UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom (परमाणु की संरचना)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom (परमाणु की संरचना).

पाठ के अन्तर्गत दिएर गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
(i) एक ग्राम भार में इलेक्ट्रॉनों की संख्या का परिकलन कीजिए।
(ii) एक मोल इलेक्ट्रॉनों के द्रव्यमान और आवेश का परिकलन कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 2.
(i) मेथेन के एक मोल में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या का परिकलन कीजिए।
(ii) 7mg14C में न्यूट्रॉनों की
(क) कुल संख्या तथा
(ख) कुल द्रव्यमान ज्ञात कीजिए। (न्यूट्रॉन का द्रव्यमान =1.675×10-27 kg मान लीजिए।)
(iii) मानक ताप और दाब(STP) पर 34 mg NH3 में प्रोटॉनों की
(क) कुल संख्या और
(ख) कुल द्रव्यमान बताइए।
दाब और ताप में परिवर्तन से क्या उत्तर परिवर्तित हो जाएगा?
उत्तर
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प्रश्न 3.
निम्नलिखित नाभिकों में उपस्थित न्यूट्रॉनों और प्रोटॉनों की संख्या बताइए-
[latex]_{ 6 }^{ 13 }{ C }_{ 8 }^{ 16 }{ O }_{ 12 }^{ 24 }{ Mg }_{ 26 }^{ 56 }{ Fe }_{ 38 }^{ 88 }{ Sr }[/latex]
उत्तर
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प्रश्न 4.
नीचे दिए गए परमाणु द्रव्यमान (A) और परमाणु संख्या (Z) वाले परमाणुओं का पूर्ण प्रतीक लिखिए-
(i) Z = 1,A = 35
(ii) Z = 92, A = 233
(iii) Z = 4, A = 9
उत्तर
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प्रश्न 5.
सोडियम लैम्प द्वारा उत्सर्जित पीले प्रकाश की तरंगदैर्घ्य (λ) 580 mm है। इसकी आवृत्ति (v) और तरंग-संख्या (V) की परिकलन कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 6.
प्रत्येक ऐसे फोटॉन की ऊर्जा ज्ञात कीजिए-
(i) जो 3×1016 Hz आवृत्ति वाले प्रकाश के संगत हो।
(ii) जिसकी तरंगदैर्घ्य 0:50 A हो।
उत्तर
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प्रश्न 7.
2.0×10-10 s काल वाली प्रकाश तरंग की तरंगदैर्घ्य, आवृत्ति और तरंग-संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 8.
ऐसा प्रकाश, जिसकी तरंगदैर्घ्य 4000 pm हो और जो 1J ऊर्जा दे, के फोटॉनों की संख्या बताइए।
उत्तर
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प्रश्न 9.
यदि 4×10-7m तरंगदैर्घ्य वाला एक फोटॉन 2.13 ev कार्यफलन वाली धातु की सतह स’ टकराता है तो-
(i) फोटॉन की ऊर्जा (ev में)
(ii) उत्सर्जन की गतिज ऊर्जा और
(iii) प्रकाशीय इलेक्ट्रॉन के वेग का परिकलन कीजिए। (1 eV = 1,6020 x 10-19 J)
उत्तर
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प्रश्न 10.
सोडियम परमाणु के आयनंन के लिए 242 nm तरंगदैर्ध्य की विद्युत-चुम्बकीय विकिरण पर्याप्त होती है। सोडियम की आयनन ऊर्जा kJ mol-1 में ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 11.
25 वाट का एक बल्ब 0.57um तरंगदैर्घ्य वाले पीले रंग का एकवर्णी प्रकाश उत्पन्न करता है। प्रति सेकण्ड क्वाण्टा के उत्सर्जन की दर ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 12.
किसी धातु की सतह पर 6800 A तरंगदैर्ध्व वाली विकिरण डालने से शून्य वेग वाले इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं। धातु की देहली आवृत्ति (v°) और कार्यफलन (W°) ज्ञात
कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 13.
जब हाइड्रोजन परमाणु के n= 4ऊर्जा स्तर से n= 2 ऊर्जा स्तर में इलेक्ट्रॉन जाता है तो किस तरंगदैर्घ्य का प्रकाश उत्सर्जित होगा?
उत्तर
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प्रश्न 14.
यदि इलेक्ट्रॉन n=5 कक्षक में उपस्थित हो तो H-परमाणु के आयनन के लिए कितनी ऊर्जा की आवश्यकता होगी? अपने उत्तर की तुलना हाइड्रोजन परमाणु के आयनन एन्थैल्पी से कीजिए। (आयनन एन्थैल्पी n=1 कक्षक से इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा होती है।)
उत्तर
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प्रश्न 15.
जब हाइड्रोजन परमाणु में उत्तेजित इलेक्ट्रॉन = 6 से मूल अवस्था में जाता है तो प्राप्त उत्सर्जित रेखाओं की अधिकतम संख्या क्या होगी?
उत्तर
उत्सर्जित रेखाओं की प्राप्त संख्या 15 होगी। यह निम्न संक्रमणों के कारण प्राप्त होंगी-
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प्रश्न 16.
(i) हाइड्रोजन के प्रथम कक्षक से सम्बन्धित ऊर्जा – 2.18×10-18Jatom-1 है पाँचवें कक्षक से सम्बन्धित ऊर्जा बताइए।
(ii) हाइड्रोजन परमाणु के पाँचवें बोर कक्षक की त्रिज्या की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 17.
हाइड्रोजन परमाणु की ‘बामर श्रेणी में अधिकतम तरंगदैर्घ्य वाले संक्रमण की तरंग-संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
बामर श्रेणी में अधिकतम तरंगदैर्घ्य वाले संक्रमण के लिए
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प्रश्न 18.
हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन को पहली कक्ष से पाँचवीं कक्ष तक ले जाने के लिए आवश्यक ऊर्जा की जूल में गणना कीजिए। जब यह इलेक्ट्रॉन तलस्थ अवस्था में लौटता है तो किस तरंगदैर्घ्य का प्रकाश उत्सर्जित होगा? (इलेक्ट्रॉन की तलस्थ अवस्था ऊर्जा -2.18 x 10-11erg है)।
उत्तर

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प्रश्न 19.
हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा En = [latex]\frac { \left( -2.18\times { 10 }^{ -18 } \right) }{ { n }^{ 2 } } [/latex]J द्वारा दी जाती है। n=2 कक्षा से इलेक्ट्रॉन को पूरी तरह निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा की गणना कीजिए। प्रकाश की सबसे लम्बी तरंगदैर्घ्य (cm में) क्या होगी जिसका प्रयोग इस | संक्रमण में किया जा सके?
उत्तर
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प्रश्न 20.
2.05 x 107ms-1 वेगं से गंति कर रहे किसी इलेक्ट्रॉन का तरंगदैर्ध्य क्या होगी?
उत्तर
दे-ब्रॉग्ली समीकरण के अनुसार,
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प्रश्न 21.
इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान 9.1×10-31kg है। यदि इसकी गतिज ऊर्जा 3.0×10-25 Jहो तो इसकी तरंगदैर्घ्य की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 22.
निम्नलिखित में से कौन सम-आयनी स्पीशीज हैं, अर्थात् किनमें इलेक्ट्रॉनों की समान संख्या है?
Na+, K+, Mg2+, Ca2+, S2-,Ar
उत्तर
दी गई स्पीशीज में इलेक्ट्रॉन्स की संख्या निम्नवत् है-
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प्रश्न 23.
(i) निम्नलिखित आयनों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए
(क) H
(ख) Na+
(ग) O2-
(घ) F
(ii) उन तत्वों की परमाणु संख्या बताइए जिनके सबसे बाहरी इलेक्ट्रॉनों को निम्नलिखित रूप में दर्शाया जाता है-
(क) 3s1
(ख) 2p3 तथा
(ग) 3p5
(iii) निम्नलिखित विन्यासों वाले परमाणुओं के नाम बताइए-
(क) [He] 2s1
(ख) [Ne] 3s23p3
(ग) [Ar]4s23d1
उत्तर
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प्रश्न 24.
किस निम्नतम n मान द्वारा g-कक्षक का अस्तित्व अनुमत होगा?
उत्तर
g उपकोश के लिए, 1 = 4
चूँकि । का मान 0 तथा (n-1) के बीच होता है, g-कक्षक के अस्तित्व के लिए ॥ का निम्नतम मान n = 5 होगा।

प्रश्न 25.
एक इलेक्ट्रॉन किसी 3d-कक्षक में है। इसके लिए n, 1 और m1 के सम्भव मान दीजिए।
उत्तर
3d कक्षक के लिए, n = 3,1=2
1=2 के लिए, m1=-2,-1, 0, +1, +2
इस प्रकार, दिये गये इलेक्ट्रॉन के लिए।
n= 3,1= 2, m1 = -2, -1, 0, +1,+ 2

प्रश्न 26.
किसी तत्व के परमाणु में 29 इलेक्ट्रॉन और 35 न्यूट्रॉन हैं-
(i) इसमें प्रोटॉनों की संख्या बताइए।
(ii) तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास बताइए।
उत्तर
एक उदासीन परमाणु के लिए
Z= प्रोटॉनों की संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या
इसलिए, दिये गये तत्त्व का परमाणु क्रमांक (Z) = 29
(i) इसमें उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या = 29
(ii) दिये गये तत्त्व को इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न है-
1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 3d10 4s1 or [Ar]3d10 4s1

प्रश्न 27.
[latex]{ H }_{ 2 }^{ + }[/latex], H2 और [latex]{ O }_{ 2 }^{ + }[/latex] स्पीशीज में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बताइए।
उत्तर
H2 में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 1+1=2
[latex]{ H }_{ 2 }^{ + }[/latex] में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 2-1=1
[latex]{ O }_{ 2 }^{ + }[/latex] में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = (8+ 8)-1= 15

प्रश्न 28.
(i) किसी परमाणु कक्षक का n = 3 है। उसके लिए। और 2m1 के सम्भव मान क्या होंगे ?
(ii) 3d-कक्षक के इलेक्ट्रॉनों के लिए m1 और क्वाण्टम संख्याओं के मान बताइए।
(iii) निम्नलिखित में से कौन-से कक्षक सम्भव हैं
lp, 2s, 22 और 3f
उत्तर
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प्रश्न 29.
s, p, 4 संकेतन द्वारा निम्नलिखित क्वाण्टम संख्याओं वाले कक्षकों को बताइए–
(क) n = 1; l= 0
(ख) n = 3:l=1
(ग) n = 4;1= 2
(घ) n = 4:1= 3
उत्तर
(क) as
(ख) 3p
(ग) 4d
(घ) 4f

प्रश्न:30.
कारण देते हुए बताइए कि निम्नलिखित क्वाण्टम संख्या के कौन-से मान सम्भव नहीं हैं-
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उत्तर
(क) सम्भव नहीं है, क्योंकि n का मान कभी शून्य नहीं होता।
(ख) सम्भव है।
(ग) सम्भव नहीं है, क्योंकि जब n=1,1= 0 केवल
(घ) सम्भव है।
(ङ) सम्भव नहीं है, क्योंकि जब n= 3,1= 0, 1, 2
(च) सम्भव है।

प्रश्न 31.
किसी परमाणु में निम्नलिखित क्वाण्टम संख्याओं वाले कितने इलेक्ट्रॉन होंगे
(क) n=4, m2 =[latex]-\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
(ख) n= 3,l= 0
उत्तर
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प्रश्न 32.
यह दर्शाइए कि हाइड्रोजन परमाणु की बोर कक्षा की परिधि उस कक्षा में गतिमान इलेक्ट्रॉन की दे-ब्राग्ली तरंगदैर्घ्य को पूर्ण गुणक होती है।
उत्तर
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2πr बोर कक्षक की परिधि को इर्शाता है। इस प्रकार, हाइड्रोजन परमाणु के लिए बोर कक्षक की परिधि दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य की पूर्ण गुणांक होगी।

प्रश्न 33.
He+ स्पेक्ट्रम के += 4 से n = 2 बामर संक्रमण से प्राप्त तरंगदैर्घ्य के बराबर वाला संक्रमण हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम में क्या होगा?
उत्तर
हाइड्रोजन जैसी स्पीशीज़ के लिए
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यह तभी सम्भव है जब n1 =1 तथा ny = 2 हो।
अत: H स्पेक्ट्रम में समान तरंगदैर्घ्य के लिए संगत संक्रमण n=2 से n=1 होगा।

प्रश्न 34.
He+ (g) → He+ (g) +e प्रक्रिया के लिए आवश्यक ऊर्जा की गणना कीजिए।
हाइड्रोजन परमाणु की तलस्थ अवस्था में आयनन ऊर्जा 2.18 x 10-18Jatom-1 है।
उत्तर
हाइड्रोजन जैसी स्पीशीज के लिए, nth कक्षक की ऊर्जा निम्न व्यंजक से प्राप्त की जा सकती है-
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प्रश्न 35.
यदि कार्बन परमाणु का व्यास 0.15 nm है तो उन कार्बन परमाणुओं की संख्या की गणना कीजिए जिन्हें 20 cm स्केल की लम्बाई में एक-एक करके व्यवस्थित किया जा सकता है।
उत्तर
कार्बन परमाणु का व्यास = 0.15 nm = 1.5×10-10m=1.5×10<sup-8+ cm स्केल की लम्बाई जिसमें कार्बन परमाणु व्यवस्थित हैं = 20cm
∴ कार्बन परमाणुओं की संख्या जों स्केल की लम्बाई में एक-एक करके व्यवस्थित होंगे-
[latex]=\frac { 20 }{ 1.5\times { 10 }^{ -8 } } =1.33\times { 10 }^{ 9 }[/latex]

प्रश्न 36.
कार्बन के 2×108 परमाणु एक कतार में व्यवस्थित हैं। यदि इस व्यवस्था की लम्बाई 2.4 cm है तो कार्बन परमाणु के व्यास की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 37.
जिंक परमाणु का व्यास 2.6Å है—(क) जिंक परमाणु की त्रिज्या pm में तथा (ख) 1-6 cm की लम्बाई में कतार में लगातार उपस्थित परमाणुओं की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 38.
किसी कण का स्थिर विद्युत आवेश 2.5×10-16c है। इसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 39.
मिलिकन के प्रयोग में तेल की बूंद पर चमकती x-किरणों द्वारा प्राप्त स्थैतिक विद्युत-आवेश प्राप्त किया जाता है। तेल की बूंद पर यदि स्थैतिक विद्युत-आवेश
-1. 282 x 10-18c है तो इसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
इलेक्ट्रॉन द्वारा लिया गया आवेश = -1.6022×10-19C
∴ तेल की बूंद पर उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = [latex]\frac { -1.282\times { 10 }^{ -16 } }{ -1.6022\times { 10 }^{ -19 } } =8[/latex]

प्रश्न 40.
रदरफोर्ड के प्रयोग में सोने, प्लैटिनम आदि भारी परमाणुओं की पतली पन्नी पर ए-कणों द्वारा बमबारी की जाती है। यदि ऐलुमिनियम आदि जैसे हल्के परमाणु की पतली पन्नी ली जाए तो उपर्युक्त परिणामों में क्या अन्तर होगा?
उत्तर
हल्के परमाणुओं जैसे एलुमिनियम के नाभिक छोटे तथा कम धन आवेश युक्त होते हैं। यदि | इनका प्रयोग रदरफोर्ड के प्रयोग में 0-कणों द्वारा बमबारी के लिए किया जाये तो नाभिकों के छोटे होने के कारण अधिकतर -कण लक्ष्य परमाणुओं से बिना टकराये ही बाहर निकल जायेंगे। जो कण नाभिक से टकरायेगें वे भी कम नाभिकीय आवेश के कारण अधिक विचलित नहीं होंगे।

प्रश्न 41.
[latex]_{ 35 }^{ 79 }{ Br }[/latex] तथा 79Br प्रतीक मान्य हैं, जबकि [latex]_{ 79 }^{ 35 }{ Br }[/latex] तथा 35Br मान्य नहीं हैं। संक्षेप में कारण बताइए।
उत्तर
एक तत्त्व के लिए परमाणु संख्या को मान स्थिर होता है, लेकिन द्रव्यमान संख्या का मान तत्त्व के समस्थानिक की प्रकृति पर निर्भर करता है। अतः द्रव्यमान संख्या को प्रतीक के साथ दर्शाना आवश्यक हो जाती है। परम्परा के अनुसार तत्त्व के प्रतीक में द्रव्यमान संख्या को ऊपर बायें तथा परमाणु संख्या को नीचे दायें ओर इस प्रकार लिखा जाता है- AXZ,

प्रश्न 42.
एक 81 द्रव्यमान संख्या वाले तत्व में प्रोटॉनों की तुलना में 31.7% न्यूट्रॉन अधिक हैं। इसका परमाणु प्रतीक लिखिए।
उत्तर
दिये गये तत्त्व की द्रव्यमान संख्या = 81
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प्रश्न 43.
37 द्रव्यमान संख्या वाले एक आयन पर ऋणावेश की एक इकाई है। यदि आयन में इलेक्ट्रॉन की तुलना में न्यूट्रॉन 11.1% अधिक है तो आयन का प्रतीक लिखिए।
उत्तर
माना कि आयन में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या x है।
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प्रश्न 44.
56 द्रव्यमान संख्या वाले एक आयन पर धनावेश की 3 इकाई हैं और इसमें इलेक्ट्रॉन की तुलना में 30.4% न्यूट्रॉन अधिक हैं। इस आयन का प्रतीक लिखिए।
उत्तर
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प्रश्न 45.
निम्नलिखित विकिरणों के प्रकारों को आवृत्ति के बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित कीजिए
(क) माइक्रोवेव ओवन (oven) से विकिरण
(ख) यातायात-संकेत से त्रणमणि (amber) प्रकाश
(ग) एफ०एम० रेडियो से प्राप्त विकिरण
(घ) बाहरी दिक् से कॉस्मिक किरणें ।
(ङ) x-किरणें।
उत्तर
FM < माइक्रोवेव < एम्बर प्रकाश <X-किरणें < कॉस्मिक किरणें।

प्रश्न 46.
नाइट्रोजन लेजर 337.1 nm की तरंगदैर्ध्य पर एक विकिरण उत्पन्न करती है। यदि उत्सर्जित फोटॉनों की संख्या 5.6 x 10-24 हो तो इस लेजर की क्षमता की गणना कीजिए।
उत्तर
विकिरण की तरंगदैर्घ्य
λ = 337.1nm= 337.1×10-9m
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प्रश्न 47.
निऑन गैस को सामान्यतः संकेत बोर्डों में प्रयुक्त किया जाता है। यदि यह 616 nm पर प्रबलता से विकिरण-उत्सर्जन करती है तो
(क) उत्सर्जन की आवृत्ति,
(ख) 30 सेकण्ड में इस विकिरण द्वारा तय की गई दूरी,
(ग) क्वाण्टम की ऊर्जा तथा
(घ) उपस्थित क्वाण्टम की संख्या की गणना कीजिए। (यदि यह 2J की ऊर्जा उत्पन्न करती है)।
उत्तर
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प्रश्न 48.
खगोलीय प्रेक्षणों में दूरस्थ तारों से मिलने वाले संकेत बहुत कमजोर होते हैं। यदि फोटॉन संसूचक 600 nm के विकिरण से कुल 3.15×10-18 J प्राप्त करता है तो संसूचक द्वारा प्राप्त फोटॉनों की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 49.
उत्तेजित अवस्थाओं में अणुओं के जीवनकाल का माप प्रायः लगभग नैनो-सेकण्ड परास वाले विकिरण स्रोत का उपयोग करके किया जाता है। यदि विकिरण स्रोत का काल 2ns और स्पन्दित विकिरण स्रोत के दौरान उत्सर्जित फोटॉनों की संख्या 2.5×10-15 है तो स्रोत की ऊर्जा की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 50.
सबसे लम्बी द्विगुणित तरंगदैर्घ्य जिंक अवशोषण संक्रमण 589 और 589.6 nm पर देखा ‘. जाता है। प्रत्येक संक्रमण की आवृत्ति और दो उत्तेजित अवस्थाओं के बीच ऊर्जा के अन्तर की गणना कीजिए।
उत्तर
प्रथम संक्रमण के लिए :
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प्रश्न 51.
सीजियम परमाणु का कार्यफलन 1.9 ev है तो
(क) उत्सर्जित विकिरण की देहली तरंगदैर्घ्य,
(ख) देहली आवृत्ति की गणना कीजिए।
यदि सीजियम तत्व को 500 pm की तरंगदैर्घ्य के साथ विकीर्णित किया जाए तो निकले हुए फोटो इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा और वेग की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 52.
जब सोडियम धातु को विभिन्न तरंगदैर्यों के साथ विकीर्णित किया जाता है तो निम्नलिखित परिणाम प्राप्त होते है-
λ (nm) : 500 450 400
vx10-5 (cm s-1) : 2.55 4.35 5.35
देहली तरंगदैर्घ्य तथा प्लांक स्थिरांक की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 53.
प्रकाश-विद्युत प्रभाव प्रयोग में सिल्वर धातु से फोटो इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन 0.35V की वोल्टता द्वारा रोका जा सकता है। जब 256.7 nm के विकिरण का उपयोग किया जाता है तो सिल्वर धातु के लिए कार्यफलन की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 54.
यदि 150 pm तरंगदैर्घ्य का फोटॉन एक परमाणु से टकराता है और इसके अन्दर बँधा हुआ इलेक्ट्रॉन 1.5×107 ms-1 वेग से बाहर निकलता है तो उस ऊर्जा की गणना कीजिए जिससे यह नाभिक से बँधा हुआ है।
उत्तर
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प्रश्न 55.
पाश्चन श्रेणी का उत्सर्जन संक्रमण ॥ कक्ष से आरम्भ होता है। कक्ष n=3 में समाप्त होता है तथा इसे = 3.29 x 1015(Hz) [latex]\left[ \frac { 1 }{ { 3 }^{ 2 } } -\frac { 1 }{ { n }^{ 2 } } \right] [/latex] से दर्शाया जा सकता है। यदि संक्रमण 1285 nm पर प्रेक्षित होता है तो के मान की गणना कीजिए तथा स्पेक्ट्रम का क्षेत्र बताइए।
उत्तर
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प्रश्न 56.
उस उत्सर्जन संक्रमण के तरंगदैर्घ्य की गणना कीजिए, जो 1.3225 pm त्रिज्या वाले कक्ष से आरम्भ और 211.6 pm पर समाप्त होता है। इस संक्रमण की श्रेणी का नाम और स्पेक्ट्रम का क्षेत्र भी बताइए।
उत्तर
मानते हुए कि निहित प्रतिदर्श एक H परमाणु है, nth कक्ष की त्रिज्या
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प्रश्न 57.
दे-ब्रॉग्ली द्वारा प्रतिपादित द्रव्य के दोहरे व्यवहार से इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की खोज हुई, जिसे जैव अणुओं और अन्य प्रकार के पदार्थों की अति आवधित प्रतिबिम्ब के लिए उपयोग में लाया जाता है। इस सूक्ष्मदर्शी में यदि इलेक्ट्रॉन का वेग 1.6×10-ms-1 है। तो इस इलेक्ट्रॉन से सम्बन्धित दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 58.
इलेक्ट्रॉन विवर्तन के समान न्यूट्रॉन विवर्तन सूक्ष्मदर्शी को अणुओं की संरचना के निर्धारण में प्रयुक्त किया जाता है। यदि यहाँ 800 pm की तरंगदैर्घ्य ली जाए तो न्यूट्रॉन से सम्बन्धित अभिलाक्षणिक वेग की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 59.
यदि बोर के प्रथम कक्ष में इलेक्ट्रॉन का वेग 2.9 x106 ms-1 है तो इससे सम्बन्धित दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 60.
एक प्रोटॉन, जो 1000v के विभवान्तर में गति कर रहा है, से सम्बन्धित वेग 4.37×105 ms-1 है। यदि 0.1 kg द्रव्यमान की हॉकी की गेंद इस वेग से गतिमान है तो इससे सम्बन्धित तरंगदैर्घ्य की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 61.
यदि एक इलेक्ट्रॉन की स्थिति + 0.002 nm की शुद्धता से मापी जाती है तो इलेक्ट्रॉन के संवेग में अनिश्चितता की गणना कीजिए। यदि इलेक्ट्रॉन का संवेग [latex]\frac { 5 }{ 4\Pi m } \times 0.05[/latex]pm है तो । क्या इस मान को निकालने में कोई कठिनाई होगी?
उत्तर
प्रश्नानुसार, Ax= 0.002nm=2×10-12m
हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता के सिद्धान्त के अनुसार,
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-58
वास्तविक संवेग को परिभाषित नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह संवेग में अनिश्चितता (Ap) से छोटा है।

प्रश्न 62.
छः इलेक्ट्रॉनों की क्वाण्टम संख्याएँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ऊर्जा के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए। क्या इनमें से किसी की ऊर्जा समान है?
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उत्तर
दिये गये इलेक्ट्रॉन कक्षक 1.4d, 2. 3d, 3.4p, 4. 3d, 5. 3p तथा 6.4p से सम्बन्धित हैं। इनकी ऊर्जा इस क्रम में होगी-
5<2=4<6=3<1

प्रश्न 63.
ब्रोमीन परमाणु में 35 इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसके 2p कक्षक में छः इलेक्ट्रॉन, 3p कक्षक में छः इलेक्ट्रॉन तथा 4p कक्षक में पाँच इलेक्ट्रॉन होते हैं। इनमें से कौन-सा इलेक्ट्रॉन न्यूनतम प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करता है?
उत्तर
4p इलेक्ट्रॉन्स न्यूनतम प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करते हैं, क्योंकि ये नाभिक से सबसे अधिक दूर हैं।

प्रश्न 64.
निम्नलिखित में से कौन-सा कक्षक उच्च प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेगा?
(i) 2s और 3s,
(ii) 44 और 4 तथा
(iii) 3d और 3p.
उत्तर
(i) 25 कक्षक, 3s कक्षक की तुलना में नाभिक के अधिक निकट होगा। अत: 25 कक्षक उच्च प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेगा।
(ii) d कक्षक, / कक्षकों की तुलना में अधिक भेदक (penetrating) होते हैं। इसलिए 44 कक्षक उच्च प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेगा।
(iii) p कक्षक, 4 कक्षकों की तुलना में अधिक भेदक (penetrating) होते हैं। इसलिए, 3p कक्षक उच्च प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेगा।।

प्रश्न 65.
Al तथा Si में 3p कक्षक में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं। कौन-सा इलेक्ट्रॉन नाभिक से अधिक प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेगा?
उत्तर
सिलिकॉन (+14) में, ऐलुमिनियम (+13) की तुलना में अधिक नाभिकीय आवेश होता है। अत: सिलिकॉन में उपस्थित अयुग्मित 3p इलेक्ट्रॉन अधिक प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेंगे।

प्रश्न 66.
इन अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बताइए|
(क) P
(ख) Si
(ग) Cr
(घ) Fe
(ङ) Kr
उत्तर
इन तत्त्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास तथा अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या निम्न है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-60

प्रश्न 67.
(क) n = 4 से सम्बन्धित कितने उपकोश हैं?
(ख) उस उपकोश में कितने इलेक्ट्रॉन उपस्थित होंगे जिसके लिए ms =-[latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] एवं ॥= 4 हैं?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-61

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कैथोड किरणों के लिए कौन-सा कथन असत्य है?
(i) सीधी रेखा में कैथोड की तरफ चलती हैं।
(ii) ऊष्मा उत्पन्न करती हैं।
(iii) ऋण आवेश रहता है।
(iv) उच्च परमाणु भार वाली धातु से टकराकर X-किरणें उत्पन्न करती हैं।
उत्तर
(i) सीधी रेखा में कैथोड की तरफ चलती हैं।

प्रश्न 2.
न्यूट्रॉन एक मौलिक कण है जिसमें
(i) +1 आवेश एवं एक इकाई द्रव्यमान होता है।
(ii) 0 आवेश एवं एक इकाई द्रव्यमान होता है।
(iii) 0 आवेश एवं 0 द्रव्यमान होता है।
(iv) -1 आवेश एवं इकाई द्रव्यमान होता है।
उत्तर
(ii) 0 आवेश एवं एक इकाई द्रव्यमान होता है।

प्रश्न 3.
किसी तत्व के 3d उपकोश में 7 इलेक्ट्रॉन हैं। तत्त्व का परमाणु क्रमांक है
(i) 24
(ii) 27
(iii) 28
(iv) 29
उत्तर
(ii) 27

प्रश्न 4.
परमाणु क्रमांक 12 वांले तत्त्व में इलेक्ट्रॉनों की संख्या है।
(i) 0
(ii) 12
(iii) 6
(iv) 14
उत्तर
(ii) 12

प्रश्न 5.
किसी तत्त्व के समस्थानिक ,xm में न्यूट्रॉनों की संख्या होगी
(i) m+n
(ii) m
(iii) n
(iv) m-n
उत्तर
(iv) m-n

प्रश्न 6.
दे-ब्रॉग्ली के सिद्धान्त के अनुसार
(i) E= mc2
(ii) [latex]\lambda =\frac { h }{ p } [/latex]
(iii) ∆E= ∆h
(iv) [latex]\triangle x\times \triangle p=\frac { h }{ 2\Pi } [/latex]
उत्तर
(ii) [latex]\lambda =\frac { h }{ p } [/latex]

प्रश्न 7.
निश्चितता के सिद्धान्त के अनुसार
(i) E = mc2
(ii) [latex]\triangle x\times \triangle p=\frac { h }{ 4\Pi } [/latex]
(iii) [latex]\lambda =\frac { h }{ p } [/latex]
(iv) [latex]\triangle x\times \triangle p=\frac { h }{ 2\Pi } [/latex]
उत्तर
(i) [latex]\triangle x\times \triangle p=\frac { h }{ 4\Pi } [/latex]

प्रश्न 8.
निम्न में कौन-सा क्वाण्टम संख्याओं का समूह असम्भव है ?
या
किसी परमाणु में कौन-सी इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था सम्भव नहीं है?
(i) 3,2,-2,[latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
(ii) 4, 0, 0,[latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
(iii) 3, 2, 3,[latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
(iv) 5,3, 0, [latex]-\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
उत्तर
(i) 3,2,-3,[latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]

प्रश्न 9.
3d3 निकाय के तीसरे इलेक्ट्रॉन की चारों क्वाण्टम संख्याओं का सही क्रम
(i) n = 3,1= 2, m= +3, s=[latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
(ii) n = 3,l= 2, m= + 1, s=[latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
(iii) n= 3, 1= 2, m= +2, s=[latex]-\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
(iv) n = 3,1= 2, m= 0, s=[latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
उत्तर
(iv) n= 3, 1 = 2, m=0 s= [latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]

