UP Board Solutions for Class 8 English Chapter 8 The Missile Man of India

UP Board Solutions for Class 8 English Chapter 8 The Missile Man of India

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WORD MEANINGS (शब्दार्थ) ।
exceptionally – असाधारण रूप से, ferried – नौका से सवारी या माल ढोते थे, chancellor – कुलाधिपति, pilgrim – यात्री, affiliated – समबद्ध, indigenous – स्वदेशी, orbit – ग्रह-उपग्रह का परिक्रमा पथ, ballistic – प्राक्षेपिक, vision – दृष्टि ।

TRANSLATION OF THE LESSON (पाठ का हिन्दी अनुवाद)।
Avul Pakir ……………………………….vehicle technology.
हिन्दी अनुवाद- अवुल पकिर जैनुलाअबदीन अब्दुल कलाम, जिन्हें डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नाम से जाना जाता है, भारत के ग्याहरवें राष्ट्रपति (2002 से 2007) थे। ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर, 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ। हालांकि वह एक गरीब परिवार में पैदा हुए, वह एक असाधारण रूप से प्रतिभाशाली बच्चे रहे। उनके पिता जैनुलाअबदीन एक नाव के मालिक थे जो तमिलनाडु के रामेश्वरम मंदिर में हिन्दु तीर्थयात्रियों को नाव से लेकर जाते थे। उनके पिता स्थानीय मस्जिद में इमाम भी थे और उनकी माता अशिअम्मा एक गृहणी थीं। उन्होंने छोटी आयु से ही काम करना शुरू कर दिया था। (UPBoardSolutions.com) वह अपने परिवार की आर्थिक मदद के लिए इमली के बीज और अखबार बेचते थे। अपने स्कूल की पढ़ाई रामेश्वरम प्राथमिक विद्यालय से पूरी करके कलाम ने तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ्स कॉलेज में दाखिला लिया। यह कॉलेज मद्रास विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त था, जहाँ से उन्होंने 1954 में भौतिक विज्ञान में स्नातक किया। उन्होनें मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी से एयरो इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की।
डा. अब्दुल कलाम एक महान वैज्ञानिक थे। वे भारतीय अन्तरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान के कुलाधिपति भी बने। 1958 में उन्होंने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डी.आर.डी.ओ.) के साथ काम किया और फिर 1963 में भारतीय अतंरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) से जुड़े। भारतीय उपग्रह बनाने और साथ ही डी.आर.डी.ओ. के प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। एस.एल.वी.-III के परियोजना निदेशक के रूप में उन्होंने रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा के पास (UPBoardSolutions.com) स्थापित करने में भारत के पहले उपग्रह प्रक्षेपण यान (एस.एल.वी.-ill) के विकास और संचालन में योगदान दिया। उनका महानतम योगदान प्रक्षेपास्त्र के क्षेत्र में रहा। अग्नि, पृथ्वी, आकाश, त्रिशूल और नाग प्रक्षेपास्त्र उन्होंने ही विकसित किए। बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र और प्रक्षेपण यान तकनीक विकसित करने के लिए उन्हें भारत का मिसाइल मैन’ कहा जाता है।

Besides being ………………………… of our times.
हिन्दी अनुवाद- एक महान वैज्ञानिक होने के साथ-साथ, वे एक महान लेखक भी थे। उन्होंने बहुत सी किताबें लिखी हैं जैसे-‘विंग्स ऑफ फायर’, ‘इग्नाइटेड माइंडस’, ‘टारगेट 3 बिलिअन’, ‘टर्निग पॉइंट’, ‘इंडिया 20-20 : ए विज़न फॉर द न्यू मिलेनियम’, ‘माई जर्नी’ । अपनी किताब ‘इंडिया 20-20 : ए विज़न फॉर द न्यू मिलेनियम’ में उन्होंने भारत को एक विकसित देश बनाने के उनके सपनों का उल्लेख किया है। देश के युवाओं के लिए उनकी सलाह थी, “सपने लो सपने लो सपने लो। सपने सोच (UPBoardSolutions.com) में परिवर्तित होते हैं और सोच का परिणाम कर्म है।” भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण (1981), पद्म विभूषण (1990), भारत रत्न और इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार (1997) से सम्मानित किया। 27 जुलाई, 2015 को भारतीय प्रबंधन संस्थान (आई.आई.एम.) शिल्लोंग में अध्यापन कार्य के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। साधारण, विनम्र, साथ ही हमारे समय के सबसे महान व्यक्ति की अचानक एवं अकाल मृत्यु के बारे में जानकर सारी दुनिया सदमे और दुख में डूब गई।

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EXERCISE (अभ्यास)
Comprehension Questions
1. Answer the following questions:

Question a.
When and where was APJ Abdul Kalam born?
Answer:
APJ Abdul Kalam was born on 15th October, 1931, at Rameshwaram in Tamil Nadu.

Question b.
What did he do to help his family?
Answer:
He sold tamarind seeds and newspapers to support his family.

Question c.
Name two research organisations where he worked.
Answer:
(i) Defence Research and Development Organisation
(ii) Indian Satellite Research Organisation

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Question d.
Name the book in which he mentioned his dream of making India a developed country.
Answer:
‘India 20-20 : A Vision for the New Millenium’.

Question e.
List the awards by which APJ Abdul Kalam was honoured.
Answer:
Padma Bhushan (1981), Padma Vibhushan (1990), Bharat Ratna, Indira Gandhi Award for National Integration (1997)

Question f.
Why is Dr Kalam known as the ‘Missile Man of India’?
Answer:
Dr Kalam is known as the ‘Missile Man of India’ for his work (UPBoardSolutions.com) on the development of ballistic missile and launch vehicle technology.

Word Power
1. Complete the names of the missiles:

  • A G N I
  • P R I T H V I
  • N A A G
  • A K A S H
  • T R I S H U L

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2. Choose the correct words from the brackets to fill in the blanks:
Example: With a blank face she said, “My purse is empty.” (empty, blank)

  1. The principal of our school is a man of principles. (principal, principles)
  2. Little children have small hands. (little, small)
  3. You should live in union because unity is strength. (unity, union)
  4. The handsome young man has a beautiful wife. (handsome, beautiful)

Language Practice
1. Fill in the blanks with the correct degree of adjectives:

  1. Birbal was cleverer than the other ministers. (clever)
  2. The Everest is the highest peak in the world. (high)
  3. China is a big country. (big)
  4. Supriya is the tallest girl in the class. (tall)
  5. James is two years older than me. (old)

2. Add. ‘ly’ to the words given in the box to form adverbs and choose the correct adverbs to make meaningful sentence.
One is done for you: quick + ly = quickly He ran quickly.
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  • My grandmother prays silently.
  • The sun was shining brightly.
  • We must drive carefully.
  • She writes very neatly
  • The soldier fought bravely.

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3. Rewrite the following sentences after inserting the necessary punctuation marks:

  • will you help me
    Will you help me?
  • delhi the capital of india stands on the banks of river Yamuna
    Delhi, the capital of India, stands on the banks of river Yamuna.
  • how beautiful the sky is
    How beautiful the sky is!
  • where do you want to go asked meera
    “Where do you want to go?” asked Meera.

Activity
Let’s Read and Follow
Ans. Do it yourself.

Let’s Write
If you were given a chance to ask President Kalam three questions, what would they be?

  1. What inspired you to study so much even after living in a humble background ?
  2. Why do you think people of India call you ‘People’s President’ ?
  3. What difference do you notice in the education system of your times and the present times ?

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UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 6 Application of Derivatives

UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 6 Application of Derivatives (अवकलज के अनुप्रयोग) are part of UP Board Solutions for Class 12 Maths. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 6 Application of Derivatives (अवकलज के अनुप्रयोग)

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Maths
Chapter Chapter 6
Chapter Name Application of Derivatives
Exercise Ex 6.1, Ex 6.2, Ex 6.3, Ex 6.4, Ex 6.5
Number of Questions Solved 109
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 6 Application of Derivatives

प्रश्नावली 6.1

प्रश्न 1.
वृत्त के क्षेत्रफल के परिवर्तन की दर इसकी त्रिज्या r के सापेक्ष ज्ञात कीजिए, जबकि
(a) r = 3 सेमी है
(b) r = 4 सेमी है।
हल-
(a) माना वृत्त का क्षेत्रफल A है, तब
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अत: क्षेत्रफल के परिवर्तन की दर 6π सेमी²/सेकण्ड है।
(b) उपरोक्त की भाँति स्वयं हल कीजिए।[उत्तर : 8π सेमी²/से]

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प्रश्न 2.
एक घन का आयतन 9 सेमी3/से की दर से बढ़ रहा है। यदि इसकी कोर की लम्बाई 10 सेमी है तो इसके पृष्ठ का क्षेत्रफल किस दर से बढ़ रहा है?
हल-
माना घन की कोर = x सेमी, घन का आयतन = V तथा पृष्ठ क्षेत्रफल = S
तब V = x3 तथा S = 6x2. जहाँ x समय t को फलन है।
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अतः पृष्ठ क्षेत्रफल 3.6 सेमी²/से की दर से बढ़ रहा है।

प्रश्न 3.
एक वृत्त की त्रिज्या समान रूप से 3 सेमी/से की दर से बढ़ रही है। ज्ञात कीजिए की वृत्त का क्षेत्रफल किस दर से बढ़ रहा है जब त्रिज्या 10 सेमी है?
हल-
मानी वृत्त की त्रिज्या r सेमी है, तब वृत्त का क्षेत्रफल A = πr² सेमी²
प्रश्नानुसार, [latex ]\frac { dr }{ dt }=3[/latex] सेमी/से …(i)
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अत: क्षेत्रफल के परिवर्तन की दर 60π सेमी²/सेकण्ड है।

प्रश्न 4.
एक परिवर्तनशील घन का किनारा 3 cm/s की दर से बढ़ रहा है घन का आयतन किस दर से बढ़ रहा है जबकि किनारा 10 cm लम्बा है?
हल-
माना घन का आयतन = V तथा भुजा = a है, तब V = a3
ज्ञात है
[latex ]\frac { da }{ dt }=3[/latex] सेमी/से, a = 10 सेमी
∴ समय के सापेक्ष आयतन के परिवर्तन की दर
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अतः जब घन का किनारा 10 cm लम्बा हो तब घन का आयतन 900 cm2/s की दर से बढ़ रहा है।

प्रश्न 5.
एक स्थिर झील में एक पत्थर डाला जाता है और तरंगें वृत्तों में 5 सेमी/से की गति से चलती है। जब वृत्ताकार तरंग की त्रिज्या 8 सेमी है तो उस क्षण घिरा हुआ क्षेत्रफल किस दर से बढ़
हल-
दिया है- [latex ]\frac { dr }{ dt }=5[/latex] सेमी/से, r = 8 सेमी
माना तरंगों से बने वृत्त का क्षेत्रफल A सेमी² है।
तब A = πr²
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अतः जब तरंग की त्रिज्या 8 सेमी हो तब तरंगों द्वारा घिरा हुआ क्षेत्रफल 80 π सेमी²/से की दर से बढ़ रहा है।

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प्रश्न 6.
एक वृत्त की त्रिज्या 0.7 सेमी/से की दर से बढ़ रही है। इसकी परिधि की वृद्धि की दर क्या है। जब r = 4.9 सेमी है?
हल-
माना वृत्त की त्रिज्या r सेमी है, तब परिधि C = 2πr
प्रश्नानुसार,
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अत: वृत्त की परिधि 1.4π सेमी/से की दर से बढ़ रही है।

प्रश्न 7.
एक आयत की लम्बाई x, 5 सेमी/मिनट की दर से घट रही है और चौड़ाई y, 4 सेमी/मिनट की दर से बढ़ रही है। जब x = 8 सेमी और y = 6 सेमी है। तब आयत के
(a) परिमाप
(b) क्षेत्रफल के परिवर्तन की दर ज्ञात कीजिए।
हल-
ज्ञात है- [latex ]\frac { dx }{ dt }=5[/latex] सेमी/मिनट
तथा [latex ]\frac { dy }{ dt }=4[/latex] सेमी/मिनट
माना आयत का क्षेत्रफल = A सेमी², परिमाप = p सेमी
लम्बाई = x सेमी, चौड़ाई = y सेमी
(a) परिमाप p = 2(x + y)
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अत: आयत का क्षेत्रफल 2 सेमी2/सेमी की दर से बढ़ रहा है।

प्रश्न 8.
एक गुब्बारा जो सदैव गोलाकर रहता है, एक पम्प द्वारा 900 सेमी3/सेकण्ड की दर से फुलाया जाता है। गुब्बारे की त्रिज्या के परिवर्तन की दर ज्ञात कीजिए जब त्रिज्या 15 सेमी है।
हल-
माना गुब्बारे की त्रिज्या = r तथा आयतन = V
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प्रश्न 9.
एक गुब्बारा जो सदैव गोलाकार रहता है कि त्रिज्या परिवर्तनशील है। त्रिज्या के सापेक्ष आयतन के परिवर्तन की दर ज्ञात कीजिए जब त्रिज्या 10 सेमी है।
हल-
माना गुब्बारे का आयतन = V तथा त्रिज्या = r
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अतः जब त्रिज्या 10 सेमी हो तब गुब्बारे का आयतन 400 π सेमी3/सेमी की दर से बढ़ता है।

प्रश्न 10.
एक 5 मी लम्बी सीढी दीवार के सहारे झुकी है। सीढ़ी का नीचे का सिरा जमीन के अनुदिश दीवार से दूर 2.0 मी/से की दर से खींचा जाता है। दीवार पर इसकी ऊँचाई किस दर से घट रही है जबकि सीढ़ी को नीचे का सिरा दीवार से 4 मी दूर है?
हल-
माना दीवार OC है तथा किसी क्षण सीढ़ी AB की स्थिति इस प्रकार है कि OA = x और OB = y
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अत: दीवार पर सीढ़ी की ऊँचाई 8/3 मी/से की दर से घट रही है।

प्रश्न 11.
एक कण वक्र 6y = x3 + 2 के अनुगत गति कर रहा है। वक्र पर उन बिन्दुओं को ज्ञात कीजिए जबकि x निर्देशांक की तुलना में y निर्देशांक 8 गुना तीव्रता से बदल रहा है।
हल-
दिया है-
6y = x3 + 2 और [latex ]\frac { dy }{ dt } =8\frac { dx }{ dt } [/latex]
t के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्न 12.
हवा के बुलबुले की त्रिज्या, [latex ]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] सेमी/सेकण्ड की दर से बढ़ रही है। बुलबुले का आयतन किस दर से बढ़ रहा है जबकि त्रिज्या 1 सेमी है?
हल-
माना बुलबुले की त्रिज्या = r तथा बुलबुले का आयत
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UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 6 Application of Derivatives image 15
अत: बुलबुले का आयतन 2π सेमी3/से की दर से बढ़ रहा है।

प्रश्न 13.
एक गुब्बारा जो सदैव गोलाकार रहता है, का परिवर्तनशील व्यास [latex ]\frac { 3 }{ 2 }(2x+1)[/latex] है। x के सापेक्ष आयतन के परिवर्तन की दर ज्ञात कीजिए।
हल-
प्रश्नानुसार गोलाकार गुब्बारे का व्यास = [latex ]\frac { 3 }{ 2 }(2x+1)[/latex]
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प्रश्न 14.
एक पाइप से रेत 12 सेमी3/से की दर से गिर रही है। गिरती रेत जमीन पर एक ऐसा शंकु बनाती है जिसकी ऊँचाई सदैव आधार की त्रिज्या का छठा भाग है।रेत से बने शंकु की ऊँचाई किस दर से बढ़ रही है जबकि ऊँचाई 4 सेमी है?
हल-
माना किसी क्षण t है पर शंकु की त्रिज्या r, ऊँचाई h तथा आयतन V है।
[latex ]h=\frac { r }{ 6 }(2x+1)[/latex]
⇒ r = 6h
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प्रश्न 15.
एक वस्तु की x इकाइयों के उत्पादन की कुल लागत C (x) Rs में
C(x) = 0.007x3 – 0.003x2 + 15x + 4000
से प्राप्त होती है। सीमान्त लागत ज्ञात कीजिए जबकि 17 इकाइयों का उत्पादन किया जाता है।
हल-
प्रश्नानुसार, C(x) = 0.007x3 – 0.003x2 + 15x + 4000
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 6 Application of Derivatives image 19
= 6.069 – 0.102 + 15
= 20.967
अतः 17 इकाइयों के उत्पादन की सीमान्त लागत Rs 20.967 है।

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प्रश्न 16.
किसी उत्पाद की x इकाइयों के विक्रय से प्राप्त कुल आय R(x) Rs में R(x) = 13x2 + 26x + 15 से प्राप्त होती है। सीमान्त आय ज्ञात कीजिए जब x = 7 है।
हल-
प्रश्नानुसार, R(x) = 13x2 + 26x + 15
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(MR)x=7 = 26 x 7 + 26
= 182 + 26
= 208
अत: अभीष्ट सीमान्त आय Rs 208 है।

प्रश्न 17.
एक वृत्त की त्रिज्या r = 6 सेमी पर r के सापेक्ष क्षेत्रफल में परिवर्तन की दर है :
(a) 10 π
(b) 12 π
(c) 8 π
(d) 11 π
हल-
मानी वृत्त का क्षेत्रफल = A तथा त्रिज्या = r
क्षेत्रफल A = πr²
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अत: विकल्प (b) सही है।

प्रश्न 18.
एक उत्पाद की x इकाइयों के विक्रय से प्राप्त कुल आय रुपयों में R(x) = 3x² + 36x + 5 से प्रदत्त है। जब x = 15 है तो सीमान्ते आये है :
(a) 116
(b) 96
(c) 90
(d) 126
हल-
दिया है- R(x) = 3x² + 36x +5
सीमान्त ।
सीमान्त आय =
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अब, x = 15, सीमान्त आय = 6 × 21 = Rs 126
अत: विकल्प (d) सत्य है।

प्रश्नावली 6.2

प्रश्न 1.
दिखाइए कि दिया गया फलन f, f(x) = x3 – 3x² + 4x, x ∈ R, R पर निरन्तर वृद्धिमान फलन है।
हल-
दिया गया फलन
f(x) = x3 – 3x² + 4x
f ‘(x) = 3x² – 6x +4
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= 3(x – 1)² + 1 > 0, ∀ x∈R
∵ f ‘(x) > 0, ∀ x∈R
∴ f(x), R पर निरन्तर वृद्धिमान फलन है।

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प्रश्न 2.
सिद्ध कीजिए कि R पर f(x) = 3x + 17 निरन्तर वृद्धिमान फलन है।
हल-
दिया गया फलन f(x) = 3x + 17
f ‘(x) = 3 > 0, ∀ x∈R
f ‘(x) > 0, ∀ x∈R
∴ f(x), R पर निरन्तर वृद्धिमान फलन है।

प्रश्न 3.
सिद्ध कीजिए कि f(x) = sin x द्वारा दिया गया फलन
(a) (0, π/2) में निरन्तर वृद्धिमान है।
(b) (π/2, π) में निरन्तर ह्रासमान है।
(c) (0, π) में न तो वृद्धिमान है और न ह्रासमान।
हल-
(a) f(x) = sin x
⇒ f ‘(x) = cos x
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अन्तराल (0, π/2) में निरन्तर वृद्धिमान तथा अन्तराल (π/2, π) में निरन्तर ह्रासमान है।
∴ फलन अन्तराल (0, π) में न तो वृद्धिमान है और न ह्रासमान,

प्रश्न 4.
अन्तराल ज्ञात कीजिए जिनमें f(x) = 2x² – 3x द्वारा दिया गया फलन
(a) निरन्तर वृद्धिमान है,
(b) निरन्तर ह्रासमान है।
हल-
(a) दिया गया फलन f(x) = 2x² – 3x
f ‘(x) = 4x – 3 > 0, ∀ x > [latex ]\frac { 3 }{ 4 }[/latex]
∴ f(x), अन्तराल (3/4, ∞) पर निरन्तर वृद्धिमान है।

