UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P.

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 8
Chapter Name 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P.
(शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन और उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवा)
Number of Questions Solved 68
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. (शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन और उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवा)

दीर्घ उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निर्देशन की परिभाषा निर्धारित कीजिए। निर्देशन की आवश्यकता, उपयोगिता एवं महत्त्व का भी उल्लेख कीजिए।
या
निर्देशन क्या होता है?
उत्तर :

निर्देशन की संकल्पना एवं अर्थ
(Concept and Meaning of Guidance)

सामाजिक व्यक्ति के जीवन में निर्देशन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। निर्देशन सामाजिक सम्पर्को पर आधारित एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें एक व्यक्ति को इस प्रकार से सहायता प्रदान की जाती है कि वह अपनी जन्मजात और अर्जित योग्यताओं व क्षमताओं को समझते हुए उनका अपनी समस्याओं की स्वतः समाधान करने में उपयोग कर सके। निर्देशन एक सुनियोजित तथा सुव्यवस्थित ढंग की विशिष्टं प्रक्रिया का नाम है जो दो प्रकार के व्यक्तियों के मध्य होती है-पहला वह व्यक्ति जो निर्देशन चाहता है तथा दूसरा अन्य व्यक्ति जो निर्देशन प्रदान करता है। क्योंकि जीवन की प्रत्येक अवस्था में समस्याओं का उदय स्वाभाविक है; अतः निर्देशन प्राप्त केरने वाला व्यक्ति किसी भी आयु-वर्ग से सम्बन्धित हो सकता है, किन्तु निर्देशन प्रदान करने वाला व्यक्ति प्राय: वयस्क, शिक्षित, समझदार तथा अनुभवी होता है। तत्सम्बन्धी क्षेत्र में ज्ञान और अनुभव से युक्त उस व्यक्ति को निर्देशनदाता अथवा परामर्शदाता (Counsellor) या निर्देशन मनोवैज्ञानिक (Guidance Psychologist) के नाम से सम्बोधित करते हैं। निर्देशन प्राप्त करने वाला और निर्देशन प्रदान करने वाला इन दोनों व्यक्यिों में व्यक्तिगत सम्पर्क (Personal Contact) के स्थापित होने के बाद ही निर्देशन प्रक्रिया शुरू होती है। इस प्रक्रिया को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया जा सकता है –

  1. सर्वप्रथम निर्देशक-मनोवैज्ञानिक, निर्देशन चाहने (प्राप्त करने) वाले व्यक्ति को विभिन्न मनोवैज्ञानिक विधियों द्वारा इस योग्य बनाने के लिए विशेष सहायता देता है कि जिससे वह अपनी निजी क्षमताओं, शक्तियों तथा योग्यताओं का भली प्रकार ज्ञान प्राप्त कर सके।
  2. अब उस व्यक्ति को यह मालूम कराया जाता है कि वे अपनी इन समस्त शक्तियों के माध्यम से क्या-क्या कार्य करने में सक्षम है।
  3. इसके साथ ही उस व्यक्ति को उसके वातावरण के तत्वों का यथासम्भव सम्पूर्ण ज्ञान भी कराया जाता है।
  4. निर्देशन प्राप्त करने वाले व्यक्ति को अपनी समस्याओं का विश्लेषण करने तथा उन्हें भली प्रकार समझने हेतु भी सहायता प्रदान की जाती है।
  5. अन्ततः व्यक्ति को यह ज्ञान मिल जाता है कि वह अपनी समस्त क्षमताओं, शक्तियों तथा योग्यताओं का किस भाँति सदुपयोग करे ताकि उसे अपनी समस्याओं का समुचित समाधान तलाशने में सुविधा रहे |

निर्देशन की परिभाषा

प्रमुख विद्वानों के अनुसार निर्देशन को अग्रलिखित रूप से परिभाषित किया जा सकता है –

(1) स्किनर के शब्दों में, “निर्देशने एक प्रक्रिया है जो कि नवयुवकों को स्वयं अपने से, दूसने से तथा परिस्थितियों से समायोजन करना सिखाती है।”

(2) जोन्स के अनुसार, “निर्देशन एक ऐसी व्यक्तिगत सहायता है जो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को, जीवन के लक्ष्यों को विकसित करने व समायोजन करने और लक्ष्यों की प्राप्ति में आयी हुई समस्याओं को हल करने के लिए प्रदान की जाती है।”

(3) मॉरिस के मतानुसार, “निर्देशन व्यक्तियों की स्वयं अपने प्रयत्नों से सहायता करने की एक क्रिया है जिसके द्वारा वे व्यक्तिगत सुख और सामाजिक उपयोगिता के लिए अपनी समस्याओं का पता लगाते हैं तथा उनका विकास करते हैं।”

(4) हसबैण्ड के कथनानुसार, “निर्देशन को, व्यक्ति को उसके भावी जीवन के लिए तैयार करने तथा समाज में उसको अपने स्थान को उपयुक्त बनाने में सहायता देने की प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

(5) शिक्षा मन्त्रालय भारत सरकार के अनुसार, “निर्देशन एक क्रिया है जो व्यक्ति को शिक्षा, जीविका, मनोरंजन तथा मानव-क्रियाओं के समाज-सेवा सम्बन्धी कार्यों को चुनने, तैयार करने, प्रवेश करने तथा वृद्धि करने में सहायता प्रदान करती है।”

निर्देशन के सन्दर्भ में वर्णित उपर्युक्त परिभाषाओं से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि निर्देशन मनुष्य के कल्याण हेतु प्रदान की गयी एक प्रकार की सहायता है जिसमें कोई व्यक्ति अन्य को कुछ देता नहीं, अपितु सहायता प्राप्त करने वाले व्यक्ति को ही इस योग्य बना दिया जाता है कि वह व्यक्ति अपनी सहायता अपने आप करने में सक्षम हो सके।

निर्देशन की आवश्यकता, महत्त्व एवं उपयोगिता (लाभ)।
(Need, Importance and Utility of Guidance)

मनुष्य की अनन्त इच्छाओं ने उसकी आवश्यकताओं को बढ़ाकर उसके व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा व्यावसायिक जीवन में अभूतपूर्व संकट और जटिलता उत्पन्न कर दी है। इन्हीं कारणों से वर्तमान काल के सन्दर्भ में निर्देशन की आवश्यकता बढ़ती चली जा रही है। जीवन में निर्देशन की आवश्यकता हम निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत पाते हैं

(1) व्यक्ति के दृष्टिकोण से निर्देशन की आवश्यकता – मानव-जीवन की जटिलता ने पग-पग पर नयी-नयी समस्याओं और संकट-कालीन परिस्थितियों को जन्म दिया है। मनुष्य का कार्य-क्षेत्र विस्तृत हो रहा है और उसकी नित्यप्रति की आवश्यकताओं में वृद्धि हुई है। बढ़ती हुई आवश्यकताओं तथा आर्थिक विषमताओं ने मनुष्य को व्यक्तिगत, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से प्रभावित किया है। जीवन के हर एक क्षेत्र में समस्याओं के मोर्चे खुले हैं जिनसे निपटने के लिए भौतिक एवं मानसिक दृष्टि से निर्देशन की अत्यधिक आवश्यकता है।

(2) औद्योगीकरण से उत्पन्न समस्याएँ – मनुष्य प्राचीन समय में अधिकांश कार्य अपने हाथों से किया करता था, किन्तु आधुनिक युग मशीनों का युग’ कहा जाता है। तरह-तरह की मशीनों के अविष्कार से उद्योग-धन्धों का उत्पादन बढ़कर कई गुना हो गया है, किन्तु उत्पादन की प्रक्रिया जटिल-से-जटिल होती जा रही है। औद्योगिक जगत् के विस्तार से नये-नये मानव-सम्बन्ध विकसित हुए हैं जिनके मध्य सन्तुलन स्थापित करने की दृष्टि से निर्देशन बहुत आवश्यक है।

(3) नगरीकरण से उत्पन्न समस्याएँ – क्योंकि अधिकांश उद्योग-धन्धे तथा कल-कारखाने बड़े-बड़े नगरों में स्थापित हुए, इसलिए पिछले अनेक दशकों से लोगों का प्रवाह गाँवों से नगरों की ओर हुआ। नगरों में तरह-तरह की सुख-सुविधाओं, मनोरंजन के साधनों, शिक्षा की व्यवस्था, नौकरी के अवसर तथा सुरक्षा की भावना ने नगरों को आकर्षण का केन्द्र बना दिया। फलस्वरूप नगरों की संरचना में काफी जटिलता आने से समायोजन सम्बन्धी बहुत प्रकार की समस्याएँ भी उभरी हैं; अत: नगरीय जीवन से उपयुक्त समायोजन करने हेतु निर्देशन की परम आवश्यकता अनुभव होती है।

(4) जाति-प्रथा का विघटन – आजकल जाति और व्यवसाय का आपसी सम्बन्ध टूट गया है। इसका प्रमुख कारण जाति-प्रथा का विघटन है। पहले प्रत्येक जाति के बालकों को अपनी जाति के व्यवसाय का प्रशिक्षण परम्परागत रूप से उपलब्ध होता था। उदाहरणार्थ-ब्राह्मण का बेटा पण्डितई करता है, लोहार का बेटा लोहारी और बनिये का बेटा व्यापार। यह व्यवस्था अब लगभग समाप्त प्रायः हो गयी है। इन परिवर्तित दशाओं ने व्यवसाय के चुनाव तथा प्रशिक्षण, इन दोनों ही क्रियाओं के लिए निर्देशन को आवश्यक बना दिया है।

(5) व्यावसायिक बहुलता – वर्तमान समय में अनेक कारणों से व्यवसायों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप कार्य के प्रत्येक क्षेत्र में विशेषीकरण की समस्या भी बढ़ी है। व्यावसायिक बहुलता और विशेषीकरण के विचार ने प्रत्येक बालक और किशोर के सम्मुख यह एक गम्भीर समस्या खड़ी कर दी है कि वह इतने व्यवसायों के बीच से समय की माँग के अनुसार कौन-सा व्यवसाय चुने और चयनित व्यवसाय से सम्बन्धित प्रशिक्षण किस प्रकार प्राप्त करे। निश्चय ही, इस समस्या का हल निर्देशन से ही सम्भव है।

(6) मन के अनुकूल व्यवसाय का न मिलना – बेरोजगारी की समस्या आज न्यूनाधिक विश्व के प्रत्येक देश के सम्मुख विद्यमान है। हमारे देश में किसी नवयुवक के मनोनुकूल, अच्छा एवं उपयुक्त व्यवसाय मिल पाना अत्यन्त दुष्कर कार्य है। हर कोई उत्तम व्यवसाय प्राप्त करने की महत्त्वाकांक्षा रखता है, किन्तु रोजगार के अवसरों का अभाव उसे असफलता और निराशा के अतिरिक्त कुछ नहीं दे पाता। निराश, चिन्तित, तनावग्रस्त तथा उग्र बेरोजगार युवकों को सही दिशा दिखलाने की आवश्यकता है। उन्हें देश की आवश्यकताओं के अनुकूल तथा जीवन के लिए हितकारी शारीरिक कार्य करने की प्रेरणा देनी होगी। यह कार्य निर्देशन द्वारा ही सम्भव है।

(7) विशेष बालकों की समस्याएँ – विशेष बालकों से हमारा अभिप्राय पिछड़े हुए/मन्द बुद्धि या प्रतिभाशाली ऐसे बालकों से है जो सामान्य बालकों से हटकर होते हैं। ये असामान्य व्यवहार प्रदर्शित करते हैं तथा सामाजिक परिस्थितियों से स्वयं को आसानी से अनुकूलित नहीं कर पाते। कुसमायोजन के कारण इनके सामंते नित्यप्रति नयी-नयी समस्याएँ आती रहती हैं। ऐसे असामान्य एवं विशेष बालकों की समस्याएँ निर्देशन के माध्यम से ही पूरी हो सकती हैं।

(8) शैक्षिक विविधता सम्बन्धी समस्याएँ – शिक्षा के विविध क्षेत्रों में हो रहे अनुसन्धान कार्यों के कारण ज्ञान की राशि निरन्तर बढ़ती जा रही है जिससे एक ओर, ज्ञान की नवीन शाखाओं को जन्म हुआ है तो दूसरी ओर, हर सत्र में नये पाठ्यक्रमों का समावेश करना पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त, सामान्य शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त प्रत्येक बालक के सम्मुख यह समस्या आती है कि वह शिक्षा के विविध क्षेत्रों में से किस क्षेत्र को चुने और उसमें विशिष्टीकरण प्राप्त करे। समाज की निरन्तर बढ़ती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जो नये एवं विशेष व्यवसाय जन्म ले रहे हैं उनके लिए किन्हीं विशेष पाठ्य-विषयों का अध्ययन अनिवार्य है। विभिन्न व्यवसायों की सफलता भिन्न-भिन्न बौद्धिक एवं आर्थिक स्तर, रुचि, अभिरुचि, क्षमता व योग्यता पर आधारित है। व्यक्तिगत भिन्नताओं का ज्ञान प्राप्त करके उनके अनुसार बालक को उचित शैक्षिक मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए निर्देशन की अत्यधिक आवश्यकता है, क्योकि निर्देशन का अपना महत्त्व है।

(9) पाश्चात्य सभ्यता से समायोजन – आज के वैज्ञानिक युग में और क्षेत्रीय दूरी कम होने से पृथ्वी के दूरस्थ देश एवं उनकी सभ्यताएँ, अर्थात् संस्कृतियाँ, परम्पराएँ तथा रीति-रिवाज एक-दूसरे के काफी नजदीक आ गये हैं। अंग्रेजों के पदार्पण एवं शासन ने भारतीयों के मस्तिष्क पाश्चात्य सभ्यता में रँग डाले हैं। पश्चिमी देशों के भौतिकवादी आकर्षण ने भारतीय युवाओं को इस सीमा तक सम्मोहित किया है कि वे अपने पुराने रीति-रिवाज और परम्पराएँ भुला बैठे हैं और एक प्रकार से भारतीय मूल्यों की अवमानना व उपेक्षा हो रही है। इसमें असंख्य विसंगतियाँ तथा कुसमायोजन के दृष्टान्त दृष्टिगोचर हो रहे हैं। भारतीय युवाओं को इन परिस्थितियों में गम्भीर प्रतिकूल प्रभावों से बचाने के लिए समुचित निर्देशन की आवश्यकता है।

(10) यौन सम्बन्धी समस्याएँ – काम-वासना’ एक नैसर्गिक मूल-प्रवृत्ति है, जो युवावस्था में विषमलिंगी व्यक्तियों में एक-दूसरे के प्रति अपूर्व आकर्षण पैदा करती है। किन्तु समाज की मान-मर्यादाओं तथा रीति-रिवाजों की सीमाओं को लाँघकर पुरुष एवं नारी का पारस्परिक मिलन नाना प्रकार की अड़चनों से भरा है। समाज ऐसे मिलन का घोर विरोध करता है। आमतौर पर काम-वासना की इस मूल-प्रवृत्ति का अवदमन होने से व्यक्ति में ग्रन्थियाँ बन जाती हैं तथा उसका व्यवहार असामान्य हो जाता है। यौन सम्बन्धों के कारण जनित विकृतियों में सुधार लाने के लिए तथा व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से निर्देशन की आवश्यकता होती है।

(11) व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास – व्यक्तिगत एवं सामाजिक हित में मानव-शक्ति का सही दिशा में अधिकतम उपयोग अनिवार्य है जिसके लिए व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास की आवश्यकता है। बालकों के व्यक्तित्व के सर्वांगीण तथा सन्तुलित विकास के लिए उन्हें घर-परिवार, पास-पड़ोस, विद्यालय तथा समाज में प्रारम्भिक काल से ही निर्देशन प्रदान करने की अतीव आवश्यकता है।

प्रश्न 2.
समाज में समुचित निर्देशन व्यवस्था के अभाव की स्थिति में होने वाली हानियों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन का क्षेत्र अत्यधिक व्यापक और महत्त्वपूर्ण है। सम्यक् निर्देशन की सहायता से व्यक्ति का जीवन व्यवस्थित हो जाता है और अपनी समस्याओं को हल करके वह सुखी एवं सफल व्यक्ति के रूप में अपने उज्ज्वल भविष्य की रक्षा हेतु तत्पर होता है। इसके विपरीत, समुचित निर्देशन और परामर्श के अभाव में व्यक्ति का पूर्ण विकास नहीं हो पाता और वह अपनी क्षमताओं एवं योग्यताओं के अनुसार एक सफल नागरिक नहीं बन पाता है।

समुचित निर्देशन के अभाव में हानियाँ

अनिवार्यता के बावजूद भी समुचित निर्देशन प्रदान न करने की दशा में निम्नलिखित हानियाँ दृष्टिगोचर होती हैं –

(1) शारीरिक विकास एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी दोष – उचित निर्देशन के अभाव में शरीर में घर कर गयीं अनेक बीमारियाँ बढ़ती जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप शारीरिक बल तथा साहस का अभाव पाया जाता है। निर्देशन के अभाव में शारीरिक आकर्षण घटता जाता है। अत्यधिक लम्बे या छोटे कद के अतिरिक्त अनेक शारीरिक विकृतियों; यथा—हकलाना, तुतलाना, गूंगा-बहरा या अन्धापन, कुरूपता इत्यादि पर अंकुश न होने से ये बढ़ते ही जाते हैं।

(2) घर-परिवार विषयक समस्याओं में वृद्धि – माता-पिता में से किसी एक की मृत्यु, तलाक या परित्याग के कारण खण्डित हुए परिवार को दुष्प्रभाव सीधे बच्चों पर पड़ता है। उचित निर्देश न मिलने के कारण बालाकों में परस्पर ईष्र्या, द्वेष, मन-मुटाव, अपराध भावना तथा लड़ाई-झगड़ा व्याप्त रहता है। घुटन-भरा कलहपूर्ण वातावरण तथा सद्भाव की कमी बालक-बालिकाओं को घर छोड़ने पर मजबूर कर देते हैं जो बाहर निकलकर सामाजिक दोषों व आपराधिक जीवन के शिकार हो जाते हैं।

(3) व्यक्तित्व का असन्तुलित विकास – प्रायः देखने में आता है कि व्यक्तित्व के असन्तुलित विकास के कारण बालक में अत्यधिक लापरवाही, आत्मविश्वास की कमी, अत्यधिक घमण्ड तथा स्वार्थ, संवेगात्मक अस्थिरता, भ्रान्तियाँ, अधिक भावुकता, लज्जा एवं संकोच तथा प्रबल अरुचियाँ जन्मै ले बैठती हैं। समुचित निर्देशन के अभाव में ये समस्याएँ एवं दोष व्यक्तिगत और सामाजिक कुसमायोजन में वृद्धि करते हैं, जिसकी परिणति निराशा तथा असफल जीवन में होती है।

(4) विद्यालयी जीवन से सम्बन्धित विकास – प्राय: निर्देशन के अभाव में विद्यार्थीगण अपनी रुचि के अनुकूल एवं जीवनोपयोगी पाठ्य-विषयों का चयन नहीं कर पाते, जिसके परिणामस्वरूप उनको पाठ्य-विषयों में ध्यान नहीं लगता और मन उचटता रहता है। उनमें अनुशासनहीनता घर कर जाती है और वे पढ़ाई-लिखाई से बचकर कक्षा छोड़ने के आदी हो जाते हैं। जिन बालकों में पढ़ाई-लिखाई से सम्बन्धित गलत आदतें निर्मित हो जाती हैं, वे उचित निर्देशन के अभाव में स्वयं को विद्यालयी कार्यक्रमों से अभियोजित नहीं कर पाते, समय नष्ट करते रहते हैं, गृह कार्य करके नहीं लाते, मेहनत से जी चुराते हैं तथा फेल होने के भय से चिन्ताग्रस्त रहने लगते हैं।

(5) सामाजिक एवं नैतिक पतन – सम्यक् निर्देशन के अभाव में व्यक्ति सामाजिक एवं नैतिक पतन को प्राप्त होता है। अनेकानेक कारणों से बालक को असामाजिक प्रवृत्तियाँ तथा नैतिक मान्यताओं का अभाव झेलना पड़ता है। वह बेईमानी, झूठ, चालबाजी, दगाबाजी, चोरी तथा धोखाधड़ी का व्यवहार अर्जित करता है। नैतिक गुणों के अभाव में वह मादक द्रव्यों; जैसे-शराब, सिगरेट, भाँग, गाँजा, अफीम आदि का सेवन करने लगता है। दूसरों के मतों व विश्वासों के प्रति असहिष्णुता के साथ-साथ उसमें अधिकारियों के प्रति विद्रोह की भावना बढ़ती है। कभी-कभी युवा प्रेम में असफलता के कारण असामाजिक व अनैतिक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। उनमें लैंगिक जीवन की गलत आदतों के अतिरिक्त विषमलिंगी व्यक्तियों के प्रति असभ्य और असंगत व्यवहार भी देखने को मिलता है। इससे नागरिक उत्तरदायित्वों का भली प्रकार पालन नहीं कर पाते और श्रेष्ठ नागरिकता के मार्ग से भटक जाते

(6) व्यावसायिक अक्षमताएँ – प्रायः देखा गया है कि माता-पिता की किसी व्यवसाय-विशेष में इच्छा व रुचि होती है जिसे वे अपनी सन्तान पर बलात् थोपना चाहते हैं। उचित मार्गदर्शन के अभाव में अपनी योग्यताओं व क्षमताओं के विरुद्ध व्यवसाय अपनाने के कारण बालक-बालिकाएँ अपनी व्यावसायिक परिस्थितियों से उचित तालमेल नहीं बैठा पाते। इसके अतिरिक्त उचित परामर्श न मिलने के कारण व्यवसाय को प्रारम्भ करने सम्बन्धी तथा समय, स्थान व साधनों सम्बन्धी दोष व्यावसायिक विफलताओं को जन्म देते हैं।

(7) धार्मिक समस्याएँ – एक ओर, धर्म भारतीय जन-जीवन का प्राण कहलाता है तो दूसरी ओर, विज्ञान और तकनीकी के अगणित चमत्कारों से मानव-मस्तिष्क को चिन्तन के नये-नये आयाम मिले हैं। इसके फलस्वरूप वैज्ञानिक मान्यताओं तथा धार्मिक मूल्य व अवस्थाओं के बीच एक संघर्ष और विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। धार्मिक आशंकाएँ, अन्धविश्वास तथा बलात् धर्म परिवर्तन को लेकर उत्पन्न हुए प्रश्नों का मनोवैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत न करने से समाज को भारी क्षति होती है।

(8) अवकांराजनित दोषों से हानियाँ – प्रायः लोगों को अवकाश के सदुपयोग के साधनों की उचित जानकारी नहीं रहती है। उचित मार्गदर्शन प्राप्त न होने की स्थिति में दुर्बलता, कमजोरी या शारीरिक-मानसिक असमर्थता के कारण उनमें खेलकूद अथवा मनोरंजन के किसी साधन में सफलतापूर्वक भाग ले सकने की असमर्थता देखने में आती है।

उपर्युक्त विवेचने से स्पष्ट होता है कि उचित निर्देशन के अभाव में व्यक्ति को अनेकानेक क्षेत्रों से सम्बन्धित दुष्कर समस्याओं का समाना करना पड़ता है, जिससे अपूरणीय हानि की सम्भावना बनी रहती है।

प्रश्न 3.
शैक्षिक निर्देशन से आप क्या समझते हैं? शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
शैक्षिक निर्देशन का अर्थ समझाइए।
उत्तर :

शैक्षिक निर्देशन का अर्थ
(Meaning of Educational Guidance)

निर्देशन का एक मुख्य स्वरूप शैक्षिक निर्देशन (Educational Guidance) है। शैक्षिक निर्देशन का सम्बन्ध मुख्य रूप से शैक्षिक परिस्थितियों से होता है।

शैक्षिक निर्देशन बालक को अपने शैक्षिक कार्यक्रम को बुद्धिमत्तापूर्वक नियोजित कर पाने में सहायता करता है। यह बालकों को ऐसे पाठ्य-विषयों का चुनाव करने में सहायता देता है जो उनकी बौद्धिक क्षमताओं, रुचियों, योग्यताओं तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं के अनुकूल हों। यह उन्हें इस योग्य बना देता है ताकि वे शिक्षा सम्बन्धी कुछ विशेष समस्याओं तथा विद्यालय की विभिन्न परिस्थितियों से भली प्रकार समायोजन कर अपने शैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें।

शैक्षिक निर्देशन की परिभाषा
(Definition of Educational Guidance)

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों एवं विद्वानों ने शैक्षिक निर्देशन को परिभाषित करने का प्रयास किया है। उनमें से कुछ का उल्लेख अग्रलिखित है –

(1) ऑर्थर जे० जोन्स के अनुसार,“शैक्षिक निर्देशन का तात्पर्य उस व्यक्तिगत सहायता से है। जो विद्यार्थियों को इसलिए प्रदान की जाती है कि वे अपने उपयुक्त विद्यालय,,पाठ्यक्रम, पाठ्य-विषय एवं विद्यालय-जीवन का चयन कर सकें तथा उनसे समायोजन स्थापित कर सकें।”

(2) रूथ स्ट्राँग के कथनानुसार, “व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने का मुख्य लक्ष्य उसे समुचित कार्यक्रम के चुनाव तथा उसमें प्रगति करने में सहायता प्रदान करना है।”

(3) एलिस के शब्दों में, “शैक्षिक निर्देशन से तीन विशेष क्षेत्रों में सहायता मिलती है- (अ) कार्यक्रम और पाठ्य-विषयों का चयन, (ब) चालू पाठ्यक्रम में कठिनाइयों का मुकाबला करना तथा (स) अगले प्रशिक्षण हेतु विद्यार्थियों का चुनाव।”

शैक्षिक निर्देशन सम्बन्धी उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि यह प्रक्रिया बालकों के पाठ्यक्रम चयन की सर्वोत्तम विधि है। उसमें बालकों की व्यक्तिगत विभिन्नताओं, शैक्षिक उपलब्धियों, प्राप्तांकों, अभिभावकों की आशाओं-महत्त्वाकांक्षाओं तथा मनोवैज्ञानिकों के परामर्श को मुख्य रूप से ध्यान में रखा जाता है, क्योंकि इसके अन्तर्गत एक निर्देशक द्वारा प्रदान किये गये निर्देशन की जाँच भी सम्भव है, इसलिए यह विधि वैज्ञानिक एवं प्रामाणिक भी है।

शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया
(Process of Educational Guidance)

पाठ्य-विषयों के चयन में निर्देशक के जानने योग्य बातें

हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा और जूनियर हाईस्कूल स्तर तक शिक्षा में अधिक विविधता नहीं है। और समस्त विद्यार्थी लगभग एक समान विषयों का ही अध्ययन करते हैं, किन्तु जब बालक माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूल में प्रवेश करते हैं तब उन्हें पाठ्य-विषयों के चयन सम्बन्धी समस्या का सामना करना पड़ता है। शिक्षा के मार्ग पर बढ़ने का यह वह स्थल है जहाँ पाठ्यक्रम अनेक भागों में बँट जाता है और बालक को उनमें से किसी एक का चयन करना होता है। पाठ्य-विषयों के चयन सम्बन्धी शैक्षिक निर्देशन के निम्नलिखित तीन मुख्य पहलू हैं –

(अ) बालक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना।

जिसे बालक/व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन देना है, उसके सम्बन्ध में निर्देशक को निम्नलिखित सूचनाएँ प्राप्त कर लेनी चाहिए –

(1) बौद्धिक स्तर – शैक्षिक निर्देशन में बालक के बौद्धिक स्तर का पता लगाना अति आवश्यक है। तीव्र बुद्धि वाला बालक कठिन विषयों का अध्ययन करने के योग्य होता है और इसीलिए विज्ञान एवं गणित जैसे विषयों का चुनाव कर सकता है। वह उच्च कक्षाओं तक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों के साथ सुगमतापूर्वक पहुँच जाता है। कला-कौशल और रचनात्मक कार्यों में अपेक्षाकृत कम बुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार, बालक के लिए पाठ्य-विषयों का चुनाव करने में उसके बौद्धिक स्तर का ज्ञान आवश्यक है।

(2) शैक्षिक सम्प्राप्ति – शैक्षिक सम्प्राप्ति अथवा शैक्षिक उपलब्धि (Scholastic Attainment) की मुँचना अक्सर पिछली कक्षाओं के प्राप्तांकों द्वारा मिलती है, लेकिन निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत ‘सम्प्राप्ति परीक्षणों तथा सम्बन्धित अध्यापकों द्वारा भी शैक्षिक उपलब्धियों का ज्ञान कर लिया जाता है। किसी विशेष विषय में अधिक प्राप्तांकों की प्रवृत्ति, बालक की उस विषय में रुचि का संकेत करती है। मान लीजिए, एक विद्यार्थी आठवीं कक्षा तक विज्ञान में सर्वाधिक अंक लेकर उत्तीर्ण हुआ है तो कहा जा सकता है कि भविष्य में भी वह विज्ञान में अधिक अंक प्राप्त करेगा। इन प्राप्तांकों या उपलब्धियों को आधार मानकर माध्यमिक स्तर पर विषय चुनने का परामर्श दिया जाना चाहिए।

(3) मानसिक योग्यताएँ – शिक्षा-निर्देशक को बालक की मानसिक योग्यताओं का भी समुचित ज्ञान होना चाहिए, क्योंकि विभिन्न प्रकार के पाठ्य-विषयों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की मानसिक योग्यताएँ उपयोगी सिद्ध होती हैं। उदाहरण के लिए-साहित्यकार, अधिवक्ता, व्याख्याता, नेता तथा शिक्षक बनाने में शाब्दिक योग्यता’; गणितज्ञ, वैज्ञानिक तथा इन्जीनियर बनाने में सांख्यिक योग्यता’; दार्शनिक, विचारक, गणितज्ञ अधिवक्ता बनाने में ‘तार्किक योग्यता’ सहायक होती है। मानसिक योग्यताओं को ज्ञान तत्सम्बन्धी मनोवैज्ञानिक परीक्षणों तथा शिक्षकों की सूचना द्वारा लगाया जा सकता है।

(4) विशिष्ट मानसिक योग्यताएँ एवं अभिरुचियाँ – बालक के लिए पाठ्य-विषय का चयन करते समय बालक की विशिष्ट मानसिक योग्यताओं तथा अभिरुचियों का ज्ञान परमावश्यक है। विभिन्न पाठ्य-विषयों की सफलता अलग-अलग प्रकार की विशिष्ट योग्यताओं तथा अभिरुचियों पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए-संगीत एवं कला की विशिष्ट योग्यता तथा अभियोग्यता वाले बालक-बालिकाओं को प्रारम्भ से ही संगीत एवं कला विषयों का चुनाव कर लेना चाहिए।

(5) रुचियाँ – बालक की जिस विषय में अधिक रुचि होगी उस विषय के अध्ययन में वह अधिक ध्यान लगाएगा। अत: निर्देशक को बालक की रुचि का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। रुचियों का ज्ञान रुचि परीक्षणों तथा रुचि परिसूचियों के अतिरिक्त अभिभावकों, शिक्षकों तथा दैनिक निरीक्षण के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।

(6) व्यक्तित्व की विशेषताएँ – माध्यमिक स्तर पर किसी बालक को विषयों के चयन से सम्बन्धित परामर्श देने के लिए उसके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं का ज्ञान आवश्यक है। व्यक्तित्व विभिन्न प्रकार की विशेषताओं और गुणों; यथा-आत्मविश्वास, धैर्य, लगन, मनन, अध्यवसाय आदि का संगठन है। साहित्यिक विषयों का चयन भावुक व्यक्ति को, विज्ञान और गणित का चयन तर्कयुक्त एवं दृढ़ निश्चयी व्यक्ति को तथा रचनात्मक विषयों का चयन उद्योगी एवं क्रिया-प्रधान व्यक्तियों को करना चाहिए। व्यक्तित्व के गुणों का ज्ञान जिन व्यक्तित्व परीक्षणों से किया जाता है उनमें साक्षात्कार, व्यक्तित्व परिसूचियाँ, प्रश्नसूची, व्यक्ति-इतिहास, निर्धारण-मान आदि प्रमुख हैं।

(7) शारीरिक दशा – कुछ विषयों को चयन करते समय निर्देशक को बालक की शारीरिक रचना तथा स्वास्थ्य की दशाओं का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। कृषि विज्ञान एवं प्राविधिक विषय इन्हीं के अन्तर्गत आते हैं। कृषि सम्बन्धी अध्ययन जमीन के साथ कठोर श्रम पर निर्भर है जिसके लिए हृष्ट-पुष्ट शरीर होना आवश्यक है। इसी प्रकार प्राविधिक विषयों का प्रयोगात्मक ज्ञान कार्यशाला में कई घण्टे काम करके ही उपलब्ध किया जा सकता है। अतः पाठ्य-विषय के चयन से पूर्व चिकित्सक से शारीरिक विकास की जाँच करा लेनी चाहिए तथा रुग्ण या दुर्बल शरीर वाले बालकों को ऐसे विषय का चुनाव नहीं करना चाहिए।

(8) पारिवारिक स्थिति – पारिवारिक परिस्थितियों; विशेषकर आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर शिक्षा-निर्देशक उन्हीं विषयों के चयन का परामर्श देता है जिन्हें निजी परिस्थितियों के अन्तर्गत आसानी से पढ़ा जा सके। माध्यमिक स्तर पर कुछ ऐसे विषय निर्धारित हैं जिनमें उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अभिभावकों को अत्यधिक धन खर्च करना पड़ता है; यथा-विज्ञान पढ़ने के बाद मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश। बालक की योग्यताओं, उच्च बौद्धिक स्तर तथा अभिरुचि के होते हुए भी इन कॉलेजों में अपने बच्चों को भेजना प्रत्येक माता-पिता के वश की बात नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में विद्यार्थी के लिए पाठ्य-विषयों के चयन में उसके परिवार की आर्थिक दशा को ध्यान में रखना अपरिहार्य है।

(ब) पाठ्य-विषयों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना

निर्देशन एवं परामर्श प्रदान करने वाले विशेषज्ञ को बालक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने के उपरान्त पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित विस्तृत जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित दो प्रकार की जानकारियाँ आवश्यक हैं –

(1) पाठ्य-विषयों के विभिन्न वर्ग – जूनियर स्तर से निकलकर माध्यमिक स्तर में प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों के लिए पाठ्यक्रम को कई वर्गों में विभक्त किया गया है; यथा –

  1. साहित्यिक
  2. वैज्ञानिक
  3. वाणिज्य
  4. कृषि सम्बन्धी
  5. प्रौद्योगिक
  6. रचनात्मक तथा
  7. कलात्मक।

इन वर्गों के विषय में ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त यह जानना आवश्यक है कि सम्बन्धित विद्यालय में कौन-कौन-से वर्स के पाठ्य-विषय पढ़ाये जाते हैं और विद्यार्थी की रुचि के विषय भी वहाँ उपलब्ध हो सकेंगे या नहीं।

(2) विविध पाठ्य-विषयों के अध्ययन हेतु आवश्यक मानसिक योग्यताएँ – किन विषयों के लिए कौन-सी योग्यताएँ ज़रूरी हैं और उस विद्यार्थी में कौन-कौन-सी योग्यताएँ विद्यमान हैं, इन सभी बातों की विस्तृत जानकारी, शिक्षा-निर्देशक को होनी चाहिए, तभी वह उपयुक्त पाठ्य-विषयों के चयन में विद्यार्थियों की सहायता कर सकता है।

(स) पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित व्यवसायों की जानकारी प्राप्त करना

प्रत्येक विद्यार्थी अपनी शिक्षा से निवृत्त होकर जीवन-यापन के लिए किसी-न-किसी व्यवसाय का चयन करता है। आजकल अधिकांश व्यवसायों में विशेषीकरण होने से तत्सम्बन्धी प्रशिक्षण पहले से ही प्राप्त करना पड़ता है। अत: निर्देशक को पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित व्यवसायों के विषय में ये सूचनाएँ प्राप्त करना अति आवश्यक है –

(1) व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए किन पाठ्य-विषयों का अध्ययन आवश्यक है – सबसे पहले निर्देशक को यह जानना चाहिए कि किसी विशेष व्यवसाय से सम्बन्धित प्रशिक्षण कोर्स में प्रवेश पाने के लिए और अध्ययन की शुरुआत के लिए किन विषयों का ज्ञान आवश्यक है। उदाहरणार्थ-डॉक्टर बनने के लिए 9वीं कक्षा से जीवविज्ञान पढ़ना चाहिए, जबकि इंजीनियर बनने के लिए विज्ञान वर्ग में गणित पढ़ना चाहिए।

(2) विभिन्न वर्गों के पाठ्य-विषयों का अध्ययन किन व्यवसायों के योग्य बनाता है – पाठ्य-विषयों के चयन में व्यवसाय सम्बन्धी जानकारी आवश्यक है। निर्देशक को पहले ही यह ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए कि किसी व्यवसाय-विशेष का सीधा सम्बन्ध किन-किन विषयों से है ताकि व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त न करके भी उन विषयों का ज्ञान व्यवसाय के कार्य में मदद दे सके। उदाहरण के लिए-कॉमर्स लेकर कोई विद्यार्थी वाणिज्य या व्यापार के क्षेत्र में तो प्रवेश कर सकता है, किन्तु डॉक्टरी या इंजीनियरिंग के क्षेत्र में नहीं।

बालक को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने से पूर्व उपर्युक्त समस्त बातों की विस्तृत एवं वास्तविक जानकारी एक सफल शिक्षा-निर्देशक (Educational Guide) को होनी चाहिए।

प्रश्न 4.
शैक्षिक निर्देशन के लाभ अथवा उपयोगिता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

शैक्षिक निर्देशन के लाभ (उपयोगिता अथवा महत्त्व)
[Merits (Utility or Importance) of Educational Guidance)

वर्तमान शिक्षा-पद्धति एक जटिल व्यवस्था है जिसमें बालकों की क्षमताएँ, शक्तियाँ, योग्यताएँ, समय तथा धन आदि का अपव्यय होता है और वे अपने शैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रहते हैं। इन असफलताओं तथा निराशाओं के बीच शैक्षिक निर्देशनं आशा की किरणों के साथ शिक्षा के क्षेत्र में अवतरित होता है जिसकी उपयोगिता या महत्त्व सन्देह से परे है। इसके लाभों की पुष्टि निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत हो जाती है –

(1) पाठ्य-विषयों का चयन – माध्यमिक विद्यालयों में विभिन्न व्यवसायों से सम्बन्धित विविध पाठ्य-विषयों के अध्ययन की व्यवस्था है। निर्देशन की सहायता से विद्यार्थी अपने बौद्धिक स्तर, क्षमताओं, योग्यताओं तथा रुचियों के अनुसार पाठ्य-विषयों का चुनाव कर सकता है। इस भाँति वह अपने मनोनुकूल व्यवसाय की प्राप्ति कर सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है।

(2) भावी शिक्षा का सुनिश्चय – हाईस्कूल स्तर के पश्चात् विद्यार्थियों के लिए यह सुनिश्चित कर पाना दूभर हो जाता है कि उनकी भावी शिक्षा का लक्ष्य एवं स्वरूप क्या होगा, अर्थात् वे किस व्यावसायिक विद्यालय में प्रवेश लें, व्यापारिक विद्यालय में या औद्योगिक विद्यालय में। यदि किन्हीं कारणों से वे अनुपयुक्त शिक्षा संस्थान में भर्ती हो जाते हैं तो कुसमायोजन के कारण उन्हें बीच में ही संस्था छोड़नी पड़ सकती है जिसके फलस्वरूप काफी हानि उठानी पड़ती है। इसके सन्दर्भ में निर्देशन सही पथ-प्रदर्शन करता है।

(3) नवीन विद्यालय में समायोज – शैक्षिक निर्देशन उन विद्यार्थियों की सहायता करता है ज़ो किसी नये विद्यालय में प्रवेश पाते हैं और वहाँ के वातावरण के साथ समायोजित नहीं हो पाते हैं।

(4) पाठ्यक्रम का संगठन – विद्यार्थियों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को दृष्टिगत रखते हुए उनका पाठ्यक्रम निर्धारित एवं संगठित किया जाना चाहिए। पाठ्यक्रम संगठन का कार्य शैक्षिक निर्देशन के माध्यम से किया जाता है।

(5) परिवर्तित विद्यालयी प्रबन्ध, पाठ्यक्रम एवं शिक्षण-विधि के सन्दर्भ में – विद्यालय एक लघु समाज है। समाज की प्रजातान्त्रिक व्यवस्था का सीधा प्रभाव विद्यालयी प्रबन्ध एवं व्यवस्थाओं पर पड़ता है। प्रजातान्त्रिक शिक्षा समाज के सभी व्यक्तियों को समान अवसर प्रदान करती है। व्यक्तिगत विभिन्नता के सिद्धान्त पर आधारित गत्यात्मक प्रकार की प्रजातान्त्रिक विद्यालयी व्यवस्था, पाठ्यक्रम तथा शिक्षण विधियों की आवश्यकताओं की ओर पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए। इन परिवर्तित देशाओं के कारण पैदा होने वाली समस्याओं का समाधान एकमात्र शैक्षिक निर्देशन की सहायता से ही सम्भव है।

(6) मन्द बुद्धि, पिछड़े तथा मेधावी बालकों के लिए – शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत मन्द बुद्धि, पिछड़े तथा मेधावी बालकों की पहचान करके उनकी क्षमतानुसार शिक्षा की व्यवस्था की जाती है। इस विशिष्ट व्यवस्था को लाभ अलग-अलग तीनों ही वर्गों के बालकों अर्थात् । मन्द बुद्धि, पिछड़े व मेधावी बालकों को प्राप्त होता है।

(7) अभिभावकों की सन्तुष्टि के लिए – कभी-कभी अभिभावकों की महत्त्वाकांक्षाओं तथा बालकों की मानसिक योग्यताओं व क्षमताओं के मध्य गहरा अन्तर होता है। निर्देशन के माध्यम से वे अपने बालक की विशेषताओं की सही वास्तविक झलक पाकर तदनुकूल शिक्षा की व्यवस्था कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त वे शिक्षा-संस्थानों के कार्यक्रमों से परिचित होकर उन्हें अपना योगदान प्रदान कर सकते हैं।

(8) अनुशासन की समस्या के समाधान के लिए – क्योंकि शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया में बालक की क्षमताओं, रुचियों तथा अभिरुचियों को ध्यान में रखकर उसकी शिक्षा सम्बन्धी व्यवस्था की जाती है; अत: पाठ्यक्रम बालक को भार-स्वरूप नहीं लगता। इसके विपरीत, वह चयनित विषयों में रुचि लेकर अनुशासित रूप में अध्ययन करता है जिससे अनुशासन की समस्या का एक बड़ी सीमा तक समाधान निकल आता है।

(9) जीविकोपार्जन का समुचित ज्ञान – प्रायः विद्यार्थियों को विभिन्न पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित एवं आगे चलकर उपलब्ध हो सकने वाले व्यावसायिक अवसरों की जानकारी नहीं होती। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति किसी विशेष व्यवसाय में जानकारी व रुचि न होने के कारण बार-बार अपना व्यवसाय बदलते हैं जिससे व्यावसायिक अस्थिरता में वृद्धि के कारण हानि होती है। अतः रोजगार के अवसरों का ज्ञान प्राप्त करने तथा जीविकोपार्जन सम्बन्धी समुचित ज्ञान पाने की दृष्टि से शैक्षिक निर्देशन अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होता है।

(10) अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या का अन्त – अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या के अन्त ज्यादातर बालक-बालिकाएँ विभिन्न कारणों से स्थायी साक्षरता प्राप्त किये बिना ही विद्यालय का त्याग कर देते हैं जिससे प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर अत्यधिक अपव्यय हो रहा है। इसके अतिरिक्त परीक्षा में फेल होने वाले विद्यार्थियों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। इस समस्या का अन्त शैक्षिक निर्देशन के माध्यम से ही सम्भव है।

प्रश्न 5.
वैयक्तिक एवं सामूहिक शैक्षिक निर्देशन की विधि और प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

शैक्षिक निर्देशन की विधि
(Method of Educational Guidance)

प्राथमिक एवं जूनियर हाईस्कूल की सीमाओं को लाँघकर माध्यमिक स्तर की दहलीज पर आकर सभी विद्यार्थियों को सचमुच ही यह ज्ञात नहीं होता कि उनके जीवन की भावी दिशा एवं व्यूह-नीति क्या होगी। न केवल इतना ही, अपितु उनके अभिभावकगण भी उनके भावी जीवन के विषय में अधिक स्पष्ट नहीं होते। देश के असंख्य बालकों की एक विशाल भीड़ को उचित मार्ग-दर्शन एवं परामर्श की तलाश होती है जिसे निर्धारित एवं कम समय में प्रदान करना होता है। इस सन्दर्भ में ‘निर्देशन’ (Guidance) एक सर्वोत्तम विधि एवं कला है। शैक्षिक निर्देशन की दो विधियाँ प्रचलित हैं – (I) वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन तथा (II) सामूहिक शैक्षिक निर्देशन।

(i) वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन
(Personal Educational Guidance)

वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन के अन्तर्गत परामर्शदाता या निर्देशक बालक से व्यक्तिगत स्तर पर सम्पर्क स्थापित करके उसकी विभिन्न समस्याओं को अध्ययन करता है। ये समस्याएँ व्यक्तिगत, सामाजिक या संवेगात्मक इत्यादि हो सकती हैं। वह बालक के बौद्धिक स्तर, शैक्षिक उपलब्धियों, मानसिक योग्यताओं, रुचियों, अभिरुचियों, पारिवारिक तथा शारीरिक दशाओं से परिचय प्राप्त करने का भरपूर प्रयास करता है। इसके लिए निम्नलिखित प्रमुख विधियों का प्रयोग किया जाता है –

(1) भेंट या साक्षात्कार – निर्देशक या परामर्शदाता बालक से भेंट करके या साक्षात्कार द्वारा उसके सम्बन्ध में आवश्यक सूचनाएँ एकत्र करता है तथा निर्देशन की प्रक्रिया में सहायक विभिन्न तथ्यों की जानकारी उपलब्ध कराता है।

(2) प्रश्नावली – बालक के सम्बन्ध में तथ्यों का पता लगाने अथवा उसके व्यक्तिगत विचारों से परिचित होने के उद्देश्य से एक प्रश्नावली निर्मित की जाती है जिसके उत्तर स्वयं बालक को देने होते हैं। प्रश्नावली के माध्यम से बालक की आदतों, पारिवारिक वातावरण, अवकाशकालीन क्रियाओं, शिक्षा और व्यवसाय सम्बन्धी योजनाओं के विषय में ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

(3) व्यक्तिगत इतिहास –व्यक्तिगत इतिहास के माध्यम से बालक की व्यक्तिगत, सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी प्राप्त की जाती है। इसके अतिरिक्त बालक के अभिभावक, मित्र, परिवार के सदस्य एवं आस-पड़ोस के लोग भी उसके विषय में बताते हैं, जिससे उसकी समस्याओं का निदान एवं समाधान किया जाता है।

(4) संचित अभिलेख – विद्यालय में प्रत्येक विद्यार्थी से सम्बन्धित एक ‘संचित अभिलेख’ होता है। इस अभिलेख में विद्यार्थी की प्रगति, योग्यता, बौद्धिक स्तर, रुचि, पारिवारिक दशा तथा शारीरिक स्वास्थ्य सम्बन्धी सूचनाएँ संगृहीत रहती हैं। इन अभिलेखों का अध्ययन करके परामर्शदाता, निर्देशन की दिशा निर्धारित करता है।

(5) बुद्धि एवं ज्ञानार्जन परीक्षण – इन परीक्षणों के माध्यम से निर्देशक इस बात की जाँच करता है कि विद्यार्थी ने विभिन्न पाठ्य-विषयों में कितना ज्ञानार्जन किया है, उसका बौद्धिक स्तर कितना है, शिक्षक ने उसे कितनी प्रभावशालता के साथ पढ़ाया है तथा उसकी योग्यताएँ व दुर्बलताएँ। क्या हैं? इन सभी बातों का ज्ञान विद्यार्थी की भावी प्रगति के सन्दर्भ में अनुमान लगाने में निर्देशक की सहायता करता है।

(6) परामर्श – निर्देशक विद्यार्थियों की समस्या का ज्ञान प्राप्त करके तथा उनके विषय में समस्त तथ्यों का संकलन करके उन्हें शिक्षा सम्बन्धी परामर्श प्रदान करता है। यह परामर्श उनकी समस्याओं का उचित समाधान करने में सहायक होता है।

(7) अनुगामी कार्यक्रम – निर्देशन प्रदान करने के उपरान्त अनुगामी कार्य द्वारा यह जाँच की। जाती है कि निर्देशन के बाद विद्यार्थी की प्रगति सन्तोषजनक रही है अथवा नहीं। असन्तोषजनक प्रगति इस बात की द्योतक है कि विद्यार्थी के विषय में निर्देशक के अनुमान गलत थे तथा निर्देशन ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर पाया। इसलिए उसमें संशोधन करके पुनः निर्देशन प्रदान किया जाना चाहिए।

वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन की विधि के उपर्युक्त सोपान किसी विद्यार्थी की शैक्षिक समस्याओं के सम्बन्ध में समुचित परामर्श एवं समाधान प्रस्तुत करने में सहायक सिद्ध होते हैं। लेकिन इस विधि की कुछ परिसीमाएँ भी हैं; यथा – एक ही विद्यार्थी के लिए विशेषज्ञ या मनोवैज्ञानिक की आवश्यकता होती है तथा इसमें अधिक समय और धन का व्यय भी होता है। सामूहिक शैक्षिक निर्देशन से इन कमियों को पूरा करने का प्रयास किया गया है।

(ii) सामूहिक शैक्षिक निर्देशन (Group Educational Guidance)

सामूहिक शैक्षिक निर्देशन की विधि के विभिन्न सोपानों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है

(1) अनुस्थापन वार्ताएँ – सामूहिक निर्देशन के अन्तर्गत सर्वप्रथम, मनोवैज्ञानिक विद्यालय में जाकर बालकों को वार्ता के माध्यम से निर्देशन का महत्त्व समझाता है। ये वार्ताएँ विद्यार्थियों को स्वयं अपनी आवश्यकताओं, क्षमताओं, शैक्षिक उद्देश्यों एवं रुचियों इत्यादि के सम्बन्ध में सोचने-समझने हेतु प्रेरित व उत्साहित करती हैं।

(2) मनोवैज्ञानिक परीक्षण – विद्यार्थियों को उचित दिशा में निर्देशित करने के उद्देश्य से मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है। इन परीक्षणों की सहायता से विद्यार्थियों की सामान्य एवं विशिष्ट बुद्धि, मानसिक योग्यता, रुचि, अभिरुचि, भाषा एवं व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं का ज्ञान हाता है। इससे निर्देशक का कार्य सुगम हो जाता है।

(3) साक्षात्कार – व्यक्तिगत निर्देशन के समान ही साक्षात्कार का प्रयोग सामूहिक निर्देशन में भी किया जाता है। इसके लिए निर्देशक समिति एवं बालकों से भेंट करके विभिन्न पाठ्य-विषयों के प्रति उनकी रुचि, भावी शिक्षा और व्यवसाय-योजना आदि के सम्बन्ध में सूचनाएँ एकत्र करते हैं। इसके लिए स्वयं-परिसूची’ (Self-Inventory) का भी प्रयोग किया जाता है।

(4) विद्यालय से तथ्य संकलन – मनोवैज्ञानिक, बालकों की विभिन्न पाठ्य-विषयों की ‘शैक्षिक सम्प्राप्ति की जानकारी के लिए, पूर्व परीक्षाओं के प्राप्तांकों पर विचार करता है। इस सम्बन्ध में ‘संचित-लेखा’ (Cumulative Record) के साथ-साथ अध्यापकों की राय लेना भी जरूरी एवं महत्त्वपूर्ण है।

(5) सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का अध्ययन – शिक्षा से सम्बन्धित समुचित निर्देशन प्रदान करने की दृष्टि से विद्यार्थियों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का अध्ययन आवश्यक है। निर्देशक को समाज, आस-पड़ोस, घर-गृहस्थी, मित्र-मण्डली, परिचितों तथा अभिभावकों से उनके विषय में पूरी-पूरी सामाजिक-आर्थिक जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।

(6) परिवार से सम्पर्क – माता-पिता ने बालकों को जन्म दिया है, पालन-पोषण किया है, उन्हें शनैः-शनैः विकसित होते हुए देखा है तथा उसकी भावी उन्नति व व्यवसाय आदि का स्वप्न देखा है; अतः मनोवैज्ञानिक को बालकों के माता-पिता के विचारों को अवश्य समझना चाहिए। इसके लिए पत्र-व्यवहार द्वारा या माता-पिता से व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित करके तथ्यों का संकलन किया जा सकता है।

(7) पाश्र्व-चित्र – अनेकानेक स्रोतों से एकत्रित की गयी सूचनाओं व तथ्यों को एक पार्श्व-चित्र (Profile) में व्यक्त किया जाता है। इस प्रयास में उनकी विभिन्न योग्यताओं, क्षमताओं तथा भिन्न-भिन्न परीक्षण स्तर के चित्र अंकित किये जाते हैं। पाश्र्व-चित्र को देखकर बालकों के सम्बन्ध में एक साथ ही ढेर सारी महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ ज्ञात हो जाती हैं। इन सूचनाओं के आधार पर विद्यार्थियों को पाठ्य-विषय के चुनाव के सम्बन्ध में निर्देशन दिया जाता है जो प्रायः लिखित रूप में होता है।

(8) अनुगामी कार्य – अनुगामी कार्य का एक नाम अनुवर्ती अध्ययन (Follow-up study) भी है। निर्देशन से सम्बन्धित यह अन्तिम सोपान या कार्य है। निर्देशन पाने के बाद जब बालक किसी विषय का चयन करके उसका अध्ययन शुरू कर देता है तो मनोवैज्ञानिक या निर्देशक को यह जाँच करनी होती है कि बालक उस विषय को सफलता से अध्ययन कर रहा है अथवा नहीं। बालक की ठीक प्रगति का अभिप्राय है कि निर्देशन सन्तोषजनक रहा, अन्यथा उसे फिर से निर्देशन प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 6.
व्यावसायिक निर्देशन से आप क्या समझते हैं। व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया का भी विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
व्यवसाय प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का सहारा तथा जीविकोपार्जन का एक सशक्त साधन है। जिसके द्वारा जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। शिक्षा के विभिन्न उद्देश्यों में से एक महत्त्वपूर्ण एवं मुख्य उद्देश्य विद्यार्थी को व्यावसायिक दृष्टि से कुशल बनाना है। गाँधी जी के अनुसार, “सच्ची शिक्षा बेरोजगारी के विरुद्ध एक प्रकारे का आश्वासन होना चाहिए। प्राय: देखने में आता है कि लोग बिना सोचे-समझे किसी भी व्यवसाय को शुरू कर देते हैं, किन्तु बाद में कार्य-दशाओं के प्रतिकूल होने पर उन्हें वह व्यवसाय छोड़ना पड़ता है जिसमें श्रम, समय और धन की हानि होती है। अतः । व्यवसाय को चुनाव उचित और उपयोगी होना चाहिए जिसके लिए निर्देशन अत्यधिक उपयोगी सिद्ध होता है।

व्यावसायिक निर्देशन का अर्थ
(Meaning of Vocational Guidance)

व्यावसायिक निर्देशन एक ऐसी मनोवैज्ञानिक सहायता है जो व्यक्ति (विद्यार्थी) को जीवन के एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य जीविकोपार्जन’ की प्राप्ति में सहायक है। इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को यह निर्णय करने में मदद देना है कि वह जीविकोपार्जन के लिए कौन-सा उपयुक्त व्यवसाय चुने जो उसकी बुद्धि, अभिरुचि तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं के अनुकूल हो। इसके अतिरिक्त, यह व्यक्ति को व्यवसाय-चयन, वातावरण से उचित सामंजस्य तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण आदि में चयन हेतु उचित पथ-प्रदर्शन एवं सहायता प्रदान करता है। वस्तुतः जीविकोपार्जन का स्पष्ट एवं गहरा प्रभाव मानव-जीवन की प्रत्येक वृत्ति पर पड़ता है, इसलिए वर्तमान परिस्थितियों में तो इसका क्षेत्र मात्र व्यक्ति तक ही सीमित न होकर समूचे समाज तथा विश्व के प्रत्येक राष्ट्र तक विस्तृत हो गया है।

व्यावसायिक निर्देशन की परिभाषा
(Definition of Vocational Guidance)

(1) क्रो एवं क्रो के अनुसार, “व्यावसायिक निर्देशन की व्याख्या सामान्यत: उस सहायता के रूप में की जाती है, जो विद्यार्थियों को किसी व्यवसाय को चुनने, उसके लिए तैयारी करने तथा उसमें उन्नति प्रदान करने के लिए दी जाती है।”

(2) अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की राय में, “व्यावसायिक निर्देशन वह सहायता है जो एक व्यक्ति को व्यवसाय चुनने से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान हेतु प्रदान की जाती है जिससे व्यक्ति की क्षमताओं का तत्सम्बन्धी व्यवसाय-सुविधाओं के साथ समायोजन हो सके।

(3) जोन्स के अनुसार, “व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति को ऐसी व्यक्तिगत सहायता प्रदान करने का प्रयास है, जिसके द्वारा वह स्वयं अपने लिए उचित व्यवसाय का चुनाव, उसके लिए तैयारी तथा उसमें प्रवेश करके उन्नति कर सके।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि व्यावसायिक निर्देशन, उपयुक्त व्यवसाय के चुनाव में किसी व्यक्ति की सहायता करने की प्रक्रिया है। यह उसे व्यावसायिक परिस्थितियों से स्वयं को अनुकूलित करने में मदद देती है जिससे कि समाज की मानव-शक्ति का सदुपयोग हो सके तथा अर्थव्यवस्था में समुचित सन्तुलन स्थापित हो सके। इन्हीं तथ्यों को ‘वोकेशनल गाइडेन्स नामक पत्रिका में इन शब्दों में स्पष्ट किया गया है, “व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति को सहायता प्रदान करने की वह क्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति अपने लिए कोई उपयुक्त व्यवसाय चुनता है, उसके लिए स्वयं को तैयार करता है, उसे अपनाता है तथा उसमें प्रगति करता है। व्यावसायिक निर्देशन का मुख्य कार्य व्यक्ति को अपने भविष्य के सम्बन्ध में ऐसे निर्णय एवं उद्देश्य चयन करने में सहायता करना होता है, जो उसके सन्तोषजनक व्यावसायिक समायोजन के लिए आवश्यक होते हैं।”

व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया : व्यवसाय का चयन
(Process of Vocational Guidance : Selection of Vocation)

किसी व्यक्ति के लिए उपयुक्त व्यवसाय चुनने की दृष्टि से व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया प्रारम्भ की जाती है। यह प्रक्रिया निर्देशक से अग्रलिखित दो प्रकार की जानकारियों की माँग करती है –

(अ) व्यक्ति के विषय में जानकारी (Study of the Individual)

व्यावसायिक निर्देशन के अन्तर्गत उपयुक्त व्यवसाय का चुनाव करते समय, सर्वप्रथम, व्यक्ति के शारीरिक विकास, उसके बौद्धिक स्तर, मानसिक योग्यताओं, रुचियों, अभिरुचियों तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं का अध्ययन करना आवश्यक है। व्यक्ति के इस भाँति अध्ययन को ‘व्यक्ति-विश्लेषण (Individual Analysis) का नाम दिया जाता है। व्यक्ति-विश्लेषण में निम्नलिखित बातें जानना आवश्यक समझा जाता है

(1) शैक्षणिक योग्यता (Educational Qualifications) – किसी व्यवसाय के चयन में उसके लिए अपेक्षित शिक्षा के स्तर तथा शैक्षणिक योग्यता की जानकारी आवश्यक होती है। कुछ व्यवसायों के लिए प्रारम्भिक स्तर, कुछ के लिए माध्यमिक स्तर तो कुछ के लिए उच्च स्तर की शिक्षा अपेक्षित है। प्रोफेसर, इन्जीनियर, डॉक्टर, वकील तथा प्रशासक आदि के व्यवसाय हेतु उच्च शिक्षा की आवश्यकता होती है, किन्तु ओवरसियर, कम्पाउण्डर, स्टेनोग्राफर, क्लर्क, मिस्त्री तथा प्राथमिक स्तर के शिक्षक हेतु सामान्य शिक्षा ही पर्याप्त है। कृषि, निजी व्यापार, दुकानदारी आदि के लिए थोड़ी-बहुत शिक्षा से ही काम चल जाता हैं। इसके अतिरिक्त अनेक व्यवसायों में शैक्षणिक योग्यताओं के साथ-साथ विशेष परीक्षण और ओवरसियर तथा कम्पाउण्डर बनने के लिए विशेष प्रशिक्षण में सम्मिलित होना पड़ता है।

(2) बुद्धि (Intelligence) – यह बात सन्देह से परे है कि भिन्न-भिन्न व्यवसायों में सफलता प्राप्त करने के लिए भिन्न-भिन्न बौद्धिक स्तर की आवश्यकता होती है। निर्देशक या परामर्शदाता को व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता का ज्ञान निम्नलिखित तालिका से हो सकता है –

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 1

(3) मानसिक योग्यताएँ (Mental Abilities) – अलग-अलग व्यवसायों के लिए विशिष्ट मानसिक योग्यताओं की आवश्यकता होती है। निर्देशक को चाहिए कि वह सम्बन्धित व्यक्ति में विशिष्ट योग्यता की जाँच कर उसे तत्सम्बन्धी व्यवसाय चुनने का परामर्श दे। उदाहरण के लिए संगीत की विशेष योग्यता संगीतज्ञ के लिए; यान्त्रिक (Mechanical) व आन्तरिक्षक (Spatial) योग्यता इन्जीनियर और मिस्त्रियों के लिए; शाब्दिक व शब्द-प्रवाह सम्बन्धी योग्यताएँ वकील, अध्यापक और लेखक आदि के लिए आवश्यक समझी जाती हैं।

(4) अभियोग्यताएँ (Aptitudes) – विभिन्न प्रकार के व्यवसायों की सफलता हेतु विभिन्न प्रकार की अभियोग्यताएँ या अभिरुचियाँ आवश्यक हैं। सर्वमान्य रूप से, प्रत्येक व्यक्ति में किसी विशेष प्रकार का कार्य करने से सम्बन्धित योग्यता जन्म से ही होती है। यदि जन्म से चली आ रही योग्यता को ही प्रशिक्षण देकर अधिक परिष्कृत एवं प्रभावशाली बनाया जाए तो व्यक्ति की व्यावहारिक कार्यकुशलता में अभिवृद्धि हो सकती है। यान्त्रिक कार्य के लिए यान्त्रिक अभिरुचि, कला सम्बन्धी कार्य के लिए कलात्मक अभिरुचि तथा लिपिक के लिए लिपिक अभिरुचि आवश्यक है।

(5) रुचियाँ (Interests) – किसी कार्य की सफलता के लिए उसमें व्यक्ति की रुचि का होना आवश्यक है। किसी ऐसे कार्य को करना उचित है जिसमें पहले से व्यक्ति की रुचि हो, अन्यथा मिले हुए कार्य में बाद में रुचि विकसित की जा सकती है। प्रायः योग्यता और रुचि साथ-साथ पाये जाते हैं। और कम योग्यता वाले क्षेत्र में व्यक्ति रुचि प्रदर्शित नहीं करता। ऐसी दशा में रुचि और योग्यता में से किसे प्रमुखता दी जाए यह बात विचारणीय बन जाती है।

(6) व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताएँ (Personality Qualities) – अनेक व्यवसायों की सफलता व्यक्तित्व सम्बन्धी विशिष्ट गुणों पर आधारित होती है; अत: निर्देशक को व्यवसाय के चयन सम्बन्धी परामर्श प्रदान करते समय व्यक्तित्व की विशेषताओं पर भी ध्यान देना चाहिए। एजेण्ट या सेल्समैन के लिए मिलनसार, आत्मविश्वासी, खुश-मिजाज, व्यवहारकुशल तथा बहिर्मुखी व्यक्तित्व का होना परमावश्यक है। कुछ व्यवसाय ऐसे होते हैं जिनमें संवेगात्मक स्थिति, धैर्य, एकाग्रता, सामाजिकता आदि गुणों की आवश्यकता होती है; जैसे-डॉक्टर, इन्जीनियर, बैंक लिपिक, ड्राइवर इत्यादि। लेखक, विचारक और समीक्षक का व्यक्तित्व चिन्तनशील एवं अन्तर्मुखी होता है।

(7) शारीरिक दशा (Physical Condition) – प्रत्येक कार्य में शारीरिक शक्ति का उपभोग होता ही है; अत: सभी व्यवसायों के चयन में शारीरिक विकास, स्वास्थ्य आदि शारीरिक दशाओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए। कुछ व्यवसायों; जैसे-पुलिस, सेना आदि में अधिक शारीरिक क्षमता की अपेक्षा होती है और उनके लिए शारीरिक दृष्टि से क्षमतावान व्यक्तियों को ही चुना जाता है। ऐसे व्यवसायों में कम क्षमता वाले, अस्वस्थ या रोगी व्यक्तियों को कदापि नहीं लिया जा सकता, चाहे वे कितने ही बुद्धिमान क्यों न हों।

(8) आर्थिक स्थिति (Economic Condition) – बालक को व्यवसाय चुनने सम्बन्धी परामर्श प्रदान करने में उसके परिवार की आर्थिक दशा का ज्ञान निर्देशक को अवश्य रहना चाहिए। कुछ व्यवसाय ऐसे हैं जिनके प्रशिक्षण में अधिक समय और अधिक धन दोनों की आवश्यकता होती है; उदाहरणार्थ-डॉक्टरी और इन्जीनियरिंग। लम्बे समय तक शिक्षा पर भारी धन व्यय करना प्रत्येक परिवार के वश की बात नहीं है। इसी कारण से अनेक योग्य एवं प्रतिभाशाली युवक-युवतियाँ धनाभाव के कारण इन व्यवसायों का चयन नहीं कर पाते हैं।

