UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 8 Secularism

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 8 Secularism (धर्मनिरपेक्षता)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी बातें धर्मनिरपेक्षता के विचार से संगत हैं? कारण सहित बताइए।
(क) किसी धार्मिक समूह पर दूसरे धार्मिक समूह का वर्चस्व न होना।
(ख) किसी धर्म को राज्य के धर्म के रूप में मान्यता देना।
(ग) सभी धर्मों को राज्य का समान आश्रय होना।
(घ) विद्यालयों में अनिवार्य प्रार्थना होना।
(ङ) किसी अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पृथक शैक्षिक संस्थान बनाने की अनुमति होना।
(च) सरकार द्वारा धार्मिक संस्थाओं की प्रबन्धन समितियों की नियुक्ति करना।
(छ) किसी मन्दिर में दलितों के प्रवेश के निषेध को रोकने के लिए सरकार का हस्तक्षेप।
उत्तर-
(ङ) किसी अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पृथक् शैक्षिक संस्थान बनाने की अनुमति होना, धर्मनिरपेक्षता के विचार से संगत है। क्योंकि इसमें अल्पसंख्यक समुदाय को आगे बढ़ाने के लिए सरकार सहायता कर रही है। यह कार्य भारतीय संविधान द्वारा भी मान्यता प्राप्त है।
(छ) किसी मन्दिर में दलितों के प्रवेश के निषेध को रोकने के लिए सरकार का हस्तक्षेत्र उचित है, क्योंकि सरकार का यह व्यवहार धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को प्रकट करता है।

प्रश्न 2.
धर्मनिरपेक्षता के पश्चिमी और भारतीय मॉडल की कुछ विशेषताओं का आपस में घालमेल हो गया है। उन्हें अलग करें और एक नई सूची बनाएँ।
UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 8 Secularism 1

प्रश्न 3.
धर्मनिरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? क्या इसकी बराबरी धार्मिक सहनशीलता से की जी सकती है?
उत्तर-
धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि उस राज्य में विभिन्न धर्मों तथा मत मतान्तरों को मानने वाले रहते हैं। लेकिन राज्य का अपना कोई विशिष्ट धर्म नहीं होगा तथा वह धार्मिक कार्यों में भाग भी नहीं लेगा और किसी के धर्म में रुकावट भी उत्पन्न नहीं करेगा। इसकी बराबरी धार्मिक सहनशीलता से नहीं की जा सकती है। राष्ट्र की एकता, अखण्डता तथा सुदृढ़ता के लिए धर्मनिरपेक्षता को ही अपनाना उचित है। सभी नागरिकों से एकसमान न्याय करने के उद्देश्य से भी धर्मनिरपेक्षता की नीति तर्क संगत है।

प्रश्न 4.
क्या आप नीचे दिए गए कथनों से सहमत हैं? उनके समर्थन या विरोध के कारण भी दीजिए।
(क) धर्मनिरपेक्षता हमें धार्मिक पहचान बनाए रखने की अनुमति नहीं देती है।
(ख) धर्मनिरपेक्षता किसी धार्मिक समुदाय के अन्दर या विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच
असमानता के खिलाफ है।
(ग) धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्म पश्चिमी और ईसाई समाज में हुआ है। यह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है।
उत्तर-
(क) धर्मनिरपेक्षता हमें धार्मिक पहचान बनाए रखने की अनुमति नहीं देती है। यह कथन गलत है धर्मनिरपेक्षता में हम अपनी धार्मिक पहचान बनाए रख सकते हैं। चूंकि राज्य धर्म में हस्तक्षेप नहीं करता है।
(ख) धर्मनिरपेक्षता किसी धार्मिक समुदाय के अन्दर या विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच असमानता के खिलाफ है। यह कथन सही हैं। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ ही यह है कि धार्मिक समुदायों में हस्तक्षेप न किया जाए। सभी को समान दृष्टि से देखा जाए।
(ग) धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्म पश्चिमी और ईसाई समाज में हुआ है। यह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है। यह कथन गलत है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से बुनियादी रूप से भिन्न है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता भारतीय विचारकों की देन है।

प्रश्न 5.
भारतीय धर्मनिरपेक्षता का जोर धर्म और राज्य के अलगाव पर नहीं वरन उससे अधिक किन्ही बातों पर है। इस कथन को समझाइए।
उत्तर-
भारतीय धर्मनिरपेक्षता केवल धर्म और राज्य के बीच सम्बन्धविच्छेद पर बल देती है। अन्तरधार्मिक समानता भारतीय संकल्पना के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता की विशेषताएँ इसकी प्रकृति को स्पष्ट करती हैं। सर्वप्रथम तो भारतीय धर्मनिरपेक्षता गहरी धार्मिक विविधता के सन्दर्भ में जन्मी थी। यह विविधता पश्चिमी आधुनिक विचारों और राष्ट्रवाद के आगमन से पूर्व की चीज है। भारत में पूर्व से ही अन्तर धार्मिक सहिष्णुता’ की संस्कृति मौजूद थी। हमें याद रखना। चाहिए कि ‘सहिष्णुता’ धार्मिक वर्चस्व की विरोधी नहीं है। सम्भव है सहिष्णुता में हर किसी को कुछ मौका मिल जाए, लेकिन ऐसी स्वतन्त्रता प्रायः सीमित होती है। इसके अतिरिक्त सहिष्णुता हम में उन लोगों को बर्दाश्त करने की क्षमता उत्पन्न करती है जिन्हें हम पसन्द नहीं करते हैं। यह उस समाज के लिए तो विशिष्ट गुण है जो किसी बड़े गृहयुद्ध से उभर रहा हो मगर शान्ति के समय में नहीं जब लोग समान मान-मर्यादा के लिए संघर्षरत हों।

पश्चिमी आधुनिकता के प्रभावस्वरूप भारतीय चिन्तन में समानता की अवधारणा उभरकर सामने आई। इसने हमें समुदाय में समानता पर जोर देने की दिशा में अग्रसर किया। इसने भारतीय समाज में मौजूद श्रेणीबद्धता को हटाने के लिए अन्तर सामुदायिक समानता के विचार को भी उद्घाटित किया। इस प्रकार भारतीय समाज में पूर्व से ही मौजूद धार्मिक विविधता और पश्चिम से आए विचारों के बीच अन्त:क्रिया प्रारम्भ हुई जिसके परिणामस्वरूप भारतीय धर्मनिरपेक्षता ने विशिष्ट रूप धारण कर लिया।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता ने अन्त:धार्मिक और अन्तरधार्मिक वर्चस्व पर एक साथ ध्यान केन्द्रित किया। इसने हिन्दुओं के अन्दर महिलाओं के उत्पीड़ने और भारतीय मुसलमानों अथवा ईसाइयों के अन्दर महिलाओं के प्रति भेदभाव तथा बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों के अधिकारों पर उत्पन्न किए जा सकने वाले खतरों का समान रूप से विरोध किया। इस प्रकार, यह मुख्य धारा की पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से पहली महत्त्वपूर्ण भिन्नता है। इसी से सम्बद्ध दूसरी भिन्नता यह है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता का सम्बन्ध व्यक्तियों की धार्मिक स्वतन्त्रता से ही नहीं, अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक स्वतन्त्रता से भी है। इसके अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसन्द का धर्म मानने का अधिकार है।

इसी प्रकार धार्मिक अल्पसंख्यकों को भी अपनी स्वयं की संस्कृति और शैक्षिक संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार है। एक अन्य भिन्नता भी है, चूंकि धर्मनिरपेक्ष राज्य को अन्तरधार्मिक वर्चस्व के मसले पर भी समान रूप से चिन्तित रहना है; अतः भारतीय धर्मनिरपेक्षता में राज्य समर्थित धार्मिक सुधार की जगह भी है और अनुकूलता भी। अन्त में, धर्मनिरपेक्षता का तात्पर्य शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व अथवा सहिष्णुता से बहुत आगे तक जाता है। इस मुहावरे का आशय विभिन्न धर्मों के प्रति सम्मान की भावना है, तो इसमें एक अस्पष्टता है, जिसे स्पष्ट करना आवश्यक है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता विविध धर्मों में राज्य सत्ता के सैद्धान्तिक हस्तक्षेप की अनुमति प्रदान करती है। ऐसा हस्तक्षेप प्रत्येक धर्म के कुछ विशिष्ट पहलुओं के प्रति असम्मान प्रदर्शित करती है।

प्रश्न 6.
सैद्धान्तिक दूरी क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर-
भारतीय संविधान घोषणा करता है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक को देश के किसी भी भाग में स्वतन्त्रता और प्रतिष्ठा के साथ रहने का अधिकार है। मगर वास्तव में वर्जना और भेदभाव के अनेक रूप अभी दिखाई देते हैं। इसके अग्रलिखित उदाहरण प्रस्तुत हैं-

  1. सन् 1984 के दंगों में दिल्ली और देश के शेष भागों में लगभग 4,000 सिखों को मार दिया गया। पीड़ितों के परिजनों का मानना है कि दोषियों को आज तक सजा नहीं मिली है।
  2. हजारों कश्मीरी पण्डितों को घाटी में अपना घर छोड़ने के लिए विवश किया गया। वे दो दर्शकों के बाद भी अपने घर नहीं लौट सके हैं।
  3. सन् 2002 में गुजरात में लगभग 2,000 मुसलमान मारे गए। इन परिवारों के जीवित बचे हुए अनेक सदस्य अभी भी अपने गाँव वापस नहीं जा सके हैं, जहाँ से वे उजाड़ दिए गए थे।

उपर्युक्त प्रस्तुत उदाहरणों में किसी-न-किसी रूप में भेदभाव दिखाई देता है। प्रत्येक मामले में किसी एक धार्मिक समुदाय के लोगों को निशाना बनाया गया और उनकी धार्मिक पहचान के कारण उन्हें सताया गया। दूसरों शब्दों में नागरिकों के एक समूह को बुनियादी स्वतन्त्रता से वंचित किया गया। यह भी कहा जा सकता है कि यह समस्त उदाहरण अन्तरधार्मिक वर्चस्व और एक धार्मिक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय के उत्पीड़न के प्रकरण हैं। धर्मनिरपेक्षता को सर्वप्रथम और सर्वप्रमुख रूप से ऐसा सिद्धान्त समझा जाना चाहिए जो अन्तर धार्मिक वर्चस्व का विरोध करता है। हालाँकि यह धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा के महत्त्वपूर्ण पहलुओं में से केवल एक है।
धर्मनिरपेक्षता का इतना ही महत्त्वपूर्ण दूसरा पहलू अन्त:धार्मिक वर्चस्व अर्थात् धर्म में । छिपे वर्चस्व का विरोध करना है। यही सैद्धान्तिक दूरी है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है?
(क) पाकिस्तान
ख) भूटान
(ग) भारत
(घ) चीन
उत्तर-
(ग) भारत।

प्रश्न 2.
जन समुदाय के लिए अफीम किसे माना गया है?
(क) धर्म को
(ख) राष्ट्र को
(ग) साम्प्रदायिकता को
(घ) प्रशासन को
उत्तर-
(क) धर्म को।

प्रश्न 3.
मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने धर्मनिरपेक्षता का मॉडल किस राज्य में प्रस्तुत किया?
(क) तुर्की में
(ख) फ्रांस में
(ग) चीन में
(घ) भारत में
उत्तर-
(क) तुर्की में।

प्रश्न 4.
भारत में धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार संविधान के किस अनुच्छेद में दिया गया है?
(क) अनुच्छेद 25-28
(ख) अनुच्छेद 26-27
(ग) अनुच्छेद 31-32
(घ) अनुच्छेद 30-35
उत्तर-
(क) अनुच्छेद 25-28.

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘धर्मनिरपेक्ष शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर-
‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द अंग्रेजी भाषा के सेक्युलर’ (Secular) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। Secular शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘सरक्युलम’ (Sarculum) शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है-‘संसार’ अथवा ‘युग’।

प्रश्न 2.
धर्मनिरपेक्ष की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
जॉर्ज ऑस्लर के अनुसार, “धर्मनिरपेक्ष का अर्थ इस विश्व या वर्तमान जीवन से सम्बन्धित है, जो धार्मिक द्वैतवादी विचारों से बँधा हुआ न हो।”

प्रश्न 3.
धर्मनिरपेक्ष राज्य की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
एच० बी० कामथ के अनुसार, “एक धर्मनिरपेक्ष राज्य न तो ईश्वर रहित राज्य है, न ही यह अधर्मी राज्य है और न ही धर्म-विरोधी। धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का अर्थ यह है कि इसमें ईश्वर पर आधारित धर्म के अस्तित्व को नहीं माना जाता।”

प्रश्न 4.
धर्मनिरपेक्षता किस प्रकार की अवधारणा है?
उत्तर-
धर्मनिरपेक्षता मूल रूप से एक लोकतान्त्रिक अवधारणा है।

प्रश्न 5.
धर्मनिरपेक्ष राज्य के कोई दो गुण लिखिए।
उत्तर-
(i) धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में राष्ट्रीय भावनाओं को प्रोत्साहन प्राप्त होता है।
(ii) धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में साम्प्रदायिकता की भावना को कम किया जा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कमाल अतातुर्क की धर्मनिरपेक्षता के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
लीसवीं सदी के प्रथमार्द्ध में तुर्की में धर्मनिरपेक्षता अमल में आई। यह धर्मनिरपेक्षता संगठित धर्म से सैद्धान्तिक दूरी बनाने के स्थान पर धर्म में सक्रिय हस्तक्षेप के माध्यम से उसके दमन की पक्षधर थी। मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने इस प्रकार की धर्मनिरपेक्षता प्रस्तुत की और उसे प्रयोग में भी लाए।
अतातुर्क प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् सत्ता में आए। वे तुर्की के सार्वजनिक जीवन में खिलाफत को समाप्त कर देने के लिए कटिबद्ध थे। वे मानते थे कि परम्परागत सोच-विचार और अभिव्यक्तियों से नाता तोड़े बगैर तुर्की को उसकी दु:खद स्थिति से नहीं उभारा जा सकता। उन्होंने तुर्की को आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष बनाने के लिए आक्रामक ढंग से कदम बढ़ाए। उन्होंने स्वयं अपना नाम मुस्तफा कमाल पाशा से बदलकर अतातुर्क कर लिया। (अतातुर्क का अर्थ होता है तुर्को का पिता)। हैट कानून के माध्यम से मुसलमानों द्वारा पहनी जाने वाली परम्परागत फैज टोपी को प्रतिबन्धित कर दिया। स्त्रियों-पुरुषों के लिए पश्चिमी पोशाकों को बढ़ावा दिया गया। तुर्की पंचांग की जगह पश्चिमी (ग्रिगोरियन) पंचांग लाया गया। 1928 ई० में नई तुर्की वर्णमाला को संशोधित लैटिन रूप से अपनाया गया।

प्रश्न 2.
वास्तविक धर्मनिरपेक्ष होने के लिए राज्य के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर-
सचमुच धर्मनिरपेक्ष होने के लिए राज्य को न केवल धर्मतान्त्रिक होने से मना करना होगा बल्कि उसे किसी भी धर्म के साथ किसी भी तरह के औपचारिक कानूनी गठजोड़ से दूरी भी रखनी होगी। धर्म और राज्यसत्ता के बीच सम्बन्ध-विच्छेद धर्मनिरपेक्ष राज्यसत्ता के लिए आवश्यक है, मगर केवल यही पर्याप्त नहीं है। धर्मनिरपेक्ष राज्य को ऐसे सिद्धान्तों और लक्ष्यों के लिए अवश्य प्रतिबद्ध होना चाहिए जो अंशत: ही सही, गैर-धार्मिक स्रोतों से निकलते हों। ऐसे लक्ष्यों में शान्ति, धार्मिक स्वतन्त्रता, धार्मिक उत्पीड़न, भेदभाव और वर्जना से आजादी और साथ ही अन्तर-धार्मिक व अन्त:धार्मिक समानता सम्मिलित रहनी चाहिए।

प्रश्न 3.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
समाजवादी पन्थनिरपेक्ष राज्य।
उत्तर-
पन्थनिरपेक्षता या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है तथा राज्य के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी धर्म का पालन करने को अधिकार होगा। राज्य, धर्म के आधार पर नागरिकों के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा तथा धार्मिक मामलों में विवेकपूर्ण निर्णय लेगा। इसके अतिरिक्त, राज्य के द्वारा सभी व्यक्तियों के धार्मिक अधिकारों को सुनिश्चित एवं सुरक्षित करने का प्रयास किया जाएगा। राज्य धार्मिक मामलों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगा, वरन् धार्मिक सहिष्णुता एवं धार्मिक समभाव की नीति को प्रोत्साहित करने का प्रयास करेगा। धर्म के सम्बन्ध में राज्य सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार करेगा। इस प्रकार की पन्थ-निरपेक्षता या धर्मनिरपेक्षता का पालन करने वाले शासन को पन्थनिरपेक्ष या धर्मनिरपेक्ष राज्य कहते हैं।

प्रश्न 4.
भारत में धर्मनिरपेक्षता को अपनाना क्यों आवश्यक था?
उत्तर-
हम सभी जानते हैं कि भारत एक विशाल लोकतान्त्रिक देश है। ऐसे देश में राज्य को धर्म-निरपेक्ष बनाना सर्वथा आवश्यक है, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता मूल रूप से एक लोकतान्त्रिक अवधारणा है। यदि हम इतिहास पर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्मनिरपेक्षता एवं लोकतन्त्र सहगामी हैं। जब कभी धर्म की आड़ में राजाओं ने जनता पर अत्याचार किए तब जनता ने उनके शासन के विरुद्ध विद्रोह करना प्रारम्भ किया। भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध 1857 ई० की क्रान्ति को प्रमुख कारण यह था कि ब्रिटिश शासकों ने हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही धर्मों के मानने वालों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का प्रयास किया था। कालान्तर में धर्मनिरपेक्षता एवं लोकतन्त्र दोनों को मान्यता मिली। इसके अतिरिक्त, एक लोकतान्त्रिक देश में धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना इसलिए भी उचित होती है कि स्वतन्त्रता, समानता, भ्रातत्व एवं सहिष्णुता के जिन आदर्शों की स्थापना लोकतन्त्र द्वारा होती है, वे धर्मनिरपेक्षता के भी आदर्श होते हैं।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धर्मनिरपेक्ष से क्या अभिप्राय है? धर्मनिरपेक्ष राज्य की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द अंग्रेजी भाषा के सेक्युलर’ (Secular) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। Secular शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘सरक्युलम’ (Sarculum) शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है–‘संसार’ अथवा युग’। इस प्रकार शब्द-व्युत्पत्ति के आधार पर ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द से अभिप्राय सांसारिक, लौकिक अथवा ऐतिहासिक से है। दूसरे शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष धार्मिक अथवा पारलौकिक का प्रतिलोम है।” धर्मनिरपेक्ष राज्य की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं
जॉर्ज ऑस्लर के शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष का अर्थ इस विश्व या वर्तमान जीवन से सम्बन्धित है, जो धार्मिक या द्वैतवादी विचारों से बँधा हुआ न हो।”
एच०बी० कामथ के अनुसार, “एक धर्मनिरपेक्ष राज्य न तो ईश्वर-रहित है, न ही यह अधर्मी राज्य है। और न ही धर्मविरोधी। धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का अर्थ यह है कि इसमें ईश्वर पर आधारित धर्म के अस्तित्व को नहीं माना जाता।”
डोनाल्ड स्मिथ के शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष राज्य वह है, जिसके अन्तर्गत धर्म-विषयक व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वतन्त्रता सुरक्षित रहती है; जो व्यक्ति के साथ व्यवहार करते समय धर्म को बीच में नहीं लाता; जो संवैधानिक रूप से किसी धर्म से सम्बन्धित नहीं है और न किसी धर्म की उन्नति का प्रयास करता है तथा न ही किसी धर्म के मामले में हस्तक्षेप करता है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य से अभिप्राय एक ऐसे राज्य से है जिसका अपना कोई धर्म नहीं होता और जो धर्म के आधार पर व्यक्तियों में कोई भेदभाव नहीं करता है। इसका अर्थ एक धर्म-विरोधी, अधर्मी या ईश्वररहित राज्य से नहीं है, वरन् एक ऐसे राज्य से है जो धार्मिक मामलों में पूर्णतया तटस्थ रहता है क्योंकि यह धर्म को व्यक्ति की व्यक्तिगत वस्तु मानता है।

प्रश्न 2.
भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य का स्वरूप क्या है?
उत्तर-
भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य का रूप
भारत संविधान से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि संविधान निर्माताओं ने भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य को स्थापित करने का पूर्ण प्रयास किया है। भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्ष राज्य के दो आधार हैं

प्रथम, भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न केवल इस बात का उल्लेख किया गया है कि यहाँ सभी नागरिकों को विचार-अभिव्यक्ति, विश्वास व धर्म की उपासना की स्वतन्त्रता प्रदान करने का प्रयास किया जाएगा।” वरन् इसमें 42वें संशोधन द्वारा ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को जोड़कर स्थिति और भी स्पष्ट कर दी गई है।

द्वितीय, संविधान में धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना का दूसरा आधार भारतीय नागरिकों को मूल अधिकार के रूप में, धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान किया जाना है। संविधान के 25वें से 28वें अनुच्छेद नागरिकों की धार्मिक स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकार का उल्लेख करते हैं।

भारत में धर्मनिरपेक्षता के आदर्श को न केवल सिद्धान्त में वरन् व्यवहार में भी अपनाया गया है। भारत में धार्मिक आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता, वरन् यहाँ सभी धर्मों को समान रूप से मान्यता दी गई है। उदाहरण के लिए-1956 ई० में दिल्ली में आयोजित ‘बौद्ध धर्म सम्मेलन’ तथा 1964 ई० में मुम्बई में आयोजित ईसाई धर्म सम्मेलन को सफल बनाने के लिए सरकार ने वित्तीय सहायता और प्रशासनिक सहयोग भी दिया। इसके अतिरिक्त, भारत में धर्म-निरपेक्षता के सिद्धान्त का लागू किया जाना इस बात से भी सिद्ध होता है कि यहाँ धर्मों के प्रतिभाशाली व्यक्ति शासन में उच्च पदों पर आसीन रहे हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना को न केवल भारत के लिए उचित समझा जाता है, वरन् भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य के आदर्श को लागू भी किया गया है।

प्रश्न 3.
धर्मनिरपेक्षता वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा देती है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? तर्क पूर्ण उत्तरदीजिए।
उत्तर-
धर्मनिरपेक्षता वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा देती है। अनुभवजन्य रूप में यह पूर्णतः असत्य भी नहीं है। प्रथमतः लोकतन्त्र में राजनेताओं के लिए वोट पाना आवश्यक है। यह उनके काम का अंग है और लोकतान्त्रिक राजनीतिक बहुत कुछ ऐसी ही है। लोगों के किसी समूह के पीछे लगने या उनका वोट प्राप्त करने की खातिर कोई नीति बनाने का वादा करने के लिए राजनेताओं को दोष देना उचित नहीं होगा। वास्तविक रूप से प्रश्न तो यह है कि वे ठीक-ठीक किस उद्देश्य से वोट पाना चाहते हैं? इसमें सिर्फ उन्हीं का हित है या विचाराधीन समूह का भी हित है। यदि किसी राजनेता को वोट देने वाला समूह उसके द्वारा बनवाई गई नीति से लाभान्वित नहीं हुआ, तो बेशक वह राजनेता दोषी होगा।

यदि अल्पसंख्यकों को वोट चाहने वाले धर्मनिरपेक्ष राजनेता उनकी इच्छा पूरी करने में समर्थ होते हैं, तो यह उस धर्मनिरपेक्ष परियोजना की सफलता होगी, जो आखिरकार अल्पसंख्यकों के हितों की भी रक्षा करती है।

लेकिन, अगर कोई व्यक्ति विचाराधीन समूह का कल्याण अन्य समूहों के कल्याण और अधिकारों की कीमत पर करना चाहे, तब क्या होगा? यदि ये धर्मनिरपेक्ष राजनेता बहुसंख्यकों के हितों को नुकसान, पहुँचाएँ, तब क्या होगा? तब एक नया अन्याय सामने आएगा। लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि पूरा राजनीति तन्त्र अल्पसंख्यकों के पक्ष में झुका हुआ हो परन्तु भारत में ऐसा कुछ हुआ है, इसका कोई प्रमाण नहीं है। संक्षेप में, वोट बैंक की राजनीति स्वयं में इतनी गलत नहीं है। गलत तो वोट बैंक की वैसी राजनीति है, जो अन्याय को जन्म देती है। केवल यह तथ्य कि धर्मनिरपेक्ष दल वोट बैंक का प्रयोग करते हैं, कष्टकारक नहीं है। भारत में हर समुदाय के सन्दर्भ में सभी दल ऐसा करते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय धर्मनिरपेक्षता की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर-
भारतीय धर्मनिरपेक्षता की आलोचना के लिए निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं-

1. धर्म-विरोधी- धर्मनिरपेक्षता, धर्म-विरोधी है। हम सम्भवतया यह दिखा पाने में सफल हुए हैं। | कि धर्मनिरपेक्षता संस्थाबद्ध धार्मिक वर्चस्व का विरोध करती है। यह धर्म-विरोधी होने का पर्याय नहीं है।

2. पश्चिम से आयातित- धर्मनिरपेक्षता के विषय में कहा जा सकता है कि यह पश्चिम से आयातित है अर्थात् यह ईसाइयतं से सम्बद्ध है। यह आलोचना बड़ी विचित्र है। पश्चिमी राष्ट्र तब ,धर्म-निरपेक्ष बने, जब एक महत्त्वपूर्ण स्तर पर उन्होंने ईसाइयत से सम्बन्ध समाप्त कर लिया। पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता में वैसी कोई ईसाइयत नहीं है। धर्म धर्म और राज्य का पारस्परिक निषेध, जिसे पश्चिमी धर्मनिरपेक्ष समाजों का आदर्श माना जाता है, सभी धर्मनिरपेक्ष राज्य सत्ता की प्रमुख विशेषता भी नहीं है। सम्बन्धविच्छेद के विचार की व्याख्या अलग-अलग प्रकार से की जा सकती है। कोई धर्मनिरपेक्ष राज्य सत्ता समुदायों के बीच शान्ति को बढ़ावा देने के लिए धर्म से सैद्धान्तिक दूरी बनाए रख सकती है और विशिष्ट समुदायों की रक्षा के लिए वह उसमें हस्तक्षेप भी कर सकती है। भारत में ठीक यही बात हुई, यहाँ ऐसी धर्मनिरपेक्षता विकसित हुई है, जो न तो पूरी तरह ईसाइयत से सम्बद्ध है न भारतीय जमीन पर सीधे-सीधे पश्चिमी आरोपण ही है। तथ्य तो यह है कि धर्मनिरपेक्षता का विगत इतिहास पश्चिमी और गैर-पश्चिमी, दोनों मार्गों का अनुसरण करता दिखाई देता है। पश्चिमी में राज्य और चर्च का सम्बन्ध विच्छेद का प्रश्न केन्द्रीय था और भारत जैसे देशों में शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व जैसे प्रश्न महत्त्वपूर्ण रहे हैं।

3. अल्पसंख्यकवाद- धर्मनिरपेक्षता पर अल्पसंख्यकवाद का आरोप भी लगाया जाता है। यह सच है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता अल्संख्यक अधिकारों की पैरवी करती है। मगर यह पैरवी न्यायोचित रूप से करती है, आलोचकों को अल्पसंख्यक अधिकारों को विशेष सुविधाओं के रूप में नहीं देखना चाहिए।

4. अधिक हस्तक्षेप- कुछ आलोचक कहते हैं कि धर्मनिरपेक्षता उत्पीड़नकारी है और समुदायों।
की धार्मिक स्वतन्त्रता में अधिक हस्तक्षेप करती है। यह भारतीय धर्मनिरपेक्षता के बारे में गलत समझ है। यह सच है कि पारस्परिक निषेध के रूप में धर्म और राज्य में सम्बन्ध-विच्छेद के विचार को न मानकर भारतीय धर्मनिरपेक्षता धर्म में हस्तक्षेप को अस्वीकार कर देती है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि यह अधिक हस्तक्षेपकारी है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता धर्म से सैद्धान्तिक दूरी बनाकर रखती है, साथ-साथ कुछ हस्तक्षेप की गुंजाइश भी रखती है किन्तु इस हस्तक्षेप का आशय उत्पीड़नकारी हस्तक्षेप नहीं होता।

प्रश्न 2.
“भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में
प्राचीनकाल से ही धर्म का बहुत महत्त्व रहा है तथा भारतीय सामाजिक और राजनीतिक जीवन धर्म से ओत-प्रोत रहा है। वर्तमान भारत का लोकतान्त्रिक गणराज्य नैतिकता, आध्यात्मिकता और मानव धर्म पर आधारित है। भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य को सुदृढ़ करने के लिए संविधान में निम्नलिखित व्यवस्थाएँ की गई हैं

1. राज्य का अपना कोई धर्म नहीं- संविधान के अनुसार भारत का अपना कोई धर्म नहीं है। राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान हैं।

2. धार्मिक आधार पर भेदभाव समाप्त- भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को यह विश्वास | दिलाया गया है कि धर्म के आधार पर उनके साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

3. कानून की दृष्टि से सभी व्यक्ति समान- संविधान के अनुच्छेद 14 अनुसार भारतीय राज्य-क्षेत्र में सभी व्यक्ति कानून की दृष्टि से समान होंगे और धर्म, जाति अथवा लिंग के | आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

4. धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार- भारतीय संविधान द्वारा प्रत्येक नागरिक को अनुच्छेद 25-28 द्वारा धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार प्रदान किया गया है। इसमें नागरिकों को अपने अन्त:करण के अनुसार किसी भी धर्म का पालन करने, छोड़ने, प्रचार करने आदि का पूर्ण अधिकार है। किसी भी नागरिक को किसी धर्म-विशेष का पालन करने या न करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।

5. धार्मिक संस्थाओं की स्थापना और धर्म-प्रचार की स्वतन्त्रता- संविधान के अनुसार सभी , धर्मों को स्वतन्त्रता प्रदान की गई है। इसके अनुसार प्रत्येक नागरिक को धार्मिक तथा परोपकारी उद्देश्य के लिए संस्थाएँ स्थापित करने, उनका संचालन करने, धार्मिक मामलों का प्रबन्ध करने, चल व अचल सम्पत्ति रखने और प्राप्त करने तथा ऐसी सम्पत्ति का कानून के अनुसार प्रबन्ध करने का अधिकार है।

6. धार्मिक शिक्षा का निषेध- अनुच्छेद 28 के अनुसार सरकारी शिक्षण संस्थाओं में किसी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती तथा सरकार से आर्थिक सहायता यी मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं में भी किसी को धार्मिक गतिविधियों तथा कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।

7. धार्मिक कार्यों के लिए किया जाने वाला व्यय कर-मुक्त- भारतीय संविधान अपने नागरिकों को न केवल धार्मिक स्वतन्त्रता और धार्मिक संस्थाओं की स्थापना की स्वतन्त्रता प्रदान करता है, वरन् संविधान के अन्तर्गत धार्मिक कार्यों के लिए किए जाने वाले व्यय को भी कर-मुक्त घोषित किया गया है।

8. साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का अन्त- संविधान द्वारा साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का अन्त कर दिया गया है। अब प्रत्येक धर्म के अनुयायी को वयस्क मताधिकार के आधार पर मत देने का अधिकार दिया गया है।
भारत का संविधान देश की एकता तथा अखण्डता को बनाए रखने तथा सार्वजनिक हित की। दृष्टि से धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार पर कुछ प्रतिबन्ध भी आरोपित करता है। भारत में सच्चे धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना की गई है।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 7 Nationalism

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 7 Nationalism (राष्ट्रवाद)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
राष्ट्र किस प्रकार से बाकी सामूहिक सम्बद्धताओं से अलग है?
उत्तर-
राष्ट्र जनता को कोई आकस्मिक समूह नहीं है। लेकिन यह मानव समाज में पाए जाने वाले अन्य समूहों अथवा समुदायों से अलग है। यह परिवार से भी अलग है। परिवार तो प्रत्यक्ष सम्बन्धों पर आधारित होता है जिसका प्रत्येक सदस्य दूसरे सदस्यों के व्यक्तित्व और चरित्र के विषय में व्यक्तिगत जानकारी रखता है। यह जनजातीय, जातीय और अन्य सगोत्रीय समूहों से भी अलग है। इन समूहों में विवाह और वंश परम्परा सदस्यों को आपस में जोड़ती है। इसलिए यदि हम सभी सदस्यों को। व्यक्तिगत रूप से भी नहीं जानते हों तो भी आवश्यकता पड़ने पर हम उन सूत्रों को खोज निकाल सकते हैं जो हमें आपस में जोड़ते हैं। लेकिन राष्ट्र के सदस्य के रूप में हम अपने राष्ट्र के अधिकांश सदस्यों को सीधे तौर पर न कभी जान पाते हैं और न ही उनके साथ वंशानुगत नाता जोड़ने की आवश्यकता पड़ती है। फिर भी राष्ट्र हैं, लोग उनमें रहते हैं और उनका सम्मान करते हैं।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार से आप क्या समझते हैं? किस प्रकार यह विचार राष्ट्र राज्यों के निर्माण और उनको मिल रही चुनौती में परिणत होता है?
उत्तर-
शेष सामाजिक समूहों से अलग राष्ट्र अपना शासन अपने आप करने और अपने भविष्य को तय करने का अधिकार चाहते हैं। दूसरों शब्दों में, वे आत्म-निर्णय का अधिकार मानते हैं। आत्म-निर्णय के अपने दावे में राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से माँग करता है कि उसके पृथक् राजनीतिक इकाई या राज्य के दर्जे को मान्यता और स्वीकार्यता दी जाए। अक्सर ऐसी माँग उन लोगों की ओर से आती है जो दीर्घकाल से किसी निश्चित भू-भाग पर साथ-साथ रहते आए हों और उनमें साझी पहचान का बोध हो। कुछ मामलों में आत्म-निर्णय के ऐसे दावे एक स्वतन्त्र राज्य बनाने की उस इच्छा से भी जुड़े होते हैं। इन दावों का सम्बन्ध किसी समूह की संस्कृति की संरक्षा से होता है।

प्रश्न 3.
हम देख चुके हैं कि राष्ट्रवाद लोगों को जोड़ भी सकता है और तोड़ भी सकता है। उन्हें मुक्त कर सकता है और उनमें कटुता और संघर्ष भी पैदा कर सकता है। उदाहरणों के साथ उत्तर दीजिए।
उत्तर-
विगत दो सौ वर्षों की अवधि में राष्ट्रवाद एक ऐसे सम्मोहक राजनीतिक सिद्धान्त के रूप में हमारे समाने आया है जिसे इतिहास रचने में योगदान किया है। इसने उत्कृष्ट निष्ठाओं के साथ-साथ गहन विद्वेषों को भी प्रेरित किया है। इसने जनता को जोड़ा है तो विभाजित भी किया है। इसने अत्याचारी शासन से मुक्ति दिलाने से सहायता की तो इसके साथ वह विरोध, कटुता और युद्धों का कारण भी रहा है। साम्राज्यों और राष्ट्रों के ध्वस्त होने का यह भी एक कारण रहा है। राष्ट्रवादी संघर्षों ने राष्ट्रों और साम्राज्यों की सीमाओं के निर्धारण-पुनर्निर्धारण में योगदान किया है। आज भी दुनिया का एक बड़ा भाग विभिन्न राष्ट्र राज्यों में बँटा हुआ है। हालाँकि राष्ट्रों की सीमाओं के पुनर्संयोजन की प्रक्रिया अभी समाप्त नहीं हुई है और वर्तमान राष्ट्रों के अन्दर भी अलगाववादी संघर्ष साधारण बात है। राष्ट्रवाद विभिन्न चरणों से गुजर चुका है। उदाहरण के लिए, 19वीं सदी के यूरोप में इसने कई छोटी-छोटी रियासतों के एकीकरण से वृहत्तर राष्ट्र-राज्यों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। वर्तमान जर्मनी और इटली का गठन एकीकरण और सुदृढ़ीकरण की इसी प्रक्रिया के माध्यम से हुआ था।

लेटिन अमेरिका में बड़ी संख्या में नए राज्य भी स्थापित किए गए थे। राज्य की सीमाओं के सुदृढ़ीकरण के साथ स्थानीय निष्ठाएँ और बोलियाँ भी निरन्तर राष्ट्रीय निष्ठाओं एवं सर्वमान्य जनभाषाओं के रूप में विकसित हुईं। नए राष्ट्रों के लोगों ने एक नवीन राजनीतिक पहचान प्राप्त की, जो राष्ट्र-राज्य की सदस्यता पर आधारित थी। विगत सदी में हमने देश को सुदृढ़ीकरण की ऐसी ही प्रक्रिया से गुजरते देखा है। लेकिन राष्ट्रवाद बड़े-बड़े साम्राज्यों के पतन में हिस्सेदार भी रहा है। यूरोप में 20वीं सदी के आरम्भ में ऑस्ट्रियाई-हंगेरियाई और रूसी साम्राज्य तथा इनके साथ एशिया और अफ्रीका में ब्रिटिश, फ्रांसीसी, डच और पुर्तगाली साम्राज्य के विघटन के मूल में राष्ट्रवाद ही था। भारत तथा अन्य पूर्वी उपनिवेशों के औपनिवेशिक शासन से स्वतन्त्र होने के संघर्ष भी राष्ट्रवादी संघर्ष थे। ये संघर्ष विदेशी नियन्त्रण से स्वतन्त्र राष्ट्र-राज्य स्थापित करने की आकांक्षा से प्रेरित थे।

