UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 12
Chapter Name Statistics in Psychology
(मनोविज्ञान में सांख्यिकीय गणना)
Number of Questions Solved 66
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology (मनोविज्ञान में सांख्यिकीय गणना)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सांख्यिकी का अर्थ स्पष्ट कीजिए। सांख्यिकी को परिभाषित कीजिए।
या
सांख्यिकी से आप क्या समझते हैं? इसे परिभाषित करते हुए बताइए कि आप किस परिभाषा को उपयुक्त समझते हैं और क्यों?
या
“सांख्यिकी गणना का विज्ञान है।’ इस कथन की व्याख्या करते हुए समझाइए कि आपकी दृष्टि में सांख्यिकी की सही परिभाषा क्या होनी चाहिए?

उत्तर :

सांख्यिकी का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Statistics)

‘सांख्यिकी अंग्रेजी शब्द ‘स्टैटिस्टिक्स (Statistics) का हिन्दी रूपान्तर है। अंग्रेजी भाषा का स्टैटिस्टिक्स (Statistics) शब्द लैटिन भाषा के ‘स्टेटस (Status), इटैलियन भाषा के ‘स्टैटिस्टा (Statista) या जर्मन भाषा के स्टैटिस्टिक’ (Statistik) शब्द से उत्पन्न हुआ है। इन सभी शब्दों का अर्थ राज्य (State) होता है। इस प्रकार प्रारम्भ में सांख्यिकी का प्रयोग राज्य विज्ञान के रूप में किया जता था। वास्तविक रूप में सांख्यिकी’ शब्द का प्रयोग करने का श्रेय जर्मन विद्वान् गॉटफ्रायड एकेनॉल (Gottfried Achenwall) को जाता है। उन्होंने 1749 ई० में सांख्यिकी को मानव ज्ञान की एक विशिष्ट शाखा के रूप में प्रयोग किया।

सांख्यिकी’ (Statistics) शब्द का दो अर्थों में प्रयोग होता है—एक ‘एकवचन’ में तथा दूसरा ‘बहुवचन’ में। एकवचन के अर्थ में ‘सांख्यिकी’ का प्रयोग एक विज्ञान के रूप में किया जाता है। बहुवचन के अर्थ में ‘सांख्यिकी का प्रयोग आँकड़ों, संख्याओं या समंकों के रूप में लिया जाता है।

अब हम ‘सांख्यिकी’ (Statistics) शब्द की परिभाषा का उपर्युक्त दोनों ही अर्थों में अध्ययन करेंगे।

बहुवचन के रूप में सांख्यिकी का अर्थ एवं परिभाषाएँ

बहुवचन के रूप में ‘साख्यिकी’ शब्द का अर्थ समंकों या आँकड़ों से है जो किसी विशिष्ट क्षेत्र से सम्बन्धित संख्यात्मक तथ्य होते हैं। जनसंख्या, शिक्षा, कृषि, स्त्री-शिक्षा, प्रौढ़-शिक्षा आदि से सम्बन्धित आँकड़े बहुवचन के रूप में होते हैं।

(1) गॉटफ्रायड एकेनवाल के अनुसार, “राज्य से सम्बन्धित ऐतिहासिक और विवरणात्मक महत्त्वपूर्ण तथ्यों का संग्रह ‘समंक’ है।”

(2) डॉ० ए० एल० बाउले के अनुसार, “किसी अनुसन्धान से सम्बन्धित तथ्यों का अंकात्मक विवरण ‘समंक’ होते हैं, जिन्हें एक-दूसरे के सम्बन्ध में रखा जा सकता है।”

(3) होरेस सेक्राइस्ट के अनुसार, “सांख्यिकी से हमारा तात्पर्य तथ्यों के उन समूहों से है जो अनेक कारणों से पर्याप्त सीमा तक प्रभावित होते हैं, जो संख्यात्मक रूप से व्यक्त किये जाते हैं, जिनकी गणना या अनुमान शुद्धता के एक उचित स्तर तक की जाती है तथा जिन्हें किसी पूर्व निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए क्रमबद्ध ढंग से संगृहीत किया जाता है तथा जिन्हें एक-दूसरे से सम्बन्धित करके रखा जाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं में होरेस सेक्राइस्ट की परिभाषा ही सर्वश्रेष्ठ है। इस परिभाषा में समंकों की सभी विशेषताओं पर पूर्ण प्रकाश डाला गया है।

एकवचन अर्थात् विज्ञान के रूप में सांख्यिकी की परिभाषाएँ

एकवचन के रूप में ‘सांख्यिकी’ शब्द का प्रयोग एक विज्ञान की दृष्टि से किया जाता है। सांख्यिकी विज्ञान की परिभाषाओं को तीन भागों में विभक्त किया गया है –

(क) संकुचित परिभाषाएँ

प्रारम्भ में सांख्यिकी को एक राज्य-विषय के रूप में जाना जाता था; अतः प्राचीन परिभाषाएँ सांख्यिकी के केवल कुछ पहलुओं पर प्रकाश डालती है जो कि निम्नलिखित हैं

(1) बॉडिंगटन (Boddington) के अनुसार, “सांख्यिकी अनुमानों और सम्भावनाओं का विज्ञान है।” बॉडिंगटन की परिभाषा में सांख्यिकी के क्षेत्र को संकुचित कर दिया गया है। इन्होंने इसे केवल विज्ञान माना है, न कि विज्ञान और कला दोनों।

(2) डॉ० बाउले ने सांख्यिकी की तीन परिभाषाएँ दी हैं –

(i) “सांख्यिकी गणना का विज्ञान है।”
उपर्युक्त परिभाषा में सांख्यिकीय अनुसन्धान की अनेक विधियों में से केवल गणना विधि को महत्त्व दिया गया है, किन्तु केवल गणना ही सांख्यिकीय नहीं है। विशाल संख्याओं का तो मात्र अनुमान लगाया जाता है, उनकी गणना नहीं की जाती; अतः यह परिभाषा अधूरी है।

(ii) “सांख्यिकी को सही रूप में औसतों को विज्ञान कहा जा सकता है।”
प्रस्तुत परिभाषा में औसत पर बल दिया गया है। सांख्यिकीय विश्लेषण में न केवल औसत (मध्य) का प्रयोग होता है अपितु अपकिरण, विषमता, सह-सम्बन्धन आदि का भी प्रयोग किया जाता है; अतः यह परिभाषा भी अधूरी है।

(iii) “सांख्यिकी, सामाजिक व्यवस्था को सम्पूर्ण मानकर माप का विज्ञान है।”
डॉ० बाउले ने इस परिभाषा में सांख्यिकी को केवल सामाजिक संस्थाओं एवं उनके क्रिया-व्यवहार के मापन का विज्ञान कहा है। इस प्रकार गैर सामाजिक क्रियाएँ सांख्यिकी के क्षेत्र से बाहर कर सांख्यिकी का क्षेत्र अति संकुचित बना दिया गया है।

(3) पर्सन और हार्लोज के शब्दों में, “सांख्यिकी तथ्यों के समूह को प्रयोग में लाने का विज्ञान और कला है।”

प्रस्तुत परिभाषा में विश्लेषण की विधियों को स्पष्ट नहीं किया गया है।

(ख) विस्तृत परिभाषाएँ

(1) क्रॉक्स्टन और काउडेन के अनुसार, “सांख्यिकी को संख्यात्मक, समंकों के एकत्रीकरण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण तथा निर्वचन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”

(2) प्रो० सैलिगमैन के अनुसार, “सांख्यिकी वह विज्ञान है जो किसी भी अनुसन्धान (जाँच) के क्षेत्र पर प्रकाश डालने के लिए संख्यात्मक आँकड़ों के संग्रहण, प्रस्तुतीकरण, वर्गीकरण, तुलना तथा निर्वचन की रीतियों का प्रयोग करता है।”

(3) लाविट के अनुसार, “सांख्यिकी वह विज्ञान है जो संख्यात्मक तथ्यों के संग्रह, वर्गीकरण तथा सारणीयन से सम्बन्ध रखता है जिसे घटनाओं की व्याख्या, विवरण और तुलना के लिए प्रयुक्त किया जा सके।

उपर्युक्त परिभाषाओं की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  1. सांख्यिकी की प्रकृति को स्पष्ट करें
  2. सांख्यिकी के उद्देश्य को स्पष्ट करें
  3. सांख्यिकी के विषय-क्षेत्र को स्पष्ट करें तथा
  4. सांख्यिकी, विज्ञान और कला दोनों है।

(ग) उपयुक्त परिभाषा

सांख्यिकी की उपयुक्त परिभाषा वही हो सकती है जिसमें निम्नलिखित विशेषताएँ हों –

  1. सांख्यिकी की प्रकृति को स्पष्ट करे
  2. सांख्यिकी के उद्देश्य को स्ट करे
  3. सांख्यिकी के विषय-क्षेत्र को स्पष्ट करे तथा
  4. सांख्यिकी की विभिन्न रीतियों को स्पष्ट करे।

अन्त में हम कह सकते हैं कि सांख्यिकी, विज्ञान एवं कला दोनों ही है जिसमें पूर्व-निश्चित उद्देश्यों के अनुसार सर्वेक्षणों, अध्ययनों एवं प्रयोगों आदि के आधार पर प्राप्त आँकड़ों का संकलन, वर्गीकरण, विवरण, विश्लेषण, तुलना एवं विवेचन किया जाता है। आँकड़ों के विश्लेषण को उद्देश्यों, तथ्यों के पारस्परिक सम्बन्ध को ज्ञात करना, तथ्यों की विशेषताओं को वर्णन करना, तथ्यों के सम्बन्ध में अनुमान लगाना, निष्कर्ष निकालना और भविष्य कथन करना है।

प्रश्न 2.
सांख्यिकी की प्रकृति स्पष्ट कीजिए।
या
सांख्यिकी विज्ञान है अथवा कला। स्पष्ट कीजिए।
या
सांख्यिकी विज्ञान एवं कला दोनों ही है।” स्पष्ट कीजिए।
या
सांख्यिकी एक विज्ञान नहीं है, वह एक वैज्ञानिक विधि है।” आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकी की प्रकृति
(Nature of Statistics)

सांख्यिकी की प्रकृति या स्वभाव जानने के लिए यह देखना होगा कि सांख्यिकी विज्ञान है या कला अथवा दोनों है। अत: सर्वप्रथम हमें विज्ञान और कला का अर्थ जानना जरूरी है।

विज्ञान का अर्थ (Meaning of Science) – विज्ञान, ज्ञान के क्रमबद्ध समूह को कहते हैं। साधारणत: निम्नलिखित शर्तों को पूर्ण करने वाले ज्ञान (विषय) को विज्ञान कह सकते हैं –

  1. जिस ज्ञान का क्रमबद्ध अध्ययन (Systematic Study) किया जाता हो।
  2. वह ज्ञाप्त जिससे कारण और प्रभाव (Cause and Effect) के सम्बन्धों की जानकारी मिलती है।
  3. जिस ज्ञान के अध्ययन के लिए स्वयं के नियम होते हैं।
  4. जिसके नियम सार्वभौमिक (Universal) होते हैं।
  5. जिसके नियमों के द्वारा भविष्यवाणी या पूर्वानुमान (Forecasting) किये जा सके।
  6. जिसका अन्य विज्ञानों से सम्बन्ध होता है।

कला का अर्थ (Meaning of Art)-यदि विज्ञान ज्ञान है तो कला क्रिया है। किसी कार्य को करना ही कला कहलाता है। कला विज्ञान का व्यावहारिक या प्रयोगात्मक पहलू (Practical Aspect) है। किसी विज्ञान के विभिन्न नियमों तथा सिद्धान्तों का प्रयोग और क्रियान्वयन ही कला कहलाता है।

‘विज्ञान’ और ‘कला’ का अर्थ समझने के बाद अब हमें यह देखना है कि सांख्यिकी विज्ञान है। या कला है अथवा दोनों।

सांख्यिकी एक विज्ञान के रूप में
(Statistics as a Science)

सांख्यिकी एक विज्ञान है, क्योंकि इसमें विज्ञान के ऊपर वर्णित सभी लक्षण या विशेषताएँ पायी जाती हैं। सांख्यिकी ज्ञान का क्रमबद्ध अध्ययन करती है। अध्ययन के लिए इसके अपने स्वयं के सिद्धान्त और पद्धतियाँ हैं। इसके अपने नियम हैं; जैसे—सम्भावना का नियम, जड़ता का नियम, सांख्यिकीय नियमितता का नियम आदि। ये नियम सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक हैं। इन नियमों के द्वारा अध्ययन करके पुर्वानुमान या भविष्यवाणी की जा सकती है। सांख्यिकी में ‘कारण’ और ‘प्रभाव (Cause and Effect) में सम्बन्ध स्थापित करने की क्षमता है। सांख्यिकी के नियमों द्वारा किसी ‘कारण’ के ‘परिणाम’ का विश्लेषण और पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सांख्यिकी एक विज्ञान है। इसमें विज्ञान होने के सभी लक्षण पाये जाते हैं।

सांख्यिकी एक कला के रूप में
(Statistics as an ‘Art’)

सांख्यिकी कला भी है। यह विभिन्न समस्याओं के समाधान की विधि बताती है। सांख्यिकीय समंकों को एकत्रित करना, उनका उपयोग करना आदि कला के स्वरूप को व्यक्त करते हैं। विभिन्न वर्गों पर मूल्यवृद्धि का जो प्रभाव पड़ता है, उसकी जानकारी मूल्य-निर्देशकों (Price Index) द्वारा की जाती है। यह सांख्यिकी का कला पक्ष ही है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समस्याओं का विभिन्न सांख्यिकीय विधियों से अध्ययन करके आँकड़ों को बिन्दुरेखाओं (Graphs), चित्रों (Diagrams) एवं तालिकाओं द्वारा प्रदर्शित करना भी कला ही है। सांख्यिकी की विषय-वस्तु (Subject-matter) में व्यावहारिक सांख्यिकी का समावेश है।

विभिन्न सांख्यिकीय तथ्यों को तुलनीय बनाना तथा उनसे निष्कर्ष निकालना सांख्यिकी के कला पक्ष को स्पष्ट करते हैं।

सांख्यिकी विज्ञान और कला दोनों है।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि सांख्यिकी न केवल विज्ञान है, अपितु कला भी है। यह सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक दोनों प्रकार का विज्ञान है। अन्त में टिप्पेट के शब्दों में कह सकते हैं, सांख्यिकी विज्ञान और कला दोनों है। यह विज्ञान इसलिए है क्योंकि इसकी रीतियाँ मौलिक रूप से क्रमबद्ध हैं तथा उनका सर्वत्र उपयोग होता है और कला इसलिए है कि इसकी रीतियों का सफल प्रयोग पर्याप्त सीमा तक सांख्यिकी की योग्यता, विशेष अनुभव तथा उसके प्रयोग-क्षेत्र; जैसे—अर्थशास्त्र के ज्ञान पर निर्भर करता है।”

अन्त में, सांख्यिकी एक विज्ञान और कला दोनों है जिसमें किसी अनुसन्धान क्षेत्र से सम्बन्धित सामूहिक संख्यात्मके तथ्यों के संकलन, प्रदर्शन, विश्लेषण तथा निर्वचन की रीतियों का विधिवत् । अध्ययन किया जाता है।

सांख्यिकी एक वैज्ञानिक विधि है
(Statistics is a Scientific Method)

क्रॉक्सटन और काउडेन का यह विचार है कि सांख्यिकी स्वयं एक विज्ञान नहीं है, अपितु अनुसन्धान करने की एक वैज्ञानिक विधि है, ज्ञान-प्राप्ति का एक तरीका है। उपर्युक्त शीर्षकों के अन्तर्गत हम सांख्यिकी की प्रकृति को स्पष्ट करते हुए उल्लेख कर चुके हैं कि सांख्यिकी एक विज्ञान भी है और कला भी, परन्तु क्रॉक्सटन और काउडेन का मत भिन्न है। वे इसे विज्ञान नहीं मानते वरन् एक वैज्ञानिक विधि (तरीका) मानते हैं, क्योंकि सभी विषयों में अनुसन्धान के लिए सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग भरपूर तरीके से किया जाता है। अनुसन्धानकर्ता अपने-अपने निष्कर्षों को सांख्यिकीय विधियों से प्रदर्शित करते हैं; प्राप्त आँकड़ों का वर्गीकरण व निर्वचन करते हैं। जीवन के सभी क्षेत्रों अर्थात् सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक एवं प्राकृतिक क्षेत्रों में सांख्यिकीय विधियों का उपयोग किया जाता है। यही कारण है कि वॉलिस और रॉबर्स कहते हैं, “सांख्यिकी स्वतन्त्र और मूलभूत ज्ञान का समूह नहीं है, अपितु ज्ञान-प्राप्ति की रीतियों का समूह है।”

इस तरह इन विद्वानों के अनुसार, सांख्यिकी अर्थशास्त्र, भौतिकशास्त्र या रसायनशास्त्र आदि की तरह स्वयं एक स्वतन्त्र विशुद्ध विज्ञान नहीं है, अपितु ज्ञान-प्राप्ति की वैज्ञानिक विधि है। परन्तु अधिकांश विशेषज्ञ सांख्यिकी को एक विज्ञान मानते हैं; क्योंकि विज्ञान की सभी विशेषताएँ और लक्षण इसमें पाये जाते हैं।

प्रश्न 3.
मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता प्रतिपादित कीजिए।
उत्तर :
आधुनिक समय में मानव-जीवन की सभी समस्याओं के अध्ययन तथा समाधान में सांख्यिकी की उपयोगिता है और जीवन के प्रत्येक मोड़ पर यह पथ-प्रदर्शक की तरह कार्य करती है। यही कारण है कि विद्वान् सांख्यिकी को ‘मानव-कल्याण का अंकगणित’ कहते हैं। वर्तमान में मानवजीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जिसमें सांख्यिकी का उपयोग एवं महत्त्व न हो। सांख्यिकी के बढ़ते हुए महत्त्व एवं उपयोगिता के कारण टिप्पट (Tippet) ने कहा है, “सांख्यिकी प्रत्येक व्यक्ति को ‘प्रभावित करती है तथा जीवन को अनेक बिन्दुओं पर स्पर्श करती है।”

सामाजिक विज्ञानों की भाँति, मनोविज्ञान में भी सांख्यिकी का उपयोग दिन-प्रतिदिन विस्तार ले। रहा है। मनोविज्ञान की समस्याओं को समझने तथा उनके समाधान के लिए और मनोविज्ञान से सम्बन्धित शोध-कार्यों में सांख्यिकी का उपयोग अपरिहार्य हो गया है। मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता की निम्नलिखित प्रकार विवेचना कर सकते हैं

मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता
(Utility of Statistics in Psychology)

मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता निर्विवाद, सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक है। प्रायः सभी मनोवैज्ञानिक अध्ययनों, प्रयोग एवं शोध कार्यों में सांख्यिकी की भारी माँग है। सच तो यह है कि सांख्यिकीय विधियों के अभाव में ये कार्य हो ही नहीं सकते। मनोविज्ञान के क्षेत्र में सांख्यिकी की उपयोगिता के निम्नलिखित कारण हैं –

(1) आँकड़ों को सरल एवं बोधगम्य बनाना – मनोवैज्ञानिक प्रयोग अक्सर एक विशाल समूह पर लागू किये जाते हैं जिनसे प्रदत्त या समंक आँकड़े प्राप्त होते हैं। इन आँकड़ों को सार्थक बनाने के लिए आवश्यक है कि इन्हें सुव्यवस्थित किया जाए आँकड़ों को सुव्यवस्थित बनाने में सांख्यिकी विधियाँ उपयोगी हैं। उदाहरण के लिए–आँकड़ों का आवृत्ति वितरण बनाकर उन्हें विभिन्न रेखाचित्रों द्वारा प्रदर्शित करने में सांख्यिकी का बहुत महत्त्व है। केन्द्रीय प्रवृत्ति के मापन की विधियों द्वारा आँकड़ों का वर्णन करने में भी सांख्यिकी उपयोगी है। इस भॉति, सांख्यिकी अव्यवस्थित एवं अर्थहीन आँकड़ों को सरल तथा बोधगम्य बनाती है।

(2) ऑकड़ों की सुस्पष्ट एवं संक्षिप्त प्रस्तुतीकरण – सांख्यिकी की मदद से मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से सम्बद्ध आंकड़ों का सरल, सुस्पष्ट एवं संक्षिप्त प्रस्तुतीकरण किया जाता है। वृत्तचित्र, स्तम्भ रेखाचित्र, आवृत्ति बहुभुज, स्तम्भाकृति, संचित प्रतिशत वक्र तथा संचित आवृत्ति वक्र आदि विधियों के द्वारा आँकड़ों की मुख्य विशेषताओं को स्पष्टता मिलती है। एक मनोवैज्ञानिक बालकों के एक बड़े समूह पर बुद्धि परीक्षण का प्रयोग करके मध्यमान तथा प्रामाणिक विचलन की गणना द्वारा सभी इकाइयों में सामूहिक रूप से मिलने वाले लक्षणों को खोज निकालता है। वह बालकों की औसत बुद्धि ज्ञात कर सकता है और यह पता भी लगा सकता है कि समूह सजातीय है अथवा विषमजातीय। पढ़ने वाले बालकों की योग्यताओं में विषमता अधिक होने पर कक्षा को कई हिस्सों में विभाजित कर बालकों की योग्यताओं के अनुसार पढ़ाया जा सकता है। इसी प्रकार आँकड़ों के वर्णन में सामान्य सम्भावना वक्र के प्रारम्भिक सिद्धान्तों का उपयोग भी किया जाता है।

(3) आँकड़ों को मात्रात्मक स्वरूप प्रदान करना – अन्य सामाजिक विज्ञानों की तरह से मनोविज्ञान में शोध कार्य के अन्तर्गत प्राप्त आँकड़े प्रायः गुणात्मक प्रकृति के होते हैं जिन्हें मात्रात्मक स्वरूप प्रदान करना होता है। यह कार्य सांख्यिकीय विधियों की सहायता से ही सम्भव है। बुद्धि, समायोजन, अन्तर्मुखता, बहिर्मुखता आदि से सम्बन्धित गुणात्मक आँकड़ों को मात्रात्मक रूप में परिवर्तित करने के लिए सांख्यिकी अत्यन्त उपयोगी है।

(4) घटना की यथार्थ व्याख्या – सांख्यिकीय विधियाँ किसी घटना की यथार्थ व्याख्या (Exact descriptions) करने में सक्षम हैं। इस व्याख्या को कोई भी प्रशिक्षित व्यक्ति बिना किसी सन्देह के ठीक-ठीक समझ सकता है। यदि कहा जाए कि कक्षा 12 के छात्र श्याम ने मनोविज्ञान में बहुत अच्छे अंक प्राप्त किये हैं तो इससे श्याम की मनोविज्ञान में योग्यता का सुनिश्चित ज्ञान नहीं होता; किन्तु यदि यह कहा जाए कि श्याम के मनोविज्ञान में प्राप्तांकों का प्रतिशत 95 है तो इससे स्पष्टतया ज्ञात होता है। कि 95% छात्रों के मनोविज्ञान में प्राप्तांक, श्याम के प्राप्तांकों से कम हैं। इस भाँति सांख्यिकी की सहायता से घटना की सही-सही व्याख्या की जा सकती है।

(5) आँकड़ों के सहसम्बन्ध का वर्णन – मनोविज्ञान से जुड़े अध्ययन एवं अनुसन्धान कार्यों में सांख्यिकीय विधियों की सहायता से दो या दो से अधिक चरों (variables) में सहसम्बन्ध ज्ञात किया जा सकता है। यदि कोई मनोवैज्ञानिक किसी कक्षा के बालकों की आयु और उनकी स्मरण-शविन के मध्य सम्बन्ध ज्ञात करना चाहे तो वह सहसम्बन्ध गुणांक को प्रयोग करता है। सहसम्बन्ध की विधियाँ आंशिक तथा बहुगुणी सहसम्बन्ध की गणना भी कर सकती हैं।

(6) तुलनात्मक अध्ययन – बॉडिंगटन का कथन है, “सांख्यिकी का निचोड़ गणना करना ही नहीं है अपितु तुलना करना भी है।’ मनोवैज्ञानिक दो या दो से अधिक समूहों की तुलना के लिए सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग कर सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि यह ज्ञात करना हो कि कक्षा 11 के छात्रों को मनोविज्ञान पढ़ाने के लिए शिक्षण की पुस्तक-पाठन तथा व्याख्यान विधि में से कौन-सी विधि अच्छी है तो इसके लिए प्रयोग किया जा सकता है। समान योग्यता वाले छात्रों के दो समूह बनाकर एक समूह को पुस्तक-पाठन विधि द्वारा तथा दूसरे समूह को व्याख्यान विधि द्वारा पढ़ाया जाएगा। फिर दोनों समूहों की प्रामाणिक परीक्षा लेकर उनके प्राप्तांकों पर सांख्यिकीय विधियाँ लागू कर तुलनात्मक अध्ययन द्वारा यह बताना सम्भव है कि मनोविज्ञान शिक्षण की प्रभावशाली विधि कौन-सी

(7) कार्यकारण सम्बन्ध – सांख्यिकीय विधियों की सहायता से कोई भी मनोवैज्ञानिक किसी घटना को उत्पन्न करने वाले कारणों को ज्ञात कर सकता है। इसके लिए स्वतन्त्र चर का परतन्त्र चर पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना होगा। यदि यह ज्ञात करना हो कि अमुक छात्र किसी विषय में क्यों फेल हो जाता है तो तत्सम्बन्धी कारणों को प्रयोगात्मक विधि (Experimental Method) द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। उदाहरणार्थ- प्रयोग में सभी कारणों को स्थिर (Constant) करने के उपरान्त यह पाया जाए कि नियमित अध्ययन न करने वाले छात्र फेल हो जाते हैं तो सम्भवतया छात्र के उस विषय में फेल होने का कारण, नियमित अध्ययन का अभाव ही हो।

(8) मापन तथा मनोवैज्ञानिक परीक्षणों में सांख्यिकी का उपयोग – सांख्यिकीय विधियों के अभाव में मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का निर्माण, उनकी व्याख्या तथा विश्वसनीयता व वैधता की जाँच नहीं की जा सकती। बुद्धि-परीक्षण, निष्पत्ति परीक्षण, अभिवृत्ति परीक्षण तथा प्रवणता परीक्षण आदि के निर्माण में सांख्यिकीय विधियाँ अत्यधिक उपयोगी हैं। इसी प्रकार मनोवैज्ञानिक मापन में भी सांख्यिकी बहुत उपयोगी है।

(9) भविष्यकथन में सांख्यिकी का उपयोग – जब कोई मनोवैज्ञानिक मानव-व्यवहार से सम्बन्धित किसी घटना के सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगाना चाहता है या भविष्यकथन करना चाहता है तो वह सांख्यिकी की प्रतीपगमन तथा भविष्यकथन से सम्बन्धित विधियों का उपयोग करता है। उदाहरण के लिए यदि कक्षा बारह के किसी छात्र की बुद्धि-लब्धि (I.Q.), हाईस्कूल में उसके प्राप्तांक तथा अध्ययन के घण्टों के आधार पर उसकी बोर्ड की परीक्षा में सफलता का पूर्वानुमान/भविष्यकथन करना हो तो प्रतीपगमन रेखाओं की मदद से ऐसा किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक सांख्यिकीय विधियों की सहायता से यह भी ज्ञात किया जा सकता है कि उसका भविष्यकथन कितना त्रुटिपूर्ण है।

(10) शैक्षिक समस्याओं का निदान – सांख्यिकीय विधियाँ शैक्षिक समस्याओं के निराकरण में भी विशिष्ट भूमिका निभाती हैं। छात्रों के चयन (Selection), उनकी पदोन्नति (Promotion) तथा शैक्षिक उपलब्धियों (Educational Achievements) के विषय में भविष्यकथन करने में भी सांख्यिकीय विधियाँ उपयोगी हैं। छात्रों के लिए परीक्षण तैयार करने व उनके मूल्यांकन में सांख्यिकी की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसी प्रकार छात्रों के मार्गदर्शन में सांख्यिकीय विधियाँ अत्यन्त उपयोगी सिद्ध

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर निष्कर्ष निकलता है कि मनोविज्ञान में सांख्यिकी की महती उपयोगिता है। मनोवैज्ञानिक समस्याओं से सम्बन्धित आकंड़ों के संकलन, वर्गीकरण व्याख्या तथा तुलना में ही नहीं बल्कि उनसे सम्बद्ध पूर्वानुमान व भविष्यकथन में भी सांख्यिकी का बहुत उपयोग है।

प्रश्न 4.
सांख्यिकी की सीमाओं की विवेचना कीजिए।
या
“सांख्यिकीय विधियाँ अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में खतरनाक औजार हो सकती है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकी की सीमाएँ
(Limitations of Statistics)

सांख्यिकी एक लाभप्रद विज्ञान है। यह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को स्पर्श करता है। सामाजिक विज्ञान शिक्षा तथा मनोविज्ञान में सांख्यिकी का महत्त्वपूर्ण योगदान है। कृषि, नियोजन, अर्थशास्त्र, राजस्व, राजनीतिशास्त्र आदि में भी इसका भरपूर प्रयोग होता है, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि सांख्यिकी की कोई सीमाएँ (कमियाँ) ही नहीं हैं। वास्तविकता यह है कि सांख्यिकी जितना लाभदायक विज्ञान है, उतना ही यह ख़तरनाक भी है। इसका प्रयोग बहुत ही सोच-विचारकर, सावधानीपूर्वक तथा विशेषज्ञों द्वारा किया जाना चाहिए। यदि सांख्यिकी का प्रयोग अकुशल व्यक्तियों द्वारा किया जाता है तो यह बहुत हानिप्रद सिद्ध हो सकता है। इसकी सीमाओं पर सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए। सांख्यिकी की प्रमुख सीमाएँ इस प्रकार हैं –

(1) सांख्यिकी केवल संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन करती है, न कि गुणात्मक तथ्यों का – सांख्यिकी की यह महत्त्वपूर्ण कमजोरी है। यह मानव-जीवन के केवल उसी पहलू का अध्ययन करती है जिसे संख्याओं द्वारा प्रस्तुत किया जा सके; जैसे-ऊँचाई, आयु, भार तथा आय आदि। जीवन के गुणात्मक पक्ष; जैसे—सुन्दरता, भावना, दुष्टता, बुद्धिमत्ता, कुटिलता आदि का अध्ययन सांख्यिकी द्वारा नहीं कर सकते हैं। गुणात्मक पहलू को संख्याओं में व्यक्त करके अप्रत्यक्ष रूप में अध्ययन कर सकते हैं। बुद्धिमत्ता का माप अनुमानित संख्याओं द्वारा व्यक्त कर सकते हैं, प्रत्यक्ष रूप में नहीं।

(2) सांख्यिकीय समंक सजातीय और एकरूप होने चाहिए – सांख्यिकी में विजातीय तथ्यों का अध्ययन नहीं किया जा सकता, सांख्यिकीय विधियों द्वारा समंकों की तुलना तभी सम्भव है जबकि वे सजातीय हों तथा उनमें एकरूपता पायी जाये।

(3) सांख्यिकी समूह का अध्ययन करती है, न कि व्यक्ति को प्रो० नीजवैगर के अनुसार, सांख्यिकी के निष्कर्ष समूह के सामूहिक व्यवहार का अनुमान करने में सहायक होते हैं, उस समूह की व्यक्तिगत इकाइयों फ़ा नहीं।” सांख्यिकी व्यक्तिगत इकाई की विशेषता पर ध्यान न देकर सामूहिक विशेषता या औसत पर ध्यान देती है। सांख्यिकी के परिणाम समूह से जुड़े होते हैं, न कि व्यक्ति से। किसी कक्षा के प्राप्तांकों का औसत यह नहीं बताता कि अमुक विद्यार्थी के प्राप्तांक उतने ही होंगे।

(4) बिना सन्दर्भ के सांख्यिकी के परिणाम असत्य और भ्रामक होते हैं – समस्या के बिना सन्दर्भ और पूर्ण जानकारी के सांख्यिकीय परिणाम भ्रामक और असत्य मालूम होते हैं। कुछ समंकों से प्राप्त निष्कर्ष किसी भी विषय पर तब तक लागू नहीं किये जा सकते जब तक कि परिस्थिति, सन्दर्भ व समस्या की पूर्ण जानकारी न हो।

(5) सांख्यिकी के प्रयोग के लिए सांख्यिकीय विधियों की जानकारी आवश्यक – सांख्यिकी विज्ञान की यह एक गम्भीर सीमा है कि इसके सही उपयोग करने के लिए सांख्यिकीय विधियों की पूर्ण व सही जानकारी अति आवश्यक है। जो व्यक्ति सांख्यिकीय विधियों के प्रयोग की पूर्ण जानकारी नहीं रखते हैं, उनके द्वारा इनके प्रयोग से लाभ के स्थान पर नुकसान ही होता है। यूल और केण्डाल ने तो यहाँ तक कहा है, “अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में सांख्यिकीय विधियाँ खतरनाक औजार हैं।”

(6) सांख्यिकी के परिणाम दीर्घकाल में तथा औसत रूप में सही होते हैं – प्राकृतिक विज्ञानों; जैसे-रसायनशास्त्र, भौतिकशास्त्र आदि के नियम और परिणाम सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक होते हैं। ये अल्पकाल तथा दीर्घकाल सभी कालों में लागू होते हैं, परन्तु सांख्यिकी के परिणाम केवले दीर्घकाल में ही सही निकलते हैं तथा वे एक औसत प्रवृत्ति के परिचायक होते हैं। उनमें छोटे-छोटे उच्चावचन एवं कमियाँ विद्यमान रहती हैं। सांखियकी के नियम सम्भावना सिद्धान्त पर आधारित होते हैं। जिसके अनुसार यदि किसी सिक्के को 20 बार उछालें तो सम्भावना यह है कि 10 बार चित (Head) तथा 10 बार पट (Tail) आएगा; किन्तु ‘यथार्थ में हो सकता है 14 बार चित व 6 बार पट आये।

(7) सांख्यिकी एक साधन है, साध्य नहीं – सांख्यिकी का प्रमुख कार्य समस्या से सम्बन्धित आँकड़े एकत्रित कर उन्हें वर्गीकृत करके सारणीयन तथा रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुत करना है। बाउले के मत में सांख्यिकी का काम परिणाम या निष्कर्ष निकालना नहीं है। यदि सांख्यिकी परिणाम निकालेगी। भी, तो वे निष्पक्ष नहीं होंगे। परन्तु कुछ दूसरे सांख्यिकीवेत्ता यह मानते हैं कि बिना परिणाम के सांख्यिकी अनुपयोगी होगी; अतः निष्कर्ष रूप में यह कह सकते हैं कि समंकों के एकत्रीकरण में पूर्ण सावधानी रखकर तटस्थ रूप में उनका प्रयोग करना चाहिए। अनुसन्धानकर्ता के तटस्थ न रहने पर। परिणाम गलत और हानिकारक हो सकते हैं; अतः सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग साधन के रूप में बुद्धिमानीपूर्वक करना चाहिए।

(8) सांख्यिकीय विधि अनुसन्धान की एकमात्र विधि नहीं है – समस्याओं के अनुसन्धान की अनेक विधियाँ हैं, सांख्यिकीय विधि उन अनेक विधियों में से एक हैं। अत: सांख्यिकी से प्राप्त परिणामों को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि अनुसन्धान की दूसरी विधियों से परिणामों की पुनः जाँच न कर ली जाए।

अंत में यह कह सकते हैं कि सांख्यिकीय विधियों के प्रयोग में पूर्ण सावधानी रखनी चाहिए। उपर्युक्त सीमाओं को ध्यान में रखकर निष्कर्ष निकालने चाहिए, अन्यथा इसके परिणाम भ्रामक और हानिकारक हो सकते हैं। यही कारण है कि यूल और केण्डाल यह कहने पर मजबूर हुए हैं कि सांख्यिकीय गीतियाँ अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में खतरनाक औजार हो सकते हैं।

प्रश्न 5.
सांख्यिकीय श्रेणियों (Statistical series) से आप क्या समझते हैं। इनके विभिन्न प्रकारों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकीय श्रेणियाँ
(Statistical Series)

संकलिन आँकड़ों को जब एक निश्चित क्रम में लिखा जाता है तो इस भाँति बनी हुई पदमाला या श्रृंखला को सांख्यिकीय श्रेणी (Statistical Series) कहा जाता है। सांख्यिकीय श्रेणी में हम आँकड़ों को एक क्रमबद्ध ढंग से प्रदर्शित करते हैं। कॉनर (Conner) ने सांख्यिकीय श्रेणी की परिभाषा इस प्रकार दी है, “जब दो चल-राशियों के मूल्यों को साथ-साथ इस भाँति व्यवस्थित किया जाए कि एक का मापनीय अन्तरे दूसरे के मापनीय अन्तर का सहगामी हो तो इस प्रकार से प्राप्त पदमाला को सांख्यिकीय श्रेणी कहते हैं।”

सांख्यिकीय श्रेणियों के प्रकार
(Types of Statistical Series)

सांख्यिकीय श्रेणियाँ कई प्रकार की होती हैं। मुख्यतः सांख्यिकीय श्रेणियों की रचना तीन प्रकार से की जा सकती है –

  1. व्यक्तिगत श्रेणी
  2. असतत या खण्डित या विच्छिन्न श्रेणी
  3. सतत् या अखण्डित या अविच्छिन्न श्रेणी।

(1) व्यक्तिगत श्रेणी (Individual Series) – व्यक्तिगत श्रेणी वह है जिसमें समूह की प्रत्येक इकाई का मान अलग-अलग दिया जाता है। इस श्रेणी में प्रत्येक पद स्वतन्त्र होता है। व्यक्तिगत श्रेणी का निर्माण उस समय किया जाता है कि जब संकलित आँकड़ों से समूह अथवा वर्ग बनाने सम्भव न हों अथवा हर एक पद को महत्त्व देना हो। इन श्रेणियों की रचना आरोही (Ascending) तथा अवरोही (Descending) दोनों ही क्रमों में की जा सकती है। उदाहरण के लिए निम्नलिखित तालिका में कक्षा XI के दस छात्रों के मनोविज्ञान में प्राप्तांक आरोही तथा अवरोही क्रम में प्रस्तुत किये गये हैं –

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(2) असतत या खण्डित या विच्छिन्न श्रेणी (Discrete or Discontinuous Series) – जिस श्रेणी में प्रत्येक मान अलग-अलग नहीं लिखा जाता, अपितु प्रत्येक मान के समक्ष उसकी आवृत्ति लिख दी जाती है, उसे असतत/खण्डित या विच्छिन्न श्रेणी कहा जाता है। यह श्रेणी वास्तविक अन्तर को प्रकट करती है। उदाहरण के लिए—कक्षा XI के 20 छात्रों के मनोविज्ञान में प्राप्तांक निम्नलिखित हैं –
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(3) सतत या अखण्डित या अविच्छिन्न श्रेणी (Continuous Series) – सतत श्रेणी में इकाइयों के मानों को वर्गान्तरों (Class-intervals) के रूप में व्यवस्थित किया जाता है। इस प्रकार की श्रेणी में ऐसे मान आते हैं जिनका सूक्ष्म विभाजन सम्भव है; जैसे—समय को घण्टा-मिनट-सेकण्ड आदि में विभाजित किया जा सकता है। बुद्धि, भार, ऊँचाई व लम्बाई आदि को भी सरलता से मापा और उपविभाजित किया जा सकता है। मनोविज्ञान में जिन चल-राशियों का अध्ययन किया जाता है, वे अधिकतर इसी श्रेणी के अन्तर्गत आती हैं। कक्ष X के 100 छात्रों के मनोविज्ञान के प्राप्तांकों का विवरण निम्नलिखित है –
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श्रेणियों की रचना में निम्नलिखित बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक है –

(i) व्यक्तिगत श्रेणी वस्तुतः असतत या खण्डित श्रेणी का एक विशिष्ट रूप है। यदि असतत श्रेणी में प्रत्येक प्राप्तांक की आवृत्ति 1 हो तो वह व्यक्तिगत श्रेणी का रूप धारण कर लेती है।
(ii) यदि सतत श्रेणी में प्रत्येक वर्गान्तर के मध्य बिन्दु पर उनकी सम्पूर्ण आवृत्तियाँ केन्द्रित मान ली जाये तो यह श्रेणी असतत या खण्डित श्रेणी का रूप धारण कर लेती है।

प्रश्न 6.
ऑकड़ों के व्यवस्थापन से क्या आशय है? आँकड़ों के व्यवस्थापन के मुख्य प्रकारों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
आँकड़ों का व्यवस्थापन या आवृत्ति विवरण
(Organization of the Data or Frequency Distribution)

मनोविज्ञान के क्षेत्र में विभिन्न समस्याओं को लेकर अध्ययन, प्रयोग एवं अनुसन्धान कार्य किये जाते हैं। ये प्रयोग या अनुसन्धान कार्य एक विशाल समूह पर किये जाते हैं। जिनके फलस्वरूप हमें आँकड़े प्राप्त होते हैं। ये आँकड़े हमारे लिए तब तक निरर्थक हैं जब तक कि उन्हें व्यवस्थित रूप प्रदान नहीं कर दिया जाता। इस भाँति, आँकड़ों को सार्थक एवं उपयोगी बनाने के लिए व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण का विशेष महत्त्व है।

संगृहीत आँकड़ों से सुगमतापूर्वक निष्कर्ष निकालने हेतु इनका व्यवस्थापन (Organization) किया जाता है। जिसमें आँकड़ों का वर्गीकरण तथा सारणीयन सम्मिलित है। संगृहीत आँकड़ों को सर्गों तथा सारणियों के रूप में निरूपित करना ही आँकड़ों का व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण है। मुख्यत: व्यवस्थापन की तीन पद्धतियाँ हैं –

  1. वर्गीकरण (Classification)
  2. सारणीयन (Tabulation) तथा
  3. रेखाचित्र प्रस्तुतीकरण (Graphical Representation)।

आँकड़ों का वर्गीकरण समानता या सजातीयता के आधार पर किया जाता है; जैसे–सामाजिक स्तर या धर्म के आधार पर वर्गीकरण। आँकड़ों का वर्गीकरण करने के बाद उनके आपसी सम्बन्ध तथा प्रकृति का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उनका सारणीयन किया जाता है जिसे अधिक स्पष्ट रूप से समझने के लिए रेखाचित्रों के माध्यम से आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण किया जाता है।

मूल आँकड़ों के व्यवस्थापन के प्रकार
(Types of Basic Datas Distribution)

मनोवैज्ञानिक अध्ययनों या अनुसन्धान कार्यों में मूल आँकड़े अधिक संख्या में तथा विस्तृत (फैले हुए) होते हैं जिन्हें व्यवस्थापन की प्रक्रिया द्वारा सुस्पष्ट एवं सार्थक बनाया जाता है। आँकड़ों के व्यवस्थापन के प्रमुख तीन प्रकार हैं –

  1. साधारण व्यवस्था
  2. आवृत्ति व्यवस्था तथा
  3. आवृत्ति वितरण।

(1) साधारण व्यवस्था (Simple Array) – साधारण व्यवस्था आँकड़ों को व्यवस्थित करने की सबसे सरल विधि है जिसमें आँकड़ों को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाता है। आँकड़ों को इस प्रकार विन्यसित करने से उनकी प्रकृति स्पष्ट हो जाती है। आँकड़ों को साधारण व्यवस्था में उस समय व्यवस्थित किया जाना चाहिए जबकि आँकड़ों की संख्या कम हो। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी परिसीमा यह है कि इससे अन्य सांख्यिकी गणनाओं में सहायता नहीं मिलती है।

उदाहरण 1 – कक्षा XI के 10 छात्रों के मनोविज्ञान में प्राप्तांक (पूर्णाक 50) निम्न प्रकार हैं –
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अब इन्हें साधारण व्यवस्था के अन्तर्गत आरोही व अवरोही क्रम में इस प्रकार प्रदर्शित किया जाएगा –
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(2) आवृत्ति व्यवस्था (Frequency Array) – आँकड़ों की प्रकृति अधिक स्पष्ट करने के लिए उनका व्यवस्थापन आवृत्तियों के आधार पर किया जाता है। साधारण व्यवस्था से आवृत्ति व्यवस्था अधिक अच्छी समझी जाती है, किन्तु इसे तभी प्रयोग किया जाना चाहिए जबकि आँकड़ों की संख्या कम हो तथा उनकी आवृत्ति बार-बार हुई हो।

उदाहरण 2 – नीचे की तालिका में एक कक्षा के 100 विद्यार्थियों को बुद्धि-लब्धि के आधार पर विभाजित किया गया है –
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(3) आवृत्ति वितरण (Frequency Distribution) – आवृत्ति वितरण एक ऐसी व्यवस्था है। जिसमें पदों (चरों) के मूल्य तथा उनकी आवृत्तियाँ दी हुई होती हैं। आवृत्ति वितरण के दो प्रमुख तत्त्व हैं –
(i) पद (चर) तथा (ii) आवृत्तियाँ।

(i) पद (Variable) – पद या चर वह संख्यात्मक तथ्य है जो मात्रा या आकार में परिवर्तित होता रहता है; जैसे—आयु, लम्बाई, भार, आय या प्राप्तांक आदि। पद या चर दो प्रकार के हैं(अ) सतत चर तथा (ब) असतत या खण्डित चर। पद या चर को ‘x’ से प्रदर्शित करते हैं।

(ii) आवृत्तियाँ (Frequencies) – किसी प्राप्तांक के बार-बार आने की प्रवृत्ति को आवृत्ति (Frequency) कहते हैं। इकाइयों (व्यक्तियों) की वह संख्या जो किसी वर्ग-विशेष में आती है, उस वर्ग की आवृत्ति या बारम्बारता कहलाती है। इस प्रकार आवृत्तियाँ वह संख्या है जो किसी वर्ग-विशेष के पदों (मूल्यों) को ग्रहण करती है। कोई प्राप्तांक/पद या संख्या यदि पाँच बार आती है तो उस प्राप्तांक की आवृत्ति ‘5’ होगी। आवृत्ति को ‘f’ से प्रकट करते हैं। प्रत्येक वर्ग के अन्तर्गत आने वाले पदों की संख्या उस वर्ग की आवृत्ति कहलाती है।

इन आवृत्तियों को सुविधानुसार भिन्न-भिन्न वर्गों में वितरित अथवा प्रदर्शित करने की विधि आवृत्ति वितरण कहलाती है।

सरल आवृत्ति वितरण
(Simple Frequency Distribution)

सरल आवृत्ति वितरण में सर्वाधिक तथा सबसे कम प्राप्तांकों तथा उनके मध्य जितने भी प्राप्तांक आ सकते हैं उन सभी को आकार के अनुसार लिखा जाता है। फिर हर एक प्राप्तांक के सामने वह अंक लिखा जाता है जितनी बार वह प्राप्तांक दोहराया गया है। यही उस पद की आवृत्ति है।
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ये सभी प्राप्तांक अव्यवस्थित, अपरिष्कृत तथा अवर्गीकृत हैं जिन्हें न तो मस्तिष्क में अंकित रखा जा सकता है और न ही इन्हें देखकर मनोविज्ञान की कक्षा के बारे में कोई सुनिश्चित धारणा ही बनायी जा सकती है। हम इन्हें पहले सरल आवृत्ति वितरण के रूप में प्रदर्शित करते हैं –
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सरल आवृत्ति वितरण से प्रत्येक प्राप्तांक की आवृत्ति ज्ञात हो जाती है। प्राप्तांकों का वितरण अर्थात् अधिकांश विद्यार्थियों ने कम अंक प्राप्त किये हैं या उच्च अंक तथा सामान्य अंक पाने वाले विद्यार्थी कितने हैं, इन सभी बातों का हमें आसानी से ज्ञात हो जाता हैं। किन्तु सरल आवृत्ति वितरण बहुत अधिक स्थान घेरता है; अतः हम आवृत्ति वितरण बनाने की वह प्रक्रिया अपनाएँगे जो कुछ क्रुमबद्ध सोपानों पर आधारित होती है। आवृत्ति वितरण तालिका की यह प्रक्रिया निम्नलिखित है –

आवृत्ति वितरण तालिका निर्माण की प्रक्रिया
(Procedure of Preparing a Frequency Distribution Table)

आवृत्ति वितरण तालिका निर्माण की प्रक्रिया के पाँच प्रमुख सोपान हैं जिनके आधार पर आवृत्ति वितरण तालिका आसानी से निर्मित हो सकती है। ये सोपान निम्न प्रकार वर्णित हैं—

(1) प्रसार क्षेत्र (Range) – आवृत्ति वितरण तालिका बनाने के लिए सबसे पहले प्रसार क्षेत्र ज्ञात कर लेना चाहिए। आँकड़ों में उच्चतम अंक (Highest Score) तथा न्यूनतम अंक (Lowest Score) के अन्तर को प्रसार क्षेत्र कहते हैं।

प्रसार क्षेत्र = उच्चतम अंक – न्यूनतम अंक
Range = Highest Score – Lowest Score or Range =H.S. – L.S.
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(2) वर्गान्तर (Class-anterval : C.I.) – प्रसार क्षेत्र ज्ञात करने के उपरान्त वर्गान्तर की संख्या ज्ञात की जाती है जो साधारणत: 5 से लेकर 20 तक हो सकती है। कुछ विद्वानों की राय में यह 10 से कम तथा 20 से अधिक नहीं होनी चाहिए। परिणामों की शुद्धता का ध्यान रखते हुए वर्गान्तरों की संख्या 10 से 15 तक रखना उपयुक्त है।

वर्गान्तरों की संख्या ज्ञात करने के लिए आवश्यक है कि वर्गान्तर का आकार (Size of C.I.) पता लगाया जाये। वर्गान्तर का आकार सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित सूत्र प्रयुक्त होता है –
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गणना सम्बन्धी कार्य (जोड़ना व घटाना ओदि) में सुविधा की दृष्टि से वर्गान्तर का आकार ऐसा चुना जाये जो 5 से पूरी तरह विभाजित हो जाये। प्रश्न हल करते समय प्रसार क्षेत्र को सिर्फ 5 से भाग देकर वर्गान्तर का आकार ज्ञात कर लेना चाहिए। यदि प्रश्न में वर्गान्तर का आकार दिया हुआ हो तो फिर आकार ज्ञात करने की कोई आवश्यकता नहीं होती।

(3) वर्गान्तरों का निर्माण (Construction of Class-intervals) – वर्गान्तरों की संख्या तथा उनका आकार ज्ञात करने के बाद वर्गान्तरों का निर्माण किया जाता है। प्रथम वर्गान्तर बनाते समय निम्नतम अंक सर्वप्रथम लिखा जाता है, फिर निम्नतम अंक में वर्गान्तर के आकार को जोड़कर उसके सामने लिख देते हैं। उदाहरण (3) में निम्नतम अंक 30 है तथा वर्गान्तर का आकार 5 है। अत: पहले 30 लिखा जाएगा, फ़िर 30 में 5 जोड़कर (30 + 5) यानि 35 लिखा जायेगा। इस तरह से पहला वर्गान्तर 30-35 बना।

इसके आगे, पहले वर्गान्तर 30-35 की ऊपरी सीमा दूसरे वर्गान्तर की निम्न सीमा बन जायेगी तथा 35 में 5 जोड़कर (35+ 5) यानी 40, यह दूसरे वर्गान्तर की ऊपरी सीमा होगी। इस भाँति, दूसरा वर्गान्तर होगा 30-40। तीसरे वर्गान्तर की निम्न सीमा 40 होगी जिसमें वर्गान्तर का आकार 5 जोड़ने पर 40 + 5 = 45, इसकी ऊपरी सीमा बनेगी और तीसरा वर्गान्तर 40-50 होगा। वर्गान्तर बनाने का यह क्रम तब तक चलता जायेगा जब तक कि उच्चतम अंक वर्गान्तर में शामिल न हो जाये।

नोट – वर्गान्तरों का निर्माण करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

(i) अक्सर प्राप्तांकों के न्यूनतम अंक से ही वर्गान्तर बनाना शुरू करते हैं; जैसे—उपर्युक्त उदाहरण में न्यूनतम अंक 30 से वर्गान्तर बनाना प्रारम्भ किया गया है।

(ii) गणना को सुविधाजनक बनाने की दृष्टि से ‘वर्गान्तरों को न्यूनतम अंक से भी छोटा या कम अंक से शुरू किया जा सकता है। उदाहरणार्थ-यदि न्यूनतम अंक 26 है और वर्गान्तर का आकार 5 है तो 26-31 वर्गान्तर बन जाता है और यह 25-30 वर्गान्तर भी बन सकता है। वैसे वर्गान्तर 25-30 गणना की दृष्टि से सरल व सुविधाजनक कहा जाएगा।

(iii) यदि निम्नतम प्राप्तांक 5 से कम है तथा आकार 5 या 5 से ज्यादा है तो प्रथम वर्गान्तर ‘शून्य’ से प्रारम्भ करना चाहिए। यदि प्रथम वर्गान्तर ‘शून्य से प्रारम्भ है और वर्गान्तर का आकार 5 है। तो प्रथम वर्गान्तर 0-4 होगा। यहाँ यह स्पष्ट करना उचित है कि 0-4 वर्गान्तर में 5 प्राप्तांक हैं। यानि 0, 1, 2, 3 व 4। इसलिए इस समूह में 0 से लेकर 4 तक अंक पाने वाले सभी व्यक्ति शामिल हो जाएँगे। इस क्रम में दूसरा वर्गान्तर 5 से शुरू होगा तथा 9 पर समाप्त हो जाएगा यानि यही वर्गान्तर 5-9 होगा इसमें भी 5 प्राप्तांक शामिल हैं – 5, 6, 7, 8 व 9।

(iv) वर्गान्तरों को आरोही क्रम (Ascending Order) तथा अवरोही क्रम (Descending Order) दोनों में से किसी भी क्रम में लिखा जा सकता है।

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आवृत्ति तालिका का निर्माण करते समय अव्यवस्थित आँकड़ों के पहले प्राप्तांक को पढ़कर अनुमान लगायें कि यह किस वर्गान्तर में आता है। जिस वर्गान्तर में यह अंक आता हो, उसके सामने एक अंकदण्ड लगा देना चाहिए। अब दूसरा प्राप्तांक पढ़कर सम्बन्धित वर्गान्तर में उसके सामने एक अंकदण्ड लगा दें। इसी तरह से एक के बाद एक सभी प्राप्तांकों को पढ़कर अंकदण्ड लगा दिये जाते हैं। जैसे—उदाहरण (3) में पहला प्राप्तांक 42 है जिसके लिए 40-45 वर्गान्तर के सामने एक अंकदण्ड लगा देंगे। अभिप्राय यह है कि यही क्रिया सभी प्राप्तांकों के लिए दोहराई जाएगी।

(5) अंकदण्डों का आवृत्तियों में बदलना (Changing Tallies in Frequencies)- वर्गान्तरों के सम्मुख आवृत्तियों के अंकदण्डों द्वारा प्रदर्शन के बाद अंकदण्डों को आवृत्तियों में बदलकर लिख दिया जाता है। इसके लिए अंकदण्डों को जोड़कर योग को आवृत्ति (Frequencies) वाले खाने में लिख देते हैं। उदाहरण (3) के 55-60 वर्गान्तर में UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology 13 छह अंकदण्ड हैं; अत: इस वर्गान्तर के सामने आवृत्ति वाले खाने में 6 लिखा गया है। इसी प्रकार से सभी वर्गान्तरों के सामने के अंकदण्डों को आवृत्तियों में बदल दिया जाता है। यदि आवृत्ति वितरण तालिका में अंकदण्डों को लगाने में कोई त्रुटि नहीं है तो आवृत्तियों (f) का योगफल व्यक्तियों की कुल संख्या (N) के बराबर होता है।

अब हम उदाहरण (3) के अन्तर्गत सरल आवृत्ति वितरण के आधार पर आरोही तथा अवरोही क्रम में आवृत्ति वितरण तालिकाओं को निर्माण करेंगे।

आवृत्ति वितरण तालिका
(Frequency Distribution Table)
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उदाहरण 4 – कक्षा XI के 50 परीक्षार्थियों ने मनोविज्ञान में नीचे दिये गए अंक प्राप्त किये। इन प्राप्तांकों का आवृत्ति वितरण तैयार कीजिए –
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उदाहरण 5 – निम्नलिखित प्राप्तांकों से उचित वर्गान्तरलेकर आवृत्ति-वितरण तालिका बनाइए –
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उदाहरण 6 – कक्षा x के 50 छात्रों के भार (पौण्ड्स में) ज्ञात किये गये। इन भारों से उचित वर्गान्तर द्वारा आवृत्ति वितरण तालिका तैयार कीजिए –
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संचयी आवृत्तियाँ ज्ञात करना।
(To Find out the Cumulative Frequencies)

किसी आवृत्ति वितरण तालिका में संचयी आवृत्तियाँ (Cumulative Frequencies : C.E:) ज्ञात करने के लिए प्रत्येक वर्ग के सम्मुख उस वर्ग की आवृत्तियों तथा उस वर्ग के नीचे वाले कुल वर्गों की आवृत्तियों का योग लिख दिया जाता है।

उदाहरण 7 – एक स्कूल के 32 शिक्षकों की आयु (वर्षों में दर्शाने वाली संचयी आवृत्तियाँ निम्न प्रकार सारणीबद्ध हैं –
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उपर्युक्त उदाहरण में 20-25 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्ति 4 + 0 = 4 है; क्योंकि इस वर्गान्तर से नीचे आवृत्तियों की संख्या ‘शून्य’ (अर्थात् कुछ भी नहीं) है। इसी भाँति

25 – 30 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 4 + 8 = 12
30 – 35 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 7 + 12 = 19
35 – 40 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 4 + 19 = 23
40 – 45 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 4 + 23 = 27
45 – 50 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 2 + 27 = 29
50 – 55 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 2 + 29 = 31
55 – 60 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 1 + 31 = 32

प्राप्तांकों को समूहबद्ध करने की विधियाँ
(Methods of Grouping Scores)

प्राप्तांकों को समूहबद्ध करने की तीन विधियाँ हैं –

  1. समावेशी विधि (Inclusive Method)
  2. शुद्ध वर्गीकृत श्रृंखला (Pure Classification Series)
  3. अपवर्जी विधि (Exclusive Method)

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(1) समावेशी विधि (Inclusive Method) – समावेशी विधि में वर्गान्तर का अन्तिम अंक वर्गान्तर में ही शामिल है। उदाहरणार्थ-40-44 का अर्थ है कि 40 से लेकर 44 तक के प्राप्तांक इसी वर्ग में सम्मिलित हैं। इसी प्रकार 45-49 का अर्थ है कि 45 से लेकर 49 तक के सभी प्राप्तांक इस वर्ग में सम्मिलित हैं। समावेशी विधि द्वारा आवृत्ति वितरण सरलता से एवं बिना किसी त्रुटि के बनाये जा सकते हैं; अत: यह विधि प्राप्तांकों को समूहबद्ध करने की सर्वश्रेष्ठ विधि है।

(2) शुद्ध वर्गीकृत श्रृंखला (Pure Classification Method) – यह विधि सांख्यिकीय दृष्टि से विशुद्ध हैं; क्योंकि इसमें वास्तविक सीमाएँ प्रदर्शित की गयी हैं। यहाँ प्रत्येक वर्ग की उच्चतम तथा निम्नतम सीमाएँ जानने के लिए प्राप्तांकों की वास्तविक सीमाओं की गणना करते हैं। निम्नतम सीमा जानने के लिए उसे प्राप्तांक में से 0.5 घटा देते हैं तथा उचचतम सीमा जानने के लिए 0.5 जोड़ देते हैं। उदाहरण के लिए-पहले वर्गान्तर 40-44 की निम्नतम सीमा 40-0.5 = 39.5 हुई और उच्चतम सीमा 44+ 0.5 = 44.5 हुई। इसी तरह से सभी वर्गों का निर्माण करते हैं। इस विधि की परिसीमा यह है कि इसमें समय अधिक व्यय होता है।

(3) अपवर्जी विधि (Exclusive Method) – अपवर्जी विधि में वर्गान्तर 40-45 का अर्थ यह है कि इस वर्ग में 40 से लेकर 44 तक के अंक शामिल हैं किन्तु 45 शामिल नहीं हैं। 45 प्राप्तांक पहले वर्ग में न होकर दूसरे वर्ग में है। इसी प्रकार वर्गान्तर 45-50 का अर्थ है कि इसमें 45 से 49 तक शामिल हैं लेकिन 50 नहीं। 50 तीसरे वर्ग में है। अपवर्जी विधि का एक दोष यह है कि इसमें कभी-कभी भ्रमवश आवृत्ति चिह्न (अंकदण्ड) गलत वर्ग के सामने लग जाता है। क्योंकि 50 का अंक 45-50 में भी लिखा है और 50-55 में भी, जबकि इसे शामिल 50-55 वाले वर्ग में करना है; अतः यह ध्यान रखना चाहिए।

वर्गान्तर का मध्य-बिन्द ज्ञात करना
(Mid-point of a Class Interval)

किसी वर्गान्तर का मध्य-बिन्दु (Mid-point) उस वर्गान्तर के निम्नतम और उच्चतम प्राप्तांकों को जोड़कर तथा योग का आधार करने पर प्राप्त हो सकता है। इसके लिए अग्रलिखित सूत्र प्रयोग करते हैं –
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प्रश्न 7.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप से क्या आशय है। केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप के मुख्य उद्देश्य का भी उल्लेख कीजिए।
या
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
समंकों की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं को स्पष्ट करने के लिए सांख्यिकीय विश्लेषण में केन्द्रीय प्रवृत्ति (Central Tendency) की माप का महत्त्वपूर्ण स्थान है। समंकों के वर्गीकरण तथा सारणीयन से समंक सरल, सुबोध, व्यवस्थित तथा तुलनीय तो बन जाते हैं किन्तु इससे उनकी महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ प्रकट नहीं होतीं; अत: एक ऐसी विधि की आवश्यकता है जिसके द्वारा एक ही संख्या से सभी संगृहीत आँकड़ों को प्रतिनिधित्व कराया जा सके। इसके लिए केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकीय माध्यमों का अध्ययन आवश्यक है।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप : अर्थ
(Definitions of Measures of Central Tendency or Average)

संगृहीत आँकड़ों के मध्य ऐसी संख्या, जो सभी आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करती हो, तो न तो समूह की न्यूनतम मान वाली संख्या होगी और न ही अधिकतम मान वाली। अवश्य ही, वह संख्या समूह के मध्य या उसके आस-पास की संख्या होगी। अत; आँकड़ों में से किस एक आँकड़े के पास पाये जाने की उनकी प्रवृत्ति को केन्द्रीय प्रवृत्ति (Central Tendency) कहा जाता है तथा इस माध्य या औसत को केन्द्रीय माप या केन्द्रीय प्रवृत्ति की मान कहते हैं।

इस भाँति केन्द्रीय प्रवृत्ति से तात्पर्य उस मान से है जो प्राप्त आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करता है। अर्थात् वह मान जो प्राप्त आँकड़ों में सबसे अधिक बार आया हो। साधारणत: केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों से हमारा अर्थ ‘सांख्यिकीय माध्य’ या ‘औसत (Average) से होता है; क्योंकि सांख्यिकी माध्यम के आस-पास सभी आँकड़े वितरित होते हैं।

वह संख्या, जो किसी समूह-विशेष के सभी आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करती है, उस समूह का सांख्यिकीय माध्य से औसत कहलाती है।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य की परिभाषाएँ
(Definitions of Measures of Central Tendency or Average)

सांख्यिकीय माध्य या केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) सिम्पसन और काक्का के अनुसार, “केन्द्रीय प्रवृत्ति का माप एक ऐसा प्रतिरूपी मूल्य है। जिसकी ओर अन्य संख्याएँ केन्द्रित होती हैं।”

(2) क्लार्क और शकाडे के मत में, “माध्ये सम्पूर्ण समंक समूह का विवरण देने वाली एकमात्र संख्या प्राप्त करने का प्रयत्न है।”

(3) क्रॉक्सटन और काउडेन के मतानुसार, “माध्य समंकों के विस्तार के अन्तर्गत स्थित एक ऐसा पद है। जिसका प्रयोग श्रेणी के सभी पदों का प्रतिनिधित्व करने के लिए किया जाता है। समंक माला के विस्तार के अन्तर्गत स्थित होने के कारण माध्य को कभी-कभी केन्द्रीय मूल्य का माप भी कहा जाता है।

समंक माला के कुछ पद (मूल्य) माध्य से छोटे तथा कुछ मूल्य बड़े होते हैं; अत: माध्य समंक श्रेणी की केन्द्रीय प्रवृत्ति को प्रदर्शित करता है। अन्त में कह सकते हैं कि माध्य समंक श्रेणी का मध्य मूल्य होता है जो श्रेणी की बनावट वे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं को बतलाता है।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य के उद्देश्य
(Objectives of Averages)

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या औसत या सांख्यिकीय माध्य के महत्त्वपूर्ण उद्देश्य निम्नलिखित है।

(1) जटिल तथ्यों को सरल रूप में प्रस्तुत करना – जिससे वे आसानी से समझ में आ सकें।

(2) विस्तृत तथ्यों को संक्षिप्तता प्रदान करना – माध्य तथ्यों के विशाल समूह को एक संख्या के रूप में प्रस्तुत कर देता है। इससे विशाल समूह की जानकारी प्राप्त हो जाती हैं। मोरेनो के अनुसार, माध्य का उद्देश्य व्यक्तिगत मूल्यों के समूह का सरल और संक्षिप्त रूप में प्रतिनिधित्व करना है। जिससे मस्तिष्क समूह की इकाइयों के सामान्य आकार को असानी से समझ सके।”

(3) समग्र की रचना तथा विशेषताओं की जानकारी प्रदान करना – माध्य के द्वारा सारे समूह की सामान्य बनावट (रचना) की जानकारी मिल जाती है। सम्पूर्ण समूह की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं तथा गुणों की जानकारी भी मिलती है।

(4) तुलना में सहायता – माध्यों के द्वारा दो या दो से अधिक समूहों, प्रदेशों के कुछ खास लक्षणों का तुलनात्मक अध्ययन कर सकते हैं। दो कक्षा के छात्रों के माध्य से उनके भार या ऊँचाई की जानकारी मिल जाती है।

(5) मार्गदर्शक के रूप में कार्य करना – सांख्यिकीय माध्यम मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है। माध्य की जानकारी से समूह के विकास सम्बन्धी नीतियों के निर्धारण में सहायता मिलती है।

(6) सांख्यिकीय विश्लेषण का आधार – माध्यम विभिन्न वर्गों में गणितीय सम्बन्ध स्थापित करता है। माध्य से विभिन्न समूहों का सांख्यिकीय विश्लेषण किया जाता है।

(7) माध्य बहुत बड़े समूह या वार्ड के प्रतिनिधि के रूप में कार्य किया करता है।

अन्त में कह सकते हैं कि माध्यों का विश्लेषण में महत्त्वपूर्ण स्थान है। डॉ० बाउले के शब्दों में, “माध्य का उद्देश्य जटिल समूहों तथा विशाल क्रियाओं को कुछ महत्त्वपूर्ण शब्दों में या संख्याओं में प्रस्तुत करना है।”

प्रश्न 8.
मध्यमान अथवा समान्तर माध्य (Mean) से आप क्या समझते हैं? मध्यमान ज्ञात करने की विधियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
मध्यमान की परिभाषित कीजिए।
उत्तर :
मध्यमान अथवा समान्तर माध्य
(Mean or Arithmetic Mean)

अंकगणित में जिस मान को औसत (Average) कहा जाता है, उसे हम सांख्यिकी में मध्यमान अथवा समान्तर माध्य (Mean or Arithmetic Mean) कहते हैं। मध्यमान को ‘M’ अक्षर द्वारा प्रदर्शित करते हैं।

परिभाषा – “मध्यमान वह मान है जो दिये हुए पदों के योगफल में पदों की संख्या से भाग देने पर प्राप्त होता है।”

या किसी अंक-सामग्री के समस्त अंकों के योगफल को उन अंकों की संख्या से भाग देने से जो भागफल प्राप्त होता है, उसे मध्ययान कहते हैं।”

या “मध्यमान वह प्राप्तांक है जिसके दोनों ओर विचलन समान होता है।”

उदाहरण 1 – यदि कक्षा 8 के पाँच विद्यार्थियों के भार क्रमानुसार 54, 2, 56, 53 तथा 50 किलोग्राम हों तो इनके मध्यमान की गणना कीजिए।
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मध्यमान ज्ञात करना
(Calculation of Mean)

मध्यमान अव्यवस्थित (Ungrouped) तथा व्यवस्थित (Grouped) दोनों ही प्रकार के प्राप्तांकों की मदद से निकाला जा सकता है –

(I) अव्यवस्थित प्राप्तांकों से मध्यमान की गणना (The mean of the Ungreuped Scores) – (N) अव्यवस्थित प्राप्तांकों को मध्यमान निकालने के लिए अव्यवस्थित अंकों को जोड़ लेते हैं तथा प्राप्त योगफल को अंकों की संख्या से भाग दे देते हैं। इसके लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है –
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उदाहरण 3 – नीचे तालिका में प्राप्तांक तथा उनके सामने आवृत्तियाँ लिखी गयी हैं, मध्यमान की गणना कीजिए –
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  1. सबसे पहले प्रत्येक वर्गान्तर (Class-interval) का मध्य-बिन्दु ज्ञात किया जाता है।
  2. प्रत्येक मध्य-बिन्दु को तत्सम्बन्धी आवृति से गुणा कर लेते हैं।
  3. गुणनफलों के योगफल को आवृत्तियों की कुल संख्या से विभाजित कर देते हैं।

उदाहरण 4 – मीचे दी गयी सारणी का दीर्घ विधि द्वारा मध्यमान ज्ञात कीजिए –
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उदाहरण 5 – निम्नांकित सारणी का दीर्घ विधि द्वारा मध्यमान ज्ञात कीजिए –
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(2) संक्षिप्त विधि (Short Method) – मध्यमान की गणना की दीर्घ विधि में समय बहुत ज्यादा लगता है; अत: सामान्यतया, संक्षिप्त विधि से मध्यमान की गणना की जाती है। इसके क्रमागत पद निम्नलिखित हैं –

    1. सबसे पहले वर्गान्तरों के बीच से मध्यवर्ती वर्गान्तर ज्ञात किया जाता है। इस मध्यवर्ती वर्गान्तर का मध्य-बिन्दु ही कल्पित मध्यमान (Assumed Mean) है। सर्वाधिक आवृत्तियों वाले, वर्गान्तर को मध्यवर्ती वर्गान्तर मानना उचित होता है।
    2. इस कल्पित मध्यमान को प्रत्येक मध्य-बिन्दु में से घटाकर विचलन (Deviation) (X- A) ज्ञात किया जाता है।
    3. अब विचलन को वर्ग–अन्तराल से भाग देते हैं। भागफल को संक्षिप्त विचलन Step Deviation) (d) कहते हैं।
    4. स्पष्टंत: कल्पित मध्यमान वाले वर्गान्तर के सामने वाले स्तम्भ में ‘0’ लिखा जाएगा। वितरण के जिस ओर मध्य-बिन्दुओं का मान बढ़ता है, उस तरफ विचलन क्रमशः धनात्मक +1,+2, +3, +4,… आदि होता है तथा जिस ओर मध्य-बिन्दुओं का मान घटता है, उस तरफ विचलन क्रमागत ऋणात्मक -1-2-3,-4… आदि होता है।
    5. अब (fd) ज्ञात किया जाता है जिसके लिए वर्गान्तर के सामने की आवृत्तियों को विचलन से गुणा कर देते हैं और (fd) वाले खाने में लिखते हैं।
    6. (∑fd) की गणना के लिए धनात्मक व ऋणात्मक संख्याओं का अलग-अलग योग ज्ञात करके दोनों का अन्तर ज्ञात कर लिया जाता है।
    7. वर्गान्तर का आकार तथा N का मान प्रश्न से देखकर लिख लिया जाता है और सूत्र में ज्ञात मानों को रखकर मध्यमान की गणना कर ली जाती है।
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उदाहरण 7 – नीचे दी गयी सारणी का संक्षिप्त विधि से मध्यमान ज्ञात कीजिए –
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प्रश्न 9.
मध्यांक या माध्यिका (Median) से आप क्या समझते हैं? मुख्य विशेषताओं का उल्लेख करते हुए इसकी गणना की विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
मध्यांक अथवा माध्यिका
(Median)

मध्यांक (या माध्यिका) (Median) दिये हुए आँकड़ों को दो समूहों में विभक्त कर देता है जिसके एक समूह के प्रत्येक पद का मान मध्यांक से कम और दूसरे समूह का मान मध्यांक से अधिक होता है।

परिभाषा – (1) “यदि आँकड़ों को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाये तो बिल्कुल मध्य में पड़ने वाला आँकड़ा ‘मध्यांक’ कहलाता है।”

(2) गैरेट के अनुसार, “जब अव्यवस्थित अंक (Ungrouped Scores) या दूसरी माप, क्रम में व्यवस्थित हो तो मध्य का अंक मध्यांक कहलाता है।”

मध्यांक का संकेत चिह्न Md है।

उदाहरण 1 – किसी कक्षा के पाँच बच्चों की ऊँचाई क्रमानुसार 140, 143, 145, 147, 152 सेमी हैं। और इन्हें ऊँचाईं के आरोही क्रम में खड़ा किया गया है। इनका मध्यांक क्या होगा?

