UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 7 Landforms and their Evolution

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 7 Landforms and their Evolution (भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (i) स्थलरूप विकास की किस अवस्था में अधोमुख कटाव प्रमुख होता है?
(क) तरुणावस्था ।
(ख) प्रथम प्रौढ़ावस्था
(ग) अन्तिम प्रौढ़ावस्था ।
(घ) वृद्धावस्था
उत्तर-(क) तरुणावस्था।

प्रश्न (ii) एक गहरी घाटी जिसकी विशेषता सीढ़ीनुमा खड़े ढाल होते हैं, किस नाम से जानी जाती है?
(क) ‘U’ आकार घाटी ।
(ख) अन्धी घाटी
(ग) गॉर्ज
(घ) कैनियन
उत्तर-(ग) गॉर्ज। ।।

प्रश्न (iii) निम्न में से किन प्रदेशों में रासायनिक अपक्षय प्रक्रिया यान्त्रिक अपक्षय प्रक्रिया की अपेक्षा अधिक़ शक्तिशाली होती है?
(क) आर्द्र प्रदेश
(ख) शुष्क प्रदेश
(ग) चूना-पत्थर प्रदेश
(घ) हिमनद प्रदेश
उत्तर-(क) आर्द्र प्रदेश।

प्रश्न (iv) निम्न में से कौन-सा वक्तव्य लैपीज (Lapies) को परिभाषित करता है?
(क) छोटे से मध्य आकार के उथले गर्त
(ख) ऐसे स्थलरूप जिनके ऊपरी मुख वृत्ताकार वे नीचे से कीप के आकार के होते हैं।
(ग) ऐसे स्थलरूप जो धरातल से जल के टपकने से बनते हैं।
(घ) अनियमित धरातल जिनके तीखे कटक व खाँच हों |
उत्तर-(घ) अनियमित धरातल जिनके तीखे कटक व खाँच हों।

प्रश्न (v) गहरे, लम्बे व विस्तृत गर्त या बेसिन जिनके शीर्ष दीवारनुमा खड़े ढाल वाले व किनारे खड़े व अवतल होते हैं उन्हें क्या कहते हैं?
(क) सर्क
(ख) पाश्विक हिमोढ़
(ग) घाटी हिमनद
(घ) एस्कर
उत्तर-(क) सर्क।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीज़िए
प्रश्न (i) चट्टानों में अधः कर्तित विसर्प और मैदानी भागों में जलोढ़ के सामान्य विसर्प क्या बताते हैं?
उत्तर-बाढ़ प्रभावी मैदानी क्षेत्रों में नदियाँ मन्द ढाल के कारण वक्रित होकर बहती हैं, इसलिए पार्श्व अपरदन अधिक करती है और सामान्य विसर्प का निर्माण होता है जो अधिक चौड़ा होता है। तीव्र ढाल वाले चट्टानी भागों में नदियाँ पार्श्व अपरदन की अपेक्षा अधोतल या गहरा अपरदन करती हैं, इसलिए जो विसर्प बनते हैं वे अधिक गहरे होते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि चट्टानी भागों में अध:कर्तित विसर्प को गहरा होने के कारण गॉर्ज या कैनियन के रूप में देखा जा सकता है जबकि मैदानी भागों में यह सामान्य विसर्प होते हैं। क्योंकि दोनों क्षेत्रों में भिन्न उच्चावच/दाल के कारण नदी अपरदन की प्रकृति में परिवर्तन हो गया है।

प्रश्न (ii) घाटी रन्ध्र अथवा युवाला का विकास कैसे होता है?
उत्तर-चूना-पत्थर चट्टानों के तल पर घुलन क्रिया के कारण छोटे व मध्यम आकार के छिद्रों से घोल गर्यो का निर्माण होता है। घुलन क्रिया की अधिकता एवं कन्दराओं के गिरने से इनका आकार बढ़ता जाता है तथा ये परस्पर मिलते जाने से बहुत बड़ा आकार ग्रहण कर लेते हैं। इनके आकार विस्तार के आधार पर ही इन्हें भिन्न नामों से जाना जाता है; जैसे—विलियन रन्ध्र, घोल रन्ध्र आदि। अतः जब विभिन्न घोल रन्ध्रों के नीचे बनी कन्दराओं की छत गिरती है तो विस्तृत खाइयों का विकास होता है जिन्हें घाटी रन्ध्र (Valley Sinks) या युवाला (Uvalas) कहते हैं।

प्रश्न (iii) चूनायुक्त चट्टानी प्रदेशों में धरातलीय जल प्रवाह की अपेक्षा भौमजल प्रवाह अधिक पाया जाता है, क्यों?
उत्तर-चुनायुक्त चट्टानें अधिक पारगम्य एवं कोमल होती हैं। इन चट्टानों पर भूपृष्ठीय जल छिद्रों से होकर भूमिगत जल के रूप में क्षैतिजह रूप से प्रभावित होता है, क्योंकि इन चट्टानों की प्रकृति जल को नीचे की ओर स्रवण करने की है। अत: चूनायुक्त चट्टानों में मेल प्रक्रिया के कारण धरातलीय जल प्रवाह की अपेक्षा भौमजल प्रवाह अधिक पाया जाता है।

प्रश्न (iv) हिमनद घाटियों में कई रैखिक निक्षेपण स्थलरूप मिलते हैं। इनकी अवस्थिति के नाम बताएँ।
उत्तर-हिमनद घाटियों में निक्षेपणात्मक कार्य द्वारा निम्नलिखित रैखिक स्थलरूप निर्मित होते हैं(1) हिमोढ़, (2) एस्कर, (3) हिमानी धौत मैदान, (4) ड्रमलिन। उपर्युक्त सभी स्थलरूपों का निर्माण हिम के पिघलने पर होता है; अत: ये सभी स्थलरूप हिम के साथ लाए गए मलबे द्वारा निर्मित हैं जो हिम के जल रूप में परिवहन हो जाने पर निक्षेपित मलबे द्वारा निर्मित होते हैं। इसलिए इनकी अवस्थिति उच्च अक्षांशों की अपेक्षा निम्न अक्षांशों पर अधिक होती है।

प्रश्न (v) मरुस्थली क्षेत्रों में पवन कैसे अपना कार्य करती है? क्या मरुस्थलों में यही एक कारक अपरदित स्थलरूपों का निर्माण करता है?
उत्तर-मरुस्थली क्षेत्रों में पवन अपना अपरदनात्मक कार्य अपवाहन एवं घर्षण द्वारा करती है। अपवाहन में पवन धरातल से चट्टानों के छोटे कण व धूल उठाती है। वायु की परिवहन प्रक्रिया में रेत एवं बजरी आदि औजारों की तरह धरातलीय चट्टानों पर चोट पहुँचाकर घर्षण करती है। इस प्रकार मरुस्थलों में पवन अपने इस अपरदनात्मक कार्य से कई रोचक स्थलरूपों का निर्माण करती है और जब पवन की गति अत्यन्त मन्द हो जाती है तथा उसके मार्ग में अवरोध उत्पन्न हो जाता है, निक्षेपण कार्य से स्थलरूपों को निर्मित करती है। मरुस्थलीय क्षेत्रों में पवन के अतिरिक्त प्रवाहित जल भी चादर बाढ़ (Sheet flood) द्वारा कुछ स्थलरूपों का निर्माण करता है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) आई व शुष्क जलवायु प्रदेशों में प्रवाहित जल ही सबसे महत्त्वपूर्ण भू-आकृतिक कारक है। विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर- आर्द्र प्रदेशों में जहाँ अत्यधिक वर्षा होती है, प्रवाहित जल सबसे महत्त्वपूर्ण भू-आकृतिक कारक है जो धरातल के निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी है। प्रवाहित जल के दो तत्त्व हैं। एक धरातल पर परत के रूप में फैला हुआ प्रवाह है; दूसरा रैखिक प्रवाह है। जो घाटियों में नदियों, सरिताओं के रूप में बहता है। प्रवाहित जल द्वारा निर्मित अधिकतर अपरदित । स्थलरूप ढाल प्रवणता के अनुरूप बहती हुई नदियों की आक्रमण युवावस्था से संबंधित हैं। कालांतर में तेज ढाल लगातार अपरदन के कारण मंद ढाल में परिवर्तित हो जाते हैं और परिणामस्वरूप नदियों का वेग कम हो जाता है, जिससे निक्षेपण आरंभ होता है। तेज ढाल से बहती हुई सरिताएँ भी कुछ निक्षेपित भू-आकृतियाँ बनाती हैं, लेकिन ये नदियों के मध्यम तथा धीमे ढाल पर बने आकारों की अपेक्षा बहुत कम होते हैं। प्रवाहित जल की ढाल जितना मंद होगा, उतना ही अधिक निक्षेपण होगा। जब लगातार अपरदन के कारण नदी तल समतल हो जाए, तो अधोमुखी कटाव कम हो जाता है और तटों का पार्श्व अपरदन बढ़ जाता है और इसके फलस्वरूप पहाड़ियाँ और घाटियाँ समतल मैदानों में परिवर्तित हो जाती हैं। शुष्क क्षेत्रों में अधिकतर स्थलाकृतियों का निर्माण बृहत क्षरण और प्रवाहित जल की चादर बाढ़ से होता है। यद्यपि मरुस्थलों में वर्षा बहुत कम होती है, लेकिन यह अल्प समय में मूसलाधार वर्षा के रूप में होती है। मरुस्थलीय चट्टानें अत्यधिक वनस्पतिविहीन होने के कारण तथा दैनिक तापांतर के कारण यांत्रिक एवं रासायनिक अपक्षय से अधिक प्रवाहित होती हैं। मरुस्थलीय भागों में भू-आकृतिकयों का निर्माण सिर्फ पवनों से नहीं बल्कि प्रवाहित जले से भी होता है।

(ii) चूना चट्टानें आई व शुष्क जलवायु में भिन्न व्यवहार करती हैं, क्यों? चूना प्रदेशों में प्रमुख व मुख्य भू-आकृतिक प्रक्रिया कौन-सी है और इसके क्या परिणाम हैं?
उत्तर- चूना-पत्थर एक घुलनशील पदार्थ है, इसलिए चूना-पत्थर आर्द्र जलवायु में कई स्थलाकृतियों का निर्माण करता है जबकि शुष्क प्रदेशों में इसका कार्य आर्द्र प्रदेशों की अपेक्षा कम होता है। चूना-पत्थर एक घुलनशील पदार्थ होने के कारण चट्टान पर इसके रासायनिक अपक्षय का प्रभाव सर्वाधिक होता है, लेकिन शुष्क जलवायु वाले प्रदेशों में यह अपक्षय के लिए अवरोधक होता है। इसका मुख्य कारण यह है। कि लाइमस्टोन की रचना में समानता होती है तथा परिवर्तन के कारण चट्टान में फैलाव तथा संकुचन नहीं होता है, जिस कारण चट्टान का बड़े-बड़े टुकड़ों में विघटन अधिक मात्रा में नहीं हो पाता है। चूना-पत्थर या डोलोमाइट चट्टानों के क्षेत्र में भौमजल द्वारा घुलन क्रिया और उसकी निक्षेपण प्रक्रिया से बने ऐसे स्थलरूपों को कार्ट स्थलाकृति का नाम दिया गया है। अपरदनात्मक तथा निक्षेपणात्मक दोनों प्रकार के स्थलरूप कार्ट स्थलाकृतियों की विशेषताएँ हैं। अपरदित स्थलरूप घोलरंध्र, कुंड, लेपीज और चूना-पत्थर चबूतरे हैं। निक्षेपित स्थलरूप कंदराओं के भीतर ही निर्मित होते हैं। चूनायुक्त चट्टानों के अधिकतर भाग गर्ते व खाइयों के हवाले हो जाते हैं और पूरे क्षेत्र में अत्यधिक अनियमित, पतले व नुकीले कटक आदि रह जाते हैं, जिन्हें लेपीज कहते हैं। इन कटकों या लेपीज का निर्माण चट्टानों की संधियों में भिन्न घुलन क्रियाओं द्वारा होता है। कभी-कभी लेपीज के विस्तृत क्षेत्र समतल चुनायुक्त चबूतरों में परिवर्तित हो जाते हैं।

(iii) हिमनद ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों को निम्न पहाड़ियों व मैदानों में कैसे परिवर्तित करते हैं या किस प्रक्रिया से यह कार्य संपन्न होता है, बताइए?
उत्तर- प्रवाहित जल की अपेक्षा हिमनद प्रवाह बहुत धीमा होता है। हिमनद प्रतिदिन कुछ सेंटीमीटर या इससे कम से लेकर कुछ मीटर तक प्रवाहित हो सकते हैं। हिमनद मुख्यतः गुरुत्वबल के कारण गतिमान होते हैं। हिमनदों से प्रबल अपरदन होता है, जिसका कारण इसके अपने भार से उत्पन्न घर्षण है। हिमनद द्वारा घर्षित चट्टानी पदार्थ इसके तल में ही इसके साथ घसीटे जाते हैं या घाटी के किनारों पर अपघर्षण व घर्षण द्वारा अत्यधिक अपरदन करते हैं। हिमनद, अपक्षयरहित चट्टानों का भी प्रभावशाली अपरदन करते हैं, जिससे ऊँचे पर्वत छोटी पहाड़ियों व मैदानों में परिवर्तित हो जाते हैं। हिमनद के लगातार संचालित होने से हिमनद का मलबा हटता रहता है, जिससे विभाजक नीचे हो जाता है और कालांतर में ढाल इतने निम्न हो जाते हैं कि हिमनद की संचलन शक्ति समाप्त हो जाती है तथा निम्न पहाड़ियों व अन्य निक्षेपित स्थलरूपों वाला एक हिमानी धौत रह जाता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर ||

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. मरुस्थलों में कोमल और कठोर शैलों के लम्बवत् एकान्तर क्रम से स्थित होने पर बनते हैं
(क) ज्यूगेन
(ख) जालीदार शैल
(ग) छत्रक शिला
(घ) यारडंग
उत्तर-(घ) यारडंग।

प्रश्न 2. अन्धी घाटियाँ अपरदन के किस कारक से उत्पन्न होती हैं?
(क) नदी से ।
(ख) हिमानी से
(ग) पवन से
(घ) भूमिगत जल से
उत्तर-(घ) भूमिगत जल से।

प्रश्न 3. निम्नलिखित में से कौन-सी आकृति वायु द्वारा बनती है? |
(क) विसर्प ।
(ख) डुमलिन
(ग) बालुका-स्तूप
(घ) जलोढ़ पंख
उत्तर-(ग) बालुका-स्तूप।

प्रश्न 4. यारडंग का सम्बन्ध निम्नलिखित में से अपरदन के किस अभिकर्ता से है?
(क) भूमिगत जल
(ख) नदी
(ग) पवन
(घ) हिमानी
उत्तर-(ग) पवन।।

प्रश्न 5. निम्नलिखित में से कौन-सी आकृति नदी के कार्य द्वारा बनती है?
(क) हिमोढ़
(ख) चाप झील
(ग) अवकूट
(घ) इन्सेलबर्ग
उत्तर-(ख) चाप झील।

प्रश्न 6. अपक्षेप मैदान का सम्बन्ध निम्नलिखित में से अपरदन के किस अभिकर्ता से है?
(क) नदी
(ख) हिमानी ।
(ग) पवन
(घ) भूमिगत जल
उत्तर-(क) नदी।

प्रश्न 7. ‘यू’ -आकार की घाटी का सम्बन्ध निम्नलिखित में से अपरदन के किस अभिकर्ता से है?
(क) नदी ।
(ख) पवन
(ग) भूमिगत जल
(घ) हिमानी
उत्तर-(घ) हिमानी। ।

प्रश्न 8. “बालुका-स्तूप” का सम्बन्ध निम्नलिखित अपरदन अभिकर्ताओं में से किस अभिकर्ता से है?
(क) नंदी
(ख) भूमिगत जल
(ग) हिमानी
(घ) पवन
उत्र्तर-(घ) पवन।

प्रश्न 9. निम्नलिखित स्थलाकृतियों में से कौन एक नदी के अपरदन कार्य से सम्बन्धित है?
(क) ‘यू’-आकार की घाटी
(ख) वी’-आकार की घाटी ।
(ग) बरखान।
(घ) यारडंग
उत्तर-(ख) ‘वी’-आकार की घाटी।

प्रश्न 10. निम्नलिखित में से कौन-सी स्थालाकृति हिमानी के अपरदन से बनी है?
(क) अंधी घाटी
(ख) हिमोढ़
(ग) तटबंध
(घ) लोयस
उत्तर-(ख) हिमोढ़।

प्रश्न 11. प्राकृतिक पुल अपरदनात्मक स्थलरूप है
(क) बहते जल का
(ख) भूमिगत जल का
(ग) हिमानी का ।
(घ) पवन का
उत्तर-(ख) भूमिगत जल का।

प्रश्न 12. निम्नलिखित में से कौन-सी स्थलाकृति नदी द्वारा निर्मित है?
(ख) बरखान
(ग) गोखुर झील
(घ) कन्दरा
उत्तर-(ग) गोखुर झील।

प्रश्न 13. हिमोढ़ के निर्माण के लिए निम्नलिखित में से कौन अभिकर्ता उत्तरदायी है?
(क) वायु ।
(ख) नदी
(ग) हिमानी
(घ) भूमिगत जल
उत्तर-(ग) हिमानी।।

प्रश्न 14. ‘बरखान का सम्बन्ध निम्नलिखित अपरदन अभिकर्ताओं में से किससे है?
(क) भूमिगत जल
(ख) पवन
(ग) हिमानी
(घ) नदी ।
उत्तर-(ख) पवन।

प्रश्न 15. निम्नलिखित में से किस स्थलरूप का निर्माण हिमानी द्वारा किया गया है?
(क) बालुका स्तूप
(ख) U-आकार की घाटी ।
(ग) V-आकार की घाटी ।
(घ) घोल रन्ध्र
उत्तर-(ख) U-आकार की घाटी।।

प्रश्न 16. निम्नलिखित स्थलाकृतियों में से कौन भूमिगत जल का अपरदनात्मक कार्य है?
(क) कन्दरा स्तम्भ
(ख) आश्चुताश्म
(ग) निश्चुताश्म
(घ) प्राकृतिक पुल
उत्तर-(घ) प्राकृतिक पुल।। ||

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. टार्न क्या है? इसका निर्माण कैसे होता है?
उत्तर- नदी द्वारा निर्मित झील को टार्न कहते हैं। इसका निर्माण पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन की क्रिया द्वारा खिलाखण्डों से नदी का मार्ग अवरुद्ध हो जाने के फलस्वरूप होता है।

प्रश्न 2. इन्सेलबर्ग क्या है? ये कहाँ मिलते हैं?
उत्तर- वायु अपरदन द्वारा निर्मित गोलाकार पहाड़ियों को इन्सेलबर्ग कहते हैं। यह स्थलाकृति अल्जीरिया तथा नाइजीरिया (अफ्रीका) में अधिक मिलती है।

प्रश्न 3. अपरदन के कारकों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर- 1. बहता हुआ जल (नदी), 2. हिमानी, 3. पवन, 4. सागरीय लहरें तथा 5. भूमिगत जल।

प्रश्न 4. नदी का अपरदन कितने प्रकार का होता है?
उत्तर- नदी का अपरदन दो प्रकार का होता है

  1. लम्बवत् अपरदन-जिसमें नदी की तलहटी गहरी की जाती है।
  2. पाश्विक अपरदन–जिसमें नदी के किनारे क्रमानुसार कट जाते हैं, इसी के द्वारा नदी टेढ़ा-मेढ़ा मार्ग बनाकर चलती है।

प्रश्न 5. बहते हुए जल (नदी) की अपरदन क्रिया से उत्पन्न दो स्थलाकृतियों के नाम लिखिए।
उत्तर- 1. जल-प्रपात तथा 2. ‘वी’-आकार की घाटी।

प्रश्न 6. नदी के दो निक्षेपणात्मक आकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर- 1. बाढ़ का मैदान तथा 2. डेल्टा।

प्रश्न 7. लटकती घाटी अपरदन के किस साधन से उत्पन्न होती है?
उत्तर-लटकती घाटी हिमानी द्वारा उत्पन्न होती है।

प्रश्न 8. हिमोढ अपरदन के किस कारक द्वारा निर्मित होते हैं?
उत्तर-हिमोढ़ हिमानी के निक्षेपणात्मक कारक से निर्मित होते हैं।

प्रश्न 9. कार्ट स्थलाकृतियाँ कहाँ पायी जाती हैं?
उत्तर-कार्ट स्थलाकृतियाँ चूना-पत्थर जैसी घुलनशील चट्टानों में पायी जाती हैं।

प्रश्न 10. बालुका-स्तूप कहाँ और कैसे बनते हैं?
उत्तर-बालुका-स्तूप मरुस्थलों में पवन की निक्षेप क्रिया से बनते हैं।

प्रश्न 11. कन्दरा स्तम्भ कैसे बनते हैं?
उत्तर-कन्दरा स्तम्भों का निर्माण घुलनशील शैलों के क्षेत्रों में भूमिगत जल की घुलन क्रिया तथा निक्षेपण के द्वारा होता है।

प्रश्न 12. नदी की जीर्णावस्था (वृद्धावस्था) में बनने वाली किसी एक आकृति का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-नदी की जीर्णावस्था (वृद्धावस्था) में बनने वाली प्रमुख आकृति डेल्टा है।

प्रश्न 13. गंगा-ब्रह्मपुत्र का डेल्टा किस प्रकार की डेल्टा है?
उत्तर-गंगा-ब्रह्मपुत्र का डेल्टा चापाकार डेल्टा है।

प्रश्न 14. पंजाकार डेल्टा का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर-मिसीसिपी डेल्टा।

प्रश्न 15. हिमानी द्वारा निर्मित मुख्य अपरदनात्मक स्थलाकृतियों के नाम बताइए।
उत्तर-हिमानी द्वारा निर्मित मुख्य अपरदनात्मक स्थलाकृतियाँ हैं—‘यू’ आकार की घाटी, लटकती घाटी, सर्क, हिमश्रृंग, पुच्छ तथा गिरिशृंग।

प्रश्न 16. वायु द्वारा निर्मित मुख्य अपरदनात्मक स्थलाकृतियों के नाम बताइए।
उत्तर-वायु द्वारा निर्मित मुख्य अपरदनात्मक स्थलाकृतियाँ हैं—वातगर्त, इन्सेलबर्ग, छत्रक, शिला, भूस्तम्भ, ज्यूगेन, यारडंग तथा ड्राइकान्टर।

प्रश्न 17. जलोढ़ पंख से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-प्रौढ़ावस्था में नदी द्वारा निर्मित भू-आकृतियों में जलोढ़ पंख मुख्य आकृति है। पर्वतपदीय भागों में नदी बजरी, पत्थर, कंकड़, बालू, मिट्टी आदि पदार्थों का निक्षेपण शंकु के रूप में करती है। इनके बीच से अनेक छोटी-छोटी धाराएँ निकलती है। इस प्रकार के अनेक शंकु मिलकर पंखे जैसी आकृति का निर्माण करते हैं जिससे उन्हें जलोढ़ पंख का नाम दिया गया है।

प्रश्न 18. नदी की युवावस्था में बनने वाली दो आकृतियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-1. ‘V’ आकार की घाटी तथा 2. जल-प्रपात या झरना।

प्रश्न 19. नदी की प्रौढावस्था में बनने वाली दो आकृतियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-1. जलोढ़ पंख तथा 2. नदी विसर्प।

प्रश्न 20. हिमानी के निक्षेपण कार्य से निर्मित दो भू-आकृतियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-1. हिमनद हिमोढ़ तथा 2. एस्कर।

प्रश्न 21. ‘यू’ आकार की घाटी की किन्हीं दो विशेषताओं को लिखिए।
उत्तर-1. इसका तल चौरस तथा गहरा होता है।
2. इसके किनारों का ढाल खड़ा होता है।

प्रश्न 22. बरखान का निर्माण किस क्रिया द्वारा होता है ?
उत्तर-बरखान का निर्माण पवन की निक्षेपणात्मक क्रिया द्वारा होता है।

प्रश्न 23. अन्धी घाटी किसे कहते हैं ?
उत्तर-जब धरातलीय नदियाँ घोल रन्ध्र, विलयन रन्ध्र आदि छिद्रों से प्रवेश करती हैं तो आगे चलकर अचानक ही इनका जल समाप्त हो जाता है। इन्हें ही अन्धी घाटियाँ कहते हैं।

प्रश्न 24. हिमरेखा क्या होती है?
उत्तर-हिमरेखा वह काल्पनिक रेखा है जिससे ऊपर आर्द्रता सदैव हिम के रूप में पाई जाती है।

प्रश्न 25. पाश्विक हिमोढों का आधिक्य कहाँ मिलता है?
उत्तर-पाश्विक हिमोढ़ों का आधिक्य ग्रीनलैण्ड एवं अलास्का में अधिक मिलता है। यहाँ इनकी ऊँचाई 300 मीटर तक होती है।

प्रश्न 26. हिमानी जलोढ़ निक्षेप द्वारा कौन-कौन-सी स्थलाकृतियाँ बनती हैं?
उत्तर-हिमानी जलोढ़ निक्षेप द्वारा एस्कर, केम तथा हिमनद अपक्षेप मैदान आदि स्थलाकृतियाँ बनती

प्रश्न 27. हिमनद कटक (एस्कर) क्या व कैसे बनते हैं?
उत्तर-हिमानी निक्षेप से बने लम्बे किन्तु कम ऊँचाई वाले टेढ़े-मेढ़े कटक हिमानी कटक कहलाते हैं। देखने पर ये कटक प्राकृतिक बाँध जैसे प्रतीत होते हैं। ये बालू, मिट्टी और गोलाश्म से निर्मित होते हैं। इन पदार्थों का निक्षेपण हिमानी के अन्दर बहने वाली जल-धाराओं द्वारा लाए गए अवसाद से होता है।

प्रश्न 28. डेल्टा और एस्चुअरी में अन्तर बताइए।
उत्तर-डेल्टा–त्रिभुजाकार होता है जो नदी मुहाने पर निक्षेपण की क्रिया से बनता है। एस्चुअरी-‘वी’ (V) आकृति में किसी नदी का ज्वारीय मुहाना है।

प्रश्न 29. घोल रन्ध्र (स्वालो होल्स) से सम्बन्धित स्थलाकृतियों के नाम लिखिए।
उत्तर-घोल रन्ध्र से सम्बन्धित स्थलाकृतियों में विलयन रन्ध्र, डोलाइन, घोलपटल, ध्वस्त रन्ध्र, कार्ट खिड़की, कार्ट झील, युवाला, पोलिज आदि प्रमुख हैं। |

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. नदी की प्रौढावस्था का विवरण दीजिए।
उत्तर-यह नदी की मैदानी अवस्था होती है। युवावस्था के बाद जैसे ही नदी पर्वत प्रदेश से मैदानों में प्रवेश करती है, उसका वेग एकदम मन्द हो जाता है। इस अवस्था में नदी में सहायक नदियों के मिलने से जल की मात्रा तो बढ़ जाती है परन्तु जल में तेज गति न होने के कारण उसकी वहन शक्ति क्षीण हो जाती है। अतः पर्वतीय क्षेत्रो से लाए गए अवसाद तथा शिलाखण्डों को नदी पर्वतपदीय क्षेत्रों में ही जमा कर देती है, जिसे पर्वतपदीय मैदान कहते हैं। गंगा नदी ऋषिकेश एवं हरिद्वार के निकट ऐसे ही अवसादों का निक्षेप करती है। इस अवस्था में नदी गहरे कटाव की अपेक्षा पाश्विक अपरदन (Lateral Erosion) अधिक करती है। कभी-कभी नदी क्रा एक किनारा खड़े ढाल वाला तथा दूसरा प्रायः समतल होता है। ऐसी दशा में नदी खड़े किनारे की ओर अपरदन तथा समतल किनारे की ओर निक्षेपण का कार्य करती है। इस अवस्था में नदी अपनी घाटी को चौड़ा करने का कार्य ही अधिक करती है।।

प्रश्न 2. नदी के निक्षेपणात्मक कार्य का विवरण दीजिए।
उत्तर-समतल मैदानी क्षेत्रों में प्रवाहित होने वाली नदी में वेग की कमी के कारण भारी पदार्थों को बहाकर ले जाने की क्षमता कम रह जाती है; अतः नदी उन पदार्थों का अपनी तली एवं किनारों पर निक्षेप करने लगती है। बाढ़ के मैदानों एवं डेल्टाओं का निर्माण इसी निक्षेपण क्रिया का परिणाम है। पर्वतीय क्षेत्रों से जैसे ही नदी मैदानों में प्रवेश करती है, भारी-भारी शिलाखण्डों को वहीं पर्वतीय प्रदेशों में छोड़ देती है जो पर्वतपदीय मैदान कहलाता है। मैदानी क्षेत्रों में हल्के पदार्थों का ही निक्षेप हो पाता है, जबकि डेल्टाई क्षेत्रों तक बारीक मिट्टी एवं बालू के महीन कण ही पहुँच पाते हैं। सागर अथवा महासंगार में मिलने से पहले नदी अपने डेल्टा का निर्माण निक्षेपण कार्य द्वारा ही करती है।

प्रश्न 3. नदी के परिवहन सम्बन्धी कार्य को समझाइए।
उत्तर-नदियों का दूसरा महत्त्वपूर्ण कार्य शैलचूर्ण या मलबे का स्थानान्तरण है। यह स्थानान्तरण नदी की घाटी में उसके उद्गम से मुहाने तक कहीं भी हो सकता है। यही स्थानान्तरण नदी का परिवहन कार्य कहलाता है। प्रत्येक नदी में परिवहन की एक सीमा होती है। इस सीमा से अधिक जलोढ़क होने पर नदी उसका परिवहन नहीं कर पाती है। वस्तुतः नदी के वेग, जल की मात्रा, प्रवणता आदि कारकों से नदी को जो शक्ति प्राप्त होती है उसमें घर्षण तथा अपरदन के पश्चात् जो शक्ति बचती है उससे परिवहन करती है। इससे निम्नांकित सूत्र द्वारा व्यक्त किया जा सकता है

परिवहन = नंदी की कुल शक्ति – घर्षण में नष्ट शक्ति – अपरदन में नष्ट शक्ति

गिलबर्ट के अनुसार नदी की परिवहन शक्ति उसके वेग में छठे घात के तुल्य होती है अर्थात् यदि नदी । का वेग दुगुना हो जाए तो उसकी परिवहन शक्ति 64 गुना बढ़ जाती है।

प्रश्न 4. नदी के अपरदनात्मक कार्य से उत्पन्न दो स्थलाकृतियों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-नदी की युवावस्था मे अपरदन द्वारा उत्पन्न दो स्थलाकृतियाँ निम्नलिखित हैं
1. V’ आकार की घाटी-पर्वतीय क्षेत्र में नदी को निम्न कटाव अधिक सक्रिय होने के कारण वह अंग्रेजी के अक्षर V-आकार की घाटी का निर्माण करती है। कुछ नदियाँ लगातार अपनी घाटी के तल को गहरा करती जाती हैं। इस गहरी V-आकार की घाटी को कन्दरा (Gorge) कहते हैं। कन्दरा का निर्माण वहाँ होता है जहाँ कठोर शैलें पाई जाती हैं। कन्दरा का विस्तृत रूप कैनियन (Canyon) कहलाता है।

2. जल-प्रपात-पर्वतीय क्षेत्रों में नदी द्वारा निर्मित जल-प्रपात एक प्रमुख स्थलाकृति है। जब नदी ऊँची पर्वत-श्रेणियों से नीचे की ओर प्रवाहित होती है, तो धरातलीय ढाल की असमानता के कारण मार्ग में अनेक जल-प्रपात या झरने बनाती है, परन्तु यदि उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में नदी के प्रवाह-मार्ग में कोमल एवं कठोर चट्टाने एक साथ आ जाएँ तो जल कोमल चट्टानों का आसानी से अपनदन कर देता है जबकि कठोर चट्टानों को अपरदन करने में वह सफल नहीं हो पाता। इस प्रकारे प्रवाहित जल अकस्मात ऊँचाई से नीचे की ओर गिरने लगता है जिसे जल प्रपात या झरना
कहते हैं।

प्रश्न 5. नदी के निक्षेपण कार्य द्वारा निर्मित डेल्टा के मुख्य प्रकार बतलाइए।
उत्तर-संरचना एवं आकार के आधार पर डेल्टा तीन प्रकार के होते हैं
1. चापाकार डेल्टा-जब नदी की जलवितरिकाएँ मोटे जलोढ़ का निक्षेप इस प्रकार करती हैं कि बीच की मुख्य धारा आगे बढ़कर अधिक निक्षेप करती है तो चापाकार डेल्टा का निर्माण होता है। सिन्धु, ह्वांग्हो गंगा, पो, राइन आदि नदियों के डेल्टा चापाकार डेल्टा के प्रमुख उदाहरण हैं।

2. पंजाकार डेल्टा-सागर में मिलने से पूर्व नदी की धारा अनेक उपशाखाओं में बँट जाती है। प्रत्येक शाखा के पाश्र्वो पर महीन अवसाद का निक्षेप हो जाता है। यह निक्षेप पक्षियों के पंजे की भाँति दिखलाई पड़ता है, जिससे इसे पंजाकार डेल्टा कहा जाता है। मिसीसिपी नदी का डेल्टा इसका उत्तम उदाहरण है।

3. ज्वारनदमुख डेल्टा-इस प्रकार के डेल्टा का निर्माण नदियों के पूर्वनिर्मित मुहानों पर होता है। कभी-कभी नदी, धारा की तीव्र गति के कारण अवसादों को बहा ले जाती है। दूसरी ओर ज्वार-भाटा भी निक्षेप किए हुए मलबे को बहाकर सागर में ले जाता है; अतः पूर्ण डेल्टा नहीं बन पाता। एसे डेल्टाओं को ज्वारनदमुख डेल्टा कहते हैं। राइन नदी का डेल्टा इसका प्रमुख उदाहरण है।

प्रश्न 6. लम्बवत एवं अनुप्रस्थ बालू के स्तूप कहाँ व कैसे बनते हैं?
उत्तर-1. लम्बवत् बालू के टीले-इन टीलों का आकार वायु की दिशा में, लम्बवत् होता है। ये लम्बे तथा समान आकार वाले होते हैं जो निरन्तर वायु की दिशा में आगे की ओर खिसकते रहते हैं। इनकी ऊँचाई 230 मीटर तक होती है। भारत के समुद्रतटीय क्षेत्रों में शक्तिशाली मानसूनी पवनों द्वारा लम्बवत् टीले ही अधिक निर्मित होते हैं। अफ्रीका के सहारा मरुस्थल में ऐसे टीले बहुत अधिक संख्या में पाए जाते हैं।

2. अनुप्रस्थ बालू के स्तूप-जब मन्द गति से प्रवाहित होने वाली वायु के मार्ग में बाधा उत्पन्न होती है तो छोटे तथा असमान आकार के टीलों का निर्माण होता जाता है। इनका विस्तार पवन की दिशा के अनुप्रस्थ रूप में होता है। इन टीलों का आकार भी विषम होता है। इन स्तूपों का ढाल वायु की दिशा की ओर मन्द तथा विपरीत दिशा की ओर तीव रहता है। वायु की विपरीत दिशा की ओर बालू का जमाव न होने के कारण ये खोखले हो जाते हैं।

प्रश्न 7. भूमिगत जल की निक्षेपण क्रिया द्वारा निर्मित दो स्थलरूपों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-भूमिगत जल की निक्षेपण क्रिया द्वारा निर्मित दो स्थलरूप निम्नलिखित हैं
1. आश्चुताश्म-भूमिगत जल द्वारा निर्मित कन्दराओं के जल में वर्षाजल के कारण कार्बन डाइ-ऑक्साइड गैस मिली होने से कार्बोनिक अम्ल तैयार हो जाता है। यह अम्ल चूने की चट्टानों पर रासायनिक क्रिया करता है। इस प्रकार खनिजयुक्त जल बूंद-बूंद कर गुफाओं की छत से नीचे टपकता रहता है। छत से लटके चूने के इस स्तम्भ को आश्चुताश्म कहा जाता है।

2. कन्दरा स्तम्भ–कन्दरा की छत से टपकने वाले घोल द्वारा कन्दरा की छत एवं फर्श पर क्रमशः निर्मित आश्चुताश्म एवं निश्चुताश्म के परस्पर मिल जाने से स्तम्भ की रचना होती है, जिसे कन्दरा स्तम्भ या चूने का स्तम्भ (Limestone Pillars) कहा जाता है। कभी-कभी कन्दरा की छत से रिसने वाला पदार्थ कन्दरा के फर्श से जा मिलता है अथवा कन्दरा की छत से टपकने वाला पदार्थ फर्श से ऊपर की ओर बढ़ता हुआ छत से मिल जाता है। अतः इन दोनों अवस्थाओं में कन्दरा स्तम्भ की रचना हो जाती है।

प्रश्न 8. हिमोढ कैसे बनते हैं? ये कितने प्रकार के होते हैं?
या हिमानी द्वारा निर्मित हिमोढों को एक आरेख द्वारा प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर-हिमनद अपने साथ शिलाखण्ड, कंकड़, पत्थर, बालू एवं मिट्टी के अवसाद को बहाकर लाता है। ये पदार्थ हिमानी के अपरदन कार्य में सहायता करते हैं। जब यह हिम पिघल जाती है तब जल धाराओं के रूप में बहकर आगे की ओर निकल जाता है, परन्तु अवसाद वहीं एकत्र हो जाती है अर्थात् यह अवसाद हिमानी के मार्ग तथा किनारों पर जम जाती है। इस एकत्रित अवसाद के हिम के साथ प्रवाहित होने की प्रक्रिया को हिमोढ़ या मोरेन (Moraines) कहते हैं। हिमानी द्वारा किये गये। निक्षेपण विभिन्न प्रकार के होते हैं। हिमोढ़ में बालू, मिट्टी, कंकड़, पत्थर से लेकर विशाल शिलाखण्ड तक होते हैं। जब हिमानी समाप्त होती है तो वह घाटी के विभिन्न स्थानों पर हिमोढ़ों का निर्माण करती है। अत: स्थिति। के अनुसार हिमोढ़ को निम्नलिखित भागों में विभाजित कर सकते हैं
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1. पाश्विक हिमोढ़ (Lateral Moraines)-हिमानी के दोनों पाश्र्वो के सहारे एक सीधी रेखा में निक्षेपित मलबा जो शिलाखण्ड, बालू, मिट्टी तथा पत्थरों के अर्द्ध-चन्द्राकार ढेर के रूप में होता है, पाश्विक हिमोढ़ कहलाता है। ऐसे हिमोढ़ों का आधिक्य ग्रीनलैण्ड एवं अलास्का में अधिक पाया जाता है। अलास्का में कई स्थानों पर हिमोढ़ की ऊँचाई 1000 फुट तक देखी गयी है, परन्तु इनकी सामान्य ऊँचाई 100 फुट तक ही पायी जाती है।

2. मध्यस्थ हिमोढ़ (Medial Moraines)-दो हिमनदों के मिलन-स्थल पर उनके पार्श्व परस्पर जुड़ जाते हैं। इस प्रकार उनके मध्य में जमे हुए अवसाद को मध्यस्थ हिमोढ़ की संज्ञा दी जाती है। अत: दोनों हिमानियों के मध्य में कंकड़-पत्थरों की श्रृंखला के रूप में स्थित अवसाद को मध्यस्थ हिमोढ़ कहा जाता है।

3. तलस्थ हिमोढ़ (Ground Moraines)-हिमानी अपनी तली के द्वारा पर्याप्त.अवसाद ढोती है। हिम के पिघलने पर यह अवसाद घाटी की तली में चारों ओर बिखरा रह जाता है, जिसे तंलस्थ हिमोढ़ के नाम से पुकारा जाता है। दक्षिणी कनाडा में इस प्रकार की हिमानियाँ तथा हिमोढ़ अधिक पाये जाते हैं। तलस्थ हिमोढ़ के क्षेत्रों में झीलें एवं दलदल बहुत मिलती हैं।

4. अन्तिम हिमोढ़ (Terminal Moraines)-हिमनद की अन्तिम सीमा जब पिघलने लगती है तो हिमनद द्वारा लाया गया बहुत-सा पदार्थ वहाँ अर्द्ध-चन्द्राकार रूप में एकत्रित होने लगता है। इस | जमाव को अन्तिम हिमोढ़ कहते हैं। इन हिमोढ़ों को निक्षेप प्रायः श्रेणियों के रूप में होता है तथा इनका आकार भी अर्द्ध-चन्द्राकार रूप में होता है।

प्रश्न 9. बरखान या अर्द्ध-चन्द्राकार बालू के टीलों का निर्माण किस प्रकार होता है? ।
उत्तर-बरखान या अर्द्ध-चन्द्राकार बालू के टीकों (Parabolic Sand-dunes) की आकृति अर्द्ध-चन्द्राकार होती है, इसलिए इन्हें बरखान या चापाकार टीलों की नाम से भी पुकारा जाता है। इन टीलों का निर्माण तीव्रगामी पवन के मार्ग में अचानक बाधा उपस्थित हो जाने के फलस्वरूप होता है। इनकी भुजाएँ। लम्बाई में पवन की दिशा की ओर फैली हुई होती हैं। इन टीलों का वायु की दिशा की ओर का ढाल उत्तल अर्थात् मन्द तथा विपरीत दिशी का ढाल अवतल अर्थात् तीव्र होता है। जहाँ वायु सभी दिशाओं से चलती है, वहाँ इनका आकार गोलाकार हो जाता है। ये टीले समूह में पाए जाते हैं। अफ्रीका के सहारा मरुस्थल में अर्द्ध-चन्द्राकार बालू की टीलों की प्रधानता मिलती है।

प्रश्न 10. वायु के कार्य बतलाइए तथा अपरदन कार्य की प्रक्रिया समझाइए।
उत्तर-वायु के कार्य
अन्य कारकों की भाँति वायु के कार्यों को भी तीन भागों में बाँटा जा सकता है

  1. वायु का अपरदनात्मक कार्य (Erosional Work of Wind),
  2. वायु का परिवहनात्मक कार्य (Transportational Work of Wind) तथा |
  3. वायु को निक्षेपणात्मक कार्य (Depositional work of wind)

वायु का अपरदनात्मक कार्य

वायु का अपरदनात्मक कार्य अपवाहन (Deflation) और अपघर्षण (Abrasion) की क्रिया द्वारा सम्पन्न होता है। अपवाहन अर्थात् उड़ाकर ले जाने की क्रिया द्वारा वायु मरुस्थलों में उथले बेसिन बना देती है जिन्हें वात गर्त कहते हैं। जब इन वात गर्ता में वायु द्वारा अपरदित बालू का उठान जल-स्तर तक पहुँच जाता है तो मरुद्यान (Oasis) निर्मित हो जाते हैं। तीव्र वायु अपने साथ कंकड़-पत्थर, शिलाखण्ड एवं बालू लेकर शैलों पर तीव्र प्रहार करती है तथा शैलों को रेगमाल की भाँति खरोंच देती है। इस प्रकार वायु भौतिक अपरदन का कार्य अधिक करती है। अपघर्षण का सबसे अधिक प्रभाव ऊँची उठी हुई शैलों पर पड़ता है। वायु के साथ उड़कर चलने वाले पदार्थ परस्पर भी खण्डित होते रहते हैं, जिसे सन्निघर्षण की क्रिया कहते हैं। इसके अतिरिक्त ये बालू के कण मार्ग में पड़ने वाली शैलों को अपने प्रहार से घिसते हैं तो उस क्रिया को अपघर्षण कहा जाता है।

प्रश्न 11. मरुस्थलों में झील कैसे बनती है? वाजदा और प्लाया को समझाइए।
उत्तर-मरुस्थलों में मैदानों की स्थिति महत्त्वपूर्ण होती है। पर्वतों में स्थित द्रोणी की ओर से जब जल आता है तो कुछ समय में यह मैदान जल से भर जाता है और उथली झील का निर्माण हो जाता है। इस उथली झील को प्लाया (Playas) कहते हैं। इसमें जल थोड़े समय के लिए ही रहता है, क्योंकि मरुस्थलों में वाष्पीकरण की तीव्रता के कारण जल शीघ्र सूख जाता है। जब प्लाया को जल सूख जाता है तो यह सूखी झील प्लाया मैदान कहलाती है। यदि इस प्लाया मैदान का ढाल पर्वतीय क्षेत्रों में 1-5° होता है तो इसे वाजदा कहते हैं।

प्रश्न 12. रोधिकाएँ क्या हैं? इनसे सम्बन्धित स्थलरूप बताइए।
उत्तर-रोधिकाएँ जलमग्न आकृतियाँ हैं। जब यही रोधिकाएँ जल के ऊपर दिखाई देती हैं तो इनको रोध (Barriers) कहा जाता है। ऐसी रोधिकाएँ जिनका एक भाग खाड़ी के शीर्ष स्थल से जुड़ा हो तो उसे स्पिट (Spit) कहा जाता है जब रोधिका तथा स्पिट किसी खाड़ी के मुख पर निर्मित होकर इसके मार्ग को अवरुद्ध कर देते हैं तब लैगून (Lagoon) का निर्माण होता है। कालान्तर में जब यहीं लैंगून स्थल से आए तलछट द्वारा भर जाती है तो तटीय मैदान का निर्माण होता है।

