UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 7
Chapter Name Psychological Experiments
(मनोवैज्ञानिक प्रयोग)
Number of Questions Solved 2
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments (मनोवैज्ञानिक प्रयोग)

नोट – कक्षा 11 के नवीनतम पाठ्यक्रम में दो प्रयोगों को लिखने का प्रावधान है। ये प्रयोग हैं –

  1. प्रत्यक्षीकरण में तत्परता तथा
  2. अवधान विस्तार। दोनों प्रयोगों का प्रारूप निम्नवर्णित है।

प्रश्न 1.
‘प्रत्यक्षीकरण में तत्परता सम्बन्धी प्रयोग का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
प्रयोग – प्रत्यक्षीकरण में तत्परता

  1. प्रयोग का शीर्षक – प्रत्यक्षीकरण में तत्परता
  2. दिनांक – 02.01.2018
  3. वार या दिन – सोमवार
  4. समय – 10:45 प्रातः
  5. स्थान – कानपुर
  6. प्रयोज्य या विषय-पात्र का नाम – कु० अनिता गर्ग
  7. विषय-पात्र की आयु – 17 वर्ष
  8. प्रयोगकर्ता – रघुबीर शर्मा
  9. विषय-पात्र की शारीरिक एवं मानसिक दशा – सामान्य रूप से स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त।

प्रयोग की निर्धारित समस्या – प्रत्यक्षीकरण पर व्यक्ति की तत्परता के प्रभाव को ज्ञात करना या जानना।

प्रयोग की ओवश्यक सामग्री – स्टॉप वाच, दो भिन्न शब्द-सूचियाँ, जिनमें भिन्न-भिन्न दस-दस शब्द हैं। इन शब्द-सूचियों को तैयार करते समय इस बात का ध्यान रखना आवश्यक होता है कि प्रत्येक शब्द में कुल पाँच अक्षर ही हैं। इस प्रकार से चुने हुए शब्दों के अक्षरों को आगे-पीछे करके अव्यवस्थित रूप में लिख लिया जाता है। दोनों शब्द-सूचियों को अलग-अलग कागजों पर अव्यवस्थित रूप में लिख लिया जाता है। इसके अतिरिक्त कागज की एक अन्य शीट भी ली जाती है। जिसमें एक खिड़की कटी होती है, जिसमें से केवल एक ही शब्द दिखाई देता है।

चुने गये शब्दों की प्रथम सूची – प्रयोग के लिए पाँच अक्षर वाले शब्दों की प्रथम सूची में निम्नलिखित दस शब्दों को सम्मिलित किया जा सकता है। ये शब्द परस्पर सम्बद्ध नहीं हैं, बल्कि भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित हैं –

  1. NRATT (Train)
  2. URGAS (Sugar)
  3. RHMAC (March)
  4. TVOES (Stove)
  5. NEGER (Green)
  6. NEFIK (Knife)
  7. LUCOD (Cloud)
  8. OTOTH (Tooth)
  9. MPSAT (Stamp)
  10. GLVEO (Glove)

चुने गये शब्दों की द्वितीय सूची – प्रयोग के लिए पाँच अक्षर वाले शब्दों की द्वितीय सूची में केवल उन्हीं शब्दों को सम्मिलित किया गया है जिनका सम्बन्ध किसी-न-किसी रूप में विद्यालय से है। इस वर्ग के दस शब्द निम्नलिखित हो सकते हैं –

  1. CHIDL (Child)
  2. LOSOT (Stool)
  3. SCSLA (Class)
  4. HNBEC (Bench)
  5. HCKLA (Chalk)
  6. ICAHR (Chair)
  7. RDOBA (Board)
  8. LETAB (Table)
  9. PREPA (Paper)
  10. ELRCK (Clerk)

प्रयोग-विधि – प्रयोग प्रारम्भ करते हुए पहले चुने गये अव्यवस्थित शब्दों की प्रथम सूची को लिया जाता है। इसके साथ ही कागज की उस शीट को भी लिया जाता है जिसमें एक शब्द दिखाने वाली खिड़की कटी हुई है। शब्द सूची के ऊपर खिड़की वाली शीट को रखकर विषय-पात्र के सामने रखा जाता है तथा उसे खिड़की में से किसी एक अव्यवस्थित शब्द को दिखाया जाता है तथा उसे निर्देश दिया जाता है कि वह उस शब्द को व्यवस्थित रूप में बताये। विषय-पात्र को अपना उत्तर मौखिक रूप में ही देना होता है। प्रत्येक शब्द को केवल 30 सेकण्ड के लिए ही दिखाया जाता है। समय की सीमा निर्धारित करने के लिए स्टॉप वाच का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रकार एक-एक करके सभी दस शब्दों को विषय-पात्र को दिखाया जाता है तथा प्रत्येक बार विषय-पात्र द्वारा दिये गये उत्तर को नोट कर लिया जाता है। शब्दों की प्रथम सूची पूरी हो जाने के उपरान्त विषय-पात्र को कुछ विश्राम दिया जाता है। विश्राम के उपरान्त विषय-पात्र के सम्मुख चुने गये शब्दों की द्वितीय सूची को क्रमश: प्रस्तुत किया जाता है। इस सूची के शब्दों को दिखाने से पहले विषय-पात्र को सूचित कर दिया जाता है कि इस सूची में सम्मिलित सभी शब्द किसी-न-किसी रूप में विद्यालय के वातावरण से लिए गये हैं। इस सूचना को देने के उपरान्त प्रथम सूची के ही समान विषय-पात्र के सम्मुख एक-एक करके सभी दस शब्द 30-30 सेकण्ड के लिए प्रस्तुत किये जाते हैं। प्रत्येक उत्तर को नोट कर लिया जाता है। तथा उत्तर देने में लगे समय अर्थात् प्रतिक्रिया-काल को भी नोट कर लिया जाता है। यदि विषय-पात्र किसी शब्द का उत्तर नहीं दे पाता तो उसको प्रतिक्रिया काल 30 सेकण्ड ही मान लिया जाता है।

प्रदत्त निरूपण – उपर्युक्त प्रयोग से प्राप्त सभी परिणामों को निम्नलिखित तालिका में व्यवस्थित ढंग से लिख लिया जाता है –UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments 1

सावधानियाँ – प्रयोग में निम्नलिखित सावधानियों को ध्यान में रखा जाना आवश्यक होता है –

  1. विषय-पात्र को एक समय में केवल एक ही शब्द दिखाया जाना चाहिए।
  2. प्रयोग-स्थल का वातावरण पूर्ण रूप से शान्त तथा सुविधाजनक होना चाहिए।
  3. प्रतिक्रिया काल का मापन शुद्ध होना चाहिए।

परिणाम एवं निष्कर्ष – अव्यवस्थित शब्दों की दोनों सूचियों के प्रतिक्रिया काल का औसत मान ज्ञात किया तथा उनकी तुलना की गयी। इस तुलना से ज्ञात हुआ कि प्रथम सूची के शब्दों को व्यवस्थित करने में दूसरी सूची की तुलना में लगभग दो गुना समय लगा। इस परिणाम के आधार पर निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि प्रत्यक्षीकरण मर विषय-पात्र की तत्परता का प्रभाव अनिवार्य रूप से, पड़ता है।

प्रश्न 2.
पढ़ने में प्रत्यक्षीकरण या अवधान-विस्तार के प्रयोग का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

प्रयोग-पढ़ने में प्रत्यक्षीकरण या अवधान-विस्तार

  1. प्रयोगकर्ता का नाम – महेन्द्र
  2. प्रयोज्य का नाम – राकेश
  3. प्रयोज्य की आयु – 20 वर्ष
  4. प्रयोज्य की शारीरिक एवं मानसिक अवस्था – सामान्य
  5. दिनांक – 03.01.2018
  6. दिन – मंगलवार
  7. समय – प्रात: 9 बजे

प्रयोग की पृष्ठभूमि – एक साथ एक दृष्टि में व्यक्ति जितने अक्षर देख लेता है, वह उसका ‘पढ़ने में प्रत्यक्षीकरण’ या ‘अवधान-विस्तार’ कहलाता है। एक दृष्टि में जो व्यक्ति अधिक शब्द पढ़ लेता है उसकी पढ़ने की गति तीव्र होती है तथा जो कम शब्द पढ़ता है उसकी गति मन्द होती है। एक दृष्टि में व्यक्ति जितने निरर्थक अक्षर और सार्थक शब्दों को देख सकता है या पढ़ सकता है, उसे नापा जा सकता है। पढ़ने में प्रत्यक्षीकरण या अवधान-विस्तार के मापन के लिए टेचिस्टोस्कोप का निर्माण हैमिल्टन (Hamilton) ने किया तथा प्रयोग कैटेल (Cattle) ने 1885 ई० में किया।

समस्या – इंस प्रयोग में प्रयोगकर्ता के समक्ष निम्नलिखित समस्याएँ थीं –

  1. प्रयोज्य की, प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया को समझना।
  2. प्रयोज्य के सार्थक और निरर्थक शब्दों को पढ़ने की योग्यता की जाँच करना।
  3. प्रयोज्य के सार्थक और निरर्थक शब्दों के बोध विस्तार का निर्धारण करना।।

परिकल्पना – निरर्थक शब्दों की अपेक्षा सार्थक शब्दों को पढ़ने की क्षमता और बोध-स्तर अधिक होता है।

यन्त्र एवं उपकरण – टेचिस्टास्कोप, निरर्थक शब्दों की तीन सूचियाँ, सार्थक शब्दों की तीन सूचियाँ, कागज, पेन्सिल आदि।

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तैयारी – प्रयोज्य को टेचिस्टास्कोप से इतनी दूरी पर बैठाया कि कार्ड पर दिखाये जाने वाले अक्षरों को वह आसानी से पढ़ सके। टेचिस्टोस्कोप में दो अक्षरों वाले सार्थक कार्ड को सबसे पहले लगाया।

निर्देश – सभी तैयारी करने के बाद प्रयोगकर्ता ने प्रयोज्य को निम्नलिखित निर्देश दिये

  1. सर्वप्रथम मैं आपसे सावधान कहूँगा’, ‘सावधान’ कहते ही आप अपना ध्यान यन्त्र की खिड़की पर लगाना और आरम्भ कहते ही एक कार्ड आपको खिड़की पर दिखाया जाएगा, जिस पर कुछ अक्षर लिखे होंगे, इन अक्षरों को आपको पढ़ना होगा।
  2. जब आप पहले कार्ड के अक्षरों को पढ़ लोगे तो उससे अधिक अक्षरों वाले कार्ड बारी-बारी से दिखाये जाएँगे।
  3. जब किसी कार्ड के अक्षर आप एक बार में सही नहीं पढ़ पाओगे तो उतने ही अक्षरों वाला। दूसरा कार्ड आपको दिखाया जाएगा। केवल तीन बार ही एक कार्ड दिखाया जा सकता है।
  4. जब आप एक ही तरह के तीन कार्ड नहीं पढ़ पाओगे तो प्रयोग समाप्त हो जाएगा। अन्त में आपसे अन्तर्दर्शन रिपोर्ट ली जाएगी।

वास्तविक प्रयोग – निर्देश देने के पश्चात् प्रयोगकर्ता ने प्रयोग प्रारम्भ किया। ‘प्रारम्भ’ कहते ही दो अक्षरों वाले सार्थक शब्द के कार्ड को टेचिस्टास्कोप की खिड़की में से दिखाया। प्रयोज्य ने उसे ठीक पढ़ दिया। इसके बाद क्रमश: एक-एक करके सभी कार्ड उसी प्रकार खिड़की में से दिखाये गये और प्रयोज्य ने उन्हें सही-सही पढ़ दिया। अन्त में आठ अक्षरों वाला सार्थक शब्द का कार्ड प्रयोज्य जब तीन बार में भी नहीं पढ़ सका तो यहीं पर प्रयोग रोक दिया।

इसके बाद प्रयोग का दूसरा भाग शुरू किया। अब पहले दो अक्षरों वाले निरर्थक शब्द का कार्ड लगाया। इसमें प्रयोज्य ने केवल पाँच कार्ड सही रूप से पढ़े। छठे कार्ड को प्रयोज्य नहीं पढ़ सका; अत: प्रयोग यहीं पर समाप्त कर दिया।

सावधानियाँ – प्रयोग करते समय निम्नलिखित सावधानियाँ रखी गयीं –

  1. टेचिस्टास्कोप को इतना ऊँचा रखा गया जिससे प्रयोज्य ठीक से कार्ड को देख सके।
  2. टेचिस्टास्कोप की खिड़की पर उचित प्रकाश की व्यवस्था की गयी।
  3. वातावरण शान्त रखा गया।

परिणाम – प्रस्तुत प्रयोग के परिणाम इस प्रकार प्राप्त हुए—प्रयोज्य ने सार्थक शब्दों में से सात अक्षरों वाले शब्दों को पढ़ा और निरर्थक शब्दों में वह पाँच अक्षर वाले शब्दों तक ही पढ़ सका। इस प्रकार प्रयोग के परिणाम से स्पष्ट है कि सार्थक शब्दों का उसका अवधान-विस्तार सात है और “निरर्थक शब्दों का अवधान विस्तार पाँच है।

अन्तर्दर्शन रिपोर्ट – प्रयोग समाप्त होते ही प्रयोज्य ने अपनी अन्तर्दर्शन रिपोर्ट में इस प्रकार कहा, “प्रारम्भ में मुझे काफी कठिनाई का अनुभव हो रहा था लेकिन कार्ड पर लिखे गये अक्षरों की संख्या कम होने के कारण मुझे पढ़ने में आसानी हुई। निरर्थक शब्दों को पढ़ने में सार्थक शब्दों की अपेक्षा अधिक कठिनाई का अनुभव हुआ।

निष्कर्ष – इस प्रयोग के आधार पर प्रयोगकर्ता ने निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले –

  1. निरर्थक शब्दों को पढ़ने में सार्थक शब्दों की अपेक्षा अधिक कठिनाई होती है।
  2. सार्थक शब्दों का अवधान-विस्तार, निरर्थक शब्दों की अपेक्षा अधिक होता है।
  3. इस प्रयोग में गैस्टाल्टवादियों द्वारा प्रतिपादित प्रत्यक्षीकरण में समग्रता का नियम प्रभावित करता है। इसी कारण प्रयोज्य गलती को नहीं समझ पाता।

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 1 Geography as a Discipline

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 1 Geography as a Discipline (भूगोल एक विषय के रूप में)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (i) निम्नलिखित में से किस विद्वान ने भूगोल (Geography) शब्द (Term) का प्रयोग किया?
(क) हेरोडटस
(ख) गैलिलियो
(ग) इरैटोस्थेनीज
(घ) अरस्तू
उत्तर- (ग) इरैटोस्थेनीज।

प्रश्न (i) निम्नलिखित में से किस लक्षण को भौतिक लक्षण कहा जा सकता है?
(क) पत्तन
(ख) मैदान
(ग) सड़क
(घ) जल उद्यान
उत्तर- (ख) मैदान।

प्रश्न (ii) स्तम्भ I एवं II के अन्तर्गत लिखे गए विषयों को पढ़िए
UP Board Solutions for Class 11 Geography Chapter 1 Fundamentals of Physical Geography Chapter 1 Geography as a Discipline img 1
सही मेल को चिह्नांकित कीजिए
(क) 1 ब, 2 स, 3 अ, 4 द
(ख) 1 द, 2 ब, 3 स, 4 अ
(ग) 1 अ, 2 द, 3 ब, 4 स
(घ) 1 स, 2 अ, 3 द, 4 ब
उत्तर- (घ) 1 स, 2 अ, 3 द, 4 ब।

प्रश्न (iv) निम्नलिखित में से कौन-सा प्रश्न कार्य-कारण संबंध से जुड़ा हुआ है?
(क) क्यों
(ख) क्या
(ग) कहाँ
(घ) कब
उत्तर- (ख) क्या।

प्रश्न (v) निम्नलिखित में से कौन-सा विषय कालिक संश्लेषण करता है?
(क) समाजशास्त्र
(ख) मानवशास्त्र
(ग) इतिहास
(घ) भूगोल
उत्तर- (ग) इतिहास।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) आप विद्यालय जाते समय किन महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों का पर्यवेक्षण करते हैं? क्या वे सभी समान हैं अथवा असमान? उन्हें भूगोल के अध्ययन में सम्मिलित करना चाहिए अथवा नहीं? यदि हाँ तो क्यों?
उत्तर- सांस्कृतिक लक्षणों में वे सभी भूदृश्य सम्मिलित हैं जिनका निर्माण मनुष्य अपनी-विन्नि प्रकार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए करते हैं। ग्राम, नगर, सड़कें, रेल, बन्दरगाह, बाजार, खेत, कारखाने, इमारतें आदि, सांस्कृतिक भूदृश्यों के ही लक्षण हैं। हम विद्यालय जाते समय इन लक्षणों को पर्यवेक्षण करते हैं। ये लक्षण समय के साथ-साथ असमान होते हैं। इन लक्षणों को भगोल के अध्ययन में सम्मिलित किया जाता है, क्योंकि इनके द्वारा ही सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण होता है, जिसका भौतिक पर्यावरण से घनिष्ठ सम्बन्ध है। भौतिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण का समग्र अध्ययन ही भूगोल की प्रमुख विषय-वस्तु है। इसलिए सांस्कृतिक लक्षणों को भूगोल के अध्ययन में सम्मिलित किया जाना चाहिए।

प्रश्न (ii) आपने एक टेनिस गेंद, क्रिकेट गेंद, संतरा एवं लौकी को देखा होगा। इनमें से कौन-सी वस्तु की आकृति पृथ्वी की आकृति से मिलती-जुलती है? आपने इस विशेष वस्तु को पृथ्वी की आकृति को वर्णित करने के लिए क्यों चुना है?
उत्तर- टेनिस गेंद, क्रिकेट गेंद, संतरा एवं लौकी में से पृथ्वी की आकृति से मिलती-जुलती आकृति वाली वस्तु संतरा है। संतरा पृथ्वी की आकृति के समान ही सिरों पर चपटा है। इसलिए पृथ्वी की आकृति को वर्णित करने के लिए इसका चुनाव तर्कसंगत है।

प्रश्न (iii) क्या आप अपने विद्यालय में वन महोत्सव समारोह का आयोजन करते हैं? हम इतने पौधारोपण क्यों करते हैं? वृक्ष किस प्रकार पारिस्थैतिक संतुलन बनाए रखते हैं?
उत्तर- विद्यालय में वन महोत्सव समारोह का आयोजन किया जाता है। वन मनुष्य के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं, इनके अनेक प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष लाभ हैं, इसलिए पौधारोपण का कार्य किया जाता है। पौधारोपण से वृक्षों के क्षेत्र का विस्तार होता है, वृक्ष या वन क्षेत्र के विस्तार से पारिस्थैतिक तंत्र संतुलित रहता है। वृक्ष भूमि एवं मिट्टी अपरदन और भू-क्षरण को ही नहीं रोकते बल्कि वन्य जीवों को आवास भी प्रदान करते हैं तथा जलवायु चक्र को सन्तुलित रखते हुए हरित गृह प्रभाव को नियन्त्रित करते हैं।

प्रश्न (iv) आपने हाथी, हिरण, केंचुए, वृक्ष एवं घास देखे हैं। वे कहाँ रहते एवं बढ़ते हैं? उस मंडल को क्या नाम दिया गया है? क्या आप इस मंडल के कुछ लक्षणों का वर्णन कर सकते हैं?
उत्तर- हमने हाथी, हिरण, केंचुए वृक्ष एवं घास देखे हैं। ये सभी जीव मंडल में रहते हैं। जीवों का यह आवास स्थल जैवमंडल कहलाता है। इस मंडल की सीमा जल, वायु एवं स्थलमंडल के सम्पर्क क्षेत्र में उसी सीमा तक विस्तृत होती है जहाँ जीवों के विकास की अनुकूल दशाएँ विद्यमान रहती हैं। विभिन्न प्रकार के जीव इसी मंडल में उत्पन्न होते हैं तथा निवास करते हुए अपना विकास करते हैं, क्योंकि इस मंडल से जीवों के जीवन एवं विकास की सभी आवश्यकताएँ पूरी होती हैं।

प्रश्न (v) आपको अपने निवास से विद्यालय जाने में कितना समय लगता है? यदि विद्यालय आपके घर की सड़क के उस पार होता तो आप विद्यालय पहुँचने में कितना समय लेते? आने-जाने के समय पर आपके घर एवं विद्यालय के बीच की दूरी को क्या प्रभाव पड़ता है? क्या आप समय को स्थान या, इसके विपरीत, स्थान को समय में परिवर्तित कर सकते हैं?
उत्तर- अपने निवास से विद्यालय जाने में आधे घंटे का समय लगता है। यदि विद्यालय हमारे घर की सड़क के उस पार होता तो विद्यालय पहुँचने में लगभग 20 मिनट का समय लगता। आने-जाने के समय पर दूरी का प्रभाव पड़ता है। अधिक दूरी होने पर समय अधिक तथा कम दूरी होने पर समय कम लगता है। समय को स्थान या इसके विपरीत स्थान को समय में परिवर्तित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए-अपने निवास स्थान से विद्यालय तक की दूरी पैदल पूरी करने पर समय अधिक लगेगा परन्तु किसी वाहन द्वारा दूरी को कम समय में पूरा किया जा सकता है। अतः समय को स्थान या इसके विपरीत स्थान को समय में इस प्रकार परिवर्तित किया जा सकता है कि विद्यालय निवास से 3 किमी या 30 मिनट दूर है जिसे वाहन द्वारा पहुँचकर 10 मिनट दूर कहा जा सकता है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) आप अपने परिस्थान (surrounding) का अवलोकन करने पर पाते हैं, कि प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक दोनों तथ्यों में भिन्नता पाई जाती है। सभी वृक्ष एक ही प्रकार के नहीं होते। सभी पशु एवं पक्षी जिसे आप देखते हैं भिन्न-भिन्न होते हैं। ये सभी भिन्न तत्व धरातल पर पाए जाते हैं। क्या अब आप यह तर्क दे सकते हैं। कि भूगोल प्रादेशिक/क्षेत्रीय भिन्नता का अध्ययन है?
उत्तर- क्षेत्रीय विभिन्नता
प्राचीन काल से ही मानव अपने निकटवर्ती क्षेत्र (परिवेश) के विषय में विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ प्राप्त करने के लिए जिज्ञासु एवं प्रयत्नशील रहा है। इन जिज्ञासाओं को पूरा करने के लिए ही उसने विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक जानकारियाँ प्राप्त की हैं, जिसके अन्तर्गत उसे विविधताओं के दर्शन हुए हैं। वह जान सका है कि एक क्षेत्र दूसरे क्षेत्र से भिन्न है। अत: हमें पृथ्वी पर भौतिक एवं सांस्कृतिक वातावरण में अनेक प्रकार की भिन्नताएँ दिखाई देती हैं। इसलिए भूगोल को क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन करने वाला विषय मानना तर्कसंगत लगता है।

क्षेत्रीय विभिन्नता का अर्थ-18वीं एवं 19वीं शताब्दियों में जब भूगोल को विज्ञान के रूप में स्वीकार कर लिया गया तब से ही प्राकृतिक वातावरण एवं मानव के सम्बन्धों के अध्ययन भूगोल की प्रमुख विषय-वस्तु रहे हैं। पहले प्रकृतिवादियों ने मानव को प्रकृति का दास के रूप में सिद्ध करने का प्रयत्न किया है, तो बाद में विद्वानों ने प्रकृति के ऊपर मानवीय वर्चस्व की मान्यता को स्थापित करने का प्रयास किया है। दोनों विश्वयुद्धों के मध्य में प्रकृति एवं मानव के बीच एक सन्तुलित स्थिति के अध्ययन की मान्यता विकसित हुई। इसी क्रम में प्रादेशिक/क्षेत्रीय अध्ययन की परम्परा स्थापित हुई जिसका मुख्य उद्देश्य प्रादेशिक या क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन हो गया, तभी से क्षेत्रीय विभिन्नता भौगोलिक अध्ययन की एक महत्त्वपूर्ण संकल्पना के रूप में विकसित होती गई है।

क्षेत्रीय विभिन्नता की विचारधारा को विकसित एवं प्रचलित करने का मुख्य श्रेय जर्मन भूगोलवेत्ता अल्फ्रेड हेटनर को है। हेटनर ने ही 1905 ई० में बताया कि भूगोल पृथ्वी के क्षेत्रों या स्थानों का क्षेत्र विवरण सम्बन्धी विज्ञान है। इससे क्षेत्रों की विभिन्नताओं के विशिष्ट संबंधों का अध्ययन किया जाता है। क्षेत्रीय विभिन्नता की विशेषता–क्षेत्रीय विभिन्नता की प्रमुख विशेषता यह है कि इसके अंतर्गत किसी भी क्षेत्र के विषय में जो भौगोलिक अध्ययन किया जाता है उसमें समरूपता एवं विभिन्नताएँ दृष्टिगोचर होती हैं अर्थात् किसी भी भौगोलिक क्षेत्र में प्रथम दृष्टया भौगोलिक कारकों की समरूपता पाई जाती है, किन्तु यह समरूपता सूक्ष्म स्तर पर ही परिलक्षित होती है, जबकि वास्तविकता इससे भिन्न होती है। व्यापक रूप में भौगोलिक परिदृश्यों में कुछ ही अंतराल पर विभिन्नताएँ प्रकट होने लगती हैं। भौगोलिक तत्त्वों की समानता में विभिन्नता की इसी सच्चाई के कारण सम्पूर्ण स्थलमंडल को अनेकानेक वृहत् एवं सूक्ष्म क्षेत्रों या प्रदेशों में विभाजित किया जाता है। इसी के आधार पर भूगोल में प्रादेशीकरण या प्रादेशिक भूगोल का सूत्रपात हुआ है।

अतएव पृथ्वी पर भौतिक और सांस्कृतिक पर्यावरण के अनेक तत्त्वों में समानताएँ और विभिन्नताएँ पाई जाती हैं। भूगोलवेत्ता इन विभिन्नताओं की पहचान करता है और इनके कारणों की खोज करता है जिससे दो तत्त्वों या एक से अधिक तत्त्वों के मध्य कार्यकारण संबंधों को ज्ञात किया जा सके।