(9) लिंग (Sex) – लैंगिक भेद के कारण व्यक्तियों के कार्य-क्षेत्र में अन्तर आ जाता है, इसलिए व्यवसाय चयन की प्रक्रिया में निर्देशक को व्यक्ति के लिंग का भी ध्यान रखना चाहिए। सेना और पुलिस जैसे विभाग पुरुषों के लिए ही उपयुक्त समझे जाते हैं, जबकि अध्यापन, परिचर्या, लेखन आदि स्त्रियों के लिए अधिक ठीक रहते हैं। वस्तुतः स्त्रियाँ बौद्धिक कार्य तो पुरुषों के समान कर सकती हैं लेकिन उनमें पुरुषों के समान कठोर शारीरिक श्रम करने की क्षमता नहीं होती। वर्तमान परिस्थितियों में लिंग भेद की मान्यता क्रमशः घट रही है। अब महिलाएँ पुलिस, सेना तथा वायुसेना में भी सफँलतापूर्वक पदार्पण कर रही हैं।

(10) आयु (Age) – बहुत-से व्यवसायों में राज्य की ओर से सेवाओं में प्रवेश पाने की आयु-सीमाएँ निर्धारित कर दी गयी हैं। प्रशिक्षण प्राप्त करने की भी सीमाएँ सुनिश्चित कर दी गयी हैं। अतः किसी व्यवसाय के चयन हेतु निर्देशक को व्यक्ति की आयु सीमा पर भी विचार कर लेना चाहिए।

(ब) व्यवसाय-जगत् सम्बन्धी जानकारी (Study of Vocational world)

व्यावसायिक निर्देशक को व्यवसाय-जगत् की पूरी जानकारी रहनी चाहिए। विश्व-भर में कितने प्रकार के व्यवसाय हैं, किन क्षेत्रों में कौन-से व्यवसाय उपलब्ध हैं, किसी व्यवसाय की विभिन्न शाखाओं व उपशाखाओं का ज्ञान, व्यवसाय-विशेष के लिए आवश्यक शैक्षिक-बौद्धिक-मानसिक योग्यताएँ तथा व्यक्तिगत भिन्नता के साथ अपनाये गये व्यवहार का समायोजन-इन सभी बातों को लेकर जानकारी आवश्यक है। व्यवसाय-जगत् से पूर्ण परिचय के लिए निर्देशक का निम्नलिखित तथ्यों से अवगत होना परमविश्यक है –

(1) व्यवसायों का वर्गीकरण – व्यावसायिक निर्देशन के लिए व्यवसायों के प्रकारों का समझना सबसे पहला और अनिवार्य कदम है। व्यवसायों को कई आधारों पर वर्गीकृत किया है। तीन प्रमुख आधार ये हैं–(i) कार्य के स्वरूप की दृष्टि से व्यवसायों का वर्गीकरण, (i) शिक्षा, बौद्धिक स्तर, प्रशिक्षण, सामाजिक सम्मान आदि की दृष्टि से व्यवसायों का वर्गीकरण तथा (ii) रुचियों की दृष्टि से व्यवसायों का वर्गीकरण।

(2) व्यवसाय-परिवार एवं उनके विभिन्न स्तरीय कार्य – व्यवसाय जगत् से सम्बन्धित दूसरी जानकारी व्यवसाय-परिवार (Job-Family) तथा उसके विभिन्न स्तरीय कार्य (Levels of work) हैं। व्यवसाय-परिवार का अर्थ उन एक ही तरह के व्यवसायों से है जो कार्य की प्रवृत्ति, कार्य की दशा, अपेक्षित बौद्धिक क्षमता, शैक्षिक स्तर तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं के आधार पर एकसमान होते हैं। उदाहरण के तौर पर-“यान्त्रिक व्यवसाय-परिवार में ऊँचे स्तर पर इन्जीनियरिंग का कार्य होता है, मध्यम स्तर पर ओवरसियर, विद्युत-मिस्त्री तथा निम्न स्तर पर फिटर व मैकेनिक होते हैं। निर्देशक को इन सभी बातों को यथोचित ज्ञान होना चाहिए।

(3) व्यवसायों के विषय में जानकारी के स्रोत – विभिन्न व्यवसायों के विषय में जानकारी हासिल करने के स्रोतों का ज्ञान व्यावसायिक निर्देशक को अवश्य होना चाहिए। ये स्रोत इस प्रकार हैं –

  1. सरकारी विभागों की ओर से प्रकाशित सूचनाएँ
  2. रोजगार कार्यालय
  3. व्यापार एवं उद्योग सम्बन्धी सूचनाएँ
  4. पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से
  5. विभिन्न व्यवसायों के विशेषज्ञों की वार्ताओं को रेडियो प्रसारण
  6. व्यवसायों से सम्बन्धित कल-कारखानों या संस्थाओं में स्वयं जाकर
  7. व्यावसायिक एवं औद्योगिक यूनियनों के भाषण व लेख
  8. देश-विदेश के विशेषज्ञों के माध्यम से जानकारी
  9. व्यावसायिक क्षेत्रों में स्वतः कार्य अनुभव प्राप्त करके तथा
  10. निर्देशन मनोवैज्ञानिक एवं परामर्शदाताओं से सम्पर्क स्थापित करके। इस प्रकार व्यवसाय सम्बन्धी लाभप्रद सूचनाएँ ज्ञात की जा सकती हैं।

(4) व्यवसाय से सम्बन्धित कुछ स्मरणीय तथ्य – व्यवसाय की जानकारी संकलित करते समय निर्देशक के लिए ध्यान देने योग्य बातें इस प्रकार हैं –

  1. व्यवसाय में कार्य का स्वरूप (अर्थात् कार्य का प्रकार, उसकी प्रकृति, कार्मिक का उत्तरदायित्व व कर्तव्य)
  2. कार्य करने की दशाएँ (अर्थात् बन्द जगह में होता है या खुली जगह में, कार्य के घण्टे, कार्य बैठकर करते हैं या खड़े होकर, वातावरण आदि कैसा है?)
  3. बुद्धि, मानसिक योग्यता, रुचि तथा अभिरुचि से सम्बन्धित सूचनाएँ
  4. व्यवसाय के लिए व्यक्तित्व के किन गुणों की आवश्यकता है और उनका प्रयोग कब व कहाँ करना है?
  5. प्रशिक्षण सम्बन्धी अनेक जानकारियाँ प्राप्त कर लेना
  6. व्यवसाय के लिए शारीरिक दशाएँ कैसी हों?
  7. आगे चलकर पदोन्नति के अवसर भी मिलेंगे या नहीं?
  8. व्यवसाय में कितनी अमिदनी हो सकती है?
  9. समाज या बाजार में व्यवसाय की कितनी माँग है?
  10. व्यवसाय में प्रवेश हेतु क्या प्रक्रिया अपनायी जाती है; परीक्षण होता है या नहीं और किस प्रकार का?
  11. उस व्यवसाय का समाज में सम्मान होता है या नहीं? आदि।

प्रश्न 7.
व्यावसायिक निर्देशन के लाभ एवं उपयोगिता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

व्यावसायिक निर्देशन के लाभ एवं उपयोगिता
(Advantages and Utility of Vocational Guidance)

व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति एवं समुदाय के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं लाभकारी सिद्ध होता है। इसकी उपयोगिता को संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है

(1) व्यक्तिगत भेद एवं व्यावसायिक निर्देशन – मनोविज्ञान एवं सर्वमान्य रूप से कोई भी दो व्यक्ति एकसमान नहीं हो सकते और हर मामले में आनुवंशिक और परिवेशजन्य भेद पाये जाते हैं। इन्हीं भेदों के कारण हर व्यक्ति पृथक् एवं दूसरों की अपेक्षा बेहतर कार्य कर सकता है तथा इन्हीं के आधार पर व्यक्ति को सही और उपयुक्त व्यवसाय चुनने होते हैं। व्यावसायिक निर्देशन के माध्यम से व्यक्तिगत गुणों एवं क्षमताओं के आधार पर व्यवसाय चुनने से व्यक्ति को सफलता मिलती है।

(2) व्यावसायिक बहुलता एवं निर्देशन – आजकल व्यवसाय अपनाने का आधार सामाजिक परम्पराएँ व जाति-व्यवस्था नहीं रहा। समय के साथ-साथ व्यावसायिक बहुलता ने व्यवसाय के चुनाव की समस्या को जन्म दिया है। व्यावसायिक निर्देशन में विविध व्यवसायों व कार्यों का विश्लेषण करके उनके लिए आवश्यक गुणों वाले व्यक्ति को चुना जाता है।

(3) सफल एवं सुखी जीवन के लिए सोच – समझकर व्यवसाय चुनने से व्यक्ति के जीवन में स्थायित्व एवं उन्नति आती है। व्यवसाय का उपयुक्त चुनाव सफलता को जन्म देता है जिससे जीवन में सुख और समृद्धि आती है।

(4) आर्थिक लाभ – व्यवसाय में योग्य, सक्षम, बुद्धिमान एवं रुचि रखने वाले कर्मियों को नियुक्त करने से न केवल उत्पादन की मात्रा बढ़ती है, बल्कि उत्पादित वस्तुओं में गुणात्मक वृद्धि भी होती है जिससे व्यवसाय को अधिक लाभ होता है। इस लाभ का अंश कर्मचारियों में भी विभाजित होता है और वे आर्थिक लाभ अर्जित करते हैं।

(5) शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य – विवशतावश किसी व्यवसाय को अपनाने से रुचिहीनता, निराशा, उत्साहविहीनता, कुण्ठाओं एवं तनावों का जन्म होता है; अत: शारीरिक-मानसिक क्षमताओं व शक्तियों का भरपूर लाभ उठाने के लिए तथा दुर्बलताओं से बचने के लिए व्यावसायिक निर्देशन महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी है।

(6) अवांछित प्रतिस्पर्धा की समाप्ति एवं सहयोग में वृद्धि – अच्छे व्यवसाय में पद बहुत कम हैं, जबकि उनके पीछे बेतहाशा दौड़ रहे अभ्यर्थियों की भीड़ अधिक है। इससे अवांछित एवं गला-काट प्रतिस्पर्धा का जन्म हुआ है। व्यावसायिक निर्देशन का सहारा लेकर यदि व्यक्ति अपनी योग्यता, क्षमता वे, शक्ति को आँककर सही व्यवसाय चुन लेगा तो समाज में अवांछित प्रतिस्पर्धा से उत्पन्न भग्नाशा समाप्त हो जाएगी। इससे पारस्परिक सहयोग में वृद्धि होगी।

(7) मानवीय संसाधनों का सुनियोजित एवं अधिकतम उपयोग – मानव-शक्ति को समझना, आँकना और उसके लिए उपयुक्त व्यवसाय की तलाश करना व्यावसायिक निर्देशन का कार्य है। यह निर्देशन राष्ट्रीय नियोजन कार्यक्रम का भी एक महत्त्वपूर्ण अंग है, जिसके अन्तर्गत मानवीय संसाधनों का अधिकाधिक उपयोग सम्भव होता है, जिससे व्यक्तिगत एवं समष्टिगत कल्याण में अभिवृद्धि की जा सकेगी।

(8) समाज की गत्यात्मकता एवं प्रगति – समाज की प्रकृति गत्यात्मक है। हर पल नयी-नयी परिस्थितियाँ जन्म ले रही हैं। बढ़ती हुई मानवीय आवश्यकताओं, उपलब्ध किन्तु सीमित साधनों एवं प्रगति की परिवर्तनशील अवधारणाओं ने मानव व उसके समाज के मध्य समायोजन की दशाओं को विकृत कर डाला है। इस विकृत दशा में सुधार लाने की दृष्टि से तथा व्यावसायिक सन्तुष्टि के विचार को पुष्ट करने हेतु व्यक्ति को उचित कार्य देना होगा। इसके लिए व्यावसायिक निर्देशन ही एकमात्र उपाय दीख पड़ता है।

प्रश्न 8.
व्यावसायिक सूचना के विभिन्न स्रोतों को सामान्य परिचय दीजिए।
या
भारत में व्यवसाय सम्बन्धी सूचनाओं के स्रोत का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

व्यावसायिक सूचना के मुख्य स्रोत

व्यावसायिक निर्देशन एवं व्यवसाय-चयन के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति को अपनी रुचियों तथा क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए अनुकूल व्यवसाय की खोज करनी चाहिए। इसके लिए उसे विभिन्न व्यवसायों के विषय में सूचनाएँ एकत्र करनी चाहिए। अपने व्यवसाय और जीवन को गम्भीरता से लेने वाले व्यक्ति स्वयं के अनुकूल व्यवसाय को चयन करने हेतु अनेकानेक स्रोतों से आवश्यक सूचनाएँ एकत्र करते हैं और विभिन्न क्षेत्रों में सफल व्यक्तियों, उच्च पदाधिकारियों तथा संस्थाओं में कार्यरत प्रभावशाली लोगों से सम्पर्क साधते हैं। इसके अलावा समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, पुस्तकों, संचार-साधनों द्वारा प्रकाशित व प्रचारित व्यावसायिक सूचनाओं का तल्लीनता से अवलोकन भी करते है। व्यवसाय से सम्बद्ध ऐसी सूचनाएँ प्रदान करने में व्यावसायिक सूचना कक्ष’ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। व्यावसायिक सूचना के मुख्य स्रोतों का सामान्य परिचय अग्रलिखित है –

(1) समाचार-पत्र – विविध समाचार-पत्रों में रोजगार सम्बन्धी सूचनाएँ प्रकाशित होती हैं जो व्यवसाय के इच्छुक व्यक्ति के लिए आवश्यक तथा उपयोगी हैं। समाचार-पत्र दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक तथा मासिक हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त, सिर्फ रोजगार से सम्बन्धित सूचनाएँ प्रकाशित करने वाले समाचार-पत्र भी प्रकाशित होते हैं।

(2) रोजगार पत्रिकाएँ – अलग-अलग आयु वर्गों तथा योग्यता से सम्बन्धित रोजगार के अवसरों तथा प्रशिक्षण सम्बन्धी सूचनाएँ देने वाली रोजगार पत्रिकाएँ युवा वर्ग का मार्गदर्शन करती हैं। व्यावसायिक सूचना कक्ष में श्रम एवं रोजगार से सम्बद्ध बहुत-सी पत्रिकाएँ मिलती हैं।

(3) सरकारी सूचनाएँ – सरकार की ओर से समय-समय पर बेरोजगार युवक-युवतियों के लाभार्थ सूचनाएँ प्रकाशित की जाती हैं। ऐसी सूचनाएँ राजकीय संस्थानों में नियुक्ति तथा प्रशिक्षण से सम्बन्धित होती हैं।

(4) रोजगार कार्यालय – रिक्त पदों एवं प्रशिक्षण आदि से सम्बन्धित सूचनाएँ रोजगार कार्यालयों से प्राप्त हो सकती हैं। ये कार्यालय बेरोजगार तथा महत्त्वाकांक्षी युवक-युवतियों के लिए समय-समय पर व्यावसायिक सूचनाएँ उपलब्ध करते हैं। इस उद्देश्य से प्रायः प्रत्येक जिले में एक रोजगार कार्यालय होता है।

(5) वार्ताएँ – व्यावसायिक सूचना-कक्ष समय-समय पर विभिन्न प्रकार के व्यवसायों के सम्बन्ध में वार्ताएँ करते हैं। इन वार्ताओं में अलग-अलग क्षेत्रों से विशेषज्ञ आमन्त्रित किये जाते हैं।

(6) औद्योगिक संस्थान – औद्योगिक संस्थानों में समय-समय पर पद रिक्त होते रहते हैं या नये पद सृजित होते हैं। अक्सर बड़े-बड़े प्रतिष्ठान ऐसे पदों का विज्ञापन दैनिक समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, रेडियो या दूरदर्शन के माध्यम से कराते रहते हैं। इसके अलावा औद्योगिक संस्थानों द्वारा व्यावसायिक सूचना केन्द्र को भी अपनी आवश्यकता का ज्ञान कराया जाता है।

प्रश्न 9.
व्यक्तिगत निर्देशन से आप क्या समझते हैं? इसकी आवश्यकता कब पड़ती है? व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
व्यक्तिर्गत निर्देशन का अर्थ बताइए। व्यक्तिगत निर्देशन के सोपानों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर :

व्यक्तिगत निर्देशन का अर्थ
(Meaning of Personal Guidance)

व्यक्ति के जीवन से सम्बन्धित कुछ ऐसी भी समस्याएँ हैं जिन्हें शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन के अन्तर्गत स्थान प्राप्त नहीं होता। ये समस्याएँ उसकी व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याएँ होती हैं। इन समस्याओं के समाधान से सम्बन्धित निर्देशन को व्यक्तिगत निर्देशन (Personal Guidance) कहा जाता है। व्यक्तिगत निर्देशन एक ऐसी सहायता है जो व्यक्ति को उसकी संवेगात्मक सामाजिक, धार्मिक, नैतिक एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को हल करने में प्रदान की जाती है। व्यक्तिगत निर्देशन के फलस्वरूप व्यक्ति निजी व्यक्तित्व का समुचित विकास पर सन्तुलन की अवस्था प्राप्त कर पाता है। इस भाँति व्यक्तिगत निर्देशन से अभिप्राय किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत सहायता देने वाली उस विशिष्ट प्रक्रिया से है जिसके माध्यम से वह अपनी व्यक्तित्व सम्बन्धी समस्याओं के मौलिक कारणों को समझता है, उनके निराकरण का प्रयत्न करता है तथा एक ऐसी जीवन शैली अपनाता है ताकि अपने व्यक्तित्व का सन्तुलित विकास करते हुए वह जीवन की विभिन्न सरल एवं जटिल परिस्थितियों से उपयुक्त समायोजन स्थापित कर सके।

विभिन्न व्यक्तिगत समस्याएँ तथा व्यक्तिगत निर्देशन की आवश्यकता
(Various Personal Problems and Need for Personal Guidance)

आज की संक्रमणकालीन परिस्थितियों में प्रत्येक व्यक्ति का जीवन विभिन्न प्रकार की समस्याओं से भरा हुआ है। व्यक्तिगत समस्याओं और उनके विविध स्वरूपों की विशद् व्याख्या तो यहाँ प्रस्तुत नहीं की जा सकती, किन्तु उन्हें एक प्रारूप के रूप में प्रदर्शित अवश्य किया जा सकता है; यथा –

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 2

व्यक्तिगत समस्याओं की नींव व्यक्ति के शैशवकाल में ही पड़ जाती है, जबकि उसके जीवन में स्नेह, सुरक्षा, स्वतन्त्रता और उचित पोषण की कमी के कारण भविष्य में असन्तुलन की सम्भावनाएँ बल पकड़ती हैं। व्यक्ति की निजी समस्याएँ दो प्रकार की हो सकती हैं-एक, शारीरिक समस्याएँ तथा दो, मानसिक समस्याएँ। शारीरिक समस्याएँ चिकित्सा के क्षेत्र में आती हैं, किन्तु शारीरिक समस्याओं के कारण उत्पन्न कुछ मानसिक दशाएँ भी निजी समस्याएँ पैदा करती हैं; जैसे—बार-बार रोगग्रस्त होने के कारण दुर्बलत्, चिड़चिड़ापन, थकान, सुस्ती आदि। इन समस्याओं को मानसिक निर्देशन के माध्यम से हल किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त संवेगात्मक समस्याएँ; जैसे-भय, चिन्ता, निराशा आदि का तो मानसिक संमस्याओं के रूप में ही अध्ययन किया जाता है। किशोरावस्था में प्रजनन अंगों के विकास के कारण अनेक यौन समस्याओं का उदय होता है। संकोच या लज्जा के कारण किशोर-किशोरियाँ इन समस्याओं को अभिव्यक्त नहीं कर पाते और अन्धविश्वास व लज्जास्पद घुटन के कारण समस्याएँ उलझती चली जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप ये बढ़ते-बढ़ते भयानक स्वरूप धारण कर लेती हैं।

निजी समस्याओं के अतिरिक्त सामाजिक समयोजन से जुड़ी हुई भी अनेक समस्याएँ हैं; जैसे–पारिवारिक, आर्थिक एवं नैतिक समस्याएँ। पारिवारिक समस्याओं में घरों के कलह, पति-पत्नी के मध्य मनमुटाव, परिवार के अन्य सदस्यों के कारण घर में तनाव की स्थिति आदि प्रमुख हैं। आर्थिक समस्याओं में बेकारी और निर्धनता के कारण घर में आर्थिक तंगी आदि तथा नैतिक समस्याओं में व्यक्ति के आदर्श एवं समाज की यथार्थ स्थिति के बीच संघर्षपूर्ण स्थिति मुख्य हैं। कभी-कभी आदर्शवादी व्यक्ति को भी मजबूरी में रिश्वत जैसे गलत साधनों का प्रयोग करना पड़ता है जिसके परिणामस्वरूप उसे नैतिक द्वन्द्व की स्थिति से होकर गुजरना पड़ता है। यह नैतिक द्वन्द्व अक्सर मानसिक रोगों के रूप में अभिव्यक्त होता है।

कुछ अन्य व्यक्तिगत समस्याएँ –

  1. अतिशय लज्जावृत्ति एवं एकाकीपन के कारण स्वयं को समाज से दूर रखने का प्रयास
  2. अधिक संवेदनशीलता के कारण विषमता का जन्म
  3. अधिक क्रियाशीलता के कारण उद्दण्ड हो जाना
  4. निरर्थक क्रियाएँ; जैसे-अनेक बार लगातार हाथ धोना, हाथ मलते रहना
  5. चोरी, झूठ बोलना, गाली-गलौज, मारपीट तथा काम से पलायन जैसे व्यवहार सम्बन्धी दोष
  6. खुले स्थान, बन्द स्थान, पानी, छत या चूहे जैसी छोटी-छोटी चीजों से डरने सम्बन्धी अकारण भय
  7. अनवरत चिन्ता और उदासी तथा
  8. मनुष्य में दोहरा व्यक्तित्व पन्न हो जाना, इत्यादि दोष व्यक्तित्व से सम्बन्धित हैं और व्यक्तिगत समस्याओं के रूप में प्रकट होते हैं।

व्यक्तिगत निर्देशन, उपर्युक्त वर्णित समस्त व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान हेतु मनोविज्ञान के विशेषज्ञ द्वारा प्रदत्त मार्गदर्शन है। इस मार्गदर्शन को समस्या का समाधान नहीं कहा जा सकता, यह तो समस्या के प्रति व्यक्ति विशेष का दृष्टिकोण परिवर्तित करने वाला एक मनोवैज्ञानिक उपाय है। वस्तुत: यह एक परामर्श या सूत्र है जिसे विशेषज्ञ द्वारा समस्या को पूरी तरह समझ लेने के बाद पीड़ित व्यक्ति को दिया जाता है। यह परामर्श निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ एवं मनोवैज्ञानिक होता है जिससे समस्या से। ग्रस्त व्यक्ति की समझ, लोच तथा परिस्थितियों के साथ सामंजस्य की क्षमता बढ़ जाती है।

व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया के प्रमुख चरण
(Main Steps of the Process of Personal Guidance)

मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया के दो मुख्य पहलू (Aspects) स्वीकार किये हैं – (1) समस्या का निदान (Diagnosis of the Problem) तथा (2) समस्या का उपचार (Treatment of the Problem)। किन्तु कुछ विख्यात विद्वानों ने व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया में स्थूल रूप से पाँच चरण या सोपान स्वीकार किये हैं। प्रक्रिया से सम्बन्धित उपर्युक्त दोनों पहलू भी इन्हीं पाँच सोपानों में सम्मिलित हैं। व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया के ये पाँच सोपान इस प्रकार हैं

(1) तथ्यों का संग्रह (Collection of Data) – व्यक्तिगत निर्देशन का सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण चरण ‘तथ्यों का संग्रह है, क्योंकि समस्या सम्पूर्ण व्यक्तित्व से सम्बन्धित होती है। अतः तथ्यों का संग्रह भी सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विषय में ही होता है। ये तथ्य दो रूपों में एकत्र किये जाते हैं–(अ) समस्या का इतिहास–वह विशेष समस्या कब और किस परिस्थिति में प्रकट हुई? इसे किस प्रकार अनुभव किया गया था और यह किस समय बढ़ी? आदि-आदि। (ब) व्यक्ति का जीवन-वृत्त-व्यक्ति के जीवन पक्षों का सम्पूर्ण विवरण, परिपक्वता एवं अभिवृत्त आदि के विषय में सूचनाएँ एकत्र करना। आवश्यक तथ्यों को हर सम्भव स्रोत से एकत्र किया जाता है तथा एकत्र किये गये तथ्यों को एक आश्व-चित्र के रूप में तैयार कर लिया जाता है।

(2) समस्या का निदान (Diagnosis of Problem) – आवश्यक तथ्यों के संग्रह के उपरान्त मनोवैज्ञानिक या निर्देशक निदान सम्बन्धी क्रियाएँ प्रारम्भ करता है। सरल एवं उत्तम उपचार के लिए अच्छा निदान आवश्यक है। निदान का तात्पर्य उस क्रिया से है जो किसी समस्या के मूल कारणों का पता लगाने के लिए प्रयोग की जाती है। मनोवैज्ञानिक प्राप्त तथ्यों या सूचनाओं को आपस में जोड़कर उनमें निहित प्रतिमानों (Patterns) की खोज करता है। प्रतिमानों के ज्ञान से समस्या की उत्पत्ति के कारणों की खोज की जाती है। मनोवैज्ञानिक तथ्यों का विश्लेषण एवं उनकी इस प्रकार व्याख्या करता है कि उनमें एक सम्बद्धता या रूपरेखा बन जाती है और यहीं से समस्या के वास्तविक कारणों के सही-सही अनुमान की शुरुआत हो जाती है। निदान की क्रिया परामर्शदाता के कौशल तथा पूर्व-अनुभव पर निर्भर होती है। विद्वानों ने इसे समस्या के उपचार की पृष्ठभूमि कहा है जिसकी सफ़लता उपचार की सफलता को सुनिश्चित करती है।

(3) फलानुमान (Prognosis) – फलानुमान (अर्थात् फल का अनुमान) का अभिप्राय यह अनुमान लगाने से है कि मनोवैज्ञानिक या परामर्शदाता समस्या का समाधान प्राप्त करने में कहाँ तक सफल हो सकता है। फलानुमान की क्रिया निदान के साथ-साथ चलती है। उदाहरणार्थ-मान लीजिए, कोई बालक निरन्तर अपनी कक्षा में अनुत्तीर्ण हो रहा है। मनोवैज्ञानिक उसकी बुद्धि का परीक्षण करके पाता है कि उसकी बुद्धि निम्न स्तर की है। इस प्रकार वह निदान करता है कि बालक की परीक्षा में बार-बार असफलता का कारण उसका बौद्धिक स्तर नीचा होना है। इसके साथ मनोवैज्ञानिक यह फलानुमान भी देता है कि बालक उच्च परीक्षा में सफलता प्राप्त नहीं कर सकेगा। लेकिन फलानुमान प्राप्त करना कोई आसान काम नहीं है, यह एक जटिल क्रिया है। इसके लिए अनेक कारक उत्तरदायी हैं; जैसे-पारिवारिक आयु, उच्चाकांक्षाएँ तथा वातावरण। व्यक्तिगत निर्देशन को फलानुमान करने से पहले व्यक्ति को प्रभावित करने वाले सभी कारकों पर ध्यान देना होता है।

(4) चिकित्सा या समस्या का उपचार (Therapy of Treatment of the Problem) – व्यक्तिगत समस्याओं से पीड़ित और परामर्श की इच्छा रखने वाले व्यक्ति की समस्याओं को समझने तथा उनके मूल कारणों की जानकारी प्राप्त करने के बाद उपचार का कार्य प्रारम्भ होता है। परामर्श का इच्छुक व्यक्ति जब अपने से सम्बन्धित समस्त परीक्षणों, साक्षात्कार एवं परिपार्श्व-चित्र का अवलोकन कर लेता है तो उसका दृष्टिकोण बदल जाता है और अपनी समस्या को वह स्वयं ही बहुत कुछ समझे भी लेता है। यही नहीं, समस्या का समुचित समाधान प्राप्त करने के लिए वह कोई-न-कोई उपयुक्त मार्ग भी खोज लेता है। इसी दौरान परामर्शदाता मनोवैज्ञानिक रूप से उसके सामने अपने सुझाव प्रस्तुत करता है। ये सुझाव अनेक प्रकार के व्यवहारों के रूप में होते हैं जिनमें से व्यक्ति कोई एक सुझाव अपने लिए चुन लेता है। उपचार सम्बन्धी सुझाव प्रस्तुत करते समय व्यक्ति की त्रुटियों की ओर संकेत नहीं करना चाहिए और उसे सुझाव कोई उपदेश-सा भी नहीं लगना चाहिए, अन्यथा वह सुझाव के प्रति विरोधी भाव व्यक्त कर सकता है।

(5) अनुवर्ती अनुशीलन (Follow-up Studies) – समस्या समाधान के बाद भी निर्देशक को यह देखना होता है कि व्यक्ति कैसा चल रहा है, उसका व्यक्तित्व पूरी तरह समायोजित है या नहीं, उसमें कोई गड़बड़ी या नया रोग तो उत्पन्न नहीं हो रही है? इसके लिए निर्देशक को व्यक्ति से लगातार सम्पर्क बनाये रखना पड़ता है और उसकी सहायता करनी पड़ती है। इसकी उपयोगिता दो बातों को लेकर है–एक, निर्देशक को अपनी सफलता/असफलता का ज्ञान होता रहता है जिससे उसे निर्देशन प्रक्रिया को सुधारते रहने का अवसर प्राप्त होता है तथा दो, परामर्श प्राप्त करने वाला व्यक्ति यह समझकर सन्तुष्ट रहता है कि निर्देशक उसका हितचिन्तक तथा शुभाकांक्षी है।

प्रश्न 10.
उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवाओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
उत्तर प्रदेश में राज्य स्तर पर, क्षेत्रीय स्तर पर तथा विद्यालय स्तर पर होने वाले निर्देशन कार्यों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवाओं के स्वरूप को विस्तार से लिखिए।
उत्तर :

भारत में निर्देशन सेवाओं के श्रीगणेश का श्रेय हमारे प्रदेश अर्थात् उत्तर प्रदेश को प्राप्त हुआ सर्वप्रथम 1937 ई० में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नियुक्त की गयी ‘आचार्य नरेन्द्र देव शिक्षा पुनर्व्यवस्था समिति ने अपनी रिपोर्ट में विद्यालयों की मनोवैज्ञानिक सेवाओं के लिए उत्तर प्रदेश में एक ‘मनोविज्ञानशाला’ (Bureau of Psychology) स्थापित करने की सिफारिश की थी। 1947 ई० में स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् ही इस सिफारिश को कार्यान्वित किया जा सका और इसे परिणामतः उ०प्र०, शिक्षा विभाग के तत्त्वावधान में ‘मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश, इलाहाबाद’ (Bureau of Psychology U.P, Allahabad) की स्थापना हुई।

उत्तर प्रदेश में निर्देशन सेवा
(Guidance Service in Uttar Pradesh)

मनोविज्ञानशाला उ० प्र०, इलाहाबाद को उद्देश्य माध्यमिक विद्यालयों के छात्रों को शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन प्रदान करना है। प्रथम पंचवर्षीय योजना (1952 ई०) में इस मनोविज्ञानशाला का कार्यक्षेत्र और विस्तृत हुआ तथा उत्तर प्रदेश के पाँच शैक्षिक क्षेत्रों-मेरठ, बरेली, लखनऊ, कानपुर तथा वाराणसी में पाँच जिला मनोविज्ञान केन्द्र खोले गये जिनकी संख्या तृतीय पंचवर्षीय योजना में बढ़कर सात हो गयी, क्योंकि आगरा और गोरखपुर में भी जिला मनोविज्ञान केन्द्र स्थापित हो गये थे। इस भाँति, कुमाऊँ को छोड़कर सभी क्षेत्रों में इस प्रकार के केन्द्र स्थापित कर दिये गये। दूसरी योजना के अन्तर्गत निर्देशन सेवा को विद्यालय स्तर तक पहुँचाने के लिए 25 बहुउद्देशीय विद्यालयों (Multi-purpose Schools) में विद्यालय मनोवैज्ञानिकों (School Psychologists) की नियुक्ति कर दी गयी थी। अब यह संख्या 25 से बढ़कर 53 हो गयी और इस भाँति 53 उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में विद्यालय-मनोवैज्ञानिक कार्यरत हैं।

उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग ने निर्देशन कार्य की व्यवस्था तीन स्तरों पर की है – (1) राज्य स्तर, (2) क्षेत्रीय स्तर तथा (3) विद्यालय स्तर। अब हम उ० प्र० में निर्देशन सेवा के तीनों स्तरों का विवेचन प्रस्तुत करेंगे-

(1) राज्य स्तर पर निर्देशन कार्य (Guidance Services at State Level)

मनोविज्ञानशाला उ० प्र०, इलाहाबाद – राज्य स्तर पर मनोविज्ञानशाला उ० प्र०, इलाहाबाद; सम्पूर्ण राज्य के निर्देशन का कार्य संचालित करती है। इसका प्रमुख कार्य समस्त राज्य के विद्यालयों के लिए मनोवैज्ञानिक सेवाओं की व्यवस्था करना है। मनोविज्ञानशाला के गठन एवं कार्यों का वर्णन इस प्रकार है –

(अ) मनोविज्ञानशाला का गठन – उत्तर प्रदेश मनोविज्ञानशाला के प्रारम्भिक संगठन में कुल मिलाकर पन्द्रह सदस्य विभिन्न पदों पर आसीन होते हैं। पद एवं उन पर कार्यरत अधिकारियों की संख्या इस प्रकार है –

  1. निर्देशक (एक)
  2. वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक (दो)
  3. मनोवैज्ञानिक (तीन)
  4. सहायक मनोवैज्ञानिक (तीन)
  5. व्यावसायिक निर्देशन अधिकारी (एक)
  6. वरिष्ठ परीक्षणकर्ता-पुरुष (एक)
  7. वरिष्ठ परीक्षणकर्ता-स्त्री (एक)
  8. सांख्यिक विशेषज्ञ (एक)
  9. परामर्शदाता (एक)
  10. बाल-निर्देशक (एक)

उल्लेखनीय रूप से डॉ० सोहनलाल एवं डॉ० चन्द्रमोहन भाटिया जैसे विख्यात मनोवैज्ञानिक इस मनोविज्ञानशाला के निर्देशक (Director) पद को सुशोभित कर चुके हैं।

(ब) मनोविज्ञानशाला के कार्य – मनोविज्ञानशाला उ० प्र०, इलाहाबाद के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं-(i) निर्देशन, (ii) प्रशिक्षण, (ii) शोध, (iv) चयन, (v) नियोजन एवं समन्वय तथा (vi) प्रकाशन। इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है –

(i) निर्देशन कार्य (Guidance) – मनोविज्ञानशाला का प्रथम महत्त्वपूर्ण एवं विशिष्ट कार्य शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन देना है, जिसे निपुण मनोवैज्ञानिकों की देख-रेख में वैयक्तिक और सामूहिक आधार पर सम्पन्न किया जाता है

(क) वैयक्तिक निर्देशन – किसी बालक की शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत समस्याओं का निदान व समाधान वैयक्तिक स्तर पर किया जाता है। तीव्र, मन्द या प्रखर बुद्धि के बालकों का मानसिक परीक्षण कर उनके विषय में पूरी जानकारी प्राप्त की जाती है। मानसिक परीक्षण में बुद्धि, रुचि, अभियोग्यता तथा व्यक्तित्व परीक्षण सम्मिलित हैं। साक्षात्कार भी होता है। बालक को परीक्षण की रिपोर्ट दी जाती है। यहाँ की प्रयोगशाला में समस्याग्रस्त बालकों का उपचार क्रीड़ा-चिकित्सा (Play Therapy) से करने की व्यवस्था है। पिछड़े तथा किसी खास विषय में कमजोर बालकों की विशेष सहायता की जाती है।

(ख) सामूहिक निर्देशन – मनोविज्ञानशाला का एक उद्देश्य बालकों को उपयुक्त पाठ्य-विषय में मदद देना है जिसके लिए कई सामूहिक परीक्षण हैं; जैसे-सामान्य मानसिक योग्यता परीक्षण, व्यावसायिक परीक्षण, रुचि परीक्षण तथा अभिरुचि परीक्षण आदि। कक्षा 8 तथा कक्षा 10 के बाद वैकल्पिक विषय चुनने में सामूहिक रूप से निर्देशन भी दिया जाता है। इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत साक्षात्कार के आधार पर निर्देशन तथा परीक्षणों की रिपोर्ट भी बालकों को भेजी जाती है।

(ii) प्रशिक्षण (Training) – मनोविज्ञानशाला द्वारा प्रदत्त ‘डिप्लोमा इन गाइडेन्स साइकोलॉजी प्रशिक्षण कोर्स पास करके मनोविज्ञान के शिक्षार्थी स्वयं निर्देशक बन सकते हैं। सन् 1973 ई० में ‘कैरियर मास्टर कोर्स’ नामक प्रशिक्षण व्यावसायिक निर्देशन के लिए भी दिया गया, जिसमें प्रदेश में मान्यता प्राप्त राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के अध्यापक/अध्यापिकाओं को अपने विद्यालय के शिक्षार्थियों को व्यवसाय-चयन में मदद देने के लिए प्रशिक्षण दिया गया। वस्तुत: यह प्रशिक्षण कार्यक्रम अधिक सफल नहीं हो सका और आगे नहीं चल सका।

(iii) अनुसन्धान कार्य (Research work) – मनोविज्ञानशाला निर्देशन सेवा के लिए अनुसन्धान कार्य भी करती है। यह कार्य विशेष रूप से परीक्षणों के क्षेत्र में किया गया जिसे निष्कर्षतः पाया गया कि भारतीय परिस्थितियों के लिए उपयुक्त मनोवैज्ञानिक परीक्षण उपलब्ध नहीं हैं। अतः विभिन्न प्रकार के मानसिक योग्यताओं के परीक्षणों पर तीन दिशाओं में शोध कार्य शुरू किया गया— (a) परीक्षणों की रचना, (b) परीक्षणों का भारतीयकरण तथा (c) प्रभावीकरण।

(iv) चयन कार्य (Selection) – मनोविज्ञानशाला विभिन्न विभागों को चयन-कार्य में सहायता देती है; जैसे-राज्य के ट्रेनिंग कॉलेजों में प्रशिक्षणार्थ आने वाले अभ्यर्थियों का चयन, शिक्षा विभाग में एक्सटेन्शन विभाग को विभिन्न पदों के चयन में सहायता करना। यह शाला विभिन्न मनोविज्ञान परीक्षाओं के माध्यम से चंयन,की प्रक्रिया द्वारा राज्य के विभिन्न विभागों की सहायता करने का कार्य भी करती है।

(v) नियोजन एवं समन्वय (Planning and Co-ordination) – मनोविज्ञानशाला इस सम्बन्ध में योजना बनाने, निरीक्षण करने व समन्वय करने का कार्य करती है कि राज्य में विभिन्न जिला मनोविज्ञान केन्द्रों तथा विद्यालय मनोवैज्ञानिकों को क्या कदम उठाने होंगे यह शाला राज्य के अन्य विभागों को मार्गदर्शन व परामर्श देती है तथा उनके कार्यों का समन्वय करती है। इसके अलावा समय-समय पर अनेक भाषण-मालाएँ भी आयोजित की जाती हैं।

(vi) प्रकाशन (Publication) – मनोविज्ञानशाला की ओर से मनोविज्ञान और निर्देशात्मक पत्र-पत्रिकाओं व साहित्य का प्रकाशन होता है जिससे अभिभावक, शिक्षक व मनोवैज्ञानिक लाभान्वित होते हैं। सन् 1950 ई० से लेकर आज तक दर्जनों प्रकाशन हुए हैं जिनसे मनोविज्ञान व हिन्दी का साहित्य समृद्ध हुआ है।

(2) क्षेत्रीय स्तर पर निर्देशन कार्य (Guidance Services at Regional Level)

जिला मनोविज्ञान केन्द्र – क्षेत्रीय या मण्डलीय स्तर पर सात जिला मनोविज्ञान केन्द्र अपने क्षेत्र अथवा मण्डल में सम्बन्धित निर्देशन कार्य का संचालन एवं देख-रेख करते हैं।

(अ) जिला मनोविज्ञान केन्द्र का गठन – जिला मनोविज्ञान केन्द्र के संगठन में कुल मिलाकर पाँच सदस्य होते हैं जिनके पद एवं उन पर कार्यरत अधिकारियों की संख्या इस प्रकार है -(i) जिला मनोवैज्ञानिक (एक), (i) व्यावसायिक निर्देशक (दो) तथा (ii) मनोवैज्ञानिक (दो)।

(ब) जिला मनोविज्ञान केन्द्र के प्रमुख कार्य – जिला मनोविज्ञान केन्द्र तीन प्रमुख कार्य करता है–(i) निर्देशन, (ii) अनुसन्धान तथा (iii) प्रकाशन। संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

  1. निर्देशन कार्य (Guidance) – जिला मनोविज्ञान केन्द्रों का मुख्य कार्य अपने-अपने क्षेत्र/मण्डल के माध्यमिक विद्यालय के बालक-बालिकाओं को वैयक्तिक तथा सामूहिक आधार
    पर शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन प्रदान करना है।
  2. अनुसन्धान कार्य (Research work) – निर्देशन कार्य करते हुए प्राप्त तथ्यों के आधार पर अनुसन्धान कार्य तथा अनुवर्ती अध्ययन करना, जिला मनोविज्ञान केन्द्रों का कार्य है।
  3. प्रकाशन कार्य (Publication) – जिला मनोविज्ञान केन्द्र, मनोविज्ञानशाला को निर्देशन सम्बन्धी साहित्य के सृजन तथा प्रकाशन में मदद देते हैं। ये केन्द्र कभी-कभी यह कार्य स्वयं भी करते हैं।

वस्तुतः जिला मनोविज्ञान केन्द्र, मनोविज्ञानशाला, उ०प्र०, इलाहाबाद तथा विद्यालय मनोवैज्ञानिक के बीच जोड़ने वाली कड़ी का काम करते हैं। ये इलाहाबाद से आने वाली सूचनाओं, परीक्षणों व आदेश को विद्यालयों को प्रेषित करते हैं। ये प्रमुखतया शैक्षिक निर्देशन का कार्य करते हैं, लेकिन इनकी संख्या (सात केन्द्र) इतनी सीमित है कि ये इतने विस्तृत एवं बड़े राज्य के सभी माध्यमिक विद्यालयों तक कदापि नहीं पहुँच सकते।

(3) विद्यालय स्तर पर निर्देशन कार्य (Guidance Services at School Level)

विद्यालय-मनोवैज्ञानिक – विद्यालय स्तर पर मनोवैज्ञानिक तीन कार्य करते हैं–(i) निर्देशन , (ii) शिक्षण तथा (ii) अनुसन्धान में सहायता। इन कार्यों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है

  1. निर्देशन कार्य (Guidance) – विद्यालय-मनोवैज्ञानिक का मुख्य कार्य कक्षा 8 के बाद बालकों को वैयक्तिक और समूह आधार पर शैक्षिक निर्देशन तथा 10वीं-12वीं कक्षा के बाद व्यावसायिक निर्देशन और व्यक्तिगत निर्देशन देना है।
  2. शिक्षण कार्य (Teaching) – मनोवैज्ञानिक निर्देशन कार्य की सफलता के लिए शिक्षण कार्य भी करते हैं, ऐसा करके उन्हें बालकों के अधिक निकट आने का अवसर मिलता है।
  3. अनुसन्धान में सहायता (Help in Research work) – विद्यालय-मनोवैज्ञानिक अनुसन्धान कार्य के लिए समय-समय पर निर्देशन सम्बन्धी तथ्य एवं आँकड़े मनोविज्ञानशाला को प्रदान करते हैं।

उपर्युक्त कार्यों के अतिरिक्त –

  1. बालकों का मनोवैज्ञानिक परीक्षण
  2. मनोविज्ञान व निर्देशन से सम्बन्धित वार्ताएँ
  3. पिछड़े बालकों का सुधार व उपचार
  4. प्रतिभाशाली बालकों के लिए विशेष प्रबन्ध
  5. असमायोजित वे कुसमायोजित बालकों को व्यक्तिगत निर्देशन
  6. माता-पिता/अभिभावकों से सम्पर्क स्थापित करना
  7. संचयित लेखा रखना तथा
  8. मनोविज्ञानशाला के लिए क्षेत्रीय खोजकर्ता का कार्य करना आदि कार्य भी विद्यालय मनोवैज्ञानिक करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निर्देशन का एक सामान्य वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन का एक सामान्य वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत मुख्य रूप से निर्देशन के क्षेत्र को ध्यान में रखा गया है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत निर्देशन के मुख्य रूप से तीन प्रकारों या वर्गों का उल्लेख किया गया है जो कि निम्नलिखित हैं –

(i) शैक्षिक निर्देशन (Educational Guidance) – शिक्षा जीवन-पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया होने के बावजूद भी विशेष तौर पर मानव-जीवन के एक विशिष्ट काल और स्थान से सम्बन्ध रखती है। शैक्षिक जगत् में मनुष्य की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसने अपने अध्ययन के लिए किन विषयों या विशिष्ट क्षेत्र का चयन किया है। शैक्षिक निर्देशन के अन्तर्गत बालक की योग्यताओं व क्षमताओं के अनुसार उपयुक्त अध्ययन-क्षेत्र या विषयों का चुनाव किया जाता है तथा शैक्षिक समस्याओं के समाधान में सहायता प्रदान की जाती है।

(ii) व्यावसायिक निर्देशन (Vocational Guidance) – व्यवसाय व्यक्ति के जीवन-यापन का अनिवार्य माध्यम है जो व्यक्ति की रुचि और योग्यता के अनुसार होना चाहिए। व्यक्तिगत विभिन्नताओं को दृष्टिगत रखते हुए अनुकूल व्यवसाय चुनने में व्यक्ति की मदद करना व्यावसायिक निर्देशन का कार्य है। इसके अतिरिक्त नियोक्ता के लिए उपयुक्त व्यक्ति को तलाशने का कार्य भी इसी के अन्तर्गत आता है।

(iii) व्यक्तिगत निर्देशन (Personal Guidance) – प्रत्येक व्यक्ति का जीवन अनेक व्यक्तिगत समस्याओं से भरा होता है जो परिवार सम्बन्धी, मित्र सम्बन्धी, समायोजन सम्बन्धी, स्वास्थ्य सम्बन्धी, मानसिक ग्रन्थियों सम्बन्धी या यौन सम्बन्धी समस्याएँ हो सकती हैं। व्यक्तिगत समस्याओं का निराकरण व्यक्तिगत निर्देशन के अन्तर्गत होता है।

प्रश्न 2.
निर्देशन विधि के आधार पर किया गया निर्देशन का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :

निर्देशन प्रदान करने की विधि के आधार पर निर्देशन दो प्रकार का है –

(i) वैयक्तिक निर्देशन (Individual Guidance) – सर्वोत्तम समझे जाने वाले इस निर्देशन का प्रयोग व्यक्ति विशेष की गम्भीरतम समस्याओं को हल करने में किया जाता है। इसके अन्तर्गत निर्देशक समस्यायुक्त व्यक्ति से व्यक्तिगत सम्पर्क साधता है, उसका बारीकी से अध्ययन करता है, उसकी समस्याओं को स्वयं समझने का प्रयास करता है और इसके बाद व्यक्ति को इस योग्य बनाता है। कि वह अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं ही प्रस्तुत कर सके। व्यक्ति की समस्याओं का ज्ञान प्राप्त करने हेतु मनोवैज्ञानिक परीक्षण एवं साक्षात्कार के प्रयोग के अतिरिक्त उसकी पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का भी अध्ययन किया जाता है। प्राप्त सूचनाओं के आधार पर एक प्रोफाइल (Profile) तैयार की जाती है।

इस प्रकार के निर्देशन में मनोवैज्ञानिक या विशेषज्ञ एक बार में केवल एक व्यक्ति पर ध्यान दे पाता है। इस कारणवश यह निर्देशन धन और समय की दृष्टि से महँगा पड़ता है। इसके अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक/विशेषज्ञ के अभाव में इसका प्रयोग करना सम्भव नहीं है। अतः वैयक्तिक निर्देशन उसी समय प्रदान किया जाता है जबकि व्यक्ति से सम्बन्धित समस्या की प्रकृति जटिल हो गयी हो और वह सांवेगिक रूप से अत्यधिक उलझ गया हो।

(ii) सामूहिक निर्देशन (Group Guidance) – कभी-कभी एक समूह के समस्त व्यक्तियों की समस्या एक ही या एकंसमान होती है। उस दशा में व्यक्तियों के एक समूह को एक साथ निर्देशन प्रदान किया जाता है जिसे सामूहिक निर्देशन का नाम दिया जाता है। प्रसिद्ध विद्वान् ए० जे० जोन्स ने लिखा है, “सामूहिक निर्देशन वह प्रक्रिया है जो समूह में प्रत्येक व्यक्ति को इस प्रकार व्यक्तिगत सहायता प्रदान करती है जिससे वह अपनी समस्याओं को सुलझा सके तथा समायोजन स्थापित कर सके।” पाठ्य-विषयों के चुनाव से सम्बन्धित शैक्षिक निर्देशन एवं व्यावसायिक निर्देशन में यह विधि अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होती है।

प्रश्न 3.
मायर्स द्वारा प्रतिपादित निर्देशन का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
मायर्स (Myers) के अनुसार समस्याओं के आधार पर निर्देशन के आठ प्रकार बताये गये हैं, जो निम्नलिखित हैं –

  1. शैक्षिक निर्देशन–निर्देशन की यह शाखा व्यक्ति को शिक्षा सम्बन्धी समस्याओं के समाधान में सहायता करती है।
  2. व्यावसायिक निर्देशन-यह शाखा उपयुक्त व्यवसाय के चुनाव में मार्गदर्शन करती है।
  3. सामाजिक तथा नैतिक नैर्देशन—यह शाखा सामाजिक सम्बन्धों को स्वस्थ व दृढ़ बनाने, सामाजिक तनाव को कम करने तथा मनुष्यों की नैतिक मूल्यों में प्रतिष्ठा हेतु परामर्श देती है।
  4. नागरिकता सम्बन्धी निर्देशन–यह शाखा नागरिक के अधिकार एवं कर्तव्यों के सम्बन्ध में निर्देश एवं सुझाव देकर व्यक्ति को श्रेष्ठ नागरिक बनाने में मदद करती है।
  5. समाज-सेवा सम्बन्धी निर्देशन-यह शाखा समाज-सेवा सम्बन्धी कार्यों को सम्पादित करने तथा योजनाओं को पूरा करने में सहायता प्रदान करती है।
  6. नेतृत्व सम्बन्धी निर्देशन-इसके अन्तर्गत लोगों में नेतृत्व की क्षमता का विकास करने सम्बन्धी पथ-प्रदर्शन प्रदान किया जाता है।
  7. स्वास्थ्य सम्बन्धी निर्देशन–इसमें व्यक्तियों को स्वास्थ्य सम्बन्धी सलाह-मशवरा देने तथा अपने परिवार के सदस्यों का स्वास्थ्य बनाये रखने हेतु निर्देश और सुझाव मिलते हैं।
  8. मनोरंजन सम्बन्धी निर्देशन–निर्देशन की इस शाखा के अन्तर्गत लोगों को अपने खाली समय का सदुपयोग करने तथा श्रमोपरान्त मनोरंजन करने के उपायों से अवगत कराया जाता है।

प्रश्न 4.
भारत में निर्देशन की समस्याओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
वर्तमान औद्योगिक एवं नगरीय जीवन में विभिन्न प्रकार के निर्देशन की अत्यधिक आवश्यकता है। निर्देशन की व्यापक व्यवस्था को अनिवार्य माना जा रहा है तथा इसके लिए बहुपक्षीय प्रयास भी किये जा रहे हैं, परन्तु जन-साधारण निर्देशन सेवाओं से समुचित लाभ प्राप्त नहीं कर पा रहा। वास्तव में निर्देशन-क्षेत्र में कुछ समस्याएँ प्रबल हो रही हैं जिनके कारण अंभीष्ट परिणाम प्राप्त नहीं हो रहे। इस क्षेत्र की कुछ मुख्य समस्याओं का विवरण निम्नवर्णित है –

  1. हमारे विद्यालय में कुछ शिक्षकों का दृष्टिकोण पारम्परिक तथा रूढ़िवादी है। इस वर्ग के शिक्षक केवल पारम्परिक ढंग से शिक्षण कार्य ही करते हैं। वे आवश्यक परामर्श एवं निर्देशन की गतिविधियों को कोई महत्त्व नहीं देते।
  2. विभिन्न कारणों से हमारे विद्यालयों में शिक्षा सम्बन्धी आधुनिक साधनों की कमी है। इस स्थिति में निर्देशन के महत्त्व को स्वीकार करते हुए भी यथार्थ में निर्देशन सम्बन्धी समुचित व्यवस्था कर पाना प्रायः सम्भव नहीं होता।
  3. हमारे विद्यालयों में छात्र संख्या बहुत अधिक है। इस स्थिति में प्रभावशाली एवं उपयोगी निर्देशन की व्यवस्था कर पाना कठिन है।
  4. सामान्य रूप से सभी शिक्षकों पर कार्यभार काफी अधिक है। उन्हें शिक्षण के अतिरिक्त भी विभिन्न कार्य करने पड़ते हैं। इस स्थिति में वे छात्रों को आवश्यक निर्देशन देने में प्रायः असमर्थ रहते हैं।
  5. कुछ दृष्टिकोणों से हमारी शिक्षा प्रणाली भी दोषपूर्ण है। हमारी शिक्षा में व्यावसाग्निक पाठ्यक्रमों की समुचित व्यवस्था नहीं है। इस स्थिति में उपर्युक्त निर्देशन की व्यवस्था नहीं हो पा रही।
  6. हमारे देश में निर्देशन तथा परामर्श के क्षेत्र के शोध-कार्यों की समुचित व्यवस्था नहीं है। ऐसे में निर्देशन की उत्तम व्यवस्था कैसे हो सकती है?
  7. हमारे देश में निर्देशन तथा परामर्श के लिए आवश्यक मानक परीक्षणों की समुचित व्यैवस्था नहीं है। इस कमी के कारण भी उत्तम निर्देशन व्यवस्था को कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
  8. वर्तमान समय में हमारे देश में रोजगार के अवसरों की बहुत कमी है तथा बेरोजगारी का बोलबाला है। ऐसे में सफल एवं उत्तम निर्देशन की व्यवस्था कैसे हो सकती है?

प्रश्न 5.
व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

  1. व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी एवं मौलिक कारक व्यक्तिगत भिन्नता है। किसी व्यक्ति-विशेष के लिए कौन-सा व्यवसाय उपयुक्त होगा, इसके लिए व्यवसाय निर्देशन का कार्यक्रम अपेक्षित एवं अपरिहार्य है।
  2. विभिन्न व्यक्तियों में शरीर, मन या बुद्धि, योग्यता, स्वभाव, रुचि, अभिरुचि तथा व्यक्तित्व के अनेकानेक तत्त्वों की दृष्टि से पर्याप्त अन्तर दृष्टिगोचर होता है। व्यक्ति द्वारा चुने गये व्यवसाय एवं इन वैयक्तिक भिन्नताओं के मध्य समायोजन की दृष्टि से व्यावसायिक निर्देशन आवश्यक है।
  3. व्यक्ति और उसके समाज की दृष्टि से भी व्यवसाय में निर्देशन की जरूरत महसूस की जाती है। व्यक्ति द्वारा चयन किया गया व्यवसाय यदि उसकी वृत्तियों के अनुकूल हो और उसके माध्यम से वह अपना समुचित विकास स्वयं कर सके तो उसका जीवन सुखी हो सकता है। व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति की आजीविका के सम्बन्ध में अभीष्ट सहायता कर उसके हित में कार्य करता है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति का सुख मिलकर ही समूचे समाज को सुखी बनाता है।
  4. मानव संसाधनों का संरक्षण तथा व्यक्तिगत साधनों का समुचित उपयोग व्यावसायिक निर्देशन के बिना सम्भव नहीं है। व्यक्ति का आर्थिक विकास, प्रगति एवं समृद्धि उसके जीवन में प्रसन्नता उत्पन्न करती है= जिसके लिए व्यावसायिक निर्देशन की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।
  5. अनेकानेक व्यवसायों के लिए भिन्न-भिन्न क्षमताओं व योग्यताओं से युक्त व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। व्यावसायिक निर्देशन के माध्यम से किसी विशेष व्यवसाय के लिए विशेष क्षमता व योग्यता वाले उपयुक्त व्यक्तियों का सुगम व प्रभावशाली चयन किया जा सकता है।
  6. समाज गत्यात्मक एवं क्रियाशील है जिसकी परिस्थितियाँ एवं कार्य द्रुत गति से परिवर्तित हो। रहे हैं। नये-नये परिवर्तनों के साथ तालमेल बिठाने के लिए भी व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता पड़ती है। निष्कर्षत: व्यक्तिगत भिन्नता, व्यावसायिक बहुलता, विविध व्यवसायों से सम्बन्धित जानकारी तथा वातावरण के साथ उचित सामंजस्य बनाने के लिए व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता पड़ती।

प्रश्न 6.
कार्य के स्वरूप की दृष्टि से व्यवसायों का एक वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
कार्य के स्वरूप को ध्यान में रखकर व्यवसायों के निम्नलिखित वर्ग या प्रकार निर्धारित किये गये हैं

(i) पढ़ने-लिखने तथा मौलिक विचारों से सम्बन्धित व्यवसाय – इन व्यवसायों में सूक्ष्म बातों की खोज करके नवीन विचारों का प्रतिपादन किया जाता है। साहित्यकार, कवि, निबन्धकार, कथाकार, लेखक, नाटककार, वैज्ञानिक तथा दार्शनिक आदि सभी प्रकार के व्यवसाय इसी कोटि में आते हैं।

(ii) सामाजिक व्यवसाय – इस प्रकार के व्यवसायों में सामाजिक सम्पर्को व सम्बन्धों को आधार बनाया जाता है। डॉक्टर, वकील, नेता, दुकानदार, जीवन बीमा निगम के एजेण्ट आदि सभी के व्यवसाय सामाजिक सम्बन्धों पर आधारित होते हैं।

(iii) कार्यालय से सम्बन्धित व्यवसाय – आय-व्यय का हिसाब रखना, फाइलों को समझना उन पर टिप्पणी लिखना तथा व्यावसायिक-पत्रों के उत्तर देने आदि कार्यों का समावेश इस प्रकार के व्यवसायों में होता है। क्लर्क, मुनीम, कार्यालय अधीक्षक, मैनेजर, एकाउन्टेन्ट आदि इस वर्ग के
व्यवसाय हैं।

(iv) हस्त-कौशल सम्बन्धी व्यवसाय – इन व्यवसायों में विभिन्न यन्त्रों की सहायता से किसी-न-किसी चीज का निर्माण किया जाता है; जैसे-लोहार, मिस्त्री, बढ़ई, चर्मकार, जिल्दसाज, ओवरसियर व इन्जीनियर आदि।

प्रश्न 7.
व्यावसायिक निर्देशन के दृष्टिकोण से बैकमैन द्वारा प्रतिपादित व्यवसायों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
बैकमैन ने व्यक्ति की शिक्षा, बौद्धिक स्तर, प्रशिक्षण तथा सामाजिक सम्मान आदि कारकों को ध्यान में रखते हुए व्यवसायों के निम्नलिखित पाँच वर्गों का उल्लेख किया है –

(i) प्रशासकीय एवं उच्च स्तरीय व्यवसाय – इसके तीन उपवर्ग हैं -(क) भाषा सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे—विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, लेखक, वकील, सम्पादक, जज आदि। (ख) विज्ञान, सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे-डॉक्टर, इन्जीनियर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, ऑडिटर, एकाउण्टेन्ट आदि। (ग) प्रशासकीय व्यवसाय; जैसे—प्रशासक तथा मैनेजर आदि के व्यवसाय।।

(ii) व्यापार एवं मध्यम स्तरीय व्यवसाय-इसके दो उपवर्ग हैं – (क) व्यापार सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे-व्यापारी, विज्ञान के एजेण्ट, दुकानदार आदि। (ख) मध्यम स्तर के व्यवसाय; जैसे-डिजाइनर, अभिनेता, फोटोग्राफर आदि।।

(iii) कुशलतापूर्ण व्यवसाय – इनमें किसी-न-किसी कौशल की आवश्यकता होती है। इसके अन्तर्गत दो प्रकार के कौशल उपवर्ग हैं–(क) शारीरिक कौशल सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे-हँगाई, छपाई, बढ़ईगीरी, दर्जीगिरि, मिस्त्री आदि। (ख) बौद्धिक कौशल सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे-लिपिक, स्टेनोग्राफर, खजांची आदि।

(iv) अर्द्ध-कुशलतापूर्ण व्यवसाय – इनमें कुछ कौशल और कुछ यन्त्रवत् कार्य सम्मिलित हैं; जैसे-गार्ड, कण्डक्टर, पुलिस और ट्रैफिक का सिपाही, कार या ट्रक का ड्राइवर आदि।

(v) निम्न स्तरीय व्यवसाय – इन व्यवसायों में बुद्धि का सबसे कम प्रयोग किया जाता है; जैसे-चपरासी, चौकीदार, कृषि कार्य, रिक्शा-चालक, बोझा ढोना, मिल-मजदूर आदि।

प्रश्न 8.
व्यावसायिक कुशलता और रुचि के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
मनुष्य के जीवन में जीविकोपार्जन की समस्या महत्त्वपूर्ण है। जीविकोपार्जन का प्रत्यक्ष, स्थायी एवं महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध ‘व्यावसायिक कुशलता (Job Efficiency) से है। व्यावसायिक दृष्टि से कुशल व्यक्ति ही अपनी आजीविका कमाने में सफलता प्राप्त करता है। व्यावसायिक कुशलता का रुचि से गहरा सम्बन्ध है। डेवर के अनुसार, “रुचि किसी प्रवृत्ति का क्रियात्मक रूप है।” कार्य में रुचि रहने से कार्य अत्यन्त सरलता से किया जा सकता है, कठिन कार्य भी काफी सरल महसूस होता है। और व्यक्ति का ध्यान (अवधान) सम्बन्धित व्यवसाय में लगा रहता है।

रुचि परिवर्तनशील कही जाती है क्योंकि किसी खास व्यवसाय या कार्य में व्यक्ति की रुचि न होने पर भी बाद में उसकी रुचि पैदा की जा सकती है। यदि व्यक्ति में आवश्यक रुचियों के अंकुर पहले से हों तो वे कार्य से सम्बन्धित अन्य योग्यताओं के साथ मिलकर व्यावसायिक चयन की प्रक्रिया को सहज बना देते हैं। इन परिस्थितियों में यह निर्णय लेना ही श्रेयस्कर होगा कि व्यक्ति को उस व्यवसाय में जाना चाहिए जिसके प्रति पहले से रुचि हो और उसके लिए अन्य आवश्यक गुण भी मौजूद हों। निष्कर्षतः रुचि के कारण व्यावसायिक कुशलता पुष्ट एवं विकसित होती है।

प्रश्न 9.
टिप्पणी लिखिए-व्यावसायिक रुचि प्रपत्र।
उत्तर :
व्यक्ति की रुचि जानने की दृष्टि से क्यूडर द्वारा निर्मित प्रपत्र’ पर आधारित करके इलाहाबाद मनोविज्ञानशाला में व्यावसायिक रुचि प्रपत्र (Vocational Preference Record) विकसित किया गया है, जिसमें समस्त व्यवसायों को दस बड़े रुचि क्षेत्रों में बाँटा गया है। इस सन्दर्भ में, निम्नलिखित तालिका से विभिन्न रुचियों का व्यवसाय से सम्बन्ध ज्ञात होता है –

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 8 Educatlonal, Vocational and Individual Guidance and Guidance Services in U.P. 3

प्रश्न 10.
निर्देशन तथा मनोवैज्ञानिक परीक्षण में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन तथा मनोवैज्ञानिक परीक्षण में अन्तर

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शैक्षिक निर्देशन तथा व्यावसायिक निर्देशन का सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
शैक्षिक निर्देशन और व्यावसायिक निर्देशन एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। शैक्षिक निर्देशन के बाद व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता होती है, क्योंकि मानव-जीवन की सफलता इसी निर्देशन पर निर्भर करती है। शिक्षा ग्रहण करते समय विद्यार्थी उन्हीं विषयों का चयन करता है, जिनका ज्ञान उसके व्यावसायिक जीवन के लिए आवश्यक होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि शैक्षिक तथा व्यावसायिक निर्देशन की समान उपयोगिता और महत्त्व है।

प्रश्न 2.
वैयक्तिक तथा सामूहिक निर्देशन में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन की विधि के आधार पर किये गये वर्गीकरण के अन्तर्गत निर्देशन के दो वर्ग निर्धारित किये गये हैं, जिन्हें क्रमश: वैयक्तिक निर्देशन तथा सामूहिक निर्देशन कहा जाता है। इन दोनों  में मुख्य अन्तर निम्नलिखित हैं –

  1. वैयक्तिक निर्देशन में एक समय में केवल एक व्यक्ति को निर्देशन प्रदान किया जाता है, जबकि सामूहिक निर्देशन में सम्बन्धित समूह को एक साथ निर्देशन प्रदान किया जाता है।
  2. वैयक्तिक निर्देशन से अधिक लाभ प्राप्त होता है, जबकि सामूहिक निर्देशन से सीमित लाभ की सम्भावना होती हैं।
  3. वैयक्तिक निर्देशन में समय एवं धन अधिक खर्च होता है, जबकि सामूहिक निर्देशन में धन एवं समय कम खर्च होता है।
  4. वैयक्तिक निर्देशन के लिए अधिक संख्या में विशेषज्ञ निर्देशकों की आवश्यकता होती है, जबकि सामूहिक निर्देशन में ऐसा नहीं होता है।

प्रश्न 3.
व्यावसायिक निर्देशन के मुख्य उद्देश्य लिखिए।
उत्तर :
व्यावसायिक निर्देशन स्वयं में उपयोगी एवं आवश्यक प्रक्रिया है। व्यावसायिक निर्देशन का मुख्य उद्देश्य सम्बन्धित व्यक्ति को उसकी योग्यता एवं क्षमता के अनुसार व्यवसाय चुनने में सहायता प्रदान करना है। इसके अतिरिक्त इसका एक अन्य उद्देश्य प्रत्येक कार्य के लिए योग्य व्यक्ति के चुनाव में सहायता प्रदान करना भी है। व्यावसायिक निर्देशन से समाज एवं राष्ट्र की उन्नति एवं प्रगति भी एक उद्देश्य है।