प्रश्न 13. समुद्र तट पर बनी अपतटीय रोधिकाओं का सुनामी आपदा को रोकने में क्या मध है?
उत्तर-समुद्र तट पर बनी रोधिकाएँ अपतटीय रोधिका कहलाती हैं। वास्तव में ये प्राकृतिक स्थलाकृति सुनामी आपदा के समय महत्त्वपूर्ण रक्षाकवच सिद्ध होती हैं। इन रोधिकाओं के कारण सुनामी के समय सागर का जल तट से टकराकर वापस समुद्र की ओर चला जाता है। इसलिए अपतट रोधिकाएँ सुनामी के समय सागरीय जल को तट से बाहर जाने से रोकने में विशेष सहयोग प्रदान करती हैं। अपतट रोधिकाओं के अतिरिक्त सागर तट पर स्थित रोध, पुलिन तथा पुलिन स्तूप आदि ऐसी ही स्थलाकृतियाँ हैं जो सुनामी की प्रबलता को कम करती हैं। इसलिए सागरीय स्थलाकृतियों को संरक्षण प्रदान करना चाहिए क्योकि ये मानवीय बस्तियों को सागरीय तूफान से सुरक्षा प्रदान करती हैं।

प्रश्न 14. जलोढ़ पंख एवं जलोढ़ शंकु और रॉक बेसिन तथा टार्न में अन्तर बताइए।
उत्तर-1. जलोढ़ पंख एवं जलोढ़ शंकु-मैदानी क्षेत्रों में धरातलीय ढाल कम होने के कारण नदी का वेग बहुत मन्द हो जाता है अत: उसकी परिवहन क्षमता भी बहुत ही कम रह जाती है। नदी अवसाद को अपने साथ पर्वतीय क्षेत्रों से बहाकर लाती है तथा उन्हें आगे ले जाने में असमर्थ रहने के कारण उनका निक्षेप वहीं पर्वतपदीय क्षेत्रों में कर देती है। इस क्षेत्र में नदी बजरी, मिट्टी, बालू, कंकड और कॉप मिट्टी का जमाव अर्द्ध-चन्द्राकार रूप में करती है, जिसे जलोढ़ पंख कहते हैं। इसमें महीन कणों का निक्षेपण किनारे पर दूर-दूर तथा मोटे कणों का निक्षेपण पास-पास होता है। जब पर्वतीय नदी अपेक्षाकृत ऊँचे भाग से मैदान में उतरती है तो जलोढ़ पंख निर्मित होते हैं किन्तु क्रमशः निक्षेपण द्वारा इनकी ऊँचाई बढ़ती जाती है जिससे शंक्वाकार आकृति का निर्माण होता है। यही आकृति जलोढ़ शंकु कहलाती है।

2. रॉक बेसिन तथा टार्न-यह हिमनद द्वारा बनी स्थलाकृति है। वास्तव में सर्क की तली (Basin) में हिमनद के अत्यधिक दबाव तथा अपरदन से कालान्तर में एक गड्ढे का निर्माण होता है, जिसे रॉक बेसिन कहते हैं। जब तापमान अधिक होने पर हिम पिघल जाता है तो रॉक बेसिन में जल भरा रह जाता है। इस प्रकार एक झील का निर्माण होता है, जिसे टार्न कहते हैं।

प्रश्न 15, बाढ़ के मैदान एवं प्राकृतिक तटबन्ध किस प्रकार निर्मित होते हैं?
उत्तर-बाढ़ के मैदान-मैदानी भागों में नदी की वहन शक्ति बहुत ही कम हो जाती है। अत: वह अपनी तली में अवसाद जमा करती है, जिससे नदी का जल दोनों किनारों की ओर दूर-दूर तक फैल जाता है। ऐसी स्थिति में क्षमता से अधिक जल हो जाने पर नदी में बाढ़ आ जाती है। बाढ़ समाप्त हो जाने पर नदी का जल उस प्रदेश में बालू एवं काँप मिट्टी का एक विशाल निक्षेप छोड़ जाता है। इस प्रकार बार-बार बाढ़ आने से लहरदार समतल कॉप के मैदान बन जाते हैं, जिन्हें बाढ़ के मैदानों के नाम से पुकारा जाता है।

प्राकृतिक तटबन्ध–जिस समय नदी में बाढ़ आती है वह अपने किनारों पर बालू, बजरी तथा मिट्टी आदि अवसाद का निक्षेप कर देती है। इस प्रकार किनारों पर नदी के समानान्तर दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे बाँध से बन जाते हैं, जिन्हें प्राकृतिक तटबन्ध कहते हैं। ये प्राकृतिक तटबन्ध नदी के जल को नदी के किनारों के बाहर फैलने से रोकते हैं।

प्रश्न 16. गोखुर झील या धनुषाकार झील किस प्रकार निर्मित होती है?
उत्तर-गोखुर (धनुषाकार) झील-मैदानी भागों में नदियों का वेग मन्द हो जाता है तथा प्रवाह के लिए नदियाँ ढालू मार्ग कोमल चट्टानों को खोजती रहती हैं। इसी स्वभाव के कारण नदी की धारा में जगह-जगह घुमाव या मोड़ पड़ जाते हैं, जिन्हें विसर्प या नदी मोड़ कहते हैं। प्रारम्भ में नदी द्वारा निर्मित मोड़ छोटे-छोटे होते हैं परन्तु धीरे-धीरे इनका आकार बढ़कर घुमावदार होता जाता है। जब ये विसर्प बहुत विशाल और घुमावदार हो जाते हैं, तब बाढ़ के समय नदी का तेजी से बहता हुआ जल घूमकर बहने के स्थान पर सीधे ही मोड़ की संकरी ग्रीवा को काटकर प्रवाहित होने लगता है तथा नदी को मोड़ मुख्य धारा से कटकर अलग हो : जाता है। इस प्रकार उस पृथक् हुए मोड़ से एक झील का निर्माण होता है। इस झील की आकृति धनुष के आकार या गाय के खुर जैसी होती है इसलिए नदी मोड़ एवं जलधारा की तीव्र गति से बनी यह झील गोखुर झील या धनुषाकार झील कहलाती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. नदी अथवा बहते हुए जल के अपरदन कार्य का उसकी विभिन्न अवस्थाओं में वर्णन कीजिए।
या निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए
(अ) V” आकार की घाटी
(ब) जल-प्रपात
(स) गोखुर झील
(द) डेल्टा
या नदी के अपरदन कार्य द्वारा निर्मित भू-आकृतियों का वर्णन कीजिए। इन आकृतियों का मानव के लिए क्या महत्त्व है?
या नदी के अपरदन तथा निक्षेप द्वारा निर्मित किन्हीं पाँच भू-आकृतियों की विवेचना कीजिए।
या डेल्टा का निर्माण किस प्रकार होता है?
या नदी द्वारा निर्मित दो अपरदनात्मक स्थलरूपों का वर्णन कीजिए।
या छाड़न या गोखुर झील क्या है?
उत्तर-धरातल पर अपरदन के बाह्य कारकों में नदियों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। नदियों का जल ढाल की ओर प्रवाहित होता है। ऐसा अनुमान लगाया गया है कि नदियाँ प्रतिवर्ष समुद्रों में लगभग 27,460 घन किमी जलराशि बहाकर लाती हैं। नदियों में जल की आपूर्ति हिमानियों एवं वर्षा से होती है। इस प्रकार “स्वाभाविक एवं गम्भीर रूप से धरातल पर बहने वाला जल नदी कहलाता है।” धरातल पर जितनी भी जलधाराएँ हैं, वे सभी स्वतन्त्र रूप से बहती हुई मिल जाती हैं। इस प्रकार नदियों का यह अपवाह-क्षेत्र उन सभी नदियों का कार्य-क्षेत्र होता है, जिसे नदी-बेसिन के नाम से पुकारते हैं।

नदी अथवा प्रवाहित जल के कार्य

नदी, अपरदन का एक शक्तिशाली कारक है। नदियाँ अपघर्षण तथा सन्निघर्षण द्वारा अपनी घाटियों को काट-छाँट कर चौड़ा करती जाती हैं तथा मलबे को प्रवाहित कर अन्यत्र स्थान पर जमा कर देती हैं। इनके फलस्वरूप धरातल पर विभिन्न स्थलाकृतियों का निर्माण होता है। जिनका विवरण निम्नवत् है

1. नदी का अपरदनात्मक कार्य (Erosional Work of River)-नदी द्वारा अपरदन कार्य दो रूपों में सम्पन्न होता है-(अ) रासायनिक एवं (ब) भौतिक या यान्त्रिक अपरदन। रासायनिक अपरदन में नदी-जल घुलनशील तत्त्वों द्वारा चट्टानों को अपने में घुलाकर काटता रहता है, जबकि यान्त्रिक अपरदन में नदी-तल या किनारों का अपरदन अपरदनात्मक तत्त्वों से होता रहता है। नदियों द्वारा अपरदन की इस क्रिया में पाश्विक अपरदन तथा लम्बवत् अपरदन होता है। इस प्रकार नदी द्वारा अपरदन कार्य बड़ा ही व्यापक है। उद्गम से लेकर मुहाने तक नदी के कार्यों को तीन भागों में विभाजित किया जाता है-

  • पर्वतीय भाग या युवावस्था,
  • मैदानी भाग या प्रौढ़ावस्था तथा
  • डेल्टाई भाग या वृद्धावस्था।

2. नदी का परिवहन कार्य (Transportational Work of River)-नदी का परिवहन कार्य भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। नदी के जल के साथ बहने वाले शिलाखण्ड आपस में टकराकर चलते रहते हैं तथा नदी-तल को भी कुरेदते हुए प्रवाहित होते हैं। इससे इनका आकार छोटा होता जाता है। इस प्रकार नदियाँ कंकड़, पत्थर, बजरी, रेत, मिट्टी आदि भारी मात्रा में जमा करती जाती हैं। नदियाँ जब मैदानी भागों में प्रवेश करती हैं तो उनके वेग एवं तीव्रता में कमी आ जाती है। इससे नदियाँ अपनी तली तथा किनारों पर निक्षेप करते हुए प्रवाहित होती हैं। इसीलिए पर्वतपदीय क्षेत्रों में बड़े-बड़े शिलाखण्ड पाये जाते हैं। नदी द्वारा परिवहन करने की क्षमता जल की मात्रा एवं उसकी गति पर निर्भर करती है।

3. नदी का निक्षेपणात्मक कार्य (Depositional work of River)-नदी की जलधारा अपंरदित पदार्थों को प्रवाहित करती हुई मार्ग में जहाँ कहीं भी जमाव कर देती है, वह निक्षेपण कहलाता है। निक्षेपण अपरदन क्रिया का प्रतिफल होता है। इस जमाव में बालू, मिट्टी, कंकड़, पथरी, बजरी आदि सभी छोटे-बड़े पदार्थ होते हैं जो नदियों द्वारा झीलों, सागरों अथवा महासागरों तक ले जाये जाते हैं। जैसे ही नदियाँ मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती हैं, उनमें भारी पदार्थों को वहन करने की क्षमता नहीं रह पाती। इसी कारण अनुकूल दशा मिलते ही नदियाँ अपनी तली एवं पाश्र्वो पर अवसाद का निक्षेप करने लगती हैं। भारी पदार्थों को नदियाँ पर्वतीय क्षेत्रों में वहन करती हैं तथा उसका निक्षेप पर्वतपदीय क्षेत्रों में करती हैं। मैदानी क्षेत्रों में हल्के पदार्थों का ही निक्षेप हो पाता है। जलाशयों में मिलने से पहले नदियाँ विस्तृत डेल्टाओं का निर्माण करती हैं, क्योंकि यहाँ तक बारीक मिट्टी तथा बालू ही पहुँच पाती है। डेल्टाई क्षेत्रों में नदियों का प्रवाह मार्ग समुद्र तल के लगभग समानान्तर हो जाता है; अतः यहाँ जल चारों ओर फैल जाता है। निक्षेपण की क्रिया में विभिन्न भू-आकृतियों की रचना होती है। जलोढ़ पंख, विसर्पण, छाड़न झील, तट-बाँध, वेदिका, बाढ़ के मैदान एवं नदी की चौड़ी घाटी प्रमुख भू-आकृतियाँ हैं।

नदी की अवस्थाएँ

नदियाँ अपने अपरदन, परिवहन एवं निक्षेपण का कार्य अपनी विभिन्न अवस्थाओं के अन्तर्गत सम्पादित करती हैं। बहता हुआ जल अथवा नदी अपने उद्गम स्थल (पर्वतीय क्षेत्र) से लेकर अपने संगम स्थल (मुहाना) तक तीन अवस्थाओं से गुजरती है तथा अनेक स्थलाकृतियों का निर्माण करती है, जिसका विवरण निम्नलिखित है–

1. युवावस्था (Youthful Stage)-पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा तथा हिमानी के पिघलने से छोटी- छोटी जलधाराओं का जन्म होता है। इस समय नदियों में जल की मात्रा कम तथा ढाल तीव्र होने के कारण वेग अधिक होता है। इस प्रकार युवावस्था में नदियाँ ऊबड़-खाबड़ पर्वतीय क्षेत्र में प्रवाहित होती हैं। पर्वतीय भागों में मुख्य नदी धीरे-धीरे अपनी घाटी को गहरा करना प्रारम्भ कर देती है तथा इसमें अनेक सहायक नदियाँ आकर मिलने लगती हैं। इस अवस्था में नदियाँ अपने तल का अधिक कटाव करती हैं जिससे गॉर्ज, कन्दरा, जल-प्रपात, जल-गर्तिकाएँ, कुण्ड आदि स्थलाकृतियों का निर्माण होता है। युवावस्था में नदी निम्नलिखित भू-आकृतियाँ बनाती है

(i) ‘v’ आकार की घाटी-नदियों द्वारा निर्मित गहरी एवं सँकरी घाटियों को ‘v’ आकार की घाटी कहते हैं। इनका आकार अंग्रेजी वर्णमाला के.’V’ अक्षर की भाँति होता है, जिससे इन्हें v’ आकार की घाटी कहते हैं। इनके किनारे तीव्र ढाल वाले होते हैं। ये घाटियाँ किनारों पर चौड़ी तथा तली में अधिक संकुचित होती हैं। कुछ नदियाँ अपनी घाटी को और अधिक गहरा करती जाती हैं। इस अत्यधिक गहरी ‘V’ आकार की घाटी को कन्दरा (Gorge) कहते हैं। उदाहरण के लिए-भारत की सिन्धु, सतलुज, नर्मदा, कृष्णा, चम्बल आदि नदियाँ अनेक स्थानों पर कन्दराओं का निर्माण करती हैं। भाखड़ा बॉध तो सतलुज नदी की कन्दरा पर ही निर्मित है। कम चौड़ी, अधिक गहरी तथा अधिक सँकरी घाटी को कैनियन कहते हैं।
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(ii) जल-प्रपात या झरना (Waterfal)- यह नदी अपरदन द्वारा निर्मित प्राकृतिक सौन्दर्य में वृद्धि करने वाली प्राकृतिक स्थलाकृति है। जब कोई नदी उच्च पर्वत-श्रेणियों से नीचे की ओर गिरती है तो ढाल में असमानता के कारण जल-प्रपातों का निर्माण करती है। नदी का जल मार्ग में पड़ने । वाली कठोर चट्टानों को नहीं काट पाता, परन्तु कोमल चट्टानों को आसानी से काट देता है। कुछ समय पश्चात् कठोर चट्टान को भी सहारा न मिल पाने के कारण वह शिलाखण्ड भी टूटकर गिर जाता है। इस प्रकार, “नदी प्रवाह की ऐसी असमानता जिसमें नदी का जल एकदम ऊपर से नीचे की ओर गिरता है, जल-प्रपात या झरना कहलाता है।” जल निरन्तर शैलों को काटता रहता है जिससे इन प्रपातों की ऊँचाई कम होने लगती है।
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2. प्रौढ़ावस्था (Mature Stage)-नदी जब युवावस्था को पार कर मैदानी भागों में प्रवेश करती है। तो यह उसकी प्रौढ़ावस्था होती है। इस समय नदी का वेग कुछ कम हो जाता है तथा नदी द्वारा किये जाने वाले कटाव कार्य में कुछ कमी आती है। इस अवस्था में नदी अपनी घाटी को चौड़ा करना प्रारम्भ कर देती है।.नदी इस समय पाश्विक अपरदन अधिक करती है। इस अवस्था में नदी अपने साथ लाये हुए मलबे को जमा करना प्रारम्भ कर देती है। इससे जलोढ़-पंख, जलोढ़-शंकु, गोखुर झीलें, बाढ़ के मैदान आदि स्थलाकृतियों का निर्माण होता है। इस अवस्था में नदी मैदानी भागों में बहुत मन्द गति से प्रवाहित होती है जिससे प्रवाह मोड़ों एवं बाढ़ के मैदानों का निर्माण करते हुए नदी आगे बढ़ती है। प्रौढ़ावस्था में नदी निम्नांकित भू-आकृतियों का निर्माण करती है

(i) जलोढ़ पंख (Alluvial Fans)-पर्वतीय क्षेत्रों से जैसे ही नदी मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती है तो नदी की प्रवाह गति मन्द पड़ जाती है, जिसके कारण उसकी अपवाह क्षमता भी कम रह जाती है। अतः नदी भारी पदार्थों को अपने साथ प्रवाहित करने में असमर्थ रहती है और उनका निक्षेप करना प्रारम्भ कर देती है। पर्वतपदीय भागों में नदी बजरी, पत्थर, कंकड़, बालू, मिट्टी आदि पदार्थों का निक्षेपण शंकु के रूप में करती है। इनके बीच से होकर अनेक छोटी-छोटी धाराएँ निकल जाती हैं। इस प्रकार के अनेक शंकु मिलकर पंखे जैसी आकृति का निर्माण करते हैं जिससे उन्हें जलोढ़ पंख का नाम दिया जाता है।

(ii) नदी विसर्प अथवा नदी मोइ (River Meanders)-जब नदी घाटी में उतरती है तो उंसका प्रवाह मन्द पड़ जाता है। इससे नदियों के अवसाद ढोने की शक्ति कम हो जाती है। अत: ऐसी दशा में नदियाँ अपने साथ लाये हुए अवसाद को किनारों पर छोड़ती जाती हैं, परन्तु उसके मार्ग में थोड़ा-सा भी अवरोध उसके प्रवाह को आसानी से इधर-उधर मोड़ देता है। ये मोड़ ही नदी विसर्प कहलाते हैं।

(iii) धनुषाकार झीलें अथवा गोखुर झीलें (Oxbow Lakes)-प्रारम्भ में नदी-मोड़ या विसर्प छोटे होते हैं, परन्तु धीरे-धीरे इनका आकार बड़ा तथा घुमावदार होता जाता है। जब ये विसर्प अधिक बड़े तथा घुमावदार होते हैं, तब नदी घुमावदार दिशा में प्रवाहित न होकर सीधे ही प्रवाहित होने लगती है तथा नदी का यह मोड़ कटकर मुख्य धारा से बिल्कुल अलग हो जाता है। इससे एक झील-सी निर्मित हो जाती है जिसकी आकृति धनुष के आकार में अथवा गाय के खुर के समान हो । जाती है। अत: इसे धनुषाकार झील अथवा छाड़न या गोखुरं झील कहते हैं।
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(iv) बाढ़ के मैदान (Flood Plains)-मैदानी प्रदेशों में नदियों की प्रवाह शक्ति क्षीण हो जाने के कारण उसकी तली में मलबा एकत्रित होना प्रारम्भ हो जाता है जिससे नदी को जल दोनों किनारों की ओर दूर तक फैल जाता है। एक समय ऐसा आता है कि नदी और अधिक जल को धारण करने की क्षमता नहीं रख पाती तथा यह जल किनारों को पार कर बाहर की ओर फैल जाता है। एवं नदी में बाढ़ आ जाती है। जैसे ही बाढ़ समाप्त होती है तो बालू एवं कांप मिट्टी के निक्षेप बाढ़-क्षेत्र पर छा जाते हैं तथा इसमें लहरें-सी पड़ जाती हैं। इन्हें ही बाढ़ के मैदान के नाम से जाना जाता है।

(v) प्राकृतिक तटबन्ध (Natural Levees)-नदी जब बाढ़ से युक्त होती है तो वह अपने किनारों पर बजरी, कंकड़, बालू तथा मिट्टी आदि का जमाव कर देती है. जिससे किनारों पर ऊँचे-ऊँचे बाँध बन जाते हैं। इन्हें ही प्राकृतिक तटबन्ध के नाम से पुकारा जाता है।

3. वृद्धावस्था या जीर्णावस्था (Old Stage)-नदी के अन्तिम अवस्था में आते ही उसकी सामान्य स्थिति में बड़ा परिवर्तन हो जाता है। इस अवस्था में नदी मैदानी क्षेत्र से निकलकर डेल्टाई प्रदेश में प्रवेश करती है। नदी अपने सम्पूर्ण जल सहित आधार तल (Base level) तक पहुँच जाती है। इस समय नदी का अपरदन कार्य पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप नदी-घाटी की गहराई बहुत कम हो जाती है तथा नदी की चौड़ाई निरन्तर बढ़ती जाती है। इस अवस्था में नदियों के बाढ़ के मैदान अत्यधिक विस्तृत हो जाते हैं तथा नदी की भार वहन करने की शक्ति क्षीण हो जाती है। नदी अपने मुहानों पर डेल्टाओं का निर्माण करती है। इसी अवस्था में एस्चुअरी, बालुका-द्वीप एवं बालुका-भित्ति का निर्माण होता है तथा नदी डेल्टा बनाती हुई महासागर में गिर जाती है और अपना अस्तित्व सदा के लिए समाप्त कर देती है। वृद्धावस्था में निम्नलिखित स्थलाकृतियों का निर्माण होता है

(i) डेल्टा (Delta)—प्रत्येक नदी अपनी अन्तिम अवस्था में सागर, झील अथवा महासागर में गिरती है तो गिरने वाले स्थान पर अपने छ साथ लाये हुए अवसाद को एकत्रित करती रहती है। यह अवसाद लाखों वर्ग किमी क्षेत्र में एकत्रित हो जाते हैं तथा इसकी साधारण ऊँचाई समुद्र तल से अधिक होती है; अतः इस उठे हुए भाग को ही डेल्टा कहते हैं। इस डेल्टा शब्द को ग्रीक भाषा के अक्षर A (डेल्टा) से लिया गया है, क्योंकि इस स्थल स्वरूप का आकार भी इस अक्षर से मिलता-जुलता है। डेल्टा छोटे-बड़े कई प्रकार के होते हैं। इनका जमाव विशालतम पंखे जैसा होता है। इसके द्वारा नदी के मार्ग में अवरोध डाला जाता है। इसीलिए नदी उसे कई स्थानों पर काट देती है। कहीं-कहीं कुछ भाग ऊँचे खड़े रह जाते हैं, जिन्हें मोनाडनाक कहते हैं। इनकी आकृति त्रिभुजाकार होती है। आकृति के अनुसार डेल्टा निम्नलिखित प्रकार के होते हैं–
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(अ) चापाकार या धनुषाकार डेल्टा-नदी की अवसाद में कंकड़, पत्थर, मिट्टी, बालू आदि जल में घुले रहते हैं। कुछ अवसाद बहुत ही बारीक होते हैं। अत: ऐसी नदी जो अपने साथ लाये हुए अवसाद को मध्य में अधिक तथा किनारों पर कम मात्रा में निक्षेपित करती है, चापाकार या धनुषाकार आकृति का निर्माण करती है, जिसे चापाकार डेल्टा कहते हैं। सिन्धु, पो, राइन तथा गंगा-ब्रह्मपुत्र के डेल्टा इसी प्रकार के हैं।

(ब) पंजाकार डेल्टा-चिड़िया के पंजे की शक्ल में डेल्टाओं का निर्माण बारीक कणों से होता है, जो चूनायुक्त जल में घोल के रूप में घुले रहते हैं। बारीक कण भारी होने के कारण नदी के बहाव में सागर की तली में दूर-दूर तक पहुंच जाते हैं तथा तली में बैठते जाते हैं। अनेक.दिशाओं से आने वाली नदियाँ आपस में मिलकर अपने पाश्र्वो पर मोटी अवसाद जमा कर देती हैं जिनसे यह निक्षेप पक्षी के पंजे की भाँति हो जाता है, इसीलिए इसे पंजाकोर डेल्टा कहते हैं।

(स) ज्वारनदमुखी डेल्टा-इस प्रकार के डेल्टा का निर्माण नदियों के पूर्वनिर्मित मुहानों पर होता है। ऐसे मुहाने जो नीचे को धंसे हुए होते हैं, उनमें अवसाद एक लम्बी, सँकरी धारा के रूप में जमा होती जाती है। नदियों के इस मुहाने को एस्चुअरी कहते हैं। यह अवसाद ज्वार-भाटे द्वारा सागरों में ले जायी जाती है। इसी कारण यह पूर्ण रूप से डेल्टा नहीं बन पाता।

(ii) बालुका-द्वीप एवं बालुका-भित्ति-मन्द गति के कारण नदी अपने साथ लाये अवसाद को आगे बहाकर ले जाने में असमर्थ रहती है, क्योंकि जलगति क्षीण होती है। अतः अवसाद स्थान-स्थान पर कम होती जाती है। इस प्रकार नदी के बाढ़ के मैदान या चौड़ी घाटियों में बालू के द्वीप एवं बालुका-भित्ति का निर्माण होता है। इनका आकार भिन्न-भिन्न होता है। इन्हें भिन्न-भिन्न स्थानों पर अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है।

नदी के निक्षेपण कार्य से निर्मित भू-आकृतियों का मानव के लिए महत्त्व

नदी के निक्षेपण कार्य से बनी भू-आकृतियाँ मानव के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुई हैं। जलोढ़ पंखों से बने नदी के मैदान कृषि, उद्योग, परिवहन एवं मानव बसाव की दृष्टि से बहुत उपयोगी हैं। धनुषाकार झीलें सिंचाई, पेयजल एवं नौका विहार की सुविधाएँ प्रदान करके मानव के हित में वृद्धि करती हैं। इनसे जलवायु पर भी समकारी प्रभाव पड़ता है।

डेल्टाओं से उपजाऊ भूमि का निर्माण होता है। विश्व में गंगा, सिन्धु, ब्रह्मपुत्र, अमेजन और नील नदियाँ उपजाऊ डेल्टाओं का निर्माण करती हैं। डेल्टाई क्षेत्र चावल, जूट तथा गन्ना आदि फसलों के उत्पादन की दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं। अधिक उपजाऊ होने के कारण डेल्टाई क्षेत्रों में घनी जनसंख्या पायी जाती है। गंगा का डेल्टा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

प्रश्न 2. हिमानी द्वारा अपरदन एवं निक्षेपण से निर्मित स्थलाकृतियों का वर्णन कीजिए।
या हिमानी द्वारा निर्मित तीन अपरदनात्मक एवं दो निक्षेपणात्मक स्थलरूपों का वर्णन कीजिए।
या हिंमानी के अपरदन एवं निक्षेपण कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-हिमानी या हिमनद
स्थायी हिम क्षेत्रों से बर्फ की मोटी चादर का भार, ढाल के प्रभाव एवं गुरुत्वाकर्षण शक्ति के प्रभाव से ढाल की ओर खिसकने लगता है। इसी खिसकते हुए हिमखण्ड को हिमानी अथवा हिमनद कहते हैं। अपरदन के अन्य कारकों की भाँति हिमानी भी विशिष्ट भू-आकृतियों को जन्म देती है। विश्व में उच्च अक्षांशों एवं शीत-प्रधान प्रदेशों में हिमानियों का विस्तार मिलता है। हिमवृष्टि के समय वायुमण्डल में उपस्थित जलवाष्प का भी योग रहती है। हिम-कण हल्के एवं असंगठित होते हैं। काफी हिमवर्षा होने के बाद हिम के निरन्तर दबाव पड़ने के फलस्वरूप हिम-कण ठोस चट्टानों में बदल जाते हैं। शीत-प्रधान प्रदेशों में लगभग 9 माह हिमवर्षा होती है। विश्व के केवल ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप को छोड़कर प्रत्येक महाद्वीप में हिम क्षेत्र पाये जाते हैं। हिमनद भी अन्य कारकों की भाँति अपरदन, परिवहन तथा निक्षेपण का कार्य करता है।

हिमानी के कार्य

हिमानी निम्नलिखित तीन कार्यों को सम्पन्न करती है-

1. हिमानी का अपरदनात्मक कार्य
हिमानी द्वारा अपरदन का कार्य उस समय अधिक होता है जब उसके साथ कंकड़, बजरी और पत्थर प्रवाहित होते हों। हिम के साथ चलने वाले कंकड़ और पत्थर रेगमाल की भाँति कार्य करते हैं जिससे अपघर्षण की क्रिया होती है। इनकी सहायता से हिमानी अपनी तली तथा किनारों को घिसकर चिकना करती रहती है तथा साथ-ही धरातल को खुरचते हुए प्रवाहित होती है। इसके द्वारा सर्क, हिमशृंग आदि भू-आकृतियाँ निर्मित होती हैं।

हिमानी का अपरदन कार्य उसकी गति तथा उसके साथ प्रवाहित कंकड़-पत्थर पर अधिक निर्भर करता है। रैमसे एवं टिण्डल नामक विद्वानों ने बताया है कि हिमानी न केवल अपने अपरदन कार्यों द्वारा विभिन्न भू-आकृतियों का निर्माण करती है, बल्कि पहले से विकसित स्थलरूपों में परिवर्तन भी करती है। हिमानी अपरदन के द्वारा सुन्दर प्राकृतिक भू-दृश्यों का निर्माण करती है।

हिमानीकृत अपरदन से निर्मित भू-आकृतियाँ–हिमानीकृत अपरदन में बड़ी भिन्नता पायी जाती है, क्योंकि इसका यह कार्य बहुत ही धीमी गति से होता है। हिमानी द्वारा अपरदन कार्य से निम्नलिखित भू-आकृतियों का निर्माण होता है

(अ) ‘यू आकार की घाटी (‘U’ Shaped Valley)-हिमानी पर्वतीय क्षेत्रों में ऐसी घाटियों से प्रवाहित होती है जिनके ढाल खड़े तथा तली चौरस एवं सपाट होती है। घाटियों का अपरदन होने से इनका आकार अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर ‘यू’ (U) की भाँति हो जाता है। विस्तृत हिमानी क्षेत्र में इन घाटियों के ऊपर सहायक घाटियाँ लटकती दिखाई देती हैं। इन घाटियों का निर्माण पहले से विकसित नदी-घाटियों में होता है। बाद में हिमानीकृत अपरदन कार्य से इसका विस्तार एवं विकास कर लेती है। ‘यू’ आकार की घाटी के निर्माण में निम्नांकित विशेषताएँ होती हैं-(i) इस घाटी का भौतिक आकार अंग्रेजी के ‘यू’ (U) अक्षर जैसा होता है, (ii) इसका तल चौरस तथा गहरा होता है, (iii) ‘यू’ आकार की घाटी के किनारों का ढाल खड़ा होता है, (iv) इसमें छोटे-छोटे हिमोढ़ों का अभाव होता है, (v) इन घाटियों का विकास उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में होता है एवं (vi) इस घाटी के निर्माण में आग्नेय तथा परतदार चट्टानों का योग होता है।
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(ब) लटकती घाटी (Hanging Valley)-मुख्य हिमानी तथा उसकी सहायक हिमानियों के मध्य अपरदन के फलस्वरूप जो आकृति बनती है, उसे लटकती हुई घाटी अथवा निलम्बी घाटी कहते हैं। मुख्य हिमानी का अपरदन सहायक हिमानियों की अपेक्षा अधिक होता है, क्योंकि मुख्य हिमानी सहायक हिमानियों से अधिक गहरी होती है। इसी कारण सहायक हिमानियों की घाटियाँ मुख्य हिमानी से जहाँ मिलती हैं, वहाँ इनका ढाल तीव्र एवं खड़ा होता है। इसीलिए इन घाटियों की हिम लटकती हुई प्रतीत होती है।

(स) सर्क या हिमज गह्वर (Cirque)-उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में हिमानी ढालों पर गड्ढे बनाती हुई प्रवाहित होती है। हिमानी के अपरदन से गड्ढे धीरे-धीरे काफी चौड़े एवं गहरे होते जाते हैं। ऐसे । विशाल, चौड़े तथा गहरे गत को हिमज गह्वर कहते हैं। इनकी आकृति कटोरे की भाँति होती है। इन्हें कोरी या कारेन अथवा सर्क भी कहते हैं।

(द) हिमश्रृंग एवं हिमपुच्छ (Crag and Tail)-हिमानी द्वारा ऊँचे उठे भागों पर जब अपरदन द्वारा ऊबड़-खाबड़ खड़ा ढाल निर्मित हो जाता है तो हिमशृंग की आकृति का निर्माण होता है। इनका ढाल तीव्र होता है, जबकि दूसरी ओर ढाल मन्द होता है जो एक लम्बी एवं पतली पूँछ के आकार का होता है, जिसे हिमपुच्छ कहते हैं।

(य) गिरिशृंग (Horm)-हिमानी द्वारा निर्मित यह एक प्राकृतिक स्थलाकृति है। पर्वतों की चोटियों के | सहारे जब चारों ओर निर्मित सर्क को हिमानी अधिक गहराई में काट लेती है तो इसकी आकृति शिखर की भाँति हो जाती है, जिसे गिरिशृंग के नाम से पुकारा जाता है।

2. हिमानी का परिवहन कार्य
हिमानी का परिवहन कार्य तभी सम्पन्न होता है जब वह अपने उद्गम स्थान से आगे की ओर खिसकती है। अपरदन के अन्य कारकों की भाँति हिमानी भी अपने साथ कंकड़-पत्थर, शिलाखण्ड, बालू-कणे, मिट्टी आदि लेकर आगे बढ़ती है। यह अवसाद हिमानी के अनेक भागों से टकराता हुआ आगे बढ़ता है। हिमानी की तली में रगड़ खाता हुआ मलबा तलस्थ हिमोढ़ों का निर्माण करता है। किनारों पर घिसकर चलता हुआ मलबा पार्श्व हिमोढों का निर्माण करता है। बहुत-सा मलबा हिमानी के सबसे आगे वाले भाग पर रगड़ खाता हुआ चलता है, जिससे अग्रांतस्थ हिमोढ़ का निर्माण होता है। हिमानी के साथ चलने वाले भारी शिलाखण्डों का व्यास 12 मीटर से 15 मीटर तक होता है।

3. हिमानी का निक्षेपणात्मक कार्य
अधिकांशतः हिमानी का निक्षेपण कार्य तभी सम्भव हो पाता है जब हिम पिघलना प्रारम्भ कर देता है। हिमानी अपने साथ लाये गये मलबे को विभिन्न रूपों में जमा करती जाती है। हिमानी के निक्षेपण कार्य से निम्नलिखित भू-आकृतियों का निर्माण होता है

(अ) हिमनद हिमोढ़ (Glacial Moraines)-हिमानी जैसे ही आगे की ओर प्रवाहित होती है, नदी-घाटियों के शिलाखण्ड, बालू, कंकड़-पत्थर, मिट्टी आदि भी इसके साथ आगे की ओर बढ़ते हैं। अधिकांशतः यह मलबा शैलों के टूटने तथा हिमानी की तली एवं किनारों से प्राप्त होता है। इस प्रकार यह अवसाद विभिन्न भागों में एकत्र हो जाती है। एकत्रित अवसाद को ही हिमनद हिमोढ़
कहते हैं।

(ब) हिमनदोढ़ टिब्बा (Drumlin)-हिमानी के निक्षेपण कार्य से निर्मित यह एक टीलेनुमा आकृति होती है जो आकार में उल्टी नाव के समान होती है। हिमानी के सामने वाला भाग खड़े ढाल वाला तथा पीछे का भाग कम ढाल वाला होता है। वास्तव में इस प्रकार की आकृतियों का निर्माण हिमानी के आगे-पीछे हटने पर होता है। जब हिमानी पीछे हटती है तो वह आगे अग्रांतस्थ हिमोढ़ बनाती है। इस प्रकार कई बार आगे-पीछे हटने से एक ही क्रम में अग्रांतस्थ हिमोढ़ों की रचना होती है। जब हिमानी पुनः आगे की ओर प्रवाहित होती है तो पहले से विकसित हिमोढ़ों के ऊपर से होकर आगे बढ़ जाती है। इस प्रकार सामने वाला भाग खड़े ढाल वाला तथा खुरदरा हो जाता है तथा विपरीत ढाल सामान्य होता है, जिसे हिमनदोढ़ टिब्बा कहा जाता है।

(स) एस्कर (Esker)-ये हिमानी एवं जल के मिश्रित प्रभाव द्वारा निर्मित घाटियों में स्थित कम ऊँचे, कम लम्बे तथा कम चौड़े बल खाते हुए टीले के आकार में घाटी के प्रवाह की दिशा में फैले होते हैं। हिमानी के मार्ग में पहले से विकसित जितनी भी भू-आकृतियाँ होती हैं, ये उनके ऊपर बिछ जाते हैं। ये 60 से 90 मीटर ऊँचे तथा 24 किमी तक लम्बे होते हैं।

प्रश्न 3. मरुस्थलीय स्थलाकृतियों के विकास में वायु के कार्यों की विवेचना कीजिए।
या अपरदन एवं निक्षेपण के कारक के रूप में वायु के कार्यों का वर्णन कीजिए तथा इसके द्वारा निर्मित स्थलाकृतियों की विवेचना कीजिए। |
या पवंन के कार्य तथा उससे उत्पन्न स्थलाकृतियों का विवरण दीजिए।
उत्तर-अपरदन के अन्य कारकों से वायु का कार्य पर्याप्त भिन्नता रखता है, परन्तु अर्द्ध-शुष्क मरुस्थलीय भागों में वायु अपरदन का एक प्रमुख साधन होती है। ध्रुवीय भागों को छोड़कर समस्त स्थलीय भाग का 30% क्षेत्रफल मरुस्थलीय है। अत: वायु व्यापक क्षेत्र पर अपने कार्यों का सम्पादन करती है तथा अपरदन में सहयोग देती है।।

वायु अपने अपरदनात्मक कार्यों द्वारा स्थलीय भाग को अपरदित कर प्राप्त चट्टान-चूर्ण एवं रेत-कणों का कुछ दूरी तक परिवहन करती है तथा अवरोध पर उपस्थित होने पर निक्षेपण की क्रिया द्वारा विभिन्न स्थलरूपों का निर्माण करती है।

(1) वायु का अपरदनात्मक कार्य ।

पवन द्वारा अपरदन का कार्य यान्त्रिक है। यह अपने साथ उड़ाकर ले जाए जाने वाले मोटे बालू-कणों एवं चट्टान-चूर्ण की सहायता से अपरदन कार्य सम्पन्न करती है। यह कार्य वायुमण्डल के निचले स्तरों में अधिक होता है, क्योंकि नीचे की ओर ही धूल-कणों की मात्रा अधिक होती है। शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क भागों में यह कार्य अधिक देखने को मिलता है। वायु द्वारा अपरदन कार्य तीन प्रकार से सम्पन्न होता है–

(i) अपवाहन (Deflation)-इसे उड़ाने का कार्य भी कहते हैं। इसके लिए सतह का पूर्ण रूप से शुष्क होना अति आवश्यक है। इसमें वायु शुष्क एवं असंगठित पदार्थों को अपने साथ उड़ा ले जाती है। यह पदार्थ दूर-दूर तक पवन के साथ उड़ते चले जाते हैं।

(ii) अपघर्षण (Abrasion)-तीव्र वेग वाली वायु अपघर्षण की क्रिया के लिए उपयुक्त होती है। वास्तव में मोटे धूल-कण ही अपरदन के मुख्य यन्त्र हैं। इनके द्वारा चट्टानें घिस-घिसकर चिकनी | हो जाती हैं। धूल-कणों के अपघर्षण से चट्टानों में खरोंचें पड़ जाती हैं। वायु द्वारा अपघर्षण का यह कार्य सतह के समीप अधिक होता है।

(iii) सन्निघर्षण (Attrition)-वायु की तीव्रता में उड़ने वाले कण मार्ग में पड़ने वाली चट्टानों से टकराकर चट्टानों को तो घिसते ही हैं, साथ ही स्वयं टूटकर भी छोटे होते जाते हैं। इस प्रकार से परस्पर टकराने तथा बिखरने की क्रिया को सन्निघर्षण कहते हैं। वायु द्वारा अपरदन कार्य प्रत्येक क्षेत्र में समान गति एवं एक निश्चित समय में होना असम्भव है।

वायु के अपरदन कार्यों पर तथ्यों को भी प्रभाव पड़ता है—(अ) वायु वेग, (ब) धूल-कणों का आकार एवं ऊँचाई, (स) चट्टानों की संरचना एवं (द) जलवायु।।

वायु की अपरदनात्मक स्थलाकृतियाँ।
1. वातगर्त (Blow Out)-भू-सतह के ऊपर वायु के निरन्तर प्रहार से एक ही स्थान की कोमल एवं ढीली चट्टानें अपरदित होती रहती हैं। इसे वायु अपने साथ उड़ा ले जाती है। इस प्रकार उस स्थान पर गर्त-सा निर्मित हो जाता है, जिसे वातगर्त कहते हैं। इनका आकार तश्तरीनुमा होता है।

2. इन्सेलबर्ग (Inselberg)-इन्हें गुम्बदनुमा टीले भी कहते हैं। मरुस्थलीय क्षेत्रों में वायु के अपरदन से कोमल चट्टानें आसानी से कट जाती हैं, परन्तु कठोर चट्टानों के अवशेष ऊँचे-ऊँचे टीलों के रूप में खड़े रह जाते हैं। इस प्रकार के टीलों या टापुओं को इन्सेलबर्ग के नाम से पुकारते हैं। इनका निर्माण नीस अथवा ग्रेनाइट चट्टानों के अपक्षय तथा अपरदन से होता है।
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3. छत्रक शिला (Mushroom Rocks)-मरुस्थलीय भागों में कठोर शैल के ऊपरी आवरण के नीचे कोमल शैल लम्बवत् रूप में मिलती है तो उस पर अपघर्षण के प्रभाव से चट्टानों के निचले भाग इस तरह कट जाते हैं कि उनका आकार छतरीनुमा हो जाता है, जिन्हें छत्रक शिला कहते हैं। सहारा मरुस्थल में इन्हें हमादा के नाम से पुकारते हैं।

4. भू-स्तम्भ (Demoiselles)-शुष्क प्रदेशों में, जहाँ असंगठित मलबे से बनी कोमल चट्टानों के ऊपर कठोर चट्टान की परत जमा हो तो वहाँ वायु द्वारा असंगठित चट्टानों का अपरदन करते रहने से ऊँचे-नीचे टीले बने रह जाते हैं। इनके शिखर कठोर चट्टानों से निर्मित होते हैं। इस प्रकार की भू-आकृतियों को भू-स्तम्भ कहते हैं। मरुस्थलीय नदियों की घाटियों में इस प्रकार के भू-स्तम्भ देखे जा सकते हैं।
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5. ज्यूगेन (Zeugen)-इनकी आकृति ढक्कनदार दवात की भाँति होती है। इस प्रकार की आकृति मरुस्थलीय प्रदेशों में, जहाँ कोमल और कठोर चट्टानों की परतें एक-दूसरी के ऊपर बिछी होती हैं, निर्मित होती हैं। कठोर परतों की दरारों में ओस भरने के कारण तापमान निम्न हो जाता है जिससे दरारें और चौड़ी हो जाती हैं। दरारों के बढ़ने से कोमल चट्टानों की परतें निकल आती हैं। इन परतों का वायु आसानी से अपरदन कर लेती है जिससे चट्टानों के मध्य में घाटियाँ विकसित हो जाती हैं, जिन्हें ज्यूगेन कहते हैं।

6. यारडंग (Yardang)-यारडंग ज्यूगेन के विपरीत अवस्था में निर्मित होता है, अर्थात् जब कोमल और कठोर चट्टानों के स्तर लम्बवत् रूप में मिलते हैं तो वायु कोमल चट्टानों को आसानी से अपरदित कर उड़ा ले जाती है। इससे कठोर चट्टानों के अवशेष खड़े रह जाते हैं। मंगोलिया में इस प्रकार की स्थलाकृतियों को यारडंग कहते हैं।

7. त्रिकोण खण्ड (Dreikanter)-पथरीले मरुस्थलों के शिलाखण्डों पर वायु के अपरदन द्वारा खरोंचें पड़ जाती हैं, जिससे तरह-तरह की नक्काशी-सी हो जाती है। ऐसे शिलाखण्डों को त्रिकोण खण्ड कहते हैं।

(2) वायु का परिवहन कार्य।

वायु की दिशा अनिश्चित होने के कारण इसका परिवहन कार्य निश्चित नहीं होता। वायु भूतल की ऊपरी सतह पर चलती है; अतः अपरदित पदार्थों को बड़े पैमाने पर परिवहन नहीं कर पाती। हल्के पदार्थों का परिवहन दूरवर्ती भागों तक हो जाता है। सामान्यतया वायु के परिवहन द्वारा अपरदित पदार्थों का स्थानान्तरण अधिक दूरी तक नहीं हो पाता, परन्तु आँधी एवं तूफान के समय हजारों किमी की दूरी तक वायु द्वारा अपरदित पदार्थों को पहुंचा दिया जाता है। उदाहरणार्थ—सहारा के रेगिस्तान से चलने वाले तूफान बालू उड़ाकर भूमध्य सागर के पार इटली तथा जर्मनी तक पहुँचा देते हैं।

(3) वायु का निक्षेपणात्मक कार्य।

वायु का निक्षेपण कार्य बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है। जब वायु की गति मन्द होती है तथा उसके मार्ग में कोई बाधा उपस्थित होती है तो उसके द्वारा वहन किये जाने वाला बहुत-सा पदार्थ भूतल पर बिछता जाता है। हल्के पदार्थ काफी दूर तक वायु के साथ उड़ जाते हैं तथा वहीं पर बिछा दिये जाते हैं। वायु द्वारा निक्षेपणात्मक स्थलाकृतियों की रचना के लिए वायु के मार्ग में विभिन्न अवरोधों; जैसे—वनों, झाड़ियों, दलदलों, नदियों, जलाशयों आदि का होना अति आवश्यक है।