प्रश्न (ii) आप पहले ही भूगोल, इतिहास, नागरिकशास्त्र एवं अर्थशास्त्र का सामाजिक विज्ञान के घटक के रूप में अध्ययन कर चुके हैं। इन विषयों के समाकलन का प्रयास उनके अंतरापृष्ठ (Interface) पर प्रकाश डालते हुए कीजिए।
उत्तर- भूगोल एक समाकलित विषय भूगोल एक संश्लेषणात्मक (Synthesis) विषय है। इसको अंतरापृष्ठ (Interface) संबंध सभी प्राकृतिक (भौतिक) एवं सामाजिक विज्ञानों से है। प्राकृतिक विज्ञानों से अंतरापृष्ठ संबंध के रूप में परंपरागत भौतिक भूगोल-भौमिकी, मौसम विज्ञान, जल विज्ञान, मृदा विज्ञान, भू-आकृति विज्ञान, खगोल विज्ञान, वनस्पति विज्ञान तथा प्राणि विज्ञान आदि से निकट का संबंध रखता है। जबकि सामाजिक विज्ञान के सभी विषय, यथा—इतिहास, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, जनांकिकी आदि भी भूगोल से सम्बन्धित हैं।
निम्न चित्र 1.1 अन्य विज्ञानों से अंतरापृष्ठ संबंध दर्शाता है जिससे भूगोल के समाकलन विषय का स्वरूप स्पष्ट होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Geography Chapter 1 Fundamentals of Physical Geography Chapter 1 Geography as a Discipline img 2
वस्तुतः विज्ञान से संबंधित सभी विषय भूगोल से जुड़े हैं। क्योंकि उनके कई तत्त्व क्षेत्रीय संदर्भ में भिन्न-भिन्न होते हुए भी यथार्थता को समग्रता से समझने में सहायक हैं। सभी प्राकृतिक या सामाजिक विज्ञानों का एक मूल उद्देश्य यथार्थती को ज्ञात करना है। भूगोल यथार्थता से जुड़े तथ्यों के साहचर्य को बोधगम्य बनाता है। अत: भूगोल स्थानिक संदर्भ में यथार्थता को समग्रता से समझने में ही सहायक नहीं है अपितु यह सभी विषयों को समाकलित भी करता है। इसके उपागम की प्रकृति समग्रात्मक (Holistic) होती है। यह विषय इस तथ्य को मानता है कि विश्व एक परस्पर निर्भर तन्त्र है। आज वर्तमान विश्व से एक वैश्विक ग्राम का बोध होता है जिसमें परिवहन एवं सूचना तकनीकी साधनों ने स्थानिक दूरी को न्यूनतम करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। इससे स्थानिक विशेषताओं को और अधिक स्पष्टता प्राप्त हुई है। इस प्रकार भूगोल अब पहले से भी अधिक समग्रता के आधार पर अन्य विज्ञानों से अंतरापृष्ठ रूप से संबंधित विषय माना जाता है जिसके द्वारा इसके समाकलित दर्शन का बोध होता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. “भूगोल एक क्षेत्रीय विवरण विज्ञान है।” यह कथन है
(क) हार्टशोर्न का
(ख) हैटनर का
(ग) कार्ल रिटर का
(घ) हम्बोल्ट का
उत्तर- (ख) हैटनर का।

प्रश्न 2. भौतिक भूगोल के अन्तर्गत हम अध्ययन करते हैं
(क) भूगणितीय भूगोल’का
(ख) ऋतुविज्ञान एवं जलवायु विज्ञान का
(ग) समुद्र विज्ञान का
(घ) इन सभी का ।
उत्तर- (घ) इन सभी का।।

प्रश्न 3. जर्मन विद्वान रैटजेल प्रतिपादक थे
(क) क्षेत्रीय भिन्नता की संकल्पना के
(ख) पार्थिव एकता की संकल्पना के
(ग) कालगत परिवर्तन की संकल्पना के
(घ) भौगोलिक वितरण की संकल्पना के
उत्तर- (ख) पार्थिव एकता की संकल्पना के।

प्रश्न 4. निम्नलिखित में कौन-सी भौतिक भूगोल की शाखा नहीं है?
(क) मृदा विज्ञान
(ख) जैव भूगोल
(ग) पारिस्थितिकी भूगोल
(घ) भू-आकृति विज्ञान
उत्तर- (ग) पारिस्थितिकी भूगोल।

प्रश्न 5. निम्नलिखित में से कौन-सी शाखा मानव भूगोल की शाखा है?
(क) जलवायु विज्ञान
(ख) क्यूरोसिवो भूगोल
(ग) राजनैतिक भूगोल
(घ) अधिवास भूगोल
उत्तर- (ग) राजनैतिक भूगोल।।

प्रश्न 6. “भूगोल एक अन्तर्सम्बन्धित विज्ञान है।” यह कथन निम्नलिखित में से किस विद्वान से सम्बन्धित है?
(क) हम्बोल्ट
(ख) रिटर
(ग) काण्ट
(घ) हार्टशोर्न
उत्तर- (ख) रिटर।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भूगोल को परिभाषित कीजिए।
उत्तर- अमेरिकन शब्दकोष के अनुसार भूगोल भूतले की क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन है, जिसमें धरातल के सभी प्रमुख तत्त्वों; जैसे-जलवायु, वनस्पति, जनसंख्या, भूमि-उपयोग, उद्योग आदि का वर्णन किया जाता है।

प्रश्न 2. भूगोल की विषय-वस्तु के अन्तर्गत कौन-कौन से विषय सम्मिलित है।
उत्तर- भूगोल की विषय-वस्तु के अन्तर्गत स्थलमण्डल, वायुमण्डल, जलमण्डल, पृथ्वी की सूर्य से सापेक्ष स्थिति तथा भूतल के सांस्कृतिक तथ्य आदि विषय सम्मिलित हैं।

प्रश्न 3. भूगोल के अध्ययन के दो उद्देश्य बताइए।
उत्तर- 1. विश्व ज्ञान में वृद्धि करना तथा 2. पृथ्वीतल का अध्ययन मानव-संसार के रूप में करते हुए क्षेत्रों तथा स्थानों की विभिन्नताओं को समझना।

प्रश्न 4. भूगोल के अध्ययन के दो उपागम कौन-से हैं?
उत्तर- भूगोल के अध्ययन के दो उपागम हैं-

  • क्रमबद्ध उपागम तथा
  • प्रादेशिक उपागम।

प्रश्न 5. भौगोलिक अध्ययन के क्रमबद्ध उपागम का वर्णन कीजिए।
उत्तर- इस उपागम के अन्तर्गत भूगोल के विभिन्न पक्षों या प्रकरणों; यथा–भू-आकृति, जलवायु, अपवाह प्रणाली, मिट्टी, वनस्पति, जीव-जन्तु, खनिज सम्पदा, जनसंख्या, आर्थिक व्यवसाय, परिवहन, व्यापार आदि तथ्यों का अध्ययन समस्त भूतल के सन्दर्भ में पृथक्-पृथक् शीर्षकों के अन्तर्गत किया जाता है।

प्रश्न 6. भूगोल की दो महत्त्वपूर्ण शाखाएँ कौन-सी हैं?
उत्तर- भूगोल की दो महत्त्वपूर्ण शाखाएँ हैं—

  • भौतिक भूगोल तथा
  • मानव भूगोल।

प्रश्न 7. भूगोल के आधनिक स्वरूप के जनक कौन है?
उत्तर– भूगोल के आधुनिक स्वरूप के जनक जर्मन विद्वान हम्बोल्ट एवं रिटर हैं।

प्रश्न 8. किस यूनानी विद्वान को भूगोल का संस्थापक कहा जाता है?
उत्तर- यूनानी विद्वान इरैस्टास्थेनीज को भूगोल को संस्थापक कहा जाता है।

प्रश्न 9. विद्यालयों में भूगोल कब व क्यों लोकप्रिय हुआ?
उत्तर- विद्यालयों में भूगोल अठारहवीं शताब्दी में लोकप्रिय हुआ। इस शताब्दी में ही नए मार्गों तथा भू-भागों की खोज हुई जिसका राजनैतिक महत्त्व होने के कारण भूगोल को एक विषय के रूप में लोकप्रियता प्राप्त हुई।

प्रश्न 10, बीसवीं शताब्दी के भूगोल का क्या स्वरूप था।
उत्तर- बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भूगोल की परिभाषा परिवर्तित हो गई। वाल्टर इजार्ड के नेतृत्व में भूगोलविदों एवं अर्थशास्त्रियों ने इस विषय को विकास से सम्बन्धित स्वरूप प्रदान कर प्रादेशिक विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित किया है। अब इसे प्रादेशिक विकास एवं नियोजन विषय ही नहीं बल्कि मानवीय कल्याण का विषय माना जाता है।

प्रश्न 11. भौगोलिक अध्ययन के दो आधुनिक आधार कौन-से हैं?
उत्तर- भौगोलिक अध्ययन के दो आधुनिक आधार हैं-

  1. भौगोलिक सूचना तन्त्र तथा
  2. हवाई छायाचित्र।।

प्रश्न 12. भौगोलिक अध्ययन की पद्धति एवं तकनीक बताइए।
उत्तर- वस्तुतः भूगोल एक विज्ञान है अतः इसके अध्ययन की पद्धति भी वैज्ञानिक होती है। इस विषय के अन्तर्गत क्रमबद्ध ढंग से महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक एवं मानवीय तथ्यों को एकत्रित कर समानता के आधार पर उन्हें वर्गीकृत किया जाता है। तत्पश्चात् इन्हें मात्रात्मक एवं मानचित्र तकनीकियों द्वारा विश्लेषित करके तर्क एवं अर्थपूर्ण निष्कर्षों की व्याख्या की जाती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. “भूगोल सभी विज्ञानों की जननी है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर- वास्तव में यह कथन सत्य है कि भूगोल सभी विज्ञानों की जननी है। भूगोल की विषय-वस्तु इतनी व्यापक है कि इसमें प्राय: सभी सामाजिक एवं भौतिक (प्राकृतिक) विज्ञानों का सामान्य अध्ययन आवश्यक समझा जाता है। वस्तुतः विभिन्न क्रमबद्ध विज्ञानों की विषय-सामग्री प्राकृतिक या मानवीय तत्त्वों से सम्बन्धित होती है। जैसे-वनस्पति विज्ञान की विषय-वस्तु विभिन्न प्रकार की वनस्पति, जीव विज्ञान की विषय-वस्तु विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु तथा समाजशास्त्र की विषय-वस्तु व्यक्ति एवं समाज आदि को मना जाता है। भूगोल के अन्तर्गत इन विभिन्न प्राकृतिक तत्त्वों वनस्पति, जीव-जन्तु जलवायु, मिट्टी, खनिज एवं मानवीय तत्त्व-मनुष्य, समाज, जाति, प्रजाति, पूँजी आदि सभी तत्वों को विषय-वस्तु में सम्मिलित किया जाता है। इसीलिए भूगोल को सभी विज्ञानों की जननी कहा जाता है।

प्रश्न 2. भूगोल का क्षेत्र बताइए।
उत्तर- वर्तमान भौगोलिक विचारधारा के अनुसार भूगोल एक मौलिक विषय के रूप में विकसित हुआ है। इस विचारधारा में भूगोल को चतुर्दिक माना है। संक्षेप में, भौगोलिक क्षेत्र को निम्नांकित सूत्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है
भौगोलिक क्षेत्र = L³ TM
इसमें, L³ = लम्बाई, चौड़ाई एवं ऊँचाई ।
T = समय,
तथा M = मनुष्य द्वारा बाधित स्थानीय वातावरण है।

प्रश्न 3. भूगोल के अध्ययन का उद्देश्य लिखिए।
उत्तर- सामान्यत: भूगोल के अध्ययन के निम्नलिखित उद्देश्य हैं–

  1. पृथ्वी तल के विभिन्न स्वरूपों के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन करना,
  2. पर्यावरण एवं मानव-वर्गों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन करना,
  3. पृथ्वी तल पर विभिन्न संसाधनों, मानव समुदायों और अधिवासों के वितरण की विवेचना करना।
  4. विभिन्न प्रदेशों के पार्थिव घटनाक्रम को समझना।।
  5. किसी प्रदेश के पर्यावरणीय तत्त्वों और मानव वर्गों के बीच जैविक सम्बन्धों को समझने के लिए पारिस्थितिक विश्लेषण करना।।
  6. मानव कल्याण के लिए भौतिक एवं सांस्कृतिक संसाधनों के अनुकूलतम प्रयोग हेतु प्रादेशिक संगठन और योजना में योगदान देना।
    इस प्रकार पृथ्वी को मानवीय संसार के रूप में वैज्ञानिक रीति से वर्णन करना तथा क्षेत्रीय विकास योजनाओं में योगदान करना ही भूगोल का मुख्य उद्देश्य है।

प्रश्न 4. भूगोल के अध्ययन के क्रमबद्ध उपागम की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर- क्रमबद्ध या वर्गीकृत उपागम का अर्थ, भूगोल का अध्ययन प्रकरण विधि से करना है। इसमें भूगोल का अध्ययन पृथक्-पृथक् तत्त्वों के माध्यम से किया जाता है। इस उपागम की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. क्रमबद्ध उपागम के माध्यम से भूगोल के गम्भीर तथ्यों को भी सुगमतापूर्वक समझा जा सकता है। अत: भूगोल के अध्ययन की यह उत्तम विधि सिद्ध हुई है; क्योंकि क्रमबद्ध या प्रकरण अथवा
वर्गीकृत विधि में विभिन्न तत्त्वों का पृथक्-पृथक् अध्ययन किया जाता है।

2. इस उपागम में भू-आकृति, जलवायु, मिट्टियों, वनस्पतियों, खनिज पदार्थ, कृषि, जनसंख्या, उद्योग, व्यापार, परिवहन आदि के पृथक्-पृथक् शीर्षकों के माध्यम से सम्पूर्ण पृथ्वी का सुगमतापूर्वक
अध्ययन सम्भव हो जाता है।

3. क्रमबद्ध उपागम के अन्तर्गत प्रत्येक तत्त्व का पृथक्-पृथक् विश्लेषण करके उनके गुणों एवं लक्षणों के अनुरूप निष्कर्ष निकालकर सम्पूर्ण क्षेत्र, प्रदेश या पृथ्वी का अध्ययन सम्भव है।

4. क्रमबद्ध अध्ययन के आधार पर वितरण मानचित्र एवं सांख्यिकीय आरेख तथा लेखाचित्र तैयार करके इनका वर्गीकरण भौतिक तत्त्वों की भिन्नता के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार क्रमबद्ध उपागमों से भूगोल विषय में पृथ्वी तल के प्राकृतिक तथा मानवीय तथ्यों का अध्ययन अलग-अलग प्रकरणों में विभक्त करके किया जाता है। अत: भौगोलिक अध्ययन की यह विधि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 5. भूगोल की प्राचीन शाखाओं के नाम बताते हुए उनका संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर- प्राचीनकाल में भूगोल विषय को निम्नलिखित पाँच शाखाओं में विभक्त किया गया था—

1. खगोलीय भूगोल-प्राचीन खगोलीय भूगोल शाखा में पृथ्वी का सूर्य और चन्द्रमा से सम्बन्ध, चन्द्रग्रहण, दिन और रात आदि का अध्ययन किया जाता था।

2. यात्रा भूगोल-प्रारम्भिक दिनों में यात्राएँ; व्यापार, दूसरे देशों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने तथा साम्राज्य के विस्तार के लिए की जाती थीं। आरम्भ में यह यात्राएँ स्थलमार्ग से होती थीं, बाद में नदियों और सागरीय मार्गों से होने लगीं। अपनी इन यात्राओं का वर्णन अनेक यात्रियों ने लिखा है। जो भूगोल की धरोहर है।

3. संसाधन भूगोल-मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए खनिज पदार्थों, उत्तम चरागाह और कृषि प्रदेशों की खोज में प्रारम्भ से ही उद्यत रहा है जिससे अनेक संस्कृतियों का विकास हुआ।

4. मानचित्रांकन-प्राचीन काल में मनुष्यों ने अपनी यात्राओं, संसाधन की खोज आदि के लिए | विश्व मानचित्रों का निर्माण किया। टॉलेमी ने सर्वप्रथम विश्व का मानचित्र तैयार किया था। उसके
बाद अरबवासियों ने भूगोल के विकास में इन मानचित्रों का निर्माण कर योगदान दिया।

5. गणितीय भूगोल-अरब और मिस्र में गणितीय भूगोल का विकास हुआ जिसके अन्तर्गत स्थानों की दूरी, दिन और रात की अवधि, अक्षांश तथा देशान्तर रेखाएँ आदि का अध्ययन गणितीय भूगोल के अन्तर्गत किया जाता था।

प्रश्न 6. वर्तमान भूगोल की प्रमुख शाखाओं एवं उनकी उपशाखाओं को बताइए।
उत्तर- आज विश्व के सभी देशों में भूगोल के अध्ययन की दो प्रमुख शाखाएँ निम्नवत् हैं

  • भौतिक भूगोल और
  • मानव भूगोल।

अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से इन्हें अनेक उपशाखाओं में बाँटा गया है, जिनके नाम निम्नवत् हैं
भौतिक भूगोल की उपशाखाएँ इस प्रकार हैं–

  1. भू-आकृति विज्ञान,
  2. भूविज्ञान,
  3. मृदा विज्ञान,
  4. ऋतु विज्ञान,
  5. समुद्र विज्ञान,
  6. जल विज्ञान तथा
  7. जैव भूगोल।

मानव भूगोल की उपशाखाएँ इस प्रकार हैं-

  1. आर्थिक भूगोल,
  2. सांस्कृतिक भूगोल,
  3. जनसंख्या भूगोल,
  4. सामाजिक भूगोल,
  5. राजनीतिक भूगोल,
  6. पारिस्थितिकी भूगोल,
  7. ऐतिहासिक भूगोल,
  8. ग्रामीण एवं नगरीय भूगोल,
  9. मानचित्र भूगोल एवं
  10. प्रादेशिक भूगोल।

प्रश्न 7. भूगोल का भौमिकी से सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- भौमिकी (Geology) में धरातल की बनावट, चट्टानें, उनकी उत्पत्ति एवं वितरण, पृथ्वी को भू-वैज्ञानिक कालक्रम, चट्टानों में पाये जाने वाले खनिज, पृथ्वी की आन्तरिक संरचना आदि का अध्ययन किया जाता है। भूगोल में भी पृथ्वी के धरातल का अध्ययन किया जाता है जिसका सम्बन्ध पृथ्वी की आन्तरिक अवस्था से है। पर्वत, पठार, मैदान, वलन, भ्रंशन आदि का सम्बन्ध भी पृथ्वी की आन्तरिक अवस्था से है। चट्टानों में जो खनिज पाये जाते हैं, वे भूगोल के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। खनिजों एवं चट्टानों का निर्माण भूगर्भशास्त्र का भी अध्ययन क्षेत्र है; अत: भूगोल और भौमिकी में निकट का सम्बन्ध है।

प्रश्न 8. भौतिक एवं मानव भूगोल में विभेद कीजिए।
उत्तर- भौतिक एवं मानव भूगोल में विभेद
UP Board Solutions for Class 11 Geography Chapter 1 Fundamentals of Physical Geography Chapter 1 Geography as a Discipline img 3

प्रश्न 9. क्या भूगोल अध्ययन के उपागम एक-दूसरे के पूरक हैं?
उत्तरं- वास्तव में भूगोल के अध्ययन में कोई भी एक उपागम अपने में पूर्ण सक्षम नहीं है। जैसे काटने के लिए कैंची के दोनों फलक आवश्यक होते हैं, उसी प्रकार भूगोल के अध्ययन के लिए दोनों उपागमों का होना अति आवश्यक है। भूगोल का उचित ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें प्रादेशिक उपागम के साथ-साथ क्रमबद्ध उपागम की भी आवश्यकता होती है। दोनों उपागम एक-दूसरे के पूरक हैं। भूगल की ये झेनों । विधियाँ एक-दूसरे में ऐसे ही समाविष्ट हैं जैसे किसी कपड़े में ‘ताना’ और ‘बाना’ समाविष्ट होता है। उसी प्रकार ‘क्रमबद्ध’ और ‘प्रादेशिक दोनों उपागमों का उपयोग भौगोलिक अध्ययन के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 10. भूगोल का अर्थशास्त्र से सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- भूगोल एवं अर्थशास्त्र दोनों ही सामाजिक विज्ञान हैं, अत: परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं। भूगोल मनुष्य के प्राकृतिक और सांस्कृतिक पर्यावरण का अध्ययन करता है, जबकि अर्थशास्त्र मानव की आर्थिक क्रियाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। इस प्रकार दोनों के अध्ययन का केन्द्रबिन्दु मनुष्य ही है। अत: अर्थशास्त्र के बिना भूगोल तथा भूगोल के बिना अर्थशास्त्र का अध्ययन अधूरा है। मानव ने प्राकृतिक संसाधनों का अधिकाधिक संदोहन कर विभिन्न आर्थिक व्यवसाय अपनाए हैं। इनका अध्ययन आर्थिक भूगोल का एक प्रमुख अंग है। कृषि, पशुपालन, वन, खनिज, परिवहन, व्यापार आदि का अध्ययन भूगोल एवं अर्थशास्त्र दोनों ही विषयों में होता है। अतः दोनों ही विषय घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं।

प्रश्न 11. भूगोल का इतिहास से सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- भूगोल और इतिहास एक-दूसरे के जुड़वाँ हैं। वर्तमान भौगोलिक घटनाएँ ही अतीत के गर्भ में इतिहास बनकर प्रकट होती हैं। इतिहास मानव की भूतकालीन घटनाओं का पूर्ण विवरण प्रस्तुत करने वाला शास्त्र है। यह वर्तमान भूगोल की झलक अतीत की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत करता है। भूगोल की पृष्ठभूमि में जो घटनाएँ जन्म लेती हैं, वे ही आगे चलकर इतिहास को सुदृढ़ आधार प्रदान करती हैं। इस प्रकार प्राचीन इतिहास वर्तमान भूगोल है, जबकि बीता हुआ भूगोल, इतिहास है। आज का भूगोल ही कालान्तर में इतिहास का रूप धारण करता है। भूगोल की एक शाखा ऐतिहासिक भूगोल भी है, जिससे यह प्रकट होता है कि भूगोल और इतिहास परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भूगोल का अर्थ बताइए तथा इसकी विषय-वस्तु का वर्णन कीजिए।
या भूगोल की परिभाषा दीजिए तथा इसकी विषय-वस्तु बताइए।
या भूगोल की परिभाषा दीजिए तथा इसके अध्ययन-क्षेत्र की विवेचना कीजिए।
उत्तर- भूगोल का अर्थ
भूगोल एक अति प्राचीन सामाजिक विज्ञान है। इसके उद्भव का इतिहास मानव के चिन्तन से जुड़ा हुआ है। मानव ने जिस समय से चिन्तन आरम्भ किया और अपने परिवेश को समझा, तभी से भूगोल विषय का श्रीगणेश हो गया था। किन्तु इसे एक व्यवस्थित सामाजिक विज्ञान के रूप में स्थापित करने का श्रेय यूनानी विद्वानों को जाता है। यूनानी विद्वान् इरैटॉस्थेनीज (Eratosthenes) ने सर्वप्रथम ‘Geography शब्द का प्रयोग किया था, इसलिए इन्हें भूगोल का जनक (Father of Geography) कहा जाता है। भूगोल का अंग्रेजी रूपान्तर Geography है, जो यूनानी (Greek) भाषा दो शब्दों ‘Geo’ के तथा ‘graphe’ से मिलकर बना है। ‘Geo’ शब्द का अर्थ है ‘पृथ्वी’ तथा ‘graphe’ शब्द का अर्थ है ‘वर्णन करना। इस प्रकार Geography का अर्थ है-‘पृथ्वी का वर्णन करना।
हिन्दी भाषा में भी भूगोल शब्द दो पदों से मिलकर बना है-‘भू’ तथा ‘गोल’। इस प्रकार भूगोल का आशय ‘गोल पृथ्वी के वर्णन से है। वास्तव में भूगोल का अर्थ पृथ्वी का वर्णनमात्र ही नहीं, अपितु इसके व्यापक अर्थ हैं।

भूगोल की परिभाषाएँ

पृथ्वी का अध्ययन किस दृष्टिकोण से किया जाए? यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। विभिन्न विद्वानों ने भूगोल की व्याख्या अपने-अपने दृष्टिकोण से की है, जो निम्नलिखित परिभाषाओं से स्पष्ट है”भूगोल में पृथ्वीतल का अध्ययन मानवीय विकास के रूप में क्षेत्रीय भिन्नताओं के आधार पर किया जाता है।” –मोंकहाउस

मोंकहाउस के अनुसार, भूगोल वह विज्ञान है जो पृथ्वी का अध्ययन मानव के निवासस्थान के रूप में करता है। यह निवासस्थान अनेक क्षेत्रीय विभिन्नताओं से युक्त है। इन विभिन्नताओं के अनुरूप ही मानव अपना जीवनयापन करता है। किन्तु मोंकहाउस की यह परिभाषा अत्यन्त संकुचित है।

“भूगोल क्षेत्रीय विज्ञान है जिसमें पृथ्वीतल के क्षेत्रों का अध्ययन उनकी भिन्नताओं तथा स्थानिक सम्बन्धों की पृष्ठभूमि में किया जाता है।”

हैटनर हैटनर ने भूगोल को क्षेत्रीय विज्ञान माना है जिसमें पृथ्वीतल के क्षेत्रों का अध्ययन उनकी भिन्नताओं तथा विभिन्न स्थानों के मध्य सम्बन्धों की पृष्ठभूमि में किया जाता है।

“भूगोले वह विज्ञान है जो पृथ्वीतल पर समस्त मानव-जाति और उसके प्राकृतिक वातावरण की पारस्परिक क्रियाशील विस्तृत प्रणाली का अध्ययन करता है।”

एकरमैन एकरमैन ने भूगोल को एक नये दृष्टिकोण से परिभाषित किया है। उनके अनुसार, भूगोल एक ऐसा विज्ञान है जो परिवर्तनशील पर्यावरण में क्रियाशील मानव के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन करता है। उनके अनुसार, पर्यावरण और मानव के सम्बन्ध अटूट तथा शृंखलाबद्ध हैं।