(b) पुनः f ‘(3) = 4x – 3< 0, ∀ x < [latex ]\frac { 3 }{ 4 }[/latex]
∴ f(x), अन्तराल (-∞,3/4) पर निरन्तर ह्रासमान है।

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प्रश्न 5.
अन्तराल ज्ञात कीजिए जिनमें f(x) = 2x3 – 3x2 – 36x + 7 से दिया फलन f (a) निरन्तर वृद्धिमान है, (b) निरन्तर ह्रासमान है।
हल-
(a) दिया गया फलन f(x) = 2x3 – 3x2 – 36x +7
f ‘(x) = 6x2 – 6x – 36 = 6(x2 – x – 6).
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प्रश्न 6.
अन्तराल ज्ञात कीजिए जिनमें निम्नलिखित फलन निरन्तर वर्धमान अथवा हासमान है
(a) f(x) = x² + 2x + 5
(b) f (x) = 10 – 6x – 2x²
(c) f (x) = – 2x3 – 9x2 – 12x + 1
(d) f(x) = 6 – 9x – x²
(e) f(x) = (x + 1)3 (x – 3)3
हल-
(a) ज्ञात है- f (x) = x2 + 2x + 5
f ‘ (x) = 2x + 2 = 2 (x + 1)
f ‘ (x) = 0 ⇒ 2 (x + 1) ⇒ x = – 1
x = – 1 संख्या रेखा को दो भागों में बांटता है। यह भाग अन्तराल (-∞ , -1) तथा (-1, ∞ ) है।
(- ∞ , – 1) में f ‘ (x) = – ऋणात्मक
अत: अन्तराल (-∞ , -1) में फलन f निरन्तर ह्रासमान है।
(-1, ∞ ) में f ‘ (x) = + धनात्मक
अतः अन्तराल (-1, ∞ ) फलन f निरन्तर वर्धमान है।
(b) ज्ञात है. f (x) = 10 – 6x – 2x²
f ‘ (x) = – 6 – 4x = – 2 (3 + 2x)
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प्रश्न 7.
सिद्ध कीजिए कि
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अपने सम्पूर्ण प्रान्त में एक वृद्धिमान फलन है।
हल-
दिया गया फलन
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प्रश्न 8.
x के उन मानों को ज्ञात कीजिए जिनके लिए y = [x(x – 2)]² एक वर्धमान फलन है।
हल-
ज्ञात है- y = [x (x – 2)]² = x² (x + 4 – 4x)
= x4 – 4x3 + 4x2
x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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∴ x = 0, x = 1, x = 2 से वास्तविक संख्या रेखा के चार भाग अन्तराल (-∞, 0), (0, 1), (1, 2), (2, 2) बनते हैं।
अन्तराल (- ∞, 0) में f ‘ (x) = (-) (-) (-) = – ve (ऋणात्मक)
अतः फलन f निरन्तर ह्रासमान है।
अन्तराल (0, 1) में f ‘ (x) = (+) (-) (-) = + ve (धनात्मक)
अतः फलन f निरन्तर वर्धमान है।
अन्तराल (1, 2) में f ‘ (x) = (+) (+) (-) = – ve (ऋणात्मक)
अतः फलन f निरन्तर ह्रासमान है।
अन्तराल (2, ∞) में f ‘ (x) = (+) (+) (+) = +ve (धनात्मक)
अतः फलन f निरन्तर वर्धमान है।
इस प्रकार (0, 1) ∪ (2, ∞) में फलन f वर्धमान है तथा (-∞, 0) ∪ (1, 2) में फलन ह्रासमान है।

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प्रश्न 9.
सिद्ध कीजिए कि [0, π/2] में
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θ का एक वृद्धिमान फलन है।
हल-
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प्रश्न 10.
सिद्ध कीजिए कि लघुगणकीय फलन (0,∞) में निरन्तर वर्धमान फलन है।
हल-
ज्ञात है– f (x) = log x, x > 0
f ‘(x) = [latex ]\frac { 1 }{ x }[/latex] = धनात्मक, x > 0 के लिए
अतः लघुगणकीय फलन अन्तराल (0, ∞) के लिए निरन्तर वर्धमान है। इति सिद्धम्

प्रश्न 11.
सिद्ध कीजिए कि (-1,1) में f (x) = x² – x + 1 से प्रदत्त फलन न तो वर्धमान है। और न ही ह्रासमान है।
हल-
दिया है | f (x) = x² – x + 1
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इस प्रकार (-1, 1) में f ‘(x) का चिह्न एक नहीं है।
अतः इस अन्तराल में यह फलन न तो वर्धमान है और न ही ह्रासमान है। इति सिद्धम्

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में कौन से फलन (0,[latex]\frac { \pi }{ 2 } [/latex]) में निरन्तर ह्रासमान है?
(A) cos x
(B) cos 2x
(C) cos 3x
(D) tan x
हल-
(A) माना f (x) = cos x, ∴ f ‘ (x) = – sin x
अन्तराल (0, π/ 2) में, sin x = + धनात्मक ⇒f ‘ (x) = – ऋणात्मक
अतः फलन f निरन्तर ह्रासमान है।
(B) माना f (x) = cos 2x
∴ f ‘(x) = – 2 sin 2x
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प्रश्न 13.
निम्नलिखित अन्तरालों में से किस अन्तराल में f (x) = x100 + sin x – 1 द्वारा प्रदत्त फलन f निरन्तर ह्रासमान है ?
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हल-
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प्रश्न 14.
a का वह न्यूनतम मान ज्ञात कीजिए जिसके लिए अन्तराल [1, 2] में f(x) = x² + ax + 1 से दिया गया फलन निरन्तर वृद्धिमान है।
हल-
दिया गया फलन
f(x) = x² + ax + 1
f ‘(x) = 2x + a
अन्तराल [1, 2] में f ‘(x) का न्यूनतम मान f ‘(1) = 2 + a होगा
∵ f(x) अन्तराल [1, 2] में निरन्तर वृद्धिमान है ∴ f ‘(x) ≥ 0
∴ 2 + a ≥ 0
⇒ a≥ -2
अत: a का न्यूनतम मान -2 है।

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प्रश्न 15
माना[-1, 1] से असंयुक्त एक अन्तराल I हो तो सिद्ध कीजिए कि I में f(x) = [latex]x+\frac { 1 }{ x }[/latex] से दिया गया फलन f निरन्तर वृद्धिमान है।
हल-
दिया गया फलन f(x) = [latex]x+\frac { 1 }{ x }[/latex]
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∴ (x – 1)(x + 1) > 0
∴ f ‘(x) > 0
⇒ f(x) निरन्तर वृद्धिमान है जब x∈ (1, ∞)
अतः f(x), I पर निरन्तर वृद्धिमान है।

प्रश्न 16.
सिद्ध कीजिए कि फलन f(x) = log sin x,(0,[latex]\frac { \pi }{ 2 } [/latex]) में निरन्तर वर्धमान और ([latex]\frac { \pi }{ 2 } [/latex],π) में निरन्तर ह्रासमान है।
हल-
दिया है- f(x) = log sin x
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प्रश्न 17.
सिद्ध कीजिए कि फलन f(x) = log | cos x|; (0, π/2) निरन्तर ह्रासमान और (π/2, π) में निरन्तर वृद्धिमान है।
हल-
दिया गया फलन f(x) = log cos x
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प्रश्न 18.
सिद्ध कीजिए कि R में दिया गया फलन f(x) = x3 – 3x2 + 3x – 100 वर्धमान है।
हल-
ज्ञात है- f (x) = x3 – 3x2 + 3x – 100
∴f ‘(x) = 3x2 – 6x + 3 = 3 (x2 – 2x + 1) = 3(x – 1)2
∀x∈ R, f ’(x) = धनात्मक
अतः फलन f वर्धमान है। इति सिद्धम्

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प्रश्न 19.
निम्नलिखित में से किस अन्तराल में y = x2e-x वर्धमान है?
(a) (-∞, ∞)
(b) (-2, 0)
(c) (2, ∞)
(d) (0, 2)
हल-
दिया है- f (x) = x2e-x
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प्रश्नावली 6.3

प्रश्न 1.
वक्र y = 3x4 – 4x के x = 4पर स्पर्श रेखा की प्रवणता ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण y = 3x4 -4x
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= 4[3 x 64 – 1]
= 4[192 – 1]
= 4 x 191
= 764
∴स्पर्श रेखा की प्रवणता = 764

प्रश्न 2.
वक्र [latex ]y=\frac { x-1 }{ x-2 }[/latex],x ≠ 2 के x = 10 पर स्पर्श रेखा की प्रवणता ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण [latex ]y=\frac { x-1 }{ x-2 }[/latex],x ≠ 2
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर
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प्रश्न 3.
वक्र y = x3 – x + 1 की स्पर्श रेखा की प्रवणता उस बिन्दु पर ज्ञात कीजिए जिसका x-निर्देशांक 2 है।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण y = x3 – x + 1
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प्रश्न 4.
वक्र y = x3 – 3x + 2 की स्पर्श रेखा की प्रवणता उस बिन्दु पर ज्ञात कीजिए जिसका x – निर्देशांक 3 है।
हल-
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प्रश्न 5.
वक्र x = a cos3θ, y= a sin3θ के θ = [latex]\frac { \pi }{ 4 } [/latex] पर अभिलम्ब की प्रवणता ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया है, वक्र को समीकरण x = a cos3θ तथा y = a sin3θ
दोनों पक्षों का θ के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्न 6.
वक्र x = 1 – a sin θ, y = b cos² θ के θ = [latex]\frac { \pi }{ 2 } [/latex] पर अभिलम्ब की प्रवणता ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण x = 1 – a sin θ तथा y = b cos² θ
दोनों पक्षों का θ के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्न 7.
वक्र y = x3 – 3x– 9x + 7 पर उन बिन्दुओं को ज्ञात कीजिए जिन पर स्पर्श रेखायें x-अक्ष के समान्तर हैं।
हल-
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प्रश्न 8.
वक्र y = (x – 2)² पर एक बिन्दु ज्ञात कीजिए जिस पर स्पर्श रेखा बिन्दुओं (2,0) और (4,4) को मिलाने वाली रेखा के समान्तर है।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण y = (x – 2)²
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्न 9.
वक्र y = x3 – 11x + 5 पर उस बिन्दु को ज्ञात कीजिए जिस पर स्पर्श रेखा y = x – 11 है।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण y = x3 – 11x + 5
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प्रश्न 10.
प्रवणता -1 वाली सभी रेखाओं का समीकरण ज्ञात कीजिए जो वक़ [latex ]y=\frac { 1 }{ x-1 }[/latex],x ≠ -1 को स्पर्श करती है।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण [latex ]y=\frac { 1 }{ x-1 }[/latex]
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प्रश्न 11.
प्रवणता 2 वाली सभी रेखाओं का समीकरण ज्ञात कीजिए जो वक्र [latex ]y=\frac { 1 }{ x-3 }[/latex],x ≠ 3 को स्पर्श करती है।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण [latex ]y=\frac { 1 }{ x-3 }[/latex]
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्न 12.
प्रवणता 0 वाली सभी रेखाओं का समीकरण ज्ञात कीजिए जो वक्र
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को स्पर्श करती है।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण
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दोनों पक्षों को x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्न 13.
वक्र
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पर उन बिन्दुओं को ज्ञात कीजिए जिन पर स्पर्श रेखाएँ
(i) x-अक्ष के समान्तर हैं,
(ii) y-अक्ष के समान्तर हैं।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण
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दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्न 14.
दिए वक्रों पर निर्दिष्ट बिन्दुओं पर स्पर्श रेखा और अभिलम्ब के समीकरण ज्ञात कीजिए
(i) y = x4 – 6x3 + 13x2 – 10x + 5 के (0, 5) पर
(ii) y = x4 – 6x3 + 13x2 – 10x + 5 के (1, 3) पर
(iii) y = x3 के (1, 1) पर .
(iv) y = x² के (0, 0) पर
(v) x = cost, y = sin t के [latex]t=\frac { \pi }{ 4 } [/latex] पर
हल-
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प्रश्न 15.
वक्र y = x² – 2x + 7 की स्पर्श रेखा का समीकरण ज्ञात कीजिए, जो
(a) रेखा 2x – y + 9 = 0 के समान्तर है।
(b) रेखा 5y – 15x = 13 पर लम्ब है।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण y = x² – 2x + 7
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्न 16.
सिद्ध कीजिए कि वक्र y = 7x3 + 11 के उन बिन्दुओं पर स्पर्श रेखाएँ समान्तर हैं जहाँ x = 2 तथा x = – 2 है।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण y = 7x3 + 11
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर, [latex ]\frac { dy }{ dx }[/latex] = 21 x²
जब x = 2, तब स्पर्श रेखा की प्रवणता = 21 x 2² = 21 x 4 = 84
जब x = -2, तब स्पर्श रेखा की प्रवणता = 21 x (-2)² = 84
x = 2 तथा x = -2 पर स्पर्श रेखा की प्रवणता समान हैं।
अतः इन बिन्दुओं पर स्पर्श रेखाएँ समान्तर हैं। इति सिद्धम्

प्रश्न 17.
वक्र y = x3 पर उन बिन्दुओं को ज्ञात कीजिए जिन पर स्पर्श रेखा की प्रवणता बिन्दु के y-निर्देशांक के बराबर है।
हल-
दिया है, वक्र की समीकरण y = x3
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर, [latex ]\frac { dy }{ dx }[/latex] = 3x²
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प्रश्न 18.
वक्र y = 4x3 – 2x5, पर उन बिन्दुओं को ज्ञात कीजिए जिन पर स्पर्श रेखाएँ मूलबिन्दु से होकर जाती हैं।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण y = 4x3 – 2x5
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प्रश्न 19.
वक्र x² + y2 – 2x – 3 = 0 के उन बिन्दुओं पर स्पर्श रेखाओं के समीकरण ज्ञात कीजिए जहाँ पर वे x-अक्ष के समान्तर हैं।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण x² + y² – 2x – 3 = 0
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्न 20
वक्र ay2 = x3 के बिन्दु (am2, um3)पर अभिलम्ब का समीकरण ज्ञात कीजिए और m का मान बताइए जिसके लिए अभिलम्ब बिन्दु (a, 0) से होकर जाता है।
हल-
वक्र ay2 = x3 ….(1)
समीकरण (1) का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्न 21
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हल-
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प्रश्न 22.
परवलय y² = 4ax के बिन्दु (at², 2at) पर स्पर्श रेखा और अभिलम्ब के समीकरण ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण y² = 4ax
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्न 23
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हल-
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प्रश्न 24.
अतिपरवलय [latex ]\frac { { x }^{ 2 } }{ { a }^{ 2 } } -\frac { { y }^{ 2 } }{ { b }^{ 2 } } =1[/latex] के बिन्दु (x0, y0) पर स्पर्श रेखा तथा अभिलम्ब के समीकरण ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण [latex ]\frac { { x }^{ 2 } }{ { a }^{ 2 } } -\frac { { y }^{ 2 } }{ { b }^{ 2 } } =1[/latex]
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्न 25.
वक्र [latex ]y=\sqrt { 3x-2 } [/latex] की उन स्पर्श रेखाओं के समीकरण ज्ञात कीजिए जो रेखा 4x – 2y + 5 = 0 के समान्तर है।
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण [latex ]y=\sqrt { 3x-2 } [/latex] …(1)
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्न 26.
वक्र y = 2x2 + 3sin x के x = 0 पर अभिलम्ब की प्रवणता है
(A) 3
(B) [latex ]\frac { 1 }{ 3 }[/latex]
(C) 3
(D) [latex ]-\frac { 1 }{ 3 }[/latex]
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण y = 2x² + 3 sin x
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर, [latex ]\frac { dy }{ dx }=4x+3cosx[/latex]
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अतः विकल्प (D) सही है।

प्रश्न 27.
किस बिन्दु पर y = x + 1, वक्र y² = 4x की स्पर्श रेखा है?
(A) (1,2)
(B) (2,1)
(C) (1,- 2)
(D) (-1, 2)
हल-
दिया है, वक्र का समीकरण y² = 4x …(1)
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्नावली 6.4

प्रश्न 1.
अवकल का प्रयोग करके निम्नलिखित में से प्रत्येक का सन्निकट मान दशमलव के तीन स्थानों तक ज्ञात कीजिए
(i) [latex ]\sqrt { 25.3 } [/latex]
(ii) [latex ]\sqrt { 49.5 } [/latex]
(iii) [latex ]\sqrt { 0.6 } [/latex]
(iv) (0.009)1/3
(v) (0.999)1/10
(vi) (15)1/4
(vii) (26)1/3
(viii) (255)1/4
(ix) (82)1/4
(x) (401)1/2
(xi) (0.0037)1/2
(xii) (26.57)1/3
(xiii) (81.5)1/4
(xiv) (3,968)3/2
(xv) (32.15)1/5
हल-
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प्रश्न 2.
f(2.01) का सन्निकट मान ज्ञात कीजिए जबकि f(x) = 4x² + 5x + 2
हल-
माना x = 2 और x + ∆x = 2.01 तब ∆x = 0.01 = dx (∵∆Y = dx)
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प्रश्न 3.
f(5.001) का सन्निकट मान ज्ञात कीजिए जहाँ f(x) = x3 – 7 x² + 15
हल-
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प्रश्न 4.
x मी भुजा वाले घन की भुजा में 1% की वृद्धि होने के कारण घन के आयतन में होने वाला सन्निकट परिवर्तन ज्ञात कीजिए।
हल-
माना घन का आयतन V = x3
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घन के आयतन में सन्निकट परिवर्तन 0.03 x3 मी है।

प्रश्न 5.
x मी भुजा वाले घन की भुजा में 1% ह्रास होने के कारण घन के पृष्ठ क्षेत्रफल में होने वाला सन्निकट परिवर्तन ज्ञात कीजिए।
हल-
घन का पृष्ठ क्षेत्रफल S = 6x2
[latex ]\frac { dS }{ dx }=12x[/latex]
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घन के आयतन में सन्निकट परिवर्तन -0.12 x2 मी2 है।

प्रश्न 6.
एक गोले की त्रिज्या 7 मी मापी जाती है जिसमें 0.02 मी की त्रुटि है। इसके आयतन के परिकलन में सन्निकट त्रुटि ज्ञात कीजिए।
हल-
ज्ञात है- गोले की त्रिज्या = 7 मी ।
∆r = त्रिज्या में अशुद्धि = 0.02 मी
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प्रश्न 7.
एक गोले की त्रिज्या 9 मी मापी जाती है जिसमें 0.03 मी की त्रुटि है। इसके पृष्ठ क्षेत्रफल के परिकलन में सन्निकट त्रुटि ज्ञात कीजिए।
हल-
ज्ञात है- r = गोले की त्रिज्या = 9 मी
∆r = त्रिज्या में अशुद्धि = 0.03
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प्रश्न 8.
यदि f (x) = 3x² + 15x + 5 हो तो f (3.02) का सन्निकट मान है–
(A) 47.66
(B) 57.66
(C) 67.66
(D) 77.66
हल-
f (3.02) = f (3) + df (3) [3.02 = 3 + 0.02]
यदि f (x) = 3x² + 15x + 5 …(1)
f ‘(x) = 6x + 15
समी० (1) में x = 3 रखने पर,
f (3) = 3 x 9 + 15 x 3 + 5 = 27 + 45 + 5 = 77
df (x) = f ‘(x) x ∆x = (6x + 15) x ∆x
= (6 x 3 + 15) x 0.02 [∴ x = 3, ∆ x = 0.02]
= (18 + 15) x 0.02
= 33 x 0.02 = 0.66
∴ f (3.02) = f (3) + df (3) = 77 + 0.66 = 77.66
अत: विकल्प (D) सही है।