हल – ऊँचाइयाँ आरोही क्रम में-140, 143, 145, 147, 152 पाँच बच्चों की ऊँचाइयों का मध्यांक तीसरे बच्चे की ऊँचाई =145 सेमी होगा।

मध्यांक की विशेषताएँ
(Characterisitics of Median)

मध्यांक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. मध्यांक श्रेणी का केन्द्रीय मूल्य होता है; अत: मध्यांक निर्धारण के लिए श्रेणी को किसी क्रम में व्यवस्थित करना आवश्यक है।
  2. यह श्रेणी का मध्य अंक (बिन्दु) है जिसके ऊपर व नीचे की ओर आधे-आधे प्राप्तांक स्थित होते हैं; अत: मध्यांक का मान इस बात पर निर्भर है कि उसके ऊपर-नीचे कितने प्राप्तांक स्थित हैं, न कि इस बात पर कि उससे प्राप्तांक कितनी दूरी पर स्थित हैं।
  3. मध्यांक की गणना क्रमीय स्तर (Ordinal level) के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है।
  4. वितरण के सिरों पर स्थित प्राप्तांक, मध्यांक के मान को कम प्रभावित करते हैं।
  5. मध्यांक की मानक त्रुटि (Standard Error); मध्यमान की मानक त्रुटि से अधिक किन्तु बहुलक की मानक त्रुटि से कम होती है।

मध्यांक को ज्ञात करना।

मध्यांक की गणना भी ‘आँकड़ों की प्रकृति के अनुसार की जाती है। अव्यवस्थित तथा व्यवस्थित आँकड़ों के मध्यांक को ज्ञात करने की प्रक्रिया का विवरण निम्नलिखित है –

(I) अव्यवस्थित ऑकों का मध्यांक (The Medium of Ungrouped Data) – अव्यवस्थित आँकड़ों का मध्यांक निकालने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान देते हैं –

(1) सर्वप्रथम अव्यवस्थित आँकड़ों को आरोही क्रम (Ascending Order) या अवरोही क्रम (Descending Order) में रखते हैं।
(2) N की संख्या ज्ञात करके उसमें 1 जोड़ देते हैं और योग को 2 से भाग देकर भागफल निकाल लेते हैं।
(3) भागफल की संख्या वाला पद/स्थान मध्यांक है जिसकी गिनती किसी भी छोर से की जा सकती है।
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11 का विस्तार 10.5 से लेकर 11.5 तक है तथा वर्ग-विस्तार (10.5-11.5) का मध्य-बिन्दु 11 है; अतः मध्यांक =11

(II) व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यांक (The Median of Grouped Data) – व्यवस्थित या वर्गीकृत आँकड़ों का मध्यांक ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित पदों का अनुसरण करना चाहिए –

  1. सर्वप्रथम आवृत्ति वितरण तालिका से दी गयी आवृत्तियों को संचयी आवृत्तियों में बदल लेना चाहिए ताकि यह पता लग सके कि मध्यांक किस वर्गान्तर में है।
  2. इस भाँति उस वर्ग को ज्ञात किया जाता है जिसमें आवृत्तियों के योग के आधार ()[latex]\frac { N }{ 2 } [/latex] स्थित हो। इसे मध्यांक वर्ग कहते हैं।
  3. मध्यांक वर्ग ज्ञात करने के बाद ‘F’, ‘fm’ तथा ” संकेतों के मूल्य ज्ञात करके प्राप्त मूल्यों को निम्नलिखित सूत्र में स्थापित कर मध्यांक की गणना कर लेनी चाहिए –

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हल – प्रश्न में मध्यांक वह बिन्दु होगा जिसके ऊपर ([latex]\frac { 24 }{ 2 } [/latex]) = 12 प्राप्तांक हों। अवलोकन से ज्ञात होता है कि मध्यांक मान 30-39 वाले वर्ग में स्थित है जिसके सम्मुख संचयी आवृत्ति 14 लिखी है।
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विशेष परिस्थितियाँ – आवृत्ति वितरण में मध्यांक की गणना करते समय कुछ विशेष परिस्थितियाँ भी उपस्थित हो सकती हैं जो इस प्रकार हैं –

(i) यदि आवृत्ति वितरण में f का मान °0 दिया गया हो यानी आवृत्ति वितरण के ठीक मध्य में एक अन्तराल (Gap) हो तो मध्यांक की गणना का सूत्र होगा –
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उदाहरण 6 – में 22-24 वर्गान्तर की आवृत्ति ‘0’ है यानी वितरण के ठीक मध्य में एक अन्तराल (Gap) है; अतः यहाँ सूत्र Md = [latex]\frac { L+U }{ 2 } [/latex] प्रयुक्त होगा।
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उदाहरण 7 – में तीन क्रमागत वर्गान्तरों (85-89), (80-84), (75-79) की आवृत्ति ‘0’ दिखायी दे रही है। वितरण में कुल वर्गान्तरों की संख्या 9 है। यहाँ मध्य का वर्गान्तर 80-84 है; अतः =795 और U = 84.5।
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प्रश्न 10.
‘बहुलाक या ‘भूयिष्क (Mol) का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। बहुलाक की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए इसकी गणना की प्रक्रिया को भी स्पष्ट कीजिए।
या
बहुलक किसे कहते हैं?
उत्तर :
बहुलांक (Mode) को हिन्दी में भूयिष्ठक’ भी कहते हैं। यह वह मूल्य या बिन्दु है जिसकी अधिकतम आवृत्ति होती है। सबसे अधिक घनत्व वाले बिन्दु को भी बहुलोक कहते हैं। इस प्रकार से वह मूल्य जिसके आसपास सर्वाधिक श्रेणियाँ केन्द्रित हों बहुलांक कहलाएगा।

उदाहरण 1 – मान लीजिए हमने किसी कक्षा के 15 छात्रों का भार ज्ञात किया जो किग्रा में निम्न प्रकार है –
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हल – इस सारणी में 15 छात्रों में से 6 छात्र ऐसे हैं जिनका भार 51 किग्रा है अर्थात् सर्वाधिक आवृत्ति 51 किग्रा है अर्थात् इन आँकड़ों का बहुलांक 51 किग्रा है।

निष्कर्षतः, सांख्यिकीय आँकड़ों में जिस पद की आवृत्ति अधिकतम हो वह पद बहुलांक कहलाता है।

बहुलांक की परिभाषा
(Definition of Mode)

‘बहुलांक’ को अंग्रेजी में ‘Mode’ कहा गया है। ‘Mode’ शब्द की व्युत्पत्ति फ्रेंच भाषा के ‘la mode’ से हुई है जिसका अर्थ फ्रेंच में फैशन या ‘रिवाज से लिया जाता है। जो वस्तु या मूल्य सर्वाधिक फैशन या चलन में होता है, बहुलांक कहलाती है। उदाहरण के लिए—जूते की दुकान पर उस माप के जूते सबसे ज्यादा संख्या में होंगे जो सबसे ज्यादा लोगों की माप है। इसी भाँति, कपड़े की दुकान पर उस माप के कपड़े अधिक संख्या में होंगे जो अधिकांश लोगों की माप है। यह माप ही बहुलांक है। बहुलांक को Mo से प्रदर्शित किया जाता है।

बहुलांक को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया जा सकता है –

  1. गिलफोर्ड के अनुसार, “किसी वितरण में वह बिन्दु, जिसकी आवृत्ति सर्वाधिक हो, बहुलांक कहलाता है।
  2. क्रॉक्सटन ऐवं काउडेन के अनुसार, “एक श्रेणी का बहुलांक वह मूल्य है जिसके निकट श्रेणी की इकाइयाँ अधिक-से-अधिक केन्द्रित होती हैं।”
  3. ए० एम० टुटले के मतानुसार, “बहुलांक वह मूल्य है जिसके तुरन्त आस-पास आवृत्ति घनत्व अधिकतम होता है।”

बहुलांक की विशेषताएँ
(Characteristics of Mode)

बहुलांक की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. बहुलांक केन्द्रीय प्रवृत्ति को स्थिर एवं विश्वसनीय मान नहीं है, किन्तु इसकी गणना अन्य केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों की अपेक्षा अधिक सरल है।
  2. अव्यवस्थित आँकड़ों में बहुलांक की स्थिति सुनिश्चित नहीं होती; अत: ऐसे समूहों में एक से ज्यादा भी बहुलांक हो सकते हैं।
  3. बहुलांक को वर्गीय स्तर (Nominal Level) के प्राप्तांकों की केन्द्रीय प्रवृत्ति का एकमात्र तथा सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। ऐसी दशाओं में यह केन्द्रीय प्रवृत्ति का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व करता है।

अव्यवस्थित आँकड़ों का बहुलक ज्ञात करना
(The Mode of Ungrouped Data)

अव्यवस्थित आँकड़ों में बहुलांक वह प्राप्तांक होता है जो सबसे अधिक बार दोहराया गया हो, अर्थात् जिसकी आवृत्ति सबसे अधिक हो।

उदाहरण 2 – एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग में निम्नलिखित त्रुटियाँ प्राप्त हुई, इनका बहुलक ज्ञात कीजिए –
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हल – निरीक्षण से ज्ञात होता है कि 13 अंक 3 बार दोहराया गया है, जो सबसे अधिक है अर्थात् इसकी आवृत्ति 3 है। अतः अभीष्ट बहुलांक 3 होगा।

व्यवस्थित आँकड़ों का बहुलांक
(The Mode of Grouped Data)

व्यवस्थित आँकड़ों का बहुलक ज्ञात करने के प्रमुख दो सूत्र हैं –
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इस सूत्रे से बहुलांक की गणना के लिए पहले मध्यमान ज्ञात किया जाता है फिर मध्यांक। मध्यांक में 3 का गुणा करते हैं तथा मध्यमान में 2 का। पहली संख्या में से दूसरी घटाकर बहुलक ज्ञात कर लेते हैं। इस सूत्र की सहायता से बहुलक का सन्निकट मान प्राप्त होता है।
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यहाँ, Mo = बहुलांक (Mode)

L1 = उस वर्गान्तर की निम्नतम सीमा है जिसमें आवृत्तियों की संख्या सर्वाधिक है,
fa = यह उस वर्ग की आवृत्ति है जो बहुलांक मान वाले वर्ग के पास हो तथा जिसकी निम्नतम सीमा बहुलांक व मान वाले वर्ग की निम्नतम सीमा से अधिक हो (Post-modal Class),
fb = यह उस वर्ग की आवृत्ति है जो वर्ग बहुलांक मान वाले वर्ग के पास है तथा जिसकी निम्नतम सीमा बहुलांक मान वाले वर्ग की निम्नतम सीमा से कम हो (Pre-Modal Class), तथा
C.I.= वर्गान्तर

उदाहरण 3 – नीचे दी गयी व्यवस्थित अंक सामग्री से बहुलांक की गणना कीजिए –
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नोट – सूत्र (1) द्वारा ज्ञात Mo का मान 29.16 है, जबकि सूत्र (2) द्वारा ज्ञात Mo को मान 33.79 आता है। दोनों मान भिन्न हैं क्योंकि सूत्र (1) की सहायता से सन्निकट मान प्राप्त होता है।

उदाहरण 4 – नीचे दी गयी सारणी की बहुलक मान ज्ञात कीजिए –
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मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलक पर अभ्यास के लिए कुछ प्रश्न एवं उनके उत्तर,

1. निम्नलिखित आँकड़ों का मध्यमान तथा मध्यांक ज्ञात कीजिए –
5, 6, 6, 4, 7, 9, 10, 15, 13, 22

2. निम्नलिखित प्राप्तांकों का मध्यांक तथा बहुलांक ज्ञात कीजिए –
72, 80, 84, 88, 92, 76, 78,72,74, 72, 80, 62

3. निम्नलिखित व्यवस्थित अंक सामग्री से मध्यमान तथा बहुलांक की गणना कीजिए (N=70) –
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4. नीचे दी गयी सारणी का मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलांक ज्ञात कीजिए (N = 72) –
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5. नीचे दिये गये आवृत्ति वितरण की मदद से केन्द्रवर्ती मान ज्ञात कीजिए (N=84) –
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6. निम्न व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यमान, मध्यांक व बहुलांक ज्ञात कीजिए –
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7. कक्षा 11 के छात्रों की मनोविज्ञान में परीक्षा के प्राप्तांकों का आवृत्ति वितरणनीचे है। इनके द्वारा मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलक ज्ञात कीजिए (N=38) –
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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
समंकों (Data) की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
समंकों की मुख्य विशेषताएँ सांख्यिकी का सम्बन्ध समंकों से होता है। समंकों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) समंक तथ्यों के समूह होते हैं  इसका अभिप्राय यह है कि किसी एक तथ्य से सम्बन्धित संख्या समंक नहीं कही जा सकती है, क्योंकि एक संख्या से कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। उदाहरण के लिए-यदि किसी विद्यार्थी के हिन्दी में प्राप्तांक 40 हैं तो ये प्राप्तांक समंक नहीं कहे जाएँगे, परन्तु यदि उस कक्षा के समस्त विद्यार्थियों के प्राप्तांक दिये हुए हैं तो इन प्राप्तांकों को समंक कहा जाएगा।

(2) समंक संख्याओं के रूप में व्यक्त किये जाते हैं – सांख्यिकी में संख्याओं के रूप में व्यक्त किये गये तथ्य ही समंक कहलाते हैं, न कि गुणात्मक रूप में व्यक्त किये गये तथ्य उदाहरणार्थ–तथ्यों का गुणात्मक रूप; जैसे तीव्र बुद्धि, सामान्य, मन्द बुद्धि समंक नहीं कहलाएँगे; परन्तु यदि इन तथ्यों को हम संख्यात्मक रूप में व्यक्त कर दें तो वे संख्याएँ समंक कही जाएँगी; जैसे-बुद्धि को संख्यात्मक रूप में इस प्रकार व्यक्त किया जाता है –

(3) समंकों के संकलन में उचित शुद्धता होनी चाहिए – समंकों के संकलन में उनकी शुद्धता पर काफी ध्यान देना चाहिए। समंकों की शुद्धता की मात्रा अनुसन्धान के क्षेत्र, उद्देश्य, साधन, समय आदि पर निर्भर करती है।

(4) समंकों को एक-दूसरे से सम्बन्धित रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए – इसका तात्पर्य यह है कि समंक सजातीय तथा समरूप होने चाहिए, तभी उनकी आपस में तुलना की जा सकती है। जैसे-यदि हम किसी कक्षा के एक विद्यार्थी के गणित में प्राप्तांक लिख लें और दूसरे विद्यार्थी की आयु लिख लें तो इन संख्याओं को हम समंक नहीं कह सकते; क्योंकि इन्हें एक-दूसरे से सम्बन्धित नहीं किया जा सकता। परन्तु यदि दोनों विद्यार्थियों के गणित में प्राप्तांक या दोनों की आयु ही लिखें तो वे समंक कहलाये जा सकते हैं।

(5) समंकों के संकलन का पूर्व-निश्चित उद्देश्य होता है – वे संख्यात्मक तथ्य ही समंक कहे जाएँगे जिनके संकलन का पूर्व-निश्चित उद्देश्य होता है। बिना उद्देश्य के एकत्रित किये गये आँकड़े समंक नहीं बल्कि केवल संख्याएँ ही कहलाते हैं।

(6) समंक अनेक कारणों से पर्याप्त सीमा तक प्रभावित होते हैं – समंकों पर अनेक कारणों को सामूहिक रूप से प्रभाव पड़ता है। कोई एक घटना किसी एक कारण का परिणाम नहीं होती, अपितु अनेक कारणों से प्रभावित होती है। जैसे-यदि हाईस्कूल की परीक्षा में अधिक विद्यार्थियों की प्रथम श्रेणी है तो प्रथम श्रेणी के अनेक कारण हो सकते हैं। हो सकता है विद्यार्थी अधिक संख्या में प्रतिभावान हों, अधिक परिश्रम से पढ़ते हों, निरीक्षक उदार हों आदि।

(7) सर्मक व्यवस्थित रूप से संकलित होते हैं – समंक एकत्रित करने के लिए एक निश्चित योजना तैयार की जाती है तथा उन आँकड़ों का विश्लेषण करके समुचित तथा तर्कसंगत निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। संगणकों को आँकड़े एकत्रित करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। समंक प्रश्नावली तथा अनुसूची के अनुसार एकत्र किये जाते हैं।

(8) समंकों को गणना या अनुमान द्वारा संकलित किया जाता है – संमकों को गणना अथवा अनुमान द्वारा एकत्रित किया जाता है। यदि अनुसन्धान का क्षेत्र सीमित है तो गणना द्वारा समंकों का संकलन,किया जा सकता है और यदि क्षेत्र विस्तृत है तो अनुमान द्वारा ही समंकों का संकलन सम्भव है।

प्रश्न 2.
मनोविज्ञान में सांख्यिकी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
या
मनोविज्ञान में सांख्यिकीय अध्ययन की कोई चारे उपयोगिताएँ बताइए।
उत्तर :
मनोविज्ञान में सांख्यिकी का महत्त्व

आधुनिक युग में मनोविज्ञान के अध्ययनों में सांख्यिकी का अपना एक विशिष्ट स्थान है। विभिन्न मनोवैज्ञानिक समस्याओं के अध्ययन में सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। सच तो यह है कि मनोवैज्ञानिक सांख्यिकी का प्रयोग अपनी पसन्द या नापसन्द के आधार पर नहीं करता बल्कि आँकड़ों की प्रकृति के कारण सांख्यिकी का प्रयोग उसे अनिवार्य रूप से करना पड़ता है। सांख्यिकीय विधियाँ उपकल्पना की जाँच, व्यक्तिगत विभिन्नताओं के मापन तथा जटिल मानव-व्यवहार को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सांख्यिकी के प्रयोग से मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के परिणाम निष्पक्ष, विश्वसनीय तथा वैध बन जाते हैं और उनके आधार पर भविष्यवाणियाँ करना सम्भव होता है। मनोविज्ञान में सांख्यिकी का महत्त्व इस प्रकार है

(1) मनोविज्ञान की समस्याओं के अध्ययन में एकत्र किये गये आँकड़े जटिल, अतुलनीय एवं अस्पष्ट होते हैं। सांख्यिकीय विधियों से अव्यवस्थित समंकों को व्यवस्थित रूप में वर्गीकृत करके सारणी, चित्रों व रेखाचित्रों के माध्यम से सरल व बोधगम्य रूप से प्रदर्शित किया जाता है।

(2) मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के सम्बन्ध में सांख्यिकी की मदद से वस्तुगत (Objective) तथा शुद्ध (Accurate) परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं।

(3) सांख्यिकीय अध्ययनों से कुछ निष्कर्ष प्राप्त होते हैं जो तथ्यों की वैधानिक व्याख्या कर सकते हैं। सामान्य निष्कर्षों के निर्धारण में भी सांख्यिकी का महत्त्व है; क्योंकि ये निष्कर्ष सांख्यिकीय सूत्रों व नियमों के आधार पर निकाले जाते हैं।

(4) मनोविज्ञान से सम्बन्धित तुलनात्मक अध्ययनों में शुद्ध विश्वसनीय परिणाम निकाले जा सकते हैं। साथ ही तुलना ज्यादा सरल हो जाती है। उदाहरणार्थ-बालकों की बुद्धि की तुलना बुद्धि-लब्धि (1.2.) द्वारा सम्भव है।

(5) सांख्यिकीय अध्ययनों के आधार पर व्यवहार से सम्बन्धित निष्कर्षों के आधार मनोवैज्ञानिक पूर्वकथन या भविष्यवाणी कर सकते हैं।

(6) मनोविज्ञान के क्षेत्र में प्राय: अध्ययन प्रतिदर्श (Sample) पर आधारित होते हैं। प्रतिदर्श समष्टि (Universe) का प्रतिनिधि होता है। सांख्यिकी विधियाँ प्रतिनिधित्वपूर्ण प्रतिदर्श का चयन करने में सहायक हैं।

(7) मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के निर्माण में सांख्यिकी का अत्यधिक महत्त्व है। मानसिक व शारीरिक योग्यताओं के मापन हेतु बहुत-से मनोवैज्ञानिक परीक्षण निर्मित होते हैं; उदाहरणार्थ-बुद्धि परीक्षण, व्यक्तित्व परीक्षण तथा रुचि परीक्षण आदि।

स्पष्टत: मेनोविज्ञान के क्षेत्र में सांख्यिकी का विशेष महत्त्व है।

प्रश्न 3.
आँकड़ों के व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
आँकड़ों के व्यवस्थापन यो आवृत्ति वितरण का महत्त्व

आँकड़ों के व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण का महत्त्व निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत प्रतिपादित किया जा सकता है –

(1) संगृहीत किन्तु अव्यवस्थित आँकड़ों से तत्सम्बन्धी समस्या या अध्ययन विषय के परिणाम के सम्बन्ध में उचित निर्णय लेने में कठिनाई होती है। आँकड़ों को व्यवस्थित करने अर्थात् आवृत्ति वितरण बनाने पर ये ही आँकड़े संक्षिप्त, स्पष्ट तथा बोधगम्य महसूस होते हैं और इनके द्वारा परिणामों के बारे में सरलतापूर्वक उचित निर्णय दिया जा सकता है।

(2) व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण द्वारा सांख्यिकीय आँकड़ों का संक्षिप्त प्रदर्शन सम्भव है। अर्थात् आवृत्ति वितरण आँकड़ों को अर्थपूर्ण बनाने का एक सरल उपाय है। वस्तुतः अव्यवस्थित आँकड़े अर्थहीन होते हैं जिनके गुण-दोषों को सामान्यतः व्यक्ति ग्रहण नहीं कर पाता है। आवृत्ति वितरण तालिका में प्रदर्शित होकर ये ही आँकड़े अर्थपूर्ण बन जाते हैं जिन्हें व्यक्ति सरलता से ग्रहण कर लेता है।

(3) सारणीयन में आवृत्ति वितरण तालिका बनाने के उपरान्त तालिका (Table) का सिर्फ अवलोकन करके ही आँकड़ों का अर्थ ज्ञात किया जा सकता है।

(4) आवृत्ति वितरण तालिका के माध्यम से समान या सजातीय गुण (Homogeneous Characters) पूरी तरह स्पष्ट हो जाते हैं।

(5) आवृत्ति वितरण से आँकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन एकदम सरल हो जाता है।

आँकड़ों के व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण के महत्त्व को हम एक उदाहरण के माध्यम से अच्छी प्रकार समझ सकते हैं। मान लीजिए, हमें कक्षा XI के छात्रों की अंक-सूची (Marks-list) प्राप्त है। क्योंकि ये अंक अव्यवस्थित हैं; अतः इनसे परीक्षण के परिणाम के बारे में उचित निर्णय देना दुष्कर होगा। इन प्राप्तांकों को सुव्यवस्थित करैने पर अर्थात् इनका आवृत्ति वितरण तैयार करने पर यही अंक-सूची एक संक्षिप्त, स्पष्ट तथा बोधगम्य स्वरूप में हमारे सामने आ जाएगी। अब हम इसके माध्यम से आसानी से बता पाएँगे कि कितने छात्रों ने प्रथम श्रेणी, कितनों ने द्वितीय और तृतीय श्रेणी प्राप्त की है तथा कितने छात्र परीक्षा में अनुत्तीर्ण हुए हैं।

प्रश्न 4.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य के महत्त्व एवं उपयोगिता का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य : महत्त्व और उपयोगिता

माध्य के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए प्रो० फिशर ने कहा है कि विशाल संख्यात्मक तथ्यों को समझाने के लिए माध्य बहुत उपयोगी अंक है। सांख्यिकीय में माध्य के अत्यधिक महत्त्व के कारण ही डॉ० बाउले ने तो सांख्यिकी को माध्यों का विज्ञान (Science of Averages) तक कह दिया है। सांख्यिकी विश्लेषण की दूसरी अनेक विधियाँ माध्य पर ही अवलम्बित हैं।

व्यक्तिगत इकाइयों का सांख्यिकी में कोई महत्त्व या उपयोगिता नहीं है किन्तु माध्यों के द्वारा सभी इकाइयों की सामूहिक विशेषताओं व लक्षणों को आसानी से प्रकट किया जा सकता है। इसी प्रकार एक व्यक्ति की आये या आयु का कोई महत्त्व नहीं है, किन्तु सम्पूर्ण समाज की औसत आय या आयु का अत्यधिक महत्त्व है। इस तरह माध्य का समाज में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण स्थान है। माध्य के महत्त्व पर प्रो० टिप्पेट ने इस प्रकार प्रकाश डाला है—“माध्य की अपनी सीमाएँ (कमियाँ)होती हैं, किन्तु यदि उनको स्वीकार किया जाए तो कोई भी एक सांख्यिकीय संख्या माध्य से अधिक उपयोगी नहीं होती है।”

गैरेट (H.E. Garrett) ने केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों का महत्त्व इस प्रकार प्रतिपादित किया है –

  1. केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप समूह के प्राप्तांकों का प्रतिनिधित्व करती है।
  2. यह समूचे समूह के गुणों को संक्षेप में प्रदर्शित कर देती है।
  3. इसकी सहायता से दो या दो से अधिक समूह के कार्यों एवं गुणों का बोध व उनकी तुलना आसानी से की जा सकती है।
  4. इनके द्वारा ढेर सारे प्राप्तांकों के अर्थ को सिर्फ कुछ अंकों या शब्दों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।
  5. प्रामाणिक विचलन (Standard Deviation) तथा सह-सम्बन्ध (Correlation) जैसे उच्च सांख्यिकीय विश्लेषण में केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप आवश्यक होती है।
  6. उच्च सांख्यिकीय अध्ययनों में केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप का प्रयोग प्राथमिक सांख्यिकीय विधियों के रूप में किया जाता है।

प्रश्न 5.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकी माध्य की प्रमुख विशेषताओं एवं गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकीय माध्य की
प्रमुख विशेषताएँ एवं गुण

‘केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों का आदर्श माध्य में निम्नलिखित विशेषताएँ तथा गुण अनिवार्य रूप से होने चाहिए –

(1) सरल – एक अच्छी माध्य वही हो सकता है जो समझने तथा गणना करने में सरल हो। इससे उसका उपयोग व्यापक रूप में किया जा सकती है।

(2) स्पष्टता और निश्चितता – माध्य की परिभाषा स्पष्ट होनी चाहिए। उसकी कितनी ही बार गणना की जाये, उसका मान हमेशा ही समान आना चाहिए। अनुसन्धानकर्ता के अनुमान की गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए। परिभाषा में भिन्न-भिन्न अर्थ न निकले।।

(3) प्रतिनिधित्व – माध्य ऐसा होना चाहिए कि समंक माला अर्थात् समूह के प्रमुख-प्रमुख लक्षण उसमें दिखाई दें। समग्र के प्रत्येक पद में उसके निकट रहने की प्रवृत्ति दिखलाई दे।

(4) बीजगणितीय क्रियाओं के योग्य – माध्य ऐसा हो कि उससे बीजगणितीय क्रियाएँ अर्थात् । जोड़, बाकी, गुणा एवं भाग आसानी से की जा सकें।

(5) माध्ये एक निरपेक्ष संख्या होनी चाहिए – माध्यम समंक माला की संख्याओं में हो,.न कि प्रतिशत या दूसरे सापेक्ष रूप में।

(6) न्यादर्श में परिवर्तन से माध्य बहुत कम प्रभावित हो। न्यादर्श के बदल जाने से माध्य में परिवर्तन न हो या क-से-कम हो। समग्र में से एक तरीके से अनेक न्यादर्श चुने जाये जिनके माध्य लगभग समान हों।

(7) समंक माला के सभी पदों पर आधारित होना चाहिए – माध्य किसी एक पद पर आधारित न हो, तभी माध्य समग्र का प्रतिनिधित्व कर सकता है।

(8) माध्ये सीमान्त पदों से अधिक प्रभावित नहीं होना चाहिए, वह सभी पदों पर आधारित हो।

प्रश्न 6.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकीय माध्य की सीमाओं या दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकीय माध्य की सीमाएँ या दोष

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य की प्रमुख सीमाएँ या दोष निम्नलिखित हैं –

  1. सांख्यिकीय माध्य से सिर्फ समूह के गुणों, कार्यों तथा विशेषताओं को ही समझा जा सकता है, ये व्यक्तिगत विशेषताओं का वर्णन नहीं करते।
  2. यदि समूह के गुणों, कार्यों तथा विशेषताओं में विषमता पायी जाये तो उस दशा में सांख्यिकी माध्य समूह की प्रतिनिधित्व नहीं करते, जिसका परिणाम यह होता है कि उच्च सांख्यिकीय विश्लेषण के दौरन दूषित और भ्रामक निष्कर्ष निकलते हैं।
  3. अलग-अलग तरह के सांख्यिकी विश्लेषण में सांख्यिकीय माध्य के अलग-अलग मापक भिन्न परिणाम प्रस्तुत करते हैं।

प्रश्न 7.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख कीजिए तथा इनका तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य के प्रकार

सांख्यिकी में माध्य कई प्रकार के होते हैं जिनमें से प्रमुख माध्ये निम्नलिखित हैं –

  1. मध्यमान (Mean)
  2. मध्यांक माने (Median) तथा
  3. बहुलांक मान (Mode)।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की विभिन्न मापों की तुलना

मध्यमान, मध्यांक और बहुलांक – केन्द्रीय प्रवृत्ति की इन तीन मापों में समानता या विषमता, आवृत्ति वितरण की प्रकृति पर निर्भर है। इस विषय में निम्नलिखित दशाएँ अनुभव में आती हैं –

(1) सममित (Symmetrical) आवृत्ति वितरण की स्थिति में मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलक तीनों को मान समान आता है।
(2) विषमता (Skewness) आवृत्ति वितरण होने पर इन तीनों अर्थात् मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलक के मान भिन्न-भिन्न आते हैं। यहाँ दो स्थितियाँ सम्भव हैं –
(a) धनात्मक विषमता (Positively Skewed Distribution) में मध्यमान का मूल्य कम, मध्यांक को मध्यमान से अधिक तथा बहुलांक का मध्यांक से भी अधिक होता है।
(b) ऋणात्मक विषमता (Negatively Skewed Distribution) में मध्यमान का मान सबसे अधिक, मध्यांक का मान उससे कम तथा बहुलांक का मान सबसे कम होता है।
(3) मध्यमान सबसे अधिक शुद्ध, मध्यांक अपेक्षाकृत कम शुद्ध तथा बहुलांक सबसे कम शुद्ध मान स्वीकार किये गये हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सांख्यिकी की परिभाषा दीजिए।
उत्तर :
प्रो० सेलिगमैन ने सांख्यिकी की एक स्पष्ट परिभाषा इन शब्दों में प्रतिपादित की है, सांख्यिकी वह विज्ञान है जो किसी भी अनुसन्धान (जाँच) के क्षेत्र पर प्रकाश डालने के लिए संख्यात्मक आंकड़ों का संग्रहण, प्रस्तुतीकरण, वर्गीकरण, तुलना तथा निर्वचन की रीतियों का प्रयोग करता है।”

प्रश्न 2.
सांख्यिकी की किन्हीं दो विशेषताओं के बारे में लिखिए।
उत्तर :

  1. सांख्यिकी विज्ञान तथा कला दोनों है।
  2. सांख्यिकी में किसी अनुसंधान क्षेत्र से सम्बन्धित सामूहिक संख्यात्मक तथ्यों के संकलन, प्रदर्शन, विश्लेषण तथा निर्वचन की रीतियों का विधिवत् अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 3.
सांख्यिकी की मुख्य सीमाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
यह सत्य है कि सांख्यिकी की अत्यधिक उपयोगिता एवं महत्त्व है, परन्तु इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। सर्वप्रथम हम कह सकते हैं कि सांख्यिकी के माध्यम से केवल संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन किया जा सकता है, इसके माध्यम से गुणात्मक तथ्यों का अध्ययन नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार सांख्यिकी के माध्यम से विजातीय तथ्यों का अध्ययन नहीं किया जा सकता है। यही नहीं, इसके माध्यम से केवल समूह का अध्ययन किया जा सकता है, व्यक्ति का नहीं। बिना सन्दर्भ से सांख्यिकी के माध्यम से प्राप्त होने वाले परिणाम असत्य तथा भ्रामक होते हैं। सांख्यिकी के माध्यम से प्राप्त होने वाले परिणाम केवल औसत रूप में ही सही हैं। वास्तव में, सांख्यिकी एक साधन है, साध्य नहीं। इन्हीं सीमाओं को ध्यान में रखते हुए यूल तथा केण्डाल ने कहा है, “सांख्यिकीय राीतियाँ अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में खतरनाक औजार हो सकती हैं।”

प्रश्न 4.
प्रदत्त (Data) से क्या आशय है?
उत्तर :
प्रदत्त (Datum) वह तथ्य या सूचना है जिसके आधार पर हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं। किसी परीक्षा में प्राप्तांकों को प्रदत्त कहा जा सकता है। यह परीक्षा उनके व्यवहार के किसी भी पहलू से सम्बन्धित हो सकती है। उदाहरण के लिए-यदि कक्षा बारह के छात्रों की मनोविज्ञान विषय में परीक्षा ली जाये तो परीक्षा में छात्रों को जो प्राप्तांक प्राप्त होंगे उन्हें प्रदत्त कहा जाएगा। प्रयोगों, शोध कार्य या सर्वेक्षणों में जो आँकड़े सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं, उन्हें भी प्रदत्त कहा जाता है। अंग्रेजी में Data शब्द बहुवचन है जबकि Datum शब्द एकवचन।

प्रश्न 5.
प्राप्तांक (Score) के अर्थ एवं सीमाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
“किसी मनोवैज्ञानिक परीक्षा में प्राप्तांक का अभिप्राय उस इकाई से है जो दो सीमान्तों के बीच होती है। उदाहरणार्थ-किसी छात्र के बुद्धि-परीक्षण में 130 प्राप्तांक का अर्थ दो सीमान्तों 129.5-130.5 में लगाया जाता है। यहाँ 130 प्राप्तांक 129.5-130.5 का मध्य-बिन्दु है।

सांख्यिकी में किसी भी प्राप्तांक का विस्तार (Interval) दी गई संख्या से आधा इकाई कम से लेकर आधार इकाई अधिक तक माना जाता है। इस भाँति प्रत्येक प्राप्तांक का प्रसार क्षेत्र (Range) एक के बराबर होता है। किसी प्राप्तांक की दो सीमाएँ हैं—उसकी उच्चतम सीमा (Upper limit) तथा उसकी निम्नतम सीमा (Lower limit)। प्राप्तांक की उच्चतम सीमा ज्ञात करने के लिए उसमें 0.5 जोड़ देना चाहिए तथा निम्नतम सीमा ज्ञात करने के लिए उसमें से 0.5 घटा देना चाहिए। प्राप्तांक 130 से हमारा अभिप्राय- 129.5 से लेकर 130.5 तक है तथा प्राप्तांक 130 का मान इन दोनों सीमाओं के मध्य कोई भी हो सकता है। 130.5 इस प्राप्तांक की उच्चतम सीमा तथा 129.5, इसकी निम्नतम सीमा है। प्राप्तांक 150 की उच्चतम सीमा 150 + 0.5 अर्थात् 15.5 तथा निम्नतम सीमा 150-0.5 = 149.5 होगी।। इसी भाँति 151 प्राप्तांक की निम्नतम सीमा 150.05 तथा उच्चतम सीमा 151.5 होगी। इसे निम्नलिखित रूप में प्रदर्शित कर सकते हैं –
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology 60

प्रश्न 6.
सांख्यिकी में प्रसार क्या है?-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकी में प्राप्तांकों में परिवर्तनशीलता की मापों को ज्ञात किया जाता है। परिवर्तनशीलता की एक माप को प्रसार (Range) कहा जाता है। यह परिवर्तनशीलता की एक स्थल माप है। जब किसी अध्ययन के दौरान अध्ययनकर्ता के पास कम समय होता है तथा वह प्राप्तांकों के विवरण की परिवर्तनशीलता को जानना चाहता है तो उस स्थिति में विवरण के प्रसार को ज्ञात करने का प्रयास किया जाता है। नियमानुसार प्रसार को निम्नलिखित सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है –
प्रसार (Range)= (उच्चतम प्राप्तांक-न्यूनतम प्राप्तांक) +1
उदाहरण-उच्चतम प्राप्तांक 80, न्यूनतम प्राप्तांक 5
प्रसार = (80 – 5) + 1 = 76

प्रश्न 7.
मध्यमान (Mean) की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2016]
उत्तर :
मध्यमान में निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं –

  1. मध्यमान दिये गये वितरण का केन्द्र या सन्तुलन बिन्दु होता है।
  2. मध्यमान की स्थिति वितरण के प्रत्येक प्राप्तांक से प्रभावित होती है। उदाहरणार्थ—प्राप्तांकों में से किसी प्राप्तांक को घटाने या बढ़ाने पर वितरण का मध्यमान भी घट या बढ़ जाएगा।
  3. वितरण के सभी प्राप्तांकों को एक निश्चित संख्या से गुणा करने पर मध्यमान का मान उस संख्या के गुणनफल के बराबर हो जाएगा।
  4. केन्द्रीय प्रवृत्ति के मापों में मध्यमान एक निष्पक्ष (Unbiased) सांख्यिकी है जिसमें मानक त्रुटि (Standard Error) कम होती है।

प्रश्न 8.
मध्यसान के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मध्यमान के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं –

  1. केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों में सर्वाधिक शुद्ध माप मध्यमान है।
  2. यह सबसे अधिक विश्वसनीय सांख्यिकी है।
  3. इसकी गणना शीघ्र तथा सरलता से हो जाती है।
  4. मध्यमान वितरण के प्राप्तांकों का विशुद्ध प्रतिनिधित्व करता है।
  5. केन्द्रीय प्रवृत्ति की अन्य मापों की अपेक्षा मध्यमान की मदद से तुलना करना अधिक सरल
  6. प्रामाणिक विचलन तथा सहसम्बन्ध गुणांक जैसी सांख्यिकी गणनाओं में मध्यमान की गणना जरूरी है।

प्रश्न 9.
मध्यमान के मुख्य दोषों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट कीजिए कि इसका प्रयोग कब उचित होता है?
उत्तर :
मध्यमान के कुछ दोष ये हैं –

  1. मुक्त सिरों वाले या अपूर्ण प्राप्तांक वितरण के अन्तर्गत मध्यमान प्रयोग नहीं किया जा सकता।
  2. इसी प्रकार असामान्य अंक-वितरण के अन्तर्गत भी मध्यमान की जगह मध्यांक का प्रयोग उचित समझा जाता है।

मध्यमान का प्रयोग कब और कहाँ करना उचित है, इसके लिए कुछ निर्देश नीचे दिये जा रहे

  1. सबसे अधिक शुद्ध एवं विश्वसनीय केन्द्रीय प्रवृत्ति ज्ञात करने हेतु मध्यमान का प्रयोग किया जाता है।
  2. जब बहुलांक, प्रामाणिक विचलन तथा सहसम्बन्ध आदि की गणना करनी हो, तब भी मध्यमान की गणना आवश्यक होती है।
  3. सामान्य वितरण (अर्थात् जब दिये गये प्राप्तांकों के सभी अंक समान रूप से वितरित हों) के अन्तर्गत भी मध्यमान प्रयुक्त होती है।
  4. मध्यमान की गणना तुलनात्मक अध्ययन के समय भी आवश्यक होती है।

प्रश्न 10.
मध्यांक (Median) के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मध्यांक के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं –

  1. सरलता – मध्यांक को ज्ञात करना तथा इसे समझना दोनों ही बहुत आसान हैं।
  2. चरम मूल्यों से अप्रभावित – मध्यांक के मूल्य पर श्रेणी के सबसे बड़े या छोटे मूल्य का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
  3. गुणात्मक विशेषताओं के अध्ययन में उपयोगी – गुणात्मक तथ्य; जैसे-बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य, ईमानदारी, गरीबी आदि के निर्धारण में यह अति उपयोगी होता है।
  4. निश्चितता – मध्यांक का मूल्य बहुलांक की भाँति अस्पष्ट और अनिश्चित नहीं होता है।
  5. अधूरे समंक से मध्यांक निर्धारण सम्भव है। केवल मध्यांक वर्ग तथा कुछ दूसरी सूचनाएँ मिल जाने पर ही इसको ज्ञात कर सकते हैं। सम्पूर्ण पदमाला की जानकारी जरूरी नहीं।
  6. इसको बिन्दुरेख विधि से भी ज्ञात कर सकते हैं। निरीक्षण से भी मध्यांक का निर्धारण किया जा सकता है।

प्रश्न 11.
मध्यांक (Median) के मुख्य दोषों या सीमाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मध्यांक के मुख्य दोष या सीमाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. सीमान्त मूल्यों की उपेक्षा – सामान्यत: मध्यांक निर्धारण में श्रेणी के सीमान्त पदों पर ध्यान नहीं दिया जाता है। इस तरह मध्यांक में सभी पदों को समान महत्त्व नहीं देते हैं।
  2. आवश्यक क्रियाएँ – श्रेणी को आरोही या अवरोही आधार पर व्यवस्थित करने का कार्य अनिवार्य रूप से करमा पड़ता है।
  3. निर्धारण में कठिनाई – यदि मध्य पद दो मूल्यों के बीच आता है, तब मध्यांक मूल्य बिल्कुल ठीक नहीं होता है। केन्द्रीय मूल्यों के औसत को मध्यांक लिया जाता है। इसी तरह सतत श्रेणी में भी यह इस मान्यता पर आधारित है कि प्रत्येक वर्ग में आवृत्तियाँ समान हैं।
  4. कभी-कभी मध्यांक एक प्रतिनिधि माप नहीं होता है विशेषकर पदों की संख्या कम होने पर।
  5. मध्यांक बीजगणितीय विवेचन में अनुपयोगी रहता है। मध्यांक मूल्य को पदों की संख्या से गुणा करने पर पदों के मूल्यों का योग मालूम नहीं कर सकते हैं।

प्रश्न 12.
मध्यांक के उचित प्रयोग सम्बन्धी कुछ निर्देश दीजिए।
उत्तर :
मध्यांक के उचित प्रयोग हेतु निम्नलिखित निर्देश दिये जा सकते हैं –

  1. मध्यांक की गणना असामान्य वितरण की स्थिति में करनी चाहिए जबकि अंक सामग्री का वास्तविक मध्य-बिन्दु पता लगाना हो।
  2. श्रेणी के शुरू तथा अन्तर के अंक जब मध्यमान को प्रभावित करते हों तब भी मध्यांक की गणना की जाती है। उदाहरणार्थ – 2, 3, 4, 5, 6 का मध्यमान (M) तथा मध्यांक (Md) 4 है। यदि 6 के स्थान पर 11 हो तो मध्यांक 4 ही रहेगा लेकिन मध्यमान 5 हो जाएगा।
  3. इसकी गणना उस समय की जानी उचित है जबकि अपेक्षाकृत कम शुद्ध केन्द्रीय प्रवृत्ति के मान की आवश्यकता हो।
  4. बहुलांक (Mode) की गणना के समय भी मध्यांक ज्ञात किया जाता है।

प्रश्न 13.
बहुलांक (Mode) के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
बहुलांक के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं –

  1. निर्धारण में सरलता—इसको निरीक्षण अर्थात् देखकर भी तय किया जा सकता है।
  2. बिन्दुरेखीय विधि से भी इसका निर्धारण कर सकते हैं।
  3. प्रतिनिधित्व-बहुलांक मूल्य श्रेणी का सबसे श्रेष्ठ प्रतिनिधि माना जाता है।
  4. सीमान्त पदों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
  5. उद्योग, व्यापार एवं वाणिज्य में इसका बहुत उपयोग होता है। विशेषकर जूते निर्माताओं, सिले-सिलाये वस्त्र तैयार करने वालों आदि के लिए यह बहुत उपयोगी है।

प्रश्न 14.
बहुलांक (Mode) के मुख्य दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
बहुलांक के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं –

  1. समान आवृत्तियाँ होने पर इसका निर्धारण कठिन हो जाता है।
  2. सीमान्त मूल्यों की अवहेलना होती है।
  3. बीजगणितीय विश्लेषण सम्भव नहीं है।
  4. श्रेणी के सभी पदों पर आधारित नहीं होता है।
  5. श्रेणी में कभी-कभी बहुलांक भ्रमात्मक होता है।

प्रश्न 15.
बहुलांक (Mode) का प्रयोग किन परिस्थितियों में किया जाना चाहिए?
उत्तर :

बहुलांक का प्रयोग निम्नलिखित परिस्थितियों में करना वांछित है –

  1. सबसे कम शुद्ध केन्द्रीय प्रवृत्ति के मान की गणना के समय बहुलांक का प्रयोग उचित है।
  2. यदि निरीक्षण-मात्र से ही केन्द्रीय प्रवृत्ति की गणना करनी हो तो बहुलक उपयोगी है।
  3. वितरण के कुछ वर्ग या अंक छूटे होने पर भी बहुलांक का प्रयोग उचित है।
  4. व्यापार में अधिक प्रचलित वस्तु या लोकप्रिय फैशन से जुड़ी समस्या के अध्ययन में बहुलांक का सर्वाधिक प्रयोग होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. बहुवचन में सांख्यिकी शब्द का अर्थ ………………….. से है, जो किसी विशिष्ट क्षेत्र से सम्बन्धित संख्यात्मक तथ्य होते हैं।
  2. ………………….. प्रदत्तों के संग्रह, उनके विश्लेषण तथा निष्कर्ष निकालने का विज्ञान है।
  3. सांख्यिकी में संख्याओं के रूप में व्यक्त किये गये तथ्य ही ………………….. कहलाते हैं।
  4. मनोविज्ञान के क्षेत्र में तुलनात्मक अध्ययन करने में सांख्यिकी ………………….. होती है।
  5. सांख्यिकी केवल संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन करती है, ………………….. का नहीं।
  6. सांख्यिकी द्वारा केवल ………………….. तथ्यों का ही अध्ययन किया जा सकता है।
  7. सांख्यिकी अपने आप में एक साधन है, ………………….. नहीं।
  8. संकलित आँकड़ों को जब एक निश्चित क्रम में लिखा जाता है तो इस भाँति बनी हुई पदमाला या श्रृंखला को ………………….. कहा जाता है।
  9. दिये गये प्रदत्तों के उच्चतम एवं न्यूनतम अंकों के अन्तर को ………………….. कहते हैं।
  10. आँकड़ों को समानता या सजातीयता के आधार पर वर्गों में व्यवस्थित करने को ………………….. कहते हैं।
  11. किसी प्राप्तांक के बार-बार आने की प्रवृत्ति को ………………….. कहते हैं।
  12. केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप समूह के प्राप्तांकों का ………………….. करती है।
  13. अव्यवस्थित सांख्यिकीय आँकड़ों को व्यवस्थित करके मध्यमान की गणना हेतु ………………….. निर्धारित किया जाता है।
  14. किसी कक्षा के बच्चों के प्राप्तांकों को जोड़कर बच्चों की कुल संख्या से भाग देने पर जो मान प्राप्त होता है, उसे ………………….. कहते हैं।
  15. केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों में सर्वाधिक शुद्ध माप ………………….. है।
  16. सांख्यिकी में दिये गये प्राप्तांकों को ठीक दो बराबर भागों में बांटने वाले बिन्दु को ………………….. कहते हैं।
  17. आरोही अथवा अवरोही क्रम में लिखे पदों के मध्य पद के रूप को ………………….. कहते हैं।
  18. किसी दी गयी पदमाला में सर्वाधिक बार आने वाले मूल्य को ………………….. कहते हैं।
  19. बहुलांक में श्रेणी के सीमान्त मूल्यों की ………………….. होती है।

उत्तर :

  1. सर्मकों या आंकड़ों
  2. सांख्यिकी
  3. समंक
  4. सहायक
  5. गुणात्मक तथ्यों
  6. सजातीय
  7. साध्य
  8. सांख्यिकी श्रेणी
  9. वर्ग विस्तार
  10. वर्गीकरण
  11. केन्द्रीय प्रवृत्ति
  12. प्रतिनिधित्व
  13. कल्पित मध्यमान
  14. मध्यमान
  15. मध्यमान
  16. मध्यांक
  17. मण्यांक
  18. पुलकि
  19. अपहेलना।

प्रश्न II
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए।

प्रश्न 1.
शाब्दिक रूप से सांख्यिकी (Statlalc) का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकी’ शब्द दो अर्थों में प्रयोग होता है। एकवचन के अर्थ में ‘सांख्यिकी का प्रयोग एक विज्ञान के रूप में किया जाता है। बहुवचन के अर्थ में सांख्यिकी का प्रयोग आँकड़ों, संख्याओं या समंकों के रूप में लिया जाता है।

प्रश्न 2.
सांख्यिकी के सन्दर्भ में समंकों की दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. समंक तथ्यों के समूह होते हैं तथा
  2. समंक संख्याओं के रूप में व्यक्त किये जाते हैं।

प्रश्न 3.
एक विज्ञान के रूप में सांख्यिकी की उचित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
लाविट के अनुसार, “सांख्यिकी वह विज्ञान है जो संख्यात्मक तथ्यों के संग्रह, वर्गीकरण तथा सारणीयन से सम्बन्ध रखता है, जिससे उन्हें घटनाओं की व्याख्या, विवरण और तुलना के लिए प्रयुक्त किया जा सके।

प्रश्न 4.
सांख्यिकी की प्रकृति क्या है?
उत्तर :
सांख्यिकी विज्ञान तथा कला दोनों है। इसमें किसी अनुसन्धान क्षेत्र से सम्बन्धित सामूहिक संख्यात्मक तथ्यों के संकलन, प्रदर्शन, विश्लेषण तथा निर्वचन की रीतियों का विधिवत् अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 5.
सांख्यिकी के विषय में वॉलिस और “रॉबर्टस का दृष्टिकोण क्या है?
उत्तर :
बॉलिस और रॉबर्ट्स के अनुसार, “सांख्यिकी स्वतन्त्र और मूलभूत ज्ञान का समूह नहीं है अपितु ज्ञान-प्राप्ति की रीतियों का समूह है।”

प्रश्न 6.
‘सांख्यिकीय श्रेणी की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
कॉनर के अनुसार, “जब दो चल-राशियों के मूल्यों को साथ-साथ इस भाँति व्यवस्थित किया जाये कि एक मापनीय अन्तर दूसरे के मापनीय अन्तर का सहगामी हो तो इस प्रकार से प्राप्त पदमाला को सांख्यिकीय श्रेणी कहते हैं।”

प्रश्न 7.
सांख्यिकीय श्रेणियों के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

(क) व्यक्तिगत श्रेणी
(ख) असतत या खण्डित या, विच्छिन्न श्रेणी तंथा
(ग) सतत या अखण्डित या अविच्छिन श्रेणी।

प्रश्न 8.
वर्गीकरण की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
कॉनर के अनुसार, “वर्गीकरण तथ्यों को उनकी विशेषताओं अथवा गुणों के आधार पर समूह एवं वर्गों में क्रमबद्ध करने की एक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य विभिन्नताओं के बीच समान तथ्यों को खोजकर एक साथ रखना है।”

प्रश्न 9.
सारणीयन की परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
कॉनर के अनुसार, “सारणीयन किसी विचाराधीन समस्या को स्पष्ट करने के उद्देश्य से किया जाने वाला सांख्यिकी तथ्यों का क्रमबद्ध एवं सुव्यवस्थित प्रस्तुतीकरण है।’

प्रश्न 10.
प्राप्तांकों को समूहबद्ध करने की विधियाँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर :

(क) समावेशी विधि
(ख) शुद्ध वर्गीकृत श्रृंखला विधि तथा
(ग) अपवर्जी विधि।

प्रश्न 11.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप लिखिए।
उत्तर :

  1. मध्यमान, (Mean)
  2. मध्यांक (Median) तथा
  3. बहुलांक (Mode)

प्रश्न 12.
सांख्यिकीय माध्य या औसत से क्या आशय है?
उत्तर :
वह संख्या, जो किसी समूह-विशेष के सभी आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करती है, उस समूह का सांख्यिकी माध्य या औसत कहलाती है।

प्रश्न 13.
मध्यमान (Mean) से क्या आशय है?
उत्तर :
मध्यमान वह मान है जो दिये हुए पदों के योगफल में पदों की संख्या से भाग देने पर प्राप्त होता है।

प्रश्न 14.
अव्यवस्थित प्राप्तांकों से मध्यमान ज्ञात करने का सूत्र लिखिए।
उत्तर :
[latex]{ M= }\frac { \Sigma X }{ N } [/latex]
यहाँ M = मध्यमान, ∑ = प्राप्तांकों का योग, N = प्राप्तांकों की संख्या।

प्रश्न 15.
मध्यांक (Median) से क्या आशय है?
उत्तर :
यदि आँकड़ों को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाये तो बिल्कुल मध्य में पड़ने वाला आँकड़ा मध्यांक कहलाता है।

प्रश्न 16.
बहुलांक (Mode) से क्या आशय है?
उत्तर :
क्राक्सटन एवं काउडेन के अनुसार, “एक श्रेणी का बहुलांक वह मूल्य है। जिसके निकट श्रेणी की इकाइयाँ अधिक-से-अधिक केन्द्रित होती हैं।”

प्रश्न 17.
शुद्धता के दृष्टिकोण से मध्यमान, मध्यांक और बहुतांक या तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
परिणामों की शुद्धता के दृष्टिकोण से मध्यमान को सबसे अधिक शुद्ध, मध्यांक को अपेक्षाकृत कम शुद्ध तथा बहुलांक को सबसे कम शुद्ध माना जाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सांख्यिकी का प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्ध है –

(क) विज्ञान से
(ख) संख्यात्मक तथ्यों से
(ग) सुझावों एवं संकेतों से
(घ) गुणात्मक तथ्यों से,

प्रश्न 2.
“सांख्यिकी को संख्यात्मक समंकों के एकत्रीकरण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण तथा निर्वचन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।” प्रस्तुत परिभाषा के प्रतिपादक हैं –

(क) डॉ० बाउले
(ख) पर्सन और हार्लोज
(ग) क्रॉक्सटन और काउडेन
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 3.
सांख्यिकी को माना जाता है –

(क) शुद्ध विज्ञान
(ख) शुद्ध कला
(ग) विज्ञान तथा कला दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 4.
मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता है –

(क) आँकड़ों को सरल एवं बोधगम्य बनाना
(ख) आँकड़ों को सुस्पष्ट एवं संक्षिप्त प्रस्तुतीकरण
(ग) आँकड़ों के सहसम्बन्ध का वर्णन
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 5.
आँकड़ों के व्यवस्थापन की पद्धति है –

(क) वर्गीकरण
(ख) सारणीयन
(ग) रेखाचित्र प्रस्तुतीकरण
(घ) ये सभी

प्रश्न 6.
प्राप्तांक 76 की न्यूनतम सीमा है – [2014]

(क) 76
(ख) 76.5
(ग) 755
(घ) 75.

प्रश्न 7.
सांख्यिकी में प्राप्तांक 1 का विस्तार होता है – [2011]

(क) 0.0 से 1
(ख) 0.5 से 1
(ग) 0.5 से 1.5
(घ) 1 से 1.5 8.

प्रश्न 8.
आंकड़े 8, 23, 16, 15, 5, 26, 6, 38, 33, 11 एवं 15 का विस्तार है – (2015)

(क) 5
(ख) 6
(ग) 33
(घ) 38

प्रश्न 9.
केन्द्रीय प्रवृत्ति के माप हैं – (2008)

(क) मध्यमान तथा सहसम्बन्ध
(ख) मध्यांक तथा
(ग) बहुलक
(घ) मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलक।

प्रश्न 10.
अंक वितरण के सभी अंकों को जोड़कर उनकी संख्या से भाग देने पर जो भागफल प्राप्त होता है, उसे कहते हैं – (2010)

(क) प्रतिशतांक
(ख) मध्येमान
(ग) मध्यांक
(घ) प्रसार

प्रश्न 11.
मध्यमान का गुण है –

(क) सर्वाधिक शुद्ध माप
(ख) शीघ्र एवं सरल गणना
(ग) दिये गये प्राप्तांकों का विशुद्ध प्रतिनिधित्व
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 12.
किसी सांख्यिकीय वितरण में ऊपर-नीचे दो बराबर भागों में बाँटने वाले बीच के अंक को कहते हैं –

(क) मध्यमान
(ख) मध्यांक
(ग) बहुलक
(घ) प्रतिशतांक

प्रश्न 13.
यदि दिये गये आँकड़ों को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाए तो बिल्कुल मध्य में पड़ने वाला ऑकड़ा कहलाता है – (2007)

(क) मध्यमान
(ख) मध्यांक
(ग) बहुलांक
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 14.
मध्यांक का दोष है –

(क) सीमान्त मूल्यों की अपेक्षा
(ख) निर्धारण में कठिनाई
(ग) कम पदों की दशा में सही प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता
(घ) उपर्युक्त सभी दोष

प्रश्न 15.
वितरण में जिस अंक की आवृत्ति सर्वाधिक होती है, उसे कहते हैं –

(क) मध्यांक
(ख) बहुलक
(ग) मध्यमान
(घ) चतुर्थांक

प्रश्न 16.
आँकड़े 8, 6, 8, 2, 11, 6, 8 एवं 5 में से है –

(क) मध्यमान
(ख) मानक विचलन
(ग) मध्यांक
(घ) बहुलांक

उत्तर :

  1. (ख) संख्यात्मक तथ्यों से
  2. (ग) क्रॉक्सटन और काउडन
  3. (ग) विज्ञान तथा कला दोनों
  4. (घ) उपर्युक्त सभी
  5. (घ) ये सभी
  6. (ग) 75.57
  7. (ख) 0.5 से 1 8.
  8. (ग) 33
  9. (घ) मध्यमान मध्यांक तथा बहुलेक
  10. (ख) मध्यमान
  11. (घ) उपर्युक्त सभी
  12. (ख) मध्याक
  13. (ख) मध्यांक
  14. (घ) उपर्युक्त सभी दोष
  15. (ख)बहुलक
  16. (घ) बहुलाका

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 11 Psychology in Industry

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 11
Chapter Name Psychology in Industry
(उद्योग में मनोविज्ञान)
Number of Questions Solved 54
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 11 Psychology in Industry (उद्योग में मनोविज्ञान)

दीर्घ उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक मनोविज्ञान (Industrial Psychology) से आप क्या समझते हैं? अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। औद्योगिक क्षेत्र में मनोविज्ञान के महत्त्व एवं उपयोगिता को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
भूमिका
(Introduction)

आधुनिक विश्व तेजी से औद्योगीकरण की ओर बढ़ रहा है। औद्योगिक क्षेत्र में मनुष्यों के व्यवहार की जटिलताओं ने मनोविज्ञान का अध्ययन अपनी ओर आकर्षित किया। उद्योग-धन्धों से। सम्बन्धित तथा इन क्षेत्रों में निवास करने वाले व्यक्तियों का व्यवहार समाज के अन्य क्षेत्रों के निवासियों के व्यवहार से कुछ भिन्न पाया जाता है तथा उनकी समस्याएँ भी कुछ अलग प्रकार की हो जाती हैं। उद्योग से जुड़े लोगों की समस्याओं का अध्ययन करने एवं उनका उचित समाधान ढूंढ़ने के प्रयास ने ‘औद्योगिक मनोविज्ञान (Industrial Psychology) को जन्म दिया। कालान्तर में मनोविज्ञान ने उद्योग के क्षेत्र में एक विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है।

औद्योगिक मनोविज्ञान का अर्थ
(Meaning of Industrial Psychology)

‘औद्योगिक मनोविज्ञान’ एक संयुक्त शब्द है जो दो शब्दों से मिलकर बना है : ‘उद्योग + मनोविज्ञान’ अर्थात् उद्योग जगत से सम्बन्धित मनोविज्ञान। दूसरे शब्दों में, औद्योगिक मनोविज्ञान, व्यावहारिक मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसमें उद्योग सम्बन्धी समस्याओं को सुलझाने के लिए मनोविज्ञान की सहायता ली जाती है। श्रमिकों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाना, उनके आवास, स्वास्थ्य व उनके बच्चों की शिक्षा का समुचित प्रबन्ध करना आदि बातों को लेकर मनोविज्ञान ने उद्योग में कदम रखा। मनोविज्ञान में विभिन्न श्रमिक समस्याओं; यथा-कार्य विश्लेषण, कार्य और विश्राम का समय निर्धारण, थकान का प्रभाव, कुशल कार्य और गति तथा मालिक-मजदूर सम्बन्ध आदि से सम्बन्धित अनुसन्धान कार्य भी हुए। स्पष्टत: उद्योग, उसके कर्मचारियों तथा मालिकों के मानवीय व्यवहार व सम्बन्धों को लेकर जो भी समस्याएँ और तनावपूर्ण परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं, उनका निदान तथा समाधान मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव में असम्भव था। मनोवैज्ञानिकों के सत्प्रयासों से लघु और बड़े सभी उद्योगों में मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित हुआ। यह सम्पूर्ण विवेचन औद्योगिक मनोविज्ञान के अर्थ को अभिप्रकाशित एवं स्पष्ट करता है।

औद्योगिक मनोविज्ञान की परिभाषा
(Definition of Industrial Psychology)

विभिन्न विद्वानों ने औद्योगिक मनोविज्ञान की अनेक परिभाषाएँ दी हैं। प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) हैरल के अनसार, “औद्योगिक मनोविज्ञान उद्योग और व्यवसाय में लगे लोगों का अध्ययन हैं,

(2) ब्लम के मतानुसार, “मानवीय औद्योगिक समस्याओं से सम्बन्धित मनोवैज्ञानिक तथ्यों और सिद्धान्तों का विस्तारपूर्वक अध्ययन ही औद्योगिक मनोविज्ञान है।’

(3) स्मिथ के शब्दों में, “व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए औद्योगिक मनोविज्ञान को उन लोगों के व्यवहार का अध्ययन केहकर परिभाषित किया जा सकता है जो अपने मस्तिष्क तथा हाथ के कार्य को जीविका कमाने के लिए अनिवार्य वस्तुओं में बदल लेते हैं।”

उपर्युक्त विवरण के आधार पर औद्योगिक मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि ‘औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसका सम्बन्ध मनोविज्ञान के व्यावहारिक पक्ष से है।” औद्योगिक मनोविज्ञान के अन्तर्गत मुख्य रूप से औद्योगिक एवं व्यावसायिक पर्यावरण में होने वाले मानवीय व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। औद्योगिक मनोविज्ञान सम्बन्धित क्षेत्र की समस्याओं के लक्षणों, कारणों एवं समाधान के उपायों का भी अध्ययन करता है।

औद्योगिक क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता एवं महत्त्व
(Need and Importance of Psychology in the Field of Industry)

मानव-व्यवहार और स्वभाव से प्रभावित जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता महसूस की गयी है और इसके महत्त्व में वृद्धि हुई है। औद्योगिक जगत की समस्याएँ न्यूनाधिक रूप से मानवीय सम्बन्धों की समस्याएँ हैं, जिसे मनोविज्ञान के अन्तर्गत मानवीय अध्ययन द्वारा ही सुलझाया जा सकता है। उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता एवं महत्त्व एवं प्रकार वर्णित है –

(1) उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता – आधुनिक समय में नगरीकरण तथा औद्योगीकरण के फलस्वरूप उद्योग-धन्धों का अत्यधिक विकास हुआ है। बड़ी-बड़ी मिलों, कारखानों तथा फैक्ट्रियों में, जहाँ सैकड़ों-हजारों कर्मचारी श्रम में जुटे हों, नाना प्रकार की समस्याओं का प्रादुर्भाव निश्चित है। इन समस्याओं में भौतिक दशाओं से सम्बन्धित समस्याओं के अतिरिक्त बहुत सारी मानवीय सम्बन्धों की समस्याएँ भी होती हैं। ये समस्याएँ मानवीय अध्ययन द्वारा ही हल की जा सकती है; अत: उद्योग के क्षेत्र की समस्याओं का समाधान करने के लिए मनोविज्ञान की आवश्यकवा अनुभव की जाती है।

(2) उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व – वर्तमान औद्योगिक युग ने घरेलू उद्योगों को गौण बना दिया है। बड़ी मात्रा में मशीनों तथा मजदूरों ने मिलकर राष्ट्रीय एवं व्यापक स्तर पर उत्पादन कार्य शुरू किया तथा दूर-दूर से भारी मात्रा में कच्चा सामान’ मँगाया जाने लगा। कर्मचारियों पर वरयता क्रम में अधिकारी नियुक्त हुए। उनके निरीक्षण में श्रमिकों की कार्यशक्ति और उत्पादन शक्ति बढ़ाकर उत्पादित वस्तुओं को दूर-दूर भेजने का प्रयास किया गया। श्रमिकों की कार्यशक्ति एवं उत्पादन शक्ति बढ़ाने की नयी-नयी युक्तियों की खोज होने के अतिरिक्त मिल-मालिकों तथा श्रमिकों के सम्बन्धों की ओर भी ध्यान दिया गया। इस प्रकार उद्योग का क्षेत्र जटिल से जटिलतम हुआ, समस्याएँ उलझती गईं, जिनके विश्लेषण एवं निराकरण हेतु मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों तथा प्रविधियों का उपयोग किया गया। कालान्तर में उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व स्थायी रूप से अंकित हो गया। उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व निम्नांकित कारणों से है –

(1) कर्मचारियों के चयन की समस्या (Problem of the Personnel Selection)-उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान ने जो सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण कार्य किया, वह कर्मचारियों के चुनाव में सहायता पहुँचाना है। वर्तमान समय में उद्योग के क्षेत्र में विशेषीकरण (Specialization) का बोलबाला है। कार्य का विभाजन और कार्य की हर शाखा में विशेषीकरण आधुनिक उद्योगों का प्रमुख लक्षण है। प्रत्येक कार्य के लिए विशिष्ट निपुणता तथा योग्यता की आवश्यकता है। इस आवश्यकता ने हमारे सामने उपयुक्त कर्मचारियों के चयन की समस्या खड़ी कर दी है। मनोवैज्ञानिक परीक्षणों से यह ज्ञात हो जाता है कि किस व्यक्ति में कौन-सी योग्यता कितनी मात्रा में है? उसी के अनुसार कर्मचारियों का चयन किया जाता है और तद्नुसार ही उन्हें कार्य भी प्रदान किया जाता है।

(2) कार्य की परिस्थितियों की समस्या (Problem of working Condition)–वर्तमान समय में उद्योग सम्बन्धी कार्य की परिस्थितियों के निर्धारण में मनोविज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कर्मचारियों की कार्य करने की दशाओं का उत्पादन और कार्यक्षमता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। मनोविज्ञान कार्य की परिस्थितियों को समझने में सहायता प्रदान करता है। उत्पादन की वृद्धि हेतु इस बात का अनुभव किया गया कि कार्य करने की विभिन्न परिस्थितियों; जैसे—प्रकाश, तापमान, वायु संचार, विश्राम आदि को अनुकूल बनाया जाए। मनोविज्ञान की सहायता से श्रमिकों के कार्य की परिस्थितियों में उचित सुधार लाने का प्रयास किया जाता है।

(3) पदोन्नति की समस्या (Problem of the Promotion)-उद्योगों में कार्य की विभिन्न श्रेणियों के अनुसार कर्मचारियों व अधिकारियों के पद निर्धारित हैं। कुछ समय तक कार्यानुभव प्राप्त करने के उपरान्त व्यक्ति को उच्च पद पर भेजने की आवश्यकता महसूस की जाती है। किसी विशेष पद के लिए कर्मचारी की बुद्धि, मानसिक योग्यता, कार्य के प्रति रुचि, कार्य को सीखने की क्षमता आदि की जाँच मनोवैज्ञानिक परीक्षणों तथा विधियों की सहायता से की जाती है। जाँच के परिणामों व निष्कर्षों के आधार पर ही किसी कर्मचारी की उपयुक्तता निश्चित की जा सकती है। स्पष्टत: पदोन्नति की समस्या का उचित समाधान मनोविज्ञान पर ही आधारित है।