निक्षेपणात्मक स्थलाकृतियाँ

वायु के निक्षेपण कार्यों से निम्नलिखित प्रमुख स्थलाकृतियों का निर्माण होता है
1. तरंग चिह या ऊर्मिका चिह (Ripples Mark)-मरुस्थलीय प्रदेशों में बालू के निक्षेपं लहरों के रूप में दिखाई पड़ते हैं। इनका आकार और क्रम जल में उठने वाली लहरों के समान होता है। इनकी ऊँचाई एक इंच से भी कम होती है। इनकी पंक्तियाँ वायु की दिशा से लम्बवत् होती हैं। इन्हें ऊर्मिका चिह्न भी कहते हैं। वायु की दिशा में परिवर्तन से इनका स्वरूप भी बदलता रहता है।

2. बालुका-स्तूप या बालू के टीले (Sand-Dunes)-बालुका-स्तूप रेत के वे टीले होते हैं जो वायु द्वारा रेत के निक्षेप से निर्मित होते हैं। बालू के टीले उन स्थानों पर अधिक मिलते हैं जहाँ ढीले रेत के कण प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हों तथा वायु की दिशा भी प्रायः स्थिर हो। इन टीलों के आकार तथा स्वरूप में पर्याप्त अन्तर मिलता है। बालू के टीलों का निर्माण शुष्क तथा अर्द्ध-शुष्क भागों के अतिरिक्त सागरतटीय क्षेत्रों, झीलों के रेतीले तटों, रेतीले प्रदेशों से बहने वाली नदियों के बाढ़ प्रदेशों आदि स्थानों में होता है। सामान्यतया बालू के टीलों की ऊँचाई 30 मीटर से 60 मीटर तक पायी जाती है, परन्तु लम्बाई कई किमी तक होती है। कुछ टीलों की ऊँचाई 120 मीटर तथा लम्बाई 6 किमी तक देखी गयी है। इनका आकार गोल, नव-चन्द्राकार तथा अनुवृत्ताकार होता है। बालुका-स्तूपों के निर्माण के लिए निम्नलिखित भौगोलिक दशाओं का होना अति आवश्यक है(i) बालू की पर्याप्त मात्रा, (ii) तीव्र वायु-प्रवाह, (iii) वायु-मार्ग में अवरोध की स्थिति, (iv) बालू संचित होने का स्थान एवं (v) वायु का एक निश्चित दिशा में निरन्तर बहते रहना।। बालू के टीलों का जन्म प्रायः घास के गुच्छों, झाड़ी या पत्थर आदि द्वारा वायु के वेग में बाधा पड़ने से होता है। भूतल की अनियमितता भी बालू के टीलों को जन्म देती है। यह बाधा वायु वेग को कम कर देती है जिससे वायु में उपस्थित रेत के कणों का निक्षेप होना आरम्भ हो जाता है। यह निक्षेप विकसित होते-होते बालू के टीले निर्मित हो जाते हैं।

बालुका-स्तूपों के प्रकार (Types of Sand-Dunes)-आकार के आधार पर बालुका-स्तूप निम्नलिखित प्रकार के होते हैं

(i) अनुप्रस्थ बालुका-स्तूप (Transverse Sand-Dunes)- इस प्रकार के बालुका-स्तूप ऐसे क्षेत्रों में पाये जाते हैं, जहाँ वायु काफी समय से एक ही दिशा में बह रही हो। इनकी संरचना वायु की दिशा से लम्बवत् होती है। इन टीलों का शीर्ष वायु के विपरीत तथा रचना अर्द्ध-चन्द्राकार आकृति में होती है। वायु द्वारा निर्मित टीलों से बालू के कण मध्य भाग से उड़ते रहते हैं, जिससे मध्य भाग धीरे-धीरे खोखला हो जाता है।

(ii) समानान्तर बालुका-स्तूप, (Longitudinal Sand-Dunes)-इस प्रकार के बालुका-स्तूप की रचना एक विशेष परिस्थिति में होती है। इनकी आकृति पहाड़ी जैसी होती है। वायु की प्रवाह दिशा के समानान्तर लगातार इनका निर्माण होता रहता है। सहारा मरुस्थल में ऐसे टीलों को ‘सीफ’ नाम से पुकारा जाता है। विश्व में ऐसे बालुका स्तूप अधिक पाये जाते हैं, क्योंकि ये अधिक समय तक स्थिर रहते हैं।

(iii) अर्द्ध-चन्द्राकार बालुका-स्तूप (Parabolic Sand-Dunes)-ऐसे स्तूप की रचना वायु की दिशा के तीव्र प्रवाह के विपरीत बालू को मार्ग में एकत्रित करने से होती है। इनका आकार लम्बाई में अधिक होता है। इन स्तूपों का ढाल वायु की दिशा की ओर मन्द तथा विपरीत दिशा में तीव्र होता है। इन पर वनस्पति उग आती है जिससे ये आगे-पीछे नहीं खिसक पाते। इन टीलों का निर्माण बहुत कम होता है।

बालुका-स्तूपों का पलायन या खिसकना (Migration of Sand-Dunes)– अधिकांश बालुका स्तूप अपने स्थान पर स्थिर नहीं रहते तथा अपना स्थान परिवर्तन करते रहते हैं। बालुका टिब्बों के इस स्थान परिवर्तन को पलायन कहा। जाता है। इससे इन स्तूपों का आकार कम होता रहता है, परन्तु कुछ टीले इस : प्रक्रिया में नष्ट भी हो जाते हैं।
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वायु की दिशा के सामने से बालू-कण शिखर पर पहुँचकर विपरीत ढाल पर एकत्रित होते रहते हैं। इससे वायु के सामने का भाग छोटा और ढाल बढ़ता जाता है। जब अधिक समय तक यही प्रक्रिया होती रहती है तो बालुका-स्तूप वायु की दिशा में स्थानान्तरित होने लगते हैं। टिब्बों का पलायन सभी स्थानों पर समान गति से नहीं होता। पलायन की गति स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करती है। प्रायः बालुका टिब्बों का पलायन कुछ मीटर प्रतिवर्ष की दर से अधिक नहीं होता, परन्तु कहीं-कहीं पलायन की गति 30 मीटर वार्षिक की दर से अधिक पायी जाती है। संयुक्त राज्य के ओरेगन तट पर विशाल बालुका टिब्बा लगभग 1.2 मीटर प्रतिवर्ष की दर से पलायन कर रहे हैं।

(iv) बरखान (Barkhans)- ऊँची-नीची पहाड़ियों के मध्य बरखान पाये जाते हैं। कभी-कभी ये इधर-उधर भी बिखर जाते हैं। सहारा मरुस्थल में बरखान के बीच आने-जाने का रास्ता भी होता है, जिसे गासी और कारवाँ के नाम से जानते हैं। इनकी आकृति भी अर्द्ध-चन्द्राकार एवं धनुषाकार होती है। वायु की दिशा बदलने पर बरखान की स्थिति में भी परिवर्तन आ जाता है। इनका
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आकार 100 मील तक लम्बा तथा 600 फीट तक ऊँचा होता है। बरखान के सामने वाला। ढाल मन्द तथा विपरीत वाला ढाले अवतल होता है।

3. लोयस (Loess)-वायु में मिट्टी के बारीक कण लटके रहते हैं। ये दूर-दूर जाकर वायु द्वारा निक्षेपित कर दिये जाते हैं। इस प्रकार वायु द्वारा उड़ाई गयी धूल-कणों के निक्षेप से निर्मित स्थल स्वरूपों को लोयस कहा जाता है। लोयस के निर्माण के लिए धूल आदि आवश्यक सामग्री मरुस्थलीय भागों की रेत, नदियों के बाढ़ क्षेत्र, रेतीले समुद्रतटीय क्षेत्र तथा हिमानी निक्षेपण जनित अवसाद मिलना अति आवश्यक है। लोयस का जमाव समुद्रतल से लेकर 5,000 फीट की ऊंचाई तक पाया जाता है। इसका रंग पीला होता है जिसका प्रमुख कारण ऑक्सीकरण क्रिया का होना है। विश्व में लोयस की मोटाई 300 मीटर तक पायी जाती है। चीन में ह्वांगहो नदी के उत्तर व पश्चिम में लोयस के जमाव मिलते हैं।

4. धूल-पिशाच (Dust-Devil)-इस क्रिया में धूल के कण वायु द्वारा ऊपर उठा दिये जाते हैं। वायु में भंवरें उत्पन्न होने के कारण धूल के महीन कण ऊपर उठकर एक पिशाच का रूप धारण कर लेते हैं। इसे ही ‘धूल-पिशाच’ कहा जाता है।

5. बजादा (Bajada)-मरुस्थलों में अचानक ही वर्षा हो जाने से बाढ़ आ जाती है। अस्थायी नदियाँ तीव्र ढालों पर घाटियाँ काट लेती हैं। ढाल का मलबा तीव्रता से कट जाता है तथा नीचे की ओर जलोढ़ पंख का निर्माण हो जाता है। जब किसी बेसिन में इस प्रकार के कई पंख एक साथ मिल जाते हैं तो एक गिरिपदीय,ढाल क्षेत्र बन जाता है, जिसे ‘बजादा’ कहा जाता है।

6. प्लाया (Playa)-मरुस्थलों में भारी वर्षा होने के कारण कहीं पर गड्ढा-सा बन जाता है। यहाँ पर जल भर जाने से झील निर्मित हो जाती है। ऐसी झीलों को प्लाया झील कहते हैं।

7. बोल्सन (Bolson)-यदि किसी पर्वत से घिरे विस्तृत मरुस्थल के निचले भाग की ओर नदियाँ बाढ़ के समय अवसाद गिराती हैं तो बेसिन का फर्श जलोढ़ मिट्टी से भर जाता है। ऐसे बेसिनों को ‘बोल्सन’ कहते हैं।

प्रश्न 4. भूमिगत जल के अपरदनात्मक कार्य एवं उनसे उत्पन्न स्थलाकृतियों की विवेचना कीजिए।
या भूमिगत जल के परिवहन कार्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर-भूमिगत जल मन्द गति से प्रवाहित होता हुआ अपने रासायनिक तथा यान्त्रिक कार्यों द्वारा अपरदन के अन्य कारकों के समान चट्टानों को अपरदित कर उससे प्राप्त मलबे का कुछ सीमा तक परिवहन करता है। तथा अन्त में कोई अवरोध उपस्थित हो जाने पर उसका निक्षेपण कर देता है।

भूमिगत जल द्वारा अपरदनात्मक कार्य

भूमिगत जल का अपरदन कार्य अन्य कार्यों की अपेक्षा कम महत्त्वपूर्ण एवं मन्द गति वाला होता है। यह जल चुनायुक्त प्रदेशों में रन्ध्रयुक्त शैलों में प्रवेश कर जाता है। इसी कारण यह स्वतन्त्र रूप से कार्य नहीं कर पाता। भूमिगत जल द्वारा यान्त्रिक अपरदन वर्षा ऋतु में अधिक होता है, जबकि रासायनिक अपरदन अबैध गति से चलता रहता है। वर्षा का जल भूमि में प्रवेश कर कार्बनयुक्त हो जाता है जिससे वह रासायनिक क्रिया कर चट्टानों को अपने में घोल लेता है तथा विचित्र प्रकार की स्थलाकृतियों को जन्म देता है। इसके अपरदन कार्यों (घोलन) द्वारा निम्नलिखित स्थलाकृतियों का निर्माण होता है

अपरदनात्मक स्थलाकृतियाँ
1. लैपीज या अवकूट (Lappies)-वर्षा का जल चूने की सतहों से होकर नीचे चला जाता है। दरारों के घुलने से उनकी चौड़ाई बढ़ती जाती है और बीच के अवशिष्ट भागों में छोटी-छोटी नुकीली पहाड़ियाँ-सी खड़ी रह जाती हैं। इस प्रकार की स्थलाकृतियों को लैपीज या अवकूट कहा जाता है। इन्हें ‘कारेन’, ‘क्लिट’ तथा ‘बोगाज’ के नाम से भी पुकारते हैं।

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2. घोल रन्ध्र (Sink or Solution Holes)-वर्षा का जल चुनायुक्त प्रदेशों में सक्रिय रहने के कारण पहले छोटे-छोटे छिद्रों का निर्माण करता है। बाद में इन छिद्रों का आकार बड़ा हो जाता है, जिन्हें घोल रन्ध्र कहा जाता है। यह प्रक्रिया अवकूट के बाद में होती है। इनकी गहराई 3 मीटर से 30 मीटर तक पायी जाती है। इन्हें ‘ऐवंस’ तथा ‘स्वालो होल्स’ के नाम से भी पुकारते हैं।

3. युवाला या विलयन रन्ध्र (Uvalas)-घोल रन्ध्र परस्पर मिलकर बड़े छिद्रों का निर्माण करते हैं; अर्थात् घोल रन्ध्र से बड़ी भू-आकृति को विलयन रन्ध्र कहते हैं। कभी-कभी आकार इतना विस्तृत होता है कि इनमें भूमिगत नदियों का लोप हो जाता है जिनसे उनकी धरातलीय घाटियाँ सूख जाती हैं। कभी-कभी इनका निर्माण गुफा के नीचे पॅस जाने से भी होता है। छोटे-छोटे विलयन रन्ध्रों को जामा’ कहते हैं। इन्हें सकुण्ड भी कहा जाता है।

4. पोल्जे या राजकुण्ड (Polje)-सकुण्डों से अधिक बड़े गत को ‘राजकुण्ड’ कहते हैं। वास्तव में यह सकुण्ड का विस्तृत रूप होता है। अनेक सकुण्डों के मिलने से राजकुण्डे का निर्माण होता है। इनका आकार प्रायः 259 वर्ग किमी तक देखा गया है। इन्हें ‘काकपिट’ भी कहा जाता है। इनका विकास जमैका में अधिक हुआ है।

5. पॉकिट घाटियाँ (Pocket Valleys)-इन घाटियों को ‘स्टीप हैड’ भी कहा जाता है। अनेक स्थानों पर मूंगे की चट्टानें इतनी पारगम्य होती हैं कि उनके तीव्र ढाल वाले मुख के आधार से जल । रिसता रहता है। यहाँ पर गड्ढे उत्पन्न हो जाते हैं जिनका सिर सीधा तथा फर्श समतल होता है। घुलन क्रिया द्वारा जब गड्ढे बड़े हो जाते हैं तो इन्हें पॉकिट घाटियाँ भी कहते हैं।

6. अन्धी घाटियाँ या कार्स्ट घाटियाँ (Blind Valleys or Karst Valleys)-जब धरातलीय नदियाँ घोल रन्ध्र, विलयन रन्ध्र आदि छिद्रों से प्रवेश करती हैं तो आगे चलकर अचानक ही इनका जल समाप्त हो जाता है। यदि वर्षा अधिक हो जाये तो नदियाँ कुछ दूर आगे बहने लगती हैं। इस नदी घाटी का आकार अंग्रेजी के ‘U’ अक्षर की भाँति होता है। जैसे ही वर्षा की मात्रा कम होती है, इन घाटियों का जल छिद्रों द्वारा नीचे बहता जाता है एवं घाटी सूख जाती है। इन्हें ही ‘अन्धी घाटियाँ’ अथवा ‘कार्ट घाटियाँ’ कहा जाता है।

7. शुष्क लटकती घाटियाँ (Dry Hanging Valleys)-इन्हें ‘बाउरनेज’ नाम से भी पुकारा जाता है। जो नदियाँ चूना क्षेत्रों के बाहर से बहती हुई आती हैं, वे अपरदन द्वारा अपना मार्ग गहरा काट लेती हैं। इससे वहाँ का जल-स्तर नीचा हो जाता है। इन नदियों की सहायक नदियाँ, जो चूने या चॉक क्षेत्रों में प्रवाहित होती हैं, अधिक जल से युक्त नहीं होतीं तथा उनका जल घोल रन्ध्रों आदि से भूमिगत मार्गों द्वारा बह जाता है जिससे ये शुष्क दिखाई देती हैं। इन्हें शुष्क घाटियाँ कहते हैं। कुछ समय पश्चात् इनको तल मुख्य नदी की अपेक्षा इतना ऊँचा हो जाता है कि इन्हें, शुष्क निलम्बी घाटियाँ अथवा शुष्क लटकती घाटियाँ कहने लगते हैं।

8. हम्स या चूर्ण कूट (Hums)-जब किसी अपारगम्य शैल पर स्थित चूने की शैल घुलन-क्रिया द्वारा पूर्णतया नष्ट हो चुकी होती है तो उसके अन्तिम अवशेष को हम्स या चूर्ण कूट कहते हैं। इनका दूसरा नाम ‘मोनाडनाक’ भी है।

9. टेरा-रोसा (Terra-Rossa)-भूमि द्वारा जब वर्षा का जल सोखा जाता है तो धरातल की ऊपरी | पपड़ी के अनेक अंश घुलकर बह जाते हैं जिससे इस मिट्टी की रासायनिक संरचना में परिवर्तन हो जाता है। प्रायः इस क्रिया में लाल मिट्टी का निर्माण होता है। इसकी परतें कहीं-कहीं मोटी होती हैं। तथा कहीं पर महीन जिससे यह धरातल को ढक लेती है। इन्हें ही ‘टेरा-रोसा’ कहा जाता है।

भूमिगत जल का परिवहन कार्य

मन्द गति होने के कारण भूमिगत जल का परिवहन कार्य अधिक महत्त्व नहीं रखता। वर्षा के जल में कार्बन डाइऑक्साइड गैस होने के कारण इसकी घोलन शक्ति बढ़ जाती है जिससे यह चट्टानों को आगे की ओर बहा ले जाता है। भूमिगत जल घोल के रूप में अधिक कार्य करता है, परन्तु धरातल पर प्रत्यक्ष रूप में इससे कोई भू-आकृति नहीं बनती। यही कारण है कि भूमिगत जल का परिवहन कार्य अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है।

भूमिगत जल का निक्षेपणात्मक कार्य

भूमिगत जल का निक्षेपण कार्य अधिक महत्त्व रखता है, क्योंकि जल में खनिज लवणों को घोलने की अपार शक्ति होती है। इस जल में मैग्नीशियम, कैल्सियम कार्बोनेट, सिलिका एवं लोहांश की अधिकता होती है। इन खनिज लवणों की अधिकता के कारण यह जल अधिक आगे नहीं बढ़ पाता; अतः उसको निक्षेपण प्रारम्भ हो जाता है। निक्षेपण की इस क्रिया के लिए निम्नलिखित दशाओं का होना आवश्यक है-

  • ताप में कमी,
  • दबाव की कमी,
  • वाष्पीकरण का अधिक होना,
  • रासायनिक क्रिया का होना एवं
  • गैसों की कमी।

निक्षेपणात्मक स्थलाकृतियाँ ।
भूमिगत जल की निक्षेपण क्रिया द्वारा निम्नलिखित स्थलाकृतियों का निर्माण होता है– :
1. शिराएँ (Veins)-खनिजयुक्त जल जब संधियों एवं भ्रंशों में पहुँचता है तो खनिज पदार्थ उनमें जमकर शिराओं का रूप धारण कर लेते हैं।

2. सीमेण्ट (Cement)-ढीले तलछट में जब भूमिगत जल सिलिका, कैल्सियम कार्बोनेट, आयरन ऑक्साइड आदि का निक्षेप मिला देता है तो यह तलछट कठोर होकर ठोस रूप धारण कर लेती है। भूमिगत जल द्वारा निक्षेप किये गये ऐसे पदार्थ सीमेण्ट कहलाते हैं।

3. स्टेलेक्टाइट (आश्चुताश्म) (Stalactite)-जब कन्दरा की ऊपरी छत से चूनायुक्त अवसाद रिस-रिसकर नीचे फर्श पर टपकता रहती है तो यह अवसाद अपने साथ घुलन क्रिया द्वारा प्राप्त पदार्थों को समाविष्ट किये रहता। है। इस जल की कार्बन डाइ ऑक्साइड उड़ जाती है और जल में घुला कैल्सियम कार्बोनेट छत पर अन्दर की ओर जम जाता है। ये जमाव लम्बे किन्तु पतले स्तम्भों के रूप में होते हैं। ये कन्दरा की छत की ओर बढ़ते जाते हैं। इन लटकते हुए स्तम्भों को स्टेलेक्टाइट कहा जाता है। चूंकि स्तम्भ ऊपर से नीचे की ओर लटके रहते हैं; अतः इन्हें ‘आकाशी स्तम्भ’ भी कहते हैं। ये स्तम्भ छत की ओर मोटे होते हैं और नीचे की ओर पतले, इसलिए इन्हें ‘अवशैल’ भी कहा जाता है।
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4. स्टेलेग्माइट (निश्चुताश्म) (Stalagmite)-कन्दरा की छत से रिसने वाले जल की मात्रा यदि अधिक होती है तो वह सीधे टपककर कन्दरा के फर्श पर निक्षेपित होना प्रारम्भ हो जाता है। धीरेधीरे निक्षेप द्वारा इन स्तम्भों की ऊँचाई ऊपर की ओर बढ़ने लगती है। इस प्रकार के स्तम्भों को स्टेलेग्माइट कहा जाता है। फर्श की ओर ये मोटे तथा विस्तृत होते हैं, परन्तु ऊपर की ओर पतले तथा ‘नुकीले होते हैं। कन्दरा स्तम्भ

5. कन्दरा स्तम्भ (Cave- Pillars)-स्टेलेग्माइट की अपेक्षा स्टेलेक्टाइट अधिक लम्बे होते हैं। निरन्तर बढ़ते जाने के कारण स्टेलेक्टाइट कन्दरा के फर्श पर पहुँच जाता है। इस प्रकार के स्तम्भ को कन्दरा-स्तम्भ कहते हैं। कभी-कभी स्टेलेक्टाइट एवं स्टेलेग्माइट दोनों के एक-दूसरे की ओर बढ़ने से तथा आपस में मिलने से भी कन्दरा-स्तम्भों का निर्माण हो जाता है।

प्रश्न 5. समुद्र विभेदी अपरदन क्या है? इस क्रिया द्वारा निर्मित मुख्य स्थलाकृतियों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर–समुद्रतटीय प्रदेशों में सागरीय तरंगें अपरदन का महत्त्वपूर्ण साधन होती हैं। इस कार्य में समुद्री धाराएँ, ज्वारभाटा और सागरों में उठे तूफान भी सहयोग प्रदान करते हैं। समुद्रतटीय प्रदेशों में इस प्रकार होने वाला अपरदन ही विभेदी अपरदन कहलाता है। यह अपरदन निम्नलिखित कारकों द्वारा प्रभावित होता है|

  1. सागरीय तरंगों का आकार एवं शक्ति।
  2. ज्वारभाटा की तीव्रता।
  3. जलस्तर के मध्य स्थित तट की ऊँचाई।
  4. चट्टानों की संरचना एवं संगठन।
  5. जल की मात्रा एवं गहराई।।

सागरीय तरंगों द्वारा तीन प्रकार से अपरदन कार्य सम्पन्न होता है

  • सागरीय तरंगें जब अपनी पूरी शक्ति के साथ तट की ओर बढ़ती हैं तो चट्टानों की दरारो में हवा बड़ी तेजी से भरती है। चट्टानों से टकराकर जब सागरीय तरंग वापस होती हैं, तब यह दबी हुई हवा बहुत तेजी से फैलकर चट्टान को तोड़ देती है।
  • जब तरंगें बजरी और बालू से भरी होती हैं, तब तटीय चट्टानों को तेजी से अपरदित करती हैं। क्योंकि इनके साथ जल के अतिरिक्त चट्टानी पदार्थ भी अपरदन में सहयोग प्रदान करता है।
  • चूनायुक्त चट्टानों को सागरीय तरंगें जल के साथ घोलकर अपरदन करती हैं।

स्थलाकृतियाँ-सागरीय तरंगों की अपरदन क्रिया से समुद्री भृगु, गुफा, स्टैक तथा मेहराब आदि स्थलाकृतियाँ निर्मित होती हैं।
1. सागरीय भृगु-समुद्र के सीधे खड़े तट को समुद्री भृगु कहते हैं। प्रारम्भ में सागरीय तरंगें तटीय चट्टानों को अपरदित करके खाँचे बनाती हैं। धीरे-धीरे जब यह खाँचे चौड़े और गहरे हो जाते हैं तो इनका आकार खोखला हो जाता है और तटीय चट्टान का ऊपरी भाग ढहकर गिर जाता है। इस प्रकार समुद्री भृगु अपरदन प्रक्रिया से पीछे हटते रहते हैं। भारत के पश्चिमी तट पर यह स्थलाकृति देखी जाती है।

2. समुद्री गुफा-जब ऊपरी चट्टान कठोर तथा निचली चट्टान कोमल होती है तो सागरीय तरंगें नीचे की कोमल चट्टान का कटाव कर देती हैं तथा ऊपर की कठोर चट्टान बनी रहती है। इस प्रकार समुद्री गुफा बन जाती है। ऊपरी कठोर चट्टान इतनी दृढ़ होती है कि वह बिना आधार के भी टिकी रहती है।

3. समुद्री मेहराब-जब सागरीय तरंगें गुफा के दोनों ओर से अपरदन करती हैं तो चट्टान के आर-पार एक सुरंग बन जाती है और चट्टान का ऊपरी भाग पुल की तरह बना रहता है। इसे समुद्री मेहराब या प्राकृतिक पुल (Natural Bridge) कहते हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 12 World Climate and Climate Change

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 12 World Climate and Climate Change (विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (1) कोपेन के A प्रकार की जलवायु के लिए निम्न में से कौन-सी दशा अर्हक है?
(क) सभी महीनों में उच्च वर्षा।
(ख) सबसे ठण्डे महीने का औसत मासिक तापमान हिमांक बिन्दु से अधिक
(ग) सभी महीनों का औसत मासिक-तापमान 18° सेल्सियस से अधिक
(घ) सभी महीनों का औसत तापमान 10° सेल्सियस के नीचे ।
उत्तर-(क) सभी महीनों में उच्च वर्षा।

प्रश्न (ii) जलवायु के वर्गीकरण से सम्बन्धित कोपेन की पद्धति को व्यक्त किया जा सकता है
(क) अनुप्रयुक्त
(ख) व्यवस्थित
(ग) जननिक
(घ) आनुभविक
उत्तर-(घ) आनुभविक।।

प्रश्न (ii) भारतीय प्रायद्वीप के अधिकतर भागों को कोपेन की पद्धति के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा
(क) “AP
(ख) “BSh”
(ग) “Cfb”
(घ) “Am”
उत्तर-(घ) “Am”.

प्रश्न (iv) निम्नलिखित में से कौन-सा साल विश्व का सबसे गर्म साल माना गया है?
(क) 1990
(ख) 1998
(ग) 1885
(घ) 1950
उत्तर-(क) 1990.

प्रश्न (v) नीचे लिखे गए चार जलवायु के समूहों में से कौंन आई दशाओं को प्रदर्शित करता है?
(क) A-B-C-E
(ख) A-C-D-E
(ग) B-C-D-E
(घ) A-C-D-F
उत्तर-(ख) A-C-D-E.

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) जलवायु के वर्गीकरण के लिए कोपेन के द्वारा किन दो जलवायविक चरों का प्रयोग किया गया है?
उत्तर-जलवायु के वर्गीकरण के लिए कोपेन ने आनुभविक पद्धति का सबसे व्यापक उपयोग किया है। उनका वर्गीकरण वर्षा एवं तापमान चरों पर आधारित है जिसमें कोपेन ने वर्षा एवं तापमान के वार्षिक तथा मासिक मध्यमान के आंकड़ों का प्रयोग किया है।

प्रश्न (ii) वर्गीकरण की जननिक प्रणाली आनुभविक प्रणाली से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर-आनुभविक वर्गीकरण प्रेक्षित किए गए तापमान एवं वर्षण से सम्बन्धित आँकड़ों पर आधारित होता है, जबकि जननिक वर्गीकरण में जलवायु को उनके कारणों के आधार पर संगठित करने का प्रयास किया जाता है।

प्रश्न (iii) किस प्रकार की जलवायु में तापमान्तर बहुत कम होता है?
उत्तर-उष्ण कटिबन्धीय आर्द्र जलवायु में तापमान बहुत कम होता है।

प्रश्न (iv) सौर कलंकों में वृद्धि होने पर किस प्रकार की जलवामविक दशाएँ प्रचलित होंगी?
उत्तर-सौर कलंकों की वृद्धि होने पर तापमान कम अर्थात् मौसम ठण्डा और आर्द्र हो जाता है तथा तूफानों की संख्या बढ़ जाती है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) A एवं B प्रकार की जलवायुओं की जलवायविक दशाओं की तुलना करें।
उत्तर-A एवं B प्रकार की जलवायु दशाओं की तुलना ।
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प्रश्न (ii) c तथा A प्रकार की जलवायु में आप किस प्रकार की वनस्पति पाएँगे?
उत्तर-c-कोष्ण शीतोष्ण [मध्य अक्षांशीय जलवायु–यह जलवायु 30° से 50° अक्षांशों के मध्य मुख्यतः महाद्वीपों के पूर्वी एवं पश्चिमी सीमान्तों पर विस्तृत है। इस जलवायु में सामान्यत: ग्रीष्म ऋतु कोष्ण और शीत ऋतु मृदुल होती है। अत: C प्रकार की जलवायु में प्रायः भूमध्यसागरीय वनस्पति की प्रधानता मिलती है जिसमें जैतून, अंगूर, नारंगी आदि तथा मुलायम लकड़ी वाले वृक्ष मुख्य हैं।

A-उष्णकटिबन्धीय आर्द्र जलवायु–इस जलवायु में भूमध्यरेखीय सदाबहार वनों की प्रधानता पाई जाती है। यह वन अत्यन्त सघन तथा विभिन्न ऊँचाई समूहों में मिलते हैं। इन वनों में कठोर लकड़ी वाले वृक्षों की प्रमुखता रहती है। आबनूस, रोजवुड, लॉगवुड, रबड़, ताड़ आदि इस जलवायु प्रदेश के प्रमुख वृक्ष हैं।

प्रश्न (iii) ग्रीनहाउस गैसों से आप क्या समझते हैं? ग्रीनहाउस गैसों की एक सूची तैयार करें।
उत्तर-ग्रीनहाउस गैस-वे गैसें जो विकिरण की लम्बी तरंगों का अवशोषण करती हैं, ग्रीनहाउस गैसें कहलाती हैं। इन गैसों द्वारा वायुमण्डल तापन की प्रक्रिया होती है जो ग्रीनहाउस प्रभाव कहलाता है, इसीलिए इन गैसों का नाम ग्रीनहाउस गैस है। ग्रीनहाउस गैसों में निम्नलिखित गैसें सम्मिलित हैं

  1. कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)
  2. क्लोरोफ्लोरो कार्बन्स (CFCs)
  3. हैलोन्स (Hellons)
  4. मीथेन (CH4)
  5. नाइट्रसऑक्साइड (N2O)
  6. ओजोन (O3)

इन गैसों के अतिरिक्त नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) और कार्बन मोनोक्साइड (CO) गैसें प्रमुख ग्रीनहाउस गैसें हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. उष्ण कटिबन्धीय पतझड़ वाले वन निम्नलिखित में से किस प्रदेश में पाये जाते हैं? |
(क) टुण्ड्रा प्रदेश
(ख) विषुवत्रेखीय प्रदेश
(ग) मानसूनी प्रदेश
(घ) भूमध्यसागरीय प्रदेश
उत्तर (ग) मानसूनी प्रदेश।

प्रश्न 2. सदाबहार वन निम्नलिखित में से किस प्रदेश में पाये जाते हैं?
(क) भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश
(ख) विषुवतरेखीय जलवायु प्रदेश
(ग) रेगिस्तानी जलवायु प्रदेश
(घ) टैगा जलवायु प्रदेश
उत्तर (ख) विषुवत्रेखीय जलवायु प्रदेश।

प्रश्न 3. रेण्डियर नामकं पशु निम्नलिखित में से किस प्रदेश में पाया जाता है?
(क) टुण्डा प्रदेश ।
(ख) टैगा प्रदेश
(ग) मानसूनी वन प्रदेश
(घ) गर्म मरुस्थलीय प्रदेश
उत्तर (क) टुण्ड्रा प्रदेश।

प्रश्न 4. निम्नलिखित महाद्वीपों में से किसमें भूमध्यरेखीय जलवायु नहीं पायी जाती है?
(क) यूरोप ।
(ख) ऑस्ट्रेलिया, ।
(ग) अफ्रीका
(घ) एशिया
उत्तर (क) यूरोप।

प्रश्न 5. निम्नलिखित में से किस जलवायु प्रदेश में शीत ऋतु नहीं होती है? |
(क) भूमध्यरेखीय
(ख) भूमध्यसागरीय |
(ग) मानसूनी
(घ) चीनतुल्य
उत्तर (क) भूमध्यरेखीय।

प्रश्न 6. सघन वर्षा वन निम्नलिखित में से किस जलवायु प्रदेश में पाये जाते हैं? |
(क) गर्म मरुस्थल
(ख) भूमध्यरेखीय |
(ग) भूमध्यसागरीय
(घ) टैगा
उत्तर (ख) भूमध्यरेखीय।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. जलवायु वर्गीकरण के मुख्य उपागम बताइए।
उत्तर-जलवायु वर्गीकरण के तीन मुख्य उपागम हैं-1. आनुभविक, 2. जननिक, 3. अनुप्रयुक्त।

प्रश्न 2. कोपेन द्वारा जलवायु वर्गीकरण में कौन-सा आधार अपनाया गया है?
उत्तर-कोपेन द्वारा जलवायु र्वीकरण में मुख्य रूप से तापक्रम तथा वर्षा को आधार बनाया गया है।

प्रश्न 3. कौन-सी जलवायु में सबसे कम वार्षिक तापान्तर रहता है?
उत्तर-भूमध्यरेखीय जलवायु में वार्षिक तापान्तर सबसे कम रहता है।

प्रश्न 4. विषुवत्रेखीय जलवायु की प्रमुख विशेषता बतलाइए।
उत्तर-विषुवत्रेखीय जलवायु प्रदेशों में सूर्य की किरणें वर्षभर सीधी पड़ने के कारण उच्च तापमान पाया जाता है (औसत तापमान 27°C)। यहाँ संवहनीय प्रक्रिया द्वारा प्रत्येक दिन तीसरे पहर वर्षा होती है (वार्षिक वर्षा का औसत 200-250 सेमी रहता है)।

प्रश्न 5. भूमध्यसागरीय प्रदेशों की वनस्पति की मुख्य विशेषताएँ बतलाइए।
उत्तर-इस प्रदेश की प्राकृतिक वनस्पति शरद ऋतु में एकत्रित नमी पर निर्भर रहती है। ऐसी वनस्पति में वृक्षों की पत्तियाँ चिकनी, छोटी तथा मोटी एवं जड़े लम्बी होती हैं।

प्रश्न 6. उष्णकटिबन्धीय शुष्क मरुस्थलीय जलवायु की विशेषताएँ बतलाइए।
उत्तर-महाद्वीपों के पश्चिमी किनारों पर स्थित होने के कारण इस जलवायु पर महाद्वीपीय प्रभाव सर्वाधिक रहता है तथा वार्षिक तापान्तर अत्यधिक 17° से 22° सेल्सियस रहता है। विश्व का सर्वाधिक ताप अंकित करने वाला केन्द्र अजीजिया इसी जलवायु प्रदेश में स्थित है। वर्षा का वार्षिक औसत 10 से 12 सेमी रहता है।

प्रश्न 7. टैगा प्रदेश में कौन-कौन से जीव-जन्तु मिलते हैं?
उत्तर-टैगा प्रदेश में समूरधारी पशु पाए जाते हैं जिनमें रेण्डियर, कैरिबो, हिरन, लोमड़ी, भेड़िया, मिंक, एस्माइन आदि प्रमुख हैं। कठोर ठण्ड से बचने के लिए प्रकृति ने इन्हें कोमल एवं लम्बे बाल प्रदान किए हैं।

प्रश्न 8. टुण्ड्रा जलवायु का विस्तार कहाँ पाया जाता है?
उत्तर-टुण्ड्रा जलवायु उत्तरी कनाडा, अलास्का, यूरोप में नॉर्वे, फिनलैण्ड तथा साइबेरिया के उत्तरी भागों में पाई जाती है। उत्तरी ध्रुव के नकट स्थित होने के कारण इन्हें ध्रुवीय निम्न प्रदेश अथवा शीत मरुस्थल भी कहा जाता है।

प्रश्न 9. विश्व के सबसे गर्म स्थान का नाम बताइए।
उत्तर-विश्व के सबसे गर्म स्थान का नाम सहारा मरुस्थल में स्थित अजीजिया (लीबिया) तथा जेकोबाबाद (पाकिस्तान) है, जहाँ 58° सेल्सियस तक तापमान अंकित किए गए हैं।

प्रश्न 10. पिछली शताब्दी में मौसम परिवर्तन की चरम घटना कब हुई?
उत्तर-पिछली शताब्दी (1990 के दशक) में मौसमी परिवर्तन की चरम घटनाएँ घटित हुई हैं। इस दशक में शताब्दी का सबसे गर्म तापमान और विश्व में सबसे भयंकर बाढ़ों को रिकॉर्ड किया गया है।

प्रश्न 11. विश्व में सबसे ठण्डा स्थान कौन-सा है?
उत्तर-विश्व में सबसे ठण्डा स्थान साइबेरिया में स्थित बखयांस्क है, जिसका तापमान -65° सेल्सियस तक अंकित किया गया है।

प्रश्न12. उष्णकटिबन्धीय आर्द्र जलवायु का क्षेत्र बताइए।
उत्तर-उष्णकटिबन्धीय आर्द्र जलवायु (A) भूमध्यरेखा के दोनों ओर 5 से 10° अक्षांशों के मध्ये पाई जाती है। यह जलवायु महाद्वीपों के पूर्वी किनारों को अधिक प्रभावित करती है।

प्रश्न 13. कोपेन ने अपने वर्गीकरण में कौन-कौन से मुख्य जलवायु समूह बताए हैं? नाम लिखिए।
उत्तर-कोपेन ने निम्नलिखित पाँच मुख्य जलवायु समूह बताए हैं—1. A समूह-उष्णकटिबन्धीय आर्द्र जलवायु, 2. B समहशुष्क जलवायु, 3. C समूह-कोष्ण शीतोष्ण (मध्य अक्षांशीय जलवायु), 4. D समूह-शीतल हिम वेन जलवायु, 5. E समूह-शीत जलवायु।

प्रश्न 14. स्टैपी जलवायु की क्या विशेषता है?
उत्तर-स्टैपी जलवायु की मुख्य विशेषताएँ हैं-1. कम वर्षा, 2. कम तापमान, 3. आन्तरिक भागों में अवस्थित, 4. पर्वतीय अवरोधों से प्रभावित।

प्रश्न 15. भारत में जलवायु परिवर्तन का कोई ऐतिहासिक उदाहरण दीजिए।
उत्तर-भारत में आई एवं शुष्क युग आते जाते रहे हैं। पुरातात्त्विक खोजों से पता चला है कि ईसा से लगभग 8000 वर्ष पूर्व राजस्थान मरुस्थल की जलवायु आर्द्र एवं शीतल थी। ईसा से 3000 से 1700 वर्ष पूर्व यहाँ वर्षा अधिक होती थी। |

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. सार्वभौमिक उष्णता क्या है? इसके कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-ग्रीनहाउस प्रभाव से विश्व के तापमान में निरन्तर वृद्धि हो रही है, जिसे सार्वभौमिक उष्णता कहते हैं। इसके मुख्य कारणों में नगरीकरण और औद्योगीकरण से कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस आदि जैव । ईंधनों का अधिक प्रयोग होना है। इन पदार्थों के अधिक उपयोग से वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि हो रही है जो सार्वभौमिक उष्णता का प्रमुख कारण है। आद्योगिक क्रान्ति से पूर्व वायुमण्डल में कार्बन की मात्रा 0.0294 प्रतिशत थी जिसमें औद्योगीकरण के बाद 1980 तक 18 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसीलिए सार्वभौमिक उष्णता की दर भी तेजी से बढ़ रही है।

प्रश्न 2. बोरियल तथा ध्रुवीय जलवायु को समझाइए।
उत्तर-बोरियल (Boreal)-यह जलवायु ‘E’ समूह के अन्तर्गत आती है। बोरियल जलवायु में ग्रीष्म ऋतु छोटी तथा ठण्डी होती है, जबकि शीत ऋतु लम्बी होती है। इसे जलवायु में औसत तापमान 0° से 10° सेल्सियस के मध्य रहता है। यह जलवायु उच्च मध्य अक्षांशों में पाई जाती हैं।

ध्रुवीय जलवायु (Polar Climate)-ध्रुवीय जलवायु उच्च अक्षांशों में पाई जाती है तथा ऊँचे पर्वतों हिमालय, आल्प्स पर भी यह जलवायु पाई जाती है। यह जलवायु केवल उत्तरी गोलार्द्ध में ही पाई जाती है। इस जलवायु में तापमान 10° सेल्सियस अधिक नहीं होता है। यहाँ ग्रीष्म ऋतु नहीं होती तथा शीत ऋतु भी हिमाच्छादित रहती है।

प्रश्न 3. शुष्क तथा अर्द्ध-शुष्क जलवायु में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-शुष्क जलवायु-शुष्क या मरुस्थलीय जलवायु 20° से 30° अक्षांशों के मध्य दोनों गोलार्डो में पाई जाती है। इस जलवायु में वर्षा अत्यन्त कम होती है, इसलिए वनस्पति का अभाव पाया जाता है। अर्द्ध-शुष्क जलवायु–इस जलवायु को स्टैपी जलवायु भी कहते हैं। यह जलवायु उत्तरी अमेरिका तथा यूरेशिया के पश्चिमी भागों में पाई जाती है। इस जलवायु में वार्षिक वर्षा 20 से 60 सेमी होती है। इस जलवायु में घास के मैदानों को अच्छा विकास होता है।

प्रश्न 4. शीतोष्ण महाद्वीपीय तथा शीतोष्ण सामुद्रिक जलवायु को समझाइए।
उत्तर-शीतोष्ण महाद्वीपीय जलवायु-यह जलवायु मध्य अक्षांशों में महाद्वीपों के आन्तरिक भागों में पाई जाती है। इस जलवायु में शीत ऋतु अत्यन्त ठण्डी तथा ग्रीष्म ऋतु शीतयुक्त होती है। इसमें वार्षिक वर्षा बहुत कम होती है। यह जलवायु उत्तरी-पूर्वी एशिया, पूर्वी कनाडा तथा यूरेशिया में पाई जाती है।

शीतोष्ण सामुद्रिक जलवायु-यह जलवायु शीतोष्ण कटिबन्ध में महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में पाई जाती है। इस जलवायु में वर्ष भर शीत ऋतु मृदुल तथा ग्रीष्म ऋतु कोष्ण होती है। औसत तापमान 0°C से अधिक रहता है तथा वर्षा वर्षभर होती रहती है।

प्रश्न 5. भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेशों की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेशों की प्रमुख प्राकृतिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1. यह प्रदेश महाद्वीपों के पश्चिमीतटीय भागों में स्थित है। इसलिए यहाँ भिन्न-भिन्न पवनों का प्रभाव | रहता है। जाड़ों में बोरा तथा मिस्टूल के समान ठण्डी व शुष्क पवनें तथा गर्मियों में सिरॉक्को के समान गर्म व शुष्क पवनें चलती हैं।
2. इन प्रदेशों में वर्षा कम होती है। अधिकांश वर्षा शरद ऋतु में चक्रवातों द्वारा होती है।
3. भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेशों में मिलने वाली सनस्पति अपनी लम्बी जड़ों द्वारा भूमिगत जल पर निर्भर है। मोटी व चिकनी पत्तियों के कारण इन वृक्षों से वाष्पीकरण नहीं होता है। –
4. यहाँ कठोर गर्मी के कारण घास के मैदान छोटे तथा कम पाए जाते हैं। अत: गाय, भैंस आदि बहुत कम संख्या में पाले जाते हैं। भेड़, बकरी, घोड़ा, खच्चर आदि इस प्रदेश के मुख्य पशु हैं। कुछ भागों में सुअर एवं मुर्गीपालन भी किया जाता है।

प्रश्न 6. भूमध्यरेखीय तथा भूमध्यसागरीय जलवायु की तुलना कीजिए।
उत्तर-भूमध्यरेखीय जलवायु भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5° अक्षांशों तक पायी जाती है। इसका विस्तार अमेजन बेसिन, कांगो बेसिन तथा पूर्वी द्वीप समूहों में मिलता है। यह जलवायु उष्णार्द्र है तथा वर्षभर समान रहती है। यहाँ कोई शीतकाल नहीं होता। औसत वार्षिक तापमान 27° सेग्रे तक रहता है। वार्षिक वर्षा का औसत 200-300 सेमी रहता है। प्रतिदिन दोपहर को संवहनीय वर्षा होती है। अधिक वर्षा के कारण भूमि दलदली रहती है। यह जलवायु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तथा असह्य होती है।

भूमध्यसागरीय जलवायु के प्रदेशों का विस्तार 30° से 45° अक्षांशों के मध्य भूमध्य सागर के तटीय भागों, द० अफ्रीका के केप प्रान्त, उत्तरी अमेरिका की कैलीफोर्निया घाटी, दक्षिणी अमेरिका में मध्य चिली तथा ऑस्ट्रेलिया के दक्षिणी भाग पर है। यहाँ की जलवायु सम होती है। वार्षिक तापान्तर कम रहते हैं। ग्रीष्मकाल का औसत तापमान 21° से 26° सेग्रे रहता है। ग्रीष्म काल शुष्क रहता है। शीतकाल में वर्षा होती है।