प्रश्न 4.
शैक्षिक निर्देशन से किसी विद्यार्थी को क्या लाभ होता है?
उत्तर :
शैक्षिक निर्देशन केवल विद्यार्थियों के लिए ही आयोजित किया जाता है। शैक्षिक निर्देशन से विद्यार्थियों को पाठ्य-विषयों के चुनाव में सहायता प्राप्त होती है तथा भावी शिक्षा के स्वरूप को निर्धारित करने में सहायता प्राप्त होती है। शैक्षिक निर्देशन प्राप्त करके छात्र विद्यालय के वातावरण में अच्छे ढंग से समायोजित हो जाते हैं। शैक्षिक निर्देशन से छात्र एक हद तक अनुशासित बने रहते हैं, इससे अनेक लाभ होते हैं। शैक्षिक निर्देशन से छात्र-छात्राओं के परीक्षा में सफल होने की दर बढ़ जाती है। इससे अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या घटती है। शैक्षिक निर्देशन छात्रों को जीविका-उपार्जन के क्षेत्र में भी सहायता प्रदान करता है।

प्रश्न 5.
शैक्षिक निर्देशन की किन्हीं दो आवश्यकताओं के बारे में लिखिए।
उत्तर :

  1. विद्यालय के वातावरण में समायोजित होने के लिए शैक्षिक निर्देशन की आवश्यकता होती है।
  2. पाठ्य-विषयों के चुनाव तथा भावी जीवन के विषय में निर्णय लेने के लिए निर्देशन की आवश्यकता है।

प्रश्न 6.
व्यक्तिगत निर्देशन की आवश्यकता क्यों पड़ती है ?
उत्तर :
निर्देशन के दो स्वरूप सम्भव हैं – सामूहिक निर्देशन तथा व्यक्तिगत निर्देशन। किसी व्यक्ति की गम्भीर, जटिल एवं विशिष्ट प्रकार की समस्या के उपयुक्त समाधान प्राप्त करने के लिए या निवारण के लिए व्यक्तिगत निर्देशन की आवश्यकता है। व्यक्तिगत निर्देशन में गहनता पर बल दिया जाता है। निर्देशन के इस स्वरूप के अन्तर्गत सम्बन्धित समस्या का विस्तृत विश्लेषण किया जाता है। तथा समस्या का सर्वोत्तम हल खोजा जाता है।

प्रश्न 7.
रुचियों के आधार पर किये गये व्यवसायों के वर्गीकरण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
व्यवसायों को एक वर्गीकरण व्यक्तियों की रुचियों के आधार पर भी किया गया है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत किया गया व्यवसायों का वर्गीकरण इस प्रकार है-

  1. यान्त्रिक व्यवसाय
  2. गणनात्मक व्यवसाय
  3. बाह्य जीवन से सम्बन्धी व्यवसाय
  4. वैज्ञानिक व्यवसाय
  5. कलात्मक व्यवसाय
  6. प्रभावात्मक व्यवसाय
  7. साहित्यिक व्यवसाय
  8. संगीतात्मक व्यवसाय
  9. समाज सेवी सम्बन्धी व्यवसाय तथा
  10. लिपिक सम्बन्धी व्यवसाय।

प्रश्न 8.
व्यक्तिगत निर्देशन के लिए तथ्य-संग्रह के साधनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
व्यक्तिगत निर्देशन के लिए सम्बन्धित व्यक्ति के जीवन से सम्बन्धित विस्तृत जानकारी आवश्यक है। इसके लिए तथ्यों को विभिन्न साधनों से एकत्र किया जाता है। इस प्रकार के मुख्य साधन हैं –

  1. निरीक्षण
  2. प्रश्नावली
  3. साक्षात्कार
  4. डॉक्टरी जाँच
  5. जीवन-वृत्त
  6. सामूहिक अभिलेख
  7. बुद्धि, मानसिक योग्यताओं, अभिरुचि तथा रुचि सम्बन्धी परीक्षण
  8. विद्यालय का संचित आलेख
  9. सामान्य सेवाओं के औपचारिक आलेख; जैसे-जन्म-मृत्यु लेखा, अस्पतालों के आलेख, न्यायालय व सामाजिक एवं अन्वेषणात्मक क्रियाएँ।

प्रश्न 9.
निर्देश की प्रक्रिया के अन्तर्गत तैयार किये गये परिपाश्र्व-चित्र की रूपरेखा का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत विभिन्न स्रोतों एवं उपायों द्वारा आवश्यक तथ्यों को अर्जित किया जाता है तथा निर्देशन को अधिक उपयोग बनाने के लिए परिपार्श्व-चित्र तैयार किया जाता है। इस प्रकार परिपार्श्व-चित्र की रूपरेखा के अन्तर्गत अपनाये गये तथ्य इस प्रकार होते हैं-

  1. शारीरिक विवरण
  2. पारिवारिक विवरण
  3. पात्र के सामाजिक विकास का इतिहास
  4. विद्यालयी जीवन का इतिहास
  5. मानसिक योग्यताएँ तथा
  6. व्यक्तित्व के गुण।

प्रश्न 10.
अनुवर्ती अनुशीलन की विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन की प्रक्रिया में अनुवर्ती अनुशीलन का विशेष महत्त्व होता है। अनुवर्ती अनुशीलन द्वारा ही निर्देशन की सफलता/असफलता की जानकारी प्राप्त होती है। अनुवर्ती अनुशीलन के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियाँ हैं –

  1. परामर्श प्राप्त करने वाले व्यक्ति से पत्रों द्वारा सम्पर्क स्थापित करना
  2. व्यक्ति को सरल एवं स्पष्ट भाषा में तैयार की गयी प्रश्नावली भेजना
  3. व्यक्ति के सम्बन्ध में एक कार्ड-फाइल बनाना तथा
  4. टेलीफोन के माध्यम से विचार-विनिमय करना।

प्रश्न 11.
मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश निर्मित/संशोधित मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश द्वारा निर्मित/संशोधित मुख्य मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का विवरण निम्नलिखित है –

  1. शाब्दिक सामूहिक परीक्षण (वर्ष 12 +, 13+, 14 +, तथा वयस्कों के लिए-चार)।
  2. अशाब्दिक सामूहिक परीक्षण–पाँच।
  3. व्यक्तित्व परीक्षण (WAT, TAT’ एवं Rorscharch)-तीन।
  4. व्यक्तित्व पत्री।
  5. स्टैनफोर्ड बुद्धि परीक्षण का भारतीयकरण।
  6. उपलब्धि परीक्षण हिन्दी में (कक्षा 8 व कक्षा 10 के लिए)।
  7. व्यावसायिक रुचि प्रपत्र।
  8. यान्त्रिक अभिरुचि परीक्षण–एक।
  9. ट्वीजर यथार्थता व स्थिर परीक्षण–एक।
  10. डेटरॉय शारीरिक सामर्थ्य परीक्षण–तीन (अनुकूलित)

नवीन परीक्षण ये हैं – (1) सोहनलाल बुद्धि परीक्षण (11 + के लिए), (2) भाटिया बैट्री क्रियात्मक बुद्धि परीक्षण, (3) शाब्दिक सामूहिक बुद्धि परीक्षण (कक्षा 8 के लिए) तथा (4) गणित व अंग्रेजी में सामूहिक उपलब्धि परीक्षण।

प्रश्न 12.
उत्तर प्रदेश में गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा होने वाले निर्देशन कार्य का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
उत्तर प्रदेश में सरकारी संस्थाओं के अतिरिक्त अन्य विभागों, गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा भी निर्देशन किया जाता है। प्रदेश में श्रम विभाग की तरफ से लखनऊ, इलाहाबाद, आगरा, मेरठ तथा कानपुर में रोजगार कार्यालयों के अन्तर्गत व्यावसायिक निर्देशन विभाग स्थापित किये गये हैं जिनके द्वारा प्रतिवर्ष हजारों बालक-बालिकाओं को व्यावसायिक परामर्श प्रदान किया जाता है। राज्य के समाज कल्याण विभाग की ओर से आगरा व बनारस में शिशु निर्देशन केन्द्र कार्य कर रहे हैं जिनमें शिशुओं को निर्देशन दिया जाता है। व्यावसायिक निर्देशन कार्य में समन्वय स्थापित करने की दृष्टि से प्रान्तीय समन्वय समिति तथा युवक सेवायोजन सलाहकार समिति का निर्माण किया गया है। इसके अतिरिक्त, लखनऊ विश्वविद्यालय तथा बी० आर० कॉलेज, आगरा में भी मनोवैज्ञानिक निर्देशन एवं परामर्श के साथ मनोवैज्ञानिक परीक्षा तथा अनुसन्धान सम्बन्धी कार्य किया जाता है। इस भाँति, उत्तर प्रदेश में शैक्षिक व्यावसायिक निर्देशन का कार्य राज्य, मण्डल तथा विद्यालयी स्तर से लेकर केन्द्र तक विस्तृत है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखितं वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. किसी व्यक्ति की समस्या के समाधान में सहायता प्रदान करने की प्रक्रिया को मनोविज्ञान की भाषा में …………………. कहते हैं।
  2. निर्देशन मूल रूप में सामाजिक सम्पर्क पर आधारित एक …………………. प्रक्रिया है।
  3. शैक्षिक वातावरण से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन …………………. कहलाता है।
  4. कभी-कभी माता-पिता की उच्च …………………. बालक को अनुपयुक्त पाठ्यक्रम चुनने के लिए प्रोत्साहित करती है।
  5. व्यवसाय वरण अथवा व्यवसाय सम्बन्धी समस्या के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन …………………. कहलाता है।
  6. व्यक्ति की जटिल समायोजन सम्बन्धी के समाधान के लिए दिए जाने वाले निर्देशन की …………………. निर्देशन कहते हैं।
  7. व्यक्ति के व्यक्तिगत अथवा पारिवारिक जीवन से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान के लिए दिये जाने वाले निर्देशन को …………………. कहते हैं।
  8. एक समय में केवल एक व्यक्ति को निर्देशन प्रदान करने वाली निर्देशन-प्रक्रिया को …………………. कहते हैं।
  9. एक समय में अनेक व्यक्तियों को किसी समान समस्या के समाधान के लिए दिये जाने वाले निर्देशन को …………………. कहते हैं।
  10. शैक्षिक निर्देशन तथा व्यावसायिक निर्देशन …………………. है।
  11. उत्तम निर्देशन के लिए व्यक्ति का मनोवैज्ञानिक परीक्षण …………………. होता है।
  12. उत्तम शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया में व्यक्ति का …………………. परीक्षण सहायक होता है।
  13. उत्तम व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया में व्यक्ति का …………………. परीक्षण सहायक लेता है।
  14. निर्देशन प्रक्रिया में निर्देशन के परिणामों को जानने के अन्तिम चरण को …………………. कहते हैं।
  15. …………………. में स्थित मनोविज्ञानशाला इस प्रदेश की निर्देशन सेवाओं का संचालन करती है।
  16. इस प्रदेश में मनोवैज्ञानिक निर्देशन और परामर्श प्रदान करने वाली प्रमुख राजकीय संस्था का नाम …………………. है।

उत्तर :

  1. निर्देशन
  2. मनोवैज्ञानिक
  3. शैक्षिक निर्देशन
  4. आकांक्षा
  5. व्यावसायिक निर्देशन
  6. व्यक्तिगत
  7. व्यक्तिगत निर्देशन
  8. वैयक्तिक निर्देशन
  9. सामूहिक निर्देशन
  10. परस्पर पूरक
  11. आवश्यक
  12. बौद्धिक
  13. अभिरुचि
  14. अनुवर्ती अनुशीलन
  15. इलाहाबाद।
  16. मनोविज्ञानशाला।

प्रश्न II.
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
निर्देशन से क्या आशय है?
उत्तर :
किसी भी व्यक्ति को किसी भी समस्या के समाधान के लिए किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दी जाने वाली सहायता को निर्देशन कहते हैं।

प्रश्न 2.
निर्देशन की एक सरल एवं स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
जोन्स के अनुसार, “निर्देशन एक ऐसी व्यक्तिगत सहायता है जो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को, जीवन के लक्ष्यों को विकसित करने व समायोजन करने और लक्ष्यों की प्राप्ति में आयी हुई समस्याओं को हल करने के लिए प्रदान की जाती है।”

प्रश्न 3.
निर्देशन का कार्य सामान्य रूप से किस क्षेत्र के विद्वानों को सौंपा जाता है?
उत्तर :
निर्देशन का कार्य सामान्य रूप से मनोविज्ञान के क्षेत्र के विद्वानों को सौंपा जाता

प्रश्न 4.
क्या निर्देशक सम्बन्धित व्यक्ति की समस्या को स्वयं सुलझाता है तथा उसका आवश्यक कार्य करता है?
उत्तर :
नहीं, निर्देशक न तो सम्बन्धित व्यक्ति की समस्या को स्वयं सुलझाता है और न ही उसका कोई आवश्यक कार्य करता है।

प्रश्न 5.
निर्देशन की आवश्यकता किस व्यक्ति को होती है?
उत्तर :
प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में कभी-न-कभी अनिवार्य रूप से निर्देशन की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6.
सामान्य वर्गीकरण के अन्तर्गत निर्देशन के कौन-कौन से प्रकार सम्मिलित किये जाते हैं?
उत्तर :
सामान्य वर्गीकरण के अन्तर्गत

  1. शैक्षिक निर्देशन
  2. व्यावसायिक निर्देशन तथा
  3. व्यक्तिगत निर्देशन को सम्मिलित किया जाता है।

प्रश्न 7.
निर्देशन-विधि के आधार पर निर्देशन के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
निर्देशन-विधि के आधार पर निर्देशन के दो प्रकार होते हैं –

  1. वैयक्तिक निर्देशन तथा
  2. सामूहिक निर्देशन।

प्रश्न 8.
शैक्षिक निर्देशन की रुथ स्ट्रांग द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
रुथ स्ट्रांग के अनुसार, “व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने का मुख्य लक्ष्य उसे समुचित कार्यक्रम के चुनाव तथा उसमें प्रगति करने में सहायता प्रदान करता है।”

प्रश्न 9.
उत्तम शैक्षिक निर्देशन के लिए बालक के सम्बन्ध में कौन-कौन सी जानकारी प्राप्त करना आवश्यक होता है?
उत्तर :

  1. बौद्धिक स्तर
  2. शैक्षिक सम्प्राप्ति
  3. मानसिक योग्यताएँ
  4. विशिष्ट मानसिक योग्यता एवं अभिरुचियाँ
  5. रुचियाँ
  6. व्यक्तित्व की विशेषताएँ
  7. शारीरिक दशा तथा
  8. पारिवारिक स्थिति।

प्रश्न 10.
व्यावसायिक निर्देशन की क्रो एवं क्रो द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
क्रो एवं क्रो के अनुसार, “व्यावसायिक निर्देशन की व्याख्या सामान्यतः उस सहायता के रूप में की जाती है, जो विद्यार्थियों को किसी व्यवसाय को चुनने, उसके लिए तैयारी करने तथा उसमें उन्नति प्राप्त करने के लिए दी जाती है।”

प्रश्न 11.
व्यावसायिक सूचना के मुख्य स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. समाचार पत्र-पत्रिकाएँ
  2. रोजगार पत्रिकाएँ
  3. सरकारी सूचनाएँ
  4. रोजगार कार्यालय
  5. वार्ताएँ
  6. औद्योगिक संस्थानों की विज्ञप्ति।

प्रश्न 12.
व्यक्तिगत निर्देशन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर :
व्यक्तिगत निर्देशन से अभिप्राय किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत सहायता देने वाली उस विशिष्ट प्रक्रिया से है जिसके माध्यम से वह अपनी व्यक्तित्व सम्बन्धी समस्याओं के मौलिक कारणों को समझता है तथा उनके निराकरण का प्रयत्न करता है।

प्रश्न 13.
क्रो एवं क्रो द्वारा प्रतिपादित व्यक्तिगत निर्देशन की परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
क्रों एवं क्रो के अनुसार, “व्यक्तिगत निर्देशन वह सहायता है जो किसी व्यक्ति के जीवन के समस्त क्षेत्रों में, रवैयों और व्यवहार के विकास में ठीक तालमेल बैठाने हेतु दी जाती है।”

प्रश्न 14.
व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया के प्रमुख चरणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. तथ्यों का संग्रह
  2. समस्या का निदान
  3. फलानुमान
  4. समस्या का उपचार तथा
  5. अनुवर्ती अनुशीलन।

प्रश्न 15.
उत्तर प्रदेश में राज्य स्तर पर निर्देशन सेवाओं का संचालन किस केन्द्र द्वारा होता है?
उत्तर :
उत्तर प्रदेश में राज्य स्तर पर निर्देशन सेवाओं का संचालन मनोविज्ञानशाला उ० प्र०, इलाहाबाद के द्वारा होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
किसी व्यक्ति की किसी समस्या के समाधान के लिए किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दी जाने वाली सहायता को कहते हैं –
(क) व्यक्तिगत सहायता
(ख) निर्देशन
(ग) आवश्यक सहायता
(घ) अनावश्यक हस्तक्षेप

प्रश्न 2.
“निर्देशन एक प्रक्रिया है जो कि नवयुवकों को स्वयं अपने से, दूसरे से तथा परिस्थितियों से समायोजन करना सिखाती है।” यह परिभाषा प्रतिपादित की है
(क) स्किनर
(ख) जोन्स
(ग) मॉरिस
(घ) हसबैण्ड

प्रश्न 3.
निर्देशन को आवश्यक एवं उपयोगी माना जाता है –
(क) सुचारु बाल-विकास के लिए।
(ख) शैक्षिक एवं व्यावसायिक समस्याओं के निराकरण के लिए
(ग) व्यक्तित्व के सामान्य विकास के लिए।
(घ) उपर्युक्त सभी के लिए।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन निर्देशन प्रक्रिया की विशेषता नहीं है?
(क) निर्देशन एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है
(ख) निर्देशन समायोजन स्थापित करने की प्रक्रिया है
(ग) निर्देशन समस्या समाधान की प्रक्रिया है।
(घ) निर्देशन केवल बच्चों को सहायता पहुँचाने की प्रक्रिया है।

प्रश्न 5.
स्कूल अथवा कॉलेज में छात्र-छात्राओं की समस्याओं के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन कहलाता है –
(क) आवश्यक निर्देशन
(ख) अनावश्यक निर्देशन
(ग) व्यावसायिक निर्देशन
(घ) शैक्षिक निर्देशन

प्रश्न 6.
पाठ्य विषयों के चुनाव सम्बन्धी समस्या के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन कहलाता है
(क) सामाजिक निर्देशन
(ख) व्यक्तिगत निर्देशन
(ग) शैक्षिक निर्देशन
(घ) व्यावसायिक निर्देशन

प्रश्न 7.
शैक्षिक सफलता में सहायता पहुँचाने के लिए दिया जाना वाला निर्देशन कहलाता है
(क) सामाजिक निर्देशन
(ख) व्यक्तिगत निर्देशन
(ग) शैक्षिक निर्देशन
(घ) व्यावसायिक निर्देशन

प्रश्न 8.
अनुकूल व्यवसाय के वरण के लिए दिया जाने वाला निर्देशन कहलाता है
(क) महत्त्वपूर्ण निर्देशन
(ख) अनावश्यक निर्देशन
(ग) शैक्षिक निर्देशन
(घ) व्यावसायिक निर्देशन

प्रश्न 9.
वैयक्तिकनिर्देशन के विषय में सत्य है
(क) इसके परिणाम अच्छे नहीं होते।
(ख) इसमें कम समय तथा कम धन खर्च होता है।
(ग) इसके परिणाम उत्तम होते हैं, परन्तु इसमें धन एवं समये अधिक खर्च होता है।
(घ) यह अनावश्यक एवं व्यर्थ है।

प्रश्न 10.
किन परिस्थितियों में सामूहिक निर्देशन उपयोगी होता है
(क) सम्बन्धित व्यक्तियों की समस्याएँ नितान्त भिन्न-भिन्न हों
(ख) समस्याएँ अति गम्भीर हो
(ग) सम्बन्धित व्यक्तियों की समस्या सामान्य हो तथा अधिक गम्भीर न हो
(घ) उपर्युक्त सभी स्थितियों में

प्रश्न 11.
जो वार्ताएँ विद्यार्थियों को स्वयं अपनी आवश्यकताओं, क्षमताओं, उद्देश्यों व रुचियों आदि के विषय में सोचने-समझने हेतु प्रेरित व उत्साहित करती हैं, निर्देशन के क्षेत्र में उन्हें क्या कहा जाता है?
(क) निर्देशन वार्ताएँ
(ख) अनुगामी वार्ताएँ।
(ग) अनुस्थापन वार्ताएँ
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 12.
प्रखर बौद्धिक क्षमता से युक्त और सम्बन्धित कौन-सा व्यवसाय उपयुक्त कहा जाएगा?
(क) उच्च न्यायालय का जज
(ख) व्यापार संचालक
(ग) समाज-सुधारक
(घ) ड्राफ्टमैन

प्रश्न 13.
व्यावसायिक निर्देशन लाभदायक एवं उपयोगी है, क्योंकि –
(क) इसके माध्यम से व्यक्ति को अपनी रुचि एवं योग्यता के अनुसार व्यवसाय उपलब्ध हो जाता है।
(ख) सभी औद्योगिक-व्यावसायिक संस्थानों को योग्य एवं कुशल कर्मचारी मिल जाते हैं
(ग) उत्पादन की गुणवत्ता तथा दर में वृद्धि होती है।
(घ) उपर्युक्त सभी लाभ एवं उपयोगिताएँ।

प्रश्न 14.
व्यावसायिक निर्देशन देने के लिए व्यक्ति के विषय में जानकारी के साथ-साथ निम्नलिखित में से किसकी जानकारी आवश्यक होती है –
(क) व्यक्ति की शिक्षा का स्तर
(ख) व्यक्तित्व के गुण
(ग) व्यवसाय जगत
(घ) प्रयोग विधि।

प्रश्न 15.
शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने में सहायक सिद्ध होता है –
(क) अभिरुचि परीक्षण
(ख) व्यक्तित्व परीक्षण
(ग) बौद्धिक परीक्षण
(घ) ये सभी परीक्षण

प्रश्न 16.
व्यक्ति की संवेगात्मक, धार्मिक, नैतिक एवं शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन कहलाता है
(क) शैक्षिक निर्देशन
(ख) व्यावसायिक निर्देशन
(ग) व्यक्तिगत निर्देशन
(घ) महत्त्वपूर्ण निर्देशन

प्रश्न 17.
व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान हेतु दिया जाने वाला निर्देशन है –
(क) शैक्षिक निर्देशन
(ख) सामाजिक निर्देशन
(ग) व्यावसायिक निर्देशन
(घ) व्यक्तिगत निर्देशन

प्रश्न 18.
विद्यार्थियों को निर्देशन और परामर्श देने हेतु इलाहाबाद में मनोविज्ञानशाला की स्थापना की गई थी
(क) सन् 1935 में
(ख) सन् 1947 में
(ग) सन् 1953 में
(घ) सन् 1966 में

प्रश्न 19.
मनोविज्ञानशाला द्वारा किये जाने वाले कार्य हैं –
(क) निर्देशने कार्य
(ख) प्रशिक्षण कार्य
(ग) अनुसन्धान एवं प्रकाशन कार्य
(घ) ये सभी कार्य

प्रश्न 20.
विद्यालय स्तर पर निर्देशक के कार्य हैं –
(क) निर्देशन कार्य
(ख) शिक्षण कार्य
(ग) अनुसन्धान में सहायता
(घ) ये सभी कार्य

उत्तर :

  1. (ख) निर्देशन
  2. (क) स्किनर
  3. (घ) उपर्युक्त सभी के लिए
  4. (घ) निर्देशन केवल बच्चों को सहायता पहुँचाने की प्रक्रिया है
  5. (घ) शैक्षिक निर्देशन
  6. (ग) शैक्षिक निर्देशन
  7. (ग) शैक्षिक निर्देशन
  8. (घ) व्यावसायिक निर्देशन
  9. (ग) इसके परिणाम उत्तम होते हैं, परन्तु इसमें धन एवं समय अधिक खर्च होता है
  10. (ग) सम्बन्धित व्यक्तियों की समस्या सामान्य हो तथा अधिक गम्भीर में हो
  11. (ग) अनुस्थापन वार्ताएँ
  12. (क) उच्च न्यायालय का जज
  13. (घ) उपर्युक्त सभी लाभ एवं उपयोगिताएँ
  14. (ग) व्यवसाय जगत
  15. (ग) बौद्धिक परीक्षण
  16. (ग) व्यक्तिगत निर्देशन
  17. (घ) व्यक्तिगत निर्देशन
  18. (ख) 1947 में
  19. (घ) ये सभी कार्य
  20. (घ) ये सभी कार्य।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 4 Emotional Bases of Behaviour

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 4 Emotional Bases of Behaviour (व्यवहार के संवेगात्मक आधार) are part of UP Board Solutions for Class 11 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 4 Emotional Bases of Behaviour (व्यवहार के संवेगात्मक आधार).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 4
Chapter Name Emotional Bases of Behaviour
(व्यवहार के संवेगात्मक आधार)
Number of Questions Solved 51
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 4 Emotional Bases of Behaviour (व्यवहार के संवेगात्मक आधार)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संवेग (Emotion) से आप क्या समझते हैं? संवेगों की सामान्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
संवेग का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। संवेग की मुख्य विशेषताएँ भी बताइए।
या
संवेग को परिभाषित कीजिए।

उत्तर :

संवेग का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Emotion)

‘संवेग’ अंग्रेजी भाषा के शब्द Emotion का हिन्दी रूपान्तर है, जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द Emovere (इमोवेयर) से हुई है। इमोवेयर का शाब्दिक अर्थ है–‘हिला देना, क्रियाशील बना देना या उत्तेजित कर देना। इसका अभिप्राय यह है कि शारीरिक प्रेरणाओं के समान ही संवेग मनुष्य को हिला देते हैं, क्रियाशील बना देते हैं अथवा उसे उत्तेजित कर देते हैं। यह उत्तेजना उसके कार्यों और व्यवहारों को प्रभावित करती है।

संवेग एक जटिल, भावात्मक और मानसिक प्रक्रिया है। जब भाव का प्रकटीकरण बाहरी तथा आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों में हो जाता है, तब यह संवेग कहलाता है। । विभिन्न मनोवैज्ञानिकों द्वारा संवेग को भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषित किया गया है। प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) गेलडार्ड के मतानुसार, “संवेग क्रियाओं को उत्तेजक होता है। प्रस्तुत कथन द्वारा स्पष्ट होता है कि संवेग से व्यक्ति की क्रियाओं में गति आती है।

(2) आर्थर टी० जर्सील्ड के अनुसार, “संवेग शब्द किसी भी प्रकार के आवेग में आने, भड़क उठने या उत्तेजित होने की दशा को सूचित करता है।” प्रस्तुत परिभाषा में संवेगावस्था के मुख्य लक्षणों का उल्लेख किया गया है।

(3) इंगलिश तथ इंगलिश के अनुसार, “संवेग एक जटिल भावात्मक अवस्था है जिसमें कुछ विशेष शारीरिक तथा ग्रन्थीय क्रियाएँ होती हैं। प्रस्तुत कथन द्वारा स्पष्ट होता है कि संवेगों में भावात्मक तत्त्व की प्रधानता होती है तथा इनके परिणामस्वरूप कुछ क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं।

(4) वुडवर्थ के मतानुसार, “प्रत्येक संवेग एक अनुभूति होता है तथा साथ ही प्रत्येक संवेग उसी समय एक गत्यात्मक तत्परता होता है।”

(5) पी० टी० यंग के कथनानुसार, “संवेग सम्पूर्ण व्यक्ति का तीव्र उपद्रव है, जिसकी उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक कारणों से होती है तथा जिसके अन्तर्गत व्यवहार चेतन अनुभूति तथा जाठरिक क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं।” प्रस्तुत कथन द्वारा स्पष्ट होता है कि संवेगों की उत्पत्ति सदैव मनोवैज्ञानिक कारकों से होती है तथा इनकी परिणति व्यवहार, अनुभवों तथा जाठरिक क्रियाओं में होती हैं।

इन परिभाषाओं के अध्ययन के उपरान्त हमें संवेग से सम्बन्धित जिन तत्त्वों का ज्ञान होता है, वे इस प्रकार हैं–एक विशिष्ट परिस्थिति उत्पन्न होती है—मनुष्य इस परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण करते हैं–परिस्थिति के प्रति अनुक्रिया के कारण मनुष्य में उत्तेजना का जन्म होता है—मनुष्य सचेतन रूप से उत्तेजना का अनुभव करता है और अन्ततः–मनुष्य का संवेगात्मक व्यवहार अभिव्यक्त होता है।

संवेगों की विशेषताएँ
(Characteristics of Emotions)

संवेगों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) मनोवैज्ञानिक कारणों से उत्पन्न – संवेग की उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक कारणों से होती है। उदाहरण के लिए, बच्चा अचानक किसी अजीब-सी चीज को देखकर भयभीत हो जाता है। वह इसलिए भयभीत हुआ क्योंकि उसने उस अजीब चीज को अचानक देखा। यदि बच्चा उस वस्तु को देखने का अभ्यस्त होता या उसे ऐसी किसी वस्तु के पहले से दिखाई पड़ने की सम्भावना रहती और वह उसे अपने लिए खतरनाक न समझता तो भय का संवैग उत्पन्न ही नहीं होता। स्पष्टतः यदि मनोवैज्ञानिक कारण पर्याप्त रूप में विद्यमान नहीं हैं तो संवेग उत्पन्न नहीं होगा। वास्तव में, पर्याप्त मनोवैज्ञानिक कारणों के अभाव में संवेगों की उत्पत्ति कदापि नहीं हो सकती। कुछ विद्वान मानते हैं कि मादक द्रव्यों के सेवन के उपरान्त भी संवेगों की अनुभूति हो सकती है, परन्तु यह धारणा न तो उचित है। और न ही मान्य है। मादक द्रव्यों के प्रभाव से व्यक्ति की मनोदशा अस्त-व्यस्त हो जाती है, परन्तु वह संवेगावस्था नहीं होती।

(2) यकायक एवं तीव्र उपद्रव – संवेग मनोवैज्ञानिक कारणों से यकायक उत्पन्न होने वाला सम्पूर्ण जीव के सापेक्ष एक तीव्र उपद्रव है। यह यकायक उत्पन्न होता है और कुछ क्षणों के उपरान्त लुप्त हो जाता है। यद्यपि संवेग तीव्रता लिये होता है, किन्तु सभी संवेग तीव्र नहीं होते। कभी-कभी संवेग की अवस्था में व्यक्ति कुछ भी कर पाने में असमर्थ रहता है और निष्क्रिय-सा हो जाता है। अत: कहा जा सकता है कि संवेग अन्य मानसिक प्रक्रियाओं; यथा–भाव, स्थिति (मूड) आदि की अपेक्षा अधिक तीव्र होते हैं।

(3) सार्वभौमिकता – संवेग सार्वभौमिक हैं अर्थात् ये हर एक प्राणी में पाये जाते हैं। मनुष्य को शिशु, बाल, किशोर, प्रौढ़ तथा वृद्ध प्रत्येक अवस्था में संवेग दिखाई पड़ते हैं। पशुओं में भी संवेग दृष्टिगोचर होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति में इनकी प्रबलता एकसमान नहीं होती, यह बदल जाती है; जैसे—बालक एवं कम पढ़े-लिखे लोगों में संवेगों की अभिव्यक्ति स्वतन्त्र रूप से तथा अत्यन्त तीव्र रूप में दिखाई पड़ती है तो वृद्ध एवं पढ़े-लिखे लोगों में यह अभिव्यक्ति नियन्त्रित तथा अपेक्षाकृत कम तीव्रता लिये होती है।

(4) शारीरिक परिवर्तन – संवेग की अवस्था में व्यक्ति के शरीर में मुख्यतया दो प्रकार के परिवर्तन उत्पन्न होते हैं-आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन एवं बाह्य शारीरिक परिवर्तन। हृदय की धड़कन तथा रक्तचाप में परिवर्तन, श्वसन क्रिया की तीव्रता, अन्त:स्रावी ग्रन्थियों से हॉर्मोन्स का निकलना और पाचन-क्रिया का धीमा पड़ना या रुक जाना आदि आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन हैं। संवेग की दशा में कुछ बाह्य शारीरिक परिवर्तन भी होते हैं; यथा-चेहरे की रेखाओं तथा शारीरिक आसनों में परिवर्तन, शरीर काँपना, स्वर बदल जाना, पसीना निकलना, नेत्रों का लाल हो जाना तथा शरीर का रोमांचित हो उठना आदि विभिन्न क्रियाएँ।।

(5) व्यक्तिगत विभेद – संवेग की अभिव्यक्ति में व्यक्तिगत विभेद पाये जाते हैं। संवेगात्मक संरचना तथा प्रकटीकरण सम्बन्धी विशिष्टता के कारण हर एक व्यक्ति संवेग की अभिव्यक्ति अपने अलग ढंग से करता है। वातावरण का एक ही उत्तेजक विभिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न संवेग उत्पन्न कर देता है। उदाहरणतः, केले के छिलके से फिसलकर गिरते व्यक्ति को देखकर किसी के मन में सहानुभूति पैदा होती है तो किसी में दया और कोई उसे देखकर हँस पड़ता है। उत्तेजक एक है जबकि प्रतिक्रियाएँ विभिन्न हैं।

(6) स्थानान्तरण – संवेगों की विशेषता स्थानान्तरण भी है। ये एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में स्थानान्तरित हो जाते हैं। संवेग की अवस्था में संवेग की अभिव्यक्ति के समय जो भी व्यक्ति मौजूद होते हैं, उनमें से किसी भी व्यक्ति में संवेगात्मक क्रिया स्थानान्तरित हो सकती है। उदाहरण के लिए-एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के प्रति अपना क्रोध प्रकट कर रहा है और इसी दौरान एक अन्य व्यक्ति भी उपस्थित हो जाए तो वह भी क्रोध को भागी बन सकता है।

(7) अस्थिर एवं परिवर्तनशील – संवेग की अवस्था अस्थिर एवं परिवर्तनशील होती है। यह अधिक समय तक नहीं रहती। जैसे ही वातावरण का कोई उत्तेजक संवेग की दशा उत्पन्न करता है और उससे सम्बन्धित क्रिया समाप्त होती है, वैसे ही उसका स्वरूप भी बदल जाता है। इसके अलावा, एक उत्तेजक द्वारा उत्पन्न संवेग उस समय समाप्त हो जाता है जब दूसरे उत्तेजक द्वारा किसी अन्य प्रकार के संवेग की उत्पत्ति होती है। स्पष्टतः संवेगावस्था में चंचलता का गुण विद्यमान है।

(8) स्थायित्व – चंचल प्रवृत्ति के बावजूद भी संवेगों में कुछ-न-कुछ स्थायित्व अवश्य रहता , है। संवेग की मुख्य अवस्था समाप्त होने के बाद व्यक्ति की अवशिष्ट मनोदशा इस संवेग के स्थायित्वं की परिचायक है। उदाहरणार्थ-महान् शोक से पीड़ित व्यक्ति शोक की तीव्र परिस्थिति से उबरकर भी कुछ समय तक मायूस पाया जाता है।

(9) विचार-शक्ति का लोप – संवेगावस्था में भावात्मक पहलू की प्रबलता तथा तीव्र शारीरिक हलचल के कारण विचार-शक्ति क्षीण पड़ जाती है अथवा इसका लोप हो जाता है। यही कारण है कि संवेग के वशीभूत व्यक्ति कभी-कभी ऐसा काम कर देता है जिसके लिए बाद में उसे गहरा प्रायश्चित करना पड़ता है।

(10) सुख-दुःख की अनुभूतियाँ – विभिन्न प्रकार के संवेगों में से कुछ सुख उत्पन्न करते हैं। तो कुछ दु:ख। प्रेम का संवेग सुख उत्पन्न करता है, जबकि भय को संवेग दुःख उत्पन्न करता है।

(11) क्रियात्मक पक्ष – भावात्मक पक्ष के अतिरिक्त संवेग का एक क्रियात्मक पक्ष भी है। संवेगावस्था में क्रियात्मक पक्ष की क्रियाशीलता के कारण व्यक्ति कोई-न-कोई काम करने के लिए विवश एवं तत्पर हो जाता है।

(12) मूल प्रवृत्तियों से सम्बन्ध – संवेग का सम्बन्ध मूल प्रवृत्ति से है। मूल प्रवृत्ति द्वारा अपनी सन्तुष्टि की आवश्यकता उत्पन्न होने पर या सन्तुष्टि में अवरोध पैदा होने पर संवेग का प्रकटीकरण होता

संवेग की उपर्युक्त विशेषताओं के अध्ययन से जहाँ एक ओर संवेग का अर्थ अधिक स्पष्ट होता है, वहीं दूसरी ओर, संवेग के स्वरूप का एक विस्तृत चित्र भी उभरकर सामने आता है।

प्रश्न 2.
भाव अथवा अनुभूति (Feeling) तथा संवेग (Emotion) की समानताओं तथा भिन्नताओं का उल्लेख कीजिए।
या
भाव तथा संवेग में पाये जाने वाले अन्तरों का विस्तार से विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर :

भाव और संवेग में अन्तर
(Difference between Feeling and Emotion)

मानव-मन के तीन प्रमुख पक्ष हैं : ज्ञानात्मक, भावात्मक एवं क्रियात्मक। मन के भावात्मक पक्ष से सम्बन्धित एक प्रारम्भिक सरल मानसिक प्रक्रिया भाव है जो प्राणी को सुख या दु:ख का अनुभव कराती है। मन के चेष्टात्मक अथवा इच्छात्मक और ज्ञानात्मक, इन दो पक्षों के माध्यम से भाव का अनुभव होता है। इसी को हम ‘अनुभूति’ (Feeling) भी कहते हैं जिसे मन की चेतनावस्था में अनुभव किया जाता है। उदाहरण के लिए प्रसन्नता, सन्तोष, करुणा, चिन्ता, उल्लास तथा आश्चर्य आदि भाव या अनुभूतियाँ हैं। भाव और संवेग कुछ बिन्दुओं पर समानताएँ रखते हैं तो कुछ बिन्दुओं पर एक-दूसरे से भिन्नताएँ। ये समानताएँ और भिन्नताएँ निम्न प्रकार हैं –

समानताएँ – भाव और संवेग के मध्य गहरा सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध की घनिष्ठता इतनी अधिक है कि कुछ मनोवैज्ञानिक भाव और संवेग में अन्तर नहीं करते और दोनों को एक ही स्वीकार करते हैं। ये समानताएँ इस प्रकार हैं –

  1. भाव और संवेग, इन दोनों का सम्बन्ध स्नायु-संस्थान के अन्तर्गत मस्तिष्क से होता है।
  2. अनेक संवेग साधारणतया भाव होते हैं, जबकि भाव तीव्र रूप में संवेग बन जाता है।
  3. भाव और संवेग दोनों में ही सुख या दु:ख पाया जाता है।

अन्तर – यद्यपि भाव और संवेग दोनों का सम्बन्ध मन के भावात्मक पक्ष से है, तथापि ये दोनों भिन्न मानसिक प्रक्रियाएँ हैं। दोनों के मध्य निम्नलिखित अन्तर पाये जाते हैं –

(1) जटिलता सम्बन्धी अन्तर – संवेग एक जटिल भावात्मक मानसिक प्रक्रिया है, जबकि भाव एक सरल तथा प्राथमिक मानसिक प्रक्रिया है। संवेग परिस्थिति-विशेष की भूतकालीन स्मृति या भावी कल्पना द्वारा उत्तेजना पाकर भी उत्पन्न हो सकते हैं। इनकी उत्पत्ति के लिए किसी प्रत्यक्ष परिस्थिति का होना अनिवार्य नहीं है। उदाहरण के लिए-शीतकाल की बर्फीली रात में एक बीमार बूढ़े आदमी का नंगे बदन ठिठुरना, जब भी स्मृति में आता है तो वह करुणा का संवेग उत्पन्न करता है। विमान परिचारिका बनकर दुनियाभर की सैर करने की भावी कल्पना किसी लड़की के मन में उत्साह । पैदा करती है। इसके विपरीत, भावों की उत्पत्ति इन्द्रियजनित सरल संवेदनाओं के फलस्वरूप होती है। उदाहरण के लिए-पुरस्कार की प्राप्ति से सुख का भाव तथा शरीर में चोट लगने से दु:ख का भाव उत्पन्न होता है।

(2) व्यापकता सम्बन्धी अन्तर – संवेग भाव से अधिक व्यापक होते हैं। संवेग की स्थिति में शरीर और मन पर्याप्त रूप से प्रभावित होते हैं। इसके अन्तर्गत हृदय की धड़कन, श्वास की गति, रक्तचाप, रक्त संचार, नलिकाविहीन एवं आमाशय की ग्रन्थियाँ आदि सभी परिवर्तित दिखाई पड़ते हैं। वस्तुतः संवेग में भाव का होना आवश्यक है, किन्तु संवेग के बिना ही भाव की अनुभूति होती है अर्थात् भाव में संवेग सम्मिलित नहीं होता, किन्तु संवेग भावयुक्त होता है। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति के बाहरी तथा आन्तरिक व्यवहारों में भाव का प्रकटीकरण होने से वह संवेग का रूप धारण कर लेता है। स्पष्ट रूप से संवेग का क्षेत्र अधिक विस्तृत है। इसके विपरीत, भाव एक सीमित और संकुचित मन:स्थिति है, जिसके अन्तर्गत व्यक्ति के शरीर और मन की दशा में विशेष बदलाव नहीं आते।

(3) उग्रता सम्बन्धी अन्तर – भाव और संवेग के बीच एक अन्तर उग्रता का है। संवेग अपेक्षाकृत उग्र होता है। संवेग में एक अजीब उथल-पुथल के कारण व्यक्ति असामान्य अवस्था धारण कर लेता है। और अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठता है। वस्तुत: ‘उग्र भाव’ का ही दूसरा नाम संवेग है, जिसका प्रभाव स्मृति पर एक लम्बे समय तक बना रहता है। किसी शव को देखकर दु:ख का भाव उत्पन्न होता है, किन्तु घर में जवान मौत हो जाए तो दुःख का भाव उग्र होकर संवेग में बदल जाएगा। स्पष्टत: संवेग के विपरीत भाव में थोड़ी बहुत अव्यवस्था के बावजूद भी व्यक्ति की सामान्य अवस्था पाई जाती है।

(4) सक्रियता सम्बन्धी अन्तर – भाव की अपेक्षा संवेग के समय व्यक्ति में अधिक सक्रियता दिखाई पड़ती है। संवेग के दौरान हमारे शरीर का एक बड़ा भाग (जिसमें वृहद् मस्तिष्क की कॉर्टेक्स स्वत:संचालित स्नायुमण्डल तथा हाइपोथैलेमस होते हैं) प्रभावित होता है, जबकि भाव की दशा में केवल वृहद् मस्तिष्क की कॉर्टेक्स ही प्रभावित होती है, परिणामस्वरूप भाव की अपेक्षा संवेग की दशा में व्यक्ति अधिक सक्रिय रहता है।

(5) प्रकार सम्बन्धी अन्तर – संवेग के विभिन्न प्रकार हैं जिसके अन्तर्गत भय, शोक, क्रोध, घृणा, प्रेम तथा आश्चर्य के संवेग आते हैं। इसके विपरीत भाव के दो ही प्रकार, सुख और दुःख का भाव, मान्य हैं।

(6) उपागम सम्बन्धी अन्तर – भाव और संवेग के मध्य एक प्रमुख अन्तर उपागम (Approach) को लेकर है। उपागम (पहुँच के मार्ग) दो हैं-आत्मगत (Subjective) तथा वस्तुगत (Objective), क्योंकि भाव की अनुभूति व्यक्ति को स्वयं अपने अन्दर होती है और वह किसी अन्य के भाव को प्रत्यक्ष रूप में नहीं देख सकता; अत: भाव ‘आत्मगत’ होता है। संवेग को व्यक्ति स्वयं में तो अनुभव करता ही है, इसके साथ ही व्यवहारों के माध्यम से इसका प्रकटीकरण भी हो जाता है; अतः संवेग ‘आत्मगत और वस्तुगत’ दोनों है। व्यक्ति अपने दुःख-सुख के भाव की अनुभूति तो कर सकता है, लेकिन दूसरों की नहीं—इसलिए आत्मगत है, किन्तु क्रोध का संवेग स्वयं भी अनुभव होता है और व्यवहार द्वारा इसकी अभिव्यक्ति भी होती है-इसलिए आत्मगत के साथ वस्तुगत भी है।

प्रश्न 3.
संवेगों का एक व्यवस्थित वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए। मुख्य सरल एवं जटिल संवेगों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
सरल एवं जटिल संवेगावस्था का सामान्य परिचय देते हुए मुख्य संवेगों की उत्पत्ति, अभिव्यक्ति तथा लाभ एवं हानि का वर्णन कीजिए।

उत्तर :

संवेगों का वर्गीकरण
(Classification of Emotions)

विभिन्न प्राणियों के व्यवहार की पृष्ठभूमि में संवेगों का अत्यधिक महत्त्व है। मानव-व्यवहार के विश्लेषणात्मक अध्ययन से ज्ञात होता है कि मानव आवश्यकतानुसार अनेक प्रकार के संवेगों को प्रकट करता है। संवेगों के प्रकार के सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों में मतभेद हैं। मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुत भिन्न-भिन्न वर्गीकरण निम्नलिखित हैं –

सरल एवं जटिल संवेगात्मक अवस्थाएँ

व्यक्ति की संवेगात्मक अवस्था को ‘सरलता या जटिलता के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है–

(1) सरल संवेगात्मक अवस्था (Simple Emotional State) – सरल संवेगात्मक अवस्था के अन्तर्गत सामान्यतया एक ही. संवेग उत्पन्न होता है और इनमें कोई अन्य संवेग मिश्रित नहीं होता। सरल संवेग स्पष्ट एवं स्वाभाविक होते हैं और अपनी शुद्ध अवस्था में साधारण रूप से बालकों में देखे जा सकते हैं। इन्हें समझने में कोई कठिनाई नहीं आती। क्रोध, भय, आश्चर्य, हर्ष एवं शोक आदि सरल संवेग हैं।

(2) जटिल संवेगात्मक अवस्था (Complicated Emotional State) – जटिल संवेगात्मक अवस्था में कई प्रकार के संवेग मिश्रित रहते हैं। ये सामाजिक परिस्थितियों में क्रमश: विकसित होते हैं। और इनकी अभिव्यक्ति जटिल होती है। बढ़ती हुई आयु और परिपक्वता के साथ जब अनुभव तथा सीखने का प्रभाव पड़ने लगता है तो संवेग अस्पष्ट व अस्वाभाविक होते जाते हैं, जिन्हें समझना प्रायः कठिन होता है। क्रोध की संवेगावस्था में ईष्र्या, द्वेष, घृणा और हीनता का भाव मिश्रित रहता है। कपटी और धूर्त व्यक्तियों की संवेगात्मक अवस्थाएँ अत्यन्त जटिल होती हैं, जिन्हें सहज ही नहीं समझा जा सकता है।

कुछ प्रमुख संवेग
(Some Important Emotions)

कुछ विशिष्ट संवेगों का विवेचन निम्नलिखित है –

सरल संवेगावस्था के उदाहरण

(1) क्रोध (Ange) – क्रोध एक द्वेषात्मक प्रबल संवेग है जिसे आधुनिक मनोविज्ञान में अर्जित संवेग माना गया है। मैक्डूगल ने इसे लड़ने की मूल-प्रवृत्ति का संवेगात्मक पक्ष स्वीकार किया है तो गिलफोर्ड ने इसे प्राथमिक संवेग माना है।

उत्पत्ति का कारण – क्रोध की उत्पत्ति सम्बन्धी कारणों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि क्रोध के मूल में ऐसी इच्छाएँ, आशाएँ अथवा धारणाएँ कार्य करती हैं जिनकी पूर्ति नहीं हो पाती या जिनकी पूर्ति में रुकावट पैदा होने लगती है। लक्ष्य-सिद्धि में अवरोधक या बाधक वस्तु, संवेग को उत्तेजक (प्रेरक) कही जाती है और उसके विरुद्ध  संवेगयुक्त व्यक्ति में तीव्र विद्वेष तथा वैमनस्य का भाव जाग्रत हो जाता है, परिणामस्वरूप क्रुद्ध व्यक्ति वस्तु या व्यक्ति की बड़ी-से-बड़ी हानि के लिए उद्यत हो उठता है।

क्रोध की अभिव्यक्ति – क्रोध के संवेग से ग्रस्त शक्तिहीन शिशु रोने-चिल्लाने लगता है, हाथ-पैरं पटकने लगता है तथा आन्तरिक विद्रोह को व्यक्त करने लगता है। शनैः-शनैः शक्ति प्राप्त करता हुआ उसकी अभिव्यक्ति का ढंग भी बदलता है और वह आज्ञा न मानना, अपमान व बुराई करना, डाँट-फटकार, गाली या मारपीट करना जैसे कार्य करता है। क्रोध में व्यक्ति आक्रामक (Aggressive) स्वरूप धारण कर लेता है। इस दशा में उसकी शारीरिक क्रियाएँ चेहरा लाल होना, भौंहें चढ़ना, होंठ काँपना, मुट्ठी कसना, दाँत पीसना, काँपना, आघात या ठोकर मारना तथा गरजना आदि हैं। हत्या इसकी चरम परिणति है।

क्रोध से हानि – क्रोध की संवेगावस्था में शारीरिक-मानसिक शक्ति का ह्रास होता है। रक्त चाप, रक्त परिसंचरण तथा पाचन क्रिया बुरी तरह प्रभावित होते हैं। शरीर में निकले कुछ रासायनिक द्रव्य रक्त से मिलकर स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। क्रोध की अवस्था विवेकहीनता को जन्म देती है, जिसमें भयंकरतम भूल तथा अक्षम्य अपराध भी हो सकते हैं।

क्रोध से लाभ – क्रुद्ध व्यक्ति प्रेरित होकर अधिक शक्ति प्राप्त करता है, जिससे उसे असामान्य कार्य करने में मदद मिलती है। युद्ध में सैनिक का क्रोध राष्ट्रहित में कार्य करता है, जिससे शत्रु परास्त होता है। अपनी असफलताओं पर क्रुद्ध व्यक्ति कई गुनी ताकत से सफलता के लिए जुट जाता है।

(2) भय (Fear) – भय भी एक द्वेषीत्मक संवेग है। कुछ मनोवैज्ञानिकों ने इसे झगड़ा करने की प्रवृत्ति से जोड़ा है, जबकि मैक्डूगल ने इसे पलायन की मूल-प्रवृत्ति से सम्बन्धित किया है। वस्तुतः व्यक्ति भय के कारण से दूर रहना चाहता है या उससे स्वयं को छिपाना चाहती है। विद्वानों की दृष्टि में भय दो प्रकार के हैं-वास्तविक और काल्पनिक। शेर को देखकर वास्तविक भय पैदा होता है, किन्तु राक्षस की कल्पना करके भयभीत होना काल्पनिक भय है।

उत्पत्ति का कारण – भय की उत्पत्ति के अनेकानेक कारण और परिस्थितियाँ हैं। जब किन्हीं भयानक परिस्थितियों से घिरकर व्यक्ति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है तो उसमें भय की उत्पत्ति होती है। शिशु अवस्था में विपत्ति की आशंका उत्पन्न करने वाली तथा अस्वाभाविक जान पड़ने वाली अनेक परिस्थितियाँ; जैसे–काली चीजें, अन्धकार, बिजली की चमक, अपरिचित आवाज या जोरदार धमाका आदि; भय पैदा करती हैं। विकास की अवस्थी में आयु वृद्धि के साथ पिछले अनुभव तथा मानसिक प्रन्थियाँ भय उत्पादन में सहयोग करते हैं। प्रौढ़ व्यक्ति स्वयं से अधिक बलशाली चीजों या व्यक्तियों, विषैले प्राणियों, हिंसक जीवों, तूफान, समुद्र, पुलिस, जेल तथा कानूनी दण्ड आदि से भय खाती है।

भय की अभिव्यक्ति – भय का संवेग आन्तरिक, व्यावहारिक तथा चेतनात्मक तीनों ही प्रकार के परिवर्तनों को जन्म देता है। भय की अभिव्यक्ति अनेक प्रकार से होती है; जैसे–भागना, मुँह पीला पड़ना, काँपने लगना, पसीना आना, हृदय की धड़कने यी रक्त चाप बढ़ना, चीखना या छिपने की कोशिश करना। व्यक्ति भय की अवस्था में स्वयं को असमर्थ पाता है। कुछ लोग भय को छिपाने के लिए क्रोध का प्रदर्शन करते हैं तो कुछ मृदु-व्यवहार और उपेक्षा का प्रदर्शन करते हैं। अत्यधिक भय के कारण लँगी व्यक्ति सबसे आगे भागने की कोशिश करता है और कुछ लोग तो मलमूत्र-त्याग तक करते देखे गये हैं।

भय से हानि – भय का संवेग हानिकारक है। भयभीत शिशुओं के व्यक्तित्व का ठीक से विकास नहीं हो पाता, उनकी परिलब्धियाँ सीमित रह जाती हैं और वे उन्नति की ओर नहीं बढ़ पाते हैं। डरपोक वयस्कों के लिए उस समय काफी मुश्किलें आती हैं जब मानसिक ग्रन्थियाँ उन्हें जरा-जरा सी चीजों से भयभीत करती हैं। इसी कारण बहुत-से लोग प्रौढ़ अवस्था में भी रात को अकेले नहीं सो सकते और यहाँ तक कि केचुएँ, कॉकरोच और चूहे से भी डर जाते हैं।

भय से लाभ – मानव-जीवन को सुव्यवस्थित एवं अनुशासित रूप में संचालित करने की दृष्टि से भय का महत्त्वपूर्ण स्थान है और इसी कारण यह संवेग लाभकारी भी है। भय के कारण व्यक्ति खतरनाक और जोखिम भरी चीजों से बचने की कोशिश करता है। धर्म, समाज, शिक्षा, अर्थ एवं राष्ट्रीय क्षेत्रों में भय की संवेगावस्था सुचारु व्यवस्था को कायम रखती है। यदि कानून और पुलिस का भय समाप्त हो जाए तो अपराधी सामान्यजनों को एक पल भी न जीने देंगे।

(3) हर्ष (Joy) – हर्ष नामक संवेग की दशा में उत्साह और उल्लास की उमंग से प्रेरित व्यक्ति प्रत्येक कार्य को करने के लिए उद्यत होती है। हर्ष, मानव-मन को हल्का कर उसे प्रसन्नता से भर देता है। यह शोक की विपरीत संवेगावस्थी मानी जाती है।

उत्पत्ति के कारण – हर्ष की उत्पत्ति आवश्यकताओं, प्रवृत्तियों तथा इच्छाओं की पूर्ति के परिणामस्वरूप होती है। लम्बे परिश्रम यो संघर्ष के पश्चात् जब सफलता प्राप्त होती है तब भी हर्ष पैदा होता है। यदि कोई लाभकारी घटना मन के अनुकूल घटित होती है तो उसके कारण भी व्यक्ति हर्षित होता है। वस्तुतः हर्ष की उत्पत्ति के कारण; देशाओं और परिस्थितियों के साथ बदलते रहते हैं।

हर्ष की अभिव्यक्ति – हर्ष की अभिव्यक्ति कुछ बाह्य शारीरिक लक्षणों के साथ होती है; यथा-चेहरा खिलना, मुस्कानयुक्त चेहरा, हास्य भाव, आँखों में चमक, प्रसन्नतावश ताली बजाना, उछलना, नाचना-कूदना तथा गाने लगना आदि। यदा-कदा हर्षातिरेक के दौरान व्यक्ति को गला भर आता है और उसकी आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं। वैसे कोई भी व्यक्ति न तो बहुत लम्बे समय तके हर्षित रह सकता है और न शोक मग्न ही।।

हर्ष से हानि-हर्ष उस समय हानिकारक हो जाता है जब आवश्यकता से अधिक हर्षित व्यक्ति कर्तव्य-अकर्तव्य का विचार किये बिना, कोई न करने योग्य कार्य कर बैठे। ऐसी अवस्था में कर्तव्य के प्रति लापरवाही या उदासीनता भी दिखा सकता है।

हर्ष से लाभ – हर्ष की संवेगावस्था में उत्साह से पूर्ण व्यक्ति गति के साथ अधिक कार्य कर लेता है। उसे थकान कम होती है और उसके स्वास्थ्य में भी अभिवृद्धि होती है।

(4) शोक (Grief) – शोक का संवेग विद्रोह या हानि से जुड़ा है। किसी इच्छित वस्तु या प्रियजन की हानि से शोक का संवेग उत्पन्न होता है। जीवन की विभिन्न परिस्थितियों अथवा सोपानों में व्यक्ति साधारणतया शोक की अनुभूति करता है। दैनिक जीवन में प्राय: सभी व्यक्ति यदा-कदा शोक के संवेग को अनुभव करते हैं। छोटे बच्चे तो एक साधारण से खिलौने के टूट जाने पर भी शोकमग्न हो जाते हैं, जब कि वयस्क व्यक्ति अपने प्रियजन के वियोग या मृत्यु से शोकमग्न होते हैं।

शोक की अभिव्यक्ति – शोकाकुल व्यक्ति के अनेक बाह्य लक्षण हैं; जैसे—उसका चेहरा उतर जाता है, गला अवरुद्ध हो जाता है, वह रोता-पीटता या विलाप करता है और उसे मूच्र्छा भी आ सकती है।

(5) आश्चर्य (wonder) – आश्चर्य के संवेग को मैक्डूगल ने जिज्ञासा की मूल-प्रवृत्ति से जोड़ा है। व्यक्ति में आश्चर्य का संवेग उस समय प्रकाशित होता है जब वह किसी ऐसी चीज, घटना अथवा परिस्थितिको अपने सामने पाता है जिसकी न तो उसे पूर्व कल्पना थी या जिसके लिए वह पहले से तैयार नहीं था। बालकों को आश्चर्य का संवेग वयस्कों की अपेक्षा अधिक प्रभावित करता है।

आश्चर्य की अभिव्यक्ति – आश्चर्य की संवेगावस्था में अनेक बाह्य लक्षण प्रकट होते हैं; जैसे- चौंक पड़ना,आँखें फैल जाना, होंठ खुले रह जाना, साँस रुक जाना और काँपना आदि। जटिल संवेगावस्था के उदाहरण

(1) प्रेम (Love) – प्रेम रागात्मक जटिल संवेगावस्था है जिसकी उत्पत्ति व्यक्ति द्वारा सुखात्मक भावनाओं तथा इच्छाओं को किसी विशिष्ट व्यक्ति अथवा पदार्थ पर केन्द्रित करने से होती है। गिलफोर्ड ने इसकी गणना कृत्रिम केन्द्रित संवेगों में, पदार्थात्मक संवेगावस्था में की है। मैक्डूगल के अनुसार, यह काम (Sex) से सम्बन्धित संवेग है जबकि फ्रॉयड ने प्रेम की प्रत्येक दशा को वासनाजनित कहा है। लिंटन नामक मनोवैज्ञानिक इसे एक मनोवैज्ञानिक आवश्यकता मानता है।

प्रेम की जटिल संरचना में स्नेह, वात्सल्य, दया, ममता, सहानुभूति तथा कामवासना का योग रहता है। प्रेम की अभिव्यक्ति शारीरिक स्पर्श, चुम्बन, गोद में बिठलाना, रोमांचित होना, लम्बी-लम्बी साँसें लेना तथा आलिंगन करना आदि हैं। कभी-कभी प्रेम मात्र एक संवेग ही नहीं रहता बल्कि एक ‘स्थायी भाव’ का रूप ले लेता है। उदाहरण के लिए–माँ की अपने बच्चे के प्रति प्रेमाभिव्यक्ति स्थायी संवेग की दशा है।

प्रेम की संवेगावस्था उत्साहवर्द्धन करती है जिससे आशावादी दृष्टिकोण पैदा होता है और उच्च भावना ग्रन्थि विकसित होती है। प्रेम की स्थिति में आँखों की चमक बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त कार्यक्षमता में वृद्धि के कारण कार्य द्रुतगति से होता है। प्रेम में व्यक्तित्व का विस्तार होता है।

(2) घृणा (Hate) – प्रेम के सदृश की घृणा भी एक रागात्मक जटिल संवेगावस्था है जिसकी उत्पत्ति दु:खात्मक, विरक्तिमूलक, भय अथवा क्रोधमिश्रित भावनाओं को किसी व्यक्ति या पदार्थ विशेष पर केन्द्रित करने से मानी जाती है। वस्तुतः घृणा का संवेग उस परिस्थिति, वस्तु या व्यक्ति के प्रति पाया जाता है जिसे हम स्वयं से दूर रखना चाहते हैं। उदाहरण के लिए–दुष्ट या दुर्जन व्यक्ति को सामान्यतया सभी लोग स्वयं से दूर रखना चाहते हैं, यही कारण है कि दुष्ट या दुर्जन से हर कोई घृणा करता है। घृणा में प्रेम के विपरीत निराशावादी दृष्टिकोण तथा हीनभावना का विकास होता है तथा घृणा करने वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व संकुचित होता है।

प्रश्न 4.
संवेग में शारीरिक परिवर्तनों का क्या स्थान है? उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए।
या
संवेग की अवस्था में कौन-कौन से परिवर्तन होते हैं?”
या
संवेगावस्था में होने वाले आन्तरिक और बाह्य शारीरिक परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिए।
या
संवेगावस्था में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :

संवेगात्मक अवस्था में परिवर्तन
(Changes in Emotional Stage)

प्रत्येक संवेगात्मक अनुभव प्राणी के शरीर में कुछ स्पष्ट शारीरिक परिवर्तनों को जन्म देता है। ये शारीरिक परिवर्तन दो प्रकार के हैं—बाह्य शारीरिक परिवर्तन तथा आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन। बाह्य शारीरिक परिवर्तन उन परिवर्तनों को माना जाता है जिन्हें बाहर से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जबकि आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों को अन्दर से अनुभव किया जाता है। संवेगात्मक स्थिति में होने वाले इन दोनों प्रकार के शारीरिक परिवर्तनों का वर्णन निम्नलिखित है –

बाह्य शारीरिक परिवर्तन
(External Bodily Changes)

सभी संवेग उत्पत्ति के साथ ही अपना बाह्य प्रकाशन करते हैं जो बाह्य शारीरिक परिवर्तनों के रूप में दृष्टिगोचर होता है। इन परिवर्तनों को देखकर ही संवेग का अनुमान लगा लिया जाता है। संवेगावस्था में जो बाह्य लक्षण प्रकट होते हैं वे निम्न प्रकार हैं –

(1) मुखमण्डलीय अभिव्यक्ति (Facial Expression) – मुखमण्डल अर्थात् चेहरा हमारे आन्तरिक भावों की सही-सही अभिव्यक्ति कर देता है। संवेगात्मक स्थिति से सम्बन्धित बाह्य परिवर्तन की सर्वप्रथम अभिव्यक्ति चेहरे द्वारा होती है। मुखाकृति संवेग की सबसे सशक्त एवं महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति मानी जाती है। संवेग के समय चेहरे पर तेजी से परिवर्तन आते हैं जिसका प्रभाव मुख की मांसपेशियों के फैलने और सिकुड़ने, आँख, नाक, मुख की रेखाओं के विशिष्ट रूप में प्रभावित होने से है। सुखद संवेगावस्था में एक प्रसन्नचित्त व्यक्ति का चेहरा मांसपेशियों के फैलाव के कारण खिला हुआ दिखायी देता है। इसके विपरीत दु:खद संवेगावस्था में एक दुःखी व्यक्ति का चेहरा लटक जाता। है। लज्जा की अवस्था में आँखें नीची हो जाती हैं और चेहरा शर्म से लाल हो जाता है। क्रोधावस्था में भौंहें तन जाती हैं, आँखें बाहर की ओर उभर जाती हैं व लाल हो जाती हैं, नथुने फड़कने लगते हैं, होंठ काँपने लगते हैं तथा व्यक्ति अपने दाँत पीसने लगता है।

मुखमण्डलीय अभिप्रकाशने का सही-सही अनुमान कुशल एवं सूक्ष्म निरीक्षण की क्षमता पर निर्भर करता है। किसी व्यक्ति के सिर्फ चित्र को देखकर ही चेहरे की अभिव्यक्ति से सम्बन्धित परिवर्तनों का निर्णय नहीं लिया जा सकता। कुछ मुखमण्डलीय अभिव्यक्तियाँ जन्मजात होती हैं तो कुछ अर्जित। संस्कृति और प्रशिक्षण, इन दोनों के प्रभाव से चेहरे की संवेगावस्था को समझा या पहचाना जा सकता है।

(2) स्वर की अभिव्यक्ति (Vocal Expression) – स्वर बाह्य अभिव्यक्ति को एक प्रमुख लक्षण है। संवेगात्मक दशाओं में स्वर में परिवर्तन आ जाता है। हम अनुभव करते हैं कि प्रेमावस्था में स्वर मधुर हो जाता है, क्रोध आने पर स्वर तीव्र और भारी हो जाता है, भय में स्वर काँप उठता है या घिग्घी बँध जाती है तथा चिन्ता की अवस्था में स्वर तीव्र व कर्कश हो जाता है। इस प्रकार संवेग के समय हमारे स्वर की गम्भीरता, ऊँचाई तथा गति सामान्यावस्था से अधिक हो जाती है। मनोवैज्ञानिक खोजों से ज्ञात होता है कि स्वर के आधार पर संवेग की पहचान कठिन है, क्योंकि संवेगावस्था में स्वर का परिवर्तन साधारण रूप से होता है। संगीतशास्त्र के अन्तर्गत विविध रागों के माध्यम से स्वरों में संवेग उत्पन्न करने की क्षमता रहती है।

(3) शारीरिक मुद्रा या आसनिक अभिव्यक्ति (Postural Expression) – संवेगात्मक दशाओं में शारीरिक मुद्राओं या आसनों में परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं। इसके अन्तर्गत शरीर की समूची स्थिति में परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। व्यक्ति के बैठने तथा खड़े होने के आसन संवेग के माध्यम से प्रभावित होते हैं। आसनों द्वारा संवेगों की अभिव्यक्ति में सामाजिक रीति-रिवाज, परम्पराओं, शिक्षा तथा संस्कृति का पर्याप्त रूप से प्रभाव पड़ता है। हम देखते हैं कि क्रोध आने पर कुछ लोग इधर-उधर घूमने लगते हैं, कुछ गालियाँ बकते हैं, कुछ हाथों की मुट्ठियाँ तानकर हाथ फेंकते हैं, तनकर खड़े हो । जाते हैं, पैर पटकते हैं या दूसरे पर वार कर देते हैं।

आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन
(Internal Bodily Changes)

संवेग उत्पन्न होने के समय केवल बाह्य व्यवहार, मुद्राओं एवं अभिव्यक्तियों में ही परिवर्तन नहीं आते, अपितु व्यक्ति की अनेक आन्तरिक क्रियाओं में भी परिवर्तन आते हैं। निश्चय ही, ये आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन बाहर से दिखाई नहीं पड़ते हैं। इन परिवर्तनों का निरीक्षण करने के लिए मनोवैज्ञानिकों द्वारा अनेक विशिष्ट यन्त्रों को प्रयोग किया जाता है। संवेगावस्था में होने वाले विभिन्न आन्तरिक परिवर्तनों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है –

(1) हृदय की गति में परिवर्तन (Change in the Heart-Beats) – सामान्यतः संवेगावस्था में हृदय की गति में कुछ-न-कुछ परिवर्तन अवश्य आता है। रक्त नलिकाओं के संकुचन अथवा प्रसारण के कारण व्यक्ति के अंग विशेष में रक्त का प्रवाह कम या अधिक होने के कारण हृदय गति प्रभावित होती है। रक्त प्रवाह तेज होने पर हृदय गति तेज हो जाती है। उदाहरणार्थ-क्रोध व लज्जा के कारण गालों का रंग लाल हो जाता है, किन्तु भय के कारण रक्तप्रवाह धीमा होने की वजह से हृदय गति भी मन्द रहती है और चेहरे का रंग पीला या सफेद पड़ जाता है। हृदय गति के परिवर्तन को इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ नामक यन्त्र द्वारा मापते हैं।

(2) रक्तचाप में परिवर्तन (Change in Blood Pressure) – संवेगावस्था में रक्तचाप में परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। हृदय जिस शक्ति या दाब से शरीर के विभिन्न अंगों को रक्त भेजता है उसे रक्तचाप कहते हैं। रक्तचाप की माप प्लेथिस्मोग्राफ (Plethysmograph) नामक यन्त्र की सहायता से की जाती है। वस्तुतः रक्तचाप को संवेग की दशाओं का ज्ञान करने के लिए एक प्रभावकारी सूचक मान लिया गया है। जो व्यक्ति किसी विशेष संवेग के प्रति अभ्यस्त हो जाते हैं उनके रक्तचाप में कोई परिवर्तन नहीं मिलता, किन्तु संवेग के अनभ्यस्त लोगों का रक्तचाप संवेगावस्था में बदल जाता है। झूठ बोलने वाले अनभ्यस्त लोगों का रक्तचाप बढ़ जाता है, किन्तु झूठ बोलने वाले अभ्यस्त व्यक्तियों के रक्तचाप में कोई परिवर्तन नहीं होता। इसी के आधार पर मनोवैज्ञानिक लोग अपराधियों की बातों से झूठ या सच का पता लगा लेते हैं।

(3) रक्त-रसायन में परिवर्तन (Change in Blood Chemicals) – रासायनिक तत्त्वों में परिवर्तन मापने वाले यन्त्रों के प्रयोग से ज्ञात हुआ है कि संवेगावस्था में रक्त-रसायन (रक्त के रासायनिक तत्त्वों) में भी परिवर्तन आते हैं। संवेग जाग्रत होने पर रक्त की श्वेत एवं लाल रक्त कणिकाओं की संरचना बदल जाती है। कैनन आदि मनोवैज्ञानिकों ने कुत्ते, बिल्ली और मानव पर विभिन्न प्रयोग किये हैं। ज्ञात होता है क़ि क्रोध की संवेगावस्था में मानव की अभिवृक्क ग्रन्थियाँ, अभिवृक्की (Adrenaline) नामक रस निकालती हैं। यह रस सीधा रक्त में मिलकर रक्त की शर्करा को बढ़ा देता है, जिससे व्यक्ति को अधिक शक्ति अनुभव होती है। अतः संवेग में रक्त-रसायन में परिवर्तन आते हैं।

(4) रसपरिपाक में परिवर्तन (Change in Metabolic) – रसपरिपाक अर्थात् पाचन-क्रिया में परिवर्तन, संवेगावस्था का एक महत्त्वपूर्ण आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन है। रसपरिपाक की प्रक्रिया के अन्तर्गत भोजन का पाचन होता है और वह रक्त में मिलता है। बसविक नामक मनोवैज्ञानिक के प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि भय, क्रोध तथा दु:ख आदि की संवेगावस्था में रसपरिपाक की प्रक्रिया बन्द हो जाती है, किन्तु आश्चर्य का संवेग उसमें वृद्धि लाता है जबकि प्रसन्नता तथा हँसी-मजाक के दौरान किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता। कैनन ने इस सम्बन्ध में बिल्ली पर प्रयोग किये। प्रयोग में बिल्ली को खाना खिलाया गया जिसके उपरान्त उसमें रसपरिपाक (पाचन) की क्रिया प्रारम्भ हो गयी। तभी उसके सामने एक कुत्ते को लाया गया जिसे देखते ही भय का संवेग उत्पन्न होने के कारण रसपरिपाक की क्रिया बन्द हो गयी। इससे सिद्ध हुआ कि भय का संवेग उठने पर रसपरिपाक की क्रिया अक्रुद्ध हो जाती है।

(5) साँस की गति में परिवर्तन (Change in Rate of Respiration) – संवेगावस्था में सॉस की गति में परिवर्तन आ जाता हैं। सामान्य अवस्था में साँस की गति निश्चित रहती है और श्वासप्रश्वास का अनुपात 1:4 होता है। क्रोध, हर्ष तथा प्रत्याशा आदि के संवेग में साँस की गति बढ़ जाती है, जबकि भय, दुःख तथा आश्चर्य आदि के समय इसकी गति कम हो जाती है अथवा रुक जाती है। साँस की गति को न्यूमोग्राफ (Pneumograph) नामक यन्त्र की सहायता से मापते हैं।

(6) वैद्युत त्वक अनुक्रिया में परिवर्तन (Change in Galvanic Skin Response) – संवेग की स्थिति में वैद्युत त्वक्-अनुक्रिया निश्चित रूप से उपस्थित रहती है। यह त्वचा की विद्युत अवरोधों की क्रिया है। त्वक्-अनुक्रिया परिवर्तन के अन्तर्गत शरीर में रोमांच या सिहरन पैदा होना, रोंगटे खड़े हो जाने या पसीने की ग्रन्थियों में परिवर्तन आना दृष्टिगोचर होते हैं। इनसे संवेगावस्था का न्यूनाधिक आभास मिल ही जाता है। इसे साइकोगैल्वनोमीटर (Psychogalvanometer) की सहायता से मापा जाता है।

(7) मस्तिष्क तरंगों में परिवर्तन (Change in Brain waves) – संवेगावस्था में मस्तिष्क तरंगों की आवृत्ति में भी परिवर्तन पाया जाता है। इस प्रकार के परिवर्तनों में सहानुभूतिक नाड़ी मण्डल तथा उपसहानुभूतिक नाड़ी मण्डल जो स्वतन्त्र स्नायु मण्डल के भाग हैं, प्रभावित होते हैं।

निष्कर्ष यह है कि साधारण रूप से एक ही प्रकार के आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन विभिन्न संवेगावस्थाओं में मिलते हैं तथा हर एक संवेग के दौरान एक विशिष्ट प्रकार के आन्तरिक परिवर्तनों की एक जैसी श्रृंखला नहीं पायी जाती।

प्रश्न 5.
संवेग के जेम्स-लॉज सिद्धान्त की आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत कीजिए।
या
जेम्स लॉज का संवेग सम्बन्धी सिद्धान्त क्या है?
या
संवेग के सम्बन्ध में विभिन्न मतों (सिद्धान्तों) का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

संवेग के सिद्धान्त
(Theories of Emotion)

यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि संवेगावस्था में शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन होते हैं। दूसरे शब्दों में, संवेगों का बाह्य तथा आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों के साथ गहरा सम्बन्ध है। प्रश्न यह उठता है कि संवेगावस्था में होने वाले इन परिवर्तनों का आधार क्या है ? संवेग की दशा में पहले शारीरिक परिवर्तन आते हैं यो मानसिक परिवर्तन ? इन आधारों को समझने के लिए मनोवैज्ञानिकों द्वारा अध्ययन किये गये हैं जिनके परिणामस्वरूप इस सम्बन्ध में समय-समय पर अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन हुआ है। विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रस्तुत सिद्धान्तों में से प्रमुख सिद्धान्त ये हैं –

  1. जेम्स-लाँज का सिद्धान्त;
  2. कैनन-बार्ड का सिद्धान्त;
  3. लीपर का प्रेरणात्मक सिद्धान्त;
  4. सक्रियकरण सिद्धान्त।

जेम्स-लॉज का सिद्धान्त
(James-Lange Theory)

संवेग सम्बन्धी ‘जेम्स-लॉज का सिद्धान्त’ दो मनोवैज्ञानिकों के पृथक् एवं स्वतन्त्र प्रयासों का परिणाम है। अमेरिका के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स तथा डेनमार्क के दैहिक मनोवैज्ञानिक लाँज ने स्वतन्त्र रूप से अलग-अलग कार्य करते हुए सन् 1884-85 में अपने-अपने संवेग विषयक सिद्धान्त प्रस्तुत किए। संयोगवश दोनों विद्वानों ने लगभग एक जैसे ही विचारों का प्रतिपादन किया था। इसी कारण इनके द्वारा प्रस्तुत किए गए निष्कर्षों को संयुक्त रूप से जेम्स-लॉज सिद्धान्त का नाम दिया गया।

सिद्धान्त की व्याख्या – संवेगों के सम्बन्ध में एक सामान्य सिद्धान्त या विचारधारा प्रचलित है। जिसके अनुसार सर्वप्रथम संवेगात्मक अनुभूति होती है और इसके बाद संवेगात्मक व्यवहार होता है। इसका अभिप्राय यह है कि किसी उत्तेजना के सम्पर्क में आने वाला व्यक्ति पहले किसी परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण करता है, तब उसके अन्दर मानसिक परिवर्तन होते हैं जो शारीरिक परिवर्तनों को जन्म देते हैं और इस प्रकार वह कोई कार्य (व्यवहार) करता है। उदाहरण के लिए–बहुत दिनों के बाद एक माँ अपने बेटे को देखती है जिससे उसके अन्दर मानसिक परिवर्तन आते हैं और वात्सल्य का संवेग जन्म लेता है। यह वात्सल्य को संवेग प्यार, दुलार और आलिंगन जैसी शारीरिक क्रियाओं द्वारा व्यक्त होता है। सामान्य सिद्धान्त को निम्न प्रकार से भली प्रकार समझा जा सकता है –

व्यक्ति को उत्तेजना से सम्पर्क → परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण →
मानसिक परिवर्तन (संवेगात्मक अनुभूति) → शारीरिक परिवर्तन एवं क्रियाएँ

किन्तु जेम्स और लॉज उपर्युक्त प्रचलित विचारधारा के विपरीत अपनी अवधारणा प्रस्तुत करते हैं जिसके अनुसार व्यक्ति के विशिष्ट संवेगात्मक व्यवहार (अथवा शारीरिक परिवर्तनों) के फलस्वरूप ही अभीष्ट संवेगों की अनुभूति होती है। विलियम जेम्स ने अपने विचारों को इस प्रकार प्रकट किया है, मेरा सिद्धान्त है कि शारीरिक परिवर्तन उद्दीपक के प्रत्यक्षीकरण के तुरन्त बाद होता है और जैसे ही वे संवेग में होते हैं उनके प्रति हमारी अनुभूति बदल जाती है।’ संवेगात्मक व्यवहार के विषय में उनका स्पष्टीकरण इस प्रकार है, “हमें दुःख होता है क्योंकि हम रोते हैं, क्रोध उत्पन्न होता है क्योंकि हम मारते हैं, भय लगता है क्योंकि हमें काँपते हैं, हम इसलिए नहीं रोते, मारते या काँपते क्योंकि हमें दु:ख होता है, क्रोध उत्पन्न होता है या भय लगता है।” जेम्स के ही समान लाँज ने भी संवेगों की उत्पत्ति के लिए शारीरिक क्रियाओं को जिम्मेदार माना। लॉज के शब्दों में, “हमारे हर्षों और विषादों के लिए, हमारे आनन्दों और व्यथाओं के लिए, हमारे मानसिक जीवन के सम्पूर्ण संवेदनात्मक पहलू के लिए वाहिनी पेशी संस्थान उत्तरदायी है।”

जेम्स-लाँज सिंद्धान्त का सार-संक्षेप यह है कि उद्दीपने के उपस्थित होने पर व्यक्ति में क्रियाओं का प्रारम्भ होता है और उसके शरीर में कुछ परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। इन क्रियाओं और परिवर्तनों का ज्ञान व्यक्ति के अन्दर संवेग पैदा करता है जिसकी उसे अनुभूति होती है। इसे निम्न प्रकार से भली प्रकारे समझ सकते हैं।

परिस्थिति को प्रत्यक्षीकरण शारीरिक परिवर्तन एवं क्रियाएँ →
मानसिक परिवर्तन (संवेगात्मक अनुभूति)

जेम्स-लॉज सिद्धान्त के पक्ष में तर्क या प्रमाण

जेम्स-लाँज ने अपने संवेग सम्बन्धी सिद्धान्त को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित तर्क या प्रमाण प्रस्तुत किये हैं –

(1) संवेग जाग्रत होने से पूर्व शारीरिक परिवर्तनों की उत्पत्ति – यदि कोई उद्दीपक अचानक ही उपस्थित हो जाए तो संवेग जाग्रत होने से पूर्व ही कुछ शारीरिक परिवर्तन उत्पन्न हो जाते हैं। इस बारे में जेम्स का मत है कि अगर कोई व्यक्ति अन्धकार में किसी काली चीज को अचानक देख ले तो किसी संवेग के जगने से पहले ही उसके हृदय की धड़कनें बढ़ जाती हैं, मुँह सूख जाता है और वह हाँफने लगता है। इसके अलावा किसी भयंकर ध्वनि या धमाके को सुनकर भी व्यक्ति बिना किसी संवेग के चौंक उठती है। इसके बाद जब वह उस ध्वनि या धमाके का अभिप्राय समझता है तो उसमें भय अथवा आश्चर्य उत्पन्न होता है।

(2) शारीरिक अभिव्यक्ति का संवेग से घनिष्ठ सम्बन्ध – शरीर के अंगों की अभिव्यक्ति को संवेग से अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध होना जेम्स-लाँज सिद्धान्त’ के पक्ष में एक महत्त्वपूर्ण तर्क है। ऐसे संवेग की कल्पना करना दुष्कर है जिसमें शारीरिक अंगों की अभिव्यक्ति न होती हो। संवेग की अनुभूति के लिए तद्नुरूप शारीरिक आसन (Bodily Posture) का होना बहुत जरूरी है।

(3) शारीरिक अभिव्यक्ति के विरोधस्वरूप संवेग का भी विरोध – यदि शारीरिक अंगों की अभिव्यक्ति का विरोध किया जाए तो इसके फलस्वरूप तत्सम्बन्धी संवेग को भी विरोध हो सकता है। यदि कोई उद्दीपक सम्मुख आ जाए और उसके प्रति की जाने वाली स्वाभाविक क्रियाओं को हम रोक लें तो संवेग जाग्रत नहीं होगा। जेम्स के अनुसार, यदि किसी की मृत्यु पर कोई रुदन-क्रन्दन न केरे अथवा ऐसी ही कोई शारीरिक क्रिया प्रदर्शित न करे तो दुःख का संवेग नहीं माना जायेगा।

(4) कृत्रिम अभिव्यक्तियों के माध्यम से संवेग की जाग्रति – कृत्रिम अर्थात् बनावटी ढंग से शारीरिक अंगों की अभिव्यक्तिंयाँ प्रदर्शित करने से संवेग जाग्रत हो जाते हैं। इसे जेम्स ने फिल्म और नाटक के अभिनेताओं और अभिनेत्रियों का उदाहरण प्रस्तुत कर समझाया है। ये कलाकार फिल्म और नाटक में अभिनय के दौरान कृत्रिम व्यवहार अथवा क्रियाओं तथा हाव-भावों का प्रदर्शन कर संवेगाभिव्यक्ति करते हैं। यह बनावटी व्यवहार या क्रियाएँ उनमें तत्सम्बन्धी संवेग को जाग्रत कर देते हैं। जिससे उनका अभिनय जीवन्त एवं सफल हो जाता है।

(5) शराब अथवा नशीले पदार्थों के सेवन से संवेग की उत्पत्ति – शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों के सेवन से भी संवेग की उत्पत्ति होती है। इसका कारण यह है कि इन उत्तेजक पदार्थों के कारण शारीरिक अवस्था कुछ इस प्रकार की हो जाती है कि वह विभिन्न संवेगों को उत्पन्न कर देती है। जेम्स स्वीकार करता है कि किसी व्यक्ति द्वारा मादक या नशीले पदार्थों का सेवन करने से, बिना किसी बाहरी उद्दीपक के, उसमें स्वत: ही खुशी, दु:ख, साहस, करुणा आदि के संवेग उत्पन्न होने लगते हैं।

(6) रोगों से संवेग की उत्पत्ति – जेम्स का मत है कि किन्हीं रोगों में बाह्य उद्दीपन के बिना ही संवेग उत्पन्न होने लगते हैं। उसके अनुसार, “यकृत के रोग अवसाद तथा चिड़चिड़ाहट उत्पन्न करते हैं, जबकि स्नायविक रोग भय एवं निराशा को जन्म देते हैं।”

स्पष्टत: उपर्युक्त वर्णित एवं जेम्स द्वारा पुष्ट किये गये तर्को तथा प्रमाणों के आधार पर ‘जेम्स-लॉज सिद्धान्त’ की यह अवधारणा सिद्ध होती है, “जब तक शारीरिक व्यवहार नहीं होगा, तब तक उससे सम्बन्धित संवैग की अनुभूति हमें नहीं होगी।”

जेम्स-लाँज सिद्धान्त के विपक्ष में तर्क या आलोचना

जेम्स-लॉज के सिद्धान्त के प्रस्तुतीकरण के उपरान्त विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने इस सिद्धान्त की प्रयोगात्मक परीक्षा की। सिद्धान्त की जाँच के पश्चात् बहुत-से मनोवैज्ञानिक इस विचार से सहमत नहीं थे कि शारीरिक परिवर्तनों के बाद ही संवेग की अनुभूति होती है। फलतः इस सिद्धान्त की कटु आलोचना हुई और इसके विपक्ष में निम्नलिखित तर्क या प्रमाण प्रस्तुत किये गये –

(1) शेरिंगटन (Sherington) ने एक कुत्ते पर प्रयोग करके जेम्स-लॉज के सिद्धान्त के विरुद्ध यह सिद्ध कर दिया कि शारीरिक परिवर्तनों के अभाव में भी संवेगात्मक प्रतिक्रियाएँ सम्भव हैं। शेरिंगटन द्वारा एक कुत्ते के गले की नाड़ियों को इस भॉति पृथक् कर दिया गया कि जिससे उसके आन्तरिक परिवर्तनों का सन्देश उसके मस्तिष्क को न मिले। कुत्ते के सम्मुख संवेगात्मक परिस्थितियाँ उत्पन्न करने पर पाया गया कि कुत्ते ने प्रत्येक संवेग को पूर्ण अभिव्यक्ति दी। इस प्रकार कुत्ता शारीरिक परिवर्तनों के बिना भी संवेगों का अनुभव कर रहा था। यह प्रमाण जेम्स-लाँज के सिद्धान्त का विरोध करता है।

(2) कैनन (Canon) ने बिल्लियों पर प्रयोग किये। बिल्ली के स्वतन्त्र स्नायु मण्डल की माध्यमिक या सहानुभूति स्नायुओं को शल्य क्रिया द्वारा काटकर अलग कर दिया गया। निरीक्षण के दौरान पाया गया कि संवेगावस्था में आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन तो बन्द हो गये, किन्तु बाह्य अभिव्यक्ति पहले की तरह होती रही। बिल्ली के सामने क्रोध का उद्दीपक आने पर वह गुर्रायी तथा कान को पीछे की तरफ भी खींचा। इस प्रकार क्रोध के बाह्य लक्षण अभिव्यक्त करके भी उसमें आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन दृष्टिगोचर नहीं हुए।

(3) जेम्स-लाँज के संवेग सम्बन्धी सिद्धान्त की मान्यता है कि किसी संवेग की उत्पत्ति के लिए सम्बन्धित वस्तु का प्रत्यक्षीकरण ही काफी होता है। आलोचकों ने इस मान्यता को अस्वीकार किया है। तर्क यह है कि यदि यह मान्यता सत्य होती तो किसी एक वस्तु या घटना के प्रत्यक्षीकरण के परिणामस्वरूप प्रत्येक परिस्थिति में एक ही प्रकार की प्रतिक्रिया प्रकट की जाती, परन्तु व्यवहार में प्रायः ऐसा नहीं होता। बार्ड ने एक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लिखा है, “मान लीजिए, जेम्स का मुकाबला पहले तो पिंजरे में बन्द भालू• से होता है और तत्पश्चात् खुले हुए भालू से। पहली वस्तु (भालु) को वह मूंगफली देता है और दूसरी वस्तु (उसी भालू) से भागता है।” प्रस्तुत उदाहरण द्वारा स्पष्ट होता है कि किसी संवेग की उत्पत्ति के लिए अभीष्ट वस्तु के साथ ही कुछ परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना आवश्यक होता है। इस तर्क द्वारा भी जेम्स-लॉज सिद्धान्त को खण्डन किया गया है।

(4) डॉ० डाना (Dr. Dana) ने एक चालीस वर्षीय महिला के सम्बन्ध में भी, जो घोड़ेसे गिर गयी थी, यही कुछ पाया। महिला की गर्दन में चोट आ जाने के कारण उसका सहानुभूतिक नाड़ीमण्डल संवेदना प्राप्त नहीं कर पाता था, किन्तु वह संवेगों की अनुभूति कर उन्हें भली-भांति प्रकट कर सकती थी। इससे पता चला कि संवेगात्मक अनुभूति के लिए अन्तरावयव संवेदनाएँ तथा शारीरिक परिवर्तन आवश्यक नहीं हैं।

(5) आर्चर (Archer) नामक मनोवैज्ञानिक ने जब फिल्म और नाटक से जुड़े अभिनेताओं के सम्बन्ध में जाँच की तो इसके परिणाम जेम्स की अवधारणा के विपरीत हासिल हुए। बहुत से कलाकारों ने व्यक्त किया कि शारीरिक अंगों की अभिव्यक्ति के समय उन्हें किसी प्रकार की संवेगात्मक अनुभूति नहीं हुई।

(6) जेम्स-लाँज सिद्धान्त की मान्यता है कि शराब या मादक पदार्थों के सेवन से संवेग की उत्पत्ति होती है। अनेक व्यक्तियों को मादक तथा उत्तेजक पदार्थों का सेवन कराया गया, फिर भी उन्हें किसी प्रकार की संवेगात्मक अनुभूति नहीं हुई। इससे जेम्स-लाँज सिद्धान्त का खण्डन होता है।

(7) आन्तरिक परिवर्तन तथा जाठरिक उपद्रवों के सन्दर्भ में संवेगावस्था की जाँच करने के लिए मैरेनन केन्ड्रिल, हन्ट तथा कैनन ने प्रयोग किये, जिनसे सिद्ध हुआ कि आन्तरिक परिवर्तन तथा जठरिक उपद्रवों के होने पर भी संवेग का उठना आवश्यक नहीं है।

(8) शारीरिक अभिव्यक्तियों के आधार पर संवेग प्रकट नहीं होते। प्रायः देखा गया है कि विशिष्ट संवेग विशिष्ट प्रकार की शारीरिक अभिव्यक्तियों से सम्बन्ध नहीं रखते, बल्कि कई संवेगों के साथ ही एक ही प्रकार की शारीरिक अभिव्यक्ति होती है। दुःख और अत्यधिक हर्ष एकदम विपरीत संवेग हैं, किन्तु इनकी शारीरिक अभिव्यक्ति एकसमान है-दोनों में आँसू निकल पड़ते हैं।

(9) अन्तिम रूप से, यौन ग्रन्थियों के न रहने पर भी लोगों में यौन सम्बन्धी संवेग जाग्रत होते हुए देखा गया है-यह भी सिद्धान्त के विपरीत तथ्य है।

जेम्स-लाँज का सिद्धान्त मनोवैज्ञानिकों की कटु आलोचनाओं की परिधि में रहा और पूर्णत: मान्य न हो सका। स्वयं जेम्स को इन आलोचनाओं में वर्णित तथ्यों पर ध्यान देना पड़ा और उसने आगे चलकर अपनी विचारधारा में कुछ संशोधन भी किये जिसके परिणामस्वरूप सिद्धान्त का संशोधित रूप सामान्य विचारधारा के सदृश ही हो गया। फिर भी शारीरिक परिवर्तन तथा आंगिक क्रियाओं को महत्त्व प्रदान करने वाले इस सिद्धान्त का संवेग के क्षेत्र में अपूर्व योगदान रहा है।

प्रश्न 6.
कैनन के संवेग सम्बन्धी सिद्धान्त की विवेचना प्रस्तुत कीजिए।
या
संवेग सम्बन्धी कैनन-बार्ड सिद्धान्त का उल्लेख कीजिए।

उत्तर :

कैनन को संवेग सिद्धान्त
(Canon’s Theory of Emotion)

शारीरिक परिवर्तनों के ज्ञान तथा अनुभव करने को ही संवेग की संज्ञा देने वाले जेम्स-लॉज सिद्धान्त की विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने कटु आलोचना की। इन मनोवैज्ञानिकों में कैनन भी एक प्रमुख वैज्ञानिक है। कैनन और उनके सहयोगी बार्ड ने जेम्स-लाँज सिद्धान्त के विरुद्ध अपना सिद्धान्त प्रतिपादित किया, जिसे कैनन-बार्ड का सिद्धान्त (Canon-Bard Theory) के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इस सिद्धान्त के अनुसार संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं में हाइपोथैलेमस का स्राव प्रमुख कार्य करता है; अतः इसे हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त (Hypothalamic Theory) या आकस्मिक सिद्धान्त (Emergency Theory) भी कहते हैं।

कैनन-बार्ड सिद्धान्त की व्याख्या-मानव मस्तिष्क में संवेगात्मक अनुभूति का केन्द्र ‘वृहद् मस्तिष्क (Cerebral Cortex) है तथा संवेगात्मक अभिव्यक्ति का केन्द्र ‘अ ्तर्मस्तिष्क (Diencephalon) है। इसके दो मुख्य भाग हैं–हाइपोथैलेमस तथा थैलेमस। हाइपोथैलेमस ग्रन्थि , समस्त संवेगों का केन्द्र है तथा इसका स्राव संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं में मुख्य रूप से कार्य करती है। संवेग की क्रिया के समय सर्वप्रथम तो संवेगात्मक परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण होता है जिसके कारण हाइपोथैलेमस उत्तेजित हो उठता है। अत: सबसे पहले आदेश या संवेग हाइपोथैलेमस में उत्पन्न होता है। इसके बाद यह एक साथ ही वृहद् मस्तिष्क के कॉक्स तथा आन्तरिक अंगों की माँसपेशियों में जाता है। परिणामस्वरूप संवेगात्मक अनुभूति तथा संवेगात्मक व्यवहार एक साथ दिखाई पड़ते हैं। वस्तुतः कैनन-बार्ड सिद्धान्त की अवधारणा के अनुसार संवेगात्मक अनुभूति तथा संवेगात्मक व्यवहार दोनों की उत्पत्ति एक साथ ही एवं परस्पर स्वतन्त्र रूप से होती है।

होता यह है कि सर्वप्रथम परिस्थिति या उद्दीपक संग्राहकों को प्रभावित करती है जिससे ज्ञानवाही नाड़ियों के माध्यम से स्नायु-प्रवाह थैलेमस में पहुँचता है। थैलेमस में इस स्नायु-प्रवाह के साथ संवेगात्मक तत्त्व सम्मिलित होते हैं और अब यह प्रवाह वृहद् मस्तिष्क में भेज दिया जाता है। फलस्वरूप व्यक्ति-विशेष में किसी संवेग का अनुभव पैदा होता है। जिस समय स्नायु प्रवाह वृहद् मस्तिष्क की ओर चलता है तो थैलेमस द्वारा उसका कुछ भाग जठर तथा स्केलेटल मांसपेशियों की तरफ मोड़ दिया जाता है। इस भॉति सांवेगिक क्रियाएँ उत्पन्न होती हैं।

सिद्धान्त की विशेषताएँ – कैनन-बार्ड या हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त, जेम्स-लॉज सिद्धान्त के विरोध में प्राप्त परिणामों की उचित रूप से व्याख्या करने में सफल पाया गया। इस विचारधारा के माध्यम से पूर्व प्रतिपादित सिद्धान्त की भ्रान्त धारणाओं को सुधारने का प्रयास हुआ है। कैनन सिद्धान्त के अनुसार जब आन्तरिक अवयव तथा वृहद् मस्तिष्क का सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है तो उस दशा में भी वृहद् मस्तिष्क तथा हाइपोथैलेमस का आपसी सम्बन्ध बना रहता है। जेम्स-लॉज सिद्धान्त के अनुसार यदि सुषुम्ना नाड़ी गर्दन के पास से काट दी जाये या कट जाये तो आन्तरिक अवयवों से सम्बन्धित क्रियाएँ रुक जाएँगी और संवेग उत्पन्न नहीं होगा। इसके विपरीत, कैनन सिद्धान्त के अनुसार संवेग का आवेश हाइपोथैलेमस ग्रन्थि में उत्पन्न होता है तथा वृहद् मस्तिष्क की कॉर्टेक्स में चला जाता है, इसलिए संवेग की अनुभूति सुषुम्ना के कट जाने पर भी रहती है, क्योंकि हाइपोथैलेमस ग्रन्थि को क्रियाशील होने में जरा भी समय नहीं लगता, अतः संवेग की अनुभूति भी अविलम्ब ही हो जाती है। स्पष्ट है कि जेम्स-लॉज के सिद्धान्त की तुलना में कैनन का सिद्धान्त अधिक उपयुक्त है और इस तथ्य की पुष्टि करता है कि संवेगात्मक अनुभूति और संवेगात्मक व्यवहार दोनों एक साथ ही होते हैं।

सिद्धान्त के दोष – कैनन-बार्ड या हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त भी पूर्णतः दोषमुक्त नहीं है। इस सिद्धान्त के दोष निम्न प्रकार हैं –

  1. हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त संवेगावस्था के अन्तर्गत सिर्फ हाइपोथैलेमस को महत्त्व प्रदान करता है, जबकि वास्तव में, हाइपोथैलेमस द्वारा उत्पन्न संवेगात्मक व्यवहार न केवल क्षणिक होता है अपितु स्वाभाविक या प्राकृतिक संवेगात्मक व्यवहार से भिन्न भी होता है।
  2. संवेगों की उत्पत्ति के लिए, हाइपोथैलेमस के अतिरिक्त, स्नायु संस्थान के कुछ भाग भी उत्तरदायी हैं तथा अपना पृथक् महत्त्व रखते हैं।
  3. इन अन्य भागों द्वारा उत्पन्न व्यवहार परिस्थिति से समायोजन की क्षमता रखता है लेकिन हाइपोथैलेमस से उपजे संवेगात्मक व्यवहार में यह क्षमता नहीं होती।
  4. अन्ततः यह बात सिद्ध नहीं हो सकी है कि संवेगात्मक अनुभूति की उत्पत्ति में केवल हाइपोथैलेमिक क्रियाएँ ही महत्त्व रखती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानव-जीवन में संवेगों के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कोई भी व्यक्ति अनेकानेक मनोवैज्ञानिक कारणों से व्यवहार प्रदर्शित करता है। संवेग भी एक प्रबल मनौवैज्ञानिक कारण है जो व्यक्ति के विशिष्ट व्यवहार को जन्म देता है। वस्तुतः मानव-जीवन से सम्बन्धित अनुभवों तथा व्यवहारों में संवेग महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। मनुष्य में परिस्थिति के प्रति अनुक्रिया करने की प्रेरणा संवेग से ही आती है, जबकि संवेग के अभाव में वह स्वयं को निष्क्रिय पाता है। वीरता और शौर्य के असामान्य कार्यों की प्रेरणा मानव को संवेगों से ही मिलती है। युद्धभूमि में राष्ट्र के लिए प्राण न्योछावर करने वाला देशभक्त सिपाही बुद्धि से नहीं, संवेगों से प्रेरित होता है। हँसते-हँसते फॉसी का फन्दा चूमने वाले अमर शहीद भगत सिंह का असामान्य व्यवहार संवेगों से ही परिचालित था। संवेग की अवस्था में मनुष्य कभी-कभी ऐसे अद्भुत कार्य कर डालता है। जिनकी वह सामान्य अवस्था में कल्पना भी नहीं कर सकता। तेज ज्वर से पीड़ित बीमार होते हुए भी माता अपने शिशु को सूखे स्थान पर सुलाती है और स्वयं गीले स्थान पर लेटती है। माता-पिता का अपने बच्चों के लिए त्याग वात्सल्य के संवेग के कारण है।

भावात्मक अनुभवों के आधार पर भी कुछ व्यवहार किये जाते हैं। सहानुभूति से द्रवित होकर कोई व्यक्ति अपनी क्षमता से अधिक ऐसे लोगों की मदद कर सकता है जो सहानुभूति के पात्र हैं; किन्तु यदा-कदा सहानुभूति में किया गया व्यवहार सिर्फ कर्तव्य पूर्ति के लिए ही होता है। सामाजिक कर्तव्य का | निर्वाह करने की दृष्टि से ऐसे व्यक्ति के यहाँ शोक संवेदना व्यक्त करने जाना पड़ता है, जिनसे हमारे विचार कभी नहीं मिलते। इसी प्रकार न चाहते हुए, केवल प्रदर्शन के लिए ही उत्सव में भी सम्मिलित होना पड़ता है। मैक्डूगल ने इसे मिथ्या-प्रवृत्ति (Pseudo-Instinct) का नाम दिया है।

प्रश्न 2.
संवेगों के अवदमन से क्या आशय है?
उत्तर :
मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में मानव-जीवन में संवेगों की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। प्रायः संवेग शक्ति के प्रबल स्रोत के रूप में कार्य करते हैं। संवेगात्मक परिस्थिति में शरीर में असाधारण शक्ति को संचार होता है और संकटकालीन परिस्थितियों में यही शक्ति शरीर की रक्षा करने में सहायता करती है। आग से बचने के लिए बीमार और कमजोर व्यक्ति भी सिर पर पैर रखकर भाग लेता है और अपने प्राणों की रक्षा करता है, किन्तु यदि संवेगात्मक उद्दीपक अत्यधिक रूप से प्रभावशाली है तो वह मस्तिष्क को संज्ञाविहीन भी कर सकता है, जिससे शरीर की क्रियाशीलता समाप्त हो सकती है।

व्यक्ति, स्वहित में तथा समाज में अपनी भूमिका के सन्दर्भ में, संवेग की अभिव्यक्ति सुविचारित रूप से करता है और उन्हें नियन्त्रित रूप से ही प्रकट होने देता है। कोई भी व्यक्ति सभी के प्रति घृणा का भाव रखते हुए समाज में अच्छे सम्बन्ध स्थापित नहीं रख सकता, फलस्वरूप उसे घृणा से सम्बन्धित अपने संवेग पर नियन्त्रण रखना होगा। स्पष्टत: परिस्थिति विशेष में व्यक्ति अपने संवेगों का अवदमन (Repression of Emotions) करता है। मालिक ने नौकर को दुकान पर प्रताड़ित किया है, अन्दर-ही-अन्दर जला भुना नौकर घर जाते समय एक पहलवान व्यक्ति का अप्रिय व्यवहार भी सह जाता है और अपने क्रोध का प्रदर्शन नहीं कर पाता। नौकर खीझ में अपने क्रोध का अवदमन करती है।

प्रश्न 3.
संवेगों के अवदमन के कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
संवेगों के अवदमन का कारण उनकी अभिव्यक्ति में बाधा उत्पन्न होना है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सिगमण्ड फ्रॉयड के अनुसार, उन्हीं इच्छाओं तथा संवेगों का अवदमन सबसे ज्यादा होता है जिन्हें करने की आज्ञा हमारा आत्मसम्मान, परिवार या समाज हमें प्रदान नहीं करता है। हो सकता है, हमारी ये इच्छाएँ और संवेग समाज-विरोधी अथवा अश्लील हों।

फ्रॉयड ने मन के तीन विभाग बताये हैं – (i) चेतन मन, (ii) अवचेतन मन तथा (iii) अचेतन मन। अवदमने की यह क्रिया अचेतन रूप से होती है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत दु:खदायी तथा अवांछनीय विचार, स्मृतियाँ तथा प्रवृत्तियाँ चेतन से अवचेतन और फिर अचेतन मन की ओर भेज दिये जाते हैं। व्यक्ति की कोई भी इच्छा, भावना तथा संवेग सबसे पहले चेतन मन में स्थान पाते हैं। चेतन मन इनकी अभिव्यक्ति, पूर्ति एवं सन्तुष्टि के लिए प्रयासरत रहता है, किन्तु यदि इसमें कोई बाधा आती है तो उन्हें अचेतन मन की ओर धकेल दिया जाता है। अवचेतन मन, यद्यपि इन संवेगों के प्रकाशन एवं पूर्ति के लिए यथासम्भव प्रयास करता है, किन्तु मन के इस विभाग में, चेतन में बनी इच्छाओं के कारण इन्हें स्पष्टता नहीं मिलती और अपनी अभिव्यक्ति के लिए इन्हें अचेतन मन में जाना पड़ता है। इस भाँति चेतन मन के जो संवेग परिस्थितियों के कारण सन्तुष्ट नहीं हो पाते या खुले रूप से अभिव्यक्त नहीं हो पाते, उनका अचेतन मन में अवदमन हो जाता है।

क्योंकि समस्त असन्तुष्ट तथा अप्रदर्शित विचार, स्मृतियाँ, प्रवृत्तियाँ, इच्छाएँ तथा संवेग, अन्ततोगत्वा, अचेतन मन में संगृहीत होते जाते हैं; अतः स्वभावतः, अचेतन मन, चेतन मन की अपेक्षा काफी बड़ा हो जाता है। यह समुद्र में उत्प्लवन करते हिमखण्ड की भाँति है, जिसका एक-चौथाई अंश पानी के ऊपर है और तीन-चौथाई अंश पानी में डूबा हुआ। वस्तुत: चेतन मन सारे समाज-विरोधी, अश्लील अथवा यौनजनित संवेगों को अवचेतन मन में ठेलकर उन्हें पुनः अपने यहाँ वापिस नहीं आने देता। यही कारण है कि इन्हें अवदमित संवेगों के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 4.
संवेगों के अवदमन का मानव-व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
संवेगों के छिपाने या अवदमन से मनुष्य के व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ता है। व्यक्तित्व की सन्तुलित एवं साम्यावस्था के लिए संवेगों का अभिप्रकाशन तथा उनका अवदमन दोनों ही आवश्यक समझे जाते हैं। अत्यधिक रूप से अवदमित संवेग मानव स्वभाव एवं प्रकृति के विपरीत स्वीकार किये गये हैं। विद्वानों के अनुसार संवेगों का प्रकटीकरण एक प्राकृतिक आवश्यकता है और इसके प्रकटीकरण को जबरदस्ती रोक देने से अनेक विकृतियाँ जन्म ले सकती हैं।

मनोविश्लेषणवादियों ने दमित संवेगों से कई मानसिक तथा स्नायुविक व्याधियों का उल्लेख किया है। संवेगों का अवदमन मानव व्यक्तित्व को असामान्य तथा कुण्ठा ग्रस्त बना देता है, जिससे व्यक्तित्व का समुचित तथा अभीष्ट विकास अवरुद्ध हो जाता है।

अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि जिस व्यक्ति की इच्छाएँ, भावनाएँ या संवेग पूर्णतः सन्तुष्ट नहीं हो पाते, उनके व्यबहारों में असामान्यता उत्पन्न होने लगती है, उनका व्यक्तित्व विच्छेदन की ओर उन्मुख होने लगता है तथा वे अनेक मानसिक रोगों के शिकार हो जाते हैं। उनमें आत्महीनता, शक, ईष्र्या तथा डर के भाव उत्पन्न हो जाते हैं तथा मानसिक विकृतियों की वजह से वे ज्यादातर शारीरिक-मानसिक तनाव से कष्ट पाते रहते हैं। स्पष्टतः संवेगों का अवदमन एक निश्चित सीमा से अधिक उचित नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 5.
संवेगों के नियन्त्रण के समुचित उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
यह सत्य हैं कि समाज में रहते हुए व्यक्ति अपने संवेगों की पूर्ण रूप से मुक्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता, परन्तु संवेगों का अत्यधिक अवदमन किसी समय विस्फोटक स्थिति को जन्म दे सकता है। सामाजिक परिस्थितियों के साथ तालमेल की दृष्टि से संवेगों पर काबू रखने के लिए और उन्हें स्वाभाविक रूप में प्रकटित होने का अवसर प्रदान करने के लिए निम्नलिखित उपाय प्रयुक्त हो सकते हैं –

(1) अवांछनीय संवेगों के विपरीत परिस्थितियों का सृजन – अवांछनीय संवेगों को रोकने का एक उपाय यह है कि उनके विपरीत परिस्थितियों अथवा विरोधी संवेगों को प्रोत्साहित किया जाए। इस भाँति वांछनीय संवेगों की उत्पत्ति के लिए उसे वातावरण तथा परिस्थिति पर काबू पाना होगी जो अवांछनीय संवेगों के लिए उत्तरदायी है। शोक को कम करने के लिए सुखकारी परिस्थितियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

(2) संवेगों का रेचन – रेचन (Chatharsis) से अभिप्राय ‘भड़ास निकालने या भावनाओं को उभारने से है। संवेगों के रेचन से अनचाहे भाव शान्त होते हैं तथा प्राकृतिक आनन्द की प्राप्ति होती है। भय के संवेग को उभारकर बाहर निकालने के लिए बहुत से लोग डरावनी कहानियाँ या घटनाएँ पढ़ते हैं। पति की मृत्यु के आघात से यदि शोकाकुल पत्नी गुमसुम बैठी है और रो नहीं पा रही तो यह भयंकर रूप से हानिकारक हो सकता है। अक्सर स्त्रियाँ जोर-जोर से विलाप कर किसी भी प्रकार उसके दुःख के संवेग को उभारकर उसे रोने के लिए प्रेरित करती हैं। रोने से जी हल्का होता है तथा चित्त को शान्ति मिलती है।

(3) संवेगों का शोधन – इसके अन्तर्गत संवेगात्मक अभिव्यक्ति के परिमार्जन एवं परिवर्द्धन द्वारा स्वस्थ मानसिकता को उत्पन्न किया जाता है। संगीत, चित्रकला, लेखन तथा काव्य आदि के माध्यम से संवेगों को उत्तम अभिव्यक्ति मिलती है।

(4) संवेग का मार्ग परिवर्तन – मार्ग परिवर्तन द्वारा भी संवेग को नियन्त्रित किया जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति में घृणा का संवेगात्मक प्रकाशन अधिक होता है तो उसे अपने घृणा का भाव दुर्जन व्यक्तियों पर करना चाहिए न कि सज्जन व्यक्तियों पर।

प्रश्न 6.
बाल्यावस्था में संवेगों के होने वाले अवदमन के सम्भावित कुप्रभावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार बालक में संवेगात्मक व्यवहार शनैः-शनैः विकसित होते हैं और आयु में वृद्धि के साथ-ही-साथ उसके संवेगात्मक व्यवहार स्पष्ट होने लगते हैं। अध्ययन बताते हैं कि संवेगात्मक व्यवहार का विकास नाड़ी-पेशीय यन्त्रों की परिपक्वता पर निर्भर करता है। जीवन के विकास-क्रम में नयी-नयी परिस्थितियों तथा वातावरण के सम्पर्क में आकर बालक नयी-नयी क्रियाओं को सीखता है और इस प्रकार वह साधारण से जटिल संवेगात्मक अवस्थाओं की ओर बढ़ता है। पारिवारिक परिस्थितियों में बालक के प्राकृतिक संवेगों को समाज की सभ्यता, संस्कृति, दर्शन एवं मान्यताओं के अनुसार ढालने की कोशिश की जाती है। इस अनुकूलन के लिए संवेगावस्था पर । नियन्त्रण एक पूर्व आवश्यकता है, किन्तु नियन्त्रण की सीमाओं का अतिक्रमण करने से उत्पन्न भय एवं दबाव की परिस्थितियाँ ‘संवेगों के अवदर्मन’ को जन्म देंगी और बालक स्वयं को तनाव में महसूस करेगा। बालक को जबरदस्त भूख लगी है लेकिन उसे भोजन नहीं मिल पा रहा। क्योंकि उसकी इच्छाओं की तृप्ति में बाधा आ रही है; अतः इससे क्रोध का जन्म होगा ही। यदि बालक को अधिक डराया-धमकाया जाएगा तो वह क्रोध प्रकट न करके अन्दर-ही-अन्दर कुंठित होगा। अवदमन के कारण कुण्ठित और हीनमानसिकता से ग्रस्त व्यक्तित्व आत्मविश्वास में कमी, दब्बूपन, खीझ, मार-पीट, तोड़-फोड़ तथा विद्रोहात्मक रवैये को जन्म देता है। कभी-कभी बालक अपनी हीनभावनाएँ छुपाने के लिए तथा कुण्ठाओं के परिणामस्वरूप अनेक प्रकार के अपराधों में फँस जाते हैं। फ्रायड की अवधारणा के अनुसार, यदि बालक के चेतन मन में उपजे संवेगों की सन्तुष्टि नहीं की जाएगी और उन्हें दबाया जायेगा तो वे अचेतन मन में पहुँचकर मानसिक विकृतियों को जन्म देंगे। वास्तव में, बाल्यावस्था की दमित भावनाएँ समाप्त नहीं होतीं, ये अन्दर-ही-अन्दर सक्रिय रहती हैं तथा बहुधा भयंकर मानसिक अस्वस्थता में बदल जाती हैं। कठोर नियन्त्रण तथा प्रेम व सहानुभूति के अभाव में बालक में संवेगात्मक असुरक्षा के कारण व्यक्तित्व असन्तुलित हो जाता है। ऐसे व्यक्तित्व को समाज में सम्मान प्राप्त नहीं होता।

निष्कर्षतः बालक के स्वाभाविक संवेगों के अवदमन की जगह उनका परिमार्जन कर सही दिशा में प्रकाशन होना चाहिए। इसके लिए परिवार एवं विद्यालय सदृश समाज की प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण संस्थाएँ सुन्दर भूमिका निभा सकती हैं।

प्रश्न 7.
सहानुभूति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
‘सहानुभूति’ (Sympathy) शब्द दो शब्दों ‘सह + अनुभूति’ का सम्मिलित रूप है, जिसका अर्थ है–‘अन्य प्राणियों के समान ही अनुभूति करना। वुडवर्थ ने ‘सहानुभूति’ का अर्थ बताया है-दूसरे व्यक्ति के साथ अनुभव करना। सामान्यतः लोग गरीब, बीमार तथा अपंग व्यक्तियों के प्रति उन्हीं के समान अनुभूति करने लगते हैं। यह उनके प्रति सहानुभूति कही जाएगी। धनी, स्वस्थ तथा भले-चंगे व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति पैदा नहीं होती। शिकार-पक्षी के प्रति सहानुभूति उत्पन्न होती है शिकारी के प्रति नहीं। सहानुभूति को मनोवैज्ञानिक एक प्रकार का संवेग ही मानते हैं जिसका आधार भावात्मक है। मैक्डूगल ने इसे मिथ्या-प्रवृत्ति (Pseudo-Instinct) माना है।

सहानुभूति के प्रकार-सहानुभूति दो प्रकार की होती है –

(i) निष्क्रिय सहानुभूति – इसमें शाब्दिक सहानुभूति प्रदर्शित की जाती है; जैसे—मृत्यु पर शोक संवेदना प्रकट करना।

(ii) सक्रिय सहानुभूति – इसके अन्तर्गत हमारी सहानुभूति क्रियाशील होती है; जैसे दु:खी व्यक्ति का कष्ट कम करने के लिए प्रयत्नशील होना, भूकम्प पीड़ितों के लिए राहत कार्य में भाग लेना।

सहानुभूति की व्याख्या – सहानुभूति का जीवन में बड़ा महत्त्व है। सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार लोगों को एक-दूसरे के करीब लाता है। यह त्याग की भावना में वृद्धि करता है। वस्तुतः जीवन के किसी-न-किसी मोड़ पर हर एक व्यक्ति को सहानुभूति की आवश्यकता पड़ती है। सहानुभूति एवं जन-समर्थन पाकर लोग महानतम कष्ट सहन करते हैं। सहानुभूति प्रकट करने वाले व्यक्ति की सहानुभूति उसके पूर्व अनुभवों पर आधारित होती है अर्थात् सहानुभूति के अन्तर्गत व्यक्ति वही व्यवहार या प्रतिक्रिया प्रदर्शित करता है जो उसने समान परिस्थितियों में अन्य व्यक्तियों से प्राप्त की थी। सहानुभूति के लिए कल्पना की भी जरूरत पड़ती है, क्योंकि कल्पना के आधार पर ही दूसरे व्यक्ति के कष्टों का अनुमान किया जा सकता है। व्यवहार में सहानुभूति का प्रकटीकरण दूसरे व्यक्तियों का अनुकरण करके सीखा जाता है, किन्तु सहानुभूति मात्र अनुकरण ही नहीं है बल्कि इसके लिए। एक-दूसरे की अनुभूतियों में सहभागिता भी आवश्यक है। सहानुभूति के संवेग में पर्याप्त रूप से जन्मजात और अर्जित दोनों अंश विद्यमान होते हैं। सहानुभूति की भावना सर्वव्यापक है यानी सभी में पायी जाती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भाव या अनुभूति से क्या आशय है?
उत्तर :
भाव या अनुभूति (Feeling) का सम्बन्ध मानव-जीवन के भावात्मक पहलू से है। भाव प्राणी को सुख-दुःख की अनुभूति कराने वाली एक ऐसी प्रारम्भिक सरल मानसिक प्रक्रिया है जिसका विश्लेषण नहीं किया जा सकता। इच्छाओं की सन्तुष्टि से सुख का भाव तथा उसमें बाधा पड़ने पर दु:ख का भाव पैदा होता है। वस्तुतः मन के इच्छात्मक या चेष्टात्मक एवं ज्ञानात्मक, दोनों पहलुओं के माध्यम से भाव का अनुभव होता है। अधिकांश मनोवैज्ञानिकों ने दो प्रकार के भाव बताये हैं-सुखद तथा दु:खद। रॉयस ने इसके साथ एक तीसरा भाव उद्दीप्त एवं शान्त, भी जोड़ दिया है। वुण्ट ने भावों का त्रि-दिशात्मक सिद्धान्त प्रस्तुत किया है–सुखद-दु:खद, उद्दीप्त-शान्त तथा विक्षेप-विराम। तथ्य यह है कि सुखद और दुःखद, इन दोनों भावों के अलावा अन्य किसी प्रकार के भाव को प्रयोगात्मक परिणामों के आधार पर सत्य सिद्ध नहीं किया जा सका।

प्रश्न 2.
भाव या अनुभूति की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भाव या अनुभूति की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. भाव सरलतम तथा प्रारम्भिक प्रक्रिया है।
  2. इसका विश्लेषण सम्भव नहीं है।
  3. भाव चंचल तथा क्षणिक होता है। दु:ख के बाद सुख तथा सुख के बाद तत्काल ही दुःख की अनुभूति होने लगती है।
  4. मिश्रित भाव’ का अनुभव नहीं किया जा सकता है अर्थात् हम एक ही समय में एक से अधिक भावों का अनुभव नहीं कर सकते।
  5. भाव की प्रबलता कम या अधिक हो सकती है अर्थात् भाव की मात्रा एक समान नहीं होती।
  6. व्यक्ति की हर एक अनुभूति और व्यवहार के साथ किसी-न-किसी प्रकार का भाव मिला रहता है और अन्तिम रूप से,
  7. भाव को आत्मगत कहा जाता है, क्योंकि व्यक्ति भाव को सदैव अपने अन्दर महसूस करता है।

प्रश्न 3.
भाव तथा संवेग के अन्तर को अति संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
भाव (Feeling) तथा संवेग (Emotion) के अन्तर का अति संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 4 Emotional Bases of Behaviour 1
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 4 Emotional Bases of Behaviour 2
प्रश्न 4.
संवेग की अवस्था में होने वाले कोई चार महत्त्वपूर्ण शारीरिक परिवर्तन बताइए।
उत्तर :
संवेग की अवस्था में होने वाले मुख्य शारीरिक परिवर्तन हैं –

  1. मुखाकृति में परिवर्तन
  2. स्वर में परिवर्तन
  3. शारीरिक मुद्राओं में परिवर्तन तथा
  4. हृदय एवं श्वास गति में परिवर्तन।

प्रश्न 5.
संवेग के जेम्स-लॉज तथा कैनन बार्ड सिद्धान्त में अन्तर बताइए।
उत्तर :
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अन्तर्गत मानवीय संवेगों की उत्पत्ति के विषय में मुख्य रूप से दो सिद्धान्तों को मान्यता प्राप्त है। ये सिद्धान्त हैं-जेम्स-लॉज का सिद्धान्त तथा कैनन-बार्ड का सिद्धान्त। ये दोनों सिद्धान्त भिन्न तथा परस्पर विरोधी हैं। जेम्स-लाँज सिद्धान्त के अनुसार संवेगों की अनुभूति शारीरिक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप होती है। इस मान्यता के आधार पर कहा गया है कि यदि शारीरिक परिवर्तनों पर रोक लगा दी जाए तो संवेगों की अनुभूति भी नहीं होगी। इसके विपरीत या भिन्न रूप से कैनन-बार्ड सिद्धान्त के अनुसार संवेगों की अनुभूति बाहरी विषय-वस्तुओं के परिणामस्वरूप होती है तथा संवेग की। अनुभूति के बाद ही कुछ शारीरिक परिवर्तन तथा कुछ क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं। कैनन-बार्ड सिद्धान्त ने स्पष्ट किया है कि संवेगों की उत्पत्ति का केन्द्र मस्तिष्क में स्थित हाइपोथैलेमस नामक भाग होता है। यही कारण है कि इस सिद्धान्त को हाइपोथैलेमस सिद्धान्त के रूप में भी जाना जाता है।

प्रश्न 6.
गिलफोर्ड के अनुसार संवेगों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
गिलफोर्ड ने संवेगों का एक व्यवस्थित वर्गीकरण प्रस्तुत किया है। उसने समस्त मानवीय संवेगों को मुख्य रूप से तीन वर्गों में बाँटा है

(1) प्राथमिक संवेग – इस वर्ग में शक्तिशाली एवं प्रबल संवेगों को सम्मिलित किया गया है। ये संवेग उत्तेजना होने पर प्रकट होते हैं तथा तीव्र हलचल मचा देते हैं। इस वर्ग के मुख्य संवेग हैं-क्रोध तथा भय।।

(2) गौण संवेग – इस वर्ग में उन संवेगों को सम्मिलित किया जाता है जो प्राथमिक संवेगों के समान तीव्र नहीं होते। इन संवेगों की उत्पत्ति एकाएक न होकर धीमी गति से होती है; जैसे-भूख।

(3) कृत्रिम केन्द्रित संवेग – गिलफोर्ड ने इस वर्ग में पाँच प्रकार के संवेगों को सम्मिलित किया है, जिनका सामान्य परिचय निम्नलिखित है

  1. आत्मकेन्द्रित संवेग-व्यक्ति के आत्म एवं स्वार्थ से सम्बन्धित संवेग; जैसे-आत्मरक्षा का भाव।।
  2. बौद्धिक संवेग–बौद्धिक क्रियाओं से सम्बन्धित संवेग; जैसे—साहित्य सृजन में आनन्द लेना या स्वाध्याय द्वारा मानसिक शान्ति लाभ।
  3. सौन्दर्यात्मक संवेग-सौन्दर्यानुभूति से सम्बन्धित संवेग; जैसे—संगीत अथवा प्रकृति का आनन्द लेना।
  4. पदार्थात्मक संवेग–अन्य पदार्थों या लोगों के हित अथवा सम्पर्क से सम्बन्धित संवेग; जैसे–प्रेम, घृणा, दया तथा परोपकार।
  5. नैतिक संवेग-नैतिक व्यवहार तथा मान्यताओं से सम्बन्धित संवेग; जैसे—शुभ, अशुभ तथा सत्य।

प्रश्न 7.
मैक्डूगल के अनुसार संवेगों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
मैक्डूगल ने संवेग की अवधारणा को मूल प्रवृत्तियों के सन्दर्भ में स्पष्ट किया है। मैक्डूगल के अनुसार, प्रत्येक संवेग किसी-न-किसी मूल प्रवृत्ति से सम्बद्ध होता है। मैक्डूगल ने कुल 14 मूल-प्रवृत्तियों का उल्लेख किया है तथा इस आधार पर उसने 14 ही संवेगों का उल्लेख किया है। इन 14 संवेगों तथा सम्बद्ध मूल प्रवृत्तियों का विवरण इस प्रकार है

  1. भय संवेग-पलायन मूल प्रवृत्ति
  2. क्रोध संवेग-युयुत्सा मूल प्रवृत्ति
  3. घृणा संवेग-निवृत्ति मूल प्रवृत्ति
  4. वात्सल्य संवेग-पुत्र-कामनी मूल प्रवृत्ति
  5. करुणा संवेग-शरणागत मूल प्रवृत्ति
  6. कामुकता संवेग-काम मूल प्रवृत्ति
  7. आश्चर्य संवेग-जिज्ञासा मूल प्रवृत्ति
  8. आत्महीनता संवेग-दैन्य मूल प्रवृत्ति
  9. आत्माभिमान संवेग-आत्म-गौरव मूल प्रवृत्ति
  10. एकाकीपन संवेग-सामूहिकता मूल प्रवृत्ति
  11. भूख संवेग-भोजनान्वेषण
  12. स्वामित्व भाव संवेग-संग्रह प्रवृत्ति
  13. कृतिभाव संवेग-रचना प्रवृत्ति
  14. आमोद संवेग-हास मूल प्रवृत्ति।

प्रश्न 8.
भारतीय मनोवैज्ञानिक डॉ० जायसवाल के अनुसार संवेगों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
भारतीय मनोवैज्ञानिक डॉ० जायसवाल ने संवेगों को निम्नलिखित पाँच वर्गों में बाँटा है –

  1. जिज्ञासु संवेग – इस वर्ग में उन संवेगों को सम्मिलित किया गया है जिनको सम्बन्ध जिज्ञासा से है। ज्ञान-प्राप्ति की इच्छा या ज्ञानार्जन का प्रेम इसी वर्ग का संवेग है।
  2. स्वार्थी संवेग – इस वर्ग में व्यक्तिगत स्वार्थ से सम्बद्ध संवेगों को सम्मिलित किया गया है। इस वर्ग के मुख्य संवेग हैं-क्रोध, भय, आत्मसम्मान की भावना तथा आत्महीनता की भावना।
  3. सामाजिक संवेग – व्यक्ति के समाज से सम्बन्ध स्थापित कराने वाले संवेगों को सामाजिक संवेग कहा गया है। इस वर्ग के मुख्य संवेग हैं—प्रेम, सहानुभूति तथा सम्मान।
  4. नैतिक संवेग – इस वर्ग में नैतिकता से सम्बद्ध संवेगों को सम्मिलित किया गया है। इस वर्ग के मुख्य संवेग हैं-दया, करुणा, परोपकार तथा कर्तव्यपालन।
  5. सौदर्यात्मक संवेग – इस वर्ग में सौन्दर्य बोध से जुड़े हुए संवेगों को सम्मिलित किया गया है। इस वर्ग के मुख्य संवेग हैं-संगीत, कला या आकर्षक वस्तुओं से प्रेम।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. संवेग मूल रूप से जटिल, भावात्मक और ……………………. प्रक्रिया है।।
  2. प्रबल संवेगावस्था में व्यक्ति का मनोशारीरिक सन्तुलन ……………………. जाता है।
  3. प्रत्येक संवेग की उत्पत्ति के पीछे कोई-न-कोई ……………………. कारण निहित होता है।
  4. संवेगावस्था में अनिवार्य रूप से कुछ ……………………. परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं।
  5. प्रबल संवेगावस्था का व्यक्ति की चिन्तन क्षमता पर ……………………. प्रभाव पड़ता है।
  6. युद्धभूमि में राष्ट्र के लिए प्राण न्योछावर करने वाला देशभक्त सिपाही बुद्धि ……………………. से नहीं से प्रेरित होता है।
  7. संवेग जटिल तथा व्यापक होते हैं तथा भाव ……………………. होते हैं।
  8. सरल संवेगावस्था ……………………. में प्रकट होता है।
  9. जटिल संवेगावस्था में ……………………. संवेग मिश्रित रहते हैं।
  10. क्रोध तथा भय अपने आप में ……………………. संवेग हैं।
  11. प्रेम तथा घृणा अपने आप में ……………………. संवेग हैं।
  12. संवेगावस्था में प्रकट होने वाला मुख्य बाहरी शारीरिक परिवर्तन है ……………………. में परिवर्तन।
  13. प्रबल संवेगावस्था में हृदय की गति तथा रक्तचाप में ……………………. |
  14. उद्दीपक के प्रत्यक्षीकरण के पश्चात् पहले शारीरिक परिवर्तन होते हैं और इसके बाद संवेग की अनुभूति। यह ……………………. का मत है।
  15. ……………………. ने संवेग के हाइपोथैलेमस सिद्धान्त का प्रतिपादित किया।
  16. संवेग के विषय में कैनन-बार्ड द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त को ……………………. जाता है।
  17. संवेगों के अति अवदमन का व्यक्ति के व्यक्तित्व पर ……………………. प्रभाव पड़ता है।
  18. संवेगों के रेचन तथा मार्गान्तरीकरण द्वारा उन्हें ……………………. किया जा सकता है।

उत्तर :

  1. मानसिक
  2. बिगड़
  3. मनोवैज्ञानिक
  4. शारीरिक
  5. प्रतिकुल
  6. संवेग
  7. सरल तथा सीमित
  8. केवल एक ही संवेग
  9. दो या दो से अधिक
  10. सरल
  11. जटिल
  12. मखमण्डलीय अभिव्यक्ति
  13. अवश्य परिवर्तन होता है
  14. जेम्स-लॉज
  15. कैनन-बाडे
  16. हाइपोथैलेमिक सिलान्त
  17. प्रतिकूल
  18. नियन्त्रिता

प्रश्न II.
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
संवेग से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
संवेग एक जटिल, भावात्मक एवं मानसिक प्रक्रिया है। जब भाव का प्रकटीकरण बाहरी तथा आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों में हो जाता है, तब उसे संवेग कहते हैं।

प्रश्न 2.
संवेग की कोई एक सरल एवं स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
पी० टी० यंग के अनुसार, “संवेग सम्पूर्ण व्यक्ति का तीव्र उपद्रव है, जिसकी उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक कारणों से होती है तथा जिसके अन्तर्गत व्यवहार चेतन अनुभूति तथा जाठरिक क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं।”

प्रश्न 3.
संवेगों की चार मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(अ) संवेगों की उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक कारणों से होती है, (ब) संवेगों में कुछ बाहरी तथा आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन होते हैं, (स) संवेगों में विचार-शक्ति का लोप हो जाता है। तथा (द) प्रत्येक संवेग का सम्बन्ध किसी-न-किसी मूल प्रवृत्ति से होता है।

प्रश्न 4.
भाव तथा संवेगे में क्या-क्या समानताएँ हैं?
उत्तर
(अ) भाव तथा संवेग दोनों का सम्बन्ध, मस्तिष्क से होता है, (ब) अनेक संवेग साधारण रूप में भाव होते हैं तथा भाव भी तीव्र रूप में संवेग बन जाता है और (स) भाव तथा संवेग दोनों में ही सुख या दुःख पाया जाता है।

प्रश्न 5.
भाव तथा संवेग में पाये जाने वाले चार मुख्य अन्तर लिखिए।
उत्तर :
(अ) भाव की तुलना में संवेग अधिक जटिल होते हैं, (ब) भाव की तुलना में संवेग अधिक व्यापक होते हैं, (स) भाव की तुलना में संवेग अधिक उग्र होते हैं तथा (द) भाव की तुलना में संवेग की दशा में अधिक सक्रियता पायी जाती है।

प्रश्न 6.
क्रोध नामक संवेग के बाहरी शारीरिक लक्षण बताइए।
उत्तर :
क्रोध की दशा में व्यक्ति का चेहरा लाल हो जाता है, भौंहें चढ़ जाती हैं, होंठ कापने लगते हैं, मुट्ठियाँ कस जाती हैं, दाँत पीसने लगते हैं तथा व्यक्ति आघात करता एवं गरजता है।

प्रश्न 7.
भय नामक संवेग की उत्पत्ति के मुख्य कारण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
जब किन्हीं भयानक परिस्थितियों से घिरकर व्यक्ति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है तब भय नामक संवेग की उत्पत्ति होती है।

प्रश्न 8.
हर्ष नामक संवेग के बाहरी शारीरिक लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
हर्ष नामक संवेग के मुख्य बाहरी शारीरिक लक्षण हैं-चेहरा खिल उठना, चेहरे पर मुस्कान तथा हास्य भाव आना, आँखों में चमक आ जाना, प्रसन्नतावश ताली बजाना, उछलना, नाचना, कूदना, गाना गाने लगना आदि।

प्रश्न 9.
आश्चर्य नामक संवेग के मुख्य बाहरी शारीरिक लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
आश्चर्य नामक संवेग के मुख्य बाहरी लक्षण हैं-चौंक पड़ना, आँखें फैल जाना, होंठ खुले रह जाना, साँस रुक जाना, काँपना आदि।

प्रश्न 10.
संवेगावस्था में प्रकट होने वाले मुख्य बाहरी शारीरिक लक्षणों का उल्लेख कीजिए!
उत्तर :
(अ) मुखमण्डलीय अभिव्यक्तियों में परिवर्तन, (ब) स्वर में परिवर्तन तथा (स) शारीरिक मुद्राओं या आसनिक अभिव्यक्ति में परिवर्तन।

प्रश्न 11.
संवेगावस्था में होने वाले मुख्य आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए। या संवेग की अवस्था में होने वाले चार महत्त्वपूर्ण शारीरिक परिवर्तनों को बताइए।
उत्तर :
(अ) हृदय की गति में परिवर्तन, (ब) रक्तचाप में परिवर्तन, (स) रक्त रसायन में परिवर्तन, (द) रसपरिपाक में परिवर्तन, (य) साँस की गति में परिवर्तन, (र) वैद्युत त्वक्-अनुक्रिया में परिवर्तन तथा (ल) मस्तिष्क तरंगों में परिवर्तन।

प्रश्न 12.
संवेगों की व्याख्या करने वाले कैनन-बार्ड सिद्धान्त को किन नामों से भी जाना जाता है?
उत्तर :
कैनन-बार्ड सिद्धान्त को ‘हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त’ तथा ‘आकस्मिक सिद्धान्त के नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न 13.
संवेगों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति को रोकने या टालने की प्रक्रिया को मनोविज्ञान की भाषा में क्या कहते हैं?
उत्तर :
संवेगों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति को रोकने या टालने की प्रक्रिया को मनोविज्ञान की भाषा में ‘संवेगों को अवदमन’ कहते हैं।

प्रश्न 14.
संवेगों को नियन्त्रित करने के मुख्य उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(अ) अवांछनीय संवेगों के विपरीत परिस्थितियों का सृजन, (ब) संवेगों का रेचन, (स) संवेगों का शोधन तथा (द) संवेगों का मार्ग-परिवर्तन।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
व्यक्ति की उस दशा को क्या कहते हैं जिसमें व्यक्ति आवेश में आ जाता है, भड़क उठता है। अथवा उत्तेजित हो जाता है?
(क) भाव
(ख) प्रेरणा
(ग) मूल प्रवृत्ति
(घ) संवेग

प्रश्न 2.
“संवेग शब्द किसी भी प्रकार के आवेग में आने, भड़क उठने या उत्तेजित होने की दशा को सूचित करता है।” यह कथन किसका है?
(क) गिलफोर्ड
(ख) वुडवर्थ
(ग) आर्थर टी० जर्सील्ड
(घ) पी० टी० यंग

प्रश्न 3.
संवेगों की स्थिति में सर्वप्रथम परिवर्तित हो जाती है –
(क) व्यक्ति की बातचीत
(ख) व्यक्ति की शारीरिक गतिविधियाँ
(ग) चेहरे की अभिव्यक्तियाँ
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 4.
संवेगों की अवस्था में क्रियाशील हो जाता है-
(क) थैलेमस
(ख) हाइपोथैलेमस
(ग) सुषुम्ना
(घ) लघु मस्तिष्क

प्रश्न 5.
संवेगावस्था में निम्नलिखित में से कौन-सा गुण विद्यमान होता है?
(क) चंचलता
(ख) स्थायित्व
(ग) मानसिक साम्य
(घ) निष्क्रियता

प्रश्न 6.
संवेगावस्था में होने वाले मुख्य आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन हैं
(क) रक्तचाप तथा रक्त-रसायन में परिवर्तन
(ख) हृदय तथा श्वास की गति में परिवर्तन
(ग) रस-परिपाक में उल्लेखनीय परिवर्तन
(घ) ये सभी परिवर्तन

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से कौन-सा संवेग सरल संवेग है ?
(क) प्रेम
(ख) भय
(ग) घृणा
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 8.
जेम्स-लॉज सिद्धान्त का सम्बन्ध है
(क) संवेग से
(ख) अधिगम से
(ग) चिन्तन से
(घ) स्मृति से

प्रश्न 9.
शारीरिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप ही संवेग की अनुभूति होती है। यह मान्यता किस सिद्धान्त की है?
(क) कैनन-बार्ड सिद्धान्त
(ख) जेम्स-लॉज सिद्धान्त
(ग) लीपर द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 10.
संवेग सम्बन्धी हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं –
(क) जेम्स तथा लाँज :
(ख) कैनन तथा बार्ड
(ग) लेपियर
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 11.
कैनन-बार्ड सिद्धान्त का सम्बन्ध है –
(क) विस्मृति से
(ख) संवेग से
(ग) अभिप्रेरणा से
(घ) चिन्तन से

प्रश्न 12.
किस सिद्धान्त के अनुसार संवेगावस्था में शारीरिक परिवर्तन तथा संवेग की अनुमति साथ-साथ होती है?
(क) लीपर द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त
(ख) जेम्स-लाँज सिद्धान्त
(ग) कैनन-बार्ड सिद्धान्त
(घ) ये सभी सिद्धान्त

प्रश्न 13.
संवेगों के अवदमन से क्या आशय है?
(क) प्रायः शान्त बैठे रहना।
(ख) सदैव संवेगों की मुक्त अभिव्यक्ति
(ग) संवेग की स्वाभाविक अभिव्यक्ति पर रोक लग जाना
(घ) सदैव प्रसन्न रहना

प्रश्न 14.
संवेगों के अति अवदमन के परिणाम स्वरूप
(क) व्यक्ति मानसिक एवं स्नायविक रोगग्रस्त हो सकता है।
(ख) व्यक्तित्व का सुचारु विकास अवरुद्ध हो सकता है।
(ग) व्यक्ति कुण्ठाओं का शिकार हो सकता है।
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 15.
संवेगों को नियन्त्रित किया जा सकता है –
(क) संवेगों के विरोध द्वारा
(ख) संवेगों के रेचन द्वारा
(ग) संवेगों के मार्गान्तरीकरण एवं शोध द्वारा
(घ) इन सभी उपायों द्वारा

उत्तर :

  1. (घ) संवेग
  2. (ग) आर्थर टी० बसल्ड
  3. (ग) चेहरे की अभिव्यक्तियाँ
  4. (ख) हाइपोथैलेमस
  5. (क) चंचलता
  6. (घ) ये सी परिवर्तन
  7. (ख) भय
  8. (क) संवेग से
  9. (ख) जेम्स-लाँज सिद्धान्त
  10. (ख) कैनन तथा बार्ड
  11. (ख) संवेग से
  12. (ग) कैन-बार्ड सिद्धान्त
  13. (ग) संवेगों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति पर रोक लग जाना
  14. (घ) उपर्युक्त सभी
  15. (घ) इन सभी उपायों द्वारा।

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UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 6 Work Energy and power

UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 6 Work Energy and power (कार्य, ऊर्जा और शक्ति)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Physics. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 6 Work Energy and power (कार्य, ऊर्जा और शक्ति).