(4) मानवीय सम्बन्धों की समस्या (Problem of Human Relations)-औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् उद्योगों में मानवीय सम्बन्धों को महत्त्व प्रदान किया जाने लगा। इससे पूर्व पिछली शताब्दी में श्रमिकों के साथ पशुओं जैसा अमानवीय व्यवहार किया जाता था। उनसे प्रति दिवस बारह घण्टे से ऊपर कार्य कराया जाता था। इन दशाओं ने उद्योग में मनोविज्ञान का प्रवेश करा दिया जिसके परिणामस्वरूप श्रमिकों के कल्याण पर ध्यान दिया गया। श्रमिकों के आवास, चिकित्सा, प्रशिक्षण, स्त्रियों के लिए कल्याण-केन्द्र तथा उनके बच्चों के लिए समुचित शिक्षा की व्यवस्था को आवश्यक समझा गया। मनोविज्ञान ने लोगों को परस्पर मानवीय दृष्टि से देखने में सहायता दी, मजदूरी यूनियनों ने भी श्रमिक हितों के लिए अथक संघर्ष किया और शनैः-शनैः उद्योगपति श्रमिकों के प्रति उदारता दिखाने लगे। उद्योग में मानवीय सम्बन्धों की समस्या के निराकरण एवं श्रम-कल्याण सम्बन्धी कार्यों को करने में मनोविज्ञान ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

(5) औद्योगिक संघर्ष की समस्या (Problem of Industrial Conflicts)-कभी-कभी स्वहितों की रक्षार्थ श्रमिकों और मिल-मालिकों के मध्य तनाव एवं संषर्घ की,दशाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। या तो श्रमिक अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं अथवा मालिकों पर अनुचित दबाव डालकर अधिक लाभ प्राप्त करने चाहते हैं-दोनों ही स्थितियों में औद्योगिक संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप हड़ताल और तालाबन्दी की स्थितियाँ जन्म लेती हैं तथा समूचे औद्योगिक क्षेत्र में अशान्ति पैदा हो जाती है। मनोविज्ञान ही श्रमिक वर्ग एवं मिल मालिकों दोनों की मानसिक स्थिति को ठीक-ठीक समझ सकता है। मनुष्यों के दो वर्गों के बीच उत्पन्न इस तनाव की स्थिति को समझकर हल करने का प्रयास मनोविज्ञान की विधियों द्वारा सम्भव है। इस प्रकार औद्योगिक संघर्ष से बचने का उपाय भी मनोविज्ञान के ही पास है।

प्रश्न 2.
कर्मचारी चयन (Personnel Selection) से क्या आशय है? कर्मचारी-चयन की सम्पूर्ण प्रक्रिया का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
कर्मचारी चयन के उद्देश्य से कार्य-विश्लेषण तथा कर्मचारी-विश्लेषण की प्रक्रियाओं का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
कर्मचारियों के चयन की समस्या
(Problem of Personnel Selection)

आधुनिक काल के मिल, कारखानों या फैक्ट्रियों में कार्य-विशेषीकरण के आधार पर कार्य का विभाजन हुआ। इस श्रम-विभाजन के कारण उत्पादन कार्य को पूरी गति मिली; अत: हर विभाग के विशेष कार्य हेतु निपुणतम व्यक्ति की खोज हुई। विज्ञापन छापे गये, सैकड़ों अभ्यर्थियों ने नियोक्ताओं (मालिकों) के पास अपने प्रार्थना-पत्र भेजे। अब नियोक्ता अथवा मालिकों के सामने उनमें से सर्वाधिक योग्य व्यक्ति के चुनाव की समस्या उत्पन्न हुई।

विभिन्न प्रकार के व्यवसायों अथवा कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं की आवश्यकता होती है। अनुभव द्वारा पता चलता है कि एक व्यक्ति विभिन्न प्रकार के व्यवसायों या कार्यों को एक समान कुशलता से नहीं कर सकता; इसी प्रकार से अनेक व्यक्ति एक व्यवसाय या कार्य के लिए एक समान कुशलता भी नहीं अपना सकते। यहाँ यह समस्या उठ खड़ी होती है कि किस भाँति व्यक्ति को उपयुक्त व्यवसाय तथा व्यवसाय को उपयुक्त व्यक्ति उपलब्ध हो? व्यक्ति के लाभ और सुख की दृष्टि से आवश्यक है कि उसे अपनी सर्वोत्तम योग्यता के अनुकूल कार्य मिले। स्पष्ट रूप से कर्मचारियों के चयन की समस्या के दो पहलू हैं-एक, व्यक्ति को उसकी सर्वोत्तम योग्यताओं के अनुसार उद्योग में कार्य मिलना, तथा दो, उद्योगों के विभिन्न कार्यों हेतु अभ्यर्थियों में से सर्वोत्तम व्यक्ति का चयन करना। कर्मचारी चयन के नकारात्मक पक्ष में उपयुक्त व्यक्तियों को छाँटकर अलग कर देते हैं तथा ‘स्वीकारात्मक पक्ष में उपयुक्त व्यक्तियों का चयन कर लेते हैं।

कर्मचारियों के चयन की प्रक्रिया
(Process of the Personnel Selection)

कर्मचारियों के चयन की प्रक्रिया के दो महत्त्वपूर्ण पहलू हैं – (1) व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण तथा (2) कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण। व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण के अन्तर्गत यह ज्ञात किया जाता है कि किसी व्यवसाय के लिए किस तरह के कार्य, किस तरह की कार्य की परिस्थितियों, किस स्तर की शिक्षा, बौद्धिक स्तर तथा मानसिक योग्यताओं की आवश्यकता है। कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण के अन्तर्गत यह पता लगाया जाता है कि कर्मचारी में किस स्तर की बुद्धि है, उसकी कौन-कौन सी मानसिक योग्यताएँ, रुचियाँ, अभिरुचियाँ तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताएँ हैं। अब हम इन दोनों पक्षों का अलग-अलग विवेचन प्रस्तुत करेंगे।

(1) व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण (Job-Analysis)

व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण का अर्थ है कि किसी व्यवसाय से सम्बन्धित पूरी जानकारी प्राप्त करना। उद्योग-धन्धों तथा विभिन्न व्यवसायों के सन्दर्भ में व्यवसाय-विश्लेषण का प्रयोग बहुतायत से किया जाता है। वस्तुतः इस प्रक्रिया के अन्तर्गत कार्य के विभिन्न तत्त्वों को फैलाकर उनका सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है। कर्मचारी के कर्तव्य तथा कार्य की दशा, के साथ-साथ कर्मचारी की व्यक्तिगत विशेषताओं का अध्ययन भी किया जाता है। व्यवसाय-विश्लेषण के माध्यम से कार्य के आधारभूत या मूल तत्त्वों का निर्धारण एवं स्पष्टीकरण हो जाता है। इसके अतिरिक्त कर्मचारी में अपेक्षित गुण और विशेषताओं का ज्ञान भी हो जाता है।

ब्लम ने व्यवसाय-विश्लेषण को इस प्रकार परिभाषित किया है, “व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण किसी व्यवसाय के विभिन्न तत्त्वों का सूक्ष्म अध्ययन है। इसका सम्बन्ध न केवल कार्य से सम्बन्धित कर्तव्य और दशाओं से है, वरन् कार्य के लिए अपेक्षित वैयक्तिक योग्यताओं से भी है।”

इस भाँति, व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण का तात्पर्य किसी व्यवसाय या कार्य के अन्तर्गत सम्मिलित समस्त बातों के सूक्ष्म एवं व्यापक अध्ययन से है जिससे कार्य से सम्बन्धित बातों का सही-सही ज्ञान हो सके।

व्यवसाय या कार्य से सम्बन्धित प्राप्त की जाने वाली सूचनाएँ – व्यवसाय-विश्लेषण करते समय किसी कार्य से सम्बन्धित अनेक सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं। वाइटलीज (Viteles) ने व्यवसाय-विश्लेषण के अन्तर्गत एकत्र की जाने वाली सूचनाओं की एक सूची जारी की है, जिसे प्रस्तुत किया जा रहा है –

  1. कार्य का नाम
  2. कर्मचारियों की संख्या
  3. कर्तव्यों का विवरण
  4. कार्य में प्रयुक्त होने वाले यन्त्र
  5. क्रियाओं का विश्लेषण
  6. कार्य की दशाएँ या परिस्थितियाँ
  7. वेतन एवं अन्य सुविधाएँ (जैसे- मुफ्त आवास एवं चिकित्सा सुविधाएँ)
  8. अन्य समान व्यवसायों से सम्बन्ध
  9. स्थानान्तरण तथा पदोन्नति के अवसर
  10. प्रशिक्षण-काल तथा उसकी प्रकृति
  11. व्यक्तिगत

योग्यताएँ –

  1. अवस्था, लिंग, राष्ट्रीयता तथा वैवाहिक स्तर
  2. शारीरिक योग्यताएँ
  3. मानसिक योग्यताएँ
  4. शैक्षिक योग्यताएँ
  5. पूर्व अनुभव
  6. सामान्य एवं विशिष्ट मानसिक योग्यताएँ तथा
  7. स्वभाव एवं चरित्र सम्बन्धी विशेषताएँ।

कार्य से सम्बन्धित सूचनाएँ एकत्रित करने की विधियाँ-किसी भी व्यवसाय या कार्य से सम्बन्धित विभिन्न सूचनाएँ एकत्र करने में अनेक विधियों का प्रयोग किया जाता है। प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं –

(1) प्रश्नावली विधि (Questionnaire Method) – इस विधि में किसी व्यवसाय या कार्य से सम्बन्धित, व्यक्तित्व की विभिन्न विशेषताओं के आधार पर, कुछ प्रश्नों की एक तालिका बना ली जाती है। इस तालिका को सम्बन्धित कर्मचारियों व अधिकारियों में बाँट दिया जाता है। उनसे जो उत्तर प्राप्त होते हैं, उनसे कार्य सम्बन्धी सूचनाएँ एकत्र कर ली जाती हैं और कर्मचारियों का चयन कर लिया जाता है।

(2) निरीक्षण विधि (Observation Method) – इस विधि के अन्तर्गत सूचना एकत्र करने वाला व्यक्ति स्वयं कार्य-स्थल पर जाकर कर्मचारियों को काम करते हुए देखता है। वह उनके कार्यों को भली प्रकार निरीक्षण करता है तथा तत्सम्बन्धी निष्कर्ष निकालता है।

(3) परीक्षण विधि (Test Method) – इस विधि में किसी विशेष व्यवसाय से सम्बन्धित आवश्यक योग्यताओं को लेकर कुछ विश्वसनीय व प्रामाणिक परीक्षाएँ तैयार की जाती हैं। उस आधार पर यह ज्ञात किया जाता है कि उस कार्य की सफलता हेतु कौन-सी योग्यता कितनी मात्रा में होनी चाहिए।

(4) वैयक्तिक मनोरेखा विधि (Individual Psychographic Method) – इस विधि द्वारा किसी विशेष व्यवसाय या कार्य में सफल किसी कर्मचारी की मानसिक एवं अन्य विशेषताओं का पता लगाया जाता है। उन्हें ज्ञात करने के बाद एक ग्राफ पर प्रदर्शित किया जाता है तथा ग्राफों के प्रदर्शनों के आधार पर कर्मचारियों की मानसिक विशेषताओं से सम्बन्धित सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं।

(5) व्यवसाय मनोरेखांकित विधि (Job Psychographic Method) – इस विधि के द्वारा भी रेखाचित्रों के माध्यम से कार्य में लगे हुए लोगों की विशेषताओं को ग्राफ पर प्रदर्शित करके व्यवसाय का मनोरेखांकन किया जाता है। वाइटलीज द्वारा वर्णित इस विधि में तीन आवश्यक बातें इस प्रकार हैं – (अ) मानसिक गुणों का सुगम वर्गीकरण, (ब) प्रशिक्षित निरीक्षकों द्वारा प्रत्यक्ष पर्यावलोकन एवं (स) प्रामाणिक मूल्यांकन विधि। यहाँ कुछ विशेषज्ञों द्वारा व्यवसाय या कार्य का विश्लेषण करके एक ऐसी तालिका निर्मित की जाती है जिसमें कार्य के लिए आवश्यक समस्त गुणों का सुगम वर्गीकरण सम्भव हो सके। इन समस्त गुणों के आधार पर एक ग्राफ तैयार करके भविष्य में उससे सहायता ली जाती है।

(6) गति अध्ययन विधि (Motion Study Method) – इस विधि के माध्यम से किसी विशेष व्यवसाय में लगे कर्मचारी के काम की गति तथा काम में लगा हुआ समय ज्ञात किया जाता है। इस भाँति, भिन्न-भिन्न कर्मचारियों की गति नोट कर ली जाती है तथा उसकी आपस में तुलना कर ली जाती है जिसे भविष्य में गति अध्ययन (Time and Motion Study) है जिसके अन्तर्गत आजकल सम्पूर्ण कार्य का विस्तृत चित्रांकन मूवी कैमरे द्वारा कर लिया जाता है। इसके बाद, फिल्म को धीमी गति से चलाकर पूरी प्रक्रिया का विश्लेषण किया जाता है।

उपर्युक्त वर्णित विधियों में से किसी भी एक विधि का आवश्यकता व परिस्थिति के अनुसार चयन करके कार्य के विषय में सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती हैं।

(2) कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण
(Individual Analysis)

कर्मचारियों के चयन में जहाँ एक ओर कार्य की विशेषताओं की विस्तृत जानकारी आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर अभ्यर्थी (काम पाने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति) के विषय में भी पूरी जानकारी प्राप्त होनी चाहिए। कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण, व्यक्तिगत स्तर पर व्यक्तिगत गुणों का होता है जिसके माध्यम से यह निश्चित किया जाता है कि अमुक व्यक्ति किस प्रकार के कार्य के योग्य या अयोग्य है। इसके द्वारा व्यवसाय से सम्बन्धित प्रशिक्षण के विषय में ज्ञान मिलता है तथा कर्मचारी की योग्यतानुसार वेतन निर्धारित करने में सहायता प्राप्त होती है। कर्मचारी या व्यक्ति-विश्लेषण के अन्तर्गत व्यक्ति के घिषय में निम्नलिखित जानकारियाँ हासिल करनी होती हैं –

  1. नाम
  2. आयु
  3. लिंग
  4. जाति
  5. धर्म
  6. राष्ट्रीयता
  7. शारीरिक स्वास्थ्य एवं विशेषताएँ; जैसे – भार ऊँचाई, दृष्टि, सीने की माप, दाँतों की अवस्था, हृदय एवं फेफड़ों की दशा, नाक-कान की दशा, कोई कमी (यदि हो तो) इत्यादि
  8. मानसिक सूचनाएँ; जैसे – बुद्धि का स्तर, मानसिक योग्यताएँ व उनका स्तर, रुचियाँ-अभिरुचियाँ तथा व्यक्तित्व की विशेषताएँ
  9. शैक्षिक योग्यताएँ
  10. कार्य का अनुभव
  11. प्रशिक्षण का विवरण तथा
  12. चरित्र सम्बन्धी विशेषताएँ।

कर्मचारी या व्यक्ति-विश्लेषण की विधियाँ – कर्मचारी विश्लेषण की प्रक्रिया में कर्मचारी से सम्बन्धित उपर्युक्त सूचनाएँ एकत्र करने के लिए निम्नलिखित विधियाँ काम में लायी जाती हैं –

(1) आवेदन-पत्र (Application Form) – उद्योग के कार्यालय में कार्य पाने के इच्छुक अभ्यर्थियों को सादे छपे हुए आवेदन-पत्र प्रदान किये जाते हैं। इन आवेदन-पत्रों में कुछ शीर्षकों के अन्तर्गत सूचनाएँ माँगी जाती हैं। अभ्यर्थी द्वारा भरकर दिये गये आवेदन-पत्र के माध्यम से उस व्यक्ति के सम्बन्ध में शिक्षा, अनुभव, प्रशिक्षण तथा व्यक्तिगत इतिहास का पता चल जाता है। इसके अतिरिक्त उसकी शक्तियों, महत्त्वाकांक्षाओं तथा पाठान्तर क्रियाओं का भी ज्ञान हो जाता है। आवेदन-पत्रों के माध्यम से उपयोगी सूचनाएँ मँगाने के लिए उन्हें विश्वसनीय और प्रामाणिक बनाना आवश्यक समझा जाता है। आवेदन-पत्रों के माध्यम से वे समस्त सूचनाएँ उपलब्ध हो जाती हैं जिनका उत्तर अभ्यर्थी से मिल सकता है। आजकल कुछ विशिष्ट कम्पनियाँ विज्ञापनों में ही आवेदन-पत्र का नमूना भी छाप देती हैं और आशा करती हैं कि आवेदक उसी नमूने के अनुसार आवेदन करें।

(2) संस्तुति-पत्र (Letters of Recommendation) – प्रत्येक अभ्यर्थी के पास उसके शिक्षाकाल में मिले कुछ संस्तुति-पत्र और प्रमाण-पत्र होते हैं जो उसकी विशेषताओं पर पर्याप्त रूप से प्रकाश डालते हैं। बहुत-से व्यावसायिक संस्थान आवेदन-पत्रों के साथ कम-से-कम दो महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के संस्तुति-पत्र भी मँगवाते हैं। इससे अभ्यर्थियों के बारे में आवश्यक व महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ मिलने की सम्भावनाएँ रहती हैं। इससे उसकी कमियों व दोषों की जानकारी तो, नहीं, किन्तु विशिष्टताएँ अवश्य प्रकाश में आ जाती हैं। संस्तुति-पत्रों का सबसे बड़ा दोष यह है कि इनमें व्यक्ति के विषय में अतिशयोक्तिपूर्ण चित्रण कर दिया जाता है। इससे इनकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है, किन्तु, व्यावसायिक संस्थान संस्तुति (सिफारिश) करने वाले व्यक्तियों से संम्पर्क स्थापित करके प्रश्नावलियों (Questionnaire) व निर्धारण-मान (Rating-scale) की सहायता से अभ्यर्थी के विषय में आवश्यक एवं वास्तविक सूचनाएँ प्राप्त कर लेते हैं।

(3) शैक्षिक आलेख (Academic Records) – शैक्षिक आलेख के माध्यम से अभ्यर्थी की शिक्षा सम्बन्धी योग्यता का पता चल जाता है। विभिन्न व्यावसायिक संस्थान अभ्यर्थियों से आवेदन-पत्रों के साथ उनका शैक्षिक आलेख प्रमाणित प्रतिलिपियों के रूप में मॅगा लेते हैं। इनके साथ ही उन संस्थानों के नाम भी पूछे जाते हैं जहाँ से अभ्यर्थी ने शिक्षा प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त शिक्षा संस्थाओं में अभ्यर्थी से सम्बन्धित सामूहिक अभिलेख (Cumulative Records) होते हैं जिनके अवलोकनों से अभ्यर्थी के विषय में काफी जानकारी प्राप्त हो जाती है।

(4) समूह निरीक्षण विधि (Group Observation Method) – इस विधि के अन्तर्गत किसी पद के लिए उपस्थित हुए अभ्यर्थियों के समूह में विभिन्न व्यक्तियों के व्यवहार का निरीक्षण किया जाता है। निरीक्षण के दौरान ध्यान दिया जाता है कि कोई व्यक्ति समूह में किस प्रकार का व्यवहार कर रहा है। इस विधि द्वारा अभ्यर्थियों के नेतृत्व, सामाजिकता, कर्तव्यपरायणता, हास्यप्रियता, ईमानदारी तथा तात्कालिक बुद्धि आदि गुणों का पता करने हेतु सामूहिक निरीक्षण किया जाता है।

(5) शारीरिक परीक्षण (Physical Tests) – अनेक व्यवसायों में कुछ विशेष प्रकार की शारीरिक विशेषताओं व योग्यताओं की जरूरत पड़ती है। जिसके लिए शारीरिक परीक्षण अनिवार्य है। इसके लिए भार ज्ञात करने की मशीन, स्टेथोस्कोप, फीता तथा अन्य यन्त्रों का प्रयोग किया जाता है। पुलिस विभाग के कर्मचारियों के लिए हृष्ट-पुष्ट शरीर व रेलवे गार्ड के लिए उत्तम नेत्र-शक्ति आवश्यक है। खदान उद्योग में काम करने वालों की भी शारीरिक जाँच विस्तार से की जाती है, क्योंकि उन्हें अस्वास्थ्यप्रद दर्शाओं में रहकर काम करना होता है।

(6) प्रयोगात्मक एवं अन्वेषणात्मक क्रियाएँ (Try-out) – इसके अन्तर्गत, यदि अधिकारीगण आवश्यकता महसूस करे तो, अभ्यर्थियों को उस पद या उन मशीनों के साथ काम करने का अवसर दिया जाता है जिन पर उन्हें काम करना है। उनसे आवश्यक पूछताछ व कार्य कराकर भी देखा जा सकता है। इस प्रकार की प्रयोगात्मक वे अन्वेषणात्मक क्रियाओं से अभ्यर्थियों की योग्यता का वास्तविक बोध हो जाता है।

(7) मनोवैज्ञानिक परीक्षण (Psychological Tests) – कर्मचारी की योग्यताओं का मूल्यांकन करने के लिए विभिन्न मनोवैज्ञानिक परीक्षण हैं। अभ्यर्थियों का बौद्धिक स्तर, मानसिक योग्यताएँ, रुचियाँ, अभिरुचियाँ तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं को जानने के लिए तत्सम्बन्धी मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रयोग किया जाना चाहिए।

(8) साक्षात्कार (Interview) – कार्य-विश्लेषण की प्रक्रिया में अभ्यर्थियों से सम्बन्धित सूचनाएँ प्राप्त करने के उपरान्त साक्षात्कार द्वारा उनके व्यक्तित्व का पता लगाना चाहिए। अभ्यर्थी को सामने बैठाकर उससे बातचीत करना या प्रश्न पूछना साक्षात्कार कहलाता है। साक्षात्कार के माध्यम से अन्य सूचनाओं के साथ-साथ अभ्यर्थियों का आत्म-विश्वास, तत्परता, आचार-विचार, अनुशासनप्रियता, आत्म-नियन्त्रण, महत्त्वाकांक्षाएँ तथा वेशभूषा आदि का सम्यक् ज्ञान होता है। विद्वानों के मतानुसार साक्षात्कार विधि जितनी ही अधिक विश्वसनीय, वैध तथा वस्तुनिष्ठ होगी, कर्मचारियों का चयन उतना ही अधिक उपयुक्त व प्रामाणिक होगा।

निष्कर्षत: कर्मचारियों के चयन सम्बन्धी प्रक्रिया में व्यवसाय-विश्लेषण तथा कर्मचारी विश्लेषण के माध्यम से जो सूचनाएँ प्राप्त होती हैं उनका तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। जो अभ्यर्थी रिक्त पद के लिए वांछित योग्यताएँ देखते हैं उनका चयन कर लिया जाता है। कर्मचारियों का उपयुक्त चयन किसी भी उद्योग या व्यावसायिक संस्थान की सफलता हेतु एक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण कार्य है।

प्रश्न 3.
‘कार्य की दशाओं से क्या आशय है? कार्य की दशाओं के महत्व को स्पष्ट करते हुए औद्योगिक क्षेत्र की भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक दशाओं का उल्लेख कीजिए।
या
उद्योग में कार्य की परिस्थितियों का कर्मचारी की कुशलता पर क्या प्रभाव पड़ता है? मनोवैज्ञानिक अध्ययनों की सहायता से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कार्य की दशाओं या परिस्थितियों को अर्थ
(Meaning of Working Conditions)

प्रत्येक व्यवसाय या कार्य में एक विशेष प्रकार का वातावरण होता है जिसे कार्य का वातावरण या ‘औद्योगिक वातावरण कहकर पुकारते हैं। वस्तुत: किसी भी स्थान पर कार्य करते समय व्यक्ति या कर्मचारी के अतिरिक्त वहाँ जो कुछ भी स्थूले या सूक्ष्म रूप में होता है उसे ‘कार्य की दशाओं (working conditions) के अन्तर्गत सम्मिलित किया जा सकता है और यही दूसरे शब्दों में कार्य का वातावरण है। कार्य की दशाओं या वातावरण में भवन, स्वच्छता, प्रकाश, तापमान, वायु संचार, मशीनें, ध्वनियाँ तथा कर्मचारियों की मानसिक स्थितियाँ निहित हैं। कार्य की दशाओं को मूल रूप से निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है – (अ) भौतिक दशाएँ तथा (ब) मनोवैज्ञानिक दशाएँ।

कार्य की दशाओं का महत्त्व
(Importance of Working Conditions)

औद्योगिक श्रमिक उन परिस्थितियों से अत्यधिक प्रभावित होते हैं जिनमें वे कार्य करते हैं। कार्य की दशाएँ यदि कर्मचारियों या श्रमिकों के अनुकूल होती हैं तो इससे न केवल कर्मचारी अपितु अन्ततोगत्वा उद्योगपतियों का भी हित होता है। कार्य करने की अनुकूल परिस्थितियों में श्रमिक अपेक्षाकृत अधिक एकाग्र भाव से परिश्रम करते पाये जाते हैं। इसके विपरीत असन्तोषजनक परिस्थितियाँ उनकी मनोदशाओं, कार्यक्षमताओं एवं स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती हैं। श्रमिक को कार्य करते समय उत्साहपूर्ण एवं स्वस्थ वातावरण होना चाहिए। इससे वह अधिक कार्यकुशलता से कार्य करता है। गन्दा एवं क्षुब्ध कर देने वाला वातावरण उत्पादन में तो कमी करता है, इससे श्रमिकों की प्रवासी प्रवृत्ति, श्रम अनुपस्थिता तथा श्रम-परिवर्तन को भी बढ़ावा मिलता है। इन सबका अन्ततोगत्वा उद्योग के उत्पादने पर भी बुरा असर पड़ता है और इससे सेवायोजक लाभ भी घटता चला जाता है। उद्योगों में तालाबन्दी की सम्भावनाएँ दृष्टिगोचर होने लगती हैं, जिससे श्रमिक बेरोजगार होने लगते हैं। यह सम्पूर्ण दुश्चक्र समाज को बहुत बुरी तरह से प्रभावित करता है।

अतः यह अत्यन्त आवश्यक हो जाता है कि श्रमिक की कार्य करने की प्रतिकूल दशाओं में सुधार लाया जाये। इससे न केवल श्रमिकों की मनोवृत्ति, स्वास्थ्य तथा कार्य क्षमताओं पर अनुकूल प्रभाव पड़ेगा अपितु उत्पादन में आशातीत वृद्धि सम्भव हो पायेगी और श्रमिक-नियोजन सम्बन्धों में सुन्दर समन्वय स्थापित हो सकेगा।

(1) भौतिक दशाएँ एवं उनका प्रभाव (Physical Conditions and their Effect)

उद्योग से सम्बन्धित भौतिक दशाओं के अन्तर्गत बाहरी स्थूल परिस्थितियाँ; जैसे—स्वच्छता, ऊष्मा एवं ताप, प्रकाश, वायु का प्रबन्ध, धूल से रक्षा, कार्य के घण्टे तथा विश्राम आदि की व्यवस्था सम्मिलित किये जाते हैं। इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित हैं” –

(1) स्वच्छता (Sanitation) – साधारणतः मनुष्य स्वच्छता पसन्द करते हैं। गन्दगी के बीच रहकर श्रमिक जन कार्य नहीं कर पाते हैं, न ही कार्य करने में उनका मन लग पाता है। अस्वच्छता विभिन्न रोगों की जननी है; अत: कारखाने की नित्य प्रति सफाई अनिवार्य है। कार्य करने की अनुकूल दशाओं में स्वच्छता सबसे मुख्य वस्तु है। वर्ष में कम-से-कम दो बार सफेदी अवश्य हो जानी चाहिए। मशीनों, छतों एवं दीवारों की धूल को प्रतिदिन हटाया जाना चाहिए। फर्श पक्का हो, पानी के निकलने । की उत्तम व्यवस्था हो तथा शौचालय आदि का उचित प्रबन्ध हो। कारखाने के अन्दर का कूड़ा-करकट कूड़ादान में इकट्ठा किया जाता रहे तथा कारखाने के बाहर चारों ओर सफाई रहना भी अति आवश्यक है। स्वच्छ वातावरण श्रमिकों को उत्साहपूर्वक कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।

(2) ऊष्मा एवं ताप (Heat and Temperature) – तापमान का शरीर की शक्ति और क्रियाशीलता पर सीधा असर पड़ता है। श्रमिक अधिक ताप और अधिक ठण्डक में क्षमतापूर्वक कार्य नहीं कर सकते हैं। जिन कारखानों में वातावरण का तापमान सामान्य से कहीं अधिक होता है वहाँ श्रमिकों का स्वास्थ्य एवं मानसिक सन्तोष विकृत हो जाती है। तापमान अधिक रहने से जल्दी थकान आती है, कर्मचारियों का ध्यान विचलित हो जाता है तथा दुर्घटनाएँ बढ़ जाती हैं। स्टील, काँच तथा आयरन के उद्योगों में अत्यधिक ऊष्मा एवं ताप पाया जाता है। ऐसी दशाओं में कार्य करने वाले श्रमिकों को असहनीय पीड़ा होती है एवं इन परिस्थितियों में दुर्घटनाओं के घटित होने की सम्भावनाएँ भी तीव्र हो जाती हैं। खनन-उद्योगों में भी यही तथ्य सामने आते हैं। कुछ खानों का तापमान काफी अधिक पाया जाता है। मैसूर की 11,000 फुट गहरी खानों को तापक्रम 150°F तक मिलता है। ये खाने विश्व में दूसरा स्थान रखती हैं। इतने ऊँचे तापक्रम पर इतनी गहराई में काम करने वाले श्रमिकों को विशेष साहस का परिचय देना पड़ता है। ऐसी दशाओं में स्वास्थ्य की रक्षा, कार्यक्षमता को बनाये रखना एवं दुर्घटनाओं को नगण्य कर देना अत्यन्त कठिन है।

(3) प्रकाश (Lighting) – प्रकाश की दशा से सम्बन्धित कई महत्त्वपूर्ण बातें हैं; जैसे—स्थिति, वितरण, तीव्रता और रंग। स्थिति से तात्पर्य है—प्रकाश का स्रोत कहाँ स्थित है। प्रकाश-स्रोत की स्थिति ऐसी हो कि प्रकाश सीधे आँखों पर न पड़े, यन्त्रों या लिखने की मेज आदि पर पड़े। प्रकाश का वितरण काम करने के स्थान पर एक समान होना चाहिए। इसके अतिरिक्त प्रकाश न अधिक तीव्रता के साथ हो और न बहुत कम। गहन काम में तीव्र प्रकाश चाहिए। इसी प्रकार प्रकाश का रंग भी महत्त्वपूर्ण है। दिन के उजाले जैसा प्रकाश का रंग होना अच्छा है। यदि रंगीन प्रकाश की आवश्यकता हो तो हल्का रंग प्रयोग करना उपयुक्त है। यदि कारखाने में प्रकाश की समुचित व्यवस्था नहीं होगी तो दुर्घटनाओं में वृद्धि होगी तथा उत्पादन स्तर गिर जाएगा।

प्रकाश श्रमिकों की कार्य करने की दशाओं में एक सर्वप्रमुख घटक है। इसकी उपस्थिति रोग के अनेकानेक कीटाणु का विनाश करती है एवं इससे प्राकृतिक रूप से विसंक्रमण (Disinfection) होता रहता है। रोशनदान एवं खिड़कियों की सहायता से प्राकृतिक प्रकाश की व्यवस्था की जा सकती है। प्राकृतिक प्रकाश के अभाव में कृत्रिम प्रकाश; जैसे – विद्युत, गैसीय लैम्प आदि का प्रबन्ध किया जा सकता है। प्रकाश की व्यवस्था करते। समय श्रमिकों की नेत्रदृष्टि को ध्यान में रखना अनिवार्य होता है। अप्राकृतिक प्रकाश उनकी नेत्र-ज्योति को लम्बी समयावधि में बुरे रूप से प्रभावित कर सकता है।

(4) वायु का प्रबन्ध (Ventilation) – वायु संचार से कर्मचारियों की क्रियाशीलता बनी रहती है और वे स्वस्थ रहते हैं; अतः उद्योग अथवा कारखाने में स्वच्छ एवं ताजी हवा के आरपार जाने की व्यवस्था (Cross Ventilation) होनी चाहिए। इससे कारखाने की गर्म एवं गन्दी हवा का विसर्जन होता रहता है तथा बाहर की शुद्ध एवं ताजा हवा अन्दर आती रहती है। भारत के विभिन्न उद्योगों में अभी तक इस विषय पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। सूती वस्त्र उद्योग में जहाँ पर कि धूल और नम वायु की प्रधानता पायी जाती है तथा साथ-ही-साथ उन उद्योगों में जहाँ पर कि विषैली गैसें उत्पन्न होती रहती हैं, इस व्यवस्था का होना सबसे पहली आवश्यकता है। पोफनबर्जन (Pofenbergen) के अनुसार वायु में 14% ऑक्सीजन की मात्रा होने पर काम करने वालों पर बुरा प्रभाव पड़ना शुरू हो जाता है। इसके अतिरिक्त वायु में वांछित रूप से नमी की मात्रा भी होनी चाहिए।

(5) धूल (bust) – भारत जैसे देश की जलवायु कुछ ऐसी है कि गर्मी की ऋतु में यहाँ धूल बड़ी मात्रा में उत्पन्न हो जाती है। सामान्य परिस्थितियों में भी उद्योगों के अन्दर धूल तथा बुरादा दूर करने की विशेष व्यवस्था होनी चाहिए। धूल से भरे वातावरण में श्रमिकों को साँस लेने में कठिनाई होती है तथा उनकी आँखों पर भी धूल का अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है। भारत के अनेक उद्योगों में धूल विशाल मात्रा में उत्पन्न होती है। इसका तुरन्त समाधान किया जाना चाहिए तथा उचित उपायों द्वारा धूल को दूर करने की व्यवस्था की जानी चाहिए।

(6) कार्य के घण्टे (working Hours) – प्रायः ऐसा समझा जाता है कि कर्मचारियों से अधिक-से-अधिक कार्य लेने पर उत्पादन में वृद्धि होगी, किन्तु अनुभव बताते हैं कि कार्य के घण्टे आवश्यकता से अधिक बढ़ा देने पर उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति के काम करने की क्षमता सीमित है, इससे अधिक कार्य उसे थका देता है और बीमार बना देता है; अतः उद्योगों में कार्य करने के अधिक घण्टे नहीं होने चाहिए। किसी भी श्रमिक से एक निश्चित अवधि के बाद कार्य नहीं लिया जाना चाहिए। इसके लिए पुरुष, महिला, किशोर एवं बालक वर्ग के लिए कार्य करने के घण्टे तय कर दिये जाएँ। इससे श्रमिकों की कार्यक्षमता तथा कार्य-कुशलता पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है तथा औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि होती है।

(7) पीने का पानी (Drinking water) – कारखाने में श्रमिकों के लिए पीने के पानी की उत्तम व्यवस्था होनी चाहिए। पीने का पानी स्वच्छ हो तथा ग्रीष्म ऋतु में शीतल जल का प्रबन्ध किया जाये।

(8) विश्रामालय (Rest Houses) – मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि लगातार काम करने से कर्मचारी थकान अनुभव करते हैं और ऊब जाते हैं; अतः श्रमिकों की कार्यक्षमता में वृद्धि करने के लिए उन्हें शारीरिक रूप से आराम प्रदान करने की व्यवस्था विशेष रूप से की जानी चाहिए। एक लम्बे मध्यान्तर के अतिरिक्त बीच-बीच में 5-10 मिनट का विश्राम भी मिलता रहना चाहिए। उनके लिए कारखाने के भीतर ही उचित स्थान पर आराम-घरों की समुचित व्यवस्था की जाये जहाँ कि वे अवकाश के समय आराम कर सकें। इस व्यवस्था का सीधा प्रभाव उत्पादन की वृद्धि में पाया जाता

(9) शौचालय एवं मूत्रालय (Laterines and Urinals) – श्रमिकों के लिए कारखाने के . भीतर ही शौचालय एवं मूत्रालय की आवश्यक रूप से व्यवस्था होनी चाहिए। इन स्थानों की पर्याप्त सफाई बहुत अनिवार्य है तथा महिला कर्मचारियों के लिए इसका अलग से प्रबन्ध किया जाना चाहिए।

(10) भीड़ (Over Crowding) – भारतीय उद्योगों में श्रमिकों के लिए खुले स्थान का प्रबन्ध नहीं मिलता है। एक श्रमिक के लिए न्यूनतम 50 वर्ग फुट स्थान स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयुक्त माना जाता है। इसके अभाव में उद्योग के भीतर भीड़ के कारण दुर्घटनाएँ घटित होने की आशंका रहती है।

(11) यन्त्रों से सुरक्षा (Safety Provision of Machines) – कारखाने के यन्त्रों से श्रमिकों की पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था अनिवार्य है अन्यथा अवांछनीय दुर्घटनाओं की सम्भावना अधिक होती है। मशीनों के बीच में काफी स्थान दिया जाना चाहिए तथा मशीनों के ऊपर आवश्यक मात्रा में आवरण रहने चाहिए। केवल उन्हीं भागों को खुला रखा जा सकता है जिन्हें ढकना कदापि सम्भव नहीं। प्रायः कारखानों में शाफ्ट, पैली, पट्टे तथा ऐसी अन्य बहुत-सी चीजें खुली अवस्था में रहती हैं जिनकी चपेट में कार्यशील श्रमिक आ सकते हैं। इसके लिए उचित प्रबन्ध किया जाना चाहिए।

(12) संगीत (Music) – काम के समय में हल्का लयात्मक संगीत कार्य को रोचक बना देता है। इससे कार्य अधिक होता है तथा उत्पादन बढ़ता है। संगीत से कार्य में उत्साह बना रहता है। स्मिथ ने 1000 कर्मचारियों के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला कि 98% कर्मचारियों ने 8 घण्टे तक काम के समय संगीत का आनन्द अनुभव किया और उनमें ऊब व थकान काफी कम हुई।

(2) मनोवैज्ञानिक दशाएँ एवं उनका प्रभाव
(Psychological Conditions and their Effect)

उद्योग के अन्तर्गत मनोवैज्ञानिक दशाएँ मुख्य रूप से मानव-मन और उसके व्यवहार से सम्बन्धित होती हैं। प्रमुख मनोवैज्ञानिक दशाएँ और उनके प्रभाव निम्नलिखित हैं

(1) सुरक्षा (Security) – सुरक्षा जीवन की एक महान् आवश्यकता है जिसका उद्योग और व्यवसाय में समान महत्त्व है। जिन उद्योगों और व्यवसायों में कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा होती है। उनमें लोग बहुत ही प्रसन्नता से कार्य करते हैं तथा उत्पादन में वृद्धि करके निरन्तर प्रशंसा पाने को प्रयास करते हैं। ऐसी परिस्थितियों में कम-से-कम एक निश्चित समयावधि के बाद तो नौकरी पक्की हो जानी चाहिए। असुरक्षित नौकरी वाले व्यक्ति को कार्य-विशेष से कोई लगाव नहीं रहता। नौकरी की सुरक्षा के अतिरिक्त कर्मचारी को बुढ़ापे, बेकारी, बीमारी तथा दुर्घटनाओं आदि अवस्थाओं में भी सुरक्षा की गारण्टी मिलनी चाहिए। जीवन बीमा, ग्रेच्युइटी, प्रॉविडेण्ट फण्ड तथा पेन्शन इत्यादि सुविधाएँ भी व्यक्ति को अधिकाधिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। वस्तुतः सुरक्षा एक ऐसी मनोवैज्ञानिक दशा और आवश्यकता है जो कर्मचारियों को अधिक-से-अधिक कार्य हेतु प्रेरित करती है।

(2) अधिकारियों का व्यवहार (Behaviour of Authorities) – अधिकारियों का अच्छा व्यवहार भी एक महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक दशा है। अधिकारी अपने अच्छे व्यवहार से उद्योग के कर्मचारियों में स्फूर्ति, उत्साह तथा सौहार्द उत्पन्न कर सकते हैं। मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार, कर्मचारी प्रेम, सहानुभूति एवं सहयोग के वातावरण में अधिक लगन से कार्य करते हैं। वस्तुतः अधिकारियों का कर्मचारियों से प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है; अतः उनका कर्मचारियों के प्रति अच्छा व्यवहार अति आवश्यक समझा जाता है। इसके विपरीत बुरा व्यवहार तनाव, क्षोभ एवं विद्रोह को जन्म देता है। कर्मचारियों को अपने अधिकारियों से मधुर सम्बन्ध होना, उनके प्रति सम्मान भावना तथा उचित सामंजस्य के कारण तनाव की प्रत्येक स्थिति दूर होती है जिससे उत्पादन में वांछित उन्नति होती है। क्रोधी, चिड़चिड़े तथा अभिमानी अधिकारियों का व्यवहार कर्मचारियों तथा श्रमिकों को भड़का देता है, वे रुचि के साथ ध्यानपूर्वक काम करना बन्द कर देते हैं जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

(3) कर्मचारियों के आपसी सम्बन्ध (Mutual Relations among Employees) – कर्मचारियों में परस्पर प्रेम, मैत्री और भाईचारे का सम्बन्ध भी कार्य करने की एक महत्त्वपूर्ण दशा है। जिस उद्योग में कर्मचारियों में पारस्परिक सद्व्यवहार बना रहता है, वहाँ कर्मचारी सन्तुष्ट रहते हैं तथा उत्पादन में वृद्धि होती रहती है। किन्हीं कारणों से कर्मचारियों में फूट, प्रतिस्पर्धा और तनाव की दशाएँ उत्पन्न होने से उत्पादन कार्य हतोत्साहित होता है। वस्तुतः सामूहिक कार्य मिल-जुलकर सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना से किये जाने चाहिए।

(4) आवश्यकताओं की पूर्ति (Satisfaction of Needs) – उद्योग में कार्य करने वाले प्रत्येक कर्मचारी की अनेक शारीरिक, पारिवारिक, सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, चिकित्सा सम्बन्धी तथा सांवेगिक आवश्यकताएँ होती हैं। यदि कर्मचारी अपनी और परिवार की इन आधारभूत आवश्यकताओं के प्रति चिन्तित रहेगा तो वह तनाव महसूस करेगा; अतः वह अस्थिर चित्त से ठीक प्रकार कार्य नहीं कर पाएगा। सेवायोजकों या मालिकों को चाहिए कि वे कर्मचारियों के प्रति उत्तरदायित्व एवं सद्भावना प्रदर्शित करते हुए इन आवश्यकताओं की पूर्ति में उन्हें सहायता दें। जिन उद्योगों के सेवायोजक या मालिक इन कल्याणकारी कार्यों के लिए प्रयास करते हैं, वहाँ के कर्मचारी अधिक मेहनत से काम करते हैं, उत्पादन वृद्धि में सहयोग देते हैं तथा उद्योगों के हित में पूरी शक्ति लगा देते हैं।

(5) प्रलोभन (Incentives) – व्यवसायों में कर्मचारियों या श्रमिकों को प्रेरणा प्रदान करने की आवश्यकता होती है। जिस उद्योग में कर्मचारियों को सुविधाओं का प्रलोभन रहता है, वहाँ लोग लगन से कार्य करते हैं। इन प्रलोभनों में वेतन वृद्धि, बोनस, प्रशंसा, गुड एन्ट्री, पुरस्कार तथा पदोन्नति आदि प्रमुख हैं। इनसे प्रेरित होकर कर्मचारीगण निरन्तर श्रमपूर्वक कार्य करते हैं।

(6) पदोन्नति के अवसर (Opportunities of Promotion) – प्रत्येक व्यवसाय या उद्योग में कार्य की विभिन्न श्रेणियाँ होती हैं। जब कोई व्यक्ति कुछ दिन तक किसी कार्य को कर लेता है तो उसे उस कार्य का अनुभव हो जाता है। सन्तोषजनक और अच्छे कार्य के लिए व्यक्ति को उच्च पद प्रदान कर दिया जाता है, यह क्रिया ही पदोन्नति कहलाती है। वस्तुत: पदोन्नति उद्योग की एक मनोवैज्ञानिक दशा है जो कर्मचारियों को अच्छा काम करने के लिए प्रेरित करती है तथा उद्योग को उनके अनुभव से लाभ उठाने में सहायता प्रदान करती है। न्यायोचित पदोन्नति से कर्मचारियों, मिल-मालिकों तथा उस औद्योगिक इकाई को कई लाभ मिलते हैं जिससे अन्ततः उत्पादन वृद्धि को बल मिलता है।

उद्योग को अपनी ही इकाई से अनुभवी कर्मचारी मिल जाते हैं जो प्रेरित होकर उद्योग के विकास हेतु और अधिक कार्य करते हैं। पदोन्नति से कर्मचारियों में लगातार उत्साह तथा कार्य करने की प्रेरणा बनी रहती है। इससे कर्मचारियों में अधिक सुरक्षा एवं आत्म-विश्वास की भावना उत्पन्न होती है। वे पदोन्नति का लक्ष्य लेकर अच्छे-से-अच्छा काम करने को तत्पर रहते हैं। रुचिपूर्वक मन लगाकर काम करने से अधिकारीगण सन्तुष्ट रहते हैं जिससे आपसी सम्बन्धों में मधुरता का संचार होता है और उद्योग में शान्तिपूर्ण वातावरण बना रहता है। औद्योगिक तनाव और संघर्ष जन्म नहीं लेते तथा उत्पादन कार्य सामान्य गति से चलता है। इस प्रकार पदोन्नति के अवसर एक ओर, कर्मचारियों की दक्षता बनाये रखने में सहायक सिद्ध होते हैं; तो दूसरी ओर उनकी उत्पादन क्षमताओं पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है।

निष्कर्षतः कहा जा सकती है कि उद्योग पर प्रभाव डालने वाली विभिन्न भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक दशाएँ अनुकूल परिस्थितियों में ऐसे वातावरण का सृजन करती हैं जिसके माध्यम से औद्योगिक उत्पादक में आशातीत वृद्धि होती है। इसके विपरीत, प्रतिकूल परिस्थितियों में उत्पादन में कमी आती है।

प्रश्न 4.
कर्मचारियों की पदोन्नति से क्या आशय है? पदोन्नति करते समय ध्यान में रखने योग्य बातों का उल्लेख कीजिए।
या
उद्योगों में कर्मचारियों की पदोन्नति के क्या आधार होने चाहिए? उदाहरणों द्वारा अपना मत स्पष्ट कीजिए।
या
उद्योग में पदोन्नति के अवसर के बारे में लिखिए।
उत्तर :
विभिन्न औद्योगिक संस्थानों तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में कार्य की विविध श्रेणियों के अन्तर्गत कर्मचारियों एवं अधिकारियों के पद सुनिश्चित होते हैं और किसी विशेष पद के लिए कर्मचारी की उपयुक्तता भी\ किन्हीं मानदण्डों के आधार पर निर्धारित की जाती है। आवश्यक रूप से ये मानदण्ड कर्मचारी की योग्यता, उसकी कार्य की क्षमता, निपुणता, रुचि, वरिष्ठता तथा अपने उच्च अधिकारियों के साथ उसके सम्बन्धों पर आधारित हो सकते हैं। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि कोई भी कर्मचारी अपने वर्तमान पद पर लम्बे समय तक सन्तुष्ट नहीं रह सकता। वह एक के बाद एक उच्च पद पर उन्नत होने की लालसा व महत्त्वाकांक्षा रखता है। पदोन्नति की कामना ही उसे अपने कर्म-पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करती है। कर्मचारियों की पदोन्नति से सम्बन्धित विभिन्न बिन्दुओं पर ध्यान केन्द्रित करने से पूर्व आवश्यक है कि यह समझा जाए कि ‘पदोन्नति’ से क्या अभिप्राय है।

पदोन्नति का अर्थ
(Meaning of Promotion)

किसी भी उद्योग अथवा व्यवसाय के प्रबन्ध-तन्त्र की कार्यकुशलता इस बात पर निर्भर करती है। कि वह अपने कर्मचारियों को ऊँचा उठाने के पर्याप्त एवं यथेष्ट अवसर ‘किस सीमा तक’ प्रदान करता है। विभिन्न पदों के लिए अधिक-से-अधिक सक्षम कर्मचारी प्राप्त करने की दृष्टि से किसी भी प्रबन्ध-तन्त्र को अपने कर्मचारियों को निरन्तर प्रेरित एवं उत्साहित करते रहना चाहिए। एक पद से उच्च पद पर अग्रसरित एवं उन्नत करने से बढ़कर किसी भी कर्मचारी को कोई दूसरी प्रेरणा क्या मिलेगी? इस भाँति स्पष्ट रूप से कर्मचारियों की पदोन्नति एक वांछित, अनिवार्य एवं अभीष्ट माँग है।

अर्थ – पदोन्नति से अभिप्राय उच्च पद की प्राप्ति से होता है जिसमें कर्मचारियों की प्रतिष्ठा, उत्तरदायित्वों, पद तथा आय में वृद्धि होती है। आवश्यक नहीं कि पदोन्नति के साथ आय में भी वृद्धि हो, बिना आय में वृद्धि हुए भी पदोन्नति सम्भव है। इसके साथ ही, वार्षिक वेतन वृद्धि को भी पदोन्नति नहीं कहा जा सकता। कर्तव्यों तथा उत्तरदायित्वों में परिवर्तन होना पदोन्नति की प्रक्रिया का अनिवार्य लक्षण है।

विलियम जी० टोरपी के अनुसार, “पदोन्नति पदाधिकारी के एक पद से ऐसे दूसरे पद पर पहुँचने की ओर संकेत करती है जो उच्चतर श्रेणी या उच्चतर न्यूनतम वेतन वाला होता है। पदोन्नति का अभिप्राय है-कर्मचारी के कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों में वृद्धि कर देना।”

एल० डी० ह्वाइट के शब्दों में, “पदोन्नति का अर्थ है एक पद से किसी उच्चतर श्रेणी के अन्य पद पर नियुक्ति जिसमें कठिनतर प्रकृति एवं गहनतर उत्तरदायित्वों का कार्य करना पड़ता है। इसमें पद का नाम बदल जाता है और प्रायः वेतन में भी वृद्धि होती है।”

इस प्रकार पदोन्नति के अन्तर्गत किसी उद्योग अथवा व्यवसाय में कार्य करने वाला कर्मचारी किसी दूसरे ऐसे कार्य (पद) पर स्थानान्तरित कर दिया जाता है जिससे उसे अधिक उत्तरदायित्व, आय, सुविधाएँ तथा प्रतिष्ठा प्राप्त होते हैं।

पदोन्नति के समय ध्यान रखने योग्य बातें।
(Factors Determining Eligibility of Promotion)

पदोन्नति के लिए कर्मचारियों की पात्रता का क्षेत्र क्या हो या कर्मचारियों की पदोन्नति करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखा जाये, यह एक प्रमुख समस्या समझी जाती है। पदोन्नति करते समय निम्नलिखित बातों (तत्त्वों) पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाना आवश्यक है –

(1) ज्येष्ठता या वरिष्ठता – अधिकतर कर्मचारीगण पदोन्नति के लिए ज्येष्ठता या वरिष्ठता के सिद्धान्त का समर्थन करते हैं। इसके अन्तर्गत उच्चतर पद पर किसी भी कर्मचारी की पदोन्नति इसलिए की जानी चाहिए, क्योंकि उसका सेवा काल (Length of Service) दूसरे कर्मचारियों की तुलना में अधिक है। इसका अभिप्राय यह है कि सेवा में पहले भर्ती होने वाले व्यक्ति की पदोन्नति पहले तथा बाद में भर्ती होने वाले व्यक्ति की पदोन्नति बाद में की जानी चाहिए। ज्येष्ठ कर्मचारी का कार्य अनुभव अपेक्षाकृत अधिक होता है और अधिक अनुभव पदोन्नति के लिए एक बड़ी योग्यता है; अतः कहा जाता है कि पदोन्नति के लिए “ज्येष्ठता ही योग्यता है। यह आधार पदोन्नति को निश्चितता प्रदान करता है और इससे पुराने कर्मचारियों की प्रतिष्ठा की रक्षा हो पाती है। ज्येष्ठता का तत्त्व स्वयंचालित पदोन्नति का नेतृत्व करता है। इस प्रकार इसे उचित, न्यायपूर्ण एवं निष्पक्ष आधार रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

कुछ विचारकों की दृष्टि से ज्येष्ठता या वरिष्ठता के आधार पर कर्मचारियों की पदोन्नति नहीं की जानी चाहिए। इससे कर्मचारियों में प्रतिस्पर्धा की भावना पर रोक लगती है और वे अधिक मेहनत, बुद्धिमत्ता एवं उत्साह से कार्य नहीं कर पाते। आलोचकों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को सौभाग्य से नियति ने पहले जन्म देकर ज्येष्ठता प्रदान कर दी है तो इसका अर्थ यह नहीं हो जाता कि वह उस पद के लिए पूरी तरह सक्षम, कुशल एवं योग्य है। इसके साथ-ही-साथ ज्येष्ठता या वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति मिलने की नीति उन प्रतिभा सम्पन्न नौजवान कर्मचारियों का भी अहित करती है जिन्होंने स्वतन्त्र प्रतियोगिता में सफलता प्राप्त आगे बढ़ने की उम्मीद से व्यवसाय/संस्थान में प्रवेश किया है।

वास्तव में, पदोन्नति का आशय है-उच्चतर कर्तव्यों तथा उत्तरदायित्वों के लिए व्यक्ति की नियुक्ति और इसके लिए एकमात्र ज्येष्ठता को ही आधार नहीं बनाया जा सकता, किन्तु व्यवहार में ज्येष्ठता या वरिष्ठता या सेवा-काल की किसी भी भाँति उपेक्षा नहीं की जा सकती। ‘टॉमलिन आयोग (Tbmlin Commission) ने ठीक ही कहा है, “सेवा के सम्बन्ध में सामान्यतः ज्येष्ठता (वरिष्ठता) के तत्त्व के कम मूल्यांकन की सम्भावना नहीं है।”

(2) योग्यता – आधुनिक युग में पदोन्नति का आधार कर्मचारी की योग्यता’ को बनाने पर विशेष बल दिया जाता है। किन्तु योग्यता की जाँच किस तरह की जाये और इसके लिए क्या मानदण्ड होना चाहिए, यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा जटिल प्रश्न है। निश्चय ही पदोन्नति के लिए योग्यता की जाँच का मानदण्ड नितान्त रूप से वस्तुनिष्ठ अर्थात् व्यक्ति निरपेक्ष होना चाहिए।

(3) कार्य में दक्षता या निपुणता – कर्मचारियों की पदोन्नति के लिए कार्य में दक्षता या निपुणता का आधार अत्यन्त सामान्य तथा लोकप्रिय सिद्धान्त है। किसी भी उद्योग या व्यापारिक संस्थान में नियोक्ता (मालिक) की यही इच्छा रहती है कि उसका कर्मचारी कार्य में दक्ष या निपुण हो और वह अच्छे-से-अच्छा कार्य करे। नौकरी के मामले में प्राय: देखा जाता है कि जो कर्मचारी अच्छा कार्य करते हैं, मालिक या अधिकारियों की दृष्टि में उनका एक विशेष स्थान बन जाता है। उनकी दक्षता, क्षमता तथा विश्वसनीयता के आधार पर उन्हें ऊँचे पद पर प्रोन्नत कर दिया जाता है। उत्तम कार्य प्रदर्शित कर पदोन्नति पाने का यह सिद्धान्त दूसरे कर्मचारियों में अच्छा कार्य करने का प्रलोभन पैदा करता है। इससे अन्य लोगों के उत्साह एवं रुचि में वृद्धि होती है। दक्षता या निपुणता के आधार पर उच्च पद, अधिक आय, सुविधाएँ तथा प्रतिष्ठा पाने वाले कर्मचारियों का अनुकरण कर अन्य कर्मचारी भी उन्हीं की तरह कार्य में दक्ष एवं निपुण होने के लिए प्रयास करते हैं।

(4) सिफारिश या कृपा – आजकल पदोन्नति पाने के लिए उच्च अधिकारी की सिफारिश या कृपा सबसे बड़ा एवं प्रभावशाली अस्त्र समझा जाता है। इस अस्त्र के सामने कर्मचारी की ज्येष्ठता, योग्यता, निपुणता या विश्वसनीयता सभी गुण व्यर्थ हो जाते हैं। प्रायः अधिकारियों की दावतें करने वाले, उन्हें तरह-तरह के लाभ पहुँचाने वाले, किसी-न-किसी बहाने भेट अर्पित करने वाले चाटुकार कर्मचारी सबसे पहले पदोन्नति पाते हैं। चाटुकारिता के माध्यम से अपने अधिकारियों की कृपा द्वारा पदोन्नति हासिल करने वाले कर्मचारियों के सामने लम्बी अवधि तक सेवा करने वाले अनुभवी, कार्यकुशल, ईमानदार तथा सुयोग्य कर्मचारी वर्षों तक निम्न स्तर पर ही पड़े रहते हैं। स्पष्टतः सिफारिश या कृपा के आधार पर पदोन्नति पाने की यह बुरी रीति किसी भी प्रकार से अनुकरणीय नहीं है, यह सर्वथा त्याज्य है।

उपर्युक्त बिन्दुओं के अन्तर्गत हमने उन सभी बातों का विवेचन किया है जिन्हें कर्मचारियों की पदोन्नति के अवसर पर पूरी तरह से ध्यान में रखा जाना चाहिए। स्पष्टतः पदोन्नति के लिए व्यक्तिगत भेदभाव से दूर; व्यक्ति को निरपेक्ष एवं वस्तुनिष्ठ नीति अपनायी जानी चाहिए। पक्षपातपूर्ण, मनचाहे तरीके से तथा सिफारिशों के माध्यम से होने वाली पदोन्नतियाँ संस्थानों के वातावरण को दूषित कर सकती हैं।

प्रश्न 5.
उद्योग में मानवीय सम्बन्ध स्थापित करने से क्या लाभ होता है? उद्योग में मानवीय सम्बन्ध बनाये रखने के लिए क्या उपाय किये जा सकते हैं?
या
उद्योग में मानवीय सम्बन्ध से क्या समझते हैं? उद्योग में मानवीय सम्बन्धों के महत्व को विस्तार से समझाइये।
या
श्रम-कल्याण कार्यों से आप क्या समझते हैं? औद्योगिक क्षेत्र में किये जाने वाले श्रम-कल्याण कार्यों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
श्रम-कल्याण से आप क्या समझते हैं? उद्योग के श्रम-कल्याण कार्यों का महत्त्व बताइए।
या
उभेग में कर्मचारी-कल्याण से सम्बन्धित योजनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक क्रान्ति से पहले उद्योगपतियों के अपने कर्मचारियों या श्रमिकों के साथ भावनाहीन और अमानवीय सम्बन्ध थे। उद्योगपतियों का मात्र एक लक्ष्य था-अधिकतम आर्थिक लाभ अर्जित करना, जिसकी पूर्ति के लिए वे श्रमिकों से मशीनों के कलपुर्जा की तरह काम लेते थे। जिस प्रकार मशीन का कलपुर्जा टूट जाने या व्यर्थ हो जाने पर फेंक दिया जाता है वही स्थिति श्रमिकों की भी थी; अयोग्य होने पर उन्हें निकाल बाहर कर दिया जाता था। उनसे पशुवत् व्यवहार रखते हुए दस-बारह घण्टे तक लगातार काम लिया जाता था। उन्हें कठिनाई से पेट भरने के लिए थोड़ा-सा धन दिया जाता था। उनके खून-पसीने की गाढ़ी कमाई उद्योगपतियों तथा सेवायोजकों की विलासिता में खर्च होती थी। बीमार श्रमिकों, गर्भवती स्त्रियों तथा बच्चों से भी गुलामों की तरह काम लिया जाता था। यह उत्पीड़न आर्थिक शोषण तथा अमानवीय कृत्यों की चरम परिणति थी।

ऐसी विषम परिस्थितियों में श्रमिक वर्ग के दु:खों, निराशाओं तथा असन्तोष की कोई सीमा न थी। शनैः-शनैः श्रमिकों में जागृति आयी, वे अपने अधिकारों के लिए उठ खड़े हुए तथा संघर्षों की महान् त्रासदियों के बाद अमानवीयता के काले बादलों से उद्योग में मानवीय सम्बन्धों की रोशनी झलकी। औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् श्रम-कल्याण जैसे नवीन मूल्यों को मान्यता प्राप्त हुई। इसी के परिणामस्वरूप आज स्वयं उद्योगपति और सेवायोजक श्रमिकों की भलाई के कार्यों में गहरी दिलचस्पी लेते हैं।

उद्योग में मानवीय सम्बन्ध
(Human Relation in Industry)

उद्योग में मानवीय सम्बन्धों का अर्थ – वर्तमान समय में औद्योगिक प्रगति के लिए मानवीय सम्बन्धों को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया जाने लगा है। मानवीय सम्बन्धों का आधार है-प्रेम, दया, सहानुभूति, सहयोग, सौहार्द तथा बन्धुत्व की भावनाएँ। इन्हें मानवीय भावनाओं का नाम दिया जाता है, क्योंकि इनके माध्यम से ही विश्व के मनुष्य एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं तथा अटूट सम्बन्धों में बँध जाते हैं। जब औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत मनुष्यों को आपसी व्यवहार इस प्रकार की भावनाओं से युक्त होता है तो ऐसे सम्बन्धों को उद्योग में मानवीय सम्बन्ध कहकर परिभाषित किया जा सकता है।

इस भाँति श्रमिकों अथवा कर्मचारियों के साथ सद्व्यवहार करते हुए उनकी शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक, सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक जरूरतों को पूरा करने की दृष्टि से विभिन्न कल्याणकारी कार्यों को लेकर श्रमिकों तथा उद्योगपतियों के मध्य प्रेम एवं श्रद्धा का सम्बन्ध स्थापित होना ही उद्योग में मानवीय सम्बन्ध कहलाता है। ये मानवीय सम्बन्ध उत्तम कार्य, अधिक उत्पादन तथा औद्योगिक शान्ति के प्रणेता होते हैं। उद्योगों में मानवीय सम्बन्ध अच्छे स्तर पर रखने से सरकार, उद्योगपति तथा कर्मचारी सभी का हित होता है। आजकल औद्योगिक प्रगति के लिए प्रत्येक सभ्य देश में मानवीय सम्बन्धों को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया जाने लगा है।

उद्योगों में मानवीय सम्बन्धों के रूप
उद्योगों में मानवीय सम्बन्ध दो रूपों में दृष्टिगोचर होते हैं –

(i) औद्योगिक प्रशासन एवं प्रबन्धन में मानवीय सम्बन्ध
(Human Relations in Industrial Administration and Management)

आधुनिक समय में औद्योगिक प्रशासन और प्रबन्धन में एक बुनियादी परिवर्तन आया है। आजकल औद्योगिक इकाइयों में मानवीय तत्त्व को प्रमुखता प्रदान कर एक मौलिक आवश्यकता की पूर्ति की गयी है। सेवायोजकों और उद्योगपतियों ने इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है कि श्रमिक और कर्मचारी लोग मनुष्य हैं, मशीनें नहीं हैं। उन्हें तेल या बिजली से नहीं चलाया जा सकता, उनकी प्यास और जरूरत प्रेरणाएँ, प्रशंसाएँ, सम्मान, प्रेम और सहानुभूति हैं। प्रोत्साहन और प्रलोभन के वशीभूत होकर श्रमिक अधिक-से-अधिक कार्य करने हेतु प्रवृत्त होता है। पशु या गुलाम जैसे व्यवहार और कठोरतम प्रशासन उसे विद्रोह की ओर बढ़ाता है।

‘सामूहिके उत्साहशीलता द्वारा मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन – औद्योगिक प्रगति एवं मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन प्रदान करने हेतु कर्मचारियों तथा श्रमिकों में सामूहिक उत्साहशीलता (Group Morale का होना अत्यन्त आवश्यक है। सामूहिक उत्साहशीलता एक सामूहिक भावना को नाम है जो उन लोगों में उत्पन्न हो जाती है जो एक लक्ष्य से प्रेरित होकर एक साथ ही एक ही प्रकार का कार्य करते हैं। एक साथ काम करने से उनमें जो उत्साह पैदा होता है उसे सामूहिक उत्साहशीलता कहा जाता है। प्रत्येक उद्योग में सामूहिक उत्साहशीलता एक महान् आवश्यकता है। वस्तुतः यही मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन प्रदान करने की कुंजी भी है। इसके माध्यम से मानवीय सम्बन्धों को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं –

(1) सामान्य लक्ष्य के प्रति जागरूकता – उद्योगपति, अधिकारियों, कर्मचारियों तथा श्रमिकों सभी का यही लक्ष्य होना चाहिए कि उद्योग में अधिक-से-अधिक प्रगति हो। इसके लिए आवश्यक है। कि सभी श्रमिक अपने उद्योग के प्रति सम्मान एवं सर्वहित की भावना उत्पन्न कर प्रयत्नशील बनें।

(2) लक्ष्य पूर्ति में प्रगति – सामान्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उद्योग के समस्त कर्मचारी सतत प्रयास करें। इसके लिए अति आवश्यक है कि उद्योग का लाभांश उसके अंशों में विवेकपूर्ण दृष्टि से विभाजित हो। यह प्रलोभन ही सबको लक्ष्य की ओर ले जाएगा।

(3) लाभांश वितरण – मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन देने हेतु कम्पनी के लाभ का सभी कर्मचारियों तथा श्रमिकों को उपयुक्त एवं न्यायपूर्वक अंश मिलना चाहिए। इससे उद्योग से सम्बन्धित उत्पादन के सभी अंग अधिकाधिक कार्य करेंगे और अधिक लाभ पाने की प्रेरणा से मिलजुलकर कठोर श्रम करेंगे।

(4) निश्चित सार्थक कार्य – कर्मचारियों और श्रमिकों में यह विचार उत्पन्न होने पर कि उनका कार्य उद्योग का अभिन्न अंग है, एक समान भावधारा का प्रवाह होगा। इसके फलस्वरूप वे सभी प्रेम, भाईचारे व सहयोग के साथ काम करेंगे।

(5) सामूहिक सहयोग एवं परामर्श – उद्योग से सम्बन्धित सभी समस्याओं के निराकरण हेतु सभी श्रमिकों व कर्मचारियों का सहयोग एवं परामर्श वांछित है। इसके लिए श्रमिकों के प्रतिनिधियों को वार्ताओं में आमन्त्रित किया जाये। ये वार्ताएँ उत्पादन वृद्धि और उद्योग व कर्मचारियों की समस्याओं के समाधान तलाशने के लिए आयोजित की जाती हैं।

(6) पुरस्कार – अधिक कार्य करने तथा अच्छे कार्यों के लिए प्रोत्साहित करने की दृष्टि से कर्मचारियों को समय-समय पर पुरस्कार दिये जाने चाहिए।

इस प्रकार, उपर्युक्त उपायों के माध्यम से मिल-मालिकों एवं श्रमिकों के बीच प्रेम, सहयोग एवं मैत्री की भावना उत्पन्न कर सहयोग को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे मानवीय सम्बन्ध प्रोत्साहित होते हैं जो प्रत्येक उद्योग की एक अपरिहार्य मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है।

(ii) श्रम-कल्याण कार्य (Labour welfare Activities)

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने मानवीय सम्बन्धों को स्थापित करने तथा उन्हें अधिक-से-अधिक दृढ़ बनाने के लिए ‘श्रम-कल्याण (Labour welfare) का विचार दिया है।

श्रम-कल्याण का अर्थ (Meaning of Labour welfare)-श्रम-कल्याण के अन्तर्गत व्यावसायिक संस्थानों तथा उद्योग समूह के कर्मचारियों को मानवीय आधार पर अधिक-से-अधिक शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा शैक्षिक सुविधाएँ प्रदान करने पर जोर दिया। जाता है। ‘श्रम-कल्याण’ का विचार अत्यन्त विस्तृत और अनेकार्थबोधक है जोकि देश-काल व परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न होते है। किसी विशिष्ट स्थान के श्रमिकों या कर्मचारियों के लिए एक समय-विशेष पर जो कार्य कल्याणकारी समझा जा रहा है, आवश्यक नहीं है कि वह अन्य स्थान के श्रमिकों या कर्मचारियों के लिए भी समय-विशेष पर कल्याणकारी कहा जाये। हमारे देश में किसी उद्योग के श्रमिकों के लिए सन्तुलित आहार तथा वर्दी का प्रबन्ध करना श्रम-कल्याण कार्य के अन्तर्गत गिना जा सकता है लेकिन जापान, जर्मनी या अमेरिका के लिए इसे आवश्यक रूप से श्रम-कल्याण कार्य के अन्तर्गत सम्मिलित नहीं कर सकते।

इस विषय में ‘श्रम पर रॉयल कमीशन की रिपोर्ट (Report of Royalcommission on Labour) में ठीक ही कहा गया है, “कल्याण शब्द, जैसा कि औद्योगिक श्रमिकों के लिए लागू होता है, आवश्यक रूप से लचीला, एक-दूसरे देश से भिन्न अर्थ वाला, विभिन्न सामाज्ञिक प्रथाओं, औद्योगीकरण के स्तर और श्रमिकों के शैक्षणिक विकास के अनुरूप होता है। सच तो यह है कि श्रम-कल्याण एक बहुत ही व्यापक शब्द है जो श्रमिकों तथा कर्मचारियों के लिए भाँति-भाँति की आवश्यक सुविधाओं को प्रदान करने से सम्बन्धित है। प्रारम्भ में श्रम-कल्याण का अर्थ उद्योगपति या मालिकों द्वारा अपने श्रमिकों को वेतन के अतिरिक्त प्रदान की जाने वाली उन सुविधाओं से समझा जाता था जो उनकी उन्नति में सहायक सिद्ध होती थीं, किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में श्रम-कल्याण का अर्थ अधिक व्यापक हो गया है। अपने व्यापक अर्थ में श्रम-कल्याण से अभिप्राय कर्मचारियों या श्रमिकों की शारीरिक, शासन तथा श्रम संगठनों द्वारा किये जाने वाले समस्त प्रयासों अथवा कार्यों से है।”

भ्रम-कल्याण की परिभाषा (Definition of Labour welfare)–श्रम-कल्याण के अर्थ को और स्पष्ट करने के लिए हम निम्नलिखित परिभाषाओं का उल्लेख करेंगे –

