्थानाय स्त्रीशिक्षायै च कार्यमकरोत्।। (UPBoardSolutions.com) शब्दार्थ सतारातः आगत्य = सतारा से आकर पुष्पमालां गुम्फयन् =फूलमाला बनाते हुए। मालाकारस्य कायें संलग्नाः = माली के कार्य में संलग्न होने से। दैववशात् =भाग्यवश होकर| मनसि विचार्य = मन से सोचकर। भार्यापि = पत्नी भी। स्त्रीशिक्षायै = स्त्री-शिक्षा के लिए।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में लेखक दीनबंधु ज्योतिबा के उपनाम तथा शिक्षा के विषय में बताते हुए लिखता है।

अनुवाद उनके पूर्वज पहले सतारा से आकर पुणे नगर में पुनः लौटकर फूलमाला बनाते हुए अपने जीवन का निर्वाह करने लगे। इसके परिणामस्वरूप माली के कार्य में संलग्न होने के कारण ये ‘फुले’ नाम से विख्यात हो गये। इस महोदय ने प्रारम्भिक काल में मराठी को पढ़ा किन्तु भाग्यवश इनकी शिक्षा बीच में ही रुक गयी। उन्होंने पुनः पढ़ने का विचार करके इक्कीस वर्ष की अवस्था में अंग्रेजी भाषा से सातवीं कक्षा की शिक्षा पूरी की। सन् 1840 ई० में इनका विवाह सावित्री नाम की कन्या के साथ हुआ। इनकी पत्नी भी स्वयं ही एक प्रसिद्ध समाजसेविका हुईं। समाज की उन्नति के लिए अपनी पत्नी के साथ मिलकर इन्होंने दलितों के उत्थान और स्त्री-शिक्षा के लिए कार्य किए।

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(3)
ज्योतिबा फुले भारतीयसमाजे प्रचलिताः जात्याः आधारिताः विभाजनस्य पक्षौ नाऽसीत्। सः वैधव्ययुक्तानां नारीणाम् एवम् अपराणां नारीणां कृते महत्त्वपूर्ण कार्यं कृतवान्। कृषकाणां दशां वीक्ष्य दुःखितोऽयं तेषाम् उद्धाराय सतत् प्रयत्नशीलः आसीत्। ‘स्त्रीणामसफलतायाः कारणं तेषामशिक्षैव विद्यते’ इति विचार्य सः अष्टाचत्वरिंशत् अधिकाष्टदशखष्टाब्दे एकः विद्यालयः संचालितवान् अस्य कार्याय देशस्यायं प्रथमो विद्यालयः आसीत्। बालिका शिक्षायै शिक्षिकायाः स्वल्पतां दृष्ट्वा सः स्वयमेव शिक्षकस्य भूमिका निर्वहत्। अनन्तरं स्वभार्या शिक्षिकारूपेण नियुक्तवान्। उच्च सवंर्गीयाः जनाः प्रारम्भ कालादेव तस्य कार्ये बाधां स्थापयितु कटिबद्धाः आसन्। परञ्च अयं (UPBoardSolutions.com) स्वकार्ये प्रयतमानः अग्रगण्यः अभवत्। तं अग्रे गतिशीलं दृष्ट्वा ते दुर्जनाः तस्य पितरं प्रति अशोभनीयं कथनमुक्ता। दम्पत्तिं स्वगृहात् बहिः प्रेषितवान्। स्वगृहात् बर्हिगमने सतितस्य कार्यावरुद्धं संजातम् परंच शीघ्रातिशीघ्रमेव सः बलिकाशिक्षायै त्रयोः विद्यालयाः उदघाटितवान्।