प्रश्न 4.
वंश, भाषा, धर्म या नस्ल में से कोई भी पूरे विश्व में राष्ट्रवाद के लिए साझा कारण होने का दावा नहीं कर सकता। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-
साधारणतया यह माना जाता है कि राष्ट्रों का निर्माण ऐसे समूह द्वारा किया जाता है जो कुल या भाषा अथवा धर्म या फिर जातीयता जैसी कुछेक निश्चित पहचान का सहभागी होता है। लेकिन ऐसे निश्चित विशिष्ट गुण वास्तव में हैं ही नहीं जो सभी राष्ट्रों में समान रूप से मौजूद हों। कई राष्ट्रों की अपनी कोई एक सामान्य भाषी नहीं है। कनाड़ा का उदाहरण लिया जा सकता है। कनाडा में अंग्रेजी और फ्रांसीसी भाषा-भाषी लोग साथ रहते हैं। भारत में भी अनेक भाषाएँ हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में और भिन्न-भिन्न समुदायों द्वारा बोली जाती हैं। बहुत से शब्दों में उन्हें जोड़ने वाला कोई सामान्य धर्म भी नहीं है। नस्ल अथवा कुल जैसी अन्य विशिष्टताओं के लिए भी यही कहा जा सकता है। राष्ट्र बहुत सीमा तक एक काल्पनिक समुदाय होता है, जो अपने सदस्यों के सामूहिक विश्वास आकांक्षाओं और कल्पनाओं के सहारे एक सूत्र में बँधा होता है। यह कुछ मान्यताओं पर आधारित होता है जिन्हें लोग उस समग्र समुदाय के लिए तैयार करते हैं, जिससे वे अपनी पहचान बनाते हैं। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि वंश, भाषा, धर्म या नस्ल में से कोई भी पूरे विश्व में राष्ट्रवाद के लिए साझा कारण होने का दावा नहीं कर सकता।

प्रश्न 5.
राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रेरित करने वाले कारकों पर सोदाहरण रोशनी डालिए।
उत्तर-
राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रेरित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-

  1. साझे विश्वास – राष्ट्र विश्वास के माध्यम से बनता है। राष्ट्रवाद समूह के भविष्य के लिए सामूहिक पहचान और दृष्टि का प्रमाण है, जो स्वतन्त्र राजनीतिक अस्तित्व का आकांक्षी है।
  2. इतिहास – राष्ट्रवादी भावनाओं को इतिहास भी प्रेरित करती है। राष्ट्रवादियों में स्थायी ऐतिहासिक पहचान की भावना होती है। यानी वे राष्ट्र को इस रूप में देखते हैं जैसे वे बीते अतीत के साथ-साथ आने वाले भविष्य को समेटे हुए हैं।
  3. भू-क्षेत्र – राष्ट्रवादी भावनाएँ एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती हैं। किसी विशिष्ठ भू-क्षेत्र पर दीर्घकाल तक साथ-साथ रहना और उससे जुड़े साझे अतीत की यादें लोगों को एक सामूहिक पहचान का बोध कराती हैं।
  4. साझे राजनीतिक आदर्श – राष्ट्रवादियों की साझा राजनीतिक दृष्टि होती है कि वे किस प्रकार का राज्य बनाना चाहते हैं। शेष बातों के अलावा वे लोकतन्त्र, धर्म निरपेक्षता और उदारवाद जैसे मूल्यों और सिद्धान्तों को भी स्वीकार करते हैं।

प्रश्न 6.
संघर्षरत राष्ट्रवादी आकांक्षाओं के साथ बरताव करने में तानाशाही की अपेक्षा लोकतन्त्र अधिक समर्थ होता है। कैसे?
उत्तर-
लोकतन्त्र में कुछ राजनीतिक मूल्यों और आदर्शों के लिए साझी प्रतिबद्धता ही किसी राजनीतिक समुदाय या राष्ट्र का सर्वाधिक वांछित आधार होती है। इसके अन्तर्गत राजनीतिक समुदाय के सदस्य कुछ दायित्वों से बँधे होते हैं। ये दायित्व सभी लोगों के नागरिकों के रूप में अधिकारों को पहचान लेने से पैदा होते हैं। अगर राष्ट्र के नागरिक अपने सहनागरिकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को जान और मान लेते हैं तो इससे राष्ट्र मजबूत ही होता है। लोकतन्त्र राष्ट्रवाद की भावना को समझता है। तथा उसी की आधारशिला पर टिका हुआ है इसलिए तानाशाही की अपेक्षा लोकतन्त्र संघर्षरत राष्ट्रवादियों से अच्छा बरताव करता है।
प्रश्न 7.
आपकी राय में राष्ट्रवाद की सीमाएँ क्या हैं?
उत्तर-
राष्ट्रवादी अधिकतर स्वतन्त्र राज्य को अधिकार के रूप में मानने लगते हैं। लेकिन यह सम्भव नहीं कि प्रत्येक राष्ट्रीय समूह को स्वतन्त्र राज्य प्रदान किया जाए। साथ ही, यह सम्भवतः अवांछनीय भी होगा। यह ऐसे राज्यों के गठन की ओर ले जा सकता है जो आर्थिक और राजनीतिक क्षमता की दृष्टि से अत्यन्त छोटे हों और इससे अल्पसंख्यक समहों की समस्याएँ और बढ़े। हमें राष्ट्रवाद के असहिष्णु और एक जातीय स्वरूपों के साथ कोई सहानुभूति नहीं रखनी चाहिए।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से किसने राष्ट्रवाद की समालोचना प्रस्तुत की थी?
(क) रवीन्द्रनाथ टैगोर
(ख) महात्मा गांधी
(ग) जवाहरलाल नेहरू :
(घ) बंकिमचन्द्र चटर्जी
उत्तर-
(क) रवीन्द्रनाथ टैगोर।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीयता के विकास में बाधक तत्त्व नहीं है
(क) अशिक्षा
(ख) धर्म-निरपेक्षता
(ग) जातिवाद
(घ) साम्प्रदायिकता
उत्तर-
(ख) धर्म-निरपेक्षता।

प्रश्न 3.
“राष्ट्रीयता सामूहिक भावना का एक रूप है, जो विशिष्ट गहनता, समीपता तथा महत्ता से एक निश्चित देश से सम्बन्धित होती है।” यह कथन किसका है?
(क) लॉस्की
(ख) गार्नर
(ग) जिमर्न
(घ) ब्राइस
उत्तर-
(ग) जिमर्न।

प्रश्न 4.
“अन्तर्राष्ट्रीयता एक ऐसी भावना है जिसके अनुसार व्यक्ति केवल अपने राज्य का ही सदस्य नहीं है, बल्कि विश्व का एक नागरिक है।” यह मत किसका है?
(क) गोल्ड स्मिथ
(ख) जोसेफ इमैनुअल
(ग) बार्कर
(घ) शूमां
उत्तर-
(ग) बार्कर।

प्रश्न 5.
अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग का बाधक तत्त्व है
(क) विश्व-बन्धुत्व की भावना
(ख) उग्र राष्ट्रवाद
(ग) अन्तर्राष्ट्रीय कानून
(घ) वैज्ञानिक प्रगति
उत्तर-
(ख) उग्र राष्ट्रवाद।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्रीयता के मार्ग में उत्पन्न होने वाली दो बाधाएँ लिखिए।
उत्तर-
(i) साम्प्रदायिकता की भावना तथा
(ii) जातीयता एवं प्रान्तीयता की भावना।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीयता के दो तत्त्व बताइए।
उत्तर-
(i) भौगोलिक एकता तथा
(ii) सांस्कृतिक एकता।

प्रश्न 3.
राष्ट्रीयता के विकास में दो बाधक तत्त्व लिखिए।
उत्तर-
(i) भाषावाद तथा
(ii) क्षेत्रवाद।

प्रश्न 4.
राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रीयता के दो दोष लिखिए।
उत्तर-
(i) सैन्यवाद को जन्म तथा
(ii) युद्ध को प्रोत्साहन।

प्रश्न 5.
राष्ट्रीयता के दो लाभ बताइए।
उत्तर-
(i) देशप्रेम की प्रेरणा तथा
(ii) बन्धुत्व की भावना का विकास।

प्रश्न 6.
राष्ट्रवाद का अध्ययन क्यों आवश्यक है?
उत्तर-
राष्ट्रवाद वैश्विक मामलों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इसलिए राष्ट्रवाद का अध्ययन आवश्यक है।

प्रश्न 7.
‘बास्क’ कहाँ है?
उत्तर-
‘बास्क’ स्पेन में स्थित है। यह स्पेन को एक पहाड़ी क्षेत्र है।

प्रश्न 8.
आत्म-निर्णय का दावा क्या है?
उत्तर-
आत्म-निर्णय के दावे में राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से माँग करता है कि उसके पृथक् इकाई या राज्य के दर्जे को मान्यता और स्वीकार्यता दी जाए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्रिक जाति और समुदाय से क्या आशय है?
उत्तर-
लार्ड ब्राइस के अनुसार, राष्ट्रिक जाति की भावना वह अनुभूति या अनुभूतियाँ हैं जो व्यक्तियों के एक समूह को उन बन्धनों के प्रति सजग बनाती हैं जो पूरी तरह से न तो राजनीतिक होते हैं, न धार्मिक और जो उन व्यक्तियों को ऐसे समाज के रूप में संगठित करने देते हैं जो या तो राष्ट्र होता है। या राष्ट्र होने की क्षमता रखता है।
‘राष्ट्रीय समुदाय’ शब्द का उपयोग एक ऐसे समाज को व्यक्त करने के लिए किया जाता है जिसमें राष्ट्रीय भावना का अभी निर्माण ही हो रहा हो और जिसमें एक राष्ट्र की तरह रहने की इच्छा की कमी

प्रश्न 2.
हमारे लिए राष्ट्रवाद क्यों आवश्यक है?
उत्तर–
जहाँ तक भारत का सम्बन्ध है, राष्ट्रवाद हमारे लिए आवश्यक है। हमारा अस्तित्व ही राष्ट्रीयता पर निर्भर करता है, यह हमारे जीवन-मरण का प्रश्न है। यद्यपि अपने सारे दुर्भाग्यों के लिए विदेशियों को जिम्मेदार ठहराना मूर्खता है, फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं कि अंग्रेजों की लम्बी गुलामी ने हममें बहुत-सी बुराइयाँ उत्पन्न कर दी हैं जिनका वास्तविक उपचार आत्म-निर्णय है। भये, कार्यरता और कपट जैसी बुराइयों को राजनीतिक राष्ट्रीयता ही दूर कर सकती है।

प्रश्न 3.
राष्ट्रीयता के मार्ग की बाधाओं को दूर करने के उपायों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीयता के मार्ग में आने वाली बाधाओं को निम्नलिखित उपायों से दूर किया जा सकता है

  1. संकुचित भावनाओं का त्याग और देश-प्रेम या देशभक्ति की प्रबल भावना का विकास किया जाना चाहिए।
  2. देश के विभिन्न भागों में भावनात्मक, साहित्यिक तथा सांस्कृतिक सम्पर्क बढ़ाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए।
  3. शिक्षा का व्यापक स्तर पर प्रचार तथा प्रसार किया जाना चाहिए तथा शिक्षा व्यवस्था का समुचित प्रबन्ध होना चाहिए।
  4. देशभर में परिवहन तथा संचार के साधनों का पर्याप्त विकास किया जाना चाहिए।
  5. देश के सभी क्षेत्रों का सन्तुलित आर्थिक विकास किया जाना चाहिए।
  6. संकीर्ण हितों तथा स्वार्थपूर्ण मनोवृत्तियों पर आधारित राजनीति को नियन्त्रित किया जाना चाहिए।
  7. देश में सुदृढ़ तथा न्यायपूर्ण शासन व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिए।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी राष्ट्र के स्वतन्त्र और सम्प्रभु बन सकने से पूर्व उसमें क्या योग्यताएँ होनी चाहिए?
उत्तर-
किसी राष्ट्र के स्वतन्त्र और सम्प्रभु बन सकने से पूर्व उसमें निम्नलिखित बातों का होना आवश्यक है-

  1. उसमें अपनी सम्पत्ति की व्यवस्था करने और अपने प्राकृतिक साधनों तथा अपनी पूँजी का विकास कर सकने की क्षमता होनी चाहिए।
  2. उसे अच्छे कानून बनाने चाहिए और न्याय की उचित व्यवस्था करनी चाहिए। राज्य क्षेत्रातीतन्यायालयों की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
  3. उसे एक उपयुक्त ढंग की सरकार स्थापित करनी चाहिए।
  4. उसे व्यापार करने देने, कर्ज अदा करने और यात्रा की अनुमति देने का अथवा कर्त्तव्य स्वीकार करना चाहिए।
  5. उसे अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। उसे राजदूतों को अपने यहाँ आमन्त्रित करना चाहिए, विवादों में मध्यस्थताएँ स्वीकार करनी चाहिए और सन्धियाँ करनी चाहिए आदि। उसके पास ऐसे नागरिक होने चाहिए जो गौरव के साथ अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में उसका प्रतिनिधित्व कर सकें।
  6. जब तक युद्धों का होना जारी है तब तक उसे विदेशी आक्रमणों से अपनी रक्षा करने में समर्थ होना चाहिए।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीयता तथा अन्तर्राष्ट्रीयता के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
वर्तमान में राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता के मध्य सम्बन्ध को लेकर दो विरोधी विचार प्रचलित हैं। पहले मत के विद्वानों का कहना है कि राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता परस्पर विरोधी हैं। उनका तर्क है कि राष्ट्रीयता व्यक्ति को अपने देश के प्रति श्रद्धा भाव रखने के लिए प्रेरित करती है, जबकि अन्तर्राष्ट्रीयता का आधारभूत सिद्धान्त विश्वबन्धुत्व की स्थापना करना है। लेकिन यह मत भ्रामक और असंगत प्रतीत होता है। वास्तव में राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता परस्पर विरोधी नहीं हैं। राष्ट्रीयता तभी अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग में बाधक बनती है, जबकि उसका अन्धानुकरण किया जाए तथा उसके उग्र रूप को ग्रहण किया जाए। उदार राष्ट्रीयता अन्तर्राष्ट्रीयता की पोषक और विश्व-शान्ति की समर्थक है। भारत का पंचशील सिद्धान्त इस सन्दर्भ में उदाहरणस्वरूप लिया जा सकता है।

इस प्रकार राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता एक-दूसरे की परस्पर पूरक हैं। यही मत अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है, क्योंकि राष्ट्रीयता ही अन्तर्राष्ट्रीयता का प्रथम चरण है। गांधी जी के अनुसार, “मेरे विचार से राष्ट्रवादी हुए बिना अन्तर्राष्ट्रवादी होना असम्भव है। अन्तर्राष्ट्रीयता तभी सम्भव हो सकती है, जबकि राष्ट्रीयता एक यथार्थ बन जाए।”

प्रश्न 3.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने राष्ट्रवाद की आलोचना किस प्रकार की है?
उत्तर-
अनेक विचारक राष्ट्रवाद के बहुत बड़े प्रशंसक और भक्त हैं। वे इसमें अच्छाइयाँ-हीअच्छाइयाँ पाते हैं। पर दूसरे लोगों का कहना है कि राष्ट्रवाद से अनेक बुरे परिणाम निकले हैं। इन लोगों का विश्वास है कि राष्ट्रीयता अपने वर्तमान रूप में अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सद्भावना की सबसे बड़ी शत्रु है। राष्ट्रवाद पर अपने निबन्ध में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने नि:संकोच राष्ट्रवाद को बुरा कहा है। वह उसे ‘समूची जाति का सामूहिक और संगठित स्वार्थ’, ‘आत्मपूजा’, ‘स्वार्थी उद्देश्यों के लिए राजनीति और व्यवसाय का संगठन’, ‘शोषण के लिए संगठित शक्ति’ आदि कहते हैं।

राष्ट्रवाद पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर की समालोचना
“राष्ट्रवाद हमारा अन्तिम आध्यात्मिक मंजिल नहीं हो सकता मेरी शरणस्थली तो मानवता है। मैं हीरों की कीमत पर शीशा नहीं खरीदूंगा और जब तक मैं जीवित हूँ देशभक्ति को मानवता पर कदापि विजयी नहीं होने दूंगा” यह रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था वे औपनिवेशिक शासन के विरोधी थे और भारत की स्वाधीनता के अधिकार का दावा करते थे वे महसूस करते थे कि उपनिवेशों के ब्रितानी प्रशासन में ‘मानवीय सम्बन्धों की गरिमा बरकरार रखने की गुंजाइश नहीं है। यह एक ऐसा विचार है। जिसे ब्रितानी सभ्यता में भी स्थान मिला है। टैगोर पश्चिमी साम्राज्यवाद का विरोध करने और पश्चिमी सभ्यता को खारिज करने के बीच फर्क करते थे। भारतीयों को अपनी संस्कृति और विरासत में गहरी सभ्यता होनी ही चाहिए लेकिन बाहरी दुनिया से मुक्त भाव से सीखने और लाभान्वित होने का प्रतिरोध नहीं करनी चाहिए।

टैगोर जिसे ‘देशभक्ति’ कहते थे, उसकी समालोचना उनके लेखन का स्थायी विषय था। वे देश के स्वाधीनता आन्दोलन में मौजूद संकीर्ण राष्ट्रवाद के कटु आलोचक थे। उन्हें भय था कि तथाकथित | | भारतीय परम्परा के पक्ष में पश्चिम की खारिजी का विचार यहीं तक सीमित रहने वाला नहीं है। यह अपने देश में मौजूद ईसाई, यहूदी, पारसी और इस्लाम समेत तमाम विदेशी प्रभावों के खिलाफ आसानी से आक्रामक भी हो सकता है।
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प्रश्न 4.
राष्ट्रीयता अथवा राष्ट्रवाद के प्रमुख गुणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद के गुण राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-

1. देशप्रेम की प्रेरणा- राष्ट्रीयता की भावना लोगों में देशप्रेम का भाव उत्पन्न करती है और उन्हें देश के हित के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए प्रेरित करती है। यह प्रेरणा राष्ट्रीय पर्वो के आयोजन, राष्ट्रगान तथा राष्ट्रीय गीतों, नाटकों आदि से और अधिक व्यापक होती है।

2. राजनीतिक एकता की स्थापना में योगदान- राष्ट्रीयता की भावना राजनीतिक एकता की स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है। राष्ट्रीयता से प्रेरित होकर ही विभिन्न जातियों व धर्मों के | लोग एकता के सूत्र में संगठित हो जाते हैं और एक शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण करते हैं।

3. राज्यों को स्थायित्व- राष्ट्रीयता राज्यों को स्थायित्व भी प्रदान करती है। राष्ट्रीय चेतना के आधार पर निर्मित राज्य अधिक स्थायी सिद्ध हुए हैं।

4. उदारवाद को प्रोत्साहन- राष्ट्रीयता आत्म-निर्णय के सिद्धान्त को मान्यता देती है। इसलिए राष्ट्रीयता मानवीय स्वतन्त्रता को स्वीकार कर उदारवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देती है।

5. सांस्कृतिक विकास- राष्ट्रीयता देश के सांस्कृतिक विकास को प्रोत्साहित करती है। प्राचीन यूनान के महाकवि होमर, फ्रांस के दान्ते तथा वोल्तेयर, इंग्लैण्ड के टेनीसन, शैले, टामस पेन, जर्मनी के हीगल और भारत के मैथिलीशरण गुप्त आदि ने राष्ट्रीयता से प्रेरित होकर ही साहित्यिक रचनाएँ की हैं।

6. आत्म-सम्मान की भावना- राष्ट्रीयता व्यक्ति में आत्म-सम्मान की भावना उत्पन्न करती है। और उसे आत्म-गौरव को सँजोने की प्रेरणा देती है।

7. विश्वबन्धुत्व की पोषक- राष्ट्रीयती व्यक्ति के दृष्टिकोण को व्यापक बनाकर अन्तर्राष्ट्रीय मैत्री और सहयोग को प्रोत्साहित करती है। इस प्रकार राष्ट्रीयता विश्वबन्धुत्व की पोषक भी है; उदाहरणार्थ-भारत का पंचशील सिद्धान्त ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’का पोषक है।

8. आर्थिक विकास में योगदान- राष्ट्रीयता राष्ट्र के आर्थिक विकास को भी प्रोत्साहित करती है। | राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर ही व्यक्ति अपने राष्ट्र को आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न बनाने के लिए एकजुट होकर कार्य करते हैं।

प्रश्न 5.
बास्क राष्ट्रवादी आन्दोलन के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
बास्क स्पेन का एक पहाड़ी और समृद्ध क्षेत्र है। इस क्षेत्र को स्पेनी सरकार ने स्पेन राज्यसंघ के अन्तर्गत स्वायत्त क्षेत्र का दर्जा दे रखा है, लेकिन बास्क राष्ट्रवादी आन्दोलन के नेतागण इस स्वायत्तता से सन्तुष्ट नहीं हैं। वे चाहते हैं कि बास्क स्पेन से अलग होकर एक स्वतन्त्र देश बन जाए। इस आन्दोलन के समर्थकों ने अपनी माँग पर जोर डालने के लिए संवैधानिक और हाल तक हिंसक तरीकों का इस्तेमाल किया है।
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बास्क राष्ट्रवादियों का कहना है कि उनकी संस्कृति स्पेनी से बहुत भिन्न है। उनकी अपनी भाषा है, जो स्पेनी भाषा से बिल्कुल नहीं मिलती है। हालाँकि आज बास्क के मात्र एक-तिहाई लोग उस भाषा को समझ पाते हैं। बास्क क्षेत्र की पहाड़ी भू-संरचना उसे शेष स्पेन से भौगोलिक तौर पर अलग करती है। रोमन काल से अब तक बास्क क्षेत्र ने स्पेनी शासकों के समक्ष अपनी स्वायत्तता का कभी समर्पण नहीं किया। उसकी न्यायिक, प्रशासनिक एवं वित्तीय प्रणालियाँ उसकी अपनी विशिष्ट व्यवस्था के जरिए संचालित होती थीं।

आधुनिक बास्क राष्ट्रवादी आन्दोलन की शुरूआत तब हुई जब उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में स्पेनी शासकों ने उसकी विशिष्ट राजनीतिक-प्रशांसनिक व्यवस्था को समाप्त करने की कोशिश की। बीसवीं सदी में स्पेनी तानाशाह फ्रैंको ने इस स्वायत्तता में और कटौती कर दी। उसने बास्क भाषा को सार्वजनिक स्थानों, यहाँ तक कि घर में भी बोलने पर पाबन्दी लगा दी थी। ये दमनकारी कदम अब वापस लिए जा चुके हैं। लेकिन बास्क आन्दोलनकारियां को स्पेनी शासक के प्रति सन्देह और क्षेत्र में बाहरी लोगों के प्रवेश का भय बरकरार है। उने विरोधियों का कहना है कि बास्क अलगाववादी एक ऐसे मुद्दे का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं जिसका समाधान हो चुका है।

प्रश्न 6.
‘एक संस्कृति-एक राज्य के विचार को त्यागने के पश्चात राज्यों के लिए क्या आवश्यक हो जाता है?
उत्तर-
एक संस्कृति-एक राज्य के विचार को त्यागते ही यह आवश्यक हो जाता है कि ऐसे तरीकों के बारे में विचार किया जाए जिसमें विभिन्न संस्कृतियाँ और समुदाय एक ही देश में फल-फूल सकें। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अनेक लोकतान्त्रिक देशों ने सांस्कृतिक रूप से अल्पसंख्यक समुदायों की पहचान को स्वीकार करने और संरक्षित करने के उपायों को प्रारम्भ किया है। भारतीय संविधान में धार्मिक, भाषाई और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों की संरक्षा के लिए विस्तृत प्रावधान किए हैं।

विभिन्न देशों में समूहों को जो भी अधिकार प्रदान किए गए हैं, उनमें सम्मिलित हैं-
अल्पसंख्यक समूहों एवं उनके सदस्यों की भाषा, संस्कृति एवं धर्म के लिए संवैधानिक संरक्षा के अधिकार। कुछ प्रकरणों में इन समूहों को विधायी संस्थाओं और अन्य राजकीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का अधिकार भी होता है। इन अधिकारों को इस आधार पर न्यायोचित ठहराया जा सकता है कि ये अधिकार इन समूहों के सदस्यों के लिए कानून द्वारा समान व्यवहार एवं सुरक्षा के साथ ही समूह की सांस्कृतिक पहचान के लिए भी सुरक्षा का प्रावधान करते हैं। इसके अलावा, इन समूहों को राष्ट्रीय समुदाय के एक अंग के रूप में भी मान्यता देनी होती है। इसका आशय यह है कि राष्ट्रीय पहचान को समावेशी रीति से परिभाषित करना होगा जो राष्ट्र-राज्य के सदस्यों की महत्ता और अद्वितीय योगदान को मान्यता प्रदान कर सके।

यह आशा की जाती है कि समूहों को मान्यता और संरक्षा प्रदान करने से उनकी आकांक्षाएँ सन्तुष्ट होंगी, फिर भी हो सकता है, कि कुछ समूह पृथक् राज्य की माँग पर अडिग रहें। यह विरोधाभासी भी प्रतीत हो सकता है कि जहाँ दुनिया में भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया जारी है वहाँ राष्ट्रीय आकांक्षाएँ अभी भी बहुत सारे समूह और मनुष्यों को उद्देलित कर रही हैं। ऐसी माँगों से लोकतान्त्रिक तरीके से निपटने के लिए यह आवश्यक है कि सम्बन्धित देश अत्यन्त उदारता व दक्षता का परिचय दें।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्रीयता किसे कहते हैं? राष्ट्रीयता का निर्माण किन तत्त्वों से होता है?
या
राष्ट्रीयता की परिभाषा दीजिए तथा इसके विभिन्न पोषक तत्वों की विवेचना कीजिए।
या
राष्ट्रीयता के विकास में उत्तरदायी तत्त्वों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीयता का अर्थ एवं परिभाषाएँ
‘राष्ट्रीयता’ शब्द अंग्रेजी भाषा के ‘नैशनलिटी’ (Nationality) शब्द का हिन्दी अनुवाद है, जिसका उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘नेशियो’ (Natio) शब्द से हुई है। इस शब्द से जन्म और जाति का बोध होता है। राष्ट्रीयता एक सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक भावना है, जो लोगों को एकता के सूत्र में बाँधती है। इसी भावना के कारण लोग अपने राष्ट्र से प्रेम करते हैं। इस प्रकार राष्ट्रीयता एक भावात्मक शब्द है। इसी भावना के कारण लोग अपने देश पर संकट आने की स्थिति में अपने तन, मन और धन का बलिदान करने से भी पीछे नहीं हटते हैं। जे० एच० रोज के अनुसार, “राष्ट्रीयता हृदयों की वह एकता है, जो एक बार बनने के बाद कभी खण्डित नहीं होती है।”

राष्ट्रीयता की पूर्ण एवं सम्यक परिभाषा करना एक कठिन कार्य है; किन्तु कुछ विद्वानों ने इसे स्पष्ट रूप से परिभाषित करने का प्रयास किया है। इन विद्वानों की परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

जिमर्न के अनुसार, “राष्ट्रीयता सामूहिक भावना का एक रूप है, जो विशिष्ट गहनता, समीपता तथा महत्ता से एक निश्चित देश से सम्बन्धित होती है।”

ब्लंश्ली के अनुसार, “राष्ट्रीयता मनुष्यों का वह समूह है, जो समान उत्पत्ति, समान जाति, समान भाषा, समान परम्पराओं, समान इतिहास तथा समान हितों के कारण एकता के सूत्र में बँधकर राज्य का निर्माण करता है।”

गिलक्राइस्ट के अनुसार, “राष्ट्रीयता एक आध्यात्मिक भावना या सिद्धान्त है, जिसकी उत्पत्ति उन लोगों में से होती है, जो साधारणत: एक जाति के होते हैं, जो एक भूखण्ड पर रहते हैं तथा जिनकी एक भाषा, एक धर्म, एक इतिहास, एक जैसी परम्पराएँ एवं एक जैसे हित होते हैं तथा जिनके राजनीतिक समुदाय और राजनीतिक एकता के एक-से आदर्श होते हैं।”

डॉ० बेनीप्रसाद के अनुसार, “राष्ट्रीयता की निश्चित परिभाषा करना कठिन है। परन्तु यह स्पष्ट है कि ऐतिहासिक गतिविधियों में यह पृथक् अस्तित्व ही उस चेतना का प्रतीक है, जो सामान्य आदतों, परम्परागत रीति-रिवाजों, स्मृतियों, आकांक्षाओं, अवर्णनीय सांस्कृतिक सम्प्रदायों तथा हितों पर आधारित है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं, “राष्ट्रीयता एक ऐसी भावना है, जिसके कारण एक देश के लोग एकता के सूत्र में बँधे रहते हैं और जो अपने देश एवं देशवासियों के प्रति संभावपूर्वक रहने की प्रेरणा देती है।”

राष्ट्रीयता के प्रमुख निर्माणक तत्त्व
राष्ट्रीयता के निर्माण अथवा राष्ट्रीयता की भावना के विकास में अनेक तत्त्व सहायक होते हैं। उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

1. भौगोलिक एकता- भौगोलिक एकता राष्ट्रीय एकता की प्रेरणा-स्रोत है। जब लोग समान भौगोलिक परिस्थितियों में रहते हैं तो उनकी आवश्यकताएँ एवं समस्याएँ भी समान होती हैं। अत: वे लोग मिल-जुलकर समान ढंग से अपनी समस्याएँ सुलझाने हेतु एकजुट होते हैं। इसके परिणामस्वरूप उनमें एकता की भावना उत्पन्न होती है, यह भावना ही कालान्तर में राष्ट्रीयता का प्रतीक बनती है। परन्तु इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि भौगोलिक एकता राष्ट्रीयता को एक सहायक तत्त्व है; अतः इसे अनिवार्य तत्त्व नहीं माना जाना चाहिए।

2. भाषा की एकता- राष्ट्रीयता के विकास में भाषा की एकता भी महत्त्व रखती है। समान भाषा-भाषी देशों में समान विचार एवं समान साहित्य का सृजन होता है। उनके समान रीति-रिवाज एवं समान रहन-सहन के कारण उनमें समान राष्ट्रीयता की भावना का उदय होता है। भाषा की एकता भी राष्ट्रीयता का एक अनिवार्य तत्त्व नहीं है; उदाहरणार्थ-कर्नाटक प्रान्त के नागरिक कन्नड़ भाषा बोलते हैं; तमिलनाडु के निवासी तमिल बोलते हैं और भारत के अधिकांश उत्तर-मध्य क्षेत्र में हिन्दी बोली जाती है। अत: इस आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि भारत में राष्ट्रीयता का अभाव है।

3. संस्कृति की एकता- सांस्कृतिक एकता राष्ट्रीयता के मूल्यवान तत्त्वों में से एक है। संस्कृति के अन्तर्गत एक निश्चित भू-भाग के व्यक्तियों का साहित्य, रीति-रिवाज, प्राचीन परम्पराएँ इत्यादि सम्मिलित होती हैं। समान संस्कृति के आधार पर समान विचार, समान आदर्श तथा समान प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, जिससे राष्ट्रीयता के निर्माण में सहायता मिलती है।

4. समान ऐतिहासिक परम्पराएँ- ऐतिहासिक घटनाओं एवं स्मृतियों का भी राष्ट्रीयता के विकास में काफी महत्त्व होता है। विजय और पराजय की स्मृतियाँ, सामाजिक विकास के आदर्श, सांस्कृतिक उत्थान-पतन का संकलित इतिहास राष्ट्रीयता के विकास में पर्याप्त सहायक होता है। सम्राट अशोक, अकबर और शिवाजी आदि का गौरव गाथा पढ़ने से समस्त भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना का संचार होता है।

5. धार्मिक एकता- धार्मिक एकता भी राष्ट्रीयता के निर्माण तथा विकास में वृद्धि करती है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि धार्मिक भिन्नता के कारण अनेक देशों में कितना अधिक रक्तपात हुआ है। धार्मिक भिन्नता के आगे राष्ट्रीयता की भावना दुर्बल पड़ जाती है, जिसके परिणामस्वरूप दो भिन्न धर्मावलम्बी राष्ट्रों के मध्य युद्ध होते हैं। इसीलिए प्रसिद्ध विद्वान रैम्जे म्योर ने लिखा है, “कुछ मामलों में धार्मिक एकता राजनीतिक एकता के निर्माण में शक्तिशाली योग देती है, जबकि कुछ दूसरे मामलों में धार्मिक भिन्नता उसके मार्ग में अनेक बाधाएँ उपस्थित करती है।”

6. राजनीतिक एकता- समान राजनीतिक व्यवस्था के अन्तर्गत रहने वाले लोग भी एकता का अनुभव करते हैं। इसके अतिरिक्त वे समान राजनीतिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप मानसिक एकता का भी अनुभव करते हैं, जो आगे चलकर राष्ट्रीयता के निर्माण में सहायक होती है। इसके साथ ही कठोर विदेशी शासन भी राष्ट्रीयता के निर्माण में सहायक सिद्ध होता है।

7. जातीय एकता- जातीय एकता भी राष्ट्रीयता के विकास में सहायक होती है। एक जाति के लोग समान संस्कारों एवं रीति-रिवाजों आदि के कारण एक संगठन में बंधे रहते हैं, जिनके परिणामस्वरूप उनमें एकता की भावना का उदय होता है।

8. सामान्य आर्थिक हित- आधुनिककाल में राष्ट्रीयता के निर्माण में आर्थिक तत्त्व सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व माना जाता है। भारत के परिप्रेक्ष्य में रोजगार प्राप्त करने में सभी का सामान्य आर्थिक हित है। अत: इस दिशा में किए जाने वाले प्रयास राष्ट्रीय एकता के प्रयास के अन्तर्गत आते हैं।

9. अन्य तत्व- समान सिद्धान्तों में आस्था, सामान्य आपदाएँ, युद्ध लोकमत एवं सामूहिक एकता की चेतना भी राष्ट्रीयता के विकास में सहायक सिद्ध होती है। सामान्य आपदाओं; जैसे-गुजरात में आए भूकम्प और तमिलनाडु तथा अण्डमान द्वीप समूह में आए सुनामी समुद्री लहरों के तूफान के समय सभी क्षेत्रों से की गई सहायता इस बात का प्रतीक है कि हमारे अन्दर राष्ट्रीयता की भावना विद्यमान है।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि राष्ट्रीयता भावात्मक एकता का प्रतीक होती है। राष्ट्रीयता की भावना के कारण ही व्यक्ति राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण तथा बलिदान की भावना प्रकट करता है। राष्ट्रीयता का निर्माण विभिन्न तत्त्वों के मिश्रण से होता है। इनमें सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक परम्पराओं की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। राष्ट्रीयता की भावना के कारण ही भारत अंग्रेजी दासता से स्वतन्त्र हुआ। तथा यहूदियों ने यहूदी राष्ट्रीयता की भावना से आप्लावित होकर अपने स्वतन्त्र राष्ट्र की स्थापना की।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय भावना के विकास में बाधक तत्त्वों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीय भावना के विकास में बाधक तत्त्व
राष्ट्रीय भावना के विकास में निम्नलिखित तत्त्व बाधक हैं-

1. अज्ञानता और अशिक्षा- राष्ट्रीयता के निर्माण में प्रमुख बाधक तत्त्व अज्ञानता और अशिक्षा हैं। शिक्षा के अभाव में व्यक्ति का दृष्टिकोण संकुचित हो जाता है और वह राष्ट्रहित के स्थान पर व्यक्तिगत हित को सर्वोपरि समझने लगता है। इस कारण ऐसे संकुचित दृष्टिकोण वाले व्यक्ति राष्ट्रीयता के विकास में बाधक सिद्ध होते हैं।

2. आवागमन के अच्छे साधनों का अभाव- आवागमन के अच्छे साधनों के अभाव में देश के विभिन्न भागों में रहने वाले लोगों के बीच सम्पर्क स्थापित नहीं हो पाता है। इस सम्पर्क के अभाव में उस पारस्परिक एकता का जन्म नहीं हो पाता है, जो राष्ट्रीयता का मूल आधार है। परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से अब विकसित एवं विकासशील देशों में आवागमन के अच्छे साधनों , का अभाव नहीं रह गया है।

3. साम्प्रदायिकता की भावना- किसी वर्ग-विशेष द्वारा अपने स्वार्थों को महत्त्व देना और दूसरे वर्ग या वर्गों के हितों की उपेक्षा करना या उन्हें नीचा दिखाने की प्रवृत्ति साम्प्रदायिकता कहलाती है। साम्प्रदायिकता से द्वेष, शत्रुता, फूट, मतभेद आदि की भावनाएँ पनपती हैं, जो राष्ट्रीयता की प्रबल विरोधी हैं।