प्रश्न 7. भूमध्यरेखीय जलवायु की स्थिति एवं जलवायु का विवरण दीजिए।
उत्तर-स्थिति-भूमध्य या विषुवत्रेखीय जलवायु प्रदेश भूमध्य रेखा के 5° उत्तर एवं 5°दक्षिणी अक्षांशों के मध्य स्थित हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में कुछ स्थानों पर इन क्षेत्रों को विस्तार 10° अक्षांशों तक पाया जाता है। इस जलवायु प्रदेश के अन्तर्गत अमेजन बेसिन, कांगो बेसिन, मलेशिया और इण्डोनेशिया आदि क्षेत्र सम्मिलित

जलवायु-विषुवत्रेखीय जलवायु प्रदेशों में सूर्य की किरणें वर्षभर सीधी पड़ने के कारण उच्च तापमान पाया जाता है। इन प्रदेशों में औसत तापमान 27° सेल्सियस रहता है। संवहनीय प्रक्रिया के कारण इन क्षेत्रों में प्रत्येक दिन तीसरे पहर वर्षा होती है। वार्षिक वर्षा का औसत 200-250 सेमी अंकित किया जाता है। इन प्रदेशों की जलवायु मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक एवं कष्टकारक होती है।

प्रश्न “8. भूमध्यसागरीय प्रदेशों से उदाहरण देते हुए समझाइए कि वनस्पति अपनी जलवायु से किस प्रकार समानुकूलन करती है?
उत्तर-भूमध्यसागरीय प्रदेशों में शरद ऋतु में वर्षा होती है, जबकि ग्रीष्मकाल शुष्क रहता है। अतः यहाँ इस प्रकार की वनस्पति उगती है जो शरद ऋतु में एकत्र की गई नमी पर निर्भर रह सके। यहाँ उगने वाले वृक्षों की पत्तियाँ चिकनी, छोटी तथा मोटी होती हैं तथा कुछ पत्तियों पर मोम जैसा चिकना एवं दूध जैसा पदार्थ निकलकर चिपक जाता है। पत्तियों की इसी विशेषता के कारण इन वृक्षों से वाष्पीकरण की क्रिया द्वारा नमी नष्ट नहीं होती है। वृक्षों की छालें लम्बी एवं मोटी होती हैं। अतः यहाँ कम ऊँचाई की चौड़ी पत्ती वाली सदाहरित वनस्पति उगती है।

इस जलवायु प्रदेश में ओक, चीड़, अंजीर, अखरोट, जैतून, नारंगी एवं शहतूत आदि के वृक्ष प्रमुख रूप से उगते हैं। इस प्रकार यहाँ ऐसे वृक्ष उगते हैं जो सरलता से ग्रीष्मकाल की शुष्कता को सहन करने में । सक्षम होते हैं तथा उन्होंने अपनी जलवायु से पूर्ण रूप से समायोजन कर लिया है। तूरस एवं रसदार फलों के लिए यह प्रदेश विश्वविख्यात है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. कोपेन के जलवायु वर्गीकरण के आधार बताइए तथा उनके द्वारा बताए गए जलवायु समूहों (प्रदेशों) का विवरण दीजिए।
उत्तर-कोपेन का जलवायु वर्गीकरण । कोपेन ने विश्व जलवायु वर्गीकरण में आनुभविक पद्धति को अपनाया है। इस पद्धति में कोपेन ने तापमान तथा वर्षण के निश्चित मानों के आधार पर वनस्पति के वितरण से सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया है। कोपेन ने अपने जलवायु वर्गीकरण की सीमाएँ वनस्पति सीमाओं को ध्यान में रखकर बनाई हैं। उनका विचार था कि वनस्पति का उगना और विकास वर्षा की प्रभावशीलता पर निर्भर है। अतः कोपेन ने अपने जलवायु वर्गीकरण के लिए वर्षा और तापमान के मासिक एवं वार्षिक औसत (मध्यमान) आँकड़ों को आधार माना है। उन्होंने जलवायु के समूहों एवं प्रकारों की पहचान के लिए बड़े तथा छोटे अंग्रेजी अक्षरों का प्रयोग किया है। यद्यपि इन्होंने अपना यह जलवायु वर्गीकरण 1918 में प्रस्तुत किया था तथा समय-समय पर इसको संशोधित भी किया है, किन्तु यह वर्गीकरण इतना पुराना होते हुए आज भी लोकप्रिय एवं प्रचलित है।

कोपेन ने विश्व की जलवायु को पाँच मुख्य समूहों तथा 14 उपसमूहों में विभक्त किया है। इन जलवायु समूहों की संक्षिप्त विवरण तालिका इस प्रकार है

तालिका : कोपेन के जलवायु समूह एवं उपसमूह
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प्रश्न 2. उष्ण कटिबन्धीय आर्द्र (Af) (भूमध्यरेखीय जलवायु) तथा उष्ण कटिबन्धीय मानसून जलवायु (Am) की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-उष्ण कटिबन्धीय आर्द्र (Af) जलवायु की विशेषताएँ ।
उष्णकटिबन्धीय आर्द्र जलवायु समूह A उष्णकटिबन्धीय वर्ग की जलवायु है। यह जलवायु विषुवत् वृत्त के निकट पाई जाती है। इस जलवायु के मुख्य क्षेत्र दक्षिण अमेरिका का अमेजन बेसिन, पश्चिमी विषुवतीय अफ्रीका तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया के द्वीप हैं। इसे भूमध्यरेखीय जलवायु प्रदेश कहा जाता है। इस प्रदेश में वर्ष के प्रत्यक माह में दोपहर के बाद गरज और बौछारों के साथ प्रचुर वर्षा होती है। इस वर्षा को संवहनीय वर्षा कहा जाता है। यहाँ तापमान समान रूप से ऊँचा रहता है; अत: वार्षिक तापान्तर नगण्य पाया जाता है। किसी भी दिन अधिकतम तापमान लगभग 30°C और न्यूनतम तापमान लगभग 20°C होता है (चित्र 12.1)। इस जलवायु प्रदेश में सघन सदाबहार वन तथा व्यापक जैव विविधता पाई जाती है। इन प्रदेशों की जलवायु मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक एवं कष्टकारक होती है। इस जलवायु का प्रतिनिधि नगर सिंगापुर है।
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मानसून जलवायु (Am) की विशेषताएँ

इस जलवायु के अन्तर्गत भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यांमार, थाईलैण्ड, फिलीपीन्स, कम्बोडिया, चीन, ताइवान, अफ्रीका महाद्वीप के पूर्वी तट तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी तटीय भाग और ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी भाग सम्मिलित हैं। मानसूनी जलवायु प्रदेशों में उच्च तापमन पाया जाता है। सर्वाधिक तापमान ग्रीष्मकाल में अंकित किया जाता है। यहाँ वर्ष में तीन प्रकार के मौसम परिलक्षित होते हैं जो एक चक्र के रूप में पाए जाते हैं (मार्च से जून-ग्रीष्मकाल, जुलाई, से अक्टूबर–वर्षाकाल तथा नवम्बर से फरवरी-शीतकाल)। ग्रीष्मकाल का औसत तापमान 30° सेल्सियस, जबकि शीतकाल का औसत तापमान 10° से 15° सेल्सियस तक पाया जाता है। इसी कारण यहाँ तापान्तर अधिक पाया जाता है। तापमान पर महाद्वीपीयता का प्रभाव स्पष्ट दिखलाई पड़ता है। तटीय भागों में तापान्तर कम, जबकि आन्तरिक क्षेत्रों में तापान्तर अधिक पाया जाता है। भारत में इस जलवायु का प्रतिनिधि नगर कोलकाता है। उत्तरी भारत में ग्रीष्मकाल में गर्म पवने (लू) चलती हैं। भारत के आन्तरिक क्षेत्रों में तो तापमान 48° सेल्सियस तक अंकित किए जाते हैं, जबकि शीतकाल का तापमान 4° सेल्सियस तक गिर जाता है। मानसूनी वर्षा मुख्यतः पर्वतीय (Orographic) होती है। तटीय भागों में चक्रवातीय वर्षा तथा ग्रीष्मकाल के आरम्भ में सर्वाधिक वर्षा होती है। मानसूनी पवनें पर्वतों से टकराकर सम्मुख ढालों पर तीव्र वर्षा करती हैं। क्रमशः आन्तरिक भागों की ओर बढ़ने पर उनकी आर्द्रता कम होती जाती है, परन्तु वर्षा का वितरण एवं मात्रा असमान होती है (चित्रे 12.2)।

इस प्रदेश में वर्षा एवं तापमान विविधता के कारण वनस्पति में भी विविधता पाई जाती है। यहाँ सदापर्णी और पर्णपाती वन पाए जाते हैं। साल, शीशम, सागौन, जामुने तथा महुआ और विभिन्न प्रकार की झाड़ियाँ इस प्रदेश की प्रमुख वनस्पतियाँ हैं।

प्रश्न 3. उष्णकटिबन्धीय शुष्क जलवायु का सम्बन्ध इस प्रदेश में उगने वाली प्राकृतिक वनस्पति से निर्धारित कजिए।
उत्तर-उष्ण कटिबन्धीय शुष्क मरुस्थलीय जलवायु
यह सहारा तुल्य जलवायु भी कहलाती है जो 15 से 30° अक्षांशों के मध्य दोनों गोलार्थों में महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में पाई जाती है। विश्व के सभी उष्ण मरुस्थल इस जलवायु प्रदेश के अन्तर्गत सम्मिलित हैं।

जलवायु–महाद्वीपों के पश्चिमी किनारों पर स्थित होने के कारण यहाँ जलवायु पर महाद्वीपीय प्रभाव सर्वाधिक दिखलाई पड़ता है। दूसरे शब्दों में, वार्षिक तापान्तर अत्यधिक (17° से 22° सेल्सियस) होता है। तापमान के आधार पर यहाँ दो ऋतुएँ परिलक्षित होती हैं-ग्रीष्म एवं शीत ऋतु। ग्रीष्मकाल में यह क्षेत्र अधिकतम मात्रा में सूर्यातप प्राप्त करता है तथा यहाँ विश्व का सर्वाधिक ताप अंकित किया जाता है। (लीबिया में अजीजिया-58° सेल्सियस)। परन्तु यहाँ पर रात्रि का तापमान इतना नीचे गिर जाता है कि दैनिक तापान्तर औसतन 22° से 28° सेल्सियस अंकित किया जाता है। दिन का तापमान शीतकाल में भी 18° सेल्सियस तक पहुँच जाता है, यद्यपि रात्रिकाल में तापमान अत्यधिक कम हो जाता है। इस जलवायु प्रदेश में वर्षा की अनिश्चितता रहती है। कभी वर्षों तक वर्षा की एक बूंद भी नहीं पड़ती है। तो कभी एक साथ इतनी वर्षा हो जाती है कि बाढ़ आ जाती है। अधिकांश क्षेत्रों में वर्षा का औसत 10 से 12 सेमी तक रहता है। जैकोबाबाद (पाकिस्तान) इस जलवाय का प्रतिनिधि नगर है।
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प्राकृतिक वनस्पति-उष्ण मरुस्थल प्रायः वनस्पतिविहीन होते हैं। सहारा एवं अरब के मरुस्थल ऐसे ही उजाड़ प्रदेश हैं। कुछ भागों में विशिष्ट प्रकार की शुष्क वनस्पति पाई जाती है। झाड़ियाँ, छोटी घास व बबूल, खजूर, नागफनी आदि वृक्ष एवं पौधे उगते हैं, जो प्राकृतिक रूप से शुष्क वातावरण में समायोजित होते हैं। इनकी जड़े धरातल से काफी गहराई तक चली जाती हैं जिससे इन्हें नमी प्राप्त होती रहे। इनके तने मोटी छाल वाले एवं पत्तीविहीन होते हैं। यदि कुछ पौधों में पत्तियाँ होती हैं तो वे अत्यन्त मोटी, छीटी, चिकनी एवं काँटेदार होती हैं; जैसे–नागफनी आदि।

प्रश्न 4. पश्चिमी यूरोप तुल्य जलवायु के क्षेत्रों तथा विशेषताओं का विवरण दीजिए।
या पश्चिमी यूरोप तुल्य जलवायु का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए
(अ) स्थिति तथा विस्तार, (ब) जलवायु की विशेषताएँ, (स) प्राकृतिक वनस्पति।
उत्तर- पश्चिमी यूरोप तुल्य जलवायु प्रदेश की विशेषताएँ
स्थिति एवं विस्तार–इस जलवायु प्रदेश का विस्तार उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों गोलाद्ध में 45° से 60° अक्षांशों के मध्य महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में है। यूरोप महाद्वीप के ग्रेट ब्रिटेन, दक्षिणी नॉर्वे, दक्षिणी-पूर्वी फिनलैण्ड, बेल्जियम, हॉलैण्ड, डेनमार्क, जर्मनी, उत्तरी स्पेन, उत्तरी फ्रांस; उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के दक्षिणी अलास्का तथा ब्रिटिश कोलम्बिया; दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप के दक्षिणी चिली; ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के तस्मानिया तथा दक्षिणी न्यूजीलैण्ड आदि क्षेत्रों की जलवायु इसी प्रकार की है।

जलवायु की विशेषताएँ-पश्चिमी यूरोप तुल्य जलवायु प्रदेश की जलवायु सम है, क्योंकि जलवायु पर सामुद्रिक स्थिति का व्यापक प्रभाव पड़ा है। इनके तटीय भागों में गर्म जल की सागरीय धाराएँ प्रवाहित होती हैं तथा सदैव गर्म पछुवा हवाएँ प्रवाहित होती हैं। इनके प्रभाव के फलस्वरूप इन प्रदेशों में ग्रीष्म ऋतु शीतल एवं शीत ऋतु साधारण ठण्डी होती है। शीतकाल का औसत तापमान 3° से 7° सेग्रे रहता है, जबकि महाद्वीपों के आन्तरिक भागों में तापान्तर बढ़ता जाता है, परन्तु यहाँ पर तापमान कभी भी हिमांक बिन्दु तक नहीं पहुँच पाता।

इस प्रदेश में वर्षा वर्ष भर होती है। ग्रीष्म ऋतु की अपेक्षा शीत ऋतु में वर्षा अधिक होती है। वर्षा का वार्षिक औसत 150 से 250 सेमी है। पर्वतीय भागों में वर्षा का वार्षिक औसत 300 से 400 सेमी, तटीय भागों में 200 से 300 सेमी तथा आन्तरिक मैदानी भागों में 50 से 100 सेमी के मध्य है।।

प्राकृतिक वनस्पति-वर्षा में भिन्नता के कारण पश्चिमी यूरोप तुल्य जलवायु प्रदेश में प्राकृतिक वनस्पति में भी विभिन्नता मिलना स्वाभाविक है। अत्यधिक वर्षा वाले पर्वतीय भागों में नुकीली पत्ती वाले कोणधारी वन उगते हैं जिनमें पाइन, फर, लार्च, चीड़, स्पूस तथा हेमलॉक के वृक्ष मुख्य हैं। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में समुद्रतटीय एवं मैदानी भागों में चौड़ी पत्ती वाले पतझड़ वन मिलते हैं। इनमें ओक, बर्च, बीच, एल्म, मैपिल, चेस्टनट, वॉलनट आदि के वृक्ष प्रमुख हैं। अत्यधिक कम वर्षा वाले भागों में घास के मैदान भी मिलते हैं। वर्तमान समय में इन वनों को काटकर कृषि-योग्य भूमि का विस्तार किया जा रहा है, जिससे वन प्रदेशों का क्षेत्रफल धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।

पशु-जीवन-पर्वतीय घाटियों एवं मैदानों में मिलने वाली घास पर डेयरी पशुपालन उद्योग का विकास हुआहै। पशुओं से दूध प्राप्त किया जाता है जिसके कारण ये प्रदेश पनीर तथा मक्खन के उत्पादन में विश्व में सबसे अग्रणी हैं। डेनमार्क ने दुग्ध उद्योग में विशेष प्रगति की है। पर्वतीय क्षेत्रों में घोड़े तथा सूअर पाले जाते हैं जो यातायात एवं मांस के लिए प्रयुक्त किये जाते हैं। भेड़-बकरियों से ऊन एवं मांस भी प्राप्त किया जाता है।

आर्थिक विकास—सागरीय स्थिति, वर्ष भर पर्याप्त वर्षा एवं तापमान के कारण इन प्रदेशों में आर्थिक विकास के पर्याप्त संसाधन विकसित हुए हैं। यूरोप का यह प्रदेश विश्व का सबसे उन्नतशील एवं विकसित प्रदेश है। इसके आर्थिक विकास का अध्ययन निम्नलिखित रूपों में किया जा सकता है–

(i) कृषि-इन प्रदेशों में कृषि-कार्य उन्नत दशा में है। कृषि मैदानी प्रदेशों एवं पर्वतीय घाटियों में की जाती है। गेहूँ, जौ, जई, चुकन्दर, आलू आदि मुख्य फसलें हैं। यहाँ पर वसन्तकालीन एवं शीतकालीन दोनों प्रकार का गेहूँ उगाया जाता है।

(ii) खनिज पदार्थ-पश्चिमी यूरोप तुल्यं जलवायु प्रदेश में खनन कार्य प्रगति कर गया है। कोयला, लोहा, चाँदी, सोना, सीसा, जस्ता, बॉक्साइट आदि प्रमुख खनिज पदार्थ मिलते हैं। इस प्रदेश के अन्तर्गत आने वाले देशों की उन्नति का प्रमुख कारण पर्याप्त खनिज-सम्पदा की उपलब्धि का होना है।

(iii) उद्योग-धन्धे-भौगोलिक सुविधाओं के कारण पश्चिमी यूरोप तुल्य जलवायु प्रदेश की अधिकांश जनसंख्या उद्योग-धन्धों में लगी हुई है। लोहा-इस्पात, सूती वस्त्र, ऊनी वस्त्र, कागज एवं लुग्दी तथा लकड़ी काटना प्रधान व्यवसाय हैं। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी तथा बेल्जियम इस प्रदेश के महत्त्वपूर्ण औद्योगिक देश हैं।

मानव-जीवन-पश्चिमी यूरोप तुल्य जलवायु प्रदेश विश्व के सबसे सम्पन्न एवं उन्नतशीत प्रदेश हैं। यहाँ के निवासी उद्योग-धन्धों में कुशल एवं प्रशिक्षित हैं। विश्व के शिक्षित एवं सभ्य मानव इसी प्रदेश में सबसे अधिक निवास करते हैं। दक्षिणी चिली को छोड़कर सभी देशों ने कला-कौशल के क्षेत्र में विशेष प्रगति की है। अत्यधिक आर्थिक विकास पश्चिमी यूरोपीय देशों की विशेषता है। इस प्रदेश की 50% से अधिक जनसंख्या महानगरों में निवास करती है। समुद्रतटीय पत्तनों एवं निकटवर्ती भागों में स्थित नगरों में जनसंख्या अधिक निवास करती है। लन्दन, पेरिस, बर्लिन, मानचेस्टर आदि स्थान विश्व के विकसित महानगरों में से हैं। इस प्रदेश में मानव को जीवन-यापन के लिए विशेष प्रयास नहीं करने पड़ते। यहाँ सभ्यता एवं संस्कृति को विकास चरम सीमा तक हुआ है। ईसाई धर्मावलम्बी इस क्षेत्र में अधिक निवास करते हैं।

प्रश्न 5. कोष्ण शीतोष्ण (मध्य अक्षांशीय) जलवायु (C) के उपजलवायु समूह बताइए तथा भूमध्यसागरीय (Cs) जलवायु सम्बन्धी विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-कोष्ण शीतोष्ण (मध्य अक्षांशीय) जलवायु को C समहों में रखा गया है। इस समूह की जलवायु 30° से 50° अक्षांशों के मध्य मुख्यतः महाद्वीपों के पूर्वी और पश्चिमी सीमान्तों पर विस्तृत है। इस जलवायु को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है
(i) आर्द्र उपोषण कटिबन्धीय (Cfa), (ii) भूमध्यसागरीय (Csa), (iii) समुद्री पश्चिमतटीय (Cfb)।

भूमध्यसागरीय (Csa) जलवायु–इस जलवायु का अधिकांश विस्तार 30° से 45° अक्षांशों के मध्य है। यह मुख्यतः भूमध्यसागर के समीपवर्ती भागों में पाए जाने के कारण भूमध्यसागरीय जलवायु कहलाती है

जलवायु (तापमान एवं वर्षा)-भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेशों में दो ऋतुएँ होती हैं—शरद एवं ग्रीष्म। यहाँ शरद ऋतु छोटी, कर्म ठण्डी व नम तथा ग्रीष्म ऋतु लम्बी, गर्म एवं शुष्क होती है। इस जलवायु परे शरद ऋतु में ध्रुवों की ओर से तथा ग्रीष्म ऋतु में मरुस्थलों की ओर से आने वाली पवनों का विशेष प्रभाव पड़ता है। यहाँ शरद ऋतु में औसत तापमान 7° से 10° सेल्सियस एवं ग्रीष्म ऋतु में तापमान 21° से 30° सेल्सियस रहता है। शरद ऋतु केवल तीन माह तक होती है। हर महीने में दोपहर का तापमान 13° से 15° सेल्सियस तक रहता है, परन्तु रात का तापमान 8° सेल्सियस तक पहुँच जाता है। इस जलवायु प्रदेश में वर्षा का वार्षिक औसत 30 से 50 सेमी तक रहता है। यहाँ वर्षा शरद ऋतु में चक्रवातों द्वारा होती है। ऐसी वर्षा में बादल अधिक सघन नहीं होते तथा ग्रीष्म ऋतु में इन प्रदेशों के व्यापारिक पवनों की पेटी में आ जाने के कारण वर्षा नहीं हो पाती है। रेडब्लफ (कैलीफोर्निया) इस जलवायु का प्रतिनिधि नगर (चित्र 12.4) है।
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प्रश्न 6. टुण्ड्रा (ET) जलवायु दशाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर–टुण्ड्रा तुल्य जलवायु 10° से 0°C (जुलाई) समताप रेखाओं के मध्य पाई जाती है। इस जलवायु में कनाडा, अलास्का, यूरोप के नॉर्वे, फिनलैण्ड तथा साइबेरिया के उत्तरी भाग सम्मिलित हैं। ध्रुव के निकट स्थित होने के कारण यह जलवायु ध्रुवीय जलवायु भी कहलाती है।

जलवायु (तापमान एवं वर्षण)-टुण्ड्रा प्रदेश की जलवायु अत्यन्त शीतल है। शीत ऋतु अत्यधिक लम्बी एवं कठोर तथा ग्रीष्म ऋतु छोटी परन्तु ठण्डी होती है। वर्ष के अधिकांश भाग में तापमान हिमांक बिन्दु के नीचे बना रहता है। औसत वार्षिक तापमान – 12° सेल्सियस पाया जाता है। ग्रीष्म ऋतु का तापमान 0° से 10° सेल्सियस अंकित किया जाता है। इस प्रकार यहाँ वार्षिक तापान्तर अधिक रहता है। शीतकाल में यहाँ भयंकर बर्फीले तूफान अर्थात् ध्रुवीय वाताग्र चला करते हैं जिससे शीत ऋतु में कठोरता और भी बढ़ जाती है। शीतकाल में यह क्षेत्र न्यूनतम ताप ग्रहण कर पाता है, क्योंकि दिन की लम्बाई बहुत कम होती है। यदि कुछ सूर्यातप प्राप्त होता भी है तो उसका अधिकांश भाग हिम से टकराकर परिवर्तित हो जाता है तथा जो ताप शेष बचता है वह हिम को पिघलाने में नष्ट हो जाता है। दिन व रात की लम्बाई में अत्यधिक अन्तर होने के कारण दैनिक तापान्तर न्यून पाया जाता है। इस प्रदेश का प्रतिनिधि नगर उपरनिविक है (चित्र 12.5)।।

टुण्ड्रा प्रदेश में वर्षा बहुत कम होती है। अधिकांश वर्षा हिमपात के रूप में होती है। यद्यपि ग्रीष्मकाल में वर्षा कभी-कभी जल के रूप में भी हो जाती है, परन्तु इसकी मात्रा कम ही रहती है। यहाँ वर्षा का वार्षिक औसत 30 सेमी से भी कम रहता है। ग्रीष्मकाल में चक्रवातीय वर्षा होती है तथा तटीय क्षेत्रों में कुहरा छाया रहता है।

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प्रश्न 7. भूमण्डलीय तापन के लिए उत्तरदायी गैसें कौन-सी हैं? इनके प्रभाव की विवेचना कीजिए।
या भूमण्डलीय तापन पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-भूमण्डलीय तापन पृथ्वी के तापमान में वृद्धि मानवजनित ग्रीनहाउस प्रभाव का एक दुष्परिणाम है। इसकी ओर विश्व समुदाय का ध्यान आकृष्ट करने के लिए 1989 में पर्यावरण दिवस पर संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा ‘भूमण्डली तापन : भूमण्डलीय चेतावनी’ (Global warming : Global warming) नामक नारा दिया गया। ग्रीनहाउस गैसों का निरन्तर बढ़ना विश्व तापन का प्रमुख कारण है। वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि प्रति दशके विश्व तापमान में 0.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो रही है। बीसवीं सदी में धरती का औसत तापमान 0.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया। ‘विश्व मौसम संगठन द्वारा पहले 1990, फिर 1995, 1997 तथा 1998 को शताब्दी के सर्वाधिक गर्म वर्ष के रूप में उल्लेख करना विश्व तापमान में निरन्तर वृद्धि का प्रमाण है। भूतापमान में वृद्धि के लिए उत्तरदायी गैसों को ग्रीनहाउस गैस कहा जाता है। ग्रीनहाउस प्रभाव उत्पन्न करने वाली गैसें निम्नलिखित हैं—

1. कार्बन डाइऑक्साइड-ग्रीनहाउस प्रभाव उत्पन्न करने वाली गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड प्रमुख है। तीव्र औद्योगिकीकरण एवं परिवहन साधनों की वृद्धि से इस गैस की मात्रा में निरन्तर वृद्धि हो रही है।

2. मीथेन-कार्बन एवं हाइड्रोजन के मेल से निर्मित यह गैस कार्बन डाई-ऑक्साइड से 21 गुना अधिक ग्रीनहाउस प्रभाव उत्पन्न करती है।

3. नाइट्रस ऑक्साइड-यह अत्यन्त खतरनाक प्रभाव उत्पादक गैस है। वायुमण्डल में इसकी मात्रा कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में बहुत कम है फिर भी यह कार्बन डाइऑक्साइड की अपेक्षा 290 गुना अधिक खतरनाक होती है। ग्रीनहाउस प्रभाव उत्पन्न करने में इस गैस का योगदान 6 प्रतिशत है।

4. क्लोरो-फ्लोरो कार्बन-कलोरो-फ्लोरो कार्बन या सी०एफ०सी० गैसों का निर्माण प्राकृतिक क्रियाओं द्वारा न होकर रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा होता है। यह बीसवीं शताब्दी की देन है। वायुमण्डल में इसका अस्तित्व 130 वर्ष तक बना रहता है। यह गैस ओजोन परत को भारी क्षति पहुँचाती है।

उपर्युक्त उल्लेखनीय हरित गैसों की उपस्थिति के कारण वायुमण्डल एक हरित गृह की भाँति व्यवहार करता है। यद्यपि हरित गृह काँच का बना होता है। काँचै प्रवेशी सौर विकिरण की लघु तरंगों के लिए पारदर्शी होता है तथा बहिर्गामी विकिरण की लम्बी तरंगों के लिए अपारदर्शी है। इसी प्रकार का व्यवहार ग्रीनहाउस गैसों से वायुमण्डल में होने के कारण वर्तमान शताब्दी में भूमण्डलीय तापन की समस्या उत्पन्न हो रही है।

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 3 Interior of the Earth

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 3 Interior of the Earth (पृथ्वी की आंतरिक संरचना)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (1) निम्नलिखित में से कौन भू-गर्भ की जानकारी का प्रत्यक्ष साधन है?
(क) भूकम्पीय तरंगें
(ख) गुरुत्वाकर्षण बल
(ग) ज्वालामुखी
(घ) पृथ्वी का चुम्बकत्व
उत्तर- (ग) ज्वावालामुखी।

प्रश्न (ii) दक्कन ट्रैप की शैल समूह किस प्रकार के ज्वालामुखी उद्गार का परिणाम है?
(क) शील्ड
(ख) मिश्र
(ग) प्रवाह
(घ) कुण्ड
उत्तर- (ग) प्रवाह।

प्रश्न (iii) निम्नलिखित में से कौन-सा स्थलमण्डल को वर्णित करता है?
(क) ऊपरी व निचले मैंटल
(ख) भूपटल व क्रोड
(ग) भूपटल व ऊपरी मैंटले
(घ) मैंटल व क्रोड
उत्तर- (ग) भूपटल व ऊपरी मैंटल।

प्रश्न (iv) निम्न में से कौन-सी भूकम्प तरंगें चट्टानों में संकुचन व फैलाव लाती हैं?
(क) ‘P’ तरंगें
(ख) ‘s’ तरंगें
(ग) धरातलीय तरंगें।
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर- (क) ‘P’ तरंगें।.

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) भूगर्भीय तरंगें क्या हैं?
उत्तर- भूगर्भीय तरंगें उद्गम केंद्र से ऊर्जा मुक्त होने के दौरान पैदा होती हैं और पृथ्वी के अंदरूनी भाग से होकर सभी दिशाओं में आगे बढ़ती हैं, इसलिए इन्हें भूगर्भिक तरंगें कहा जाता है। भूगर्भीय तरंगें दो प्रकार की होती हैं। इन्हें ‘P’ तरंगें व ‘S’ तरंगें कहा जाता है।

(ii) भूगर्भ की जानकारी के लिए प्रत्यक्ष साधनों के नाम बताइए।
उत्तर- भूगर्भ की जानकारी के लिए प्रत्यक्ष साधनों में धरातलीय चट्टानें हैं अथवा वे चट्टाने हैं जो हम खनन क्षेत्रों से प्राप्त करते हैं। खनन के अतिरिक्त वैज्ञानिक विभिन्न परियोजनाओं के अंतर्गत पृथ्वी की आंतरिक स्थिति को जानने के लिए पर्पटी में गहराई तक छानबीन कर रहे हैं। संसार भर के वैज्ञानिक दो मुख्य परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं। ज्वालामुखी उद्गार प्रत्यक्ष जानकारी का एक अन्य स्रोत हैं। जब कभी भी ज्वालामुखी उद्गार से लावा पृथ्वी के धरातल पर आता है, यह प्रयोगशाला अन्वेषण के लिए उपलब्ध होता है।

(iii) भूकंपीय तरंगें छाया क्षेत्र कैसे बनाती हैं?
उत्तर- जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंग अभिलेखित नहीं होती। ऐसे क्षेत्र को भूकंपीय छाया क्षेत्र कहा जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भूकंप अधिकेंद्र से 105° और 145° के बीच का क्षेत्र दोनों प्रकार की तरंगों के लिए छाया क्षेत्र है। एक भूकंप का छाया क्षेत्र दूसरे भूकंप के छाया क्षेत्र से भिन्न होता है। 105° के परे क्षेत्र में ‘S’ तरंगें नहीं पहुँचतीं। ‘S’ तरंगों का छाया क्षेत्र ‘P’ तरंगों के छाया क्षेत्र से अधिक विस्तृत है। भूकंप अधिकेंद्र के 105° से 145° तक ‘P’ तरंगों का छाया क्षेत्र एक पट्टी के रूप में पृथ्वी के चारों तरफ प्रतीत होता है। ‘S’ तरंगों का छाया क्षेत्र न केवल विस्तार में बड़ा है, वरन यह पृथ्वी के 40 प्रतिशत भाग से भी अधिक है।

(iv) भूकंपीय गतिविधियों के अतिरिक्त भूगर्भ की जानकारी संबंधी अप्रत्यक्ष साधनों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर- पदार्थ के गुणधर्म के विश्लेषण से पृथ्वी के आंतरिक
भाग की अप्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त होती है। खनन क्रिया से हमें पता चलता है कि पृथ्वी के धरातल में गहराई बढ़ने के साथ-साथ पदार्थ का घनत्व भी बढ़ता है। पृथ्वी की आंतरिक जानकारी का दूसरा अप्रत्यक्ष स्रोत उल्काएँ हैं जो कभी-कभी धरती तक पहुँचती हैं। उल्काएँ वैसे ही ठोस पदार्थ से बनी हैं, जिनसे हमारा ग्रह पृथ्वी बना है। अतः पृथ्वी की आंतरिक जानकारी के लिए उल्काओं का अध्ययन एक अन्य महत्त्वपूर्ण स्रोत है। अन्य अप्रत्यक्ष स्रोतों में गुरुत्वाकर्षण तथा चुंबकीय क्षेत्र शामिल हैं। पृथ्वी के केंद्र से दूरी के कारण गुरुत्वाकर्षण बल ध्रुवों पर अधिक और भूमध्यरेखा पर कम होता है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए
(i) भूकंपीय तरंगों के संचरण का उन चट्टानों पर प्रभाव बताएँ, जिनसे होकरे ये तरंगें गुजरती हैं।
उत्तर- भूकंपीय तरंगें दो प्रकार की होती हैं। इन्हें ‘P’ तरंगें व ‘S’ तरंगें कहा जाता है। ‘P’ तरंगें तीव्र गति से चलने वाली तरंगें हैं और धरातल पर सबसे पहले पहुँचती हैं। ‘P’ तरंगें गैस, तरल व ठोस तीनों प्रकार के पदार्थों से गुजर सकती हैं। ‘S’ तरंगों के विषय में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि ये केवल ठोस पदार्थों के ही माध्यम से चलती हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार की भूकंपीय तरंगों के संचरित होने की प्रणाली भिन्न-भिन्न होती हैं। जैसे ही ये संचरित होती हैं। वैसे ही शैलों में कंपन पैदा होता है। ‘P’ तरंगों से कंपन की दिशा तरंगों की दिशा के समानांतर ही होती हैं। यह संचरण गति की दिशा में ही पदार्थ पर दबाव डालती हैं। इसके दबाव के फलस्वरूप पदार्थ के घनत्व में भिन्नता आती है और शैलों में संकुचन व फैलाव की प्रक्रिया पैदा होती है। अन्य तीन तरह की तरंगें संचरण गति के समकोण दिशा में कंपन पैदा करती हैं। ‘S’ तरंगें ऊर्ध्वाधर तल में तरंगों की दिशा के समकोण पर कंपन पैदा करती हैं। अतः ये जिस पदार्थ से गुजरती हैं, उसमें उभार व गर्त बनाती हैं। धरातलीय तरंगें सबसे अधिक विनाशकारी समझी जाती हैं।

(ii) अंतर्वेधी आकृतियों से आप क्या समझते हैं? विभिन्न अंतर्वेधी आकृतियों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर- जब मैग्मा भूपटल के भीतर ही ठंडा हो जाता है। तो कई आकृतियाँ बनती हैं। ये आकृतियाँ अंतर्वेधी आकृतियाँ कहलाती हैं। अंतर्वेधी आकृतियों में बैथोलिथ, लैकोलिथ, लैपोलिथ, फैकोलिथ व सिल प्रमुख हैं।
(i) बैथोलिथ – ग्रेनाइट के बने मैग्मा का बड़ा पिण्ड भूपर्पटी में अधिक गहराई पर ठंडा हो जाए तो यह एक गुंबद के आकार में विकसित हो जाता है। इसे बैथोलिथ कहा जाता है।
(ii) लैकोलिथ – ये गुम्बदनुमा विशाल अंतर्वेधी चट्टानें हैं, जिनका तल समतल व एक पाइप रूपी वाहक नली से नीचे से जुड़ा होता है तथा गहराई में पाया जाता है, इन्हें लैकोलिथ कहा जाता है।
(iii) लैपोलिथ – ऊपर उठते मैग्मा का कुछ भाग क्षैतिज दिशा में पाए जाने वाले कमजोर धरातल में चला जाता है। यहाँ यह अलग-अलग आकृतियों में जम जाता है। यदि यह तश्तरी के आकार में जम जाए तो यह लैपोलिथ कहलाता
(iv) फैकोलिथ – कई बार अंतर्वेधी आग्नेय चट्टानों की मोड़दार अवस्था में अपनति के ऊपर व अभिनति के तल में मैग्मा का जमाव पाया जाता है। ये परतनुमा चट्टानें एक निश्चित वाहक नली से मैग्मा भंडारों से जुड़ी होती हैं। यही फैकोलिथ कहलाते हैं।
(v) सिल – अंतर्वेधी आग्नेय चट्टानों का क्षैतिज तल में एक चादर के रूप में ठंडा होना सिल कहलाता है। इसके जमाव की मोटाई अधिक होती है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. भूकम्पीय तरंगों का अध्ययन करने वाला यन्त्र है
(क) बैरोमीटर
(ख) थर्मामीटर
(ग) वायुदाबमापी
(घ) सीस्मोग्राफ
उत्तर- (घ) सीस्मोग्राफ।

प्रश्न 2. पृथ्वी की आन्तरिक संरचना की ऊपरी परत कौन-सी है ?
(क) निफे
(ख) सियाल
(ग) सिमा
(घ) इनमें से कोई नहीं ।
उत्तर- (ख) सियाल।

प्रश्न 3. पृथ्वी की आन्तरिक परत निफे में किन तत्त्वों की प्रधानता है?
(क) सिलिका व ऐलुमिनियम
(ख) सिलिका व मैग्नीशियम
(ग) बैसाल्ट व सिलिका
(घ) निकिल व लोहा
उत्तर- (घ) निकिले व लोहा। ।

प्रश्न 4. निम्नलिखित में कौन पृथ्वी का सबसे आन्तरिक का भाग है?
(क) सियाले
(ख) निफे।
(ग) सिमा
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर- (ख) निफे।

प्रश्न 5. भूकम्प की उत्पत्ति के केन्द्र को कहते हैं
(क) अधिकेन्द्र
(ख) उद्गम केन्द्र
(ग) (क) व (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर- (ख) उद्गम केन्द्र।

प्रश्न 6. सर्वाधिक भूकम्प किस पेटी में आते हैं?
(क) प्रशान्त महासागरीय पेटी में
(ख) मध्य महाद्वीपीय पेटी में
(ग) मध्य अटलांटिक पेटी में
(घ) बिखरे क्षेत्रों में
उत्तर- (क) प्रशान्त महासागरीय पेटी में।

प्रश्न 7. धरातल पर जिस छिद्र से ज्वालामुखी का उद्गार होता है, उसे कहते हैं
(क) ज्वालामुखी
(ख) ज्वालामुख (क्रेटर)
(ग) काल्डेरा।
(घ) ज्वालामुखी शंकु
उत्तर- (क) ज्वालामुखी।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भूपृष्ठ के दो भाग कौन-कौन से हैं। इनकी औसत मोटाई बताइए।
उत्तर- भूपृष्ठ के दो भाग एवं इनकी औसत मोटाई निम्नलिखित हैं

  • महाद्वीपीय भूपृष्ठ-औसत मोटाई 30 किमी।
  • महासागरीय भूपृष्ठ-औसत मोटाई 5 किमी।

प्रश्न 2. स्वेस ने पृथ्वी को कितनी परतों में बाँटा है?
उत्तर- स्वेस ने पृथ्वी को तीन परतों में बाँटा है, जो क्रमश: सियाल, सिमा तथा निफे कहलाती हैं।

प्रश्न 3. सिमा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर- सिमा परत सिलिका तथा मैग्नीशियम से निर्मित परत है। इसमें बैसाल्ट की अधिकता होती है।

प्रश्न 4. निफे से आप क्या समझते हैं?
उत्तर- निफे परत पृथ्वी की सबसे गहराई में स्थित परत है, जो निकिल तथा फेरम जैसे सघन धात्विक पदार्थों से निर्मित है।

प्रश्न 5. पृथ्वी के अभ्यन्तर की दो परतों के नाम बताइए।
उत्तर- सिमा तथा निफे।

प्रश्न 6. पृथ्वी की आन्तरिक संरचना की जानकारी देने वाले साधनों के नाम बताइए।
उत्तर- पृथ्वी की आन्तरिक संरचना की जानकारी देने वाले साधन निम्नलिखित हैं–

  1. अप्राकृतिक साधन,
  2. पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित सिद्धान्तों के साक्ष्य तथा
  3. प्राकृतिक साधन।.

