UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 14 Dalton Method

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 14 Dalton Method (डाल्टन पद्धति) are the part of UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 14 Dalton Method (डाल्टन पद्धति).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 14
Chapter Name Dalton Method (डाल्टन पद्धति)
Number of Questions Solved 29
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 14 Dalton Method (डाल्टन पद्धति)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिक्षा की डाल्टन पद्धति का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इसके मुख्य सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
या
डाल्टन शिक्षण पद्धति के क्या सिद्धान्त हैं ?
उतर:

हाल्टन पद्धति का अर्थ
(Meaning of Dalton Method)

शिक्षा की आधुनिक पद्धतियों में डाल्टन पद्धति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। शिक्षा की इस नयी पद्धति को अमेरिका की मिस हैलन पार्कहर्ट ने जन्म दिया है। इस पद्धति का सर्वप्रथम प्रयोग अमेरिका के डाल्टन नगर में हुआ था, इसलिए इस पद्धति को डाल्टन पद्धति के नाम से जाना जाता है। इस पद्धति का पहला विद्यालय सन् 1920 में स्थापित हुआ। मिस पार्कहर्स्ट को डॉ० मॉण्टेसरी के साथ कुछ समय तक कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ था, जिसके कारण विचारों में कुछ समानता होने के कारण मॉण्टेसरी और डाल्टन पद्धति में भी कुछ समानता पाई जाती है। मॉण्टेसरी पद्धति के समान ही डाल्टन पद्धति भी बच्चों में पाई जाने वाली व्यक्तिगत विभिन्नता पर विशेष बल देती है। 11 और 12 वर्ष की आयु के बालकों के लिए डाल्टन पद्धति बड़ी उपयोगी और सफल मानी जाती है।

इस पद्धति को ‘प्रयोगशाला पद्धति” भी कहा जाता है। इस पद्धति के द्वारा शिक्षा देने वाले विद्यालयों में प्रत्येक विषय की प्रयोगशालाएँ होती हैं। इनमें अनेक विषयों के अध्यापक रहते हैं और बालकों के ऊपर समय का कोई बन्धन नहीं होता। बालकों की रुचि और इच्छाओं को ध्यान में रखकर बालकों को एक सप्ताह या एक महीने का कार्य करने को दिया जाता है। जब बालक अपना काम पूरा कर लेता है तो उसे आगे काम मिल जाता है। इस प्रकार इस पद्धति में कला-शिक्षण और व्यक्तिगत शिक्षण का प्रबन्ध होता है। और बालक की स्वतन्त्रता का भी ध्यान रखा जाता है।

इस प्रकार “डाल्टन का तात्पर्य उस पद्धति से है जिसमें बालकों को उनकी रुचियों और इच्छाओं के अनुकूल कार्यों को, सुविधायुक्त प्रयोगशालाओं में दिए गए समय में पूरा करते हुए, अपने व्यक्तित्व का उत्तरदायित्वपूर्ण समुचित विकास करने का अवसर प्राप्त होता है।” डाल्टन पद्धति की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

  1. मिस हैलन पार्कहर्ट के अनुसार, “डाल्टन पद्धति एक यान्त्रिक व्यवस्था है जिसमें कि वैयक्तिक कार्य के सिद्धान्त को व्यवहार में लाया जाता है। यह शिक्षालयों का सरल एवं आर्थिक पुनसँगठन है, जहाँ शिक्षक एवं शिक्षार्थी को अधिक उपयोगी एवं समय से कार्य करने के लिए अवसर प्राप्त होते हैं।”
  2. ग्रेव्ज (Graves) के अनुसार, “डाल्टन पद्धति में एक ऐसी ‘निर्दिष्ट कार्य व्यवस्था निहित है जिसमें कि बालक एक दिए गए समय में कार्य को पूरा करने को स्वीकार करता है और जिसमें उस कार्य को पूरा । करने के साधन एवं भागों के चयन करने का कार्य उसी पर छोड़ दिया जाता है।”

डाल्टन पद्धति के उद्देश्य
(Aims of Dalton Method)

मिस हैलन पार्कहर्ट ने डाल्टन पद्धति के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखा है, “इस योजना का उद्देश्य बालकों को साधारण कक्षा में मिलने वाली जीवन की परिस्थितियों से बिल्कुल भिन्न परिस्थितियों में रखकर एक नए प्रकार के शैक्षिक समाज को जन्म देना तथा विद्यालय के सामाजिक जीवन का पुनर्सगठन करना

डाल्टन पद्धति के सिद्धान्त
(Principles of Dalton Method)

डाल्टन पद्धति के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं–

1. बाल-केन्द्रित शिक्षा-मनोवैज्ञानिक विचारधारा के प्रवेश से पूर्व शिक्षा में बालक का कोई स्थान नहीं था और शिक्षा देते समय बालक की व्यक्तिगत विभिन्नता पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। मिस हैलेन ने इस परिपाटी को बदल दिया। उन्होंने अपनी शिक्षा पद्धति में बालक डाल्टन पद्धति के सिद्धान्त को प्रधान बनाया। शिक्षक को उसकी शिक्षा में सहायता देने वाला एक सहायक समझा गया जो बालक का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करके बालक को उसकी योग्यता के अनुसार उसे सीखने के लिए आवश्यक सामग्री जुटाता है। मिस पार्कहर्स्ट के शब्दों में, “फलस्वरूप उसका पूर्ण स्वतन्त्रता विकास प्राकृतिक संगति से होता है और प्रयास से प्राप्त की जाने वाली शिक्षक पथ-प्रदर्शक के रूप में योग्यता वास्तविक एवं सुदृढ़ होती है।”

2. स्वशिक्षा का सिद्धान्त-कक्षा शिक्षण में बालक को यह स्वतन्त्रता नहीं होती कि वह जितनी देर चाहे एक विषय का अध्ययन में व्यक्तिगत करे, लेकिन डाल्टन पद्धति में स्वशिक्षा के सिद्धान्त की पूर्ति होती है। विशेष परीक्षा की व्यवस्था इसके अनुसार बालक जितनी देर तक चाहे एक विषय का अध्ययन कर सकता है। वह अपनी शिक्षा के लिए किसी पर पूर्णरूप से आश्रित नहीं होता। स्वाध्याय के लिए बालक को सुविधाएँ दे दी जाती हैं। प्रयोगशालाओं में सब प्रकार की सामग्री तथा पुस्तकें उपस्थित रहती हैं। वह स्वयं अध्ययन करती है। इस प्रकार प्राप्त किया हुआ ज्ञान स्थायी होता है। इससे बालक में आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता के गुण का विकास होता है।

3. पूर्ण स्वतन्त्रता-इस पद्धति में बालकों को अपनी रुचि, योग्यता तथा गति के अनुसार कार्य करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है। वह समय के बन्धन से मुक्त रहता है। इस पद्धति में इस बात की सुविधा है कि यदि किसी तीव्र बुद्धि वाले बालक ने अपना कार्य शीघ्र ही समाप्त कर लिया है तो उसे दूसरा कार्य प्रदान कर दिया जाता है। इसके विपरीत मन्दबुद्धि के बालकों को अधिक समय दिया जाता है। जब बालक काम में लगा रहता है तो अनुशासन की समस्या नहीं रहती।

4. शिक्षक पथ-प्रदर्शक के रूप में इसके अन्तर्गत यद्यपि प्रयोगशालाओं में विभिन्न विषयों के शिक्षक रहते हैं, लेकिन वे बालकों के कार्य तथा अध्ययन में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करते। उनका कार्य बालक का पथ-प्रदर्शन करना होता है। शिक्षक बालक को उसके कार्य से सम्बन्धित निर्देश दे देता है। वह बालकों को यह बता देता है कि उसे किन-किन पुस्तकों की सहायता लेनी चाहिए तथा किस प्रकार से काम करना चाहिए। शिक्षक बालक की कठिनाइयों को दूर करता है। बालकों के कार्य करते समय शिक्षक बालकों का निरीक्षण करता है और पास आने पर पथ-प्रदर्शन करता है।

5. सामूहिक शिक्षा- यद्यपि इस शिक्षा पद्धति में व्यक्तिगत शिक्षा पर बल दिया गया है, लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि इसमें बालकों के सामाजिक पक्ष की अवहेलना की जाती है। दिन में कम-से-कम दो बार सभी बालक एक जगह एकत्र होकर पारस्परिक वाद-विवाद, परामर्श, वार्ता आदि करके विचारों और अनुभवों का आदान-प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त स्वतन्त्र रूप से कार्य करते समय भी आवश्यकता पड़ने पर वे दूसरों की सम्मति ले सकते हैं। इस प्रकार बालकों को सहयोग से काम करने का अवसर मिल जाता है और उनमें सहकारिता तथा सामाजिकता की भावना का विकास होता है।

6. मनोवैज्ञानिकता- इस पद्धति में बालक सर्वप्रथम अपने सारे कार्य पर दृष्टिपात करता है। फिर वह उसको करने के लिए प्रत्येक दृष्टिकोण से प्रयत्नशील होता है। वह अपनी गलती स्वयं पकड़ता है और उसे सुधारने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार से उसका दृष्टिकोण मनोवैज्ञानिक हो जाता है।

7. व्यक्तिगत विभिन्नता पर ध्यान-इस पद्धति में बालक की व्यक्तिगत योग्यता की अवहेलना नहीं की जाती, बल्कि उनकी व्यक्तिगत भिन्नता को ध्यान में रखकर शिक्षा प्राप्त करने का अवसर दिया जाता है। बालक अपनी योग्यता के अनुसार अपने कार्य का चुनाव करता है और अपनी गति से कार्य को करता है। मन्दबुद्धि के बालक को सामूहिक खिंचाव में विवश होकर नहीं बहना पड़ता। इसी प्रकार से कुशाग्र बुद्धि वाले बालक आगे बढ़ जाते हैं। उन्हें कमजोर बालकों के साथ घिसटने की आवश्यकता नहीं रहती। .

8. विशेष परीक्षा की व्यवस्था- आजकल की दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली से यह पद्धति मुक्त है। इस पद्धति में साधारण परीक्षा प्रविधि को नहीं अपनाया गया है। इसमें बालक के कार्य का प्रतिदिन मूल्यांकन किया जाता है। यदि कोई बालक निश्चित समय में अपना कार्य पूरा नहीं कर सकता तो वह दूसरा कार्य नहीं ले सकता। शिक्षक प्रतिदिन के कार्य का निरीक्षण करता है और उसी की प्रकृति के आधार पर बालक को अगली कक्षा में भेजता है। पुस्तकीय ज्ञान के अतिरिक्त बालक के व्यावहारिक ज्ञान को भी महत्त्व दिया जाता है।

प्रश्न 2.
शिक्षा की डाल्टन पद्धति की शिक्षण-विधि का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उतर:

डाल्टन पद्धति की शिक्षण विधि
(Teaching Technique of Dalton Method)

डाल्टन पद्धति की शिक्षण विधि को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत समझा जा सकता है

1. पाठ का ठेका- जिस प्रकार एक ठेकेदार किसी काम को निश्चित अवधि में पूरा करता है, उसी प्रकार इस पद्धति में बालक भी निर्दिष्ट कार्य को करने का ठेका लेता है। वर्ष के प्रारम्भ में ही शिक्षक सम्पूर्ण सत्र के कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार कर लेता है, जिससे विद्यार्थी इस डाल्टन पद्धति की शिक्षण विधि | बात से परिचित हो जाता है कि वर्ष भर में उसे कितना काम करना है। उनका सम्पूर्ण सत्र के लिए निर्धारित पाठों को बारह भागों में विभाजित कर , निर्दिष्ट पत्र दिया जाता है और उस काम को निश्चित अवधि में पूरा करने का कार्य इकाई उत्तरदायित्व बालक का होता है। इस प्रकार बालक किसी भी काम को . प्रयोगशालाएँ ठेके के रूप में स्वीकार करता है। बालक इस ठेके को पूरा करने में स्वतन्त्र होता है। वह अपनी सुविधा के अनुसार समय के अन्दर काम को पूरा करता है।

2. निर्दिष्ट पाठ- कार्य की सुविधा के लिए शिक्षक मासिक कार्य को साप्ताहिक कार्य में बाँट देता है। शिक्षक यह निश्चित कर देता है कि किस सप्ताह में बालक को मासिक कार्य का कितना काम करना है। इस प्रकार का विभाजन बालक की योग्यता को ध्यान में रखकर किया जाता है। शिक्षक यह विभाजन बड़ी योग्यता से करता है, जिससे कार्य न तो बिल्कुल आसान होता है। और न ही काफी कठिन। इस प्रकार शिक्षक बालक के महीनेभर के कार्य को चार भागों में विभाजित कर देता है और बालक पर निर्दिष्ट कार्य को एक सप्ताह में पूरा करने का उत्तरदायित्व रहता है। इस प्रकार एक सप्ताह के कार्य को निर्दिष्ट पाठ कहा जाता है और निर्दिष्ट पाठों के सम्मिलित रूप को वह ठेका कहता है।

3. कार्य इकाई- कार्य की दृष्टि से प्रत्येक पाठ के पाँच भाग किए जाते हैं और प्रत्येक भाग को इकाई कहा जाता है। इस प्रकार प्रत्येक निर्दिष्ट पाठ में पाँच और महीने के ठेके में बीस इकाइयाँ होती हैं। इस प्रकार एक दिन के कार्य को इकाई कहते हैं, परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक बालक प्रतिदिन प्रत्येक विषय की इकाई को पूरा कर ले। उसे अपनी गति के अनुसार कार्य करने की पूरी स्वतन्त्रता होती है। यदि कोई बालक अपने सभी विषयों के कार्य को एक महीने से पहले कर लेता है तो उसे अगले माह का ठेका दे दिया जाता है। शिक्षक को यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रत्येक बालक अपने ठेके के अनुसार अपने एक महीने के कार्य को उसी महीने में यथासम्भव पूरा कर दे।

4. प्रयोगशालाएँ- डाल्टन पद्धति में कक्षाओं सम्बन्धी प्रयोगशाला में उस विषय से सम्बन्धित पुस्तकें व चित्र इत्यादि होते हैं। इसके अलावा प्रत्येक प्रयोगशाला में प्रत्येक कक्षा के बालकों के लिए स्थान निश्चित होते हैं। इससे कक्षा-प्रबन्ध में सुविधा रहती है। इस प्रकार बालक निर्दिष्ट कार्य की इकाई के अनुसार विभिन्न प्रयोगशालाओं में जाकर अध्ययन कार्य करता है। जिस बालक को जिस विषय से सम्बन्धित कठिनाई दूर करनी होती है, वह उसी प्रयोगशाला में चला जाता है।

5. सम्मेलन तथा विमर्श सभा- सम्मेलन तथा विमर्श सभा डाल्टन पद्धति के अंग हैं। ठेके के अनुसार कार्य में जो कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं उन्हें दूर करने के लिए कक्षा की विमर्श सभाएँ होती हैं, जो प्रात:काल होती हैं। उसमें शिक्षक बालकों को आवश्यक सूचनाएँ देता है। दूसरी सभा शाम को होती है, जिसमें विद्यार्थी – अपने अनुभवों का वर्णन सुनाता है। इस प्रकार प्रात:काल शिक्षक निर्देश देता है और विद्यार्थी अपने अनुभव सुनाता है। सम्मेलन और विमर्श सभा विद्यार्थियों के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध होते हैं।

6. प्रगतिसूचक रेखाचित्र- विद्यार्थी अपना कार्य ठीक प्रकार से कर रहे हैं या नहीं, यह जानने के लिए प्रगतिसूचक रेखाचित्रों का प्रयोग किया जाता है। ये रेखाचित्रयाग्राफ तीन प्रकार के होते हैं

  • प्रत्येक बालक अपने पास एक रेखाचित्र रखता है, जिसमें वह प्रत्येक विषय में जितना कार्य करता है, उसे अंकित कर देता है। इससे बालक को यह पता चलता है कि उसने कितनी इकाइयाँ पूरी कर ली हैं।
  • दूसरा रेखाचित्र शिक्षक के पास रहता है, जिसमें विषय विशेषज्ञ बालक की अपने विषय में की गई प्रगति को अंकित करता है। इससे शिक्षक और विद्यार्थी दोनों को पता रहता है कि उनके कार्य की क्या स्थिति
  • तीसरा रेखाचित्र सम्पूर्ण कक्षा का होता है। इसमें कक्षा के प्रत्येक विद्यार्थी सम्पूर्ण विषयों में कितना कार्य करते हैं, उसे अंकित कर दिया जाता है। इस आधार पर यह ज्ञात किया जा सकता है कि किस विद्यार्थी का कार्य कैसा है।

यह ग्राफ मार्गदर्शन के कार्य में शिक्षक की बड़ी सहायता करता है। इसके द्वारा विद्यार्थियों के कार्य की तुलना की जा सकती है। जिस विषय में बालक कमजोर होता है, उस विषय का शिक्षक बालक पर विशेष ध्यान देता है और उसे आगे बढ़ाने की चेष्टा करता है।

7. सामाजिक क्रियाएँ- मूल रूप से डाल्टन पद्धति में सामाजिक क्रियाओं को यथोचित स्थान दिया गया, लेकिन बाद में इनको कुछ कारणों से हटा देना पड़ा। फिर भी कुछ समर्थकों ने तीसरे प्रहर कुछ खेल, जिमनास्टिक व सामाजिक योजनाओं को स्थान दिया है।

प्रश्न 3.
शिक्षा की डाल्टन पद्धति के गुणों अथवा विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
डाल्टन प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

डाल्टन:पद्धति के गुण या विशेषताएँ
(Merits or Features of Dalton Method)

डाल्टन पद्धति में कुछ विशिष्ट गुण पाए जाते हैं, जिनका विवेचन निम्नलिखित है

1. योग्यतानुसार प्रगति का अवसर- इस पद्धति का प्रमुख गुण यह है कि इसमें प्रत्येक बालक को अपनी योग्यता, रुचि, शक्ति तथा गति के अनुसार शिक्षा प्राप्त करने की स्वतन्त्रता होती है। किसी भी विद्यार्थी को दूसरे विद्यार्थियों की तीव्र गति होने के कारण न तो शीघ्रता से आगे बढ़ना पड़ता है और न ही मन्दबुद्धि सहपाठियों के कारण ठहरना पड़ता है।

2. कार्य की निरन्तरता- इस पद्धति के अनुसार ज्ञानार्जन का कार्य निरन्तर होता रहता है। उसका क्रम भंग नहीं होता। यदि विद्यार्थी किसी कारण से विद्यालय में उपस्थित नहीं रह पाता, तो वह अपनी कमी को व अपने पिछड़े कार्य को स्वयं प्रयत्न करके पूरा करता है। इसमें किसी विद्यार्थी का कार्य अन्य विद्यार्थियों पर निर्भर नहीं होता।

3. समय का सदुपयोग- चूंकि प्रत्येक बालक अपना कार्य समय से करता है, इसलिए इस पद्धति में समय का दुरुपयोग नहीं होता। इस पद्धति में विद्यार्थियों के अनुत्तीर्ण होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।

4. सभी विषयों का यथोचित अध्ययन- इस पद्धति में विद्यार्थियों को विषयों का चयन करने की पूर्ण । स्वतन्त्रता होती है। वह किसी विषय को जितना चाहे पढ़ सकता है। इससे बालक किसी भी विषय को गहन अध्ययन कर सकता है।

5. अपने स्रोतों से ज्ञान संचय करने का अवसर- इस पद्धति में बालकों को स्वयं शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलता है। विद्यार्थी अपने पाठ स्वयं तैयार करते हैं और अन्य कार्य भी स्वतन्त्रतापूर्वक अकेले रहकर करते हैं। इसके लिए वे प्रयोगशालाओं में विभिन्न पुस्तकें और साधनों का अध्ययन करते हैं। इससे बालकों में आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, स्वावलम्बन आदि गुणों का विकास होता है। इसके द्वारा बालक श्रम का महत्त्व समझने लगते हैं।

6. उत्तरदायित्व की शिक्षा- इस पद्धति में बालक पर ही अपने पाठ को पूरा करने का उत्तरदायित्व रहता है। वे अपने ठेके को पूरा करने के लिए विभिन्न विषयों एवं उपभागों को पढ़ते हैं और अपनी योग्यतानुसार आगे बढ़ते हैं। इसमें बालक को यह ज्ञात रहता है कि उसे क्या कार्य करना है। अपने उत्तरदायित्व को निभाने की उसे चिन्ता रहती है। इससे उसे उत्तरदायित्व के मूल्य का ज्ञान रहता है।

7. शिक्षक एवं विद्यार्थी का परस्पर सम्बन्ध- इस पद्धति में। शिक्षक और विद्यार्थियों को पारस्परिक सम्बन्ध बड़ा मधुर रहता है। में शिक्षक विद्यार्थियों के मित्र एवं पथ-प्रदर्शक के रूप में योग्यतानुसार प्रगति का अवसर उन्हें आवश्यक सहायता देते हैं। विद्यार्थी भी बिना किसी डर या। संकोच के शिक्षकों की आवश्यक सहायता लेते रहते हैं।

8. गृह-कार्य का अनिवार्य न होना इस पद्धति में गृह- कार्य को अनिवार्य नहीं बताया गया है। विद्यार्थी द्वारा सम्पूर्ण कार्य विद्यालय अध्ययन की प्रयोगशालाओं में पूरा करने का प्रयास किया जाता है। घर पर अपने स्रोतों से ज्ञान संचय करने अध्ययन करना उनकी इच्छा पर निर्भर करता है। 

9. स्वतन्त्र वातावरण- इस पद्धति में बालकों को पूर्णरूप से स्वतन्त्र वातावरण में पढ़ने का अवसर प्राप्त होता है। उन पर शिक्षक एवं विद्यार्थी का परस्पर टाइम-टेबिल व कक्षा का कोई बन्धन नहीं होता। बालक जिस कक्षा में सम्बन्ध चाहे प्रवेश कर सकता है। शिक्षक विद्यार्थियों पर विश्वास करके उन्हें गृह-कार्य का अनिवार्य न होना । बिना डराए-धमकाए पढ़ाने का प्रयास करते हैं।

10. अन्वेषण की प्रेरणा- इस पद्धति में बालक स्वयं अध्ययन करते हैं और स्वयं ही अपनी समस्याओं का समाधान करने का प्रयास करते हैं। इससे बालकों की अन्वेषण शक्ति का विकास होता है। वह शिक्षण में समन्वय अध्ययन के दौरान नई-नई बातों की खोज करने लगती है।

11. कक्षा शिक्षण एवं वैयक्तिकं शिक्षण में समन्वय- इस अवसर पद्धति में कक्षा शिक्षण और वैयक्तिक शिक्षण में समन्वय किया जा सकता है। बालक वैयक्तिक रूप से कार्य करके अपने ठेके को पूरा कक्षा शिक्षण और परीक्षा प्रणाली करते हैं, परन्तु ठेके पर विचार-विमर्श तथा उसके पूर्ण होने पर के दोषों से मुक्त उसका मूल्यांकन सामूहिक रूप से करते हैं। अतः उनका व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों प्रकार का विकास होता है।

12. पारस्परिक सहायता देने का अवसरे- इस पद्धति में सम्मेलनों तथा विचार-विमर्श सभाओं को बहुत अधिक महत्त्व दिया गया है। इससे बालक एक-साथ बैठकर एक-दूसरे की समस्याओं का समाधान करते हैं और एक-दूसरे को उचित सुझाव देते हैं। इस प्रकार इस पद्धति में बालकों को पारस्परिक सहायता देने का अवसर प्राप्त हो जाता है।

13. ग्राफ रिकॉर्डों का महत्त्व- इस पद्धति में ग्राफ रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था है, जिससे विद्यार्थी की प्रगति को मापा जाता है। इन रिकॉर्डों में बालकों के कार्यों एवं समय के सदुपयोग आदि का लेखा-जोखा रहता है। इन रिकॉर्डों के द्वारा विद्यार्थियों को प्रेरणा भी मिलती है।

14. कक्षा शिक्षण और परीक्षा प्रणाली के दोषों से मुक्त- यह पद्धति कक्षा शिक्षण के दोषों से मुक्त है, क्योंकि इसमें बालक की वैयक्तिक भिन्नता पर काफी ध्यान दिया जाता है। इस पद्धति में बालक के सिर पर परीक्षा का भूत भी सवार नहीं होता, क्योंकि इसमें परीक्षा को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। वर्षभर का ठेका पूरा करने के बाद बालक को नई कक्षा में प्रवेश दिया जाता है।

15. अनुशासन की समस्या का समाधान कार्य करने के लिए पूर्णरूप से स्वतन्त्र होने और रुचिपूर्ण कार्य करने के कारण बालकों के मन की भावनाओं का दमन नहीं होता और वे अनुशासनहीनता उत्पन्न करने के लिए तनिक भी प्रेरित नहीं होते। इस पद्धति में बालक पर विश्वास किया जाता है और विश्वास की भावना अनुशासन स्थापना में बहुत सहायक होती है।

प्रश्न 4.
डाल्टन पद्धति के मुख्य दोषों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उतर:

डाल्टन पद्धति के दोष।
(Demerits of Dalton Method)

इस पद्धति के प्रमुख दोष निम्न प्रकार हैं

1.वैयक्तिक शिक्षण पर विशेष बल- इस पद्धति में वैयक्तिक शिक्षण पर आवश्यकता से अधिक बल दिया जाता है, जिसके कारण बालकों में सामूहिक भावना का विकास नहीं हो पाता है।

2. शिक्षकों की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध- इस पद्धति के द्वारा। डाल्टन पद्धति के दोष शिक्षा देने से बालकों को तो स्वतन्त्रता मिल जाती है, लेकिन शिक्षकों की स्वतन्त्रता सीमित रह जाती है।

3. शिक्षकों के प्रभाव में कमी- इस पद्धति में बालक वैयक्तिक। रूप से अध्ययन करते हैं जिससे शिक्षकों को कम काम करना पड़ता है। और उनका प्रभाव घट जाता है। इसके अतिरिक्त बालकों पर शिक्षकों के व्यक्तित्व तथा चरित्र की छाप नहीं पड़ती, फलस्वरूप उनके व्यक्तित्व तथा चरित्र का कोई मूल्य नहीं रह जाता है।

4. योग्य एवं प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव- इस पद्धति के अनुकूल शिक्षा देने के लिए प्रशिक्षित और योग्य शिक्षकों की कमी है। इसी कमी के कारण बालकों के शिक्षण का कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न नहीं किया जा सकता।

5. विशेषीकरण पर बल- इस पद्धति में विशेषीकरण पर बल संगीत तथा विज्ञान की शिक्षा देना दिया जाता है। यह असंगत प्रतीत होता है। विशेषीकरण से बालक को असम्भव सर्वतोन्मुखी विकास नहीं हो पाता है। छोटी आयु में सर्वांगीण विकास अनैतिक कार्य होने की आशंका न होने के कारण बालक का व्यक्तित्व एकांगी रह जाता है। पुस्तकीय निर्भरता का भय

6. सामूहिक शिक्षा का अभाव इस पद्धति में वैयक्तिक शिक्षा, पाठान्तर क्रियाओं का अभाव पर इतना अधिक बल दिया जाता है कि सामूहिक शिक्षा का सर्वथा व्ययशील पद्धति अभाव हो जाता है। इस पद्धति में अभिनय, संगीत, खेल आदि के दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली माध्यम से शिक्षा नहीं दी जाती, जब कि ये सामूहिक शिक्षा के स्वरूप

7, मौखिक कार्य का अभाव- इस पद्धति में बालकों को लिखने का काम अधिक करना पड़ता है, इसलिए उन्हें मौखिक कार्य के अभ्यास के लिए अवसर नहीं मिल पाता। इसके परिणामस्वरूप बालक की भाषा को विकास भी सन्तुलित रूप में नहीं हो पाता है।

8. उत्तम पुस्तकों का अभाव डाल्टन पद्धति को कार्यान्वित करने के लिए उपयुक्त पुस्तकों का होना अति आवश्यक है, परन्तु अभी हमारे देश में भी विभिन्न विषयों पर इस पद्धति के ढंग की पुस्तकों का अभाव पाया जाता है। इसी कारण यह पद्धति भारत में कार्यान्वित नहीं की जा सकी है।

9. विषयों में सानुबन्ध का अभाव- इस पद्धति में जो शिक्षक कार्य करते हैं, वे अपने विषय के विशेषज्ञ होते हैं। उनके द्वारा जो विषय पढ़ाए जाते हैं उनमें सानुबन्ध नहीं होने पाता। चूंकि प्रत्येक विषय का अध्ययन अलग-अलग होता है। इस कारण विभिन्न विषयों का समन्वय करना कठिन है। | 10. संगीत तथा विज्ञान की शिक्षा देना असम्भव-कुछ विषयों में शिक्षक को अधिक बताने की आवश्यकता होती है। ऐसे विषयों में विद्यार्थी बिना शिक्षक की सहायता के आगे नहीं बढ़ सकते। इसी कारण इस पद्धति से सब विषयों की शिक्षा नहीं दी जा सकती, विशेष रूप से संगीत और विज्ञान की शिक्षा देना तो सम्भव ही नहीं है।

10. अनैतिक कार्य होने की आशंका- इस पद्धति में शिक्षा सम्बन्धी कुछ अनैतिक कार्य होने की सम्भावना भी रहती है। इस पद्धति में यह भी आशंका रहती है कि बालक अपना कार्य किसी दूसरे विद्यार्थी की सहायता से न करा ले या उसके कार्य की नकल कर ले। चारित्रिक तथा मानसिक विकास की दृष्टि से यह कार्य अनुचित है।

12. पुस्तकीय निर्भरता का भय- इस पद्धति के द्वारा शिक्षा देने से बालक किताबी कीड़े बन जाते हैं। इसका कारण यह है कि इसमें व्यावहारिक शिक्षा का अभाव रहता है और पुस्तकीय शिक्षा की प्रधानता है।

13. पाठान्तर क्रियाओं का अभाव- इस पद्धति में पिकनिक, निरीक्षण, भ्रमण आदि को महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं दिया गया है। इससे बालकों के संर्वतोन्मुखी विकास में बाधा पड़ती है।

14. व्ययशील पद्धति- इस पद्धति के अनुसार शिक्षा देने में प्रत्येक विषय के लिए एक प्रयोगशाला, विषय-विशेषज्ञ, उपयुक्त पुस्तकों तथा शिक्षण यन्त्रों की आवश्यकता होती है। इनकी व्यवस्था के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है, परन्तु भारत जैसे निर्धन देश में वर्तमान स्थितियों को देखते हुए इतनी व्ययशील पद्धति कार्यान्वित नहीं की जा सकती है।

15. दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली- इस पद्धति में वार्षिक कार्य के आधार पर बालक को अगली कक्षा में चढ़ाया जाता है। इससे बालक की सही योग्यता का मापन नहीं होता। कार्य तो वह अन्य किसी से भी करा सकता है। फिर कार्य कर लेने से यह नहीं समझा जा सकता है कि बालक ने उसे सीख लिया है और उसे धारण कर लिया है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
समुचित तर्क के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा की डाल्टन प्रणाली शिक्षा की अन्य प्रचलित शिक्षा-प्रणालियों से भिन्न है।
उत्तर:

डाल्टन प्रणाली की विशिष्टता
(Characteristics of Dalton Method)

मिस हैलन पार्कहर्ट द्वारा प्रतिपादित डाल्टन शिक्षा-प्रणाली शिक्षा की अन्य प्रचलित प्रणालियों से पर्याप्त भिन्न है। यह शिक्षा प्रणाली सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक दोनों ही दृष्टिकोणों से एक प्रयोगात्मक प्रणाली है। डाल्टन शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत शिक्षण कार्य सदैव सम्बन्धित विषय की सुव्यवस्थित प्रयोगशाला में ही सम्पन्न होता है। इस शिक्षा-प्रणाली की आधारभूत मान्यता के अनुसार बच्चों द्वारा स्वयं कार्य करके ज्ञान अर्जित किया जाता है। किसी भी विषय का ज्ञान शिक्षक द्वारा कक्षा-शिक्षण विधि द्वारा प्रदान नहीं किया जाता। शिक्षक ही सामान्य रूप से बच्चों के लिए मात्र पथ-प्रदर्शक ही होता है।

बच्चों को कुछ कार्य सौंपे जाते हैं तथा सौंपे गए कार्य को पूरा करने का दायित्व बच्चों का ही होता है। जैसे-जैसे बच्चे अपना कार्य पूरा कर लेते हैं, वैसे-वैसे ही उन्हें आगे का कार्य सौंप दिया जाता है। बच्चा अपनी योग्यता एवं क्षमता के अनुसार दिए गए कार्य को निर्धारित समय से पूर्व भी पूरा कर सकता है। डाल्टन प्रणाली के अन्तर्गत किसी व्यवस्थित परीक्षा-पद्धति का प्रावधान नहीं है। बच्चों को उनके द्वारा पूरे किए गए कार्य को ध्यान में रखते हुए ही अगली कक्षा में भेज दिया जाता है। इस शिक्षा प्रणाली में अनुशासन की समस्या भी प्रायः नहीं होती तथा शिक्षक एवं शिष्य के सम्बन्ध भी मधुर होते हैं। इन समस्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं। कि डाल्टन प्रणाली अन्य शिक्षा-प्रणालियों से भिन्न एवं विशिष्ट है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली के मुख्य उद्देश्य का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली का प्रतिपादन कुछ विशेष उद्देश्यों को ध्यान में रख कर किया गया है। वास्तव में इस शिक्षा-प्रणाली का प्रतिपादन पूर्व प्रचलित शिक्षा के दोषों को समाप्त करने के लिए किया गया था। इस शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य शिक्षा को अधिक व्यावहारिक तथा जीवन से सम्बद्ध बनाना था। इस शिक्षा-प्रणाली का उद्देश्य एक नए शैक्षिक समाज का निर्माण करना था। डाल्टन प्रणाली के उद्देश्य को पार्कहर्ट ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “इस योजना का उद्देश्य बालकों को साधारण कक्षा में मिलने वाली

जीवन की परिस्थितियों से बिल्कुल भिन्न परिस्थितियों में रखकर एक नए प्रकार के शैक्षिक समाज को जन्म : देना तथा विद्यालय के सामाजिक जीवन का पुनसँगठन करना था।’

प्रश्न 2.
तर्कसहित स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा की डाल्टन प्रणाली एक बाल-केन्द्रित शिक्षा-प्रणाली है?
उत्तर:
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली में शिक्षण की सम्पूर्ण व्यवस्था बालक पर केन्द्रित है। इस प्रणाली में बालक के बहुपक्षीय विकास को प्राथमिकता दी गई है। बालक को अधिक महत्त्व दिया गया है तथा शिक्षक की भूमिका गौण है। इस शिक्षा प्रणाली में बालक को जो कार्य सौंपे जाते हैं वे उसकी योग्यता, क्षमता, स्वभाव एवं कार्य के अनुकूल होते हैं। यही नहीं सौंपे गए कार्यों को करने में भी बालक पूर्ण रूप से स्वतन्त्र होता है। वह अपनी इच्छा से कार्य को निर्धारित समय से पूर्व भी पूरा कर सकता है। डाल्टन शिक्षा-प्रणाली की इन समस्त मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए, हम कह सकते हैं कि यह शिक्षा प्रणाली बाल-केन्द्रित शिक्षा-प्रणाली है।

प्रश्न 3.
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली में शिक्षक का क्या स्थान है ?
उत्तर:
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली अपने आप में एक विशिष्ट शिक्षा-प्रणाली है। इस शिक्षा-प्रणाली में बालक या छात्र का स्थान मुख्य है तथा उसी के बहुपक्षीय विकास को शिक्षा का मुख्य उद्देश्य स्वीकार किया गया है। इस सैद्धान्तिक मान्यता को ध्यान में रखते हुए नि:सन्देह रूप से कहा जा सकता है कि इस प्रणाली में शिक्षक का स्थान गौण ही है। डाल्टन प्रणाली में शिक्षक केवल पथ-प्रदर्शक की ही भूमिका निभाता है। इस शिक्षा प्रणाली में कक्षा-शिक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। अतः शिक्षक के व्यक्तित्व को बच्चों पर प्रभाव भी पड़ने की कोई गुंजाइश नहीं होती। डाल्टन प्रणाली में शिक्षक द्वारा किसी रूप में नियन्त्रक की भूमिका नहीं निभाई जाती, वह तो बालकों का मित्र एवं सहायक ही होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली के प्रतिपादक का नाम क्या है ?
उत्तर:
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली के प्रतिपादक का नाम है–मिस हैलन पार्कहर्ट।

प्रश्न 2.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली को अन्य किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर:
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली को प्रयोगशाला प्रणाली’ के नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न 3.
मिस हैलन पार्कहर्स्ट द्वारा प्रतिपादित शिक्षा-प्रणाली को ‘डाल्टन शिक्षा-प्रणाली’ का नाम क्यों दिया गया है ?
उत्तर:
मिस हैलन पार्कहर्ट ने अपनी शैक्षिक अवधारणा के आधार पर प्रथम विद्यालय अमेरिका के डाल्टन नगर में स्थापित किया था। इसी कारण से इस शिक्षा प्रणाली को डाल्टन शिक्षा प्रणाली’ नाम दिया गया है।

प्रश्न 4.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत अध्ययन के किस स्वरूप को अपनाया गया है ?
उत्तर:
डाल्टन शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत अध्ययन के प्रयोगात्मक स्वरूप को अपनाया गया है।

प्रश्न 5.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत किस आयु-वर्ग के बच्चों को विद्यालय में प्रवेश दिया जाता
उत्तर:
ल्टन शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत सामान्य रूप से 11-12 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों को विद्यालय में प्रवेश दिया जाता है।

प्रश्न 6.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत अपनाई जाने वाली शिक्षण-विधि क्या कहलाती है ?
उत्तर:
डाल्टन शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत अपनाई जाने वाली शिक्षण-विधि ‘कार्य की ठेका पद्धति कहलाती है।

प्रश्न 7.
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली में शिक्षक की भूमिका क्या है ?
उत्तर:
डाल्टन शिक्षा प्रणाली में शिक्षक द्वारा बालकों के मित्र, सहायक तथा पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभाई जाती है।

प्रश्न 8.
“डाल्टन पद्धति एक यान्त्रिक व्यवस्था है, जिसमें कि कार्य के सिद्धान्त को व्यवहार में लाया जाता है। यह शिक्षालयों को सरल एवं आर्थिक पुनसँगठन है, जहाँ शिक्षक एवं शिक्षार्थी को अधिक उपयोगी ढंग से कार्य करने के अवसर प्राप्त होते हैं।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन मिस हैलन पार्कहर्स्ट का है।

प्रश्न 9.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली के चार मुख्य सिद्धान्त बताइए।
उत्तर:
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली के मुख्य सिद्धान्त हैं-

  • बाल-केन्द्रित शिक्षा का सिद्धान्त,
  • स्व-शिक्षा का सिद्धान्त,
  • पूर्ण स्वतन्त्रता का सिद्धान्त तथा
  • व्यक्तिगत शिक्षा का सिद्धान्त।

प्रश्न 10.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत ‘निर्दिष्ट पाठ’ से क्या आशय है ?
उत्तर:
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत बालक द्वारा एक सप्ताह में किए जाने वाले कार्य को निर्दिष्ट पाठ कहते हैं।

प्रश्न 11.
डाल्टन शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत कार्य इकाई’ से क्या आशय है ?
उत्तर:
डाल्टन शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत बालक द्वारा एक दिन में समाप्त किए जाने वाले कार्य को ‘कार्य इकाई’ कहते हैं।

प्रश्न 12.
कार्य का ठेका और निर्दिष्ट कार्य किस शिक्षा-प्रणाली के सिद्धान्त हैं ?
उत्तर:
डाल्टन शिक्षा प्रणाली के।

प्रश्न 13.
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली किलपैट्रिक/हैलेन पार्कहर्ट ने प्रारम्भ की।
उत्तर:
शिक्षा की डाल्टन प्रणाली हैलेन पार्कहर्ट ने प्रारम्भ की।

प्रश्न 14 निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. डाल्टन प्रणाली का प्रादुर्भाव मॉण्टेसरी प्रणाली के विरोधस्वरूप हुआ है।
  2. डाल्टन शिक्षा-प्रणाली में प्रयोगात्मक कार्यों की पूर्ण अवहेलना की जाती है।
  3. डाल्टने शिक्षा-प्रणाली छोटे शिशुओं की शिक्षा के लिए एक उपयोगी प्रणाली है।
  4. डाल्टन शिक्षा-प्रणाली में शिक्षक द्वारा सहायक एवं पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभाई जाती है।
  5. डाल्टन प्रणाली व्यक्तिवादी विचारधारा पर आधारित है।
  6. डाल्टन शिक्षा प्रणाली में त्रैमासिक, अर्द्धवार्षिक तथा वार्षिक परीक्षाओं की व्यवस्था की जाती है।
  7. भारत में डाल्टन प्रणाली के प्रयोग में अनेक कठिनाइयाँ हैं।

उत्तर

  1. असत्य,
  2. असत्य,
  3. असत्य,
  4. सत्य,
  5. सत्य,
  6. असत्य,
  7. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
डाल्टन शिक्षण पद्धति के प्रवर्तक का नाम क्या है?
(क) मैडम हैलन पार्कहर्स्ट
(ख) फ्रॉबेल
(ग) जॉन डीवी
(घ) मार्टिन

प्रश्न 2.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली में अधिक बल दिया जाता है
(क) सैद्धान्तिक अध्ययन पर
(ख) प्रयोगात्मक अध्ययन पर ध्ययन पर
(घ) कक्षा-अध्ययन पर

प्रश्न 3.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली में प्रावधान नहीं है
(क) प्रयोगात्मक कार्यों को
(ख) नियमित परीक्षाओं का
(ग) कार्य करने की स्वतन्त्रता का
(घ) उपर्युक्त सभी का।

प्रश्न 4.
मूल रूप से डाल्टन शिक्षा-प्रणाली है–
(क) शिक्षक-केन्द्रित प्रणाली
(ख) बाल-केन्द्रित प्रणाली
(ग) उत्पादन-केन्द्रित प्रणाली
(घ) प्रदर्शन-केन्द्रित प्रणाली

प्रश्न 5.
डाल्टन शिक्षा-प्रणाली में बालक को आगे बढ़ने का अवसर दिया जाता है–
(क) आयु के अनुसार
(ख) समय के अनुसार।
(ग) योग्यता के अनुसार
(घ) शिक्षक की सिफारिश के अनुसार

प्रश्न 6.
“डाल्टन पद्धति में एक ऐसी ठेका व्यवस्था निहित है, जिसमें बालक को एक दिए हुए समय में कार्य पूरा करने के साधन एवं मार्गों के चयन का कार्य उसी पर छोड़ दिया जाता है।” यह कथन किसका है?
(क) हैलन पार्कहर्स्ट
(ख) ग्रेव्ज
(ग) फ्रॉबेल
(घ) जॉन डीवी

प्रश्न 7.
किस शिक्षा विधि में बालक प्रयोगशालाओं में कार्य करते हैं?
(क) मॉण्टेसरी
(ख) बेसिक शिक्षा
(ग) डाल्टन प्लान
(घ) किण्डरगार्टन विधि

उत्तर:

1. (क) मैडम हैलन पार्कहर्स्ट,
2. (ख) प्रयोगात्मक अध्ययन पर,
3. (ख) नियमित परीक्षाओं का,
4. (ख) बाल-केन्द्रित प्रणाली,
5. (ग) योग्यता के अनुसार,
6. (ख) ग्रेव्ज,
7. (ग) डाल्टन प्लान।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 24 Individual Differences: Meaning, Kinds, Causes and Measurement

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 24
Chapter Name Individual Differences: Meaning, Kinds, Causes and Measurement (व्यक्तिगत भिन्नताएँ- अर्थ, प्रकार, कारण एवं मापन)
Number of Questions Solved 31
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 24 Individual Differences: Meaning, Kinds, Causes and Measurement (व्यक्तिगत भिन्नताएँ- अर्थ, प्रकार, कारण एवं मापन)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
व्यक्तिगत भिन्नता से आप क्या समझते हैं ? व्यक्तिगत भिन्नता के मुख्य कारणों का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
व्यक्तिगत भिन्नता का क्या अर्थ है ? इसके मुख्य कारण क्या हैं ? समझाकर लिखिए।
या
व्यक्तिगत भेद किसे कहते हैं? इसके कारणों को स्पष्ट कीजिए।
या
“भिन्नताएँ प्रत्येक व्यक्ति में पायी जाती हैं।” यदि आप इस कथन से सहमत हैं, तो वैयक्तिक विभिन्नता के कारणों का वर्णन कीजिए।
या
व्यक्तिगत विभिन्नताओं के क्या कारण हैं ? विस्तार से समझाइए।
या
व्यक्तिगत भिन्नता के कारणों का उल्लेख कीजिए।
या
व्यक्तिगत विभिन्नता को परिभाषित कीजिए।
या
दो व्यक्तियों में जिन कारणों से व्यक्तिगत भिन्नताएँ पायी जाती हैं, उन्हीं के आधार पर व्यक्तिगत भेद निश्चित किये जाते हैं।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

व्यक्तिगत भिन्नता का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Individual Difference)

व्यक्तिगत भिन्नता का नियम यद्यपि प्राचीनकाल से ही माना जाता रहा है, परन्तु जब से बुद्धि-मापन के परीक्षण प्रारम्भ हुए, तब से इसका महत्त्व काफी बढ़ गया है। व्यक्तिगत भिन्नता को अर्थ है–किन्हीं दो व्यक्तियों का परस्पर एक-सा न होना। भिन्नताएँ प्रत्येक व्यक्ति में पायी जाती हैं। यह भिन्नता जुड़वाँ बालकों तक में पायी जाती है। दूसरे शब्दों में, “व्यक्तिगत भिन्नताओं का अर्थ एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से रूप-रंग, शारीरिक गठन, बुद्धि, विशिष्ट योग्यताओं, रुचियों, उपलब्धियों, स्वभाव, व्यक्तित्व के गुणों आदि में भिन्नता से है। कोई भी दो व्यक्ति शारीरिक गठन, बुद्धि, रुचियों, व्यक्तित्व के गुणों आदि में समान नहीं पाये जाते हैं।”

व्यक्तिगत भिन्नता की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नांकित हैं-

  1. जेम्स ड्रेवर के अनुसार, “औसत समूह से मानसिक, शारीरिक विशेषताओं के सन्दर्भ में समूह के सदस्य के रूप में भिन्नता या अन्तर को वैयक्तिक भिन्नता कहते हैं।”
  2. स्किनर के अनुसार, “मापन किया जाने वाला व्यक्तित्व का प्रत्येक पक्ष वैयक्तिक भिन्नता का अंश हैं।”
  3. टॉयलर के अनुसार, “शरीर के आकार और रूप, शारीरिक कार्य, गति की क्षमताओं, बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान, रुचियों, अभिवृत्तियों और व्यक्तित्व के लक्षणों में मापी जाने वाली भिन्नताओं को वैयक्तिक भिन्नताओं के अन्तर्गत रखा जा सकता है।”

व्यक्तिगत विभिन्नताओं के कारण
(Causes of Individual Differences)

व्यक्तिगत विभिन्नताओं के अनेक कारण हैं जिनमें प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

1. वंशानुक्रम- कुछ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार व्यक्तिगत भिन्नताओं का मूल कारण वंशानुक्रम है। प्रायः देखा गया है कि बुद्धिमान माता-पिता की सन्तान बुद्धिमान होती है और मन्द-बुद्धि माता-पिता की सन्तान मन्द-बुद्धि। अपराधी व्यक्ति की सन्तान में भी अपराध की प्रवृत्ति पायी जाती है। इसी प्रकार कुछ अन्य गुण-अवगुणों का भी हस्तान्तरण आनुवंशिक रूप से होता रहता है।

2. वातावरण- व्यक्तिगत भिन्नता का अन्य महत्त्वपूर्ण कारण वातावरण है। भौतिक वातावरण द्वारा व्यक्ति की लम्बाई, रंग, रूप तथा आचार-विचार प्रभावित होते हैं, जबकि सामाजिक वातावरण व्यक्ति की सामाजिक मान्यताओं का निर्धारण करता है। वातावरण की भिन्नता के कारण ही ठण्डे देश के निवासी गोरे, लम्बे तथा शक्तिवान होते हैं, उनमें श्रम करने की प्रवृत्ति होती है। इसके विपरीत गरम देशों के व्यक्ति काले, ठिगने तथा आलसी होते हैं।

3. लिंग-भेद- लिंग-भेद के कारण ही बालक और बालिकाओं की शारीरिक बनावट, सोचने-विचारने तथा बौद्धिक क्षमताओं में अन्तर पाया जाता है। बालकों में शारीरिक कार्य करने की अधिक क्षमता होती है तो बालिकाओं में सहनशीलता का गुण अधिक मात्रा में पाया जाता है। बालिकाओं की स्मरण शक्ति बालकों की अपेक्षा तीव्र होती है। यदि बालक गणित और विज्ञान में अधिक कुशाग्र होते हैं तो बालिकाएँ साहित्य और कला में विशेष निपुण होती हैं। बालिकाओं का हस्तलेख बालकों से अधिक सुन्दर और आकर्षक होता है।

4. जाति, प्रजाति और देश- जाति, प्रजाति और देश का भी व्यक्तिगत विभिन्नताओं पर विशेष प्रभाव पड़ता है। वैश्य व्यापार में निपुण होते हैं, तो ब्राह्मण अध्ययन और अध्यापन में। क्षत्रिय अपनी युद्धप्रियता के लिए प्रसिद्ध हैं। इसी प्रकार प्रादेशिक भिन्नता भी प्रभाव डालती है। भारत में प्रादेशिक भिन्नता का प्रभाव विशेष रूप से देखा जा सकता है।

5. आयु और बुद्धि का प्रभाव- आयु और बुद्धि का प्रभाव भी व्यक्तिगत भिन्नता पर पड़ता है। आयु के आधार पर ही बालक को शारीरिक, मानसिक और भावात्मक विकास होता है। इस प्रकार आयु के कारण भी बालकों में भिन्नता पायी जाती है। बुद्धि जन्मजात गुण है। अत: कोई बालक प्रतिभाशाली होता है, तो कोई मूढ़।

6. शिक्षा और आर्थिक दशा- शिक्षा व्यक्ति में पर्याप्त परिवर्तन कर देती है। जो व्यक्ति साक्षर होते हैं, वे निरक्षर व्यक्तियों से काफी भिन्नताएँ रखते हैं। शिक्षित व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास निरक्षर व्यक्ति की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है। शिक्षा के समान ही आर्थिक दशा का प्रभाव भी व्यक्तिगत भिन्नता पर पड़ता है। अक्सर निर्धन बालक अभावग्रस्त और लालची होते हैं। उनमें हीनता की भावना भी पायी जाती है, परन्तु धन की अधिकता भी बालकों को भ्रष्ट कर देती है।

प्रश्न 2
बालकों में पायी जाने वाली व्यक्तिगत भिन्नता को ध्यान में रखते हुए अध्यापक को शिक्षण-कार्य में किन-किन व्यवस्थाओं को लागू करना चाहिए ?
या
व्यक्तिगत भिन्नताओं के कारण शिक्षक को मुख्य रूप से किन-किन बातों को ध्यान में । रखना चाहिए ?
या
शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्तिगत भिन्नता की भूमिका एवं महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
या
“व्यक्तिगत भेदों के ज्ञान ने शिक्षा की व्यवस्था को प्रभावशाली बनाया है।” आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं ?
या
“व्यक्तिगत भिन्नताओं के ज्ञान ने शिक्षा को अत्यधिक प्रभावित किया है।” कैसे?
या
“व्यक्तिगत भिन्नता का ज्ञान शिक्षक के लिए अत्यन्त उपयोगी है।” स्पष्ट कीजिए।
या
पाठ्यक्रम, छात्रों के वर्गीकरण और शिक्षण-विधियों में व्यक्तिगत भिन्नताओं को कैसे समायोजित किया जा सकता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:

व्यक्तिगत भिन्नताएँ तथा शिक्षा
(Individual Differences and Education)

आधुनिक युग में शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्तिगत भिन्नताओं को विशेष महत्त्व दिया जाता है। बालक की व्यक्तिगत रुचियों, क्षमताओं, इच्छाओं तथा मानसिक योग्यताओं को ध्यान में रखकर ही शिक्षा का आयोजन करना आवश्यक है। इस दशा में अध्यापक को अग्रलिखित बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए

1. उचित वर्गीकरण- प्रायः विद्यालय में परम्परागत विधि के अनुसार बालकों का कंक्षाओं में विभाजन किया जाता है। परन्तु यह विभाजन सर्वथा गलत है, क्योंकि विद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों की आयु में ही अन्तर नहीं होता, वरन् शारीरिक व मानसिक दृष्टि से भी उनमें अन्तर होता है। अतः ऐसी दशा में बालकों की विशेषताओं के अनुसार उनको । विभाजन समरूप समूहों में किया जाना चाहिए। वर्गीकरण में मानसि योग्यताओं को ध्यान में रखना आवश्यक है। प्रत्येक कक्षा में प्रतिभाशाली, सामान्य तथा निम्न मानसिक क्षमताओं वाले बालकों को तीन समूहों में विभाजित किया जाना चाहिए।

2. कक्षा का सीमित आकार- वर्तमान समय में शिक्षा की हीन दशा का प्रमुख कारण कक्षा में छात्रों को आवश्यकता से अधिक संख्या में होना है। जब कक्षा में छात्रों की संख्या 50 से 60 तक होती है तो अध्यापक के लिए उनसे व्यक्तिगत सम्पर्क रखना कठिन हो जाता है। अध्यापक न तो व्यक्तिगत रूप से उन बालकों की समस्याओं को समझ पाता है और न ही छात्र अध्यापक से अपनी शंकाओं का समाधान कर पाते हैं। अत: कक्षाओं में छात्रों की संख्या 20 से 30 के बीच में होनी चाहिए।

3. विस्तृत पाठ्यक्रम- बालकों की आकाँक्षाओं, रुचियों और क्षमताओं में पर्याप्त अन्तर होता है। अत: सबके लिए एक-सा पाठ्यक्रम निर्धारित करना उनकी व्यक्तिगत विभिन्नताओं की उपेक्षा करना है। अतः पाठ्यक्रम विस्तृत और लचीला बनाया जाए, जिससे छात्र अपनी-अपनी रुचि के अनुकूल विषयों का चुनाव कर सकें।

4. व्यक्तिगत शिक्षण की व्यवस्था- बालकों में मानसिक भिन्नताएँ पायी जाती हैं। अत: उन्हें सामूहिक शिक्षण द्वारा ज्ञान प्रदान करना निरर्थक है। उनकी मानसिक क्षमताओं को ध्यान में रखकर व्यक्तिगत शिक्षण की व्यवस्था करना अत्यन्त आवश्यक है। डाल्टन योजना तथा बिने योजनाओं का निर्माण इसी उद्देश्य से किया गया है।

5. गृह-कार्य- बालकों को गृहकार्य उनकी शारीरिक और मानसिक क्षमताओं को ध्यान में रखकर ही प्रदान किया जाए। जो बालक प्रतिभाशाली हैं, उन्हें गृह-कार्य अधिक प्रदान किया जाए तथा मन्दबुद्धि और निर्बल शरीर वाले बालकों को कम गृह-कार्य प्रदान किया जाए।

6. शिक्षण-विधि- शिक्षण विधियों का निर्माण भी व्यक्तिगत भिन्नताओं के आधार पर ही किया जाना चाहिए। कुशाग्र बुद्धि का बालक एक मूर्ख की अपेक्षा शीघ्र सीख जाता है। अत: दोनों को शिक्षा प्रदान करने की विधियों में अन्तर होना चाहिए। मन्दबुद्धि वाले बालकों के साथ विशेष सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार की आवश्यकता है।

7. रुचियों पर ध्यान- विद्यालय में अध्ययन करने वाले बालकों की विभिन्न रुचियाँ होती हैं। अतः उनकी रुचियों के विषय में अध्यापक को अवश्य जानकारी रखनी चाहिए तथा उनके समुचित विकास की चेष्टा भी करनी चाहिए। टी० पी० नन (T: P Nunn) के अनुसार, “हमें बालकों को एक ही रुचि में ढाली गयी मशीनों का स्वरूप नहीं देना है, क्योंकि प्रत्येक की अलग-अलग सत्ता है और व्यक्तिगत सत्ता के अनुसार ही उनकी रुचियाँ हैं, अत: उनका विनाश न करके उन्हें प्रोत्साहन देना चाहिए।’

8. शारीरिक अयोग्यता का ध्यान- बालकों की शारीरिक समर्थताओं तथा अयोग्यताओं का पूरा-पूरा ध्यान रखना आवश्यक है। कक्षा में कुछ बालक ऐसे होते हैं, जिन्हें कम सुनाई देता है तथा कुछ की दृष्टि कमजोर होती है। ऐसे बालकों को कक्षा में आगे बैठाना चाहिए। इसी प्रकार कुछ बालक शारीरिक दृष्टि से अत्यन्त निर्बल होते हैं। ऐसे बालकों के पढ़ने के बीच में पर्याप्त विश्राम दिया जाए तथा उन्हें गृह-कार्य भी कम दिया जाए तथा समय-समय पर ऐसे बालकों की डॉक्टरी जाँच कराई जाए।

9. आर्थिक और सामाजिक स्तर का ध्यान- बालकों के परिवारों के आर्थिक और सामाजिक स्तरों का उनके रहन-सहन, आचार-विचार तथा दृष्टिकोणों पर विशेष प्रभाव पड़ता है। ये प्रभाव ही उनमें व्यक्तिगत भिन्नताएँ उत्पन्न करते हैं। अत: अध्यापकों को बालकों के आर्थिक और सामाजिक स्तर का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए तथा उसी आधार पर उनकी शिक्षा का आयोजन किया जाना चाहिए।

10. लिंग-भेद का ध्यान- बालक और बालिकाओं की रुचियों, आवश्यकताओं और क्षमताओं में पर्याप्त अन्तर होता है। अत: दोनों के पाठ्यक्रमों में अन्तर अवश्य होना चाहिए। शिक्षा प्रदान करते समय भी लिंग-भेद का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्तिगत भिन्नता की उल्लेखनीय भूमिका एवं महत्त्व है। यही कारण है कि हम कहते हैं कि व्यक्तिगत भेदों के ज्ञान ने शिक्षा की व्यवस्था को प्रभावशाली बनाया है।

प्रश्न 3
विभिन्न आधारों पर किये गये व्यक्तिगत भिन्नताओं के वर्गीकरण का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
वैयक्तिक विभिन्नता के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
या
शेल्डन के अनुसार व्यक्तित्व के प्रकार का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

व्यक्तिगत भिन्नताओं का वर्गीकरण
(Classification of Individual Differences)

व्यक्तिगत भिन्नता के सम्बन्ध में टरमन ने लिखा है, “उच्च योग्यता वालों या प्रतिभाशाली बालकों में कुछ सीमा तक अपनी अनेक योग्यताओं के मामले में अपने ही भीतर या अन्य व्यक्तियों के साथ भिन्नताएँ होती हैं।” व्यक्तियों में निम्नांकित प्रकार की भिन्नताएँ पायी जाती हैं’

1. शारीरिक भिन्नता- शरीर की बनावट, रूप, रंग, आकृति, यौन में अन्तर को शारीरिक भिन्नता कहते हैं। शरीर के स्वास्थ्य एवं अंगों की क्रियाशीलता में भेद होने से शारीरिक भिन्नता पायी जाती है। भिन्न-भिन्न विद्वानों ने व्यक्ति में विभिन्न भिन्नताएँ पायी हैं और उसके अनुसार उन्हें निम्न वर्गों में बाँटा है

(i) क्रेश्मर का वर्गीकरण

  1. ऐथलेटिक- मजबूत हड्डी, स्वस्थ मांसपेशियों, चौड़े सीने, लम्बे हाथ-पैर और लम्बे चेहरे वाले, क्रियाशील, चिन्तारहित, उचित रूप से समायोजित करने वाले।
  2. ऐसथेनिक- लम्बे, पतले हाथ-पैर वाले, तिकोने चेहरे, चपटे सीने और छोटी ठोढ़ी वाले, अपनी निन्दा न सुनने वाले, दूसरों की निन्दा करने वाले।
  3. पिकनिक- बड़े सिर और धड़ वाले, छोटे पैर, गोल सीने व कन्धे, छोटे हाथ-पैर वाले।
  4. डिसप्लास्टिक- असाधारण शरीर वाले, रोगग्रस्त, ग्रन्थि रोग वाले, उपर्युक्त तीनों प्रकार के लोगों का मिश्रण।