(1) एनसाइक्लोपीडिया ऑफ सोशल साइन्सेज के अनुसार, “श्रम-कल्याण के अन्तर्गत किसी मिल के मालिकों के वे ऐच्छिक प्रयास सम्मिलित हैं जिनके द्वारा, वर्तमान औद्योगिक व्यवस्था में, कर्मचारियों के लिए कार्य के आवश्यक तथा यदा-कदा जीवन के लिए आवश्यक उन दशाओं की स्थापना की जाती है जो कानून, उद्योग की प्रथा एवं बाजार की दशा के ऊपर होती है।”

(2) अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, “श्रमिकों के कल्याण का अर्थ ऐसी सेवाओं, सुविधाओं तथा आरामों से है जोकि उद्योगों में या उनके निकट स्थापित किये जायें ताकि काम करने वाले लोग अपना काम स्वस्थ और अनुकूल वातावरण में कर सकें तथा उन्हें अच्छे स्वास्थ्य एवं उच्च सामूहिक उत्साहशीलता के वर्द्धन में सहायक सुविधाएँ प्राप्त हो सकें।

श्रम-कल्याण के कार्य (Labour-welfare Activities)-श्रम-कल्याण के कार्यों को सामान्य रूप से तीन प्रमुख वर्गों के अन्तर्गत रखा जाता है

(अ) श्रम-कल्याण के कार्यों का सामान्य वर्गीकरण – साधारणतया श्रम-कल्याण के कार्य तीन भागों में विभाजित किये जा सकते हैं –

(1) श्रम-कल्याण के वैधानिक कार्य – श्रम-कल्याण के वैधानिक कार्यों के श्रमिकों के हित में कानून द्वारा सुनिश्चित ऐसे कल्याण कार्य सम्मिलित हैं जिन्हें करने के लिए उद्योगपति कानून से बाध्य होते हैं। उदाहरण के लिए कार्य के घण्टे, सुरक्षा की व्यवस्था तथा कार्य करने की आवश्यक अनुकूल दशाओं को बनाये रखना आदि वैधानिक कार्यों में सम्मिलित हैं।

(2) श्रम-कल्याण के ऐच्छिक कार्य – ये श्रमिकों के हितार्थ किये जाने वाले वे सभी कार्य हैं। जिन्हें उद्योगपति अपनी इच्छा से सम्पादित करते हैं। इन कार्यों को करने के लिए मालिकों को बाध्य नहीं किया जा सकता है।

(3) पारस्परिक कार्य – पारस्परिक कार्यों में ऐसी सुविधाएँ सम्मिलित हैं जो श्रम संगठनों तथा उद्योगपतियों के मध्य समझौता होकर सुनिश्चित की जाती हैं तथा श्रमिकों को मिलती हैं।

(ब) डॉ० ब्राउटन के अनुसार श्रम-कल्याण कार्यों का वर्गीकरण-डॉ० ब्राउटन (Dr. Broughton) ने श्रम-कल्याण कार्यों को मुख्य रूप से दो वर्गों में रखा है –

  1. उद्योग की आन्तरिक व्यवस्था से सम्बन्धित कार्य तथा
  2. उद्योग के बाहर श्रम-कल्याण के कार्य।

इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

(1) उद्योग की आन्तरिक व्यवस्था से सम्बन्धित कार्य-ये कार्य निम्नलिखित हैं –

(i) वैज्ञानिक भर्ती – औद्योगिक इकाइयों में श्रमिकों की भर्ती पक्षपातविहीन तथा वैज्ञानिक ढंग से की जानी चाहिए। इस भर्ती का आधार पूर्व अनुभव, साक्षात्कार, क्षमताओं एवं अभिवृत्तियों का परीक्षण होना चाहिए। वैज्ञानिक भर्ती उस भर्ती को कहा जाता है जिसे सभी लोग न्याययुक्त एवं निष्पक्ष स्वीकार करते हों और उससे किसी को असन्तोष नहीं होता।

(ii) औद्योगिक प्रशिक्षण – नये-नये कार्यों को सिखाने के लिए उद्योग के कर्मचारियों को आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान करने की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।

(iii) दुर्घटनाओं की रोकथाम – उद्योग में घटित होने वाली दुर्घटनाओं से श्रमिकों को बचाने के लिए अनिवार्य एवं व्यापक प्रबन्ध किये जाने चाहिए। खतरनाक यन्त्रों से हानि, अत्यधिक ताप तथा आग लगने से हानि की उचित रोकथाम हो। सावधानी के तौर पर आकस्मिक खतरों की पूर्व-सूचना के यन्त्र उपयोग में लाये जा सकते हैं।

(iv) स्वच्छता, प्रकाश तथा वायु का प्रबन्ध – कर्मचारियों के व्यक्तिगत स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए उद्योग के अन्दर कुछ सुविधाओं का दिया जाना आवश्यक है। उद्योग में सफाई, पुताई, रोशनदान, पीने का पानी, प्रकाश, स्नानगृह, मूत्रालय, शौचालय, गन्दी वायु बाहर निकालने के पंखे, ताजी हवा प्रदान करने के पंखे एवं वातानुकूलन इत्यादि की व्यवस्था की जानी चाहिए।

(v) अन्य सुविधाएँ  उद्योग के भीतर रेडियो, टेलीविजन, मनोरंजन कक्ष, जलपानगृह तथा विश्राम गृह का भी प्रबन्ध किया जाए जहाँ बीच-बीच में जाकर श्रमिक और कर्मचारीगण आराम व राहत पा सकें।

(2) उद्योग के बाहर श्रम – कल्याण के कार्य – उद्योग के बाहर श्रम-कल्याण के प्रमुख कार्य इस प्रकार हो सकते हैं –

(i) सस्ते एवं पौष्टिक भोजन की व्यवस्था – श्रमिकों को सस्ता, अच्छा एवं पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने की दृष्टि से उद्योग की तरफ से भोजनालय शुरू किये जा सकते हैं। बहुत-से श्रमिक और कर्मचारी ऐसे होते हैं जो किन्हीं परिस्थितियोंवश अपने साथ परिवार नहीं रखते या वे परिवारविहीन होते हैं। उनका काफी समय एवं शक्ति भोजन की व्यवस्था में खर्च हो जाती है। भोजनालय की व्यवस्था से ऐसे श्रमिकों या कर्मचारियों को भोजन के कष्ट से मुक्ति मिल सकती है। इसके अतिरिक्त श्रमिक बस्तियों के निकट सरकारी सस्ते गल्ले, घी-तेल, मिट्टी का तेल तथा अन्य घरेलू आवश्यक सामान की बिक्री की व्यवस्था हो।

(ii) उत्तम आवास की व्यवस्था – कुछ महानगरों में आवास की विकट समस्या रहती है। उद्योग के श्रमिकों या कर्मचारियों को उनकी हैसियत के मुताबिक उचित आवास नहीं मिल पाता अथवा उन्हें उद्योग से काफी दूर जाकर आवास उपलब्ध होता है जिससे आने-जाने की समस्या उत्पन्न होती है। यदि उद्योगों के निकट श्रमिकों को आवास की सुविधा दी जाये तो वे राहत महसूस करेंगे जिसका उत्पादन पर अच्छा प्रभाव होगा। इसके लिए उद्योगपति, कारखाने में या उसके समीप सस्ते हवादार मकाने बनवा सकते हैं।

(iii) चिकित्सा की व्यवस्था – कोई भी व्यक्ति बीमार पड़ सकता है, श्रमिक भी बीमार होते हैं। कुछ उद्योगों की प्रतिकूल दशाएँ श्रमिकों या कर्मचारियों को रोगी बना देती हैं। आजकल की महँगाई में श्रमिक अपना अच्छा इलाज नहीं करवा पाते, इसलिए उनका रोग बढ़ता रहता है। पौष्टिक आहार के अभाव में कमजोर और कृशकाय श्रमिकों को रोग जल्दी घेरते हैं। रोगों से उत्पादन क्षमता पर उल्टा असर होता है। मिल-मालिकों को उद्योग या उसके बाहर चिकित्सा की सस्ती, सुलभ एवं अच्छी व्यवस्था प्रदान करनी चाहिए।

(iv) शिक्षा की व्यवस्था – मालिकों द्वारा श्रमिकों या कर्मचारियों के बच्चों हेतु अच्छी प्राथमिक एवं विद्यालयी शिक्षा का प्रबन्ध किया जाना चाहिए। उनकी पत्नियों के लिए प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र खोले जाने चाहिए। इसके अलावा सामाजिक शिक्षा भी श्रम-कल्याण का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। शिक्षा की यह व्यवस्था नि:शुल्क होनी चाहिए।

(v) मनोरंजन की व्यवस्था – कठोर श्रम के बाद मनोरंजन विश्राम जैसा लाभ देता है। श्रमिकों के कल्याण की दृष्टि से उद्योगों के बाहर कर्मचारियों तथा श्रमिकों के मनोरंजन की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके लिए उद्योगपति विभिन्न प्रकार के प्रबन्ध कर सकते हैं; जैसे-रेडियो, टेलीविजन, वीडियो पर फिल्में, चलते-फिरते सिनेमा की व्यवस्था, श्रमिक क्लब, पुस्तकालय तथा वाचनालय आदि की व्यवस्था। श्रमिक बस्तियों में समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों, नाटकों, स्वांग-तमाशों, धार्मिक लीलाओं, राग-रागनियों, आल्हा आदि के आयोजनों से भी श्रमिकों का मनोरंजन किया जा सकता है। श्रमिकों एवं कर्मचारियों के आवास क्षेत्र में पार्क, मैदान, खेल-क्लब, तैरने व नहाने के ताल तथा अखाड़े आदि का भी प्रबन्ध किया जा सकता है।

(स) आर्थिक लाभ सम्बन्धी भ्रम-कल्याण कार्य – श्रमिकों एवं कर्मचारियों के आर्थिक लाभ की दृष्टि से निम्नलिखित श्रम-कल्याण के कार्य किये जाने आवश्यक हैं –

(i) ओवरटाइम की सुविधा – कभी-कभी उद्योग में उत्पादन-कार्य जोर-शोर से चलता है। कार्य की अधिकता के कारण श्रमिकों को कार्य के नियत घण्टों के अतिरिक्त कार्य करना पड़ता है। जो श्रमिक निर्धारित समय से अधिक कार्य करते हैं, उनके लिए ओवरटाइम की व्यवस्था की जानी चाहिए।

(ii) नियमों की सुरक्षा – श्रमिकों के हितों को दृष्टिगत रखते हुए उन्हें उद्योग में लागू नियमों की सुरक्षा की गारण्टी प्रदान की जाये। पदोन्नति, कार्य के घण्टे, कार्य की अनुकूल दशाएँ तथा अन्य सुविधाओं का नियमानुसार एवं न्यायोचित पालन किया जाना चाहिए। सर्वविदित रूप से, नियमानुसार प्रदान की जाने वाली सुविधाओं में अवहेलना तथा अन्याय से अशान्ति, तनाव एवं संघर्ष जन्म लेते हैं।

(iii) प्रॉविडेण्ट फण्ड, बीमा तथा पेन्शन की सुविधा – यदि उद्योग में कार्यरत श्रमिक और कर्मचारी अपने भविष्य के प्रति चिन्तामग्न रहेंगे तो मानसिक अशान्ति एवं तनाव के कारण वे ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर पायेंगे। श्रमिकों और कर्मचारियों के भविष्य को सुरक्षित करने की दृष्टि से प्रॉविडेण्ट फण्ड, जीवन बीमा, सामूहिक बीमा, क्षतिपूर्ति बीमा, महँगाई-भत्ते की किस्तें, बोनस तथा पेन्शन आदि की सुविधाएँ प्रदान की जानी चाहिए।

(iv) यात्रा-भत्ता – देशाटन से स्थान-स्थान की आबोहवा, सांस्कृतिक विनिमय तथा स्वच्छन्दता पाकर व्यक्ति का मन सुखी होता है। यदि श्रमिक या कर्मचारी को वर्ष में एक बार अपने परिवारजनों के साथ भ्रमण की सुविधा प्रदान की जाये तो उससे उसका शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य सुधरेगा। मालिकों के प्रति उसकी श्रद्धा में वृद्धि होगी, उसका उत्साह व कार्यक्षमता बहुगुणित होकर वर्षपर्यन्त बने रहेंगे। इसके लिए समुचित यात्रा-भत्ता प्रदान किया जाना चाहिए।

निष्कर्षतः मनोविज्ञान के उद्योग में मानव-कल्याण के उन्नयन पर अत्यधिक बल दिया है। श्रम-कल्याण के कार्यों के बिना श्रमिकों की कार्य-क्षमता एवं उत्पादन वृद्धि की बात करना व्यर्थ है। मानवीय सम्बन्ध चिर-स्थायी हैं जिन्हें प्रोत्साहित करने के लिए श्रमिकों की भलाई में श्रम-कल्याण कार्यों का नियोजन अपरिहार्य है, किन्तु यह भी समझ लेना चाहिए कि श्रमिकों तथा कर्मचारियों के हिव में श्रम-कल्याण कार्य सुसंयोजित तथा उदारतापूर्वक प्रशासित हों। वस्तुतः बुद्धिमत्तापूर्वक आयोजित एवं उदारतापूर्वक प्रशासित कल्याण कार्य अन्ततः उद्योगपतियों तथा सेवायोजकों के लिए ही उपयोगी व लाभप्रद सिद्ध होते हैं।

प्रश्न 6.
हड़ताल’ एवं ‘तालाबन्दी के अर्थ एवं कारणों का उल्लेख करते हुए इनकी रोकथाम के उपायों को भी स्पष्ट कीजिए।
या
हड़ताल एवं तालाबन्दी को रोकने में मनोविज्ञान किस प्रकार सहायक है?
उत्तर :
भूमिका
(Introduction)

मानव जीवन का प्रत्येक क्षेत्र समस्याओं तथा अशान्ति से परिपूर्ण है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्रों की समस्याओं के अनुरूप ही औद्योगिक क्षेत्र भी विभिन्न समस्याओं से ग्रस्त है। इन समस्याओं में से कुछ उत्पादन सम्बन्धी समस्याएँ होती हैं अथवा तकनीकी बातों को लेकर उत्पन्न होती हैं; और कुछ समस्याएँ मानव व्यवहार से सम्बन्धित होती हैं। अधिकांश उद्योगपति श्रमिकों और कर्मचारियों को-कम-से कम वेतन देकर अधिक-से-अधिक लाभ उठाने का प्रयास करते हैं। इसके विपरीत श्रमिकों और कर्मचारियों का यह प्रयास रहता है कि वे अपने कड़े परिश्रम के बदले जीने के लिए पर्याप्त वेतन तथा जीवन सम्बन्धी सभी आवश्यक सुविधाएँ; जैसे—काम करने के घण्टे, विश्राम, दुर्घटना व बीमारी के लिए उचित चिकित्सा की व्यवस्था तथा भत्ता आदि उद्योगपतियों से प्राप्त करें जब औद्योगिक व व्यावसायिक संस्थानों में कल्याणकारी योजनाओं को लागू नहीं किया जाता और श्रमिक हितों की अनदेखी की जाती है तो उससे दोनों वर्गों-उद्योगपति वर्ग एवं श्रमिक वर्ग के बीच तनाव एवं संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। उद्योगपतियों तथा श्रमिकों के बीच का तनाव प्रायः ‘हड़ताल’ और ‘तालाबन्दी’ के रूप में प्रकट होता है।

हड़ताल
(Strike)

हड़ताल का अर्थ (Meaning of Strike)

हड़ताल औद्योगिक’ अशान्ति का एक प्रमुख एवं प्रचलित रूप है। उद्योगपति एवं श्रमिकों के सम्बन्धों का इतिहास बहुत पुराना है। प्रारम्भिक काल में श्रमिक उद्योगपतियों को ईश्वर या देवता का प्रतिरूप मानते हुए उनकी सभी आज्ञाओं का पालन करते थे और उद्योगपति इस भावना का लाभ उठाते हुए उनका जबरदस्त शोषण करते थे, किन्तु औद्योगिक क्रान्ति के आगमन ने पासा ही पलट दिया, श्रमिकों में जागरूकता आयी और वे अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो गये। आवश्यकताओं, कठिनाईयों तथा समस्याओं में समानता के आधार पर श्रमिकों में एकता तथा सहयोग की भावना विकसित हो जाना स्वाभाविक है। श्रमिक एक हुए और उनके संगठन बने। इस प्रकार सामूहिक एकता ने श्रमिक संघों (Labour Unions) की विचारधारा को व्यवहार में बदल दिया। श्रमिक संघों ने उद्योगपतियों से अपने अधिकारों तथा सुविधाओं की माँगें प्रारम्भ कीं जिन्हें अधिकतम लाभ की लालसा से प्रेरित उद्योगपतियों द्वारा ठुकरा दिया गया। जब उद्योग में श्रमिकों पर काम का दबाव अधिक पड़ता है लेकिन उनकी न्यायोचित माँगों की ओर ध्यान नहीं दिया जाता तो वे विरोधस्वरूप काम पर जाना बन्द कर देते हैं। वे सभी या अधिकांश लोग, जो काम पर नहीं जाते, उद्योगपति एवं उसकी नीतियों के विरुद्ध तथा अपनी माँगों व समस्याओं के समर्थन में प्रदर्शन करते हैं, नारे लगाते हैं, जुलूस आदि निकालते हैं तथा भूख-हड़ताल पर बैठ जाते हैं। श्रमिकों की इन समस्त क्रियाओं को हड़ताल (Strike) कहा जाता है।

हड़ताल के कारण (Causes of Strike)

हड़ताल के मूल में उद्योगपतियों तथा श्रमिकों के परस्पर विरोधी लक्ष्यों एवं हितों पर आधारित वर्ग-संघर्ष की एक लम्बी दास्तान निहित है। इस वर्ग-संघर्ष के अनेक कारण हो सकते हैं; यथा-अधिक वेतन व भत्तों की माँग, कम के घण्टे कम करने की माँग, बोनस तथा दूसरी सुविधाओं को लेकर मजदूर-मालिक में संघर्ष आदि। वास्तविकता यह है कि श्रमिक जानता है कि उद्योगपति के भोग-विलास के सभी साधन उसकी खून-पसीने की कमाई से आये हैं, जबकि वह जीवन-पर्यन्त झोंपड़पट्टी में पशुओं की तरहू जीवन जीता है। श्रमिक स्वयं को शोषित तथा उद्योगपति को शोषक समझता है। अपने शोषण को लेकर श्रमिकों के मन में असन्तोष की यह आग प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तात्कालिक कारणों से हड़ताल के रूप में भड़क उठती है। हड़ताल के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

(1) इतिहासजनित अविश्वास की प्रवृत्ति – औद्योगिक क्रान्ति से लेकर वर्तमान क्षणों तक करीब-करीब तीन शताब्दियाँ बीत चुकी हैं। औद्योगिक संघर्षों के इस लम्बे इतिहास में उद्योगपति और श्रमिकों के बीच छत्तीस (36) का आँकड़ा रहा है यानि दोनों एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं। विरोध के उग्र होते स्वरों ने दोनों वर्गों के बीच अविश्वास की खाई को इतना चौड़ा कर दिया है कि हर पल विश्व के किसी-न-किसी कोने में हड़ताल देखी जा सकती है।

(2) सामाजिक दूरी – उद्योगपति और श्रमिक समाज की सीमाओं के दो छोर हैं जिनके बीच कोई सामाजिक सम्बन्ध, सम्पर्क, प्रेम एवं सहानुभूति नहीं पायी जाती। इससे भी निकटता समाप्त होती है तथा अविश्वास बढ़ता है। दोनों वर्ग अपने हितों में जरा से भी आघात से तिलमिला उठते हैं। श्रमिक उद्योगपतियों के अन्याय से उत्तेजित होकर हड़ताल का निर्णय ले लेते हैं। सामाजिक दूरी के कारण उनमें आपसी सूझ-बूझ होने का अवसर और समझौते का रास्ता नहीं मिलता।।

(3) दुर्व्यवहार – कभी-कभी किसी उद्योग के अधिकारी श्रमिकों को मार बैठते हैं या उनके साथ दुर्व्यवहार, कर बैठते हैं जिससे सामूहिक असन्तोष पैदा होता है और उस अधिकारी को दण्डित कराने के लिए हड़ताल होती है।

(4) कार्य की दशाएँ – कार्य की प्रतिकूल दशाएँ हड़ताल को जन्म देती हैं। कुछ उद्योगों में श्रमिकों से अमानवीय तरीके से काम लिया जाता है और उन्हें आवश्यक सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। उदाहरणार्थ-श्रमिकों के काम के घण्टे अधिक होते हैं, उन्हें विश्राम नहीं करने दिया जाता, उन्हें अधिक ताप याघातक मशीनों का सामना करना पड़ता है तथा उनसे बचाव का कोई उचित प्रबन्ध भी नहीं किया जाता ईत्यादि। इससे न केवल श्रमिकों की कार्य-क्षमता पर बुरा असर पड़ता है बल्कि उनका स्वास्थ्य भी गिरता जाता है। इन कारणों से कभी-कभी किसी श्रमिक की मृत्यु भी हो सकती है। इन विभिन्न कारणों से श्रमिकों में रोष उत्पन्न हो जाता है और वे हड़ताल के माध्यम से अपनी माँगे मनवाते हैं।

(5) ओवरटाइम – काम के निर्धारित घण्टों के अतिरिक्त काम करने पर जब श्रमिकों को इस अतिरिक्त समय को पारिश्रमिक नहीं दिया जाता तो उन्हें हड़ताल का सहारा लेना पड़ता है।

(6) वेतन-वृद्धि, भत्ता और बोनस – बढ़ती हुई महँगाई के विरुद्ध उद्योगों के श्रमिक अपने मालिकों से वेतन बढ़ाने की माँग करते हैं। महँगाई बढ़ने के साथ-साथ भत्तों का बढ़ना भी आवश्यक है। इसके अतिरिक्त उद्योगों में लाभ का पूरा अंश मालिकों के पेट में क्ला जाता है। अतः वेतन-वृद्धि, भत्ता तथा बोनस को लेकर जब श्रमिकों की माँगें पूरी नहीं होतीं तो वे हड़ताल करने पर उतारू हो जाते

(7) राजनीतिक कारण – कुछ स्वार्थी नेता लोग अपनी नेतागिरि चमकाने के इरादे से श्रमिकों को बहला-फुसलाकर हड़ताल करवाते हैं और उद्योगपति से साँठ-गाँठ कर पैसा खा जाते हैं। इससे श्रमिकों को भारी हानि होती है।

(8) मजदूर-संगठनों की बहुलता – आजकल दुनिया में इतने सच्चे-झूठे मजदूर-संगठन किसी-न-किसी लक्ष्य को लेकर पैदा हो गये हैं कि उनमें से अधिकांश अपने अस्तित्व या स्वार्थपूर्ति में श्रमिकों को मोहरा बनाकर हड़ताल कराने में सफल हो ही जाते हैं। श्रमिक इनके बहकावे में आकर हड़ताल कर देते हैं।

तालाबन्दी
(Lockout)

तालाबन्दी का अर्थ (Meaning of Lockout)

तालाबन्दी औद्योगिक अशान्ति का एक दूसरा किन्तु प्रमुख पक्ष है। इसके लिए विशेष रूप से उद्योगपतियों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। कभी-कभी जब उद्योगपति श्रमिकों की माँग पूरी नहीं कर पाते या पूरी करना नहीं चाहते तो वे उद्योग या मिल में ताला डाल देते हैं। इससे औद्योगिक इकाई बन्द हो जाती है और उत्पादन कार्य रुक जाता है। ऐसी अवस्था में श्रमिकों या कर्मचारियों को उद्योग में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है। इस भाँति ‘तालाबन्दी’ (Lockout) हड़ताल का एक विरोधी रूप है।

तालाबन्दी के कारण (Causes of Lockout)

तालाबन्दी के बहुत से कारण हो सकते हैं। इनमें से प्रमुख कारणों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है –

(1) प्रथमतः उद्योगपति श्रमिकों की अतिशय, औचित्य की सीमा से बाहर तथा राजनीति से प्रेरित माँगों से परेशान होकर तालाबन्दी का आश्रय लेते हैं। उद्योगपति सोचते हैं कि लम्बे समय तक भूख और जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं से तड़प-तड़पकर श्रमिक सबक सीख जाएँगे और ताला खोलने की खुशामद करेंगे। इस प्रकार, भारी नुकसान सहते हुए भी श्रमिकों पर अंकुश लगाने का उद्योगपतियों की दृष्टि में यह एक उपाय है।

(2) दुसरे, किन्हीं कारणों से कभी-कभी कोई औद्योगिक इकाई लगातार नुकसान उठाती है और इस भाँति घाटे में चलती है। उद्योगपति कुछ समय तक तो घाटा सहते रहते हैं लेकिन फिर वे मिल में ताला लगा देते हैं।

(3) तीसरे, यदा-कदा लम्बे समय तक पावर सप्लाई, ईंधन या कच्चे माल की आपूर्ति न होने के कारण भी उद्योगपति को नुकसान होता है। उत्पादन घटने या समाप्त होने से तैयार माल का उठान नहीं हो पाता; अत: चे विवश होकर तालाबन्दी कर देते हैं।

हड़ताल और तालाबन्दी की रोकथाम के उपाय
(Measures to Remove Strikes and Lockouts)

‘हड़ताल और तालाबन्दी’ दोनों ही औद्योगिक अशान्ति के परिचायक हैं। हड़ताल में श्रमिक काम बन्द कर देते हैं और तालाबन्दी में उद्योगपति कारखाने का ताला बन्द कर देते हैं। दोनों में ही औद्योगिक संघर्ष का वीभत्स रूप देखने को मिलता है जिससे उत्पादन कार्य ठप हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्तिगत एवं राष्ट्रीय स्तर पर हानि उठानी पड़ती है; अतः हड़ताल और तालाबन्दी की रोकथाम व निवारण के तत्काल उपाय करने चाहिए। इसके प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं

(1) श्रमिकों का सहयोग (Co-operation of Labourers) – उद्योगपतियों को श्रमिकों का विश्वास अर्जित कर उनसे प्रशासनिक कार्यों में सहयोग प्राप्त करना चाहिए। इससे औद्योगिक अशान्ति एवं संघर्ष स्वतः ही दूर हो जाएगा।

(2) उचित वेतन, भत्ता तथा बोनस (Sufficient wages, Allowance and Bonus) – श्रमिकों को उचित वेतन, भत्ता तथा बोनस आदि समय पर तथा नियमानुसार प्रदान किया जाना चाहिए ताकि वे अपनी आवश्यकताओं की भली प्रकार पूर्ति कर सकें। बढ़ती हुई महँगाई के साथ वेतन-दरों में वृद्धि न्यायोचित तथा मानवीय दृष्टि से वांछित है।

(3) तात्कालिक कारणों का निराकरण (Removing of Immediate Causes) – हड़ताल और तालाबन्दी की रोकथाम के लिए तात्कालिक असन्तोष के कारणों को जल्दी ही निराकरण कर लिया जाए। ऐसी परिस्थितियों की जाँच-पड़ताल किन्हीं सर्वमान्य एवं उपयुक्त व्यक्तियों के माध्यम से करायी जाए और उनका शीघ्र समाधान प्रस्तुत कर उसे क्रियान्वित किया जाए।

(4) श्रम-कल्याण कार्यों का प्रबन्ध (Managing Labour-welfare Activities) – उद्योग की तरफ से श्रमिकों के लिए कुछ सुविधाओं का प्रबन्ध किया जाना चाहिए। इन सुविधाओं की प्राप्ति से उन्हें सुख और सन्तोष मिलता है जिससे वे अधिक समायोजन के साथ कार्य कर सकते हैं। इन सुविधाओं में चिकित्सा, स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन, आवास, भोजन आदि का प्रबन्ध मुख्य है।

(5) विशिष्ट समिति (Specific Association) – औद्योगिक प्रशासन के लिए एक विशेष समिति का निर्माण किया जाना चाहिए, जिसमें श्रमिकों, कर्मचारियों तथा मालिकों के प्रतिनिधियों को स्थान दिया जाए। यह समिति किसी भी समस्या या अवरोध की परिस्थिति में सभी मामलों में विचार-विमर्श करते हुए पारस्परिक मतभेदों का निवारण करेगी। इससे सहयोगपूर्ण वातावरण की वृद्धि होगी और औद्योगिक तनाव व अशान्ति कम होगी।

निष्कर्षतः हड़ताल और तालाबन्दी इन दोनों में से किसी एक का भी विचार व्यक्तिगत एवं राष्ट्रहित में नहीं है। इनसे उत्पादन में कमी, जमाखोरी, मुनाफाखोरी तथा अन्ततः भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। ये दोनों ही आन्दोलन, तनाव और संघर्ष के परिचायक हैं जिनके परिणामतः अशान्ति व अव्यवस्था का जन्म होता है। कुल मिलाकर उद्योग की मुख्य जिम्मेदारी उद्योगपति या सेवायोजक की होती है। यदि वे अपने लाभांश की एक छोटी-सी मात्रा का त्याग करना सीखें तथा श्रमिकों के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्हें सहानुभूति का पात्र बनायें तो इससे न केवल उत्पादन-वृद्धि होगी अपितु उद्योग की सम्पूर्ण व्यवस्था अभीष्ट रूप से संचालित भी हो सकेगी।

प्रश्न 7.
विज्ञापन (Advertisement) से क्या आशय है? विज्ञापन के उद्देश्यों अथवा कार्यों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक क्रान्ति के सूत्रपात ने विश्व के सभी देशों की औद्योगिक इकाइयों को आधुनिकतम तथा स्वचालित मशीनों से सजा दिया। इससे उत्पादन में गुणात्मक एवं मात्रात्मक वृद्धि हुई और वाणिज्य एवं आर्थिक क्षेत्रों की काया ही पलट हो गयी, लेकिन जनसंख्या-वृद्धि तथा मानव सम्पर्को की परिधि व्यापक होने के कारण एक नयी समस्या उभरी। यह समस्या औद्योगिक उत्पादनों की प्रमुखता की वजह से एक ही प्रकार के अनेकानेक उत्पादन बाजार में आने के कारण उत्पादकों के सम्मुख उत्पादित वस्तुओं की बिक्री की समस्या थी। वस्तुत: विज्ञान और तकनीकी की विकसित प्रविधियों की सहायता से एक ही वस्तु अनेक स्थानों पर बहुत-सी कम्पनियों द्वारा बनायी जाने लगी जिससे प्रतियोगिता बहुत बढ़ गयी। प्रगतिशील व्यापारियों एवं औद्योगिक संस्थानों ने बिक्री की समस्या के समाधान तथा अतिरिक्त उपभोक्ताओं को अपने उत्पादन के प्रति आकर्षित करने के विचार से ‘विज्ञापन (Advertisement) का सहारा लिया।

विज्ञापन का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Advertisement)

आधुनिक समय विज्ञापन का समय है। विज्ञापन का शाब्दिक अर्थ है-‘वि + ज्ञापन’ अर्थात् विशेष प्रकार से बताना तथा जानकारी प्रदान करना। ‘विज्ञापन’ एक प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत उपभोक्ताओं का ध्यान किसी उत्पादन (वस्तु) विशेष की ओर इस भाँति आकृष्ट किया जाता है कि वह व्यक्ति उस वस्तु को खरीदने हेतु प्रेरित हो तथा अन्तत: उसे क्रय कर ही ले। अतः विज्ञापन से तात्पर्य उस पद्धति से है जिसके माध्यम से कुछ विशिष्ट एवं निश्चित वस्तुओं अथवा सेवाओं के अस्तित्व एवं विशेषताओं की ओर लोगों का ध्यान खींचा जाता है। कुल मिलाकर विज्ञापन एक तरह का प्रचार है जो किसी वस्तु की आन्तरिक व बाह्य विशेषताओं तथा उपयोगिताओं को लोगों के मस्तिष्क पर इस प्रकार से चित्रित करता है कि वे उसे खरीदने के लिए लालायित हो उठते हैं। इस प्रकार विज्ञापित वह वस्तु पहले की अपेक्षा अधिक बिकने लगती है।

आरडब्ल्यू० हसबैण्ड ने विज्ञापन को इस प्रकार परिभाषित किया है, “विज्ञापन को प्रचार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो कुछ वस्तुओं अथवा सेवाओं के अस्तित्व व गुणों की ओर ध्यान आकर्षित करता है।”

“Advertisement may be defined as publicity which calls attention to the existence and merits of certain goods and services.”
-R. W. Husband

विज्ञापन के उद्देश्य अथवा कार्य अथवा विज्ञापन के मनोवैज्ञानिक आधार
(Aims or Functions of Advertisement)

विज्ञापन का अर्थ जानने एवं इसकी परिभाषा का अध्ययन करने के उपरान्त ज्ञात होता है कि विज्ञापन के माध्यम से कुछ उपलब्ध उत्पादनों की ओर ध्यान आकर्षित कराने का प्रयास किया जाता है। इसके साथ ही जो विज्ञापन इस उद्देश्य अथवा कार्य में सफल रहते हैं उनकी उत्पादित वस्तुओं की बिक्री में वृद्धि हो जाती है। विज्ञापन के प्रमुख उद्देश्य अथवा कार्य निम्नलिखित हैं –

(1) ध्यान आकृष्ट करना (To Attract Attention) – विज्ञापन का सर्वप्रथम उद्देश्य एवं कार्य लोगों का ध्यान वस्तु-विशेष की ओर आकृष्ट करना है। विज्ञापन के माध्यम से वस्तु के प्रति यह आकर्षण इतना अधिक उत्पन्न कर दिया जाता है कि लोगों की वस्तु में रुचि बढ़ जाती है तथा वे प्रेरित होकर उसे खरीद लेते हैं। इसके लिए आकर्षक शीर्षक, रंगबिरंगे चित्र, रेडियो पर रुचिकर मधुर ध्वनि तथा टी० वी० पर तस्वीर और आवाज का मनोहारी संगम प्रस्तुत किया जाता है।

(2) रुचि उत्पन्न करना (To Create Interest) – विज्ञापन का दूसरा उद्देश्य या कार्य वस्तु-विशेष में लोगों की रुचि उत्पन्न करना है। विज्ञापनदाता अपनी वस्तु में रुचि उत्पन्न करने के लिए तरह-तरह के साधन अपनाते हैं। विज्ञापन की अनोखी शब्दावली का प्रयोग किया जाता है। पुरुषों में रुचि पैदा करने की दृष्टि से सुन्दर युवतियों के चित्र प्रदर्शित किये जाते हैं। बच्चों को उस वस्तु को प्रयोग करते दिखाया जाता है।

(3) विश्वास पैदा करना (‘Tb Produce Belief) – विज्ञापन का उद्देश्य यह होता है कि उसके माध्यम से उपभोक्ताओं में वस्तु-विशेष के प्रति यह विश्वास पैदा हो जाए कि सिर्फ वही वस्तु उनके लिए उपयोगी हो सकती है, कोई अन्य वस्तु नहीं। विश्वास उत्पन्न करने की दृष्टि से विज्ञापन के चित्र के अतिरिक्त शीर्षक एवं लिखी गयी सामग्री को प्रभावशाली ढंग से संयोजित किया जाता है। उदाहरण के लिए कोई लोकप्रिय गायिका किसी गोली को चूसते हुए यह विश्वास दिलाती है इसके उसके गले की खराश एकदम ठीक ही गयी है।

(4) स्मृति पर प्रभाव (Tb Influence Memory) – विज्ञापन का एक मुख्य उद्देश्य यह भी है। कि किसी वस्तु-विशेष के विषय में जो बातें उसमें व्यक्त की जाएँ वे लोगों के मस्तिष्क पर लम्बे समय तक अंकित रहें तथा उनका प्रभाव स्थायित्व ग्रहण कर सके। मानव स्मृति पर जितना तीव्र प्रभाव विज्ञापन डालेगा इतना ही वह सफल होगा।

(5) क्रय की प्रेरणा (Intention to Buy) – विज्ञापन का अन्तिम किन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य एवं कार्य यह है कि वह व्यक्ति में विज्ञापित वस्तु को खरीदने की इच्छा उत्पन्न कर दे। वस्तुतः वस्तु के क्रय की प्रेरणा एवं बिक्री के विचार से ही अन्य सभी उद्देश्य जुड़े हैं। इस उद्देश्य में सफल विज्ञापन अपने उपयुक्त सभी उद्देश्यों में सफल समझा जाता है।

प्रश्न 8.
वर्तमान युग में विज्ञापन के प्रमुख साधनों का उल्लेख करते हुए उनके सापेक्षिक महत्त्व का विवेचन कीजिए।
उत्तर :
आधुनिक युग में विज्ञापनों की बढ़ती हुई उपयोगिता के कारण इन्हें मानव-जीवन का एक अपरिहार्य अंग मान लिया गया है। हर रोज सुबह को समाचार-पत्रों में विज्ञापन के साथ दिनारम्भ होता है, समाचार-पत्रों में रखे विज्ञापन के पैम्फलेट, रेडियो या एफ०एम० पर विज्ञापन, सड़क और चौराहों के बोर्ड, टेलीविजन पर विज्ञान आदि-आदि, मनुष्य का जीवन हर तरफ विज्ञापनों से भरा पड़ा है। छोटी-से छोटी वस्तु के क्रय-विक्रय से लेकर आवश्यकताओं से सम्बन्धित तथा वैवाहिक विज्ञापन अपने महत्त्व एवं उपयोगिता को सिद्ध करते हैं। विज्ञापन और तकनीक की प्रगति ने विज्ञापन के क्षेत्र को भी विभिन्न नवीनतम प्रविधियों, यन्त्रों, माध्यमों तथा साधनों से सुसज्जित किया है।

विज्ञापन के प्रमुख साधन अथवा माध्यम
(Advertising Media)

विज्ञापन के प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं –

(1) समाचार-पत्र – समाचार-पत्र विज्ञापन का सर्वव्यापी एवं सर्वस्वीकृत साधन है। अधिकांश समाचार-पत्र प्रतिदिवस प्रात: प्रकाशित होते हैं। कुछ सन्ध्याकाल में या सप्ताहवार भी प्रकाशित किये जाते हैं। समाचार-पत्रों की आय का मुख्य साधन विज्ञापन है क्योंकि इन पत्रों के माध्यम से सन्देश को देश-विदेश में पहुँचाया जा सकता है। वस्तुतः दैनिक समाचार-पत्र जन-सम्पर्क के श्रेष्ठ साधन कहे जाते हैं। शिक्षित लोगों का एक बड़ा प्रतिशत तो निस्सन्देह, समाचार-पत्र पढ़ने को आदि है ही, लेकिन अनपढ़ लोग भी इसमें समुचित दिलचस्पी रखते हैं और शिक्षित लोगों से पूछताछ कर विज्ञापन आदि की जानकारी प्राप्त करते हैं। समाचार-पत्रों के कुछ पृष्ठ एवं विशिष्ट स्थान विज्ञापन के लिए ही निश्चित होते हैं। ये विज्ञापन प्रायः भावात्मक अपील के साथ सरल और सीधी भाषा-शैली में होते हैं। विज्ञापनों की निरन्तर पुनरावृत्ति से विज्ञापन की प्रभावकता में वृद्धि भी होती है। नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, जनसत्ता, दैनिक जागरण, अमर उजाला, पंजाब केसरी, आदि-आदि अनेक समाचार-पत्र विभिन्न स्थानों से प्रकाशित एवं प्रसारित होते हैं। इस प्रकार समाचार-पत्र नाना प्रकार के विज्ञापन का प्रमुख साधन है।

(2) पत्रिकाएँ एवं अन्य प्रकाशन – अनेक मासिक, पाक्षिक तथा साप्ताहिक पत्रिकाएँ भी विज्ञापन की अच्छी माध्यम हैं। कुछ जनप्रिय एवं अच्छी पत्रिकाओं की साज-सज्जा, कागज, छपाई तथा पाठ्य-सामग्री इतनी आकर्षक होती है कि लोग इन्हें खरीदकर पढ़ते हैं और सँभालकर रख लेते हैं। इन पत्रिकाओं का एक विशेष आकर्षण उनमें छपे रंगीन एवं अनूठे विज्ञापन हैं। आजकल पत्रिकाओं में प्रकाशित विज्ञापनों के चित्र, सामग्री तथा प्रस्तुतीकरण का समंजन इतने उच्च स्तर का होने लगा है। कि बहुत से लोग तो इन्हें बहुत ही दिलचस्पी लेकर देखते-पढ़ते हैं। मुख्य पत्रिकाओं के अतिरिक्त अन्य प्रकाशन भी हमें प्राय: हर एक बुक स्टॉल पर रखे हुए मिलते हैं। इस भाँति पत्रिकाएँ तथा अन्य कुछ प्रकाशन विझपन के महत्त्वपूर्ण साधन हैं।

(3) पोस्टर एवं बोर्ड – नगरों एवं महानगरों के चौराहों पर, राष्ट्रीय राजमार्गों पर तथा अन्य महत्त्वपूर्ण स्थानों पर विशालकाय बोर्ड लगाकर उन पर विज्ञापन लिखे जाते हैं। ये बोर्ड अपनी स्थिति के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं। बहुधा इन बोर्डो पर लिखे विज्ञापनों की सामग्री संक्षिप्त, रोचक व प्रभावशाली होती है तथा चित्रे बड़े, रंगीन और आकर्षक होने के कारण लोगों का ध्यान बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करते हैं। कुछ छोटे-छोटे बोर्ड बस, ट्रक या कारों पर भी लटके हुए देखे जा सकते हैं।

बोर्डों के अतिरिक्त नगरों की दीवारों पर पोस्टर भी चिपके हुए दिखाई पड़ते हैं। ये पोस्टर किसी कम्पनी या व्यापारिक संस्थान के हो सकते हैं तथा फिल्मों के भी-ज्यादातर फिल्म उद्योग से सम्बन्धित पोस्टर ही हमें दीवारों पर चिपके हुए दिखाई पड़ते हैं। पोस्टर चिपकाने से दीवारें खराब हो जाती हैं; अत: मकान मालिक इनके चिपकाने पर आपत्ति करते हैं। यही कारण है कि आमतौर पर रात को ही पोस्टर चिपकाये आते हैं। इस दृष्टि से यह आपत्तिजनक तथा समाज विरोधी कार्य है। ऐसा ही एक अन्य कार्य दीवारों पर रंग-रोगन से लिखवाकर विज्ञापन करना भी है। निजी दीवार पर लिखना या किराया देकर वे स्वीकृति लेकर लिखना एक अलग बात है, अन्यथा इसे भी अच्छा एवं उचित नहीं कहा जा सकता। कुछ भी सही लेकिन बोर्ड के माध्यम से, पोस्टर द्वारा या दीवार पर लिखकर विज्ञापन करना विज्ञापन के प्रमुख माध्यम हैं।

(4) पर्चे छपवाना – आमतौर पर कम्पनियाँ, व्यापारिक संस्थाएँ, प्रतिष्ठित दुकानदार एवं अन्य संस्थान कागज के पर्चे पर विज्ञापन छपवाकर उन्हें समाचार-पत्रों में रखवा देती हैं या बाजार आदि में बँटवाती हैं। विज्ञापन की दुनिया में इसे एक स्वस्थ परम्परा तथा सशक्त माध्यम के रूप में स्वीकार किया जाता है क्योंकि इससे किसी को किसी प्रकार की हानि नहीं होती। विज्ञापनकर्ता द्वारा छपवाकर बाँटे गये ऐसे पर्चे जिज्ञासु, इच्छुक तथा सम्बन्धित लोग ही पढ़ पाते हैं, अन्यथा प्रायः लोग इन्हें फाड़कर फेंक देते हैं।

(5) रेडियो पर विज्ञापन – आज की दुनिया में रेडियो/मोबाइल फोन का प्रयोग बहुतायत से होता है। हमारे देश में रेडियो पर विविध भारती, ऑल इण्डिया रेडियो तथा रेडियो सीलोन पर प्रसारित कार्यक्रमों ने काफी लोकप्रियता अर्जित की है। इन प्रसारणों में विज्ञापन प्रसारण सेवा प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण है। विज्ञापन के प्रसारण में संगीत लय की सुमधुर धुनें हृदय पर गहरा प्रभाव डालती हैं। इनकी अनुगूंज श्रोता के मस्तिष्क में लम्बे समय तक बसी रहती है। यही कारण है कि रेडियो के विज्ञापन घर-घर सुने जाते हैं और विज्ञापन के सशक्त माध्यम के रूप में स्वीकृत हैं।

(6) दृश्य-श्रव्य माध्यम – दृश्य-श्रव्य माध्यम में टेलीविजन, वीडियो, मोबाइल तथा सिनेमा प्रमुख एवं प्रभावशाली माध्यम हैं। यह माध्यम मुद्रित माध्यम से कई गुना अधिक प्रभावशाली कहा जा सकता है। टेलीविजन पर अनेक कम्पनियों, उद्योगों तथा व्यापारिक संस्थानों के विज्ञापन तथा प्रायोजित कार्यक्रम दिखाये जाते हैं। वीडियो फिल्में भी टेलीविजन के साथ जुड़ी हैं। वीडियो रील में तो विज्ञापनों की भरमार होती है। सिनेमा में सभी आयु वर्ग के लोग मनोरंजन हेतु जाते हैं पिक्चर शुरू होने से ही पहले तथा इण्टरवल के समय भारी मात्रा में विज्ञापन दिखाये जाते हैं। इस प्रकार दृश्य-श्रव्य माध्यम विज्ञापन का एक अत्यन्त प्रभावशाली व महत्त्वपूर्ण साधन है।

(7) अन्य माध्यम – कुछ समृद्ध औद्योगिक एवं व्यापारिक संस्थान पर वार्षिक कैलेण्डर, डायरी, चाबी के गुच्छे, पेन तथा पेन-होल्डर आदि पर अपना विज्ञापन छपवाते हैं। रेलवे टाइम-टेबिल तथा टेलीफोन निर्देशिका पर भी विज्ञापन दिए जाते हैं। बड़े-बड़े मेलों में विशालकाय उड़ने वाले गुब्बारों पर भी विज्ञापन देखे जाते हैं।

लघुउतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक मनोविज्ञान की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक मनोविज्ञान की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की व्यावहारिक शाखा है
  2. यह औद्योगिक जगत् से सम्बन्धित मनुष्यों के व्यवहारों का सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन है
  3. मनोविज्ञान की यह अध्ययन शाखा उत्पादक व उत्पादक तत्त्वों के मध्य कड़ी का काम करती है
  4. औद्योगिक मनोविज्ञान जहाँ एक ओर निरीक्षक तथा उसके अधीनस्थ कर्मचारियों के सम्बन्धों के विषय में अध्ययन करता है वहीं दूसरी ओर श्रम एवं प्रबन्ध का भी समुचित ज्ञान कराता है
  5. इसके अन्तर्गत उद्योग में ‘उपयुक्त कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जाता है
  6. यह मनोविज्ञान के सामान्य सिद्धान्तों को उद्योगों में लागू करता है जिससे उद्योगों से सम्बन्धित सभी व्यक्तियों का हित एवं कल्याण होता है तथा
  7. औद्योगिक मनोविज्ञान, औद्योगिक क्षेत्र में मनोवैज्ञानिक अनुसन्धान तथा उपलब्धियों से सम्बन्ध रखता है।

प्रश्न 2.
औद्योगिक क्षेत्र में उपयुक्त कर्मचारियों के चयन का क्या महत्त्व है?
उत्तर :
उत्पादन में वांछित वृद्धि के अतिरिक्त कर्मचारियों के मानसिक सुख के लिए उपयुक्त कार्य हेतु उपयुक्त व्यक्तियों का चयन आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। इस चयन का महत्त्व निम्न प्रकार प्रतिपादित है –

(1) कर्मचारी का सुख एवं सन्तोष – जब कोई कर्मचारी अपनी रुचि, अभिरुचि, योग्यताओं एवं क्षमताओं के अनुकूल कार्य या व्यवसाय प्राप्त करता है तो उसे वह अत्यन्त दक्षता और कुशलतापूर्वक सम्पन्न करता है। यह दक्षता और कुशलता उसे पदोन्नति की ओर अग्रसर करती है। उच्च पद पर आसीन होकर कर्मचारी और अधिक सुख व सन्तोष प्राप्त करता है।

(2) उत्पादन-वृद्धि – योग्यताओं एवं रुचि के अनुसार कार्य पाने पर कर्मचारी खूब मन लगाकर उसमें जुट जाता है, जिससे उत्पादन में गुणात्मक एवं मात्रात्मक अभिवृद्धि होती है। अतः उपयुक्त कर्मचारी का चयन उत्पादन वृद्धि के विचार से सम्बद्ध है।

(3) समय एवं धन की बचत – उपयुक्त कर्मचारियों के चयन से समय एवं धन की बचत होती है। हम जानते हैं कि अनुपयुक्त कार्य या व्यवसाय को व्यक्ति कुछ दिन करके छोड़ देता है। वह नये सिरे से पुनः नया कार्य पकड़ता है जिसके लिए चयन एवं प्रशिक्षण की प्रक्रिया दोहरायी जाती है। इससे समय और धन की हानि होती है।

(4) दुर्घटनाओं का अभाव – मनवांछित तथा उपयुक्त कार्य पाकर कर्मचारी पूरे मन और ध्यान से कार्य करता है। ध्यान उचटने से मशीनों के साथ दुर्घटनाएँ घटती हैं, किन्तु ध्यानपूर्वक कार्य करने से दुर्घटनाओं के होने की बहुत कम सम्भावना रहती है। इससे उद्योग में टूट-फूट भी कम होती है।

(5) परिस्थितियों से उचित समायोजन – उपयुक्त व्यवसाय मिलने पर कर्मचारी का व्यवसाय से उचित एवं स्वस्थ समायोजन स्थापित हो जाती हैं। वह चुने गये कार्य एवं परिस्थितियों के साथ आसानी से तालमेल बना लेता है।

(6) स्थायित्व – मनोनुकूल व्यवसाय या कार्य मिलने पर कर्मचारी अपने कार्य को छोड़कर अन्य स्थान पर नहीं जाते, वरन् वे उसी उद्योग में स्थिर रहना चाहते हैं और उनकी गतिशीलता कम हो जाती है।

(7) औद्योगिक शान्ति – व्यवसाय से सन्तुष्ट, सुखी एवं समायोजित कर्मचारी मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है। वह तनावों से मुक्त रहता है और प्रतिकूल परिस्थितियों से भी मधुर सामंजस्य बनाने में सफल रहता है। इन दशाओं में औद्योगिक शान्ति कायम रहती है, उत्पादन कार्य प्रगति पर रहता है और किसी प्रकार का कोई अवरोध उत्पन्न नहीं होता।

प्रश्न 3.
पदोन्नति के लिए योग्यता की जाँच की मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक क्षेत्र में व्यक्ति की पदोन्नति के लिए आवश्यक योग्यता का होना अनिवार्य माना जाता है। व्यक्ति की इस आवश्यक योग्यता के मूल्यांकन या जाँच के लिए निम्नलिखित विधियों को अपनाया जाता है –

(1) प्रतियोगी परीक्षाएँ – वर्तमान समय में पदोन्नति के लिए कर्मचारी की योग्यता आँकने की यह पहली वस्तुनिष्ठ विधि हो सकती है। कर्मचारी तीन प्रकार परीक्षाओं में अपनी योग्यता प्रदर्शित कर सकते हैं –

(i) खुली प्रतियोगिता परीक्षा – इसके अन्तर्गत सभी कर्मचारियों को परीक्षा में बैठकर पदोन्नति का समान अवसर प्रदान करते हुए उच्च पदों के लिए व्यापक क्षेत्र की व्यवस्था की जाती है। यह आवश्यक नहीं है कि इसमें भाग लेने वाले परीक्षार्थी पहले से ही सेवा में हों।

(ii) सीमित प्रतियोगिता परीक्षा – इसके अन्तर्गत परीक्षा में बैठने का अवसर सिर्फ पहले से ही निम्न पदों पर काम कर रहे कर्मचारियों को प्रदान किया जाता है। इसे बन्द व्यवस्था भी कहते हैं।

(iii) उत्तीर्णता परीक्षा – न्यूनतम योग्यता सिद्ध करने वाले परीक्षार्थियों को केवल उत्तीर्ण भर होना होता है। उत्तीर्ण व्यक्तियों की एक सूची तैयार कर ली जाती है तथा पद रिक्त होने पर सूची के आधार पर उन्हें पदोन्नत कर दिया जाता है।

(2) सेवा अभिलेख – कर्मचारी की योग्यता मापन के लिए उसकी सेवा का एक अभिलेख (Record) तैयार किया जाता है, जिसमें उसके कार्य सम्पादन का पूरा विवरण होता है। इसे ‘कार्यकुशलता माप’ भी कहते हैं। अनेक व्यवसायों में सेवा अभिलेख के आधार पर पदोन्नति का प्रावधान होता है।

(3) नियुक्ति करने वाले अधिकारी या विशिष्ट पदोन्नति मण्डल का वैयक्तिक निर्णय – कर्मचारी जिस विभाग में कार्यरत हैं, उस विभाग के अध्यक्ष द्वारा कर्मचारियों की कार्यकुशलता का मूल्यांकन किया जाता है, क्योंकि कर्मचारी विभागाध्यक्ष के अधीन लम्बी अवधि तक काम कर चुके होते हैं; अत: वह उनकी अच्छाइयों-बुराइयों को बेहतर पहचान सकता है। विभागाध्यक्ष के व्यक्तिगत निर्णय में पक्षपात का दोष आ सकता है। इस दोष के निवारण हेतु विभागीय पदोन्नति मण्डल’ स्थापित किये जाते हैं। ये मण्डल सभी कर्मचारियों के काम की समीक्षा करते हैं तथा सेवा-अभिलेखों के आधार पर उनकी पदोन्नति के विषय में अपनी संस्तुति प्रस्तुत करते हैं।

प्रश्न 4.
टिप्पणी लिखिए-हड़ताल का स्वरूप।
उत्तर :
हड़ताल का स्वरूप श्रमिकों की माँग के विषय तथा उद्योगपतियों की मनोवृत्ति द्वारा निर्धारित होता है। हड़ताल के विभिन्न स्वरूप हैं; यह शान्त प्रकृति की भी हो सकती है और उग्र प्रवृत्ति की भी। कभी-कभी हड़ताल में कर्मचारी चुपचाप एक ओर खड़े होकर इकट्ठा होते रहते हैं तथा अपनी माँगों के समर्थन में प्रबन्धकों एवं सेवायोजक का शान्तिपूर्वक विरोध करते हैं। ‘कलम-बन्दी’ (Pen-Strike) भी हड़ताल का एक रूप है जिसके अन्तर्गत कर्मचारी काम पर तो जाते हैं, उपस्थिति भी भरते हैं किन्तु काम बिल्कुल नहीं करते। प्रायः लोग अपनी माँगों और समस्याओं को लेकर चिल्लाते हैं, जोर-जोर से नारे लगाते हैं या अपनी माँगों को गीतों के रूप में उच्चारित करते हैं। कहीं-कहीं कर्मचारियों को भूख-हड़ताल के माध्यम से स्वयं को यन्त्रणा देते हुए देखा जाता है, इससे उनके पक्ष में जनसमर्थन जुटता है। कभी-कभी तो भूख-हड़ताल का सुखद परिणाम निकलता है क्योंकि उद्योगपति उनकी न्यूनाधिक माँगों को स्वीकार कर उन्हें जल्दी ही हड़ताल खत्म करने के लिए राजी कर लेते हैं।

किन्तु कभी-कभी भूख-हड़ताल लम्बी खिंच जाने से श्रमिक नेता की मृत्यु तक हो जाती है, ऐसा होने पर हड़ताल अधिक उग्र रूप धारण कर लेती है तथा हिंसात्मक हो जाती है। इन दशाओं में, आन्दोलनकारी श्रमिकों में अराजक तत्त्व मिल जाते हैं जो तोड़-फोड़, आगजनी तथा लूटमार कर उद्योग की करोड़ों की सम्पत्ति को हानि पहुँचाते हैं। धीरे-धीरे हड़ताल अनियन्त्रित होती जाती है और उसका नेतृत्व अकुशल वे अवसरवादी नेताओं के हाथ में पहुँच जाता है। इसके विपरीत, सुलझे हुए तथा कुशल नेता हड़ताल को तब तक शान्तिपूर्वक चलाते हैं जब तक कि श्रमिकों की माँगे नहीं मान ली जातीं। हड़ताल की प्रक्रिया को तीव्र एवं प्रभावी बनाने के लिए सरकार, राजनीतिक दलों तथा समाजसेवी संगठनों की ओर से उद्योगपतियों से श्रमिकों की माँगें स्वीकार कर हड़ताल समाप्त करवाने की अपील की जाती है।

प्रश्न 5.
टिप्पणी लिखिए-औद्योगिक संघर्ष।
उत्तर :
औद्योगिकसंघर्ष’ वर्तमान युग में औद्योगिक जगत् की प्रमुख समस्या है। उद्योग की दुनिया में दो वर्ग हैं-उद्योगपति वर्ग एवं श्रमिक वर्ग। यदा-कदा उत्पादन सम्बन्धी तकनीकी या मानव-व्यवहार से सम्बन्धित किन्हीं समस्याओं को लेकर उद्योगपति (मिल मालिक)तथा श्रमिकों (मजदूरों) के बीच संघर्ष की स्थिति आ जाती है। उद्योगपतियों की मनोवृत्ति अपने मजदूरों तथा कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन प्रदान कर अधिकाधिक लाभ अर्जित करने की होती है। इसके विपरीत मजदूरों तथा कर्मचारियों का प्रयास रहता है कि वे अपने कठोर श्रम के बदले जीवन निर्वाह हेतु पर्याप्त वेतन तथा सभी आवश्यक सुविधाएँ; जैसे—-कार्य के घण्टे, विश्राम, दुर्घटना तथा बीमारी के लिए। उचित चिकित्सा की व्यवस्था और भत्ता आदि मिल मालिकों से प्राप्त करें। जब उद्योगों तथा व्यावसायिक संस्थानों में मजदूरों के हितों की अनदेखी होती है और कल्याणकारी योजनाओं को लागू नहीं किया जाता तो उद्योगपति एवं श्रमिक वर्ग आमने-सामने आ जाते हैं, जिसके परिणामतः तनाव और संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। यह तनाव अक्सर हड़ताल व तालाबन्दी के रूप में प्रकट होता है तथा औद्योगिक क्षेत्र को भीषण समस्याओं व अशान्ति से भर देता है।

इस भाँति, औद्योगिक क्षेत्र से सम्बन्धित श्रमिक एवं उद्योगपति जब अपने-अपने हितों की पूर्ति हेतु संघर्ष के लिए तत्पर होते हैं तो यह स्थिति औद्योगिक संघर्ष कहलाती है। आजकल श्रमिकों में एकता व सहयोग की भावना जाग्रत होने के फलस्वरूप शक्तिशाली श्रमिक-संघ बन गये हैं। श्रमिक-संर्यों का नेतृत्व उद्योगपतियों से अपने अधिकारों व सुविधाओं की माँग करता है। जब उद्योग में मजदूरों की न्यायोचित माँगों की उपेक्षा हो और उन पर काम का दबाव अधिक हो तो समस्त या अधिकांश मजदूर विरोध प्रकट करते हुए काम पर जाना छोड़ देते हैं। वे मिल-मालिकों की नीतियों के विरोध में तथा अपनी माँगों के समर्थन में प्रदर्शन, नारेबाजी, जूलूस, भूख-हड़ताल व आमरण अनशन का सहारा लेते हैं। मजदूर वर्ग की ये सभी गतिविधियाँ ‘हड़ताल के अन्तर्गत आती हैं।

कभी-कभी मिल-मालिक मजदूरों की माँग पूरी नहीं कर पाते (अथवा पूरी करना नहीं चाहते) तो वे उद्योग या मिल में ताला डाल देते हैं। इससे मिल बन्द हो जाती है और उत्पादन कार्य रुक जाता है। यह तालाबन्दी है। तालाबन्दी की दशा में मजदूरों या कर्मचारीगणों को उद्योग में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है, जिसका वे विरोध करते हैं। हड़ताल और तालाबन्दी औद्योगिक संघर्ष के परिचायक हैं।

प्रश्न 6.
मानवीय सम्बन्धों पर औद्यौगीकरण के कारण पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए
या
भारतीय समाज पर औद्योगीकरण के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक गतिविधियों की गति एवं दर के बढ़ने की प्रक्रिया को औद्योगीकरण कहा जाता है। प्रत्यक्ष रूप से औद्योगीकरण एक आर्थिक-व्यावसायिक प्रक्रिया है, परन्तु इसके विभिन्न प्रभाव मानवीय/सामाजिक सम्बन्धों पर भी पड़ते हैं। औद्योगीकरण के परिणाम स्वरूप मानवीय सम्बन्धों एवं समाज पर पड़ने वाले मुख्य प्रभाव निम्नलिखित हैं –

  1. मानवीय सम्बन्ध औपचारिक हो जाते हैं।
  2. आपसी सम्बन्ध वर्ग-भेद के आधार पर निर्धारित होते हैं।
  3. उच्च वर्ग के लिए निम्न आर्थिक वर्ग के लोगों से एक प्रकार की सामाजिक दूरी बनाये रखते
  4. समाज में वर्ग-संघर्षों में वृद्धि होती है तथा मानवीय सम्बन्ध तनावपूर्ण हो जाते हैं।
  5. पारिवारिक एवं वैवाहिक सम्बन्ध भी परिवर्तित होते हैं। संयुक्त परिवार विघटित होते हैं तथा वैवाहिक सम्बन्धों में स्थायित्व घटता है।
  6. औद्योगीकरण के प्रभाव से समाज में गतिशीलता में वृद्धि होती है।
  7. औद्योगीकरण ने सामाजिक स्तरीकरण के नये प्रतिमान निर्धारित किये हैं।
  8. सामाजिक नियन्त्रण के लिए औपचारिक अभिकरणों को प्राथमिकता दी जाने लगती है।
  9. धार्मिक एवं शैक्षिक क्षेत्र में परिवर्तन होता है।
  10. भारतीय समाज में प्रचलित जाति-व्यवस्था के नियमों में शिथिलता आयी है।

प्रश्न 7.
औद्योगिक क्षेत्र में विज्ञापन के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
या
विज्ञापन तथा उद्योग के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
आज के वैज्ञानिक एवं औद्योगिक युग में विज्ञापन का महत्त्व बहुत बढ़ गया है। विश्व की विकसित एवं विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ व्यापक स्तर पर विज्ञापन सम्बन्धी प्रविधियाँ तथा तकनीकों को अपनाती हैं। आर्थिक एवं व्यापारिक क्षेत्रों में प्रतियोगिता का बोलबाला है। बाजार में अनेकानेक फर्मे हैं और उनके ढेरों उत्पादन हैं। किसी एक वस्तु की खरीदारी के समय क्रेता बाजार में उस वस्तु के अनेक फर्मों द्वारा निर्मित स्वरूप देखता है। उदाहरण के लिए–साबुन खरीदते समय वह एक ही दुकान पर ढेर सारे साबुन; जैसे–लक्स, हमाम, रेक्सोना, लाइफबॉय, लिरिल, सिन्थॉल, मोती, मारवेल, गोदरेज, सरल तथा निरमा आदि-आदि देखता है।

क्रेता के सामने इनमें से एक साबुन को चुनने की समस्या है और साथ-ही-साथ उसे अपनी जेब का ख्याल भी रखना है। यहाँ विज्ञापन उसे बताता है कि कम दामों में वह कैसे अपनी रुचि का अच्छे-से-अच्छा साबुन खरीद सकता है। इसका दूसरा पक्ष भी है – मान लीजिए, किसी नयी फर्म ने एक नहाने का साबुन बनाया जो गुणवत्ता में इन सबसे आगे है और दाम भी कम हैं; लेकिन खरीदार को यह कैसे पता चले कि इस नाम से एक साबुन उपलब्ध है; फिर उसकी विशेषताओं को भी बताना होगा, अन्य साबुनों की तुलना में उसका वजन और दाम भी खोलना होगा, यह भी बताना होगा कि खरीदार कम-से-कम दाम में बढ़िया-से-बढ़िया चीज खरीदकर ले जा रहा है; यही नहीं, उसे इसका विश्वास कैसे दिलाया जाए और उसकी रुचि के अनुसार उसमें उस साबुन के क्रय की इच्छा कैसे पैदा की जाए? ये सभी बातें विज्ञापन के अन्तर्गत आती हैं और विज्ञापन के माध्यम से सुगम बनायी जाती हैं।

विज्ञापनों के माध्यम से उत्पादक, उत्पादित वस्तु तथा उपभोक्ताओं के मध्य एक अच्छा तालमेल स्थापित हो जाता है। उत्पादक घर बैठे ही उपभोक्ता से सम्पर्क साध लेता है और अपनी वस्तु उसके पास पहुँचा देता है। जो फर्म या व्यापारिक संस्था जितना अच्छे स्तर का विज्ञापन जुटा पाती है, उसकी बिक्री उतनी ही बढ़ जाती है। यही कारण है कि आज के समय में विज्ञापन एक कला, एक विज्ञान, एक उद्योग के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका है। सभी बड़े-बड़े उद्योग अपने वार्षिक बजट का एक अच्छा प्रतिशत विज्ञापन पर खर्च करते हैं।

बहुत-सी संस्थाएँ विज्ञापन पर करोड़ों तथा अरबों रुपया खर्च करती हैं और उनके माध्यम से उससे ज्यादा कमाती भी हैं। इसके लिए बड़े-बड़े साइनबोर्ड, इलेक्ट्रॉनिक्स के माध्यम से जगमगाते एवं गति करते बोर्ड, भाँति-भाँति के पोस्टर, पैम्फलेट, रेडियो, टी०वी०, सिनेमा तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञापन देकर प्रचार किया जाता है। आजकल हर एक वस्तु विज्ञापित हो सकती है, इसमें दैनिक उपयोग की वस्तुएँ, साहित्य, कला, राजनीतिक नेता, अभिनेता, वर-वधू के विज्ञापन, संस्थाओं तथा प्रतिष्ठानों के विज्ञापन तथा विज्ञापन-फर्मों के भी विज्ञापन सम्मिलित किये जाते हैं। निस्सन्देह विज्ञापन मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष पर छा चुका है और उद्योगों व व्यापारिक संस्थानों के लिए तो यह एक वरदान सिद्ध हो चुका है। यही कारण है कि प्रगतिशील देशों में विज्ञापन के क्षेत्र में हर रोज एक-न-एक नयी खोज की जाती है जो प्रचार की दुनिया में बढ़ता हुआ एक नया कदम होता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक मनोविज्ञान के क्षेत्र का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक मनोविज्ञान का क्षेत्र उद्योग-धन्धों के अतिरिक्त व्यापार एवं व्यवसाय तक विस्तृत है, तथापि यह उनमें निहित मानवीय तत्त्वों का ही अध्ययन करता है। इसका विषय-क्षेत्र इस प्रकार है –

  1. कर्मचारियों का चयन, प्रशिक्षण एवं दक्षता सम्बन्धी नयी-नयी विधियों की खोज;
  2. उपयुक्त कार्यों के लिए उपयुक्त व्यक्तियों का चयन तथा व्यवसाय परामर्श;
  3. कर्मचारियों के पदोन्नति के अवसर;
  4. कार्य की दशाएँ;
  5. उत्पादन व उत्पादन से सम्बन्धित मानवीय समस्याएँ;
  6. विज्ञापन एवं विक्रय;
  7. कर्मचारियों को मनोबल तथा प्रेरणा बनाये रखना;
  8. श्रम कल्याण;
  9. औद्योगिक असन्तोष, तनाव व संघर्ष के निराकरण के उपायों की खोज तथा
  10. हड़ताल व तालाबन्दी की समस्याएँ।

प्रश्न 2.
व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण की उपयोगिता या महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण की उपयोगिता या महत्त्व के मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं –

  1. व्यवसाय-विलेषणे से व्यवसायों का वर्गीकरण आसानी से किया जा सकता है;
  2. इसके माध्यम से कर्मचारियों के कार्य-सम्बन्धी कर्तव्यों का निर्धारण हो जाता है;
  3. कर्मचारियों के उत्तरदायित्व को निश्चित किया जा सकता है;
  4. पूर्ण व्यवसाय-विश्लेषण से कर्मचारियों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है;
  5. व्यवसाय के लिए आवश्यक क्षमताएँ तथा योग्यताएँ सुनिश्चित होती हैं;
  6. नयी भर्ती द्वारा आये कर्मचारियों के प्रशिक्षण की अवधि और उसके स्वरूप को निश्चित किया जा सकता है;
  7. इसके कर्मचारियों में आपसी सद्भावना उत्पन्न होने में मदद मिलती है;
  8. कर्मचारियों के कार्य के अनुसार उनके वेतन का निर्धारण हो सकता है;
  9. आवश्यक कच्चे माल के विषय में जानकारी मिलती है;
  10. कार्य में आने वाले तथा उपयोगी, यन्त्रों, उपकरणों, मशीनों व औजारों के बारे में विस्तृत सूचना मिलती है;
  11. कार्य में लगने वाले समय का अनुमान हो जाता है तथा
  12. कार्य के लाभकारी एवं हानिकारक, शारीरिक और मानसिक पहलुओं का सम्यक् बोध हो जाता है।

प्रश्न 3.
व्यावसायिक निर्देशन और व्यावसायिक चयन में क्या अन्तर है?
उत्तर :
किसी व्यक्ति को व्यवसाय के चुनाव के लिए आवश्यक जानकारी एवं सहायता प्रदान करना व्यावसायिक निर्देशन है। वास्तव में व्यावसायिक निर्देशने व्यक्ति को ऐसी व्यक्तिगत सहायता प्रदान करने का प्रयास है जिसके द्वारा स्वयं अपने लिए उचित व्यवसाय का चुनाव, उसके लिए तैयारी तथा उसमें प्रवेश करके उन्नति कर सके। इससे भिन्न व्यावसायिक चयन का अर्थ है-किसी कार्य के लिए उपयुक्त कर्मचारी का चुनाव करना। इसके लिए कार्य की प्रकृति तथा सम्बन्धित व्यक्ति की योग्यता एवं क्षमता को मुख्य रूप से ध्यान में रखा जाता है। व्यावसायिक निर्देशन का कार्य निर्देशन द्वारा प्रदान किया जाता है, जबकि व्यावसायिक चयन का कार्य सम्बन्धित कार्यालय या संस्थान के प्रबन्धकों या अधिकारियों द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 4.
पदोन्नति के महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
पदोन्नति कर्मचारियों में अनवरत प्रेरणा का स्रोत है जो उन्हें हमेशा कार्यकुशल बनाये रखती है। यह कुशल सेवा के लिए पुरस्कार की गारण्टी देती है। पदोन्नति की आशा लेकर कर्मचारी अपने कार्य को रुचिपूर्वक करते हैं। नियोक्ता (मालिक) अपने कर्मचारियों की योग्यता और कार्य अनुभव का पूरा लाभ उठा पाते हैं, क्योंकि पदोन्नत होने वाले कर्मचारीगण पहले से ही सेवा में लगे हुए थे। अतः उन्हें उत्पादन की सभी प्रक्रियाओं तथा कार्य प्रणालियों का पूरा ज्ञान रहता है। इस प्रकार से नियोक्ता की दृष्टि से भी पदोन्नति का विचार महत्त्वपूर्ण है। पदोन्नति की कामना कर्मचारियों को अनुशासित एवं सन्तुष्ट बनाये रखती है जिससे औद्योगिक या व्यापारिक संगठन में सम्भावित विरोधाभास शान्त रहते हैं। पदोन्नति के सुनिश्चित एवं स्पष्ट नियम कर्मचारियों में आत्म-विश्वास तथा सुरक्षा का विचार उत्पन्न करते हैं। निष्कर्षत: पदोन्नति की नीति प्रत्येक व्यवसाय में नियोक्ता तथा कर्मचारी दोनों के लिए लाभप्रद एवं महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 5.
हड़ताल एवं तालाबन्दी में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
हड़ताल एवं तालाबन्दी दोनों ही औद्योगिक क्षेत्र की मुख्य समस्याएँ हैं। हड़ताल एवं तालाबन्दी दोनों ही दशाओं में कार्य ठप हो जाता है। हड़ताल श्रमिकों एवं कर्मचारियों द्वारा उचित-अनुचित माँगों को मनवाने के लिए की जाती है। यह प्रायः आन्दोलन के रूप में होती है तथा इसके हिंसक रूप धारण करने की भी आशंका रहती है। इससे भिन्न तालाबन्दी मालिकों एवं प्रबन्धकों द्वारा घोषित की जाती है। इस दशा में श्रमिकों को कार्य से वंचित कर दिया जाता है तथा मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया जाता है। यह कार्य प्रायः मजबूरी में या अपनी सत्ता को दर्शाने के लिए किया जाता है। श्रमिक तालाबन्दी का विरोध करते हैं।

प्रश्न 6.
तालाबन्दी के क्या परिणाम होते हैं?
उत्तर :
तालाबन्दी में उद्योगपति उद्योग को बन्द रखता है जिससे श्रमिक व कर्मचारी काम पर नहीं जा पाते हैं। इससे श्रमिकों को वेतन नहीं मिल पाता और वे बेरोजगार हो जाते हैं। उनके पास अपना कोई संचित धन तो होता है नहीं, वे तो शाम तक श्रम करते हैं और प्राप्त पारिश्रमिक से दो जून की रोटी खाते हैं; अतः उनकी दशा खराब होती जाती है और वे भूखों मरने लगते हैं। इसके विरोध-स्वरूप वे प्रदर्शन, जुलूस तथा अनशन आदि का सहारा लेते हैं। कभी-कभी यह विरोध उग रूप धारण कर तोड़फोड़, आगजनी तथा हिंसात्मक घटनाओं में बदल जाता है। इसमें प्रशासन, पुलिस तथा राजनेताओं को भी हस्तक्षेप करमा पड़ता है। इसके अलावा तालाबन्दी के परिणामस्वरूप उत्पादित वस्तुओं की बाजार में कमी हो जाती है जिससे मुनाफाखोरी व जमाखोरी जैसी आर्थिक दुष्प्रवृत्तियों का जन्म होता है। इससे सम्बन्धित अन्य उद्योग, कारखाने या व्यावसायिक संस्थान भी बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं। जिससे अन्ततः राष्ट्र की आर्थिक हानि होती है।

प्रश्न 7.
उद्योग में विज्ञापन के किन्हीं दो कार्यों के बारे में लिखिए।
उत्तर :

(i) उद्योग में विज्ञापन के माध्यम से सम्बन्धित उत्पादनों को बहुपक्षीय जानकारी जनसामान्य तक पहुँचायी जाती है। सम्बन्धित उत्पाद के गुणों, उपयोगों तथा लाभों एवं सुविधाओं आदि की समुचित जानकारी उपलब्ध करायी जाती है।

(ii) विज्ञापन द्वारा किया जाने वाला दूसरा मुख्य कार्य सम्बन्धित उपभोक्ता वर्ग को अपने उत्पादनों को खरीदने या अपनाने के लिए प्रेरित करना होता है। विज्ञापन का यह कार्य अधिक
विश्यक एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.

निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. औद्योगिक-व्यावसायिक परिस्थितियों में होने वाले मानवीय-व्यवहार का अध्ययन करने वाली मनोविज्ञान की शाखा को ……………………. कहते हैं।
  2. औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान के ……………………. पक्ष से सम्बन्धित है।
  3. आधुनिक युग में औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप औद्योगिक मनोविज्ञान की उपयोगिता ……………………. है।
  4. कर्मचारी चयन की प्रक्रिया में कार्य-विश्लेषण के साथ-साथ ……………………. भी आवश्यक होता है।
  5. उद्योग में अनुपयुक्त कार्य-दशाओं के कारण कर्मचारी की ……………………. घट जाती है।
  6. कार्य की दशाओं में भौतिक दशाओं के अतिरिक्त ……………………. को भी ध्यान में रखा जाता है।
  7. औद्योगिक स्थल की स्वच्छता, प्रकाश की व्यवस्था, वायु तथा कार्य के घण्टे कार्य की मुख्य ……………………. दशाएँ हैं।
  8. नौकरी की सुरक्षा, अधिकारियों का व्यवहार तथा पदोन्नति के अवसर कार्य की मुख्य ……………………. दशाएँ हैं।
  9. तापमान में वृद्धि के कारण कर्मचारी का ……………………. घट जाता है।
  10. कार्य की भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक दशाओं के अनुकूल होने की स्थिति में उत्पादन की दर एवं गुणवत्ता ……………………. है।
  11. कार्य के दौरान अल्पकालिक विश्राम से व्यक्ति की कार्य-क्षमता ……………………. है।
  12. कार्यस्थल पर अधिक शोर या ध्वनि प्रदूषण का श्रमिकों के मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य पर ……………………. प्रभाव पड़ता है।
  13. कार्य के घण्टे बढ़ा देने पर उत्पादन की दर ……………………. है।
  14. पदोन्नति कर्मचारियों के लिए ……………………. स्रोत है जो उन्हें निरन्तर कार्य-कुशल बनाये रखती है।
  15. औद्योगिक मालिकों द्वारा श्रमिकों एवं कर्मचारियों तथा उनके परिवारों को दी जाने वाली अतिरिक्त सुविधाओं को ……………………. कहते है।
  16. औद्योगिक प्रगति के लिए उद्योगपति और कर्मचारियों के बीच अच्छे ……………………. का होना आवश्यक होता है।
  17. श्रमिकों के बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य एवं मनोरंजन की व्यवस्था करना ……………………. कहलाता है।
  18. हड़ताल एवं ……………………. का उद्योग की उन्नति पर ……………………. प्रभाव पड़ता है।
  19. श्रमिकों द्वारा विद्रोह स्वरूप कार्य करना बन्द कर देना ……………………. कहलाता है।
  20. उद्योगपतियों द्वारा उत्पादन कार्य रोक देना तथा श्रमिकों को कार्य से रोक देना ……………………. कहलाता है।
  21. तीव्र औद्योगिक तनाव के चलते उद्योगों में ……………………. और ……………………. की घटनाएँ होती हैं।
  22. उद्योग में उत्पाद का प्रचार ……………………. कहलाता है।
  23. किसी उत्पाद की उपस्थिति एवं विशेषताओं का प्रचार ……………………. कहलाता है।
  24. प्रलोभन विज्ञापन की प्रभावकता को ……………………. है।
  25. प्रेरणा और आवश्यकताएँ औद्योगिक विज्ञापन के ……………………. आधार हैं।
  26. बड़े आकार का उद्दीपक उपभोक्ता के ध्यान को ……………………. करता है।
  27. वर्तमान समय में औद्योगिक एवं व्यावसायिक सफलता के लिए विज्ञापन ……………………. है।
  28. किसी उद्योग की सफलता के लिए प्रबन्ध-तन्त्र, संसाधन एवं ……………………. में आपसी समन्वय होना आवश्यक है।

उत्तर :

  1. औद्योगिक मनोविज्ञान
  2. व्यावहारिक
  3. बढ़ गयी
  4. कर्मचारी-विश्लेषण
  5. कार्य-क्षमता
  6. मनोवैज्ञानिक दशाओं
  7. भौतिक दशाएँ
  8. मनोवैज्ञानिक
  9. कार्य के प्रति उत्साह
  10. बढ़ जाती
  11. बढ़ जाती
  12. प्रतिकूल
  13. घट जाती
  14. प्रेरणा का
  15. श्रम-कल्याण कार्य
  16. सम्बन्धों
  17. श्रम कल्याण कार्य
  18. तालाबन्दी, प्रतिकूल
  19. तालाबन्दी
  20. तालाबन्दी
  21. हड़ताल, तालाबन्दी,
  22. विज्ञापन
  23. विज्ञापन
  24. बढ़ाता
  25. मनोवैज्ञानिक
  26. आकर्षित
  27. अनिवार्य
  28. श्रमिक वर्ग

प्रश्न II

निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
औद्योगिक मनोविज्ञान से क्या आशय है?
उत्तर :
औद्योगिक परिस्थितियों में होने वाले मानवीय व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन ही औद्योगिक मनोविज्ञान कहलाता है।

प्रश्न 2.
औद्योगिक मनोविज्ञान की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
ब्लम के अनुसार, “मानवीय औद्योगिक समस्याओं से सम्बन्धित मनोवैज्ञानिक तथ्यों और सिद्धान्तों का विस्तारपूर्वक अध्ययन ही औद्योगिक मनोविज्ञान है।”

प्रश्न 3.
औद्योगिक मनोविज्ञान की दो मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(i) औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की व्यावहारिक शाखा है।
(ii) यह औद्योगिक जगत से सम्बन्धित मनुष्य के व्यवहार का सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन है।

प्रश्न 4.
औद्योगिक क्षेत्र में मनोविज्ञान की भूमिका अथवा महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. कर्मचारियों के चुनाव में सहायक
  2. औद्योगिक झगड़ों तथा तनाव को समाप्त करने में सहायक
  3. कार्य की दशाओं के सुधार में सहायक तथा
  4. औद्योगिक क्षेत्र में मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन।

प्रश्न 5.
कर्मचारी-विश्लेषण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
किसी श्रमिक अथर्वा कर्मचारी की व्यक्तिगत योग्यताओं, क्षमताओं, रुचियों, अभिरुचियों तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी गुणों को जानने की प्रक्रिया को कर्मचारी-विश्लेषण कहते हैं।

प्रश्न 6.
उपयुक्त कर्मचारी के चुनाव से होने वाले मुख्य लाभों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. कर्मचारी सुखी एवं सन्तुष्ट रहते हैं
  2. उत्पादन वृद्धि
  3. समय एवं धन की बचत
  4. दुर्घटनाओं की आशंका घटती है
  5. स्थायित्व रहता है तथा
  6. औद्योगिक शान्ति बनी रहती है।

प्रश्न 7.
कर्मचारी-विश्लेषण के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. आवेदन-पत्र
  2. संस्तुति-पत्र
  3. शैक्षिक आलेख
  4. समूह निरीक्षण विधि
  5. शारीरिक परीक्षण
  6. प्रयोगात्मक एवं अन्वेषणात्मक क्रियाएँ
  7. मनोवैज्ञानिक परीक्षण तथा
  8. साक्षात्कार।

प्रश्न 8.
कार्य-स्थल की मुख्य भौतिक दशाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
कार्य-स्थल की मुख्य भौतिक दशाएँ हैं-स्वच्छता, ऊष्मा या ताप, प्रकाश व्यवस्था, वायु का प्रबन्ध, पानी, शौचालय आदि की सुविधा, कार्य के घण्टे तथा यन्त्रों से सुरक्षा।

प्रश्न 9.
कार्य-स्थल की मुख्य भौतिक दशाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
कार्य-स्थल की मुख्य भौतिक दशाएँ हैं-नौकरी की सुरक्षा, अधिकारियों का व्यवहार, कर्मचारियों के आपसी सम्बन्ध, आवश्यकताओं की पूर्ति, उचित प्रलोभन तथा पदोन्नति के अवसर।

प्रश्न 10.
‘पदोन्नति की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
विलियम जी० टोरपी के अनुसार, “पदोन्नति पदाधिकारी के एक पद से ऐसे दूसरे पद पर पहुँचने की ओर संकेत करती है जो उच्चतर श्रेणी या उच्चतर न्यूनतम वेतन वाला होता । है। पदोन्नति का अभिप्राय है-कर्मचारी के कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों में वृद्धि कर देना।”

प्रश्न 11.
पदोन्नति के मुख्य आवश्यक तत्त्वों का उल्लेख कीजिए। .
उत्तर :

  1. उच्चतर पद पर स्थानान्तरण
  2. उत्तरदायित्व की अधिकता तथा
  3. वेतन में वृद्धि।

प्रश्न 12.
पदोन्नति के मुख्य आधारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. ज्येष्ठता या वरिष्ठता
  2. योग्यता
  3. कार्य में ‘दक्षता या निपुणता तथा
  4. सिफारिश या कृपा।

प्रश्न 13.
उद्योग में मानवीय सम्बन्धों से क्या आशय है?
उत्तर :
श्रमिकों अथवा कर्मचारियों के साथ सद्व्यवहार करते हुए उनकी शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक, सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक आवश्यकताओं को पूरा करने की दृष्टि से विभिन्न कल्याणकारी कार्यों को लेकर श्रमिकों तथा उद्योगपतियों के मध्य प्रेम तथा श्रद्धा का सम्बन्ध स्थापित होना ही उद्योग में मानवीय सम्बन्ध कहलाता है।

प्रश्न 14.
उद्योग में अच्छे मानवीय सम्बन्ध स्थापित करने से क्या लाभ होते हैं?
उत्तर :
उद्योग में अच्छे मानवीय सम्बन्ध स्थापित होने से कार्य उत्तम होते हैं, उत्पादन की दर में वृद्धि होती है तथा औद्योगिक शान्ति में वृद्धि होती है। इससे कर्मचारियों, उद्योगपतियों तथा राज्य सभी का हित होता है।

प्रश्न 15.
श्रम-कल्याण-कार्यों से क्या आशय है?
उत्तर :
श्रम-कल्याण से अभिप्राय कर्मचारियों या श्रमिकों की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, नैतिक तथा सांस्कृतिक उन्नति के लिए उद्योग के भीतर और बाहर उद्योगपतियों, शासन तथा श्रम-संगठनों द्वारा किये जाने वाले समस्त प्रयासों अथवा कार्यों से है।

प्रश्न 16.
उद्योग की आन्तरिक व्यवस्था से सम्बन्धित मुख्य श्रम-कल्याण कार्य कौन-कौन से हैं?
उत्तर :

  1. वैज्ञानिक भर्ती
  2. औद्योगिक प्रशिक्षण
  3. दुर्घटनाओं से रोकथाम
  4. स्वच्छता, प्रकाश और वायु का प्रबन्ध तथा
  5. अन्य आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराना।

प्रश्न 17.
श्रमिकों के आर्थिक लाभ सम्बन्धी श्रम-कल्याण कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. ओवरटाइम की सुविधा
  2. नियमों की सुरक्षा
  3. प्रॉविडेण्ट फण्ड, बीमा और पेन्शन की सुविधा तथा
  4. यात्रा-भत्ता।

प्रश्न 18.
विज्ञापन की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
आर० डब्ल्यू० हसबैण्ड के अनुसार, “विज्ञापन को प्रचार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो कुछ वस्तुओं अथवा सेवाओं के अस्तित्व व गुणों की ओर ध्यान आकर्षित करता है।

प्रश्न 19.
विज्ञापन के मुख्य कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. ध्यान आकृष्ट करना
  2. रुचि उत्पन्न करना
  3. विश्वास पैदा करना
  4. स्मृति पर प्रभाव डालना तथा
  5. क्रय के लिए प्रेरणा।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
औद्योगिक परिस्थितियों में मानवीय व्यवहार का अध्ययन करने वाली मनोविज्ञान की शाखा को कहते हैं –
(क) व्यावहारिक मनोविज्ञान
(ख) सामान्य मनोविज्ञान
(ग) औद्योगिक मनोविज्ञान
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 2.
व्यावहारिक मनोविज्ञान की एक शाखा के रूप में औद्योगिक मनोविज्ञान का महत्त्व है –
(क) इसके अध्ययन से औद्योगिक समस्याओं के समाधान में सहायता मिलती है।
(ख) कर्मचारियों के उचित चुनाव में सहायता मिलती है।
(ग) औद्योगिक क्षेत्र में मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन देता है।
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व

प्रश्न 3.
औद्योगिक मनोविज्ञान सहायक होता है –
(क) उपर्युक्त यन्त्र एवं मशीनें खरीदने में
(ख) आर्थिक नियोजन में
(ग) अधिक लाभ कमाने में
(घ) कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति के चुनाव में

प्रश्न 4.
वर्तमान परिस्थितियों में कर्मचारी-विश्लेषण की सरल एवं उत्तम विधि है –
(क) आवदेन-पत्र विधि
(ख) शैक्षिक प्रमाण-पत्र विधि
(ग) शारीरिक परीक्षण विधि
(घ) सिफारिश का

प्रश्न 5.
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर कर्मचारियों के चुनाव से लाभ हैं
(क) औद्योगिक प्रबन्धकों की शान बढ़ती है।
(ख) नियुक्त किये गये कर्मचारियों को अधिक वेतन देना पड़ता है
(ग) नियुक्त किये गये कर्मचारी अधिक लगन, रुचि एवं परिश्रम से कार्य करते हैं।
(घ) कर्मचारी निकम्मे होते हैं तथा उत्पादन घटता है।

प्रश्न 6.
अधिक आयु वाले कर्मचारियों के कार्य-स्थल पर कैसा प्रकाश होना चाहिए?
(क) चकाचौंध युक्त प्रकाश
(ख) मन्द प्रकाश
(ग) तीव्र प्रकाश
(घ) चाहे जैसा प्रकाश

प्रश्न 7.
कार्यस्थल पर संगीत व्यवस्था का उत्पादन एवं कार्यक्षमता पर कैसा प्रभाव पड़ता है?
(क) प्रतिकूल प्रभाव
(ख) अनुकूल प्रभाव
(ग) अनावश्यक प्रतीत होती है।
(घ) बाधक प्रतीत होती है।

प्रश्न 8.
श्रमिकों तथा उनके परिवारों की दी जाने वाली अतिरिक्त सुविधाओं को कहा जाता है –
(क) श्रमिक संघ के कार्य
(ख) आवश्यक कार्य
(ग) श्रम-कल्याण सम्बन्धी कार्य
(घ) पारिवारिक सहायता

प्रश्न 9.
“पदोन्नति का अर्थ है एक पद से किसी उच्चतर श्रेणी के अन्य पद पर नियुक्ति, जिसमें कठिनतर प्रकृति एवं गहनतर उत्तरदायित्वों का कार्य करना पड़ता है। इस पद का नाम बदल जाता है और प्रायः वेतन में भी वृद्धि होती है।” यह कथन किसका है?
(क) ब्लम
(ख) टोरपी
(ग) एल० डी० ह्वाइट
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं

प्रश्न 10.
पदोन्नति के स्वीकृत आधार हैं –
(क) ज्येष्ठता या वरिष्ठता
(ख) योग्यता
(ग) कार्य में दक्षता या निपुणता
(घ) ये सभी

प्रश्न 11.
यदि श्रमिक औद्योगिक कार्यों में सहयोग देना बन्द कर दें तो उसे कहा जाता है –
(क) नाराजगी
(ख) हड़ताल
(ग) तालाबन्दी
(घ) अवकाश पर जाना।

प्रश्न 12.
उद्योगपतियों एवं प्रबन्धकों द्वारा अपनी मर्जी से उत्पादन कार्य बन्द कर देना कहलाता है –
(क) हड़ताल
(ख) बँटनी
(ग) तालाबन्दी
(घ) गम्भीर समस्या

उत्तर :

  1. (ग) औद्योगिक मनोविज्ञान
  2. (घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व
  3. (घ) कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति के चुनाव में
  4. (क) आवेदन-पत्र विधि
  5. (ग) नियुक्त किये गये कर्मचारी अधिक लगन, रुचि एवं परिश्रम से कार्य करते हैं
  6. (ग) तीव्र प्रकाश
  7. (ख) अनुकूल प्रभाव
  8. (ग) अम-कल्याण सम्बन्धी कार्य
  9. (ग) एल० डी० ह्वाइट
  10. (घ) ये सभी
  11. (ख) हड़ताल
  12. (ग) तालाबन्दी।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 3 Motivational Bases of Behaviour

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 3
Chapter Name Motivational Bases of Behaviour
(व्यवहार के अभिप्रेरणात्मक आधार)
Number of Questions Solved 55
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 3 Motivational Bases of Behaviour व्यवहार के अभिप्रेरणात्मक आधार

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रेरणा (Motivation) से आप क्या समझते हैं? प्रेरणायुक्त व्यवहार के मुख्य लक्षणों को भी स्पष्ट कीजिए।
या
अभिप्रेरित व्यवहार के कोई दो लक्षण बताइए।
उत्तर :
मनोविज्ञान मनुष्य के व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन है और मनुष्य का व्यवहार प्राय: दो प्रकार की शक्तियों द्वारा संचालित होता है—बाह्य शक्तियाँ तथा आन्तरिक शक्तियाँ। मनुष्य के अधिकांश व्यवहार तो बाह्य वातावरण से प्राप्त उत्तेजनाओं के कारण उत्पन्न होते हैं, जब कि कुछ अन्य व्यवहार आन्तरिक शक्तियों द्वारा संचालित होते हैं। व्यवहारों को संचालित करने वाली ये आन्तरिक शक्तियाँ तब तक निरन्तर क्रियाशील रहती हैं जब तक कि व्यवहार से सम्बन्धित लक्ष्य सिद्ध नहीं हो जाता। इसके अतिरिक्त ये शक्तियाँ उस समय तक समाप्त नहीं होतीं, जिस समय तक प्राणी क्षीण अवस्था को प्राप्त होकर असहाय नहीं हो जाता अथवा मर ही नहीं जाता है। स्पष्टतः किसी प्राणी द्वारा विशेष प्रकार की क्रिया या व्यवहार करने को बाध्य करने वाली ये आन्तरिक शक्तियाँ ही प्रेरणा (Motivation) कहलाती हैं।

प्रेरणा का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Motivation)

अर्थ – प्रेरणा का शाब्दिक अर्थ है-क्रियाओं को प्रारम्भ करने वाली, दिशा प्रदान करने वाली अथवा उत्तेजित करने वाली शक्ति। व्यक्ति को किसी विशिष्ट व्यवहार या कार्य करने के लिए उत्तेजित करने की शक्ति प्रेरणा कहलाती है। उदाहरण के लिए एक छोटे बच्चे को रोता हुआ देखकर उसकी माँ उसे दूध पिला देती है और बच्चा रोना बन्द कर देता है। रोना बच्चे का विशिष्ट व्यवहार या कार्य है। जिसका कारण उसकी भूख है। स्पष्ट रूप से भूख ही बच्चे के व्यवहार की प्रेरणा’ हुई। व्यक्ति द्वारा विशेष व्यवहार करने की इच्छा या आवश्यकता अन्दर से महसूस की जाती है। इस दशा या आन्तरिक स्थिति का नाम ही प्रेरणा-शक्ति (Force of Motivation) है और प्रेरणा-शक्ति ही हमारे व्यवहारों में विभिन्न मोड़ लाती है। प्रेरणा को जन्म देने वाला तत्त्व मनोविज्ञान में प्रेरक’ (Motive) के नाम से जाना जाता है।

परिभाषाएँ – विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रेरणा को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है –

(1) गिलफोर्ड के अनुसार, “प्रेरणा कोई विशेष आन्तरिक अवस्था या दशा है जो किसी कार्य को शुरू करने और उसे जारी रखने की प्रवृत्ति से युक्त होती है।”

(2) वुडवर्थ के मतानुसार, “प्रेरणा व्यक्ति की एक अवस्था या मनोवृत्ति है जो उसे किसी व्यवहार को करने तथा किन्हीं लक्ष्यों को खोजने के लिए निर्देशित करती है।”

(3) लॉवेल के कथनानुसार, “प्रेरणा को अधिक औपचारिक रूप से किसी आवश्यकता द्वारा प्रारम्भ मनो-शारीरिक आन्तरिक प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो इस क्रिया को जन्म देती है या जिसके द्वारा उस आवश्यकता को सन्तुष्ट किया जाता है।”

(4) किम्बाल यंग के अनुसार, “प्रेरणा एक व्यक्ति की आन्तरिक स्थिति होती है जो उसे क्रियाओं की ओर प्रेरित करती है।’

(5) एम० जॉनसन के अनुसार, “प्राणी के व्यवहार को आरम्भ करने तथा दिशा देने वाली क्रिया के सामान्य प्रतिमान के प्रभाव को प्रेरणा के नाम से जाना जाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि प्रेरणा (या प्रेरक) एक आन्तरिक अवस्था है जो प्राणी में व्यवहार या क्रिया को जन्म देती है। प्राणी में यह व्यवहार या क्रियाशीलता किसी लक्ष्य की पूर्ति तक बनी रहती है, किन्तु लक्ष्यपूर्ति के साथ-साथ प्रेरक शक्तियाँ क्षीण पड़ने लगती हैं।

प्रेरणायुक्त व्यवहार के लक्षण
(Characteristics of Motivated Behaviour)

प्रेरणायुक्त व्यवहार के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं –

(1) अधिक शक्ति का संचालन – प्रेरणायुक्त व्यवहार का प्रथम मुख्य लक्षण व्यक्ति में कार्य करने की अधिक शक्ति का संचालन है। आन्तरिक गत्यात्मक शक्ति प्रेरणात्मक व्यवहार का आधार है। जिसके अभाव में व्यक्ति प्रायः निष्क्रिय हो जाता है। यह माना जाता है कि व्यक्ति के व्यवहार की तीव्रता जितनी अधिक होगी उसकी पृष्ठभूमि में प्रेरणा भी उतनी ही शक्तिशाली होगी। उदाहरण के लिए परीक्षा के दिनों में विद्यार्थी बिना थके घण्टों तक पढ़ते रहते हैं, जबकि सामान्य दिनों में वे उतना परिश्रम नहीं करते तथा क्रोध की अवस्था में एक दुबला-पतला-सा व्यक्ति कई लोगों के काबू में नहीं आता। प्रेरणा की दशा में इस प्रकार के अतिरिक्त शक्ति के संचालन का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि शक्ति के इस अतिरिक्त संचालन का मुख्य कारण प्रबल प्रेरणा की दशा में उत्पन्न होने वाले शारीरिक एवं रासायनिक परिवर्तन होते हैं।

(2) परिवर्तनशीलता – प्रेरणायुक्त व्यवहार का दूसरा लक्षण उसमें निहित परिवर्तनशीलता या अस्थिरता का गुण है। वस्तुत: प्रत्येक व्यवहार अथवा क्रिया का कोई-न-कोई लक्ष्य/उद्देश्य अवश्य होता है। यदि किसी एक मार्ग, विधि, उपाय अथवा प्रयास द्वारा अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती है तो प्रेरित व्यक्ति लक्ष्य-सिद्धि के लिए विभिन्न प्रकार के प्रयास करता है। प्रयासों में एकरसता और पुनरावृत्ति का सगुण नहीं पाया जाता, अपितु आवश्यकतानुसार बराबर परिवर्तन की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। इस प्रकार लक्ष्य प्राप्ति का सही मार्ग मिलने तक प्रेरित व्यक्ति मार्ग परिवर्तित करता रहता है।

(3) निरन्तरता – प्रेरणायुक्त व्यवहार या क्रिया के लगातार जारी रहने का लक्षण निरन्तरता कहलाता है। उद्देश्यानुसार प्रारम्भ की गई ये क्रियाएँ उस समय तक अनवरत रूप से चलती रहती हैं। जब तक कि लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता। कार्य पूर्ण हो जाने पर प्रेरणा की यह विशेषता स्वत: ही समाप्त या कम हो जाती है। कार्य की निरन्तरता अल्पकालीन भी हो सकती है तथा दीर्घकालीन भी। भूखा व्यक्ति भोजन पाने का तब तक ही निरन्तर प्रयास करता है जब तक कि उसे भोजन नहीं मिल जाता। भोजन प्राप्त होते ही उसके प्रयास या तो समाप्त हो जाते हैं या शिथिल पड़ जाते हैं।

(4) चयनता – प्रेरणायुक्त व्यवहार का एक प्रमुख लक्षण चयनता भी है। प्रेरित व्यक्ति अपनी आवश्यकता के अनुसार व्यवहार एवं अनुभव का चयन करता है। वह विभिन्न वस्तुओं के बीच से अधिक आवश्यक वस्तु का चयन करने त्था उसे पाने का प्रयास करता है। उदाहरण के लिए किसी प्यासे व्यक्ति के सम्मुख विभिन्न प्रकार के व्यंजन परोसे जाने पर भी अन्य व्यंजनों की तुलना में उसका प्रत्येक प्रयास जल को प्राप्त करने के लिए होगा।

(5) लक्ष्य प्राप्त करने की व्याकुलता – प्रेरणायुक्त व्यवहार में लक्ष्य प्राप्त करने की व्याकुलता पाई जाती है। यह व्याकुलता लक्ष्य पूर्ण होने तक बनी रहती है। अतः प्रेरित व्यवहार लक्ष्योन्मुख व्यवहार कहलाता है। परीक्षार्थी में परीक्षा पूर्ण होने तक व्याकुलता बनी रहती है और वह तनावग्रस्त रहता है।

(6) लक्ष्य-प्राप्ति पर व्याकुलता की समाप्ति – व्याकुलता उस समय तक बनी रहती है जब तक कि लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता। लक्ष्य-प्राप्ति के उपरान्त व्याकुलता समाप्त हो जाती है। पूर्वोक्त उदाहरण में परीक्षा समाप्त होते ही परीक्षार्थी की व्याकुलता समाप्त हो जाती है और वह तनावमुक्त होकर शान्त हो जाता है। इसी प्रकार भूख से व्याकुल व्यक्ति भोजन प्राप्त होते ही शान्ति लाभ करता है। और उसकी व्याकुलता समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 2.
प्रेरणा की अवधारणा के स्पष्टीकरण के लिए विभिन्न दृष्टिकोणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
प्रेरणा के सम्बन्ध में कुछ दृष्टिकोण

प्रेरणा का अभिप्राय व्यक्ति या पशु की ऐसी आन्तरिक अवस्था से होता है जो उसे एक निश्चित लक्ष्य की ओर व्यवहार करने को बाध्य करती है। प्रेरणा के सम्बन्ध में अनेक दृष्टिकोण प्रचलित रहे हैं, उनमें से प्रमुख दृष्टिकोण निम्नलिखित हैं

(1) मूलप्रवृत्तियाँ – प्रेरणा के विषय में वैज्ञानिक अध्ययन प्रसिद्ध विद्वान मैक्डूगल से शुरू हुए। मैक्डूगल ने प्रेरित व्यवहार का कारण मूलप्रवृत्तियाँ बताया है। बाद में, मूलप्रवृत्तियों के दृष्टिकोण की कूओ, लारमैन तथा लैथ्ले आदि मनोवैज्ञानिकों ने प्रयोगों द्वारा जंच की और पाया कि प्रेरित व्यवहार मूलप्रवृत्तियों द्वारा उत्पन्न नहीं होता।

(2) वातावरण के अनुभव – कुओ ने अभिप्रेरित व्यवहार के सम्बन्ध में एक प्रयोग किया। उसने कुछ बिल्लियों को चूहों के बच्चों के साथ पाला और चार महीने बाद पाया कि बिल्लियों ने चूहों के साथ न तो लगाव ही दिखाया और न ही उन पर हमला किया। इन्हीं बिल्ल्यिों को फिर से ऐसी बिल्लियों के साथ रखा गया जो चूहों का शिकार करती थीं। इनमें से 6 बिल्लियाँ साथ में पले हुए 17 चूहों को मारकर खा गयीं। कूओ के इस प्रयोग को निष्कर्ष था कि प्राणी का व्यवहार मूलप्रवृत्तियों से नहीं, प्रारम्भिक वातावरण के अनुभवों से प्रेरित होता है।

(3) आवश्यकता – प्रत्येक प्राणी की कुछ-न-कुछ आवश्यकताएँ होती हैं जिनकी सन्तुष्टि या असन्तुष्टि से व्यक्ति का व्यवहार प्रभावित होता है। बोरिंग के अनुसार, “आवश्यकता प्राणी के शरीर की कोई जरूरत या अभाव है।” जब प्राणी के शरीर में किसी चीज की कमी या अति की अवस्था पैदा हो जाती है तो उसे ‘आवश्यकता (Need) की संज्ञा दी जाती है। आवश्यकता की वजह से शारीरिक तनाव या असन्तुलन पैदा होता है जिसके फलस्वरूप ऐसा व्यवहार उत्पन्न करने की प्रवृत्ति होती है, जिससे तनाव असन्तुलन समाप्त हो जाता है। उदाहरणार्थ–‘प्यास’ शरीर की कोशिकाओं में पानी की कमी है, जबकि मलमूत्र त्याग’ शरीर में अनावश्यक पदार्थों का ‘अति में जमा हो जाना है। इस भाति, दोनों ही दशाओं में ‘कमी’ तथा ‘अति’ का बोध तनाव/असन्तुलन को जन्म देता है।

प्रेरणा से सम्बन्धित इस दृष्टिकोण में मनोवैज्ञानिकों ने आवश्यकताओं के दो प्रकार बताये हैं –

(i) शारीरिक आवश्यकताएँ – जैसे-पानी, भोजन, नींद, मल-मूत्र त्याग तथा काम (Sex) की आवश्यकता।
(ii) मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ – जैसे-धन-दौलत, प्रतिष्ठा, उपलब्धि तथा प्रशंसा की आवश्यकता।।

(4) अन्तर्वोद-साटेंन के अनुसार-“अन्तर्नाद ऐसे तनाव या क्रियाशीलता की अवस्था को कहा जाता है जो किसी आवश्यकता द्वारा उत्पन्न होती है। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है। कि अभिप्रेरित व्यवहार का कारण अन्तर्नाद (Drive) है। अन्तर्नाद की उत्पत्ति किसी-न-किसी शारीरिक आवश्यकता से होती है। आवश्यकताओं की तरह से अन्तर्नाद भी शारीरिक व मनोवैज्ञानिक है। शारीरिक आवश्यकताओं से उत्पन्नअन्तर्वोद शारीरिक अन्तर्नाद कहलाते हैं, जबकि मानसिक आवश्यकताओं से उत्पन्न अन्तर्नाद मनोवैज्ञानिक अन्तनोंद कहे जाते हैं। भूख की अवस्था में भूख अन्तर्नाद, प्यास लगने पर प्यास अन्तर्नाद तथा काम (Sex) की इच्छा होने पर काम अन्तनोंद पैदा होता है। हल के मतानुसार, “अन्तर्नाद व्यवहार को ऊर्जा प्रदान करता है, किन्तु दिशा नहीं।” बोरिंग के अनुसार, अन्तर्वोद शरीर की एक आन्तरिक क्रिया या दशा है जो एक विशेष प्रकार के व्यवहार दे लिए प्रेरणा प्रदान करती है।

(5) प्रलोभन या प्रोत्साहन – प्रलोभन या प्रोत्साहन (Incentive) उस लक्ष्य को कहा जाता है। जिसकी ओर अभिप्रेरित व्यवहार अग्रसर होता है। यह वातावरण की वह वस्तु है जो व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करती है तथा जिसकी प्राप्ति से उसकी आवश्यकता की पूर्ति तथा अन्तनोंद में कमी होती है। उदाहरणार्थ-भूखे व्यक्ति के लिए भोजन एक प्रलोभन या प्रोत्साहन है, क्योंकि यह भूखे व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करता है। भोजन के उपरान्त व्यक्ति की भूख की आवश्यकता कुछ देर के लिए समाप्त हो जाती है और भूख का अन्तर्वोद भी कम हो जाता है।

(6) प्रेरणा के मुख्य अंग: आवश्यकता, अन्तर्वोद तथा प्रलोभन – आवश्यकता, अन्तर्वोद तथा प्रलोभन (या प्रोत्साहन) ये तीनों ही प्रेरणा के मुख्य अंग हैं जो आपस में गहन सम्बन्ध रखते हैं। प्रेरणा का प्रारम्भ आवश्यकता से होता है और यह प्रलोभन की प्राप्ति तक चलता है। वस्तुत: आवश्यकता एवं अन्तनोंद प्राणी की आन्तरिक अवस्थाएँ या तत्परताएँ हैं, जबकि प्रलोभन बाह्य वातावरण में उपस्थित कोई चीज या उद्दीपक है। प्रेरणा उत्पन्न होने की प्रक्रिया में पहले आवश्यकता जन्म लेती है, उसके बाद अन्तर्नाद उत्पन्न होता है। ये दोनों ही व्यक्ति के भीतर की दशाएँ हैं। अन्तर्नाद की अवस्था में व्यक्ति में तनाव तथा क्रियाशीलता दृष्टिगोचर होती है जिसके परिणामतः वह एक निश्चित दिशा में प्रलोभन की प्राप्ति के लिए कुछ व्यवहार प्रदर्शित करता है। यदि ‘भूख’ प्रेरणा का उदाहरण है तो इसकी प्रक्रिया में भूख की आवश्यकता, भूख का अन्तनोंद तथा भोजन की प्राप्ति तीनों ही सम्मिलित हैं।

इस भाँति, प्रेरणा के सम्बन्ध में उपर्युक्त वर्णित दृष्टिकोण प्रस्तुत हुए हैं। मैक्डूगल के मूल प्रवृत्तियों से सम्बन्धुित दृष्टिकोण को महत्त्वपूर्ण नहीं माना जाता। इसके विरुद्ध प्रारम्भिक वातावरण के अनुभवों का दृष्टिकोण अभिव्यक्त हुआ है। प्रेरणा के सम्बन्ध में आधुनिक दृष्टिकोण; आवश्यकता, अन्तर्नाद तथा प्रलोभन के पारस्परिक सम्बन्ध तथा अन्त:क्रिया पर आधारित है और यही प्रेरणा के प्रत्यय की सन्तोषजनक व्याख्या प्रस्तुत करता है।

प्रश्न 3.
प्रेरणाओं का हमारे जीवन में महत्त्व बताइए।
या
मानव जीवन में अभिप्रेरणा का क्या महत्त्व होता है?
उत्तर :
प्रेरणा (प्रेरक) का महत्व
(Importance of Motivation)

प्रेरणा एक विशेष आन्तरिक अवस्था है जो प्राणी में किसी क्रिया या व्यवहार को आरम्भ करने की प्रवृत्ति जाग्रत करती है। यह प्राणी में व्यवहार की दिशा तथा मात्रा भी निश्चित करती है। वस्तुतः मनुष्य एवं पशु, सभी का व्यवहार प्रेरणाओं से युक्त तथा संचालित होता है। इस भाँति, मनुष्य के जीवन में उसके व्यवहार और अनुभवों के सन्दर्भ में प्रेरणाओं का उल्लेखनीय स्थान तथा महत्त्व है।

मानव-व्यवहार तथा अनुभवों में प्रेरकों की भूमिका
(Role of Motives in the Human Behaviour and Experiences)

आधुनिक मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार व्यक्ति के व्यवहार और उसके जीवन के अनुभवों में प्रेरणा (प्रेरक) की विशिष्ट एवं निर्विवाद भूमिका है। इसका प्रतिपादन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है

(1) व्यवहार-प्रदर्शन एवं प्रेरक – मनुष्य के प्रत्येक व्यवहार के पीछे प्रेरणा का प्रत्यय निहित रहता है। कोई मनुष्य एक विशेष व्यवहार क्यों प्रदर्शित करता है-यह विषय प्रारम्भ से ही जिज्ञासा, चिन्तन तथा विवाद का रहा है उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति अपना क्या जीवन लक्ष्य निर्धारित करता है। वह अन्य व्यक्ति या वस्तुओं में रुचि क्यों लेता है, वह किन वस्तुओं का संग्रह करना पसन्द करता है और क्यों, वह उपलब्धि के लिए क्यों प्रयासशील रहता है, उसकी आकांक्षा का स्तर क्या है, उसकी विशिष्ट आदतें क्या हैं और ये किस भाँति निर्मित हुईं?–ये सभी प्रश्न ‘मनोवैज्ञानिकों के लिए महत्त्वपूर्ण रहे हैं, जिनका अध्ययन प्रेरणा के अन्तर्गत किया जाता है।

(2) उपकल्पनात्मक-प्रक्रिया –  प्रेरणा एक उपकल्पनात्मक प्रक्रिया (Hypothetical Process) है, जिसका सीधा सम्बन्ध व्यवहारे के निर्धारण से होता है। प्रेरक व्यवहार का मूल स्रोत है। और मानव के व्यवहार की नियन्त्रण अनेक प्रकार के प्रेरक करते हैं। जैविक (या जन्मजात) प्रेरक प्राणी में जन्म से ही पाये जाते हैं। ये जीवन के आधार हैं और इनके अभाव में प्राणी जीवित नहीं रह सकता। इन प्रेरकों में भूख, प्यास, नींद, मल-मूत्र त्याग, क्रोध, प्रेम तथा काम आदि प्रमुख हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण में रहने से उसमें अर्जित प्रेरक पैदा होते हैं। व्यक्ति का जीवन-लक्ष्य, आकांक्षा का स्तर, रुचि, आदत तथा मनोवृत्तियाँ आदि व्यक्तिगत प्रेरणाएँ हैं जो व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से सीखी जाती हैं। सामुदायिकता, प्रशंसा व निन्दा तथा आत्मगौरव जैसी सामाजिक प्रेरणाएँ व्यक्ति में सामाजिक प्रभाव के कारण निर्धारित होती हैं। इस भाति, प्रेरणा एक उपकल्पनात्मक-प्रक्रिया है और जैविक एवं अर्जित प्रेरक ही व्यक्ति को क्रियाशील बनाकर विशिष्ट व्यवहार करने की प्ररेणा प्रदान करते हैं और इसी कारण मानव के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

(3) लक्ष्य निर्देशित व्यवहार – प्रत्येक प्रकार की प्रेरणा से सम्बन्धित व्यवहार का कोई-न-कोई लक्ष्य या उद्देश्य अवश्य होता है। इसे लक्ष्य या उद्देश्य को पूरा करने के लिए व्यक्ति हर सम्भव प्रयास करता है और उसका प्रयास तब तक जारी रहता है जब तक कि वह लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेता। प्यासी व्यक्ति, पानी की प्राप्ति का लक्ष्य लेकर तब तक भटकता रहता है जब तक वह पानी पीकर प्यास नहीं बुझा लेता। लक्ष्य निर्देशित व्यवहार किसी भी प्रकार को हो सकता है; जैसे-किसी पर आक्रमण करना, किसी वस्तु का संग्रह करना या किसी वस्तु पर अधिकार जमाना और अपना जीवन-लक्ष्य निर्धारिते करना आदि।

(4) श्रेष्ठ कार्य निष्पादन – प्रेरणाएँ मनुष्य के व्यवहार को असाधारण व्यवस्था प्रदान करती हैं। जिसके परिणामस्वरूप वह स्वयं को अधिक ऊर्जा एवं चेतना से परिपूर्ण पाता है। प्रेरित व्यवहार की अवस्था में उत्पन्न जागृति, आन्तरिक तनाव, तत्परती अथवा शक्ति के कारण ही व्यक्ति सामान्य अवस्था से अधिक कार्य कर पाता है। इतना ही नहीं, उसके कार्य का निष्पादन श्रेष्ठ प्रकार का होता है।

(5) महान सफलता या उपलब्धि के लिए प्रयास – प्रेरित व्यवहार के कारण व्यक्ति महान सफलता या उपलब्धि के लिए क्रियाशील हो जाता है। वह व्यवहार के किसी क्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए प्रयास कर सकता है; क्योंकि व्यक्ति उन्हीं कार्यों को अधिकाधिक करते हैं जिनमें वे अपना उत्कृष्ट प्रदर्शन कर पाते हैं, प्रायः देखा जाता है कि सम्बन्धित जीवन-क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धि या सफलता पाने तथा अपने जीवन को अधिक उन्नत बनाने के लिए व्यक्ति अभिप्रेरित हो उठता है। इस भाँति, महान सफलता या उपलब्धि की प्रेरणा मानव-जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।।

(6) सामूहिक जीवन की प्रवृत्ति – व्यक्ति समूह में रहना अधिक पसन्द करता है। समूह में वह निर्भीक रहता है तथा अन्य लोगों के सहयोग से सुखी एवं सुविधापूर्ण जीवन-यापन करता है। समूह में रहते हुए उसे आत्म-अभिव्यक्ति के अवसर मिलते हैं, अनेक आवश्यकताओं तथा इच्छाओं की सन्तुष्टि होती है। मैत्री तथा यौन इच्छाएँ भी समूह में सन्तुष्ट हो पाती हैं। इसके साथ ही व्यक्ति को समाज की परम्पराओं, प्रथाओं तथा आदर्शों के अनुरूप सामाजिक कार्य करने के अवसर प्राप्त होते हैं। किन्तु आधुनिक समय में सामाजिक परिवर्तनों , सामाजिक गतिशीलताओं तथा जटिल अन्त:क्रियाओं के कारण सामूहिक जीवन की प्रवृत्ति में कमी दृष्टिगोचर हो रही है। परिणाम यह है कि विश्व स्तर पर जीवन का आनन्द खोता जा रहा है और मानसिक तनाव बढ़ते जा रहे हैं। सामूहिकता की प्रेरणा व्यक्ति को सुखमय एवं आनन्ददायक जीवन-यापन के लिए उत्साहित करती है।

(7) तर्क-निर्णय एवं संकल्प – प्रायः व्यक्ति के जीवन में ऐसी स्थितियाँ आती हैं कि जब वह कोई उचित निर्णय नहीं ले पाता और मानसिक तनाव व संघर्ष के कारण व्याकुलता अनुभव करती है। ऐसी दशा में उपस्थित विकल्पों पर तर्क-वितर्क या विचरण करके तथा अभिप्रेरणाओं के गुण-दोषों पर विचार करके निर्णय की प्रक्रिया शुरु होती है। व्यक्ति कई विकल्पों में से सबसे ज्यादा उचित विकल्प के चुनाव का निर्णय लेता है और प्रेरण को कार्यान्वित करता है। यदि व्यक्ति अपने निर्णय को तत्काल कार्यान्वित नहीं कर पाता तो ऐसी अवस्था में उसे संकल्प की आवश्यकता पड़ती है। उदाहरणार्थ– पढ़ाई करने तथा नौकरी करने के बीच उत्पन्न मानसिक संघर्ष में तर्क-वितर्क के बाद एक युवक पढ़ाई करने का निर्णय लेता है और कष्ट उठाकर भी इस संकल्प को पूरा करता है। इस तरह से तर्क, निर्णय एवं संकल्प की प्रेरणाएँ व्यक्ति को मानसिक संघर्ष से निकालकर उपयुक्त निर्णय को क्रियान्वित करने हेतु संकल्पवान बनाती हैं।

निष्कर्षत: प्रेरक मानव-जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और उनका व्यवहार एवं अनुभवों में विशिष्ट स्थान है।

प्रश्न 4.
सीखने एवं शिक्षा के क्षेत्र में प्रेरणा के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सीखने में प्रेरणा का महत्त्व
(Importance of Motivation in Learning)

शिक्षा के क्षेत्र में और बालकों के सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में प्रेरणा निम्न प्रकार से उपयोगी सिद्ध होती है –

(1) लक्ष्यों की स्पष्टता – प्रेरणाओं के लक्ष्य एवं आदर्श स्पष्ट होने चाहिए। लक्ष्यों की स्पष्टता से प्रेरणाओं की तीव्रता में वृद्धि होती है जिसके परिणामस्वरूप प्रेरित विद्यार्थी जल्दी सीख लेता है। यदि समय-समय पर विद्यार्थियों को लक्ष्य प्राप्ति हेतु उनके प्रयासों की प्रगति बतायी जाये तो वे उत्साहित होकर शीघ्र और अधिक सीखते हैं।

(2) सोद्देश्य शिक्षा – प्राप्त की जाने वाली वस्तु जितनी अधिक आवश्यक होगी, उसे प्राप्त करने की प्रेरणा भी उतनी ही अधिक होगी। प्रेरक शिक्षा को विद्यार्थी की आवश्यकताओं से जोड़ देते हैं। जिससे शिक्षा सोद्देश्य बन जाती है और बालक सीखने के लिए प्रेरित एवं तत्पर हो जाते हैं।

(3) सीखने की रुचि उत्पन्न होना – पर्याप्त रुचि के अभाव में कोई भी क्रिया या व्यवहार फलदायक नहीं हो सकता। प्रेरणा से बालकों में रुचि पैदा होती है जिससे उनका ध्यान पाठ्य-सामग्री की ओर आकृष्ट होता है तथा वे रुचिपूर्वक अध्ययन में जुट जाते हैं।

(4) कार्यों के परिणाम का प्रभाव – आनन्ददायक एवं सन्तोषजनक परिणाम वाले कार्यों में बच्चे अधिक रुचि लेते हैं और उन्हें उत्साहपूर्वक करते हैं। विद्यार्थियों को प्रेरित करने की दृष्टि से उन्हीं कार्यों को करवाना श्रेयस्कर समझा जाता है जिन कार्यों के परिणाम सकारात्मक रूप से प्रभावकारी हों।

(5) ग्रहणशीलता – प्रेरणाओं के माध्यम से, बालक द्वारा वांछित व्यवहार ग्रहण करने तथा अवांछित व्यवहार छोड़ने के लिए, उसे प्रेरित किया जा सकता है। इस भाँति उचित ज्ञान को ग्रहण करने की दृष्टि से प्रेरणा अत्यधिक लाभकारी है।

(6) आचरण पर प्रभाव – प्रेरणाओं के माध्यम से बालक को अपने व्यवहार परिवर्तन में सहायता मिलती है तथा वह स्वयं को आदर्श रूप में ढालने का प्रयास करता है। वस्तुतः निन्दा, पुरस्कार तथा दण्ड आदि आचरण पर गहरा प्रभाव रखते हैं और इनके माध्यम से नैतिकता व सच्चरित्रता का विकास सम्भव है।।

(7) व्यक्तिगत एवं सामूहिक कार्य-प्रेरणा – किसी कार्य में दूसरे बालक से आगे बढ़ने की भावना व्यक्तिगत कार्य-प्रेरणा को उत्पन्न करती है। इसी भाँति एक वर्ग या समूह द्वारा दूसरे वर्ग से आगे निकलने का प्रयास सामूहिक कार्य-प्रेरणा को जन्म देता है। व्यक्तिगत कार्य-प्रेरणाएँ ही सामूहिक कार्य-प्रेरणाओं की जननी हैं। विद्यार्थियों की व्यक्तिगत प्रगति अन्ततोगत्वा सामूहिक प्रगति का प्रतीक मानी जाती है।

(8) शिक्षण विधियों की सफलता – प्रेरक से सम्बन्धित करके शिक्षण की विधियों तथा प्रविधियों में वांछित परिवर्तन लाये जाते हैं। प्रेरणाओं पर आधारित विधियाँ प्रभावशाली एवं सफल शिक्षण को जन्म देती हैं।

(9) खेल के माध्यम से सीखना – शिक्षा में खेलकूद का महत्त्वपूर्ण स्थान है। खेल प्रत्यक्ष प्रेरणा के गुणों से युक्त होते हैं; अतः इन्हें अध्ययन कार्य का साधन बनाना सरल है। इनके द्वारा गम्भीरतम विषयों की शिक्षा भी सहज ही प्रदान की जा सकती है।

(10) अनुशासन – आत्मानुशासन श्रेष्ठ अनुशासन माना जाता है और यह प्रेरणाओं पर आधारित है। प्रेरणा का प्रयोग विद्यालय में अनुशासन स्थापित करने में किया जाता है।

प्रश्न 5.
प्रेरकों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए तथा मुख्य जन्मजात प्रेरकों का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
जन्मजात अथवा जैविक प्रेरकों से आप क्या समझते हैं? मुख्य जन्मजात प्रेरकों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर :

प्रेरक का अर्थ
(Meaning of Motive)

मैक कॉक (Mc Couch) ने ‘प्रेरक का इस प्रकार वर्णन किया है, “व्यक्ति की वह दशा जो उसे किसी दिये हुए लक्ष्य की ओर अभ्यास करने का संकेत देती है और जो उसकी क्रियाओं की पर्याप्तता और लक्ष्य की प्राप्ति पर प्रकाश डालती है, प्रेरक कहलाती है। मनोवैज्ञानिकों ने प्रेरक के अनेक वर्गीकरण प्रस्तुत किये हैं; यथा-शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक, आन्तरिक एवं बाह्य तथा वैयक्तिक एवं सामाजिक आदि। इस सन्दर्भ में प्रेरक को अनेक शब्दों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है-आवश्यकता (Need), प्रेरक (Motive), उदीरणा या ईहा (Drive), प्रवृत्तियाँ (Propensities) तथा मूलप्रवृत्तियाँ (Instincts) इत्यादि।

मैस्लो (Maslow) द्वारा प्रेरकों का विभाजन अध्ययन की दृष्टि से सुविधाजनक है। उसने प्रेरक को मुख्य दो भागों में बाँटा है–(i) जन्मजात प्रेरक और (ii) अर्जित प्रेरक।

जन्मजात (जैविक) प्रेरक
(Innate Motives)

जन्मजात या आन्तरिक प्रेरक व्यक्ति में जन्म से ही पाये जाते हैं और इन्हें सीखना (अर्जित करना) नहीं पड़ता है। इसी कारण इन्हें शारीरिक या प्राथमिक प्रेरक भी कहा जाता है। ये प्रेरक व्यक्ति के जीवन का आधार हैं, जिनके पूर्ण न होने से शारीरिक एवं मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। प्रमुख जन्मजात प्रेरकों को संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है –

(1) भूख – भूख एक प्रबल तथा महत्त्वपूर्ण जन्मजात प्रेरक है। निश्चय ही, भूख (Hunger) जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं में से एक है जिसकी सन्तुष्टि से शरीर का विकास एवं पोषण होता है और काम करने की शक्ति प्राप्त होती है। भोजन की कमी (अर्थात् भूख) के कारण वेदना उत्पन्न होने लगती है और शरीर में बेचैनी बढ़ जाती है। ‘भूख-वेदना’ आमाशय एवं आँत की सिकुड़न से सम्बन्धित है तथा यह रक्त की रासायनिक दशा पर निर्भर है। भूख से प्रेरित होकर व्यक्ति विभिन्न प्रकार के सामान्य तथा असामान्य व्यवहार प्रदर्शित करता है। भूख महसूस करने पर व्यक्ति भोजन खोजने का प्रयास करता है। भोजन प्राप्त होनेपर भूख का यह प्रेरक कुछ समय के लिए सन्तुष्ट हो जाता है, किन्तु पुनः एक निश्चित समय पर प्रकट हो जाता है।

(2) प्यास – भूख के समान ही जन्मजात प्रेरकों में प्यास का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्यास एक शारीरिक आवश्यकता है जो व्यक्ति को क्रिया करने की प्रेरणा प्रदान करती है। जैसे-जैसे शरीर में जल की मात्रा कम होने लगती है, वैसे-वैसे शरीर में कष्टकारी प्रतिक्रियाएँ होने लगती हैं, शरीर का सन्तुलन बिगड़ जाता है और प्राणी क्रियाशील हो उठता है। इस दशा में मुंह और गला सूख जाता है। प्यास का यह आवश्यक प्रेरक व्यक्ति को पानी खोजने के लिए मजबूर करता है।

(3) काम – काम सम्बन्धी जन्मजात प्रेरक सन्तानोत्पत्ति का मूल आधार है और जीवन में विशेष महत्त्व रखता है। ‘काम’ के महत्त्व को शोपेन हावर ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “यह प्रवृत्ति युद्ध का कारण, शान्ति का लक्ष्य, गम्भीरता का आधार, न्यायोचितता का लक्ष्य, हँसी पैदा करने वाली बातों का स्रोत एवं समस्त रहस्यमय संकेतों का आधार है।” विरोधी लिंग के प्रति आकर्षित होने की इच्छा काम-वासना या कामेच्छा कहलाती है। काम का प्रेरक पशु, पक्षी तथा मनुष्य सहित प्रत्येक प्राणी में पाया जाता है तथा व्यवहार पर गहरा प्रभाव डालता है। काम सम्बन्धी इच्छाओं की तुष्टि आवश्यक है। जिसकी सर्वोच्च सामाजिक स्वीकृति विवाह एवं पारिवारिक जीवन में निहित है। जिन व्यक्तियों की काम-वासना पूरी नहीं हो पाती उनका व्यवहार असामान्य रूप धारण कर लेता है।

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सिगमण्डै फ्रायड ने ‘काम’ की मूलप्रवृत्ति को ही सम्पूर्ण मानव घ्यवहार एवं क्रियाओं को उद्गम स्वीकार किया है।

(4) नींद – नींद का प्रेरक भी एक महत्त्वपूर्ण प्रेरक है। यह प्रेरक थकान तथा उद्दीपनों के अभाव की स्वाभाविक प्रतिक्रिया समझा जाता है। मनुष्य दैनिक जीवन में विभिन्न कार्य करते हैं। इन कार्यों को करने में शारीरिक कोषों की क्षति होती है तथा शरीर में कुछ रासायनिक परिवर्तन घटित होते हैं। मनुष्य की मांसपेशियाँ अशक्त हो जाती हैं जिससे थकान का अनुभव होता है। थकान की अवस्था में व्यक्ति विश्राम करने की आवश्यकता का अनुभव करता है। आवश्यकतानुसार विश्राम कर लेने के पश्चात् नींद का यह प्रेरक समाप्त हो जाता है।

(5) प्रेम – प्रेम का प्रेरके मनुष्य में जन्म से ही पाया जाता है। यह प्रत्येक व्यक्ति की मानसिक आवश्यकता है। प्रेम की आवश्यकता अनुभव होने पर व्यक्ति के शरीर और मन में एक प्रकार का तनाव उत्पन्न होता है। यह तनाव प्रेम-प्रदर्शन या प्रेम-प्राप्ति के उपरान्त ही शान्त हो पाता है।

(6) क्रोध – क्रोध प्रत्येक व्यक्ति में जन्मे से विद्यमान रहती है। किसी व्यक्ति की इच्छाओं अथवा कार्यों की पूर्ति न होने की अवस्था में व्यक्ति बाधक वस्तु के प्रति अपनी क्रोध व्यक्त करता है। क्रोध की अवस्था में प्राणी का व्यवहार असामान्य हो जाता है तथा उसका स्वयं पर नियन्त्रण नहीं रहता। क्रोध का प्रेरक मार्ग की बाधाओं को हटाने के लिए बाध्य करता है। बाधा हट जाने पर क्रोध शान्त हो जाता है और व्यक्ति का व्यवहार भी सामान्य हो जाता है।

(7) मल-मूत्र त्याग – शरीर की आन्तरिक प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप शरीर में कुछ हानिकारक पदार्थ बनते हैं जिनका शरीर से बाहर होना अत्यन्त आवश्यक है। इस शारीरिक आवश्यकता को तत्काल पूरा करना अनिवार्य है अन्यथा शरीर में एक अजीब-सा तनाव उत्पन्न हो जाता है। शरीर से मल-मूत्र, श्वास तथा पसीने आदि को बाहर निकालने की व्यवस्था हमारे शरीर में है। मल-मूत्र आदि का त्याग करने पर तनाव की दशा स्वत: ही समाप्त हो जाती है।

(8) युयुत्सा – युयुत्सा एक जन्मजात प्रेरक है। इससे संघर्ष करने की प्रेरणा मिलती है। जब व्यक्ति अपने लक्ष्य के मार्ग में कोई बाधा पाता है तो वह उस बाधक वस्तु को हटाना चाहता है या उस पर विजय प्राप्त करना चाहता है। बाधा हटने तक उसमें शरीर सम्बन्धी, आन्तरिक या संवेगात्मक

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 3 Motivational Bases of Behaviour 1

असन्तुलन बना रहता है। उत्पन्न असन्तुलन को सन्तुलित अवस्था में लाने का प्रयास जिस व्यवहार के ” माध्यम से किया जाता है, वह युयुत्सा नामक प्रेरक के कारण है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि मानव-व्यवहार में जैविक प्रेरकों का महत्त्वपूर्ण स्थान है |

प्रश्न 6.
अर्जित प्रेरकों से क्या आशय है? मुख्य अर्जित प्रेरकों को सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
अर्जित प्रेरक किन्हें कहते हैं? मुख्य व्यक्तिगत अर्जित प्रेरकों तथा सामाजिक अर्जित प्रेरकों को सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
अजित प्रेरक
(Acquired Motives)

जन्मजात प्रेरकों के अलावा व्यक्ति में उसके समाज तथा पर्यावरण के प्रभाव से भी बहुत से प्रेरक विकसित होते हैं। इस प्रकार के प्रेरकों को जो समाज में रहकर अर्जित किये जाते हैं, अर्जित या सामाजिक प्रेरक कहकर पुकारा जाता है। इन प्रेरकों में मनुष्य के व्यवहार के वे चालक सम्मिलित हैं। जिन्हें वह शिक्षा या वातावरण के सम्पर्क से अपने जीवनकाल में आवश्यकतानुसार अर्जित करता है। अर्जित प्रेरकों का एक नाम गौण आवश्यकताएँ भी है, क्योकि इन्हें व्यक्ति सामाजिक समायोजन के लिए प्राप्त करता है; ये सार्वभौमिक (Universal) नहीं होते। अर्जित प्रेरक मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं – (अ) व्यक्तिगत अर्जित प्रेरक तथा (ब) सामाजिक अर्जित प्रेरक। अब हम इनका अलग-अलग संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करेंगे –

(अ) व्यक्तिगत अर्जित प्रेरक

एन० एल० मस ने व्यक्तिगत अर्जित प्रेरकों को इस प्रकार समझाया है, “व्यक्तिगत प्रेरक वे प्रेरक हैं जो किसी विशेध संस्कृति में स्वयं प्रधान नहीं होते अपितु वे शारीरिक तथा सामान्य सामाजिक प्रेरकों से सम्बन्धित होते हैं। इनके विभिन्न प्रकारों का वर्णन निम्नलिखित है –

(1) जीवन लक्ष्य – हर व्यक्ति अपना एक जीवन-लक्ष्य निर्धारित करता है जो उसकी भावनाओं, विचारों, इच्छाओं, योग्यताओं, क्षमताओं तथा प्रेरणाओं पर आधारित होता है। लक्ष्य-निर्धारण के पश्चात् व्यक्ति उसे प्राप्त करने हेतु चेष्टाएँ करता है। व्यक्ति के जीवन की क्रियाएँ तथा व्यवहार इन्हीं जीवन-लक्ष्यों के अनुरूप होते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति का जीवन-लक्ष्य डॉक्टर बनना है तो वह ऐसी क्रियाएँ करेगा जो उसे डॉक्टर बनने में सहायता दे सकें।

(2) आकांक्षा-स्तर – प्रत्येक व्यक्ति के मन में स्वयं को जीवन के किसी अभीष्ट स्तर तक पहुँचाने की इच्छा होती है, यही आकांक्षा का स्तर (Level of Aspiration) कहलाता है। प्रत्येक व्यक्ति की आकांक्षा का स्तर भिन्न-भिन्न होता है। स्पष्ट रूप से यह आकांक्षा का स्तर व्यक्ति के लिए प्रेरक का कार्य करता है। जीवन में प्रगति करने के लिए अथवा महान् कार्य करने के लिए आकांक्षा-स्तर से अत्यधिक प्रेरणा प्राप्त होती है। उदाहरणार्थ–12वीं की बोर्ड परीक्षा में प्रथम स्थान पाने की आकांक्षा वाला मेधावी विद्यार्थी अपने समस्त प्रयास उस ओर लगा देगा।

(3) मद-व्यसन – मद-व्यसन एक प्रबल अर्जित प्रेरक है। बहुत से व्यक्तियों में नशे के सेवन की प्रवृत्ति इतनी बढ़ जाती है कि वे उस विशेष नशे के बिना नहीं रह पाते। यह नशा उनके लिए एक अत्यधिक प्रबल प्रेरक का कार्य करता है, जिसके अभाव में उनका शारीरिक सन्तुलन समाप्त हो जाता है तथा वे अशान्ति एवं तनाव अनुभव करने लगते हैं। उदाहरण के लिए—बीड़ी सिगरेट, तम्बाकू, भाँग, चरस, गाँजा, अफीम, शराब और यहाँ तक कि चाय व कॉफी पीने की आदत डालना मद-व्यसन के अन्तर्गत आते हैं।

(4) आदत की विवशता – यदि किसी कार्य को नियमित रूप से बार-बार दोहराया जाए तो वे आदत बन जाते हैं। ये आदतें स्वचालित (Automatic) हो जाती हैं और एक विशिष्ट उत्तेजक आदत की प्रक्रिया को चालित कर देती हैं। उदाहरण के लिए-माना कोई व्यक्ति सुबह 4.30 बजे जागकर चाय पीता है तो इस क्रिया को बार-बार लगातार करने पर यह उसकी आदत बन जाएगी। आदत बन जाने के उपरान्त व्यक्ति उसी के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य हो जाता है।

(5) रुचि – रुचि अधिक अच्छी लगने की एक प्रवृत्ति है और प्रबल प्रेरक का कार्य करती है। व्यक्ति अपने चारों ओर के वातावरण में विविध प्रकार की वस्तुएँ पाता है, किन्तु सम्पर्क में रहकर वह किन्हीं विशेष वस्तुओं को अधिक पसन्द करने लगता है और उन्हें पाकर प्रसन्नता का अनुभव करता है। व्यक्ति की यह पसन्दगी या रुचि उन वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है। प्रत्येक व्यक्ति की रुचि भिन्न हो सकती है जिसमें आयु के अनुसार परिवर्तन होता रहता है। उदाहरणार्थ-एक बच्चा अखबार पाकर ‘बाल-स्तम्भ’ के अन्तर्गत कहानियाँ-कविताएँ आदि पढ़ने में रुचि दिखाता है, जबकि एक प्रौढ़ व्यक्ति देश-विदेश के समाचारों, लेखों या सम्पादकीय पढ़ने में रुचि प्रदर्शित करता है। स्पष्ट है कि रुचि के वशीभूत होकर व्यक्ति सम्बन्धित कार्य करने को बाध्य हो जाता। है। इस रूप को एक व्यक्तिगत अर्जित प्रेरक के रूप में माना जाता है।

(6) अचेतन मन – व्यक्ति के व्यवहार को संचालित करने वाले कारकों में अचेतन मन की प्रेरणा भी विशिष्ट स्थान रखती है। व्यक्ति की अनेक कामनाएँ या इच्छाएँ, जिनकी सन्तुष्टि नहीं हो पाती है, अचेतन मन में दब जाती हैं; किन्तु दबकर भी नष्ट नहीं होतीं, अपितु वहीं से अपनी सन्तुष्टि का प्रयास करती हैं। मन के अचेतन स्तर में बैठी हुई बातें व्यक्ति के व्यवहार को अत्यधिक प्रेरित करती हैं। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति को नदी में प्रवेश करने से बहुत डर लगता है। पूर्व का इतिहास जानने पर पता लगा है कि वह बचपन में नदी में डूबने से बचा था और नदी से वही डर उसके मन की गहराई में जाकर बैठ गया।

(7) मनोवृत्तियाँ – मनोवृत्ति (Attitude) एक आन्तरिक अवस्था है जो व्यक्ति को किसी कार्य को करने या छोड़ने के लिए प्रेरित करती है। यह रुचि से भिन्न प्रेरक है। रुचि में हम अपनी पसन्द के कार्यों में संलग्म हो जाते हैं, जबकि मनोवृत्ति हमारे भीतर पसन्द की वस्तुओं की ओर आकर्षण तथा नापसन्द की वस्तुओं की ओर विकर्षण उत्पन्न कर देती है। उदाहरणार्थ-यदि किसी व्यक्ति को शास्त्रीय गायन पसन्द है तो वह उस ओर आकर्षित होकर गायन सुनेगा, अन्यथा नहीं।

(8) संवेग – संवेगों को कार्य का प्रेरक माना जाता है। भय, क्रोध, प्रेम, दया, वात्सल्य, घृणा तथा करुणा आदि संवेग के उदाहरण हैं जिनके प्रभाव में व्यक्ति ऐसा व्यवहार प्रदर्शित कर सकता है। जिसकी वह सामान्यावस्था में कल्पना भी नहीं कर सकता। उदाहरणार्थ- आत्म-सम्मान पर चोट लगने से क्रुद्ध व्यक्ति अपने प्रियजन पर भी आघात कर सकता है।

(ब) सामाजिक अर्जित प्रेरक

अर्जित प्रेरकों के एक प्रकार को सामाजिक अर्जित प्रेरक कहते हैं। एक समाज के अधिकांश सदस्यों में ये प्रेरक लगभग समान रूप में पाये जाते हैं, परन्तु ये प्रेरके जन्मजात नहीं होते बल्कि समाज के सम्पर्क एवं प्रभाव के परिणामस्वरूप विकसित होते हैं। मुख्य सामाजिक अर्जित प्रेरकों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है.