प्रश्न 7. ज्वालामुखी क्रिया को पृथ्वी की कौन-सी परत जन्म देती है।
उत्तर- सिमा की परत ज्वालामुखी क्रिया को जन्म देती है।

प्रश्न 8. पृथ्वी की कौन-सी परत में चुम्बकीय गुण विद्यमान है और क्यों?
उत्तर- पृथ्वी की निफे परत में चुम्बकीय गुण विद्यमान है, क्योंकि इस आन्तरिक भाग में लौह-पदार्थों की अधिकता है।

प्रश्न 9. पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के अध्ययन का सबसे अधिक विश्वसनीय साधन कौन-सा
उत्तर- ‘भूकम्प विज्ञान’ पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के अध्ययन का सबसे अधिक विश्वसनीय साधन है।

प्रश्न 10. सौरमण्डल के दो ग्रहों के नाम बताइए।
उत्तर- सौरमण्डल के दो ग्रहों के नाम हैं-

  1. पृथ्वी तथा
  2. मंगल।

प्रश्न 11. पृथ्वी के चुम्बकीय गुण इसकी आन्तरिक संरचना की क्या जानकारी देते हैं?
उत्तर- पृथ्वी में चुम्बकीय गुण विद्यमान है। यह गुण पृथ्वी के केन्द्र (अन्तरतम) में सबसे अधिक पाया जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि पृथ्वी का अन्तरतम आन्तरिक भाग लोहे, निकिल जैसे भारी धात्विक पदार्थों से बना है।

प्रश्न 12. एस्थोनेस्फीयर क्या है?
उत्तर- भूपृष्ठ से निचली सतह अर्थात् मैंटले की ऊपरी पर्त जो 400 किमी तक पाई जाती है, एस्थोनेस्फीयर कहलाती है। इसे दुर्बलता मण्डल भी कहते हैं। ज्वालामुखी उद्गार के समय जो लावा धरातल पर पहुँचता है उसका मुख्य स्रोत यही है।

प्रश्न 13. सिस्फोग्राफ क्या हैं? इसका उपयोग बताइए।
उत्तर- यह सूक्ष्मग्राही यन्त्र है जिसका उपयोग भूकम्प झटकों द्वारा उत्पन्न तरंगों का आलेख ग्राफ बनाने के लिए किया जाता है।

प्रश्न 14. भूकम्प तरंगों के तीन प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर- भूकम्प तरंगों के तीन मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं

  1. P तरंगें या प्राथमिक तरंगें।
  2. S तरंगें या गौण तरंगें।।
  3. L तरंगें यो धरातलीय तरंगें।

प्रश्न 15. पृथ्वी की ऊष्मा के क्या स्रोत हैं? धात्विक क्रोड का तापमान बताइए।
उत्तर- पृथ्वी की ऊष्मा के तीन स्रोत हैं—

  • रेडियोधर्मिता,
  • तलवृद्धि ऊष्मा तथा
  • पृथ्वी के निर्माणकारी पदार्थों की ऊष्मा।। धात्विक क्रोड का तापमान 2000° से है।

प्रश्न 16. मोहोरोविसिस विसंगति/असम्बद्धता क्या है?
उत्तर- भूपृष्ठ के निचले आधार पर भूकम्पीय लहरों की गति में अचानक वृद्धि हो जाती है, इसलिए निचले भूपृष्ठ तथा ऊपरी मैंटल के मध्य एक विसंगति या असम्बद्धता उत्पन्न हो जाती है। इस तथ्य की खोज सर्वप्रथम ए० मोहोरोविसिस ने 1909 में की थी, इसीलिए यह मोहोरोविसिस विसंगति कहलाती है।

प्रश्न 17. निम्नलिखित के लिए एक पारिभाषिक शब्द दीजिए

  1. भूगर्भ का वह भाग जो अत्यधिक तापमान के बावजूद ठोस की तरह आचरण करता है।
  2. महाद्वीपीय के नीचे की परत का रासायनिक संघटन।
  3. भूगर्भ का वह भाग जो मिश्रित धातुओं और सिलिकेट से बना है।
  4. वह भूकम्पीय तरंग जो पृथ्वी के धात्विक क्रोड से गुजर सकती है।
  5. महासागरों के नीचे की परत की रासायनिक संरचना।

उत्तर-

  1. आन्तरिक धात्विक क्रोड (गुरुमण्डल),
  2. सियाल (सिलिका + ऐलुमिनियम),
  3. मैंटल,
  4. P तरंगें,
  5. सिमा (सिलिकेट + मैग्नेशियम)।

प्रश्न 18. प्रसुप्त ज्वालामुखी किसे कहते हैं? एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर- प्रसुप्त ज्वालामुखी वे ज्वालामुखी हैं जो सक्रिय होने के बाद काफी समय तक शान्त रहते हैं तथा पुनः सक्रिय हो जाते हैं। उदाहरण-इटली का विसूवियस ज्वालामुखी।

प्रश्न 19. जाग्रत (सक्रिय) ज्वालामुखी का अर्थ बताते हुए इसका एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर- जाग्रत ज्वालामुखी वे हैं जिनमें सदैव उद्गार होता रहता है। इटली का एटना ज्वालामुखी ऐसा ही

प्रश्न 20. निष्क्रिय या शान्त ज्वालामुखी की परिभाषा तथा एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर- निष्क्रिय ज्वालामुखी वे हैं जिनसे प्राचीन काल में उद्गार हुआ था, किन्तु अब वे शान्त हो चुके हैं। तथा भविष्य में भी उनमें उद्गार की कोई सम्भावना नहीं है। ईरान का कोहे-सुल्तान एक शान्त ज्वालामुखी है।

प्रश्न 21. प्रसुप्त एवं शान्त ज्वालामुखियों में अन्तर बताइए।
उत्तर- प्रसुप्त ज्वालामुखी एक बार उद्गार के बाद बीच-बीच में शान्त रहते हैं तथा कुछ समय बाद उद्गार प्रारम्भ कर देते हैं। इसके विपरीत शान्त ज्वालामुखियों में एक बार उद्गार के बाद फिर कभी उद्गार नहीं होता।

प्रश्न 22. ज्वालामुखी से निकलने वाले पदार्थ कौन-से हैं?
उत्तर- ज्वालामुखी से निकलने वाले पदार्थ हैं-गैस, जलवाष्प, विखण्डित पदार्थ; जैसे-शैलों के टुकड़े, मैग्मा या लावा पदार्थ।

प्रश्न 23. ज्वालामुखी उपजाऊ मिट्टी का निर्माण कैसे करते हैं?
उत्तर- ज्वालामुखी से निकले लावा के फैलकर सूखने से उपजाऊ काली मिट्टी का निर्माण होता है। यह उपजाऊ मिट्टी पोषक तत्वों से भरपूर होती है। दक्षिण भारत में काली मिट्टी का क्षेत्र ज्वालामुखी उद्गारों की देन है।

प्रश्न 24. विश्व में सर्वाधिक भूकम्प कहाँ आते हैं?
उत्तर- विश्व में सर्वाधिक भूकम्प जापान में आते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भूपर्पटी तथा धात्विक क्रोड में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- भूपर्पटी तथा धात्विक क्रोड में अन्तर
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प्रश्न 2. दिए गए भूकम्प छाया चित्र के आधार पर P तथा S भूकम्प तरंगों के छाया क्षेत्र का वर्णन कीजिए।
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उत्तर- भूकम्प छाया क्षेत्र के चित्र 3.3 से प्रकट होता है कि ‘P’ तरंगों का छाया क्षेत्र ‘s’ तरंगों के छाया क्षेत्र से छोटा है अर्थात् S तरंगों का छाया क्षेत्र विस्तृत है। भूकम्प अधिकेन्द्र के 105° से 145° तक ‘P’ तरंगों का छाया क्षेत्र एक पट्टी (Band) के रूप में पृथ्वी के चारों तरफ प्रतीत होता है। ‘s’ तरंगों का छाया क्षेत्र न केवुल विस्तृत है बल्कि यह पृथ्वी के 40% से भी अधिक भाग को घेरे हुए है।

प्रश्न 3. भूकम्प विज्ञान से पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के विषय में क्या जानकारी मिलती है ?
या भूकम्पीय लहरों से पृथ्वी की आन्तरिक संरचना पर क्या प्रकाश पड़ा है?
उत्तर- भूकम्प विज्ञान (Seismology) में भूकम्प की तरंगों का अध्ययन किया जाता है। इन तरंगों के अध्ययन से पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। ध्वनि तरंगों के समान ही भूकम्पीय तरंगें ठोस पदार्थ के भीतर तीव्र गति से चलती हैं एवं तरल माध्यम से गुजरते हुए उनकी गति कम हो जाती है। गौण तरंगें (S-waves) तरल पदार्थ को बिल्कुल पार नहीं कर पातीं। यदि भूगर्भ की रचना सर्वत्र समान पदार्थ से होती तो भूकम्प की तरंगों के पथ में भिन्नता न होती। भूगर्भ में जहाँ कहीं भी दो भिन्न घनत्व के स्तर मिलते हैं, वहाँ इन तरंगों में अपवर्तन (Refraction) तथा परावर्तन (Reflection) हो जाता है। भूकम्पीय तरंगों के अध्ययन से यह बात स्पष्ट होती है कि पृथ्वी के आन्तरिक भाग में तरंगों की गति गहराई के अनुसार बढ़ती है। भूपटल से लगभग 2,900 किमी की गहराई तक लहरों की गति लगातार बढ़ती है, इसके आगे एकाएक परिवर्तन होते हैं। आड़ी तरंगें (S-waves) यहाँ पहुँचकर समाप्त हो जाती ‘, हैं। आड़ी तरंगें द्रव पदार्थ में प्रवेश नहीं कर पाती हैं; अतः यह अनुमान लगाया गया है कि पृथ्वी को केन्द्रीय पिण्ड तरल अवस्था में है। प्रधान तरंगें (P-waves) पृथ्वी के केन्द्र तक पहुँचती हैं, किन्तु केन्द्रीय पिण्ड में ये कम वेग से तथा मुड़कर चलती हैं। धरातलीय तरंगें (L-waves) महाद्वीपों की अपेक्षा सागरीय तल के नीचे तेजी से चलती हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि महासागरीय तल भारी या सघन पदार्थों से निर्मित है।

उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर विद्वानों ने दो निष्कर्ष निकाले-(1) 2,900 किमी से अधिक गहराई पर भूगर्भ की रचना अधिक सघन पदार्थ से हुई है। S-तरंगों के स्वभाव के आधार पर अन्तरतम (Core) अधिक सघन किन्तु लचीली व तरल शैलों से निर्मित है। (2) अन्तरतम (Core) में केवल P-तरंगें ही प्रवेश कर पाती हैं, s-तरंगें प्रविष्ट नहीं होतीं; अत: मध्यवर्ती लौह-अन्तरतम तरल होना चाहिए। भूकम्प विज्ञान के आधार पर पृथ्वी की आन्तरिक संरचना को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा गया है

1. ऊपरी परत- यह पृथ्वी का सबसे बाह्य ठोस भाग है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी है। इसको निर्माण परतदार व ग्रेनाइट चट्टानों से हुआ है। इस भाग की चट्टानों का औसत घनत्व 2.7 है। यही :- कारण है कि ऊपरी परत में इन लहरों की गति अति मन्द होती है।

2. मध्यवर्ती परत- यह पृथ्वी को मध्य भाग है जिसकी गहराई 33 किमी से 2,900 किमी तक है। गहराई के साथ-ही-साथ यहाँ की चट्टानों का घनत्व भी क्रमशः बढ़ता जाता है। यह भी पृथ्वी का कठोर भाग है। इसकी संरचना डेली तथा जैफ़े ने ग्लासी बैसाल्ट से निर्मित मानी है।

3. निचली परत- भूगर्भ में 2,900 किमी की गहराई से पृथ्वी के केन्द्र तक का भाग ‘क्रोड कहलाता है। इसका ऊपरी भाग तरल अवस्था में है, परन्तु अनुमान है कि आन्तरिक भाग ठोस है। इस भाग का औसत घनत्व 11 माना गया है जिसमें लौह तत्त्वों की अधिकता है। नॉट ने बताया है। कि पृथ्वी के अन्तरतम का घनत्व चाहे अधिक हो, परन्तु वहाँ की चट्टानें द्रवित अवस्था में हैं।

प्रश्न 4. पृथ्वी के आन्तरिक भाग की भौतिक अवस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर- पृथ्वी के आन्तरिक भाग में जाने पर प्रारम्भ में प्रति 32 मीटर की गहराई पर 1° सेग्रे तापक्रम की वृद्धि होती है। इस प्रकार पृथ्वी के आन्तरिक भाग में 20 से 30 किलोमीटर जाने पर तापक्रम की वृद्धि के कारण कोई चट्टान अपनी मौलिक अवस्था में नहीं रह सकेगी और इसे ताप आधिक्य के कारण चट्टानें द्रव अवस्था में परिवर्तित हो जाएँगी। ज्वालामुखी विस्फोट के समय निकला लावा इनका प्रमाण है। महाद्वीपों और महासागरों की उत्पत्ति के सिद्धान्त भी आन्तरिक भाग की द्रव अवस्था में होने की सम्भावना व्यक्त करते हैं, किन्तु वहाँ की चट्टानों पर ऊपरी तल का भारी दबाव उन्हें द्रव जैसा नहीं बनने देता। अत: वहाँ की सारी स्थिति बड़ी जटिल है। यदि पृथ्वी को आन्तरिक भाग द्रव होता तो स्थल भाग भी ज्वार शक्तियों के प्रभाव से प्रभावित होता। चन्द्रमा और सूर्य की आकर्षण शक्तियों से अप्रभावित रहने और पृथ्वी के ठोस पिण्ड के समान व्यवहार के कारण अनेक वैज्ञानिक पृथ्वी को ठोस ही मानते हैं, परन्तु भूकम्प लहरों के आधार पर पृथ्वी को पूर्ण रूप से ठोस भी नहीं कहा जा सकता और उसके आन्तरिक भाग को पूर्ण रूप से द्रव अवस्था में भी नहीं माना जा सकता। अतः पृथ्वी के आन्तरिक भाग की भौतिक अवस्था के सम्बन्ध में निम्नलिखित निष्कर्ष निकाल सकते हैं

  • पृथ्वी, ज्वार शक्तियों के प्रभाव के समय ठोस आकृति की भाँति व्यवहार करती है।
  • आन्तरिक चट्टानें उपयुक्त अवसर पर या दबाव घटने पर ही गाढ़े द्रव का रूप धारण कर लेती हैं।
  • आन्तरिक चट्टानें दबावमुक्त होने पर या स्थानीय रूप से विशेष तापवृद्धि के कारण ही द्रव अवस्था में आ सकती हैं।

प्रश्न 5. P तथा S तरंगों में अन्तर बताइए।
उत्तर- P तरंगें इन्हें प्राथमिक तरंग कहते हैं। ये ध्वनि की तरह होती हैं जो ठोस, तरह तथा गैस तीनों ही माध्यमों से गुजरती हैं। ये तीव्र गति से चलने वाली होती हैं और धरातल पर सबसे पहले पहुँचती हैं। S तरंगें इन्हें द्वितीयक तरंग कहते हैं। ये केवल ठोस पदार्थों के माध्यम से ही चलती हैं। ये तरंगें अधिक . विनाशकारी होती हैं। इनसे चट्टानें विस्थापित हो जाती हैं तथा इमारतें गिर जाती हैं। इन तरंगों की गति धीमी होती है तथा ये दोलन की दिशा में समकोण बनाती हुई चलती हैं।

प्रश्न 6. सामान्यतः भूकम्प कितने प्रकार के होते हैं? संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर- सामान्यतः भूकम्प निम्नलिखित पाँच प्रकार के होते हैं

1. विवर्तनिक (Tectonic) भूकम्प- ये भूकम्प भ्रंशतल के किनारे चट्टानों के सरक जाने के कारण उत्पन्न होते हैं। सामान्यतः अधिकांश प्राकृतिक भूकम्प विवर्तनिक ही होते हैं।

2. ज्वालामुखीजन्य (Volcanic) भूकम्प- एक विशिष्ट वर्ग के विवर्तनिक भूकम्प को ही ज्वालामुखीजन्य भूकम्प समझा जाता है। ये भूकम्प अधिकांशत सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्र तक सीमित रहते हैं।

3. निंपात (Collapse) भूकम्प-खनन क्षेत्रों में कभी- कभी अत्यधिक खनन कार्य से भूमिगत खानों की छत ढह जाती है, जिससे हल्के झटके महसूस होते हैं। इस प्रकार के भूकम्प को निपात भूकम्प कहा जाता है।

4. रासायनिक विस्फोट (Explosion) जनित भूकम्प- जब कभी परमाणु या रासायनिक विस्फोट के कारण झटकों का अनुभव होता है तो उन्हें रासायनिक या परमाणु विस्फोटजनित भूकम्प कहते हैं।

5. बाँधजनित (Reservoir Induced) भूकम्प- जो भूकम्प बड़े बाँध वाले क्षेत्रों में आते हैं उन्हें बॉधजनित कहते हैं।

प्रश्न 7. भूकम्पों की माप से आप क्या समझते हैं? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर- भूकम्पीय तीव्रता को माप को ‘रिक्टर स्केल’ (Richter Scale) या ‘भूकम्पीय तीव्रता की मापनी कहते हैं। इस मापनी के आधार पर भूकम्प तीव्रता या भूकम्प के आघात का मापन किया जाता है। इस मापनी के अनुसार भूकम्प की तीव्रता 0 से 10 तक होती है। भूकम्प आघात की तीव्रता/गहनता को इटली के भूकम्प वैज्ञानिक मरकैली के नाम पर भी जाना जाता है। यह झटकों से हुई प्रत्यक्ष हानि द्वारा निर्धारित की जाती हैं। इसकी गहनता 1 से 12 तक होती है।

प्रश्न 8. भूकम्प के विभिन्न प्रभाव बताइए।
उत्तर- भूकम्प एक प्राकृतिक आपदा है। इसका प्रभाव मानव के लिए सदा ही एक विपत्ति के रूप में देखा जाता है। भूकम्प के प्रमुख प्रकोप या प्रभाव निम्नलिखित हैं(i) भूमि का हिलना, (ii) धरातलीय विसंगति, (iii) भू-स्खलन/पंकस्खलन, (iv) मृदा द्रवण, (v) धरातलीय चट्टानों का एक ओर झुकना या मुड़ना, (vi) हिमस्खलन, (vii) धरातलीय विस्थापन, (viii) बॉध व तटबन्ध का टूटना, (ix) आग लगना, (x) इमारतों का टूटना, (xii) सुनामी। भूकम्प के उपर्युक्त सूचीबद्ध प्रभावों में से पहले छ: का प्रभाव स्थलरूपों पर देखा जा सकता है जबकि अन्य प्रभाव को उस क्षेत्र में होने वाले जन-धन की क्षति से समझा जा सकता है।

प्रश्न 9. पृथ्वी की रासायनिक संरचना बताइए।
उत्तर- स्वेस महोदय ने पृथ्वी की आन्तरिक संरचना को रासायनिक तत्त्वों के आधार पर निम्नलिखित तीन परतों में विभाजित किया है–
1. सिायल- पृथ्वी की ऊपरी पतली परत जो भूपर्पटी के नीचे पाई जाती है, सिलिका (Si) तथा ऐलुमिनियम (Al) की अधिकता से बनी है। इन पदार्थों के मिश्रण के कारण इसे सियाल कहा जाता है। इस परत में अम्लीय पदार्थों की प्रधानता पाई जाती है।

2. सिमा- सियाल के नीचे ‘सिमा’ परत पाई जाती है। इस परत में सिलिका (Si) तथा मैग्नीशियम (Mg) तत्त्वों की अधिकता होती है, इसी कारण इस परत को सिमा कहा जाता है। यही वह परत है. जो ज्वालामुखी क्रिया को जन्म देती है। इस परत में क्षारीय पदार्थों की प्रधानता होती है। इस परत में कैल्शियम, मैग्नीशियम तथा सिलिकेट भी अधिक उपलब्ध होते हैं। सीमा का घनत्व 2.9 से 4.7 तक पाया जाता है।

3. निफे- यह ‘सिमा’ के नीचे की अन्तिम परत है। इसका निर्माण कठोर धात्विक पदार्थों मुख्यतः निकिल (Ni) तथा फेरस (Fe) तत्त्वों से जुड़ा हुआ है अतः इन्हीं रासायनिक संरचना संघुटन के कारण यह निफे कहलाती है। इस परत को औसत घनत्व 11 है।

प्रश्न 10. पृथ्वी के आन्तरिक भाग में तापक्रम विभिन्नता को समझाइए।
उतर- भूपृष्ठ पर ज्वालामुखी उद्गार तथा गर्म जल के कुण्डों से यह सिद्ध होता है कि पृथ्वी के आन्तरिक भाग में उच्च तापमान है। सामान्यत: 32 मीटर की गहराई में जाने पर ताप में क्रमश: 1° सेल्सियम की देर से वृद्धि होती है परन्तु इस तापमान में सर्वत्र समानता नहीं मिलती है। प्रायः 100 किमी की गहराई तक तापमान 12° प्रति किमी की औसत दर से बढ़ता है, जबकि 100 से 300 किमी की गहराई तक 2° से० तथा 300 किमी से अधिक गहराई पर तापमान 1° से० प्रति किमी की दर से बढ़ता है। अतः इसी कारण पृथ्वी के आन्तरिक भाग के तापमान में सर्वत्र समानता नहीं पाई जाती है।

दीर्घ उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1. पृथ्वी की आन्तरिक संरचना का वर्णन कीजिए तथा उससे सम्बन्धित किन्हीं दो प्रमाणों का उल्लेख कीजिए। या पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के विषय में जानकारी देने वाले कौन-कौन से साधन हैं? ।
उत्तर- पृथ्वी (भूगर्भ) की आन्तरिक संरचना
प्राचीन काल से ही मानव्र पृथ्वी की उत्पत्ति, आयु, आन्तरिक रचना आदि के रहस्यों को जानने के लिए प्रयत्नशील रहा है। आज से लगभग 2,000 वर्ष पूर्व यूनानी विद्वानों ने उष्ण जल-स्रोतों, पातालतोड़ कुओं एवं सक्रिय ज्वालामुखियों के आधार पर पृथ्वी के आन्तरिक भाग में जल, वायु एवं अग्नि के भण्डारों की सम्भावना व्यक्त की थी। लगभग 200 वर्ष पूर्व बाफर नामक फ्रेंच वैज्ञानिक ने पृथ्वी के आन्तरिक भाग को पर्वतों से अधिक सघने बताया तथा यह सिद्ध किया कि पृथ्वी का आन्तरिक भाग रिक्त, वायव्य या जलपूर्ण नहीं है। अनेक विद्वानों ने ज्वालामुखी क्रिया के आधार पर पृथ्वी के आन्तरिक भाग को उष्ण तथा तरल बताया। लाप्लास ने पृथ्वी की उत्पत्ति की व्याख्या करते हुए उसे आरम्भ में उष्ण तथा गैसीय बताया।

पृथ्वी की आन्तरिक संरचना की जानकारी के साधन

पृथ्वी की आन्तरिक संरचना पर प्रकाश डालने में एक बड़ी समस्या यह है कि मनुष्य का भूगर्भ सम्बन्धी व्यावहारिक ज्ञान धरातल से मात्र 5 या 6 किलोमीटर की गहराई तक सीमित है। किन्तु तापमान, घनत्व, दबाव, ज्वालामुखी क्रिया तथा भूकम्प के परोक्ष साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आन्तरिक संरचना को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। इन साधनों को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जा सकता है–
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1. अप्राकृतिक साधन
(i) घनत्व (Density)- पृथ्वी के घनत्व के सम्बन्ध में पहले अनुमानों का प्रयोग किया जाता था, परन्तु आज वैज्ञानिक यन्त्रों की सहायता से इसका पता लगाया गया है कि भूगर्भ का घनत्व सर्वाधिक है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि पृथ्वी की ऊपरी सतह मोटी परतदार चट्टानों से बनी है, जिसकी मोटाई 750 मीटर तक है; परन्तु कहीं-कहीं पर यह अधिक भी हो सकती है। सन् 1774 ई० में न्यूटन नामक वैज्ञानिक ने समस्त पृथ्वी का घनत्व 5.5 बताया था तथा इसकी ऊपरी परत का घनत्व 3.0 है। कहीं-कहीं पर यह 3.5 तक भी है। परतदार शैलों के नीचे रवेदार या स्फटकीय शैलों का जमाव मिलता है। अतः इस परत को घनत्व 5.5 से भी अधिक होना चाहिए। पृथ्वी के आन्तरिक भाग में केन्द्र के निकट निकिल, लोहा जैसी भारी धातुएँ अधिक मात्रा में पायी जाती हैं। इस आधार पर भूगर्भ के अन्तरतम के घनत्व की अन्तिम सीमा 11.0 मानी गयी है, क्योंकि पृथ्वी के आन्तरिक भाग में अत्यधिक भारी पदार्थ विद्यमान हैं। इससे ज्ञात होता है कि पृथ्वी का आन्तरिक भाग तरलावस्था में है।

(ii) दबाव (Pressure)- पदार्थों के ऊपर अन्य वस्तुओं का बढ़ता हुआ भार दबाव कहलाता है। पृथ्वी की ऊपरी सतह से भूगर्भ में अन्तरतम की ओर जाते ही चट्टानों का भार बढ़ने लगता है। दबाव में वृद्धि के साथ ही शैलों का घनत्व भी बढ़ जाता है। इस प्रकार दबाव के कारण बहुत-सी चट्टानें पिघलकर द्रव रूप धारण कर लेती हैं तथा उनमें गर्मी धारण करने की अपार क्षमता उत्पन्न हो जाती है। अत्यधिक मात्रा में पिघली हुई शैलें पृथ्वी की ऊपरी पपड़ी को तोड़कर बड़ी तेजी से ऊपर की ओर निकल आती हैं, जिसका वर्तमान स्वरूप हमें ज्वालामुखी-लावा के रूप में दिखलाई पड़ता है। वर्तमान समय में वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है कि प्रत्येक शैल में एक ऐसी अन्तिम सीमा होती है जिससे आगे उसके घनत्व में वृद्धि नहीं हो पाती, चाहे उसका दबाव कितना ही अधिक बढ़ जाए। अनेक प्रयोगों तथा पर्यवेक्षणों के द्वारा यह स्पष्ट हुआ है कि पृथ्वी को आन्तरिक भाग निकिल तथा लोहे द्वारा निर्मित है। इनसे पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति का पता चलता है। दबाव के आधार पर स्पष्ट होता है कि पृथ्वी को आन्तरिक भाग ठोस तथा द्रव अवस्था में विद्यमान है।

(iii) तापमान (Temperature)- तापमान तथा दबाव का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है। जहाँ तापमान में वृद्धि होती है, वहाँ दबाव भी बढ़ जाता है। आग्नेय चट्टानों, ज्वालामुखी पर्वत, गर्म जल-स्रोतों, खानों में उष्णता के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है कि पृथ्वी के केन्द्र की ओर जाने पर तापमान में वृद्धि होती जाती है। यह अनुमान है कि प्रति 32 मीटर गहराई पर 1° सेग्रे तापमान में वृद्धि हो जाती है। इस आधार पर निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भूगर्भ का आन्तरिक भाग इतना अधिक गर्म होगा कि प्रत्येक कठोर-से-कठोर वस्तु भी तरल अवस्था में परिणत हो जाएगी। केलविन महोदय ने परिकलन कर भूगर्भ का तापमान 4000° सेग्रे बताया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि भूगर्भ की चट्टानें अत्यधिक ताप के कारण पिघल जाएँगी एवं पृथ्वी को आन्तरिक भाग तरलावस्था में होगा।

परन्तु आधुनिक वैज्ञानिक प्रयोगों से यह सिद्ध होता है कि चट्टानों के दबाव के साथ-साथ उनका द्रवणांक बिन्दु भी बढ़ जाता है। पृथ्वी के आन्तरिक भाग में जाने से यदि तापमान में वृद्धि होती है तो दबाव में वृद्धि के साथ-साथ चट्टानें नहीं पिघल सकतीं। इस आधार पर पृथ्वी को आन्तरिक भाग ठोस अवस्था में होना चाहिए।

वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट किया गया है कि प्रत्येक शैल में एक ऐसी अन्तिम सीमा होती है। कि दबाव जितना अधिक बढ़ जाए, परन्तु वह किसी भी अवस्था में शैलों को ठोस नहीं रख सकता। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि पृथ्वी का अन्तरतम ठोस अवस्था में न हो तो यह वायव्य अवस्था में होना चाहिए। यदि भूगर्भ वायव्य अवस्था में है तो इससे अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं। यदि किसी कारणवश पृथ्वी की वायु बाहर निकल जाए तो पृथ्वी पिचक सकती है, परन्तु वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी के घनत्व, दबाव एवं तापमान के आधार पर ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिया जा सकता कि पृथ्वी की आन्तरिक संरचना का वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो सके। वूलरिज तथा मोरगन नामक विद्वानों ने पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के विषय में निम्नलिखित तीन निष्कर्ष निकाले हैं

  1. पृथ्वी एक ठोस गेंद के रूप में स्थित है।
  2. इसका अधिकांश ऊपरी भाग चिपचिपे तरल पदार्थों जैसा व्यवहार कर सकता है।
  3. भूगर्भ लगातार चट्टानों के दबाव के कारण तरलावस्था में हो सकता है, जिससे ज्वालामुखी क्रिया का आविर्भाव हो सकता है।

2. पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित सिद्धान्तों के साक्ष्य ।
पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित साक्ष्यों से यह समझना कठिन हो जाता है कि पृथ्वी की संरचना किस प्रकार हुई है? पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित सभी सिद्धान्त एकरूप नहीं हैं। विभिन्न विद्वानों ने पृथ्वी की उत्पत्ति की समस्या के निराकरण के लिए उसे ठोस, तरल एवं वायव्य अवस्था में होना बताया है। चैम्बरलिन एवं मोल्टन की ‘ग्रहाणु परिकल्पना’ के अनुसार पृथ्वी का निर्माण ठोस ग्रहाणुओं के – एकत्रीकरण के फलस्वरूप हुआ। अतएव सम्पूर्ण पृथ्वी ठोस अवस्था में होनी चाहिए, परन्तु जीन्स एवं ‘ जैफ्रे की ‘ज्वारीय परिकल्पना’ इसकी पूर्णरूप से विरोधाभासी है। उनके अनुसार पृथ्वी का अभ्यान्तर तरलोवस्था में होना चाहिए, परन्तु ऐसा भी नहीं है। लाप्लास महोदय की निहारिका परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति गैसीय निहारिका द्वारा हुई है। अतः पृथ्वी का आन्तरिक भाग वायव्य अवस्था में होना चाहिए, जबकि ऐसा भी नहीं है। इन साक्ष्यों से पृथ्वी की आन्तरिक संरचना का स्पष्टीकरण नहीं हो पाता; अत: इसे सम्बन्ध में और अधिक अध्ययन किये जाने के प्रयास किये जा रहे हैं।

3.-प्राकृतिक साधन ।
(i) ज्वालामुखी उद्गार- ज्वालामुखी उद्गार से निकले लावा से यह सिद्ध होता है कि पृथ्वी का आन्तरिक भाग तरल लावे द्वारा निर्मित है। पृथ्वीतल पर अनेक ज्वालामुखी उद्गार हुए हैं। -: अधिकांश ज्वालामुखी समुद्रतटवर्ती भागों में विस्तृत हैं। पूर्वी एशिया में प्रशान्त महासागर के सहारे-सहारे उत्तर से दक्षिण तक ज्वालामुखी एक मेखला में विस्तृत है। यही क्रम उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर प्रशान्त महासागर के सहारे-सहारे मिलता है। तीसरी पेटी ‘मध्यवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों में विस्तृत है, जो यूरोप महाद्वीप के पश्चिम से लेकर एशिया महाद्वीप के पूर्वी भागों तक फैली है। अधिकांश ज्वालामुखी समुद्रतटीय भागों में पाये जाते हैं। चट्टानों का दबाव कम होने से लावा की उत्पत्ति मानी जा सकती है। यह पिघला हुआ लावा ही उद्गार के समय बाहर आता है। इस प्रकार ज्वालामुखी उद्गार के द्वारा भी पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के विषय में कोई निश्चित जानकारी | प्राप्त नहीं हो पाती।

(ii) भूकम्प- जब पृथ्वी का कोई भाग अचानक कम्पन करने लगता है तो वह ‘भूकम्प’ कहलाता है। भूकम्प झटकों के रूप में आता है, जिन्हें भूकम्पीय लहरें कहते हैं। भूकम्पीय लहरों का अंकन सीस्मोग्राफ नामक यन्त्र में होता है। भूकम्प विज्ञान एक ऐसा प्रत्यक्ष साक्ष्य है जिससे पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के विषय में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध हो सकती है। जिस स्थान से भूकम्प का कम्पन प्रारम्भ होता है, उसे ‘भूकम्प मूल’ (Focus) कहते हैं। जिस स्थान पर भूकम्पीय लहरों का अनुभव सबसे पहले किया जाता है, उसे ‘भूकम्प केन्द्र’ (Epicentre) कहते हैं। मूल बिन्दु से भूकम्पीय लहरें जिन भागों में पहुँचती हैं, उसे भूकम्प क्षेत्र (Area of Earthquake) कहते हैं। भूकम्पीय क्रिया में निम्नलिखित तीन प्रकार की लहरें जन्म लेती हैं–(अ) प्राथमिक अथवा लम्बी लहरें (P), (ब) गौण अथवा तिरछी लहरें (S), (स) धरातलीय लहरें (L)।

सबसे पहले लघु कम्पन होता है जिसे प्राथमिक कम्पन कहते हैं, जिसमें लहरें कुछ लम्बी होती हैं। कुछ अन्तराल के पश्चात् दूसरा अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली कम्पन होता है जिसे द्वितीय कम्पन या गौण कम्पन कहते हैं, जिसमें लहरें तिरछी प्रवाहित होती हैं। इसके बाद अधिक अवधि वाला मुख्य कम्पन होता है, जिसे धरातलीय कम्पन कहते हैं। इस प्रकार ये तीनों भूकम्पीय कम्पन क्रमशः अंग्रेजी के P, S तथा L लहरों द्वारा प्रकट किये जाते हैं। भूकम्पीय लहरों का यही क्रम होता है, जिन्हें अग्रांकित चित्र द्वारा प्रदर्शित किया गया है

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भूकम्पीय लहरें भूगर्भ की आन्तरिक संरचना के वास्तविक स्वरूप का अंकन करती हैं। इन तरंगों की गति तथा भ्रमण-पथ के आधार पर भूगर्भ की आन्तरिक संरचना के विषय में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। भूकम्पीय लहरें प्रायः ठोस भाग से होकर गुजरती हैं जो सीधी रेखा में प्रवाहित होती हैं। परन्तु जब ठोस भाग के घनत्व में अन्तर आता है, तब ये वक्राकार मार्ग का अनुसरण करने लगती हैं। इस प्रकार यदि पृथ्वी एक ही प्रकार के ठोस घनत्व वाली चट्टानों से निर्मित होती तो ये लहरें वक्राक़ार मार्ग का अनुसरण करतीं। s लहरें कभी भी तरल भागों से नहीं गुजरती हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि पृथ्वी के आन्तरिक भाग के घनत्व में भारी अन्तर है जिससे ये लहरें परिवर्तित हो जाती हैं।

उपर्युक्त आधार पर यह स्पष्ट एवं प्रमाणित हो जाता है कि पृथ्वी के आन्तरिक भाग में तरलावस्था में एक केन्द्र है जो 2,900 किमी से भी अधिक गहराई पर केन्द्र के चारों ओर विस्तृत है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पृथ्वी के अन्तरतम भाग का लोहा तथा निकिल तरलावस्था में हैं। P तरंगें पृथ्वी के ठोस भाग से गुजरती हैं जिससे पता चलता है कि पृथ्वी की ऊपरी परत परतदार चट्टानों द्वारा निर्मित है। मध्यवर्ती परत बेसाल्ट पदार्थों द्वारा बनी है जिसकी मोटाई 20 से 30 किमी तक है। अतः उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि पृथ्वी की ऊपरी परत ठोस पदार्थों द्वारा निर्मित है, जबकि उसका अन्तरतम तरल पदार्थों द्वारा निर्मित है।

प्रश्न 2. उद्गार की प्रवृत्ति और धरातल पर विकसित आकृतियों के आधार पर ज्वालामुखियों का वर्गीकरण कीजिए और प्रत्येक का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर- ज्वालामुखियों को उनकी उद्गार प्रवृत्ति और धरातल पर इनके द्वारा विकसित आकृतियों के आधार पर निम्नलिखित चार प्रकारों में विभाजित किया जाता है–

1. शील्ड ज्वालामुखी- ये सबसे विशाल ज्वालामुखी होते हैं। इनका निर्माण मुख्यतः बेसाल्ट से निर्मित लावा के ठण्डे होने से होता है। उद्गार के समय यह लावा अत्यन्त तरल होता है, इसलिए इन ज्वालामुखियों का ढाल तीव्र नहीं होता। इनसे लावा फव्वारे के रूप में बाहर आता है और निकास पर एक शंकु बनता है जो सिंडर शंकु के रूप में विकसित होता है। ये ज्वालामुखी सामान्यत: कम विस्फोटक होते हैं किन्तु यदि किसी तरह निकास नलिका से पानी भीतर चला जाए तो ये ज्वालामुखी पिस्फोटक भी हो जाते हैं।

2. मिश्रित ज्वालामुखी- प्रायः ये ज्वालामुखी भीषण विस्फोटक होते हैं। इनसे गाढ़ा या चिपचिपा लावा उद्गार होता है। लावा के साथ भारी मात्रा में ज्वलखण्डाश्मि पदार्थ (लावा के जमे टुकड़े, मलबा, राख आदि) भी धरातल पर पहुँचते हैं। यह पदार्थ निकासनली के आस-पास परतों के रूप में जमा हो जाते हैं जिनके जमाव से मिश्रित ज्वालामुखी का विकास होता है।

3. ज्वालामुखी कुण्ड- ये पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे अधिक विस्फोटक ज्वालामुखी हैं। इनका विस्फोटक इतना भीषण होता है कि इनसे ऊँचा ढाँची बनने के स्थान पर धरातल स्वयं नीचे पॅस जाता है। इस धंसे हुए विध्वंस गर्त को ही ज्वालमुखी कुण्ड कहते हैं। इनके द्वारा निर्मित पहाड़ी मिश्रित ज्वालामुखी की तरह प्रतीत होती है।

4. बेसाल्ट प्रवाह क्षेत्र- ये ज्वालामुखी अत्यधिक तरल लावा उगलते हैं, जो बहुत दूर तक फैल जाता है। इनमें लावा प्रवाह क्रमानुसार होता है और कुछ प्रवाह 50 मीटर से भी अधिक मोटे हो जाते हैं। भारत का दक्कन ट्रैप वृहत बेसाल्ट प्रवाह ज्वालामुखी का अच्छा उदाहरण है।

प्रश्न 3. भूकम्पों के कारणों की विवेचना कीजिए। विश्व में उनकी पेटियों का विवरण दीजिए।
या भूकम्प किसे कहते हैं? ये किस प्रकार उत्पन्न होते हैं? विश्व के भूकम्प क्षेत्रों तथा उनके प्रभाव का वर्णन कीजिए।
या भूकम्प से आप क्या समझते हैं। विश्व में इससे प्रभावित क्षेत्रों का वर्णन कीजिए।
या भूकम्प से आप क्या समझते हैं। उसके विश्व-वितरण का वर्णन कीजिए।
या भूकम्प से आप क्या समझते हैं? विश्व में भूकंप के प्रमुख क्षेत्र एवं उनके प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर- भूकम्प का अर्थ एवं परिभाषाएँ
भूकम्प भूतल की आन्तरिक शक्तियों में से एक है। साधारणतः भूकम्प एक प्राकृतिक घटना है जो भूपटल में हलचल पैदा कर देती है। इन हलचलों के कारण पृथ्वी अनायास ही वेग से काँपने लगती है, जिसे भूचाल या भूकम्प कहते हैं। इस प्रकार यह एक आकस्मिक घटना है।।

आर्थर होम्स के अनुसार, “भूकम्प धरातल के ऊपरी भाग का वह कम्पन है जो कि धरातल के ऊपर अथवा नीचे चट्टानों के लचीलेपन एवं गुरुत्वाकर्षण की समस्थिति में न्यून अवस्था से प्रारम्भ होता है।” सैलिसंबरी ने भूकम्प की परिभाषा इस प्रकार दी है, “भूकम्प धरातल के वे कम्पन हैं जो व्यक्ति से असम्बन्धित क्रियाओं के परिणामस्वरूप होते हैं।”

भूकम्प की उत्पत्ति

भूगर्भ में भूकम्पीय लहरें चलती रहती हैं। जिस स्थान से इन लहरों का प्रारम्भ होता है, उसे भूकम्प मूल (Focus) कहते हैं। भूपटल पर जिस स्थान पर भूकम्पीय लहरों का अनुभव सर्वप्रथम किया जाता है, भूकम्प का अधिकेन्द्र (Epicentre) कहते हैं। अधिकेन्द्र से लहरें जितने बड़े क्षेत्र को प्रभावित करती हैं, उसे भूकम्प क्षेत्र कहते हैं। इन लहरों की तीव्रता एवं प्रकृति की जानकारी भूकम्पमापी (Seismograph) द्वारा ज्ञात की जाती है। भूकम्प एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जिससे बचाव का कोई समाधान आज तक नहीं खोजा जा सका है। भूकम्प के उद्गम का क्षेत्र धरातल से 250 किमी से 750 किमी नीचे तक रहता है। भूकम्प तेरंगों को मिलाने वाली रेखाएँ समभूकम्प रेखाएँ (Isoseismal Lines) कहलाती हैं।

भूकम्पों की उत्पत्ति के कारण

वर्तमान वैज्ञानिक युग में भूकम्पों की उत्पत्ति के कारणों का पता लगाने का प्रयास किया गया है। भूगर्भशास्त्रियों ने स्पष्ट किया है कि भूकम्प और ज्वालामुखी दोनों ही क्रियाओं के लगभग एक से ही कारण, तथ्य एवं दिशाएँ हैं। भूगर्भवेत्ताओं ने भूकम्पों की उत्पत्ति के निम्नलिखित कारण स्पष्ट किये हैं
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1. ज्वालामुखी उद्गार- जिन क्षेत्रों में ज्वालामुखी उद्गार होते हैं, वहाँ भूकम्प अवश्य ही आते हैं। जब विवर्तनिक हलचलों के कारण भूगर्भ से गैसयुक्त द्रवित लत्वा भूपटल की ओर प्रवाहित होता है तो उसके दबाव से भूपटल की शैलें हिल उठती हैं। यदि लावा के मार्ग में कोई भारी चट्टान आ जाए तो प्रवाहशील लावा दबाव की शक्ति का पुनः संचय कर उस चट्टान को वेग से ढकेलता है, जिससे भूकम्प आ जाता है। लावा का तीव्र वेग भी पृथ्वी को कँपा देता है।

2. भंशन- तनाव अथवा दबाव की क्रिया से भूपटल में भ्रंशें पड़ जाती हैं। भ्रंश के सहारे शैलखण्ड ऊपर अथवा नीचे की ओर खिसकने लगता है, जिससे पृथ्वी हिल उठती है।

3. भू-सन्तुलन में अव्यवस्था- भूपटल पर विभिन्न बल समतल समायोजन में लगे रहते हैं जिससे ऊँचे भाग नीचे हो जाते हैं तथा नीचे के भागों में शैल-चूर्ण जमा हो जाता है। इस प्रक्रिया में विभिन्न क्षेत्रों का भार घटता-बढ़ता रहता है जिससे भूगर्भ की सियाल एवं सिमा की परतों में परिवर्तन होते रहते हैं। यह प्रक्रिया बहुत धीरे-धीरे होती है। परन्तु यदि यह क्रिया कहीं पर एकाएक प्रारम्भ हो जाए तो पृथ्वी का कम्पन प्रारम्भ हो जाता है तथा उस क्षेत्र में भूकम्प के झटके आने प्रारम्भ हो जाते हैं।

4. भूपटल की प्लेटों का खिसकना- नवीनतम खोजों द्वारा ज्ञात किया गया है कि भूकम्पों की उत्पत्ति का मुख्य कारण भूपटल की प्लेटों का खिसकना है। भूगोलविदों का मत है कि भूपटल पर एक दर्जन . बड़ी-बड़ी प्लेटें हैं। ये कम घनत्व की होने के कारण शैलों की परतों पर तैरती रहती हैं तथा जैसे ही एक प्लेट खिसकती है वह भूकम्पों को जन्म देती है। भारत में उत्तरकाशी तथा गुजरात में लाटूर क्षेत्र में इसी प्रकार भूकम्प उत्पन्न हुए थे।

5. जलीय भार- धरातल के जिन भागों में, झीलें, तालाब, जलाशय आदि हैं, उनके नीचे की चट्टानों में भार एवं दबाव के कारण हेर-फेर होने लगता है। यदि यह परिवर्तन अचानक हो जाए तो भूकम्प आ जाता है। यह स्थिति स्थायी जल क्षेत्रों में नहीं होती, क्योंकि वहाँ पर सन्तुलन स्थापित हो जाता है। यह स्थिति तो मानव द्वारा बनाये गये बाँध आदि द्वारा भी उत्पन्न हो सकती है। 11 दिसम्बर, 1967 ई० को कोयना (महाराष्ट्र) में भूकम्प कोयना जलाशय में जल भर जाने के कारण आया था।

6. भूपटल में सिकुड़न- डाना एवं बरमाण्ट नामक भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार, भूगर्भ की गर्मी विकिरण के माध्यम से धीरे-धीरे कम होती रहती हैं। ताप की कमी से पृथ्वी की ऊपरी पपड़ी में सिकुड़न है। भूपटल की सिकुड़न पर्वत निर्माणकारी क्रिया को जन्म देती है। जब यह प्रक्रिया तीव्रता से होती है तो भूपटल में कम्पन प्रारम्भ हो जाता है।

7. गैसों का फैलाव- जब भूगर्भ में किसी कारणवश जल प्रवेश करता है तो भूगर्भ में ताप के कारण ‘जल’ गैस अथवा वाष्प में परिणत हो जाता है। कम दबाव के कारण यह गैस ऊपर की ओर निकलने का प्रयास करती है। गैस का बार-बार यह प्रयास भूपटल में कम्पन पैदा कर देता है।

भूकम्पों का मानव-जीवन पर प्रभाव

भूकम्प मानव-हृदय को कँपा देने वाली सबसे घातक एवं विनाशकारी प्राकृतिक घटना है। इनके द्वारा पृथ्वी पर विनाशकारी तथा रचनात्मक, दोनों प्रकार के कार्य सम्पन्न होते हैं

(अ) विनाशकारी प्रभाव या भूकम्प से हानियाँ
भूकम्पों का कुप्रभाव मानव तथा प्रकृति-प्रदत्त सभी वस्तुओं पर पड़ता है। जिस समय मानव को भूकम्प आने की सूचना मिलती है, उसके हृदय में भयानक आशंकाएँ जन्म ले लेती हैं। इससे होने वाले विनाशकारी प्रभाव निम्नलिखित हैं

1. सांस्कृतिक पर्यावरण का विनाश- भूकम्पों के प्रहार से मानव-रचित प्राचीनतम एवं नवीनतम * रचनाएँ नष्ट हो जाती हैं। मानव द्वारा निर्मित इमारतें, रेल की पटरियाँ, अन्य ऐतिहासिक इमारतें ध्वस्त हो जाती हैं; अर्थात् मानवकृत सांस्कृतिक भूदृश्य विनष्ट हो जाता है। उदाहरण के लिए, 1923 ई० में जापान में सगामी खाड़ी में आये भूकम्प से 5 लाख घरों की वास्तविक स्थिति का पता नहीं चल पाया था। सन् 2001 में गुजरात के भुज क्षेत्र में आये भूकम्प से कच्छ प्रदेश तथा अनेक नगरों में भवनों की क्षति हुई तथा 20 हजार से अधिक व्यक्ति मारे गये। 25 अप्रैल, 2015 को नेपाल में 7.8 तीव्रता का भूकम्प आया था। इस भूकम्प में भारत, चीन तथा बांग्लादेश भी प्रभावित हुए। इस भूकम्प से नेपाल में 8,800 से अधिक, भारत में 78, चीन में 27 तथा
बांग्लादेश में 4 लोगों की मृत्यु हो गई।

2. बाढ़ का प्रकोप- भूकम्प आने से नदियों में बाढ़ आ जाती हैं, क्योंकि उनसे नदियों के प्रवाह मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। उदाहरणार्थ-1950 ई० में असम (अब असोम) के भूकम्प से ब्रह्मपुत्र तथा इसकी सहायक नदी दिहांग का मार्ग रुक गया था एवं बाढ़ आ गयी थी।

3. भूस्खलन- भूकम्पों के प्रभाव से नदी-घाटियों तथा पर्वतीय घाटियों में पर्वतों के बड़े-बड़े शिलाखण्ड टूटकर गिर जाते हैं। इसके अतिरिक्त हिमानियाँ भी टूटकर गिर जाती हैं जिससे भूमि का एक बड़ा भाग टूट जाता है। हिमानी के टूटने से सागरों में जलयानों को अत्यधिक हानि होती

4. भूतल में दरारों का पड़ना- विश्व के किसी भाग में जब भूकम्प आता है तो उस क्षेत्र के 90% भूभाग में दरारें पड़ जाती हैं। ये दरारें इतनी भयानक होती हैं कि कभी-कभी इनमें झीलें तक विकसित हो जाती हैं। सन् 1897 में असम में आये भूकम्प से 12 मील लम्बी तथा 35 फीट चौड़ी दरार पड़ गयी थी।

5. भू-असन्तुलन- भूकम्पों के प्रभाव से धरातल में उभार एवं धंसाव की क्रिया होती है जिससे भू-असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है। उदाहरण के लिए, 1819 ई० में सिन्धु नदी के डेल्टा में आये भूकम्प से 4,500 वर्ग किमी का क्षेत्र नीचे धंस गया था, जिसने सागर का रूप ले लिया था।

6. आग लगना- प्रायः देखा जाता है कि भूकम्प तरंगों तथा तीव्र वायु के वेग के आवेश से विद्युत आवेश बनता है तथा अग्नि का जन्म होता है जिससे अपार धन-जन की हानि होती है। 1923 ई० में जापान की सगामी खाड़ी में आये भूकम्प से आग लगने के कारण याकोहामा तथा टोकियो नगरों की 2 अरब 50 करोड़ डॉलर की सम्पत्ति जलकर रख हो गयी थी।

7. सुनामिस तरंगों की उत्पत्ति- जिन सागरों में या सागर-तटों के पास भूकम्प आते हैं, वहाँ जल की ऊँची तरंगें (सुनामिस) ज्वार के साथ तेजी से ऊपर उठती हैं जो समीपवर्ती बस्तियों के लिए बहुत हानिकारक होती हैं। 16 जून, 1819 में कच्छ की खाड़ी में आये भूकम्प ने सागर जल की तरंगों को इतना ऊँचे उछाल दिया था कि वहाँ उपस्थित जलयानों तथा बसाव-क्षेत्र में अपार धन-जन की हानि हुई थी। दिसम्बर, 2004 में इण्डोनेशिया के समीप सागर से उठी सुनामिस तरंगों ने इण्डोनेशिया, थाइलैण्ड, जावा, सुमात्रा, श्रीलंका एवं भारत के समुद्री तटों पर भयंकर तबाही की, जिसमें लगभग दो लाख व्यक्ति मारे गये तथा अपार क्षति हुई।