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर 

प्रश्न 1.
किसी वस्तु पर किसी बल द्वारा किए गए कार्य का चिह्न समझना महत्त्वपूर्ण है। सावधानीपूर्वक बताइए कि निम्नलिखित राशियाँ धनात्मक हैं या ऋणात्मक –

(a) किसी व्यक्ति द्वारा किसी कुएँ में से रस्सी से बँधी बाल्टी को रस्सी द्वारा बाहर निकालने में किया गया कार्य।
(b) उपर्युक्त स्थिति में गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य।
(c) किसी आनत तल पर फिसलती हुई किसी वस्तु पर घर्षण द्वारा किया गया कार्य।
(d) किसी खुरदरे क्षैतिज तल पर एकसमान वेग से गतिमान किसी वस्तु पर लगाए गए बल द्वारा किया गया कार्य।
(e) किसी दोलायमान लोलक को विरामावस्था में लाने के लिए वायु के प्रतिरोधी बल द्वारा किया गया कार्य।

उत्तर :

(a) चूँकि मनुष्य द्वारा लगाया गया बल तथा बाल्टी का विस्थापन दोनों ऊपर की ओर दिष्ट हैं; अत: कार्य धनात्मक होगा।
(b) चूँकि गुरुत्वीय बल नीचे की ओर दिष्ट है तथा बाल्टी का विस्थापन ऊपर की ओर है; अतः गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक होगा।
(c) चूँकि घर्षण बेल सदैव वस्तु के विस्थापन की (UPBoardSolutions.com) दिशा के विपरीत दिष्ट होता है; अत: घर्षण बल द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक होगा।
(d) वस्तु पर लगाया गया बल घर्षण के विपरीत अर्थात् वस्तु की गति की दिशा में है; अत: इस बल द्वारा कृत कार्य धनात्मक होगा।
(e) वायु का प्रतिरोधी बल सदैव गति के विपरीत दिष्ट होता है; अतः कार्य ऋणात्मक होगा।

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प्रश्न 2.
2kg द्रव्यमान की कोई वस्तु जो आरम्भ में विरामावस्था में है, 7N के किसी क्षैतिज बल के प्रभाव से एक मेज पर गति करती है। मेज का गतिज-घर्षण गुणांक 0:1 है। निम्नलिखित का परिकलन कीजिए और अपने परिणामों की व्याख्या कीजिए –

(a) लगाए गए बल द्वारा 10 s में किया गया कार्य।
(b) घर्षण द्वारा 10 s में किया गया कार्य।
(c) वस्तु पर कुल बल द्वारा 10 s में किया गया कार्य।
(d) वस्तु की गतिज ऊर्जा में 10 s में परिवर्तन।

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व्याख्या – गतिज ऊर्जा में कुल-परिवर्तन (625 J) बाह्य बल द्वारा किए गए कार्य (875 J) से कम है। इसका कारण यह है कि बाह्य बल के द्वारा किए गए कार्य का कुछ भाग घर्षण के प्रभाव को समाप्त करने में व्यय होता है।

प्रश्न 3.
चित्र – 6.1 में कुछ एकविमीय स्थितिज ऊर्जा-फलनों के उदाहरण दिए गए हैं। कण की कुल ऊर्जा कोटि-अक्ष पर क्रॉस द्वारा निर्देशित की गई है। प्रत्येक स्थिति में, कोई ऐसे क्षेत्र बंताइए, यदि कोई हैं तो जिनमें दी गई ऊर्जा के लिए, कण को नहीं पाया जा सकता। इसके अतिरिक्त, कण की कुल न्यूनतम ऊर्जा भी निर्देशित कीजिए। कुछ ऐसे भौतिक सन्दर्भो के विषय में सोचिए जिनके लिए ये स्थितिज ऊर्जा आकृतियाँ प्रासंगिक हों।
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उत्तर :
K.E. + P.E. = E (constant)
∴ K.E. = E – P.E.

(a) इस ग्राफ में x < a के लिए स्थितिज ऊर्जा वक्र, दूरी अक्ष के साथ (UPBoardSolutions.com) सम्पाती है (P.E. = O) जबकि x > a के लिए स्थितिज ऊर्जा कुल ऊर्जा से अधिक है; अतः गतिज ऊर्जा ऋणात्मक हो जाएगी जो कि असम्भव है।

अतः कण x > a क्षेत्र में नहीं पाया जा सकता।
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प्रश्न 4.
रेखीय सरल आवर्त गति कर रहे किसी कण का (d) स्थितिज ऊर्जा फलन v (x) = 1/2 kx2 / 2 है, जहाँ k दोलक का बल नियतांक है। k= 0.5 N m-1 के लिए v (x) व x के मध्य ग्राफ चित्र-6.2 में दिखाया गया है। यह दिखाइए कि इस विभव के अन्तर्गत गतिमान कुल 1J ऊर्जा वाले कण को अवश्य ही ‘वापस आना चाहिए जब यह x = ± 2 m पर पहुँचता है।
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प्रश्न 5.
निम्नलिखित का उत्तर दीजिए –

(a) किसी रॉकटे का बाह्य आवरण उड़ान के दौरान घर्षण के कारण जल जाता है। जलने के लिए आवश्यक ऊष्मीय ऊर्जा किसके व्यय पर प्राप्त की गई रॉकेट या वातावरण?

(b) धूमकेतु सूर्य के चारों ओर बहुत ही दीर्घवृत्तीय कक्षाओं में घूमते हैं। साधारणतया धूमकेतु पर सूर्य का गुरुत्वीय बल धूमकेतु के लम्बवत नहीं होता है। फिर भी धूमकेतु की सम्पूर्ण कक्षा में गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य शून्य होता है। क्यों?

(c) पृथ्वी के चारों ओर बहुत ही क्षीण वायुमण्डल में घूमते हुए किसी कृत्रिम उपग्रह की ऊर्जा धीरे-धीरे वायुमण्डलीय प्रतिरोध (चाहे यह कितना ही कम क्यों न हो) के विरुद्ध क्षय के कारण कम होती जाती है फिर भी जैसे-जैसे कृत्रिम उपग्रह पृथ्वी के (UPBoardSolutions.com) समीप आता है तो उसकी चाल में लगातार वृद्धि क्यों होती है?

(d) चित्र-6.3 (i) में एक व्यक्ति अपने हाथों में 15 kg का कोई द्रव्यमान लेकर 2 m चलता है। चित्र-6.3 (ii) में वह उतनी ही दूरी अपने पीछे रस्सी को खींचते हुए चलता है। रस्सी घिरनी पर चढ़ी हुई है और उसके दूसरे सिरे पर 15 kg का द्रव्यमान लटका हुआ है। परिकलन कीजिए कि किस स्थिति में किया गया कार्य अधिक है?
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उत्तर :

(a) बाह्य आवरण के जलने के लिए आवश्यक ऊष्मीय ऊर्जा रॉकेट की यान्त्रिक ऊर्जा (K.E. + P.E.) से प्राप्त की गई।

(b) धूमकेतु पर सूर्य द्वारा आरोपित गुरुत्वाकर्षण बल एक संरक्षी बल है। संरक्षी बल के द्वारा बन्द पथ में गति करने वाले पिण्ड पर किया गया नेट कार्य शून्य होता है; अत: धूमकेतु की सम्पूर्ण कक्षा में सूर्य ‘क गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा कृत कार्य शून्य होगा।

(c) जैसे-जैसे उपग्रह पृथ्वी के समीप आता है वैसे-वैसे उसकी गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा घटती है, ऊर्जा संरक्षण के अनुसार गतिज ऊर्जा बढ़ती जाती है; अत: उसकी चाल बढ़ती जाती है। कुल ऊर्जा का कुछ भाग घर्षण बल के विरुद्ध कार्य करने में खर्च हो जाती है।

(d) (i) इस दशा में व्यक्तिद्रव्यमान को उठाए रखने के लिए भार के विरुद्ध ऊपर की ओर बल लगाता है जबकि उसका विस्थापन क्षैतिज दिशा में है (θ = 90°)

∴ मनुष्य द्वारा कृत कार्य W = F d cos 90° = 0

(ii) इस दशा में पुली मनुष्य द्वारा लगाए गए क्षैतिज बल की दिशा को ऊर्ध्वाधर कर देती है तथा द्रव्यमान का विस्थापन भी ऊपर की ओर है (θ = 0° )

∴ मनुष्य द्वारा कृत कार्य W = m g h cos 0° = 15 kg × 10 m s-2 × 2 m = 300 J

अतः दशा (ii) में अधिक कार्य किया जाएगा।

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प्रश्न 6.
सही विकल्प को रेखांकित कीजिए –

(a) जब कोई संरक्षी बल किसी वस्तु पर धनात्मक कार्य करता है तो वस्तु की स्थितिज ऊर्जा बढ़ती है/घटती है/अपरिवर्ती रहती है।
(b) किसी वस्तु द्वारा घर्षण के विरुद्ध किए गए कार्यका परिणाम हमेशा इसकी गतिज/स्थितिज ऊर्जा में क्षय होता है।
(c) किसी बहुकण निकाय के कुल संवेग-परिवर्तन की दर निकाय के बाह्य बल/ आन्तरिक बलों के जोड़ के अनुक्रमानुपाती होती है।
(d) किन्हीं दो पिण्डों के अप्रत्यास्थ संघट्ट में वे राशियाँ, जो संघट्ट के बाद नहीं बदलती हैं; निकाय की कुल गतिज ऊर्जा/कुल रेखीय संवेग/कुल ऊर्जा हैं।

उत्तर :

(a) घटती है, क्योंकि संरक्षी बल के विरुद्ध किया गया कार्य (बाह्य बल द्वारा धनात्मक कार्य) ही स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित होता है।
(b) गतिज ऊर्जा, क्योंकि घर्षण के विरुद्ध कार्य तभी होता है जबकि गति हो रही हो।
(c) बाह्य बल, क्योंकि बहुकण निकाय में आन्तरिक बलों (UPBoardSolutions.com) का परिणामी शून्य होता है तथा आन्तरिक बल संवेग परिवर्तन के लिए उत्तरदायी नहीं होते।
(d) कुल रेखीय संवेग

प्रश्न 7.
बताइए कि निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य। अपने उत्तर के लिए कारण भी दीजिए –

(a) किन्हीं दो पिण्डों के प्रत्यास्थ संघट्ट में, प्रत्येक पिण्ड का संवेग व ऊर्जा संरक्षित रहती है।
(b) किसी पिण्ड पर चाहे कोई भी आन्तरिक व बाह्य बल क्यों न लग रहा हो, निकाय की कुल ऊर्जा सर्वदा संरक्षित रहती है।
(c) प्रकृति में प्रत्येक बल के लिए किसी बन्द लूप में, किसी पिण्ड की गति में किया गया कार्य शून्य होता है।
(d) किसी अप्रत्यास्थ संघट्ट में, किसी निकाय की अन्तिम गतिज ऊर्जा, आरम्भिक गतिज ऊर्जा से हमेशा कम होती है।

उत्तर :

(a) असत्य, पूर्ण निकाय का संवेग व गतिज ऊर्जा संरक्षित रहते हैं।
(b) सत्य, निकाय की कुल ऊर्जा सदैव संरक्षित रहती है।
(c) असत्य, केवल संरक्षी बलों के लिए, बन्द लूप में गति के दौरान पिण्ड पर किया गया कार्य शून्य होता है।
(d) सत्य, क्योंकि अप्रत्यास्थ संघट्ट में गतिज ऊर्जा की सदैव हानि होती है।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित का उत्तर ध्यानपूर्वक, कारण सहित दीजिए –

(a) किन्हीं दो बिलियर्ड-गेंदों के प्रत्यास्थ संघट्ट में, क्या गेंदों के संघट्ट की अल्पावधि में (जब वे सम्पर्क में होती हैं) कुल गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है?
(b) दो गेंदों के किसी प्रत्यास्थ संघट्ट की लघु अवधि में क्या कुल रेखीय संवेग संरक्षित रहता
(c) किसी अप्रत्यास्थ संघट्ट के लिए प्रश्न (a) व (b) के लिए आपके उत्तर क्या हैं?
(d) यदि दो बिलियर्ड-गेंदों की स्थितिज ऊर्जा केवल उनके केन्द्रों के मध्य, पृथक्करण-दूरी पर निर्भर करती है तो संघट्ट प्रत्यास्थ होगा या अप्रत्यास्थ? (ध्यान दीजिए कि यहाँ हम संघट्ट के दौरान बल के संगत स्थितिज ऊर्जा की बात कर रहे हैं, न कि गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा की)

उत्तर :

(a) नहीं, संघट्ट काल के दौरान गेंदें संपीडित हो जाती हैं; अत: गतिज ऊर्जा, गेंदों की स्थितिज ऊर्जा में बदल जाती है।
(b) हाँ, संवेग संरक्षित रहता है।
(c) उत्तर उपर्युक्त ही रहेंगे।
(d) चूंकि स्थितिज ऊर्जा केन्द्रों की पृथक्करण दूरी पर निर्भर (UPBoardSolutions.com) करती है, इसका यह अर्थ हुआ कि संघट्ट काल में पिण्डों के बीच लगने वाला संरक्षी बल है; अत: ऊर्जा संरक्षित रहेगी। इसलिए संघट्ट प्रत्यास्थ होगा।

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प्रश्न 9.
कोई पिण्ड जो विरामावस्था में है, अचर त्वरण से एकविमीय गति करता है। इसको किसी। समय पर दी गई शक्ति अनुक्रमानुपाती है –

  1. t1/2
  2. t
  3. t3/2
  4. t2

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प्रश्न 10.
एक,पिण्ड अचर शक्ति के स्रोत के प्रभाव में एक ही दिशा में गतिमान है। इसकाt समय में विस्थापन, अनुक्रमानुपाती है –

  1. t1/2
  2. t
  3. t3/2
  4. t2

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प्रश्न 11.
किसी पिण्ड पर नियत बल लगाकर उसे किसी निर्देशांक प्रणाली के अनुसार z – अक्ष के अनुदिश गति करने के लिए बाध्य किया गया है, जो इस प्रकार है –
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 6 Work Energy and power 10
जहाँ  [latex]\hat { i }[/latex] , [latex]\hat { j }[/latex] तथा [latex]\hat { k }[/latex] क्रमशः x , y एवं z – अक्षों के अनुदिश एकांक सदिश हैं। इस वस्तु को 2-अक्ष के अनुदिश 4 मी की दूरी तक गति कराने के लिए आरोपित बल द्वारा किया गया कार्य कितना होगा?
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प्रश्न 12.
किसी अन्तरिक्ष किरण प्रयोग में एक इलेक्ट्रॉन और एक प्रोटॉन का संसूचन होता है जिसमें पहले कण की गतिज ऊर्जा 10 kev है और दूसरे कण की गतिज ऊर्जा 100 kev है। इनमें कौन-सा तीव्रगामी है, इलेक्ट्रॉन या प्रोटॉन? इनकी चालों को अनुपात ज्ञात कीजिए।
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प्रश्न 13.
2 मिमी त्रिज्या की वर्षा की कोई बूंद 500 मी की ऊँचाई से पृथ्वी पर गिरती है। यह अपनी आरम्भिक ऊँचाई के आधे हिस्से तक (वायु के श्यान प्रतिरोध के कारण) घटते त्वरण के साथ गिरती है और अपनी अधिकतम (सीमान्त) चाल प्राप्त कर लेती है, और उसके बाद एकसमान चाल से गति करती है। वर्षा की बूंद पर उसकी यात्रा के पहले व दूसरे अर्द्ध भागों में गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य कितना होगा? यदि बूंद की चाल पृथ्वी तक पहुँचने पर 10 मी / से-1 हो तो सम्पूर्ण यात्रा में प्रतिरोधी बल द्वारा किया गया कार्य कितना होगा?
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प्रश्न 14.
किसी गैस-पात्र में कोई अणु200 m s-1 की चाल से अभिलम्ब के साथ 30° का कोण बनाता हुआ क्षैतिज दीवार से टकराकर पुनः उसी चाल से वापस लौट जाता है। क्या इस संघट्ट में संवेग संरक्षित है? यह संघट्ट प्रत्यास्थ है या अप्रत्यास्थ?
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प्रश्न 15.
किसी भवन के भूतल पर लगा कोई पम्प 30 m3 आयतन की पानी की टंकी को 15 मिनट में भर देता है। यदि टंकी पृथ्वी तल से 40 m ऊपर हो और पम्प की दक्षता 30% हो तो पम्प द्वारा कितनी विद्युत शक्ति का उपयोग किया गया?

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प्रश्न 16.
दो समरूपी बॉल-बियरिंग एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं और किसी घर्षणरहित मेज। पर विरामावस्था में हैं। इनके साथ समान द्रव्यमान का कोई दूसरा बॉल-बियरिंग, जो आरम्भ में y चाल से गतिमान है. सम्मुख संघट्ट करता है। यदि संघट्ट प्रत्यास्थ है तो संघट्ट के पश्चात् निम्नलिखित (चित्र-6.4) में से कौन-सा परिणाम सम्भव है?
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∴ केवल दशा (ii) में ही गतिज ऊर्जा संरक्षित रही है; अतः केवल यही परिणाम सम्भव है।

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प्रश्न 17.
किसी लोलक के गोलक A को, जो ऊधर से 30° का कोण बनाता है, छोड़े जाने पर मेज पर, विरामावस्था में रखे दूसरे गोलक B से टकराता है जैसा कि चित्र-6.5 में प्रदर्शित है। ज्ञात कीजिए कि संघट्ट के पश्चात् गोलक A कितना ऊँचा उठता है? गोलकों के आकारों की उपेक्षा कीजिए और मान लीजिए कि संघट्ट प्रत्यास्थ है।
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उत्तर :
दोनों गोलक समरूप हैं तथा संघट्ट प्रत्यास्थ है; अतः संघट्ट के दौरान लटका हुआ गोलक अपना सम्पूर्ण संवेग नीचे रखे गोलक को दे देता है और जरा भी ऊपर नहीं उठता।

प्रश्न 18.
किसी लोलक के गोलक को क्षैतिज अवस्था से छोड़ा गया है। यदि लोलक की लम्बाई 1.5 m है तो निम्नतम बिन्दु पर आने पर गोलक की चाल क्या होगी? यह दिया गया है कि इसकी प्रारम्भिक ऊर्जा का 5% अंश वायु प्रतिरोध के विरुद्ध क्षय हो जाता है।
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प्रश्न 19.
300 kg द्रव्यमान की कोई ट्रॉली, 25 kg रेत का बोरा लिए हुए किसी घर्षणरहित पथ पर 27 km h-1 की एकसमान चाल से गतिमान है। कुछ समय पश्चात बोरे में किसी छिद्र से रेत 0.05 kg s-1 की दर से निकलकर ट्रॉली के फर्श पर रिसने लगती है। रेत का बोरा खाली होने के पश्चात् ट्रॉली की चाल क्या होगी?
उत्तर :
ट्रॉली तथा रेत का बोरा एक ही निकाय के अंग हैं जिस पर कोई बाह्य बल नहीं लगा है (एकसमान वेग के कारण); अत: निकाय का रैखिक संवेग नियत रहेगा भले ही निकाय में किसी भी प्रकार का आन्तरिक परिवर्तन (रेत ट्रॉली में ही गिर रहा है, बाहर नहीं) (UPBoardSolutions.com) क्यों न हो जाए। अतः ट्रॉली की चाल 27 km h-1 ही बनी रहेगी।

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प्रश्न 20.
0.5 kg द्रव्यमान का एक कण = a x 3/2 वेग से सरल रेखीय मति करता है, जहाँ a = 5 m-1/2 s-1 है। x = 0 से x= 2m तक इसके विस्थापन में कुल बल द्वारा किया गया कार्य कितना होगा?
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प्रश्न 21.
किसी पवनचक्की के ब्लेड, क्षेत्रफल A के वृत्त जितना क्षेत्रफल प्रसर्प करते हैं।
(a) यदि हवा υ वेग से वृत्त के लम्बवत दिशा में बहती है तो t समय में इससे गुजरने वाली वायु का द्रव्यमाने क्या होगा?
(b) वायु की गतिज ऊर्जा क्या होगी?
(c) मान लीजिए कि पवनचक्की हवा की 25% ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपान्तरित कर देती है। यदि A = 30 मी2 और υ = 36 किमी/घण्टा-1 और वायु का घनत्व 1 : 2 किग्रा – मी-3  है। तो उत्पन्न विद्युत शक्ति का परिकलन कीजिए।
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प्रश्न 22.
कोई व्यक्ति वजन कम करने के लिए 10 किग्रा द्रव्यमान को 0.5 मी की ऊँचाई तक 1000 बार उठाता है। मान लीजिए कि प्रत्येक बार द्रव्यमान को नीचे लाने में खोई हुई ऊर्जा क्षयित हो जाती है।
(a) वह गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध कितना कार्य करता है?
(b) यदि वसा 3.8 × 107 J ऊर्जा प्रति किलोग्राम आपूर्ति करता हो जो कि 20% दक्षता की दर से यान्त्रिक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है तो वह कितनी वसा खर्च कर डालेगा
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प्रश्न 23.
कोई परिवार 8 kw विद्युत-शक्ति का उपभोग करता है।
(a) किसी क्षैतिज सतह पर सीधे आपतित होने वाली सौर ऊर्जा की औसत दर 200 w m-2 है। यदि इस ऊर्जा का 20% भाग लाभदायक विद्युत ऊर्जा में रूपान्तरित किया जा सकता है तो 8kw की विद्युत आपूर्ति के लिए कितने क्षेत्रफल की आवश्यकता होगी?
(b) इस क्षेत्रफल की तुलना किसी विशिष्ट भवन की छत के क्षेत्रफल से कीजिए।
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अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 24.
0.012 kg द्रव्यमान की कोई गोली 70 ms-1  की क्षैतिज चाल से चलते हुए 0.4 kg द्रव्यमान के लकड़ी के गुटके से टकराकर गुटके के सापेक्ष तुरन्त ही विरामावस्था में आ जाती है। गुटके को छत से पतली तारों द्वारा लटकाया गया है। परिकलन कीजिए कि गुटका किस ऊँचाई तक ऊपर उठता है? गुटके में पैदा हुई ऊष्मा की मात्रा का भी अनुमान लगाइए।
हल : गोली का द्रव्यमान, m= 0.012 किग्रा
गोली की प्रारम्भिक चाल µ = 70 मी से-1 तथा गुटके का द्रव्यमान M = 0.4 किग्रा
जब गोली गुटके से टकराकर गुटके के सापेक्ष विरामावस्था में (UPBoardSolutions.com) आ जाती है तो इसका अर्थ है कि गोली गुटके में घुसकर रुक जाती है तथा (गोली + गुटका) निकाय (माना) एक साथ υ वेग से गति करके (माना) h ऊँचाई ऊपर उठ जाता है।
संवेग संरक्षण के सिद्धान्त से,
mu + M × 0 = (M + m) υ
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प्रश्न 25.
दो घर्षणरहित आनत पथ, जिनमें से एक की ढाल अधिक है। और दूसरे की ढाल कम है, बिन्दु A पर मिलते हैं। बिन्दु A से प्रत्येक पथ पर एक-एक पत्थर को विरामावस्था से नीचे सरकाया जाता है (चित्र-6.7) क्या ये पत्थर एक ही समय 40 पर नीचे पहुँचेंगे? क्या वे वहाँ एक ही चाल से पहुँचेंगे? व्याख्या कीजिए। यदि θ1 = 30°, θ2, = 60° और h= 10 m दिया है तो दोनों पत्थरों की चाल एवं उनके द्वारा नीचे पहुँचने में लिए गए समय क्या हैं?
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प्रश्न 26.
किसी रूक्ष आनत तल पर रखा हुआ 1 kg द्रव्यमान का गुटका किसी 100 N m-1 स्प्रिंग नियतांक वाले स्प्रिंग से दिए गए चित्र 6.8 के अनुसार जुड़ा है। गुटके को सिंप्रग की बिना खिंची। स्थिति में, विरामावस्था से छोड़ा जाता है। गुटका विरामावस्था में आने से पहले आनत तल पर 10 cm नीचे खिसक जाता है। गुटके और आनत तल चित्र 6.8 के मध्य घर्षण गुणांक ज्ञात कीजिए। मान लीजिए कि स्प्रिंग का द्रव्यमान उप्रेक्षणीय है और घिरनी घर्षणरहित है।
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हल : यहाँ दिये गये गुटके पर कार्य करने वाले विभिन्न बल चित्र 6.9 में (UPBoardSolutions.com) प्रदर्शित किये गये हैं। नत समतल के लम्बवत् पिण्ड की साम्यावस्था के लिए तल की गुटके पर अभिलम्ब प्रतिक्रिया
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प्रश्न 27.
0.3 kg द्रव्यमान का कोई बोल्ट 7 m s-1 की एकसमान चाल से नीचे आ रही किसी लिफ्ट की छत से गिरता है। यह लिफ्ट के फर्श से टकराता है (लिफ्ट की लम्बाई = 3m) और वापस नहीं लौटता है। टक्कर द्वारा कितनी ऊष्मा उत्पन्न हुई? यदि लिफ्ट स्थिर होती तो क्या आपको उत्तर इससे भिन्न होता?
हल : जड़त्व के कारण बोल्ट की प्रारम्भिक चाल, लिफ्ट की चाल के बराबर है। अत: लिफ्ट के सापेक्ष बोल्ट की प्रारम्भिक चाल शून्य है। जब बोल्ट नीचे गिरता है, इसकी स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में बदलती है, जो अन्त में ऊष्मा में बदल जाती है।

∴ उत्पन्न ऊष्मा = mgh = 3 × 9.8 × 3 जूल = 8.82 जूल।

यदि लिफ्ट स्थिर होती तो भी बोल्ट की लिफ्ट के सापेक्ष चाल शून्य (UPBoardSolutions.com) होती; इसलिए उत्तर अब भी वही रहेगा अर्थात् अब भी इस दशा में उत्पन्न ऊष्मा = 8.82 जूल।

प्रश्न 28.
200 kg द्रव्यमान की कोई ट्रॉली किसी घर्षणरहित पथ पर 36 km h-1 की एकसमान चल से गतिमान है। 20 kg द्रव्यमान का कोई बच्चा ट्रॉली के एक सिरे से दूसरे सिरे तक (10 m दूर) ट्रॉली के सापेक्ष 4 m s-1 की चाल से ट्रॉली की गति की विपरीत दिशा में दौड़ता है। और ट्रॉली से बाहर कूद जाता है। ट्रॉली की अन्तिम चाल क्या है? बच्चे के दौड़ना आरम्भ करने के समय से ट्रॉली ने कितनी दूरी तय की ?
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प्रश्न 29.
चित्र-6.10 में दिए गए स्थितिज ऊर्जा वक़ों में से कौन-सा वक्र सम्भवतः दो बिलियर्ड-गेंदों के प्रत्यास्थ संघट्ट का वर्णन नहीं करेगा? यहाँr गेंदों के केन्द्रों के मध्य की दूरी है और प्रत्येक गेंद का अर्धव्यास R है।
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उत्तर :
जब गेंदें संघट्ट करेंगी और एक-दूसरे को संपीडित करेंगी तो उनके केन्द्रों के बीच की दूरी r, 2R से घटती जाएगी और इनकी स्थितिज ऊर्जा बढ़ती जाएगी।

प्रत्यानयन काल में गेंदें अपने आकार को वापस पाने की क्रिया में एक-दूसरे से दूर हटेंगी तो उनकी स्थितिज ऊर्जा घटेगी और प्रारम्भिक आकार पूर्णतः प्राप्त कर लेने पर (r = 2R) स्थितिज ऊर्जा शून्य हो जाएगी।

केवल ग्राफ (V) की ही उपर्युक्त व्याख्या हो सकती है; अतः अन्य ग्राफों में से कोई भी बिलियर्ड गेंदों के प्रत्यास्थ संघट्ट को प्रदर्शित नहीं करता है।

प्रश्न 30.
विरामावस्था में किसी मुक्त न्यूट्रॉन के क्षय पर विचार कीजिए n → p + e

प्रदर्शित कीजिए कि इस प्रकार के द्विपिण्ड क्षय से नियत ऊर्जा (UPBoardSolutions.com) का कोई इलेक्ट्रॉन अवश्य उत्सर्जित होना चाहिए, और इसलिए यह किसी न्यूट्रॉन या किसी नाभिक के β – क्ष्य में प्रेक्षित सतत ऊर्जा वितरण का स्पष्टीकरण नहीं दे सकता। (चित्र-6.11)

[नोट – इस अभ्यास का हल उन कई तर्कों में से एक है जिसे डब्ल्यु पॉली द्वारा β – क्षय के क्षय उत्पादों में किसी तीसरे कण के अस्तित्व का पूर्वानुमान करने के लिए दिया गया था। यह कण न्यूट्रिनो के नाम से जाना जाता है। अब हम जानते हैं कि यह निजी प्रचक्रण 1/2 (जैसे e, p या n) का कोई कण है। लेकिन यह उदासीन है या द्रव्यमानरहित या इसका द्रव्यमान (इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान की तुलना में) अत्यधिक कम है और जो द्रव्य के साथ दुर्बलता से परस्पर क्रिया करता है। न्यूट्रॉन की उचित क्षय – प्रक्रिया इस प्रकार है : n → p + e + v]
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उत्तर :
चूँकि न्यूट्रॉन विरामावस्था में है; अत: उक्त अभिक्रिया के अनुसार न्यूट्रॉन क्षय में एक नियत ऊर्जा मुक्त होनी चाहिए और β – कण को उस नियत ऊर्जा के साथ नाभिक से उत्सर्जित होना चाहिए। इस प्रकार नाभिक से उत्सर्जित β – कण की ऊर्जा नियत होनी चाहिए, जबकि दिया गया ग्राफ यह प्रदर्शित करता है कि उत्सर्जित β – कण शून्य से लेकर एक महत्तम मान के बीच कोई भी ऊर्जा लेकर बाहर आ सकता है; अतः न्यूट्रॉन क्षय की उक्त अभिक्रिया ग्राफ द्वारा प्रदर्शित हु-कणों के सतत ऊर्जा वितरण की व्याख्या नहीं कर सकता।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कार्य ऊर्जा प्रमेय है।
(i) न्यूटन के गति के प्रथम नियम का समाकल रूप
(ii) न्यूटन के द्वितीय नियम का समाकल रूप
(iii) न्यूटन के तृतीय नियम का समाकल रूप
(iv) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर :
(i) न्यूटन के गति के प्रथम नियम का समाकल रूप

प्रश्न 2.
कार्य का S.I. मात्रक है।
(i) जूल
(ii) अर्ग
(iii) किग्रा-भार x मीटर
(iv) किलोवाट
उत्तर :
(i) जूल

प्रश्न 3.
यदि किसी पिण्ड का संवेग दोगुना कर दिया जाए, तो उसकी गतिज ऊर्जा हो जायेगी
(i) दोगुनी
(ii) आधी
(iii) चार गुनी
(iv) चौथाई
उतर :
(ii) चार गुनी

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प्रश्न 4.
किसी पिण्ड का द्रव्यमान दोगुना तथा वेग आधा करने पर उसकी गतिज ऊर्जा हो जायेगी
(i) आधी
(ii) दोगुनी
(iii) अपरिवर्तित
(iv) चौथाई
उत्तर :
(i) आधी

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन गतिज ऊर्जा का उदाहरण है।
(i) पृथ्वी-तल से 2 मीटर ऊँचाई पर उठा हुआ 5 किग्रा-भार का एक पिण्ड
(ii) चाबी भरी हुई घड़ी का स्प्रिंग
(iii) भूमि पर लुढ़कती क्रिकेट की गेंद
(iv) बन्द बेलन में पिस्टन द्वारा सम्पीडित गैस
उत्तर :
(iii) भूमि पर लुढ़कती क्रिकेट की गेंद

प्रश्न 6.
संरक्षी बल [latex]\overrightarrow { (F) } [/latex] तथा स्थितिज ऊर्जा (U) में सम्बन्ध होता है।
(i) [latex]\overrightarrow { F } [/latex] = ∆U
(ii) U = ∆ . [latex]\overrightarrow { F } [/latex]
(iii) [latex]\overrightarrow { F } [/latex] = ∆U
(iv) U = – ∆ . [latex]\overrightarrow { F } [/latex]
उत्तर :
(iii) [latex]\overrightarrow { F } [/latex] = ∆U

प्रश्न 7.
ऊर्जा संरक्षण के नियम का अभिप्राय है।
(i) कुल यान्त्रिक ऊर्जा संरक्षित रहती है।
(ii) कुल गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है।
(iii) कुल स्थितिज ऊर्जा संरक्षित रहती है।
(iv) सभी प्रकार की ऊर्जाओं का योग संरक्षित रहता है।
उत्तर :
(iv) सभी प्रकार की ऊर्जाओं का योग संरक्षित रहता है।

प्रश्न 8.
शक्तिका S.I. मात्रक है।
(i) जूल
(ii) अश्वशक्ति
(iii) वाट
(iv) किलोवाट
उत्तर :
(iii) वाट

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प्रश्न 9.
किलोवाट-घण्टा मात्रक है।
(i) शक्ति का
(ii) ऊर्जा का
(iii) दोनों का
(iv) किसी का भी नहीं
उत्तर :
(ii) ऊर्जा का

प्रश्न 10.
एक किलोवाट बराबर होता है।
(i) 1.34 अश्व-सामर्थ्य
(ii) 10 अश्व-सामर्थ्य
(iii) 746 अश्व-सामर्थ्य
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(i) 1.34 अश्व-सामर्थ्य

प्रश्न 11.
कार्य एवं सामर्थ्य में सम्बन्ध होता है।
(i) कार्य = सामर्थ्य x समय
(ii) कार्य = सामर्थ्य + समय
(iii) कार्य = समय/सामर्थ्य
(iv) कार्य = सामर्थ्य/समय
उत्तर :
(i) कार्य = सामर्थ्य x समय

प्रश्न 12.
एक मशीन 200 जूल कार्य 8 सेकण्ड में करती है। मशीन की सामर्थ्य होगी
(i) 25 वाट
(ii) 25 जूल
(iii) 1600 जूले-सेकण्ड
(iv) 25 जूल-सेकण्ड
उत्तर :
(i) 25 वाट

प्रश्न 13.
दो पिण्डों की प्रत्यास्थ टक्कर में
(i) निकाय की केवल गंतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है।
(ii) निकाय का केवल संवेग संरक्षित रहता है।
(iii) निकाय की गतिज ऊर्जा व संवेग दोनों संरक्षित रहते हैं।
(iv) निकाय की न तो गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है और न ही संवेग
उत्तर :
(iii) निकाय की गतिज ऊर्जा व संवेग दोनों संरक्षित रहते हैं।

प्रश्न 14.
पूर्णतः अप्रत्यास्थ संघट्ट में होते हैं।
(i) संवेग एवं गतिज ऊर्जा दोनों संरक्षित
(ii) संवेग एवं गतिज ऊर्जा दोनों असंरक्षित
(iii) संवेग संरक्षित एवं गतिज ऊर्जा असंरक्षित
(iv) संवेग असंरक्षित एवं गतिज ऊर्जा संरक्षित
उत्तर :
(iii) संवेग संरक्षित एवं गतिज ऊर्जा असंरक्षित

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1 जूल से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
यदि किसी वस्तु पर 1 न्यूटन का बल कार्य करता है और वस्तु को अपनी ही दिशा में 1 मीटर विस्थापित कर देता है तो बल द्वारा किया गया कार्य 1 जूल कहलाता है।
1 जूल = 1 न्यूटन × 1 मीटर अर्थात्
= 1 न्यूटन मीटर

प्रश्न 2.
एक क्षैतिज प्लेटफॉर्म पर अपने सिर पर बॉक्स रखकर कुली घूम रहा है। क्या वह गुरुत्व बल के विरुद्ध कोई कार्य कर रहा है? वह किस बल के विरुद्ध कार्य कर रहा है?
उत्तर :
उसकी गति क्षैतिज है और गुरुत्व बल ऊर्ध्वाधर नीचे की ओर होता है, (UPBoardSolutions.com) अत: वह कोई कार्य नहीं कर रहा है। परन्तु चलते समय वह घर्षण बल के विरुद्ध कार्य कर रहा है।

प्रश्न 3.
5.0 ग्राम द्रव्यमान की एक गेंद 1.0 किमी की ऊँचाई से गिर रही है। यह 50.0 मी/से के वेग से पृथ्वी से टकराती है। किये गये कार्य की गणना कीजिए। (g = 10 मी/से2)
हल : गुरुत्वीय बल f = mg = 5.0 × 10 = 50 न्यूटन
∴ कृत कार्य, W = बल × विस्थापन = 50 × 1000= 50,000 जूल

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प्रश्न 4.
एक हल्की और एक भारी वस्तु के संवेग समान हैं तो किसकी गतिज ऊर्जा अधिक होगी?
उत्तर :
हल्की वस्तु की। (∵ K = p2/2m)

प्रश्न 5.
स्थितिज ऊर्जा किन कारणों से उत्पन्न होती है?
उत्तर :
वस्तु की विकृत अवस्था एवं स्थिति के कारण।

प्रश्न 6.
स्थितिज ऊर्जा का मान धनात्मक तथा ऋणात्मक दोनों ही हो सकते हैं। व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
ऊर्जा संरक्षण नियम से, कुल ऊर्जा E = K + U = नियतांक। अब क्योंकि गतिज ऊर्जा K = 1/2 mυ2, सदैव धनात्मक है, अत: U का मान धनात्मक या ऋणात्मक दोनों ही सम्भव हैं।

प्रश्न 7.
द्रव्यमान-ऊर्जा सम्बन्ध लिखिए। यह किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर :
E = mc2 (आइन्स्टीन की द्रव्यमान-ऊर्जा सम्बन्ध)।

प्रश्न 8.
किलोवाट-घण्टा तथा जूल में सम्बन्ध लिखिए।
उत्तर :
1 किलोवाट-घण्टा =3.6 × 106 जूल।

प्रश्न 9.
72 किमी प्रति घण्टाकी चाल से क्षैतिज सड़क पर चलने वाली कोई कार 180 न्यूटन बल का सामना कर रही है। उसके इंजन की शक्ति ज्ञात कीजिए।
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प्रश्न 10.
अप्रत्यास्थ संघट्ट में ऊर्जा-हानि का क्या होता है?
उत्तर :
टकराने वाले पिण्डों की आन्तरिक उत्तेजन ऊर्जा ऊष्मीय तथा ध्वनि ऊर्जा में बदल जाती है।

प्रश्न 11.
प्रत्यास्थ टक्कर में ऊर्जा का आदान-प्रदान अधिकतम कब होता है?
उत्तर :
जब टकराने वाली वस्तुओं के द्रव्यमान बराबर होते हैं।

प्रश्न 12.
दर्शाइए कि समान द्रव्यमान की दो गतिशील वस्तुओं के प्रत्यास्थ संघटन के बाद उनके वेग आपस में बदल जाते हैं।
उत्तर :
माना संघट्टन के बाद उनके वेग क्रमशः υ1 तथा υ2 हैं (UPBoardSolutions.com) तो संवेग संरक्षण के नियम से,
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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कार्य क्या है? इसका S.I. मात्रक तथा विमीय सूत्र लिखिए।
उत्तर :
कार्य – बल लगाकर किसी वस्तु को बल की दिशा में विस्थापित करने की क्रिया को कार्य कहते
कार्य = बल × बल की दिशा में वस्तु का विस्थापन
W = F. s. कार्य एक अदिश राशि हैं।
कार्य का S.I. पद्धति में मात्रक जूल तथा विमा [ML2-T-2] है।

प्रश्न 2.
एक पिण्ड पर बल लगाकर उसे विस्थापित किया जाता है, बताइए

  1. पिण्ड पर किस दिशा में बल लगाने पर अधिकतम कार्य होगा?
  2. पिण्ड पर किस दिशा में बल लगाने पर कार्य शून्य होगा?

या
अधिकतम एवं न्यूनतम कार्य के लिए बल तथा विस्थापन के बीच कितना कोण होना चाहिए?
उत्तर :
पिण्ड पर किए गए कार्य का सूत्र w = F × s cos θ से,

(i) यदि 8 = 0° तो cos θ = 1 जो कि Cose का अधिकतम मान है। Wmax= F × s

अतः जब पिण्ड का विस्थापन लगाए गए बल की दिशा में होता है, अर्थात् θ = 0° तो किया गया कार्य अधिकतम होगा।

(ii) यदि θ = 90° तो cos 90° = 0 जो कि cos θ का न्यूनतम मान है। Wmin (न्यूनतम) = 0

अतः जब पिण्ड का विस्थापन लगाए गए बल के लम्बवत् होता है, अर्थात् θ = 90° तो किया गया कार्य शून्य (न्यूनतम) होगा।

प्रश्न 3.
गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा किसे कहते हैं? किसी पिण्ड की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा का व्यजंक प्राप्त कीजिए।
उत्तर :
किसी वस्तु की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा उस कार्य के बराबर है जो (UPBoardSolutions.com) गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध वस्तु को पृथ्वी के तल से उच्च स्थिति में रखने में किया जाता है।

किसी पिण्ड की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा के लिए व्यंजक – माना m द्रव्यमान का एक पिण्ड पृथ्वी तल से उठाकर h ऊँचाई पर रखा जाता है।

तब पिण्ड की स्थितिज ऊर्जा = पिण्ड को गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध h ऊँचाई तक रखने में कृत कार्य = बाह्य बल (F) × दूरी (h)
परन्तु बाह्य बल = पिण्ड का भार = mg

∴ स्थितिज ऊर्जा = भार × ऊँचाई = (mg) × h = mgh

स्थितिज ऊर्जा (mgh) गुरुत्वीय के विरुद्ध कार्य करने के कारण है, इसलिए इसे गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा कहते हैं।

प्रश्न 4.
द्रव्यमान-ऊर्जा समलुल्यता का अर्थ स्पष्ट कीजिए। आइन्स्टाइन का द्रव्यमान-ऊर्जा सम्बन्ध लिखिए।
उत्तर :
द्रव्यमान-ऊर्जा समतुल्यता – सन् 1905 में अल्बर्ट आइंस्टाइन ने प्रदर्शित किया कि द्रव्यमान तथा ऊर्जा एक-दूसरे के तुल्य हैं। द्रव्य को ऊर्जा एवं ऊर्जा को द्रव्य में परिवर्तित किया जा सकता है। उन्होंने द्रव्य को ऊर्जा में बदलने के लिए एक सरल समीकरण का प्रतिपादन किया जिसे द्रव्यमान-ऊर्जा समतुल्यता कहते हैं।
द्रव्यमान-ऊर्जा सम्बन्ध E = mc2
(जहाँ m = द्रव्यमान तथा c = प्रकाश की निर्वात् में चाल 3 × 108 मी/से) इसे ही द्रव्यमान-ऊर्जा सम्बन्ध कहते हैं।
1 किग्रा द्रव्यमान के तुल्य ऊर्जा E = 1 × (3 × 108) जूल = 9 × 1016 जूल

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प्रश्न 5.
ऊर्जा संरक्षण का सिद्धान्त उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर :
ऊर्जा संरक्षण का सिद्धान्त – ऊर्जा संरक्षण सिद्धान्त के अनुसार, “ऊर्जा न तो नष्ट की जा सकती है और न ही इसे उत्पन्न किया जा सकता है इसका एक रूप से दूसरे रूप में रूपान्तरण ही सम्भव है। दूसरे शब्दों में, जब ऊर्जा का एक रूप विलुप्त होता है तो वही ऊर्जा इतने ही परिमाण में किसी और रूप में प्रकट हो जाती है।

यह व्यापक सिद्धान्त संरक्षी एवं असंरक्षी दोनों प्रकार के बलों के लिए समान उपयोगी है।

उदाहरण – बाँधों में संचित जल की स्थितिज ऊर्जा, टरबाइन की गतिज ऊर्जा में बदलती है जो अन्ततः जेनरेटर द्वारा विद्युत ऊर्जा में बदल दी जाती है।

प्रश्न 6.
प्रत्यास्थ तथा अप्रत्यास्थ संघट्ट से आप क्या समझते हैं?
या
प्रत्यास्थ संघट्ट की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :

  1. प्रत्यास्थ संघट्ट – यदि संघट्ट के दौरान निकाय की कुले गतिज ऊर्जा एवं संवेग नियत रहते हैं, तो संघट्ट प्रत्यास्थ संघट्ट कहलाता है। अपरमाणविक कणों (sub atomic particles) में संघट्ट प्रायः प्रत्यास्थ होता है। ऐसे संघट्टों में यांत्रिक ऊर्जा की हानि नहीं होती। दो स्टील की गेंदों का संघट्ट लगभग प्रत्यास्थ होता है।
  2. अप्रत्यास्थ संघट्ट – यदि संघट्ट के दौरान निकाय की कुल गतिज ऊर्जा (UPBoardSolutions.com) नियत न रहे, तो संघट्ट अप्रत्यास्थ कहलाता है। दैनिक जीवन में होने वाले संघट्ट सामान्यत: अप्रत्यास्थ ही होते हैं। बन्दूक की गोली का लक्ष्य से संघट्ट अप्रत्यास्थ है। यदि दो वस्तुएँ संघट्ट के पश्चात् परस्पर चिपक जाती हैं, तो संघट्ट पूर्णत: अप्रत्यास्थ कहलाता है। दीवार के साथ कीचड़ का संघट्ट पूर्णतः अप्रत्यास्थ है।

प्रश्न 7.
10 किग्रा के द्रव्यमान की, जिसका वेग 5 मीटर/सेकण्ड है, एक अन्य 10 किग्रा के द्रव्यमान से, जो विरामावस्था में है, सम्मुख प्रत्यास्थ टक्कर होती है। टक्कर के बाद दोनों द्रव्यमानों के वेग ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 6 Work Energy and power 40

चूँकि टक्कर पूर्ण प्रत्यास्थ है तथा दोनों द्रव्यमान बराबर हैं, अतः टक्कर के पश्चात् दूसरा द्रव्यमान 5 मी/से के वेग से गति करेगा तथा पहला विरामावस्था में आ जायेगा। अतः टक्कर के बाद υ1 = 0 तथा υ2 =5 मी/से।

प्रश्न 8.
4.0 मी/से वेग से गतिमान एक 10 किग्रा द्रव्यमान की वस्तु एक घर्षणहीन मेज से जुड़े हुए स्प्रिंग से टकराती है और स्थिर हो जाती है। यदि स्प्रिंग का बल नियतांक 4 × 105 न्यूटन/मी हो तो स्प्रिंग की लम्बाई में कितना परिवर्तन होगा?
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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कार्य-ऊर्जा प्रमेयः बताइए तथा उसको सिद्ध कीजिए। इस प्रमेय की उपयोगिता समझाइए।
या
कार्य-ऊर्जा प्रमेय का कथन लिखिए।
या
कार्य-ऊर्जा प्रमेय का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
कार्य-ऊर्जा प्रमेय –“जब किसी बाह्य बल द्वारा किसी वस्तु पर कुछ कार्य किया जाता है तो वस्तु की गतिज ऊर्जा में इस कार्य के बराबर वृद्धि हो जाती है। इसके विपरीत यदि कोई वस्तु किसी अवरोधी बल के विरुद्ध कुछ कार्य करती है.तो उसकी गतिज ऊर्जा में इस कार्य के बराबर कमी हो जाती है।”

अतः कार्य-ऊर्जा प्रमेय के अनुसार, “कार्य तथा गतिज ऊर्जा एक-दूसरे (UPBoardSolutions.com) के समतुल्य हैं तथा गतिज ऊर्जा में परिवर्तन किये गये कार्य के बराबर होता है।”

उपपत्ति Proof – स्थिति 1 : जब वस्तु पर अचर (constant) बल लगा हो – माना एक अचर या नियत बल [latex]\xrightarrow { F } [/latex] , m द्रव्यमान की वस्तु पर कार्य करता है। यदि इस बल के कारण, बल की दिशा में, विस्थापन [latex]\xrightarrow { S } [/latex] हो तो किया गया कार्य

W = [latex]\xrightarrow { F } [/latex] . [latex]\xrightarrow { S } [/latex] = Fs

यदि बल द्वारा वस्तु में त्वरण a उत्पन्न होता है, तो F = ma (न्यूटन के गति विषयक द्वितीय नियम से)
∴ w = (ma) s = m (as) ……(1)
वस्तु के प्रारम्भिक और अन्तिम वेगों के परिमाण क्रमशः µ तथा υ हैं तब गति की तृतीय समीकरण υ2 = u2 +2as से,
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अत: किसी नियत बल द्वारा किसी वस्तु पर किया गया कार्य उसकी गतिज ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर होता है। (यही कार्य-ऊर्जा प्रमेय का कथन है।)
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स्थिति 2 : जब वस्तु पर परिवर्ती (variable) बल लगा हो – माना m द्रव्यमान का एक कण बिन्दु A से B तक। एक वक्र के अनुदिश (चित्र 6.12) एक परिवर्ती बल के आधीन गति करता है। अब यदि कण के बिन्दु A से B तक की यात्रा के मध्य कृत कार्य की गणना करनी हो तो ऐसी दशा में बिन्दु A व B के बीच के पथ को ∆x लम्बाई के छोटे-छोटे खण्डों में इस प्रकार विभाजित किया जाना चाहिए कि इन खण्डों में बल F लगभग नियत रहे। (UPBoardSolutions.com) यदि प्रथम अन्तराल के मध्य औसत बल F1 हो तथा यह लघुखण्ड ∆X1, से θ1, कोण बनाता हो। इसी प्रकार द्वितीय लघु खण्ड ∆x2 पर लग रहा औसत बल F2 हो और यह खण्ड ∆X2 से θ2 कोण बनाता हो तब,
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अत: यह स्पष्ट है कि परिवर्ती बल द्वारा किया गया कार्य वस्तु की गतिज ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर होता है (यही कार्य ऊर्जा-प्रमेय का कथन है)। इस प्रकार कार्य-ऊर्जा प्रमेय, चाहे बल नियत हो या परिवर्ती, दोनों ही स्थितियों में सत्य होती है।

कार्य-ऊर्जा प्रमेय की उपयोगिता – अनेक समस्याओं में बल और उसके विस्थापन का सम्पूर्ण ज्ञान नहीं होता है, अत: बल द्वारा किये गये कार्य की गणना सीधे ही नहीं की जा सकती। ऐसी समस्याओं में प्रायः वस्तु की या निकाय की गतिज ऊर्जा में वृद्धि या कमी को आसानी से ज्ञात किया जा सकता है।

गतिज ऊर्जा में यह परिवर्तन ही बल द्वारा किये गये कार्य के बराबर होता है।

प्रश्न 2.
किसी पिण्ड की यान्त्रिक-ऊर्जा से क्या तात्पर्य है? मुक्त रूप से गिरते हुए पिण्ड के लिए यान्त्रिक ऊर्जा के संरक्षण सिद्धान्त की पुष्टि कीजिए।
या
सिद्ध कीजिए कि मुक्त रूप से गिरते हुए पिण्ड में प्रत्येक बिन्दु पर स्थितिज ऊर्जा तथा गतिज ऊर्जा का योग सदैव स्थिर रहता है।
उत्तर :
यान्त्रिक-ऊर्जा के संरक्षण का नियम-यदि बल संरक्षी है, तो कण की यान्त्रिक ऊर्जा नियत रहती है। अर्थात्
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मुक्त रूप से गिरते हुए पिण्ड का उदाहरण

मुक्त रूप से गिरते हुए पिण्ड की यान्त्रिक ऊर्जा (अर्थात् गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा) नियत रहती है। इसे गणनों द्वारा निम्न प्रकार दर्शाया जा सकता है
माना m द्रव्यमान की कोई वस्तु पृथ्वी तंल से h ऊँचाई पर स्थित बिन्दु A से गिरती है। प्रारम्भ में बिन्दु A पर गतिज ऊर्जा शून्य है और केवल स्थितिज ऊर्जा है।
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∴A बिन्दु पर वस्तु में कुल ऊर्जा
= गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा
= 0 + mgh = mgh …(1)
माना गिरते समय किसी क्षण वस्तु बिन्दु B पर है, जो अपनी प्रारम्भिक स्थिति से x दूरी गिर चुकी है। यदि बिन्दु B पर वस्तु का वेग υ हो, तो सूत्र
υ2 = u2 + 2as
υ2 = 0 + 2gx = 2gx

∴ बिन्दु B पर वस्तु की गतिज ऊर्जा =[latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] mυ2
= [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] m x 2gx = mgx
बिन्दु B पर वस्तु की स्थितिज ऊर्जा = mg (h – x)

∴ बिन्दु B पर वस्तु की कुल ऊर्जा = गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा
= mgx + mg (h – x) = mgh …(2)

अब माना वस्तु पृथ्वी तल पर स्थित बिन्दु c के ठीक ऊपर है तथा वस्तु पृथ्वी से ठीक टकराने ही वाली है। अब उसकी स्थितिज ऊर्जा शून्य है। वस्तु द्वारा गिरी ऊँचाई = h
सूत्र = υ2 +u2 + 2as से, C पर वस्तु का वेग (a = g तथा s = h),
υ2 = 0 + 2gh = 2gh

C पर वस्तु की गतिज ऊर्जा = [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] m (υ’)2 = [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] m × 2gh = mgh
C पर वस्तु की कुल ऊर्जा = गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा
= mgh + 0 = mgh

इस प्रकार हम देखते हैं कि गिरती वस्तु के प्रत्येक बिन्दु पर गतिज ऊर्जा तथा स्थितिज ऊर्जा का योग नियत बना रहता है। अतः गुरुत्वीय बल के अन्तर्गत वस्तु की कुल यान्त्रिक ऊर्जा नियत रहती है।

प्रश्न 3.
प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा से आप क्या समझते हैं। किसी स्प्रिंग की प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा के लिए व्यंजक का निगमन कीजिए।
उत्तर :
प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा – किसी वस्तु में उसके सामान्य आकार अथवा विन्यास में परिवर्तन के कारण जो कार्य करने की क्षमता होती है, वस्तु की प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा कहलाती है।

जब किसी प्रत्यास्थ वस्तु को उसकी सामान्य अवस्था से विकृत किया जाता है, तो वस्तु पर एक प्रत्यानंयन बल (restoring force) कार्य करता है जो वस्तु को उसकी सामान्य अवस्था में लाने का प्रयत्न करता है। इस प्रत्यानयन बल के कारण ही विकृत वस्तु में कार्य करने की क्षमता निहित रहती है।
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सिंप्रग की प्रत्यास्थ ऊर्जा के लिए व्यंजक – जब किसी स्प्रिंग को संपीडित या प्रसारित किया जाता है, तो स्प्रिंग में एक प्रत्यानयन बल (restoring force) कार्य करता है, जो स्प्रिंग में होने वाले परिवर्तन का विरोध करता है। अतः लगाए गए बाह्य बल को प्रत्यानयन बल के विरूद्ध कार्य करना पड़ता है जो स्प्रिंग में प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है।

अतः संपीडित अथवा प्रसारित स्प्रिंग में जो कार्य करने की क्षमता निहित रहती है, स्प्रिंग की प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा कहलाती है।

माना एक भारहीन एवं पूर्ण प्रत्यास्थ स्प्रिंग का एक सिरा एक दृढ़ आधार (UPBoardSolutions.com) (rigid support) से जुड़ा है तथा इसके दूसरे सिरे से m द्रव्यमान का एक गुटका सम्बन्धित है जो एक घर्षणरहित क्षैतिज समतल मेज पर गति के लिए स्वतन्त्र है।

स्प्रिंग की सामान्य स्थिति में गुटके की माध्य स्थिति बिन्दू o पर है। [चित्र-6.14 (a)] स्प्रिंग पर बाह्य बल लगाकर उसकी लम्बाई में ऋणात्मक वृद्धि करने पर स्प्रिंग पर एक प्रत्यानयन बल कार्य करता है जो स्प्रिंग की लम्बाई में वृद्धि के अनुक्रमानुपाती होता है।

यदि स्प्रिंग की लम्बाई में वृद्धि x हो, तब उस पर कार्यरत् है प्रत्यानयन बल F α – x अथवा F = – kx

जहाँ k एक नियतांक है जिसे स्प्रिंग का बल नियतांक या स्प्रिंग नियतांक कहते हैं।

सिंप्रग की लम्बाई में वृद्धि के लिए प्रत्यानयन बल के विपरीत दिशा में बराबर बाह्य बल लगाना पड़ता है। [चित्र – 6.14(b)]। अतः स्प्रिंग पर लगाया गया बाह्य बल
Fext = – F = – (- kx) = kx

बाह्य बल द्वारा स्प्रिंग की लम्बाई में अत्यन्त सूक्ष्म वृद्धि dx करने में किया गया कार्य
dw = Fext × dx = kx dx

बाह्य बल द्वारा स्प्रिंग की लम्बाई में x1 = 0 से x2 = x तक वृद्धि करने में किया गया कार्य
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 6 Work Energy and power 49

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प्रश्न 4.
X – अक्ष में 0.1 किग्रा द्रव्यमान की एक गेंद 4.0 मी/से के वेग से गति करती हुई, उसी दिशा में 3.0 मी/से के वेग से गतिशील 0.2 किग्रा की दूसरी गेंद से टकराती है। टक्कर के बाद प्रथम गेंद 0.2 मी/से के वेग से वापस लौटने लगती है। दूसरी गेंद की टक्कर के बाद गतिज ऊर्जा की गणना कीजिए।
हल : दिया है, पहली गेंद का द्रव्यमान, m1 = 0.1 किग्रा,
पहली गेंद का वेग u1 = 4.0 मी/से,
दूसरी गेंद का द्रव्यमान m2 = 0.2 किग्रा
तथा दूसरी गेंद का वेग u2 = 3.0 मी/से
टक्कर के पश्चात् पहली गेंद का विपरीत दिशा में वेग υ1 = – 0.2 मी/से
(ऋणात्मक चिह्न इसलिए लिया गया है, क्योंकि गेंद टक्कर के बाद वापस लौटने लगती है।) संवेग संरक्षण के नियमानुसार,
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 6 Work Energy and power 50

प्रश्न 5.
0.5 किग्रा द्रव्यमान का एक पिण्ड 4.0 मी/से के वेग से एक चिकने तल पर गति कर रहा है। यह एक-दूसरे से 1.0 किग्रा के स्थिर पिण्ड से टकराता है और वे एक पिण्ड के रूप में एक साथ गति करते हैं। संघट्ट के समय ऊर्जा हास की गणना कीजिए।
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 6 Work Energy and power 51

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 7 Federalism

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 7 Federalism (संघवाद)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Political Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 7 Federalism (संघवाद).

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
नीचे कुछ घटनाओं की सूची दी गई है। इनमें से किसको आप संघवाद की कार्य-प्रणाली के रूप में चिह्नित करेंगे और क्यों?