(ii) केनन का वर्गीकरण

  1. थायरॉइड ग्रन्थि-प्रधान-पर्याप्त शक्ति वाले, स्वस्थ, ओजस्वी व्यक्ति।
  2. थायरॉइड ग्रन्थि से न्यून स्राव वाले-कमजोर, अस्वस्थ, आलसी, क्रियाहीन व्यक्ति।
  3. एड्रीनल ग्रन्थि-प्रधान-बहादुर, लड़ाकू, क्रोधी, साहसी, कर्मठ व्यक्ति।
  4. पिट्यूटरी ग्रन्थि-प्रधान-क्रियाशील, हँसी-मजाक में निपुण, प्रसन्नचित्त व्यक्ति।
  5. गोनाड ग्रन्थि-प्रधान-अधिक क्रियाशील, कामुक, नाटे, स्वस्थ व्यक्ति।

(iii) शेल्डन का वर्गीकरण

  1. कोमल, गोल तथा मोटे शरीर वाले व्यक्ति।
  2. हृष्टपुष्ट, शक्तिशाली, भारी और मजबूत व्यक्ति।
  3. लम्बे आकार वाले, शक्तिहीन, दुर्बल मांसपेशियों वाले, शीघ्र उत्तेजित होने वाले व्यक्ति।

(iv) वार्नर का वर्गीकरण

  1. सामान्यतया स्वस्थ, सुडौल, गठीले शरीर वाले व्यक्ति।
  2. अविकसित अंग वाले, छोटे हाथ, पैर, गर्दन वाले व्यक्ति।
  3. असन्तुलित शरीर वाले, निर्बल, अपरिपुष्ट व्यक्ति।
  4. स्नायुविक गड़बड़ी वाले, शीघ्र घबराने वाले व्यक्ति।
  5. अंगहीन, हाथ, पैर, आँख, कान ठीक न होने वाले व्यक्ति
  6. आलसी, सुस्त, इच्छाविहीन, निर्जीव से व्यक्ति।
  7. पिछड़े हुए, आयु के अनुकूल कार्य करने में असमर्थ व्यक्ति।
  8. प्रतिभाशाली, अपनी आयु से अधिक कार्य करने वाले व्यक्ति।
  9. मिर्गी रोगग्रस्त व्यक्ति।
  10. स्नायु रोगग्रस्त व्यक्ति।

2. बौद्धिक भिन्नता- टरमन (Turman) ने बुद्धिलब्धि निकालकर निम्नलिखित भिन्नताएँ बतायी।

           प्रकारे                                        बुद्धिलब्धि

  1. अति प्रतिभाशाली               200 या इससे अधिक
  2. प्रतिभाशाली                       140 से 200 तक
  3. अति उत्कृष्ट                       120 से 140 तक
  4. उत्कृष्ट                               110 से 120 तक
  5. साधारण                            90 से 110 तक
  6. मन्दबुद्धि                           80 से 90 तक
  7. निर्बल बुद्धि                       70 से 80 तक
  8. हीन बुद्धि                          70 से कम
  9. मूर्ख                                  50 से 70 तक
  10. मूढ़                                   20 से 50 तक
  11. जड़                                  20 से कम

3. मानसिक योग्यताओं की भिन्नता- व्यक्ति संवेदनशीलता, प्रत्यक्षीकरण, निरीक्षण, स्मरण, कल्पना, चिन्तन, तर्क, अधिगम आदि मानसिक योग्यताओं में भिन्न पाये जाते हैं। कुछ बड़े संवेदनशील होते हैं, कुछ तीव्र स्मरण करने वाले होते हैं, कुछ बड़े तार्किक होते हैं, कुछ की कल्पना-शक्ति बहुत तीव्र होती है, कुछ देर से सीखते हैं आदि। कुछ मनोवैज्ञानिकों द्वारा इस सम्बन्ध में किये गए वर्गीकरण इस प्रकार हैं—

(i) थॉर्नडाइक का वर्गीकरण- यह वर्गीकरण विचारशक्ति पर आधारित है

  1. सूक्ष्म विचारक; जैसे-गणितज्ञ, तर्कशास्त्री, वैज्ञानिक।
  2. प्रत्यय विचारक; जैसे-कवि, साहित्यकार, नाटककार।
  3. स्थूल विचारक; जैसे-वस्तुओं के साथ विचार करने वाले।
  4. ज्ञानेन्द्रिय-प्रधान विचारक; जैसे-आँख से देखकर समझने वाले।

(ii) थॉर्नडाइक का कल्पना- शक्ति पर आधारित वर्गीकरण

  1. दर्शनालु अर्थात् आँख की इन्द्रिय-प्रधान व्यक्ति।
  2. श्रवणालु अर्थात् कान की इन्द्रिय-प्रधान व्यक्ति।
  3. गमनालु अर्थात् क्रिया, इन्द्रिय-प्रधान व्यक्ति।
  4. स्पर्शालु, अर्थात् त्वक इन्द्रिय-प्रधान व्यक्ति।
  5. घृणालु अर्थात् नासिको इन्द्रिय-प्रधान व्यक्ति।
  6. मिश्रित अर्थात् कई इन्द्रियों को एक-साथ मिलाकर कार्य करने वाले व्यक्ति।

(iii) स्टीफेन्सन का वर्गीकरण- इनका वर्गीकरण बाह्य उत्तेजकों द्वारा मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभावों पर आधारित है

  1. प्रसारक- अर्थात् स्थायी प्रभाव वाले व्यक्ति।
  2. अप्रसारक-अर्थात् क्षणिक प्रभाव वाले व्यक्ति।

4. स्वभावगत भिन्नता- व्यक्तियों में स्वभावगत भिन्नता भी पायी जाती है। इसका ज्ञान मनोवैज्ञानिकों द्वारा दिये गये वर्गीकरण से होता है। इनका विवरण इस प्रकार है

(i) मॉर्गन और गिलीलैण्ड का वर्गीकरण- यह वर्गीकरण मनोभावों पर आधारित है-

  1. प्रफुल्ल, जो हमेशा हँसने वाले, आशावादी, गम्भीरतारहित काम करने वाले, संकट में प्रसन्न रहने वाले, जीवन को खेल समझने वाले होते हैं।
  2. उदास, जो सदैव दु:खी रहते हैं और निराशावादी अभिवृत्ति रखते हैं।
  3. चिड़चिड़े जो छोटी-छोटी बातों में खीझ उठते हैं, जल्दी क्रुद्ध हो जाते हैं और मजाक को सहन नहीं करते हैं।
  4. अस्थिर, जो शीघ्र क्रुद्ध, शीघ्र प्रसन्न, शीघ्र दुःखी, अनियन्त्रित भावना वाले होते हैं।

(ii) गैलन का वर्गीकरण- यह शारीरिक क्रियाओं पर आधारित है

  1. अति रुधिरयुक्त, जो अत्यन्त संवेदनशील, परिवर्तनशील, शीघ्र उत्तेजित होने वाले, उत्साही एवं कार्य करने वाले होते हैं।
  2. पीतपित्त-प्रधान, जो क्रोधी, वीर, साहसी, हठी, दृढ़-प्रतिज्ञ तथा कठोर स्वभाव वाले होते हैं।
  3. श्याम पित्त-प्रधान, जो दुःखी, चिन्तित, हतोत्साही, निराशावादी तथा कार्य में अरुचि रखने वाले होते हैं।
  4. कफ-प्रधान, जो आलसी, सुस्त, कम संवेदनशील, काम से भागने वाले तथा परिश्रमहीन होते हैं।

(iii) शेल्डन का वर्गीकरण- यह स्वाभाविक गुणों पर आधारित है-

  1. आलसी, जो आराम-पसन्द, निद्रा-प्रेमी, पराश्रित, परामुखी तथा काम न करने वाले होते हैं।
  2. कर्मठ, जो सक्रिय, परिश्रमी, साहसी, अधिकार-प्रेमी, कार्यरत तथा शक्तिशाली होते हैं।
  3. संयमी, जो अपने पर नियन्त्रण रखने वाले, संकोची, कार्याभ्यस्त तथा एकान्त प्रेमी होते हैं।

5. सामाजिकता सम्बन्धी भिन्नता- व्यक्तियों में सामाजिकता अधिक या कम होती है। कुछ अपने आप में, कुछ दूसरों में और कुछ अपने तथा दूसरों में बराबर-बराबर रुचि रखते हैं। प्रोफेसर गुंग ने व्यक्तियों को तीन वर्गों में विभक्त किया है-

  1. अन्तर्मुखी- जो आत्म-केन्द्रित, समाज के कार्यों में रुचि न लेने वाले, एकान्त प्रेमी, भविष्य की चिन्ता अधिक करने वाले, अधिक सोच-विचार करने वाले, देर से निर्णय लेने वाले, अव्यावहारिक तथा चिन्ता से घिरे होते हैं।
  2. बहिर्मुखी- जो सामाजिक कार्यों में भाग लेने वाले, दूसरों की भलाई में लगे रहने वाले, अकेले ऊबने वाले, व्यवहार-कुशल, सक्रिय, शीघ्र निर्णय लेने वाले, दृढ़ निश्चयी, मिलनसार, नेता, प्रशासक तथा वक्ता होते हैं।
  3. उभयमुखी- इनमें उपर्युक्त दोनों प्रकार के गुणों से सम्पन्न व्यक्ति होते हैं। अधिकांश व्यक्ति इसी वर्ग में आते हैं।

6. सीखने की क्षमता में भिन्नता- एबिंगहास ने अनेक परीक्षणों के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि विभिन्न आयु के बालकों एवं वयस्कों में भी सीखने की क्षमता भिन्न पायी जाती है। कोई बालक जल्दी सीखता है तो कोई देर से। कक्षा में एक बात को कुछ बालक जल्दी समझने लगते हैं और दूसरों को बहुत समय लगता है।

7. रुचि की भिन्नता- प्रत्येक व्यक्ति की रुचि दूसरे की रुचि से भिन्न होती है। कुछ बालक पढ़ने में रुचि रखते हैं तो कुछ वैज्ञानिक कार्य करने और कुछ शिल्प-कार्यों में।

8. अभिरुचि की भिन्नता- कुछ व्यक्ति संगीत में अभिरुचि रखते हैं, तो दूसरे हस्तकौशल या तकनीकी कार्यों में। वकील, डॉक्टर, मास्टर, इंजीनियर, कारीगर, क्लर्क व प्रशासक में अभिरुचि की भिन्नता पायी जाती है।

9. चारित्रिक भिन्नता- आचरण, व्यवहार, अभिवृत्ति, आदत, स्थायी भाव ये सब मिलकर चरित्र को निर्माण करते हैं। चोर, लुटेरे, अपराधी, हत्यारे, उदार, दृढ़ प्रतिज्ञ, कृत संकल्पी, शीलवान, लज्जाशील चारित्रिक भिन्नता के व्यक्ति होते हैं।

10. ज्ञानात्मक भिन्नता- व्यक्ति प्रायः व्यावहारिक एवं सैद्धान्तिक ज्ञान वाले होते हैं। व्यावहारिक ज्ञान के कारण संसार के क्रिया-कलापों में, विषम परिस्थितियों में और पारस्परिक सम्पर्क में व्यक्ति आगे बढ़ता है। सैद्धान्तिक ज्ञान-भाषा, गणित, इतिहास, भूगोल, विज्ञान, तकनीकी, वाणिज्य, कृषि आदि का ज्ञान होता है। ज्ञान की भिन्नता आयु, बुद्धि, सामाजिक व आर्थिक स्थिति, सीखने के अवसर व प्रेरणा आदि पर कम या अधिक हो सकती है। व्यावहारिक ज्ञान वास्तविक परिस्थितियों में कार्य करने से मिलता है।

11. व्यक्तित्व की भिन्नता- व्यक्ति के विभिन्न गुणों के समूह का मनोवैज्ञानिक नाम व्यक्तित्व होता है। सभी व्यक्तियों में सभी गुण नहीं होते हैं। व्यक्तित्व की भिन्नता के निम्नलिखित वर्ग हैं

(i) स्पेल्जर का वर्गीकरण- इन्होंने छह प्रकार के व्यक्तियों का उल्लेख किया है-

  1. ऐन्द्रिय सुख चाहने वाला, जो अपनी इन्द्रियों को सतुष्ट करने में संलग्न रहे; जैसे-लोभी, लालची, कामी, घूसखोर, कालाबाजारी, तस्कर, व्यापारी, बेईमान आदि।
  2. धन से प्रेम रखने वाला, जो व्यापार एवं वाणिज्य में दिन-रात लगा रहता है और धन कमाने के पीछे तन-मन सब कुछ खराब कर देता है।
  3. चिन्तन-मनन करने वाला, जो दार्शनिक, वैज्ञानिक, साहित्यिक, अध्ययन में, शोध कार्य में अपना सारा समय लगता है।
  4. राजनीति में संलग्न रहने वाला, जो शासन के कार्यों में, दलबन्दी करने में, दाँव-पेंच व घात-प्रतिघात में लगा हुआ पाया जाता है।
  5. समाज के कार्यों में लगा रहने वाला, जो जाति-पाँति से दूर सभी समाजों के समस्त कार्यों में सजग रूप में लगा रहता है।
  6. धर्मनिष्ठ, जो ईश्वर के भजन, पूजा-पाठ, स्थान-ध्यान, रोजा-नमाज व चर्च की सेवा में लगा पाया जाता है।

(ii) सामान्य वर्गीकरण- इनके तीन वर्ग हैं-

  1. भाव-प्रधान व्यक्ति, जो जल्दी ही संवेदनशील हो उठते हैं। कोमल हृदय वाले होते हैं; जैसे-कवि, सेवक, भक्त, दयालु।
  2. विचार-प्रधान व्यक्ति, जो जीवन की समस्याओं के सम्बन्ध में काफी सोच-विचार और चिन्तन किया करते हैं; जैसे–दार्शनिक, लेखक, वैज्ञानिक आदि।
  3. हिंसा-प्रधान व्यक्ति, जो अपने जीवन में क्रिया ही करना पसन्द करते हैं; जैसे-सैनिक, खिलाड़ी श्रमिक, कारीगर आदि।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
व्यक्तिगत भिन्नताओं की प्रकृति का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
व्यक्तिगत भिन्नताओं की प्रकृति- व्यक्तिगत भिन्नताओं की प्रकृति निम्न प्रकार की होती

  1. व्यक्तिगत भिन्नताएँ सर्वव्यापी होती हैं। विश्व के सभी देशों के लोगों में ये भिन्नताएँ पायी जाती हैं।
  2. व्यक्तिगत भिन्नता व्यक्ति के प्रत्येक गुण में पायी जाती है। भिन्नता की मात्रा में अन्तर-हो सकता है।
  3. व्यक्तिगत भिन्नता व्यक्ति के प्रत्येक गुण की सभी किस्मों में पायी जाती है; जैसे—काले रंग की कई किस्में होती हैं और प्रत्येक किस्म में कुछ-न-कुछ भेद दिखायी देता है।
  4. व्यक्तिगत भिन्नता जन्म के बाद बढ़ती जाती है। जन्म के समय प्रायः सभी प्राणी एक-समान दिखायी देते हैं, परन्तु बाद में उनमें भिन्नता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।
  5. व्यक्तिगत भिन्नता का मूल स्रोत वंशानुक्रम है। विशेषकर व्यक्तियों में पर्यावरण की भिन्नता के बाद में व्यक्तिगत भिन्नता में वृद्धि होती है।
  6. व्यक्तिगत भिन्नता व्यक्तियों के लक्षणों व संगठन में भी पायी जाती है। इसी कारण व्यक्तित्व में भिन्नता देखने को मिलती है।
  7. व्यक्तिगत भिन्नता का अनुपात सदैव बदलता रहता है। इसीलिए दो व्यक्तियों के बीच पायी जाने. वाली भिन्नता सदैवं एक-समान नहीं रहती है।
  8. व्यक्तिगत भिन्नता से व्यक्ति के व्यवहार में भी परिवर्तन होता रहता है और तदनुरूप उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

प्रश्न 2
व्यक्तिगत भिन्नताओं के मुख्य आधारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

व्यक्तिगत भिन्नता के आधार
(Bases of Individual Difference)

व्यक्तिगत भिन्नता के निम्नलिखित आधार हैं-

  1. शारीरिक रचना- शरीर की रचना के आधार पर हम व्यक्तिगत भिन्नता निश्चित करते हैं। शरीर रचना की दृष्टि से लम्बे, नाटे, मोटे, पतले आदि व्यक्ति होते हैं। रंग-रूप में भी भिन्नता पायी जाती है।
  2. मानसिक योग्यताएँ- बुद्धि, स्मृति तथा उपलब्धि परीक्षणों से ज्ञात हुआ है कि व्यक्तियों में काफी अन्तर पाया जाता है। कोई निम्न बुद्धि का, कोई तीव्र बुद्धि का, अधिकतर सामान्य बुद्धि के होते हैं। कुछ शिल्पी, कुछ दार्शनिक तो कुछ वैज्ञानिक होते हैं।
  3. रुचि-पढ़ने- लिखने, खाने-पीने, वस्त्र-आभूषण पहनने, खेलने-कूदने आदि में लोग भिन्न रुचि रखते हैं। इस आधार पर भी व्यक्तिगत भिन्नता का निर्धारण किया जाता है।
  4. सीखना- सीखने के आधार पर भी व्यक्तिगत भिन्नता पायी जाती है। कोई जल्दी सीखता है, तो कोई देर से सीखता है। यही नहीं कोई व्यक्ति त्रुटिरहित ढंग से सीखता है जबकि कोई व्यक्ति सीखने में अधिक त्रुटियाँ करता है।
  5. व्यक्तित्व- व्यक्तित्व के लक्षणों के आधार पर कोई रूढ़िवादी विचार का, कोई ईमानदार, कोई प्रचारक, कोई परिश्रमी, कोई आलसी, कोई सामाजिक और कोई अन्तर्मुखी व्यक्तित्व वाला कहा जाता है।
  6. क्षमता व उपलब्धि- इसके आधार पर कोई वैज्ञानिक, कोई कवि, कोई चित्रकार, कोई संगीतज्ञ, कोई अधिक या कोई कम उपलब्धि वाला होता है।
  7. स्वभाव के आधार पर- कुछ क्रोधी, कुछ प्रसन्नचित्त, कुछ चिड़चिड़े या लड़ाकू होते हैं।
  8. विशिष्टता- ऐसा देखने में आता है कि कोई बालक सभी विषयों में अच्छा होते हुए भी भाषा में कमजोर हो सकता है। इसके विपरीत कोई अन्य बालक गणित में तेज होते हुए भी कला में कमजोर हो सकता है। यह भिन्नता विशिष्टता पर आधारित है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
व्यक्तिगत भेद के प्रकारों को स्पष्ट कीजिए।
या
व्यक्तिगत भेद कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर:
व्यक्ति के समस्त पक्षों में पायी जाने वाली भिन्नताओं के आधार पर ही व्यक्तिगत भेदों के प्रकारों का निर्धारण किया जाता है। इस प्रकार व्यक्तिगत भिन्नता या भेद के मुख्य प्रकार हैं-शारीरिक भिन्नता, बौद्धिक भिन्नता, मानसिक भिन्नता, स्वभावगत भिन्नता, सामाजिकता-सम्बन्धी भिन्नता, सीखने की क्षमता सम्बन्धी भिन्नता, रुचि की भिन्नता, अभिरुचि की भिन्नता, चारित्रिक भिन्नता, ज्ञानात्मक भिन्नता तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी भिन्नता।

प्रश्न 2
व्यक्तिगत भिन्नता के मापन के लिए अपनायी जाने वाली परीक्षण विधि का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
विभिन्न परीक्षण व्यक्ति के विभिन्न गुणों को मापते हैं; जैसे-शारीरिक परीक्षण शरीर सम्बन्धी गुणों को मापते हैं। बुद्धि परीक्षण बुद्धि को मापते हैं। क्षमता परीक्षण विशिष्ट योग्यताओं को मापते हैं। उपलब्धि परीक्षण विभिन्न विषयों के ज्ञान को मापते हैं। संवेग परीक्षण व्यक्ति के संवेगों का मापन करते हैं। निदानात्मक परीक्षण व्यक्ति की विषय सम्बन्धी कमजोरियों को परखते हैं। अभिवृत्ति परीक्षण विशेष प्रवृत्तियों की जाँच करते हैं। रुचि परीक्षण विभिन्न कामों में व्यक्ति की रुचि को बताते हैं। व्यक्तित्व परीक्षण व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, भावात्मक गुणों तथा लक्षणों का मापन करते हैं।

प्रश्न 3
व्यक्तिगत भिन्नताओं के अध्ययन के लिए अपनायी जाने वाली विधि व्यक्ति-इतिहास विधि का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:
व्यक्तिगत भिन्नताओं के अध्ययन के लिए अपनायी जाने वाली एक विधि व्यक्ति-इतिहास विधि’ भी है। यह विधि मुख्य रूप से समस्यात्मक बालकों के व्यक्तित्व सम्बन्धी अध्ययनों के लिए अपनायी जाती है। इस अध्ययन विधि के अन्तर्गत व्यक्ति-विशेष से सम्बन्धित अनेक सूचनाएँ एकत्रित की जाती हैं; यथा-उसका शारीरिक स्वास्थ्य, संवेगात्मक स्थिरता, सामाजिक जीवन आदि। व्यक्ति के भूतकालीन जीवन के अध्ययन द्वारा उसकी वर्तमान मानसिक व व्यावहारिक संरचना को समझने का प्रयास किया जाता है। इन सूचनाओं को इकट्ठा करने में व्यक्ति-विशेष के माता-पिता, अभिभावक, सगे-सम्बन्धी, मित्र-पड़ोसी तथा चिकित्सकों से सहायता ली जाती है। इन सभी सूचनाओं, बुद्धि परीक्षण तथा रुचि परीक्षण के आधार पर व्यक्ति विशेष के व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया जाता है। इस प्रकार किसी व्यक्ति के वर्तमान व्यवहार की असामान्यताओं के कारणों की खोज उसके भूतकाल के जीवन से करने में व्यक्ति-इतिहास विधि उपयोगी सिद्ध होती है।

प्रश्न 4
व्यक्तिगत भिन्नताओं के अध्ययन के लिए अपनायी जाने वाली भेंट या साक्षात्कार विधि का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:
व्यक्तिगत भिन्नताओं को ज्ञात करने के लिए भेट या साक्षात्कार विधि को भी अपनाया जाता है। व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने की यह विधि सरकारी नौकरियों में चुनाव के लिए सर्वाधिक प्रयोग की जाती है। भेंट या साक्षात्कार के दौरान परीक्षक परीक्षार्थी से प्रश्न पूछता है और उसके उत्तरों के आधार पर उसके व्यक्तित्व का मूल्यांकन करता है। बालक के व्यक्तित्व का अध्ययन करने के लिए उसके अभिभावक, माता-पिता, भाई-बहन, मित्रों आदि से भी भेंट या साक्षात्कार किया जा सकता है। इस विधि का सबसे बड़ा दोष आत्मनिष्ठता का है। थोड़े से समय में किसी व्यक्ति विशेष के हर पक्ष से सम्बन्धित प्रश्न नहीं पूछे जा सकते और अध्ययन किये गये विभिन्न व्यक्तित्वों की पारस्परिक तुलना भी नहीं की जा सकती है। इस विधि को अधिकतम उपयोगी बनाने के लिए एक निर्धारित मान का प्रयोग किया जाना चाहिए तथा प्रश्न व उनके उत्तर पूर्व-निर्धारित हों ताकि साक्षात्कार के दौरान समय एवं शक्ति की बचत हो।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
व्यक्तिगत भिन्नता से क्या आशय है ?
उत्तर:
व्यक्तिगत भिन्नता का आशय एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से रूप-रंग, शारीरिक गठन, बुद्धि, विशिष्ट योग्यताओं, रुचियों, उपलब्धियों, स्वभाव तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी गुणों में पायी जाने वाली भिन्नता से है।

प्रश्न 2
व्यक्तित्व भिन्नता के चार मुख्य आधारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
व्यक्तित्व भिन्नता के चार मुख्य आधार हैं-

  1. शारीरिक रचना
  2. मानसिक योग्यताएँ
  3. रुचियाँ तथा
  4. क्षमता एवं उपलब्धि

प्रश्न 3
व्यक्तिगत भिन्नताओं के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
व्यक्तिगत भिन्नता के मुख्य कारण हैं-

  1. वंशानुक्रम या आनुवंशिकता
  2. वातावरण
  3. लिंग-भेद तथा
  4. आयु तथा बुद्धि का प्रभाव

प्रश्न 4
व्यक्तिगत भिन्नता का शिक्षा से क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
बालक की शिक्षा की व्यवस्था उसके व्यक्तिगत गुणों के अनुसार ही होनी चाहिए।

प्रश्न 5
व्यक्तिगत भिन्नता को जानने की प्रमुख विधि कौन-सी है ?
उत्तर:
व्यक्तिगत भिन्नता को जानने की प्रमुख विधि है-परीक्षण विधि।

प्रश्न 6
व्यक्तिगत भिन्नता की सैद्धान्तिक मान्यता के अनुसार शिक्षक का मुख्य दायित्व क्या है?
उत्तर:
व्यक्तिगत भिन्नता की सैद्धान्तिक मान्यता के अनुसार शिक्षक का दायित्व है कि वह कक्षा के प्रत्येक छात्र के प्रति व्यक्तिगत रूप से ध्यान दे।

प्रश्न 7
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. प्रकृति ने समस्त मनुष्यों को एकसमान बनाया है।
  2. यह सत्य है कि इस जगत् में कोई दो व्यक्ति पूर्ण रूप से समान नहीं हैं।
  3. व्यक्तिगत भिन्नता पर न तो आनुवंशिकता का कोई प्रभाव पड़ता है और न ही वातावरण का।
  4. व्यक्तिगत भिन्नता की अवधारणा ने शिक्षा की व्यवस्था में अनेक परिवर्तन किये हैं।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-

प्रश्न 1.
वैयक्तिक विभिन्नताओं का जनक किसे माना गया है ?
(क) टेलर को
(ख) गाल्टन को
(ग) थॉर्नडाइक को
(घ) टरमन को

प्रश्न 2.
‘मनोमिति’ किस विज्ञान की शाखा है ?
(क) मनोविज्ञान
(ख) शिक्षा मनोविज्ञान
(ग) पर्यावरण विज्ञान
(घ) बाल मनोविज्ञान

प्रश्न 3.
वैयक्तिक विभिन्नता का प्रमुख आधार है
(क) आर्थिक स्थिति
(ख) सामाजिक स्थिति
(ग) वंशानुक्रम
(घ) बौद्धिक श्रेष्ठता

प्रश्न 4.
वैयक्तिक विभिन्नता का कारण है:
(क) वंशानुक्रम
(ख) पृथ्वी
(ग) आसमान
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 5.
“बालकों की विभिन्नताएँ, प्रेरणा, बुद्धि, परिपक्वता, वातावरण सम्बन्धी उद्दीपकों की विभिन्नता का परिणाम होती हैं।” यह किसका मत है ?
(क) गैरीसन को
(ख) जर्सील्ड का
(ग) गिलफोर्ड का
(घ) थॉर्नडाइक को

प्रश्न 6.
सर्वप्रथम व्यक्तित्व के चार अर्थ किसने बताए?
(क) आगस्टाइन ने
(ख) सिसरो ने
(ग) अरस्तू ने
(घ) प्लेटो ने

प्रश्न 7.
“व्यक्तित्व उन मनोशारीरिक अवस्थाओं का गत्यात्मक संगठन है, जो किसी व्यक्ति का उसके पर्यावरण के साथ अनूठा समायोजन स्थापित करते हैं।” यह परिभाषा किसने दी है ?
(क) मन ने
(ख) ड्रेवर ने
(ग) आलपोर्ट ने
(घ) मार्टन प्रिन्स ने

प्रश्न 8.
व्यक्तित्व का सर्वप्रथम वर्गीकरण किसने किया ?
(क) हिप्पोक्रेटीज ने
(ख) कैमरर ने
(ग) थॉर्नडाइक ने
(घ) कार्ल यंग ने

प्रश्न 9.
मानव प्रकृति के आधार पर किस विद्वान् ने व्यक्तित्व के तीन प्रकार बताए हैं ?
(क) कैटेल ने
(ख) टरमन ने
(ग) कार्ल यंग ने
(घ) जुड ने

प्रश्न 10.
वैयक्तिक भिन्नता की अवधारणा ने किस शिक्षण-विधि को जन्म दिया है?
(क) कक्षा शिक्षण-विधि को
(ख) डाल्टने विधि को
(ग) सामूहिक शिक्षा-विधि को
(घ) व्यक्तिगत शिक्षा-विधि को

प्रश्न 11.
व्यक्तिगत भेद के कारण हैं
(क) वंशानुक्रम और वातावरण
(ख) वातावरण और आदत
(ग) वंशानुक्रम और रुचि
(घ) आदत और रुचि

प्रश्न 12.
जन्मजात भिन्नता के लिए मुख्य रूप से कौन-से कारक जिम्मेदार होते हैं?
(क) समाज का प्रभाव
(ख) वंशानुक्रम
(ग) जाति एवं धर्म
(घ) पर्यावरण

प्रश्न 13.
निम्नलिखित कारण व्यक्तिगत भेद के हैं सिवाय-
(क) वंशानुक्रम
(ख) वातावरण
(ग) शिक्षा-व्यवस्था
(घ) आयु एवं बुद्धि

प्रश्न 14.
व्यक्तिगत विभिन्नता का मुख्य आधार है-
(क) वर्गवाद
(ख) धर्मवाद
(ग) वंशानुक्रम
(घ) आतंकवाद

प्रश्न 15.
व्यक्तिगत भिन्नता के प्रकार हैं
(क) शारीरिक भिन्नता
(ख) मानसिक भिन्नता
(ग) व्यक्तित्व भिन्नता
(घ) ये सभी

प्रश्न 16.
स्कूली बच्चों में व्यक्तिगत भिन्नताएँ किस रूप में पायी जाती हैं ?
(क) शारीरिक
(ख) मानसिक
(ग) रुचि सम्बन्धी
(घ) ये सभी

उत्तर:

  1. (ख) गाल्टन को
  2. (क) मनोविज्ञान
  3. (ग) वंशानुक्रम
  4. (क) वंशानुक्रम
  5. (क) गैरीसन का
  6. (ख) सिसरो ने
  7. (ग) आलपोर्ट ने
  8. (क) हिप्पोक्रेटीज ने
  9. (ग) कार्ल यंग ने
  10. (ख) डाल्टन विधि को
  11. (क) वंशानुक्रम और वातावरण
  12. (ख) वंशानुक्रम
  13. (ग) शिक्षा-व्यवस्था
  14. (ग) वंशानुक्रम
  15. (घ) ये सभी
  16. (घ) ये सभी

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 6 Home or Family: As an Informal Agency of Education

