UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 3 Motivational Bases of Behaviour

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 3
Chapter Name Motivational Bases of Behaviour
(व्यवहार के अभिप्रेरणात्मक आधार)
Number of Questions Solved 55
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 3 Motivational Bases of Behaviour व्यवहार के अभिप्रेरणात्मक आधार

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रेरणा (Motivation) से आप क्या समझते हैं? प्रेरणायुक्त व्यवहार के मुख्य लक्षणों को भी स्पष्ट कीजिए।
या
अभिप्रेरित व्यवहार के कोई दो लक्षण बताइए।
उत्तर :
मनोविज्ञान मनुष्य के व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन है और मनुष्य का व्यवहार प्राय: दो प्रकार की शक्तियों द्वारा संचालित होता है—बाह्य शक्तियाँ तथा आन्तरिक शक्तियाँ। मनुष्य के अधिकांश व्यवहार तो बाह्य वातावरण से प्राप्त उत्तेजनाओं के कारण उत्पन्न होते हैं, जब कि कुछ अन्य व्यवहार आन्तरिक शक्तियों द्वारा संचालित होते हैं। व्यवहारों को संचालित करने वाली ये आन्तरिक शक्तियाँ तब तक निरन्तर क्रियाशील रहती हैं जब तक कि व्यवहार से सम्बन्धित लक्ष्य सिद्ध नहीं हो जाता। इसके अतिरिक्त ये शक्तियाँ उस समय तक समाप्त नहीं होतीं, जिस समय तक प्राणी क्षीण अवस्था को प्राप्त होकर असहाय नहीं हो जाता अथवा मर ही नहीं जाता है। स्पष्टतः किसी प्राणी द्वारा विशेष प्रकार की क्रिया या व्यवहार करने को बाध्य करने वाली ये आन्तरिक शक्तियाँ ही प्रेरणा (Motivation) कहलाती हैं।

प्रेरणा का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Motivation)

अर्थ – प्रेरणा का शाब्दिक अर्थ है-क्रियाओं को प्रारम्भ करने वाली, दिशा प्रदान करने वाली अथवा उत्तेजित करने वाली शक्ति। व्यक्ति को किसी विशिष्ट व्यवहार या कार्य करने के लिए उत्तेजित करने की शक्ति प्रेरणा कहलाती है। उदाहरण के लिए एक छोटे बच्चे को रोता हुआ देखकर उसकी माँ उसे दूध पिला देती है और बच्चा रोना बन्द कर देता है। रोना बच्चे का विशिष्ट व्यवहार या कार्य है। जिसका कारण उसकी भूख है। स्पष्ट रूप से भूख ही बच्चे के व्यवहार की प्रेरणा’ हुई। व्यक्ति द्वारा विशेष व्यवहार करने की इच्छा या आवश्यकता अन्दर से महसूस की जाती है। इस दशा या आन्तरिक स्थिति का नाम ही प्रेरणा-शक्ति (Force of Motivation) है और प्रेरणा-शक्ति ही हमारे व्यवहारों में विभिन्न मोड़ लाती है। प्रेरणा को जन्म देने वाला तत्त्व मनोविज्ञान में प्रेरक’ (Motive) के नाम से जाना जाता है।

परिभाषाएँ – विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रेरणा को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है –

(1) गिलफोर्ड के अनुसार, “प्रेरणा कोई विशेष आन्तरिक अवस्था या दशा है जो किसी कार्य को शुरू करने और उसे जारी रखने की प्रवृत्ति से युक्त होती है।”

(2) वुडवर्थ के मतानुसार, “प्रेरणा व्यक्ति की एक अवस्था या मनोवृत्ति है जो उसे किसी व्यवहार को करने तथा किन्हीं लक्ष्यों को खोजने के लिए निर्देशित करती है।”

(3) लॉवेल के कथनानुसार, “प्रेरणा को अधिक औपचारिक रूप से किसी आवश्यकता द्वारा प्रारम्भ मनो-शारीरिक आन्तरिक प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो इस क्रिया को जन्म देती है या जिसके द्वारा उस आवश्यकता को सन्तुष्ट किया जाता है।”

(4) किम्बाल यंग के अनुसार, “प्रेरणा एक व्यक्ति की आन्तरिक स्थिति होती है जो उसे क्रियाओं की ओर प्रेरित करती है।’

(5) एम० जॉनसन के अनुसार, “प्राणी के व्यवहार को आरम्भ करने तथा दिशा देने वाली क्रिया के सामान्य प्रतिमान के प्रभाव को प्रेरणा के नाम से जाना जाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि प्रेरणा (या प्रेरक) एक आन्तरिक अवस्था है जो प्राणी में व्यवहार या क्रिया को जन्म देती है। प्राणी में यह व्यवहार या क्रियाशीलता किसी लक्ष्य की पूर्ति तक बनी रहती है, किन्तु लक्ष्यपूर्ति के साथ-साथ प्रेरक शक्तियाँ क्षीण पड़ने लगती हैं।

प्रेरणायुक्त व्यवहार के लक्षण
(Characteristics of Motivated Behaviour)

प्रेरणायुक्त व्यवहार के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं –

(1) अधिक शक्ति का संचालन – प्रेरणायुक्त व्यवहार का प्रथम मुख्य लक्षण व्यक्ति में कार्य करने की अधिक शक्ति का संचालन है। आन्तरिक गत्यात्मक शक्ति प्रेरणात्मक व्यवहार का आधार है। जिसके अभाव में व्यक्ति प्रायः निष्क्रिय हो जाता है। यह माना जाता है कि व्यक्ति के व्यवहार की तीव्रता जितनी अधिक होगी उसकी पृष्ठभूमि में प्रेरणा भी उतनी ही शक्तिशाली होगी। उदाहरण के लिए परीक्षा के दिनों में विद्यार्थी बिना थके घण्टों तक पढ़ते रहते हैं, जबकि सामान्य दिनों में वे उतना परिश्रम नहीं करते तथा क्रोध की अवस्था में एक दुबला-पतला-सा व्यक्ति कई लोगों के काबू में नहीं आता। प्रेरणा की दशा में इस प्रकार के अतिरिक्त शक्ति के संचालन का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि शक्ति के इस अतिरिक्त संचालन का मुख्य कारण प्रबल प्रेरणा की दशा में उत्पन्न होने वाले शारीरिक एवं रासायनिक परिवर्तन होते हैं।

(2) परिवर्तनशीलता – प्रेरणायुक्त व्यवहार का दूसरा लक्षण उसमें निहित परिवर्तनशीलता या अस्थिरता का गुण है। वस्तुत: प्रत्येक व्यवहार अथवा क्रिया का कोई-न-कोई लक्ष्य/उद्देश्य अवश्य होता है। यदि किसी एक मार्ग, विधि, उपाय अथवा प्रयास द्वारा अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती है तो प्रेरित व्यक्ति लक्ष्य-सिद्धि के लिए विभिन्न प्रकार के प्रयास करता है। प्रयासों में एकरसता और पुनरावृत्ति का सगुण नहीं पाया जाता, अपितु आवश्यकतानुसार बराबर परिवर्तन की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। इस प्रकार लक्ष्य प्राप्ति का सही मार्ग मिलने तक प्रेरित व्यक्ति मार्ग परिवर्तित करता रहता है।

(3) निरन्तरता – प्रेरणायुक्त व्यवहार या क्रिया के लगातार जारी रहने का लक्षण निरन्तरता कहलाता है। उद्देश्यानुसार प्रारम्भ की गई ये क्रियाएँ उस समय तक अनवरत रूप से चलती रहती हैं। जब तक कि लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता। कार्य पूर्ण हो जाने पर प्रेरणा की यह विशेषता स्वत: ही समाप्त या कम हो जाती है। कार्य की निरन्तरता अल्पकालीन भी हो सकती है तथा दीर्घकालीन भी। भूखा व्यक्ति भोजन पाने का तब तक ही निरन्तर प्रयास करता है जब तक कि उसे भोजन नहीं मिल जाता। भोजन प्राप्त होते ही उसके प्रयास या तो समाप्त हो जाते हैं या शिथिल पड़ जाते हैं।

(4) चयनता – प्रेरणायुक्त व्यवहार का एक प्रमुख लक्षण चयनता भी है। प्रेरित व्यक्ति अपनी आवश्यकता के अनुसार व्यवहार एवं अनुभव का चयन करता है। वह विभिन्न वस्तुओं के बीच से अधिक आवश्यक वस्तु का चयन करने त्था उसे पाने का प्रयास करता है। उदाहरण के लिए किसी प्यासे व्यक्ति के सम्मुख विभिन्न प्रकार के व्यंजन परोसे जाने पर भी अन्य व्यंजनों की तुलना में उसका प्रत्येक प्रयास जल को प्राप्त करने के लिए होगा।

(5) लक्ष्य प्राप्त करने की व्याकुलता – प्रेरणायुक्त व्यवहार में लक्ष्य प्राप्त करने की व्याकुलता पाई जाती है। यह व्याकुलता लक्ष्य पूर्ण होने तक बनी रहती है। अतः प्रेरित व्यवहार लक्ष्योन्मुख व्यवहार कहलाता है। परीक्षार्थी में परीक्षा पूर्ण होने तक व्याकुलता बनी रहती है और वह तनावग्रस्त रहता है।

(6) लक्ष्य-प्राप्ति पर व्याकुलता की समाप्ति – व्याकुलता उस समय तक बनी रहती है जब तक कि लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता। लक्ष्य-प्राप्ति के उपरान्त व्याकुलता समाप्त हो जाती है। पूर्वोक्त उदाहरण में परीक्षा समाप्त होते ही परीक्षार्थी की व्याकुलता समाप्त हो जाती है और वह तनावमुक्त होकर शान्त हो जाता है। इसी प्रकार भूख से व्याकुल व्यक्ति भोजन प्राप्त होते ही शान्ति लाभ करता है। और उसकी व्याकुलता समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 2.
प्रेरणा की अवधारणा के स्पष्टीकरण के लिए विभिन्न दृष्टिकोणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
प्रेरणा के सम्बन्ध में कुछ दृष्टिकोण

प्रेरणा का अभिप्राय व्यक्ति या पशु की ऐसी आन्तरिक अवस्था से होता है जो उसे एक निश्चित लक्ष्य की ओर व्यवहार करने को बाध्य करती है। प्रेरणा के सम्बन्ध में अनेक दृष्टिकोण प्रचलित रहे हैं, उनमें से प्रमुख दृष्टिकोण निम्नलिखित हैं

(1) मूलप्रवृत्तियाँ – प्रेरणा के विषय में वैज्ञानिक अध्ययन प्रसिद्ध विद्वान मैक्डूगल से शुरू हुए। मैक्डूगल ने प्रेरित व्यवहार का कारण मूलप्रवृत्तियाँ बताया है। बाद में, मूलप्रवृत्तियों के दृष्टिकोण की कूओ, लारमैन तथा लैथ्ले आदि मनोवैज्ञानिकों ने प्रयोगों द्वारा जंच की और पाया कि प्रेरित व्यवहार मूलप्रवृत्तियों द्वारा उत्पन्न नहीं होता।

(2) वातावरण के अनुभव – कुओ ने अभिप्रेरित व्यवहार के सम्बन्ध में एक प्रयोग किया। उसने कुछ बिल्लियों को चूहों के बच्चों के साथ पाला और चार महीने बाद पाया कि बिल्लियों ने चूहों के साथ न तो लगाव ही दिखाया और न ही उन पर हमला किया। इन्हीं बिल्ल्यिों को फिर से ऐसी बिल्लियों के साथ रखा गया जो चूहों का शिकार करती थीं। इनमें से 6 बिल्लियाँ साथ में पले हुए 17 चूहों को मारकर खा गयीं। कूओ के इस प्रयोग को निष्कर्ष था कि प्राणी का व्यवहार मूलप्रवृत्तियों से नहीं, प्रारम्भिक वातावरण के अनुभवों से प्रेरित होता है।

(3) आवश्यकता – प्रत्येक प्राणी की कुछ-न-कुछ आवश्यकताएँ होती हैं जिनकी सन्तुष्टि या असन्तुष्टि से व्यक्ति का व्यवहार प्रभावित होता है। बोरिंग के अनुसार, “आवश्यकता प्राणी के शरीर की कोई जरूरत या अभाव है।” जब प्राणी के शरीर में किसी चीज की कमी या अति की अवस्था पैदा हो जाती है तो उसे ‘आवश्यकता (Need) की संज्ञा दी जाती है। आवश्यकता की वजह से शारीरिक तनाव या असन्तुलन पैदा होता है जिसके फलस्वरूप ऐसा व्यवहार उत्पन्न करने की प्रवृत्ति होती है, जिससे तनाव असन्तुलन समाप्त हो जाता है। उदाहरणार्थ–‘प्यास’ शरीर की कोशिकाओं में पानी की कमी है, जबकि मलमूत्र त्याग’ शरीर में अनावश्यक पदार्थों का ‘अति में जमा हो जाना है। इस भाति, दोनों ही दशाओं में ‘कमी’ तथा ‘अति’ का बोध तनाव/असन्तुलन को जन्म देता है।

प्रेरणा से सम्बन्धित इस दृष्टिकोण में मनोवैज्ञानिकों ने आवश्यकताओं के दो प्रकार बताये हैं –

(i) शारीरिक आवश्यकताएँ – जैसे-पानी, भोजन, नींद, मल-मूत्र त्याग तथा काम (Sex) की आवश्यकता।
(ii) मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ – जैसे-धन-दौलत, प्रतिष्ठा, उपलब्धि तथा प्रशंसा की आवश्यकता।।

(4) अन्तर्वोद-साटेंन के अनुसार-“अन्तर्नाद ऐसे तनाव या क्रियाशीलता की अवस्था को कहा जाता है जो किसी आवश्यकता द्वारा उत्पन्न होती है। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है। कि अभिप्रेरित व्यवहार का कारण अन्तर्नाद (Drive) है। अन्तर्नाद की उत्पत्ति किसी-न-किसी शारीरिक आवश्यकता से होती है। आवश्यकताओं की तरह से अन्तर्नाद भी शारीरिक व मनोवैज्ञानिक है। शारीरिक आवश्यकताओं से उत्पन्नअन्तर्वोद शारीरिक अन्तर्नाद कहलाते हैं, जबकि मानसिक आवश्यकताओं से उत्पन्न अन्तर्नाद मनोवैज्ञानिक अन्तनोंद कहे जाते हैं। भूख की अवस्था में भूख अन्तर्नाद, प्यास लगने पर प्यास अन्तर्नाद तथा काम (Sex) की इच्छा होने पर काम अन्तनोंद पैदा होता है। हल के मतानुसार, “अन्तर्नाद व्यवहार को ऊर्जा प्रदान करता है, किन्तु दिशा नहीं।” बोरिंग के अनुसार, अन्तर्वोद शरीर की एक आन्तरिक क्रिया या दशा है जो एक विशेष प्रकार के व्यवहार दे लिए प्रेरणा प्रदान करती है।

(5) प्रलोभन या प्रोत्साहन – प्रलोभन या प्रोत्साहन (Incentive) उस लक्ष्य को कहा जाता है। जिसकी ओर अभिप्रेरित व्यवहार अग्रसर होता है। यह वातावरण की वह वस्तु है जो व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करती है तथा जिसकी प्राप्ति से उसकी आवश्यकता की पूर्ति तथा अन्तनोंद में कमी होती है। उदाहरणार्थ-भूखे व्यक्ति के लिए भोजन एक प्रलोभन या प्रोत्साहन है, क्योंकि यह भूखे व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करता है। भोजन के उपरान्त व्यक्ति की भूख की आवश्यकता कुछ देर के लिए समाप्त हो जाती है और भूख का अन्तर्वोद भी कम हो जाता है।

(6) प्रेरणा के मुख्य अंग: आवश्यकता, अन्तर्वोद तथा प्रलोभन – आवश्यकता, अन्तर्वोद तथा प्रलोभन (या प्रोत्साहन) ये तीनों ही प्रेरणा के मुख्य अंग हैं जो आपस में गहन सम्बन्ध रखते हैं। प्रेरणा का प्रारम्भ आवश्यकता से होता है और यह प्रलोभन की प्राप्ति तक चलता है। वस्तुत: आवश्यकता एवं अन्तनोंद प्राणी की आन्तरिक अवस्थाएँ या तत्परताएँ हैं, जबकि प्रलोभन बाह्य वातावरण में उपस्थित कोई चीज या उद्दीपक है। प्रेरणा उत्पन्न होने की प्रक्रिया में पहले आवश्यकता जन्म लेती है, उसके बाद अन्तर्नाद उत्पन्न होता है। ये दोनों ही व्यक्ति के भीतर की दशाएँ हैं। अन्तर्नाद की अवस्था में व्यक्ति में तनाव तथा क्रियाशीलता दृष्टिगोचर होती है जिसके परिणामतः वह एक निश्चित दिशा में प्रलोभन की प्राप्ति के लिए कुछ व्यवहार प्रदर्शित करता है। यदि ‘भूख’ प्रेरणा का उदाहरण है तो इसकी प्रक्रिया में भूख की आवश्यकता, भूख का अन्तनोंद तथा भोजन की प्राप्ति तीनों ही सम्मिलित हैं।

इस भाँति, प्रेरणा के सम्बन्ध में उपर्युक्त वर्णित दृष्टिकोण प्रस्तुत हुए हैं। मैक्डूगल के मूल प्रवृत्तियों से सम्बन्धुित दृष्टिकोण को महत्त्वपूर्ण नहीं माना जाता। इसके विरुद्ध प्रारम्भिक वातावरण के अनुभवों का दृष्टिकोण अभिव्यक्त हुआ है। प्रेरणा के सम्बन्ध में आधुनिक दृष्टिकोण; आवश्यकता, अन्तर्नाद तथा प्रलोभन के पारस्परिक सम्बन्ध तथा अन्त:क्रिया पर आधारित है और यही प्रेरणा के प्रत्यय की सन्तोषजनक व्याख्या प्रस्तुत करता है।

प्रश्न 3.
प्रेरणाओं का हमारे जीवन में महत्त्व बताइए।
या
मानव जीवन में अभिप्रेरणा का क्या महत्त्व होता है?
उत्तर :
प्रेरणा (प्रेरक) का महत्व
(Importance of Motivation)

प्रेरणा एक विशेष आन्तरिक अवस्था है जो प्राणी में किसी क्रिया या व्यवहार को आरम्भ करने की प्रवृत्ति जाग्रत करती है। यह प्राणी में व्यवहार की दिशा तथा मात्रा भी निश्चित करती है। वस्तुतः मनुष्य एवं पशु, सभी का व्यवहार प्रेरणाओं से युक्त तथा संचालित होता है। इस भाँति, मनुष्य के जीवन में उसके व्यवहार और अनुभवों के सन्दर्भ में प्रेरणाओं का उल्लेखनीय स्थान तथा महत्त्व है।

मानव-व्यवहार तथा अनुभवों में प्रेरकों की भूमिका
(Role of Motives in the Human Behaviour and Experiences)

आधुनिक मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार व्यक्ति के व्यवहार और उसके जीवन के अनुभवों में प्रेरणा (प्रेरक) की विशिष्ट एवं निर्विवाद भूमिका है। इसका प्रतिपादन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है

(1) व्यवहार-प्रदर्शन एवं प्रेरक – मनुष्य के प्रत्येक व्यवहार के पीछे प्रेरणा का प्रत्यय निहित रहता है। कोई मनुष्य एक विशेष व्यवहार क्यों प्रदर्शित करता है-यह विषय प्रारम्भ से ही जिज्ञासा, चिन्तन तथा विवाद का रहा है उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति अपना क्या जीवन लक्ष्य निर्धारित करता है। वह अन्य व्यक्ति या वस्तुओं में रुचि क्यों लेता है, वह किन वस्तुओं का संग्रह करना पसन्द करता है और क्यों, वह उपलब्धि के लिए क्यों प्रयासशील रहता है, उसकी आकांक्षा का स्तर क्या है, उसकी विशिष्ट आदतें क्या हैं और ये किस भाँति निर्मित हुईं?–ये सभी प्रश्न ‘मनोवैज्ञानिकों के लिए महत्त्वपूर्ण रहे हैं, जिनका अध्ययन प्रेरणा के अन्तर्गत किया जाता है।

(2) उपकल्पनात्मक-प्रक्रिया –  प्रेरणा एक उपकल्पनात्मक प्रक्रिया (Hypothetical Process) है, जिसका सीधा सम्बन्ध व्यवहारे के निर्धारण से होता है। प्रेरक व्यवहार का मूल स्रोत है। और मानव के व्यवहार की नियन्त्रण अनेक प्रकार के प्रेरक करते हैं। जैविक (या जन्मजात) प्रेरक प्राणी में जन्म से ही पाये जाते हैं। ये जीवन के आधार हैं और इनके अभाव में प्राणी जीवित नहीं रह सकता। इन प्रेरकों में भूख, प्यास, नींद, मल-मूत्र त्याग, क्रोध, प्रेम तथा काम आदि प्रमुख हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण में रहने से उसमें अर्जित प्रेरक पैदा होते हैं। व्यक्ति का जीवन-लक्ष्य, आकांक्षा का स्तर, रुचि, आदत तथा मनोवृत्तियाँ आदि व्यक्तिगत प्रेरणाएँ हैं जो व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से सीखी जाती हैं। सामुदायिकता, प्रशंसा व निन्दा तथा आत्मगौरव जैसी सामाजिक प्रेरणाएँ व्यक्ति में सामाजिक प्रभाव के कारण निर्धारित होती हैं। इस भाति, प्रेरणा एक उपकल्पनात्मक-प्रक्रिया है और जैविक एवं अर्जित प्रेरक ही व्यक्ति को क्रियाशील बनाकर विशिष्ट व्यवहार करने की प्ररेणा प्रदान करते हैं और इसी कारण मानव के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

(3) लक्ष्य निर्देशित व्यवहार – प्रत्येक प्रकार की प्रेरणा से सम्बन्धित व्यवहार का कोई-न-कोई लक्ष्य या उद्देश्य अवश्य होता है। इसे लक्ष्य या उद्देश्य को पूरा करने के लिए व्यक्ति हर सम्भव प्रयास करता है और उसका प्रयास तब तक जारी रहता है जब तक कि वह लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेता। प्यासी व्यक्ति, पानी की प्राप्ति का लक्ष्य लेकर तब तक भटकता रहता है जब तक वह पानी पीकर प्यास नहीं बुझा लेता। लक्ष्य निर्देशित व्यवहार किसी भी प्रकार को हो सकता है; जैसे-किसी पर आक्रमण करना, किसी वस्तु का संग्रह करना या किसी वस्तु पर अधिकार जमाना और अपना जीवन-लक्ष्य निर्धारिते करना आदि।

(4) श्रेष्ठ कार्य निष्पादन – प्रेरणाएँ मनुष्य के व्यवहार को असाधारण व्यवस्था प्रदान करती हैं। जिसके परिणामस्वरूप वह स्वयं को अधिक ऊर्जा एवं चेतना से परिपूर्ण पाता है। प्रेरित व्यवहार की अवस्था में उत्पन्न जागृति, आन्तरिक तनाव, तत्परती अथवा शक्ति के कारण ही व्यक्ति सामान्य अवस्था से अधिक कार्य कर पाता है। इतना ही नहीं, उसके कार्य का निष्पादन श्रेष्ठ प्रकार का होता है।

(5) महान सफलता या उपलब्धि के लिए प्रयास – प्रेरित व्यवहार के कारण व्यक्ति महान सफलता या उपलब्धि के लिए क्रियाशील हो जाता है। वह व्यवहार के किसी क्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए प्रयास कर सकता है; क्योंकि व्यक्ति उन्हीं कार्यों को अधिकाधिक करते हैं जिनमें वे अपना उत्कृष्ट प्रदर्शन कर पाते हैं, प्रायः देखा जाता है कि सम्बन्धित जीवन-क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धि या सफलता पाने तथा अपने जीवन को अधिक उन्नत बनाने के लिए व्यक्ति अभिप्रेरित हो उठता है। इस भाँति, महान सफलता या उपलब्धि की प्रेरणा मानव-जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।।

(6) सामूहिक जीवन की प्रवृत्ति – व्यक्ति समूह में रहना अधिक पसन्द करता है। समूह में वह निर्भीक रहता है तथा अन्य लोगों के सहयोग से सुखी एवं सुविधापूर्ण जीवन-यापन करता है। समूह में रहते हुए उसे आत्म-अभिव्यक्ति के अवसर मिलते हैं, अनेक आवश्यकताओं तथा इच्छाओं की सन्तुष्टि होती है। मैत्री तथा यौन इच्छाएँ भी समूह में सन्तुष्ट हो पाती हैं। इसके साथ ही व्यक्ति को समाज की परम्पराओं, प्रथाओं तथा आदर्शों के अनुरूप सामाजिक कार्य करने के अवसर प्राप्त होते हैं। किन्तु आधुनिक समय में सामाजिक परिवर्तनों , सामाजिक गतिशीलताओं तथा जटिल अन्त:क्रियाओं के कारण सामूहिक जीवन की प्रवृत्ति में कमी दृष्टिगोचर हो रही है। परिणाम यह है कि विश्व स्तर पर जीवन का आनन्द खोता जा रहा है और मानसिक तनाव बढ़ते जा रहे हैं। सामूहिकता की प्रेरणा व्यक्ति को सुखमय एवं आनन्ददायक जीवन-यापन के लिए उत्साहित करती है।

(7) तर्क-निर्णय एवं संकल्प – प्रायः व्यक्ति के जीवन में ऐसी स्थितियाँ आती हैं कि जब वह कोई उचित निर्णय नहीं ले पाता और मानसिक तनाव व संघर्ष के कारण व्याकुलता अनुभव करती है। ऐसी दशा में उपस्थित विकल्पों पर तर्क-वितर्क या विचरण करके तथा अभिप्रेरणाओं के गुण-दोषों पर विचार करके निर्णय की प्रक्रिया शुरु होती है। व्यक्ति कई विकल्पों में से सबसे ज्यादा उचित विकल्प के चुनाव का निर्णय लेता है और प्रेरण को कार्यान्वित करता है। यदि व्यक्ति अपने निर्णय को तत्काल कार्यान्वित नहीं कर पाता तो ऐसी अवस्था में उसे संकल्प की आवश्यकता पड़ती है। उदाहरणार्थ– पढ़ाई करने तथा नौकरी करने के बीच उत्पन्न मानसिक संघर्ष में तर्क-वितर्क के बाद एक युवक पढ़ाई करने का निर्णय लेता है और कष्ट उठाकर भी इस संकल्प को पूरा करता है। इस तरह से तर्क, निर्णय एवं संकल्प की प्रेरणाएँ व्यक्ति को मानसिक संघर्ष से निकालकर उपयुक्त निर्णय को क्रियान्वित करने हेतु संकल्पवान बनाती हैं।

निष्कर्षत: प्रेरक मानव-जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और उनका व्यवहार एवं अनुभवों में विशिष्ट स्थान है।

प्रश्न 4.
सीखने एवं शिक्षा के क्षेत्र में प्रेरणा के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सीखने में प्रेरणा का महत्त्व
(Importance of Motivation in Learning)

शिक्षा के क्षेत्र में और बालकों के सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में प्रेरणा निम्न प्रकार से उपयोगी सिद्ध होती है –

(1) लक्ष्यों की स्पष्टता – प्रेरणाओं के लक्ष्य एवं आदर्श स्पष्ट होने चाहिए। लक्ष्यों की स्पष्टता से प्रेरणाओं की तीव्रता में वृद्धि होती है जिसके परिणामस्वरूप प्रेरित विद्यार्थी जल्दी सीख लेता है। यदि समय-समय पर विद्यार्थियों को लक्ष्य प्राप्ति हेतु उनके प्रयासों की प्रगति बतायी जाये तो वे उत्साहित होकर शीघ्र और अधिक सीखते हैं।

(2) सोद्देश्य शिक्षा – प्राप्त की जाने वाली वस्तु जितनी अधिक आवश्यक होगी, उसे प्राप्त करने की प्रेरणा भी उतनी ही अधिक होगी। प्रेरक शिक्षा को विद्यार्थी की आवश्यकताओं से जोड़ देते हैं। जिससे शिक्षा सोद्देश्य बन जाती है और बालक सीखने के लिए प्रेरित एवं तत्पर हो जाते हैं।

(3) सीखने की रुचि उत्पन्न होना – पर्याप्त रुचि के अभाव में कोई भी क्रिया या व्यवहार फलदायक नहीं हो सकता। प्रेरणा से बालकों में रुचि पैदा होती है जिससे उनका ध्यान पाठ्य-सामग्री की ओर आकृष्ट होता है तथा वे रुचिपूर्वक अध्ययन में जुट जाते हैं।

(4) कार्यों के परिणाम का प्रभाव – आनन्ददायक एवं सन्तोषजनक परिणाम वाले कार्यों में बच्चे अधिक रुचि लेते हैं और उन्हें उत्साहपूर्वक करते हैं। विद्यार्थियों को प्रेरित करने की दृष्टि से उन्हीं कार्यों को करवाना श्रेयस्कर समझा जाता है जिन कार्यों के परिणाम सकारात्मक रूप से प्रभावकारी हों।

(5) ग्रहणशीलता – प्रेरणाओं के माध्यम से, बालक द्वारा वांछित व्यवहार ग्रहण करने तथा अवांछित व्यवहार छोड़ने के लिए, उसे प्रेरित किया जा सकता है। इस भाँति उचित ज्ञान को ग्रहण करने की दृष्टि से प्रेरणा अत्यधिक लाभकारी है।

(6) आचरण पर प्रभाव – प्रेरणाओं के माध्यम से बालक को अपने व्यवहार परिवर्तन में सहायता मिलती है तथा वह स्वयं को आदर्श रूप में ढालने का प्रयास करता है। वस्तुतः निन्दा, पुरस्कार तथा दण्ड आदि आचरण पर गहरा प्रभाव रखते हैं और इनके माध्यम से नैतिकता व सच्चरित्रता का विकास सम्भव है।।

(7) व्यक्तिगत एवं सामूहिक कार्य-प्रेरणा – किसी कार्य में दूसरे बालक से आगे बढ़ने की भावना व्यक्तिगत कार्य-प्रेरणा को उत्पन्न करती है। इसी भाँति एक वर्ग या समूह द्वारा दूसरे वर्ग से आगे निकलने का प्रयास सामूहिक कार्य-प्रेरणा को जन्म देता है। व्यक्तिगत कार्य-प्रेरणाएँ ही सामूहिक कार्य-प्रेरणाओं की जननी हैं। विद्यार्थियों की व्यक्तिगत प्रगति अन्ततोगत्वा सामूहिक प्रगति का प्रतीक मानी जाती है।

(8) शिक्षण विधियों की सफलता – प्रेरक से सम्बन्धित करके शिक्षण की विधियों तथा प्रविधियों में वांछित परिवर्तन लाये जाते हैं। प्रेरणाओं पर आधारित विधियाँ प्रभावशाली एवं सफल शिक्षण को जन्म देती हैं।

(9) खेल के माध्यम से सीखना – शिक्षा में खेलकूद का महत्त्वपूर्ण स्थान है। खेल प्रत्यक्ष प्रेरणा के गुणों से युक्त होते हैं; अतः इन्हें अध्ययन कार्य का साधन बनाना सरल है। इनके द्वारा गम्भीरतम विषयों की शिक्षा भी सहज ही प्रदान की जा सकती है।

(10) अनुशासन – आत्मानुशासन श्रेष्ठ अनुशासन माना जाता है और यह प्रेरणाओं पर आधारित है। प्रेरणा का प्रयोग विद्यालय में अनुशासन स्थापित करने में किया जाता है।

प्रश्न 5.
प्रेरकों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए तथा मुख्य जन्मजात प्रेरकों का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
जन्मजात अथवा जैविक प्रेरकों से आप क्या समझते हैं? मुख्य जन्मजात प्रेरकों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर :

प्रेरक का अर्थ
(Meaning of Motive)

मैक कॉक (Mc Couch) ने ‘प्रेरक का इस प्रकार वर्णन किया है, “व्यक्ति की वह दशा जो उसे किसी दिये हुए लक्ष्य की ओर अभ्यास करने का संकेत देती है और जो उसकी क्रियाओं की पर्याप्तता और लक्ष्य की प्राप्ति पर प्रकाश डालती है, प्रेरक कहलाती है। मनोवैज्ञानिकों ने प्रेरक के अनेक वर्गीकरण प्रस्तुत किये हैं; यथा-शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक, आन्तरिक एवं बाह्य तथा वैयक्तिक एवं सामाजिक आदि। इस सन्दर्भ में प्रेरक को अनेक शब्दों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है-आवश्यकता (Need), प्रेरक (Motive), उदीरणा या ईहा (Drive), प्रवृत्तियाँ (Propensities) तथा मूलप्रवृत्तियाँ (Instincts) इत्यादि।

मैस्लो (Maslow) द्वारा प्रेरकों का विभाजन अध्ययन की दृष्टि से सुविधाजनक है। उसने प्रेरक को मुख्य दो भागों में बाँटा है–(i) जन्मजात प्रेरक और (ii) अर्जित प्रेरक।

जन्मजात (जैविक) प्रेरक
(Innate Motives)

जन्मजात या आन्तरिक प्रेरक व्यक्ति में जन्म से ही पाये जाते हैं और इन्हें सीखना (अर्जित करना) नहीं पड़ता है। इसी कारण इन्हें शारीरिक या प्राथमिक प्रेरक भी कहा जाता है। ये प्रेरक व्यक्ति के जीवन का आधार हैं, जिनके पूर्ण न होने से शारीरिक एवं मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। प्रमुख जन्मजात प्रेरकों को संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है –

(1) भूख – भूख एक प्रबल तथा महत्त्वपूर्ण जन्मजात प्रेरक है। निश्चय ही, भूख (Hunger) जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं में से एक है जिसकी सन्तुष्टि से शरीर का विकास एवं पोषण होता है और काम करने की शक्ति प्राप्त होती है। भोजन की कमी (अर्थात् भूख) के कारण वेदना उत्पन्न होने लगती है और शरीर में बेचैनी बढ़ जाती है। ‘भूख-वेदना’ आमाशय एवं आँत की सिकुड़न से सम्बन्धित है तथा यह रक्त की रासायनिक दशा पर निर्भर है। भूख से प्रेरित होकर व्यक्ति विभिन्न प्रकार के सामान्य तथा असामान्य व्यवहार प्रदर्शित करता है। भूख महसूस करने पर व्यक्ति भोजन खोजने का प्रयास करता है। भोजन प्राप्त होनेपर भूख का यह प्रेरक कुछ समय के लिए सन्तुष्ट हो जाता है, किन्तु पुनः एक निश्चित समय पर प्रकट हो जाता है।

(2) प्यास – भूख के समान ही जन्मजात प्रेरकों में प्यास का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्यास एक शारीरिक आवश्यकता है जो व्यक्ति को क्रिया करने की प्रेरणा प्रदान करती है। जैसे-जैसे शरीर में जल की मात्रा कम होने लगती है, वैसे-वैसे शरीर में कष्टकारी प्रतिक्रियाएँ होने लगती हैं, शरीर का सन्तुलन बिगड़ जाता है और प्राणी क्रियाशील हो उठता है। इस दशा में मुंह और गला सूख जाता है। प्यास का यह आवश्यक प्रेरक व्यक्ति को पानी खोजने के लिए मजबूर करता है।

(3) काम – काम सम्बन्धी जन्मजात प्रेरक सन्तानोत्पत्ति का मूल आधार है और जीवन में विशेष महत्त्व रखता है। ‘काम’ के महत्त्व को शोपेन हावर ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “यह प्रवृत्ति युद्ध का कारण, शान्ति का लक्ष्य, गम्भीरता का आधार, न्यायोचितता का लक्ष्य, हँसी पैदा करने वाली बातों का स्रोत एवं समस्त रहस्यमय संकेतों का आधार है।” विरोधी लिंग के प्रति आकर्षित होने की इच्छा काम-वासना या कामेच्छा कहलाती है। काम का प्रेरक पशु, पक्षी तथा मनुष्य सहित प्रत्येक प्राणी में पाया जाता है तथा व्यवहार पर गहरा प्रभाव डालता है। काम सम्बन्धी इच्छाओं की तुष्टि आवश्यक है। जिसकी सर्वोच्च सामाजिक स्वीकृति विवाह एवं पारिवारिक जीवन में निहित है। जिन व्यक्तियों की काम-वासना पूरी नहीं हो पाती उनका व्यवहार असामान्य रूप धारण कर लेता है।

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सिगमण्डै फ्रायड ने ‘काम’ की मूलप्रवृत्ति को ही सम्पूर्ण मानव घ्यवहार एवं क्रियाओं को उद्गम स्वीकार किया है।

(4) नींद – नींद का प्रेरक भी एक महत्त्वपूर्ण प्रेरक है। यह प्रेरक थकान तथा उद्दीपनों के अभाव की स्वाभाविक प्रतिक्रिया समझा जाता है। मनुष्य दैनिक जीवन में विभिन्न कार्य करते हैं। इन कार्यों को करने में शारीरिक कोषों की क्षति होती है तथा शरीर में कुछ रासायनिक परिवर्तन घटित होते हैं। मनुष्य की मांसपेशियाँ अशक्त हो जाती हैं जिससे थकान का अनुभव होता है। थकान की अवस्था में व्यक्ति विश्राम करने की आवश्यकता का अनुभव करता है। आवश्यकतानुसार विश्राम कर लेने के पश्चात् नींद का यह प्रेरक समाप्त हो जाता है।

(5) प्रेम – प्रेम का प्रेरके मनुष्य में जन्म से ही पाया जाता है। यह प्रत्येक व्यक्ति की मानसिक आवश्यकता है। प्रेम की आवश्यकता अनुभव होने पर व्यक्ति के शरीर और मन में एक प्रकार का तनाव उत्पन्न होता है। यह तनाव प्रेम-प्रदर्शन या प्रेम-प्राप्ति के उपरान्त ही शान्त हो पाता है।

(6) क्रोध – क्रोध प्रत्येक व्यक्ति में जन्मे से विद्यमान रहती है। किसी व्यक्ति की इच्छाओं अथवा कार्यों की पूर्ति न होने की अवस्था में व्यक्ति बाधक वस्तु के प्रति अपनी क्रोध व्यक्त करता है। क्रोध की अवस्था में प्राणी का व्यवहार असामान्य हो जाता है तथा उसका स्वयं पर नियन्त्रण नहीं रहता। क्रोध का प्रेरक मार्ग की बाधाओं को हटाने के लिए बाध्य करता है। बाधा हट जाने पर क्रोध शान्त हो जाता है और व्यक्ति का व्यवहार भी सामान्य हो जाता है।

(7) मल-मूत्र त्याग – शरीर की आन्तरिक प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप शरीर में कुछ हानिकारक पदार्थ बनते हैं जिनका शरीर से बाहर होना अत्यन्त आवश्यक है। इस शारीरिक आवश्यकता को तत्काल पूरा करना अनिवार्य है अन्यथा शरीर में एक अजीब-सा तनाव उत्पन्न हो जाता है। शरीर से मल-मूत्र, श्वास तथा पसीने आदि को बाहर निकालने की व्यवस्था हमारे शरीर में है। मल-मूत्र आदि का त्याग करने पर तनाव की दशा स्वत: ही समाप्त हो जाती है।

(8) युयुत्सा – युयुत्सा एक जन्मजात प्रेरक है। इससे संघर्ष करने की प्रेरणा मिलती है। जब व्यक्ति अपने लक्ष्य के मार्ग में कोई बाधा पाता है तो वह उस बाधक वस्तु को हटाना चाहता है या उस पर विजय प्राप्त करना चाहता है। बाधा हटने तक उसमें शरीर सम्बन्धी, आन्तरिक या संवेगात्मक

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असन्तुलन बना रहता है। उत्पन्न असन्तुलन को सन्तुलित अवस्था में लाने का प्रयास जिस व्यवहार के ” माध्यम से किया जाता है, वह युयुत्सा नामक प्रेरक के कारण है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि मानव-व्यवहार में जैविक प्रेरकों का महत्त्वपूर्ण स्थान है |

प्रश्न 6.
अर्जित प्रेरकों से क्या आशय है? मुख्य अर्जित प्रेरकों को सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
अर्जित प्रेरक किन्हें कहते हैं? मुख्य व्यक्तिगत अर्जित प्रेरकों तथा सामाजिक अर्जित प्रेरकों को सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
अजित प्रेरक
(Acquired Motives)

जन्मजात प्रेरकों के अलावा व्यक्ति में उसके समाज तथा पर्यावरण के प्रभाव से भी बहुत से प्रेरक विकसित होते हैं। इस प्रकार के प्रेरकों को जो समाज में रहकर अर्जित किये जाते हैं, अर्जित या सामाजिक प्रेरक कहकर पुकारा जाता है। इन प्रेरकों में मनुष्य के व्यवहार के वे चालक सम्मिलित हैं। जिन्हें वह शिक्षा या वातावरण के सम्पर्क से अपने जीवनकाल में आवश्यकतानुसार अर्जित करता है। अर्जित प्रेरकों का एक नाम गौण आवश्यकताएँ भी है, क्योकि इन्हें व्यक्ति सामाजिक समायोजन के लिए प्राप्त करता है; ये सार्वभौमिक (Universal) नहीं होते। अर्जित प्रेरक मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं – (अ) व्यक्तिगत अर्जित प्रेरक तथा (ब) सामाजिक अर्जित प्रेरक। अब हम इनका अलग-अलग संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करेंगे –

(अ) व्यक्तिगत अर्जित प्रेरक

एन० एल० मस ने व्यक्तिगत अर्जित प्रेरकों को इस प्रकार समझाया है, “व्यक्तिगत प्रेरक वे प्रेरक हैं जो किसी विशेध संस्कृति में स्वयं प्रधान नहीं होते अपितु वे शारीरिक तथा सामान्य सामाजिक प्रेरकों से सम्बन्धित होते हैं। इनके विभिन्न प्रकारों का वर्णन निम्नलिखित है –

(1) जीवन लक्ष्य – हर व्यक्ति अपना एक जीवन-लक्ष्य निर्धारित करता है जो उसकी भावनाओं, विचारों, इच्छाओं, योग्यताओं, क्षमताओं तथा प्रेरणाओं पर आधारित होता है। लक्ष्य-निर्धारण के पश्चात् व्यक्ति उसे प्राप्त करने हेतु चेष्टाएँ करता है। व्यक्ति के जीवन की क्रियाएँ तथा व्यवहार इन्हीं जीवन-लक्ष्यों के अनुरूप होते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति का जीवन-लक्ष्य डॉक्टर बनना है तो वह ऐसी क्रियाएँ करेगा जो उसे डॉक्टर बनने में सहायता दे सकें।

(2) आकांक्षा-स्तर – प्रत्येक व्यक्ति के मन में स्वयं को जीवन के किसी अभीष्ट स्तर तक पहुँचाने की इच्छा होती है, यही आकांक्षा का स्तर (Level of Aspiration) कहलाता है। प्रत्येक व्यक्ति की आकांक्षा का स्तर भिन्न-भिन्न होता है। स्पष्ट रूप से यह आकांक्षा का स्तर व्यक्ति के लिए प्रेरक का कार्य करता है। जीवन में प्रगति करने के लिए अथवा महान् कार्य करने के लिए आकांक्षा-स्तर से अत्यधिक प्रेरणा प्राप्त होती है। उदाहरणार्थ–12वीं की बोर्ड परीक्षा में प्रथम स्थान पाने की आकांक्षा वाला मेधावी विद्यार्थी अपने समस्त प्रयास उस ओर लगा देगा।

(3) मद-व्यसन – मद-व्यसन एक प्रबल अर्जित प्रेरक है। बहुत से व्यक्तियों में नशे के सेवन की प्रवृत्ति इतनी बढ़ जाती है कि वे उस विशेष नशे के बिना नहीं रह पाते। यह नशा उनके लिए एक अत्यधिक प्रबल प्रेरक का कार्य करता है, जिसके अभाव में उनका शारीरिक सन्तुलन समाप्त हो जाता है तथा वे अशान्ति एवं तनाव अनुभव करने लगते हैं। उदाहरण के लिए—बीड़ी सिगरेट, तम्बाकू, भाँग, चरस, गाँजा, अफीम, शराब और यहाँ तक कि चाय व कॉफी पीने की आदत डालना मद-व्यसन के अन्तर्गत आते हैं।

(4) आदत की विवशता – यदि किसी कार्य को नियमित रूप से बार-बार दोहराया जाए तो वे आदत बन जाते हैं। ये आदतें स्वचालित (Automatic) हो जाती हैं और एक विशिष्ट उत्तेजक आदत की प्रक्रिया को चालित कर देती हैं। उदाहरण के लिए-माना कोई व्यक्ति सुबह 4.30 बजे जागकर चाय पीता है तो इस क्रिया को बार-बार लगातार करने पर यह उसकी आदत बन जाएगी। आदत बन जाने के उपरान्त व्यक्ति उसी के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य हो जाता है।

(5) रुचि – रुचि अधिक अच्छी लगने की एक प्रवृत्ति है और प्रबल प्रेरक का कार्य करती है। व्यक्ति अपने चारों ओर के वातावरण में विविध प्रकार की वस्तुएँ पाता है, किन्तु सम्पर्क में रहकर वह किन्हीं विशेष वस्तुओं को अधिक पसन्द करने लगता है और उन्हें पाकर प्रसन्नता का अनुभव करता है। व्यक्ति की यह पसन्दगी या रुचि उन वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है। प्रत्येक व्यक्ति की रुचि भिन्न हो सकती है जिसमें आयु के अनुसार परिवर्तन होता रहता है। उदाहरणार्थ-एक बच्चा अखबार पाकर ‘बाल-स्तम्भ’ के अन्तर्गत कहानियाँ-कविताएँ आदि पढ़ने में रुचि दिखाता है, जबकि एक प्रौढ़ व्यक्ति देश-विदेश के समाचारों, लेखों या सम्पादकीय पढ़ने में रुचि प्रदर्शित करता है। स्पष्ट है कि रुचि के वशीभूत होकर व्यक्ति सम्बन्धित कार्य करने को बाध्य हो जाता। है। इस रूप को एक व्यक्तिगत अर्जित प्रेरक के रूप में माना जाता है।

(6) अचेतन मन – व्यक्ति के व्यवहार को संचालित करने वाले कारकों में अचेतन मन की प्रेरणा भी विशिष्ट स्थान रखती है। व्यक्ति की अनेक कामनाएँ या इच्छाएँ, जिनकी सन्तुष्टि नहीं हो पाती है, अचेतन मन में दब जाती हैं; किन्तु दबकर भी नष्ट नहीं होतीं, अपितु वहीं से अपनी सन्तुष्टि का प्रयास करती हैं। मन के अचेतन स्तर में बैठी हुई बातें व्यक्ति के व्यवहार को अत्यधिक प्रेरित करती हैं। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति को नदी में प्रवेश करने से बहुत डर लगता है। पूर्व का इतिहास जानने पर पता लगा है कि वह बचपन में नदी में डूबने से बचा था और नदी से वही डर उसके मन की गहराई में जाकर बैठ गया।

(7) मनोवृत्तियाँ – मनोवृत्ति (Attitude) एक आन्तरिक अवस्था है जो व्यक्ति को किसी कार्य को करने या छोड़ने के लिए प्रेरित करती है। यह रुचि से भिन्न प्रेरक है। रुचि में हम अपनी पसन्द के कार्यों में संलग्म हो जाते हैं, जबकि मनोवृत्ति हमारे भीतर पसन्द की वस्तुओं की ओर आकर्षण तथा नापसन्द की वस्तुओं की ओर विकर्षण उत्पन्न कर देती है। उदाहरणार्थ-यदि किसी व्यक्ति को शास्त्रीय गायन पसन्द है तो वह उस ओर आकर्षित होकर गायन सुनेगा, अन्यथा नहीं।

(8) संवेग – संवेगों को कार्य का प्रेरक माना जाता है। भय, क्रोध, प्रेम, दया, वात्सल्य, घृणा तथा करुणा आदि संवेग के उदाहरण हैं जिनके प्रभाव में व्यक्ति ऐसा व्यवहार प्रदर्शित कर सकता है। जिसकी वह सामान्यावस्था में कल्पना भी नहीं कर सकता। उदाहरणार्थ- आत्म-सम्मान पर चोट लगने से क्रुद्ध व्यक्ति अपने प्रियजन पर भी आघात कर सकता है।

(ब) सामाजिक अर्जित प्रेरक

अर्जित प्रेरकों के एक प्रकार को सामाजिक अर्जित प्रेरक कहते हैं। एक समाज के अधिकांश सदस्यों में ये प्रेरक लगभग समान रूप में पाये जाते हैं, परन्तु ये प्रेरके जन्मजात नहीं होते बल्कि समाज के सम्पर्क एवं प्रभाव के परिणामस्वरूप विकसित होते हैं। मुख्य सामाजिक अर्जित प्रेरकों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है.

(1) सामुदायिकता – सामुदायिकता प्रत्येक सामाजिक प्राणी में पाई जाने वाली सार्वभौमिक भावना तथा एक सामाजिक प्रेरक है। यह भावना ही व्यक्ति को सामाजिक कार्यों के लिए प्रेरित करती है और इस भाँति सामाजिक व्यवहार का प्रेरक बनती है। इसी प्रेरणा के कारण व्यक्ति समूह अथवा समुदाय में रहना पसन्द करता है तथा सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करता है। सामुदायिकता के कारण व्यक्ति अनेक कार्य एवं व्यवहार करने को बाध्य होता है।

(2) आत्म-गौरव या आत्म-स्थापन – समाज के सम्पर्क एवं अन्य व्यक्तियों के मध्य रहते हुए व्यक्ति में आदर पाने की भावना विकसित होती है। हर एक व्यक्ति अन्य लोगों की तुलना में अधिक अच्छा, अधिक सफल, उन्नत एवं प्रगतिशील रहना चाहता है। वह अपने लक्ष्य के मार्ग की बाधाओं को जीतकर गौरवान्वित होता है, यही आत्म-गौरव की प्रवृत्ति,है। समाज में कार्य करने वाली यह भावना व्यक्ति को ऐसे अनेक कार्यों की प्रेरणा प्रदान करती है जो उसे समाज में सम्मान एवं प्रतिष्ठा दिला सकें। एडलर नामक मनोवैज्ञानिक ने आत्म-स्थापन’ अथवा ‘शक्ति की इच्छा को प्रबल प्रेरक स्वीकार किया है।

(3) प्रशंसा तथा निन्दा – प्रशंसा एवं निन्दा भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं प्रबल प्रेरक हैं। प्रशंसा एवं निन्दा व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार को पर्याप्त रूप में प्रभावित करते हैं। समाज में व्यक्ति के अच्छे कार्यों की प्रशंसा तथा बुरे कार्यों की निन्दा की जाती है। प्रशंसा प्राप्त करने की लालसा से मनुष्य अच्छे कार्यों को बार-बार दोहराने की प्रेरणा पाता है, जबकि वह निन्दनीय कार्यों को दोहराने का प्रयास नहीं करता।

(4) आत्म-समर्पण – आत्म-समर्पण अर्थात् अन्य व्यक्तियों की श्रेष्ठता के सम्मुख स्वयं को हीन बना देने की भावना भी सामाजिक व्यवहार को निर्धारित करने वाला एक मुख्य प्रेरक है। आत्म-समर्पण के प्रेरक हमें ऐसे कार्य करने के लिए बाध्य करते हैं जिनके माध्यम से हम स्वयं को अपने से श्रेष्ठ व्यक्तित्व के सम्मुख अधीन कर देते हैं तथा उनके विचार एवं मत के अनुसार कार्य करते हैं।

(5) आक्रामक-प्रवृत्ति – आक्रामक-प्रवृत्ति सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर करने वाली एक अर्जित प्रवृत्ति है। यह शारीरिक आवश्यकताओं या कुण्ठाओं की सन्तुष्टि के अवरोध में पैदा होती है। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से ज्ञात होता है कि मानव न तो आक्रामक प्रवृत्ति का है और न ही शान्त प्रवृत्ति का। जब तक उसकी शारीरिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि में अवरोध उत्पन्न नहीं होता वह शान्त दिखाई पड़ता है, किन्तु अवरोध उत्पन्न होते ही वह आक्रामक स्वरूप धारण कर लेता है। उदाहरणार्थ-न्यूगिनी के ‘अरापेश’ जाति के लोग तथा हिमालय की अनेक पहाड़ी जातियाँ एकदम शान्तिप्रिय हैं, जबकि ‘मुण्डुगुमार’ जाति के लोगों को बाल्यावस्था से ही युद्ध प्रिय बनाया जाता है। व्यक्ति के अनेक व्यवहार उसकी आक्रामक प्रवृत्ति के वशीभूत होकर भी सम्पन्न होते हैं। इस रूप में आक्रामक प्रवृत्ति भी एक सामाजिक अर्जित प्रेरक है।

(6) आत्म-प्रकाशन – समाज के प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा होती है कि उसका रहन-सहन दूसरे व्यक्तियों से अच्छा हो और वह अन्य व्यक्तियों से अच्छा व्यक्त करे। जब कभी इसमें रुकावट पैदा होती है। तो वह क्रोधित हो जाता है और झुंझला उठता है। मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि आत्म-प्रकाशन की इच्छा-प्रभुत्व, नेतृत्व आत्म-प्रदर्शन एवं प्रतिष्ठा की भावना आदि में निहित होती है।

(7) अर्जनात्मकता – अर्जनात्मकता अर्थात् किसी वस्तु या वस्तुओं को संचित करने की प्रवृत्ति को भी एक सामाजिक अर्जित प्रेरक माना गया है। वास्तव में व्यक्ति में यदि किसी वस्तु को संचित या एकत्र करने की प्रवृत्ति प्रबल हो जाती है, तो वह उसके लिए अधिक प्रयत्नशील हो जाता है। ज्यों-ज्यों वह सम्बन्धित वस्तुओं को संचित करता जाता है, त्यों-त्यों उसे विशेष सन्तोष की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत यदि व्यक्ति अभीष्ट वस्तु को संचित नहीं कर पाता तो वह परेशान हो उठता है तथा अधिक तत्परता से विभिन्न प्रयास करता है। इस रूप में अर्जनात्मकता को प्रबल सामाजिक अर्जित प्रेरक माना गया है। सामान्य रूप से धन सम्बन्धी अर्जनात्मकता प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रशन 1.
व्यक्ति के व्यवहार सम्बन्धी उन विशेषताओं का उल्लेख कीजिए जो किसी प्रबल प्रेरणा की दशा में देखी जा सकती है।
उत्तर :
किसी भी प्रबल प्रेरणा की दशा में व्यक्ति का व्यवहार सामान्य से भिन्न हो जाता है। इस दशा में व्यक्ति के व्यवहार में सामान्य से काफी अधिक सक्रियता तथा गतिशीलता आ जाती है। व्यवहार सम्बन्धी इस परिवर्तन का कारण प्रेरणा की दशा में होने वाला शक्ति का अतिरिक्त संचालन होता है। वास्तव में, प्रबल प्रेरणा की दशा में कुछ शारीरिक एवं रासायनिक परिवर्तन होते हैं, जिनके कारण शरीर में शक्ति का अतिरिक्त संचालन होने लगता है। प्रबल प्रेरणा की दशा में व्यक्ति के व्यवहार में निरन्तरता तथा परिवर्तनशीलता के लक्षण भी दिखाई देने लगते हैं।

प्रबल प्रेरणा की दशा में व्यक्ति सम्बन्धित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उस समय तक लगातार प्रयास करता रहता है, जब तक निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती। इस प्रक्रिया में व्यक्ति अपने प्रयासों को प्राय: बदलता भी रहता है।’प्रबल-प्रेरणा की दशा में व्यक्ति के व्यवहार की एक अन्य विशेषता व्यवहार में बेचैनी भी है। प्रबल प्रेरणा से ग्रस्त व्यक्ति अपने लक्ष्य को जब तक प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक एक विशेष प्रकार की बेचैनी अनुभव करता रहता है। व्यवहार की यह बेचैनी लक्ष्य को प्राप्त कर लेने पर अपने आप ही समाप्त हो जाती है।

प्रशन 2.
मानवीय प्रेरकों का एक सामान्य वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
व्यक्ति के जीवन में प्रेरकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। व्यक्ति के व्यवहार के परिचालन में अनेक प्रेरकों का योगदान होता है। भिन्न-भिन्न मनोवैज्ञानिकों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रेरकों के भिन्न-भिन्न वर्गीकरण प्रस्तुत किये हैं। कुछ विद्वानों ने समस्त प्रेरकों को शारीरिक प्रेरक तथा मनोवैज्ञानिक प्रेरकों में बाँटा है, कुछ विद्वान् आन्तरिक प्रेरक तथा बाह्य प्रेरक-दो वर्ग निर्धारित करते हैं। इन वर्गीकरणों के अतिरिक्त एक अन्य वर्गीकरण भी प्रस्तुत किया गया है जो अधिक लोकप्रिय है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत समस्त प्रेरकों को दो वर्गों में बाँटा गया है। ये वर्ग हैं-जन्मजात प्रेरक तथा अर्जित प्रेरक। जन्मजात प्रेरकों को ही आन्तरिक प्रेरक भी माना जाता है। ये प्रेरक सभी मनुष्यों में जन्म से ही समान रूप में पाये जाते हैं, इन्हें सीखना नहीं पड़ता।

मुख्य जन्मजात प्रेरक हैं-भूख, प्यास, काम, नींद, प्रेम, क्रोध, मल-मूत्र त्याग तथा युयुत्सा। इनसे भिन्न, अर्जित प्रेरक उन प्रेरकों को कहा जाता है जिन्हें व्यक्ति द्वारा अपने जीवन में क्रमशः सीखा जाता है। अर्जित प्रेरकों को भी दो वर्गों में बाँटा गया है-व्यक्तिगत अर्जित प्रेरक तथा सामाजिक अर्जित प्रेरका व्यक्तिगत अर्जित प्रेरकों का स्वरूप भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न हो सकता है। मुख्य व्यक्तिगत अर्जित प्रेरक हैं-जीवन-लक्ष्य, आकांक्षा-स्तर, मद-व्यसन, आदत की विवशता, रुचि, अचेतन मन, मनोवृत्तियाँ तथा संवेग। सामाजिक अर्जित प्रेरक समाज के प्रभाव से उत्पन्न होते हैं तथा एक समाज के सदस्यों में इन अर्जित प्रेरकों में काफी समानता होती है। मुख्य सामाजिक अर्जित प्रेरक हैं—सामुदायिकता, आत्म-गौरव या आत्म-स्थापन, प्रशंसा तथा निन्दा, आत्म-समर्पण, आक्रामक प्रवृत्ति, आत्म-प्रकाशन तथा अर्जनात्मकता।

प्रश्न 3.
जन्मजात तथा अजित प्रेरकों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
जन्मजात तथा अर्जित प्रेरकों में निम्नलिखित अन्तर होते हैं –
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प्रश्न 4.
प्रेरकों की प्रबलता के मापन की मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
प्रेरकों की प्रबलता के मापन के लिए सामान्य रूप से अग्रलिखित तीन विधियों को अपनाया जाता है –

(1) अवरोध विधि – प्रेरकों की प्रबलता-मापन की एक मुख्य विधि अवरोध विधि (Obstruction Method) है। इस विधि की सैद्धान्तिक मान्यता यह है कि यदि प्रेरक प्रबल है तो सम्बन्धित लक्ष्य की प्राप्ति के मार्ग में आने वाले अपेक्षाकृत बड़े अवरोधों को भी व्यक्ति या प्राणी पार कर जाता है। इस विधि के अन्तर्गत प्रेरकों की प्रबलता की माप तुलनात्मक आधार पर की जा सकती है। भिन्न-भिन्न प्रबलता वाले प्रेरकों की दशा में एकसमान अवरोध उपस्थित करके प्राप्त परिणामों के आधार पर उनकी प्रबलता की माप की जा सकती है।

(2) शिक्षण विधि – शिक्षण विधि द्वारा भी प्रेरकों की प्रबलता की माप की जाती है। इस विधि की सैद्धान्तिक मान्यता यह है कि किसी विषय को सीखने की गति विद्यमान प्रेरक की प्रबलता के अनुपात में होती है अर्थात् यदि प्रबल प्रेरक विद्यमान हो तो शिक्षण की दर अधिक होती है तथा दुर्बल प्रेरक की दशा में शिक्षण की दर कम होती है। प्रेरक के नितान्त अभाव में शिक्षण की प्रक्रिया चल ही नहीं पाती।

(3) चुनाव विधि-प्रेरकों की प्रबलता के मापन के लिए अपनायी जाने वाली एक विधि चुनाव विधि’ भी है। इस विधि में प्रेरकों की प्रबलता का मापन तुलनात्मक रूप में ही किया जाता है। चुनाव विधि द्वारा प्रेरकों की प्रबलता को जानने के लिए व्यक्ति के सम्मुख एक ही समय में दो या दो से अधिक प्रेरक उपस्थित किये जाते हैं, तब देखा जाता है कि व्यक्ति पहले किस प्रेरक से प्रेरित होकर सम्बद्ध व्यवहार करता है।

प्रश्न 5.
नवजात शिशु के जीवन में पाये जाने वाले मुख्य प्रेरकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
नवजात शिशु के व्यवहार को परिचालित करने वाले मुख्य प्रेरकों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है –

(1) भूख – भूख प्रत्येक प्राणी के जीवन की आधारभूत आवश्यकता है। जन्म के उपरान्त मानव-शिशु भी भूख की आवश्यकता के कारण स्वाभाविक क्रियाएँ व व्यवहार प्रकट करता है। वस्तुतः भूख लगने पर रक्त के रासायनिक अंशों में परिवर्तन के कारण वेदना उत्पन्न होती है तथा शरीर में व्याकुलता बढ़ती है। नवजात शिशु इस ‘भूख-वेदना’ को अभिव्यक्ति देने के लिए हाथ-पैर हिलाता है या रोता-चिल्लाता है। माँ, बच्चे के इस व्यवहार को पहचानने में सक्षम होती है और उसकी आवश्यकता सन्तुष्ट करने की चेष्टा करती है। आवश्यकता-पूर्ति के बाद भूखे का प्रेरक शान्त हो जाता है।

(2) प्यास – भूखं की तरह ही प्यास भी एक शारीरिक आवश्यकता है। प्यास का प्रेरक शरीर में जल की कमी के कारण है। प्यास के कारण प्राणी का शारीरिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। मानव-शिशु को भी प्यास लगती है जिसके कारण वह व्याकुल होकर शरीर को हिलाता-डुलाता है या रोकर अपनी ओर ध्यान आकृष्ट करता है। पानी की पूर्ति के बाद पानी के शरीर की विभिन्न नलिकाओं में पहुँचने से शिशु की प्यास का प्रेरक सन्तुष्ट हो जाता है।

(3) नींद – नींद का प्रेरक शिशु के जन्म से ही उससे सम्बन्ध रखता है। यह भी शिशु की एक बहुत बड़ी शारीरिक आवश्यकता है। अपने जन्म के काफी समय बाद तक शिशु का अधिकतम समय नींद में ही व्यतीत होता है। नींद में विघ्न आने पर शिशु बेचैनी अभिव्यक्त करता है। अतः आवश्यकतानुसार उसे भरपूर नींद के प्रेरक की पूर्ति करनी अनिवार्य है।

(4) मल-मूत्र विसर्जन – जन्म के उपरान्त शिशु समय-समय पर वज्र्य पदार्थ मल-मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकालता है। शरीर की आन्तरिक प्रक्रियाओं के फलस्वरूप शरीर में अनेक हानिकारक एवं वर्त्य पदार्थ निर्मित होते हैं जिनका मल-मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकलना अत्यन्त आवश्यक है। यदि इन पदार्थों को तत्काल विसर्जन न किया जाये तो शिशु के शरीर में एक अजीब-सा तनाव पैदा होगा। वह पीड़ा अनुभव कर रोएगा-चिल्लाएगा। मल-मूत्र विसर्जन के उपरान्त शिशु को तनाव एवं पीड़ा से मुक्ति मिल जाती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जन्मजात प्रेरक क्या हैं?
या
जैविक अभिप्रेरकों को स्पष्ट कीजिए तथा उनके नाम लिखिए।
उत्तर :
प्रेरकों के दो मुख्य प्रकार यावर्ग निर्धारित किये गये हैं, जिन्हें क्रमशः जन्मजात प्रेरक तथा अर्जित प्रेरक कहा गया है। जन्मजात प्रेरकों को आन्तरिक प्रेरक तथा जैविक प्रेरक भी कहा जाता है। जन्मजात या आन्तरिक प्रेरक व्यक्ति में जन्म से ही विद्यमान होते हैं तथा इन्हें सीखना नहीं पड़ता। यही कारण है कि इन्हें प्राथमिक या शारीरिक प्रेरक भी कहा जाता है। ये प्रेरक व्यक्ति के जीवन के आधार हैं। तथा इनके पूर्ण न होने से व्यक्ति का शारीरिक एवं मानसिक सन्तुलन भी बिगड़ जाता है। व्यक्ति के जीवन में जन्मजात प्रेरकों का अत्यधिक महत्त्व है। जीवन के सुचारु परिचालन में इन प्रेरकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। हम यह भी कह सकते हैं कि इन प्रेरकों के अभाव में जीवन का चल पाना प्रायः सम्भव नहीं होता। मुख्य जन्मजात प्रेरक हैं-भूख, प्यास, काम, नींद, तापक्रम, मातृत्व व्यवहार तथा मल-मूत्र त्याग।

प्रश्न 2.
किन्हीं दो जन्मजात प्रेरकों के नाम लिखिए तथा संक्षेप में उनका महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
मुख्य जन्मजात प्रेरक हैं-भूख, प्यास, काम, नींद, मातृत्व व्यवहार तथा मल-मूत्र-त्याग।
(i) भूख नामक जन्मजात प्रेरक का व्यक्ति के लिए सर्वाधिक महत्त्व है। इस प्रेरक से प्रेरित होकर व्यक्ति आहार ग्रहण करता है। आहार ग्रहण करने से शरीर का पोषण होता है, ऊर्जा प्राप्त होती है तथा रोगों से मुकाबला करने की शक्ति प्राप्त होती है।
(ii) नींद नामक प्रेरक का भी व्यक्ति के जीवन में विशेष महत्त्व है। इस प्रेरक से प्रेरित होकर व्यक्ति विश्राम करता है। नींद से व्यक्ति की थकान समाप्त होती है, चुस्ती एवं स्फूर्ति प्राप्त होती है तथा वह तरो-ताजा महसूस करता है। नींद से स्वभाव एवं व्यवहार की झुंझलाहट समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 3.
अर्जित प्रेरक क्या हैं?
या
अर्जित प्रेरकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
प्रेरकों के एक वर्ग को अर्जित प्रेरक (Acquired Motives) के रूप में जाना जाता है। इस प्रकार के प्रेरकों का उदय सामाजिक सम्पर्क के परिणामस्वरूप होता है। सामाजिक सम्पर्क के परिणामस्वरूप विकसित होने के कारण इन्हें सामाजिक प्रेरक भी कहा जाता है। अर्जित प्रेरक व्यक्ति के सामाजिक समायोजन में सहायक होते हैं। अर्जित प्रेरकों को दो वर्गों में बाँटा जाता है (i) व्यक्तिगत अर्जित प्रेरक तथा (ii) सामाजिक अर्जित प्रेरक।