(क) केन्द्र सरकार ने मंगलवार को जीएनएलएफ के नेतृत्त्व वाले दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल को छठी अनुसूची में वर्णित दर्जा देने की घोषणा की। इससे पश्चिम बंगाल के इस पर्वतीय जिले के शासकीय निकाय को ज्यादा स्वायत्तता प्राप्त होगी। दो दिन के गहन विचार-विमर्श के बाद नई दिल्ली में केन्द्र सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार और सुभाष घीसिंग के नेतृत्व वाले गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के बीच त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए।

(ख) वर्षा प्रभावित प्रदेशों के लिए सरकार कार्य-योजना लाएगी। केन्द्र सरकार ने वर्षा प्रभावित प्रदेशों से पुनर्निर्माण की विस्तृत योजना भेजने को कहा है ताकि वह अतिरिक्त राहत प्रदान करने की उनकी माँग पर फौरन कार्रवाई कर सके।

(ग) दिल्ली के लिए नए आयुक्त। देश की राजधानी दिल्ली में नए नगरपालिका आयुक्त को बहाल किया जाएगा। इस बात की पुष्टि करते हुए एमसीडी के वर्तमान आयुक्त राकेश मेहता ने कहा कि उन्हें अपने तबादले के आदेश मिल गए हैं और संभावना है। कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अशोक कुमार उनकी जगह सँभालेंगे। अशोक कुमार अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिव की हैसियत से काम कर रहे हैं। 1975 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी श्री मेहता पिछले साढ़े तीन साल से आयुक्त की हैसियत से काम कर रहे हैं।

(घ) मणिपुर विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा। राज्यसभा ने बुधवार को मणिपुर विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान करने वाला विधेयक पारित किया। मानव संसाधन विकास मन्त्री ने वायदा किया है कि अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और सिक्किम जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों में भी ऐसी संस्थाओं का निर्माण होगा।

(ड) केन्द्र ने धन दिया। केन्द्र सरकार ने अपनी ग्रामीण जलापूर्ति योजना के तहत अरुणाचल प्रदेश को 533 लाख रुपये दिए हैं। इस धन की पहली.किस्त के रूप में अरुणाचल प्रदेश को 466 लाख रुपये दिए गए हैं।

(च) हम बिहारियों को बताएँगे कि मुंबई में कैसे रहना है। करीब 100 शिव सैनिकों ने मुंबई के जे०जे०, अस्पताल में उठा-पटक करके रोजमर्रा के कामधंधे में बाधा पहुँचाई, नारे लगाए और धमकी दी कि गैर-मराठियों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं की गई तो इस मामले को वे स्वयं ही निपटाएँगे।

(छ) सरकार को भंग करने की माँग कांग्रेस विधायक दल ने प्रदेश के राज्यपाल को हाल में सौंपे एक ज्ञापन में सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक एलायंस ऑफ नागालैंड (डीएएन) की सरकार को तथाकथित वित्तीय अनियमितता और सार्वजनिक धन के गबन के आरोप में भंग करने की माँग की है।

(ज) एनडीए सरकार ने नक्सलियों से हथियार रखने को कहा। विपक्षी दल राजद और उसके सहयोगी कांग्रेस और सीपीआई (एम) के वॉक आउट के बीच बिहार सरकार ने आज नक्सलियों से अपील की कि वे हिंसा का रास्ता छोड़ दें। बिहार को विकास के नए युग में ले जाने के लिए बेरोजगारी को जड़ से खत्म करने के अपने वादे को भी सरकार ने दोहराया।
उत्तर-
उपर्युक्त उदाहरणों में ‘क’ में वास्तविक संघीय प्रणाली की स्थिति दिखाई देती है क्योंकि इसमें सांस्कृतिक व भौगोलिक समीपता के आधार पर स्वायत्त परिषद् का निर्माण कर शक्तियों का बँटवारा किया जाता है जिससे निश्चित क्षेत्र का वहाँ के स्थानीय लोगों की इच्छा व अपेक्षाओं के अनुसार विकास हो सके। दूसरा उदाहरण (ख) भी वास्तविक संघीय प्रणाली की स्थिति को प्रकट करता है जिसमें केन्द्र उन राज्यों से व्यय का विवरण माँगता है जो वर्षा से अधिक प्रभावित हुए हैं ताकि उन्हें आवश्यक सहायता दी जा सके। उदाहरण (ङ) में भी वास्तविक संघीय प्रणाली की स्थिति है क्योंकि इसमें भी अरुणाचल प्रदेश की पानी की आवश्यकता को पूरा करने के लिए आवश्यक धन की व्यवस्था की गई है।

प्रश्न 2.
बताएँ कि निम्नलिखित में कौन-सा कथन सही होगा और क्यों?
(क) संघवाद से इस बात की सम्भावना बढ़ जाती है कि विभिन्न क्षेत्रों के लोग मेल-जोल से रहेंगे और उन्हें इस बात का भय नहीं रहेगा कि एक की संस्कृति दूसरे पर लाद दी जाएगी।
(ख) अलग-अलग किस्म के संसाधनों वाले दो क्षेत्रों के बीच आर्थिक लेन-देन को संघीय प्रणाली से बाधा पहुँचेगी।
(ग) संघीय प्रणाली इस बात को सुनिश्चित करती है जो केन्द्र में सत्तासीन हैं उनकी शक्तियाँ सीमित रहें।
उत्तर-
उपर्युक्त में प्रथम कथन (क) सही है क्योंकि संघीय प्रणाली में सभी को अपनी-अपनी संस्कृति के विकास का पूरा अवसर प्राप्त होता है जिसमें यह भी भय नहीं रहता है कि किसी पर दूसरे की संस्कृति लाद दी जाएगी। तीसरा कथन (ग) भी सही है क्योंकि संघीय प्रणाली में शक्तियों का केन्द्र व राज्यों में बँटवारा करके केन्द्र की शक्तियों को सीमित किया जाता है।

प्रश्न 3.
बेल्जियम के संविधान के कुछ प्रारंभिक अनुच्छेद नीचे लिखे गए हैं। इसके आधार पर बताएँ कि बेल्जियम में संघवाद को किस रूप में साकार किया गया है। भारत के संविधान के लिए ऐसा ही अनुच्छेद लिखने का प्रयास करके देखें।
शीर्षक-1 : संघीय बेल्जियम, इसके घटक और इसका क्षेत्र
अनुच्छेद-1 – बेल्जियम एक संघीय राज्य है—जो समुदायों और क्षेत्रों से बना है।
अनुच्छेद-2 – बेल्जियम तीन समुदायों से बना है—फ्रेंच समुदाय, फ्लेमिश समुदाय और जर्मन समुदाय।
अनुच्छेद-3 – बेल्जियम तीन क्षेत्रों को मिलाकर बना है-वैलून क्षेत्र, फ्लेमिश क्षेत्र और ब्रूसेल्स क्षेत्र।
अनुच्छेद-4 – बेल्जियम में 4 भाषाई क्षेत्र हैं- फ्रेंच-भाषी क्षेत्र, डच-भाषी क्षेत्र, ब्रसेल्स की राजधानी का द्विभाषी क्षेत्र तथा जर्मन भाषी क्षेत्र। राज्य का प्रत्येक ‘कम्यून’ इन भाषाई क्षेत्रों में से किसी एक का हिस्सा है।
अनुच्छेद-5 – वैलून क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले प्रान्त हैं-वैलून ब्राबैंट, हेनॉल्ट, लेग, लक्जमबर्ग और नामूर। फ्लेमिश क्षेत्र के अन्तर्गत शामिल प्रांत हैं- एंटीवर्प, फ्लेमिश ब्राबैंट, वेस्ट फ्लैंडर्स, ईस्ट फ्लैंडर्स और लिंबर्ग।
उत्तर-
बेल्जियम के उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि बेल्जियम समाज एक बहुसंख्यक (संघीय) समाज है जिसमें विभिन्न जाति, भाषा, बोली के लोग रहते हैं। ये अलग-अलग क्षेत्रों व प्रान्तों में रहते हैं; अतः बेल्जियम में संघीय समाज के कारण संघीय शासन-प्रणाली की भी आवश्यकता है यह एक ऐसा संघ होगा जिसमें विभिन्न क्षेत्र व प्रान्त सम्मिलित होंगे।

भारतीय समाज भी एक संघीय समाज है जिसमें विभिन्न जाति, धर्म, संस्कृति, बोली व भाषा के लोग रहते हैं। भारत 29 राज्यों का संघ है। भारत में संघीय शासन-प्रणाली है परन्तु इसमें अनेक एकात्मक तत्त्व हैं जिन्हें भारतीय एकता, अखण्डता की सुरक्षा के लिए सम्मिलित किया गया है। संविधान की योजना के आधार पर केन्द्र व राज्यों में शक्तियों का विभाजन किया गया है। राज्य अपने क्षेत्र में प्रभावकारी है परन्तु मुख्य विषयों पर केन्द्र को शक्तिशाली बनाया गया है। शक्तियों का विभाजन भी केन्द्र के पक्ष में अधिक है यद्यपि प्रशासन के क्षेत्र में व विकास के क्षेत्र में केन्द्र व राज्य आपसी सहयोग के आधार पर काम करते हैं।

प्रश्न 4.
कल्पना करें कि आपको संघवाद के संबंध में प्रावधान लिखने हैं। लगभग 300 शब्दों का एक लेख लिखें जिसमें निम्नलिखित बिन्दुओं पर आपके सुझाव हों-
(क) केन्द्र और प्रदेशों के बीच शक्तियों का बँटवारा
(ख) वित्त-संसाधनों का वितरण
(ग) राज्यपालों की नियुक्ति
उत्तर-
बहुल समाज में सभी वर्गों के विकास के लिए वे उनके हितों की रक्षा के लिए प्रजातन्त्रीय संघीय शासन-प्रणाली आवश्यकता है। संघीय ढाँचे का निर्माण संविधान की योजना के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए।

संघीय शासन-प्रणाली की प्रमुख विशेषता केन्द्र व राज्यों के बीच शक्तियों के विभाजन से है। संघ का निर्माण संघीय सिद्धान्तों के आधार पर होना चाहिए जिसमें संघ राज्यों की मर्जी पर आधारित होना चाहिए।, प्रान्तीय व क्षेत्रीय विषयों पर राज्यों का ही नियन्त्रण रहना चाहिए। संघ के पास केवल राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व के विषय होने चाहिए। रक्षित शक्तियाँ राज्यों के पास होनी चाहिए। राज्यों की केन्द्र पर निर्भरता कम-से-कम होनी चाहिए। राज्यों के स्रोतों को राज्यों के विकास के लिए अधिक-से-अधिक उपयोग होना चाहिए। केन्द्र व राज्यों में आर्थिक स्रोतों का विभाजन विवेकपूर्ण आधार पर होना चाहिए।

राज्यपाल राज्यों का संवैधानिक मुखिया कहलाता है जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति राज्यपालों की नियुक्ति केन्द्र सरकार की सलाह पर करता है। राज्यपाल का पद राज्यों में महत्त्वपूर्ण पद है जो संवैधानिक मुखिया के साथ-साथ केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। राज्यपाल के पद की इस स्थिति के कारण इसका राजनीतिकरण हो गया है। अतः संघीय व्यवस्था की सफलता के लिए आवश्यक है कि इस पद का दुरुपयोग न हो व राज्यपाल की नियुक्ति में राज्यों के मुख्यमन्त्रियों का परामर्श लिया जाना चाहिए व इस पद पर योग्य व निष्पक्ष व्यक्ति की नियुक्ति की जानी चाहिए।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में कौन-सा प्रांत के गठन का आधार होना चाहिए और क्यों?
(क) सामान्य भाषा
(ख) सामान्य आर्थिक हित
(ग) सामान्य क्षेत्र
(घ) प्रशासनिक सुविधा
उत्तर-
यद्यपि अभी तक भारत में राज्यों का गठन 1956 के कानून के आधार पर भाषा आधारित होता रहा है परन्तु वर्तमान परिस्थितियों में प्रशासनिक सुविधा को राज्यों के पुनर्गठन का प्रमुख आधार माना जा रहा है जिससे लोगों को कुशल प्रशासन प्रदान किया जा सके जिसमें स्थानीय लोगों का विकास भी सम्भव हो सके।

प्रश्न 6.
उत्तर भारत के प्रदेशों-राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा बिहार के अधिकांश लोग हिंदी बोलते हैं। यदि इन सभी प्रांतों को मिलाकर एक प्रदेश बना दिया जाए तो क्या ऐसा करना संघवाद के विचार से संगत होगा? तर्क दीजिए।
उत्तर-
यदि उत्तर भारत के प्रदेशों-राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा बिहार जो कि सभी हिन्दी भाषी हैं, सभी को मिला दिया जाए तो भाषाई व सांस्कृतिक दृष्टि से तो वे सभी एक-इकाई के रूप में इकट्ठे हो सकते हैं परन्तु प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से यह उचित नहीं होगा। संघीय प्रशासन का प्रमुख आधार प्रशासनिक सुविधा है। देश में छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड व झारखण्ड का निर्माण प्रशासनिक आधार पर किया गया है।

प्रश्न 7.
भारतीय संविधान की ऐसी चार विशेषताओं का उल्लेख करें जिनमें प्रादेशिक सरकार की अपेक्षा केन्द्रीय सरकार को ज्यादा शक्ति प्रदान की गई।
उत्तर-
निम्नलिखित चार विशेषताएँ ऐसी हैं जिनके आधार पर केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बनाया गया है-

  1. केन्द्र के पक्ष में शक्तियों का विभाजन,
  2. राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियाँ,
  3. राज्यों में राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था,
  4. अखिल भारतीय सेवाओं की भूमिका।

प्रश्न 8.
बहुत-से प्रदेश राज्यपाल की भूमिका को लेकर नाखुश क्यों हैं?
उत्तर-
भारतीय राजनीति में वर्तमान में सर्वाधिक चर्चित पद राज्यपाल का है। देश के अधिकांश राज्यों को अपने यहाँ के राज्यपालों से किसी-न-किसी रूप में शिकायत रहती है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि अधिकांश राज्यपालों की राजनीतिक पृष्ठभूमि होती है जिसके आधार पर केन्द्र के शासक दल द्वारा उनकी नियुक्ति की जाती है। इस कारण राज्यपाल निरपेक्ष रूप से अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं करते। इनकी भूमिका केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप में होती है जिसके आधार पर इनकी जिम्मेदारी केन्द्र के हितों की रक्षा करना होता है परन्तु ये केन्द्र में जिस दल की सरकार होती है उसके रक्षक बन जाते हैं जिससे राज्यों की सरकारों और राज्यपालों में टकराव उत्पन्न हो जाता है।

प्रश्न 9.
यदि शासन संविधान के प्रावधानों के अनुकूल नहीं चल रहा, तो ऐसे प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। बताएँ कि निम्नलिखित में कौन-सी स्थिति किसी देश में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिहाज से संगत है और कौन-सी नहीं? संक्षेप में कारण भी दें।
(क) राज्य की विधानसभा के मुख्य विपक्षी दल के दो सदस्यों को अपराधियों ने मार दिया है और विपक्षी दल प्रदेश की सरकार को भंग करने की माँग कर रहा है।
(ख) फिरौती वसूलने के लिए छोटे बच्चों के अपहरण की घटनाएँ बढ़ रही हैं। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में इजाफा हो रहा है।
(ग) प्रदेश में हुए हाल के विधानसभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला है। भय है कि एक दल दूसरे दल के कुछ विधायकों से धन देकर अपने पक्ष में उनका समर्थन हासिल कर लेगा।
(घ) केन्द्र और प्रदेशों में अलग-अलग दलों का शासन है और दोनों एक-दूसरे के कट्टर शत्रु हैं।
(ङ) सांप्रदायिक दंगे में 200 से ज्यादा लोग मारे गए हैं।
(च) दो प्रदेशों के बीच चल रहे जल-विवाद में एक प्रदेश ने सर्वोच्च न्यायालय का आदेश मानने से इनकार कर दिया है।
उत्तर-
उपर्युक्त परिस्थितियों में (ग) में दिया गया उदाहरण राष्ट्रपति शासन लागू करने के लिए सबसे उपयुक्त है। ऐसी स्थिति में जब चुनाव के बाद किसी भी दल को आवश्यक बहुमत प्राप्त न हो तो इस बात की सम्भावना बढ़ जाती है कि राजनीतिक दलों द्वारा सरकार बनाने के प्रयास में जोड़-तोड़ की राजनीति व विधायकों की खरीद-फरोख्त प्रारम्भ हो जाती है।

प्रश्न 10.
ज्यादा,स्वायत्तता की चाह में प्रदेशों ने क्या माँगें उठाई हैं?
उत्तर-
1960 से निरन्तर विभिन्न राज्यों से प्रान्तीय स्वतन्त्रता की माँग निरन्तर उठाई जाती रही है। पश्चिम बंगाल, पंजाब, तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर व कुछ उत्तर पूर्वी राज्यों से विशेष रूप से यह माँग आती रही है-

  1. केन्द्र व राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन राज्यों के पक्ष में होना चाहिए।
  2. राज्यों की केन्द्र पर आर्थिक निर्भरता नहीं होनी चाहिए।
  3. राज्यों के मामलों में केन्द्र का कम-से-कम हस्तक्षेप होना चाहिए।
  4. राज्यपाल के पद का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए व राज्यपाल की नियुक्ति में राज्यों में मुख्यमन्त्रियों का परामर्श लिया जाना चाहिए।
  5. सांस्कृतिक स्वायत्तता होनी चाहिए।
  6. सभी राज्यों का समान विकास होना चाहिए।
  7. संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 11.
क्या कुछ प्रदेशों में शासन के लिए विशेष प्रावधान होने चाहिए? क्या इससे दूसरे प्रदेशों में नाराजगी पैदा होती है? क्या इन विशेष प्रावधानों के कारण देश के विभिन्न क्षेत्रों के बीच एकता मजबूत करने में मदद मिलती है?
उत्तर-
संघीय प्रशासन के सिद्धान्तों के अनुसार सभी राज्यों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। सभी राज्यों में विकास कार्य समान होने चाहिए। भारत में ऐसा नहीं है। भारत में कुछ छोटे राज्य हैं, कुछ बड़े। राज्यसभा में राज्यों का असमान प्रतिनिधित्व है। जम्मू-कश्मीर को संविधान के अनुच्छेद 370 के अन्तर्गत विशेष दर्जा दिया गया है जिसके आधार पर जम्मू-कश्मीर की राज्य के रूप में अपनी प्रभुसत्ता है। इसी प्रकार से उत्तर-पूर्वी राज्यों (असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश व त्रिपुरा) के विकास के लिए विशेष प्रावधान हैं। इन राज्यों के राज्यपाल को विशेष शक्तियाँ प्राप्त हैं। कमजोर और पिछड़े राज्यों के विकास के लिए विशेष सुविधाएँ देना अनुचित नहीं है और न ही अन्य प्रदेशों को इससे असहमत होना चाहिए। सभी राज्यों की आवश्यकताओं को पूरा किया जाना चाहिए जिससे राष्ट्रीय एकता, अखण्डता को कोई खतरा उत्पन्न न हो।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘फेडरेशन ऑफ वेस्टइंडीज का जन्म किस वर्ष हुआ था?
(क) सन् 1958 में
(ख) सन् 1962 में
(ग) सन् 1963 में
(घ) सन् 1964 में
उत्तर :
(क) सन् 1958 में

प्रश्न 2.
‘यूनियन’ शब्द किस देश के संविधान से लिया गया है?
(क) ऑस्ट्रेलिया
(ख) कनाडा
(ग) ब्रिटेन
(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका
उत्तर :
(ख) कनाडा

प्रश्न 3.
“भारत वस्तुतः एक संघात्मक राज्य नहीं है, वरन् अर्द्ध संघात्मक राज्य है।” यह किसका। कथन है?
(क) के० सी० ह्वीयर
(ख) जी० एन० जोशी
(ग) के० सन्थानम,
(घ) डॉ० बी०आर० अम्बेडकर
उत्तर :
(ख) जी० एन० जोशी।

प्रश्न 4.
“भारत का ढाँचा संघात्मक है, किन्तु उसकी आत्मा एकात्मक है।” यह किसका कथन है?
(क) दुर्गादास बसु
(ख) जस्टिस सप्रू
(ग) एम०वी० पायली
(घ) रणजीत सिंह सरकारिया
उत्तर :
(ग) एम०वी० पायली।

प्रश्न 5.
राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन कब हुआ था?
(क) 1950 ई० में
(ख) 1952 ई० में
(ग) 1954 ई० में
(घ) 1956 ई० में
उत्तर :
(ग) 1954 ई० में

प्रश्न 6.
संघ सूची में कुल कितने विषय है?
(क) 66
(ख) 97
(ग) 47
(घ) 100
उत्तर :
(ख) 97

प्रश्न 7.
राज्य सूची में कितने विषय हैं?
(क) 62
(ख) 64
(ग) 60
(घ) 72
उत्तर :
(क) 62

प्रश्न 8.
समवर्ती सूची पर कानून निर्मित करने का अधिकार किसको प्राप्त है?
(क) केन्द्र को
(ख) राज्य को
(ग) केन्द्र तथा राज्य दोनों को
(घ) केन्द्र-शासित प्रदेश को
उत्तर :
(ग) केन्द्र तथा राज्य दोनों को

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन-सा विषय संघ सूची में सम्मिलित नहीं है?
(क) रक्षा
(ख) विदेश
(ग) वाणिज्य
(घ) शिक्षा
उत्तर :
(घ) शिक्षा

प्रश्न 10.
42वें संविधान संशोधन द्वारा निम्नलिखित में से कौन-सा विषय समवर्ती सूची में सम्मिलित किया गया है?
(क) कृषि
(ख) जेल
(ग) पुलिस
(घ) वन
उत्तर :
(घ) वन

प्रश्न 11.
आपातकालीन स्थिति में भारतीय संघ का ढाँचा हो जाता है –
(क) पूर्ण संघात्मक
(ख) अर्द्ध-संघात्मक
(ग) एकात्मक
(घ) कोई प्रभाव नहीं
उत्तर :
(ग) एकात्मक।

प्रश्न 12.
केन्द्र-राज्य संबंधों से जुड़े मसलों की जाँच के लिए सरकारिया आयोग कब गठित किया गया था?
(क) सन् 1947 में
(ख) सन् 1983 में
(ग) सन् 1984 में
(घ) सन् 1985 में
उत्तर :
(ख) सन् 1983 में

प्रश्न 13.
प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से उत्तर प्रदेश को विभाजित कर कौन-सा राज्य गठित किया गया?
(क) उत्तराखण्ड
(ख) छत्तीसगढ़
(ग) झारखण्ड
(घ) हरियाणा
उत्तर :
(क) उत्तराखण्ड।

प्रश्न 14.
कावेरीजल प्रवाह किन दो राज्यों के मध्य है?
(क) गुजरात-महाराष्ट्र
(ख) उत्तराखण्ड-हिमाचल प्रदेश
(ग) तमिलनाडु-कर्नाटक
(घ) मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र
उत्तर :
(ग) तमिलनाडु-कर्नाटक

प्रश्न 15.
संविधान के अनुच्छेद 370 के अन्तर्गत किस राज्य को विशिष्ट स्थिति प्रदान की गई
(क) पंजाब
(ख) मिजोरम
(ग) सिक्किम
(घ) जम्मू-कश्मीर
उत्तर :
(घ) जम्मू-कश्मीर

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान संघात्मक है या एकात्मक?
उत्तर :
भारतीय संविधान संघात्मक भी है और एकात्मक भी।

प्रश्न 2.
संविधान के दो संघात्मक तत्त्व बताइए।
उत्तर :

  1. लिखित संविधान तथा
  2. स्वतन्त्र व निष्पक्ष न्यायपालिका

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान के दो एकात्मक लक्षण बताइए।
उत्तर :

  1. शक्तिशाली केन्द्र तथा
  2. इकहरी नागरिकता।

प्रश्न 4.
भारतीय संघ में कितने राज्य हैं?
उत्तर :
भारत में राज्यों की कुल संख्या 29 है।

प्रश्न 5.
संघ सूची में कितने विषय है?
उत्तर :
संघ सूची में 97 विषय हैं।

प्रश्न 6.
संघ सूची में सम्मिलित किन्हीं दो विषयों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. रक्षा तथा
  2. वैदेशिक मामले।

प्रश्न 7.
समवर्ती सूची के दो विषयों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. फौजदारी विधि एवं प्रक्रिया और
  2. शिक्षा

प्रश्न 8.
समवर्ती सूची के विषयों पर किसे कानून बनाने का अधिकार है?
उत्तर :
समवर्ती सूची के विषयों पर केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकार दोनों को ही कानून बनाने का अधिकार है।

प्रश्न 9.
उस परिस्थिति का उल्लेख कीजिए, जब संसद राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बना सकती है।
उत्तर :
यदि राज्यसभा अपने 2/3 बहुमत से राज्य सूची में निहित किसी विषय को राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित कर दे।

प्रश्न 10.
संघ सरकार की आय के ऐसे दो साधन बताइए, जो राज्य सरकार की आय के साधन नहीं हैं।
उत्तर :

  1. केन्द्रीय उत्पाद शुल्क तथा
  2. आयकर।

प्रश्न 11.
संघ सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार किसको है?
उत्तर :
संघ सूची के विषयों पर कानून बनाने का एकमात्र अधिकार भारतीय संसद को है।

प्रश्न 12.
केन्द्र तथा राज्यों में शक्तियों का विभाजन की तीन सूचियों में से शिक्षा किस सूची में
उत्तर :
शिखा को समवर्ती सूची में सम्मिलित किया गया है।

प्रश्न 13.
भारतीय संविधान में विधायी शक्तियों का विभाजन जिन सूचियों में किया गया है, उनके नाम बताइए।
उत्तर :
भारतीय संविधान में विधायी शक्तियों का विभाजन निम्नलिखित तीन सूचियों में किया गया

  1. संघ सूची
  2. समवर्ती सूची तथा
  3. राज्य सूची।

प्रश्न 14.
राज्य सूची में कितने विषय हैं?
उत्तर :
राज्य सूची में 62 विषय हैं।

प्रश्न 15.
समवर्ती सूची में कितने विषय हैं?
उत्तर :
समवर्ती सूची में विषयों की संख्या 52 है।

प्रश्न 16.
वित्त आयोग की नियुक्ति कौन करता है?
उत्तर :
वित्त आयोग की नियुक्ति राष्ट्रपति करती है।

प्रश्न 17.
राज्य पुनर्गठन आयोग (1956) के अध्यक्ष कौन थे?
उत्तर :
राज्य पुनर्गठन आयोग के अध्यक्ष फजल अली थे।

प्रश्न 18.
एक संघात्मक राज्य में उच्चतम (सर्वोच्च न्यायालय क्यों आवश्यक है?
उत्तर :
संघ और इकाइयों के बीच विवादों को हल करने के लिए संघात्मक राज्य में एक उच्चतम (सर्वोच्च) न्यायालय का होना आवश्यक है।

प्रश्न 19.
भारत को एक संघात्मक राज्य क्यों कहा जाता है?
उत्तर :
भारत 29 राज्यों तथा 7 संघशासित प्रदेश से बना हुआ एक संघ है और इसमें संघात्मक राज्य की सभी विशेषताएँ हैं, इसलिए इसे संघात्मक राज्य कहा जा सकता है।

प्रश्न 20.
भारतीय संविधान की संघात्मकता की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. संविधान की सर्वोच्चता तथा
  2. केन्द्र व राज्यों में शक्तियों का विभाजन।

प्रश्न 21.
राज्य सूची पर कौन कानून बनाता है?
उत्तर :
राज्य सूची पर राज्य सरकार कानून बनाती है, परन्तु यदि कोई विषय राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित किए जाने पर, उस पर कानून बनाने का अधिकार केन्द्र सरकार को प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 22.
संविधान का अनुच्छेद 370 किस राज्य से संबंधित है?
उत्तर :
संविधान का अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर राज्य से संबंधित है।

लघु उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संघात्मक शासन के अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
संघात्मक शासन व्यवस्था वह शासन व्यवस्था होती है जिसमें दो प्रकार की सरकारें होती हैं। वह सरकार, जो समस्त देश का प्रशासन करती है, ‘संघीय सरकार’ कहलाती है तथा दूसरी वह सरकार, जो राज्य का प्रशासन करती है, ‘राज्य-सरकार’ कहलाती है। फ्रीमैन के शब्दों में, “संघात्मक शासन वह है जो दूसरे राष्ट्रों के साथ संबंध में एक राज्य के समान हो, परन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह अनेक राज्यों का योग हो।’ डायसी के शब्दों में, “संघात्मक राज्य एक ऐसे राजनीतिक उपाय के अतिरिक्त कुछ नहीं है जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता तथा राज्यों के अधिकारों में मेल स्थापित करना है।”

प्रश्न 2.
भारत में केन्द्र तथा राज्यों के संबंधों पर केन्द्र की स्थिति किस प्रकार की प्रतीत होती है?
उत्तर :
केन्द्र तथा राज्यों के मध्य संबंधों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत में केन्द्रीय सरकार को अधिक शक्तिशाली बनाने का प्रयास किया गया है। राज्यों की स्वायत्तता की अपेक्षा केन्द्र को शक्तिशाली बनाने पर अत्यधिक बल दिया गया है। वास्तव में, बजाय इसके कि केन्द्र के हस्तक्षेप पर प्रतिबन्ध लगाए जाते, संविधान ने राज्यों की शक्तियों पर प्रतिबंध लगाए हैं। भारतीय संविधान में अनेक ऐसे प्रावधानों की व्याख्या की गई है, जिन्होंने राज्यों की स्थिति पर विपरीत प्रभाव डाला है तथा राज्यों को संघ सरकार के अधीन कर दिया है। इस स्थिति को देखते हुए आलोचकों को यह कहने का अवसर प्राप्त हुआ है कि भारतीय संघ पूर्ण रूप से एक संघीय राज्य नहीं है।

प्रश्न 3.
संघ (केन्द्र) सूची का संक्षिप्त उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
संघ (केन्द्र) सूची के अन्तर्गत उन विषयों को रखा गया है, जिन पर केवल केन्द्र सरकार ही कानूनों का निर्माण कर सकती है। ये विषय बहुत महत्त्वपूर्ण एवं राष्ट्रीय स्तर के हैं। संघ सूची में 97 विषय हैं। इस सूची में प्रमुख विषय–रक्षा, वैदेशिक मामले, युद्ध व सन्धि तथा बैंकिंग हैं।

प्रश्न 4.
समवर्ती सूची पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
औपचारिक रूप में और कानूनी दृष्टि से इन तीनों सूचियों के विषयों की संख्या वही बनी हुई है। जो मूल संविधान में है। लेकिन 42वें संविधान संशोधन द्वारा राज्य-सूची के चार विषय (शिक्षा, वन, जंगली पशु तथा पक्षियों की रक्षा एवं नाप-तौल) समवर्ती सूची में सम्मिलित कर दिये गये हैं और समवर्ती सूची में इन चार के अतिरिक्त एक नवीन विषय ‘जनसंख्या नियन्त्रण और परिवार नियोजन’ भी सम्मिलित किया गया है। इस सूची में साधारणतया वे विषय रखे गये हैं जिनका महत्त्व क्षेत्रीय एवं संघीय दोनों ही दृष्टियों से है। इस सूची के विषय पर संघ तथा राज्य दोनों को ही कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। यदि इस सूची के किसी विषय पर संघीय तथा राज्य सरकार द्वारा बनाये गये कानुन परस्पर विरोधी हों तो सामान्यतया संघ का कानुन मान्य होगा। इस सूची में कुल 52 विषय हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं-फौजदारी विधि तथा प्रक्रिया, निवारक निरोध, विवाह एवं विवाह-विच्छेद, दत्तक एवं उत्तराधिकार, कारखाने, श्रमिक संघ, औद्योगिक विवाद, आर्थिक और सामाजिक योजना, सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा, पुनर्वास और पुरातत्त्व, शिक्षा, जनसंख्या नियन्त्रण और परिवार नियोजन, वन इत्यादि।

प्रश्न 5.
भारत के संविधान में शक्तिशाली केन्द्र की स्थापना क्यों की गई है?
उत्तर :
भारत के संविधान में शक्तिशाली केन्द्र की स्थापना इसलिए की गई है, क्योकि –

  1. यह भारत की एकता तथा अखण्डता की परिचायक है।
  2. यह भारत में एकता बनाए रखने का महत्त्वपूर्ण एवं शक्तिशाली साधन है।
  3. समस्त भारत की प्रगति और उन्नति के लिए शक्तिशाली केन्द्र आवश्यक है।
  4. भारत का इतिहास इस बात को सिद्ध करता है कि जब-जब भारत में केन्द्रीय सत्ता कमजोर हुई है,

भारत पर विदेशी राज्यों का आक्रमण हुआ तथा भारत छोटे-छोटे राज्यों की आन्तरिक फूट के कारण अनेक वर्षों तक दासता की जंजीरों में जकड़ा रहा। इसीलिए भारत के संविधान-निर्माताओं ने सोच-विचार कर शक्तिशाली केन्द्र की स्थापना की।

प्रश्न 6.
भारत में संघीय व्यवस्था का भविष्य किस बात पर निर्भर करता है? संक्षेप में विवेचना कीजिए।
उत्तर :
भारत में संघीय व्यवस्था का भविष्य केन्द्र-राज्य संबंधों के सफल संचालन पर निर्भर करता है। केन्द्र तथा राज्यों का संबंध कतिपय तात्कालिक समस्याओं के समाधान पर निर्भर करेगा। ये समस्याएँ हैं-केन्द्र द्वारा राज्यों को अपने क्षेत्र में अधिक-से-अधिक स्वतन्त्रता प्रदान करना, केन्द्रीय वित्तीय संसाधनों का राज्यों के मध्य न्यायपूर्ण विभाजन, खाद्य समस्या तथा रिजर्व बैंक में राज्यों द्वारा ओवर ड्राफ्ट लेना। इन समस्याओं में दोनों सरकारों के बीच सहयोग होना चाहिए न कि प्रतिस्पर्धा तथा विरोध।

प्रश्न 7.
भारतीय संघवाद के विशिष्ट लक्षणों की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
उत्तर :
भारतीय संघवाद के विशिष्ट लक्षण निम्नलिखित हैं –

  1. संविधान के उपबन्धों द्वारा औपचारिक रूप में स्थापित, भारतीय संघीय व्यवस्था का स्वरूप प्रादेशिक है।
  2. भारतीय संघवाद क्षैतिज है जिसका एक सशक्त केन्द्र के प्रति झुकाव है।
  3. भारतीय संघ इस रूप में लचीला है कि वह विशेषतया संकटकाल में एकात्मकस्वरूप में सहजता से बदला जा सकता है।
  4. भारतीय संघ व्यवस्था इस रूप में सहकारी है कि वह सामान्य हितों के मामले में केन्द्र तथा राज्यों से सहयोग की अपेक्षा करती है।
  5. केन्द्र पर एक दल के आधिपत्य के कारण संघ का स्वरूप एकात्मक हो गया है।

प्रश्न 8.
राष्ट्रपति शासन से क्या आशय है?
उत्तर :
भारतीय संविधान में राज्यों में राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत की गई है। यह निम्नलिखित परिस्थितियों में लागू किया जा सकता है –

  1. किसी राज्य में कानून व्यवस्था भंग हो जाने की स्थिति में।
  2. राज्य में राजनैतिक अस्थिरता की स्थिति में।
  3. किसी भी दल को चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत प्राप्त न हुआ हो। और सरकार का गठन सम्भव न होने की स्थिति में।
  4. सरकार संविधान के अनुसार न चलाई जा रही हो अर्थात् राज्य में केन्द्र सरकार के कानूनों व आदेशों की अवहेलना हो रही हो।

उपर्युक्त स्थितियों में से एक स्थिति में भी राज्यपाल अपने विवेक के आधार पर निर्णय लेकर राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकता है।

प्रश्न 9.
राज्यपाल की विवेकीय शक्तियाँ समझाइए।
उत्तर :
जिन शक्तियों को राज्यपाल स्वयं मुख्यमंत्री व मन्त्रिमण्डल के परामर्श के बिना प्रयोग करता है, उन्हें उसकी विवेकीय शक्तियाँ कहते हैं। राज्यपाल के पास अनेक विवेकीय शक्तियाँ हैं जिनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं –

  1. राज्यपाल किसी ऐसे बिल को, जिसे विधानसभा ने पास कर दिया हो, राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज सकता है।
  2. जब चुनाव के बाद, राज्य में किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत प्राप्त न हो तो राज्यपाल अपने विवेक के आधार पर किसी दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमन्त्रित करता है।
  3. कानून व्यवस्था का मूल्यांकन व राजनीतिक अस्थिरता का मूल्यांकन करना।
  4. राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करना।

प्रश्न 10.
भारतीय संविधान में निहित एकात्मक तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भारतीय संविधान यद्यपि संघात्मक है परन्तु उसमें अनेक एकात्मक तत्त्वों का भी समावेश किया गया है। इसी कारण के० सी० क्लीयर ने इसे ‘अर्द्ध-संघात्मक राज्य की संज्ञा प्रदान की है। भारत की संघात्मक व्यवस्था में निम्नलिखित एकात्मक तत्त्व पाए जाते हैं –

  1. भारत में इकहरी नागरिकता है।
  2. भारत का इकहरा संविधान है।
  3. न्यायपालिका का स्वरूप एकीकृत है।
  4. आपातकालीन स्थिति में राज्य का संघात्मक रूप एकात्मक में परिणत हो जाता है।
  5. राज्य में राज्यपालों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है।
  6. राज्य को केन्द्र से पृथक् होने का अधिकार नहीं है।
  7. संसद के उच्च सदन में राज्यों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान नहीं किया गया है।
  8. केन्द्र; राज्यों की सीमाओं, नामों में परिवर्तन करके नए राज्य का निर्माण कर सकता है।
  9. केन्द्र द्वारा अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है।

प्रश्न 11.
भारतीय राजनीति पर अनुच्छेद 370 के प्रभाव की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
वर्तमान में अनुच्छेद 370 विवादास्पद बना हुआ है क्योंकि इसके कारण कश्मीर को विशेष स्थिति प्राप्त है जो उसको शेष भारत से मनोवैज्ञानिक ढंग से पृथक् करती है। कश्मीर को यह विशेष स्थिति तत्कालीन अंतर्राष्ट्रीय स्थिति को देखते हुए अस्थायी रूप से प्रदान की गई थी परन्तु राजनीतिज्ञों न इसे राजनीतिक लाभ के लिए स्थायी बना दिया। अनुच्छेद 370 के कारण ही कश्मीर को अपना अलग संविधान बनाने का अधिकार प्राप्त हुआ है। भारतीय संघ में केवल जम्मू-कश्मीर ही ऐसा राज्य है जिसका पृथक् संविधान है। वहाँ पर कोई भी गैर कश्मीरी भारतीय, भूमि नहीं खरीद सकता है तथा स्थायी रूप से निवास नहीं बना सकता है जबकि 1947 ई० में कश्मीर से पाकिस्तान गए लोगों को पुनः कश्मीर वापस लौटने तथा वहाँ बसने का अधिकार है।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत का संघात्मक स्वरूप अन्य संघों से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर :
विश्व के अनेक राज्यों में संघात्मक शासन व्यवस्था को अपनाया गया है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के उपरान्त भारत में भी संघात्मक शासन व्यवस्था की नींव डाली गई। हमने अपनी संघात्मक व्यवस्था को अमेरिका से न लेकर कनाडा से ग्रहण किया है। हमने संघ के लिए यूनियन शब्द का प्रयोग किया है। भारत के संघ को विद्वानों ने कमजोर संघ अथवा अर्द्ध-संघ के नाम से सम्बोधित किया है। भारत के संघ में संघात्मक सरकार के सभी लक्षणों का समावेश किया गया है परन्तु फिर भी भारत का संघात्मक स्वरूप अन्य संघों से अनेक प्रकार से भिन्न है। जैसे

(1) भारतीय संविधान में कहीं पर भी संघात्मक शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, इसमें केवल यह कहा गया है कि भारत राज्यों का संघ है।

(2) दूसरे संघों में केन्द्र की तुलना में राज्यों को अधिक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं परन्तु भारत में राज्यों की तुलना में केन्द्र को अधिक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। संघ की सूची में वर्णित विषयों की संख्या 97 है जबकि राज्यों को मात्र 62 विषय प्रदान किए गए हैं। समवर्ती सूची में 52 विषयों को सम्मिलित किया गया है। समवर्ती सूची पर केन्द्र तथा राज्यों (दोनों) को कानून-निर्माण करने की शक्ति प्रदान की गई है परन्तु यदि इन दोनों के निर्मित कानूनों में। टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तो केन्द्र के कानून को मान्यता प्राप्त होती है।

(3) आपातकालीन स्थिति में भारतीय संघीय व्यवस्था एकात्मक में परिवर्तित हो जाती है।

(4) हमारे संघ का निर्माण इस प्रकार से नहीं हुआ है, जैसे अमेरिका के संघ का निर्माण हुआ था। हमने भारत के विभिन्न राज्यों का समय-समय पर विभाजन करके नए-नए राज्यों का निर्माण किया है जबकि अन्य संघात्मक राज्यों में स्वतन्त्र तथा सम्प्रभु राज्य सम्मिलित हुए थे।

(5) केन्द्रीय विधायिका (संसद) किसी भी राज्य की सीमा में परिवर्तन कर सकती है, यहाँ तक कि वह किसी भी राज्य को समाप्त करके नए राज्य का निर्माण कर सकती है जबकि अन्य संघात्मक राज्यों में इस स्थिति को नहीं अपनाया गया है।

प्रश्न 2.
भारत में संघीय व्यवस्था को क्यों अपनाया गया है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
भारतीय संविधान ने संघात्मक शासन-प्रणाली की व्यवस्था की है। भारत में वर्षों तक अंग्रेजों का शासन रहा। भारत की अपनी परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि अंग्रेजों ने भी 1935 के अधिनियम द्वारा भारत में संघीय प्रणाली की व्यवस्था की थी। स्वतन्त्रता के पश्चात् संविधान निर्माताओं ने इसी व्यवस्था को अपनाया। भारतीय संविधान निर्माताओं द्वारा निम्नलिखित कारणों से संघात्मक व्यवस्था को अपनाया गया –

  1. भारत भौगोलिक क्षेत्रफल की दृष्टि से एक उप-महाद्वीप के समान है जिसमें प्रशासनिक दृष्टिकोण से संघात्मक व्यवस्था ही उपयुक्त हो सकती थी।
  2. भारतीय समाज में विभिन्न धर्म, भाषा, जाति, संस्कृति आदि पाए जाते हैं जिनमें सामंजस्य स्थापित करने के लिए संघात्मक व्यवस्था ही उचित समझी गई।
  3. अंग्रेजों ने भारत को स्वतन्त्र करने के साथ-साथ देशी रियासतों को भी स्वतन्त्र कर दिया था। इन देशी रियासतों को भारत में मिलाने के लिए संघात्मक व्यवस्था ही उपयुक्त थी। इसके द्वारा । स्थानीय स्वायत्तता तथा राष्ट्रीय एकता दोनों लक्ष्यों की प्राप्ति हो जाती है।
  4. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान सदैव संघात्मक व्यवस्था की माँग की थी।
  5. भारतीयों को संघात्मक व्यवस्था का अनुभव भी था क्योंकि 1935 में भारत सरकार अधिनियम के अन्तर्गत संघात्मक व्यवस्था ही अपनाई गई थी।

संविधान सभा में डॉ० बी०आर० अम्बेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि यह एक संघीय संविधान है क्योंकि यह दोहरे शासन तन्त्र की व्यवस्था करता है जिसमें केंद्र में सघीय सरकार तथा उसके चारों ओर परिधि में राज्य सरकारें हैं जो संविधान द्वारा निर्धारित क्षेत्रों में सर्वोच्च सत्ता का प्रयोग करती हैं।

प्रश्न 3.
केंद्र तथा राज्य संबंधों में राज्यपाल की भूमिका की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
राज्य का अध्यक्ष राज्यपाल होता है। उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त अपने पद पर रहता है। राज्यपाल की नियुक्ति पाँच वर्ष के लिए की जाती है; परन्तु वास्तविकता यह है कि वह अपनी नियुक्ति तथा पदच्युति के लिए केंद्रीय सरकार पर आश्रित रहता है। उसकी यही आश्रियता केंद्र तथा राज्य संबंधों में तनाव का कारण बन जाती है।

जब केंद्र तथा राज्य में विभिन्न दलों की सरकार हो तो राज्य सरकार यह दावा करती है कि राज्यपाल की नियुक्ति उसके परामर्श से की जाए। परन्तु केंद्रीय सरकार अपनी पसंद के व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त करके राज्य सरकार पर नियन्त्रण रखने का प्रयत्न करती है।

राज्यपाल को कुछ ऐसे अधिकार भी प्राप्त हैं जिनका प्रयोग वह अपनी इच्छा से करता है, मंत्रिमण्डल की सलाह पर नहीं। ये अधिकार महत्त्वपूर्ण भी हैं। राज्य में संवैधानिक मशीनरी के असफल होने की रिपोर्ट वह अपने विवेक से करता है जिसके आधार पर केंद्र राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करता है। केंद्र ने अनेक बार उन राज्यों से जहाँ अन्य दल की सरकार थी, राज्यपाल से मनमाने ढंग से ऐसी रिपोर्ट ली और राष्ट्रपति शासन लागू कराया। राज्यपाल के ऐसे कार्यों ने केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव को बढ़ाया है। दिसम्बर 1992 की अयोध्या घटना के पश्चात् केंद्र ने भाजपा द्वारा शासित चारों राज्योंउत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश तथा राजस्थान में राज्यपाल की रिपोर्टों के आधार पर राष्ट्रपति , शासन लागू कर दिया था।

राज्यपाल का एक अधिकार जिसका प्रयोग वह अपने विवेक से करता है और राज्यपालों ने केंद्रीय सरकार के हित में इसका अत्यधिक प्रयोग किया है, वह है राज्य विधानमण्डल द्वारा पास किए गए। किसी बिल को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजना। इससे राज्य की विधायिका शक्ति प्रभावित होती है और बिल राष्ट्रपति के पास बहुत दिनों तक उसकी स्वीकृति के लिए पड़े रहते हैं। इस प्रकार केंद्र-राज्य संबंधों की दृष्टि से राज्यपाल की भूमिका अत्यन्त विवादास्पद रही है और इसने केंद्र और राज्यों के बीच कटुता और तनाव की स्थिति को बढ़ाया है।

प्रश्न 4.
केन्द्र तथा राज्य के मध्य तनाव के राजनीतिक एवं व्यावहारिक कारण लिखिए।
उत्तर :
केन्द्र तथा राज्यों के मध्य तनाव के राजनीतिक कारण केन्द्र तथा राज्य सम्बन्धों का राजनीतिक पक्ष बहुत मुखरित रहा है। केन्द्र तथा राज्य सरकारें एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लागती हैं, जिन्हें अग्रनुसार रखा जा सकता है –

(1) केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा एक – दूसरे पर संकीर्ण दलबन्दी की भावना के अनेक आरोप लगाए जाते रहे हैं। केन्द्र में कांग्रेसी शासन के साथ जब कभी किसी राज्य में गैर कांग्रेसी सरकार बनी तो उसका यही आरोप रहा कि केन्द्र राज्य सरकार को गिराने अथवा नीचा दिखाने को प्रयत्नशील है। दूसरी ओर केन्द्र का यह आरोप रहा है कि राज्य सरकार केन्द्र के साथ असहयोग की राजनीति कर रही है। इस तरह के आरोपों-प्रत्यारोपों से पारस्परिक संबंधों में तनाव पैदा होता है।

(2) डॉ० मिश्र ने लिखा है, “कुछ विपक्षी दल क्षेत्रीय साम्प्रदायिक भावनाओं की मदद से जनता में लोकप्रिय होना चाहते हैं तथा क्षेत्रीय स्तर पर निर्वाचन में सफलता प्राप्त करने के उद्देश्य से केन्द्र तथा राज्य के मध्य तनाव पैदा करते हैं। कुछ वामपन्थी दल, जिनकी लोकप्रियता कुछ क्षेत्रों तक सीमित है निर्वाचन नीति के रूप में केन्द्र के विरुद्ध राजनीतिक प्रचार करते हैं।”

केन्द्र तथा राज्यों के मध्य तनाव के व्यावहारिक कारण

केन्द्र तथा राज्य संबंधों में तनाव के लिए कतिपय व्यावहारिक कारण भी उत्तरदायी रहे हैं, जिनका उल्लेख निम्नानुसार किया जा सकता है –

  1. केन्द्र तथा राज्यों में ये तनाव पैदा हो जाता है कि राज्य द्वारा आर्थिक अनुदान अथवा आर्थिक सहायता माँगने पर केन्द्रीय सरकार एक ओर तो उदार रवैया न अपनाकर यह आरोप लगाती है। कि राज्य सरकारें अपने स्वयं के राजस्व स्रोतों का समुचित विदोहन नहीं करतीं। केन्द्र का यह भी आरोप रहा है कि कुछ राज्य सरकारें उपलब्ध राशि को विकास योजनाओं पर उचित समय पर व्यय नहीं करतीं।
  2. ओवर-ड्राफ्ट को लेकर केन्द्र एवं राज्यों के मध्य संघर्ष तथा तनाव की स्थिति बनी रहती है।
  3. अंतर्राज्यीय विवादों को हल करने के संबंध में केन्द्र सरकार की निष्पक्षता को लेकर भी आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाते रहे हैं।

प्रश्न 5.
नए राज्यों की माँग केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में तनाव का कारण किस प्रकार है?
उत्तर :
भारत की संघीय व्यवस्था में नए राज्यों के गठन की माँग को लेकर भी तनाव रहा है। राष्ट्रीय आन्दोलन ने अखिल भारतीय राष्ट्रीय एकता को नहीं बल्कि समान भाषा, क्षेत्र और संस्कृति के आधार पर एकता को भी जन्म दिया। हमारा राष्ट्रीय आन्दोलन लोकतन्त्र के लिए भी एक आन्दोलन था। अतः राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान यह भी तय किया गया कि यथासम्भव समान संस्कृति और भाषा के आधार पर राज्यों का गठन होगा।

इससे स्वतन्त्रता के बाद भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की माँग उठी। सन् 1954 में राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना की गई जिसने प्रमुख भाषाई समुदायों के लिए भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की सिफारिश की सन् 1956 में कुछ राज्यों का पुनर्गठन हुआ। इससे भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की शुरुआत हुई और यह प्रक्रिया आज भी जारी है। सन् 1960 में गुजरात और महाराष्ट्र का गठन हुआ; सन् 1966 में पंजाब और हरियाणा को अलग-अलग किया गया। बाद में पूर्वोत्तर के राज्यों का पुनर्गठन किया गया और अनेक नए राज्यों; जैसे—मेघालय, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश अस्तित्व में आए।

1990 के दशक में नए राज्य बनाने की माँग को पूरा करने तथा अधिक प्रशासकीय सुविधा के लिए कुछ बड़े राज्यों का विभाजन किया गया। बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश को विभाजित कर तीन नए राज्य क्रमश: झारखण्ड, उत्तराखण्ड और छतीसगढ़ बनाए गए। कुछ क्षेत्र और भाषाई समूह अब भी अलग राज्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं जिनमें आन्ध्र प्रदेश में तेलंगाना, उत्तर प्रदेश में हरित प्रदेश और महाराष्ट्र में विदर्भ प्रमुख हैं। सन् 2014 में आन्ध्र प्रदेश को विभाजित कर ‘तेलंगाना राज्य का गठन कर दिया गया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“भारत का संविधान अर्द्ध-संघीय शासन-व्यवस्था की स्थापना करता है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
“भारत का संविधान संघात्मक भी है और एकात्मक भी।” व्याख्या कीजिए।
या
“भारतीय संविधान का रूप संघात्मक है, लेकिन उसकी आत्मा एकात्मक।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
भारत के संघवाद के पक्ष में चार तर्क दीजिए।
या
“भारत एक संघात्मक राज्य है।” इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
या
भारतीय संघात्मक व्यवस्था के एकात्मक लक्षणों का वर्णन कीजिए।
या
भारतीय संविधान में संघ और राज्यों के बीच शक्तियों में बँटवारे का आधार और महत्त्व बताइए।
उत्तर :
भारत एक विशाल तथा विभिन्नताओं वाला राज्य है। इस प्रकार के राज्य का प्रबन्ध एक केन्द्रीय सरकार द्वारा सफलतापूर्वक चलाया जाना कठिन ही नहीं अपितु असम्भव भी है। इसी कारण भारत में संघीय शासन-व्यवस्था को अपनाया गया है। लेकिन इसके बावजूद भारत में संघात्मक स्वरूप सम्बन्धी विवाद पाया जाता है, क्योंकि भारतीय संविधान में न तो कहीं ‘संघात्मक और न ही कहीं ‘एकात्मक’ शब्द का प्रयोग किया गया है।

भारतीय संविधान के संघीय स्वरूप सम्बन्धी अपने विचारों को व्यक्त करते हुए प्रो० डी० एन० बनर्जी ने उचित ही कहा है कि “भारतीय संविधान स्वरूप में संघात्मक तथा भावना में एकात्मक है।” भारतीय संविधान के संघीय स्वरूप को भली प्रकार से समझने के लिए हमें इसके दोनों पक्षों (संघात्मक तथा एकात्मक) का अध्ययन करना पड़ेगा जो कि निम्नलिखित हैं

भारतीय संविधान की संघीय विशेषताएँ (लक्षण)

हालांकि भारतीय संविधान में ‘संघ’ शब्द का उपयोग नहीं किया गया है, लेकिन फिर भी व्यवहार में संघात्मक शासन-प्रणाली को ही स्वीकार किया गया है। भारतीय संविधान में कहा गया है कि भारत राज्यों का एक ‘संघ’ होगा। इस तथ्य की अवहेलना नहीं की जा सकती कि भारतीय संविधान में एकात्मक तत्त्व विद्यमान हैं, लेकिन यह भी अटल सत्य है कि भारतीय संविधान में संघात्मक प्रणाली के भी समस्त लक्षण विद्यमान हैं, जिन्हें निम्नलिखित रूप में व्यक्त किया जा सकता है –

(1) संविधान की सर्वोच्चता – संघात्मक शासन में संविधान को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। संविधान और संविधान द्वारा बनाये गये कानून देश के सर्वोच्च कानून होते हैं। भारतीय संविधान में संवैधानिक सर्वोच्चता का उल्लेख नहीं है, लेकिन फिर भी संविधान की सर्वोच्चता को इस रूप में स्वीकार किया गया है कि भारतीय राष्ट्रपति, संसद इत्यादि सभी संविधान से शक्तियाँ ग्रहण करते हैं और वे संविधान से ऊपर नहीं हैं। इसके अतिरिक्त, भारतीय राष्ट्रपति द्वारा शपथ ग्रहण करते समय यह स्पष्ट किया जाता है कि वह संविधान की रक्षा करेंगे इसके साथ ही भारत की संसद अथवा विधानसभा द्वारा ऐसा कोई कानून पारित नहीं किया जा सकता जो संविधान के विपरीत हो। अतः कहा जा सकता है कि भारत में संविधान की सर्वोच्चता को स्वीकार किया गया है।

(2) लिखित संविधान – संघात्मक शासन का एक लक्षण संविधान का लिखित होना भी है। यहाँ पर यह प्रश्न उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है कि संघात्मक राज्य का संविधान लिखित होना क्यों आवश्यक है? लिखित संविधान स्थायी होता है और इसके सम्बन्ध में बाद में मतभेद उत्पन्न होने की सम्भावना बहुत ही कम होती है। चूंकि संघात्मक शासन में दोहरा शासन अर्थात्के न्द्रीय शासन तथा प्रान्तों का शासन होता है, इसलिए इसमें विवादों की सम्भावना बनी रहती है। लेकिन यदि लिखित संविधान के अनुसार प्रत्येक बात को लिखित रूप में दिया गया हो तो फिर परस्पर मतभेद उत्पन्न होने की सम्भावना कम-से-कम हो जाती है।

(3) कठोर संविधान – जब संवैधानिक कानून को साधारण कानून से ऊँचा दर्जा दिया जाता है और संवैधानिक कानून को परिवर्तित करने हेतु साधारण कानून के निर्माण की प्रक्रिया से पृथक् तरीका अपनाया जाता है तो संविधान कठोर होता है। इस दृष्टि से भारतीय संविधान भी कठोर संविधान की श्रेणी में आता है। इसमें साधारण विषयों को छोड़कर महत्त्वपूर्ण संशोधन करने के लिए संघ राज्य के साथ-साथ इकाई राज्यों के सहयोग की भी आवश्यकता होती है। कठोर संविधान होने के कारण ही उसमें संशोधन प्रक्रिया जटिल है।

(4) विषयों का विभाजन – शासन के संघात्मक स्वरूप का एक लक्षण यह भी है कि इसमें विषयों का विभाजन किया जाता है। भारतीय संविधान में भी विषयों का विभाजन किया गया है। इस दृष्टि से भारतीय संविधान में तीन सूचियाँ हैं—संघीय सूची जिसमें 98 विषय हैं और जिन पर संसद ही कानून बना सकती है। राज्य सूची जिसमें 62 विषय हैं और जिन पर सामान्यतया राज्यों की विधानसभाएँ ही कानून बनाती हैं। समवर्ती सूची जिसके अन्तर्गत 52 विषय हैं और जिन पर संसद एवं विधानसभा दोनों ही कानून बना सकती हैं। अवशिष्ट विषय संघीय सरकार को सौंपे गये हैं।

(5) दोहरी शासन-व्यवस्था – संघात्मक शासन-प्रणाली में दोहरी शासन-व्यवस्था – (i) केन्द्र सरकार तथा (ii) प्रान्तों की सरकार होती है। भारत में केन्द्र सरकार नयी दिल्ली में है जो कि सम्पूर्ण देश को शासन-प्रबन्ध करती है और दूसरी सरकार प्रत्येक प्रान्त की राजधानी में है जो प्रान्त के हितों को ध्यान में रखती है।

(6) द्विसदनात्मक विधानमण्डल – संघीय सरकार में द्विसदनीय विधानमण्डल की व्यवस्था की जाती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार भारत में भी द्विसदनीय विधानमण्डल का प्रबन्ध है, जिसे संघीय संसद कहा जाता है। भारतीय संघीय संसद के उच्च सदन का नाम राज्यसभा है। संघीय संसद के निम्न (निचले) सदन का नाम लोकसभा है इसके सदस्य एक-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों में जनसाधारण द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं।

(7) न्यायपालिका की सर्वोच्चता – संघात्मक शासन में अन्य अंगों से न्यायपालिका को सर्वोच्च स्तर दिया जाता है; क्योंकि

  1. संविधान की रक्षा हेतु
  2. संविधान की व्याख्या करने हेतु तथा
  3. केन्द्र एवं राज्यों के विवादों का निपटारा करने के लिए ऐसा करना आवश्यक है।

भारतीय संविधान में भी केन्द्र में सर्वोच्च न्यायालय तथा राज्यों में उच्च न्यायालय का प्रबन्ध करके इन्हें स्वतन्त्र बनाये रखने हेतु सभी व्यवस्थाएँ की गयी हैं। ये न्यायपालिकाएँ भारतीय संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करती हैं।

भारतीय संविधान की एकात्मक विशेषताएँ (लक्षण)

(1) इकहरी (एकल) नागरिकता – एकात्मक सरकार में इकहरी नागरिकता के सिद्धान्त को अपनाया जाता है, व्यक्ति प्रान्तों के नागरिक न होकर सम्पूर्ण देश के नागरिक होते हैं भारतीय संविधान के अन्तर्गत इसी सिद्धान्त को स्वीकार किया गया है अर्थात् सभी भारतीयों को चाहे वे किसी भी प्रान्त के निवासी क्यों न हों, उन्हें भारतीय नागरिक के रूप में स्वीकार किया गया है। यह एकात्मक तत्त्व का महत्त्वपूर्ण प्रतीक है।

(2) विषयों के विभाजन का अभाव – सामान्यतः संघात्मक शासन-व्यवस्था में केन्द्र अथवा संघ को कुछ सीमित शक्तियाँ प्रदान की जाती हैं तथा शेष शक्तियाँ राज्यों को प्राप्त होती हैं। लेकिन भारत में इसके विपरीत शक्तियों का बँटवारा किया गया है जो शक्तिशाली केन्द्र का निर्माण करते हैं तथा राज्य अधिक स्वायत्तता का उपभोग नहीं कर सकते।

(3) भारत में समूचे राष्ट्र के लिए एक ही संविधान रखा गया है, जो पुनः एकात्मक तत्त्व है।

(4) एकल न्याय-व्यवस्था – भारत में एकीकृत न्याय-व्यवस्था लागू की गयी है। संयुक्त राज्य अमेरिका की भाँति भारत में दोहरी न्यायिक व्यवस्था नहीं है। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय समूचे देश का एकमात्र सर्वोच्च न्यायालय है जिसके आदेशों के विरुद्ध अपील नहीं की जा सकती।

(5) आपातकालीन स्थिति – भारतीय संविधान द्वारा अनुच्छेद 352, 356 तथा 360 में राष्ट्रपति को आपातकालीनं घोषणा करने की शक्ति प्रदान की गयी है। आपातकालीन स्थिति में राज्यों की स्वायत्तता समाप्त हो सकती है। पायली के मतानुसार, आपातकालीन स्थिति की घोषणा भारत में संघात्मक शासन के स्वरूप को समाप्त कर देती है। अन्य शब्दों में कहा जा सकता है कि आपातकाल की घोषणा होते ही बिना किसी औपचारिक संशोधन के भारतीय संविधान एकात्मक हो जाता है।

(6) राष्ट्रपति द्वारा राज्यपालों की नियुक्ति – भारतीय संघ में इकाई राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति केन्द्रीय शासन के अंग राष्ट्रपति द्वारा की जाती है तथा इन्हें उनके पद से हटाने का अधिकार भी राष्ट्रपति के ही पास है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि राज्यों के राज्यपाल केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं।

(7) संविधान संशोधन के सम्बन्ध में केन्द्र की सशक्त स्थिति – संविधान के कुछ उपबन्धों का संशोधन तो केन्द्रीय संसद साधारण कानून पारित करके, कुछ उपबन्धों का संशोधने सदन के दोनों सदन अपने-अपने दो-तिहाई बहुमत से तथा कुछ उपबन्धों का संशोधन संसद आधे से अधिक राज्यों की विधान-सभाओं की स्वीकृति से कर सकती है। राज्यों की विधानसभाएँ अपनी ओर से कोई संशोधन प्रस्तावित नहीं कर सकतीं। इस प्रकार संविधान के संशोधन की व्यवस्था में राज्यों की तुलना में केन्द्र की स्थिति सबल है।

(8) राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन करने का संसद का अधिकार – भारतीय संविधान के अनुसार संसद कानून द्वारा वर्तमान राज्यों के क्षेत्र को कम अथवा अधिक कर सकती है, उनके नाम बदल सकती है और दो अथवा उससे अधिक राज्यों को मिलाकर एक नवीन राज्य का गठन कर सकती है।

समीक्षा – भारतीय संविधान के उपर्युक्त एकात्मक लक्षणों को देखते हुए प्रो० के० सी० ह्वीयर का कथन है कि “भारतीय संविधान एक ऐसी शासन-प्रणाली की स्थापना करता है, जो अधिक-से-अधिक अर्द्धसंघीय (Quasi-federal) है। यह एक ऐसे एकात्मक राज्य की स्थापना करता है, जिसमें गौण रूप से कुछ संघात्मक तत्त्व हों।” इसी प्रकार जी० एन० जोशी का विचार है कि भारतीय संघ एक संघ नहीं, वरन् अर्द्धसंघ है, जिसमें एकात्मक राज्य की कतिपय महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का समावेश है।” डॉ० डी० डी० बसु के अनुसार, “भारतीय संविधान न तो नितान्त संघात्मक है और न ही एकात्मक, वरन् यह दोनों का मिश्रण है। इसी प्रकार पायली का मत है कि “भारत के संविधान का ढाँचा (रूप) संघात्मक व आत्मा एकात्मक है। कभी-कभी इन एकात्मक लक्षणों को संघात्मक व्यवस्था के उल्लंघनकारी तत्त्व की संज्ञा दे दी जाती है।

प्रश्न 2.
संघात्मक शासन-प्रणाली के गुण लिखिए।
उत्तर :

संघात्मक शासन-प्रणाली के गुण

संघात्मक शासन-प्रणाली के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं –

1. संघीय सरकार निरंकुश नहीं हो पाती – केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों के कार्य एवं अधिकार-क्षेत्र संविधान द्वारा निश्चित होते हैं, इसलिए केन्द्र तथा राज्यों में से कोई भी किसी अन्य की सीमा में हस्तक्षेप करके निरंकुश नहीं हो पाता है।

2. प्रशासन में कुशलता – इस व्यवस्था में केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों के बीच कार्य एवं शक्तियाँ विभाजित होती हैं। इसीलिए केन्द्रीय सरकार अपनी शक्तियों का समुचित प्रयोग करते हुए देश के महत्त्वपूर्ण कार्यों को सम्पादित करती है और स्थानीय अथवा इकाई सरकारें अपनी शक्तियों का स्वतन्त्रापूर्वक उपयोग करते हुए स्थानीय समस्याओं का समाधान करती हैं इस प्रकार देश का प्रशासन सुचारु रूप से संचालित होता है।

3. विविधता में एकता – प्रत्येक संघ सरकार में अनेक राज्य सम्मिलित होते हैं, जो विभिन्न अर्थों (जाति, धर्म, भाषा, रीति-रिवाज इत्यादि) में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, किन्तु वे अपनी सामान्य समस्याओं को सुलझाने के लिए एक सूत्र में बँधकर रहते हैं। इस प्रकार संघीय शासन के अन्तर्गत विविधता में एकता होती है।

4. बड़े देशों के लिए उपयोगी – विस्तृत क्षेत्र वाले देशों के लिए यह शासन व्यवस्था उत्तम है, क्योंकि एक ही स्थान (केन्द्र) से दूर के स्थानों का शासन ठीक प्रकार से संचालित करना कठिन होता है।

5. नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा – संघात्मक संविधानों में नागरिकों के मूल अधिकारों में सरलता से संशोधन नहीं हो सकता, क्योंकि संविधान कठोर होता है। इसके संशोधन के लिए केन्द्र तथा राज्य दोनों ही की आवश्यकता होती है।

6. स्थानीय स्वशासन में कुशलता-लॉर्ड ब्राइस के अनुसार, “संघवाद स्थानी विधानमण्डलों को काफी शक्तियाँ प्रदान करके राष्ट्रीय विधानमण्डलों को उन बहुत-से कार्यों से मुक्ति दिलाता है, जो उसके लिए अन्यथा बोझ बन जाते हैं। अत: संघीय सरकार को भी राष्ट्रीय हित के विषयों पर पूरा-पूरा ध्यान देने का अवसर मिल जाता है, जिससे प्रशासन में दृढ़ता आ जाती

7. स्थानीय स्वशासन का लाभ – संघात्मक शासन में इकाइयों को स्वशासन का पूर्ण अधिकार प्राप्त होता है, इसलिए ये अपनी जनता की आवश्यकतानुसार आचरण करके नागरिकों के हितों में वृद्धि करती हैं। विगत कुछ वर्षों से, भारत के परिप्रेक्ष्य में पंचायती राज्यों के अधिकारों में वृद्धि इसका ज्वलन्त उदाहरण है।