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 6
Chapter Name Home or Family: As an Informal Agency of Education
(गृह या परिवार: शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण के रूप में)
Number of Questions Solved 33
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 6 Home or Family: As an Informal Agency of Education (गृह या परिवार: शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण के रूप में)

विस्तृत उत्तरीय प्रशा

प्रश्न 1.
परिवार से आप क्या समझते हैं ? एक संस्था के रूप में परिवार के शैक्षिक महत्व को स्पष्ट कीजिए।
या
“गृह बालक की शिक्षा की प्रथम पाठशाला है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
बालक/बालिका की शिक्षा में गृह का क्या महत्त्व है ?
या
शिक्षा के अभिकरण के रूप में घर के महत्व पर प्रकाश डालिए।
या
शिक्षा के अभिकरण के रूप में परिवार की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

गृह या परिवार का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Home or Family)

गृह या परिवार समाज का लघु रूप और सामाजिक व्यवस्था का प्रमुख आधार है। व्यक्ति का समाजीकरण परिवार के माध्यम से ही होता है। मनुष्य शिशु के रूप में परिवार में जन्म लेता है, पालित-पोषित एवं विकसित होता है। शैक्षिक प्रक्रिया के अन्तर्गत सीखने की दृष्टि से शिशु अवस्था को आदर्श काल माना गया है। इस अवस्था के विकास में गृह या परिवार का सर्वाधिक योगदान होता है। नि:सन्देह परिवार, शिक्षा का प्रभावशाली अभिकरण या साधन होने के कारण बालक की शिक्षा में प्राथमिक एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री पी० वी० यंग एवं मैक का विचार है, “परिवार सबसे पुराना और मौलिक मानव-समूह है। पारिवारिक ढाँचे का विशिष्ट स्वरूप एक समाज से दूसरे समाज में भिन्न हो सकता है और होता है, पर सब जगह परिवार के मुख्य कार्य हैं-बच्चे का पालन करना और उसे समाज की संस्कृति से परिचित कराना–सारांश में उसका समाजीकरण करना।”

सामाजिक संगठनों में सर्वाधिक प्राचीन तथा प्रमुख संगठन ‘परिवार’ है। यह समाज की एक महत्त्वपूर्ण इकाई है और सबसे अधिक मौलिक सामाजिक समूह भी है। एकांकी परिवार में सामान्यत: पति-पत्नी और उनके बच्चे होते हैं, जब कि संयुक्त परिवार में पति या पत्नी के माता-पिता, उनके अन्य भाई-बहन या दो-तीन पीढ़ियों के सदस्य एक साथ मिलकर रहते हैं।

‘परिवार’ शब्द का अंग्रेजी रूपान्तर ‘Family’ शब्द ‘Famulus’ से बना है, जिसका अर्थ है’Servant’ नौकर। यही कारण है कि कुछ प्राचीन समाजों में नौकरों को भी परिवार का ही सदस्य माना जाता था।

गृह या परिवार की निम्नलिखित परिभाषाएँ इसके अर्थ को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं|

  1. क्लेयर के अनुसार, “परिवार से हम सम्बन्धों की वह व्यवस्था समझते हैं, जो माता-पिता और उनकी सन्तानों के बीच पायी जाती है।”
  2. मैकाइवर तथा पेज के मतानुसार, “परिवार उस समूह का नाम है जिसमें स्त्री-पुरुष का यौन सम्बन्ध पर्याप्त निश्चित हो और इनका साथ इतनी देर तक रहे जिससे सन्तान उत्पन्न हो जाए और उसका पालन-पोषण भी किया जाए।
  3. बील्स तथा हाइजर के कथनानुसार, “संक्षेप में, परिवार को सामाजिक समूह के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसके सदस्य रक्त सम्बन्धों द्वारा बँधे रहते हैं।”

संस्था के रूप में परिवार का शैक्षिक महत्त्व
(Educational Importance of Family as Institution)

परिवार सदैव ही बालक पर अपना स्थायी प्रभाव छोड़ता है। बालक का जन्म, विकास और समाजीकरण परिवार से ही शुरू होता है। उसकी आधारभूत आवश्यकताएँ भी घर या परिवार से ही पूरी होती हैं। परिवार के वातावरण का प्रभाव बालक के विकास के सभी स्तरों पर पड़ता है। लॉरी का कथन है, “शैक्षिक इतिहास । के सभी स्तरों पर परिवार बालक की शिक्षा का प्रमुख साधन है।” अधिकांशत: बालक वैसा ही बनता है, जैसा उसका परिवार उसे बनाना चाहता है। अपने परिवार के सदस्यों का अनुकरण करके ही बच्चे अच्छे या बुरे गुण सीखते हैं। एक ओर जहाँ शिवाजी मराठा, गोपालकृष्ण गोखले, महात्मा गांधी और लोकमान्य तिलक आदि महापुरुषों का सदाचरण अपने परिवार की आदर्श पृष्ठभूमि पर आधारित था, वहीं दूसरी ओर एच० सी० एण्डरसन यह भी प्रमाण देते हैं, “हमारे अपराधियों में से 80 प्रतिशत अपराधी असहानुभूतिपूर्ण परिवारों से आते हैं।’

बालक की शिक्षा के सन्दर्भ में समाज की मौलिक संस्था परिवार का महत्त्व निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत स्पष्ट किया जा सकता है–

1. शिक्षा की प्राचीनतम संस्था- प्राचीन समय में बालक के संस्था के रूप में परिवार का लालन-पालने, विकास तथा शिक्षा-दीक्षा के लिए परिवार ही शैक्षिक महत्त्व उत्तरदायी था। प्रागैतिहासिक काल से लेकर ईसा की, दसवीं सदी पूर्व शिक्षा की प्राचीनतम संस्था तक भारत में बालकों को व्यवस्थित रूप से शिक्षा देने के लिए परि विद्यालय नहीं थे, तब परिवार और विद्यालय अलग-अलग नहीं थे, अच्छी आदतों की शिक्षा और शिक्षा का कार्य परिवार द्वारा ही सम्पन्न किया जाता था। वस्तुतः उस समय परिवार ही विद्यालय था और माता-पिता गुरुजन। वैदिक व्यक्तित्व एवं संस्कृति का तथा उपनिषद् काल में परिवार का नेता अपने पुत्रों को वेद, साहित्य, विकास धर्म, व्यवसाय, कृषि, व्यापार आदि का ज्ञान देता था। इस प्रकार शिक्षा , व्यावसायिक शिक्षा का केन्द्र की प्राचीनतम संस्था के रूप में परिवार का बड़ा महत्त्व था।

2. परिवार का आश्रय एवं अनुकरण- मानव-शिशु जन्म से असहाय होता है। अपनी विभिन्न क्रियाओं; जैसे–खाना-पीना, चलना-फिरना, बोलना तथा जीवन के बहुत-से कार्यों के लिए बालक माता-पिता पर निर्भर करता है। वह इन सभी क्रियाओं को परिवारजनों के अनुकरण द्वारा ही सीखता है। इस भाँति, आश्रय एवं अनुकरण की दृष्टि से बालक के जीवन में परिवार का सर्वोपरि स्थान है।

3. अच्छी आदतों की शिक्षा- बालक को अच्छी आदतों की शिक्षा अपने घर-परिवार से ही मिलती है। परिवार के बीच में रहकर ही वह सत्य, न्याय, प्रेम, दया, करुणा तथा श्रम का महत्त्व सीखता है। इस बारे में। रेमॉण्ट का यह कथन उल्लेखनीय है, “घर ही वह स्थान है, जहाँ वे महान् गुण उत्पन्न होते हैं, जिनकी सामान्य विशेषता ‘सहानुभूति’ है। घर में ही घनिष्ठ प्रेम की भावनाओं का विकास होता है। यहीं बालक उदारता एवं अनुदारता, नि:स्वार्थ एवं स्वार्थ, न्याय एवं अन्याय, सत्य एवं असत्य, परिश्रम एवं आलस्य में अन्तर सीखता है। यहीं उसमें इनमें से कुछ की आदत सबसे पहले पड़ती है।” अच्छी आदत सिखाने की दृष्टि से परिवार का बहुत महत्त्व है।

4. बालक का समाजीकरण- सामाजिक दृष्टि से परिवार में ही बालक के समाजीकरण की प्रक्रिया शुरू होती है। परिवार बालक को समाज की आवश्यकताओं के अनुसार ढालता है। समाज में रहने-सहने, व्यवहार करने, सम्बोधन, जीवन-यापन एवं प्रतिक्रियाएँ करने के तरीके परिवार से ही सीखे जाते हैं। परिवार बालक के समाजीकरण का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है।

5. व्यक्तित्व एवं संस्कृति का विकास- परिवार बालक के व्यक्तित्व एवं संस्कृति का निर्माता एवं ” पोषक है। व्यक्तित्व के प्रारम्भिक तथा मौलिक गुणों का निर्माण परिवार से होता है और मानव के व्यक्तित्व का परिचय परिवार की संस्कृति से प्राप्त होता है। सदरलैण्ड और वुडवर्थ ने लिखा है, “वास्तव में परिवार व्यक्तित्व के सामान्य प्रकार पर छाप लगा देता है। परिवार के अच्छे और बुरे संस्कारों का भी पर्याप्त प्रभाव बालक पर पड़ता है। जैसा कि बर्गेस और लॉक का कथन है, “परिवार बालक पर सांस्कृतिक प्रभाव डालने वाली एक मौलिक समिति है और पारिवारिक परम्परा बालक को उसके प्रति प्रारम्भिक व्यवहार, प्रतिमान एवं आचरण का स्तर प्रदान करती है।”

6. व्यावसायिक शिक्षा का केन्द्र- सामान्यत: परिवार ही समस्त आर्थिक क्रियाओं का केन्द्र होता है। अत: अपने आरम्भिक जीवन में बालक आर्थिक दृष्टि से परिवार पर ही निर्भर करता है। आजकल उत्पादन 

का कार्य परिवार से बाहर चला गया है, किन्तु पहले यह परिवार के अन्तर्गत ही था और इसी कारण बालक के लिए व्यावसायिक शिक्षा का केन्द्र होता था। आज भी परिवार के आश्रय, प्रयासों तथा सहयोग द्वारा ही बालक आत्मनिर्भर और स्वावलम्बी बनने की शिक्षा प्राप्त करता है।

परिवार : बालकों की प्रथम पाठशाला
(Family: Child’s First School)

विश्व के सभी शिक्षाशास्त्रियों ने बालक की शिक्षा के सन्दर्भ में परिवार के महत्त्व को एकमत से स्वीकार किया है। आदि काल से आज तक बालक की शिक्षा को श्रीगणेश घर-परिवार के आँगन से होता आया है।

और परिवार की शिक्षा ने ही सदैव उसके संस्कारों पर अमिट छाप छोड़ी है। बाल-मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्य के व्यक्तित्व, चरित्र, आचरण, व्यवहार, आदर्श एवं जीवन-मूल्यों का बीजारोपण उसकी शैशवावस्था में परिवार के माध्यम से होता है। मैजिनी कहते हैं, “बालक नागरिकता का सुन्दरतम् पाठ माता के चुम्बन और पिता के दुलार से सीखता है।” महात्मा गांधी की दृष्टि में, “बालक को प्रथम पाँच वर्षों में जो शिक्षा प्राप्त होती है वह फिर कभी नहीं मिलती।” मॉण्टेसरी विद्यालय को ‘बालघर’ (Children’s Home) मानते हुए शिशु शिक्षा में परिवार के वातावरण को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारक स्वीकार करते हैं। पेस्टालॉजी का स्पष्ट विचार है, “घर ही शिक्षा का सर्वोत्तम साधन और बालक का प्रथम विद्यालय है।”

इस भाँति, निष्कर्ष रूप में परिवार का वातावरण ही बालक का भविष्य निर्धारित करता है और कुल मिलाकर यह चित्र उभरता है कि परिवार बालकों की प्रथम पाठशाला है। इसी के समर्थन में बोगाईस के शब्द यहाँ उद्धृत करने योग्य हैं, “परिवार-समूह मानव की प्रथम पाठशाला है। प्रत्येक व्यक्ति की अनौपचारिक शिक्षा सामान्य रूप से परिवार में ही प्रारम्भ होती है। बालक की शिक्षा-प्राप्ति का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समय परिवार में ही व्यतीत होता है।”

प्रश्न 2.
परिवार के मुख्य शैक्षणिक कार्यों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
या
घर अथवा परिवार के शैक्षिक कार्यों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रसिद्ध विद्वान् ऑगबर्न तथा निमकॉफ ने परिवार के सात कार्य निर्धारित किए हैं-धार्मिक, 
आर्थिक, शैक्षिक, पारिवारिक स्थिति, प्रेम सम्बन्धी, रक्षा सम्बन्धी तथा मनोरंजन सम्बन्धी। उन्होंने इन कार्यों में शैक्षिक कार्यों को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना है। पारिवारिक शिक्षा के कुछ महत्त्वपूर्ण उद्देश्य एवं कार्य निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत स्पष्ट किए जा सकते हैं–

परिवार के मुख्य शैक्षणिक कार्य
(Main Educational Functions of Family)

1.शारीरिक विकास- शरीर का स्वास्थ्य और उसका समुचित विकास मनुष्य के जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। कहते हैं स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है। अतः बालक के शारीरिक स्वास्थ्य एवं विकास हेतु पौष्टिक, सन्तुलित भोजन तथा नियमित दिनचर्या को प्रबन्ध किया जाना चाहिए। परिवार बालक के शारीरिक विकास हेतु पौष्टिक भोजन, वस्त्र, मनोरंजन, व्यायाम, खेलकूद, उचित वातावरण, चिकित्सा और विश्राम आदि की व्यवस्था करता है। इसीलिए परिवार का पहला शैक्षिक उद्देश्य एवं कार्य बालक का शारीरिक विकास है।

2. मानसिक विकास- परिवार का वातावरण बालक की मानसिक शक्तियों, रुचियों और प्रवृत्तियों के निर्माण एवं विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि बालक की जिज्ञासा और कल्पना-शक्ति उसके मानसिक विकास की आधारशिला होती है। अत: परिवार का शैक्षिक दायित्व है कि वह यथोचित उत्तर के माध्यम से बालक की जिज्ञासा और उत्सुकता को शान्त करे, उनका दमन न करे। बौद्धिक विकास की दृष्टि से परिवार को भी चाहिए कि वह बालक को सर्वोत्तम एवं वांछित साहित्य सुलभ कराए। वस्तुतः बालक की निरीक्षण, परीक्षण, चिन्तन, कल्पना, विचार आदि मानसिक शक्तियों का प्रशिक्षण परिवार से ही शुरू हो जाता है।

3. भावात्मक एवं सांस्कृतिक विकास- गृह शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य एवं कार्य बालक का भावात्मक एवं सांस्कृतिक विकास है। बालक में घर की सफाई तथा सौन्दर्यकरण द्वारा कलात्मक विषयों के प्रति रुचि जाग्रत की जानी चाहिए। साहित्य, संगीत और कला आदि में विशेष रुचि रखने वाले परिवार के बालकों में भावात्मकःप्रवृत्तियाँ आवश्यक रूप से मिलती हैं। इसके अलावा प्रत्येक समाज की संस्कृति के पालन, संरक्षण तथा हस्तान्तरण का पहला और सार्थक कार्य परिवार के माध्यम से ही सम्भव है। परिवार में रहते हुए बालक सहज और अनजाने ही संस्कृति को ग्रहण कर लेता है। अत: बालक के भावात्मक एवं सांस्कृतिक विकास हेतु घर का वातावरण सदाचरण से युक्त होना चाहिए।

4.चारित्रिक एवं नैतिक विकास- बालक के चारित्रिक एवं नैतिक विकास की आधारशिला घर-परिवार में ही रखी जाती है। बालक में शुरू से ही अनुकरण करने की आदत होती है। अत: परिवार के सदस्यों का कर्तव्य है कि वे बालक में उत्तम चरित्र और नैतिक मूल्यों के निर्माण हेतु सत्य, न्याय, प्रेम, दया, उदारता, सहानुभूति, सहिष्णुता, शिष्टाचार तथा श्रद्धा की भावना जगाएँ। सच तो यह है कि बालक के नैतिक-चरित्र की रूपरेखा विद्यालय जाने से पूर्व छोटी अवस्था में घर पर ही बन जाती है। अतः गृह-शिक्षा के माध्यम से बालक के चारित्रिक एवं नैतिक विकास पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

5. धार्मिक शिक्षा- धार्मिक शिक्षा के अभाव में बालक का पूर्ण नैतिक-चरित्र विकसित नहीं हो सकता। एक धर्म-निरपेक्ष लोकतन्त्र परिवार के मुख्य शैक्षणिक कार्य होने के कारण हमारे देश में धार्मिक शिक्षा देने के लिए परिवार का शारीरिक विकास उत्तरदायित्व विशेष रूप से बढ़ गया है। घर में धर्म-ग्रन्थों को पढ़ने, मानसिक विकास धार्मिक कथाएँ सुनने, पूजा-अर्चना तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में भावात्मक एवं सांस्कृतिक सम्मिलित होने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं, जिसके फलस्वरूप विकास बालक का धर्म में विश्वास एवं आस्था दृढ़ होती है। पारिवारिक चारित्रिक एवं नैतिक विकास वातावरण से प्राप्त धार्मिक शिक्षा बालक को जीवन-पर्यन्त प्रभावित * धार्मिक शिक्षा । करती है। अतः परिवार को एक शैक्षिक उद्देश्य एवं कार्य धार्मिक आदत, रुचि एवं पसन्द का शिक्षा भी है। 

6. आदत, रुचि एवं पसन्द का विकास- बालक में सामाजिक भावना का विकास अच्छी-बुरी आदतों, रुचियों एवं पसन्दों का विकास परिवार में ही व्यावसायिक विकास होता है। घर के सदस्यों की आदतों को देखकर बालक अनजाने ही व्यक्तित्व का विकास उन्हें ग्रहण कर लेता है। घर की सुन्दर व आकर्षक वस्तुओं में उसकी रुचि अधिक होती है। इसी भाँति बालक की अलग-अलग चीजों के प्रति पसन्दगी या नापसन्दगी भी पारिवारिक वातावरण पर निर्भर करती है। अत: यह आवश्यक है कि अच्छी आदतों, रुचियों एवं पसन्दों के विकास हेतु अभिभावकगण अपने बच्चों के सम्मुख श्रेष्ठ उदाहरण ही प्रस्तुत करें।

7. सामाजिक भावना का विकास- परिवार एक छोटा-सा समाज है जो बालक को सामाजिक आदर्श एवं परम्पराओं के नमूने और आदर्श आचरण एवं व्यवहार के तरीके सिखाता है। परिवार के वातावरण में ही बालक को पहली बार सहयोग, सद्भावना, न्याय तथा अन्याय की अनुभूति होती है। स्पष्टतः परिवार ही बालक के सामाजिक जीवन का पहला शैक्षिक केन्द्र है, जहाँ उसमें अभीष्ट सामाजिक भावनाओं का विकास होता है।

8. व्यावसायिक विकास- गृह-शिक्षा का एक उद्देश्य एवं कार्य यह भी है कि वह बालक की व्यावसायिक रुचियों एवं अभिरुचियों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन कर उसे उचित व्यावसायिक निर्देशन प्रदान करे। वस्तुतः बालक की व्यावसायिक रुचियों व आकांक्षाओं की जितनी व्यापक जानकारी उसके परिवार के सदस्यों को हो सकती है, उतनी समाज की अन्य व्यावसायिक एवं प्रशिक्षण संस्थाओं को नहीं हो सकती। प्राचीनकाल में आयु बढ़ने के साथ-साथ बालके पैतृक व्यवसाय में हाथ बँटाकर प्रशिक्षण प्राप्त करता था और इस भाँति कुशलता प्राप्त कर लेता था।

9. व्यक्तित्व का विकास- बालक के व्यक्तित्व के शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक, धार्मिक, नैतिक तथा सामाजिक आदि विभिन्न पक्षों का विकास परिवार के बीच रहकर ही होता है। बचपन में पड़ने वाले अच्छे संस्कारों का प्रभाव स्थायी होता है और यह बालक के व्यक्तित्व को सन्तुलित एवं सुन्दर बनाता है। वस्तुतः गृह शिक्षा बालक के व्यक्तित्व के भावी विकास का स्वरूप एवं दिशा निर्धारित करती है।

इस भाँति घर या परिवार ही वह प्रथम स्थान है, जहाँ बालक जीवन की अनेकानेक शिक्षाएँ ग्रहण करता है। गृह-शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य एवं कार्य बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास है। रेमॉण्ट ने उचित  ही लिखा है, “सामान्य रूप से घर ही वह स्थान है जहाँ बालक अपनी माँ से चलना, बोलना, मैं और तुम में .. अन्तर करना और अपने चारों ओर की वस्तुओं के सरलतम गुणों को सीखता है।”

प्रश्न 3.
गृह-शिक्षा के मुख्य सिद्धान्तों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

गृह-शिक्षा के सिद्धान्त
(Principles of Home Education)

परिवार को शिक्षा का प्रभावशाली साधन बनाने के लिए निम्नलिखित सामान्य सिद्धान्तों पर विचार किया जा सकता है

1. शारीरिक विकास का सिद्धान्त- बालक के शारीरिक विकास का सीखने की क्रियाओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अभिभावकों को शरीर विज्ञान के सामान्य सिद्धान्तों का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए ताकि बालक के शारीरिक विकास की विभिन्न अवस्थाओं के अनुसार शिक्षा की समुचित व्यवस्था की जा सके। शरीर वैज्ञानिक मानते हैं कि बाल-जीवन के पहले 6 वर्षों में बच्चे के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। उसके सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार, व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, गृह-शिक्षा के सिद्धान्त स्वच्छ व हवादार आवास, चलने-फिरने, बोलने तथा व्यवहार के शारीरिक विकास का सिद्धान्त तौर-तरीकों पर भी ध्यान देना चाहिए। घर में बालक को शिक्षा देते समय शारीरिक विकास का सिद्धान्त अभिभावकों के लिए परमे। उपयोगी सिद्ध होता है।

2. बाल-मनोविज्ञान का सिद्धान्त- रूसो का कथन है, खेल द्वारा शिक्षा का सिद्धान्त बालक ऐसी पुस्तक है जिसे शिक्षक को आदि से अन्त तक पढ़ना पड़ता है। क्योंकि गृह-शिक्षा के सन्दर्भ में घर-परिवार के सदस्य ही शिक्षक की भूमिका निभाते हैं। अत: परिवार में माता-पिता और परिवार के अन्य वयस्क सदस्यों को बालमनोविज्ञान का ज्ञान अवश्य ही होना चाहिए। बाल-मनोविज्ञान के सिद्धान्त बालक की रुचियों, अभिरुचियों, आदतों, योग्यताओं, क्षमताओं, स्वभाव, भावनाओं तथा निर्माण आवश्यकताओं को समझने में अभिभावकों की भरपूर मदद करते हैं। इसके साथ ही, बाल-मनोविज्ञान का सिद्धान्त व्यावहारिक ज्ञान के सहज एवं स्वाभाविक विकास में योगदान देता है। वस्तुतः बालक की बुद्धि, मानसिक शक्तियों, प्रवृत्तियों तथा व्यक्तित्व की विशेषताओं के आधार पर ही उसकी शिक्षा की उचित व्यवस्था की जा सकती है।

3. बाल-केन्द्रित शिक्षा का सिद्धान्त-आधुनिक शिक्षा प्रणाली बाल-केन्द्रित शिक्षा के विचार पर आधारित है। इसका अभिप्राय यह है कि शिक्षा में अन्य तत्त्वों की अपेक्षा बालक को प्रमुखता दी जानी चाहिए। प्रायः अनुभव किया जाता है कि शिक्षा के सन्दर्भ में माता-पिता बालक की रुचि तथा अभिरुचि की अवहेलना कर अपनी ही इच्छा व आकांक्षा को थोपने का प्रयास करते हैं। इससे धन, शक्ति और समय का दुरुपयोग होता है। बाल-केन्द्रित शिक्षा का सिद्धान्त बालक की रुचि, योग्यता और सामर्थ्य के अनुसार ही उसकी शिक्षा के प्रबन्ध पर बल देता है। अतः अभिभावकों का कर्तव्य है कि वे अपने बच्चे को बाल-केन्द्रित शिक्षा के सिद्धान्त पर आधारित शिक्षा ही दिलाएँ।

4. क्रियाशीलता का सिद्धान्त- बच्चों में जन्म से और स्वभावतः क्रियाशीलता की प्रवृत्ति पायी जाती ” है। वे कभी भी शान्त होकर नहीं बैठते, हमेशा ही कुछ-न-कुछ करते रहते हैं। वस्तुत: बालक किसी काम को स्वयं करके शीघ्र और प्रभावशाली ढंग से सीख लेते हैं। अत: माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों की क्रियाशील प्रवृत्तियों का महत्त्व समझे और उनकी रचनात्मक क्रियाओं को अधिकाधिक प्रोत्साहित करें। क्रियाशीलता के परिणामस्वरूप बालक की अन्त:शक्तियों का प्रकाशन होता है। स्पष्टत: क्रियाशीलता का सिद्धान्त ‘स्वयं करके सीखने के विचार पर आधारित एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है।

5. खेल द्वारा शिक्षा का सिद्धान्त- “खेल” बालक द्वारा आनन्दपूर्वक की जाने वाली विभिन्न क्रियाओं का नाम है। यह बालक की एक सामान्य प्रवृत्ति है जो उसकी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के बीच सन्तुलन बनाती हुई उसके शारीरिक व मानसिक विकास में सहायता देती है। कर्मेन्द्रियों पर आधारित बालक की समस्त क्रियाशीलता का स्वतन्त्र अभिप्रकाशन खेल के माध्यम से होता है। निश्चय ही वह खेल के द्वारा। काफी कुछ सीखता है और अपनी रचनात्मक शक्तियों का विकास करता है। अभिभावकों को चाहिए कि वे घर-परिवार के अधिकांश कार्य बच्चों से खेल द्वारा कराएँ और इस भाँति उन्हें खेल-खेल में शिक्षित करने का प्रयास करें।

6. स्वतन्त्रता का सिद्धान्त-बालक के सन्तुलित व्यक्तित्व-निर्माण तथा स्वाभाविक व सर्वांगीण विकास की दृष्टि से उसे अपनी इच्छानुसार कार्य करने की स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए। इसके लिए परिवार में स्वतन्त्र वातावरण अपेक्षित है। बालक पर अनावश्यक एवं अनुचित बन्धन थोपने या अत्यधिक नियन्त्रण लगाने के फलस्वरूप उसमें हीनता की ग्रन्थियाँ बन जाती हैं और उसका व्यक्तित्व कुण्ठित हो जाता है। वह धीरे-धीरे उद्दण्ड और विद्रोही प्रकृति का बनकर अपने भावी जीवन को खराब कर लेता है। अत: गृह-शिक्षा के अन्तर्गत माता-पिता को बालकों की स्वतन्त्रता का समुचित ध्यान रखना चाहिए।

7. आत्मानुशासन का सिद्धान्त अनुशासन के सभी प्रकारों में आत्मानुशासन श्रेष्ठ है। आत्मानुशासन के अन्तर्गत बालक अपनी प्रवृत्तियों, इच्छाओं, क्रियाओं तथा निज के व्यवहार पर स्वयं ही नियन्त्रण रखने का प्रयास करते हैं। स्वशासन व स्वव्यवस्था का प्रशिक्षण मिलने पर वे आवश्यकतानुसार अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में सफलता प्राप्त करते हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार परिवार में माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को छोटी-छोटी गलतियों पर डाँटने या सजा देने के बदले उन्हें प्यार से समझाएँ। परिवार के क्रियाकलापों में बालकों का सहयोग लेने की दृष्टि से उन्हें जिम्मेदारी के कुछ कार्य भी सौंपे जाने चाहिए।

8. सहानुभूति का सिद्धान्त- घर में अभिभावकों को सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार बच्चों को अपने माता-पिता के अधिक निकट लाता है। अतः बालक के प्रति घर के सदस्यों का व्यवहार हमेशा ही सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए। माता-पिता से भयभीत और अलग रहने वाले बच्चे अपने कष्टों और कठिनाइयों को उनके सामने रखने से सकुचाते हैं और परिणामस्वरूप मानसिक उलझनों व ग्रन्थियों के शिकार हो जाते हैं। सहानुभूति का सिद्धान्त बात-बात पर बच्चों को अपमानित या लांछित करने का विरोधी और उन्हें अधिकाधिक लाड़-प्यार एवं स्नेह देने का प्रबल समर्थक है।

9. निष्पक्ष व्यवहार का सिद्धान्त- माता-पिता को घर के सभी बच्चों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए। पक्षपातपूर्ण व्यवहार का बालक के व्यक्तित्व एवं मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा और प्रतिकूल असर पड़ता है। आवश्यक रूप से घर के प्रत्येक बच्चे के अच्छे कार्यों की प्रशंसा की जाए और सभी बच्चों को समान महत्त्व प्रदान किया जाए। घर के किसी बच्चे के साथ असमान व्यवहार करने में वह स्वयं को हीन एवं उपेक्षित समझने लगता है, जिससे उसके व्यक्तित्व का सही विकास रुक जाता है। स्पष्टत: अभिभावकों का परम कर्तव्य है कि वे बच्चों के साथ पक्षपातरहित व्यवहार करें।

10. उत्तम चरित्र एवं आदतों का निर्माण- मनोवैज्ञानिकों एवं शिक्षाशास्त्रियों का मत है कि बालक सदैव अनुकरण से सीखते हैं। परिवार के सदस्यों को देखकर वे अच्छी और बुरी आदतों का अनुकरण करते हैं। बालक के चरित्र व आदतों में ही उसके भविष्य की सफलता का रहस्य छिपा है। अत: माता-पिता को यह ध्यान रखना चाहिए कि बालक में उत्तम चरित्र और श्रेष्ठ आदतों का निर्माण हो। इसके लिए बालकों के समक्ष परिवार में नैतिकता, सदाचार, स्वच्छता तथा सामाजिक जीवन के आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किए जाएँ।

प्रश्न 4.
गृह-शिक्षा के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

गृह-शिक्षा की विधियाँ
(Methods of Home Education)

घर-परिवार को शिशु की प्रथम पाठशाला माना जाता है। घर पर रहकर ही शिशु हर प्रकार का प्रारम्भिक ज्ञान प्राप्त करता है। स्पष्ट है कि बच्चे की शिक्षा में घर-परिवार द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जाती है। अब प्रश्न उठता है कि गृह-शिक्षा को सुचारु एवं उत्तम बनाने के लिए किन विधियों को अपनाया जाता है। गृह-शिक्षा के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