शब्दार्थ प्रचलितजात्याधारितविभाजनस्य = प्रचलित जाति पर आधारित विभाजन के वैधव्ययुक्तानां नारीणाम् = विधवा स्त्रियों के अपराणां नारीणाम् = अन्य (दूसरी) नारियों के वीक्ष्य = देखकर/जानकर/समझकरे त्रीणामसफलतायाः कारणम् =स्त्रियों की असफलता का कारण स्वल्पता दृष्ट्वा = अपनी कमी को जानकर कार्ये बाधां स्थापयितुम = कार्य में अड़चन (बाधा डालने के लिए प्रयतमानः = प्रयास में लगे रहने वाले

प्रसंग इस गद्यांश में समाजसेवी ज्योतिराव गोविन्दराव फुले के द्वारा किए गए सामाजिक कार्यों का उल्लेख किया गया है।

अनुवाद ज्योतिबा फुले भारतीय समाज में प्रचलित जातिगत विभाजन के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने विधवा स्त्रियों और दूसरी नारियों के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किए, किसानों की दशा को देखकर दु:खी होकर ये उनके उद्धार के लिए सतत् प्रयत्नशील हुए। ‘स्त्रियों की असफलता का कारण उनकी अशिक्षा ही है। ऐसा विचार करके उन्होंने सन् 1848 ई० में एक विद्यालय चलाया। इस कार्य के लिए देश का यह प्रथम विद्यालय था। लड़कियों की शिक्षा के लिए अध्यापिकाओं की कमी जानकर (देखकर) उन्होंने स्वयं ही शिक्षक की भूमिका का निर्वहन किया। बाद में अपनी पत्नी को शिक्षिका के रूप में नियुक्त किया। उच्चवर्गीय लोग प्रारम्भिक काल से ही उनके कार्य में बाधा डालने के लिए कटिबद्ध थे। परन्तु ये अपने कार्य में निरन्तर अग्रगण्य रहे। उनकी आगे बढ़ने की गतिशीलता को देखकर उन दुर्जनों ने उनके पिता के प्रति अशोभनीय बातें भी कहीं। पति-पत्नी को अपने घर से बाहर भेज दिया। अपने घर से बाहर निकलने से उनका कार्य रुक गया, परन्तु अति शीघ्र ही उन्होंने बलिकाओं की शिक्षा के लिए तीन विद्यालय खोल दिए।

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(4)
अस्य हृदि सन्त-महात्मानं प्रति बहुरुचिरासीत्। तस्य विचारेषु ‘ईश्वस्य सम्मुखे नर-नारी सर्वे समानाः सन्ति, तेषु श्रेष्ठता लघुता अशोभनीया विद्यते। दलितजनानामसहायञ्च न्यायार्थं महापुरुषोऽयं ‘सत्यशोधक समाजम्’ स्थापितवान्। अस्य सामाजिक सेवाकार्यं विलोक्य अष्टाशीति अष्टादशशतख्रीष्टाब्दे मुम्बईनगरस्य एका विशाला सभा तं ‘महात्मा’ इत्युपाधिना अलङ्कृतवान्। ज्योतिबा महोदयेन ब्राह्मणेन पुरोहितेन बिनैव विवाहसंस्कारमकारयत्। (UPBoardSolutions.com) अस्य संस्कारस्य मुम्बई न्यायालयात् मान्यता संप्राप्ता। सः तु बालविवाहस्य विरोधं एवञ्च विधवाविवाहस्य समर्थकः आसीत्।

शब्दार्थ हृदि = हृदय में। विचारेषु = विचारों में। दलितजनानामसहायांनाञ्च = दलितों और असहाय जनों का। विलोक्य = देखकर

प्रसंग इस गद्यांश में लेखक ज्योतिबा फुले की रुचियों का ज्ञान तथा उनको मिली उपाधि आदि के विषय में चर्चा करता हुआ कहता है।