प्रश्न 9.
भुजा में 3% वृद्धि के कारण भुजा x के घन के आयतन में सन्निकट परिवर्तन है
(A) 0.06 x3 मी3
(B) 0.6 x3 मी3
(C) 0.09 xमी3
(D) 0.9 xमी3
हल-
चूँकि घन का आयतन V = x3 (∵ भुजा = x मी)
भुजा में वृद्धि, ∆x = 3% = x का
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अत: विकल्प (C) सही है।

प्रश्नावली 6.5

प्रश्न 1.
निम्नलिखित दिए गए फलनों के उच्चतम या निम्नतम मान, यदि कोई हो तो ज्ञात कीजिए
(i) f (x) = (2x – 1)² + 3
(ii) f (x) = 9x² + 12x + 2
(iii) f (x) = -(x – 1)² + 10
(iv) g(x) = x3 + 1
हल-
(i) दिया गया फलन f(x) = (2x – 1)² + 3
(2x – 1)² का कम-से-कम मान = 0,
⇒ f(x) ≥ 3; ∀ x∈R
∴ f (x) का निम्नतम मान = 3
(ii) दिया गया फलन f (x) = 9x² + 12x + 2 = 9x² + 12x + 4 – 2
= (3x + 2)² – 2
(3x + 2)² का निम्नतम मान = 0,
⇒ f (x) ≥ -2; ∀ x∈R
∴ f (x) का निम्नतम मान = -2
(iii) दिया गया फलन f (x) = – (x – 1)² + 10
– (x – 1)² का उच्चतम मान = 0
⇒f (x) ≤ 10; ∀ x∈R
∴f का उच्चतम मान = 10
(iv) यहाँ g(x) = x3 + 1.
g ‘(x) = 3x² जो x ∈ R के लिए धनात्मक है।
g ‘(x) = 3x² ≥ 0; ∀ x∈R
अत: g एक वर्धमान फलन है।
∴ इसका कोई न्यूनतम तथा अधिकतम मान नहीं है।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित दिए गए फलनों के उच्चतम मान या निम्नतम मान, यदि कोई हो तो ज्ञात कीजिए
(i) f(x) = |x + 2| – 1
(ii) g(x) = -|x + 1| + 3
(iii) h(x) = sin (2x) + 5
(iv) f(x) =|sin 4x + 3|
(v) h(x) = x + 1, x∈(-1,1)
हल-
(i) दिया गया फलन f(x) =|x + 2| – 1, f (x)≥ -1; ∀ x∈R
|x + 2| को निम्नतम मान 0 है।
∴ f का निम्नतम मान = -1
|x + 2| कर उच्चतम मान अनन्त हो सकता है।
अत: उच्चतम मान का अस्तित्व नहीं है।
(ii) दिया गया फलन g(x) = -|x + 1| + 3; g (3) ≤ 3∀ x∈R
-|x +1| का उच्चतम मान = 0
g(x) = -|x + 1| + 3 का उच्चतम मान = 0 + 3 = 3
तथा निम्नतम मान का अस्तित्व नहीं है।
(iii) दिया गया फलन h(x) = sin (2x) + 5
हम जानते हैं कि -1 ≤ sin 2x ≤ 1
⇒ 4 ≤ 5 + sin 2x ≤ 6
sin 2x का उच्चतम मान = 1
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प्रश्न 3
निम्नलिखित फलनों के स्थानीय उच्चतम या निम्नतम, यदि कोई हो तो ज्ञात कीजिए तथा स्थानीय उच्चतम या स्थानीय निम्नतम माने, जैसी स्थिति हो, भी ज्ञात कीजिए।
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हल-
(i) दिया गया फलन f(x) = x²
⇒ f ‘(x) = 2x
यदि f ‘(x) = 0 तब 2x = 0 या x = 0
f ‘(x) जैसे ही x = 0 से होकर आगे बढ़ता है तब इसका चिह्न ऋणात्मक से धनात्मक में बदल जाता है।
∴x = 0 पर f स्थानीय मान निम्नतम है।
स्थानीय निम्नतम मान = f (0) = 0
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प्रश्न 4
सिद्ध कीजिए कि निम्नलिखित फलनों को उच्चतम या निम्नतम मान नहीं है–
(i) f (x) = ex
(ii) g(x) = log x
(iii) h(x) = x3 + x2 + x + 1
हल-
(i) दिया गया फलन f ‘(x) = ex
∴f ‘(x) = ex
f ‘(x), x∈R कभी भी शून्य के समान नहीं है।
अत: f का कोई उच्चतम या निम्नतम मान नहीं है। इति सिद्धम्
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प्रश्न 5
प्रदत्त अन्तरालों में निम्नलिखित फलनों के निरपेक्ष उच्चतम मान और निरपेक्ष निम्नतम मान ज्ञात कीजिए
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हल-
(i) दिया गया फलन f(x) = x3, अन्तराल [-2, 2]
f ‘(x) = 3x2
यदि f ‘(x) = 0, तब 3x² = 0
⇒ x = 0
x = -2 पर, f(-2) = (-2)3 = – 8
x = 0 पर, f(0) = (0)3 = 0
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प्रश्न 6
यदि लाभ फलन p(x) = 41 – 72x – 18x² से प्रदत्त है तो किसी कम्पनी द्वारा अर्जित उच्चतम लाभ ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया गया फलन लाभ p(x) = 41 -72x – 18x² …(1)
p’ (x) = – 72 – 36x = – 36 (2 + x)
p ” (x) = – 36
यदि p ‘(x) = 0, तब – 36 (2 + x) = 0 ⇒ 2 + x = 0 ∴ x = -2
p ‘(x) = – ve
अतः x = -2 पर p(x) उच्चतम है।
∴उच्चतम लाभ = p(-2)
[समी० (1) में x  = -2 रखने पर]
= 41 – 72 (-2)2 – 18 (-2)²
= 41 + 144 – 72
= 43 इकाई

प्रश्न 7
अन्तराल [0, 3] पर 3x4 – 8x3 + 12x2 – 48x + 25 के उच्चतम मान और निम्नतम मान ज्ञात कीजिए।
हल-
माना f (x) = 3x4 – 8x3 + 12x2 – 48x + 25
f ‘(x) = 12x3 – 24x2 + 24x – 48
= 12 [x3 – 2x2 + 2x – 4] = 12 [x² (x – 2) + 2 (x – 2)]
= 12 (x – 2) (x2 + 2)
यदि f ‘(x) = 0, तब x – 2 = 0 ⇒ x = 2
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प्रश्न 8
अन्तराल [0, 2π] के किन बिन्दुओं पर फलन sin 2 x अपना उच्चतम मान प्राप्त करता है।
हल-
माना f (x) = sin 2x, अन्तराल [0, 2π]
f ‘(x) = 2 cos 2x
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प्रश्न 9.
फलन sin x + cos x का उच्चतम मान क्या है?
हल-
माना f (x) = sin x + cos x, अन्तराल [0, 2π]
f ‘(x) = cos x – sin x
उच्चतम व निम्नतम मान के लिए,
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प्रश्न 10.
अन्तराल [1,3] में 2x3 – 24x + 107 का महत्तम मान ज्ञात कीजिए। इसी फलन का अन्तराला [-3,-1] में भी महत्तम मान ज्ञात कीजिए।
हल-
माना
f (x) = 2x3 – 24x + 107, अन्तराल [1, 3]
f ‘(x) = 6x² – 24
उच्चतम व निम्नतम मान के लिए, f ‘(x) = 0
⇒ 6x2 – 24 = 0 ⇒ 6x2 = 24 ⇒ x2 = 4 ⇒ x = ±2
अन्तराल [1, 3] के लिए f(x) = 2x3 – 24x + 107 में x के मान रखने पर,
x = 1 पर, f(1) = 2(1)3 – 24 (1) + 107 = 2 – 24 + 107 = 85
x = 3 पर, f (3) = 2(3)3 – 24 (3) + 107 = 54 – 72 + 107 = 89
x = 2 परे, f(2) = 2(2)3 – 24(2) + 107 = 16 – 48 + 107 = 75
इस प्रकार अधिकतम मान f (x) = 89,
x = 3 पर, अन्तराल [-3,-1] के लिए हम x = – 3, – 2, – 1 पर f(x) का मान ज्ञात करते हैं।
x = – 3 पर, f(-3) = 2(-3)3 – 24 (-3) + 107
= – 54 + 72 + 107 = – 54 + 179 = 125
x = – 1 पर f(-1) = 2 (-1)3 – 24 (-1) + 107 = -2 +24 + 107 = 129
x = – 2 पर f(-2) = 2(-2)3 – 24 (-2) + 107 = -16 + 48 +107 = 139
इस प्रकार अधिकतम मान f (x) = 139, x = -2 पर।

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प्रश्न 11.
यदि दिया है कि अन्तराल [0,2] में x = 1 पर फलन x4 – 62x2 + ax + 9 उच्चतम मान प्राप्त करता है तो a का मान ज्ञात कीजिए।
हल-
माना f(x) = x4 – 62x2 + ax + 9
f ‘(x) = 4x3 – 124x + a
उच्चतम व निम्नतम मान के लिए, f ‘(x) = 0
⇒ 4x3 – 124x + a = 0
दिया है, x = 1 पर, f उच्चतम है ⇒ f (1) = 0
4x3 – 124x + a = 0 में x = 1 रखने पर
4 x 1 – 124 x 1 + a = 0 ⇒ 4 – 124 + a = 0 ⇒ – 120 + a = 0
a = 120
इसलिए a का मान 120 है।

प्रश्न 12.
[0,2π] पर x + sin 2x का उच्चतम और निम्नतम मान ज्ञात कीजिए।
हल-
माना f(x) = x + sin 2x
f ‘(x) = 1 + 2 cos 2x
उच्चतम व निम्नतम मान के लिए, f ‘(x) = 0
⇒ 1 + 2 cos 2x = 0 ⇒ cos2x = [latex]-\frac { 1 }{ 2 }[/latex]
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प्रश्न 13.
ऐसी दो संख्याएँ ज्ञात कीजिए जिनका योग 24 है और जिनका गुणनफल उच्चतम हो।
हल-
माना पहली संख्या = x तब दूसरी संख्या = 24 – x है।
प्रश्नानुसार, उनका गुणनफल p = x(24 – x) = 24x – x² …(1)
उच्चतम व निम्नतम मान के लिए, [latex]\frac { dp }{ dx }=0[/latex]
समी० (1) का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्न 14.
ऐसी दो धन संख्याएँ x और y ज्ञात कीजिए ताकि x + y = 60 और xy3 उच्चतम हो।
हल-
दिया है,
x + y = 60
x = 60 – y …(1)
माना xy3 = P …(2)
समीकरण (1) से x का मान समीकरण (2) में रखने पर,
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प्रश्न 15.
ऐसी दो धन संख्याएँ x और y ज्ञात कीजिए जिनका योग 35 हो और गुणनफल x2y5 उच्चतम हो।
हल-
दो धन संख्याएँ x, y हैं।
दिया है, x + y = 35
⇒ y = 35 – x …(1)
प्रश्नानुसार, माना गुणनफल p = x2y5 …(2)
समीकरण (1) से y का मान समीकरण (2) में रखने पर,
p = x2 (35 – x)5
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्न 16.
ऐसी दो धन संख्याएँ ज्ञात कीजिए जिनका योग 16 हो और जिनके घनों का योग निम्नतम हो।
हल-
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प्रश्न 17.
18 सेमी भुजा के टिन के किसी वर्गाकार टुकड़े से प्रत्येक कोने पर एक वर्ग काटकर तथा इस प्रकार बने टिन के फलकों को मोड़कर ढक्कन रहित एक सन्दूक बनाना है। काटे जाने वाले वर्ग की भुजा कितनी होगी जिससे सन्दूक का आयतन उच्चतम होगा?
हल-
माना वर्ग की प्रत्येक भुजा x सेमी काटी गई है।
∴ सन्दूक के लिए,
लम्बाई = 18 – 2x
चौड़ाई = 18 – 2x
ऊँचाई = x
आयतन V = ल० × चौ० × ऊँ०
= x(18 – 2x) (18 – 2x)
= x(18 – 2x)x² …(1)
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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प्रश्न 18
45 सेमी लम्बी और 24 सेमी चौड़ी आयताकार लोहे की एक चादर के चारों कोनों से समान भुजा का एक वर्गाकार निकालने के पश्चात् खुला हुआ एक सन्दुक बनाया जाता है। वर्गों की भुजा की माप ज्ञात कीजिये जिसके काटने पर बने सन्दूक का आयतन महत्तम होगा।
हल-
माना अभीष्ट वर्ग की भुजा x है तब ।।
सन्दूक की लम्बाई = (45-2x)
तथा सन्दूक की चौड़ाई = (24-2x)
सन्दूक की ऊँचाई = x
∴ सन्दूक का आयतन
V = (45 – 2x) (24 – 2x) x
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∴x = 5 पर V का मान महत्तम होगा।
∴ वर्ग की भुजा 5 सेमी होगी।

प्रश्न 19.
सिद्ध कीजिए कि एक दिए वृत्त के अन्तर्गत सभी आयतों में वर्ग का क्षेत्रफल उच्चतम होता है।
हल-
माना a त्रिज्या के वृत्त के अन्तर्गत आयत की लम्बाई x तथा चौड़ाई y है।
चित्र ABC में,
AC = व्यास = 2a
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प्रश्न 20.
सिद्ध कीजिए कि दिए हुए सम्पूर्ण पृष्ठ और महत्तम आयतन के लम्बवृत्तीय बेलन की ऊँचाई , उसके आधार के व्यास के बराबर है।
हल-
माना बेलन की ऊँचाई h तथा आधार की त्रिज्या r है।
पुनः माना बेलन का सम्पूर्ण पृष्ठ S और आयतन V है, तब
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प्रश्न 21.
100 सेमी3 आयतन वाले डिब्बे सभी बेलनाकार (लम्ब वृत्तीय) डिब्बों में से न्यूनतम पृष्ठ क्षेत्रफल वाले डिब्बे की विमाएँ ज्ञात कीजिए।
हल-
माना बेलनाकार डिब्बों की त्रिज्या r और ऊँचाई h है।
आयतन = πr²h = 100 सेमी3
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प्रश्न 22.
28 मीटर लम्बे तार के दो टुकड़े करके एक को वर्ग तथा दूसरे को वृत्त के रूप में मोड़ा जाता है। दोनों टुकड़ों की लम्बाई ज्ञात कीजिए यदि उनसे बनी आकृतियों को संयुक्त क्षेत्रफल न्यूनतम है।
हल-
तार की लम्बाई l = 28 मी
माना वर्ग की भुजा x तथा वृत्त की त्रिज्या r है, तब
l = वर्ग का परिमाप + वृत्त की परिधि = 4x + 2πr = 28 …(1)
माना संयुक्त क्षेत्रफल A है।
A = वर्ग की क्षेत्रफल + वृत्त का क्षेत्रफल = x² + πr²
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प्रश्न 23.
सिद्ध कीजिए कि R त्रिज्या के गोले के अन्तर्गत विशालतम शंकु का आयतन गोले के आयतन का [latex ]\frac { 8 }{ 27 }[/latex] होता है।
हल-
माना V, AB गोले के अन्तर्गत विशालतम शंकु का आयतन है। स्पष्टतया अधिकतम आयतन के लिए शंकु का अक्ष गोले की ऊँचाई के साथ होना चाहिए।
माना ∠AOC = θ,
∴ AC, शंकु के आधार की त्रिज्या = R sin θ, जहाँ R गोले की त्रिज्या है।
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प्रश्न 24.
दर्शाइये कि एक निश्चित आयतन के शंक्वाकार डेरे के बनाने में कम-से-कम कपड़ा लगेगा जब उसकी ऊँचाई आधार की त्रिज्या के √2 गुना होगी।
हल-
माना शंकु की ऊँचाई h, त्रिज्या r तथा तिरछी ऊँचाई l है।
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प्रश्न 25.
सिद्ध कीजिए कि दी हुई तिर्यक ऊँचाई और महत्तम आयतन वाले शंकु का अर्द्ध शीर्ष कोण tan-1√2 होता है।
हल-
माना शंकु की त्रिज्या = r, अर्द्धशीर्ष ∠BAM = θ
ऊँचाई = h; तिर्यक ऊँचाई = l
ऊर्ध्वाधर ऊँचाई, h = AM = l cos θ
शंकु की त्रिज्या, r = MC = l sin θ
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प्रश्न 26.
सिद्ध कीजिए कि दिए हुए पृष्ठ और महत्त्म आयतन वाले लम्बवृत्तीय शंकु का अर्द्धशीर्ष कोण [latex ]{ sin }^{ -1 }\left( \frac { 1 }{ 3 } \right) [/latex] होता है।
हल-
माना शंकु की त्रिज्या r, तिरछी ऊँचाई l सम्पूर्ण पृष्ठ S तथा आयतन V है।
सम्पूर्ण पृष्ठ S = πr (r + l) या πrl = S – πr²
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प्रश्न 27.
वक्र x² = 2y पर (0, 5) से न्यूनतम दूरी पर स्थित बिन्दु है
(A) (2√2, 4)
(B) ( 2√2 , 0)
(C) (0, 0)
(D) (2, 2)
हल-
माना वक्र x² = 2y पर कोई बिन्दु P(x, y) है।
दिया हुआ बिन्दु A (0, 5) है।
PA² = (x – 0)² + (y – 5)² = z (माना)
Z = x² + (y – 5)² …(1)
तथा वक्र x² = 2y …(2)
x² का मान समी० (1) में रखने पर,
Z = 2y + (y – 5)² =2y + y² + 25 – 10y = y² + 25 – 8y
दोनों पक्षों का y के सापेक्ष अवकलन करने पर, [latex ]\frac { dZ }{ dy }=2y-8[/latex]
उच्चतम व निम्नतम मान के लिए, [latex ]\frac { dZ }{ dy }=0[/latex]
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प्रश्न 28.
x के सभी वास्तविक मानों के लिए!
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का न्यूनतम मान है–
(A) 0
(B) 1
(C) 3
(D) [latex]\frac { 1 }{ 3 }[/latex]
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 6 Application of Derivatives image 146

प्रश्न 29.
[x (x – 1) + 1]1/3,0≤x≤1 का उच्चतम मान है
(A) [latex]{ \left( \frac { 1 }{ 3 } \right) }^{ \frac { 1 }{ 3 } }[/latex]
(B) [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex]
(C) 1
(D) 0
हल-
माना y = [x (x – 1) + 1]1/3
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
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UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 6 Application of Derivatives image 148
उच्चतम मान = 1
अत: विकल्प (C) सही है।

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UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 13 व्यक्तिगत उत्तरदायित्व

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 13 व्यक्तिगत उत्तरदायित्व (Individual Responsibility)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 13 व्यक्तिगत उत्तरदायित्व

UP Board Class 11 Home Science Chapter 13 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से समाज के प्रति प्रत्येक व्यक्ति का क्या कर्त्तव्य है? समझाकर लिखिए।
अथवा
समाज के प्रति एक जागरूक नागरिक के उत्तरदायित्वों का सविस्तार वर्णन कीजिए।
अथवा
एक अच्छे नागरिक के उत्तरदायित्वों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
अथवा
टिप्पणी लिखिए-व्यक्तिगत उत्तरदायित्व।
उत्तरः
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मनुष्यों से ही मिलकर समाज बना है और समाज के अनुरूप ही व्यक्ति का व्यक्तित्व विकसित होता है; अत: व्यक्ति के भी समाज के प्रति अनेक कर्त्तव्य होने स्वाभाविक ही हैं। दूसरी ओर समाज के भी व्यक्ति के प्रति अनेक कर्त्तव्य हैं। इस प्रकार, व्यक्ति और समाज दोनों एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। जिस समाज में जितने अधिक लोग अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, वह समाज उतना ही सुदृढ़, स्वस्थ, सम्पन्न तथा उन्नतिशील रहता है। दूसरी ओर, यदि व्यक्ति समाज के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन नहीं करता है, तो उसका प्रभाव समाज के सभी सदस्यों पर पड़ता है। इसलिए अपने सुख और शान्ति तथा उन्नति के लिए हमें समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन बड़ी सतर्कता तथा तत्परता से करना चाहिए।