1. खेल-विधि-गृह- शिक्षा में खेलों का विशिष्ट स्थान है। खेलों में बालक की जन्मजात एवं सहज रुचि होती है। खेल द्वारा आत्म-प्रकाशन का उचित अवसर मिलता है और इसके माध्यम से बच्चे अपनी सृजनात्मक प्रवृत्तियों तथा क्षमताओं का अधिकतम अभिप्रकाशन कर सकते हैं। यही नहीं, खेल बालक के. समाजीकरण का प्रभावशाली साधन भी हैं। खेल में बालक पास-पड़ोस के बच्चों के सम्पर्क में आता है और उनसे अच्छी-अच्छी बातें सीखता है। खेलों द्वारा दी गई शिक्षा सरल एवं स्वाभाविक होती है।

अतः शुरू से ही घर के बच्चों को खेल-विधि द्वारा शिक्षा देने का अधिकाधिक प्रयास करना चाहिए। माता-पिता का दायित्व है। कि वे अपने परिवार में भाँति-भाँति के खेलों का आयोजन कर बच्चों को खेलने के लिए प्रोत्साहित करें। एक ओर जहाँ खेलों द्वारा बालक को मौलिकता, सहयोग, सद्भाव, भाई-चारा, परोपकार तथा आत्मनिर्भरता की शिक्षा दी जा सकती है, वहीं दूसरी ओर परिवार में खेल के माध्यम से कहानियाँ, इतिहास, वर्णमाला तथा गिनती का ज्ञान भी आसानी से कराया जा सकता है। आजकल शिशुओं को मॉण्टेसरी व किण्डरगार्टन शिक्षा-पद्धतियों द्वारा मनोवैज्ञानिक आधार पर खेल-विधि द्वारा ही उत्तम शिक्षा दी जाती है।

2. कहानी-विधि-छोटे बच्चे कहानी सुनना पसन्द करते हैं। कहानी के माध्यम से उनकी कल्पना, विचार एवं तर्क-शक्ति का विकास होता है। पुराने जमाने से ही बड़े-बड़े लोग घर के बच्चों को धार्मिक, पौराणिक तथा शिक्षाप्रद कहानियाँ सुनाते आए हैं जो बालक के ज्ञान, गह-शिक्षा की विधियाँ सामाजिक व नैतिक गुणों के विकास में मदद देती हैं। कहानियाँ छोटी, रोचक और आयु के अनुसार होनी चाहिए।

3. अभ्यास-विधि-सीखने में अभ्यास का विशेष महत्त्व है।” अभ्यास-विधि बालक को कोई क्रिया सिखाने के लिए उसे बार-बार करने का अवसर देना चाहिए। इस भाँति निरन्तर अभ्यास द्वारा बालक के मानसिक विचार दृढ़ एवं स्थायी हो जाते हैं। अभ्यास-विधि केइन्द्रिय-प्रशिक्षण-विधि अन्तर्गत एक ही क्रिया को दोहराने में बालक को आनन्द आता है और वह उस कार्य को अच्छी प्रकार से सीख लेता है। गणित एवं संगीत की शिक्षा में अभ्यास-विधि अतीव उपयोगी सिद्ध हुई है। इसके अलावा मन्द बुद्धि बालकों के लिए इसे सर्वोत्तम विधि माना गया है।

4. साहचर्य-विधि-साहचर्य-विधि के अन्तर्गत बालक की “ शिक्षा-सम्बन्धी क्रियाओं को उसके ‘आनन्दमयपूर्व अनुभवों से सम्बन्धित किया जाता है। किसी कार्य को सीखने के लिए उसके प्रति बालक की रुचि जाग्रत होना आवश्यक है और आनन्ददायक कार्य या अनुभव में बालक की रुचि होना स्वाभाविक है। अत: साहचर्य विधि द्वारा बालक कार्य में रुचि प्रदर्शित कर उसे आसानी से सीख लेते हैं। बालक में सहयोग, भाईचारा, अनुशासन तथा सामाजिक गुणों का विकास करने हेतु यह विधि अत्यन्त उपयोगी है। वस्तुत: घर-परिवार में बालक साहचर्य द्वारा बहुत-से अच्छे कार्य सीख लेता है।

5. उत्तरदायित्व-विधि-जैसे- जैसे बच्चा बड़ा और समझदार होता जाता है, कहे गए कार्य को पूरा करने में आनन्द अनुभव करने लगता है। जिम्मेदारी या उत्तरदायित्व की भावना बालक में उत्साह, आत्मविश्वास तथा कार्यकुशलता का विचार जाग्रत करती है। माता-पिता को चाहिए कि वे उपयुक्त अवसर जानकर बालक को छोटे-मोटे कार्य की जिम्मेदारी अवश्य सौंपे। जिम्मेदारी के काम को बालक अविलम्ब और प्रभावशाली ढंग से सफलतापूर्वक करने का प्रयास करता है। कार्य की सफलता उसे अभिप्रेरित करती है। गृह-शिक्षा के दौरान बच्चे को पहले छोटे और शनैः-शनै: बड़े कार्यों का उत्तरदायित्व सौंपना अत्यन्त हितकर ,

6. इन्द्रिय-प्रशिक्षण-विधि- बालक की ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों का उसकी शिक्षा में विशेष योगदान रहता है। बालक को बाह्य जगत् की जानकारी ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से ही मिलती है। ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान का प्रवेश द्वार कहलाती हैं और इनकी कार्यकुशलता से वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है। यही कारण है कि मनोवैज्ञानिक तथा शिक्षाशास्त्री बालक को शुरू से ही दृष्टि, स्पर्श, श्रवण, स्वाद तथा घ्राण सम्बन्धी ज्ञानेन्द्रियों का विशिष्ट प्रशिक्षण देने का परामर्श देते हैं। बालक की कर्मेन्द्रियों का विकास भी बालपन की आरम्भिक स्थिति से होना चाहिए। भाँति-भाँति की शैक्षिक प्रविधियों को प्रयोग कर बालक को शारीरिक अंगों को मस्तिष्क से सन्तुलन सिखाया जाए। इसके अलावा परिवार में विविध रंग तथा ध्वनि वाले खिलौने और शैक्षिक उपकरण होने आवश्यक हैं, जिनकी सहायता से बालक की ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों के बीच मधुर सामंजस्य स्थापित किया जा सके।

7. निर्देश-विधि- बालक को कुछ जीवनोपयोगी बातों; जैसे-सदैव सत्य बोलना, बड़ों की आज्ञा मानना, सभी का आदर करना, चोरी न करना आदि का सीधे-सीधे निर्देश देना पड़ता है। माता-पिता यदि अच्छी बातों व आदर्श कार्यों को करने का बच्चों को निर्देश देंगे तो बच्चे अवश्य ही अनुकूल व्यवहार करेंगे। अत: गृह-शिक्षा में निर्देश विधि भी अत्यन्त उपयोगी है।

8.करके सीखने की विधि- जब बच्चे अपनी रुचि के अनुकूल कार्य को स्वयं करते हैं तो वे न केवल अधिक अच्छा महसूस करते हैं, बल्कि उत्साहित भी होते हैं। स्वयं या परिवार से सम्बन्धित सामान्य समस्याओं को अपने निजी प्रयास से हल करने से बालकों में आत्मविश्वास तथा अभिप्रेरणा का विकास होता है। उनमें प्रतिदिन अच्छे कार्य करने की आदत पड़ती है और वे अधिकांश कार्य सीख जाते हैं। अत: परिवार में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न की जानी चाहिए, जिससे बालक स्वयं कार्य करके सीखने के लिए प्रेरित हो सके।

9. भाषा द्वारा शिक्षा- भाषा गृह-शिक्षा की एक महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी विधि है। भाषा द्वारा भावनाओं को अभिव्यक्ति मिलती है। बच्चे विभिन्न ध्वनियों द्वारा अपने भावों को अभिव्यक्त करते हैं। यही नहीं, वे ध्वनि सुनकर उत्तेजित भी होते हैं और लगातार शब्दों की ध्वनि सुनकर पुन: उसके अनुकरण का प्रयत्न करते हैं। वास्तव में बच्चों को भाषा का ज्ञान अनुकरण द्वारा ही होता है। माता-पिता बच्चे के सम्मुख बहुत-से शब्द उच्चारित करते हैं, जिनका अनुकरण करके वह शुद्ध बोलना सीखता है। कुछ समय तक अभ्यास करके बालक का भाषा के बोलने व लिखने पर अधिकार हो जाता है। स्पष्टतः भाषा द्वारा शिक्षा परिवार के सदस्य ही प्रदान करते हैं।

10. संगीत द्वारा शिक्षा- बच्चे विशेषतः संगीत की ओर आकर्षित होते हैं और इसके परिणामस्वरूप उनके भाषा-ज्ञान में पर्याप्त वृद्धि होती है। प्रयोगों द्वारा ज्ञात हुआ है कि भाव-गीतों के साथ-साथ अभिनय से बालक का शारीरिक, मानसिक व सांवेगिक विकास होता है। किसी विषय-वस्तु को गीत रूप में याद करने में वह जल्दी ही याद हो जाती है। यही कारण है कि प्राइमरी स्तर पर शिशुओं को वर्णमाला, गिनती या पहाड़ों का ज्ञान गीतों के माध्यम से कराया जाता है। फ्रॉबेल ने अपनी किण्डरगार्टन प्रणाली में गीतों को उल्लेखनीय स्थान प्रदान किया है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बालक की शिक्षा में घर-परिवार के योगदान को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

बालक की शिक्षा में घर-परिवार का योगदान
(Contribution of Family in Child’s Education)

बालक की शिक्षा की प्रक्रिया घर-परिवार से ही प्रारम्भ होती है। शिक्षा अपने आप में एक अत्यधिक व्यापक एवं बहुपक्षीय प्रक्रिया है। शिक्षा की प्रक्रिया के प्रत्येक पक्ष में घर-परिवार का सर्वाधिक योगदान है। सर्वप्रथम हम कह सकते हैं कि बालक को भाषा का ज्ञान परिवार द्वारा ही प्रदान किया जाता है। भाषा का ज्ञान औपचारिक शिक्षा अर्जित करने के लिए अनिवार्य शर्त है। शिक्षा के लिए शिष्टाचार एवं अच्छी आदतों की भी आवश्यकता होती है। परिवार इस कार्य में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परिवार ही बालक की आदतों, रुचियों एवं कुछ अभिवृत्तियों के विकास में आधारभूत योगदान प्रदान करता है। शिक्षा के लिए बालक का शारीरिक, मानसिक, भावात्मक एवं सांस्कृतिक विकास भी आवश्यक होता है।

विकास के इन विभिन्न पक्षों में घर-परिवार का उल्लेखनीय योगदान होता है। शिक्षा का एक पक्ष व्यावसायिक शिक्षा भी है। बालक की व्यावसायिक शिक्षा में भी घर-परिवार द्वारा महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान किया जाता है। पारम्परिक रूप से प्रत्येक परिवार का कोई-न-कोई पारिवारिक व्यवसाय होता था। इस दशा में परिवार के बालक स्वाभाविक रूप से ही अपने पारिवारिक व्यवसाय के प्रति उन्मुख हो जाते थे तथा उन्हें परिवार में अपने व्यवसाय का प्रशिक्षण प्राप्त हो जाता था। आज भी परिवार का वातावरण बालक के व्यवसाय-वरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इन सबके अतिरिक्त यह भी सत्य है कि बालक की सम्पूर्ण औपचारिक शिक्षा की व्यवस्था में भी परिवार का विशेष योगदान होता है।

प्रश्न 2.
घर को शिक्षा का पभावशाली अभिकरण कैसे बनाया जा सकता है?
उत्तर:
निःसन्देह घर-परिवार बालक की शिक्षा का एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण अभिकरण है। शिक्षा के इस अभिकरण को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए कुछ बातों को ध्यान में रखना अति आवश्यक है। सर्वप्रथम घर-परिवार को चाहिए कि वह बालक के शारीरिक, मानसिक, भावात्मक, सांस्कृतिक चारित्रिक एवं नैतिक विकास पर समुचित ध्यान दें। इसके लिए हरै सँम्भव उपाय किया जाना चाहिए। परिवार द्वारा बच्चों को समुचित धार्मिक शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए। परिवार को बच्चों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास का ध्यान रखना चाहिए। इसके साथ-ही-साथ घर-परिवार को विद्यालय के साथ पूर्ण सहयोग रखना चाहिए। वास्तव में परिवार द्वारा शिक्षा की प्रक्रिया को प्रारम्भ किया जाता है तथा विद्यालय द्वारा उसे विस्तृत रूप दिया जाता है। इस स्थिति में परिवार का सहयोग अति उपयोगी सिद्ध होता है। यदि परिवार द्वारा इन सब बातों को ध्यान में रखा जाता है तो निश्चित रूप से घर-परिवार बालक की शिक्षा का एक अधिक प्रभावशाली अभिकरण बन सकता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. स्पष्ट कीजिए कि परिवार ही बालक की शिक्षा की प्राचीनतम संस्था है।
उत्तर:
परिवार बालक की शिक्षा की प्राचीनतम संस्था है। आदिम काल में जब सभ्यता का कुछ भी विकास नहीं हुआ था तब भी बालक को प्रशिक्षित करने का कार्य परिवार द्वारा ही किया जाता था। बच्चों को शिकार करने, कन्द-मूल खोजने, शत्रु से मुकाबला करने के दाँव-पेंच परिवार द्वारा ही सिखाए जाते थे। वर्तमान विद्यालयों के विकास से पूर्व भी हर प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था परिवार द्वारा ही की जाती थी। स्पष्ट है कि परिवार ही बालक की शिक्षा की प्राचीनतम संस्था है।

प्रश्न 2.
बच्चों को शिक्षित करने के दृष्टिकोण से उनके प्रति माता-पिता का व्यवहार कैसा होना 
चाहिए?
उत्तर:
माता-पिता का एक मुख्य दायित्व है:-बच्चों को उचित ढंग से शिक्षित करना तथा शिक्षा की 
ओर उन्मुख करना। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए माता-पिता को बच्चों के प्रति सदैव सन्तुलित एवं निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए। माता-पिता को अपने बच्चों की रुचि, योग्यता एवं क्षमता आदि को जानने का प्रयास करना चाहिए तथा उन्हीं के अनुसार बच्चों को शिक्षित करने का प्रयास करना चाहिए। साथ ही बच्चों की क्षमताओं एवं रुचियों को उचित दिशा में विकसित करने के भी प्रयास करने चाहिए। परिवार का कोई बच्चा यदि दुर्भाग्यवश किसी क्षेत्र में पिछड़ा हुआ हो तो उस बालक के प्रति विशेष ध्यान देना चाहिए। उसकी अवहेलना नहीं की जानी चाहिए तथा उनके प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को सदैव आवश्यक प्रोत्साहन प्रदान करते रहे। इसके अतिरिक्त यह भी आवश्यक है। कि बच्चों को समुचित स्वतन्त्रता प्रदान करके अनुशासन में रहना सिखाया जाए।

प्रश्न 3.
स्पष्ट कीजिए कि बच्चों में मानवीय मूल्यों के विकास में परिवार का सर्वाधिक योगदान होता है।
उत्तर:
बच्चों में मानवीय मूल्यों की स्थापना में परिवार का सर्वाधिक योगदान होता है। बच्चा अपने पिता से न्याय, माता से नि:स्वार्थ प्रेम तथा भाई-बहनों से भ्रातृत्व-भाव की शिक्षा लेता है। जब बच्चा बड़ा होकर समझदार बनता है तो वह अपने परिवारजनों को परस्पर सहयोग देते हुए देखता है। वह इन सभी से सहयोग की शिक्षा ग्रहण करता है। बच्चा अपने घर में ही क्षमा, सच्चाई, सहानुभूति, उदारता तथा परिश्रम के महत्त्व को समझता है। इसके अतिरिक्त बच्चे अपने परिवार से ही परोपकार के मूल्य को सीखते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि बच्चों के मानवीय मूल्यों का सर्वाधिक विकास परिवार के द्वारा ही होता है।

प्रश्न 4.
गृह-शिक्षा की मुख्य विधियाँ कौन-कौन सी हैं ?
उत्तर:
घर बच्चों की शिक्षा की महत्त्वपूर्ण संस्था है। घर एवं परिवार द्वारा बच्चों की शिक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती है। इस स्थिति में गृह-शिक्षा के अन्तर्गत विभिन्न विधियों को अपनाया जाता है। गृह-शिक्षा के लिए अपनाई जाने वाली मुख्य विधियाँ अग्रलिखित हैं

  • खेल-विधि।
  • कहानी-विधि।
  • अभ्यास-विधि।
  • साहचर्य-विधि।
  • उत्तरदायित्व-विधि।
  • इन्द्रिय-प्रशिक्षण-विधि।
  • निर्देश-विधि।
  • करके सीखने की विधि।
  • भाषा द्वारा शिक्षा।
  • संगीत द्वारा शिक्षा।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बच्चे की शिक्षा की प्रक्रिया सर्वप्रथम किस संस्था द्वारा प्रारम्भ होती है ?
उत्तर:
बच्चे की शिक्षा की प्रक्रिया सर्वप्रथम परिवार नामक संस्था द्वारा प्रारम्भ होती है।

प्रश्न 2.
बालक की प्रथम पाठशाला कौन-सी है? ।
उत्तर:
बालक की प्रथम पाठशाला घर-परिवार है।

प्रश्न 3.
“परिवार समूह ही प्रथम मानवीय विद्यालय है, परिवार में प्रत्येक व्यक्ति की अनौपचारिक शिक्षा सामान्यतया आरम्भ होती है। बालक का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समय परिवार में ही बीतता है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
बोगास का।

प्रश्न 4.
“माताएँ आदर्श अध्यापिकाएँ हैं और घर द्वारा दी जाने वाली अनौपचारिक शिक्षा सबसे अधिक प्रभावशाली और स्वाभाविक है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन फ्रॉबेल का है।

प्रश्न 5.
आपके मतानुसार बच्चों के शिक्षण की प्राचीनतम संस्था कौन-सी है ?
उत्तर:
बच्चों के शिक्षण की प्राचीनतम संस्था परिवार है।

प्रश्न 6.
बच्चों के सामान्य विकास तथा व्यावहारिक शिक्षा में सर्वाधिक योगदान किसका होता है?
उत्तर:
बच्चों के सामान्य विकास तथा व्यावहारिक शिक्षा में सर्वाधिक योगदान परिवार का ही होता है।

प्रश्न 7.
“बालक नागरिकता का सुन्दरतम पाठ माता के चुम्बन और पिता के दुलार से सीखता है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन मैजिनी का है। प्रश्न 8 आपके विचार से गृह-शिक्षा किस प्रकार की होनी चाहिए? उत्तर हमारे विचार से गृह-शिक्षा बाल-केन्द्रित होनी चाहिए।

प्रश्न 9.
बच्चों को उत्तरदायित्व वहन करने की शिक्षा किस प्रकार से दी जा सकती है?
उत्तर:
बच्चों को छोटे-छोटे घरेलू कार्य सौंपकर उत्तरदायित्व वहन करने की शिक्षा प्रदान की जा सकती है।

प्रश्न 10.
गृह-शिक्षा के अन्तर्गत बच्चे विभिन्न कार्यों को सर्वाधिक किस विधि द्वारा सीखते हैं ?
उत्तर:
गृह-शिक्षा के अन्तर्गत बच्चे विभिन्न कार्यों को करना सर्वाधिक अनुकरण विधि द्वारा सीखते हैं।

प्रश्न 11.
बच्चों के नैतिक विकास के लिए गृह-शिक्षा के अन्तर्गत किस विधि को अपनाना चाहिए?
उत्तर:
कहानी विधि को अपनाकर बच्चों का समुचित नैतिक विकास किया जा सकता है।

प्रश्न 12.
परिवार बच्चे को शिक्षा देता है—
(i) औपचारिक,
(i) अनौपचारिक।
उत्तर:
परिवार बच्चे को अनौपचारिक शिक्षा देता है।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. गृह बच्चों की प्रथम पाठशाला है।
  2. गृह शिक्षा का एक औपचारिक अभिकरण है।
  3. परिवार बच्चों की शिक्षा का एक निष्क्रिय अभिकरण है।
  4. बालक का समाजीकरण परिवार में नहीं होता है।
  5. बालक के व्यक्तित्व पर सबसे अधिक प्रभाव माता का पड़ता है।

उत्तर:

  1. सत्य,
  2. असत्य,
  3. असत्य,
  4. असत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-
प्रश्न 1.
बालक की शिक्षा का मुख्यतम अनौपचारिक अभिकरण है
(क) मित्र-मण्डली
(ख) परिवार
(ग) पास-पड़ोस
(घ) धार्मिक स्थल

प्रश्न 2.
गृह यो परिवार शिक्षा के किस अभिकरण के उदाहरण हैं?
(क) औपचारिक अभिकरण
(ख) अनौपचारिक अभिकरण
(ग) सक्रिय अभिकरण
(घ) निष्क्रिय अभिकरण

प्रश्न 3.
बालक के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावात्मक तथा सांस्कृतिक विकास में सर्वाधिक योगदान किया जाता है
(क) प्राथमिक विद्यालय द्वारा
(ख) मित्रों एवं साथियों द्वारा
(ग) परिवार द्वारा।
(घ) राज्य द्वारा

प्रश्न 4.
गृह अथवा परिवार का शैक्षिक दायित्व या कार्य नहीं है
(क) दैनिक जीवन से सम्बन्धित शिक्षा प्रदान करना
(ख) शारीरिक, मानसिक एवं धार्मिक विकास में योगदान देना।
(ग) शैक्षिक योग्यता एवं अर्जित ज्ञान का प्रमाण-पत्र प्रदान करना
(घ) उपर्युक्त सभी कार्य

प्रश्न 5.
बच्चों को अनौपचारिक शिक्षा प्रदान करते समय अभिभावकों को ध्यान रखना चाहिए
(क) बच्चों को न तो कठोर अनुशासन में रखना चाहिए और न ही पूर्ण स्वतन्त्रता देनी चाहिए
(ख) शिक्षा सदैव बच्चों की रुचि, योग्यता तथा क्षमता के अनुसार हो
(ग) परिवार को बच्चों के प्रति कोई पक्षपात या पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए
(घ) उपर्युक्त सभी बातें.

प्रश्न 6.
परिवार द्वारा बच्चों को दी जाती है
(क) आज्ञापालन एवं कर्तव्यपालन की शिक्षा
(ख) सहयोग एवं अन्य सद्गुणों की शिक्षा
(ग) शारीरिक स्वास्थ्य के नियमों की शिक्षा
(घ) उपर्युक्त सभी प्रकार की शिक्षा

प्रश्न 7.
गृह-शिक्षा के लिए अपनाई जाती है
(क) अनुकरण विधि
(ख) निर्देश विधि
(ग) उत्तरदायित्व विधि
(घ) उपर्युक्त सभी विधियाँ

प्रश्न 8.
गृह-शिक्षा की उस विधि को क्या कहते हैं जिसके अन्तर्गत बालक परिवार के अन्य सदस्यों को देखकर किसी कार्य को करना सीख लेते हैं?
(क) अभ्यास विधि
(ख) निर्देश विधि।
(ग) उत्तरदायित्व विधि
(घ) अनुकरण विधि

प्रश्न 9.
“घर ही शिक्षा का सर्वोत्तम साधन और बालक का प्रथम विद्यालय है।”यह कथन किसका है?
(क) पेस्टालॉजी
(ख) बोगास
(ग) फ्रॉबेल
(घ) महात्मा गांधी

प्रश्न 10.
समाज की कौन-सी प्रथम शिक्षा संस्था है?
(क) पुस्तकालय
(ख) गृह
(ग) विद्यालय
(घ) संग्रहालय

उत्तर:

  1. (ख) परिवार,
  2. (ख) अनौपचारिक अभिकरण,
  3. (ग) परिवार द्वारा,
  4. (ग) शैक्षिक योग्यता एवं अर्जित ज्ञान का प्रमाण-पत्र प्रदान करना,
  5. (घ) उपर्युक्त सभी बातें,
  6. (घ) उपर्युक्त सभी प्रकार की शिक्षा,
  7. (घ) उपर्युक्त सभी विधियाँ,
  8. (घ) अनुकरण विधि,
  9. (क) पेस्टालॉजी,
  10. (ख) गृह।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 5 Agencies of Education

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 5
Chapter Name Agencies of Education (शिक्षा के अभिकरण)
Number of Questions Solved 36
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 5 Agencies of Education (शिक्षा के अभिकरण)

विस्तृत उत्तरीय प्रज

प्रश्न 1.
शिक्षा के अभिकरण (साधन) से क्या आशय है ? शिक्षा के अभिकरणों का एक व्यवस्थित
या
वर्गीकरण प्रस्तुत करते हुए औपचारिक तथा अनौपचारिक अभिकरणों का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
शिक्षा के औपचारिक साधन कौन-कौन से हैं?
या
शिक्षा के ‘औपचारिक’ एवं ‘अनौपचारिक’ अभिकरण का क्या तात्पर्य है?
या
शिक्षा के अनौपचारिक साधन कौन-कौन से हैं?
या
‘शिक्षा के अभिकरणों (साधनों) का वर्गीकरण’ पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:

शिक्षा के अभिकरण (या साधन) का अर्थ
(Meaning of the Agencies of Education)

प्राचीनकाल से ही समाज ने शिक्षा को क्रियान्वित करने के लिए अर्थात् यथार्थ में लागू करने के लिए विभिन्न संस्थाओं को अपनाकर उनका विकास किया है, इन्हीं संस्थाओं या माध्यमों को शिक्षा के अभिकरण (या साधन) कहा जाता है। अभिकरण या साधन अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘Agency’ का हिन्दी रूपान्तर है जो स्वयं Agent’ से बना है। ‘Agent’ का अर्थ ‘प्रतिनिधि’ या कार्यकर्ता’ या ‘साधन’ है। वस्तुतः ‘Agent’ से हमारा अभिप्राय उस व्यक्ति या संस्था से होता है जो कोई कार्य करता है या प्रभाव डालता है।

शिक्षा के अभिकरण या साधन के अन्तर्गत वे सभी तत्त्व, कारक, स्थान अथवा संस्थाएँ आ जाती हैं जो किसी-न-किसी प्रकार से शिक्षा प्रदान करती हैं या बालक को सीखने में सहायता देती हैं। सर गॉडफ्रे थामसन के अनुसार, “व्यापक अर्थ में सम्पूर्ण वातावरण व्यक्ति की शिक्षा का साधन है, पर इस वातावरण में कुछ तत्त्व अधिक महत्त्वपूर्ण हैं; जैसे–घर, विद्यालय, चर्च, प्रेस, व्यवसाय, सार्वजनिक जीवन, मनोरंजन और प्रिय कार्य।” शिक्षा के अभिकरणों की विविधता या अनेकता को स्पष्ट करते हुए रेमॉण्ट ने लिखा है, “अध्यापक ही केवल शिक्षक नहीं होता, केवल स्कूल या कॉलेज ही शिक्षण संस्थाएँ नहीं हैं, वरन् ऐसी कई अन्य संस्थाएँ हैं, जिनका प्रभाव शैक्षिक होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शिक्षा की प्रक्रिया में सहयोग देने वाले समस्त कारक शिक्षा के अभिकरण ही हैं।

शिक्षा के साधनों का वर्गीकरण
(Classification of the Agencies of Education)

शिक्षा के समस्त अभिकरणों या साधनों को सामान्य रूप से चार वर्गों में विभक्त किया जा सकता है

  • शिक्षा के औपचारिक साधन,
  • शिक्षा के अनौपचारिक साधन,
  • शिक्षा के सक्रिय साधन तथा
  • शिक्षा के निष्क्रिय साधन।।

शिक्षा के औपचारिक साधन
(Formal Agencies of Education)

शिक्षा के औपचारिक साधनों को सविधिक साधन भी कहते हैं। ये वे साधन हैं जो समाज द्वारा निर्मित तथा विशेष रूप से शिक्षा हेतु निर्धारित एवं निर्दिष्ट किए जाते हैं। औपचारिक साधनों द्वारा शिक्षा का कार्य एक निश्चित योजना के अनुसार होता है। इनका प्रयोग बालक के आचरण को रूपान्तरित करने के लिए किया जाता है। इनके निश्चित नियम होते हैं और इनकी देखभाल भी प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा की जाती है। शिक्षा सम्बन्धी सभी कार्यक्रम; जैसे-उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधि, नियम तथा व्यवस्था आदि की योजना पहले से ही तैयार कर ली जाती है।
ब्राउन ने अपनी पुस्तक ‘शिक्षा-समाजशास्त्र में शिक्षा के निम्नलिखित औपचारिक साधन बताए हैं–

  • स्कूल या विद्यालय,
  • पुस्तकालय तथा वाचनालय,
  • संग्रहालय,
  • धार्मिक संस्थाएँ,
  • कला-वीथिकाएँ तथा
  • व्यायामशाला।।

शिक्षा के अनौपचारिक साधन
(Informal Agencies of Education)

शिक्षा के अनौपचारिक साधनों को अविधिक साधन भी कहा जाता है। ये वे साधन हैं जिनकी न तो कोई पूर्व-निर्धारित योजना होती है और न ही कोई सुनिश्चित नियम। इनमें विधिपूर्वक प्रवेश लेना आवश्यक नहीं होता और इनका कोई निश्चित पाठ्यक्रम भी नहीं होता। अनौपचारिक साधन बालक के आचरण का रूपान्तरण करते हैं, लेकिन यहाँ रूपान्तरण की प्रक्रिया अज्ञात, अप्रत्यक्ष व अनौपचारिक होती है। इस प्रकार ये साधन बालक को अप्रत्यक्ष तथा अज्ञात रूप से प्रभावित करते हैं। अनौपचारिक अभिकरण निजी क्रियाओं द्वारा स्वाभाविक रूप से शिक्षा प्रदान करने का कार्य करते हैं। शिक्षा के अनौपचारिक साधन निम्न प्रकार हैं

  1. घर एवं परिवार,
  2. खेल समुदाय,
  3. समाज तथा राज्य,
  4. व्यावसायिक साधन–
    • प्रेस,
    • आकाशवाणी (रेडियो),
    • दूरदर्शन (टी० बी०),
    • चलचित्र तथा
    • पत्र-पत्रिकाएँ।
  5. अव्यावसायिक साधन-
    • खेल-संघ,
    • सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएँ,
    • राजनीतिक संस्थाएँ,
    • प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र,
    • बालचर तथा गर्ल्स गाइड और
    • यात्राएँ।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिक्षा के औपचारिक साधनों या अभिकरणों के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा के औपचारिक साधनों या