प्रश्न 4.
प्रमुख सामाजिक प्रेरकों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सामाजिक प्रेरक जन्मजात नहीं होते। ये पूर्ण रूप से अर्जित अर्थात् जन्म के उपरान्त सीखे जाने वाले प्रेरक हैं। इनका सम्बन्ध शारीरिक या प्राणात्मक आवश्यकताओं से नहीं होता। सामाजिक प्रेरकों का विकास एवं सक्रियता सामाजिक सम्पर्क के परिणामस्वरूप प्रारम्भ होती है। सामाजिक प्रेरकों में पर्याप्त भिन्नता पायी जाती है। इनका निर्धारण व्यक्ति की सामाजिक परिस्थितियों द्वारा होता है। सामाजिक प्रेरकों पर शिक्षा का भी प्रभाव पड़ता है। मुख्य सामाजिक प्रेरक हैं—सामुदायिकता, आत्म-गौरव या।। आत्म-स्थापन, प्रशंसा एवं निन्दा, आत्म-समर्पण, आक्रामक प्रवृत्ति, आत्म-प्रकाशन तथा अर्जनात्मकता।

प्रश्न 5.
मूल प्रवृत्ति से क्या आशय है?
उत्तर :
प्राणियों के व्यवहार की व्याख्या प्रस्तुत करने के लिए प्रेरकों के साथ-ही-साथ मूल प्रवृत्तियों (Instincts) को भी जानना आवश्यक है। वास्तव में, प्राणियों का स्वभावगत व्यवहार मूल रूप से मूल प्रवृत्तियों द्वारा ही परिचालित होता है। मूल प्रवृत्तियाँ जन्मजात होती हैं तथा प्राणियों के स्वभाव में निहित होती हैं। मूल प्रवृत्तियों का सम्बन्ध संवेगों से होता है। मूल प्रवृत्तियों के अर्थ को मैक्डूगल ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “मूल प्रवृत्ति एक परम्परागत अथवा जन्मजात मनोशारीरिक प्रवृत्ति है, जो उसके अधिकारों के लिए यह निर्धारित करती है कि व्यक्ति किसी एक जाति की वस्तुओं को प्रत्यक्ष करेगा एवं उन पर ध्यान देगा, किसी ऐसी वस्तु के प्रत्यक्ष के उपरान्त एक उद्वेगात्मक तीव्रता का अनुभव करेगा और उसके सम्बन्ध में एक विशेष प्रकार की क्रिया करेगा या कम-से-कम ऐसी क्रिया करने के आवेग का अनुभव करेगा।”

प्रश्न 6.
मूल प्रवृत्तियों की सामान्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
प्राणियों के व्यवहार के एक मुख्य निर्धारक कारक के रूप में मूल प्रवृत्तियों की सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित होती हैं –

  1. समस्त मूल प्रवृत्तियाँ जन्मजात होती हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति अथवा प्राणी के स्वभाव में निहित होती हैं।
  2. प्रायः सभी प्राणियों के अनेक व्यवहार मूल प्रवृत्तियों द्वारा परिचालित होते हैं।
  3. मूल प्रवृत्ति के कारण सम्पन्न होने वाले व्यवहार को सदैव बहुत अधिक समानता की दृष्टि से देखा जा सकता है।
  4. सभी मूल प्रवृत्ति के मुख्य उद्देश्य स्पष्ट तथा सामान्य रूप से निश्चित होते हैं।
  5. प्रत्येक मूल प्रवृत्ति का सम्बन्ध अनिवार्य रूप से किसी-न-किसी संवेग से होता है।
  6. मूल प्रवृत्तियों के तीन मुख्य पक्ष होते हैं – ज्ञानात्मक, संवेगात्मक तथा क्रियात्मक।
  7. मूल प्रवृत्तियाँ अनेक हैं तथा वे व्यक्ति के जीवन-काल में भिन्न-भिन्न स्तरों पर स्वत: प्रकट एवं सक्रिय होती हैं।

प्रश्न 7.
मूल प्रवृत्तियों तथा प्रतिक्षेप क्रियाओं में क्या अन्तर है?
उत्तर :
मूल प्रवृत्तियों तथा प्रतिक्षेप क्रियाओं में कुछ समानताएँ होती हैं; जैसे कि दोनों ही जन्मजात तथा स्वाभाविक होती हैं तथा दोनों को ही सीखने की आवश्यकता नहीं होती, परन्तु इन दोनों प्रकार की क्रियाओं में पर्याप्त अन्तर भी हैं। इन दोनों के अन्तर का विवरण निम्नलिखित है

  1. मूल प्रवृत्ति द्वारा प्रेरित व्यवहार का सम्बन्ध सम्पूर्ण शरीर से होता है, जबकि प्रतिक्षेप क्रिया द्वारा प्रेरित व्यवहार या क्रिया का सम्बन्ध शरीर के किसी एक अंग से ही होता है।
  2. मूल प्रवृत्ति जन्य व्यवहार व्यापक होता है, जबकि प्रतिक्षेप क्रिया के परिणामस्वरूप होने वाला व्यवहार सीमित होता है।
  3. मूल प्रवृत्ति जन्य व्यवहार में यदि व्यक्ति चाहे तो कुछ सीमा तक परिवर्तन कर सकता है, परन्तु प्रतिक्षेप क्रियाओं में व्यक्ति कुछ भी परिवर्तन नहीं कर सकता।
  4. मूल प्रवृत्ति-जन्य व्यवहार के तीन पक्ष अर्थात् ज्ञानात्मक, संवेगात्मक तथा क्रियात्मक पक्ष होते हैं, परन्तु प्रतिक्षेप क्रिया का केवल क्रियात्मक पक्ष ही प्रस्तुत होता है।
  5. मूल प्रवृत्ति-जन्य व्यवहार पर प्रेरणा, रुचि तथा संवेग आदि कारकों को प्रभाव पड़ सकता है, परन्तु प्रतिक्षेप क्रियाओं पर इन कारकों का सामान्य रूप से कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. व्यक्ति के कार्यों के पीछे निहित परिचालक कारकों को …………………. कहते हैं।
  2. कोई भी आन्तरिक उत्तेजक जो प्राणी के व्यवहार या क्रिया को दिशा देकर लक्ष्य से जोड़ता है, …………………. कहलाता है।
  3. आवश्यकता और उदोलन …………………. की प्रक्रिया के मूलभूत सम्प्रत्यय हैं।
  4. प्रेरणा के नितान्त अभाव में व्यक्ति के कार्य ………………….
  5. व्यक्ति की क्रियाओं में अतिरिक्त शक्ति के संचालन का कारण …………………. होती है |
  6. प्रेरणायुक्त व्यवहार में लक्ष्य की प्राप्ति के लिए …………………. पायी जाती है।
  7. प्रबल प्रेरणा के वशीभूत होने वाले कार्य सामान्य से …………………. होते हैं।
  8. व्यक्ति के कुछ प्रेरक जन्मजात होते हैं तथा कुछ जन्म के उपरान्त जीवन में …………………. किये जाते हैं।
  9. भूख एक …………………. प्रेरक है।
  10. जीवन लक्ष्य एक …………………. प्रेरक है।
  11. आकांक्षा-स्तर एक …………………. प्रेरक है।
  12. सामुदायिकता तथा प्रशंसा एवं निन्दा …………………. प्रेरक हैं।
  13. सामाजिक प्रेरकों के विकास के लिए …………………. आवश्यक होता है।
  14. भिन्न-भिन्न सामाजिक परिस्थितियों में …………………. का स्वरूप भिन्न-भिन्न होता है। ।।
  15. मूल प्रवृत्तियों के आधार पर मानव-व्यवहार की व्याख्या मुख्य रूप से …………………. ने की है।
  16. …………………. ने अभिप्रेरणात्मक व्यवहार की व्याख्या मूल प्रवृत्तियों के आधार पर की है।

उत्तर :

  1. प्रेरक
  2. प्रेरक
  3. प्रेरणा
  4. हो ही नहीं सकते
  5. प्रबल प्रेरणा
  6. व्याकुलता
  7. श्रेष्ठ
  8. अर्जित
  9. जन्मजात
  10. व्यक्तिगत अर्जित
  11. व्यक्तिगत अर्जित
  12. सामाजिक अर्जित
  13. सामाजिक सम्पर्क
  14. सामाजिक प्रेरकों
  15. मैक्डूगल
  16. मैक्डूगल।

प्रश्न I.
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1. प्रेरणा से क्या आशय है?
उत्तर :
किसी प्राणी द्वारा विशेष प्रकार की क्रिया या व्यवहार करने को बाध्य करने वाली आन्तरिक शक्तियों को प्रेरणा कहते हैं।

प्रश्न 2. प्रेरणा की एक सरल, संक्षिप्त एवं स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
किम्बाल यंग के अनुसार, “प्रेरणा एक व्यक्ति की आन्तरिक स्थिति होती है, जो उसे क्रियाओं की ओर प्रेरित करती है।”

प्रश्न 3. प्रेरणायुक्त व्यवहार के मुख्य लक्षणों अथवा विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. शक्ति का अतिरिक्त संचालन
  2. परिवर्तनशीलता
  3. निरन्तरता
  4. चयनता
  5. लक्ष्य-प्राप्त करने की व्याकुलता तथा
  6. लक्ष्य-प्राप्ति पर व्याकुलता की समाप्ति।

प्रश्न 4. प्रबल प्रेरणा की दशा में सीखने की प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
प्रबले प्रेरणा की दशा में सीखने की प्रक्रिया शीघ्रता से तथा सुचारु ढंग से सम्पन्न होती है।

प्रश्न 5. प्रेरकों का सर्वमान्य वर्गीकरण क्या है?
उत्तर :
प्रेरकों के एक सर्वमान्य वर्गीकरण के अन्तर्गत समस्त प्रेरकों को मूल रूप से दो वर्गों में बाँटा गया है – (i) जन्मजात प्रेरक तथा (ii) अर्जित प्रेरक।

प्रश्न 6. चार मुख्य जन्मजात प्रेरकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(i) भूख, (ii) प्यास, (iii) नींद तथा (iv) काम।

प्रश्न 7. अजित प्रेरकों को किन-किन वर्गों में बाँटा जाता है?
उत्तर :
अर्जित प्रेरकों को दो वर्गों में बाँटा जाता है- (i) व्यक्तिगत अर्जित प्रेरक तथा (ii) सामाजिक अर्जित प्रेरक।

प्रश्न 8. चार मुख्य व्यक्तिगत अर्जित प्रेरकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(i) जीवन-लक्ष्य, (ii) आकांक्षा-स्तर, (ii) मद-व्यसन तथा (iv) रुचि।

प्रश्न 9. चार मुख्य सामाजिक अर्जित प्रेरकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(i) सामुदायिक, (i) आत्म-गौरव या आत्म-स्थापन, (ii) प्रशंसा तथा निन्दा व (iv) आत्म-समर्पण।

प्रश्न 10. प्रेरकों की प्रबलता के मापन के लिए अपनायी जाने वाली विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(i) अवरोध विधि, (ii) शिक्षण विधि तथा (iii) चुनाव विधि।।

प्रश्न 11. नवजात शिशु में कौन-कौन से प्रेरक प्रबल होते हैं?
उत्तर :
नवजात शिशु में (i) भूख, (ii) प्यास, (iii) नींद तथा (iv) मल-मूत्र त्याग नामक प्रेरक प्रबल होते हैं।

प्रश्न 12. मूल प्रवृत्ति की एक समुचित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
“मूल प्रवृत्ति शब्द के अन्तर्गत हम उन सभी जटिल कार्यों को लेते हैं जो बिना पूर्व-अनुभव के उसी प्रकार से किये जाते हैं जिस प्रकार से उस लिंग और प्रजाति के समस्त सदस्यों द्वारा किये जाते हैं।”

प्रश्न 13. मूल प्रवृत्तियों की एक मुख्य विशेषता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
समस्त मूल प्रवृत्तियाँ जन्मजात होती हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति अथवा प्राणी के स्वभाव में निहित होती हैं।

प्रश्न 14. ‘भूख’ तथा मद-व्यसन किस प्रकार के प्रेरक हैं?
उत्तर :
‘भूख’ एक जन्मजात प्रेरक है, जबकि ‘मद-व्यसन’ एक अर्जित प्रेरक है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
प्रेरक कोई विशेष आन्तरिक अवस्था या दशा है जो किसी कार्य को शुरू करने और उसे जारी रखने की प्रवृत्ति से युक्त होती है। यह कथन किसका है?
(क) गिलफोर्ड
(ख) वुडवर्थ
(ग) किम्बाल यंग
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 2.
व्यक्ति द्वारा किये जाने वाले कार्यों के पीछे निहित महत्त्वपूर्ण कारक को कहते हैं
(क) संवेग
(ख) प्रलोभन
(ग) चिन्तन एवं कल्पना
(घ) प्रेरणा

प्रश्न 3.
प्रेरणायुक्त व्यवहार का एक मुख्य लक्षण है
(क) सामान्य से अधिक बोलना।
(ख) व्यक्ति का आक्रामक होना
(ग) अतिरिक्त शक्ति का संचालन
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन-सा लक्षण अभिप्रेरित व्यवहार का है?
(क) श्वसन देर में परिवर्तन
(ख) हृदय गति में परिवर्तन
(ग) प्रवलने
(घ) व्यवहार में दिशा

प्रश्न 5.
प्रेरणाओं के नितान्त अभाव की स्थिति में व्यक्ति का व्यवहार
(क) तीव्र हो जाएगा
(ख) उत्तम हो जाएगा।
(ग) हो ही नहीं सकता
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 6.
व्यक्ति (प्राणी) के जीवन में प्रेरणा का महत्त्व है
(क) व्यक्ति के व्यवहार का परिचालन होता है
(ख) सम्बन्धित कार्य शीघ्र तथा अच्छे रूप में सम्पन्न होता है।
(ग) विषय को शीघ्र सीख लिया जाता है।
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से कौन-सा प्रेरक जन्मजात प्रेरक है?
(क) रुचि
(ख) जीवन-लक्ष्य
(ग) भूख
(घ) प्रशंसा एवं निन्दा

प्रश्न 8.
जन्मजात प्रेरक है
(क) प्यास
(ख) उपलब्धि
(ग) आकांक्षा स्तर
(घ) जीवन-लक्ष्य

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन जन्मजात या प्राथमिक प्रेरक नहीं है?
(क) यौन
(ख) नींद
(ग) संग्रहणशीलता
(घ) भूख

प्रश्न 10.
प्यास है
(क) जैविक अभिप्रेरक
(ख) मनोवैज्ञानिक अभिप्रेरक
(ग) व्यक्तिगत अभिप्रेरक
(घ) अर्जित अभिप्रेरक

प्रश्न 11.
जन्मजात प्रेरकों की विशेषता है
(क) ये जन्म से ही विद्यमान होते हैं तथा इन्हें सीखना नहीं पड़ता
(ख) इनका स्वरूप सभी मनुष्यों में समान होता है
(ग) ये प्रबल होते हैं तथा जीवित रहने के लिए आवश्यक होते हैं।
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ

प्रश्न 12.
अर्जित प्रेरकों की विशेषता है
(क) व्यक्ति द्वारा समाज में रहकर सीखे जाते हैं।
(ख) प्रायः सभी व्यक्तियों में इनका स्वरूप भिन्न-भिन्न होता है।
(ग) इन प्रेरकों की समुचित पूर्ति के अभाव में भी जीवन चलता रहता है।
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ

प्रश्न 13.
अनुमोदन अभिप्रेरणा है
(क) जन्मजात
(ख) व्यक्तिगत
(ग) सामाजिक
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 14.
सम्बन्धन प्रेरक है
(क) जन्मजात
(ख) व्यक्तिगत
(ग) सामाजिक
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 15.
मैक्डूगल नामक मनोवैज्ञानिक ने प्रेरित व्यवहार का क्या कारण बताया है?
(क) वंशानुक्रम
(ख) उत्तेजना
(ग) मूल प्रवृत्तियाँ
(घ) वातावरण

प्रश्न 16.
मूल प्रवृत्तियों की विशेषताएँ हैं
(क) ये जन्मजात होती हैं।
(ख) ये प्राणियों के स्वभाव में निहित होती हैं।
(ग) मूल प्रवृत्तियाँ किसी-न-किसी संवेग से सम्बद्ध होती हैं।
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ।

प्रश्न 17.
मूल प्रवृत्तियों के आधार पर प्रेरणात्मक व्यवहार की व्याख्या की गई
(क) मास्लो द्वारा
(ख) वुण्ट द्वारा
(ग) वाटसन द्वारा
(घ) मैक्डूगल द्वारा

प्रश्न 18.
अभिप्रेरणात्मक व्यवहार की व्याख्या मूल प्रवृत्तियों के आधार पर किसने की है?
(क) वाटसन
(ख) स्किनर
(ग) मैक्डूगल
(घ) वुण्ट

प्रश्न 19.
ऐसे तनाव या क्रियाशीलता की अवस्था को क्या कहकर पुकारते हैं जो किसी आवश्यकता द्वारा उत्पन्न होती है?
(क) अन्तनोंद
(ख) आवश्यकता
(ग) प्रलोभन
(घ) संवेग

प्रश्न 20.
आमाशय एवं आँत की सिकुड़न से सम्बन्धित तथा रक्त की रासायनिक दशा पर निर्भर कौन-सा प्रेरक है?
(क) क्रोध
(ख) मल-मूत्र त्याग
(ग) प्यास
(घ) भूख

प्रश्न 21.
कौन-सा प्रेरक व्यक्ति को अपने लक्ष्य के मार्ग में बाधा आने पर विजय पाने तथा संघर्ष के लिए अभिप्रेरित करता है?
(क) पलायन
(ख) युयुत्सा
(ग) अनुकरण
(घ) क्रोध

प्रश्न 22.
‘काम की मूल प्रवृत्ति को ही सम्पूर्ण मानव-व्यवहार एवं क्रियाओं का उद्गम स्वीकार करने वाले मनोवैज्ञानिक का नाम क्या है?
(क) सिगमण्ड फ्रॉयड
(ख) ट्रॉटर
(ग) बी० एन० झा
(घ) वुडवर्थ

उत्तर :

  1. (क) गिलफोर्ड
  2. (घ) प्रेरणा
  3. (ग) अतिरिक्त शक्ति का संचालन
  4. (घ) व्यवहार में दिशा
  5. (ग) हो ही नहीं सकता
  6. (घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व
  7. (ग) भूख
  8. (क) प्यास
  9. (ग) संग्रहणशीलता
  10. (क) जैविक अभिप्रेरक
  11. (घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएं
  12. (घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ
  13. (ग) सामाजिक
  14. (ग) सामाजिक
  15. (ग) मूलप्रवृत्तियाँ
  16. (घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ
  17. (घ) मैक्डूगल द्वारा
  18. (ग) मैक्डूगल
  19. (क) अन्तनोंद
  20. (घ) भूख
  21. (ख) युयुत्सा
  22. सिगमण्ड फ्रॉयड।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 5 Attention

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 5 Attention (अवधान) are part of UP Board Solutions for Class 11 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 5 Attention (अवधान).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 5
Chapter Name Attention
(अवधान)
Number of Questions Solved 35
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 5 Attention (अवधान)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अवधान या ध्यान का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। अवधान की प्रमुख विशेषताओं का भी उल्लेख कीजिए।
या
अवधान को परिभाषित कीजिए।

अवधान का अर्थ
(Meaning of Attention)

सामान्य दृष्टिकोण से ‘अवधान या ‘ध्यान का अर्थ है-‘किसी काम में मन लगाना। भारतीय दर्शन में अवधान (ध्यान) को एक विलक्षण या अद्भुत शक्ति माना गया है। प्रत्येक कार्य को करते समय व्यक्ति अपनी चेतना, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को लगाती है। उसका अपनी मानसिक शक्तियों या चेतना का वातावरण की किसी विशेष उत्तेजना पर केन्द्रित करना तत्कालीन आवश्यकता अथवा लक्ष्य सिद्धि पर निर्भर करता है। अपनी चेतना या मानसिक शक्तियों को जब व्यक्ति किसी विषय-वस्तु पर केन्द्रित करता है तो केन्द्रीकरण की यह प्रक्रिया या अवस्था अवधान कहलायेगी। वस्तुतः अवधान की यह प्रक्रिया व्यक्ति के उस कार्य-व्यापार की सफलता का आधार है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अवधान एक सामान्य मानसिक प्रक्रिया है।

अवधान की परिभाषा
(Definition of Attention)

प्रमुख विद्वानों ने अवधान को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है –

  1. जे० एस रॉस के अनुसार, “अवधान किसी विचार की वस्तु को मन के सम्मुख स्पष्ट रूप में रखने की प्रक्रिया है।”
  2. मैक्डूगल के अनुसार, “ज्ञानात्मक प्रक्रिया पर पड़े प्रभाव की दृष्टि से विचार करने पर अवधान एक चेष्टा या प्रयास-भर है।”
  3. डूमवाइल के अनुसार, “यह (अवधान) किन्हीं अन्य वस्तुओं की अपेक्षा किसी एक वस्तु पर चेतना का केन्द्रीकरण है।”
  4. एन० एल० मन के कथनानुसार, “हम चाहे जिस दृष्टिकोण से विचार करें, अन्तिम विश्लेषण में अवधान एक प्रेरणात्मक प्रक्रिया है।”

अवधान के अर्थ एवं उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि “अवधान (ध्यान) किसी एक विचार को मानव मस्तिष्क में स्पष्टत: अंकित करने से सम्बन्धित या मानव चेतना की चुनाव सम्बन्धी अवरत एवं सुव्यवस्थित प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया मानव के मस्तिष्क में मौजूद विविध वस्तुओं में से कभी एक तो कभी अन्य को चेतना के ध्यान केन्द्र में पहुँचाती है।”

अवधान की विशेषताएँ
(Characteristics of Attention)

अवधान के अर्थ एवं परिभाषा के आधार पर हम अवधान की कुछ विशेषताओं पर प्रकाश डाल सकते हैं। ये विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) चंचलता – अवधान की प्रकृति चंचल है। हमारा अवधान हमेशा एक वस्तु से दूसरी वस्तु की ओर परिवर्तित होता रहता है। यह निरन्तर खिसकता रहता है। अवधान की चंचलता पर हुए प्रयोगों से सिद्ध होता है कि हमारा ध्यान किसी वस्तु या विचार पर अधिक समय तक नहीं टिकता। ध्यान परिवर्तन की अवधि 9 से 10 सेकण्ड तक बतायी गयी है।

(2) चयनात्मक प्रक्रिया – व्यक्ति अपने चारों तरफ के वातावरण में विभिन्न तत्त्वों से घिरा है. किन्तु वह एक समय पर उनमें से सिर्फ एक तत्त्व की ओर ही ध्यान केन्द्रित कर सकता है। इसीलिए अवधान की वस्तु का चयन किया जाता है। हमारी चेतना की सीमा के भीतर की विभिन्न वस्तुओं में से हमारा मस्तिष्क एक वस्तु को चुन लेता है और वही चेतना के ध्यान-केन्द्र में पहुँच जाती है। चयन की यह प्रक्रिया हर समय चलती रहती है।

(3) मानसिक सक्रियता – किसी वस्तु पर ध्यान केन्द्रित करते समय हमारा मस्तिष्क सक्रिय हो जाता है और वह कोई-न-कोई क्रिया अवश्य करता है। इस प्रकार अवधान में मानसिक प्रक्रियाएँ सक्रिय रहती हैं।

(4) संकुचित क्षेत्र – अवधान का क्षेत्र काफी संकीर्ण अथवा संकुचित होता है। मानव-मस्तिष्क एक साथ अनेक वस्तुओं पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर सकता।

(5) प्रयोजनशीलता – अवधान एक उद्देश्यपूर्ण क्रिया है। अवधान का कोई-न-कोई लक्ष्य या प्रयोजन अवश्य होता है। जिसकी प्रेरणावश व्यक्ति का ध्यान उस वस्तु या उद्दीपक की ओर केन्द्रित होता है। यह उद्देश्य या लक्ष्य बौद्धिक हो सकता है; जैसे–किसी अमूर्त विचार की ओर ध्यान केन्द्रित होना; अथवा संवेदनात्मक हो सकता है; जैसे-गाने, दृश्य या सुगन्ध की तरफ ध्यान लगना; और बौद्धिक एवं संवेदनात्मक दोनों भी हो सकता है, जैसे-शतरंज के खेल में ध्यान का केन्द्रण।

(6) तत्परता – तत्परता का गुण अवधान की प्रक्रिया में सहायता करता है। अवधान के लिए व्यक्ति का मानसिक रूप से तत्पर होना आवश्यक है। यदि व्यक्ति किसी वस्तु पर ध्यान लगाने के लिए मानसिक रूप से तत्पर (तैयार) नहीं है तो उस वस्तु पर शीघ्र ध्यान न लग सकेगा।

(7) अन्वेषणात्मकता – अवधान में अन्वेषणात्मकता की विशेषता पायी जाती है। जिस नवीन वस्तु की ओर हमारा अवधान खिंचता है, उसके विषय में हम अन्वेषण या खोज करने लगते हैं तथा उसकी अच्छाई-बुराइयों की छानबीन का प्रयास करने लगते हैं।

(8) शारीरिक समायोजन – अवधान की प्रक्रिया समायोजन (Adjustment) से सम्बन्धित है। मानसिक समायोजन के साथ-साथ अवधान में शारीरिक समायोजन भी होता है। इसके यह तीन प्रकार है :

(i) ग्राहक समायोजन – जब व्यक्ति किसी उत्तेजना के प्रति ध्यान लगाता है तो उससे जुड़े ग्राहक अंग या ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, नाक, कान, जिह्वा तथा त्वचा) उस उत्तेजना से सम्बद्ध हो जाते हैं और विशिष्ट रूप से समायोजित हो जाते हैं।
(ii) शरीर-मुद्रा समायोजन – अवधान की प्रक्रिया में जिस तरफ से उत्तेजना प्राप्त होती है, व्यक्ति अपना शरीर झुका लेता है। ध्यानपूर्वक कोई खास बात सुनते समय नेत्र श्रोता की ओर टकटकी लगाते हैं, गर्दन उस ओर झुक जाती है तथा शरीर के अंग हिलना-डुलना बन्द कर देते हैं।
(iii) मांसपेशीय समायोजन – अवधान के दौरान मांसपेशियाँ एक तनाव की दशा में आ जाती हैं और इस वजह से अधिक सक्रिय हो जाती हैं। इससे ध्यान केन्द्रित करने में मदद मिलती है।

(9) त्रिपक्षीय प्रक्रिया – एक मानसिक प्रक्रिया होने के कारण अवधान का सीधा सम्बन्ध मन से है। मन के तीन विभिन्न पक्ष हैं-ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक पक्ष। ध्यान के माध्यम से व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त होता है, उसके भीतर भावनाओं का उदय होता है और किसी-न-किसी क्रिया का जन्म भी होता है।

(10) विश्लेषणात्मकता और संश्लेषणात्मकता – अवधान के अन्तर्गत उत्तेजनाओं के विविध पक्षों का विश्लेषण एवं संश्लेषण होता रहता है। किसी वस्तु-विशेष की ओर ध्यान केन्द्रित होने पर मस्तिष्क उससे सम्बन्धित विभिन्न तत्त्वों या पक्षों का विश्लेषण करता है; जैसे—किसी पौधे के सामने आने पर उसके तने, पत्तियों, शाखाओं, प्रशाखाओं, पुष्पों तथा फलों की ओर अलग-अलग ध्यान जाता है। तत्पश्चात् इन सभी अंगों को मिलाकर पौधे का सम्पूर्ण स्वरूप यानी पौधे के संश्लेषित पक्ष की ओर भी ध्यान देते हैं।

प्रश्न 2.
अवधान में सहायक मुख्य दशाओं अथवा अवधान के निर्धारक कारकों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
या
अवधान की बाह्य या वस्तुगत दशाओं तथा आन्तरिक या आत्मगत दशाओं का उल्लेख कीजिए।
या
अवधान के किन्हीं दो वस्तुगत निर्धारकों को स्पष्ट कीजिए।
या
अवधान के निर्धारकों का विस्तार से वर्णन कीजिए।

उत्तर :

अवधान की मुख्य सहायक दशाएँ (ध्यान के कारण अथवा निर्धारक)
(Favourable Conditions/Causes or Determinants of Attention)

अवधान या ध्यान एक चयनात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति एक विशेष शारीरिक मुद्रा बनाकर किसी वस्तु को चेतना के केन्द्र में लाने के लिए तत्पर रहता है। अवधान की प्रक्रिया के अन्तर्गत व्यक्ति अनेक उपस्थित उद्दीपकों में से किसी विशिष्ट उद्दीपक को चुनता है तथा उसे अपनी चेतना के केन्द्र में लाता है। अवधान की सहायक दशाओं में या निर्धारकों से ज्ञात होता है कि हम किसी वस्तु पर ध्यान क्यों देते है?

वे सभी दशाएँ जो एक वस्तु या उत्तेजना को हमारे अवधान का केन्द्र बनाती हैं, अवधान की मुख्य सहायक दशाएँ कहलाती हैं। हमारा ध्यान किसी एक विशेष वस्तु की ओर क्यों केन्द्रित होता है, यह अवधान की दशाओं द्वारा निर्धारित होता है। अवधान की इन निर्धारक दशाओं को हम अवधान का कारण भी कह सकते हैं। ये दशाएँ मुख्यत: दो प्रकार की होती हैं–(अ) बाह्य या वस्तुगत दशाएँ तथा (ब) आन्तरिक या आत्मगत दशाएँ।

(अ) अवधान की बाह्य या वस्तुगत दशाएँ
(External or Objective Conditions of Attention)

जब किसी वस्तु अथवा परिस्थिति की ओर व्यक्ति का ध्यान केन्द्रित करने का कारण स्वयं उस वस्तु में ही मौजूद होता है तो इस प्रकार की दशाएँ बाह्य या वस्तुगत दशाएँ कहलाती हैं। ये बाह्य दशाएँ अनेक बाह्य उत्तेजनाओं पर निर्भर करती हैं, जिनमें से प्रमुख उत्तेजनाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) उत्तेजना को व्यवस्थित रूप – अनिश्चित एवं अस्पष्ट रूप वाली वस्तुओं की अपेक्षा निश्चित तथा व्यवस्थित रूप वे आकार वाली वस्तुएँ हमारे ध्यान को जल्दी और अधिक आकर्षित करती हैं। उदाहरणार्थ-पूर्णिमा की रात्रि को पूर्णचन्द्र के आसपास तैरते बादलों की अपेक्षा चन्द्रमा की ओर हमारा ध्यान जल्दी जाता है। बादलों का रूप अनिश्चित है, जबकि चन्द्रमा का रूप निश्चित। पृष्ठभूमि की अन्य वस्तुओं की अपेक्षा ताजमहल हमें अपनी ओर अधिक आकर्षित करता है।

(2) उत्तेजना का आकार – अवधान को आकर्षित करने में किसी वस्तु का आकार भी महत्त्वपूर्ण है। छोटे आकार की वस्तु पर हमारी चेतना जल्दी केन्द्रित नहीं हो पाती, किन्तु बड़े आकार की वस्तुएँ अपेक्षाकृत हमारे अवधान को जल्दी आकर्षित कर लेती हैं। उदाहरण के लिए-छोटे आकार के चित्र की अपेक्षा बड़े चित्र की ओर ध्यान आसानी से केन्द्रित होता है। प्रत्येक दुकानदार बड़े-से-बड़ा साइनबोर्ड लगवाना चाहता है।

(3) तीव्रता – अधिक तीव्रता वाले उत्तेजक कम तीव्रता वाले उत्तेजक की अपेक्षा हमारा ध्यान शीघ्र ही आकर्षित कर लेते हैं। जलते हुए दीपक की अपेक्षा विद्युत बल्ब का प्रकाश जल्दी ध्यान आकर्षित करता है। रेलवे प्लेटफार्म पर जोर से आवाज लगाने वाले हॉकर की ओर अन्यों की तुलना में अधिक ध्यान जाता है।

(4) स्थिति – उत्तेजना की स्थिति हमारा ध्यान आकर्षित करने में एक महत्त्वपूर्ण दशा है। किसी विशेष स्थान अथवा स्थिति में उपस्थित उत्तेजना अपनी ओर हमारा ध्यान शीघ्रता से खींच लेती है। अखबार में अलग-अलग अभिप्राय के समाचार अपने विशिष्ट स्थानों पर छपते हैं और वहीं से हमारा ध्यान खींच लेते हैं। किसी कार्यालय में एक अधिकारी पद के अनुसार अपनी विशिष्ट स्थिति के आधार पर हमारे ध्यान को अपनी ओर खींच लेता है।

(5) गति – स्थिर वस्तुओं की तुलना में गतिशील वस्तुओं की ओर जल्दी ध्यान जाता है। विवह, नुमाइश या प्रदर्शनी के मौके पर गति करता हुआ बिजली का जलता-बुझता’प्रकाश हमारे अवधान को जल्दी एवं अधिक आकर्षित कर लेता है। असंख्य स्थिर तारों के बीच टूटा हुआ और पृथ्वी की ओर गति करता हुआ तारा अधिक ध्यान आकर्षित करता है।

(6) स्वरूप – ध्यान केन्द्रित करने में उत्तेजना का स्वरूप भी अपनी विशेष भूमिका निभाता है। जब उत्तेजक अथवा वस्तु के स्वरूप में कोई विशिष्टता होती है तो इससे हमारा ध्यान जल्दी आकर्षित होता है, लेकिन साधारण स्वरूप की वस्तुओं पर अधिक ध्यान नहीं जाता। साधारण प्रकार के वस्त्र पहने हुए अनेक लोगों के बीच यदि कोई चटकीले-भड़कीले वस्त्र पहने हुए है तो हमारा ध्यान उस एक व्यक्ति की ओर ही आकर्षित होगा।

(7) नवीनता – नवीनता ध्यान की अत्यधिक अनुकूल दशा है। पुरानी पृष्ठभूमि में किसी नवीन वस्तु या परिस्थिति की ओर अनायास ही ध्यान चला जायेगा। यदि कोई व्यक्ति पुराने वस्त्रों को बदलकर नये वस्त्र पहनकर आये तो हमारा ध्यान सहज ही उसकी ओर आकृष्ट हो जायेगा। नवीन ध्वनि, गन्ध, स्वाद या फैशन की ओर जल्दी ध्यान केन्द्रित होता है।

(8) परिवर्तनशीलता – वस्तु या उत्तेजना के परिवर्तन के कारण भी सहज ही ध्यान आकर्षित होता है। अपरिवर्तनशील या स्थिर वस्तुएँ ऐसा नहीं कर पातीं। सत्य ही, लगातार एक जैसी उत्तेजना या वस्तु से हमारा मन ऊब जाता है और हम उसकी ओर आकर्षित नहीं हो पाते। हेयर कटिंग कराने के बाद व्यक्ति कुछ बदला-बदला नजर आता है और यह परिवर्तन उसमें आकर्षण भर देता है जिसके प्रति बरबस ध्यान चला जाता है। परिवर्तनशीलता एक महत्त्वपूर्ण दशा है।

(9) विषमता – विषम या विरोधी गुण वाली वस्तु सहज ही हमारा ध्यान आकर्षित कर लेती है। गोरे रंग के व्यक्तियों के बीच एक काले रंग का व्यक्ति सभी लोगों का ध्यान खींच लेता है।

(10) रहस्यमयता – रहस्यमय परिस्थितियाँ या वस्तुएँ मानव मन की जिज्ञासाओं के केन्द्र बनते हैं और हमारा ध्यान आसानी से व जल्दी आकृष्ट कर लेते हैं। यदि किसी इमारत के सभी कमरों के दरवाजे खुले हों और सिर्फ कमरे के दरवाजे पर ताला पड़ा हो तो दर्शकों के लिए वही एक कमरा रहस्य की वस्तु बन जायेगा जिसे देखने के लिए हर कोई लालायित होगा।

(11) अवधि य उपस्थिति-काल – उत्तेजना की अवधि या उसका उपस्थिति-काल भी अवधान को प्रभावित करता है। लम्बी अवधि तक रहने वाली उत्तेजना अपनी ओर शीघ्र ध्यान केन्द्रित करती है, किन्तु थोड़ी अवधि तक रहने वाली अथवा क्षणिक उत्तेजना हमारे ध्यान को उतनी शीघ्र आकर्षित नहीं कर पाती। किसी फैक्ट्री या मिल से लम्बे समय तक बजने वाला भोंपू या सायरन हमारे ध्यान को सहज ही अपनी तरफ खींच लेता है। सड़क पर वाहनों के ड्राइवर अक्सर सामने आये किसी वाहन को देर तक हॉर्न बजाकर हटने के लिए मजबूर कर देते हैं।

(12) पुनरावृत्ति – जब कोई उत्तेजना बार-बार प्रकट होती है और जिन वस्तुओं के वातावरण में पुनरावृत्ति होती रहती है, उनकी तरफ तत्काल ही ध्यान आकृष्ट हो जाता है। यदि रात में घर का कुत्ता बार-बार भौंके तो गृहस्वामी उसे खतरे का संकेत समझता है और उस स्थिति की ओर तुरन्त ध्यान देता है।

(ब) अवधान की आन्तरिक या आत्मगत दशाएँ
(Internal or Subjective Conditions of Attention)

अवधान की कुछ ऐसी दशाएँ भी हैं जिनका निर्धारण आन्तरिक दशाओं द्वारा होता है। ये दशाएँ व्यक्ति के अन्दर स्थित होती हैं तथा उसकी अभिप्रेरणाओं से उत्पन्न होती हैं। इन्हें अवधान की आत्मगत दशाएँ भी कहते हैं। अवधान को प्रभावित करने वाली कुछ प्रमुख आन्तरिक या आत्मगत दशाएँ निम्न प्रकार हैं

(1) मनोवृत्ति – प्रत्येक व्यक्ति के मन की एक वृत्ति होती है। यह अवधान की आन्तरिक दशाओं में से एक महत्त्वपूर्ण दशा है। जिस वस्तु के कारण हमें मूल-प्रवृत्तात्मक उत्तेजना प्राप्त होती है, उस वस्तु की ओर हमारा ध्यान आकर्षित हो जाता है। धार्मिक मनोवृत्ति वाला व्यक्ति आम प्रचलित फिल्मों के पोस्टरों की ओर आकर्षित नहीं होगा, किन्तु यदि ‘सम्पूर्ण रामायण’ फिल्म का पोस्टर उसे कहीं लगा मिल जाये तो वह तत्काल आकृष्ट हो जायेगा।

(2) संवेग – संवेग का अवधान पर काफी प्रभाव पड़ता है। अन्धकार में जब हम भयकी संवेगावस्था से प्रेरित होते हैं तो साधारण-सी आहट भी हमें अपनी ओर आकर्षित करती है। यदि व्यक्ति किसी से नफरत करता है तो उसकी जरा-सी भूल भी उस व्यक्ति का ध्यान आकर्षित कर लेती है, किन्तु प्रसन्नता की संवेगावस्था में इन्हीं जरा-जरा सी भूलों पर व्यक्ति का ध्यान नहीं जाता। संवेग अवधान की महत्त्वपूर्ण आन्तरिक दशा है।

(3) रुचि – अवधान के लिए रुचि का बड़ा महत्त्व है। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की भिन्न-भिन्न रुचियाँ होती हैं और वे विषयों का अवलोकन भी व्यक्तिगत रुचि के आधार पर ही करते हैं। जो व्यक्ति जिस प्रकार की रुचि रखता है उसी से सम्बन्धित वस्तुओं के प्रति उसका ध्यान जाता है। सट्टेबाजों का ध्यान समाचार-पत्र के बाजार भावों में रहता है, छात्र का पुस्तकों में, संगीतशास्त्री का संगीत में तथा क्रिकेट प्रेमी का ध्यान टी० वी० पर आ रहे टेस्ट मैच पर ही केन्द्रित होगा।

(4) जिज्ञासा – जिज्ञासा भी अवधान की एक आंतरिक दशा है। किसी वस्तु या उत्तेजना के बारे में व्यक्ति की जितनी तीव्र जिज्ञासा होगी। उसके बारे में परिचय पाने की दृष्टि से उसकी ओर ध्यान भी उतना ही अधिक जायेगा।

(5) अनुभव – अनुभव का अवधान से गहरा सम्बन्ध है। विगत अनुभव के आधार पर हमारा ध्यान उस वस्तु की ओर चला जाता है। पहले से अनुभव की गई वस्तुओं, घटनाओं या उत्तेजनाओं की तरफ हमारा ध्यान जल्दी तथा सहज रूप से चला जाता है। यदि राम, मोहन से पहले कभी मिला है तो भविष्य में किसी अवसर पर मोहन को देखकर राम का ध्यान उसकी तरफ खिंच जाएगा। किसी व्यक्ति ने आपत्ति के समय हमें नि:स्वार्थ मदद दी हो तो संमान परिस्थितियों में उस व्यक्ति की ओर ध्यान चला जाएगा। ऐसा पिछली अनुभूतियों के कारण है।

(6) आवश्यकताएँ – आवश्यकता व्यक्ति के अवधान की मुख्य सहायक दशा है। इस दृष्टि से ये दो प्रकार की होती हैं—शारीरिक और मानसिक आवश्यकताएँ। दोनों ही प्रकार की आवश्यकताएँ अवधान केन्द्रण में हमारी मदद करती हैं। प्यासे व्यक्ति का ध्यान पानी की ओर जाता है, क्योंकि उसे पानी की आवश्यकता है।

(7) उद्देश्य यो लक्ष्य – हम प्रायः उन्हीं वस्तुओं या व्यक्तियों की ओर ध्यान देते हैं जिनसे हमारा उद्देश्य या लक्ष्य पूरा होता है, किन्तु जो हमारे उद्देश्य की पूर्ति में सहायक नहीं हैं उनकी तरफ ध्यान भी आकृष्ट नहीं होता है। माना किसी पुलिस अधिकारी का लक्ष्य एक हत्यारे की खोज करना है, तो अधिकारी हत्यारे से सम्बन्धित छोटे-से-छोटे तथ्य की ओर भी ध्यान देगा।

(8) आदत – आदत को अवधान की सबसे अनुकूल दशा माना गया है। व्यक्ति को जब जिस विषय-वस्तु की आदत होती है उससे सम्बन्धित पदार्थ की ओर एक निर्धारित समय पर उसका ध्यान अवश्य चला जायेगा। यदि किसी को दोपहर बाद तीन बजे चाय पीने की आदत है तो निश्चित समय पर उसका ध्यान चाय की ओर केन्द्रित हो जाएगा।

(9) मानसिक तत्परता – मानसिक तत्परता से अभिप्राय है व्यक्ति के मन का झुकाव। किसी व्यक्ति के मन का झुकाव जिस वस्तु या उत्तेजना की ओर जिस समय होता है, उसका ध्यान भी उसी ओर आकर्षित हो जाता है। परीक्षाकाल में विद्यार्थियों का ध्यान वातावरण के अन्य आकर्षणों से हटकर परीक्षा से सम्बन्धित बातों की ओर ही लगा रहता है।

(10) अर्थ – सार्थक विषय-वस्तुओं की ओर हमेशा ध्यान जल्दी आकर्षित होता है, किन्तु जिन चीजों के अर्थ का हमें ज्ञान नहीं होता उनकी ओर हमारा ध्यान भी नहीं जाता। यदि कोई व्यक्ति शतरंज का खेल जानता है और उसकी चालों को भी बखूबी पहचानता है तो उसका ध्यान शतरंज के खेल की तरफ जाएगा, परन्तु जो इस खेल से अनभिज्ञ है वह शतरंज के खेल की तरफ ध्यान नहीं देगा।

उपर्युक्त विवेचन में हमने अवधान की बाह्य और आन्तरिक सहायक दशाओं का ज्ञान प्राप्त किया है। ये दशाएँ व्यक्ति के ध्यान को पर्याप्त रूप से प्रभावित करती हैं और इन्हीं के कारण व्यक्ति किसी वस्तु-विशेष की ओर ध्यान केन्द्रित करता है, जबकि उसके चारों ओर वातावरण में अनेक उत्तेजनाएँ मौजूद होती हैं।

प्रश्न 3.
रुचि का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। रुचि एवं ध्यान
या
अवधान का सम्बन्ध भी स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :

रुचि का अर्थ व परिभाषा
(Meaning and Definition of Interest)

अवधान के प्रत्यय की व्याख्या करते समय रुचि’ की महत्त्वपूर्ण अवधारणा को भी समझना आवश्यक है। अवधान और रुचि का गहरा मेल है और दोनों ही विचार एक-दूसरे की परिपूर्ति करते हैं। जिन कार्यों में हम रुचि लेते हैं उन्हें करने में हमें सुख और सन्तोष मिलता है-आनन्द की प्राप्ति होती है। ऐसे कार्यों को करने के लिए हम प्रेरित होते हैं और ध्यान लगाकर अथक रूप से उन्हें पूरा करते हैं। वस्तुतः हम उन्हीं वस्तुओं या कार्यों की ओर उन्मुख होते हैं जो हमारे भीतर रुचि उत्पन्न करते हैं।

रुचि को एक ऐसी प्रवृत्ति अथवा प्रेरक-शक्ति के रूप में जाना जा सकता है जो हमें वातावरण के कुछ विशिष्ट तत्त्वों की ओर ध्यान देने की प्रेरणा प्रदान करती है। इसे प्रभावपूर्ण अनुभव भी कह सकते हैं जो स्वयं अपनी सक्रियता से उत्तेजित होता है। इस अर्थ में यह एक व्यक्ति के अनुभव की पुकार है और इसका तात्पर्य–व्यक्तिगत तात्पर्य है। कुछ विद्वानों के अनुसार “रुचि किसी उत्तेजना, वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति की ओर आकर्षित होने की प्राकृतिक, जन्मजात या अर्जित प्रवृत्ति है।” लैटिन भाषा में रुचि शब्द का अर्थ है-“यह आवश्यक होती है” (It Matters.) या यह सम्बन्धित होती है’ (It Concerns.)। दूसरे शब्दों में, हमारे अन्दर, रुचि पैदा करने वाली वस्तु हमारे लिए आवश्यक होती है और हमसे सम्बन्धित भी होती है।

रुचि का आधार प्रायः मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ हैं। सच तो यह है कि मनुष्य की आवश्यक रुचियाँ स्वयं उसकी मूल प्रवृत्तियाँ होती हैं अर्थात् आरम्भिक अवस्थाओं में मनुष्य की रुचियाँ मूल प्रवृत्त्यात्मक कही जाती हैं। रुचि एक अस्थायी तथा सामाजिक प्रकार की शक्ति है जो अपना कार्य पूर्ण करने के बाद विलीन हो जाती है। बच्चे की रुचि खिलौने में होती है, कुछ बड़े बालकों का आकर्षण हम उम्र साथियों के प्रति होता है, किशोर विपरीत-लिंगी व्यक्ति की ओर आकर्षित होता है तथा किसान खेती-बाड़ी में रुचि रखता है। रुचि की विरोधी प्रवृत्ति उपेक्षा है।

रुचि की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. जेम्स ड्रेवर के अनुसार, “रुचि अपने में ही एक गत्यात्मक वृत्ति है।”
  2. क्रो एवं क्रो के अनुसार, “रुचि उस प्रेरक शक्ति को कहते हैं जो हमें किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा क्रिया के प्रति ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है।”
  3. मैक्डूगल का कथन है, “रुचि गुप्त अवधान होता है और अवधान रुचि का क्रियात्मक रूप है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के अनुसार-रुचि को गत्यात्मक वृत्ति, प्रेरक शक्ति गुप्त तथा अवधान के रूप में समझा गया है। अवधान की ही भाँति रुचि के भी तीन पक्ष माने गये हैं-ज्ञानात्मक, क्रियात्मक और भावात्मक।

रुचि और अवधान का सम्बन्ध (रुचि का अवधान में महत्त्व)
(Relationship between Attention and Interest)

रुचि और अवधान के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है। ये दोनों एक ही वस्तु का प्रत्यक्ष करने के दो भिन्न दृष्टिकोण हैं और एक-दूसरे के पूरक समझे जाते हैं। व्यक्ति की जन्मजात एवं अर्जित रुचियाँ परस्पर मिलकर कार्य करती हैं और अवधान केन्द्रित करने में सहायता करती हैं। इसी प्रकार किसी वस्तु पर ध्यान केन्द्रित करने से शनैः-शनैः उसमें रुचि विकसित हो जाती है।

रुचि और अवधान सम्बन्धी मनोवैज्ञानिक मत-रुचि और अवधान के सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से निम्नलिखित तीन मत अभिव्यक्त होते हैं

(1) अवधान रुचि पर आधारित है – कुछ विद्वानों का मत है कि अवधान रुचि पर आधारित होता है। सामान्य रूप से व्यक्ति उन्हीं घटनाओं, पदार्थों या कार्यों पर ध्यान देता है जिनमें उसकी रुचि होती है। यदि किसी व्यक्ति की संगीत में गहरी रुचि है तो अन्य क्रियाओं में व्यस्त रहते हुए भी उसका ध्यान दूर से सुनाई पड़ रहे संगीत की और चला जाएगा, किन्तु यदा-कदा ऐसा भी देखा गया है कि किसी चीज में रुचि होने के बावजूद भी हम उसकी ओर ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते और कोई अन्य तीव्र उत्तेजना अपनी तरफ हमारा ध्यान खींच लेती है। यदि बालक पाठ में रुचि लेकर पढ़ रहा है, किन्तु गली में भालू वाला डुगडुगी बजाकर भालू का खेल दिखा रहा है तो निश्चय ही बालक को ध्यान भालू की ओर जाएगा, लेकिन यह भी सत्य है कि यदि बालक की पाठ में तीव्र रुचि होगी तो थोड़े-बहुत भटकाव के बाद उसका ध्यान पुनः पाठ में अवस्थित हो जाएगा।

(2) अवधान रुचि को प्रभावित करता है – एक ओर यदि अवधान रुचि पर आधारित है तो दूसरी ओर रुचि अवधान पर आधारित होती है अर्थात् अवधान रुचि को प्रभावित करता है। किसी वस्तु के प्रति ध्यान केन्द्रित करने से उसके प्रति रुचि स्वतः ही बढ़ जाती है। यह सम्भव है कि प्रारम्भ में किसी वस्तु या घटना में हमारी रुचि न हो, किन्तु यदि उसकी ओर लगातार जबरन अवधान केन्द्रित किया जाए तो अन्ततः उसमें रुचि उत्पन्न हो ही जाती है। यदि किसी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह चार बजे जबरदस्ती जगा दिया जाए तो शुरू में यह प्रक्रिया उसे अरुचिपूर्ण तथा पीड़ादायक ही महसूस होगी, किन्तु एक दिन उस निश्चित समय पर जागने की उसे आदत पड़ जाएगी, जिसे बाद में वह रुचि के साथ करने लगेगा।

(3) समन्वयवादी विचारधारा – समन्वयवादी विचारधारा के अनुसार रुचि और अवधान दोनों का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और एक-दूसरे को समान रूप से प्रभावित करते हैं।

रुचि गुप्त अवधान और अवधान एक क्रियाशील रुचि-यहाँ हम विख्यात मनोवैज्ञानिक विलियम मैक्डूगल के कथन का विवेचन करते हुए अवधान एवं रुचि के मध्य सम्बन्ध स्थापित करेंगे। जिस प्रकार एक संरचना (Structure) क्रिया (Action) से सम्बन्धित होती है, उसी प्रकार रुचि अवधान से जुड़ी है। किसी प्रत्यय के सम्पूर्ण एवं व्यवस्थित ज्ञान के लिए उसका संरचनात्मक एवं क्रियात्मक अध्ययने आवश्यक है। इसी कारणवश विज्ञान के विद्यार्थी पहले विद्युत घण्टी की संरचना (बनावट) का ज्ञान प्राप्त करते हैं, फिर उसकी क्रियाविधि के विषय में जानने का प्रयास करते हैं। मानव मन से सम्बन्धुित व्यापार में भी मानसिक संरचना तथा मानसिक क्रिया दोनों महत्त्वपूर्ण हैं तथा । दोनों का समान रूप से योगदान है। मानसिक संरचना रुचि है और मानसिक क्रिया ‘अवधान है। संरचना क्रिया को संचालित करती है अर्थात् रुचि अवधान का संचालन करती है। दूसरे शब्दों में, मानव की रुचि का अभिप्रकाशन उसके अवधान के रूप में होता है। यह कहना एक भूल होगी कि जिस वस्तु में मनुष्य की रुचि नहीं है उसमें अवधान नहीं होगा तथा जिस वस्तु की ओर अवधान केन्द्रित होता है, उसमें रुचि भी अवश्य होती है। परीक्षा की तैयारी के लिए विद्यार्थी पाठ में रुचि न होने पर भी ध्यान देता है। कुछ विद्वानों का यह मत उचित नहीं कहा जा सकता कि अवधान रुचि का परिणाम होता है। रुचि एक मानसिक संस्कार है जो अवधान के लिए एक अत्यन्त आवश्यक तत्त्व या दशा है। अवधान के विभिन्न आन्तरिक प्रेरक हैं और उनमें से सबसे बलवान प्रेरक रुचि है। सामान्यतः व्यक्ति किसी वस्तु-विशेष के प्रति रुचि रखता है। उसे बलात् कुछ अन्य कार्य भी करने पड़ते हैं जिनमें उसका अवधान केन्द्रित रहता है, किन्तु यह अवधान उसकी रुचि में छिपा रहता है। इसी प्रकार किसी वस्तु पर ध्यान देने का अभिप्राय है उसमें सक्रिय रुचि को प्रकट करना। निष्कर्षत: मैक्डूगल का यह कथन कि “रुचि गुप्त अवधान है तथा अवधान एक क्रियाशील रुचि है”-सत्य प्रतीत होता है।

प्रश्न 4.
अवधान या ध्यान के विस्तार (Span of Attention) से क्या आशय है? अवधान के विस्तार को निर्धारित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए।
या
अवधान के विस्तार का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

अवधान के विस्तार का अर्थ एवं परीक्षण

हम जानते हैं कि अवधान या ध्यान एक मानसिक प्रक्रिया है तथा इस प्रक्रिया के अन्तर्गत व्यक्ति अपनी मानसिक शक्तियों को अभीष्ट विषय-वस्तु पर केन्द्रित करता है। अवधान नामक मानसिक प्रक्रिया के सन्दर्भ में अवधान के विस्तार (Span of Attention) का भी व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है।

अवधान के विस्तार का सम्बन्ध अवधान के क्षेत्र या व्यापकता से है। किसी व्यक्ति द्वारा किसी एक समय में अधिक-से-अधिक जितने बाहरी उद्दीपकों को ध्यान का विषय बनाया जाता है, उसे ही अवधान का विस्तार माना जाता है। भिन्न-भिन्न प्रकार के उद्दीपकों के सन्दर्भ में व्यक्ति के अवधान का विस्तार भी भिन्न-भिन्न होता है। इस सन्दर्भ में वुडवर्थ तथा श्लासबर्ग ने व्यवस्थित अध्ययन किया तथा निष्कर्ष स्वरूप बताया कि यदि उद्दीपक बिन्दुओं के रूप में हों तो अवधान का विस्तार सर्वाधिक होता है। इससे कम अक्षरों का अवधान विस्तार होता है। जहाँ तक ज्यामितिक आकृतियों का प्रश्न है, उनको अवधान-विस्तार सबसे कम होता है।

अवधान के विस्तार के निर्धारण के लिए हेमिल्टन नामक मनोवैज्ञानिक ने सर्वप्रथम कुछ व्यवस्थित अध्ययन आयोजित किये। उसने 1859 ई० में छात्रों के अवधान के विस्तार को जानने के लिए एक अध्ययन का आयोजन किया। इस अध्ययन के अन्तर्गत उसने विषय-पात्रों के सम्मुख संगमरमर के कुछ टुकड़ों को बिखेर दिया तथा उन्हें बिखरे हुए टुकड़ों पर तुरन्त ध्यान केन्द्रित करने का निर्देश दिया। इस परीक्षण के दौरान हेमिल्टन ने देखा कि सामान्य रूप से छात्र एक साथ अधिक-से-अधिक संगमरमर के 6-7 टुकड़ों पर अवधान को केन्द्रित करने में सफल हुए। इस प्रकार निष्कर्षस्वरूप बताया गया कि छात्रों के अवधान का विस्तार 6-7 विषयों तक है। इस परीक्षण से ही मिलता-जुलती एक अन्य परीक्षण 1871 ई० में जेवोन्स द्वारा आयोजित किया गया। उसने अपने विषय-पात्रों के सम्मुख रखी लकड़ी की ट्रे में मटर के कुछ दानों को बिखेर दिया तथा उन्हें मटर के अधिक-से-अधिक दानों पर ध्यान केन्द्रित करने का निर्देश दिया। इस परीक्षण में देखा गया कि सामान्य विषय-पात्र एक समय में 3-4 मटरों पर सरलता से ध्यान केन्द्रित करने में सफल रहा। 5 से अधिक मटरों पर ध्यान केन्द्रित करने के प्रयास में अधिक त्रुटियाँ पायी गयीं। वास्तव में अवधान का विस्तार एक मानसिक प्रक्रिया होने के साथ-साथ व्यक्तिगत क्षमता भी है। सभी व्यक्तियों का अवधान-विस्तार समान नहीं होता। कुछ का सामान्य से कम तथा कुछ का सामान्य से अधिक भी हो सकता है। अवधान के विस्तार को अभ्यास एवं प्रयास द्वारा कुछ हद तक बढ़ाया भी जा सकता है।

अवधान के विस्तार को निर्धारित करने वाले कारक

यह सत्य है कि भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के अवधान का विस्तार भिन्न-भिन्न होता है। यही नहीं, एक ही व्यक्ति का अवधान-विस्तार भी भिन्न-भिन्न काल एवं परिस्थिति में भिन्न-भिन्न हो सकता है। वास्तव में अवधान के विस्तार पर विभिन्न कारकों का अनुकूल अथवा प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अवधान के विस्तार को प्रभावित करने वाले ये कारक ही अवधान-विस्तार के निर्धारक कारक कहलाते हैं। अवधान के विस्तार के मुख्य निर्धारक कारकों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है –

(1) उद्दीपन सम्बन्धी कारक – अवधान के विस्तार के निर्धारकों में मुख्यतम कारक हैउद्दीपन सम्बन्धी कारक। अवधान-विस्तार के इस निर्धारक कारक को प्रतिप्रादित करने का कार्य हण्टर तथा सिंगलर नामक मनोवैज्ञानिकों ने किया था। विभिन्न परीक्षणों के आधार पर इन मनोवैज्ञानिकों ने निष्कर्ष प्राप्त किया कि विषय-वस्तु को प्रस्तुत करने की अवधि तथा वातावरण में विद्यमान प्रकाश की तीव्रता व्यक्ति के अवधान के विस्तार को प्रभावित करने वाले उद्दीपन सम्बन्धी मुख्य कारक हैं। यदि समुचित प्रकाश में पर्याप्त समय-अवधि के लिए किसी विषय-वस्तु को प्रस्तुत किया जाए तो व्यक्ति के अवधान का विस्तार अधिक होता है। इसके विपरीत, यदि सामान्य से कम प्रकाश में कम समय के लिए विषय-वस्तु को प्रस्तुत किया जाए तो निश्चित रूप से व्यक्ति के अवधान का विस्तार कम होता है।

(2) उद्दीपकों की सार्थकता – व्यक्ति के अवधान के विस्तार को प्रभावित एवं निर्धारित करने वाला एक कारक है–सम्बन्धित उद्दीपकों की सार्थकता। विभिन्न अध्ययनों के आधार पर निष्कर्ष प्राप्त किया गया है कि सरल एवं सार्थक उद्दीपकों के सन्दर्भ में व्यक्ति के अवधान का विस्तार सामान्य रूप से अधिक होता है। यदि उद्दीपक का स्वरूप कठिन तथा निरर्थक हो तो व्यक्ति के अवधान का विस्तार सामान्य से कम होता है। व्यवहार में भी हम देख सकते हैं कि कोई भी व्यक्ति अधिक संख्या में सार्थक शब्दों पर ध्यान केन्द्रित कर सकता है, परन्तु अधिक संख्या में निरर्थक शब्दों पर ध्यान को : केन्द्रित कर पाना प्रायः कठिन होता है।

(3) उद्दीपकों की पृष्ठभूमि – व्यक्ति के अवधान के विस्तार को निर्धारित करने में सम्बन्धित विषय-वस्तु की पृष्ठभूमि द्वारा भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जाती है। इसे कारक के स्पष्टीकरण के लिए पैटर्सन तथा टिचनर नामक मनोवैज्ञानिकों ने एक परीक्षण का आयोजन किया तथा निष्कर्षस्वरूप बताया कि यदि विषय-वस्तु की पृष्ठभूमि में अधिक विरोध हो तो उस स्थिति में व्यक्ति के अवधान का विस्तार सामान्य से अधिक होता है।

(4) उद्दीपकों के मध्य पायी जाने वाली दूरी – अवधान के विस्तार के निर्धारक कारकों में एक अन्य कारक है—उद्दीपकों के मध्य पायी जाने वाली दूरी। इस कारक को जानने के लिए 1938 ई० में वुडरो नामक मनोवैज्ञानिक ने एक परीक्षण का आयोजन किया तथा निष्कर्षस्वरूप स्पष्ट किया कि यदि उद्दीपकों के मध्य दूरी कम हो तो उस स्थिति में व्यक्ति के अवधान का विस्तार प्रायः कम होता है, क्योंकि इस स्थिति में विभिन्न उद्दीपकों को पहचानने में कुछ कठिनाई होती है। इससे भिन्न यदि सम्बन्धित उद्दीपकों के मध्य पर्याप्त दूरी हो तो उन्हें सरलता से पहचाना जा सकता है। इस दशा में व्यक्ति के अवधान का विस्तार बढ़ जाता है।

(5) उद्दीपकों से पूर्व-परिचय – यदि व्यक्ति को सम्बन्धित उद्दीपकों से पूर्व-परिचय हो तो उस दशा में अवधान का विस्तार उस स्थिति से अधिक हो सकता है, जिसमें व्यक्ति का उद्दीपकों से किसी प्रकार का पूर्व परिचय न हो।

(6) व्यक्ति की आयु – व्यक्ति के अवधान के विस्तार को प्रभावित एवं निर्धारित करने वाले कारकों में एक कारक है व्यक्ति की आयु। छोटे बच्चों को अवधान का विस्तार वयस्क व्यक्तियों की तुलना में कम होता है। आयु के आधार पर अवधान के विस्तार के इस अन्तर का मुख्य कारण है आयु के साथ-साथै व्यक्ति की मानसिक क्षमताओं में वृद्धि होना। जैसे-जैसे बालक की आयु बढ़ती है, वैसे-वैसे उसकी बुद्धि, स्मृति, कल्पना एवं चिन्तन शक्ति भी बढ़ती है तथा ये सभी क्षमताएँ अवधान के विस्तार में सहायक होती हैं।

(7) व्यक्ति की रुचि – व्यक्ति की रुचि का भी उसके अवधान के विस्तार पर अनिवार्य रूप से प्रभाव पड़ता है, अर्थात् रुचि भी अवधान के विस्तार का एक निर्धारक कारक है। जो विषय व्यक्ति के लिए रुचिकर होता है, उसके सन्दर्भ में व्यक्ति का अवधान-विस्तार अधिक होता है तथा अरुचिकर विषय के सन्दर्भ में व्यक्ति को अवधान-विस्तार अपेक्षाकृत रूप से कम होता है।

(8) व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला अभ्यास – अवधान-विस्तार के निर्धारक कारकों में व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला अभ्यास भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है। यदि किसी व्यक्ति द्वारा किसी एक प्रकार की विषय-वस्तु पर पुनः-पुनः अवधान केन्द्रित करने का अभ्यास किया जाता है तो व्यक्ति के अवधान-विस्तार में क्रमशः वृद्धि हो जाती है। इससे भिन्न यदि किसी विषय-वस्तु के प्रति प्रथम बार ध्यान केन्द्रित किया जाता है, उस स्थिति में व्यक्ति के अवधान का विस्तार कम भी हो सकता है।

प्रश्न 5.
अनवधान या ध्यान-भंग से क्या आशय है? विभिन्न मनोवैज्ञानिकों द्वारा आयोजित अनवधान सम्बन्धी परीक्षणों तथा उनसे प्राप्त होने वाले निष्कर्षों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :

अनवधान या ध्यान-भंग का अर्थ

अवधान या ध्यान की स्थिति में किसी प्रकार की बाधा का उत्पन्न हो जाना ही अनवधान या ध्यान-भंग है। अवधान में किसी बाधात्मक कारक का प्रभाव पड़ना ही अनवधान है। अनवधान की दशा में व्यक्ति का ध्यान अपने विषय से हटकर कहीं ओर चला जाता है। ध्यान में बाधा पड़ जाना ही अनवधान है। सामान्य रूप से कोई प्रबल कारक ही व्यक्ति के ध्यान को भंग करता है। यह कारक कोई प्रबल उद्दीपक हो सकता है। इस प्रकार के बाधात्मक कारक को ध्यान-भंजक कहते हैं।

अनवधान सम्बन्धी परीक्षण तथा अनेक निष्कर्ष

अनवधान या ध्यान-भंग अपने आप में एक असामान्य स्थिति है तथा व्यक्ति के कार्यकलापों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने अनवधान सम्बन्धी विभिन्न परीक्षणों का आयोजन किया तथा महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष प्राप्त किये हैं। इस प्रकार के मुख्य परीक्षणों तथा प्राप्त निष्कर्षों का विवरण निम्नलिखित है –

(1) मॉर्गन द्वारा किया गया प्रयोग तथा प्राप्त निष्कर्ष – अनवधान अथवा ध्यान-भंग के विषय में व्यवस्थित अध्ययन करने के लिए मार्गन ने एक परीक्षण आयोजित किया। इस परीक्षण के अन्तर्गत उसने टाइप का कार्य करने के लिए दो प्रयोज्यों का चयन किया। इस कार्य के लिए पहले पूर्ण रूप से शान्त वातावरण उपलब्ध कराया गया तथा बाद में ऐसे वातावरण में टाइप का कार्य करवाया गया जिसमें अवधान-भंग करने वाले कारक विद्यमान थे।