समाज के प्रति व्यक्ति के कर्तव्य (Duties of a Person towards Society) –
मनुष्य स्वस्थ और सुखी रहे, इस बात का ध्यान रखकर ही समाज अपने नियम बनाता है परन्तु नियमों का पालन या उल्लंघन करना व्यक्ति का काम होता है। जहाँ समाज के सभी लोग नियम पालन करते हैं वहाँ समाज का कार्य शान्तिपूर्वक चलता है। यदि समाज के कुछ व्यक्ति भी समाज के नियम भंग करते हैं, तो उसका प्रभाव पूरे समाज पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पड़ता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी प्रत्येक व्यक्ति के समाज के प्रति कुछ कर्त्तव्य हैं। इन कर्त्तव्यों का पालन हमें अपने सुख के लिए ही नहीं, समाज के लिए भी करना आवश्यक होता है। ये कर्त्तव्य निम्नलिखित हैं –

(1) स्वच्छता या सफाई का मानव-जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। स्वयं को तथा अपने अन्य साथियों या समाज को स्वस्थ बनाए रखने के लिए सफाई का ध्यान रखना आवश्यक है। साफ-सुथरा स्थान, कपड़े और साफ-सुथरे व्यक्ति सभी को अच्छे और आकर्षक लगते हैं। व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखकर हम केवल अपने को ही स्वस्थ और सुखी नहीं रखते बल्कि समाज को स्वस्थ और सुखी रखने के लिए भी यह अत्यन्त आवश्यक है। अपने निवास-स्थान की सफाई के साथ-साथ पास-पड़ोस और अपने शहर की सफाई को भी ध्यान में रखकर प्रत्येक कार्य करना चाहिए।

(2) कुएँ, तालाब, नदी इत्यादि के सम्बन्ध में इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि इनके आस-पास गन्दे कपड़ों को धोकर, मल-मूत्र त्यागकर या कूड़ा इत्यादि डालकर जल को अशुद्ध और अस्वास्थ्यकर न बनाएँ।

(3) प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह अपने क्षेत्र में टूटी सड़कों की सूचना नगर महापालिका को अवश्य दे। यदि कहीं कोई मृत जानवर पड़ा हो तो उसकी सूचना भी सम्बन्धित कार्यालय में दे देनी चाहिए।

(4) समाज के बनाए हुए सड़क के नियमों का पालन करके दुर्घटनाओं से बचाव करें।

(5) यदि अपने घर या पास-पड़ोस में कोई संक्रामक रोग फैला हो, तो रोगी को अन्य लोगों से पृथक् रखने की व्यवस्था और स्वास्थ्य विभाग को सूचना भेजकर टीका आदि लगवाने का प्रबन्ध करना अति आवश्यक है। यदि रोगी को अस्पताल भेजना आवश्यक हो, तो उसको वहाँ भेजकर समाज के अन्य लोगों के स्वस्थ रहने में सहायता करनी चाहिए।

(6) घर के बाहर मैदान में या सड़क के किनारे मल-मूत्र त्यागकर गन्दगी करने से वातावरण दूषित होता है। ऐसा न करें और यदि दूसरे लोगों को इस प्रकार की गन्दगी करते देखें तो उन्हें भी स्वच्छता का महत्त्व समझाकर वैसा करने के लिए मना करना पर्यावरण को बचाने के लिए आवश्यक है।

(7) जब कोई संक्रामक रोग का रोगी ठीक हो जाए तो उसके कपड़े सीधे धोबी को न देकर वस्त्रों को पहले नि:संक्रामक पदार्थों के साथ उबालें तब उन्हें धोबी को देने चाहिए। उसके सभी सामान तथा कमरे की सफाई आदि के लिए नि:संक्रामक पदार्थों का भी प्रयोग आवश्यक है।

(8) जहाँ कहीं धूम्रपान वर्जित हो वहाँ बीड़ी-सिगरेट कदापि नहीं पीनी चाहिए। यदि दूसरे व्यक्ति ऐसा करते हैं तो उन्हें समझाना तथा धूम्रपान न करने के लिए बाध्य करना आवश्यक है।

(9) मेले या नुमाइश इत्यादि में जाने पर सफाई का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए और टीका इत्यादि लगवाकर ही जाना चाहिए। अन्य व्यक्तियों को भी इसके लिए प्रेरित करना चाहिए।

(10) यदि अपना स्वास्थ्य खराब हो तो अन्य लोगों को अपने से बचाने वाले नियमों का पालन करना चाहिए।

इस प्रकार, जब प्रत्येक व्यक्ति सम्पूर्ण समाज को अपना परिवार समझकर स्वास्थ्य के नियमों का पालन करना तथा कराना अपना उत्तरदायित्व समझेगा तथा तदनुरूप पालन करेगा तभी जन-स्वास्थ्य में सुधार हो सकेगा।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 13  लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जन-स्वास्थ्य से क्या तात्पर्य है?
उत्तरः
जन-स्वास्थ्य से तात्पर्य –
‘जन-स्वास्थ्य’ का अर्थ जनता का स्वस्थ होना माना जाता है। जिस देश या समाज में जितने अधिक व्यक्तियों का स्वास्थ्य उत्तम होता है वह देश या समाज उतनी ही अधिक उन्नत अवस्था को प्राप्त करता है। अतः जन-स्वास्थ्य पर प्रत्येक व्यक्ति को ध्यान देना आवश्यक है। समाज के एक-एक व्यक्ति को जब स्वास्थ्य के नियमों का ज्ञान होगा तभी अधिकांश लोग अपने को स्वस्थ रख सकेंगे। अपने हित और स्वास्थ्य लाभ के साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि समाज के अन्य लोगों को हमारे व्यवहार या कार्यों से दुःख या हानि न पहुँचे।

उदाहरणार्थ-प्राय: यह देखा जाता है कि अपने स्वास्थ्य और अपने निवास स्थान को साफ-सुथरा और अच्छा बनाने की दृष्टि से हम अपनी और अपने घर की सफाई तो करते हैं, परन्तु घर की गन्दगी को बाहर निकालकर लापरवाही से डाल देते हैं। इस कारण समाज के अन्य लोगों को हानि उठानी पड़ती है। अतः इस बात के लिए विशेष रूप से सतर्क होना चाहिए कि हमें ऐसा कार्य या व्यवहार करना है जिससे सम्पूर्ण समाज के लोगों का स्वास्थ्य ठीक रहे।

वास्तव में, व्यक्तिगत स्वास्थ्य तथा जन-स्वास्थ्य एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। व्यक्तियों के अस्वस्थ होने से जन-स्वास्थ्य को खतरा होने लगता है तथा जन-स्वास्थ्य का स्तर गिरने से स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य को भी खतरा उत्पन्न हो जाता है।

प्रश्न 2.
जन-स्वास्थ्य की उन्नति के लिए शासन द्वारा किए जाने वाले उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
जन-स्वास्थ्य की उन्नति हेतु शासन द्वारा किए जाने वाले उपाय –
जनता के स्वास्थ्य को अच्छा बनाने के लिए शासन की ओर से अनेक उपाय किए जाते हैं। इनमें से कुछ उपाय शासन स्वयं करता है जबकि अन्य को नगरपालिकाओं, महानगरपालिकाओं, नगर पंचायतों आदि स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से कराता है। यही नहीं, इस ओर स्वतन्त्र सामाजिक संस्थाओं का योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सम्पूर्ण समाज का स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए शासन द्वारा किए जाने वाले उपायों में निम्नलिखित उपाय महत्त्वपूर्ण हैं –

  • अनिवार्य शिक्षा-शासन बालकों के लिए अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करता है ताकि वे ज्ञान अर्जित कर स्वास्थ्य के नियमों को समझ सकें तथा उनके अनुरूप उन्हें कार्य करने की प्रेरणा प्राप्त हो सके।
  • प्रौढ़ शिक्षा-बच्चों के साथ-साथ प्रौढ़ों को शिक्षित करना भी राज्य अपना कर्त्तव्य समझता है। प्रौढ़ शिक्षा के अन्तर्गत स्वास्थ्य सम्बन्धी उपयोगी जानकारी अनिवार्य रूप से प्रदान की जाती है।
  • चलते-फिरते तथा स्थायी पुस्तकालयों का विकास-जन-स्वास्थ्य के नियमों को समझाने हेतु विभिन्न स्थानों पर साहित्य उपलब्ध कराने के लिए इस प्रकार के पुस्तकालय आदि आवश्यक हैं। इन स्थानों पर नागरिकों को आपस में विचार-विनिमय के लिए भी अवसर मिलना चाहिए। राज्य ऐसे पुस्तकालयों की स्थापना एवं संचालन का प्रबन्ध करता है।
  • स्वास्थ्य के नियमों का प्रचार-राज्य द्वारा महामारी एवं संक्रामक रोगों की जानकारी और रोकथाम, स्वास्थ्य के सामान्य नियमों आदि का रेडियो, टेलीविजन, पत्र-पत्रिकाओं, पोस्टरों आदि के माध्यम से व्यापक प्रचार किया जाता है।
  • परिवार कल्याण योजनाओं का क्रियान्वयन राज्य सुखी व स्वस्थ जीवन के लिए परिवार नियोजन का प्रचार-प्रसार करता है और शिशु व माता के कल्याण के लिए प्रसूतिका गृहों का निर्माण तथा उचित चिकित्सा हेतु परामर्श के साधन उपलब्ध कराता है।
  • चिकित्सा व्यवस्था और स्वास्थ्य संस्थाएँ बनाना-शासन द्वारा जन-जन को उचित चिकित्सा परामर्श तथा उपर्युक्त कार्यों के क्रियान्वयन के लिए विशेष स्वास्थ्य संस्थाओं का जाल शासन द्वारा सम्पूर्ण देश में फैलाया गया है।

प्रश्न 3.
व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य और सुख के सम्बन्ध में किन-किन बातों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है?
उत्तरः
व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य और सुख के लिए विशेष ध्यान देना आवश्यक होता है क्योंकि स्वास्थ्य और सुख का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है और स्वास्थ्य ऐसी वस्तु है जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनमोल सम्पत्ति है। संसार की समस्त सम्पत्ति खोने के बाद पुन: प्राप्त हो सकती है परन्तु खोया हुआ स्वास्थ्य किसी भी प्रयास द्वारा पुनः प्राप्त करना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हो जाता है। अपने को स्वस्थ और सुखी बनाए रखने के लिए व्यक्ति को अनेक बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्वच्छता, समय, निष्ठा तथा नियम पालन करना आवश्यक है।

स्वच्छता अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी है। किसी एक स्थान की गन्दगी भी स्वास्थ्य को खराब करने के लिए पर्याप्त होती है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने शरीर, वस्त्र, भोजन, घर और खाने-पीने की समस्त चीजों तथा पास-पड़ोस की सफाई का ध्यान रखना आवश्यक होता है।

अच्छे स्वास्थ्य के लिए नियमित जीवन व्यतीत करना; जैसे—प्रात: जल्दी उठना, शौच इत्यादि से निवृत्त होकर टहलना या व्यायाम करना, थोड़ा आराम करके स्नान करना, फिर ताजा शुद्ध नाश्ता लेकर अपने कार्य में लगना, समय से विश्राम और कार्य करने के साथ नियत समय पर पौष्टिक, हल्का, ताजा भोजन करना इत्यादि आवश्यक होता है।

परिश्रम और लगन से काम करने के साथ जीवन में सन्तोष रखना ही अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक होता है। सन्तोष के साथ कर्त्तव्य-पथ पर चलने वाला व्यक्ति सदैव प्रसन्न रहता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि एक व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य और सुख के सम्बन्ध में उन सभी कर्त्तव्यों को ध्यान में रखना चाहिए जिनके आधार पर उसका अपना स्वास्थ्य और जीवन सुखी बनता है। स्वास्थ्य के सम्बन्ध में मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों का ध्यान आवश्यक होता है। मन और शरीर दोनों से सन्तुष्ट व्यक्ति ही सुखी रह सकता है।

प्रश्न 4.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए-‘स्वास्थ्य के नियमों का प्रचार कार्य।’
उत्तरः
स्वास्थ्य के नियमों का प्रचार कार्य –
स्वास्थ्य के मुख्य नियमों का पालन व्यक्ति एवं समाज के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। आज के वैज्ञानिक युग में भी अधिकांश भारतीय स्वास्थ्य के नियमों से भली-भाँति परिचित नहीं हैं। अतएव सार्वजनिक हितों को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य के नियमों का व्यापक स्तर पर प्रचार कार्य अनिवार्य है।

स्वास्थ्य के नियमों का प्रचार कार्य विभिन्न स्तरों पर विभिन्न माध्यमों द्वारा किया जा सकता है। व्यापक स्तर पर यह कार्य सरकारी प्रचार तन्त्र के माध्यमों से किया जाता है। स्वास्थ्य विभाग निरन्तर रूप से यह कार्य करता रहता है। इसके लिए जन-सम्पर्क के समस्त साधनों का प्रयोग किया जाता है। पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर लेख एवं विज्ञापन देकर, स्वास्थ्य विभाग द्वारा स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रदर्शनियों आदि का आयोजन करके, अनेक प्रकार से यह प्रचार कार्य सम्पन्न किया जा सकता है।

सरकारी क्षेत्र के अतिरिक्त निजी एवं सामाजिक क्षेत्रों में भी स्वास्थ्य नियमों के प्रचार का कार्य किया जा सकता है। सभी सामाजिक संस्थाओं को चाहिए कि वे अन्य कार्यों के साथ-साथ जनता को स्वास्थ्य के नियमों से भी अवगत कराएँ। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक व्यक्ति भी अपने स्तर पर यह कार्य कर सकता है। अपने पास-पड़ोस में स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों का प्रचार करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। इस क्षेत्र में शिक्षा संस्थाएँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। समय-समय पर लगने वाले कैम्पों द्वारा ग्रामीण जनता को स्वास्थ्य के नियमों से अवगत कराया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, ग्राम पंचायतों के माध्यम से ग्रामीण जनता को स्वास्थ्य के नियमों से अवगत कराया जा सकता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 13 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जन-स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से व्यक्ति का प्रमुख कर्त्तव्य क्या है?
उत्तरः
जन-स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से व्यक्ति का प्रमुख कर्त्तव्य है-पर्यावरण को साफ-सुथरा तथा प्रदूषण-रहित रखना।

प्रश्न 2.
जन-स्वास्थ्य से क्या आशय है?
उत्तरः
जन-साधारण के सामान्य स्वास्थ्य को ‘जन-स्वास्थ्य’ कहा जाता है।

प्रश्न 3.
जन-स्वास्थ्य का व्यक्तिगत स्वास्थ्य से क्या सम्बन्ध है?
उत्तरः
जन-स्वास्थ्य तथा व्यक्तिगत स्वास्थ्य परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं। ये एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं।

प्रश्न 4.
जन-स्वास्थ्य के मुख्य नियम क्या हैं?
उत्तरः

  • खाँसने एवं छींकने में सावधानी रखें,
  • जहाँ-तहाँ न थूकें,
  • मल-मूत्र त्याग करने में सावधानी रखें तथा
  • जहाँ-तहाँ कूड़ा-करकट न फेंकें।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 13 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए.
1. व्यक्ति के समाज के प्रति कर्त्तव्य हैं
(क) हर प्रकार की सफाई का ध्यान रखें
(ख) संक्रामक रोगों की रोकथाम में सहयोग दें
(ग) सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान न करें
(घ) उपर्युक्त सभी कर्त्तव्य।
उत्तर
(घ) उपर्युक्त सभी कर्त्तव्य।

2. व्यक्तिगत स्वास्थ्य तथा जन-स्वास्थ्य का सम्बन्ध है –
(क) कोई सम्बन्ध नहीं है
(ख) व्यक्तिगत स्वास्थ्य ही महत्त्वपूर्ण है
(ग) दोनों में घनिष्ठ सम्बन्ध है
(घ) जनस्वास्थ्य ही महत्त्वपूर्ण है।
उत्तर
(ग) दोनों में घनिष्ठ सम्बन्ध है।

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UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 15 विकास तथा क्रियात्मक क्षमता पर व्यायाम का प्रभाव

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 15 विकास तथा क्रियात्मक क्षमता पर व्यायाम का प्रभाव (Effect of Exercise on Development and Functional Capacity)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 15 विकास तथा क्रियात्मक क्षमता पर व्यायाम का प्रभाव

UP Board Class 11 Home Science Chapter 15 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
व्यायाम से क्या आशय है? व्यायाम के मुख्य लाभ तथा नियम भी बताइए।
उत्तरः
शारीरिक स्वास्थ्य के लिए सन्तुलित आहार तथा शारीरिक स्वच्छता के साथ-साथ उचित व्यायाम, विश्राम तथा निद्रा भी नितान्त आवश्यक हैं। व्यायाम से प्रत्येक व्यक्ति परिचित है। बच्चों को प्रारम्भ से ही व्यायाम के गुणों से अवगत कराया जाता है। व्यायाम के गुणों एवं महत्त्व से प्रत्येक व्यक्ति परिचित है तथा समझता है कि नियमित रूप से व्यायाम करने से अनेक लाभ होते हैं, परन्तु फिर भी आलस्यवश अधिकांश व्यक्ति या तो व्यायाम करते ही नहीं अथवा करते भी हैं तो नियमित रूप से नहीं करते। हमारे स्वास्थ्य के लिए व्यायाम भी उतना ही आवश्यक है जितना कि भोजन तथा विश्राम।

व्यायाम का अर्थ –
ऐसी शारीरिक क्रियाएँ एवं गतिविधियाँ जो मनुष्य के समस्त अंगों के पूर्ण और सन्तुलित विकास में सहायक होती हैं व्यायाम कहलाती हैं। व्यायाम में शरीर के विभिन्न अंगों को विभिन्न प्रकार से गति करनी पड़ती है। व्यायाम के विभिन्न प्रकार हो सकते हैं। सुबह व शाम को घूमना भी एक प्रकार का व्यायाम ही है। खेल खेलना भी व्यायाम है। भागना-दौड़ना, दण्ड-बैठक लगाना, मलखम्भ, योगाभ्यास आदि भी व्यायाम के ही रूप हैं। तैरना भी एक अच्छा व्यायाम है। इसके अतिरिक्त स्त्रियों द्वारा घर के कार्य करना भी एक प्रकार से व्यायाम में सम्मिलित किया जा सकता है। जो व्यक्ति किसी भी प्रकार के श्रम के कार्य; जैसे-बढ़ईगीरी, राजगीरी आदि करते हैं, उन्हें अलग से व्यायाम करने की विशेष आवश्यकता नहीं होती। इसके विपरीत, मानसिक कार्य एवं अधिक समय तक बैठने वाले कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए अलग से व्यायाम करना आवश्यक होता है।

नियमित रूप से व्यायाम करने से शरीर सुन्दर, सुडौल एवं ओजस्वी बनता है। व्यायाम करने से मांसपेशियाँ सुविकसित होती हैं तथा शरीर की कार्यक्षमता में भी वृद्धि होती है। व्यायाम के परिणामस्वरूप शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य बढ़ता है। व्यायाम करते समय श्वसन क्रिया तीव्र हो जाती है; अतः अधिक मात्रा में ऑक्सीजन ग्रहण की जा सकती है। व्यायाम करने से पाचन क्रिया ठीक हो जाती है तथा भूख बढ़ती है। व्यायाम करने से नींद अच्छी आती है।