अभिकरणों के गुण-दोष
(Merits and Demerits of Formal Means of Education)

शिक्षा के औपचारिक साधनों या अभिकरणों के मुख्य गुण-दोष निम्नलिखित हैंगुण-

  1. औपचारिक अभिकरणों द्वारा प्रदान की जाने वाली शिक्षा लक्ष्यों के अनुसार होती है।
  2. औपचारिक अभिकरणों के अन्तर्गत शिक्षण-प्रक्रिया को पूर्व निश्चित योजनाओं के अनुसार सम्पन्न किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप शिक्षा सुनिश्चित तथा अत्यन्त प्रभावशाली होती है।
  3. शिक्षा के औपचारिक साधनों द्वारा कम समय में उत्तम शिक्षा प्रदान की जाती है। शिक्षा के ये साधन प्रत्यक्ष रूप से बालक के व्यक्तिगत स्वभाव को प्रभावित करते हैं।
  4. शिक्षा के औपचारिक अभिकरणों के गुणों को स्पष्ट करते हुए जॉन डीवी ने कहा है, “औपचारिक शिक्षा के बिना जटिल समाज के साधनों और उपलब्धियों को हस्तान्तरित करना सम्भव नहीं है। यह एक ऐसे अनुभव की प्राप्ति का द्वार खोलता है, जिसको बालक दूसरों के साथ रहकर अनौपचारिक शिक्षा द्वारा प्राप्त नहीं कर सकता।”
  5. वर्तमान समय में औपचारिक अभिकरणों द्वारा प्रदान की गई शिक्षा को ही प्रामाणिक शिक्षा माना जाता है तथा इन अभिकरणों द्वारा प्रदान किए गए प्रमाण-पत्र को ही योग्यता का एकमात्र प्रमाण माना जाता है।

दोष-शिक्षा के औपचारिक साधनों या अभिकरणों के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं

  1. शिक्षा के औपचारिक साधन बालकों को केवल सीमित ज्ञान ही प्रदान करते हैं।
  2. शिक्षा के इन अभिकरणों में अनेक बन्धनों एवं कठोर नियमों के कारण कृत्रिमता का वातावरण होता है तथा इस वातावरण में बालक का स्वाभाविक विकास नहीं हो पाता।
  3. शिक्षा के औपचारिक अभिकरणों में केवल पुस्तकीय ज्ञान पर बल दिया जाता है। इन अभिकरणों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा सैद्धान्तिक अधिक तथा व्यावहारिक कम होती है। जॉन डीवी के अनुसार, “इस बात का सदैव डर रहता है कि औपचारिक शिक्षा जीवन के अनुभव से कोई सम्बन्ध न रखकर केवल विद्यालयों की विषय-सामग्री न बन जाए।”

प्रश्न 2.
शिक्षा के अनौपचारिक साधनों या अभिकरणों के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के अनौपचारिक साधनों या अभिकरणों के गुण-दोष
(Merits and Demerits of Informal Means of Education)

गुण- 1. शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों का सम्बन्ध शिक्षा के व्यापक रूप से है।

  1. शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण जीवन के निकट तथा जीवन से जुड़े होते हैं। इस स्थिति में ये अभिकरण बालक के चरित्र के स्वाभाविक विकास में योगदान प्रदान करते हैं।
  2. शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण अनेक हैं तथा इनसे व्यक्तियों को व्यापक तथा उचित शिक्षा प्राप्त होती है। इस शिक्षा से व्यक्ति को जीवन की समस्याओं को हल करने में सहायता प्राप्त होती है।
  3. शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों के माध्यम से सभी प्रकार की शिक्षा प्राप्त की जा सकती है तथा इस प्रकार से पूरा विश्व ही शिक्षा-प्राप्ति का क्षेत्र है। शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों के महत्त्व को जॉन

डीवी ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “बालक दूसरों के साथ रहकर अनौपचारिक ढंग से शिक्षा प्राप्त करता है। और साथ रहने की प्रक्रिया ही शिक्षा प्रदान करने का कार्य करती है। यह प्रक्रिया अनुभव को विस्तृत बनाती है। और कल्पना को प्रेरित करती है। यह कथन और विचारों में शुद्धता व सजीवता लाती है। यह शैक्षिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

दोष-शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों या साधनों के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं

  1. अनौपचारिक अभिकरणों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा की कोई पूर्व-योजना नहीं होती; अतः कभी-कभी ज्ञान प्राप्ति के अवसर कष्टदायक हो सकते हैं।
  2. शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों द्वारा सीखने की प्रक्रिया में अधिक समय लगता है।
  3. इन अभिकरणों द्वारा प्रदान की आने वाली शिक्षा अव्यवस्थित होती है। इस स्थिति में बालक कुछ ऐसा ज्ञान भी अर्जित कर सकता है जो उसके लिए तथा समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
  4. शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों से अर्जित की गई शिक्षा का कोई योग्यता प्रमाण-पत्र प्राप्त नहीं होता।

प्रश्न 3.
शिक्षा के औपचारिक तथा अनौपचारिक अभिकरणों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के औपचारिक तथा अनौपचारिक अभिकरणों में अन्तर
(Difference between the Formal and Informal means of Education)

शिक्षा के औपचारिक तथा अनौपचारिक साधनों या अभिकरणों के बीच पर्याप्त अन्तर हैं, जिन्हें निम्नलिखित तालिका द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है–

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शिक्षा के सक्रिय साधनों या अभिकरणों से क्या आशय है ?
उत्तर:
शिक्षा के सक्रिय साधनं या अभिकरण (Active Agencies of Education) शिक्षा के वे अभिकरण हैं, जिनके अन्तर्गत शिक्षा पाने वाले तथा शिक्षा देने वाले दोनों ही के व्यक्तित्व एक-दूसरे से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते हैं। इस व्यवस्था के अन्तर्गत दोनों ही एक-दूसरे पर क्रिया और प्रतिक्रिया करते हैं तथा इस भाँति दोनों के आचरण में रूपान्तरण होता है। इस वर्ग के मुख्य अभिकरण हैं-विद्यालय, परिवार, समाज, राज्य, धर्म तथा समाजकल्याण केन्द्र आदि।

प्रश्न 2.
शिक्षा के निष्क्रिय साधनों या अभिकरणों से क्या आशय है ?
उत्तर:
शिक्षा के निष्क्रिय साधन या अभिकरण (Passive Agencies of Education) शिक्षा के वे अभिकरण हैं, जिनके अन्तर्गत शिक्षा की प्रक्रिया से सम्बद्ध दो पक्षों में से केवल एक पक्ष ही प्रभावित होता है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत दूसरा पक्ष सामान्य रूप से निष्क्रिय ही रहता है। शिक्षा के निष्क्रिय अभिकरण इस अर्थ में निष्क्रिय हैं। वे दूसरों को तो प्रभावित करते हैं, किन्तु स्वयं दूसरों से प्रभावित नहीं होते। यह भी कहा जा सकता है कि इस व्यवस्था के अन्तर्गत शिक्षा ग्रहण करने वाला तो कुछ-न-कुछ अवश्य सीखता एवं ज्ञान अर्जित करता है, परन्तु शिक्षा प्रदान करने वाला पक्ष न तो कुछ सीखता है और न ही ज्ञान अर्जित करता है। इस वर्ग के मुख्य अभिकरण हैं—रेडियो, चलचित्र, दूरदर्शन तथा पत्र-पत्रिकाएँ आदि।

प्रश्न 3.
आपके विचार के अनुसार शिक्षा के औपचारिक तथा अनौपचारिक साधनों या अभिकरणों ” 
में से कौन-से साधन अधिक महत्त्वपूर्ण हैं ?
उत्तर:
शिक्षा के मुख्य रूप से दो प्रकार के अभिकरण माने गए हैं जिन्हें क्रमश: शिक्षा के औपचारिक तथा अनौपचारिक अभिकरण कहा जाता है। शिक्षा के ये दोनों ही अभिकरण अपने-अपने क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण हैं। औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता समाज की जटिलता के साथ बढ़ती जाती है। आधुनिक युग में ज्ञान, विज्ञान एवं तकनीकी कुशलता में आशातीत वृद्धि हुई है, जिसके परिणामस्वरूप औपचारिक शिक्षा का काफी विस्तार हुआ है, किन्तु इस विस्तार के साथ ही प्रत्यक्ष सम्पर्क और विद्यालयी अनुभवों में अवांछनीय अन्तर होने का डर भी है। ऐसा इस कारण है, क्योंकि शिक्षा के दोनों साधनों के बीच उचित सन्तुलन नहीं रखी जा सका। किसी एक साधन को अनावश्यक रूप से महत्त्व दे दिया गया, जब कि दूसरे की उपेक्षा कर  
दी गई। वास्तव में, औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों ही साधनों को बराबर मूल्य एवं महत्त्व प्रदान किया जाना चाहिए।

प्रश्न 4.
जन-संचार माध्यम शिक्षा के कौन-से अभिकरण हैं?
या
जन-संचार माध्यमों की क्या उपयोगिता है?
उत्तर:
जन-संचार के माध्यम शिक्षा के अनौपचारिक अंभिकरण (Informal Agencies of Education) हैं। जन-संचार के मुख्य माध्यम हैं–प्रेस, आकाशवाणी, दूरदर्शन, चलचित्र, पत्र-पत्रिकाएँ आदि। आजकल इण्टरनेट भी इस क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान कर रहा है। शिक्षा के इन अभिकरणों से शिक्षा प्राप्त करने के लिए नियमित रूप से न तो प्रवेश लेना पड़ता है और न ही निर्धारित नियमों का पालन करना पड़ता है। ये आजीवन शिक्षा प्रदान करने वाले अभिकरण हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि जन-संचार के माध्यम शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण हैं।

वर्तमान परिस्थितियों में जन-संचार के माध्यमों को व्यापक शिक्षा के दृष्टिकोण से अत्यधिक उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योकि इनके माध्यम से कोई भी व्यक्ति कभी भी ज्ञान अर्जित कर सकता है। ये शिक्षा के सुलभ एवं सुविधापूर्ण अभिकरण हैं। इनमें अधिक समय तथा धन भी खर्च नहीं करना पड़ता।

प्रश्न 5.
पुस्तकालय के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
या
शिक्षा के अभिकरण के रूप में पुस्तकालय के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
या
पुस्तकालय की उपयोगिता बताइए।
उत्तर:
पुस्तकालय शिक्षा का एक औपचारिक अभिकरण है। पुस्तकालय में अनेक प्रकार की पुस्तकों का संकलन होता है। पुस्तकें ज्ञान का भण्डार होती हैं तथा असंख्य सूचनाओं का अधिकाधिक स्रोत भी। ज्ञात-प्राप्ति का इच्छुक कोई भी बालक या व्यक्ति पुस्तकालयों से अत्यधिक लाभ प्राप्त कर सकता है। निर्धन तथा ज्ञान-प्राप्ति के इच्छुक बालकों के लिए तो पुस्तकालय वरदानस्वरूप हैं। पुस्तकालय के वातावरण में गहन अध्ययन करना सरल एवं सुविधाजनक होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘शिक्षा के अभिकरण’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
शिक्षा के अभिकरण या साधनों के अन्तर्गत वे सभी तत्त्व, कारण, स्थान अथवा संस्थाएँ सम्मिलित मानी जाती हैं जो किसी-न-किसी प्रकार की शिक्षा प्रदान करती हैं या सीखने में सहायता प्रदान करती हैं।

प्रश्न 2.
व्यवस्था एवं नियमों की निश्चितता के आधार पर शिक्षा के अभिकरण के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
व्यवस्था एवं नियमों की निश्चितता के आधार पर शिक्षा के मुख्य अभिकरण हैं-

  • शिक्षा के औपचारिक अभिकरण तथा
  • शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण।।

प्रश्न 3.
शिक्षा प्रदान करने वाले तथा शिक्षा ग्रहण करने वाले पक्षों के आपसी सम्बन्धों के आधार पर शिक्षा के अभिकरणों के मुख्य रूप से कौन-कौन से प्रकार निर्धारित किए गए हैं ?
उत्तर:

  • शिक्षा के सक्रिय अभिकरण तथा
  • शिक्षा के निष्क्रिय अभिकरण।

प्रश्न 4.
शिक्षा के दो अभिकरण बताइट।
उत्तर:
शिक्षा के दो मुख्य अभिकरण हैं-घर तथा विद्यालय। घर शिक्षा का मुख्यतम अनौपचारिक अभिकरण है तथा विद्यालय शिक्षा का मुख्यतम औपचारिक अभिकरण है।

प्रश्न 5.
घर-परिवार, खेल-समूह तथा मित्रमण्डली आदि को शिक्षा के किस प्रकार के अभिकरण 
माना जाता है ?
या
परिवार (गृह) शिक्षा का किस प्रकार का अभिकरण है?
उतर:
घर-परिवार, खेल-समूह तथा मित्रमण्डली आदि को शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण माना जाता है।

प्रश्न 6 शिक्षा के किन अभिकरणों से व्यावहारिक जीवन से सम्बन्धित शिक्षा प्राप्त होती है?
उत्तर:
व्यावहारिक जीवन से सम्बन्धित शिक्षा मुख्य रूप से शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों से प्राप्त होती है।

प्रश्न 7.
विद्यालय, पाठशाला तथा विश्वविद्यालय आदि शिक्षण-संस्थाओं को शिक्षा के किस प्रकार 
के अभिकरण माना जाता है ?
उत्तर:
विद्यालय, पाठशाला तथा विश्वविद्यालय आदि शिक्षण संस्थाओं को शिक्षा के औपचारिक अभिकरण माना जाता है।

प्रश्न 8.
मकतब एवं मदरसे तथा गुरुकुल शिक्षा के किस प्रकार के अभिकरण हैं ?
उत्तर:
मकतब एवं मदरसे तथा गुरुकुल शिक्षा के औपचारिक अभिकरण हैं।

प्रश्न 9.
शैक्षिक योग्यता का प्रमाण-पत्र शिक्षा के किस प्रकार के अभिकरणों द्वारा प्रदान किया जाता
उत्तर:
शैक्षिक योग्यता का प्रमाण-पत्र शिक्षा के औपचारिक अभिकरणों द्वारा प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 10.
शिक्षा के उन अभिकरणों को क्या कहा जाता है जिनमें शिक्षा ग्रहण करने वाले तथा शिक्षा प्रदान करने वाले दोनों पक्ष एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं ?
उत्तर:
शिक्षा के इस प्रकार के अभिकरणों को शिक्षा के सक्रिय अभिकरण कहा जाता है।

प्रश्न 11.
शिक्षा के उन अभिकरणों को क्या कहा जाता है जिनमें शिक्षा प्रदान करने वाला पक्ष प्रभावित नहीं होता ?
उत्तर:
इस प्रकार के अभिकरणों को शिक्षा के निष्क्रिय अभिकरण कहा जाता है।

प्रश्न 12.
‘राज्य शिक्षा के किस अभिकरण का उदाहरण है?
उत्तर:
राज्य शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण का उदाहरण है।

प्रश्न 13.
‘समुदाय’ शिक्षा के किस अभिकरण का उदाहरण है ?
उत्तर:
‘समुदाय’ शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण का उदाहरण है।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. विद्यालय ही शिक्षा का मुख्यतम औपचारिक अभिकरण है।
  2. शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों का न तो कोई महत्त्व है और न ही कोई आवश्यकता।
  3. व्यावहारिक जीवन में कुशलता अर्जित करने में शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण सहायक होते हैं।
  4. संग्रहालय शिक्षा के औपचारिक अभिकरण हैं।
  5. राज्य शिक्षा का अभिकरण नहीं है।
  6. रेडियो शिक्षा का निष्क्रिय साधन है।

उत्तर:

  1. सत्य,
  2. असत्य,
  3. सत्य,
  4. सत्य,
  5. असत्य,
  6. सत्य।.

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
शिक्षा की किसी भी प्रकार की प्रक्रिया के परिचालन में सहायक कारकों को माना जाता है
(क) शिक्षा के अंग।
(ख) शिक्षा के अभिकरण या साधन
(ग) शिक्षा को प्रभावित करने वाले कारक
(घ) विद्यालय

प्रश्न 2.
पूर्व-निर्धारित योजना, उद्देश्य एवं व्यवस्था के अनुसार शिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षा के अभिकरणों को कहते हैं
(क) महत्त्वपूर्ण अभिकरण
(ख) औपचारिक अभिकरण
(ग) अनौपचारिक अभिकरण
(घ) निष्क्रिय अभिकरण

प्रश्न 3.
शिक्षा का औपचारिक उपकरण ( अभिकरण ) है ?
(क) घर
(ख) राज्य
(ग) विद्यालय
(घ) समाज

प्रश्न 4.
बालक को शिक्षा प्रदान करने वाला प्रथम या प्रारम्भिक अभिकरण है ?
(क) क्रीड़ा विद्यालय
(ख) नर्सरी स्कूल
(ग) भाई-बहन तथा मित्र
(घ) परिवार

5. “अध्यापक ही केवल शिक्षक नहीं होता, केवल स्कूल या कॉलेज ही शिक्षण संस्थाएँ नहीं हैं, वरन् ऐसी कई अन्य संस्थाएँ हैं जिनका प्रभाव शैक्षिक होता है।” यह कथन किसको है?
(क) स्वामी विवेकानन्द का
(ख) रेमॉण्ट का
(ग) फ्रॉबेल का
(घ) बी० डी० भाटिया का

प्रश्न 6.
पुस्तकालय शिक्षा का अभिकरण है
(क) औपचारिक
(ख) अनौपचारिक
(ग) औपचारिकेत्तर
(घ) सक्रिय

प्रश्न 7.
‘दूरदर्शन’ शिक्षा का किस प्रकार की अभिकरण है?
(क) सक्रिय अभिकरण
(ख) निष्क्रिय अभिकरण
(ग) औपचारिक अभिकरण
(घ) अनावश्यक अभिकरण

प्रश्न 8.
शिक्षा के औपचारिक अभिकरणों की विशेषता है
(क) निश्चित नियमावली होती है।
(ख) निर्धारित पाठ्यक्रम एवं परीक्षा का प्रावधान है।
(ग) योग्यता का प्रमाण-पत्र दिया जाता है।
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ

प्रश्न 9.
शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों की विशेषता नहीं है
(क) कोई निश्चित एवं पूर्व-र्निर्धारित पाठ्यक्रम नहीं होता।
(ख) योग्यता का प्रमाण-पत्र दिया जाता है।
(ग) कोई निश्चित स्थान नहीं होता।
(घ) किसी-न-किसी रूप में आजीवन सक्रिय रहते हैं।

प्रश्न 10.
गृह या परिवार शिक्षा के किस अभिकरण के उदाहरण हैं ?
(क) औपचारिक अभिकरण
(ख) अनौपचारिक अभिकरण
(ग) निरौपचारिक अभिकरण
(घ) निष्क्रिय अभिकरण

प्रश्न 11.
विद्यालय शिक्षा का अभिकरण है।
(क) अनौपचारिक
(ख) औपचारिक
(ग) निरौपचारिक
(घ) विशेष

प्रश्न 12.
शिक्षा का प्रमुख सक्रिय साधन है
(क) राज्य
(ख) धर्म
(ग) विद्यालय
(घ) सिनेमा

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में कौन-सा शिक्षा का निष्क्रिय अभिकरण है?
(क) गिरजाघर
(ख) क्लब
(ग) विद्यालय
(घ) टेलीविजन

उत्तर:

1. (ख) शिक्षा के अभिकरण या साधन,
2. (ख) औपचारिक अभिकरण,
3. (ग) विद्यालय,
4. (घ) परिवार,
5. (ख) रेमॉण्ट का,
6. (क) औपचारिक,
7, (ख) निष्क्रिय अभिकरण,
8, (घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ,
9. (ख) योग्यता को प्रमाण-पत्र दिया जाता है,
10. (ख) अनौपचारिक अभिकरण,
11.(ख) औपचारिक,
12. (ग) विद्यालय,
13. (घ) टेलीविजन।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 18 Stages of Child Development

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 18
Chapter Name Stages of Child Development (बाल-विकास की अवस्थाएँ)
Number of Questions Solved 55
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 18 Stages of Child Development (बाल-विकास की अवस्थाएँ)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शैशवावस्था से क्या आशय है ? शैशवावस्था की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

शैशवावस्था का अर्थ
(Meaning of Infancy)

शिशु होने की अवस्था को शैशवावस्था कहा जाता है। जो बालक अपने आप जीवन की सभी क्रियाओं को नहीं कर पाता, उसे शिशु कहा जाता है। ऐसा बालक अपने अस्तित्व एवं विकास के लिए दूसरों पर आश्रित होता है। शाब्दिक अर्थ में शिशु एक अबोध प्राणी है, जो अपने लिए कुछ कर नहीं सकता अर्थात् दूसरों पर आश्रित रहने वाला प्राणी है। शैशवावस्था को पराश्रितता तथा असहायावस्था भी कहते हैं। क्रो और क्रो के अनुसार, “शैशवावस्था वह अवस्था है जिसमें इन्द्रिय प्रणालियाँ कार्य करने लगती हैं और शिशु रेंगना, चलना और बोलना सीखता है। सामान्य रूप से जन्म से 2-3 वर्ष की आयु तक के काल को शैशवावस्था माना जाता है। कुछ विद्वानों ने जन्म से 6 वर्ष की आयु तक के काल को शैशवावस्था माना है।

शैशवावस्था की प्रमुख विशेषताएँ
(Major Characteristics of Infancy)

शैशवावस्था में निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं-

1. पराश्रयिता- जन्म से लेकर;6 वर्ष की आयु तक शिशु अपने माता-पिता एवं अन्य लोगों पर आश्रित होता है, क्योंकि डेढ़-दो वर्ष तक तो शिशु की शारीरिक स्थिति ऐसी होती है कि वह अपने आप कुछ नहीं कर सकता। बाद में भी माँ उसे साफ करती, नहलाती, धुलाती, कपड़े पहनाती तथा भोजन कराती है। अपनी रक्षा, ज्ञानार्जन एवं प्रशिक्षण के लिए शिशु अपने से बड़ों पर आश्रित होता है। आयु के बढ़ने के साथ-साथ यह पराश्रितता कम हो जाती है।

2. अपरिपक्वता- जन्म के समय शिशु सर्वथा अशक्त एवं असहाय होता है। रोने, चिल्लाने व हाथ-पैर हिलाने के अतिरिक्त वह कुछ दिन तक और कुछ नहीं कर सकता। मानसिक क्रिया करने में भी वह अशक्त रहता है। भाषा बोलने में वह असमर्थ पाया जाता है। संवेगात्मक रूप से भी वह अपरिपक्व होता है। धीरे-धीरे शारीरिक, मानसिक एवं संवेगात्मक क्षमताओं की परिपक्वता आती है।

3. अभिवृद्धि और विकास की निरन्तरता- जन्म के समय अत्यन्त अपरिपक्वता होते हुए भी शिशु में निरन्तर अभिवृद्धि और विकास होता है। उसके शरीर का आकार, ‘भार, मांसपेशियों का गठन, हड्डियों की वृद्धि एवं परिपक्वता तथा सिर से लेकर पैर तक सभी अंगों का बढ़ना और पुष्ट होना निरन्तर चलता रहता है। सम्पर्क से वह भाषा सीखता है, बीत करना जानता है और उसकी अन्य मानसिक क्रियाएँ विकसित होती रहती हैं। अपने माता-पिता, भाई-बहन, पास-पड़ोस के लोगों से प्रेम, सहानुभूति, क्रोध, घृणा आदि के संवेगों को भी वह प्रकट करता है।

4. सीखने की तीव्रता- इस अवस्था में सीखने की क्रिया तेजी से होती है। अनुभव बढ़ने के साथ भाषा का ज्ञान बढ़ता है। प्रथम. छह वर्षों में भाषा की वृद्धि तेजी से होती है और शब्द भण्डार बहुत बड़ा हो जाता है। लगभग 15 हजार शब्द वह सीख लेता है, जो आगामी 12 वर्ष की दुगुनी मात्रा होती है। चलना, फिरना, दौड़ना, लोगों के साथ व्यवहार करना, अपने विचार-भाव व्यक्त करना भी तेजी से पाया जाता है और ये सब इसी अवस्था में सीखे जाते हैं।

5. अन्य मानसिक क्रियाओं की तीव्रता- शिशु में संवेदना, प्रत्यक्षीकरण, स्मरण और विस्मरण भी तीव्र गति से होता है। अवधान में चंचलता पायी जाती है और किसी एक बिन्दु पर वह बहुत थोड़ी देर तक ही ध्यान दे पाता है। तर्क का अभाव अवश्य होता है, परन्तु फिर भी मानसिक क्रियाओं में तीव्रता पायी जाती है।

6. कल्पना का बाहुल्य- शिशु काल्पनिक और वास्तविक जगत में भेद नहीं कर पाता है। इसलिए उसमें कल्पना की अधिकता पायी जाती है। खेल में, बातचीत में तथा प्रेम व्यवहार में वह कल्पना का ही प्रयोग करता है। रॉस (Ross) के अनुसार, “जीवन की विषम परिस्थितियों की चोट से अपने को बचाने की वह कोशिश करता है। इसी कारण वह कल्पनाशील होता है। झूठ भी वह कल्पना की अधिकता के कारण ही बोलता है। अज्ञानता ही इसका कारण है, जो बाद में दूर हो जाता है और वह झूठ का प्रयोग नहीं करता है।

7. एकान्तप्रियता-शिशु आरम्भ में अकेले रहना पसन्द करता है। कोई साथी न रहने पर भी वह अकेले खेलता है। वह गुड्डे-गुड़ियों को ही अपने साथी होने की कल्पना कर लेता है। धीरे-धीरे उसमें समवयस्कों के साथ खेलने की इच्छा बढ़ती है। आरम्भ से इस प्रकार वह अन्तर्मुखी व्यक्तित्व वाला कहा जाता है।

8. अनुकरण की प्रवृत्ति- शिशु अपने चारों ओर जो कुछ क्रिया अन्य लोगों को करते देखता है, उसे ही दोहराता है और ऐसी स्थिति में उसमें अनुकरण की प्रवृत्ति पायी जाती है। खेल, बोलचाल, खाने-पीने व घरेलू काम-काज करने में शिशु की अनुकरणशीलता पायी जाती है। इसका कारण मानसिक क्षमता में कम वृद्धि होना है।

9. मूल-प्रवृत्यात्मक व्यवहार- इस अवस्था में शिशु का व्यवहार मूल-प्रवृत्तियों को प्रभावित करता है। उसकी आवश्यकता ही व्यवहार करने के लिए प्रेरित करती है। भूख लगने पर वह रोता है। मचलना, हठ करना व मनमाना कार्य करना उसके मूल-प्रवृत्यात्मक व्यवहार हैं। उसे समाज के रीति-रिवाज, परम्परा, नियम की चिन्ता नहीं रहती है।

10. अपनी क्रियाओं की पुनरावृत्ति- प्रो० भाटिया के अनुसार-“शिशुओं में अपनी गतियों एवं ध्वनियों को दोहराने की प्रवृत्ति पायी जाती है। वास्तव में शिशु के पास कोई अन्य क्रिया करने को नहीं होती है। इसलिए वह अपनी ही क्रियाओं को दोहराता है। चारपाई पर पड़े अशक्त शिशु के लिए अपने हाथ-पैर मारने की आदत स्वाभाविक है। पड़े-पड़े वह बलबलाती रहता है।”

11. स्नेह की आकांक्षा- शिशु सभी से स्नेह पाने की आकांक्षा रखता है। वह सभी से लिपट जाता है और सभी से स्नेह पाने की कोशिश करता है। स्नेह के अभाव में वह मानसिक आघात का अनुभव करता है, उसके मन में कुण्ठाएँ उत्पन्न हो जाती हैं तथा भाव-ग्रन्थियाँ बन जाती हैं। इनका उसके व्यक्तित्व के विकास पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है।

12. आत्म के प्रति विशेष प्रेम- शिशु अपने आत्म के लिए विशेष प्रेम रखता है। इस कारण वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हठ करता है। वह अपनी चीजों के लिए बहुत अधिक प्रेम रखता है और दूसरों को छूने नहीं देता। वह माता-पिता, भाई-बहने तथा अन्य सभी सम्बन्धियों को केवल अपने से सम्बन्ध रखने की इच्छा रखता है। अन्य हिस्सेदारों से वह ईर्ष्या भी रखता है। बाद में वह इस प्रेम को दूसरों के साथ बाँट लेता है।

13. संवेगशीलता की तीव्रता- शिशु में क्रोध, घृणा, आश्चर्य, प्रेम, ईष्र्या आदि संवेगों का प्रकाशन तीव्रता से होता है, लेकिन ये संवेग क्षणिक, अपरिष्कृत तथा अपरिपक्व होते हैं। इनकी अभिव्यक्ति स्वतन्त्र रूप से होती है। इसलिए शिशु स्थान, समय एवं व्यक्ति की परवाह इन्हें अभिव्यक्त करते समय नहीं करती। धीरे-धीरे वह इन पर नियन्त्रण करना सीख लेता है।

14.पर्यावरण से अनुकूलन की असमर्थता- अपनी अशक्तता के कारण शिशु अपने वातावरण के साथ अनुकूलन नहीं कर पाता है। इसी बाध्यता के कारण यदि दुर्भाग्यवश उसे समुचित संरक्षण प्राप्त नहीं होता तो वह रोग ग्रस्त हो सकता है तथा परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु भी हो सकती है। सामाजिक रूप से भी वह अनुभवहीन होने के कारण समायोजन करने में समर्थ नहीं होता। इसीलिए अधिकांशत: शिशु अशिष्ट व्यवहार कर देता है।

15. इन्द्रिय संवेदनाओं की तीव्रता- शिशु अपनी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का प्रयोग करने की तीव्र इच्छा रखता है। छोटा शिशु खिलौने को अपने मुँह में डाल लेता है और सभी चीजों को पकड़ने की कोशिश करता है। इस प्रकार वह इन्द्रिय संवेदनाओं को तीव्रता से प्रकट करती है।

16. काम-प्रवृत्ति की सुप्तता- फ्रॉयड तथा अनेक मनोविश्लेषणवादियों ने अपनी खोजों के आधार पर सिद्ध किया है कि शिशु में काम-प्रवृत्ति सुप्त होती है और इसीलिए उसका प्रकटीकरण दूसरे तरीके से होता है; जैसे-अँगूठा चूसना, मल-मूत्र त्याग करना, दुग्धपान करते समय माँ के स्तन पकड़ना आदि। इससे उसकी काम-प्रवृत्ति सन्तुष्ट होती है, परन्तु यह कथन पूर्णतया सत्य प्रतीत नहीं होता। इसी प्रकार मनोविश्लेषणवादियों के अनुसार पुत्र का माता के प्रति प्रेम तथा पुत्री का पिता के प्रति प्रेम भी शिशु में पाया जाता है।