8. कृषि-योग्य उपजाऊ भूमि में कमी- भूकम्पों के कारण कृषि-योग्य उपजाऊ भूमि में दरारें पड़ जाती हैं। भूगर्भ के आन्तरिक भागों की कीचड़युक्त अवसाद इस उपजाऊ भूमि पर फैल जाती है। तथा उसे कृषि के अयोग्य बना देती है।

(ब) भूकम्पों का रचनात्मक प्रभाव या लाभ
भूकम्पों से जितना विनाश होता है उसका 1% भी लाभ नहीं हो पाता। कुछ लाभ अप्रत्यक्ष रूप से होते हैं, जो निम्नलिखित हैं

1. उपजाऊ कृषि-योग्य भूमि का निर्माण- भूकम्पों द्वारा भूस्खलन क्रिया होती है जो कि अपक्षय में सहायक है। किसी भाग की उपजाऊ मिट्टी किसी ऊसर भूमि में पहुँच जाती है तो उस क्षेत्र की मिट्टी को कृषि के योग्य बना देती है।

2. शैलों में अंश उत्पन्न होना- भूकम्पों के द्वारा अचानक चट्टानों में वलन, भ्रंशन एवं दरारें पड़ जाती हैं। इनके कारण जल-स्रोतों का जन्म होता है जो कि मानव के लिए बहुत ही उपयोगी हैं।

3. प्राकृतिक भूदृश्यों का निर्माण- भूकम्पों द्वारा किसी स्थलखण्ड में अचानक उभार आ जाता है। तथा कहीं पर गहरी झील का निर्माण हो जाता है जो बाद में मानव के लिए प्राकृतिक भूदृश्य बन जाते हैं तथा पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित होते हैं।

4. खनिज पदार्थों की प्राप्ति- भूकम्प से धरातल में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ जाती हैं। इसी कारण बहुत-से खनिज ऊपर की ओर आ जाते हैं, जिन्हें सरलता से निकाल लिया जाता है।

5. भूगर्भ की आन्तरिक रचना की जानकारी- भूकम्प के द्वारा जब कोई भूभाग विशेष रूप से ऊबड़-खाबड़ हो जाता है तो उसमें भूगर्भ की बहुत-सी परतें स्पष्ट देखी जा सकती हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से भूगर्भ की आन्तरिक रचना के ज्ञान में वृद्धि करती हैं।

6. नवीन स्थलाकृतियों का उदय- भूकम्पों के कारण धरातल पर नवीन पर्वत, पठार, मैदान, द्वीप तथा झीलें आदि उदित हो जाती हैं, जो अनेक प्रकार से मानव के लिए कल्याणकारी हैं।

7. नवीन पत्तनों का उदय- भूकम्पों के प्रभाव से जलमग्न तटों का विस्तार हो जाता है जिससे वहाँ गहरी खाड़ियाँ विकसित हो जाती हैं। यहाँ सुरक्षित तथा प्राकृतिक पत्तनों का विकास हो जाता है, जो व्यापार में सहायक होते हैं।

8. नवीन जल-स्रोतों का उदय- भूकम्पीय क्रिया से धरातल में दरारें पड़ जाने के फलस्वरूप नवीन जल-स्रोतों का उदय हो जाता है जो मानव के लिए बहुत ही उपयोगी होते हैं। अधिकांश स्रोतों में गन्धक आदि रासायनिक खनिज पदार्थ मिले होने के कारण ये चर्म रोगों से मुक्ति दिलाते हैं।

भूकम्प मानव के लिए कल्याणकारी और विनाशकारी दोनों होते हैं। एक ओर ये मानव के विनाश का प्रलयकारी दृश्य उपस्थित करते हैं तो दूसरी ओर मानव-कल्याण का पथ प्रशस्त करते हैं। फिर भी विनाश का पक्ष ही अधिक प्रभावशाली प्रतीत ह्येता है।

भूकम्पों का विश्व-वितरण (पेटियाँ)

साधारणतया भूकम्प धरातल के कमजोर भागों में पाये जाते हैं। विश्व में जहाँ नवीन मोड़दार पर्वत-श्रेणियाँ पायी जाती हैं, वहाँ विश्व के लगभग 50% भूकम्पीय क्षेत्र स्थापित हैं; क्योंकि पर्वत निर्माणकारी घटनाएँ भूतल में हलचल पैदा कर देती हैं। महाद्वीपों एवं महासागरों के मिलन स्थलों पर जल रिस-रिसकर भूमि में आसानी से पहुँचता रहता है। तापमान की अधिकता के कारण यह जल जलवाष्प एवं गैस में बदलती रहता है जिससे भूकम्प की स्थिति बन जाती है। विश्व के 40% भूकम्प ऐसे ही क्षेत्रों में पाये जाते हैं। ऐसे क्षेत्रों में जहाँ पर भूपटल-भ्रंशन की क्रियाएँ क्रियाशील रहती हैं, वहाँ प्रायः भूकम्प आते हैं। इस आधार पर विश्व में भूकम्पीय क्षेत्रों को निम्नलिखित पेटियों में विभाजित किया जा सकता है

1. प्रशान्त महासागरीय तटीय पेटी–विश्व के 68% भूकम्प इसी क्षेत्र में आते हैं। क्षेत्रफल के | दृष्टिकोण से यह विश्व की सबसे बड़ी पेटी है। यहाँ भूकम्प आने की तीन दशाएँ उपलब्ध हैं—

  • महाद्वीपों एवं महासागरों के मिलन बिन्दु,
  • नवीन मोड़दार पर्वतों के क्षेत्र एवं
  • ज्वालामुखी के विस्तृत क्षेत्र।।

प्रशान्त महासागर के पूर्वी भाग में विस्तृत भूकम्प पेटी कमचटका प्रायद्वीप से प्रारम्भ होकर तट के सहारे-सहारे क्यूराइल द्वीप, जापान, फारमूसा, फिलीपाइन, इण्डोनेशिया, मलेशिया तथा ऑस्ट्रेलिया के पूरब में न्यूजीलैण्ड तक विस्तृत है। जापान में प्रतिवर्ष 1,500 भूकम्प आते हैं। जापान में अभी तक विनाशकारी भूकम्पों की संख्या 223 रही है तथा साथ ही प्रतिदिन 4 भूकम्पों का औसत रहा है। टोकियो में प्रति तीसरे दिन बड़ा भूकम्प आता है। दूसरी पेटी उत्तरी अमेरिका के पश्चिम में अलास्का से लेकर दक्षिण में चिली, रॉकी तथा एण्डीज नवीन मोड़दार पर्वतों तक विस्तृत है।

2. मध्य महाद्वीपीय पेटी- इसे भूमध्यसागरीय पेटी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर विश्व के 21 प्रतिशत भूकम्प आते हैं। इस पेटी में भ्रंशन एवं सन्तुलनमूलक भूकम्प ही अधिक आते हैं। यह पेटी यूरोप के आल्प्स पर्वत से लेकर एशिया में हिमालय पर्वत एवं म्यांमार की अराकानयोमा पहाड़ियों तक विस्तृत है। भूमध्य सागर के समीपवर्ती क्षेत्रों में केपवढे द्वीप, पुर्तगाल आदि क्षेत्रों में इस पेटी का विस्तार है। पामीर की गाँठ से जैसे-जैसे मोड़दार पर्वत-श्रेणियाँ फैली हैं, वैसे ही यह भूकम्प पेटी विस्तृत है। पूर्व में यह पेटी पूर्वी द्वीप समूह की भूकम्प पेटी से मिल जाती है। भारतीय भूकम्प पेटी को भी इसमें शामिल किया जाता है। हिमालय पर्वत-श्रेणी के सहारे-सहारे यह पेटी स्थित है। इसकी एक उपशाखा असम से बंगाल की खाड़ी होती हुई कन्याकुमारी तक विस्तृत है। प्रायद्वीपीय भारत एक कठोर भूखण्ड है, परन्तु 11 दिसम्बर, 1967 में महाराष्ट्र के कोयना नगर में आये भूकम्प ने इसमें सन्देह पैदा कर दिया है। 30 सितम्बर, 1993 को महाराष्ट्र राज्य के किल्लारी, लातूर व उस्मानाबाद क्षेत्रों में आये भूकम्प ने सबका दिल दहला दिया, फिर भी यह एक न्यूनतम भूकम्प प्रभावित क्षेत्र है। इसमें केवल सामान्य भूकम्प ही आते हैं, जिन्हें संवेदनात्मक भूकम्प कह सकते हैं।

3. मध्य अन्ध महासागरीय पेटी- भूकम्पों के दृष्टिकोण से यह पेटी बहुत प्रसिद्ध है, परन्तु क्षेत्रफल में महत्त्वपूर्ण नहीं है। अन्ध महासागर के मध्य में जो ऊँची उठी हुई कटक (Ridge) उत्तर से दक्षिण को फैली है, उसके सहारे-सहारे इस पेटी का विस्तार है। इस पेटी में भूकम्पों की भरमार

4. अन्य क्षेत्र- उपर्युक्त पेटियों के अतिरिक्त कुछ अन्य क्षेत्र भी भूकम्पों से प्रभावित हैं। यह क्षेत्र मुख्य रूप से अफ्रीका के पूर्वी भाग में दक्षिण तक फैला हुआ है। पूर्वी अफ्रीका की दरार घाटी इसी भूकम्पीय क्षेत्र में स्थित है। अदन की खाड़ी से एक अन्य उपशाखा अरब सागर में प्रवेश करती है। हिन्द महासागर में आने वाले भूकम्प इसी क्षेत्र में सम्मिलित हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 4 Distribution of Oceans and Continents

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 4 Distribution of Oceans and Continents (महासागरों और महाद्वीपों का वितरण)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (i) निम्न में से किसने सर्वप्रथम यूरोप, अफ्रीका व अमेरिका के साथ स्थित होने की सम्भावना व्यक्त की?
(क) अल्फ्रेड वेगनर
(ख) अब्राहमें आरटेलियस
(ग) एनटोनियो पेलेग्रिनी
(घ) एडमण्ड हैस।
उत्तर- (ग) एनटोनियो पेलेग्रिनी।

प्रश्न (ii) पोलर फ्लीइंग बल (Polar fleeing Force) निम्नलिखित में से किससे सम्बन्धित है?
(क) पृथ्वी का परिक्रमण
(ख) पृथ्वी को घूर्णन
(ग) गुरुत्वाकर्षण
(घ) ज्वारीय बल
उत्तर- (ख) पृथ्वी का घूर्णन।

प्रश्न (iii) इनमें से कौन-सी लघु (Minor) प्लेन नहीं है?
(क) नजका
(ख) फ़िलिपीन
(ग) अरब
(घ) अण्टार्कटिक
उत्तर- (घ) अण्टार्कटिक।

प्रश्न (iv) सागरीय अधःस्तल विस्तार सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए हैस ने निम्न में से किस अवधारणा पर विचार नहीं किया?
(क) मध्य-महासागरीय कटकों के साथ ज्वालामुखी क्रियाएँ
(ख) महासागरीय नितल की चट्टानों में सामान्य व उत्क्रमण चुम्बकत्व क्षेत्र की पट्टियों का होना
(ग) विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण
(घ) महासागरीय तल की चट्टानों की आयु ।
उत्तर- (ग) विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण।

प्रश्न (v) हिमालय पर्वतों के साथ भारतीय प्लेट की सीमा किस तरह की प्लेट सीमा है?
(क) महासागरीय-महाद्वीपीय अभिसरण
(ख) अपसारी सीमा
(ग) रूपान्तरण सीमा
(घ) महाद्वीपीय-महाद्वीपीय अभिसरण
उत्तर- (घ) महाद्वीपीय-महाद्वीपीय अभिसरण।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वेगनर ने किन बलों का उल्लेख किया?
उत्तर- वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन के लिए निम्नलिखित दो बलों का उल्लेख किया है

  1. पोलर या ध्रुवीय फ्लीइंग बल (Polar feeling force) तथा
  2. ज्वारीय बल (Tidal force)।

ध्रुवीय फ्लीइंग बल पृथ्वी के घूर्णन से सम्बन्धित है। वास्तव में पृथ्वी की आकृति एक सम्पूर्ण गोले जैसी नहीं है, वरन् यह भूमध्य रेखा पर उभरी हुई है। यह उभार पृथ्वी के घूर्णन के कारण है। दूसरा ज्वारीय बल सूर्य व चन्द्रमा के आकर्षण से सम्बद्ध है, जिससे महासागर में ज्वार पैदा होता है। वेगनर का मानना था कि करोड़ों वर्षों के दौरान ये बल प्रभावशाली होकर विस्थापन के लिए सक्षम हुए।

प्रश्न (ii) मैंटल में संवहन धाराओं के आरम्भ होने और बने रहने के क्या कारण हैं?
उत्तर- 1930 के दशक में आर्थर होम्स ने मैंटल भाग में संवहन धाराओं के प्रभाव की सम्भावना व्यक्त की थी। संवहन धाराएँ रेडियोएक्टिव तत्त्वों से ताप भिन्नता के कारण मैंटल में उत्पन्न होती हैं। ये धाराएँ रेडियोएक्टिव तत्त्वों की उपलब्धता के कारण ही मैंटल में बनी रहती हैं तथा इन्हीं तत्त्वों से संवहनीय धाराएँ आरम्भ होकर चक्रीय रूप में प्रवाहित होती रहती हैं।

प्रश्न (iii) प्लेट की रूपान्तर सीमा, अभिसरण सीमा और अपसारी सीमा में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर- प्लेट की रूपान्तर सीमा में पर्पटी का न तो निर्माण होता है और न ही विनाश। जबकि अभिसरण सीमा में पर्पटी का विनाश होता है तथा अपसारी सीमा में पर्पटी का निर्माण होता है। अत: रूपान्तर, अभिसरण और अपसारी सीमा में मुख्य अन्तर पर्पटी के निर्माण, विनाश और दिशा संचालन के कारण है।

प्रश्न (iv) दक्कन ट्रैप के निर्माण के दौरान भारतीय स्थलखण्ड की स्थिति क्या थी?
उत्तर- आज से लगभग 14 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय स्थलखण्ड सुदूर दक्षिण में 50° दक्षिणी अक्षांश पर स्थित था। भारतीय उपमहाद्वीप व यूरेशियन प्लेट को टैथीज सागर अलग करता था और तिब्बती खण्ड एशियाई खण्ड के करीब था। इण्डियन प्लेट के एशियाई प्लेट की तरफ प्रवाह के दौरान एक प्रमुख घटना लावा प्रवाह के कारण दक्कन टैप का निर्माण हुआ। अत: भारतीय स्थलखण्ड दक्कन टैप निर्माण के समय भूमध्य रेखा के निकट स्थित था।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए
(i) महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के पक्ष में दिए गए प्रमाणों का वर्णन करें।
उत्तर- महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के तहत वेगनर ने कहा है कि 20 करोड़ वर्ष पहले सभी महाद्वीप आज की तरह अलग-अलग नहीं थे, बल्कि पैंजिया के ही भाग थे। इसको प्रमाणित करने के लिए वेगनर ने कई साक्ष्य दिए हैं
(क) भूवैज्ञानिक क्रियाओं के फलस्वरूप 47 करोड़ से 35 करोड़ वर्ष पुरानी पर्वत पट्टी का निर्माण एक अविच्छिन्न कटिबंध के रूप में हुआ था। ये पर्वत अब अटलांटिक महासागर द्वारा पृथक कर दिए गए हैं।
(ख) कुछ जीवाश्म भी यह बताते हैं कि समस्त महाद्वीप कभी परस्पर जुड़े हुए थे। उदाहरण के लिए, ग्लोसोप्टेरिस नामक पौधे तथा मेसोसौरस एवं लिस्ट्रोसौरस नामक जंतुओं के जीवाश्म गोंडवानालैंड के सभी महाद्वीपों में मिलते हैं जबकि आज ये महाद्वीप एक-दूसरे से काफी दूर हैं।
(ग) अफ्रीका के घाना तट पर सोने का निक्षेप पाया जाता है जबकि 5000 कि०मी० चौड़े महासागर के पार दक्षिणी अमेरिका में ब्राजील के तटवर्ती भाग में भी सोने का निक्षेप पाया जाता है।
(घ) पर्मोकार्बनी काल में मोटे हिमानी निक्षेप उरुग्वे, ब्राजील, अफ्रीका, दक्षिणी भारत, दक्षिणी आस्ट्रेलिया तथा तस्मानिया के धरातल पर दिखाई देते थे। इन अवसादों की प्रकृति में एकरूपता यह सिद्ध करती है कि भूवैज्ञानिक अतीत काल में समस्त महाद्वीप एक-दूसरे से जुड़े हुए थे तथा यहाँ एक जैसी जलवायविक दशाएँ थीं।
(ङ) महाद्वीपों का विस्थापन अभी भी जारी है। अटलांटिक महासागर की चौड़ाई प्रतिवर्ष कई सेंटीमीटर के हिसाब से बढ़ रही है जबकि प्रशांत महासागर छोटा हो रहा है। लाल सागर भूपर्पटी में एक दरार का हिस्सा है जो भविष्य में करोड़ों वर्ष पश्चात एक नए महासागर की रचना करेगा। दक्षिणी अटलांटिक महासागर के चौड़ा होने से अफ्रीका तथा दक्षिणी अमेरिकी एक-दूसरे से अलग हो गए हैं।

(ii) महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत व प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत में मूलभूत अंतर बताइए।
उत्तर- महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की आधारभूत संरचना यह थी कि सभी महाद्वीप पहले एक ही भूखंड के भागे थे, जिसे पैंजिया नाम दिया गया था। ये भूखंड एक बड़े महासागर से घिरा हुआ था। वेगनर के अनुसार, लगभग 20 करोड़ वर्ष पहले पैंजिया का विभाजन आरंभ हुआ। पैंजिया पहले दो बड़े भूखंड लारेशिया और गोंडवानालैंड के रूप में विभक्त हुआ। इसके बाद लारेशिया व गोंडवानालैंड धीरे-धीरे अनेक छोटे-छोटे हिस्सों में बँट गए जो आज के वर्तमान महाद्वीप के रूप में हैं। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी के स्थलमंडल को सात मुख्य प्लेटों व कुछ छोटी प्लेटों में विभक्त किया जाता है। नवीन वलित पर्वतश्रेणियाँ, खाइयाँ और भ्रंश इन मुख्य प्लेटों को सीमांकित करते हैं। महाद्वीप एक प्लेट का हिस्सा है और प्लेट गतिमान है। वेगनर की संकल्पना कि केवल महाद्वीप ही गतिमान है, सही नहीं है।

(iii) महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत के उपरांत की प्रमुख खोज क्या है, जिससे वैज्ञानिकों ने महासागर व महाद्वीप वितरण के अध्ययन में पुनः रुचि ली?
उत्तर- महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत के द्वारा वेगनर ने ज जानकारी प्रस्तुत की थी, वह पुराने तर्क पर आधारित थी। वर्तमान में जानकारी के जो स्रोत हैं, वे वेगनर के समय में उपलब्ध नहीं थे। चट्टानों के चुंबकीय अध्ययन और महासागरीय तल के मानचित्रण ने विशेष रूप से निम्न तथ्यों को उजागर किया
(क) यह देखा गया कि मध्य-महासागरीय कटकों के साथ-साथ ज्वालामुखी उद्गार सामान्य क्रिया है और ये उद्गार इस क्षेत्र में बड़ी मात्रा में लावा निकालते हैं।
(ख) महासागरीय कटक के मध्य भाग के दोनों तरफ समान दूरी पर पाई जाने वाली चट्टानों के निर्माण का समय, संरचना, संघटन और चुंबकीय गुणों में समानता पाई जाती है। महासागरीय कटकों के समीप की चट्टानों में सामान्य चुंबकत्व ध्रुवण पाई जाती है तथा ये चट्टानें नवीनतम हैं। कटकों के शीर्ष से दूर चट्टानों की आयु भी अधिक है।
(ग) महासागरीय पर्पटी की चट्टानें महाद्वीपीय पर्पटी की चट्टानों की अपेक्षा अधिक नई हैं। महासागरीय पर्पटी की चट्टानें कहीं भी 20 करोड़ वर्ष से अधिक पुरानी नहीं हैं। महाद्वीपीय पर्पटी के भूकंप उद्गम केंद्र अधिक गहराई पर हैं जबकि मध्य-महासागरीय कटकों के क्षेत्र के भूकंप उद्गम केंद्र कम गहराई पर विद्यमान हैं।
(घ) गहरी खाइयों में भूकंप उद्गम केंद्र अधिक गहराई पर हैं जबकि मध्य-महासागरीय कटकों के क्षेत्र के भूकंप उद्गम केंद्र कम गहराई पर विद्यमान हैं।

सागरीय अधःस्तल परिकल्पना

चुम्बकीय गुणों के आधार पर हैस ने 1961 में एक परिकल्पना प्रस्तुत की जिसे ‘सागरीय अध:स्तल विस्तार के नाम से जाना जाता है। हैस के तर्कानुसार महासागरीय कटकों के शीर्ष पर लगातार ज्वालामुखी उद्भेदन से महासागरीय पर्पटी में विभेदन हुआ और नया लावा इस दरार को भरकर महासागरीय पर्पटी के दोनों तरफ धकेल रहा है। इस प्रकार महासागरीय अध:स्तल का विस्तार हो रही है। इसके साथ ही दूसरे महासागर के न सिकुड़ने पर हैस ने महासागरीय पर्पटी के क्षेपण की बात कही है। अत: एक ओर महासागरों में पर्पटी का निर्माण होता है तो दूसरी तरफ महासागरीय गर्गों में इसका विनाश भी होता है। (देखिए चित्र 4.1)।

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प्लेट विवर्तनिक संकल्पना

हैस की परिकल्पना के उपरान्त विद्वानों की महासागरों वे महाद्वीपों के वितरण के अध्ययन में फिर से रुचि उत्पन्न हुई। सन् 1967 में मैकेन्जी, पारकर और मोरगन ने स्वतन्त्र रूप से उपलब्ध विचारों को समन्वित कर अध्ययन प्रस्तुत किया, जिसे प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त कहा गया। एक विवर्तनिक प्लेट ठोस चट्टान का विशाल व अनियमित आकार का खण्ड है, जो महाद्वीप व महासागर स्थलमण्डलों के संयोग से बना है (चित्र 4.2)। ये प्लेटें दुर्बलतामण्डल पर दृढ़ इकाई के रूप में संवहन धाराओं के प्रभाव से चलायमान हैं। इन प्लेटों द्वारा ही महाद्वीप व महासागरों का वितरण, निर्माण तथा अन्य भूगर्भीय घटनाएँ निर्धारित होती हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन के लिए कितने बलों का उल्लेख किया है?
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर- (ख) दो।

प्रश्न 2. आर्थर होम्स ने मैंटल भाग में संवहन धाराओं के प्रभाव की सम्भावना व्यक्त की थी
(क) 1910 के दशक में
(ख) 1920 के दशक में
(ग) 1930 के दशक में
(घ) 1940 के दशक में
उत्तर- (ग) 1930 के दशक में।

प्रश्न 3. मैकेन्जी और पारकर ने प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त कब प्रतिपादित किया?
(क) 1966 में
(ख) 1967 में
(ग) 1968 में
(घ) 1969 में
उत्तर- (ख)1967 में।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. पैजिया क्या है?
उत्तर- 150 मिलियन वर्ष पूर्व एक विशाल महाद्वीप जिसमें वर्तमान सभी महाद्वीप एक साथ जुड़े हुए थे, पैंजिया कहलाता था। वेगनर ने अपने ‘महाद्वीप विस्थापन सिद्धान्त’ के अन्तर्गत इसी पैंजिया के विखण्डन से वर्तमान महाद्वीपों की उत्पत्ति और वितरण की व्याख्या की है।

प्रश्न 2. प्लेट के संचरण के लिए कौन-सा बल कार्य करता है?
उत्तर- संवहन धाराएँ तथा तापीय संवहन की प्रक्रिया प्लेट को खिसकाने में बल का कार्य करती हैं। गर्म धाराएँ जैसे ही धरातल के पास पहुँचती हैं, ठण्डी हो जाती हैं। उसी समय ठण्डी धाराएँ नीचे जाती हैं। यही संवाहनिक संचरण धरातलीय प्लेट को खिसकाता है।

प्रश्न 3. पैंथालासा क्या हैं?
उत्तर- पैंथालासा का सामान्य अर्थ जल-क्षेत्र है। वैज्ञानिकों का मत है कि पूर्वकाल में सभी महासागर एक सम्बद्ध जल-क्षेत्र था पैंथालासा कहा जाता था। पैंजिया स्थल क्षेत्र इसी जल-क्षेत्र के लगभग मध्य में स्थित था जिसके विखण्डन से महाद्वीपों का निर्माण हुआ है।

प्रश्न 4. पैजिया का प्रारम्भिक विखण्डन कब व कितने खण्डों में हुआ था?
उत्तर- वेगनर के अनुसार लगभग 20 करोड़ वर्ष पूर्व पैंजिया का विभाजन आरम्भ हुआ। इस समय पैंजिया के निम्नलिखित दो खण्ड हुए–

  • लारेशिया जिससे उत्तरी महाद्वीप बने तथा
  • गोंडवानालैण्ड जिसमें दक्षिण महाद्वीप सम्मिलित थे।

प्रश्न 5. पोलर वेण्डरिंग क्या है?
उत्तर- भूगर्भिक परिवर्तन की प्रक्रिया जिसके अन्तर्गत ध्रुवों (Poles) की स्थिति बदल गई, पोलर वेण्डरिंग कहलाता है।

प्रश्न 6. कौन-सी प्लेट महासागरीय धरातल से बनी है?
उत्तर- प्रशान्त प्लेट महासागरीय धरातल से बनी है।

प्रश्न 7. रूपान्तरण सीमा क्या है?
उत्तर- प्लेट संचलन की वह सीमा जहाँ न तो कोई नई पर्पटी का निर्माण होता है और न ही पर्पटी का विनाश होता है, रूपान्तरण सीमा कहलाती है।

प्रश्न 8. अभिसरण के प्रकार बताइए।
उत्तर- अभिसरण के निम्नलिखित तीन प्रकार हो सकते हैं

  • महासागरीय व महाद्वीपीय प्लेट के मध्य अभिसरण।
  • महासागरीय प्लेटों के मध्य अभिसरण।
  • दो महाद्वीपीय प्लेटों के मध्य अभिसरण।

प्रश्न 9. अपसारी सीमा क्या है? इसका एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर- जब दो प्लेटें एक-दूसरे से विपरीत दिशा में अलग हटती हैं और नई पर्पटी का निर्माण होता है तो उन्हें अपसारी प्लेट कहते हैं। अपसारी सीमा का सबसे अच्छा उदाहरण मध्य अटलांटिक कटक है।

प्रश्न 10. प्रविष्ठन (Subduction) क्षेत्र क्या होता है?
उत्तर- अभिसरण सीमा पर जहाँ भू-प्लेट धंसती है, उस क्षेत्र को प्रविष्ठन क्षेत्र कहते हैं। हिमालय पर्वतीय क्षेत्र इसका प्रमुख उदाहरण है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भारतीय प्लेट की अवस्थिति एवं विस्तार पर प्रकाश डालिए।
उत्तर- भारतीय प्लेट में प्रायद्वीप भारत और ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप सम्मिलित हैं। इसकी उत्तरी सीमा हिमालय पर्वत श्रेणियों में स्थित प्रविष्ठन क्षेत्र द्वारा निर्धारित होती है, जो पूर्व दिशा में म्यांमार के राकिन्योमा पर्वत से होते हुए एक चाप के रूप में जावा खाई तक विस्तृत है। भारतीय प्लेट की पूर्वी सीमा विस्तारित तल के रूप में तथा पश्चिमी सीमा पाकिस्तान की किरथर श्रेणियों का अनुसरण करती हुई मकरान तट के साथ-साथ लाल सागर द्रोणी तक स्थित है। यह प्लेट महाद्वीपीय-महाद्वीपीय अभिसरण के रूप में अर्थात् दो महाद्वीपों से प्लेटों की सीमा निश्चित होती है। वर्तमान में इस प्लेट की अवस्थिति का विश्लेषण नागपुर क्षेत्र में पाई जाने वाली चट्टानों के आधार पर किया जाता है।

प्रश्न 2. विवर्तनिक प्लेटों को संचालित करने वाले कौन-से बल हैं, वर्णन कीजिए।
उत्तर- जिस समय वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त प्रस्तुत किया था, उस समय यह माना जाता था कि पृथ्वी एक ठोस गतिरहित पिण्ड है। किन्तु सागरीय अध:स्तल विस्तार और प्लेट विवर्तनिक दोनों सिद्धान्तों से यह सिद्ध हो गया है कि पृथ्वी का धरातल एवं भूगर्भ दोनों ही स्थिर न होकर गतिमान हैं। प्लेट चलायमान है, आज यह निर्विवाद तथ्य है। ऐसा माना जाता है कि दृढ़ प्लेट के नीचे चलायमान चट्टानें वृत्ताकार रूप में चल रही हैं। उष्ण पदार्थ धरातल पर पहुँचता है, फैलता है और धीरे-धीरे ठण्डा होता है, फिर गहराई में जाकर नष्ट हो जाता है। यही चक्र बारम्बार दोहराया जाता है। वैज्ञानिक इसे संवहन प्रवाह (Convection Flow) कहते हैं। इस विचार को सर्वप्रथम 1930 में होम्स ने प्रतिपादित किया था। इनके आधार पर वर्तमान में यही माना जाता है कि मैंटल में स्थित रेडियोधर्मी तत्त्वों के क्षय से उत्पन्न बल ही संवहनीय धाराओं के रूप में प्लेट को संचलित करने के लिए उत्तरदायी है।

प्रश्न 3. प्लेट प्रवाह दरें कैसे निर्धारित होती हैं? प्लेट प्रवाह की न्यूनतम एवं वृहदतम् दरें बताइए।
उत्तर- सामान्य व उत्क्रमण चुम्बकीय क्षेत्र पट्टियाँ जो मध्य महासागरीय कटक के समानान्तर हैं, प्लेट प्रवाह की दर को समझने में वैज्ञानिकों के लिए सहायक सिद्ध हुई हैं। प्लेट प्रवाह की दरों में विभिन्नताएँ मिलती हैं। स्थलमण्डलीय प्लेटों में आर्कटिक कटक की प्रवाह दर सबसे कम (2.5 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष से भी कम) है, जबकि पूर्वी द्वीप के निकट पूर्वी प्रशान्त महासागरीय उभार, जो चिली से 3400 किमी पश्चिम की ओर दक्षिण प्रशान्त महासागर में है, इसकी प्रवाह दर सर्वाधिक (5 सेमी प्रतिवर्ष से भी अधिक) है।

प्रश्न 4, पृथ्वी के स्थलमण्डल की सात मुख्य प्लेटों के नाम लिखिए।
उत्तर- प्लेट विवर्तनिकी के सिद्धान्त के अनुसार पृथ्वी का स्थलमण्डल सात मुख्य प्लेटों व कुछ छोटी प्लेटों में विभक्त है। सात मुख्य प्लेटों के नाम निम्नलिखित हैं(1) अंटार्कटिक प्लेट (जिसमें अंटार्कटिक से घिरा महासागर भी सम्मिलित है), (2) उत्तरी अमेरिकी प्लेट, (3) दक्षिणी अमेरिकी प्लेट, (4) प्रशान्त महासागरीय प्लेट, (5) इंडो-ऑस्ट्रेलियन-न्यूजीलैण्ड प्लेट, (6) अफ्रीकी प्लेट, (7) यूरेशियाई प्लेट (जिसमें पूर्वी अटलांटिक महासागरीय तल भी सम्मिलित है)।

प्रश्न 5. स्थलमण्डल की महत्त्वपूर्ण छोटी प्लेटों के नाम लिखिए तथा इनकी स्थिति बताइए।
उत्तर- स्थलमण्डल की महत्त्वपूर्ण छोटी प्लेटों के नाम निम्नलिखित हैं

  1. कोकोस प्लेट- यह प्लेट मध्यवर्ती अमेरिका और प्रशान्त महासागरीय प्लेट के बीच स्थित है।
  2.  नफ्रका प्लेट- यह दक्षिण अमेरिका व प्रशान्त महासागरीय प्लेट के मध्य है।
  3. अरेबियन प्लेट- इसमें अधिकतर अरब प्रायद्वीप का भूभाग स्थित है।
  4. फिलिपीन प्लेट- यह एशिया महाद्वीप और प्रशान्त महासागरीय प्लेट के बीच स्थित है।
  5. कैरोलिन प्लेट- यह न्यूगिनी के उत्तर में फिलिपियन व इण्डियन प्लेट के बीच स्थित है।
  6. फ्यूजी प्लेट- यह ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्व में स्थित है।

प्रश्न 6. संवहन धारा सिद्धान्त क्या है?
उत्तर- पृथ्वी के मैंटल में स्थित रेडियोएक्टिव तत्त्वों में ताप-भिन्नता के कारण संवहन धाराएँ प्रवाहित होती रहती हैं। 1930 के दशक में आर्थर होम्स ने सबसे पहले इन संवहन धाराओं की उपस्थिति तथा इनके चक्रीय प्रवाह की सम्भावनाएँ व्यक्त की थीं। होम्स ने ही महाद्वीप व महासागरों के वितरण और पर्वतों के निर्माण के सम्बन्ध में संवहन धारा सिद्धान्त को प्रतिपादन किया था। यह सिद्धान्त पर्वतों, महाद्वीप तथा महासागरों की उत्पत्ति एवं इनके वितरण की वैज्ञानिक व्याख्या करता है तथा अपने से पूर्व के सभी सिद्धान्तों से अधिक मान्य है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त का वर्णन कीजिए तथा प्लेटों की प्रक्रिया पर प्रकाश डालिए।’
उत्तर- प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त
महाद्वीपीय विस्थापन एवं सागरीय तल विस्तार अवधारणा के पश्चात् महाद्वीप, महासागर एवं पर्वतों का निर्माण तथा वितरण सम्बन्धी समस्याओं के समाधान हेतु सन् 1967 में मैकेन्जी (Mekenzie), पारकर (Parker) और मोरगन (Morgan) ने स्वतन्त्र रूप से उपलब्ध विचारों को समन्वित कर प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त को प्रस्तुत किया है। यह सिद्धान्त भूगर्भ एवं भूपटल से सम्बन्धित विभिन्न जटिल प्रश्नों; जैसे—भूकम्प आने का क्या कारण है, ज्वालामुखी विस्फोट क्यों होते हैं महाद्वीप एवं महासागरों की उत्पत्ति कैसे हुई, इनके वितरण का क्या आधार है? आदि का समुचित समाधान करने में अभी तक की सबसे अधिक मान्य एवं वैज्ञानिक व्याख्या है।

एक विवर्तनिक प्लेट (जिसे स्थलमण्डल प्लेट भी कहा जाता है) ठोस चट्टान का विशाल व अनियमित आकार का खण्ड है। अतएव स्थलमण्डल अनेक प्लेटों में विभक्त है। प्रत्येक प्लेट स्वतन्त्र रूप से दुर्बलतामण्डल से संचलन करती रहती है महाद्वीप एवं महासागरों की सतह को संचलने इन प्लेटों के माध्यम से ही होता है। स्थलमण्डल की ये 7 बड़ी एवं छोटी कठोर प्लेटें हैं (चित्र 4.2)। इन भू-प्लूटों पर स्थलाकृतियों का निर्माण, भ्रंशन तथा विस्थापन क्रियाओं द्वारा होता है जिन्हें विवर्तनिकी कहते हैं।
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प्लेट विवर्तनिकी प्रक्रिया

संवहनीय धाराओं के आधार पर भू-प्लेटों की प्रक्रिया, विस्तार एवं क्षेत्र निम्नलिखित प्रकार से सम्पन्न होता है–
1. अपसारी क्षेत्र (प्लेट)-जब दो प्लेट एक-दूसरे से विपरीत दिशा में अलग हटती हैं और नई पर्पटी का निर्माण होता है, उन्हें अपसारी प्लेट कहते हैं। वह स्थान जहाँ से प्लेट एक-दूसरे से दूर हटती हैं, प्रसारी स्थान (Spreading Site) या अपसारी क्षेत्र कहलाता है।

2. अभिसारी क्षेत्र (प्लेट)-जब एक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे धंसती है और जहाँ भूपर्पटी नष्ट होती है, वह अभिसरण क्षेत्र या सीमा कहलाता है। इस प्रक्रिया में जब दो भिन्न दिशाओं में प्लेटें एक-दूसरे के ऊपर चढ़ जाती हैं तो संपीडन के कारण पर्वत, खाइयाँ आदि स्थल-रूप निर्मित होते हैं।

3. रूपान्तर क्षेत्र (प्लेट)-इन किनारों पर न तो नये पदार्थ का निर्माण होता है और न विनाश होता | है। ऐसी स्थिति महासागरीय कटक के पास होती है।

प्रश्न 2. वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर- महाद्वीपीय प्रवाह (विस्थापन) सिद्धान्त
महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धान्त जर्मन मौसमविद् अल्फ्रेड वेगनर (Alfred wegner) द्वारा सन् 1912 में प्रस्तावित किया था। यह सिद्धान्त महाद्वीप एवं महासागरों के वितरण से सम्बन्धित है। इस सिद्धान्त की आधारभूत संकल्पना यह थी कि सभी महाद्वीप पूर्वकाल में परस्पर जुड़े हुए थे जिसे पैंजिया कहा जाता है। इसके चारों तरफ महासागर था, जिसे पैन्थालासा कहा जाता है पैंजिया सियाल निर्मित था जो सघन सीमा पर तैर रहा था। पैंजिया के मध्य में टैथिज उथला सागर था। इस सागर को उत्तरी भाग अंगारालैण्ड तथा दक्षिणी भाग गोंडवानालैण्ड था। अंगारालैण्ड में उत्तरी अमेरिका तथा यूरेशिया संलग्न थे। गोंडवानालैण्ड में दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका प्रायद्वीपीय भारत तथा अंटार्कटिका आदि परस्पर संलंग्न थे। कार्बोनिफेरस युग के अन्त में पैंजिया टूट गया। पैंजिया के विखण्डित भाग उत्तर में भूमध्यरेखा तथा पश्चिमी की ओर विस्थापित हुए। भूमध्यरेखा की ओर विस्थापन का कारण वेगनर गुरुत्वाकर्षण एवं प्लवनशीलता बल को तथा पश्चिम की ओर विस्थापकों का कारण ज्वारीय बल को मानते हैं। वेगनर इसी विस्थापन को महाद्वीप एवं महासागर के वर्तमान क्रम के लिए उत्तरदायी मानते हैं।

प्रश्न 3. वेगनर के महाद्वीपीय सिद्धान्त एवं प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त की तुलनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर- वास्तव में वेगनर ने अपने सिद्धान्त में युग तथा दिशा को सही ढंग से समझाने का प्रयास नहीं किया है। धरातल पर कई प्रकार के परिवर्तन हुए हैं। पृथ्वी का भू-वैज्ञानिक इतिहास इसका साक्षी है। महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त यद्यपि विभिन्न भूगर्भिक समस्याओं की विवेचना करता है, फलस्वरूप इसे एक अच्छा सिद्धान्त तो माना जाता है, परन्तु इसे सत्य सिद्धान्त नहीं कहा जा सकता है। वेगनर के सिद्धान्त के अनुसार केवल महाद्वीप गतिमान है, सही नहीं है। वास्तव में महाद्वीप एक प्लेट का हिस्सा है और प्लेट गतिमान है। यह निर्विवाद तथ्य है कि भूवैज्ञानिक इतिहास में सभी प्लेट गतिमान रही हैं और भविष्य में भी गतिमान रहेंगी। चित्र 4.3 में विभिन्न कालों में महाद्वीपीय भागों की स्थिति को दर्शाया गया है। पुराचुम्बकीय आँकड़ों के केवल महाद्वीप गतिमान है, सही नहीं है। वास्तव में महाद्वीप एक प्लेट का हिस्सा है और प्लेट गतिमान है। यह निर्विवाद तथ्य है कि भूवैज्ञानिक इतिहास में सभी प्लेट गतिमान रही हैं और भविष्य में भी गतिमान रहेंगी। चित्र 4.3 में विभिन्न कालों में महाद्वीपीय भागों की स्थिति को दर्शाया गया है। पुराचुम्बकीय आँकड़ों के आधार पर वैज्ञानिकों ने विभिन्न भूकालों में प्रत्येक महाद्वीपीय खण्ड की अवस्थिति निर्धारित की है। इससे यह स्पष्ट होता है कि महाद्वीपीय पिण्ड जो प्लेट के ऊपर स्थित है भू-वैज्ञानिक कालपर्यन्त चलायमान थे और पैंजिया अलग-अलग महाद्वीपीय खण्डों के अभिसरण से बना था, जो कभी एक या किसी दूसरी प्लेट के हिस्से थे। अत: महासागरों एवं महाद्वीपों की उत्पत्ति एवं वर्तमान क्रम महाद्वपीय विस्थापन से नहीं बल्कि प्लेट विवर्तन प्रक्रिया के परिणामस्वरूप है।
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प्रश्न 4. महासागरीय अधःस्तल की बनावट का वर्णन कीजिए।
उत्तर- महासागरीय अध:स्तल की बनावट महाद्वीप एवं महासागरों के वितरण को समझने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। गहराई एवं उच्चावच के आधार पर महासागरीय तल को (चित्र 4.4) निम्नलिखित तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है–

1. महाद्वीपीय सीमा-महाद्वीपीय सीमा महाद्वीपीय किनारों और गहरे समुद्री बेसिन के बीच का भाग है। इसके अन्तर्गत महाद्वीपीय मग्नतट, महाद्वीपीय ढाल, महाद्वीपीय उभार और गहरी महासागरीय खाइयाँ आदि सम्मिलित हैं। महासागरों व महाद्वीपों के वितरण को समझने में गहरी महासागरीय खाइयों का विशेष महत्त्व है।
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2. वितलीय मैदान-महाद्वीपीय तट एवं मध्य महासागरीय कटकों के बीच स्थित लगभग समतल क्षेत्र को वितलीय मैदान कहते हैं। इनका निर्माण महाद्वीपों से बहाकर लाए गए अवसादों द्वारा महासागरों के तटों से दूर निक्षेपण से होता है।

3. मध्य महासागरीय कटक-मध्य महासागरीय कटक परस्पर संलग्न पर्वतों की एक श्रृंखला है। यह महासागरीय जल में डूबी हुई पृथ्वी के धरातल पर पाई जाने वाली सम्भवतः सबसे लम्बी पर्वत श्रृंखला मानी जाती है। यह वास्तव में सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्र ही नहीं बल्कि विवर्तनिकी का मुख्य क्षेत्र है जो महाद्वीप एवं महासागरों के निर्माण एवं वितरण में महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

प्रश्न 5. भारतीय प्लेट संचलन का वर्णन कीजिए।
उत्तर- भारतीय प्लेट का संचलन पूर्व में भारत एक वृहत् द्वीप था, जो ऑस्ट्रेलियाई तट से दूर एक विशाल महासागर में स्थित थी। लगभग 22.5 करोड़ वर्ष पहले तक टेथीस सागर इसे एशिया महाद्वीप से अलग करता था। ऐसा माना जाता है। कि लगभग 20 करोड़ वर्ष पहले, जब पैंजिया विभक्त हुआ तब भारत ने उत्तर दिशा की ओर खिसकना आरम्भ किया। लगभग 4 से 5 करोड़ वर्ष पूर्व भारत एशिया से टकराया परिणामस्वरूप हिमालय पर्वत का उत्थान हुआ। 7.1 करोड़ वर्ष पूर्व भारत की स्थिति मानचित्र 4.5 में दर्शाई गई है। इस चित्र में भारतीय उपमहाद्वीप व यूरेशियन प्लेट की स्थिति भी दर्शाई गई है।
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आज से लगभग 14 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप सुदूर दक्षिण में 50° दक्षिणी अक्षांश पर स्थित था। इन दो प्रमुख प्लेटों को टेथीस सागर अलग करता था। और तिब्बतीय खण्ड, एशियाई स्थलखण्ड के निकट था। भारतीय प्लेट के एशियाई प्लेट की ओर प्रवाह के समय दक्षिण में लावा प्रवाह से दक्कन ट्रैप का निर्माण हुआ, जिसे एक विशेष घटना माना जाता है। यह घटना लगभग 6 करोड़ वर्ष पूर्व से आरम्भ होकर लम्बे समय तक जारी रही। भारतीय प्लेट प्रवाह के सम्बन्ध में उल्लेखनीय बिन्दु, यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप तब भी भूमध्य रेखा के निकट था और वर्तमान में भी भूमध्य रेखा के निकट हैं। (देखिए चित्र 4.5)।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 9 Mental Hygiene and Mental Health

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 9 Mental Hygiene and Mental Health (मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान तथा मानसिक स्वास्थ्य) are part of UP Board Solutions for Class 11 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 9 Mental Hygiene and Mental Health (मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान तथा मानसिक स्वास्थ्य).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 9
Chapter Name Mental Hygiene and Mental Health
(मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान तथा मानसिक स्वास्थ्य)
Number of Questions Solved 47
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 9 Mental Hygiene and Mental Health (मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान तथा मानसिक स्वास्थ्य)