प्रश्न 10.
चुम्बकीय क्वाण्टम संख्या बताती है।
(i) ऑर्बिटलों की आकृति
(ii) ऑर्बिटलों का आकार
(iii) ऑर्बिटलों का अभिविन्यास
(iv) नाभिकीय स्थायित्व
उत्तर
(iii) ऑर्बिटलों का अभिविन्यास

प्रश्न 11.
परमाणु उपकोशों की बढ़ती ऊर्जा का सही क्रम है।
(i) 5p<4f< 6s< 5d
(ii) 5p< 6s<4f<5d
(iii) 4f<5p<5d<6s
(iv) 5p<5d <4f< 6s
उत्तर
(ii) 5p<6s<4f<5d

प्रश्न 12.
ताँबा परमाणु की आद्य अवस्था में इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है।
(i) [Ar] 3d94s2
(ii) [Ar] 3d104s2
(iii) [Ar] 3d104s1 ,
(iv) [Ar] 3d104s2 4p1
उत्तर
(iii) [Ar] 3d104s1

प्रश्न 13.
Fe3+ (परमाणु क्रमांक Fe=26) का सही विन्यास है।
(i) 1s2, 2s2, 3s2 3p6 3d5
(ii) 1s2, 2s2 2p6, 3s2 3p6 3d6, 4s2
(iii) 1s2, 2s2 2p6, 3s2 3p63d5, 4s2
(iv) 1s2 ,2s2 2p6, 3s2 3p6 3d5 4s1
उत्तर
(i) s2, 2s2, 3s2 3p6 3d5

प्रश्न 14.
Cr परमाणु (Z = 24) की तलस्थ अवस्था में सही इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है।
(i) [Ar] 3d4,4s2
(ii) [Ar] 3d5,4s2
(iii) [Ar] 3d6,4s2
(iv) [Ar] 3d5,4s1
उत्तर
(iv) [Ar] 3d6,4s1

प्रश्न 15.
Fe2+(z= 26) में 4-इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर नहीं है।
(i) Ne (Z=10) में p-इलेक्ट्रॉनों की संख्या
(ii) Mg (Z= 12) में इलेक्ट्रॉनों की संख्या
(iii) Fe में d-इलेक्ट्रॉनों की संख्या
(iv) Cl(Z=17) में p-इलेक्ट्रॉनों की संख्या
उत्तर
(iv) Cl(2=17) में p-इलेक्ट्रॉनों की संख्या

प्रश्न 16.
H का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है।
(i) 1s0
(ii) 1s1
(iii) 1s2
(iv) 1s2, 2s1
उत्तर
(iii) H में 2 इलेक्ट्रॉन हैं, अत: विकल्प (iii) 1s2 सही है।

प्रश्न 17.
निम्न आयनों में कौन अनुचुम्बकीय है?
(i) Zn2+
(ii) Ni2+
(iii) Cu2+
(iv) Ca2+
उत्तर
(ii) एवं (iii)

प्रश्न 18.
प्रतिचुम्बकीय आयन है।
(i) Cu2+
(ii) Fe2+
(iii) Ni2+
(iv) Zn2+
उत्तर
(iv) Zn2+

प्रश्न 19.
(n+1) नियमानुसार इलेक्ट्रॉन np ऊर्जा स्तर पूर्ण करने के बाद
(i) (n-1)d में प्रवेश करता है।
(ii) (n+ 1)s में प्रवेश करता है।
(iii) (n+ 1)p में प्रवेश करता है।
(iv) nd में प्रवेश करता है।
उत्तर
(ii) (n+1)s में प्रवेश करता है।

प्रश्न 20.
p ऑर्बिटलों में चारों इलेक्ट्रॉनों का सही वितरण है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-62
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-63

प्रश्न 21.
Cu2+ (z=29) में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है।
(i) 1
(ii) 2
(iii) 3
(iv) 4
उत्तर
(i) 1

प्रश्न 22.
निम्नलिखित में सेमान अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों वाले आयनों को पहचानिए
I. Fe3+ (Z=26)
II. Zn2+ (Z= 30)
III. Cr3+ (Z = 24)
IV. Mn2+ (2=25)
(i) I तथा II ।
(ii) I, II तथा III
(iii) I तथा III
(iv) I तथा IV
उत्तर
(iv) I तथा IV

प्रश्न 23.
निम्न में से किसमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं हैं?
(i) Fe2+
(ii) Ni2+
(iii) Cu2+
(iv) Zn2+
उत्तर
(iv) Zn2+

प्रश्न 24.
निम्नलिखित किस आयन में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिकतम है?
(i) Cr3+ (Z=24)
(ii) Ni2+ (Z= 28)
(iii) Mn2+ (Z=25)
(iv) Ti22+ (Z= 22)
उत्तर
(iii) Mn2+ (Z= 25)

प्रश्न 25.
Ni2+(z = 28) आयन में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है।
(i) 1
(ii) 2
(iii) 3
(iv) 8
उत्तर
(ii) 2

प्रश्न 26.
Cr2+ (2=24) आयन में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है।
(i) 6
(ii) 4
(iii) 3
(iv) 1
उत्तर
(ii) 4

प्रश्न 27.
निम्नलिखित में से किस आयन में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या शून्य (0) है?
(i) Cr22+ (2=24)
(ii) Fe2+(Z= 26)
(iii) Cu2+ (Z = 29)
(iv) Zn2+(Z= 30)
उत्तर
(iv) Zn2+ (Z = 30)

प्रश्न 28.
कार्बन परमाणु में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है।
(i) 1
(ii) 4
(iii) 3
(iv) 2
उत्तर
(iv) 2

प्रश्न 29.
आयन जिसमें सबसे अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं, है।
(i) Fe3+
(ii) Co2+
(iii) Ni2+
उत्तर
(i) Fe3+

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दो कारण दीजिए जिनके आधार पर इलेक्ट्रॉन को पदार्थ का मौलिक कण समझा जाता है।
उत्तर
इलेक्ट्रॉन सभी पदार्थों के मौलिक कण होते हैं। ऐसा कई प्रकार की घटनाओं के अध्ययन द्वारा सिद्ध हुआ है। इसके दो प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. तापायनिक उत्सर्जन-जब किसी पदार्थ को उच्च ताप तथा कम दाब पर गर्म किया जाता है। तब पदार्थ से इलेक्ट्रॉन बाहर निकलने लगते हैं।
  2. प्रकाश वैद्युत प्रभाव-जब X-किरणें, y-किरणे अथवा पराबैंगनी किरणें धातुओं से टकराती | हैं, तब भी इलेक्ट्रॉन उन धातुओं से बाहर निकलने लगते हैं।

प्रश्न 2.
इलेक्ट्रॉन की तरंग प्रवृतिं क्या है ? इससे सम्बन्धित व्यंजक लिखिए।
उत्तर
सन् 1924 में दे-ब्रॉग्ली ने यह विचार प्रस्तुत किया कि गतिशील सूक्ष्म कण; जैसे—इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन आदि तरंग के गुण प्रदर्शित करते हैं। यदि m द्रव्यमान का एक सूक्ष्म कण ) वेग से गतिमान है, तो उसके तरंगदैर्घ्य 2 और संवेग p=) में निम्नलिखित सम्बन्ध होता है।

[latex]\lambda =\frac { h }{ p } =\frac { h }{ mv } [/latex]

प्रश्न 3.
इलेक्ट्रॉन की द्वैती प्रकृति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
इलेक्ट्रॉन, कण तथा तरंग दोनों के गुण व्यक्त करते हैं, इसे इलेक्ट्रॉन की द्वैती प्रकृति कहते हैं; जैसे

  1. कैथोड किरणें (जिनमें केवल इलेक्ट्रॉन होते हैं) अपने मार्ग में रखी हल्की वस्तु को चला | सकती हैं। इससे सिद्ध होता है कि इलेक्ट्रॉनों में कण के गुण हैं।
  2. प्रकाश किरणों की तरह इलेक्ट्रॉन किरणपुंज भी विवर्तन और व्यतिकरण प्रक्रिया प्रदर्शित करता है। इससे सिद्ध होता है कि इलेक्ट्रॉनों में तरंग के गुण हैं।

प्रश्न 4.
इलेक्ट्रॉन को ऋणात्मक आवेश की इकाई क्यों माना जाता है?
उत्तर
इलेक्ट्रॉन पर उपस्थित आवेश विद्युत का सूक्ष्मतम आवेश होता है इसलिए इलेक्ट्रॉन के आवेश को इकाई ऋणावेश माना जाता है।

प्रश्न 5.
द्रव्यमान संख्या तथा परमाणु भार में सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान लगभग नगण्य होता है तथा प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन का द्रव्यमान लगभग 1 amu होता है। अतः परमाणु भार और द्रव्यमान संख्या लगभग बराबर होती है।

परमाणु भार = द्रव्यमान संख्या

प्रश्न 6.
हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता का नियम स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
इस नियम के अनुसार, किसी गतिशील कण की स्थिति तथा वेग दोनों का एक साथ यथार्थ निर्धारण सम्भव नहीं है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-64

यदि ∆x किसी कण की स्थिति निर्धारण की अनिश्चितता हो और ∆p उसके संवेग (द्रव्यमान x वेग) के निर्धारण की अनिश्चितता हो तो इस सिद्धान्त के अनुसार,

[latex]\triangle x\times \triangle y\ge \frac { h }{ 4\Pi } [/latex]
जहाँ h = प्लांक स्थिरांक (6.625×10-27 अर्ग-सेकण्ड)

प्रश्न 7.
हाइड्रोजन परमाणु का इलेक्ट्रॉन मेघ मॉडल समझाइए।
उत्तर
आधुनिक विचारों के अनुसार, नाभिक के चारों ओर स्पष्ट वृत्तीय कक्षाएँ नहीं हैं, अपितु इलेक्ट्रॉन मेघ है। हाइड्रोजन परमाणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉन का ऋणावेश एक मेघ (cloud) के रूप में नाभिक के चारों ओर विसरित रहता है। जिन क्षेत्रों में इलेक्ट्रॉन के उपस्थित होने की प्रायिकता अधिक होती है, उन क्षेत्रों में ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन मेघ का घनत्व अधिक होता है। वे त्रिविम क्षेत्र, जिनमें निश्चित ऊर्जा के इलेक्ट्रॉन के उपस्थित होने की प्रायिकता अधिकतम होती है, ऑर्बिटल (कक्षक) कहलाते हैं। भिन्न-भिन्न उपकोशों में कक्षकों की संख्याएँ भिन्न-भिन्न होती हैं।

प्रश्न 8.
कोश एवं उपकोश क्या हैं?
उत्तर
समान मुख्य क्वाण्टम संख्या n के परमाणु कक्षकों का समूह कोश कहलाता है जबकि समान मुख्य क्वाण्टम संख्या n की और दिगंशी क्वाण्टम संख्या । के परमाणु कक्षकों का समूह उपकोश कहलाता है।

प्रश्न 9.
कक्षक किसे कहते हैं? एक कक्षक में अधिकतम कितने इलेक्ट्रॉन रह सकते हैं?
उत्तर
कक्षक नाभिक के चारों ओर स्थित आकाश के उन त्रिविम क्षेत्रों को कहते हैं जिनमें इलेक्ट्रॉन औसतन अधिक पाए जाते हैं। प्रत्येक कक्षक का केन्द्र परमाणु का नाभिक होता है। एक कक्षक में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन रह सकते हैं जिनके चक्रण विपरीत दिशा में होते हैं।

प्रश्न 10.
d-उपकोश में पाँच कक्षक होते हैं। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
d-उपकोश में अधिकतम इलेक्ट्रॉनों की संख्या 10 होती है, जबकि एक कक्षक में केवल ” अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन रह सकते हैं, अतः 4-उपकोश में पाँच कक्षक होते हैं।

प्रश्न 11.
एक तत्त्व के 47 उपकोश में 7 इलेक्ट्रॉन हैं। इस / उपकोश के अन्तिम इलेक्ट्रॉन की चारों क्वाण्टम संख्याएँ लिखिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-65

प्रश्न 12.
क्लोरीन के अन्तिम इलेक्ट्रॉन के लिए चारों क्वाण्टम संख्याओं के मान लिखिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-66

प्रश्न 13.
एक तत्त्व (परमाणु क्रमांक = 21) के अन्तिम डाले गये इलेक्ट्रॉन के लिए चारों क्वाण्टम संख्याओं के मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-67

प्रश्न 14.
मुख्य क्वाण्टम संख्या 2 के लिए सभी चुम्बकीय क्वाण्टम संख्याओं के मान लिखिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-68

प्रश्न 15.
3d8 इलेक्ट्रॉन के लिए #, 1, तथा s के मान लिखिए।
उत्तर

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-69

प्रश्न 16.
Fe (Z = 26) के 24 वें इलेक्ट्रॉन के लिए क्वाण्टम संख्याओं के मान लिखिए।
उत्तर
-Fe (Z = 26) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नवत् है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-70

प्रश्न 17.
Sc (परमाणु क्रमांक =210) में अन्तिम इलेक्ट्रॉन के लिए चारों क्वाण्टम संख्याओं के मान लिखिए।
उत्तर
Sc (Z = 21) तत्त्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नवत् है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-71

प्रश्न 18.
L कोश में कितने उपकोश होते हैं। इसके उपकोशों की आकृतियाँ तथा अभिविन्यास बताइए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-72

प्रश्न 19.
s, p और 4 कक्षकों की आकृतियाँ बताइए?
उत्तर
कक्षक की आकृति गोलाकार, p कक्षक की आकृति डम्बलाकार तथा d कक्षक की आकृति द्वि-डम्बलाकार होती है।

प्रश्न 20.
ऑफबाऊ सिद्धान्त का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
इस सिद्धान्त के अनुसार, “विभिन्न कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों का प्रवेश उपकोशों की ऊर्जा की वृद्धि के क्रमानुसार होता है. और इलेक्ट्रॉन एक-एक करके ऊर्जा के बढ़ते क्रम वाले उपकक्षकों में प्रवेश पाते हैं।”

प्रश्न 21.
पाउली के अपवर्जन नियम को स्पष्ट कीजिए तथा एक परमाणु के चतुर्थ मुख्य ऊर्जा स्तर में इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
इस सिद्धान्त के अनुसार, “किसी परमाणु में दो इलेक्ट्रॉनों के लिए चारों क्वाण्टम संख्याओं के मान समान नहीं हो सकते हैं। यदि किन्हीं दो इलेक्ट्रॉनों के लिए n, 1 तथा m के मान समान भी हो जायें, तो s का मान निश्चित रूप से भिन्न होगा। इस स्थिति में यदि प्रथम इलेक्ट्रॉन के लिए ” का मान [latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex] हो, तो दूसरे इलेक्ट्रॉन के लिए यह मान [latex]-\frac { 1 }{ 2 } [/latex] होगा। परमाणु के चतुर्थ मुख्य ऊर्जा स्तर में इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या = 2n2 = 2×16= 32

प्रश्न 22.
हुण्ड के नियम का उल्लेख कीजिए। एक उदाहरण देकर इसे स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
हुण्ड के नियम के अनुसार, “किसी उपकोश के कक्षक में इलेक्ट्रॉन तभी युग्मित होते हैं जब उस उपकोश के सभी कक्षकों में एक-एक इलेक्ट्रॉन भर जाता है। इलेक्ट्रॉन जब युग्मित होते हैं तो युग्म के दोनों इलेक्ट्रॉन विपरीत चक्रण वाले होते हैं।”

इस नियम के अनुसार, इ-कक्षक में दूसरे इलेक्ट्रॉन के प्रवेश पर, p-कक्षक में चौथे इलेक्ट्रॉन के प्रवेश । पर, 4-कक्षक में छठे इलेक्ट्रॉन के प्रवेश पर तथा f-कक्षक में आठवें इलेक्ट्रॉन के प्रवेश पर युग्मन आरम्भ होता है। उदाहरणार्थ-नाइट्रोजन परमाणु में p-उपकोश में तीनों इलेक्ट्रॉन अलग-अलग । p-कंक्षकों अर्थात् px, py और pz में रहते हैं। ये इलेक्ट्रॉन अयुग्मित तथा समदिश चक्रण वाले होते हैं।
इस परमाणु में इलेक्ट्रॉन वितरण इस प्रकार होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-73

प्रश्न 23.
किसी तत्त्व के 34 उपकोश में 4 इलेक्ट्रॉन हैं। तत्त्व के 4 उपकोश में इलेक्ट्रॉनों का वितरण प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर
हुण्ड के नियमानुसार, इलेक्ट्रॉनों का वितरण निम्नवत् होगा-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-74

प्रश्न 24.
Cu2+तथा Mn4+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास s, p, 4, f में लिखिए।
(Cu की परमाणु संख्या = 29, Mn की परमाणु संख्या = 25)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-75

प्रश्न 25.
एक तत्त्व के बाह्यतम कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 4s2 4p5 है। इस तत्त्व का पूर्ण | इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए। इस तत्त्व का परमाणु क्रमांक क्या है ?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-76

प्रश्न 26.
मैग्नीशियम, कैल्सियम तथा ब्रोमीन के परमाणु क्रमांक क्रमशः 25, 20 तथा 35 हैं। निम्नलिखित के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए Mn2+,ca2+ तथा Br-1
उत्तर

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-77

प्रश्न 27.
Fe2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या लिखिए।
(Z =26)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-78

प्रश्न 28.
कोबाल्ट (Z = 27) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए एवं उसमें उपस्थित अयुग्मित | इलेक्ट्रॉनों की संख्या बताइए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-79
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-80

प्रश्न 29.
किसी परमाणु के 7 उपकोश में दस इलेक्ट्रॉन हैं। इनका बॉक्स वितरण दिखाते हुए अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बताइए। अपने उत्तर का आधार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-81

प्रश्न 30.
क्रोमियम (Cr) का परमाणु क्रमांक 24 है। Cr3+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यासs, p, d,f के | रूप में दीजिए तथा अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बताइए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-82

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन की खोज किसने की? इन कणों के अभिलक्षण भी लिखिए।
उत्तर
इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन अति सूक्ष्म ऋणावेशित कण हैं। एक इलेक्ट्रॉन पर इकाई ऋणावेश होता है। इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान (me = 5.4860×10-4 amu) हाइड्रोजन परमाणु (H) के द्रव्यमान (mh = 100797amu) का लगभग [latex]\frac { 1 }{ 1837 } [/latex] है। इलेक्ट्रॉन की खोज सन् 1897 में अंग्रेज वैज्ञानिक जे०जे० टॉमसन ने कैथोड किरणों में की। सभी परमाणुओं में इलेक्ट्रॉन होते हैं। प्रोटॉन-प्रोटॉन अति सूक्ष्म धनावेशित कण हैं। एक प्रोटॉन पर इकाई धनावेश होता है।

प्रोटॉन का द्रव्यमान (mp = 1.007276amu) हाइड्रोजन परमाणु (H) के द्रव्यमान के लगभग बराबर है। हाइड्रोजन परमाणु में से इलेक्ट्रॉन बाहर निकल जाने पर जो इकाई धनावेशित कण (H+) शेष रह जाता है उसे हाइड्रोजन परमाणु का नाभिक या प्रोटॉन कहते हैं। अंग्रेज भौतिक विज्ञानी अर्नेस्ट रदरफोर्ड (191) ने प्रोटॉन की खोज की और सिद्ध किया कि सभी परमाणुओं में प्रोटॉन होते हैं।

न्यूट्रॉन-न्यूट्रॉन विद्युत् उदासीन कण हैं। न्यूट्रॉन का द्रव्यमाने (mn = 1.008665 amu) हाइड्रोजन परमाणु (H) के द्रव्यमान के लगभग बराबर है। न्यूट्रॉन की खोज सन् 1932 में अंग्रेज वैज्ञानिक जे० चैडविक ने की। हाइड्रोजन-1 परमाणु ([latex]_{ 1 }^{ 1 }{ H }[/latex]) को छोड़कर अन्य सभी परमाणुओं में न्यूट्रॉन होते हैं।

प्रश्न 2.
टॉमसन का परमाणु मॉडल समझाइए। इसकी सीमाएँ भी लिखिए।
उत्तर
टॉमसन का परमाणु मॉडल ।। कैथोड किरणों और धन किरणों पर किए गए प्रयोगों से प्राप्त जानकारी के आधार पर जे०जेटॉमसन (J.J. Thomson, 1904) ने प्रथम परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया। टॉमसन मॉडल के अनुसार, परमाणु अतिसूक्ष्म गोलाकार (spherical) विद्युत-उदासीन कण हैं जो धन और ऋण आवेशित द्रव्य से बने हुए हैं। धनावेशित द्रव्य परमाणु में एक समान रूप से फैला हुआ है तथा इलेक्ट्रॉन धन-आवेश में इस प्रकार पॅसे हुए हैं जैसे तरबूज में बीज धंसे रहते हैं।

टॉमसन परमाणु मॉडल, परमाणु का “तरबूज मॉडल” (water-melon model) भी कहलाता है। यह मॉडल परमाणु स्पेक्ट्रम की उत्पत्ति की व्याख्या करने में असफल रहा। सन् 1911 में लॉर्ड रदरफोर्ड ने ऐल्फा-कणों के प्रकीर्णन प्रयोग द्वारा इस मॉडल का खण्डन किया और परमाणु का नाभिकीय मॉडल प्रस्तुत किया।

प्रश्न 3.
परमाणु क्रमांक से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
किसी तत्व के परमाणु नाभिक पर स्थित धनावेश इकाइयों की संख्या को उस तत्व का परमाणु क्रमांक (2) कहते हैं। परमाणु नाभिक पर स्थित धनावेश इकाइयों की संख्या नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होती है। अत: किसी तत्व के परमाणु नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या उस तत्व का परमाणु क्रमांक (Z) होता है। प्रत्येक तत्व का परमाणु क्रमांक निश्चित और स्थिर होता है। भिन्न-भिन्न तत्वों के परमाणु क्रमांक भिन्न-भिन्न होते हैं। किसी तत्व के सभी परमाणुओं में प्रोटॉनों की संख्या समान होती है। अतः परमाणु क्रमांक (2) तत्वों का मूल लक्षण (fundamental property) है। हाइड्रोजन का परमाणु क्रमांक 1 है, इस कथन से यह अभिप्राय है कि हाइड्रोजन परमाणु के नाभिक में एक प्रोटॉन है। कार्बन का परमाणु क्रमांक 6 और सोडियम का परमाणु क्रमांक 11 है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-83

प्रश्न 4.
निम्नलिखित को स्पष्ट कीजिए।
(i) समस्थानिक,
(ii) समभारिक
उत्तर
(i) समस्थानिक–किसी एक तत्त्व के ऐसे परमाणु जिनकी परमाणु संख्या समान होती है। परन्तु द्रव्यमान संख्या भिन्न होती है, समस्थानिक कहलाते हैं। ऐसे परमाणुओं में प्रोटॉनों की संख्या तो समान होती है परन्तु न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न होती है। उदाहरणार्थ-प्रोटियम (1H1), ड्यूटीरियम (1H2) तथा ट्राइटियम (1H3) हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक हैं। इन समस्थानिकों की परमाणु संख्या 1 है। परन्तु द्रव्यमान संख्याएँ क्रमशः 1, 2 व 3 हैं।

(ii) समभारिक–विभिन्न तत्त्वों के ऐसे परमाणु जिनकी द्रव्यमान संख्या समान होती है, समभारिक कहलाते हैं। उदाहरणार्थ- 18Ar40, 19K40 तथा 20Ca40 समभारिक हैं।

प्रश्न 5.
निम्न में से कौन-से इलेक्ट्रॉनिक विन्यास नियमानुसार सही नहीं हैं। सम्बन्धित नियमों को परिभाषित भी कीजिए
(i) 1s2, 2s2
(ii) 1s2, 2s2, 2p2x, 2p1y
(iii) 1s2, 2s2, 2p2x, 2p2y , 2p1z
(iv) 1s2, 2s2, 2p7
उत्तर
(ii) 1s2,2s2,2p2x,2p1y), इलेक्ट्रॉनिक विन्यास सही नहीं है, क्योंकि हुण्ड के नियमानुसार इसका सही विन्यास 1s2,2s2,2p1x,2p1y, 2p1z होना चाहिए। हुण्ड का नियम–किसी उपकोश के कक्षक, में इलेक्ट्रॉनों का युग्मन तब तक नहीं हो सकता जब तक प्रत्येक ऑर्बिटल में समदिश स्पिन के एक-एक इलेक्ट्रॉन नहीं हो जाते हैं।
(iv) 1s2,2s2,2p7 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास सही नहीं है क्योंकि पाउली के अपवर्जन नियम के अनुसार, p उपकोश में अधिकतम 6 इलेक्ट्रॉन ही हो सकते हैं। सही इलेक्ट्रॉनिक विन्यास इस प्रकार होना चाहिए 1s2,2s2,2p6,3s1

पाउली का अपवर्जन नियम-“किसी परमाणु के किन्हीं दो इलेक्ट्रॉनों के लिए चारों क्वाण्टम संख्याओं के मान समान नहीं हो सकते हैं।”

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल (सिद्धान्त) का उल्लेख कीजिए। इसकी सीमाएँ भी लिखिए।
उत्तर
रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल (सिद्धान्त ) : विभिन्न तत्वों के परमाणुओं पर तीव्रगामी o-कणों की बमबारी के प्रयोग से प्राप्त प्रेक्षणों के आधार पर रदरफोर्ड ने निम्नलिखित सिद्धान्त दिया, जिसे परमाणु का नाभिकीय सिद्धान्त कहते हैं जो कि निम्न प्रकार है-

  1. परमाणु अति सूक्ष्म, गोलाकार, विद्युत-उदासीन कण है। यह धनावेशित नाभिक के चारों ओर विशाल त्रिविम आकाश में गतिशील इलेक्ट्रॉनों का एक समूह होता है।
  2. परमाणु का केन्द्रीय भाग, जिसमें परमाणु का कुल धनावेश और लगभग समस्त द्रव्यमान निहित होता है, नाभिक कहलाता है।
  3. नाभिक पर कुल केन्द्रित धनावेश, इलेक्ट्रॉनों के कुल ऋणावेशों के बराबर होता है जिससे परमाणु में विद्युत आवेशों का सन्तुलन बना रहता है और वह उदासीन रहता है।
  4. नाभिक की त्रिज्या 10-12 सेमी और परमाणु की त्रिज्या 10-8 सेमी होती है। स्पष्ट है कि परमाणु की त्रिज्या नाभिक की त्रिज्या से लगभग 10,000 गुना अधिक होती है।
  5. परमाणु के ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन इसके धनावेशित नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाते रहते हैं।
  6. परमाणु के नाभिक में स्थित धनावेशित कणों की संख्या उसके ऋणावेशित इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होती है; अतः परमाणु विद्युत-उदासीन होता है।
  7. नाभिक तथा उसके चारों ओर भ्रमण कर रहे इलेक्ट्रॉन के बीच परस्पर स्थिर-वैद्युत आकर्षण होने के बाद भी इलेक्ट्रॉन तीब्र गति से भ्रमण करते रहते हैं और नाभिक में नहीं गिरते; क्योंकि इन इलेक्ट्रॉनों के परिक्रमण से उत्पन्न अपकेन्द्री बल नाभिक के स्थिर-वैद्युत आकर्षण बल को सन्तुलित कर देता है।

रदरफोर्ड के उपर्युक्त मॉडल को परमाणु का मॉडल (nuclear model) कहा गया। इस मॉडल को सौर (solar) या ग्रहीय (planetary) मॉडल भी कहते हैं; क्योंकि इस मॉडल में यह कल्पना की गई है कि जिस प्रकार सूर्य के चारों ओर ग्रह परिक्रमा करते हैं; उसी प्रकार नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन घूमते रहते हैं। रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल की सीमाएँ (अर्थात् दोष या कमियाँ) निम्नलिखित हैं-

  1. रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल के अनुसार इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर विभिन्न कक्षाओं में तीव्र गति से चक्कर लगाते हैं। क्लार्क मैक्सवेल ने बताया कि विद्युत-चुम्बकीय सिद्धान्त के अनुसार, ऋणावेशित इलेक्ट्रॉनों को धनावेशित नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाने के कारण सतत रूप से प्रकाश विकिरण उत्सर्जित करने चाहिए जिससे लगातार ऊर्जा की क्षति होनी चाहिए तथा उनकी कक्षा की त्रिज्या लगातार कम होती जानी चाहिए और अन्त में वे नाभिक में गिरकर नष्ट हो जाने चाहिए। परन्तु ऐसा नहीं होता है क्योंकि परमाणु एक स्थायी निकाय है। अतः रदरफोर्ड मॉडल परमाणु निकाय के स्थायित्व की व्यवस्था करने में असफल रहा है।
  2. रदरफोर्ड के -कणों के प्रकीर्णन प्रयोग से परमाणु में उपस्थित प्रोटॉनों तथा इलेक्ट्रॉनों की । | संख्या के बारे में कोई जानकारी प्राप्त नहीं होती है। अतः यह परमाणु संरचना के बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं करता है।
  3. इस सिद्धान्त के द्वारा यह भी स्पष्ट नहीं होता कि इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर कहाँ और कैसे स्थित रहता है और उसकी ऊर्जा क्या है।
  4. परमाणु रेखीय स्पेक्ट्रम (line spectrum) देते हैं, जबकि यदि इलेक्ट्रॉन के परिक्रमण से निरन्तर ऊर्जा का उत्सर्जन होता है तो रेखीय स्पेक्ट्रम के स्थान पर सतत स्पेक्ट्रम (continuous spectrum) प्राप्त होना चाहिए था। दूसरे शब्दों में, स्पेक्ट्रम में निश्चित आवृत्ति की रेखाएँ नहीं होनी चाहिए, परन्तु वास्तव में परमाणु का स्पेक्ट्रम सतत नहीं होता। इसके स्पेक्ट्रम में निश्चित आवृति’ की कई रेखाएँ होती हैं। अतः रदरफोर्ड परमाणु मॉडल परमाणुओं के रैखिक स्पेक्ट्रम (line spectrum) को समझाने में असफल रहा है।

रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल की कमियों को दूर करने के लिए नील बोर ने सन् 1913 में स्पेक्ट्रमी अध्ययन और क्वाण्टम सिद्धान्त की सहायता से अपना परमाणु सिद्धान्त तथा परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया।