(1) सामुदायिकता – सामुदायिकता प्रत्येक सामाजिक प्राणी में पाई जाने वाली सार्वभौमिक भावना तथा एक सामाजिक प्रेरक है। यह भावना ही व्यक्ति को सामाजिक कार्यों के लिए प्रेरित करती है और इस भाँति सामाजिक व्यवहार का प्रेरक बनती है। इसी प्रेरणा के कारण व्यक्ति समूह अथवा समुदाय में रहना पसन्द करता है तथा सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करता है। सामुदायिकता के कारण व्यक्ति अनेक कार्य एवं व्यवहार करने को बाध्य होता है।

(2) आत्म-गौरव या आत्म-स्थापन – समाज के सम्पर्क एवं अन्य व्यक्तियों के मध्य रहते हुए व्यक्ति में आदर पाने की भावना विकसित होती है। हर एक व्यक्ति अन्य लोगों की तुलना में अधिक अच्छा, अधिक सफल, उन्नत एवं प्रगतिशील रहना चाहता है। वह अपने लक्ष्य के मार्ग की बाधाओं को जीतकर गौरवान्वित होता है, यही आत्म-गौरव की प्रवृत्ति,है। समाज में कार्य करने वाली यह भावना व्यक्ति को ऐसे अनेक कार्यों की प्रेरणा प्रदान करती है जो उसे समाज में सम्मान एवं प्रतिष्ठा दिला सकें। एडलर नामक मनोवैज्ञानिक ने आत्म-स्थापन’ अथवा ‘शक्ति की इच्छा को प्रबल प्रेरक स्वीकार किया है।

(3) प्रशंसा तथा निन्दा – प्रशंसा एवं निन्दा भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं प्रबल प्रेरक हैं। प्रशंसा एवं निन्दा व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार को पर्याप्त रूप में प्रभावित करते हैं। समाज में व्यक्ति के अच्छे कार्यों की प्रशंसा तथा बुरे कार्यों की निन्दा की जाती है। प्रशंसा प्राप्त करने की लालसा से मनुष्य अच्छे कार्यों को बार-बार दोहराने की प्रेरणा पाता है, जबकि वह निन्दनीय कार्यों को दोहराने का प्रयास नहीं करता।

(4) आत्म-समर्पण – आत्म-समर्पण अर्थात् अन्य व्यक्तियों की श्रेष्ठता के सम्मुख स्वयं को हीन बना देने की भावना भी सामाजिक व्यवहार को निर्धारित करने वाला एक मुख्य प्रेरक है। आत्म-समर्पण के प्रेरक हमें ऐसे कार्य करने के लिए बाध्य करते हैं जिनके माध्यम से हम स्वयं को अपने से श्रेष्ठ व्यक्तित्व के सम्मुख अधीन कर देते हैं तथा उनके विचार एवं मत के अनुसार कार्य करते हैं।

(5) आक्रामक-प्रवृत्ति – आक्रामक-प्रवृत्ति सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर करने वाली एक अर्जित प्रवृत्ति है। यह शारीरिक आवश्यकताओं या कुण्ठाओं की सन्तुष्टि के अवरोध में पैदा होती है। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से ज्ञात होता है कि मानव न तो आक्रामक प्रवृत्ति का है और न ही शान्त प्रवृत्ति का। जब तक उसकी शारीरिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि में अवरोध उत्पन्न नहीं होता वह शान्त दिखाई पड़ता है, किन्तु अवरोध उत्पन्न होते ही वह आक्रामक स्वरूप धारण कर लेता है। उदाहरणार्थ-न्यूगिनी के ‘अरापेश’ जाति के लोग तथा हिमालय की अनेक पहाड़ी जातियाँ एकदम शान्तिप्रिय हैं, जबकि ‘मुण्डुगुमार’ जाति के लोगों को बाल्यावस्था से ही युद्ध प्रिय बनाया जाता है। व्यक्ति के अनेक व्यवहार उसकी आक्रामक प्रवृत्ति के वशीभूत होकर भी सम्पन्न होते हैं। इस रूप में आक्रामक प्रवृत्ति भी एक सामाजिक अर्जित प्रेरक है।

(6) आत्म-प्रकाशन – समाज के प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा होती है कि उसका रहन-सहन दूसरे व्यक्तियों से अच्छा हो और वह अन्य व्यक्तियों से अच्छा व्यक्त करे। जब कभी इसमें रुकावट पैदा होती है। तो वह क्रोधित हो जाता है और झुंझला उठता है। मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि आत्म-प्रकाशन की इच्छा-प्रभुत्व, नेतृत्व आत्म-प्रदर्शन एवं प्रतिष्ठा की भावना आदि में निहित होती है।

(7) अर्जनात्मकता – अर्जनात्मकता अर्थात् किसी वस्तु या वस्तुओं को संचित करने की प्रवृत्ति को भी एक सामाजिक अर्जित प्रेरक माना गया है। वास्तव में व्यक्ति में यदि किसी वस्तु को संचित या एकत्र करने की प्रवृत्ति प्रबल हो जाती है, तो वह उसके लिए अधिक प्रयत्नशील हो जाता है। ज्यों-ज्यों वह सम्बन्धित वस्तुओं को संचित करता जाता है, त्यों-त्यों उसे विशेष सन्तोष की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत यदि व्यक्ति अभीष्ट वस्तु को संचित नहीं कर पाता तो वह परेशान हो उठता है तथा अधिक तत्परता से विभिन्न प्रयास करता है। इस रूप में अर्जनात्मकता को प्रबल सामाजिक अर्जित प्रेरक माना गया है। सामान्य रूप से धन सम्बन्धी अर्जनात्मकता प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रशन 1.
व्यक्ति के व्यवहार सम्बन्धी उन विशेषताओं का उल्लेख कीजिए जो किसी प्रबल प्रेरणा की दशा में देखी जा सकती है।
उत्तर :
किसी भी प्रबल प्रेरणा की दशा में व्यक्ति का व्यवहार सामान्य से भिन्न हो जाता है। इस दशा में व्यक्ति के व्यवहार में सामान्य से काफी अधिक सक्रियता तथा गतिशीलता आ जाती है। व्यवहार सम्बन्धी इस परिवर्तन का कारण प्रेरणा की दशा में होने वाला शक्ति का अतिरिक्त संचालन होता है। वास्तव में, प्रबल प्रेरणा की दशा में कुछ शारीरिक एवं रासायनिक परिवर्तन होते हैं, जिनके कारण शरीर में शक्ति का अतिरिक्त संचालन होने लगता है। प्रबल प्रेरणा की दशा में व्यक्ति के व्यवहार में निरन्तरता तथा परिवर्तनशीलता के लक्षण भी दिखाई देने लगते हैं।

प्रबल प्रेरणा की दशा में व्यक्ति सम्बन्धित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उस समय तक लगातार प्रयास करता रहता है, जब तक निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती। इस प्रक्रिया में व्यक्ति अपने प्रयासों को प्राय: बदलता भी रहता है।’प्रबल-प्रेरणा की दशा में व्यक्ति के व्यवहार की एक अन्य विशेषता व्यवहार में बेचैनी भी है। प्रबल प्रेरणा से ग्रस्त व्यक्ति अपने लक्ष्य को जब तक प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक एक विशेष प्रकार की बेचैनी अनुभव करता रहता है। व्यवहार की यह बेचैनी लक्ष्य को प्राप्त कर लेने पर अपने आप ही समाप्त हो जाती है।

प्रशन 2.
मानवीय प्रेरकों का एक सामान्य वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
व्यक्ति के जीवन में प्रेरकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। व्यक्ति के व्यवहार के परिचालन में अनेक प्रेरकों का योगदान होता है। भिन्न-भिन्न मनोवैज्ञानिकों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रेरकों के भिन्न-भिन्न वर्गीकरण प्रस्तुत किये हैं। कुछ विद्वानों ने समस्त प्रेरकों को शारीरिक प्रेरक तथा मनोवैज्ञानिक प्रेरकों में बाँटा है, कुछ विद्वान् आन्तरिक प्रेरक तथा बाह्य प्रेरक-दो वर्ग निर्धारित करते हैं। इन वर्गीकरणों के अतिरिक्त एक अन्य वर्गीकरण भी प्रस्तुत किया गया है जो अधिक लोकप्रिय है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत समस्त प्रेरकों को दो वर्गों में बाँटा गया है। ये वर्ग हैं-जन्मजात प्रेरक तथा अर्जित प्रेरक। जन्मजात प्रेरकों को ही आन्तरिक प्रेरक भी माना जाता है। ये प्रेरक सभी मनुष्यों में जन्म से ही समान रूप में पाये जाते हैं, इन्हें सीखना नहीं पड़ता।

मुख्य जन्मजात प्रेरक हैं-भूख, प्यास, काम, नींद, प्रेम, क्रोध, मल-मूत्र त्याग तथा युयुत्सा। इनसे भिन्न, अर्जित प्रेरक उन प्रेरकों को कहा जाता है जिन्हें व्यक्ति द्वारा अपने जीवन में क्रमशः सीखा जाता है। अर्जित प्रेरकों को भी दो वर्गों में बाँटा गया है-व्यक्तिगत अर्जित प्रेरक तथा सामाजिक अर्जित प्रेरका व्यक्तिगत अर्जित प्रेरकों का स्वरूप भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न हो सकता है। मुख्य व्यक्तिगत अर्जित प्रेरक हैं-जीवन-लक्ष्य, आकांक्षा-स्तर, मद-व्यसन, आदत की विवशता, रुचि, अचेतन मन, मनोवृत्तियाँ तथा संवेग। सामाजिक अर्जित प्रेरक समाज के प्रभाव से उत्पन्न होते हैं तथा एक समाज के सदस्यों में इन अर्जित प्रेरकों में काफी समानता होती है। मुख्य सामाजिक अर्जित प्रेरक हैं—सामुदायिकता, आत्म-गौरव या आत्म-स्थापन, प्रशंसा तथा निन्दा, आत्म-समर्पण, आक्रामक प्रवृत्ति, आत्म-प्रकाशन तथा अर्जनात्मकता।

प्रश्न 3.
जन्मजात तथा अजित प्रेरकों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
जन्मजात तथा अर्जित प्रेरकों में निम्नलिखित अन्तर होते हैं –
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 3 Motivational Bases of Behaviour 2
प्रश्न 4.
प्रेरकों की प्रबलता के मापन की मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
प्रेरकों की प्रबलता के मापन के लिए सामान्य रूप से अग्रलिखित तीन विधियों को अपनाया जाता है –

(1) अवरोध विधि – प्रेरकों की प्रबलता-मापन की एक मुख्य विधि अवरोध विधि (Obstruction Method) है। इस विधि की सैद्धान्तिक मान्यता यह है कि यदि प्रेरक प्रबल है तो सम्बन्धित लक्ष्य की प्राप्ति के मार्ग में आने वाले अपेक्षाकृत बड़े अवरोधों को भी व्यक्ति या प्राणी पार कर जाता है। इस विधि के अन्तर्गत प्रेरकों की प्रबलता की माप तुलनात्मक आधार पर की जा सकती है। भिन्न-भिन्न प्रबलता वाले प्रेरकों की दशा में एकसमान अवरोध उपस्थित करके प्राप्त परिणामों के आधार पर उनकी प्रबलता की माप की जा सकती है।

(2) शिक्षण विधि – शिक्षण विधि द्वारा भी प्रेरकों की प्रबलता की माप की जाती है। इस विधि की सैद्धान्तिक मान्यता यह है कि किसी विषय को सीखने की गति विद्यमान प्रेरक की प्रबलता के अनुपात में होती है अर्थात् यदि प्रबल प्रेरक विद्यमान हो तो शिक्षण की दर अधिक होती है तथा दुर्बल प्रेरक की दशा में शिक्षण की दर कम होती है। प्रेरक के नितान्त अभाव में शिक्षण की प्रक्रिया चल ही नहीं पाती।

(3) चुनाव विधि-प्रेरकों की प्रबलता के मापन के लिए अपनायी जाने वाली एक विधि चुनाव विधि’ भी है। इस विधि में प्रेरकों की प्रबलता का मापन तुलनात्मक रूप में ही किया जाता है। चुनाव विधि द्वारा प्रेरकों की प्रबलता को जानने के लिए व्यक्ति के सम्मुख एक ही समय में दो या दो से अधिक प्रेरक उपस्थित किये जाते हैं, तब देखा जाता है कि व्यक्ति पहले किस प्रेरक से प्रेरित होकर सम्बद्ध व्यवहार करता है।

प्रश्न 5.
नवजात शिशु के जीवन में पाये जाने वाले मुख्य प्रेरकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
नवजात शिशु के व्यवहार को परिचालित करने वाले मुख्य प्रेरकों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है –

(1) भूख – भूख प्रत्येक प्राणी के जीवन की आधारभूत आवश्यकता है। जन्म के उपरान्त मानव-शिशु भी भूख की आवश्यकता के कारण स्वाभाविक क्रियाएँ व व्यवहार प्रकट करता है। वस्तुतः भूख लगने पर रक्त के रासायनिक अंशों में परिवर्तन के कारण वेदना उत्पन्न होती है तथा शरीर में व्याकुलता बढ़ती है। नवजात शिशु इस ‘भूख-वेदना’ को अभिव्यक्ति देने के लिए हाथ-पैर हिलाता है या रोता-चिल्लाता है। माँ, बच्चे के इस व्यवहार को पहचानने में सक्षम होती है और उसकी आवश्यकता सन्तुष्ट करने की चेष्टा करती है। आवश्यकता-पूर्ति के बाद भूखे का प्रेरक शान्त हो जाता है।

(2) प्यास – भूखं की तरह ही प्यास भी एक शारीरिक आवश्यकता है। प्यास का प्रेरक शरीर में जल की कमी के कारण है। प्यास के कारण प्राणी का शारीरिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। मानव-शिशु को भी प्यास लगती है जिसके कारण वह व्याकुल होकर शरीर को हिलाता-डुलाता है या रोकर अपनी ओर ध्यान आकृष्ट करता है। पानी की पूर्ति के बाद पानी के शरीर की विभिन्न नलिकाओं में पहुँचने से शिशु की प्यास का प्रेरक सन्तुष्ट हो जाता है।

(3) नींद – नींद का प्रेरक शिशु के जन्म से ही उससे सम्बन्ध रखता है। यह भी शिशु की एक बहुत बड़ी शारीरिक आवश्यकता है। अपने जन्म के काफी समय बाद तक शिशु का अधिकतम समय नींद में ही व्यतीत होता है। नींद में विघ्न आने पर शिशु बेचैनी अभिव्यक्त करता है। अतः आवश्यकतानुसार उसे भरपूर नींद के प्रेरक की पूर्ति करनी अनिवार्य है।

(4) मल-मूत्र विसर्जन – जन्म के उपरान्त शिशु समय-समय पर वज्र्य पदार्थ मल-मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकालता है। शरीर की आन्तरिक प्रक्रियाओं के फलस्वरूप शरीर में अनेक हानिकारक एवं वर्त्य पदार्थ निर्मित होते हैं जिनका मल-मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकलना अत्यन्त आवश्यक है। यदि इन पदार्थों को तत्काल विसर्जन न किया जाये तो शिशु के शरीर में एक अजीब-सा तनाव पैदा होगा। वह पीड़ा अनुभव कर रोएगा-चिल्लाएगा। मल-मूत्र विसर्जन के उपरान्त शिशु को तनाव एवं पीड़ा से मुक्ति मिल जाती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जन्मजात प्रेरक क्या हैं?
या
जैविक अभिप्रेरकों को स्पष्ट कीजिए तथा उनके नाम लिखिए।
उत्तर :
प्रेरकों के दो मुख्य प्रकार यावर्ग निर्धारित किये गये हैं, जिन्हें क्रमशः जन्मजात प्रेरक तथा अर्जित प्रेरक कहा गया है। जन्मजात प्रेरकों को आन्तरिक प्रेरक तथा जैविक प्रेरक भी कहा जाता है। जन्मजात या आन्तरिक प्रेरक व्यक्ति में जन्म से ही विद्यमान होते हैं तथा इन्हें सीखना नहीं पड़ता। यही कारण है कि इन्हें प्राथमिक या शारीरिक प्रेरक भी कहा जाता है। ये प्रेरक व्यक्ति के जीवन के आधार हैं। तथा इनके पूर्ण न होने से व्यक्ति का शारीरिक एवं मानसिक सन्तुलन भी बिगड़ जाता है। व्यक्ति के जीवन में जन्मजात प्रेरकों का अत्यधिक महत्त्व है। जीवन के सुचारु परिचालन में इन प्रेरकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। हम यह भी कह सकते हैं कि इन प्रेरकों के अभाव में जीवन का चल पाना प्रायः सम्भव नहीं होता। मुख्य जन्मजात प्रेरक हैं-भूख, प्यास, काम, नींद, तापक्रम, मातृत्व व्यवहार तथा मल-मूत्र त्याग।

प्रश्न 2.
किन्हीं दो जन्मजात प्रेरकों के नाम लिखिए तथा संक्षेप में उनका महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
मुख्य जन्मजात प्रेरक हैं-भूख, प्यास, काम, नींद, मातृत्व व्यवहार तथा मल-मूत्र-त्याग।
(i) भूख नामक जन्मजात प्रेरक का व्यक्ति के लिए सर्वाधिक महत्त्व है। इस प्रेरक से प्रेरित होकर व्यक्ति आहार ग्रहण करता है। आहार ग्रहण करने से शरीर का पोषण होता है, ऊर्जा प्राप्त होती है तथा रोगों से मुकाबला करने की शक्ति प्राप्त होती है।
(ii) नींद नामक प्रेरक का भी व्यक्ति के जीवन में विशेष महत्त्व है। इस प्रेरक से प्रेरित होकर व्यक्ति विश्राम करता है। नींद से व्यक्ति की थकान समाप्त होती है, चुस्ती एवं स्फूर्ति प्राप्त होती है तथा वह तरो-ताजा महसूस करता है। नींद से स्वभाव एवं व्यवहार की झुंझलाहट समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 3.
अर्जित प्रेरक क्या हैं?
या
अर्जित प्रेरकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
प्रेरकों के एक वर्ग को अर्जित प्रेरक (Acquired Motives) के रूप में जाना जाता है। इस प्रकार के प्रेरकों का उदय सामाजिक सम्पर्क के परिणामस्वरूप होता है। सामाजिक सम्पर्क के परिणामस्वरूप विकसित होने के कारण इन्हें सामाजिक प्रेरक भी कहा जाता है। अर्जित प्रेरक व्यक्ति के सामाजिक समायोजन में सहायक होते हैं। अर्जित प्रेरकों को दो वर्गों में बाँटा जाता है (i) व्यक्तिगत अर्जित प्रेरक तथा (ii) सामाजिक अर्जित प्रेरक।

प्रश्न 4.
प्रमुख सामाजिक प्रेरकों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सामाजिक प्रेरक जन्मजात नहीं होते। ये पूर्ण रूप से अर्जित अर्थात् जन्म के उपरान्त सीखे जाने वाले प्रेरक हैं। इनका सम्बन्ध शारीरिक या प्राणात्मक आवश्यकताओं से नहीं होता। सामाजिक प्रेरकों का विकास एवं सक्रियता सामाजिक सम्पर्क के परिणामस्वरूप प्रारम्भ होती है। सामाजिक प्रेरकों में पर्याप्त भिन्नता पायी जाती है। इनका निर्धारण व्यक्ति की सामाजिक परिस्थितियों द्वारा होता है। सामाजिक प्रेरकों पर शिक्षा का भी प्रभाव पड़ता है। मुख्य सामाजिक प्रेरक हैं—सामुदायिकता, आत्म-गौरव या।। आत्म-स्थापन, प्रशंसा एवं निन्दा, आत्म-समर्पण, आक्रामक प्रवृत्ति, आत्म-प्रकाशन तथा अर्जनात्मकता।

प्रश्न 5.
मूल प्रवृत्ति से क्या आशय है?
उत्तर :
प्राणियों के व्यवहार की व्याख्या प्रस्तुत करने के लिए प्रेरकों के साथ-ही-साथ मूल प्रवृत्तियों (Instincts) को भी जानना आवश्यक है। वास्तव में, प्राणियों का स्वभावगत व्यवहार मूल रूप से मूल प्रवृत्तियों द्वारा ही परिचालित होता है। मूल प्रवृत्तियाँ जन्मजात होती हैं तथा प्राणियों के स्वभाव में निहित होती हैं। मूल प्रवृत्तियों का सम्बन्ध संवेगों से होता है। मूल प्रवृत्तियों के अर्थ को मैक्डूगल ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “मूल प्रवृत्ति एक परम्परागत अथवा जन्मजात मनोशारीरिक प्रवृत्ति है, जो उसके अधिकारों के लिए यह निर्धारित करती है कि व्यक्ति किसी एक जाति की वस्तुओं को प्रत्यक्ष करेगा एवं उन पर ध्यान देगा, किसी ऐसी वस्तु के प्रत्यक्ष के उपरान्त एक उद्वेगात्मक तीव्रता का अनुभव करेगा और उसके सम्बन्ध में एक विशेष प्रकार की क्रिया करेगा या कम-से-कम ऐसी क्रिया करने के आवेग का अनुभव करेगा।”

प्रश्न 6.
मूल प्रवृत्तियों की सामान्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
प्राणियों के व्यवहार के एक मुख्य निर्धारक कारक के रूप में मूल प्रवृत्तियों की सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित होती हैं –

  1. समस्त मूल प्रवृत्तियाँ जन्मजात होती हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति अथवा प्राणी के स्वभाव में निहित होती हैं।
  2. प्रायः सभी प्राणियों के अनेक व्यवहार मूल प्रवृत्तियों द्वारा परिचालित होते हैं।
  3. मूल प्रवृत्ति के कारण सम्पन्न होने वाले व्यवहार को सदैव बहुत अधिक समानता की दृष्टि से देखा जा सकता है।
  4. सभी मूल प्रवृत्ति के मुख्य उद्देश्य स्पष्ट तथा सामान्य रूप से निश्चित होते हैं।
  5. प्रत्येक मूल प्रवृत्ति का सम्बन्ध अनिवार्य रूप से किसी-न-किसी संवेग से होता है।
  6. मूल प्रवृत्तियों के तीन मुख्य पक्ष होते हैं – ज्ञानात्मक, संवेगात्मक तथा क्रियात्मक।
  7. मूल प्रवृत्तियाँ अनेक हैं तथा वे व्यक्ति के जीवन-काल में भिन्न-भिन्न स्तरों पर स्वत: प्रकट एवं सक्रिय होती हैं।

प्रश्न 7.
मूल प्रवृत्तियों तथा प्रतिक्षेप क्रियाओं में क्या अन्तर है?
उत्तर :
मूल प्रवृत्तियों तथा प्रतिक्षेप क्रियाओं में कुछ समानताएँ होती हैं; जैसे कि दोनों ही जन्मजात तथा स्वाभाविक होती हैं तथा दोनों को ही सीखने की आवश्यकता नहीं होती, परन्तु इन दोनों प्रकार की क्रियाओं में पर्याप्त अन्तर भी हैं। इन दोनों के अन्तर का विवरण निम्नलिखित है

  1. मूल प्रवृत्ति द्वारा प्रेरित व्यवहार का सम्बन्ध सम्पूर्ण शरीर से होता है, जबकि प्रतिक्षेप क्रिया द्वारा प्रेरित व्यवहार या क्रिया का सम्बन्ध शरीर के किसी एक अंग से ही होता है।
  2. मूल प्रवृत्ति जन्य व्यवहार व्यापक होता है, जबकि प्रतिक्षेप क्रिया के परिणामस्वरूप होने वाला व्यवहार सीमित होता है।
  3. मूल प्रवृत्ति जन्य व्यवहार में यदि व्यक्ति चाहे तो कुछ सीमा तक परिवर्तन कर सकता है, परन्तु प्रतिक्षेप क्रियाओं में व्यक्ति कुछ भी परिवर्तन नहीं कर सकता।
  4. मूल प्रवृत्ति-जन्य व्यवहार के तीन पक्ष अर्थात् ज्ञानात्मक, संवेगात्मक तथा क्रियात्मक पक्ष होते हैं, परन्तु प्रतिक्षेप क्रिया का केवल क्रियात्मक पक्ष ही प्रस्तुत होता है।
  5. मूल प्रवृत्ति-जन्य व्यवहार पर प्रेरणा, रुचि तथा संवेग आदि कारकों को प्रभाव पड़ सकता है, परन्तु प्रतिक्षेप क्रियाओं पर इन कारकों का सामान्य रूप से कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. व्यक्ति के कार्यों के पीछे निहित परिचालक कारकों को …………………. कहते हैं।
  2. कोई भी आन्तरिक उत्तेजक जो प्राणी के व्यवहार या क्रिया को दिशा देकर लक्ष्य से जोड़ता है, …………………. कहलाता है।
  3. आवश्यकता और उदोलन …………………. की प्रक्रिया के मूलभूत सम्प्रत्यय हैं।
  4. प्रेरणा के नितान्त अभाव में व्यक्ति के कार्य ………………….
  5. व्यक्ति की क्रियाओं में अतिरिक्त शक्ति के संचालन का कारण …………………. होती है |
  6. प्रेरणायुक्त व्यवहार में लक्ष्य की प्राप्ति के लिए …………………. पायी जाती है।
  7. प्रबल प्रेरणा के वशीभूत होने वाले कार्य सामान्य से …………………. होते हैं।
  8. व्यक्ति के कुछ प्रेरक जन्मजात होते हैं तथा कुछ जन्म के उपरान्त जीवन में …………………. किये जाते हैं।
  9. भूख एक …………………. प्रेरक है।
  10. जीवन लक्ष्य एक …………………. प्रेरक है।
  11. आकांक्षा-स्तर एक …………………. प्रेरक है।
  12. सामुदायिकता तथा प्रशंसा एवं निन्दा …………………. प्रेरक हैं।
  13. सामाजिक प्रेरकों के विकास के लिए …………………. आवश्यक होता है।
  14. भिन्न-भिन्न सामाजिक परिस्थितियों में …………………. का स्वरूप भिन्न-भिन्न होता है। ।।
  15. मूल प्रवृत्तियों के आधार पर मानव-व्यवहार की व्याख्या मुख्य रूप से …………………. ने की है।
  16. …………………. ने अभिप्रेरणात्मक व्यवहार की व्याख्या मूल प्रवृत्तियों के आधार पर की है।

उत्तर :

  1. प्रेरक
  2. प्रेरक
  3. प्रेरणा
  4. हो ही नहीं सकते
  5. प्रबल प्रेरणा
  6. व्याकुलता
  7. श्रेष्ठ
  8. अर्जित
  9. जन्मजात
  10. व्यक्तिगत अर्जित
  11. व्यक्तिगत अर्जित
  12. सामाजिक अर्जित
  13. सामाजिक सम्पर्क
  14. सामाजिक प्रेरकों
  15. मैक्डूगल
  16. मैक्डूगल।

प्रश्न I.
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1. प्रेरणा से क्या आशय है?
उत्तर :
किसी प्राणी द्वारा विशेष प्रकार की क्रिया या व्यवहार करने को बाध्य करने वाली आन्तरिक शक्तियों को प्रेरणा कहते हैं।

प्रश्न 2. प्रेरणा की एक सरल, संक्षिप्त एवं स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
किम्बाल यंग के अनुसार, “प्रेरणा एक व्यक्ति की आन्तरिक स्थिति होती है, जो उसे क्रियाओं की ओर प्रेरित करती है।”

प्रश्न 3. प्रेरणायुक्त व्यवहार के मुख्य लक्षणों अथवा विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. शक्ति का अतिरिक्त संचालन
  2. परिवर्तनशीलता
  3. निरन्तरता
  4. चयनता
  5. लक्ष्य-प्राप्त करने की व्याकुलता तथा
  6. लक्ष्य-प्राप्ति पर व्याकुलता की समाप्ति।

प्रश्न 4. प्रबल प्रेरणा की दशा में सीखने की प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
प्रबले प्रेरणा की दशा में सीखने की प्रक्रिया शीघ्रता से तथा सुचारु ढंग से सम्पन्न होती है।

प्रश्न 5. प्रेरकों का सर्वमान्य वर्गीकरण क्या है?
उत्तर :
प्रेरकों के एक सर्वमान्य वर्गीकरण के अन्तर्गत समस्त प्रेरकों को मूल रूप से दो वर्गों में बाँटा गया है – (i) जन्मजात प्रेरक तथा (ii) अर्जित प्रेरक।

प्रश्न 6. चार मुख्य जन्मजात प्रेरकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(i) भूख, (ii) प्यास, (iii) नींद तथा (iv) काम।

प्रश्न 7. अजित प्रेरकों को किन-किन वर्गों में बाँटा जाता है?
उत्तर :
अर्जित प्रेरकों को दो वर्गों में बाँटा जाता है- (i) व्यक्तिगत अर्जित प्रेरक तथा (ii) सामाजिक अर्जित प्रेरक।

प्रश्न 8. चार मुख्य व्यक्तिगत अर्जित प्रेरकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(i) जीवन-लक्ष्य, (ii) आकांक्षा-स्तर, (ii) मद-व्यसन तथा (iv) रुचि।

प्रश्न 9. चार मुख्य सामाजिक अर्जित प्रेरकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(i) सामुदायिक, (i) आत्म-गौरव या आत्म-स्थापन, (ii) प्रशंसा तथा निन्दा व (iv) आत्म-समर्पण।

प्रश्न 10. प्रेरकों की प्रबलता के मापन के लिए अपनायी जाने वाली विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(i) अवरोध विधि, (ii) शिक्षण विधि तथा (iii) चुनाव विधि।।

प्रश्न 11. नवजात शिशु में कौन-कौन से प्रेरक प्रबल होते हैं?
उत्तर :
नवजात शिशु में (i) भूख, (ii) प्यास, (iii) नींद तथा (iv) मल-मूत्र त्याग नामक प्रेरक प्रबल होते हैं।

प्रश्न 12. मूल प्रवृत्ति की एक समुचित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
“मूल प्रवृत्ति शब्द के अन्तर्गत हम उन सभी जटिल कार्यों को लेते हैं जो बिना पूर्व-अनुभव के उसी प्रकार से किये जाते हैं जिस प्रकार से उस लिंग और प्रजाति के समस्त सदस्यों द्वारा किये जाते हैं।”

प्रश्न 13. मूल प्रवृत्तियों की एक मुख्य विशेषता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
समस्त मूल प्रवृत्तियाँ जन्मजात होती हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति अथवा प्राणी के स्वभाव में निहित होती हैं।

प्रश्न 14. ‘भूख’ तथा मद-व्यसन किस प्रकार के प्रेरक हैं?
उत्तर :
‘भूख’ एक जन्मजात प्रेरक है, जबकि ‘मद-व्यसन’ एक अर्जित प्रेरक है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
प्रेरक कोई विशेष आन्तरिक अवस्था या दशा है जो किसी कार्य को शुरू करने और उसे जारी रखने की प्रवृत्ति से युक्त होती है। यह कथन किसका है?
(क) गिलफोर्ड
(ख) वुडवर्थ
(ग) किम्बाल यंग
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 2.
व्यक्ति द्वारा किये जाने वाले कार्यों के पीछे निहित महत्त्वपूर्ण कारक को कहते हैं
(क) संवेग
(ख) प्रलोभन
(ग) चिन्तन एवं कल्पना
(घ) प्रेरणा

प्रश्न 3.
प्रेरणायुक्त व्यवहार का एक मुख्य लक्षण है
(क) सामान्य से अधिक बोलना।
(ख) व्यक्ति का आक्रामक होना
(ग) अतिरिक्त शक्ति का संचालन
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन-सा लक्षण अभिप्रेरित व्यवहार का है?
(क) श्वसन देर में परिवर्तन
(ख) हृदय गति में परिवर्तन
(ग) प्रवलने
(घ) व्यवहार में दिशा

प्रश्न 5.
प्रेरणाओं के नितान्त अभाव की स्थिति में व्यक्ति का व्यवहार
(क) तीव्र हो जाएगा
(ख) उत्तम हो जाएगा।
(ग) हो ही नहीं सकता
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 6.
व्यक्ति (प्राणी) के जीवन में प्रेरणा का महत्त्व है
(क) व्यक्ति के व्यवहार का परिचालन होता है
(ख) सम्बन्धित कार्य शीघ्र तथा अच्छे रूप में सम्पन्न होता है।
(ग) विषय को शीघ्र सीख लिया जाता है।
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से कौन-सा प्रेरक जन्मजात प्रेरक है?
(क) रुचि
(ख) जीवन-लक्ष्य
(ग) भूख
(घ) प्रशंसा एवं निन्दा

प्रश्न 8.
जन्मजात प्रेरक है
(क) प्यास
(ख) उपलब्धि
(ग) आकांक्षा स्तर
(घ) जीवन-लक्ष्य

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन जन्मजात या प्राथमिक प्रेरक नहीं है?
(क) यौन
(ख) नींद
(ग) संग्रहणशीलता
(घ) भूख

प्रश्न 10.
प्यास है
(क) जैविक अभिप्रेरक
(ख) मनोवैज्ञानिक अभिप्रेरक
(ग) व्यक्तिगत अभिप्रेरक
(घ) अर्जित अभिप्रेरक

प्रश्न 11.
जन्मजात प्रेरकों की विशेषता है
(क) ये जन्म से ही विद्यमान होते हैं तथा इन्हें सीखना नहीं पड़ता
(ख) इनका स्वरूप सभी मनुष्यों में समान होता है
(ग) ये प्रबल होते हैं तथा जीवित रहने के लिए आवश्यक होते हैं।
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ

प्रश्न 12.
अर्जित प्रेरकों की विशेषता है
(क) व्यक्ति द्वारा समाज में रहकर सीखे जाते हैं।
(ख) प्रायः सभी व्यक्तियों में इनका स्वरूप भिन्न-भिन्न होता है।
(ग) इन प्रेरकों की समुचित पूर्ति के अभाव में भी जीवन चलता रहता है।
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ

प्रश्न 13.
अनुमोदन अभिप्रेरणा है
(क) जन्मजात
(ख) व्यक्तिगत
(ग) सामाजिक
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 14.
सम्बन्धन प्रेरक है
(क) जन्मजात
(ख) व्यक्तिगत
(ग) सामाजिक
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 15.
मैक्डूगल नामक मनोवैज्ञानिक ने प्रेरित व्यवहार का क्या कारण बताया है?
(क) वंशानुक्रम
(ख) उत्तेजना
(ग) मूल प्रवृत्तियाँ
(घ) वातावरण

प्रश्न 16.
मूल प्रवृत्तियों की विशेषताएँ हैं
(क) ये जन्मजात होती हैं।
(ख) ये प्राणियों के स्वभाव में निहित होती हैं।
(ग) मूल प्रवृत्तियाँ किसी-न-किसी संवेग से सम्बद्ध होती हैं।
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ।

प्रश्न 17.
मूल प्रवृत्तियों के आधार पर प्रेरणात्मक व्यवहार की व्याख्या की गई
(क) मास्लो द्वारा
(ख) वुण्ट द्वारा
(ग) वाटसन द्वारा
(घ) मैक्डूगल द्वारा

प्रश्न 18.
अभिप्रेरणात्मक व्यवहार की व्याख्या मूल प्रवृत्तियों के आधार पर किसने की है?
(क) वाटसन
(ख) स्किनर
(ग) मैक्डूगल
(घ) वुण्ट

प्रश्न 19.
ऐसे तनाव या क्रियाशीलता की अवस्था को क्या कहकर पुकारते हैं जो किसी आवश्यकता द्वारा उत्पन्न होती है?
(क) अन्तनोंद
(ख) आवश्यकता
(ग) प्रलोभन
(घ) संवेग

प्रश्न 20.
आमाशय एवं आँत की सिकुड़न से सम्बन्धित तथा रक्त की रासायनिक दशा पर निर्भर कौन-सा प्रेरक है?
(क) क्रोध
(ख) मल-मूत्र त्याग
(ग) प्यास
(घ) भूख

प्रश्न 21.
कौन-सा प्रेरक व्यक्ति को अपने लक्ष्य के मार्ग में बाधा आने पर विजय पाने तथा संघर्ष के लिए अभिप्रेरित करता है?
(क) पलायन
(ख) युयुत्सा
(ग) अनुकरण
(घ) क्रोध

प्रश्न 22.
‘काम की मूल प्रवृत्ति को ही सम्पूर्ण मानव-व्यवहार एवं क्रियाओं का उद्गम स्वीकार करने वाले मनोवैज्ञानिक का नाम क्या है?
(क) सिगमण्ड फ्रॉयड
(ख) ट्रॉटर
(ग) बी० एन० झा
(घ) वुडवर्थ

उत्तर :

  1. (क) गिलफोर्ड
  2. (घ) प्रेरणा
  3. (ग) अतिरिक्त शक्ति का संचालन
  4. (घ) व्यवहार में दिशा
  5. (ग) हो ही नहीं सकता
  6. (घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व
  7. (ग) भूख
  8. (क) प्यास
  9. (ग) संग्रहणशीलता
  10. (क) जैविक अभिप्रेरक
  11. (घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएं
  12. (घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ
  13. (ग) सामाजिक
  14. (ग) सामाजिक
  15. (ग) मूलप्रवृत्तियाँ
  16. (घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ
  17. (घ) मैक्डूगल द्वारा
  18. (ग) मैक्डूगल
  19. (क) अन्तनोंद
  20. (घ) भूख
  21. (ख) युयुत्सा
  22. सिगमण्ड फ्रॉयड।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 5 Attention

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 5
Chapter Name Attention
(अवधान)
Number of Questions Solved 35
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 5 Attention (अवधान)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अवधान या ध्यान का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। अवधान की प्रमुख विशेषताओं का भी उल्लेख कीजिए।
या
अवधान को परिभाषित कीजिए।

अवधान का अर्थ
(Meaning of Attention)

सामान्य दृष्टिकोण से ‘अवधान या ‘ध्यान का अर्थ है-‘किसी काम में मन लगाना। भारतीय दर्शन में अवधान (ध्यान) को एक विलक्षण या अद्भुत शक्ति माना गया है। प्रत्येक कार्य को करते समय व्यक्ति अपनी चेतना, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को लगाती है। उसका अपनी मानसिक शक्तियों या चेतना का वातावरण की किसी विशेष उत्तेजना पर केन्द्रित करना तत्कालीन आवश्यकता अथवा लक्ष्य सिद्धि पर निर्भर करता है। अपनी चेतना या मानसिक शक्तियों को जब व्यक्ति किसी विषय-वस्तु पर केन्द्रित करता है तो केन्द्रीकरण की यह प्रक्रिया या अवस्था अवधान कहलायेगी। वस्तुतः अवधान की यह प्रक्रिया व्यक्ति के उस कार्य-व्यापार की सफलता का आधार है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अवधान एक सामान्य मानसिक प्रक्रिया है।

अवधान की परिभाषा
(Definition of Attention)

प्रमुख विद्वानों ने अवधान को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है –

  1. जे० एस रॉस के अनुसार, “अवधान किसी विचार की वस्तु को मन के सम्मुख स्पष्ट रूप में रखने की प्रक्रिया है।”
  2. मैक्डूगल के अनुसार, “ज्ञानात्मक प्रक्रिया पर पड़े प्रभाव की दृष्टि से विचार करने पर अवधान एक चेष्टा या प्रयास-भर है।”
  3. डूमवाइल के अनुसार, “यह (अवधान) किन्हीं अन्य वस्तुओं की अपेक्षा किसी एक वस्तु पर चेतना का केन्द्रीकरण है।”
  4. एन० एल० मन के कथनानुसार, “हम चाहे जिस दृष्टिकोण से विचार करें, अन्तिम विश्लेषण में अवधान एक प्रेरणात्मक प्रक्रिया है।”

अवधान के अर्थ एवं उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि “अवधान (ध्यान) किसी एक विचार को मानव मस्तिष्क में स्पष्टत: अंकित करने से सम्बन्धित या मानव चेतना की चुनाव सम्बन्धी अवरत एवं सुव्यवस्थित प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया मानव के मस्तिष्क में मौजूद विविध वस्तुओं में से कभी एक तो कभी अन्य को चेतना के ध्यान केन्द्र में पहुँचाती है।”

अवधान की विशेषताएँ
(Characteristics of Attention)

अवधान के अर्थ एवं परिभाषा के आधार पर हम अवधान की कुछ विशेषताओं पर प्रकाश डाल सकते हैं। ये विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) चंचलता – अवधान की प्रकृति चंचल है। हमारा अवधान हमेशा एक वस्तु से दूसरी वस्तु की ओर परिवर्तित होता रहता है। यह निरन्तर खिसकता रहता है। अवधान की चंचलता पर हुए प्रयोगों से सिद्ध होता है कि हमारा ध्यान किसी वस्तु या विचार पर अधिक समय तक नहीं टिकता। ध्यान परिवर्तन की अवधि 9 से 10 सेकण्ड तक बतायी गयी है।

(2) चयनात्मक प्रक्रिया – व्यक्ति अपने चारों तरफ के वातावरण में विभिन्न तत्त्वों से घिरा है. किन्तु वह एक समय पर उनमें से सिर्फ एक तत्त्व की ओर ही ध्यान केन्द्रित कर सकता है। इसीलिए अवधान की वस्तु का चयन किया जाता है। हमारी चेतना की सीमा के भीतर की विभिन्न वस्तुओं में से हमारा मस्तिष्क एक वस्तु को चुन लेता है और वही चेतना के ध्यान-केन्द्र में पहुँच जाती है। चयन की यह प्रक्रिया हर समय चलती रहती है।

(3) मानसिक सक्रियता – किसी वस्तु पर ध्यान केन्द्रित करते समय हमारा मस्तिष्क सक्रिय हो जाता है और वह कोई-न-कोई क्रिया अवश्य करता है। इस प्रकार अवधान में मानसिक प्रक्रियाएँ सक्रिय रहती हैं।

(4) संकुचित क्षेत्र – अवधान का क्षेत्र काफी संकीर्ण अथवा संकुचित होता है। मानव-मस्तिष्क एक साथ अनेक वस्तुओं पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर सकता।

(5) प्रयोजनशीलता – अवधान एक उद्देश्यपूर्ण क्रिया है। अवधान का कोई-न-कोई लक्ष्य या प्रयोजन अवश्य होता है। जिसकी प्रेरणावश व्यक्ति का ध्यान उस वस्तु या उद्दीपक की ओर केन्द्रित होता है। यह उद्देश्य या लक्ष्य बौद्धिक हो सकता है; जैसे–किसी अमूर्त विचार की ओर ध्यान केन्द्रित होना; अथवा संवेदनात्मक हो सकता है; जैसे-गाने, दृश्य या सुगन्ध की तरफ ध्यान लगना; और बौद्धिक एवं संवेदनात्मक दोनों भी हो सकता है, जैसे-शतरंज के खेल में ध्यान का केन्द्रण।

(6) तत्परता – तत्परता का गुण अवधान की प्रक्रिया में सहायता करता है। अवधान के लिए व्यक्ति का मानसिक रूप से तत्पर होना आवश्यक है। यदि व्यक्ति किसी वस्तु पर ध्यान लगाने के लिए मानसिक रूप से तत्पर (तैयार) नहीं है तो उस वस्तु पर शीघ्र ध्यान न लग सकेगा।

(7) अन्वेषणात्मकता – अवधान में अन्वेषणात्मकता की विशेषता पायी जाती है। जिस नवीन वस्तु की ओर हमारा अवधान खिंचता है, उसके विषय में हम अन्वेषण या खोज करने लगते हैं तथा उसकी अच्छाई-बुराइयों की छानबीन का प्रयास करने लगते हैं।

(8) शारीरिक समायोजन – अवधान की प्रक्रिया समायोजन (Adjustment) से सम्बन्धित है। मानसिक समायोजन के साथ-साथ अवधान में शारीरिक समायोजन भी होता है। इसके यह तीन प्रकार है :

(i) ग्राहक समायोजन – जब व्यक्ति किसी उत्तेजना के प्रति ध्यान लगाता है तो उससे जुड़े ग्राहक अंग या ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, नाक, कान, जिह्वा तथा त्वचा) उस उत्तेजना से सम्बद्ध हो जाते हैं और विशिष्ट रूप से समायोजित हो जाते हैं।
(ii) शरीर-मुद्रा समायोजन – अवधान की प्रक्रिया में जिस तरफ से उत्तेजना प्राप्त होती है, व्यक्ति अपना शरीर झुका लेता है। ध्यानपूर्वक कोई खास बात सुनते समय नेत्र श्रोता की ओर टकटकी लगाते हैं, गर्दन उस ओर झुक जाती है तथा शरीर के अंग हिलना-डुलना बन्द कर देते हैं।
(iii) मांसपेशीय समायोजन – अवधान के दौरान मांसपेशियाँ एक तनाव की दशा में आ जाती हैं और इस वजह से अधिक सक्रिय हो जाती हैं। इससे ध्यान केन्द्रित करने में मदद मिलती है।

(9) त्रिपक्षीय प्रक्रिया – एक मानसिक प्रक्रिया होने के कारण अवधान का सीधा सम्बन्ध मन से है। मन के तीन विभिन्न पक्ष हैं-ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक पक्ष। ध्यान के माध्यम से व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त होता है, उसके भीतर भावनाओं का उदय होता है और किसी-न-किसी क्रिया का जन्म भी होता है।

(10) विश्लेषणात्मकता और संश्लेषणात्मकता – अवधान के अन्तर्गत उत्तेजनाओं के विविध पक्षों का विश्लेषण एवं संश्लेषण होता रहता है। किसी वस्तु-विशेष की ओर ध्यान केन्द्रित होने पर मस्तिष्क उससे सम्बन्धित विभिन्न तत्त्वों या पक्षों का विश्लेषण करता है; जैसे—किसी पौधे के सामने आने पर उसके तने, पत्तियों, शाखाओं, प्रशाखाओं, पुष्पों तथा फलों की ओर अलग-अलग ध्यान जाता है। तत्पश्चात् इन सभी अंगों को मिलाकर पौधे का सम्पूर्ण स्वरूप यानी पौधे के संश्लेषित पक्ष की ओर भी ध्यान देते हैं।

प्रश्न 2.
अवधान में सहायक मुख्य दशाओं अथवा अवधान के निर्धारक कारकों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
या
अवधान की बाह्य या वस्तुगत दशाओं तथा आन्तरिक या आत्मगत दशाओं का उल्लेख कीजिए।
या
अवधान के किन्हीं दो वस्तुगत निर्धारकों को स्पष्ट कीजिए।
या
अवधान के निर्धारकों का विस्तार से वर्णन कीजिए।

उत्तर :

अवधान की मुख्य सहायक दशाएँ (ध्यान के कारण अथवा निर्धारक)
(Favourable Conditions/Causes or Determinants of Attention)

अवधान या ध्यान एक चयनात्मक मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति एक विशेष शारीरिक मुद्रा बनाकर किसी वस्तु को चेतना के केन्द्र में लाने के लिए तत्पर रहता है। अवधान की प्रक्रिया के अन्तर्गत व्यक्ति अनेक उपस्थित उद्दीपकों में से किसी विशिष्ट उद्दीपक को चुनता है तथा उसे अपनी चेतना के केन्द्र में लाता है। अवधान की सहायक दशाओं में या निर्धारकों से ज्ञात होता है कि हम किसी वस्तु पर ध्यान क्यों देते है?

वे सभी दशाएँ जो एक वस्तु या उत्तेजना को हमारे अवधान का केन्द्र बनाती हैं, अवधान की मुख्य सहायक दशाएँ कहलाती हैं। हमारा ध्यान किसी एक विशेष वस्तु की ओर क्यों केन्द्रित होता है, यह अवधान की दशाओं द्वारा निर्धारित होता है। अवधान की इन निर्धारक दशाओं को हम अवधान का कारण भी कह सकते हैं। ये दशाएँ मुख्यत: दो प्रकार की होती हैं–(अ) बाह्य या वस्तुगत दशाएँ तथा (ब) आन्तरिक या आत्मगत दशाएँ।

(अ) अवधान की बाह्य या वस्तुगत दशाएँ
(External or Objective Conditions of Attention)

जब किसी वस्तु अथवा परिस्थिति की ओर व्यक्ति का ध्यान केन्द्रित करने का कारण स्वयं उस वस्तु में ही मौजूद होता है तो इस प्रकार की दशाएँ बाह्य या वस्तुगत दशाएँ कहलाती हैं। ये बाह्य दशाएँ अनेक बाह्य उत्तेजनाओं पर निर्भर करती हैं, जिनमें से प्रमुख उत्तेजनाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) उत्तेजना को व्यवस्थित रूप – अनिश्चित एवं अस्पष्ट रूप वाली वस्तुओं की अपेक्षा निश्चित तथा व्यवस्थित रूप वे आकार वाली वस्तुएँ हमारे ध्यान को जल्दी और अधिक आकर्षित करती हैं। उदाहरणार्थ-पूर्णिमा की रात्रि को पूर्णचन्द्र के आसपास तैरते बादलों की अपेक्षा चन्द्रमा की ओर हमारा ध्यान जल्दी जाता है। बादलों का रूप अनिश्चित है, जबकि चन्द्रमा का रूप निश्चित। पृष्ठभूमि की अन्य वस्तुओं की अपेक्षा ताजमहल हमें अपनी ओर अधिक आकर्षित करता है।

(2) उत्तेजना का आकार – अवधान को आकर्षित करने में किसी वस्तु का आकार भी महत्त्वपूर्ण है। छोटे आकार की वस्तु पर हमारी चेतना जल्दी केन्द्रित नहीं हो पाती, किन्तु बड़े आकार की वस्तुएँ अपेक्षाकृत हमारे अवधान को जल्दी आकर्षित कर लेती हैं। उदाहरण के लिए-छोटे आकार के चित्र की अपेक्षा बड़े चित्र की ओर ध्यान आसानी से केन्द्रित होता है। प्रत्येक दुकानदार बड़े-से-बड़ा साइनबोर्ड लगवाना चाहता है।

(3) तीव्रता – अधिक तीव्रता वाले उत्तेजक कम तीव्रता वाले उत्तेजक की अपेक्षा हमारा ध्यान शीघ्र ही आकर्षित कर लेते हैं। जलते हुए दीपक की अपेक्षा विद्युत बल्ब का प्रकाश जल्दी ध्यान आकर्षित करता है। रेलवे प्लेटफार्म पर जोर से आवाज लगाने वाले हॉकर की ओर अन्यों की तुलना में अधिक ध्यान जाता है।

(4) स्थिति – उत्तेजना की स्थिति हमारा ध्यान आकर्षित करने में एक महत्त्वपूर्ण दशा है। किसी विशेष स्थान अथवा स्थिति में उपस्थित उत्तेजना अपनी ओर हमारा ध्यान शीघ्रता से खींच लेती है। अखबार में अलग-अलग अभिप्राय के समाचार अपने विशिष्ट स्थानों पर छपते हैं और वहीं से हमारा ध्यान खींच लेते हैं। किसी कार्यालय में एक अधिकारी पद के अनुसार अपनी विशिष्ट स्थिति के आधार पर हमारे ध्यान को अपनी ओर खींच लेता है।

(5) गति – स्थिर वस्तुओं की तुलना में गतिशील वस्तुओं की ओर जल्दी ध्यान जाता है। विवह, नुमाइश या प्रदर्शनी के मौके पर गति करता हुआ बिजली का जलता-बुझता’प्रकाश हमारे अवधान को जल्दी एवं अधिक आकर्षित कर लेता है। असंख्य स्थिर तारों के बीच टूटा हुआ और पृथ्वी की ओर गति करता हुआ तारा अधिक ध्यान आकर्षित करता है।

(6) स्वरूप – ध्यान केन्द्रित करने में उत्तेजना का स्वरूप भी अपनी विशेष भूमिका निभाता है। जब उत्तेजक अथवा वस्तु के स्वरूप में कोई विशिष्टता होती है तो इससे हमारा ध्यान जल्दी आकर्षित होता है, लेकिन साधारण स्वरूप की वस्तुओं पर अधिक ध्यान नहीं जाता। साधारण प्रकार के वस्त्र पहने हुए अनेक लोगों के बीच यदि कोई चटकीले-भड़कीले वस्त्र पहने हुए है तो हमारा ध्यान उस एक व्यक्ति की ओर ही आकर्षित होगा।

(7) नवीनता – नवीनता ध्यान की अत्यधिक अनुकूल दशा है। पुरानी पृष्ठभूमि में किसी नवीन वस्तु या परिस्थिति की ओर अनायास ही ध्यान चला जायेगा। यदि कोई व्यक्ति पुराने वस्त्रों को बदलकर नये वस्त्र पहनकर आये तो हमारा ध्यान सहज ही उसकी ओर आकृष्ट हो जायेगा। नवीन ध्वनि, गन्ध, स्वाद या फैशन की ओर जल्दी ध्यान केन्द्रित होता है।

(8) परिवर्तनशीलता – वस्तु या उत्तेजना के परिवर्तन के कारण भी सहज ही ध्यान आकर्षित होता है। अपरिवर्तनशील या स्थिर वस्तुएँ ऐसा नहीं कर पातीं। सत्य ही, लगातार एक जैसी उत्तेजना या वस्तु से हमारा मन ऊब जाता है और हम उसकी ओर आकर्षित नहीं हो पाते। हेयर कटिंग कराने के बाद व्यक्ति कुछ बदला-बदला नजर आता है और यह परिवर्तन उसमें आकर्षण भर देता है जिसके प्रति बरबस ध्यान चला जाता है। परिवर्तनशीलता एक महत्त्वपूर्ण दशा है।

(9) विषमता – विषम या विरोधी गुण वाली वस्तु सहज ही हमारा ध्यान आकर्षित कर लेती है। गोरे रंग के व्यक्तियों के बीच एक काले रंग का व्यक्ति सभी लोगों का ध्यान खींच लेता है।

(10) रहस्यमयता – रहस्यमय परिस्थितियाँ या वस्तुएँ मानव मन की जिज्ञासाओं के केन्द्र बनते हैं और हमारा ध्यान आसानी से व जल्दी आकृष्ट कर लेते हैं। यदि किसी इमारत के सभी कमरों के दरवाजे खुले हों और सिर्फ कमरे के दरवाजे पर ताला पड़ा हो तो दर्शकों के लिए वही एक कमरा रहस्य की वस्तु बन जायेगा जिसे देखने के लिए हर कोई लालायित होगा।

(11) अवधि य उपस्थिति-काल – उत्तेजना की अवधि या उसका उपस्थिति-काल भी अवधान को प्रभावित करता है। लम्बी अवधि तक रहने वाली उत्तेजना अपनी ओर शीघ्र ध्यान केन्द्रित करती है, किन्तु थोड़ी अवधि तक रहने वाली अथवा क्षणिक उत्तेजना हमारे ध्यान को उतनी शीघ्र आकर्षित नहीं कर पाती। किसी फैक्ट्री या मिल से लम्बे समय तक बजने वाला भोंपू या सायरन हमारे ध्यान को सहज ही अपनी तरफ खींच लेता है। सड़क पर वाहनों के ड्राइवर अक्सर सामने आये किसी वाहन को देर तक हॉर्न बजाकर हटने के लिए मजबूर कर देते हैं।

(12) पुनरावृत्ति – जब कोई उत्तेजना बार-बार प्रकट होती है और जिन वस्तुओं के वातावरण में पुनरावृत्ति होती रहती है, उनकी तरफ तत्काल ही ध्यान आकृष्ट हो जाता है। यदि रात में घर का कुत्ता बार-बार भौंके तो गृहस्वामी उसे खतरे का संकेत समझता है और उस स्थिति की ओर तुरन्त ध्यान देता है।

(ब) अवधान की आन्तरिक या आत्मगत दशाएँ
(Internal or Subjective Conditions of Attention)

अवधान की कुछ ऐसी दशाएँ भी हैं जिनका निर्धारण आन्तरिक दशाओं द्वारा होता है। ये दशाएँ व्यक्ति के अन्दर स्थित होती हैं तथा उसकी अभिप्रेरणाओं से उत्पन्न होती हैं। इन्हें अवधान की आत्मगत दशाएँ भी कहते हैं। अवधान को प्रभावित करने वाली कुछ प्रमुख आन्तरिक या आत्मगत दशाएँ निम्न प्रकार हैं

(1) मनोवृत्ति – प्रत्येक व्यक्ति के मन की एक वृत्ति होती है। यह अवधान की आन्तरिक दशाओं में से एक महत्त्वपूर्ण दशा है। जिस वस्तु के कारण हमें मूल-प्रवृत्तात्मक उत्तेजना प्राप्त होती है, उस वस्तु की ओर हमारा ध्यान आकर्षित हो जाता है। धार्मिक मनोवृत्ति वाला व्यक्ति आम प्रचलित फिल्मों के पोस्टरों की ओर आकर्षित नहीं होगा, किन्तु यदि ‘सम्पूर्ण रामायण’ फिल्म का पोस्टर उसे कहीं लगा मिल जाये तो वह तत्काल आकृष्ट हो जायेगा।

(2) संवेग – संवेग का अवधान पर काफी प्रभाव पड़ता है। अन्धकार में जब हम भयकी संवेगावस्था से प्रेरित होते हैं तो साधारण-सी आहट भी हमें अपनी ओर आकर्षित करती है। यदि व्यक्ति किसी से नफरत करता है तो उसकी जरा-सी भूल भी उस व्यक्ति का ध्यान आकर्षित कर लेती है, किन्तु प्रसन्नता की संवेगावस्था में इन्हीं जरा-जरा सी भूलों पर व्यक्ति का ध्यान नहीं जाता। संवेग अवधान की महत्त्वपूर्ण आन्तरिक दशा है।

(3) रुचि – अवधान के लिए रुचि का बड़ा महत्त्व है। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की भिन्न-भिन्न रुचियाँ होती हैं और वे विषयों का अवलोकन भी व्यक्तिगत रुचि के आधार पर ही करते हैं। जो व्यक्ति जिस प्रकार की रुचि रखता है उसी से सम्बन्धित वस्तुओं के प्रति उसका ध्यान जाता है। सट्टेबाजों का ध्यान समाचार-पत्र के बाजार भावों में रहता है, छात्र का पुस्तकों में, संगीतशास्त्री का संगीत में तथा क्रिकेट प्रेमी का ध्यान टी० वी० पर आ रहे टेस्ट मैच पर ही केन्द्रित होगा।

(4) जिज्ञासा – जिज्ञासा भी अवधान की एक आंतरिक दशा है। किसी वस्तु या उत्तेजना के बारे में व्यक्ति की जितनी तीव्र जिज्ञासा होगी। उसके बारे में परिचय पाने की दृष्टि से उसकी ओर ध्यान भी उतना ही अधिक जायेगा।

(5) अनुभव – अनुभव का अवधान से गहरा सम्बन्ध है। विगत अनुभव के आधार पर हमारा ध्यान उस वस्तु की ओर चला जाता है। पहले से अनुभव की गई वस्तुओं, घटनाओं या उत्तेजनाओं की तरफ हमारा ध्यान जल्दी तथा सहज रूप से चला जाता है। यदि राम, मोहन से पहले कभी मिला है तो भविष्य में किसी अवसर पर मोहन को देखकर राम का ध्यान उसकी तरफ खिंच जाएगा। किसी व्यक्ति ने आपत्ति के समय हमें नि:स्वार्थ मदद दी हो तो संमान परिस्थितियों में उस व्यक्ति की ओर ध्यान चला जाएगा। ऐसा पिछली अनुभूतियों के कारण है।

(6) आवश्यकताएँ – आवश्यकता व्यक्ति के अवधान की मुख्य सहायक दशा है। इस दृष्टि से ये दो प्रकार की होती हैं—शारीरिक और मानसिक आवश्यकताएँ। दोनों ही प्रकार की आवश्यकताएँ अवधान केन्द्रण में हमारी मदद करती हैं। प्यासे व्यक्ति का ध्यान पानी की ओर जाता है, क्योंकि उसे पानी की आवश्यकता है।

(7) उद्देश्य यो लक्ष्य – हम प्रायः उन्हीं वस्तुओं या व्यक्तियों की ओर ध्यान देते हैं जिनसे हमारा उद्देश्य या लक्ष्य पूरा होता है, किन्तु जो हमारे उद्देश्य की पूर्ति में सहायक नहीं हैं उनकी तरफ ध्यान भी आकृष्ट नहीं होता है। माना किसी पुलिस अधिकारी का लक्ष्य एक हत्यारे की खोज करना है, तो अधिकारी हत्यारे से सम्बन्धित छोटे-से-छोटे तथ्य की ओर भी ध्यान देगा।

(8) आदत – आदत को अवधान की सबसे अनुकूल दशा माना गया है। व्यक्ति को जब जिस विषय-वस्तु की आदत होती है उससे सम्बन्धित पदार्थ की ओर एक निर्धारित समय पर उसका ध्यान अवश्य चला जायेगा। यदि किसी को दोपहर बाद तीन बजे चाय पीने की आदत है तो निश्चित समय पर उसका ध्यान चाय की ओर केन्द्रित हो जाएगा।

(9) मानसिक तत्परता – मानसिक तत्परता से अभिप्राय है व्यक्ति के मन का झुकाव। किसी व्यक्ति के मन का झुकाव जिस वस्तु या उत्तेजना की ओर जिस समय होता है, उसका ध्यान भी उसी ओर आकर्षित हो जाता है। परीक्षाकाल में विद्यार्थियों का ध्यान वातावरण के अन्य आकर्षणों से हटकर परीक्षा से सम्बन्धित बातों की ओर ही लगा रहता है।

(10) अर्थ – सार्थक विषय-वस्तुओं की ओर हमेशा ध्यान जल्दी आकर्षित होता है, किन्तु जिन चीजों के अर्थ का हमें ज्ञान नहीं होता उनकी ओर हमारा ध्यान भी नहीं जाता। यदि कोई व्यक्ति शतरंज का खेल जानता है और उसकी चालों को भी बखूबी पहचानता है तो उसका ध्यान शतरंज के खेल की तरफ जाएगा, परन्तु जो इस खेल से अनभिज्ञ है वह शतरंज के खेल की तरफ ध्यान नहीं देगा।

उपर्युक्त विवेचन में हमने अवधान की बाह्य और आन्तरिक सहायक दशाओं का ज्ञान प्राप्त किया है। ये दशाएँ व्यक्ति के ध्यान को पर्याप्त रूप से प्रभावित करती हैं और इन्हीं के कारण व्यक्ति किसी वस्तु-विशेष की ओर ध्यान केन्द्रित करता है, जबकि उसके चारों ओर वातावरण में अनेक उत्तेजनाएँ मौजूद होती हैं।

प्रश्न 3.
रुचि का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। रुचि एवं ध्यान
या
अवधान का सम्बन्ध भी स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :

रुचि का अर्थ व परिभाषा
(Meaning and Definition of Interest)

अवधान के प्रत्यय की व्याख्या करते समय रुचि’ की महत्त्वपूर्ण अवधारणा को भी समझना आवश्यक है। अवधान और रुचि का गहरा मेल है और दोनों ही विचार एक-दूसरे की परिपूर्ति करते हैं। जिन कार्यों में हम रुचि लेते हैं उन्हें करने में हमें सुख और सन्तोष मिलता है-आनन्द की प्राप्ति होती है। ऐसे कार्यों को करने के लिए हम प्रेरित होते हैं और ध्यान लगाकर अथक रूप से उन्हें पूरा करते हैं। वस्तुतः हम उन्हीं वस्तुओं या कार्यों की ओर उन्मुख होते हैं जो हमारे भीतर रुचि उत्पन्न करते हैं।

रुचि को एक ऐसी प्रवृत्ति अथवा प्रेरक-शक्ति के रूप में जाना जा सकता है जो हमें वातावरण के कुछ विशिष्ट तत्त्वों की ओर ध्यान देने की प्रेरणा प्रदान करती है। इसे प्रभावपूर्ण अनुभव भी कह सकते हैं जो स्वयं अपनी सक्रियता से उत्तेजित होता है। इस अर्थ में यह एक व्यक्ति के अनुभव की पुकार है और इसका तात्पर्य–व्यक्तिगत तात्पर्य है। कुछ विद्वानों के अनुसार “रुचि किसी उत्तेजना, वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति की ओर आकर्षित होने की प्राकृतिक, जन्मजात या अर्जित प्रवृत्ति है।” लैटिन भाषा में रुचि शब्द का अर्थ है-“यह आवश्यक होती है” (It Matters.) या यह सम्बन्धित होती है’ (It Concerns.)। दूसरे शब्दों में, हमारे अन्दर, रुचि पैदा करने वाली वस्तु हमारे लिए आवश्यक होती है और हमसे सम्बन्धित भी होती है।

रुचि का आधार प्रायः मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ हैं। सच तो यह है कि मनुष्य की आवश्यक रुचियाँ स्वयं उसकी मूल प्रवृत्तियाँ होती हैं अर्थात् आरम्भिक अवस्थाओं में मनुष्य की रुचियाँ मूल प्रवृत्त्यात्मक कही जाती हैं। रुचि एक अस्थायी तथा सामाजिक प्रकार की शक्ति है जो अपना कार्य पूर्ण करने के बाद विलीन हो जाती है। बच्चे की रुचि खिलौने में होती है, कुछ बड़े बालकों का आकर्षण हम उम्र साथियों के प्रति होता है, किशोर विपरीत-लिंगी व्यक्ति की ओर आकर्षित होता है तथा किसान खेती-बाड़ी में रुचि रखता है। रुचि की विरोधी प्रवृत्ति उपेक्षा है।

रुचि की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. जेम्स ड्रेवर के अनुसार, “रुचि अपने में ही एक गत्यात्मक वृत्ति है।”
  2. क्रो एवं क्रो के अनुसार, “रुचि उस प्रेरक शक्ति को कहते हैं जो हमें किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा क्रिया के प्रति ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है।”
  3. मैक्डूगल का कथन है, “रुचि गुप्त अवधान होता है और अवधान रुचि का क्रियात्मक रूप है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के अनुसार-रुचि को गत्यात्मक वृत्ति, प्रेरक शक्ति गुप्त तथा अवधान के रूप में समझा गया है। अवधान की ही भाँति रुचि के भी तीन पक्ष माने गये हैं-ज्ञानात्मक, क्रियात्मक और भावात्मक।

रुचि और अवधान का सम्बन्ध (रुचि का अवधान में महत्त्व)
(Relationship between Attention and Interest)

रुचि और अवधान के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है। ये दोनों एक ही वस्तु का प्रत्यक्ष करने के दो भिन्न दृष्टिकोण हैं और एक-दूसरे के पूरक समझे जाते हैं। व्यक्ति की जन्मजात एवं अर्जित रुचियाँ परस्पर मिलकर कार्य करती हैं और अवधान केन्द्रित करने में सहायता करती हैं। इसी प्रकार किसी वस्तु पर ध्यान केन्द्रित करने से शनैः-शनैः उसमें रुचि विकसित हो जाती है।

रुचि और अवधान सम्बन्धी मनोवैज्ञानिक मत-रुचि और अवधान के सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से निम्नलिखित तीन मत अभिव्यक्त होते हैं

(1) अवधान रुचि पर आधारित है – कुछ विद्वानों का मत है कि अवधान रुचि पर आधारित होता है। सामान्य रूप से व्यक्ति उन्हीं घटनाओं, पदार्थों या कार्यों पर ध्यान देता है जिनमें उसकी रुचि होती है। यदि किसी व्यक्ति की संगीत में गहरी रुचि है तो अन्य क्रियाओं में व्यस्त रहते हुए भी उसका ध्यान दूर से सुनाई पड़ रहे संगीत की और चला जाएगा, किन्तु यदा-कदा ऐसा भी देखा गया है कि किसी चीज में रुचि होने के बावजूद भी हम उसकी ओर ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते और कोई अन्य तीव्र उत्तेजना अपनी तरफ हमारा ध्यान खींच लेती है। यदि बालक पाठ में रुचि लेकर पढ़ रहा है, किन्तु गली में भालू वाला डुगडुगी बजाकर भालू का खेल दिखा रहा है तो निश्चय ही बालक को ध्यान भालू की ओर जाएगा, लेकिन यह भी सत्य है कि यदि बालक की पाठ में तीव्र रुचि होगी तो थोड़े-बहुत भटकाव के बाद उसका ध्यान पुनः पाठ में अवस्थित हो जाएगा।

(2) अवधान रुचि को प्रभावित करता है – एक ओर यदि अवधान रुचि पर आधारित है तो दूसरी ओर रुचि अवधान पर आधारित होती है अर्थात् अवधान रुचि को प्रभावित करता है। किसी वस्तु के प्रति ध्यान केन्द्रित करने से उसके प्रति रुचि स्वतः ही बढ़ जाती है। यह सम्भव है कि प्रारम्भ में किसी वस्तु या घटना में हमारी रुचि न हो, किन्तु यदि उसकी ओर लगातार जबरन अवधान केन्द्रित किया जाए तो अन्ततः उसमें रुचि उत्पन्न हो ही जाती है। यदि किसी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह चार बजे जबरदस्ती जगा दिया जाए तो शुरू में यह प्रक्रिया उसे अरुचिपूर्ण तथा पीड़ादायक ही महसूस होगी, किन्तु एक दिन उस निश्चित समय पर जागने की उसे आदत पड़ जाएगी, जिसे बाद में वह रुचि के साथ करने लगेगा।

(3) समन्वयवादी विचारधारा – समन्वयवादी विचारधारा के अनुसार रुचि और अवधान दोनों का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और एक-दूसरे को समान रूप से प्रभावित करते हैं।

रुचि गुप्त अवधान और अवधान एक क्रियाशील रुचि-यहाँ हम विख्यात मनोवैज्ञानिक विलियम मैक्डूगल के कथन का विवेचन करते हुए अवधान एवं रुचि के मध्य सम्बन्ध स्थापित करेंगे। जिस प्रकार एक संरचना (Structure) क्रिया (Action) से सम्बन्धित होती है, उसी प्रकार रुचि अवधान से जुड़ी है। किसी प्रत्यय के सम्पूर्ण एवं व्यवस्थित ज्ञान के लिए उसका संरचनात्मक एवं क्रियात्मक अध्ययने आवश्यक है। इसी कारणवश विज्ञान के विद्यार्थी पहले विद्युत घण्टी की संरचना (बनावट) का ज्ञान प्राप्त करते हैं, फिर उसकी क्रियाविधि के विषय में जानने का प्रयास करते हैं। मानव मन से सम्बन्धुित व्यापार में भी मानसिक संरचना तथा मानसिक क्रिया दोनों महत्त्वपूर्ण हैं तथा । दोनों का समान रूप से योगदान है। मानसिक संरचना रुचि है और मानसिक क्रिया ‘अवधान है। संरचना क्रिया को संचालित करती है अर्थात् रुचि अवधान का संचालन करती है। दूसरे शब्दों में, मानव की रुचि का अभिप्रकाशन उसके अवधान के रूप में होता है। यह कहना एक भूल होगी कि जिस वस्तु में मनुष्य की रुचि नहीं है उसमें अवधान नहीं होगा तथा जिस वस्तु की ओर अवधान केन्द्रित होता है, उसमें रुचि भी अवश्य होती है। परीक्षा की तैयारी के लिए विद्यार्थी पाठ में रुचि न होने पर भी ध्यान देता है। कुछ विद्वानों का यह मत उचित नहीं कहा जा सकता कि अवधान रुचि का परिणाम होता है। रुचि एक मानसिक संस्कार है जो अवधान के लिए एक अत्यन्त आवश्यक तत्त्व या दशा है। अवधान के विभिन्न आन्तरिक प्रेरक हैं और उनमें से सबसे बलवान प्रेरक रुचि है। सामान्यतः व्यक्ति किसी वस्तु-विशेष के प्रति रुचि रखता है। उसे बलात् कुछ अन्य कार्य भी करने पड़ते हैं जिनमें उसका अवधान केन्द्रित रहता है, किन्तु यह अवधान उसकी रुचि में छिपा रहता है। इसी प्रकार किसी वस्तु पर ध्यान देने का अभिप्राय है उसमें सक्रिय रुचि को प्रकट करना। निष्कर्षत: मैक्डूगल का यह कथन कि “रुचि गुप्त अवधान है तथा अवधान एक क्रियाशील रुचि है”-सत्य प्रतीत होता है।