17. नैतिक भावना का अभाव- मनोवैज्ञानिकों के अनुसार शिशु में नैतिकता की भावना नहीं होती अर्थात् वह उचित-अनुचित में अन्तर नहीं कर पाता। वह अपनी इच्छा को स्वतन्त्र रूप से प्रकट करता है और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेता है।

प्रश्न 2
शैशवावस्था में दी जाने वाली शिक्षा का सामान्य परिचय दीजिए।
या
शैशवावस्था में शिक्षा का स्वरूप क्या होना चाहिए? समझाइए।
उत्तर:

शैशवावस्था की शिक्षा
(Infancy of Education)

शैशवावस्था विकास की प्रारम्भिक अवस्था है, इसलिए इस काल को शिक्षा का आधार भी कहें तो अनुचित नहीं होगा। फ्रॉयड के अनुसार, “मनुष्य चार-पाँच वर्षों में ही जो कुछ बनना होता है, बन जाता है। इसी प्रकार एडलर ने कहा है, “शैशवावस्था सम्पूर्ण जीवन का क्रम निर्धारित कर देती हैं।” इस अवस्था की शिक्षा में हमें निम्नांकित बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए|

1. शारीरिक विकास का प्रयास- माता-पिता एवं शिक्षक सभी को शिशु को स्वस्थ बनाने का विशेष प्रयत्न करना चाहिए। शिशु को सन्तुलित भोजन, उपयुक्त आवास एवं । स्वस्थ क्रियाओं के लिए अवसर देना चाहिए।

2. शिशु की क्षमताओं का ज्ञान- शिशु की शारीरिक, मानसिक ५ शारीरिक विकास का प्रयास एवं भावात्मक क्षमताओं को समझकर उसी के अनुकूल शिक्षा की क्रियाओं का आयोजन करना चाहिए। इस अवस्था में मॉण्टेसरी और किण्डरगार्टन शिक्षा-प्रणालियों को अपनाना चाहिए।

3. जिज्ञासा की सन्तुष्टि- माता-पिता और शिक्षक का कर्तव्य है। कि खिलौने आदि देते समय शिशु उनसे जो प्रश्न पूछे, उनका उत्तर देकर शिशु की जिज्ञासा को सन्तुष्ट करें तथा उसके मानसिक विकास में सहायता दे।

4. शारीरिक दोषों का निराकरण- शिशु के शारीरिक दोषों को दूर करने के प्रयत्न करने चाहिए, क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का विकास होता है।

5. उचित वातावरण- शिशु के समुचित विकास के लिए यह आवश्यक है कि शिशु के लिए उचित वातावरण बनाया जाए। खेल की चीजें, ज्ञानात्मक अनुभव की वस्तुएँ, स्वतन्त्र क्रिया के लिए स्थान एव अवसर देने से शिशु को उत्तम विकास होता है।

6. भावात्मक दमन से सुरक्षा- बालक की मूल-प्रवृत्तियों एवं संवेगों का दमन नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें उचित रूप में अभिव्यक्त करने के अवसर देने चाहिए।

7. भाषा का विकास- परस्पर अच्छी भाषा का प्रयोग करने से शिशु में भाषा का अच्छे ढंग से विकास होता है।

8. समाजीकरण व अच्छी आदतों का निर्माण- शिशु के साथ प्रेम, सहानुभूति व सहयोग के द्वारा व्यवहार करके उसमें भी समायोजन करने की आदत डाली जा सकती है।

9. दण्ड व भय से मुक्ति- शिशुओं के साथ दण्ड का प्रयोग नहीं करना चाहिए। उन्हें किसी प्रकार का भय भी नहीं दिखाना चाहिए, अन्यथा उनमें भाव-ग्रन्थियाँ बन जाएँगी और उनका विकास अवरुद्ध हो जाएगा।

10. आदर्शों द्वारा चरित्र-निर्माण- बड़े लोगों को चाहिए कि वे शिशु के समक्ष अच्छे आदर्श उपस्थित करें। इससे शिशुओं के चरित्र का निर्माण होता है।

11. अवस्थानुकूल शिक्षा- शिशु की शारीरिक, मानसिक, भावात्मक एवं सामाजिक विशेषताओं के अनुकूल ही शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम एवं शिक्षण-विधि का प्रयोग करना चाहिए।

12. स्वतन्त्रता, सहानुभूति एवं सहकारिता का व्यवहार- शिशु को स्वतन्त्रता देकर उसके साथ सहानुभूति एवं सहकारिता का व्यवहार करने से उसका उत्तम विकास होता है।

13. क्रिया द्वारा शिक्षा-शिशु एक क्रिया- प्रधान प्राणी होता है। अत: उसे क्रिया द्वारा ही शिक्षा दी जानी चाहिए। इससे शिशुओं को आत्म-प्रदर्शन का भी अवसर मिलता है और कर्मेन्द्रियों का भी प्रशिक्षण होता है।

14. ज्ञानेन्द्रियों का प्रशिक्षण- मॉण्टेसरी एवं किण्डरगार्टन पद्धतियों में शिशुओं को ज्ञानेन्द्रियों के प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाती है। इनके शिक्षा उपकरणों तथा उपहारों का प्रयोग करके शिशु अपनी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को प्रशिक्षित करता है।

प्रश्न 3
बाल्यावस्था से क्या आशय है ? बाल्यावस्था की मुख्य विशेषताओं का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
बाल्यावस्था से आप क्या समझते हैं ? इस अवस्था में भाषा के विकास का निरूपण कीजिए।
उत्तर:

बाल्यावस्था का अर्थ
(Meaning of Childhood)

शैशवावस्था की विशेषताएँ समाप्त होते ही बाल्यावस्था का आगमन हो जाता है। बालक वह व्यक्ति होता है, जो शिशु से बड़ा होता है। हरलॉक के अनुसार, “बाल्यकाल 6 वर्ष की आयु से 11-12 वर्ष की आयु तक होता है। इस अवस्था में बालक नियमित रूप से विद्यालय जाने लगता है और सामूहिक जीवन व्यतीत करता है। इसलिए कुछ मनोवैज्ञानिकों ने इसे ‘विद्यालय अवस्था’ और कुछ ने ‘क्षीण बौद्धिक बाधा’ की अवस्था कहा है, जिससे आगामी वयस्क जीवन के लिए सफल प्रयास किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त इस अवस्था को चुस्ती की आयु’, ‘गन्दी आयु’ तथा ‘समूह आयु’ आदि नामों से भी जाना जाता है।

बाल्यावस्था की प्रमुख विशेषताएँ
(Major Characteristics of Childhood)

बाल्यावस्था की प्रमुख विशेषताओं का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

1. स्थायित्व- बाल्यावस्था में प्रवेश करते ही बालक के शारीरिक और मानसिक विकास में स्थायित्व आ जाता है। यह स्थायित्व उसे शारीरिक और मानसिक दृष्टि से दृढ़ बनाता है। अत: बालक मानसिक दृष्टि से प्रौढ़-सा प्रतीत होने लगता है। परन्तु यह परिपक्वता वास्तविक न होकर ‘मिथ्या परिपक्वता होती है।

2. यथार्थ जगत् से सम्बन्ध- स्ट्रांग (Strong) के अनुसार, “बालक अपने को अति व्यापक संसार में पाता है तथा उसके विषय में शीघ्र जानकारी प्राप्त करना चाहता है।” शैशवावस्था का काल्पनिक जगत् इस अवस्था में प्रायः समाप्त हो जाता है और बालक जीवन की यथार्थताओं में प्रवेश करता है। अब वह केवल उन वस्तुओं की ही कल्पना करता है, जो उसके यथार्थ जीवन से सम्बन्धित होती हैं।

3. मानसिक योग्यताओं का विकास- इस अवस्था में बालक की मानसिक शक्ति का तीव्रता से विकास होता है। उसकी प्रत्यक्षीकरण और संवेदना शक्ति पर्याप्त विकसित हो जाती है तथा वह किसी बात पर पर्याप्त काल तक अपना ध्यान केन्द्रित करने लगता है।

4. जिज्ञासा की तीव्रता- बाल्यावस्था में जिज्ञासा प्रवृत्ति और अधिक प्रबल हो जाती है। बालक अपने वातावरण के सम्बन्ध में बहुत कुछ जानने का प्रयास करता है। माता-पिता तथा शिक्षक से वह प्रश्न किया करता है-यह कैसे हुआ ? ऐसा क्यों है ? इसका अर्थ क्या है ? आदि। जिज्ञासा की तीव्रता उसके मानसिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है। माता-पिता तथा अध्यापकों का दायित्व है कि वे बालक की जिज्ञासा को शान्त करने का प्रयास करें।

5. स्मरण- शक्ति का विकास-शैशवावस्था में बालक अपने सामने के पदार्थ के विषय में ही सोचता है, परन्तु बाल्यावस्था में बालक उन वस्तुओं के विषय में भी सोच लेता है, जो कि सामने नहीं है। प्रायः 6 से 12 वर्ष के मध्य के बालक पूर्व अनुभवों को याद करने के योग्य हो जाते हैं, और भाषा भी अनुभव द्वारा ज्ञानार्जन करने के लिए सहायता देती है।

6. रचनात्मक कार्यों में रुचि- इस अवस्था में बालकों में सामाजिकता की भावना का तीव्रता से विकास होता है। शैशवावस्था में बालक प्रायः अकेले ही खेलना पसन्द करता है, परन्तु बाल्यकाल में वह अपने साथियों के साथ खेलने में विशेष आनन्द का अनुभव करता है। उसका अधिकांश समय अपने सहयोगियों के साथ व्यतीत होता है।

7. संग्रह प्रवृत्ति का विकास- बाल्यावस्था में संग्रह प्रवृत्ति विशेष रूप से क्रियाशील रहती है। बालक चाक, टिकट, गोलियाँ तथा चित्रों आदि का संग्रह करने में विशेष रुचि लेते हैं। बालिकाएँ गुड़िया, सूई, वस्तुओं के टुकड़े तथा खिलौने आदि के संग्रह में आनन्द का अनुभव करती हैं।

8. अनुकरण प्रवृत्ति का विकास- इस अवस्था के बालकों में अनुकरण प्रवृत्ति का बाहुल्य होता है। बालक अपने बड़ों की नकल करने का प्रयास करते हैं तथा उनके जैसा आचरण करने में रुचि का अनुभव करते हैं। बालिकाएँ अपनी माँ के समान खाना पकाने, झाड़ लगाने तथा साड़ी पहनने का अनुकरण करती हैं।

9. निरुद्देश्य भ्रमण की प्रवृत्ति- बर्ट (Burt) महोदय ने अनेक परीक्षण करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि 9वर्ष की आयु के बालक आवारा घूमने, कक्षा से भागने तथा आलस्य में पड़े रहने के अभ्यस्त हो जाते हैं।

10. रुचियों में परिवर्तन- इस अवस्था में बालकों की रुचियों में निरन्तर परिवर्तन होते हैं। रुचियों में परिवर्तन वातावरण के आधार पर होता रहता है।

11. सामूहिक खेलों में रुचि- इस अवस्था में बालक सामूहिक खेलों में विशेष रुचि लेते हैं। बालक गिरोह बनाकर किसी पार्क या मैदान में सामूहिक रूप से खेलना पसन्द करते हैं। वे विभिन्न प्रकार के खेलों द्वारा अनुकरण का पाठ भी सीखते हैं।

12. नैतिक गुणों का विकास- तिक भावना का विकास बाल्यकाल में ही होता है। बालक उचित और अनुचित के बीच अन्तर करने लग जाता है। अब वह किसी कार्य को करने से पूर्व विचार करने लगता है। स्ट्रांग (Strong) के अनुसार, “आठ वर्ष के बालकों में भले-बुरे के ज्ञान का न्यायपूर्ण व्यवहार, न्यायप्रियता तथा सामाजिक मूल्यों का विकास होने लगता है।”

13. भाषा का विकास- इस अवस्था में भाषा का विकास सबसे अधिक तीव्रता के साथ होता है। बालक अब शुद्ध उच्चारण करने लगता है। शब्दों के स्थान पर अब वह वाक्यों का भी प्रयोग सफलता के साथ करता है, परन्तु भाषा में पूर्ण शुद्धता नहीं आती।

14. स्वलिंगीय प्रेम- इस अवस्था में बालक का प्रेम माता-पिता से हटकर अपने मित्रों के प्रति अधिक होता है। बालक प्रायः बालकों के साथ तथा बालिकाएँ बालिकाओं के साथ खेलना पसन्द करती हैं।

15. बहिर्मुखी व्यक्तित्व का विकास- शैशवावस्था में बालक एकान्तप्रिय होता है और वह केवल अपने में ही रुचि लेता है। इस प्रकार शैशवकाल में उसका व्यक्तित्व अन्तर्मुखी होता है, परन्तु बाल्यकाल में बालक में बाह्य जगत के प्रति रुचि उत्पन्न हो जाती है और वह अन्य व्यक्तियों में रुचि लेने लग जाता है।

प्रश्न 4
बाल्यावस्था में दी जाने वाली शिक्षा के स्वरूप को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

बाल्यावस्था की शिक्षा :
(Childhood of Education)

बाल्यावस्था की किसी भी रूप में उपेक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि यह वह अवस्था है जब कि आधारभूत दृष्टिकोणों, मूल्यों और आदर्शों का पर्याप्त सीमा तक निर्माण हो जाता है। अत: बाल्यावस्था में बालक की शिक्षा का स्वरूप निर्धारित करते समय निम्नलिखित बातों पर विशेष रूप से ध्यान देना आवश्यक है

1. अवस्थानुकूल शिक्षा- प्रत्येक बालक की शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक तथा अन्य आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए।

2. भाषा के ज्ञान पर बल- इस अवस्था में बालक की भाषा में विशेष रुचि होती है। अत: उसे भाषा का समुचित ज्ञान कराने की उत्तम व्यवस्था की जानी चाहिए।

3. क्रियाशील शिक्षा- बाल्यावस्था में बालक में क्रियाशीलता की प्रधानता होती है। अतः उसकी शिक्षा का आयोजन क्रियाशीलता के सिद्धान्त को ध्यान में रखकर किया जाए। किण्डरगार्टन तथा मॉण्टेसरी शिक्षा प्रणालियाँ इस उद्देश्य को प्राप्त कराने में सहायक हैं। अतः अध्यापक को उनके सिद्धान्तों का अध्ययन करना चाहिए और यथासम्भव उनको प्रयोग करना चाहिए।

4. रचनात्मक प्रवृत्तियों का विकास- इस अवस्था के स बालकों में रचनात्मक कार्यों के प्रति विशेष रुचि होती है। अतः बालक की शिक्षा में हस्त-कार्यों का भी आयोजन किया जाए। बालक से गृहं उपयोगी तथा सजावट की वस्तुएँ बनवायी जा सकती हैं।

5. पाठ्यक्रम के निर्माण में सावधानी- पाठ्यक्रम के निर्माण में विशेष सावधानी रखनी चाहिए। उन विषयों को पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाना चाहिए, जो इस अवस्था के बालकों की आवश्यकताओं को पूरा करते हों। भाषा, गणित, विज्ञान, सामाजिक अध्ययन, चित्रकला, पुस्तक कला, काष्ठ कला तथा सुलेख, निबन्ध आदि को विशेष स्थान दिया जाए। किसी विदेशी भाषा का भी प्रारम्भ इस स्तर पर किया जा सकता है।

6. रोचक पाठ्य-सामग्री- बाल्यावस्था में बालक की रुचियों में विभिन्नता और परिवर्तनशीलता होती है। अत: पाठ्य-सामग्री का चुनाव रोचकता और विभिन्नता के सिद्धान्त के आधार पर किया जाना चाहिए। पाठ्य-पुस्तकों, साहसी गाथाओं, नाटक, वार्तालाप, हास्य प्रसंग व विभिन्न देशों के निवासियों के विवरण आदि को स्थान दिया जाना चाहिए।

7. जिज्ञासा की सन्तुष्टि- दस वर्ष की अवस्था के बालक के मस्तिष्क का पर्याप्त विकास हो जाता है। अतः उसकी जिज्ञासा प्रवृत्ति काफी तीव्र हो जाती है। वह प्रत्येक बात को समझने का प्रयास करता है और अनेक प्रश्न करता है। अध्यापक का कर्तव्य है कि वह बालकों की जिज्ञासु प्रवृत्ति को सन्तोषजनक ढंग से सन्तुष्ट करे, बालक द्वारा किये गये प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दे तथा समय-समय पर उन्हें अजायबघर और चिड़ियाघर ले जाकर उनके सामान्य ज्ञान का विकास करे।

8. संवेगों की अभिव्यक्ति के अवसर- बाल्यावस्था में संवेगों का विकास तीव्रता से होता है। कोल और बुस के अनुसार, “बाल्यावस्था संवेगात्मक विकास का अनोखा काल है। अतः अध्यापक का कर्तव्य है कि बालकों के संवेगों का दमन न करके यथासम्भव उन्हें अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करे।

9. सामूहिक प्रवृत्ति की तृप्ति- इस अवस्था में बालक समूह में रहना अधिक पसन्द करते हैं। इस प्रवृत्ति की तृप्ति के लिए विद्यालय में सामूहिक कार्यों तथा सामूहिक खेलों का आयोजन किया जाए। विद्यालय के समारोहों का आयोजन भी बालकों के द्वारा ही कराया जाए।

10. प्रेम और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार-इस अवस्था में बालक का हृदय कोमल होता है। अत: वह कठोर अनुशासन को पसन्द नहीं करता। अध्यापक का कर्तव्य है कि इस अवस्था के बालकों के साथ वह यथासम्भव उदारता, प्रेम एवं सहानुभूति का व्यवहार करे। शारीरिक दण्ड और बल-प्रयोग का बालक पर इतना अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता जितना कि प्रेम और सहानुभूति की।

11. उत्तम आचरण की शिक्षा- बाल्यावस्था में बालकों को उत्तम आचरण की विशेष रूप से शिक्षा प्रदान की जाए। नमस्कार व अभिवादन की शिक्षा के साथ-साथ बालकों से उनके साथियों के जन्मदिवस पर बधाई-पत्र, उपहार आदि भिजवाएँ।

12. सामाजिक गुणों का विकास- विद्यालय में उन क्रियाओं और गतिविधियों का आयोजन किया जाए, जिससे बालकों में सामाजिकता का विकास हो सके। किलपैट्रिक के अनुसार, “बाल्यावस्था प्रतिद्वन्द्वात्मक समाजीकरण का काल है। ऐसी दशा में विद्यालय में समय-समय पर उन क्रियाओं का आयोजन किया जाए, जिनसे छात्रों में आत्म-नियन्त्रण, सहानुभूति, प्रतियोगिता, सहयोग आदि गुणों का विकास हो सके।

13. पाठ्य-सहगामी क्रियाओं की व्यवस्था- बालकों की विभिन्न रुचियों की सन्तुष्टि के लिए और विभिन्न शक्तियों के प्रदर्शन के लिए विद्यालय में विभिन्न पाठ्य-सहगामी क्रियाओं का आयोजन करना परम ।
आवश्यक है। संगीत प्रतियोगिता, अन्त्याक्षरी, कविता पाठ, वाद-विवाद प्रतियोगिता आदि का आयोजन विद्यालय में समय-समय पर किया जाना चाहिए।

14. पर्यटन तथा स्काउटिंग की व्यवस्था- इस अवस्था में बालकों में बिना किसी उद्देश्य के इधर-उधर घूमने की प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति को सन्तुष्ट करने के लिए पर्यटन की समय-समय पर योजनाएँ बनायी जाएँ। बालकों को ऐतिहासिक स्थलों, कल-कारखानों तथा बन्दरगाहों का भ्रमण कराया जाए। विद्यालयों में स्काउटिंग की व्यवस्था भी अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होती है।

प्रश्न 5
किशोरावस्था से आप क्या समझते हैं ? किशोरावस्था की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख
कीजिए।
या
किशोरावस्था की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। इनकी शिक्षण व्यवस्था में किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
या
“किशोरावस्था में मानसिक विकास उच्चतम सीमा पर पहुँच जाता है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए और इस काल में होने वाले मानसिक विकास का उल्लेख कीजिए।
या
“किशोरावस्था तूफान और तनाव की अवस्था है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
किशोरावस्था को तनाव, तूफान और संघर्ष का काल क्यों कहा जाता है?
या
किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों का वर्णन कीजिए।
या
किशोरावस्था क्या है? किशोरावस्था की समस्याओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

किशोरावस्था का आशय
(Meaning of Adolescence)

किशोरावस्था जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण काल है। यह अवस्था 12 से 18 वर्ष तक मानी जाती है। इस अवस्था में किशोर न तो बालक होता है और न वह प्रौढ़ होता है। जरसील्ड ने किशोरावस्था की परिभाषा देते हुए लिखा है-“किशोरावस्था वह अवस्था है, जिसमें मनुष्य बाल्यावस्था से परिपक्वता की ओर अग्रसर होता है। ब्लयेर, जोन्स तथा सिम्पसन के अनुसार, “किशोरावस्था प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में वह काल है, जो बाल्यावस्था के अन्त से प्रारम्भ होता है तथा प्रौढ़ावस्था के आरम्भ में समाप्त हो जाता है।” बालक भावी जीवन में क्या बनेगा, इसका निर्णय बहुत कुछ किशोरावस्था में ही हो जाता है। इसे ऐसे भी कह सकते हैं, “किशोरावस्था में मानसिक विकास उच्चतम सीमा पर पहुँच जाता है।”

किशोरावस्था की प्रमुख विशेषताएँ
(Major Characteristics of Adolescence)

किशोरावस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तन होते हैं। अतः यह काल परिवर्तन का काल कहलाता है। बिग्स एवं हण्ट (Bigges and Hunt) के अनुसार, “किशोरावस्था की विशेषताओं को सर्वोत्तम रूप में अभिव्यक्त करने वाला एक शब्द है-परिवर्तन। यह परिवर्तन शारीरिक; मानसिक और मनोवैज्ञानिक होता है।” किशोरावस्था में होने वाले परिवर्तनों का विवरण निम्नलिखित है-

1. शारीरिक परिवर्तन- इस अवस्था में किशोरों में पर्याप्त परिपक्वता आ जाती है। यह परिपक्वता लड़कों में 16 वर्ष तथा लड़कियों में 14 वर्ष तक आ जाती है। बालक तथा बालिकाओं की ऊँचाई में भी क्रान्तिकारी परिवर्तन होते हैं। किशोरावस्था के प्रारम्भ में लड़कियों का विकास तीव्रता से होता है, परन्तु 16 वर्ष की आयु तक बालकों का कद लड़कियों की अपेक्षा अधिक हो जाता है। भार में भी पर्याप्त वृद्धि होती है। लड़कों की आवाज में भारीपन आने लगता है। उनकी दाढ़ी, मूछों, बगल तथा गुप्तांगों पर बाल चमकने लगते हैं। किशोरियों के स्तन उभरने लगते हैं तथा रजोदर्शन का आरम्भ भी इस अवस्था में हो जाता है। ये शारीरिक परिवर्तन किशोर तथा किशोरियों के मन में हलचल उत्पन्न कर देते हैं।

2. मानसिक परिवर्तन- इस अवस्था में शारीरिक परिवर्तन के साथ-साथ मानसिक परिवर्तन भी तीव्रता से होते हैं। बालक की वृद्धि, कल्पना, विचार तथा तर्क शक्तियाँ पर्याप्त विकसित हो जाती हैं। ये परिवर्तन इतनी तीव्रता से होते हैं कि बालक को ऐसा ज्ञान होने लगता है कि मानो वह उन परिस्थितियों में लाकर खड़ा कर दिया गया हो, जिनके लिए वह पहले से तैयार नहीं था।

3. आत्म-सम्मान का विकास- किशोर का मानसिक विकास पर्याप्त हो जाने से वह बालकों के मध्य अधिक रहना पसन्द नहीं करता। यदि माता-पिता अब भी उसके साथ बालक जैसा व्यवहार करते हैं तो उसे ठेस लगती है। इस अवस्था तक उसमें आत्म-सम्मान का विकास हो जाता है और वह अपने को बालक न मानकर वयस्क मानने लगता है।

4. स्थायित्व का अभाव- किशोर में स्थायित्व और समायोजन का अभाव रहता है। उसका मन शिशु के समान ही स्थिर नहीं होता। वह कभी कुछ विचार करता है, कभी कुछ। वह वातावरण में समायोजन नहीं कर पाता।

5. कल्पना की प्रधानता- इस अवस्था में किशोर में कल्पना की प्रधानता होती है। उसकी कल्पना-शक्ति का पर्याप्त विकास हो जाता है और उसका अधिकांश समय दिवा-स्वप्न देखने में ही व्यतीत होता है। किशोर तथा किशोरियाँ उपन्यास तथा कहानियों में विशेष रुचि लेते हैं। साहित्य रचना के बीज इस अवस्था में अंकुरित होते हैं। कल्पना की प्रधानता के कारण किशोरों की प्रवृत्ति अन्तर्मुखी हो जाती है।

6. रुचियों में परिवर्तन तथा स्थिरता- प्रारम्भ में किशोर और किशोरियों की रुचियों में निरन्तर परिवर्तन होते रहते हैं, परन्तु बाद में स्थिरता आ जाती है। किशोर और किशोरियों की रुचियों में समानता भी होती है और असमानता भी। उपन्यास कहानियाँ, पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने, सिनेमा देखने फैशन आदि में किशोर और किशोरियाँ समान रुचि रखते हैं, परन्तु लड़कों को यदि शारीरिक व्यायाम, खेलकूद तथा दौड़-भाग में विशेष रुचि होती है तो लड़कियों में सीने, काढ़ने, बुनने तथा नृत्य और संगीत में विशेष रुचि होती है।

7. व्यवहार में भिन्नता- इस अवस्था में संवेगों की प्रबलता होती है। किशोर भावुकता, अस्थिरता, उत्साह तथा उदासीनता में ग्रसित होता है। वह कभी एकदम उत्साहित हो जाते हैं तो कभी निरुत्साहित। उसके संवेगात्मक व्यवहार में कुछ विरोध होता है।

8. घनिष्ठ मित्रता पर बल- वेलेण्टाइन के अनुसार, “घनिष्ठ और व्यक्तिगत मित्रता उत्तर किशोरावस्था की विशेषता है।” किशोर यद्यपि किसी समूह का सदस्य होता है, परन्तु इस पर भी वह .. किसी-न-किसी को अपना घनिष्ठ मित्र बनाता है। घनिष्ठ मित्र से अपने मन की बात कहकर वह विशेष आत्म-सन्तोष का अनुभव करता है।

9. वीर पूजा- किशोर काल में वीर पूजा की भावना प्रबल होती है। शैशवावस्था में बालक का अनुराग अपनी माता की ओर अधिक रहता है, परन्तु किशोरकाल में माता-पिता का स्थान कोई महान नेता, वैज्ञानिक या आदर्श अध्यापक ले लेता है। प्रत्येक किशोर किसी उपन्यास, नाटक या सिनेमा के नायक को अपना इष्ट मान लेता है और उसके प्रति श्रद्धा रखता है।

10.धार्मिक चेतना का विकास- वीर पूजा के समान इस अवस्था के किशोर धर्म के प्रति अपना सम्मान प्रकट करने लगते हैं। मानसिक अस्थिरता किशोरों में धर्म के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करती है। ईश्वर के प्रति निष्ठा की भावना इस काल में ही उत्पन्न होती है।

11. तार्किक भावना का विकास- किशोर किसी भी बात को आँख बन्द करके स्वीकार नहीं करते। उनमें तर्कात्मक-शक्ति का पर्याप्त विकास हो जाता है और वे किसी भी बात को स्वीकार करने से पूर्व काफी तर्क-वितर्क करते हैं।

12. भावी व्यवसाय की चिन्ता- किशोर प्राय: भावी व्यवसाय की समस्या से चिंतित हो जाते हैं। ये विद्यार्थी जीवन में ही अपनी व्यावसायिक समस्या का निराकरण करने का प्रयास करते हैं, परन्तु उन्हें जब इस विषय में कोई मार्गदर्शन नहीं मिलता तो वे चिंतित हो जाते हैं। स्ट्रांग (Strong) के अनुसार, “जब विद्यार्थी हाईस्कूल में होता है तो वह किसी व्यवसाय का चुनाव करने, उसके लिए तैयारी करने, उसमें प्रवेश करने तथा उसमें प्रगति करने के लिए अधिक-से-अधिक चिन्तनशील होता जाता है।”

13. अपराध प्रवृत्ति का विकास- इस अवस्था में दिवास्वप्न देखने के कारण बालकों में अपराध प्रवृत्ति का विकास होता है। बर्ट (Bert) के अनुसार, “प्राय: सभी बाल-अपराधी किशोर दिवास्वप्न-दृष्टा होते हैं।” दूसरे संवेगों की अस्थिरता और बलता, निराशा और प्रेम में असफलता भी बालकों को अपराधी बना देती है। वेलेण्टाइन के अनुसार, “किशोरकाल, अपराध प्रवृत्ति में विकास का नाजुक काल है।” अधिकांश अपराधी किशोरकाल में ही अपराधों में प्रवीण हो चुके होते हैं।

14. समाज सेवा की भावना- किशोरों में सामाजिक सेवा की भावना को तीव्रता से विकास होता है। समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए वे समाज सेवा में विशेष रुचि लेते हैं। रॉस (Ross) के अनुसार, किशोर, समाज-सेवा के आदर्शों को निर्मित तथा पोषित करता है। उसका उदार हृदय मानव-जाति के प्रेम से ओत-प्रोत हो जाता है तथा आदर्श समाज के निर्माण में सहायता करने की इच्छा से व्यग्र हो जाता है।”

15. मानसिक स्वतन्त्रता और विद्रोह की भावना- किशोर स्वभाव से परम्पराओं और रूढ़ियों के विरोधी तथा स्वतन्त्रता-प्रेमी होते हैं। वे प्राचीन परम्पराओं, अन्धविश्वासों तथा रूढ़ियों के बन्धन में न रहकर स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करना पसन्द करते हैं।