इस परीक्षण का सूक्ष्म निरीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि कार्य करते समय यदि ध्यान में बाधक कोई कारक प्रबल हो जाता है तो तुरन्त व्यक्ति की कार्य करने की दर घट जाती है, परन्तु जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, वैसे-वैसे व्यक्ति की कार्य करने की दर में क्रमशः वृद्धि होने लगती है तथा बाद में अवधान-भंजक कारक के होते हुए भी व्यक्ति सामान्य गति से कार्य करने लगता है। इस परीक्षण के आधार पर मॉर्गन ने एक निष्कर्ष भी प्राप्त किया जोकि सामान्य के विपरीत था। यदि किसी व्यक्ति को प्रबल अवधान-भंजक कारक की उपस्थिति में पर्याप्त समय तक कार्य करने का अभ्यास हो और यदि उसे एकाएक पूर्ण रूप से शान्त वातावरण उपलब्ध करा दिया जाए तो इस परिवर्तित दशा में भी व्यक्ति की कार्य करने की दर घट जाती है।

(2) स्मिथ द्वारा किया गया प्रयोग एवं प्राप्त निष्कर्ष – स्मिथ नामक मनोवैज्ञानिक ने अनवधान सम्बन्धी एक प्रयोग के अन्तर्गत कुछ विषय-पात्रों को अंकों की जाँच को कार्य सौंपा तथा इस दौरान किसी प्रबल ध्यान-भंजक कारक का पदार्पण किया गया। इस प्रयोग के अन्तर्गत जो निष्कर्ष प्राप्त हुए वे इस प्रकार थे-ध्यान-भंजक कारक की उपस्थिति में अर्थात् अनवधान की दशा में व्यक्ति ने अपना कार्य सामान्य से कुछ तीब्र गति से पूरा कर लिया, परन्तु कार्य में होने वाली त्रुटियाँ सामान्य दशा में होने वाली त्रुटियों से कुछ अधिक थीं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि अनवधान की दशा में व्यक्ति की कार्य-कुशलता घट जाती है।

(3) केण्डरिक पैरेसे द्वारा किया गया प्रयोग एवं प्राप्त निष्कर्ष – केण्डरिक पैरेसे ने ध्यान-भंजक कारक के प्रभाव को जानने के लिए एक प्रयोग आयोजित किया। उसने चुने हुए विषय-पात्रों को कोई विषय पढ़ने का कार्य सौंपा तथा वहाँ पहले कोई साधारण गीत बजवाया तथा फिर किसी अत्यधिक लोकप्रिय संगीत को बजवाया। इस परीक्षण के दौरान पाया गया कि साधारण गीत बजने की दशा में सम्बन्धित व्यक्तियों की पढ़ने की क्रिया पर कुछ प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, परन्तु लोकप्रिय संगीत बजने की दशा में पढ़ने की क्रिया पर किसी प्रकार प्रतिकूल प्रभाव नहीं देखा गया।

(4) फोर्ड द्वारा किया गया प्रयोग तथा प्राप्त निष्कर्ष – फोर्ड ने अपने विषय-पात्रों से पहले विभिन्न कार्य साधारण परिस्थितियों में करवाये तथा बाद में उन्हीं कार्यों को किसी ध्यान-भंजक कारक की उपस्थिति में करवाया। इस परीक्षण के आधार पर फोर्ड ने अनवधान की दशा में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों का उल्लेख किया। उसने बताया कि ध्यान-भंजक कारकों की प्रबलता की दशा में व्यक्ति की पेशीय गतियों में उल्लेखनीय वृद्धि हो जाती है।

(5) होवे द्वारा किया गया प्रयोग तथा प्राप्त निष्कर्ष – होवे ने भी एक परीक्षण का आयोजन किया तथा विषय-पात्र से पहले शान्त दशाओं में कार्य करवाया तथा इसके उपरान्त ध्यान भंजक कारक की उपस्थिति में कार्य करवाया। दोनों दशाओं का विश्लेषण करने से ज्ञात हुआ कि अनवधान की अवस्था में उत्पादन की दर में कुछ कमी हुई।

प्रश्न 6.
ध्यान-विचलनसे क्या आशयै है? ध्यान-विचलन के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर :

ध्यान-विचलन से आशय

ध्यान अथवा अवधान की प्रक्रिया का व्यवस्थित अध्ययन करते समय ध्यान सम्बन्धी एक स्थिति देखने को मिलती है, जिसे ध्यान का विचलन (Fluctuation of Attention) कहते हैं। ध्यान सम्बन्धी इस दशा में व्यक्ति का ध्यान किसी एक विषय पर केन्द्रित न होकर बारी-बारी दो या अधिक विषयों (उद्दीपकों) के प्रति आकृष्ट होता रहता है। हम कह सकते हैं कि यदि व्यक्ति को ध्यान कुछ क्षण एक उद्दीपक पर केन्द्रित हो तथा कुछ क्षण किसी अन्य उद्दीपक पर केन्द्रित होने के बाद पुनः प्रथम उद्दीपक पर केन्द्रित हो जाता है तो इस दशा को अवधान का विचलन ही कहा जाएगा। वास्तव में, ध्यान या अवधान की प्रकृति ही ऐसी है कि उसमें चंचलता पायी जाती है। ध्यान का निरन्तर अधिक समय तक किसी एक विषय पर केन्द्रण सम्भव नहीं होता है। किसी उद्दीपक के प्रति व्यक्ति के ध्यान-केन्द्रण की तीव्रता स्वाभाविक रूप से ही कम या अधिक होती रहती है। ध्यान में पूर्ण एकाग्रता नहीं पायी जाती है। ध्यान की एकाग्रता का घटना-बढ़ना ही ध्यान का विचलन कहलाता है। ध्यान के विचलन का व्यवस्थित अध्ययन करने वाले मनोवैज्ञानिकों ने यह भी ज्ञात करने का प्रयास किया कि कोई व्यक्ति किसी एक उद्दीपक या विषय पर अधिक-से-अधिक कितने समय तक ध्यान को एकाग्र कर सकता है। इस प्रकार का सर्वप्रथम परीक्षण विलिंग्स द्वारा 1914 ई० में आयोजित किया गया तथा उसने निष्कर्ष प्राप्त किया कि व्यक्ति केवल दो सेकण्ड तक ही ध्यान को एकाग्र कर सकता है। दो सेकण्ड के उपरान्त ध्यान-विचलन हो जाता है। इससे भिन्न वुडवर्थ ने अपने अवधान-विचलन सम्बन्धी परीक्षण के आधार पर घोषित किया कि यदि अवधान सम्बन्धी उद्दीपक जटिल हो तो व्यक्ति अपने ध्यान को उसके प्रति 5 सेकण्ड से भी अधिक अवधि तक केन्द्रित कर सकता है। यहाँ एक अन्य स्पष्टीकरण भी प्रस्तुत किया गया। वुडवर्थ के अनुसार, जब किसी विषय के प्रति ध्यान का केन्द्रण 5 सेकण्ड या अधिक समय तक होता है तो उस अवधि में व्यक्ति का ध्यान सम्बन्धित उद्दीपक के ही भिन्न-भिन्न भागों पर विचलित हो सकता है। उदाहरण के लिए किसी सुन्दर फूल पर ध्यान का केन्द्रण करते समय उसकी भिन्न-भिन्न पंखुड़ियों या भागों पर ध्यान का केन्द्रण हो सकता है। वुडवर्थ की मान्यता से भिन्ने कुछ अन्य मनोवैज्ञानिकों ने अपने परीक्षणों के आधार पर स्पष्ट किया है कि व्यक्ति के ध्यान का केन्द्रण 6 सेकण्ड तक भी हो सकता है।

ध्यान-विचलन के मुख्य कारण

ध्यान या अवधान अपनी प्रकृति का चंचल होता है तथा निरन्तर रूप से ध्यान का विचलन होता रहता है। ध्यान की इस चंचलता या विचलन के कारणों को ज्ञात करने के लिए भी कुछ परीक्षण किये गये तथा ध्यान-विचलन के कुछ कारणों को खोजा गया। ध्यान-विचलन के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

(i) थकान अथवा सांवेदिक अनुकूलन – ध्यान-केन्द्रण अपने आप में एक विशिष्ट मानसिक प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न मानसिक क्षमताओं को अभीष्ट विषय पर केन्द्रित किया जाता है। मानसिक क्षमताओं के इन केन्द्रण से एक विशेष प्रकार की थकान होती है। इस थकान अथवा सांवेदिक अनुकूलन के कारण भी ध्यान का विचलन होता है अर्थात् थकान या सांवेदिक अनुकूलन ध्यान के विचलन को एक कारण है। ध्यान की प्रक्रिया का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया गया है कि ध्यान-केन्द्रण के समय व्यक्ति की ज्ञानेन्द्रियों को निरन्तर रूप से कार्य करना पड़ता है तथा इस प्रकार से निरन्तर कार्य करने से ज्ञानेन्द्रियों के संवेदनात्मक समायोजन में कुछ बाधा उत्पन्न होती है। ध्यान-केन्द्रण की प्रक्रिया में हमारे शरीर के वे समस्त न्यूरॉन्स थक जाते हैं, जिनके माध्यम से संवेदनाएँ ग्रहण की जाती हैं। इस प्रकार से होने वाली थकान ही ध्यान-विचलन का एक कारण है।

(ii) आँखों की गतिः – अवधान-विचलन का एक कारण आँखों की गति भी माना गया है। इस कारक का स्पष्टीकरण जानने के लिए विभिन्न परीक्षण किये गये तथा देखा गया कि आँखों की स्वाभाविक गति के कारण बार-बार सम्बन्धित उद्दीपक की प्रतिमा आँख के रेटिना के एक निश्चित भाग से हट जाती है तथा तुरन्त ही किसी अन्य स्थान पर बनने लगती है। इस प्रकार के होने वाले परिवर्तन के कारण ध्यान या अवधान का विचलन हो जाता है। इससे भिन्न एक अन्य स्पष्टीकरण के अन्तर्गत रॉबर्टसन ने अवधान के विचलन का कारण उद्दीपक के भिन्न-भिन्न भागों पर भिन्न-भिन्न मात्रा में प्रकाश का पड़ना माना है। उसके अनुसार उद्दीपक के किसी एक भाग पर अन्य भागों की तुलना में कम या अधिक प्रकाश पड़ सकता है। उद्दीपक पर प्रकाश के इस असमान वितरण के कारण अवधान का विचलन हो सकता है।

(iii) रक्त-संचालन में होने वाले विचलन – यह एक शरीरशास्त्रीय तथ्य है कि हमारे शरीर में होने वाले रक्त-संचालन में निरन्तर रूप से कुछ हल्के तथा साधारण विचलन होते रहते हैं। रक्त-संचालन में होने वाला यह विचलन ‘Traube-Hearing Wave’ कहलाता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, रक्त-संचालन में होने वाला यह विचलन भी अवधान-विचलन का ही एक कारण है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अवधान के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
या
अवधान के प्रकार सोदाहरण समझाइए।
उत्तर :
अवधान मुख्यत: तीन प्रकार का होता है। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

(1) ऐच्छिक अवधान – ऐच्छिक अवधान में व्यक्ति प्रयास करके और स्वेच्छा से किसी उत्तेजना या वस्तु की ओर अपना ध्यान केन्द्रित करता है। बाजार से पसन्द की वस्तु खरीदते समय ऐच्छिक अवधान का सहारा लिया जाता है। ऐच्छिक अवधान दो प्रकार का होता है –

(अ) अविचारित अवधान – अविचारित अवधान के अन्तर्गत साधारण-सा प्रयास करके ही व्यक्ति का ध्यान केन्द्रित हो जाता है। इस प्रक्रिया में उसे अधिक विचारपूर्ण नहीं होना पड़ता।

(ब) सविचारित अवधान – सविचारित अवधान के अन्तर्गत व्यक्ति को काफी सोच-विचार की आवश्यकता होती है। वह वस्तु की ओर ध्यान केन्द्रित करने के लिए प्रयास करता है। गणित के प्रश्नों को हल करने के लिए सविचारित अवधान चाहिए।

(2) अनैच्छिक अवधान – अनैच्छिक अवधान में किसी उत्तेजना या वस्तु की ओर व्यक्ति का ध्यान अनिच्छा से या बिना विशेष प्रयास के चला जाता है। वातावरण में होने वाला कोई धमाका हमारे ध्यान को जबरदस्ती और बिना चाहे अपनी ओर खींच लेता है। यह भी दो प्रकार का होता है

(अ) सहज अवधान – सहज अवधान में किसी वस्तु की ओर व्यक्ति का ध्यान उसकी रुचियों अथवा मूल प्रवृत्तियों के कारण आकृष्ट होता है।

(ब) बाध्य अवधान – जब हमारा ध्यान किसी उत्तेजना या वस्तु की ओर आकृष्ट होने के लिए बाध्य (विवश) हो जाए तो ऐसा अवधान, बाध्य अवधान होगा। इसके लिए उद्दीपक की प्रबल तीव्रता आवश्यक है।

(3) अनभिप्रेत अवधान – अनभिप्रेत अवधान एक विशेष प्रकार का अवधान है जिसमें व्यक्ति को विशिष्ट प्रयास की जरूरत होती है। यह अवधान ऐच्छिक होकर भी ऐच्छिक अवधान से भिन्न होता है। अनभिप्रेत अवधान के अन्तर्गत व्यक्ति किसी उत्तेजना या वस्तु पर अपनी इच्छा तथा रुचि के विरुद्ध जाकर ध्यान केन्द्रित करता है, लेकिन ऐच्छिक अवधान में व्यक्ति उस उत्तेजना या वस्तु की ओर अपनी इच्छा और रुचि के अनुकूल ध्यान केन्द्रित करने का प्रयास करता है। उदाहरणार्थ-माने लीजिए एक कवि अपनी इच्छा एवं रुचि के अनुकूल काव्य रचना में लगा है और उसी समय उसे किसी बीमार आदमी के लिए जरूरी तौर पर दवा लाने जाना पड़े तो कविता से हटकर उसका जो ध्यान दवाइयों की दुकान पर केन्द्रित होगा, उसे अनभिप्रेत अवधान कहेंगे।

प्रश्न 2.
अनवधान या ध्यान-भंग के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
अनवधान या ध्यान-भंग के मुख्य रूप से दो प्रकारों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें क्रमशः निरन्तर अनवधान या निरन्तर ध्यान-भंग (Continuous Distraction) तथा अनिरन्तर अनवधान या अनिरन्तर ध्यान-भंग (Discontinuous Distraction) के रूप में जाना जाता है। इन दोनों प्रकार के अनवधानों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है –

(1) निरन्तर अनवधान – जो अनवधान कुछ समय के लिए निरन्तर बना रहता है, उसे निरन्तर अनवधान कहते हैं। उदाहरण के लिए-तेज गति से चलने वाली रेलगाड़ी में यात्रा करने वाले यात्री रेलगाड़ी से होने वाले शोर से प्रभावित होते हैं। यह दशा निरन्तर अनवधान की दशा होती है। इसी प्रकार से औद्योगिक स्थल पर चलने वाली मशीनों के निरन्तर शोर से होने वाला अनवधान भी निरन्तर अनवधान ही होता है। निरन्तर अनवधान का व्यक्ति के कार्यों आदि पर अधिक प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। वास्तव में, निरन्तर अनवधान की उपस्थिति में व्यक्ति शीघ्र ही अपने पर्यावरण के साथ आवश्यक समायोजन स्थापित कर लेता है। इस प्रकार का समायोजन स्थापित हो जाने की दशा में व्यक्ति के द्वारा किये जाने वाले उत्पादन पर कोई विशेष प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। हम जानते हैं कि सभी कल-कारखानों में सदैव ही निरन्तर रूप से शोर होता रहता है, परन्तु वहाँ के श्रमिक एवं कर्मचारी अपनी स्वाभाविक गति एवं क्षमता के अनुसार कार्य करते रहते हैं।

(2) अनिरन्तर अनवधान – जब अनवधान में बाधा डालने वाला कोई कारक रुक-रुक कर सक्रिय होता रहता है तब उस स्थिति में होने वाले अनवधान को अनिरन्तर अनवधान कहते हैं। अनिरन्तर अनवधान एक असामान्य दशा होती है तथा इसका अधिक प्रतिकूल प्रभाव व्यक्ति के कार्यों एवं उत्पादन-क्षमता पर पड़ता है। उदाहरण के लिए-रुक-रुक कर बजने वाला हॉर्न, टेलीफोन की घण्टी, किसी द्वारा पुकारा जाना या मच्छर द्वारा डंक मारना अनिरन्तर अनवधान के कारक हैं। वास्तव में, अनवधान के अनिरन्तर बाधक कारकों के साथ व्यक्ति तुरन्त समायोजन स्थापित नहीं कर पाता; अतः उस स्थिति में व्यक्ति के कार्यों एवं उत्पादन-क्षमता पर गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अनवधान या ध्यान-भंग से बचने के लिए क्या उपाय किये जा सकते हैं?
उतर :
अनवधान या ध्यान-भंग से बचने के लिए या उसके प्रभाव को कम करने के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं –

(1) अधिक सक्रियता से कार्य करना – यदि सामान्य से अधिक सक्रियतापूर्वक कार्य किया जाए तो अवधान-मंजक कारकों के प्रभाव को कम किया जा सकता है। वैसे यह एक सत्यापित तथ्य है। कि यदि व्यक्ति अधिक सक्रियतापूर्वक कार्य करता है तो उसे सामान्य से अधिक शक्ति खर्च करनी पड़ती है।

(2) उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण अपनाना – यदि व्यक्ति ध्यान-भंजक कारक के प्रति उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण विकसित कर ले तो उस स्थिति में भी अनवधान के प्रतिकूल प्रभाव कुछ कम हो जाते हैं।

(3) ध्यान-भंजक कारक को कार्य का अंग मान लेना – यदि ध्यान-भंजक कारक को व्यक्ति अपने द्वारा किये जाने वाले कार्य के एक परिस्थितिजन्य अंग के रूप में स्वीकार कर ले तो उस स्थिति में ध्यान-भंजक कारक का प्रतिकूल प्रभाव या तो घट जाता है अथवा समाप्त ही हो जाता है।

(4) अभ्यास – अनवधान या ध्यान-भंग की दशा को प्रभावहीन बनाने का एक उपाय व्यक्ति द्वारा अभीष्ट परिस्थिति में व्यक्ति द्वारा किये जाने वाला अभ्यास भी है। यदि व्यक्ति ध्यान-भंजक कारक की उपस्थिति में निरन्तर कार्य करने का अभ्यास कर ले तो वह अनवधान के प्रतिकूल प्रभावों से बच सकता है।

प्रश्न 2.
रुचि के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
रुचि मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं –
(1) जन्मजात रुचि एवं
(2) अर्जित रुचि।

(1) जन्मजात रुचि – जन्मजात रुचि, मूल प्रवृत्तियों (Instincts) पर आधारित होती है और मनुष्य के स्वभाव तथा प्रकृति में निहित होती है। इनका स्रोत व्यक्ति के अन्दर जन्म से ही विद्यमान होता है। भोजन में हमारी रुचि भूख की जन्मजात प्रवृत्ति के कारण है। काम-वासना में रुचि होने के कारण हमारा ध्यान विपरीत लिंग की ओर आकृष्ट होता है। चिड़िया दाना खाने, गाय तथा भैंस हरा चारा खाने तथा हिंसक पशु मांस खाने में रुचि रखते हैं। जन्मजात रुचियों के कारण हैं।

(2) अर्जित रुचि – अर्जित करने का अर्थ है-उपार्जित करना (अर्थात् कमाना)। अर्जित रुचियों को व्यक्ति अपने वातावरण से ग्रहण करता है। इनका निर्माण मनुष्य के अनुभव के आधार पर होता है। मनुष्य के मन की भावनाएँ तथा आदतें इनकी आधारशिला हैं। अतः भावनाओं तथा आदतों में परिवर्तन के साथ ही इनमें परिवर्तन आता रहता है। अपने हितं या लाभ की परिस्थितियों के प्रति व्यक्ति की रुचियाँ बढ़ : जाती हैं। किसी वस्तु या प्राणी के प्रति आकर्षण के कारण उसके प्रति हमारी रुचि पैदा हो जाती है। एक फोटोग्राफर की अच्छे कैमरे में रुचि होती है तथा बच्चों की रुचि नये-नये खिलौनों में।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. मानसिक शक्तियों के लिए किसी विषय-वस्तु पर केन्द्रित करने की प्रक्रिया को ……………………. कहते हैं।
  2. मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से अवधान एक ……………………. है।
  3. अवधान अपने आप में एक ……………………. होती है।
  4. जब कोई व्यक्ति किसी विषय-वस्तु के प्रति अपना ध्यान स्वयं केन्द्रित करता है तो उसे ……………………. कहते हैं।
  5. जब किसी उत्तेजना के प्रति व्यक्ति का ध्यान बरबस केन्द्रित हो जाता है तो उसे ……………………. कहते हैं।
  6. मानसिक तत्परता अवधान के केन्द्रण में ……………………. होती है।
  7. रुचि के अभाव में विषय-वस्तु के प्रति ध्यान का केन्द्रण ……………………. होता है।
  8. समन्वयवादी विचारधारा के अनुसार रुचि और अवधान में ……………………. का सम्बन्ध है।
  9. किसी व्यक्ति द्वारा किसी एक समय में अधिक-से-अधिक जितने बाहरी उद्दीपकों को ध्यान का विषय बनाया जाता है, उसे ही ……………………. माना जाता है।
  10. रुचिकर विषयों के सन्दर्भ में व्यक्ति का अवधान-विस्तार ……………………. होता है।
  11. अवधान की स्थिति में किसी प्रकार की बाधा को उत्पन्न हो जाना ही ……………………. कहलाता है।
  12. रेलगाड़ी में यात्रा करते समय शोर के कारण होने वाले अनवधान को ……………………. कहते हैं।
  13. रुक-रुक कर बजने वाले सायरन के कारण होने वाले अनवधान को ……………………. कहते हैं।
  14. अधिक सक्रियता से कार्य करने पर अनवधान को प्रतिकूल प्रभाव ……………………. जाता है।
  15. रुचि छिपा हुआ ……………………. है।
  16. अवधान तथा रुचि परस्पर ……………………. होते हैं।

उत्तर :

  1. अवधान का ध्यान
  2. मानसिक प्रक्रिया
  3. मानसिक प्रक्रिया
  4. ऐच्छिक अवधान
  5. अनैच्छिक अवधान
  6. सहायक
  7. कठिन
  8. अन्योन्याश्रितता
  9. अवधान का विस्तार
  10. अधिक
  11. अनवधान
  12. निरन्तर अनवधान
  13. अनिरन्तर अनवधान
  14. घट
  15. अवधान
  16. पूरक

प्रश्न II.
निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
ध्यान अथवा अवधान से क्या आशय है?
उत्तर :
ध्यान अथवा अवधान एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न मानसिक शक्तियों को अभीष्ट विषय-वस्तु पर केन्द्रित किया जाता है तथा इस स्थिति में अन्य विषय-वस्तुओं की अवहेलना की जाती है।

प्रश्न 2.
अवधान की प्रक्रिया की चार मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. चंचलता
  2. चयनात्मकता
  3. मानसिक सक्रियता तथा
  4. संकुचित क्षेत्र।

प्रश्न 3.
अवधान की प्रक्रिया के कौन-कौन से पक्ष होते हैं?
उत्तर :
अवधान की प्रक्रिया एक त्रिपक्षीय प्रक्रिया है। इसके तीन विभिन्न पक्ष हैं-ज्ञानात्मक पक्ष, भावात्मक पक्ष तथा क्रियात्मक पक्ष।

प्रश्न 4.
अवधान के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
अवधान के मुख्य प्रकार हैं-ऐच्छिक अवधान, अनैच्छिक अवधान तथा अनभिप्रेत अवधान।

प्रश्न 5.
अवधान में सहायक चार बाह्य या वस्तुगत दशाओं का उल्लेख कीजिए।
या
अवधान के किन्हीं दो वस्तुगत निर्धारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
अवधान में सहायक चार वस्तुगत दशाएँ हैं-उत्तेजना का आकार, उत्तेजना की तीव्रता, उत्तेजना का स्वरूप तथा उत्तेजना की परिवर्तनशीलता।

प्रश्न 6.
अवधान में सहायक चार आन्तरिक या आत्मगत दशाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
अवधान में सहायक चार आत्मगत दशाएँ हैं—मनोवृत्ति, संवेग, रुचि तथा जिज्ञासा।

प्रश्न 7.
रुचि से क्या आशय है?
उत्तर :
रुचि किसी उत्तेजना, वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति की ओर आकर्षित होने की प्राकृतिक, जन्मजात या अर्जित प्रवृत्ति है।

प्रश्न 8.
‘रुचि की एक स्पष्ट एवं सरल परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
क्रो एवं क्रो के अनुसार, “रुचि उस प्रेरक शक्ति को कहते हैं जो हमें किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा क्रिया के प्रति ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है।”

प्रश्न 9.
कोई ऐसा कथन लिखिए जो रुचि एवं अवधान के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है।
उत्तर :
मैक्डूगल के अनुसार, “रुचि गुप्त अवधान होता है और अवधान रुचि का क्रियात्मक रूप है।”

प्रश्न 10.
रुचि के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
रुचियाँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं –
(i) जन्मजात रुचि तथा
(ii) अर्जित रुचि।

प्रश्न 11.
अवधान के विस्तार से क्या आशय है?
उत्तर :
किसी व्यक्ति द्वारा किसी एक समय में अधिक-से-अधिक जितने बाहरी उद्दीपकों को ध्यान का विषय बनाया जाता है, उसे ही अवधान का विस्तार माना जाता है।

प्रश्न 12.
अनवधान या ध्यान-भंग के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
अवधान या ध्यान की स्थिति में किसी प्रकार की बाधा का उत्पन्न हो जाना ही अनवधान या ध्यान-भंग है।

प्रश्न 13.
अनवधान या ध्यान-भंग के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
अनवधान या ध्यान-भंग के मुख्य प्रकार हैं-निरन्तर अनवधान तथा अनिरन्तर अनवधान।

प्रश्न 14.
अनवधान या ध्यान-भंग से बचने के उपाय क्या हैं?
उत्तर :

  1. अधिक सक्रियता से कार्य करना
  2. उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण अपनाना
  3. ध्यान-भंजक कारक को कार्य का अंग मान लेना तथा
  4. अभ्यास।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
व्यक्ति द्वारा अपनी मानसिक शक्तियों को अभीष्ट कार्य या विषय पर केन्द्रित करने को कहते हैं –
(क) स्मृति
(ख) चिन्तन
(ग) अवधान
(घ) प्रेरणा

प्रश्न 2.
उद्दीपक या उद्दीपकों का चयन करके उसे चेतना के मुख्य केन्द्र में लाने की प्रक्रिया को कहते हैं –
(क) अवधान
(ख) अधिगम
(ग) प्रत्यक्षीकरण
(घ) संवेदना

प्रश्न 3.
अवधान को केन्द्रित करने के लिए आवश्यक होता है –
(क) पौष्टिक आहार.
(ख) उत्तम स्वास्थ्य
(ग) मानसिक तत्परता
(घ) मधुर संगीत

प्रश्न 4.
अवधान अथवा ध्यान की प्रक्रिया की विशेषता है –
(क) चुनाव
(ख) चंचलता
(ग) मानसिक तत्परता
(घ) ये सभी

प्रश्न 5.
अवधान के प्रकार हैं –
(क) ऐच्छिक अवधान
(ख) अनैच्छिक अवधान
(ग) अनभिप्रेत अवधान
(घ) ये सभी

प्रश्न 6.
निरन्तर अनवधान की दशा में –
(क) व्यक्ति कोई कार्य नहीं कर सकता
(ख) उत्पादन की दर घट जाती है
(ग) परिस्थिति से समायोजन स्थापित करना पड़ता है।
(घ) व्यक्ति पूर्ण रूप से असामान्य हो जाता है।

प्रश्न 7.
अनिरन्तर अनवधान की दशा में
(क) उत्पादन की दर बढ़ जाती है।
(ख) उत्पादन की दर घट जाती है।
(ग) उत्पादन पूर्ण रूप से ठप हो जाता है।
(घ) उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता

प्रश्न 8.
अनवधानं या ध्यान-भंग से बचने का उपाय है –
(क) अधिक सक्रियता से कार्य करना
(ख) उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण अपनाना
(ग) अभ्यास
(घ) ये सभी

प्रश्न 9.
ध्यान-विचलन की दशा में
(क) व्यक्ति का ध्यान भिन्न-भिन्न विषयों के प्रति आकृष्ट होता है।
(ख) व्यक्ति के ध्यान का कोई विषय नहीं होता
(ग) व्यक्ति का ध्यान भंग हो जाता है।
(घ) व्यक्ति का ध्यान पूर्ण रूप से एकाग्र हो जाता है।

प्रश्न 10.
ध्यान-विचलन का कारण है
(क) थकान अथवा सांवेदिक अनुकूलन
(ख) आँखों की गति
(ग) रक्त-संचालन में होने वाले विचलन
(घ) ये सभी

उत्तर :

  1. (ग) अवधान,
  2. (क) अवधान,
  3. (ग) मानसिक तत्परता,
  4. (घ) ये सभी,
  5. (घ) ये सभी,
  6. (ग) परिस्थिति से समायोजन स्थापित करना पड़ता है,
  7. (ख) उत्पादन की दर घट जाती है,
  8. (घ) ये सभी,
  9. (क) व्यक्ति का ध्यान भिन्न-भिन्न विषयों के प्रति आकृष्ट होता है,
  10. (घ) ये सभी।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 10 Juvenile Delinquency

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 10 Juvenile Delinquency (बाल-अपराध) are part of UP Board Solutions for Class 11 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 10 Juvenile Delinquency (बाल-अपराध).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 10
Chapter Name Juvenile Delinquency
(बाल-अपराध)
Number of Questions Solved 52
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 10 Juvenile Delinquency (बाल-अपराध)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बाल-अपराध से आप क्या समझते हैं? इसे परिभाषित कीजिए। बाल-अपराधी के लक्षण बताइए।
उत्तर :
बाल-अपराध का अर्थ
(Meaning of Juvenile Delinquency)

कानून की सीमित परिधि में कानूनी नियमों को तोड़ने वाला कार्य ‘अपराध’ और ऐसे कार्य करने वाला व्यक्ति अपराधी है। ‘अपराध’ और ‘अपराधी’ के समाजशास्त्रीय अर्थ में इन शब्दों की परिधि व्यापक हो जाती है—प्रत्येक समाज-विरोधी कार्य ‘अपराध तथा उस कार्य को करने वाला व्यक्ति ‘अपराधी’ कहलाता है। मनोवैज्ञानिक सन्दर्भ में इस समाजशास्त्रीय अर्थ को ही ग्रहण कर लिया गया है। जिसमें कानूनी अर्थ भी समाहित है। उल्लेखनीय रूप से, समाज-विरोधी कार्य करने वाला व्यक्ति यदि वयस्क न होकर बालक है तो उसे ‘बाल-अपराधी’ कहते हैं। बालंक द्वारा किया गया ऐसा कोई भी कार्य जो समाज-विरोधी है और कानूनी नियमों को भी भंग कर सकता है, ‘बाल-अपराध’ कहलाता है।

यह स्पष्ट करना भी उचित है कि प्रत्येक समाज-विरोधी कार्य तो कानून-विरोधी नहीं होता लेकिन प्रत्येक कानून-विरोधी कार्य समाज-विरोधी अवश्य होता है। बाल-अपराध के अन्तर्गत दोनों ही प्रकार के कार्य सम्मिलित किये जाते हैं।

स्पष्टतः बाल-अपराध का निश्चय करने में ‘आयु’ एक प्रमुख एवं अनिवार्य तत्त्व है जिसका निर्धारण प्रत्येक देश के संविधान द्वारा किया जाता है। विभिन्न देशों में बाल-अपराध की आयु सीमा को निम्नलिखित रूप से व्यक्त किया जा सकता है –

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 10 Juvenile Delinquency 1

भारत में 18 वर्ष से नीचे के अपराधी बाल-अपराधी हैं और इनके विषय में विभिन्न राज्यों में ‘बाल-अपराध अधिनियम लागू किये गये हैं। ये अधिनियम उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक में निर्मित हो चुके हैं। जहाँ यह अधिनियम निर्मित नहीं हुआ है, वहाँ ‘रिफोर्मेट्री स्कूल अधिनियम (1897)’ लागू किया गया है। इसके अन्तर्गत बच्चों को अपराधी वातावरण से हटाकर सुधार-गृहों में रखने का प्रावधान है। मुम्बई और मध्य प्रदेश में बाल-अपराधी की अधिकतम आयु सीमा 16 वर्ष है। उत्तर प्रदेश में प्रथम अपराधी अधिनियम (First Offenders Act) लागू है, जिसके अन्तर्गत यदि 18 वर्ष से छोटा बालक पहली बार अपराध करता है तो एक ऑफिसर की निगरानी में प्रोबेशन पर छोड़ दिया जाता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि नवीनतम कानूनी संशोधनों के अनुसार अब हत्या, बलात्कार आदि जघन्य अपराधों के लिए 16 वर्ष की आयु को निर्धारित किया गया है। ऐसे बाल अपराधियों को 2 वर्ष तक सुधार-गृह में रखने के उपरान्त सामान्य अपराधियों के रूप में देखा जाता है।

बालू-अपराध की परिभाषा
(Definition of Juvenile Deliquency)

बाल-अपराध की मनोवैज्ञानिक परख उसकी कानूनी परख से भिन्न और व्यापक समझी जाती है। यही कारण है कि बाल-अपराध की मनोवैज्ञानिक परिभाषा भी उसकी कानूनी परिभाषा से कहीं अधिक व्यापक है। इस सन्दर्भ में कुछ विख्यात मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रतिपादित परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) होली के अनुसार, “व्यवहार के सामाजिक नियमों से विचलित होने वाले बालक को बाल-अपराधी कहते हैं।”

(2) न्यूमेयर ने बाल-अपराध तथा बाल-अपराधी दोनों ही के अर्थ को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। उसके अनुसार, “एक बाल-अपराधी निर्धारित आयु से कम आयु वाला वह व्यक्ति है, जो समाज-विरोधी कार्य करने का दोषी है तथा जिसका दुराचरण कानून का उल्लंघन है।’ बालअपराधी का अर्थ स्पष्ट करने के उपरान्त न्यूमेयर ने बाल-अपराध को इन शब्दों में स्पष्ट किया है, इस अपराध के अन्तर्गत एक समाज-विरोधी व्यवहार सम्मिलित होता है जो व्यक्तिगत और सामाजिक विघटन से मुक्त होता है।”

(3) सिरिल बर्ट के मतानुसार, “किसी बालक को बाल-अपराधी वास्तव में तभी मानना चाहिए जब उसकी समाज-विरोधी प्रवृत्तियाँ इतना गम्भीर रूप ले लें कि उस पर सरकारी कार्यवाही आवश्यक हो जाए।”

(4) डॉ० सेठना के कथनानुसार, “बाल-अपराध से अभिप्राय किसी स्थान-विशेष के नियमों के अनुसार एक निश्चित आयु से कम के बालक या युवक व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला अनुचित कार्य है।” ‘ .

(5) संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, “बाल-अपराधी वह नवयुवक या नवयुवती है जिसने निश्चित आयु के भीतर दण्ड विधान के अन्तर्गत अपराध किया और जिसे न्याय अदालत या बाल-कल्याण समिति जैसी संस्था के सामने पेश किया गया है ताकि उसकी ऐसी चिकित्सा का प्रबन्ध हो सके जिससे वह समाज द्वारा पुनः स्थापित यानि स्वीकृत हो जाए।

(6) भारतीय विद्वान् डॉ० सुशील चन्द्र के शब्दों में, “शैतानीपन जब एक ऐसी आदत के रूप में विकसित हो जाता है, जो समाज में प्रतिष्ठा प्रतिमान की सीमाओं को पार कर जाती है तो उससे जिस व्यवहार का उदय होता है, वही बाल-अपराध कहलाता है।”

बाल-अपराधी की विशेषताएँ या लक्षण

सैद्धान्तिक रूप से राज्य द्वारा निर्धारित किसी भी कानून के बालक द्वारा होने वाले उल्लंघन को बाल अपराध की श्रेणी में रखा जाता है, परन्तु बालकों द्वारा किये जाने वाले कुछ सामान्य कार्यों को जानना आवश्यक है। इस वर्ग के कुछ कार्य या लक्षण निम्नवर्णित हैं

  1. आमतौर पर चोरी करना। यह घर, विद्यालय या कहीं भी हो सकती है।
  2. झूठ बोलने की आदत।
  3. अधिक शैतानी करना, आवारागर्दी करना, बुरा व्यवहार करना तथा उद्दण्डता।
  4. सार्वजनिक स्थानों पर भीख माँगना।
  5. धूम्रपान तथा नशाखोरी करना एवं जुआ खेलना।
  6. समय-समय पर विद्यालय से भाग जाना।
  7. विद्यालय में वस्तुओं को नष्ट करना, तोड़-फोड़ करना तथा मार-पीट करना।
  8. सार्वजनिक रूप से नंगपाने या निर्लज्जता का प्रदर्शन।
  9. अश्लील बातें करना या दीवारों पर गन्दी बातें लिखना।
  10. लड़कियों या महिलाओं से छेड़खानी करना।
  11. समलिंगीय या विषमलिंगीय यौन-सम्बन्ध स्थापित करना।
  12. रात के समय बिना किसी उद्देश्य के सड़कों या रेलवे लाइनों पर घूमना।
  13. ऐसा कोई भी कार्य करना जिससे स्वयं को या किसी अन्य व्यक्ति को चोट पहुँच सकती
  14. अवैध कामों जैसी तस्करी या नशीली दवाओं का लेन-देन करना।

उपर्युक्त विशेषताओं और लक्षणों के आधार पर निम्नलिखित कृत्यों को बाल-अपराध के अन्तर्गत शामिल किया जा सकता है –

(1) चुनौती देने की प्रवृत्तियाँ 

  1. चोरी करना
  2. झूठ बोलना
  3. बिना किसी प्रयोजन के इधर-उधर घूमना
  4. कक्षा छोड़कर भागना
  5. लड़ाई-झगड़ा करना
  6. अन्य बालकों को चिढ़ाना
  7. स्कूल की चीजें नष्ट करना
  8. धूम्रपान करना
  9. प्रताड़ित करना
  10. ललकारना
  11. दूसरों को पीड़ा पहुँचाना
  12. दीवार पर लिखना
  13. शेखी बघारना।

(2) यौन अपराध –

  1. हस्तमैथुन
  2. समलिंगीमैथुन
  3. निर्लज्ज प्रदर्शन तथा नंगापन
  4. इच्छा रखने वाले समान आयु के विषमलिंगी सदस्य के साथ कामुक क्रिया
  5. इच्छा ने रखने वाले छोटी आयु के विषमलिंगी सदस्य के साथ कामुक क्रिया करना आदि।

प्रश्न 2.
बाल-अपराध के कौन-कौन से कारण होते हैं? बाल-अपराध के सामाजिक कारकों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
या
बाल-अपराध के सामाजिक कारणों को बताइए। इन कारणों को दूर करने के लिए घर और विद्यालय द्वारा क्या उपाय किये जा सकते हैं?
उत्तर :
आधुनिक समय में ‘बाल-अपराध’ (Juvenile Delinquency) अत्यन्त गम्भीर सामाजिक समस्या के रूप में उभर रहे हैं। विश्व के प्रायः समस्त देशों में बाल-अपराधियों की संख्या में निरन्तर तथा अबाध गति से वृद्धि हो रही है। विभिन्न कारकों के प्रभाव से बालकों की प्रवृत्ति समाज-विरोधी । कार्यों की ओर बढ़ती जा रही है। बाल-अपराध जैसे गम्भीर एवं जटिल समस्या निश्चय ही विभिन्न कारकों की क्रियाशीलतों का परिणाम है।

बाल-अपराध के कारण।
(Causes of Juvenile Delinquency)

अपराधशास्त्र की नवीन विचारधाओं के अन्तर्गत बाल-अपराध के विभिन्न कारणों को कई प्रकार से वर्गीकृत किया गया है। कुछ अपराधशास्त्रियों ने इसे दो कारकों में बाँटा है(अ) आन्तरिक कारण–इनमें शारीरिक व मनोवैज्ञानिक कारक सम्मिलित हैं। (ब) बाह्य कारण–इनमें विभिन्न सामाजिक कारण आते हैं। अमेरिकी अपराधशास्त्री लिंडस्मिथ तथा डनहेम ने इनके दो वर्ग बताये हैं – (अ) सामाजिक अपराधी तथा (ब) व्यक्तिगत अपराधी। सामाजिक अपराधी सामाजिक कारणों से तथा व्यक्तिगत अपराधी व्यक्तिगत कारणों से पैदा होते हैं। वाल्टर रैकलैस ने (अ) रचनात्मक–स्वयं व्यक्ति की संरचना में सन्निहित तथा (ब) परिस्थितिगतपरिस्थितिजन्य कारण-दो कारण बताये हैं। इसी कारण कुछ विद्वानों की दृष्टि में (i) समाजजन्य कारण तथा (i) मनोजन्य कारणों से बाल-अपराधी उत्पन्न होते हैं।

बाल-अपराध के सामाजिक कारण
(Social Causes of Juvenile Delinquency)

बाल-अपराध के सर्वप्रमुख एवं व्यापक कारक सामाजिक कारण हैं। समाज की कुछ परिस्थितियाँ बालक को अपराधी बनने के लिए मजबूर कर देती हैं; इसीलिए इन्हें परिस्थितिजन्य अथवा समाजजन्य कारण भी कहा जाता है। बाल-अपराध के प्रमुख सामाजिक कारण निम्नलिखित हैं।

(1) परिवार – परिवार एक आधारभूत सामाजिक संस्था है जो सामाजिक नियन्त्रण के लिए अत्यन्त शक्तिशाली साधन भी है। परिवार की सामान्य परिस्थितियाँ यदि अपराध के विरुद्ध सुरक्षा कवच का कार्य करते हैं तो इसके विपरीत परिवार की असामान्य परिस्थितियाँ बालक के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा उपस्थित करती हैं। कभी-कभी परिवार ही ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देता है। जिनसे विवश होकर बालक अपराध करता है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री इलियट तथा मैरिल ने बाल-अपराध का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण परिवार का दुष्प्रभाव माना है। हीली तथा ब्रोनर ने अमेरिका में घनी आबादी वाले शिकागो एवं बोस्टन नगर के 4000 बाल-अपराधियों का अध्ययन किया। इनमें से 20% वे किशोर थे जो पारिवारिक परिस्थितियों के दुष्प्रभाव से अपराधी बने थे। परिवार की वे प्रमुख परिस्थितियाँ जिनसे प्रेरित होकर बालक अपराध करता है निम्नलिखित हैं

(i) भग्न परिवार – ऐसा परिवार जिसमें पति-पत्नी में मतैक्य न हो, उनमें पृथक्करण हो गया हो, एक ने दूसरे को तलाक दे दिया हो या दोनों में से कोई एक मर गया हो अथवा अन्य किसी कारण से परिवार अपूर्ण हो तथा उसमें संगठन का अभाव हो, भग्न परिवार कहलाता है। इन परिवारों में बालकों की उपेक्षा होने लगती है, उनकी इच्छाएँ या आवश्यकताएँ अधूरी रहती हैं तथा उनमें विचारों के संघर्ष उठा करते हैं। ऐसे अस्थिर मन और असन्तुलित व्यक्तित्व के कारण वे अनुचित एवं अनैतिक कार्य कर बैठते हैं। अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि अधिकांश बाल-अपराधी भग्न परिवारों की देन हैं।

(ii) अन-अपेक्षित एवं अधिक बच्चे – अधिक बच्चों वाले परिवार में बालक की उपेक्षा स्वाभाविक है। एक शोध कार्य का निष्कर्ष था कि 6 बच्चों वाले 336 परिवारों में 12% बच्चे अपराधी बने गये। अन-अपेक्षित बालक असामान्य दशाओं में पलते हैं। कभी-कभी अपने माता-पिता के सान्निध्य से वंचित रहकर उन्हें किसी अनाथालय आदि की शरण लेनी पड़ती है; अत: उन्हें माता-पिता का लाड़-प्यार नहीं मिल पाता। इसके अतिरिक्त उन्हें समाज की घृणा ही सहनी पड़ती है। इसके फलस्वरूप संवेगात्मक संघर्ष के कारण उनका मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है और वे अपने विरोधी पक्ष के प्रति असामान्य व उग्र व्यवहार प्रदर्शित करने लगते हैं। परिवार में अधिक बच्चों या अन-अपेक्षित बच्चों की सामान्य आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं हो पातीं जिनकी क्षतिपूर्ति वे अपराधों द्वारा करते हैं।

(iii) माता-पिता का असमान या उपेक्षापूर्ण व्यवहार – माता-पिता को बच्चों का साथ असमान या उपेक्षापूर्ण व्यवहार भी अपराध का कारण बनता है। प्रायः माता-पिता सबसे बड़े या सबसे छोटे बच्चो को अधिक लाड़-प्यार करते हैं जिससे वह बच्चा स्वयं को दूसरों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण समझने लगता है और अपने अधिकारों के प्रति आवश्यकता से अधिक जागरूक हो जाता है। दूसरे भाई-बहन ‘स्वयं को तिरस्कृत एवं उपेक्षित महसूस कर उससे ईष्र्या रखने लगते हैं। वे शनैः-शनैः असामाजिक होने लगते हैं तथा समाज-विरोधी कृत्यों द्वारा अपराध की ओर उन्मुख होते हैं।

(iv) विमाता या विपिता का दुर्व्यवहार – सौतेली माँ का दुर्व्यवहार बच्चे को घर से भाग जाने तथा बुरी संगत में फँस जाने को बाध्य करता है। माँ के प्रेम से वंचित तथा अपने को अपेक्षित समझने वाले ये बच्चे प्रतिक्रिया स्वरूप विरोध प्रकट करने के लिए समाज-विरोधी कार्यों में जुट जाते हैं। ऐसी विधवा स्त्री जिसकी पहले पति से सन्तान हों, यदि दूसरा विवाह कर लेती है तो उसकी पूर्व सन्तानों को अपने नये पिता से वांछित व्यवहार नहीं मिल पाता। ऐसी दशाओं में भी बच्चे अपराध की दुनिया में कदम रख देते हैं।

(v) परिवार के अन्य सदस्यों का अनैतिक प्रभाव – बालक अधिकांश बातें अनुकरण से सीखते हैं। अतः परिवार के अन्य सदस्यों; जैसे – बालक के भाई-बहन, चाचा, मामा, मौसी, बुआ आदि का कोई भी अनैतिक व्यवहार या समाज-विरोधी कार्य स्वभावतः उन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। प्रायः अपराधी प्रवृत्ति के बड़े भाई-बहन का आचरण छोटे बालक को अपराधी की दिशा में मोड़ देता है। मिस इलियट ने अपराधी बालिकाओं से सम्बन्धित एक अध्ययन में पाया कि 67% अपराधी लड़कियाँ अनैतिक परिवारों की थीं।

(vi) माता-पिता की बेकारी – जिन परिवारों में माता-पिता बेरोजगार होते हैं तथा धनोपार्जन नहीं कर पाते, ऐसे परिवारों में अभावग्रस्तता के कारण बच्चों को अपने निर्वाह के विषय में स्वयं सोचना पड़ता है। इन परिवारों के बच्चे, असामाजिक, अनैतिक व कानून-विरोधी कार्य करना शुरू कर देते हैं।

(2) विद्यालय – परिवार की भाँति विद्यालय भी बालक के समाजीकरण तथा सामाजिक प्रशिक्षण का एक सशक्त माध्यम है। विद्यालय की शिक्षा, साहचर्य तथा प्रशिक्षण बालक के व्यक्तित्व पर जीवन-पर्यन्त असर रखते हैं। बालक को अपराधी बनाने में विद्यालय का भी बड़ा योगदान है। आदर्शात्मक व्यवहार को विकसित करने का अभिकरण समझी जाने वाली ‘कुंछ शिक्षा संस्थाएँ तो बाल-अपराधों के प्रशिक्षण केन्द्र का कार्य कर रही हैं। विद्यालयों की शिक्षा न तो बालकों के लिए रुचिपूर्ण है और न ही सार्थक विद्यालय बालकों को अपनी ओर आकर्षित नहीं करता, बल्कि अधिकांश बालकों के लिए वह दिन का कारावास है। अमनोवैज्ञानिक शिक्षण, शिक्षक का दुर्व्यवहार, दुरूह पाठ्यक्रम, कठोर अनुशासन और दण्ड बालक को स्कूल से भागने के लिए प्रेरित करता है। स्कूल से भागा हुआ बच्चा आवारागर्दी करता है; वह चोरी, लड़ाई-झगड़ा, फिल्म तथा यौन अपराधों की शरण लेता है। अधिकांश किशोर पेशेवर अपराधियों के चंगुल में फंस जाते हैं। बहुत-से विद्यालयों के किशोर मादक द्रव्यों का सेवन करते हैं तथा उसी के दुश्चक्र में फंसकर अपराधी बन जाते हैं। स्पष्टत: आज के विद्यालयों का वातावरण बाल-अपराधियों की संख्या में वृद्धि करने वाला है।

(3) अपराधी क्षेत्र या समुदाय – कुछ सामाजिक क्षेत्र अथवा समुदाय ऐसे हैं जहाँ कोई सामाजिक नियम लागू नहीं होता जिसके परिणामस्वरूप वहाँ अपराधियों तथा अपराधों की संख्या बढ़ जाती है। भिन्न-भिन्न बस्तियों में बाल-अपराध की भिन्न-भिन्न दर पायी जाती है। महानगरों की झोंपड़-पट्टियाँ (Slums) अस्थिर बस्तियाँ होती हैं, इनमें सबसे निचले वर्ग के गरीब और अशिक्षित लोग रहते हैं। इन स्थानों पर निर्धनता, अशिक्षा, बीमारी, पारिवारिक विघटन, मानसिक विकार आदि की विषम परिस्थितियाँ बनी रहती हैं तथा मनोरंजन के स्वस्थ साधनों का पूर्ण अभाव रहता है। इन्हीं कारणों से यहाँ अपराध पनपते हैं और अपराधी लोग शरण भी पाते हैं। अपराध की दर बस्ती की सघनता के साथ चलती है। कम बसी हुई बस्तियों में कम अपराध तथा घनी बसी हुई बस्तियों की अपराध दर अधिक होती है। कुछ नगरों में विशेष रूप से अपराध-क्षेत्र बन जाते हैं; जैसे-लालबत्ती क्षेत्र जो वेश्यावृत्ति का स्थान होता है। यहाँ चोर-उचक्के, जुआरी, जेबकतरे, दलाल तथा विभिन्न असामाजिक धन्धे करने वाले बहुतायत से मिलते हैं। इन क्षेत्रों से सम्बन्धित बालक इसके गम्भीर दुष्प्रभाव से नहीं बच पाते। इसके अतिरिक्त पुलिस के रिकॉर्ड में कुछ अपराधी जातियों, जिन्हें जरायमपेशा जातियाँ कहते हैं, दर्ज होती हैं। इनके लिए अपराध एक पेशे के रूप में मान्य हैं; अत: इनके अनुभवी व बुजुर्ग लोग अपने बालकों को चोरी, उठाईगिरि, सेंध लगाना तथा जेब काटना आदि स्वयं सिखाते हैं।

(4) बुरी संगति – बुरी संगति बालक को अपराध की ओर ले जाती है। जिन घरों के पड़ोस में चोर-उचक्के, गुण्डे, शराबी या वेश्याओं का निवास होता है, उनसे प्रभावित बालक उन्हीं की तरह की क्रियाएँ करने लगते हैं। चरित्रहीन एवं अनैतिक प्रौढ़ों के सम्पर्क में रहने वाले बालकों में गन्दी आदतें पड़ जाती हैं। कुछ प्रौढ़ समलिंगी दुराचार के आदी होते हैं तथा छोटी आयु के बालकों को अपना शिकार बनाते हैं। ऐसे बालक जल्दी ही यौन विकारों के शिकंजे में फंस जाते हैं। इसी प्रकार समवयस्क साथियों की बुरी संगति भी बालक को आवारा और अपराधी बना देती है।

(5) सामाजिक विघटन – समाज के विघटन की स्थिति में नैतिक मूल्यों के टूटने से व्यक्ति का विघटन प्रराम्भ हो जाता है जिसके फलस्वरूप बाल-अपराधियों की संख्या बढ़ने लगती है। सामाजिक विघटन के बहुत-से कारण हैं; जैसे—भूकम्प, तूफान, बाढ़, सूखा एवं अन्य प्राकृतिक कारण, युद्ध, औद्योगीकरण तथा आर्थिक कारण। इन कारणों से मुसीबत और यातनाओं के शिकार लोग समाज की प्रथाओं, परम्पराओं, रीति-रिवाजों तथा मूल्य का खुलेआम उल्लंघन करते हैं और अपराध करने लगते हैं। उनका अनुकरण करके बालक भी कानून तोड़ते हैं और अपराधोन्मुख होते हैं।

(6) स्वस्थ मनोरंजन का अभाव – मनोरंजन के स्वस्थ एवं उपयुक्त साधनों का बालक के व्यक्तित्व के विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। मनोरंजन के साधनों का अभाव या उनका दूषित होना बालक के हित में नहीं है। आजकल फिल्में मनोरंजन का सर्वसुलभ और सबसे सस्ता साधन समझी जाती हैं। किन्तु; फिल्मों में दर्शायी गयी हिंसा, मारधाड़, अश्लीलता तथा समाज-विरोधी कार्यों के तौर-तरीके बालक-बालिकाओं के अपरिपक्व मस्तिष्क को प्रदूषित करते हैं। इनसे स्वस्थ मनोरंजन के स्थान पर असामाजिक कृत्य, गन्दी भाषा, कामुकता तथा अपराधी प्रवृत्तियाँ ही प्राप्त होती हैं। बर्ट द्वारा किये गये एक अध्ययन के अनुसार 7% बाल-अपराधी फिल्मों के बेहद शौकीन थे। जहाँ एक ओर मनोरंजन के दूषित साधन बालकों को अपराध की दिशा में मोड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्वस्थ मनोरंजन का अभाव भी अपराध बढ़ाने में सहायक है। मनोरंजन के अभाव में बालक ऐसे अनुचित साधनों से मन बहलाने लगते हैं जिनसे न केवल उनका समय व्यर्थ होता है, बल्कि उनमें असामाजिक प्रवृत्तियाँ भी उभरती हैं। ऐसे बालक सड़कों पर आवारा घूमते हुए, खेलकूद मचाते हुए, काँच की गोलियाँ खेलते हुए, भाँडों का नाच देखते हुए या जुए जैसे खेलों में रत पाये जाते हैं। बर्ट का यह निष्कर्ष उचित ही है कि सबसे ज्यादा बाल-अपराधी सड़कछाप मनोरंजन द्वारा बनते हैं।

(7) स्थानान्तरण – नौकरीपेशे वाले बहुत-से माता-पिता जल्दी-जल्दी एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरित होते रहते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनके बालकों में उच्छृखलता बढ़ जाती है। ऐसे बालक छात्रावासों से, मकान मालिकों के घरों से या पास-पड़ोस सम समाज-विरोधी कार्यों की दीक्षा लेते हैं और धीरे-धीरे निजी अपराध-क्षेत्र का विकास कर लेते हैं। जॉन स्टुअर्ट मिल द्वारा किये गये एक अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार बाल-अपराधी स्थानान्तरण वाले क्षेत्रों में बहुतायत से पाये जाते हैं।

(8) युद्ध – युद्ध भय एवं आतंक से युक्त समाज की एक आपात स्थिति है। इस स्थिति में तथा इसके बीत जाने पर बाल-अपराध की दरें बढ़ जाती हैं। युद्ध में हिंसा का खुला प्रदर्शन किशोरों के मन में सोती हुई हिंसक प्रवृत्तियों को जगा देता है जिससे हत्या व लूटमार को बढ़ावा मिलता है। युद्धकाल में सैनिकों और उनके परिवारजनों की भारी व्यस्तता के कारण बालकों पर से नियन्त्रण कम हो जाता है। इसके परिणामत: किशोर-किशोरियों को आपस में सम्पर्क करने की पूरी छूट मिल जाती है और यौन-अपराध होने लगते हैं। युद्ध के दौरान खाली मकानों में होने वाली लूटमार तथा आगजनी आदि प्राय: किशोरों द्वारा ही सम्भव है। स्पष्टतः युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियाँ भी बाल-अपराध को जन्म देती

सामाजिक कारणों से छुटकारा दिलाने में घर एवं विद्यालय का योगदान

समाज-वैज्ञानिकों के अनुसार घर या परिवार समाज की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संस्था है। घर का शान्त एवं स्वस्थ वातावरण, बालक के अनुकूल आन्तरिक परिस्थितियाँ तथा समृद्ध परम्पराएँ बालक में स्वस्थ दृष्टिकोण का विकास करती हैं। सुसंस्कारित घर में पालित-पोषित बालक समाज का उपयोगी नागरिक बनाता है; अत: घर के मुखिया तथा अन्य सदस्यों को भरपूर प्रयास करना चाहिए कि घर का वातावरण व आन्तरिक परिस्थितियाँ हर प्रकार से बालक के अनुकूल हों।

माता-पिता तथा बालकों के आपसी सम्बन्ध भी बालकों के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसी प्रकार मातृविहीन, पितृविहीन अथवा इकलौते बालक वाले परिवारों की संरचना समस्याग्रस्त हो सकती हैं जो बालक के व्यवहार को समस्यामूलक बना देती हैं। माता-पिता को चाहिए कि वे अत्यधिक प्यार, घोर नियन्त्रण, तिरस्कार या किन्हीं बच्चों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार–सभी प्रकार के सम्बन्धों के दोषों से बचें। बच्चों को जीवन की वास्तविकताओं से साक्षात्कार के अवसर मिलने चाहिए तथा उनमें आत्मानुशासन विकसित करने का अभ्यास कराया जाना चाहिए।

घर में बालक के विकास में जिस भूमिका का निर्वाह माता-पिता करते हैं, वही भूमिका विद्यालय में शिक्षक निभाता है। विद्यालय में बालक के व्यवहार को प्रभावित करने वाले तीन प्रधान तत्त्व हैं-शिक्षक, वातावरण तथा उसके मित्र। शिक्षक की क्रियाएँ बालक में स्वस्थ प्रौढ़ता को जन्म दें। विद्यालय का वातावरण बालक के अनुकूल हो और उसे आकर्षित करे। बालक के मित्र चरित्रवान तथा अध्ययनशील हों। यदि स्कूल की परिस्थितियाँ बालक के अनुकूल होंगी, शिक्षक उसकी पढ़ाई में कमजोरी सम्बन्धी दुर्बलताओं को दूर करेंगे, उनकी उपेक्षा नहीं होगी तथा विद्यालय में अनुशासन के विशिष्ट नियमों का पालन होगा तो बालक में अध्ययन के प्रति लगाव उत्पन्न होगा। इसके अतिरिक्त विद्यालय के शिक्षकों को पारस्परिक कलह या अवांछनीय (राजनीतिक) व्यवहार से भी बचना चाहिए। इस भाँति घर तथा विद्यालय उन सभी सामाजिक कारकों से बालक को छुटकारा दिलाने में भारी योगदान कर सकते हैं जो उसे अपराध जगत् की ओर ठेल देते हैं।

प्रश्न 3.
बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारणों पर प्रकाश डालिए। घर और विद्यालय में क्या उपाय अपेक्षित हैं जिससे बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारणों से छुटकारा पाया जा सके? आपका उत्तर व्यावहारिक हो और प्रतिदिन के जीवन पर आधारित हो।
या
बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारणों को बताइए। इन कारणों को दूर करने के लिए घर और विद्यालय क्या उपाय कर सकते हैं?
उत्तर :
बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारण
(Psychological Causes of Juvenile Delinquency)

बाल-अपराध के सामाजिक एवं आर्थिक कारणों के समान ही मनोवैज्ञानिक कारण भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। मन; व्यक्ति के समस्त आचरण और व्यवहार का मूल कारण है। स्वाभाविक रूप से मन का विकार अपराध का कारण बन सकता है।

बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारणों की खोज की जीवन-वृत्त विधि एवं मनोविश्लेषण विधि के आधार पर अध्ययन के उपरान्त ज्ञात होता है कि बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारणों का (क) मानसिक या बौद्धिक कारण, (ख) संवेगात्मक कारण, (ग) व्यक्तित्व की विशिष्टताएँ तथा (घ) विशेष प्रकार के मानसिक रोग शीर्षकों के अन्तर्गत उल्लेख किया जा सकता है। बाल-अपराध के प्रमुख मनोवैज्ञानिक कारण निम्नलिखित हैं(क) मानसिक या बौद्धिक कारण मानसिक या बौद्धिक कारणों में अनेक कारण सम्मिलित हैं, जिनमें प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

(1) मानसिक हीनता – अपराधियों में मानसिक हीनता बहुत अधिक होती है। गिलिन एवं गिलिन ने इसके समर्थन में कहा है कि “मानसिक दुर्बलता अपराधी बनाने में एक शक्तिशाली कारक है। सामान्य बुद्धि की कमी से युक्त बालक किसी भी कार्य की अच्छाई-बुराई या उसके परिणामों के विषय में भली प्रकार नहीं सोच सकते, उनकी चिन्तन शक्ति ठीक से काम नहीं करती। मानसिक दृष्टि से दुर्बल बालक समाज से अपना उचित समायोजन करने तथा अच्छे ढंग से आजीविका कमाने में असमर्थ रहते हैं और अपनी आवश्यकताओं की समुचित पूर्ति नहीं कर पाते। ऐसे बालक अपने स्वार्थ की सिद्धि गलत उपायों से करने लगते हैं और अपराध की ओर उन्मुख हो जाते हैं।’

(2) अति तीव्र बुद्धि – आधुनिक मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार केवल बुद्धि की दुर्बलता को अपराध का कारण स्वीकार नहीं किया जा सकता। टरमेन ने तीव्र बुद्धि वाले बालकों से सम्बन्धित अध्ययन के आधार पर कहा है कि ऊँचे प्रकार के अपराधी तथा गिरोहों के सरदार सामान्य से काफी ऊँचे बुद्धि स्तर वाले होते हैं। अति तीव्र बुद्धि वाले बालक अपराध के नये तरीके खोजने तथा पुलिस को धोखा देने में भी माहिर होते हैं और इसीलिए ये गिरोह के सरगना बन जाते हैं। इस भाँति तीव्र बुद्धि का बाल-अपराध से सीधा सम्बन्ध है।

(3) मानसिक योग्यताओं का निम्न स्तर – व्यक्ति में निहित मानसिक योग्यताएँ जीवन के विविध कार्यों में व्यक्ति की सहायता करती हैं तथा उसके समायोजन में सहायक होती हैं। किसी बालक में कार्य-विशेष की पूर्ति हेतु वांछित योग्यताओं में कमी उसे गलत मार्ग अपनाने तथा अपराध करने की प्रेरणा देती है।

(ख) संवेगात्मक कारण

विभिन्न संवेगात्मक कारणों में से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

(1) अति संवेगात्मकता – कुछ बालक भावना-प्रधान होते हैं। संवेगात्मक स्थिति में विवेक उनका साथ नहीं देता और वे उचित-अनुचित का निर्णय लिये बिना बड़े-से-बड़ा अपराध कर बैठते हैं। बर्ट ने अपने अध्ययन में 9% बाल-अपराधियों में तीव्र संवेगात्मकता प्राप्त की है। सर्वशक्तिमान संवेग दो हैं-क्रोध और कामुकता। क्रोध के आधिक्य में बालक का व्यवहार आक्रामक होता है तथा कामुकता की अधिकता में वे काम-सम्बन्धी अपराध कर बैठते हैं।

(2) स्वभावगत अस्थिरता – इस विशेषता के कारण व्यक्ति किसी एक सिद्धान्त या बात पर टिक नहीं पाता और उसके व्यवहार का मानदण्ड परिवर्तित होता रहता है। बर्ट द्वारा 34% अपराधी बालकों में स्वभावगत अस्थिरता बतायी गयी। यह अस्थिरता बालक में उसके शैशव की प्रतिकूल परिस्थितियों; जैसे-असुरक्षा भावना, स्नेह व सहानुभूति का अभाव, कठोर अनुशासन व दण्ड विधान, प्रारम्भ से अपर्याप्तता/हीनता की भावना, नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ तथा असन्तोष व विद्रोहात्मक प्रवृत्ति आदि; के कारण उत्पन्न होती है जिसके परिणामतः वह नैतिक मूल्यों का परित्याग और असामाजिक कार्य करने लगता है।

(3) समायोजन दोष – बालक अपने अहम्, नैतिक मन तथा इदम् के मध्य साम्य स्थापित करने की कोशिश करता है। यदि बालक का अहम् (Ego) तथा नैतिक मन (Super Ego) कमजोर पड़ जाते हैं तो साम्य स्थापित नहीं हो पाता और समायोजन सम्बन्धी दोष उत्पन्न होने लगते हैं। समायोजन के दोष बालक को गलत राह के लिए अभिप्रेरित करते हैं।

(4) भावना ग्रन्थियाँ एवं मनोविक्षेप – पारिवारिक एवं सामाजिक निषेधों के कारण बालकों और किशोरों को अपनी इच्छाओं, प्रवृत्तियों तथा भावनाओं आदि का दमन करना पड़ता है। दबी हुई इच्छाएँ और प्रवृत्तियाँ भावना ग्रन्थियों (Complexes) को जन्म देती हैं जो उनके अचेतन मन में जाकर बस जाती हैं। शनैः-शनैः मानसिक संघर्ष और भावना ग्रन्थियाँ उनमें मनोविक्षेप (Psychoneuroses) को जन्म देती हैं। बालकों में समाज के प्रति विद्रोह के भाव जगने लगते हैं। ये उन्हें बदले की भावना से भर देते हैं। इसका परिणाम बाल-अपराधों के रूप में सामने आता है। बर्ट ने अपने अध्ययन में 75% अपराधी बालकों को भावना ग्रन्थियों तथा मानसिक संघर्षों से ग्रसित पाया।

(5) किशोरावस्था के परिवर्तन – किशोरावस्था में व्यक्ति में उत्पन्न होने वाले शारीरिक, मानसिक और संवेगात्मक परिवर्तन परिस्थितियों से उनका सन्तुलन बिगाड़ देते हैं। स्टैनली हाल ने उचित ही कहा है, ‘किशोरावस्था बल एवं तनाव, तूफान एवं विरोध की अवस्था है।’ उन्होंने इसे ‘अपराध की अवस्था (Criminal Age) का नाम दिया है, क्योंकि मानसिक-सांवेगिक तनाव एवं असन्तुलन की स्थिति में वे बिना सोचे-समझे समाज-विरोधी कार्य कर बैठते हैं। इस प्रकार किशोरावस्था के क्रान्तिकारी परिवर्तन बाल-अपराधों को जन्म दे सकते हैं।