“भूगोल भूतल की क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन है। यहाँ पर क्षेत्रों की लक्षण व्यवस्था के अन्तर्सम्बन्धों में ऐसी अनेक विभिन्नताएँ दिखाई देती हैं। धरातल पर पाये जाने वाले प्रमुख तत्त्वों; जैसे-जलवायु, वनस्पति, जनसंख्या, भूमि-उपयोग, उद्योग आदि का इसमें वर्णन किया जाता है तथा इन तत्वों की जटिलताओं से निर्मित इकाई व क्षेत्रों का विस्तार से अध्ययन इसमें सम्मिलित है।” – अमेरिकन शब्दकोश

अमेरिकन शब्दकोश की उपर्युक्त परिभाषा सर्वांगीण कही जा सकती है। इस परिभाषा में भूगोल को एक परिपूर्ण विज्ञान माना गया है, जिसमें पृथ्वीतल की समस्त जटिलताओं का अध्ययन एक इकाई के रूप में किया जाता है।

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि भूगोल पृथ्वीतल पर निवास करने वाले मानव का विज्ञान है। यह पृथ्वी को मानव का निवासगृह मानकर उसकी व्याख्या करता है। दूसरे शब्दों में, भूगोल भूक्षेत्र और उसके निवासियों का वर्णन करने वाला विज्ञान है। भूगोल में हम पृथ्वीतल के विभिन्न क्षेत्रों में पायी जाने वाली विभिन्नताओं का अध्ययन मनुष्य के सन्दर्भ में करते हैं। टॉलेमी ने भूगोल को एक आभामय विज्ञान, जो स्वर्ग में पृथ्वी का प्रतिबिम्ब देखता है’ कहा था। वास्तव में भूगोल पृथ्वी का विज्ञान है जो मानव के क्रियाकलापों का अध्ययन करता है। पृथ्वी और मानव दोनों ही परिवर्तनशील हैं; अत: भूगोल एक प्रगतिशील विज्ञान है। यही नहीं, भूगोल ‘समस्त विज्ञानों की जननी’ (Mother of all sciences) है। अपने गतिशील स्वरूप के कारण ही भूगोल का विकास विभिन्न शाखाओं और उपशाखाओं के रूप में हो सका है तथा उनका अध्ययन क्रमबद्ध रूप में किया जाने लगा है। भूगोल की विभिन्न परिभाषाओं का सार निम्नलिखित है

  1. भूगोल का सम्बन्ध उस पृथ्वीतल से है जिस पर मानव निवास करता है।
  2. भूगोल में पृथ्वीतल पर पाये जाने वाले सभी प्राकृतिक तथा मानवीय तत्त्वों का अध्ययन किया जाता है।
  3. भूगोल में पृथ्वीतल के प्राकृतिक तत्त्वों के क्षेत्रीय वितरण तथा मानवीय तत्त्वों के साथ उनके पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन सम्मिलित है।
  4. भूगोल का अध्ययन वैज्ञानिक तथा क्रमबद्ध विधि से किया जाता है, जिसमें कार्य तथा कारण के बीच सम्बन्धों को स्थापित किया जाता है।

भूगोल की विषय-वस्तु या अध्ययन-क्षेत्र

भूगोल की विषय-वस्तु या अध्ययन-क्षेत्र से तात्पर्य उस सामग्री से है जिसका अध्ययन भूगोल में किया जाता है। भूगोल एक विशद विषय है; अतः इसकी विषय-वस्तु या अध्ययन-क्षेत्र भी विशाल है। वस्तुतः भूतल पर दो मुख्य प्रकार के भूदृश्य मिलते हैं-भौतिक तथा सांस्कृतिक। भौतिक भूदृश्यों को प्राकृतिक भूदृश्य भी कहते हैं। इनका अध्ययन भौतिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। सांस्कृतिक भूदृश्य मानव के द्वारा निर्मित होते हैं। इनका अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है।

भूगोल का अध्ययन-क्षेत्र भूतल का वह कटिबन्ध है जहाँ स्थलमण्डल, जलमण्ड़ल और वायु- मण्डल परस्पर सम्बद्ध होते हैं तथा जहाँ जैवमण्डल का विस्तार पाया जाता है। ये सभी मण्डल भूगोल की विषय-वस्तु हैं।

भूगोल की विषय-वस्तु के अन्तर्गत निम्नलिखित सम्मिलित हैं
1. स्थलमण्डल- स्थलमण्डल के अन्तर्गत पृथ्वी के प्रथम श्रेणी के उच्चावच लक्षण (महाद्वीप), द्वितीय श्रेणी के उच्चावच लक्षण या प्रमुख स्थलरूप (पर्वत, पठार, मैदान) तथा तृतीय श्रेणी के उच्चावच लक्षण (घाटियाँ, ढाल, अपरदन के साधनों से निर्मित अनेक प्रकार के आकार, आन्तरिक शक्तियों से उत्पन्न आकार आदि) का अध्ययन किया जाता है। इसके अतिरिक्त पृथ्वी की आन्तरिक रचना, ज्वालामुखी, चट्टानों, मिट्टियों, भूमिगत जल, खनिज भण्डारों आदि का भी अध्ययन स्थलमण्डल के अन्तर्गत किया जाता है।

2. वायुमण्डल- पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए गैसों का एक विशाल आवरण है जिसे वायुमण्डल कहा जाता है। इसकी निचली परत को क्षोभमण्डल कहते हैं जिसमें मौसम तथा जलवायु सम्बन्धी सभी परिवर्तन तथा परिघटनाएँ होती हैं। मौसम के तत्त्व (तापमान, वर्षा, पवन, आर्द्रता आदि) पृथ्वी की भौतिक दशाओं तथा मानव पर गहरा प्रभाव डालते हैं। पृथ्वीतल तथा वायुमण्डल के बीच ऊष्मा तथा आर्द्रता का सदैव आदान-प्रदान होता रहता है। अतएव वायुमण्डल भूगोल के अध्ययन में विशिष्ट स्थान रखता है।

3. जलमण्डल- पृथ्वी पर जल का व्यापक विस्तार पाया जाता है। पृथ्वी के कुल क्षेत्र का लगभग 71% महासागरों तथा सागरों के नीचे है। महासागरीय तल का उच्चावच, जल का परिसंचार, तापमान- लवणता, निक्षेप आदि का अध्ययन भूगोल की विशिष्ट विषय-वस्तु है।

4. पृथ्वी की सूर्य से सापेक्ष स्थिति- इसके अन्तर्गत पृथ्वी के आकार, अक्षीय झुकाव, परिक्रमण, परिभ्रमण, दिन-रात की अवधि, सूर्यातप, ऋतु-परिवर्तन आदि का अध्ययन किया जाता है।

5. भूतल के सांस्कृतिक तथ्य- इसमें मानवीय बस्तियों, जनसंख्या वितरण, कृषि, उद्योग, परिवहन एवं संचार के साधनों, व्यापार आदि का अध्ययन सम्मिलित है।

इस प्रकार पृथ्वी के सभी भौतिक तथा सांस्कृतिक पक्षों का अध्ययन भूगोल की विषय-वस्तु है। भूगोल की विषय-वस्तु पर प्रकाश डालते हुए कार्ल रिटर ने लिखा है-“भूगोल में भूमण्डल के सभी लक्षणों, घटनाओं और उनके सम्बन्धों का, पृथ्वी को स्वतन्त्र मानते हुए अध्ययन किया जाता है। इसकी समग्र एकता में मानव और जगतपिता से सम्बन्ध दिखाई पड़ते हैं।”

निष्कर्ष यह है कि भूगोल का अध्ययन-क्षेत्र पर्यावरण और मानव के अन्तर्सम्बन्धों के अध्ययन से सम्बन्धित है।

प्रश्न 2. भूगोल की प्रकृति तथा अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
या भूगोल की संकल्पनाओं को स्पष्ट करते हुए भूगोल के अध्ययन के उद्देश्य बताइए।
उत्तर- भूगोल की प्रकृति
भूगोल एक ऐसा विज्ञान है जिसमें प्राकृतिक तथा सामाजिक दोनों प्रकार के विज्ञानों का समन्वय पाया जाता है। यह जानने के लिए कि इसका स्वरूप कैसा है, इसकी प्रकृति को समझना आवश्यक है। भूगोल की प्रकृति से आशय है कि भूगोल विज्ञान है या कला, या दोनों।

भूगोल एक विज्ञान है-भूगोल को एक विज्ञान के रूप में परखने के लिए इसे विज्ञान की कसौटी पर कसना आवश्यक होगा। विज्ञान किसी विषय के क्रमबद्ध विशेष विवरण को कहा जाता है जिसे विशेष परीक्षण, निरीक्षण, विश्लेषण और वर्गीकरण द्वारा प्राप्त किया जाता है। इस कसौटी पर भूगोल एक विज्ञान के रूप में खरा उतरता है, क्योंकि इसमें पृथ्वी का क्रमबद्ध तथा विशेष विवरण; परीक्षण, निरीक्षण तथा विश्लेषण के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। अग्रलिखित तर्कों के आधार पर भूगोल को विज्ञान की संज्ञा दी जा सकती है

1. भूगोल के नियम सार्वभौम हैं- अन्य भौतिक (प्राकृतिक) विज्ञानों की भाँति भूगोल के नियम भी सभी कालों में सत्य तथा व्यापक हैं। उदाहरणार्थ-पृथ्वी का परिभ्रमण तथा परिक्रमण, गुरुत्वाकर्षण, ज्वार-भाटे का सिद्धान्त, वायु-संचरण के सिद्धान्त, जल-परिसंचरण के सिद्धान्त, फैरल का नियम, बाइज बैलट का नियम आदि सभी सार्वभौम हैं। ये नियम निश्चित तथा सत्यपरक हैं, अतः भूगोल को एक विज्ञान मानना उचित है।

2. भूगोल की अध्ययन विधि वैज्ञानिक है- भूगोल के अध्ययन में क्रमबद्ध (व्यवस्थित) तथा प्रादेशिक दो प्रकार के उपागम (विधियाँ) प्रचलित हैं। ये दोनों विधियाँ विज्ञान पर आधारित हैं। भूगोल के अध्ययन में परीक्षण, निरीक्षण, विश्लेषण, वर्गीकरण आदि वैज्ञानिक चरणों का उपयोग होता है। कार्ल पियर्सन के अनुसार, “विज्ञान की एकमात्र पहचान उसकी अध्ययन पद्धति से होती है न कि उसकी अध्ययन सामग्री से।” इस दृष्टि से भूगोल एक विज्ञान है।।

3. भूगोल कार्य और कारण की व्याख्या करता है- भूगोल में अन्य भौतिक विज्ञानों की भाँति ‘कार्य-कारण सम्बन्ध पाया जाता है। उदाहरणार्थ-भू-परिक्रमण ऋतु-परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है। पृथ्वी और चन्द्रमा की परिभ्रमण गतियों के कारण सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण होते हैं। ज्वार-भाटा आने का कारण चन्द्रमा और सूर्य की पृथ्वी पर पड़ने वाली गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। भूगोल एक विज्ञान के रूप में इन्हीं कार्य और कारणों की व्याख्या करता है।

4. मानवीय क्रियाकलापों का अध्ययन- भूगोल में प्राकृतिक पर्यावरण के साथ-साथ मानव और उसके क्रियाकलापों का भी अध्ययन किया जाता है। अत: भूगोल एक विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित है। टॉलेमी, वारेनियस, हम्बोल्ट, रिटर, रैटजेल, ब्लाश आदि विद्वानों ने भूगोल को एक विज्ञान की संज्ञा दी है।

भूगोल एक कला है—ज्ञान को प्राप्त कर उसे वास्तविक जीवन में उतारने के कौशल को कला कहते हैं। कला जीवन का ढंग है। प्रश्न उठता है कि क्या भूगोल एक कला है? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए भूगोल को कला की कसौटी पर परखना होगा। भूगोल को कला मानने के सम्बन्ध में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं

1. भूगोल एक व्यावहारिक शास्त्र (विज्ञान) है- प्रतिष्ठित भौतिक नियमों तथा उनके तथ्यों का अनुप्रयोग (व्यवहार में उपयोग करना) भूगोल का एक विशिष्ट अंग है। उदाहरण के लिए, ‘मानव- कल्याण के लिए जल संसाधनों का क्या उपयोग होना चाहिए ? ‘भूगोल उत्तर देता है कि नदियों पर बाँध बनाकर योजनाबद्ध ढंग से जल संसाधनों का दोहन किया जाना चाहिए। इस दृष्टि से भूगोल एक कला है।

2. भूगोल कल्याण की राह दिखाता है- भूगोल एक ऐसा पथ-प्रदर्शक शास्त्र है, जो हमें योजनाबद्ध ढंग से प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग करना सिखाता है। इस प्रकार वह मानव-कल्याण का पथ-प्रशस्त करता है। भूगोल हमें सिखाता है कि वनों का संरक्षण करके पर्यावरण विघटन को रोका जा सकता है। जनसंख्या वृद्धि पर प्रभावी नियन्त्रण लगाकर राष्ट्र को समृद्धि के मार्ग पर अग्रसर किया जा सकता है।

निष्कर्ष यह निकलता है कि भूगोल में विज्ञान तथा कला दोनों के गुण विद्यमान हैं। सिद्धान्त रूप से यह विज्ञान है तथा व्यवहार में कला है। यह विज्ञान के समान खोज और अनुसन्धान करता है और कला के अनुसार उन तथ्यों को मानव-कल्याण के लिए प्रयुक्त करने की राह दिखाता है।

भूगोल की अवधारणा या संकल्पना

अवधारणा या संकल्पना से आशय किसी विषय की उन मौलिक विचारधाराओं या सिद्धान्तों से है जिनके आधार पर उस विषय का विकास तथा संवर्द्धन होता है। इन संकल्पनाओं के अभाव में भूगोलवेत्ता अधूरा ही रहता है। संकल्पनाएँ ऐसे निर्देशक सिद्धान्त हैं जिनके माध्यम से विषय का पूर्ण विश्लेषण सम्भव होता है। अतएव भूगोलवेत्ताओं को इन संकल्पनाओं का ज्ञान होना नितान्त आवश्यक है। भूगोल की महत्त्वपूर्ण संकल्पनाएँ अग्रलिखित हैं

1. स्थान की संकल्पना- भूगोल में स्थान का आशय भूतल के एक टुकड़े से है। भूतल में समस्त स्थलमण्डल, जलमण्डल तथा वायुमण्डल के सम्पर्क से निर्मित सम्पूर्ण कटिबन्ध सम्मिलित हैं, जिसमें सौर ऊर्जा की प्राप्ति होती है तथा पृथ्वी की आन्तरिक और बाह्य शक्तियों से विभिन्न घटनाएँ घटित होती हैं। भूतल से ही खनिज, मिट्टी, जल, ऊर्जा तथा वनस्पतियाँ प्राप्त होत्री हैं। जैवमण्डल इसी भूतल की देन है। भूतल ही समस्त मानवीय क्रियाओं का केन्द्र है।

2. अवस्थिति की संकल्पना- भूगोल में अवस्थिति की अवधारणा विभिन्न स्थानों की अक्षांशीय तथा देशान्तरीय स्थिति से सम्बन्धित है। किसी स्थान की अवस्थिति से ही उसकी जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, मिट्टियों आदि का बोध होता है। इसके अतिरिक्त, भौगोलिक अवस्थिति से संसार के प्रमुख परिवहन तथा संचार के साधनों की सापेक्ष स्थिति का भी ज्ञान होता है। इस प्रकार, भौगोलिक अध्ययनों में अवस्थिति की संकल्पना बहुत महत्त्वपूर्ण है।

3. भौगोलिक वितरण की संकल्पना- भूतल पर प्राकृतिक संसाधनों; जैसे—वनस्पति, जल, मिट्टी, खनिज, कृषि आदि का वितरण असमान है। भूगोल इन्हीं संसाधनों के भौगोलिक वितरण की व्याख्या करता है तथा उनकी प्रभावी पर्यावरणीय दशाओं पर भी प्रकाश डालता है। इस हेतु वह वितरण मानचित्रों का निर्माण करता है तथा क्षेत्रों की पारस्परिक निर्भरता का बोध कराता है। उदाहरणार्थ-चावल या जूट का भौगोलिक वितरण उष्णार्द्र जलवायु, चिकनी मिट्टी, पर्याप्त वर्षा एवं श्रम की उपलब्धता का द्योतक है। इस प्रकार भौगोलिक वितरण की संकल्पना पर्यावरणीय दशाओं के स्थानीय अन्तर को स्पष्ट करती है।

4. स्थानिक अन्तःक्रिया की संकल्पना- भूतल पर पायी जाने वाली विभिन्नताओं के कारण एक क्षेत्र दूसरे क्षेत्र से सहयोग प्राप्त करता है। यह परस्पर सहयोग ही अन्त:क्रिया कहलाता है। क्षेत्रीय विभिन्नताएँ ही घटनाओं की अन्त:क्रिया को जन्म देती हैं। इनसे क्षेत्रीय सहयोग तथा क्षेत्रीय विकास में बहुत सहायता मिलती है। वस्तुओं तथा सेवाओं के विनिमय में स्थानिक अन्त:क्रियाओं की संकल्पना की प्रमुख भूमिका होती है, जो जीवन के अस्तित्व के लिए नितान्त आवश्यक है। विभिन्न स्थानों के मध्य वस्तुओं, विचारों तथा मानव की गतिशीलता को ही स्थानिक अन्त:क्रिया की संकल्पना कहा जाता है।

5. प्रादेशीकरण की संकल्पना- सम्पूर्ण पृथ्वी का अध्ययन उसे कुछ प्रदेशों में बाँटकर किया जाता है। प्रदेशों का निर्धारण तथा सीमांकन भूतल पर पायी जाने वाली भौतिक तथा सांस्कृतिक समानताओं के आधार पर किया जाता है। किसी प्रदेश की जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, धरातल, कृषि तथा अन्य आर्थिक एवं मानवीय क्रियाकलापों को जानने का आधार प्रादेशीकरण की संकल्पना ही है।

6. क्षेत्रीय भिन्नता की संकल्पना- हैटनर के अनुसार, भूगोल स्थानों का विज्ञान है और स्थानों में विभिन्नताएँ पायी जाती हैं। अतएव भूगोलवेत्ता क्षेत्रीय विभिन्नताओं के कारणों की व्याख्या करते हैं। इस प्रकार क्षेत्रीय भिन्नता की संकल्पना भौगोलिक अध्ययन में बहुत महत्त्वपूर्ण है।

7. पार्थिव एकता की संकल्पना- इस संकल्पना के प्रतिपादक जर्मन विद्वान् रैटजेल थे। उनके अनुसार, सम्पूर्ण पृथ्वी एक इकाई है। पृथ्वी पर पायी जाने वाली विभिन्नताएँ तो केवल बाह्य हैं। वस्तुत: भूतल का प्रत्येक भाग एक-दूसरे से संयुक्त है तथा उसमें एक सार्वभौमिक एकता पायी जाती है। सम्पूर्ण पृथ्वी पर एक जैसे भौतिक नियम तथा प्रक्रम कार्य करते हैं। पार्थिव एकता की संकल्पना भूगोल में बहुत लोकप्रिय रही है।

8. कालगत परिवर्तन की संकल्पना- भूतल के सभी तत्त्व चाहे वे भौतिक हों या सांस्कृतिक; परिवर्तनशील हैं। समय के साथ उनमें परिवर्तन आता है और वे एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश करते हैं। सभी भौगोलिक अध्ययनों में परिवर्तनकारी क्रियाओं की प्रकृति, दिशा और परिवर्तन की दर को ध्यान में रखना आवश्यक है।

9. सांस्कृतिक प्रदेशों की संकल्पना- भूतल पर भौतिक तथा अभौतिक संस्कृति के संयोग से। सांस्कृतिक प्रदेश बनते हैं। प्रादेशिक विकास की दृष्टि से सांस्कृतिक प्रदेशों का अध्ययन बहुत लाभकारी होता है। सांस्कृतिक मूल्यों तथा विकास की प्रवृत्तियों के द्वारा एक प्रदेश को दूसरे प्रदेश से पृथक् किया जा सकता है। सांस्कृतिक प्रदेशों के अध्ययन से समस्त ग्लोब के सांस्कृतिक पर्यावरण का समुचित ज्ञान सम्भव है।

भूगोल के अध्ययन के उद्देश्य

भूगोल एक निरन्तर प्रगतिशील विज्ञान है। इसके क्रमश: विकास से उसके अध्ययन के उद्देश्य का भी विस्तार हो रहा है। भूगोल का उद्देश्य पृथ्वी के साथ मानवीय क्रियाओं के सम्बन्धों की व्याख्यामात्र ही नहीं, अपितु निरन्तर विकासोन्मुख तथा परिवर्तनीय प्राकृतिक घटनाओं के साथ क्रियाशील एवं प्रगतिपथ पर अग्रसर मानव के साथ सम्बन्धों को समझना है। यह राष्ट्रीय विकास और जनकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। ब्रोइक महोदय ने भूगोल के अध्ययन के निम्नलिखित तीन प्रमुख उद्देश्य निर्धारित किये हैं

  1. विश्व-ज्ञान में वृद्धि करना।।
  2. पृथ्वीतल का अध्ययन मानव-निवास के रूप में करते हुए क्षेत्रों तथा स्थानों की विभिन्नताओं को समझना।
  3. मानवीय समृद्धि के लिए प्रादेशिक संसाधनों का अध्ययन करना तथा उनके प्रयोग में सक्रिय सहयोग देते हुए पृथ्वी पर प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय विकास के लिए योजनाएँ बनाना। यथार्थ में, भूगोल का उद्देश्य भूमि और मानव की वास्तविक पृष्ठभूमि का अध्ययन कर स्थानिक संगठन की व्याख्या करना है।

हार्टशोर्न के शब्दों में, “पृथ्वी का मानवीय संसार के रूप में वैज्ञानिक रीति से वर्णन करना ही भूगोल का उद्देश्य है।”

कार्ल रिटर ने भूगोल के उद्देश्यों की व्याख्या करते हुए लिखा है, “भूगोल का उद्देश्य है कि सम्पूर्ण पृथ्वीतल पर प्राकृतिक एवं मानवीय दशाओं का सजीव चित्रण ऐसी शैली में किया जाए कि मनुष्य एवं प्रकृति के बीच महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध स्वत: ही स्पष्ट हो जाएँ।”

राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (1965) ने अपनी एक रिपोर्ट में भूगोल के उद्देश्य स्पष्ट करते हुए व्यक्त किया, “स्थानिक वितरणों, स्थानिक सम्बन्धों के दृष्टिकोण से मानव-वातावरण की प्रणाली का अध्ययन करना भूगोल का प्रमुख उद्देश्य है।”

वर्तमान समय में पर्यावरण और परिस्थितियों का अध्ययन विश्व के सभी देशों के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण हो गया है। विकास और प्रगति के साथ-साथ पर्यावरण का संरक्षण भी महत्त्वपूर्ण हो गया है। अतएव भूगोल के अध्ययन के निम्नलिखित उद्देश्य हैं

  • पृथ्वीतल के विभिन्न स्वरूपों के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन करना,
  • पर्यावरण और मानव वर्गों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन करना,
  • विभिन्न वितरणों की विवेचना करना,
  • विकास योजनाओं में सहयोग देना,
  • पारिस्थितिकी विश्लेषण करना,
  • प्रकृति की एकता को प्रदर्शित करना तथा
  • विभिन्न प्रदेशों के पार्थिव घटनाक्रम को समझना।।

प्रश्न 3. भूगोल की मुख्य शाखाएँ कौन-सी हैं? किसी एक शाखा की विषय-वस्तु की विवेचना कीजिए।
या भूगोल की दो प्रमुख शाखाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर- भूगोल की शाखाएँ
भूगोल एक ऐसा प्राचीन विज्ञान है जिसका अंकुरण ईसा से पूर्व ही यूनान की उर्वरा भूमि में हो गया था। तब से आज तक भूगोल एक विशाल वृक्ष बन चुका है। प्राचीन काल में भूगोल का अध्ययन एक मिश्रित सामाजिक विज्ञान के रूप में किया जाता था। जैसे-जैसे ज्ञान में वृद्धि होती गयी, भूगोल की शाखाओं-उपशाखाओं का विकास होता गया। प्रारम्भ में भूगोल की दो प्रमुख शाखाएँ भौतिक भूगोल तथा मानव भूगोल के रूप में विकसित हुईं। भूगोल में विशेषीकरण की प्रवृत्ति के साथ ही इन दोनों शाखाओं की अनेक उपशाखाएँ बन गयीं। वर्तमान समय में भूगोल की प्रमुख शाखाएँ अग्रवत् हैं

I. भौतिक भूगोल
भौतिक भूगोल भूगोलरूपी वृक्ष की प्रमुख शाखा है। इसके अन्तर्गत पृथ्वी की उत्पत्ति, आन्तरिक संरचना, शैल (चट्टानें), ज्वालामुखी क्रिया, भूकम्प, स्थलमण्डल के विविध स्थलरूपों एवं स्थलाकृतियों, अपक्षय एवं अपरदन, मिट्टियाँ, खनिज, वनस्पति, जलवायु आदि की दशाओं का अध्ययन किया जाता है। जलमण्डल, वायुमण्डल एवं जैवमण्डल का अध्ययन भी भौतिक भूगोल के अभिन्न अंग हैं। प्रारम्भ में । खगोल विज्ञान (Astronomy) का अध्ययन भी भौतिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता था। भौतिक भूगोल की शाखाएँ निम्नलिखित हैं

1. भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology)- भू-आकृति विज्ञान के अन्तर्गत धरातल के उच्चावच तथा भूपटल के विभिन्न स्वरूपों का अध्ययन किया जाता है।
2. भू-विज्ञान (Geology)- भू-विज्ञान के अन्तर्गत पृथ्वी की उत्पत्ति, संरचना, खनिज तथा शैलों का अध्ययन किया जाता है।
3. मृदा विज्ञान (Pedology)- मृदा विज्ञान में मिट्टियों की उत्पत्ति, संरचना, वितरण तथा उपयोगिता का अध्ययन किया जाता है।
4. ऋतु विज्ञान (Meteorology)- मौसम और जलवायु के तत्त्वों में वायुमण्डल की दशाओं, पृथ्वी पर तापमान के वितरण, पवन संचरण तथा वर्षा के वितरण से लेकर जलवायु प्रदेशों का ज्ञान देने वाला शास्त्र ऋतु विज्ञान कहलाता है। इसमें मानवीय जीवन तथा क्रियाकलापों पर पड़ने वाले जलवायु प्रभावों का भी अध्ययन किया जाता है।
5. समुद्र विज्ञान (Oceanography)- पृथ्वी के तल पर 70% जल का विस्तार है। जल के विशाल खण्डों को समुद्र कहा जाता है। महासागरों के वितरण, गतियों, तापमान, लवणता और सागरीय निक्षेपों का विस्तृत विवरण देने वाला शास्त्र समुद्र विज्ञान कहलाता है।
6. जल विज्ञान (Hydrological Science)- जल विज्ञान में जलराशियों के वितरण-जलचक्र, भूमिगत जल, जल प्रवाह, गतियों तथा स्थितियों का अध्ययन किया जाता है।
7. जैव भूगोल (Bio-Geography)- जैव भूगोल के अन्तर्गत जन्तु जगत तथा पादप तन्त्र का अध्ययन किया जाता है। इसमें वनस्पतियों तथा जन्तुओं के वितरण तथा पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है।