4. जातिवाद तथा भाषावाद- सम्प्रदायवाद के समान ही जातिवाद और भाषावाद भी राष्ट्रीयता के विकास में बाधक हैं। जातिवाद विभिन्न जातियों के मध्य कटुता और घृणा का भाव उत्पन्न करता है। तथा भाषावाद लोगों में एकता की भावना को खण्डित करता है। इस कारण विभिन्न जाति व भाषायी लोगों में राष्ट्रीयता की भावना विकसित नहीं हो पाती है।

5. क्षेत्रीयता की भावना- क्षेत्रीयता की भावना राष्ट्रीयता के विकास के लिए घातक है। इस | भावना के कारण एक क्षेत्र में रहने वाले लोग अन्य या दूसरे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से घृणा करने लगते हैं। इसी कारण पंजाबी, बंगाली, मराठी, सिन्धी जैसी धारणाएँ विकसित होती हैं, जो राष्ट्रीयता के विकास को अवरुद्ध कर देती हैं। भारत में नए-नए राज्यों का उदय उग्र क्षेत्रवाद की भावना के ही परिणाम हैं।

6. पराधीनता- पराधीनता सभी बुराइयों की जड़ है। पराधीन व्यक्ति अपने देश या राष्ट्र के लिए न कुछ सोच सकता है और न कुछ कर सकता है। इसलिए पराधीनता राष्ट्रीयता के मार्ग की सबसे बड़ी अवरोधक है।

7. देशभक्ति की भावना का अभाव- जिस देश के नागरिकों में देश-प्रेम का अभाव होता है, उस देश में राष्ट्रीयता का विकास होना असम्भव है। ऐसा देश अल्प समय में ही दूसरे देश के अधीन होकर अपनी स्वतन्त्रता खो बैठता है।

प्रश्न 3.
राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद के विभिन्न दोषों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद के दोष
राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद की पराकाष्ठा कभी-कभी विश्व-शान्ति के लिए खतरा बन जाती है। इसीलिए राष्ट्रीयता में कुछ दोष भी हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है-
1. विश्व-शान्ति के लिए घातक- संकीर्ण और उग्र राष्ट्रीयता विश्व शान्ति के लिए घातक होती है। उग्र राष्ट्रवाद से प्रेरित होकर ही बीसवीं शताब्दी में जर्मनी ने सम्पूर्ण मानव जाति को दो-दो विश्व युद्धों की विभीषिकाएँ झेलने को विवश कर दिया था।

2. सैन्यवाद और युद्ध को प्रोत्साहन- राष्ट्रीयता का उग्र रूप सैन्यवाद और युद्ध को प्रोत्साहन देता है। इतिहास साक्षी है कि उग्र राष्ट्रीयता से प्रेरित होकर ही फ्रांस तथा जर्मनी अनेक बार युद्धरत हुए और दोनों देशों को जन-धन की अपार क्षति उठानी पड़ी।

3. साम्राज्यवाद का उदय- उग्र राष्ट्रीयता की भावना देशवासियों को अंहकारी तथा स्वार्थी बना देती है और वे अपने राष्ट्र को ही विश्व शक्ति के रूप में देखना चाहते हैं। इस मनोवृत्ति का परिणाम साम्राज्यवादी विस्तार के रूप में प्रकट होता है। उन्नीसवीं शताब्दी में साम्राज्यवाद के विकास का एक प्रमुख कारण राष्ट्रवाद भी था।

4. छोटे-छोटे राज्यों का संगठन- उग्र राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर कभी-कभी छोटे-छोटे राज्य बन जाते हैं और उनमें आपसी द्वेष के कारण देश की एकता को खतरा उत्पन्न हो जाता है। मध्यकाल में यूरोप में अनेक छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना उग्र राष्ट्रीयता का ही परिणाम थी।

5. व्यक्ति का नैतिक पतन- संकीर्ण राष्ट्रीयता व्यक्ति को स्वार्थी और अंहकारी बना देती है। वह इतना पतित हो जाता है कि मानव जाति को समूल नष्ट करने की दिशा में प्रवृत्त हो जाता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी ने संकीर्ण राष्ट्रीयता से प्रेरित होकर यहूदियों पर भयानक अत्याचार किए थे।

6. अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में बाधक- राष्ट्रीयता की मान्यता है-‘एक राष्ट्र एक राज्य’, लेकिन राष्ट्रीयता का यह सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय के प्रतिकूल है। राष्ट्रीयता की भावना के कारण ही विभिन्न राष्ट्रों का दृष्टिकोण अन्य राष्ट्रों के प्रति संकीर्ण तथा उपेक्षित-सा हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और सद्भावना का विकास अवरुद्ध हो जाता है। और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में अनेक समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं।

प्रश्न 4.
राष्ट्रीय आत्म-निर्णय का अधिकार क्या है?
उत्तर-
आत्म-निर्णय के अधिकार के दावे के रूप में राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से माँग करता है कि उसके पृथक् राजनीतिक इकाई या राज्य के दर्जे को मान्यता और स्वीकार्यता प्रदान की जाए। अक्सर ऐसी माँग उन लोगों की तरफ से आती हैं जो दीर्घकाल से किसी निश्चित भू-भौग पर साथ-साथ रहते आए हों और जिनमें साझी पहचान को बोध हो। कुछ प्रकरणों में आत्म-निर्णय के दावे एक स्वतन्त्र राज्य बनाने की इच्छा से भी जुड़े होते हैं। इन दावों का सम्बन्ध किसी समूह की संस्कृति की संरक्षा से होता है।

दूसरी तरह के बहुत-से दावे उन्नीसवीं सदी के यूरोप में सामने आए, उस समय ‘एक संस्कृति-एक राज्य की मान्यता ने जोर पकड़ा। परिणामस्वरूप पहले विश्वयुद्ध के पश्चात् राज्यों की पुनर्व्यवस्था में ‘एक संस्कृति-एक राज्य के विचार को प्रयोग में लाया गया। वर्साय की सन्धि से बहुत-से छोटे नवे स्वतन्त्र राज्यों का गठन हुआ लेकिन उस समय उठाई जा रही आत्म-निर्णय की सभी माँगों को सन्तुष्ट करना वास्तव में असम्भव था। इसके अतिरिक्त ‘एक संस्कृति-एक राज्य की माँगों को सन्तुष्ट करने से राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन हुए। इससे सीमाओं के एक ओर से दूसरी ओर बहुत बड़ी जनसंख्या का विस्थापन हुआ। इसके परिणामस्वरूप लाखों लोग अपने घरों से उजड़ गए और उस जगह से उन्हें बाहर धकेल दिया गया जहाँ पीढ़ियों से उनका घर था। बहुत सारे लोग साम्प्रदायिक हिंसा के भी शिकार हो गए।

अलग-अलग सांस्कृतिक समुदायों को अलग-अलग राष्ट्र राज्य प्राप्त हुए, इसे ध्यान में रखकर सीमाओं में परिवर्तन किया गया। इस प्रयास के कारण मानव जाति को भारी मूल्य चुकाना पड़ा। इस प्रयास के बाद भी यह सुनिश्चित करना सम्भव नहीं हो सका कि नवगठित राज्यों में केवल एक ही नस्ल के लोग रहें। वास्तव में अधिकतर राज्यों की सीमाओं के अन्दर एक से अधिक नस्ल और संस्कृति के लोग रहते थे। ये छोटे-छोटे समुदाय राज्य के अन्दर अल्पसंख्यक थे और अक्सर हानिकारक स्थितियों में रहते थे। इस विकास का सकारात्मक पक्ष यह था कि उन बहुत सारे राष्ट्रवादी समूहों को राजनीतिक मान्यता प्रदान की गई जो स्वयं को एक अलग राष्ट्र के रूप में देखते थे और अपने भविष्य को निश्चित करने तथा अपना शासन स्वयं चलाना चाहते थे। लेकिन राज्यों के भीतर अल्पसंख्यक समुदायों की समस्या यथावत् बनी रही।

जब एशिया एवं अफ्रीका औपनिवेशिक प्रभुत्व के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे, तब राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलनों ने राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार की भी घोषणा की। राष्ट्रीय आन्दोलनों का मानना था कि राजनीतिक स्वाधीनता राष्ट्रीय समूहों को सम्मान एवं मान्यता प्रदान करेगी और साथ ही वहाँ के लोगों के सामूहिक हितों की रक्षा भी करेगी। अधिकांश राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन राष्ट्र के लिए न्याय, अधिकार और समृद्धि प्राप्त करने के लक्ष्य से प्रेरित थे। हालाँकि यहाँ भी प्रत्येक सांस्कृतिक समूह जिनमें से कुछ पृथक् राष्ट्र होने का दावा करते थे, के लिए राजनीतिक स्वाधीनता तथा राज्यसत्ता सुनिश्चित करना लगभग असम्भव साबित हुआ। इस क्षेत्र के अनेक देश जनसंख्या के देशान्तरण, सीमाओं पर युद्ध और हिंसा की चपेट में आते रहे। इस प्रकार, यहाँ राष्ट्रीय राज्य विरोधाभासी स्थिति में दिखाई देते हैं जिन्होंने संघर्षों की बदौलत स्वाधीनता प्राप्त की, लेकिन अब वे अपने भू-क्षेत्रों में राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार की माँग करने वाले अल्पसंख्यक समूहों का विरोध कर रहे हैं।

वास्तव में आज दुनिया की सभी राज्य सत्ताएँ इस दुविधा में फँसी हैं कि आत्म-निर्णय के आन्दोलनों से , कैसे निपटा जाए और इसने राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार पर सवाल उत्पन्न कर दिए हैं। बहुत-से । लोग यह अनुभव करने लगे हैं कि समाधान नए राज्यों के गठन में नहीं वरन् वर्तमान राज्यों को अधिक लोकतान्त्रिक और समतामूलक बनाने में हैं। समाधान यह सुनिश्चित करने में है कि अलग-अलग सांस्कृतिक और नस्लीय पहचानों के लोग देश में समान नागरिक और मित्रों के समान सह अस्तित्वपूर्वक रह सकें। यह न केवल आत्म-निर्णय के नए दावों के उभार से उत्पन्न होने वाली समस्याओं के समाधान के लिए वरन् सुदृढ़ और एकताबद्ध राज्य बनाने के लिए आवश्यक होगा। जो राष्ट्र-राज्य अपने शासन में अल्पसंख्यक समूहों के अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान का सम्मान नहीं करते उनके लिए अपने सदस्यों की निष्ठा प्राप्त करना कठिन होता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 5 Minerals and Rocks

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 5 Minerals and Rocks (खनिज एवं शैल)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 5 Minerals and Rocks (खनिज एवं शैल)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (i) निम्न में से कौन ग्रेनाइट के दो प्रमुख घटक हैं?
(क) लौह एवं निकिल ।
(ख) सिलिका एवं ऐलुमिनियम
(ग) लौह एवं चाँदी ।
(घ) लौह ऑक्साइड एवं पोटैशियम
उत्तर-(ग) लौह एवं चाँदी।।

प्रश्न (ii) निम्न में से कौन-सा कायान्तरित शैलों का प्रमुख लक्षण है?
(क) परिवर्तनीय
(ख) क्रिस्टलीय
(ग) शान्त
(घ) पत्रण
उत्तर-(क) परिवर्तनीय।

प्रश्न (iii) निम्न में से कौन-सा एकमात्र तत्त्व वाला खनिज नहीं है?
(क) स्वर्ण
(ख) माइका ।
(ग) चाँदी
(घ) ग्रेफाइट
उत्तर-(घ) ग्रेफाइट।

प्रश्न (iv) निम्न में से कौन-सा कठोरतम खनिज है?
(क) टोपाज
(ख) क्वार्ट्ज
(ग) हीरा
(घ) फेल्सफर
उत्तर-(ग) हीरा

प्रश्न (v) निम्न में से कौन-सी शैल अवसादी नहीं है?
(क) टायलाइट
(ख) ब्रेशिया
(ग) बोरॅक्स
(घ) संगमरमर
उत्तर-(घ) संगमरमर।।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
(i) शैल से आप क्या समझते हैं? शैल के तीन प्रमुख वर्गों के नाम बताएँ।
उत्तर- पृथ्वी की पर्पटी चट्टानों से बनी है। चट्टान का निर्माण एक या एक से अधिक खनिजों से मिलकर होता है। चट्टानें कठोर या नरम तथा विभिन्न रंगों की हो सकती हैं। जैसे ग्रेनाइट कठोर तथा सोपस्टोन नरम है। गैब्रो काला तथा क्वार्टज़ाइट दूधिया श्वेत हो सकता है। शैलों में खनिज घटकों का कोई निश्चित संघटक नहीं होता है। शैलों में सामान्यतः पाए जाने वाले खनिज पदार्थ फेल्डस्पर तथा क्वार्ट्ज हैं। शैलों को निर्माण पद्धति के आधार पर तीन समूहों में विभाजित किया गया है-
(i) आग्नेय शैल
(ii) अवसादी शैल
(iii) कायांतरित शैल।

(ii) आग्नेय शैल क्या हैं? आग्नेय शैल के निर्माण की पद्धति एवं लक्षण बताएँ।
उत्तर- आग्नेय शैलों का निर्माण पृथ्वी के आंतरिक भाग के मैग्मा से होता है, अतः इनको प्राथमिक शैल भी कहते हैं। मैग्मा के ठंडे होकर घनीभूत हो जाने पर आग्नेय शैलों का निर्माण होता है। मैग्मा ठंडा होकर ठोस बन जाता है तो यह आग्नेय शैल कहलाता है। इसकी बनावट इसके कणों के आकार एवं व्यवस्था अथवा पदार्थ की भौतिक अवस्था पर निर्भर करती है। यदि पिघले हुए पदार्थ धीरे-धीरे गहराई तक ठंडे होते हैं। तो खनिज के कण पर्याप्त बड़े हो सकते हैं। सतह पर हुई आकस्मिक शीतलता के कारण छोटे एवं चिकने कण बनते हैं। शीतलता की मध्यम परिस्थितियाँ होने पर आग्नेय चट्टान को बनाने वाले कण मध्यम आकार के हो सकते हैं। ग्रेनाइट, बेसाल्ट, वोल्केनिक ब्रेशिया तथा टफ़ आग्नेय शैल के उदाहरण हैं।

(iii) अवसादी शैल का क्या अर्थ है? अवसादी शैल के निर्माण की पद्धति बताएँ।
उत्तर- अवसादी अर्थात् सेडीमेंटरी शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द सेडिमेंट्स से हुई है, जिसका अर्थ है-व्यवस्थित होना। पृथ्वी की सतह की शैलें अपक्षयकारी कारकों के प्रति अनावृत होती हैं, जो विभिन्न आकार के विखंडों में विभाजित होती हैं। ऐसे उपखंडों को विभिन्न बहिर्जनित कारकों के द्वारा संवहन एवं निक्षेपण होता है। सघनता के द्वारा ये संचित पदार्थ शैलों में परिणत हो जाते हैं। यह प्रक्रिया शिलीभवन कहलाती है। बहुत-सी अवसादी शैलों में निक्षेपित परतें शिलीभवन के बाद भी अपनी विशेषताएँ बनाए रखती हैं। इसी कारणवश बालुकाश्म, शैल जैसी अवसादी शैलों में विविध सांद्रता वाली अनेक सतहें होती हैं।

(iv) शैली चक्र के अनुसार प्रमुख प्रकार की शैलों के मध्य क्या संबंध होता है?
उत्तर- शैली चक्र एक सतत प्रक्रिया होती है, जिसमें पुरानी चट्टानें परिवर्तित होकर नवीन रूप लेती हैं। आग्नेय चट्टानें तथा अन्य (अवसादी एवं कायांतरित) चट्टानें इन प्राथमिक चट्टानों से निर्मित होती हैं। आग्नेय चट्टानों को कायांतरित चट्टानों में परिवर्तित किया जा सकता है। आग्नेय एवं कायांतरित चट्टानों से प्राप्त अंशों से अवसादी चट्टानों का निर्माण होता है। अवसादी चट्टानें अपखंडों में परिवर्तित हो सकती हैं तथा ये अपखंड अवसादी चट्टानों के निर्माण का एक स्रोत हो सकते हैं।

विभिन्न प्रकार की चट्टानों की प्रकृति एवं अन्तर

1. आग्नेय चट्टान-आग्नेय चट्टानें कलेर, रवेदार एवं अप्रवेश्य होती हैं। इनमें जीवाश्म नहीं पाए जाते हैं।
2. परतदार चट्टान-परतदार चट्टानें कोमल, प्रवेश्य, जीवाश्मयुक्त होती हैं। इनमें कणों के स्थान पर | परत पाई जाती हैं।
3. कायान्तरित चट्टान-ये चट्टानें कठोर होती हैं। टूटने पर इनके कण बिखर जाते हैं। इनकी उत्पत्ति धरातल से हजारों मीटर की गहराई पर होती है। ये चट्टानें विभिन्न रंगों वाली होती हैं।

प्रश्न (iii) कायान्तरित शैल क्या है? इनके प्रकार एवं निर्माण की पद्धति का वर्णन करें।
उत्तर-कायान्तरित का अर्थ हैं—रूप में परिवर्तन; अत: ऐसी आग्नेय एवं परतदार चट्टानें जिनका धरातल के नीचे ताप या दाब वृद्धि के कारण रूप बदल जाता है, कायान्तरित शैलें कहलाती हैं। इस प्रकार कायान्तरित चट्टानों का निर्माण पूर्व चट्टान के आयतन, दाब व तापमान में परिवर्तन के कारण होता है। उदाहरण के लिए, आग्नेय और तलछटी शैलों का उष्मा, संपीडन और विलियन द्वारा परिवर्तन होता है। संगमरमर, स्लेट और ग्रेफाइट इसी के द्वारा उत्पन्न कायान्तरित चट्टानें हैं। इन चट्टानों के रूप, रंग और। आकार में इतना परितर्वन हो जाता है कि इनके मूल रूप की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

कायान्तरित चट्टानों के प्रकार

कायान्तरित चट्टानें रूप-परिवर्तन के परिणामस्वरूप निम्नलिखित तीन प्रकार की होती हैं
1. गतिक कायान्तरित शैल-जब मूल चट्टान अत्यधिक दाब के कारण रूपान्तरित हो जाती है तो उसे गति कायान्तरित शैल कहते हैं। इस प्रकार से निर्मित कायान्तरित शैलों में ग्रेनाइट से नाईस तथा मिट्टी से शैल, शिष्ट आदि प्रमुख चट्टानें हैं।

2. तापीय कायान्तरित शैल-जब भूपर्पटी में अत्यधिक उष्मा के प्रभाव से अवसादी अथवा आग्नेय चट्टानों के खनिजों में रवों का पुनर्निर्माण या रूप परिवर्तन होता है तो उसे तापीय कायान्तरित शैल कहते हैं। इसे स्पर्श रूपान्तरित शैल भी कहते हैं। इस रूपान्तरण से चूना-पत्थर संगमरमर में, बालू क्वार्ट्जाइट में तथा चिकनी मिट्टी स्लेट में और कोयला ग्रेफाइट में बदल जाता

3. क्षेत्रीय/प्रादेशिक कायान्तरित शैल-इस स्थिति में बहुत गहराई पर ताप में हुई वृद्धि और भूसंचरण का दाब एक साथ मिलकर किसी बड़े क्षेत्र पर एक साथ कार्य करता है तो पूरे क्षेत्र की चट्टानों का रूपान्तरण हो जाता है। इसी से क्षेत्रीय अथवा प्रादेशिक कायान्तरित शैल बनती हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. “चट्टानें अधिकतर विभिन्न प्रकार के खनिज पदार्थों का संयोग होती हैं।” यह कथन है|
(क) टॉर एवं मार्टिन का
(ख) सर आर्थर होम्स का।
(ग) कुमारी सैम्पुल का
(घ) गुटेनबर्ग का
उत्तर-(ख) सर आर्थर होम्स का।

प्रश्न 2. कायान्तरण या रूप-परिवर्तन के कारण हैं
(क) तापमान
(ख) सम्पीडन एवं दबाव
(ग) घोलन-शक्ति
(घ) ये सभी
उत्तर-(घ) ये सभी।

प्रश्न 3. जिप्सम है|
(क) अवसादी चट्टाने
(ख) आग्नेय चट्टान
(ग) रूपान्तरित चट्टान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(क) अवसादी चट्टान।।

प्रश्न 4. बेसाल्ट है
(क) अवसादी चट्टान
(ख) आग्नेय चट्टान
(ग) कायान्तरित चट्टान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(ख) आग्नेय चट्टान।

प्रश्न 5. निम्नांकित में से कौन-सी चट्टान कायान्तरित नहीं है?
(क) ग्रेनाइट
(ख) नीस
(ग) शिस्ट (घ) संगमरमर
उत्तर-(क) ग्रेनाइट।

प्रश्न 6. सम्पीडन एवं दबाव किन शैलों के निर्माण में सहायक होते हैं?
या पृथ्वी के आन्तरिक भाग में कौन-सी चट्टान अधिक गर्मी व दबाव से बनी है?
(क) अवसादी शैलों के
(ख) आग्नेय शैलों के
(ग) कायान्तरित शैलों के
(घ) इनमें से किसी के भी नहीं
उत्तर-(ग) कायान्तरित शैलों के।

प्रश्न 7. निम्नलिखित में से कौन एक कायान्तरित चट्टान है?
(क) बालुका पत्थर
(ख) बेसाल्ट
(ग) संगमरमर
(घ) ग्रेनाइट
उत्तर-(ग) संगमरमर। ।

प्रश्न 8. निम्नलिखित में से कौन आग्नेय चट्टान है?
(क) बालुका पत्थर
(ख) स्लेट
(ग) बेसाल्ट
(घ) शैल
उत्तर-(ग) बेसाल्ट।

प्रश्न 9. निम्नलिखित में से कौन-सी कायान्तरित शैल है?
(क) ग्रेनाइट
(ख) शैल
(ग) चूना-पत्थर
(घ) स्लेट
उत्तर-(घ) स्लेट।।

प्रश्न 10. निम्नलिखित में से कौन-सी आग्नेय चट्टान है?
(क) ग्रेनाइट
(ख) चूना-पत्थर
(ग) शैल
(घ) स्लेट
उत्तर-(क) ग्रेनाइट।

प्रश्न 11. निम्नलिखित में से कौन-सी कायान्तरित चट्टान है?
(क) बेसाल्ट
(ख) क्वार्ट्जाइट
(ग) ग्रेनाइट
(घ) बालुका पत्थर
उत्तर-(ख) क्वार्ट्जाइट।

प्रश्न 12. रूपान्तरण क्रिया की सरल ऊर्जा है
(क) चट्टानों का विघटन
(ख) चट्टानों का वियोजन
(ग) चट्टानों का रूप परिवर्तन
(घ) चट्टानों की स्थिति में परिवर्तन
उत्तर-(ग) चट्टानों का रूप परिवर्तन।

प्रश्न 13. निम्नलिखित में से कौन परतदार चट्टान है?
(क) संगमरमर
(ख) स्लेट
(ग) चूने का पत्थर
(घ) बेसाल्ट
उत्तर-(ग) चूने का पत्थर।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. शैल या चट्टान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-भूपटल पर पाये जाने वाले वे समस्त पदार्थ जो धातुएँ नहीं हैं, चाहे वे चीका मिट्टी की तरह मुलायम हों या ग्रेनाइट की भाँति कठोर हों, चट्टान कहलाते हैं।

प्रश्न 2. आग्नेय चट्टानें कैसे बनती हैं?
उत्तर-पृथ्वी के भीतरी भागों से आन्तरिक क्रिया द्वारा पृथ्वी के ऊपरी धरातल पर जब पिघला हुआ पदार्थ ठोस रूप धारण करता है, तो आग्नेय चट्टानें बनती हैं।

प्रश्न 3. कायान्तरित या रूपान्तरित चट्टानें किन्हें कहते हैं?
उत्तर-जिन चट्टानों में दबाव, गर्मी एवं रासायनिक क्रियाओं द्वारा उनकी बनावट, रूप तथा खनिजों का पूरी तरह कायापलट हो जाता है, उन्हें कायान्तरित या रूपान्तरित चट्टानें कहते हैं।

प्रश्न 4. कायान्तरित या रूपान्तरित शैलों का निर्माण कैसे होता है?
उत्तर-कायान्तरित या रूपान्तरित शैलों का निर्माण आग्नेय तथा अवसादी शैलों पर अत्यधिक दबाव तथा अधिक तापमानों के प्रभाव से उनके रूपान्तर द्वारा होता है।

प्रश्न 5. अवसादी शैलें कैसे बनती हैं?
उत्तर-अपक्षय और अपरदन के विभिन्न साधनों द्वारा धरातल, झीलों, सागरों एवं महासागरों में लगातार मलबा जमा होता रहता है। यह मलबा परतों के रूप में जमा होता रहता है। इस प्रकार लगातार मलबे की परत के ऊपर परत जमा होती रहती है। ऊपरी दबाव के कारण नीचे वाली परतें कुछ कठोर हो जाती हैं। ये परतें ही कठोर होकर अवसादी शैलें बन जाती हैं।

प्रश्न 6. आग्नेय शैलों की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-आग्नेय शैलों की दो विशेषताएँ निम्नवत् हैं

  • ये अत्यन्त कठोर होती हैं; अतः इनमें जल प्रवेश नहीं कर सकता।
  • इन शैलों का निर्माण ज्वालामुखी से निकले गर्म एवं तप्त मैग्मा द्वारा होता है।

प्रश्न 7. प्रमुख कायान्तरित चट्टानों के नाम लिखिए।
उत्तर-प्रमुख कायान्तरित चट्टानें हैं—स्लेट, ग्रेफाइट, संगमरमर, हीरा, नीस आदि।

प्रश्न 8. पातालीय आग्नेय चट्टानें क्या हैं? उदाहरण देकर बताइए।
उत्तर-भूगर्भ का जो मैग्मा धरातल पर न आकर भीतरी भागों में बहुत अधिक गहराई पर ठण्डा होकर जम जाता है और उससे जो चट्टानें बनती हैं, वे पातालीय चट्टानें कहलाती हैं; जैसे-ग्रेनाइट और ग्रैबो।।

प्रश्न 9. कायान्तरित एवं आग्नेय चट्टानों के चार-चार उदाहरण दीजिए।
उत्तर-कायान्तरित चट्टानें—(1) स्लेट, (2) नीस, (3) हीरा तथा (4) संगमरमर। | आग्नेय चट्टानें-(1) गैब्रो, (2) बेसाल्ट, (3) ग्रेनाइट तथा (4) सिल।।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. स्पष्ट कीजिए-चट्टानें खनिजों का समूह हैं।
उत्तर-कुछ चट्टानें एक ही खनिज से निर्मित होती हैं; जैसे—बलुआ पत्थर, चूना-पत्थर, संगमरमर आदि, किन्तु कुछ चट्टानें एक से अधिक खनिजों के सम्मिश्रण से बनी होती हैं; जैसे—ग्रेनाइट, स्फटिक, फेल्सफर और अभ्रक, जो तीन या चार खनिजों से मिलकर बनते हैं। कुछ अन्य अनेक प्रकार की धातु एवं अधातु खनिजों के जटिल मिश्रण से भी बनती हैं; जैसे-ऐलुमिना, कांग्लोमरेट, लिमोनाइट अयस्क आदि। भूवैज्ञानिकों द्वारा अब तक लगभग 2,000 खनिजों का पता लगाया जा चुका है, किन्तु भूपटल के निर्माण में इनमें से केवल 20 खनिज ही महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। खनिज विशेष प्रकार के गुणों वाला मूल-तत्त्वों का रासायनिक यौगिक (Chemical Compound) होता है। अभी तक 115 मूल तत्त्वों के बारे में जानकारी प्राप्त हो सकी है, किन्तु भू-पृष्ठ के निर्माण में इसमें से केवल 8 ही प्रमुख माने गये हैं। इस प्रकार भू-पृष्ठ का 98.59 प्रतिशत भाग केवल 8 खनिजों ऑक्सीजन (46.8), सिलिकन (27.7), ऐलुमिनियम (8.13), लोहा (5.0), कैल्सियम (3.63), सोडियम (2.83), पोटैशियम (2.49) और मैग्नीशियम (2.09) प्रतिशत से निर्मित है। पृथ्वी के शेष 1.41 प्रतिशत भाग की रचना टाइटैनियम, हाइड्रोजन फॉस्फोरस, कार्बन, मैंगनीज, गन्धक, बोरियम, क्लोरीन, सोना, चाँदी, ताँबा, पारा, सीसा आदि शेष सभी तत्त्वों से हुई है। इस प्रकार चट्टानें खनिजों का समूह हैं।

प्रश्न 2. शैलों के तापीय और गत्यात्मक कायान्तरण का अन्तर बताइए।
उत्तर-शैलों का तापीय कायान्तरण ज्वालामुखी क्रिया के द्वारा होता है। ज्वालामुखी क्रिया के दौरान उष्ण मैग्मा के मार्ग में पड़ने वाली शैलें अत्यधिक ताप के कारण परिवर्तित हो जाती हैं। इसे तापीय कायान्तरण कहते हैं। इसके विपरीत, गत्यात्मक कायान्तरण का कारण भूगर्भ की पर्वत निर्माणकारी हलचलें हैं। इन हलचलों के कारण शैलों में गतिशीलता उत्पन्न होती है। परिणामतः वे काफी गहराई पर पहुँच जाती हैं। अत्यधिक दबाव, भिंचाव तथा उष्णता के कारण उनमें कायान्तरण होता है।

प्रश्न 3. रूपान्तरण के मुख्य प्रकार बताइए।
उत्तर-रूपान्तरण के प्रभाव-क्षेत्र एवं उसके अभिकर्ताओं के अनुसार प्रमुख प्रकार निम्नवत् हैं–
1. संस्पर्शीय रूपान्तरण अथवा तापीय रूपान्तरण-जब तप्त मैग्मा के सम्पर्क में आकर शैल का रूप बदल जाता है तो उसे संस्पर्शीय या तापीय रूपान्तरण कहते हैं। भूगर्भ में बैथोलिथ सिल, डाइक आदि का निर्माण मैग्मा क्षेत्रों के निकटवर्ती भागों में शैलों के रूपान्तरण द्वारा इसी प्रकार : होता है। बलुआ-पत्थर से क्वार्ट्ज़ाइट और चूना पत्थर से संगमरमर इसी प्रकार बनी रूपान्तरित
शैलें हैं।

2. प्रादेशिक रूपान्तरण-जब रूपान्तरण की क्रिया अत्यधिक ताप एवं दबाव के कारण एक विस्तृत क्षेत्र में घटित होती है तो उसे प्रादेशिक रूपान्तरण कहते हैं। ऐसा रूपान्तरण प्रायः नवीन | पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाता है। यहाँ संगमरमर, स्लेट, सिस्ट, क्वार्ट्जाइट, नीस आदि रूपान्तरित शैलें व्यापक स्तर पर मिलती हैं।

प्रश्न 4. शैलों को वर्गीकृत कीजिए।
या शैल या चट्टान कितने प्रकार की होती हैं?
उत्तर-भू-पटल पर पाई जाने वाली शैलों को उनकी संरचना एवं गुणों के आधार पर निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा जा सकता है

1. आग्नेय या प्राथमिक शैल-यह शैल पृथ्वी के तरल मैग्मा के शीतल होने से सर्वप्रथम निर्मित हुई थी, इसलिए इसे प्राथमिक शैल कहते है।

2. परतदार या अवसादी शैल-जल भागों में अवसादों एवं जीवावशेषों के जमाव से निर्मित शैलें अवसादी शैलें कहलाती हैं। इनका निर्माण विभिन्न अपरदन कारकों जल, वायु, हिमानी आदि से होता है।

3. रूपान्तरित या कायान्तरित शैल-दाब एवं ताप के कारण अवसादी या आग्नेय शैलों के रूप परिवर्तन के फलस्वरूप कायान्तरित शैलों का निर्माण होता है।

प्रश्न 5. आग्नेय शैलों का रासायनिक संरचना के आधार पर वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर-रासायनिक संरचना के आधार पर आग्नेयशैलों का वर्गीकरण-आग्नेय शैलों की संरचना में सिलिका प्रमुख घटक होता है। सिलिका की मात्रा के आधार पर इन्हें निम्नलिखित चार भागों में बाँटा गया हैं

  1. अधिसिलिका या अम्लप्रधान चट्टानें–इनका उदाहरण ग्रेनाइट और आब्सीडियन चट्टानें हैं। जिनमें सिलिका की मात्रा 65% से अधिक होती है। इन चट्टानों का रंग हल्का होता है।
  2. मध्यसिलिका चट्टानें-डायोराइट और एण्डोजाइट इसी प्रकार की चट्टानें हैं जिनमें सिलिका की मात्रा 55% से 65% तक होती है।
  3. अल्पसिलिका या बेसिक चट्टानें-इनमें सिलिका 45% से 55% तक पाया जाता है। इनका रंग गहरा होता है। बेसाल्ट और गैब्रो इनके उदाहरण हैं।
  4. अत्यल्प सिलिका या बेसिक चट्टानें-इनमें सिलिका की मात्रा 45% से भी कम होती है। पेरिडोटाइट इसी प्रकार की चट्टान है जो बहुत भारी होती है।

प्रश्न 6. कायान्तरित शैलों की मुख्य विशेषता एवं आर्थिक महत्त्व बताइए।
उत्तर-कायान्तरित शैलों की विशेषताएँ
कायान्तरित शैलों में निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती हैं

  • इन चट्टानों में रवे तो पाए जाते हैं, परन्तु परतों का प्रायः अभाव पाया जाता है। शैलों का कायान्तरण हो जाने के फलस्वरूप उनके जीवाश्म नष्ट हो जाते हैं।
  • ये शैलें संगठित तथा कठोर होती हैं: अतः इन पर ऋतु-अपक्षय एवं अपरदन की क्रियाओं का विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है।
  • ये शैलें अरन्ध्र होती हैं, अतः इनमें जल प्रवेश नहीं कर पाता। इनका अपरदन तथा अपक्षये भी कठिनाई से होता है।
  • यद्यपि इन शैलों का निर्माण आग्नेय तथा परतदार शैलों के रूप-परिवर्तन से होता है, फिर भी इनमें मूल चट्टान का कोई लक्षण नहीं पाया जाता है।

कायान्तरित शैलों का आर्थिक महत्त्व

कायान्तरित शैलें आर्थिक दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण होती हैं। इन्हीं शैलों में सोना, हीरा, संगमरमर, चाँदी, ग्रेफाइट तथा चुम्बकीय लोहा जैसे मूल्यवान खनिज पाए जाते हैं, जिनका उपयोग उद्योगों तथा भवन-निर्माण के लिए किया जाता है। सोना, चाँदी तथा हीरा बहुमूल्य खनिज हैं। इन शैलों में गन्धक-मिश्रित जल के स्रोत पाए जाते हैं, जिनमें स्नान करने से त्वचा के रोग नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 7. प्रमुख कायान्तरित शैल एवं उनके मौलिक रूपों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर- प्रमुख कायान्तरित शैलें तथा उनके मौलिक रूप
UP Board Solutions for Class 11 Geography Fundamentals of Physical Geography Chapter 5 Minerals and Rocks 2

प्रश्न 8. खनिज एवं चट्टान में अन्तर बताइए।
उत्तर-खनिज एवं चट्टान में अन्तर
UP Board Solutions for Class 11 Geography Fundamentals of Physical Geography Chapter 5 Minerals and Rocks 3

प्रश्न 9. रूपान्तरित एवं अवसादी शैलों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-रूपान्तरित एवं अवसादी शैलों में अन्तर
UP Board Solutions for Class 11 Geography Fundamentals of Physical Geography Chapter 5 Minerals and Rocks 4

प्रश्न 10. फोलिएशन (Foliation) एवं लिनिएशन (Lineation) में भेद कीजिए।
उत्तर-फोलिएशन (पत्रण)—जब रूपान्तरित शैल के कण कुछ परत के रूप में समान्तर अवस्था में पाए। जाते हैं तो इस प्रकार की कायान्तरित शैलों की बनावट फोलिएशन या पत्रण कहलाती है।
लिनिएशन—यह भी रूपान्तरित चट्टानों की एक विशेष बनावट है जिसके अन्तर्गत खनिजों के कण लम्बे, पतले तथा पेन्सिल के रूप में पाए जाते हैं।

प्रश्न 11. खनिजों का सामान्य वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर-सामान्यतः खनिजों का वर्गीकरण धात्विक खनिज एवं अधात्विक खनिजों के रूप में किया जाता है
(क) धात्विक खनिज-इनमें धातु तत्त्वों की प्रधानता होती है। इन्हें तीन वर्गों में विभक्त किया जाता है

  1. बहुमूल्य धातु खनिज-स्वर्ण, चाँदी, प्लेटिनम आदि।
  2. लौह धातु खनिज-लौह एवं स्टील के निर्माण के लिए प्रयुक्त खनिज; जैसे—मैंगनीज आदि।
  3. अलौहिक धातु खनिज-इनमें ताम्र, सीसा, जिंक, टिन, ऐलुमिनियम आदि धातुएँ सम्मिलित हैं।