(6) मनोवैज्ञानिकं आवश्यकताओं की पूर्ति न होना – प्रत्येक बालक और किशोर की कुछ जन्मजात एवं अर्जित मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ हैं; जैसे-आत्मप्रदर्शन, प्रेम, सुरक्षा, काम आदि। इनकी सामान्य ढंग से पूर्ति या तृप्ति न होने पर बालक में कुण्ठा का जन्म होता है जिसके फलस्वरूप उसमें हीनता, क्रोध तथा आक्रमण की भावना जन्म लेती है। इसके अतिरिक्त दूसरी अनेक असामाजिक प्रवृत्तियाँ भी उत्पन्न होती हैं और बालकअपराध की ओर प्रवृत्त होता है।

(ग) व्यक्तित्व की विशिष्टताएँ

प्रमुख मनोवैज्ञानिकों एवं अनुसन्धानकर्ताओं ने बाल-अपराधियों से सम्बन्धित अपने अध्ययनों के अन्तर्गत उनके व्यक्तित्व में कुछ विशिष्टताओं को पाया है। बाल-अपराधियों में सामान्य बालकों से भिन्नता रखते हुए ये गुण मुख्य रूप में मिलते हैं –

  1. अत्यधिक हिंसात्मक प्रवृत्ति
  2. अनियन्त्रण एवं असंयम
  3. स्वच्छन्द स्वभाव
  4. अनुशासन का अभाव
  5. अस्थिरता, निर्णय न ले सकना तथा मानसिक अशान्ति
  6. विद्रोही नकारात्मक व्यवहार
  7. शंकालु स्वभाव
  8. दूसरों को पीड़ित करके सुख पाना
  9. सांवेगिक अपरिपक्वता
  10. बहिर्मुखी स्वभाव तथा
  11. समाज से कुसमायोजन।

अपराध करने वाले बालक के व्यक्तित्व की ये विशेषताएँ उसे सामाजिक परिस्थितियों व स्वीकृत मानदण्डों से समायोजित नहीं होने देतीं और वह कुसमायोजन का शिकार हो जाता है। कुसमायोजित बालक में धीरे-धीरे अन्य मानसिक विकार उत्पन्न हो जाते हैं जो उसे अपराध की ओर उन्मुख करते हैं।

(घ) विशेष प्रकार के मानसिक रोग

टप्पन, ग्लूक एवं ग्लूक सहित अनेक मनोवैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि कुछ विशेष प्रकार के . मानसिक रोगों से ग्रस्त रोगी भी अपराध किया करते हैं। इन मानसिक रोगों का वर्णन अग्र प्रकार है –

(1) मनोविकृति – बालपन में स्नेह, सहानुभूति, प्रेम तथा नियन्त्रण के अभाव, अन्यों के दुर्व्यवहार से मिली पीड़ा व यन्त्रणा तथा वंचना के कारण उत्पन्न मनोविकृति का मानसिक रोग बालक और किशोर को शुरू से ही समाज-विरोधी, निर्दयी, ईष्र्यालु, झगड़ालू, शंकालु, द्वेष तथा प्रतिशोध की भावना से युक्त बना देता है। ऐसे बालक सामान्य से उच्च बौद्धिक स्तर वाले तथा आत्मकेन्द्रित प्रकृति के होते हैं तथा बिना किसी प्रायश्चित्त के हिंसा या हत्या कर सकते हैं।

(2) मेनिया – ‘मेनिया’ एक प्रकार का पागलपन है जिसका उपचार सम्भव होता है। यह अनेक प्रकार का है; जैसे—आग लगाने, चोरी करने तथा तोड़-फोड़ का मेनिया। मेनिया से ग्रस्त बालक अपराध करने लगते हैं और धीरे-धीरे अपराध के आदी हो जाते हैं।

(3) बाध्यता – इस मानसिक रोग से पीड़ित बालक ऐसे कार्य करने के लिए बाध्य होता है जो उसके अवचेतन में निर्मित ग्रन्थि से सम्बन्धित हैं, लेकिन बालक को इस बात का पता नहीं होता, वह तो बस बाध्य या विवश होकर उस हानिकारक कार्य को करता जाता है। इन कार्यों में आग लगाना, तोड़-फोड़ करना तथा सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाना आदि सम्मिलित हैं। स्पष्टत: बाध्यता का मनोरोग भी बाल-अपराध का एक मुख्य कारण है।

मनोवैज्ञानिक कारणों से मुक्ति हेतु घरं एवं विद्यालय द्वारा किये जाने वाले उपाय

बालक अपने आरम्भिक जीवन को दो ही स्थानों पर अधिकांशतः व्यतीत करता है—इनमें पहला स्थान घर का है और दूसरा विद्यालय का। अपराध की दुनिया में कदम रखने वाले बालक विभिन्न मनोवैज्ञानिक कारणों एवं मानसिक दशाओं से उत्प्रेरित हो सकते हैं। इन कारकों एवं दशाओं का सीधा सम्बन्ध घर-परिवार और विद्यालय के वातावरण से होता है; अतः घर एवं विद्यालय, बाल-अपराध से सम्बद्ध मनोवैज्ञानिक कारणों से मुक्ति हेतु अनेक उपाय कर अपनी भूमिका निभा सकते हैं।

परिवार के प्रौढ़ एवं उत्तरदायी सदस्यों को चाहिए कि वे घर के बालक को एक खुली किताब समझें और उसकी योग्यताओं, क्षमताओं, आदतों, रुचियों, अभिरुचियों तथा उसके व्यक्तित्व के प्रत्येक पक्ष का आकलन करें। बालक के साथ भावात्मक एवं संवेगात्मक तादात्म्य स्थापित करें और उसकी भावनाओं, इच्छाओं वे आदतों को समझकर व्यवहार करें। बालक के स्वस्थ मानसिक विकास के लिए प्रेम, सुरक्षा, अभिव्यक्ति, स्वतन्त्रता, स्वीकृति, मान्यता आदि मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ परमावश्यक हैं। इन आवश्यकताओं से वंचित रहकर बालक हीन-भावना से ग्रस्त हो जाता है और उसमें चिड़चिड़ापन, संकोच, लज्जा, भय, क्रूरता एवं क्रोध जैसी भावना पैदा हो जाती है। अन्ततोगत्वा ईष्र्या, द्वेष तथा आत्म-प्रदर्शन से अभिप्रेरित बालक में अपराधी वृत्तियाँ पनपने लगती हैं और वह अपराध करने लगता है। इसी प्रकार से घर-परिवार से अमान्य या तिरस्कृत बालक विद्रोही और आक्रामक बन जाता है। स्पष्टत: घर का दायित्व है कि वह बालक में मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के कारण कुण्ठाओं को जन्म न लेने दें।

इसी प्रकार से विद्यालय भी कुछ ऐसे उपाय अपना सकता है जिनसे किशोर बालकों को अपराध के लिए प्रेरित करने वाले मनोवैज्ञानिक कारणों से मुक्ति मिल सके। विद्यालय के बालकों की बुद्धि-लब्धि का आकलन कर उनका बौद्धिक स्तर ज्ञात किया जाना आवश्यक है। अनेकानेक मनोवैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि बालक में बुद्धि की कमी अपराध का मूल कारण है। कक्षा में दुर्बल बुद्धि, सामान्य बुद्धि तथा तीव्र बुद्धि के बालकों का वर्गीकरण कर दुर्बल बुद्धि के बालकों के साथ विशिष्ट उपचारात्मक तरीके अपनाये जाने चाहिए। इसी प्रकार तीव्र बुद्धि के बालकों के साथ भी तदनुसार व्यवहार के प्रतिमान निर्धारित किये जाएँ। कक्षा में शिक्षक का अपने छात्रों के प्रति व्यवहार आदर्श होना चाहिए। शिक्षक को न तो आवश्यकता से अधिक ढीला नियन्त्रण करना चाहिए और न ही अत्यधिक कठोर, क्योंकि दोनों ही परिस्थितियों में बालक कक्षा से बचते हैं और विद्यालय से पलायन कर जाते हैं। यह कक्षा-पलायन ही उनकी आपराधिक वृत्तियों के लिए पृष्ठभूमि तैयार कर देता है। छात्रों की अध्ययन सम्बन्धी तथा अन्य परिस्थितियों को समझा जाना चाहिए तथा उनके प्रति स्नेहपूर्ण व्यवहार प्रदर्शित किया जाना चाहिए। शिक्षक का व्यवहार अपने छात्र के प्रति ऐसा हो कि वह अपनी व्यक्तिगत समस्याएँ भी शिक्षक से अभिव्यक्त कर सके। कुल मिलाकर शिक्षक की भूमिका एक मित्र और निर्देशक की होनी चाहिए।

इस भाँति घर और विद्यालय उपर्युक्त सुझावों के आधार पर ऐसा वातावरण तैयार कर सकते हैं। ताकि बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारणों से छुटकारा मिल सके।

प्रश्न 4.
बाल-अपराध के आर्थिक कारणों को स्पष्ट कीजिए।
या
बाल-अपराध के आर्थिक कारणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
बाल-अपराध के आर्थिक कारण
(Economic Causes of Juvenile Delinquency)

आर्थिक विषमता तथा अपराधशास्त्र का अत्यन्त निकट का और गहरा सम्बन्ध है। बौंगर एवं फोर्नासिरी विर्सी के शोध-कार्य का निष्कर्ष है कि निर्धनता अपराध की प्रवृत्तियों को बढ़ावा देती है। निर्धन परिवारों के आय के अच्छे एवं पर्याप्त साधन नहीं होते जिसके फलस्वरूप उनके बच्चों की अधिकांश इच्छाएँ अतृप्त रह जाती है। इन इच्छाओं को तृप्त करने के लिए निर्धन घर के बच्चे अपराधों का सहारा लेते हैं। इसके अतिरिक्त निर्धनता के कारण उत्पन्न हीनमन्यता एवं विद्रोह की भावना के कारण भी किशोर अपराध की ओर उन्मुख होते हैं।

आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित होकर भी बालक अपराध करता है। बाल-अपराध के प्रमुख आर्थिक कारण निम्नलिखित हैं –

(1) निर्धनता – बर्ट के अनुसार, “आधे से अधिक अपराधी बालक निर्धन परिवारों के होते हैं। निर्धनता के कारणं जीवन में ऐसी अनेक परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं जो बालकों को अपराध के लिए उकसाती हैं तथा मजबूर कर देती हैं। निर्धनता के कारण बहुत-से गरीब परिवारों की आवश्यकताएँ व इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं। वे अपने आस-पास के वातावरण में लोगों को अच्छा खाता-पीता तथा आकर्षक साधनों को प्रयोग करता देखते हैं जिससे उनके अन्दर भी उन साधनों को पाने की लालसा उत्पन्न होती है। इन वस्तुओं एवं साधनों को वे अपने घर से तो प्राप्त नहीं कर पाते; अतः इन्हें वे चोरी से ठगी करके, छीनकर पाने का प्रयास करते हैं। वहीं से उनके अपराधी जीवन की शुरुआत हो जाती है।’

निर्धनता से उत्पन्न ऐसी प्रमुख असुविधाएँ तथा परिस्थितियाँ जो बाल-अपराध की मुख्य आर्थिक परिस्थितियाँ कहीं जाती हैं, निम्नलिखित हैं –

(i) भुखमरी – निर्धनता के कारण बहुत-से गरीब घरों के बच्चे भरपेट भोजन के लिए तरसते हैं। कभी-कभी तो उन्हें कई वक्त बिना भोजन के रहना पड़ता है। ऐसी विषम दशाओं में बालक आदरपूर्ति के लिए अनेक प्रकार के अपराधों की शरण लेते हैं। कहा भी गया है-‘बुभुक्षितं किं न करोति पापम–अर्थात् भूखा कौन-सा पाप नहीं करता?

(ii) अनुपयुक्त निवास-स्थान – निर्धनता के कारण गरीब लोगों को अपने बच्चों के साथ छोटे, गन्दे, सीलन-भरे, अन्धेरे तथा अस्वास्थ्यप्रद घरों में रहना पड़ता है। छोटी-सी जगह में परिवार के सभी लोग एक साथ ही रात बिताते हैं। स्त्री-पुरुष के यौन सम्बन्धों को देखकर बालक कच्ची उम्र में ही यौन सम्बन्धों को जान जाते हैं तथा उनमें रुचि रखने लगते हैं। वे एक ओर तो यौन सम्बन्धी अपराधी करने लगते हैं, दूसरी ओर इन बस्तियों के अनपढ़ तथा भ्रष्ट लोगों के बीच में रहकर अपराधों में लिप्त हो जाते हैं।

(iii) पारिवारिक संघर्ष – निर्धन एवं अभावग्रस्त परिवारों के सदस्य छोटी-छोटी बातों के लिए आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं। सांवेगिक असन्तुलन के कारण वे मानसिक विक्षोभ तथा मानसिक तनाव के शिकार हो जाते हैं। इनकी अन्तिम परिणति अपराध की ओर ले जाती है।

(iv) छोटे बालकों का नौकरी करना – निर्धन परिवारों के छोटे बालकों को मजबूरन धनी परिवारों, फैक्ट्रियों, सिनेमाघरों, होटलों तथा खेतों आदि में काम करना पड़ता है। इस वजह से वे न केवल शिक्षा से वंचित रह जाते हैं, बल्कि बीड़ी पीना, जुआ खेलना, शराबखोरी, वेश्यावृत्ति, चोरी । इत्यादि गन्दी आदतों के शिकार भी हो जाते हैं।

(2) बेकारी – जीविकोपार्जन का कोई उचित साधन न मिलने के कारण बेकार बालकों या किशोरों का मन बुरे कामों की ओर प्रवृत्त होता है। जब उन्हें माँ-बाप या अन्य परिवारजनों की कटी-जली बातें सुनने को मिलती हैं तो वे घर से भाग जाते हैं तथा अपराध करके पैसा कमाते हैं। प्रायः अशिक्षित लोग किशोर अवस्था में ही लड़कों का विवाह कर देते हैं। इन बेरोजगार युवकों को घर-गृहस्थी का बोझ उठाने के लिए नौकरी तो मिल नहीं पाती; अतः ये असामाजिक कार्यों द्वारा जीविकोपार्जन करने लगते हैं।

(3) अरुचिकर व्यवसाय – क्षमताओं के प्रतिकूल और अरुचिकर व्यवसाय में मन न लगने के कारण किशोरों को जल्दी ही थकान हो जाती है। वे व्यवसाय से असन्तुष्ट रहने के कारण चिन्तित एवं चिड़चिड़े स्वभाव वाले बन जाते हैं। इन परिस्थितियों में वे जरा-जरा सी बात पर मालिक या अधिकारी के प्रति उग्र हो उठते हैं तथा उनसे बदला लेने के लिए असामाजिक कार्य कर सकते हैं। व्यावसायिक असन्तोष से उत्पन्न मानसिक अस्थिरता के वशीभूत होकर वे कोई भी अपराध कर सकते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बाल-अपराध और साधारण अपराध में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उतर :
बाल-अपराध और साधारण अपराध दोनों ही समाज और कानून के विरुद्ध कृत्य हैं। इन दोनों के ही कारण समाज का वातावरण दूषित होता है तथा उसे हानि पहुँचती है। कुछ समानताओं के बावजूद भी विभिन्न कारणों एवं मौलिक भेदों के कारण एक ही प्रकार के कानून-विरोधी कार्य को कभी बाल-अपराध, तो कभी साधारण अपराध मान लिया जाता है बाल-अपराध तथा साधारण अपराध में निम्नलिखित अन्तर हैं –

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 10 Juvenile Delinquency 2
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 10 Juvenile Delinquency 3

प्रश्न 2.
बाल-अपराध के पर्यावरणीय कारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
बाल-अपराधियों के विकास के लिए कुछ पर्यावरणीय या सामाजिक कारक भी जिम्मेदार होते हैं। बाल-अपराध के पर्यावरणीय कारकों में सबसे मुख्य कारक है-परिवार का असामान्य वातावरण। वास्तव में बाल-अपराधी पारिवारिक विघटन के ही प्रतीक होते हैं। भग्न या विघटित परिवारों के बालक शीघ्र ही अपराधों की ओर उन्मुख हो जाते हैं। यदि परिवारों में बच्चों की संख्या अधिक हो या अन-अपेक्षित बच्चे हों तो भी उनके अपराधी बनने की आशंका बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त बच्चों के प्रति माता-पिता का उपेक्षापूर्ण व्यवहार, विमाता या विपिता का दुर्व्यवहार तथा परिवार के अन्य सदस्यों का अपराधों में लिप्त होना भी बाल-अपराध के पारिवारिक पर्यावरण सम्बन्धी कारक हैं। विद्यालय का प्रतिकूल वातावरण भी बाल अपराध का एक पर्यावरणीय कारक है। विद्यालय में अमनोवैज्ञानिक शिक्षण, शिक्षक का दुर्व्यव्यहार, दुरुह पाठ्यक्रम, कठोर अनुशासन तथा दण्ड की अधिकता के कारण बालक प्राय: स्कूल से भागने लगते हैं तथा आवारागर्दी करने लगते हैं। ये बालक शीघ्र ही बाल-अपराधों में लिप्त हो जाते हैं। इन कारकों के अतिरिक्त कुछ अन्य पर्यावरणीय कारक भी बाल अपराध के लिए जिम्मेदार हैं, जैसे कि अपराधी-क्षेत्र या समुदाय का प्रभाव, बालक की बुरी संगति, सामाजिक विघटन, स्वस्थ मनोरंजन का अभाव, अधिक स्थानान्तरण तथा युद्ध का प्रभाव।

प्रश्न 3.
बाल-अपराध के जैविकीय तथा शारीरिक कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
अनेक मनोवैज्ञानिकों तथा अपराधशास्त्रियों ने अपने अध्ययन और खोजों के आधार पर बाल-अपराधियों के जैविकीय तथा शारीरिक कारणों की पुष्टि की है। हूटन ने 668 अपराधियों तथा अपराधी की परस्पर तुलना करके बताया कि अपराध को मुख्य कारण ‘जैविकीय हीनता’ है। बर्ट, हीली व ब्रोनर, ग्ल्यूक तथा हिर्श व थर्स्टन ने संकेत दिया है कि अपराधियों में शारीरिक कारक (Physical Factors) अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। इसी प्रकार गिलिन एवं गिलिन के अध्ययनों से पता चला है कि शारीरिक दोषों के कारण बहुत-से बालक अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ हो जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप वे बहुत से समाज-विरोधी कार्यों में लग जाते हैं। अन्धापन, बहरापन, लँगड़ाना, हकलाना, तुतलाना, बहुत ज्यादा मोटे-पतले या नाटे तथा इसी तरह से विकृतियों के कारण बालक सामान्य बालकों से अलग हो जाते हैं जिससे उसके आचरण में भिन्नता आ जाती है। कुरूप, काने और लँगड़े बालकों को अक्सर लोग चिढ़ाते हैं जिसकी प्रतिक्रिया में वे असामाजिक कार्य कर डालते हैं निष्कर्षत: शारीरिक हीनता व विकृति के कारण बालक को समाज में असफलता मिलती है जो उसके अपराध का कारण बनती है।

बाल-अपराध से सम्बन्धित प्रारम्भिक अध्ययनों से ज्ञान होता है कि अपराधी बालकों में वंशानुक्रम या पैतृकता (Heredity) का भी महत्त्वपूर्ण प्रभाव होता है। वंशानुक्रम तथा पर्यावरण दोनों ही अपराध के लिए उत्तरदायी हैं। एक जन्मजात कारक है और दूसरा अर्जित कारक। बालक में कुछ जन्मजात गुण निहित होते हैं और ये गुण किन्हीं निश्चित परिस्थितियों से एक विशेष प्रकार का परिणाम देते हैं। अच्छी परिस्थतियों में अच्छा परिणाम तथा बुरी परिस्थितियों में बुरा परिणाम निकलता है। गाल्टन, गोडार्ड तथा डगडेल के निष्कर्षों से पुष्ट होता है कि वंशानुक्रम ही अपराध का प्रमुख कारण है, क्योंकि ‘ज्यूक्स’ तथा कालीकाक’ आदि अपराधी वंशों में उत्पन्न अधिकांश सन्तानें बड़ी होकर अपराधी बनीं। सीजर, लाम्ब्रोसो तथा फैरी का कथन है कि बाल-अपराधों का सम्बन्ध शारीरिक विशेषताओं से है। विभिन्न शारीरिक गुण; यथा स्नायविक संस्थान, रक्त की संरचना, ग्रन्थीय बनावट आदि वंशानुक्रम द्वारा ही संक्रमित होते हैं जिनकी विशिष्ट अवस्थाएँ बालक को अपराध करने के लिए प्रेरित करती हैं।

प्रश्न 4.
बाल-अपराध-निरोध के सन्दर्भ में सर्टीफाइड स्कूल का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
बाल-अपराध-निरोध का एक उपाय ‘सर्टीफाइड स्कूल’ है। सर्टीफाइड स्कूल ‘बाल अधिनियम’ (Children Act) के अन्तर्गत भारत के लगभग सभी राज्यों में स्थापित किये जा चुके हैं। बाल अधिनियम; बाल-अपराध-निरोध में पर्याप्त रूप से लाभदायक सिद्ध हुआ। समाज में रहने वाले बालकों की प्रवृत्ति अपराधों की ओर न जाए, इस उद्देश्य से बाल अधिनियम लागू किया गया था। सर्टीफाइड स्कूलों में छोटे-छोटे अपराध करने वाले बालकों को रखा जाता है। 14 वर्ष तक के बालक जूनियर स्टफाइड स्कूलों में तथा 14-16 वर्ष तके के बालक सर्टीफाइड स्कूलों में रखे जाते हैं। इन। स्कूलों में 5वीं से 8वीं कक्षा तक शिक्षा प्रदान की जाती है। कुछ राज्यों में बालक और बालिकाओं के अलग-अलग स्कूल हैं किन्तु कुछ राज्यों में ये स्कूल सम्मिलित प्रकार के हैं। सर्टीफाइड स्कूल महाराष्ट्र, बंगाल; आन्ध्र प्रदेश, केरल तथा तमिलनाडु में पर्याप्त संख्या में खुल चुके हैं। कुछ राज्यों में ‘स्वयं सेवी संस्थाएँ भी इस प्रकार के स्कूल चलाती हैं; यथा – महाराष्ट्र में ‘उपयुक्त व्यक्ति संस्थाएँ, कोलकाता में ‘आवारा बच्चों का शरणालय’ तथा ‘कोलकाता विजिलेन्स समिति शरणालय’, आन्ध्र प्रदेश में ‘कुटी नेल्लोडी बाल शरणालय’ तथा ‘गिन्दी बाल शरणालय’ एवं मैसूर में ‘बेलारी का सर्टीफाइड स्कूल’ आदि बाल सुधार की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

प्रश्न 5.
बाल-अपराध के उपचार के उपायों के सन्दर्भ में सुधार स्कूलों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
सुधार स्कूल के कार्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
बाल-अपराधियों के सुधार के लिए विभिन्न उपाय किये जा रहे हैं। इन उपायों में से एक मुख्य उपाय है-सुधार स्कूलों की स्थापना।’

‘रिफोमेंट्री स्कूल अधिनियम, 1897′ (Reformatory School’s Act, 1897) के अन्तर्गत भारत में चार सुधार स्कूल Reformatories of Reformatory School स्थापित किये गये। इनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है

(1) लखनऊ रिफोर्मेट्री स्कूल – उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के इस स्कूल में 9-15 वर्ष कीआयु के अपराधी बालकों को 4 से 7 वर्ष तक स्कूली शिक्षा प्रदान की जाती है। बालकों को सामान्य शिक्षा के अतिरिक्त प्रौद्योगिक शिक्षा भी दी जाती है। बालकों को बैण्ड बजाने की प्रशिक्षण भी दिया जाता है। जिसका प्रदर्शन विभिन्न अवसरों पर नगर में किया जाता है। स्कूल के बालकों को जेब खर्च दिया जाता है तथा स्कूल से बाहर जाने का अवकाश प्रदान किया जाता है।

(2) हिसार रिफोर्मेट्री स्कूल – दिल्ली, हरियाणा और पंजाब प्रान्तों से आये अपराधी बालकों के लिए हिसार (हरियाणा) में यह स्कूल स्थापित किया गया है। यहाँ 15 वर्ष से कम आयु के बालक 3-5 वर्ष तक रखे जाते हैं, जिन्हें मिडिल स्तर की शिक्षा के अतिरिक्त कुछ धन्धे भी सिखाये जाते हैं। इनमें सिलाई, बढ़ई, लुहार तथा चकड़े का काम प्रमुख है। स्काउटिंग के साथ स्वस्थ नागरिकता की। शिक्षा दी जाती है। बालक का आचरण अच्छा होने पर उसे पुरस्कार तथा घर जाने हेतु 15 दिन का अवकाश प्रदान किया जाता है।

(3) जबलपुर रिफोर्मेंट्री स्कूल – मध्य प्रदेश के बाल-अपराधियों के लिए यह सुधार स्कूल स्थापित किया गया है। बालकों को सामान्य शिक्षा एवं प्रौद्योगिक प्रशिक्षण दोनों ही प्रदान करने की यहाँ व्यवस्था है। अपराधी बालकों को आत्म-निर्भर बनाने के साथ-साथ विद्यालय जैसी पूर्ण स्वतन्त्रता भी प्रदान की जाती है।

(4) हजारीबाग रिफोर्मेट्री स्कूल – यह सुधार स्कूल बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा तथा असम के बाल-अपराधियों को सुधारने के लिए हैं। स्कूल में प्राथमिक शिक्षा तथा काम-धन्धों के प्रशिक्षण का प्रबन्ध किया गया है। स्कूल से बाहर के विद्यार्थी भी यहाँ आकर शिक्षा व प्रशिक्षण पा सकते हैं। अच्छे आचरण वाले, योग्य एवं मेधावी बालकों को शिक्षण-प्रशिक्षण हेतु बाहर की अन्य शिक्षा संस्थाओं में भेजा जाता है।

प्रश्न 6.
बाल-अपराधियों की सुधार योजना के रूप में प्रवीक्षण या प्रोबेशन का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
प्रवीक्षण (Probation); बाल-अपराधियों को सुधारने की सर्वाधिक प्रचलित विधि समझी जाती है। प्रवीक्षण के विषय में क्रेबन का कथन है, “प्रवीक्षण अपराध के विरुद्ध रक्षा की प्रथम पंक्ति है।” (“Probation is the first line of defence against crime.” – Craben) प्रवीक्षण के अन्तर्गत अपराधी बालकों को एक प्रवीक्षण अधिकारी (Probation Officer) के संरक्षण में रखा जाता है। इसके अनुसार न्यायालय द्वारा 18 वर्ष से कम उम्र के किशोर अपराधी को दण्डित नहीं किया जाता, बल्कि उसे एक प्रवीक्षण अधिकारी के पास भेज दिया जाता है। प्रवीक्षण अधिकारी अपने संरक्षण में उसे उसके माता-पिता के पास रखता है और सुधारने का पूरा प्रयास करता है। वह समय-समय पर न्यायालय में उसकी चरित्र सम्बन्धी रिपोर्ट भेजता रहता है।

भारत का प्रथम प्रवीक्षण अधिनियम (First Offenders Probation Act), उत्तर प्रदेश राज्य में 1938 ई० में पास हुआ जिसके अन्तर्गत 7 से 16 वर्ष की आयु तक पहली बार अपराध करने वाले बालक या किशोर को प्रवीक्षण अधिकारी की निगरानी में छोड़ दिया जाता है। ये अपराधी सिर्फ लड़के होते हैं।

प्रवीक्षण के ये उद्देश्य हैं 

  1. पहली बार अपराध करने वाले अवयस्क व्यक्ति (बालक और किशोर) के साथ नरम रुख अपनाना और उसे सुधारने के अवसर प्रदान करना;
  2. ऐसे अपराधी को चेतावनी देना तथा दण्ड के भय का प्रदर्शन कर अपराध की ओर से हटाना;
  3. बाल-अपराधी को अपराध से युक्त परिवेश से अलग हटाना, दण्ड या भय के माध्यम से अपराध से दूर रखना;
  4. अभावग्रस्त परिस्थितियों से अलग करके बालक की सामाजिक-मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ पूरी करना तथा
  5. अपराधी बालक की प्रवृत्ति तथा व्यक्तित्व का गहन का सूक्ष्म अध्ययन करके उसके उपचार के उपाय प्रस्तावित करना।

प्रश्न 7.
प्रवीक्षण अधिकारी के कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

प्रवीक्षण अधिकारी के मुख्य कार्य हैं

  1. प्रवीक्षण अधिकारी दोषी बालकों को अपने संरक्षण में रखता है;
  2. बालक के अपराध का निदान करता है तथा तत्सम्बन्धी कारणों को समझने का प्रयास करता है;
  3. दोषियों को सुधारने का प्रयास करता है तथा उनके विषय में न्यायालय को समय-समय पर सूचित करता है;
  4. अपराधी को हर सम्भव उपाय से समाज का अच्छा नागरिक बनाने का प्रयास करता है;
  5. उसे आजीविका दिलाने की भरपूर कोशिश करता है जिससे कि वह अपना और अपने परिवार का निर्वाह कर सके तथा
  6. समाज में रहकर अच्छा आचरण एवं व्यवहार न दिखाने वाले को जेल पहुँचाना।

उत्तर प्रदेश, दिल्ली, तमिलनाडु, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात सहित लगभग सभी राज्यों में प्रवीक्षण कानून लागू कर दिया गया है। सभी स्थानों पर प्रवीक्षण अधिकारी नियुक्त हैं जिनसे हजारों-हजारों बच्चे लाभ उठा रहे हैं। वर्तमान जनतान्त्रिक युग में प्रत्येक सभ्य देश में प्रवीक्षण कानून का प्रयोग किया जा रहा है। प्रवीक्षण के माध्यम से बाल-अपराध को रोकने की दिशा में भारी सफलता प्राप्त हुई है।

प्रश्न 8.
टिप्पणी लिखिए-बाल-अपराधी का मनोवैज्ञानिक उपचार।
या
बाल अपराध के उपचार में मनोचिकित्सा की क्या भूमिका है?
उत्तर :
बाल-अपराध की उत्पत्ति से सम्बन्धित दो प्रमुख कारक हैं – सामाजिक या परिवेशगत कारक तथा मनोवैज्ञानिक कारक। सामाजिक या परिवेशगत कारकों की वजह से उत्पन्न अवयस्क या बाल-अपराध को सुधार-गृहों तथा प्रवीक्षण कानून द्वारा दूर किया जा सकता है, किन्तु इनके माध्यम से व्यक्गित दोषों का निवारण नहीं हो सकता। यदि कोई बालक बौद्धिक कारणों से, संवेगात्मक अस्थिरता, व्यक्तित्व सम्बन्धी असन्तुलन तथा मानसिक विकारों की वजह से अपराध के लिए प्रवृत्त हुआ है तो उसका उपचार सुधार संस्थाओं या प्रवीक्षण द्वारा करना सम्भव नहीं है। अनेकानेक मनोवैज्ञानिकों के अनवरत अध्ययन तथा अनुसन्धान कार्य से निष्कर्ष प्राप्त हुए हैं कि अधिकांश अपराधी बालक मानसिक अस्वस्थता के शिकार होकर अपराध करते हैं, इनके व्यक्तित्व का समुचित विकास नहीं हो पाता तथा ये विभिन्न मनोवैज्ञानिक दोषों से प्रेरित होते हैं; अतः इन्हें सुधारने के लिए मनोवैज्ञानिक उपायों की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। आजकल सुधार संस्थाओं में मनोवैज्ञानिक उपचार के समुचित साधन उपलब्ध हैं। मनोवैज्ञानिक उपचार का प्रथम सोपान निदान (Diagnosis) अर्थात् अपराध के कारण की खोज है, जिसके लिए मनोवैज्ञानिक विधियो; जैसे—निरीक्षण, परीक्षण, जीवन-वृत्त तथा साक्षात्कार का सहारा लिया जाता है, तत्पश्चात् उपचार की कार्य योजना तैयार की जाती है। बाल-अपराधियों के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य मनोवैज्ञानिक विधियाँ हैं-क्रीड़ा-चिकित्सा, अंगुलि-चित्रण तथा मनोअभिनय।

प्रश्न 9.
टिप्पणी लिखिए-क्रीड़ा चिकित्सा।
उत्तर :
क्रीड़ा चिकित्सा मनोवैज्ञानिक उपचार की सबसे सरल, सस्ती, स्वाभाविक तथा महत्त्वपूर्ण विधि है। क्रीड़ा चिकित्सा का आधारभूत सिद्धान्त यह बताता है कि बालक की रचनात्मक शक्तियों को स्वाभाविक रूप से अभिप्रकाशित न करने देने के कारण वे विचलित होकर विनाशात्मक प्रवृत्तियों में बदल जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप बालक अपराधी बन जाते हैं। मनोवैज्ञानिक तथ्य के अनुसार बालक अपने मन कुण्ठाओं तथा ग्रन्थियों को खेल के माध्यम से प्रकाशित करता है। खेल के माध्यम से उसकी वृत्तियों को बाहर निकलने का अवसर मिलता है और उसकी रचनात्मक शक्तियाँ विकसित हो पाती हैं। अभावग्रस्त बालकों के मानसिक दोषों को दूर करके उन्हें सन्तुष्टि प्रदान करने के लिए स्वतन्त्र रूपसे रुचि के अनुसार खेलने के अवसर दिये जाने चाहिए। खेल व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं। व्यक्तिगत खेल व्यक्तिगत समायोजन में सहायता करते हैं तो सामूहिक खेल बालकों में प्रेम, सहयोग तथा सहकारिता जैसे सामाजिक विशेषताएँ विकसित करते हैं।

क्रीड़ा चिकित्सा को एक उदाहरण के सहायता से भली प्रकार समझा जा सकता है। ‘मोहन’ नाम के एक बारह वर्षीय बालक को पुलिस ने किसी घर में जलता हुआ कपड़ा फेंककर आग लगाने के जुर्म में पकड़ लिया। मोहन ने मानसिक चिकित्सालय में आकर चारों तरफ तोड़-फोड़ मचा दी। वह स्वभाव से विद्रोही लगता था। मनोवैज्ञानिकों ने उसके जीवन इतिहास की खोजबीन करके पता लगाया कि मोहन की असली माँ का बहुत पहले निधन हो चुका था और उसकी विमाता शराबी पिता से मोहन की निर्दयुतापूर्वक पिटाई करवाती थी। अक्सर उसे भूखे पेट ही सो जाना पड़ता था। लगातार उत्पीड़न, यन्त्रणाओं और भीषण अवदमन के शिकार मोहन में धीरे-धीरे कुण्ठा और विद्रोह की भावनाएँ भर गयीं और वह तोड़-फोड़ व आगजनी के सहारे इस समाज से बदला लेने लगा। उसे मनोवैज्ञानिक उपचार के अन्तर्गत पहले व्यक्तिगत खेल में लगाया गया; जैसे—रेत के घरौंदे बनाना, ब्लॉक्स से भवन और पुल आदि बनाना। शुरू में उसने इन चीजों की रचना की फिर उन्हें तोड़ा। धीरे-धीरे उसकी रुचि तोड़ने में कम होती गयी तथा रचना की ओर बढ़ती गयी। अब वह अपने साथियों की तरफ उन्मुख हुआ और सामूहिक क्रीड़ा पद्धति के माध्यम से टीम-भावना (Team Spirit) के साथ तथा नियमानुसार खेलने लगा। इस प्रकार क्रीड़ा चिकित्सा के माध्यम से मोहन एकदम सामान्य हो गया।

प्रश्न 10.
टिप्पणी लिखिए-अंगुलि-चित्रण (Finger Painting)।
उत्तर :
अंगुलि-चित्रण की विधि, क्रीड़ा चिकित्सा के समान ही मनोवैज्ञानिक उपचार की एक स्वाभाविक विधि है जो अपराधी बालक के मानसिक तनावों को दूर कर उसे सामान्य बनाने में सहायक होती है। बालक के सामने सादा सफेद कागज तथा लाल, पीला, नीला, हरा आदि अनेक रंग होते हैं। बालक को मनचाहे रंग तथा अपने ही ढंग से कागज पर चित्र बनाने की स्वतन्त्रता प्रदान की जाती है। बिना किसी रोक-टोक के रंग पोतने तथा बिखराने में बालक को अपूर्व आनन्द मिलता है, जिससे उसके संवेगात्मक तनाव बाहर निकल जाते हैं और वह तनावमुक्त, स्वस्थ एवं सामान्य बालक की भाँति व्यवहार करने लगता है। कुछ कुशल एवं प्रवीण मनोवैज्ञानिक उँगली से बनाये गये चित्रों के रूप, आकार तथा प्रयुक्त रंगों को देखकर बालक की मनोस्थिति का अनुमान कर लेते हैं। इससे बाल-अपराधी के उपचार में सहायता मिलती है।

प्रश्न 11.
टिप्पणी लिखिए—मनोअभिनय (Psychodrama)।
उत्तर :
मनोअभिनय मानसिक उपचार की एक नवीन और सफल विधि है जिसका शुभारम्भ 1964 ई० में मुरेनो (Mureno) द्वारा अमेरिका में किया गया था। इस विधि में बिना किसी पूर्व योजना के बालकों का समूह नाटक में अपनी काल्पनिक भूमिका करता है। इस भूमिका के सम्बन्ध से ही वह अपने अवचेतन मन में स्थिर संवेगात्मक ग्रन्थियों को अभिव्यक्त करता है। अभिनय द्वारा उसके दमित संवेगों का अभिप्रकाशन होता है, उसका संवेगात्मक रेचन हो जाता है और वह पुनः मानसिक स्वास्थ्य की ओर उन्मुख होता है। मनो अभिनय में बालक ऐसे नाटक करते हैं जिनमें उनकी हिंसात्मक और ध्वंसात्मक प्रवृत्तियों को सन्तुष्टि मिले; यथा—बच्चों से कहा जाए कि, “सामने पहाड़ी पर एक काले भयानक दैत्य का दुर्ग है। उसमें एक सुन्दर राजकुमारी को कैद कर रखा है। आओ, उस दैत्य को मारकर राजकुमारी को छुड़ाएँ।” सभी बालके अपनी-अपनी काल्पनिक भूमिकाएँ चुनकर तद्नुसार अभिनय करते हैं। निरीक्षक अभिनय का निरीक्षण करता है तथा बाल-अपराधी की संवेगात्मक अनुभूतियों को अध्ययन कर निष्कर्ष निकालता है। इस प्रकार के नाटक व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों प्रकार के हो संकते हैं और इनके द्वारा बालक की प्रगति का मूल्यांकन भी सम्भव है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बाल-अपराध के निदान के उपाय बताइए।
उत्तर :
मनोविज्ञान की संकल्पना के अनुसार बाल-अपराध एक मानसिक रोग है। बाल-अपराधी को सुधारने के लिए सर्वप्रथम उन कारणों का पता लगाया जाती है जिनके कारण से कोई बालक अपराधी बना होता है। यह अपराध की नैदानिक प्रक्रिया के अन्तर्गत आता है। बाल-अपराधों के कारणों का निदान करते समय निम्नलिखित बातों की ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त की जाती है –

  1. बाल-अपराधी की शारीरिक विशेषताओं की जानकारी
  2. बालक के बौद्धिक स्तर, मानसिक योग्यताओं, रुचियों, अभिरुचियों तथा अन्य विशेषताओं को परीक्षण एवं मूल्यांकन
  3. उनकी संवेगात्मक संरचना का अध्ययन
  4. अपराधी बालक के परिवार के लोगों के विषय में जानकारी
  5. आस-पड़ोस, साथियों, सम्पर्क सूत्रों तथा सामाजिक व्यवहार का अध्ययन
  6. परिवार की आर्थिक स्थिति तथा आय के साधन
  7. अपराधी बालक के व्यवसाय (अगर वह कोई धन्धा करता हो) की दशाओं का ज्ञान तथा
  8. उसके विद्यालयी व्यवहार का लेखा-जोखा तथा उसकी सम्प्राप्तियों का विवरण।

साक्षात्कार – उपर्युक्त विभिन्न पक्षों के सम्बन्ध में आवश्यक सूचना एकत्रित करने के उपरान्त अपराधी बालक से साक्षात्कार करके उसकी उन सभी समस्याओं तथा कारणों का समुचित ज्ञान किया। जाता है जिन्होंने उसे अपराध के लिए प्रेरित किया था।

प्रश्न 2.
बाल-अपराध के कोई दो मनोवैज्ञानिक कारण बताइए।
उत्तर :
बाल – अपराध के दो मुख्य मनोवैज्ञानिक कारणों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

(i) मानसिक या बौद्धिक कारण – बाल-अपराध के मुख्य मानसिक कारण हैं-बालक को मानसिकहीनता का शिकार होना अथवा अति तीव्र बुद्धि वाला होना। प्रायः अति तीव्र बुद्धि वाला बालक यादि पथ-भ्रष्ट हो जाए तो वह अपराध जगत् में गिरोह का नेता बन जाया करती है। इसके साथ ही बालक यादि मानसिक योग्यताओं से हीन हो, तो भी वह अपराध जगत् की ओर उन्मुख हो सकता है।

(ii) संवेगात्मक कारण – बालक की संवेगात्मक असामान्यता भी उसे अपराध जगत् की ओर उन्मुख कर सकती है। सामान्य रूप से अति सवेगात्मकता, स्वभावगत अस्थिरता, समायोजन की कमी तथा भावना ग्रन्थियों की प्रबलता के कारण भी बालक अपराधी बन जाया करते हैं।

प्रश्न 3.
बोर्टल स्कूल के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर :
सबसे पहले, सर रगल्स ब्राइस (Sir Ruggles Brice) ने 1902 ई० में इंग्लैण्ड के बोल नामक स्थान पर एक गैर-सरकारी जेलखाना खोला था। इसका उद्देश्य किशोर अपराधियों को सुधारना था। उसी स्थान के नाम पर ये बोर्टल स्कूल कहलाने लगे। इन स्कूलों में 16-21 वर्ष तक की आयु के अपराधी रखे जाते हैं तथा अपराधी बालक के व्यक्तित्व को इस तरह निर्मित किया जाता है ताकि वह स्वयं ही अपराधी प्रवृत्ति को त्याग दे। सुधार गृह की भाँति ये मान्यता प्राप्त विद्यालय होते हैं, किन्तु ये एक प्रकार से बन्दीगृह भी हैं। सामान्य रूप से ये जेल विभाग के अन्तर्गत आते हैं। यहाँ सामान्य शिक्षा के साथ-साथ शारीरिक शिक्षा तथा औद्योगिक शिक्षा भी प्रदान की जाती है। इस प्रकार के स्कूल तमिलनाडु, बंगाल, महाराष्ट्र तथा मैसूर आदि राज्यों में स्थापित किये गये हैं जो किशोर अपराधियों को सुधारने में बहुत सफल हुए हैं।

प्रश्न 4.
बाल-न्यायालय बाल-अपराध को दूर करने में किस प्रकार सहायक है?
या
बाल-न्यायालयों के कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
पुलिस द्वारा पकड़े जाने वाले बाल-अपराधियों की सुनवाई के लिए अलग से न्यायालय स्थापित किये गये हैं, जिन्हें बाल-न्यायालय (Juvenile Courts) कहा जाता है। बाल-न्यायालयों की स्थापना का उद्देश्य बाल-अपराधियों को दण्डितं करना नहीं बल्कि उनको सुधार करना है। बाल-न्यायालय बाल-अपराधी की अपराधी-प्रवृत्ति, पारिवारिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि आदि को ध्यान में रखते हुए उसे बाल-बन्दीगृह, सुधार स्कूल, प्रोबेशन अथवा बोस्ट्रल स्कूल आदि में भेज देता है। आवश्यकता होने पर बाल-अपराधी के मनोवैज्ञानिक उपचार की भी सिफारिश की जाती है। इन समस्त उपायों द्वारा बाल-न्यायालय बाल-अपराध की प्रवृत्ति को समाप्त करने में सहायता देते हैं।

प्रश्न 5.
टिप्पणी लिखिए-बाल-बन्दीगृह।
उत्तर :
बाल-बन्दीगृह सामान्य जेलों से भिन्न एक सुधार संस्था है। उत्तर प्रदेश में बरेली में बोर्टल व्यवस्था के अन्तर्गत एक बाल-बन्दीगृह (Juvenile Jail) स्थापित किया गया था जिसमें 18 वर्ष तक की आयु के अपराधी रखे जाते हैं। यहाँ उन्हें सामान्य शिक्षा के साथ-साथ विभिन्न उद्योगों की शिक्षा भी दी जाती है ताकि वे बन्दीगृह से बाहर जाकर एक उपयोगी जीवन व्यतीत कर सकें। जो बालक आगे पढ़ने के इच्छुक होते हैं, उन्हें जेल से बाहर अन्य विद्यालयों में भेजने की भी व्यवस्था है। जेल छोड़ते समय बाल-अपराधियों को उन्हीं के परिश्रम से उपार्जित धन प्रदान किया जाता है ताकि वे उससे अपना कोई स्वतन्त्र व्यवसाय स्थापित कर सकें।

प्रश्न 6.
टिप्पणी लिखिए-सहायक गृह।
उत्तर :
सहायक गृह सर्टीफाइड स्कूलों के लिए अपराधी बालक लेने का कार्य करते हैं। ये सरकारी और गैर-सरकारी दोनों प्रकार के होते हैं। इन स्कूलों में मिडिल स्तर तक सामान्य शिक्षा के साथ कुछ धन्धे भी सिखाये जाते हैं; जैसे-चटाई बनाना, जिल्द बनाना, बढ़ई-राजगिरि-दर्जी तथा कताई-बुनाई का काम। इनके अलावा स्काउटिंग, प्राथमिक चिकित्सा, संगीत तथा कृषि कार्य भी सिखाया जाता है। यह पाया गया है कि सहायक गृहों से निकले बच्चे बहुत कम संख्या में दोबारा अपराध करते हैं।

प्रश्न 7.
बाल-अपराध-निरोध के सन्दर्भ में चलाये जाने वाले सतर्कता कार्यक्रम का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
सतर्कता कार्यक्रम (Care Programme); भारत की केन्द्रीय सरकार द्वारा बच्चों के पुनर्वास तथा शिक्षण हेतु संचालित किये जाते हैं। इन कार्यक्रमों के अन्तर्गत विभिन्न राज्यों में 17 सर्टीफाइड स्कूल 9 बोर्टल स्कूल, 5 रिमाण्ड होम्स, 14 लड़कों के क्लब तथा 5 प्रोबेशन होस्टल्स हैं। सरकार द्वारा किशोर अपराधियों के लिए पृथकू से न्यायालय स्थापित किये गये हैं। इस समय देश में 91 किशोर न्यायालय, 100 विशेष विद्यालय तथा अनेक फिट पर्सन्स संस्थाएँ हैं।

प्रश्न 8.
बाल-अपराध की रोकथाम में विद्यालय की दो महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ लिखिए।
उत्तर :
बाल-अपराध की रोकथाम में विद्यालय द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जा सकती है। सर्वप्रथम विद्यालय के शिक्षकों को उन सभी बालकों के प्रति विशेष ध्यान रखना चाहिए जिनकी गतिविधियाँ कुछ असामान्य हों, जैसे कि स्कूल से प्रायः अनुपस्थित रहना, भाग जाना या देर से आना। ऐसे बालकों के अभिभावकों से निरन्तर सम्पर्क बनाये रखना चाहिए। इसके अतिरिक्त विद्यालय के वातावरण को उत्तम, रोचक एवं आकर्षक बनाकर भी बाल-अपराध की प्रवृत्ति को नियन्त्रित किया जा सकता है। विद्यालय की उत्तम अनुशासन व्यवस्था भी बाल-अपराध की प्रवृत्ति को नियन्त्रित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.

निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. किसी 13 वर्ष के बालक द्वारा की गयी चोरी को ……………….. की श्रेणी का अपराध कहा जाएगा।
  2. बाल-अपराध को ……………….. का प्रतीक माना जाता है।
  3. बाल-अपराध का निर्धारण मुख्य रूप से अपराधी की ……………….. के आधार पर होता है।
  4. आधुनिक नगरीय समाज में बाल-अपराध की दर में ……………….. हो रही है।
  5. अधिकांश बाल-अपराधी ……………….. परिवारों से सम्बन्धित होते हैं।
  6. अमनोवैज्ञानिक शिक्षण, शिक्षक का दुर्व्यवहार, दुरुह पाठ्यक्रम, कठोर अनुशासन तथा दण्ड के कारण कुछ बालक स्कूल से भागने लगते हैं तथा क्रमशः ……………….. बन जाते हैं।
  7. बालक को स्कूल से प्रायः भाग जाना अपने आप में बाल-अपराध तथा ……………….. है।
  8. समायोजन का दोष भी बालकों को ……………….. बना सकता है।
  9. कुछ विशेष प्रेकार के मानसिक रोगों से ग्रस्त बालक भी ……………….. की ओर शीघ्र ही उन्मुख हो जाते हैं।
  10. बाल-अपराधियों को दण्ड नहीं दिया जाता बल्कि उन्हें ……………….. के उपाय किये जाते हैं।
  11. आर्थिक अभावों एवं निर्धनता के कारण भी अनेक बालक ……………….. की ओर उन्मुख होते हैं।
  12. सर्टीफाइड स्कूल तथा बोर्टल स्कूल का मुख्य उद्देश्य बाल-अपराधियों को ……………….. है।
  13. परिवीक्षा काल का सम्बन्ध ……………….. को दूर करने या रोकने से होता है।
  14. बाल-अपराधी सुधार के लिए ……………….. भेजे जाते हैं।
  15. भारत में प्रथम प्रवीक्षण अधिनियम उत्तर प्रदेश राज्य में सन् ……………….. में पारित हुआ था।
  16. बाल अंपराध सिद्ध होने पर बालक को ……………….. अधिकारी के पास भेजा जाता है।
  17. प्रवीक्षण अधिनियम के अनुसार प्रथम बार अपराध करने वाले बालक को ……………….. की निगरानी में छोड़ दिया जाता है।
  18. बाल-अपराधियों के उपचार के लिए मुरेनो नामक मनोवैज्ञानिक ने ……………….. नामक विधि को खोजा था।

उत्तर :

  1. बाल-अपराध
  2. पारिवारिक विघटन
  3. आयु
  4. वृद्धि
  5. विघटित
  6. बाल-अपराधी
  7. अन्य अपराधों का कारण भी
  8. बाल अपराधी
  9. अपराधों
  10. सुधारने
  11. अपराधों
  12. सुधारना
  13. बाल-अपराध
  14. सुधार स्कूल
  15. 1938
  16. प्रवीक्षण अधिकारी
  17. प्रवीक्षण अधिकारी
  18. मनोअभिनया

प्रश्न II.

निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
बाल-अपराध का सामान्य अर्थ क्या है?
उत्तर :
किसी बालक (कानून द्वारा निर्धारित आयु से कम) द्वारा ऐसा कोई भी कार्य जो समाज-विरोधी है और जिससे कानून का उल्लंघन होता है, बाल-अपराध कहलाता है।

प्रश्न 2.
सिरिल बर्ट के अनुसार किस बालक को बाल-अपराधी कहा जा सकता है?
उत्तर :
सिरिल बर्ट के अनुसर, किसी बालक को बाल-अपराधी वास्तव में तभी मानना चाहिए जब उसकी समाज-विरोधी प्रवृत्तियाँ इतना गम्भीर रूप ले लें कि उस पर सरकारी कार्यवाही आवश्यक हो जाए।

प्रश्न 3.
‘बाल-अपराध की डॉ० सेठना द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
डॉ० सेठना के अनुसार, “बाल-अपराध से अभिप्राय किसी स्थान-विशेष के नियमों के अनुसार एक निश्चित आयु से कम के बालक या युवक व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला अनुचित कार्य है।”

प्रश्न 4.
बाल-अपराध के परिवार सम्बन्धी मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
बाल-अपराध के परिवार सम्बन्धी मुख्य कारण हैं-परिवार का विघटित होना, परिवार में अन-अपेक्षित एवं अधिक बच्चे होना, माता-पिता का असमान या उपेक्षापूर्ण व्यवहार, विमाता या विपिता का दुर्व्यवहार तथा परिवार के अन्य सदस्यों का अपराधों में लिप्त होना।

प्रश्न 5.
विद्यालय को किस प्रकार का वातावरण बालकों को अपराधों की ओर प्रेरित करता है?
उत्तर :
यदि, विद्यालय में अमनोवैज्ञानिक शिक्षण, शिक्षक का दुर्व्यवहार, दुरूह पाठ्यक्रम, कठोर अनुशासन तथा दण्ड जैसे कारक प्रबल हों तो बालक स्कूल से भाग कर अपराधों की ओर प्रेरित हो सकते हैं।

प्रश्न 6.
बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारकों को किन वर्गों में बाँटा जाता है?
उत्तर :
बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कराकों को चार वर्गों में बाँटा जाता है –

(क) मानसिक अथवा बौद्धिक कारक
(ख) संवेगात्मक कारक
(ग) व्यक्तित्व की विशिष्टताएँ तथा
(घ) विशेष प्रकार के मानसिक रोग।

प्रश्न 7.
बाल-अपराध के मुख्य संवेगात्मक कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
बाल-अपराध के मुख्य संवेगात्मक कारण हैं –

(क) अति संवेगात्मकता
(ख) स्वभावगत अस्थिरता
(ग) समायोजन दोष
(घ) भावना ग्रन्थियाँ एवं मनोविक्षेप
(ङ) किशोरावस्था के परिवर्तन तथा
(च) मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति न होना।

प्रश्न 8.
बाल-अपराधियों को सुधारने के मुख्य उपाय क्या हैं?
उत्तर :
बाल-अपराधियों को सुधारने के मुख्य उपाय हैं –

(क) सुधार संस्थाएँ
(ख) अवीक्षण या प्रोबेशन तथा
(ग) मनोवैज्ञानिक चिकित्सा।

प्रश्न 9.
बाल-अपराधियों तथा वयस्क अपराधियों की मुख्य सुधार संस्थाएँ कौन-कौन-सी हैं?
उत्तर :
बाल-अपराधियों तथा वयस्क अपराधियों की मुख्य सुधार संस्थाएँ हैं – सुधार स्कूल, सर्टीफाइड स्कूल, बोटंल स्कूल तथा बाल-बन्दीगृह।

प्रश्न 10.
बाल-अपराधियों तथा वयस्क अपराधियों में मुख्य अन्तर क्या होता है?
उत्तर :
बाल-अपराधी कच्चे अपराधी होते हैं तथा उनका सुधार सरल होता है, जबकि वयस्क अपराधी पक्के अपराधी होते हैं तथा उनका सुधार काफी कठिन होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
किस बालक की कानून-विरोधी गतिविधियों को बाल-अपराध की श्रेणी में रखा जाता है?
(क) जिसकी शिक्षा अधूरी रह गयी हो
(ख) जिसकी समझ विकसित हो गयी हो
(ग) जिसकी दाढ़ी-मूंछ निकल आयी हो
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 2.
दस वर्ष की आयु वाले बालक के द्वारा गम्भीर अपराध करने को कहते हैं –
(क) बाल-अपराधी
(ख) अपराधी
(ग) असामाजिक बालक
(घ) मानसिक विक्षिप्त

प्रश्न 3.
“व्यवहार के सामाजिक नियमों से विचलित होने वाले बालक को बाल-अपराधी कहते हैं।” यह कथन किसका है?
(क) होली
(ख) न्यूमेयर
(ग) बर्ट
(घ) सेठना

प्रश्न 4.
अधिकांश बाल-अपराधी किस प्रकार के परिवारों से सम्बन्धित होते हैं?
(क) धनवान परिवार
(ख) सुसंगठित परिवार
(ग) विघटित परिवार
(घ) संयुक्त परिवार

प्रश्न 5.
बाल अपराध को कारण है –
(क) अच्छी संगति
(ख) स्वस्थ मनोरंजन
(ग) दूषित पारिवारिक वातावरण
(घ) संवेगात्मक स्थिरता

प्रश्न 6.
बाल-अपराध का मनोवैज्ञानिक कारण है –
(क) भग्न परिवार
(ख) संवेगात्मक अस्थिरता
(ग) निर्धनता
(घ) वंशानुगत कारक।

प्रश्न 7.
बाल-अपराध के मानसिक या बौद्धिक कारण हैं –
(क) मानसि हीनता
(ख) अति तीव्र बुद्धि
(ग) मानसिक योग्यताओं का निम्न स्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 8.
बाल-अपराधियों के विकास के लिए जिम्मेदार मानसिक रोग है –
(क) मनोविकृति
(ख) मेनिया
(ग) बाध्यता
(घ) ये सभी

प्रश्न 9.
परिवीक्षा काल का सम्बन्ध है –
(क) अपराध से
(ख) परीक्षा से
(ग) इतिहास से
(घ) बाल-अपराध से

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से कौन बाल-अपराध का आर्थिक कारण नहीं है
(क) निर्धनता
(ख) बेकारी
(ग) भूखमरी
(घ) कुसमायोजन

प्रश्न 11.
बाल-अपराध का आर्थिक कारण होता है
(क) मन्दबुद्धि
(ख) कुण्ठा
(ग) निर्धनता
(घ) कुसमायोजन

प्रश्न 12.
बाल-अपराध के लिए जिम्मेदार सामाजिक कारक हैं –
(क) सस्ते तथा घटिया मनोरंजन के साधन
(ख) बदनाम बस्तियों के निवासियों का प्रभाव
(ग) शिक्षण संस्थाओं के वातावरण का दूषित होना
(घ) उपर्युक्त सभी कारक

प्रश्न 13.
बाल-अपराधियों से सम्बन्धित तथ्य है –
(क) इनके गिरोह सुसंगठित होते हैं।
(ख) भारतीय कानून संहिता में इन्हें कठोर दण्ड देने का प्रावधान है।
(ग) ये सामाजिक विघटन के प्रतीक माने जाते हैं।
(घ) ये कम आयु के कच्चे अपराधी होते हैं, ये पारिवारिक विघटन के प्रतीक होते हैं तथा इनका सुधार हो सकता है।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में कौन बाल-अपराध से सम्बन्धित नहीं है।
(क) बाल न्यायालय
(ख) निर्देशन उपचार शालाएँ
(ग) सुधार स्कूल
(घ) जिला कारागार

प्रश्न 15.
हमारे देश में बाल-अपराधियों के सुधार के लिए कौन-सी संस्था है?
(क) साधारण विद्यालय
(ख) बन्दीगृह
(ग) विकलांग शिक्षण संस्थाएँ
(घ) सुधार स्कूल या रिफोमेंट्री स्कूल

प्रश्न 16.
किस महान बाल-सुधारक ने प्रवीक्षण या प्रोबेशन की धारणा को प्रस्तुत किया था?
(क) फ्रॉयड ने।
(ख) जॉन ऑगस्टस ने
(ग) डॉ० सेठना ने
(घ) मुरेनो ने

प्रश्न 17.
समाज में बाल-अपराधियों की निरन्तर बढ़ती हुई दर को नियन्त्रित करने का मुख्यतम उपाय है
(क) कठोर दण्ड-व्यवस्था लागू की जाए।
(ख) बालकों के लिए अधिक-से-अधिक शिक्षण संस्थाएँ स्थापित की जाएँ।
(ग) सामाजिक विघटन को रोका जाए।
(घ) पारिवारिक विघटन को रोका जाए तथा पारिवारिक वातावरण को उत्तम बनाया जाए।

प्रश्न 18.
बाल-अपराधियों के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली मनोवैज्ञानिक विधि है
(क) क्रीड़ा चिकित्सा
(ख) अंगुलि-चित्रण
(ग) मनो-अभिनय
(घ) ये सभी

प्रश्न 19.
इनमें से कौन बाल-अपराध का लक्षण नहीं हो सकता है?
(क) चोरी
(ख) मद्यपान
(ग) तोड़फोड़
(घ) कक्षा-कार्य को पूरा न कर पाना।

उत्तर :

  1. (ख) जिसकी समझ विकसित हो गयी हो
  2. (क) बाल-अपराधी
  3. (क) हीली
  4. (ग) विघटित परिवार
  5. (ग) दूषित पारिवारिक वातावरण
  6. (ख) संवेगात्मक अस्थिरता
  7. (घ) ये सभी
  8. (घ) ये सभी
  9. (घ) बाल अपराध से
  10. (घ) कुसमायोजन
  11. (ग) निर्धनता
  12. (घ) उपर्युक्त सभी कारक
  13. (घ) ये कम आयु के कच्चे अपराधी होते हैं, ये पारिवारिक विषटन के प्रतीक होते है तथा इनका सुधार हो सकता है
  14. (घ) जिला कारागार
  15. (घ) सुधार स्कूल या रिफोमेंट्री स्कूल
  16. (ख) जॉन ऑगस्टस ने
  17. (घ) पारिवारिक विघटन को रोका जाए तथा पारिवारिक वातावरण को उत्तम बनाया जाए।
  18. (घ) ये सभी
  19. (घ) कक्षा-कार्य को पूरा न कर पाना।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P.

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. (शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन और उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवा) are part of UP Board Solutions for Class 11 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. (शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन और उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवा).