प्रश्न 2.
बोर के परमाणु मॉडल का वर्णन कीजिए तथा उसकी सीमाएँ भी लिखिए।
उत्तर
बोर का परमाणु मॉडल यह प्लांक के क्वाण्टम सिद्धान्त (Planck’s quantum theory) पर आधारित है। यह रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल में पाये जाने वाले दोषों को दूर करता है और परमाणु के स्थायित्व व उसके रैखिक स्पेक्ट्रम की व्याख्या करता है। नील बोर (Neils Bohr, 1913) ने परमाणु संरचना के सम्बन्ध में निम्नलिखित अभिकल्पनाएँ (assumptions) प्रस्तुत की

  1. इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर किसी विशेष वृतीय कक्ष (circular orbit) में बिना ऊर्जा का | उत्सर्जन (emission) किये चक्कर लगाते रहते हैं। इन कक्षों को स्थायी कक्षाएँ (stationary orbits) कहते हैं।
  2. नाभिक के चारों ओर अनेक वृत्तीय कक्षाएँ सम्भव हैं परन्तु इलेक्ट्रॉन इन सभी सम्भव कक्षाओं में चक्कर नहीं लगाते हैं। इलेक्ट्रॉन केवल उसी कक्षा में चक्कर लगाते हैं जिसमें उसका कोणीय संवेग (angular momentum) [latex]\frac { h }{ 2\Pi } [/latex] का गुणित (integral multiple) होता है। यदि m द्रव्यमान का इलेक्ट्रॉन, r त्रिज्या वाली कक्षा में v वेग से घूमता है, तो इलेक्ट्रॉन का कोणीय संवेग
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-84
    [latex]mvr=\frac { nh }{ 2\Pi } [/latex]
    जहाँ, h प्लांक नियतांक है।
    n स्थायी कक्षा की क्रम संख्या (principal quantum number) है। n= 1, 2, 3, … या K, L, M, N …
    यदि किसी इलेक्ट्रॉन का कोणीय संवेग h/2π हैं, तो वह परमाणु के K-कोश में चक्कर लगाता है। इसी प्रकार यदि किसी इलेक्ट्रॉन का कोणीय संवेग [latex]\frac { 2h }{ 2\Pi } [/latex] अर्थात् [latex]\frac { h }{ \Pi } [/latex] है, तो वह परमाणु के L-कोश (n=2) में चक्कर लगाती है।
  3.  प्रत्येक स्थायी कक्षा की एक निश्चित ऊर्जा होती है। इसलिए इन कक्षाओं को ऊर्जा स्तर (energy level) भी कहते हैं। जैसे-जैसे मुख्य क्वाण्टम संख्या (n) का मान बढ़ता है वैसे-वैसे स्थायी कक्षा की त्रिज्या (r) और उसकी ऊर्जा (E) का मान बढ़ता जाता है। जब तक इलेक्ट्रॉन एक-निश्चित ऊर्जा वाली स्थायी कक्षा में घूमता रहता है, तो वह ऊर्जा का शोषण या उत्सर्जन नहीं कर सकता।
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-85
  4. जब कोई इलेक्ट्रॉन एक स्थायी कक्षा (ऊर्जा स्तर) से दूसरी स्थायी कक्षा (ऊर्जा स्तर) में कूदता है, तो दोनों ऊर्जा स्तरों की ऊर्जा का अन्तर (∆E) एक विकिरण के रूप में अवशोषित (absorb) या उत्सर्जित (emit) होता है। इस विकिरण की आवृत्ति (v) या तरंगदैर्घ्य (λ) का मान निम्नलिखित समीकरण से निकाल सकते हैं।
    [latex]{ E }_{ 2 }-{ E }_{ 1 }=\left( \triangle E \right) =hv=\frac { hv }{ \lambda } [/latex]
    जब इलेक्ट्रॉन एक न्यून ऊर्जा (E1) के स्तर से एक उच्च ऊर्जा (E2) के स्तर में कूदता है, तो परमाणु द्वारा ∆E ऊर्जा अवशोषित होती है। इसके विपरीत, यदि इलेक्ट्रॉन एक-उच्च ऊर्जा (E2) स्तर से एक न्यून ऊर्जा (E1) के स्तर में कूदता है तो ऊर्जा विकिरण के रूप में परमाणु द्वारा उत्सर्जित होती है।
  5. इन परिवर्तनों के फलस्वरूप प्राप्त स्पेक्ट्रम में निश्चित आवृति की रेखायें (lines) उत्पन्न होती हैं। इस प्रकार यह मॉडल परमाणु के रैखिक स्पेक्ट्रम की व्याख्या करता है।
    परमाणु में इलेक्ट्रॉन हमेशा निम्नतम ऊर्जा वाली कक्षाओं में रहते हैं। इस अवस्था को परमाणु की आद्य अवस्था (ground state) कहते हैं। बाहर से ऊर्जा देने पर इलेक्ट्रॉन उत्तेजित (excite) होकर अधिक ऊर्जा वाली कक्षाओं में कूद जाते हैं। परमाणु की इस अवस्था को उत्तेजित अवस्था (excited state) कहते हैं। परमाणु को बाहर से बहुत अधिक ऊर्जा देने पर इलेक्ट्रान परमाणु को छोड़कर उससे बाहर निकल जाते हैं और धनायन (cation) प्राप्त होते हैं।

बोर के परमाणु मॉडल की सीमाएँ निम्नवत् हैं-

  1. बोर का परमाणु मॉडल केवल उन परमाणुओं और आयनों के स्पेक्ट्रम की व्याख्या करता है। जिनमें केवल एक इलेक्ट्रॉन होता है; जैसे-H-परमाणु, He+ और Li2+ आयन। यह उन निकायों (systems) की व्याख्या नहीं करता जिनमें एक से अधिक इलेक्ट्रॉन होते हैं। जैसे-N, ,0, Cl आदि।
  2. बोर के सिद्धान्त द्वारा जीमनं प्रभाव (Zeeman effect) और स्टार्क प्रभाव (Stark effect) की व्याख्या नहीं की जा सकती है। जिस वस्तु से विकिरण का उत्सर्जनं हो रहा है उस वस्तु को चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर उसकी स्पेक्ट्रम रेखाएँ विभक्त (split) हो जाती हैं। इस प्रकार स्पेक्ट्रम रेखाओं का चुम्बकीय क्षेत्र में विभक्त होना जीमन-प्रभाव (Zeeman effect) कहलाता है। इसी प्रकार वैद्युत क्षेत्र में स्पेक्ट्रम रेखाओं का विभक्त होना स्टार्क प्रभाव कहलाता है।
  3. यह हाइड्रोजन परमाणु के सूक्ष्म स्पेक्ट्रम की संरचना (fine spectrum of H-atom) की व्याख्या नहीं करता है।
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-86
    जब हाइड्रोजन के स्पेक्ट्रम का अध्ययन उच्च विभेदन क्षमता (high resolving power) वाले स्पेक्ट्रोस्कोप (spectroscope) से करते हैं तो यह पाया जाता है कि प्रत्येक एकल रेखा (single line) वास्तव में कई सूक्ष्म रेखाओं (fine lines) से मिलकर बनी हैं। हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम में इन सूक्ष्म रेखाओं को हाइड्रोजन परमाणु का सूक्ष्म स्पेक्ट्रम (fine spectrum of H-atom) कहते हैं। बोर का परमाणु मॉडल इसकी व्याख्या नहीं कर सकता है।
  4. बोर का परमाणु मॉडल हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता सिद्धान्त (Heisenberg’s uncertainty principle) के विरूद्ध है।

प्रश्न 3.
क्वाण्टम संख्याएँ क्या हैं? ये कितने प्रकार की होती हैं? इनमें से प्रत्येक को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर
क्वाण्टम संख्याएँ-जिन संख्याओं का प्रयोग करके हम परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा तथा स्थिति (नाभिक से दूरी, कक्षक की आकृति, अभिविन्यास तथा चक्रण की दिशा) से सम्बन्धित समस्त जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, उन्हें क्वाण्टम संख्याएँ कहते हैं। क्वाण्टम संख्याएँ निम्नलिखित चार प्रकार की होती हैं।

1. मुख्य क्वाण्टम संख्या—यह क्वाण्टम संख्या परमाणु के इलेक्ट्रॉन के मुख्य ऊर्जा स्तर अथवा
कोश (shell) को व्यक्त करती है। इसे n से प्रदर्शित करते हैं। यह क्वाण्टम संख्या, परमाणु के इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा तथा नाभिक से उसकी कोश की औसत दूरी प्रदर्शित करती है। इसका मान ‘0 के अतिरिक्त कोई पूर्णांक 1, 2, 3, 4 इत्यादि हो सकता है। मुख्य ऊर्जा स्तरों को क्रमशः नाभिक से आरम्भ करके K, L, M, N आदि अक्षरों से भी व्यक्त करते हैं। इन कोशों हेतु ॥ का मान क्रमशः 1, 2, 3, 4 आदि होता है। अर्थात् ॥=1 का अर्थ है न्यूनतम ऊर्जा स्तर अर्थात् K-कोश
n=2 का अर्थ है L-कोश
n= 3 का अर्थ है M-कोश
n= 4 का अर्थ है N-कोश इत्यादि।
n का मान बढ़ने के साथ-साथ इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा तथा उसकी नाभिक से औसत दूरी प्राय: बढ़ती जाती है।
2. दिगंशी क्वाण्टम संख्या—इसे कोणीय संवेग (angular momentum) या भौम क्वाण्टम संख्या (secondary quantum number) भी कहते हैं। इसे 1 से प्रदर्शित करते हैं। तत्त्वों के स्पेक्ट्रमों में मुख्य रेखाओं के अतिरिक्त बारीक रेखाएँ भी होती हैं। इन बारीक रेखाओं की उत्पत्ति को समझाने के लिए यह सुझाया गया कि किसी बहुइलेक्ट्रॉनिक परमाणु के मुख्य कोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा समान नहीं होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ये इलेक्ट्रॉन विभिन्न पथों पर गति करते हैं और इनके कोणीय संवेग भी भिन्न-भिन्न होते हैं। अत: एक ही मुख्य कोश में अनेक उपकोश (sub-shell) अथवा ऊर्जा के उपस्तर (sub levels) होते हैं। इनके कारण ही इलेक्ट्रॉनों की कूदों (jumps) की संख्या बढ़ जाती है जिससे स्पेक्ट्रम में अधिक संख्या में रेखाएँ प्राप्त होती हैं।
दिगंशी क्वाण्टम संख्या 1, इलेक्ट्रॉन के उप ऊर्जा-स्तर (उपकोश) को प्रदर्शित करती है। के मान मुख्य क्वाण्टम संख्या n पर निर्भर करते हैं। किसी n के लिये । के मान 0 से लेकर (n-1) तक होते हैं।
n=1 तो, 1= 0
n=2 तो, 1=0 और 1
n=3 तो,1= 0, 1 और 2
जिन उपकोशों के लिये । के मान क्रमश: 0, 1, 2 और 3 होते हैं उन्हें क्रमशः s, p, d और f अक्षरों द्वारा प्रदर्शित करते हैं।
1 का मान उप ऊर्जा-स्तर का प्रतीक
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किसी n के लिये 1 के मानों की कुल संख्या ॥ के बराबर होती है अर्थात् किसी कोश में उपकोशों की कुल संख्या उस कोश की मुख्य क्वाण्टम संख्या n के बराबर होती है।। का मान । उपकोश के कक्षकों की आकृति को निर्धारित करता है।
3. चुम्बकीय क्वाण्टम संख्या—इसे m या m; द्वारा प्रदर्शित करते हैं।
यह क्वाण्टम संख्या उप ऊर्जा-स्तरों के कक्षकों को प्रदर्शित करती है। m के मान दिगंशी क्वाण्टम संख्या के मान पर निर्भर करते हैं। किसी m के मान +1 से लेकर -1 तक (शून्य सहित) या -1 से +1 तक होते हैं।
यदि l= 0 तो, m=0
1= 1 तो, m= + 1, 0 -1
1= 2 तो, m= + 2, + 1, 0, -1 -2
1= 3 तो, m= +3, +2, + 1, 0,-1,- 2,-3
किसी 1 के लिए m के मानों की कुल संख्या (21+1) होती है, अर्थात् किसी उपकोश में कक्षकों की कुल संख्या (21+ 1) होती है।
(जहाँ । उपकोश की दिगंशी क्वाण्टम संख्या है)।
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कभी-कभी + चिन्हों को बिना किसी विभेद के प्रयोग किया जाता है। बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में किसी उपकोश में उपस्थित सभी कक्षकों की ऊर्जाएँ । समान होती हैं। ऐसे कक्षकों को समभ्रंश कक्षक (degenerate orbital) कहते हैं। बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की उपस्थिति में किसी एक उपकोश में उपस्थित कक्षकों की ऊर्जाओं में थोड़ा अन्तर आ जाता है। किसी स्पेक्ट्रमी रेखा के कई रेखाओं में विभक्त होने का कारण भी यह ऊर्जाओं में अन्तर है।
4. चक्रण क्वाण्टम संख्या—इसे s या m, से प्रदर्शित करते हैं। इस संख्या की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि परमाणु में इलेक्ट्रॉन न केवल नाभिक के चारों ओर घूमता है बल्कि अपने अक्ष पर घूर्णन (चक्रण) करता है। यह संख्या इलेक्ट्रॉन के चक्रण की दिशा को प्रदर्शित करती है। इलेक्ट्रॉन के चक्रण की दिशा दक्षिणावर्त (clockwise) या वामावर्त (anticlockwise) हो सकती है। m के किसी मान के लिए : के केवल दो मान होते हैं- [latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex] या [latex]-\frac { 1 }{ 2 } [/latex] इन दोनों मानों को विपरीत दिशाओं को दर्शाते हुए तीरों (क्रमश: ↑ और ↓) द्वारा प्रदर्शित करते हैं। प्रत्येक इलेक्ट्रॉन का उसके चक्रण के कारण कोणीय संवेग होता है जिसका परिमाण निम्न व्यंजक से प्राप्त होता है।
चक्रण कोणीय संवेग [latex]\sqrt { s\left( s+1 \right) } \times \overline { h } [/latex] जहाँ [latex]s=+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
इस क्वाण्टम संख्या से पदार्थों के चुम्बकीय गुणों के विषय में भी जानकारी मिलती है। घूमता हुआ इलेक्ट्रॉन छोटे चुम्बक के समान व्यवहार करता है। यदि किसी कक्षक में दो इलेक्ट्रॉन होते हैं तो वे एक-दूसरे के प्रभाव को निरस्त कर देते हैं। यदि किसी परमाणु के सभी कक्षक पूर्णतः भरे होते हैं तो सभी इलेक्ट्रॉन एक-दूसरे के चुम्बकीय प्रभाव को नष्ट कर देते हैं और पदार्थ प्रतिचुम्बकीय (diamagnetic) होता है। ऐसा पदार्थ बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा प्रतिकर्षित होता है। दूसरी ओर यदि पदार्थ में कुछ अर्द्ध-पूर्ण कक्षक होते हैं तो इसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉन एक-दूसरे के चुम्बकीय प्रभाव को पूर्णतः नष्ट नहीं कर पाते। ऐसा पदार्थ अनुचुम्बकीय (paramagnetic) होता है। यह पदार्थ बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की तरफ आकर्षित होता हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 10 Development

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 10 Development (विकास)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आप ‘विकास’ से क्या समझते हैं? क्या ‘विकास की प्रचलित परिभाषा से समाज के सभी वर्गों को लाभ होता है?
उत्तरं-
‘विकास’ शब्द अपने व्यापक अर्थ में उन्नति, प्रगति, कल्याण और बेहतर जीवन की अभिलाषा के विचारों का वाहक है। कोई समाज के बारे में अपनी समझ द्वारा यह स्पष्ट करता है कि समाज के लिए समग्र रूप से उसकी दृष्टि क्या है और उसे प्राप्त करने का सर्वोत्तम उपाय क्या है? साधारणतया विकास शब्द का प्रयोग प्रायः आर्थिक विकास की दर में वृद्धि और समाज को आधुनिकीकरण जैसे संकीर्ण अर्थों में भी होता रहता है। ‘विकास’ की प्रचलित परिभाषा से समाज के सभी वर्गों को लाभ नहीं होता है। प्रायः देखा गया है कि विकास को काम समाज के व्यापक दृष्टिकोण के अनुसार नहीं होता है। इस प्रक्रिया में समाज के कुछ हिस्से लाभान्वित होते हैं जबकि शेष लोगों को अपने घर, जमीन, जीवन-शैली को बिना किसी भरपाई के खोना पड़ सकता है।

प्रश्न 2.
जिस तरह का विकास अधिकतर देशों में अपनाया जा रहा है उससे पड़ने वाले सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
जिस तरह का विकास अधिकतर देशों में अपनाया जा रहा है उससे निम्नलिखित सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव पड़े हैं-
सामाजिक प्रभाव
विकास की समाज को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। अन्त बातों के अतिरिक्त बड़े बाँधों के निर्माण,
औद्योगिक गतिविधियों और उत्खनन कार्यों के कारण बड़ी संख्या में लोगों को उनके घरों और क्षेत्रों से विस्थापन हुआ है। विस्थापन का परिणाम आजीविका खोने और दरिद्रता में वृद्धि के रूप में हमारे सामने आया है। अगर ग्रामीण खेतिहर समुदाय अपने परम्परागत पेशे और क्षेत्र से विस्थापित होते हैं, तो वे समाज के हाशिए पर चले जाते हैं। कालान्तर में वे नगरीय और ग्रामीण गरीबों की विशाल संख्या में सम्मिलित हो जाते हैं। उनके परम्परागत कौशल नष्ट हो जाते हैं। संस्कृति भी नष्ट होती है क्योंकि जब लोग नई जगह पर जाते हैं, तो वे अपनी पूरी सामुदायिक जीवन पद्धति खो बैठते हैं।

पर्यावरणीय प्रभाव
विकास के कारण अनेक देशों के पर्यावरण को भी बहुत नुकसान पहुँचा है। जब दक्षिणी और दक्षिण-पूर्व एशिया के तटों पर सुनामी ने कहर ढाया, तो यह देखा गया कि तटीय वनों के नष्ट होने और समुद्र तट के निकट वाणिज्यिक उद्यमों के स्थापित होने के कारण ही इतना अधिक नुकसान हुआ। कालान्तर में पारिस्थितिकी संकट से हम बुरी तरह प्रभावित होंगे। वायु प्रदूषण सभी को प्रभावित करने वाली समस्या है। भूमि का जल स्तर भी गिर गया है, ग्रामीण महिलाओं को पानी लेने अब बहुत दूर जाना पड़ता है।

विकास के लिए हम जिन क्रियाओं पर निर्भर हैं वे ऊर्जा के निरन्तर बढ़ते उपयोग से सम्पन्न होते हैं। विश्व में प्रयुक्त ऊर्जा का अधिकांश भाग कोयला अथवा पेट्रोलियम जैसे स्रोतों से आता है, जिन्हें पुनः प्राप्त करना सम्भव नहीं है। उपभोक्ताओं की बढ़ी हुई आवश्यकताओं को पूरा करने में अमेजन के बरसाती जंगलों का विशाल भू-भाग उजड़ता जा रहा है। इस प्रकार विकास ने समाज और पर्यावरण को गम्भीर रूप से प्रभावित किया है।

प्रश्न 3.
विकास की प्रक्रिया ने किन नए अधिकारों के दावों को जन्म दिया है?
उत्तर-
विकास की प्रक्रिया ने जिन नए अधिकारों के दावों को जन्म दिया है, उनमें प्रमुख हैं-
1. आजीविका के अधिकार का दावा – विकास की कीमत अत्यन्त दरिद्रों और आबादी के असुरक्षित भाग को चुकानी पड़ती है। चाहे यह कीमत पारिस्थितिकी तन्त्र में नुकसान के कारण हो या विस्थापन के समय आजीविका खाने के कारण। लोकतन्त्र में लोगों को यह अधिकार है। कि वे सरकार के सामने आजीविका के अधिकार की माँग कर सकते हैं।
2. नैसर्गिक संसाधनों पर अधिकार का दावा – आदिवासी और आदिम समुदाय जिनका पर्यावरण से गहन संबंध होता है नैसर्गिक संसाधनों के उपयोग के परम्परागत अधिकारों का दावा करने लगे हैं।

प्रश्न 4.
विकास के बारे में निर्णय सामान्य हित को बढ़ावा देने के लिए किए जाएँ, यह सुनिश्चित करने में अन्य प्रकार की सरकार की अपेक्षा लोकतान्त्रिक व्यवस्था के क्या लाभ हैं?
उत्तर-
लोकतान्त्रिक व्यवस्था में संसाधनों को लेकर विरोध या बेहतर जीवन के विषय में विभिन्न विचारों के द्वन्द्व का हल विचार-विमर्श और सभी के अधिकारों के प्रति सम्मान के माध्यम से होता है। इन्हें ऊपर से थोपा नहीं जा सकता। इस प्रकार अगर बेहतर जीवन प्राप्त करने में समाज का प्रत्येक व्यक्ति साझीदार है, तो विकास के लक्ष्य तय करने और उसके कार्यान्वयन के तरीके खोजने में भी प्रत्येक व्यक्ति को सम्मिलित करने की आवश्यकता है। इस प्रकार विकास के बारे में निर्णय लेने में अन्य सरकार की अपेक्षा लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ही लाभ है।

प्रश्न 5.
विकास से होने वाली सामाजिक और पर्यावरणीय क्षति के प्रति सरकार को जवाबदेह बनवाने में लोकप्रिय संघर्ष और आन्दोलन कितने सफल रहे हैं।
उत्तर-
विकास से होने वाली सामाजिक और पर्यावरणीय क्षति के प्रति सरकार को जवाबदेह बनवाने में पर्यावरण आन्दोलन बड़े सफल रहे हैं। पर्यावरण आन्दोलन की जड़े औद्योगीकरण के विरुद्ध 19वीं सदी में विकसित हुए विद्रोह में देखी जा सकती हैं। वर्तमान में पर्यावरणीय आन्दोलन एक विश्वव्यापी प्रकरण बन गया है और इसके गवाह हैं विश्वभर में फैले हजारों गैर-सरकारी संगठन और बहुत-सी ‘ग्रीन’ पार्टियाँ। कुछ जाने-माने पर्यावरण संगठनों में ग्रीन पीस और वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फण्ड शामिल हैं। भारत में भी हिमालय के वन क्षेत्र को बचाने के लिए ‘चिपको आन्दोलन’ का जन्म हुआ। ये समूह पर्यावरण उद्देश्यों की रोशनी में सरकार की औद्योगिक एवं विकास नीतियों को बदलने के लिए दबाव डालने का प्रयत्न करते हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
बेहतर जीवन की कामना से संबंधित है
(क) विकास
(ख) पर्यावरण
(ग) तानाशाही
(घ) योजना
उत्तर-
(क) विकास।

प्रश्न 2.
मानव विकास प्रतिवेदन प्रकाशित करता है
(क) योजना आयोग
(ख) संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP)
(ग) भारतीय संसद
(घ) मानवाधिकार आयोग
उत्तर-
(ख) संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP)।

प्रश्न 3.
‘चिपको आन्दोलन किससे सम्बद्ध है?
(क) पर्यावरण
(ख) विधि
(ग) योजना
(घ) नर्मदा बाँध
उत्तर-
(क) पर्यावरण।

प्रश्न 4.
ओगोनी प्रान्त किस देश में है?
(क) नाइजीरिया
(ख) दक्षिणी अफ्रीका
(ग) इजरायल
(घ) फिलिस्तीन
उत्तर-
(क) नाइजीरिया।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एशियाई व अफ्रीकी देशों के लोगों की क्या समस्याएँ हैं?
उत्तर-
एशियाई व अफ्रीकी देशों में गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी, निरक्षरता और बुनियादी सुविधाओं के अभाव की समस्याएँ हैं।

प्रश्न 2.
पर्यावरणवादियों के क्या विचार हैं?
उत्तर-
पर्यावरणवादियों का विचार है कि मानव को पारिस्थितिकी के सुर-में-सुर मिलाकर जीना चाहिए और पर्यावरण में अपने तात्कालिक हितों के लिए छेड़छाड़ करना बंद करना चाहिए।

प्रश्न 3.
‘चिपको आन्दोलन क्या है?
उत्तर-
यह एक पर्यावरणीय आन्दोलन है और भारत में हिमालय के वनक्षेत्र को बचाने के लिए प्रारम्भ किया गया था।

प्रश्न 4.
‘मानव विकास प्रतिवेदन क्या है?
उत्तर-
‘मानव विकास प्रतिवेदन संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) प्रकाशित करता है। यह उसका वार्षिक प्रकाशन है। इस प्रतिवेदन में साक्षरता और शैक्षिक स्तर, आयु सम्भावित और मातृ-मृत्यु दर जैसे विभिन्न सामाजिक संकेतकों के आधार पर देशों का दर्जा निर्धारित किया जाता है।

प्रश्न 5.
लोकतन्त्र और विकास दोनों का समान उद्देश्य क्या है?
उत्तर-
लोकतन्त्र और विकास दोनों का समान उद्देश्य जनसाधारण के लिए रोजगार प्राप्त कराना है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘विकास’ शब्द का क्या अर्थ है? ।
उत्तर-
‘विकास’ शब्द अपने व्यापकतम अर्थ में उन्नति, प्रगति, कल्याण और बेहतर जीवन की अभिलाषा के विचारों का वाहक है। कोई समाज विकास के बारे में अपनी समझे द्वारा यह स्पष्ट करता है कि समाज के लिए समग्र रूप से उसकी दृष्टि क्या है और उसे प्राप्त करने का सर्वोत्तम तरीका क्या है? विकास शब्द का प्रयोग प्रायः आर्थिक विकास की दर में वृद्धि और समाज का आधुनिकीकरण जैसे संकीर्ण अर्थों में भी होता रहता है। दुर्भाग्यवश विकास को साधारणतया पूर्व निर्धारित लक्ष्यों का बाँध, उद्योग, अस्पताल जैसी परियोजनाओं को पूरा करने से जोड़कर देखा जाता है। विकास का काम । समाज के व्यापक दृष्टिकोण के अनुसार नहीं होता है। इस प्रक्रिया में समाज के कुछ हिस्से लाभान्वित होते हैं जबकि शेष लोगों को अपने घर, जमीन, जीवन-शैली को बिना किसी भरपाई के खोना पड़ सकता है।

प्रश्न 2.
विकास की सामाजिक अवधारणा क्या है?
उत्तर-
विकास की सामाजिक अवधारणा का प्रयोग करने का श्रेय एल०टी० हॉबहाउस (L.T. Hobhouse) को दिया जाता है जिन्होंने अपनी पुस्तक सोशल डेवलपमेण्ट (Social Development) में विकास की सामाजिक अवधारणा, विकास की दशाओं तथा विभिन्न प्रकार के विकासों (जैसे कि संस्थाओं का विकास अथवा बौद्धिक विकास) इत्यादि अनेक विषयों पर समुचित प्रकाश डाला है। हॉबहाउस (Hobhouse) के अनुसार, “विकास का अभिप्राय नए प्रकायों के उदय होने के परिणामस्वरूप सामान्य कार्यक्षमता में वृद्धि अथवा पुराने प्रकार्यों की एक-दूसरे के साथ समायोजना के कारण सामान्य उपलब्धि में वृद्धि से है।

हॉबहाउस ने विकास की अवधारणा को समुदायों के विकास के संदर्भ में विकसित किया है। यदि कोई समुदाय अपने स्तर, कुशलता, स्वतन्त्रता तथा पारस्परिकता में आगे बढ़ता है तो हम यह कह सकते हैं। कि वह अमुक समुदाय विकास की ओर अग्रसर है। किसी एक तत्त्व का ही नहीं अपितु सभी तत्त्वों का समन्वय विकास के लिए अनवार्य है।

प्रश्न 3.
नर्मदा बचाओ आंदोलन के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
नर्मदा बचाओ आंदोलन’ नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर परियोजना के अंतर्गत बनने वाले बाँधों के निर्माण के विरुद्ध एक मिशन है। बड़े बाँधों के समर्थकों का तर्क है कि इनसे बिजली उत्पन्न होगी, काफी बड़े क्षेत्र में जमीन की सिंचाई में सहायता मिलेगी। सौराष्ट्र और कच्छ के रेगिस्तानी क्षेत्र को पेयजल भी उपलब्ध होगा। बड़े बाँधों के विरोधी (नर्मदा बचाओ आंदोलन) इन दावों का खण्डन करते हैं। इसके अतिरिक्त अपनी जमीन के डूबने और उसके कारण अपनी आजीविका के छिनने से दस लाख से अधिक लोगों के विस्थापन की समसया उत्पन्न हो गई है। इनमें से अधिकांश लोग जनजाति या दलित समुदायों के हैं और देश के अति वंचित समूहों में आते हैं।

प्रश्न 4.
‘सामाजिक विकास एक बहु-आयामी अवधारणा है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
‘सामाजिक विकास’ को टी०बी० बॉटोमोर ने इस प्रकार परिभाषित किया है, ‘सामाजिक विकास से हमारा तात्पर्य उस स्थिति से है जिसमें समाज के व्यक्तियों में ज्ञान की वृद्धि हो और व्यक्ति प्रौद्यागिक आविष्कारों द्वारा प्राकृतिक पर्यावरण पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लें साथ ही वे आर्थिक दृष्टि से आत्म-निर्भर हो जाएँ।” सामाजिक विकास की प्रक्रिया के अंतर्गत औद्योगीकरण की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप आर्थिक व राजनीतिक संगठनों की कार्यक्षमता में वृद्धि हुई है तथा इसके आधार पर समाजों को विकसित तथा अविकसित या विकासशील जैसी श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।

सामाजिक विकास का अभिप्राय जैवकीय विकास न होकर मानवीय ज्ञान में वृद्धि तथा प्राकृतिक पर्यावरण पर मानवीय नियंत्रण में अधिकाधिक वृद्धि है। मानवीय ज्ञान में वृद्धि की दृष्टि से अगर समाज में व्यक्ति अपने पूर्वजों की अपेक्षा ज्ञान में अभिवृद्धि कर चुके हैं तो उसे हम विकसित समाज कह सकते हैं। प्राकृतिक पर्यावरण पर मानवीय नियन्त्रण की वृद्धि भी विकास का एक सूचक है तथा जिन समाजों ने इस नियन्त्रण में सफलता प्राप्त कर ली है वे विकसित समाज हैं। वास्तव में, सामाजिक विकास को केवल आर्थिक विकास तक ही सीमित करना उचित नहीं है। विकासशील देशों के लिए ‘सामाजिक विकास’ एक बहु-आयामी अवधारणा है।