व्यायाम के लाभ –
समुचित व्यायाम करने से निम्नलिखित लाभ होते हैं –

  • शरीर अधिक स्वस्थ, सुन्दर, सुडौल तथा आकर्षक हो जाता है।
  • पेशियों के अधिक क्रियाशील हो जाने से शरीर तेजस्वी तथा स्फूर्तिदायक हो जाता है। आलस्य नहीं रहता है।
  • व्यायाम करते समय श्वसन क्रिया अधिक तेज हो जाती है जिससे फेफड़े शुद्ध वायु ग्रहण करते हैं। उनकी सामर्थ्य, धारिता तथा कार्यक्षमता बढ़ती है। इससे शरीर को अधिक ऑक्सीजन मिलने के साथ ही विषैली कार्बन डाइऑक्साइड को अधिक मात्रा में निकालने में सहायता मिलती है।
  • व्यायाम से हृदय गति बढ़ती है, अधिक रुधिर संचार होता है तथा शरीर के कोने-कोने तक पोषक तत्त्व तथा ऑक्सीजन पहुँचते हैं।
  • हृदय रोग, श्वसन तन्त्र के रोग तथा पाचन सम्बन्धी रोगों के होने की आशंकाएँ घटती हैं।
  • व्यायाम से मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं अर्थात् शारीरिक शक्ति का विकास होता है।
  • पाचन क्रिया तेज होती है, भूख अधिक लगती है। इससे शरीर स्वस्थ रहता है।
  • व्यायाम से मानसिक विकास होता है, मानसिक तनाव भी कम होता है। मस्तिष्क की कार्यशीलता में वृद्धि होती है।

व्यायाम के सामान्य नियम –
व्यायाम से लाभ प्राप्त करने के लिए व्यायाम के निम्नलिखित नियमों को जानना चाहिए। यदि अज्ञानवश व्यायाम किया जाए तो लाभ के स्थान पर हानि भी हो सकती है –

  • व्यायाम सदैव अपनी क्षमता के अनुकूल करना चाहिए। जब थकान अनुभव हो तो व्यायाम बन्द कर देना चाहिए।
  • प्रारम्भ में हल्का व्यायाम करना चाहिए तथा शक्ति बढ़ने पर क्रमशः कठिन एवं भारी व्यायाम किया जा सकता है।
  • व्यायाम सदैव नियमित रूप से करना चाहिए।
  • व्यायाम सदैव खुली हवा में ही करना चाहिए, बन्द कमरे में नहीं।
  • व्यायाम करते समय शरीर अधिक-से-अधिक खुला रहना चाहिए अर्थात् शरीर पर कम-से-कम कपड़े पहनने चाहिए।
  • सामान्य रूप से व्यायाम सुबह के समय करना ही उपयुक्त होता है।
  • व्यायाम से पहले तथा व्यायाम के तुरन्त पश्चात् कुछ खाना-पीना नहीं चाहिए। कुछ समय विश्राम करने के बाद ही कुछ खाना-पीना चाहिए।
  • व्यायाम सदैव रुचि से करना चाहिए। प्रसन्नता से किया गया व्यायाम मनोरंजक तथा लाभदायक होता है।

प्रश्न 2.
विकास पर व्यायाम का क्या प्रभाव पड़ता है? विस्तार से स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
विकास जीवन की प्रमुख विशेषता तथा लक्षण है। विकास की प्रक्रिया आजीवन किसी-नकिसी रूप में चलती रहती है। विकास वह जटिल प्रक्रिया है, जिसके परिणामस्वरूप बालक या व्यक्ति की अन्तर्निहित शक्तियाँ एवं गुण प्रस्फुटित होते हैं। विकास के लिए विभिन्न कारक जिम्मेदार होते हैं। कुछ कारक विकास की प्रक्रिया को सुचारु बनाने में सहायक होते हैं तथा इसके विपरीत कुछ कारक ऐसे भी हैं जो विकास की प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। विकास का प्रत्यक्ष सम्बन्ध व्यक्ति की क्रियात्मक क्षमता से भी है। विकास के साथ-साथ व्यक्ति की क्रियात्मक क्षमता भी बढ़ती है। ‘विकास’ तथा ‘क्रियात्मक क्षमता’ को सुचारु बनाए रखने वाले कारकों में से एक महत्त्वपूर्ण कारक है-नियमित रूप से व्यायाम करना।

विकास पर व्यायाम का प्रभाव –
विकास अपने आप में एक बहुपक्षीय प्रक्रिया है। इसीलिए विकास के विभिन्न स्वरूप माने गए हैं। विकास के मुख्य स्वरूप या पक्ष हैं-शारीरिक विकास, सामाजिक विकास, मानसिक विकास, संवेगात्मक विकास तथा नैतिक विकास। विकास के इन सभी पक्षों को सुचारु बनाए रखने में नियमित व्यायाम का विशेष योगदान होता है। विकास पर व्यायाम के प्रभावों को स्पष्ट करने के लिए विकास के सभी स्वरूपों पर व्यायाम के पड़ने वाले प्रभावों का विवरण अग्रवर्णित है –

1. व्यायाम का शारीरिक विकास पर प्रभाव – विकास का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष शारीरिक विकास है। सुचारु शारीरिक विकास का अनुकूल प्रभाव विकास के अन्य पक्षों पर भी पड़ता है। जहाँ तक व्यायाम का प्रश्न है, नियमित व्यायाम निश्चित रूप से शारीरिक विकास को सुचारु बनाने में उल्लेखनीय योगदान देता है। नियमित व्यायाम से हमारा शरीर स्वस्थ रहता है, पुष्ट होता है तथा पर्याप्त स्फूर्ति बनी रहती है। उचित रूप से व्यायाम करने से शरीर के सभी संस्थान भी अपने कार्यों को सुचारु रूप से करते हैं।

उदाहरण के लिए शारीरिक व्यायाम से हमारा पाचन-तन्त्र सुचारु रूप से कार्य करता है, भूख सही रहती है, ग्रहण किए गए आहार का पाचन एवं अवशोषण भी सामान्य बना रहता है। इसके परिणामस्वरूप शरीर कुपोषण का शिकार नहीं होता तथा शरीर क्रमशः पुष्ट होता जाता है। इसी प्रकार शरीर का अस्थि संस्थान भी नियमित व्यायाम से दोषरहित तथा सुदृढ़ बना रहता है। उचित व्यायाम से अस्थि-संस्थान की गतिविधियाँ नियमित रहती हैं तथा हड्डियों के जोड़ों से सम्बन्धित दोषों से व्यक्ति बचा रहता है।

जहाँ तक शरीर के पेशी तन्त्र का प्रश्न है, निश्चित रूप से व्यायाम से यह तन्त्र भी प्रभावित होता है। व्यायाम से शरीर की सभी पेशियाँ सुविकसित तथा पुष्ट होती हैं। इसी प्रकार नियमित व्यायाम शरीर के श्वसन तन्त्र तथा परिसंचरण तन्त्र को भी अनुकूल रूप में प्रभावित करता है। व्यायाम करते समय शरीर का श्वसन तन्त्र पूर्ण रूप से सक्रिय हो जाता है तथा फेफड़ों में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन पहुँचती है। शरीर में पर्याप्त ऑक्सीजन पहुँचने से रक्त का शुद्धिकरण भी सही रूप में होता रहता है तथा साथ ही शरीर के विजातीय तत्त्व श्वसन तथा पसीने के माध्यम से शरीर से विसर्जित होते रहते हैं। इन दशाओं में शरीर निश्चित रूप से स्वस्थ बना रहता है।

नियमित व्यायाम शरीर के सुचारु विकास में योगदान देने के साथ-ही-साथ शरीर को विभिन्न रोगों से बचाए रखने में भी सहायक होता है। नियमित व्यायाम से व्यक्ति मोटापे का शिकार नहीं होता। इस स्थिति में व्यक्ति मोटापे से सम्बन्धित रोगों जैसे कि उच्च रक्त चाप, उच्च कोलेस्ट्रॉल, हृदय रोग तथा मधुमेह से बचा रहता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यायाम से व्यक्ति का शारीरिक विकास सुचारु रहता है तथा व्यक्ति का स्वास्थ्य उत्तम रहता है।

2. व्यायाम का सामाजिक विकास पर प्रभाव – विकास का दूसरा मुख्य पक्ष या स्वरूप हैसामाजिक विकास। सामाजिक विकास माध्यम से ही व्यक्ति का सामाजिक व्यवहार सामाजिक मान्यताओं एवं मर्यादाओं के अनुकूल बनता है। सामाजिक विकास ही व्यक्ति को सामाजिक समायोजन की योग्यता प्रदान करता है। सामाजिक विकास की प्रक्रिया अनिवार्य रूप से सामाजिक सम्पर्क तथा सम्बन्धों की स्थापना से परिचालित होती है।

सामाजिक विकास की प्रक्रिया सबसे तीव्र बाल्यावस्था में होती है। इस अवस्था में बालक का सामाजिक सम्पर्क परिवार के अतिरिक्त सबसे अधिक खेल समूह से होता है। खेल एवं व्यायाम के लिए एक सम-आयु समूह की आवश्यकता होती है। खेल के दौरान बालक सामाजिक मान्यताओं एवं नियमोंमर्यादाओं से भली-भाँति परिचित हो जाता है। इससे बालक के सामाजिक विकास में समुचित योगदान मिलता है। सामूहिक खेलों तथा व्यायाम की प्रक्रिया में बच्चों को सहयोग, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा तथा समता आदि सामाजिक गुणों के महत्त्व की व्यावहारिक जानकारी प्राप्त हो जाती है। यह सुचारु विकास के लिए अति महत्त्वपूर्ण सिद्ध होती है।

सामूहिक खेल तथा व्यायाम से बच्चों को आत्म-प्रदर्शन, नेतृत्व, प्रभुत्व आदि गुणों के विकास के अवसर भी उपलब्ध होते हैं। इन गुणों से व्यक्ति का समुचित विकास होता है तथा इन गुणों से बालक के सामाजिक विकास की प्रक्रिया भी सुचारु बनी रहती है। इसके अतिरिक्त सामूहिक खेल एवं व्यायाम निश्चित रूप से बच्चों में सामाजिक समायोजन के गुण का भी विकास करते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यायाम से सामाजिक विकास अनुकूल रूप से प्रभावित होता है।

3. व्यायाम का मानसिक विकास पर प्रभाव – बालक की मानसिक क्षमताओं का सुचारु विकास ही मानसिक विकास कहलाता है। मानसिक विकास के माध्यम से बालक की मानसिक क्षमताओं का उदय होता है तथा ये क्षमताएँ क्रमश: विकसित तथा पुष्ट होती हैं।

मानसिक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों में एक मुख्य कारक है, बालक का शारीरिक रूप से स्वस्थ तथा पुष्ट होना। वास्तव में शारीरिक रूप से पुष्ट बालक अधिक मानसिक श्रम कर सकते हैं तथा इसके परिणामस्वरूप उनका बौद्धिक विकास सुचारु होता है। इस सन्दर्भ में यह पूर्व निश्चित है कि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए व्यायाम की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। व्यायाम से मानसिक क्षमताओं के विकास में भी समुचित योगदान मिलता है। सामूहिक रूप से खेलने तथा व्यायाम करने से बालक की मानसिक तथा बौद्धिक क्षमताओं का सुचारु तथा बहुपक्षीय विकास होता है। इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि नियमित रूप से व्यायाम करना मानसिक विकास के लिए एक अनुकूल कारक है।

4. व्यायाम का संवेगात्मक विकास पर प्रभाव – बाल-विकास का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष संवेगात्मक विकास भी है। संवेगात्मक विकास का सम्बन्ध बालक के संवेगों के सुचारु विकास से है। जैसे-जैसे बालक का संवेगात्मक विकास होता है, वैसे-वैसे बालक संवेगों को नियन्त्रित करना सीख लेता है। बालक के संवेग क्रमशः सरल से जटिल रूप ग्रहण करते हैं।

सुचारु संवेगात्मक विकास के लिए व्यायाम तथा खेलों का विशेष महत्त्व होता है। विभिन्न मनोवैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा ज्ञात हुआ है कि नियमित रूप से व्यायाम करने से तथा सामूहिक खेलों एवं प्राणायाम आदि से संवेगों की उग्रता को नियन्त्रित करने में सहायता मिलती है। सामूहिक खेलों में सम्मिलित होने वाले बालक क्रमशः क्रोध, भय तथा ईर्ष्या आदि उग्र संवेगों को नियन्त्रित करने में सफल होते हैं। यह भी पाया गया है कि शारीरिक रूप से स्वस्थ बालकों में प्राय: अस्वस्थ रहने वाले तथा दुर्बल बालकों की अपेक्षा संवेगात्मक स्थिरता अधिक होती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि नियमित व्यायाम तथा खेल सुचारु संवेगात्मक विकास के लिए अनुकूल कारक हैं।

5. व्यायाम का नैतिक विकास पर प्रभाव – सम्पूर्ण विकास के लिए नैतिक विकास पर भी ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक है। नैतिक विकास का मूल्यांकन सामाजिक मान्यताओं एवं निर्धारित नियमों से होता है जो बालक या व्यक्ति समाज द्वारा निर्धारित नियमों एवं मान्यताओं का स्वेच्छा से पालन करता है, उसका नैतिक विकास सुचारु माना जाता है। नैतिकता के नियम उचित-अनुचित से सम्बन्धित होते हैं। अनुचित व्यवहार करने वाले व्यक्ति को अनैतिक माना जाता है तथा उचित व्यवहार करना नैतिकता का प्रतीक माना जाता है।

सुचारु नैतिक विकास के लिए जहाँ उचित शिक्षा आदि विभिन्न कारक जिम्मेदार होते हैं, वहीं व्यायाम तथा सामूहिक खेल सम्बन्धी गतिविधियों का भी उल्लेखनीय योगदान होता है। व्यायाम तथा नियमित रूप से खेलों में सम्मिलित होने से बालक का जीवन नियमित तथा संयमित होता है। इस स्थिति में बालक की संकल्प शक्ति का भी समुचित विकास होता है।

विकसित संकल्प शक्ति वाले बालक को नैतिक नियमों के पालन के लिए शक्ति तथा प्रेरणा मिलती है। व्यायाम तथा सामूहिक खेलों के दौरान खेल के साथियों से भी नैतिक विकास में काफी सहयोग प्राप्त होता है। निश्चित रूप से समूह में खेलने वाले बालक को सहयोग, सच्चाई तथा ईमानदारी एवं साहस का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त होता है। ये सभी नैतिक सद्गुण हैं तथा इनका समुचित विकास ही नैतिक विकास है। स्पष्ट है कि बालक के नैतिक विकास में खेल एवं व्यायाम का उल्लेखनीय योगदान होता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 15 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
व्यक्ति की क्रियात्मक क्षमता पर व्यायाम का प्रभाव स्पष्ट करें
उत्तरः
व्यक्ति के स्वास्थ्य एवं विकास के मूल्यांकन के लिए उसकी क्रियात्मक क्षमता को जानना भी आवश्यक होता है। कार्य या श्रम करने की शक्ति या क्षमता को क्रियात्मक क्षमता के रूप में जाना जाता है। सामान्य क्रियात्मक क्षमता के लिए शरीर का स्वस्थ तथा समुचित स्तर का ऊर्जावान होना अनिवार्य कारक है। जहाँ तक शारीरिक स्वास्थ्य एवं ऊर्जा का प्रश्न है, इसके लिए सबसे अनुकूल कारक नियमित रूप से व्यायाम करना ही है। नियमित रूप से व्यायाम करने वाले व्यक्ति के सभी तन्त्र स्वस्थ तथा सुदृढ़ बनते हैं।

इस स्थिति में व्यक्ति की क्रियात्मक क्षमता का सुचारु विकास एक स्वाभाविक परिणाम होता है। इस तथ्य को कुछ उदाहरणों से भी स्पष्ट किया जा सकता है। जब कोई व्यक्ति सही रूप में व्यायाम करता है तब श्वसन तन्त्र के माध्यम से शरीर में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन प्रवेश करती है। इससे शरीर का रक्त तेजी से शुद्ध होता रहता है तथा शुद्ध रक्त का शरीर में अधिक परिसंचरण होता है।

इससे शरीर को उचित पोषण प्राप्त होता है तथा शरीर में अधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है। पर्याप्त ऊर्जा उत्पन्न होने की स्थिति में व्यक्ति की क्रियात्मक-क्षमता भी बढ़ती है। एक अन्य उदाहरण पाचन-तन्त्र से सम्बन्धित है। यदि व्यक्ति नियमित रूप से व्यायाम करता है तो उसके पाचन-तन्त्र की क्रियाएँ सुचारु रूप से सम्पन्न होती हैं। इससे शरीर को समुचित पोषण प्राप्त होता है तथा वह आलस्य से बचा रहता है। इस दशा में व्यक्ति की क्रियात्मक क्षमता भी सामान्य बनी रहती है। पाचन तन्त्र के ही समान हमारे उत्सर्जन तन्त्र की क्रियाओं पर भी व्यायाम का अच्छा प्रभाव पड़ता है तथा यह स्थिति भी कार्यात्मक क्षमता के लिए अनुकूल कारक बनती है।

इसके अतिरिक्त एक अन्य तथ्य भी महत्त्वपूर्ण है। सामान्य तथा उत्तम क्रियात्मक क्षमता के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति का चित्त प्रसन्न हो तथा उसमें उत्साह और उल्लास की कमी न हो। यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि नियमित रूप से व्यायाम करने तथा खेल-कूद में सम्मिलित होने से चित्त प्रसन्न रहता है. तथा व्यक्ति उत्साहित रहता है। इन दशाओं में व्यक्ति प्रत्येक कार्य को प्रसन्नतापूर्वक करता है तथा कार्य के प्रति रुचि बनाए रखता है। इन परिस्थितियों में नि:सन्देह रूप से व्यक्ति की क्रियात्मक क्षमता भी निरन्तर उत्तम ही रहती है। स्पष्ट है कि नियमित व्यायाम क्रियात्मक क्षमता के सुचारु विकास के लिए एक अनुकूल कारक है। अच्छी क्रियात्मक क्षमता वाला व्यक्ति जीवन के सभी क्षेत्रों में सफल रहता है।

प्रश्न 2.
व्यायाम न करने के शरीर एवं स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल परिणामों का उल्लेख करें। ‘
उत्तरः
जहाँ एक ओर व्यायाम करने से विभिन्न लाभ होते हैं तथा विकास एवं क्रियात्मक क्षमता पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है, वहीं व्यायाम न करने की स्थिति में व्यक्ति के स्वास्थ्य एवं जीवन पर अनेक प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ सकते हैं।

निश्चित रूप से व्यायाम न करने की स्थिति में सामान्य स्वास्थ्य को सामान्य बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। यदि कोई व्यक्ति व्यायाम या खेल-कूद नहीं करता तो व्यक्ति के चेहरे का स्वाभाविक तेज या रौनक कम होने लगती है। यही नहीं व्यक्ति की शारीरिक चुस्ती-फुर्ती भी घटने लगती है। व्यायाम न करने की दशा में व्यक्ति के स्वभाव तथा व्यवहार पर भी बुरा प्रभाव पड़ने लगता है। इन दशाओं में व्यक्ति का स्वभाव उत्साहरहित तथा उदासीन बन जाता है।