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 8
Chapter Name 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P.
(शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन और उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवा)
Number of Questions Solved 68
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. (शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन और उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवा)

दीर्घ उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निर्देशन की परिभाषा निर्धारित कीजिए। निर्देशन की आवश्यकता, उपयोगिता एवं महत्त्व का भी उल्लेख कीजिए।
या
निर्देशन क्या होता है?
उत्तर :

निर्देशन की संकल्पना एवं अर्थ
(Concept and Meaning of Guidance)

सामाजिक व्यक्ति के जीवन में निर्देशन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। निर्देशन सामाजिक सम्पर्को पर आधारित एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें एक व्यक्ति को इस प्रकार से सहायता प्रदान की जाती है कि वह अपनी जन्मजात और अर्जित योग्यताओं व क्षमताओं को समझते हुए उनका अपनी समस्याओं की स्वतः समाधान करने में उपयोग कर सके। निर्देशन एक सुनियोजित तथा सुव्यवस्थित ढंग की विशिष्टं प्रक्रिया का नाम है जो दो प्रकार के व्यक्तियों के मध्य होती है-पहला वह व्यक्ति जो निर्देशन चाहता है तथा दूसरा अन्य व्यक्ति जो निर्देशन प्रदान करता है। क्योंकि जीवन की प्रत्येक अवस्था में समस्याओं का उदय स्वाभाविक है; अतः निर्देशन प्राप्त केरने वाला व्यक्ति किसी भी आयु-वर्ग से सम्बन्धित हो सकता है, किन्तु निर्देशन प्रदान करने वाला व्यक्ति प्राय: वयस्क, शिक्षित, समझदार तथा अनुभवी होता है। तत्सम्बन्धी क्षेत्र में ज्ञान और अनुभव से युक्त उस व्यक्ति को निर्देशनदाता अथवा परामर्शदाता (Counsellor) या निर्देशन मनोवैज्ञानिक (Guidance Psychologist) के नाम से सम्बोधित करते हैं। निर्देशन प्राप्त करने वाला और निर्देशन प्रदान करने वाला इन दोनों व्यक्यिों में व्यक्तिगत सम्पर्क (Personal Contact) के स्थापित होने के बाद ही निर्देशन प्रक्रिया शुरू होती है। इस प्रक्रिया को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया जा सकता है –

  1. सर्वप्रथम निर्देशक-मनोवैज्ञानिक, निर्देशन चाहने (प्राप्त करने) वाले व्यक्ति को विभिन्न मनोवैज्ञानिक विधियों द्वारा इस योग्य बनाने के लिए विशेष सहायता देता है कि जिससे वह अपनी निजी क्षमताओं, शक्तियों तथा योग्यताओं का भली प्रकार ज्ञान प्राप्त कर सके।
  2. अब उस व्यक्ति को यह मालूम कराया जाता है कि वे अपनी इन समस्त शक्तियों के माध्यम से क्या-क्या कार्य करने में सक्षम है।
  3. इसके साथ ही उस व्यक्ति को उसके वातावरण के तत्वों का यथासम्भव सम्पूर्ण ज्ञान भी कराया जाता है।
  4. निर्देशन प्राप्त करने वाले व्यक्ति को अपनी समस्याओं का विश्लेषण करने तथा उन्हें भली प्रकार समझने हेतु भी सहायता प्रदान की जाती है।
  5. अन्ततः व्यक्ति को यह ज्ञान मिल जाता है कि वह अपनी समस्त क्षमताओं, शक्तियों तथा योग्यताओं का किस भाँति सदुपयोग करे ताकि उसे अपनी समस्याओं का समुचित समाधान तलाशने में सुविधा रहे |

निर्देशन की परिभाषा

प्रमुख विद्वानों के अनुसार निर्देशन को अग्रलिखित रूप से परिभाषित किया जा सकता है –

(1) स्किनर के शब्दों में, “निर्देशने एक प्रक्रिया है जो कि नवयुवकों को स्वयं अपने से, दूसने से तथा परिस्थितियों से समायोजन करना सिखाती है।”

(2) जोन्स के अनुसार, “निर्देशन एक ऐसी व्यक्तिगत सहायता है जो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को, जीवन के लक्ष्यों को विकसित करने व समायोजन करने और लक्ष्यों की प्राप्ति में आयी हुई समस्याओं को हल करने के लिए प्रदान की जाती है।”

(3) मॉरिस के मतानुसार, “निर्देशन व्यक्तियों की स्वयं अपने प्रयत्नों से सहायता करने की एक क्रिया है जिसके द्वारा वे व्यक्तिगत सुख और सामाजिक उपयोगिता के लिए अपनी समस्याओं का पता लगाते हैं तथा उनका विकास करते हैं।”

(4) हसबैण्ड के कथनानुसार, “निर्देशन को, व्यक्ति को उसके भावी जीवन के लिए तैयार करने तथा समाज में उसको अपने स्थान को उपयुक्त बनाने में सहायता देने की प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

(5) शिक्षा मन्त्रालय भारत सरकार के अनुसार, “निर्देशन एक क्रिया है जो व्यक्ति को शिक्षा, जीविका, मनोरंजन तथा मानव-क्रियाओं के समाज-सेवा सम्बन्धी कार्यों को चुनने, तैयार करने, प्रवेश करने तथा वृद्धि करने में सहायता प्रदान करती है।”

निर्देशन के सन्दर्भ में वर्णित उपर्युक्त परिभाषाओं से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि निर्देशन मनुष्य के कल्याण हेतु प्रदान की गयी एक प्रकार की सहायता है जिसमें कोई व्यक्ति अन्य को कुछ देता नहीं, अपितु सहायता प्राप्त करने वाले व्यक्ति को ही इस योग्य बना दिया जाता है कि वह व्यक्ति अपनी सहायता अपने आप करने में सक्षम हो सके।

निर्देशन की आवश्यकता, महत्त्व एवं उपयोगिता (लाभ)।
(Need, Importance and Utility of Guidance)

मनुष्य की अनन्त इच्छाओं ने उसकी आवश्यकताओं को बढ़ाकर उसके व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा व्यावसायिक जीवन में अभूतपूर्व संकट और जटिलता उत्पन्न कर दी है। इन्हीं कारणों से वर्तमान काल के सन्दर्भ में निर्देशन की आवश्यकता बढ़ती चली जा रही है। जीवन में निर्देशन की आवश्यकता हम निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत पाते हैं

(1) व्यक्ति के दृष्टिकोण से निर्देशन की आवश्यकता – मानव-जीवन की जटिलता ने पग-पग पर नयी-नयी समस्याओं और संकट-कालीन परिस्थितियों को जन्म दिया है। मनुष्य का कार्य-क्षेत्र विस्तृत हो रहा है और उसकी नित्यप्रति की आवश्यकताओं में वृद्धि हुई है। बढ़ती हुई आवश्यकताओं तथा आर्थिक विषमताओं ने मनुष्य को व्यक्तिगत, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से प्रभावित किया है। जीवन के हर एक क्षेत्र में समस्याओं के मोर्चे खुले हैं जिनसे निपटने के लिए भौतिक एवं मानसिक दृष्टि से निर्देशन की अत्यधिक आवश्यकता है।

(2) औद्योगीकरण से उत्पन्न समस्याएँ – मनुष्य प्राचीन समय में अधिकांश कार्य अपने हाथों से किया करता था, किन्तु आधुनिक युग मशीनों का युग’ कहा जाता है। तरह-तरह की मशीनों के अविष्कार से उद्योग-धन्धों का उत्पादन बढ़कर कई गुना हो गया है, किन्तु उत्पादन की प्रक्रिया जटिल-से-जटिल होती जा रही है। औद्योगिक जगत् के विस्तार से नये-नये मानव-सम्बन्ध विकसित हुए हैं जिनके मध्य सन्तुलन स्थापित करने की दृष्टि से निर्देशन बहुत आवश्यक है।

(3) नगरीकरण से उत्पन्न समस्याएँ – क्योंकि अधिकांश उद्योग-धन्धे तथा कल-कारखाने बड़े-बड़े नगरों में स्थापित हुए, इसलिए पिछले अनेक दशकों से लोगों का प्रवाह गाँवों से नगरों की ओर हुआ। नगरों में तरह-तरह की सुख-सुविधाओं, मनोरंजन के साधनों, शिक्षा की व्यवस्था, नौकरी के अवसर तथा सुरक्षा की भावना ने नगरों को आकर्षण का केन्द्र बना दिया। फलस्वरूप नगरों की संरचना में काफी जटिलता आने से समायोजन सम्बन्धी बहुत प्रकार की समस्याएँ भी उभरी हैं; अत: नगरीय जीवन से उपयुक्त समायोजन करने हेतु निर्देशन की परम आवश्यकता अनुभव होती है।

(4) जाति-प्रथा का विघटन – आजकल जाति और व्यवसाय का आपसी सम्बन्ध टूट गया है। इसका प्रमुख कारण जाति-प्रथा का विघटन है। पहले प्रत्येक जाति के बालकों को अपनी जाति के व्यवसाय का प्रशिक्षण परम्परागत रूप से उपलब्ध होता था। उदाहरणार्थ-ब्राह्मण का बेटा पण्डितई करता है, लोहार का बेटा लोहारी और बनिये का बेटा व्यापार। यह व्यवस्था अब लगभग समाप्त प्रायः हो गयी है। इन परिवर्तित दशाओं ने व्यवसाय के चुनाव तथा प्रशिक्षण, इन दोनों ही क्रियाओं के लिए निर्देशन को आवश्यक बना दिया है।

(5) व्यावसायिक बहुलता – वर्तमान समय में अनेक कारणों से व्यवसायों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप कार्य के प्रत्येक क्षेत्र में विशेषीकरण की समस्या भी बढ़ी है। व्यावसायिक बहुलता और विशेषीकरण के विचार ने प्रत्येक बालक और किशोर के सम्मुख यह एक गम्भीर समस्या खड़ी कर दी है कि वह इतने व्यवसायों के बीच से समय की माँग के अनुसार कौन-सा व्यवसाय चुने और चयनित व्यवसाय से सम्बन्धित प्रशिक्षण किस प्रकार प्राप्त करे। निश्चय ही, इस समस्या का हल निर्देशन से ही सम्भव है।

(6) मन के अनुकूल व्यवसाय का न मिलना – बेरोजगारी की समस्या आज न्यूनाधिक विश्व के प्रत्येक देश के सम्मुख विद्यमान है। हमारे देश में किसी नवयुवक के मनोनुकूल, अच्छा एवं उपयुक्त व्यवसाय मिल पाना अत्यन्त दुष्कर कार्य है। हर कोई उत्तम व्यवसाय प्राप्त करने की महत्त्वाकांक्षा रखता है, किन्तु रोजगार के अवसरों का अभाव उसे असफलता और निराशा के अतिरिक्त कुछ नहीं दे पाता। निराश, चिन्तित, तनावग्रस्त तथा उग्र बेरोजगार युवकों को सही दिशा दिखलाने की आवश्यकता है। उन्हें देश की आवश्यकताओं के अनुकूल तथा जीवन के लिए हितकारी शारीरिक कार्य करने की प्रेरणा देनी होगी। यह कार्य निर्देशन द्वारा ही सम्भव है।

(7) विशेष बालकों की समस्याएँ – विशेष बालकों से हमारा अभिप्राय पिछड़े हुए/मन्द बुद्धि या प्रतिभाशाली ऐसे बालकों से है जो सामान्य बालकों से हटकर होते हैं। ये असामान्य व्यवहार प्रदर्शित करते हैं तथा सामाजिक परिस्थितियों से स्वयं को आसानी से अनुकूलित नहीं कर पाते। कुसमायोजन के कारण इनके सामंते नित्यप्रति नयी-नयी समस्याएँ आती रहती हैं। ऐसे असामान्य एवं विशेष बालकों की समस्याएँ निर्देशन के माध्यम से ही पूरी हो सकती हैं।

(8) शैक्षिक विविधता सम्बन्धी समस्याएँ – शिक्षा के विविध क्षेत्रों में हो रहे अनुसन्धान कार्यों के कारण ज्ञान की राशि निरन्तर बढ़ती जा रही है जिससे एक ओर, ज्ञान की नवीन शाखाओं को जन्म हुआ है तो दूसरी ओर, हर सत्र में नये पाठ्यक्रमों का समावेश करना पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त, सामान्य शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त प्रत्येक बालक के सम्मुख यह समस्या आती है कि वह शिक्षा के विविध क्षेत्रों में से किस क्षेत्र को चुने और उसमें विशिष्टीकरण प्राप्त करे। समाज की निरन्तर बढ़ती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जो नये एवं विशेष व्यवसाय जन्म ले रहे हैं उनके लिए किन्हीं विशेष पाठ्य-विषयों का अध्ययन अनिवार्य है। विभिन्न व्यवसायों की सफलता भिन्न-भिन्न बौद्धिक एवं आर्थिक स्तर, रुचि, अभिरुचि, क्षमता व योग्यता पर आधारित है। व्यक्तिगत भिन्नताओं का ज्ञान प्राप्त करके उनके अनुसार बालक को उचित शैक्षिक मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए निर्देशन की अत्यधिक आवश्यकता है, क्योकि निर्देशन का अपना महत्त्व है।

(9) पाश्चात्य सभ्यता से समायोजन – आज के वैज्ञानिक युग में और क्षेत्रीय दूरी कम होने से पृथ्वी के दूरस्थ देश एवं उनकी सभ्यताएँ, अर्थात् संस्कृतियाँ, परम्पराएँ तथा रीति-रिवाज एक-दूसरे के काफी नजदीक आ गये हैं। अंग्रेजों के पदार्पण एवं शासन ने भारतीयों के मस्तिष्क पाश्चात्य सभ्यता में रँग डाले हैं। पश्चिमी देशों के भौतिकवादी आकर्षण ने भारतीय युवाओं को इस सीमा तक सम्मोहित किया है कि वे अपने पुराने रीति-रिवाज और परम्पराएँ भुला बैठे हैं और एक प्रकार से भारतीय मूल्यों की अवमानना व उपेक्षा हो रही है। इसमें असंख्य विसंगतियाँ तथा कुसमायोजन के दृष्टान्त दृष्टिगोचर हो रहे हैं। भारतीय युवाओं को इन परिस्थितियों में गम्भीर प्रतिकूल प्रभावों से बचाने के लिए समुचित निर्देशन की आवश्यकता है।

(10) यौन सम्बन्धी समस्याएँ – काम-वासना’ एक नैसर्गिक मूल-प्रवृत्ति है, जो युवावस्था में विषमलिंगी व्यक्तियों में एक-दूसरे के प्रति अपूर्व आकर्षण पैदा करती है। किन्तु समाज की मान-मर्यादाओं तथा रीति-रिवाजों की सीमाओं को लाँघकर पुरुष एवं नारी का पारस्परिक मिलन नाना प्रकार की अड़चनों से भरा है। समाज ऐसे मिलन का घोर विरोध करता है। आमतौर पर काम-वासना की इस मूल-प्रवृत्ति का अवदमन होने से व्यक्ति में ग्रन्थियाँ बन जाती हैं तथा उसका व्यवहार असामान्य हो जाता है। यौन सम्बन्धों के कारण जनित विकृतियों में सुधार लाने के लिए तथा व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से निर्देशन की आवश्यकता होती है।

(11) व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास – व्यक्तिगत एवं सामाजिक हित में मानव-शक्ति का सही दिशा में अधिकतम उपयोग अनिवार्य है जिसके लिए व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास की आवश्यकता है। बालकों के व्यक्तित्व के सर्वांगीण तथा सन्तुलित विकास के लिए उन्हें घर-परिवार, पास-पड़ोस, विद्यालय तथा समाज में प्रारम्भिक काल से ही निर्देशन प्रदान करने की अतीव आवश्यकता है।

प्रश्न 2.
समाज में समुचित निर्देशन व्यवस्था के अभाव की स्थिति में होने वाली हानियों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन का क्षेत्र अत्यधिक व्यापक और महत्त्वपूर्ण है। सम्यक् निर्देशन की सहायता से व्यक्ति का जीवन व्यवस्थित हो जाता है और अपनी समस्याओं को हल करके वह सुखी एवं सफल व्यक्ति के रूप में अपने उज्ज्वल भविष्य की रक्षा हेतु तत्पर होता है। इसके विपरीत, समुचित निर्देशन और परामर्श के अभाव में व्यक्ति का पूर्ण विकास नहीं हो पाता और वह अपनी क्षमताओं एवं योग्यताओं के अनुसार एक सफल नागरिक नहीं बन पाता है।

समुचित निर्देशन के अभाव में हानियाँ

अनिवार्यता के बावजूद भी समुचित निर्देशन प्रदान न करने की दशा में निम्नलिखित हानियाँ दृष्टिगोचर होती हैं –

(1) शारीरिक विकास एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी दोष – उचित निर्देशन के अभाव में शरीर में घर कर गयीं अनेक बीमारियाँ बढ़ती जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप शारीरिक बल तथा साहस का अभाव पाया जाता है। निर्देशन के अभाव में शारीरिक आकर्षण घटता जाता है। अत्यधिक लम्बे या छोटे कद के अतिरिक्त अनेक शारीरिक विकृतियों; यथा—हकलाना, तुतलाना, गूंगा-बहरा या अन्धापन, कुरूपता इत्यादि पर अंकुश न होने से ये बढ़ते ही जाते हैं।

(2) घर-परिवार विषयक समस्याओं में वृद्धि – माता-पिता में से किसी एक की मृत्यु, तलाक या परित्याग के कारण खण्डित हुए परिवार को दुष्प्रभाव सीधे बच्चों पर पड़ता है। उचित निर्देश न मिलने के कारण बालाकों में परस्पर ईष्र्या, द्वेष, मन-मुटाव, अपराध भावना तथा लड़ाई-झगड़ा व्याप्त रहता है। घुटन-भरा कलहपूर्ण वातावरण तथा सद्भाव की कमी बालक-बालिकाओं को घर छोड़ने पर मजबूर कर देते हैं जो बाहर निकलकर सामाजिक दोषों व आपराधिक जीवन के शिकार हो जाते हैं।

(3) व्यक्तित्व का असन्तुलित विकास – प्रायः देखने में आता है कि व्यक्तित्व के असन्तुलित विकास के कारण बालक में अत्यधिक लापरवाही, आत्मविश्वास की कमी, अत्यधिक घमण्ड तथा स्वार्थ, संवेगात्मक अस्थिरता, भ्रान्तियाँ, अधिक भावुकता, लज्जा एवं संकोच तथा प्रबल अरुचियाँ जन्मै ले बैठती हैं। समुचित निर्देशन के अभाव में ये समस्याएँ एवं दोष व्यक्तिगत और सामाजिक कुसमायोजन में वृद्धि करते हैं, जिसकी परिणति निराशा तथा असफल जीवन में होती है।

(4) विद्यालयी जीवन से सम्बन्धित विकास – प्राय: निर्देशन के अभाव में विद्यार्थीगण अपनी रुचि के अनुकूल एवं जीवनोपयोगी पाठ्य-विषयों का चयन नहीं कर पाते, जिसके परिणामस्वरूप उनको पाठ्य-विषयों में ध्यान नहीं लगता और मन उचटता रहता है। उनमें अनुशासनहीनता घर कर जाती है और वे पढ़ाई-लिखाई से बचकर कक्षा छोड़ने के आदी हो जाते हैं। जिन बालकों में पढ़ाई-लिखाई से सम्बन्धित गलत आदतें निर्मित हो जाती हैं, वे उचित निर्देशन के अभाव में स्वयं को विद्यालयी कार्यक्रमों से अभियोजित नहीं कर पाते, समय नष्ट करते रहते हैं, गृह कार्य करके नहीं लाते, मेहनत से जी चुराते हैं तथा फेल होने के भय से चिन्ताग्रस्त रहने लगते हैं।

(5) सामाजिक एवं नैतिक पतन – सम्यक् निर्देशन के अभाव में व्यक्ति सामाजिक एवं नैतिक पतन को प्राप्त होता है। अनेकानेक कारणों से बालक को असामाजिक प्रवृत्तियाँ तथा नैतिक मान्यताओं का अभाव झेलना पड़ता है। वह बेईमानी, झूठ, चालबाजी, दगाबाजी, चोरी तथा धोखाधड़ी का व्यवहार अर्जित करता है। नैतिक गुणों के अभाव में वह मादक द्रव्यों; जैसे-शराब, सिगरेट, भाँग, गाँजा, अफीम आदि का सेवन करने लगता है। दूसरों के मतों व विश्वासों के प्रति असहिष्णुता के साथ-साथ उसमें अधिकारियों के प्रति विद्रोह की भावना बढ़ती है। कभी-कभी युवा प्रेम में असफलता के कारण असामाजिक व अनैतिक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। उनमें लैंगिक जीवन की गलत आदतों के अतिरिक्त विषमलिंगी व्यक्तियों के प्रति असभ्य और असंगत व्यवहार भी देखने को मिलता है। इससे नागरिक उत्तरदायित्वों का भली प्रकार पालन नहीं कर पाते और श्रेष्ठ नागरिकता के मार्ग से भटक जाते

(6) व्यावसायिक अक्षमताएँ – प्रायः देखा गया है कि माता-पिता की किसी व्यवसाय-विशेष में इच्छा व रुचि होती है जिसे वे अपनी सन्तान पर बलात् थोपना चाहते हैं। उचित मार्गदर्शन के अभाव में अपनी योग्यताओं व क्षमताओं के विरुद्ध व्यवसाय अपनाने के कारण बालक-बालिकाएँ अपनी व्यावसायिक परिस्थितियों से उचित तालमेल नहीं बैठा पाते। इसके अतिरिक्त उचित परामर्श न मिलने के कारण व्यवसाय को प्रारम्भ करने सम्बन्धी तथा समय, स्थान व साधनों सम्बन्धी दोष व्यावसायिक विफलताओं को जन्म देते हैं।

(7) धार्मिक समस्याएँ – एक ओर, धर्म भारतीय जन-जीवन का प्राण कहलाता है तो दूसरी ओर, विज्ञान और तकनीकी के अगणित चमत्कारों से मानव-मस्तिष्क को चिन्तन के नये-नये आयाम मिले हैं। इसके फलस्वरूप वैज्ञानिक मान्यताओं तथा धार्मिक मूल्य व अवस्थाओं के बीच एक संघर्ष और विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। धार्मिक आशंकाएँ, अन्धविश्वास तथा बलात् धर्म परिवर्तन को लेकर उत्पन्न हुए प्रश्नों का मनोवैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत न करने से समाज को भारी क्षति होती है।

(8) अवकांराजनित दोषों से हानियाँ – प्रायः लोगों को अवकाश के सदुपयोग के साधनों की उचित जानकारी नहीं रहती है। उचित मार्गदर्शन प्राप्त न होने की स्थिति में दुर्बलता, कमजोरी या शारीरिक-मानसिक असमर्थता के कारण उनमें खेलकूद अथवा मनोरंजन के किसी साधन में सफलतापूर्वक भाग ले सकने की असमर्थता देखने में आती है।

उपर्युक्त विवेचने से स्पष्ट होता है कि उचित निर्देशन के अभाव में व्यक्ति को अनेकानेक क्षेत्रों से सम्बन्धित दुष्कर समस्याओं का समाना करना पड़ता है, जिससे अपूरणीय हानि की सम्भावना बनी रहती है।

प्रश्न 3.
शैक्षिक निर्देशन से आप क्या समझते हैं? शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
शैक्षिक निर्देशन का अर्थ समझाइए।
उत्तर :

शैक्षिक निर्देशन का अर्थ
(Meaning of Educational Guidance)

निर्देशन का एक मुख्य स्वरूप शैक्षिक निर्देशन (Educational Guidance) है। शैक्षिक निर्देशन का सम्बन्ध मुख्य रूप से शैक्षिक परिस्थितियों से होता है।

शैक्षिक निर्देशन बालक को अपने शैक्षिक कार्यक्रम को बुद्धिमत्तापूर्वक नियोजित कर पाने में सहायता करता है। यह बालकों को ऐसे पाठ्य-विषयों का चुनाव करने में सहायता देता है जो उनकी बौद्धिक क्षमताओं, रुचियों, योग्यताओं तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं के अनुकूल हों। यह उन्हें इस योग्य बना देता है ताकि वे शिक्षा सम्बन्धी कुछ विशेष समस्याओं तथा विद्यालय की विभिन्न परिस्थितियों से भली प्रकार समायोजन कर अपने शैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें।

शैक्षिक निर्देशन की परिभाषा
(Definition of Educational Guidance)

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों एवं विद्वानों ने शैक्षिक निर्देशन को परिभाषित करने का प्रयास किया है। उनमें से कुछ का उल्लेख अग्रलिखित है –

(1) ऑर्थर जे० जोन्स के अनुसार,“शैक्षिक निर्देशन का तात्पर्य उस व्यक्तिगत सहायता से है। जो विद्यार्थियों को इसलिए प्रदान की जाती है कि वे अपने उपयुक्त विद्यालय,,पाठ्यक्रम, पाठ्य-विषय एवं विद्यालय-जीवन का चयन कर सकें तथा उनसे समायोजन स्थापित कर सकें।”

(2) रूथ स्ट्राँग के कथनानुसार, “व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने का मुख्य लक्ष्य उसे समुचित कार्यक्रम के चुनाव तथा उसमें प्रगति करने में सहायता प्रदान करना है।”

(3) एलिस के शब्दों में, “शैक्षिक निर्देशन से तीन विशेष क्षेत्रों में सहायता मिलती है- (अ) कार्यक्रम और पाठ्य-विषयों का चयन, (ब) चालू पाठ्यक्रम में कठिनाइयों का मुकाबला करना तथा (स) अगले प्रशिक्षण हेतु विद्यार्थियों का चुनाव।”

शैक्षिक निर्देशन सम्बन्धी उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि यह प्रक्रिया बालकों के पाठ्यक्रम चयन की सर्वोत्तम विधि है। उसमें बालकों की व्यक्तिगत विभिन्नताओं, शैक्षिक उपलब्धियों, प्राप्तांकों, अभिभावकों की आशाओं-महत्त्वाकांक्षाओं तथा मनोवैज्ञानिकों के परामर्श को मुख्य रूप से ध्यान में रखा जाता है, क्योंकि इसके अन्तर्गत एक निर्देशक द्वारा प्रदान किये गये निर्देशन की जाँच भी सम्भव है, इसलिए यह विधि वैज्ञानिक एवं प्रामाणिक भी है।

शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया
(Process of Educational Guidance)

पाठ्य-विषयों के चयन में निर्देशक के जानने योग्य बातें

हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा और जूनियर हाईस्कूल स्तर तक शिक्षा में अधिक विविधता नहीं है। और समस्त विद्यार्थी लगभग एक समान विषयों का ही अध्ययन करते हैं, किन्तु जब बालक माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूल में प्रवेश करते हैं तब उन्हें पाठ्य-विषयों के चयन सम्बन्धी समस्या का सामना करना पड़ता है। शिक्षा के मार्ग पर बढ़ने का यह वह स्थल है जहाँ पाठ्यक्रम अनेक भागों में बँट जाता है और बालक को उनमें से किसी एक का चयन करना होता है। पाठ्य-विषयों के चयन सम्बन्धी शैक्षिक निर्देशन के निम्नलिखित तीन मुख्य पहलू हैं –

(अ) बालक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना।

जिसे बालक/व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन देना है, उसके सम्बन्ध में निर्देशक को निम्नलिखित सूचनाएँ प्राप्त कर लेनी चाहिए –

(1) बौद्धिक स्तर – शैक्षिक निर्देशन में बालक के बौद्धिक स्तर का पता लगाना अति आवश्यक है। तीव्र बुद्धि वाला बालक कठिन विषयों का अध्ययन करने के योग्य होता है और इसीलिए विज्ञान एवं गणित जैसे विषयों का चुनाव कर सकता है। वह उच्च कक्षाओं तक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों के साथ सुगमतापूर्वक पहुँच जाता है। कला-कौशल और रचनात्मक कार्यों में अपेक्षाकृत कम बुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार, बालक के लिए पाठ्य-विषयों का चुनाव करने में उसके बौद्धिक स्तर का ज्ञान आवश्यक है।

(2) शैक्षिक सम्प्राप्ति – शैक्षिक सम्प्राप्ति अथवा शैक्षिक उपलब्धि (Scholastic Attainment) की मुँचना अक्सर पिछली कक्षाओं के प्राप्तांकों द्वारा मिलती है, लेकिन निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत ‘सम्प्राप्ति परीक्षणों तथा सम्बन्धित अध्यापकों द्वारा भी शैक्षिक उपलब्धियों का ज्ञान कर लिया जाता है। किसी विशेष विषय में अधिक प्राप्तांकों की प्रवृत्ति, बालक की उस विषय में रुचि का संकेत करती है। मान लीजिए, एक विद्यार्थी आठवीं कक्षा तक विज्ञान में सर्वाधिक अंक लेकर उत्तीर्ण हुआ है तो कहा जा सकता है कि भविष्य में भी वह विज्ञान में अधिक अंक प्राप्त करेगा। इन प्राप्तांकों या उपलब्धियों को आधार मानकर माध्यमिक स्तर पर विषय चुनने का परामर्श दिया जाना चाहिए।

(3) मानसिक योग्यताएँ – शिक्षा-निर्देशक को बालक की मानसिक योग्यताओं का भी समुचित ज्ञान होना चाहिए, क्योंकि विभिन्न प्रकार के पाठ्य-विषयों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की मानसिक योग्यताएँ उपयोगी सिद्ध होती हैं। उदाहरण के लिए-साहित्यकार, अधिवक्ता, व्याख्याता, नेता तथा शिक्षक बनाने में शाब्दिक योग्यता’; गणितज्ञ, वैज्ञानिक तथा इन्जीनियर बनाने में सांख्यिक योग्यता’; दार्शनिक, विचारक, गणितज्ञ अधिवक्ता बनाने में ‘तार्किक योग्यता’ सहायक होती है। मानसिक योग्यताओं को ज्ञान तत्सम्बन्धी मनोवैज्ञानिक परीक्षणों तथा शिक्षकों की सूचना द्वारा लगाया जा सकता है।

(4) विशिष्ट मानसिक योग्यताएँ एवं अभिरुचियाँ – बालक के लिए पाठ्य-विषय का चयन करते समय बालक की विशिष्ट मानसिक योग्यताओं तथा अभिरुचियों का ज्ञान परमावश्यक है। विभिन्न पाठ्य-विषयों की सफलता अलग-अलग प्रकार की विशिष्ट योग्यताओं तथा अभिरुचियों पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए-संगीत एवं कला की विशिष्ट योग्यता तथा अभियोग्यता वाले बालक-बालिकाओं को प्रारम्भ से ही संगीत एवं कला विषयों का चुनाव कर लेना चाहिए।

(5) रुचियाँ – बालक की जिस विषय में अधिक रुचि होगी उस विषय के अध्ययन में वह अधिक ध्यान लगाएगा। अत: निर्देशक को बालक की रुचि का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। रुचियों का ज्ञान रुचि परीक्षणों तथा रुचि परिसूचियों के अतिरिक्त अभिभावकों, शिक्षकों तथा दैनिक निरीक्षण के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।

(6) व्यक्तित्व की विशेषताएँ – माध्यमिक स्तर पर किसी बालक को विषयों के चयन से सम्बन्धित परामर्श देने के लिए उसके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं का ज्ञान आवश्यक है। व्यक्तित्व विभिन्न प्रकार की विशेषताओं और गुणों; यथा-आत्मविश्वास, धैर्य, लगन, मनन, अध्यवसाय आदि का संगठन है। साहित्यिक विषयों का चयन भावुक व्यक्ति को, विज्ञान और गणित का चयन तर्कयुक्त एवं दृढ़ निश्चयी व्यक्ति को तथा रचनात्मक विषयों का चयन उद्योगी एवं क्रिया-प्रधान व्यक्तियों को करना चाहिए। व्यक्तित्व के गुणों का ज्ञान जिन व्यक्तित्व परीक्षणों से किया जाता है उनमें साक्षात्कार, व्यक्तित्व परिसूचियाँ, प्रश्नसूची, व्यक्ति-इतिहास, निर्धारण-मान आदि प्रमुख हैं।

(7) शारीरिक दशा – कुछ विषयों को चयन करते समय निर्देशक को बालक की शारीरिक रचना तथा स्वास्थ्य की दशाओं का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। कृषि विज्ञान एवं प्राविधिक विषय इन्हीं के अन्तर्गत आते हैं। कृषि सम्बन्धी अध्ययन जमीन के साथ कठोर श्रम पर निर्भर है जिसके लिए हृष्ट-पुष्ट शरीर होना आवश्यक है। इसी प्रकार प्राविधिक विषयों का प्रयोगात्मक ज्ञान कार्यशाला में कई घण्टे काम करके ही उपलब्ध किया जा सकता है। अतः पाठ्य-विषय के चयन से पूर्व चिकित्सक से शारीरिक विकास की जाँच करा लेनी चाहिए तथा रुग्ण या दुर्बल शरीर वाले बालकों को ऐसे विषय का चुनाव नहीं करना चाहिए।

(8) पारिवारिक स्थिति – पारिवारिक परिस्थितियों; विशेषकर आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर शिक्षा-निर्देशक उन्हीं विषयों के चयन का परामर्श देता है जिन्हें निजी परिस्थितियों के अन्तर्गत आसानी से पढ़ा जा सके। माध्यमिक स्तर पर कुछ ऐसे विषय निर्धारित हैं जिनमें उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अभिभावकों को अत्यधिक धन खर्च करना पड़ता है; यथा-विज्ञान पढ़ने के बाद मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश। बालक की योग्यताओं, उच्च बौद्धिक स्तर तथा अभिरुचि के होते हुए भी इन कॉलेजों में अपने बच्चों को भेजना प्रत्येक माता-पिता के वश की बात नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में विद्यार्थी के लिए पाठ्य-विषयों के चयन में उसके परिवार की आर्थिक दशा को ध्यान में रखना अपरिहार्य है।

(ब) पाठ्य-विषयों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना

निर्देशन एवं परामर्श प्रदान करने वाले विशेषज्ञ को बालक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने के उपरान्त पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित विस्तृत जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित दो प्रकार की जानकारियाँ आवश्यक हैं –

(1) पाठ्य-विषयों के विभिन्न वर्ग – जूनियर स्तर से निकलकर माध्यमिक स्तर में प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों के लिए पाठ्यक्रम को कई वर्गों में विभक्त किया गया है; यथा –

  1. साहित्यिक
  2. वैज्ञानिक
  3. वाणिज्य
  4. कृषि सम्बन्धी
  5. प्रौद्योगिक
  6. रचनात्मक तथा
  7. कलात्मक।

इन वर्गों के विषय में ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त यह जानना आवश्यक है कि सम्बन्धित विद्यालय में कौन-कौन-से वर्स के पाठ्य-विषय पढ़ाये जाते हैं और विद्यार्थी की रुचि के विषय भी वहाँ उपलब्ध हो सकेंगे या नहीं।

(2) विविध पाठ्य-विषयों के अध्ययन हेतु आवश्यक मानसिक योग्यताएँ – किन विषयों के लिए कौन-सी योग्यताएँ ज़रूरी हैं और उस विद्यार्थी में कौन-कौन-सी योग्यताएँ विद्यमान हैं, इन सभी बातों की विस्तृत जानकारी, शिक्षा-निर्देशक को होनी चाहिए, तभी वह उपयुक्त पाठ्य-विषयों के चयन में विद्यार्थियों की सहायता कर सकता है।

(स) पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित व्यवसायों की जानकारी प्राप्त करना

प्रत्येक विद्यार्थी अपनी शिक्षा से निवृत्त होकर जीवन-यापन के लिए किसी-न-किसी व्यवसाय का चयन करता है। आजकल अधिकांश व्यवसायों में विशेषीकरण होने से तत्सम्बन्धी प्रशिक्षण पहले से ही प्राप्त करना पड़ता है। अत: निर्देशक को पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित व्यवसायों के विषय में ये सूचनाएँ प्राप्त करना अति आवश्यक है –

(1) व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए किन पाठ्य-विषयों का अध्ययन आवश्यक है – सबसे पहले निर्देशक को यह जानना चाहिए कि किसी विशेष व्यवसाय से सम्बन्धित प्रशिक्षण कोर्स में प्रवेश पाने के लिए और अध्ययन की शुरुआत के लिए किन विषयों का ज्ञान आवश्यक है। उदाहरणार्थ-डॉक्टर बनने के लिए 9वीं कक्षा से जीवविज्ञान पढ़ना चाहिए, जबकि इंजीनियर बनने के लिए विज्ञान वर्ग में गणित पढ़ना चाहिए।

(2) विभिन्न वर्गों के पाठ्य-विषयों का अध्ययन किन व्यवसायों के योग्य बनाता है – पाठ्य-विषयों के चयन में व्यवसाय सम्बन्धी जानकारी आवश्यक है। निर्देशक को पहले ही यह ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए कि किसी व्यवसाय-विशेष का सीधा सम्बन्ध किन-किन विषयों से है ताकि व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त न करके भी उन विषयों का ज्ञान व्यवसाय के कार्य में मदद दे सके। उदाहरण के लिए-कॉमर्स लेकर कोई विद्यार्थी वाणिज्य या व्यापार के क्षेत्र में तो प्रवेश कर सकता है, किन्तु डॉक्टरी या इंजीनियरिंग के क्षेत्र में नहीं।

बालक को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने से पूर्व उपर्युक्त समस्त बातों की विस्तृत एवं वास्तविक जानकारी एक सफल शिक्षा-निर्देशक (Educational Guide) को होनी चाहिए।

प्रश्न 4.
शैक्षिक निर्देशन के लाभ अथवा उपयोगिता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

शैक्षिक निर्देशन के लाभ (उपयोगिता अथवा महत्त्व)
[Merits (Utility or Importance) of Educational Guidance)

वर्तमान शिक्षा-पद्धति एक जटिल व्यवस्था है जिसमें बालकों की क्षमताएँ, शक्तियाँ, योग्यताएँ, समय तथा धन आदि का अपव्यय होता है और वे अपने शैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रहते हैं। इन असफलताओं तथा निराशाओं के बीच शैक्षिक निर्देशनं आशा की किरणों के साथ शिक्षा के क्षेत्र में अवतरित होता है जिसकी उपयोगिता या महत्त्व सन्देह से परे है। इसके लाभों की पुष्टि निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत हो जाती है –

(1) पाठ्य-विषयों का चयन – माध्यमिक विद्यालयों में विभिन्न व्यवसायों से सम्बन्धित विविध पाठ्य-विषयों के अध्ययन की व्यवस्था है। निर्देशन की सहायता से विद्यार्थी अपने बौद्धिक स्तर, क्षमताओं, योग्यताओं तथा रुचियों के अनुसार पाठ्य-विषयों का चुनाव कर सकता है। इस भाँति वह अपने मनोनुकूल व्यवसाय की प्राप्ति कर सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है।

(2) भावी शिक्षा का सुनिश्चय – हाईस्कूल स्तर के पश्चात् विद्यार्थियों के लिए यह सुनिश्चित कर पाना दूभर हो जाता है कि उनकी भावी शिक्षा का लक्ष्य एवं स्वरूप क्या होगा, अर्थात् वे किस व्यावसायिक विद्यालय में प्रवेश लें, व्यापारिक विद्यालय में या औद्योगिक विद्यालय में। यदि किन्हीं कारणों से वे अनुपयुक्त शिक्षा संस्थान में भर्ती हो जाते हैं तो कुसमायोजन के कारण उन्हें बीच में ही संस्था छोड़नी पड़ सकती है जिसके फलस्वरूप काफी हानि उठानी पड़ती है। इसके सन्दर्भ में निर्देशन सही पथ-प्रदर्शन करता है।

(3) नवीन विद्यालय में समायोज – शैक्षिक निर्देशन उन विद्यार्थियों की सहायता करता है ज़ो किसी नये विद्यालय में प्रवेश पाते हैं और वहाँ के वातावरण के साथ समायोजित नहीं हो पाते हैं।

(4) पाठ्यक्रम का संगठन – विद्यार्थियों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को दृष्टिगत रखते हुए उनका पाठ्यक्रम निर्धारित एवं संगठित किया जाना चाहिए। पाठ्यक्रम संगठन का कार्य शैक्षिक निर्देशन के माध्यम से किया जाता है।

(5) परिवर्तित विद्यालयी प्रबन्ध, पाठ्यक्रम एवं शिक्षण-विधि के सन्दर्भ में – विद्यालय एक लघु समाज है। समाज की प्रजातान्त्रिक व्यवस्था का सीधा प्रभाव विद्यालयी प्रबन्ध एवं व्यवस्थाओं पर पड़ता है। प्रजातान्त्रिक शिक्षा समाज के सभी व्यक्तियों को समान अवसर प्रदान करती है। व्यक्तिगत विभिन्नता के सिद्धान्त पर आधारित गत्यात्मक प्रकार की प्रजातान्त्रिक विद्यालयी व्यवस्था, पाठ्यक्रम तथा शिक्षण विधियों की आवश्यकताओं की ओर पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए। इन परिवर्तित देशाओं के कारण पैदा होने वाली समस्याओं का समाधान एकमात्र शैक्षिक निर्देशन की सहायता से ही सम्भव है।

(6) मन्द बुद्धि, पिछड़े तथा मेधावी बालकों के लिए – शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत मन्द बुद्धि, पिछड़े तथा मेधावी बालकों की पहचान करके उनकी क्षमतानुसार शिक्षा की व्यवस्था की जाती है। इस विशिष्ट व्यवस्था को लाभ अलग-अलग तीनों ही वर्गों के बालकों अर्थात् । मन्द बुद्धि, पिछड़े व मेधावी बालकों को प्राप्त होता है।

(7) अभिभावकों की सन्तुष्टि के लिए – कभी-कभी अभिभावकों की महत्त्वाकांक्षाओं तथा बालकों की मानसिक योग्यताओं व क्षमताओं के मध्य गहरा अन्तर होता है। निर्देशन के माध्यम से वे अपने बालक की विशेषताओं की सही वास्तविक झलक पाकर तदनुकूल शिक्षा की व्यवस्था कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त वे शिक्षा-संस्थानों के कार्यक्रमों से परिचित होकर उन्हें अपना योगदान प्रदान कर सकते हैं।

(8) अनुशासन की समस्या के समाधान के लिए – क्योंकि शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया में बालक की क्षमताओं, रुचियों तथा अभिरुचियों को ध्यान में रखकर उसकी शिक्षा सम्बन्धी व्यवस्था की जाती है; अत: पाठ्यक्रम बालक को भार-स्वरूप नहीं लगता। इसके विपरीत, वह चयनित विषयों में रुचि लेकर अनुशासित रूप में अध्ययन करता है जिससे अनुशासन की समस्या का एक बड़ी सीमा तक समाधान निकल आता है।

(9) जीविकोपार्जन का समुचित ज्ञान – प्रायः विद्यार्थियों को विभिन्न पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित एवं आगे चलकर उपलब्ध हो सकने वाले व्यावसायिक अवसरों की जानकारी नहीं होती। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति किसी विशेष व्यवसाय में जानकारी व रुचि न होने के कारण बार-बार अपना व्यवसाय बदलते हैं जिससे व्यावसायिक अस्थिरता में वृद्धि के कारण हानि होती है। अतः रोजगार के अवसरों का ज्ञान प्राप्त करने तथा जीविकोपार्जन सम्बन्धी समुचित ज्ञान पाने की दृष्टि से शैक्षिक निर्देशन अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होता है।

(10) अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या का अन्त – अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या के अन्त ज्यादातर बालक-बालिकाएँ विभिन्न कारणों से स्थायी साक्षरता प्राप्त किये बिना ही विद्यालय का त्याग कर देते हैं जिससे प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर अत्यधिक अपव्यय हो रहा है। इसके अतिरिक्त परीक्षा में फेल होने वाले विद्यार्थियों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। इस समस्या का अन्त शैक्षिक निर्देशन के माध्यम से ही सम्भव है।

प्रश्न 5.
वैयक्तिक एवं सामूहिक शैक्षिक निर्देशन की विधि और प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

शैक्षिक निर्देशन की विधि
(Method of Educational Guidance)

प्राथमिक एवं जूनियर हाईस्कूल की सीमाओं को लाँघकर माध्यमिक स्तर की दहलीज पर आकर सभी विद्यार्थियों को सचमुच ही यह ज्ञात नहीं होता कि उनके जीवन की भावी दिशा एवं व्यूह-नीति क्या होगी। न केवल इतना ही, अपितु उनके अभिभावकगण भी उनके भावी जीवन के विषय में अधिक स्पष्ट नहीं होते। देश के असंख्य बालकों की एक विशाल भीड़ को उचित मार्ग-दर्शन एवं परामर्श की तलाश होती है जिसे निर्धारित एवं कम समय में प्रदान करना होता है। इस सन्दर्भ में ‘निर्देशन’ (Guidance) एक सर्वोत्तम विधि एवं कला है। शैक्षिक निर्देशन की दो विधियाँ प्रचलित हैं – (I) वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन तथा (II) सामूहिक शैक्षिक निर्देशन।

(i) वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन
(Personal Educational Guidance)

वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन के अन्तर्गत परामर्शदाता या निर्देशक बालक से व्यक्तिगत स्तर पर सम्पर्क स्थापित करके उसकी विभिन्न समस्याओं को अध्ययन करता है। ये समस्याएँ व्यक्तिगत, सामाजिक या संवेगात्मक इत्यादि हो सकती हैं। वह बालक के बौद्धिक स्तर, शैक्षिक उपलब्धियों, मानसिक योग्यताओं, रुचियों, अभिरुचियों, पारिवारिक तथा शारीरिक दशाओं से परिचय प्राप्त करने का भरपूर प्रयास करता है। इसके लिए निम्नलिखित प्रमुख विधियों का प्रयोग किया जाता है –

(1) भेंट या साक्षात्कार – निर्देशक या परामर्शदाता बालक से भेंट करके या साक्षात्कार द्वारा उसके सम्बन्ध में आवश्यक सूचनाएँ एकत्र करता है तथा निर्देशन की प्रक्रिया में सहायक विभिन्न तथ्यों की जानकारी उपलब्ध कराता है।

(2) प्रश्नावली – बालक के सम्बन्ध में तथ्यों का पता लगाने अथवा उसके व्यक्तिगत विचारों से परिचित होने के उद्देश्य से एक प्रश्नावली निर्मित की जाती है जिसके उत्तर स्वयं बालक को देने होते हैं। प्रश्नावली के माध्यम से बालक की आदतों, पारिवारिक वातावरण, अवकाशकालीन क्रियाओं, शिक्षा और व्यवसाय सम्बन्धी योजनाओं के विषय में ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

(3) व्यक्तिगत इतिहास –व्यक्तिगत इतिहास के माध्यम से बालक की व्यक्तिगत, सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी प्राप्त की जाती है। इसके अतिरिक्त बालक के अभिभावक, मित्र, परिवार के सदस्य एवं आस-पड़ोस के लोग भी उसके विषय में बताते हैं, जिससे उसकी समस्याओं का निदान एवं समाधान किया जाता है।

(4) संचित अभिलेख – विद्यालय में प्रत्येक विद्यार्थी से सम्बन्धित एक ‘संचित अभिलेख’ होता है। इस अभिलेख में विद्यार्थी की प्रगति, योग्यता, बौद्धिक स्तर, रुचि, पारिवारिक दशा तथा शारीरिक स्वास्थ्य सम्बन्धी सूचनाएँ संगृहीत रहती हैं। इन अभिलेखों का अध्ययन करके परामर्शदाता, निर्देशन की दिशा निर्धारित करता है।

(5) बुद्धि एवं ज्ञानार्जन परीक्षण – इन परीक्षणों के माध्यम से निर्देशक इस बात की जाँच करता है कि विद्यार्थी ने विभिन्न पाठ्य-विषयों में कितना ज्ञानार्जन किया है, उसका बौद्धिक स्तर कितना है, शिक्षक ने उसे कितनी प्रभावशालता के साथ पढ़ाया है तथा उसकी योग्यताएँ व दुर्बलताएँ। क्या हैं? इन सभी बातों का ज्ञान विद्यार्थी की भावी प्रगति के सन्दर्भ में अनुमान लगाने में निर्देशक की सहायता करता है।

(6) परामर्श – निर्देशक विद्यार्थियों की समस्या का ज्ञान प्राप्त करके तथा उनके विषय में समस्त तथ्यों का संकलन करके उन्हें शिक्षा सम्बन्धी परामर्श प्रदान करता है। यह परामर्श उनकी समस्याओं का उचित समाधान करने में सहायक होता है।

(7) अनुगामी कार्यक्रम – निर्देशन प्रदान करने के उपरान्त अनुगामी कार्य द्वारा यह जाँच की। जाती है कि निर्देशन के बाद विद्यार्थी की प्रगति सन्तोषजनक रही है अथवा नहीं। असन्तोषजनक प्रगति इस बात की द्योतक है कि विद्यार्थी के विषय में निर्देशक के अनुमान गलत थे तथा निर्देशन ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर पाया। इसलिए उसमें संशोधन करके पुनः निर्देशन प्रदान किया जाना चाहिए।

वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन की विधि के उपर्युक्त सोपान किसी विद्यार्थी की शैक्षिक समस्याओं के सम्बन्ध में समुचित परामर्श एवं समाधान प्रस्तुत करने में सहायक सिद्ध होते हैं। लेकिन इस विधि की कुछ परिसीमाएँ भी हैं; यथा – एक ही विद्यार्थी के लिए विशेषज्ञ या मनोवैज्ञानिक की आवश्यकता होती है तथा इसमें अधिक समय और धन का व्यय भी होता है। सामूहिक शैक्षिक निर्देशन से इन कमियों को पूरा करने का प्रयास किया गया है।

(ii) सामूहिक शैक्षिक निर्देशन (Group Educational Guidance)

सामूहिक शैक्षिक निर्देशन की विधि के विभिन्न सोपानों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है

(1) अनुस्थापन वार्ताएँ – सामूहिक निर्देशन के अन्तर्गत सर्वप्रथम, मनोवैज्ञानिक विद्यालय में जाकर बालकों को वार्ता के माध्यम से निर्देशन का महत्त्व समझाता है। ये वार्ताएँ विद्यार्थियों को स्वयं अपनी आवश्यकताओं, क्षमताओं, शैक्षिक उद्देश्यों एवं रुचियों इत्यादि के सम्बन्ध में सोचने-समझने हेतु प्रेरित व उत्साहित करती हैं।

(2) मनोवैज्ञानिक परीक्षण – विद्यार्थियों को उचित दिशा में निर्देशित करने के उद्देश्य से मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है। इन परीक्षणों की सहायता से विद्यार्थियों की सामान्य एवं विशिष्ट बुद्धि, मानसिक योग्यता, रुचि, अभिरुचि, भाषा एवं व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं का ज्ञान हाता है। इससे निर्देशक का कार्य सुगम हो जाता है।

(3) साक्षात्कार – व्यक्तिगत निर्देशन के समान ही साक्षात्कार का प्रयोग सामूहिक निर्देशन में भी किया जाता है। इसके लिए निर्देशक समिति एवं बालकों से भेंट करके विभिन्न पाठ्य-विषयों के प्रति उनकी रुचि, भावी शिक्षा और व्यवसाय-योजना आदि के सम्बन्ध में सूचनाएँ एकत्र करते हैं। इसके लिए स्वयं-परिसूची’ (Self-Inventory) का भी प्रयोग किया जाता है।

(4) विद्यालय से तथ्य संकलन – मनोवैज्ञानिक, बालकों की विभिन्न पाठ्य-विषयों की ‘शैक्षिक सम्प्राप्ति की जानकारी के लिए, पूर्व परीक्षाओं के प्राप्तांकों पर विचार करता है। इस सम्बन्ध में ‘संचित-लेखा’ (Cumulative Record) के साथ-साथ अध्यापकों की राय लेना भी जरूरी एवं महत्त्वपूर्ण है।

(5) सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का अध्ययन – शिक्षा से सम्बन्धित समुचित निर्देशन प्रदान करने की दृष्टि से विद्यार्थियों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का अध्ययन आवश्यक है। निर्देशक को समाज, आस-पड़ोस, घर-गृहस्थी, मित्र-मण्डली, परिचितों तथा अभिभावकों से उनके विषय में पूरी-पूरी सामाजिक-आर्थिक जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।

(6) परिवार से सम्पर्क – माता-पिता ने बालकों को जन्म दिया है, पालन-पोषण किया है, उन्हें शनैः-शनैः विकसित होते हुए देखा है तथा उसकी भावी उन्नति व व्यवसाय आदि का स्वप्न देखा है; अतः मनोवैज्ञानिक को बालकों के माता-पिता के विचारों को अवश्य समझना चाहिए। इसके लिए पत्र-व्यवहार द्वारा या माता-पिता से व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित करके तथ्यों का संकलन किया जा सकता है।

(7) पाश्र्व-चित्र – अनेकानेक स्रोतों से एकत्रित की गयी सूचनाओं व तथ्यों को एक पार्श्व-चित्र (Profile) में व्यक्त किया जाता है। इस प्रयास में उनकी विभिन्न योग्यताओं, क्षमताओं तथा भिन्न-भिन्न परीक्षण स्तर के चित्र अंकित किये जाते हैं। पाश्र्व-चित्र को देखकर बालकों के सम्बन्ध में एक साथ ही ढेर सारी महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ ज्ञात हो जाती हैं। इन सूचनाओं के आधार पर विद्यार्थियों को पाठ्य-विषय के चुनाव के सम्बन्ध में निर्देशन दिया जाता है जो प्रायः लिखित रूप में होता है।

(8) अनुगामी कार्य – अनुगामी कार्य का एक नाम अनुवर्ती अध्ययन (Follow-up study) भी है। निर्देशन से सम्बन्धित यह अन्तिम सोपान या कार्य है। निर्देशन पाने के बाद जब बालक किसी विषय का चयन करके उसका अध्ययन शुरू कर देता है तो मनोवैज्ञानिक या निर्देशक को यह जाँच करनी होती है कि बालक उस विषय को सफलता से अध्ययन कर रहा है अथवा नहीं। बालक की ठीक प्रगति का अभिप्राय है कि निर्देशन सन्तोषजनक रहा, अन्यथा उसे फिर से निर्देशन प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 6.
व्यावसायिक निर्देशन से आप क्या समझते हैं। व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया का भी विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
व्यवसाय प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का सहारा तथा जीविकोपार्जन का एक सशक्त साधन है। जिसके द्वारा जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। शिक्षा के विभिन्न उद्देश्यों में से एक महत्त्वपूर्ण एवं मुख्य उद्देश्य विद्यार्थी को व्यावसायिक दृष्टि से कुशल बनाना है। गाँधी जी के अनुसार, “सच्ची शिक्षा बेरोजगारी के विरुद्ध एक प्रकारे का आश्वासन होना चाहिए। प्राय: देखने में आता है कि लोग बिना सोचे-समझे किसी भी व्यवसाय को शुरू कर देते हैं, किन्तु बाद में कार्य-दशाओं के प्रतिकूल होने पर उन्हें वह व्यवसाय छोड़ना पड़ता है जिसमें श्रम, समय और धन की हानि होती है। अतः । व्यवसाय को चुनाव उचित और उपयोगी होना चाहिए जिसके लिए निर्देशन अत्यधिक उपयोगी सिद्ध होता है।

व्यावसायिक निर्देशन का अर्थ
(Meaning of Vocational Guidance)

व्यावसायिक निर्देशन एक ऐसी मनोवैज्ञानिक सहायता है जो व्यक्ति (विद्यार्थी) को जीवन के एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य जीविकोपार्जन’ की प्राप्ति में सहायक है। इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को यह निर्णय करने में मदद देना है कि वह जीविकोपार्जन के लिए कौन-सा उपयुक्त व्यवसाय चुने जो उसकी बुद्धि, अभिरुचि तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं के अनुकूल हो। इसके अतिरिक्त, यह व्यक्ति को व्यवसाय-चयन, वातावरण से उचित सामंजस्य तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण आदि में चयन हेतु उचित पथ-प्रदर्शन एवं सहायता प्रदान करता है। वस्तुतः जीविकोपार्जन का स्पष्ट एवं गहरा प्रभाव मानव-जीवन की प्रत्येक वृत्ति पर पड़ता है, इसलिए वर्तमान परिस्थितियों में तो इसका क्षेत्र मात्र व्यक्ति तक ही सीमित न होकर समूचे समाज तथा विश्व के प्रत्येक राष्ट्र तक विस्तृत हो गया है।

व्यावसायिक निर्देशन की परिभाषा
(Definition of Vocational Guidance)

(1) क्रो एवं क्रो के अनुसार, “व्यावसायिक निर्देशन की व्याख्या सामान्यत: उस सहायता के रूप में की जाती है, जो विद्यार्थियों को किसी व्यवसाय को चुनने, उसके लिए तैयारी करने तथा उसमें उन्नति प्रदान करने के लिए दी जाती है।”

(2) अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की राय में, “व्यावसायिक निर्देशन वह सहायता है जो एक व्यक्ति को व्यवसाय चुनने से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान हेतु प्रदान की जाती है जिससे व्यक्ति की क्षमताओं का तत्सम्बन्धी व्यवसाय-सुविधाओं के साथ समायोजन हो सके।

(3) जोन्स के अनुसार, “व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति को ऐसी व्यक्तिगत सहायता प्रदान करने का प्रयास है, जिसके द्वारा वह स्वयं अपने लिए उचित व्यवसाय का चुनाव, उसके लिए तैयारी तथा उसमें प्रवेश करके उन्नति कर सके।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि व्यावसायिक निर्देशन, उपयुक्त व्यवसाय के चुनाव में किसी व्यक्ति की सहायता करने की प्रक्रिया है। यह उसे व्यावसायिक परिस्थितियों से स्वयं को अनुकूलित करने में मदद देती है जिससे कि समाज की मानव-शक्ति का सदुपयोग हो सके तथा अर्थव्यवस्था में समुचित सन्तुलन स्थापित हो सके। इन्हीं तथ्यों को ‘वोकेशनल गाइडेन्स नामक पत्रिका में इन शब्दों में स्पष्ट किया गया है, “व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति को सहायता प्रदान करने की वह क्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति अपने लिए कोई उपयुक्त व्यवसाय चुनता है, उसके लिए स्वयं को तैयार करता है, उसे अपनाता है तथा उसमें प्रगति करता है। व्यावसायिक निर्देशन का मुख्य कार्य व्यक्ति को अपने भविष्य के सम्बन्ध में ऐसे निर्णय एवं उद्देश्य चयन करने में सहायता करना होता है, जो उसके सन्तोषजनक व्यावसायिक समायोजन के लिए आवश्यक होते हैं।”

व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया : व्यवसाय का चयन
(Process of Vocational Guidance : Selection of Vocation)

किसी व्यक्ति के लिए उपयुक्त व्यवसाय चुनने की दृष्टि से व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया प्रारम्भ की जाती है। यह प्रक्रिया निर्देशक से अग्रलिखित दो प्रकार की जानकारियों की माँग करती है –

(अ) व्यक्ति के विषय में जानकारी (Study of the Individual)

व्यावसायिक निर्देशन के अन्तर्गत उपयुक्त व्यवसाय का चुनाव करते समय, सर्वप्रथम, व्यक्ति के शारीरिक विकास, उसके बौद्धिक स्तर, मानसिक योग्यताओं, रुचियों, अभिरुचियों तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं का अध्ययन करना आवश्यक है। व्यक्ति के इस भाँति अध्ययन को ‘व्यक्ति-विश्लेषण (Individual Analysis) का नाम दिया जाता है। व्यक्ति-विश्लेषण में निम्नलिखित बातें जानना आवश्यक समझा जाता है

(1) शैक्षणिक योग्यता (Educational Qualifications) – किसी व्यवसाय के चयन में उसके लिए अपेक्षित शिक्षा के स्तर तथा शैक्षणिक योग्यता की जानकारी आवश्यक होती है। कुछ व्यवसायों के लिए प्रारम्भिक स्तर, कुछ के लिए माध्यमिक स्तर तो कुछ के लिए उच्च स्तर की शिक्षा अपेक्षित है। प्रोफेसर, इन्जीनियर, डॉक्टर, वकील तथा प्रशासक आदि के व्यवसाय हेतु उच्च शिक्षा की आवश्यकता होती है, किन्तु ओवरसियर, कम्पाउण्डर, स्टेनोग्राफर, क्लर्क, मिस्त्री तथा प्राथमिक स्तर के शिक्षक हेतु सामान्य शिक्षा ही पर्याप्त है। कृषि, निजी व्यापार, दुकानदारी आदि के लिए थोड़ी-बहुत शिक्षा से ही काम चल जाता हैं। इसके अतिरिक्त अनेक व्यवसायों में शैक्षणिक योग्यताओं के साथ-साथ विशेष परीक्षण और ओवरसियर तथा कम्पाउण्डर बनने के लिए विशेष प्रशिक्षण में सम्मिलित होना पड़ता है।

(2) बुद्धि (Intelligence) – यह बात सन्देह से परे है कि भिन्न-भिन्न व्यवसायों में सफलता प्राप्त करने के लिए भिन्न-भिन्न बौद्धिक स्तर की आवश्यकता होती है। निर्देशक या परामर्शदाता को व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता का ज्ञान निम्नलिखित तालिका से हो सकता है –

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 1

(3) मानसिक योग्यताएँ (Mental Abilities) – अलग-अलग व्यवसायों के लिए विशिष्ट मानसिक योग्यताओं की आवश्यकता होती है। निर्देशक को चाहिए कि वह सम्बन्धित व्यक्ति में विशिष्ट योग्यता की जाँच कर उसे तत्सम्बन्धी व्यवसाय चुनने का परामर्श दे। उदाहरण के लिए संगीत की विशेष योग्यता संगीतज्ञ के लिए; यान्त्रिक (Mechanical) व आन्तरिक्षक (Spatial) योग्यता इन्जीनियर और मिस्त्रियों के लिए; शाब्दिक व शब्द-प्रवाह सम्बन्धी योग्यताएँ वकील, अध्यापक और लेखक आदि के लिए आवश्यक समझी जाती हैं।

(4) अभियोग्यताएँ (Aptitudes) – विभिन्न प्रकार के व्यवसायों की सफलता हेतु विभिन्न प्रकार की अभियोग्यताएँ या अभिरुचियाँ आवश्यक हैं। सर्वमान्य रूप से, प्रत्येक व्यक्ति में किसी विशेष प्रकार का कार्य करने से सम्बन्धित योग्यता जन्म से ही होती है। यदि जन्म से चली आ रही योग्यता को ही प्रशिक्षण देकर अधिक परिष्कृत एवं प्रभावशाली बनाया जाए तो व्यक्ति की व्यावहारिक कार्यकुशलता में अभिवृद्धि हो सकती है। यान्त्रिक कार्य के लिए यान्त्रिक अभिरुचि, कला सम्बन्धी कार्य के लिए कलात्मक अभिरुचि तथा लिपिक के लिए लिपिक अभिरुचि आवश्यक है।

(5) रुचियाँ (Interests) – किसी कार्य की सफलता के लिए उसमें व्यक्ति की रुचि का होना आवश्यक है। किसी ऐसे कार्य को करना उचित है जिसमें पहले से व्यक्ति की रुचि हो, अन्यथा मिले हुए कार्य में बाद में रुचि विकसित की जा सकती है। प्रायः योग्यता और रुचि साथ-साथ पाये जाते हैं। और कम योग्यता वाले क्षेत्र में व्यक्ति रुचि प्रदर्शित नहीं करता। ऐसी दशा में रुचि और योग्यता में से किसे प्रमुखता दी जाए यह बात विचारणीय बन जाती है।

(6) व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताएँ (Personality Qualities) – अनेक व्यवसायों की सफलता व्यक्तित्व सम्बन्धी विशिष्ट गुणों पर आधारित होती है; अत: निर्देशक को व्यवसाय के चयन सम्बन्धी परामर्श प्रदान करते समय व्यक्तित्व की विशेषताओं पर भी ध्यान देना चाहिए। एजेण्ट या सेल्समैन के लिए मिलनसार, आत्मविश्वासी, खुश-मिजाज, व्यवहारकुशल तथा बहिर्मुखी व्यक्तित्व का होना परमावश्यक है। कुछ व्यवसाय ऐसे होते हैं जिनमें संवेगात्मक स्थिति, धैर्य, एकाग्रता, सामाजिकता आदि गुणों की आवश्यकता होती है; जैसे-डॉक्टर, इन्जीनियर, बैंक लिपिक, ड्राइवर इत्यादि। लेखक, विचारक और समीक्षक का व्यक्तित्व चिन्तनशील एवं अन्तर्मुखी होता है।

(7) शारीरिक दशा (Physical Condition) – प्रत्येक कार्य में शारीरिक शक्ति का उपभोग होता ही है; अत: सभी व्यवसायों के चयन में शारीरिक विकास, स्वास्थ्य आदि शारीरिक दशाओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए। कुछ व्यवसायों; जैसे-पुलिस, सेना आदि में अधिक शारीरिक क्षमता की अपेक्षा होती है और उनके लिए शारीरिक दृष्टि से क्षमतावान व्यक्तियों को ही चुना जाता है। ऐसे व्यवसायों में कम क्षमता वाले, अस्वस्थ या रोगी व्यक्तियों को कदापि नहीं लिया जा सकता, चाहे वे कितने ही बुद्धिमान क्यों न हों।

(8) आर्थिक स्थिति (Economic Condition) – बालक को व्यवसाय चुनने सम्बन्धी परामर्श प्रदान करने में उसके परिवार की आर्थिक दशा का ज्ञान निर्देशक को अवश्य रहना चाहिए। कुछ व्यवसाय ऐसे हैं जिनके प्रशिक्षण में अधिक समय और अधिक धन दोनों की आवश्यकता होती है; उदाहरणार्थ-डॉक्टरी और इन्जीनियरिंग। लम्बे समय तक शिक्षा पर भारी धन व्यय करना प्रत्येक परिवार के वश की बात नहीं है। इसी कारण से अनेक योग्य एवं प्रतिभाशाली युवक-युवतियाँ धनाभाव के कारण इन व्यवसायों का चयन नहीं कर पाते हैं।

(9) लिंग (Sex) – लैंगिक भेद के कारण व्यक्तियों के कार्य-क्षेत्र में अन्तर आ जाता है, इसलिए व्यवसाय चयन की प्रक्रिया में निर्देशक को व्यक्ति के लिंग का भी ध्यान रखना चाहिए। सेना और पुलिस जैसे विभाग पुरुषों के लिए ही उपयुक्त समझे जाते हैं, जबकि अध्यापन, परिचर्या, लेखन आदि स्त्रियों के लिए अधिक ठीक रहते हैं। वस्तुतः स्त्रियाँ बौद्धिक कार्य तो पुरुषों के समान कर सकती हैं लेकिन उनमें पुरुषों के समान कठोर शारीरिक श्रम करने की क्षमता नहीं होती। वर्तमान परिस्थितियों में लिंग भेद की मान्यता क्रमशः घट रही है। अब महिलाएँ पुलिस, सेना तथा वायुसेना में भी सफँलतापूर्वक पदार्पण कर रही हैं।

(10) आयु (Age) – बहुत-से व्यवसायों में राज्य की ओर से सेवाओं में प्रवेश पाने की आयु-सीमाएँ निर्धारित कर दी गयी हैं। प्रशिक्षण प्राप्त करने की भी सीमाएँ सुनिश्चित कर दी गयी हैं। अतः किसी व्यवसाय के चयन हेतु निर्देशक को व्यक्ति की आयु सीमा पर भी विचार कर लेना चाहिए।

(ब) व्यवसाय-जगत् सम्बन्धी जानकारी (Study of Vocational world)

व्यावसायिक निर्देशक को व्यवसाय-जगत् की पूरी जानकारी रहनी चाहिए। विश्व-भर में कितने प्रकार के व्यवसाय हैं, किन क्षेत्रों में कौन-से व्यवसाय उपलब्ध हैं, किसी व्यवसाय की विभिन्न शाखाओं व उपशाखाओं का ज्ञान, व्यवसाय-विशेष के लिए आवश्यक शैक्षिक-बौद्धिक-मानसिक योग्यताएँ तथा व्यक्तिगत भिन्नता के साथ अपनाये गये व्यवहार का समायोजन-इन सभी बातों को लेकर जानकारी आवश्यक है। व्यवसाय-जगत् से पूर्ण परिचय के लिए निर्देशक का निम्नलिखित तथ्यों से अवगत होना परमविश्यक है –

(1) व्यवसायों का वर्गीकरण – व्यावसायिक निर्देशन के लिए व्यवसायों के प्रकारों का समझना सबसे पहला और अनिवार्य कदम है। व्यवसायों को कई आधारों पर वर्गीकृत किया है। तीन प्रमुख आधार ये हैं–(i) कार्य के स्वरूप की दृष्टि से व्यवसायों का वर्गीकरण, (i) शिक्षा, बौद्धिक स्तर, प्रशिक्षण, सामाजिक सम्मान आदि की दृष्टि से व्यवसायों का वर्गीकरण तथा (ii) रुचियों की दृष्टि से व्यवसायों का वर्गीकरण।

(2) व्यवसाय-परिवार एवं उनके विभिन्न स्तरीय कार्य – व्यवसाय जगत् से सम्बन्धित दूसरी जानकारी व्यवसाय-परिवार (Job-Family) तथा उसके विभिन्न स्तरीय कार्य (Levels of work) हैं। व्यवसाय-परिवार का अर्थ उन एक ही तरह के व्यवसायों से है जो कार्य की प्रवृत्ति, कार्य की दशा, अपेक्षित बौद्धिक क्षमता, शैक्षिक स्तर तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं के आधार पर एकसमान होते हैं। उदाहरण के तौर पर-“यान्त्रिक व्यवसाय-परिवार में ऊँचे स्तर पर इन्जीनियरिंग का कार्य होता है, मध्यम स्तर पर ओवरसियर, विद्युत-मिस्त्री तथा निम्न स्तर पर फिटर व मैकेनिक होते हैं। निर्देशक को इन सभी बातों को यथोचित ज्ञान होना चाहिए।

(3) व्यवसायों के विषय में जानकारी के स्रोत – विभिन्न व्यवसायों के विषय में जानकारी हासिल करने के स्रोतों का ज्ञान व्यावसायिक निर्देशक को अवश्य होना चाहिए। ये स्रोत इस प्रकार हैं –

  1. सरकारी विभागों की ओर से प्रकाशित सूचनाएँ
  2. रोजगार कार्यालय
  3. व्यापार एवं उद्योग सम्बन्धी सूचनाएँ
  4. पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से
  5. विभिन्न व्यवसायों के विशेषज्ञों की वार्ताओं को रेडियो प्रसारण
  6. व्यवसायों से सम्बन्धित कल-कारखानों या संस्थाओं में स्वयं जाकर
  7. व्यावसायिक एवं औद्योगिक यूनियनों के भाषण व लेख
  8. देश-विदेश के विशेषज्ञों के माध्यम से जानकारी
  9. व्यावसायिक क्षेत्रों में स्वतः कार्य अनुभव प्राप्त करके तथा
  10. निर्देशन मनोवैज्ञानिक एवं परामर्शदाताओं से सम्पर्क स्थापित करके। इस प्रकार व्यवसाय सम्बन्धी लाभप्रद सूचनाएँ ज्ञात की जा सकती हैं।

(4) व्यवसाय से सम्बन्धित कुछ स्मरणीय तथ्य – व्यवसाय की जानकारी संकलित करते समय निर्देशक के लिए ध्यान देने योग्य बातें इस प्रकार हैं –