(ख) अधात्विक खनिज-इसमें धातु के अंश उपस्थित नहीं होते हैं। गन्धक, फॉस्फेट तथा नाइट्रेट आदि अधात्विक खनिज के मुख्य उदाहरण हैं। सीमेण्ट अधात्विक खनिजों का मिश्रित पदार्थ है।

प्रश्न 12. निर्माण पद्धति के आधार पर अवसादी चट्टानों के तीन मुख्य प्रकार उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर–निर्माण पद्धति के आधार पर अवसादी शैलों के तीन मुख्य वर्ग निम्नलिखित हैं

  1. यांत्रिकी रूप से निर्मित-उदाहरणार्थ; बालुकाश्म, पिण्डशिला, चूना प्रस्तर, शैल विमृदा आदि।
  2. कार्बनिक रूप से निर्मित-उदाहरणार्थ, गीजराइट, खड़िया, चूना-पत्थर, कोयला आदि।
  3. रासायनिक रूप से निर्मित-उदाहरणार्थ; श्रृंगार प्रस्तर, चूना-पत्थर, हेलाइट, पोटाश आदि।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. खनिज को परिभाषित कीजिए तथा भौतिक विशेषताओं और स्वभाव के आधार पर खनिजों की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर-खनिज की परिभाषा
पृथ्वी से प्राप्त वे पदार्थ जिनकी साधारणतः एक विशेष प्रकार की रासायनिक संरचना होती है तथा जिसमें विशेष रासायनिक और भौतिक गुण पाए जाते हैं, उन्हें खनिज कहते हैं। खनिज प्राय: दो या दो से अधिक पदार्थों के मिश्रण से बनते हैं, परन्तु कुछ खनिज ऐसे भी हैं जो केवल एक ही पदार्थ से बनते हैं। जैसे–सल्फर, ग्रेफाइट, सोना आदि।।

भौतिक विशेषताएँ

  1. क्रिस्टल-खनिजों के कणों का ब्राह्यरूप अणुओं की आन्तरिक व्यवस्था द्वारा निश्चित होता है। खनिजों के कण घनाकार, अष्ट्भुजाकार या षट्भुजाकार भी हो सकते हैं।
  2. विदलन-खनिजों में विदलन प्रकृति दिशा द्वारा निश्चित होती है। खनिज एक या अनेक दिशाओं में एक-दूसरे से कोई भी कोण बनाकर टूट सकते हैं।
  3. विभंजन-खनिजों के अणुओं की आन्तरिक व्यवस्था अत्यन्त जटिल होती है। इसलिए इनमें विभाजन अनियमित होता है।
  4. चमक-प्रत्येक खनिज की अपनी चमक होती है; जैसे—मेटैलिक, रेशमी, ग्लॉसी आदि।
  5. रंग-खनिजों के रंग उनकी परमाणविक संरचना से तथा कुछ में अशुद्धियों के कारण निर्धारित होते हैं। मैलाकाइट, एजुराइट, कैल्सोपाइराट आदि परमाणविक संरचना के तथा अशुद्धियों के कारण क्वार्ट्ज का रंग श्वेत, हरा, लाल व पीला होना इसके मुख्य उदाहरण हैं।
  6. धारियाँ-खनिजों में विभिन्न रंगों के मिश्रण के कारण धारियाँ होती हैं।
  7. पारदर्शिता-खनिजों में पारदर्शिता के कारण प्रकाश की किरणें आर-पार हो जाती हैं। कुछ खनिज अपारदर्शी भी होते हैं।
  8. संरचना-प्रत्येक खनिज की संरचना भिन्न-भिन्न होती है, इसका निर्धारण क्रिस्टल की व्यवस्था पर निर्भर होता है।
  9. कठोरता-खनिज कठोर एवं कोमल दोनों प्रकार के होते हैं, किन्तु अधिकांश खनिज कठोर ही होते हैं।

प्रश्न 2. शैल या चट्टान से आप क्या समझते हैं? चट्टानों का वर्गीकरण कीजिए तथा उनका आर्थिक महत्त्व बताइए।
या परतदार या अवसादी चट्टानों की उत्पत्ति, विशेषताओं एवं आर्थिक महत्त्व की विवेचना कीजिए।
या शैलों को वर्गीकृत कीजिए तथा आग्नेय शैलों की विशेषताएँ एवं आर्थिक महत्त्व बताइए।
या अवसादी शैलों का वर्गीकरण कीजिए एवं प्रत्येक की विशेषताएँ बताइए।
या आग्नेय शैलों की उत्पत्ति, विशेषताओं एवं आर्थिक महत्त्व की विवेचना कीजिए।
उत्तर-शैल या चट्टान का अर्थ एवं परिभाषा
सामान्य रूप से भूतल की रचना जिन पदार्थों से हुई है, उन्हें चट्टान या शैल के नाम से पुकारते हैं। चट्टानें अनेक खनिज पदार्थों का सम्मिश्रण होती हैं। खनिज पदार्थों का यह सम्मिश्रण रासायनिक तत्त्वों का योग होता है। वर्तमान वैज्ञानिक युग में 115 मूल तत्त्वों की खोज कर ली गयी है। उपर्युक्त तत्त्वों में धरातलीय संरचना का लगभग 98% भाग केवल आठ तत्त्वों-ऑक्सीजन, सिलिकन, ऐलुमिनियम, लोहा, कैल्सियम, सोडियम, पोटैशियम एवं मैग्नीशियम द्वारा निर्मित है। शेष 2% भाग 98 तत्त्वों के योग से बना है। इसके अतिरिक्त प्रकृति द्वारा प्रदत्त अन्य तत्त्वे भी धरातलीय निर्माण में सहायक हुए हैं।

‘चट्टान’ शब्द का शाब्दिक अर्थ किसी दृढ़ एवं कठोर स्थलखण्ड से लिया जाता है, परन्तु भूतल की ऊपरी पपड़ी में मिले हुए सभी पदार्थ, चाहे वे ग्रेनाइट की भाँति कठोर हों या चीका की भाँति कोमल, चट्टान कहलाते हैं। आर्थर होम्स का मत है कि “शैल अथवा चट्टानों का अधिकतम भाग खनिज पदार्थों कां सम्मिश्रण होता है।” खनिज पदार्थों के सम्मिश्रण चाहे चीका के समान कोमल हों या क्वार्ट्जाइट के समान ठोस या बालू के समान ढीले तथा मोटे कण वाले हों, सभी चट्टान कहलाते हैं। इस आधार पर चट्टान की परिभाषा इन शब्दों में व्यक्त की जा सकती है-“चट्टान अपनी भौतिक स्थिति का वह पिण्ड है जिसके द्वारा धरातल का ठोस रूप परिणत हुआ है।” वास्तव में भूपटल के निर्माण में सहयोग देने वाले सभी तत्त्व शैल या चट्टान कहलाते हैं।

चट्टानों का वर्गीकरण

सामान्य रूप से चट्टानों को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा जा सकता है-

  • आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks),
  • अवसादी या परतदार चट्टानें (Sedimentary Rocks) एवं
  • कायान्तरित या रूपान्तरित चट्टानें (Metamorphic Rocks)।

1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks)-‘आग्नेय’ शब्द लैटिन भाषा के Igneous शब्द का रूपान्तरण है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘अग्नि’ से होता है। भूगोलवेत्ताओं का विचार है कि प्रारम्भ में सम्पूर्ण पृथ्वी आग की तपता हुआ एक गोला थी, जो धीरे-धीरे ठण्डी होकर द्रव अवस्था में परिणत हुई है। द्रव अवस्था से ठोस तथा इस ठोस अवस्था से अधिकांशत: आग्नेय चट्टानें बनी हैं। वारसेस्टर नामक भूगोलवेत्ता का कथन है कि “द्रव अवस्था वाली चट्टानें जब ठण्डी होकर ठोस अवस्था में परिवर्तित हुईं, वे ही आग्नेय चट्टानें बनीं।” जब भूगर्भ का गर्म एवं द्रवित लावा । ज्वालामुखी क्रिया द्वारा धरातल पर फैलने से ठण्डा होकर ठोस बनने लगा, तभी आग्नेय चट्टानों को निर्माण हुआ। ज्वालामुखी क्रिया द्वारा इन चट्टानों का निर्माण आज भी होता रहता है, क्योंकि ये प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से अन्य चट्टानों को भी जन्म देती हैं।

आग्नेय चट्टानों की विशेषताएँ–

  1. इन चट्टानों का निर्माण ज्वालामुखी से निकले गर्म एवं तप्त मैग्मा द्वारा होता है।
  2. ये अत्यन्त कठोर होती हैं और इनमें जल प्रवेश नहीं कर सकता। जल का इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ती है, परन्तु ये विखण्डन के कारण टूट जाती हैं।
  3. इन चट्टानों के रवे बड़े ही महीन होते हैं। इन रवों को कोई आकार तथा क्रम नहीं होता।
  4. इन चट्टानों का स्वरूप कभी गोलाकार स्थिति में नहीं मिलता है।
  5. ये चट्टानें सघन होती हैं। इनमें परतों का अस्तित्व देखने को भी नहीं मिलता, परन्तु ज्वालामुखी उद्गार के क्रमशः होते रहने से परतों की भ्रान्ति हो सकती है। इन चट्टानों के वर्गाकार जोड़ों पर ही ऋतु-अपक्षय का प्रभाव पड़ता है।
  6. इन चट्टानों में जीवावशेष (Fossils) नहीं पाये जाते हैं, क्योंकि तप्त एवं तरल लावा इन्हें | नष्ट कर देता है। यह इन शैलों की सबसे बड़ी विशेषता है।
  7. आग्नेय चट्टानों में अनेक खनिज पाये जाते हैं।

आग्नेय चट्टानों का वर्गीकरण- विश्व में प्राचीनतम आग्नेय चट्टानों की आयु लगभग 15 अरब वर्ष ऑकी गयी है। इस प्रकार की चट्टानें प्रायद्वीपीय भारत में अधिक पायी जाती हैं। राजस्थान का अरावली पर्वत, छोटा नागपुर की गुम्बदनुमा पहाड़ियाँ, राजमहल की श्रेणी और रॉची का पठार इस प्रकार की चट्टानों के बने हैं। अजन्ता की गुफाएँ इन्हीं चट्टानों को काटकर बनाई गयी हैं। स्थिति के अनुसार आग्नेय चट्टानों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा गया है(अ) आभ्यन्तरिक या आन्तरिक आग्नेय चट्टानें (Intrusive Rocks) एवं (ब) बाह्य आग्नेय चट्टानें (Extrusive Rocks)।
(अ) आभ्यन्तरिक या आन्तरिक आग्नेय चट्टानें (Intrusive Rocks)-जब गर्म एवं तप्त लावा अत्यधिक ताप एवं एकत्रित गैस के माध्यम से भूगर्भ की चट्टानों को तोड़कर ऊपर आने का प्रयास करता है तो लावे का अधिकांश भाग भूगर्भ में नीचे की परतों में ही रह जाता है। यह लावा वहीं ठण्डा होकर आग्नेय चट्टानों में परिवर्तित हो जाता है, जिन्हें आभ्यन्तरिक या आन्तरिक चट्टानें कहते हैं। लावे के शीतल होने की अवधि के आधार पर इन चट्टानों को निम्नलिखित उप-विभागों में बाँटा जा सकता है

(i) पातालीय आग्नेय चट्टानें (Plutonic lgneous Rocks)-जब भूगर्भ का गर्म एवं तप्त लावा बाहर न निकलकर अन्दर ही अन्दर जमकर ठोस हो जाता है, तो पातालीय आग्नेय शैल का निर्माण होता है। इनमें मोटे रवे पाये जाते हैं। ग्रेनाइट शैल इसका प्रमुख उदाहरण है।

(ii) अर्द्ध-पातालीय आग्नेय चट्टानें (Hypabyssal-Igneous Rocks)-इन्हें मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानें या अधिवितलीय आग्नेय चट्टानें भी कहते हैं। जब भूगर्भ का गर्म एवं तप्त लावा पृथ्वी की ऊपरी पपड़ी पर आने में असमर्थ रहता है तथा मार्ग में पड़ने वाली सन्धियों एवं दरारों में पहुँचकर जम जाता है, तब यही लावा बाद में ठण्डा होकर चट्टानों को रूप धारण कर लेता है। इन्हें अर्द्ध-पातालीय आग्नेय चट्टानों के नाम से पुकारते हैं। इनमें रवे छोटे आकार के होते हैं। लैकोलिथ, लैपोलिथ, फैकोलिथ, सिल, डाइक आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

(ब) बाह्य आग्नेय चट्टानें (Extrusive Igneous Rocks)-जब भूगर्भ का तप्त एवं तरल लावा किसी कारणवश ज्वालामुखी उद्गार द्वारा धरातल के ऊपर ठोस रूप में जम जाता है। तो वह चट्टान का रूप धारण कर लेता है। इससे जिन चट्टानों का निर्माण होता है, उन्हें बाह्य आग्नेय चट्टानें कहते हैं। इनमें रवे नहीं होते। गैब्रो तथा बेसाल्ट ऐसी ही शैलें हैं।

आग्नेय चट्टानों का आर्थिक उपयोग (लाभ)-आग्नेय चट्टानों में विभिन्न प्रकार के खनिज पाये जाते हैं। अधिकांश खनिज व धातु-अयस्क इसी प्रकार की चट्टानों में पाये जाते हैं। लौह-अयस्क,सोना, चाँदी, सीसा, जस्ता, ताँबा, मैंगनीज आदि महत्त्वपूर्ण धातु खनिज आग्नेय चट्टानों में पाये जाते हैं।

ग्रेनाइट जैसी कठोर चट्टानों का उपयोग भवन-निर्माण में व उसके सजाने में किया जाता है। भारत के छोटा नागपुर, ब्राजील का मध्य पठारी भाग, संयुक्त राज्य अमेरिका व कनाडा के लोरेंशियन शील्ड के भागों में आग्नेय चट्टानों में अधिकांश खनिज पाये जाते हैं।

2. अवसादी या परतदार चट्टानें (Sedimentary Rocks)-भूतल के 75% भाग पर अवसादी या परतदार चट्टानों का विस्तार है, शेष 25% भाग में आग्नेय एवं कायान्तरित चट्टानें विस्तृत हैं। इन चट्टानों का निर्माण अवसादों के एकत्रीकरण से हुआ है। अपक्षय एवं अपरदन के विभिन्न साधनों द्वारा धरातल, झीलों, सागरों एवं महासागरों में लगातार मलबा (Debris) जमा होता रहता है। यह मलबा परतों के रूप में जमा होता रहता है। इस प्रकार लगातार मलबे की परत के ऊपर परत जमा होती रहती है। अत: ऊपरी दबाव के कारण नीचे वाली परतें कुछ कठोर हो जाती हैं। इन परतों के विषय में पी० जी० वारसेस्टर ने कहा है कि ‘अवसादी चट्टानों का अर्थ होता है–धरातलीय चट्टानों के टूटे मलबे तथा खनिज पदार्थ किसी स्थान पर एकत्र होते रहते हैं, जो धीरे-धीरे एक परत का रूप ले लेते हैं।” यही परतें कठोर होकर पंरतदार शैलें बन जाती हैं। इन चट्टानों में कणों के जमने का क्रम भी एक निश्चित गति से होता है। पहले मोटे कण जमा होते हैं तथा बाद में उनके ऊपर छोटे-छोटे कण जमा होते जाते हैं तथा इनके ऊपर एक महीन एवं बारीक कणों की परत जमा हो जाती है। इस प्रकार कणों का जमाव अपरदन के साधनों के ऊपर निर्भर करता है। बाद में ये चट्टानें संगठित हो जाती हैं। अवसादों के जल-क्षेत्रों में जमाव के कारण इन चट्टानों में जीवाश्म पाये जाते हैं। आरम्भिक अवस्था में इन चट्टानों का निर्माण समतल भूमि एवं जल-क्षेत्रों में होता है, परन्तु कालान्तर में इन्हीं चट्टानों द्वारा ऊँचे-ऊँचे वलित पर्वतों का निर्माण भी ‘होता है। इन चट्टानों को जोड़ने वाले मुख्य तत्त्व कैलसाइट, लौह-मिश्रण तथा सिलिका आदि हैं। भारत में इनके क्षेत्र गंगा, यमुना, सतलुज, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, ताप्ती, महानदी, दामोदर, कृष्णा, गोदावरी आदि नदी-घाटियाँ हैं।

अवसादी चट्टानों की विशेषताएँ—अवसादी चट्टानों में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं

  1. अवसादी चट्टानों में जीवावशेष पाये जाते हैं। इन अवशेषों से इन चट्टानों के समय तथा स्थान का भूतकालीन परिचय प्राप्त हो जाता है।
  2. ये चट्टानें कोमल तथा रवेविहीन होती हैं।
  3. इन चट्टानों की निर्माण-प्रक्रिया में छोटे-बड़े सभी प्रकार के कणों का योग होता है, जिससे इनके आकार में भी भिन्नता रहती है।
  4. इन चट्टानों में परतें पायी जाती हैं जो स्तरों के रूप में एक-दूसरी पर समतल रूप में फैल जाती हैं।
  5. सागरीय जल में बनने वाली चट्टानों में धाराओं तथा लहरों के चिह्न स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होते हैं।
  6. इन चट्टानों को चाकू अथवा किसी लोहे की छड़ से खुरचने पर धारियाँ स्पष्ट रूप से बन जाती हैं। इन खुरचे हुए पदार्थों के विश्लेषण से पता चलता है कि इसमें विभिन्न खनिज पदार्थों का मिश्रण होता है।
  7. ये चट्टानें सरन्ध्र अर्थात् प्रवेश्य होती हैं। जल इन चट्टानों में शीघ्रता से प्रवेश कर जाता है।
  8. नदियों की बाढ़ द्वारा लाई गयी कांप मिट्टी पर जब सूर्य की किरणें पड़ती हैं तो उष्णता के कारण इनमें दरारें पड़ जाती हैं। इसे पंक-फटन कहते हैं।
  9. परतदार चट्टानों में जोड़ तथा सन्धियाँ पायी जाती हैं।
  10. कोयला, पेट्रोल, जिप्सम, डोलोमाइट व नमक जैसे खनिज अवसादी शैलों में ही पाये जाते हैं।
  11. कृषि-कार्य, सिंचाई के साधनों का विकास करने तथा भवन निर्माण में अवसादी शैलों का अधिक महत्त्व है।

अवसादी चट्टानों का वर्गीकरण—(क) निर्माण में प्रयुक्त साधन के अनुसार अवसादी शैलों का वर्गीकरण-अवसादी चट्टानों की निर्माण-प्रक्रिया के साधनों या, कारकों के आधार पर इन्हें ‘निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है

(i) जल-निर्मित (जलज) चट्टानें-अवसादी शैलों के निर्माण में जल का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। पृथ्वीतल पर अधिकांश अवसादी चट्टानें जल द्वारा ही निर्मित हुई हैं। इनमें भी सबसे अधिक योगदान नदियों का रहा है। इन चट्टानों का निर्माण जलीय क्षेत्रों में होता है; अतः इन्हें जलज चट्टानें भी कहते हैं। जल द्वारा निर्मित अवसादी चट्टानों को निम्नलिखित तीन उपविभागों में बाँटा जा सकता है—(अ) नदीकृत चट्टानें, (ब) समुद्रकृत चट्टानें तथा (स) झीलकृत चट्टानें।

(ii) वायु-निर्मित चट्टानें-उष्ण एवं शुष्क मरुस्थलीय क्षेत्रों की चट्टानों में यान्त्रिक अपक्षय तथा अपघटन जारी रहता है। इसलिए बहुत-सा मलबा चूर्ण एवं कणों के आकार में बिखरा पड़ा रहता है। वायु इस मलबे को समय-समय पर विभिन्न स्थानों पर लगातार परतों के रूप में जमा करती रहती है। बाद में इस जमा हुए मलबे से अवसादी चट्टानों का निर्माण हो जाता है। लोयस के जमाव इसी प्रकार होते हैं।

(iii) हिमानी-निर्मित चट्टानें-उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में हिमानियाँ अपरदन एवं निक्षेपण की क्रियाएँ करती हैं। निक्षेपण की क्रिया से हिमानीकृत जो अवसादी चट्टानों का निर्माण होता है, उन्हें ‘हिमोढ़’ अथवा ‘मोरेन’ कहा जाता है।

(ख) निर्माण प्रक्रिया के अनुसार अवसादी शैलों का वर्गीकरण-निर्माण-प्रक्रिया के अनुसार अवसादी शैलों का वर्गीकरण निम्नवत् है–
(i) बलकृत या यन्त्रीकृत अवसादी शैलें-अपरदन के साधनों; जैसे–बहते हुए जल, हिम, पवन, लहरों के द्वारा विभिन्न आकारों में अवसाद जमा किये जाते हैं। इन अवसादों से शैलें बनती हैं। कणों की मोटाई के आधार पर चीका मिट्टी (सूक्ष्म कण), बलुआ पत्थर (मध्यम कण) तथा कांग्लोमरेट या गोलाश्म बलकृत अवसादी शैलों के उदाहरण हैं।

(ii) जैविक तत्त्वों से निर्मित चट्टानें-वनस्पतियों, जीव-जन्तुओं आदि के अवशेष भूतल में दब जाने से काफी समय बाद कार्बनिक चट्टानों के रूप में परिणत हो जाते हैं। दबाव की क्रिया के फलस्वरूप ये कठोर रूप धारण कर लेते हैं। इस क्रिया में निर्मित चट्टानों में कोयला, मूंगे की चट्टान, चूने का पत्थर एवं पीट आदि का , महत्त्वपूर्ण स्थान है।

(iii) रासायनिक तत्त्वों से निर्मित चट्टानें-इन चट्टानों का निर्माण चूने एवं जीव-जन्तुओं के अवशेषों का जल में घुलकर होने से हुआ है। अधिकांशतः इन चट्टानों के जमाव समुद्री भागों में मिलते हैं। जब चट्टानों में ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइ-ऑक्साइड गैसें प्रवेश करती हैं तो वे चट्टानों के रासायनिक संगठन को परिवर्तित कर देती हैं। खड़िया, सेलखड़ी, डोलोमाइट, जिप्सम, नमक आदि इसी प्रकार की चट्टानें हैं। इन चट्टानों पर अपक्षय की क्रियाओं का प्रभाव शीघ्रता से पड़ता है।

अवसादी चट्टानों का आर्थिक उपयोग (लाभ)-अवसादी चट्टाने अनेक प्रकार से उपयोगी हैं। वर्तमान में सभी देशों में नदियों द्वारा निर्मित समतल अवसादी मैदान, बालू के महीन जमाव के लोयस के मैदान आदि विश्व के सबसे उपजाऊ एवं सघन क्रियाकलाप एवं सघन बसाव के प्रदेश हैं। विश्व की सभ्यता के विकास का निर्माण इन्हीं उपजाऊ एवं सघन मैदानों में किया जाता रहा है। बलुआ पत्थर, चूने के पत्थर आदि का उपयोग भवन-निर्माण में किया जाता है। चूना एवं डोलोमाइट व अन्य मिट्टियाँ इस्पात उद्योग में काम आती हैं। अवसादी चट्टानों से प्राप्त चूने के पत्थर का उपयोग सीमेण्ट बनाने में किया जाता है। सीमेण्ट उद्योग आज विश्व के प्रमुख उद्योगों में गिना जाता है।

जिप्सम का उपयोग विविध प्रकार के उद्योगों—चीनी मिट्टी के बर्तन, सीमेण्ट आदि में किया जाता है।

अनेक प्रकार के क्षार, रसायन, पोटाश एवं नमक जो कि अवसादी चट्टानों से प्राप्त होते हैं— विभिन्न रासायनिक उद्योगों के आधार हैं। कोयला एवं खनिज तेल भी अवसादी चट्टानों से प्राप्त होते हैं। ये शक्ति के प्रमुख स्रोत हैं। आज का औद्योगिक विकास कोयले के कारण ही सम्भव हो सका है।

3. कायान्तरित चट्टानें (Metamorphic Rocks)–इन्हें रूपान्तरित चट्टानों के नाम से भी पुकारा जाता है। अंग्रेजी भाषा का मेटामोरफिक’ शब्द मेटा एवं मार्फे शब्दों के सम्मिलन से बना है। अतः मेटा का अर्थ परिवर्तन तथा मार्फे का अर्थ रूप से है अर्थात् ”जिन चट्टानों में दबाव, गर्मी एवं रासायनिक क्रियाओं द्वारा उनकी बनावट, रूप तथा खनिजों का पूर्णरूपेण कायापलट हो जाता है, कायान्तरित चट्टानें कहलाती हैं।” विश्व के प्राय: सभी प्राचीन पठारों पर कायान्तरित चट्टानें मिलती हैं। भारत में ऐसी चट्टानें दक्षिण के प्रायद्वीप, दक्षिण अफ्रीका के पठारे और दक्षिणी अमेरिका के ब्राजील के पठार, उत्तरी कनाडा, स्कैण्डेनेविया, अरब, उत्तरी रूस और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के पठार पर पायी जाती हैं।

चट्टानों का कायान्तरण भौतिक तथा रासायनिक दोनों ही क्रियाओं से सम्पन्न होता है। इसमें चट्टान एवं खनिज का रूप पूरी तरह से परिवर्तित हो जाता है। इन चट्टानों में भूगर्भ के ताप, दबाव, जलवाष्प, भूकम्प आदि कारणों से उनके मूल गुणों में परिवर्तन आ जाता है। रूप-परिवर्तन के बाद इनकी प्रारम्भिक स्थिति भी नहीं बतायी जा सकती। मूल चट्टान के रूपान्तरण से उसके रूप, रंग,
आकार तथा गुण आदि में पूर्ण परिवर्तन हो जाता है तथा वह अपने प्रारम्भिक रूप को खो देती है, जिससे मूल चट्टान में कठोरता आ जाती है। कभी-कभी एक ही चट्टान कई रूप धारण कर लेती है। चूना-पत्थर के रूपान्तरण से संगमरमर नामक पत्थर को निर्माण होता है। यह रूपान्तरण आग्नेय एवं अवसादी, दोनों ही चट्टानों का हो सकता है।

कायान्तरण अथवा रूप-परिवर्तन के कारण—चट्टानों का कायान्तरण निम्नलिखित कारणों के फलस्वरूप होता है–
1. तापमान-कायान्तरण का एक प्रमुख कारण तापक्रम है। भूगर्भ का अत्यधिक तापमान ज्वालामुखी उद्गार एवं पर्वत निर्माणकारी हलचलों को जन्म देता है जिससे चट्टानों का रूप-परिवर्तन हो जाता है।

2. सम्पीडन एवं दबाव-कायान्तरण में महाद्वीपों पर पर्वत–निर्माणकारी बलों एवं भूकम्प आदि से चट्टानों पर भारी दबाव पड़ता है जिससे चट्टानें टूटती ही नहीं, बल्कि उनका रूपान्तरण अथवा कायान्तरण हो जाता है।

3. घोलन शक्ति-सामान्यतया जल सभी पदार्थों को अपने में घोलने की शक्ति रखता है, परन्तु जब इस जल में ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें मिलती हैं तो इसकी घुलन-शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। वर्षा का जल इसका प्रमुख उदाहरण है। वर्षा का जल चट्टानों के साथ मिलकर रासायनिक अपरदन का कार्य करता है जिससे वह चट्टानों को अपने में घोल लेता है। इससे चट्टानों की संरचना में रासायनिक रूपान्तरण हो जाता है।

इस प्रकार आग्नेय चट्टानें शिस्ट में, शैल स्लेट में, ग्रेनाइट नीस में, बलुआ पत्थर क्वार्ट्जाइट में, बिटुमिनस एन्थ्रेसाइट में तथा चूना-पत्थर संगमरमर में रूपान्तरित हो जाती हैं। कायान्तरित चट्टानों की विशेषताएँ—कायान्तरित चट्टानों में अग्रलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं

  • ये चट्टानें संगठित हो जाने से कठोर हो जाती हैं; अतः इन पर अपक्षय एवं अपरदन क्रियाओं का प्रभाव बहुत ही कम पड़ता है।
  • इन चट्टानों की संरचना अरन्ध्र होती है; अतः इनमें जल प्रवेश नहीं कर सकता।
  • ये चट्टानें रवेदार होती हैं, परन्तु इनमें परतें नहीं पायी जातीं।
  • कायान्तरण की क्रिया के कारण इन चट्टानों में जीवाश्म नहीं पाये जाते हैं।
  • कायान्तरण आग्नेय एवं अवसादी चट्टानों का होता है, परन्तु बाद में इनमें मूल अर्थात् प्रारम्भिक चट्टान की कोई लक्षण नहीं पाया जाता।
  • इन चट्टानों में सोना, हीरा, संगमरमर, चाँदी आदि बहुमूल्य खनिज पाये जाते हैं।

कायान्तरित चट्टानों का आर्थिक उपयोग (लाभ)-कायान्तरित चट्टानों में अनेक प्रकार के महत्त्वपूर्ण धातु खनिज पाये जाते हैं जो मानव के लिए अनेक प्रकार से उपयोगी हैं। अधिकांश बहुमूल्य खनिज (संगमरमर, सोना, चाँदी और हीरा) कायान्तरित चट्टानों से ही प्राप्त होते हैं। संगमरमर, जो एक प्रमुख कायान्तरित चट्टान है, भवन निर्माण में प्रयोग होता है। विश्वप्रसिद्ध ताजमहल एवं अनेक महत्त्वपूर्ण मन्दिर इसी प्रकार की चट्टान (संगमरमर) से निर्मित हैं। एन्थेसाइट कोयला, ग्रेनाइट एवं हीरा भी बहु-उपयोगी कायान्तरित चट्टानें हैं। अभ्रक जैसे खनिज भी बार-बार अवसादी चट्टानों के कायान्तरण होने से बनते हैं। कठोर क्वार्ट्जाइट का निर्माण भी अवसादी चट्टान के कायान्तरण से हुआ है एवं इसका उपयोग सुरक्षा एवं अन्य विशेष धातु उद्योग में अधिक होता है।

चट्टानों का आर्थिक महत्त्व

चट्टानें मानवीय जीवन के लिए अति महत्त्वपूर्ण तथा उपयोगी होती हैं। मानव को लगभग 2,000 वस्तुएँ चट्टानों एवं इनके माध्यम से प्राप्त होती हैं। पर्वत निर्माणकारी घटनाएँ, भूकम्प आदि विस्तृत वन क्षेत्रों को मिट्टी में दबा देती हैं, कालान्तर में ये कोयले में परिणत हो जाते हैं। कोयले की निर्माण प्रक्रिया में भी चट्टानों का अधिक हाथ रहता है। इमारती पत्थर, औद्योगिक खनिज-लोहा, कोयला एवं खनिज तेल तथा कीमती धातुएँ–सोना, चाँदी, टिन आदि इन्हीं चट्टानों से प्राप्त होती हैं। समस्त पृथ्वी की ऊपरी पपड़ी जिस पर मानव एवं जीव-जगत बसा हुआ है, चट्टानों के बारीक चूर्ण से ही निर्मित हुई है। चट्टानों के आर्थिक महत्त्व को निम्नलिखित शीर्षकों के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है–

1. कृषि के क्षेत्र में-उपजाऊ मिट्टी कृषि का आधार है। उपजाऊ मिट्टी के निर्माण में शैलों का विशेष महत्त्व रहता है। शैल चूर्ण जमकर ही उपजाऊ मिट्टी को जन्म देते हैं। अन्न, फल, शाक, भाजी, कपास, गन्ना, रबड़, नारियल, चाय, कहवा तथा गरम मसाले सभी मिट्टी में ही उगाये जाते हैं।

2. चरागाहों के क्षेत्र में-हरी घास के विस्तृत क्षेत्र चरागाह कहलाते हैं। हरी घास पशुओं को पौष्टिक चारा उपलब्ध कराती है। चरागाह पशुपालन के आदर्श क्षेत्र माने जाते हैं। हरी घास शैलों में ही उगा करती है; अत: पशुचारण और पशुपालन में भी शैलों की उपयोगिता अद्वितीय मानी गयी है।

3. भवन-निर्माण के क्षेत्र में-पत्श्रर भवन-निर्माण की प्रमुख सामग्री है। स्लेट, चूना-पत्थर, बलुआ पत्थर तथा संगमरमर भवन-निर्माण में सहयोग देते हैं। भवन-निर्माण का सस्ता और टिकाऊ मसाला चट्टानों से प्राप्त पदार्थों से ही बनाया जाता है। संगमरमर तथा ग्रेनाइट पत्थर भवनों को सुन्दर तथा भव्य स्वरूप प्रदान करते हैं।

4. खनिज उत्पादन के क्षेत्र में-खनिज पदार्थों का जन्म भूगर्भ में शैलों द्वारा ही होता है। शैलें सोना,चाँदी, ताँबा, लोहा, कोयला, मैंगनीज तथा अभ्रक आदि उपयोगी खनिजों को जन्म देकर जहाँ मानव के कल्याण की राह खोलती हैं, वहीं कोयला तथा खनिज तेल देकर ऊर्जा तथा तापमान के स्रोत बन जाती हैं।

5. उद्योगों को कच्चे माल प्रदान करने के क्षेत्र में- कृषिगत उपजों, वन्य पदार्थों तथा खनिज पदार्थों पर अनेक उद्योग-धन्धे निर्भर होते हैं। चट्टानें एक ओर तो उद्योगों को कच्चे माल देकर उनका पोषण करती हैं और दूसरी ओर शक्ति के साधनों की आपूर्ति करके उन्हें ऊर्जा तथा चालक-शक्ति प्रदान करती हैं। राष्ट्र का आर्थिक विकास जहाँ उद्योग-धन्धों पर निर्भर है, वहीं उद्योग-धन्धों का विकास शैलों से प्राप्त कच्चे मालों पर निर्भर करता है।

6. मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के क्षेत्र में- शैलें मानव को उसकी तीनों प्रथमिक आवश्यकताओं-भोजन, वस्त्र और मकान की आपूर्ति कराती हैं। मानव के पोषण में शैलों की विशेष सहयोग रहता है।

7. पेयजल स्रोतों के रूप में- पृथ्वी पर मानव के लिए पेयजल भूस्तरीय जल के अतिरिक्त भूगर्भीय जल भी होता है। भूगर्भीय जल चट्टानों में स्वस्थ और सुरक्षित रहता है। भूस्तरीय जल नदियों, झरनों और झीलों के रूप में तथा भूगर्भीय जल हैण्डपम्पों, पम्पसेटों तथा नलकूपों के द्वारा प्राप्त होता है।

8. मानवीय सभ्यता के गणक के रूप में-मानव सभ्यता का ज्ञान प्रदान कराने में चट्टानों का विशेष , योगदान रहता है। पृथ्वी की आयु व आन्तरिक संरचना चट्टानों की निर्माण-प्रक्रिया को आधार मानकर ही ज्ञात की जाती है।

शैलों की रचना तथा निर्माण प्रक्रिया के अध्ययन से भूविज्ञान तथा भूगर्भ विज्ञान के अध्ययन में बहुत सहायता मिलती है। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि शैलें मानव के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती हैं तथा उसे अधिक सुख-सुविधाएँ उपलब्ध कराती हैं। वर्तमान विश्व का सम्पूर्ण औद्योगिक ढाँचा तथा प्रौद्योगिकी तन्त्र शैलों से ही अनुप्रमाणित है।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship (नागरिकता)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Political Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship (नागरिकता).