II. मानव भूगोल
मानव की आर्थिक और सांस्कृतिक क्रियाओं के अध्ययन करने वाले विज्ञान को मानव भूगोल कहा जाता है। इसके अन्तर्गत मनुष्य की जातियों, प्रजातियों, शारीरिक गठन तथा आर्थिक क्रियाकलापों का अध्ययन किया जाता है। मानव भूगोल प्राकृतिक वातावरण एवं मानव के सम्बन्धों का अध्ययन प्रस्तुत करता है। मानव तथा पर्यावरण दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। मानव भूगोल इन दोनों के अन्त:सम्बन्धों की व्याख्या करता है। मानव भूगोल का अध्ययन-क्षेत्र बहुत व्यापक है। इसकी प्रमुख शाखाएँ तथा उपशाखाएँ निम्नलिखित हैं

1. आर्थिक भूगोल (Economic Geography)- आर्थिक भूगोल मानव भूगोल की एक महत्त्वपूर्ण शाखा है। मनुष्य अपने जीवनयापन के लिए प्रकृति का दोहन करता है; अत: मानव के आर्थिक विकास की कहानी प्रकृति के साथ संघर्ष की कहानी है। मनुष्य अपने जीवनयापन के लिए जो प्राथमिक तथा द्वितीयक व्यवसाय अपनाता है, उन सभी का विवरण आर्थिक भूगोल में है। प्रो० बुकानन के शब्दों में, “आर्थिक भूगोल मानव भूगोल की वह शाखा है जिसमें मानव के आर्थिक प्रयत्नों का उसके निवासस्थान के सन्दर्भ में अध्ययन किया जाता है। आर्थिक भूगोल की प्रशाखाएँ निम्नलिखित हैं

  • कृषि भूगोल (Agricultural Geography)।
  • परिवहन भूगोल (Transportation Geography)।
  • वाणिज्य भूगोल (Commercial Geography)।
  • औद्योगिक भूगोल (Industrial Geography)।
  • संसाधन भूगोल (Resource Geography)।।

2. सांस्कृतिक भूगोल (Cultural Geography)- संस्कृति मानव-जीवन का आवश्यक और अभिन्न अंग है। संस्कृति सीखे हुए व्यवहार को कहा जाता है। जिस विज्ञान में किसी क्षेत्र के सांस्कृतिक प्रतिरूपों, रीति-रिवाजों, धार्मिक विश्वासों तथा परम्पराओं का अध्ययन किया जाता है, उसे सांस्कृतिक भूगोल की संज्ञा दी जाती है। मानव विज्ञान भी सांस्कृतिक भूगोल की ही एक
प्रशाखा है।

3. जनसंख्या भूगोल (Population Geography)- जनसंख्या भूगोल में भूतल के जनसांख्यिकीय पक्ष, जनसंख्या वितरण, घनत्व, वृद्धि-दर, लिंग अनुपात, साक्षरता तथा जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न समस्याओं का विवरण दिया जाता है। आवासीय भूगोल भी जनसंख्या भूगोल की प्रमुख शाखा है।

4. सामाजिक भूगोल (Social Geography)- सामाजिक भूगोल में मनुष्य के सामाजिक जीवन का विवरण दिया जाता है। इसमें समुदायों, संस्थाओं, वर्गों और उनके कार्यों व सम्बन्धों को अध्ययन किया जाता है। सामाजिक प्रवृत्तियों के मानव-जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करना सामाजिक भूगोल का मुख्य विषय है।।

5. राजनीतिक भूगोल (Political Geography)- राजनीतिक भूगोल में राजनीतिक इकाइयों, प्रादेशिक क्षेत्रों, सीमाओं, राजधानियों, राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय नीतियों से सम्बन्धित बातों का भौगोलिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में अध्ययन किया जाता है। उपनिवेशों तथा साम्राज्यों का अध्ययन भी राजनीतिक भूगोल का ही विषय है।

6. पारिस्थितिकी भूगोल (Ecological Geography)- मनुष्य जिस प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण में रहता है वह उसकी पारिस्थितिकी कहलाती है। पारिस्थितिकी भूगोल में पर्यावरण एवं मानव के सह-सम्बन्धों एवं प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।

7. ऐतिहासिक भूगोल (Historical Geography)- भूतकालीन भौगोलिक घटनाएँ ही इतिहास बन जाती हैं। ऐतिहासिक भूगोल के अन्तर्गत हम राष्ट्र के इतिहास पर उसकी भौगोलिक पृष्ठभूमि का प्रभाव, स्थिति, उच्चावच, सुविधाओं और बाधाओं का अध्ययन करते हैं। अत: ऐतिहासिक भूगोल भी भूगोल की एक महत्त्वपूर्ण शाखा है।

8. ग्रामीण एवं नगरीय भूगोल (Rural and Urban Geography)- ग्रामीण तथा नगरीय भूगोल में वहाँ की अर्थव्यवस्था, प्राकृतिक संसाधन, उत्पत्ति तथा विकास, आकारिकी आदि का अध्ययन किया जाता है।

9. मानचित्र भूगोल (Cartography)- मानचित्र भूगोल, भूगोल के अध्ययन के आवश्यक तथा महत्त्वपूर्ण उपकरण हैं। मानचित्र भूगोल में उनकी रचना, प्रकार, मापक, प्रक्षेप, उच्चावच प्रदर्शन तथा भूमापन आदि का अध्ययन किया जाता है। अतः यह भी भूगोल की एक महत्त्वपूर्ण शाखा बन गया है।

10. प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography)- प्रादेशिक भूगोल में प्रदेशीकरण, उसके आकार तथा प्रदेशों के भौगोलिक एवं मानवीय सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 4. भूगोल का अन्य विषयों के साथ सम्बन्ध की विवेचना कीजिए।
या भूगोल और इतिहास के मध्य सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
या भूगोल तथा अर्थशास्त्र के सम्बन्ध की विवेचना कीजिए।
या भूगोल तथा राजनीतिशास्त्र के बीच सम्बन्ध की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-भूगोल का अन्य विषयों से सम्बन्ध
भूगोल एक समाकलित विज्ञान है जो सभी प्राकृतिक और सामाजिक विज्ञानों से किसी-न-किसी रूप में सम्बन्ध रखता है। भूगोल की विषय-वस्तु में भौतिक एवं मानवीय तथ्य सम्मिलित हैं। अत: भूगोल का इन दोनों ही विज्ञानों से सम्बन्धं पाया जाता है।

भूगोल का प्राकृतिक विज्ञानों से सम्बन्ध
1. भूगोल एवं खगोल विज्ञान- ब्रह्माण्ड में सौरमण्डल के सदस्य के रूप में पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य आदि की स्थिति का सापेक्ष अध्ययन भूगोल तथा खगोल विज्ञान दोनों में ही किया जाता है, यद्यपि दोनों के अध्ययन के उद्देश्य भिन्न-भिन्न हैं। पृथ्वी, सूर्य तथा चन्द्रमा की सापेक्ष स्थितियों के प्रभाव अनेक रूपों में देखे जाते हैं; जैसे–दिन-रात का होना, ऋतु-परिवर्तन, सूर्यातप की प्राप्ति, चन्द्रमा की कलाएँ इत्यादि। ये सभी भूगोल तथा खगोल विज्ञान के अध्ययन के विषय हैं। अत: दोनों विषय एक-दूसरे के बहुत निकट हैं।

2. भूगोल एवं गणित- गणित का भौगोलिक अध्ययनों में प्राचीन काल से ही गहरा प्रभाव रहा है। देशों व प्रदेशों की अक्षांशीय व देशान्तरीय स्थितियाँ तथा उनकी आकृतियाँ व क्षेत्रफल आदि का भूगोल के अन्तर्गत अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन गणित के सहयोग के बिना सम्भव नहीं है। आधुनिक काल में गणित की शाखा सांख्यिकी के उपयोग से भूगोल के विभिन्न अध्ययनों में मात्राकरण इतना महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है कि गणितीय भूगोल का भूगोल की एक प्रमुख शाखा के रूप में विकास हो रहा है।

3. भूगोल एवं भूगर्भ विज्ञान- भूगर्भ विज्ञान पृथ्वी के आन्तरिक अध्ययन से सम्बन्धित है। भूगोल में भी पृथ्वी की आन्तरिक रचना, चट्टानों आदि का अध्ययन किया जाता है; क्योंकि इसी अध्ययन से मिट्टियों, खनिज पदार्थों, भू-आकृतियों के स्वरूपों और भूमिगत जल का अध्ययन जुड़ा हुआ है। इस प्रकार भूगोल और भूगर्भ विज्ञान का एक-दूसरे से गहरा सम्बन्ध है।

4. भूगोल एवं जलवायु विज्ञान- जलवायु विज्ञान में मौसम के तत्त्वों के विभिन्न संयोगों से उत्पन्न जलवायवीय दशाओं का अध्ययन किया जाता है। भूगोल में भौतिक पर्यावरण के अध्ययन में जलवायु को विशेष महत्त्व दिया जाता है जो धरातलीय परिघटनाओं को प्रभावित करती है। इसलिए भूगोल को जलवायु विज्ञान से गहरा सम्बन्ध है।

5. भूगोल एवं मृदा विज्ञान- विश्व में खाद्यान्नों की प्राप्ति कृषि-कार्यों से होती है। कृषि-फसलों के पर्याप्त उत्पादन हेतु उपजाऊ मिट्टी का होना अति आवश्यक है। शाकाहारी लोगों का भोजन कृषि-उपजों से प्राप्त होता है, जबकि मांसाहारी लोगों का भोजन पशुओं से प्राप्त होता है, जो घास एवं वनस्पति पर निर्भर रहते हैं। अत: खाद्य पदार्थों की प्राप्ति प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में मिट्टी से ही होती है। खाद्यान्न तथा अन्य कच्चे पदार्थों का उत्पादन करने वाली मिट्टियों का अध्ययन भूगोल तथा मृदा विज्ञान का प्रमुख विषय है। इस प्रकार भूगोल और मृदा विज्ञान परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं।

6. भूगोल एवं वनस्पति विज्ञान- वृक्षों का मानव-जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनसे अनेक उद्योगों के लिए कच्चे माल की प्राप्ति होती है। वन बाढ़ों एवं भूक्षरण को रोकने में सहायक होते हैं। अतः ये एक मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन हैं। भूगोल में वनस्पति का अध्ययन महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। अतः भूगोल का सम्बन्ध वनस्पति विज्ञान से अत्यधिक गहरा है।

7. भूगोल एवं जन्तु विज्ञान- पशुधन से मानव का गहरा सम्बन्ध है। पशुओं से मानव को दूध, मांस, ऊन, चमड़ा आदि अनेक उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। अनेक पशुओं का उपयोग कृषि-कार्यों, बोझा ढोने एवं यात्रा करने में किया जाता है। इस प्रकार आदिकाल से ही मानव का सम्बन्ध पशुओं से रहा है। इसी कारण भूगोल का सम्बन्ध जन्तु विज्ञान से भी है।

भूगोल का सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध
1. भूगोल और अर्थशास्त्र- भूगोल और अर्थशास्त्र दोनों ही सामाजिक विज्ञान हैं तथा एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं। भूगोल मनुष्य के प्राकृतिक और सांस्कृतिक पर्यावरण का अध्ययन करता है, जबकि अर्थशास्त्र मानव की आर्थिक क्रियाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। इस प्रकार दोनों के अध्ययन का केन्द्र-बिन्दु मनुष्य ही है। प्राकृतिक पर्यावरण का प्रत्यक्ष प्रभाव मानव-जीवन पर पड़ता है। भूगोल में दोनों की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। प्रादेशिक स्तर पर प्राकृतिक पर्यावरण ही मानव के आर्थिक क्रियाकलापों का निर्धारण करता है। उपजाऊ भूमि वाले क्षेत्रों में लोग कृषि कर सकते हैं, जबकि घास के क्षेत्रों में पशुचारण प्रमुख व्यवसाय है। समुद्रतटीय भागों में मत्स्य उद्योग तथा वन-प्रधान क्षेत्रों में लोगों का प्रधान व्यवसाय लकड़ी काटना होता है। भूगोल के अध्ययनमात्र से ही हमें ज्ञात हो जाता है कि उस क्षेत्र में मानव की आजीविका के साधन क्या होंगे। सभी प्राकृतिक परिस्थितियाँ; जैसे-भूमि, नदी, पर्वत, मैदान तथा वनस्पतियाँ; मनुष्य के आर्थिक विकास के स्तर का निर्धारण करती हैं। कनाडा में लकड़ी काटना, टैगा में समूर एकत्र करना, कांगो बेसिन में जंगली रबड़ एकत्र करना तथा मलाया में रबड़ का उत्पादन वहाँ के प्राकृतिक पर्यावरण की ही देन है। मनुष्य अपनी आजीविका के लिए प्रकृति के साथ कठोर संघर्ष करता है। उसके इसी संघर्ष का अध्ययन आर्थिक भूगोल में होता है। अर्थशास्त्र में भी मानव के व्यवसायों; यथा-कृषि, उद्योग, परिवहन के साधनों तथा व्यापार का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार अर्थशास्त्र और आर्थिक भूगोल में गहरा सम्बन्ध है।

2. भूगोल और इतिहास- इतिहास भूतकालीन घटनाओं का वर्णन करने वाला शास्त्र है। वर्तमान की भौगोलिक घटनाएँ ही भविष्य में इतिहास बन जाती हैं। इतिहास वर्तमान भौगोलिक घटनाओं को अतीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के फ्रेम में व्यवस्थित करता है। किसी देश के इतिहास के निर्माण में वहाँ की भौगोलिक दशाओं का अभूतपूर्व योग रहता है। बकल महोदय के शब्दों में, “विश्व का सम्पूर्ण इतिहास मनुष्य एवं प्रकृति की क्रिया-प्रतिक्रिया से ओत-प्रोत है। मानव सभ्यता के विकास का इतिहास इने सम्बन्धों से पृथक् नहीं किया जा सकता।’ ऐतिहासिक घटनाओं की समग्र पृष्ठभूमि भूगोल द्वारा ही तैयार की जाती है। प्रत्येक ऐतिहासिक घटना का एक विशिष्ट वातावरण होता है, जबकि भौगोलिक घटनाओं का भी एक निश्चित इतिहास होता है। भारत में उत्तर का विशाल मैदान कैसे बना, इसकी एक निश्चित ऐतिहासिक श्रृंखला है। इस क्षेत्र के इतिहास के निर्माण में किन-किन भौगोलिक दशाओं का योग रहा, यह भी इतना ही महत्त्वपूर्ण है। आज का भूगोल कल का इतिहास है, जबकि कल का इतिहास आज का भूगोल बन जाता है। कुमारी सैम्पुल के शब्दों में, “वास्तव में आज जो भूगोल है, कल वही काल के अन्तर में इतिहास बन जाता है।” उच्चावच स्थिति, जलवायु, प्रादेशिक विस्तार तथा अन्य भौगोलिक दशाएँ राष्ट्र के ऐतिहासिक स्वरूप का निर्माण करती हैं। मिस्र में नील घाटी की सभ्यता, एशिया में मेसोपोटामिया की सभ्यता, चीन में ह्वांगहो घाटी की सभ्यता वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों की ही देन रही हैं। यूनान, इंग्लैण्ड, फ्रांस और जापान देशों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के निर्माण में वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों का विशेष योगदान रहा है। सिकन्दर और नेपोलियन के उत्थान और पतन के पीछे भी वहाँ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमियों का ही विशेष हाथ रहा है। भूगोल को इतिहास की सहायता से तथा इतिहास को भूगोल की सहायता से भली प्रकार समझा जा सकता है। इस प्रकार इतिहास और
भूगोल एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं।

3. भूगोल और समाजशास्त्र- समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन करने वाला विज्ञान है। यह सामाजिक पृष्ठभूमि में मानव के सामाजिक क्रियाकलापों का विवरण प्रस्तुत करता है। यह मनुष्य की भौतिक-अभौतिक संस्कृति का अध्ययन करता है। समाजशास्त्र सामाजिक पृष्ठभूमि के सन्दर्भ में सामाजिक मानव का गहन अध्ययन करता है। सामाजिक परिवेश के निर्माण में प्राकृतिक पर्यावरण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मानव भूगोल का लक्ष्य मानव के सामाजिक और आर्थिक पहलू का अध्ययन करना है। इन दोनों पहलुओं के निर्माण में भौगोलिक दशाओं का विशेष हाथ रहता है। समाज में प्रचलित रीति-रिवाज, परम्पराएँ, धर्म, नैतिकता, भाषा एवं संस्कृति का निर्धारण प्राकृतिक पर्यावरण द्वारा ही किया जाता है। समाजशास्त्र में इन्हीं सभी प्रतिमानों का अध्ययन किया जाता है। समाज के स्वरूप, संस्थाओं और उनके ढाँचे के निर्माण में भौगोलिक दशाओं का ही हाथ रहता है। अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ही यूनान के लोग वीर और दार्शनिक तथा ब्रिटेन के लोग बुद्धिमान हो गये। मानसूनी जलवायु की अनिश्चितता के कारण ही वहाँ के लोग भाग्यवादी बने हैं, जबकि भूमध्यरेखीय प्रदेशों में आज भी जनमानस में जादू-टोने का प्रचलन है। इस सामाजिक परिवेश का रूप भौगोलिक पर्यावरण की प्रत्यक्ष देन है। अतः हम कह सकते हैं कि भूगोल और समाजशास्त्र एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं।

4. भूगोल और राजनीतिशास्त्र- राजनीतिशास्त्र वह विज्ञान है जिसमें राज्य की उत्पत्ति, विकास, प्रभुसत्ता, कानून और सरकारों का अध्ययन किया जाता है। भूगोल में मानव की विभिन्न दशाओं का अध्ययन किया जाता है। भौगोलिक दशाएँ ही राज्य के स्वरूप तथा सरकारों के ढाँचों का निर्माण करती हैं। मैदानी तथा उपजाऊ क्षेत्रों में सदैव राजनीतिक उथल-पुथल तथा युद्ध लगे रहते हैं। सरकार, कानून, प्रशासन और समुदायों का निर्माण भौगोलिक परिवेश की देन है। इन्हीं सबका अध्ययन राजनीतिशास्त्र में किया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रजातन्त्र और पूँजीवाद, रूस और चीन में साम्यवाद और समाजवाद घहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों की ही देन हैं। एशिया महाद्वीप के पृथक्-पृथक् देशों में प्रचलित विभिन्न प्रशासनिक प्रारूप यहाँ की विविध जलवायु की ही देने हैं। ब्रिटेन की द्वीपीय स्थिति के कारण वहाँ जहाजी बेड़ा शक्तिशाली बन सका। उसी के बल पर उसने एशिया और अफ्रीका में उपनिवेश स्थापित कर साम्राज्यवाद का पोषण किया। भूगोल में भूराजनीति और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है। वर्तमान समय में विश्व में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन भौगोलिक परिस्थितियों की ही उपज है। पर्यावरण-प्रदूषण के बढ़ते खतरों को देखकर ही महाशक्तियाँ आणविक शक्ति प्रसार को तत्पर हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राजनीतिशास्त्र और भूगोल परस्पर सम्बद्ध हैं।

प्रश्न 5. भूगोल के अध्ययन की कौन-कौन सी विधियाँ हैं?
या भूगोल के अध्ययन के दो प्रमुख उपागम कौन-से हैं? किसी एक उपागम की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या भूगोल के अध्ययन में प्रादेशिक उपागम का क्या महत्त्व है?
या ‘क्रमबद्ध एवं प्रादेशिक उपागम एक-दूसरे के पूरक हैं।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-भूगोल के अध्ययन की विधियाँ या उपागम
प्रत्येक विज्ञान के अध्ययन की एक पद्धति, विधि या प्रणाली होती है। इन विधियों के द्वारा विषय की जटिलताओं को दूर करके उसे सरल बनाया जाता है। भूगोल में मात्रात्मक विश्लेषणों और पर्यावरणीय समस्याओं के रहस्यों का उद्घाटन करने के लिए जिन साधनों का सहारा लिया जाता है, उन्हें भूगोल के अध्ययन की विधियाँ या उपागम कहते हैं। भूपटल के अध्ययन को वैज्ञानिक ढंग से व्यवस्थित करने के उद्देश्य से इसके अध्ययन के लिए निम्नलिखित दो उपागम (विधियाँ) प्रयोग में लाये जीते हैं

1. क्रमबद्ध या वर्गीकृत उपागम ।
इसे प्रकरण उपागम (Topical Approach) भी कहा जाता है। इसके अन्तर्गत भूगोल के सभी तथ्यों का पृथक्-पृथक् अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार के भूगोल को क्रमबद्ध या वर्गीकृत भूगोल (Systematic Geography) कहते हैं। इस उपागम के अन्तर्गत भूगोल के विभिन्न पक्षों या प्रकरणों (Topics); यथा- भू-आकृति, जलवायु, अपवाह प्रणाली, मिट्टी, वनस्पति, ज़ीव-जन्तु, खनिज सम्पदा, जनसंख्या, आर्थिक व्यवसाय (कृषि, उद्योग), परिवहन-व्यापार आदि तथ्यों का अध्ययन समस्त भूतल के सन्दर्भ में पृथक्-पृथक् शीर्षकों के अन्तर्गत किया जाता है। इसमें प्रत्येक भौगोलिक तत्त्व को विश्लेषण एवं विश्व में उनके वितरण का अध्ययन किया जाता है। उदाहरणार्थ-प्राकृतिक वनस्पति को वन, घास, कंटीली झाड़ियों आदि के वर्गों में बाँटकर उनके विभिन्न प्रकारों का वर्णन किया जाता है। इसी प्रकार भौतिक, रासायनिक तथा जैविक विशेषताओं के आधार पर मिट्टियों का वर्गीकरण करके विश्व में उनके वितरण का अध्ययन किया जाता है। जलवायु के भी विभिन्न प्रकारों का अध्ययन किया जाता है। कृषि-फसलों के वितरण के अध्ययन में विभिन्न फसलों के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाओं (तापमान, वर्षा, मिट्टियाँ, सिंचाई, मानवीय श्रम आदि) का वर्णन किया जाता है, तत्पश्चात् विश्व में उनके वितरण के प्रारूपों का उल्लेख किया जाता है। अन्य भौगोलिक तत्त्वों; जैसे—खनिज पदार्थों, विनिर्माणी उद्योगों, जनसंख्या, परिवहन के साधनों, व्यापार आदि का भी अध्ययन क्रमबद्ध रूप में किया जाता है।

2. प्रादेशिक उपागम
पृथ्वी का आकार बहुत विशाल है; अतः इसका समग्र रूप में अध्ययन करना सरल नहीं है। अतः इसे एकसमान विशेषताओं के आधार पर विभिन्न प्रदेशों में बाँटकर उनका पृथक्-पृथक् विश्लेषण किया जाता है। इस विधि को हो प्रादेशिक उपागम कहते हैं। भौगोलिक अध्ययन के इस पक्ष को प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography) कहा जाता है।

समान भौगोलिक विशेषताओं के आधार पर विश्व को विभिन्न प्रदेशों में विभाजित करना ही प्रादेशिक उपागम है। इस प्रकार सीमांकित प्रदेशों में समान भौगोलिक विशेषताओं के साथ-साथ किसी-न-किसी प्रकार की आन्तरिक सम्बद्धता पायी जाती है। इसके पश्चात् उस प्रदेश के भौगोलिक तथ्यों; जैसे-भू-आकृति, जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, जल संसाधन, मिट्टी, जीव-जन्तु, खनिज सम्पदा, जनसंख्या, आर्थिक व्यवसायों आदि का अध्ययन किया जाता है। उदाहरणार्थ-गंगा के मैदान के प्रादेशिक अध्ययन में उसके अध्ययन के प्रकरणों का अध्ययन (वर्णन) किया जाता है; जैसे—(i) धरातलीय संरचना, (ii) अपवाह प्रणाली, (iii) जलवायु की दशाएँ, (iv) मिट्टियाँ, (v) प्राकृतिक वनस्पति, (vi) जीव- जन्तु, (vii) जनसंख्या, (viii) आर्थिक व्यवसाय, (ix) परिवहन एवं व्यापार, (x) बस्तियों के प्रकार आदि। इसी भाँति अन्य भौगोलिक प्रदेशों; जैसे-गंगा की निचली घाटी, छोटा नागपुर का पठार, मालवा का पठार, गोदावरी बेसिन, मालाबार तट, कोंकण तट, ब्रह्मपुत्रे घाटी आदि का भी वर्णन किया जाता है। इन प्रदेशों का आकार सूक्ष्म या वृहद् हो सकता है।

प्रादेशिक अध्ययन के लिए विश्व के किसी भी भू-क्षेत्र का चुनाव किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, डेन्यूब बेसिन, यूराल प्रदेश, वोल्गा बेसिन, मिसीसिपी डेल्टा, कैलीफोर्निया की घाटी, यांगटिसी बेसिन आदि क्षेत्र हो सकते हैं।

यहाँ यह बताना आवश्यक है कि प्रदेशों के सीमांकन का आधार भौगोलिक समानता अथवा राजनीतिक इकाई कुछ भी हो सकता है। दोनों प्रकार के प्रदेशों में मौलिक अन्तर पाया जाता है। भौगोलिक प्रदेशों में जहाँ भौगोलिक समानता पायी जाती है, वहीं राजनीतिक प्रदेशों में समानता के बजाय विषमता अधिक दृष्टिगोचर होती है। एक राजनीतिक इकाई में अनेक प्रकार के भौगोलिक प्रदेश हो सकते हैं। उदाहरणार्थ-भारत एक राजनीतिक इकाई है, इसमें अनेक प्रकार के भौगोलिक प्रदेश मिलते हैं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश एक राजनीतिक इकाई है जिसमें अधिक भौगोलिक प्रदेश मिलते हैं; यथा-गंगा का ऊपरी मैदान, गंगा का मध्यवर्ती मैदान, बुन्देलखण्ड का पठार, बघेलखण्ड का पठार आदि।।