  1. व्यवसाय में कार्य का स्वरूप (अर्थात् कार्य का प्रकार, उसकी प्रकृति, कार्मिक का उत्तरदायित्व व कर्तव्य)
  2. कार्य करने की दशाएँ (अर्थात् बन्द जगह में होता है या खुली जगह में, कार्य के घण्टे, कार्य बैठकर करते हैं या खड़े होकर, वातावरण आदि कैसा है?)
  3. बुद्धि, मानसिक योग्यता, रुचि तथा अभिरुचि से सम्बन्धित सूचनाएँ
  4. व्यवसाय के लिए व्यक्तित्व के किन गुणों की आवश्यकता है और उनका प्रयोग कब व कहाँ करना है?
  5. प्रशिक्षण सम्बन्धी अनेक जानकारियाँ प्राप्त कर लेना
  6. व्यवसाय के लिए शारीरिक दशाएँ कैसी हों?
  7. आगे चलकर पदोन्नति के अवसर भी मिलेंगे या नहीं?
  8. व्यवसाय में कितनी अमिदनी हो सकती है?
  9. समाज या बाजार में व्यवसाय की कितनी माँग है?
  10. व्यवसाय में प्रवेश हेतु क्या प्रक्रिया अपनायी जाती है; परीक्षण होता है या नहीं और किस प्रकार का?
  11. उस व्यवसाय का समाज में सम्मान होता है या नहीं? आदि।

प्रश्न 7.
व्यावसायिक निर्देशन के लाभ एवं उपयोगिता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

व्यावसायिक निर्देशन के लाभ एवं उपयोगिता
(Advantages and Utility of Vocational Guidance)

व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति एवं समुदाय के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं लाभकारी सिद्ध होता है। इसकी उपयोगिता को संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है

(1) व्यक्तिगत भेद एवं व्यावसायिक निर्देशन – मनोविज्ञान एवं सर्वमान्य रूप से कोई भी दो व्यक्ति एकसमान नहीं हो सकते और हर मामले में आनुवंशिक और परिवेशजन्य भेद पाये जाते हैं। इन्हीं भेदों के कारण हर व्यक्ति पृथक् एवं दूसरों की अपेक्षा बेहतर कार्य कर सकता है तथा इन्हीं के आधार पर व्यक्ति को सही और उपयुक्त व्यवसाय चुनने होते हैं। व्यावसायिक निर्देशन के माध्यम से व्यक्तिगत गुणों एवं क्षमताओं के आधार पर व्यवसाय चुनने से व्यक्ति को सफलता मिलती है।

(2) व्यावसायिक बहुलता एवं निर्देशन – आजकल व्यवसाय अपनाने का आधार सामाजिक परम्पराएँ व जाति-व्यवस्था नहीं रहा। समय के साथ-साथ व्यावसायिक बहुलता ने व्यवसाय के चुनाव की समस्या को जन्म दिया है। व्यावसायिक निर्देशन में विविध व्यवसायों व कार्यों का विश्लेषण करके उनके लिए आवश्यक गुणों वाले व्यक्ति को चुना जाता है।

(3) सफल एवं सुखी जीवन के लिए सोच – समझकर व्यवसाय चुनने से व्यक्ति के जीवन में स्थायित्व एवं उन्नति आती है। व्यवसाय का उपयुक्त चुनाव सफलता को जन्म देता है जिससे जीवन में सुख और समृद्धि आती है।

(4) आर्थिक लाभ – व्यवसाय में योग्य, सक्षम, बुद्धिमान एवं रुचि रखने वाले कर्मियों को नियुक्त करने से न केवल उत्पादन की मात्रा बढ़ती है, बल्कि उत्पादित वस्तुओं में गुणात्मक वृद्धि भी होती है जिससे व्यवसाय को अधिक लाभ होता है। इस लाभ का अंश कर्मचारियों में भी विभाजित होता है और वे आर्थिक लाभ अर्जित करते हैं।

(5) शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य – विवशतावश किसी व्यवसाय को अपनाने से रुचिहीनता, निराशा, उत्साहविहीनता, कुण्ठाओं एवं तनावों का जन्म होता है; अत: शारीरिक-मानसिक क्षमताओं व शक्तियों का भरपूर लाभ उठाने के लिए तथा दुर्बलताओं से बचने के लिए व्यावसायिक निर्देशन महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी है।

(6) अवांछित प्रतिस्पर्धा की समाप्ति एवं सहयोग में वृद्धि – अच्छे व्यवसाय में पद बहुत कम हैं, जबकि उनके पीछे बेतहाशा दौड़ रहे अभ्यर्थियों की भीड़ अधिक है। इससे अवांछित एवं गला-काट प्रतिस्पर्धा का जन्म हुआ है। व्यावसायिक निर्देशन का सहारा लेकर यदि व्यक्ति अपनी योग्यता, क्षमता वे, शक्ति को आँककर सही व्यवसाय चुन लेगा तो समाज में अवांछित प्रतिस्पर्धा से उत्पन्न भग्नाशा समाप्त हो जाएगी। इससे पारस्परिक सहयोग में वृद्धि होगी।

(7) मानवीय संसाधनों का सुनियोजित एवं अधिकतम उपयोग – मानव-शक्ति को समझना, आँकना और उसके लिए उपयुक्त व्यवसाय की तलाश करना व्यावसायिक निर्देशन का कार्य है। यह निर्देशन राष्ट्रीय नियोजन कार्यक्रम का भी एक महत्त्वपूर्ण अंग है, जिसके अन्तर्गत मानवीय संसाधनों का अधिकाधिक उपयोग सम्भव होता है, जिससे व्यक्तिगत एवं समष्टिगत कल्याण में अभिवृद्धि की जा सकेगी।

(8) समाज की गत्यात्मकता एवं प्रगति – समाज की प्रकृति गत्यात्मक है। हर पल नयी-नयी परिस्थितियाँ जन्म ले रही हैं। बढ़ती हुई मानवीय आवश्यकताओं, उपलब्ध किन्तु सीमित साधनों एवं प्रगति की परिवर्तनशील अवधारणाओं ने मानव व उसके समाज के मध्य समायोजन की दशाओं को विकृत कर डाला है। इस विकृत दशा में सुधार लाने की दृष्टि से तथा व्यावसायिक सन्तुष्टि के विचार को पुष्ट करने हेतु व्यक्ति को उचित कार्य देना होगा। इसके लिए व्यावसायिक निर्देशन ही एकमात्र उपाय दीख पड़ता है।

प्रश्न 8.
व्यावसायिक सूचना के विभिन्न स्रोतों को सामान्य परिचय दीजिए।
या
भारत में व्यवसाय सम्बन्धी सूचनाओं के स्रोत का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

व्यावसायिक सूचना के मुख्य स्रोत

व्यावसायिक निर्देशन एवं व्यवसाय-चयन के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति को अपनी रुचियों तथा क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए अनुकूल व्यवसाय की खोज करनी चाहिए। इसके लिए उसे विभिन्न व्यवसायों के विषय में सूचनाएँ एकत्र करनी चाहिए। अपने व्यवसाय और जीवन को गम्भीरता से लेने वाले व्यक्ति स्वयं के अनुकूल व्यवसाय को चयन करने हेतु अनेकानेक स्रोतों से आवश्यक सूचनाएँ एकत्र करते हैं और विभिन्न क्षेत्रों में सफल व्यक्तियों, उच्च पदाधिकारियों तथा संस्थाओं में कार्यरत प्रभावशाली लोगों से सम्पर्क साधते हैं। इसके अलावा समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, पुस्तकों, संचार-साधनों द्वारा प्रकाशित व प्रचारित व्यावसायिक सूचनाओं का तल्लीनता से अवलोकन भी करते है। व्यवसाय से सम्बद्ध ऐसी सूचनाएँ प्रदान करने में व्यावसायिक सूचना कक्ष’ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। व्यावसायिक सूचना के मुख्य स्रोतों का सामान्य परिचय अग्रलिखित है –

(1) समाचार-पत्र – विविध समाचार-पत्रों में रोजगार सम्बन्धी सूचनाएँ प्रकाशित होती हैं जो व्यवसाय के इच्छुक व्यक्ति के लिए आवश्यक तथा उपयोगी हैं। समाचार-पत्र दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक तथा मासिक हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त, सिर्फ रोजगार से सम्बन्धित सूचनाएँ प्रकाशित करने वाले समाचार-पत्र भी प्रकाशित होते हैं।

(2) रोजगार पत्रिकाएँ – अलग-अलग आयु वर्गों तथा योग्यता से सम्बन्धित रोजगार के अवसरों तथा प्रशिक्षण सम्बन्धी सूचनाएँ देने वाली रोजगार पत्रिकाएँ युवा वर्ग का मार्गदर्शन करती हैं। व्यावसायिक सूचना कक्ष में श्रम एवं रोजगार से सम्बद्ध बहुत-सी पत्रिकाएँ मिलती हैं।

(3) सरकारी सूचनाएँ – सरकार की ओर से समय-समय पर बेरोजगार युवक-युवतियों के लाभार्थ सूचनाएँ प्रकाशित की जाती हैं। ऐसी सूचनाएँ राजकीय संस्थानों में नियुक्ति तथा प्रशिक्षण से सम्बन्धित होती हैं।

(4) रोजगार कार्यालय – रिक्त पदों एवं प्रशिक्षण आदि से सम्बन्धित सूचनाएँ रोजगार कार्यालयों से प्राप्त हो सकती हैं। ये कार्यालय बेरोजगार तथा महत्त्वाकांक्षी युवक-युवतियों के लिए समय-समय पर व्यावसायिक सूचनाएँ उपलब्ध करते हैं। इस उद्देश्य से प्रायः प्रत्येक जिले में एक रोजगार कार्यालय होता है।

(5) वार्ताएँ – व्यावसायिक सूचना-कक्ष समय-समय पर विभिन्न प्रकार के व्यवसायों के सम्बन्ध में वार्ताएँ करते हैं। इन वार्ताओं में अलग-अलग क्षेत्रों से विशेषज्ञ आमन्त्रित किये जाते हैं।

(6) औद्योगिक संस्थान – औद्योगिक संस्थानों में समय-समय पर पद रिक्त होते रहते हैं या नये पद सृजित होते हैं। अक्सर बड़े-बड़े प्रतिष्ठान ऐसे पदों का विज्ञापन दैनिक समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, रेडियो या दूरदर्शन के माध्यम से कराते रहते हैं। इसके अलावा औद्योगिक संस्थानों द्वारा व्यावसायिक सूचना केन्द्र को भी अपनी आवश्यकता का ज्ञान कराया जाता है।

प्रश्न 9.
व्यक्तिगत निर्देशन से आप क्या समझते हैं? इसकी आवश्यकता कब पड़ती है? व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
व्यक्तिर्गत निर्देशन का अर्थ बताइए। व्यक्तिगत निर्देशन के सोपानों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर :

व्यक्तिगत निर्देशन का अर्थ
(Meaning of Personal Guidance)

व्यक्ति के जीवन से सम्बन्धित कुछ ऐसी भी समस्याएँ हैं जिन्हें शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन के अन्तर्गत स्थान प्राप्त नहीं होता। ये समस्याएँ उसकी व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याएँ होती हैं। इन समस्याओं के समाधान से सम्बन्धित निर्देशन को व्यक्तिगत निर्देशन (Personal Guidance) कहा जाता है। व्यक्तिगत निर्देशन एक ऐसी सहायता है जो व्यक्ति को उसकी संवेगात्मक सामाजिक, धार्मिक, नैतिक एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को हल करने में प्रदान की जाती है। व्यक्तिगत निर्देशन के फलस्वरूप व्यक्ति निजी व्यक्तित्व का समुचित विकास पर सन्तुलन की अवस्था प्राप्त कर पाता है। इस भाँति व्यक्तिगत निर्देशन से अभिप्राय किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत सहायता देने वाली उस विशिष्ट प्रक्रिया से है जिसके माध्यम से वह अपनी व्यक्तित्व सम्बन्धी समस्याओं के मौलिक कारणों को समझता है, उनके निराकरण का प्रयत्न करता है तथा एक ऐसी जीवन शैली अपनाता है ताकि अपने व्यक्तित्व का सन्तुलित विकास करते हुए वह जीवन की विभिन्न सरल एवं जटिल परिस्थितियों से उपयुक्त समायोजन स्थापित कर सके।

विभिन्न व्यक्तिगत समस्याएँ तथा व्यक्तिगत निर्देशन की आवश्यकता
(Various Personal Problems and Need for Personal Guidance)

आज की संक्रमणकालीन परिस्थितियों में प्रत्येक व्यक्ति का जीवन विभिन्न प्रकार की समस्याओं से भरा हुआ है। व्यक्तिगत समस्याओं और उनके विविध स्वरूपों की विशद् व्याख्या तो यहाँ प्रस्तुत नहीं की जा सकती, किन्तु उन्हें एक प्रारूप के रूप में प्रदर्शित अवश्य किया जा सकता है; यथा –

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 2

व्यक्तिगत समस्याओं की नींव व्यक्ति के शैशवकाल में ही पड़ जाती है, जबकि उसके जीवन में स्नेह, सुरक्षा, स्वतन्त्रता और उचित पोषण की कमी के कारण भविष्य में असन्तुलन की सम्भावनाएँ बल पकड़ती हैं। व्यक्ति की निजी समस्याएँ दो प्रकार की हो सकती हैं-एक, शारीरिक समस्याएँ तथा दो, मानसिक समस्याएँ। शारीरिक समस्याएँ चिकित्सा के क्षेत्र में आती हैं, किन्तु शारीरिक समस्याओं के कारण उत्पन्न कुछ मानसिक दशाएँ भी निजी समस्याएँ पैदा करती हैं; जैसे—बार-बार रोगग्रस्त होने के कारण दुर्बलत्, चिड़चिड़ापन, थकान, सुस्ती आदि। इन समस्याओं को मानसिक निर्देशन के माध्यम से हल किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त संवेगात्मक समस्याएँ; जैसे-भय, चिन्ता, निराशा आदि का तो मानसिक संमस्याओं के रूप में ही अध्ययन किया जाता है। किशोरावस्था में प्रजनन अंगों के विकास के कारण अनेक यौन समस्याओं का उदय होता है। संकोच या लज्जा के कारण किशोर-किशोरियाँ इन समस्याओं को अभिव्यक्त नहीं कर पाते और अन्धविश्वास व लज्जास्पद घुटन के कारण समस्याएँ उलझती चली जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप ये बढ़ते-बढ़ते भयानक स्वरूप धारण कर लेती हैं।

निजी समस्याओं के अतिरिक्त सामाजिक समयोजन से जुड़ी हुई भी अनेक समस्याएँ हैं; जैसे–पारिवारिक, आर्थिक एवं नैतिक समस्याएँ। पारिवारिक समस्याओं में घरों के कलह, पति-पत्नी के मध्य मनमुटाव, परिवार के अन्य सदस्यों के कारण घर में तनाव की स्थिति आदि प्रमुख हैं। आर्थिक समस्याओं में बेकारी और निर्धनता के कारण घर में आर्थिक तंगी आदि तथा नैतिक समस्याओं में व्यक्ति के आदर्श एवं समाज की यथार्थ स्थिति के बीच संघर्षपूर्ण स्थिति मुख्य हैं। कभी-कभी आदर्शवादी व्यक्ति को भी मजबूरी में रिश्वत जैसे गलत साधनों का प्रयोग करना पड़ता है जिसके परिणामस्वरूप उसे नैतिक द्वन्द्व की स्थिति से होकर गुजरना पड़ता है। यह नैतिक द्वन्द्व अक्सर मानसिक रोगों के रूप में अभिव्यक्त होता है।

कुछ अन्य व्यक्तिगत समस्याएँ –

  1. अतिशय लज्जावृत्ति एवं एकाकीपन के कारण स्वयं को समाज से दूर रखने का प्रयास
  2. अधिक संवेदनशीलता के कारण विषमता का जन्म
  3. अधिक क्रियाशीलता के कारण उद्दण्ड हो जाना
  4. निरर्थक क्रियाएँ; जैसे-अनेक बार लगातार हाथ धोना, हाथ मलते रहना
  5. चोरी, झूठ बोलना, गाली-गलौज, मारपीट तथा काम से पलायन जैसे व्यवहार सम्बन्धी दोष
  6. खुले स्थान, बन्द स्थान, पानी, छत या चूहे जैसी छोटी-छोटी चीजों से डरने सम्बन्धी अकारण भय
  7. अनवरत चिन्ता और उदासी तथा
  8. मनुष्य में दोहरा व्यक्तित्व पन्न हो जाना, इत्यादि दोष व्यक्तित्व से सम्बन्धित हैं और व्यक्तिगत समस्याओं के रूप में प्रकट होते हैं।

व्यक्तिगत निर्देशन, उपर्युक्त वर्णित समस्त व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान हेतु मनोविज्ञान के विशेषज्ञ द्वारा प्रदत्त मार्गदर्शन है। इस मार्गदर्शन को समस्या का समाधान नहीं कहा जा सकता, यह तो समस्या के प्रति व्यक्ति विशेष का दृष्टिकोण परिवर्तित करने वाला एक मनोवैज्ञानिक उपाय है। वस्तुत: यह एक परामर्श या सूत्र है जिसे विशेषज्ञ द्वारा समस्या को पूरी तरह समझ लेने के बाद पीड़ित व्यक्ति को दिया जाता है। यह परामर्श निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ एवं मनोवैज्ञानिक होता है जिससे समस्या से। ग्रस्त व्यक्ति की समझ, लोच तथा परिस्थितियों के साथ सामंजस्य की क्षमता बढ़ जाती है।

व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया के प्रमुख चरण
(Main Steps of the Process of Personal Guidance)

मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया के दो मुख्य पहलू (Aspects) स्वीकार किये हैं – (1) समस्या का निदान (Diagnosis of the Problem) तथा (2) समस्या का उपचार (Treatment of the Problem)। किन्तु कुछ विख्यात विद्वानों ने व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया में स्थूल रूप से पाँच चरण या सोपान स्वीकार किये हैं। प्रक्रिया से सम्बन्धित उपर्युक्त दोनों पहलू भी इन्हीं पाँच सोपानों में सम्मिलित हैं। व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया के ये पाँच सोपान इस प्रकार हैं

(1) तथ्यों का संग्रह (Collection of Data) – व्यक्तिगत निर्देशन का सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण चरण ‘तथ्यों का संग्रह है, क्योंकि समस्या सम्पूर्ण व्यक्तित्व से सम्बन्धित होती है। अतः तथ्यों का संग्रह भी सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विषय में ही होता है। ये तथ्य दो रूपों में एकत्र किये जाते हैं–(अ) समस्या का इतिहास–वह विशेष समस्या कब और किस परिस्थिति में प्रकट हुई? इसे किस प्रकार अनुभव किया गया था और यह किस समय बढ़ी? आदि-आदि। (ब) व्यक्ति का जीवन-वृत्त-व्यक्ति के जीवन पक्षों का सम्पूर्ण विवरण, परिपक्वता एवं अभिवृत्त आदि के विषय में सूचनाएँ एकत्र करना। आवश्यक तथ्यों को हर सम्भव स्रोत से एकत्र किया जाता है तथा एकत्र किये गये तथ्यों को एक आश्व-चित्र के रूप में तैयार कर लिया जाता है।

(2) समस्या का निदान (Diagnosis of Problem) – आवश्यक तथ्यों के संग्रह के उपरान्त मनोवैज्ञानिक या निर्देशक निदान सम्बन्धी क्रियाएँ प्रारम्भ करता है। सरल एवं उत्तम उपचार के लिए अच्छा निदान आवश्यक है। निदान का तात्पर्य उस क्रिया से है जो किसी समस्या के मूल कारणों का पता लगाने के लिए प्रयोग की जाती है। मनोवैज्ञानिक प्राप्त तथ्यों या सूचनाओं को आपस में जोड़कर उनमें निहित प्रतिमानों (Patterns) की खोज करता है। प्रतिमानों के ज्ञान से समस्या की उत्पत्ति के कारणों की खोज की जाती है। मनोवैज्ञानिक तथ्यों का विश्लेषण एवं उनकी इस प्रकार व्याख्या करता है कि उनमें एक सम्बद्धता या रूपरेखा बन जाती है और यहीं से समस्या के वास्तविक कारणों के सही-सही अनुमान की शुरुआत हो जाती है। निदान की क्रिया परामर्शदाता के कौशल तथा पूर्व-अनुभव पर निर्भर होती है। विद्वानों ने इसे समस्या के उपचार की पृष्ठभूमि कहा है जिसकी सफ़लता उपचार की सफलता को सुनिश्चित करती है।

(3) फलानुमान (Prognosis) – फलानुमान (अर्थात् फल का अनुमान) का अभिप्राय यह अनुमान लगाने से है कि मनोवैज्ञानिक या परामर्शदाता समस्या का समाधान प्राप्त करने में कहाँ तक सफल हो सकता है। फलानुमान की क्रिया निदान के साथ-साथ चलती है। उदाहरणार्थ-मान लीजिए, कोई बालक निरन्तर अपनी कक्षा में अनुत्तीर्ण हो रहा है। मनोवैज्ञानिक उसकी बुद्धि का परीक्षण करके पाता है कि उसकी बुद्धि निम्न स्तर की है। इस प्रकार वह निदान करता है कि बालक की परीक्षा में बार-बार असफलता का कारण उसका बौद्धिक स्तर नीचा होना है। इसके साथ मनोवैज्ञानिक यह फलानुमान भी देता है कि बालक उच्च परीक्षा में सफलता प्राप्त नहीं कर सकेगा। लेकिन फलानुमान प्राप्त करना कोई आसान काम नहीं है, यह एक जटिल क्रिया है। इसके लिए अनेक कारक उत्तरदायी हैं; जैसे-पारिवारिक आयु, उच्चाकांक्षाएँ तथा वातावरण। व्यक्तिगत निर्देशन को फलानुमान करने से पहले व्यक्ति को प्रभावित करने वाले सभी कारकों पर ध्यान देना होता है।

(4) चिकित्सा या समस्या का उपचार (Therapy of Treatment of the Problem) – व्यक्तिगत समस्याओं से पीड़ित और परामर्श की इच्छा रखने वाले व्यक्ति की समस्याओं को समझने तथा उनके मूल कारणों की जानकारी प्राप्त करने के बाद उपचार का कार्य प्रारम्भ होता है। परामर्श का इच्छुक व्यक्ति जब अपने से सम्बन्धित समस्त परीक्षणों, साक्षात्कार एवं परिपार्श्व-चित्र का अवलोकन कर लेता है तो उसका दृष्टिकोण बदल जाता है और अपनी समस्या को वह स्वयं ही बहुत कुछ समझे भी लेता है। यही नहीं, समस्या का समुचित समाधान प्राप्त करने के लिए वह कोई-न-कोई उपयुक्त मार्ग भी खोज लेता है। इसी दौरान परामर्शदाता मनोवैज्ञानिक रूप से उसके सामने अपने सुझाव प्रस्तुत करता है। ये सुझाव अनेक प्रकार के व्यवहारों के रूप में होते हैं जिनमें से व्यक्ति कोई एक सुझाव अपने लिए चुन लेता है। उपचार सम्बन्धी सुझाव प्रस्तुत करते समय व्यक्ति की त्रुटियों की ओर संकेत नहीं करना चाहिए और उसे सुझाव कोई उपदेश-सा भी नहीं लगना चाहिए, अन्यथा वह सुझाव के प्रति विरोधी भाव व्यक्त कर सकता है।

(5) अनुवर्ती अनुशीलन (Follow-up Studies) – समस्या समाधान के बाद भी निर्देशक को यह देखना होता है कि व्यक्ति कैसा चल रहा है, उसका व्यक्तित्व पूरी तरह समायोजित है या नहीं, उसमें कोई गड़बड़ी या नया रोग तो उत्पन्न नहीं हो रही है? इसके लिए निर्देशक को व्यक्ति से लगातार सम्पर्क बनाये रखना पड़ता है और उसकी सहायता करनी पड़ती है। इसकी उपयोगिता दो बातों को लेकर है–एक, निर्देशक को अपनी सफलता/असफलता का ज्ञान होता रहता है जिससे उसे निर्देशन प्रक्रिया को सुधारते रहने का अवसर प्राप्त होता है तथा दो, परामर्श प्राप्त करने वाला व्यक्ति यह समझकर सन्तुष्ट रहता है कि निर्देशक उसका हितचिन्तक तथा शुभाकांक्षी है।

प्रश्न 10.
उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवाओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
उत्तर प्रदेश में राज्य स्तर पर, क्षेत्रीय स्तर पर तथा विद्यालय स्तर पर होने वाले निर्देशन कार्यों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवाओं के स्वरूप को विस्तार से लिखिए।
उत्तर :

भारत में निर्देशन सेवाओं के श्रीगणेश का श्रेय हमारे प्रदेश अर्थात् उत्तर प्रदेश को प्राप्त हुआ सर्वप्रथम 1937 ई० में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नियुक्त की गयी ‘आचार्य नरेन्द्र देव शिक्षा पुनर्व्यवस्था समिति ने अपनी रिपोर्ट में विद्यालयों की मनोवैज्ञानिक सेवाओं के लिए उत्तर प्रदेश में एक ‘मनोविज्ञानशाला’ (Bureau of Psychology) स्थापित करने की सिफारिश की थी। 1947 ई० में स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् ही इस सिफारिश को कार्यान्वित किया जा सका और इसे परिणामतः उ०प्र०, शिक्षा विभाग के तत्त्वावधान में ‘मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश, इलाहाबाद’ (Bureau of Psychology U.P, Allahabad) की स्थापना हुई।

उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवा
(Guidance Service in Uttar Pradesh)

मनोविज्ञानशाला उ० प्र०, इलाहाबाद को उद्देश्य माध्यमिक विद्यालयों के छात्रों को शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन प्रदान करना है। प्रथम पंचवर्षीय योजना (1952 ई०) में इस मनोविज्ञानशाला का कार्यक्षेत्र और विस्तृत हुआ तथा उत्तर प्रदेश के पाँच शैक्षिक क्षेत्रों-मेरठ, बरेली, लखनऊ, कानपुर तथा वाराणसी में पाँच जिला मनोविज्ञान केन्द्र खोले गये जिनकी संख्या तृतीय पंचवर्षीय योजना में बढ़कर सात हो गयी, क्योंकि आगरा और गोरखपुर में भी जिला मनोविज्ञान केन्द्र स्थापित हो गये थे। इस भाँति, कुमाऊँ को छोड़कर सभी क्षेत्रों में इस प्रकार के केन्द्र स्थापित कर दिये गये। दूसरी योजना के अन्तर्गत निर्देशन सेवा को विद्यालय स्तर तक पहुँचाने के लिए 25 बहुउद्देशीय विद्यालयों (Multi-purpose Schools) में विद्यालय मनोवैज्ञानिकों (School Psychologists) की नियुक्ति कर दी गयी थी। अब यह संख्या 25 से बढ़कर 53 हो गयी और इस भाँति 53 उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में विद्यालय-मनोवैज्ञानिक कार्यरत हैं।

उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग ने निर्देशन कार्य की व्यवस्था तीन स्तरों पर की है – (1) राज्य स्तर, (2) क्षेत्रीय स्तर तथा (3) विद्यालय स्तर। अब हम उ० प्र० में निर्देशन सेवा के तीनों स्तरों का विवेचन प्रस्तुत करेंगे-

(1) राज्य स्तर पर निर्देशन कार्य (Guidance Services at State Level)

मनोविज्ञानशाला उ० प्र०, इलाहाबाद – राज्य स्तर पर मनोविज्ञानशाला उ० प्र०, इलाहाबाद; सम्पूर्ण राज्य के निर्देशन का कार्य संचालित करती है। इसका प्रमुख कार्य समस्त राज्य के विद्यालयों के लिए मनोवैज्ञानिक सेवाओं की व्यवस्था करना है। मनोविज्ञानशाला के गठन एवं कार्यों का वर्णन इस प्रकार है –

(अ) मनोविज्ञानशाला का गठन – उत्तर प्रदेश मनोविज्ञानशाला के प्रारम्भिक संगठन में कुल मिलाकर पन्द्रह सदस्य विभिन्न पदों पर आसीन होते हैं। पद एवं उन पर कार्यरत अधिकारियों की संख्या इस प्रकार है –

  1. निर्देशक (एक)
  2. वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक (दो)
  3. मनोवैज्ञानिक (तीन)
  4. सहायक मनोवैज्ञानिक (तीन)
  5. व्यावसायिक निर्देशन अधिकारी (एक)
  6. वरिष्ठ परीक्षणकर्ता-पुरुष (एक)
  7. वरिष्ठ परीक्षणकर्ता-स्त्री (एक)
  8. सांख्यिक विशेषज्ञ (एक)
  9. परामर्शदाता (एक)
  10. बाल-निर्देशक (एक)

उल्लेखनीय रूप से डॉ० सोहनलाल एवं डॉ० चन्द्रमोहन भाटिया जैसे विख्यात मनोवैज्ञानिक इस मनोविज्ञानशाला के निर्देशक (Director) पद को सुशोभित कर चुके हैं।

(ब) मनोविज्ञानशाला के कार्य – मनोविज्ञानशाला उ० प्र०, इलाहाबाद के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं-(i) निर्देशन, (ii) प्रशिक्षण, (ii) शोध, (iv) चयन, (v) नियोजन एवं समन्वय तथा (vi) प्रकाशन। इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है –

(i) निर्देशन कार्य (Guidance) – मनोविज्ञानशाला का प्रथम महत्त्वपूर्ण एवं विशिष्ट कार्य शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन देना है, जिसे निपुण मनोवैज्ञानिकों की देख-रेख में वैयक्तिक और सामूहिक आधार पर सम्पन्न किया जाता है

(क) वैयक्तिक निर्देशन – किसी बालक की शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत समस्याओं का निदान व समाधान वैयक्तिक स्तर पर किया जाता है। तीव्र, मन्द या प्रखर बुद्धि के बालकों का मानसिक परीक्षण कर उनके विषय में पूरी जानकारी प्राप्त की जाती है। मानसिक परीक्षण में बुद्धि, रुचि, अभियोग्यता तथा व्यक्तित्व परीक्षण सम्मिलित हैं। साक्षात्कार भी होता है। बालक को परीक्षण की रिपोर्ट दी जाती है। यहाँ की प्रयोगशाला में समस्याग्रस्त बालकों का उपचार क्रीड़ा-चिकित्सा (Play Therapy) से करने की व्यवस्था है। पिछड़े तथा किसी खास विषय में कमजोर बालकों की विशेष सहायता की जाती है।

(ख) सामूहिक निर्देशन – मनोविज्ञानशाला का एक उद्देश्य बालकों को उपयुक्त पाठ्य-विषय में मदद देना है जिसके लिए कई सामूहिक परीक्षण हैं; जैसे-सामान्य मानसिक योग्यता परीक्षण, व्यावसायिक परीक्षण, रुचि परीक्षण तथा अभिरुचि परीक्षण आदि। कक्षा 8 तथा कक्षा 10 के बाद वैकल्पिक विषय चुनने में सामूहिक रूप से निर्देशन भी दिया जाता है। इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत साक्षात्कार के आधार पर निर्देशन तथा परीक्षणों की रिपोर्ट भी बालकों को भेजी जाती है।

(ii) प्रशिक्षण (Training) – मनोविज्ञानशाला द्वारा प्रदत्त ‘डिप्लोमा इन गाइडेन्स साइकोलॉजी प्रशिक्षण कोर्स पास करके मनोविज्ञान के शिक्षार्थी स्वयं निर्देशक बन सकते हैं। सन् 1973 ई० में ‘कैरियर मास्टर कोर्स’ नामक प्रशिक्षण व्यावसायिक निर्देशन के लिए भी दिया गया, जिसमें प्रदेश में मान्यता प्राप्त राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के अध्यापक/अध्यापिकाओं को अपने विद्यालय के शिक्षार्थियों को व्यवसाय-चयन में मदद देने के लिए प्रशिक्षण दिया गया। वस्तुत: यह प्रशिक्षण कार्यक्रम अधिक सफल नहीं हो सका और आगे नहीं चल सका।

(iii) अनुसन्धान कार्य (Research work) – मनोविज्ञानशाला निर्देशन सेवा के लिए अनुसन्धान कार्य भी करती है। यह कार्य विशेष रूप से परीक्षणों के क्षेत्र में किया गया जिसे निष्कर्षतः पाया गया कि भारतीय परिस्थितियों के लिए उपयुक्त मनोवैज्ञानिक परीक्षण उपलब्ध नहीं हैं। अतः विभिन्न प्रकार के मानसिक योग्यताओं के परीक्षणों पर तीन दिशाओं में शोध कार्य शुरू किया गया— (a) परीक्षणों की रचना, (b) परीक्षणों का भारतीयकरण तथा (c) प्रभावीकरण।

(iv) चयन कार्य (Selection) – मनोविज्ञानशाला विभिन्न विभागों को चयन-कार्य में सहायता देती है; जैसे-राज्य के ट्रेनिंग कॉलेजों में प्रशिक्षणार्थ आने वाले अभ्यर्थियों का चयन, शिक्षा विभाग में एक्सटेन्शन विभाग को विभिन्न पदों के चयन में सहायता करना। यह शाला विभिन्न मनोविज्ञान परीक्षाओं के माध्यम से चंयन,की प्रक्रिया द्वारा राज्य के विभिन्न विभागों की सहायता करने का कार्य भी करती है।

(v) नियोजन एवं समन्वय (Planning and Co-ordination) – मनोविज्ञानशाला इस सम्बन्ध में योजना बनाने, निरीक्षण करने व समन्वय करने का कार्य करती है कि राज्य में विभिन्न जिला मनोविज्ञान केन्द्रों तथा विद्यालय मनोवैज्ञानिकों को क्या कदम उठाने होंगे यह शाला राज्य के अन्य विभागों को मार्गदर्शन व परामर्श देती है तथा उनके कार्यों का समन्वय करती है। इसके अलावा समय-समय पर अनेक भाषण-मालाएँ भी आयोजित की जाती हैं।

(vi) प्रकाशन (Publication) – मनोविज्ञानशाला की ओर से मनोविज्ञान और निर्देशात्मक पत्र-पत्रिकाओं व साहित्य का प्रकाशन होता है जिससे अभिभावक, शिक्षक व मनोवैज्ञानिक लाभान्वित होते हैं। सन् 1950 ई० से लेकर आज तक दर्जनों प्रकाशन हुए हैं जिनसे मनोविज्ञान व हिन्दी का साहित्य समृद्ध हुआ है।

(2) क्षेत्रीय स्तर पर निर्देशन कार्य (Guidance Services at Regional Level)

जिला मनोविज्ञान केन्द्र – क्षेत्रीय या मण्डलीय स्तर पर सात जिला मनोविज्ञान केन्द्र अपने क्षेत्र अथवा मण्डल में सम्बन्धित निर्देशन कार्य का संचालन एवं देख-रेख करते हैं।

(अ) जिला मनोविज्ञान केन्द्र का गठन – जिला मनोविज्ञान केन्द्र के संगठन में कुल मिलाकर पाँच सदस्य होते हैं जिनके पद एवं उन पर कार्यरत अधिकारियों की संख्या इस प्रकार है -(i) जिला मनोवैज्ञानिक (एक), (i) व्यावसायिक निर्देशक (दो) तथा (ii) मनोवैज्ञानिक (दो)।

(ब) जिला मनोविज्ञान केन्द्र के प्रमुख कार्य – जिला मनोविज्ञान केन्द्र तीन प्रमुख कार्य करता है–(i) निर्देशन, (ii) अनुसन्धान तथा (iii) प्रकाशन। संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

  1. निर्देशन कार्य (Guidance) – जिला मनोविज्ञान केन्द्रों का मुख्य कार्य अपने-अपने क्षेत्र/मण्डल के माध्यमिक विद्यालय के बालक-बालिकाओं को वैयक्तिक तथा सामूहिक आधार
    पर शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन प्रदान करना है।
  2. अनुसन्धान कार्य (Research work) – निर्देशन कार्य करते हुए प्राप्त तथ्यों के आधार पर अनुसन्धान कार्य तथा अनुवर्ती अध्ययन करना, जिला मनोविज्ञान केन्द्रों का कार्य है।
  3. प्रकाशन कार्य (Publication) – जिला मनोविज्ञान केन्द्र, मनोविज्ञानशाला को निर्देशन सम्बन्धी साहित्य के सृजन तथा प्रकाशन में मदद देते हैं। ये केन्द्र कभी-कभी यह कार्य स्वयं भी करते हैं।

वस्तुतः जिला मनोविज्ञान केन्द्र, मनोविज्ञानशाला, उ०प्र०, इलाहाबाद तथा विद्यालय मनोवैज्ञानिक के बीच जोड़ने वाली कड़ी का काम करते हैं। ये इलाहाबाद से आने वाली सूचनाओं, परीक्षणों व आदेश को विद्यालयों को प्रेषित करते हैं। ये प्रमुखतया शैक्षिक निर्देशन का कार्य करते हैं, लेकिन इनकी संख्या (सात केन्द्र) इतनी सीमित है कि ये इतने विस्तृत एवं बड़े राज्य के सभी माध्यमिक विद्यालयों तक कदापि नहीं पहुँच सकते।

(3) विद्यालय स्तर पर निर्देशन कार्य (Guidance Services at School Level)

विद्यालय-मनोवैज्ञानिक – विद्यालय स्तर पर मनोवैज्ञानिक तीन कार्य करते हैं–(i) निर्देशन , (ii) शिक्षण तथा (ii) अनुसन्धान में सहायता। इन कार्यों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है

  1. निर्देशन कार्य (Guidance) – विद्यालय-मनोवैज्ञानिक का मुख्य कार्य कक्षा 8 के बाद बालकों को वैयक्तिक और समूह आधार पर शैक्षिक निर्देशन तथा 10वीं-12वीं कक्षा के बाद व्यावसायिक निर्देशन और व्यक्तिगत निर्देशन देना है।
  2. शिक्षण कार्य (Teaching) – मनोवैज्ञानिक निर्देशन कार्य की सफलता के लिए शिक्षण कार्य भी करते हैं, ऐसा करके उन्हें बालकों के अधिक निकट आने का अवसर मिलता है।
  3. अनुसन्धान में सहायता (Help in Research work) – विद्यालय-मनोवैज्ञानिक अनुसन्धान कार्य के लिए समय-समय पर निर्देशन सम्बन्धी तथ्य एवं आँकड़े मनोविज्ञानशाला को प्रदान करते हैं।

उपर्युक्त कार्यों के अतिरिक्त –

  1. बालकों का मनोवैज्ञानिक परीक्षण
  2. मनोविज्ञान व निर्देशन से सम्बन्धित वार्ताएँ
  3. पिछड़े बालकों का सुधार व उपचार
  4. प्रतिभाशाली बालकों के लिए विशेष प्रबन्ध
  5. असमायोजित वे कुसमायोजित बालकों को व्यक्तिगत निर्देशन
  6. माता-पिता/अभिभावकों से सम्पर्क स्थापित करना
  7. संचयित लेखा रखना तथा
  8. मनोविज्ञानशाला के लिए क्षेत्रीय खोजकर्ता का कार्य करना आदि कार्य भी विद्यालय मनोवैज्ञानिक करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निर्देशन का एक सामान्य वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन का एक सामान्य वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत मुख्य रूप से निर्देशन के क्षेत्र को ध्यान में रखा गया है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत निर्देशन के मुख्य रूप से तीन प्रकारों या वर्गों का उल्लेख किया गया है जो कि निम्नलिखित हैं –

(i) शैक्षिक निर्देशन (Educational Guidance) – शिक्षा जीवन-पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया होने के बावजूद भी विशेष तौर पर मानव-जीवन के एक विशिष्ट काल और स्थान से सम्बन्ध रखती है। शैक्षिक जगत् में मनुष्य की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसने अपने अध्ययन के लिए किन विषयों या विशिष्ट क्षेत्र का चयन किया है। शैक्षिक निर्देशन के अन्तर्गत बालक की योग्यताओं व क्षमताओं के अनुसार उपयुक्त अध्ययन-क्षेत्र या विषयों का चुनाव किया जाता है तथा शैक्षिक समस्याओं के समाधान में सहायता प्रदान की जाती है।

(ii) व्यावसायिक निर्देशन (Vocational Guidance) – व्यवसाय व्यक्ति के जीवन-यापन का अनिवार्य माध्यम है जो व्यक्ति की रुचि और योग्यता के अनुसार होना चाहिए। व्यक्तिगत विभिन्नताओं को दृष्टिगत रखते हुए अनुकूल व्यवसाय चुनने में व्यक्ति की मदद करना व्यावसायिक निर्देशन का कार्य है। इसके अतिरिक्त नियोक्ता के लिए उपयुक्त व्यक्ति को तलाशने का कार्य भी इसी के अन्तर्गत आता है।

(iii) व्यक्तिगत निर्देशन (Personal Guidance) – प्रत्येक व्यक्ति का जीवन अनेक व्यक्तिगत समस्याओं से भरा होता है जो परिवार सम्बन्धी, मित्र सम्बन्धी, समायोजन सम्बन्धी, स्वास्थ्य सम्बन्धी, मानसिक ग्रन्थियों सम्बन्धी या यौन सम्बन्धी समस्याएँ हो सकती हैं। व्यक्तिगत समस्याओं का निराकरण व्यक्तिगत निर्देशन के अन्तर्गत होता है।

प्रश्न 2.
निर्देशन विधि के आधार पर किया गया निर्देशन का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :

निर्देशन प्रदान करने की विधि के आधार पर निर्देशन दो प्रकार का है –

(i) वैयक्तिक निर्देशन (Individual Guidance) – सर्वोत्तम समझे जाने वाले इस निर्देशन का प्रयोग व्यक्ति विशेष की गम्भीरतम समस्याओं को हल करने में किया जाता है। इसके अन्तर्गत निर्देशक समस्यायुक्त व्यक्ति से व्यक्तिगत सम्पर्क साधता है, उसका बारीकी से अध्ययन करता है, उसकी समस्याओं को स्वयं समझने का प्रयास करता है और इसके बाद व्यक्ति को इस योग्य बनाता है। कि वह अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं ही प्रस्तुत कर सके। व्यक्ति की समस्याओं का ज्ञान प्राप्त करने हेतु मनोवैज्ञानिक परीक्षण एवं साक्षात्कार के प्रयोग के अतिरिक्त उसकी पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का भी अध्ययन किया जाता है। प्राप्त सूचनाओं के आधार पर एक प्रोफाइल (Profile) तैयार की जाती है।

इस प्रकार के निर्देशन में मनोवैज्ञानिक या विशेषज्ञ एक बार में केवल एक व्यक्ति पर ध्यान दे पाता है। इस कारणवश यह निर्देशन धन और समय की दृष्टि से महँगा पड़ता है। इसके अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक/विशेषज्ञ के अभाव में इसका प्रयोग करना सम्भव नहीं है। अतः वैयक्तिक निर्देशन उसी समय प्रदान किया जाता है जबकि व्यक्ति से सम्बन्धित समस्या की प्रकृति जटिल हो गयी हो और वह सांवेगिक रूप से अत्यधिक उलझ गया हो।

(ii) सामूहिक निर्देशन (Group Guidance) – कभी-कभी एक समूह के समस्त व्यक्तियों की समस्या एक ही या एकंसमान होती है। उस दशा में व्यक्तियों के एक समूह को एक साथ निर्देशन प्रदान किया जाता है जिसे सामूहिक निर्देशन का नाम दिया जाता है। प्रसिद्ध विद्वान् ए० जे० जोन्स ने लिखा है, “सामूहिक निर्देशन वह प्रक्रिया है जो समूह में प्रत्येक व्यक्ति को इस प्रकार व्यक्तिगत सहायता प्रदान करती है जिससे वह अपनी समस्याओं को सुलझा सके तथा समायोजन स्थापित कर सके।” पाठ्य-विषयों के चुनाव से सम्बन्धित शैक्षिक निर्देशन एवं व्यावसायिक निर्देशन में यह विधि अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होती है।

प्रश्न 3.
मायर्स द्वारा प्रतिपादित निर्देशन का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
मायर्स (Myers) के अनुसार समस्याओं के आधार पर निर्देशन के आठ प्रकार बताये गये हैं, जो निम्नलिखित हैं –

  1. शैक्षिक निर्देशन–निर्देशन की यह शाखा व्यक्ति को शिक्षा सम्बन्धी समस्याओं के समाधान में सहायता करती है।
  2. व्यावसायिक निर्देशन-यह शाखा उपयुक्त व्यवसाय के चुनाव में मार्गदर्शन करती है।
  3. सामाजिक तथा नैतिक नैर्देशन—यह शाखा सामाजिक सम्बन्धों को स्वस्थ व दृढ़ बनाने, सामाजिक तनाव को कम करने तथा मनुष्यों की नैतिक मूल्यों में प्रतिष्ठा हेतु परामर्श देती है।
  4. नागरिकता सम्बन्धी निर्देशन–यह शाखा नागरिक के अधिकार एवं कर्तव्यों के सम्बन्ध में निर्देश एवं सुझाव देकर व्यक्ति को श्रेष्ठ नागरिक बनाने में मदद करती है।
  5. समाज-सेवा सम्बन्धी निर्देशन-यह शाखा समाज-सेवा सम्बन्धी कार्यों को सम्पादित करने तथा योजनाओं को पूरा करने में सहायता प्रदान करती है।
  6. नेतृत्व सम्बन्धी निर्देशन-इसके अन्तर्गत लोगों में नेतृत्व की क्षमता का विकास करने सम्बन्धी पथ-प्रदर्शन प्रदान किया जाता है।
  7. स्वास्थ्य सम्बन्धी निर्देशन–इसमें व्यक्तियों को स्वास्थ्य सम्बन्धी सलाह-मशवरा देने तथा अपने परिवार के सदस्यों का स्वास्थ्य बनाये रखने हेतु निर्देश और सुझाव मिलते हैं।
  8. मनोरंजन सम्बन्धी निर्देशन–निर्देशन की इस शाखा के अन्तर्गत लोगों को अपने खाली समय का सदुपयोग करने तथा श्रमोपरान्त मनोरंजन करने के उपायों से अवगत कराया जाता है।

प्रश्न 4.
भारत में निर्देशन की समस्याओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
वर्तमान औद्योगिक एवं नगरीय जीवन में विभिन्न प्रकार के निर्देशन की अत्यधिक आवश्यकता है। निर्देशन की व्यापक व्यवस्था को अनिवार्य माना जा रहा है तथा इसके लिए बहुपक्षीय प्रयास भी किये जा रहे हैं, परन्तु जन-साधारण निर्देशन सेवाओं से समुचित लाभ प्राप्त नहीं कर पा रहा। वास्तव में निर्देशन-क्षेत्र में कुछ समस्याएँ प्रबल हो रही हैं जिनके कारण अंभीष्ट परिणाम प्राप्त नहीं हो रहे। इस क्षेत्र की कुछ मुख्य समस्याओं का विवरण निम्नवर्णित है –

  1. हमारे विद्यालय में कुछ शिक्षकों का दृष्टिकोण पारम्परिक तथा रूढ़िवादी है। इस वर्ग के शिक्षक केवल पारम्परिक ढंग से शिक्षण कार्य ही करते हैं। वे आवश्यक परामर्श एवं निर्देशन की गतिविधियों को कोई महत्त्व नहीं देते।
  2. विभिन्न कारणों से हमारे विद्यालयों में शिक्षा सम्बन्धी आधुनिक साधनों की कमी है। इस स्थिति में निर्देशन के महत्त्व को स्वीकार करते हुए भी यथार्थ में निर्देशन सम्बन्धी समुचित व्यवस्था कर पाना प्रायः सम्भव नहीं होता।
  3. हमारे विद्यालयों में छात्र संख्या बहुत अधिक है। इस स्थिति में प्रभावशाली एवं उपयोगी निर्देशन की व्यवस्था कर पाना कठिन है।
  4. सामान्य रूप से सभी शिक्षकों पर कार्यभार काफी अधिक है। उन्हें शिक्षण के अतिरिक्त भी विभिन्न कार्य करने पड़ते हैं। इस स्थिति में वे छात्रों को आवश्यक निर्देशन देने में प्रायः असमर्थ रहते हैं।
  5. कुछ दृष्टिकोणों से हमारी शिक्षा प्रणाली भी दोषपूर्ण है। हमारी शिक्षा में व्यावसाग्निक पाठ्यक्रमों की समुचित व्यवस्था नहीं है। इस स्थिति में उपर्युक्त निर्देशन की व्यवस्था नहीं हो पा रही।
  6. हमारे देश में निर्देशन तथा परामर्श के क्षेत्र के शोध-कार्यों की समुचित व्यवस्था नहीं है। ऐसे में निर्देशन की उत्तम व्यवस्था कैसे हो सकती है?
  7. हमारे देश में निर्देशन तथा परामर्श के लिए आवश्यक मानक परीक्षणों की समुचित व्यैवस्था नहीं है। इस कमी के कारण भी उत्तम निर्देशन व्यवस्था को कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
  8. वर्तमान समय में हमारे देश में रोजगार के अवसरों की बहुत कमी है तथा बेरोजगारी का बोलबाला है। ऐसे में सफल एवं उत्तम निर्देशन की व्यवस्था कैसे हो सकती है?

प्रश्न 5.
व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

  1. व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी एवं मौलिक कारक व्यक्तिगत भिन्नता है। किसी व्यक्ति-विशेष के लिए कौन-सा व्यवसाय उपयुक्त होगा, इसके लिए व्यवसाय निर्देशन का कार्यक्रम अपेक्षित एवं अपरिहार्य है।
  2. विभिन्न व्यक्तियों में शरीर, मन या बुद्धि, योग्यता, स्वभाव, रुचि, अभिरुचि तथा व्यक्तित्व के अनेकानेक तत्त्वों की दृष्टि से पर्याप्त अन्तर दृष्टिगोचर होता है। व्यक्ति द्वारा चुने गये व्यवसाय एवं इन वैयक्तिक भिन्नताओं के मध्य समायोजन की दृष्टि से व्यावसायिक निर्देशन आवश्यक है।
  3. व्यक्ति और उसके समाज की दृष्टि से भी व्यवसाय में निर्देशन की जरूरत महसूस की जाती है। व्यक्ति द्वारा चयन किया गया व्यवसाय यदि उसकी वृत्तियों के अनुकूल हो और उसके माध्यम से वह अपना समुचित विकास स्वयं कर सके तो उसका जीवन सुखी हो सकता है। व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति की आजीविका के सम्बन्ध में अभीष्ट सहायता कर उसके हित में कार्य करता है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति का सुख मिलकर ही समूचे समाज को सुखी बनाता है।
  4. मानव संसाधनों का संरक्षण तथा व्यक्तिगत साधनों का समुचित उपयोग व्यावसायिक निर्देशन के बिना सम्भव नहीं है। व्यक्ति का आर्थिक विकास, प्रगति एवं समृद्धि उसके जीवन में प्रसन्नता उत्पन्न करती है= जिसके लिए व्यावसायिक निर्देशन की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।
  5. अनेकानेक व्यवसायों के लिए भिन्न-भिन्न क्षमताओं व योग्यताओं से युक्त व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। व्यावसायिक निर्देशन के माध्यम से किसी विशेष व्यवसाय के लिए विशेष क्षमता व योग्यता वाले उपयुक्त व्यक्तियों का सुगम व प्रभावशाली चयन किया जा सकता है।
  6. समाज गत्यात्मक एवं क्रियाशील है जिसकी परिस्थितियाँ एवं कार्य द्रुत गति से परिवर्तित हो। रहे हैं। नये-नये परिवर्तनों के साथ तालमेल बिठाने के लिए भी व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता पड़ती है। निष्कर्षत: व्यक्तिगत भिन्नता, व्यावसायिक बहुलता, विविध व्यवसायों से सम्बन्धित जानकारी तथा वातावरण के साथ उचित सामंजस्य बनाने के लिए व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता पड़ती।

प्रश्न 6.
कार्य के स्वरूप की दृष्टि से व्यवसायों का एक वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
कार्य के स्वरूप को ध्यान में रखकर व्यवसायों के निम्नलिखित वर्ग या प्रकार निर्धारित किये गये हैं

(i) पढ़ने-लिखने तथा मौलिक विचारों से सम्बन्धित व्यवसाय – इन व्यवसायों में सूक्ष्म बातों की खोज करके नवीन विचारों का प्रतिपादन किया जाता है। साहित्यकार, कवि, निबन्धकार, कथाकार, लेखक, नाटककार, वैज्ञानिक तथा दार्शनिक आदि सभी प्रकार के व्यवसाय इसी कोटि में आते हैं।

(ii) सामाजिक व्यवसाय – इस प्रकार के व्यवसायों में सामाजिक सम्पर्को व सम्बन्धों को आधार बनाया जाता है। डॉक्टर, वकील, नेता, दुकानदार, जीवन बीमा निगम के एजेण्ट आदि सभी के व्यवसाय सामाजिक सम्बन्धों पर आधारित होते हैं।

(iii) कार्यालय से सम्बन्धित व्यवसाय – आय-व्यय का हिसाब रखना, फाइलों को समझना उन पर टिप्पणी लिखना तथा व्यावसायिक-पत्रों के उत्तर देने आदि कार्यों का समावेश इस प्रकार के व्यवसायों में होता है। क्लर्क, मुनीम, कार्यालय अधीक्षक, मैनेजर, एकाउन्टेन्ट आदि इस वर्ग के
व्यवसाय हैं।

(iv) हस्त-कौशल सम्बन्धी व्यवसाय – इन व्यवसायों में विभिन्न यन्त्रों की सहायता से किसी-न-किसी चीज का निर्माण किया जाता है; जैसे-लोहार, मिस्त्री, बढ़ई, चर्मकार, जिल्दसाज, ओवरसियर व इन्जीनियर आदि।

प्रश्न 7.
व्यावसायिक निर्देशन के दृष्टिकोण से बैकमैन द्वारा प्रतिपादित व्यवसायों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
बैकमैन ने व्यक्ति की शिक्षा, बौद्धिक स्तर, प्रशिक्षण तथा सामाजिक सम्मान आदि कारकों को ध्यान में रखते हुए व्यवसायों के निम्नलिखित पाँच वर्गों का उल्लेख किया है –

(i) प्रशासकीय एवं उच्च स्तरीय व्यवसाय – इसके तीन उपवर्ग हैं -(क) भाषा सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे—विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, लेखक, वकील, सम्पादक, जज आदि। (ख) विज्ञान, सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे-डॉक्टर, इन्जीनियर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, ऑडिटर, एकाउण्टेन्ट आदि। (ग) प्रशासकीय व्यवसाय; जैसे—प्रशासक तथा मैनेजर आदि के व्यवसाय।।

(ii) व्यापार एवं मध्यम स्तरीय व्यवसाय-इसके दो उपवर्ग हैं – (क) व्यापार सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे-व्यापारी, विज्ञान के एजेण्ट, दुकानदार आदि। (ख) मध्यम स्तर के व्यवसाय; जैसे-डिजाइनर, अभिनेता, फोटोग्राफर आदि।।

(iii) कुशलतापूर्ण व्यवसाय – इनमें किसी-न-किसी कौशल की आवश्यकता होती है। इसके अन्तर्गत दो प्रकार के कौशल उपवर्ग हैं–(क) शारीरिक कौशल सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे-हँगाई, छपाई, बढ़ईगीरी, दर्जीगिरि, मिस्त्री आदि। (ख) बौद्धिक कौशल सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे-लिपिक, स्टेनोग्राफर, खजांची आदि।

(iv) अर्द्ध-कुशलतापूर्ण व्यवसाय – इनमें कुछ कौशल और कुछ यन्त्रवत् कार्य सम्मिलित हैं; जैसे-गार्ड, कण्डक्टर, पुलिस और ट्रैफिक का सिपाही, कार या ट्रक का ड्राइवर आदि।

(v) निम्न स्तरीय व्यवसाय – इन व्यवसायों में बुद्धि का सबसे कम प्रयोग किया जाता है; जैसे-चपरासी, चौकीदार, कृषि कार्य, रिक्शा-चालक, बोझा ढोना, मिल-मजदूर आदि।

प्रश्न 8.
व्यावसायिक कुशलता और रुचि के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
मनुष्य के जीवन में जीविकोपार्जन की समस्या महत्त्वपूर्ण है। जीविकोपार्जन का प्रत्यक्ष, स्थायी एवं महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध ‘व्यावसायिक कुशलता (Job Efficiency) से है। व्यावसायिक दृष्टि से कुशल व्यक्ति ही अपनी आजीविका कमाने में सफलता प्राप्त करता है। व्यावसायिक कुशलता का रुचि से गहरा सम्बन्ध है। डेवर के अनुसार, “रुचि किसी प्रवृत्ति का क्रियात्मक रूप है।” कार्य में रुचि रहने से कार्य अत्यन्त सरलता से किया जा सकता है, कठिन कार्य भी काफी सरल महसूस होता है। और व्यक्ति का ध्यान (अवधान) सम्बन्धित व्यवसाय में लगा रहता है।

रुचि परिवर्तनशील कही जाती है क्योंकि किसी खास व्यवसाय या कार्य में व्यक्ति की रुचि न होने पर भी बाद में उसकी रुचि पैदा की जा सकती है। यदि व्यक्ति में आवश्यक रुचियों के अंकुर पहले से हों तो वे कार्य से सम्बन्धित अन्य योग्यताओं के साथ मिलकर व्यावसायिक चयन की प्रक्रिया को सहज बना देते हैं। इन परिस्थितियों में यह निर्णय लेना ही श्रेयस्कर होगा कि व्यक्ति को उस व्यवसाय में जाना चाहिए जिसके प्रति पहले से रुचि हो और उसके लिए अन्य आवश्यक गुण भी मौजूद हों। निष्कर्षतः रुचि के कारण व्यावसायिक कुशलता पुष्ट एवं विकसित होती है।

प्रश्न 9.
टिप्पणी लिखिए-व्यावसायिक रुचि प्रपत्र।
उत्तर :
व्यक्ति की रुचि जानने की दृष्टि से क्यूडर द्वारा निर्मित प्रपत्र’ पर आधारित करके इलाहाबाद मनोविज्ञानशाला में व्यावसायिक रुचि प्रपत्र (Vocational Preference Record) विकसित किया गया है, जिसमें समस्त व्यवसायों को दस बड़े रुचि क्षेत्रों में बाँटा गया है। इस सन्दर्भ में, निम्नलिखित तालिका से विभिन्न रुचियों का व्यवसाय से सम्बन्ध ज्ञात होता है –

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 3

प्रश्न 10.
निर्देशन तथा मनोवैज्ञानिक परीक्षण में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन तथा मनोवैज्ञानिक परीक्षण में अन्तर

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 4

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 5

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शैक्षिक निर्देशन तथा व्यावसायिक निर्देशन का सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
शैक्षिक निर्देशन और व्यावसायिक निर्देशन एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। शैक्षिक निर्देशन के बाद व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता होती है, क्योंकि मानव-जीवन की सफलता इसी निर्देशन पर निर्भर करती है। शिक्षा ग्रहण करते समय विद्यार्थी उन्हीं विषयों का चयन करता है, जिनका ज्ञान उसके व्यावसायिक जीवन के लिए आवश्यक होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि शैक्षिक तथा व्यावसायिक निर्देशन की समान उपयोगिता और महत्त्व है।

प्रश्न 2.
वैयक्तिक तथा सामूहिक निर्देशन में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन की विधि के आधार पर किये गये वर्गीकरण के अन्तर्गत निर्देशन के दो वर्ग निर्धारित किये गये हैं, जिन्हें क्रमश: वैयक्तिक निर्देशन तथा सामूहिक निर्देशन कहा जाता है। इन दोनों  में मुख्य अन्तर निम्नलिखित हैं –

  1. वैयक्तिक निर्देशन में एक समय में केवल एक व्यक्ति को निर्देशन प्रदान किया जाता है, जबकि सामूहिक निर्देशन में सम्बन्धित समूह को एक साथ निर्देशन प्रदान किया जाता है।
  2. वैयक्तिक निर्देशन से अधिक लाभ प्राप्त होता है, जबकि सामूहिक निर्देशन से सीमित लाभ की सम्भावना होती हैं।
  3. वैयक्तिक निर्देशन में समय एवं धन अधिक खर्च होता है, जबकि सामूहिक निर्देशन में धन एवं समय कम खर्च होता है।
  4. वैयक्तिक निर्देशन के लिए अधिक संख्या में विशेषज्ञ निर्देशकों की आवश्यकता होती है, जबकि सामूहिक निर्देशन में ऐसा नहीं होता है।

प्रश्न 3.
व्यावसायिक निर्देशन के मुख्य उद्देश्य लिखिए।
उत्तर :
व्यावसायिक निर्देशन स्वयं में उपयोगी एवं आवश्यक प्रक्रिया है। व्यावसायिक निर्देशन का मुख्य उद्देश्य सम्बन्धित व्यक्ति को उसकी योग्यता एवं क्षमता के अनुसार व्यवसाय चुनने में सहायता प्रदान करना है। इसके अतिरिक्त इसका एक अन्य उद्देश्य प्रत्येक कार्य के लिए योग्य व्यक्ति के चुनाव में सहायता प्रदान करना भी है। व्यावसायिक निर्देशन से समाज एवं राष्ट्र की उन्नति एवं प्रगति भी एक उद्देश्य है।

प्रश्न 4.
शैक्षिक निर्देशन से किसी विद्यार्थी को क्या लाभ होता है?
उत्तर :
शैक्षिक निर्देशन केवल विद्यार्थियों के लिए ही आयोजित किया जाता है। शैक्षिक निर्देशन से विद्यार्थियों को पाठ्य-विषयों के चुनाव में सहायता प्राप्त होती है तथा भावी शिक्षा के स्वरूप को निर्धारित करने में सहायता प्राप्त होती है। शैक्षिक निर्देशन प्राप्त करके छात्र विद्यालय के वातावरण में अच्छे ढंग से समायोजित हो जाते हैं। शैक्षिक निर्देशन से छात्र एक हद तक अनुशासित बने रहते हैं, इससे अनेक लाभ होते हैं। शैक्षिक निर्देशन से छात्र-छात्राओं के परीक्षा में सफल होने की दर बढ़ जाती है। इससे अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या घटती है। शैक्षिक निर्देशन छात्रों को जीविका-उपार्जन के क्षेत्र में भी सहायता प्रदान करता है।

प्रश्न 5.
शैक्षिक निर्देशन की किन्हीं दो आवश्यकताओं के बारे में लिखिए।
उत्तर :

  1. विद्यालय के वातावरण में समायोजित होने के लिए शैक्षिक निर्देशन की आवश्यकता होती है।
  2. पाठ्य-विषयों के चुनाव तथा भावी जीवन के विषय में निर्णय लेने के लिए निर्देशन की आवश्यकता है।

प्रश्न 6.
व्यक्तिगत निर्देशन की आवश्यकता क्यों पड़ती है ?
उत्तर :
निर्देशन के दो स्वरूप सम्भव हैं – सामूहिक निर्देशन तथा व्यक्तिगत निर्देशन। किसी व्यक्ति की गम्भीर, जटिल एवं विशिष्ट प्रकार की समस्या के उपयुक्त समाधान प्राप्त करने के लिए या निवारण के लिए व्यक्तिगत निर्देशन की आवश्यकता है। व्यक्तिगत निर्देशन में गहनता पर बल दिया जाता है। निर्देशन के इस स्वरूप के अन्तर्गत सम्बन्धित समस्या का विस्तृत विश्लेषण किया जाता है। तथा समस्या का सर्वोत्तम हल खोजा जाता है।

प्रश्न 7.
रुचियों के आधार पर किये गये व्यवसायों के वर्गीकरण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
व्यवसायों को एक वर्गीकरण व्यक्तियों की रुचियों के आधार पर भी किया गया है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत किया गया व्यवसायों का वर्गीकरण इस प्रकार है-

  1. यान्त्रिक व्यवसाय
  2. गणनात्मक व्यवसाय
  3. बाह्य जीवन से सम्बन्धी व्यवसाय
  4. वैज्ञानिक व्यवसाय
  5. कलात्मक व्यवसाय
  6. प्रभावात्मक व्यवसाय
  7. साहित्यिक व्यवसाय
  8. संगीतात्मक व्यवसाय
  9. समाज सेवी सम्बन्धी व्यवसाय तथा
  10. लिपिक सम्बन्धी व्यवसाय।

प्रश्न 8.
व्यक्तिगत निर्देशन के लिए तथ्य-संग्रह के साधनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
व्यक्तिगत निर्देशन के लिए सम्बन्धित व्यक्ति के जीवन से सम्बन्धित विस्तृत जानकारी आवश्यक है। इसके लिए तथ्यों को विभिन्न साधनों से एकत्र किया जाता है। इस प्रकार के मुख्य साधन हैं –

  1. निरीक्षण
  2. प्रश्नावली
  3. साक्षात्कार
  4. डॉक्टरी जाँच
  5. जीवन-वृत्त
  6. सामूहिक अभिलेख
  7. बुद्धि, मानसिक योग्यताओं, अभिरुचि तथा रुचि सम्बन्धी परीक्षण
  8. विद्यालय का संचित आलेख
  9. सामान्य सेवाओं के औपचारिक आलेख; जैसे-जन्म-मृत्यु लेखा, अस्पतालों के आलेख, न्यायालय व सामाजिक एवं अन्वेषणात्मक क्रियाएँ।

प्रश्न 9.
निर्देश की प्रक्रिया के अन्तर्गत तैयार किये गये परिपाश्र्व-चित्र की रूपरेखा का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत विभिन्न स्रोतों एवं उपायों द्वारा आवश्यक तथ्यों को अर्जित किया जाता है तथा निर्देशन को अधिक उपयोग बनाने के लिए परिपार्श्व-चित्र तैयार किया जाता है। इस प्रकार परिपार्श्व-चित्र की रूपरेखा के अन्तर्गत अपनाये गये तथ्य इस प्रकार होते हैं-

  1. शारीरिक विवरण
  2. पारिवारिक विवरण
  3. पात्र के सामाजिक विकास का इतिहास
  4. विद्यालयी जीवन का इतिहास
  5. मानसिक योग्यताएँ तथा
  6. व्यक्तित्व के गुण।

प्रश्न 10.
अनुवर्ती अनुशीलन की विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन की प्रक्रिया में अनुवर्ती अनुशीलन का विशेष महत्त्व होता है। अनुवर्ती अनुशीलन द्वारा ही निर्देशन की सफलता/असफलता की जानकारी प्राप्त होती है। अनुवर्ती अनुशीलन के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियाँ हैं –

  1. परामर्श प्राप्त करने वाले व्यक्ति से पत्रों द्वारा सम्पर्क स्थापित करना
  2. व्यक्ति को सरल एवं स्पष्ट भाषा में तैयार की गयी प्रश्नावली भेजना
  3. व्यक्ति के सम्बन्ध में एक कार्ड-फाइल बनाना तथा
  4. टेलीफोन के माध्यम से विचार-विनिमय करना।

प्रश्न 11.
मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश निर्मित/संशोधित मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश द्वारा निर्मित/संशोधित मुख्य मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का विवरण निम्नलिखित है –