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता के रूप में नागरिकता में अधिकार और दायित्व दोनों शामिल हैं। समकालीन लोकतान्त्रिक राज्यों में नागरिक किन अधिकारों के उपभोग की अपेक्षा कर सकते हैं? नागरिकों के राज्य और अन्य नागरिकों के प्रति क्या
दायित्व हैं?
उत्तर-
समकालीन विश्व में राष्ट्रों ने अपने सदस्यों को एक सामूहिक राजनीतिक पहचान के साथ-साथ कुछ अधिकार भी प्रदान किए हैं। नागरिकों को प्रदत्त अधिकारों की सुस्पष्ट प्रकृति विभिन्न राष्ट्रों में भिन्न-भिन्न हो सकती है, लेकिन अधिकतर लोकतान्त्रिक देशों ने आज उनमें कुछ राजनीतिक अधिकार शामिल किए हैं। उदाहरणस्वरूप, मतदान अभिव्यक्ति या आस्था की आजादी जैसे नागरिक अधिकार और न्यूनतम मजदूरी या शिक्षा पाने से जुड़े कुछ सामाजिक-आर्थिक अधिकार अधिकारों और प्रतिष्ठा की समानता नागरिकता के बुनियादी अधिकारों में से एक है।

प्रश्न 2.
सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए तो जा सकते हैं लेकिन हो सकता है कि वे इन अधिकारों का प्रयोग समानता से न कर सकें। इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
सभी नागरिकों को समान अधिकार और अवसर देने पर विचार करना और सुनिश्चित करना किसी सरकार के लिए सरल नहीं होता। विभिन्न समूह के लोगों की आवश्यकताएँ और समस्याएँ अलग-अलग हो सकती हैं और एक समूह के अधिकार दूसरे समूह के अधिकारों के प्रतिकूल हो सकते हैं। नागरिकों के लिए समान अधिकार का आशय यह नहीं होता कि सभी लोगों पर समान नीतियाँ लागू की दी जाएँ, क्योंकि विभिन्न समूह के लोगों की आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न हो सकती हैं। अगर उद्देश्य केवल ऐसी नीति बनाना नहीं है जो सभी लोगों पर एक तरह से लागू हों बल्कि लोगों को अधिक बराबरी पर लाना है तो नीतियों का निर्माण करते समय विभिन्न आवश्यकताओं और दावों का ध्यान रखना होगा।

प्रश्न 3.
भारत में नागरिक अधिकारों के लिए हाल के वर्षों में किए गए किन्हीं दो संघर्षों पर टिप्पणी लिखिए। इन संघर्षों में किन अधिकारों की मॉग की गई थी?
उत्तर-
झोपड़पट्टी वाली का आन्दोलन – भारत के प्रत्येक शहर में एक बड़ी जनसंख्या झोपड़पट्टियों और अवैध कब्जे की जमीन पर बसे लोगों की हैं। यद्यपि ये लोग अपरिहार्य और उपयोगी काम अक्सर कम मजदूरी पर करते हैं फिर भी शहर की शेष जनसंख्या उन्हें अवांछनीय अतिथि के रूप में देखती है। उन पर शहर के संसाधनों पर बोझ बनने या अपराध करने का आरोप लगाया जाता हैं।

गन्दी बस्तियों की दशा अत्यन्त दयनीय होती है। छोटे-छोटे कमरों में बहुत-से लोग हुँसे रहते हैं। यहाँ न निजी शौचालय होता है, न जलापूर्ति और न सफाई व्यवस्था। गन्दी बस्तियों में जीवन और सम्पत्ति असुरक्षित होते हैं। झोपड़ी-पट्टियों के निवासी अपने श्रम से अर्थव्यव्सथा में महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं। अन्य व्यवसायों के बीच ये फेरीवाले, छोटे व्यापारी, सफाई कर्मी या घरेलू नौकर, नल ठीक करने वाले या मिस्त्री होते हैं। झोपड़-पट्टियों में बेत-बुनाई या कपड़ा-हँगाई-छपाई या सिलाई जैसे छोटे व्यवसाय भी चलते हैं।

झोपड़-पटिटय अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और संगठित हो रही हैं। उन्होंने इसके लिए आन्दोलन भी चलाए और अदालतों में दस्तक भी दी है। उनके लिए वोट देने जैसे बुनियादी राजनीतिक अधिकार का प्रयोग करना भी कठिन हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने मुम्बई की झोपड़-पट्टियों में रहने वालों के अधिकारों के बारे में समाजकर्मी ओल्गा टेलिस की जनहित याचिका (ओल्गा टेलिस बनाम बम्बई नगर निगम) पर 1985 में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय दिया। याचिका में कार्यस्थल के निकट रहने की वैकल्पिक जगह उपलब्ध नहीं होने के कारण फुटपाथ या झोपड़-पट्टियों में रहने के अधिकार का दावा किया गया था। अगर यहाँ रहने वालों को हटने के लिए मजबूर किया गया तो उन्हें आजीविका भी गॅवानी पड़ेगी। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संविधान की धारा 21 में जीने के अधिकार की गारण्टी दी गई है, जिसमें आजीविका का अधिकार शामिल है। इसलिए अगर फुटपाथवासियों को बेदखल करना हो तो उन्हें आश्रय के अधिकार के अन्तर्गत पहले वैकल्पिक जगह उपलब्ध करानी होगी।

टिहरी विस्थापितों का आन्दोलन – टिहरी गढ़वाल में टिहरी बाँध के बनने से टिहरी शहर डूब गया। इसके विस्थापितों के लिए सरकार ने जो व्यवस्थाएँ की थीं वे अपर्याप्त थीं। उचित मुआवजे की माँग और उचित आवास की माँग ने जीने के अधिकार का रूप धारण कर लिया। एक बड़ा आन्दोलन चला। अन्तत: सरकार ने सभी को उनके अधिकारों के अन्तर्गत राहत प्रदान की।

प्रश्न 4.
शरणार्थियों की समस्याएँ क्या हैं? वैश्विक नागरिकता की अवधारणा किस प्रकार उनकी सहायता कर सकती है?
उत्तर-
जब हम शरणार्थियों या अवैध अप्रवासियों के विषय में सोचते हैं तो मन में अनेक छवियाँ उभरती हैं। उसमें एशिया या अफ्रीका के ऐसे लोगों की छवि हो सकती है जिन्होंने यूरोप या अमेरिका में चोरी-छिपे घुसने के लिए दलाल को पैसे का भुगतान किया हो। इसमें जोखिम बहुत है लेकिन वे प्रयास में तत्पर दिखते हैं। एक अन्य छवि युद्ध या अकाल से विस्थापित लोगों की हो सकती है। इस प्रकार के बहुत से दृश्य हमें दूरदर्शन पर दिखाई दे जाते हैं। सूडान डरफर क्षेत्र के शरणार्थी, फिलीस्तीनी, बर्मी या बंगलादेशी शरणार्थी जैसे कई उदाहरण हैं। ये सभी ऐसे लोग हैं जो अपने ही देश या पड़ोसी देश में शरणार्थी बनने के लिए मजबूर किए गए हैं।

हम यह मान लेते हैं कि किसी देश की पूर्ण सदस्यता उन सबको उपलब्ध होनी चाहिए, जो सामान्यतया उस देश में रहते और काम करते हैं या जो नागरिकता के लिए आवेदन करते हैं। वैसे अनेक देश वैश्विक और समावेशी नागरिकता को समर्थन करते हैं लेकिन नागरिकता देने की शर्ते भी निर्धारित करते हैं। ये शर्ते साधारणतया देश के संविधान और कानूनों में लिखी होती हैं। अवांछित आगंतुकों को नागरिकता से बाहर रखने के लिए राज्य सत्ताएँ शक्ति का प्रयोग करती हैं।

अनेक प्रतिबन्ध, दीवार और बाड़ लगाने के बाद आज भी दुनिया में बड़े पैमाने पर लोगों का देशान्तरण होता है। अगर कोई देश स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता और वे घर नहीं लौट सकते तो वे राज्यविहीन और शरणार्थी हो जाते हैं। वे शिविरों में या अवैध प्रवासी के रूप में रहने के लिए विवश किए जाते हैं। अक्सर वे कानूनी रूप से काम नहीं कर सकते या अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा नहीं सकते या सम्पत्ति अर्जित नहीं कर सकते। शरणार्थियों की समस्या इतनी गम्भीर है कि संयुक्त राष्ट्र ने शरणार्थियों की जाँच करने और सहायता करने के लिए उच्चायुक्त नियुक्त किया हुआ है।

विश्व नागरिकता की अवधारणा अभी साकार नहीं हुई है। फिर भी इसके आकर्षणों में से एक यह है कि इससे राष्ट्रीय सीमाओं के दोनों ओर की उन समस्याओं का मुकाबला करना सरल हो सकता है। जिसमें कई देशों की सरकारों और लोगों की संयुक्त कार्यवाही आवश्यक होती है। इससे शरणार्थियों की समस्या का सर्वमान्य समाधान पाना सरल हो सकता है या कम-से-कम उनके बुनियादी अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है चाहे वे किसी भी देश में रहते हों।

प्रश्न 5.
देश के अन्दर एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में लोगों के आप्रवासन का आमतौर पर स्थानीय लोग विरोध करते हैं। प्रवासी लोग स्थानीय अर्थव्यवस्था में क्या योगदान दे सकते हैं?
उत्तर-
प्रवासी लोग अपने श्रम से अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं। अन्य व्यवसायों के बीच ये प्रवासी फेरीवाले, छोटे व्यापारी, सफाईकर्मी या घरेलू नौकर, नल ठीक करने वाले या मिस्त्री होते हैं। प्रवासी लोग अपने रहने के स्थान पर बेत-बुनाई या कपड़ा-हँगाई-छपाई, कपड़ों की सिलाई जैसे छोटे कारोबार भी चलाते हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship 1
यदि ये प्रवासी लोग किसी नगर के जीवन से चले जाएँ या अपनी सभी आर्थिक गतिविधियाँ बन्द कर दें तो लोगों की क्या दशा होगी उसे उपर्युक्त चित्र के माध्यम से भली-भाँति समझा जा सकता है।

प्रश्न 6.
भारत जैसे समान नागरिकता देने वाले देशों में भी लोकतान्त्रिक नागरिकता एक पूर्ण स्थापित तथ्य नहीं वरन एक परियोजना है। नागरिकता से जुड़े उन मुद्दों की चर्चा कीजिए जो आजकल भारत में उठाये जा रहे हैं?
उत्तर-
भारत स्वयं को धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक राष्ट्र राज्य कहता है। स्वतन्त्रता आन्दोलन का आधार व्यापक था और विभिन्न धर्म, क्षेत्र और संस्कृति के लोगों को आपस में जोड़ने के कृत संकल्प प्रयास किए गए। यह सही है कि जब मुस्लिम लीग से विवाद नहीं सुलझाया जा सका, तब 1947 ई० में देश का विभाजन हुआ। लेकिन इसने उस राष्ट्र राज्य के धर्मनिरपेक्ष ओर समावेशी चरित्र को बनाए रखने के भारतीय राष्ट्रीय नेताओं के निश्चय को और सुदृढ़ ही किया जिसके निर्माण के लिए वे प्रतिबद्ध थे। यह निश्चय संविधान में सम्मिलित किया गया।

भारतीय संविधान ने बहुत ही विविधतापूर्ण समाज को समायोजित करने का प्रयास किया है। इन विविधताओं में से कुछ उल्लेखनीय हैं-
इसने अनुसूचित्र जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे भिन्न-भिन्न समुदायों, पूर्व में समान अधिकार से वंचित रही महिलाएँ, आधुनिक सभ्यता के साथ मामूली सम्पर्क रखने वाले अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह के कुछ सुदूरवर्ती समुदायों और कई अन्य समुदायों को पूर्ण और समान नागरिकता देने का प्रयास किया।
इसने देश के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित विभिन्न भाषाओं, धर्म और रिवाजों की पहचान बनाए रखने का प्रयास किया। इसे लागों को उनकी निजी आस्था, भाषा या सांस्कृतिक रिवाजों को छोड़ने के लिए बाध्य किए बिना सभी को समान अधिकार उपलब्ध कराना था। संविधान के जरिए आरम्भ किया गया यह अद्वितीय प्रयोग था दिल्ली में गणतन्त्र दिवस परेड में विभिन्न क्षेत्र, संस्कृति और धर्म के लोगों को सम्मिलित करने के राजसत्ता के प्रयास को प्रतिबिम्बित करता है।

नागरिकता से सम्बन्धित प्रावधानों का उल्लेख संविधान के तीसरे भाग और संसद द्वारा बाद में पारित कानूनों में हुआ है। संविधान ने नागरिकता की लोकतान्त्रिक और समावेशी धारणा को अपनाया है। भारत में जन्म, वंश परम्परा, पंजीकरण, देशीकरण या किसी भू-क्षेत्र के राज क्षेत्र शामिल होने से नागरिकता प्राप्त की जा सकती है। संविधान में नागरिकों के अधिकार और दायित्वों का उल्लेख है। यह प्रावधान भी है कि राज्य को नस्ल/जाति/लिंग/जन्मस्थल में से किसी भी आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों को भी संरक्षित किया गया है। इस प्रकार के समावेशी प्रवाधानों ने संघर्ष और विवादों को जन्म दिया है। महिला आन्दोलन, दलित आन्दोलन या विकास योजनाओं से विस्थापित लोगों का संघर्ष ऐसे लोगों द्वारा चलाए जा रहे संघर्षों के कुछ उदाहरण हैं, जो मानते हैं कि उनकी नागरिकता को पूर्ण अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। भारत के अनुभवों से संकेत प्राप्त होते हैं कि किसी देश में लोकतान्त्रिक नागरिकता एक परियोजना या लक्ष्यसिद्धि का एक आदर्श है। जैसे-जैसे समाज बदल रहे हैं, वैसे-वैसे नित-नए मुद्दे भी समाने आ रहे हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘कर्तव्य के उचित क्रम-निर्धारण का नाम ही नागरिकता है।’ यह कथन किसका है।
(क) ए० के० सीयू को
(ख) सुकरात का
(ग) प्लेटो का
(घ) डॉ० विलियम बॉयड का
उत्तर-
(घ) डॉ० विलियम बॉयड का।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से नागरिक का सामाजिक अधिकार चुनिए
(क) मताधिकार
(ख) शिक्षा का अधिकार
(ग) चुनाव लड़ने का अधिकार
(घ) न्याय प्राप्त करने का अधिकार
उत्तर-
(ख) शिक्षा का अधिकार।

प्रश्न 3.
निम्नांकित में कौन विदेशी है?
(क) राजनीतिक अधिकार प्राप्त
(ख) सैनिक
(ग) राजदूत
(घ) राज्य का सदस्य
उत्तर-
(ग) राजदूत।

प्रश्न 4.
किन देशों में सम्पत्ति खरीदने पर वहाँ की नागरिकता प्राप्त हो जाती है?
(क) भारत
(ख) बांग्लादेश
(ग) दक्षिणी अमेरिका के कुछ देश
(घ) पाकिस्तान
उत्तर-
(ग) दक्षिणी अमेरिका के कुछ देश।

प्रश्न 5.
आदर्श नागरिकता का तत्त्व नहीं है
(क) कर्तव्यपरायणता
(ख) जागरूकता
(ग) शिक्षा
(घ) साम्प्रदायिकता
उत्तर-
(घ) साम्प्रदायिकता।

प्रश्न 6.
“शिक्षा, जो आत्मा का भोजन है, स्वस्थ नागरिकता की प्रथम शर्त है।” यह कथन किसका है?
(क) अब्राहम लिंकन का
(ख) सुकरात का
(ग) बाल गंगाधर तिलक को
(घ) महात्मा गांधी का
उत्तर-
(घ) महात्मा गांधी का।

प्रश्न 7.
आदर्श नागरिक के मार्ग में बाधा है
(क) अशिक्षा व अज्ञानता
(ख) अच्छा स्वास्थ्य
(ग) संयुक्त परिवार
(घ) निर्धन मित्र
उत्तर-
(क) अशिक्षा व अज्ञानता।

प्रश्न 8.
आदर्श नागरिक का गुण नहीं है
(क) सच्चरित्रता
(ख) आत्म-संयम
(ग) उग्र-राष्ट्रीयता
(घ) अधिकार-कर्तव्य का ज्ञान
उत्तर-
(ग) उग्र-राष्ट्रीयता।

प्रश्न 9.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में बाधा नहीं है
(क) साम्प्रदायिकता
(ख) अशिक्षा
(ग) निर्धनता
(घ) राष्ट्र के प्रति सम्मान की भावना
उत्तर-
(घ) राष्ट्र के प्रति सम्मान की भावना।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से कौन-सा तत्त्व आदर्श नागरिकता के मार्ग में बाधक नहीं है।
(क) निर्धनता
(ख) अनुशासन
(ग) अशिक्षा
(घ) स्वार्थपरता
उत्तर-
(ख) अनुशासन।

प्रश्न 11.
किसी राज्य में निवास करने वाले विदेशी के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
(क) वह राज्य में भूमि का क्रय नहीं कर सकता
(ख) उसकी जान-माल की सुरक्षा के लिए राज्य उत्तरदायी नहीं है।
(ग) राज्य उसे अल्पकाल के लिए निवास करने की अनुमति दे सकता है।
(घ) वह अपने राज्य के प्रति निष्ठा रखता है।
उत्तर-
(ख) उसकी जान-माल की सुरक्षा के लिए राज्य उत्तरदायी नहीं है।

प्रश्न 12.
किसी देश में विदेशी को निम्नलिखित में से कौन-से अधिकार प्राप्त नहीं हैं ?
(क) राजनीतिक अधिकार
(ख) सामाजिक अधिकार
(ग) धार्मिक अधिकार
(घ) व्यापारिक अधिकार
उत्तर-
(क) राजनीतिक अधिकार।

प्रश्न 13.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में प्रमुख बाधा क्या है ?
(क) औद्योगीकरण
(ख) शहरीकरण
(ग) साक्षरता
(घ) निर्धनता
उत्तर-
(घ) निर्धनता।

प्रश्न 14.
संसद में भारतीय नागरिकता अधिनियम कब पारित हुआ ?
(क) 1950 ई० में
(ख) 1952 ई० में
(ग) 1955 ई० में
(घ) 1960 ई० में
उत्तर-
(ग) 1955 ई० में।

प्रश्न 15.
“दि फिलॉस्फी ऑफ सिटिजनशिप” नामक पुस्तक के लेखक हैं
(क) एफ० जी० गोल्ड
(ख) अल्फ्रेड जे० शॉ
(ग) डॉ० ई० एम० ह्वाइट
(घ) वार्ड
उत्तर-
(ग) डॉ० ई० एम० ह्वाइट।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नागरिकता प्राप्त करने के दो तरीके बताइए।
या नागरिकता प्राप्त होने की कोई दो स्थितियाँ बताइए।
उत्तर-
1. जन्म द्वारा तथा
2. देशीयकरण द्वारा।

प्रश्न 2.
भारत में नागरिकता के लोप होने के कोई दो कारण लिखिए।
या नागरिकता खोने के दो आधार बताइए।
उत्तर-

  1.  विदेश में सरकारी नौकरी करने पर तथा
  2.  सेना से भागने पर।

प्रश्न 3.
आदर्श नागरिक के विषय में लॉर्ड ब्राइस की परिभाषा लिखिए।
उत्तर–
“एक लोकतन्त्रीय (आदर्श) नागरिक में बुद्धि, आत्म-संयम तथा उत्तरदायित्व होना चाहिए।’

प्रश्न 4.
कोई दो स्थितियाँ बताइए जिनमें केन्द्रीय सरकार नागरिक की नागरिकता समाप्त कर | सकती है।
या एक भारतीय स्त्री की नागरिकता का लोप हो गया है। इसके दो सम्भावित कारणों का |’ उल्लेख कीजिए।
उत्तर-

  1.  देशद्रोह करने पर तथा
  2.  लम्बे समय तक देश से अनुपस्थित रहने पर।

प्रश्न 5.
आदर्श नागरिकता के चार तत्त्व बताइए।
उत्तर–
आदर्श नागरिकता के चार तत्त्व हैं—

  1.  कर्तव्यपरायणता,
  2.  प्रगतिशीलता,
  3.  व्यापक दृष्टिकोण तथा
  4.  जागरूकता।

प्रश्न 6.
भारतीय संविधान में समस्त नागरिकों के लिए कैसी नागरिकता की व्यवस्था की गयी है?
उत्तर-
भारतीय संविधान में समस्त नागरिकों के लिए इकहरी नागरिकता की व्यवस्था की गयी है।

प्रश्न 7.
नागरिक के दो प्रमुख कर्तव्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर–
नागरिक के दो प्रमुख कर्तव्य हैं—

  1.  राज्य के प्रति भक्ति एवं
  2.  राज्य के कानूनों का पालन करना।

प्रश्न 8.
विदेशी किसे कहते हैं ?
उत्तर–
विदेशी वह व्यक्ति है जो अपना देश छोड़कर किसी कारणवश अन्य देश में रहने लगा हो। उसे उस देश के सामाजिक अधिकार प्राप्त होते हैं, राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होते।

प्रश्न 9.
विदेशियों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर–
विदेशियों को तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

  1.  स्थायी विदेशी,
  2.  अस्थायी विदेशी तथा
  3.  राजदूत।

प्रश्न 10.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में सहायक दो प्रमुख तत्त्व बताइए।
उत्तर-
आदर्श नागरिकता के मार्ग में सहायक दो प्रमुख तत्त्व हैं-

  1.  स्वतन्त्र प्रेस तथा
  2.  स्वस्थ राजनीतिक दल।

प्रश्न 11.
“शिक्षा श्रेष्ठ नागरिक जीवन के वृत्त-खण्ड की आधारशिला है।” यह कथन किस विद्वान् का है ?
उत्तर-
यह कथन डॉ० बेनी प्रसाद नामक विद्वान् का है।

प्रश्न 12.
नागरिकों के कौन-से दो मुख्य प्रकार होते हैं ?
उत्तर-
नागरिकों के दो मुख्य प्रकार हैं-

  1.  जन्मजात नागरिक तथा
  2.  देशीयकरण से नागरिकता प्राप्त नागरिक।

प्रश्न 13.
भारत में नागरिकता अधिनियम कब बनाया गया?
उत्तर-
भारत में नागरिकता अधिनियम 1955 ई० में बनाया गया।

प्रश्न 14.
भारत का प्रथम नागरिक कौन है?
उत्तर-
भारत का राष्ट्रपति भारत का प्रथम नागरिक माना जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नागरिक की विभिन्न परिभाषाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
‘नागरिक’ की परिभाषाएँ
प्राचीन यूनानी विचारक अरस्तु ने नागरिक की परिभाषा इन शब्दों में की थी, “एक नागरिक वह है, जिसने राज्य के शासन में कुछ भाग लिया हो और जो राज्य द्वारा प्रदान किए गए सम्मान का उपभोग कर सके।”
भले ही तत्कालीन परिस्थितियों में अरस्तु की उपर्युक्त परिभाषा सटीक रही हो, लेकिन अरस्तू की यह परिभाषा आधुनिक काल में अपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि आज नगर-राज्यों का स्थान विशाल राज्यों ने ले लिया है। फलतः ‘नागरिक’ शब्द का अर्थ भी बहुत अधिक व्यापक हो गया है। आधुनिक विद्वानों ने ‘नागरिक’ शब्द की परिभाषा निम्नलिखित प्रकार से दी है ।
लॉस्की के अनुसार, “नागरिक केवल समाज का एक सदस्य ही नहीं है, वरन् वह कुछ कर्तव्यों का यान्त्रिक रूप से पालनकर्ता तथा आदेशों का बौद्धिक रूप से ग्रहणकर्ता भी है।”
गैटिल के अनुसार, “नागरिक समाज के वे सदस्य हैं, जो कुछ कर्तव्यों द्वारा समाज से बँधे रहते हैं, जो उसके प्रभुत्व को मानते हैं और उससे समान रूप से लाभ उठाते हैं।”
सीले के अनुसार, “नागरिक उस व्यक्ति को कहते हैं, जो राज्य के प्रति भक्ति रखता हो, उसे सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकार प्राप्त हों और जन-सेवा की भावना से प्रेरित हो।”

प्रश्न 2.
किसी देश के नागरिक को कितनी श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर-
किसी देश के नागरिक को निम्नलिखित चार श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं

1. अल्प-वयस्क नागरिक- ये एक निश्चित आयु से कम आयु के व्यक्ति होते हैं। ऐसे नागरिकों को समस्त प्रकार के अधिकार प्राप्त होते हैं, लेकिन निर्धारित आयु के पूर्व वे अपने राजनीतिक अधिकारों का उपयोग नहीं कर सकते। भारत में 18 वर्ष की आयु से कम के व्यक्ति इस श्रेणी
में आते हैं।

2. मताधिकार रहित वयस्क नागरिक- ये वे नागरिक होते हैं जो निर्धारित आयु पूर्ण करने के बाद | भी शारीरिक एवं मानसिक अयोग्यताओं के कारण मत देने के अधिकार से वंचित कर दिये जाते हैं। उदाहरणार्थ-कोढ़ी, पागल, दिवालिया व देशद्रोही इत्यादि। इन्हें सिर्फ सामाजिक अधिकार प्राप्त होते हैं।

3. मताधिकार प्राप्त वयस्क नागरिक- इस श्रेणी में वे नागरिक आते हैं जो चारों शर्तों को पूरा करते हों, अर्थात् वे राज्य के सदस्य हों, उन्हें सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकार प्राप्त हों, उन्हें मताधिकार प्राप्त हो तथा उनमें राज्य के प्रति भक्ति-प्रदर्शन की भावना हो।

4.  देशीयकृत नागरिक- इस श्रेणी में वे नागरिक आते हैं जो पूर्व में किसी अन्य देश अथवा राज्य के नागरिक थे, लेकिन किसी देश में बहुत दिनों तक रहने एवं कुछ शर्तों को पूरा करने पर राज्य की ओर से उन्हें राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकार दे दिये गये हों।

प्रश्न 3.
‘विदेशी पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
विदेशी वह व्यक्ति है जो अस्थायी रूप से उस राज्य में निवास करता है जिसका वह सदस्य नहीं है। कोई भी व्यक्ति किसी देश में विदेशी उस समय कहा जा सकता है जब वह अल्पावधि हेतु किसी कार्यवश अपना देश छोड़कर दूसरे देश में रहने के लिए आया हो। कोई व्यक्ति व्यापार करने, शिक्षा प्राप्त करने अथवा घूमने के लिए दूसरे देश में आता है और जितने समय तक अपना देश छोड़कर बाहर रहता है, उतने समय तक उस राज्य में विदेशी कहा जाता है। उसे उस देश के राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होते तथा न ही वह उस राज्य के प्रति भक्तिभाव रखता है। वह उस राज्य के प्रति भक्तिभाव रखता है जिसका वह सदस्य है। इस प्रकार विदेशी वह व्यक्ति है जो सिर्फ सामाजिक अधिकारों का उपयोग करता है। एक विदेशी को जीवन एवं सम्पत्ति की रक्षा एवं कुछ सामान्य सामाजिक अधिकार प्राप्त होते हैं, लेकिन अन्य सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होते। इन अधिकारों की प्राप्ति के बदले विदेशियों को सम्बन्धित देश के कानून का पूर्णतया पालन करना होता है।

प्रश्न 4.
नागरिकता प्राप्त करने के सन्दर्भ में जन्म-स्थान के सिद्धान्त का विवरण दीजिए।
उत्तर-
इस सिद्धान्त के अनुसार बालक की नागरिकता उसके जन्मस्थान के आधार पर निश्चित की जाती है। उदाहरणार्थ, यदि भारत के किसी नागरिक का बच्चा अर्जेण्टाइना की भूमि पर जन्म लेता है। तो वह बच्चा वहाँ का नागरिक माना जाएगा। लेकिन इसके विपरीत, यदि अर्जेण्टाइन के नागरिक का बच्चा भारत- भूमि पर अथवा अन्य किसी राज्य में जन्म लेता है तो वह स्वदेश की नागरिकता से वंचित रह जाएगा। यद्यपि यह सिद्धान्त अर्जेण्टाइना में प्रचलित है, लेकिन वहाँ की अपेक्षा यह इंग्लैण्ड में अधिक व्यापक है। वहाँ तो कोई बच्चा यदि इंग्लैण्ड के जहाज में भी पैदा होता है तो वह इंग्लैण्ड का नागरिक माना जाता है।
इस सिद्धान्त का सबसे बड़ा दोष यह है कि कोई दम्पति विश्व-भ्रमण के लिए निकले तो हो सकता है। कि उसकी एक सन्तान जापान में हो, दूसरी भारत में तथा तीसरी संयुक्त राज्य अमेरिका में। ऐसी दशा में जन्म-स्थान नियम के अनुसार तीनों बच्चे अलग-अलग देशों के नागरिक होंगे तथा उन्हें अपने माता-पिता के देश की नागरिकता प्राप्त नहीं होगी।

प्रश्न 5.
नागरिकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
नागरिकता वह भावना है जो नागरिक में निवास करती है। यह भावना नागरिक में देशभक्ति को जाग्रत करती है और नागरिक को उसके कर्तव्य-पालन तथा उत्तरदायित्व निभाने के लिए सजग करती है। लॉस्की के कथनानुसार, “अपनी प्रशिक्षित वृद्धि को लोकहित के लिए प्रयोग करना ही नागरिकता , है।’ गैटिल के विचारानुसार, “नागरिकता किसी व्यक्ति की उस स्थिति को कहते हैं, जिसके अनुसार वह अपने राज्य में सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकारों का उपभोग कर सकता है तथा कर्तव्यों का पालन करने के लिए तत्पर रहता है।”

विलियम बॉयड के अनुसार, “भक्ति भावना का उचित क्रम-निर्धारण ही नागरिकता है।” डॉ० आशीर्वादी लाल के अनुसार, नागरिकता केवल राजनीतिक कार्य ही नहीं, वरन् एक सामाजिक एवं नैतिक कर्तव्य भी है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि नागरिक होने की दशा का नाम ही नागरिकता है। दूसरे शब्दों में, “जीवन की वह स्थिति, जिसमें व्यक्ति किसी राज्य का सदस्य होने के नाते समस्त प्रकार के सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकारों का उपभोग करता है, ‘नागरिकता (Citizenship) कहलाती है।”

प्रश्न 6.
स्थायी विदेशी तथा अस्थायी विदेशी में अन्तर बताइए।
उत्तर-
स्थायी विदेशी-ऐसे विदेशी जो अपना पूर्व देश छोड़कर किसी ऐसे देश में आ गये हों जहाँ वे स्थायी रूप से रहना चाहते हों तथा नागरिकता-प्राप्ति की शर्तों को पूरा कर रहे हों, स्थायी विदेशी कहलाते हैं। नागरिकता-प्राप्ति की प्रक्रिया द्वारा ये विदेशी उस देश के नागरिक बन जाते हैं। अस्थायी विदेशी–अस्थायी विदेशी विशेष कारण से अपना देश छोड़कर अल्पावधि हेतु दूसरे देश में आकर रहते हैं तथा अपना कार्य पूर्ण करके स्वदेश लौट जाते हैं। सामान्यतया इनका उद्देश्य शिक्षा, भ्रमण अथवा व्यापार होता है।

प्रश्न 7.
नागरिक तथा मतदाता में भेद बताइए।
उत्तर-
एक राज्य के अन्तर्गत नागरिक तथा मतदाता में भेद (अन्तर) होता है। एक राज्य के समस्त नागरिक मतदाता नहीं होते हैं। मतदाता कौन हो सकता है; यह राज्य के कानूनों द्वारा स्पष्ट किया जाता है। किसी भी देश के अन्तर्गत अवयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं होता है। इसके अलावा, कतिपय राज्यों में धर्म, सम्पत्ति, लिंग एवं शिक्षा के आधार पर भी कुछ नागरिकों को मताधिकार से वंचित किया जाता है। किन्तु आधुनिक समय की प्रवृत्ति इस प्रकार के प्रतिबन्धों के प्रतिकूल है। संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत, इंग्लैण्ड, पाकिस्तान, फ्रांस इत्यादि संसार के अधिकांश राज्यों में समस्त वयस्क नागरिकों को मतदान का अधिकार प्राप्त है।

प्रश्न 8.
नागरिकता की चार विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-
नागरिकता की चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. राज्य की सदस्यता- नागरिकता की सर्वप्रथम विशेषता राज्य की सदस्यता है।
  2. सर्वव्यापकता- नागरिकता प्रत्येक उस व्यक्ति को प्राप्त होती है जो कि राज्य का निवासी हो, भले ही वह शहर में निवास करता हो अथवा किसी ग्राम में।
  3. राज्य के प्रति निष्ठा- नागरिकता में देशभक्ति का गुण होना परम आवश्यक है।
  4. अधिकारों का प्रयोग- नागरिकता व्यक्ति को राज्य की तरफ से अधिकार प्रदान करती है।

प्रश्न 9.
देशीयकरण द्वारा नागरिकता प्राप्त करने की चार शर्ते बताइए।
या भारतीय नागरिकता को प्राप्त करने की दो शर्ते बताइए।
उत्तर-
देशीयकरण द्वारा नागरिकता प्राप्त करने की चार शर्ते निम्नलिखित हैं

  1.  विदेशी ऐसे राज्य का नागरिक न हो जहाँ भारतीयों पर वहाँ की नागरिकता ग्रहण करने पर प्रतिबन्ध लगाया गया हो।
  2.  वह प्रार्थना-पत्र देने की तिथि से पूर्व न्यूनतम एक वर्ष से लगातार भारत में निवास कर रहा हो।
  3.  वह एक वर्ष से पूर्व, न्यूनतम 5 वर्षों तक भारत में रह चुका हो अथवा भारत सरकार की नौकरी में । रह चुका हो अथवा दोनों मिलाकर 7 वर्ष का समय हो, लेकिन किसी भी परिस्थिति में 4 वर्ष से कम समय न हो।
  4.  उसका आचरण अच्छा हो।

प्रश्न 10.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में अशिक्षा कैसे बाधक है?
उत्तर-
शिक्षा तथा ज्ञान के अभाव में आदर्श नागरिकता की कल्पना करना व्यर्थ है। अशिक्षित एवं अज्ञानी व्यक्ति उचित व अनुचित में अन्तर नहीं कर पाते। वे अपने उत्तरदायित्व के बोध से अपरिचित रहते हैं। ऐसे व्यक्ति राजनीतिक तथा सार्वजनिक कर्तव्यों का निष्पादन अपनी समझ-बूझ के आधार पर न करके अन्य व्यक्तियों के बहकावे में आकर करते हैं। शिक्षा तथा ज्ञान के बिना व्यक्ति न तो अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है और न ही राष्ट्र के विकास में योगदान दे सकता है। मैकम ने तो यहाँ तक कहा है कि शिक्षा के बिना नागरिक अपूर्ण है।”

प्रश्न 11.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में साम्प्रदायिकता कैसे बाधक है?
उत्तर-
साम्प्रदायिकता को आदर्श नागरिक की प्रबलतम शत्रु माना गया है। साम्प्रदायिकता की भावना से ही सामाजिक जीवन में कटुता पैदा हो जाती है तथा शान्ति नष्ट हो जाती है। कभी-कभी इसके वशीभूत होकर व्यक्ति अपने धार्मिक एवं राजनीतिक समुदायों को इतना अधिक महत्त्व देते हैं कि वे समाज एवं राज्य के हितों की अपेक्षा हेतु तत्पर हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में आदर्श नागरिकता की प्राप्ति असम्भव हो जाती है।

प्रश्न 12.
नागरिकता का लोप होने की किन्हीं पाँच स्थितियों का विवेचन कीजिए।
उत्तर-
नागरिकता का लोप
सामान्यतया निम्नलिखित स्थितियों में नागरिकता का लोप हो जाता है अथवा किसी व्यक्ति की नागरिकता समाप्त हो जाती है-

  1. विदेशी नागरिकता ग्रहण करने पर- यदि कोई व्यक्ति विदेश की नागरिकता ग्रहण कर लेता है, तो उसकी अपने देश की नागरिकता स्वत: ही समाप्त हो जाती है।
  2. विवाह द्वारा- यदि कोई महिला विदेशी पुरुष से विवाह कर लेती है, तो वह अपने देश की नागरिकता खो देती है।
  3. अनुपस्थिति के कारण- यदि कोई व्यक्ति अपने देश से लम्बी अवधि तक अनुपस्थित रहता | है, तो उसकी नागरिकता समाप्त हो जाती है।
  4. सेना से भागने पर- सेना से भागे सैनिक, देशद्रोही तथा घोर अपराधी भी नागरिकता से वंचित कर दिए जाते हैं।
  5. विदेशों में नौकरी करने से- यदि कोई व्यक्ति विदेश में नौकरी कर लेता है अथवा विदेशी नागरिकता ग्रहण कर लेता है, तो वह अपने देश की नागरिकता खो देता है।

प्रश्न 13.
सत्रहवीं से बीसवीं सदी के बीच यूरोप के गोरे लोगों ने दक्षिण अफ्रीका के लोगों पर अपना शासन कायम रखा। 1994 तक दक्षिण अफ्रीका में अपनाई गई नीतियों के बारे में नीचे दिए गए ब्योरे को पढिए।
श्वेत लोगों को मत देने, चुनाव लड़ने और सरकार को चुनने का अधिकार था। वे सम्पत्ति खरीदने और देश में कहीं भी आने-जाने के लिए स्वतन्त्र थे। काले लोगों को ऐसे अधिकार नहीं थे। काले और गोरे लोगों के लिए पृथक मोहल्ले और कालोनियाँ बसाई गई थीं। काले लोगों को अपने पड़ोस की गोरे लोगों की बस्ती में काम करने के लिए ‘पास लेने पड़ते थे। उन्हें गोरों के इलाके में अपने परिवार रखने की अनुमति नहीं थी। अलग-अलग रंग के लोगों के लिए विद्यालय भी अलग-अलग थे।
(i) क्या अश्वेत लोगों की दक्षिण अफ्रीका में पूर्ण और समान सदस्यता मिली हुई थी? कारण सहित बताइए।
(ii) ऊपर दिया गया ब्योरा हमें दक्षिण अफ्रीका में भिन्न समूहों के अन्तर्सम्बन्धों के बारे में क्या बताता है?
उत्तर-
(i) नहीं, अश्वेत लोगों को दक्षिण अफ्रीका में पूर्ण समान सदस्यता प्राप्त नहीं थी। वहाँ रंगभेद नीति इसका प्रमुख कारण था।
(ii) दक्षिण अफ्रीका में भिन्न समूह (गोर-काले) के अन्तर्सम्बन्ध ठीक नहीं थे। दोनों में आपस में गहरे मतभेद थे।

प्रश्न 14.
नागरिक के लक्षणों की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
उत्तर-
नागरिक के निम्नलिखित लक्षण या विशेषताएँ होती हैं