क्रमबद्ध एवं प्रादेशिक उपागम की सम्बद्धता ।

क्रमबद्ध एवं प्रादेशिक भूगोल एक-दूसरे से इस प्रकार सम्बद्ध हैं जैसे एक सिक्के के दो पहलू हों। दोनों उपागम एक-दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि क्रमबद्ध या वर्गीकरण भूगोल में प्रत्येक तत्त्व की विशेषताओं के विश्लेषण के बाद सम्पूर्ण ग्लोब पर उसके वितरण-क्षेत्रों का सीमांकन किया जाता है, जबकि प्रादेशिक भूगोल में छाँटे गये प्रदेश के समस्त भौगोलिक तथ्यों का विश्लेषण किया जाता है।

भूगोल के अध्ययन के लिए दोनों उपागम (विधियाँ) आवश्यक हैं। इन दोनों का तालमेल ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार वस्त्र में ताना-बाना मिला रहता है। वस्तुत: भूगोल के तथ्यों को समझने के लिए दोनों ही उपागम आवश्यक होते हैं। क्रमबद्ध तथा प्रादेशिक उपागम एक-दूसरे से इस प्रकार जुड़े हुए हैं। कि इन्हें एक-दूसरे का पूरक कहा जा सकता है। क्षेत्रीय भूगोल के अध्ययन की निरन्तरता तथा क्रमबद्धता क्रमबद्ध उपागम को जन्म देती है। दोनों उपागम अन्योन्याश्रित हैं। भौगोलिक घटनाओं के ठीक से अध्ययन के लिए प्रादेशिक उपागम के साथ क्रमबद्ध उपागम का होना नितान्त आवश्यक हो जाता है।

क्रमबद्ध तथा प्रादेशिक उपागम में अन्तर

जहाँ वर्गीकृत तथा प्रादेशिक उपागमों में प्रतिबद्धता पायी जाती है, वहीं दोनों में निम्नलिखित अन्तर भी पाये जाते हैं
UP Board Solutions for Class 11 Geography Chapter 1 Fundamentals of Physical Geography Chapter 1 Geography as a Discipline img 4
निष्कर्ष रूप से यह कहा जा सकता है कि दोनों विधियों में अन्तर नाममात्र के हैं। दोनों विधियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 7 School: As a Formal Agency of Education

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 7 School: As a Formal Agency of Education (विद्यालय: शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में) are the part of UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 7 School: As a Formal Agency of Education (विद्यालय: शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 7
Chapter Name School: As a Formal Agency of Education
(विद्यालय: शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में)
Number of Questions Solved 34
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 7 School: As a Formal Agency of Education (विद्यालय: शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विद्यालय का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। विद्यालय की आवश्यकता एवं उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

विद्यालय का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of School)

शिक्षा के औपचारिक अभिकरणों में विद्यालय (School) मुख्यतम अभिकरण है। साधारण शब्दों में कहा जा सकता है कि बच्चों को शिक्षा प्रदान करने वाली व्यवस्थित संस्था को विद्यालय या स्कूल कहते हैं। विद्यालय शब्द विद्या + आलय दो शब्दों का संयोग है। आलय का शाब्दिक अर्थ स्थान है। इस प्रकार विद्यालय से अभिप्राय उस स्थान से हैं जहाँ विद्यार्थियों को विद्या प्रदान की जाती है। अंग्रेजी के स्कूल शब्द की व्युत्पत्ति यूनानी शब्द ‘Schola’ से हुई है, जिसका अर्थ है-अवकाश (Leisure)। प्रत्यक्ष रूप से तो विद्यालय और अवकाश के बीच कोई समानता या सम्बन्ध नहीं जान पड़ता, किन्तु इतना अवश्य है कि प्राचीन यूनान में अवकाश का उपयोग आत्म-विकास के लिए किया जाता था। आत्म-विकास का अभ्यास एक विशिष्ट एवं सुनिश्चित स्थान पर होता था, जिसे ‘अवकाश’ कहकर पुकारा गया। इस भाँति, अवकाश-आत्म-विकास (अर्थात् शिक्षा) में जुड़ गया। कालान्तर में अवकाश शिक्षा का समानार्थी बन गया। इस विचार के समर्थन में ए० एफ० लीच ने लिखा है, “वाद-विवाद या वार्ता के स्थान, जहाँ एथेन्स के युवक अपने अवकाश के समय को खेलकूद, व्यवसाय और युद्ध के प्रशिक्षण में बिताते थे, धीरे-धीरे दर्शन और उच्च कलाओं के स्कूलों में बदल गए। एकेडेमी के सुन्दर उद्यानों में व्यतीत किए जाने वाले अवकाश के माध्यम से विद्यालयों का विकास हुआ।”

अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने विद्यालय की निम्नलिखित परिभाषाएँ प्रतिपादित की हैं

  1. जॉन डीवी के अनुसार, “विद्यालय एक ऐसा विशिष्ट वातावरण है जहाँ जीवन के कुछ गुणों और कुछ विशेष प्रकार की क्रियाओं तथा व्यवसायों की शिक्षा इस उद्देश्य से दी जाती है कि बालक का विकास वांछित दिशा में हो।”
  2. ओटावे के अनुसार, “विद्यालय को एक ऐसा सामाजिक आविष्कार मानना चाहिए जो समाज के बालकों के लिए विशेष प्रकार की शिक्षा प्रदान करने में समर्थ हो।’
  3. रॉस के अनुसार, “विद्यालय वे संस्थाएँ हैं, जिनको सभ्य मनुष्य के द्वारा इस उद्देश्य से स्थापित किया जाता है कि समाज में सुव्यवस्थित और योग्य सदस्यता के लिए बालकों की तैयारी में सहायता मिले।”
  4. टी० पी० नन के अनुसार, “विद्यालय को मुख्य रूप से इस प्रकार का स्थान नहीं समझा जाना चाहिए जहाँ किसी निश्चित ज्ञान को सीखा जाता है, वरन् ऐसा स्थान जहाँ बालकों को क्रियाओं के उन निश्चित रूपों में प्रशिक्षित किया जाता है जो इस विशाल संसार में सबसे महान् और सबसे अधिक महत्त्व वाली है।”

विद्यालय की आवश्यकता और उपयोगिता
(Need and Utility of School)

आज विद्यालय शिक्षा का एक आवश्यक, औपचारिक, शक्तिशाली एवं महत्त्वपूर्ण स्थान बन गया है। आधुनिक समाज में विद्यालये की आवश्यकता तथा उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए एस० बालकृष्ण जोशी लिखते हैं, “किसी भी राष्ट्र की प्रगति का निर्माण विधानसभाओं, न्यायालयों और फैक्ट्रियों में नहीं, बल्कि विद्यालयों में होता है।”

उपर्युक्त विवेचन से निष्कर्ष निकलता है कि शिक्षा का सविधिक तथा औपचारिक साधन विद्यालय, व्यक्ति और समाज, दोनों की ही प्रगति के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण, आवश्यक एवं उपयोगी है। किसी भी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व्यवस्था के अन्तर्गत इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। टी० पी० नन का कहना है, एक राष्ट्र के विद्यालय उसके जीवन के वे अंग हैं, जिनका विशेष कार्य है उसकी आध्यात्मिक शक्ति को दृढ़ बनाना, उसकी ऐतिहासिक निरन्तरता को बनाए रखना, उसकी भूतकाल की सफलताओं को सुरक्षित रखना और उसके भविष्य की गारण्टी करना।”

प्रश्न 2.
शिक्षा के एक मुख्य औपचारिक अभिकरण के रूप में विद्यालय के कार्यों का उल्लेख 
कीजिए।
विद्यालय के कार्यों की व्याख्या कीजिए। विद्यालय के चार प्रमुख कार्यों की व्याख्या कीजिए।
वैयक्तिक विकास के विचार से विद्यालय के कार्यों को लिखिए।
उत्तर:

विद्यालय के कार्य
(Functions of School)

विद्यालय के कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य निम्नलिखित हैं|

1.शारीरिक विकास- आधुनिक विद्यालयों का प्रमुख एवं प्रथम कर्तव्य बालक का शारीरिक विकास करना है। बालकों का मानसिक विकास, शारीरिक विकास पर ही निर्भर करता है। अत: बालकों को स्वच्छता व स्वास्थ्यवर्द्धन का विद्यालय के कार्य प्रशिक्षण प्रदान करने हेतु प्रत्येक विद्यालय अपने प्रांगण में खेलकूद और व्यायाम का समुचित प्रबन्ध रखता है। इसके अलावा आजकल विद्यालयों में बच्चों के लिए सन्तुलित आहार एवं चिकित्सा सेवा की व्यवस्था भी रहती है।

2. मानसिक विकास- विद्यालय का दूसरा औपचारिक कार्य प्रशिक्षण बालक का मानसिक एवं बौद्धिक विकास करना है। विद्यालय का । सामाजिक प्रशिक्षण वातावरण एवं क्रियाएँ इस प्रकार की हैं कि बालक में ज्ञान की भूख ” भावात्मक एवं सौन्दर्यात्मक जाग्रत हो और उसमें अधिक-से-अधिक जानने के लिए जिज्ञासा व प्रशिक्षण उत्सुकता पैदा हो। शिक्षा का एक विशिष्ट कार्य बालक की रुचि के नेतृत्व एवं नागरिकता के गुणों का अभिरुचि, योग्यता तथा आवश्यकताओं के अनुसार उसकी मानसिक विकास शक्तियों का विकास करना है। मानसिक रूप से विकसित बालक ही बौद्धिक उन्नति को प्राप्त कर भावी जीवन के मूल्यों का निर्माण कर सकता है।

3. नैतिक एवं चारित्रिक विकास- बालक में नैतिक-चरित्र विकसित करना विद्यालय का तीसरा औपचारिक कर्तव्य है। चारित्रिक विकास की दृष्टि से विद्यालय में इस प्रकार का वातावरण तैयार किया जाना चाहिए जिससे कि बालक में नैतिक मूल्यों का प्रादुर्भाव एवं विकास हो सके। शिक्षार्थियों का नैतिक विकास समाज के वातावरण पर निर्भर करता है। अत: विद्यालय को उपयुक्त सामाजिक वातावरण की रचना तथा उत्तम सामाजिक क्रियाओं की व्यवस्था में भी योगदान करना चाहिए। वस्तुत: सामाजिक वातावरण में सामाजिक क्रियाओं के माध्यम से ही बालकों में नैतिक गुण एवं आदर्श आचरण का विकास सम्भव है।

4. व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण- विद्यालय का एक महत्त्वपूर्ण कार्य यह है कि वह बालक को भावी जीवन में आत्मनिर्भर बनने के लिए व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण प्रदान करे। माध्यमिक शिक्षा की समाप्ति पर आधुनिक विद्यालय बालकों की रुचि एवं रुझान के व्यवसायों में उचित प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। विद्यालय ऐसे विभिन्न व्यवसायों की शिक्षा का प्रबन्ध करते हैं जो शिक्षार्थियों को आगे चलकर अपने निर्दिष्ट व्यवसाय को चुनने में सहायता दे सके और इस भाँति उन्हें जीविकोपार्जन के लिए तैयार कर सके। यही कारण है कि वर्तमान समय में व्यावसायिक और औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थाओं का महत्त्व उत्तरोत्तर बढ़ रहा है।

5. सामाजिक प्रशिक्षण- आधुनिक समय में यह विचारधारा परिपक्व एवं सर्वमान्य होती जा रही है । कि विद्यालय को सामुदायिक केन्द्र के रूप में कार्य करना चाहिए। सामाजिक पुनर्रचना के दायित्व का निर्वाह करने की दृष्टि से विद्यालय सामाजिक समारोहों, सामाजिक कार्यों तथा समाज-सेवा के माध्यम से बालकों को उचित सामाजिक प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।

6. भावात्मक एवं सौन्दर्यात्मक प्रशिक्षण- बच्चों को भावात्मक एवं सौन्दर्यात्मक प्रशिक्षण प्रदान करना भी विद्यालय का एक प्रमुख औपचारिक कार्य हैं। आधुनिक विद्यालयों में संगीत सम्मेलनों, नाटकों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं तथा चित्रकला प्रदर्शनियों का आयोजन कर शिक्षार्थियों को भावात्मक तथा सौन्दर्यात्मक परीक्षण दिया जाता है।

7. नेतृत्व एवं नागरिकता के गुणों का विकास- लोकतन्त्र की सफलता उत्तम नेतृत्व एवं नागरिकता पर निर्भर करती है। विद्यालय के वातावरण तथा गतिविधियों के अन्तर्गत ही बालक-बालिकाओं में श्रेष्ठ नेतृत्व के गुणों का विकास होता है। इसके अतिरिक्त विद्यालय ही बालकों को अपने कर्तव्य एवं अधिकार समझने की तथा उनका उचित उपयोग करने की शिक्षा प्रदान करते हैं। बालक को समाज में अपना योग्य एवं विशिष्ट स्थान बनाने का प्रशिक्षण भी विद्यालय द्वारा ही प्राप्त होता है। स्पष्टत: विद्यालय के प्रधान कर्तव्यों में आदर्श नागरिकता एवं नेतृत्व के गुणों का विकास भी सम्मिलित है।

8. मानव-मात्र का कल्याण- शिक्षा का एकमात्र अभीष्ट लक्ष्य मानव-मात्र का कल्याण करना है। शिक्षा की औपचारिक संस्थाएँ विद्यालय हैं। वस्तुत: विद्यालय ज्ञान के वे महान् प्रकाश-स्तम्भ हैं जो विचलित एवं भूले-भटके मनुष्यों को सत्य का मार्ग दिखाते हैं। ज्ञानयुक्त मानव ही सुखी, समृद्ध, शान्त एवं सम्यक् जीवन जी सकता है। सद्ज्ञान, त्याग, परोपकार एवं नि:स्वार्थ सेवा का भाव जगाता है। इस भॉति सद्ज्ञान एवं वास्तविक शिक्षा प्रदान कर विद्यालय मानव-मात्र का कल्याण करते हैं।

 

प्रश्न 3 घर तथा विद्यालय में सम्बन्ध स्थापित करने के मुख्य उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
घर एवं परिवार बालक की प्रथम पाठशाला है। घर में बालक की प्रारम्भिक शिक्षा की व्यवस्था होती है तथा शिक्षा को विस्तृत रूप प्रदान करने का कार्य विद्यालय द्वारा किया जाता है। इस स्थिति में बच्चों की शिक्षा की सुचारु व्यवस्था के लिए घर तथा विद्यालय में परस्पर अच्छे सम्बन्ध एवं सहयोग का होना अति आवश्यक है। इस सहयोगात्मक सम्बन्ध को स्थापित करने के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित उपायों या विधियों को अपनाना आवश्यक है|

1. अभिभावकों का सम्मेलन- समय-समय पर विद्यालय के घर तथा विद्यालय में सम्बन्ध प्रांगण में अभिभावकों के सम्मेलन आयोजित होते रहने चाहिए और स्थापित करने के उपाय उनमें सभी वर्गों के प्रतिनिधियों को आमन्त्रित किया जाना चाहिए,  ताकि उस बालक के माता-पिता, गुरुजनों तथा समाज के ‘प्रतिनिधियों को परस्पर मिलने का अवसर प्राप्त हो सके। सभी लोग प्रधानाचार्य का सहयोग एकत्र होकर बालकों की पढ़ाई-लिखाई तथा अनुशासन सम्बन्धी विद्यालय द्वारा आर्थिक दण्ड नहीं समस्याओं पर विचार-विमर्श कर सकते हैं और उनका उचित हल खोज सकते हैं। यदि गृह एवं समुदाय के लोग विद्यालय के लगन क्रिया-कलापों में रुचि प्रदर्शित कर सहयोग देंगे तो इससे शिक्षा की व्यवस्था सुन्दर बन सकेगी।

2. बालक की प्रगति-रिपोर्ट- विद्यालय को चाहिए कि वह घर सामायिक जीवन के केन्द्र से सम्बन्ध स्थापित करने हेतु समय-समय पर बालकों की प्रगति-रिपोर्ट अभिभावकों को भेजता रहे। उधर अभिभावकों को भी कर्तव्य है कि वे अपने बालक की पढ़ाई-लिखाई तथा चाल-चलन पर पूरा ध्यान दें और वस्तुस्थिति से शिक्षकों को लगातार अवगत कराते रहें। यदि बालक अध्ययन-कार्य में कम रुचि ले रहा है या अनुशासनहीन । हो रहा है तो अभिभावकों को तत्काल ही विद्यालय से सम्पर्क स्थापित कर समस्या का निराकरण करना चाहिए।

3. प्रधानाचार्य का सहयोग- समस्याग्रस्त बालक के अभिभावक की रिपोर्ट पर प्रधानाचार्य को तुरन्त ध्यान देना चाहिए। सम्भव है बालक स्कूल से घर जल्दी या बहुत देर में पहुँचता हो, गृहकार्य न करता हो, बुरी संगति का शिकार हो गया हो या कक्षा छोड़कर भाग जाता हो आदि। सभी दशाओं में शिकायत मिलने पर प्रधानाचार्य का कर्तव्य है कि वह बालक को सम्बन्धित शिक्षक के सामने बुलाकर उसके बारे में बातचीत करे, समझाए या दण्ड दे और भविष्य में उस पर पूरी निगाह रखें। इस प्रकार प्रधानाचार्य का सहयोग घर तथा विद्यालय को परस्पर जोड़ने में मदद देता है।

4. विद्यालय द्वारा आर्थिक दण्ड नहीं- आर्थिक दण्ड का प्रत्यक्ष भार बालक के माता-पिता पर पड़ता है, जिससे उन्हें परेशानी हो सकती है। अत: अधिकतम सहयोग लेने की दृष्टि से विद्यालय को चाहिए कि बच्चों को कभी भी आर्थिक दण्ड न दिया जाए। । 5. शिक्षक बालक के घर जाए-शिक्षा के विभिन्न साधनों के बीच तालमेल स्थापित करने की दृष्टि से समय-समय पर शिक्षक का बालक के घर जाना आवश्यक है। शिक्षकों को चाहिए कि वे समय निकालकर बालक के अभिभावकों से उनके घर सम्पर्क स्थापित करें, उनसे बालक की समस्या जाने और उनका यथोचित समाधान तलाश करें। सभी शिक्षा-मनोवैज्ञानिकों का मत है कि शिक्षक को समस्यात्मक बालक के घर अनिवार्य रूप से जाना चाहिए।

5. शिक्षकों की सत्यनिष्ठा एवं लगन- शिक्षक को विद्यालय के अन्तर्गत अपने कर्तव्य की पूर्ति अत्यन्त सत्यनिष्ठा, लगन एवं तत्परता के साथ करनी चाहिए। इससे बालकों तथा अभिभावकों पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है, जिसके परिणामत: वे शिक्षकों को अधिकाधिक सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और उनसे सम्पर्क बनाकर प्रसन्न तथा प्रेरित होते हैं।

7. सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार- शैक्षिक अधिकारियों का बालकों के अभिभावकों तथा समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ प्रेम एवं सहानुभूतिपूर्ण तथा मानवीय व्यवहार होना चाहिए। शिक्षा के विभिन्न अभिकरणों का एक-दूसरे से उत्तम व्यवहार, विश्वास और सहयोग की दिशा में एक सार्थक कदम है।

8. सामाजिक कार्य- समाज सेवा, राष्ट्रीय सेवा योजना, श्रमदान, सफाई सप्ताह, बालचर संघ तथा प्रौढ़ शिक्षा आदि सामाजिक कार्य क्योंकि समाज के कल्याण की भावना से परिपूर्ण होते हैं; अत: अभिभावकों, शिक्षकों तथा शिक्षार्थियों को मिलकर इसमें भागीदारी करनी चाहिए। इस प्रकार के सामाजिक क्रियाकलापों से घर, विद्यालय तथा समुदाय के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध बनेंगे।

9. सामुदायिक जीवन के केन्द्र- विद्यालयों की स्थापना समुदाय द्वारा जनकल्याण की भावना से की जाती है; अतः विद्यालयों को सामुदायिक जीवन का सबल एवं सजीव केन्द्र होना चाहिए। इसके लिए विद्यालय के प्रांगण में प्रौढ़ शिक्षा, स्त्री शिक्षा, रात्रि पुस्तकालय एवं वाचनालय तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों की व्यवस्था की जा सकती है। परिवार एवं समुदाय द्वारा विद्यालय के साधनों का उपयोग एक स्वस्थ परम्परा को जन्म देता है, जिसके फलस्वरूप गृह, विद्यालय एवं समुदाय के सदस्यों के बीच गहन सूझ-बूझ तथा अन्तर्सम्बन्ध स्थापित होते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विद्यालय से आप क्या समझते हैं ? विद्यालय को एक प्रभावशाली अभिकरण बनाने के लिए आप क्या सुझाव देंगे ?
शिक्षा के अभिकरण के रूप में विद्यालय का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में बच्चों को औपचारिक रूप से शिक्षा प्रदान करने वाला मुख्यतम अभिकरण ‘विद्यालय’ (School) कहलाता है। विद्यालय शिक्षा का औपचारिक अभिकरण है। सभ्य मानव समाज ने अपनी सोच के बल पर विद्यालयों का विकास किया है। ओटावे के अनुसार, ‘‘विद्यालय को एक सामाजिक आविष्कार मानना चाहिए जो समाज के बालकों के लिए विशेष प्रकार की शिक्षा प्रदान करने में समर्थ है। इसी प्रकार रॉस ने स्पष्ट किया है, “विद्यालय वे संस्थाएँ हैं, जिनको सभ्य मनुष्य के द्वारा इस उद्देश्य से स्थापित किया जाता है कि समाज में सुव्यवस्थित और योग्य सदस्यता के लिए बालकों को तैयारी में सहायता मिले।”

स्पष्ट है कि बच्चों की व्यवस्थित शिक्षा में विद्यालय का विशेष महत्त्व है। अब प्रश्न उठता है कि विद्यालयों को शिक्षा का अधिक प्रभावशाली एवं उपयोगी अभिकरण कैसे बनाया जाए? इसके लिए प्रथम सुझाव यह है कि विद्यालय की अनुशासन व्यवस्था अति उत्तम होनी चाहिए। विद्यालयों का शैक्षिक वातावरण अधिक-से-अधिक सौहार्दपूर्ण, आदर्शपरक तथा मूल्यपरक होना चाहिए। विद्यालय में अध्यापकों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। अध्यापकों को पूर्ण निष्ठा एवं लगन से तथा दायित्वपूर्ण ढंग से अध्यापन कार्य । करना चाहिए। विद्यालय प्रबन्धन द्वारा शिक्षा के स्तर को हर प्रकार से उन्नत करने के सभी सम्भव उपाय किए जाने चाहिए।

प्रश्न 2 शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में विद्यालय का विकास कैसे हुआ है ?
उत्तर:

विद्यालय के विकास के कारक
(Points of Development of Schools)

शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में व्यवस्थित विद्यालयों का विकास सभ्यता के पर्याप्त विकास के बहुत बाद में हुआ है। शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में विद्यालय के विकास को प्रोत्साहन देने वाले मुख्य कारक निम्नलिखित हैं

1. पारम्परिक परिवार के स्वरूप में परिवर्तन- पारम्परिक रूप से परिवार का स्वरूप एवं आकार आज के एकाकी परिवार से नितान्त भिन्न था। परिवार बड़े एवं विस्तृत थे। इस प्रकार के परिवारों में बच्चों की सामान्य शिक्षा की समुचित व्यवस्था परिवार में ही हो जाती थी। परन्तु जब पारम्परिक परिवार ने क्रमशः एकाकी परिवार का रूप ग्रहण किया तो परिवार में बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था हो पाना असम्भव हो गया। अत: बच्चों की शिक्षा की सुचारु व्यवस्था के लिए व्यवस्थित विद्यालयों की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। इसके अतिरिक्त सभ्यता के विकास के साथ-साथ शिक्षा भी अधिक विस्तृत, विशिष्ट एवं जटिल हो गई। इस प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था घर पर सम्भव नहीं थी।

2. परिवार द्वारा दायित्वमुक्त होना- पारम्परिक रूप से बच्चों की शिक्षा का दायित्व परिवार का होता था, परन्तु वर्तमान सभ्यता के विकास के परिणामस्वरूप बच्चों की शिक्षा को सार्वजनिक एवं सामाजिक क्षेत्र का कार्य मान लिया गया। इसके साथ ही शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए विद्यालय का विकास भी हुआ।

3. विद्यालय के विकास के आर्थिक कारण- विद्यालय के विकास के लिए कुछ आर्थिक कारक भी जिम्मेदार हैं। सभ्यता के विकास के साथ-साथ परिवार की आर्थिक समस्याएँ बढ़ने लगीं। इन दशाओं में बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करना परिवार के लिए प्रायः असम्भव हो गया। अत: बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था के लिए विद्यालय का प्रादुर्भाव हुआ।

प्रश्न 3.
विद्यालय की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

विद्यालय की प्रमुख विशेषताएँ
(Main Characteristics of School)

शिक्षा के प्रमुख औपचारिक अभिकरण के रूप में विद्यालय की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं|

  1. विद्यालय एक औपचारिक अभिकरण है। इसका उद्देश्य छात्रों में आदर्श नागरिकों के गुणों को विकसित करना होता है। विद्यालय अपने आप में समाज की एक लघु संस्था है।
  2. विद्यालय एक सामाजिक ढाँचा है। इस व्यवस्था में छात्रों द्वारा विभिन्न विषयों को सीखने का तथा अध्यापकों द्वारा सिखाने का कार्य किया जाता है।
  3. औपचारिक अभिकरण होने के कारण विद्यालय की एक स्पष्ट तथा निश्चित नीति निर्धारित की जाती है जिसका पालन सभी पक्षों द्वारा किया जाता है।
  4. विद्यालय के कार्य सुचारु तथा नियमित रूप से सम्पन्न होते हैं।
  5. विद्यालय की एक अपनी संस्कृति होती है। यह सबके हित के लिए होती है तथा सभी पक्ष इसका पालन करते हैं।
  6. विद्यालय के माध्यम से सामूहिक ढंग से जीवन व्यतीत किया जाता है। इससे जुड़े सभी व्यक्तियों के लिए ‘मैं’ या ‘मेरे’ के स्थान पर ‘हम’ या ‘हमारे’ का भाव प्रबल होता है।
  7. विद्यालय की एक विशेषता यह है कि इस वातावरण में अनेक प्रकार की सामाजिक अन्तर्कियाएँ । सम्पन्न होती हैं। ये अन्तर्कियाएँ विभिन्न बालकों के मध्य, बालकों तथा अध्यापकों के मध्य, अध्यापक तथा अध्यापक के मध्य, अध्यापकों एवं प्रधानाचार्य के मध्य सम्पन्न हुआ करती हैं।