प्रश्न 5.
विकास का ‘जनांकिकीय संक्रान्ति सिद्धान्त क्या है?
उत्तर-
किसी भी देश के आर्थिक विकास का उस देश की मानव-शक्ति पर प्रभाव पड़ता है। इस प्रभाव को ‘जनांकिकीय संक्रान्ति सिद्धान्त’ द्वारा स्पष्ट किया जाता है जिसके अनुसार-

1. किसी भी अविकसित राष्ट्र में अशिक्षा, बाल विवाह एवं अन्य धार्मिक विश्वासों के कारण जन्म-दर अधिक होती है तथा स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में मृत्यु-दर भी अधिक होती है। इसलिए मानव-शक्ति में विशेष वृद्धि नहीं होती।

2. किसी भी विकासशील राष्ट्र में स्वास्थ्य सुविधाओं के बढ़ने से मृत्यु-दर कम होती है किन्तु
जन्म-दर में कोई विशेष कमी नहीं होती। इससे जनसंख्या में वृद्धि होती है तथा प्राकृतिक संसाधनों का विदोहन अधिक होने लगता है। ऐसा होने से प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है। किन्तु एक सीमा से अधिक जनसंख्या बढ़ जाने पर विपरीत प्रभाव पड़ने लगता है जिसे दूर करने के लिए मानव-शक्ति का नियोजन आवश्यक हो जाता है।

3. किसी भी विकसित राष्ट्र में शिक्षा की वृद्धि एवं रहन-सहन का स्तर ऊँचा होने के कारण रूढ़िवादिता एवं पारम्परिक दृष्टिकोण समाप्त हो जाता है जिससे जन्म-दर में कमी आ जाती है। तथा स्वस्थ सेवाओं एवं उत्पादन में वृद्धि के कारण मृत्यु-दर में भी कमी आती है। इसलिए मानव-शक्ति में वृद्धि होती है तथा समाज में आर्थिक संतुलन की स्थिति बन जाती है।

प्रश्न 6.
मानवीय संसाधनों का विकास किन विधियों द्वारा किया जा सकता है?
उत्तर-
टी० डब्ल्यूशुल्ज (T.W. Schultz) का मत है कि मानवीय साधनों का विकास निम्नलिखित पाँच विधियों से किया जा सकता है-

  1.  कार्यरत प्रशिक्षण की व्यवस्था करके,
  2.  वयस्क श्रमिकों के लिए अध्ययन कार्यक्रमों का संगठन करना, जिसमें कृषि संबंधी विस्तार । कार्यक्रम सम्मिलित हों,
  3.  ऐसी स्वास्थ्य सेवाएँ, सम्मिलित करना जिनसे लोगों का जीवन-स्तर, शक्ति एवं तेज में वृद्धि हो,
  4.  प्रारम्भिक, माध्यमिक एवं उच्चतर स्तर पर संगठित शिक्षा की व्यवस्था करना तथा
  5.  व्यक्तियों व परिवारों को स्थान परिवर्तित करके उन्हें नौकरी के अवसरों से समायोजित करना। | इस सूची में तकनीकी सहायता, विशेषज्ञों, तथा सलाहकारों का आयात करना भी जोड़ा जा सकता है। ।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आर्थिक विकास की प्रकृति स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
आर्थिक विकास के निम्नलिखित प्रमुख लक्षण इसकी प्रकृति को स्पष्ट करते हैं-

1. आर्थिक विकास एक प्रक्रिया- आर्थिक विकास किसी विशेष आर्थिक स्थिति का परिचायक नहीं है। यह तो प्रक्रिया है जो अविकसित या अर्द्धविकसित समाजों के उन प्रयासों को प्रकट करती है जो एक विशेष समय सन्दर्भ में उने लक्ष्यों की प्राप्ति से संबंधित हैं जिनके द्वारा वह
समाज विकसित अथवा औद्योगीकृत समाजों के रूप में रूपान्तरित होने के लिए करता है।

2. एक, चेतन प्रक्रिया- आर्थिक विकास एक चेतन प्रक्रिया है जिसमें विकास के स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं और उनकी प्राप्ति के लिए कार्यक्रम नियोजित किया जाता है।

3. नवोदित राष्ट्रों की तीसरी दुनिया से संबंधित- यह प्रक्रिया विशेषतः एशिया और अफ्रीका के उन राष्ट्रों में घटित हो रही है जो औद्योगीकरण की राह में पिछड़े हुए हैं। वे अपनी परम्परागत कृषि व्यवस्था में औद्योगिक अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर हो रहे हैं। उनके अपने विभिन्न मॉडल और प्रयास हैं।

4. संक्रमणकालिक स्थिति- उपर्युक्त विशेषता इस बात को भी प्रकट करती है कि आर्थिक विकास की प्रक्रिया संक्रमण अथवा रूपान्तर के दौर से संबंधित है। विकास के एक निश्चित बिंदु पर पहुँचकर इस प्रक्रिया का अर्थ और संदर्भ बदल जाता है क्योंकि तब तो संबंधित राष्ट्र विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आ चुके होते हैं।

प्रश्न 2.
विकास के कुप्रभावों से बचने के लिए हमें अपनी जीवन-शैली में किस प्रकार के बदलाव लाने होंगे?
उत्तर-
विकास का वैकल्पिक प्रारूप विकास की महँगी, पर्यावरण की नुकसान पहुँचाने वाली और प्रौद्योगिकी से संचालित सोच से दूर होने का प्रयास करता है। विकास को देश में मोबाइल फोनों की संख्या अत्याधुनिक हथियारों अथवा कारों की बढ़ती संख्या से नहीं बल्कि लोगों के जीवन की उस गुणवत्ता से नापा जाना चाहिए, जो उनकी प्रसन्नता, सुख-शांति और बुनियादी आवश्यकताओं के पूरा होने में झलकती है।

एक स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित रखने और ऊर्जा के पुनः प्राप्त हो सकने वाले स्रोतों का यथासंभव उपयोग करने के प्रयास किए जाने चाहिए। वर्षा जल संचयन, सौर एवं जैव गैस संयन्त्र, लघु-पनबिजली परियोजना, जैव कचरे से खाद बनाने के लिए कम्पोस्ट गड्ढे बनाना आदि इस दिशा में संभव प्रयासों के कुछ उदाहरण हैं। बड़े सुधार को प्रभावी बनाने के लिए बड़ी परियोजनाएँ ही एकमात्र तरीका नहीं हैं। बड़े बाँधों के विरोधियों ने छोटे बाँधों की वकालत की है, जिनमें बहुत कम निवेश की आवश्यकता होती है और विस्थापन भी कम होता है। ऐसे छोटे बाँध नागरिकों के लिए अधिक लाभप्रद हो सकते हैं।

इसी के साथ-साथ हमें अपने जीवन स्तर को बदलकर उन साधनों की आवश्यकताओं को भी कम करने की आवश्यकता है, जिनका नवीकरण नहीं हो सकता। यह एक उलझा हुआ मामला है। इसे चयन की आजादी में कटौती भी माना जा सकता है, लेकिन जीवन जीने के वैकल्पिक तरीकों की संभावनाओं पर विचार-विमर्श करने का आशय अच्छे जीवन की वैकल्पिक दृष्टि को खोलकर स्वतंत्रता और सृजनशीलता की संभावना बढ़ाना भी है। ऐसी किसी नीति के लिए देश-भर के लोगों और सरकार के बीच बड़े पैमाने पर सहयोग की आवश्यकता होगी। इसका अर्थ होगा कि ऐसे मामलों में निर्णय लेने के लिए लोकतान्त्रिक पद्धति अपनाई जाए। अगर हम विकास को किसी की स्वतंत्रता में वृद्धि की प्रक्रिया के रूप में देखते हैं और लोगों को निष्क्रिय उपभोक्ता नहीं मानकर विकास-लक्ष्यों को निर्धारित करने में सक्रिय भागीदारी मानते हैं, तो वैसे मसलों पर सहमति तक पहुँचना संभव है।

प्रश्न 3.
मानवीय विकास पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
विकास का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पहलू ‘मानव’ है। इसलिए किसी भी देश का आर्थिक विकास वस्तुत: वहाँ की मानव-शक्ति की अवस्था एवं उसके विकास पर अत्यधिक निर्भर करता है। अंतर्राष्ट्रीय विकास संगठनों के प्रलेखों एवं कार्यक्रमों में विकास को जनसाधारण की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के रूप में देखा जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की इस घोषणा के पश्चात् कि विकास का अतिंम लक्ष्य सभी को अच्छे जीवन हेतु अधिक अवसर प्रदान करता है’ शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास, सामाजिक कल्याण एवं पर्यावरण संरक्षण जैसी सुविधाओं में सुधार पर बल दिया गया है। इसी प्रकार यूनीसेफ की विकास संबंधी नीति; जैसे सुरक्षित जल, संतुलित आहार, स्वच्छ आवास, मौलिक शिक्षा, महिला विकास आदि अनेक दैनिक आवश्यकताओं के प्रावधान पर केन्द्रित है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी आधुनिक क्षेत्र के विकास की आवश्यकताओं को अनदेखा किए बिना लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पादन योजनाओं के विकास पर बल दिया है।

यद्यपि प्राकृतिक संसाधन, पूँजी निर्माण, तकनीकी व नवाचार, सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक संस्थाएँ, विदेशी सहायता एवं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की आर्थिक विकास में अपनी-अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका है, तथापि इन सब से ‘मानव संसाधन के विकास का प्रश्न जुड़ा हुआ है। मानव विकास एवं आर्थिक विकास साथ-साथ चलने वाली क्रियाएँ हैं तथा एक के बिना दूसरी की न तो कल्पना की जा सकती है और न ही एक दूसरी के बिना आगे बढ़ सकती है। आर्थिक विकास में यंत्र, उपकरण, कच्चा माल, वित्त इत्यादि अपनी विशेष भूमिका का निर्वाह करते हैं किंतु मानवीय कारक एवं मानवीय सहायता के बिना आर्थिक विकास का कोई भी साधन न तो गति प्राप्त कर सकता है और न ही आर्थिक विकास में अपना समुचित योगदान ही प्रदान कर सकता है। इसलिए यह माना जाता है कि आर्थिक विकास के समस्त भौतिक संसाधन मानव के लिए हैं और मानव ही उनका उपयोग आर्थिक विकास के निमित्त करता है।

यदि मनुष्य पूर्ण क्षमता से कार्य करता है तो भौतिक संसाधन भी अपना पूरा योगदान आर्थिक विकास में देते हैं, किंतु यदि मानव संसाधन की कमी होती है तो अन्य संसाधनों की सम्पूर्णता के बावजूद यथेष्ट आर्थिक विकास नहीं होता। आर्थिक विकास में एक ओर मानव के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास किया जाता है तथा दूसरी ओर आर्थिक विकास स्वयं मानवीय साधनों द्वारा सम्पन्न किया जाता है। मानवीय पूँजी में वृद्धि से ही विश्व के विकसित राष्ट्रों ने विकास की गति को बढ़ाया है तथा आज आर्थिक वृद्धि की प्रक्रिया में मानवीय संसाधन को महत्त्वपूर्ण मानते हुए मानव पूंजी में निवेश की विचारधारा विकसित हुई है।

प्रश्न 4.
केन सारो वीवा के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
सन् 1950 में नाइजीरिया के ओगोनी प्रान्त में तेल पाया गया। जल्द ही आर्थिक वृद्धि और बड़े व्यापार के दावेदारों ने ओगोनी के चारों ओर राजनीतिक षड्यन्त्र, पर्यावरणीय समस्याओं और भ्रष्टाचार का घना ताना-बाना बुन दिया। इसने उसी क्षेत्र के विकास को रोक दिया जहाँ तेल मिला था। केन सारो वीवा जम से एक ओगोनीवासी थे और 1980 के दशक में एक लेखक, पत्रकार एवं टेलीविजन निर्माता के रूप में जाने जाते थे। अपने काम के दौरान उन्होंने देखा कि तेल और गैस उद्योग ने गरीब ओगोनी किसानों के पैरों के नीचे दबे खजाने को लूट लिया और बदले में उनकी जमीन को प्रदूषित और किसानों को बेघर कर दिया। सारो वीवा ने अपने चारों ओर होने वाले इस शोषण पर प्रतिक्रिया दर्ज की। सारो वीवा ने सन् 1990 में एक खुले, जमीनी और समुदाय पर टिके हुए राजनीतिक आंदोलन द्वारा अहिंसक संघर्ष का नेतृत्व किया।

आंदोलन का नाम ‘मूवमेण्ट फॉर सरवायवल ऑफ ओगोनी पीपल’ था। आंदोलन इतना असरदार हुआ कि तेल कंपनियों को 1993 तक ओगोनी से वापस जाना पड़ा। लेकिन सारो वीवा को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। नाइजीरिया के सैनिक शासकों ने उसे एक हत्या के मामले में फंसा दिया और सैनिक न्यायाधिकरण ने उसे फाँसी की सजा सुना दी। सारो वीवा का कहना था कि सैनिक ऐसी शैल’ नामक उस बहुराष्ट्रीय तेल कंपनी के दबाव में कर रहे हैं जिसे ओगोनी से भागना पड़ा था। दुनियाभर के मानवाधिकार संगठनों ने इस मुकदमे को विरोध किया और सारो वीवा को छोड़ देने का आह्वान किया। विश्वव्यापी विरोध की अवहेलना करते हुए नाइजीरिया के शासकों ने सन् 1995 में सारो वीवा को फाँसी दे दी।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विकास का अर्थ एवं परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
राजनीतिक विज्ञान में विकास शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया गया है। उदाहरण के लिए, औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया तथा आर्थिक एवं राजनीतिक संगठनों की कार्यकुशलता में वृद्धि के लिए शब्द का प्रयोग किया गया है। अनेक विद्वानों ने विकास शब्द का प्रयोग दो प्रकार के देशों-विकसित (Developed) तथा विकासशील (Developing) में भेद करने के लिए किया है। वास्तव में, विकास (जोकि जैविक एवं सावयविक अवधारणा है) की अवधारणा का सामाजिक विज्ञानों के अध्ययनों में प्रयोग किए जाने का एक प्रमुख कारण ही नए राष्ट्रों का उदय तथा उनके द्वारा विभिन्न सामाजिक समस्याओं के समाधान के प्रयास हैं। नवीन राष्ट्रों के सम्मुख एक प्रमुख समस्या देश को आर्थिक एवं राजनीतिक दृष्टि से सुदृढ़ बनाने तथा राष्ट्र-निर्माण करके समस्याओं के समाधान की रही है।

विकास शब्द से अभिप्राय उन्नत दिशा में विभेदीकरण है जो कि अनेक दशाओं में वृद्धि इत्यादि में देखा जा सकता है। इन दशाओं में तीन दशाएँ प्रमुख हैं-

  1.  श्रम-विभाजन में वृद्धि,
  2.  संस्थाओं और समितियों की संख्या में वृद्धि तथा
  3.  संचार साधनों में वृद्धि। इस शब्द का प्रयोग केवल परिमाणात्मक वृद्धि के लिए ही नहीं किया जाता अपितु संगठन की कार्यकुशलता में वृद्धि के लिए भी किया जाता है।

एस०एफ० नैडल (S.F. Nadel) के अनुसार विकास शब्द से तात्पर्य केवल उस परिवर्तन से नहीं है। जिससे कोई अप्रकट अथवा छिपी चीज सामने आती है, अपितु इनका संबंध संभावित परिवर्तनों से भी है। उनका कहना है कि विकास की प्रक्रिया का अतिंम रूप ही किसी समाज को प्रगति की अवस्था तक पहुँचाता है। अधिकांश विद्वान् (जैसे पारसन्स इत्यादि) विकास शब्द का प्रयोग उन परिवर्तनों के लिए करते हैं जो औद्योगीकरण के कारण सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक संस्थाओं पर परिलक्षित होते हैं।

एस० चोडक (S. Chodak) के अनुसार, विकास शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में क्रिया जाता है, जिनमें से चार का उल्लेख उन्होंने अपनी पुस्तक सोसाइटल डिवेलपमेण्ट (Societal Development) में किया है। ये अर्थ हैं-

  1.  उविकास (Evolution) के दृष्टिकोण के अनुसार विकास संगठन की उच्च अवस्था की ओर होने वाली आकस्मिक प्रक्रिया है जोकि धीमी गति से होती है।
  2.  उत्पत्ति (Genetic) संबंधी दृष्टिकोण के अनुसार विकास आंतरिक तत्त्वों में वृद्धि है।
  3.  संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक (Structural-functional) दृष्टिकोण के अनुसार विकास संरचना और प्रकार्यों में परिवर्तन की एक निरंतर प्रक्रिया है जिसके परिणामस्वरूप विशेषीकरण, विभेदीकरण, अंगों की पारस्परिक आश्रितता तथा समग्र की स्वतन्त्रता में वृद्धि होती हैं।
  4.  निर्णायकवाद (Determinism) दृष्टिकोण के अनुसार विकास स्वतः होने वाली परिवर्तन की एक जटिल प्रक्रिया है जिसके द्वारा संरचनाओं व अन्तक्रियाओं में जटिलता आ जाती है।

प्रश्न 2.
संपोषित या सतत विकास से क्या आशय है? इसके लक्ष्य क्या है?
उत्तर-
आज सम्पूर्ण विश्व में संपोषित विकास पर विशेष बल दिया जा रहा है। यह विकास की वह प्रक्रिया है जिसे कोई भी देश अपने संसाधनों द्वारा इसे दीर्घकालीन अवधि तक बनाए रख सकता है। इस प्रकार के विकास द्वारा वर्तमान की आवश्यकताएँ तो पूरी होती ही हैं, साथ ही भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं के प्रति जवाबदेही भी निश्चित की जाती है। इसका अर्थ ऐसा विकास है जो ने केवल मानव समाज की तत्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति पर बल देता है अपितु स्थायी तौर पर भविष्य के लिए भी निर्वाध विकास का आधार प्रस्तुत करता है। संपोषित विकास की धारणा सर्वप्रथम सन् 1987 ई० में ब्रटलैण्ड प्रतिवदेन में सम्मिलित की गई जिसमें इस तथ्य पर जोर दिया गया कि आर्थिक विकास की ऐसी पद्धति बनाई जानी चाहिए जिससे भावी पीढ़ियों के विकास पर किसी प्रकार की, आँच न आए। इस प्रकार का संरक्षण सकारात्मक प्रकृति का होता है जिसके अंतर्गत पारिस्थितिकीय तंत्र के तत्त्वों का संचय, रखरखाव, पुनस्र्थापन, दीर्घावधिक उपयोग एवं अभिवृद्धि सभी समाहित होती है।

संपोषित विकास की धारणा विकास को केवल आर्थिक एवं औद्योगीकरण के पहलू से ही नहीं देखती अपितु इसमें उसके सामाजिक-सांस्कृतिक पहलुओं पर भी समुचित विचार किया जाता है। आर्थिक विकास के साथ-साथ मानव के जीवन-स्तर में गुणात्मक सुधार बनाए रखना संपोषित विकास का प्रमुख लक्ष्य है। विकास के विश्लेषण का यह परिप्रेक्ष्य समग्र विकास पर बल देता है। संपोषित विकास एक बहुमुखी धारणा है जिसमें समानता, सामाजिक सहभागिता, पर्यावरण संरक्षण की क्षमता विकेन्द्रीकरण, आत्म-निर्भरता, मानव की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है। संपोषित विकास हेतु आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति को भोजन, वस्त्र और आवास के साथ-साथ बिजली, पानी परिवहन एवं संचार जैसी बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध हों। इसके साथ ही मनुष्य का स्वास्थ्य अच्छा हो तथा उसे काम करने हेतु प्रदूषणरहित पर्यावरण, पोषित आहार तथा चिकित्सा सुविधाएँ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो सकें।

संपोषित विकास जनसाधारण को आर्थिक गतिविधियों में रोजगार के अवसर प्रदान करने पर बल देता है ताकि उनका जीवन-स्तर ऊँचा हो सके। संपोषित विकास का लक्ष्य आर्थिक विकास, सामाजिक समानता एवं न्याय तथा पर्यावरण संरक्षण में वृद्धि करना है। अन्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि संपोषित विकास का लक्ष्य आर्थिक, पर्यावरणीय एवं सामाजिक आवश्यकताओं में संतुलन बनाए रखना है ताकि वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। इसके निम्नलिखित चार लक्षण हैं-

  1.  सामाजिक प्रगति एवं समानता,
  2.  पर्यावरणीय संरक्षण,
  3.  प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण,
  4.  स्थायी आर्थिक वृद्धि।

संपोषित विकास एक ऐसा दीर्घकालीन एवं समकालीन परिप्रेक्ष्य है जो स्वस्थ समुदाय के विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु आर्थिक, पर्यावरणीय एवं सामाजिक मुद्दों की ओर संयुक्त रूप से ध्यान देता है तथा सम्पूर्ण प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक उपभोग से बचने का प्रयास करता है। इस प्रकार का विकास हमें अपने प्राकृतिक स्रोतों को बचाने एवं उनमें वृद्धि करने की प्रेरणा देता है। संपोषित विकास की धारणा को अनेक उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। सभी जानते हैं कि भूमि के नीचे पानी का स्तर घटता जा रहा है एवं पानी की मात्रा कम होती जा रही है। आने वाले दशकों में पानी की मात्रा इतनी कम हो जाएगी कि इसके लिए भी संघर्ष होने लगेगा। यदि कोई देश संपोषित विकास द्वारा इस समस्या का हल करना चाहता है तो उसे न केवल पानी का उपयोग कम करना होगा अपितु इसमें वृद्धि के उपाय भी खोजने होंगे। इसी भाँति, औद्योगिक विकास के समय पर्यावरणीय संरक्षण एवं संतुलन का ध्यान रखना होगा। निर्धनता एवं स्वास्थ्य का निम्न स्तर परस्पर जुड़े हुए हैं। इसके समाधान हेतु ऐसी योजना बनाने की आवश्यकता है कि रोगों की रोकथाम हेतु प्रभावी उपाए किए जाएँ साथ ही निर्धनता उन्मूलन के कार्यक्रम लागू किए जाएँ।

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
क्या आप जानते हैं कि एक शान्तिपूर्ण दुनिया की ओर बदलाव के लिए लोगों के सोचने के तरीके में बदलाव जरूरी है? क्या मस्तिष्क शान्ति को बढ़ावा दे सकता है? क्या मानव मस्तिष्क पर केन्द्रित रहना शान्ति स्थापना के लिए पर्याप्त है?
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनिसेफ) के संविधान ने उचित टिप्पणी की है कि चूंकि युद्ध का आरम्भ लोगों के दिमाग से होता है, इसलिए शान्ति के बचाव भी लोगों के दिमाग में ही रचे जाने चाहिए।’ इस कथन से स्पष्ट है कि शान्तिपूर्ण दुनिया के लिए लोगों के सोचने के तरीके में बदलाव जरूरी है। मस्तिष्क शान्ति को बढ़ावा दे सकता है। इस दिशा में करुणा जैसे अनेक पुरातन आध्यात्मिक सिद्धान्त और ध्यान बिल्कुल उपयुक्त हैं।

हिंसा का आरम्भ केवल किसी व्यक्ति के मस्तिष्क से नहीं होता, वरन् इसकी जड़े कुछ सामाजिक संरचनाओं में भी होती हैं। न्यायपूर्ण और लोकतान्त्रिक समाज की रचना सरंचनात्मक हिंसा को निर्मूल करने के लिए अनिवार्य है। शान्ति, जिसे सन्तुष्ट लोगों के समरस सह-अस्तित्व के रूप में समझा जाता है, ऐसे ही समाज की उपज हो सकती है। शान्ति एक बार में हमेशा के लिए प्राप्त नहीं की जा सकती है। शान्ति कोई अन्तिम स्थिति नहीं बल्कि ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें व्यापकतम अर्थों में मानव-कल्याण की स्थापना के लिए आवश्यक नैतिक और भौतिक संसाधनों के सक्रिय क्रिया-कलाप सम्मिलित होते हैं। स्पष्ट है कि मानव मस्तिष्क पर केन्द्रित रहना शान्ति स्थापना के लिए पर्याप्त नहीं है।

प्रश्न 2.
राज्य को अपने नागरिकों के जीवन और अधिकारों की रक्षा अवश्य ही करनी चाहिए। हालाँकि कई बार राज्य के कार्य इसके कुछ नागरिकों के विरुद्ध हिंसा के स्रोत होते हैं। कुछ उदाहरणों की मदद से इस पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-
राज्य को अपने नागरिकों के जीवन और अधिकारों की रक्षा अवश्य करनी चाहिए। इसके लिए राज्यों ने बल प्रयोग के अपने उपकरणों को मजबूत किया है। राज्य से अपेक्षा यह थी कि वह सेना या पुलिस का प्रयोग अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए करेगा लेकिन वास्तव में इन दोनों शक्तियों का प्रयोग अपने ही नागरिकों के विरोध के स्वर को दबाने के लिए किया गया है। इसके सबसे उत्कृष्ट उदाहरण म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश हैं। यहाँ सेना ने नागरिक की आवाज को हमेशा दबाया है। म्यांमार व पाकिस्तान में तो सैनिक तानाशाही स्पष्ट दिखाई देती है।

समस्याओं का दीर्घकालिक समाधान सार्थक लोकतन्त्रीकरण और अधिक नागरिक स्वतन्त्रता की एक कारगर पद्धति में है। इसके माध्यम से राज्यसत्ता को अधिक जवाबदेह बनाया जा सकता है। रंगभेद की समाप्ति के पश्चात् दक्षिण अफ्रीका में यही पद्धति अपनाई गई, जो अद्यतन राजनीतिक सफलता का एक प्रमुख उदाहरण है।

प्रश्न 3.
शान्ति को सर्वोत्तम रूप में तभी पाया जा सकता है जब स्वतन्त्रता, समानता और न्याय कायम हो। क्या आप सहमत हैं?
उत्तर-
शान्ति को सर्वोत्तम रूप में तभी पाया जा सकता है जब स्वतन्त्रता, समानता और न्याय पूर्ण से राज्य में स्थापित हों। शान्ति एक स्थायी भाव है। शान्ति विकास के लिए भी आवश्यक है। यदि देश में नागरिकों को स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं होगी तो वे कुण्ठित रहेंगे। यही कुण्ठा अशान्ति या हिंसा को जन्म देगी। इसी प्रकार समानता का भाव न होने से वैमनस्यता, ईष्र्या, द्वेष के भाव जन्मेंगे। यह भी अशान्ति के कारक हैं, इसलिए राष्ट्र में समानता भी आवश्यक है। न्याय एक ऐसी संस्था है जो शान्तिपूर्ण वातावरण स्थापित करने में अत्यन्त सहायक है।

प्रश्न 4.
हिंसा के माध्यम से दूरगामी न्यायोचित उद्देश्यों को नहीं पाया जा सकता। आप इस कथन के बारे में क्या सोचते हैं?
उत्तर-
अधिकांश लोग यह सोचते हैं कि हिंसा एक बुराई है लेकिन कभी-कभी यह शान्ति लाने के लिए अनिवार्य होती है। यह तर्क प्रस्तुत किया जा सकता है कि तानाशाहों और उत्पीड़कों को जबरन हटाकर ही उन्हें, जनता को निरन्तर नुकसान पहुँचाने से रोका जा सकता है। या फिर, उत्पीड़ित लोगों के मुक्ति संघर्षों को हिंसा के कुछ प्रयोग के बाद भी न्यायपूर्ण ठहराया जा सकता है। लेकिन अच्छे उद्देश्य से भी हिंसा का सहारा लेना आत्मघाती हो सकता है। एक बार प्रारम्भ हो जाने पर इसकी प्रवृत्ति नियन्त्रण से बाहर हो जाने की होती है और इसके कारण यह अपने पीछे मौत और बरबादी की एक श्रृंखला छोड़ जाती है।

शान्तिवादी को उद्देश्य लड़ाकुओं की क्षमता को कम करके आँकना नहीं है, वरन् प्रतिरोध के अहिंसक स्वरूप पर जोर देना है। संघर्ष का एक प्रमुख तरीका सविनय अवज्ञा है और उत्पीड़न की संरचना की नींव हिलाने में इसका अच्छा प्रयोग हो रहा है। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान गांधी जी द्वारा सत्याग्रह का प्रयोग एक अच्छा उदाहरण है। गांधी जी ने न्याय को अपना आधार बनाया और विदेशी शासकों के अन्त:करण को आवाज दी। जब उससे काम न चला तो उन पर नैतिक और राजनैतिक दवाब बनाने के लिए उन्होंने जन-आन्दोलन आरम्भ किया, जिसमें अनुचित कानूनों को अहिंसक रूप में खुलेआम तोड़ना सम्मिलित है। उनसे प्रेरणा लेकर मार्टिन लूथर किंग ने अमेरिका में काले लोगों के साथ भेदभाव के विरुद्ध सन् 1960 में इसी प्रकार का संघर्ष प्रारम्भ किया था। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि हिंसा के माध्यम से दूरगामी न्यायोचित उद्देश्यों को नहीं पाया जा सकता।

प्रश्न 5.
विश्व में शान्ति स्थापना के जिन दृष्टिकोणों की अध्याय में चर्चा की गई है? उनके बीच क्या अन्तर है?
उत्तर-
शान्ति के क्रियाकलापों में सद्भावनापूर्ण सामाजिक सम्बन्ध के सृजन और सम्वर्द्धन के अविचल प्रयास सम्मिलित होते हैं, जो मानव कल्याण और खुशहाली के लिए प्रेरक होते हैं। शान्ति के मार्ग में अन्याय से लेकर उपनिवेशवाद तक अनेक अवरोध हैं, लेकिन उन्हें हटाने में बेलाग हिंसा के प्रयोग का लालच अनैतिक और अत्यधिक जोखिमपूर्ण दोनों हैं। नस्ल संहार, आतंकवाद और पूर्ण युद्ध के योग में, जो नागरिक और योद्धा के बीच की रेखा को धूमिल करता है, शान्ति की खोज को राजनीतिक कार्यवाहियों के समाधान और साध्ये, दोनों को ही रूपायित करना चाहिए।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
फ्रेड्रिक नीत्शे किस देश का दार्शनिक था?
(क) जर्मनी
(ख) फ्रांस
(ग) जापान
(घ) भारत
उत्तर-
(क) जर्मनी।

प्रश्न 2.
विश्व की सर्वोच्च महाशक्ति कहलाता है-
(क) रूस
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका
(ग) फ्रांस
(घ) चीन
उत्तर-
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका।

प्रश्न 3.
भ्रूण हत्यारूपी हिंसा किनसे संबंधित है?
(क) महिलाओं से
(ख) पुरुषों से
(ग) विचारों से
(घ) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर-
(क) महिलाओं से।

प्रश्न 4.
दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद को लेकर हिंसा कब तक होती रही?
(क) 1997
(ख) 1996
(ग) 1992
(घ) 1998
उत्तर-
(ग) 1992.