  1.  वह राज्य का सदस्य हो।
  2.  वह राज्य की सीमा के अन्दर रहता हो, चाहे वह नगर-निवासी हो अथवा ग्रामवासी।
  3.  उसे सभी सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकार प्राप्त हों।
  4.  वह राज्य की सम्प्रभुता को स्वीकार करता हो और राज्य में पूर्ण निष्ठा एवं भक्ति रखता हो।
  5.  उसे मताधिकार प्राप्त हो।
  6.  उसमें कर्तव्यपरायणता की भावना निहित हो।
  7.  वह राष्ट्र तथा समाज के प्रति पूर्ण निष्ठा तथा भक्ति की भावना से ओतप्रोत हो।

प्रश्न 15.
विश्व नागरिकता की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
उत्तर-
विश्व नागरिकता की अवधारणा आधुनिक विचारकों की देन है। जिस प्रकार विश्व-राज्य व विश्व-बन्धुत्व की कल्पना की गई है, उसी प्रकार विश्व-नागरिकता का विचार भी विकसित हुआ है। विश्व-बन्धुत्व की कल्पना को साकार बनाकर विश्व नागरिकता के विचार को व्यावहारिक रूप प्रदान किया जा सकता है, परन्तु यह काल्पनिक अवधारणा यथार्थ के धरातल पर असम्भव ही प्रतीत होती है। विश्व नागरिकता का आशय ऐसी नागरिकता से है, जो सभी राष्ट्रों द्वारा मान्य हो। संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएँ विश्व नागरिकता की अवधारणा को व्यावहारिक रूप दे सकती हैं। राजनीतिक सम्बन्ध, शान्ति की इच्छा, आवागमन के साधनों का विकास, सांस्कृतिक एकता, विश्व-बन्धुत्व की भावना व मानवाधिकार, अन्तर्राष्ट्रीय कानून और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के माध्यम से विश्व नागरिकता के आदर्श को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की जा सकती है। नेहरू जी विश्व नागरिकता के प्रबल समर्थक थे।

प्रश्न 16.
आदर्श नागरिकता के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
किसी भी देश की प्रगति का आधार वहाँ के नागरिक होते हैं। जिस देश के नागरिक आदर्श नागरिकता के गुणों से परिपूर्ण होते हैं, वह देश शीघ्र ही उन्नति के शिखर पर पहुँच जाता है। अरस्तू का कथन है, “श्रेष्ठ नागरिक ही श्रेष्ठ राज्य का निर्माण कर सकते हैं; अतः राज्य के नागरिक आदर्श होने चाहिए।” वास्तव में आदर्श नागरिकता ही राज्य के विकास का आधार बन सकती है। डॉ० आशीर्वादी के अनुसार, “नागरिकता का सम्बन्ध केवल राजनीतिक जीवन से ही नहीं है, वरन् । सामाजिक और नैतिक जीवन से भी है।”
एक आदर्श नागरिक के गुणों को व्यक्त करते हुए लॉर्ड ब्राइस ने लिखा है, “एक लोकतन्त्रीय नागरिक में बुद्धि, आत्म-संयम तथा उत्तरदायित्व की भावना होनी चाहिए।
इसी प्रकार डॉ० ह्वाइट ने लिखा है, “आदर्श नागरिक में तीन गुण; व्यावहारिक बुद्धि, ज्ञान और भक्ति; आवश्यक हैं।”

प्रश्न 17.
आदर्श नागरिकता की किन्हीं चार बाधाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
आदर्श नागरिकता के मार्ग की चार मुख्य बाधाएँ निम्नलिखित हैं

  1.  आदर्श नागरिकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा अशिक्षा तथा निरक्षरता है।
  2.  संकीर्ण धार्मिक भावनाएँ तथा साम्प्रदायिकता की मनोदशा आदर्श नागरिकता के मार्ग को अवरुद्ध कर देती हैं।
  3.  संकीर्ण मनोवृत्तियों पर आधारित दलीय राजनीति भी आदर्श नागरिकता को कुंठित कर देती है।
  4.  पूँजीवाद के अनियन्त्रित विकास ने भी समाज को निर्धन तथा अमीर दो वर्गों में विभाजित कर दिया है। अतः निर्धनता भी आदर्श नागरिकता के लिए अभिशाप है।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नागरिकता का समानता और अधिकार से क्या सम्बन्ध है?
उत्तर-
नागरिकता केवल एक कानूनी अवधारणा नहीं है। इसका समानता और अधिकारों के व्यापक उद्देश्यों से भी घनिष्ठ सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध का सर्वसम्मत सूत्रीकरण अंग्रेज समाजशास्त्री टी० एच० मार्शल (1893-1981) ने किया है। अपनी पुस्तक ‘नागरिकता और सामाजिक वर्ग में मार्शल ने नागरिकता को किसी समुदाय के पूर्ण सदस्यों को प्रदत्त प्रतिष्ठा के रूप में परिभाषित किया है। इस प्रतिष्ठा को ग्रहण करने वाले सभी लोग प्रतिष्ठा में अन्तर्भूत अधिकारों और कर्तव्यों के मामले में समान होते हैं।

नागरिकता की मार्शल द्वारा प्रदत्त कुँजी धारणा में मूल संकल्पना ‘समानता’ की है। इसमें दो बातें अन्तर्निहित हैं। पहली यह कि प्रदत्त अधिकार और कर्तव्यों की गुणवत्ता बढ़े। दूसरी यह कि उन लोगों की संख्या बढ़े जिन्हें वे दिए गए हैं।
मार्शल नागरिकता में तीन प्रकार के अधिकारों को शामिल मानते हैं–नागरिक, राजनीतिक और सामाजिक अधिकार।
नागरिक अधिकार व्यक्ति के जीवन, स्वतन्त्रता और सम्पत्ति की रक्षा करते हैं। राजनीतिक अधिकार व्यक्ति को शासन प्रक्रिया में सहभागी बनने की शक्ति प्रदान करते हैं। सामाजिक अधिकार व्यक्ति के लिए शिक्षा और रोजगार को सुलभ बनाते हैं। कुल मिलाकर ये अधिकार नागरिक के लिए सम्मान के साथ जीवन-बसर करना सम्भव बनाते हैं।

मार्शल ने सामाजिक वर्ग को ‘असमानता की व्यवस्था के रूप में चिह्नित किया। नागरिकता वर्ग पदानुक्रम के विभाजक परिणामों का प्रतिकार कर समानता सुनिश्चित करती है। इस प्रकार यह बेहतर सुबद्ध और समरस समाज रचना को सुसाध्य बनाता है।

प्रश्न 2.
भारतीय नागरिकता किन आधारों पर लुप्त हो सकती है? कोई दो प्रकार बताइए।
उत्तर-
भारतीय नागरिक अधिनियम, 1955 नागरिकता के लोप के विषय में भी व्यवस्था करता है, चाहे वह भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत प्राप्त की गई हो या संविधान के उपबन्धों के अनुसार प्राप्त की गई हो। इस अधिनियम के अनुसार नागरिकता का लोप निम्न प्रकार से हो सकता है

1. नागरिकता का परित्याग- कोई भी वयस्क भारतीय नागरिक जो किसी दूसरे देश का भी ‘ नागरिक है, भारतीय नागरिकता को त्याग सकता है। इसके लिए उसे एक घोषणा करनी होगी और उस घोषणा का पंजीकरण हो जाने पर उसकी भारतीय नागरिकता लुप्त हो जाएगी, किन्तु यदि ऐसी घोषणा किसी ऐसे युद्धकाल में की जाती है, जिसमें भारत एक पक्षकार हो, तो पंजीकरण को तब तक रोका जा सकता है, जब तक भारत सरकार उचित समझे। यह उल्लेखनीय है कि जब कोई पुरुष भारतीय नागरिकता का त्याग करता है, तो उसके साथ-साथ उसके अवयस्क बच्चे भी भारतीय नागरिकता खो देते हैं।

2. अन्य देशों की नागरिकता स्वीकार करने पर- यदि कोई भारतीय नागरिक अपनी इच्छा से  किसी दूसरे देश की नागरिकता स्वीकार कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता लुप्त हो जाती है। यह नियम उन नागरिकों के सम्बन्ध में लागू नहीं होता है, जो किसी ऐसे युद्धकाल में,
जिसमें भारत एक पक्षकार हो, स्वेच्छा से दूसरे देश की नागरिकता स्वीकार कर लेते हैं।

प्रश्न 3.
नागरिक और विदेशी में अन्तर लिखिए।
उत्तर-
नागरिक और विदेशी में अन्तर
UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship 2
UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship 3

प्रश्न 4.
नागरिक और राष्ट्र के सम्बन्ध की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्र राज्य की अवधारणा आधुनिक काल में विकसित हुई। राष्ट्र राज्य की सम्प्रभुता और नागरिकों के लोकतान्त्रिक अधिकारों का दावा सर्वप्रथम 1789 में फ्रांस के क्रान्तिकारियों ने किया था। राष्ट्र राज्यों का दावा है कि उनकी सीमाएँ केवल राज्यक्षेत्र को नहीं बल्कि एक अनोखी संस्कृति और साझा इतिहास को भी परिभाषित करती हैं। राष्ट्रीय पहचान को एक झण्डा, राष्ट्रगान, राष्ट्रभाषा या कुछ विशिष्ट उत्सवों के आयोजन जैसे प्रतीकों से व्यक्त किया जा सकता है।
अधिकतर आधुनिक राज्य स्वयं विभिन्न धर्मों, भाषा और सांस्कृतिक परम्पराओं के लोगों को सम्मिलित करते हैं।

लेकिन एक लोकतान्त्रिक राज्य की राष्ट्रीय पहचान में नागरिकों को ऐसी राजनीतिक पहचान देने की कल्पना होती है, जिसमें राज्य के सभी सदस्य भागीदार हो सकें। लोकतान्त्रिक देश साधारणतया अपनी पहचान इस प्रकार परिभाषित करने प्रयास करते हैं कि वह यथासम्भव समावेशी हो अर्थात् जो सभी नागरिकों को राष्ट्र के अंग के रूप में स्वयं को पहचानने की अनुमति देता हो। लेकिन व्यवहार में अधिकतर देश अपनी पहचान को इस प्रकार परिभाषित करने की ओर अग्रसर हैं, जो कुछ नागरिकों के लिए राष्ट्र के साथ अपनी पहचान व सम्बन्ध बनाए रखना अन्यों की तुलना में आसान बनाता है। यह राजसत्ता के लिए भी अन्यों की तुलना में कुछ लोगों को नागरिकता देना सरल कर देता है। यह अप्रवासियों का देश होने पर गौरवान्वित होने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका के बारे में भी वैसे ही सच है जैसे कि किसी अन्य देश के बारे में।

प्रश्न 5.
नागरिक अधिकार आन्दोलन के लिए मार्टिन लूथर किंग जूनियर की भूमिका की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
1950 का दशक संयुक्त राज्य अमेरिका के अनेक दक्षिणी राज्यों में काली और गोरी जनसंख्या के बीच व्याप्त विषमताओं के विरुद्ध नागरिक अधिकार आन्दोलन के उत्थान का साक्षी रहा है। इस प्रकार की विषमताएँ इन राज्यों द्वारा पृथक्करण कानून के नाम से विख्यात ऐसे कानूनों द्वारा पोषित होती थीं, जिनसे काले लोगों को अनेक नागरिक और राजनीतिक अधिकारों से वंचित किया जाता था। उन कानूनों ने विभिन्न नागरिक सुविधाओं; जैसे-रेल, बस, रंगशाला, आवास, होटल, रेस्टोरेण्ट आदि में गोरे और काले लोगों के लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित कर रखे थे। इन कानूनों के कारण काले और गोरे बच्चों के स्कूल भी अलग-अलग थे।

इन कानूनों के विरुद्ध हुए आन्दोलन में मार्टिन लूथर किंग जूनियर अग्रणी काले नेता थे। उन्होंने इनके विरुद्ध अनेक अकाट्य तर्क प्रस्तुत किए। पहला, आत्म गौरव व आत्म-सम्मान के मामले में विश्व की प्रत्येक जाति या वर्ण का मनुष्य बराबर है। दूसरा, किंग ने कहा कि पृथक्करण राजनीति के चेहरे पर ‘सामाजिक कोढ़’ की तरह है क्योंकि यह उन लोगों को गहरे मनोवैज्ञानिक घाव देता है, जो ऐसे काननों के शिकार हैं।

किंग के तर्क दिया कि पृथक्करण की प्रथा गोरे समुदाय के जीवन की गुणवत्ता भी कम करती है। किंग इसे उदाहरणों द्वारा स्पष्ट करते हैं। गोरे समुदाय ने अदालत के निर्देशानुसार कुछ सामुदायिक उद्यानों में काले लोगों को प्रवेश की आज्ञा देने के बजाय उन्हें बन्द करने का फैसला किया। इसी प्रकार कुछ बेसबॉल टीमें टूट गईं क्योंकि अधिकारी काले खिलाड़ियों को स्वीकार नहीं करना चाहते थे। तीसरे, पृथक्करण कानून लोगों के बीच कृत्रिम सीमाएँ खींचते हैं और उन्हें देश के व्यापक हित के लिए एक-दूसरे का सहयोग करने से रोकते हैं। इन कारणों से किंग ने बहस छेड़ी कि उन कानूनों को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने पृथक्करण कानूनों के विरुद्ध शान्तिपूर्ण और अहिंसक प्रतिरोध का आह्वान किया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नागरिकता की परिभाषा देते हुए, नागरिक के प्रकार लिखिए।
या नागरिकता से आप क्या समझते हैं? नागरिक कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर-
नागरिकता की परिभाषा
नागरिकता उस स्थिति का नाम है, जिसके अन्तर्गत राज्य द्वारा व्यक्ति को नागरिक और राजनीतिक अधिकार प्रदान किए जाते हैं और व्यक्ति राज्य के प्रति विशेष निष्ठा रखता है। नागरिकता को निम्नलिखित शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है
लॉस्की के अनुसार, “अपनी प्रशिक्षित बुद्धि को लोकहित के लिए प्रयोग करना ही नागरिकता है।”
गैटिल के अनुसार, “नागरिकता व्यक्ति की वह स्थिति है, जिसके कारण वह कुछ सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों का उपभोग करता है।
विलियम बॉयड के अनुसार, “भक्ति-भावना का उचित क्रम-निर्धारण ही नागरिकता है।’ नागरिकता की उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर स्पष्ट होता है कि नागरिकता जीवन की वह स्थिति है, जिसमें व्यक्ति किसी राज्य का सदस्य होने के नाते सभी प्रकार के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों का उपभोग करता है तथा राज्य के प्रति उसके अपने कुछ कर्तव्य भी सुनिश्चित होते हैं। इस प्रकार नागरिक होने की दशा का नाम ही नागरिकता है।

नागरिक के प्रकार
प्रत्येक राज्य में दो प्रकार के व्यक्ति निवास करते हैं
1. नागरिक (Citizen) और
2. विदेशी (Alien)

1. नागरिक
किसी राज्य में चार प्रकार के नागरिक होते हैं-

  • अल्पवयस्क नागरिक- ये एक निश्चित आयु से कम के व्यक्ति होते हैं और इन्हें मताधिकार प्राप्त नहीं होता है। भारत में 18 वर्ष की आयु से कम के व्यक्ति इस श्रेणी में आते हैं।
  • वयस्क नागरिक- ये एक निश्चित आयु प्राप्त व्यक्ति होते हैं। भारत में यह आयु 18 वर्ष निर्धारित की गई है तथा इन्हें मताधिकार प्राप्त होता है।
  • नागरिकता-प्राप्त विदेशी- ये विदेशी होते हैं, परन्तु उन्हें कुछ शर्ते पूरी करने के पश्चात् नागरिकता प्राप्त हो जाती है।
  • मताधिकार-रहित वयस्क नागरिक- इस वर्ग के अन्तर्गत ऐसे व्यक्ति सम्मिलित किए जाते हैं, जिनकी आयु नागरिकता प्राप्त करने की निश्चित आयु अधिक होती है, परन्तु किन्हीं विशेष कारणों से इन्हें मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं होता है।

2. विदेशी
विदेशी वे होते हैं, जो किसी अन्य देश के मूल निवासी होते हैं और कुछ विशेष कारणों से कुछ समय के लिए दूसरे राज्य में निवास करते हैं। विदेशी निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं

  • स्थायी विदेशी- ऐसे विदेशी, जो अपना देश छोड़कर अन्य देशों में जाकर बस जाते हैं और उसी देश की नागरिकता प्राप्त कर लेते हैं, ‘स्थायी विदेशी’ कहलाते हैं।
  • अस्थायी विदेशी अथवा विदेशी पर्यटक- ऐसे विदेशी, जो किसी विशेष कार्य के लिए कुछ समय के लिए दूसरे देश में जाते हैं और अपना कार्य पूरा करके स्वदेश लौट आते हैं, ‘अस्थायी विदेशी’ अथवा ‘विदेशी पर्यटक’ कहलाते हैं।
  • राजदूत एवं राजनयिक- ये विदेशी होते हैं, तथापि इन्हें अन्य विदेशियों की अपेक्षा अधिक | सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। किसी अन्य देश में ये अपने देश का कूटनीतिक एवं राजनयिक प्रतिनिधित्व करते हैं।
    सम्बन्धों के आधार पर विदेशी निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं-
  • विदेशी शत्रु- शत्रु देशों में चोरी-छिपे घुसपैठ करने वाले विदेशी, विदेशी शत्रु’ कहलाते हैं। प्रायः शत्रु देशों से आने वाले विदेशियों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जाती है और उन पर अनेक प्रतिबन्ध भी लगा दिए जाते हैं।
  • विदेशी मित्र- मित्र राष्ट्रों से आने वाले विदेशी, विदेशी मित्र’ कहलाते हैं। ये विदेशी अतिथि के रूप में आते हैं।

प्रश्न 2.
नागरिकता को परिभाषित कीजिए। नागरिकता कैसे प्राप्त होती है तथा इसका किस प्रकार विलोपन होता है?
या नागरिकता की परिभाषा दीजिए और भारत में नागरिकता प्राप्त करने की विधियाँ बताइए।
या नागरिकता समाप्त होने की किन्हीं चार परिस्थितियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
नागरिकता का तात्पर्य किसी राज्य में व्यक्ति का नागरिक होने की स्थिति से है। यह उस वैधानिक या कानूनी सम्बन्ध का नाम है जो व्यक्ति को उस राज्य के साथ, जिसका वह सदस्य है, सम्बद्ध करता है।
1. लॉस्की के शब्दों में, “अपनी प्रशिक्षित बुद्धि का लोकहित में प्रयोग ही नागरिकता है।”
2. गैटिल के अनुसार, “नागरिकता व्यक्ति की उस अवस्था को कहते हैं जिसके कारण वह अपने राज्य में राष्ट्रीय और राजनीतिक अधिकारों का उपयोग कर सकता है और अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए तैयार रहता है।
इस प्रकार किसी राज्य और उसके नागरिकों के उन आपसी सम्बन्धों को ही ‘नागरिकता’ कहा जाता है जिससे नागरिकों को राज्य की ओर से सामाजिक और राजनीतिक अधिकार मिलते हैं। तथा वे राज्य के प्रति कुछ कर्तव्यों का पालन करते हैं।

नागरिकता प्राप्त करने की विधियाँ
नागरिकता प्राप्त करने की विधियों को निम्नलिखित दो भागों में विभक्त किया जा सकता है
1. जन्मजात नागरिकता की प्राप्ति तथा
2. राज्यकृत नागरिकता की प्राप्ति।

1. जन्मजात नागरिकता की प्राप्ति
जन्मजात नागरिकता निम्नलिखित तरीकों से प्राप्त होती है-

  • रक्त अथवा वंश सम्बन्धी सिद्धान्त- जन्मजात नागरिकता प्राप्त करने की प्रथम विधि रक्त सम्बन्ध है। इस सिद्धान्त के अनुसार बच्चे को जन्म किसी भी स्थान पर क्यों न हो, उसे अपने पिता की नागरिकता प्राप्त होती है। फ्रांस, इटली एवं स्विट्जरलैण्ड में इस सिद्धान्त को अपनाया गया है। यह सिद्धान्त न्यायसंगत और विवेकयुक्त है।
  • जन्म-स्थान सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार बच्चे की नागरिकता का निर्णय उसके जन्म-स्थान के आधार पर किया जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार बच्चे को उसी देश की नागरिकता प्राप्त होती है, जिस देश की भूमि पर उसका जन्म होता है। अर्जेण्टाइना, इंग्लैण्ड तथा अमेरिका में नागरिकता का यह सिद्धान्त लागू है। यह सिद्धान्त नागरिकता का निर्णय करने में तो बहुत सरल है, किन्तु तर्कसंगत नहीं है।
  • दोहरा नियम- कई देशों में दोनों सिद्धान्तों को अपनाया गया है। इंग्लैण्ड, फ्रांस एवं अमेरिका में रक्त-सम्बन्धी सिद्धान्त तथा जन्म-स्थान सिद्धान्त दोनों प्रचलित हैं। दोहरे नियम के सिद्धान्त के अनुसार जो बच्चा अंग्रेज दम्पती से उत्पन्न हुआ हो, चाहे बच्चे का जन्म भारत में हो, अंग्रेज कहलाता है। उसे अपने पिता की नागरिकता प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त यदि किसी विदेशी की इंग्लैण्ड में सन्तान पैदा होती है, तो उसे इंग्लैण्ड की भी नागरिकता प्राप्त होगी।
    इस सिद्धान्त में यह दोष है कि एक बच्चा एक समय में दो देशों का नागरिक बन सकता है, किन्तु वयस्क होने पर वह यह निर्णय कर सकता है कि वह किस देश की नागरिकता को अपनाये और किसका परित्याग करे।

2. राज्यकृत नागरिकता की प्राप्ति
राज्यकृत नागरिकता नियमानुसार विदेशियों को प्रदान की जाती है। ऐसे व्यक्ति जिन्हें नागरिकता जन्मजात सिद्धान्त से प्राप्त नहीं होती, वरन् उस राज्य की ओर से प्राप्त होती है, जिसके कि वे मूल नागरिक नहीं हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने देश को छोड़कर किसी दूसरे देश में बस जाती है और कुछ समय पश्चात् उस देश की नागरिकताको प्राप्त कर लेता है तो उस व्यक्ति को राज्यकृत नागरिकं कहीं जाता है। नागरिकता देना अथवा न देना राज्य पर निर्भर करती है।
इस सिद्धान्त के अनुसार नागरिकता की प्राप्ति निम्नलिखित रूपों में की जाती है

  • निश्चित समय के लिए- यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे देश में जाकर एक निश्चित अवधि तक निवास करे तो वह प्रार्थना-पत्र देकर वहाँ की नागरिकता प्राप्त कर सकता है। इंग्लैण्डे और अमेरिका में निवास की अवधि 5 वर्ष है, जब कि फ्रांस में 10 वर्ष। भारत में निवास की अवधि 4 वर्ष है।
  • विवाह- यदि कोई स्त्री किसी दूसरे देश के नागरिक से विवाह कर लेती है तो उसे अपने पति के देश की नागरिकता प्राप्त हो जाती है। भारत का नागरिक पुरुष यदि इंग्लैण्ड की नागरिक महिला के साथ विवाह कर लेता है तो उस महिला को भारत की नागरिकता प्राप्त हो जाती है। जापान में इसके विपरीत नियम है। यदि कोई विदेशी व्यक्ति जापान की नागरिक महिला से विवाह कर लेता है तो उस व्यक्ति को जापान की नागरिकता प्राप्त हो जाती है।
  • सम्पत्ति खरीदना- सम्पत्ति खरीदने से भी नागरिकता प्राप्त हो जाती है। ब्राजील, पीरू और
    मैक्सिको में यह नियम प्रचलित है। यदि कोई विदेशी पीरू में सम्पत्ति खरीद लेता है तो उसे वहाँ की नागरिकता प्राप्त हो जाती है।
  • गोद लेना- जब एक देश का नागरिक व्यक्ति किसी दूसरे देश के नागरिक बच्चे को गोद ले | लेता है तो गोद लिये जाने वाले बच्चे को अपने पिता के देश की नागरिकता प्राप्त हो जाती है।
  • सरकारी नौकरी- कई देशों में यह नियम है कि यदि कोई विदेशी वहाँ सरकारी नौकरी कर ले तो उसे वहाँ की नागरिकता मिल जाती है। उदाहरणस्वरूप, यदि कोई भारतीय इंग्लैण्ड में सरकारी नौकरी कर लेता है तो उसे इंग्लैण्ड की नागरिकता प्राप्त हो जाती है।
  • विद्वत्ता द्वारा- कई देशों में विदेशी विद्वानों को नागरिक बनने के लिए विशेष सुविधाएँ दी | जाती हैं। विदेशी विद्वानों के निवास की अवधि दूसरे विदेशियों के निवास की अवधि से कम | होती है। फ्रांस में वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों के लिए वहाँ की नागरिकता प्राप्त करने के लिए एक वर्ष का निवास हीं पर्याप्त है।
  • दोबारा नागरिकता की प्राप्ति- यदि कोई नागरिक अपने देश की नागरिकता छोड़कर दूसरे देश की नागरिकता प्राप्त कर लेता है तो उसे दूसरे देश का नागरिक माना जाता है, परन्तु यदि वह चाहे तो कुछ शर्ते पूरी करके पुन: अपने देश की नागरिकता भी प्राप्त कर सकता है।

भारतीय नागरिकता प्राप्त करने की विधियाँ
निम्नलिखित विधियों में से किसी एक आधार पर भारतीय नागरिकता प्राप्त की जा सकती है

1. जन्म या वंश के आधार पर- 1992 ई० में संसद ने सर्वसम्मति से एक विधेयक पारित कर ‘भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955′ को संशोधित किया है। 1992 ई० के पूर्व भारत के बाहर जन्मे किसी व्यक्ति को रक्त-सम्बन्ध या वंश के आधार पर भारत की नागरिकता तभी प्राप्त होती थी, जब कि उसका पिता भारत का नागरिक हो। अब व्यवस्था यह की गयी है कि भारत से बाहर जन्मे ऐसे किसी भी व्यक्ति को भारत की नागरिकता प्राप्त होगी; जिसका पिता या माता, उसके जन्म के समय भारत के नागरिक हों। इस प्रकार अब नागरिकता के प्रसंग में बच्चे की माता को पिता के ‘समकक्ष स्थिति प्रदान कर दी गयी है।
2. पंजीकरण द्वारा- निम्नलिखित श्रेणी के व्यक्ति पंजीकरण के आधार पर नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं-

  •  जो व्यक्ति पंजीकरण के माध्यम से भारतीय नागरिकता प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें अब भारत में कम-से-कम 5 वर्ष निवास करना होगा। पहले यह अवधि 6 माह थी।
  •  ऐसे भारतीय जो विदेशों में जाकर बस गये हैं, भारतीय दूतावासों में आवेदन-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकेंगे।
  •  विदेशी स्त्रियाँ, जिन्होंने भारतीय नागरिक से विवाह कर लिया हो, आवेदन-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकेंगी।
  •  राष्ट्रमण्डलीय देशों के नागरिक, यदि वे भारत में ही रहते हों या भारत सरकार की नौकरी , कर रहे हों, आवेदन-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं।

3. देशीयकरण द्वारा- देशीयकरण द्वारा नागरिकता तभी प्रदान की जाती है, जब कि सम्बन्धित व्यक्ति कम-से-कम 10 वर्ष तक भारत में रह चुका हो। पहले यह अवधि 5 वर्ष थी। ‘नागरिकता संशोधन अधिनियम, 1986′ जम्मू-कश्मीर तथा असम सहित भारत के सभी राज्यों पर लागू होता है।

4. भूमि विस्तार द्वारा- यदि किसी नवीन क्षेत्र को भारत में शामिल किया जाए तो वहाँ की जनता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो जाएगी। जैसे 1961 ई० में गोआ तथा 1975 ई० में सिक्किम को भारत में सम्मिलित किये जाने पर वहाँ की जनता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो गयी।

नागरिकता का लोप
जिस तरह नागरिकता को प्राप्त किया जा सकता है, उसी तरह कुछ स्थितियों में नागरिकता को खोया भी जा सकता है। निम्नलिखित स्थितियों में प्रायः नागरिकता का लोप हो जाता है

  1. लम्बे समय तक अनुपस्थिति- कई देशों में यह नियम है कि यदि वहाँ का नागरिक लम्बे समय तक देश से बाहर रहे तो उसकी नागरिकता समाप्त कर दी जाती है। उदाहरणस्वरूप, यदि कोई फ्रांसीसी नागरिक लगातार 10 वर्ष की अवधि से अधिक फ्रांस से बाहर रहे तो उसकी नागरिकता समाप्त कर दी जाती है।
  2. विवाह- महिलाएँ विदेशी नागरिकों से विवाह करके अपने देश की नागरिकता खो देती हैं।
  3. विदेश में सरकारी नौकरी- यदि एक देश का नागरिक अपने देश की सरकार की आज्ञा प्राप्त | किये बिना किसी दूसरे देश में सरकारी नौकरी कर लेता है तो उसे अपने देश की नागरिकता छोड़नी पड़ती है।
  4. स्वेच्छा से नागरिकता का त्याग- कई देशों की सरकारें अपने नागरिकों को उनकी इच्छा के अनुसार किसी देश का नागरिक बनने की आज्ञा प्रदान कर देती हैं। इस प्रकार के व्यक्ति अपनी जन्मजात नागरिकता त्यागकर अन्य देश की नागरिकता प्राप्त कर लेते हैं।
  5. सेना से भाग जाने पर- यदि कोई नागरिक सेना से भागकर दूसरे देश में चला जाता है तो | उसकी नागरिकता समाप्त हो जाती है।
  6. दोहरी नागरिकता प्राप्त हो जाने पर- जब किसी व्यक्ति को दो राज्यों की नागरिकता प्राप्त हो जाती है तब उसे एक राज्य की नागरिकता छोड़नी पड़ती है।
  7. देश-द्रोह- जब कोई व्यक्ति राज्य के विरुद्ध विद्रोह अथवा क्रान्ति करता है तो उसकी नागरिकता छीन ली जाती है, परन्तु देश-द्रोह के आधार पर उन्हीं नागरिकों की नागरिकता को छीना जा सकता है जो राज्यकृत नागरिक हों।
  8. गोद लेना- यदि कोई बच्चा किसी विदेशी द्वारा गोद ले लिया जाए तो बच्चे की अपने देश की नागरिकता समाप्त हो जाती है और वह अपने नये माता-पिता के देश की नागरिकता प्राप्त कर लेता है।
  9. विदेशी सरकार से सम्मान प्राप्त करना- यदि कोई नागरिक अपने देश की आज्ञा के बिना किसी विदेशी सरकार द्वारा दिये गये सम्मान को स्वीकार कर लेता है तो उसे उसकी मूल नागरिकता से वंचित कर दिया जाता है।
  10. पागल, दिवालिया अथवा साधु- संन्यासी होने पर- यदि कोई व्यक्ति पागल, दिवालिया अथवा साधु-संन्यासी हो जाता है तो उसका नागरिकता का अधिकार समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 3.
‘विश्व नागरिकता की अवधारणा क्या है? इसके समर्थन में क्या तर्क प्रस्तुत किए जाते है?
उत्तर-
हम आज एक ऐसे विश्व में रहते हैं जो आपस में जुड़ा हुआ है। संचार के इण्टरनेट, टेलीविजन, सेलफोन और सैटेलाइट फोन जैसे नए साधनों ने उन तरीकों में भारी बदलाव कर दिया है, . जिनसे हम अपने विश्व को समझते हैं। पहले विश्व के एक हिस्से की गतिविधियों की खबर अन्य हिस्सों तक पहुँचने में महीनों लग जाते थे। लेकिन संचार के नये तरीकों ने विश्व के विभिन्न भागों में घट रही घटनाओं को हमारे तत्काल सम्पर्क की सीमाओं में ला दिया है। हम अपने टेलीविजन के पर्दे पर विनाश और युद्धों को होते देख सकते हैं, इससे विश्व के विभिन्न देशों के लोगों में साझे सरोकार और सहानुभूति विकसित होने में सहायता मिली है।

विश्व नागरिकता के समर्थक तर्क प्रस्तुत करते हैं कि चाहे विश्व-कुटुम्ब और वैश्विक समाज अभी विद्यमान नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार लोग आज एक-दूसरे से जुड़ाव अनुभव करते हैं। उदाहरणार्थ-एशिया की सुनामी या अन्य बड़ी दैवी आपदाओं के पीड़ितों की सहायता के लिए विश्व के सभी हिस्सों से उमड़ा भावोद्गार विश्व-समाज की ओर उभार का संकेत है। हमें इस भावना को मजबूत करना चाहिए और एक विश्व नागरिकता की अवधारणा की दिशा में सक्रिय होना चाहिए। राष्ट्रीय नागरिकता की अवधारणा यह मानती है कि हमारी राज्यसत्ता हमें वह सुरक्षा और अधिकार दे सकती है जिनकी हमें आज विश्व में गरिमा के साथ जीने के लिए आवश्यकता है। लेकिन राजसत्ताओं के समक्ष आज अनेक ऐसी समस्याएँ हैं, जिनका मुकाबला वे अपने बल पर नहीं कर सकतीं।

विश्व नागरिकता की अवधारणा के आकर्षणों में से एक यह है कि इससे राष्ट्रीय सीमाओं के दोनों ओर की उन समस्याओं का समाधान करना आसान हो सकता है जिसमें कई देशों की सरकारों और लोगों की संयुक्त कार्यवाही आवश्यक होती है। उदाहरण के लिए, इससे प्रवासी और राज्यहीन लोगों की समस्या का सर्वमान्य समाधान पाना आसान हो सकता है या कम-से-कम उनके बुनियादी अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है चाहे वे जिस किसी देश में रहते हों।

हम अध्ययन कर चुके हैं कि एक देश के भीतर की समान नागरिकता को सामाजिक-आर्थिक असमानता या अन्य समस्याओं से खतरा हो सकता है। इन समस्याओं का समाधान अन्ततः सम्बन्धित समाज की सरकार और जनता ही कर सकती है। इसलिए लोगों के लिए आज एक राज्य की पूर्ण और समान सदस्यता महत्त्वपूर्ण है। लेकिन विश्व नागरिकता की अवधारणा हमें याद दिलाती है कि राष्ट्रीय नागरिकता को समझदारी से जोड़ने की आवश्यकता है कि हम आज अन्तर्समबद्ध विश्व में रहते हैं। और हमारे लिए यह भी आवश्यक है कि हम विश्व के विभिन्न हिस्सों के लोगों के साथ अपने सम्बन्ध सुदृढ़ करें और राष्ट्रीय सीमाओं के पार के लोगों और सरकारों के साथ काम करने के लिए तैयार हों।

प्रश्न 4.
आदर्श नागरिक के गुणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
आदर्श नागरिक के गुण
महान् दार्शनिक अरस्तू का मत है कि “श्रेष्ठ नागरिक ही श्रेष्ठ राज्य का निर्माण कर सकते हैं, इसलिए राज्य के नागरिक आदर्श होने चाहिए।” आज का युग प्रजातन्त्र का युग है, जिसमें शासन का दायित्व वहाँ के नागरिकों पर होता है। अत: आदर्श नागरिकता ही राज्य के विकास का आधार है। एक आदर्श नागरिक में अग्रलिखित गुणों का होना आवश्यक है-