  1. शाब्दिक सामूहिक परीक्षण (वर्ष 12 +, 13+, 14 +, तथा वयस्कों के लिए-चार)।
  2. अशाब्दिक सामूहिक परीक्षण–पाँच।
  3. व्यक्तित्व परीक्षण (WAT, TAT’ एवं Rorscharch)-तीन।
  4. व्यक्तित्व पत्री।
  5. स्टैनफोर्ड बुद्धि परीक्षण का भारतीयकरण।
  6. उपलब्धि परीक्षण हिन्दी में (कक्षा 8 व कक्षा 10 के लिए)।
  7. व्यावसायिक रुचि प्रपत्र।
  8. यान्त्रिक अभिरुचि परीक्षण–एक।
  9. ट्वीजर यथार्थता व स्थिर परीक्षण–एक।
  10. डेटरॉय शारीरिक सामर्थ्य परीक्षण–तीन (अनुकूलित)

नवीन परीक्षण ये हैं – (1) सोहनलाल बुद्धि परीक्षण (11 + के लिए), (2) भाटिया बैट्री क्रियात्मक बुद्धि परीक्षण, (3) शाब्दिक सामूहिक बुद्धि परीक्षण (कक्षा 8 के लिए) तथा (4) गणित व अंग्रेजी में सामूहिक उपलब्धि परीक्षण।

प्रश्न 12.
उत्तर प्रदेश में गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा होने वाले निर्देशन कार्य का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
उत्तर प्रदेश में सरकारी संस्थाओं के अतिरिक्त अन्य विभागों, गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा भी निर्देशन किया जाता है। प्रदेश में श्रम विभाग की तरफ से लखनऊ, इलाहाबाद, आगरा, मेरठ तथा कानपुर में रोजगार कार्यालयों के अन्तर्गत व्यावसायिक निर्देशन विभाग स्थापित किये गये हैं जिनके द्वारा प्रतिवर्ष हजारों बालक-बालिकाओं को व्यावसायिक परामर्श प्रदान किया जाता है। राज्य के समाज कल्याण विभाग की ओर से आगरा व बनारस में शिशु निर्देशन केन्द्र कार्य कर रहे हैं जिनमें शिशुओं को निर्देशन दिया जाता है। व्यावसायिक निर्देशन कार्य में समन्वय स्थापित करने की दृष्टि से प्रान्तीय समन्वय समिति तथा युवक सेवायोजन सलाहकार समिति का निर्माण किया गया है। इसके अतिरिक्त, लखनऊ विश्वविद्यालय तथा बी० आर० कॉलेज, आगरा में भी मनोवैज्ञानिक निर्देशन एवं परामर्श के साथ मनोवैज्ञानिक परीक्षा तथा अनुसन्धान सम्बन्धी कार्य किया जाता है। इस भाँति, उत्तर प्रदेश में शैक्षिक व्यावसायिक निर्देशन का कार्य राज्य, मण्डल तथा विद्यालयी स्तर से लेकर केन्द्र तक विस्तृत है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखितं वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. किसी व्यक्ति की समस्या के समाधान में सहायता प्रदान करने की प्रक्रिया को मनोविज्ञान की भाषा में …………………. कहते हैं।
  2. निर्देशन मूल रूप में सामाजिक सम्पर्क पर आधारित एक …………………. प्रक्रिया है।
  3. शैक्षिक वातावरण से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन …………………. कहलाता है।
  4. कभी-कभी माता-पिता की उच्च …………………. बालक को अनुपयुक्त पाठ्यक्रम चुनने के लिए प्रोत्साहित करती है।
  5. व्यवसाय वरण अथवा व्यवसाय सम्बन्धी समस्या के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन …………………. कहलाता है।
  6. व्यक्ति की जटिल समायोजन सम्बन्धी के समाधान के लिए दिए जाने वाले निर्देशन की …………………. निर्देशन कहते हैं।
  7. व्यक्ति के व्यक्तिगत अथवा पारिवारिक जीवन से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान के लिए दिये जाने वाले निर्देशन को …………………. कहते हैं।
  8. एक समय में केवल एक व्यक्ति को निर्देशन प्रदान करने वाली निर्देशन-प्रक्रिया को …………………. कहते हैं।
  9. एक समय में अनेक व्यक्तियों को किसी समान समस्या के समाधान के लिए दिये जाने वाले निर्देशन को …………………. कहते हैं।
  10. शैक्षिक निर्देशन तथा व्यावसायिक निर्देशन …………………. है।
  11. उत्तम निर्देशन के लिए व्यक्ति का मनोवैज्ञानिक परीक्षण …………………. होता है।
  12. उत्तम शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया में व्यक्ति का …………………. परीक्षण सहायक होता है।
  13. उत्तम व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया में व्यक्ति का …………………. परीक्षण सहायक लेता है।
  14. निर्देशन प्रक्रिया में निर्देशन के परिणामों को जानने के अन्तिम चरण को …………………. कहते हैं।
  15. …………………. में स्थित मनोविज्ञानशाला इस प्रदेश की निर्देशन सेवाओं का संचालन करती है।
  16. इस प्रदेश में मनोवैज्ञानिक निर्देशन और परामर्श प्रदान करने वाली प्रमुख राजकीय संस्था का नाम …………………. है।

उत्तर :

  1. निर्देशन
  2. मनोवैज्ञानिक
  3. शैक्षिक निर्देशन
  4. आकांक्षा
  5. व्यावसायिक निर्देशन
  6. व्यक्तिगत
  7. व्यक्तिगत निर्देशन
  8. वैयक्तिक निर्देशन
  9. सामूहिक निर्देशन
  10. परस्पर पूरक
  11. आवश्यक
  12. बौद्धिक
  13. अभिरुचि
  14. अनुवर्ती अनुशीलन
  15. इलाहाबाद।
  16. मनोविज्ञानशाला।

प्रश्न II.
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
निर्देशन से क्या आशय है?
उत्तर :
किसी भी व्यक्ति को किसी भी समस्या के समाधान के लिए किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दी जाने वाली सहायता को निर्देशन कहते हैं।

प्रश्न 2.
निर्देशन की एक सरल एवं स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
जोन्स के अनुसार, “निर्देशन एक ऐसी व्यक्तिगत सहायता है जो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को, जीवन के लक्ष्यों को विकसित करने व समायोजन करने और लक्ष्यों की प्राप्ति में आयी हुई समस्याओं को हल करने के लिए प्रदान की जाती है।”

प्रश्न 3.
निर्देशन का कार्य सामान्य रूप से किस क्षेत्र के विद्वानों को सौंपा जाता है?
उत्तर :
निर्देशन का कार्य सामान्य रूप से मनोविज्ञान के क्षेत्र के विद्वानों को सौंपा जाता

प्रश्न 4.
क्या निर्देशक सम्बन्धित व्यक्ति की समस्या को स्वयं सुलझाता है तथा उसका आवश्यक कार्य करता है?
उत्तर :
नहीं, निर्देशक न तो सम्बन्धित व्यक्ति की समस्या को स्वयं सुलझाता है और न ही उसका कोई आवश्यक कार्य करता है।

प्रश्न 5.
निर्देशन की आवश्यकता किस व्यक्ति को होती है?
उत्तर :
प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में कभी-न-कभी अनिवार्य रूप से निर्देशन की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6.
सामान्य वर्गीकरण के अन्तर्गत निर्देशन के कौन-कौन से प्रकार सम्मिलित किये जाते हैं?
उत्तर :
सामान्य वर्गीकरण के अन्तर्गत

  1. शैक्षिक निर्देशन
  2. व्यावसायिक निर्देशन तथा
  3. व्यक्तिगत निर्देशन को सम्मिलित किया जाता है।

प्रश्न 7.
निर्देशन-विधि के आधार पर निर्देशन के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन-विधि के आधार पर निर्देशन के दो प्रकार होते हैं –

  1. वैयक्तिक निर्देशन तथा
  2. सामूहिक निर्देशन।

प्रश्न 8.
शैक्षिक निर्देशन की रुथ स्ट्रांग द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
रुथ स्ट्रांग के अनुसार, “व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने का मुख्य लक्ष्य उसे समुचित कार्यक्रम के चुनाव तथा उसमें प्रगति करने में सहायता प्रदान करता है।”

प्रश्न 9.
उत्तम शैक्षिक निर्देशन के लिए बालक के सम्बन्ध में कौन-कौन सी जानकारी प्राप्त करना आवश्यक होता है?
उत्तर :

  1. बौद्धिक स्तर
  2. शैक्षिक सम्प्राप्ति
  3. मानसिक योग्यताएँ
  4. विशिष्ट मानसिक योग्यता एवं अभिरुचियाँ
  5. रुचियाँ
  6. व्यक्तित्व की विशेषताएँ
  7. शारीरिक दशा तथा
  8. पारिवारिक स्थिति।

प्रश्न 10.
व्यावसायिक निर्देशन की क्रो एवं क्रो द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
क्रो एवं क्रो के अनुसार, “व्यावसायिक निर्देशन की व्याख्या सामान्यतः उस सहायता के रूप में की जाती है, जो विद्यार्थियों को किसी व्यवसाय को चुनने, उसके लिए तैयारी करने तथा उसमें उन्नति प्राप्त करने के लिए दी जाती है।”

प्रश्न 11.
व्यावसायिक सूचना के मुख्य स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. समाचार पत्र-पत्रिकाएँ
  2. रोजगार पत्रिकाएँ
  3. सरकारी सूचनाएँ
  4. रोजगार कार्यालय
  5. वार्ताएँ
  6. औद्योगिक संस्थानों की विज्ञप्ति।

प्रश्न 12.
व्यक्तिगत निर्देशन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर :
व्यक्तिगत निर्देशन से अभिप्राय किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत सहायता देने वाली उस विशिष्ट प्रक्रिया से है जिसके माध्यम से वह अपनी व्यक्तित्व सम्बन्धी समस्याओं के मौलिक कारणों को समझता है तथा उनके निराकरण का प्रयत्न करता है।

प्रश्न 13.
क्रो एवं क्रो द्वारा प्रतिपादित व्यक्तिगत निर्देशन की परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
क्रों एवं क्रो के अनुसार, “व्यक्तिगत निर्देशन वह सहायता है जो किसी व्यक्ति के जीवन के समस्त क्षेत्रों में, रवैयों और व्यवहार के विकास में ठीक तालमेल बैठाने हेतु दी जाती है।”

प्रश्न 14.
व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया के प्रमुख चरणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. तथ्यों का संग्रह
  2. समस्या का निदान
  3. फलानुमान
  4. समस्या का उपचार तथा
  5. अनुवर्ती अनुशीलन।

प्रश्न 15.
उत्तर प्रदेश में राज्य स्तर पर निर्देशन सेवाओं का संचालन किस केन्द्र द्वारा होता है?
उत्तर :
उत्तर प्रदेश में राज्य स्तर पर निर्देशन सेवाओं का संचालन मनोविज्ञानशाला उ० प्र०, इलाहाबाद के द्वारा होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
किसी व्यक्ति की किसी समस्या के समाधान के लिए किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दी जाने वाली सहायता को कहते हैं –
(क) व्यक्तिगत सहायता
(ख) निर्देशन
(ग) आवश्यक सहायता
(घ) अनावश्यक हस्तक्षेप

प्रश्न 2.
“निर्देशन एक प्रक्रिया है जो कि नवयुवकों को स्वयं अपने से, दूसरे से तथा परिस्थितियों से समायोजन करना सिखाती है।” यह परिभाषा प्रतिपादित की है
(क) स्किनर
(ख) जोन्स
(ग) मॉरिस
(घ) हसबैण्ड

प्रश्न 3.
निर्देशन को आवश्यक एवं उपयोगी माना जाता है –
(क) सुचारु बाल-विकास के लिए।
(ख) शैक्षिक एवं व्यावसायिक समस्याओं के निराकरण के लिए
(ग) व्यक्तित्व के सामान्य विकास के लिए।
(घ) उपर्युक्त सभी के लिए।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन निर्देशन प्रक्रिया की विशेषता नहीं है?
(क) निर्देशन एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है
(ख) निर्देशन समायोजन स्थापित करने की प्रक्रिया है
(ग) निर्देशन समस्या समाधान की प्रक्रिया है।
(घ) निर्देशन केवल बच्चों को सहायता पहुँचाने की प्रक्रिया है।

प्रश्न 5.
स्कूल अथवा कॉलेज में छात्र-छात्राओं की समस्याओं के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन कहलाता है –
(क) आवश्यक निर्देशन
(ख) अनावश्यक निर्देशन
(ग) व्यावसायिक निर्देशन
(घ) शैक्षिक निर्देशन

प्रश्न 6.
पाठ्य विषयों के चुनाव सम्बन्धी समस्या के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन कहलाता है
(क) सामाजिक निर्देशन
(ख) व्यक्तिगत निर्देशन
(ग) शैक्षिक निर्देशन
(घ) व्यावसायिक निर्देशन

प्रश्न 7.
शैक्षिक सफलता में सहायता पहुँचाने के लिए दिया जाना वाला निर्देशन कहलाता है
(क) सामाजिक निर्देशन
(ख) व्यक्तिगत निर्देशन
(ग) शैक्षिक निर्देशन
(घ) व्यावसायिक निर्देशन

प्रश्न 8.
अनुकूल व्यवसाय के वरण के लिए दिया जाने वाला निर्देशन कहलाता है
(क) महत्त्वपूर्ण निर्देशन
(ख) अनावश्यक निर्देशन
(ग) शैक्षिक निर्देशन
(घ) व्यावसायिक निर्देशन

प्रश्न 9.
वैयक्तिकनिर्देशन के विषय में सत्य है
(क) इसके परिणाम अच्छे नहीं होते।
(ख) इसमें कम समय तथा कम धन खर्च होता है।
(ग) इसके परिणाम उत्तम होते हैं, परन्तु इसमें धन एवं समये अधिक खर्च होता है।
(घ) यह अनावश्यक एवं व्यर्थ है।

प्रश्न 10.
किन परिस्थितियों में सामूहिक निर्देशन उपयोगी होता है
(क) सम्बन्धित व्यक्तियों की समस्याएँ नितान्त भिन्न-भिन्न हों
(ख) समस्याएँ अति गम्भीर हो
(ग) सम्बन्धित व्यक्तियों की समस्या सामान्य हो तथा अधिक गम्भीर न हो
(घ) उपर्युक्त सभी स्थितियों में

प्रश्न 11.
जो वार्ताएँ विद्यार्थियों को स्वयं अपनी आवश्यकताओं, क्षमताओं, उद्देश्यों व रुचियों आदि के विषय में सोचने-समझने हेतु प्रेरित व उत्साहित करती हैं, निर्देशन के क्षेत्र में उन्हें क्या कहा जाता है?
(क) निर्देशन वार्ताएँ
(ख) अनुगामी वार्ताएँ।
(ग) अनुस्थापन वार्ताएँ
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 12.
प्रखर बौद्धिक क्षमता से युक्त और सम्बन्धित कौन-सा व्यवसाय उपयुक्त कहा जाएगा?
(क) उच्च न्यायालय का जज
(ख) व्यापार संचालक
(ग) समाज-सुधारक
(घ) ड्राफ्टमैन

प्रश्न 13.
व्यावसायिक निर्देशन लाभदायक एवं उपयोगी है, क्योंकि –
(क) इसके माध्यम से व्यक्ति को अपनी रुचि एवं योग्यता के अनुसार व्यवसाय उपलब्ध हो जाता है।
(ख) सभी औद्योगिक-व्यावसायिक संस्थानों को योग्य एवं कुशल कर्मचारी मिल जाते हैं
(ग) उत्पादन की गुणवत्ता तथा दर में वृद्धि होती है।
(घ) उपर्युक्त सभी लाभ एवं उपयोगिताएँ।

प्रश्न 14.
व्यावसायिक निर्देशन देने के लिए व्यक्ति के विषय में जानकारी के साथ-साथ निम्नलिखित में से किसकी जानकारी आवश्यक होती है –
(क) व्यक्ति की शिक्षा का स्तर
(ख) व्यक्तित्व के गुण
(ग) व्यवसाय जगत
(घ) प्रयोग विधि।

प्रश्न 15.
शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने में सहायक सिद्ध होता है –
(क) अभिरुचि परीक्षण
(ख) व्यक्तित्व परीक्षण
(ग) बौद्धिक परीक्षण
(घ) ये सभी परीक्षण

प्रश्न 16.
व्यक्ति की संवेगात्मक, धार्मिक, नैतिक एवं शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन कहलाता है
(क) शैक्षिक निर्देशन
(ख) व्यावसायिक निर्देशन
(ग) व्यक्तिगत निर्देशन
(घ) महत्त्वपूर्ण निर्देशन

प्रश्न 17.
व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान हेतु दिया जाने वाला निर्देशन है –
(क) शैक्षिक निर्देशन
(ख) सामाजिक निर्देशन
(ग) व्यावसायिक निर्देशन
(घ) व्यक्तिगत निर्देशन

प्रश्न 18.
विद्यार्थियों को निर्देशन और परामर्श देने हेतु इलाहाबाद में मनोविज्ञानशाला की स्थापना की गई थी
(क) सन् 1935 में
(ख) सन् 1947 में
(ग) सन् 1953 में
(घ) सन् 1966 में

प्रश्न 19.
मनोविज्ञानशाला द्वारा किये जाने वाले कार्य हैं –
(क) निर्देशने कार्य
(ख) प्रशिक्षण कार्य
(ग) अनुसन्धान एवं प्रकाशन कार्य
(घ) ये सभी कार्य

प्रश्न 20.
विद्यालय स्तर पर निर्देशक के कार्य हैं –
(क) निर्देशन कार्य
(ख) शिक्षण कार्य
(ग) अनुसन्धान में सहायता
(घ) ये सभी कार्य

उत्तर :

  1. (ख) निर्देशन
  2. (क) स्किनर
  3. (घ) उपर्युक्त सभी के लिए
  4. (घ) निर्देशन केवल बच्चों को सहायता पहुँचाने की प्रक्रिया है
  5. (घ) शैक्षिक निर्देशन
  6. (ग) शैक्षिक निर्देशन
  7. (ग) शैक्षिक निर्देशन
  8. (घ) व्यावसायिक निर्देशन
  9. (ग) इसके परिणाम उत्तम होते हैं, परन्तु इसमें धन एवं समय अधिक खर्च होता है
  10. (ग) सम्बन्धित व्यक्तियों की समस्या सामान्य हो तथा अधिक गम्भीर में हो
  11. (ग) अनुस्थापन वार्ताएँ
  12. (क) उच्च न्यायालय का जज
  13. (घ) उपर्युक्त सभी लाभ एवं उपयोगिताएँ
  14. (ग) व्यवसाय जगत
  15. (ग) बौद्धिक परीक्षण
  16. (ग) व्यक्तिगत निर्देशन
  17. (घ) व्यक्तिगत निर्देशन
  18. (ख) 1947 में
  19. (घ) ये सभी कार्य
  20. (घ) ये सभी कार्य।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 4 Emotional Bases of Behaviour

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 4 Emotional Bases of Behaviour (व्यवहार के संवेगात्मक आधार) are part of UP Board Solutions for Class 11 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 4 Emotional Bases of Behaviour (व्यवहार के संवेगात्मक आधार).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 4
Chapter Name Emotional Bases of Behaviour
(व्यवहार के संवेगात्मक आधार)
Number of Questions Solved 51
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 4 Emotional Bases of Behaviour (व्यवहार के संवेगात्मक आधार)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संवेग (Emotion) से आप क्या समझते हैं? संवेगों की सामान्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
संवेग का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। संवेग की मुख्य विशेषताएँ भी बताइए।
या
संवेग को परिभाषित कीजिए।

उत्तर :

संवेग का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Emotion)

‘संवेग’ अंग्रेजी भाषा के शब्द Emotion का हिन्दी रूपान्तर है, जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द Emovere (इमोवेयर) से हुई है। इमोवेयर का शाब्दिक अर्थ है–‘हिला देना, क्रियाशील बना देना या उत्तेजित कर देना। इसका अभिप्राय यह है कि शारीरिक प्रेरणाओं के समान ही संवेग मनुष्य को हिला देते हैं, क्रियाशील बना देते हैं अथवा उसे उत्तेजित कर देते हैं। यह उत्तेजना उसके कार्यों और व्यवहारों को प्रभावित करती है।

संवेग एक जटिल, भावात्मक और मानसिक प्रक्रिया है। जब भाव का प्रकटीकरण बाहरी तथा आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों में हो जाता है, तब यह संवेग कहलाता है। । विभिन्न मनोवैज्ञानिकों द्वारा संवेग को भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषित किया गया है। प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) गेलडार्ड के मतानुसार, “संवेग क्रियाओं को उत्तेजक होता है। प्रस्तुत कथन द्वारा स्पष्ट होता है कि संवेग से व्यक्ति की क्रियाओं में गति आती है।

(2) आर्थर टी० जर्सील्ड के अनुसार, “संवेग शब्द किसी भी प्रकार के आवेग में आने, भड़क उठने या उत्तेजित होने की दशा को सूचित करता है।” प्रस्तुत परिभाषा में संवेगावस्था के मुख्य लक्षणों का उल्लेख किया गया है।

(3) इंगलिश तथ इंगलिश के अनुसार, “संवेग एक जटिल भावात्मक अवस्था है जिसमें कुछ विशेष शारीरिक तथा ग्रन्थीय क्रियाएँ होती हैं। प्रस्तुत कथन द्वारा स्पष्ट होता है कि संवेगों में भावात्मक तत्त्व की प्रधानता होती है तथा इनके परिणामस्वरूप कुछ क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं।

(4) वुडवर्थ के मतानुसार, “प्रत्येक संवेग एक अनुभूति होता है तथा साथ ही प्रत्येक संवेग उसी समय एक गत्यात्मक तत्परता होता है।”

(5) पी० टी० यंग के कथनानुसार, “संवेग सम्पूर्ण व्यक्ति का तीव्र उपद्रव है, जिसकी उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक कारणों से होती है तथा जिसके अन्तर्गत व्यवहार चेतन अनुभूति तथा जाठरिक क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं।” प्रस्तुत कथन द्वारा स्पष्ट होता है कि संवेगों की उत्पत्ति सदैव मनोवैज्ञानिक कारकों से होती है तथा इनकी परिणति व्यवहार, अनुभवों तथा जाठरिक क्रियाओं में होती हैं।

इन परिभाषाओं के अध्ययन के उपरान्त हमें संवेग से सम्बन्धित जिन तत्त्वों का ज्ञान होता है, वे इस प्रकार हैं–एक विशिष्ट परिस्थिति उत्पन्न होती है—मनुष्य इस परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण करते हैं–परिस्थिति के प्रति अनुक्रिया के कारण मनुष्य में उत्तेजना का जन्म होता है—मनुष्य सचेतन रूप से उत्तेजना का अनुभव करता है और अन्ततः–मनुष्य का संवेगात्मक व्यवहार अभिव्यक्त होता है।

संवेगों की विशेषताएँ
(Characteristics of Emotions)

संवेगों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) मनोवैज्ञानिक कारणों से उत्पन्न – संवेग की उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक कारणों से होती है। उदाहरण के लिए, बच्चा अचानक किसी अजीब-सी चीज को देखकर भयभीत हो जाता है। वह इसलिए भयभीत हुआ क्योंकि उसने उस अजीब चीज को अचानक देखा। यदि बच्चा उस वस्तु को देखने का अभ्यस्त होता या उसे ऐसी किसी वस्तु के पहले से दिखाई पड़ने की सम्भावना रहती और वह उसे अपने लिए खतरनाक न समझता तो भय का संवैग उत्पन्न ही नहीं होता। स्पष्टतः यदि मनोवैज्ञानिक कारण पर्याप्त रूप में विद्यमान नहीं हैं तो संवेग उत्पन्न नहीं होगा। वास्तव में, पर्याप्त मनोवैज्ञानिक कारणों के अभाव में संवेगों की उत्पत्ति कदापि नहीं हो सकती। कुछ विद्वान मानते हैं कि मादक द्रव्यों के सेवन के उपरान्त भी संवेगों की अनुभूति हो सकती है, परन्तु यह धारणा न तो उचित है। और न ही मान्य है। मादक द्रव्यों के प्रभाव से व्यक्ति की मनोदशा अस्त-व्यस्त हो जाती है, परन्तु वह संवेगावस्था नहीं होती।

(2) यकायक एवं तीव्र उपद्रव – संवेग मनोवैज्ञानिक कारणों से यकायक उत्पन्न होने वाला सम्पूर्ण जीव के सापेक्ष एक तीव्र उपद्रव है। यह यकायक उत्पन्न होता है और कुछ क्षणों के उपरान्त लुप्त हो जाता है। यद्यपि संवेग तीव्रता लिये होता है, किन्तु सभी संवेग तीव्र नहीं होते। कभी-कभी संवेग की अवस्था में व्यक्ति कुछ भी कर पाने में असमर्थ रहता है और निष्क्रिय-सा हो जाता है। अत: कहा जा सकता है कि संवेग अन्य मानसिक प्रक्रियाओं; यथा–भाव, स्थिति (मूड) आदि की अपेक्षा अधिक तीव्र होते हैं।

(3) सार्वभौमिकता – संवेग सार्वभौमिक हैं अर्थात् ये हर एक प्राणी में पाये जाते हैं। मनुष्य को शिशु, बाल, किशोर, प्रौढ़ तथा वृद्ध प्रत्येक अवस्था में संवेग दिखाई पड़ते हैं। पशुओं में भी संवेग दृष्टिगोचर होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति में इनकी प्रबलता एकसमान नहीं होती, यह बदल जाती है; जैसे—बालक एवं कम पढ़े-लिखे लोगों में संवेगों की अभिव्यक्ति स्वतन्त्र रूप से तथा अत्यन्त तीव्र रूप में दिखाई पड़ती है तो वृद्ध एवं पढ़े-लिखे लोगों में यह अभिव्यक्ति नियन्त्रित तथा अपेक्षाकृत कम तीव्रता लिये होती है।

(4) शारीरिक परिवर्तन – संवेग की अवस्था में व्यक्ति के शरीर में मुख्यतया दो प्रकार के परिवर्तन उत्पन्न होते हैं-आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन एवं बाह्य शारीरिक परिवर्तन। हृदय की धड़कन तथा रक्तचाप में परिवर्तन, श्वसन क्रिया की तीव्रता, अन्त:स्रावी ग्रन्थियों से हॉर्मोन्स का निकलना और पाचन-क्रिया का धीमा पड़ना या रुक जाना आदि आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन हैं। संवेग की दशा में कुछ बाह्य शारीरिक परिवर्तन भी होते हैं; यथा-चेहरे की रेखाओं तथा शारीरिक आसनों में परिवर्तन, शरीर काँपना, स्वर बदल जाना, पसीना निकलना, नेत्रों का लाल हो जाना तथा शरीर का रोमांचित हो उठना आदि विभिन्न क्रियाएँ।।

(5) व्यक्तिगत विभेद – संवेग की अभिव्यक्ति में व्यक्तिगत विभेद पाये जाते हैं। संवेगात्मक संरचना तथा प्रकटीकरण सम्बन्धी विशिष्टता के कारण हर एक व्यक्ति संवेग की अभिव्यक्ति अपने अलग ढंग से करता है। वातावरण का एक ही उत्तेजक विभिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न संवेग उत्पन्न कर देता है। उदाहरणतः, केले के छिलके से फिसलकर गिरते व्यक्ति को देखकर किसी के मन में सहानुभूति पैदा होती है तो किसी में दया और कोई उसे देखकर हँस पड़ता है। उत्तेजक एक है जबकि प्रतिक्रियाएँ विभिन्न हैं।

(6) स्थानान्तरण – संवेगों की विशेषता स्थानान्तरण भी है। ये एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में स्थानान्तरित हो जाते हैं। संवेग की अवस्था में संवेग की अभिव्यक्ति के समय जो भी व्यक्ति मौजूद होते हैं, उनमें से किसी भी व्यक्ति में संवेगात्मक क्रिया स्थानान्तरित हो सकती है। उदाहरण के लिए-एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के प्रति अपना क्रोध प्रकट कर रहा है और इसी दौरान एक अन्य व्यक्ति भी उपस्थित हो जाए तो वह भी क्रोध को भागी बन सकता है।

(7) अस्थिर एवं परिवर्तनशील – संवेग की अवस्था अस्थिर एवं परिवर्तनशील होती है। यह अधिक समय तक नहीं रहती। जैसे ही वातावरण का कोई उत्तेजक संवेग की दशा उत्पन्न करता है और उससे सम्बन्धित क्रिया समाप्त होती है, वैसे ही उसका स्वरूप भी बदल जाता है। इसके अलावा, एक उत्तेजक द्वारा उत्पन्न संवेग उस समय समाप्त हो जाता है जब दूसरे उत्तेजक द्वारा किसी अन्य प्रकार के संवेग की उत्पत्ति होती है। स्पष्टतः संवेगावस्था में चंचलता का गुण विद्यमान है।

(8) स्थायित्व – चंचल प्रवृत्ति के बावजूद भी संवेगों में कुछ-न-कुछ स्थायित्व अवश्य रहता , है। संवेग की मुख्य अवस्था समाप्त होने के बाद व्यक्ति की अवशिष्ट मनोदशा इस संवेग के स्थायित्वं की परिचायक है। उदाहरणार्थ-महान् शोक से पीड़ित व्यक्ति शोक की तीव्र परिस्थिति से उबरकर भी कुछ समय तक मायूस पाया जाता है।

(9) विचार-शक्ति का लोप – संवेगावस्था में भावात्मक पहलू की प्रबलता तथा तीव्र शारीरिक हलचल के कारण विचार-शक्ति क्षीण पड़ जाती है अथवा इसका लोप हो जाता है। यही कारण है कि संवेग के वशीभूत व्यक्ति कभी-कभी ऐसा काम कर देता है जिसके लिए बाद में उसे गहरा प्रायश्चित करना पड़ता है।

(10) सुख-दुःख की अनुभूतियाँ – विभिन्न प्रकार के संवेगों में से कुछ सुख उत्पन्न करते हैं। तो कुछ दु:ख। प्रेम का संवेग सुख उत्पन्न करता है, जबकि भय को संवेग दुःख उत्पन्न करता है।

(11) क्रियात्मक पक्ष – भावात्मक पक्ष के अतिरिक्त संवेग का एक क्रियात्मक पक्ष भी है। संवेगावस्था में क्रियात्मक पक्ष की क्रियाशीलता के कारण व्यक्ति कोई-न-कोई काम करने के लिए विवश एवं तत्पर हो जाता है।

(12) मूल प्रवृत्तियों से सम्बन्ध – संवेग का सम्बन्ध मूल प्रवृत्ति से है। मूल प्रवृत्ति द्वारा अपनी सन्तुष्टि की आवश्यकता उत्पन्न होने पर या सन्तुष्टि में अवरोध पैदा होने पर संवेग का प्रकटीकरण होता

संवेग की उपर्युक्त विशेषताओं के अध्ययन से जहाँ एक ओर संवेग का अर्थ अधिक स्पष्ट होता है, वहीं दूसरी ओर, संवेग के स्वरूप का एक विस्तृत चित्र भी उभरकर सामने आता है।

प्रश्न 2.
भाव अथवा अनुभूति (Feeling) तथा संवेग (Emotion) की समानताओं तथा भिन्नताओं का उल्लेख कीजिए।
या
भाव तथा संवेग में पाये जाने वाले अन्तरों का विस्तार से विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर :

भाव और संवेग में अन्तर
(Difference between Feeling and Emotion)

मानव-मन के तीन प्रमुख पक्ष हैं : ज्ञानात्मक, भावात्मक एवं क्रियात्मक। मन के भावात्मक पक्ष से सम्बन्धित एक प्रारम्भिक सरल मानसिक प्रक्रिया भाव है जो प्राणी को सुख या दु:ख का अनुभव कराती है। मन के चेष्टात्मक अथवा इच्छात्मक और ज्ञानात्मक, इन दो पक्षों के माध्यम से भाव का अनुभव होता है। इसी को हम ‘अनुभूति’ (Feeling) भी कहते हैं जिसे मन की चेतनावस्था में अनुभव किया जाता है। उदाहरण के लिए प्रसन्नता, सन्तोष, करुणा, चिन्ता, उल्लास तथा आश्चर्य आदि भाव या अनुभूतियाँ हैं। भाव और संवेग कुछ बिन्दुओं पर समानताएँ रखते हैं तो कुछ बिन्दुओं पर एक-दूसरे से भिन्नताएँ। ये समानताएँ और भिन्नताएँ निम्न प्रकार हैं –

समानताएँ – भाव और संवेग के मध्य गहरा सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध की घनिष्ठता इतनी अधिक है कि कुछ मनोवैज्ञानिक भाव और संवेग में अन्तर नहीं करते और दोनों को एक ही स्वीकार करते हैं। ये समानताएँ इस प्रकार हैं –

  1. भाव और संवेग, इन दोनों का सम्बन्ध स्नायु-संस्थान के अन्तर्गत मस्तिष्क से होता है।
  2. अनेक संवेग साधारणतया भाव होते हैं, जबकि भाव तीव्र रूप में संवेग बन जाता है।
  3. भाव और संवेग दोनों में ही सुख या दु:ख पाया जाता है।

अन्तर – यद्यपि भाव और संवेग दोनों का सम्बन्ध मन के भावात्मक पक्ष से है, तथापि ये दोनों भिन्न मानसिक प्रक्रियाएँ हैं। दोनों के मध्य निम्नलिखित अन्तर पाये जाते हैं –

(1) जटिलता सम्बन्धी अन्तर – संवेग एक जटिल भावात्मक मानसिक प्रक्रिया है, जबकि भाव एक सरल तथा प्राथमिक मानसिक प्रक्रिया है। संवेग परिस्थिति-विशेष की भूतकालीन स्मृति या भावी कल्पना द्वारा उत्तेजना पाकर भी उत्पन्न हो सकते हैं। इनकी उत्पत्ति के लिए किसी प्रत्यक्ष परिस्थिति का होना अनिवार्य नहीं है। उदाहरण के लिए-शीतकाल की बर्फीली रात में एक बीमार बूढ़े आदमी का नंगे बदन ठिठुरना, जब भी स्मृति में आता है तो वह करुणा का संवेग उत्पन्न करता है। विमान परिचारिका बनकर दुनियाभर की सैर करने की भावी कल्पना किसी लड़की के मन में उत्साह । पैदा करती है। इसके विपरीत, भावों की उत्पत्ति इन्द्रियजनित सरल संवेदनाओं के फलस्वरूप होती है। उदाहरण के लिए-पुरस्कार की प्राप्ति से सुख का भाव तथा शरीर में चोट लगने से दु:ख का भाव उत्पन्न होता है।

(2) व्यापकता सम्बन्धी अन्तर – संवेग भाव से अधिक व्यापक होते हैं। संवेग की स्थिति में शरीर और मन पर्याप्त रूप से प्रभावित होते हैं। इसके अन्तर्गत हृदय की धड़कन, श्वास की गति, रक्तचाप, रक्त संचार, नलिकाविहीन एवं आमाशय की ग्रन्थियाँ आदि सभी परिवर्तित दिखाई पड़ते हैं। वस्तुतः संवेग में भाव का होना आवश्यक है, किन्तु संवेग के बिना ही भाव की अनुभूति होती है अर्थात् भाव में संवेग सम्मिलित नहीं होता, किन्तु संवेग भावयुक्त होता है। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति के बाहरी तथा आन्तरिक व्यवहारों में भाव का प्रकटीकरण होने से वह संवेग का रूप धारण कर लेता है। स्पष्ट रूप से संवेग का क्षेत्र अधिक विस्तृत है। इसके विपरीत, भाव एक सीमित और संकुचित मन:स्थिति है, जिसके अन्तर्गत व्यक्ति के शरीर और मन की दशा में विशेष बदलाव नहीं आते।

(3) उग्रता सम्बन्धी अन्तर – भाव और संवेग के बीच एक अन्तर उग्रता का है। संवेग अपेक्षाकृत उग्र होता है। संवेग में एक अजीब उथल-पुथल के कारण व्यक्ति असामान्य अवस्था धारण कर लेता है। और अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठता है। वस्तुत: ‘उग्र भाव’ का ही दूसरा नाम संवेग है, जिसका प्रभाव स्मृति पर एक लम्बे समय तक बना रहता है। किसी शव को देखकर दु:ख का भाव उत्पन्न होता है, किन्तु घर में जवान मौत हो जाए तो दुःख का भाव उग्र होकर संवेग में बदल जाएगा। स्पष्टत: संवेग के विपरीत भाव में थोड़ी बहुत अव्यवस्था के बावजूद भी व्यक्ति की सामान्य अवस्था पाई जाती है।

(4) सक्रियता सम्बन्धी अन्तर – भाव की अपेक्षा संवेग के समय व्यक्ति में अधिक सक्रियता दिखाई पड़ती है। संवेग के दौरान हमारे शरीर का एक बड़ा भाग (जिसमें वृहद् मस्तिष्क की कॉर्टेक्स स्वत:संचालित स्नायुमण्डल तथा हाइपोथैलेमस होते हैं) प्रभावित होता है, जबकि भाव की दशा में केवल वृहद् मस्तिष्क की कॉर्टेक्स ही प्रभावित होती है, परिणामस्वरूप भाव की अपेक्षा संवेग की दशा में व्यक्ति अधिक सक्रिय रहता है।

(5) प्रकार सम्बन्धी अन्तर – संवेग के विभिन्न प्रकार हैं जिसके अन्तर्गत भय, शोक, क्रोध, घृणा, प्रेम तथा आश्चर्य के संवेग आते हैं। इसके विपरीत भाव के दो ही प्रकार, सुख और दुःख का भाव, मान्य हैं।

(6) उपागम सम्बन्धी अन्तर – भाव और संवेग के मध्य एक प्रमुख अन्तर उपागम (Approach) को लेकर है। उपागम (पहुँच के मार्ग) दो हैं-आत्मगत (Subjective) तथा वस्तुगत (Objective), क्योंकि भाव की अनुभूति व्यक्ति को स्वयं अपने अन्दर होती है और वह किसी अन्य के भाव को प्रत्यक्ष रूप में नहीं देख सकता; अत: भाव ‘आत्मगत’ होता है। संवेग को व्यक्ति स्वयं में तो अनुभव करता ही है, इसके साथ ही व्यवहारों के माध्यम से इसका प्रकटीकरण भी हो जाता है; अतः संवेग ‘आत्मगत और वस्तुगत’ दोनों है। व्यक्ति अपने दुःख-सुख के भाव की अनुभूति तो कर सकता है, लेकिन दूसरों की नहीं—इसलिए आत्मगत है, किन्तु क्रोध का संवेग स्वयं भी अनुभव होता है और व्यवहार द्वारा इसकी अभिव्यक्ति भी होती है-इसलिए आत्मगत के साथ वस्तुगत भी है।

प्रश्न 3.
संवेगों का एक व्यवस्थित वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए। मुख्य सरल एवं जटिल संवेगों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
सरल एवं जटिल संवेगावस्था का सामान्य परिचय देते हुए मुख्य संवेगों की उत्पत्ति, अभिव्यक्ति तथा लाभ एवं हानि का वर्णन कीजिए।

उत्तर :

संवेगों का वर्गीकरण
(Classification of Emotions)

विभिन्न प्राणियों के व्यवहार की पृष्ठभूमि में संवेगों का अत्यधिक महत्त्व है। मानव-व्यवहार के विश्लेषणात्मक अध्ययन से ज्ञात होता है कि मानव आवश्यकतानुसार अनेक प्रकार के संवेगों को प्रकट करता है। संवेगों के प्रकार के सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों में मतभेद हैं। मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुत भिन्न-भिन्न वर्गीकरण निम्नलिखित हैं –

सरल एवं जटिल संवेगात्मक अवस्थाएँ

व्यक्ति की संवेगात्मक अवस्था को ‘सरलता या जटिलता के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है–

(1) सरल संवेगात्मक अवस्था (Simple Emotional State) – सरल संवेगात्मक अवस्था के अन्तर्गत सामान्यतया एक ही. संवेग उत्पन्न होता है और इनमें कोई अन्य संवेग मिश्रित नहीं होता। सरल संवेग स्पष्ट एवं स्वाभाविक होते हैं और अपनी शुद्ध अवस्था में साधारण रूप से बालकों में देखे जा सकते हैं। इन्हें समझने में कोई कठिनाई नहीं आती। क्रोध, भय, आश्चर्य, हर्ष एवं शोक आदि सरल संवेग हैं।

(2) जटिल संवेगात्मक अवस्था (Complicated Emotional State) – जटिल संवेगात्मक अवस्था में कई प्रकार के संवेग मिश्रित रहते हैं। ये सामाजिक परिस्थितियों में क्रमश: विकसित होते हैं। और इनकी अभिव्यक्ति जटिल होती है। बढ़ती हुई आयु और परिपक्वता के साथ जब अनुभव तथा सीखने का प्रभाव पड़ने लगता है तो संवेग अस्पष्ट व अस्वाभाविक होते जाते हैं, जिन्हें समझना प्रायः कठिन होता है। क्रोध की संवेगावस्था में ईष्र्या, द्वेष, घृणा और हीनता का भाव मिश्रित रहता है। कपटी और धूर्त व्यक्तियों की संवेगात्मक अवस्थाएँ अत्यन्त जटिल होती हैं, जिन्हें सहज ही नहीं समझा जा सकता है।

कुछ प्रमुख संवेग
(Some Important Emotions)

कुछ विशिष्ट संवेगों का विवेचन निम्नलिखित है –

सरल संवेगावस्था के उदाहरण

(1) क्रोध (Ange) – क्रोध एक द्वेषात्मक प्रबल संवेग है जिसे आधुनिक मनोविज्ञान में अर्जित संवेग माना गया है। मैक्डूगल ने इसे लड़ने की मूल-प्रवृत्ति का संवेगात्मक पक्ष स्वीकार किया है तो गिलफोर्ड ने इसे प्राथमिक संवेग माना है।

उत्पत्ति का कारण – क्रोध की उत्पत्ति सम्बन्धी कारणों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि क्रोध के मूल में ऐसी इच्छाएँ, आशाएँ अथवा धारणाएँ कार्य करती हैं जिनकी पूर्ति नहीं हो पाती या जिनकी पूर्ति में रुकावट पैदा होने लगती है। लक्ष्य-सिद्धि में अवरोधक या बाधक वस्तु, संवेग को उत्तेजक (प्रेरक) कही जाती है और उसके विरुद्ध  संवेगयुक्त व्यक्ति में तीव्र विद्वेष तथा वैमनस्य का भाव जाग्रत हो जाता है, परिणामस्वरूप क्रुद्ध व्यक्ति वस्तु या व्यक्ति की बड़ी-से-बड़ी हानि के लिए उद्यत हो उठता है।

क्रोध की अभिव्यक्ति – क्रोध के संवेग से ग्रस्त शक्तिहीन शिशु रोने-चिल्लाने लगता है, हाथ-पैरं पटकने लगता है तथा आन्तरिक विद्रोह को व्यक्त करने लगता है। शनैः-शनैः शक्ति प्राप्त करता हुआ उसकी अभिव्यक्ति का ढंग भी बदलता है और वह आज्ञा न मानना, अपमान व बुराई करना, डाँट-फटकार, गाली या मारपीट करना जैसे कार्य करता है। क्रोध में व्यक्ति आक्रामक (Aggressive) स्वरूप धारण कर लेता है। इस दशा में उसकी शारीरिक क्रियाएँ चेहरा लाल होना, भौंहें चढ़ना, होंठ काँपना, मुट्ठी कसना, दाँत पीसना, काँपना, आघात या ठोकर मारना तथा गरजना आदि हैं। हत्या इसकी चरम परिणति है।

क्रोध से हानि – क्रोध की संवेगावस्था में शारीरिक-मानसिक शक्ति का ह्रास होता है। रक्त चाप, रक्त परिसंचरण तथा पाचन क्रिया बुरी तरह प्रभावित होते हैं। शरीर में निकले कुछ रासायनिक द्रव्य रक्त से मिलकर स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। क्रोध की अवस्था विवेकहीनता को जन्म देती है, जिसमें भयंकरतम भूल तथा अक्षम्य अपराध भी हो सकते हैं।

क्रोध से लाभ – क्रुद्ध व्यक्ति प्रेरित होकर अधिक शक्ति प्राप्त करता है, जिससे उसे असामान्य कार्य करने में मदद मिलती है। युद्ध में सैनिक का क्रोध राष्ट्रहित में कार्य करता है, जिससे शत्रु परास्त होता है। अपनी असफलताओं पर क्रुद्ध व्यक्ति कई गुनी ताकत से सफलता के लिए जुट जाता है।

(2) भय (Fear) – भय भी एक द्वेषीत्मक संवेग है। कुछ मनोवैज्ञानिकों ने इसे झगड़ा करने की प्रवृत्ति से जोड़ा है, जबकि मैक्डूगल ने इसे पलायन की मूल-प्रवृत्ति से सम्बन्धित किया है। वस्तुतः व्यक्ति भय के कारण से दूर रहना चाहता है या उससे स्वयं को छिपाना चाहती है। विद्वानों की दृष्टि में भय दो प्रकार के हैं-वास्तविक और काल्पनिक। शेर को देखकर वास्तविक भय पैदा होता है, किन्तु राक्षस की कल्पना करके भयभीत होना काल्पनिक भय है।

उत्पत्ति का कारण – भय की उत्पत्ति के अनेकानेक कारण और परिस्थितियाँ हैं। जब किन्हीं भयानक परिस्थितियों से घिरकर व्यक्ति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है तो उसमें भय की उत्पत्ति होती है। शिशु अवस्था में विपत्ति की आशंका उत्पन्न करने वाली तथा अस्वाभाविक जान पड़ने वाली अनेक परिस्थितियाँ; जैसे–काली चीजें, अन्धकार, बिजली की चमक, अपरिचित आवाज या जोरदार धमाका आदि; भय पैदा करती हैं। विकास की अवस्थी में आयु वृद्धि के साथ पिछले अनुभव तथा मानसिक प्रन्थियाँ भय उत्पादन में सहयोग करते हैं। प्रौढ़ व्यक्ति स्वयं से अधिक बलशाली चीजों या व्यक्तियों, विषैले प्राणियों, हिंसक जीवों, तूफान, समुद्र, पुलिस, जेल तथा कानूनी दण्ड आदि से भय खाती है।

भय की अभिव्यक्ति – भय का संवेग आन्तरिक, व्यावहारिक तथा चेतनात्मक तीनों ही प्रकार के परिवर्तनों को जन्म देता है। भय की अभिव्यक्ति अनेक प्रकार से होती है; जैसे–भागना, मुँह पीला पड़ना, काँपने लगना, पसीना आना, हृदय की धड़कने यी रक्त चाप बढ़ना, चीखना या छिपने की कोशिश करना। व्यक्ति भय की अवस्था में स्वयं को असमर्थ पाता है। कुछ लोग भय को छिपाने के लिए क्रोध का प्रदर्शन करते हैं तो कुछ मृदु-व्यवहार और उपेक्षा का प्रदर्शन करते हैं। अत्यधिक भय के कारण लँगी व्यक्ति सबसे आगे भागने की कोशिश करता है और कुछ लोग तो मलमूत्र-त्याग तक करते देखे गये हैं।

भय से हानि – भय का संवेग हानिकारक है। भयभीत शिशुओं के व्यक्तित्व का ठीक से विकास नहीं हो पाता, उनकी परिलब्धियाँ सीमित रह जाती हैं और वे उन्नति की ओर नहीं बढ़ पाते हैं। डरपोक वयस्कों के लिए उस समय काफी मुश्किलें आती हैं जब मानसिक ग्रन्थियाँ उन्हें जरा-जरा सी चीजों से भयभीत करती हैं। इसी कारण बहुत-से लोग प्रौढ़ अवस्था में भी रात को अकेले नहीं सो सकते और यहाँ तक कि केचुएँ, कॉकरोच और चूहे से भी डर जाते हैं।

भय से लाभ – मानव-जीवन को सुव्यवस्थित एवं अनुशासित रूप में संचालित करने की दृष्टि से भय का महत्त्वपूर्ण स्थान है और इसी कारण यह संवेग लाभकारी भी है। भय के कारण व्यक्ति खतरनाक और जोखिम भरी चीजों से बचने की कोशिश करता है। धर्म, समाज, शिक्षा, अर्थ एवं राष्ट्रीय क्षेत्रों में भय की संवेगावस्था सुचारु व्यवस्था को कायम रखती है। यदि कानून और पुलिस का भय समाप्त हो जाए तो अपराधी सामान्यजनों को एक पल भी न जीने देंगे।

(3) हर्ष (Joy) – हर्ष नामक संवेग की दशा में उत्साह और उल्लास की उमंग से प्रेरित व्यक्ति प्रत्येक कार्य को करने के लिए उद्यत होती है। हर्ष, मानव-मन को हल्का कर उसे प्रसन्नता से भर देता है। यह शोक की विपरीत संवेगावस्थी मानी जाती है।

उत्पत्ति के कारण – हर्ष की उत्पत्ति आवश्यकताओं, प्रवृत्तियों तथा इच्छाओं की पूर्ति के परिणामस्वरूप होती है। लम्बे परिश्रम यो संघर्ष के पश्चात् जब सफलता प्राप्त होती है तब भी हर्ष पैदा होता है। यदि कोई लाभकारी घटना मन के अनुकूल घटित होती है तो उसके कारण भी व्यक्ति हर्षित होता है। वस्तुतः हर्ष की उत्पत्ति के कारण; देशाओं और परिस्थितियों के साथ बदलते रहते हैं।

हर्ष की अभिव्यक्ति – हर्ष की अभिव्यक्ति कुछ बाह्य शारीरिक लक्षणों के साथ होती है; यथा-चेहरा खिलना, मुस्कानयुक्त चेहरा, हास्य भाव, आँखों में चमक, प्रसन्नतावश ताली बजाना, उछलना, नाचना-कूदना तथा गाने लगना आदि। यदा-कदा हर्षातिरेक के दौरान व्यक्ति को गला भर आता है और उसकी आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं। वैसे कोई भी व्यक्ति न तो बहुत लम्बे समय तके हर्षित रह सकता है और न शोक मग्न ही।।

हर्ष से हानि-हर्ष उस समय हानिकारक हो जाता है जब आवश्यकता से अधिक हर्षित व्यक्ति कर्तव्य-अकर्तव्य का विचार किये बिना, कोई न करने योग्य कार्य कर बैठे। ऐसी अवस्था में कर्तव्य के प्रति लापरवाही या उदासीनता भी दिखा सकता है।

हर्ष से लाभ – हर्ष की संवेगावस्था में उत्साह से पूर्ण व्यक्ति गति के साथ अधिक कार्य कर लेता है। उसे थकान कम होती है और उसके स्वास्थ्य में भी अभिवृद्धि होती है।

(4) शोक (Grief) – शोक का संवेग विद्रोह या हानि से जुड़ा है। किसी इच्छित वस्तु या प्रियजन की हानि से शोक का संवेग उत्पन्न होता है। जीवन की विभिन्न परिस्थितियों अथवा सोपानों में व्यक्ति साधारणतया शोक की अनुभूति करता है। दैनिक जीवन में प्राय: सभी व्यक्ति यदा-कदा शोक के संवेग को अनुभव करते हैं। छोटे बच्चे तो एक साधारण से खिलौने के टूट जाने पर भी शोकमग्न हो जाते हैं, जब कि वयस्क व्यक्ति अपने प्रियजन के वियोग या मृत्यु से शोकमग्न होते हैं।

शोक की अभिव्यक्ति – शोकाकुल व्यक्ति के अनेक बाह्य लक्षण हैं; जैसे—उसका चेहरा उतर जाता है, गला अवरुद्ध हो जाता है, वह रोता-पीटता या विलाप करता है और उसे मूच्र्छा भी आ सकती है।

(5) आश्चर्य (wonder) – आश्चर्य के संवेग को मैक्डूगल ने जिज्ञासा की मूल-प्रवृत्ति से जोड़ा है। व्यक्ति में आश्चर्य का संवेग उस समय प्रकाशित होता है जब वह किसी ऐसी चीज, घटना अथवा परिस्थितिको अपने सामने पाता है जिसकी न तो उसे पूर्व कल्पना थी या जिसके लिए वह पहले से तैयार नहीं था। बालकों को आश्चर्य का संवेग वयस्कों की अपेक्षा अधिक प्रभावित करता है।

आश्चर्य की अभिव्यक्ति – आश्चर्य की संवेगावस्था में अनेक बाह्य लक्षण प्रकट होते हैं; जैसे- चौंक पड़ना,आँखें फैल जाना, होंठ खुले रह जाना, साँस रुक जाना और काँपना आदि। जटिल संवेगावस्था के उदाहरण

(1) प्रेम (Love) – प्रेम रागात्मक जटिल संवेगावस्था है जिसकी उत्पत्ति व्यक्ति द्वारा सुखात्मक भावनाओं तथा इच्छाओं को किसी विशिष्ट व्यक्ति अथवा पदार्थ पर केन्द्रित करने से होती है। गिलफोर्ड ने इसकी गणना कृत्रिम केन्द्रित संवेगों में, पदार्थात्मक संवेगावस्था में की है। मैक्डूगल के अनुसार, यह काम (Sex) से सम्बन्धित संवेग है जबकि फ्रॉयड ने प्रेम की प्रत्येक दशा को वासनाजनित कहा है। लिंटन नामक मनोवैज्ञानिक इसे एक मनोवैज्ञानिक आवश्यकता मानता है।

प्रेम की जटिल संरचना में स्नेह, वात्सल्य, दया, ममता, सहानुभूति तथा कामवासना का योग रहता है। प्रेम की अभिव्यक्ति शारीरिक स्पर्श, चुम्बन, गोद में बिठलाना, रोमांचित होना, लम्बी-लम्बी साँसें लेना तथा आलिंगन करना आदि हैं। कभी-कभी प्रेम मात्र एक संवेग ही नहीं रहता बल्कि एक ‘स्थायी भाव’ का रूप ले लेता है। उदाहरण के लिए–माँ की अपने बच्चे के प्रति प्रेमाभिव्यक्ति स्थायी संवेग की दशा है।

प्रेम की संवेगावस्था उत्साहवर्द्धन करती है जिससे आशावादी दृष्टिकोण पैदा होता है और उच्च भावना ग्रन्थि विकसित होती है। प्रेम की स्थिति में आँखों की चमक बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त कार्यक्षमता में वृद्धि के कारण कार्य द्रुतगति से होता है। प्रेम में व्यक्तित्व का विस्तार होता है।

(2) घृणा (Hate) – प्रेम के सदृश की घृणा भी एक रागात्मक जटिल संवेगावस्था है जिसकी उत्पत्ति दु:खात्मक, विरक्तिमूलक, भय अथवा क्रोधमिश्रित भावनाओं को किसी व्यक्ति या पदार्थ विशेष पर केन्द्रित करने से मानी जाती है। वस्तुतः घृणा का संवेग उस परिस्थिति, वस्तु या व्यक्ति के प्रति पाया जाता है जिसे हम स्वयं से दूर रखना चाहते हैं। उदाहरण के लिए–दुष्ट या दुर्जन व्यक्ति को सामान्यतया सभी लोग स्वयं से दूर रखना चाहते हैं, यही कारण है कि दुष्ट या दुर्जन से हर कोई घृणा करता है। घृणा में प्रेम के विपरीत निराशावादी दृष्टिकोण तथा हीनभावना का विकास होता है तथा घृणा करने वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व संकुचित होता है।

प्रश्न 4.
संवेग में शारीरिक परिवर्तनों का क्या स्थान है? उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए।
या
संवेग की अवस्था में कौन-कौन से परिवर्तन होते हैं?”
या
संवेगावस्था में होने वाले आन्तरिक और बाह्य शारीरिक परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिए।
या
संवेगावस्था में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :

संवेगात्मक अवस्था में परिवर्तन
(Changes in Emotional Stage)

प्रत्येक संवेगात्मक अनुभव प्राणी के शरीर में कुछ स्पष्ट शारीरिक परिवर्तनों को जन्म देता है। ये शारीरिक परिवर्तन दो प्रकार के हैं—बाह्य शारीरिक परिवर्तन तथा आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन। बाह्य शारीरिक परिवर्तन उन परिवर्तनों को माना जाता है जिन्हें बाहर से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जबकि आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों को अन्दर से अनुभव किया जाता है। संवेगात्मक स्थिति में होने वाले इन दोनों प्रकार के शारीरिक परिवर्तनों का वर्णन निम्नलिखित है –

बाह्य शारीरिक परिवर्तन
(External Bodily Changes)

सभी संवेग उत्पत्ति के साथ ही अपना बाह्य प्रकाशन करते हैं जो बाह्य शारीरिक परिवर्तनों के रूप में दृष्टिगोचर होता है। इन परिवर्तनों को देखकर ही संवेग का अनुमान लगा लिया जाता है। संवेगावस्था में जो बाह्य लक्षण प्रकट होते हैं वे निम्न प्रकार हैं –

(1) मुखमण्डलीय अभिव्यक्ति (Facial Expression) – मुखमण्डल अर्थात् चेहरा हमारे आन्तरिक भावों की सही-सही अभिव्यक्ति कर देता है। संवेगात्मक स्थिति से सम्बन्धित बाह्य परिवर्तन की सर्वप्रथम अभिव्यक्ति चेहरे द्वारा होती है। मुखाकृति संवेग की सबसे सशक्त एवं महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति मानी जाती है। संवेग के समय चेहरे पर तेजी से परिवर्तन आते हैं जिसका प्रभाव मुख की मांसपेशियों के फैलने और सिकुड़ने, आँख, नाक, मुख की रेखाओं के विशिष्ट रूप में प्रभावित होने से है। सुखद संवेगावस्था में एक प्रसन्नचित्त व्यक्ति का चेहरा मांसपेशियों के फैलाव के कारण खिला हुआ दिखायी देता है। इसके विपरीत दु:खद संवेगावस्था में एक दुःखी व्यक्ति का चेहरा लटक जाता। है। लज्जा की अवस्था में आँखें नीची हो जाती हैं और चेहरा शर्म से लाल हो जाता है। क्रोधावस्था में भौंहें तन जाती हैं, आँखें बाहर की ओर उभर जाती हैं व लाल हो जाती हैं, नथुने फड़कने लगते हैं, होंठ काँपने लगते हैं तथा व्यक्ति अपने दाँत पीसने लगता है।

मुखमण्डलीय अभिप्रकाशने का सही-सही अनुमान कुशल एवं सूक्ष्म निरीक्षण की क्षमता पर निर्भर करता है। किसी व्यक्ति के सिर्फ चित्र को देखकर ही चेहरे की अभिव्यक्ति से सम्बन्धित परिवर्तनों का निर्णय नहीं लिया जा सकता। कुछ मुखमण्डलीय अभिव्यक्तियाँ जन्मजात होती हैं तो कुछ अर्जित। संस्कृति और प्रशिक्षण, इन दोनों के प्रभाव से चेहरे की संवेगावस्था को समझा या पहचाना जा सकता है।

(2) स्वर की अभिव्यक्ति (Vocal Expression) – स्वर बाह्य अभिव्यक्ति को एक प्रमुख लक्षण है। संवेगात्मक दशाओं में स्वर में परिवर्तन आ जाता है। हम अनुभव करते हैं कि प्रेमावस्था में स्वर मधुर हो जाता है, क्रोध आने पर स्वर तीव्र और भारी हो जाता है, भय में स्वर काँप उठता है या घिग्घी बँध जाती है तथा चिन्ता की अवस्था में स्वर तीव्र व कर्कश हो जाता है। इस प्रकार संवेग के समय हमारे स्वर की गम्भीरता, ऊँचाई तथा गति सामान्यावस्था से अधिक हो जाती है। मनोवैज्ञानिक खोजों से ज्ञात होता है कि स्वर के आधार पर संवेग की पहचान कठिन है, क्योंकि संवेगावस्था में स्वर का परिवर्तन साधारण रूप से होता है। संगीतशास्त्र के अन्तर्गत विविध रागों के माध्यम से स्वरों में संवेग उत्पन्न करने की क्षमता रहती है।

(3) शारीरिक मुद्रा या आसनिक अभिव्यक्ति (Postural Expression) – संवेगात्मक दशाओं में शारीरिक मुद्राओं या आसनों में परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं। इसके अन्तर्गत शरीर की समूची स्थिति में परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। व्यक्ति के बैठने तथा खड़े होने के आसन संवेग के माध्यम से प्रभावित होते हैं। आसनों द्वारा संवेगों की अभिव्यक्ति में सामाजिक रीति-रिवाज, परम्पराओं, शिक्षा तथा संस्कृति का पर्याप्त रूप से प्रभाव पड़ता है। हम देखते हैं कि क्रोध आने पर कुछ लोग इधर-उधर घूमने लगते हैं, कुछ गालियाँ बकते हैं, कुछ हाथों की मुट्ठियाँ तानकर हाथ फेंकते हैं, तनकर खड़े हो । जाते हैं, पैर पटकते हैं या दूसरे पर वार कर देते हैं।

आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन
(Internal Bodily Changes)

संवेग उत्पन्न होने के समय केवल बाह्य व्यवहार, मुद्राओं एवं अभिव्यक्तियों में ही परिवर्तन नहीं आते, अपितु व्यक्ति की अनेक आन्तरिक क्रियाओं में भी परिवर्तन आते हैं। निश्चय ही, ये आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन बाहर से दिखाई नहीं पड़ते हैं। इन परिवर्तनों का निरीक्षण करने के लिए मनोवैज्ञानिकों द्वारा अनेक विशिष्ट यन्त्रों को प्रयोग किया जाता है। संवेगावस्था में होने वाले विभिन्न आन्तरिक परिवर्तनों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है –

(1) हृदय की गति में परिवर्तन (Change in the Heart-Beats) – सामान्यतः संवेगावस्था में हृदय की गति में कुछ-न-कुछ परिवर्तन अवश्य आता है। रक्त नलिकाओं के संकुचन अथवा प्रसारण के कारण व्यक्ति के अंग विशेष में रक्त का प्रवाह कम या अधिक होने के कारण हृदय गति प्रभावित होती है। रक्त प्रवाह तेज होने पर हृदय गति तेज हो जाती है। उदाहरणार्थ-क्रोध व लज्जा के कारण गालों का रंग लाल हो जाता है, किन्तु भय के कारण रक्तप्रवाह धीमा होने की वजह से हृदय गति भी मन्द रहती है और चेहरे का रंग पीला या सफेद पड़ जाता है। हृदय गति के परिवर्तन को इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ नामक यन्त्र द्वारा मापते हैं।

(2) रक्तचाप में परिवर्तन (Change in Blood Pressure) – संवेगावस्था में रक्तचाप में परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। हृदय जिस शक्ति या दाब से शरीर के विभिन्न अंगों को रक्त भेजता है उसे रक्तचाप कहते हैं। रक्तचाप की माप प्लेथिस्मोग्राफ (Plethysmograph) नामक यन्त्र की सहायता से की जाती है। वस्तुतः रक्तचाप को संवेग की दशाओं का ज्ञान करने के लिए एक प्रभावकारी सूचक मान लिया गया है। जो व्यक्ति किसी विशेष संवेग के प्रति अभ्यस्त हो जाते हैं उनके रक्तचाप में कोई परिवर्तन नहीं मिलता, किन्तु संवेग के अनभ्यस्त लोगों का रक्तचाप संवेगावस्था में बदल जाता है। झूठ बोलने वाले अनभ्यस्त लोगों का रक्तचाप बढ़ जाता है, किन्तु झूठ बोलने वाले अभ्यस्त व्यक्तियों के रक्तचाप में कोई परिवर्तन नहीं होता। इसी के आधार पर मनोवैज्ञानिक लोग अपराधियों की बातों से झूठ या सच का पता लगा लेते हैं।

(3) रक्त-रसायन में परिवर्तन (Change in Blood Chemicals) – रासायनिक तत्त्वों में परिवर्तन मापने वाले यन्त्रों के प्रयोग से ज्ञात हुआ है कि संवेगावस्था में रक्त-रसायन (रक्त के रासायनिक तत्त्वों) में भी परिवर्तन आते हैं। संवेग जाग्रत होने पर रक्त की श्वेत एवं लाल रक्त कणिकाओं की संरचना बदल जाती है। कैनन आदि मनोवैज्ञानिकों ने कुत्ते, बिल्ली और मानव पर विभिन्न प्रयोग किये हैं। ज्ञात होता है क़ि क्रोध की संवेगावस्था में मानव की अभिवृक्क ग्रन्थियाँ, अभिवृक्की (Adrenaline) नामक रस निकालती हैं। यह रस सीधा रक्त में मिलकर रक्त की शर्करा को बढ़ा देता है, जिससे व्यक्ति को अधिक शक्ति अनुभव होती है। अतः संवेग में रक्त-रसायन में परिवर्तन आते हैं।

(4) रसपरिपाक में परिवर्तन (Change in Metabolic) – रसपरिपाक अर्थात् पाचन-क्रिया में परिवर्तन, संवेगावस्था का एक महत्त्वपूर्ण आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन है। रसपरिपाक की प्रक्रिया के अन्तर्गत भोजन का पाचन होता है और वह रक्त में मिलता है। बसविक नामक मनोवैज्ञानिक के प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि भय, क्रोध तथा दु:ख आदि की संवेगावस्था में रसपरिपाक की प्रक्रिया बन्द हो जाती है, किन्तु आश्चर्य का संवेग उसमें वृद्धि लाता है जबकि प्रसन्नता तथा हँसी-मजाक के दौरान किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता। कैनन ने इस सम्बन्ध में बिल्ली पर प्रयोग किये। प्रयोग में बिल्ली को खाना खिलाया गया जिसके उपरान्त उसमें रसपरिपाक (पाचन) की क्रिया प्रारम्भ हो गयी। तभी उसके सामने एक कुत्ते को लाया गया जिसे देखते ही भय का संवेग उत्पन्न होने के कारण रसपरिपाक की क्रिया बन्द हो गयी। इससे सिद्ध हुआ कि भय का संवेग उठने पर रसपरिपाक की क्रिया अक्रुद्ध हो जाती है।

(5) साँस की गति में परिवर्तन (Change in Rate of Respiration) – संवेगावस्था में सॉस की गति में परिवर्तन आ जाता हैं। सामान्य अवस्था में साँस की गति निश्चित रहती है और श्वासप्रश्वास का अनुपात 1:4 होता है। क्रोध, हर्ष तथा प्रत्याशा आदि के संवेग में साँस की गति बढ़ जाती है, जबकि भय, दुःख तथा आश्चर्य आदि के समय इसकी गति कम हो जाती है अथवा रुक जाती है। साँस की गति को न्यूमोग्राफ (Pneumograph) नामक यन्त्र की सहायता से मापते हैं।