प्रश्न 5.
भारत में अंहिसा का पुजारी किसे कहा जाता है?
(क) महात्मा गांधी को
(ख) जवाहरलाल नेहरू को
(ग) लाला लाजपतराय को
(घ) रवींद्रनाथ टैगोर को
उत्तर-
(ग) महात्मा गांधी को।

प्रश्न 6.
रवांडा कहाँ है?
(क) एशिया में
(ख) अफ्रीका में
(ग) ऑस्ट्रेलिया में
(घ) भारत में
उत्तर-
(ख) अफ्रीका में।

प्रश्न 7.
फिलिस्तीनी संघर्ष किसके विरुद्ध है?
(क) इजराइल के
(ख) ईरान के
(ग) इराक के
(घ) संयुक्त अरब अमीरात के
उत्तर-
(क) इजराइल के।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शांति के विषय में नकारात्मक विचार रखने वाले दो विचारकों के नाम लिखिए।
उत्तर-

  1.  फेड्रिक नीत्शे,
  2.  विल्फ्रेडो पैरेटो।

प्रश्न 2.
द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका द्वारा जापान के किन नगरों पर परमाणु बम गिराए गए थे?
उत्तर-

  1.  हिरोशिमा,
  2.  नागासाकी।

प्रश्न 3.
क्यूबाई मिसाइल संकट का समाधान कैसे हुआ?
उत्तर–
क्यूबाई मिसाइल संकट का समाधान सोवियत संघ द्वारा अपनी मिसाइलें क्यूबा से हटा लेने के बाद हुआ।

प्रश्न 4.
हिंसा या अशांति के कारण कौन-से हो सकते हैं?
उत्तर-
जातिभेद, वर्गभेद, पितृसत्ता, उपनिवेशवाद, नस्लवाद, साम्प्रदायिकता आदि अशांति के कारण हो सकते हैं।

प्रश्न 5.
टिकाऊ शांति किस प्रकार प्राप्त की जा सकती है?
उत्तर-
न्यायपूर्ण और टिकाऊ शांति अप्रकट शिकायतों और संघर्षों के कारणों को साफ-साफ व्यक्त करने और बातचीत द्वारा हल करने के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नीत्शे और पैरेटो के शांति संबंधी विचार लिखिए।
उत्तर-
अतीत के अनेक महत्त्वपूर्ण विचारकों ने शांति के बारे में नकारात्मक ढंग से लिखा है। जर्मन दार्शनिक फेड्रिक नीत्शे युद्ध को महिमामण्डित करने वाले विचारक थे। नीत्शे ने शांति का महत्त्व नहीं दिया, क्योंकि उसको मानना था कि केवल संघर्ष ही सभ्यता की उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। इसी प्रकार अन्य अनेक विचारकों ने शांति को व्यर्थ बताया है और संघर्ष की प्रशंसा. व्यक्तिगत बहादुरी और सामाजिक जीवंतता के वाहक के रूप में की है। इटली के समाज सिद्धांतकार विल्फ्रेडो पैरेटो (1843-1923) का दावा था कि अधिकांश समाजों में शासक वर्ग का निर्माण सक्षम और अपने लक्ष्यों को पाने के लिए शक्ति का प्रयोग करने के लिए तैयार लोगों से होता है। उसने ऐसे लोगों का वर्णन शेर के रूप में किया है।

प्रश्न 2.
‘शिकायतें किस प्रकार अशांति को जन्म देती हैं?
उत्तर-
हिंसा का शिकार व्यक्ति जिन मनोवैज्ञानिक और भौतिक हानियों से गुजरता है वे उसके भीतर शिकायतें उत्पन्न करती हैं। ये शिकायतें पीढ़ियों तक बनी रहती हैं। ऐसे समूह कभी-कभी किसी घटना अथवा टिप्पणी से उत्तेजित होकर संघर्ष (हिंसा) शुरू कर देते हैं। दक्षिण एशिया में विभिन्न समुदायों द्वारा एक-दूसरे के विरुद्ध मन में रखी पुरानी शिकायतों के उदाहरण हमारे सामने हैं, जैसे सन् 1947 में भारत के विभाजन के दौरान भड़की हिंसा से पैदा हुई शिकायते।

न्यायपूर्ण और टिकाऊ शांति अप्रकट शिकायतें और संघर्ष के कारणों को साफ-साफ व्यक्त करने और बातचीत द्वारा हल करने के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती हैं। इसलिए भारत और पाकिस्तान के बीच समस्याओं का हल करने के वर्तमान प्रयासों में प्रत्येक वर्ग के लोगों के बीच अधिक सम्पर्क को प्रोत्साहित करना भी शामिल है।

प्रश्न 3.
मार्टिन लूथर किंग के नागरिक अधिकार के क्षेत्र में योगदान की संक्षिप्त विवेचना कीजिए।
उत्तर-

  1.  मार्टिन लूथर किंग ने अमेरिका में रंगभेद तथा जाति-विभेद की नीति के विरुद्ध अहिंसात्मक आंदोलन प्रारम्भ किया। उसके प्रयत्नों के परिणामस्वरूप बसों तथा भोजनालयों में काले लोगों के साथ किए जाने वाले भेदभाव को समाप्त किया गया।
  2.  उन्होंने काले लोगों के लिए सिविल अधिकार प्राप्त करने की दिशा में सराहनीय कार्य किया। उनके प्रयासों से सिविल अधिकारों को कानूनी अधिकार मान लिया गया तथा काले लोगों को मताधिकार प्राप्त हो गया। इसके लिए लूथर किंग को अपने जीवन का बलिदान देना पड़ा।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘शान्तिवाद के विषय में आप क्या जानते हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
‘शान्तिवाद’ विवादों को सुलझाने के हथियार के रूप में युद्ध अथवा हिंसा के बजाय शान्ति का उपदेश देता है। इसमें विचारों की अनेक छवियाँ सम्मिलित हैं। इसके क्षेत्र में कूटनीति को अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का समाधान करने में प्राथमिकता देने से लेकर किसी भी हालत में हिंसा और शक्ति के प्रयोग के पूर्ण निषेध तक आते हैं। शान्तिवाद सिद्धान्तों पर भी आधारित हो सकती है और व्यावहारिकता पर भी।

सैद्धान्तिक शान्तिवाद का जन्म इस विश्वास से होता है कि युद्ध सुविचारित घातक हथियार, हिंसा या किसी प्रकार की जोर-जबरदस्ती नैतिक रूप से गलत है। व्यावहारिक शान्तिवाद ऐसे किसी चरम सिद्धान्त का अनुसरण नहीं करता है। व्यावहारिक शान्तिवाद मानता है कि विवादों के समाधान में युद्ध से बेहतर तरीके भी हैं या फिर यह समझता है कि युद्ध पर लागत अधिक आती है, लाभ कम होते हैं। युद्ध से बचने के पक्षधर लोगों के लिए ‘श्वेत कपोत’ जैसे अनौपचारिक शब्दों का प्रयोग होता है। शब्द सुलह-समझौते के पक्षधरों की सौम्य प्रकृति की ओर इशारा करते हैं। कुछ लोग सुलह-समझौते के पक्षधरों को शान्तिवादी के वर्ग में नहीं रखते, क्योंकि वे कतिपय परिस्थितियों में युद्ध को औचित्यपूर्ण मान सकते हैं।

‘बाज’ या युद्ध-पिपासु लोग कपोत प्रकृति के विपरीत होते हैं। युद्ध का विरोध करने वाले कुछ शान्तिवादी सभी प्रकार की जोर-जबरदस्ती जैसे शारीरिक बल प्रयोग या सम्पत्ति की बरबादी के विरोधी नहीं होते। उदाहरणस्वरूप, असैन्यवादी साधारणतया हिंसा के बजाय आधुनिक राष्ट्र-राज्यों की सैनिक संस्थाओं के विशेष रूप से विरोधी होते हैं। अन्य शान्तिवादी अंहिसा के सिद्धान्तों का अनुसरण करते हैं, क्योंकि वे केवल अहिंसक कार्यवाही के स्वीकार्य होने का विश्वास करते हैं।

प्रश्न 2.
शान्ति स्थापित करने में समकालीन चुनौतियाँ कौन-सी हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
वर्तमान विश्व में शक्तिशाली राष्ट्रों ने अपनी सम्प्रभुता का प्रभावपूर्ण प्रदर्शन किया है और क्षेत्रीय सत्ता संरचना तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को भी अपनी प्राथमिकताओं और धारणाओं के आधार पर बदलना चाहा है। इसके लिए उन्होंने सीधी सैन्य कार्यवाही को भी सहारा लिया है और विदेशी क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया है। इस प्रकार के आचरण का प्रत्यक्ष उदाहरण अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका ताजा हस्तक्षेप है। इस प्रक्रिया से उपजे युद्ध में बहुत लोगों की जानें गईं।

आतंकवाद के उदय का एक कारण आक्रामक राष्ट्रों का स्वार्थपूर्ण आचरण भी रहा है। प्रायः आधुनिक हथियारों और उन्नत तकनीक का दक्ष और निर्मम प्रयोग करके आतंकवादी इन दिनों शान्ति के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। 11 सितम्बर, 2001 को आतंकवादियों द्वारा अमेरिका के न्यूयार्क स्थित विश्व व्यापार केन्द्र को ध्वस्त किया जाना इस अमंगलकारी वास्तविकता की उल्लेखनीय अभिव्यक्ति है। इन ताकतों द्वारा अति विध्वंसक जैविक, रासायनिक अथवा परमाण्विक हथियारों के प्रयोग की आशंका दहला देने वाली है।

वैश्विक समुदाय धौंस जमाने वाली ताकतों की लोलुपता और आतंकवादियों की गुरिल्ला युक्तियों को रोकने में असफल है। वह नस्ल संहार का मूक दर्शन बना रहता है। यह स्थिति रवांडा में दिखाई देती है। इस अफ्रीकी देश में सन् 1994 में लगभग 5 लाख तुत्सी लोगों को हुतू लोगों ने मार डाला। हत्याकाण्ड के आरम्भ होने के पूर्व गुप्त सूचना प्राप्त होने और इसके भड़कने पर अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया में घटना का विवरण आने के बावजूद कोई अन्तर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप नहीं हुआ। संयुक्त राष्ट्र ने रवांडा के खून-खराबे को रोकने के लिए शान्ति अभियान चलाने से मना कर दिया।

इसका आशय यह नहीं कि शान्ति एक चुका हुआ सिद्धान्त है। दूसरे विश्वयुद्ध के पश्चात् जापान और कोस्यरिका जैसे देशों ने सैन्यबल नहीं रखने का निर्णय लिया। विश्व के अनेक भागों में परमाण्विक हथियार से मुक्त क्षेत्र बने हैं, जहाँ आण्विक हथियारों को विकसित और तैनात करने पर एक अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त समझौते के अन्तर्गत पाबन्दी लगी है। आज इस तरह के छह क्षेत्र हैं जिसमें ऐसा हुआ है या इसकी प्रक्रिया चल रही है। इसका विस्तार दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र, लैटिन अमेरिका और कैरेबियन क्षेत्र, दक्षिण-पूर्वी एशिया, अफ्रीका, दक्षिण प्रशान्त क्षेत्र और मंगोलिया तक है। तत्कालीन सोवियत संघ के सन् 1991 में विघटन से अति शक्तिशाली देशों के बीच सैनिक प्रतिद्वन्द्विता (विशेषकर परमाण्विक प्रतिद्वन्द्विता) पर पूर्णविराम लग गया और अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति के लिए प्रमुख खतरा समाप्त हो गया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संरचनात्मक हिंसा के विविध रूप कौन-से हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
संरचनात्मक हिंसा के विविध रूप निम्नलिखित हैं-

1. अस्पृश्यता- परम्परागत जाति व्यवस्था कुछ विशिष्ट समूह के लोगों को अस्पृश्य मानकर व्यवहार करती थी। स्वतन्त्र भारत के संविधान द्वारा गैर-कानूनी घोषित किए जाने तक अस्पृश्यता के प्रचलन ने उन्हें सामाजिक बहिष्कार और अत्यधिक वंचना का शिकार बना रखा था। भयावह रीति-रिवाजों के इन घावों को देश अभी तक सह रहा है। हालाँकि वर्ग आधारित समाज व्यवस्था अधिक लचीली दिखती है, लेकिन इसने भी काफी असमानती और उत्पीड़न को जन्म दिया है। विकासशील देशों की अधिकांश कार्यशील जनसंख्या असंगठित क्षेत्र से सम्बद्ध है, जिसमें पारिश्रमिक और काम की दशा बहुत खराब है।

2. स्त्री हिंसा- समाज में पितृसत्ता के आधार पर जिन सामाजिक संगठनों का निर्माण होता है, उनकी परिणति महिलाओं को व्यवस्थित रूप से अधीन बनाने और उनके साथ भेदभाव करने में होती है। इसकी अभिव्यक्ति कन्या भ्रूण हत्या, लड़कियों को पर्याप्त पोषण और शिक्षा न देना, बाल-विवाह, पत्नी को पीटना, दहेज से जुड़े अपराध, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, बलात्कार, हत्या के रूप में होती है। भारत में निम्न लिंगानुपात (प्रति 1000 पुरुषों पर 933 स्त्रियाँ) पितृसत्ता विध्वंस का मर्मस्पर्शी सूचक है।

3. गुलामी का जीवन- उपनिवेशवादी विदेशी शासन के फलस्वरूप लोगों पर प्रत्यक्ष और दीर्घकाल के लिए गुलामी थोप दी गई थी। अब ऐसा होना लगभग असम्भव है। पर इजरायली प्रभुत्व के विरुद्ध जारी फिलिस्तीनी संघर्ष दिखाता है कि इसका अस्तित्व पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इसके अतिरिक्त, यूरोपीय उपनिवेशवादी देशों के पूर्ववर्ती उपनिवेशों को अभी भी बहुआयामी शोषण के उन प्रभावों से पूरी तरह उभरना शेष है, जिसे उन्होंने औपनिवेशिक काल में झेला।

4. रंगभेद और साम्प्रदायिकता- रंगभेद और साम्प्रदायिकता में एक सम्पूर्ण नस्लगत समूह अथवा समुदाय पर लांछन लगाना और उनका दमन करना सम्मिलित रहता है। हालाँकि मानवता को विभिन्न नस्लों के आधार पर विभाजित कर सकने की अवधारणा वैज्ञानिक रूप से अप्रमाणिक है लेकिन अनेक बार इसका उपयोग मानव विरोधी कुकृत्यों को उचित ठहराने में किया ही जाता है। सन् 1865 तक अमेरिका में अश्वेत लोगों को गुलाम बनाने की प्रथा; हिटलर के समय जर्मनी में यहूदियों का कत्लेआम तथा दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार की सन् 1992 तक अपनी बहुसंख्यक अश्वेत आबादी के साथ निम्न दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार करने वाली रंगभेद की नीति इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं। पश्चिमी देशों में नस्ली भेदभाव गोपनीय रूप से अभी भी जारी है। अब इसका प्रयोग प्राय: एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विभिन्न देशों के आप्रवासियों के विरुद्ध होता है। साम्प्रदायिकता को नस्लवाद को दक्षिण एशियाई प्रतिरूप स्वीकारा जा सकता है। जहाँ शिकार अल्पसंख्यक धार्मिक समूह हुआ करते हैं।

हिंसा का शिकार व्यक्ति जिन मनोवैज्ञानिक और भौतिक हानियों से गुजरता है ये हानियाँ उसके भीतर शिकायतें उत्पन्न करती हैं। ये शिकायतें पीढ़ियों तक बनी रहती हैं। ऐसे समूह कभी-कभी किसी घटना या टिप्पणी से भी उत्तेजित होकर संघर्षों के ताजा दौर की शुरूआत कर सकते हैं। दक्षिण एशिया में विभिन्न समुदायों द्वारा एक-दूसरे के विरुद्ध लम्बे समय से मन में रखी पुरानी शिकायतों के उदाहरण हमारे सामने हैं; जैसे-सन् 1947 में भारत के विभाजन के दौरान भड़की हिंसा से उपजी शिकायतें आज भी लोगों में टीस पैदा करती हैं।

न्यायपूर्ण और टिकाऊ शान्ति अप्रकट शिकायतें और संघर्ष के कारणों को साफ-साफ प्रकट करने और बातचीत द्वारा हल करने के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती हैं। इसीलिए भारत और पाकिस्तान के बीच की समस्याओं का हल करने के वर्तमान प्रयासों में प्रत्येक वर्ग के लोगों
के बीच अधिक सम्पर्क को प्रोत्साहित करना भी सम्मिलित है।

प्रश्न 2.
शान्ति स्थापित करने के विभिन्न तरीकों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
शान्ति स्थापित करने और बनाए रखने के लिए विभिन्न रणनीतियाँ अपनाई गई हैं। इन रणनीतियों को आकार देने के लिए तीन तरीकों ने सहायता दी है जो निम्नलिखित हैं-

1. प्रथम तरीका राष्ट्रों को केन्द्रीय स्थान प्रदान करता है, उनकी सम्प्रभुता का सम्मान करता है। उनके बीच प्रतिद्वन्द्विता को जीवन्त सत्य मानता है। उसकी प्रमुख प्रतिद्वन्द्विता के उपयुक्त प्रबन्धन तथा संघर्ष की आशंका का शमन सत्ता-सन्तुलन की पारस्परिक व्यवस्था के माध्यम से करने की होती है। कहा जाता है कि वैसा एक सन्तुलन 19वीं सदी में प्रचलित था, जब प्रमुख यूरोपीय देशों ने सम्भावित आक्रमण को रोकने और बड़े पैमाने पर युद्ध से बचने के लिए अपने सत्ता संघर्षों में गठबन्धन बनाते हुए तालमेल किया।

2. दूसरा तरीका भी राष्ट्रों की गहराई तक जमी आपसी प्रतिद्वन्द्विता की प्रकृति को स्वीकार करता है, लेकिन इसका जोर सकारात्मक उपस्थिति और परस्पर निर्भरता की सम्भावनाओं पर है। यह विभिन्न देशों के बीच विकासमान सामाजिक आर्थिक सहयोग को रेखांकित करता है। अपेक्षा रहती है कि वैसे सहयोग राष्ट्र की सम्प्रभुता को नरम करेंगे और अन्तर्राष्ट्रीय समझदारी को प्रोत्साहित करेंगे। परिणामस्वरूप वैश्विक संघर्ष कम होंगे, जिससे शान्ति की अच्छी सम्भावनाएँ। बनेंगी। इस पद्धति के पक्षकारों द्वारा अक्सर दिया जाने वाला एक उदाहरण द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् के यूरोप का है, जो आर्थिक एकीकरण से राजनीतिक एकीकरण की ओर बढ़ता गया है।

3. तीसरी पद्धति राष्ट्र आधारित व्यवस्था को मानव इतिहास की समाप्तप्राय अवस्था स्वीकारती है। यह अधिराष्ट्रीय व्यवस्था को मनोचित्र बनाती है और वैश्विक समुदाय के अभ्युदय को शान्ति की विश्वसनीय गारण्टी मानती है। वैसे समुदाय के बीज राष्ट्रों की सीमाओं के आर-पार बढ़ती आपसी अन्त:क्रियाओं और संश्रयों में दिखते हैं जिसमें बहुराष्ट्रीय निगम और जनान्दोलन जैसे विविध गैर-सरकारी कर्ता सम्मिलित हैं। इस तरीके के प्रस्तावक और समर्थक तर्क देते हैं कि वैश्वीकरण की चल रही प्रक्रिया राष्ट्रों को पहले से ही घट गई प्रधानता और सम्प्रभुता को और अधिक क्षीण कर रही है, जिसके फलस्वरूप विश्व-शान्ति स्थापित होने की परिस्थितियाँ बन रही हैं।

यह कहा जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र तीनों की पद्धतियों के प्रमुख तत्त्वों को साकार कर सकता है। सुरक्षा परिषद्, जो स्थायी सदस्यता और पाँच प्रमुख राष्ट्रों को निषेधाधिकार (अन्य सदस्यों द्वारा समर्थित प्रस्ताव को भी गिरा देने का अधिकार) देता है, प्रचलित अन्तर्राष्ट्रीय श्रेणीबद्धता को ही व्यक्त करता है। आर्थिक-सामाजिक परिषद् अनेक क्षेत्रों में राष्ट्रों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करता है। मानवाधिकार आयोग अन्तर्राष्ट्रीय मानदण्डों को आकार देना
और लागू करना चाहता है।

प्रश्न 3.
अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा बनाए रखने के लिए शान्तिपूर्ण समाधान की प्रक्रियाओं की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
या
“संयुक्त राष्ट्र संघ का मूल उद्देश्य चार्टर के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा को बनाए रखना है।” विवेचना कीजिए।
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना इस दृष्टि से की गई थी कि वह विश्व में शान्ति तथा सुरक्षा को बनाए रखेगा। चार्टर के अन्तर्गत यह दायित्व सुरक्षा परिषद् को सौंपा गया और विशेष परिस्थिति में महासभा भी इस कार्य में अपना योगदान दे सकती है। संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य चार्टर के अनुच्छेद 2 के अनुसार इस बात के लिए वचनबद्ध हैं कि वे वर्तमान चार्टर के अनुसार सुरक्षा परिषद् के सभी निर्णयों को स्वीकार करेंगे तथा उनका पालन करेंगे। चार्टर के अध्याय 6 तथा 7 में उन प्रक्रियाओं का उल्लेख किया गया है, जिसके द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के समाधान के प्रयास किए जाएँगे। चार्टर की वर्तमान व्यवस्था के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के समाधान तथा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा स्थापित करने के लिए कुछ विशिष्ट प्रक्रियाएँ प्रयोग में लाई जाती हैं।

शान्तिपूर्ण समाधान की प्रक्रियाएँ

संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में अनुच्छेद 33 से 38 तक अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के शान्तिपूर्ण समाधान की प्रक्रियाओं का उल्लेख किया गया है। विवादों के शान्तिपूर्ण समाधान के लिए अनुच्छेद 33 में जो उपाय बताए गए हैं, वे सभी यह स्पष्ट करते हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय जगत में सभी विवादों की प्रकृति समान नहीं । हो सकती और न ही किसी एक उपाय द्वारा सभी विवादों का समाधान सम्भव है। पिछले वर्षों में संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष प्रस्तुत विवादों के तीन रूप रहे हैं-
1. तथ्यमूलक विवाद- इन विवादों में एक पक्ष दूसरे पक्ष पर अनुचित कार्यवाही करने का दोष लगाते हैं। उदाहरणार्थ-1960 में रूस द्वारा अमेरिका के R.B.-47 विमान को मार गिराना तथ्यमूलक विवाद था।
2. कानून सम्बन्धी विवाद- इन विवादों में वैधानिक अधिकारों तथा कर्तव्यों के प्रश्न निहित होते हैं। आयरलैण्ड तथा ब्रिटेन का विवाद कानून संबंधी विवाद था।
3. नीति संबंधी विवाद- इस प्रकार के विवाद वे होते हैं जिनमें विवादी पक्षों की नीतियों से संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। बर्लिन की स्थिति संबंधी समस्या नीति संबंधी विवाद था जिसमें तत्कालीन सोवियत संघ तथा मित्र राष्ट्रों की नीतियों में टकराहट थी।

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों तथा संयुक्त राष्ट्र के विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में निम्नलिखित उपाय किए जाते हैं-

1. वार्ता- वार्ता का साधन कूटनीतिक माना जाता है। विवादी पक्षों के बीच वार्ता या तो शीर्ष स्तर | पर सीधे राज्याध्यक्षों के बीच होती है या उनके द्वारा नियुक्त अभिकर्ताओं द्वारा। यह वार्ता सुविधानुसार सम्पन्न होती है।

2. जाँच- अनुच्छेद 34 तथा 36 के अंतर्गत यह व्यवस्था है कि सुरक्षा परिषद् किसी ऐसे विवाद या स्थिति की जाँच-पड़ताल कर सकती है जो अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष का रूप धारण कर सकता हो या जिससे दूसरा गंभीर विवाद उठ खड़ा होने की आशंका हो।

3. सौमनस्य या संराधन- विवादों के समाधान का एक प्रभावशाली साधन सौमनस्य है। इसमें विभिन्न उपायों का प्रयोग किया जाता है। इन उपायों को तीसरा पक्ष दो या दो से अधिक राज्यों के विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से निर्णीत करने के लिए अपनाते हैं। इस दृष्टि से संराधन की प्रक्रिया में तथ्यों की जाँच, मध्यस्थता तथा वाद-विवाद के लिए प्रस्ताव का प्रेक्षण किया जाता है।

4. वाद-विवाद- सुरक्षा परिषद् या महासभा किसी भी प्रकार की सिफारिश करने से पहले विवादी पक्षों को लिखित या मौखिक रूप से अपने दावे प्रस्तुत करने के लिए भी आमंत्रित करती है। वहाँ वे अपनी शिकायतों को निष्पक्ष रूप में रखते हैं और द्विपक्षीय कूटनीति के माध्यम से ऐसी स्थिति में पहुँच सकते हैं जहाँ विवाद के समाधान के लिए कोई समझौता हो सके।

5. सत्सेवा तथा मध्यस्थता- जब कभी कोई विवाद वार्ता या अन्य किसी तरीके से सुलझाए नहीं जा सकते, तब तीसरा मित्र राज्य अपनी सत्सेवा या मध्यस्थता द्वारा मतभेदों को मैत्रीपूर्ण ढंग से दूर करने में सहायता कर सकता है। यह दशा उस समय उत्पन्न होती है जब विवाद में उलझे पक्ष स्वार्थान्ध भाव का परिचय देते हैं। तीसरा राज्य अपने प्रभाव द्वारा सत्सेवा के इस कार्य का सम्पादन करता है तथा दोनों पक्षों के बीच शांतिपूर्ण समझौता करा देता है।

6. न्यायिक समाधान- विवादों को न्यायिक समाधान अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के माध्यम से होता है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णयों की मान्यता के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में अनुच्छेद 94 में यह स्पष्ट व्यवस्था दी गई है कि “संघ का प्रत्येक सदस्य प्रतिज्ञा करता है कि वह किसी मामले में विवादी होने पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय को मानेगा।” संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य अपने आप ही अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की संविधि के सदस्य बन जाते हैं। इसके लिए प्रत्येक मामले में महासभा सुरक्षा परिषद् की संस्तुति पर आवश्यक शर्तों का , निधारण करती है। यद्यपि न्यायालय का आवश्यक तथा सार्वभौम क्षेत्राधिकारी नहीं है तथापि इसके निर्णय उन पक्षों पर बाध्यकारी होते हैं जो इसके न्यायाधिकरण को स्वेच्छा से स्वीकार करते हैं।

7. पंच निर्णय- साधारण रूप से वार्ता, सौमनस्य, मध्यस्थता, जाँच आदि उपाय निर्णयेत्तर कहलाते हैं, क्योंकि विवादी पक्ष इस बात के लिए बाध्य नहीं होते कि इन उपायों द्वारा दिए गए। सुझावों या निर्णयों को स्वीकार करें। इन्हें प्रभावशाली बनाने के लिए कुछ अन्य उपाय भी किए जाते हैं जिनके निर्णयों को दोनों पक्षों द्वारा मानना आवश्यक होता है। ये निर्णयात्मक उपाय पंच निर्णय तथा न्यायिक निर्णय कहलाते हैं।

8. मध्यस्थ या प्रतिनिधि- कुछ विवाद ऐसे होते हैं जिनके समाधान में सुरक्षा परिषद् महासभा या आयोग की अपेक्षा एक अकेला व्यक्ति, मध्यस्थ या प्रतिनिधि के रूप में अधिक उपयोगी सिद्ध होता है। सुरक्षा परिषद्, महासभा के सभापतियों तथा महासचिव ने इस दृष्टि से अनेक अवसरों पर प्रभावशाली भूमिका निभाई है। किसी तटस्थ स्थान पर अथवा विपक्षी दलों की राजधानियों में या विवाद-स्थल पर संयुक्त राष्ट्रीय मध्यस्थ या प्रतिनिधि ने विवाद के समाधान या मतभेदों को समाप्त करने की दिशा में अपनी महती उपयोगिता सिद्ध की है।

9. अवरोधक कूटनीति- अवरोधक कूटनीति का उपाय शांतिपूर्ण समाधान का रूपक है जिसका उद्देश्य विवाद में तनाव को कम करना तथा स्थिति को बिगड़ने से बचाने का होता है। वर्तमान में महासभा में निर्गुट राष्ट्र शांति स्थापित करने में जो नई भूमिका निभा रहे हैं तथा शीतयुद्ध के क्षेत्र को सीमित करते जा रहे हैं, वे अवरोधक कूटनीति की ही विशेषताएँ हैं। इस प्रकार अपने सीमित साधनों तथा परिस्थितियों के अंतर्गत तथा राष्ट्रों के प्रभुसत्ता सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए अनेक उल्लेखनीय प्रयास किए हैं जिनमें से बहुतों में उसको सफलता प्राप्त हुई तथा महाशक्तियों के अवरोध:के कारण अनेक बार उसे विफल भी होना पड़ा है।

प्रश्न 4.
अंतर्राष्ट्रीय शांति तथा सुरक्षा बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा की जाने वाली बाध्यकारी कार्यवाही की संक्षिप्त विवेचना कीजिए।
उत्तर-
बाध्यकारी कार्यवाही
संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अध्याय 7 में यह व्यवस्था की गई है कि यदि विश्व-शांति तथा सुरक्षा के लिए संकट उत्पन्न हो या शांति भंग से अथवा विश्व के किसी भी क्षेत्र में सशस्त्र आक्रमण होने की स्थिति उत्पन्न हो या हो गई हो तो संयुक्त राष्ट्र संघ शांति स्थापनार्थ बल प्रयोग कर सकता है। वह प्रतिरोधात्मक उपायों का आश्रय भी ले सकता है। यह बल प्रयोग संघ दो प्रकार से करता है-

  1.  जिसमें सशस्त्र सेना के प्रयोग की आवश्यकता नहीं होती एवं
  2.  जिसमें सशस्त्र सैन्य बल का प्रयोग आवश्यक हो जाता है।