उसके व्यवहार में चिड़चिड़ापन तथा झुंझलाहट देखी जा सकती है। कुछ व्यक्ति व्यायाम तो करते नहीं परन्तु स्वाद एवं लोभवश अधिक तथा पौष्टिक आहार ग्रहण करते रहते हैं। इस स्थिति में शरीर में वसा की मात्रा बढ़ जाती है तथा व्यक्ति मोटापे का शिकार हो जाता है। इस स्थिति में व्यक्ति को विभिन्न रोग भी घेर लेते हैं। मधुमेह, उच्च रक्तचाप तथा हृदय रोग इसी श्रेणी के रोग हैं। लगातार व्यायाम न करने से व्यक्ति की पाचन-क्रिया पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति अपच का शिकार होने लगता है तथा उसकी भूख भी घट जाती है।

प्रश्न 3.
टिप्पणी लिखिए—विभिन्न अवस्थाओं में उपयोगी व्यायाम।
उत्तरः
विभिन्न अवस्थाओं में उपयोगी व्यायाम
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UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 15 विकास तथा क्रियात्मक क्षमता पर व्यायाम का प्रभाव 2

UP Board Class 11 Home Science Chapter 15 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘व्यायाम’ से आप क्या समझती हैं?
उत्तरः
उन समस्त क्रियाओं तथा गतिविधियों को व्यायाम माना जाता है जो व्यक्ति के शरीर के समस्त अंगों के पूर्ण तथा सन्तुलित विकास में सहायक होती हैं।

प्रश्न 2.
नियमित रूप से व्यायाम करने से क्या मुख्य लाभ होता है?
उत्तरः
नियमित रूप से व्यायाम करने से शरीर सुन्दर, सुडौल तथा ओजस्वी बनता है।

प्रश्न 3.
व्यायाम के दो मुख्य नियम बताइए।
उत्तरः

  1. व्यायाम सदैव अपनी क्षमता के अनुकूल करना चाहिए। जब थकान अनुभव हो तब व्यायाम करना बन्द कर देना चाहिए।
  2. व्यायाम सदैव नियमित रूप से करना चाहिए।

प्रश्न 4.
व्यायाम करने से किस वर्ग के रोगों को नियन्त्रित किया जा सकता है?
उत्तरः
व्यायाम करने से मोटापे से सम्बन्धित रोगों को नियन्त्रित किया जा सकता है। इस वर्ग के मुख्य रोग हैं-उच्च रक्तचाप, उच्च कोलेस्ट्रॉल, हृदय रोग तथा मधुमेह।

प्रश्न 5.
व्यायाम से शरीर का कौन-सा तन्त्र या संस्थान प्रभावित होता है?
उत्तरः
व्यायाम से शरीर के सभी तन्त्र या संस्थान प्रभावित होते हैं। व्यायाम से शरीर के सभी तन्त्रों की क्रियाशीलता में सुधार होता है तथा शरीर की क्रियात्मक क्षमता का समुचित विकास होता है।

प्रश्न 6.
व्यायाम से व्यक्ति के विकास के कौन-कौन से पक्ष प्रभावित होते हैं?
उत्तरः
व्यायाम से व्यक्ति का सम्पूर्ण विकास सुचारु बनता है अर्थात व्यायाम से विकास के सभी पक्षों पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। .

प्रश्न 7.
अच्छी क्रियात्मक क्षमता से क्या लाभ होता है?
उत्तरः
अच्छी क्रियात्मक क्षमता वाला व्यक्ति जीवन के सभी क्षेत्रों में सफल रहता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 15 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –
1. स्वस्थ रहने के लिए व्यायाम आवश्यक है, क्योंकि यह शरीर को बनाता है –
(क) आलसी एवं निष्क्रिय
(ख) क्रियाशील एवं स्वस्थ
(ग) स्वस्थ एवं आलसी ।
(घ) दुर्बल एवं बुद्धिमान।
उत्तरः
(ख) क्रियाशील एवं स्वस्था

2. व्यायाम करने से त्वचा द्वारा शरीर से पृथक होते रहते हैं –
(क) अधिक उत्सर्जी पदार्थ
(ख) अधिक पौष्टिक पदार्थ
(ग) अधिक दुर्गन्धयुक्त पदार्थ
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तरः
(क) अधिक उत्सर्जी पदार्थ।

3. मनुष्य को व्यायाम कब करना चाहिए –
(क) भोजन के पश्चात
(ख) रात्रि में
(ग) प्रात:काल खाली पेट
(घ) चाहे जब।
उत्तरः
(ग) प्रात:काल खाली पेट।

4. व्यायाम से लाभान्वित हो सकते हैं –
(क) केवल स्कूल जाने वाले लड़के-लड़कियाँ
(ख) केवल छोटे बच्चे तथा वृद्ध जन
(ग) केवल खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले
(घ) सभी व्यक्ति लाभान्वित होते हैं।
उत्तरः
(घ) सभी व्यक्ति लाभान्वित होते हैं।

5. व्यायाम का अनुकूल प्रभाव पड़ता है –
(क) स्वास्थ्य एवं शारीरिक विकास पर
(ख) मानसिक एवं बौद्धिक विकास पर
(ग) संवेगात्मक विकास तथा स्वभाव पर
(घ) उपर्युक्त सभी अनुकूल प्रभाव।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी अनुकूल प्रभाव।

6. वृद्ध जनों के लिए उपयोगी व्यायाम है –
(क) सुबह-शाम घूमना तथा शारीरिक स्वास्थ्य के अनुसार हल्के कार्य करना
(ख) दौड़ लगाना या जॉगिंग करना
(ग) दौड़-धूप के खेल खेलना
(घ) कोई भी व्यायाम उपयोगी नहीं है।
उत्तरः
(क) सुबह-शाम घूमना तथा शारीरिक स्वास्थ्य के अनुसार हल्के कार्य करना।

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UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति (Water and Food Materials Supply)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति

UP Board Class 11 Home Science Chapter 12 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जल प्राप्ति के प्राकृतिक स्रोतों को बताइए। गाँवों में इन स्रोतों का किस प्रकार लाभ उठाया जा सकता है?
अथवा
जल क्या है? गाँव में जल प्राप्ति के प्रमुख साधनों को समझाइए।
अथवा
जल का संघटन बताइए। जल प्राप्ति के स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
जल से आशय (Meaning of Water) –
जल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का एक यौगिक है। इसमें दो भाग हाइड्रोजन और एक भाग ऑक्सीजन है। इसका रासायनिक सूत्र H2O है। यही शुद्ध जल होता है। सामान्यत: जल में कई प्रकार के लवण घुले रहते हैं जिसके कारण यह अशुद्ध हो जाता है। जल एक महत्त्वपूर्ण विलायक होने के कारण अनेक पदार्थों (जैसे अनेक तत्त्वों के लवण इत्यादि) को अपने अन्दर घोल लेता है।

जल प्राप्ति के स्रोत (Sources of Water) –
वर्षा ही जल प्राप्ति का प्रमुख स्रोत है। समुद्र और झीलों का जल, वाष्प बनकर वायुमण्डल में पहुँचता है। वायुमण्डल में यह ठण्डा होकर बादलों का रूप ले लेता है और वर्षा के रूप में भूमि पर गिरता है।

वर्षा के जल का कुछ भाग पृथ्वी पर बहता है जबकि उसका काफी भाग मिट्टी से होकर भूमि के अन्दर चला जाता है। यह भूमि के अन्दर उपस्थित कच्ची या पक्की चट्टानों के ऊपर एकत्र होता रहता है। इस प्रकार जल स्रोतों को दो भागों में विभाजित किया जाता है – (1) पृष्ठ स्रोत तथा (2) भूमिगत स्रोत। इनका विवरण निम्नवत् है –

1. पृष्ठ स्रोत (Surface water) –
जैसा उपर्युक्त विवरण में बताया गया है, जल के सभी स्रोत वर्षा के जल से ही बनते हैं, इनका हम निम्नलिखित प्रकार से अध्ययन करते हैं –

(क) वर्षा का जल–अनेक स्थानों पर वर्षा के जल को जलरोधी कुण्डों में एकत्र कर लिया जाता है, वैसे भी गड्डे इत्यादि में यह जल एकत्र हो जाता है। यह जल पीने आदि के लिए उपयोगी नहीं होता है, फिर भी यदि जलकुण्ड साफ-सुथरे हों, तो सामान्य क्रिया द्वारा इसे पीने योग्य बनाया जा सकता है।

(ख) जलधाराएँ-पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा का जल, जलधाराओं के रूप में प्रवाहित होता है। प्रारम्भिक रूप में जल शुद्ध होता है किन्तु मिट्टी इत्यादि मिल जाने के कारण इसमें अनेक अशुद्धियाँ व्याप्त हो जाती हैं।

(ग) नदियाँ-बर्फ के पिघलने तथा जलधाराओं आदि के मिलने से नदियाँ बनती हैं। इनके जल में अनेक प्रकार की अशुद्धियाँ हो सकती हैं जो धरातलीय स्रोत अथवा रास्ते में मिलती रहती हैं।

(घ) झीलें-वर्षा और बर्फ के पिघले जल से पहाड़ी क्षेत्रों में झीलें बन जाती हैं। सामान्यतः झीलों का तल जलरोधी होता है। कई बार झीलों में अन्य स्रोत भी मिल जाते हैं। कभी-कभी झरने इत्यादि भी झीलों को भरने में सम्मिलित होते हैं। यह जल भी अनेक कारणों से अशुद्ध होता है।

(ङ) समुद्र-पृथ्वी के सम्पूर्ण तल से बहकर आने वाला जल समुद्र में एकत्रित हो जाता है। यह जल अत्यन्त अशुद्ध एवं खारा होता है। यह न तो पीने योग्य होता है और न ही कृषि-कार्यों के लिए उपयोगी होता है।

(च) परिबद्ध जलाशय-यह एक कृत्रिम झील होती है जो जलधाराओं को रोककर बनाई जाती है। इसको कृत्रिम जलाशय भी कहा जा सकता है। जल की कमी के समय में इनका जल किसी अच्छी विधि द्वारा शुद्ध करके उपयोग में लाया जा सकता है।

2. भूमिगत स्रोत (Ground water) –
वर्षा का जल भूमि के अन्दर धीरे-धीरे समाता रहता है तथा भीतरी भागों में पहुँचकर पक्के स्थानों में, कंकरीली या चट्टानी परतों के ऊपर जमा हो जाता है। इस प्रकार का जल कभी-कभी अपने आप स्रोत के रूप में निकल आता है अन्यथा कृत्रिम विधियों द्वारा इसे बाहर निकाला जाता है। प्रमुख भूमिगत स्रोत – (क) झरने, (ख) कुएँ, (ग) ट्यूबवैल होते हैं।

(क) झरने – यह भूमि द्वारा अवशोषित जल ही है जो किसी स्थान पर जल-स्तर के खुल जाने से बाहर निकल आता है। इसी को झरना (spring) कहते हैं। इसमें भी अनेक पदार्थ घुले हुए हो सकते हैं। विभिन्न स्थानों पर पाए जाने वाले झरनों के पानी के गुण भिन्न-भिन्न होते हैं।

(ख) कुएँ-यह भूमि द्वारा अवशोषित जल है जो किसी चट्टान पर जाकर रुक जाता है। इसमें भी अनेक विलेय अशुद्धियाँ होती हैं। इसे भूमि को खोदकर निकाला जाता है। कुछ कुएँ उथले होते हैं जो ऊपरी जलधारी स्तर तक ही बनाए जाते हैं। अन्य अधिक नीचे तथा अधिक पक्के जलधारी स्तर तक खोदे जाते हैं। यह जल अच्छा तथा पीने योग्य होता है। कुएँ से रहट, घिरौं या शक्तिचालित पम्प द्वारा जल निकालने की व्यवस्था होती है।

(ग) ट्यूबवैल-भूमिगत जल को प्राप्त करने के लिए ट्यूबवैल भी बनाए जाते हैं। ये अत्यधिक गहरे होते हैं तथा इनसे जल प्राप्त करने के लिए विद्युत-चालित पम्प इस्तेमाल किए जाते हैं। इनकी गहराई 100 मीटर तक भी हो सकती है।

गाँवों में परिस्थितियों के अनुसार नदियों, झीलों तथा वर्षा के जल को उपयोग में लाया जाता है। इसके अतिरिक्त भूमिगत जल को भी कुओं. ट्यूबवैल अथवा हैंडपम्प के माध्यम से प्राप्त कर लिया जाता है। इन स्रोतों से प्राप्त जल को सामान्य रूप से किसी घरेलू विधि द्वारा शुद्ध करके ही पीने के काम में लाना चाहिए।

प्रश्न 2.
नगरों में किस प्रकार से पेयजल तैयार किया जाता है?
अथवा
जल को पीने योग्य बनाने की बड़े शहरों में जो व्यवस्था होती है, उसका क्रमवार वर्णन कीजिए।
उत्तरः
नगरों में पेयजल आपूर्ति तथा जल शोधन (Supply of Drinking Water and Purification of Water in Cities) –
नगरों में प्राय: नदियों के जल को जल आपूर्ति के लिए प्रयोग में लाया जाता है। यह जल वर्षा का तथा प्राकृतिक होता है। प्राकृतिक जल में अनेक अवांछित एवं हानिप्रद अशुद्धियाँ होती हैं जिन्हें दूर करने के लिए जल का शोधन होता है। इसमें नदी का जल विभिन्न हौजों; जैसे-स्कन्दन हौज, तलछटी हौज, निस्यन्दन हौज और क्लोरीनीकरण हौज से होकर निकाला जाता है। जब इन हौजों में होकर पानी निकलता है तो इसकी अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं तथा जल पीने योग्य हो जाता है। इसके लिए एक निश्चित विधि निश्चित चरणों में अपनाई जाती है –

1. स्कन्दन हौज (Coagulation tank) – जल को पहले इसी हौज में भेजा जाता है। पानी की अशुद्धियों को दूर करने के लिए स्कन्दन पदार्थ जैसे लोहा और ऐलुमिनियम के लवण प्रयोग में आते हैं।
2. तलछटी हौज (Setling tank) – स्कन्दित जल को निस्तारण हेतु इस हौज में भेजा जाता है जहाँ जल स्थिर रहता है और अशुद्धियाँ हौज की तली में नीचे बैठ जाती हैं।
3. निस्यन्दन हौज (Filtration tank) – जल को छानने के लिए बड़े आयताकार टैंकों में बजरी, कंकड़, मोटी रेत, महीन रेत तथा चारकोल से निर्मित फिल्टर बेड्स (Filter Beds) बनाए जाते हैं।
4. वातन तथा क्लोरीनीकरण (Ventilation and Chlorination) – आवश्यकता पड़ने पर जल का क्लोरीनीकरण तथा वातन किया जाता है।
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति 1

उपर्युक्त सभी टैंकों से निकालने पर जल की विभिन्न अशुद्धियों और जीवाणुओं का निराकरण हो जाता है। किन्तु जल में अब भी कुछ रोगाणु शेष रह जाते हैं। इन्हें नष्ट करने के लिए द्रव क्लोरीन, ब्लीचिंग पाउडर या ओजोन आदि को निश्चित मात्रा में मिलाया जाता है। ये पदार्थ रोगाणुओं को पूर्णत: नष्ट कर देते हैं।

वातन के लिए जल को फव्वारे के रूप में निकालते हैं। इस प्रकार, जल में वायु के मिलने से इसकी गन्ध इत्यादि दूर हो जाती है तथा कीटाणु आदि को नष्ट करने में सहायता मिलती है।

प्रश्न 3.
शुद्ध जल से क्या तात्पर्य है? जल में किस प्रकार की अशुद्धियाँ हो सकती हैं? दूषित जल को शुद्ध करने की विधियाँ बताइए।
अथवा
जल किन कारणों से अशुद्ध होता है? दूषित जल को शुद्ध करने की विधियाँ लिखिए।
उत्तरः
शुद्ध जल (Pure Water) –
शुद्ध जल स्वादहीन, गन्धहीन तथा रंगहीन द्रव होता है। यह स्वच्छ एवं पूर्ण रूप से पारदर्शी होता है। इसमें एक प्रकार की प्राकृतिक चमक होती है। जल एक सार्वभौमिक तथा उत्तम विलायक है, इसलिए इसके अशुद्ध होने की अत्यधिक सम्भावना रहती है। यह अनेक वस्तुओं को बिना घुली अवस्था में भी रोके रखता है।

जल की अशुद्धियाँ (Impurities of Water) –
जल में दो प्रकार की अशुद्धियाँ मिलती हैं –

  1. विलेय (घुलित) अशुद्धियाँ तथा
  2. अविलेय (अघुलित) अशुद्धियाँ।

1. विलेय अशुद्धियाँ (Soluble impurities) – जल अनेक पदार्थों के सम्पर्क में आने पर उन्हें घोल लेता है। सामान्य अवस्था में जो जल हम पीते हैं उसमें भी अनेक रासायनिक पदार्थ, विशेषकर लवण आदि थोड़ी मात्रा में घुले रहते हैं। इनकी अधिक मात्रा होने पर ये हानिकारक हो जाते हैं। ये अशुद्धियाँ निम्नलिखित प्रकार की हो सकती हैं –

  • लवण-अनेक तत्त्वों के लवण जल में घुल जाते हैं और जल को दूषित कर देते हैं। कुछ लवण जल को कठोर बना देते हैं। इनमें कैल्सियम तथा मैग्नीशियम के बाइकार्बोनेट, सल्फेट तथा क्लोराइड्स इत्यादि प्रमुख हैं।
  • सड़े हुए जैविक पदार्थ-अनेक जैविक पदार्थों के मृत भाग जल में घुल जाते हैं तथा उनसे प्राप्त लवण इसी में घुले रहते हैं। इनमें नाइट्राइट्स, नाइट्रेट्स व अमोनिया इत्यादि के लवण हो सकते हैं।
  • गैसें-अनेक गैसें जल में घुलनशील हैं। उदाहरणार्थ-हाइड्रोजन सल्फाइड, कार्बन डाइऑक्साइड, अमोनिया आदि जल में घुलकर उसे दूषित कर देती हैं।

2. अविलेय अशुद्धियाँ (Insoluble impurities) – अशुद्ध जल में कुछ ऐसी अशुद्धियाँ भी पायी जाती हैं जो जल में घुलती नहीं परन्तु इनका जल में अस्तित्व ही जल को दूषित एवं हानिकारक बना देता है। इस प्रकार की मुख्य अशुद्धियाँ निम्नलिखित हैं –

  • धूल-मिट्टी के कण एवं विभिन्न प्रकार का कूड़ा-करकट; उदाहरणार्थ–पत्ते, घास, तिनके आदि।
  • विभिन्न रोगों के कीटाणु व बीजाणु। पानी में मुख्य रूप से हैजा, पेचिश, मोतीझरा आदि रोगों के कीटाणु विद्यमान हो सकते हैं।
  • विभिन्न कीटाणुओं के अण्डे तथा छोटे बच्चे।
  • विभिन्न पशुओं द्वारा उत्पन्न गन्दगी; जैसे-मल-मूत्र आदि।

उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि जल अनेक प्रकार से प्रदूषित हो सकता है। वास्तव में, किसी भी प्रकार से जल में किसी अशुद्धि के समावेश से जल प्रदूषित हो जाता है।

दूषित जल को शुद्ध करने की विधियाँ (Methods of Purification of Contaminated Water) –
अशुद्ध जल को शुद्ध करने के लिए तीन प्रकार की विधियाँ अपनाई जाती हैं –
(क) भौतिक विधि
(ख) यान्त्रिक विधि तथा
(ग) रासायनिक विधि।

(क) भौतिक विधि (Physical method) –
अशुद्ध जल को भौतिक विधि द्वारा निम्नलिखित तीन प्रकार से शुद्ध किया जा सकता है –