8. राजनीतिक चेतना एवं विश्व-संघ की ओर कदम – संघीय शासन अपने नागरिकों को श्रेष्ठ राजनीतिक प्रशिक्षण प्रदान करके उनमें राजनीतिक चेतना उत्पन्न करता है। संघ राज्य विश्व-संघ के निर्माण की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण प्रयास है।

प्रश्न 3.
केन्द्र व राज्यों के मध्य विधायी सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
संघात्मक शासन व्यवस्था की यह विशेषता होती है कि इसमें केन्द्र और इकाई राज्य सरकारों के मध्य शक्तियों, अधिकारों एवं कार्यों का संविधान द्वारा स्पष्ट विभाजन कर दिया जाता है, जिससे केंद्र एवं राज्य-सरकारों के मध्य किसी भी प्रकार का विवाद उत्पन्न न हो, दोनों सरकारें अपने-अपने कार्यों एवं उत्तरदायित्वों का समुचित रूप से पालन कर सकें और सम्पूर्ण देश में शान्ति एवं सुरक्षा का वातावरण बना रहे।

केंद्र व राज्य के मध्य विधायी संबंध

संविधान ने विधि या कानून का निर्माण करने से संबंधित विषयों की तीन सूचियाँ बनाई हैं। इन सूचियों को बनाने का उद्देश्य केंद्र और राज्यों की सरकारों के मध्य विधि-निर्माण संबंधी क्षेत्रों को विभक्त करनी है। ये सूचियाँ निम्नलिखित हैं –

1. संघ सूची (Union List) – इस सूची के अंतर्गत उन विषयों को रखा गया है, जिन पर केवल केंद्र सरकार की कानूनों का निर्माण कर सकती है। ये विषय बहुत महत्त्वपूर्ण एवं राष्ट्रीय स्तर के हैं। इस संघ सूची में 97 विषय हैं। इस सूची के प्रमुख विषय–रक्षा, वैदेशिक मामले, युद्ध व संधि तथा बैंकिंग आदि हैं।

2. राज्य सूची (State List) – मूल संविधान में इस सूची में 66 विषय थे। परन्तु 42वें संवैधानिक संशोधन के उपरान्त अब इस सूची में 62 विषय रह गए हैं। इन सब विषयों से संबंधित कानूनों का निर्माण करने का अधिकार राज्य सरकारों को होता है। वैसे तो इन विषयों पर केवल राज्य सरकारें ही कानून बना सकती हैं; किंतु कुछ विशेष स्थितियों में केंद्र सरकार भी इन विषयों पर कानून बना सकती है। इस सूची के प्रमुख विषय-पुलिस, न्याय, कृषि, स्थानीय स्वशासन आदि हैं।

3. समवर्ती सूची (Concurrent List) – मूल संविधान में इस सूची में 47 विषय थे, परन्तु अब इस सूची में 52 विषय हो गए हैं। इन विषयों पर राज्य एवं केंद्र-दोनों सरकारों को कानून बनाने का समान अधिकार है, परन्तु मतभेद की स्थिति में संघ सरकार के कानून को प्राथमिकता दी जाती है। इस सूची के प्रमुख विषय फौजदारी विधि-प्रक्रिया, शिक्षा, विवाह, न्यास (ट्रस्ट), वन आदि हैं।

4. अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers) – यदि कोई विषय उपर्युक्त तीनों सूचियों में सम्मिलित न हो तो वह अवशिष्ट विषय कहा जाता है और उस पर कानून बनाने का अधिकार केवल संघ सरकार को ही है।

अतः इन सूचियों के विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारों के विधि-निर्माण से संबंधित अधिकार-क्षेत्र पृथक्-पृथक् हैं। इस विभाजन के आधार पर यह भी स्पष्ट होता है कि केन्द्र सरकार राज्य सरकार की तुलना में अधिक शक्तिसम्पन्न है। यद्यपि समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार दोनों सरकारों को प्राप्त होता है; किन्तु सामान्यतया इन विषयों पर संसद ही कानूनों का निर्माण करती है तथा मतभेद होने की स्थिति में संघ सरकार का कानूनी मान्य होता है।

[नोट – 42वें संवैधानिक संशोधन 1976 के द्वारा राज्य सूची के चार विषय (शिक्षा, वन, वन्य जीव-जन्तुओं और पक्षियों का रक्षण तथा नाप-तौल (समवर्ती सूची में सम्मिलित कर दिए गए तथा समवर्ती सूची में एक नया विषय जनसंख्या नियन्त्रण और परिवार नियोजन’ जोड़ा गया। अब समवर्ती सूची में 52 विषय और राज्य सूची में 62 विषय रह गए हैं।]

राज्य सूची के विषयों पर कानून-निर्माण की संसद की शक्ति – संविधान ने संसद को विशेष परिस्थितियों में राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बनाने का अधिकार दिया है। ये परिस्थितियाँ निम्नलिखित हैं –

1. संकटकाल की घोषणा के समय – आपातकाल में राज्य सूची के अंतर्गत आने वाले विषयों पर संसद को विधि-निर्माण का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।

2. राज्य सूची का कोई विषय राष्टीय महत्त्व का होने पर – यदि राज्यसभा अपने दो-तिहाई बहुमत से अपने एक प्रस्ताव के माध्यम से राज्य सूची के किसी विषय के संबंध में यह घोषणा कर दे कि राष्ट्रीय हित में उस विषय पर केंद्रीय सरकार को कानून-निर्माण करना चाहिए तो केंद्रीय सरकार (संसद) उस विषय पर कानून बना सकती है। यह कानून एक वर्ष तक लागू रह सकता है। राज्यसभा इसी आशय का दोबारा प्रस्ताव पारित करके इसकी अंवधि में वृद्धि कर सकती है।

3. राज्यों के विधानमण्डलों की प्रार्थना पर – यदि दो या दो से अधिक राज्यों के विधानमण्डल यह प्रस्ताव पारित करें या याना करें कि राज्य सूची के अधीन किसी विषय पर संसद कानून बनाए तो संसद उस विषय पर भी कानून बनाती है।

4. विदेशी राज्यों से संधि के पालन करने के लिए – संविधान के अनुसार संसद को ही किसी संधि, समझौते या अन्य देशों के साथ होने वाले सभी प्रकार के समझौतों का पालन करवाने हेतु कानून बनाने का अधिकार है, भले ही वे विषय राज्य सूची के अंतर्गत आते हों।

5. राज्य में संवैधानिक व्यवस्था भंग होने पर – यदि किसी राज्य में संवैधानिक संकट उत्पन्न हो जाए या इस राज्य का संवैधानिक तन्त्र विफल हो जाए तो अनुच्छेद 356 के अंतर्गत लगाए गए राष्ट्रपति शासन के अंतर्गत राष्ट्रपति राज्य विधानमण्डल के समस्त अधिकार संसद को प्रदान कर सकता है।

6. राज्यपाल द्वारा विधेयक को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना – राज्य के राज्यपाल को यह शक्ति प्राप्त है कि वह राज्य व्यवस्थापिका द्वारा पारित किसी भी विधेयक को राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए आरक्षित कर सकता है। राष्ट्रपति को अधिकार है कि वह उस विधेयक को स्वीकार करे अथवा अस्वीकार करे। केंद्र तथा राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन होने पर भी विशेष स्थितियों में केंद्र को राज्यों के विषयों पर कानून-निर्माण के व्यापक अधिकार प्राप्त हैं।

प्रश्न 4.
केन्द्र और राज्यों के प्रशासनिक सम्बन्धों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :

केन्द्र और राज्यों के प्रशासनिक सम्बन्ध

श्री दुर्गादास बसु के शब्दों में, “संघीय व्यवस्था की सफलता और दृढ़ता संघ की विविध सरकारों के बीच अधिकाधिक सहयोग तथा समन्वय पर निर्भर करती है। इसी कारण प्रशासनिक सम्बन्धों की व्यवस्था करते हुए जहाँ राज्यों को अपने-अपने क्षेत्रों में सामान्यतः स्वतन्त्रता प्रदान की गयी है वहाँ इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि राज्यों के प्रशासनिक तन्त्र पर संघ का नियन्त्रण बना रहे और संघ तथा राज्यों के बीच संघर्ष की सम्भावना कम-से-कम हो जाए। राज्य सरकारों पर संघीय शासन के नियन्त्रण की व्यवस्था निम्नलिखित उपायों के आधार पर की गयी है –

(1) राज्य सरकारों को निर्देश – केन्द्र द्वारा राज्यों को निर्देश सामान्यतया संघीय व्यवस्था के अनुकूल नहीं समझे जाते हैं, लेकिन भारतीय संघ में केन्द्र द्वारा राज्य सरकारों को निर्देश देने की व्यवस्था की गयी है। संविधान के अनुच्छेद 256 में स्पष्ट कहा गया है कि “प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार होगा कि संसद द्वारा निर्मित कानूनों का पालन सुनिश्चित रहे।

(2) राज्य सरकारों को संघीय कार्य सौंपना – संघीय सरकार राज्य सरकारों को कोई भी कार्य सौंप सकती है। यदि राज्यों की सरकार या उसके अधिकारी उसे पूरा न करें, तो राष्ट्रपति को अधिकार है कि वह संकटकालीन स्थिति की घोषणा कर राज्य शासन अपने हाथ में ले ले।

(3) अखिल भारतीय सेवाएँ – संविधान संघ तथा राज्य सरकारों के लिए अलग-अलग सेवाओं की व्यवस्था करता है, लेकिन कुछ ऐसी सेवाओं की भी व्यवस्था करता है जो संघ तथा राज्य सरकारें दोनों के लिए सामान्य हैं। इन्हें अखिल भारतीय सेवाएँ कहते हैं और इन सेवाओं के अधिकारियों पर संघीय सरकार का विशेष नियन्त्रण रहता है।

(4) सहायता अनुदान – संघीय शासन द्वारा राज्यों को आवश्यकतानुसार सहायता अनुदान भी दिया जा सकता है। अनुदान देते समय संघ राज्यों पर कुछ शर्ते लगाकर उनके व्यय को भी नियन्त्रित कर सकता है।

(5) अन्तर्राज्यीय नदियों पर नियन्त्रण – संसद को अधिकार है कि वह विधि द्वारा किसी अन्तर्राज्यीय नदी अथवा इसके जल के प्रयोग, वितरण या नियन्त्रण के सम्बन्ध में व्यवस्था करे।

(6) अन्तर-राज्य परिषद् (Inter-State Council) की स्थापना (जून 1990 ई०) – भारतीय संविधान के अनुच्छेद 263 में एक ‘अन्तर-राज्य परिषद् की स्थापना का प्रावधान किया गया है और राजमन्नार आयोग, प्रशासनिक सुधार आयोग तथा सबसे अन्त में सरकारिया आयोग, जिसने नवम्बर, 1987 ई० में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की; इन सभी ने अपनी सिफारिशों में इस बात पर बल दिया कि अन्तर- राज्य परिषद् की स्थापना की जानी चाहिए, लेकिन व्यवहार में मई 1990 ई० तक अन्तर-राज्य परिषद् की स्थापना नहीं की गयी थी  इस परिषद् की स्थापना जून 1990 ई० में की गयी है। यह परिषद् संघीय व्यवस्था और केन्द्र-राज्य सम्बन्धों के सुचारु संचालन हेतु एक विचार-मंच का कार्य करेगी। परिषद् के दिन प्रतिदिन के कार्य हेतु एक स्थायी सचिवालय की स्थापना की गयी है।

(7) संचार साधनों की रक्षा – समस्त भारतीय संघ के संचार साधनों की रक्षा का भार भी संघीय सरकार पर ही है। संघ सरकार राज्यों के अन्तर्गत हवाई अड्डों, रेलों तथा अन्य राष्ट्रीय महत्त्व के आवागमन और संचार साधनों की रक्षा के लिए राज्य सरकारों को आवश्यक आदेश दे सकती है जिनका पालन राज्य सरकारों के लिए आवश्यक है। इन आदेशों के पालन में राज्य सरकारों को जो अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा, वह संघ सरकार राज्य सरकार को देगी।

(8) राष्ट्रपति द्वारा राज्यपालों की नियुक्ति – इस सबके अतिरिक्त राज्य सरकारों पर संघीय शासन के नियन्त्रण का एक प्रमुख उपाय यह है कि प्रधानमन्त्री के परामर्श से राष्ट्रपति राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति करता है जो वहाँ राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं।

(9) मुख्यमन्त्री तथा अन्य मन्त्रियों के विरुद्ध आरोपों की जाँच – यदि किसी राज्य में मुख्यमन्त्री या मन्त्रियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार या अन्य किसी प्रकार के आरोप लगाये जाते हैं तो इस प्रकार का आरोप-पत्र कार्यवाही के लिए राष्ट्रपति को भेज दिया जाता है और केन्द्रीय सरकार को ही इस बात के सम्बन्ध में निर्णय लेने का अधिकार है कि इन आरोपों की न्यायिक जाँच करवानी चाहिए अथवा नहीं। आरोप सिद्ध हो जाने पर केन्द्रीय सरकार सम्बन्धित मन्त्रियों को पद छोड़ने के लिए कह सकती है। पंजाब के मुख्यमन्त्री कैरो और ओडिशा के मुख्यमन्त्री वीरेन मित्रा को न्यायिक जाँच में दोषी पाये जाने पर ही त्याग-पत्र देना पड़ा था।

(10) राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करना – इन सबके अलावा संविधान के अनुच्छेद 356 में कहा गया है कि यदि किसी राज्य में संवैधानिक तन्त्र भंग हो जाता है तो राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर या अपने विवेक से राष्ट्रपति द्वारा उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है। राज्य में संवैधानिक तन्त्र भंग हुआ है अथवा नहीं; इस सम्बन्ध में निर्णय लेने की शक्ति राष्ट्रपति अर्थात् केन्द्रीय शासन को ही प्राप्त है और राष्ट्रपति शासन की यह बड़ी छड़ी राज्यों को केन्द्र के सभी निर्देश मानने के लिए बाध्य करती है। इस प्रकार प्रशासनिक क्षेत्र में राज्यों पर भारत सरकार को प्रभावदायक नियन्त्रण है, लेकिन इनके साथ यह नहीं भुला देना चाहिए कि ये प्रावधान बहुत अधिक सावधानीपूर्वक और संकटकाल में ही उपयोग के लिए हैं। सामान्यतया राज्य को कानून निर्माण और प्रशासन के सम्बन्ध में अपने निश्चित क्षेत्र में पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त होगी।

प्रश्न 5.
केन्द्र और राज्यों के मध्य वित्तीय सम्बन्धों की परीक्षण कीजिए।
उत्तर :
वित्तीय क्षेत्र में संविधान के द्वारा संघ व राज्य सरकारों के क्षेत्र अलग-अलग कर दिये गये हैं। तथा दोनों ही सरकारें सामान्यतया अपने-अपने क्षेत्र में स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करती हैं। इस सम्बन्ध में संविधान द्वारा की गयी व्यवस्था निम्न प्रकार है –

संघीय आय के साधन – संघीय सरकार को आय के अलग साधन प्राप्त हैं। इन साधनों में कृषि आय को छोड़कर अन्य आय पर कर, सीमा-शुल्क, निर्यात-शुल्क, उत्पादन-शुल्क, निगम कर, कम्पनियों के मूल धन पर कर, कृषि भूमि को छोड़कर अन्य सम्पत्ति शुल्क आदि प्रमुख हैं।

राज्यों की आय के साधन – वित्त के क्षेत्र में राज्य सरकार के आय के साधन भी अलग कर दिये गये हैं। उनमें भू-राजस्व, कृषि आयकर, कृषि भूमि का उत्तराधिकार शुल्क व सम्पत्ति शुल्क, मादक वस्तुओं पर उत्पादन कर, बिक्री कर, यात्री कर, मनोरंजन कर, दस्तावेज कर आदि प्रमुख हैं। (42वें संवैधानिक संशोधन द्वारा रेडियो और टेलीविजन से प्रसारित विज्ञापनों पर कर राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में रख दिया गया है।)

व्यय की प्रमुख मदें – संघीय शासन की व्यय की मदें सेना, परराष्ट्र सम्बन्ध आदि हैं, जब कि राज्य शासन के व्यय की मुख्य मदें पुलिस, कारावास, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य आदि हैं।

राज्यों की वित्तीय सहायता – क्योंकि राज्यों की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपर्युक्त साधन पर्याप्त नहीं समझे गये, इसलिए संघीय शासन द्वारा राज्यों को वित्तीय सहायता की व्यवस्था की गयी है, जो इस प्रकार है।

पहले प्रकार के कर ऐसे हैं जो केन्द्र द्वारा लगाये और वसूल किये जाते हैं, पर जिनकी सम्पूर्ण आय राज्यों में बाँट दी जाती है। इस प्रकार के करों में प्रमुख रूप से उत्तराधिकार कर, सम्पत्ति कर, समाचार-पत्र कर आदि आते हैं।

दूसरे प्रकार के वे कर हैं, जो केन्द्र निर्धारित करता, किन्तु राज्य एकत्रित करते और अपने उपयोग में लाते हैं। स्टाम्प शुल्क करं एक ऐसा ही कर है। केन्द्र शासित क्षेत्रों में इन करों की वसूली केन्द्रीय सरकार करती है।

तीसरे प्रकार के कर वे हैं जो केन्द्र द्वारा लगाये व वसूल किये जाते हैं, पर जिनकी शुद्ध आय संघ व राज्यों के बीच बाँट दी जाती है। कृषि आय के अतिरिक्त अन्य आय पर कर प्रमुख रूप से इसी प्रकार का कर है।

राज्यों को अनुदान – संविधान के अनुच्छेद 275 के अनुसार जिन राज्यों को संसद विधि द्वारा अनुदान देना निश्चित करे उन राज्यों को अनुदान दिया जाएगा। ये अनुदान पिछड़े हुए वर्गों को ऊँचा उठाने और अन्य विकास योजनाओं को पूरा करने के लिए दिये जाएँगे।

सार्वजनिक ऋण प्राप्ति की व्यवस्था – संघीय सरकार अपनी संचित निधि की जमानत पर संसद की आज्ञानुसार ऋण ले सकती है। राज्यों की सरकारें भी विधानमण्डल द्वारा निर्धारित सीमा तक ऋण ले सकती हैं। संघीय सरकार विदेशों से भी ऋण ले सकती है, किन्तु राज्य सरकारें ऐसा नहीं कर सकतीं।

वित्त आयोग – संविधान के अनुच्छेद 280 में व्यवस्था में की गयी है कि प्रति 5 वर्ष बाद राष्ट्रपति एक वित्त आयोग की स्थापना करेगा। इस आयोग के द्वारा संघ और राज्य सरकारों के बीच करों के वितरण, भारत की संचित निधि में से धन के व्यय तथा वित्तीय व्यवस्था से सम्बन्धित अन्य विषयों पर सिफारिश करने का कार्य किया जाएगा।

प्रश्न 6.
केंद्र तथा राज्य के मध्य तनाव के सांविधानिक कारण लिखिए।
उत्तर :

केन्द्र तथा राज्यों के मध्य तनाव के सांविधानिक कारण

समय-समय पर केन्द्र तथा राज्य सरकारों के मध्य उपस्थित होने वाले संघर्ष एवं तनावों के कारणों को निम्नलिखित वर्गों में रखा गया है –

(1) भारतीय संविधान में शक्तियों का वितरण केन्द्र के पक्ष में अधिक है। संघ सूची तथा समवर्ती सूची में केन्द्रीय कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका को इतने अधिकार प्रदान किए गए हैं कि राज्यों की स्वायत्तता पर आँच आ सकती है। 1970 में तमिलनाडु सरकार द्वारा नियुक्त राजमन्नार समिति ने सिफारिश की थी कि –

  1. संघ सूची तथा समवर्ती सूची में से कुछ शक्तियाँ निकालकर राज्य सूची में डाल देनी चाहिए।
  2. वित्त आयोग को एक अस्थायी अधिकरण बना देना चाहिए, एवं
  3. केन्द्रीय राजस्व स्रोतों को हटाकर राज्यों को हस्तान्तरित कर देना चाहिए जिससे केन्द्र पर राज्यों की वित्तीय निर्भरता कम हो।

(2) राज्य सदैव यह अनुभव करते हैं कि उनकी विधायी तथा प्रशासनिक शक्तियाँ सीमित हैं तथा उन्हें अपने निर्णयों के कार्यान्वयन में केन्द्र के निर्णय का इन्तजार करना पड़ता है। जब केन्द्र तथा राज्य में एक ही दल की सरकार रहती है तब तो समस्या प्रबल नहीं हो पाती है, किन्तु विपरीत स्थिति में तनाव प्रायः बढ़ जाता है। उदाहरणार्थ-1967 के पश्चात् राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं तो शक्तियों के पुनः वितरण की आवाज विशेष रूप से उठाई गई।

(3) राज्यपाल केन्द्र द्वारा नियुक्त ऐसे शक्तिशाली अभिकरण हैं जो राज्यों में केन्द्र का वर्चस्व रखने में सहयोग देते हैं। संविधान उन्हें अधिकार देता है कि समवर्ती सूची में संबंधित विधेयकों को वे राष्ट्रपति की अनुमति के लिए सुरक्षित रखें तथा केन्द्रीय सरकार को यह अवसर प्रदान करें कि वह राष्ट्रपति द्वारा राज्यों द्वारा पारित विधेयक अथवा विधेयकों को अस्वीकृत करा दे। केरल के राज्यपाल ने ई०एम०एस० नम्बूदरीपाद के नेतृत्व वाली साम्यवादी सरकार का प्रगतिशील भूमि सुधार विधेयक राष्ट्रपति की अनुमति के लिए सुरक्षित रख लिया था। इसके पश्चात् केन्द्रीय सरकार ने इस विधेयक को राष्ट्रपति द्वारा अस्वीकृत करा दिया। गैर-कांग्रेसी राज्य सरकारें राज्यपालों की भूमिका से सशंकित रहती हैं। आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एन०टी० रामाराव ने तो उन्हें केन्द्रीय जासूस’ तक की संज्ञा दे दी थी। अनेक अवसरों पर गैर-कांग्रेसी सरकारों द्वारा राज्यपाल पद को ही समाप्त करने की माँग की गई है। राज्यपाल पद ने केन्द्र-राज्य संबंधों में तनाव तथा संघर्ष की स्थिति उत्पन्न की है।

(4) आपातकालीन उपबन्धों ने संविधान को एकात्मक स्वरूप प्रदान कर दिया है तथा आपातकाल के समय राज्य सम्पूर्णत: केन्द्र निर्देशित इकाइयाँ बन जाते हैं। यह स्थिति कुछ राज्य सरकारों हेतु बहुत अप्रिय रही है। तनाव के सांविधानिक कारणों का अध्ययन करने पर यह लक्ष्य सामने आती है। राज्य चाहते हैं कि उन्हें अधिक स्वायत्तता प्रदान की जाए तथा उन पर केन्द्र का अंकुश न रहे।

प्रश्न 7.
अनुच्छेद 370 के सन्दर्भ में बताइए कि जम्मू-कश्मीर राज्य की स्थिति भारतीय संघ के अन्य राज्यों से किस प्रकार भिन्न है?
या
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 पर अपने विचार लिखिए।
या
भारतीय संविधान की धारा 370 के अन्तर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को दी गयी किन्हीं दो सुविधाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर राज्य की स्थिति भारतीय संघ के अन्य राज्यों से भिन्न है –

(1) भारतीय संघ के अन्य किसी भी राज्य का अपना संविधान नहीं है, लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य का अपना संविधान है जो 26 नवम्बर, 1957 ई० में लागू हुआ था तथा जम्मू-कश्मीर राज्य का प्रशासन इस संविधान के उपबन्धों के अनुसार चलता है।

(2) भारतीय संविधान द्वारा संघ और राज्यों के बीच जो शक्ति-विभाजन किया गया है, उसके अन्तर्गत अवशेष शक्तियाँ संघीय सरकार को सौंपी गयी हैं और अवशेष विषयों के सम्बन्ध में कानून- निर्माण का अधिकार संघीय संसद को प्राप्त है, लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य इस सम्बन्ध में अपवाद है। अनुच्छेद 370 में व्यवस्था की गयी है कि जम्मू-कश्मीर राज्य के सम्बन्ध में अवशेष शक्तियाँ जम्मू-कश्मीर राज्य के पास ही रहेंगी।

(3) इस राज्य के लिए विधि बनाने की संघीय संसद की शक्ति संघ सूची और समवर्ती सूची के उन विषयों तक सीमित होगी, जिनको जम्मू-कश्मीर राज्य की सरकार के साथ परामर्श करके उन विषयों के ‘तत्स्थानी विषय’ (Correspond to matters) घोषित कर दें, जिनके सम्बन्ध में ‘अधिमिलन-पत्र’ में भारतीय संसद को अधिकार दिया गया है।

(4) संसद संघ सूची और समवर्ती सूची के अन्य विषयों पर विधि राज्य सरकार की सहमति से ही बना सकेगी।

(5) संविधान के आपातकालीन प्रावधानों के सम्बन्ध में भी जम्मू-कश्मीर राज्य के प्रसंग में विशेष व्यवस्था है। अनुच्छेद 352, जिसके अन्तर्गत राष्ट्रपति को राष्ट्रीय संकट की घोषणा करने का अधिकार प्राप्त है, जम्मू-कश्मीर राज्य में एक सीमा तक ही और जम्मू-कश्मीर राज्य की सहमति से ही लागू हो सकता है। अनुच्छेद 360, जो राष्ट्रपति को वित्तीय संकट घोषित करने का अधिकार देता है, जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होता। अनुच्छेद 356 के उपबन्ध अर्थात् राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की व्यवस्था जम्मू-कश्मीर राज्य पर भी लागू होगी।

(6) भारत के नागरिक स्वत: ही जम्मू-कश्मीर के नागरिक नहीं बन जाते, उन्हें जम्मू-कश्मीर राज्य में बसने का भी कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है। भारत संघ के अन्य राज्यों के निवासियों को जम्मू-कश्मीर राज्य में भूमि अथवा अन्य कोई चल सम्पत्ति प्राप्त करने का अधिकार भी नहीं है। अनुच्छेद 370 के कारण ही केन्द्र के अनेक लाभकारी और प्रगतिशील कानून; जैसे-सम्पत्ति कर, शहरी भूमि सीमा कानून और उपहार कर, इत्यादि यहाँ लागू नहीं हो सकते।

(7) राज्य की नीति के निदेशक तत्त्वों से सम्बन्धित संविधान के भाग 4 के उपबन्ध जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होते हैं।

(8) संसद जम्मू-कश्मीर राज्य के विधानमण्डल की सहमति के बिना उस राज्य के नाम, क्षेत्र या सीमाओं में कोई परिवर्तन नहीं कर सकती।

(9) अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान में किये गये संशोधन जम्मू-कश्मीर राज्य में तब तक लागू नहीं होंगे, जब तक कि राष्ट्रपति आदेश द्वारा उसे जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू नहीं कर दें।

जम्मू – कश्मीर राज्य के सम्बन्ध में धारा 370 की आलोचना अथवा विवाद

जम्मू – कश्मीर राज्य को भारतीय संघ में यह विशेष स्थिति तत्कालीन विशेष परिस्थितियों के कारण प्रदान की गयी थी। जम्मू-कश्मीर राज्य को प्राप्त यह विशेष स्थिति संविधान का अस्थायी या संक्रमणकालीन प्रावधान ही है और इस कारण यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर राज्य को सदैव ही यह विशेष स्थिति प्राप्त रहेगी। वर्तमान समय में भारत की एकता और अखण्डता के प्रबल समर्थकों और भारतीय राजनीति के एक प्रमुख दल भाजपा द्वारा यह कहा जाता है कि जम्मू-कश्मीर में आज आतंकवाद और अलगाववाद की जो स्थिति समय-समय पर खड़ी हो जाती है उसका मूल कारण अनुच्छेद 370 या भारतीय संघ के अन्तर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को प्राप्त विशेष स्थिति है तथा अलगाववाद की इस स्थिति को समाप्त करने हेतु अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। जम्मू-कश्मीर राज्य के भूतपूर्व राज्यपाल जगमोहन ने अपनी पुस्तक ‘कश्मीर : समस्या और विश्लेषण’ में पूरे विस्तार के साथ विचार व्यक्त किया है कि “अनुच्छेद 370 विविध निहित स्वार्थों के हाथों शोषण का साधन बन गया है। इस अनुच्छेद के कारण एक दुष्चक्र स्थापित हो गया है जो अलगाववादी शक्तियों को जन्म देता है और ये शक्तियाँ बदले में अनुच्छेद 370 को मजबूत बनाती हैं।” जगमोहन के इस विश्लेषण में तार्किकता और सत्य का अंश है। यह तथ्य है कि अनुच्छेद 370 के कारण अलगाववादी तत्त्वों ने अपनी शक्ति में वृद्धि की है तथा यह अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर राज्य के आर्थिक विकास में भी एक प्रमुख बाधक तत्त्व रहा है। लेकिन इसके साथ ही यह भी तथ्य है कि जम्मू-कश्मीर राज्य में आज आतंकवाद और अलगाववाद की जो स्थिति है, अनुच्छेद 370 उसका मूल कारण नहीं है। आज की परिस्थितियों में अटल बिहारी वाजपेयी का यह कथन अधिक सत्य है। कि “मेरा मानना यह है कि केवल धारा 370 हटाने से ही कश्मीर-समस्या हल नहीं हो सकती।” राजनीतिक दलों के आपसी मतभेदों के कारण ही सरकार ने अनुच्छेद 370 को अब स्थायी कर दिया है। 27 जून, 2000 ई० को जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने तीन-चौथाई बहुमत से स्वायत्तता प्रस्ताव पारित किया जिसे स्वीकार करना सम्भव नहीं है। इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 370 को समाप्त करने का यह निश्चित रूप से उपयुक्त समय नहीं है। यदि आज अनुच्छेद 370 को समाप्त करने का प्रयत्न किया जाए, तो वह जम्मू-कश्मीर राज्य की स्थिति को अधिक चुनौतीपूर्ण बना सकता है। निष्कर्षतः । भविष्य में अनुच्छेद 370 को समाप्त किया जा सकता है और किया जाना चाहिए, लेकिन आज इस कार्य के लिए उपयुक्त समय नहीं है।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 6 Judiciary

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 6 Judiciary (न्यायपालिका)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को सुनिश्चित करने के विभिन्न तरीके कौन-कौन से हैं? निम्नलिखित में जो बेमेल हो उसे छाँटें-
(क) सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से सलाह ली जाती है।
(ख) न्यायाधीशों को अमूमन अवकाश-प्राप्ति की आयु से पहले नहीं हटाया जाता।
(ग) उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का तबादला दूसरे उच्च न्यायालय में नहीं किया जा सकता।
(घ) न्यायाधीशों की नियुक्ति में संसद की दखल नहीं है।
उत्तर-
उपर्युक्त कथनों में (ग) बेमेल कथन है जिसमें यह कहा गया है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का तबादला दूसरे उच्च न्यायालय में नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 2.
क्या न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ यह है कि न्यायपालिका किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है। अपना उत्तर अधिकतम 100 शब्दों में लिखें।
उत्तर-
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता से आशय यह बिल्कुल नहीं है कि न्यायपालिका किसी के प्रति जवाबदेह न हो, न्यायपालिका भी संविधान को ही भाग है, वह संविधान के ऊपर नहीं है। न्यायपालिका भी संविधान के अनुसार ही कार्य करेगी। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ यह है कि न्यायपालिका बिना किसी अनावश्यक हस्तक्षेप के अपना कार्य करे व इसके निर्णयों को सम्मानपूर्वक स्वीकार किया जाए। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ यह भी है कि न्यायाधीश अपनी नियुक्ति के लिए, सेवाकाल के लिए, सेवाशर्ती व सेवा सुविधाओं के लिए कार्यपालिका व विधायिका पर निर्भर न हो। न्यायाधीश को हटाने का तरीका भी पक्षपातरहित हो। भारत में न्यायपालिका स्वतन्त्र है तथा उसे सम्मानजनक स्थान प्राप्त है।

प्रश्न 3.
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को बनाए रखने के लिए संविधान के विभिन्न प्रावधान कौन-कौन से हैं?
उत्तर-
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को बनाए रखने के लिए भारतीय संविधान में निम्नलिखित प्रावधान हैं-

  1. न्यायाधीशों की नियुक्ति में संसद व विधानसभाओं की कोई भूमिका नहीं है।
  2. न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए निश्चित योग्यताएँ व अनुभव दिए गए हैं।
  3. न्यायपालिका अपने वेतन, भत्तों व अन्य आर्थिक सुविधाओं के लिए कार्यपालिका अथवा संसद पर निर्भर नहीं है। उनके खर्चे से सम्बन्धित बिल पर बहस व मतदान नहीं होता।
  4. न्यायाधीशों का सेवाकाल लम्बा व सुनिश्चित होता है यद्यपि कुछ परिस्थितियों में इनको हटाया भी जा सकती है परन्तु महाभियोग की प्रक्रिया काफी लम्बी व मुश्किल होती है।
  5. न्यायाधीशों के कार्यों व निर्णयों के आधार पर उनकी व्यक्तिगत आलोचना नहीं की जा सकती।
  6. जो न्यायालय की व इसके निर्णयों की अवमानना करते हैं, न्यायालय उन्हें दण्डित कर सकता है।
  7. न्यायालय के निर्णय बाध्यकारी होते हैं।

प्रश्न 4.
नीचे दी गई समाचार-रिपोर्ट पढे और उनमें निम्नलिखित पहलुओं की पहचान करें
(क) मामला किसे बारे में है?
(ख) इस मामले में लाभार्थी कौन है?
(ग) इस मामले में फरियादी कौन है?
(घ) सोचकर बताएँ कि कम्पनी की तरफ से कौन-कौन से तर्क दिए जाएँगे?
(ङ) किसानों की तरफ से कौन-से तर्क दिए जाएँगे?
सर्वोच्च न्यायालय ने रिलायंस से दहानु के किसानों को 300 करोड़ रुपये देने को कहा – निजी कारपोरेट ब्यूरो, 24 मार्च 2005
मुंबई – सर्वोच्च न्यायालय ने रिलायंस एनर्जी से मुंबई के बाहरी इलाके दहानु में चीकू फल उगाने वाले किसानों को 300 करोड़ रुपये देने के लिए कहा है। चीकू उत्पादक किसानों ने अदालत में रिलायंस के ताप-ऊर्जा संयंत्र से होने वाले प्रदूषण के विरुद्ध अर्जी दी थी। अदालत ने इसी मामले में अपना फैसला सुनाया है।
दहानु मुंबई से 150 किमी दूर है। एक दशक पहले तक इस इलाके की अर्थव्यवस्था खेती और बागवानी के बूते आत्मनिर्भर थी और दहानु की प्रसिद्धि यहाँ के मछली-पालन तथा जंगलों के कारण थी। सन् 1989 में इस इलाके में ताप-ऊर्जा संयंत्र चालू हुआ और इसी के साथ शुरू हुई इस इलाके की बर्बादी। अगले साल इस उपजाऊ क्षेत्र की फसल पहली दफा मारी गई। कभी महाराष्ट्र के लिए फलों का टोकरा रहे दहानु की अब 70 प्रतिशत फसल समाप्त हो चुकी है। मछली पालन बंद हो गया है और जंगल विरल होने लगे हैं। किसानों और पर्यावरणविदों का कहना है कि ऊर्जा संयंत्र से निकलने वाली राख भूमिगत जल में प्रवेश कर जाती है और पूरा पारिस्थितिकी-तंत्र प्रदूषित हो जाता है। दहानु तालुका पर्यावरण सुरक्षा प्राधिकरण ने ताप-ऊर्जा संयंत्र को प्रदूषण नियंत्रण की इकाई स्थापित करने का आदेश दिया था ताकि सल्फर का उत्सर्जन कम हो सके। सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्राधिकरण के आदेश के पक्ष में अपना फैसला सुनाया था। इसके बावजूद सन् 2002 तक प्रदूषण नियंत्रण का संयंत्र स्थापित नहीं हुआ। सन् 2003 में रिलायंस ने ताप-ऊर्जा संयंत्र को हासिल किया और सन् 2004 में उसने प्रदूषण-नियंत्रण संयंत्र लगाने की योजना के बारे में एक खाका प्रस्तुत किया। प्रदूषण नियंत्रण संयंत्र चूँकि अब भी स्थापित नहीं हुआ था, इसलिए दहानु तालुका पर्यावरण सुरक्षा प्राधिकरण ने रिलायंस से 300 करोड़ रुपये की बैंक-गारंटी देने को कहा।
उत्तर-
(क) मामला दहानु मुंबई क्षेत्र के चीकू पैदा करने वाले उन किसानों को मुआवजा देने के बारे में है जिनका थर्मल पावर प्लांट के नुकसानदायक रिसाव के कारण भारी नुकसान हुआ है।
(ख) इस मामले में दहानु क्षेत्र के चीकू उत्पादन करने वाले किसान लाभान्वित हुए हैं।
(ग) इस मामले में दहानु क्षेत्र के चीकू उत्पादन करने वाले किसान फरियादी हैं।
(घ) रिलायंस कम्पनी ने न्यायालय में तर्क दिया कि थर्मल पावर प्लांट के नुकसानदायक रिसाव को नियन्त्रित करने के लिए एक प्रदूषण नियन्त्रक बोर्ड का गठन किया जाना चाहिए।
(ङ) किसानों ने पर्यावरणविदों के सहयोग से कहा था कि ऊर्जा संयंत्र से निकलने वाली राख से भूमिगत जल प्रभावित हुआ है।

प्रश्न 5.
नीचे की समाचार-रिपोर्ट पढे और चिह्नित करें कि रिपोर्ट में किस-किस स्तर की सरकार सक्रिय दिखाई देती है?
(क) सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका की निशानदेही करें।
(ख) कार्यपालिका और न्यायपालिका के कामकाज की कौन-सी बातें आप इसमें पहचान सकते हैं?
(ग) इस प्रकरण से सम्बद्ध नीतिगत मुद्दे, कानून बनाने से सम्बन्धित बातें, क्रियान्वयन तथा कानून की व्याख्या से जुड़ी बातों की पहचान करें।

सीएनजी – मुद्दे पर केन्द्र और दिल्ली सरकार एक साथ
स्टाफ रिपोर्टर, द हिंदू, सितंबर 23, 2001 राजधानी के सभी गैर-सीएनजी व्यावसायिक वाहनों को यातायात से बाहर करने के लिए केन्द्र और दिल्ली सरकार संयुक्त रूप से सर्वोच्च न्यायालय का सहारा लेंगे। दोनों सरकारों में इस बात की सहमति हुई है। दिल्ली और केन्द्र की सरकार ने पूरी परिवहन व्यवस्था को एकल ईंधन-प्रणाली से चलाने के बजाय दोहरे ईंधन-प्रणाली से चलाने के बारे में नीति बनाने का फैसला किया है क्योंकि ईंधन-प्रणाली खतरों से भरी है और इसके परिणामस्वरूप विनाश हो सकता है।

राजधानी के निजी वाहन धारकों द्वारा सीएनजी के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने का भी फैसला किया गया है। दोनों सरकारें राजधानी में 0.05 प्रतिशत निम्न सल्फर डीजल से बसों को चलाने की अनुमति देने के बारे में दबाव डालेंगी। इसके अतिरिक्त अदालत से कहा जाएगा कि जो व्यावसायिक वाहन यूरो-दो मानक को पूरा करते हैं उन्हें महानगर में चलने की अनुमति दी जाए। हालाँकि केन्द्र और दिल्ली अलग-अलग हलफनामा दायर करेंगे लेकिन इनमें समान बिन्दुओं को उठाया जाएगा। केन्द्र सरकार सीएनजी के मसले पर दिल्ली सरकार के पक्ष को अपना समर्थन देगी। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और केन्द्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री श्रीराम नाइक के बीच हुई बैठक में ये फैसले लिए गए। श्रीमती शीला दीक्षित ने कहा कि केन्द्र सरकार अदालत से विनती करेगी कि डॉ० आर०ए० मशेलकर की अगुवाई में गठित उच्चस्तरीय समिति को ध्यान में रखते हुए अदालत बसों को सीएनजी में बदलने की आखिरी तारीख आगे बढ़ा दे क्योकि 10,000 बसों को निर्धारित समय में सीएनजी में बदल पाना असंभव है। डॉ० मशेलकर की अध्यक्षता में गठित समिति पूरे देश के लिए ऑटो ईंधन नीति का सुझाव देगी। उम्मीद है कि यह समिति छ: माह में अपनी रिपोर्ट पेश करेगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि अदालत के निर्देशों पर अमल करने के लिए समय की जरूरत है। इस मसले पर समग्र दृष्टि अपनाने की बात कहते हुए श्रीमती दीक्षित ने बताया-सीएनजी से चलने वाले वाहनों की संख्या, सीएनजी की आपूर्ति करने वाले स्टेशनों पर लगी लंबी कतार की समाप्ति, दिल्ली के लिए पर्याप्त मात्रा में सीएनजी ईंधन जुटाने तथा अदलात के निर्देशों को अमल में लाने के तरीके और साधनों पर एक साथ ध्यान दिया जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने ……….. सीएनजी के अतिरिक्त किसी अन्य ईंधन से महानगर में बसों को चलाने की अपनी मनाही में छूट देने से इनकार कर दिया था लेकिन अदालत का कहना था कि टैक्सी और ऑटो-रिक्शा के लिए भी सिर्फ सीएनजी इस्तेमाल किया जाए, इस बात पर उसने कभी जोर नहीं डोला। श्रीराम नाइक का कहना था कि केन्द्र सरकार सल्फर की कम मात्रा वाले डीजल से बसों को चलाने की अनुमति देने के बारे में अदालत से कहेगी, क्योंकि पूरी यातायात व्यवस्था को सीएनजी पर निर्भर करना खतरनाक हो सकता है। राजधानी में सीएनजी की आपूर्ति पाइपलाइन के जरिए होती है। और इसमें किसी किस्म की बाधा आने पर पूरी सार्वजनिक यातायात प्रणाली अस्त-व्यस्त हो जाएगी।
उत्तर-
इस केस में केन्द्रीय सरकार और दिल्ली की राज्य सरकार सक्रिय दिखाई देती हैं।
(क) यातायात के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा निश्चित मापदण्डों के आधार पर केस को तय करने में सर्वोच्च न्यायालय की महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी।
(ख) कार्यपालिका प्रदूषण नियंत्रण की नीति तय करेगी तथा न्यायपालिका यह तय करेगी कि कार्यपालिका की नीति (प्रदूषण नियंत्रण) का कितनी उल्लंघन हुआ है।
(ग) इस प्रकरण में राज्य सरकार का नीतिगत निर्णय यह है कि दिल्ली में CNG के प्रयोग की बसें चलेंगी। इस पर दिल्ली सरकार कानून बनाएगी। नीति वे कानून के निर्माण के सम्बन्ध में यह निर्णय लिया गया कि ऐसा करते समय पर्यावरण प्रदूषण से सुरक्षा को मुख्य रूप से ध्यान में रखा जाए।

प्रश्न 6.
देश के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में राष्ट्रपति की भूमिको को आप किस रूप में देखते हैं? (एक काल्पनिक स्थिति का ब्योरा दें और छात्रों से उसे उदाहरण के रूप में लागू करने को कहें)।
उत्तर-
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति यह नियुक्ति प्रधानमन्त्री की सलाह पर करता है। साधारणतया सर्वोच्च न्यायालय में सर्वाधिक वरिष्ठ न्यायाधीश को ही मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है, परन्तु अनेक अवसर ऐसे आए हैं जब मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में वरिष्ठता के सिद्धान्त का उल्लंघन हुआ है। मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में राष्ट्रपति की अपनी कोई विशेष भूमिका नहीं है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित कथन इक्वाडोर के बारे में है। इस उदाहरण और भारत की न्यायपालिका के बीच आप क्या समानता अथवा असमानता पाते हैं। सामान्य कानूनों की कोई संहिता अथवा पहले सुनाया गया कोई न्यायिक फैसला मौजूद होता तो पत्रकार के अधिकारों को स्पष्ट करने में मदद मिलती। दुर्भाग्य से इक्वाडोर की अदालत इस रीति से काम नहीं करती। पिछले मामलों में उच्चतर अदालत के न्यायाधीशों ने जो फैसले दिए हैं उन्हें कोई न्यायाधीश उदाहरण के रूप में मानने के लिए बाध्य नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका के विपरीत इक्वाडोर (अथवा दक्षिण अमेरिका में किसी और देश में जिस न्यायाधीश के सामने अपील की गई है उसे । अपना फैसला और उसको कानूनी आधार लिखित रूप में नहीं देना होता। कोई न्यायाधीश आज एक मामले में कोई फैसला सुनाकर कल उसी मामले में दूसरा | फैसला दे सकता है और इसमें उसे यह बताने की जरूरत नहीं कि वह ऐसा क्यों कर रहा है।
उत्तर-
भारतीय न्याय-प्रणाली में किसी विषय पर उच्च न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्णय आगे आने वाले निर्णयों के लिए मार्गदर्शक होते हैं जो बाध्यकारी भी होते हैं यह स्थिति इक्वाडोर के उदाहरण से भिन्न है क्योंकि वहाँ न्यायाधीश उसी विषय पर दिए गए निर्णय को मानने के लिए बाध्य नहीं होता। भारतीय न्याय व्यवस्था व इक्वाडोर की न्याय व्यवस्था में एक समानता यह है कि भारत व इक्वाडोर में न्यायाधीश नवीन परिस्थिति में अपना प्रथम निर्णय किसी विषय पर बदल सकते हैं।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित कथनों को पढ़िए और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अमल में लाए जाने वाले विभिन्न क्षेत्राधिकार; मसलन-मूल, अपील और परामर्शकारी-से इनका मिलान कीजिए-
(क) सरकार जानना चाहती थी कि क्या यह पाकिस्तान-अधिगृहीत जम्मू-कश्मीर के निवासियों की नागरिकता के सम्बन्ध में कानून पारित कर सकती है।
(ख) कावेरी नदी के जल विवाद के समाधान के लिए तमिलनाडु सरकार अदालत की शरण लेना चाहती है।
(ग) बाँध-स्थल से हटाए जाने के विरुद्ध लोगों द्वारा की गई अपील को अदालत ने ठुकरा दिया।
उत्तर-
(क) परामर्श सम्बन्धी अधिकार।
(ख) प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार।
(ग) अपीलीय क्षेत्राधिकार।

प्रश्न 9.
जनहित याचिका किस तरह गरीबों की मदद कर सकती है?
उत्तर-
संविधान द्वारा भारत के नामरिकों को यह अधिकार दिया गया है कि यदि नागरिकों को राज्य के कानूनों द्वारा कोई हानि पहुँचती है तो वे उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय में विभिन्न प्रकार की याचिकाएँ प्रस्तुत कर सकते हैं। जनहित याचिका का तात्पर्य यह है कि लोकहित के किसी भी मामले में कोई भी व्यक्ति या समूह जिसने व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से सरकार के हाथों किसी भी प्रकार से हानि उठाई हो, अनुच्छेद 21 तथा 32 के अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय तथा अनुच्छेद 226 के अनुसार उच्च न्यायालय की शरण ले सकता है।

उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि गरीब, अपंग अथवा सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से पिछड़े लोगों के मामले में आम जनता का कोई आदमी न्यायालय के समक्ष ‘वाद’ ला सकता है। न्यायाधीश कृष्णा अय्यर के अनुसार ‘वाद कारण तथा पीड़ित व्यक्ति की संकुचित धारणा का स्थान अब ‘वर्ग कार्यवाही तथा लोकहित में कार्यवाही ने ले लिया है। जनहित याचिका की विशेष बात यह है कि न्यायालय अपने समस्त तकनीकी तथा कार्यवाही सम्बन्धी नियमों की परवाह किए बिना एक सामान्य पत्र के आधार पर भी कार्यवाही कर सकेगा। जनहित याचिकाओं का महत्त्व-जनहित याचिकाओं के महत्त्व को देखते हुए जनता में इसके प्रति काफी रुचि बढ़ी है।

जनहित याचिकाओं का महत्त्व निम्नवत् है-
1. सामान्य जनता की आसान पहुँच – जनहित याचिकाओं द्वारा आम नागरिक भी व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से न्याय के लिए न्यायालय के दरवाजे खटखटा सकता है। जनहित याचिकाओं के लिए किन्हीं विशेष कानूनी प्रावधानों के चक्कर में उलझना नहीं पड़ता है। व्यक्ति सीधे उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय में अपना वाद प्रस्तुत कर सकता है।
2. शीर्घ निर्णय – जनहित याचिकाओं पर न्यायालय तुरन्त न्यायिक प्रक्रिया को प्रारम्भ कर देता है। तथा उन पर जल्दी ही सुनवाई होता है। उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 तथा 32 की राज्य द्वारा अवज्ञा के मामलों को बहुत ही गम्भीरता से लिया है। जनहित याचिकाओं पर तुरन्त सुनवाई के कारण बहुत जल्दी निर्णय लिया जाता है।
3. प्रभावी राहत – अधिकांश जनहित याचिकाओं में यह देखने को मिलती है कि इसमें पीड़ित पक्ष को बहुत अधिक राहत हो जाती है तथा प्रतिवादी को सजा देने का भी प्रावधान है।
4. कम व्यय – जनहित याचिकाओं में याचिका प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति का खर्चा बहुत कम होता है क्योंकि इसमें सामान्य न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना नहीं पड़ता है। यदि न्यायालय याचिका को निर्णय के लिए स्वीकार कर लेता है तो उस पर तुरन्त कार्यवाही के कारण निर्णय हो जाता है। इससे पीड़ित पक्ष को कम खर्च में शीघ्र न्याय प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 10.
क्या आप मानते हैं कि न्यायिक सक्रियता से न्यायपालिका और कार्यपालिका में विरोध पनप सकता है? क्यों?
उत्तर-
भारतीय न्यायपालिका को न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति प्राप्त है जिसके आधार पर न्यायपालिका विधायिका द्वारा पारित कानूनों तथा कार्यपालिका द्वारा जारी आदेशों की संवैधानिक वैधता की जाँच कर सकती है, अगर ये संविधान के विपरीत पाए जाते हैं तो न्यायपालिका उन्हें अवैध घोषित कर सकती है। परन्तु न्यायपालिका नीतिगत विषय पर टिप्पणी नहीं कर सकती। विगत कुछ वर्षों में न्यायपालिका ने अपनी इस सीमा को तोड़ा है व कार्यपालिका के कार्यों में निरन्तर हस्तक्षेप व बाधा कर रही है जिसे राजनीतिक क्षेत्रों में न्यायिक सक्रियता कहा जाता है जिसके परिणामस्वरूप कार्यपालिका व न्यायपालिका में टकराव उत्पन्न हो गया है।

प्रश्न 11.
न्यायिक सक्रियता मौलिक अधिकारों की सुरक्षा में किस रूप में जुड़ी है? क्या इससे मौलिक अधिकारों के विषय-क्षेत्र को बढ़ाने में मदद मिली है?
उत्तर-
न्यायिक सक्रियता मौलिक अधिकारों की सुरक्षा से पूर्ण रूप से जुड़ी है। इसने मौलिक अधिकारों के विषय-क्षेत्र को भी काफी विस्तृत कर दिया है। न्यायपालिका ने जीने के अधिकार का अर्थ यह लिया है–सम्मानपूर्ण जीवन, शुद्ध वायु, शुद्ध पानी तथा शुद्ध वातावरण में जीने का अधिकार। इसीलिए न्यायपालिका में पर्यावरण को साफ-सुथरा रखने, प्रदूषण को रोकने, नदियों को साफ-सुथरा रखे जाने, उद्योगों को आवासीय क्षेत्र से बाहर निकाले जाने, आवासीय क्षेत्रों से दुकानों को हटाए जाने आदि के कितने ही आदेश दिए हैं। इस प्रकार न्यायपालिका ने न्यायिक सक्रियता द्वारा नागरिकों के मौलिक अधिकारों के क्षेत्र को काफी व्यापक बनाया है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति कौन करता है?
(क) संसद
(ख) प्रधानमन्त्री
(ग) राष्ट्रपति
(घ) मन्त्रिपरिषद्
उत्तर :
(ग) राष्ट्रपति।

प्रश्न 2.
भारत का सर्वोच्च न्यायालय कहाँ स्थित है?
(क) इलाहाबाद में
(ख) नयी दिल्ली में
(ग) मुम्बई में
(घ) चेन्नई में
उत्तर :
(ख) नयी दिल्ली में।

प्रश्न 3.
सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश अपने पद पर कार्यरत रहता है –
या
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अवकाश प्राप्त करने की आयु है –
(क) 58 वर्ष की आयु तक
(ख) 60 वर्ष की आयु तक
(ग) 65 वर्ष की आयु तक
(घ) 62 वर्ष की आयु तक
उत्तर :
(ग) 65 वर्ष की आयु तक

प्रश्न 4.
भारत में संविधान का संरक्षक कौन है?
(क) राष्ट्रपति
(ख) प्रधानमन्त्री
(ग) सर्वोच्च न्यायालय
(घ) संसद
उत्तर :
(ग) सर्वोच्च न्यायालय

प्रश्न 5.
उच्चतम न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त कुल कितने न्यायाधीश होते हैं?
(क) 23
(ख) 24
(ग) 30
(घ) 26
उत्तर :
(ग) 30.

प्रश्न 6.
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति किसकी सलाह पर की जाती है?
(क) केन्द्रीय विधि मन्त्री
(ख) प्रधानमन्त्री
(ग) महान्यायवादी
(घ) भारत के मुख्य न्यायाधीश
उत्तर :
(घ) भारत के मुख्य न्यायाधीश

प्रश्न 7.
संविधान के अनुसार उच्चतम न्यायालय की कार्यवाहियों की अधिकृत भाषा है
(क) केवल अंग्रेजी
(ख) अंग्रेजी तथा हिन्दी
(ग) अंग्रेजी तथा कोई भी क्षेत्रीय भाषा
(घ) अंग्रेजी तथा आठवीं सूची में निर्दिष्ट भाषा
उत्तर :
(क) केवल अंग्रेजी।

प्रश्न 8.
भारत में न्यायिक पुनरवलोकन का सिद्धान्त लिया गया है
(क) फ्रांस के संविधान से
(ख) जर्मनी के संविधान से
(ग) संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से
(घ) कनाडा के संविधान से
उत्तर :
(ग) संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से

प्रश्न 9.
संविधान के किस अनुच्छेद के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है?
(क) अनुच्छेद 29
(ख) अनुच्छेद 31
(ग) अनुच्छेद 33
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 10.
उच्च न्यायालय से परामर्श माँगने का अधिकार किसको है?
(क) प्रधानमन्त्री को
(ख) लोकसभा अध्यक्ष को
(ग) राष्ट्रपति को
(घ) विधिमन्त्री को
उत्तर :
(ग) राष्ट्रपति को

प्रश्न 11.
उच्च न्यायालय के वह कौन-से मुख्य न्यायाधीश थे, जिन्हें कार्यकारी राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ?
(क) गजेन्द्र गडकर
(ख) एम० हिदायतुल्लाह
(ग) के० सुब्बाराव
(घ) पी० एन० भगवती
उत्तर :
(ख) एम० हिदायतुल्लाह

प्रश्न 12.
उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति किसकी सलाह पर की जाती है?
(क) केन्द्रीय विधि मन्त्री
(ख) प्रधानमन्त्री
(ग) महान्यायवादी
(घ) भारत के मुख्य न्यायाधीश
उत्तर :
(घ) भारत के मुख्यं न्यायाधीश

प्रश्न 13.
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु क्या है?
(क) 65 वर्ष
(ख) 60 वर्ष
(ग) 58 वर्ष
(घ) 62 वर्ष
उत्तर :
(घ) 62 वर्ष

प्रश्न 14.
सर्वोच्च न्यायालय के कार्य-क्षेत्र को बढ़ाया जा सकता है?
(क) संसद द्वारा
(ख) राष्ट्रपति द्वारा।
(ग) मंत्रिमंडल द्वारा
(घ) प्रधानमंत्री द्वारा
उत्तर :
(क) संसद द्वारा।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
न्यायपालिका किसके प्रति जवाबदेह है?
उत्तर :
न्यायपालिका देश के संविधान, लोकतान्त्रिक परम्परा और जनता के प्रति जवाबदेह है।

प्रश्न 2.
मुख्य न्यायाधीश सहित उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या कितनी है?
उत्तर :
भारत के उच्चतम न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा 30 अन्य न्यायाधीश हैं। इस प्रकार : मुख्य न्यायाधीश सहित उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की कुल संख्या 31 है।

प्रश्न 3.
उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति कौन करता है?
उत्तर :
उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।

प्रश्न 4.
उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति कैसे की जाती है?
उत्तर :
भारत के राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के परामर्श पर अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है।

प्रश्न 5.
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश का कार्यकाल कितना होता है?
उत्तर :
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश अपने पद पर 65 वर्ष की आयु तक कार्यरत रह सकते हैं।

प्रश्न 6.
उच्चतस न्यायालय से परामर्श माँगने का अधिकार किसको है?
उत्तर :
उच्चतम न्यायालय से परामर्श माँगने का अधिकार राष्ट्रपति को है।

प्रश्न 7.
उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश के पदच्युति का प्रस्ताव करने के लिए संविधान में क्या आधार बताए गए हैं?
उत्तर :
केवल ‘प्रमाणित कदाचार तथा ‘असमर्थता की स्थिति में ही उसके विरुद्ध पदच्युति का प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकता है।

प्रश्न 8.
भारत का उच्चतम न्यायालय कहाँ पर स्थित है?
उत्तर :
भारत का उच्चतम न्यायालय नई दिल्ली में स्थित है।

प्रश्न 9.
भारत का उच्चतम न्यायालय न्यायिक पुनरावलोकन के अधिकार का प्रयोग किस आधार पर करता है?
उत्तर :
न्यायालय इस अधिकार का प्रयोग ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया द्वारा करता है।

प्रश्न 10.
उच्चतम न्यायालय के दो अधिकार बताइए।
उत्तर :

  1. मूल अधिकारों की रक्षा
  2. संविधान का संरक्षण

प्रश्न 11.
देश में न्यायिक सक्रियता का मुख्य साधन क्या है?
उत्तर :
भारत में न्यायिक सक्रियता को मुख्य साधन जनहित याचिका या सामाजिक व्यवहार याचिका (Social Action Litigation) है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य कार्य क्या हैं?
उत्तर :
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं –

  1. केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों के मध्य होने वाले विवादों की सुनवाई करना।
  2. उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई करना।
  3. राष्ट्रपति को न्यायिक प्रश्नों पर परामर्श देना।
  4. नागरिकों के मूल अधिकारों की सुरक्षा करना।
  5. संविधान की व्याख्या तथा सुरक्षा करना।
  6. अभिलेख न्यायालय के रूप में कार्य करना।
  7. संघात्मक व्यवस्था को बनाए रखना।
  8. परिवर्तित सामाजिक तथा आर्थिक परिस्थितियों में संविधान की न्यायसंगत तथा तर्कसंगत व्याख्या प्रस्तुत करना। प्रश्न

प्रश्न 2.
न्यायिक सक्रियता का मानव के सामाजिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा है? संक्षेप में विवेचना कीजिए।
उत्तर :
न्यायिक सक्रियता का मानव-जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ा है –

  1. उच्चतम न्यायालय ने जनहितकारी विवादों को मान्यता प्रदान की है। इसके अनुसार कोई भी व्यक्ति किसी ऐसे समूह अथवा वर्ग की ओर से मुकदमा लड़ सकता है जिसको उसके कानूनों अथवा संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया है।
  2. उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की नवीन व्याख्या की है तथा आम आदमी के जीवन व सुरक्षा को वास्तविक बनाने का प्रयास किया गया है।
  3. उच्चतम न्यायालय ने नागरिकों की गरिमा तथा प्रतिष्ठा की सुरक्षा की ओर अधिक ध्यान केन्द्रित किया है।
  4. उच्चतम न्यायालय ने पूर्णतः स्पष्ट कर दिया है कि कार्यपालिको के ‘स्वविवेक’ पर नियंत्रण किया जाना चाहिए।
  5. वर्तमान में उच्चतम न्यायालय की यह मान्यता बन गई है कि यद्यपि न्यायाधीश का कार्य कानून का निर्माण करना नहीं है, परन्तु वह कानून की रूपरेखा में रंग अवश्य भरता है।

प्रश्न 3.
भारतीय न्यायपालिका एकीकृत न्यायपालिका किस प्रकार है?
उत्तर :
भारतीय न्यायपालिका एकीकृत न्यायपालिका है। इसके शिखर पर उच्चतम न्यायालय है, मध्य में उच्च न्यायालय है व जिला स्तर पर अधीनस्थ न्यायालय है। ये न्यायालय एकीकृत इस अर्थ में हैं कि उच्चतम न्यायालय का नीचे वाले न्यायालय पर प्रशासनिक व न्यायिक नियंत्रण है। निचली अदालतों के निर्णयों के विरुद्ध उच्च न्यायालय में लाया जा सकता है, उच्च न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में लाया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय के निर्णय अधीनस्थ न्यायालयों पर बाध्यकारी होते हैं। उच्चतम न्यायालय न्यायाधीशों के स्थानान्तरण करने के लिए भी स्वतन्त्र है। उच्चतम न्यायालय नीचे वाले न्यायालय से किसी भी मुकदमे को अपने पास ले सकता है, अगर उच्चतम न्यायालय यह समझता है कि किसी प्रकरण में कानून का कोई गम्भीर विषय शामिल है। उच्चतम न्यायालय अधीनस्थ न्यायालयों को कोई भी आवश्यक निर्देश दे सकता है।

प्रश्न 4.
सर्वोच्च न्यायालय के परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार को समझाइए।
उत्तर :
संविधान के अनुच्छेद 143 के अनुसार, राष्ट्रपति किसी कानूनी या तथ्य के प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय से परामर्श मॉग सकता है। उच्चतम न्यायालय, राष्ट्रपति को परामर्श देने के लिए खुली सुनवाई (Open Hearings) का भी प्रबन्ध करता है। अमेरिका के संविधान में उच्चतम न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति को परामर्श दिए जाने की व्यवस्था नहीं है। इस न्यायालय पर संवैधानिक दृष्टि से ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि उसे परामर्श देना ही पड़े। राष्ट्रपति के लिए भी यह आवश्यक नहीं है। कि वह उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए परामर्श के अनुसार ही कार्य करे।

प्रश्न 5.
जनहित याचिकाओं का भारतीय व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
जनहित याचिकाओं का भारतीय व्यवस्था पर निम्नलिखित प्रभाव दृष्टिगत होता है –

  1. ऐसे लोगों की स्वतन्त्रता व हितों की रक्षा करने में सहायता मिलती है जो स्वयं अपने हितों की रक्षा करने में समर्थ नहीं थे।
  2. इससे सामाजिक एकता का विकास होता है।
  3. इससे राष्ट्रीय एकता सुदृढ़ हुई है।
  4. न्यायिक सक्रियता का विकास हुआ है।
  5. कार्यपालिका पर भी कुछ नियंत्रण स्थापित हुआ है।
  6. गलत कानून-निर्माण पर रोक लगी है।
  7. नौकरशाही पर नियंत्रण स्थापित हुआ है।
  8. गरीब जनता में विश्वास उत्पन्न हुआ है।

प्रश्न 6.
संसद व न्यायपालिका का मौलिक अधिकारों के संशोधन को लेकर टकराव, संक्षेप में। समझाइए।
उत्तर :
संविधान में संशोधन विशेषकर मौलिक अधिकारों में संशोधन को लेकर न्यायपालिका का संसद से निरन्तर टकराव बना रहा है। प्रारम्भ में शंकरी प्रसाद प्रकरण में न्यायालय ने निर्णय दिया था कि संसद संविधान के किसी भी भाग में, यहाँ तक कि मौलिक अधिकारों में भी संशोधन कर सकती है। सन् 1967 में गोलकनाथ केस में न्यायालय ने अपने इस निर्णय को बदलते हुए नया निर्णय दिया कि संसद मौलिक अधिकार में संशोधन नहीं कर सकती। इससे न्यायपालिका व संसद में टकराव की स्थिति उत्पन्न हो गई। संसद में गोलकनाथ केस के निर्णय को समाप्त करने के उद्देश्य से 38 व 39वाँ संविधान संशोधन किया जिन्हें 1973 में केशवानन्द भारती केस में चुनौती दी गई जिसमें यह निर्णय हुआ कि संसद, संविधान के किसी भी भाग में यहाँ तक कि मौलिक अधिकारों में भी संशोधन कर सकती है परन्तु संविधान की मौलिक रचना में संशोधन नहीं कर सकती। इस प्रकार न्यायपालिका व संसद में टकराव होता रहा है।

प्रश्न 7.
उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति में किन अर्हताओं का होना आवश्यक है?
उत्तर :
उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति में निम्नलिखित अर्हताओं का होना आवश्यक है –

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. वह किसी उच्च न्यायालय अथवा दो या दो से अधिक न्यायालयों में लगातार कम-से-कम 5 वर्ष तक न्यायाधीश के रूप में कार्य कर चुका हो।

या वह किसी उच्च न्यायालय या न्यायालयों में लगातार 10 वर्ष तक अधिवक्ता रह चुका हो। या राष्ट्रपति की दृष्टि में कानून का उच्चकोटि का ज्ञाता हो।

प्रश्न 8.
अभिलेख न्यायालय पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
भारत का उच्चतम न्यायालय अभिलेख (रिकॉर्ड) न्यायालय के रूप में भी कार्य करता है। अभिलेख न्यायालय का यह तात्पर्य है कि न्यायालय के समस्त निर्णयों को अभिलेख के रूप में सुरक्षित रखा जाता है। इन निर्णयों को भविष्य में देश के किसी भी न्यायालय में पूर्व उदाहरणों के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय को यह भी अधिकार प्राप्त होता है कि वह अपनी मानहानि के लिए किसी भी व्यक्ति को जुर्माना अथवा कारावास का दण्ड दे सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय, अन्य अधीनस्थ न्यायालयों में आवश्यकता पड़ने पर नजीर (केस लॉ) के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं।