अनुच्छेद 39 के अनुसार सुरक्षा परिषद् ही यह निर्णय करती है कि किन कार्यों द्वारा शांति भंग की दशा में आक्रमण की संक्रिया की जा सकती है। इस अनुच्छेद के अनुसार परिषद् सिफारिश तथा निर्णय दोनों प्रकार के कार्य करती है। अनुच्छेद 40 में यह व्यवस्था है कि किसी स्थिति को बिगड़ने से बचाने के लिए सुरक्षा परिषद् अपनी सिफारिशें करने अथवा किसी कार्यवाही का निश्चय करने से पूर्व विवादी पक्षों से ऐसे अस्थायी कदम उठाने की माँग करेगी, जिन्हें वह आवश्यक समझती हो। इन अस्थायी कार्यों से विवादी पक्ष के अधिकारों, दावों या उनकी हैसियत को किसी प्रकार की हानि नहीं होगी। यदि कोई पक्ष इस प्रकार के अस्थायी कदम नहीं उठाता है तो सुरक्षा परिषद् इसकी ओर भी ध्यान रखेगी।

बल प्रयोग के दोनों उपाय सुरक्षा परिषद् के निर्णय के अनुसार संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्यों को मानने पड़ते हैं। इसका संचालन भी सुरक्षा परिषद् ही करती है। चार्टर में कहीं ‘आक्रमण’, ‘शांति भंग’, ‘शांति का संकट’, ‘घरेलू मामला’ आदि वाक्यों को स्पष्ट नहीं किया गया है। यदि एक राष्ट्र की दृष्टि । में कोई आक्रमण होता है तो दूसरे राष्ट्र की दृष्टि में वही ‘घरेलू मामला हो सकता है। इस प्रकार के सभी मामलों के निर्णय के लिए परिषद् के 5 स्थायी सदस्यों के मतों सहित कुल 9 सदस्यों के स्वीकारात्मक मत आवश्यक होते हैं। परन्तु राजनीतिक गुटबन्दी के कारण इस प्रकार का निर्णय लेना कठिन कार्य हो जाता है। यही कारण है कि सुरक्षा परिषद् ऐसे मामलों में तत्क्षण कोई निर्णय नहीं ले पाती है।

एक बार यह निश्चित हो जाने पर कि किसी देश के लिए युद्ध जैसी परिस्थितियाँ या किसी देश पर हुआ आक्रमण विश्व शांति के लिए संकट है तो इस स्थिति में सुरक्षा परिषद् तुरंत कार्यवाही कर सकती है। इस प्रकार की कार्यवाही में सैनिक तथा असैनिक दोनों प्रकार की अनुशास्तियाँ निहित हैं। और संघ के सभी सदस्य परिषद् के निर्णय पर अमल करने के लिए, संघ के विधानानुसार बाध्य हैं। जब विवाद में,सशस्त्र संघर्ष उत्पन्न हो जाता है तो संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन के सामने गंभीर चुनौती उत्पन्न हो जाती है। सिद्धांततः चार्टर के अनुच्छेद 7 के अनुसार विवादी पक्षों पर अनुशास्तियाँ स्थापित करने की व्यवस्था है, तथापि संयुक्त राष्ट्र संघ सामान्यतया दमनकारी या प्रतिरोध के उपायों से दूर रहने का प्रयत्न करता है तथा कूटनीतिक, राजनीतिक या वैधानिक उपायों से समस्या को सुलझाने का प्रयास करता है। सशस्त्र संघर्ष को विराम देने के लिए वैसे तो चार्टर में स्पष्टतः युद्ध विराम आदेश के विषय में कुछ नहीं कहा गया है, तथापि अनुच्छेद 40 के बारे में विस्तार से लिखा गया है।

अनेक मामलों में विवादी पक्ष युद्ध विराम के लिए तैयार हो जाते हैं। परन्तु इस बात की भी प्रबल सम्भावना रहती है कि विवादी राष्ट्रों द्वारा सुरक्षा के आदेशों या सिफारिशों को ठुकरा दिया जाए। इण्डोनेशिया और डचों, यहूदियों और अरबों, साइप्रस के यूनानियों तथा तुर्को और दो अवसरों पर भारतीयों तथा पाकिस्तानियों के बीच युद्ध रोकने में सुरक्षा परिषद् की युद्ध विराम की आज्ञाएँ प्रभावी मानी गईं।

अनुच्छेद 41 के अंतर्गत यह व्यवस्था है कि सुरक्षा परिषद् अपने निर्णयों पर अमल करने के लिए कोई भी कार्यवाही कर सकती है, जिसमें सशस्त्र सेना का प्रयोग न हो। यह संघ-सदस्यों में इस प्रकार की कार्यवाही करने की माँग कर सकती है। इन कार्यवाहियों के अनुसार आर्थिक संबंध पूर्णरूपेण या आंशिक रूप से समाप्त किए जा सकते हैं। समुद्र, वायु, डाक-तार, रेडियो और यातायात के अन्य साधनों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है और कूटनीतिक संबंधों को समाप्त किया जा सकता है।

अनुच्छेद 42 में चर्चा की गई है कि शांति तथा सुरक्षा के लिए की जाने वाली कार्यवाहियाँ यदि अपर्याप्त सिद्ध हो गई हों तो जल, थल और वायु सेनाओं द्वारा आवश्यक कार्यवाही की जा सकती है। इस कार्यवाही में विरोध प्रदर्शन माकेबन्दी तथा संघ के सदस्य राष्ट्रों की जल, थल तथा वायु सेनाओं द्वारा की जाने वाली कोई भी कार्यवाही सम्मिलित है।

अनुच्छेद 43 के अनुसार परिषद् इस बात को निश्चित करती है कि उपयुक्त कार्यवाही संघ के कुछ सदस्यों द्वारा की जाए या सभी सदस्यों द्वारा। जो कार्य किया जाए वह स्वतन्त्र रूप से हो या प्रत्यक्ष हो या फिर उसे क्रियान्वित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सहायता ली जाए। सदस्य राष्ट्रों को यह कर्तव्य है कि वे सुरक्षा परिषद् के माँगने पर तथा विशेष समझौते के अनुसार अपनी सशस्त्र सेनाएँ, सहायता तथा अन्य सुविधा उपलब्ध कराएँगे। संघ की व्यवस्था के अनुसार जिस प्रकार के समझौतों द्वारा यह निश्चिय किया जाना था कि संघ का प्रत्येक सदस्य कितनी सहायता देगा, सेनाओं की उपलब्धता क्या होगी, ये अविलम्ब कार्यवाही करने के लिए कैसे तैयार होंगी तथा प्रत्येक सदस्य किस प्रकार अन्य सुविधाएँ प्रदान करेगा-परन्तु ऐसे समझौते अभी तक हुए नहीं हैं। उस दशा में अनुच्छेद में यह कहा गया है-“जब सुरक्षा परिषद् बल प्रयोग करने का निश्चय कर ले तो किसी ऐसे सदस्य से, जिसे इसमें प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है, सशस्त्र सेनाएँ जुटाने के लिए कहने से पूर्व वह उस देश को, यदि संबंधित देश चाहे तो उसकी सशस्त्र सेनाओं के प्रयोग से संबंधित निर्णयों में भाग लेने को आमंत्रित करेगी।”

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 8 Secularism

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 8 Secularism (धर्मनिरपेक्षता)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी बातें धर्मनिरपेक्षता के विचार से संगत हैं? कारण सहित बताइए।
(क) किसी धार्मिक समूह पर दूसरे धार्मिक समूह का वर्चस्व न होना।
(ख) किसी धर्म को राज्य के धर्म के रूप में मान्यता देना।
(ग) सभी धर्मों को राज्य का समान आश्रय होना।
(घ) विद्यालयों में अनिवार्य प्रार्थना होना।
(ङ) किसी अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पृथक शैक्षिक संस्थान बनाने की अनुमति होना।
(च) सरकार द्वारा धार्मिक संस्थाओं की प्रबन्धन समितियों की नियुक्ति करना।
(छ) किसी मन्दिर में दलितों के प्रवेश के निषेध को रोकने के लिए सरकार का हस्तक्षेप।
उत्तर-
(ङ) किसी अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पृथक् शैक्षिक संस्थान बनाने की अनुमति होना, धर्मनिरपेक्षता के विचार से संगत है। क्योंकि इसमें अल्पसंख्यक समुदाय को आगे बढ़ाने के लिए सरकार सहायता कर रही है। यह कार्य भारतीय संविधान द्वारा भी मान्यता प्राप्त है।
(छ) किसी मन्दिर में दलितों के प्रवेश के निषेध को रोकने के लिए सरकार का हस्तक्षेत्र उचित है, क्योंकि सरकार का यह व्यवहार धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को प्रकट करता है।

प्रश्न 2.
धर्मनिरपेक्षता के पश्चिमी और भारतीय मॉडल की कुछ विशेषताओं का आपस में घालमेल हो गया है। उन्हें अलग करें और एक नई सूची बनाएँ।
UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 8 Secularism 1

प्रश्न 3.
धर्मनिरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? क्या इसकी बराबरी धार्मिक सहनशीलता से की जी सकती है?
उत्तर-
धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि उस राज्य में विभिन्न धर्मों तथा मत मतान्तरों को मानने वाले रहते हैं। लेकिन राज्य का अपना कोई विशिष्ट धर्म नहीं होगा तथा वह धार्मिक कार्यों में भाग भी नहीं लेगा और किसी के धर्म में रुकावट भी उत्पन्न नहीं करेगा। इसकी बराबरी धार्मिक सहनशीलता से नहीं की जा सकती है। राष्ट्र की एकता, अखण्डता तथा सुदृढ़ता के लिए धर्मनिरपेक्षता को ही अपनाना उचित है। सभी नागरिकों से एकसमान न्याय करने के उद्देश्य से भी धर्मनिरपेक्षता की नीति तर्क संगत है।

प्रश्न 4.
क्या आप नीचे दिए गए कथनों से सहमत हैं? उनके समर्थन या विरोध के कारण भी दीजिए।
(क) धर्मनिरपेक्षता हमें धार्मिक पहचान बनाए रखने की अनुमति नहीं देती है।
(ख) धर्मनिरपेक्षता किसी धार्मिक समुदाय के अन्दर या विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच
असमानता के खिलाफ है।
(ग) धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्म पश्चिमी और ईसाई समाज में हुआ है। यह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है।
उत्तर-
(क) धर्मनिरपेक्षता हमें धार्मिक पहचान बनाए रखने की अनुमति नहीं देती है। यह कथन गलत है धर्मनिरपेक्षता में हम अपनी धार्मिक पहचान बनाए रख सकते हैं। चूंकि राज्य धर्म में हस्तक्षेप नहीं करता है।
(ख) धर्मनिरपेक्षता किसी धार्मिक समुदाय के अन्दर या विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच असमानता के खिलाफ है। यह कथन सही हैं। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ ही यह है कि धार्मिक समुदायों में हस्तक्षेप न किया जाए। सभी को समान दृष्टि से देखा जाए।
(ग) धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्म पश्चिमी और ईसाई समाज में हुआ है। यह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है। यह कथन गलत है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से बुनियादी रूप से भिन्न है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता भारतीय विचारकों की देन है।

प्रश्न 5.
भारतीय धर्मनिरपेक्षता का जोर धर्म और राज्य के अलगाव पर नहीं वरन उससे अधिक किन्ही बातों पर है। इस कथन को समझाइए।
उत्तर-
भारतीय धर्मनिरपेक्षता केवल धर्म और राज्य के बीच सम्बन्धविच्छेद पर बल देती है। अन्तरधार्मिक समानता भारतीय संकल्पना के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता की विशेषताएँ इसकी प्रकृति को स्पष्ट करती हैं। सर्वप्रथम तो भारतीय धर्मनिरपेक्षता गहरी धार्मिक विविधता के सन्दर्भ में जन्मी थी। यह विविधता पश्चिमी आधुनिक विचारों और राष्ट्रवाद के आगमन से पूर्व की चीज है। भारत में पूर्व से ही अन्तर धार्मिक सहिष्णुता’ की संस्कृति मौजूद थी। हमें याद रखना। चाहिए कि ‘सहिष्णुता’ धार्मिक वर्चस्व की विरोधी नहीं है। सम्भव है सहिष्णुता में हर किसी को कुछ मौका मिल जाए, लेकिन ऐसी स्वतन्त्रता प्रायः सीमित होती है। इसके अतिरिक्त सहिष्णुता हम में उन लोगों को बर्दाश्त करने की क्षमता उत्पन्न करती है जिन्हें हम पसन्द नहीं करते हैं। यह उस समाज के लिए तो विशिष्ट गुण है जो किसी बड़े गृहयुद्ध से उभर रहा हो मगर शान्ति के समय में नहीं जब लोग समान मान-मर्यादा के लिए संघर्षरत हों।

पश्चिमी आधुनिकता के प्रभावस्वरूप भारतीय चिन्तन में समानता की अवधारणा उभरकर सामने आई। इसने हमें समुदाय में समानता पर जोर देने की दिशा में अग्रसर किया। इसने भारतीय समाज में मौजूद श्रेणीबद्धता को हटाने के लिए अन्तर सामुदायिक समानता के विचार को भी उद्घाटित किया। इस प्रकार भारतीय समाज में पूर्व से ही मौजूद धार्मिक विविधता और पश्चिम से आए विचारों के बीच अन्त:क्रिया प्रारम्भ हुई जिसके परिणामस्वरूप भारतीय धर्मनिरपेक्षता ने विशिष्ट रूप धारण कर लिया।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता ने अन्त:धार्मिक और अन्तरधार्मिक वर्चस्व पर एक साथ ध्यान केन्द्रित किया। इसने हिन्दुओं के अन्दर महिलाओं के उत्पीड़ने और भारतीय मुसलमानों अथवा ईसाइयों के अन्दर महिलाओं के प्रति भेदभाव तथा बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों के अधिकारों पर उत्पन्न किए जा सकने वाले खतरों का समान रूप से विरोध किया। इस प्रकार, यह मुख्य धारा की पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से पहली महत्त्वपूर्ण भिन्नता है। इसी से सम्बद्ध दूसरी भिन्नता यह है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता का सम्बन्ध व्यक्तियों की धार्मिक स्वतन्त्रता से ही नहीं, अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक स्वतन्त्रता से भी है। इसके अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसन्द का धर्म मानने का अधिकार है।

इसी प्रकार धार्मिक अल्पसंख्यकों को भी अपनी स्वयं की संस्कृति और शैक्षिक संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार है। एक अन्य भिन्नता भी है, चूंकि धर्मनिरपेक्ष राज्य को अन्तरधार्मिक वर्चस्व के मसले पर भी समान रूप से चिन्तित रहना है; अतः भारतीय धर्मनिरपेक्षता में राज्य समर्थित धार्मिक सुधार की जगह भी है और अनुकूलता भी। अन्त में, धर्मनिरपेक्षता का तात्पर्य शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व अथवा सहिष्णुता से बहुत आगे तक जाता है। इस मुहावरे का आशय विभिन्न धर्मों के प्रति सम्मान की भावना है, तो इसमें एक अस्पष्टता है, जिसे स्पष्ट करना आवश्यक है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता विविध धर्मों में राज्य सत्ता के सैद्धान्तिक हस्तक्षेप की अनुमति प्रदान करती है। ऐसा हस्तक्षेप प्रत्येक धर्म के कुछ विशिष्ट पहलुओं के प्रति असम्मान प्रदर्शित करती है।

प्रश्न 6.
सैद्धान्तिक दूरी क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर-
भारतीय संविधान घोषणा करता है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक को देश के किसी भी भाग में स्वतन्त्रता और प्रतिष्ठा के साथ रहने का अधिकार है। मगर वास्तव में वर्जना और भेदभाव के अनेक रूप अभी दिखाई देते हैं। इसके अग्रलिखित उदाहरण प्रस्तुत हैं-

  1. सन् 1984 के दंगों में दिल्ली और देश के शेष भागों में लगभग 4,000 सिखों को मार दिया गया। पीड़ितों के परिजनों का मानना है कि दोषियों को आज तक सजा नहीं मिली है।
  2. हजारों कश्मीरी पण्डितों को घाटी में अपना घर छोड़ने के लिए विवश किया गया। वे दो दर्शकों के बाद भी अपने घर नहीं लौट सके हैं।
  3. सन् 2002 में गुजरात में लगभग 2,000 मुसलमान मारे गए। इन परिवारों के जीवित बचे हुए अनेक सदस्य अभी भी अपने गाँव वापस नहीं जा सके हैं, जहाँ से वे उजाड़ दिए गए थे।

उपर्युक्त प्रस्तुत उदाहरणों में किसी-न-किसी रूप में भेदभाव दिखाई देता है। प्रत्येक मामले में किसी एक धार्मिक समुदाय के लोगों को निशाना बनाया गया और उनकी धार्मिक पहचान के कारण उन्हें सताया गया। दूसरों शब्दों में नागरिकों के एक समूह को बुनियादी स्वतन्त्रता से वंचित किया गया। यह भी कहा जा सकता है कि यह समस्त उदाहरण अन्तरधार्मिक वर्चस्व और एक धार्मिक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय के उत्पीड़न के प्रकरण हैं। धर्मनिरपेक्षता को सर्वप्रथम और सर्वप्रमुख रूप से ऐसा सिद्धान्त समझा जाना चाहिए जो अन्तर धार्मिक वर्चस्व का विरोध करता है। हालाँकि यह धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा के महत्त्वपूर्ण पहलुओं में से केवल एक है।
धर्मनिरपेक्षता का इतना ही महत्त्वपूर्ण दूसरा पहलू अन्त:धार्मिक वर्चस्व अर्थात् धर्म में । छिपे वर्चस्व का विरोध करना है। यही सैद्धान्तिक दूरी है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है?
(क) पाकिस्तान
ख) भूटान
(ग) भारत
(घ) चीन
उत्तर-
(ग) भारत।

प्रश्न 2.
जन समुदाय के लिए अफीम किसे माना गया है?
(क) धर्म को
(ख) राष्ट्र को
(ग) साम्प्रदायिकता को
(घ) प्रशासन को
उत्तर-
(क) धर्म को।

प्रश्न 3.
मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने धर्मनिरपेक्षता का मॉडल किस राज्य में प्रस्तुत किया?
(क) तुर्की में
(ख) फ्रांस में
(ग) चीन में
(घ) भारत में
उत्तर-
(क) तुर्की में।

प्रश्न 4.
भारत में धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार संविधान के किस अनुच्छेद में दिया गया है?
(क) अनुच्छेद 25-28
(ख) अनुच्छेद 26-27
(ग) अनुच्छेद 31-32
(घ) अनुच्छेद 30-35
उत्तर-
(क) अनुच्छेद 25-28.

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘धर्मनिरपेक्ष शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर-
‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द अंग्रेजी भाषा के सेक्युलर’ (Secular) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। Secular शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘सरक्युलम’ (Sarculum) शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है-‘संसार’ अथवा ‘युग’।

प्रश्न 2.
धर्मनिरपेक्ष की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
जॉर्ज ऑस्लर के अनुसार, “धर्मनिरपेक्ष का अर्थ इस विश्व या वर्तमान जीवन से सम्बन्धित है, जो धार्मिक द्वैतवादी विचारों से बँधा हुआ न हो।”

प्रश्न 3.
धर्मनिरपेक्ष राज्य की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
एच० बी० कामथ के अनुसार, “एक धर्मनिरपेक्ष राज्य न तो ईश्वर रहित राज्य है, न ही यह अधर्मी राज्य है और न ही धर्म-विरोधी। धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का अर्थ यह है कि इसमें ईश्वर पर आधारित धर्म के अस्तित्व को नहीं माना जाता।”

प्रश्न 4.
धर्मनिरपेक्षता किस प्रकार की अवधारणा है?
उत्तर-
धर्मनिरपेक्षता मूल रूप से एक लोकतान्त्रिक अवधारणा है।

प्रश्न 5.
धर्मनिरपेक्ष राज्य के कोई दो गुण लिखिए।
उत्तर-
(i) धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में राष्ट्रीय भावनाओं को प्रोत्साहन प्राप्त होता है।
(ii) धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में साम्प्रदायिकता की भावना को कम किया जा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कमाल अतातुर्क की धर्मनिरपेक्षता के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
लीसवीं सदी के प्रथमार्द्ध में तुर्की में धर्मनिरपेक्षता अमल में आई। यह धर्मनिरपेक्षता संगठित धर्म से सैद्धान्तिक दूरी बनाने के स्थान पर धर्म में सक्रिय हस्तक्षेप के माध्यम से उसके दमन की पक्षधर थी। मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने इस प्रकार की धर्मनिरपेक्षता प्रस्तुत की और उसे प्रयोग में भी लाए।
अतातुर्क प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् सत्ता में आए। वे तुर्की के सार्वजनिक जीवन में खिलाफत को समाप्त कर देने के लिए कटिबद्ध थे। वे मानते थे कि परम्परागत सोच-विचार और अभिव्यक्तियों से नाता तोड़े बगैर तुर्की को उसकी दु:खद स्थिति से नहीं उभारा जा सकता। उन्होंने तुर्की को आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष बनाने के लिए आक्रामक ढंग से कदम बढ़ाए। उन्होंने स्वयं अपना नाम मुस्तफा कमाल पाशा से बदलकर अतातुर्क कर लिया। (अतातुर्क का अर्थ होता है तुर्को का पिता)। हैट कानून के माध्यम से मुसलमानों द्वारा पहनी जाने वाली परम्परागत फैज टोपी को प्रतिबन्धित कर दिया। स्त्रियों-पुरुषों के लिए पश्चिमी पोशाकों को बढ़ावा दिया गया। तुर्की पंचांग की जगह पश्चिमी (ग्रिगोरियन) पंचांग लाया गया। 1928 ई० में नई तुर्की वर्णमाला को संशोधित लैटिन रूप से अपनाया गया।

प्रश्न 2.
वास्तविक धर्मनिरपेक्ष होने के लिए राज्य के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर-
सचमुच धर्मनिरपेक्ष होने के लिए राज्य को न केवल धर्मतान्त्रिक होने से मना करना होगा बल्कि उसे किसी भी धर्म के साथ किसी भी तरह के औपचारिक कानूनी गठजोड़ से दूरी भी रखनी होगी। धर्म और राज्यसत्ता के बीच सम्बन्ध-विच्छेद धर्मनिरपेक्ष राज्यसत्ता के लिए आवश्यक है, मगर केवल यही पर्याप्त नहीं है। धर्मनिरपेक्ष राज्य को ऐसे सिद्धान्तों और लक्ष्यों के लिए अवश्य प्रतिबद्ध होना चाहिए जो अंशत: ही सही, गैर-धार्मिक स्रोतों से निकलते हों। ऐसे लक्ष्यों में शान्ति, धार्मिक स्वतन्त्रता, धार्मिक उत्पीड़न, भेदभाव और वर्जना से आजादी और साथ ही अन्तर-धार्मिक व अन्त:धार्मिक समानता सम्मिलित रहनी चाहिए।

प्रश्न 3.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
समाजवादी पन्थनिरपेक्ष राज्य।
उत्तर-
पन्थनिरपेक्षता या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है तथा राज्य के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी धर्म का पालन करने को अधिकार होगा। राज्य, धर्म के आधार पर नागरिकों के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा तथा धार्मिक मामलों में विवेकपूर्ण निर्णय लेगा। इसके अतिरिक्त, राज्य के द्वारा सभी व्यक्तियों के धार्मिक अधिकारों को सुनिश्चित एवं सुरक्षित करने का प्रयास किया जाएगा। राज्य धार्मिक मामलों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगा, वरन् धार्मिक सहिष्णुता एवं धार्मिक समभाव की नीति को प्रोत्साहित करने का प्रयास करेगा। धर्म के सम्बन्ध में राज्य सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार करेगा। इस प्रकार की पन्थ-निरपेक्षता या धर्मनिरपेक्षता का पालन करने वाले शासन को पन्थनिरपेक्ष या धर्मनिरपेक्ष राज्य कहते हैं।

प्रश्न 4.
भारत में धर्मनिरपेक्षता को अपनाना क्यों आवश्यक था?
उत्तर-
हम सभी जानते हैं कि भारत एक विशाल लोकतान्त्रिक देश है। ऐसे देश में राज्य को धर्म-निरपेक्ष बनाना सर्वथा आवश्यक है, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता मूल रूप से एक लोकतान्त्रिक अवधारणा है। यदि हम इतिहास पर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्मनिरपेक्षता एवं लोकतन्त्र सहगामी हैं। जब कभी धर्म की आड़ में राजाओं ने जनता पर अत्याचार किए तब जनता ने उनके शासन के विरुद्ध विद्रोह करना प्रारम्भ किया। भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध 1857 ई० की क्रान्ति को प्रमुख कारण यह था कि ब्रिटिश शासकों ने हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही धर्मों के मानने वालों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का प्रयास किया था। कालान्तर में धर्मनिरपेक्षता एवं लोकतन्त्र दोनों को मान्यता मिली। इसके अतिरिक्त, एक लोकतान्त्रिक देश में धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना इसलिए भी उचित होती है कि स्वतन्त्रता, समानता, भ्रातत्व एवं सहिष्णुता के जिन आदर्शों की स्थापना लोकतन्त्र द्वारा होती है, वे धर्मनिरपेक्षता के भी आदर्श होते हैं।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धर्मनिरपेक्ष से क्या अभिप्राय है? धर्मनिरपेक्ष राज्य की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द अंग्रेजी भाषा के सेक्युलर’ (Secular) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। Secular शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘सरक्युलम’ (Sarculum) शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है–‘संसार’ अथवा युग’। इस प्रकार शब्द-व्युत्पत्ति के आधार पर ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द से अभिप्राय सांसारिक, लौकिक अथवा ऐतिहासिक से है। दूसरे शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष धार्मिक अथवा पारलौकिक का प्रतिलोम है।” धर्मनिरपेक्ष राज्य की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं
जॉर्ज ऑस्लर के शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष का अर्थ इस विश्व या वर्तमान जीवन से सम्बन्धित है, जो धार्मिक या द्वैतवादी विचारों से बँधा हुआ न हो।”
एच०बी० कामथ के अनुसार, “एक धर्मनिरपेक्ष राज्य न तो ईश्वर-रहित है, न ही यह अधर्मी राज्य है। और न ही धर्मविरोधी। धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का अर्थ यह है कि इसमें ईश्वर पर आधारित धर्म के अस्तित्व को नहीं माना जाता।”
डोनाल्ड स्मिथ के शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष राज्य वह है, जिसके अन्तर्गत धर्म-विषयक व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वतन्त्रता सुरक्षित रहती है; जो व्यक्ति के साथ व्यवहार करते समय धर्म को बीच में नहीं लाता; जो संवैधानिक रूप से किसी धर्म से सम्बन्धित नहीं है और न किसी धर्म की उन्नति का प्रयास करता है तथा न ही किसी धर्म के मामले में हस्तक्षेप करता है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य से अभिप्राय एक ऐसे राज्य से है जिसका अपना कोई धर्म नहीं होता और जो धर्म के आधार पर व्यक्तियों में कोई भेदभाव नहीं करता है। इसका अर्थ एक धर्म-विरोधी, अधर्मी या ईश्वररहित राज्य से नहीं है, वरन् एक ऐसे राज्य से है जो धार्मिक मामलों में पूर्णतया तटस्थ रहता है क्योंकि यह धर्म को व्यक्ति की व्यक्तिगत वस्तु मानता है।

प्रश्न 2.
भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य का स्वरूप क्या है?
उत्तर-
भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य का रूप
भारत संविधान से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि संविधान निर्माताओं ने भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य को स्थापित करने का पूर्ण प्रयास किया है। भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्ष राज्य के दो आधार हैं

प्रथम, भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न केवल इस बात का उल्लेख किया गया है कि यहाँ सभी नागरिकों को विचार-अभिव्यक्ति, विश्वास व धर्म की उपासना की स्वतन्त्रता प्रदान करने का प्रयास किया जाएगा।” वरन् इसमें 42वें संशोधन द्वारा ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को जोड़कर स्थिति और भी स्पष्ट कर दी गई है।

द्वितीय, संविधान में धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना का दूसरा आधार भारतीय नागरिकों को मूल अधिकार के रूप में, धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान किया जाना है। संविधान के 25वें से 28वें अनुच्छेद नागरिकों की धार्मिक स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकार का उल्लेख करते हैं।

भारत में धर्मनिरपेक्षता के आदर्श को न केवल सिद्धान्त में वरन् व्यवहार में भी अपनाया गया है। भारत में धार्मिक आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता, वरन् यहाँ सभी धर्मों को समान रूप से मान्यता दी गई है। उदाहरण के लिए-1956 ई० में दिल्ली में आयोजित ‘बौद्ध धर्म सम्मेलन’ तथा 1964 ई० में मुम्बई में आयोजित ईसाई धर्म सम्मेलन को सफल बनाने के लिए सरकार ने वित्तीय सहायता और प्रशासनिक सहयोग भी दिया। इसके अतिरिक्त, भारत में धर्म-निरपेक्षता के सिद्धान्त का लागू किया जाना इस बात से भी सिद्ध होता है कि यहाँ धर्मों के प्रतिभाशाली व्यक्ति शासन में उच्च पदों पर आसीन रहे हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना को न केवल भारत के लिए उचित समझा जाता है, वरन् भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य के आदर्श को लागू भी किया गया है।

प्रश्न 3.
धर्मनिरपेक्षता वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा देती है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? तर्क पूर्ण उत्तरदीजिए।
उत्तर-
धर्मनिरपेक्षता वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा देती है। अनुभवजन्य रूप में यह पूर्णतः असत्य भी नहीं है। प्रथमतः लोकतन्त्र में राजनेताओं के लिए वोट पाना आवश्यक है। यह उनके काम का अंग है और लोकतान्त्रिक राजनीतिक बहुत कुछ ऐसी ही है। लोगों के किसी समूह के पीछे लगने या उनका वोट प्राप्त करने की खातिर कोई नीति बनाने का वादा करने के लिए राजनेताओं को दोष देना उचित नहीं होगा। वास्तविक रूप से प्रश्न तो यह है कि वे ठीक-ठीक किस उद्देश्य से वोट पाना चाहते हैं? इसमें सिर्फ उन्हीं का हित है या विचाराधीन समूह का भी हित है। यदि किसी राजनेता को वोट देने वाला समूह उसके द्वारा बनवाई गई नीति से लाभान्वित नहीं हुआ, तो बेशक वह राजनेता दोषी होगा।

यदि अल्पसंख्यकों को वोट चाहने वाले धर्मनिरपेक्ष राजनेता उनकी इच्छा पूरी करने में समर्थ होते हैं, तो यह उस धर्मनिरपेक्ष परियोजना की सफलता होगी, जो आखिरकार अल्पसंख्यकों के हितों की भी रक्षा करती है।