1. उबालकर (By boiling) – अशुद्ध जल को शुद्ध करने के लिए यह सर्वोत्तम उपाय है। जल को उबालने से उसमें घुलित या अघुलित अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं। विभिन्न प्रकार के कीटाणु, जीवाणु या रोगाणु इत्यादि मर जाते हैं। अधिक मात्रा में घुले हुए लवण अलग होकर नीचे बैठ जाते हैं। विभिन्न प्रकार की घुली हुई गैसें उबालने से निकल जाती हैं। इस प्रकार अशुद्ध जल को उबालने से उसकी अधिकांश अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं तथा जल पीने योग्य हो जाता है। घरेलू स्तर पर पीने के लिए जल को शुद्ध करने के लिए यह विधि सर्वोत्तम है।

2. आसवन द्वारा (By distillation) – आसवन की विधि के अन्तर्गत अशुद्ध जल को भाप में परिवर्तित कर लिया जाता है। इसके बाद जलवाष्प को ठण्डा कर पुन: जल में बदल दिया जाता है। इस क्रिया के लिए एक वाष्पीकरण उपकरण प्रयोग में लाया जाता है जिसका एक भाग भाप बनाने का तथा दूसरा भाग भाप को ठण्डा करने का कार्य करता है।

आसवन से प्राप्त जल आसुत जल कहलाता है। इसमें किसी प्रकार की घुलित या अघुलित अशुद्धियाँ नहीं रह जाती हैं। यह सर्वथा शुद्ध जल है किन्तु सामान्य अवस्था में इस जल का पीने के जल के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता क्योंकि आवश्यक लवण इस जल में उपस्थित नहीं रहते हैं। आसुत जल को दवाइयों आदि के लिए तथा इंजेक्शन को घोलने के उपयोग में लाया जाता है। आसवन विधि द्वारा केवल सीमित मात्रा में ही जल को शुद्ध किया जा सकता है।

3. पराबैंगनी किरणों द्वारा (By Ultraviolet rays) – प्रकाश में उपस्थित पराबैंगनी किरणें (Ultraviolet rays) जल को शुद्ध कर देती हैं। ये किरणें जल में उपस्थित रोगाणुओं को भी नष्ट कर देती हैं। बड़े पैमाने पर इस प्रकार की किरणों को यन्त्रों द्वारा बनाकर उपयोग में लाया जा सकता है।

(ख) यान्त्रिक विधि (Mechanical method) –
अशुद्ध जल को शुद्ध करने के लिए अनेक यान्त्रिक साधन भी अपनाए जा सकते हैं जिसमें विभिन्न प्रकार से छानना, निथारना आदि सम्मिलित हैं। पहली विधि में केवल मोटी अघुलित अशुद्धियों को दूर किया जा सकता है। दूसरी विधि में सभी अघुलित अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं परन्तु इसमें घुलित अशुद्धियों को दूर नहीं कर सकते हैं। विभिन्न परिमाप के कणों (पदार्थों) का उपयोग करके कुछ सीमा तक जल को शुद्ध किया जा सकता है। चार घड़ों द्वारा जल को शुद्ध करने की विधि का प्राचीनकाल से भारत में प्रचलन रहा है। इसके अतिरिक्त, अब विभिन्न प्रकार के वाटर फिल्टर उपलब्ध हैं जो पानी को सूक्ष्मता से छानते हैं तथा शुद्ध जल उपलब्ध हो जाता है। कुछ विद्युत-चालित उपकरण भी जल को शुद्ध करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। एक्वागार्ड इसी प्रकार का एक लोकप्रिय उपकरण है।

(ग) रासायनिक विधि (Chemical method) –
जल में घुलित या अघुलित अशुद्धियों को नष्ट करने के लिए कुछ रासायनिक पदार्थों का प्रयोग भी किया जाता है। ये रासायनिक पदार्थ दो प्रकार से क्रिया करते हैं। पहली क्रिया में ये अघुलित या घुलित अशुद्धियों को अवक्षेपण द्वारा अलग कर देते हैं जिसको छानकर अलग किया जा सकता है, जबकि दूसरी विधि, जल में उपस्थित रोगाणुओं को नष्ट करने के लिए होती है।

1. अवक्षेपण विधि (Dispersal method) – कुछ पदार्थ जल में उपस्थित अशुद्धियों को अलग कर उनके साथ तल में नीचे बैठ जाते हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण पदार्थ फिटकरी है। थोड़ी-सी फिटकरी जल के अविलेय तथा विलेय पदार्थों को अवक्षेपित कर जल को शुद्ध करके तल में बैठ जाती है। यद्यपि यह कुछ सीमा तक कीटाणुनाशक भी है किन्तु इसका अधिक प्रभाव नहीं होता। इससे कठोर जल भी मृदु हो जाता है। अवक्षेपण के लिए उपयोगी निर्मली नामक फल का ग्रामीण क्षेत्रों में प्रयोग किया जाता है।

2. कीटाणुनाशक पदार्थ (Germicidic substances) – अशुद्ध जल में रहने वाले विभिन्न रोगों के कीटाणुओं को नष्ट करने के लिए अनेक रासायनिक पदार्थ प्रयोग किए जाते हैं। इनमें से मुख्य निम्नलिखित हैं –

(क) लाल दवा – जल को शुद्ध करने के लिए यह उत्तम पदार्थ है। इसका रासायनिक नाम पोटैशियम परमैंगनेट है। इसके प्रयोग से अधिकांश कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। गाँवों में तालाब, कुओं तथा एकत्रित जल में इस दवा का प्रयोग किया जाता है। इसकी थोड़ी-सी मात्रा जल में घोलकर उस जल में डाली जाती है जिसमें कीटाणु उपस्थित होते हैं। इस दवा के प्रभाव से जल में विद्यमान कीटाणु नष्ट हो जाते हैं व जल शुद्ध हो जाता है।

(ख) कॉपर सल्फेट (तूतिया) – यह अत्यन्त अल्पमात्रा में प्रयुक्त किए जाने पर अशुद्ध जल को कीटाणुरहित कर सकता है। इसका रासायनिक नाम कॉपर सल्फेट है। घरेलू रूप में इसका प्रयोग इसलिए वर्जित है क्योंकि थोड़ी भी अधिक मात्रा में यह हानिकारक सिद्ध हो सकता है।

(ग) ब्लीचिंग पाउडर – ब्लीचिंग पाउडर की बहुत कम मात्रा ही जल को कीटाणुरहित कर सकती है। 2.5 किग्रा ब्लीचिंग पाउडर एक लाख गैलन पानी को रोगाणु-मुक्त कर देता है।

(घ) क्लोरीन – यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कीटाणुनाशक गैस है। सभी बड़े नगरों में जल-आपूर्ति की संस्था होती है जिसके द्वारा क्लोरीन गैस का प्रयोग कीटाणुओं को नष्ट करने के लिए किया जाता है।

पर्वोक्त रासायनिक पदार्थों के अतिरिक्त आयोडीन, ओजोन आदि गैसें भी जल को कीटाणुरहित कर सकती हैं, यद्यपि इनका प्रयोग प्रचलित नहीं है। ऑक्सीजन गैस स्वयं भी बहुत-सी अशुद्धियों का ऑक्सीकरण कर देती है।

प्रश्न 4.
खाद्य-पदार्थों के संग्रह से क्या आशय है? घर पर खाद्य-पदार्थों के उचित संग्रह की व्यवस्था का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तरः
आहार के लिए विभिन्न प्रकार के खाद्य-पदार्थों की निरन्तर आवश्यकता होती है। आहार की नियमित आपूर्ति के लिए घर पर विभिन्न खाद्य-सामग्रियों को संगृहीत करके रखना आवश्यक होता है। बाजार से लाई गई खाद्य-सामग्री को घर में सँभालकर सुरक्षित ढंग से रखना आहार-संग्रह कहलाता है। आहार-संग्रह व्यवस्थित ढंग से तथा खाद्य-सामग्री की प्रकृति के अनुरूप होना चाहिए। घर पर आहार-संग्रह की उचित व्यवस्था को आवश्यक एवं लाभकारी माना जाता है।

इससे रसोईघर के कार्य अर्थात् भोजन तैयार करने में विशेष सुविधा होती है, समय एवं श्रम की बचत होती है तथा आर्थिक लाभ भी होता है। उचित संग्रह से खाद्य-सामग्री नष्ट होने से बची रहती है। उचित संग्रह की समुचित जानकारी होने की दशा में अनाज आदि फसल के अवसर पर एक साथ वर्ष भर की आवश्यकतानुसार ले लिए जाते हैं। इस अवसर पर भाव कम होते हैं जिससे धन की बचत हो जाती है। इसी प्रकार प्याज, आलू, अदरक, लहसुन आदि खाद्य-सामग्रियों को भी एक साथ थोक के भाव खरीदने से आर्थिक लाभ होता है।

खाद्य-सामग्री के संग्रह की विधियाँ (Methods of Food Storage) –
भिन्न-भिन्न प्रकृति वाली खाद्य-सामग्रियों के संग्रह के लिए भिन्न-भिन्न उपाय एवं विधियाँ अपनाई जाती हैं। आहार-संग्रह के दृष्टिकोण से खाद्य-पदार्थों को तीन वर्गों में बाँटा जाता है। ये वर्ग हैं – नाशवान भोज्य-पदार्थ, अर्द्ध-नाशवान भोज्य-पदार्थ तथा अनाशवान भोज्य-पदार्थ।

खाद्य-सामग्री के नष्ट या विकृत होने के लिए दो प्रकार के कारण जिम्मेदार होते हैं। प्रथम वर्ग के कारणों को आहार को नष्ट करने वाले आन्तरिक कारण कहा जाता है तथा द्वितीय वर्ग के कारणों को बाहरी कारण कहा जाता है। आन्तरिक कारणों में मुख्य रूप से आहार में विद्यमान एन्जाइम उल्लेखनीय भूमिका निभाते हैं। बाहरी कारणों में मुख्य हैं-बैक्टीरिया, मोल्ड तथा यीस्ट का प्रभाव। इन सभी कारकों की सक्रियता नमी की उपस्थिति में बढ़ जाती है। इन कारकों के अतिरिक्त विभिन्न घरेलू जीव, कीट एवं पशु-पक्षी भी खाद्य-सामग्री को नष्ट एवं दूषित करते हैं।

नाशवान भोज्य पदार्थों का संग्रह (Storage of perishable food materials) – नाशवान भोज्य पदार्थों को नष्ट या विकृत होने से बचाने के लिए दो विधियों को अपनाया जा सकता है – प्रथम गर्म अथवा ताप पर आधारित विधि है तथा द्वितीय ठण्डी या प्रशीतन पर आधारित विधि है। गर्म अथवा ताप पर आधारित विधि के अन्तर्गत खाद्य-सामग्री को अधिक ताप पर गर्म करके विकृत होने से बचाया जा सकता है। कच्चे दूध को उबालकर रखने से वह फटने एवं विकृत होने से बच जाता है। ठण्डी अथवा प्रशीतन पर आधारित विधि के अन्तर्गत खाद्य-सामग्री को कम या अति कम तापक्रम पर संगृहीत करने की व्यवस्था की जाती है। घरों में इस विधि को फ्रिज के माध्यम से अपनाया जाता है, जबकि व्यापक स्तर पर यह कार्य कोल्ड स्टोरेज के माध्यम से किया जाता है।

अर्द्ध-नाशवान भोज्य पदार्थों का संग्रह (Storage of semi perishable food materials) – अर्द्ध-नाशवान भोज्य पदार्थों में नमी की मात्रा कम होती है जैसे कि आलू, प्याज, अदरक, लहसुन आदि। इस प्रकार के भोज्य पदार्थों के संग्रह के लिए किन्हीं विशिष्ट उपायों को अपनाना आवश्यक नहीं होता। इन खाद्य-पदार्थों को मुख्य रूप से आहार को नष्ट करने वाले बाहरी कारकों तथा नमी से बचाकर रखना आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ये खाद्य-पदार्थ अधिक गर्म वातावरण में न रखे जाएँ। साथ ही इन्हें जीव-जन्तुओं से बचाकर रखने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए।

अनाशवान भोज्य पदार्थों का संग्रह (Storage of imperishable food materials) – अनाशवान भोज्य-पदार्थों के संग्रहण में मुख्य रूप से बाहरी कारकों को नियन्त्रित करना अनिवार्य होता है। इस श्रेणी में मुख्य रूप से अनाजों, दालों आदि को सम्मिलित किया जाता है। इन भोज्य पदार्थों को संगृहीत करने के लिए दो प्रकार के उपाय किए जाते हैं। प्रथम प्रकार के उपायों के अन्तर्गत अनाजों एवं दालों को बन्द ढक्कनदार पात्रों या डिब्बों में पूर्ण रूप से नमीरहित दशा में रखा जाता है। द्वितीय प्रकार के उपायों के अन्तर्गत अनाजों में कीटनाशक दवाओं, नीम के सूखे पत्ते, नमक, हल्दी या बोरिक अम्ल को रखकर कीड़ों तथा घुन आदि से बचाया जा सकला है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 12 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पेयजल के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
शुद्ध जल (पेयजल) के गुण बताइए।
उत्तरः
पेयजल के गुण ऐसा जल, जो उन सभी हानिकारक पदार्थों से मुक्त हो जो स्वास्थ्य को हानि पहुँचा सकते हैं तथा जिसमें शरीर के लिए आवश्यक खनिज पदार्थ मौजूद हों, ‘पेयजल’ कहलाता है। आदर्श पेयजल में निम्नलिखित गुण होते हैं

  • यह स्वच्छ (पारदर्शी), गन्धहीन, रंगहीन तथा कुछ आवश्यक खनिज लवणयुक्त होना चाहिए।
  • यह सुस्वादु होना चाहिए।
  • इसका ताप सामान्यत: 4°-10°C के मध्य होना चाहिए।
  • यह जीवाणुओं, विषाणुओं, रोगाणुओं आदि से मुक्त होना चाहिए।
  • इससे बर्तनों, पाइपों तथा कपड़ों पर धब्बे नहीं लगने चाहिए।
  • यह हानिकारक पदार्थों से मुक्त होना चाहिए।
  • यह मृदु जल होना चाहिए।
  • अधिक देर तक रखने पर भी यह ताजा बना रहना चाहिए।

प्रश्न 2.
जल की कठोरता को कैसे दूर करेंगी?
उत्तरः
जल में दो प्रकार की कठोरता हो सकती है – अस्थायी कठोरता तथा स्थायी कठोरता। जल की अस्थायी कठोरता दो उपायों द्वारा दूर की जा सकती है। ये उपाय हैं –

1. जल को उबालना तथा
2. जल में चूना मिलाना। जल की स्थायी कठोरता को दूर करने के तीन उपाय हैं –

  • कपड़े धोने के सोडे द्वारा
  • सोडे तथा चूने द्वारा तथा
  • परम्यूरिट विधि द्वारा।

प्रश्न 3.
पेयजल तैयार करने के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
पेयजल तैयार करने के उपाय –
पेयजल सामान्यतः जल को उबालकर, छानकर तैयार किया जा सकता है। बड़े पैमाने पर विशेषकर शहरों में प्राकृतिक जल से अवांछित एवं हानिप्रद अशुद्धियों को निकालकर जल शोधन किया जाता है, तब यह पीने योग्य होता है। इसके लिए एक निश्चित विधि अपनाई जाती है जिसके निम्नलिखित सोपान होते हैं –

1. स्कन्दन (Coagulation)-इस विधि में अशुद्ध जल को ऐसे हौज में भेजा जाता है जिसमें कुछ स्कन्दन पदार्थ (Coagulants) मिलाए जाते हैं जो सामान्यत: लोहा तथा ऐलुमिनियम के लवण होते हैं। इस प्रकार के लवणों में फिटकरी, फेरस सल्फेट, फेरिक क्लोराइड, चूना आदि प्रमुख हैं। ये पदार्थ जल में घुलकर एक चिपचिपा पदार्थ बना देते हैं जो जल में उपस्थित अशुद्धियों को अपने साथ चिपकाकर भारी बना देते हैं और हौज की तली में बैठ जाते हैं। ये कुछ निलम्बित कणों को उदासीन भी बनाते हैं; अतः वे भारी होकर तली में बैठ जाते हैं और इस प्रकार जल शुद्ध हो जाता है।

2. निथारना-जल में बैठने वाली अशुद्धियों को निकालने का तरीका ‘निथारना’ कहलाता है। इस विधि में जल को कुछ समय के लिए स्थिर रखा जाता है जिससे उसमें उपस्थित अशुद्धियाँ नीचे बैठ जाती हैं। अब ऊपर के साफ जल को निथारकर अलग कर लिया जाता है तथा प्रयोग में लाया जाता है। तली में शेष बचे जल में अशुद्धियाँ रह जाती हैं जिसे विसर्जित कर दिया जाता है।

3. निस्यन्दन-इस विधि में जल को छाना जाता है ताकि छोटी-बड़ी सभी प्रकार की अशुद्धियाँ उसमें से निकल जाएँ।

4. कीटाणुनाशक-जब पानी में से विभिन्न प्रकार की अशुद्धियाँ निकल जाती हैं, तो उसमें कुछ जीवाणु इत्यादि रह जाते हैं जो रोग उत्पन्न कर सकते हैं। इन्हें नष्ट करने के लिए जल में क्लोरीन भेजी जाती है (ब्लीचिंग पाउडर का प्रयोग करके)। इस गैस के प्रभाव से सभी प्रकार के रोगाणु पूर्णत: नष्ट हो जाते हैं। सामान्यतः घरों में पोटैशियम परमैंगनेट (लाल दवा) का प्रयोग भी जल को कीटाणु-रहित करने के लिए किया जाता है। कुओं आदि में भी इस दवा को डलवाया जाता है।

प्रश्न 4.
मनुष्य के शरीर के लिए जल की उपयोगिता बताइए।
अथवा
ल की मानव-जीवन में क्या उपयोगिता है?
उत्तरः
शरीर के लिए जल अत्यन्त आवश्यक है। शरीर के अन्दर जल ही अनेक कार्यों को करने के लिए माध्यम तथा क्रियाशीलता प्रदान करता है। जल के निम्नलिखित मुख्य उपयोग हैं –

  • रुधिर का अधिकतम भाग जल ही होता है तथा रुधिर को तरल बनाए रखने का कार्य यही करता है।
  • जल भोजन को पचाने में सहायक है। पचा हुआ भोजन भी इसी के साथ आंत्र की दीवार में और वहाँ से सम्पूर्ण शरीर में घुलित अवस्था में पहुँचता है।
  • जल शरीर के ताप को नियन्त्रित तथा नियमित करता है।
  • हानिकारक, व्यर्थ तथा विषैले पदार्थों को जल ही अपने अन्दर घोलकर उत्सर्जन क्रिया के द्वारा वृक्कों से मूत्र के रूप में तथा त्वचा से पसीने के रूप में निकालता है।
  • जल शरीर के अनेकानेक भागों को कोमल तथा मुलायम बनाए रखता है, मुख्यतः मांसपेशियों, तन्तु तथा त्वचा आदि को।
  • शरीर जिन कोशिकाओं से मिलकर बना है उनमें प्रमुख भाग लगभग 85% से 90% तक जल ही होता है।
  • शरीर के अन्दर होने वाली सभी छोटी-बड़ी, निर्माण या टने-फटने सम्बन्धी क्रियाओं को. जिन्हें सम्मिलित रूप में उपापचय (metabolism) कहते हैं, जल ही आधार प्रदान करता है (बिना जल के ये क्रियाएँ नहीं हो सकती हैं)।
  • प्यास लगने पर जल ही प्यास को शान्त करता (बुझाता) है।