अनुवाद इनके (ज्योतिबा फुले के) हृदय में संत-महात्माओं के प्रति अत्यधिक रुचि थी। उनके विचारों में भगवान के सामने स्त्री-पुरुष सभी समान हैं और उनके बीच लघुता और श्रेष्ठता प्रकट करना अशोभनीय है। दलितों और असहाय जनों के न्याय के लिए इस महापुरुष ने ‘सत्यशोधक समाज’ स्थापित किया। इनके सामाजिक सेवा कार्य को देखकर 1888 ई० में मुम्बई नगर की एक विशाल सभा में इन्हें महात्मा’ इस उपाधि से अलंकृत किया गया। ज्योतिबा महोदय के द्वारा ब्राह्मण और पुरोहितों के बिना विवाह संस्कार कराया गया। इस संस्कार की मुम्बई न्यायालय से मान्यता मिली। वे बाल विवाह के विरोधक और विधवा विवाह के समर्थक थे।

(5)
स्वजीवनकाले स तु अनेकानि पुस्तकानि अलिखत्, यथा—तृतीयरत्नं, छत्रपतिशिवाजी, राजाभोसले इत्याख्यस्य पँवाडा, ब्राह्मणानां चातुर्यम्, कृषकस्य कशा अस्पृश्यानां समाचारं इत्यादयः। महात्मा ज्योतिबा एवं तस्य संगठनस्य संघर्ष कारणात् सर्वकारेण ‘एग्रीकल्चरएक्ट’ इति स्वीकृतम्। धर्मसमाजस्य परम्परायाः सत्यं सर्वेर्षां सम्मुखमानेतुं तेन अन्यानि अपराणि पुस्तकानि-रचितानि। ज्योतिबा बुद्धिमान् महान् क्रान्तिकारी-भारतीयविचारकः समाजसेवकः लेखकः दार्शनिकश्चासीत्। महाराष्ट्रनगरे धार्मिकसंशोधनमान्दोलनं प्रचलनासीत्। जातिप्रथामुन्मूलनार्थमेकेश्वरवादं स्वीकर्ते ‘प्रार्थना समाजस्य स्थापना संजाता। अस्य प्रमुखः (UPBoardSolutions.com) गोविन्द रानाडे आरजी भण्डारकरश्चासीत्। अयं महान् समाजसेवकः अस्पृश्यानां उद्धाराय सत्यशोधक समाजस्य स्थापनाम् अकरोत्। महात्मा ज्योतिबा फुले (ज्योतिराव गोविन्दराव फुले) महोदयस्य मृत्युः नवम्बर मासस्य अष्ट विंशति दिनांके नवत्यधिक अष्टादशशततमे खीष्टाब्दे (28 नवम्बर, 1890 ई०) पुणे नगरे अभवत्।।

शब्दार्थ स्वजीवनकाले = अपने जीवनकाल में। कृषकस्य कशाः = किसानों का कोड़ा। अस्पृश्यानां समाचारम् =अछूतों की कैफियत। सर्वेषां सम्मुखमानेतुम् = सभी के सामने लाने के लिए। जातिप्रथामुन्मूलनार्थम् =जाति प्रथा को जड़ से मिटाने के लिए।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश में महात्मा ज्योतिबा फुले के लेखन कार्य के द्वारा दी गई समाज-सेवा का उल्लेख किया गया है।

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अनुवाद अपने जीवनकाल में तो उन्होंने अनेक पुस्तकों की रचना की; जैसे–तीसरे रत्न छत्रपति शिवाजी, राजा भोसले आदि की जीवनियाँ, ब्राह्मणों की चतुरता, किसानों का कोड़ा, अछूतों की कैफियत
आदि। महात्मा ज्योतिबा एवं उनके संगठन के संघर्ष के कारण से सरकार के द्वारा ‘एग्रीकल्चर एक्ट स्वीकार किया गया। धर्म समाज की परम्परा की सत्यता को सबके सम्मुख लाने के लिए इनके द्वारा अनेक दूसरी पुस्तकों की रचना की गई। ज्योतिबा बुद्धिमान, महान् क्रान्तिकारी, भारतीय विचारक, समाजसेवक, लेखक और दार्शनिक थे। महाराष्ट्र नगर में धार्मिक संशोधन आन्दोलन प्रचलित था। जाति प्रथा को जड़ से उखाड़ने के लिए और एक ईश्वरवाद को स्वीकार करने के लिए प्रार्थना समाज’ की स्थापना की गई। इसके प्रमुख गोविन्द रानाडे और आर०जी० भण्डारकर थे। इस महान् समाजसेवक ने अछूतों के उद्धार के लिए सत्यशोधक समाज की स्थापना की। महात्मा ज्योतिबा फुले की मृत्यु 28 नवम्बर, 1890 ई० में पुणे नगर में हुई।