लेकिन, अगर कोई व्यक्ति विचाराधीन समूह का कल्याण अन्य समूहों के कल्याण और अधिकारों की कीमत पर करना चाहे, तब क्या होगा? यदि ये धर्मनिरपेक्ष राजनेता बहुसंख्यकों के हितों को नुकसान, पहुँचाएँ, तब क्या होगा? तब एक नया अन्याय सामने आएगा। लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि पूरा राजनीति तन्त्र अल्पसंख्यकों के पक्ष में झुका हुआ हो परन्तु भारत में ऐसा कुछ हुआ है, इसका कोई प्रमाण नहीं है। संक्षेप में, वोट बैंक की राजनीति स्वयं में इतनी गलत नहीं है। गलत तो वोट बैंक की वैसी राजनीति है, जो अन्याय को जन्म देती है। केवल यह तथ्य कि धर्मनिरपेक्ष दल वोट बैंक का प्रयोग करते हैं, कष्टकारक नहीं है। भारत में हर समुदाय के सन्दर्भ में सभी दल ऐसा करते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय धर्मनिरपेक्षता की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर-
भारतीय धर्मनिरपेक्षता की आलोचना के लिए निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं-

1. धर्म-विरोधी- धर्मनिरपेक्षता, धर्म-विरोधी है। हम सम्भवतया यह दिखा पाने में सफल हुए हैं। | कि धर्मनिरपेक्षता संस्थाबद्ध धार्मिक वर्चस्व का विरोध करती है। यह धर्म-विरोधी होने का पर्याय नहीं है।

2. पश्चिम से आयातित- धर्मनिरपेक्षता के विषय में कहा जा सकता है कि यह पश्चिम से आयातित है अर्थात् यह ईसाइयतं से सम्बद्ध है। यह आलोचना बड़ी विचित्र है। पश्चिमी राष्ट्र तब ,धर्म-निरपेक्ष बने, जब एक महत्त्वपूर्ण स्तर पर उन्होंने ईसाइयत से सम्बन्ध समाप्त कर लिया। पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता में वैसी कोई ईसाइयत नहीं है। धर्म धर्म और राज्य का पारस्परिक निषेध, जिसे पश्चिमी धर्मनिरपेक्ष समाजों का आदर्श माना जाता है, सभी धर्मनिरपेक्ष राज्य सत्ता की प्रमुख विशेषता भी नहीं है। सम्बन्धविच्छेद के विचार की व्याख्या अलग-अलग प्रकार से की जा सकती है। कोई धर्मनिरपेक्ष राज्य सत्ता समुदायों के बीच शान्ति को बढ़ावा देने के लिए धर्म से सैद्धान्तिक दूरी बनाए रख सकती है और विशिष्ट समुदायों की रक्षा के लिए वह उसमें हस्तक्षेप भी कर सकती है। भारत में ठीक यही बात हुई, यहाँ ऐसी धर्मनिरपेक्षता विकसित हुई है, जो न तो पूरी तरह ईसाइयत से सम्बद्ध है न भारतीय जमीन पर सीधे-सीधे पश्चिमी आरोपण ही है। तथ्य तो यह है कि धर्मनिरपेक्षता का विगत इतिहास पश्चिमी और गैर-पश्चिमी, दोनों मार्गों का अनुसरण करता दिखाई देता है। पश्चिमी में राज्य और चर्च का सम्बन्ध विच्छेद का प्रश्न केन्द्रीय था और भारत जैसे देशों में शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व जैसे प्रश्न महत्त्वपूर्ण रहे हैं।

3. अल्पसंख्यकवाद- धर्मनिरपेक्षता पर अल्पसंख्यकवाद का आरोप भी लगाया जाता है। यह सच है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता अल्संख्यक अधिकारों की पैरवी करती है। मगर यह पैरवी न्यायोचित रूप से करती है, आलोचकों को अल्पसंख्यक अधिकारों को विशेष सुविधाओं के रूप में नहीं देखना चाहिए।

4. अधिक हस्तक्षेप- कुछ आलोचक कहते हैं कि धर्मनिरपेक्षता उत्पीड़नकारी है और समुदायों।
की धार्मिक स्वतन्त्रता में अधिक हस्तक्षेप करती है। यह भारतीय धर्मनिरपेक्षता के बारे में गलत समझ है। यह सच है कि पारस्परिक निषेध के रूप में धर्म और राज्य में सम्बन्ध-विच्छेद के विचार को न मानकर भारतीय धर्मनिरपेक्षता धर्म में हस्तक्षेप को अस्वीकार कर देती है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि यह अधिक हस्तक्षेपकारी है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता धर्म से सैद्धान्तिक दूरी बनाकर रखती है, साथ-साथ कुछ हस्तक्षेप की गुंजाइश भी रखती है किन्तु इस हस्तक्षेप का आशय उत्पीड़नकारी हस्तक्षेप नहीं होता।

प्रश्न 2.
“भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में
प्राचीनकाल से ही धर्म का बहुत महत्त्व रहा है तथा भारतीय सामाजिक और राजनीतिक जीवन धर्म से ओत-प्रोत रहा है। वर्तमान भारत का लोकतान्त्रिक गणराज्य नैतिकता, आध्यात्मिकता और मानव धर्म पर आधारित है। भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य को सुदृढ़ करने के लिए संविधान में निम्नलिखित व्यवस्थाएँ की गई हैं

1. राज्य का अपना कोई धर्म नहीं- संविधान के अनुसार भारत का अपना कोई धर्म नहीं है। राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान हैं।

2. धार्मिक आधार पर भेदभाव समाप्त- भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को यह विश्वास | दिलाया गया है कि धर्म के आधार पर उनके साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

3. कानून की दृष्टि से सभी व्यक्ति समान- संविधान के अनुच्छेद 14 अनुसार भारतीय राज्य-क्षेत्र में सभी व्यक्ति कानून की दृष्टि से समान होंगे और धर्म, जाति अथवा लिंग के | आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

4. धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार- भारतीय संविधान द्वारा प्रत्येक नागरिक को अनुच्छेद 25-28 द्वारा धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार प्रदान किया गया है। इसमें नागरिकों को अपने अन्त:करण के अनुसार किसी भी धर्म का पालन करने, छोड़ने, प्रचार करने आदि का पूर्ण अधिकार है। किसी भी नागरिक को किसी धर्म-विशेष का पालन करने या न करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।

5. धार्मिक संस्थाओं की स्थापना और धर्म-प्रचार की स्वतन्त्रता- संविधान के अनुसार सभी , धर्मों को स्वतन्त्रता प्रदान की गई है। इसके अनुसार प्रत्येक नागरिक को धार्मिक तथा परोपकारी उद्देश्य के लिए संस्थाएँ स्थापित करने, उनका संचालन करने, धार्मिक मामलों का प्रबन्ध करने, चल व अचल सम्पत्ति रखने और प्राप्त करने तथा ऐसी सम्पत्ति का कानून के अनुसार प्रबन्ध करने का अधिकार है।

6. धार्मिक शिक्षा का निषेध- अनुच्छेद 28 के अनुसार सरकारी शिक्षण संस्थाओं में किसी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती तथा सरकार से आर्थिक सहायता यी मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं में भी किसी को धार्मिक गतिविधियों तथा कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।

7. धार्मिक कार्यों के लिए किया जाने वाला व्यय कर-मुक्त- भारतीय संविधान अपने नागरिकों को न केवल धार्मिक स्वतन्त्रता और धार्मिक संस्थाओं की स्थापना की स्वतन्त्रता प्रदान करता है, वरन् संविधान के अन्तर्गत धार्मिक कार्यों के लिए किए जाने वाले व्यय को भी कर-मुक्त घोषित किया गया है।

8. साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का अन्त- संविधान द्वारा साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का अन्त कर दिया गया है। अब प्रत्येक धर्म के अनुयायी को वयस्क मताधिकार के आधार पर मत देने का अधिकार दिया गया है।
भारत का संविधान देश की एकता तथा अखण्डता को बनाए रखने तथा सार्वजनिक हित की। दृष्टि से धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार पर कुछ प्रतिबन्ध भी आरोपित करता है। भारत में सच्चे धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना की गई है।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 7 Nationalism

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 7 Nationalism (राष्ट्रवाद)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
राष्ट्र किस प्रकार से बाकी सामूहिक सम्बद्धताओं से अलग है?
उत्तर-
राष्ट्र जनता को कोई आकस्मिक समूह नहीं है। लेकिन यह मानव समाज में पाए जाने वाले अन्य समूहों अथवा समुदायों से अलग है। यह परिवार से भी अलग है। परिवार तो प्रत्यक्ष सम्बन्धों पर आधारित होता है जिसका प्रत्येक सदस्य दूसरे सदस्यों के व्यक्तित्व और चरित्र के विषय में व्यक्तिगत जानकारी रखता है। यह जनजातीय, जातीय और अन्य सगोत्रीय समूहों से भी अलग है। इन समूहों में विवाह और वंश परम्परा सदस्यों को आपस में जोड़ती है। इसलिए यदि हम सभी सदस्यों को। व्यक्तिगत रूप से भी नहीं जानते हों तो भी आवश्यकता पड़ने पर हम उन सूत्रों को खोज निकाल सकते हैं जो हमें आपस में जोड़ते हैं। लेकिन राष्ट्र के सदस्य के रूप में हम अपने राष्ट्र के अधिकांश सदस्यों को सीधे तौर पर न कभी जान पाते हैं और न ही उनके साथ वंशानुगत नाता जोड़ने की आवश्यकता पड़ती है। फिर भी राष्ट्र हैं, लोग उनमें रहते हैं और उनका सम्मान करते हैं।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार से आप क्या समझते हैं? किस प्रकार यह विचार राष्ट्र राज्यों के निर्माण और उनको मिल रही चुनौती में परिणत होता है?
उत्तर-
शेष सामाजिक समूहों से अलग राष्ट्र अपना शासन अपने आप करने और अपने भविष्य को तय करने का अधिकार चाहते हैं। दूसरों शब्दों में, वे आत्म-निर्णय का अधिकार मानते हैं। आत्म-निर्णय के अपने दावे में राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से माँग करता है कि उसके पृथक् राजनीतिक इकाई या राज्य के दर्जे को मान्यता और स्वीकार्यता दी जाए। अक्सर ऐसी माँग उन लोगों की ओर से आती है जो दीर्घकाल से किसी निश्चित भू-भाग पर साथ-साथ रहते आए हों और उनमें साझी पहचान का बोध हो। कुछ मामलों में आत्म-निर्णय के ऐसे दावे एक स्वतन्त्र राज्य बनाने की उस इच्छा से भी जुड़े होते हैं। इन दावों का सम्बन्ध किसी समूह की संस्कृति की संरक्षा से होता है।

प्रश्न 3.
हम देख चुके हैं कि राष्ट्रवाद लोगों को जोड़ भी सकता है और तोड़ भी सकता है। उन्हें मुक्त कर सकता है और उनमें कटुता और संघर्ष भी पैदा कर सकता है। उदाहरणों के साथ उत्तर दीजिए।
उत्तर-
विगत दो सौ वर्षों की अवधि में राष्ट्रवाद एक ऐसे सम्मोहक राजनीतिक सिद्धान्त के रूप में हमारे समाने आया है जिसे इतिहास रचने में योगदान किया है। इसने उत्कृष्ट निष्ठाओं के साथ-साथ गहन विद्वेषों को भी प्रेरित किया है। इसने जनता को जोड़ा है तो विभाजित भी किया है। इसने अत्याचारी शासन से मुक्ति दिलाने से सहायता की तो इसके साथ वह विरोध, कटुता और युद्धों का कारण भी रहा है। साम्राज्यों और राष्ट्रों के ध्वस्त होने का यह भी एक कारण रहा है। राष्ट्रवादी संघर्षों ने राष्ट्रों और साम्राज्यों की सीमाओं के निर्धारण-पुनर्निर्धारण में योगदान किया है। आज भी दुनिया का एक बड़ा भाग विभिन्न राष्ट्र राज्यों में बँटा हुआ है। हालाँकि राष्ट्रों की सीमाओं के पुनर्संयोजन की प्रक्रिया अभी समाप्त नहीं हुई है और वर्तमान राष्ट्रों के अन्दर भी अलगाववादी संघर्ष साधारण बात है। राष्ट्रवाद विभिन्न चरणों से गुजर चुका है। उदाहरण के लिए, 19वीं सदी के यूरोप में इसने कई छोटी-छोटी रियासतों के एकीकरण से वृहत्तर राष्ट्र-राज्यों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। वर्तमान जर्मनी और इटली का गठन एकीकरण और सुदृढ़ीकरण की इसी प्रक्रिया के माध्यम से हुआ था।

लेटिन अमेरिका में बड़ी संख्या में नए राज्य भी स्थापित किए गए थे। राज्य की सीमाओं के सुदृढ़ीकरण के साथ स्थानीय निष्ठाएँ और बोलियाँ भी निरन्तर राष्ट्रीय निष्ठाओं एवं सर्वमान्य जनभाषाओं के रूप में विकसित हुईं। नए राष्ट्रों के लोगों ने एक नवीन राजनीतिक पहचान प्राप्त की, जो राष्ट्र-राज्य की सदस्यता पर आधारित थी। विगत सदी में हमने देश को सुदृढ़ीकरण की ऐसी ही प्रक्रिया से गुजरते देखा है। लेकिन राष्ट्रवाद बड़े-बड़े साम्राज्यों के पतन में हिस्सेदार भी रहा है। यूरोप में 20वीं सदी के आरम्भ में ऑस्ट्रियाई-हंगेरियाई और रूसी साम्राज्य तथा इनके साथ एशिया और अफ्रीका में ब्रिटिश, फ्रांसीसी, डच और पुर्तगाली साम्राज्य के विघटन के मूल में राष्ट्रवाद ही था। भारत तथा अन्य पूर्वी उपनिवेशों के औपनिवेशिक शासन से स्वतन्त्र होने के संघर्ष भी राष्ट्रवादी संघर्ष थे। ये संघर्ष विदेशी नियन्त्रण से स्वतन्त्र राष्ट्र-राज्य स्थापित करने की आकांक्षा से प्रेरित थे।

प्रश्न 4.
वंश, भाषा, धर्म या नस्ल में से कोई भी पूरे विश्व में राष्ट्रवाद के लिए साझा कारण होने का दावा नहीं कर सकता। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-
साधारणतया यह माना जाता है कि राष्ट्रों का निर्माण ऐसे समूह द्वारा किया जाता है जो कुल या भाषा अथवा धर्म या फिर जातीयता जैसी कुछेक निश्चित पहचान का सहभागी होता है। लेकिन ऐसे निश्चित विशिष्ट गुण वास्तव में हैं ही नहीं जो सभी राष्ट्रों में समान रूप से मौजूद हों। कई राष्ट्रों की अपनी कोई एक सामान्य भाषी नहीं है। कनाड़ा का उदाहरण लिया जा सकता है। कनाडा में अंग्रेजी और फ्रांसीसी भाषा-भाषी लोग साथ रहते हैं। भारत में भी अनेक भाषाएँ हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में और भिन्न-भिन्न समुदायों द्वारा बोली जाती हैं। बहुत से शब्दों में उन्हें जोड़ने वाला कोई सामान्य धर्म भी नहीं है। नस्ल अथवा कुल जैसी अन्य विशिष्टताओं के लिए भी यही कहा जा सकता है। राष्ट्र बहुत सीमा तक एक काल्पनिक समुदाय होता है, जो अपने सदस्यों के सामूहिक विश्वास आकांक्षाओं और कल्पनाओं के सहारे एक सूत्र में बँधा होता है। यह कुछ मान्यताओं पर आधारित होता है जिन्हें लोग उस समग्र समुदाय के लिए तैयार करते हैं, जिससे वे अपनी पहचान बनाते हैं। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि वंश, भाषा, धर्म या नस्ल में से कोई भी पूरे विश्व में राष्ट्रवाद के लिए साझा कारण होने का दावा नहीं कर सकता।

प्रश्न 5.
राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रेरित करने वाले कारकों पर सोदाहरण रोशनी डालिए।
उत्तर-
राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रेरित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-

  1. साझे विश्वास – राष्ट्र विश्वास के माध्यम से बनता है। राष्ट्रवाद समूह के भविष्य के लिए सामूहिक पहचान और दृष्टि का प्रमाण है, जो स्वतन्त्र राजनीतिक अस्तित्व का आकांक्षी है।
  2. इतिहास – राष्ट्रवादी भावनाओं को इतिहास भी प्रेरित करती है। राष्ट्रवादियों में स्थायी ऐतिहासिक पहचान की भावना होती है। यानी वे राष्ट्र को इस रूप में देखते हैं जैसे वे बीते अतीत के साथ-साथ आने वाले भविष्य को समेटे हुए हैं।
  3. भू-क्षेत्र – राष्ट्रवादी भावनाएँ एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती हैं। किसी विशिष्ठ भू-क्षेत्र पर दीर्घकाल तक साथ-साथ रहना और उससे जुड़े साझे अतीत की यादें लोगों को एक सामूहिक पहचान का बोध कराती हैं।
  4. साझे राजनीतिक आदर्श – राष्ट्रवादियों की साझा राजनीतिक दृष्टि होती है कि वे किस प्रकार का राज्य बनाना चाहते हैं। शेष बातों के अलावा वे लोकतन्त्र, धर्म निरपेक्षता और उदारवाद जैसे मूल्यों और सिद्धान्तों को भी स्वीकार करते हैं।

प्रश्न 6.
संघर्षरत राष्ट्रवादी आकांक्षाओं के साथ बरताव करने में तानाशाही की अपेक्षा लोकतन्त्र अधिक समर्थ होता है। कैसे?
उत्तर-
लोकतन्त्र में कुछ राजनीतिक मूल्यों और आदर्शों के लिए साझी प्रतिबद्धता ही किसी राजनीतिक समुदाय या राष्ट्र का सर्वाधिक वांछित आधार होती है। इसके अन्तर्गत राजनीतिक समुदाय के सदस्य कुछ दायित्वों से बँधे होते हैं। ये दायित्व सभी लोगों के नागरिकों के रूप में अधिकारों को पहचान लेने से पैदा होते हैं। अगर राष्ट्र के नागरिक अपने सहनागरिकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को जान और मान लेते हैं तो इससे राष्ट्र मजबूत ही होता है। लोकतन्त्र राष्ट्रवाद की भावना को समझता है। तथा उसी की आधारशिला पर टिका हुआ है इसलिए तानाशाही की अपेक्षा लोकतन्त्र संघर्षरत राष्ट्रवादियों से अच्छा बरताव करता है।
प्रश्न 7.
आपकी राय में राष्ट्रवाद की सीमाएँ क्या हैं?
उत्तर-
राष्ट्रवादी अधिकतर स्वतन्त्र राज्य को अधिकार के रूप में मानने लगते हैं। लेकिन यह सम्भव नहीं कि प्रत्येक राष्ट्रीय समूह को स्वतन्त्र राज्य प्रदान किया जाए। साथ ही, यह सम्भवतः अवांछनीय भी होगा। यह ऐसे राज्यों के गठन की ओर ले जा सकता है जो आर्थिक और राजनीतिक क्षमता की दृष्टि से अत्यन्त छोटे हों और इससे अल्पसंख्यक समहों की समस्याएँ और बढ़े। हमें राष्ट्रवाद के असहिष्णु और एक जातीय स्वरूपों के साथ कोई सहानुभूति नहीं रखनी चाहिए।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से किसने राष्ट्रवाद की समालोचना प्रस्तुत की थी?
(क) रवीन्द्रनाथ टैगोर
(ख) महात्मा गांधी
(ग) जवाहरलाल नेहरू :
(घ) बंकिमचन्द्र चटर्जी
उत्तर-
(क) रवीन्द्रनाथ टैगोर।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीयता के विकास में बाधक तत्त्व नहीं है
(क) अशिक्षा
(ख) धर्म-निरपेक्षता
(ग) जातिवाद
(घ) साम्प्रदायिकता
उत्तर-
(ख) धर्म-निरपेक्षता।

प्रश्न 3.
“राष्ट्रीयता सामूहिक भावना का एक रूप है, जो विशिष्ट गहनता, समीपता तथा महत्ता से एक निश्चित देश से सम्बन्धित होती है।” यह कथन किसका है?
(क) लॉस्की
(ख) गार्नर
(ग) जिमर्न
(घ) ब्राइस
उत्तर-
(ग) जिमर्न।

प्रश्न 4.
“अन्तर्राष्ट्रीयता एक ऐसी भावना है जिसके अनुसार व्यक्ति केवल अपने राज्य का ही सदस्य नहीं है, बल्कि विश्व का एक नागरिक है।” यह मत किसका है?
(क) गोल्ड स्मिथ
(ख) जोसेफ इमैनुअल
(ग) बार्कर
(घ) शूमां
उत्तर-
(ग) बार्कर।

प्रश्न 5.
अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग का बाधक तत्त्व है
(क) विश्व-बन्धुत्व की भावना
(ख) उग्र राष्ट्रवाद
(ग) अन्तर्राष्ट्रीय कानून
(घ) वैज्ञानिक प्रगति
उत्तर-
(ख) उग्र राष्ट्रवाद।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्रीयता के मार्ग में उत्पन्न होने वाली दो बाधाएँ लिखिए।
उत्तर-
(i) साम्प्रदायिकता की भावना तथा
(ii) जातीयता एवं प्रान्तीयता की भावना।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीयता के दो तत्त्व बताइए।
उत्तर-
(i) भौगोलिक एकता तथा
(ii) सांस्कृतिक एकता।

प्रश्न 3.
राष्ट्रीयता के विकास में दो बाधक तत्त्व लिखिए।
उत्तर-
(i) भाषावाद तथा
(ii) क्षेत्रवाद।

प्रश्न 4.
राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रीयता के दो दोष लिखिए।
उत्तर-
(i) सैन्यवाद को जन्म तथा
(ii) युद्ध को प्रोत्साहन।

प्रश्न 5.
राष्ट्रीयता के दो लाभ बताइए।
उत्तर-
(i) देशप्रेम की प्रेरणा तथा
(ii) बन्धुत्व की भावना का विकास।

प्रश्न 6.
राष्ट्रवाद का अध्ययन क्यों आवश्यक है?
उत्तर-
राष्ट्रवाद वैश्विक मामलों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इसलिए राष्ट्रवाद का अध्ययन आवश्यक है।

प्रश्न 7.
‘बास्क’ कहाँ है?
उत्तर-
‘बास्क’ स्पेन में स्थित है। यह स्पेन को एक पहाड़ी क्षेत्र है।

प्रश्न 8.
आत्म-निर्णय का दावा क्या है?
उत्तर-
आत्म-निर्णय के दावे में राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से माँग करता है कि उसके पृथक् इकाई या राज्य के दर्जे को मान्यता और स्वीकार्यता दी जाए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्रिक जाति और समुदाय से क्या आशय है?
उत्तर-
लार्ड ब्राइस के अनुसार, राष्ट्रिक जाति की भावना वह अनुभूति या अनुभूतियाँ हैं जो व्यक्तियों के एक समूह को उन बन्धनों के प्रति सजग बनाती हैं जो पूरी तरह से न तो राजनीतिक होते हैं, न धार्मिक और जो उन व्यक्तियों को ऐसे समाज के रूप में संगठित करने देते हैं जो या तो राष्ट्र होता है। या राष्ट्र होने की क्षमता रखता है।
‘राष्ट्रीय समुदाय’ शब्द का उपयोग एक ऐसे समाज को व्यक्त करने के लिए किया जाता है जिसमें राष्ट्रीय भावना का अभी निर्माण ही हो रहा हो और जिसमें एक राष्ट्र की तरह रहने की इच्छा की कमी

प्रश्न 2.
हमारे लिए राष्ट्रवाद क्यों आवश्यक है?
उत्तर–
जहाँ तक भारत का सम्बन्ध है, राष्ट्रवाद हमारे लिए आवश्यक है। हमारा अस्तित्व ही राष्ट्रीयता पर निर्भर करता है, यह हमारे जीवन-मरण का प्रश्न है। यद्यपि अपने सारे दुर्भाग्यों के लिए विदेशियों को जिम्मेदार ठहराना मूर्खता है, फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं कि अंग्रेजों की लम्बी गुलामी ने हममें बहुत-सी बुराइयाँ उत्पन्न कर दी हैं जिनका वास्तविक उपचार आत्म-निर्णय है। भये, कार्यरता और कपट जैसी बुराइयों को राजनीतिक राष्ट्रीयता ही दूर कर सकती है।

प्रश्न 3.
राष्ट्रीयता के मार्ग की बाधाओं को दूर करने के उपायों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीयता के मार्ग में आने वाली बाधाओं को निम्नलिखित उपायों से दूर किया जा सकता है

  1. संकुचित भावनाओं का त्याग और देश-प्रेम या देशभक्ति की प्रबल भावना का विकास किया जाना चाहिए।
  2. देश के विभिन्न भागों में भावनात्मक, साहित्यिक तथा सांस्कृतिक सम्पर्क बढ़ाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए।
  3. शिक्षा का व्यापक स्तर पर प्रचार तथा प्रसार किया जाना चाहिए तथा शिक्षा व्यवस्था का समुचित प्रबन्ध होना चाहिए।
  4. देशभर में परिवहन तथा संचार के साधनों का पर्याप्त विकास किया जाना चाहिए।
  5. देश के सभी क्षेत्रों का सन्तुलित आर्थिक विकास किया जाना चाहिए।
  6. संकीर्ण हितों तथा स्वार्थपूर्ण मनोवृत्तियों पर आधारित राजनीति को नियन्त्रित किया जाना चाहिए।
  7. देश में सुदृढ़ तथा न्यायपूर्ण शासन व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिए।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी राष्ट्र के स्वतन्त्र और सम्प्रभु बन सकने से पूर्व उसमें क्या योग्यताएँ होनी चाहिए?
उत्तर-
किसी राष्ट्र के स्वतन्त्र और सम्प्रभु बन सकने से पूर्व उसमें निम्नलिखित बातों का होना आवश्यक है-

  1. उसमें अपनी सम्पत्ति की व्यवस्था करने और अपने प्राकृतिक साधनों तथा अपनी पूँजी का विकास कर सकने की क्षमता होनी चाहिए।
  2. उसे अच्छे कानून बनाने चाहिए और न्याय की उचित व्यवस्था करनी चाहिए। राज्य क्षेत्रातीतन्यायालयों की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
  3. उसे एक उपयुक्त ढंग की सरकार स्थापित करनी चाहिए।
  4. उसे व्यापार करने देने, कर्ज अदा करने और यात्रा की अनुमति देने का अथवा कर्त्तव्य स्वीकार करना चाहिए।
  5. उसे अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। उसे राजदूतों को अपने यहाँ आमन्त्रित करना चाहिए, विवादों में मध्यस्थताएँ स्वीकार करनी चाहिए और सन्धियाँ करनी चाहिए आदि। उसके पास ऐसे नागरिक होने चाहिए जो गौरव के साथ अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में उसका प्रतिनिधित्व कर सकें।
  6. जब तक युद्धों का होना जारी है तब तक उसे विदेशी आक्रमणों से अपनी रक्षा करने में समर्थ होना चाहिए।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीयता तथा अन्तर्राष्ट्रीयता के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
वर्तमान में राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता के मध्य सम्बन्ध को लेकर दो विरोधी विचार प्रचलित हैं। पहले मत के विद्वानों का कहना है कि राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता परस्पर विरोधी हैं। उनका तर्क है कि राष्ट्रीयता व्यक्ति को अपने देश के प्रति श्रद्धा भाव रखने के लिए प्रेरित करती है, जबकि अन्तर्राष्ट्रीयता का आधारभूत सिद्धान्त विश्वबन्धुत्व की स्थापना करना है। लेकिन यह मत भ्रामक और असंगत प्रतीत होता है। वास्तव में राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता परस्पर विरोधी नहीं हैं। राष्ट्रीयता तभी अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग में बाधक बनती है, जबकि उसका अन्धानुकरण किया जाए तथा उसके उग्र रूप को ग्रहण किया जाए। उदार राष्ट्रीयता अन्तर्राष्ट्रीयता की पोषक और विश्व-शान्ति की समर्थक है। भारत का पंचशील सिद्धान्त इस सन्दर्भ में उदाहरणस्वरूप लिया जा सकता है।

इस प्रकार राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता एक-दूसरे की परस्पर पूरक हैं। यही मत अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है, क्योंकि राष्ट्रीयता ही अन्तर्राष्ट्रीयता का प्रथम चरण है। गांधी जी के अनुसार, “मेरे विचार से राष्ट्रवादी हुए बिना अन्तर्राष्ट्रवादी होना असम्भव है। अन्तर्राष्ट्रीयता तभी सम्भव हो सकती है, जबकि राष्ट्रीयता एक यथार्थ बन जाए।”

प्रश्न 3.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने राष्ट्रवाद की आलोचना किस प्रकार की है?
उत्तर-
अनेक विचारक राष्ट्रवाद के बहुत बड़े प्रशंसक और भक्त हैं। वे इसमें अच्छाइयाँ-हीअच्छाइयाँ पाते हैं। पर दूसरे लोगों का कहना है कि राष्ट्रवाद से अनेक बुरे परिणाम निकले हैं। इन लोगों का विश्वास है कि राष्ट्रीयता अपने वर्तमान रूप में अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सद्भावना की सबसे बड़ी शत्रु है। राष्ट्रवाद पर अपने निबन्ध में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने नि:संकोच राष्ट्रवाद को बुरा कहा है। वह उसे ‘समूची जाति का सामूहिक और संगठित स्वार्थ’, ‘आत्मपूजा’, ‘स्वार्थी उद्देश्यों के लिए राजनीति और व्यवसाय का संगठन’, ‘शोषण के लिए संगठित शक्ति’ आदि कहते हैं।

राष्ट्रवाद पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर की समालोचना
“राष्ट्रवाद हमारा अन्तिम आध्यात्मिक मंजिल नहीं हो सकता मेरी शरणस्थली तो मानवता है। मैं हीरों की कीमत पर शीशा नहीं खरीदूंगा और जब तक मैं जीवित हूँ देशभक्ति को मानवता पर कदापि विजयी नहीं होने दूंगा” यह रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था वे औपनिवेशिक शासन के विरोधी थे और भारत की स्वाधीनता के अधिकार का दावा करते थे वे महसूस करते थे कि उपनिवेशों के ब्रितानी प्रशासन में ‘मानवीय सम्बन्धों की गरिमा बरकरार रखने की गुंजाइश नहीं है। यह एक ऐसा विचार है। जिसे ब्रितानी सभ्यता में भी स्थान मिला है। टैगोर पश्चिमी साम्राज्यवाद का विरोध करने और पश्चिमी सभ्यता को खारिज करने के बीच फर्क करते थे। भारतीयों को अपनी संस्कृति और विरासत में गहरी सभ्यता होनी ही चाहिए लेकिन बाहरी दुनिया से मुक्त भाव से सीखने और लाभान्वित होने का प्रतिरोध नहीं करनी चाहिए।