प्रश्न 9.
भारत में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा न्यायपालिका किस प्रकार करती है?
उत्तर :
भारतीय संविधान द्वारा भारत के नागरिकों को प्रदान किए गए मौलिक अधिकारों की सुरक्षा का उत्तरदायित्व भारत के सर्वोच्च न्यायालय को प्रदान किया गया है। यदि सरकार नागरिकों के मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण करती है या कोई नागरिक किसी दूसरे नागरिक को उसके मौलिक अधिकारों का प्रयोग स्वतन्त्रतापूर्वक नहीं करने देता, तो प्रभावित व्यक्ति अपने मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए उच्चतम न्यायालय की शरण ले सकता है। उच्चतम न्यायालय के संविधान में अनुच्छेद 32 में वर्णित ‘संवैधानिक उपचारों के अधिकारों के अन्तर्गत मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करता है। इने संवैधानिक उपचारों में बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohibition), अधिकार पृच्छा (Quo Warranto) तथा उत्प्रेषण (Certiorari) नामक पाँच लेखों का प्रयोग नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए किया जाता है।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत की संघात्मक व्यवस्था में न्यायपालिका की भूमिका पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
समस्त प्रकार की शासन-प्रणालियों में न्यायपालिका की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है, परन्तु । संघात्मक व्यवस्था में न्यायपालिका के दायित्व और भी बढ़ जाते हैं। संघात्मक व्यवस्था में शासन की सत्ता एक लिखित एवं कठोर संविधान द्वारा केन्द्र तथा राज्यों के मध्य विभाजित होती है। केन्द्र की सरकार केवल उन विषयों पर ही कानून का निर्माण कर सकती है, जो संघ-सूची में वर्णित होते हैं तथा राज्य सरकारें राज्य-सूची के विषयों पर ही कानून का निर्माण कर सकती हैं। किसी भी सरकार को दूसरी सरकार के क्षेत्र का अतिक्रमण करने का अधिकार प्राप्त नहीं होता है। यदि ऐसा होता है तो संघात्मक व्यवस्था ही समाप्त हो जाएगी। न्यायपालिका को यह अधिकार प्राप्त है कि वह शासन के कार्यक्षेत्र एवं शक्तियों पर अपना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अंकुश रखे जिससे इन शक्तियों का दुरुपयोग या अतिक्रमण न होने पाए। इसीलिए न्यायपालिका को यह शक्ति प्राप्त होती है कि वह ऐसे किसी भी कानून अथवा आदेश को अवैध घोषित कर दे जो संविधान की धाराओं का उल्लंघन करता हो। एक स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिको ही अपने दायित्वों का समुचित रूप से पालन कर सकती है। यदि न्यायपालिका अपने इस अधिकार का प्रयोग न करे तो संघात्मक व्यवस्था एकात्मक शासन व्यवस्था में परिवर्तित हो जाएगी तथा संविधान का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

प्रश्न 2.
लोकतन्त्र में न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को सुनिश्चित करने के दो उपायों का उल्लेख कीजिए।
या
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के दो उपाय लिखिए।
उत्तर :

न्यायपालिका की स्वतन्त्रता

न्यायपालिका का कार्यक्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है और उसके द्वारा विविध प्रकार के कार्य किये जाते हैं, लेकिन न्यायपालिका इस प्रकार के कार्यों को उसी समय कुशलतापूर्वक सम्पन्न कर सकती है जबकि न्यायपालिका स्वतन्त्र हो। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता से हमारा आशय यह है कि न्यायपालिका को कानूनों की व्याख्या करने और न्याय प्रदान करने के सम्बन्ध में स्वतन्त्र रूप से अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिए और उन्हें कर्तव्यपालन में किसी से अनुचित तौर पर प्रभावित नहीं होना चाहिए। सीधे-सादे शब्दों में इसका आशय यह है कि न्यायपालिका, व्यवस्थापिका और कार्यपालिका किसी राजनीतिक दल, किसी वर्ग विशेष और अन्य सभी दबावों से मुक्त रहते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करे।

न्यायपालिका की स्वतन्त्रता सुनिश्चित करने के दो उपाय निम्नलिखित हैं –

1. न्यायाधीश की योग्यता – न्यायाधीशों का पद केवल ऐसे ही व्यक्तियों को दिया जाए जिनकी व्यावसायिक कुशलता और निष्पक्षता सर्वमान्य हो। राज्य व्यवस्था के संचालन में न्यायाधिकारी वर्ग का बहुत अधिक महत्त्व होता है और अयोग्य न्यायाधीश इस महत्त्व को नष्ट कर देंगे।

2. कार्यपालिका और न्यायपालिका का पृथक्करण – न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए आवश्यक है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका को एक-दूसरे से पृथक् रखा जाना चाहिए। एक ही व्यक्ति के सत्ता अभियोक्ता और साथ-ही-साथ न्यायाधीश होने पर स्वतन्त्र न्याय की आशा नहीं की जा सकती है।

प्रश्न 3.
न्यायपालिका के दो कार्यों का उल्लेख कीजिए तथा स्वतन्त्र न्यायपालिका के पक्ष में दो तर्क प्रस्तुत कीजिए।
या
लोकतन्त्रात्मक शासन में स्वतन्त्र न्यायपालिका की आवश्यकता एवं महत्ता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
किसी लोकतन्त्रात्मक शासन में एक स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका सर्वथा अनिवार्य है। इसे आधुनिक और प्रगतिशील संविधानों एवं शासन-व्यवस्था का प्रमुख लक्षण माना जाता है न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के महत्त्व को निम्नलिखित रूपों में प्रकट किया जा सकता है –

1. लोकतन्त्र की रक्षा हेतु – लोकतन्त्र के अनिवार्य तत्त्व स्वतन्त्रता और समानता हैं। नागरिकों की स्वतन्त्रता और कानून की दृष्टि से व्यक्तियों की समानता-इन दो उद्देश्यों की प्राप्ति स्वतन्त्र न्यायपालिका द्वारा ही सम्भव है। इस दृष्टि से स्वतन्त्र न्यायपालिका को ‘लोकतन्त्र का प्राण’ कहा जाता है।

2. संविधान की रक्षा हेतु – आधुनिक युग के राज्यों में संविधान की सर्वोच्चता का विचार प्रचलित है। संविधान की रक्षा का दायित्व न्यायपालिका का होता है। न्यायपालिका द्वारा इस दायित्व का भली-भाँति निर्वाह उस समय ही सम्भव है, जब न्यायपालिका स्वतन्त्र और निष्पक्ष हो। स्वतन्त्र न्यायपालिका संविधान की धाराओं की स्पष्ट व्याख्या करती है तथा व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका के उन कार्यों को जो संविधान के विरुद्ध होते हैं, अवैध घोषित कर देती है। इस प्रकार स्वतन्त्र न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है।

3. न्याय की रक्षा हेतु – न्यायपालिका का प्रथम और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य न्याय करना है। न्यायपालिका यह कार्य तभी ठीक प्रकार से कर सकती है, जबकि वह निष्पक्ष और स्वतन्त्र हो तथा व्यवस्थापिका और कार्यपालिका के प्रभाव से पूर्ण रूप से मुक्त हो।

4. नागरिक अधिकारों की रक्षा हेतु – न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का महत्त्व अन्य कारणों की अपेक्षा नागरिक अधिकारों की रक्षा की दृष्टि से अधिक है। इसके लिए न्यायपालिका को स्वतन्त्र और निष्पक्ष होना अत्यन्त आवश्यक है।

न्यायपालिका के दो कार्य – न्यायपालिका के दो कार्य निम्नलिखित हैं –

1. कानूनों की व्याख्या करना – कानूनों की भाषा सदैव स्पष्ट नहीं होती है और अनेक बार कानूनों की भाषा के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के विवाद उत्पन्न हो जाते हैं। इस प्रकार की प्रत्येक परिस्थिति में कानूनों की अधिकारपूर्ण व्याख्या करने का कार्य न्यायपालिका ही करती है। न्यायालयों द्वारा की गयी इस प्रकार की व्याख्याओं की स्थिति कानून के समान ही होती है।

2. लेख जारी करना – सामान्य नागरिकों या सरकारी अधिकारियों के द्वारा जब अनुचित या अपने अधिकार-क्षेत्र के बाहर कोई कार्य किया जाता है तो न्यायालये उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए विविध प्रकार के लेख जारी करता है। इस प्रकार के लेखों में बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश और प्रतिषेध आदि लेख प्रमुख हैं।

प्रश्न 4.
“सर्वोच्च न्यायालय संविधान का रक्षक ही नहीं बल्कि उसे न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति भी प्राप्त है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर :
सर्वोच्च न्यायालय संविधान की पवित्रता की रक्षा भी करता है। यदि संसद संविधान का अतिक्रमण करके कोई कानून बनाती है तो उच्चतम न्यायालय उस कानून को अवैध घोषित कर सकता है। संक्षेप में, सर्वोच्च न्यायालय को अधिकार है कि वह संघ सरकार अथवा राज्य सरकार के उन कानूनों को अवैध घोषित कर सकता है, जो संविधान के विपरीत हों। इसी प्रकार वह संघ सरकार अथवा राज्य सरकार के संविधान का अतिक्रमण करने वाले आदेशों को भी अवैध घोषित कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय संविधान की व्याख्या करने वाला (Interpreter) अन्तिम न्यायालय है। संक्षेप में, कहा जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय को न्यायिक पुनरवलोकन (Judicial Review) का अधिकार है, क्योंकि इसे कानूनों की वैधानिकता के परीक्षण की शक्ति प्राप्त है। इस शक्ति के आधार पर न्यायपालिका ने सम्पत्ति के अधिकार का अतिक्रमण करने वाले अनेक कानूनों को गोलकनाथ केस, सज्जनसिंह केस तथा केशवानन्द भारती केस में अवैध घोषित किया है।

प्रश्न 5.
स्वतन्त्र न्यायपालिका के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।

लोकतन्त्र में न्यायपालिका को महत्त्व इंगित कीजिए।
उत्तर :

स्वतन्त्र न्यायपालिका का महत्त्व अथवा लाभ

न्यायपालिका अपने विविध कार्यों को उसी समय कुशलतापूर्वक सम्पन्न कर सकती है, जब वह स्वतन्त्र रूप से कार्य करे। स्वतन्त्र न्यायपालिका का महत्त्व निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर स्पष्ट होता है –

1. नागरिकों की स्वतन्त्रता एवं अधिकारों की रक्षा – स्वतन्त्र न्यायपालिका ही ागरिकों की स्वतन्त्रता और मौलिक अधिकारों की रक्षा कर सकती है। चान्सलर कैण्ट के अनुसार, “जहाँ कानूनों की व्याख्या करने, उन्हें लागू करने तथा अधिकारों को अमल में लाने के लिए कोई न्याय विभाग न हो, वहाँ स्वयं अपनी शक्तिहीनता के कारण शासन का विनाश हो जाएगा अथवा शासन के दूसरे विभाग के आदेशों का पालन करने के लिए उस पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर नागरिक स्वतन्त्रता का सर्वनाश कर देंगे।”

2. निष्पक्ष न्याय की प्राप्ति – निष्पक्ष न्याय की प्राप्ति कराना न्यायपालिका का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य है। न्यायपालिका को अपने इस महत्त्वपूर्ण कार्य के सम्पादन के लिए स्वतन्त्र होना आवश्यक है। उसके कार्यों में व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका को कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

3. लोकतंत्र की सुरक्षा – लोकतन्त्र की सफलता के लिए स्वतन्त्र न्यायपालिका का होना अनिवार्य है। लोकतन्त्र के अनिवार्य तत्त्व स्वतन्त्रता और समानती हैं। अतः नागरिकों को स्वतन्त्रता और समानता के अवसर उसी समय प्राप्त हो सकेंगे, जब न्यायपालिका निष्पक्षता के साथ अपने कार्य का सम्पादन करेगी।

4. संविधान की सुरक्षा – स्वतन्त्र न्यायपालिका संविधान की रक्षक होती है। न्यायपालिका संविधान-विरोधी कानूनों को अवैध घोषित करके रद्द कर देती है। अतः संविधान के स्थायित्व एवं सुरक्षा के लिए स्वतन्त्र न्यायपालिका का होना आवश्यक है।

5. व्यवस्थापिका और कार्यपालिका पर नियंत्रण – स्वतन्त्र न्यायपालिको व्यवस्थापिका और कार्यपालिका पर नियंत्रण रखकर शासन की कार्यकुशलता में वृद्धि करती है।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि स्वतन्त्र न्यायपालिका का प्रत्येक देश की शासन-प्रणाली में बहुत अधिक महत्त्व है। लोकतन्त्रात्मक शासन के लिए तो स्वतन्त्र न्यायपालिका का होना अति आवश्यक है। वस्तुत: स्वतन्त्र न्यायपालिका के बिना एक सभ्य राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती है।

प्रश्न 6.
उच्चतम न्यायालय की कार्यविधि के सम्बन्ध में संविधान में क्या व्यवस्था की गई है?
उत्तर :

उच्चतम न्यायालय की कार्यविधि

उच्चतम न्यायालय की कार्यविधि के सम्बन्ध में संविधान में कुछ व्यवस्थाएँ की गई हैं। इस सम्बन्ध में नियम बनाने का अधिकार संविधान द्वारा संसद को दिया गया है और जिन बातों पर संविधान और संसद ने कोई व्यवस्था न की हो, ऐसी बातों पर स्वयं न्यायालय की अनुमति से कानून बन सकता है। उच्चतम न्यायालय की कार्यविधि के सम्बन्ध में निम्नलिखित व्यवस्थाएँ की गई हैं –

(1) जिन विषयों का सम्बन्ध संविधान की व्याख्या के साथ हो या जिनमें कोई संवैधानिक प्रश्न उपस्थित होता हो यो कानून के अर्थ को समझाने की आवश्यकता हो या जिन विषयों पर विचार करने का कार्य राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय को सौंपा गया हो उनकी सुनवाई उच्चतम न्यायालय के कम-से-कम 5 न्यायाधीशों द्वारा की जाएगी।

(2) उच्चतम न्यायालय के सम्मुख किसी ऐसे मुकदमे की अपील भी पेश की जा सकती है जिसकी सुनवाई के पश्चात् यह अनुभव किया जाए कि उसमें संविधान की व्याख्या करना अनिवार्य है। या कानून के अभिप्राय को तात्त्विक रूप से प्रकट करना होगा। इसी प्रकार के मुकदमे आरम्भ में 5 से कम न्यायाधीशों के सम्मुख प्रस्तुत किए जा सकते हैं। परन्तु यदि यह स्पष्ट हो जाए कि उसमें संविधान की व्याख्या का स्पष्टीकरण होना आवश्यक है तो उसको भी कम-से-कम 5 न्यायाधीशों के सम्मुख उपस्थित किया जाएगा और उसकी व्याख्या के अनुसार उसका निर्णय किया जाएगा।

(3) उच्चतम न्यायालय के सभी निर्णय खुले तौर पर सम्पन्न होते हैं।

(4) उच्चतम न्यायालय के निर्णय बहुमत के आधार पर होंगे। परन्तु यदि निर्णय से कोई न्यायाधीश सहमत नहीं है तो वह अपना पृथक् निर्णय दे सकती है परन्तु बहुमत से हुआ निर्णय ही मान्य समझा जाएगा।

प्रश्न 7.
सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा न्यायिक पुनरवलोकन का संचालन किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर :

न्यायिक पुनरवलोकन का संचालन

न्यायिक पुनरवलोकन का तात्पर्य न्यायालय द्वारा कानूनों तथा प्रशासकीय नीतियों की संवैधानिकता की जाँच तथा ऐसे कानूनों एवं नीतियों को असंवैधानिक घोषित करना है जो संविधान के किसी अनुच्छेद पर अतिक्रमण करती है।

भारत में भी सर्वोच्च न्यायालय को अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय के समान ही न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति प्रदान की गई है। भारत में भी संविधान को सर्वोच्च कानून घोषित किया गया है। अतः न्यायपालिका का यह अधिकार है कि वह संसद अथवा विधानमण्डलों द्वारा निर्मित ऐसे कानूनों को अवैध घोषित कर दे जो संविधान की धाराओं का अतिक्रमण करते हों। भारत का सर्वोच्च न्यायालय इस शक्ति का प्रयोग ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ (Procedure established by law) के आधार पर करता है जबकि अमेरिका का सर्वोच्च न्यायालय ‘कानून की उचित प्रक्रिया’ (Due process of the law) के आधार पर न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति का प्रयोग करता है। भारत का सर्वोच्च न्यायालय यह निश्चित करने में भी कोई कानून संवैधानिक शक्ति है अथवा नहीं, प्राकृतिक न्यायालय के सिद्धान्तों को या उचित-अनुचित की अपनी धारणाओं को लागू नहीं कर सकता है।

भारत के उच्चतम न्यायालय ने पिछले अनेक वर्षों में ऐसे महत्त्वपूर्ण निर्णय दिए हैं जिनमें न्यायिक पुनरवलोकन के अधिकार का प्रयोग किया गया है। जैसे—गोलकनाथ बनाम मद्रास राज्य के मुकदमे में निवारक निरोध अधिनियम के 14वें खण्ड को असंवैधानिक घोषित किया गया है। स्वर्ण नियंत्रण अधिनियम, पाकिस्तानी शरणार्थियों के भारत आगमन पर रोक लगाने सम्बन्धी अधिनियम, बैंक राष्ट्रीयकरण अधिनियम तथा अखबारी कागज सम्बन्धी नीति आदि।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
न्यायपालिका के कार्यों का वर्णन कीजिए।
या
“आधुनिक काल में न्यायपालिका के कार्यों में अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि हो गई है। इस कथन के आलोक में न्यायपालिका के कार्यों का वर्णन कीजिए।
या
आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था में न्यायपालिका के कार्यों की समीक्षा कीजिए।
या
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता क्यों आवश्यक है? इसकी स्वतन्त्रता बनाए रखने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए?
या
आधुनिक राज्य में न्यायपालिका के कार्यों एवं उसकी बढ़ती हुई महत्ता की व्याख्या कीजिए। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को बनाए रखने हेतु क्या व्यवस्था की जानी चाहिए?
या
आधुनिक लोकतान्त्रिक राज्यों में न्यायपालिका के कार्यों तथा स्वतन्त्र न्यायपालिका के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

न्यायपालिका के कार्य

आधुनिक लोकतन्त्रात्मक प्रणाली में न्यायपालिका को मुख्यत: निम्नलिखित कार्य करने पड़ते हैं –

1. न्याय करना – न्यायपालिका का मुख्य कार्य न्याय करना है। कार्यपालिका कानून का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को पकड़कर न्यायपालिका के समक्ष प्रस्तुत करती है। न्यायपालिका उन समस्त मुकदमों को सुनती है जो उसके सामने आते हैं तथा उन पर अपना न्यायपूर्ण निर्णय देती

2. कानूनों की व्याख्या करना – न्यायपालिका विधानमण्डल में बनाये हुए कानूनों की व्याख्या के साथ-साथ उन कानूनों की व्याख्या भी करती है जो स्पष्ट नहीं होते। न्यायपालिका के द्वारा की गयी कानून की व्याख्या अन्तिम होती है और कोई भी व्यक्ति उस व्याख्या को मानने से इंकार नहीं कर सकता।

3. कानूनों का निर्माण – साधारणतया कानून-निर्माण का कार्य विधानमण्डल करता है, परन्तु कई दशाओं में न्यायपालिका भी कानूनों का निर्माण करती है। कानून की व्याख्या करते समय न्यायाधीश कानून के कई नये अर्थों को जन्म देते हैं, जिससे कानूनों का स्वरूप ही बदल जाता है और एक नये कानून का निर्माण हो जाता है। कई बार न्यायपालिका के सामने ऐसे मुकदमे भी आते हैं, जहाँ उपलब्ध कानूनों के आधार पर निर्णय नहीं किया जा सकता। ऐसे समय पर न्यायाधीश न्याय के नियमों, निष्पक्षता तथा ईमानदारी के आधार पर निर्णय करते हैं। यही निर्णय भविष्य में कानून बन जाते हैं।

4. संविधान का संरक्षण – संविधान की सर्वोच्चता को बनाये रखने का उत्तरदायित्व न्यायपालिका पर होता है। यदि व्यवस्थापिका कोई ऐसा कानून बनाये, जो संविधान की धाराओं के विरुद्ध हो तो न्यायपालिका उस कानून को असंवैधानिक घोषित कर सकती है। न्यायपालिका की इसे शक्ति को न्यायिक पुनरवलोकन (Judicial Review) का नाम दिया गया है संविधान की व्याख्या करने का अधिकार भी न्यायपालिका को प्राप्त होता है। इसी प्रकार न्यायपालिका संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करती है।

5. संघ का संरक्षण – जिन देशों ने संघात्मक शासन-प्रणाली को अपनाया है, वहाँ न्यायपालिका संघ के संरक्षक के रूप में भी कार्य करती है। संघात्मक शासन-प्रणाली में कई बार केन्द्र तथा राज्यों के मध्य विभिन्न प्रकार के मतभेद उत्पन्न हो जाते हैं, इनका निर्णय न्यायपालिका द्वारा ही किया जाता है। न्यायपालिका का यह कार्य है कि वह इस बात का ध्यान रखे कि केन्द्र राज्यों के कार्य में हस्तक्षेप न करे और न ही राज्य केन्द्र के कार्यों में।

6. नागरिक अधिकारों का संरक्षण – लोकतन्त्र को जीवित रखने के लिए नागरिकों की स्वतन्त्रता और अधिकारों की सुरक्षा अत्यन्त आवश्यक है। यदि इनकी सुरक्षा नहीं की जाती तो कार्यपालिका निरंकुश और तानाशाह बन सकती है। नागरिकों की स्वतन्त्रता तथा अधिकारों की सुरक्षा न्यायपालिका द्वारा की जाती है। अनेक राज्यों में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की व्यवस्था का संविधान में उल्लेख कर दिया गया है जिससे उन्हें संविधान और न्यायपालिका का संरक्षण प्राप्त हो सके। इस प्रकार न्यायपालिका का विशेष उत्तरदायित्व होता है कि वह सदैव यह दृष्टि में रखे कि सरकार का कोई अंग इन अधिकारों का अतिक्रमण न कर सके।

7. परामर्श देना – कई देशों में न्यायपालिका कानून सम्बन्धी परामर्श भी देती है। भारत में राष्ट्रपति किसी भी विषय पर उच्चतम न्यायालय से परामर्श ले सकता है, परन्तु इस सलाह को मानना या न मानना राष्ट्रपति पर निर्भर है।

8. प्रशासनिक कार्य – कई देशों में न्यायालयों को प्रशासनिक कार्य भी करने पड़ते हैं। भारत में उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय तथा अधीनस्थ न्यायालयों पर प्रशासकीय नियंत्रण रहता है।

9. आज्ञा-पत्र जारी करना – न्यायपालिका जनता को आदेश दे सकती है कि वे अमुक कार्य नहीं कर सकते और यह किसी कार्य को करवा भी सकती है। यदि वे कार्य न किये जाएँ तो न्यायालय बिना अभियोग चलाये दण्ड दे सकता है अथवा मानहानि का अभियोग लगाकर जुर्माना आदि भी कर सकता है।

10. कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड के कार्य – न्यायपालिका कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड को भी कार्य करती है, जिसका अर्थ है कि न्यायपालिका को भी सभी मुकदमों के निर्णयों तथा सरकार को दिये गये परामर्शो का रिकॉर्ड भी रखना पड़ता है। इन निर्णयों तथा परामर्शो की प्रतियाँ किसी भी समय, प्राप्त की जा सकती हैं।

न्यायपालिका का महत्त्व

व्यक्ति एक विचारशील प्राणी है और इसके साथ-साथ प्रत्येक व्यक्ति के अपने कुछ विशेष स्वार्थ भी होते हैं। व्यक्ति के विचारों और उसके स्वार्थों में इस प्रकार के भेद होने के कारण उनमें परस्पर संघर्ष नितान्त स्वाभाविक है। इसके अतिरिक्त शासन-कार्य करते हुए शासक वर्ग अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर सकता है। ऐसी स्थिति में सदैव ही एक ऐसी सत्ता की आवश्यकता रहती है जो व्यक्तियों के पारस्परिक विवादों को हल कर सके और शासक वर्ग को अपनी सीमाओं में रहने के लिए बाध्य कर सके। इन कार्यों को करने वाली सत्ता का नाम ही न्यायपालिका है।

राज्य के आदिकाल से लेकर आज तक किसी-न-किसी रूप में न्याय विभाग का अस्तित्व सदैव ही रहा है और सामान्य जनता के दृष्टिकोण से न्यायिक कार्य का सम्पादन सर्वाधिक महत्त्व रखता है। राज्य में व्यवस्थापिका और कार्यपालिका की व्यवस्था चाहे कितनी ही पूर्ण और श्रेष्ठ क्यों न हो, परन्तु यदि न्याय करने में पक्षपात किया जाता है, अनावश्यक व्यय और विलम्ब होता है या न्याय विभाग में अन्य किसी प्रकार का दोष है तो जनजीवन नितान्त दु:खपूर्ण हो जाएगा। न्याय विभाग के सम्बन्ध में बाइस ने अपनी श्रेष्ठ शब्दावली में कहा है, “न्याय विभाग की कुशलता से बढ़कर सरकार की उत्तमता की दूसरी कोई भी कसौटी नहीं है, क्योंकि किसी और चीज से नागरिक की सुरक्षा और हितों पर इतना प्रभाव नहीं पड़ता है, जितना कि उसके इस ज्ञान से कि वह एक निश्चित, शीघ्र व अपक्षपाती न्याय शासन पर निर्भर रह सकता है। वर्तमान समय में तो न्यायपालिका का महत्त्व बहुत अधिक बढ़ गया है, क्योंकि अभियोगों के निर्णय के साथ-साथ न्यायपालिका संविधान की व्याख्या और रक्षा का कार्य भी करती है।

न्यायपालिका की स्वतन्त्रता बनाये रखने हेतु उपाय

स्वतन्त्र न्यायपालिका उत्तम शासन की कसौटी है। इसलिए यह आवश्यक है कि न्यायपालिका का संगठन और कार्यविधि ऐसी हो जिससे वह बिना किसी भय और दबाव के स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य कर सके। स्वतन्त्र न्यायपालिका बनाये रखने के लिए निम्नलिखित व्यवस्था होनी चाहिए –

1. न्यायाधीशों की नियुक्ति और कार्यकाल – अधिकांश देशों में न्यायाधीशों की नियुक्ति और उनके कार्यकाल का निर्धारण कार्यपालिका के द्वारा किया जाता है। नियुक्ति का आधार योग्यता और प्रतिभा को बनाया जाता है।

2. न्यायाधीशों का वेतन – न्यायाधीशों को वेतन के रूप में अच्छी धनराशि मिलनी चाहिए। उचित वेतन होने पर ही वे निष्पक्षता और ईमानदारी से काम कर पाएँगे।

3. न्यायाधीशों की पदोन्नति – न्यायाधीशों की पदोन्नति के भी निश्चित नियम होने चाहिए। योग्यता और वरिष्ठता के आधार पर ही न्यायाधीशों की पदोन्नति होनी चाहिए। पदोन्नति का अधिकार नियुक्त करने वाली संस्था या कार्यपालिका को न होकर उच्चतम न्यायालय को होना चाहिए।

4. न्यायाधीशों को हटाना – न्यायाधीशों को उनके पद से हटाने के लिए भी एक निश्चित प्रक्रिया अपनायी जानी चाहिए। न्यायाधीशों को भ्रष्ट या अयोग्य होने पर ही उनके पद से हटाया जाना। चाहिए।

5. न्याय तथा शासन सम्बन्धी कार्यों का विभाजन – न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए यह भी अनिवार्य है कि शासन तथा न्याय विभाग दोनों के कार्यक्षेत्र अलग-अलग हों। यदि कार्यपालिका और न्यायपालिका पृथक् नहीं हैं तो न्यायाधीश अपने प्रशासनिक उत्तरदायित्व को पूरा करने के लिए अपनी न्यायिक शक्तियों का दुरुपयोग कर सकते हैं।

6. न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी पद देने से अलग रखा जाना – सेवानिवृत्त होने के बाद किसी भी न्यायाधीश को अन्य किसी सरकारी पद पर नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए।

7. न्यायाधीशों के निर्णयों, कार्यों और चरित्र की अनुचित आलोचना पर प्रतिबन्ध –  न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए यह भी आवश्यक है कि न्यायाधीशों के कार्यकाल में कोई भी उनके वैयक्तिक चरित्र अथवा कार्यों पर टिप्पणी न करे और उनके निर्णयों की आलोचना न करे।

प्रश्न 2.
न्यायाधीशों की नियुक्ति के विषय में आप क्या जानते हैं?
या
उच्चतम न्यायालय के गठन पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
भारत का उच्चतम न्यायालय राजधानी दिल्ली में स्थित है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या, उच्चतम न्यायालय का क्षेत्राधिकार, न्यायाधीशों के वेतन तथा सेवा-शर्तों को निश्चित करने का अधिकार संसद को प्रदान किया गया है। अब उच्चतम न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा 30 अन्य न्यायाधीश हैं। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत का राष्ट्रपति करता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के सम्बन्ध में राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय अथवा उच्च न्यायालयों के ऐसे अन्य न्यायाधीशों से परामर्श लेता है, जिनसे वह इस सम्बन्ध में परामर्श लेना आवश्यक समझता है। अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के सम्बन्ध में जुलाई 1998 ई० को राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय में भेजे गए स्पष्टीकरण प्रस्ताव पर विचार करते हुए नौ-सदस्यीय खण्डपीठ ने सर्वसम्मति से निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि उच्चतम न्यायालय में किसी न्यायाधीश की नियुक्ति तथा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अथवा किसी न्यायाधीश के स्थानान्तरण के विषय में अपनी संस्तुतियाँ प्रेषित करने से पूर्व उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों तथा उच्च न्यायालय में नियुक्ति करने से पूर्व दो, वरिष्ठतम न्यायाधीशों से परामर्श किया जाना आवश्यक है। यदि दो न्यायाधीश भी विपरीत राय देते हैं। तो मुख्य न्यायाधीश द्वारा सरकार को अपनी सिफारिश नहीं भेजनी चाहिए।

तदर्थ नियुक्तियाँ (ad hoc Appointments) – संविधान के अनुच्छेद 127 के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति से तदर्थ नियुक्तियाँ भी कर सकता है। ऐसे न्यायाधीशों की नियुक्तियाँ किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु की जाती हैं।

1. न्यायाधीशों की योग्यताएँ – उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ होनी आवश्यक हैं –
(क) वह भारतीय नागरिक हो।
(ख) वह किसी उच्च न्यायालय में कम-से-कम पाँच वर्ष तक न्यायाधीश रह चुका हो,
अथवा 10 वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो,
अथवा राष्ट्रपति की दृष्टि में लब्धप्रतिष्ठ विधिवेत्ता हो।

2. न्यायाधीशों का कार्यकाल तथा पदच्युति – उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर कार्यरत रह सकते हैं। 65 वर्ष की आयु समाप्ति पर उन्हें सेवानिवृत्त कर दिया जाता है। यदि कोई न्यायाधीश चाहे तो इससे पूर्व भी राष्ट्रपति को त्यागपत्र देकर अपने पदभार से मुक्त हो सकता है। इसके अतिरिक्त उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर राष्ट्रपति के आदेश द्वारा उसके पद से हटाया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उसके पद से हटाने के लिए समावेदन प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा समर्थित होना चाहिए। इसके बाद वह समावेदन राष्ट्रपति के समक्ष रखा जाएगा और उसके आदेश देने पर अमुक न्यायाधीश को उसके पद से हटा दिया जाएगा। लेकिन ऐसा समावेदन संसद के एक ही सत्र में प्रस्तावित और स्वीकृत होना चाहिए। इसी प्रक्रिया के आधार पर उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति रामास्वामी को हटाने का प्रयास संसद द्वारा किया गया था, परन्तु न्यायमूर्ति रामास्वामी ने आरोप सिद्ध होने से पूर्व ही अपना पद-त्याग कर दिया।

3. न्यायाधीशों के वेतन – 1998 ई० के एक अधिनियम द्वारा उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ₹ 1 लाख प्रतिमाह और अन्य न्यायाधीशों को ₹ 90,000 प्रतिमाह वेतन निर्धारित किया गया है तथा इसके साथ-साथ उन्हें नि:शुल्क आवास, सवेतन छुट्टियाँ तथा सेवानिवृत्ति प्राप्त करने पर पेंशन आदि की व्यवस्था की गई है।

प्रश्न 3.
भारत के उच्चतम न्यायालय की संरचना का उल्लेख कीजिए। उसे संविधान का संरक्षक क्यों कहा जाता है?
या
“भारत के सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का संरक्षक व नागरिकों के मूलाधिकारों का रक्षक कहा जाता है।” व्याख्या कीजिए।
या
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति कैसे होती है?
या
सर्वोच्च न्यायालय के संगठन का वर्णन कीजिए। उसको ‘संविधान का रक्षक’ एवं ‘नागरिकों के मूल अधिकारों का रक्षक’ क्यों कहा जाता है ?
या
उच्चतम न्यायालय का संगठन समझाइए। उसके महत्त्व को भी समझाइए।
या
भारत के उच्चतम न्यायालय के गठन व उसके कार्यों को संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
भारत के उच्चतम न्यायालय के संगठन तथा क्षेत्राधिकार का वर्णन कीजिए।
या
न्यायालय की स्वतन्त्रता का संरक्षण किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर :

सर्वोच्च न्यायालय की आवश्यकता (महत्त्व)

भारतीय संविधान-निर्माताओं के समक्ष यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न था कि भारत में संविधान व लोकतन्त्र की रक्षा का दायित्व किसे सौंपा जाए? गम्भीर विचार-विमर्श के पश्चात् संविधान निर्माताओं ने भारत । संघ में लोकतन्त्र, नागरिकों के अधिकार व संविधान की रक्षा का दायित्व एक स्वतन्त्र व निष्पक्ष न्यायपालिका को सौंपा। भारत में न्याय-व्यवस्था के शिखर पर सर्वोच्च न्यायालय का गठन किया गया है। श्री वी० एस० देशपाण्डे के शब्दों में, “भारत में संविधान व लोकतन्त्र की रक्षा का दायित्व सर्वोच्च न्यायालय को ही है। स्वतन्त्र भारत में सर्वोच्च न्यायालय का कार्यकरण बहुत गौरवमय रहा है। तथा आम जनता में व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों तथा स्वाधीनता के प्रहरी के रूप में उसके प्रति अटूट श्रद्धा-विश्वास है।”

भारत की संघीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अन्तर्गत न्यायालय की आवश्यकता अथवा महत्त्व को निम्नलिखित तर्को द्वारा प्रमाणित किया जा सकता है –

1. संघात्मक शासन के लिए अनिवार्य – संघीय शासन-व्यवस्था के अन्तर्गत केन्द्र व राज्यों के मध्य शक्तियों का पृथक्करण पाया जाता है। ऐसी स्थिति में अपने-अपने अधिकार-क्षेत्र को लेकर केन्द्र व राज्यों में विवाद की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं। अत: केन्द्र व राज्यों के मध्य उत्पन्न किसी भी विवाद के निराकरण हेतु एक स्वतन्त्र व निष्पक्ष शक्ति का होना अनिवार्य होता है। भारत में इसी उद्देश्य को दृष्टि में रखते हुए एक स्वतन्त्र व निष्पक्ष सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गयी है। जी० एन० जोशी ने संघीय व्यवस्था में निष्पक्ष व स्वतन्त्र न्यायपालिका की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा है, “संघात्मक शासन में कई सरकारों का समन्वय होने के कारण संघर्ष अवश्यम्भावी है। अतः संघीय नीति का यह आवश्यक गुण है कि देश में एक ऐसी न्यायिक व्यवस्था हो, जो संघीय कार्यपालिका एवं व्यवस्थापिका तथा इकाइयों की सरकारों से स्वतन्त्र हो।”

2. संविधान का रक्षक – भारत में एक लिखित और कठोर संविधान को अपनाया गया है और इसके साथ ही संविधान की सर्वोच्चता के सिद्धान्त को मान्यता प्रदान की गयी है। संविधान की सर्वोच्चता को बनाये रखने का कार्य सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा ही किया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा संविधान के रक्षक और संविधान के आधिकारिक व्याख्याता के रूप में कार्य किया जाता है। वह संसद द्वारा निर्मित ऐसी प्रत्येक विधि को अवैध घोषित कर सकता है जो संविधान के विरुद्ध हो। अपनी इस शक्ति के आधार पर वह संविधान की प्रभुता और सर्वोच्चता की रक्षा करता है। संविधान के सम्बन्ध में किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न होने पर संविधान की अधिकारपूर्ण व्याख्या उसी के द्वारा की जाती है। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय संविधान की रक्षा करता है।

3. परामर्शदात्री संस्था के रूप में – भारत को सर्वोच्च न्यायालय एक परामर्शदात्री संस्था के रूप में भी विशिष्ट दायित्वों का निर्वहन करता है। राष्ट्रपति किसी भी महत्त्वपूर्ण विषय के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श माँग सकता है। इस सम्बन्ध में यह उल्लेखनीय है कि न्यायालय के परामर्श को स्वीकार करने या न करने के लिए राष्ट्रपति पूर्ण स्वतन्त्र होता है।

4. मौलिक अधिकारों का रक्षक – संविधान के अनुच्छेद 32 में वर्णित है कि न्यायालय संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिकों के मौलिक अधिकारों का अभिरक्षक है। भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का किसी भी रूप में हनन होने पर व्यक्ति न्यायालय की शरण ले सकता है। इस सम्बन्ध में पायली ने कहा है, “मौलिक अधिकारों का महत्त्व एवं सत्ता समय-समय पर न्यायालयों द्वारा दिये गये निर्णयों से सिद्ध होती है, जिससे कार्यपालिका की निरंकुशता तथा विधानमण्डलों की स्वेच्छाचारिता से नागरिकों की रक्षा होती है।

5. भारत का अन्तिम न्यायालय – भारत की न्यायिक व्यवस्था में सर्वोच्च न्यायालय अन्तिम न्यायालय है। परिणामस्वरूप इसके निर्णय अन्तिम व सर्वमान्य होते हैं। इन निर्णयों में परिवर्तन केवल वह ही कर सकता है।

अन्तत: सर्वोच्च न्यायालय की आवश्यकता व महत्त्व को डॉ० एम० वी० पायली के इस कथन से प्रमाणित किया जा सकता है, “सर्वोच्च न्यायालय संघीय व्यवस्था का एक आवश्यक अंग है। यह संविधान की व्याख्या करने वाला, केन्द्र व राज्यों के मध्य उत्पन्न विवादों का निराकरण करने वाला तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने वाला अन्तिम अभिकरण है।”

सर्वोच्च न्यायालय का गठन

संविधान के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या, सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार, न्यायाधीशों के वेतन या सेवा-शर्ते निश्चित करने का अधिकार संसद को दिया गया था। अनुच्छेद 124 के अनुसार, “भारत का एक उच्चतम न्यायालय होगा, जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश तथा सात अन्य न्यायाधीश होंगे।” परन्तु इस सम्बन्ध में संविधान में यह व्यवस्था की गयी है कि संसद विधि के द्वारा न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि कर सकती है। वर्तमान समय में 1985 ई० में पारित विधि के अन्तर्गत संसद द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या 31 कर दी गयी है। वर्तमान समय में सर्वोच्च न्यायालय में 1 मुख्य न्यायाधीश व 30 अन्य न्यायाधीश होते हैं। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के परामर्श से की जाती है तथा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से की जाती है।

न्यायाधीशों की योग्यताएँ (मुख्य न्यायाधीश) – संविधान द्वारा उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ निर्धारित की गयी हैं –

  1. वह भारत को नागरिक हो।
  2. वह कम-से-कम पाँच वर्ष तक किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद पर कार्य कर चुका हो अथवा वह दस वर्ष तक किसी उच्च न्यायालय में अधिवक्ता रहा हो।
  3. राष्ट्रपति की दृष्टि में विख्यात विधिवेत्ती हो।
  4. उसकी आयु 65 वर्ष से कम हो।

कार्यकाल – उच्चतम न्यायालय का प्रत्येक न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बना रह सकता है। 65 वर्ष की आयु पूर्ण करने के पश्चात् उसे पदमुक्त कर दिया जाता है, परन्तु यदि न्यायाधीश समय से पूर्व पदत्याग करना चाहता है, तो वह राष्ट्रपति को अपना.त्याग-पत्र देकर मुक्त,हो सकता है।

महाभियोग – संवैधानिक प्रावधान के अनुसार दुर्व्यवहार व भ्रष्टाचार के आरोप में लिप्त पाये जाने पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को संसद द्वारा 2/3 बहुमत से महाभियोग लगाकर, राष्ट्रपति के माध्यम से पदच्युत किया जा सकता है।

शपथ – उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश पद को ग्रहण करने से पूर्व प्रत्येक न्यायाधीश राष्ट्रपति के समक्ष शपथ लेता है।

वेतन व भत्ते – नवीन वेतनमानों के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को र 2,80,000 मासिक वेतन व अन्य न्यायाधीशों को 2,50,000 मासिक वेतन की धनराशि देना निश्चित किया गया है। इसके अतिरिक्त न्यायाधीशों के लिए नि:शुल्क आवास व सेवा-निवृत्ति के पश्चात् पेंशन देने की व्यवस्था भी की गयी है। इस सम्बन्ध में यह स्मरणीय है कि न्यायाधीशों को वेतन व भत्ते भारत की संचित निधि में से दिये जाते हैं, जो संसद के अधिकारक्षेत्र से मुक्त होता है। इसके साथ ही न्यायाधीशों के वेतन में उनके कार्यकाल के समय में कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता। केवल वित्तीय आपात के समय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन-भत्ते कम किये जा सकते हैं।

उन्मुक्तियाँ – संविधान द्वारा न्यायाधीशों को प्राप्त उन्मुक्तियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. न्यायाधीशों के कार्यों व निर्णयों को आलोचना से मुक्त रखा गया है।
  2. किसी भी निर्णय के सम्बन्ध में न्यायाधीश पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि उसने वह निर्णय स्वार्थवश तथा किसी के हित विशेष को ध्यान में रखकर लिया है।
  3. महाभियोग के अतिरिक्त किसी अन्य प्रक्रिया के द्वारा न्यायाधीश के आचरण के विषय में कोई चर्चा नहीं की जा सकती।

वकालत पर रोक – जो व्यक्ति भारत के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के पद पर आसीन हो जाती है, वह अवकाश ग्रहण करने के पश्चात् भारत के किसी भी न्यायालय में या किसी अन्य अधिकारी के समक्ष वकालत नहीं कर सकता। संविधान द्वारा यह व्यवस्था न्यायाधीशों को अपने कार्यकाल में निष्पक्ष व स्वतन्त्र होकर अपने दायित्वों का निर्वहन करने के उद्देश्य को दृष्टि में रखकर की गयी है।

[संकेत – उच्चतम न्यायालय के कार्य व क्षेत्राधिकार तथा न्यायालय की स्वतन्त्रता का संरक्षण हेतु दीर्घ प्रश्न 4 का अध्ययन करें।]

प्रश्न 4.
उच्चतम न्यायालय को अभिलेख न्यायालय क्यों कहते हैं? उसके क्षेत्राधिकार का वर्णन कीजिए।
या
नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय किस प्रकार के लेख (रिट) जारी कर सकते हैं? किन्हीं दो का उदाहरण देते हुए समझाइए।
या
सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार का वर्णन कीजिए और यह भी बताइए कि न्यायपालिका की स्वतन्त्रता हेतु संविधान में क्या प्रावधान किए गए हैं?
या
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियों और अधिकारों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
या
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार का वर्णन कीजिए।
या
भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के कार्य एवं शक्तियों का उल्लेख कीजिए।
या
न्यायपालिका को स्वतन्त्र रखने के लिए संविधान में क्या व्यवस्थाएँ की गयी हैं? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
सर्वोच्च न्यायालय के प्रारम्भिक तथा अपीलीय क्षेत्राधिकार का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
सर्वोच्च न्यायालय की स्वतन्त्रता का संरक्षण किस प्रकार किया गया है?
उत्तर :

सर्वोच्च न्यायालय के कार्य और अधिकार

सर्वोच्च न्यायालय भारत का सर्वोपरि न्यायालय है। अतएव उसे अत्यधिक विस्तृत अधिकार प्रदान किये गये हैं। इन अधिकारों को निम्नलिखित सन्दर्भो में समझा जा सकता है –

(1) प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार

श्री दुर्गादास बसु ने कहा कि “यद्यपि हमारा संविधान एक सन्धि या समझौते के रूप में नहीं है, फिर भी संघ तथा राज्यों के बीच व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका सम्बन्धी अधिकारों का विभाजन किया गया है। अतः अनुच्छेद 131 संघ तथा राज्य या राज्यों के बीच न्याय-योग्य विवादों के निर्णय का प्रारम्भिक तथा एकमेव क्षेत्राधिकार सर्वोच्च न्यायालय को सौंपता है।”

इस क्षेत्राधिकार को पुनः दो वर्गों में रखा जा सकता है –

(क) प्रारम्भिक एकमेव क्षेत्राधिकार – प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत वे अधिकार आते हैं जो उच्चतम न्यायालय के अतिरिक्त किसी अन्य न्यायालय को प्राप्त नहीं हैं। सर्वोच्च न्यायालय कुछ उन विवादों पर विचार करता है जिन पर अन्य न्यायालय विचार नहीं कर सकते हैं। ये विवाद निम्नलिखित प्रकार के होते हैं –

  1. भारत सरकार तथा एक या एक से अधिक राज्यों के बीच विवाद।
  2. वे विवाद जिनमें भारत सरकार तथा एक या एक से अधिक राज्य एक ओर हों और एक या एक से अधिक राज्य दूसरी ओर हों।
  3. दो या दो से अधिक राज्यों के बीच विवाद।

इस सम्बन्ध में यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि 26 जनवरी, 1950 के पूर्व जो सन्धियाँ अथवा संविदाएँ भारत संघ और देशी राज्यों के बीच की गयी थीं और यदि वे इस समय भी लागू हों तो उन पर उत्पन्न विवाद सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार के बाहर है।

(ख) प्रारम्भिक समवर्ती क्षेत्राधिकार – भारतीय संविधान में लिखित मूल अधिकारों को लागू करने का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय के साथ ही उच्च न्यायालयों को भी प्रदान कर दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 32 द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को यह जिम्मेदारी दी गयी है कि वह मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए उचित कार्यवाही करे।

(2) अपीलीय क्षेत्राधिकार

भारत में एकीकृत न्यायिक-प्रणाली अपनाने के कारण राज्यों के उच्च न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय के अधीन हैं और इस रूप में उसका इन उच्च न्यायालयों पर अधीक्षण और नियंत्रण स्थापित किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय में सभी उच्च न्यायालयों और न्यायाधिकरणों द्वारा, केवल सैनिक न्यायालय को छोड़कर, संवैधानिक, दीवानी और फौजदारी मामलों में दिये गये निर्णयों के विरुद्ध अपील की जा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार को निम्नलिखित वर्गों में रखा जा सकता है –

(क) संवैधानिक अपीलें – संवैधानिक मामलों से सम्बन्धित उच्च न्यायालय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील तब की जा सकती है जब कि उच्च न्यायालये यह प्रमाणित कर दे कि इस विवाद में “संविधान की व्याख्या से सम्बन्धित विधि का कोई सारवान प्रश्न सन्निहित है। लेकिन यदि उच्च न्यायालय ऐसा प्रमाण-पत्र देने से इंकार कर देता है तो स्वयं सर्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 136 के अन्तर्गत अपील की विशेष आज्ञा दे सकती है, यदि उसे यह विश्वास हो जाए कि उसमें कानून का कोई सारवान प्रश्न सन्निहित है। निर्वाचन आयोग बनाम श्री वेंकटरावे (1953) के मुकदमे में यह प्रश्न उठाया गया था कि क्या किसी संवैधानिक विषय में अनुच्छेद 132 के अधीन किसी अकेले न्यायाधीश के निर्णय की अपील भी सर्वोच्च न्यायालय में की जा सकती है अथवा नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने इसका उत्तर ‘हाँ’ में दिया है।

(ख) दीवानी की अपीलें – संविधान द्वारा दीवानी मामलों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपील सुने जाने की व्यवस्था की गयी है। किसी भी राशि का मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय के पास आ सकता है, जब उच्च न्यायालय यह प्रमाण-पत्र दे दे कि मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय के सुनने योग्य है या उच्च न्यायालय यह प्रमाण-पत्र दे दे कि मुकदमे में कोई कानूनी प्रश्न विवादग्रस्त है। यदि उच्च न्यायालय किसी दीवानी मामले में इस प्रकार का प्रमाण-पत्र न दे तो सर्वोच्च न्यायालय स्वयं भी किसी व्यक्ति को अपील करने की विशेष आज्ञा दे सकता है।

(ग) फौजदारी की अपीलें – फौजदारी के मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील सुन सकता है। ये अपीलें इन दशाओं में की जा सकती हैं –

  1. जब किसी उच्च न्यायालय ने अधीन न्यायालय के दण्ड-मुक्ति के निर्णय को रद्द करके अभियुक्त को मृत्यु-दण्ड दे दिया हो।
  2. जब कोई उच्च न्यायालय यह प्रमाण-पत्र दे दे कि विवाद उच्चतम न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत किये जाने योग्य है।
  3. जब किसी उच्च न्यायालय के किसी मामले को अधीनस्थ न्यायालय से मँगाकर अभियुक्त को मृत्यु-दण्ड दिया हो।
  4. यदि सर्वोच्च न्यायालय किसी मुकदमे में यह अनुभव करता है कि किसी व्यक्ति के साथ वास्तव में अन्याय हुआ है, तो वह सैनिक न्यायालयों के अतिरिक्त किसी भी न्यायाधिकरण के विरुद्ध अपील करने की विशेष आज्ञा प्रदान कर सकता है।

(घ) विशिष्ट अपील – अनुच्छेद 136 द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को यह भी अधिकार प्रदान किया गया है कि वह अपने विवेक से प्रभावित पक्ष को अपील का अधिकार प्रदान करे। किसी सैनिक न्यायाधिकरण के निर्णय को छोड़कर सर्वोच्च न्यायालय भारत के किसी भी उच्च न्यायालये या न्यायाधिकरण के निर्णय दण्ड या आदेश के विरुद्ध अपील की विशेष आज्ञा प्रदान कर सकता है, चाहे भले ही उच्च न्यायालय ने अपील की आज्ञा से इंकार ही क्यों न किया हो।

अपीलीय क्षेत्राधिकार के दृष्टिकोण से भारत का सर्वोच्च न्यायालय विश्व में सबसे अधिक शक्तिशाली है। सर्वोच्च न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार को लक्ष्य करते हुए ही 1950 ई० को सर्वोच्च न्यायालय के उद्घाटन के अवसर पर भाषण देते हुए श्री एम० सी० सीतलवाड़ ने कहा था कि “यह कहना सत्य होगा कि स्वरूप व विस्तार की दृष्टि से इस न्यायालय का क्षेत्राधिकार और शक्तियाँ राष्ट्रमण्डल के किसी भी देश के सर्वोच्च न्यायालय तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय के कार्यक्षेत्र तथा शक्तियों से व्यापक हैं।”

(3) संविधान का रक्षक व मूल अधिकारों का प्रहरी

संविथान की व्याख्या तथा रक्षा करना भी सर्वोच्च न्यायालय का एक मुख्य कार्य है। जब कभी संविधान की व्याख्या के बारे में कोई मतभेद उत्पन्न हो जाए तो सर्वोच्च न्यायालय इस विषय में स्पष्टीकरण देकर उचित व्याख्या करता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गयी व्याख्या को अन्तिम तथा सर्वोच्च माना जाता है। केवल संविधान की व्याख्या करना ही नहीं, बल्कि इसकी रक्षा करना भी सर्वोच्च न्यायालय का कार्य है। सर्वोच्च न्यायालय को व्यवस्थापिका और कार्यपालिका के कार्यों का पुनरवलोकन करने का भी अधिकार है। यदि सर्वोच्च न्यायालय को यह विश्वास हो जाए कि संसद द्वारा बनाया गया कोई कानून या कार्यपालिका का कोई आदेश संविधान का उल्लंघन करता है तो वह उस कानून व आदेश को असंवैधानिक घोषित करके रद्द कर सकता है। इस प्रकार न्यायालय संविधान की सर्वोच्चता कायम रखता है।

संविधान की धारा 32 के अनुसार न्यायालय का यह भी उत्तरदायित्व है कि वह मूल अधिकारों की रक्षा करे। इन अधिकारों की रक्षा के लिए यह न्यायालय बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार पृच्छा और उत्प्रेषण लेख जारी करता है।

(4) परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार

सर्वोच्च न्यायालय के पास परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार भी है। अनुच्छेद 143 के अनुसार, यदि कभी राष्ट्रपति को यह प्रतीत हो कि विधि या तथ्यों के बारे में कोई ऐसा महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाया गया है या उठने वाला है, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय की राय लेना जरूरी है तो वह उस प्रश्न को परामर्श के लिए सर्वोच्च न्यायालय के पास भेज सकता है, किन्तु अनुच्छेद 143 ‘बाध्यकारी प्रकृति का नहीं है। यह न तो राष्ट्रपति को बाध्य करता है कि वह सार्वजनिक महत्त्व के विषय पर न्यायालय की राय माँगे और न ही सर्वोच्च न्यायालय को बाध्य करता है कि वह भेजे गये प्रश्न पर अपनी राय दे। वैसे भी यह राय न्यायिक उद्घोषणा’ या ‘न्यायिक निर्णय नहीं है। इसीलिए इसे मानने के लिए राष्ट्रपति बाध्य नहीं है।

अब तक राष्ट्रपति ने सर्वोच्च न्यायालय से अनेक बार परामर्श माँगा है। केरल शिक्षा विधेयक, 1947 में, ‘राष्ट्रपति के चुनाव पर एवं 1978 ई० में ‘विशेष अदालत विधेयक पर माँगी गयी सम्पतियाँ अधिक महत्त्वपूर्ण रही हैं।

सर्वोच्च न्यायालय का परामर्श सम्बन्धी क्षेत्राधिकार मुकदमेबाजी को रोकने या उसे कम करने में सहायक होता है। संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के सर्वोच्च न्यायालयों द्वारा सलाहकार की भूमिका अदा करना पसन्द नहीं किया गया है। इस सम्बन्ध में भारत की व्यवस्था कनाडा और बर्मा के अनुरूप है।

(5) अन्य क्षेत्राधिकार

(क) अधीनस्थ न्यायालयों की जाँच – सर्वोच्च न्यायालय को अपने अधीनस्थ न्यायालयों के कार्यों की जाँच करने का अधिकार प्राप्त है।

(ख) न्यायालयों की कार्यवाही संचालन हेतु नियम बनाना – सर्वोच्च न्यायालय को अपने अधीनस्थ न्यायालयों की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाने हेतु नियम बनाने का अधिकार है, परन्तु उन नियमों पर राष्ट्रपति की स्वीकृति अनिवार्य होती है।

(ग) पुनर्विचार का अधिकार – सर्वोच्च न्यायालय यदि ऐसा अनुभव करे कि वह अपने निर्णय में कोई भूल कर बैठा है या उसके निर्णय में कोई कमी रह गयी है, तो उस विवाद पर पुनर्विचार करने की प्रार्थना की जा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पहले निर्णय को बदलकर अनेक बार नये निर्णय दिये हैं।

(6) अभिलेख न्यायालय

अनुच्छेद 129 सर्वोच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय का स्थान प्रदान करता है। इसके दो अर्थ हैं –

  1. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और अदालती कार्यवाही को अभिलेख के रूप में रखा जाएगा जो अधीनस्थ न्यायालयों में दृष्टान्त के रूप में प्रस्तुत किये जाएँगे और उनकी प्रामाणिकता के बारे में किसी प्रकार का सन्देह नहीं किया जाएगा।
  2. इस न्यायालय द्वारा न्यायालय की अवमानना’ के लिए दण्ड दिया जा सकता है। वैसे तो यह बात प्रथम स्थिति में स्वतः ही मान्य हो जाती है, लेकिन संविधान में इस न्यायालय की अवमानना करने वालों के लिए दण्ड की व्यवस्था विशिष्ट रूप से की गयी है।

सर्वोच्च न्यायालय के उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि सर्वोच्च न्यायालय का सर्वप्रमुख कार्य संविधान की रक्षा करना ही है। इस सम्बन्ध में श्री डी० के० सेन ने लिखा है, “न्यायालय भारत के सभी न्यायालयों के न्यायिक निरीक्षण की शक्तियाँ रखता है और वही संविधान का वास्तविक व्याख्याता और संरक्षक है। उसका यह कर्तव्य होता है कि वह यह देखे कि उसके प्रावधानों को उचित रूप में माना जा रहा है और जहाँ कहीं आवश्यक होता है वहाँ वह उसके प्रावधानों को स्पष्ट करता है।”

संक्षेप में, मौलिक अधिकारों को छोड़कर भारतीय सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियाँ ‘विश्व के किसी भी सर्वोच्च न्यायालय से अधिक हैं। इस पर भी भारत का सर्वोच्च न्यायालय अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय से अधिक शक्तिशाली नहीं है, क्योंकि इसकी शक्तियाँ ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के कारण मर्यादित हैं, इसीलिए यह संसद के तीसरे सदन की भूमिका नहीं अपना सकता है।।

सर्वोच्च न्यायालय की स्वतन्त्रता

भारतीय संविधान में सर्वोच्च न्यायालय की स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए अनेक प्रावधान किये गये हैं, जो निम्नवत् हैं –

  1. न्यायपालिका को कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका से पृथक् कर दिया गया है।
  2. न्यायाधीशों के वेतन तथा भत्ते भारत सरकार की संचित निधि से दिये जाते हैं। न्यायाधीशों के लिए पर्याप्त वेतन की व्यवस्था की गयी है। न्यायाधीशों के वेतन व भत्तों में किसी भी प्रकार की कटौती नहीं की जा सकती है।
  3. न्यायाधीश अपने पद पर 65 वर्ष की आयु तक कार्य कर सकते हैं। यद्यपि महाभियोग लगाकर न्यायाधीशों को अपने पद से हटाने का प्रावधान भारतीय संविधान में किया गया है, परन्तु वह बहुत जटिल है; इसलिए न्यायाधीशों को उनके पद से हटाना भी सरल नहीं है।
  4. न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। संसद का इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं है। इस कारण न्यायाधीश पूर्ण स्वतन्त्र रहते हैं।
  5. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के निर्णयों व कार्यों की आलोचना नहीं की जा सकती है। इस कारण भी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करते हैं।
  6. सर्वोच्च न्यायालय को अपने कर्मचारी वर्ग पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त है।
  7. सर्वोच्च न्यायालय को अपनी कार्यप्रणाली के संचालन हेतु नियम बनाने का अधिकार है।

प्रश्न 5.
जनहित याचिकाएँ (जनहित अभियोग) के अर्थ एवं महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
या
जनहित याचिका से आप क्या समझते हैं? भारतीय न्याय-व्यवस्था में इनकी भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर :

जनहित याचिकाएँ (जनहित अभियोग) का अर्थ

न्याय के प्रसंग में परम्परागत धारणा यह रही है कि न्यायालय से न्याय पाने को हक उसी व्यक्ति को है जिसके मूल अधिकारों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है, जिसे स्वयं या जिसके पारिवारिक जन को कोई पीड़ा पहुँची है, किन्तु आज की परिस्थितियों में न्यायिक सक्रियतावाद के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय ने आंग्ल विधि के उपर्युक्त नियम को परिवर्तित करते हुए यह व्यवस्था की है कि कोई भी व्यक्ति किसी ऐसे समूह या वर्ग की ओर से मुकदमा लड़ सकता है, जिसको उसके कानून या संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया हो। सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि गरीब, अपंग अथवा सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से दलित लोगों के मामले में आम जनता का कोई आदमी न्यायालय के समक्ष ‘वाद’ (मुकदमा) ला सकता है। न्यायालय अपने सारे तकनीकी और कार्यविधि सम्बन्धी नियमों की परवाह किये बिना ‘वाद’ लिखित रूप में देने मात्र से ही कार्यवाही करेगा। न्यायाधीश कृष्णा अय्यर के अनुसार, ‘वाद कारण’ और ‘पीड़ित व्यक्ति की संकुचित धारणा का स्थान अब ‘वर्ग कार्यवाही और लोकहित में कार्यवाही की व्यापक धारणा ने ले लिया है। ऐसे मामले व्यक्तिगत मामलों से भिन्न होते हैं। वैयक्तिक मामलों में ‘वादी’ और ‘प्रतिवादी होते हैं, जब कि जनहित संरक्षण से सम्बन्धित मामले किसी एक व्यक्ति के बजाय ऐसे समूह के हितों की रक्षा पर बल देते हैं जो कि शोषण और अत्याचार का शिकार होता है और जिसे संवैधानिक और मानवीय अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है।

इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने गरीब और असहाय लोगों की ओर से जनहित में कार्य करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को मुकदमा लड़ने का अधिकार दे दिया है। इस प्रकार के मुकदमे के लिए जो . प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत किया जाता है, वह जनहित याचिका’ है तथा इस प्रकार का मुकदमा जनहित अभियोग है।

जनहित याचिकाओं का महत्त्व

जनहित याचिकाओं का महत्त्व निम्नलिखित रूप में बताया जा सकता है –

1. समाज के निर्धन व्यक्तियों और कमजोर वर्गों को न्याय प्राप्त होना – भारत में करोड़ों ऐसे व्यक्ति हैं जो राजव्यवस्था और समाज के धनी-मानी व्यक्तियों के अत्याचार भुगत रहे हैं, जिनका शोषण हो रहा है, लेकिन उनके पास न्यायालय में जाने के लिए आवश्यक जानकारी, समझ और साधन नहीं हैं। जनहित याचिकाओं के माध्यम से अब समाज के शिक्षित और साधन सम्पन्न व्यक्ति इन कमजोर वर्गों की ओर से न्यायालय में जाकर इनके लिए न्याय प्राप्त कर सकते हैं। जनहित याचिकाओं की विशेष बात यह है कि ‘वाद’ प्रस्तुत करने के लिए कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करना आवश्यक नहीं होता और इन मुकदमों में न्यायालय पीड़ित पक्ष के लिए आवश्यकतानुसार नि:शुल्क कानूनी सहायता की व्यवस्था भी करता है।

2. कानूनी न्याय के साथ-साथ आर्थिक-सामाजिक न्याय पर बल – जनहित याचिकाओं और न्यायिक सक्रियता के अन्तर्गत संविधान की भावना को दृष्टि में रखते हुए इस विचार को अपनाया गया कि देश के दीन और दलित जनों के प्रति न्यायालयों का विशेष दायित्व है। अतः इन न्यायालयों को कानूनी न्याय से आगे बढ़कर आर्थिक-सामाजिक न्याय प्रदान करने का प्रयत्न करना चाहिए। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश के हरिजनों के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं उनकी आर्थिक-सामाजिक दशाओं को जाँचने के लिए एक आयोग गठित किया आयोग की जाँच रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि हरिजनों का धन्धा ठेके पर दिये जाने से उन्हें न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलेगी। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में इस बात का प्रतिपादन किया कि यदि निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम मजदूरी दी जाती है तो इसे संविधान के अनुच्छेद 23 का उल्लंघन और बेगार मानेंगे। इस प्रकार बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत सरकार’ विवाद में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘बँधुआ मुक्ति मोर्चा संस्था के पत्र को रिट मानकर आयोग नियुक् कर जाँच करवाई और जाँच में जब पाया कि ‘मजदूर अमानवीय दशा में कार्यरत हैं तब न्यायालय ने इन मजदूरों की मुक्ति के आदेश दिये।

3. शासन की स्वेच्छाचारिता पर नियंत्रण – जनहित याचिकाओं का एक रूप और प्रयोजन शासन की स्वेच्छाचारिता पर नियंत्रण है। संविधान और कानून के अन्तर्गत उच्च कार्यपालिका अधिकारियों को कुछ ‘स्वविवेकीय शक्तियाँ प्रदान की गयी हैं। इस पृष्ठभूमि में जनहित याचिकाओं और न्यायिक सक्रियता के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात का प्रतिपादन किया कि विवेकात्मक शक्तियों के अन्तर्गत सरकार की कार्यवाही विवेक सम्मत होनी चाहिए तथा इस कार्यवाही को सम्पन्न करने के लिए जो कार्यविधि अपनायी जाए, वह कार्यविधि भी विवेक सम्मत, उत्तम और न्यायपूर्ण होनी चाहिए।

4. शासन को आवश्यक निर्देश देना – 1993-2003 के वर्षों में तो सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने जनहित याचिकाओं और न्यायिक सक्रियता के आधार पर समस्त राजनीतिक व्यवस्था में पहले से बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका प्राप्त कर ली। इन न्यायालयों ने जब यह देखा कि जाँच एजेन्सियाँ उच्च पदस्थ अधिकारियों के विरुद्ध जाँच कार्य में ढिलाई बरत रही हैं तब न्यायालयों ने विभिन्न जाँच एजेन्सियों को अपना कार्य ठीक ढंग से करने के लिए निर्देश दिये और इस बात का प्रतिपादन किया कि व्यक्ति चाहे कितना भी बड़ा हो, कानून उससे ऊपर है’ तथा सरकारी एजेन्सी को अपना कार्य निष्पक्षता के साथ करना चाहिए। पिछले 20 वर्षों में जनहित याचिकाओं और न्यायिक सक्रियता के आधार पर न्यायालयों ने बन्धुआ मजदूरी और बाल श्रम की स्थितियाँ समाप्त करने, कानून और व्यवस्था बनाये रखते हुए निर्दोष नागरिकों के जीवन की रक्षा करने, प्राथमिक शिक्षा सम्बन्धी संविधान के प्रावधान को अनिवार्य रूप से लागू करने, बस दुर्घटनाओं को रोकने की दृष्टि से व्यवस्था करने, सफाई की व्यवस्था कर महामारियों की रोकथाम करने, सरसों के तेल और अन्य खाद्य पदार्थों में मिलावट को रोकने के लिए आवश्यक व्यवस्था करने और पर्यावरण की रक्षा आदि के प्रसंग में समय-समय पर अनेक आदेश-निर्देश जारी किये हैं।

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