प्रश्न 4.
विद्यालय के सामान्य महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

विद्यालय का सामान्य महत्त्व
(General Importance of School)

विद्यालय के सामान्य महत्त्व का विवरण निम्नलिखित है|

  1. आधुनिक जीवन अत्यधिक जटिल होता जा रहा है। जनसंख्या, आवश्यकताओं तथा मूल्य-वृद्धि ने मनुष्यों को जीवन-व्यापार में असामान्य रूप से व्यस्त कर दिया है। लोगों के पास इतना समय नहीं रह गया है। कि वे अपने बच्चों की शिक्षा की देखभाल कर सकें। अत: शिक्षा सम्बन्धी अधिकतम दायित्व विद्यालय के पास आ गए हैं।
  2. अपने सुनिश्चित उद्देश्य तथा पूर्व-नियोजित शैक्षिक कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यालय बालक के व्यक्तित्व को व्यापक रूप से प्रभावित करता है। यहाँ बालक के व्यक्तित्व का सामंजस्यपूर्ण विकास होता
  3. विद्यालय में राज्य के लिए उपयोगी नागरिक के गुणों; जैसे-धैर्य, सहयोग, उत्तरदायित्व आदि का विकास होता है। वस्तुतः विद्यालय ही एकमात्र वह साधन है जिसके द्वारा शिक्षित नागरिकों का निर्माण सम्भव है।
  4. शिक्षा की प्रक्रिया सामाजिक है और विद्यालय एक प्रमुख सामाजिक संस्था है। विद्यालय में समाज की निरन्तरता और विकास के लिए सभी प्रभावपूर्ण साधन केन्द्रित होते हैं।
  5. विद्यालय राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तान्तरित करने के अभिकरण हैं। इसके अतिरिक्त ये बालकों में बहुमुखी संस्कृति का विकास करने का महत्त्वपूर्ण साधन भी हैं।
  6. विद्यालय गृह एवं व्यापक विश्व को जोड़ने वाली कड़ी हैं। जैसा कि रेमॉण्ट का कथन है, “विद्यालय बाह्य जीवन के बीच की अर्द्ध-पारिवारिक कड़ी है जो बालक की उस समय प्रतीक्षा करता है, जब वह अपने माता-पिता की छत्रछाया को छोड़ती है।”

प्रश्न 5.
घर तथा विद्यालय में पाए जाने वाले सम्बन्ध का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

घर तथा विद्यालय का आपसी सम्बन्ध
(Relation between Home and School)

घर अथवा परिवार तथा विद्यालय के आपसी सम्बन्ध की आवश्यकता एवं महत्त्व को रॉस ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “यदि गृह एवं विद्यालय के बीच सहयोग या सामंजस्य स्थापित न किया जाए तो बालक का अत्यधिक अहित होगा। घर बालक का प्रथम विद्यालय है और विद्यालय एक प्रकार से घर का विस्तार है। शिक्षण संस्था के रूप में विद्यालय घर का स्थान नहीं ले सकता, परन्तु इन दोनों के बीच विशेष सहयोग होता है।” घर अथवा परिवार तथा विद्यालय के आपसी सम्बन्ध का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है

  1. घर तथा विद्यालय दोनों ही समाज की अभिन्न इकाइयाँ हैं तथा बालक के सर्वांगीण विकास के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं।
  2. बच्चों का जीवन घर एवं विद्यालय में ही व्यतीत होता है। बच्चा घर से विद्यालय जाता है तथा विद्यालय से घर के वातावरण में पुनः आ जाता है। इस प्रकार से घर तथा विद्यालय दोनों ही बच्चों के व्यक्तित्व के विकास में निरन्तर योगदान प्रदान करते हैं।
  3. बच्चे की शिक्षा की प्रक्रिया में विद्यालय तथा परिवार दोनों का योगदान होता है। विद्यालय द्वारा दिया गया गृह-कार्य आदि परिवार के सदस्यों की सहायता से पूरा होता है। विद्यालय की विभिन्न शैक्षिक गतिविधियों को सुचारु रूप से पूरा करने के लिए परिवार की सहायता अति आवश्यक होती है।

उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि घर अथवा परिवार तथा विद्यालय परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है। बच्चों की शिक्षा के दृष्टिकोणों से ये दोनों परस्पर पूरक हैं। घर शिक्षा का मुख्यतम अनौपचारिक अभिकरण है, जब कि विद्यालय शिक्षा का मुख्यतम औपचारिक अभिकरण है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्पष्ट कीजिए कि पारिवारिक परिस्थितियों में होने वाले परिवर्तन ने विद्यालय के विकास को प्रोत्साहन दिया है ?
उत्तर:
पारम्परिक रूप से घर या परिवार ही बच्चों को शिक्षा प्रदान करने का कार्य करता था, परन्तु सभ्यता के विकास के साथ-साथ परिवार की परिस्थितियाँ, कार्य-क्षेत्र एवं स्वरूप में उल्लेखनीय परिवर्तन होने लगा। इस स्थिति में घर-परिवार द्वारा बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था कर पाना कठिन हो गया। परिणामस्वरूप, बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए विद्यालय का विकास हुआ। एक अन्य पारिवारिक कारक ने भी विद्यालय के विकास में उल्लेखनीय योगदान प्रदान किया। यह कारक था शिक्षा का अधिक जटिल तथा विस्तृत हो जाना। इस प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था कर पाना परिवार के लिए सम्भव नहीं था। अत: विद्यालय का प्रादुर्भाव एवं विकास हुआ।

प्रश्न 2.
बच्चों की शिक्षा की सुव्यवस्था के लिए घर तथा विद्यालय में समुचित सहयोग की 
आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बच्चों की शिक्षा की सुव्यवस्था के लिए घर तथा विद्यालय के बीच समुचित सहयोग अति आवश्यक है। वास्तव में घर बच्चों की शिक्षा की प्रथम पाठशाला है तथा उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर-परिवार द्वारा शुरू की जाती है। शिक्षा की इस प्रक्रिया को विस्तृत, व्यवस्थित तथा विशिष्ट रूप प्रदान करने का कार्य विद्यालय द्वारा किया जाता है। विद्यालय द्वारा बच्चों को शिक्षित करने के कार्य में परिवार द्वारा महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान किया जाता है। बच्चे की पारिवारिक समस्याओं के निवारण में शिक्षक द्वारा समुचित योगदान दिया जा सकता है। इसी प्रकार से बच्चे को विद्यालय सम्बन्धी समस्याओं के समाधान में भी परिवार को सहयोग आवश्यक होता है। वर्तमान समय में विद्यालय की शिक्षा पर्याप्त व्यय-साध्य हो गई है। यह खर्च परिवार द्वारा ही वहन किया जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि बच्चों की शिक्षा की सुव्यवस्था के लिए घर तथा विद्यालय में समुचित सहयोग अति आवश्यक है।

प्रश्न 3.
आपके विचारानुसार घर तथा विद्यालय में आवश्यक सहयोग कैसे स्थापित किया जा 
सकता है?
उत्तर:
बच्चों की सुचारु शिक्षा के लिए घर-परिवार तथा विद्यालय के बीच में समुचित सहयोग होना। अति आवश्यक है। इस प्रकार का सहयोग स्थापित करने के लिए विद्यालय के शिक्षकों तथा बच्चों के अभिभावकों के बीच निकटता के सम्बन्ध एवं नियमित सम्पर्क बना रहना अति आवश्यक है। इस सम्पर्क के लिए विद्यालय द्वारा शिक्षक-अभिभावक संघ की स्थापना की जानी चाहिए तथा इस संघ की समय-समय पर बैठक होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त शिक्षकों को भी कभी-कभी बच्चों के घर जाना चाहिए। शिक्षकों का दायित्व है कि वे बच्चों की शैक्षिक, अनुशासनात्मक तथा व्यक्तिगत गतिविधियों से उनके अभिभावकों को अवगत कराते रहें। इन सभी उपायों द्वारा घर तथा विद्यालय के बीच आवश्यक सहयोग स्थापित किया जा सकता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शाब्दिक दृष्टिकोण से विद्यालय के अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘विद्यालय’ शब्द ‘विद्या’ तथा ‘आलय’ दो शब्दों के योग से बना है। इस प्रकार से विद्यालय का अर्थ है–विद्या या ज्ञान का घर।

प्रश्न 2 ‘विद्यालय की एक संक्षिप्त परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
“विद्यालय वे संस्थाएँ हैं, जिनको सभ्य मनुष्य के द्वारा इस उद्देश्य से स्थापित किया जाता है कि समाज में सुव्यवस्थित और योग्य सदस्यता के लिए बालकों की तैयारी में सहायता मिले।” –रॉस

प्रश्न 3.
“विद्यालय को एक ऐसा सामाजिक आविष्कार मॉनना चाहिए जो समाज के बालकों के लिए
विशेष प्रकार की शिक्षा प्रदान करने में समर्थ हो।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री ओटावे का है।

प्रश्न 4.
कोई ऐसा कथन लिखिए जो विद्यालयों के महत्त्व एवं उपयोगिता को स्पष्ट करता हो?
उत्तर:
“किसी भी राष्ट्र का निर्माण तथा प्रगति विधानसभाओं, न्यायालयों तथा फैक्ट्रियों में नहीं, बल्कि विद्यालयों में होता है।” एस० बालकृष्ण जोशी

प्रश्न 5. विद्यालय शिक्षा का किस प्रकार का अभिकरण है ?
उत्तर:
विद्यालय शिक्षा का मुख्यतम औपचारिक अभिकरण है।

प्रश्न 6.
आधुनिक युग के विद्यालयों के व्यवस्थित गठन से पूर्व बच्चों की शिक्षा का दायित्व किस सामाजिक संस्था का था ?
उत्तर:
आधुनिक युग के विद्यालयों के व्यवस्थित गठन से पूर्व बच्चों की शिक्षा का दायित्व परिवार का था।

प्रश्न 7.
परिवार ने अपने आपको बच्चों की शिक्षा के दायित्व से मुक्त क्यों कर लिया?
उत्तर:
परिवार के आकार एवं स्वरूप के परिवर्तित हो जाने तथा शिक्षा के जटिल एवं विस्तृत हो जाने के कारण परिवार ने अपने आपको बच्चों की शिक्षा के दायित्व से मुक्त कर लिया।

प्रश्न 8.
विद्यालय के चार मुख्य कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • छात्रों का शारीरिक एवं मानसिक विकास करना,
  • छात्रों का नैतिक एवं चारित्रिक विकास करना,
  • व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण प्रदान करना तथा
  • नेतृत्व एवं नागरिकता के गुणों का विकास करना।

प्रश्न 9.
बच्चों की शैक्षिक-व्यवस्था के दृष्टिकोण से घर तथा विद्यालय के सम्बन्ध को स्पष्ट 
कीजिए।
उत्तर:
बच्चों की शैक्षिक-व्यवस्था के दृष्टिकोण से घर तथा विद्यालय परस्पर पूरक हैं।

प्रश्न 10.
बच्चों के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य की पूर्ति के लिए घर एवं विद्यालय का क्या दायित्व है?
उत्तर:
बच्चों के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य की पूर्ति के लिए घर एवं विद्यालय में पूर्ण सहयोग होना चाहिए।

प्रश्न 11.
“विद्यालय को वास्तव में घर का विस्तृत रूप होना चाहिए।”
उत्तर:
ऐसा किसने कहा? उत्तर जॉन डीवी ने।

प्रश्न 12.
घर एवं विद्यालय में समुचित सहयोग बनाए रखने का मुख्यतम उपाय बताइट।
उत्तर:
घर एवं विद्यालय में समुचित सहयोग बनाए रखने के लिए विद्यालय के शिक्षकों तथा बच्चों के अभिभावकों में निरन्तर सम्पर्क स्थापित होना चाहिए।

प्रश्न 13.
“शिक्षालय न तो ज्ञान की दुकान हैं और न अध्यापक उसके विक्रेता।” प्रस्तुत कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन जॉन एडम्स का है।

प्रश्न 14 शिक्षा के अभिकरण की दृष्टि से विद्यालय और समाज में क्या अन्तर है ?
उत्तर:
विद्यालय शिक्षा का प्रमुख औपचारिक अभिकरण है, इससे भिन्न समाज शिक्षा का एक अनौपचारिक अभिकरण है।

प्रश्न 15 निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. विद्यालय शिक्षा का मुख्यतम अनौपचारिक अभिकरण है।
  2. व्यक्ति की शैक्षिक योग्यता का प्रमाण-पत्र विद्यालय द्वारा ही दिया जाता है।
  3. घर बालक की प्रथम पाठशाला है तथा विद्यालय घर का ही विस्तृत रूप है।
  4. बच्चों की शिक्षा के दृष्टिकोण से धर एवं विद्यालय का परस्पर सहयोग अनावश्यक एवं व्यर्थ है।
  5. बच्चों की सुचारु शिक्षा-व्यवस्था के लिए सभी विद्यालयों में अभिभावक-शिक्षक संघ होना अति आवश्यक है।

उत्तर:

  1. असत्य,
  2. सत्य,
  3. सत्य,
  4. असत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
“विद्यालय बाह्य जीवन के बीच एक अर्द्ध-पारिवारिक कड़ी है, जो बालक की उस समय प्रतीक्षा करता है जब वह अपने माता-पिता की छत्रछाया को छोड़ता है।” यह कथन किसका है?
(क) जॉन डीवी का
(ख) रेमॉण्ट का।
(ग) फ्रॉबेल का।
(घ) टी० पी० नन का

प्रश्न 2.
आधुनिक युग में विद्यालय के विकास का कारक है
(क) परिवार के आकार एवं स्वरूप में परिवर्तन
(ख) शिक्षा का जटिल एवं विस्तृत हो जाना
(ग) शिक्षा-व्यवस्था को सामाजिक दायित्व स्वीकार करना
(घ) उपर्युक्त सभी कारण :

प्रश्न 3.
विद्यालय से आशय है
(क) यह शिक्षा का मुख्य अनौपचारिक अभिकरण है।
(ख) यह शिक्षा का मुख्य औपचारिक अभिकरण है।
(ग) यह शिक्षा का व्यावसायिक अभिकरण है।
(घ) यह शिक्षा का अनावश्यक अभिकरण है।

प्रश्न 4.
विद्यालय की विशेषता नहीं है।
(क) बालक के बहुपक्षीय विकास में योगदान प्रदान करना
(ख) बालक की शैक्षिक योग्यता का प्रमाण-पत्र प्रदान करना
(ग) आजीवन शिक्षा की प्रक्रिया का परिचालन करना
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ।

प्रश्न 5.
घर एवं विद्यालय के आपसी सम्बन्ध को स्पष्ट करने वाला कथन है
(क) घर एवं विद्यालय दो नितान्त भिन्न संस्थाएँ हैं।
(ख) घर पालन-पोषण करता है, जबकि विद्यालय शिक्षा की व्यवस्था करता है।
(ग) घर तथा विद्यालय परस्पर पूरक संस्थाएँ हैं।
(घ) घर एवं विद्यालय परस्पर विरोधी संस्थाएँ हैं।

प्रश्न 6.
घर तथा विद्यालय में सहयोग स्थापित करने का उपाय है
(क) प्रत्येक विद्यालय में शिक्षक-अभिभावक संघ स्थापित करना
(ख) विद्यालय के विभिन्न उत्सवों में अभिभावकों को आमन्त्रित करना
(ग) शिक्षकों का अभिभावकों से निरन्तर सम्पर्क रहना
(घ) उफ्र्युक्त सभी उपाय

प्रश्न 7.
औपचारिक शिक्षा का प्रमुख साधन है
(क) घर
(ख) समाज
(ग) राज्य
(घ) विद्यालय

प्रश्न 8.
विद्यालय शिक्षा के किस अभिकरण के उदाहरण हैं ?
(क) औपचारिक अभिकरण
(ख) अनौपचारिक अभिकरण
(ग) निरौपचारिक अभिकरण
(घ) निष्क्रिय अभिकरण

प्रश्न 9.
विद्यालय के महत्व को दर्शाने वाला कथन है
(क) विद्यालय में ढीला-ढाला अनुशासन होता है।
(ख) विद्यालय एक विस्तृत संस्था है।
(ग) विद्यालय का घर-परिवार से कोई सम्बन्ध नहीं है।
(घ) विद्यालय घर तथा समाज को जोड़ने वाली कड़ी है।
उत्तर:

1. (ख) रेमॉण्ट का,
2. (घ) उपर्युक्त सभी कारण,
3. (ख) यह शिक्षा का मुख्य औपचारिक अभिकरण है,
4. (ग) आजीवन शिक्षा की प्रक्रिया का परिचालन करना,
5. (ग) घर तथा विद्यालय परस्पर पूरक संस्थाएँ हैं,
6. (घ) उपर्युक्त सभी उपाय,
7. (घ) विद्यालय,
8. (क) औपचारिक अभिकरण,
9. (घ) विद्यालय घर तथा समाज को जोड़ने वाली कड़ी है।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 9 Local Bodies: As an Agency of Education

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 9
Chapter Name Local Bodies: As an
Agency of Education
(स्थानीय संस्थाए: शिक्षा के
अभिकरण के रूप में)
Number of Questions Solved 15
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 9 Local Bodies: As an Agency of Education (स्थानीय संस्थाए: शिक्षा के अभिकरण के रूप में)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्थानीय संस्थाओं से आप क्या समझते हैं? स्थानीय संस्थाओं के महत्त्व को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आज के युग में किसी भी राष्ट्र की केन्द्रीय या राज्य सरकार के पास स्थानीय (अर्थात् क्षेत्र विशेष की) समस्याओं के समाधान हेतु समय नहीं होता। ग्राम, कस्बे और नगर की स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय संस्थाओं; जैसे—ग्राम पंचायत, टाउन एरिया या नोटीफाइड एरिया कमेटी, जिला परिषद् या नग़रमहापालिका आदि के माध्यम से किया जाता है। स्थानीय संस्थाएँ अन्य मामलों के साथ-साथ अपने क्षेत्र से जुड़े शिक्षा सम्बन्धी मामलों के विषय में स्वविवेकानुसार निर्णय लेने तथा कार्य करने की पूर्ण स्वतन्त्रता रखती हैं।

स्थानीय संस्थाओं का अर्थ
(Meaning of Local Bodies)

स्थानीय संस्थाओं का तात्पर्य ऐसी संस्थाओं से है जिनका सम्बन्ध किसी स्थान (या क्षेत्र) विशेष से हो और जिनका प्रबन्धं उस स्थान विशेष के निवासियों द्वारा ही किया जाए। स्थानीय संस्थाएँ स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) के अन्तर्गत आती हैं। स्थानीय स्वशासन में स्थानीय जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को क्षेत्र के शासन-प्रबन्ध में भाग लेने का अवसर मिलता है। इस शासन द्वारा नगर, कस्बे या ग्राम में रहने वाले लोगों को अपने स्थानीय मामलों को अपनी आवश्यकता तथा इच्छा के अनुसार प्रबन्ध करने की स्वतन्त्रता होती है।

स्थानीय संस्थाओं का महत्त्व
(Importance of Local Bodies)

स्थानीय संस्थाओं के महत्त्व का वर्णन निम्नलिखित आधारों पर किया जा सकता है

  1. स्थानीय लोगों का शासन से सम्बन्ध-आधुनिक समय में विश्व के अधिकांश देशों में प्रतिनिध्यात्मक लोकतान्त्रिक शासन-पद्धति प्रचलित है। इस पद्धति के अन्तर्गत स्थानीय लोगों का शासन से सीधा सम्बन्ध नहीं होता। वे स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से समस्याओं का कार्यभार हल्का शासन से सम्बन्ध रखते हैं।
  2. समस्याओं का कार्यभार हल्का स्थानीय संस्थाएँ, केन्द्र और राज्य सरकारों से सम्बद्ध छोटी-छोटी समस्याओं की जिम्मेदारी स्वयं अपने ऊपर लेकर उनका कार्यभार हल्का कर देती हैं।
  3. शक्ति का विकेन्द्रीकरण-उत्तम ढंग से शासन-कार्य चलाने के लिए शासन-शक्ति का अधिकाधिक विकेन्द्रीकरण होना चाहिए। यह विकेन्द्रीकरण सिर्फ स्थानीय संस्थाओं द्वारा ही किया जा सकता
  4. स्थानीय विषयों का कुशल प्रबन्ध-केन्द्र या प्रान्त की सरकारों को न तो स्थानीय विषयों/समस्याओं की जानकारी होती है और न ही वे इनमें खास दिलचस्पी रखती हैं। यही कारण है कि वे स्थानीय विषयों का प्रबन्ध कुशलता से नहीं कर पातीं। स्थानीय व्यक्ति एक तो उस क्षेत्र विशेष के वातावरण तथा समस्याओं से भली-प्रकार परिचित होते हैं और साथ ही वहाँ के विकास में रुचि भी रखते हैं। अत: स्थानीय मामलों का प्रबन्ध स्थानीय संस्थाओं के हाथ में ही रहना श्रेयस्कर है।
  5. शिक्षा साधन के रूप में-शिक्षा साधन के रूप में स्थानीय संस्थाएँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे अपने-अपने क्षेत्रों में बालक-बालिकाओं की शिक्षा का दायित्व सँभालती हैं। स्थानीय निकायों द्वारा प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक की व्यवस्था की जाती है। इसके लिए उन्हें राज्य सरकार से आर्थिक सहायता प्राप्त होती है।

टॉकविल ने स्थानीय संस्थाओं का महत्त्व बताते हुए लिखा है, “नागरिकों की स्थानीय संस्थाएँ स्वतन्त्र राष्ट्रों की शक्ति का निर्माण करती हैं। जो महत्त्व विज्ञान की शिक्षा के लिए प्रयोगशालाओं का है वही स्वतन्त्रता का पाठ पढ़ाने के लिए नगर सभाओं का है। एक राष्ट्र स्वतन्त्र सरकार की पद्धति भले ही स्थापित कर ले, किन्तु स्थानीय संस्थाओं के बिना उसमें स्वतन्त्रता की भावना नहीं आ सकती।’

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नगरीय क्षेत्रों में स्थानीय संस्थाओं के शैक्षणिक कार्यों का सामान्य विवरण दीजिए।
उत्तर:

नगरीय क्षेत्रों में स्थानीय संस्थाओं के शैक्षणिक कार्य।
(Educational Functions of Local Bodies in Urban Areas)

नगरीय क्षेत्रों की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए बड़े नगरों में नगरपालिका, नगर महापालिका या नगर निगम बनाए गए हैं। उपनगरों या कस्बों के लिए टाउन एरिया कमेटी एवं नोटीफाइड एरिया कमेटी हैं। इन प्रशासनिक इकाइयों की शासन-व्यवस्था हेतु अधीक्षक के अन्तर्गत विशेष विभागों को संगठन बनाया गया है। इन संस्थाओं के शैक्षणिक कार्य निम्न प्रकार हैं

  1. नगरों की स्थानीय संस्थाएँ प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना करती हैं। ये शासन की शिक्षा नीति के अन्तर्गत बालक-बालिकाओं के लिए माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा का प्रबन्ध भी करती हैं।
  2. 6 – 14 वर्ष आयु वर्ग के समस्त बालक-बालिकाओं को अनिवार्य तथा निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करने के लिए अभिप्रेरित और विवश करती हैं। ‘
  3. राज्य सरकार द्वारा प्राप्त आर्थिक सहायता को विभिन्न शिक्षा संस्थाओं में वितरित करने की व्यवस्था करती हैं।
  4. निजी शासन-प्रबन्ध के अन्तर्गत संचालित विद्यालयों में योग्य एवं प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति करती हैं।
  5. नगरों की स्थानीय संस्थाएँ समय-समय पर विभिन्न विद्यालयों के क्रियाकलापों का शिक्षा विभाग के अधिकारियों द्वारा निरीक्षण कराती हैं।
  6. ये प्राथमिक तथा जूनियर हाईस्कूल स्तर पर परीक्षाओं का संचालन कर परीक्षा परिणाम घोषित कराती हैं।
  7. शैक्षिक प्रचार-प्रसार की दृष्टि से उपयुक्त स्थानों पर सार्वजनिक पुस्तकालय तथा वाचनालय खोलती हैं, उनकी देखभाल करती हैं तथा उन्हें आर्थिक सहायता भी देती हैं।
  8. प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम के अन्तर्गत रात्रि-पाठशालाएँ तथा प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र स्थापित करने हेतु धन प्रदान करती हैं।
  9. ये संस्थाएँ चलचित्र, प्रदर्शन और प्रतियोगिताओं के माध्यम से जनता में शिक्षा के अधिकाधिक प्रचार-प्रसार की व्यवस्था करती हैं।
  10. राज्य सरकार की शैक्षिक-नीतियों का अनुपालन करते हुए स्थानीय स्तर पर सभी के लिए श्रेष्ठ एवं हितकारी शिक्षा का प्रबन्ध करती हैं।

प्रश्न 2.
ग्रामीण क्षेत्र में जिला-परिषद के मुख्य शैक्षणिक कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

जिला-परिषद के शैक्षणिक कार्य
(Educational Functions of District Councils)

नगरीय क्षेत्रों की भाँति ग्रामीण क्षेत्रों में जिला- परिषदें शिक्षा की व्यवस्था करती हैं। प्रत्येक जिले में शिक्षा के सुप्रबन्ध तथा विकास हेतु एक शिक्षा विभाग स्थापित किया गया है जो जिला विद्यालय निरीक्षक तथा उपविद्यालय निरीक्षक की सहायता से शिक्षा का प्रबन्ध करता है। जिला परिषद् के शैक्षणिक कार्य इस प्रकार हैं|