प्रश्न 4.
अवधान या ध्यान के विस्तार (Span of Attention) से क्या आशय है? अवधान के विस्तार को निर्धारित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए।
या
अवधान के विस्तार का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

अवधान के विस्तार का अर्थ एवं परीक्षण

हम जानते हैं कि अवधान या ध्यान एक मानसिक प्रक्रिया है तथा इस प्रक्रिया के अन्तर्गत व्यक्ति अपनी मानसिक शक्तियों को अभीष्ट विषय-वस्तु पर केन्द्रित करता है। अवधान नामक मानसिक प्रक्रिया के सन्दर्भ में अवधान के विस्तार (Span of Attention) का भी व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है।

अवधान के विस्तार का सम्बन्ध अवधान के क्षेत्र या व्यापकता से है। किसी व्यक्ति द्वारा किसी एक समय में अधिक-से-अधिक जितने बाहरी उद्दीपकों को ध्यान का विषय बनाया जाता है, उसे ही अवधान का विस्तार माना जाता है। भिन्न-भिन्न प्रकार के उद्दीपकों के सन्दर्भ में व्यक्ति के अवधान का विस्तार भी भिन्न-भिन्न होता है। इस सन्दर्भ में वुडवर्थ तथा श्लासबर्ग ने व्यवस्थित अध्ययन किया तथा निष्कर्ष स्वरूप बताया कि यदि उद्दीपक बिन्दुओं के रूप में हों तो अवधान का विस्तार सर्वाधिक होता है। इससे कम अक्षरों का अवधान विस्तार होता है। जहाँ तक ज्यामितिक आकृतियों का प्रश्न है, उनको अवधान-विस्तार सबसे कम होता है।

अवधान के विस्तार के निर्धारण के लिए हेमिल्टन नामक मनोवैज्ञानिक ने सर्वप्रथम कुछ व्यवस्थित अध्ययन आयोजित किये। उसने 1859 ई० में छात्रों के अवधान के विस्तार को जानने के लिए एक अध्ययन का आयोजन किया। इस अध्ययन के अन्तर्गत उसने विषय-पात्रों के सम्मुख संगमरमर के कुछ टुकड़ों को बिखेर दिया तथा उन्हें बिखरे हुए टुकड़ों पर तुरन्त ध्यान केन्द्रित करने का निर्देश दिया। इस परीक्षण के दौरान हेमिल्टन ने देखा कि सामान्य रूप से छात्र एक साथ अधिक-से-अधिक संगमरमर के 6-7 टुकड़ों पर अवधान को केन्द्रित करने में सफल हुए। इस प्रकार निष्कर्षस्वरूप बताया गया कि छात्रों के अवधान का विस्तार 6-7 विषयों तक है। इस परीक्षण से ही मिलता-जुलती एक अन्य परीक्षण 1871 ई० में जेवोन्स द्वारा आयोजित किया गया। उसने अपने विषय-पात्रों के सम्मुख रखी लकड़ी की ट्रे में मटर के कुछ दानों को बिखेर दिया तथा उन्हें मटर के अधिक-से-अधिक दानों पर ध्यान केन्द्रित करने का निर्देश दिया। इस परीक्षण में देखा गया कि सामान्य विषय-पात्र एक समय में 3-4 मटरों पर सरलता से ध्यान केन्द्रित करने में सफल रहा। 5 से अधिक मटरों पर ध्यान केन्द्रित करने के प्रयास में अधिक त्रुटियाँ पायी गयीं। वास्तव में अवधान का विस्तार एक मानसिक प्रक्रिया होने के साथ-साथ व्यक्तिगत क्षमता भी है। सभी व्यक्तियों का अवधान-विस्तार समान नहीं होता। कुछ का सामान्य से कम तथा कुछ का सामान्य से अधिक भी हो सकता है। अवधान के विस्तार को अभ्यास एवं प्रयास द्वारा कुछ हद तक बढ़ाया भी जा सकता है।

अवधान के विस्तार को निर्धारित करने वाले कारक

यह सत्य है कि भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के अवधान का विस्तार भिन्न-भिन्न होता है। यही नहीं, एक ही व्यक्ति का अवधान-विस्तार भी भिन्न-भिन्न काल एवं परिस्थिति में भिन्न-भिन्न हो सकता है। वास्तव में अवधान के विस्तार पर विभिन्न कारकों का अनुकूल अथवा प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अवधान के विस्तार को प्रभावित करने वाले ये कारक ही अवधान-विस्तार के निर्धारक कारक कहलाते हैं। अवधान के विस्तार के मुख्य निर्धारक कारकों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है –

(1) उद्दीपन सम्बन्धी कारक – अवधान के विस्तार के निर्धारकों में मुख्यतम कारक हैउद्दीपन सम्बन्धी कारक। अवधान-विस्तार के इस निर्धारक कारक को प्रतिप्रादित करने का कार्य हण्टर तथा सिंगलर नामक मनोवैज्ञानिकों ने किया था। विभिन्न परीक्षणों के आधार पर इन मनोवैज्ञानिकों ने निष्कर्ष प्राप्त किया कि विषय-वस्तु को प्रस्तुत करने की अवधि तथा वातावरण में विद्यमान प्रकाश की तीव्रता व्यक्ति के अवधान के विस्तार को प्रभावित करने वाले उद्दीपन सम्बन्धी मुख्य कारक हैं। यदि समुचित प्रकाश में पर्याप्त समय-अवधि के लिए किसी विषय-वस्तु को प्रस्तुत किया जाए तो व्यक्ति के अवधान का विस्तार अधिक होता है। इसके विपरीत, यदि सामान्य से कम प्रकाश में कम समय के लिए विषय-वस्तु को प्रस्तुत किया जाए तो निश्चित रूप से व्यक्ति के अवधान का विस्तार कम होता है।

(2) उद्दीपकों की सार्थकता – व्यक्ति के अवधान के विस्तार को प्रभावित एवं निर्धारित करने वाला एक कारक है–सम्बन्धित उद्दीपकों की सार्थकता। विभिन्न अध्ययनों के आधार पर निष्कर्ष प्राप्त किया गया है कि सरल एवं सार्थक उद्दीपकों के सन्दर्भ में व्यक्ति के अवधान का विस्तार सामान्य रूप से अधिक होता है। यदि उद्दीपक का स्वरूप कठिन तथा निरर्थक हो तो व्यक्ति के अवधान का विस्तार सामान्य से कम होता है। व्यवहार में भी हम देख सकते हैं कि कोई भी व्यक्ति अधिक संख्या में सार्थक शब्दों पर ध्यान केन्द्रित कर सकता है, परन्तु अधिक संख्या में निरर्थक शब्दों पर ध्यान को : केन्द्रित कर पाना प्रायः कठिन होता है।

(3) उद्दीपकों की पृष्ठभूमि – व्यक्ति के अवधान के विस्तार को निर्धारित करने में सम्बन्धित विषय-वस्तु की पृष्ठभूमि द्वारा भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जाती है। इसे कारक के स्पष्टीकरण के लिए पैटर्सन तथा टिचनर नामक मनोवैज्ञानिकों ने एक परीक्षण का आयोजन किया तथा निष्कर्षस्वरूप बताया कि यदि विषय-वस्तु की पृष्ठभूमि में अधिक विरोध हो तो उस स्थिति में व्यक्ति के अवधान का विस्तार सामान्य से अधिक होता है।

(4) उद्दीपकों के मध्य पायी जाने वाली दूरी – अवधान के विस्तार के निर्धारक कारकों में एक अन्य कारक है—उद्दीपकों के मध्य पायी जाने वाली दूरी। इस कारक को जानने के लिए 1938 ई० में वुडरो नामक मनोवैज्ञानिक ने एक परीक्षण का आयोजन किया तथा निष्कर्षस्वरूप स्पष्ट किया कि यदि उद्दीपकों के मध्य दूरी कम हो तो उस स्थिति में व्यक्ति के अवधान का विस्तार प्रायः कम होता है, क्योंकि इस स्थिति में विभिन्न उद्दीपकों को पहचानने में कुछ कठिनाई होती है। इससे भिन्न यदि सम्बन्धित उद्दीपकों के मध्य पर्याप्त दूरी हो तो उन्हें सरलता से पहचाना जा सकता है। इस दशा में व्यक्ति के अवधान का विस्तार बढ़ जाता है।

(5) उद्दीपकों से पूर्व-परिचय – यदि व्यक्ति को सम्बन्धित उद्दीपकों से पूर्व-परिचय हो तो उस दशा में अवधान का विस्तार उस स्थिति से अधिक हो सकता है, जिसमें व्यक्ति का उद्दीपकों से किसी प्रकार का पूर्व परिचय न हो।

(6) व्यक्ति की आयु – व्यक्ति के अवधान के विस्तार को प्रभावित एवं निर्धारित करने वाले कारकों में एक कारक है व्यक्ति की आयु। छोटे बच्चों को अवधान का विस्तार वयस्क व्यक्तियों की तुलना में कम होता है। आयु के आधार पर अवधान के विस्तार के इस अन्तर का मुख्य कारण है आयु के साथ-साथै व्यक्ति की मानसिक क्षमताओं में वृद्धि होना। जैसे-जैसे बालक की आयु बढ़ती है, वैसे-वैसे उसकी बुद्धि, स्मृति, कल्पना एवं चिन्तन शक्ति भी बढ़ती है तथा ये सभी क्षमताएँ अवधान के विस्तार में सहायक होती हैं।

(7) व्यक्ति की रुचि – व्यक्ति की रुचि का भी उसके अवधान के विस्तार पर अनिवार्य रूप से प्रभाव पड़ता है, अर्थात् रुचि भी अवधान के विस्तार का एक निर्धारक कारक है। जो विषय व्यक्ति के लिए रुचिकर होता है, उसके सन्दर्भ में व्यक्ति का अवधान-विस्तार अधिक होता है तथा अरुचिकर विषय के सन्दर्भ में व्यक्ति को अवधान-विस्तार अपेक्षाकृत रूप से कम होता है।

(8) व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला अभ्यास – अवधान-विस्तार के निर्धारक कारकों में व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला अभ्यास भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है। यदि किसी व्यक्ति द्वारा किसी एक प्रकार की विषय-वस्तु पर पुनः-पुनः अवधान केन्द्रित करने का अभ्यास किया जाता है तो व्यक्ति के अवधान-विस्तार में क्रमशः वृद्धि हो जाती है। इससे भिन्न यदि किसी विषय-वस्तु के प्रति प्रथम बार ध्यान केन्द्रित किया जाता है, उस स्थिति में व्यक्ति के अवधान का विस्तार कम भी हो सकता है।

प्रश्न 5.
अनवधान या ध्यान-भंग से क्या आशय है? विभिन्न मनोवैज्ञानिकों द्वारा आयोजित अनवधान सम्बन्धी परीक्षणों तथा उनसे प्राप्त होने वाले निष्कर्षों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :

अनवधान या ध्यान-भंग का अर्थ

अवधान या ध्यान की स्थिति में किसी प्रकार की बाधा का उत्पन्न हो जाना ही अनवधान या ध्यान-भंग है। अवधान में किसी बाधात्मक कारक का प्रभाव पड़ना ही अनवधान है। अनवधान की दशा में व्यक्ति का ध्यान अपने विषय से हटकर कहीं ओर चला जाता है। ध्यान में बाधा पड़ जाना ही अनवधान है। सामान्य रूप से कोई प्रबल कारक ही व्यक्ति के ध्यान को भंग करता है। यह कारक कोई प्रबल उद्दीपक हो सकता है। इस प्रकार के बाधात्मक कारक को ध्यान-भंजक कहते हैं।

अनवधान सम्बन्धी परीक्षण तथा अनेक निष्कर्ष

अनवधान या ध्यान-भंग अपने आप में एक असामान्य स्थिति है तथा व्यक्ति के कार्यकलापों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने अनवधान सम्बन्धी विभिन्न परीक्षणों का आयोजन किया तथा महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष प्राप्त किये हैं। इस प्रकार के मुख्य परीक्षणों तथा प्राप्त निष्कर्षों का विवरण निम्नलिखित है –

(1) मॉर्गन द्वारा किया गया प्रयोग तथा प्राप्त निष्कर्ष – अनवधान अथवा ध्यान-भंग के विषय में व्यवस्थित अध्ययन करने के लिए मार्गन ने एक परीक्षण आयोजित किया। इस परीक्षण के अन्तर्गत उसने टाइप का कार्य करने के लिए दो प्रयोज्यों का चयन किया। इस कार्य के लिए पहले पूर्ण रूप से शान्त वातावरण उपलब्ध कराया गया तथा बाद में ऐसे वातावरण में टाइप का कार्य करवाया गया जिसमें अवधान-भंग करने वाले कारक विद्यमान थे।

इस परीक्षण का सूक्ष्म निरीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि कार्य करते समय यदि ध्यान में बाधक कोई कारक प्रबल हो जाता है तो तुरन्त व्यक्ति की कार्य करने की दर घट जाती है, परन्तु जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, वैसे-वैसे व्यक्ति की कार्य करने की दर में क्रमशः वृद्धि होने लगती है तथा बाद में अवधान-भंजक कारक के होते हुए भी व्यक्ति सामान्य गति से कार्य करने लगता है। इस परीक्षण के आधार पर मॉर्गन ने एक निष्कर्ष भी प्राप्त किया जोकि सामान्य के विपरीत था। यदि किसी व्यक्ति को प्रबल अवधान-भंजक कारक की उपस्थिति में पर्याप्त समय तक कार्य करने का अभ्यास हो और यदि उसे एकाएक पूर्ण रूप से शान्त वातावरण उपलब्ध करा दिया जाए तो इस परिवर्तित दशा में भी व्यक्ति की कार्य करने की दर घट जाती है।

(2) स्मिथ द्वारा किया गया प्रयोग एवं प्राप्त निष्कर्ष – स्मिथ नामक मनोवैज्ञानिक ने अनवधान सम्बन्धी एक प्रयोग के अन्तर्गत कुछ विषय-पात्रों को अंकों की जाँच को कार्य सौंपा तथा इस दौरान किसी प्रबल ध्यान-भंजक कारक का पदार्पण किया गया। इस प्रयोग के अन्तर्गत जो निष्कर्ष प्राप्त हुए वे इस प्रकार थे-ध्यान-भंजक कारक की उपस्थिति में अर्थात् अनवधान की दशा में व्यक्ति ने अपना कार्य सामान्य से कुछ तीब्र गति से पूरा कर लिया, परन्तु कार्य में होने वाली त्रुटियाँ सामान्य दशा में होने वाली त्रुटियों से कुछ अधिक थीं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि अनवधान की दशा में व्यक्ति की कार्य-कुशलता घट जाती है।

(3) केण्डरिक पैरेसे द्वारा किया गया प्रयोग एवं प्राप्त निष्कर्ष – केण्डरिक पैरेसे ने ध्यान-भंजक कारक के प्रभाव को जानने के लिए एक प्रयोग आयोजित किया। उसने चुने हुए विषय-पात्रों को कोई विषय पढ़ने का कार्य सौंपा तथा वहाँ पहले कोई साधारण गीत बजवाया तथा फिर किसी अत्यधिक लोकप्रिय संगीत को बजवाया। इस परीक्षण के दौरान पाया गया कि साधारण गीत बजने की दशा में सम्बन्धित व्यक्तियों की पढ़ने की क्रिया पर कुछ प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, परन्तु लोकप्रिय संगीत बजने की दशा में पढ़ने की क्रिया पर किसी प्रकार प्रतिकूल प्रभाव नहीं देखा गया।

(4) फोर्ड द्वारा किया गया प्रयोग तथा प्राप्त निष्कर्ष – फोर्ड ने अपने विषय-पात्रों से पहले विभिन्न कार्य साधारण परिस्थितियों में करवाये तथा बाद में उन्हीं कार्यों को किसी ध्यान-भंजक कारक की उपस्थिति में करवाया। इस परीक्षण के आधार पर फोर्ड ने अनवधान की दशा में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों का उल्लेख किया। उसने बताया कि ध्यान-भंजक कारकों की प्रबलता की दशा में व्यक्ति की पेशीय गतियों में उल्लेखनीय वृद्धि हो जाती है।

(5) होवे द्वारा किया गया प्रयोग तथा प्राप्त निष्कर्ष – होवे ने भी एक परीक्षण का आयोजन किया तथा विषय-पात्र से पहले शान्त दशाओं में कार्य करवाया तथा इसके उपरान्त ध्यान भंजक कारक की उपस्थिति में कार्य करवाया। दोनों दशाओं का विश्लेषण करने से ज्ञात हुआ कि अनवधान की अवस्था में उत्पादन की दर में कुछ कमी हुई।

प्रश्न 6.
ध्यान-विचलनसे क्या आशयै है? ध्यान-विचलन के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर :

ध्यान-विचलन से आशय

ध्यान अथवा अवधान की प्रक्रिया का व्यवस्थित अध्ययन करते समय ध्यान सम्बन्धी एक स्थिति देखने को मिलती है, जिसे ध्यान का विचलन (Fluctuation of Attention) कहते हैं। ध्यान सम्बन्धी इस दशा में व्यक्ति का ध्यान किसी एक विषय पर केन्द्रित न होकर बारी-बारी दो या अधिक विषयों (उद्दीपकों) के प्रति आकृष्ट होता रहता है। हम कह सकते हैं कि यदि व्यक्ति को ध्यान कुछ क्षण एक उद्दीपक पर केन्द्रित हो तथा कुछ क्षण किसी अन्य उद्दीपक पर केन्द्रित होने के बाद पुनः प्रथम उद्दीपक पर केन्द्रित हो जाता है तो इस दशा को अवधान का विचलन ही कहा जाएगा। वास्तव में, ध्यान या अवधान की प्रकृति ही ऐसी है कि उसमें चंचलता पायी जाती है। ध्यान का निरन्तर अधिक समय तक किसी एक विषय पर केन्द्रण सम्भव नहीं होता है। किसी उद्दीपक के प्रति व्यक्ति के ध्यान-केन्द्रण की तीव्रता स्वाभाविक रूप से ही कम या अधिक होती रहती है। ध्यान में पूर्ण एकाग्रता नहीं पायी जाती है। ध्यान की एकाग्रता का घटना-बढ़ना ही ध्यान का विचलन कहलाता है। ध्यान के विचलन का व्यवस्थित अध्ययन करने वाले मनोवैज्ञानिकों ने यह भी ज्ञात करने का प्रयास किया कि कोई व्यक्ति किसी एक उद्दीपक या विषय पर अधिक-से-अधिक कितने समय तक ध्यान को एकाग्र कर सकता है। इस प्रकार का सर्वप्रथम परीक्षण विलिंग्स द्वारा 1914 ई० में आयोजित किया गया तथा उसने निष्कर्ष प्राप्त किया कि व्यक्ति केवल दो सेकण्ड तक ही ध्यान को एकाग्र कर सकता है। दो सेकण्ड के उपरान्त ध्यान-विचलन हो जाता है। इससे भिन्न वुडवर्थ ने अपने अवधान-विचलन सम्बन्धी परीक्षण के आधार पर घोषित किया कि यदि अवधान सम्बन्धी उद्दीपक जटिल हो तो व्यक्ति अपने ध्यान को उसके प्रति 5 सेकण्ड से भी अधिक अवधि तक केन्द्रित कर सकता है। यहाँ एक अन्य स्पष्टीकरण भी प्रस्तुत किया गया। वुडवर्थ के अनुसार, जब किसी विषय के प्रति ध्यान का केन्द्रण 5 सेकण्ड या अधिक समय तक होता है तो उस अवधि में व्यक्ति का ध्यान सम्बन्धित उद्दीपक के ही भिन्न-भिन्न भागों पर विचलित हो सकता है। उदाहरण के लिए किसी सुन्दर फूल पर ध्यान का केन्द्रण करते समय उसकी भिन्न-भिन्न पंखुड़ियों या भागों पर ध्यान का केन्द्रण हो सकता है। वुडवर्थ की मान्यता से भिन्ने कुछ अन्य मनोवैज्ञानिकों ने अपने परीक्षणों के आधार पर स्पष्ट किया है कि व्यक्ति के ध्यान का केन्द्रण 6 सेकण्ड तक भी हो सकता है।

ध्यान-विचलन के मुख्य कारण

ध्यान या अवधान अपनी प्रकृति का चंचल होता है तथा निरन्तर रूप से ध्यान का विचलन होता रहता है। ध्यान की इस चंचलता या विचलन के कारणों को ज्ञात करने के लिए भी कुछ परीक्षण किये गये तथा ध्यान-विचलन के कुछ कारणों को खोजा गया। ध्यान-विचलन के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

(i) थकान अथवा सांवेदिक अनुकूलन – ध्यान-केन्द्रण अपने आप में एक विशिष्ट मानसिक प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न मानसिक क्षमताओं को अभीष्ट विषय पर केन्द्रित किया जाता है। मानसिक क्षमताओं के इन केन्द्रण से एक विशेष प्रकार की थकान होती है। इस थकान अथवा सांवेदिक अनुकूलन के कारण भी ध्यान का विचलन होता है अर्थात् थकान या सांवेदिक अनुकूलन ध्यान के विचलन को एक कारण है। ध्यान की प्रक्रिया का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया गया है कि ध्यान-केन्द्रण के समय व्यक्ति की ज्ञानेन्द्रियों को निरन्तर रूप से कार्य करना पड़ता है तथा इस प्रकार से निरन्तर कार्य करने से ज्ञानेन्द्रियों के संवेदनात्मक समायोजन में कुछ बाधा उत्पन्न होती है। ध्यान-केन्द्रण की प्रक्रिया में हमारे शरीर के वे समस्त न्यूरॉन्स थक जाते हैं, जिनके माध्यम से संवेदनाएँ ग्रहण की जाती हैं। इस प्रकार से होने वाली थकान ही ध्यान-विचलन का एक कारण है।

(ii) आँखों की गतिः – अवधान-विचलन का एक कारण आँखों की गति भी माना गया है। इस कारक का स्पष्टीकरण जानने के लिए विभिन्न परीक्षण किये गये तथा देखा गया कि आँखों की स्वाभाविक गति के कारण बार-बार सम्बन्धित उद्दीपक की प्रतिमा आँख के रेटिना के एक निश्चित भाग से हट जाती है तथा तुरन्त ही किसी अन्य स्थान पर बनने लगती है। इस प्रकार के होने वाले परिवर्तन के कारण ध्यान या अवधान का विचलन हो जाता है। इससे भिन्न एक अन्य स्पष्टीकरण के अन्तर्गत रॉबर्टसन ने अवधान के विचलन का कारण उद्दीपक के भिन्न-भिन्न भागों पर भिन्न-भिन्न मात्रा में प्रकाश का पड़ना माना है। उसके अनुसार उद्दीपक के किसी एक भाग पर अन्य भागों की तुलना में कम या अधिक प्रकाश पड़ सकता है। उद्दीपक पर प्रकाश के इस असमान वितरण के कारण अवधान का विचलन हो सकता है।

(iii) रक्त-संचालन में होने वाले विचलन – यह एक शरीरशास्त्रीय तथ्य है कि हमारे शरीर में होने वाले रक्त-संचालन में निरन्तर रूप से कुछ हल्के तथा साधारण विचलन होते रहते हैं। रक्त-संचालन में होने वाला यह विचलन ‘Traube-Hearing Wave’ कहलाता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, रक्त-संचालन में होने वाला यह विचलन भी अवधान-विचलन का ही एक कारण है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अवधान के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
या
अवधान के प्रकार सोदाहरण समझाइए।
उत्तर :
अवधान मुख्यत: तीन प्रकार का होता है। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

(1) ऐच्छिक अवधान – ऐच्छिक अवधान में व्यक्ति प्रयास करके और स्वेच्छा से किसी उत्तेजना या वस्तु की ओर अपना ध्यान केन्द्रित करता है। बाजार से पसन्द की वस्तु खरीदते समय ऐच्छिक अवधान का सहारा लिया जाता है। ऐच्छिक अवधान दो प्रकार का होता है –

(अ) अविचारित अवधान – अविचारित अवधान के अन्तर्गत साधारण-सा प्रयास करके ही व्यक्ति का ध्यान केन्द्रित हो जाता है। इस प्रक्रिया में उसे अधिक विचारपूर्ण नहीं होना पड़ता।

(ब) सविचारित अवधान – सविचारित अवधान के अन्तर्गत व्यक्ति को काफी सोच-विचार की आवश्यकता होती है। वह वस्तु की ओर ध्यान केन्द्रित करने के लिए प्रयास करता है। गणित के प्रश्नों को हल करने के लिए सविचारित अवधान चाहिए।

(2) अनैच्छिक अवधान – अनैच्छिक अवधान में किसी उत्तेजना या वस्तु की ओर व्यक्ति का ध्यान अनिच्छा से या बिना विशेष प्रयास के चला जाता है। वातावरण में होने वाला कोई धमाका हमारे ध्यान को जबरदस्ती और बिना चाहे अपनी ओर खींच लेता है। यह भी दो प्रकार का होता है

(अ) सहज अवधान – सहज अवधान में किसी वस्तु की ओर व्यक्ति का ध्यान उसकी रुचियों अथवा मूल प्रवृत्तियों के कारण आकृष्ट होता है।

(ब) बाध्य अवधान – जब हमारा ध्यान किसी उत्तेजना या वस्तु की ओर आकृष्ट होने के लिए बाध्य (विवश) हो जाए तो ऐसा अवधान, बाध्य अवधान होगा। इसके लिए उद्दीपक की प्रबल तीव्रता आवश्यक है।

(3) अनभिप्रेत अवधान – अनभिप्रेत अवधान एक विशेष प्रकार का अवधान है जिसमें व्यक्ति को विशिष्ट प्रयास की जरूरत होती है। यह अवधान ऐच्छिक होकर भी ऐच्छिक अवधान से भिन्न होता है। अनभिप्रेत अवधान के अन्तर्गत व्यक्ति किसी उत्तेजना या वस्तु पर अपनी इच्छा तथा रुचि के विरुद्ध जाकर ध्यान केन्द्रित करता है, लेकिन ऐच्छिक अवधान में व्यक्ति उस उत्तेजना या वस्तु की ओर अपनी इच्छा और रुचि के अनुकूल ध्यान केन्द्रित करने का प्रयास करता है। उदाहरणार्थ-माने लीजिए एक कवि अपनी इच्छा एवं रुचि के अनुकूल काव्य रचना में लगा है और उसी समय उसे किसी बीमार आदमी के लिए जरूरी तौर पर दवा लाने जाना पड़े तो कविता से हटकर उसका जो ध्यान दवाइयों की दुकान पर केन्द्रित होगा, उसे अनभिप्रेत अवधान कहेंगे।

प्रश्न 2.
अनवधान या ध्यान-भंग के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
अनवधान या ध्यान-भंग के मुख्य रूप से दो प्रकारों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें क्रमशः निरन्तर अनवधान या निरन्तर ध्यान-भंग (Continuous Distraction) तथा अनिरन्तर अनवधान या अनिरन्तर ध्यान-भंग (Discontinuous Distraction) के रूप में जाना जाता है। इन दोनों प्रकार के अनवधानों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है –

(1) निरन्तर अनवधान – जो अनवधान कुछ समय के लिए निरन्तर बना रहता है, उसे निरन्तर अनवधान कहते हैं। उदाहरण के लिए-तेज गति से चलने वाली रेलगाड़ी में यात्रा करने वाले यात्री रेलगाड़ी से होने वाले शोर से प्रभावित होते हैं। यह दशा निरन्तर अनवधान की दशा होती है। इसी प्रकार से औद्योगिक स्थल पर चलने वाली मशीनों के निरन्तर शोर से होने वाला अनवधान भी निरन्तर अनवधान ही होता है। निरन्तर अनवधान का व्यक्ति के कार्यों आदि पर अधिक प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। वास्तव में, निरन्तर अनवधान की उपस्थिति में व्यक्ति शीघ्र ही अपने पर्यावरण के साथ आवश्यक समायोजन स्थापित कर लेता है। इस प्रकार का समायोजन स्थापित हो जाने की दशा में व्यक्ति के द्वारा किये जाने वाले उत्पादन पर कोई विशेष प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। हम जानते हैं कि सभी कल-कारखानों में सदैव ही निरन्तर रूप से शोर होता रहता है, परन्तु वहाँ के श्रमिक एवं कर्मचारी अपनी स्वाभाविक गति एवं क्षमता के अनुसार कार्य करते रहते हैं।

(2) अनिरन्तर अनवधान – जब अनवधान में बाधा डालने वाला कोई कारक रुक-रुक कर सक्रिय होता रहता है तब उस स्थिति में होने वाले अनवधान को अनिरन्तर अनवधान कहते हैं। अनिरन्तर अनवधान एक असामान्य दशा होती है तथा इसका अधिक प्रतिकूल प्रभाव व्यक्ति के कार्यों एवं उत्पादन-क्षमता पर पड़ता है। उदाहरण के लिए-रुक-रुक कर बजने वाला हॉर्न, टेलीफोन की घण्टी, किसी द्वारा पुकारा जाना या मच्छर द्वारा डंक मारना अनिरन्तर अनवधान के कारक हैं। वास्तव में, अनवधान के अनिरन्तर बाधक कारकों के साथ व्यक्ति तुरन्त समायोजन स्थापित नहीं कर पाता; अतः उस स्थिति में व्यक्ति के कार्यों एवं उत्पादन-क्षमता पर गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अनवधान या ध्यान-भंग से बचने के लिए क्या उपाय किये जा सकते हैं?
उतर :
अनवधान या ध्यान-भंग से बचने के लिए या उसके प्रभाव को कम करने के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं –

(1) अधिक सक्रियता से कार्य करना – यदि सामान्य से अधिक सक्रियतापूर्वक कार्य किया जाए तो अवधान-मंजक कारकों के प्रभाव को कम किया जा सकता है। वैसे यह एक सत्यापित तथ्य है। कि यदि व्यक्ति अधिक सक्रियतापूर्वक कार्य करता है तो उसे सामान्य से अधिक शक्ति खर्च करनी पड़ती है।

(2) उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण अपनाना – यदि व्यक्ति ध्यान-भंजक कारक के प्रति उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण विकसित कर ले तो उस स्थिति में भी अनवधान के प्रतिकूल प्रभाव कुछ कम हो जाते हैं।

(3) ध्यान-भंजक कारक को कार्य का अंग मान लेना – यदि ध्यान-भंजक कारक को व्यक्ति अपने द्वारा किये जाने वाले कार्य के एक परिस्थितिजन्य अंग के रूप में स्वीकार कर ले तो उस स्थिति में ध्यान-भंजक कारक का प्रतिकूल प्रभाव या तो घट जाता है अथवा समाप्त ही हो जाता है।

(4) अभ्यास – अनवधान या ध्यान-भंग की दशा को प्रभावहीन बनाने का एक उपाय व्यक्ति द्वारा अभीष्ट परिस्थिति में व्यक्ति द्वारा किये जाने वाला अभ्यास भी है। यदि व्यक्ति ध्यान-भंजक कारक की उपस्थिति में निरन्तर कार्य करने का अभ्यास कर ले तो वह अनवधान के प्रतिकूल प्रभावों से बच सकता है।

प्रश्न 2.
रुचि के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
रुचि मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं –
(1) जन्मजात रुचि एवं
(2) अर्जित रुचि।

(1) जन्मजात रुचि – जन्मजात रुचि, मूल प्रवृत्तियों (Instincts) पर आधारित होती है और मनुष्य के स्वभाव तथा प्रकृति में निहित होती है। इनका स्रोत व्यक्ति के अन्दर जन्म से ही विद्यमान होता है। भोजन में हमारी रुचि भूख की जन्मजात प्रवृत्ति के कारण है। काम-वासना में रुचि होने के कारण हमारा ध्यान विपरीत लिंग की ओर आकृष्ट होता है। चिड़िया दाना खाने, गाय तथा भैंस हरा चारा खाने तथा हिंसक पशु मांस खाने में रुचि रखते हैं। जन्मजात रुचियों के कारण हैं।

(2) अर्जित रुचि – अर्जित करने का अर्थ है-उपार्जित करना (अर्थात् कमाना)। अर्जित रुचियों को व्यक्ति अपने वातावरण से ग्रहण करता है। इनका निर्माण मनुष्य के अनुभव के आधार पर होता है। मनुष्य के मन की भावनाएँ तथा आदतें इनकी आधारशिला हैं। अतः भावनाओं तथा आदतों में परिवर्तन के साथ ही इनमें परिवर्तन आता रहता है। अपने हितं या लाभ की परिस्थितियों के प्रति व्यक्ति की रुचियाँ बढ़ : जाती हैं। किसी वस्तु या प्राणी के प्रति आकर्षण के कारण उसके प्रति हमारी रुचि पैदा हो जाती है। एक फोटोग्राफर की अच्छे कैमरे में रुचि होती है तथा बच्चों की रुचि नये-नये खिलौनों में।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. मानसिक शक्तियों के लिए किसी विषय-वस्तु पर केन्द्रित करने की प्रक्रिया को ……………………. कहते हैं।
  2. मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से अवधान एक ……………………. है।
  3. अवधान अपने आप में एक ……………………. होती है।
  4. जब कोई व्यक्ति किसी विषय-वस्तु के प्रति अपना ध्यान स्वयं केन्द्रित करता है तो उसे ……………………. कहते हैं।
  5. जब किसी उत्तेजना के प्रति व्यक्ति का ध्यान बरबस केन्द्रित हो जाता है तो उसे ……………………. कहते हैं।
  6. मानसिक तत्परता अवधान के केन्द्रण में ……………………. होती है।
  7. रुचि के अभाव में विषय-वस्तु के प्रति ध्यान का केन्द्रण ……………………. होता है।
  8. समन्वयवादी विचारधारा के अनुसार रुचि और अवधान में ……………………. का सम्बन्ध है।
  9. किसी व्यक्ति द्वारा किसी एक समय में अधिक-से-अधिक जितने बाहरी उद्दीपकों को ध्यान का विषय बनाया जाता है, उसे ही ……………………. माना जाता है।
  10. रुचिकर विषयों के सन्दर्भ में व्यक्ति का अवधान-विस्तार ……………………. होता है।
  11. अवधान की स्थिति में किसी प्रकार की बाधा को उत्पन्न हो जाना ही ……………………. कहलाता है।
  12. रेलगाड़ी में यात्रा करते समय शोर के कारण होने वाले अनवधान को ……………………. कहते हैं।
  13. रुक-रुक कर बजने वाले सायरन के कारण होने वाले अनवधान को ……………………. कहते हैं।
  14. अधिक सक्रियता से कार्य करने पर अनवधान को प्रतिकूल प्रभाव ……………………. जाता है।
  15. रुचि छिपा हुआ ……………………. है।
  16. अवधान तथा रुचि परस्पर ……………………. होते हैं।

उत्तर :

  1. अवधान का ध्यान
  2. मानसिक प्रक्रिया
  3. मानसिक प्रक्रिया
  4. ऐच्छिक अवधान
  5. अनैच्छिक अवधान
  6. सहायक
  7. कठिन
  8. अन्योन्याश्रितता
  9. अवधान का विस्तार
  10. अधिक
  11. अनवधान
  12. निरन्तर अनवधान
  13. अनिरन्तर अनवधान
  14. घट
  15. अवधान
  16. पूरक

प्रश्न II.
निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
ध्यान अथवा अवधान से क्या आशय है?
उत्तर :
ध्यान अथवा अवधान एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न मानसिक शक्तियों को अभीष्ट विषय-वस्तु पर केन्द्रित किया जाता है तथा इस स्थिति में अन्य विषय-वस्तुओं की अवहेलना की जाती है।

प्रश्न 2.
अवधान की प्रक्रिया की चार मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. चंचलता
  2. चयनात्मकता
  3. मानसिक सक्रियता तथा
  4. संकुचित क्षेत्र।

प्रश्न 3.
अवधान की प्रक्रिया के कौन-कौन से पक्ष होते हैं?
उत्तर :
अवधान की प्रक्रिया एक त्रिपक्षीय प्रक्रिया है। इसके तीन विभिन्न पक्ष हैं-ज्ञानात्मक पक्ष, भावात्मक पक्ष तथा क्रियात्मक पक्ष।

प्रश्न 4.
अवधान के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
अवधान के मुख्य प्रकार हैं-ऐच्छिक अवधान, अनैच्छिक अवधान तथा अनभिप्रेत अवधान।

प्रश्न 5.
अवधान में सहायक चार बाह्य या वस्तुगत दशाओं का उल्लेख कीजिए।
या
अवधान के किन्हीं दो वस्तुगत निर्धारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
अवधान में सहायक चार वस्तुगत दशाएँ हैं-उत्तेजना का आकार, उत्तेजना की तीव्रता, उत्तेजना का स्वरूप तथा उत्तेजना की परिवर्तनशीलता।

प्रश्न 6.
अवधान में सहायक चार आन्तरिक या आत्मगत दशाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
अवधान में सहायक चार आत्मगत दशाएँ हैं—मनोवृत्ति, संवेग, रुचि तथा जिज्ञासा।

प्रश्न 7.
रुचि से क्या आशय है?
उत्तर :
रुचि किसी उत्तेजना, वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति की ओर आकर्षित होने की प्राकृतिक, जन्मजात या अर्जित प्रवृत्ति है।

प्रश्न 8.
‘रुचि की एक स्पष्ट एवं सरल परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
क्रो एवं क्रो के अनुसार, “रुचि उस प्रेरक शक्ति को कहते हैं जो हमें किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा क्रिया के प्रति ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है।”

प्रश्न 9.
कोई ऐसा कथन लिखिए जो रुचि एवं अवधान के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है।
उत्तर :
मैक्डूगल के अनुसार, “रुचि गुप्त अवधान होता है और अवधान रुचि का क्रियात्मक रूप है।”

प्रश्न 10.
रुचि के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
रुचियाँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं –
(i) जन्मजात रुचि तथा
(ii) अर्जित रुचि।

प्रश्न 11.
अवधान के विस्तार से क्या आशय है?
उत्तर :
किसी व्यक्ति द्वारा किसी एक समय में अधिक-से-अधिक जितने बाहरी उद्दीपकों को ध्यान का विषय बनाया जाता है, उसे ही अवधान का विस्तार माना जाता है।

प्रश्न 12.
अनवधान या ध्यान-भंग के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
अवधान या ध्यान की स्थिति में किसी प्रकार की बाधा का उत्पन्न हो जाना ही अनवधान या ध्यान-भंग है।

प्रश्न 13.
अनवधान या ध्यान-भंग के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
अनवधान या ध्यान-भंग के मुख्य प्रकार हैं-निरन्तर अनवधान तथा अनिरन्तर अनवधान।

प्रश्न 14.
अनवधान या ध्यान-भंग से बचने के उपाय क्या हैं?
उत्तर :

  1. अधिक सक्रियता से कार्य करना
  2. उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण अपनाना
  3. ध्यान-भंजक कारक को कार्य का अंग मान लेना तथा
  4. अभ्यास।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
व्यक्ति द्वारा अपनी मानसिक शक्तियों को अभीष्ट कार्य या विषय पर केन्द्रित करने को कहते हैं –
(क) स्मृति
(ख) चिन्तन
(ग) अवधान
(घ) प्रेरणा

प्रश्न 2.
उद्दीपक या उद्दीपकों का चयन करके उसे चेतना के मुख्य केन्द्र में लाने की प्रक्रिया को कहते हैं –
(क) अवधान
(ख) अधिगम
(ग) प्रत्यक्षीकरण
(घ) संवेदना

प्रश्न 3.
अवधान को केन्द्रित करने के लिए आवश्यक होता है –
(क) पौष्टिक आहार.
(ख) उत्तम स्वास्थ्य
(ग) मानसिक तत्परता
(घ) मधुर संगीत

प्रश्न 4.
अवधान अथवा ध्यान की प्रक्रिया की विशेषता है –
(क) चुनाव
(ख) चंचलता
(ग) मानसिक तत्परता
(घ) ये सभी

प्रश्न 5.
अवधान के प्रकार हैं –
(क) ऐच्छिक अवधान
(ख) अनैच्छिक अवधान
(ग) अनभिप्रेत अवधान
(घ) ये सभी

प्रश्न 6.
निरन्तर अनवधान की दशा में –
(क) व्यक्ति कोई कार्य नहीं कर सकता
(ख) उत्पादन की दर घट जाती है
(ग) परिस्थिति से समायोजन स्थापित करना पड़ता है।
(घ) व्यक्ति पूर्ण रूप से असामान्य हो जाता है।

प्रश्न 7.
अनिरन्तर अनवधान की दशा में
(क) उत्पादन की दर बढ़ जाती है।
(ख) उत्पादन की दर घट जाती है।
(ग) उत्पादन पूर्ण रूप से ठप हो जाता है।
(घ) उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता

प्रश्न 8.
अनवधानं या ध्यान-भंग से बचने का उपाय है –
(क) अधिक सक्रियता से कार्य करना
(ख) उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण अपनाना
(ग) अभ्यास
(घ) ये सभी

प्रश्न 9.
ध्यान-विचलन की दशा में
(क) व्यक्ति का ध्यान भिन्न-भिन्न विषयों के प्रति आकृष्ट होता है।
(ख) व्यक्ति के ध्यान का कोई विषय नहीं होता
(ग) व्यक्ति का ध्यान भंग हो जाता है।
(घ) व्यक्ति का ध्यान पूर्ण रूप से एकाग्र हो जाता है।

प्रश्न 10.
ध्यान-विचलन का कारण है
(क) थकान अथवा सांवेदिक अनुकूलन
(ख) आँखों की गति
(ग) रक्त-संचालन में होने वाले विचलन
(घ) ये सभी

उत्तर :

  1. (ग) अवधान,
  2. (क) अवधान,
  3. (ग) मानसिक तत्परता,
  4. (घ) ये सभी,
  5. (घ) ये सभी,
  6. (ग) परिस्थिति से समायोजन स्थापित करना पड़ता है,
  7. (ख) उत्पादन की दर घट जाती है,
  8. (घ) ये सभी,
  9. (क) व्यक्ति का ध्यान भिन्न-भिन्न विषयों के प्रति आकृष्ट होता है,
  10. (घ) ये सभी।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 10 Juvenile Delinquency

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 10 Juvenile Delinquency (बाल-अपराध) are part of UP Board Solutions for Class 11 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 10 Juvenile Delinquency (बाल-अपराध).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 10
Chapter Name Juvenile Delinquency
(बाल-अपराध)
Number of Questions Solved 52
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 10 Juvenile Delinquency (बाल-अपराध)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बाल-अपराध से आप क्या समझते हैं? इसे परिभाषित कीजिए। बाल-अपराधी के लक्षण बताइए।
उत्तर :
बाल-अपराध का अर्थ
(Meaning of Juvenile Delinquency)

कानून की सीमित परिधि में कानूनी नियमों को तोड़ने वाला कार्य ‘अपराध’ और ऐसे कार्य करने वाला व्यक्ति अपराधी है। ‘अपराध’ और ‘अपराधी’ के समाजशास्त्रीय अर्थ में इन शब्दों की परिधि व्यापक हो जाती है—प्रत्येक समाज-विरोधी कार्य ‘अपराध तथा उस कार्य को करने वाला व्यक्ति ‘अपराधी’ कहलाता है। मनोवैज्ञानिक सन्दर्भ में इस समाजशास्त्रीय अर्थ को ही ग्रहण कर लिया गया है। जिसमें कानूनी अर्थ भी समाहित है। उल्लेखनीय रूप से, समाज-विरोधी कार्य करने वाला व्यक्ति यदि वयस्क न होकर बालक है तो उसे ‘बाल-अपराधी’ कहते हैं। बालंक द्वारा किया गया ऐसा कोई भी कार्य जो समाज-विरोधी है और कानूनी नियमों को भी भंग कर सकता है, ‘बाल-अपराध’ कहलाता है।

यह स्पष्ट करना भी उचित है कि प्रत्येक समाज-विरोधी कार्य तो कानून-विरोधी नहीं होता लेकिन प्रत्येक कानून-विरोधी कार्य समाज-विरोधी अवश्य होता है। बाल-अपराध के अन्तर्गत दोनों ही प्रकार के कार्य सम्मिलित किये जाते हैं।

स्पष्टतः बाल-अपराध का निश्चय करने में ‘आयु’ एक प्रमुख एवं अनिवार्य तत्त्व है जिसका निर्धारण प्रत्येक देश के संविधान द्वारा किया जाता है। विभिन्न देशों में बाल-अपराध की आयु सीमा को निम्नलिखित रूप से व्यक्त किया जा सकता है –

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 10 Juvenile Delinquency 1

भारत में 18 वर्ष से नीचे के अपराधी बाल-अपराधी हैं और इनके विषय में विभिन्न राज्यों में ‘बाल-अपराध अधिनियम लागू किये गये हैं। ये अधिनियम उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक में निर्मित हो चुके हैं। जहाँ यह अधिनियम निर्मित नहीं हुआ है, वहाँ ‘रिफोर्मेट्री स्कूल अधिनियम (1897)’ लागू किया गया है। इसके अन्तर्गत बच्चों को अपराधी वातावरण से हटाकर सुधार-गृहों में रखने का प्रावधान है। मुम्बई और मध्य प्रदेश में बाल-अपराधी की अधिकतम आयु सीमा 16 वर्ष है। उत्तर प्रदेश में प्रथम अपराधी अधिनियम (First Offenders Act) लागू है, जिसके अन्तर्गत यदि 18 वर्ष से छोटा बालक पहली बार अपराध करता है तो एक ऑफिसर की निगरानी में प्रोबेशन पर छोड़ दिया जाता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि नवीनतम कानूनी संशोधनों के अनुसार अब हत्या, बलात्कार आदि जघन्य अपराधों के लिए 16 वर्ष की आयु को निर्धारित किया गया है। ऐसे बाल अपराधियों को 2 वर्ष तक सुधार-गृह में रखने के उपरान्त सामान्य अपराधियों के रूप में देखा जाता है।

बालू-अपराध की परिभाषा
(Definition of Juvenile Deliquency)

बाल-अपराध की मनोवैज्ञानिक परख उसकी कानूनी परख से भिन्न और व्यापक समझी जाती है। यही कारण है कि बाल-अपराध की मनोवैज्ञानिक परिभाषा भी उसकी कानूनी परिभाषा से कहीं अधिक व्यापक है। इस सन्दर्भ में कुछ विख्यात मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रतिपादित परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) होली के अनुसार, “व्यवहार के सामाजिक नियमों से विचलित होने वाले बालक को बाल-अपराधी कहते हैं।”

(2) न्यूमेयर ने बाल-अपराध तथा बाल-अपराधी दोनों ही के अर्थ को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। उसके अनुसार, “एक बाल-अपराधी निर्धारित आयु से कम आयु वाला वह व्यक्ति है, जो समाज-विरोधी कार्य करने का दोषी है तथा जिसका दुराचरण कानून का उल्लंघन है।’ बालअपराधी का अर्थ स्पष्ट करने के उपरान्त न्यूमेयर ने बाल-अपराध को इन शब्दों में स्पष्ट किया है, इस अपराध के अन्तर्गत एक समाज-विरोधी व्यवहार सम्मिलित होता है जो व्यक्तिगत और सामाजिक विघटन से मुक्त होता है।”

(3) सिरिल बर्ट के मतानुसार, “किसी बालक को बाल-अपराधी वास्तव में तभी मानना चाहिए जब उसकी समाज-विरोधी प्रवृत्तियाँ इतना गम्भीर रूप ले लें कि उस पर सरकारी कार्यवाही आवश्यक हो जाए।”

(4) डॉ० सेठना के कथनानुसार, “बाल-अपराध से अभिप्राय किसी स्थान-विशेष के नियमों के अनुसार एक निश्चित आयु से कम के बालक या युवक व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला अनुचित कार्य है।” ‘ .

(5) संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, “बाल-अपराधी वह नवयुवक या नवयुवती है जिसने निश्चित आयु के भीतर दण्ड विधान के अन्तर्गत अपराध किया और जिसे न्याय अदालत या बाल-कल्याण समिति जैसी संस्था के सामने पेश किया गया है ताकि उसकी ऐसी चिकित्सा का प्रबन्ध हो सके जिससे वह समाज द्वारा पुनः स्थापित यानि स्वीकृत हो जाए।

(6) भारतीय विद्वान् डॉ० सुशील चन्द्र के शब्दों में, “शैतानीपन जब एक ऐसी आदत के रूप में विकसित हो जाता है, जो समाज में प्रतिष्ठा प्रतिमान की सीमाओं को पार कर जाती है तो उससे जिस व्यवहार का उदय होता है, वही बाल-अपराध कहलाता है।”

बाल-अपराधी की विशेषताएँ या लक्षण

सैद्धान्तिक रूप से राज्य द्वारा निर्धारित किसी भी कानून के बालक द्वारा होने वाले उल्लंघन को बाल अपराध की श्रेणी में रखा जाता है, परन्तु बालकों द्वारा किये जाने वाले कुछ सामान्य कार्यों को जानना आवश्यक है। इस वर्ग के कुछ कार्य या लक्षण निम्नवर्णित हैं

  1. आमतौर पर चोरी करना। यह घर, विद्यालय या कहीं भी हो सकती है।
  2. झूठ बोलने की आदत।
  3. अधिक शैतानी करना, आवारागर्दी करना, बुरा व्यवहार करना तथा उद्दण्डता।
  4. सार्वजनिक स्थानों पर भीख माँगना।
  5. धूम्रपान तथा नशाखोरी करना एवं जुआ खेलना।
  6. समय-समय पर विद्यालय से भाग जाना।
  7. विद्यालय में वस्तुओं को नष्ट करना, तोड़-फोड़ करना तथा मार-पीट करना।
  8. सार्वजनिक रूप से नंगपाने या निर्लज्जता का प्रदर्शन।
  9. अश्लील बातें करना या दीवारों पर गन्दी बातें लिखना।
  10. लड़कियों या महिलाओं से छेड़खानी करना।
  11. समलिंगीय या विषमलिंगीय यौन-सम्बन्ध स्थापित करना।
  12. रात के समय बिना किसी उद्देश्य के सड़कों या रेलवे लाइनों पर घूमना।
  13. ऐसा कोई भी कार्य करना जिससे स्वयं को या किसी अन्य व्यक्ति को चोट पहुँच सकती
  14. अवैध कामों जैसी तस्करी या नशीली दवाओं का लेन-देन करना।

उपर्युक्त विशेषताओं और लक्षणों के आधार पर निम्नलिखित कृत्यों को बाल-अपराध के अन्तर्गत शामिल किया जा सकता है –

(1) चुनौती देने की प्रवृत्तियाँ 

  1. चोरी करना
  2. झूठ बोलना
  3. बिना किसी प्रयोजन के इधर-उधर घूमना
  4. कक्षा छोड़कर भागना
  5. लड़ाई-झगड़ा करना
  6. अन्य बालकों को चिढ़ाना
  7. स्कूल की चीजें नष्ट करना
  8. धूम्रपान करना
  9. प्रताड़ित करना
  10. ललकारना
  11. दूसरों को पीड़ा पहुँचाना
  12. दीवार पर लिखना
  13. शेखी बघारना।

(2) यौन अपराध –

  1. हस्तमैथुन
  2. समलिंगीमैथुन
  3. निर्लज्ज प्रदर्शन तथा नंगापन
  4. इच्छा रखने वाले समान आयु के विषमलिंगी सदस्य के साथ कामुक क्रिया
  5. इच्छा ने रखने वाले छोटी आयु के विषमलिंगी सदस्य के साथ कामुक क्रिया करना आदि।

प्रश्न 2.
बाल-अपराध के कौन-कौन से कारण होते हैं? बाल-अपराध के सामाजिक कारकों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
या
बाल-अपराध के सामाजिक कारणों को बताइए। इन कारणों को दूर करने के लिए घर और विद्यालय द्वारा क्या उपाय किये जा सकते हैं?
उत्तर :
आधुनिक समय में ‘बाल-अपराध’ (Juvenile Delinquency) अत्यन्त गम्भीर सामाजिक समस्या के रूप में उभर रहे हैं। विश्व के प्रायः समस्त देशों में बाल-अपराधियों की संख्या में निरन्तर तथा अबाध गति से वृद्धि हो रही है। विभिन्न कारकों के प्रभाव से बालकों की प्रवृत्ति समाज-विरोधी । कार्यों की ओर बढ़ती जा रही है। बाल-अपराध जैसे गम्भीर एवं जटिल समस्या निश्चय ही विभिन्न कारकों की क्रियाशीलतों का परिणाम है।

बाल-अपराध के कारण।
(Causes of Juvenile Delinquency)

अपराधशास्त्र की नवीन विचारधाओं के अन्तर्गत बाल-अपराध के विभिन्न कारणों को कई प्रकार से वर्गीकृत किया गया है। कुछ अपराधशास्त्रियों ने इसे दो कारकों में बाँटा है(अ) आन्तरिक कारण–इनमें शारीरिक व मनोवैज्ञानिक कारक सम्मिलित हैं। (ब) बाह्य कारण–इनमें विभिन्न सामाजिक कारण आते हैं। अमेरिकी अपराधशास्त्री लिंडस्मिथ तथा डनहेम ने इनके दो वर्ग बताये हैं – (अ) सामाजिक अपराधी तथा (ब) व्यक्तिगत अपराधी। सामाजिक अपराधी सामाजिक कारणों से तथा व्यक्तिगत अपराधी व्यक्तिगत कारणों से पैदा होते हैं। वाल्टर रैकलैस ने (अ) रचनात्मक–स्वयं व्यक्ति की संरचना में सन्निहित तथा (ब) परिस्थितिगतपरिस्थितिजन्य कारण-दो कारण बताये हैं। इसी कारण कुछ विद्वानों की दृष्टि में (i) समाजजन्य कारण तथा (i) मनोजन्य कारणों से बाल-अपराधी उत्पन्न होते हैं।

बाल-अपराध के सामाजिक कारण
(Social Causes of Juvenile Delinquency)

बाल-अपराध के सर्वप्रमुख एवं व्यापक कारक सामाजिक कारण हैं। समाज की कुछ परिस्थितियाँ बालक को अपराधी बनने के लिए मजबूर कर देती हैं; इसीलिए इन्हें परिस्थितिजन्य अथवा समाजजन्य कारण भी कहा जाता है। बाल-अपराध के प्रमुख सामाजिक कारण निम्नलिखित हैं।

(1) परिवार – परिवार एक आधारभूत सामाजिक संस्था है जो सामाजिक नियन्त्रण के लिए अत्यन्त शक्तिशाली साधन भी है। परिवार की सामान्य परिस्थितियाँ यदि अपराध के विरुद्ध सुरक्षा कवच का कार्य करते हैं तो इसके विपरीत परिवार की असामान्य परिस्थितियाँ बालक के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा उपस्थित करती हैं। कभी-कभी परिवार ही ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देता है। जिनसे विवश होकर बालक अपराध करता है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री इलियट तथा मैरिल ने बाल-अपराध का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण परिवार का दुष्प्रभाव माना है। हीली तथा ब्रोनर ने अमेरिका में घनी आबादी वाले शिकागो एवं बोस्टन नगर के 4000 बाल-अपराधियों का अध्ययन किया। इनमें से 20% वे किशोर थे जो पारिवारिक परिस्थितियों के दुष्प्रभाव से अपराधी बने थे। परिवार की वे प्रमुख परिस्थितियाँ जिनसे प्रेरित होकर बालक अपराध करता है निम्नलिखित हैं

(i) भग्न परिवार – ऐसा परिवार जिसमें पति-पत्नी में मतैक्य न हो, उनमें पृथक्करण हो गया हो, एक ने दूसरे को तलाक दे दिया हो या दोनों में से कोई एक मर गया हो अथवा अन्य किसी कारण से परिवार अपूर्ण हो तथा उसमें संगठन का अभाव हो, भग्न परिवार कहलाता है। इन परिवारों में बालकों की उपेक्षा होने लगती है, उनकी इच्छाएँ या आवश्यकताएँ अधूरी रहती हैं तथा उनमें विचारों के संघर्ष उठा करते हैं। ऐसे अस्थिर मन और असन्तुलित व्यक्तित्व के कारण वे अनुचित एवं अनैतिक कार्य कर बैठते हैं। अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि अधिकांश बाल-अपराधी भग्न परिवारों की देन हैं।

(ii) अन-अपेक्षित एवं अधिक बच्चे – अधिक बच्चों वाले परिवार में बालक की उपेक्षा स्वाभाविक है। एक शोध कार्य का निष्कर्ष था कि 6 बच्चों वाले 336 परिवारों में 12% बच्चे अपराधी बने गये। अन-अपेक्षित बालक असामान्य दशाओं में पलते हैं। कभी-कभी अपने माता-पिता के सान्निध्य से वंचित रहकर उन्हें किसी अनाथालय आदि की शरण लेनी पड़ती है; अत: उन्हें माता-पिता का लाड़-प्यार नहीं मिल पाता। इसके अतिरिक्त उन्हें समाज की घृणा ही सहनी पड़ती है। इसके फलस्वरूप संवेगात्मक संघर्ष के कारण उनका मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है और वे अपने विरोधी पक्ष के प्रति असामान्य व उग्र व्यवहार प्रदर्शित करने लगते हैं। परिवार में अधिक बच्चों या अन-अपेक्षित बच्चों की सामान्य आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं हो पातीं जिनकी क्षतिपूर्ति वे अपराधों द्वारा करते हैं।

(iii) माता-पिता का असमान या उपेक्षापूर्ण व्यवहार – माता-पिता को बच्चों का साथ असमान या उपेक्षापूर्ण व्यवहार भी अपराध का कारण बनता है। प्रायः माता-पिता सबसे बड़े या सबसे छोटे बच्चो को अधिक लाड़-प्यार करते हैं जिससे वह बच्चा स्वयं को दूसरों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण समझने लगता है और अपने अधिकारों के प्रति आवश्यकता से अधिक जागरूक हो जाता है। दूसरे भाई-बहन ‘स्वयं को तिरस्कृत एवं उपेक्षित महसूस कर उससे ईष्र्या रखने लगते हैं। वे शनैः-शनैः असामाजिक होने लगते हैं तथा समाज-विरोधी कृत्यों द्वारा अपराध की ओर उन्मुख होते हैं।

(iv) विमाता या विपिता का दुर्व्यवहार – सौतेली माँ का दुर्व्यवहार बच्चे को घर से भाग जाने तथा बुरी संगत में फँस जाने को बाध्य करता है। माँ के प्रेम से वंचित तथा अपने को अपेक्षित समझने वाले ये बच्चे प्रतिक्रिया स्वरूप विरोध प्रकट करने के लिए समाज-विरोधी कार्यों में जुट जाते हैं। ऐसी विधवा स्त्री जिसकी पहले पति से सन्तान हों, यदि दूसरा विवाह कर लेती है तो उसकी पूर्व सन्तानों को अपने नये पिता से वांछित व्यवहार नहीं मिल पाता। ऐसी दशाओं में भी बच्चे अपराध की दुनिया में कदम रख देते हैं।

(v) परिवार के अन्य सदस्यों का अनैतिक प्रभाव – बालक अधिकांश बातें अनुकरण से सीखते हैं। अतः परिवार के अन्य सदस्यों; जैसे – बालक के भाई-बहन, चाचा, मामा, मौसी, बुआ आदि का कोई भी अनैतिक व्यवहार या समाज-विरोधी कार्य स्वभावतः उन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। प्रायः अपराधी प्रवृत्ति के बड़े भाई-बहन का आचरण छोटे बालक को अपराधी की दिशा में मोड़ देता है। मिस इलियट ने अपराधी बालिकाओं से सम्बन्धित एक अध्ययन में पाया कि 67% अपराधी लड़कियाँ अनैतिक परिवारों की थीं।

(vi) माता-पिता की बेकारी – जिन परिवारों में माता-पिता बेरोजगार होते हैं तथा धनोपार्जन नहीं कर पाते, ऐसे परिवारों में अभावग्रस्तता के कारण बच्चों को अपने निर्वाह के विषय में स्वयं सोचना पड़ता है। इन परिवारों के बच्चे, असामाजिक, अनैतिक व कानून-विरोधी कार्य करना शुरू कर देते हैं।

(2) विद्यालय – परिवार की भाँति विद्यालय भी बालक के समाजीकरण तथा सामाजिक प्रशिक्षण का एक सशक्त माध्यम है। विद्यालय की शिक्षा, साहचर्य तथा प्रशिक्षण बालक के व्यक्तित्व पर जीवन-पर्यन्त असर रखते हैं। बालक को अपराधी बनाने में विद्यालय का भी बड़ा योगदान है। आदर्शात्मक व्यवहार को विकसित करने का अभिकरण समझी जाने वाली ‘कुंछ शिक्षा संस्थाएँ तो बाल-अपराधों के प्रशिक्षण केन्द्र का कार्य कर रही हैं। विद्यालयों की शिक्षा न तो बालकों के लिए रुचिपूर्ण है और न ही सार्थक विद्यालय बालकों को अपनी ओर आकर्षित नहीं करता, बल्कि अधिकांश बालकों के लिए वह दिन का कारावास है। अमनोवैज्ञानिक शिक्षण, शिक्षक का दुर्व्यवहार, दुरूह पाठ्यक्रम, कठोर अनुशासन और दण्ड बालक को स्कूल से भागने के लिए प्रेरित करता है। स्कूल से भागा हुआ बच्चा आवारागर्दी करता है; वह चोरी, लड़ाई-झगड़ा, फिल्म तथा यौन अपराधों की शरण लेता है। अधिकांश किशोर पेशेवर अपराधियों के चंगुल में फंस जाते हैं। बहुत-से विद्यालयों के किशोर मादक द्रव्यों का सेवन करते हैं तथा उसी के दुश्चक्र में फंसकर अपराधी बन जाते हैं। स्पष्टत: आज के विद्यालयों का वातावरण बाल-अपराधियों की संख्या में वृद्धि करने वाला है।

(3) अपराधी क्षेत्र या समुदाय – कुछ सामाजिक क्षेत्र अथवा समुदाय ऐसे हैं जहाँ कोई सामाजिक नियम लागू नहीं होता जिसके परिणामस्वरूप वहाँ अपराधियों तथा अपराधों की संख्या बढ़ जाती है। भिन्न-भिन्न बस्तियों में बाल-अपराध की भिन्न-भिन्न दर पायी जाती है। महानगरों की झोंपड़-पट्टियाँ (Slums) अस्थिर बस्तियाँ होती हैं, इनमें सबसे निचले वर्ग के गरीब और अशिक्षित लोग रहते हैं। इन स्थानों पर निर्धनता, अशिक्षा, बीमारी, पारिवारिक विघटन, मानसिक विकार आदि की विषम परिस्थितियाँ बनी रहती हैं तथा मनोरंजन के स्वस्थ साधनों का पूर्ण अभाव रहता है। इन्हीं कारणों से यहाँ अपराध पनपते हैं और अपराधी लोग शरण भी पाते हैं। अपराध की दर बस्ती की सघनता के साथ चलती है। कम बसी हुई बस्तियों में कम अपराध तथा घनी बसी हुई बस्तियों की अपराध दर अधिक होती है। कुछ नगरों में विशेष रूप से अपराध-क्षेत्र बन जाते हैं; जैसे-लालबत्ती क्षेत्र जो वेश्यावृत्ति का स्थान होता है। यहाँ चोर-उचक्के, जुआरी, जेबकतरे, दलाल तथा विभिन्न असामाजिक धन्धे करने वाले बहुतायत से मिलते हैं। इन क्षेत्रों से सम्बन्धित बालक इसके गम्भीर दुष्प्रभाव से नहीं बच पाते। इसके अतिरिक्त पुलिस के रिकॉर्ड में कुछ अपराधी जातियों, जिन्हें जरायमपेशा जातियाँ कहते हैं, दर्ज होती हैं। इनके लिए अपराध एक पेशे के रूप में मान्य हैं; अत: इनके अनुभवी व बुजुर्ग लोग अपने बालकों को चोरी, उठाईगिरि, सेंध लगाना तथा जेब काटना आदि स्वयं सिखाते हैं।

(4) बुरी संगति – बुरी संगति बालक को अपराध की ओर ले जाती है। जिन घरों के पड़ोस में चोर-उचक्के, गुण्डे, शराबी या वेश्याओं का निवास होता है, उनसे प्रभावित बालक उन्हीं की तरह की क्रियाएँ करने लगते हैं। चरित्रहीन एवं अनैतिक प्रौढ़ों के सम्पर्क में रहने वाले बालकों में गन्दी आदतें पड़ जाती हैं। कुछ प्रौढ़ समलिंगी दुराचार के आदी होते हैं तथा छोटी आयु के बालकों को अपना शिकार बनाते हैं। ऐसे बालक जल्दी ही यौन विकारों के शिकंजे में फंस जाते हैं। इसी प्रकार समवयस्क साथियों की बुरी संगति भी बालक को आवारा और अपराधी बना देती है।

(5) सामाजिक विघटन – समाज के विघटन की स्थिति में नैतिक मूल्यों के टूटने से व्यक्ति का विघटन प्रराम्भ हो जाता है जिसके फलस्वरूप बाल-अपराधियों की संख्या बढ़ने लगती है। सामाजिक विघटन के बहुत-से कारण हैं; जैसे—भूकम्प, तूफान, बाढ़, सूखा एवं अन्य प्राकृतिक कारण, युद्ध, औद्योगीकरण तथा आर्थिक कारण। इन कारणों से मुसीबत और यातनाओं के शिकार लोग समाज की प्रथाओं, परम्पराओं, रीति-रिवाजों तथा मूल्य का खुलेआम उल्लंघन करते हैं और अपराध करने लगते हैं। उनका अनुकरण करके बालक भी कानून तोड़ते हैं और अपराधोन्मुख होते हैं।

(6) स्वस्थ मनोरंजन का अभाव – मनोरंजन के स्वस्थ एवं उपयुक्त साधनों का बालक के व्यक्तित्व के विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। मनोरंजन के साधनों का अभाव या उनका दूषित होना बालक के हित में नहीं है। आजकल फिल्में मनोरंजन का सर्वसुलभ और सबसे सस्ता साधन समझी जाती हैं। किन्तु; फिल्मों में दर्शायी गयी हिंसा, मारधाड़, अश्लीलता तथा समाज-विरोधी कार्यों के तौर-तरीके बालक-बालिकाओं के अपरिपक्व मस्तिष्क को प्रदूषित करते हैं। इनसे स्वस्थ मनोरंजन के स्थान पर असामाजिक कृत्य, गन्दी भाषा, कामुकता तथा अपराधी प्रवृत्तियाँ ही प्राप्त होती हैं। बर्ट द्वारा किये गये एक अध्ययन के अनुसार 7% बाल-अपराधी फिल्मों के बेहद शौकीन थे। जहाँ एक ओर मनोरंजन के दूषित साधन बालकों को अपराध की दिशा में मोड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्वस्थ मनोरंजन का अभाव भी अपराध बढ़ाने में सहायक है। मनोरंजन के अभाव में बालक ऐसे अनुचित साधनों से मन बहलाने लगते हैं जिनसे न केवल उनका समय व्यर्थ होता है, बल्कि उनमें असामाजिक प्रवृत्तियाँ भी उभरती हैं। ऐसे बालक सड़कों पर आवारा घूमते हुए, खेलकूद मचाते हुए, काँच की गोलियाँ खेलते हुए, भाँडों का नाच देखते हुए या जुए जैसे खेलों में रत पाये जाते हैं। बर्ट का यह निष्कर्ष उचित ही है कि सबसे ज्यादा बाल-अपराधी सड़कछाप मनोरंजन द्वारा बनते हैं।

(7) स्थानान्तरण – नौकरीपेशे वाले बहुत-से माता-पिता जल्दी-जल्दी एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरित होते रहते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनके बालकों में उच्छृखलता बढ़ जाती है। ऐसे बालक छात्रावासों से, मकान मालिकों के घरों से या पास-पड़ोस सम समाज-विरोधी कार्यों की दीक्षा लेते हैं और धीरे-धीरे निजी अपराध-क्षेत्र का विकास कर लेते हैं। जॉन स्टुअर्ट मिल द्वारा किये गये एक अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार बाल-अपराधी स्थानान्तरण वाले क्षेत्रों में बहुतायत से पाये जाते हैं।

(8) युद्ध – युद्ध भय एवं आतंक से युक्त समाज की एक आपात स्थिति है। इस स्थिति में तथा इसके बीत जाने पर बाल-अपराध की दरें बढ़ जाती हैं। युद्ध में हिंसा का खुला प्रदर्शन किशोरों के मन में सोती हुई हिंसक प्रवृत्तियों को जगा देता है जिससे हत्या व लूटमार को बढ़ावा मिलता है। युद्धकाल में सैनिकों और उनके परिवारजनों की भारी व्यस्तता के कारण बालकों पर से नियन्त्रण कम हो जाता है। इसके परिणामत: किशोर-किशोरियों को आपस में सम्पर्क करने की पूरी छूट मिल जाती है और यौन-अपराध होने लगते हैं। युद्ध के दौरान खाली मकानों में होने वाली लूटमार तथा आगजनी आदि प्राय: किशोरों द्वारा ही सम्भव है। स्पष्टतः युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियाँ भी बाल-अपराध को जन्म देती

सामाजिक कारणों से छुटकारा दिलाने में घर एवं विद्यालय का योगदान

समाज-वैज्ञानिकों के अनुसार घर या परिवार समाज की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संस्था है। घर का शान्त एवं स्वस्थ वातावरण, बालक के अनुकूल आन्तरिक परिस्थितियाँ तथा समृद्ध परम्पराएँ बालक में स्वस्थ दृष्टिकोण का विकास करती हैं। सुसंस्कारित घर में पालित-पोषित बालक समाज का उपयोगी नागरिक बनाता है; अत: घर के मुखिया तथा अन्य सदस्यों को भरपूर प्रयास करना चाहिए कि घर का वातावरण व आन्तरिक परिस्थितियाँ हर प्रकार से बालक के अनुकूल हों।