दीर्घ उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान (Mental Hygiene) से आप क्या समझते हैं? मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के महत्व को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
भौतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों से समायोजन स्थापित करने की दृष्टि से मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) का विचार अत्यन्त महत्त्व रखता है। मानसिक स्वास्थ्य तथा सन्तुलन बनाये रखने के लिए एक विज्ञान की उत्पत्ति हुई, जिसका नाम ‘मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान (Mental Hygiene) है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के जन्मदाता डब्लयू० बीयर नामक मनोवैज्ञानिक हैं, जिन्होंने व्यक्तित्व सम्बन्धी विकारों के निवारण तथा उनके दुष्प्रभावों से बचने के लिए कुछ नियमों का प्रतिपादन किया। बीयर के सत्प्रयासों से 1908 ई० में मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान समिति की स्थापना हुई जिसके बाद इसी सम्बन्ध में एक राष्ट्रीय परिषद् का निर्माण हुआ। आगे चलकर एक आन्दोलन के रूप में यह पूरे यूरोप में फैल गया 1911 ई० में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर 1930 ई० में इसका प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय अधिवेशन वाशिंगटन में हुआ। शनैः-शनै: मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का प्रचार विश्व के सभी प्रगतिशील देशों में हो गया।

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का अर्थ
(Meaning of Mental Hygiene)

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान, मानसिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित एक विज्ञान है। यह विज्ञान व्यक्तित्व के सन्तुलित विकास का अध्ययन करता है, क्योंकि सन्तुलित व्यक्तित्व वाला मनुष्य ही स्वयं को सम-विषम परिस्थितियों के अनुरूप समायोजित करके मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त कर सकता है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के अन्तर्गत मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन प्रकार के कार्यों को सम्मिलित किया जाता है –

  1. मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा – व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य बनाये रखने से सम्बन्धित सभी सामान्य कार्य इस पक्ष के अन्तर्गत सम्मिलित हैं।
  2. मानसिक रोगों की रोकथाम – मानसिक रोगों से व्यक्ति को बचाना ताकि वे दशाएँ या परिस्थितियाँ उत्पन्न न हों जो मानसिक रोग पैदा कर सकती हैं।
  3. मानसिक रोगों का प्रारम्भिक उपचार – मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के अन्तर्गत व्यक्ति के प्रारम्भिक मानसिक रोगों का उपचार किया जाता है।

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान उपर्युक्त तीनों कार्यों को सम्पन्न करता है। इन कार्यों को दो पहलुओं के रूप में अभिव्यक्त कर सकते हैं –

(i) विधेयात्मक पहलू (Positive Aspect) – इसमें उन नियमों, सिद्धान्तों तथा तरीकों की जाँच व खोज की जाती है जिनमें व्यक्ति का सन्तुलन स्थापित हो सके। वह अपने को वातावरण की परिस्थितियों से अधिकाधिक समायोजित कर सके तथा अपने मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा कर सके।

(ii) निषेधात्मक पहलू (Negative Aspect) – यह व्यक्ति को मानसिक अस्वस्थता से बचाता है, जिसके परिणामतः उसमें संघर्ष, मानसिक विकार तथा समायोजन के दोष उत्पन्न नहीं हो पाते। दूसरे शब्दों में, यह मानसिक रोगों की रोकथाम तथा प्रारम्भिक उपचार से सम्बन्धित पहलू है।

इस प्रकार मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान (Mental Hygiene) वह विज्ञान है जो व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करता है, उसे मानसिक रोगों से मुक्त रखता है तथा यदि व्यक्ति मानसिक विकार/रोग अथवा समायोजन के दोषों से ग्रस्त हो जाता है तो उसके कारणों का निदान करके समुचित उपचार की व्यवस्था का प्रयास करता है।

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की परिभाषा
(Definition of Mental Hygiene)

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की प्रमुख परिभाषाएँ अग्रलिखित हैं –

  1. हैडफील्ड के अनुसार, “मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का सम्बन्ध मानसिक स्वास्थ्य बनाये | रखने तथा मानसिक अस्वस्थता रोकने से हैं।”
  2. ड्रेवर के कथनानुसार, “मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का अर्थ है-मानसिक स्वास्थ्य के नियमों की खोज करना और उसको सुरक्षित रखने के उपाय करना
  3. भाटिया के शब्दों में, “मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान मानसिक रोगों से बचने और मानसिक स्वास्थ्य बनाये रखने का विज्ञान और कला है। यह कुसमायोजनों के सुधारों से सम्बन्धित है। इस कार्य में यह आवश्यक रूप से कारणों के निर्धारण का कार्य भी करता है।”

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का महत्त्व या उपयोगिता
(Importance or Utility of Mental Hygiene)

मानसिक स्वास्थ्य का एक लक्ष्य है जिसकी पूर्ति के लिए मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की सहायता लेनी पड़ती है। यह विज्ञान मानसिक रोगियों की समस्याओं का समाधान करने तथा उनके उपचार करने की दशा में एक वैज्ञानिक प्रयास है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की आधुनिक दृष्टिकोण सहानुभूति, सहृदयतापूर्ण और सुधारवादी है। पेरिस के प्रसिद्ध कारागार चिकित्सक पिने (Phillipe Pinel) ने सर्वप्रथम इन रोगियों को सुधारने के लिए सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार तथा नैतिक उपचार का मार्ग सुझाया। उसने मानसिक रोगियों की जंजीरें खुलवा दी और उन्हें घूमने-फिरने की स्वतन्त्रता प्रदान की है। इसके परिणामस्वरूप बहुत-से रोगी अधिक सहयोगी व आज्ञाकारी बन गये और दूसरों के बेहतर उपचार को मार्ग प्रशस्त हुआ। इसका समस्त श्रेय मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की विचारधारा को ही जाता है। वर्तमान समय में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का महत्त्व निम्नलिखित है –

(1) सन्तुलित व्यक्तित्व (Balanced Personality) – मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान हमारे व्यक्तित्व के विभिन्नु पक्षों-शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा सांवेगिक आदि को सन्तुलित रूप से विकसित होने का अवसर प्रदान करता है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की सहायता से मानसिक संघर्ष कम होता है तथा भावना ग्रन्थियाँ नहीं पनपने पातीं।

(2) सुसमायोजित जीवन (Well-adjusted Life) – मनुष्य का सन्तुलित व्यक्तित्व उसे सन्तुलित जीवन जीने में सहायता देता है। इससे व्यक्ति को सम-विषम परिस्थितियों का अनुकूलन स्थापित करने में सहायता मिलती है। सन्तुलित जीवन के अवसर मिलने का अर्थ है–सुखी और सुसमायोजित जीवन-यापन का सौभाग्य प्राप्त होना।।

(3) स्वस्थ सामाजिक जीवन (Healthy Social Life) – व्यक्ति समाज की इकाई है और व्यक्तियों के समूह से समाज बनता है। समाज के सभी व्यक्तियों का सन्तुलित व्यक्तित्व तथा समायोजित जीवन सामाजिक जीवन को साम्य एवं स्वस्थ बनाता है। ऐसे सन्तुलित समाज में सामाजिक विषमता और संघर्ष नहीं होंगे। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान, सामाजिक जीवन को स्वस्थ और सुन्दर बनाता है।

(4) स्वस्थ पारिवारिक वातावरण (Healthy Environment of the Family) – स्वस्थ व्यक्तित्व के निर्माण से पारिवारिक सन्तुलन, सुसमायोजन, शान्ति, व्यवस्था और सुख में वृद्धि होती है। परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम और सौहार्दपूर्ण व्यवहार से हर प्रकार के आनन्द तथा स्वस्थ वातावरण का सृजन होता है।

(5) शिशुओं का उचित पालन-पोषण (Well_Rearing of the Infants) – मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के माध्यम से शिशुओं के माता-पिता एवं परिवारजन भली प्रकार यह समझ सकते हैं। कि नवजात शिशुओं की देखभाल किस प्रकार की जाए। इससे शिशुओं की उचित सेवा सुश्रूषा हो सकेगी तथा उनका विकास भी पूर्ण रूप से हो सकेगा। यह पारिवारिक सन्तुलन की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है।

(6) शैक्षिक प्रगति (Educational Progress) – मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के नियम और सिद्धान्त बालकों के स्वस्थ संवेगात्मक विकास में सहायक होते हैं। भावना ग्रन्थियों तथा मानसिक संघर्ष से मुक्त रहकर वे पास-पड़ोस तथा विद्यालय से समायोजन स्थापित कर सकते हैं। शिक्षा के मार्य में बाधक मानसिक रोग ग्रन्थियाँ हटने से शैक्षिक प्रगति सम्भव होती है।

(7) उपचारात्मक महत्त्व (Treatmentative Importance) – व्यावसायिक स्वास्थ्य विज्ञान मात्र स्वस्थ रहने और समायोजित जीवन व्यतीत करने सम्बन्धी नियम एवं सिद्धान्त ही निर्धारित नहीं करता अपितु उपचार लेकर मानव-समाज की सेवा में उपस्थित होता है। रोकथाम और बचाव के साधन प्रयोग में लाने पर भी यदि कोई व्यक्ति मानसिक रोगों से ग्रस्त हो जाता है तो मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान उसके प्रारम्भिक उपचार की व्यवस्था करता है।

(8) व्यावसायिक सफलता (Vocational Progress) – व्यावसायिक सफलता के लिए व्यक्ति का जीवन सन्तुलित एवं समायोजित होना चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान सन्तुलित व्यक्तित्व का सृजन करके व्यक्ति की व्यावसायिक क्षमता में वृद्धि करता है।

(9) राष्ट्रीयता की भावना एवं सांवेगिक एकता (Feeling of Nationality and Emotional Integration) – विषमता और विघटनकारी प्रवृत्तियों के प्रभाव से वर्तमान परिस्थितियों में हमारा राष्ट्र सम्प्रदायवाद, भाषावाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद आदि दूषित विचारधाराओं से जूझ रहा है। इससे बचाव के लिए देश के नागरिकों में संवेगात्मक एकता का संचार करना होगा। यह कार्य मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की सक्रियता के अभाव में नहीं हो सकता।

(10) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सहयोग (International Peace and Cooperation) – अन्तर्राष्ट्रीय (विश्व) शान्ति के लिए आवश्यक है कि दुनिया के सभी देशों के नेतागण, चिन्तक, विचारक, समाज-सुधारक तथा नागरिक सन्तुलित और समायोजित व्यक्तित्व वाले हों। यदि देश के कर्णधारों का मानसिक स्वास्थ्य खराब होगा तो विभिन्न देशों के बीच तनाव और संघर्ष निश्चित रूप से होगा। प्रायः एक ही व्यक्ति को असन्तुलित मस्तिष्क समूची मानव-संसृति को युद्ध एवं विनाश की अग्नि में झोंक देगा। उस असन्तुलित मस्तिष्क के उपचार का दायित्व मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान पर है। इससे विश्व-स्तर पर उत्पन्न तनाव और संघर्ष समाप्त होगा और विरोधी विचारधारा वाले देश निकट आकर मित्रता में बंध जाएँगे।

उपर्युक्त विवेचैन से स्पष्ट होता है कि मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का महत्त्व व्यक्ति के निजी जीवन से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक समान रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है। मनुष्य और उसके समाज से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं में मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की उपयोगिता एकमत से स्वीकार की जाती है।

प्रश्न 2.
मानसिक स्वास्थ्य क्या है? मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति की क्या विशेषताएँ होती हैं?
या
मानसिक स्वास्थ्य का मनोवैज्ञानिक अर्थ क्या है? मानसिक रूप से स्वस्थ एक 18 वर्षीय किशोर के मानसिक लक्षणों का वर्णन कीजिए।
या
मानसिक स्वास्थ्य से क्या तात्पर्य है? उन प्रमुख लक्षणों की विवेचना कीजिए जिन्हें आप अच्छे मानसिक स्वास्थ्य का द्योतक मानते हैं?
उत्तर :
प्राचीन काल के समाजों में व्यक्ति का जीवन सरल तथा साधारण था और आवश्यकताएँ बहुत सीमित थीं। मानव सभ्यता के बढ़ते कदम ज्ञान, विज्ञान और तकनीकी की उपलब्धियों के साक्षी हैं, किन्तु इससे मानव का जीवन जटिल हो गया। भौतिकवादी उन्माद ने बड़ी-बड़ी महत्त्वाकांक्षाओं को जन्म दिया जिनकी असफलता ने मनुष्य के मन को निराशा, असन्तोष तथा चिन्ताओं से भर दिया। परिणामत: उसे अपने समाज के साथ समायोजन स्थापित करने में कठिनाइयों का अनुभव होने लगा। दुःख, चिन्ता और तनाव लम्बे समय तक सहन नहीं किये जा सकते। इन्हीं परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में व्यक्ति के लिए मानसिक सुख और शान्ति प्राप्त कर समाज का सुसमायोजित प्राणी बनने हेतु मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) का अध्ययन परमावश्यक है।

मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ
(Meaning of Mental Health)

मानसिक स्वास्थ्य से तात्पर्य व्यक्ति की उस योग्यता से है जिसके माध्यम से वह अपनी कठिनाइयों को दूर कर हर परिस्थिति में अपने को समायोजित कर लेता है। सुखी जीवन के लिए जितना शारीरिक स्वास्थ्य आवश्यक है, उसना ही मानसिक स्वास्थ्य भी। चिकित्साशास्त्रियों के अनुसार सामान्य शारीरिक व्याधियाँ; यथा–रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग आदि मानसिक कारकों से उत्पन्न होती हैं। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति चिन्तारहित, पूर्णत: समायोजित, आत्मनियन्त्रित, आत्मविश्वासी तथा संवेगात्मक रूप से स्थिर व्यक्ति होता है। उसके व्यवहार में सन्तुलन रहता है तथा वह अधिक समय तक मानसिक तनाव की स्थिति में नहीं रहता। वह प्रत्येक परिस्थिति में स्वयं को शीघ्र ही समायोजित कर लेता है। वर्तमान परिस्थितियों में, पूरे समाज में, उसके विभिन्न अंगों में तथा उसके नागरिकों के बीच अच्छे से अच्छा समायोजन समष्टिगत कल्याण का द्योतक है, जिसके लिए मानसिक स्वास्थ्य एक पूर्व आवश्यकता है।

मानसिक स्वास्थ्य की परिभाषा
(Definition of Mental Health)

विभिन्न विद्वानों ने मानसिक स्वास्थ्य की अनेक परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं। प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) हैडफील्ड के अनुसार, “सम्पूर्ण व्यक्तित्व की पूर्ण एवं सन्तुलित क्रियाशीलता को मानसिक स्वास्थ्य कहते हैं।’

(2) मैनिंजर के अनुसार, “हम मानसिक स्वास्थ्य की परिभाषा अधिकतम प्रभावोत्पादकता और आनन्द के साथ मानव-प्राणियों का संसार से और परस्पर समंजन के रूप में कर सकते हैं। यह एक सम स्वभाव, एक जागरूक बुद्धि, सामाजिक रूप से सन्तुलित व्यवहार और एक स्वस्थ स्नायु-विन्यास बनाये रखने की योग्यता है।”

(3) लैडल के शब्दों में, “मानसिक स्वास्थ्य से अभिप्राय वास्तविक आधार पर वातावरण से पर्याप्त समायोजन करने की योग्यता है।”

(4) प्रो० एम० आर० भाटिया ने मानसिक स्वास्थ्य के अर्थ को इन शब्दों में स्पष्ट किया है, मानसिक स्वास्थ्य यह बताता है कि कोई व्यक्ति जीवन की माँगों और अवसरों के प्रति कितनी अच्छी तरह समायोजित है।

उपर्युक्त वर्णिते. परिभाषाओं के विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि मानसिक स्वास्थ्य से आशय व्यक्ति की उस दशा या योग्यता से है जिसके आधार पर वह जीवन में समायोजित रहता है। मानसिक स्वास्थ्य का व्यक्ति के जीवन में अत्यधिक महत्त्व है तथा इससे व्यक्ति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व प्रभावित होता है।

मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति के लक्षण
(Symptoms of Mentally Healthy Person)

जिस प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य को कुछ विशिष्ट लक्षणों के आधार पर पहचाना जा सकता है, उसी प्रकार से मानसिक स्वास्थ्य की भी कुछ लक्षणों के आधार पर पहचान सम्भव है। कुछ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य एक कल्पनामात्र है और कोई भी व्यक्ति मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ नहीं होता। तथापि मानसिक स्वास्थ्य से सम्पन्न व्यक्ति के विशिष्ट लक्षण अवश्य हैं। इनमें सर्वप्रथम (A) हैडफील्ड के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य की नितान्त आवश्यकताओं का उल्लेख किया जाएगा और इसके बाद (B) अन्य प्रमुख लक्षणों का विवेचन किया जाएगा। ये निम्नलिखित हैं –

(A) मानसिक स्वास्थ्य की नितान्त आवश्यकताएँ या प्रमुख विशेषताएँ (लक्षण)
हैडफील्ड के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य की निम्नलिखित तीन नितान्त आवश्यकताएँ हैं, जिन्हें प्रमुख विशेषताएँ या लक्षण भी कहा जा सकता है

(1) पूर्ण अभिव्यक्ति (Full Expression) – व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य उसकी मूलप्रवृत्तियों, इच्छाओं व शक्तियों की पूर्ण अभिव्यक्ति पर निर्भर है। इनके अवदमन से वृत्तियाँ दमित व कुण्ठित होकर व्यक्तित्व में मानसिक विकारों तथा कुसमायोजन का कारण बनती हैं, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।

(2) सन्तुलन (Harmonization) – व्यक्ति को भावना ग्रन्थियों के निर्माण, प्रतिरोध व मानसिक द्वन्द्व जैसे दोषों से बचाने के लिए आवश्यक है कि उसकी मूल प्रवृत्तियों, आकांक्षाओं तथा समस्त क्षमताओं के बीच आपसी सन्तुलन व वातावरण से समायोजन बना रहे। मानसिक स्वास्थ्य के लिए सन्तुलन और समायोजन परमावश्यक है।

(3) सामान्य लक्ष्य (Common End) – विभिन्न क्षमताओं, इच्छाओं व प्रवृत्तियों के बीच सन्तुलन व समन्वय तथा उसकी पूर्ण अभिव्यक्ति सिर्फ तभी सम्भव है जब वे एक सामान्य एवं व्यापक लक्ष्य की ओर उन्मुख हों। ये लक्ष्य मानसिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से निर्धारित किये जाने चाहिए।

मानसिक स्वास्थ्य व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व से सम्बन्धित है जिसके लिए व्यक्तित्व के गुणों की पूर्ण अभिव्यक्ति, उनकी सन्तुलित क्रियाशीलता तथा सामान्य एवं व्यापक लक्ष्य आवश्यक हैं।

(B) अन्य प्रमुख लक्षण

मानसिक स्वास्थ्य को कुछ अन्य प्रमुख लक्षणों के आधार पर भी पहचाना जाता है, जो निम्नलिखित रूप में वर्णित हैं

(1) अन्तर्दृष्टि एवं आत्म-मूल्यांकन – जिस व्यक्ति में स्वयं के समायोजन सम्बन्धी समस्याओं की अन्तर्दृष्टि होती है, वह अपनी सामर्थ्य की अधिकतम और निम्नतम दोनों सीमाओं से भली-भाँति परिचित होता है। ऐसा व्यक्ति अपने दोषों को स्वीकार कर या तो उन्हें दूर करने की चेष्टा करता है या उनसे समझौता कर लेता है। वह आत्म-दर्शन तथा आत्म-विश्लेषण की क्रिया द्वारा अपनी उलझनों, तनावों, पूर्वाग्रहों, अन्तर्द्वन्द्वों तथा विषमताओं का सहज समाधान खोजकर उन्हें समाप्त या कम करने की कोशिश करता है। वह अपनी इच्छाओं, क्षमताओं तथा शक्तियों का वास्तविक मूल्यांकन करके उन्हें सही दिशा प्रदान कर सकता है।

(2) समायोजनशीलता – मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के लचीलेपन के गुण के कारण, नवीन एवं परिवर्तित परिस्थितियों से शीघ्र एवं उचित समायोजन स्थापित करने में सफल रहता है। वह विषम परिस्थितियों से भय खाकर या घबराकर उससे पलायन नहीं करता, अपितु उनका दृढ़ता से सामना करता है और उनके बीच से ही अपना मार्ग खोज लेता है। समायोजनशीलता के अन्तर्गत दोनों ही बातें सम्मिलित हैं–(i) परिस्थितियों को अपने अनुसार ढाल लेना या (ii) स्वयं परिस्थितियों के अनुसार ढल जाना। स्वस्थ व्यक्ति समाज के परिवर्तनशील नियमों तथा रीति-रिवाजों से परिचित होने के कारण उनसे उचित सामंजस्य स्थापित कर लेता है।

(3) बौद्धिक तथा सांवेगिक परिपक्वता – मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से बौद्धिक एवं सांवेगिक परिपक्वता की नितान्त आवश्यकता है। बौद्धिक परिपक्वता से युक्त मनुष्य अपने ज्ञान का विस्तार करता है, उत्तरदायित्वों का निर्वाह करता है तथा अपना निर्माण स्वयं करने के लिए प्रयासशील रहता है। प्रखर बुद्धि से अहं भाव तथा मन्द बुद्धि से हीनभावना को जन्म हो सकता है; अतः बौद्धिक स्वास्थ्य की दृष्टि से इनके प्रति सतर्कता की आवश्यकता है। सांवेगिक रूप से परिपक्व व्यक्ति अपने संवेगों तथा भावों पर उचित नियन्त्रण रखता है। वह सांवेगिक ग्रन्थियों (यथा ईष्र्या, उन्माद आदि) से पूर्णतया मुक्त होता है। स्पष्टतः मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति में बौद्धिक एवं सांवेगिक परिपक्वता आवश्यक है।

(4) यथार्थ दृष्टिकोण एवं स्वस्थ अभिवृत्ति – मानसिक स्वास्थ्य से युक्त व्यक्ति जीवन के प्रति यथार्थ दृष्टिकोण तथा स्वस्थ अभिवृत्ति अपनाता है। ऐसे व्यक्ति के विचारों, वृत्तियों, आकांक्षाओं तथा कार्य-पद्धति के बीच उचित सन्तुलन रहने से वह कल्पना-प्रधान, अतिशयवादी या कोरा स्वप्नदृष्टा नहीं होता, वरन् उच्च एवं हीन-भावना ग्रन्थियों के विचार से मुक्त होकर स्वविवेक के आधार पर कार्य करता है। उसकी प्रवृत्तियों तथा अभिवृत्तियों के बीच विरोधाभास दिखाई नहीं देता। वह जो कुछ है। उसका यथार्थ मूल्यांकन करता है और तद्नुसार ही कार्य में रत हो जाता है। उसकी कथनी-करनी में भेद नहीं रहता। इस प्रकार वह अपने जीवन के विषय में वास्तविक दृष्टि एवं श्रेष्ठ अभिवृत्तियाँ अपनाकर सन्तुलित एवं संयमित जीवन व्यतीत करता है।

(5) व्यावसायिक सन्तुष्टि – मानसिकै स्वास्थ्य की एक प्रमुख विशेषता अपने व्यवसाय अथवा कार्य के प्रति पूर्ण सन्तुष्टि की अनुभूति भी है। अपने कार्य से सन्तुष्ट व्यक्ति मन लगाकर कार्य करता है और श्रम से पीछे नहीं हटता। उसकी कार्यक्षमता में उत्तरोत्तर वृद्धि उसे अपने व्यावसायिक उद्देश्यों के प्रति सुनिश्चित एवं दृढ़ बनाती है। परिणामतः वह व्यावसायिक सफलता प्राप्त कर सुखी-सम्पन्न जीवन बिताता है। इसके विरुद्ध व्यावसायिक दृष्टि से असन्तुष्ट व्यक्ति आर्थिक विपन्नता, निराशा, चिन्ता तथा तनावों से ग्रस्त रहते हैं। वे मानसिक रोगी हो जाते हैं।

(6) सामाजिक सामंजस्य – व्यक्ति अपने समाज का एक अविभाज्य अंग है और उसकी एक इकाई है। उसकी अपूर्ण सत्ता समाज की पूर्णता में समाहित होकर परिपूर्ण होती है; अत: उसका समाज के साथ समायोजन, अनुकूलन तथा समन्वय सर्वथा प्राकृतिक एवं अनिवार्य कहा जाएगा। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति समाज के साथ सामंजस्य बनाकर रखता है। वह सदैव समाज की समस्याओं और मर्यादाओं का ध्यान रखता है। वह केवल अपने सामाजिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए ही प्रयास नहीं करता, अपितु समाज के प्रति अपने कर्तव्यों की पूर्ति भी करता है। वह स्व-हित और पर-हित के मध्य सन्तुलन बनाकर चलता है। समाज के साथ प्रतिकूल एवं तनावपूर्ण सम्बन्ध मानसिक अस्वस्थता के परिचायक हैं।

उपर्युक्त लक्षणों के अतिरिक्त, मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति नियमित जीवन बिताने वाला, आत्मविश्वासी, सहनशील, धैर्यवान तथा सन्तोषी मनुष्य होता है। उसकी इच्छाएँ तथा आवश्यकताएँ सामाजिक मान्यताओं की सीमाओं में और उसकी आदतें समाज के लिए हितकारी होती हैं।

प्रश्न 3.
मानसिक अस्वस्थता से आप क्या समझते हैं? मानसिक अस्वस्थता के कुछ लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता का अर्थ
(Meaning of Mental III-health)

‘मानसिक स्वास्थ्य की पूर्णता’ एक आदर्श किन्तु काल्पनिक अवस्था है। यही कारण है कि आधुनिक युग की जटिल परिस्थितियों में मानसिक अस्वस्थता किसी-न-किसी अंश में प्रत्येक व्यक्ति में घर कर गयी है। मानसिक अस्वस्थता और कुछ नहीं, मानसिक स्वास्थ्य की एक विपरीत अवस्था है।

जब कोई मनुष्य अपने कार्य में आने वाली बाधाओं को दूर करने में असमर्थ रहता है, अथवा उन बाधाओं से उचित समायोजन स्थापित नहीं कर पाता तो उसका मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। और उसमें ‘मानसिक अस्वस्थता’ पैदा हो जाती है। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति स्वयं को अपने वातावरण की परिस्थितियों के साथ समायोजित न करने के कारण सांवेगिक दृष्टि से अस्थिर हो जाता है, उसके आत्मविश्वास में कमी आ जाती है, मानसिक उलझनों, तनावों, हताशाओं वे चिन्ताओं के कारण उसमें भावना ग्रन्थियाँ बन जाती हैं तथा वह व्यक्तित्व सम्बन्धी अनेकानेक अव्यवस्थाओं का शिकार हो जाता है।

इस प्रकार, मानसिक अस्वस्थता वह स्थिति है जिसमें जीवन की आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने में व्यक्ति स्वयं को असमर्थ पाता है तथा संवेगात्मक असन्तुलन का शिकार हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति में बहुत-सी मानसिक विकृतियाँ या व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और उसे मानसिक रूप से अस्वस्थ कहा जाता है।

मानसिक अस्वस्थता के लक्षण
(Symptoms of Mental III-health)

मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति में उन सभी लक्षणों का अभाव रहता है जिनका मानसिक स्वास्थ्य के लक्षणों के रूप में अध्ययन किया गया है। व्यक्ति के असामान्य व्यवहार से लेकर उसके पागलपन की स्थिति के बीच अनेकानेक स्तर या सोपान दृष्टिगोचर होते हैं, तथापि मानसिक अस्वस्थता के प्रमुख लक्षणों का सोदाहरण किन्तु संक्षिप्त वर्णन अग्रलिखित है –

(1) साधारण समायोजन दोष (Minor Mal-adjustment) – साधारण समायोजन सम्बन्धी दोष के लक्षण प्राय: प्रत्येक व्यक्ति में पाये जाते हैं। इसे मानसिक अस्वस्थता का एक सामान्य रूप कहा जा सकता है। प्राय: देखने में आता है कि कोई बाधा या अवरोध उत्पन्न होने के कारण अपने कार्य की सम्पन्नता में असफल रहने वाला व्यक्ति अतिशय संवेदनशील, हठी, चिड़चिड़ा या आक्रामक हो जाता है। यह मानसिक अस्वस्थता की शुरुआत है।

(2) मनोरुग्णता (Psychopathic Personalities) – सामान्य जीवन जीने वाले कुछ लोगों में भी मानसिक अस्वस्थता के संकेत दिखाई पड़ते हैं। लिखने-पढ़ने, बोलने या अन्य क्रिया-कलापों में प्रायः लोगों से भूल होना स्वाभाविक ही है और इसे मानसिक अस्वस्थता का नाम नहीं दिया जा सकता, किन्तु यदि इन भूलों की आवृत्ति बढ़ जाए और असामान्य-सी प्रतीत हो तो इसे मनोविकृति कहा जाएगा। तुतलाना, हकलाना, क्रम बिगाड़कर वाक्य बोलना, बेढंगे तथा अप्रचलित वस्त्र धारण करना, चलने-फिरने में असामान्य लगना, अजीब-अजीब हरकतें करना, चोरी करना, धोखा देना आदि मानसिक अस्वस्थता के लक्षण हैं।

(3) मनोदैहिक रोग (Psychosomatic Illness) – मनोदैहिक रोगों का कारण व्यक्ति के शरीर में निहित होता है। उदाहरण के लिए-शरीर के किसी संवदेनशील भाग में चोट या आघात के कारण स्थायी दोष पैदा हो जाते हैं और व्यक्ति को जीवन-भर कष्ट देते हैं। सिगरेट, तम्बाकू, अफीम, चरस, गाँजा या शराब आदि पीने से भी अनेक मानसिक विकार उत्पन्न होते. हैं। दमा-खाँसी से चिड़चिड़ापन, निम्न या उच्च रक्तचाप के कारण मानसिक असन्तुलन तथा यकृत एवं पाचन सम्बन्धी व्याधियों में बहुत-से मानसिक विकारों का जन्म होता है। इसी के साथ-साथ किसी प्रवृत्ति का बलपूर्वक दमन करने से रक्त की संरचना, साँस की प्रक्रिया तथा हृदय की धड़कनों में परिवर्तन आता है, जिसके परिणामतः व्यक्ति का शरीर सदा के लिए रोगी हो जाता है। इस प्रकार से शरीर और मन दोनों ही मानसिक अस्वस्थता से प्रभावित होते हैं।

(4) मनस्ताप (Psychoneurosis) – मनस्ताप का जन्म समायोजन-दोषों की गम्भीरता के परिणामस्वरूप होता है। ये व्यक्तित्व के ऐसे आंशिक दोष हैं जिनमें यथार्थता से सम्बन्ध विच्छेद नहीं हो पाता। इसके अन्तर्गत (i) स्नायु दौर्बल्य तथा (ii) मनोदौर्बल्य रोग सम्मिलित हैं

(i) स्नायु दौर्बल्य (Neurasthania) – इसमें व्यक्ति अकारण ही थकावट अनुभव करता है। इससे उसमें अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, विभिन्न अंगों में दर्द, काम के प्रति अनिच्छा, मंदाग्नि, दिल धड़कना तथा हमेशा अपने स्वास्थ्य की चिन्ता के लक्षण दिखाई पड़ते हैं। ऐसा व्यक्ति किसी एक डॉक्टर के पास नहीं टिकता और अपनी व्यथा कहने के लिए बेचैन रहता है।

(ii) मनोदौर्बल्य (Psychosthenia) – मनोदौर्बल्य में ये मानसिक विकार आते हैं

(a) कल्पना गृह या विश्वासबाध्यता (Obsession) के रोगी के मन में निराधार व असंगत विचार, विश्वास और कल्पनाएँ आती रहती हैं।

(b) हठ प्रवृत्ति (Compulsion) से पीड़ित व्यक्ति कामों की निरर्थकता से परिचित होते हुए भी उन्हें हठपूर्वक करता रहता है और बाद में दुःख भी पाता है।

(c) भीतियाँ (Phobias) के अन्तर्गत व्यक्ति विशेष प्रकार की वस्तुओं, दृश्यों तथा विचारों से अकारण ही भयभीत रहता है; जैसे—खुली हवा से डरना, भीड़, पानी आदि से डरना।

(d) शरीरोन्माद (Hysteria) में व्यक्ति के अहम द्वारा दमित कामेच्छाओं का शारीरिक दोषों के रूप में प्रकटीकरण होता है; जैसे-हँसना, रोना, हाथ-पैर पटकना, मांसपेशियों का जकड़ना, मूच्र्छा आदि।

(e) चिन्ता रोग (Anxiety Neurosis) में अकारण ही भविष्य सम्बन्धी चिन्ताएँ लगी रहती हैं।

(f) क्षति क्रमबाध्यता (Mania) से ग्रस्त व्यक्ति अकारण ही ऐसे काम कर बैठता है जिससे दूसरों को हानि हो; जैसे—मारना-पीटना, हत्या या दूसरे के घर में आग लगा देना। इस रोग का सबसे अच्छा उदाहरण ‘कनपटीमार’ या ‘सीरियल किलर’ व्यक्ति का आतंक है जो कनपटी पर मारकर अकारण ही लोगों की हत्या कर देता था।

(5) मनोविकृति (Psychosis)–यह गम्भीर मानसिक रोग है जिसके उपचार हेतु मानसिकें चिकित्सालय में दाखिल होना पड़ता है। मनोविकृति से पीड़ित व्यक्तियों को यथार्थ से पूरी तरह सम्बन्ध टूट जाता है। वे अनेक प्रकार के भ्रमों व भ्रान्तियों के शिकार हो जाते हैं और उन्हें सत्य समझने लगते हैं। मनोविकृति के अन्तर्गत ये रोग आते हैं—स्थिर भ्रम (Paranoia) से ग्रसित किसी व्यक्ति को पीड़ा भ्रम (Delusion of Persecution) रहने के कारण वह स्वयं को पीड़ित समझ बैठता है तो किसी व्यक्ति में ऐश्वर्य भ्रम (Delusion of Prosperity) पैदा होने के कारण वह स्वयं को ऐश्वर्यशाली या महान् समझता है। उत्साह-विषादचक्र मनोदशा (Manic Depressive Psychosis) का रोगी कभी अत्यधिक प्रसन्न दिखाई पड़ता है तो कभी अत्यधिक उदास।।

(6) यौन विकृतियाँ (Sexual Perversions)-मानसिक रोगी का यौन सम्बन्धी का लैंगिक जीवन सामान्य नहीं होता। यौन विकृतियाँ मानसिक अस्वस्थता की परिचायक हैं और अस्वस्थता में वृद्धि करती हैं। इनके प्रमुख लक्षण ये हैं–विपरीत लिंग के वस्त्र पहनना, स्पर्श से यौन सुख प्राप्त करना, स्वयं को या दूसरे को पीड़ा पहुँचाकर काम सुख प्राप्त करना, बालकों-पशुओं-समलिगियों तथा शव से यौन क्रियाएँ करना, हस्तमैथुन, गुदामैथुन आदि।

उपर्युक्त वर्णित विभिन्न मनोरोगों को उनके सम्बन्धित लक्षणों के साथ वर्णन किया गया है। यह आवश्यक नहीं है कि किसी व्यक्ति में ये सभी लक्षण दिखाई पड़े, इनमें से कोई एक लक्षण भी मानसिक अस्वस्थता का संकेत देता है। व्यक्ति में इन लक्षणों के प्रकट होते ही उनका मानसिक उपचार किया जाना चाहिए।

प्रश्न 4.
मानसिक अस्वस्थता के विभिन्न कारणों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता के कारण
(Causes of Mental III-health)

वर्तमान युग की जटिलताओं ने किसी-न-किसी अंश में प्रत्येक व्यक्ति को मानसिक अस्वस्थता का शिकार बनाया है। मानसिक अस्वस्थता के भिन्न-भिन्न प्रकारों के लिए विभिन्न प्रकार के कारण जिम्मेदार हैं। इन कारणों का निम्नलिखित वर्गों के अन्तर्गत इस प्रकार विवेचन किया जा सकता है –

(1) प्रवृत्ति उत्पन्न करने वाले कारण (Predisposing Causes)
प्रवृत्ति उत्पन्न करने वाले प्रमुख कारणों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है –

(i) शारीरिक कारण (Bodily Causes)-कभी-कभी मानसिक अस्वस्थता के मूल में शारीरिक कारण निहित होते हैं। प्रायः क्षय, संग्रहणी, कैन्सर आदि असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्तियों की शारीरिक शक्ति काफी घट जाती है तथा उन्हें शीघ्र ही थकान का अनुभव होने लगता है। ऐसे व्यक्ति स्वभाव से चिड़चिड़े और दु:खी होते हैं, क्योंकि उनमें जीवन के प्रति निराशा छा जाती है।

(ii) वंशानुक्रमणीय कारण (Hereditary Causes)-कुछ मनुष्य वंशानुक्रम में ऐसी विशेषताएँ लेकर अवतीर्ण होते हैं जिनके कारण वे सामान्य प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मानसिक विकारों से ग्रस्त हो जाते हैं वंशानुक्रमणीय विशेषताओं के कारण ही मनोविकृति का रोग एक पीढ़ी से दूसरे फेढ़ी में संक्रमित होता रहता है।

(iii) संवेगात्मक कारण (Emotional Causes)-मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि संवेग मानसिक रोगों के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। व्यक्ति की विभिन्न मूल प्रवृत्तियाँ किसी-न-किसी संवेग से सम्बन्धित हैं। इनमें से क्रोध, भय तथा कामवासना की प्रवृत्तियाँ और संवेग अत्यधिक प्रबल हैं। जिनके दमन से या केन्द्रीकरण से मानसिक असन्तुलन पैदा होता है। वस्तुतः मानसिक स्वास्थ्य की समस्या मूल प्रवृत्ति-संवेग (Instinct-emotion) की समस्या है। जब व्यक्ति में कोई प्रवृत्ति जाग्रत होती है तो उससे सम्बन्धित संवेग भी जाग जाता है। उदाहरणार्थ-आत्मस्थापन के साथ गर्व का, पलायन के साथ भय का तथा कामवृत्ति के साथ वासना का संवेग जाग्रत होता है। जाग्रत संवेग की असन्तुष्टि ही मानसिक रोग को जन्म देती है।

(iv) पारिवारिक कारण (Familial Causes)—कुछ घरों में माता या पिता अथवा दोनों के अभाव से अथवा विमाता व विपिता के होने से बच्चे का पूरा पालन-पोषण, सुरक्षापूर्ण बर्ताव या स्नेह नहीं मिलता। ऐसे बच्चों की आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो पातीं और अभावग्रस्त बने रहते हैं। कहीं-कहीं माता-पिता के लड़ाई-झगड़े के कारण कलह को वातावरण रहता है जिसकी वजह से बालक को मानसिक घुटने अनुभव होती है और वह घर से दूर भागता है। इस प्रकार ‘भग्न परिवार’ (Broken House) मानसिक अस्वास्थ्य का मुख्य कारण बनता है।

(v) विद्यालयी कारण (Causes related to School)—बालकों का मानसिक स्वास्थ्य खराब रहने का एक प्रमुख कारण विद्यालय भी है। जिन विद्यालयों में बच्चों पर कठोरतम अनुशासन थोपा जाता है, बच्चों को अकारण डाँट-फटकार या कठोर दण्ड सहने पड़ते हैं, अध्यापकों का स्नेह नहीं मिल पाता, पाठ्य-विषये अनुपयुक्त होते हैं तथा बालकों को अमनोवैज्ञानिक विधियों से पढ़ाया जाता है, अध्यापक या प्रबन्धक बच्चों को अपनी स्वार्थसिद्धि में भड़काकर आपस में अध्यापकों से लड़वा देते हैं। ऐसे विद्यलियों में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और उनका मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है।

(vi) सामाजिक कारण (Social Causes)-कभी-कभी कुछ समाज विरोधी तत्त्व व्यक्ति के मन पर भारी आघात पहुँचाकर उसे मानसिक दृष्टि से असन्तुलित कर देते हैं। यदि व्यक्ति के कार्यों व विचारों का व्यर्थ ही विरोध किया जाए तो उसके मित्रों-पड़ोसियों तथा अन्य लोगों द्वारा उसे समाज में उचित मान्यता, स्थान ये प्रतिष्ठा प्राप्त न हो, तो उसमें प्राय: हीनता की ग्रन्थियाँ पड़ जाती हैं। उनका व्यक्तित्व कुण्ठा और तनाव का शिकार हो जाता है। आत्मस्थापन की प्रवृत्ति के सन्तुष्ट न होने के कारण भी व्यक्ति दु:खी और खिन्न हो जाते हैं।

(vii) जीवन की विषम परिस्थितियाँ (Adverse Conditions of Life)—हर एक व्यक्ति को अपने जीवन में कभी-न-कभी विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। ये परिस्थितियाँ निराशा और असफललाओं के कारण जन्म ले सकती हैं। आर्थिक संकट, व्यवसाय या परीक्षा या प्रेम में असफलता तथा सामाजिक स्थिति के प्रति असन्तोष—इनमें सम्बन्धित प्रतिकूल एवं विषम परिस्थितियाँ मानव मन पर बुरा असर छोड़ती हैं। विषम परिस्थितियों के कारण समायोजन के दोष उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे मानसिक अस्वस्थता सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते हैं।

(viii) आर्थिक कारण (Economic Causes)-आर्थिक तंगी के कारण व्यक्ति की आवश्यकताएँ तथा ईच्छाएँ अतृप्त रह जाती हैं और उसे अपनी इच्छाओं का दमन करना पड़ता है। दमित इच्छाएँ नाना प्रकार के अपराध तथा समाज विरोधी व्यवहार को जन्म देती हैं। धन की कमी से बाध्य होकर व्यक्ति को अथक एवं अतिरिक्त परिश्रम करना पड़ता है जिससे उनका मन दुःखी मन मानसिक विकारों को पैदा करता है। अत्यधिक धन के कारण भी जुआ, शराब तथा वेश्यागमन की लत पड़ जाती है जिससे मानसिक असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है।

(ix) भौगोलिक कारण (Geographical Causes)-भौगोलिक कारण अप्रत्यक्ष रूप से मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालते हैं। अधिक गर्मी या सर्दी के कारण लोगों का समायोजन बिगड़ जाता है, शारीरिक दशा गिरने लगती है, उनके अभाव में चिड़चिड़ापन या तनाव पैदा होता है, जिससे मानसिक असन्तुलन उत्पन्न होता है।

(x) सांस्कृतिक कारण (Cultural Causes)-यदा-कदा सांस्कृतिक परम्पराएँ व्यक्ति की भावनाओं तथा इच्छाओं की पृर्ति के मार्ग में बाधक बनती हैं। प्रायः व्यक्ति को अपनी प्रवृत्तियों का दमन कर कुछ कार्य विवशतावश करने पड़ते हैं जिससे मानसिक असन्तोष तथा कुण्ठा उत्पन्न होते हैं। एक संस्कृति में जन्मी तथा पलो हुआ व्यक्ति जब किसी दूसरी संस्कृति में कदम रखता है तो उसे मानसिक संघर्ष का सामना करना पड़ता है जिससे असमायोजन के दोष उत्पन्न होते हैं। अतः सांस्कृतिक कारणों से भी मनोविकार उत्पन्न होते हैं।

(2) उत्तेजक अथवा तात्कालिक कारण (Exciting or Direct Causes)

मानसिक रोगों के तात्कालिक कारण निम्नलिखित हैं –

(i) तीव्र मानसिक संघर्ष (Intense Mental Conflict)-जब व्यक्ति के जीवन मूल्य और आदर्श संसार की यथार्थ परिस्थितियों या प्रचलित व्यवहार से टकराते हैं तो मानसिक संघर्ष का जन्म होता है। यह व्यक्ति के मन में अन्तर्द्वन्द्व के रूप में उभरता है। मानसिक संघर्ष अपनी सामान्य अवस्था में उल्लेखनीय नहीं होते, किन्तु इनकी तीव्रता से व्यक्ति अपना मानसिक सन्तुलन खोकर मनोविकार के शिकार हो जाते हैं।

(ii) अत्यधिक मानसिक दबाव (Stress Conditions)-आज की भौतिकवादी परिस्थितियों ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रतिद्वन्द्विता एवं प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है। सीमित सामर्थ्य के साथ व्यक्ति अपनी और अपने परिवार की महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पाता। इसके परिणामस्वरूप उसमें अधिक चिन्ता और उद्विग्नता भर जाती है जिससे उसकी उपलब्धियों के स्तर में निरन्तर गिरावट आती है। यह गिरावट और ज्यादा निराशा, उद्विग्नता तथा मानसिक दबाव पैदा करती है। स्पष्टत: अत्यधिक मानसिक दबाव का यह दुश्चक्र ही मानसिक अस्वस्थता के लिए जिम्मेदार होता है।

(iii) मानसिक तनाव (Mental Tension)-समान आकर्षण वाले लक्ष्य विपरीत दिशा में खींचकर व्यक्ति में संवेगात्मक तनाव उत्पन्न करते हैं। इन संवेगात्मक तनावों के कारण व्यक्ति क्षुब्ध और पीड़ित होते हैं जिसके फलस्वरूप व्यक्तित्व के टूटने की स्थिति भी आ सकती है। इसके अतिरिक्त मानसिक आघात; जैसे-माँ से बच्चे का बिछुड़ना तथा किसी प्रियजन की आकस्मिक मृत्यु; मानसिक असन्तुलन के कारण बनते हैं।

(iv) दमित भावना ग्रन्थियाँ (Complexes)-कभी-कभी व्यक्ति में असामान्य भावनाओं का जमाव देखा जाता है, जिसके परिणामस्वरूप भावनाएँ एक-दूसरे से उलझकर ग्रन्थियों बना देती हैं। इन ग्रन्थियों के निर्माण का व्यक्ति को पता नहीं रहता, किन्तु इनसे हीनता की भावना (Inferiority Complex), उच्चता की भावना (Superiority Complex), अपराध भावना (Guilty Complex) आदि भावनाएँ पैदा हो जाती हैं। इस प्रकार से दमित भावना ग्रन्थियाँ मानसिक विकार उत्पन्न कर सकती हैं।