  1. जिला-परिषद् अपने क्षेत्र के अन्तर्गत ग्रामों में आवश्यकतानुसार प्राथमिक तथा जूनियर हाईस्कूल खोलने की व्यवस्था करती है।
  2. यह इन विद्यालयों के लिए भवन, शिक्षण-सामग्री तथा अन्य साधनों का प्रबन्ध भी करती है।
  3. शिक्षा सम्बन्धी अपने दायित्वों की पूर्ति हेतु जिला-परिषद् को शिक्षा शुल्क लगाने का अधिकार प्राप्त
  4. परिषद् इन विद्यालयों के लिए शिक्षकों की नियुक्ति करती है तथा उनके वेतन आदि का प्रबन्ध करती
  5. विद्यालयों के अन्तर्गत खेलकूद एवं व्यायाम, सांस्कृतिक एवं पाठ्य सहगामी क्रियाओं तथा अन्य लाभकारी गतिविधियों का क्रियान्वयन भी परिषद् ही करती है। यह परीक्षा लेने का दायित्व भी निभाती है।
  6. जिला-परिषद् ग्रामीण अंचलों में प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम संचालित करती है तथा उनके लिए धन की व्यवस्था करती है।
  7. जिला परिषद् प्रदेश के शासन द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार ही शिक्षा की व्यवस्था करती है। शिक्षा व्यवस्था के निरीक्षण एवं मूल्यांकन कार्य में यह राज्य द्वारा नियुक्त अधिकारियों की मदद लेती है।
  8. जिला-परिषदें अपने विद्यालयों को शासन द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार ही वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं।

प्रश्न 3.
ग्रामीण स्थानीय संस्था ग्राम पंचायत के मुख्य शैक्षणिक कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

ग्राम पंचायत के शैक्षणिक कार्य
(Educational Functions of Gram Panchayat)

हमारे देश में पंचायती राज्य संशोधित अधिनियम (1954) के अनुसार, 250 से अधिक आबादी वाले प्रत्येक ग्राम में एक ग्राम सभा की व्यवस्था की गई है। इससे कम आबादी वाले ग्रामों को पास के ग्राम में मिलाने का प्रावधान है। कई गाँवों को मिलाकर जिस कार्यकारिणी का गठन होता है उसे ग्राम पंचायत कहते हैं। वस्तुत: ग्राम पंचायत ग्राम सभा की कार्यकारिणी समिति है जो निजी क्षेत्र की उन्नति हेतु विविध कार्यक्रमों की व्यवस्था करती है। ग्राम पंचायत के शिक्षा सम्बन्धी कार्य संक्षेप में इस प्रकार हैं

  1. मात्र ग्राम के अन्तर्गत शिक्षा प्रबन्ध तक सीमित रहने वाली ग्राम पंचायत, बालक-बालिकाओं के लिए प्राथमिक विद्यालय स्थापित कर उनका संचालन करती है।
  2. यह ग्रामवासियों के शैक्षिक विकास हेतु ग्राम पंचायत वाचनालय और पुस्तकालय खोलती है।
  3. ग्रामीण अंचल के लोगों को देश-विदेश के समाचार उपलब्ध कराने की दृष्टि से ग्राम में रेडियो तथा टी० वी० का प्रबन्ध करती है।
  4. अनपढ़ लोगों के लिए रात्रि पाठशालाएँ चलवाती है।
  5. ग्रामवासियों की शैक्षणिक प्रगति में सहायक विभिन्न कुटीर उद्योगों का प्रबन्ध करती है।
  6. शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु मेले, प्रदर्शनियाँ, चलचित्र, नाटक, सम्मेलन, व्याख्यान तथा समारोह आयोजित करती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्थानीय संस्थाओं का व्यवस्थित वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
किसी क्षेत्र-विशेष की शासन- व्यवस्था के लिए गठित की गई प्रशासनिक संस्था को स्थानीय संस्था (Local Body) कहा जाता है। स्थानीय संस्थाओं के वर्गीकरण का मुख्य आधार नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्र है। प्रथम वर्ग में हम उन स्थानीय संस्थाओं को सम्मिलित करते हैं जिनका गठन नगरीय क्षेत्र की व्यवस्था एवं समस्याओं के समाधान के लिए किया जाता है। इस वर्ग की स्थानीय संस्थाओं को पुनः दो वर्गों में बाँटा गया है। प्रथम वर्ग में उन स्थानीय संस्थाओं को सम्मिलित किया जाता है जो बड़े नगरों में गठित की जाती हैं। इस वर्ग की मुख्य स्थानीय संस्थाएँ हैं–नगरपालिका नगर महापालिका तथा नगर निगम नगरीय
क्षेत्र की दूसरे वर्ग की स्थानीय संस्थाएँ छोटे नगरों एवं कस्बों से सम्बन्धित हैं। इस वर्ग की स्थानीय संस्थाएँ हैं-टाउन एरिया कमेटी तथा नोटीफाइड एरिया कमेटी। ग्रामीण क्षेत्र की मुख्य स्थानीय संस्थाएँ दो हैं—जिला-परिषद् तथा ग्राम पंचायत।

प्रश्न 2.
शिक्षा के प्रसार में स्थानीय संस्थाओं का क्या योगदान है?
उत्तर:
स्थानीय संस्थाओं का एक मुख्य कार्य अपने क्षेत्र में शिक्षा की समुचित व्यवस्था करना है। इसके लिए स्थानीय संस्थाएँ अपने उपलब्ध साधनों एवं सुविधाओं के अनुसार शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करती हैं। तथा उनका संचालन करती हैं। इसके अतिरिक्त ये स्थानीय संस्थाएँ अपने क्षेत्र में रहने वाले समस्त परिवारों को अपने बच्चों को विद्यालय भेजने के लिए प्रेरित भी करती हैं। इसके लिए प्रचार-कार्य तथा कुछ प्रलोभन भी दिए जाते हैं, जैसे कि बच्चों को मुफ्त पुस्तकें या वर्दी देना। बच्चों की शिक्षा के अतिरिक्त प्रौढ़ शिक्षा के प्रसार एवं प्रचार में भी स्थानीय संस्थाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्थानीय संस्थाओं से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
किसी क्षेत्र विशेष की प्रशासनिक व्यवस्था तथा समस्याओं के समाधान के लिए गठित की गई प्रशासनिक संस्थाओं को स्थानीय संस्था कहा जाता है।

प्रश्न 2.
“स्थानीय संस्थाएँ सरकार की दूसरे अंगों से बढ़कर जनता को लोकतन्त्र की शिक्षा देती हैं। वे जातियों को शिक्षित बनाती हैं, नागरिक के गुणों के लिए प्रारम्भिक पाठशालाओं का काम लेती हैं तथा जनता को वास्तविक स्वतन्त्रता का अनुभव कराती हैं।”-यह कथन किसका
उत्तर:
प्रस्तुत कथन लॉस्की का है।

प्रश्न 3.
स्थानीय संस्थाओं के गठन का एक मुख्य उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:
स्थानीय संस्थाओं के गठन का एक मुख्य उद्देश्य है–सत्ता का विकेन्द्रीकरण।

प्रश्न 4.
ग्रामीण क्षेत्र की मुख्य स्थानीय संस्था कौन-सी है?
उत्तर:
ग्रामीण क्षेत्र की मुख्य स्थानीय संस्था ग्राम पंचायत है।

प्रश्न 5.
छोटे उपनगरों अथवा कस्बों में स्थापित की जाने वाली स्थानीय संस्थाएँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर:
छोटे उपनगरों अथवा कस्बों में स्थापित की जाने वाली स्थानीय संस्थाएँ हैं-टाउन एरिया कमेटी तथा नोटीफाइड एरिया कमेटी।। प्रश्न 6 बड़े नगरों में स्थापित की जाने वाली स्थानीय संस्थाएँ कौन-कौन सी हैं? उत्तर:बड़े नगरों में स्थापित की जाने वाली स्थानीय संस्थाएँ हैं—नगरपालिका, नगर महापालिका तथा नगर निगम।।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य|

  1. किसी क्षेत्र विशेष की प्रशासन-व्यवस्था के लिए गठित प्रशासनिक संस्था को स्थानीय संस्था कहा जाता है।
  2. स्थानीय संस्थाएँ शैक्षणिक कार्यों में कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं निभातीं।
  3. ग्राम पंचायतों द्वारा प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था के लिए रात्रि पाठशालाओं की व्यवस्था की जाती है।
  4. स्थानीय संस्थाएँ शिक्षा की व्यवस्था मनमाने ढंग से करती हैं।
  5. स्थानीय संस्थाओं के संचालन में जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती

उत्तर:

  1. सत्य,
  2. असत्य,
  3. सत्य,
  4. असत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
किसी क्षेत्र-विशेष की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गठित संस्थाओं को कहते हैं
(क) नगरपालिका
(ख) ग्राम पंचायत
(ग) नोटीफाइड एरिया
(घ) स्थानीय संस्थाएँ

प्रश्न 2.
स्थानीय संस्थाएँ अपने क्षेत्र में शिक्षा की व्यवस्था करती हैं
(क) जैसे-तैसे
(ख) राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार
(ग) स्थानीय सम्पन्न परिवारों के मतानुसार
(घ) अधिक शुल्क लेकर

प्रश्न 3.
ग्राम पंचायत का निर्धारित शैक्षिक दायित्व नहीं है
(क) प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था करना
(ख) प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था करना
(ग) ग्रामीण जनता को आवश्यक सूचनाएँ प्रदान करना
(घ) उच्च शिक्षा की व्यवस्था करना

उत्तर:

1. (घ) स्थानीय संस्थाएँ,
2. (ख) राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार,
3. (घ) उच्च शिक्षा की व्यवस्था करना।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 15 Basic Education System

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 15 Basic Education System (बेसिक शिक्षा-पद्धति) are the part of UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 15 Basic Education System (बेसिक शिक्षा-पद्धति).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 15
Chapter Name Basic Education System
(बेसिक शिक्षा-पद्धति)
Number of Questions Solved 22
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 15 Basic Education System (बेसिक शिक्षा-पद्धति)

विरतृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित बेसिक शिक्षा-पद्धति का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इस शिक्षा-प्रणाली के मुख्य सिद्धान्तों का भी वर्णन कीजिए।
या
बेसिक शिक्षा को बुनियादी शिक्षा क्यों कहा गया है ?
या
बेसिक शिक्षा-प्रणाली के मूलभूत सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बेसिक शिक्षा के जन्मदाता महात्मा गाँधी थे। उनका विचार था कि शिक्षा की रूपरेखा ग्रामीण होनी चाहिए, वह जनसाधारण के लिए होनी चाहिए, भारतीय संस्कृति का उसके द्वारा पुनर्जागरण होना चाहिए और उसमें भारतीय जनता की समस्याओं को सुलझाने की क्षमता होनी चाहिए।

ब्रिटिश शासन काल में भारत में अंग्रेजी शिक्षा का लक्ष्य सरकारी नौकरी के लिए उपयुक्त कर्मचारी तैयार करना था; भारतीयों को शारीरिक, मानसिक तथा चारित्रिक विकास करना नहीं। अत: महात्मा गाँधी ने देश की निर्धन, बेकार, निरक्षर और अस्वस्थ जनता को उन्नति के पथ पर अग्रसर करने के लिए बेसिक शिक्षा योजना का निर्माण किया। गाँधी जी ने हरिजन नामक पत्रिका में राष्ट्रीय शिक्षा की नवीन रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए लिखा है, “शिक्षा से मेरा तात्पर्य बालक और मनुष्य में जो श्रेष्ठतम है, उसका सम्पूर्ण विकास करना अर्थात् शरीर, बुद्धि एवं आत्मा तीनों का विकास करना है। साक्षरता स्वयं में कोई शिक्षा नहीं है, इसलिए मैं बालक की शिक्षा का प्रारम्भ बालक को कुछ हस्तकला सिखाकर उसको प्रशिक्षण के समय से ही उत्पादन करने में समर्थ बनाकर करूंगा। इस प्रकार प्रत्येक स्कूल आत्मनिर्भर हो सकता है, शर्त यह है कि राज्य स्कूल में निर्मित वस्तुओं को खरीद लें।”

बेसिक शिक्षा-पद्धति का प्रारम्भ 1937-38 ई० में हुआ। डॉ० जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी। इस समिति ने एक शिक्षा योजना तैयार की, जिसे वर्धा योजना भी कहा जाता है।

बेसिक शिक्षा का अर्थ
(Meaning of Basic Education)

बेसिक शिक्षा वह शिक्षा है जो बालकों को विभिन्न प्रकार की हस्तकलाओं का प्रशिक्षण देते हुए उनका शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास कर सके, जिससे देश में समाजवादी समाज की स्थापना हो और जनता को सुखी तथा समृद्ध बनाया जा सके। गाँधी जी के अनुसार, “यह जीवन की शिक्षा है जो जन्म से मृत्यु तक की प्रक्रिया में चलती है।” बेसिक शब्द का हिन्दी रूपान्तर ‘आधारभूत’ तथा ‘बुनियादी’ शब्द है।

इसके नामकरण के निम्नांकित कारण

  1. बेसिक शिक्षा को भारत की राष्ट्रीय सम्पत्ति, सभ्यता एवं शैक्षणिक संगठन के आधार के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
  2. यह शिक्षा सामुदायिक जीवन के आधारभूत व्यवसाय से सम्बन्धित है।
  3. इसमें हस्तकला के माध्यम से शिक्षा दी जाती है, जिनका प्रयोग व्यक्ति जीवन-निर्वाह के लिए करते
  4. इसमें बालकों की रुचियों और आवश्यकताओं को सम्बन्धित करके शिक्षा दी जाती है।
  5. यह शिक्षा भारत के प्रत्येक स्त्री-पुरुष की सामान्य सम्पत्ति समझी जाती है।
  6. यह शिक्षा व्यक्ति को अपने वातावरण में सामंजस्य करने के योग्य बनाती है।
  7. प्रत्येक भारतीय बालक के लिए इस शिक्षा की अनिवार्य व्यवस्था की गई है।

बेसिक शिक्षा के मौलिक सिद्धान्त
(Fundamental Principles of Basic Education)

बेसिक शिक्षा-पद्धति के मौलिक सिद्धान्त निम्नलिखित हैं|
1.निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा- गाँधी जी का विचार था कि प्राइमरी शिक्षा प्रत्येक बालक के लिए सुलभ होनी चाहिए। गुलामी के कारण हमारे देश के बालक इस अधिकार से वंचित थे। लोकतन्त्र उसी देश में सफल होता है जहाँ शिक्षा सार्वजनिक हो। इसी कारण महात्मा गाँधी ने 
यह निश्चय किया कि 7 से 14 वर्ष तक के बालकों की शिक्षा अनिवार्य और नि:शुल्क होनी चाहिए। गाँधी जी ने स्वयं लिखा है, “जिस प्रकार के नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा वायु और जल पर सबका अधिकार है और सभी उसे समान रूप से स्वावलम्बन तथा आत्मनिर्भरता प्रयोग में ला सकते हैं, उसी प्रकार शिक्षा भी सबके लिए सुलभ हो शिक्षा का माध्यम मातृभाषा और गरीब लोग भी शिक्षा प्राप्त कर सकें, इसलिए इसका अनिवार्य शिक्षा का आधार हस्तकला और नि:शुल्क होना आवश्यक है।”

2. स्वावलम्बन तथा आत्मनिर्भरता- इस सिद्धान्त का तात्पर्य के जीवनोपयोगी शिक्षा है कि शिक्षकों का वेतन और विद्यालय के अन्य व्यय विद्यालय में बनी। बालक का स्वतन्त्र विकास वस्तुओं को बेचने से आंशिक रूप से निकल आएँ। इस प्रकार से समन्वय समन्वय पर बल शिक्षा संस्थाओं की आर्थिक समस्या का बहुत कुछ हद तक समाधान नागरिकता का आदेश हो जाएगा। इसके अतिरिक्त जब बालक जान जाएँगे कि अपनी शिक्षा के वे स्वयं उत्तरदायी हैं और उसके लिए वे अन्य किसी पर निर्भर नहीं हैं तो उनके अन्तर में आत्मनिर्भरता और स्वावलम्बन के भाव उत्पन्न होंगे और उनमें आत्मविश्वास की भावना का विकास होगा।

3. शिक्षा का माध्यम मातृभाषा- कमेनियस ने मातृभाषा के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए लिखा है, मातृभाषा को सीखने से पहले विदेशी भाषा की शिक्षा प्रदान करना उतना ही विवेकरहित है, जितना कि बच्चे को चलने से पूर्व चढ़ना सिखाना।” इसीलिए बेसिक शिक्षा-पद्धति में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा रखा गया है। प्रथम पाँच कक्षाओं में अंग्रेजी बिल्कुल हटा दी गई है और सभी विषय मातृभाषा के माध्यम से पढ़ाए जाते

4. शिक्षा का आधार हस्तकला- इस पद्धति में हस्तकला को शिक्षा का केन्द्र बनाया गया है। इस पद्धति में बेसिक स्कूलों में किसी हस्तकला से शिक्षा देने की व्यवस्था की जाती है। पाठ्यक्रम के सभी विषय किसी हस्तकला के चारों ओर केन्द्रित करके पढ़ाए जाते हैं। इस पद्धति में ‘क्रिया द्वारा शिक्षा तथा अनुभवे द्वारा सीखना’ दोनों सिद्धान्त निहित हैं। हस्तकलाओं के सम्बन्ध में गाँधी जी ने लिखा है, “प्रत्येक हस्तकार्य आजकल की भाँति यन्त्रवत् नहीं, वरन् वैज्ञानिक ढंग से सिखाया जाएगा ताकि बालक प्रत्येक क्रिया के कार्य-कारण सम्बन्ध को अच्छी तरह समझ जाएँ।” श्री ललित ने लिखा है, “बुनियादी हस्तकला सूर्यमण्डल के केन्द्र के रूप में होनी चाहिए एवं अन्य विषयों को ग्रह नक्षत्रों की भाँति चारों ओर घूमने तथा केन्द्रीय सूर्य से अपने उत्ताप या रोशनी को प्राप्त करना चाहिए।” आधुनिक शिक्षाशास्त्रियों का मत है कि हस्तकला द्वारा दी गई शिक्षा बालक के लिए अधिक मनोवैज्ञानिक होती है, क्योंकि इससे उसके मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार के अनुभव सन्तुलित होते हैं।

5. अहिंसा पर आधारित-बेसिक शिक्षा का आधार गाँधी जी का सत्य और अहिंसा का विचार है। गाँधी जी का यह विचार था कि पाश्चात्य शिक्षा हिंसात्मक प्रवृत्तियों को जन्म देती है, जिससे प्रेम, सहानुभूति, दया, धर्म, उदारता आदि गुणों का लोप होने लगता है, इसीलिए उनका कहना है कि विद्यालय में दण्ड का अभाव होना चाहिए। विद्यालय में इस प्रकार का वातावरण रखना चाहिए, जिससे बालकों में पारस्परिक घृणा, साम्प्रदायिक द्वेष तथा कलह की मनोवृत्तियाँ न विकसित हो सकें।

6. जीवनोपयोगी शिक्षा-तत्कालीन शिक्षा बालक के वास्तविक जीवन से सम्बन्धित नहीं थी। इसलिए बालक को अपने वातावरण से समायोजन करने में कठिनाई अनुभव होती थी और इसके अभाव में वह अपना जीवन भली प्रकार व्यतीत नहीं कर पाता था, इसलिए बेसिक शिक्षा-पद्धति में गाँधी जी ने हस्तकला को प्राकृतिक तथा सामाजिक वातावरण से सम्बन्धित करके बालक के वास्तविक जीवन से सम्बन्ध स्थापित कर दिया। इस पद्धति में शिक्षा बालक की जीवन की परिस्थितियों से सम्बन्धित रहती है और शिक्षा का कार्य । जीवन की वास्तविक परिस्थितियों में सम्पन्न होता है।

7. बालक का स्वतन्त्र विकास- अन्य आधुनिक शिक्षा-पद्धतियों की भॉति बेसिक शिक्षा में भी बालकों की रुचि का ध्यान रखा जाता है और उन्हें पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त होती है। बालकों को स्वतन्त्र अभिव्यक्ति प्रदान करने का अवसर मिलता है। गाँधी जी के अनुसार, “जब शिक्षा का उद्देश्य एक स्वच्छन्द तथा रचनात्मक स्वक्रिया के द्वारा बालक की अधिकतम अभिवृद्धि तथा विकास समझा जाता है तो विद्यार्थियों को स्वयं सोचने, अपनी रुचि के अनुसार अपना कार्य नियोजित करने तथा उन आयोजनों को अपनी ही गति के अनुसार आगे बढ़ने की पर्याप्त स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए।’

8. समन्वय पर बल- किसी हस्तकला के आधार पर शिक्षा देने का तात्पर्य शिक्षा को समन्वित करना है। अर्थात् पाठ्यक्रम के सभी विषयों में शरीर के विभिन्न अवयवों की भाँति एक स्वाभाविक सम्बन्ध स्थापित करना है। इस पद्धति में सभी विषयों की शिक्षा किसी हस्तकला को केन्द्र मानकर दी जाती है। बेसिक शिक्षा में बालक के विकास के तीन आधार बताए गए हैं—प्राकृतिक वातावरण, सामाजिक वातावरण और हस्तकला। हस्तकला के द्वारा पहले दो आधारों पर समन्वय सहज ही हो जाता है, क्योंकि हस्तकला की उत्पत्ति और विकास इन्हीं पर निर्भर है। प्राकृतिक शक्तियों और साधनों के उपयोग के द्वारा मनुष्य कई वस्तुएँ तैयार करता है, उद्योग-धन्धे चलाता है, जिनकी समाज को आवश्यकता है। इन तीनों को केन्द्र मानकर बालक की शिक्षा को समन्वित किया जाता है।

9. नागरिकता का आदर्श बेसिक शिक्षा में नागरिकतों का आदर्श निहित है। यदि इस पद्धति में से नागरिकता का सिद्धान्त निकाल दिया जाए तो यह पद्धति अपना निजत्व खो बैठती है। इसका उद्देश्य ऐसे नागरिक तैयार करना है, जो अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों को बुद्धिमानी से समझ सकें और समाज के क्रियाशील सदस्य बनकर समाज के ऋण को किसी सेवा के रूप में चुका सकें। डॉ० जाकिर हुसैन ने लिखा है, “नवीन शिक्षा या बेसिक शिक्षा भारत के भावी नागरिकों में आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता, आत्मशक्ति एवं सामाजिक सेवा की भावना उत्पन्न करेगी।’

प्रश्न 2.
गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित बेसिक शिक्षा-प्रणाली के मुख्य गुणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
या
बेसिक शिक्षा-प्रणाली की मुख्य विशेषताओं का विस्तार से वर्णन कीजिए।
या
बेसिक शिक्षा के गुण एवं दोषों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
या
बेसिक शिक्षा के गुण-दोषों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:

बेसिक शिक्षा के गुण
(Merits of Basic Education)

इस पद्धति के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं|

1. दार्शनिकता- बेसिक शिक्षा योजना महात्मा गाँधी के आदर्शवादी दर्शन का प्रतीक है। यह भारतीय आदर्शवाद पर आधारित है। यह पद्धति बालकों के अन्दर त्याग, कर्तव्य, संयम, सत्य तथा सेवा की भावना का विकास करने पर जोर देती है।

2. सामाजिकता- यह पद्धति सामाजिक दृष्टि से भी बहुत उपयोगी है, क्योंकि यह बालकों के अन्दर सामाजिक गुणों का विकास करती है। यह पद्धति ऐसे नागरिकों का निर्माण करती है जो अपने कर्तव्य एवं अधिकार को भली-भाँति समझकर अपने उत्तरदायित्व को निभा सकें और समाज के विकास में अपना योगदान दे सकें।

3. मनोवैज्ञानिकता- यह पद्धति आधुनिक मनोविज्ञान के प्रमुख सिद्धान्त ‘क्रिया द्वारा शिक्षा पर आधारित है। इसके द्वारा बालकों की जन्मजात तथा रचनात्मक प्रवृत्तियाँ सन्तुष्ट होती हैं तथा बालकों के हाथ एवं मस्तिष्क का प्रशिक्षण एकसाथ होता है, जिससे सीखी हुई वस्तु का प्रभाव इनके ऊपर स्थायी तथा अमिट हो जाता है।

4. आर्थिक दृष्टि से उपयोगी हमारे देश में वर्तमान शिक्षा प्रणाली का प्रमुख दोष यह है कि बालक शिक्षा प्राप्त करने के बाद केवल नौकरी का इच्छुक रहता है और नौकरी प्राप्त न होने पर अपनी शिक्षा को बेकार समझता है, लेकिन बेसिक शिक्षा-पद्धति से बालक किसी-न-किसी उद्योग में प्रवीण हो जाता है और आगे चलकर वह स्वावलम्बी बन जाता है।

5.क्रिया द्वारा शिक्षा- इस शिक्षा-पद्धति में बालकों को ऐसे अवसर मिलते हैं, जिससे वह स्वयं कार्य करके उपयोगी ज्ञान प्राप्त करता है। इस प्रकार वह स्वयं कार्य करके सीखता है।

6. श्रम का महत्त्व- इस पद्धति में बालकों को किसी हस्तकार्य के माध्यम से शिक्षा देने पर बल दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप बालक के हृदय में श्रम के प्रति आदर की भावना का विकास होता है और वह श्रमिकों के कार्य को हीन दृष्टि से नहीं देखता।

7. समन्वयता- बेसिक शिक्षा-पद्धति की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि किसी उपयुक्त हस्तकला के माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाती है। शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार से की जाती है कि सभी पाठ्य-विषय परस्पर सम्बन्धित रहते हैं। इसे ही शिक्षा में समन्वय एवं अनुबन्ध प्रणाली कहते हैं। इससे समस्याओं के प्रति बालकों में एक जिज्ञासा की भावना उठती है और वे उसे पूर्ण करने में अग्रसर हो जाते हैं। इस प्रकार इस पद्धति में बालक विभिन्न विषयों का ज्ञान अलग-अलग प्राप्त नहीं करता, वरन् दस्तकारी की सहायता से समस्त विषयों को सह-सम्बन्धित करके लाभकारी ज्ञान प्राप्त करता है। इससे शिक्षा एकांगी नहीं रहती।