टैगोर जिसे ‘देशभक्ति’ कहते थे, उसकी समालोचना उनके लेखन का स्थायी विषय था। वे देश के स्वाधीनता आन्दोलन में मौजूद संकीर्ण राष्ट्रवाद के कटु आलोचक थे। उन्हें भय था कि तथाकथित | | भारतीय परम्परा के पक्ष में पश्चिम की खारिजी का विचार यहीं तक सीमित रहने वाला नहीं है। यह अपने देश में मौजूद ईसाई, यहूदी, पारसी और इस्लाम समेत तमाम विदेशी प्रभावों के खिलाफ आसानी से आक्रामक भी हो सकता है।
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प्रश्न 4.
राष्ट्रीयता अथवा राष्ट्रवाद के प्रमुख गुणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद के गुण राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-

1. देशप्रेम की प्रेरणा- राष्ट्रीयता की भावना लोगों में देशप्रेम का भाव उत्पन्न करती है और उन्हें देश के हित के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए प्रेरित करती है। यह प्रेरणा राष्ट्रीय पर्वो के आयोजन, राष्ट्रगान तथा राष्ट्रीय गीतों, नाटकों आदि से और अधिक व्यापक होती है।

2. राजनीतिक एकता की स्थापना में योगदान- राष्ट्रीयता की भावना राजनीतिक एकता की स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है। राष्ट्रीयता से प्रेरित होकर ही विभिन्न जातियों व धर्मों के | लोग एकता के सूत्र में संगठित हो जाते हैं और एक शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण करते हैं।

3. राज्यों को स्थायित्व- राष्ट्रीयता राज्यों को स्थायित्व भी प्रदान करती है। राष्ट्रीय चेतना के आधार पर निर्मित राज्य अधिक स्थायी सिद्ध हुए हैं।

4. उदारवाद को प्रोत्साहन- राष्ट्रीयता आत्म-निर्णय के सिद्धान्त को मान्यता देती है। इसलिए राष्ट्रीयता मानवीय स्वतन्त्रता को स्वीकार कर उदारवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देती है।

5. सांस्कृतिक विकास- राष्ट्रीयता देश के सांस्कृतिक विकास को प्रोत्साहित करती है। प्राचीन यूनान के महाकवि होमर, फ्रांस के दान्ते तथा वोल्तेयर, इंग्लैण्ड के टेनीसन, शैले, टामस पेन, जर्मनी के हीगल और भारत के मैथिलीशरण गुप्त आदि ने राष्ट्रीयता से प्रेरित होकर ही साहित्यिक रचनाएँ की हैं।

6. आत्म-सम्मान की भावना- राष्ट्रीयता व्यक्ति में आत्म-सम्मान की भावना उत्पन्न करती है। और उसे आत्म-गौरव को सँजोने की प्रेरणा देती है।

7. विश्वबन्धुत्व की पोषक- राष्ट्रीयती व्यक्ति के दृष्टिकोण को व्यापक बनाकर अन्तर्राष्ट्रीय मैत्री और सहयोग को प्रोत्साहित करती है। इस प्रकार राष्ट्रीयता विश्वबन्धुत्व की पोषक भी है; उदाहरणार्थ-भारत का पंचशील सिद्धान्त ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’का पोषक है।

8. आर्थिक विकास में योगदान- राष्ट्रीयता राष्ट्र के आर्थिक विकास को भी प्रोत्साहित करती है। | राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर ही व्यक्ति अपने राष्ट्र को आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न बनाने के लिए एकजुट होकर कार्य करते हैं।

प्रश्न 5.
बास्क राष्ट्रवादी आन्दोलन के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
बास्क स्पेन का एक पहाड़ी और समृद्ध क्षेत्र है। इस क्षेत्र को स्पेनी सरकार ने स्पेन राज्यसंघ के अन्तर्गत स्वायत्त क्षेत्र का दर्जा दे रखा है, लेकिन बास्क राष्ट्रवादी आन्दोलन के नेतागण इस स्वायत्तता से सन्तुष्ट नहीं हैं। वे चाहते हैं कि बास्क स्पेन से अलग होकर एक स्वतन्त्र देश बन जाए। इस आन्दोलन के समर्थकों ने अपनी माँग पर जोर डालने के लिए संवैधानिक और हाल तक हिंसक तरीकों का इस्तेमाल किया है।
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बास्क राष्ट्रवादियों का कहना है कि उनकी संस्कृति स्पेनी से बहुत भिन्न है। उनकी अपनी भाषा है, जो स्पेनी भाषा से बिल्कुल नहीं मिलती है। हालाँकि आज बास्क के मात्र एक-तिहाई लोग उस भाषा को समझ पाते हैं। बास्क क्षेत्र की पहाड़ी भू-संरचना उसे शेष स्पेन से भौगोलिक तौर पर अलग करती है। रोमन काल से अब तक बास्क क्षेत्र ने स्पेनी शासकों के समक्ष अपनी स्वायत्तता का कभी समर्पण नहीं किया। उसकी न्यायिक, प्रशासनिक एवं वित्तीय प्रणालियाँ उसकी अपनी विशिष्ट व्यवस्था के जरिए संचालित होती थीं।

आधुनिक बास्क राष्ट्रवादी आन्दोलन की शुरूआत तब हुई जब उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में स्पेनी शासकों ने उसकी विशिष्ट राजनीतिक-प्रशांसनिक व्यवस्था को समाप्त करने की कोशिश की। बीसवीं सदी में स्पेनी तानाशाह फ्रैंको ने इस स्वायत्तता में और कटौती कर दी। उसने बास्क भाषा को सार्वजनिक स्थानों, यहाँ तक कि घर में भी बोलने पर पाबन्दी लगा दी थी। ये दमनकारी कदम अब वापस लिए जा चुके हैं। लेकिन बास्क आन्दोलनकारियां को स्पेनी शासक के प्रति सन्देह और क्षेत्र में बाहरी लोगों के प्रवेश का भय बरकरार है। उने विरोधियों का कहना है कि बास्क अलगाववादी एक ऐसे मुद्दे का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं जिसका समाधान हो चुका है।

प्रश्न 6.
‘एक संस्कृति-एक राज्य के विचार को त्यागने के पश्चात राज्यों के लिए क्या आवश्यक हो जाता है?
उत्तर-
एक संस्कृति-एक राज्य के विचार को त्यागते ही यह आवश्यक हो जाता है कि ऐसे तरीकों के बारे में विचार किया जाए जिसमें विभिन्न संस्कृतियाँ और समुदाय एक ही देश में फल-फूल सकें। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अनेक लोकतान्त्रिक देशों ने सांस्कृतिक रूप से अल्पसंख्यक समुदायों की पहचान को स्वीकार करने और संरक्षित करने के उपायों को प्रारम्भ किया है। भारतीय संविधान में धार्मिक, भाषाई और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों की संरक्षा के लिए विस्तृत प्रावधान किए हैं।

विभिन्न देशों में समूहों को जो भी अधिकार प्रदान किए गए हैं, उनमें सम्मिलित हैं-
अल्पसंख्यक समूहों एवं उनके सदस्यों की भाषा, संस्कृति एवं धर्म के लिए संवैधानिक संरक्षा के अधिकार। कुछ प्रकरणों में इन समूहों को विधायी संस्थाओं और अन्य राजकीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का अधिकार भी होता है। इन अधिकारों को इस आधार पर न्यायोचित ठहराया जा सकता है कि ये अधिकार इन समूहों के सदस्यों के लिए कानून द्वारा समान व्यवहार एवं सुरक्षा के साथ ही समूह की सांस्कृतिक पहचान के लिए भी सुरक्षा का प्रावधान करते हैं। इसके अलावा, इन समूहों को राष्ट्रीय समुदाय के एक अंग के रूप में भी मान्यता देनी होती है। इसका आशय यह है कि राष्ट्रीय पहचान को समावेशी रीति से परिभाषित करना होगा जो राष्ट्र-राज्य के सदस्यों की महत्ता और अद्वितीय योगदान को मान्यता प्रदान कर सके।

यह आशा की जाती है कि समूहों को मान्यता और संरक्षा प्रदान करने से उनकी आकांक्षाएँ सन्तुष्ट होंगी, फिर भी हो सकता है, कि कुछ समूह पृथक् राज्य की माँग पर अडिग रहें। यह विरोधाभासी भी प्रतीत हो सकता है कि जहाँ दुनिया में भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया जारी है वहाँ राष्ट्रीय आकांक्षाएँ अभी भी बहुत सारे समूह और मनुष्यों को उद्देलित कर रही हैं। ऐसी माँगों से लोकतान्त्रिक तरीके से निपटने के लिए यह आवश्यक है कि सम्बन्धित देश अत्यन्त उदारता व दक्षता का परिचय दें।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्रीयता किसे कहते हैं? राष्ट्रीयता का निर्माण किन तत्त्वों से होता है?
या
राष्ट्रीयता की परिभाषा दीजिए तथा इसके विभिन्न पोषक तत्वों की विवेचना कीजिए।
या
राष्ट्रीयता के विकास में उत्तरदायी तत्त्वों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीयता का अर्थ एवं परिभाषाएँ
‘राष्ट्रीयता’ शब्द अंग्रेजी भाषा के ‘नैशनलिटी’ (Nationality) शब्द का हिन्दी अनुवाद है, जिसका उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘नेशियो’ (Natio) शब्द से हुई है। इस शब्द से जन्म और जाति का बोध होता है। राष्ट्रीयता एक सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक भावना है, जो लोगों को एकता के सूत्र में बाँधती है। इसी भावना के कारण लोग अपने राष्ट्र से प्रेम करते हैं। इस प्रकार राष्ट्रीयता एक भावात्मक शब्द है। इसी भावना के कारण लोग अपने देश पर संकट आने की स्थिति में अपने तन, मन और धन का बलिदान करने से भी पीछे नहीं हटते हैं। जे० एच० रोज के अनुसार, “राष्ट्रीयता हृदयों की वह एकता है, जो एक बार बनने के बाद कभी खण्डित नहीं होती है।”

राष्ट्रीयता की पूर्ण एवं सम्यक परिभाषा करना एक कठिन कार्य है; किन्तु कुछ विद्वानों ने इसे स्पष्ट रूप से परिभाषित करने का प्रयास किया है। इन विद्वानों की परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

जिमर्न के अनुसार, “राष्ट्रीयता सामूहिक भावना का एक रूप है, जो विशिष्ट गहनता, समीपता तथा महत्ता से एक निश्चित देश से सम्बन्धित होती है।”

ब्लंश्ली के अनुसार, “राष्ट्रीयता मनुष्यों का वह समूह है, जो समान उत्पत्ति, समान जाति, समान भाषा, समान परम्पराओं, समान इतिहास तथा समान हितों के कारण एकता के सूत्र में बँधकर राज्य का निर्माण करता है।”

गिलक्राइस्ट के अनुसार, “राष्ट्रीयता एक आध्यात्मिक भावना या सिद्धान्त है, जिसकी उत्पत्ति उन लोगों में से होती है, जो साधारणत: एक जाति के होते हैं, जो एक भूखण्ड पर रहते हैं तथा जिनकी एक भाषा, एक धर्म, एक इतिहास, एक जैसी परम्पराएँ एवं एक जैसे हित होते हैं तथा जिनके राजनीतिक समुदाय और राजनीतिक एकता के एक-से आदर्श होते हैं।”

डॉ० बेनीप्रसाद के अनुसार, “राष्ट्रीयता की निश्चित परिभाषा करना कठिन है। परन्तु यह स्पष्ट है कि ऐतिहासिक गतिविधियों में यह पृथक् अस्तित्व ही उस चेतना का प्रतीक है, जो सामान्य आदतों, परम्परागत रीति-रिवाजों, स्मृतियों, आकांक्षाओं, अवर्णनीय सांस्कृतिक सम्प्रदायों तथा हितों पर आधारित है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं, “राष्ट्रीयता एक ऐसी भावना है, जिसके कारण एक देश के लोग एकता के सूत्र में बँधे रहते हैं और जो अपने देश एवं देशवासियों के प्रति संभावपूर्वक रहने की प्रेरणा देती है।”

राष्ट्रीयता के प्रमुख निर्माणक तत्त्व
राष्ट्रीयता के निर्माण अथवा राष्ट्रीयता की भावना के विकास में अनेक तत्त्व सहायक होते हैं। उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

1. भौगोलिक एकता- भौगोलिक एकता राष्ट्रीय एकता की प्रेरणा-स्रोत है। जब लोग समान भौगोलिक परिस्थितियों में रहते हैं तो उनकी आवश्यकताएँ एवं समस्याएँ भी समान होती हैं। अत: वे लोग मिल-जुलकर समान ढंग से अपनी समस्याएँ सुलझाने हेतु एकजुट होते हैं। इसके परिणामस्वरूप उनमें एकता की भावना उत्पन्न होती है, यह भावना ही कालान्तर में राष्ट्रीयता का प्रतीक बनती है। परन्तु इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि भौगोलिक एकता राष्ट्रीयता को एक सहायक तत्त्व है; अतः इसे अनिवार्य तत्त्व नहीं माना जाना चाहिए।

2. भाषा की एकता- राष्ट्रीयता के विकास में भाषा की एकता भी महत्त्व रखती है। समान भाषा-भाषी देशों में समान विचार एवं समान साहित्य का सृजन होता है। उनके समान रीति-रिवाज एवं समान रहन-सहन के कारण उनमें समान राष्ट्रीयता की भावना का उदय होता है। भाषा की एकता भी राष्ट्रीयता का एक अनिवार्य तत्त्व नहीं है; उदाहरणार्थ-कर्नाटक प्रान्त के नागरिक कन्नड़ भाषा बोलते हैं; तमिलनाडु के निवासी तमिल बोलते हैं और भारत के अधिकांश उत्तर-मध्य क्षेत्र में हिन्दी बोली जाती है। अत: इस आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि भारत में राष्ट्रीयता का अभाव है।

3. संस्कृति की एकता- सांस्कृतिक एकता राष्ट्रीयता के मूल्यवान तत्त्वों में से एक है। संस्कृति के अन्तर्गत एक निश्चित भू-भाग के व्यक्तियों का साहित्य, रीति-रिवाज, प्राचीन परम्पराएँ इत्यादि सम्मिलित होती हैं। समान संस्कृति के आधार पर समान विचार, समान आदर्श तथा समान प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, जिससे राष्ट्रीयता के निर्माण में सहायता मिलती है।

4. समान ऐतिहासिक परम्पराएँ- ऐतिहासिक घटनाओं एवं स्मृतियों का भी राष्ट्रीयता के विकास में काफी महत्त्व होता है। विजय और पराजय की स्मृतियाँ, सामाजिक विकास के आदर्श, सांस्कृतिक उत्थान-पतन का संकलित इतिहास राष्ट्रीयता के विकास में पर्याप्त सहायक होता है। सम्राट अशोक, अकबर और शिवाजी आदि का गौरव गाथा पढ़ने से समस्त भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना का संचार होता है।

5. धार्मिक एकता- धार्मिक एकता भी राष्ट्रीयता के निर्माण तथा विकास में वृद्धि करती है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि धार्मिक भिन्नता के कारण अनेक देशों में कितना अधिक रक्तपात हुआ है। धार्मिक भिन्नता के आगे राष्ट्रीयता की भावना दुर्बल पड़ जाती है, जिसके परिणामस्वरूप दो भिन्न धर्मावलम्बी राष्ट्रों के मध्य युद्ध होते हैं। इसीलिए प्रसिद्ध विद्वान रैम्जे म्योर ने लिखा है, “कुछ मामलों में धार्मिक एकता राजनीतिक एकता के निर्माण में शक्तिशाली योग देती है, जबकि कुछ दूसरे मामलों में धार्मिक भिन्नता उसके मार्ग में अनेक बाधाएँ उपस्थित करती है।”

6. राजनीतिक एकता- समान राजनीतिक व्यवस्था के अन्तर्गत रहने वाले लोग भी एकता का अनुभव करते हैं। इसके अतिरिक्त वे समान राजनीतिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप मानसिक एकता का भी अनुभव करते हैं, जो आगे चलकर राष्ट्रीयता के निर्माण में सहायक होती है। इसके साथ ही कठोर विदेशी शासन भी राष्ट्रीयता के निर्माण में सहायक सिद्ध होता है।

7. जातीय एकता- जातीय एकता भी राष्ट्रीयता के विकास में सहायक होती है। एक जाति के लोग समान संस्कारों एवं रीति-रिवाजों आदि के कारण एक संगठन में बंधे रहते हैं, जिनके परिणामस्वरूप उनमें एकता की भावना का उदय होता है।

8. सामान्य आर्थिक हित- आधुनिककाल में राष्ट्रीयता के निर्माण में आर्थिक तत्त्व सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व माना जाता है। भारत के परिप्रेक्ष्य में रोजगार प्राप्त करने में सभी का सामान्य आर्थिक हित है। अत: इस दिशा में किए जाने वाले प्रयास राष्ट्रीय एकता के प्रयास के अन्तर्गत आते हैं।

9. अन्य तत्व- समान सिद्धान्तों में आस्था, सामान्य आपदाएँ, युद्ध लोकमत एवं सामूहिक एकता की चेतना भी राष्ट्रीयता के विकास में सहायक सिद्ध होती है। सामान्य आपदाओं; जैसे-गुजरात में आए भूकम्प और तमिलनाडु तथा अण्डमान द्वीप समूह में आए सुनामी समुद्री लहरों के तूफान के समय सभी क्षेत्रों से की गई सहायता इस बात का प्रतीक है कि हमारे अन्दर राष्ट्रीयता की भावना विद्यमान है।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि राष्ट्रीयता भावात्मक एकता का प्रतीक होती है। राष्ट्रीयता की भावना के कारण ही व्यक्ति राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण तथा बलिदान की भावना प्रकट करता है। राष्ट्रीयता का निर्माण विभिन्न तत्त्वों के मिश्रण से होता है। इनमें सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक परम्पराओं की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। राष्ट्रीयता की भावना के कारण ही भारत अंग्रेजी दासता से स्वतन्त्र हुआ। तथा यहूदियों ने यहूदी राष्ट्रीयता की भावना से आप्लावित होकर अपने स्वतन्त्र राष्ट्र की स्थापना की।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय भावना के विकास में बाधक तत्त्वों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीय भावना के विकास में बाधक तत्त्व
राष्ट्रीय भावना के विकास में निम्नलिखित तत्त्व बाधक हैं-

1. अज्ञानता और अशिक्षा- राष्ट्रीयता के निर्माण में प्रमुख बाधक तत्त्व अज्ञानता और अशिक्षा हैं। शिक्षा के अभाव में व्यक्ति का दृष्टिकोण संकुचित हो जाता है और वह राष्ट्रहित के स्थान पर व्यक्तिगत हित को सर्वोपरि समझने लगता है। इस कारण ऐसे संकुचित दृष्टिकोण वाले व्यक्ति राष्ट्रीयता के विकास में बाधक सिद्ध होते हैं।

2. आवागमन के अच्छे साधनों का अभाव- आवागमन के अच्छे साधनों के अभाव में देश के विभिन्न भागों में रहने वाले लोगों के बीच सम्पर्क स्थापित नहीं हो पाता है। इस सम्पर्क के अभाव में उस पारस्परिक एकता का जन्म नहीं हो पाता है, जो राष्ट्रीयता का मूल आधार है। परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से अब विकसित एवं विकासशील देशों में आवागमन के अच्छे साधनों , का अभाव नहीं रह गया है।

3. साम्प्रदायिकता की भावना- किसी वर्ग-विशेष द्वारा अपने स्वार्थों को महत्त्व देना और दूसरे वर्ग या वर्गों के हितों की उपेक्षा करना या उन्हें नीचा दिखाने की प्रवृत्ति साम्प्रदायिकता कहलाती है। साम्प्रदायिकता से द्वेष, शत्रुता, फूट, मतभेद आदि की भावनाएँ पनपती हैं, जो राष्ट्रीयता की प्रबल विरोधी हैं।

4. जातिवाद तथा भाषावाद- सम्प्रदायवाद के समान ही जातिवाद और भाषावाद भी राष्ट्रीयता के विकास में बाधक हैं। जातिवाद विभिन्न जातियों के मध्य कटुता और घृणा का भाव उत्पन्न करता है। तथा भाषावाद लोगों में एकता की भावना को खण्डित करता है। इस कारण विभिन्न जाति व भाषायी लोगों में राष्ट्रीयता की भावना विकसित नहीं हो पाती है।

5. क्षेत्रीयता की भावना- क्षेत्रीयता की भावना राष्ट्रीयता के विकास के लिए घातक है। इस | भावना के कारण एक क्षेत्र में रहने वाले लोग अन्य या दूसरे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से घृणा करने लगते हैं। इसी कारण पंजाबी, बंगाली, मराठी, सिन्धी जैसी धारणाएँ विकसित होती हैं, जो राष्ट्रीयता के विकास को अवरुद्ध कर देती हैं। भारत में नए-नए राज्यों का उदय उग्र क्षेत्रवाद की भावना के ही परिणाम हैं।

6. पराधीनता- पराधीनता सभी बुराइयों की जड़ है। पराधीन व्यक्ति अपने देश या राष्ट्र के लिए न कुछ सोच सकता है और न कुछ कर सकता है। इसलिए पराधीनता राष्ट्रीयता के मार्ग की सबसे बड़ी अवरोधक है।

7. देशभक्ति की भावना का अभाव- जिस देश के नागरिकों में देश-प्रेम का अभाव होता है, उस देश में राष्ट्रीयता का विकास होना असम्भव है। ऐसा देश अल्प समय में ही दूसरे देश के अधीन होकर अपनी स्वतन्त्रता खो बैठता है।

प्रश्न 3.
राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद के विभिन्न दोषों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद के दोष
राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद की पराकाष्ठा कभी-कभी विश्व-शान्ति के लिए खतरा बन जाती है। इसीलिए राष्ट्रीयता में कुछ दोष भी हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है-
1. विश्व-शान्ति के लिए घातक- संकीर्ण और उग्र राष्ट्रीयता विश्व शान्ति के लिए घातक होती है। उग्र राष्ट्रवाद से प्रेरित होकर ही बीसवीं शताब्दी में जर्मनी ने सम्पूर्ण मानव जाति को दो-दो विश्व युद्धों की विभीषिकाएँ झेलने को विवश कर दिया था।

2. सैन्यवाद और युद्ध को प्रोत्साहन- राष्ट्रीयता का उग्र रूप सैन्यवाद और युद्ध को प्रोत्साहन देता है। इतिहास साक्षी है कि उग्र राष्ट्रीयता से प्रेरित होकर ही फ्रांस तथा जर्मनी अनेक बार युद्धरत हुए और दोनों देशों को जन-धन की अपार क्षति उठानी पड़ी।

3. साम्राज्यवाद का उदय- उग्र राष्ट्रीयता की भावना देशवासियों को अंहकारी तथा स्वार्थी बना देती है और वे अपने राष्ट्र को ही विश्व शक्ति के रूप में देखना चाहते हैं। इस मनोवृत्ति का परिणाम साम्राज्यवादी विस्तार के रूप में प्रकट होता है। उन्नीसवीं शताब्दी में साम्राज्यवाद के विकास का एक प्रमुख कारण राष्ट्रवाद भी था।

4. छोटे-छोटे राज्यों का संगठन- उग्र राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर कभी-कभी छोटे-छोटे राज्य बन जाते हैं और उनमें आपसी द्वेष के कारण देश की एकता को खतरा उत्पन्न हो जाता है। मध्यकाल में यूरोप में अनेक छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना उग्र राष्ट्रीयता का ही परिणाम थी।

5. व्यक्ति का नैतिक पतन- संकीर्ण राष्ट्रीयता व्यक्ति को स्वार्थी और अंहकारी बना देती है। वह इतना पतित हो जाता है कि मानव जाति को समूल नष्ट करने की दिशा में प्रवृत्त हो जाता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी ने संकीर्ण राष्ट्रीयता से प्रेरित होकर यहूदियों पर भयानक अत्याचार किए थे।

6. अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में बाधक- राष्ट्रीयता की मान्यता है-‘एक राष्ट्र एक राज्य’, लेकिन राष्ट्रीयता का यह सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय के प्रतिकूल है। राष्ट्रीयता की भावना के कारण ही विभिन्न राष्ट्रों का दृष्टिकोण अन्य राष्ट्रों के प्रति संकीर्ण तथा उपेक्षित-सा हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और सद्भावना का विकास अवरुद्ध हो जाता है। और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में अनेक समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं।

प्रश्न 4.
राष्ट्रीय आत्म-निर्णय का अधिकार क्या है?
उत्तर-
आत्म-निर्णय के अधिकार के दावे के रूप में राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से माँग करता है कि उसके पृथक् राजनीतिक इकाई या राज्य के दर्जे को मान्यता और स्वीकार्यता प्रदान की जाए। अक्सर ऐसी माँग उन लोगों की तरफ से आती हैं जो दीर्घकाल से किसी निश्चित भू-भौग पर साथ-साथ रहते आए हों और जिनमें साझी पहचान को बोध हो। कुछ प्रकरणों में आत्म-निर्णय के दावे एक स्वतन्त्र राज्य बनाने की इच्छा से भी जुड़े होते हैं। इन दावों का सम्बन्ध किसी समूह की संस्कृति की संरक्षा से होता है।

दूसरी तरह के बहुत-से दावे उन्नीसवीं सदी के यूरोप में सामने आए, उस समय ‘एक संस्कृति-एक राज्य की मान्यता ने जोर पकड़ा। परिणामस्वरूप पहले विश्वयुद्ध के पश्चात् राज्यों की पुनर्व्यवस्था में ‘एक संस्कृति-एक राज्य के विचार को प्रयोग में लाया गया। वर्साय की सन्धि से बहुत-से छोटे नवे स्वतन्त्र राज्यों का गठन हुआ लेकिन उस समय उठाई जा रही आत्म-निर्णय की सभी माँगों को सन्तुष्ट करना वास्तव में असम्भव था। इसके अतिरिक्त ‘एक संस्कृति-एक राज्य की माँगों को सन्तुष्ट करने से राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन हुए। इससे सीमाओं के एक ओर से दूसरी ओर बहुत बड़ी जनसंख्या का विस्थापन हुआ। इसके परिणामस्वरूप लाखों लोग अपने घरों से उजड़ गए और उस जगह से उन्हें बाहर धकेल दिया गया जहाँ पीढ़ियों से उनका घर था। बहुत सारे लोग साम्प्रदायिक हिंसा के भी शिकार हो गए।

अलग-अलग सांस्कृतिक समुदायों को अलग-अलग राष्ट्र राज्य प्राप्त हुए, इसे ध्यान में रखकर सीमाओं में परिवर्तन किया गया। इस प्रयास के कारण मानव जाति को भारी मूल्य चुकाना पड़ा। इस प्रयास के बाद भी यह सुनिश्चित करना सम्भव नहीं हो सका कि नवगठित राज्यों में केवल एक ही नस्ल के लोग रहें। वास्तव में अधिकतर राज्यों की सीमाओं के अन्दर एक से अधिक नस्ल और संस्कृति के लोग रहते थे। ये छोटे-छोटे समुदाय राज्य के अन्दर अल्पसंख्यक थे और अक्सर हानिकारक स्थितियों में रहते थे। इस विकास का सकारात्मक पक्ष यह था कि उन बहुत सारे राष्ट्रवादी समूहों को राजनीतिक मान्यता प्रदान की गई जो स्वयं को एक अलग राष्ट्र के रूप में देखते थे और अपने भविष्य को निश्चित करने तथा अपना शासन स्वयं चलाना चाहते थे। लेकिन राज्यों के भीतर अल्पसंख्यक समुदायों की समस्या यथावत् बनी रही।

जब एशिया एवं अफ्रीका औपनिवेशिक प्रभुत्व के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे, तब राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलनों ने राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार की भी घोषणा की। राष्ट्रीय आन्दोलनों का मानना था कि राजनीतिक स्वाधीनता राष्ट्रीय समूहों को सम्मान एवं मान्यता प्रदान करेगी और साथ ही वहाँ के लोगों के सामूहिक हितों की रक्षा भी करेगी। अधिकांश राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन राष्ट्र के लिए न्याय, अधिकार और समृद्धि प्राप्त करने के लक्ष्य से प्रेरित थे। हालाँकि यहाँ भी प्रत्येक सांस्कृतिक समूह जिनमें से कुछ पृथक् राष्ट्र होने का दावा करते थे, के लिए राजनीतिक स्वाधीनता तथा राज्यसत्ता सुनिश्चित करना लगभग असम्भव साबित हुआ। इस क्षेत्र के अनेक देश जनसंख्या के देशान्तरण, सीमाओं पर युद्ध और हिंसा की चपेट में आते रहे। इस प्रकार, यहाँ राष्ट्रीय राज्य विरोधाभासी स्थिति में दिखाई देते हैं जिन्होंने संघर्षों की बदौलत स्वाधीनता प्राप्त की, लेकिन अब वे अपने भू-क्षेत्रों में राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार की माँग करने वाले अल्पसंख्यक समूहों का विरोध कर रहे हैं।

वास्तव में आज दुनिया की सभी राज्य सत्ताएँ इस दुविधा में फँसी हैं कि आत्म-निर्णय के आन्दोलनों से , कैसे निपटा जाए और इसने राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार पर सवाल उत्पन्न कर दिए हैं। बहुत-से । लोग यह अनुभव करने लगे हैं कि समाधान नए राज्यों के गठन में नहीं वरन् वर्तमान राज्यों को अधिक लोकतान्त्रिक और समतामूलक बनाने में हैं। समाधान यह सुनिश्चित करने में है कि अलग-अलग सांस्कृतिक और नस्लीय पहचानों के लोग देश में समान नागरिक और मित्रों के समान सह अस्तित्वपूर्वक रह सकें। यह न केवल आत्म-निर्णय के नए दावों के उभार से उत्पन्न होने वाली समस्याओं के समाधान के लिए वरन् सुदृढ़ और एकताबद्ध राज्य बनाने के लिए आवश्यक होगा। जो राष्ट्र-राज्य अपने शासन में अल्पसंख्यक समूहों के अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान का सम्मान नहीं करते उनके लिए अपने सदस्यों की निष्ठा प्राप्त करना कठिन होता है।

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