16. समूह या दल को महत्त्व- किशोर की अपने समूह या दल के प्रति विशेष श्रद्धा होती है। वह अपने समूह या दल को विद्यालय तथा परिवार से भी अधिक महत्त्व देता है तथा उससे ही सबसे अधिक प्रभावित होता है। ब्रिग्स तथा हण्ट के अनुसार, “जिन समूहों से किशोर सम्बन्धित होते हैं, उनसे उनके प्राय: सभी कार्य प्रभावित होते हैं। समूह उनकी भाषा, नैतिक मूल्यों, वस्त्र धारण करने की आदतों तथा भोजन करने की प्रणालियों को प्रभावित करते हैं।”

17. काम भावना का विकास- बाल्यावस्था में समलिंगीय प्रेम की भावना प्रबल होती है। बालक बालकों के प्रति तथा बालिकाएँ-बालिकाओं के प्रति आकर्षित होती हैं। किशोरावस्था में इसके विपरीत विषमलिंगीय प्रेम की भावना प्रबल होती है। प्रत्येक लड़का किसी लड़की के सम्पर्क में आना चाहता है और इसी प्रकार लड़कियाँ भी किसी-न-किसी लड़के का सम्पर्क चाहती हैं। प्रेम भावना के साथ-साथ किशोरकाल में काम-भावना का भी विशेष वेग होता है। प्राय: लड़के-लड़कियों में परस्पर काम-सम्बन्धों की स्थापना हो जाती है।
(नोट-किशोरावस्था में शिक्षा के स्वरूप के लिए प्रश्न संख्या 6 देखें)।

प्रश्न 6
किशोरावस्था में शिक्षा की किस प्रकार की व्यवस्था होनी चाहिए? विस्तारपूर्वक स्पष्ट कीजिएँ।
या
किशोरावस्था में शिक्षा के स्वरूप का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

किशोरावस्था की शिक्षा
(Adolescence of Education)

शैक्षिक दृष्टि से किशोरावस्था का अपना विशेष महत्त्व है। यह वह अवस्था हैं, जबकि बालक संवेगात्मक अस्थिरता तथा यौवन आवेग से ग्रसित होने के साथ-साथ एक नवीन उत्साह और आदर्श से प्रेरित होते हैं। यदि किशोरों को उचित मार्गदर्शन मिल जाता है तो भावी जीवन में वे बहुत कुछ कर सकते हैं। इसके विपरीत उचित मार्गदर्शन के अभाव में वे निराशा, अपराध तथा असफलताओं के शिकार हो जाते हैं। किशोरावस्था में बालकों की शिक्षा-व्यवस्था के अन्तर्गत निम्नांकित बातों पर ध्यान देना अति आवश्यक है

1. शारीरिक विकास सम्बन्धी शिक्षा- किशोरावस्था में शरीर में अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तन होते हैं। उनमें शक्ति का अतिरिक्त प्रवाह होता है। अत: इस अतिरिक्त शक्ति के उचित प्रयोग तथा उनके शारीरिक विकास के लिए व्यायाम तथा विभिन्न शारीरिक परिश्रम वाले खेलों का आयोजन किया जाए। बालकों के लिए दौड़-धूप वाले खेल विशेष रूप से उपयोगी होते हैं। लड़कियों के नृत्य तथा हल्के शारीरिक व्यायाम अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।

2. समुचित पाठ्यक्रम का निर्माण- किशोर के उचित मानसिक विकास के लिए पाठ्यक्रम का निर्माण करते समय उनकी रुचियों, अभिरुचियों, आवश्यकताओं तथा योग्यताओं का विशेष रूप से ध्यान रखा जाए। इस उद्देश्य से पाठ्यक्रम में गणित, कला, विज्ञान, साहित्य, भूगोल, इतिहास, नागरिकशास्त्र तथा हस्तशिल्प को अवश्य शामिल किया जाए।

3. कल्पना-शक्ति का समुचित उपयोग- किशोर और किशोरियाँ अत्यधिक कल्पनाशील होते हैं। उनकी कल्पना-शक्ति का समुचित उपयोग करने के लिए विद्यालय में आवश्यक व्यवस्था की सामाजिक सम्बन्धों की जाए। विद्यालय के पुस्तकालय में किशोरावस्था के अनुकूल साहित्य होना चाहिए। महान् पुरुषों के जीवन-चरित्र, साहित्यिक यात्रा वृतान्त, विभिन्न देशों के भौगोलिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विवरण, आदि सम्बन्धी पुस्तकें पुस्तकालय में अवश्य मँगवाई जाएँ।

4. संवेगों का उचित शोधन- किशोरावस्था में संवेगों का प्राबल्य होता है। अत: इनका उचित शोधन और मार्गान्तीकरण करने का प्रयास किया जाना चाहिए। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विद्यालय में विभिन्न पाठ्य-सहगामी क्रियाओं का आयोजन किया जाना चाहिए। समय-समय पर साहित्य, कला, संगीत तथा विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाए। इन क्रियाओं के माध्यम से निकृष्ट संवेगों का शोधन और मार्गान्तीकरण किया जा सकता है।

5. किशोर को महत्त्व देना- प्रत्येक किशोर समाज में अपना महत्त्व चाहता है। अतः इसके महत्त्व को मान्यता देना आवश्यक है। किशोरों को उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य सौंपने चाहिए तथा उन कार्यों के सम्पादन के बाद उनकी प्रशंसा भी की जानी चाहिए। विद्यालय अनुशासन स्थापना में भी छात्रों से हर प्रकार का सहयोग प्राप्त करना उपयोगी सिद्ध होगा।

6. बालक तथा बालिकाओं के पाठ्यक्रम में अन्तर- शारीरिक, मानसिक और रुचियों के सम्बन्ध में बालक तथा बालिकाओं की आवश्यकताओं में भिन्नता होती है। अत: इनके पाठ्यक्रम में अन्तर होना चाहिए। बी० एन० झा के अनुसार, “लिंग-भेद के कारण तथा इस विचार से कि बालकों और बालिकाओं को भावी जीवन में समाज में भिन्न-भिन्न कार्य करने हैं, दोनों के पाठ्यक्रम में विभिन्नता होनी चाहिए।’
यौन-शिक्षा

7. उचित शिक्षण विधियों का प्रयोग- किशोरों को परम्परागत विधियों के आधार पर शिक्षा प्रदान करना। पूर्णतया अनुचित है।. यथासम्भव उन शिक्षण विधियों का प्रयोग किया जाए जिससे किशोरों को स्वयं परीक्षण-निरीक्षण, विचार और तर्क करने के अवसर प्राप्त हो सकें। सभी विषयों का शिक्षण पूर्णतया व्यावहारिक और दैनिक जीवन से सम्बन्धित होना चाहिए। साथ ही शिक्षण ऐसा हो जो बालकों की रुचियों को जाग्रत करे तथा उन्हें क्रियाशीलता के अवसर प्रदान करे।

8. व्यक्तिगत भिन्नता के आधार पर शिक्षा- किशोरावस्था में बालक तथा बालिकाओं के दृष्टिकोणों, भावनाओं और रुचियों में भिन्नता आ जाती है। अत: शिक्षा की योजना इस प्रकार की हो कि बालकों की विभिन्न रुचियों और भावनाओं की सन्तुष्टि हो सके। इस उद्देश्य से विद्यालय में विभिन्न पाठ्यक्रमों की व्यवस्था की जानी चाहिए।

9. सामाजिक सम्बन्धों की शिक्षा- किशोर के लिए विद्यालय और परिवार से भी अधिक महत्त्व उस ‘समूह’ का होता है, जिसका वह सदस्य होता है। ऐसी दशा में विद्यालय में ही कुछ समूहों का संगठन किया जाए, जिससे कि छात्र उनके सदस्य बनकर उत्तम आचरण की शिक्षा ग्रहण कर सकें। ये समूह अध्यापकों के निरीक्षण में संगठित किये जाएँ। इसके अतिरिक्त विद्यालय में सामूहिक खेल तथा सामूहिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाए। इनमें भाग लेकर बालक सामाजिकता की शिक्षा स्वाभाविक ढंग से प्राप्त कर सकते हैं।

10. स्काउटिंग तथा गर्लगाइड- किशोरों की अतिरिक्त शक्तियों तथा संवेगों को उचित दिशा में लगाने के लिए स्काउटिंग तथा गर्लगाइड जैसी संस्थाओं का संगठन करना अति आवश्यक है। स्काउटिंग किशोरों की पाशविक तथा निरुद्देशीय भ्रमण करने की प्रवृत्ति पर नियन्त्रण का साधन है। स्काउटिंग उन्हें समाज-सेवा करने का अवसर प्रदान करती है तथा उनकी साहसिक प्रवृत्तियों को सन्तुष्ट करती है। गर्लगाइड की योजना किशोरियों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होती है।

11. व्यावसायिक मार्गदर्शन- किशोरावस्था में बालक व्यवसाय सम्बन्धी चिन्ता करने लगता है। अतः शिक्षक का कर्तव्य है कि वह इस दिशा में बालकों का समुचित मार्गदर्शन करे। किशोर यह निश्चय नहीं कर पाता है कि उसके लिए कौन-सा व्यवसाये उचित है। अत: शिक्षक का कर्तव्य है कि वह बालकों की रुचियों, झुकावों तथा योग्यताओं का ध्यानपूर्वक अध्ययन करे तथा उसके आधार पर उनका व्यावसायिक निर्देशन करे। विद्यालयों में भी कुछ व्यवसायों के प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए। बहुउद्देशीय विद्यालयों की स्थापना इस उद्देश्य की पूर्ति करती है।

12. धार्मिक और नैतिक शिक्षा- किशोरावस्था में बालकों में जो मानसिक द्वन्द्व होता है, उसको समाप्त करने के लिए धार्मिक और नैतिक शिक्षा की व्यवस्था करना आवश्यक है। नैतिक तथा धार्मिक शिक्षा का स्वरूप ऐसा हो जिससे बालक उचित और अनुचित के मध्य अन्तर करना सीख सकें। महापुरुषों की जीवनगाथाओं का अध्ययन इस उद्देश्य को प्राप्त करने में विशेष सहायक सिद्ध हो सकता है।

13. यौन-शिक्षा- किशोरावस्था में काम-भावना का विकास होता है। यदि किशोरों को उचित मार्गदर्शन नहीं मिलता तो वे भटक जाते हैं और अनेक उलझनें उत्पन्न हो जाती हैं। अत: किसी-न-किसी रूप में यौन शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए। यौन शिक्षा बिना झिझक के उसी प्रकार प्रदान की जाए जिस प्रकार अन्य विषयों की शिक्षा प्रदान की जाती है। किशोरों को यौन शिक्षा प्रदान करते समय स्वास्थ्य विज्ञान और शरीर विज्ञान का भी पूरा-पूरा ज्ञान कराया जाए। बालिकाओं को यौन शिक्षा गृह विज्ञान के साथ दी जाए तो उत्तम है।

काम-प्रवृत्ति को यथासम्भव उचित ढंग से शोधून या मार्गान्तीकरण किया जाना अति आवश्यक है। निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि किशोरावस्था जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण और नाजुक अवस्था है। बालक भावी जीवन में जो कुछ बनेगा, वह किशोरावस्था में ही ज्ञात हो जाता है। जो बालक किशोरावस्था में अपराध, अधार्मिकता तथा आवारागर्दी में पड़ गया तो वह भावी जीवन में समाज व देश के लिए एक सिरदर्द बन सकता है। इसके विपरीत यदि उसका झुकाव साहित्य, कला तथा विज्ञान की ओर हो गया तो वह महान् साहित्यकार, कलाकार या वैज्ञानिक कुछ भी बन सकता है। अतः अभिभावकों तथा शिक्षकों का कर्तव्य है। कि वे किशोरों की मूल आवश्यकताओं, रुचियों, अभिरुचियों तथा समस्याओं को भली प्रकार समझें तथा उनका समुचित मार्गदर्शन करें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
हरंलॉक द्वारा किये गये बाल-विकास की विभिन्न अवस्थाओं का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

हरलॉक द्वारा किया गया वर्गीकरण
(Classification by Hurlock)

विकास के सिद्धान्त के अनुसार बाल-विकास क्रमशः होता है। इस विकास की प्रक्रिया में भिन्न-भिन्न अवस्थाओं की विशेषताएँ भिन्न-भिन्न होती हैं। इन विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए तथा विकास की प्रक्रिया का व्यवस्थित अध्ययन करने के लिए विकास की विभिन्न अवस्थाएँ निर्धारित की गयी हैं। यह वर्गीकरण भिन्न-भिन्न रूप में किया गया है। हरलॉक द्वारा किया गया वर्गीकरण निम्नलिखित है

  1. गर्भावस्था- गर्भधारण होने से लेकर शिशु के जन्म तक।
  2. नवजात अवस्था- शिशु के जन्म से 14 दिन तक।
  3. शैशवावस्था- 14 दिन की आयु से दो वर्ष की आयु तक।
  4. बाल्यावस्था- 2 वर्ष की आयु से 11 वर्ष की आयु तक।
  5. किशोरावस्था- 11 वर्ष की आयु से 21 वर्ष की आयु तक।

हरलॉक ने विकास की उपर्युक्त मुख्य अवस्थाएँ मानी हैं। इसके उपरान्त उसने किशोरावस्था का पुनः वर्गीकरण किया है। हरलॉक ने किशोरावस्था को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा है

(क) पूर्व किशोरावस्था- 11 वर्ष की आयु से 13 वर्ष की आयु तक का काल।
(ख) मध्य किशोरावस्था- 13 वर्ष की आयु से 17 वर्ष की आयु तक का काल।
(ग) उत्तर किशोरावस्था- 17 वर्ष की आयु से 21 वर्ष तक की आयु तक का काल।

प्रश्न 2
किशोरावस्था के विकास के मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
या
किशोरावस्था में बच्चों के, सामाजिक विकास का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

किशोरावस्था के विकास के सिद्धान्त
(Theories of Development of Adolescence)

जब बालक बाल्यावस्था से किशोरावस्था में प्रवेश करता है तो उसके अन्दर क्रान्तिकारी, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा संवेगात्मक परिवर्तन होते हैं। ये परिवर्तन शरीर और मन दोनों को प्रभावित करते हैं। इन परिवर्तनों के सम्बन्ध में निम्नलिखित दो सिद्धान्त प्रचलित हैं

1. आकस्मिक विकास का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के प्रतिपादक स्टेनले हाल (Stenley Hall) हैं। इनके अनुसार किशोरावस्था में प्रवेश करते ही बालक में जो परिवर्तन होते हैं, उनका सम्बन्ध न तो शैशवावस्था से होता है और न बाल्यावस्था से। इस प्रकार किशोरावस्था एक प्रकार से नया जन्म है। इस अवस्था में बालकों में जो परिवर्तन होते हैं, वे सब आकस्मिक होते हैं।

2. क्रमिक विकास का सिद्धान्त- क्रमिक विकास का सिद्धान्त आकस्मिक विकास के सिद्धान्त के ठीक विपरीत है। थॉर्नडाइक का मत है कि किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक, मानसिक और संवेगात्मक परिवर्तन अचानक न होकर क्रमिक होते हैं। किंग (King) के अनुसार, “जिस प्रकार एक ऋतु में ही दूसरी ऋतु के आगमन के लक्षण प्रकट होने लगते हैं, उसी प्रकार बाल्यावस्था और किशोरावस्था परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं।”

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
स्पष्ट कीजिए कि किशोरावस्था में व्यवहार एवं स्वभाव में अस्थिरता पायी जाती है ?
उत्तर:
किशोरावस्था के प्रारम्भिक चरण में ही बालक के व्यवहार एवं स्वभाव में पर्याप्त अस्थिरता एवं चंचलता आ जाती है। इस काल में बालक कल्पनाओं में अधिक रहता है। इस काल में बालक कभी उदास, कभी प्रसन्न, कभी आत्म-विश्वासी तथा इसी प्रकार परस्पर विरोधी मानसिक स्थितियों से गुजरता रहता है। इस काल में यौन-आकर्षण भी प्रारम्भ हो जाता है। यह भी किशोरों के लिए अस्थिरता का एक कारण होता है। इस काल में असुरक्षा की भावना भी काफी प्रबल हो उठती है।

प्रश्न 2
स्पष्ट कीजिए कि किशोरावस्था में कल्पनाओं तथा भावनाओं की अधिकता होती है ?
उत्तर:
किशोरावस्था में बालक एवं बालिकाएँ अधिकतर कल्पनाओं में खोये रहते हैं। उनकी कल्पनाएँ। जीवन के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित होती हैं, जिनका ठोस आधार कुछ भी नहीं होता। इसीलिए अनेक किशोर-किशोरियाँ प्रायः अन्तर्मुखी हो जाते हैं। कल्पनाओं के अतिरिक्त इस काल में कोमल भावनाओं को भी बोलबाला रहता है। भावनाओं के वशीभूत होकर किशोर कभी-कभी ऐसे भी कार्य कर बैठते हैं जिन्हें असाधारण कार्य कहा जाता है।

प्रश्न 3
आडीपस (मातृ भावना) और इलेक्ट्रा (पितृ भावना) काम्प्लेक्स क्या हैं?
उत्तर:
बाल्यावस्था में प्राय: कुछ मनोग्रन्थियाँ विकसित हो जाती हैं। इन मनोग्रन्थियों में दो मुख्य मंनोग्रन्थियाँ हैं-आडीपस (मातृ भावना) तथा इलेक्ट्रा (पितृ भावना)। इन मनोग्रन्थियों का विस्तृत विवरण फ्रॉयड ने प्रस्तुत किया है। फ्रॉयड के अनुसार, आडीपस मनोग्रन्थि से ग्रस्त बालक (लड़की) अपनी माँ के प्रति विशेष रूप से आकृष्ट होता है तथा वह उस पर अधिकार बनाना चाहता है। इस स्थिति में बालक अपने पिता को अपना प्रतिद्वन्द्वी मानने लगता है तथा माँ पर पिता के अधिकार को सहन नहीं कर पाता। इलेक्ट्रा या पितृ भावना की ग्रन्थि लड़कियों में विकसित होती है। इस ग्रन्थि से ग्रस्त बालिका अर्थात् बेटी अपने पिता के प्रति आकृष्ट होती है तथा पिता पर अपना अधिकार दर्शाना चाहती है। वह पिता पर माँ के अधिकार को सहन नहीं कर पाती।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सामान्य वर्गीकरण के अनुसार विकास की मुख्य अवस्थाएँ कौन-कौन सी हैं ?
उत्तर:
सामान्य वर्गीकरण के अनुसार विकास की मुख्य अवस्थाएँ हैं-

  1. गर्भावस्था
  2. शैशवावस्था
  3. बाल्यावस्था तथा
  4. किशोरावस्था

प्रश्न 2
हरलॉक ने किशोरावस्था को किन उपवर्गों में बाँटा है ?
उत्तर:
हरलॉक ने किशोरावस्था को तीन उपवर्गों में बाँटा है-

  1. पूर्व किशोरावस्था
  2. मध्य किशोरावस्था तथा
  3. उत्तर किशोरावस्था

प्रश्न 3
“व्यक्ति का जितना भी मानसिक विकास होता है, उसका आधा तीन वर्ष की आयु तक हो जाता है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन गुडएनफ का है।

प्रश्न 4
विकास की किस अवस्था में सीखने की दर सर्वाधिक होती है ?
उत्तर:
विकास की शैशवावस्था में सीखने की दर सर्वाधिक होती है।

प्रश्न 5
विकास की किस अवस्था में व्यक्ति का व्यवहार मुख्य रूप से मूलप्रवृत्यात्मक होता है?
उत्तर:
विकास की शैशवावस्था में व्यक्ति का व्यवहार मुख्य रूप से मूलप्रवृत्यात्मक होता है।

प्रश्न 6
शैशवावस्था में मुख्य रूप से किस विधि द्वारा सीखा जाता है ?
उत्तर:
शैशवावस्था में मुख्य रूप से अनुकरण विधि द्वारा सीखा जाता है।

प्रश्न 7
शैशवावस्था में नैतिक विकास की क्या स्थिति होती है ?
उत्तर:
शैशवावस्था में नैतिक विकास का प्रायः नितान्त अभाव होता है।

प्रश्न 8
विकास की बाल्यावस्था को अन्य किन-किन नामों से भी जाना जाता है ?
उत्तर:
विकास की बाल्यावस्था को क्रमशः ‘चुस्ती की आयु’, ‘गन्दी आयु’, ‘समूह आयु तथा ‘प्राथमिक विद्यालय की आयु’ आदि नामों से भी जाना जाता है।

प्रश्न 9
किन वर्षों के बीच की अवधि को प्रारम्भिक बाल्यकाल कहा जाता है?
उत्तर:
2 से 5 वर्षों के बीच की अवधि को प्रारम्भिक बाल्यकाल कहा जाता है।

प्रश्न 10
5 से 12 वर्ष तक विकास की अवस्था को क्या कहते हैं ?
उत्तर:
मध्य बाल्यावस्था।

प्रश्न 11
विकास की किस अवस्था में व्यक्ति का नैतिक विकास प्रारम्भ हो जाता है ?
उत्तर:
सामान्य रूप से बाल्यावस्था में व्यक्ति का नैतिक विकास प्रारम्भ हो जाता है।

प्रश्न 12
व्यक्ति की जिज्ञासा वृत्ति विकास की किस अवस्था में प्रबल होती है ?
उत्तर:
व्यक्ति की जिज्ञासा वृत्ति बाल्यावस्था में प्रबन्न होती है।

प्रश्न 13
किशोरावस्था से क्या आशय है ?
उत्तर:
“किशोरावस्था बाल्यावस्था और प्रौढ़ावस्था के मध्य का परिवर्तन काल है।”

प्रश्न 14
कौन-सी अवस्था संघर्ष, तनाव, तूफान तथा विरोध की अवस्था कहलाती है?
उत्तर:
किशोरावस्था संघर्ष, तनाव, तूफान तथा विरोध की अवस्था कहलाती है।

प्रश्न 15
किशोरावस्था की व्याख्या करने वाले मुख्य सिद्धान्त कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
किशोरावस्था की व्याख्या करने वाले मुख्य सिद्धान्त हैं–

  1. त्वरित विकास का सिद्धान्त अथवा आकस्मिक विकास का सिद्धान्त तथा
  2. क्रमशः विकास का सिद्धान्त।

प्रश्न 16
किशोरावस्था के त्वरित विकास के सिद्धान्त को स्पष्ट करने वाले किसी कथन का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
“किशोर में जो शारीरिक तथा मानसिक परिवर्तन होते हैं, वे एकदम छलाँग मारकर आते हैं।’

प्रश्न 17
किशोरावस्था के क्रमशः विकास के सिद्धान्त को स्पष्ट करने वाले किसी कथन का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
“जिस तरह एक ऋतु का आगमन दूसरी ऋतु के उपरान्त होता है, परन्तु पहली ही ऋतु में दूसरी ऋतु के आने के लक्षण प्रतीत होने लगते हैं, उसी प्रकार बाल्यावस्था और किशोरावस्था परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं।”

प्रश्न 18
शैशवावस्था को जीवन का महत्त्वपूर्ण काल क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
शैशवावस्था में सम्पूर्ण विकास का प्रारम्भ होता है। शैशवावस्था को सम्पूर्ण विकास का आधार माना जाता है। इस अवस्था में यदि सुचारु विकास हो जाता है तो भावी विकास-प्रक्रिया भी सुचारु रूप में ही चलती है। इसीलिए शैशवावस्था को जीवन का महत्त्वपूर्ण काल कहा जाता है।

प्रश्न 19
शिशु में किस भावना का प्रभुत्व होता है?
उत्तर:
शिशु में स्नेह की भावना का प्रभुत्व होता है।

प्रश्न 20
बालक के विकास की किस अवस्था में पूनरावृत्ति की प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है ?
उत्तर:
बालक के विकास की पूर्व-बाल्यावस्था में पुनरावृत्ति की प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है।

प्रश्न 21
बालक की किस अवस्था को संकट की अवस्था कहते है?
उत्तर:
बालक की किशोरावस्था को संकट की अवस्था कहते हैं।

प्रश्न 22
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. शैशवावस्था में बालक के विकास पर उसके स्वास्थ्य का गम्भीर प्रभाव पड़ता है।
  2. बाल्यावस्था को चुस्ती का काल’ भी कहते हैं।
  3. बाल्यावस्था में कठोर अनुशासन द्वारा शिक्षा दी जानी चाहिए।
  4. बाल्यावस्था संघर्ष और तनाव का काल है।
  5. किशोरावस्था महान तनाव, तूफान तथा विरोध का काल है।
  6. किशोरावस्था में कोई प्रबल समस्या नहीं होती।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. सत्य
  6. असत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-

प्रश्न 1.
शैशवावस्था में कौन-सा विकास तीव्र गति से होता है ?
(क) शारीरिक विकास
(ख) मानसिक विकास
(ग) सामाजिक विकास
(घ) भाषागत विकास

प्रश्न 2.
शैशवावस्था में सुचारु विकास के लिए किस बात का विशेष ध्यान रखना अनिवार्य है ?
(क) आज्ञापालन
(ख) अध्ययन
(ग) नैतिकता
(घ) पोषण

प्रश्न 3.
शैशवावस्था की मुख्य विशेषता है
(क) नैतिक बोध की प्रधानता
(ख) जटिल संवेगों का प्रदर्शन
(ग) काम-प्रवृत्ति का प्रकाशन
(घ) अनुकरण द्वारा सीखने की प्रधानता

प्रश्न 4.
विकास की किस अवस्था में यौन-प्रवृत्ति सुप्तावस्था में होती है ?
(क) शैशवावस्था
(ख) बाल्यावस्था
(ग) किशोरावस्था
(घ) प्रौढ़ावस्था

प्रश्न 5.
बाल्यावस्था की उल्लेखनीय विशेषता है-
(क) मानसिक विकास की अधिकता
(ख) अनुभव में वृद्धि
(ग) जिज्ञासा में वृद्धि
(घ) खेल की अवहेलना

प्रश्न 6.
विकास की किस अवधि को प्रारम्भिक विद्यालय की आयु’ कहा जाता है ?
(क) शैशवावस्था
(ख) बाल्यावस्था
(ग) किशोरावस्था
(घ) प्रौढ़ावस्था

प्रश्न 7.
विकास की किस अवस्था में शारीरिक परिवर्तनों से सम्बन्धित समस्याएँ प्रबल होती हैं ?
(क) शैशवावस्था
(ख) बाल्यावस्था
(ग) किशोरावस्था
(घ) युवावस्था

प्रश्न 8.
वीर पूजा की अवस्था कहलाती है
(क) शैशवावस्था
(ख) बाल्यावस्था
(ग) किशोरावस्था
(घ) प्रौढ़ावस्था

प्रश्न 9.
किशोरावस्था जीवन का
(क) अधिक महत्त्वपूर्ण काल है
(ख) महत्त्वपूर्ण काल है
(ग) अत्यधिक महत्त्वपूर्ण काल है
(घ) कम महत्त्वपूर्ण काल है

प्रश्न 10.
किशोरावस्था जीवन की सबसे
(क) महत्त्वपूर्ण काल है
(ख) कठिन काल है
(ग) अनोखा काल है
(घ) आदर्श काल है

प्रश्न 11.
अधिक तनाव का काल है-
(क) शैशवावस्था
(ख) बाल्यावस्था
(ग) किशोरावस्था
(घ) युवावस्था

प्रश्न 12.
किशोरावस्था के विकास के सिद्धान्त हैं
(क) तीन
(ख) दो
(ग) चार
(घ) पाँच

प्रश्न 13.
यौन-शिक्षा को सामान्य शिक्षा में अनिवार्य रूप से सम्मिलित करना चाहिए
(क) बाल्यावस्था में
(ख) किशोरावस्था में
(ग) युवावस्था में।
(घ) प्रत्येक अवस्था में

प्रश्न 14.
किशोरावस्था सम्बन्धी समस्याएँ हैं
(क) समायोजन की समस्याएँ
(ख) शारीरिक परिवर्तन सम्बन्धी समस्याएँ
(ग) यौन समस्याएँ
(घ) ये सभी समस्याएँ

प्रश्न 15.
किशोरों हेतु सर्वाधिक आवश्यक है
(क) शैक्षिक निर्देशन
(ख) यौन शिक्षा
(ग) कैरियर सम्बन्धी व्यावसायिक निर्देशन
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 16.
जन्म के समय बालकों का औसत भार होता है-
(क) 2.5 किग्रा
(ख) 2.9 किग्रा
(ग) 3.2 किग्रा
(घ) 4.7 किग्रा

प्रश्न 17.
शैशवावस्था की प्रमुख मनोवैज्ञानिक विशेषता है|
(क) सामाजिक व्यवहार
(ख) धार्मिक व्यवहार
(ग) मूल-प्रवृत्यात्मक व्यवहार
(घ) अनुकरणात्मक प्रवृत्ति का अभाव

प्रश्न 18.
शैशवावस्था की प्रमुख विशेषता नहीं है-
(क) अनुकरण द्वारा सीखने की प्रवृत्ति
(ख) मूल प्रवृत्यात्मक व्यवहार
(ग) कल्पनाशीलता
(घ) परिपक्वता

प्रश्न 19.
चुस्त-दुरुस्त अवस्था’ किस अवस्था को कहा जाता है ?
(क) पूर्व शैशवावस्था
(ख) शैशवावस्था
(ग) बाल्यावस्था
(घ) किशोरावस्था

प्रश्न 20.
जीवन का अनोखा काल’ कहा जाता है
(क) किशोरावस्था को
(ख) शैशवावस्था को
(ग) बाल्यावस्था को
(घ) युवावस्था को

प्रश्न 21.
स्वतन्त्रता व विद्रोह की भावना प्रबल होती है
(क) शैशवावस्था में
(ख) बाल्यावस्था में
(ग) किशोरावस्था में
(घ) इन सभी में

उत्तर:

  1. (क) शारीरिक विकास
  2. (घ) पोषण
  3. (घ) अनुकरण द्वारा सीखने की प्रधानता
  4. (ख) बाल्यावस्था
  5. (ग) जिज्ञासा में वृद्धि
  6. (ख) बाल्यावस्था
  7. (ग) किशोरावस्था
  8. (ग) किशोरावस्था
  9. (ग) अत्यधिक महत्त्वपूर्ण काल है
  10. (ग) अनोखी काल है
  11. (ग) किशोरावस्था
  12. (ख) दो
  13. (ख) किशोरावस्था में
  14. (घ) ये सभी समस्याएँ
  15. (ख) यौन शिक्षा
  16. (ख) 2.9 किग्रा
  17. (ग) मूल-प्रवृत्यात्मक व्यवहार
  18. (घ) परिपक्वता
  19. (ग) बाल्यावस्था
  20. (क) किशोरावस्था को
  21. (ग) किशोरावस्था में

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