(6)
अस्पृश्यनां दुःखेनोन्मूलने अस्य भूमिका अकथनीया विद्यते। पुणेनगरे दलितानां गृतिः शोचनीयासीत्। उच्चजातीनां कुपात् जलं नेतुं ते मुक्ताः नासन्। ते दलितानामेतादृशीं दुर्दशां दृष्ट्वा-दृष्ट्वा तस्य हृदयं विदीर्णोजातः तदैव सः स्वमनसि विचारयामास यत् एषाम् दुःखम् दूरीकरणीयम्। अयं महापुरुषः तेषाम्। अमानवीयव्यवहारं दृष्ट्वा सः स्वगृहस्य जलसंचय कूपम् अपृश्यानां कृते मुक्तं कृतवान्। सः नगरपालिकायाः सदस्यः आसीत् अतः तेषां कृते सार्वजनिकस्थाने (UPBoardSolutions.com) जलसंचय कूपं स्यात् एतत् प्रबन्धनं कृतम्। मालाकारसमाजस्य महात्मा ज्योतिबा फुले एव एतादृशः महामानवः आसीत् यः निम्नजातीनां जनानां कृते समानतायाः अधिकारस्य आजीवनं कार्यमकरोत्।।

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शब्दार्थ दलितानां गतिः = दलितों की स्थिति हृदयं विदीर्णोजातः = मन दुःखी हो जाता था, जलसंचय कूपम् = पानी की हौज।।

प्रसंग अछूत जातियों के दुःख के उन्मूलन में इनकी भूमिका का वर्णन इस गद्यांश में किया गया है।

अनुवाद अछूत वर्ग (की जाति) के दु:खों को दूर करने में इनकी भूमिका अकथनीय है। पुणे नगर में दलितों की गति सोचनीय थी। उच्च जाति के लोगों के कुएँ से पानी लेने के लिए वे मुक्त नहीं थे (अर्थात् पानी नहीं ले सकते थे)। उन दलितों की ऐसी दुर्दशा देख-देखकर उनका हृदय विदीर्ण हो जाता था तभी उन्होंने अपने मन में विचार किया कि इनके दुःख को दूर करना होगा। इन महापुरुष ने उनके अमानवीय व्यवहार को देखकर अपने घर में जलसंचय करने के लिए कुएँ को अछूतों के लिए मुक्त कर दिया। वे नगरपालिका के सदस्य थे अत: उनके लिए सार्वजनिक स्थानों से जलसंचय करने के लिए कुआँ हो, ऐसा प्रबन्ध किया। माली समाज के महात्मा ज्योतिबा फुले ऐसे ही महामानव थे जिन्होंने निम्न जाति के लोगों के समानता के अधिकार के लिए आजीवन कार्य किया।

(7)
अस्य सहधर्मचारिणी सावित्रीबाई अस्य कार्येण प्रभाविता आसीत्। अतः सा नारी शिक्षयितुं कटिबद्धासीत्। यदा सा नारी पाठयितुं प्रारब्धवती तदैव दलितविरोधिनः उच्चस्वरैः विरोधं प्रकटयन उक्तवन्तः यत् एकाहिन्दूनारी शिक्षिका भूता समाजस्य धर्मस्य च विरोधं कर्तुं शक्नोति। नारी जातेः पठनं पाठनं वा धर्मविरुद्धं वर्तते। सावित्रीबाई यदा विद्यालयं गच्छति स्म तदा तस्योपरि मृत्तिका-गोमय-प्रस्तरखण्डान् नारीशिक्षाविरोधिनः प्रक्षेपयन्ति स्म एवञ्च व्यंग्यबाणैः अपीड़यन् तथापि सा स्वकर्तव्यात् विमुखा न सजाता| मराठी शिक्षकः शिवराम भवालकरः अस्याः प्रशिक्षकः आसीत्। इयं उपेक्षितानां दलितनारीणां कृते बहुविद्यालयं संचालितवती।।