  1. उत्तम स्वास्थ्य- आदर्श नागरिक में उत्तम स्वास्थ्य का होना अनिवार्य है। अस्वस्थ व्यक्ति समाज पर भार स्वरूप होता है। वह न तो अपने व्यक्तिगत कर्तव्यों और न ही समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन कर सकता है।
  2. सच्चरित्रता- मनुष्य के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में सच्चरित्रता का बहुत अधिक महत्त्व है। चरित्रवान् व्यक्ति ही आदर्श नागरिक बन सकता है, क्योंकि चरित्र द्वारा ही व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का सर्वोत्तम विकास कर सकता है।
  3. शिक्षा- शिक्षा आदर्श नागरिक जीवन की नींव है। गांधी जी ने कहा था कि “शिक्षा, जो आत्मा का भोजन है, स्वस्थ नागरिकता की प्रथम शर्त है। शिक्षा ही अज्ञान के अन्धकार का विनाश कर ज्ञान का प्रकाश करती है। अशिक्षित नागरिक कभी भी आदर्श नागरिक नहीं बन सकता।
  4. विवेक और आत्म-संयम- लॉर्ड ब्राइस के अनुसार, “विवेक आदर्श नागरिक का पहला गुण है।’ विवेक के आधार पर नागरिक अच्छे-बुरे का ज्ञान प्राप्त करता है तथा अपने कर्तव्यों और अधिकारों को भली प्रकारे समझ सकता है। आदर्श नागरिक का दूसरा गुण आत्म-संयम है, अर्थात् नागरिक में अपने हितों का परित्याग कर देने की स्थिति में आत्म-संयम की भावना होनी चाहिए।
  5. परिश्रमशीलता- परिश्रमशीलता वैयक्तिक विकास और सामाजिक प्रगति की आधारशिला है। इससे व्यक्ति में स्वावलम्बन की भावना उत्पन्न होती है। परिश्रमी व्यक्ति ही आदर्श नागरिक बनकर अपना, समाज का और देश का कल्याण कर सकता है।
  6. कर्तव्यपरायणता- श्रेष्ठ सामाजिक जीवन के लिए कर्तव्यपरायणता की भावना बहुत महत्त्वपूर्ण है। कर्तव्यपरायणता आदर्श नागरिक जीवन की कुंजी है।
  7. परोपकारिता- आदर्श नागरिक में परोपकार की भावना होनी आवश्यक है। समाज के असहाय, दीन-दुःखियों तथा अपाहिजों पर उपकार करना प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक कर्तव्य है।
  8. सहानुभूति और दया- सहानुभूति और दया की भावना भी आदर्श नागरिक के अनिवार्य गुण | हैं। ये ही व्यक्ति को दूसरों की सहायता करने के लिए प्रेरित करते हैं।
  9. मितव्ययिता- आवश्यक व्यय करना आदर्श नागरिक का एक महान् गुण होता है। जो व्यक्ति फिजूलखर्जी करता है, उसे अपने जीवन में अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अनावश्यक खर्च करने वाला व्यक्ति स्वयं तो कष्ट उठाता ही है, साथ ही परिवार, समाज व राष्ट्र को भी हानि पहुँचाता है; अतः आदर्श नागरिक में मितव्ययिता का गुण होना आवश्यक है।
  10. आज्ञापालन तथा अनुशासन- एक आदर्श नागरिक में आज्ञापालन और अनुशासन की भावना | होनी अनिवार्य है, तभी वह राज्य द्वारा बनाये गये कानूनों का निष्ठापूर्वक पालन कर सकेगा। और दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा दे सकेगा।
  11. जागरूकता- आदर्श नागरिक के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने अधिकारों के कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहे। आदर्श नागरिक को अपने परिवार, ग्राम, प्रान्त तथा राष्ट्र के हितों के प्रति जागरूक रहना चाहिए और उनके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
  12. प्रगतिशीलता- आधुनिक युग लोकतन्त्र का युग है; अत: यह आवश्यक है कि आदर्श नागरिक रूढ़ियों एवं कुरीतियों की उपेक्षा कर प्रगतिशील विचारों के अनुकूल आचरण करे।
  13. नि:स्वार्थता- आदर्श नागरिक को स्वार्थपरता से दूर रहना चाहिए तथा उसका अन्त:करण जन-कल्याण के उच्च आदर्शों से प्रेरित होना चाहिए।
  14. मताधिकार का उचित प्रयोग- आधुनिक प्रजातान्त्रिक युग में सभी वयस्क स्त्री-पुरुषों को मताधिकार प्राप्त है। इस अधिकार का उचित प्रयोग निष्पक्षता के साथ करना प्रत्येक आदर्श नागरिक का प्रथम कर्तव्य है। इस अधिकार के अनुचित प्रयोग से शासन में भ्रष्टाचार फैल सकता है और शासन-सत्ता अयोग्य व्यक्तियों के हाथ में पहुँच सकती है।
  15. देशभक्ति- आदर्श नागरिक का सर्वोच्च गुण देशभक्ति है। प्रत्येक आदर्श नागरिक में देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी होनी चाहिए। संकट के समय देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर नागरिक अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए तत्पर हो जाता है।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि आदर्श नागरिक में उपर्युक्त गुणों का होना आवश्यक है, क्योंकि आदर्श नागरिक ही समाज और देश को उन्नति के चरम शिखर पर पहुंचा सकते हैं।

प्रश्न 5.
भारतीय नागरिकता पर संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।
या भारतीय नागरिकता अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
भारतीय नागरिकता
स्वाधीनता प्राप्ति से पूर्व भारत के नागरिक ब्रिटिश साम्राज्य के नागरिक कहलाते थे। लेकिन उन्हें वे सब अधिकार प्राप्त नहीं थे, जो उस समय एक अंग्रेज को प्राप्त थे। ब्रिटिश सरकार की अधीनता में भारतीयों को अनेक कठिनाइयों तथा असुविधाओं का सामना करना पड़ता था। अंग्रेज अधिकारी भारतीयों के साथ बड़ा अमानुषिक व्यवहार करते थे। भारतीयों की भाषण एवं प्रेस की स्वतन्त्रता पर भी अनेक प्रतिबन्ध लगे हुए थे। लेकिन 15 अगस्त, 1947 ई० के बाद भारतीयों को नागरिकता सम्बन्धी वे सभी अधिकार मिल गए जिनके माध्यम से वे देश के शासन प्रबन्ध में निर्णायक भूमिका निभाने लगे।

इकहरी नागरिकता
विश्व के सभी संघीय संविधानों में नागरिकों को दोहरी नागरिकता प्राप्त होती है-एक संघ सरकार की नागरिकता और दूसरी उस इकाई या राज्य (प्रान्त) की नागरिकता, जिसमें वह निवास करता है। लेकिन स्वतन्त्र भारत का संविधान संघात्मक होते हुए भी भारतीयों को इकहरी नागरिकता प्रदान करता है। इसका आशय यह है कि प्रत्येक भारतीय केवल भारत संघ का नागरिक, उस राज्य का नहीं जिसमें वह निवास करता है। भारतीय संविधान ने देश की अखण्डता को कायम रखने के लिए इकहरी नागरिकता की व्यवस्था को अपनाया है।

भारत का नागरिक होने का हकदार
भारतीय संविधान-निर्माताओं ने यह निश्चित नहीं किया था कि भविष्य में भारतीय नागरिकता किस प्रकार प्राप्त की जा सकती है तथा उसका लोप किस प्रकार सम्भव है। भारतीय संविधान में केवल यह वर्णित है कि 27 जनवरी, 1950 ई० को भारत के नागरिक कौन हैं। नागरिकता की प्राप्ति तथा उसके निर्णय और लुप्त होने के सम्बन्ध में संविधान ने भारतीय संसद को पूर्ण अधिकार प्रदान कर दिए हैं। इस प्रकार संविधान ने नागरिकता सम्बन्धी नियमों के निर्माण का एकाधिकार भारतीय संसद को सौंप दिया है।
भारतीय संविधान के लागू होने के समय नागरिकता सम्बन्धी सिद्धान्त निम्नवत् निर्धारित किए गए थे

  1. जन्म- भारत राज्य क्षेत्र में जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति को भारत संघ की नागरिकता प्राप्त होगी।
  2. वंश- वे सभी व्यक्ति भारत संघ के नागरिक माने जाएँगे, जिनके माता-पिता में से किसी एक ने भारत राज्य क्षेत्र में जन्म लिया है।
  3. निवास- वे सभी व्यक्ति भारत संघ के नागरिक होंगे, जो संविधान लागू होने के पाँच वर्ष पूर्व से भारत राज्य क्षेत्र के सामान्य निवासी थे।
  4. शरणार्थी- पाकिस्तान से भारत आने वाले व्यक्तियों में से वे व्यक्ति भारत संघ के नागरिक माने जाएँगे-(अ) जो 19 जुलाई, 1948 ई० से पूर्व भारत चले आए थे और जिनके माता या पिता का जन्म अविभाजित भारत में हुआ था। (ब) जो 19 जुलाई, 1948 ई० के बाद भारत
    आए हों और तत्कालीन भारत सरकार द्वारा पंजीकृत कर लिए गए हों।
  5. भारतीय विदेशी- भारत के संविधान में ऐसे भारतीयों को भी नागरिकों की श्रेणी में पंजीकृत करने का उल्लेख है जो भारत राज्य क्षेत्र के बाहर किसी अन्य देश में निवास करते हों। उनके लिए निम्नलिखित दो शर्ते हैं-(अ) वे या उनके माता-पिता अथवा पितामह-पितामही में से कोई एक अविभाजित भारत में जन्में हों। (ब) उन्होंने अमुक देश में रहने वाले भारतीय राजदूत के पास भारत संघ का नागरिक बनने के लिए आवेदन-पत्र दे दिया हो और उन्हें भारतीय नागरिक पंजीकृत कर दिया गया हो।

भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955
भारतीय संसद ने सन् 1955 में भारतीय नागरिकता अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम में भारतीय नागरिकता की प्राप्ति और उसके विलोपन के प्रकार को बताया गया है। इस अधिनियम के प्रावधान निम्नलिखित हैं–

भारतीय नागरिकता की प्राप्ति

  1. जन्म- उने सभी व्यक्तियों को भारत संघ की नागरिकता प्राप्त होगी, जिनका जन्म 26 जनवरी, 1950 ई० के बाद भारत राज्य क्षेत्र के किसी भी भाग में हुआ हो।
  2. पाकिस्तान से आगमन या प्रव्रजन- उन सभी व्यक्तियों को, जो 26 जुलाई, 1949 ई० के बाद भारते आए हों, भारत संघ की नागरिकता प्राप्त हो जाएगी, बशर्ते वे भारतीय नागरिकों के रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करा लें और कम-से-कम एक वर्ष से भारत में अवश्य निवास | करते हों।
  3. पंजीकरण- विदेशों में निवास करने वाले भारतीय भारत सरकार के दूतावास में अपना नाम |पंजीकृत कराकर भारतीय संघ की नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं।
  4. विवाह- उन सभी विदेशी स्त्रियों को, जिन्होंने भारतीयों से विवाह किया है, भारत संघ की नागरिकता प्राप्त हो जाएगी।
  5. आवेदन-पत्र- कोई भी विदेशी व्यक्ति आवेदन-पत्र देकर भारत संघ का नागरिक बन सकता है, लेकिन शर्त यह है कि वह अच्छे आचरण का हो, संविधान में वर्णित किसी एक भाषा का ज्ञाता हो, भारत में स्थायी रूप से निवास करने की इच्छा रखता हो और कम-से-कम एक वर्ष | से भारत में लगातार रह रहा हो।
  6. निवास अथवा नौकरी- राष्ट्रमण्डल के सदस्य देशों के वे नागरिक जो भारत में रहते हों या भारत में नौकरी करते हों, तो वे प्रार्थना-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकेंगे।
  7. भूमि विस्तार- यदि किसी नए प्रदेश को भारत में मिला लिया जाता है, तो वहाँ के निवासियों को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो जाएगी।

भारतीय नागरिकता संशोधन अधिनियम, 1986 तथा 1992
भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 के प्रावधानों की सरलता का लाभ उठाकर जम्मू-कश्मीर, पंजाब और असम जैसे राज्यों में लाखों विदेशियों ने अनधिकृत रूप से भारत में प्रवेश कर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर ली। अतः केन्द्र सरकार ने भारतीय नागरिकता संशोधन अधिनियम, 1986 पारित करके नागरिकता सम्बन्धी प्रावधानों को कठोर बना दिया।

सन 1986 के संशोधन अधिनियम के अनुसार कोई भी विदेशी जब तक कम-से-कम 10 वर्ष तक भारत ‘राज्य-क्षेत्र का निवासी नहीं रहा होगा, भारतीय नागरिकता प्राप्त नहीं कर सकेगा। भारतीय नागरिकता सम्बन्धी प्रावधानों को जम्मू-कश्मीर तथा असम राज्यों पर भी लागू किया गया। इस संशोधन अधिनियम में यह शर्त भी जोड़ दी गई है कि भारत में जन्म लेने वाले व्यक्ति को भारतीय नागरिकता तभी प्राप्त होगी, जबकि उसके माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक होगा।

सन् 1992 में भारतीय संसद ने नागरिकता से सम्बन्धित दूसरा संशोधन अधिनियम पारित होगा। इस संशोधन अधिनियम के अनुसार यह व्यवस्था की गई है कि विदेश में निवास कर रहे किसी भारतीय दम्पती के यदि कोई सन्तान उत्पन्न होती है, तो वह भारतीय नागरिक मानी जाएगी, बशर्ते कि दम्पती में से किस एक (पति या पत्नी) ने पहले से ही भारतीय नागरिकता प्राप्त कर रखी हो। इससे पूर्व केवल पति का ही भारतीय नागरिक होना अनिवार्य था।

प्रश्न 6.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में आने वाली बाधाओं का वर्णन कीजिए तथा उन्हें दूर करने के सुझाव दीजिए।
या
आदर्श नागरिकता प्राप्त करने के मार्ग में कौन-कौन-सी बाधाएँ हैं? विवेचना कीजिए।
या
आदर्श नागरिकता के मार्ग की बाधाओं के निवारण के उपायों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
आदर्श नागरिकता के मार्ग में आने वाली बाधाएँ 
कोई भी नागरिक जन्म से ही एक आदर्श नागरिक के गुणों को लेकर पैदा नहीं होता, अपितु वह बड़ा होकर अपने जीवन में इन गुणों को विकसित करता है। परिवार, समुदाय, समाज और राज्य उसके लिए उन सुविधाओं को जुटाते हैं जिनसे वह एक आदर्श नागरिक बन सकता है। किन्तु कभी-कभी आदर्श नागरिक बनने के मार्ग में अनेक बाधाएँ उपस्थित हो जाती हैं, जिसके फलस्वरूप वह आदर्श नागरिक के गुणों से वंचित रह जाता है। ये बाधाएँ अग्रलिखित हैं

1. अशिक्षा और अज्ञानता- अशिक्षा ही अज्ञानता की जड़ है। अज्ञानी व्यक्ति में उचित और अनुचित का अन्तर कर पाने का विवेक नहीं होता। अशिक्षित व्यक्ति न तो अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है और न ही राष्ट्र की सेवा। अतः अशिक्षा व अज्ञानता व्यक्ति के आदर्श
नागरिक बनने के मार्ग में बाधा उत्पन्न करते हैं।

2. व्यक्तिगत स्वार्थ- यह आदर्श नागरिक के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। स्वार्थी व्यक्ति अपने | स्वार्थ को सर्वोपरि मानता है और अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए समाज तथा राष्ट्र के हितों का भी बलिदान कर देता है। वह केवल अपने विषय में सोचता, कार्य करता और जीवित रहता है तथा किसी भी तरह अपने स्वार्थों की पूर्ति कर लेना ही सब कुछ मान लेता है; उदाहरणार्थ-व्यापारी के रूप में कालाबाजारी, सरकारी अधिकारी के रूप में रिश्वतखोरी
आदि। निजी स्वार्थों की प्रबलता ही कुछ मुद्राओं के लिए राष्ट्रीय हितों का सौदा कर लेती है।

3. निर्धनता अथवा आर्थिक विषमता- आदर्श नागरिकता के मार्ग में आर्थिक बाधाएँ प्रबल होती हैं। आर्थिक बाधाओं में दरिद्रता, बेरोजगारी तथा आर्थिक विषमता मुख्य हैं। भूखे व्यक्ति की नैतिकता और ईमान केवल रोटी बन जाती है। गम्भीर आर्थिक विषमताएँ उनमें वर्ग-संघर्ष की भावना उत्पन्न करती हैं, जिससे व्यक्ति अपने वर्ग के हित के लिए समाज के हित को अनदेखा कर देता है।

4. अकर्मण्यता- अकर्मण्यता अथवा आलस्य व्यक्ति को कार्य करने के प्रति उदासीन बना देता है। ऐसा व्यक्ति किसी प्रकार के कार्य करने में रुचि नहीं लेता और अपने कर्तव्य-पालन से दूर रहना चाहता है। इस प्रकारे अकर्मण्यता आदर्श नागरिकता की उपलब्धि में महान् दुर्गुण है।

5. साम्प्रदायिकता एवं जातीयता- अनेक बार व्यक्ति अपने सम्प्रदाय अथवा जातिगत स्वार्थों के वशीभूत होकर समाज और राज्य के हितों की भी अवहेलना करने लगता है। इसी भावना के कारण देश के अनेक भागों में भीषण रक्तपात तथा आत्मदाह जैसी घटनाएँ घटित हुई हैं। इस प्रकार की संकुचित भावनाएँ मनुष्य को आदर्श नागरिक नहीं बनने देतीं।

6. अनुचित दलबन्दी- आधुनिक प्रजातन्त्र का आधार दलीय व्यवस्था है। स्वस्थ दलीय परम्परा प्रजातन्त्रीय शासन की सफलता में सहायक होती है तथा जनसाधारण में राजनीतिक चेतना उत्पन्न करती है; किन्तु अनुचित दलबन्दी सारे वातावरण को विषाक्त कर देती है। यहाँ तक कि विभिन्न राजनीतिक दल अपने लाभ के लिए जातीय और साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काकर दंगे भी कराते हैं। ऐसे दूषित वातावरण में आदर्श नागरिकता की कल्पना भी असम्भव है।

7. सामाजिक कुप्रथाएँ और रूढ़िवादिता- कुछ सामाजिक कुप्रथाएँ भी आदर्श नागरिकता के मार्ग | में बाधा बन जाती हैं। भारतीय समाज में छुआछूत, जाति-पाँति का भेद, बाल-विवाह, दहेज-प्रथा, सती- प्रथा, विधवा-विवाह आदि ऐसी ही सामाजिक कुप्रथाएँ हैं।

8. उग्र-राष्ट्रीयता और साम्राज्यवाद- उग्र-राष्ट्रीयता के कारण नागरिक अपने राष्ट्र को ऊँचा समझते हैं तथा दूसरे राष्ट्रों से घृणा करते हैं। वे अपने राष्ट्र के क्षुद्र स्वार्थ के लिए पड़ोसी राष्ट्रों में साम्प्रदायिक वैमनस्य और आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं। इसके अतिरिक्त साम्राज्यवादी प्रवृत्ति भी आदर्श नागरिक जीवन की प्रबल शत्रु है। साम्राज्यवादी देश छोटे राज्यों को पराधीन कर लेते । हैं, जिसके कारण युद्ध होते हैं; उदाहरणार्थ-इराक की साम्राज्यवादी कार्यवाही के कारण इराक व बहुराष्ट्रीय सेनाओं में हुआ भीषण युद्ध।

आदर्श नागरिकता की बाधाओं को दूर करने के उपाय

आदर्श नागरिकता के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाओं को निम्नलिखित उपायों द्वारा समाप्त किया जा सकता है

1. उचित शिक्षा को प्रसार- शिक्षा के प्रसार से व्यक्ति की बौद्धिक और सांस्कृतिक उन्नति होती है, अज्ञानता समाप्त होती है और उसमें विवेक जाग्रत होता है। शिक्षित व्यक्ति अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहता है। इसलिए शिक्षा के अधिकाधिक विकास से अज्ञानता को ।
दूर करके व्यक्ति को आदर्श नागरिक बनने में सहायता की जा सकती है।

2. निर्धनता का विनाश- ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे सभी व्यक्ति अपने भोजन, वस्त्र, निवास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें। ऐसा होने पर ही | वे अपने सार्वजनिक कर्तव्यों का सम्पादन कर सकते हैं। अतः आर्थिक विषमताओं का अन्त । | करके अधिकाधिके रूप में आर्थिक समानता स्थापित की जानी चाहिए।

3. नैतिकता का उत्थान- नागरिकों को उत्तम चरित्र ही राष्ट्र की अमूल्य निधि है। जिस देश के नागरिकों में नैतिक मूल्यों का समावेश होगा, उस देश का सर्वांगीण विकास होगा। व्यक्ति को निजी स्वार्थों का त्याग करके जनहित को सर्वोपरि मानना चाहिए।

4. समाज- सुधार और रूढ़िवादिता का अन्त-समाज में प्रचलित कुप्रथाओं को सरकार द्वारा . समाज-सुधारकों की सहायता से समाप्त किया जाना चाहिए। ऐसा करने पर ही आदर्श नागरिकता का विकास सम्भव है।

5. स्वतन्त्र और शक्तिशाली प्रेस- आदर्श नागरिकता के विकास के लिए स्वतन्त्र और शक्तिशाली प्रेस का होना बहुत आवश्यक है। विभिन्न घटनाओं और गतिविधियों की सही जानकारी नागरिकों को स्वतन्त्र रूप से विचार करने के लिए प्रेरित करती है, किन्तु ऐसा तभी सम्भव है जब प्रेस सरकारी नियन्त्रण से मुक्त हो।

6. स्वस्थ राजनीतिक दलों की स्थापना- देश में राजनीतिक दलों को संगठन विशुद्ध राजनीतिक व आर्थिक आधार पर किया जाना चाहिए। ऐसा होने पर राजनीतिक दल समाज व राष्ट्र के हितों को दृष्टि में रखकर काम करेंगे। ऐसे राजनीतिक दल ही नागरिकों को प्रत्येक विषय पर सार्वजनिक हित की दृष्टि से सोचने की दिशा में अग्रसर करेंगे।

7. विश्व-बन्धुत्व की भावना उग्र- राष्ट्रीयता तथा साम्राज्यवाद के दोषों से बचने के लिए विश्व बन्धुत्व की भावना को अपनाना अत्यन्त आवश्यक है। ‘जीओ और जीने दो’ तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ आदर्श नागरिकता के महान् सन्देश हैं, जो परस्पर सहयोग और सह-अस्तित्व की धारणा पर अवलम्बित हैं। इस भावना को अपनाकर एक आदर्श नागरिक अपने देश के विकास के लिए इस प्रकार कार्य करता है कि वह अन्य देशों की प्रगति में बाधक न हो।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 5 Rights

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 5 Rights (अधिकार)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Political Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 5 Rights (अधिकार).

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अधिकार क्या हैं और वे महत्त्वपूर्ण क्यों हैं? अधिकारों का दावा करने के लिए उपयुक्त आधार क्या हो सकते हैं?
उत्तर-
‘अधिकार’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के दो शब्दों ‘अधि’ और ‘कार’ से मिलकर हुई है। जिनका क्रमशः अर्थ है ‘प्रभुत्व’ और ‘कार्य’। इस प्रकार शाब्दिक अर्थ में अधिकार का अभिप्राय उस कार्य से है, जिस पर व्यक्ति का प्रभुत्व है। मानव एक सामाजिक प्राणी होने के नाते समाज के अन्तर्गत ही व्यक्तित्व के विकास के लिए उपलब्ध सुविधाओं का उपभोग करता है। इन सुविधाओं अथवा अधिकारों के उपयोग से ही व्यक्ति, अपने शारीरिक, मानसिक एवं नैतिक विकास का अवसर प्राप्त करता है। संक्षेप में, अधिकार मनुष्य के जीवन की यह अनिवार्य परिस्थिति है, जो विकास के लिए आवश्यक है तथा जिसे राज्य और समाज द्वारा मान्यता प्रदान की जाती है।
अधिकारों का दावा करने के लिए उपयुक्त आधार निम्नलिखित हो सकते हैं-

  1. सम्मान और गरिमापूर्ण जीवन बसर करने के लिए अधिकारों का दावा किया जा सकता है।
  2. अधिकारों की दावेदारी का दूसरा आधार यह है कि वे हमारी बेहतरी के लिए आवश्यक हैं।

प्रश्न 2.
किन आधारों पर यह अधिकार अपनी प्रकृति में सार्वभौमिक माने जाते हैं?
उत्तर-
17 वीं और 18वीं सदी में राजनीतिक सिद्धान्तकार तर्क प्रस्तुत करते थे कि हमारे लिए अधिकार प्रकृति या ईश्वर प्रदत्त हैं। हमें जन्म से वे अधिकार प्राप्त हैं। परिणामस्वरूप कोई व्यक्ति या शासक उन्हें हमसे छीन नहीं सकता। उन्होंने मनुष्य के तीन प्राकृतिक अधिकार चिह्नित किए। थे-जीवन को अधिकार, स्वतन्त्रता का अधिकार और सम्पत्ति का अधिकार। अन्य विभिन्न अधिकार इन बुनियादी अधिकारों से ही निकले हैं। हम इन अधिकारों का दावा करें या न करें, व्यक्ति होने के कारण हमें यह प्राप्त हैं। यह विचार कि हमें जन्म से ही कुछ विशिष्ट अधिकार प्राप्त हैं, बहुत शक्तिशाली अवधारणा है, क्योंकि इसका अर्थ है जो ईश्वर प्रदत्त है और उन्हें कोई मानव शासक या राज्य हमसे छीन नहीं सकता।

प्रश्न 3.
संक्षेप में उन नए अधिकारों की चर्चा कीजिए, जो हमारे देश में सामने रखे जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, आदिवासियों के अपने रहवास और जीन के तरीके को संरक्षित रखने तथा बच्चों के बँधुआ मजदूरी के खिलाफ अधिकार जैसे नए अधिकारों को लिया जा सकता है।
उत्तर-
वर्तमान में कुछ नए अधिकारों की चर्चा होने लगी है। उनमें प्रमुख हैं-
1. अपनी मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा पाने का अधिकार – यह अधिकार सांस्कृतिक अधिकारों के अन्तर्गत रखा जा सकता है। अब विभिन्न भाषा-भाषी राज्यों में यह माँग उठने लगी है कि बच्चों को प्राथमिक शिक्षा उनकी मातृभाषा में दी जाए, क्योंकि मातृभाषा को सीखने और उसके माध्यम से शिक्षा पाने का उन्हें पूर्ण अधिकार है।
2. अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थाएँ खोलने का अधिकार – अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा और उसके विकास के लिए कुछ अल्पसंख्यक इस प्रकार की शिक्षण संस्थाओं को प्रारम्भ करने के लिए इसे अधिकार के रूप में मानने लगे हैं। भारत में यह सुविधा प्रदान की गई है।

प्रश्न 4.
राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों में अन्तर बताइए। हर प्रकार के अधिकार के उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर-
राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों में अन्तर
UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 5 Rights 4

प्रश्न 5.
अधिकार राज्य की सत्ता पर, कुछ सीमाएँ लगाते हैं। उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
अधिकार राज्य को कुछ विशिष्ट तरीकों से कार्य करने के लिए वैधानिक दायित्व सौंपते हैं। प्रत्येक अधिकार निर्देशित करता है कि राज्य के लिए क्या करने योग्य है और क्या नहीं। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति के जीवन जीने का अधिकार राज्य को ऐसे कानून बनाने के लिए बाध्य करता है। जो दूसरों के द्वारा क्षति पहुँचाने से उसे बचा सके। यह अधिकार राज्य से माँग करता है कि वह व्यक्ति को चोट या नुकसान पहुँचाने वालों को दण्डित करे। यदि कोई समाज अनुभव करता है कि जीने के अधिकार को आशय अच्छे स्तर के जीवन का अधिकार है, तो वह राज्य से ऐसी नीतियों के अनुपालन की अपेक्षा करता है, जो स्वस्थ जीवन के लिए स्वच्छ पर्यावरण और अन्य आवश्यक निर्धारकों का प्रावधान करे।

अधिकार केवल यह ही नहीं बताते कि राज्य को क्या करना है, वे यह भी बताते हैं कि राज्य को क्या कुछ नहीं करना है। उदाहरणार्थ, किसी व्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार कहता है कि राज्य केवल । अपनी मर्जी से उसे गिरफ्तार नहीं कर सकता। अगर वह गिरफ्तार करना चाहता है तो उसे इस । कार्यवाही को उचित ठहराना पड़ेगा, उसे किसी न्यायालय के समक्ष इस व्यक्ति की स्वतन्त्रता में कटौती करने का कारण स्पष्ट करना होगा। इसलिए किसी व्यक्ति को पकड़ने के लिए पहले गिरफ्तारी का वारण्ट दिखाना पुलिस के लिए आवश्यक होता है, इस प्रकार अधिकार राज्य की सत्ता पर कुछ सीमाएँ लगाते हैं।

दूसरों शब्दों में, कहा जाए तो हमारे अधिकार यह सुनिश्चित करते हैं कि राज्य की सत्ता वैयक्तिक जीवन और स्वतन्त्रता की मर्यादा का उल्लंघन किए बिना काम करे। राज्य सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न सत्ता हो सकता है, उसके द्वारा निर्मित कानून बलपूर्वक लागू किए जा सकते हैं, लेकिन सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न राज्य का अस्तित्व अपने लिए नहीं बल्कि व्यक्ति के हित के लिए होता है। इसमें जनता का ही अधिक महत्त्व है औ सत्तात्मक सरकार को उसके ही कल्याण के लिए काम करना होता है। शासक अपनी कार्यवाहियों के लिए जबावदेह है और उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि कानून लोगों की भलाई सुनिश्चित करने के लिए ही होते हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
“अधिकार वह माँग है, जिसे समाज स्वीकार करता है और राज्य लागू करता है। यह कथन किसका है?
(क) हॉलैण्ड
(ख) बोसांके
(ग) वाइल्ड
(घ) ऑस्टिन
उत्तर-
(ख) बोसांके।

प्रश्न 2.
“अधिकार कुछ विशेष कार्यों को करने की स्वतन्त्रता की उचित माँग है।” यह कथन किसका है?
(क) वाइल्ड
(ख) बेनीप्रसाद
(ग) श्रीनिवास शास्त्री
(घ) ग्रीन
उत्तर-
(क) वाइल्ड।

प्रश्न 3.
अधिकारों की उत्पत्ति के प्राकृतिक सिद्धान्त के समर्थकों में कौन नहीं है?
(क) हॉब्स
(ख) बर्क
(ग) रूसो
(घ) लॉक
उत्तर-
(ख) बर्क।

प्रश्न 4.
अधिकारों के सामाजिक कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्त के समर्थक कौन हैं?
(क) बेन्थम
(ख) रूसो
(ग) रिची
(घ) लॉस्की
उत्तर-
(क) बेन्थम।

प्रश्न 5.
अधिकारों के वैधानिक सिद्धान्त के समर्थक हैं
(क) गिलक्राइस्ट
(ख) अरस्तू
(ग) हॉलैण्ड
(घ) जैफरसन
उत्तर-
(ग) हॉलैण्ड। .

प्रश्न 6.
“अपने कर्तव्य का पालन करो, अधिकार स्वतः तुम्हें प्राप्त हो जाएँगे।” यह किसका कथन |
(क) महात्मा गांधी
(ख) बेनीप्रसाद
(ग) श्रीनिवास शास्त्री
(घ) ग्रीन
उत्तर-
(क) महात्मा गांधी।

प्रश्न 7.
लॉस्की के अधिकार सम्बन्धी विचार उनकी किस कृति में मिलते हैं?
(क) दि ग्रामर ऑफ दि पॉलिटिक्स
(ख) पॉलिटिक्स
(ग) रिपब्लिक
(घ) लॉज
उत्तर-
(क) दि ग्रामर ऑफ दि पॉलिटिक्स। |

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अधिकार किसे कहते हैं?
उत्तर–
अधिकार वह माँग है, जिसे समाज स्वीकार करता है और राज्य क्रियान्वित करता है।

प्रश्न 2.
अधिकारों की एक परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
डॉ० बेनीप्रसाद के अनुसार, “अधिकार वे सामाजिक दशाएँ हैं, जो मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक हैं।”

प्रश्न 3.
अधिकारों के दो भेद बताइए।
उत्तर-
(i)सामाजिक अधिकार,
(ii) राजनीतिक अधिकार।

प्रश्न 4.
दो मूल अधिकारों के नाम लिखिए।
उत्तर-
(i) समानता का अधिकार,
(ii) स्वतन्त्रता का अधिकार।

प्रश्न 5.
अधिकार के किन्हीं दो तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर–
अधिकार के दो तत्त्व निम्नवत् है।
(i) सार्वभौमिकता और
(ii) राज्य का सरंक्षण।

प्रश्न 6.
अधिकारों का कौन-सा सिद्धान्त सर्वाधिक सन्तोषप्रद है?
उत्तर-
अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त सर्वाधिक सन्तोषप्रद है।

प्रश्न 7.
दो मानवाधिकारों को लिखिए।
उत्तर-
(i) स्वतन्त्रता का अधिकार
(ii) समानता का अधिकार।

प्रश्न 8.
नागरिक का एक राजनीतिक अधिकार बताइए।
उत्तर–
नागरिक का एक राजनीतिक अधिकार है-मतदान का अधिकार।

प्रश्न 9.
कानूनी अधिकार कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर-
कानूनी अधिकार दो प्रकार के होते है।
(i) सामाजिक अधिकार तथा
(ii) राजनीतिक अधिकार।

प्रश्न 10.
कानूनी अधिकार के सिद्धान्त के दो समर्थकों के नाम लिखिए।
उत्तर-
(i) बेन्थम,
(ii) ऑस्टिन।

प्रश्न 11.
लॉक द्वारा बताए गए किन्हीं दो प्राकृतिक अधिकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
(i) स्वतन्त्रता का अधिकार,
(ii) सम्पत्ति का अधिकार।

प्रश्न 12.
विदेशियों को राज्य में प्राप्त होने वाले कोई दो अधिकार लिखिए।
उत्तर-
(i) जीवन रक्षा का अधिकार,
(ii) पारिवारिक जीवन व्यतीत करने का अधिकार।

प्रश्न 13.
नागरिक के दो प्राकृतिक अधिकार बताइए।
उत्तर-
(i) जीवन का अधिकार,
(ii) सम्पत्ति का अधिकार।

प्रश्न 14.
अधिकारों के समाज कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्तों का समर्थन किस विचारक ने किया है?
उत्तर–
अधिकारों के समाज कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्तों का समर्थन लॉस्की ने किया है।

प्रश्न 15.
अधिकारों के आदर्शवादी सिद्धान्त के समर्थक किन्हीं दो विचारकों के नाम बताइए।
उत्तर-
थॉमस हिल ग्रीन एवं बोसांके।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किन्हीं चार महत्त्वपूर्ण सामाजिक अधिकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर–
व्यक्ति के चार महत्त्वपूर्ण सामाजिक अधिकार निम्नलिखित हैं

  1.  जीवन-सुरक्षा का अधिकार- प्रत्येक मनुष्य को जीवन का अधिकार है। यह अधिकार | मौलिक तथा आधारभूत है, क्योंकि इसके अभाव में अन्य अधिकारों का अस्तित्व महत्त्वहीन है।
  2.  समानता का अधिकार- समानता का तात्पर्य है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यक्ति के रूप में व्यक्ति का समान रूप से सम्मान किया जाए तथा उसे उन्नति के समान अवसर प्रदान किए जाएँ।
  3.  स्वतन्त्रता का अधिकार- स्वतन्त्रता का अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में अपरिहार्य है। स्वतन्त्रता के अधिकार के आधार पर व्यक्ति अपनी इच्छा से बिना किसी बाह्य बन्धन के अपने जीवन के विकास का ढंग निर्धारित कर सकता है।
  4.  सम्पत्ति का अधिकार- समाज में व्यक्ति वैध तरीकों से सम्पत्ति का अर्जन करता है। अत: उसे यह अधिकार होना चाहिए कि वह स्वतन्त्र रूप से अर्जित किए हुए धने का उपयोग स्वेच्छा से अपने व्यक्तित्व विकास के लिए कर सके।

प्रश्न 2.
अधिकारों के महत्त्व की संक्षिप्त विवेचना कीजिए।
उत्तर–
अधिकारों का महत्त्व निम्नलिखित दृष्टियों से है

  1.  व्यक्तित्व के विकास के लिए अधिकार बहुत ही आवश्यक हैं।
  2.  अधिकार समाज और राष्ट्र की उन्नति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  3.  अधिकार प्रजातन्त्र का आधार हैं। प्रो० बार्कर के अनुसार, “व्यक्ति के अधिकारों के स्पष्ट दर्शन से ही स्वतन्त्रता का विचार एक वास्तविक अर्थ प्राप्त करता है। उसके अभाव में स्वतन्त्रता एक खोखली या निरर्थक एवं व्यक्तिवाद एक काल्पनिक वस्तु रह जाता है।”
  4.  अधिकार सुदृढ़ एवं कल्याणकारी राज्य की स्थापना में सहायक हैं।
  5.  सच्चे अर्थों में किसी नागरिक से अधिकारों के अभाव में आदर्शवादिता की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

प्रश्न 3.
अधिकारों के अस्तित्व के लिए समाज की स्वीकृति आवश्यक है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
उत्तर-
यह बात सर्वमान्य है कि व्यक्ति अपने अधिकारों का प्रयोग सामाजिक पृष्ठभूमि में करता है। अधिकारों की अवधारणा के मूल में यह बात स्पष्टयता परिलक्षित होती है कि व्यक्ति अधिकारों का प्रयोग अपने हित में करने के साथ-साथ सामाजिक हितों में भी करे। जब तक कोई अधिकार समाज द्वारा स्वीकृत नहीं है, तब तक वह अस्तित्वहीन ही रहता है; उदाहरणार्थ-नागरिक को अपनी इच्छानुसार जीवन-यापन करने का अधिकार दिया गया है, लेकिन साथ-ही-साथ उसका यह कर्तव्य भी बन जाता है कि उसकी यह स्वेच्छा सामाजिक एवं नैतिक मानदण्डों को पूरा करती है कि नहीं। यदि आपके अधिकार सामाजिक व नैतिक मर्यादा का उल्लंघन करते हैं, तो इन्हें सामाजिक स्वीकृति नहीं दी जा सकती। इस पर अधिकारों के अस्तित्व के लिए समाज की स्वीकृति आवश्यक है। समाज कभी भी व्यक्ति के जुआ खेलने, मद्यपान करने, वेश्यावृत्ति करने तथा दूसरे का अहित करने के अधिकार को मान्यता प्रदान नहीं करता है। समाज केवल उन्हीं अधिकारों को स्वीकृति प्रदान करता है जो समाज में सहयोग, भाई-चारे तथा सामंजस्य की भावना को सुदृढ़ करते हैं।