माता-पिता तथा बालकों के आपसी सम्बन्ध भी बालकों के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसी प्रकार मातृविहीन, पितृविहीन अथवा इकलौते बालक वाले परिवारों की संरचना समस्याग्रस्त हो सकती हैं जो बालक के व्यवहार को समस्यामूलक बना देती हैं। माता-पिता को चाहिए कि वे अत्यधिक प्यार, घोर नियन्त्रण, तिरस्कार या किन्हीं बच्चों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार–सभी प्रकार के सम्बन्धों के दोषों से बचें। बच्चों को जीवन की वास्तविकताओं से साक्षात्कार के अवसर मिलने चाहिए तथा उनमें आत्मानुशासन विकसित करने का अभ्यास कराया जाना चाहिए।

घर में बालक के विकास में जिस भूमिका का निर्वाह माता-पिता करते हैं, वही भूमिका विद्यालय में शिक्षक निभाता है। विद्यालय में बालक के व्यवहार को प्रभावित करने वाले तीन प्रधान तत्त्व हैं-शिक्षक, वातावरण तथा उसके मित्र। शिक्षक की क्रियाएँ बालक में स्वस्थ प्रौढ़ता को जन्म दें। विद्यालय का वातावरण बालक के अनुकूल हो और उसे आकर्षित करे। बालक के मित्र चरित्रवान तथा अध्ययनशील हों। यदि स्कूल की परिस्थितियाँ बालक के अनुकूल होंगी, शिक्षक उसकी पढ़ाई में कमजोरी सम्बन्धी दुर्बलताओं को दूर करेंगे, उनकी उपेक्षा नहीं होगी तथा विद्यालय में अनुशासन के विशिष्ट नियमों का पालन होगा तो बालक में अध्ययन के प्रति लगाव उत्पन्न होगा। इसके अतिरिक्त विद्यालय के शिक्षकों को पारस्परिक कलह या अवांछनीय (राजनीतिक) व्यवहार से भी बचना चाहिए। इस भाँति घर तथा विद्यालय उन सभी सामाजिक कारकों से बालक को छुटकारा दिलाने में भारी योगदान कर सकते हैं जो उसे अपराध जगत् की ओर ठेल देते हैं।

प्रश्न 3.
बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारणों पर प्रकाश डालिए। घर और विद्यालय में क्या उपाय अपेक्षित हैं जिससे बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारणों से छुटकारा पाया जा सके? आपका उत्तर व्यावहारिक हो और प्रतिदिन के जीवन पर आधारित हो।
या
बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारणों को बताइए। इन कारणों को दूर करने के लिए घर और विद्यालय क्या उपाय कर सकते हैं?
उत्तर :
बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारण
(Psychological Causes of Juvenile Delinquency)

बाल-अपराध के सामाजिक एवं आर्थिक कारणों के समान ही मनोवैज्ञानिक कारण भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। मन; व्यक्ति के समस्त आचरण और व्यवहार का मूल कारण है। स्वाभाविक रूप से मन का विकार अपराध का कारण बन सकता है।

बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारणों की खोज की जीवन-वृत्त विधि एवं मनोविश्लेषण विधि के आधार पर अध्ययन के उपरान्त ज्ञात होता है कि बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारणों का (क) मानसिक या बौद्धिक कारण, (ख) संवेगात्मक कारण, (ग) व्यक्तित्व की विशिष्टताएँ तथा (घ) विशेष प्रकार के मानसिक रोग शीर्षकों के अन्तर्गत उल्लेख किया जा सकता है। बाल-अपराध के प्रमुख मनोवैज्ञानिक कारण निम्नलिखित हैं(क) मानसिक या बौद्धिक कारण मानसिक या बौद्धिक कारणों में अनेक कारण सम्मिलित हैं, जिनमें प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

(1) मानसिक हीनता – अपराधियों में मानसिक हीनता बहुत अधिक होती है। गिलिन एवं गिलिन ने इसके समर्थन में कहा है कि “मानसिक दुर्बलता अपराधी बनाने में एक शक्तिशाली कारक है। सामान्य बुद्धि की कमी से युक्त बालक किसी भी कार्य की अच्छाई-बुराई या उसके परिणामों के विषय में भली प्रकार नहीं सोच सकते, उनकी चिन्तन शक्ति ठीक से काम नहीं करती। मानसिक दृष्टि से दुर्बल बालक समाज से अपना उचित समायोजन करने तथा अच्छे ढंग से आजीविका कमाने में असमर्थ रहते हैं और अपनी आवश्यकताओं की समुचित पूर्ति नहीं कर पाते। ऐसे बालक अपने स्वार्थ की सिद्धि गलत उपायों से करने लगते हैं और अपराध की ओर उन्मुख हो जाते हैं।’

(2) अति तीव्र बुद्धि – आधुनिक मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार केवल बुद्धि की दुर्बलता को अपराध का कारण स्वीकार नहीं किया जा सकता। टरमेन ने तीव्र बुद्धि वाले बालकों से सम्बन्धित अध्ययन के आधार पर कहा है कि ऊँचे प्रकार के अपराधी तथा गिरोहों के सरदार सामान्य से काफी ऊँचे बुद्धि स्तर वाले होते हैं। अति तीव्र बुद्धि वाले बालक अपराध के नये तरीके खोजने तथा पुलिस को धोखा देने में भी माहिर होते हैं और इसीलिए ये गिरोह के सरगना बन जाते हैं। इस भाँति तीव्र बुद्धि का बाल-अपराध से सीधा सम्बन्ध है।

(3) मानसिक योग्यताओं का निम्न स्तर – व्यक्ति में निहित मानसिक योग्यताएँ जीवन के विविध कार्यों में व्यक्ति की सहायता करती हैं तथा उसके समायोजन में सहायक होती हैं। किसी बालक में कार्य-विशेष की पूर्ति हेतु वांछित योग्यताओं में कमी उसे गलत मार्ग अपनाने तथा अपराध करने की प्रेरणा देती है।

(ख) संवेगात्मक कारण

विभिन्न संवेगात्मक कारणों में से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

(1) अति संवेगात्मकता – कुछ बालक भावना-प्रधान होते हैं। संवेगात्मक स्थिति में विवेक उनका साथ नहीं देता और वे उचित-अनुचित का निर्णय लिये बिना बड़े-से-बड़ा अपराध कर बैठते हैं। बर्ट ने अपने अध्ययन में 9% बाल-अपराधियों में तीव्र संवेगात्मकता प्राप्त की है। सर्वशक्तिमान संवेग दो हैं-क्रोध और कामुकता। क्रोध के आधिक्य में बालक का व्यवहार आक्रामक होता है तथा कामुकता की अधिकता में वे काम-सम्बन्धी अपराध कर बैठते हैं।

(2) स्वभावगत अस्थिरता – इस विशेषता के कारण व्यक्ति किसी एक सिद्धान्त या बात पर टिक नहीं पाता और उसके व्यवहार का मानदण्ड परिवर्तित होता रहता है। बर्ट द्वारा 34% अपराधी बालकों में स्वभावगत अस्थिरता बतायी गयी। यह अस्थिरता बालक में उसके शैशव की प्रतिकूल परिस्थितियों; जैसे-असुरक्षा भावना, स्नेह व सहानुभूति का अभाव, कठोर अनुशासन व दण्ड विधान, प्रारम्भ से अपर्याप्तता/हीनता की भावना, नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ तथा असन्तोष व विद्रोहात्मक प्रवृत्ति आदि; के कारण उत्पन्न होती है जिसके परिणामतः वह नैतिक मूल्यों का परित्याग और असामाजिक कार्य करने लगता है।

(3) समायोजन दोष – बालक अपने अहम्, नैतिक मन तथा इदम् के मध्य साम्य स्थापित करने की कोशिश करता है। यदि बालक का अहम् (Ego) तथा नैतिक मन (Super Ego) कमजोर पड़ जाते हैं तो साम्य स्थापित नहीं हो पाता और समायोजन सम्बन्धी दोष उत्पन्न होने लगते हैं। समायोजन के दोष बालक को गलत राह के लिए अभिप्रेरित करते हैं।

(4) भावना ग्रन्थियाँ एवं मनोविक्षेप – पारिवारिक एवं सामाजिक निषेधों के कारण बालकों और किशोरों को अपनी इच्छाओं, प्रवृत्तियों तथा भावनाओं आदि का दमन करना पड़ता है। दबी हुई इच्छाएँ और प्रवृत्तियाँ भावना ग्रन्थियों (Complexes) को जन्म देती हैं जो उनके अचेतन मन में जाकर बस जाती हैं। शनैः-शनैः मानसिक संघर्ष और भावना ग्रन्थियाँ उनमें मनोविक्षेप (Psychoneuroses) को जन्म देती हैं। बालकों में समाज के प्रति विद्रोह के भाव जगने लगते हैं। ये उन्हें बदले की भावना से भर देते हैं। इसका परिणाम बाल-अपराधों के रूप में सामने आता है। बर्ट ने अपने अध्ययन में 75% अपराधी बालकों को भावना ग्रन्थियों तथा मानसिक संघर्षों से ग्रसित पाया।

(5) किशोरावस्था के परिवर्तन – किशोरावस्था में व्यक्ति में उत्पन्न होने वाले शारीरिक, मानसिक और संवेगात्मक परिवर्तन परिस्थितियों से उनका सन्तुलन बिगाड़ देते हैं। स्टैनली हाल ने उचित ही कहा है, ‘किशोरावस्था बल एवं तनाव, तूफान एवं विरोध की अवस्था है।’ उन्होंने इसे ‘अपराध की अवस्था (Criminal Age) का नाम दिया है, क्योंकि मानसिक-सांवेगिक तनाव एवं असन्तुलन की स्थिति में वे बिना सोचे-समझे समाज-विरोधी कार्य कर बैठते हैं। इस प्रकार किशोरावस्था के क्रान्तिकारी परिवर्तन बाल-अपराधों को जन्म दे सकते हैं।

(6) मनोवैज्ञानिकं आवश्यकताओं की पूर्ति न होना – प्रत्येक बालक और किशोर की कुछ जन्मजात एवं अर्जित मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ हैं; जैसे-आत्मप्रदर्शन, प्रेम, सुरक्षा, काम आदि। इनकी सामान्य ढंग से पूर्ति या तृप्ति न होने पर बालक में कुण्ठा का जन्म होता है जिसके फलस्वरूप उसमें हीनता, क्रोध तथा आक्रमण की भावना जन्म लेती है। इसके अतिरिक्त दूसरी अनेक असामाजिक प्रवृत्तियाँ भी उत्पन्न होती हैं और बालकअपराध की ओर प्रवृत्त होता है।

(ग) व्यक्तित्व की विशिष्टताएँ

प्रमुख मनोवैज्ञानिकों एवं अनुसन्धानकर्ताओं ने बाल-अपराधियों से सम्बन्धित अपने अध्ययनों के अन्तर्गत उनके व्यक्तित्व में कुछ विशिष्टताओं को पाया है। बाल-अपराधियों में सामान्य बालकों से भिन्नता रखते हुए ये गुण मुख्य रूप में मिलते हैं –

  1. अत्यधिक हिंसात्मक प्रवृत्ति
  2. अनियन्त्रण एवं असंयम
  3. स्वच्छन्द स्वभाव
  4. अनुशासन का अभाव
  5. अस्थिरता, निर्णय न ले सकना तथा मानसिक अशान्ति
  6. विद्रोही नकारात्मक व्यवहार
  7. शंकालु स्वभाव
  8. दूसरों को पीड़ित करके सुख पाना
  9. सांवेगिक अपरिपक्वता
  10. बहिर्मुखी स्वभाव तथा
  11. समाज से कुसमायोजन।

अपराध करने वाले बालक के व्यक्तित्व की ये विशेषताएँ उसे सामाजिक परिस्थितियों व स्वीकृत मानदण्डों से समायोजित नहीं होने देतीं और वह कुसमायोजन का शिकार हो जाता है। कुसमायोजित बालक में धीरे-धीरे अन्य मानसिक विकार उत्पन्न हो जाते हैं जो उसे अपराध की ओर उन्मुख करते हैं।

(घ) विशेष प्रकार के मानसिक रोग

टप्पन, ग्लूक एवं ग्लूक सहित अनेक मनोवैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि कुछ विशेष प्रकार के . मानसिक रोगों से ग्रस्त रोगी भी अपराध किया करते हैं। इन मानसिक रोगों का वर्णन अग्र प्रकार है –

(1) मनोविकृति – बालपन में स्नेह, सहानुभूति, प्रेम तथा नियन्त्रण के अभाव, अन्यों के दुर्व्यवहार से मिली पीड़ा व यन्त्रणा तथा वंचना के कारण उत्पन्न मनोविकृति का मानसिक रोग बालक और किशोर को शुरू से ही समाज-विरोधी, निर्दयी, ईष्र्यालु, झगड़ालू, शंकालु, द्वेष तथा प्रतिशोध की भावना से युक्त बना देता है। ऐसे बालक सामान्य से उच्च बौद्धिक स्तर वाले तथा आत्मकेन्द्रित प्रकृति के होते हैं तथा बिना किसी प्रायश्चित्त के हिंसा या हत्या कर सकते हैं।

(2) मेनिया – ‘मेनिया’ एक प्रकार का पागलपन है जिसका उपचार सम्भव होता है। यह अनेक प्रकार का है; जैसे—आग लगाने, चोरी करने तथा तोड़-फोड़ का मेनिया। मेनिया से ग्रस्त बालक अपराध करने लगते हैं और धीरे-धीरे अपराध के आदी हो जाते हैं।

(3) बाध्यता – इस मानसिक रोग से पीड़ित बालक ऐसे कार्य करने के लिए बाध्य होता है जो उसके अवचेतन में निर्मित ग्रन्थि से सम्बन्धित हैं, लेकिन बालक को इस बात का पता नहीं होता, वह तो बस बाध्य या विवश होकर उस हानिकारक कार्य को करता जाता है। इन कार्यों में आग लगाना, तोड़-फोड़ करना तथा सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाना आदि सम्मिलित हैं। स्पष्टत: बाध्यता का मनोरोग भी बाल-अपराध का एक मुख्य कारण है।

मनोवैज्ञानिक कारणों से मुक्ति हेतु घरं एवं विद्यालय द्वारा किये जाने वाले उपाय

बालक अपने आरम्भिक जीवन को दो ही स्थानों पर अधिकांशतः व्यतीत करता है—इनमें पहला स्थान घर का है और दूसरा विद्यालय का। अपराध की दुनिया में कदम रखने वाले बालक विभिन्न मनोवैज्ञानिक कारणों एवं मानसिक दशाओं से उत्प्रेरित हो सकते हैं। इन कारकों एवं दशाओं का सीधा सम्बन्ध घर-परिवार और विद्यालय के वातावरण से होता है; अतः घर एवं विद्यालय, बाल-अपराध से सम्बद्ध मनोवैज्ञानिक कारणों से मुक्ति हेतु अनेक उपाय कर अपनी भूमिका निभा सकते हैं।

परिवार के प्रौढ़ एवं उत्तरदायी सदस्यों को चाहिए कि वे घर के बालक को एक खुली किताब समझें और उसकी योग्यताओं, क्षमताओं, आदतों, रुचियों, अभिरुचियों तथा उसके व्यक्तित्व के प्रत्येक पक्ष का आकलन करें। बालक के साथ भावात्मक एवं संवेगात्मक तादात्म्य स्थापित करें और उसकी भावनाओं, इच्छाओं वे आदतों को समझकर व्यवहार करें। बालक के स्वस्थ मानसिक विकास के लिए प्रेम, सुरक्षा, अभिव्यक्ति, स्वतन्त्रता, स्वीकृति, मान्यता आदि मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ परमावश्यक हैं। इन आवश्यकताओं से वंचित रहकर बालक हीन-भावना से ग्रस्त हो जाता है और उसमें चिड़चिड़ापन, संकोच, लज्जा, भय, क्रूरता एवं क्रोध जैसी भावना पैदा हो जाती है। अन्ततोगत्वा ईष्र्या, द्वेष तथा आत्म-प्रदर्शन से अभिप्रेरित बालक में अपराधी वृत्तियाँ पनपने लगती हैं और वह अपराध करने लगता है। इसी प्रकार से घर-परिवार से अमान्य या तिरस्कृत बालक विद्रोही और आक्रामक बन जाता है। स्पष्टत: घर का दायित्व है कि वह बालक में मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के कारण कुण्ठाओं को जन्म न लेने दें।

इसी प्रकार से विद्यालय भी कुछ ऐसे उपाय अपना सकता है जिनसे किशोर बालकों को अपराध के लिए प्रेरित करने वाले मनोवैज्ञानिक कारणों से मुक्ति मिल सके। विद्यालय के बालकों की बुद्धि-लब्धि का आकलन कर उनका बौद्धिक स्तर ज्ञात किया जाना आवश्यक है। अनेकानेक मनोवैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि बालक में बुद्धि की कमी अपराध का मूल कारण है। कक्षा में दुर्बल बुद्धि, सामान्य बुद्धि तथा तीव्र बुद्धि के बालकों का वर्गीकरण कर दुर्बल बुद्धि के बालकों के साथ विशिष्ट उपचारात्मक तरीके अपनाये जाने चाहिए। इसी प्रकार तीव्र बुद्धि के बालकों के साथ भी तदनुसार व्यवहार के प्रतिमान निर्धारित किये जाएँ। कक्षा में शिक्षक का अपने छात्रों के प्रति व्यवहार आदर्श होना चाहिए। शिक्षक को न तो आवश्यकता से अधिक ढीला नियन्त्रण करना चाहिए और न ही अत्यधिक कठोर, क्योंकि दोनों ही परिस्थितियों में बालक कक्षा से बचते हैं और विद्यालय से पलायन कर जाते हैं। यह कक्षा-पलायन ही उनकी आपराधिक वृत्तियों के लिए पृष्ठभूमि तैयार कर देता है। छात्रों की अध्ययन सम्बन्धी तथा अन्य परिस्थितियों को समझा जाना चाहिए तथा उनके प्रति स्नेहपूर्ण व्यवहार प्रदर्शित किया जाना चाहिए। शिक्षक का व्यवहार अपने छात्र के प्रति ऐसा हो कि वह अपनी व्यक्तिगत समस्याएँ भी शिक्षक से अभिव्यक्त कर सके। कुल मिलाकर शिक्षक की भूमिका एक मित्र और निर्देशक की होनी चाहिए।

इस भाँति घर और विद्यालय उपर्युक्त सुझावों के आधार पर ऐसा वातावरण तैयार कर सकते हैं। ताकि बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारणों से छुटकारा मिल सके।

प्रश्न 4.
बाल-अपराध के आर्थिक कारणों को स्पष्ट कीजिए।
या
बाल-अपराध के आर्थिक कारणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
बाल-अपराध के आर्थिक कारण
(Economic Causes of Juvenile Delinquency)

आर्थिक विषमता तथा अपराधशास्त्र का अत्यन्त निकट का और गहरा सम्बन्ध है। बौंगर एवं फोर्नासिरी विर्सी के शोध-कार्य का निष्कर्ष है कि निर्धनता अपराध की प्रवृत्तियों को बढ़ावा देती है। निर्धन परिवारों के आय के अच्छे एवं पर्याप्त साधन नहीं होते जिसके फलस्वरूप उनके बच्चों की अधिकांश इच्छाएँ अतृप्त रह जाती है। इन इच्छाओं को तृप्त करने के लिए निर्धन घर के बच्चे अपराधों का सहारा लेते हैं। इसके अतिरिक्त निर्धनता के कारण उत्पन्न हीनमन्यता एवं विद्रोह की भावना के कारण भी किशोर अपराध की ओर उन्मुख होते हैं।

आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित होकर भी बालक अपराध करता है। बाल-अपराध के प्रमुख आर्थिक कारण निम्नलिखित हैं –

(1) निर्धनता – बर्ट के अनुसार, “आधे से अधिक अपराधी बालक निर्धन परिवारों के होते हैं। निर्धनता के कारणं जीवन में ऐसी अनेक परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं जो बालकों को अपराध के लिए उकसाती हैं तथा मजबूर कर देती हैं। निर्धनता के कारण बहुत-से गरीब परिवारों की आवश्यकताएँ व इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं। वे अपने आस-पास के वातावरण में लोगों को अच्छा खाता-पीता तथा आकर्षक साधनों को प्रयोग करता देखते हैं जिससे उनके अन्दर भी उन साधनों को पाने की लालसा उत्पन्न होती है। इन वस्तुओं एवं साधनों को वे अपने घर से तो प्राप्त नहीं कर पाते; अतः इन्हें वे चोरी से ठगी करके, छीनकर पाने का प्रयास करते हैं। वहीं से उनके अपराधी जीवन की शुरुआत हो जाती है।’

निर्धनता से उत्पन्न ऐसी प्रमुख असुविधाएँ तथा परिस्थितियाँ जो बाल-अपराध की मुख्य आर्थिक परिस्थितियाँ कहीं जाती हैं, निम्नलिखित हैं –

(i) भुखमरी – निर्धनता के कारण बहुत-से गरीब घरों के बच्चे भरपेट भोजन के लिए तरसते हैं। कभी-कभी तो उन्हें कई वक्त बिना भोजन के रहना पड़ता है। ऐसी विषम दशाओं में बालक आदरपूर्ति के लिए अनेक प्रकार के अपराधों की शरण लेते हैं। कहा भी गया है-‘बुभुक्षितं किं न करोति पापम–अर्थात् भूखा कौन-सा पाप नहीं करता?

(ii) अनुपयुक्त निवास-स्थान – निर्धनता के कारण गरीब लोगों को अपने बच्चों के साथ छोटे, गन्दे, सीलन-भरे, अन्धेरे तथा अस्वास्थ्यप्रद घरों में रहना पड़ता है। छोटी-सी जगह में परिवार के सभी लोग एक साथ ही रात बिताते हैं। स्त्री-पुरुष के यौन सम्बन्धों को देखकर बालक कच्ची उम्र में ही यौन सम्बन्धों को जान जाते हैं तथा उनमें रुचि रखने लगते हैं। वे एक ओर तो यौन सम्बन्धी अपराधी करने लगते हैं, दूसरी ओर इन बस्तियों के अनपढ़ तथा भ्रष्ट लोगों के बीच में रहकर अपराधों में लिप्त हो जाते हैं।

(iii) पारिवारिक संघर्ष – निर्धन एवं अभावग्रस्त परिवारों के सदस्य छोटी-छोटी बातों के लिए आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं। सांवेगिक असन्तुलन के कारण वे मानसिक विक्षोभ तथा मानसिक तनाव के शिकार हो जाते हैं। इनकी अन्तिम परिणति अपराध की ओर ले जाती है।

(iv) छोटे बालकों का नौकरी करना – निर्धन परिवारों के छोटे बालकों को मजबूरन धनी परिवारों, फैक्ट्रियों, सिनेमाघरों, होटलों तथा खेतों आदि में काम करना पड़ता है। इस वजह से वे न केवल शिक्षा से वंचित रह जाते हैं, बल्कि बीड़ी पीना, जुआ खेलना, शराबखोरी, वेश्यावृत्ति, चोरी । इत्यादि गन्दी आदतों के शिकार भी हो जाते हैं।

(2) बेकारी – जीविकोपार्जन का कोई उचित साधन न मिलने के कारण बेकार बालकों या किशोरों का मन बुरे कामों की ओर प्रवृत्त होता है। जब उन्हें माँ-बाप या अन्य परिवारजनों की कटी-जली बातें सुनने को मिलती हैं तो वे घर से भाग जाते हैं तथा अपराध करके पैसा कमाते हैं। प्रायः अशिक्षित लोग किशोर अवस्था में ही लड़कों का विवाह कर देते हैं। इन बेरोजगार युवकों को घर-गृहस्थी का बोझ उठाने के लिए नौकरी तो मिल नहीं पाती; अतः ये असामाजिक कार्यों द्वारा जीविकोपार्जन करने लगते हैं।

(3) अरुचिकर व्यवसाय – क्षमताओं के प्रतिकूल और अरुचिकर व्यवसाय में मन न लगने के कारण किशोरों को जल्दी ही थकान हो जाती है। वे व्यवसाय से असन्तुष्ट रहने के कारण चिन्तित एवं चिड़चिड़े स्वभाव वाले बन जाते हैं। इन परिस्थितियों में वे जरा-जरा सी बात पर मालिक या अधिकारी के प्रति उग्र हो उठते हैं तथा उनसे बदला लेने के लिए असामाजिक कार्य कर सकते हैं। व्यावसायिक असन्तोष से उत्पन्न मानसिक अस्थिरता के वशीभूत होकर वे कोई भी अपराध कर सकते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बाल-अपराध और साधारण अपराध में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उतर :
बाल-अपराध और साधारण अपराध दोनों ही समाज और कानून के विरुद्ध कृत्य हैं। इन दोनों के ही कारण समाज का वातावरण दूषित होता है तथा उसे हानि पहुँचती है। कुछ समानताओं के बावजूद भी विभिन्न कारणों एवं मौलिक भेदों के कारण एक ही प्रकार के कानून-विरोधी कार्य को कभी बाल-अपराध, तो कभी साधारण अपराध मान लिया जाता है बाल-अपराध तथा साधारण अपराध में निम्नलिखित अन्तर हैं –

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 10 Juvenile Delinquency 2
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 10 Juvenile Delinquency 3

प्रश्न 2.
बाल-अपराध के पर्यावरणीय कारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
बाल-अपराधियों के विकास के लिए कुछ पर्यावरणीय या सामाजिक कारक भी जिम्मेदार होते हैं। बाल-अपराध के पर्यावरणीय कारकों में सबसे मुख्य कारक है-परिवार का असामान्य वातावरण। वास्तव में बाल-अपराधी पारिवारिक विघटन के ही प्रतीक होते हैं। भग्न या विघटित परिवारों के बालक शीघ्र ही अपराधों की ओर उन्मुख हो जाते हैं। यदि परिवारों में बच्चों की संख्या अधिक हो या अन-अपेक्षित बच्चे हों तो भी उनके अपराधी बनने की आशंका बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त बच्चों के प्रति माता-पिता का उपेक्षापूर्ण व्यवहार, विमाता या विपिता का दुर्व्यवहार तथा परिवार के अन्य सदस्यों का अपराधों में लिप्त होना भी बाल-अपराध के पारिवारिक पर्यावरण सम्बन्धी कारक हैं। विद्यालय का प्रतिकूल वातावरण भी बाल अपराध का एक पर्यावरणीय कारक है। विद्यालय में अमनोवैज्ञानिक शिक्षण, शिक्षक का दुर्व्यव्यहार, दुरुह पाठ्यक्रम, कठोर अनुशासन तथा दण्ड की अधिकता के कारण बालक प्राय: स्कूल से भागने लगते हैं तथा आवारागर्दी करने लगते हैं। ये बालक शीघ्र ही बाल-अपराधों में लिप्त हो जाते हैं। इन कारकों के अतिरिक्त कुछ अन्य पर्यावरणीय कारक भी बाल अपराध के लिए जिम्मेदार हैं, जैसे कि अपराधी-क्षेत्र या समुदाय का प्रभाव, बालक की बुरी संगति, सामाजिक विघटन, स्वस्थ मनोरंजन का अभाव, अधिक स्थानान्तरण तथा युद्ध का प्रभाव।

प्रश्न 3.
बाल-अपराध के जैविकीय तथा शारीरिक कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
अनेक मनोवैज्ञानिकों तथा अपराधशास्त्रियों ने अपने अध्ययन और खोजों के आधार पर बाल-अपराधियों के जैविकीय तथा शारीरिक कारणों की पुष्टि की है। हूटन ने 668 अपराधियों तथा अपराधी की परस्पर तुलना करके बताया कि अपराध को मुख्य कारण ‘जैविकीय हीनता’ है। बर्ट, हीली व ब्रोनर, ग्ल्यूक तथा हिर्श व थर्स्टन ने संकेत दिया है कि अपराधियों में शारीरिक कारक (Physical Factors) अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। इसी प्रकार गिलिन एवं गिलिन के अध्ययनों से पता चला है कि शारीरिक दोषों के कारण बहुत-से बालक अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ हो जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप वे बहुत से समाज-विरोधी कार्यों में लग जाते हैं। अन्धापन, बहरापन, लँगड़ाना, हकलाना, तुतलाना, बहुत ज्यादा मोटे-पतले या नाटे तथा इसी तरह से विकृतियों के कारण बालक सामान्य बालकों से अलग हो जाते हैं जिससे उसके आचरण में भिन्नता आ जाती है। कुरूप, काने और लँगड़े बालकों को अक्सर लोग चिढ़ाते हैं जिसकी प्रतिक्रिया में वे असामाजिक कार्य कर डालते हैं निष्कर्षत: शारीरिक हीनता व विकृति के कारण बालक को समाज में असफलता मिलती है जो उसके अपराध का कारण बनती है।

बाल-अपराध से सम्बन्धित प्रारम्भिक अध्ययनों से ज्ञान होता है कि अपराधी बालकों में वंशानुक्रम या पैतृकता (Heredity) का भी महत्त्वपूर्ण प्रभाव होता है। वंशानुक्रम तथा पर्यावरण दोनों ही अपराध के लिए उत्तरदायी हैं। एक जन्मजात कारक है और दूसरा अर्जित कारक। बालक में कुछ जन्मजात गुण निहित होते हैं और ये गुण किन्हीं निश्चित परिस्थितियों से एक विशेष प्रकार का परिणाम देते हैं। अच्छी परिस्थतियों में अच्छा परिणाम तथा बुरी परिस्थितियों में बुरा परिणाम निकलता है। गाल्टन, गोडार्ड तथा डगडेल के निष्कर्षों से पुष्ट होता है कि वंशानुक्रम ही अपराध का प्रमुख कारण है, क्योंकि ‘ज्यूक्स’ तथा कालीकाक’ आदि अपराधी वंशों में उत्पन्न अधिकांश सन्तानें बड़ी होकर अपराधी बनीं। सीजर, लाम्ब्रोसो तथा फैरी का कथन है कि बाल-अपराधों का सम्बन्ध शारीरिक विशेषताओं से है। विभिन्न शारीरिक गुण; यथा स्नायविक संस्थान, रक्त की संरचना, ग्रन्थीय बनावट आदि वंशानुक्रम द्वारा ही संक्रमित होते हैं जिनकी विशिष्ट अवस्थाएँ बालक को अपराध करने के लिए प्रेरित करती हैं।

प्रश्न 4.
बाल-अपराध-निरोध के सन्दर्भ में सर्टीफाइड स्कूल का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
बाल-अपराध-निरोध का एक उपाय ‘सर्टीफाइड स्कूल’ है। सर्टीफाइड स्कूल ‘बाल अधिनियम’ (Children Act) के अन्तर्गत भारत के लगभग सभी राज्यों में स्थापित किये जा चुके हैं। बाल अधिनियम; बाल-अपराध-निरोध में पर्याप्त रूप से लाभदायक सिद्ध हुआ। समाज में रहने वाले बालकों की प्रवृत्ति अपराधों की ओर न जाए, इस उद्देश्य से बाल अधिनियम लागू किया गया था। सर्टीफाइड स्कूलों में छोटे-छोटे अपराध करने वाले बालकों को रखा जाता है। 14 वर्ष तक के बालक जूनियर स्टफाइड स्कूलों में तथा 14-16 वर्ष तके के बालक सर्टीफाइड स्कूलों में रखे जाते हैं। इन। स्कूलों में 5वीं से 8वीं कक्षा तक शिक्षा प्रदान की जाती है। कुछ राज्यों में बालक और बालिकाओं के अलग-अलग स्कूल हैं किन्तु कुछ राज्यों में ये स्कूल सम्मिलित प्रकार के हैं। सर्टीफाइड स्कूल महाराष्ट्र, बंगाल; आन्ध्र प्रदेश, केरल तथा तमिलनाडु में पर्याप्त संख्या में खुल चुके हैं। कुछ राज्यों में ‘स्वयं सेवी संस्थाएँ भी इस प्रकार के स्कूल चलाती हैं; यथा – महाराष्ट्र में ‘उपयुक्त व्यक्ति संस्थाएँ, कोलकाता में ‘आवारा बच्चों का शरणालय’ तथा ‘कोलकाता विजिलेन्स समिति शरणालय’, आन्ध्र प्रदेश में ‘कुटी नेल्लोडी बाल शरणालय’ तथा ‘गिन्दी बाल शरणालय’ एवं मैसूर में ‘बेलारी का सर्टीफाइड स्कूल’ आदि बाल सुधार की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

प्रश्न 5.
बाल-अपराध के उपचार के उपायों के सन्दर्भ में सुधार स्कूलों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
सुधार स्कूल के कार्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
बाल-अपराधियों के सुधार के लिए विभिन्न उपाय किये जा रहे हैं। इन उपायों में से एक मुख्य उपाय है-सुधार स्कूलों की स्थापना।’

‘रिफोमेंट्री स्कूल अधिनियम, 1897′ (Reformatory School’s Act, 1897) के अन्तर्गत भारत में चार सुधार स्कूल Reformatories of Reformatory School स्थापित किये गये। इनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है

(1) लखनऊ रिफोर्मेट्री स्कूल – उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के इस स्कूल में 9-15 वर्ष कीआयु के अपराधी बालकों को 4 से 7 वर्ष तक स्कूली शिक्षा प्रदान की जाती है। बालकों को सामान्य शिक्षा के अतिरिक्त प्रौद्योगिक शिक्षा भी दी जाती है। बालकों को बैण्ड बजाने की प्रशिक्षण भी दिया जाता है। जिसका प्रदर्शन विभिन्न अवसरों पर नगर में किया जाता है। स्कूल के बालकों को जेब खर्च दिया जाता है तथा स्कूल से बाहर जाने का अवकाश प्रदान किया जाता है।

(2) हिसार रिफोर्मेट्री स्कूल – दिल्ली, हरियाणा और पंजाब प्रान्तों से आये अपराधी बालकों के लिए हिसार (हरियाणा) में यह स्कूल स्थापित किया गया है। यहाँ 15 वर्ष से कम आयु के बालक 3-5 वर्ष तक रखे जाते हैं, जिन्हें मिडिल स्तर की शिक्षा के अतिरिक्त कुछ धन्धे भी सिखाये जाते हैं। इनमें सिलाई, बढ़ई, लुहार तथा चकड़े का काम प्रमुख है। स्काउटिंग के साथ स्वस्थ नागरिकता की। शिक्षा दी जाती है। बालक का आचरण अच्छा होने पर उसे पुरस्कार तथा घर जाने हेतु 15 दिन का अवकाश प्रदान किया जाता है।

(3) जबलपुर रिफोर्मेंट्री स्कूल – मध्य प्रदेश के बाल-अपराधियों के लिए यह सुधार स्कूल स्थापित किया गया है। बालकों को सामान्य शिक्षा एवं प्रौद्योगिक प्रशिक्षण दोनों ही प्रदान करने की यहाँ व्यवस्था है। अपराधी बालकों को आत्म-निर्भर बनाने के साथ-साथ विद्यालय जैसी पूर्ण स्वतन्त्रता भी प्रदान की जाती है।

(4) हजारीबाग रिफोर्मेट्री स्कूल – यह सुधार स्कूल बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा तथा असम के बाल-अपराधियों को सुधारने के लिए हैं। स्कूल में प्राथमिक शिक्षा तथा काम-धन्धों के प्रशिक्षण का प्रबन्ध किया गया है। स्कूल से बाहर के विद्यार्थी भी यहाँ आकर शिक्षा व प्रशिक्षण पा सकते हैं। अच्छे आचरण वाले, योग्य एवं मेधावी बालकों को शिक्षण-प्रशिक्षण हेतु बाहर की अन्य शिक्षा संस्थाओं में भेजा जाता है।

प्रश्न 6.
बाल-अपराधियों की सुधार योजना के रूप में प्रवीक्षण या प्रोबेशन का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
प्रवीक्षण (Probation); बाल-अपराधियों को सुधारने की सर्वाधिक प्रचलित विधि समझी जाती है। प्रवीक्षण के विषय में क्रेबन का कथन है, “प्रवीक्षण अपराध के विरुद्ध रक्षा की प्रथम पंक्ति है।” (“Probation is the first line of defence against crime.” – Craben) प्रवीक्षण के अन्तर्गत अपराधी बालकों को एक प्रवीक्षण अधिकारी (Probation Officer) के संरक्षण में रखा जाता है। इसके अनुसार न्यायालय द्वारा 18 वर्ष से कम उम्र के किशोर अपराधी को दण्डित नहीं किया जाता, बल्कि उसे एक प्रवीक्षण अधिकारी के पास भेज दिया जाता है। प्रवीक्षण अधिकारी अपने संरक्षण में उसे उसके माता-पिता के पास रखता है और सुधारने का पूरा प्रयास करता है। वह समय-समय पर न्यायालय में उसकी चरित्र सम्बन्धी रिपोर्ट भेजता रहता है।

भारत का प्रथम प्रवीक्षण अधिनियम (First Offenders Probation Act), उत्तर प्रदेश राज्य में 1938 ई० में पास हुआ जिसके अन्तर्गत 7 से 16 वर्ष की आयु तक पहली बार अपराध करने वाले बालक या किशोर को प्रवीक्षण अधिकारी की निगरानी में छोड़ दिया जाता है। ये अपराधी सिर्फ लड़के होते हैं।

प्रवीक्षण के ये उद्देश्य हैं 

  1. पहली बार अपराध करने वाले अवयस्क व्यक्ति (बालक और किशोर) के साथ नरम रुख अपनाना और उसे सुधारने के अवसर प्रदान करना;
  2. ऐसे अपराधी को चेतावनी देना तथा दण्ड के भय का प्रदर्शन कर अपराध की ओर से हटाना;
  3. बाल-अपराधी को अपराध से युक्त परिवेश से अलग हटाना, दण्ड या भय के माध्यम से अपराध से दूर रखना;
  4. अभावग्रस्त परिस्थितियों से अलग करके बालक की सामाजिक-मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ पूरी करना तथा
  5. अपराधी बालक की प्रवृत्ति तथा व्यक्तित्व का गहन का सूक्ष्म अध्ययन करके उसके उपचार के उपाय प्रस्तावित करना।

प्रश्न 7.
प्रवीक्षण अधिकारी के कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

प्रवीक्षण अधिकारी के मुख्य कार्य हैं

  1. प्रवीक्षण अधिकारी दोषी बालकों को अपने संरक्षण में रखता है;
  2. बालक के अपराध का निदान करता है तथा तत्सम्बन्धी कारणों को समझने का प्रयास करता है;
  3. दोषियों को सुधारने का प्रयास करता है तथा उनके विषय में न्यायालय को समय-समय पर सूचित करता है;
  4. अपराधी को हर सम्भव उपाय से समाज का अच्छा नागरिक बनाने का प्रयास करता है;
  5. उसे आजीविका दिलाने की भरपूर कोशिश करता है जिससे कि वह अपना और अपने परिवार का निर्वाह कर सके तथा
  6. समाज में रहकर अच्छा आचरण एवं व्यवहार न दिखाने वाले को जेल पहुँचाना।

उत्तर प्रदेश, दिल्ली, तमिलनाडु, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात सहित लगभग सभी राज्यों में प्रवीक्षण कानून लागू कर दिया गया है। सभी स्थानों पर प्रवीक्षण अधिकारी नियुक्त हैं जिनसे हजारों-हजारों बच्चे लाभ उठा रहे हैं। वर्तमान जनतान्त्रिक युग में प्रत्येक सभ्य देश में प्रवीक्षण कानून का प्रयोग किया जा रहा है। प्रवीक्षण के माध्यम से बाल-अपराध को रोकने की दिशा में भारी सफलता प्राप्त हुई है।

प्रश्न 8.
टिप्पणी लिखिए-बाल-अपराधी का मनोवैज्ञानिक उपचार।
या
बाल अपराध के उपचार में मनोचिकित्सा की क्या भूमिका है?
उत्तर :
बाल-अपराध की उत्पत्ति से सम्बन्धित दो प्रमुख कारक हैं – सामाजिक या परिवेशगत कारक तथा मनोवैज्ञानिक कारक। सामाजिक या परिवेशगत कारकों की वजह से उत्पन्न अवयस्क या बाल-अपराध को सुधार-गृहों तथा प्रवीक्षण कानून द्वारा दूर किया जा सकता है, किन्तु इनके माध्यम से व्यक्गित दोषों का निवारण नहीं हो सकता। यदि कोई बालक बौद्धिक कारणों से, संवेगात्मक अस्थिरता, व्यक्तित्व सम्बन्धी असन्तुलन तथा मानसिक विकारों की वजह से अपराध के लिए प्रवृत्त हुआ है तो उसका उपचार सुधार संस्थाओं या प्रवीक्षण द्वारा करना सम्भव नहीं है। अनेकानेक मनोवैज्ञानिकों के अनवरत अध्ययन तथा अनुसन्धान कार्य से निष्कर्ष प्राप्त हुए हैं कि अधिकांश अपराधी बालक मानसिक अस्वस्थता के शिकार होकर अपराध करते हैं, इनके व्यक्तित्व का समुचित विकास नहीं हो पाता तथा ये विभिन्न मनोवैज्ञानिक दोषों से प्रेरित होते हैं; अतः इन्हें सुधारने के लिए मनोवैज्ञानिक उपायों की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। आजकल सुधार संस्थाओं में मनोवैज्ञानिक उपचार के समुचित साधन उपलब्ध हैं। मनोवैज्ञानिक उपचार का प्रथम सोपान निदान (Diagnosis) अर्थात् अपराध के कारण की खोज है, जिसके लिए मनोवैज्ञानिक विधियो; जैसे—निरीक्षण, परीक्षण, जीवन-वृत्त तथा साक्षात्कार का सहारा लिया जाता है, तत्पश्चात् उपचार की कार्य योजना तैयार की जाती है। बाल-अपराधियों के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य मनोवैज्ञानिक विधियाँ हैं-क्रीड़ा-चिकित्सा, अंगुलि-चित्रण तथा मनोअभिनय।

प्रश्न 9.
टिप्पणी लिखिए-क्रीड़ा चिकित्सा।
उत्तर :
क्रीड़ा चिकित्सा मनोवैज्ञानिक उपचार की सबसे सरल, सस्ती, स्वाभाविक तथा महत्त्वपूर्ण विधि है। क्रीड़ा चिकित्सा का आधारभूत सिद्धान्त यह बताता है कि बालक की रचनात्मक शक्तियों को स्वाभाविक रूप से अभिप्रकाशित न करने देने के कारण वे विचलित होकर विनाशात्मक प्रवृत्तियों में बदल जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप बालक अपराधी बन जाते हैं। मनोवैज्ञानिक तथ्य के अनुसार बालक अपने मन कुण्ठाओं तथा ग्रन्थियों को खेल के माध्यम से प्रकाशित करता है। खेल के माध्यम से उसकी वृत्तियों को बाहर निकलने का अवसर मिलता है और उसकी रचनात्मक शक्तियाँ विकसित हो पाती हैं। अभावग्रस्त बालकों के मानसिक दोषों को दूर करके उन्हें सन्तुष्टि प्रदान करने के लिए स्वतन्त्र रूपसे रुचि के अनुसार खेलने के अवसर दिये जाने चाहिए। खेल व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं। व्यक्तिगत खेल व्यक्तिगत समायोजन में सहायता करते हैं तो सामूहिक खेल बालकों में प्रेम, सहयोग तथा सहकारिता जैसे सामाजिक विशेषताएँ विकसित करते हैं।

क्रीड़ा चिकित्सा को एक उदाहरण के सहायता से भली प्रकार समझा जा सकता है। ‘मोहन’ नाम के एक बारह वर्षीय बालक को पुलिस ने किसी घर में जलता हुआ कपड़ा फेंककर आग लगाने के जुर्म में पकड़ लिया। मोहन ने मानसिक चिकित्सालय में आकर चारों तरफ तोड़-फोड़ मचा दी। वह स्वभाव से विद्रोही लगता था। मनोवैज्ञानिकों ने उसके जीवन इतिहास की खोजबीन करके पता लगाया कि मोहन की असली माँ का बहुत पहले निधन हो चुका था और उसकी विमाता शराबी पिता से मोहन की निर्दयुतापूर्वक पिटाई करवाती थी। अक्सर उसे भूखे पेट ही सो जाना पड़ता था। लगातार उत्पीड़न, यन्त्रणाओं और भीषण अवदमन के शिकार मोहन में धीरे-धीरे कुण्ठा और विद्रोह की भावनाएँ भर गयीं और वह तोड़-फोड़ व आगजनी के सहारे इस समाज से बदला लेने लगा। उसे मनोवैज्ञानिक उपचार के अन्तर्गत पहले व्यक्तिगत खेल में लगाया गया; जैसे—रेत के घरौंदे बनाना, ब्लॉक्स से भवन और पुल आदि बनाना। शुरू में उसने इन चीजों की रचना की फिर उन्हें तोड़ा। धीरे-धीरे उसकी रुचि तोड़ने में कम होती गयी तथा रचना की ओर बढ़ती गयी। अब वह अपने साथियों की तरफ उन्मुख हुआ और सामूहिक क्रीड़ा पद्धति के माध्यम से टीम-भावना (Team Spirit) के साथ तथा नियमानुसार खेलने लगा। इस प्रकार क्रीड़ा चिकित्सा के माध्यम से मोहन एकदम सामान्य हो गया।

प्रश्न 10.
टिप्पणी लिखिए-अंगुलि-चित्रण (Finger Painting)।
उत्तर :
अंगुलि-चित्रण की विधि, क्रीड़ा चिकित्सा के समान ही मनोवैज्ञानिक उपचार की एक स्वाभाविक विधि है जो अपराधी बालक के मानसिक तनावों को दूर कर उसे सामान्य बनाने में सहायक होती है। बालक के सामने सादा सफेद कागज तथा लाल, पीला, नीला, हरा आदि अनेक रंग होते हैं। बालक को मनचाहे रंग तथा अपने ही ढंग से कागज पर चित्र बनाने की स्वतन्त्रता प्रदान की जाती है। बिना किसी रोक-टोक के रंग पोतने तथा बिखराने में बालक को अपूर्व आनन्द मिलता है, जिससे उसके संवेगात्मक तनाव बाहर निकल जाते हैं और वह तनावमुक्त, स्वस्थ एवं सामान्य बालक की भाँति व्यवहार करने लगता है। कुछ कुशल एवं प्रवीण मनोवैज्ञानिक उँगली से बनाये गये चित्रों के रूप, आकार तथा प्रयुक्त रंगों को देखकर बालक की मनोस्थिति का अनुमान कर लेते हैं। इससे बाल-अपराधी के उपचार में सहायता मिलती है।

प्रश्न 11.
टिप्पणी लिखिए—मनोअभिनय (Psychodrama)।
उत्तर :
मनोअभिनय मानसिक उपचार की एक नवीन और सफल विधि है जिसका शुभारम्भ 1964 ई० में मुरेनो (Mureno) द्वारा अमेरिका में किया गया था। इस विधि में बिना किसी पूर्व योजना के बालकों का समूह नाटक में अपनी काल्पनिक भूमिका करता है। इस भूमिका के सम्बन्ध से ही वह अपने अवचेतन मन में स्थिर संवेगात्मक ग्रन्थियों को अभिव्यक्त करता है। अभिनय द्वारा उसके दमित संवेगों का अभिप्रकाशन होता है, उसका संवेगात्मक रेचन हो जाता है और वह पुनः मानसिक स्वास्थ्य की ओर उन्मुख होता है। मनो अभिनय में बालक ऐसे नाटक करते हैं जिनमें उनकी हिंसात्मक और ध्वंसात्मक प्रवृत्तियों को सन्तुष्टि मिले; यथा—बच्चों से कहा जाए कि, “सामने पहाड़ी पर एक काले भयानक दैत्य का दुर्ग है। उसमें एक सुन्दर राजकुमारी को कैद कर रखा है। आओ, उस दैत्य को मारकर राजकुमारी को छुड़ाएँ।” सभी बालके अपनी-अपनी काल्पनिक भूमिकाएँ चुनकर तद्नुसार अभिनय करते हैं। निरीक्षक अभिनय का निरीक्षण करता है तथा बाल-अपराधी की संवेगात्मक अनुभूतियों को अध्ययन कर निष्कर्ष निकालता है। इस प्रकार के नाटक व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों प्रकार के हो संकते हैं और इनके द्वारा बालक की प्रगति का मूल्यांकन भी सम्भव है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बाल-अपराध के निदान के उपाय बताइए।
उत्तर :
मनोविज्ञान की संकल्पना के अनुसार बाल-अपराध एक मानसिक रोग है। बाल-अपराधी को सुधारने के लिए सर्वप्रथम उन कारणों का पता लगाया जाती है जिनके कारण से कोई बालक अपराधी बना होता है। यह अपराध की नैदानिक प्रक्रिया के अन्तर्गत आता है। बाल-अपराधों के कारणों का निदान करते समय निम्नलिखित बातों की ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त की जाती है –

  1. बाल-अपराधी की शारीरिक विशेषताओं की जानकारी
  2. बालक के बौद्धिक स्तर, मानसिक योग्यताओं, रुचियों, अभिरुचियों तथा अन्य विशेषताओं को परीक्षण एवं मूल्यांकन
  3. उनकी संवेगात्मक संरचना का अध्ययन
  4. अपराधी बालक के परिवार के लोगों के विषय में जानकारी
  5. आस-पड़ोस, साथियों, सम्पर्क सूत्रों तथा सामाजिक व्यवहार का अध्ययन
  6. परिवार की आर्थिक स्थिति तथा आय के साधन
  7. अपराधी बालक के व्यवसाय (अगर वह कोई धन्धा करता हो) की दशाओं का ज्ञान तथा
  8. उसके विद्यालयी व्यवहार का लेखा-जोखा तथा उसकी सम्प्राप्तियों का विवरण।

साक्षात्कार – उपर्युक्त विभिन्न पक्षों के सम्बन्ध में आवश्यक सूचना एकत्रित करने के उपरान्त अपराधी बालक से साक्षात्कार करके उसकी उन सभी समस्याओं तथा कारणों का समुचित ज्ञान किया। जाता है जिन्होंने उसे अपराध के लिए प्रेरित किया था।

प्रश्न 2.
बाल-अपराध के कोई दो मनोवैज्ञानिक कारण बताइए।
उत्तर :
बाल – अपराध के दो मुख्य मनोवैज्ञानिक कारणों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

(i) मानसिक या बौद्धिक कारण – बाल-अपराध के मुख्य मानसिक कारण हैं-बालक को मानसिकहीनता का शिकार होना अथवा अति तीव्र बुद्धि वाला होना। प्रायः अति तीव्र बुद्धि वाला बालक यादि पथ-भ्रष्ट हो जाए तो वह अपराध जगत् में गिरोह का नेता बन जाया करती है। इसके साथ ही बालक यादि मानसिक योग्यताओं से हीन हो, तो भी वह अपराध जगत् की ओर उन्मुख हो सकता है।

(ii) संवेगात्मक कारण – बालक की संवेगात्मक असामान्यता भी उसे अपराध जगत् की ओर उन्मुख कर सकती है। सामान्य रूप से अति सवेगात्मकता, स्वभावगत अस्थिरता, समायोजन की कमी तथा भावना ग्रन्थियों की प्रबलता के कारण भी बालक अपराधी बन जाया करते हैं।

प्रश्न 3.
बोर्टल स्कूल के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर :
सबसे पहले, सर रगल्स ब्राइस (Sir Ruggles Brice) ने 1902 ई० में इंग्लैण्ड के बोल नामक स्थान पर एक गैर-सरकारी जेलखाना खोला था। इसका उद्देश्य किशोर अपराधियों को सुधारना था। उसी स्थान के नाम पर ये बोर्टल स्कूल कहलाने लगे। इन स्कूलों में 16-21 वर्ष तक की आयु के अपराधी रखे जाते हैं तथा अपराधी बालक के व्यक्तित्व को इस तरह निर्मित किया जाता है ताकि वह स्वयं ही अपराधी प्रवृत्ति को त्याग दे। सुधार गृह की भाँति ये मान्यता प्राप्त विद्यालय होते हैं, किन्तु ये एक प्रकार से बन्दीगृह भी हैं। सामान्य रूप से ये जेल विभाग के अन्तर्गत आते हैं। यहाँ सामान्य शिक्षा के साथ-साथ शारीरिक शिक्षा तथा औद्योगिक शिक्षा भी प्रदान की जाती है। इस प्रकार के स्कूल तमिलनाडु, बंगाल, महाराष्ट्र तथा मैसूर आदि राज्यों में स्थापित किये गये हैं जो किशोर अपराधियों को सुधारने में बहुत सफल हुए हैं।

प्रश्न 4.
बाल-न्यायालय बाल-अपराध को दूर करने में किस प्रकार सहायक है?
या
बाल-न्यायालयों के कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
पुलिस द्वारा पकड़े जाने वाले बाल-अपराधियों की सुनवाई के लिए अलग से न्यायालय स्थापित किये गये हैं, जिन्हें बाल-न्यायालय (Juvenile Courts) कहा जाता है। बाल-न्यायालयों की स्थापना का उद्देश्य बाल-अपराधियों को दण्डितं करना नहीं बल्कि उनको सुधार करना है। बाल-न्यायालय बाल-अपराधी की अपराधी-प्रवृत्ति, पारिवारिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि आदि को ध्यान में रखते हुए उसे बाल-बन्दीगृह, सुधार स्कूल, प्रोबेशन अथवा बोस्ट्रल स्कूल आदि में भेज देता है। आवश्यकता होने पर बाल-अपराधी के मनोवैज्ञानिक उपचार की भी सिफारिश की जाती है। इन समस्त उपायों द्वारा बाल-न्यायालय बाल-अपराध की प्रवृत्ति को समाप्त करने में सहायता देते हैं।

प्रश्न 5.
टिप्पणी लिखिए-बाल-बन्दीगृह।
उत्तर :
बाल-बन्दीगृह सामान्य जेलों से भिन्न एक सुधार संस्था है। उत्तर प्रदेश में बरेली में बोर्टल व्यवस्था के अन्तर्गत एक बाल-बन्दीगृह (Juvenile Jail) स्थापित किया गया था जिसमें 18 वर्ष तक की आयु के अपराधी रखे जाते हैं। यहाँ उन्हें सामान्य शिक्षा के साथ-साथ विभिन्न उद्योगों की शिक्षा भी दी जाती है ताकि वे बन्दीगृह से बाहर जाकर एक उपयोगी जीवन व्यतीत कर सकें। जो बालक आगे पढ़ने के इच्छुक होते हैं, उन्हें जेल से बाहर अन्य विद्यालयों में भेजने की भी व्यवस्था है। जेल छोड़ते समय बाल-अपराधियों को उन्हीं के परिश्रम से उपार्जित धन प्रदान किया जाता है ताकि वे उससे अपना कोई स्वतन्त्र व्यवसाय स्थापित कर सकें।

प्रश्न 6.
टिप्पणी लिखिए-सहायक गृह।
उत्तर :
सहायक गृह सर्टीफाइड स्कूलों के लिए अपराधी बालक लेने का कार्य करते हैं। ये सरकारी और गैर-सरकारी दोनों प्रकार के होते हैं। इन स्कूलों में मिडिल स्तर तक सामान्य शिक्षा के साथ कुछ धन्धे भी सिखाये जाते हैं; जैसे-चटाई बनाना, जिल्द बनाना, बढ़ई-राजगिरि-दर्जी तथा कताई-बुनाई का काम। इनके अलावा स्काउटिंग, प्राथमिक चिकित्सा, संगीत तथा कृषि कार्य भी सिखाया जाता है। यह पाया गया है कि सहायक गृहों से निकले बच्चे बहुत कम संख्या में दोबारा अपराध करते हैं।

प्रश्न 7.
बाल-अपराध-निरोध के सन्दर्भ में चलाये जाने वाले सतर्कता कार्यक्रम का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
सतर्कता कार्यक्रम (Care Programme); भारत की केन्द्रीय सरकार द्वारा बच्चों के पुनर्वास तथा शिक्षण हेतु संचालित किये जाते हैं। इन कार्यक्रमों के अन्तर्गत विभिन्न राज्यों में 17 सर्टीफाइड स्कूल 9 बोर्टल स्कूल, 5 रिमाण्ड होम्स, 14 लड़कों के क्लब तथा 5 प्रोबेशन होस्टल्स हैं। सरकार द्वारा किशोर अपराधियों के लिए पृथकू से न्यायालय स्थापित किये गये हैं। इस समय देश में 91 किशोर न्यायालय, 100 विशेष विद्यालय तथा अनेक फिट पर्सन्स संस्थाएँ हैं।

प्रश्न 8.
बाल-अपराध की रोकथाम में विद्यालय की दो महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ लिखिए।
उत्तर :
बाल-अपराध की रोकथाम में विद्यालय द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जा सकती है। सर्वप्रथम विद्यालय के शिक्षकों को उन सभी बालकों के प्रति विशेष ध्यान रखना चाहिए जिनकी गतिविधियाँ कुछ असामान्य हों, जैसे कि स्कूल से प्रायः अनुपस्थित रहना, भाग जाना या देर से आना। ऐसे बालकों के अभिभावकों से निरन्तर सम्पर्क बनाये रखना चाहिए। इसके अतिरिक्त विद्यालय के वातावरण को उत्तम, रोचक एवं आकर्षक बनाकर भी बाल-अपराध की प्रवृत्ति को नियन्त्रित किया जा सकता है। विद्यालय की उत्तम अनुशासन व्यवस्था भी बाल-अपराध की प्रवृत्ति को नियन्त्रित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.

निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. किसी 13 वर्ष के बालक द्वारा की गयी चोरी को ……………….. की श्रेणी का अपराध कहा जाएगा।
  2. बाल-अपराध को ……………….. का प्रतीक माना जाता है।
  3. बाल-अपराध का निर्धारण मुख्य रूप से अपराधी की ……………….. के आधार पर होता है।
  4. आधुनिक नगरीय समाज में बाल-अपराध की दर में ……………….. हो रही है।
  5. अधिकांश बाल-अपराधी ……………….. परिवारों से सम्बन्धित होते हैं।
  6. अमनोवैज्ञानिक शिक्षण, शिक्षक का दुर्व्यवहार, दुरुह पाठ्यक्रम, कठोर अनुशासन तथा दण्ड के कारण कुछ बालक स्कूल से भागने लगते हैं तथा क्रमशः ……………….. बन जाते हैं।
  7. बालक को स्कूल से प्रायः भाग जाना अपने आप में बाल-अपराध तथा ……………….. है।
  8. समायोजन का दोष भी बालकों को ……………….. बना सकता है।
  9. कुछ विशेष प्रेकार के मानसिक रोगों से ग्रस्त बालक भी ……………….. की ओर शीघ्र ही उन्मुख हो जाते हैं।
  10. बाल-अपराधियों को दण्ड नहीं दिया जाता बल्कि उन्हें ……………….. के उपाय किये जाते हैं।
  11. आर्थिक अभावों एवं निर्धनता के कारण भी अनेक बालक ……………….. की ओर उन्मुख होते हैं।
  12. सर्टीफाइड स्कूल तथा बोर्टल स्कूल का मुख्य उद्देश्य बाल-अपराधियों को ……………….. है।
  13. परिवीक्षा काल का सम्बन्ध ……………….. को दूर करने या रोकने से होता है।
  14. बाल-अपराधी सुधार के लिए ……………….. भेजे जाते हैं।
  15. भारत में प्रथम प्रवीक्षण अधिनियम उत्तर प्रदेश राज्य में सन् ……………….. में पारित हुआ था।
  16. बाल अंपराध सिद्ध होने पर बालक को ……………….. अधिकारी के पास भेजा जाता है।
  17. प्रवीक्षण अधिनियम के अनुसार प्रथम बार अपराध करने वाले बालक को ……………….. की निगरानी में छोड़ दिया जाता है।
  18. बाल-अपराधियों के उपचार के लिए मुरेनो नामक मनोवैज्ञानिक ने ……………….. नामक विधि को खोजा था।

उत्तर :

  1. बाल-अपराध
  2. पारिवारिक विघटन
  3. आयु
  4. वृद्धि
  5. विघटित
  6. बाल-अपराधी
  7. अन्य अपराधों का कारण भी
  8. बाल अपराधी
  9. अपराधों
  10. सुधारने
  11. अपराधों
  12. सुधारना
  13. बाल-अपराध
  14. सुधार स्कूल
  15. 1938
  16. प्रवीक्षण अधिकारी
  17. प्रवीक्षण अधिकारी
  18. मनोअभिनया

प्रश्न II.

निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
बाल-अपराध का सामान्य अर्थ क्या है?
उत्तर :
किसी बालक (कानून द्वारा निर्धारित आयु से कम) द्वारा ऐसा कोई भी कार्य जो समाज-विरोधी है और जिससे कानून का उल्लंघन होता है, बाल-अपराध कहलाता है।

प्रश्न 2.
सिरिल बर्ट के अनुसार किस बालक को बाल-अपराधी कहा जा सकता है?
उत्तर :
सिरिल बर्ट के अनुसर, किसी बालक को बाल-अपराधी वास्तव में तभी मानना चाहिए जब उसकी समाज-विरोधी प्रवृत्तियाँ इतना गम्भीर रूप ले लें कि उस पर सरकारी कार्यवाही आवश्यक हो जाए।

प्रश्न 3.
‘बाल-अपराध की डॉ० सेठना द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
डॉ० सेठना के अनुसार, “बाल-अपराध से अभिप्राय किसी स्थान-विशेष के नियमों के अनुसार एक निश्चित आयु से कम के बालक या युवक व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला अनुचित कार्य है।”

प्रश्न 4.
बाल-अपराध के परिवार सम्बन्धी मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
बाल-अपराध के परिवार सम्बन्धी मुख्य कारण हैं-परिवार का विघटित होना, परिवार में अन-अपेक्षित एवं अधिक बच्चे होना, माता-पिता का असमान या उपेक्षापूर्ण व्यवहार, विमाता या विपिता का दुर्व्यवहार तथा परिवार के अन्य सदस्यों का अपराधों में लिप्त होना।

प्रश्न 5.
विद्यालय को किस प्रकार का वातावरण बालकों को अपराधों की ओर प्रेरित करता है?
उत्तर :
यदि, विद्यालय में अमनोवैज्ञानिक शिक्षण, शिक्षक का दुर्व्यवहार, दुरूह पाठ्यक्रम, कठोर अनुशासन तथा दण्ड जैसे कारक प्रबल हों तो बालक स्कूल से भाग कर अपराधों की ओर प्रेरित हो सकते हैं।

प्रश्न 6.
बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारकों को किन वर्गों में बाँटा जाता है?
उत्तर :
बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कराकों को चार वर्गों में बाँटा जाता है –

(क) मानसिक अथवा बौद्धिक कारक
(ख) संवेगात्मक कारक
(ग) व्यक्तित्व की विशिष्टताएँ तथा
(घ) विशेष प्रकार के मानसिक रोग।

प्रश्न 7.
बाल-अपराध के मुख्य संवेगात्मक कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
बाल-अपराध के मुख्य संवेगात्मक कारण हैं –

(क) अति संवेगात्मकता
(ख) स्वभावगत अस्थिरता
(ग) समायोजन दोष
(घ) भावना ग्रन्थियाँ एवं मनोविक्षेप
(ङ) किशोरावस्था के परिवर्तन तथा
(च) मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति न होना।

प्रश्न 8.
बाल-अपराधियों को सुधारने के मुख्य उपाय क्या हैं?
उत्तर :
बाल-अपराधियों को सुधारने के मुख्य उपाय हैं –

(क) सुधार संस्थाएँ
(ख) अवीक्षण या प्रोबेशन तथा
(ग) मनोवैज्ञानिक चिकित्सा।

प्रश्न 9.
बाल-अपराधियों तथा वयस्क अपराधियों की मुख्य सुधार संस्थाएँ कौन-कौन-सी हैं?
उत्तर :
बाल-अपराधियों तथा वयस्क अपराधियों की मुख्य सुधार संस्थाएँ हैं – सुधार स्कूल, सर्टीफाइड स्कूल, बोटंल स्कूल तथा बाल-बन्दीगृह।

प्रश्न 10.
बाल-अपराधियों तथा वयस्क अपराधियों में मुख्य अन्तर क्या होता है?
उत्तर :
बाल-अपराधी कच्चे अपराधी होते हैं तथा उनका सुधार सरल होता है, जबकि वयस्क अपराधी पक्के अपराधी होते हैं तथा उनका सुधार काफी कठिन होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
किस बालक की कानून-विरोधी गतिविधियों को बाल-अपराध की श्रेणी में रखा जाता है?
(क) जिसकी शिक्षा अधूरी रह गयी हो
(ख) जिसकी समझ विकसित हो गयी हो
(ग) जिसकी दाढ़ी-मूंछ निकल आयी हो
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 2.
दस वर्ष की आयु वाले बालक के द्वारा गम्भीर अपराध करने को कहते हैं –
(क) बाल-अपराधी
(ख) अपराधी
(ग) असामाजिक बालक
(घ) मानसिक विक्षिप्त

प्रश्न 3.
“व्यवहार के सामाजिक नियमों से विचलित होने वाले बालक को बाल-अपराधी कहते हैं।” यह कथन किसका है?
(क) होली
(ख) न्यूमेयर
(ग) बर्ट
(घ) सेठना

प्रश्न 4.
अधिकांश बाल-अपराधी किस प्रकार के परिवारों से सम्बन्धित होते हैं?
(क) धनवान परिवार
(ख) सुसंगठित परिवार
(ग) विघटित परिवार
(घ) संयुक्त परिवार

प्रश्न 5.
बाल अपराध को कारण है –
(क) अच्छी संगति
(ख) स्वस्थ मनोरंजन
(ग) दूषित पारिवारिक वातावरण
(घ) संवेगात्मक स्थिरता

प्रश्न 6.
बाल-अपराध का मनोवैज्ञानिक कारण है –
(क) भग्न परिवार
(ख) संवेगात्मक अस्थिरता
(ग) निर्धनता
(घ) वंशानुगत कारक।

प्रश्न 7.
बाल-अपराध के मानसिक या बौद्धिक कारण हैं –
(क) मानसि हीनता
(ख) अति तीव्र बुद्धि
(ग) मानसिक योग्यताओं का निम्न स्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 8.
बाल-अपराधियों के विकास के लिए जिम्मेदार मानसिक रोग है –
(क) मनोविकृति
(ख) मेनिया
(ग) बाध्यता
(घ) ये सभी

प्रश्न 9.
परिवीक्षा काल का सम्बन्ध है –
(क) अपराध से
(ख) परीक्षा से
(ग) इतिहास से
(घ) बाल-अपराध से

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से कौन बाल-अपराध का आर्थिक कारण नहीं है
(क) निर्धनता
(ख) बेकारी
(ग) भूखमरी
(घ) कुसमायोजन

प्रश्न 11.
बाल-अपराध का आर्थिक कारण होता है
(क) मन्दबुद्धि
(ख) कुण्ठा
(ग) निर्धनता
(घ) कुसमायोजन

प्रश्न 12.
बाल-अपराध के लिए जिम्मेदार सामाजिक कारक हैं –
(क) सस्ते तथा घटिया मनोरंजन के साधन
(ख) बदनाम बस्तियों के निवासियों का प्रभाव
(ग) शिक्षण संस्थाओं के वातावरण का दूषित होना
(घ) उपर्युक्त सभी कारक

प्रश्न 13.
बाल-अपराधियों से सम्बन्धित तथ्य है –
(क) इनके गिरोह सुसंगठित होते हैं।
(ख) भारतीय कानून संहिता में इन्हें कठोर दण्ड देने का प्रावधान है।
(ग) ये सामाजिक विघटन के प्रतीक माने जाते हैं।
(घ) ये कम आयु के कच्चे अपराधी होते हैं, ये पारिवारिक विघटन के प्रतीक होते हैं तथा इनका सुधार हो सकता है।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में कौन बाल-अपराध से सम्बन्धित नहीं है।
(क) बाल न्यायालय
(ख) निर्देशन उपचार शालाएँ
(ग) सुधार स्कूल
(घ) जिला कारागार

प्रश्न 15.
हमारे देश में बाल-अपराधियों के सुधार के लिए कौन-सी संस्था है?
(क) साधारण विद्यालय
(ख) बन्दीगृह
(ग) विकलांग शिक्षण संस्थाएँ
(घ) सुधार स्कूल या रिफोमेंट्री स्कूल

प्रश्न 16.
किस महान बाल-सुधारक ने प्रवीक्षण या प्रोबेशन की धारणा को प्रस्तुत किया था?
(क) फ्रॉयड ने।
(ख) जॉन ऑगस्टस ने
(ग) डॉ० सेठना ने
(घ) मुरेनो ने

प्रश्न 17.
समाज में बाल-अपराधियों की निरन्तर बढ़ती हुई दर को नियन्त्रित करने का मुख्यतम उपाय है
(क) कठोर दण्ड-व्यवस्था लागू की जाए।
(ख) बालकों के लिए अधिक-से-अधिक शिक्षण संस्थाएँ स्थापित की जाएँ।
(ग) सामाजिक विघटन को रोका जाए।
(घ) पारिवारिक विघटन को रोका जाए तथा पारिवारिक वातावरण को उत्तम बनाया जाए।

प्रश्न 18.
बाल-अपराधियों के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली मनोवैज्ञानिक विधि है
(क) क्रीड़ा चिकित्सा
(ख) अंगुलि-चित्रण
(ग) मनो-अभिनय
(घ) ये सभी

प्रश्न 19.
इनमें से कौन बाल-अपराध का लक्षण नहीं हो सकता है?
(क) चोरी
(ख) मद्यपान
(ग) तोड़फोड़
(घ) कक्षा-कार्य को पूरा न कर पाना।

उत्तर :

  1. (ख) जिसकी समझ विकसित हो गयी हो
  2. (क) बाल-अपराधी
  3. (क) हीली
  4. (ग) विघटित परिवार
  5. (ग) दूषित पारिवारिक वातावरण
  6. (ख) संवेगात्मक अस्थिरता
  7. (घ) ये सभी
  8. (घ) ये सभी
  9. (घ) बाल अपराध से
  10. (घ) कुसमायोजन
  11. (ग) निर्धनता
  12. (घ) उपर्युक्त सभी कारक
  13. (घ) ये कम आयु के कच्चे अपराधी होते हैं, ये पारिवारिक विषटन के प्रतीक होते है तथा इनका सुधार हो सकता है
  14. (घ) जिला कारागार
  15. (घ) सुधार स्कूल या रिफोमेंट्री स्कूल
  16. (ख) जॉन ऑगस्टस ने
  17. (घ) पारिवारिक विघटन को रोका जाए तथा पारिवारिक वातावरण को उत्तम बनाया जाए।
  18. (घ) ये सभी
  19. (घ) कक्षा-कार्य को पूरा न कर पाना।

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