शब्दार्थ सहधर्मचारिणी = धर्मपत्नी। पाठयितुं प्रारब्धवती = पढ़ाना आरम्भ किया, उच्चस्वरैः = ऊँची आवाजों में उक्तवन्तः = कहने लगे। गोमयम् = गोबर व्यंग्यबाणैः = उपहास के बाणों से।

प्रसंग इस गद्यांश में ज्योतिबा फुले की धर्मपत्नी सावित्रीबाई के स्वभाव और सामाजिक कार्यों का वर्णन किया गया है।

अनुवाद इनकी धर्मपत्नी सावित्रीबाई इनके कार्यों से प्रभावित थीं। अतः वे नारी शिक्षा के लिए कटिबद्ध थी। जब उन्होंने नारियों को पढ़ाना प्रारम्भ किया तभी दलित विरोधियों ने उच्च स्वरों में विरोध प्रकट करते हुए कहा कि एक हिन्दू नारी शिक्षक होने से समाज और धर्म का विरोध कर सकती है। नारी जाति को पढ़ना या पढ़ानी धर्म के विरुद्ध है। सावित्रीबाई जब विद्यालय जाती थीं तब उनके ऊपर मिट्टी-गोबर-पत्थर के टुकड़े नारी-शिक्षा के विरोधी फेंकते थे और व्यंग्य के बाणों से पीड़ित करते थे। तब भी वे अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं हुईं। मराठी शिक्षक शिवराम भवालकर इनके प्रशिक्षक थे। इन्होंने उपेक्षित दलित स्त्रियों के लिए अनेक विद्यालय संचालित किए।

(8)
द्विपंचाशताधिकाष्टादशखीष्टाब्दे फरवरीमासस्य सप्तदशदिनाङ्के अस्य विद्यालयस्य निरीक्षणं सजातम् परिणामस्वरूपे अस्य अष्टादशविद्यालयाः संचालिताः अभवन्। नवम्बरमासस्य षोडशदिनाङ्के ‘विश्रामबाडा’ इति स्थाने सार्वजनिव-अभिनन्दनसमारोहे अस्याः अभिनन्दनं सम्पन्नम्। अस्माकं देशस्य इतिहासे सावित्री फूले प्रथमा दलिताशिक्षिकायाः गौरवेणालङ्कृता।

शब्दार्थ निरीक्षणं सञ्जातम् = निरीक्षण किया गया। इति स्थाने = इस नाम वाले स्थान पर। देशस्य इतिहासे = देश के इतिहास में।।

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प्रसंग इस गद्यांश में ज्योतिबा फुले की धर्मपत्नी सावित्रीबाई’ के द्वारा शिक्षा जगत् के लिए किया गया प्रयास और उनकी सफलता का वर्णन किय गया है।

अनुवाद सत्रह फरवरी, सन् 1852 ई० में इनके (UPBoardSolutions.com) विद्यालय का निरीक्षण हुआ जिसके परिणामस्वरूप इनके अठारह विद्यालय संचालित हुए। नवम्बर मास की सोलह दिनांक को विश्रामबाडा नामक स्थान पर सार्वजनिक अभिनन्दन समारोह में इनका अभिनन्दन किया गया। हमारे देश के इतिहास में सवित्री फुले प्रथम दलित शिक्षिका के गौरव से अलंकृत हुईं।

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