8. बाल-केन्द्रित शिक्षा- इस शिक्षा-पद्धति में शिक्षा का केन्द्र बेसिक शिक्षा के गुण बालक है। इसके अन्तर्गत बालकों की रुचि, आवश्यकता, अभिवृद्धि दार्शनिकता एवं बुद्धि को ध्यान में रखकर कार्य किया जाता है।

9. लोकतान्त्रिक व्यवस्था- बेसिक स्कूलों में बालकों के स्तर मनोवैज्ञानिकता के अनुकूल बाल संगठनों की व्यवस्था की गई है, जिससे उनमें आर्थिक दृष्टि से उपयोगी अनुशासन की भावना व लोकतान्त्रिक गुणों का विकास हो सके। क्रिया द्वारा शिक्षा धर्म- निरपेक्षता, अस्पृश्यता निवारण, असाम्प्रदायिकता, व्यावहारिक लक्ष्य, नवनिर्माण, ग्रामोत्थान, समाजवादी समाज का निर्माण, विश्व-बन्धुत्व आदि लोकतान्त्रिक गुणः बाल संगठन की प्रमुख बाल-केन्द्रित शिक्षा विशेषताएँ हैं।

10. स्वतन्त्रता प्रधान प्रणाली- इस पद्धति में बालकों के स्वतन्त्रता प्रधान प्रणाली स्वतन्त्र विकास को बहुत अधिक महत्त्व दिया गया है। विद्यालय में सौन्दर्यानुभूति का विकास बालकों को ऐसा वातावरण दिया जाता है, जिससे बालकों की पाठान्तर क्रियाओं का महत्त्व प्रवृत्तियों का स्वतन्त्रतापूर्वक विकास हो सके। ऐसा करने में बालक पर बल खेल के समान ही ज्ञानार्जन करने में भी आनन्द का अनुभव करेगा।

11. सौन्दर्यानुभूति का विकास- यह शिक्षा-पद्धति बालकों के अन्दर सौन्दर्यानुभूति के भावों का विकास करती है। बालक। दिन-प्रतिदिन दूसरों से अधिक सुन्दर तथा सुडौल वस्तुएँ बनाने का प्रयत्न करता है, जिससे उसकी बनाई हुई वस्तुओं की प्रशंसा हो। ऐसे प्रयासों से बालकों में सौन्दर्यानुभूति का विकास होता है। इसके अतिरिक्त बालकों की मूल-प्रवृत्तियों का शोधन और मार्गान्तीकरण भी हो जाता है।

12. पाठान्तर क्रियाओं का महत्त्व- इस पद्धति में विभिन्न पाठान्तर क्रियाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है; जैसे-श्रमदान प्रदर्शनी, उत्सवों का आयोजन, राष्ट्रीय पर्व, भ्रमण, पर्यटन, स्काउटिंग इत्यादि। इनके द्वारा बालकों के व्यावहारिक ज्ञान में वृद्धि होती है।

13. शिक्षकों के चरित्र और व्यक्तित्व पर बल- शिक्षक और बालक के मध्य बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है, इसलिए यह आवश्यक है कि शिक्षक चरित्रवान, ज्ञानवान, क्षमाशील, मृदुभाषी, मिलनसार, कर्तव्यपरायण, विनोदप्रिय, स्फूर्तिवान, परिश्रमी तथा संयमी हों।

14. विद्यालय समाज के वास्तविक प्रतिनिधि- तत्कालीन शिक्षा-प्रणाली का एक दोष यह भी था कि बालक के जीवन, समाज और विद्यालय में कोई सम्बन्ध नहीं था। बेसिक शिक्षा-पद्धति में विद्यालय में समाज के अनुकूल वातावरण रखा जाता है, जिससे बालक अपने वातावरण से सामंजस्य स्थापित कर सकें।

बेसिक शिक्षा के दोष
(Demerits of Basic Education)

बेसिक शिक्षा-पद्धति में कुछ दोष भी हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है|

1. हस्तकला पर आवश्यकता से अधिक बल- बालकों को हस्तकला के माध्यम से शिक्षा देने का। विचार दोषपूर्ण है। बालकों पर प्रारम्भ से हस्तकला लाद देने से उनकी रुचि और स्वतन्त्रता का हनन होता है। आरम्भ से ही बालकों के सम्मुख जीविकोपार्जन का उद्देश्य रख देने से उनका विकास एकांगी रह जाता है।

2. आत्मनिर्भरता का सिद्धान्त दोषपूर्ण है- बेसिक शिक्षा के स्वावलम्बी होने की योजना बहुत-से लोगों को अव्यावहारिक जान पड़ती है। इससे शिक्षकों तथा विद्यार्थियों में धन कमाने की प्रतिस्पर्धा चल पड़ेगी और सारे स्कूल कारखानों का रूप ले लेंगे। इससे बालकों की रुचियों का विकास नहीं हो सकेगा। स्कूल तथा शिक्षकों की सफलता का मूल्यांकन शिक्षा की प्रगति से नहीं, बल्कि बनी हुई वस्तुओं की बिक्री से प्राप्त मूल्य से होगा।

3. कच्चे माल की बरबादी- बेसिक शिक्षा-पद्धति में समस्या छोटे-छोटे बालकों को हस्तकार्य सिखाने की व्यवस्था की गई, कार्य समय का दोषपूर्ण विभाजन जिससे बहुत अधिक मात्रा में कच्चा माल नष्ट होता है।

4. निर्मित वस्तुओं की बिक्री की समस्या- बालक कितना ही घार्मिक शिक्षा की अवहेलना प्रयत्न करें, किन्तु उनके द्वारा निर्मित वस्तुएँ उतनी उत्कृष्ट नहीं होने वैयक्तिक विभिन्नता की उपेक्षा सकतीं जितनी कि कुशल कारीगरों द्वारा निर्मित। अत: इस प्रकार की उत्पादक कार्यों पर आवश्यकता वस्तुओं की बिक्री की समस्या है। दूसरे बेसिक स्कूलों में निर्मित से अधिक बल वस्तुओं की लागत भी अधिक होगी।

5. कार्य समय का दोषपूर्ण विभाजन- बेसिक स्कूलों का उपेक्षा समय विभाग चक्र दोषपूर्ण है। इसके अनुसार बालकों को लगातार साढ़े तीन घण्टे तक हस्तकार्य में लगे रहना पड़ता है। इतनी देर तक अभाव एक ही कार्य करने से बालकों में अरुचि पैदा हो जाती है, जिससे वे। भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल अन्य विषयों की उपेक्षा करने लगते हैं।

6. शिक्षकों के हितों की उपेक्षा- बेसिक शिक्षा-पद्धति में शिक्षकों को बहुत कम वेतन देकर उनसे अधिक परिश्रम लिया जाता। अपूर्ण शिक्षा-पद्धति है। इससे वे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकते और इस व पेशे की ओर से लोगों का ध्यान हटने लगता है।

7. धार्मिक शिक्षा की अवहेलना- भारत एक धर्मप्रधान देश है, लेकिन बेसिक शिक्षा योजना में धर्म की अवहेलना की गई। प्रत्येक युग की शिक्षा में धर्म को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता रहा है, लेकिन महात्मा गाँधी जैसे धार्मिक व्यक्ति द्वारा इसका परित्याग आश्चर्यजनक प्रतीत होता है।

8. वैयक्तिक विभिन्नता की उपेक्षा- इस पद्धति में बालकों को अपनी रुचि तथा मानसिक स्थिति के अनुसार विषय का चयन करने की स्वतन्त्रता नहीं है। जिस बालक की हस्तकौशल में रुचि नहीं होती, उसे हस्तकौशल सीखने के लिए विवश करना अमनोवैज्ञानिक है।

9. उत्पादक कार्यों पर आवश्यकता से अधिक बल- इस पद्धति में उत्पादक कार्यों पर आवश्यकता से अधिक बल दिया गया है। साढ़े पाँच घण्टे के विद्यालय के समय में साढ़े तीन घण्टे से कुछ कम उत्पादक कार्यों की शिक्षा पर व्यय किए जाते हैं। उत्पादक कार्यों पर इतना अधिक समय देना अनुचित है। इससे बालकों को अन्य विषयों के अध्ययन का अवसर नहीं मिलता।

10. पाठ्य-पुस्तकों की उपेक्षा- बेसिक शिक्षा में पाठ्य-पुस्तकों का महत्त्व बहुत कम है, फलस्वरूप इस पद्धति का क्षेत्र बहुत ही सीमित हो जाता है। बालक पुस्तकों से प्राप्त होने वाले लाभ से वंचित रह जाते हैं। और उनके ज्ञान का क्षेत्र शिक्षकों के उपदेशों तक ही सीमित रह जाता है।

11. विज्ञान तथा तकनीकी ज्ञान की उपेक्षा- बेसिक शिक्षा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए तो उपयुक्त हो सकती है, लेकिन नगरों के लिए यह उपयुक्त नहीं है; क्योंकि आजकल विज्ञान और तकनीकी ज्ञान का अत्यधिक प्रचार हो रहा है, परन्तु यह पद्धति हस्तकार्य पर इतना अधिक बल देती है कि विज्ञान और तकनीकी ज्ञान की उपेक्षा स्वतः हो जाती है।

12. कुशल एवं प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव- बेसिक शिक्षा योजना के लिए कुशल, योग्य एवं प्रशिक्षित शिक्षकों का मिलना कठिन है। ऐसे शिक्षक बहुत कम होते हैं, जो किसी भी हस्तकार्य के माध्यम से विभिन्न विषयों का विस्तृत ज्ञान दे सकें। अत: बेसिक शिक्षा में कुशल योग्य तथा प्रशिक्षित शिक्षकों के अभाव की समस्या रहती है।

13. भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल- बेसिक शिक्षा-पद्धति व्यक्ति को बहुत अधिक भौतिकवादी बनाती है और इसमें आध्यात्मिक आदर्शवाद का अभाव है जो कि भारतीय संस्कृति का मूलमन्त्र है।

14. समन्वय की व्यवस्था अव्यावहारिक--इस शिक्षा-पद्धति में समन्वय की व्यवस्था अव्यावहारिक, अस्वाभाविक तथा अमनोवैज्ञानिक मालूम पड़ती है। विषयों को खींचतान कर हस्तकला से सम्बन्धित किया जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि समन्वय पूर्ण रूप से सफल नहीं होता और पाठ्यक्रम की बहुत-सी बातें छूट जाती हैं। कुछ विषयों में तो यह अभाव हो सकता है, परन्तु किसी ऐसी सर्वमान्य कला का अभी तक अनुसन्धान नहीं हुआ है जिसके चारों ओर संभी विषय केन्द्रित किए जा सकें।

15. अपूर्ण शिक्षा-पद्धति- बेसिक शिक्षा-पद्धति को अपूर्ण शिक्षा-पद्धति माना जाता है, क्योंकि इसमें सात वर्ष की आयु से पहले और 14 वर्ष की आयु के बाद की शिक्षा की कोई रूपरेखा प्रस्तुत नहीं की गई है। निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि बेसिक शिक्षा-पद्धति में अनेक दोष पाए जाते हैं, लेकिन यह दोष ऐसे नहीं हैं जिन्हें दूर न किया जा सकता हो। बेसिक शिक्षा-पद्धति में आवश्यक परिवर्तन तथा सुधार करके इसे उपयोगी, व्यावहारिक और लोकप्रिय बनाया जा सकता है। वस्तुत: बेसिक शिक्षा-पद्धति नितान्त मौलिक है। तथा हमारे जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं को पूर्ण करने में सर्वथा समर्थ है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बेसिक शिक्षा-प्रणाली द्वारा निर्धारित किए गए पाठ्यक्रम का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

बेसिक शिक्षा का पाठ्यक्रम
(Curriculum of Primary Education)

बेसिक शिक्षा के पाठ्यक्रम के अन्तर्गत निम्नलिखित विषयों को प्रमुख स्थान दिया गया है|

  1. हस्तकलाएँ- कताई, बुनाई, कृषि, काष्ठकला, चर्म कार्य, फलों तथा साग-सब्जी के उद्योग, मिट्टी के खिलौने बनाना, प्राकृतिक तथा सामाजिक वातावरण के अनुकूल अन्य कोई हस्तकला, जिसका शैक्षिक मूल्य हो।
  2. मातृभाषा।
  3. अंकगणित।
  4. सामाजिक विषय (इतिहास, भूगोल तथा नागरिकशास्त्र)।
  5. सामान्य विज्ञान (बागवानी, वनस्पतिशास्त्र, पशु विद्या, शरीर विज्ञान, रसायनशास्त्र आदि)।
  6. स्वास्थ्य विज्ञान।
  7. संगीत।
  8. चित्रकला तथा ड्राइंग।
  9. हिन्दुस्तानी।

बेसिक शिक्षा में पाँचवीं कक्षा तक सह-शिक्षा का आयोजन है तथा लड़के एवं लड़कियों के लिए एक ही . प्रकार के पाठ्यक्रम की व्यवस्था की गई है। छठी से आठवीं कक्षाओं में लड़कों को सामान्य विज्ञान और लड़कियों को गृह विज्ञान पढ़ना होता है। बेसिक शिक्षा के पाठ्यक्रम के अन्तर्गत अंग्रेजी और धार्मिक शिक्षा को कोई स्थान नहीं दिया गया है।

बेसिक स्कूल में विभिन्न विषयों के समय चक्र निम्नवत् हैं

प्रश्न 2.
बेसिक शिक्षा-प्रणाली की मुख्य समस्या का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

बेसिक शिक्षा की प्रमुख समस्याएँ
(Main Problems of Primary Education)

महात्मा गाँधी के निर्देशानुसार भारत में बेसिक शिक्षा बड़े उत्साह के साथ लागू की गई, परन्तु 1937 ई० से 1947 ई० तक इसकी प्रगति नगण्य रही। बाद में कोठारी आयोग ने इसे स्वीकार तो किया, लेकिन इसका स्वरूप ही बदल दिया। वास्तव में बेसिक शिक्षा की निम्नांकित समस्याओं ने इसकी प्रगति में अवरोध उपस्थित किया है

  1. क्राफ्ट और अन्य विषयों में सह-सम्बन्ध कैसे स्थापित किया जा सकता है ?
  2. क्राफ्ट और उद्योग के उत्पादन का उपयोग कैसे किया जाना चाहिए ?
  3. पाठ्य-विषयों के सन्दर्भ में सामग्री कैसे उपलब्ध हो सकती है ?
  4. पाठ्यक्रम के विषयों का भौतिक और सामाजिक पर्यावरण के साथ किस प्रकार सम्बन्ध स्थापित हो सकता है ?
  5. बेसिक विद्यालयों और अन्य विद्यालयों के छात्रों का स्थान क्या है ?
  6. योग्य अध्यापकों की पूर्ति किस प्रकार की जा सकती है ?
  7. बेसिक विद्यालय समाज के जीवन से क्या सम्बन्ध रखते हैं ?
  8. बेसिक शिक्षा बालिकाओं के लिए किस प्रकार उपयोगी बनाई जा सकती है ?
  9. बेसिक शिक्षा को राजनीति से किस प्रकार दूर रखा जा सकता है ?
  10. बेसिक शिक्षा का मानदण्ड क्यों गिर रहा है ?

प्रश्न 3.
गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित बेसिक शिक्षा-प्रणाली को सफल बनाने के लिए कुछ उपयोगी सुझाव दीजिए।
उत्तर:

बेसिक शिक्षा की सफलता हेतु सुझाव
(Suggestions to Success of Primary Education)

  1. क्राफ्ट और अन्य विषयों में सह-सम्बन्ध लाने के लिए योग्य एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों की खोज की जाए। अध्यापकों में विशेष योग्यता रखने वाले को खोज निकालना शोधकर्ताओं का कार्य है। अत: बेसिक शिक्षा-पद्धति पर विशद् अनुसन्धान किया जाना चाहिए।
  2. बेसिक विद्यालय द्वारा उत्पादित सामग्री स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से बेची जाए तथा सहकारी .. सहयोग से भी काम लिया जाए।
  3. विषय-सामग्री उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न स्रोतों की खोज करना आवश्यक है, लेकिन इस कार्य में देश की आर्थिक कठिनाई को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
  4. पाठ्यक्रम के विषयों का भौतिक और सामाजिक वातावरण के साथ सम्बन्ध रखने के लिए विषय-सामग्री को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप निर्धारित किया जाए। यहाँ भी शोध एवं सर्वेक्षण की आवश्यकता होगी।
  5. बेसिक विद्यालय के छात्रों और अन्य विद्यालयों के छात्रों की उपलब्धियों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए और प्रशिक्षण कॉलेज एवं स्नातकोत्तर छात्रों के लिए ऐसे कार्य दिए जाएँ।
  6. योग्य अध्यापकों की पूर्ति के लिए अधिक संख्या में प्रशिक्षण महाविद्यालयों को खोलकर तथा प्रशिक्षण की सभी सुविधाएँ उपलब्ध करके अधिक संख्या में अध्यापकों को प्रशिक्षित किया जाए। इसके साथ अंशकालीन एवं अभिनवे कोर्स की व्यवस्था भी उचित ढंग से की जाए।
  7. समाज के लोगों को विद्यालय में आमन्त्रित करके उन्हें सहयोग देने के लिए आकर्षित किया जाए और जीवन की क्रियाओं को विद्यालय में ही पूरा कराया जाए।
  8. बालिकाओं के लिए पृथक् कोर्स की व्यवस्था की जाए, जो बालिका जिस प्रकार की शिक्षा लेना चाहे, उसे उसी प्रकार की शिक्षा दी जाए। सभी को एक ढंग की शिक्षा न दी जाए।
  9. शिक्षा राज्य सरकार के नियन्त्रण में न होकर शिक्षाशास्त्रियों के अधीन हो। शिक्षकों में दलगत दूषित राजनीति से अपने को दूर रखने का साहस होना चाहिए। दलगत शिक्षकों को अध्यापन सेवा से अलग कर दिया जाए।
  10. बेसिक विद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा के मानदण्ड को ऊँचा उठाने के लिए सुप्रशिक्षित अध्यापक, कुशल कारीगर एवं योग्य प्रबन्धक रखे जाएँ। इसके साथ ही छात्रों को उत्पादन के लाभ में हिस्सा भी दिया जाए।

तिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बेसिक शिक्षा प्रणाली द्वारा अपनाई जाने वाली शिक्षण-विधि का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या बेसिक शिक्षा की शिक्षण पद्धतियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बेसिक शिक्षा की शिक्षण-विधि निम्नलिखित है

  1. विषयों को हस्तकला पर केन्द्रित करके पढ़ाना-बेसिक स्कूलों में हस्तकला के माध्यम से शिक्षा दी जाती है। विद्यार्थी स्कूल में अधिक समय उसी हस्तकौशल से सम्बन्धित कार्य करते हैं। शेष समय में जो विषय पढ़ाए जाते हैं, वे उसी दिन के कार्य से सम्बन्धित होते हैं। इस प्रकार इस पद्धति में केन्द्रीकरण विधि द्वारा शिक्षा देने का प्रमुख स्थान है।
  2. क्रिया द्वारा शिक्षा-इस पद्धति में विद्यार्थी केवल मात्र निष्क्रिय श्रोता नहीं होता, बल्कि वह अपने हाथ से कार्य करता है। वह बहुत शीघ्र ही हस्तकार्य को सीख जाता है और रुचिपूर्वक उसे करता है। इस प्रकार इस पद्धति में क्रिया की प्रधानता रहती है।
  3. स्वाभाविक रूप से शिक्षा- इस पद्धति में पाठ्यक्रम को सात भागों में विभक्त कर दिया जाता है और प्रत्येक विषय का ज्ञान् क्रम से व्यवस्थित कर लिया जाता है। फिर उसी क्रम के अनुसार विषय का ज्ञान बालकों को दिया जाता है; जैसे-पहली कक्षा में मौखिक वार्तालाप या कहानी के द्वारा बालक को मातृभाषा का ज्ञान कराया जाता है। फिर उसे पढ़ना-लिखना या रचनात्मक कार्य सिखाए जाते हैं।
  4. छोटे-छोटे समूहों में शिक्षा- बालकों के छोटे-छोटे समूह बनाकर उन्हें कुछ निश्चित कार्य दे दिया जाता है, जिसे वे एक-दूसरे के सहयोग से पूरा करते हैं।
  5. भाषण विधि- कुछ विषय ऐसे हैं, जो कि भाषण विधि द्वारा पढ़ाए जाते हैं। सामान्य रूप से बेसिक शिक्षा-पद्धति में आधुनिक मनोवैज्ञानिक शिक्षण विधियों के सभी सूत्रों को प्रयोग में लाया जाता है और शिक्षण को अधिक-से-अधिक मनोवैज्ञानिक बनाने का प्रयास किया जाता है।

प्रश्न 2.
बेसिक शिक्षा-प्रणाली तथा प्रोजेक्ट पद्धति में विद्यमान समानताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
बेसिक शिक्षा-प्रणाली तथा प्रोजेक्ट पद्धति में विद्यमान समानताओं को निम्नलिखित तालिका में दर्शाया गया है

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
महात्मा गाँधी ने कौन-सी शिक्षण पद्धति बनाई थी ? बेसिक शिक्षा प्रणाली के जन्मदाता कौन थे?
उत्तर:
महात्मा गाँधी ने बेसिक शिक्षा पद्धति का प्रतिपादन किया था।

प्रश्न 2.
बेसिक शिक्षा-प्रणाली को किस अन्य नाम से भी जाना जाता है ?
उक्ट
बेसिक शिक्षा-प्रणाली को ‘बुनियादी तालीम’ या ‘बुनियादी शिक्षा के नाम से भी जाना जाता या।

प्रश्न 3.
बेसिक शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत किस आयु वर्ग के बालक-बालिकाओं की शिक्षा की व्यवस्था है ?
सन् 1937 में वर्धा योजना (बेसिक शिक्षा) में प्रस्तावित प्राथमिक शिक्षा के लिए बालकों की क्या आयु वर्ग निश्चित की गई थी?
उत्तर
बेसिक शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत 7 से 14 वर्ष के बालक-बालिकाओं के लिए शिक्षा की व्यवस्था है।

प्रश्न 4.
गाँधी जी ने बेसिक शिक्षा-प्रणाली का मुख्य उद्देश्य क्या निर्धारित किया था ?
उत्तर:
गाँधी जी ने बेसिक शिक्षा-प्रणाली का मुख्य उद्देश्य बालक-बालिकाओं को स्वावलम्बी तथा आत्मनिर्भर बनाना निर्धारित किया था।

प्रश्न 5.
बेसिक शिक्षा-प्रणाली के चार मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(i) नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का सिद्धान्त,
(ii) स्वावलम्बन तथा आत्मनिर्भरता का सिद्धान्त,
(iii) शिक्षा का माध्यम मातृभाषा तथा
(iv) शिक्षा का आधार हस्तकला।

प्रश्न 6.
शिक्षा की कौन-सी विधि शिल्प के माध्यम से शिक्षा पर बल देती है ?
उक्ट
गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित बेसिक-शिक्षा प्रणाली शिल्प के माध्यम से शिक्षा पर बल देती है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. बेसिक शिक्षा-प्रणाली के प्रवर्तक डॉ० जाकिर हुसैन थे।
  2. बेसिक शिक्षा-प्रणाली कुछ जटिल सिद्धान्तों पर आधारित है।
  3. बेसिक शिक्षा-प्रणाली में कठोर अनुशासन का प्रावधान है।
  4. बेसिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा को बनाया गया है।
  5. वर्तमान भारतीय परिस्थितियों में बेसिक शिक्षा-प्रणाली का कोई व्यावहारिक महत्त्व नहीं है।

उन्ट

  1. असत्य,
  2. असत्य,
  3. असत्य,
  4. सत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
बेसिक शिक्षा प्रणाली का निर्धारण किया गया है
(क) अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर
(ख) तत्कालीन भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर
(ग) औद्योगिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर
(घ) कृषि सम्बन्धी दशाओं को ध्यान में रखकर

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन एक गाँधी जी की शिक्षा योजना नहीं है?
(क) बेसिक शिक्षा
(ख) वर्धा योजना
(ग) नयी तालीम
(घ) हस्तशिल्प

प्रश्न 3.
बेसिक शिक्षा-प्रणाली के पाठ्यक्रम में सम्मिलित नहीं किया गया है
(क) हस्तकलाओं की शिक्षा को
(ख) गणित की शिक्षा को
(ग) धार्मिक शिक्षा को
(घ) सामाजिक विषयों की शिक्षा को

प्रश्न 4.
बेसिक शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्मत सामान्य शिक्षा सम्बद्ध है
(क) धार्मिक जीवन से ।
(ख) भौतिक जीवन से
(ग) व्यावहारिक जीवन से
(घ) काल्पनिक जीवन से

प्रश्न 5.
वर्धा शिक्षा योजना कब प्रस्तुत की गई?
(क) अगस्त 1929 में।
(ख) अक्टूबर 1930 में
(ग) अक्टूबर 1937 में
(घ) जनवरी 1939 में।

प्रश्न 6.
“जिस प्रकार वायु और जल पर सबका अधिकार है और सभी इन्हें समान रूप से प्रयोग में ला सकते हैं, उसी प्रकार शिक्षा भी सबके लिए सुलभ हो और निर्धन भी शिक्षा प्राप्त कर सके। इसको अनिवार्य एवं निःशुल्क होना जरूरी है।” यह मान्यता किसकी है?
(क) मैडम मॉण्टेसरी।
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) मदन मोहन मालवीय
(घ) डॉ० राधाकृष्णन

प्रश्न 7.
बेसिक शिक्षा का विचार दिया गया था
(क) पेस्टालॉजी द्वारा।
(ख) महामना मालवीय द्वारा
(ग) महात्मा गाँधी द्वारा
(घ) डा० एनीबेसेंट द्वारा

प्रश्न 8.
कौन-सी शिक्षा प्रणाली शिल्प-केन्द्रित है?
(क) बेसिक शिक्षा
(ख) डाल्टन प्लान
(ग) मॉण्टेसरी विधि
(घ) प्रोजेक्ट विधि
उत्तर:

1. (ख) तत्कालीन भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर,
2. (ग) नयी तालीम,
3. (ग) धार्मिक शिक्षा को,
4. (ग) व्यावहारिक जीवन से,
5. (ग) अक्टूबर 1937 में,
6. (ख) महात्मा गाँधी,
7. (ग) महात्मा गाँधी द्वारा,
8. (क) बेसिक शिक्षा।

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