प्रश्न 5.
दैनिक कार्यों के लिए हमें कितने जल की आवश्यकता होती है?
उत्तरः
जल एक महत्त्वपूर्ण विलायक है। यह हमारे जीवन, रहन-सहन, व्यवसाय, भोजन, जलवायु के निर्माण आदि के लिए अत्यन्त आवश्यक है। कई बार हम यह भी सोच सकते हैं कि जल के बिना हमारा जीवन असम्भव है। यद्यपि व्यक्ति की जल सम्बन्धी आवश्यकता भिन्न-भिन्न होती है और इस सम्बन्ध में सामान्यत: नियम बनाना उचित प्रतीत नहीं होता। फिर भी एक सामान्य व्यक्ति को औसतन 120-140 लीटर तक जल की आवश्यकता होती है। यद्यपि जीवित रहने भर के लिए 1 – 1.5 लीटर जल ही प्रतिदिन आवश्यक होता है। निम्नांकित सारणी एक व्यक्ति के दिन भर के सामान्य जल-प्रयोग को प्रदर्शित करती है
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति 2

जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति 145 पूर्वोक्त विभाजन में ग्रीष्मकाल में जल की मात्रा में वृद्धि हो सकती है। इसी प्रकार सामान्यत: गर्म प्रदेशों में ठण्डे प्रदेशों की अपेक्षा निवासियों को अधिक जल की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6.
अशुद्ध जल क्या है? शुद्ध तथा अशुद्ध जल में अन्तर बताइए।
अथवा
शुद्ध जल तथा अशुद्ध जल में अन्तर लिखिए।
उत्तरः
अशुद्ध जल –
शुद्ध जल एक उत्तम विलायक है, इसी गुण के कारण जल शीघ्र ही विभिन्न लवणों तथा अन्य पदार्थों को घोल लेता है तथा इसके परिणामस्वरूप शीघ्र ही अशुद्ध हो जाता है। कुछ पदार्थ लटकी हुई अवस्था में भी जल को अशुद्ध बनाते हैं। जिस जल में शुद्ध जल के उपर्युक्त गुण नहीं होते वह जल अशुद्ध जल कहलाता है। शुद्ध एवं अशुद्ध जल के अन्तर को निम्नांकित सारणी द्वारा समझा जा सकता है –
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प्रश्न 7.
मृदु जल और कठोर जल में अन्तर लिखिए।
उत्तरः
जल में अनावश्यक लवणों की उपस्थिति/अनुपस्थिति के आधार पर जल के दो प्रकार निर्धारित किए गए हैं जिन्हें क्रमश: मृदु जल (soft water) तथा कठोर जल (hard water) कहा जाता है। मृदु जल तथा कठोर जल की पहचान के लिए मुख्य उपाय है-साबुन द्वारा पानी में झाग बनाना। मृदु जल तथा कठोर जल के अन्तर का विवरण निम्नांकित है –
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति 4

प्रश्न 8.
अशुद्ध जल से होने वाली हानियों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
अशुद्ध जल से होने वाले रोगों की सूची बनाइए।
उत्तरः
अशुद्ध जल से होने वाली हानियाँ –
अशुद्ध जल में अनेक प्रकार के हानिकारक पदार्थ हो सकते हैं जिनकी उपस्थिति से ही यह दोषयुक्त होता है। जब ऐसा जल पीने के काम में लाया जाता है तो यह आहारनाल में पहुँचता है। जल में उपस्थित रोगों के जीवाणु इत्यादि आहारनाल के विभिन्न स्थानों में अपनी क्रिया प्रारम्भ कर देते हैं। इस प्रकार शरीर में कुछ ऐसे लक्षण उत्पन्न होते हैं जो किसी रोग को उत्पन्न करते हैं।

अशुद्ध जल से फैलने वाले रोग – अशुद्ध जल से सामान्यतः आहारनाल सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते हैं। उदाहरणार्थ – हैजा, टायफॉइड, अतिसार, संग्रहणी, आंत्रक्षय तथा पीलिया आदि।

दूषित जल का स्वास्थ्य पर प्रभाव –
दूषित जल का जन-जीवन पर स्पष्ट रूप से कुप्रभाव पड़ता है। दूषित जल से अनेक प्रकार की महामारियाँ; जैसे-टायफॉइड, पेचिश आदि रोग हो जाते हैं क्योंकि इन रोगों के रोगाणु दूषित जल में उपस्थित रहते हैं। गोलकृमि, सूत्रकृमि आदि आँतों में रहने वाले परजीवी भी दूषित जल द्वारा मनुष्य की आँत में पहुंचते हैं। दूषित जल में ऑक्सीजन की कमी होती है; अत: ऐसे जल में रहने वाली मछलियाँ आदि भी मर जाती हैं। यही नहीं, दूषित जल दुर्गन्ध के कारण वायुमण्डल को अशुद्ध करता है। इस जल का पशुओं को प्रयोग कराना वर्जित होना चाहिए क्योंकि यह उनमें भी रोग पैदा करता है।

दूषित जल, रोगाणु मुक्त होने पर भी अन्य कई प्रकार से स्वास्थ्य को हानि पहुँचाने वाला होता है। इससे नज़ला, त्वचा के रोग, उल्टियाँ, हैजा, डायरिया आदि जैसे रोगों के लक्षण भी पैदा होते हैं।

प्रश्न 9.
जल को शुद्ध करने की घरेलू विधियों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
जल को शुद्ध करने की चार-घड़ों की विधि का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तरः
जल शुद्ध करने की घरेलू विधियाँ

  1. जल किसी भौतिक साधन से शुद्ध किया जा सकता है; जैसे – उबालना, आसवन आदि।
  2. रासायनिक पदार्थों के प्रयोग के द्वारा भी जल शुद्ध किया जा सकता है; जैसे-कीटाणुनाशक पोटैशियम परमैंगनेट (लाल दवा) का प्रयोग संगृहीत जल में किया जाता है।
  3. अशुद्ध जल को शुद्ध करने के लिए अनेक यान्त्रिक साधन अपनाए जा सकते हैं, जिसमें कपड़े द्वारा छानना तथा छन्ने कागज द्वारा छानना आदि सम्मिलित हैं। पहली विधि में केवल मोटी अघुलित अशुद्धियों को दूर किया जा सकता है। दूसरी विधि में सभी अघुलित अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं, परन्तु इसमें सभी घुलित अशुद्धियों को दूर नहीं कर सकते हैं।

घरेलू फिल्टर बेड विधि : चार घड़ों की विधि –
इस विधि में चार घड़े लिए जाते हैं। इनमें से तीन घड़ों की पेंदी में एक छोटा-सा छिद्र कर लिया जाता है जिससे पानी बूंद-बूंद करके निकल सके। इन घड़ों को एक बड़े स्टैण्ड में एक के ऊपर एक करके इस प्रकार रख दिया जाता है कि ऊपर वाले घड़े का जल बूंद-बूंद करके दूसरे घड़े में आ जाए। इसी प्रकार दूसरे घड़े का जल तीसरे में और तीसरे का चौथे में आ सकता है।

इस प्रकार रखे गए घड़ों में सबसे ऊपरी घड़े में अशुद्ध जल रखा जाता है जो बूंद-बूंद करके निचले घड़े में गिरता रहता है। दूसरे घड़े में रखे । लकड़ी के कोयलों पर यह जल गिरकर छनता है और पेंदी से निकलकर चित्र 12.2-जल शुद्ध करने की तीसरे घड़े में पहुँचता है। इस घड़े में पहले से ही रेत (बालू) भरकर रखी जाती है। इस घड़े में जल एक बार और छनता है और अत्यन्त बारीक कण भी रेत के द्वारा छान लिए जाते हैं। इस प्रकार चौथे (सबसे निचले) घड़े में जल निलम्बित अशुद्धियों से रहित होता है।

यह विधि बड़े पैमाने पर जल शुद्ध करने की आधारभूत विधि है।
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 12 जल तथा खाद्य पदार्थ आपूर्ति 5

प्रश्न 10.
खाद्य पदार्थों की प्राप्ति के मुख्य स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
खाद्य पदार्थों की प्राप्ति के स्रोत –
मनुष्य ने अपने आहार में असंख्य खाद्य-पदार्थों को सम्मिलित किया है। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में निवास करने वाले व्यक्तियों के आहार में बहुत अधिक विविधता देखी जा सकती है। इस स्थिति में खाद्य पदार्थों की प्राप्ति के स्रोतों का व्यवस्थित अध्ययन करने के लिए उनका स्पष्ट वर्गीकरण करना आवश्यक है। सामान्य रूप से खाद्य पदार्थों की प्राप्ति के स्रोतों के दो वर्ग निर्धारित किए जाते हैं। खाद्य-प्राप्ति के वनस्पतिजन्य स्रोत तथा खाद्य-प्राप्ति के प्राणिजन्य स्रोत। इन दोनों स्रोतों का सामान्य परिचय निम्नलिखित है –

1.खाद्य-प्राप्ति के वनस्पतिजन्य स्त्रोत-मनुष्य के खाद्य-पदार्थों की प्राप्ति का एक मुख्य स्रोत वनस्पति-जगत है। वनस्पति-जगत से अनाज, दालें, सब्जियाँ तथा फल प्राप्त होते हैं। ये सभी खाद्य पदार्थ विभिन्न पोषक-तत्त्वों से भरपूर तथा भूख को शान्त करने वाले होते हैं। फलों एवं सब्जियों में पर्याप्त मात्रा में विटामिन एवं खनिज लवण पाए जाते हैं। अनाज कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होते हैं। दालों में प्रोटीन की प्रचुरता होती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि वनस्पति-जगत से प्राप्त होने वाले खाद्य-पदार्थ हमारी आहार सम्बन्धी सम्पूर्ण आवश्यकता को पूरा कर सकते हैं।

2. खाद्य-प्राप्ति के प्राणिजन्य स्रोत-मनुष्य की खाद्य-सामग्री की प्राप्ति का एक स्रोत प्राणि-जगत भी है। प्राणि-जगत से मनुष्य मुख्य रूप से दूध, मांस तथा अण्डे प्राप्त करता है। प्राणि-जगत से प्राप्त खाद्य-पदार्थ भी विभिन्न पोषक तत्त्वों से भरपूर होते हैं। दूध एक आदर्श एवं सम्पूर्ण आहार है। इसमें आहार के प्रायः सभी पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। अण्डों में भी प्रायः सभी पोषक तत्त्व पाए जाते हैं। मांस, प्रोटीन एवं खनिज लवणों की प्राप्ति का उत्तम स्रोत है। मांस में पायी जाने वाली प्रोटीन उत्तम प्रकार की तथा अधिक उपयोगी होती है।

प्रश्न 11.
खाद्य पदार्थों में मिलावट से क्या आशय है?
उत्तरः
खाद्य पदार्थों में मिलावट –
प्रत्येक खाद्य पदार्थ का अपना एक विशेष संघटन होता है। उसमें उपस्थित ये संघटक तत्त्व ही उस खाद्य पदार्थ के पोषक गुणों को निर्धारित करते हैं। किसी खाद्य पदार्थ से, निश्चित मात्रा में उपस्थित उस पोषक तत्त्व को निकाल लिया जाए अथवा अन्य कम मूल्य का या विजातीय कोई पदार्थ मिला दिया जाए तो यह क्रिया मिलावट या अपमिश्रण कहलाती है।

भारत सरकार के खाद्य अपमिश्रण निवारण नियम (Prevention of Food Adulteration Act, 1954) के अनुसार निम्नलिखित स्थितियों में खाद्य पदार्थ को ‘अपमिश्रण’ या ‘मिलावट-युक्त’ कहा जाएगा –

  • खाद्य पदार्थ जब अपने वास्तविक रूप-रंग वाले नहीं रहते हैं।
  • खाद्य पदार्थों में स्वास्थ्य को हानि पहुँचाने वाला कोई तत्त्व होता है।
  • खाद्य पदार्थ से कोई पोषक तत्त्व निकाल लिया जाता है।
  • खाद्य पदार्थ में जब कोई घटिया या कम स्तर का कोई पदार्थ मिला दिया जाता है।
  • खाद्य पदार्थ में जब कोई हानिकर या विषैला तत्त्व मिला दिया जाता है या मिल जाता है।
  • जब खाद्य पदार्थ को ऐसे बर्तन (container) में रखा जाता है जिसके सम्पर्क से यह दूषित हो जाता है।
  • जब खाद्य पदार्थ किसी रोगी पशु-पक्षी से प्राप्त किया गया हो।
  • जब खाद्य पदार्थ में कोई वर्जित या न खाने योग्य रासायनिक पदार्थ, रंग आदि मिला दिया गया हो।
  • जब खाद्य पदार्थों के संग्रह करते समय अथवा डिब्बाबन्दी के समय दूषित हाथों या दूषित विधि का उपयोग किया गया हो।
  • जब खाद्य पदार्थ में संरक्षण के लिए प्रयुक्त रंग या संरक्षक पदार्थ निर्धारित सीमा से अधिक मिला दिया गया हो।
  • जब भोज्य पदार्थ के गुणों एवं शुद्धता का गलत विवरण उनके डिब्बे पर दिया गया हो।

इस प्रकार, मिलावट से खाद्य पदार्थ में पोषक तत्त्व या तत्त्वों की कमी हो जाती है अर्थात् उनका पोषक स्तर कम हो जाता है। यही नहीं, वे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध होते हैं और कभी-कभी तो रोग फैलाने वाले या मृत्यु को निमन्त्रण देने वाले भी हो सकते हैं।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 12 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जल से आप क्या समझती हैं?
अथवा
जल का संघटन लिखिए।।
उत्तरः
जल एक यौगिक है। यह दो तत्त्वों-हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के संयोग से बना है। इसका रासायनिक सूत्र H2O होता है।

प्रश्न 2.
जल का रासायनिक सूत्र लिखिए।
उत्तरः
जल का रासायनिक सूत्र है – H2O.

प्रश्न 3.
जल प्राप्ति के मुख्य स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तरः
जल प्राप्ति के मुख्य स्रोत हैं-समुद्र, वर्षा, नदियाँ, तालाब, कुएँ, झीलें, झरने एवं सोते।

प्रश्न 4
प्राणियों के लिए जल की मुख्य उपयोगिता क्या है?
उत्तरः
प्राणियों के लिए जल की मुख्य उपयोगिता है – प्यास को शान्त करना।

प्रश्न 5.
हमारे रक्त में जल की क्या भूमिका है?
उत्तरः
जल रक्त को आवश्यक तरलता प्रदान करता है।

प्रश्न 6.
शरीर के तापक्रम पर जल का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तरः
जल शरीर के तापक्रम का नियमन करता है।

प्रश्न 7.
शुद्ध जल के मुख्य गुण क्या हैं?
अथवा
शुद्ध जल की पहचान कैसे करेंगी?
उत्तरः
शुद्ध जल रंगहीन, गन्धहीन तथा स्वादहीन होता है। यह पारदर्शी होता है तथा इसमें एक विशेष प्रकार की चमक होती है।

प्रश्न 8.
अशुद्ध जल में कौन-कौन सी अशुद्धियाँ पायी जाती हैं?
उत्तरः
अशुद्ध जल में दो प्रकार की अशुद्धियाँ पायी जाती हैं-

  1. घुलित अशुद्धियाँ तथा
  2. अघुलित अशुद्धियाँ।

प्रश्न 9.
अशुद्ध जल को मुख्य रूप से किन-किन विधियों द्वारा शुद्ध किया जा सकता है?
उत्तरः
अशुद्ध जल को मुख्य रूप से तीन विधियों से शुद्ध किया जाता है –

  1. यान्त्रिक विधि
  2. भौतिक विधि तथा
  3. रासायनिक विधि।

प्रश्न 10.
जल के कीटाणुओं को मारने वाले मुख्य रासायनिक पदार्थ कौन-कौन से हैं?
अथवा
अशुद्ध जल को शुद्ध करने के मुख्य रासायनिक पदार्थों के नाम लिखिए।
उत्तरः
जल के कीटाणुओं को मारने वाले मुख्य रासायनिक पदार्थ हैं – लाल दवा, कॉपर सल्फेट, ब्लीचिंग पाउडर तथा क्लोरीन।

प्रश्न 11.
मनुष्य अपना आहार मुख्य रूप से किन स्रोतों से प्राप्त करता है?
उत्तरः
मनुष्य अपना आहार मुख्य रूप से दो स्रोतों से प्राप्त करता है –

  1. वनस्पतिजन्य स्रोत तथा
  2. प्राणिजन्य स्रोत।

प्रश्न 12.
वनस्पति-जगत से मुख्य रूप से कौन-कौन से खाद्य पदार्थ प्राप्त होते हैं?
उत्तरः
वनस्पति-जगत से मुख्य रूप से अनाज, दालें, सब्जियाँ तथा फल प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 13.
प्राणि-जगत से प्राप्त होने वाले भोज्य पदार्थ कौन-कौन से हैं?
उत्तरः
प्राणि-जगत से प्राप्त होने वाले भोज्य पदार्थ हैं-दूध, अण्डा तथा मांस।

प्रश्न 14.
खाद्य पदार्थों में मिलावट से क्या आशय है?
उत्तरः
किसी खाद्य पदार्थ से निश्चित मात्रा में उपस्थित उस पोषक तत्त्व को निकाल लिया जाए अथवा अन्य कम मूल्य का या विजातीय कोई पदार्थ मिला दिया जाए तो यह क्रिया मिलावट कहलाती है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 12 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –
1. जल महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी है –
(क) प्यास बुझाने के लिए
(ख) फसलों को सींचने के लिए
ग) दैनिक कार्यों को पूरा करने के लिए
(घ) उपर्युक्त सभी के लिए।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी के लिए।

2. जल का रासायनिक सूत्र है –
(क) H2O2
(ख) H2O
(ग) HO2
(घ) 2HO.
उत्तरः
(ख) H2O

3. हमारे शरीर के लिए जल उपयोगी है –
(क) रक्त को तरलता प्रदान करने में
(ख) पाचन-क्रिया में सहायक के रूप में
(ग) हानिकारक तत्त्वों के विसर्जन में सहायक के रूप में
(घ) उपर्युक्त सभी रूपों में।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी रूपों में।

4. घरेलू स्तर पर जल को शुद्ध करने की उपयुक्त विधि है –
(क) उबालना
(ख) आसवन
(ग) अवक्षेपण
(घ) क्लोरीनीकरण।
उत्तरः
(क) उबालना।।

5. आसवन विधि द्वारा शुद्ध किए गए जल का नाम है –
(क) कठोर जल
(ख) आसुत जल
(ग) प्राकृतिक जल
(घ) मृदु जला
उत्तरः
(ख) आसुत जल।

6. वनस्पति-जगत से प्राप्त होने वाले भोज्य पदार्थ होते हैं –
(क) पोषक तत्त्वों से रहित
(ख) प्रोटीन का नितान्त अभाव होता है
(ग) पोषक तत्त्वों के उत्तम स्रोत
(घ) केवल कार्बोहाइड्रेट युक्त।
उत्तरः
(ग) पोषक तत्त्वों के उत्तम स्रोत।

7. प्राणि-जगत से प्राप्त खाद्य पदार्थों में भरपूर पाया जाने वाला पोषक तत्त्व है –
(क) कार्बोहाइड्रेट
(ख) जल
(ग) प्रोटीन
(घ) विटामिन ‘C’.
उत्तरः
(ग) प्रोटीन।

8. जो जल साबुन के साथ कम झाग देता है, वह होता है –
(क) मृदु जल
(ख) कठोर जल
(ग) शुद्ध जल
(घ) कठोर या मृदु दोनों में से कोई नहीं।
उत्तरः
(ख) कठोर जल।

9. कुएँ के पानी के शुद्धीकरण हेतु क्या मिलाया जाएगा –
(क) पोटैशियम परमैंगनेट ।
(ख) सोडियम क्लोराइड
(ग) जिंक ऑक्साइड
(घ) सिरका।
उत्तरः
(क) पोटैशियम परमैंगनेट।

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