(6) वैद्युत त्वक अनुक्रिया में परिवर्तन (Change in Galvanic Skin Response) – संवेग की स्थिति में वैद्युत त्वक्-अनुक्रिया निश्चित रूप से उपस्थित रहती है। यह त्वचा की विद्युत अवरोधों की क्रिया है। त्वक्-अनुक्रिया परिवर्तन के अन्तर्गत शरीर में रोमांच या सिहरन पैदा होना, रोंगटे खड़े हो जाने या पसीने की ग्रन्थियों में परिवर्तन आना दृष्टिगोचर होते हैं। इनसे संवेगावस्था का न्यूनाधिक आभास मिल ही जाता है। इसे साइकोगैल्वनोमीटर (Psychogalvanometer) की सहायता से मापा जाता है।

(7) मस्तिष्क तरंगों में परिवर्तन (Change in Brain waves) – संवेगावस्था में मस्तिष्क तरंगों की आवृत्ति में भी परिवर्तन पाया जाता है। इस प्रकार के परिवर्तनों में सहानुभूतिक नाड़ी मण्डल तथा उपसहानुभूतिक नाड़ी मण्डल जो स्वतन्त्र स्नायु मण्डल के भाग हैं, प्रभावित होते हैं।

निष्कर्ष यह है कि साधारण रूप से एक ही प्रकार के आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन विभिन्न संवेगावस्थाओं में मिलते हैं तथा हर एक संवेग के दौरान एक विशिष्ट प्रकार के आन्तरिक परिवर्तनों की एक जैसी श्रृंखला नहीं पायी जाती।

प्रश्न 5.
संवेग के जेम्स-लॉज सिद्धान्त की आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत कीजिए।
या
जेम्स लॉज का संवेग सम्बन्धी सिद्धान्त क्या है?
या
संवेग के सम्बन्ध में विभिन्न मतों (सिद्धान्तों) का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

संवेग के सिद्धान्त
(Theories of Emotion)

यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि संवेगावस्था में शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन होते हैं। दूसरे शब्दों में, संवेगों का बाह्य तथा आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों के साथ गहरा सम्बन्ध है। प्रश्न यह उठता है कि संवेगावस्था में होने वाले इन परिवर्तनों का आधार क्या है ? संवेग की दशा में पहले शारीरिक परिवर्तन आते हैं यो मानसिक परिवर्तन ? इन आधारों को समझने के लिए मनोवैज्ञानिकों द्वारा अध्ययन किये गये हैं जिनके परिणामस्वरूप इस सम्बन्ध में समय-समय पर अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन हुआ है। विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रस्तुत सिद्धान्तों में से प्रमुख सिद्धान्त ये हैं –

  1. जेम्स-लाँज का सिद्धान्त;
  2. कैनन-बार्ड का सिद्धान्त;
  3. लीपर का प्रेरणात्मक सिद्धान्त;
  4. सक्रियकरण सिद्धान्त।

जेम्स-लॉज का सिद्धान्त
(James-Lange Theory)

संवेग सम्बन्धी ‘जेम्स-लॉज का सिद्धान्त’ दो मनोवैज्ञानिकों के पृथक् एवं स्वतन्त्र प्रयासों का परिणाम है। अमेरिका के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स तथा डेनमार्क के दैहिक मनोवैज्ञानिक लाँज ने स्वतन्त्र रूप से अलग-अलग कार्य करते हुए सन् 1884-85 में अपने-अपने संवेग विषयक सिद्धान्त प्रस्तुत किए। संयोगवश दोनों विद्वानों ने लगभग एक जैसे ही विचारों का प्रतिपादन किया था। इसी कारण इनके द्वारा प्रस्तुत किए गए निष्कर्षों को संयुक्त रूप से जेम्स-लॉज सिद्धान्त का नाम दिया गया।

सिद्धान्त की व्याख्या – संवेगों के सम्बन्ध में एक सामान्य सिद्धान्त या विचारधारा प्रचलित है। जिसके अनुसार सर्वप्रथम संवेगात्मक अनुभूति होती है और इसके बाद संवेगात्मक व्यवहार होता है। इसका अभिप्राय यह है कि किसी उत्तेजना के सम्पर्क में आने वाला व्यक्ति पहले किसी परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण करता है, तब उसके अन्दर मानसिक परिवर्तन होते हैं जो शारीरिक परिवर्तनों को जन्म देते हैं और इस प्रकार वह कोई कार्य (व्यवहार) करता है। उदाहरण के लिए–बहुत दिनों के बाद एक माँ अपने बेटे को देखती है जिससे उसके अन्दर मानसिक परिवर्तन आते हैं और वात्सल्य का संवेग जन्म लेता है। यह वात्सल्य को संवेग प्यार, दुलार और आलिंगन जैसी शारीरिक क्रियाओं द्वारा व्यक्त होता है। सामान्य सिद्धान्त को निम्न प्रकार से भली प्रकार समझा जा सकता है –

व्यक्ति को उत्तेजना से सम्पर्क → परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण →
मानसिक परिवर्तन (संवेगात्मक अनुभूति) → शारीरिक परिवर्तन एवं क्रियाएँ

किन्तु जेम्स और लॉज उपर्युक्त प्रचलित विचारधारा के विपरीत अपनी अवधारणा प्रस्तुत करते हैं जिसके अनुसार व्यक्ति के विशिष्ट संवेगात्मक व्यवहार (अथवा शारीरिक परिवर्तनों) के फलस्वरूप ही अभीष्ट संवेगों की अनुभूति होती है। विलियम जेम्स ने अपने विचारों को इस प्रकार प्रकट किया है, मेरा सिद्धान्त है कि शारीरिक परिवर्तन उद्दीपक के प्रत्यक्षीकरण के तुरन्त बाद होता है और जैसे ही वे संवेग में होते हैं उनके प्रति हमारी अनुभूति बदल जाती है।’ संवेगात्मक व्यवहार के विषय में उनका स्पष्टीकरण इस प्रकार है, “हमें दुःख होता है क्योंकि हम रोते हैं, क्रोध उत्पन्न होता है क्योंकि हम मारते हैं, भय लगता है क्योंकि हमें काँपते हैं, हम इसलिए नहीं रोते, मारते या काँपते क्योंकि हमें दु:ख होता है, क्रोध उत्पन्न होता है या भय लगता है।” जेम्स के ही समान लाँज ने भी संवेगों की उत्पत्ति के लिए शारीरिक क्रियाओं को जिम्मेदार माना। लॉज के शब्दों में, “हमारे हर्षों और विषादों के लिए, हमारे आनन्दों और व्यथाओं के लिए, हमारे मानसिक जीवन के सम्पूर्ण संवेदनात्मक पहलू के लिए वाहिनी पेशी संस्थान उत्तरदायी है।”

जेम्स-लाँज सिंद्धान्त का सार-संक्षेप यह है कि उद्दीपने के उपस्थित होने पर व्यक्ति में क्रियाओं का प्रारम्भ होता है और उसके शरीर में कुछ परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। इन क्रियाओं और परिवर्तनों का ज्ञान व्यक्ति के अन्दर संवेग पैदा करता है जिसकी उसे अनुभूति होती है। इसे निम्न प्रकार से भली प्रकारे समझ सकते हैं।

परिस्थिति को प्रत्यक्षीकरण शारीरिक परिवर्तन एवं क्रियाएँ →
मानसिक परिवर्तन (संवेगात्मक अनुभूति)

जेम्स-लॉज सिद्धान्त के पक्ष में तर्क या प्रमाण

जेम्स-लाँज ने अपने संवेग सम्बन्धी सिद्धान्त को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित तर्क या प्रमाण प्रस्तुत किये हैं –

(1) संवेग जाग्रत होने से पूर्व शारीरिक परिवर्तनों की उत्पत्ति – यदि कोई उद्दीपक अचानक ही उपस्थित हो जाए तो संवेग जाग्रत होने से पूर्व ही कुछ शारीरिक परिवर्तन उत्पन्न हो जाते हैं। इस बारे में जेम्स का मत है कि अगर कोई व्यक्ति अन्धकार में किसी काली चीज को अचानक देख ले तो किसी संवेग के जगने से पहले ही उसके हृदय की धड़कनें बढ़ जाती हैं, मुँह सूख जाता है और वह हाँफने लगता है। इसके अलावा किसी भयंकर ध्वनि या धमाके को सुनकर भी व्यक्ति बिना किसी संवेग के चौंक उठती है। इसके बाद जब वह उस ध्वनि या धमाके का अभिप्राय समझता है तो उसमें भय अथवा आश्चर्य उत्पन्न होता है।

(2) शारीरिक अभिव्यक्ति का संवेग से घनिष्ठ सम्बन्ध – शरीर के अंगों की अभिव्यक्ति को संवेग से अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध होना जेम्स-लाँज सिद्धान्त’ के पक्ष में एक महत्त्वपूर्ण तर्क है। ऐसे संवेग की कल्पना करना दुष्कर है जिसमें शारीरिक अंगों की अभिव्यक्ति न होती हो। संवेग की अनुभूति के लिए तद्नुरूप शारीरिक आसन (Bodily Posture) का होना बहुत जरूरी है।

(3) शारीरिक अभिव्यक्ति के विरोधस्वरूप संवेग का भी विरोध – यदि शारीरिक अंगों की अभिव्यक्ति का विरोध किया जाए तो इसके फलस्वरूप तत्सम्बन्धी संवेग को भी विरोध हो सकता है। यदि कोई उद्दीपक सम्मुख आ जाए और उसके प्रति की जाने वाली स्वाभाविक क्रियाओं को हम रोक लें तो संवेग जाग्रत नहीं होगा। जेम्स के अनुसार, यदि किसी की मृत्यु पर कोई रुदन-क्रन्दन न केरे अथवा ऐसी ही कोई शारीरिक क्रिया प्रदर्शित न करे तो दुःख का संवेग नहीं माना जायेगा।

(4) कृत्रिम अभिव्यक्तियों के माध्यम से संवेग की जाग्रति – कृत्रिम अर्थात् बनावटी ढंग से शारीरिक अंगों की अभिव्यक्तिंयाँ प्रदर्शित करने से संवेग जाग्रत हो जाते हैं। इसे जेम्स ने फिल्म और नाटक के अभिनेताओं और अभिनेत्रियों का उदाहरण प्रस्तुत कर समझाया है। ये कलाकार फिल्म और नाटक में अभिनय के दौरान कृत्रिम व्यवहार अथवा क्रियाओं तथा हाव-भावों का प्रदर्शन कर संवेगाभिव्यक्ति करते हैं। यह बनावटी व्यवहार या क्रियाएँ उनमें तत्सम्बन्धी संवेग को जाग्रत कर देते हैं। जिससे उनका अभिनय जीवन्त एवं सफल हो जाता है।

(5) शराब अथवा नशीले पदार्थों के सेवन से संवेग की उत्पत्ति – शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों के सेवन से भी संवेग की उत्पत्ति होती है। इसका कारण यह है कि इन उत्तेजक पदार्थों के कारण शारीरिक अवस्था कुछ इस प्रकार की हो जाती है कि वह विभिन्न संवेगों को उत्पन्न कर देती है। जेम्स स्वीकार करता है कि किसी व्यक्ति द्वारा मादक या नशीले पदार्थों का सेवन करने से, बिना किसी बाहरी उद्दीपक के, उसमें स्वत: ही खुशी, दु:ख, साहस, करुणा आदि के संवेग उत्पन्न होने लगते हैं।

(6) रोगों से संवेग की उत्पत्ति – जेम्स का मत है कि किन्हीं रोगों में बाह्य उद्दीपन के बिना ही संवेग उत्पन्न होने लगते हैं। उसके अनुसार, “यकृत के रोग अवसाद तथा चिड़चिड़ाहट उत्पन्न करते हैं, जबकि स्नायविक रोग भय एवं निराशा को जन्म देते हैं।”

स्पष्टत: उपर्युक्त वर्णित एवं जेम्स द्वारा पुष्ट किये गये तर्को तथा प्रमाणों के आधार पर ‘जेम्स-लॉज सिद्धान्त’ की यह अवधारणा सिद्ध होती है, “जब तक शारीरिक व्यवहार नहीं होगा, तब तक उससे सम्बन्धित संवैग की अनुभूति हमें नहीं होगी।”

जेम्स-लाँज सिद्धान्त के विपक्ष में तर्क या आलोचना

जेम्स-लॉज के सिद्धान्त के प्रस्तुतीकरण के उपरान्त विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने इस सिद्धान्त की प्रयोगात्मक परीक्षा की। सिद्धान्त की जाँच के पश्चात् बहुत-से मनोवैज्ञानिक इस विचार से सहमत नहीं थे कि शारीरिक परिवर्तनों के बाद ही संवेग की अनुभूति होती है। फलतः इस सिद्धान्त की कटु आलोचना हुई और इसके विपक्ष में निम्नलिखित तर्क या प्रमाण प्रस्तुत किये गये –

(1) शेरिंगटन (Sherington) ने एक कुत्ते पर प्रयोग करके जेम्स-लॉज के सिद्धान्त के विरुद्ध यह सिद्ध कर दिया कि शारीरिक परिवर्तनों के अभाव में भी संवेगात्मक प्रतिक्रियाएँ सम्भव हैं। शेरिंगटन द्वारा एक कुत्ते के गले की नाड़ियों को इस भॉति पृथक् कर दिया गया कि जिससे उसके आन्तरिक परिवर्तनों का सन्देश उसके मस्तिष्क को न मिले। कुत्ते के सम्मुख संवेगात्मक परिस्थितियाँ उत्पन्न करने पर पाया गया कि कुत्ते ने प्रत्येक संवेग को पूर्ण अभिव्यक्ति दी। इस प्रकार कुत्ता शारीरिक परिवर्तनों के बिना भी संवेगों का अनुभव कर रहा था। यह प्रमाण जेम्स-लाँज के सिद्धान्त का विरोध करता है।

(2) कैनन (Canon) ने बिल्लियों पर प्रयोग किये। बिल्ली के स्वतन्त्र स्नायु मण्डल की माध्यमिक या सहानुभूति स्नायुओं को शल्य क्रिया द्वारा काटकर अलग कर दिया गया। निरीक्षण के दौरान पाया गया कि संवेगावस्था में आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन तो बन्द हो गये, किन्तु बाह्य अभिव्यक्ति पहले की तरह होती रही। बिल्ली के सामने क्रोध का उद्दीपक आने पर वह गुर्रायी तथा कान को पीछे की तरफ भी खींचा। इस प्रकार क्रोध के बाह्य लक्षण अभिव्यक्त करके भी उसमें आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन दृष्टिगोचर नहीं हुए।

(3) जेम्स-लाँज के संवेग सम्बन्धी सिद्धान्त की मान्यता है कि किसी संवेग की उत्पत्ति के लिए सम्बन्धित वस्तु का प्रत्यक्षीकरण ही काफी होता है। आलोचकों ने इस मान्यता को अस्वीकार किया है। तर्क यह है कि यदि यह मान्यता सत्य होती तो किसी एक वस्तु या घटना के प्रत्यक्षीकरण के परिणामस्वरूप प्रत्येक परिस्थिति में एक ही प्रकार की प्रतिक्रिया प्रकट की जाती, परन्तु व्यवहार में प्रायः ऐसा नहीं होता। बार्ड ने एक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लिखा है, “मान लीजिए, जेम्स का मुकाबला पहले तो पिंजरे में बन्द भालू• से होता है और तत्पश्चात् खुले हुए भालू से। पहली वस्तु (भालु) को वह मूंगफली देता है और दूसरी वस्तु (उसी भालू) से भागता है।” प्रस्तुत उदाहरण द्वारा स्पष्ट होता है कि किसी संवेग की उत्पत्ति के लिए अभीष्ट वस्तु के साथ ही कुछ परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना आवश्यक होता है। इस तर्क द्वारा भी जेम्स-लॉज सिद्धान्त को खण्डन किया गया है।

(4) डॉ० डाना (Dr. Dana) ने एक चालीस वर्षीय महिला के सम्बन्ध में भी, जो घोड़ेसे गिर गयी थी, यही कुछ पाया। महिला की गर्दन में चोट आ जाने के कारण उसका सहानुभूतिक नाड़ीमण्डल संवेदना प्राप्त नहीं कर पाता था, किन्तु वह संवेगों की अनुभूति कर उन्हें भली-भांति प्रकट कर सकती थी। इससे पता चला कि संवेगात्मक अनुभूति के लिए अन्तरावयव संवेदनाएँ तथा शारीरिक परिवर्तन आवश्यक नहीं हैं।

(5) आर्चर (Archer) नामक मनोवैज्ञानिक ने जब फिल्म और नाटक से जुड़े अभिनेताओं के सम्बन्ध में जाँच की तो इसके परिणाम जेम्स की अवधारणा के विपरीत हासिल हुए। बहुत से कलाकारों ने व्यक्त किया कि शारीरिक अंगों की अभिव्यक्ति के समय उन्हें किसी प्रकार की संवेगात्मक अनुभूति नहीं हुई।

(6) जेम्स-लाँज सिद्धान्त की मान्यता है कि शराब या मादक पदार्थों के सेवन से संवेग की उत्पत्ति होती है। अनेक व्यक्तियों को मादक तथा उत्तेजक पदार्थों का सेवन कराया गया, फिर भी उन्हें किसी प्रकार की संवेगात्मक अनुभूति नहीं हुई। इससे जेम्स-लाँज सिद्धान्त का खण्डन होता है।

(7) आन्तरिक परिवर्तन तथा जाठरिक उपद्रवों के सन्दर्भ में संवेगावस्था की जाँच करने के लिए मैरेनन केन्ड्रिल, हन्ट तथा कैनन ने प्रयोग किये, जिनसे सिद्ध हुआ कि आन्तरिक परिवर्तन तथा जठरिक उपद्रवों के होने पर भी संवेग का उठना आवश्यक नहीं है।

(8) शारीरिक अभिव्यक्तियों के आधार पर संवेग प्रकट नहीं होते। प्रायः देखा गया है कि विशिष्ट संवेग विशिष्ट प्रकार की शारीरिक अभिव्यक्तियों से सम्बन्ध नहीं रखते, बल्कि कई संवेगों के साथ ही एक ही प्रकार की शारीरिक अभिव्यक्ति होती है। दुःख और अत्यधिक हर्ष एकदम विपरीत संवेग हैं, किन्तु इनकी शारीरिक अभिव्यक्ति एकसमान है-दोनों में आँसू निकल पड़ते हैं।

(9) अन्तिम रूप से, यौन ग्रन्थियों के न रहने पर भी लोगों में यौन सम्बन्धी संवेग जाग्रत होते हुए देखा गया है-यह भी सिद्धान्त के विपरीत तथ्य है।

जेम्स-लाँज का सिद्धान्त मनोवैज्ञानिकों की कटु आलोचनाओं की परिधि में रहा और पूर्णत: मान्य न हो सका। स्वयं जेम्स को इन आलोचनाओं में वर्णित तथ्यों पर ध्यान देना पड़ा और उसने आगे चलकर अपनी विचारधारा में कुछ संशोधन भी किये जिसके परिणामस्वरूप सिद्धान्त का संशोधित रूप सामान्य विचारधारा के सदृश ही हो गया। फिर भी शारीरिक परिवर्तन तथा आंगिक क्रियाओं को महत्त्व प्रदान करने वाले इस सिद्धान्त का संवेग के क्षेत्र में अपूर्व योगदान रहा है।

प्रश्न 6.
कैनन के संवेग सम्बन्धी सिद्धान्त की विवेचना प्रस्तुत कीजिए।
या
संवेग सम्बन्धी कैनन-बार्ड सिद्धान्त का उल्लेख कीजिए।

उत्तर :

कैनन को संवेग सिद्धान्त
(Canon’s Theory of Emotion)

शारीरिक परिवर्तनों के ज्ञान तथा अनुभव करने को ही संवेग की संज्ञा देने वाले जेम्स-लॉज सिद्धान्त की विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने कटु आलोचना की। इन मनोवैज्ञानिकों में कैनन भी एक प्रमुख वैज्ञानिक है। कैनन और उनके सहयोगी बार्ड ने जेम्स-लाँज सिद्धान्त के विरुद्ध अपना सिद्धान्त प्रतिपादित किया, जिसे कैनन-बार्ड का सिद्धान्त (Canon-Bard Theory) के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इस सिद्धान्त के अनुसार संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं में हाइपोथैलेमस का स्राव प्रमुख कार्य करता है; अतः इसे हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त (Hypothalamic Theory) या आकस्मिक सिद्धान्त (Emergency Theory) भी कहते हैं।

कैनन-बार्ड सिद्धान्त की व्याख्या-मानव मस्तिष्क में संवेगात्मक अनुभूति का केन्द्र ‘वृहद् मस्तिष्क (Cerebral Cortex) है तथा संवेगात्मक अभिव्यक्ति का केन्द्र ‘अ ्तर्मस्तिष्क (Diencephalon) है। इसके दो मुख्य भाग हैं–हाइपोथैलेमस तथा थैलेमस। हाइपोथैलेमस ग्रन्थि , समस्त संवेगों का केन्द्र है तथा इसका स्राव संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं में मुख्य रूप से कार्य करती है। संवेग की क्रिया के समय सर्वप्रथम तो संवेगात्मक परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण होता है जिसके कारण हाइपोथैलेमस उत्तेजित हो उठता है। अत: सबसे पहले आदेश या संवेग हाइपोथैलेमस में उत्पन्न होता है। इसके बाद यह एक साथ ही वृहद् मस्तिष्क के कॉक्स तथा आन्तरिक अंगों की माँसपेशियों में जाता है। परिणामस्वरूप संवेगात्मक अनुभूति तथा संवेगात्मक व्यवहार एक साथ दिखाई पड़ते हैं। वस्तुतः कैनन-बार्ड सिद्धान्त की अवधारणा के अनुसार संवेगात्मक अनुभूति तथा संवेगात्मक व्यवहार दोनों की उत्पत्ति एक साथ ही एवं परस्पर स्वतन्त्र रूप से होती है।

होता यह है कि सर्वप्रथम परिस्थिति या उद्दीपक संग्राहकों को प्रभावित करती है जिससे ज्ञानवाही नाड़ियों के माध्यम से स्नायु-प्रवाह थैलेमस में पहुँचता है। थैलेमस में इस स्नायु-प्रवाह के साथ संवेगात्मक तत्त्व सम्मिलित होते हैं और अब यह प्रवाह वृहद् मस्तिष्क में भेज दिया जाता है। फलस्वरूप व्यक्ति-विशेष में किसी संवेग का अनुभव पैदा होता है। जिस समय स्नायु प्रवाह वृहद् मस्तिष्क की ओर चलता है तो थैलेमस द्वारा उसका कुछ भाग जठर तथा स्केलेटल मांसपेशियों की तरफ मोड़ दिया जाता है। इस भॉति सांवेगिक क्रियाएँ उत्पन्न होती हैं।

सिद्धान्त की विशेषताएँ – कैनन-बार्ड या हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त, जेम्स-लॉज सिद्धान्त के विरोध में प्राप्त परिणामों की उचित रूप से व्याख्या करने में सफल पाया गया। इस विचारधारा के माध्यम से पूर्व प्रतिपादित सिद्धान्त की भ्रान्त धारणाओं को सुधारने का प्रयास हुआ है। कैनन सिद्धान्त के अनुसार जब आन्तरिक अवयव तथा वृहद् मस्तिष्क का सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है तो उस दशा में भी वृहद् मस्तिष्क तथा हाइपोथैलेमस का आपसी सम्बन्ध बना रहता है। जेम्स-लॉज सिद्धान्त के अनुसार यदि सुषुम्ना नाड़ी गर्दन के पास से काट दी जाये या कट जाये तो आन्तरिक अवयवों से सम्बन्धित क्रियाएँ रुक जाएँगी और संवेग उत्पन्न नहीं होगा। इसके विपरीत, कैनन सिद्धान्त के अनुसार संवेग का आवेश हाइपोथैलेमस ग्रन्थि में उत्पन्न होता है तथा वृहद् मस्तिष्क की कॉर्टेक्स में चला जाता है, इसलिए संवेग की अनुभूति सुषुम्ना के कट जाने पर भी रहती है, क्योंकि हाइपोथैलेमस ग्रन्थि को क्रियाशील होने में जरा भी समय नहीं लगता, अतः संवेग की अनुभूति भी अविलम्ब ही हो जाती है। स्पष्ट है कि जेम्स-लॉज के सिद्धान्त की तुलना में कैनन का सिद्धान्त अधिक उपयुक्त है और इस तथ्य की पुष्टि करता है कि संवेगात्मक अनुभूति और संवेगात्मक व्यवहार दोनों एक साथ ही होते हैं।

सिद्धान्त के दोष – कैनन-बार्ड या हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त भी पूर्णतः दोषमुक्त नहीं है। इस सिद्धान्त के दोष निम्न प्रकार हैं –

  1. हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त संवेगावस्था के अन्तर्गत सिर्फ हाइपोथैलेमस को महत्त्व प्रदान करता है, जबकि वास्तव में, हाइपोथैलेमस द्वारा उत्पन्न संवेगात्मक व्यवहार न केवल क्षणिक होता है अपितु स्वाभाविक या प्राकृतिक संवेगात्मक व्यवहार से भिन्न भी होता है।
  2. संवेगों की उत्पत्ति के लिए, हाइपोथैलेमस के अतिरिक्त, स्नायु संस्थान के कुछ भाग भी उत्तरदायी हैं तथा अपना पृथक् महत्त्व रखते हैं।
  3. इन अन्य भागों द्वारा उत्पन्न व्यवहार परिस्थिति से समायोजन की क्षमता रखता है लेकिन हाइपोथैलेमस से उपजे संवेगात्मक व्यवहार में यह क्षमता नहीं होती।
  4. अन्ततः यह बात सिद्ध नहीं हो सकी है कि संवेगात्मक अनुभूति की उत्पत्ति में केवल हाइपोथैलेमिक क्रियाएँ ही महत्त्व रखती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानव-जीवन में संवेगों के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कोई भी व्यक्ति अनेकानेक मनोवैज्ञानिक कारणों से व्यवहार प्रदर्शित करता है। संवेग भी एक प्रबल मनौवैज्ञानिक कारण है जो व्यक्ति के विशिष्ट व्यवहार को जन्म देता है। वस्तुतः मानव-जीवन से सम्बन्धित अनुभवों तथा व्यवहारों में संवेग महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। मनुष्य में परिस्थिति के प्रति अनुक्रिया करने की प्रेरणा संवेग से ही आती है, जबकि संवेग के अभाव में वह स्वयं को निष्क्रिय पाता है। वीरता और शौर्य के असामान्य कार्यों की प्रेरणा मानव को संवेगों से ही मिलती है। युद्धभूमि में राष्ट्र के लिए प्राण न्योछावर करने वाला देशभक्त सिपाही बुद्धि से नहीं, संवेगों से प्रेरित होता है। हँसते-हँसते फॉसी का फन्दा चूमने वाले अमर शहीद भगत सिंह का असामान्य व्यवहार संवेगों से ही परिचालित था। संवेग की अवस्था में मनुष्य कभी-कभी ऐसे अद्भुत कार्य कर डालता है। जिनकी वह सामान्य अवस्था में कल्पना भी नहीं कर सकता। तेज ज्वर से पीड़ित बीमार होते हुए भी माता अपने शिशु को सूखे स्थान पर सुलाती है और स्वयं गीले स्थान पर लेटती है। माता-पिता का अपने बच्चों के लिए त्याग वात्सल्य के संवेग के कारण है।

भावात्मक अनुभवों के आधार पर भी कुछ व्यवहार किये जाते हैं। सहानुभूति से द्रवित होकर कोई व्यक्ति अपनी क्षमता से अधिक ऐसे लोगों की मदद कर सकता है जो सहानुभूति के पात्र हैं; किन्तु यदा-कदा सहानुभूति में किया गया व्यवहार सिर्फ कर्तव्य पूर्ति के लिए ही होता है। सामाजिक कर्तव्य का | निर्वाह करने की दृष्टि से ऐसे व्यक्ति के यहाँ शोक संवेदना व्यक्त करने जाना पड़ता है, जिनसे हमारे विचार कभी नहीं मिलते। इसी प्रकार न चाहते हुए, केवल प्रदर्शन के लिए ही उत्सव में भी सम्मिलित होना पड़ता है। मैक्डूगल ने इसे मिथ्या-प्रवृत्ति (Pseudo-Instinct) का नाम दिया है।

प्रश्न 2.
संवेगों के अवदमन से क्या आशय है?
उत्तर :
मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में मानव-जीवन में संवेगों की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। प्रायः संवेग शक्ति के प्रबल स्रोत के रूप में कार्य करते हैं। संवेगात्मक परिस्थिति में शरीर में असाधारण शक्ति को संचार होता है और संकटकालीन परिस्थितियों में यही शक्ति शरीर की रक्षा करने में सहायता करती है। आग से बचने के लिए बीमार और कमजोर व्यक्ति भी सिर पर पैर रखकर भाग लेता है और अपने प्राणों की रक्षा करता है, किन्तु यदि संवेगात्मक उद्दीपक अत्यधिक रूप से प्रभावशाली है तो वह मस्तिष्क को संज्ञाविहीन भी कर सकता है, जिससे शरीर की क्रियाशीलता समाप्त हो सकती है।

व्यक्ति, स्वहित में तथा समाज में अपनी भूमिका के सन्दर्भ में, संवेग की अभिव्यक्ति सुविचारित रूप से करता है और उन्हें नियन्त्रित रूप से ही प्रकट होने देता है। कोई भी व्यक्ति सभी के प्रति घृणा का भाव रखते हुए समाज में अच्छे सम्बन्ध स्थापित नहीं रख सकता, फलस्वरूप उसे घृणा से सम्बन्धित अपने संवेग पर नियन्त्रण रखना होगा। स्पष्टत: परिस्थिति विशेष में व्यक्ति अपने संवेगों का अवदमन (Repression of Emotions) करता है। मालिक ने नौकर को दुकान पर प्रताड़ित किया है, अन्दर-ही-अन्दर जला भुना नौकर घर जाते समय एक पहलवान व्यक्ति का अप्रिय व्यवहार भी सह जाता है और अपने क्रोध का प्रदर्शन नहीं कर पाता। नौकर खीझ में अपने क्रोध का अवदमन करती है।

प्रश्न 3.
संवेगों के अवदमन के कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
संवेगों के अवदमन का कारण उनकी अभिव्यक्ति में बाधा उत्पन्न होना है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सिगमण्ड फ्रॉयड के अनुसार, उन्हीं इच्छाओं तथा संवेगों का अवदमन सबसे ज्यादा होता है जिन्हें करने की आज्ञा हमारा आत्मसम्मान, परिवार या समाज हमें प्रदान नहीं करता है। हो सकता है, हमारी ये इच्छाएँ और संवेग समाज-विरोधी अथवा अश्लील हों।

फ्रॉयड ने मन के तीन विभाग बताये हैं – (i) चेतन मन, (ii) अवचेतन मन तथा (iii) अचेतन मन। अवदमने की यह क्रिया अचेतन रूप से होती है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत दु:खदायी तथा अवांछनीय विचार, स्मृतियाँ तथा प्रवृत्तियाँ चेतन से अवचेतन और फिर अचेतन मन की ओर भेज दिये जाते हैं। व्यक्ति की कोई भी इच्छा, भावना तथा संवेग सबसे पहले चेतन मन में स्थान पाते हैं। चेतन मन इनकी अभिव्यक्ति, पूर्ति एवं सन्तुष्टि के लिए प्रयासरत रहता है, किन्तु यदि इसमें कोई बाधा आती है तो उन्हें अचेतन मन की ओर धकेल दिया जाता है। अवचेतन मन, यद्यपि इन संवेगों के प्रकाशन एवं पूर्ति के लिए यथासम्भव प्रयास करता है, किन्तु मन के इस विभाग में, चेतन में बनी इच्छाओं के कारण इन्हें स्पष्टता नहीं मिलती और अपनी अभिव्यक्ति के लिए इन्हें अचेतन मन में जाना पड़ता है। इस भाँति चेतन मन के जो संवेग परिस्थितियों के कारण सन्तुष्ट नहीं हो पाते या खुले रूप से अभिव्यक्त नहीं हो पाते, उनका अचेतन मन में अवदमन हो जाता है।

क्योंकि समस्त असन्तुष्ट तथा अप्रदर्शित विचार, स्मृतियाँ, प्रवृत्तियाँ, इच्छाएँ तथा संवेग, अन्ततोगत्वा, अचेतन मन में संगृहीत होते जाते हैं; अतः स्वभावतः, अचेतन मन, चेतन मन की अपेक्षा काफी बड़ा हो जाता है। यह समुद्र में उत्प्लवन करते हिमखण्ड की भाँति है, जिसका एक-चौथाई अंश पानी के ऊपर है और तीन-चौथाई अंश पानी में डूबा हुआ। वस्तुत: चेतन मन सारे समाज-विरोधी, अश्लील अथवा यौनजनित संवेगों को अवचेतन मन में ठेलकर उन्हें पुनः अपने यहाँ वापिस नहीं आने देता। यही कारण है कि इन्हें अवदमित संवेगों के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 4.
संवेगों के अवदमन का मानव-व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
संवेगों के छिपाने या अवदमन से मनुष्य के व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ता है। व्यक्तित्व की सन्तुलित एवं साम्यावस्था के लिए संवेगों का अभिप्रकाशन तथा उनका अवदमन दोनों ही आवश्यक समझे जाते हैं। अत्यधिक रूप से अवदमित संवेग मानव स्वभाव एवं प्रकृति के विपरीत स्वीकार किये गये हैं। विद्वानों के अनुसार संवेगों का प्रकटीकरण एक प्राकृतिक आवश्यकता है और इसके प्रकटीकरण को जबरदस्ती रोक देने से अनेक विकृतियाँ जन्म ले सकती हैं।

मनोविश्लेषणवादियों ने दमित संवेगों से कई मानसिक तथा स्नायुविक व्याधियों का उल्लेख किया है। संवेगों का अवदमन मानव व्यक्तित्व को असामान्य तथा कुण्ठा ग्रस्त बना देता है, जिससे व्यक्तित्व का समुचित तथा अभीष्ट विकास अवरुद्ध हो जाता है।

अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि जिस व्यक्ति की इच्छाएँ, भावनाएँ या संवेग पूर्णतः सन्तुष्ट नहीं हो पाते, उनके व्यबहारों में असामान्यता उत्पन्न होने लगती है, उनका व्यक्तित्व विच्छेदन की ओर उन्मुख होने लगता है तथा वे अनेक मानसिक रोगों के शिकार हो जाते हैं। उनमें आत्महीनता, शक, ईष्र्या तथा डर के भाव उत्पन्न हो जाते हैं तथा मानसिक विकृतियों की वजह से वे ज्यादातर शारीरिक-मानसिक तनाव से कष्ट पाते रहते हैं। स्पष्टतः संवेगों का अवदमन एक निश्चित सीमा से अधिक उचित नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 5.
संवेगों के नियन्त्रण के समुचित उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
यह सत्य हैं कि समाज में रहते हुए व्यक्ति अपने संवेगों की पूर्ण रूप से मुक्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता, परन्तु संवेगों का अत्यधिक अवदमन किसी समय विस्फोटक स्थिति को जन्म दे सकता है। सामाजिक परिस्थितियों के साथ तालमेल की दृष्टि से संवेगों पर काबू रखने के लिए और उन्हें स्वाभाविक रूप में प्रकटित होने का अवसर प्रदान करने के लिए निम्नलिखित उपाय प्रयुक्त हो सकते हैं –

(1) अवांछनीय संवेगों के विपरीत परिस्थितियों का सृजन – अवांछनीय संवेगों को रोकने का एक उपाय यह है कि उनके विपरीत परिस्थितियों अथवा विरोधी संवेगों को प्रोत्साहित किया जाए। इस भाँति वांछनीय संवेगों की उत्पत्ति के लिए उसे वातावरण तथा परिस्थिति पर काबू पाना होगी जो अवांछनीय संवेगों के लिए उत्तरदायी है। शोक को कम करने के लिए सुखकारी परिस्थितियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

(2) संवेगों का रेचन – रेचन (Chatharsis) से अभिप्राय ‘भड़ास निकालने या भावनाओं को उभारने से है। संवेगों के रेचन से अनचाहे भाव शान्त होते हैं तथा प्राकृतिक आनन्द की प्राप्ति होती है। भय के संवेग को उभारकर बाहर निकालने के लिए बहुत से लोग डरावनी कहानियाँ या घटनाएँ पढ़ते हैं। पति की मृत्यु के आघात से यदि शोकाकुल पत्नी गुमसुम बैठी है और रो नहीं पा रही तो यह भयंकर रूप से हानिकारक हो सकता है। अक्सर स्त्रियाँ जोर-जोर से विलाप कर किसी भी प्रकार उसके दुःख के संवेग को उभारकर उसे रोने के लिए प्रेरित करती हैं। रोने से जी हल्का होता है तथा चित्त को शान्ति मिलती है।

(3) संवेगों का शोधन – इसके अन्तर्गत संवेगात्मक अभिव्यक्ति के परिमार्जन एवं परिवर्द्धन द्वारा स्वस्थ मानसिकता को उत्पन्न किया जाता है। संगीत, चित्रकला, लेखन तथा काव्य आदि के माध्यम से संवेगों को उत्तम अभिव्यक्ति मिलती है।

(4) संवेग का मार्ग परिवर्तन – मार्ग परिवर्तन द्वारा भी संवेग को नियन्त्रित किया जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति में घृणा का संवेगात्मक प्रकाशन अधिक होता है तो उसे अपने घृणा का भाव दुर्जन व्यक्तियों पर करना चाहिए न कि सज्जन व्यक्तियों पर।

प्रश्न 6.
बाल्यावस्था में संवेगों के होने वाले अवदमन के सम्भावित कुप्रभावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार बालक में संवेगात्मक व्यवहार शनैः-शनैः विकसित होते हैं और आयु में वृद्धि के साथ-ही-साथ उसके संवेगात्मक व्यवहार स्पष्ट होने लगते हैं। अध्ययन बताते हैं कि संवेगात्मक व्यवहार का विकास नाड़ी-पेशीय यन्त्रों की परिपक्वता पर निर्भर करता है। जीवन के विकास-क्रम में नयी-नयी परिस्थितियों तथा वातावरण के सम्पर्क में आकर बालक नयी-नयी क्रियाओं को सीखता है और इस प्रकार वह साधारण से जटिल संवेगात्मक अवस्थाओं की ओर बढ़ता है। पारिवारिक परिस्थितियों में बालक के प्राकृतिक संवेगों को समाज की सभ्यता, संस्कृति, दर्शन एवं मान्यताओं के अनुसार ढालने की कोशिश की जाती है। इस अनुकूलन के लिए संवेगावस्था पर । नियन्त्रण एक पूर्व आवश्यकता है, किन्तु नियन्त्रण की सीमाओं का अतिक्रमण करने से उत्पन्न भय एवं दबाव की परिस्थितियाँ ‘संवेगों के अवदर्मन’ को जन्म देंगी और बालक स्वयं को तनाव में महसूस करेगा। बालक को जबरदस्त भूख लगी है लेकिन उसे भोजन नहीं मिल पा रहा। क्योंकि उसकी इच्छाओं की तृप्ति में बाधा आ रही है; अतः इससे क्रोध का जन्म होगा ही। यदि बालक को अधिक डराया-धमकाया जाएगा तो वह क्रोध प्रकट न करके अन्दर-ही-अन्दर कुंठित होगा। अवदमन के कारण कुण्ठित और हीनमानसिकता से ग्रस्त व्यक्तित्व आत्मविश्वास में कमी, दब्बूपन, खीझ, मार-पीट, तोड़-फोड़ तथा विद्रोहात्मक रवैये को जन्म देता है। कभी-कभी बालक अपनी हीनभावनाएँ छुपाने के लिए तथा कुण्ठाओं के परिणामस्वरूप अनेक प्रकार के अपराधों में फँस जाते हैं। फ्रायड की अवधारणा के अनुसार, यदि बालक के चेतन मन में उपजे संवेगों की सन्तुष्टि नहीं की जाएगी और उन्हें दबाया जायेगा तो वे अचेतन मन में पहुँचकर मानसिक विकृतियों को जन्म देंगे। वास्तव में, बाल्यावस्था की दमित भावनाएँ समाप्त नहीं होतीं, ये अन्दर-ही-अन्दर सक्रिय रहती हैं तथा बहुधा भयंकर मानसिक अस्वस्थता में बदल जाती हैं। कठोर नियन्त्रण तथा प्रेम व सहानुभूति के अभाव में बालक में संवेगात्मक असुरक्षा के कारण व्यक्तित्व असन्तुलित हो जाता है। ऐसे व्यक्तित्व को समाज में सम्मान प्राप्त नहीं होता।

निष्कर्षतः बालक के स्वाभाविक संवेगों के अवदमन की जगह उनका परिमार्जन कर सही दिशा में प्रकाशन होना चाहिए। इसके लिए परिवार एवं विद्यालय सदृश समाज की प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण संस्थाएँ सुन्दर भूमिका निभा सकती हैं।

प्रश्न 7.
सहानुभूति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
‘सहानुभूति’ (Sympathy) शब्द दो शब्दों ‘सह + अनुभूति’ का सम्मिलित रूप है, जिसका अर्थ है–‘अन्य प्राणियों के समान ही अनुभूति करना। वुडवर्थ ने ‘सहानुभूति’ का अर्थ बताया है-दूसरे व्यक्ति के साथ अनुभव करना। सामान्यतः लोग गरीब, बीमार तथा अपंग व्यक्तियों के प्रति उन्हीं के समान अनुभूति करने लगते हैं। यह उनके प्रति सहानुभूति कही जाएगी। धनी, स्वस्थ तथा भले-चंगे व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति पैदा नहीं होती। शिकार-पक्षी के प्रति सहानुभूति उत्पन्न होती है शिकारी के प्रति नहीं। सहानुभूति को मनोवैज्ञानिक एक प्रकार का संवेग ही मानते हैं जिसका आधार भावात्मक है। मैक्डूगल ने इसे मिथ्या-प्रवृत्ति (Pseudo-Instinct) माना है।

सहानुभूति के प्रकार-सहानुभूति दो प्रकार की होती है –

(i) निष्क्रिय सहानुभूति – इसमें शाब्दिक सहानुभूति प्रदर्शित की जाती है; जैसे—मृत्यु पर शोक संवेदना प्रकट करना।

(ii) सक्रिय सहानुभूति – इसके अन्तर्गत हमारी सहानुभूति क्रियाशील होती है; जैसे दु:खी व्यक्ति का कष्ट कम करने के लिए प्रयत्नशील होना, भूकम्प पीड़ितों के लिए राहत कार्य में भाग लेना।

सहानुभूति की व्याख्या – सहानुभूति का जीवन में बड़ा महत्त्व है। सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार लोगों को एक-दूसरे के करीब लाता है। यह त्याग की भावना में वृद्धि करता है। वस्तुतः जीवन के किसी-न-किसी मोड़ पर हर एक व्यक्ति को सहानुभूति की आवश्यकता पड़ती है। सहानुभूति एवं जन-समर्थन पाकर लोग महानतम कष्ट सहन करते हैं। सहानुभूति प्रकट करने वाले व्यक्ति की सहानुभूति उसके पूर्व अनुभवों पर आधारित होती है अर्थात् सहानुभूति के अन्तर्गत व्यक्ति वही व्यवहार या प्रतिक्रिया प्रदर्शित करता है जो उसने समान परिस्थितियों में अन्य व्यक्तियों से प्राप्त की थी। सहानुभूति के लिए कल्पना की भी जरूरत पड़ती है, क्योंकि कल्पना के आधार पर ही दूसरे व्यक्ति के कष्टों का अनुमान किया जा सकता है। व्यवहार में सहानुभूति का प्रकटीकरण दूसरे व्यक्तियों का अनुकरण करके सीखा जाता है, किन्तु सहानुभूति मात्र अनुकरण ही नहीं है बल्कि इसके लिए। एक-दूसरे की अनुभूतियों में सहभागिता भी आवश्यक है। सहानुभूति के संवेग में पर्याप्त रूप से जन्मजात और अर्जित दोनों अंश विद्यमान होते हैं। सहानुभूति की भावना सर्वव्यापक है यानी सभी में पायी जाती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भाव या अनुभूति से क्या आशय है?
उत्तर :
भाव या अनुभूति (Feeling) का सम्बन्ध मानव-जीवन के भावात्मक पहलू से है। भाव प्राणी को सुख-दुःख की अनुभूति कराने वाली एक ऐसी प्रारम्भिक सरल मानसिक प्रक्रिया है जिसका विश्लेषण नहीं किया जा सकता। इच्छाओं की सन्तुष्टि से सुख का भाव तथा उसमें बाधा पड़ने पर दु:ख का भाव पैदा होता है। वस्तुतः मन के इच्छात्मक या चेष्टात्मक एवं ज्ञानात्मक, दोनों पहलुओं के माध्यम से भाव का अनुभव होता है। अधिकांश मनोवैज्ञानिकों ने दो प्रकार के भाव बताये हैं-सुखद तथा दु:खद। रॉयस ने इसके साथ एक तीसरा भाव उद्दीप्त एवं शान्त, भी जोड़ दिया है। वुण्ट ने भावों का त्रि-दिशात्मक सिद्धान्त प्रस्तुत किया है–सुखद-दु:खद, उद्दीप्त-शान्त तथा विक्षेप-विराम। तथ्य यह है कि सुखद और दुःखद, इन दोनों भावों के अलावा अन्य किसी प्रकार के भाव को प्रयोगात्मक परिणामों के आधार पर सत्य सिद्ध नहीं किया जा सका।

प्रश्न 2.
भाव या अनुभूति की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भाव या अनुभूति की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. भाव सरलतम तथा प्रारम्भिक प्रक्रिया है।
  2. इसका विश्लेषण सम्भव नहीं है।
  3. भाव चंचल तथा क्षणिक होता है। दु:ख के बाद सुख तथा सुख के बाद तत्काल ही दुःख की अनुभूति होने लगती है।
  4. मिश्रित भाव’ का अनुभव नहीं किया जा सकता है अर्थात् हम एक ही समय में एक से अधिक भावों का अनुभव नहीं कर सकते।
  5. भाव की प्रबलता कम या अधिक हो सकती है अर्थात् भाव की मात्रा एक समान नहीं होती।
  6. व्यक्ति की हर एक अनुभूति और व्यवहार के साथ किसी-न-किसी प्रकार का भाव मिला रहता है और अन्तिम रूप से,
  7. भाव को आत्मगत कहा जाता है, क्योंकि व्यक्ति भाव को सदैव अपने अन्दर महसूस करता है।

प्रश्न 3.
भाव तथा संवेग के अन्तर को अति संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
भाव (Feeling) तथा संवेग (Emotion) के अन्तर का अति संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 4 Emotional Bases of Behaviour 1
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 4 Emotional Bases of Behaviour 2
प्रश्न 4.
संवेग की अवस्था में होने वाले कोई चार महत्त्वपूर्ण शारीरिक परिवर्तन बताइए।
उत्तर :
संवेग की अवस्था में होने वाले मुख्य शारीरिक परिवर्तन हैं –

  1. मुखाकृति में परिवर्तन
  2. स्वर में परिवर्तन
  3. शारीरिक मुद्राओं में परिवर्तन तथा
  4. हृदय एवं श्वास गति में परिवर्तन।

प्रश्न 5.
संवेग के जेम्स-लॉज तथा कैनन बार्ड सिद्धान्त में अन्तर बताइए।
उत्तर :
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अन्तर्गत मानवीय संवेगों की उत्पत्ति के विषय में मुख्य रूप से दो सिद्धान्तों को मान्यता प्राप्त है। ये सिद्धान्त हैं-जेम्स-लॉज का सिद्धान्त तथा कैनन-बार्ड का सिद्धान्त। ये दोनों सिद्धान्त भिन्न तथा परस्पर विरोधी हैं। जेम्स-लाँज सिद्धान्त के अनुसार संवेगों की अनुभूति शारीरिक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप होती है। इस मान्यता के आधार पर कहा गया है कि यदि शारीरिक परिवर्तनों पर रोक लगा दी जाए तो संवेगों की अनुभूति भी नहीं होगी। इसके विपरीत या भिन्न रूप से कैनन-बार्ड सिद्धान्त के अनुसार संवेगों की अनुभूति बाहरी विषय-वस्तुओं के परिणामस्वरूप होती है तथा संवेग की। अनुभूति के बाद ही कुछ शारीरिक परिवर्तन तथा कुछ क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं। कैनन-बार्ड सिद्धान्त ने स्पष्ट किया है कि संवेगों की उत्पत्ति का केन्द्र मस्तिष्क में स्थित हाइपोथैलेमस नामक भाग होता है। यही कारण है कि इस सिद्धान्त को हाइपोथैलेमस सिद्धान्त के रूप में भी जाना जाता है।

प्रश्न 6.
गिलफोर्ड के अनुसार संवेगों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
गिलफोर्ड ने संवेगों का एक व्यवस्थित वर्गीकरण प्रस्तुत किया है। उसने समस्त मानवीय संवेगों को मुख्य रूप से तीन वर्गों में बाँटा है

(1) प्राथमिक संवेग – इस वर्ग में शक्तिशाली एवं प्रबल संवेगों को सम्मिलित किया गया है। ये संवेग उत्तेजना होने पर प्रकट होते हैं तथा तीव्र हलचल मचा देते हैं। इस वर्ग के मुख्य संवेग हैं-क्रोध तथा भय।।

(2) गौण संवेग – इस वर्ग में उन संवेगों को सम्मिलित किया जाता है जो प्राथमिक संवेगों के समान तीव्र नहीं होते। इन संवेगों की उत्पत्ति एकाएक न होकर धीमी गति से होती है; जैसे-भूख।

(3) कृत्रिम केन्द्रित संवेग – गिलफोर्ड ने इस वर्ग में पाँच प्रकार के संवेगों को सम्मिलित किया है, जिनका सामान्य परिचय निम्नलिखित है

  1. आत्मकेन्द्रित संवेग-व्यक्ति के आत्म एवं स्वार्थ से सम्बन्धित संवेग; जैसे-आत्मरक्षा का भाव।।
  2. बौद्धिक संवेग–बौद्धिक क्रियाओं से सम्बन्धित संवेग; जैसे—साहित्य सृजन में आनन्द लेना या स्वाध्याय द्वारा मानसिक शान्ति लाभ।
  3. सौन्दर्यात्मक संवेग-सौन्दर्यानुभूति से सम्बन्धित संवेग; जैसे—संगीत अथवा प्रकृति का आनन्द लेना।
  4. पदार्थात्मक संवेग–अन्य पदार्थों या लोगों के हित अथवा सम्पर्क से सम्बन्धित संवेग; जैसे–प्रेम, घृणा, दया तथा परोपकार।
  5. नैतिक संवेग-नैतिक व्यवहार तथा मान्यताओं से सम्बन्धित संवेग; जैसे—शुभ, अशुभ तथा सत्य।

प्रश्न 7.
मैक्डूगल के अनुसार संवेगों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
मैक्डूगल ने संवेग की अवधारणा को मूल प्रवृत्तियों के सन्दर्भ में स्पष्ट किया है। मैक्डूगल के अनुसार, प्रत्येक संवेग किसी-न-किसी मूल प्रवृत्ति से सम्बद्ध होता है। मैक्डूगल ने कुल 14 मूल-प्रवृत्तियों का उल्लेख किया है तथा इस आधार पर उसने 14 ही संवेगों का उल्लेख किया है। इन 14 संवेगों तथा सम्बद्ध मूल प्रवृत्तियों का विवरण इस प्रकार है

  1. भय संवेग-पलायन मूल प्रवृत्ति
  2. क्रोध संवेग-युयुत्सा मूल प्रवृत्ति
  3. घृणा संवेग-निवृत्ति मूल प्रवृत्ति
  4. वात्सल्य संवेग-पुत्र-कामनी मूल प्रवृत्ति
  5. करुणा संवेग-शरणागत मूल प्रवृत्ति
  6. कामुकता संवेग-काम मूल प्रवृत्ति
  7. आश्चर्य संवेग-जिज्ञासा मूल प्रवृत्ति
  8. आत्महीनता संवेग-दैन्य मूल प्रवृत्ति
  9. आत्माभिमान संवेग-आत्म-गौरव मूल प्रवृत्ति
  10. एकाकीपन संवेग-सामूहिकता मूल प्रवृत्ति
  11. भूख संवेग-भोजनान्वेषण
  12. स्वामित्व भाव संवेग-संग्रह प्रवृत्ति
  13. कृतिभाव संवेग-रचना प्रवृत्ति
  14. आमोद संवेग-हास मूल प्रवृत्ति।

प्रश्न 8.
भारतीय मनोवैज्ञानिक डॉ० जायसवाल के अनुसार संवेगों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
भारतीय मनोवैज्ञानिक डॉ० जायसवाल ने संवेगों को निम्नलिखित पाँच वर्गों में बाँटा है –

  1. जिज्ञासु संवेग – इस वर्ग में उन संवेगों को सम्मिलित किया गया है जिनको सम्बन्ध जिज्ञासा से है। ज्ञान-प्राप्ति की इच्छा या ज्ञानार्जन का प्रेम इसी वर्ग का संवेग है।
  2. स्वार्थी संवेग – इस वर्ग में व्यक्तिगत स्वार्थ से सम्बद्ध संवेगों को सम्मिलित किया गया है। इस वर्ग के मुख्य संवेग हैं-क्रोध, भय, आत्मसम्मान की भावना तथा आत्महीनता की भावना।
  3. सामाजिक संवेग – व्यक्ति के समाज से सम्बन्ध स्थापित कराने वाले संवेगों को सामाजिक संवेग कहा गया है। इस वर्ग के मुख्य संवेग हैं—प्रेम, सहानुभूति तथा सम्मान।
  4. नैतिक संवेग – इस वर्ग में नैतिकता से सम्बद्ध संवेगों को सम्मिलित किया गया है। इस वर्ग के मुख्य संवेग हैं-दया, करुणा, परोपकार तथा कर्तव्यपालन।
  5. सौदर्यात्मक संवेग – इस वर्ग में सौन्दर्य बोध से जुड़े हुए संवेगों को सम्मिलित किया गया है। इस वर्ग के मुख्य संवेग हैं-संगीत, कला या आकर्षक वस्तुओं से प्रेम।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. संवेग मूल रूप से जटिल, भावात्मक और ……………………. प्रक्रिया है।।
  2. प्रबल संवेगावस्था में व्यक्ति का मनोशारीरिक सन्तुलन ……………………. जाता है।
  3. प्रत्येक संवेग की उत्पत्ति के पीछे कोई-न-कोई ……………………. कारण निहित होता है।
  4. संवेगावस्था में अनिवार्य रूप से कुछ ……………………. परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं।
  5. प्रबल संवेगावस्था का व्यक्ति की चिन्तन क्षमता पर ……………………. प्रभाव पड़ता है।
  6. युद्धभूमि में राष्ट्र के लिए प्राण न्योछावर करने वाला देशभक्त सिपाही बुद्धि ……………………. से नहीं से प्रेरित होता है।
  7. संवेग जटिल तथा व्यापक होते हैं तथा भाव ……………………. होते हैं।
  8. सरल संवेगावस्था ……………………. में प्रकट होता है।
  9. जटिल संवेगावस्था में ……………………. संवेग मिश्रित रहते हैं।
  10. क्रोध तथा भय अपने आप में ……………………. संवेग हैं।
  11. प्रेम तथा घृणा अपने आप में ……………………. संवेग हैं।
  12. संवेगावस्था में प्रकट होने वाला मुख्य बाहरी शारीरिक परिवर्तन है ……………………. में परिवर्तन।
  13. प्रबल संवेगावस्था में हृदय की गति तथा रक्तचाप में ……………………. |
  14. उद्दीपक के प्रत्यक्षीकरण के पश्चात् पहले शारीरिक परिवर्तन होते हैं और इसके बाद संवेग की अनुभूति। यह ……………………. का मत है।
  15. ……………………. ने संवेग के हाइपोथैलेमस सिद्धान्त का प्रतिपादित किया।
  16. संवेग के विषय में कैनन-बार्ड द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त को ……………………. जाता है।
  17. संवेगों के अति अवदमन का व्यक्ति के व्यक्तित्व पर ……………………. प्रभाव पड़ता है।
  18. संवेगों के रेचन तथा मार्गान्तरीकरण द्वारा उन्हें ……………………. किया जा सकता है।

उत्तर :

  1. मानसिक
  2. बिगड़
  3. मनोवैज्ञानिक
  4. शारीरिक
  5. प्रतिकुल
  6. संवेग
  7. सरल तथा सीमित
  8. केवल एक ही संवेग
  9. दो या दो से अधिक
  10. सरल
  11. जटिल
  12. मखमण्डलीय अभिव्यक्ति
  13. अवश्य परिवर्तन होता है
  14. जेम्स-लॉज
  15. कैनन-बाडे
  16. हाइपोथैलेमिक सिलान्त
  17. प्रतिकूल
  18. नियन्त्रिता

प्रश्न II.
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
संवेग से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
संवेग एक जटिल, भावात्मक एवं मानसिक प्रक्रिया है। जब भाव का प्रकटीकरण बाहरी तथा आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों में हो जाता है, तब उसे संवेग कहते हैं।

प्रश्न 2.
संवेग की कोई एक सरल एवं स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
पी० टी० यंग के अनुसार, “संवेग सम्पूर्ण व्यक्ति का तीव्र उपद्रव है, जिसकी उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक कारणों से होती है तथा जिसके अन्तर्गत व्यवहार चेतन अनुभूति तथा जाठरिक क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं।”

प्रश्न 3.
संवेगों की चार मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(अ) संवेगों की उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक कारणों से होती है, (ब) संवेगों में कुछ बाहरी तथा आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन होते हैं, (स) संवेगों में विचार-शक्ति का लोप हो जाता है। तथा (द) प्रत्येक संवेग का सम्बन्ध किसी-न-किसी मूल प्रवृत्ति से होता है।

प्रश्न 4.
भाव तथा संवेगे में क्या-क्या समानताएँ हैं?
उत्तर
(अ) भाव तथा संवेग दोनों का सम्बन्ध, मस्तिष्क से होता है, (ब) अनेक संवेग साधारण रूप में भाव होते हैं तथा भाव भी तीव्र रूप में संवेग बन जाता है और (स) भाव तथा संवेग दोनों में ही सुख या दुःख पाया जाता है।

प्रश्न 5.
भाव तथा संवेग में पाये जाने वाले चार मुख्य अन्तर लिखिए।
उत्तर :
(अ) भाव की तुलना में संवेग अधिक जटिल होते हैं, (ब) भाव की तुलना में संवेग अधिक व्यापक होते हैं, (स) भाव की तुलना में संवेग अधिक उग्र होते हैं तथा (द) भाव की तुलना में संवेग की दशा में अधिक सक्रियता पायी जाती है।

प्रश्न 6.
क्रोध नामक संवेग के बाहरी शारीरिक लक्षण बताइए।
उत्तर :
क्रोध की दशा में व्यक्ति का चेहरा लाल हो जाता है, भौंहें चढ़ जाती हैं, होंठ कापने लगते हैं, मुट्ठियाँ कस जाती हैं, दाँत पीसने लगते हैं तथा व्यक्ति आघात करता एवं गरजता है।

प्रश्न 7.
भय नामक संवेग की उत्पत्ति के मुख्य कारण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
जब किन्हीं भयानक परिस्थितियों से घिरकर व्यक्ति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है तब भय नामक संवेग की उत्पत्ति होती है।

प्रश्न 8.
हर्ष नामक संवेग के बाहरी शारीरिक लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
हर्ष नामक संवेग के मुख्य बाहरी शारीरिक लक्षण हैं-चेहरा खिल उठना, चेहरे पर मुस्कान तथा हास्य भाव आना, आँखों में चमक आ जाना, प्रसन्नतावश ताली बजाना, उछलना, नाचना, कूदना, गाना गाने लगना आदि।

प्रश्न 9.
आश्चर्य नामक संवेग के मुख्य बाहरी शारीरिक लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
आश्चर्य नामक संवेग के मुख्य बाहरी लक्षण हैं-चौंक पड़ना, आँखें फैल जाना, होंठ खुले रह जाना, साँस रुक जाना, काँपना आदि।

प्रश्न 10.
संवेगावस्था में प्रकट होने वाले मुख्य बाहरी शारीरिक लक्षणों का उल्लेख कीजिए!
उत्तर :
(अ) मुखमण्डलीय अभिव्यक्तियों में परिवर्तन, (ब) स्वर में परिवर्तन तथा (स) शारीरिक मुद्राओं या आसनिक अभिव्यक्ति में परिवर्तन।

प्रश्न 11.
संवेगावस्था में होने वाले मुख्य आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए। या संवेग की अवस्था में होने वाले चार महत्त्वपूर्ण शारीरिक परिवर्तनों को बताइए।
उत्तर :
(अ) हृदय की गति में परिवर्तन, (ब) रक्तचाप में परिवर्तन, (स) रक्त रसायन में परिवर्तन, (द) रसपरिपाक में परिवर्तन, (य) साँस की गति में परिवर्तन, (र) वैद्युत त्वक्-अनुक्रिया में परिवर्तन तथा (ल) मस्तिष्क तरंगों में परिवर्तन।

प्रश्न 12.
संवेगों की व्याख्या करने वाले कैनन-बार्ड सिद्धान्त को किन नामों से भी जाना जाता है?
उत्तर :
कैनन-बार्ड सिद्धान्त को ‘हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त’ तथा ‘आकस्मिक सिद्धान्त के नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न 13.
संवेगों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति को रोकने या टालने की प्रक्रिया को मनोविज्ञान की भाषा में क्या कहते हैं?
उत्तर :
संवेगों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति को रोकने या टालने की प्रक्रिया को मनोविज्ञान की भाषा में ‘संवेगों को अवदमन’ कहते हैं।

प्रश्न 14.
संवेगों को नियन्त्रित करने के मुख्य उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(अ) अवांछनीय संवेगों के विपरीत परिस्थितियों का सृजन, (ब) संवेगों का रेचन, (स) संवेगों का शोधन तथा (द) संवेगों का मार्ग-परिवर्तन।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
व्यक्ति की उस दशा को क्या कहते हैं जिसमें व्यक्ति आवेश में आ जाता है, भड़क उठता है। अथवा उत्तेजित हो जाता है?
(क) भाव
(ख) प्रेरणा
(ग) मूल प्रवृत्ति
(घ) संवेग

प्रश्न 2.
“संवेग शब्द किसी भी प्रकार के आवेग में आने, भड़क उठने या उत्तेजित होने की दशा को सूचित करता है।” यह कथन किसका है?
(क) गिलफोर्ड
(ख) वुडवर्थ
(ग) आर्थर टी० जर्सील्ड
(घ) पी० टी० यंग

प्रश्न 3.
संवेगों की स्थिति में सर्वप्रथम परिवर्तित हो जाती है –
(क) व्यक्ति की बातचीत
(ख) व्यक्ति की शारीरिक गतिविधियाँ
(ग) चेहरे की अभिव्यक्तियाँ
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 4.
संवेगों की अवस्था में क्रियाशील हो जाता है-
(क) थैलेमस
(ख) हाइपोथैलेमस
(ग) सुषुम्ना
(घ) लघु मस्तिष्क

प्रश्न 5.
संवेगावस्था में निम्नलिखित में से कौन-सा गुण विद्यमान होता है?
(क) चंचलता
(ख) स्थायित्व
(ग) मानसिक साम्य
(घ) निष्क्रियता

प्रश्न 6.
संवेगावस्था में होने वाले मुख्य आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन हैं
(क) रक्तचाप तथा रक्त-रसायन में परिवर्तन
(ख) हृदय तथा श्वास की गति में परिवर्तन
(ग) रस-परिपाक में उल्लेखनीय परिवर्तन
(घ) ये सभी परिवर्तन

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से कौन-सा संवेग सरल संवेग है ?
(क) प्रेम
(ख) भय
(ग) घृणा
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 8.
जेम्स-लॉज सिद्धान्त का सम्बन्ध है
(क) संवेग से
(ख) अधिगम से
(ग) चिन्तन से
(घ) स्मृति से

प्रश्न 9.
शारीरिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप ही संवेग की अनुभूति होती है। यह मान्यता किस सिद्धान्त की है?
(क) कैनन-बार्ड सिद्धान्त
(ख) जेम्स-लॉज सिद्धान्त
(ग) लीपर द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 10.
संवेग सम्बन्धी हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं –
(क) जेम्स तथा लाँज :
(ख) कैनन तथा बार्ड
(ग) लेपियर
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 11.
कैनन-बार्ड सिद्धान्त का सम्बन्ध है –
(क) विस्मृति से
(ख) संवेग से
(ग) अभिप्रेरणा से
(घ) चिन्तन से

प्रश्न 12.
किस सिद्धान्त के अनुसार संवेगावस्था में शारीरिक परिवर्तन तथा संवेग की अनुमति साथ-साथ होती है?
(क) लीपर द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त
(ख) जेम्स-लाँज सिद्धान्त
(ग) कैनन-बार्ड सिद्धान्त
(घ) ये सभी सिद्धान्त

प्रश्न 13.
संवेगों के अवदमन से क्या आशय है?
(क) प्रायः शान्त बैठे रहना।
(ख) सदैव संवेगों की मुक्त अभिव्यक्ति
(ग) संवेग की स्वाभाविक अभिव्यक्ति पर रोक लग जाना
(घ) सदैव प्रसन्न रहना

प्रश्न 14.
संवेगों के अति अवदमन के परिणाम स्वरूप
(क) व्यक्ति मानसिक एवं स्नायविक रोगग्रस्त हो सकता है।
(ख) व्यक्तित्व का सुचारु विकास अवरुद्ध हो सकता है।
(ग) व्यक्ति कुण्ठाओं का शिकार हो सकता है।
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 15.
संवेगों को नियन्त्रित किया जा सकता है –
(क) संवेगों के विरोध द्वारा
(ख) संवेगों के रेचन द्वारा
(ग) संवेगों के मार्गान्तरीकरण एवं शोध द्वारा
(घ) इन सभी उपायों द्वारा

उत्तर :

  1. (घ) संवेग
  2. (ग) आर्थर टी० बसल्ड
  3. (ग) चेहरे की अभिव्यक्तियाँ
  4. (ख) हाइपोथैलेमस
  5. (क) चंचलता
  6. (घ) ये सी परिवर्तन
  7. (ख) भय
  8. (क) संवेग से
  9. (ख) जेम्स-लाँज सिद्धान्त
  10. (ख) कैनन तथा बार्ड
  11. (ख) संवेग से
  12. (ग) कैन-बार्ड सिद्धान्त
  13. (ग) संवेगों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति पर रोक लग जाना
  14. (घ) उपर्युक्त सभी
  15. (घ) इन सभी उपायों द्वारा।

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