(v) यौन हताशाएँ (Sexual Frustrations)-प्रसिद्ध मनोविश्लेषणवादी फ्रायड के अनुसार, अधिकांश मानसिक रौगो का मूल कारण यौन हताशा है। यदि व्यक्ति की यौन इच्छाओं की तृप्ति न हो और उनका बलात् दमन कर दिया जाए तो इससे मानसिक संघर्ष पैदा होता हैं। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति का मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है।

(3) समूचित समायोजन सम्बन्धी बाधाएँ (Factors Thwarting Adjustment)

वस्तुतः समुचित समायोजन ही मानसिक स्वास्थ्य का आधार है। समायोजन में बाधाएँ आने पर मानसिक विकार उत्पन्न हो जाते हैं। ये बाधक कारक निम्नलिखित हैं –

(i) परिवेशजनित कारक (Environmental Factors)–अनेक बार बाह्य परिवेश के साथ समायोजन में बाधा उपस्थित होने से मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। आजादी मिलने के समय भारत और पाकिस्तान को बँटवारा हुआ और उसमें साम्प्रदायिक हिंसा के नंगे नाच ने न जाने कितने परिवारों को नष्ट कर डाला। इसका सम्बन्धित लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल, गहरा एवं स्थायी प्रभाव पड़ा।

(ii) मनोजनित कारक (Psychic Factors)–मनोजनित कारक मन से उत्पन्न होते हैं। जब व्यक्तित्व, रुचि, अभिरुचि, स्वभाव, आदर्श तथा मूल्य का उसकी योग्यता से तालमेल नहीं बैठता तो असमायोजन उत्पन्न होता है। कुछ लोग बड़े धन्धे के योग्य नहीं होते तथा छोटे धन्धे को अपनाना नहीं चाहते, वे ऐसी दशा में मानसिक असन्तुलन के शिकार होते हैं।

(iii) समाज व संस्कृति से उत्पन्न कारक (Factors Originated from Society and Culture)-समाज में जाति-प्रथा के दोष, रुग्ण प्रथाएँ व परम्पराएँ, नये व पुराने आदर्शों के बीच संघर्ष, प्राथमिकताओं के प्रति अज्ञानता तथा भटकाव व्यक्तित्व के समायोजन में बाधा उत्पन्न करते हैं। अनेक मानसिक विकारों का जन्म सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से होता है।

प्रश्न 5.
साधारण मानसिक अस्वस्थता के उपचार की मुख्य विधियों या उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता साधारण भी हो सकती है तथा गम्भीर भी। साधारण तथा गम्भीर मानसिक अस्वस्थता के उपचार के लिए अलग-अलग विधियों को अपनाया जाता है। साधारण मानसिक अस्वस्थता के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियाँ या उपाय हैं-सुझाव, उन्नयन, निद्रा, विश्राम, पुनर्शिक्षण, मनो-अभिनय, सम्मोहन, मनोविश्लेषण विधि, खेल एवं संगीत, व्यावसायिक चिकित्सा तथा सामूहिक चिकित्सा विधि। इन उपायों द्वारा साधारण मानसिक अस्वस्थता का सफल उपचार किया जा सकता है।

साधारण मानसिक अस्वस्थता के उपचार में आवश्यकतानुसार निम्नलिखित विधियों का प्रयोग किया जाता है

(1) सुझाव – मानसिक रोगी को सीधे-सीधे सुझाव देकर समझाया जाए कि उसे अपनी अस्वस्थता के विषय में क्या सोचना व करना है। उसके भ्रम व भ्रान्तियों का भी निवारण किया जाए। इस प्रकार के सुझाव से सामान्य रूप से साधारण मानसिक अस्वस्थता का सफलतापूर्वक उपचार किया जा सकता है। मानसिक अस्वस्थता में आत्म-सुझाव का भी विशेष महत्त्व होता है।

(2) उन्नयन – इस विधि में यह जाँच की जाती है कि मानसिक रोग का किस प्रवृत्ति या संवेग से सम्बन्ध है। फिर उसी प्रवृत्ति/संवेग का स्तर उन्नत करके उसे किसी उच्च लक्ष्य के साथ जोड़ दिया जाता है।

(3) निद्रा – अचानक आघात या दुर्घटना के कारण यदि कोई व्यक्ति अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठा हो तो रोगी को औषधि देकर कई दिनों तक निद्रा में रखा जाता है। शरीर की ताकत को बनाये रखने की दृष्टि से ताकत के इन्जेक्शन दिये जाते हैं।

(4) विश्राम – अधिक कार्यभार, थकावट, तनाव तथा मानसिक उलझनों और कुपोषण के कारण अक्सर मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। ऐसे रोगियों को शान्त वातावरण में विश्राम करने दिया जाता है और उन्हें पौष्टिक भोजन खिलाया जाता है।

(5) पुनशिक्षण – इसके अन्तर्गत मानसिक रोगी में व्यावहारिक शिक्षा, संसूचन तथा उपदेश के माध्यम से आत्मविश्वास व आत्म-नियन्त्रण पैदा किया जाता है। इसके लिए अन्य व्यक्ति, समूह या दैवी-शक्तियों में विश्वास के लिए भी प्रेरित किया जा सकता है। इसी सिद्धि की सफलता रोगी द्वारा दिये गये सहयोग पर निर्भर करती है। कमजोर तथा कोमल भावनाओं वाले व्यक्तियों की इस विधि से चिकित्सा की जा सकती है।

(6) ग्रन्थ-अध्ययन विधि – पढ़े-लिखे विभिन्न प्रकार के मानसिक रोगियों के लिए ऐसे विशिष्ट ग्रन्थों की रचना की गयी हैं जिनके पढ़ने से मानसिक तनाव व असन्तुलन घटता है। रोग के अनुसार चिकित्सक सम्बन्धित ग्रन्थ पढ़ने के लिए देता है और इसके पश्चात् उचित निर्देशन प्रदान कर रोग का पूर्ण उचारे कर देता है।

(7) व्यावसायिक चिकित्सा – खाली मस्तिष्क शैतान का घर है, किन्तु कार्य में रत व्यक्ति में कई विशिष्ट गुण उत्पन्न होते हैं; जैसे—सहयोग, प्रेम, सहनशीलता, धैर्य और मैत्री। इन गुणों से। मानसिक उलझन और तनाव में कमी आती है। इसी सिद्धान्त को आधार बनाकर रोगियों को उनके पसन्द के कार्यों (जैसे—चित्रकारी, चटाई-कपड़ा-निवाड़ बुनना, टोकरी बनाना आदि) में लगा दिया जाता है। धीरे-धीरे उनका मानसिक सन्तुलन सुधर जाता है।

(8) सामूहिक चिकित्सा – सामूहिक चिकित्सा विधि में दस से लेकर एक तक एक ही प्रकार के रोगियों की एक साथ चिकित्सा की जाती है। चिकित्सक समूह के सभी रोगियों को इस प्रकार प्रेरित करता है कि वे एक-दूसरे से अपनी समस्याएँ कहें तथा दूसरों की समस्याएँ खुद सुनें। एक-दूसरे को । समस्या कहने-सुनने से पारस्परिक सहानुभूति उत्पन्न होती है। रोगी जब अपने जैसे अन्य पीड़ित व्यक्तियों को अपने साथ पाता है तो उसे सन्तोष अनुभव होता है। धीरे-धीरे चिकित्सक के दिशा निर्देशन में सभी रोगी मिलकर समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करते हैं और मानसिक सन्तुलन की अवस्था प्राप्त करते हैं।

(9) मनो-अभिनय – मनो-अभिनय विधि (Psychodrama), सामूहिक विधि से मिलती-जुलती विधि है। इसमें समूह के रोगी आपस में समस्या की व्याख्या नहीं करते बल्कि अभिनय के माध्यम से अपनी समस्या का स्वतन्त्र रूप से अभि-प्रकाशन करते हैं। इससे समस्या का रेचन हो जाता है। मनो-अभिनय चिकित्सक के निर्देशन में किया जाना चाहिए।

(10) सम्मोहन – सम्मोहन (Hypnosis), अल्पकालीन प्रभाव वाली एक मनोवैज्ञानिक विधि है। जिससे मनोरोग के लक्षण दूर होते हैं, रोग दूर नहीं होता। सम्मोहन क्रिया में चिकित्सक मानसिक रोगी । को कुछ समय के लिए अचेत कर देता है और उसे एक आरामकुर्सी पर विश्रामपूर्वक बैठाता है। अब उसे किसी ध्वन्यात्मक या दृष्टात्मक उत्तेजना पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए कहा जाता है। संसूचनाओं के माध्यम से उसे सचेत ही रखा जाता है। रोगी को निर्देश दिया जाता है कि वे अपनी स्मृति से लुप्त हो चुकी अनुभूतियों को कहे। अनुभूति के स्मरण-मात्र से ही रोगी का रोग दूर हो जाता है।

(11) मनोविश्लेषण विधि–फ्रायड नामक विख्यात मनोवैज्ञानिक ने सम्मोहन विधि की कमियों को ध्यानावस्थित रखते हुए ‘मनोविश्लेषण विधि’ (Psycho-analysis) की खोज की। रोगी को एक अर्द्धप्रकाशित कक्ष में आरामकुर्सी पर इस प्रकार विश्रामपूर्वक बैठाया जाता है कि मनोविश्लेषक तो रोगी की क्रियाओं का पूर्णरूपेण अध्ययन के निरीक्षण कर पाये लेकिन रोगी उसे न देख सके। अब मनोविश्लेषक के व्यवहार से प्रेरित् व सन्तुष्ट व्यक्ति उस पर पूरी तरह विश्वास प्रदर्शित करता है। यद्यपि शुरू में प्रतिरोध की अवस्था के कारण रोगी कुछ व्यक्त करना नहीं चाहता, किन्तु उत्तेजक शब्दों के प्रयोग से उसे पूर्व-अनुभव दोहराने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसके बाद स्थानान्तरण की अवस्था के अन्तर्गत दो बातें होती हैं –
(i) रोगी चिकित्सक को भला-बुरा कहता या गाली बकता है अथवा
(ii) रोगी मनोविश्लेषक पर मुग्ध हो जाता है और उसकी हर एक बात मानता है। शनैः-शनैः रोगी अपनी समस्त बातों की जानकारी मनोविश्लेषक को दे देता है जिससे उसकी उलझनें समाप्त हो जाती हैं और वह सामान्य व समायोजित हो जाता है।

(12) खेल और संगीत – बालकों तथा दीर्घकाल तक दबाव महसूस करने वाले व्यक्तियों के लिए खेल विधि उपयोगी है। रोगी को स्वेच्छा से स्वतन्त्रतापूर्वक नाना प्रकार के खेल खेलने के अवसर प्रदान किये जाते हैं। खेल खेलने से उसकी विचार की दिशा बदलती है तथा खेल जीतने से उसमें आत्मविश्वास बढ़ता है। इसी प्रकार संगीत भी मानसिक उलझनों को तथा तनावों को दूर करने की एक महत्त्वपूर्ण कुंजी है। रुचि का संगीत सुनने से उत्तेजना का अन्त होकर पाचन क्रिया तथा रक्तचाप सामान्य हो जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के क्षेत्र का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
‘मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान’ अपने आप में एक व्यवस्थित विज्ञान है। इसका अध्ययन-क्षेत्र पर्याप्त विस्तृत है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का सम्बन्ध सम्पूर्ण मानव-जीवन से है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के क्षेत्र का सामान्य परिचय निम्नलिखित है

(1) सामान्य व्यक्तियों का अध्ययन – सामान्य रूप से माना जाता है कि मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान द्वारा केवल मानसिक रोगियों अथवा असामान्य व्यक्तियों का ही अध्ययन किया जाता है, परन्तु यह धारणा भ्रामक है। वास्तव में, मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान सामान्य व्यक्तियों के लिए भी आवश्यक एवं उपयोगी है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान व्यक्तियों के अन्तर्गत मानसिक स्वास्थ्य के नियमों तथा उपायों का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन से समस्त सामान्य व्यक्ति लाभान्वित होते

(2) मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों का अध्ययन – मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के अन्तर्गत मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। मानसिक अस्वस्थता के विभिन्न प्रकारों, उनके कारणों, लक्षणों तथा रोकथाम एवं उपचार के उपायों का अध्ययन मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के अन्तर्गत ही किया जाता है।

(3) सम्पूर्ण समाज का अध्ययन – मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान सम्पूर्ण समाज का अध्ययन करता है तथा उसे लाभ पहुँचाता है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान सम्पूर्ण समाज को मानसिक रूप से स्वस्थ बनाये रखने में सहायता पहुँचाती है।

प्रश्न 2.
फ्रायड के अनुसार मन के गत्यात्मक पक्ष की व्याख्या करें।
या
फ्रायड के अनुसार इड, इगो (अहम) तथा सुपर इगो का समुचित विवेचन कीजिए।
उत्तर :
फ्रायड ने मन के गत्यात्मक पक्ष की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि मन के गत्यात्मक पक्ष के तीन अंग होते हैं जिन्हें फ्रायड ने क्रमशः इदम्, (Id), अहम् (Ego) तथा परम अहम् (Super Ego) कहा है। मन के गत्यात्मक पक्ष के इन तीनों भागों का संक्षिप्त परिचय निम्नवर्णित है

(अ) इदम्-फ्रायड के अनुसार, मन के गत्यात्मक पक्ष का एक मुख्य भाग इदम् या इड है। अर्थात् व्यक्ति की सम्पूर्ण मनोजैविक शक्तिस्रोत मन का यही भाग अर्थात् इड ही है। इसे व्यक्ति की जीवन मूल प्रवृत्ति तथा मृत्यु मूल प्रवृत्ति का केन्द्र माना गया है। इड का सम्बन्ध व्यक्ति के आन्तरिक जगत से होता है, इसलिए इस वास्तविक मानसिक सत्यता माना गया है। इड के माध्यम से ही व्यक्ति का सम्बन्ध बाहरी विश्व से स्थापित होता है। व्यक्ति के इड का संचालन सुखवादी सिद्धान्त होता है।

(ब) अहम – फ्रायड के अनुसार, मन के गत्यात्मक पक्ष का दूसरा भाग अहम् है। अहम् के माध्यम से व्यक्ति का बाहरी जगत से सम्पर्क स्थापित होता है। मन का अहम् नामक भाग व्यवस्थित भाग है। इसका सम्बन्ध इड से भी होता है। इड द्वारा इच्छाएँ उत्पन्न की जाती हैं; इन इच्छाओं की सामाजिक और बाहरी जगत की अर्थात् भौतिक जगत की वास्तविकताओं के सन्दर्भ में अहम् द्वारा सन्तुष्टि की जाती है। अहम् में समायोजन का गुण होता है। यह इड तथा बाहरी जगत की वास्तविकताओं में समायोजन स्थापित करता है। अहम् का निर्देशन वास्तविकता के सिद्धान्त से होता है। इसलिए अहम् को समय तथा स्थान का पूर्ण ध्यान रहता है। अहम् अपनी की जाने वाली समस्त क्रियाओं के विषय में परिणामों का भी विचार करता है। जहाँ तक नैतिक-अनैतिक का प्रश्न है, उसका विचार अहम् नहीं करता परन्तु वह अवसर का विचार अवश्य करता है। अवसर उपलब्ध होने पर वह अनैतिक तथा असमाजिक कार्यों को भी सम्पन्न कर देता है।

(स) परम अहम् या सुपर इगो – मन के गत्यात्मक पक्ष का जो भाग नैतिकता तथा आदर्शों से सम्बन्धित होता है, उसे फ्रायड ने परम अहम् या सुपर इगो कहा है। व्यक्ति के व्यक्तित्व में इस भाग का विकास इड तथा इगो के बाद ही होता है। सुपर इगो का उद्देश्य व्यक्तित्व को पूर्णता प्रदान करना होता है। परम अहम् का सम्बन्ध मुख्य रूप से नैतिकता, धर्म, संस्कृति एवं सभ्यता से होता है। परम अहम् के कुछ विशिष्ट कार्य हैं इसका एक कार्य मूल प्रवृत्तियों की सन्तुष्टि को रोकना है। यह रोक समाज के उच्च आदर्शों तथा मानदण्डों के आधार पर होती है। व्यक्ति का परम अहम् अपने अहम् के प्रति उसी प्रकार का व्यवहार करता है जिस प्रकार का व्यवहार माता-पिता अपने बच्चों के प्रति करते हैं। परम अहम् व्यक्ति के इड को पूरी तरह से प्रतिबन्धित करने का प्रयास करता है क्योंकि इड द्वारा उत्पन्न कामुक इच्छाएँ एवं आक्रामक आवेग पूर्ण रूप से आदर्शों के विरुद्ध होते हैं।

प्रश्न 3.
मानसिक स्वास्थ्य के संवर्द्धन में परिवार की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका परिवार की होती है। व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य में परिवार की भूमिका का विवरण निम्नलिखित है

(1) प्रारम्भिक विकास और सुरक्षा – मानव-जीवन के प्रारम्भिक 5-6 वर्षों में बालक का सर्वाधिक विकास हो जाता है। यह बालक की कलिकावस्था है जिसे उचित सुरक्षा प्राप्त होनी चाहिए। परिवार का इसमें विशेष दायित्व है-उसे शिशु की देख-रेख तथा रोगी से रक्षा करनी चाहिए। शिशु को सन्तुलित आहार दिया जाना चाहिए तथा उसकी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जानी चाहिए। कुपोषण और असुरक्षा की भावना से बालक के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

(2) माता-पिता का स्नेह – बालक के मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए उसे माता-पिता का प्रेम, स्नेह तथा लगाव चाहिए। प्रायः देखा गया है कि जिन बच्चों को माता-पिता का भरपूर स्नेह नहीं मिलता, वे स्वयं को अकेला महसूस करते हैं तथा असुरक्षा की भावना से भय खाकर मानसिक ग्रन्थियों के शिकार हो जाते हैं। ये ग्रन्थियाँ स्थायी हो जाती हैं और उसे जीवन-पर्यन्त असन्तुलित रखती हैं।

(3) परिवार के सदस्यों का व्यवहारे – परिवार के सदस्यों; खासतौर से माता-पिता को व्यवहार सभी बालकों के साथ एक समान होना चाहिए। उनके बीच पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाना अनुचित है। उनकी असफलताओं के लिए भी बार-बार दोषारोपण नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे उनका मानसिक सन्तुलन बिगड़ता है और वे कुसमायोजन के शिकार हो जाते हैं।

(4) उत्तम वातावरण – परिवार का उत्तम एवं मधुर वातावरण बालक के मानसिक स्वास्थ्य में वृद्धि करता है। परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्यार, सहयोग की भावना, सम्मान की भावना व प्रतिष्ठा, एकमत्य, माता-पिता के मधुर सम्बन्ध तथा परिवार का स्वतन्त्र वातावरण मानसिक स्वास्थ्य को अच्छा रखने में योग देते हैं। इसके अलावा बालक की भावनाओं व विचारों को उचित आदर, मान्यता व स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए।

(5) संवेगात्मक विकास – बालक का संवेगात्मक विकास भी ठीक ढंग से होना चाहिए। परिवार में यथोचित सुरक्षा, स्वतन्त्रता, स्वीकृति, मान्यता तथा स्नेह रहने से संवेगात्मक विकास स्वस्थ रूप से होता है तथा नये विश्वासों तथा आशाओं का जन्म होता है।

(6) खेलकूद और घूमना – मानसिक स्वास्थ्य का शारीरिक स्वास्थ्य के साथ गहरा सम्बन्ध है। परिवार को चाहिए कि बालकों के लिए खेलकूद का पर्याप्त प्रबन्ध किया जाए। उन्हें दर्शनीय स्थल दिखाने, पिकनिक पर ले जाने, ऐतिहासिक स्थलों पर घुमाने तथा भाँति-भाँति की वस्तुओं का निरीक्षण कराने का प्रयास भी किया जाना चाहिए।

(7) अनुशासन और अनुकरण – बालक अधिकांश बातें अनुकरण के माध्यम से सीखते हैं। अनुकरण आदर्श वस्तु या विचार का होता है; अत: माता-पिता का जीवन अनुशासित एवं आदर्श जीवन होना चाहिए। परिवार में आत्मानुशासन की शिक्षा प्रदान की जाए।

प्रश्न 4.
मानसिक स्वास्थ्य के संवर्द्धन में पाठशाला या विद्यालय की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
पाठशाला तथा मानसिक स्वास्थ्य-संवर्द्धन

बालक के मानसिक स्वास्थ्य पर परिवार के बाद सर्वाधिक प्रभाव पाठशाला या विद्यालय का पड़ता है। बालक के मानसिक स्वास्थ्य में विद्यालय या पाठशाला की भूमिका का विवरण निम्नलिखित

(1) पाठशाला का वातावरण – पाठशाला का सम्पूर्ण वातावरण शान्ति, सहयोग और प्रेम पर आधारित तथा उत्तम होना चाहिए। अध्यापक का विद्यार्थी के प्रति प्रेम एवं सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार, विद्यार्थी के मन में अध्यापक के प्रति रुचि और आदर उत्पन्न करता है। इससे बालक स्वतन्त्रता तथा प्रसन्नता का अनुभव करते हैं जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य ठीक बना रहता है। विद्यार्थियों के प्रति बालक का भेदभावपूर्ण बर्ताव बालकों के मन में अनादर और खीझ को जन्म देता है जिसके परिणामस्वरूप अध्यापक के निर्देशों की अवहेलना हो सकती है और परस्पर कुसमयोजन पैदा हो सकता है। इसके अलावा, पाठशाला में किसी प्रकार की राजनीति, गुटबाजी, साम्प्रदायिक भेदभाव नहीं रहना चाहिए। इससे मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

(2) श्रेष्ठ अनुशासन – पाठशाला में अनुशासन का उद्देश्य बालकों में उत्तरदायित्व की भावना पैदा करना है, न कि उनके मन और जीवन को पीड़ा देना है। अनुशासन सम्बन्धी नियम कठोर न हों, उनसे बालकों में विरोध की भावना उत्पन्न न हो तथा पालन सुगमता से कराया जा सके। बालकों को आत्मानुशासन के महत्त्व से परिचित कराया जाए। उन्हें अनुशासन समिति में स्थान देकर कार्य सौंपे जाएँ ताकि उनमें उत्तरदायित्व की भावना का विकास हो सके। इससे बालक का व्यक्तित्व विकसित व समायोजित होता है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य में योगदान मिलता है।

(3) सन्तुलित पाठ्यक्रम – बालकों के ज्ञान में अपेक्षित वृद्धि तथा उनके बौद्धिक उन्नयन के लिए पाठ्यक्रम का सन्तुलित होना आवश्यक है। पाठ्यक्रम लचीला और बच्चों की रुचि के अनुरूप होना चाहिए। रुचिजन्य अध्ययन से विद्यार्थियों को मानसिक थकान नहीं होती और उनका मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहता है। इसके विपरीत, असन्तुलित पाठ्यक्रम के बोझ से बालक मानसिक थकान महसूस करते हैं, अध्ययन में रुचि लेते हैं तथा पढ़ने-लिखने से जी चुराते हैं। अतः असन्तुलित पाठ्यक्रम मानसिक सन्तुलन एवं स्वास्थ्य में सहायक हैं।

(4) पाठ्य-सहगामी क्रियाएँ – पाठशाला में समय-समय पर पाठ्य-सहगामी गतिविधियाँ आयोजित की जानी चाहिए। इनसे बालक के व्यक्तित्व का विकास होता है तथा उसकी रुचियों का उचित अभि-प्रकाशन होता है। खेलकूद और मनोरंजन द्वारा मस्तिष्क में दमित भावनाओं को मार्ग मिलता है तथा मानसिक स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

(5) उपयुक्त शिक्षण विधियाँ – पाठशाला में अध्यापक को चाहिए कि वह विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए उपयुक्त विधियों का प्रयोग करे। नीरस शिक्षण से बालकों में अरुचि तथा थकान पैदा होती हैं, जिससे उनमें कक्षा से पलायन की प्रवृत्ति उभरती है तथा अनुशासनहीनता के अंकुर विकसित होते हैं।

(6) शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन – विद्यार्थियों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को ध्यान में रखकर उनकी मानसिक योग्यता तथा रुचि के अनुसार ही विषय दिये जाने चाहिए। इसके लिए कुशल मनोवैज्ञानिक द्वारा शैक्षिक निर्देशन की व्यवस्था की जानी चाहिए। इसके अलावा उनके भावी जीवन को ध्यान में रखकर उन्हें उचित व्यवसाय चुनने हेतु भी परामर्श व दिशा निर्देश दिये जाएँ। व्यक्तिगत निर्देशन् की सहायता से उनकी व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाया जा सकता है, जिससे मानसिक ग्रन्थियाँ समाप्त हो जाती हैं तथा मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहता है।

प्रश्न 5.
गम्भीर सोनसिक अस्वस्थता के उपचार का विधियों की उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
कुछ मानसिक विकार काफी गम्भीर होते हैं तथा उनका उपचार साधारण उपायों द्वारा नहीं किया जा सकता। इस प्रकार के मानसिक रोगियों का उपचार कुशल मनोचिकित्सकों द्वारा ही किया जा सकता है। इन रोगियों की प्राय: मनोरोग चिकित्सालयों में भर्ती भी करना पड़ता है। इन गम्भीर मानसिक रोगों के उपचार के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित विधियों को अपनाया जाता है –

(1) आघात विधि – पहले कार्बन डाइऑक्साइड तथा ऑक्सीजन के मिश्रण को सुंघाकर रोगी के मस्तिष्क को आघात (Shock) दिया जाता था जिससे क्षणिक लाभ होता था। इसके बाद अधिक मात्रा में इन्सुलिन या कपूर या मेट्राजॉल के द्वारा आघात दिया जाने लगा। रोगी को 15 से 60 तक आघात पहुँचाये जाते थे। आजकल रोगी के मस्तिष्क पर बिजली के हल्के आघात देकर मानसिक रोग ठीक किये जाते हैं।

(2) रासायनिक विधि – रासायनिक विधि (Chemo Therapy) में कुछ विशेष प्रकार की ओषधियों या रसायनों का प्रयोग करके रोगी की चिन्ता तथा बेचैनी कम की जाती है। भारत में आजकल सर्पगन्धा (Rauwolia) नामक ओषधि काफी प्रचलित वै लाभदायक सिद्ध हुई है।

(3) मनोशल्य चिकित्सा – मनोशल्य चिकित्सा (Psycho-Surgery) के अन्तर्गत मस्तिष्क का ऑपरेशन करके थैलेमस व फ्रण्टल लोब का सम्बन्ध विच्छेद कर दिया जाता है। इससे मानसिक उन्माद और विकृतियाँ ठीक हो जाती हैं। यह देखा गया है कि इस ऑपरेशन के बाद दूसरी मानसिक असमानताएँ पैदा हो जाती हैं। इस प्रकार, यह विधि सुधार की दृष्टि से तो उपयुक्त कही जा सकती है। किन्तु इससे पूर्ण उपचार नहीं हो सकता।

प्रश्न 6.
मनोरचनाएँ समायोजन में सहायक हैं।” इस कथन की विवेचना दीजिए।
उत्तर :
व्यक्ति के जीवन तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए समायोजन का विशेष महत्त्व है। समायोजन के लिए निरन्तर प्रयास एवं उपाय करने आवश्यक होते हैं। समायोजन के लिए किये जाने वाले उपायों में मनोरंजनों (Mental Mechanisms) का विशेष महत्त्वपूर्ण स्थान है। मनोरचनाएँ कुछ ऐसी प्रक्रियाएँ होती हैं, और चेतन भी होती हैं तथा अचेतन भी। मनोरचनाओं के द्वारा व्यक्ति अपने अन्तर्द्वन्द्वों से छुटकारा प्राप्त करने का प्रयास करता है। मनोरचनाओं के माध्यम से व्यक्ति विभिन्न चिन्ताओं से भी अपना बचाव करता है। मनोरचनाएँ चिन्ता से केवल रक्षा ही नहीं करतीं बल्कि यह उन विधियों की ओर संकेत भी करता हैं जिनसे चिन्ता उत्पन्न करने वाले आवेगों की दिशा भी बदली जा सकती है। इस प्रकार मनोरचनाएँ अन्तर्द्वन्द्वों को समाप्त करके तथा चिन्ताओं से मुक्ति दिलाकर व्यक्ति के जीवन में समायोजन बनाये रखने में सहायक सिद्ध होती हैं। मैक्डूगल के अनुसार, “अधिक सामान्य जैविक दृष्टि से मनोरचनाएँ व्यक्ति की अपने वातावरण से समायोजन स्थापित करने में सहायता करती हैं।”

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
टिप्पणी लिखिए-मानसिक अस्वस्थता का निदान।
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता के व्यवस्थित अध्ययन एवं उपचार के लिए मानसिक अस्वस्थता का समुचित निदान आवश्यक होता है।

निदान के अन्तर्गत मानसिक अस्वस्थता के कारणों का पता लगाने के लिए रोगी के व्यक्तित्व सम्बन्धी कुछ महत्त्वपूर्ण सूचनाओं को प्राप्त करना आवश्यक है। ये सूचनाएँ इन बिन्दुओं से सम्बन्धित होती हैं –

  1. शारीरिक दशा
  2. पारिवारिक दशा
  3. शैक्षणिक दशा
  4. सामाजिक दशा
  5. आर्थिक दशा
  6. व्यावहारिक दशा
  7. व्यक्त्वि सम्बन्धी लक्षण तथा
  8. मानसिक तत्त्व।

इन सूचनाओं को निम्नलिखित विधियों की सहायता से उपलब्ध कराया जाता है –

  1. प्रश्नावली
  2. साक्षात्कार
  3. निरीक्षण
  4. जीवन-वृत्त
  5. व्यक्तित्व परिसूची
  6. डॉक्टरी जाँच
  7. विभिन्न मनोवैज्ञानिक (बुद्धि, रुचि, अभिरुचि तथा मानसिक योग्यता सम्बन्धी) परीक्षण
  8. विद्यालय का संचित आलेख
  9. प्रक्षेपण विधियाँ तथा
  10. प्रयोगात्मक एवं अन्वेषणात्मक विधियाँ

प्रश्न 2.
टिप्पणी लिखिए-मानसिक अस्वस्थता के उपचार की विधि : सम्मोहन।
उत्तर :
सम्मोहन (Hypnosis), अल्पकालीन प्रभाव वाली एक मनोवैज्ञानिक विधि है जिससे मनोरोग के लक्षण दूर होते हैं, रोग दूर नहीं होता। सम्मोहन क्रिया में चिकित्सक मानसिक रोगी को कुछ समय के लिए अचेत कर देता है और उसे एक आरामकुर्सी पर विश्रामपूर्वक बैठाता है। अब उसे किसी ध्वन्यात्मक या दृष्टात्मक उत्तेजना पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए कहा जाता है। संसूचनाओं के माध्यम से उसे अचेत ही रखा जाता है। रोगी को निर्देश दिया जाता है कि वह अपनी स्मृति से लुप्त हो चुकी अनुभूतियों को कहे। अनुभूति के स्मरण-मात्र से ही रोगी का रोग दूर हो जाता है।

प्रश्न 3.
मनोविश्लेषण विधि का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर :
फ्रायड नामक विख्यात मनोवैज्ञानिक ने सम्मोहन विधि की कमियों को ध्यानावस्थित रखते हुए मनोविश्लेषण विधि’ (Psycho-analysis) की खोज की। रोगी को एक अर्द्ध-प्रकाशित कक्ष में आरामकुर्सी पर इस प्रकार विश्रामपूर्वक बैठाया जाता है कि मनोविश्लेषक तो रोगी की क्रियाओं का पूर्णरूपेण अध्ययन व निरीक्षण कर पाये लेकिन रोगी उसे न देख सके। अब मनोविश्लेषक के व्यवहार से प्रेरित व सन्तुष्ट व्यक्ति उस पर पूरी तरह विश्वास प्रदर्शित करता है। यद्यपि शुरू में प्रतिरोध की अवस्था के कारण रोगी कुछ व्यक्त करना नहीं चाहता, किन्तु उत्तेजक शब्दों के प्रयोग से उसे पूर्व-अनुभव दोहराने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसके बाद स्थानान्तरण की अवस्था के अन्तर्गत दो बातें होती हैं-(i) रोगी चिकित्सक को भला-बुरा कहता या गाली बकता है अथवा (ii) रोगी मनोविश्लेषक पर मुग्ध हो जाता है और उसकी हर एक बात मानता है। शनैः-शनै: रोगी अपनी समस्त बातों की जानकारी मनोविश्लेषक को दे देता है, जिससे उसकी उलझनें समाप्त हो जाती हैं और वह सामन्य व समायोजित हो जाता है।

प्रश्न 4.
किन्हीं दो मनोरक्षा युक्तियों के उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य को सामान्य बनाये रखने का एक उपाय मनोरक्षा युक्तियाँ (Defence Mechanisms) भी हैं। मनोरक्षा युक्तियाँ वे चेतन और अचेतन प्रक्रियाएँ हैं जिनसे आन्तरिक अन्तर्द्वन्द्व कम होता है अथवा समाप्त हो जाता है। दो मुख्य मनोरक्षा युक्तियों का सामान्य विवस्ण निम्नलिखित है –

(1) दमन (Repression) – दमन एक मुख्य एवं प्रधान मनोरक्षा युक्ति है। इस मनोरक्षा युक्ति के माध्यम से सम्बन्धित व्यक्ति अपनी अप्रिय एवं समाज-विरोधी इच्छाओं, कटुस्मृतियों एवं घटनाओं को मन के चेतन स्तर से हटाकर अचेतन स्तर पर भेज देता हैं दमन से कुछ हद तक मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा में सहायता प्राप्त होती है, परन्तु निरन्तर दमन की मनोरक्षा युक्ति को अपनाने से कुछ प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ सकते हैं।

(2) प्रक्षेपण (Projection) – प्रेक्षपण भी एक सामान्य रूप से पायी जाने वाली मनोरक्षा युक्ति है। व्यवहार में देखा जा सकता है कि कभी-कभी व्यक्ति में कुछ दोष या कमियाँ होती हैं, परन्तु वह इन दोषों की जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं लेना चाहता। ऐसे में वह अपने आप को दोष-रहित समझने के लिए अपने दोषों या कमियों को अन्य व्यक्तियों पर थोपता या आरोपित करता है। इस प्रकार के दोषारोपण से वह सन्तुष्टि महसूस करता है। यही प्रक्षेपण है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.

निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. मानसिक स्वास्थ्य एवं सन्तुलन बनाये रखने में सहायक विज्ञान को ……………….. के नाम से जाना जाता है।
  2. मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का जन्मदाता ……………….. नामक मनोवैज्ञानिक को माना जाता है।
  3. शारीरिक स्वास्थ्य तथा मानसिक स्वास्थ्य में ……………….. है।
  4. मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति बौद्धिक एवं संवेगात्मक रूप में ……………….. होता है।
  5. जीवन की वास्तविकताओं को स्वीकार कर उनका सामना करना ……………….. का लक्षण है।
  6. मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति का जीवन के प्रति ……………….. दृष्टिकोण होता है।
  7. नवीन परिस्थितियों में समायोजन की योग्यता ……………….. कहलाती है।
  8. मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अपने व्यवसाय से ……………….. होता है।
  9. मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति के जीवन में ……………….. की कमी होती है।
  10. व्यक्ति में अतिशयता की उपस्थिति-मानसिक ……………….. का लक्षण है।
  11. मन के तीन पक्षों, इड, इगों एवं सुपर-इगो में ……………….. व्यक्तित्व का तार्किक, व्यवस्थित एवं विवेकपूर्ण भाग है।
  12. शारीरिक विकलांगता तथा दीर्घकालिक रोगों का मानसिक स्वास्थ्य पर ……………….. प्रभाव पड़ता है।
  13. अत्यधिक मानसिक दबाव, मानसिक तनाव तथा दमित भावना ग्रन्थियाँ भी मानसिक स्वास्थ्य पर। ……………….. प्रभाव डालती हैं।
  14. सुझाव, निद्रा तथा समुचित विश्राम का मानसिक स्वास्थ्य पर ……………….. प्रभाव पड़ता है।
  15. उदात्तीकरण एक ……………….. है।
  16. सिगमण्ड फ्रायड द्वारा दी गई मानसिक अस्वस्थता के उपचार की विधि को ……………….. कहते हैं।
  17. मनोविश्लेषण का व्यापक प्रयोग ……………….. ने किया है।

उत्तर :

  1. मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान
  2. डब्ल्यू० बीयर
  3. घनिष्ठ सम्बन्ध
  4. परिपक्व
  5. उत्तम मानसिक स्वास्थ्य
  6. यथार्थ
  7. समायोजन शीलता
  8. सन्तुष्टे
  9. समायोजन
  10. अस्वस्थता
  11. सुपर इगो
  12. प्रतिकूल
  13. प्रतिकूल
  14. अनुकूल
  15. मनोरक्षा युक्ति
  16. मनोविश्लेषण
  17. सिगमण्ड फ्रायड

प्रश्न II.

निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान से क्या आशय है?
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान वह विज्ञान है जो व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करता है, उसे मानसिक रोगों से मुक्त रखता है। तथा व्यक्ति मानसिक विकार/रोग अथवा समायोजन के दोषों से ग्रस्त हो जाता है तो उसके कारणों का निदान करके समुचित उपचार की व्यवस्था का प्रयास करता है।

प्रश्न 2.
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान समिति की सर्वप्रथम स्थापना किसने तथा कब की थी?
उत्तर :
‘मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान समिति की स्थापना 1908 ई० में डब्ल्यू बीयर नामक मनोवैज्ञानिक ने की थी।

प्रश्न 3.
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के तीन मुख्य कार्य कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के तीन मुख्य कार्य हैं –

  1. मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा
  2. मानसिक रोगों की रोकथाम तथा
  3. मानसिक रोगों को प्रारम्भिक उपचार।

प्रश्न 4.
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की ड्रेवर द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
ड्रेवर के अनुसार, “मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का अर्थ है-मानसिक स्वास्थ्य के नियमों की खोज करना और उसको सुरक्षित रखने के उपाय करना।”

प्रश्न 5.
मानसिक स्वास्थ्य की एक सरल एवं स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
एच० आर० भाटिया के अनुसार, “मानसिक स्वास्थ्य यह बताता है कि कोई व्यक्ति जीवन की माँगों और अवसरों के प्रति कितनी अच्छी तरह से समायोजित है।”

प्रश्न 6.
मानसिक रूप से स्वस्थ्य व्यक्ति का एक मुख्य लक्षण बताइए।
उत्तर :
मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति समय-समय पर आत्म-निरीक्षण करता है।

प्रश्न 7.
मानसिक अस्वस्थता से क्या आशय है?
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता वह स्थिति है जिसमें जीवन की आवश्यकताओं को। सन्तुष्ट करने में व्यक्ति स्वयं को असमर्थ पाता है तथा संवेगात्मक असन्तुलन का शिकार हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति में बहुत-सी मानसिक विकृतियाँ या व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और उसे मानसिक रूप से अस्वस्थ कहा जाता है।

प्रश्न 8.
मानसिक अस्वस्थता के चार मुख्य लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. साधारण समायोजन का दोष
  2. मनोरुग्णतो
  3. मनोदैहिक रोग तथा
  4. मनस्ताप।

प्रश्न 9.
मानसिक अस्वस्थता उत्पन्न करने वाले चार प्रत्यक्ष कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. अत्यधिक थकान एवं परिश्रम
  2. संवेगात्मक असन्तुलन
  3. मानसिक दौर्बल्य तथा
  4. यौन-हताशाएँ।

प्रश्न 10.
मानसिक स्वास्थ्य पर किस मनोवैज्ञानिक कारक का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
प्रबल मानसिक संघर्ष का मानसिक स्वास्थ्य पर सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 11.
गम्भीर मानसिक अस्वस्थता के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. आघात चिकित्सा विधि
  2. रासायनिक विधि तथा
  3. मनोशल्य चिकित्सा।

प्रश्न 12.
बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर सर्वाधिक प्रभाव किस संस्था का पड़ता है?
उत्तर :
बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर सर्वाधिक प्रभाव परिवार नामक संस्था का पड़ता है।

प्रश्न 13.
परिवार के बाद बालक के मानसिक स्वास्थ्य पर किस संस्था का प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
परिवार के बाद बालक के मानसिक स्वास्थ्य पर विद्यालय का प्रभाव पड़ता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए 

प्रश्न 1.
“मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का सम्बन्ध मानसिक स्वास्थ्य को बनाये रखने तथा मानसिक अस्वस्थता को रोकने से है।” यह परिभाषा प्रतिपादित की है –
(क) फ्रायड ने
(ख) हैडफील्ड ने
(ग) ड्रेवर ने।
(घ) भाटिया ने

प्रश्न 2.
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान उपयोगी एवं आवश्यक है –
(क) केवल गम्भीर मानसिक रोगियों के लिए
(ख) केवल पथभ्रष्ट व्यक्तियों के लिए।
(ग) सभी व्यक्तियों के लिए।
(घ) किसी के लिए भी नहीं

प्रश्न 3.
मानसिक स्वास्थ्य पर किस कारक का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है?
(क) उत्तम पोषण का
(ख) शारीरिक सौन्दर्य का
(ग) शारीरिक विकलांगता का
(घ) इन सभी कारकों का

प्रश्न 4.
मानसिक स्वास्थ्य को बनाये रखने के नियम तथा उपाय बताने वाले विज्ञान को कहते हैं –
(क) व्यावहारिक मनोविज्ञान
(ख) प्राकृतिक चिकित्साशास्त्र
(ग) मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 5.
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का जीवन के किस क्षेत्र में महत्त्व है?
(क) जीवन के असामान्य क्षेत्रों में
(ख) जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में
(ग) जीवन के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में
(घ) जीवन के किसी भी क्षेत्र में नहीं

प्रश्न 6.
पूर्ण रूप से स्वस्थ व्यक्ति के लिए आवश्यक है
(क) मानसिक रूप से स्वस्थ होना
(ख) शारीरिक रूप से स्वस्थ होना
(ग) संवेगात्मक रूप से स्वस्थ होना
(घ) ये सभी

प्रश्न 7.
मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति में पाये जाने वाले लक्षण हैं
(क) व्यवहार में परिपक्वता तथा सर्वांग जीवन
(ख) समुचित आत्म-निरीक्षण
(ग) सम्मोहन पद्धति
(घ) उपर्युक्त सभी लक्षण

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से कौन मानसिक स्वास्थ्य का सूचक नहीं है?
(क) वास्तविकता से समायोजन
(ख) सन्तुलित क्रियाशीलता
(ग) वास्तविकता को स्वीकार करना
(घ) आत्मविश्वास की कमी

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति का लक्षण है?
(क) संवेगात्मक अस्थिरता
(ख) अतिशयता की उपस्थिति
(ग) आत्मविश्वास की कमी
(घ) नियमित जीवन

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से कौन मानसिक अस्वस्थता से सम्बन्धित है?
(क) दिमागी बुखार
(ख) कैंसर
(ग) तपेदिक
(घ) असंगत भय

प्रश्न 11.
मानसिक अस्वस्थता की रोकथाम के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प है –
(क) समय पर डॉक्टरी जाँच
(ख) आत्मसम्मान की, सन्तुष्टि
(ग) बालक का उचित लालन-पालन
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 12.
मानसिक उपचार की वह पद्धति क्या कहलाती है, जिसके अन्तर्गत सम्बन्धित मानसिक रोगी को अचेतनावस्था में ले जाकर आवश्यक निर्देश दिये जाते हैं
(क) सुझाव एवं संकेत पद्धति
(ख) आघात चिकित्सा पद्धति
(ग) सम्मोहन पद्धति
(घ) मनोविश्लेषण पद्धति

प्रश्न 13.
मनोविश्लेषण विधि की खोज किस मनोवैज्ञानिक द्वारा की गयी थी?
(क) सिगमण्ड फ्रॉयड
(ख) थॉर्नडाइक
(ग) गार्डनर मर्फी
(घ) पैवलोव

प्रश्न 14.
इड, इगो तथा सुपर इगो का वर्णन किसने किया है?
(क) युंग ने
(ख) बिने ने।
(ग) फ्रॉयड ने
(घ) एडलर ने

प्रश्न 15.
मन के तीन गत्यात्मक पक्षों इड, ईगो और सुपर इगो के सम्बोधन का वर्णन किया है –
(क) फ्रॉयड ने
(ख) जोन्स ने
(ग) मैक्डूगल ने।
(घ) तुष्ट ने

प्रश्न 16.
सामाजिक नैतिकता से संचालित होता है।
(क) इदम्
(ख) अहम्
(ग) पराहं।
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 17.
प्रसिद्ध कहावत “अंगूर खट्टे हैं” किस मानसिक मनोरंजन से सम्बंधित है?
(क) दमन
(ख) प्रतिक्रिया निर्माण
(ग) विस्थापन
(घ) युक्तिकरण

प्रश्न 18.
अहम् की रक्षा के लिए प्रयोग की जाने वाली रक्षा-युक्ति है –
(क) कुण्ठा
(ख) अन्तर्द्वन्द्व
(ग) दमन
(घ) दुश्चिन्ता

उतर :

  1. (ख) हैडफील्ड ने
  2. (ग) सभी व्यक्तियों के लिए
  3. (ग) शारीरिक विकलांगता का
  4. (ग) मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान)
  5. (ख) जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में
  6. (घ) ये सभी
  7. (घ) उपर्युक्त सभी लक्षण
  8. (घ) आत्मविश्वास की कमी
  9. (घ) नियमित जीवन
  10. (घ) असंगत भय
  11. (ग) बालक का उचित लालन-पालन
  12. (ग) सम्मोहन पद्धति
  13. (क) सिगमण्ड फ्रॉयड
  14. (ग) फ्रायडने
  15. (क) फ्रायड ने
  16. (ग) पराहं
  17. (ख) प्रतिक्रिया निर्माण
  18. (ग) दमन।

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