प्रश्न 4.
मानव गरिमा पर काण्ट के क्या विचार थे?
उत्तर–
अन्य प्राणियों से अलग मनुष्य की एक गरिमा होती है। इस कारण वे अपने आप में बहुमूल्य हैं। 18वीं सदी के जर्मन दार्शनिक इमैनुएल काण्ट के लिए इस साधारण विचार का गहन अर्थ था। • उनके लिए इसका आशये था कि प्रत्येक मनुष्य की गरिमा है और मनुष्य होने के नाते उसके साथ इसी के अनुकूल व्यवहार किया जाना चाहिए। मनुष्य अशिक्षित हो सकता है, गरीब या शक्तिहीन हो सकता है। वह बेईमान अथवा अनैतिक भी हो सकता है फिर भी वह एक मनुष्य है और न्यूनतम ही सही, प्रतिष्ठा पाने का अधिकारी है। काण्ट के लिए लोगों के साथ गरिमामय बरताव करने का अर्थ था उनके साथ नैतिकता से पेश आना। यह विचार उन लोगों के लिए एक सम्बल था जो लोग सामाजिक ऊँच-नीच के विरुद्ध मानवाधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किन्हीं चार राजनीतिक अधिकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
नागरिकों के चार प्रमुख राजनीतिक अधिकार निम्नलिखित हैं

  1.  मतदान का अधिकार- लोकतान्त्रिक शासन-व्यवस्था में नागरिकों को प्रदत्त मतदान का अधिकार अन्य अधिकारों में सबसे महत्त्वपूर्ण है। इस अधिकार द्वारा नागरिक अपने प्रतिनिधियों को निर्वाचित करके विधायिकाओं में भेजते हैं।
  2.  निर्वाचित होने का अधिकार– प्रत्येक नागरिक को निर्वाचित होने का अधिकार प्राप्त होता है। जब तक नागरिकों को यह अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता है तब तक वे शासन-संचालन में भाग नहीं ले सकते हैं। इस अधिकार की प्राप्ति की लिंग, जाति, सम्प्रदाय, धर्म आदि का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।
  3.  सार्वजनिक पद ग्रहण करने का अधिकार-  प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यता, क्षमता तथा अनुभव के आधार पर सरकारी पद प्राप्त करने का समान अवसर एवं अधिकार होना चाहिए। इसमें किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं करना चाहिए।
  4.  प्रार्थना-पत्र देने का अधिकार- इस अधिकार के आधार पर नागरिक असुविधा, कष्ट अथवा असामान्य परिस्थितियों में प्रार्थना-पत्र द्वारा राज्य का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर आकृष्ट कर सकते हैं।

प्रश्न 2.
मौलिक अधिकार क्या हैं? मौलिक अधिकारों का महत्त्व लिखिए।
उत्तर–
वे अधिकार, जो मानव-जीवन के लिए मौलिक तथा आवश्यक हैं तथा जिन्हें संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किया जाता हैं तथा संविधान में प्रदत्त प्रावधानों के अन्तर्गत इनकी सुरक्षा की भी व्यवस्था होती है, ‘मौलिक अधिकार’ कहलाते हैं।

मौलिक अधिकारों का महत्त्व

  1.  मौलिक अधिकार प्रजातन्त्र के आधार स्तम्भ हैं। ये व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक तथा नागरिक जीवन के प्रभावात्मक उपयोग के एकमात्र साधन हैं। मौलिक अधिकारों द्वारा उन आधारभूत स्वतन्त्रताओं तथा स्थितियों की व्यवस्था की जाती है जिसके अभाव में व्यक्ति उचित रूप से अपना जीवनयापन नहीं कर सकता है।
  2.  मौलिक अधिकार किसी व्यक्ति विशेष, वर्ग अथवा दल की तानाशाही को रोकने का प्रमुख साधन हैं। मौलिक अधिकार सरकार एवं बहुमत के अत्याचारों से व्यक्ति की, विशेष रूप से अल्पसंख्यकों की रक्षा करते हैं।
  3.  मौलिक अधिकार व्यक्ति की स्वतन्त्रता तथा सामाजिक नियन्त्रण के मध्य उचित सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करते हैं।
  4.  मौलिक अधिकार नागरिकों को न्याय तथा उचित व्यवहार की सुरक्षा प्रदान करते हैं। ये राज्य के बढ़ते हुए हस्तक्षेप तथा व्यक्ति की स्वतन्त्रता के मध्य उचित सन्तुलन स्थापित करते हैं।

प्रश्न 3.
राजनीतिक अधिकारों से क्या तात्पर्य है? प्रमुख राजनीतिक अधिकार कौन-से हैं?
उत्तर-
राजनीतिक अधिकार
डॉ० बेनीप्रसाद के अनुसार, “राजनीतिक अधिकारों का तात्पर्य उन व्यवस्थाओं से है, जिनमें नागरिकों को शासन कार्य में भाग लेने का अवसर प्राप्त होता है अथवा नागरिक शासन प्रबन्ध को प्रभावित कर सकते हैं।” राजनीतिक अधिकार के अन्तर्गत निम्नलिखित अधिकारों की गणना की जा सकती है|

  1.  मत देने का अधिकार- अपने प्रतिनिधियों के निर्वाचन के अधिकार को ही मताधिकार कहते हैं। यह अधिकार लोकतन्त्रीय शासन प्रणाली के अन्तर्गत प्राप्त होने वाला महत्त्वपूर्ण अधिकार है। और इस अधिकार का प्रयोग करके नागरिक अप्रत्यक्ष रूप से शासन प्रबन्ध में भाग लेते हैं। आधुनिक लोकतान्त्रिक राज्यों में विक्षिप्त, दिवालिये और अपराधियों को छोड़कर अन्य वयस्क नागरिकों को यह अधिकार प्राप्त है। सामान्यतया 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके भारतीय नागरिकों को मताधिकार प्राप्त है।
  2.  निर्वाचित होने का अधिकार- मताधिकार की पूर्णता के लिए प्रत्येक नागरिक को निर्वाचित होने का अधिकार भी प्राप्त होता है। निर्धारित अर्हताओं को पूरा करने पर कोई भी नागरिक किसी भी राजनीतिक संस्था के निर्वाचित होने के लिए चुनाव लड़ सकता है।
  3.  सरकारी पद प्राप्त करने का अधिकार- व्यक्ति का तीसरा राजनीतिक अधिकार सरकारी पद प्राप्त करने का अधिकार है। राज्य की ओर से नागरिकों को योग्यतानुसार उच्च सरकारी पद प्राप्त करने की सुविधा होनी चाहिए। इस अधिकार के अन्तर्गत किसी भी नागरिक को धर्म, वर्ण तथा जाति के आधार पर सरकारी पदों से वंचित नहीं किया जाएगा। डॉ० बेनीप्रसाद के अनुसार, “इस अधिकार का यह अर्थ नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति को सरकारी पद प्राप्त हो। जाएगा, वरन् इसका यह अर्थ है कि उन सभी व्यक्तियों को सरकारी पद की प्राप्ति होगी, जो उस पद को पाने की योग्यता रखते हैं।”
  4.  आवेदन-पत्र देने का अधिकार- प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार भी प्राप्त होना चाहिए कि | वह आवेदन-पत्र देकर सरकार का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर आकर्षित कर सके।
  5.  विदेशों में सुरक्षा का अधिकार- राज्य को चाहिए कि वह अपने उन नागरिकों, जो विदेशों में जाते हैं, की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था करे।

प्रश्न 4.
अधिकारों के तत्त्व अथवा लक्षणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
अधिकार के तत्त्व अथवा लक्षण
अधिकार के अनिवार्य तत्त्वों, लक्षणों अथवा विशेषताओं का वर्णन निम्नलिखित हैं

  1.  अधिकार समाज द्वारा स्वीकृत होते हैं- अधिकार के लिए समाज की स्वीकृति आवश्यक है। जब किसी माँग को समाज स्वीकार कर लेता है, तब वह अधिकार बन जाती है। प्रो० आशीर्वादी लाल के अनुसार, “प्रत्येक अधिकार के लिए समाज की स्वीकृति अनिवार्य होती है। ऐसी स्वीकृति के अभाव में अधिकार केवल कोरे दावे रह जाते हैं।”
  2.  सार्वभौमिक– अधिकार सार्वभौमिक होते हैं अर्थात् अधिकार समाज के सभी व्यक्तियों को समान रूप से प्रदान किए जाते हैं। अधिकारों की सार्वभौमिकता ही कर्तव्यों को जन्म देती है।
  3.  राज्य का संरक्षण- अधिकारों को राज्य का संरक्षण मिलना भी अनिवार्य है। राज्य के संरक्षण में ही व्यक्ति अपने अधिकारों का समुचित उपभोग कर सकता है। बार्कर के शब्दों में, “मानव चेतना स्वतन्त्रता चाहती है, स्वतन्त्रता में अधिकार निहित हैं तथा अधिकार राज्य की माँग करते हैं।”
  4.  अधिकारों में सामाजिक हित की भावना निहित होती है— अधिकारों में व्यक्तिगत स्वार्थ के साथ-साथ सार्वजनिक हित की भावना भी विद्यमान होती है।
  5.  कल्याणकारी स्वरूप- अधिकारों का सम्बन्ध मुख्यतः व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास से होता है। इस कारण अधिकार के रूप में केवल वे ही स्वतन्त्रताएँ और सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं, जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास हेतु आवश्यक होती हैं। इस प्रकार अधिकारों का स्वरूप कल्याणकारी होता है।
  6. समाज की स्वीकृति- अधिकार उन कार्यों की स्वतन्त्रता का बोध कराता है जो व्यक्ति तथा समाज दोनों के लिए उपयोगी होते हैं। समाज की स्वीकृति का यह अभिप्राय है कि व्यक्ति अपने अधिकारों का प्रयोग समाज के अहित में नहीं कर सकता।

प्रश्न 5.
राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने के अधिकार को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
राज्य के विरुद्ध विद्रोह का अधिकार
राज्य के प्रति निष्ठा एवं भक्ति रखना और राज्य की आज्ञाओं का पालन करना व्यक्ति का कानूनी दायित्व होता है। अतः व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह का कानूनी अधिकार तो प्राप्त हो ही नहीं सकता, परन्तु व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह का नैतिक अधिकार अवश्य प्राप्त होता है। शासन के अस्तित्व का उद्देश्य सामान्य जनता का हित सम्पादित करना होता है। जब शासन जनता के हित में कार्य न करे, तब व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह का केवल नैतिक अधिकार ही प्राप्त नहीं है, वरन् । यह उसका नैतिक कर्त्तव्य भी है। इस सम्बन्ध में सुकरात का मत था कि यदि व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने का अधिकार है तो राज्य द्वारा प्रदान किए गए दण्ड को भी स्वीकार करना उसका कर्तव्य है। व्यक्तिवादी तथा अराजकतावादी विचारकों ने व्यक्ति द्वारा राज्य का विरोध करने के अधिकार का समर्थन किया है। गांधी जी के अनुसार, “व्यक्ति का सर्वोच्च कर्तव्य अपनी अन्तरात्मा के प्रति होता है।” अत: अन्तरात्मा की आवाज पर राज्य का विरोध भी किया जा सकता है। राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने के सम्बन्ध में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इस अधिकार का प्रयोग राज्य एवं समाज के हित से सम्बन्धित सभी बातों पर विचार करके तथा विशेष परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। लोकतान्त्रिक राज्यों में नागरिकों को शासन की आलोचना करने एवं अपना दल बनाने का भी अधिकार होता है। लोकतान्त्रिक देशों में राज्य के प्रति विरोध का अधिकार जनता की इस भावना से परिलक्षित होता है कि वह राज्य के प्रति अपना दायित्व निष्ठापूर्वक न निभा रहे प्रतिनिधियों को आगे सत्ती का अवसर प्रदान नहीं करती।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अधिकार की परिभाषा देते हुए उसका वर्गीकरण कीजिए।
या
अधिकार से क्या तात्पर्य है? अधिकार के प्रकार लिखिए।
उत्तर-
अधिकार मुख्यतया हकदारी अथवा ऐसा दावा है जिसका औचित्य सिद्ध हो। अधिकार की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं
ऑस्टिन के अनुसार, “अधिकार व्यक्ति की वह क्षमता है, जिसके द्वारा वह अन्य व्यक्ति अथवा व्यक्तियों से कुछ विशेष प्रकार के कार्य करा लेता है।”
ग्रीन के अनुसार, “अधिकार मानव-जीवन की वे शक्तियाँ हैं, जो नैतिक प्राणी होने के नाते व्यक्ति को अपना कार्य पूरा करने के लिए आवश्यक हैं।”
बोसांके के अनुसार, “अधिकार वह माँग है, जिसे समाज स्वीकार करता है और राज्य क्रियान्वित करता है।”
हॉलैण्ड के अनुसार, “अधिकार किसी व्यक्ति की वह क्षमता है, जिससे वह अपने बल पर नहीं, अपितु समाज के बल से दूसरों के कार्यों को प्रभावित कर सकता है।”
प्रो० लॉस्की के अनुसार, “अधिकार सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं, जिनके अभाव में सामान्यतः कोई व्यक्ति अपने उच्चतम स्वरूप को प्राप्त नहीं कर सकता।”
गार्नर के अनुसार, “नैतिक प्राणी होने के नाते मनुष्य के व्यवसाय की पूर्ति के लिए आवश्यक शक्तियों को अधिकार कहा जाता है।”
श्रीनिवास शास्त्री के अनुसार, “अधिकार समुदाय के कानून द्वारा स्वीकृत वह व्यवस्था, नियम या रीति है, जो नागरिक के सर्वोच्च नैतिक कल्याण में सहायक हो।”
डॉ० बेनीप्रसाद के अनुसार, “अधिकार वे सामाजिक दशाएँ हैं, जो मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक हैं।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि-

  1.  अधिकार सामाजिक दशाएँ हैं।
  2.  अधिकार व्यक्ति के विकास के लिए आवश्यक तत्त्व हैं।
  3.  अधिकारों द्वारा ही व्यक्तिगत और सामाजिक प्रगति सम्भव है।
  4.  अधिकारों को समाज स्वीकार करता है और राज्य लागू करता है।

अधिकारों का वर्गीकरण (रूप अथवा प्रकार)

साधारण रूप से अधिकारों को निम्नलिखित रूपों अथवा प्रकारों के अन्तर्गत वर्गीकृत किया गया है

  1.  प्राकृतिक अधिकार- प्राकृतिक अधिकार वे अधिकार हैं, जो प्राकृतिक अवस्था में मनुष्यों को प्राप्त थे। परन्तु ग्रीन ने प्राकृतिक अधिकारों को आदर्श अधिकारों के रूप में माना है। उसके | अनुसार, ये वे अधिकार हैं, जो व्यक्ति के नैतिक विकास के लिए आवश्यक हैं और जिनकी प्राप्ति समाज में ही सम्भव है।
  2.  नैतिक अधिकार- ये वे अधिकार हैं, जिनका सम्बन्ध मानव के नैतिक आचरण से होता है। इनका स्वरूप अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्य-पालन में अधिक निहित होता है।
  3.  कानूनी अधिकार- कानूनी अधिकार वे हैं, जिनकी व्यवस्था राज्य द्वारा की जाती है और जिनका उल्लंघन कानून द्वारा दण्डनीय होता है। लीकॉक के अनुसार, “कानूनी अधिकार के विशेषाधिकार हैं, जो एक नागरिक को अन्य नागरिकों के विरुद्ध प्राप्त होते हैं तथा जो राज्य की सर्वोच्च शक्ति द्वारा प्रदान किए जाते हैं और (उसी के द्वारा) रक्षित होते हैं।”

कानूनी अधिकार दो प्रकार के लेते हैं
(i) सामाजिक या नागरिक अधिकार (social or Civil Rights) तथा
(ii) राजनीतिक अधिकार (Political Rights)।

प्रश्न 2.
सामाजिक या नागरिक अधिकारों को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
सामाजिक या नागरिक अधिकार
सामाजिक या नागरिक अधिकार राज्य के प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के प्राप्त होते हैं। मुख्य सामाजिक अधिकार निम्नलिखित हैं

  1.  जीवन-रक्षा का अधिकार- प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन की सुरक्षा चाहता है। यदि व्यक्ति को जीने का अधिकार प्राप्त न हो या उसके जीवन की सुरक्षा न हो, तो उस दशा में उसका सामाजिक जीवन कष्टदायी हो जाएगा। वह प्रत्येक क्षण अपने जीवन की सुरक्षा के लिए चिन्तित रहेगा और समाज के किसी भी कार्य में अपना योगदान नहीं कर सकेगा। भारत के परिप्रेक्ष्य में इस अधिकार को मौलिक अधिकारों (अनु० 21) के अन्तर्गत विशेष महत्त्व की स्थिति प्रदान की गई है।
  2.  सम्पत्ति का अधिकार- सम्पत्ति व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति का एक प्रमुख साधन है, . | इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार उसका उपभोग करने का अधिकार प्राप्त होना। चाहिए। इस अधिकार के अन्तर्गत व्यक्ति को सम्पत्ति अर्जित करने, खरीदने, बेचने और उसका उपभोग करने का अधिकार है। यूनानी विचारक अरस्तू का मत था कि सम्पत्ति व्यक्ति के लिए उतनी ही आवश्यक है, जितनी कि परिवार या कुटुम्ब की आवश्यकता। इसके विपरीत कुछ विद्वानों का मत है कि सम्पत्ति ही सब कष्टों की जननी है। उनके अनुसार सम्पत्ति पूँजीवादी व्यवस्था को जन्म देती है और समाज में वर्ग-संघर्ष उत्पन्न करती है। अत: समाज में सम्पत्ति का न्यायपूर्ण वितरण होना आवश्यक है। सम्भवतः इसी दृष्टिकोण को देखते हुए भारत के संविधान में सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की श्रेणी से पृथक् कर दिया गया है।
  3.  शिक्षा का अधिकार- शिक्षा मानवे व्यक्तित्व के विकास की आधारशिला है। समाज और राष्ट्र का विकास शिक्षित व्यक्तियों पर ही आधारित है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए।
  4.  धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार- मनुष्य की आध्यात्मिक प्रगति के लिए धर्म जीवन का एक अनिवार्य तत्त्व है। प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी धर्म का अनुयायी होता है। अतः राज्य को धर्मनिरपेक्ष रहकर प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार प्रदान करना चाहिए। जैसा कि रूसो को कथन है, “जब तक उनके सिद्धान्त नागरिकता के कर्तव्यों के प्रतिकूल न हों, व्यक्ति को उन सभी धर्मों के प्रति सहिष्णु होना चाहिए, जो दूसरों के प्रति सहिष्णु है।”
  5.  लेखन एवं विचाराभिव्यक्ति को अधिकार- राज्य को चाहिए कि वह प्रत्येक व्यक्ति को लेखन, भाषण और विचाराभिव्यक्ति का अधिकार प्रदान करे। इस अधिकार द्वारा व्यक्ति का मानसिक विकास सम्भव होता है, लेकिन मनुष्य को यह अधिकार कानून की सीमा के अन्तर्गत ही प्रदान किया जाना चाहिए।
  6.  सभा करने व संगठन बनाने का अधिकार- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह एकाकी जीवन व्यतीत नहीं कर सकता है; अतः उसे सभा करने या समुदाय बनाने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए। लेकिन इस अधिकार का उपभोग राज्य के कानूनों की सीमा के अन्तर्गत ही होना चाहिए।
  7.  आवागमन का अधिकार- इस अधिकार के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को राज्य की सीमा के अन्तर्गत स्वतन्त्रतापूर्वक ऐक स्थान से दूसरे स्थान को जाने की सुविधा प्राप्त होनी चाहिए। गिलक्राइस्ट के अनुसार, स्वतन्त्रतापूर्वक घूमने के अधिकार के अभाव में जीवन का कोई भी अर्थ नहीं है।
  8.  पारिवारिक जीवन व्यतीत करने का अधिकार- परिवार सामाजिक जीवन की आधारशिला है; अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार पारिवारिक जीवन व्यतीत करने को अधिकार भी प्राप्त होना चाहिए। परन्तु इस अधिकार का यह अर्थ कदापि नहीं है। कि परिवार समाज की नैतिक सीमाओं का उल्लंघन करे और परिवार के सदस्यों को दुराचार की शिक्षा दे। ऐसी स्थिति में किसी व्यक्ति के पारिवारिक जीवन में भी राज्य द्वारा हस्तक्षेप किया जा सकता है।
  9.  मनोरंजन का अधिकार- प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक श्रम करने के उपरान्त मनोरंजन की आवश्यकता होती है। अत: व्यक्ति को अवकाश के समय मनोरंजन का अधिकार भी प्राप्त होना चाहिए।
  10.  सांस्कृतिक अधिकार- इस अधिकार के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त है कि वह अपनी भाषा एवं साहित्य को अध्ययन व विकास कर सके। अल्पसंख्यकों के लिए यह अधिकार बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।
  11.  व्यवसाय की स्वतन्त्रता का अधिकार- व्यवसाय की स्वतन्त्रता का अभिप्राय है कि प्रत्येक व्यक्ति को इस बात की स्वतन्त्रता हो कि वह अपनी इच्छा तथा योग्यतानुसार व्यवसाय का चयन कर सके।

प्रश्न 3.
अधिकारों से सम्बन्धित प्राकृतिक सिद्धान्त और वैधानिक सिद्धान्त के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
अधिकारों को प्राकृतिक सिद्धान्त
हॉब्स, लॉक तथा रूसो आदि विद्वानों ने अधिकारों के प्राकृतिक सिद्धान्त का समर्थन किया है। यह सिद्धान्त अति प्राचीन है। इसके अनुसार अधिकार प्रकृति-प्रदत्त हैं और वे व्यक्ति को जन्म के साथ ही प्राप्त हो जाते हैं। व्यक्ति प्राकृतिक अधिकारों का प्रयोग राज्य के उदय के पूर्व से ही करता आ रहा है। राज्य इन अधिकारों को न तो छीन सकता है और न ही वह इनका जन्मदाता है। टॉमस पेन के अनुसार, “प्राकृतिक अधिकार वे अधिकार हैं, जो मनुष्य के अस्तित्व को स्थायित्व प्रदान करने के लिए आवश्यक हैं।” इस दृष्टिकोण से अधिकार असीमित, निरपेक्ष तथा स्वयंसिद्ध हैं। राज्य इन अधिकारों में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
आलोचना- इस सिद्धान्त में कतिपय दोष निम्नलिखित हैं-

  1.  यह सिद्धान्त अनैतिहासिक है, क्योंकि जिस प्राकृतिक व्यवस्था के अन्तर्गत इन अधिकारों के प्राप्त होने का उल्लेख किया गया है, वह काल्पनिक है।
  2.  ग्रीन का मत है कि समाज से प्रथक् कोई भी अधिकार सम्भव नहीं है।
  3.  यह सिद्धान्त राज्य को कृत्रिम संस्था मानता है, जो अनुचित है।
  4.  प्राकृतिक अधिकारों में परस्पर विरोधाभास पाया जाता है।
  5.  यह सिद्धान्त कर्तव्यों के प्रति मौन है, जबकि कर्त्तव्य के अभाव में अधिकारों का अस्तित्व सम्भव नहीं है।

अधिकारों का कानूनी या वैधानिक सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के प्रवर्तक बेन्थम, हॉलैण्ड ऑस्टिन आदि विचारक हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकार राज्य की इच्छा का परिणाम है और राज्य ही अधिकारों का जन्मदाता है। यह सिद्धान्त प्राकृतिक सिद्धान्त के विपरीत है। व्यक्ति राज्य के सरंक्षण में रहकर ही अधिकारों का प्रयोग कर सकता है। राज्य ही कानून द्वारा ऐसी परिस्थितियों को उत्पन्न करता है, जहाँ कि व्यक्ति अपने अधिकारों का स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग कर सके। राज्य ही अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है। यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि अधिकारों का अस्तित्व केवल राज्य के अन्तर्गत ही सम्भव है।
आलोचना—इस सिद्धान्त में कतिपय दोष निम्नलिखित हैं-

  1.  इस सिद्धान्त से राज्य की निरंकुशता का समर्थन होता है।
  2.  राज्य नैतिक बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
  3.  अधिकारों में स्थायित्व नहीं रहता है।

प्रश्न 4.
अधिकारों के ऐतिहासिक और समाज कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्तों को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
अधिकारों का ऐतिहासिक सिद्धान्त
इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकारों की उत्पत्ति प्राचीन रीति-रिवाजों के परिणामस्वरूप होती है। जिन रीति-रिवाजों को समाज स्वीकृति दे देता है, वे अधिकार का रूप धारण कर लेते हैं। इस सिद्धान्त के समर्थकों के अनुसार, अधिकार परम्परागत हैं तथा सतत् विकास के परिणाम हैं। इसके अतिरिक्त इनका आधार ऐतिहासिक है। इंग्लैण्ड के संवैधानिक इतिहास में परम्परागत अधिकारों का बहुत अधिक महत्त्व रहा है।
आलोचना- इस सिद्धान्त के आलोचकों का मत है कि अधिकारों का आधार केवल रीति-रिवाज तथा परम्पराएँ नहीं हो सकतीं, क्योंकि कुछ परम्पराएँ तथा रीति-रिवाज समाज के कल्याण में बाधक होते हैं। अत: इस दृष्टि से यह सिद्धान्त तर्कसंगत नहीं है।

अधिकारों का समाज-कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्त
जे०एस० मिल, जेरमी बेन्थम, पाउण्ड तथा लॉस्की आदि ने इस सिद्धान्त का समर्थन किया है। इस सिद्धान्त का प्रमुख लक्ष्य उपयोगिता या समाज-कल्याण है। प्रो० लॉस्की के अनुसार, “अधिकारों का औचित्य उनकी उपयोगिता के आधार पर आँकना चाहिए। इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकार वे साधन हैं, जिनसे समाज का कल्याण होता है। लॉस्की का मत है, “लोक-कल्याण के विरुद्ध मेरे अधिकार नहीं हो सकते; क्योंकि ऐसा करना मुझे उस कल्याण के विरुद्ध अधिकार प्रदान करता है। जिसमें मेरा कल्याण घनिष्ठ तथा अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।”
इस सिद्धान्त की निम्नलिखित मान्यताएँ हैं

  1.  अधिकार समाज की देन हैं, प्रकृति की नहीं।
  2.  अधिकारों का अस्तित्व समाज-कल्याण पर आधारित है।
  3.  व्यक्ति केवल उन्हीं अधिकारों का प्रयोग का सकता है, जो समाज के हित में हों।
  4.  कानून, रीति-रिवाज तथा अधिकार सभी का उद्देश्य समाज-कल्याण है।
    आलोचना- यह सिद्धान्त तर्कसंगत और उपयोगी तो है, किन्तु इसका सबसे बड़ा दोष यह है कि यह सिद्धान्त समाज-कल्याण की ओट में राज्य को व्यक्तियों की स्वतन्त्रता का अपहरण करने का अवसर प्रदान करती है, लेकिन समीक्षात्मक दृष्टि से यह दोष महत्त्वहीन है।

प्रश्न 5.
अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त क्या है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त
इसे सिद्धान्त की मान्यता है कि अधिकार वे बाह्य साधन तथा दशाएँ हैं, जो व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक होती हैं। इस सिद्धान्त का समर्थन थॉमस हिल ग्रीन, बैडले, बोसांके आदि विचारक ने किया है।
इस सिद्धान्त की अग्रलिखित मान्यताएँ हैं

  1. अधिकार व्यक्ति की माँग है।
  2.  यह माँग समाज द्वारा स्वीकृत होती है।
  3.  अधिकारों का स्वरूप नैतिक होता है।
  4.  अधिकारों का उद्देश्य समाज का वास्तविक हित है।
  5.  अधिकार व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक साधन हैं।

आलोचना- इस सिद्धान्त के कतिपय दोष निम्नलिखित हैं

  1.  यह सिद्धान्त व्यावहारिक नहीं है; क्योंकि व्यक्तित्व का विकासे व्यक्तिगत पहलू है तथा राज्य एवं समाज जैसी संस्थाओं के लिए यह जानना बहुत कठिन है कि किसके विकास के लिए क्या आवश्यक है।
  2.  यह व्यक्ति के हितों पर अधिक बल देता है तथा समाज का स्थान गौण रखता है। अतः व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए समाज के हितों के विरुद्ध कार्य कर सकता है।
  3.  मानव-जीवन के विकास की आवश्यक परिस्थितियाँ कौन-सी हैं, इनका निर्णय कौन करेगा तथा ये किस-किस प्रकार उपलब्ध होंगी-इन बातों का स्पष्टीकरण नहीं होता है। अतः इस सिद्धान्त की आधारशिला ही अवैज्ञानिक है।
    निष्कर्ष- अध्ययनोपरान्त हम कह सकते हैं कि अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त ही सर्वोपयुक्त है, क्योंकि यह इस अवधारणा पर आधारित है कि अधिकारों की उत्पत्ति व्यक्ति के व्यक्तित्व | के सर्वांगीण विकास के लिए है। राज्य तथा समाज तो केवल व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा तथा व्यवस्था करने के साधन मात्र हैं। व्यक्ति समाज के कल्याण में ही अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकता है।

प्रश्न 6.
मानवाधिकार क्या है? मानवाधिकार प्राप्ति की दिशा में क्या कार्य हो रहे हैं?
उत्तर-
विगत कुछ वर्षों से प्राकृतिक अधिकार शब्द से अधिक मानवाधिकार शब्द का प्रयोग हो रहा है। मानवाधिकारों के पीछे मूल मान्यता यह है कि सभी लोग मनुष्य होने मात्र से कुछ चीजों को पाने के अधिकारी हैं। एक मानव के रूप में प्रत्येक व्यक्ति विशिष्ट और समान महत्त्व का है। इसका अर्थ यह है कि आन्तरिक दृष्टि से सभी समान हैं। सभी एक आन्तरिक मूल्य से सम्पन्न होते हैं और उन्हें स्वतन्त्र रहने तथा अपनी पूरी सम्भावना को साकार करने का अवसर मिलना चाहिए। इस विचार का प्रयोग नस्ल, जाति, धर्म और लिंग पर आधारित वर्तमान असमानताओं को चुनौती देने के लिए किया जाता रहा है।
अधिकारों की इसी समझदारी पर मानव अधिकार सम्बन्धी संयुक्त राष्ट्र घोषणा-पत्र बना है। यह उन दावों को मान्यता देने का प्रयास करता है, जिन्हें विश्व समुदाय सामूहिक रूप से गरिमा और आत्म-सम्मान परिपूर्ण जीवन जीने के लिए आवश्यक मानता है।

सम्पूर्ण विश्व के उत्पीड़ित जन सार्वभौम मानवाधिकार की अवधारणा का प्रयोग उन कानूनों को चुनौती देने के लिए कर रहे हैं, जो उन्हें पृथक् करने वाले और समान अवसरों तथा अधिकारों से वंचित करते हैं। वे मानवता की अवधारणा की पुनर्व्याख्या के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिससे वे स्वयं को इसमें सम्मिलित कर सकें।

कुछ संघर्ष सफल भी हुए हैं, जैसे दास प्रथा का उन्मूलन हुआ। लेकिन कुछ अन्य संघर्षों में अभी तक सीमित सफलता ही प्राप्त हो सकी है। लेकिन आज भी अनेक ऐसे समुदाय हैं, जो मानवता को इस प्रकार परिभाषित करने के संघर्ष में लगे हैं जो उन्हें भी सम्मिलित करे।
विविध समाजों में जैसे-जैसे नए खतरे और चुनौतियाँ उभरती आई हैं, वैसे-वैसे ही उन मानवाधिकारों की सूची निरन्तर बढ़ती गई है जिनका लोगों ने दावा किया है। उदाहरणार्थ, हम आज प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा की आवश्यकता के प्रति बहुत सचेत हैं और इसने स्वच्छ हवा, शुद्ध जल, सुदृढ़ विकास जैसे अधिकारों की माँगें पैदा की हैं। यद्ध अथवा प्राकृतिक संकट के समय अनेक लोग विशेषकर महिलाएँ, बच्चे या बीमार जिन परिवर्तनों का सामना करते हैं उनके विषय में नई जागरूकता ने आजीविका के अधिकार, बच्चों के अधिकार और ऐसे अन्य अधिकारों की माँग भी पैदा की है। ऐसे दावे मानव गरिमा के अतिक्रमण के प्रति नैतिक आक्रोश का भाव प्रकट करते हैं और वे समस्त मानव समुदाय के लिए अधिकारों के प्रयोग और विस्तार के लिए एकजुट होने का आह्वान करते हैं।

प्रश्न 7.
अधिकार जनसाधारण पर क्या जिम्मेदारियाँ डालते हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
अधिकार न केवल राज्य पर यह जिम्मेदारी डालते हैं कि वह विशिष्ट प्रकार से काम करे बल्कि जनसाधारण पर भी जिम्मेदारी डालते हैं। उदाहरण के लिए, टिकाऊ विकास का मामला लें। हमारे अधिकार हमें याद दिलाते हैं कि इसके लिए न केवल राज्य को कुछ कदम उठाने हैं, बल्कि हमें भी इस दिशा में प्रयास करने हैं। अधिकार हमें बाध्य करते हैं कि हम अपनी निजी आवश्यकताओं और हितों के विषय में ही न सोचें, वरन कुछ ऐसी चीजों की भी रक्षा करें, जो हम सबके लिए लाभदायक हैं। ओजोन परत की रक्षा करना, वायु और जल प्रदूषण कम-से-कम करना, नए वृक्ष लगाकर और जंगलों की कटाई रोककर हरियाली बनाए रखना, पारिस्थितिकीय सन्तुलन बनाए रखना आदि ऐसी चीजें हैं, जो हम सबके लिए अनिवार्य हैं। ये जनसाधारण के लाभ की बातें हैं, जिनका पालने हमें अपनी और भावी पीढ़ियों की रक्षा के लिए भी अवश्य करना चाहिए। आने वाली पीढ़ियों को भी । सुरक्षित और स्वच्छ दुनिया प्राप्त करने का अधिकार है, इसके बिना वे बेहतर जीवन नहीं जी सकतीं।

अधिकार यह भी जिम्मेदारी डालते हैं कि हम अन्य लोगों के अधिकारों का भी सम्मान करें। टकराव की स्थिति में जनसाधारण को अधिकारों को सन्तुलित करना होता है। उदाहरणार्थ, अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार किसी को भी तस्वीर लेने की अनुमति देता है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति अपने घर में नहाते हुए किसी व्यक्ति की उसकी अनुमति के बिना तस्वीर ले ले और उसे इण्टरनेट में डाल दे, तो यह गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन होगा।
नागरिकों को अपने अधिकारों पर लगाए जाने वाले नियन्त्रणों के बारे में भी ध्यान देना होगा। अद्यतन एक विषय जिस पर बहुत अधिक चर्चा हो रही है। यह बढ़ते प्रतिबन्धों से सम्बन्धित है। ये प्रतिबन्ध कई सरकारे राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लोगों की नागरिक स्वतन्त्रताओं पर लगा रही हैं। नागरिकों के अधिकारों और भलाई की रक्षा के लिए आवश्यक मानकर राष्ट्रीय सुरक्षा बनाए रखने का समर्थन किया जा सकता है।

लेकिन किसी बिन्दु पर सुरक्षा के लिए आवश्यक मानकर थोपे गए प्रतिबन्ध अपने-आप में लोगों में अधिकारों के लिए खतरा बन जाएँ तो? क्या आतंकी बमबारी की धमकी का सामना करते राष्ट्र को अपने नागरिकों की आजादी छीन लेने की आज्ञा दी जा सकती है? क्या उसे केवल सन्देह के आधार पर किसी को गिरफ्तार करने की अनुमति मिलनी चाहिए? क्या उसे लोगों की चिट्ठियाँ देखने यो फोन टेप करने की छूट दी जा सकती है? क्या सच कबूल करवाने के लिए उसे यातना देने का सहारा लेने दिया जाना चाहिए? ऐसी स्थितियों में यह सवाल उत्पन्न होता है कि सम्बद्ध व्यक्ति समाज के लिए खतरा तो नहीं पैदा कर रहा? गिरफ्तार लोगों को भी कानूनी सलाह प्राप्त करने का आज्ञा और दण्डाधिकारी या न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। नागरिक स्वतन्त्रता में कटौती करने के प्रश्न पर अत्यन्त सावधान होने की आवश्यकता है क्योंकि इनका आसानी से दुरुपयोग किया जा सकता है। सरकारें निरकुंश हो सकती हैं और वे उन उद्देश्यों की ही जड़ खोद सकती हैं जिनके लिए सरकारें बनती हैं—यानी लोगों के कल्याण की। इसलिए यह मानते हुए भी कि अधिकार कभी सम्पूर्ण-सर्वोच्च नहीं हो सकते, हमें अपने एवं दूसरों के अधिकारों की रक्षा करने में चौकस रहने की आवश्यकता है क्योकि ये लोकतान्त्रिक समाज की बुनियाद का निर्माण करते

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