UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 3 Aims of Education

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 3 Aims of Education (शिक्षा के उद्देश्य) are the part of UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 3 Aims of Education (शिक्षा के उद्देश्य).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 3
Chapter Name Aims of Education (शिक्षा के उद्देश्य)
Number of Questions Solved 59
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 3 Aims of Education (शिक्षा के उद्देश्य)

विरतृत उत्तरीय प्रज

प्रश्न 1.
“शिक्षा एक सोद्देश्य प्रक्रिया है।” इस कथन की पुष्टि विभिन्न विचारकों के मत से कीजिए।
या
शिक्षा के उद्देश्य निर्धारण की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए। शिक्षा के कौन-कौन-से उद्देश्य हैं ? वर्णन कीजिए।
या
शिक्षा के उद्देश्य-निर्धारण की आवश्यकता क्यों है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के उद्देश्य निर्धारण की आवश्यकता
(Need for Determining the Aims of Education)

शिक्षा एक महत्त्वपूर्ण एवं व्यापक प्रक्रिया है जो मानव के सर्वांगीण विकास तथा समाज के निर्माण से जुड़ी हुई है। उद्देश्यहीन शिक्षा एक दिशाहीन तथा निष्फल प्रयास है। इस विषय में डॉ० बी० डी० भाटिया का कथन उल्लेखनीय है, “उद्देश्य के बिना शिक्षक उस नाविक के समान है जो अपना लक्ष्य नहीं जानता तथा शिक्षार्थी उस पतवारविहीन नौका के समान है जो तट से दूर कहीं बही जा रही है। शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण किए बिना शिक्षण-कार्य में सफलता नहीं मिल सकती। बालक के सर्वांगीण विकास हेतु उसमें वांछित परिवर्तन लाने की दृष्टि से शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों का निर्धारित होना अनिवार्य है।

शिक्षा के उद्देश्य एवं लक्ष्य निर्धारित होने पर मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया तीव्र होती है। स्वभावत: उद्देश्यों का ज्ञान होने पर ही उनकी प्राप्ति के उपाय आसानी से खोजे जा सकते हैं और साधनों पर भली-भाँति विचार किया जा सकता है। शैक्षिक गतिविधियों एवं क्रियाकलापों को सम्पादित करने की दृष्टि से पाठ्यक्रम, पाठ-योजना, शिक्षण-विधि, शिक्षक-प्रशिक्षण तथा अभिप्रेरणा के साधनों का उचित संगठन और व्यवस्था का तभी करना सम्भव है जब कि शैक्षिक उद्देश्य सुस्पष्ट हों।

उद्देश्य का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति ही न्यूनतम समय एवं शक्ति लगाकरं जीवन में विषम परिस्थितियों का कुशलतापूर्वक सामना कर सकता है। जिस शिक्षक को अपने उद्देश्यों का ज्ञान नहीं होता, उसे कभी भी शिक्षण-कार्य में सफलता नहीं मिल सकती। उसकी निरुद्देश्य क्रियाएँ अबोध शिक्षार्थियों को भटकाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्र का भविष्य अँधेरे में खो जाता है। इसमें सन्देह नहीं कि भारत में आधुनिक शिक्षा-प्रणाली की उद्देश्यहीनता ने युवाओं को दिशाहीन, उत्साहहीन, अनुशासनहीन तथा विद्रोही बना दिया है। राष्ट्र को एक सुन्दर एवं कल्याणकारी शिक्षा-व्यवस्था प्रदान करने के लिए शिक्षा को आदर्श उद्देश्यों से युक्त करना होगा।

शिक्षा के उद्देश्य सम्बन्धी शिक्षाशास्त्रियों के विचार
(Views of Educationists Regarding the Aims of Education)

शिक्षा के उद्देश्य प्रतिपादित करने के विषय में विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों ने अपने विचार प्रस्तुत किए हैं, जो निम्न प्रकार हैं|

  1. सुकरात के अनुसार, “शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को सत्य समझाना तथा तदनुसार व्यवहार सिखाना
  2. प्लेटो के अनुसार, “वह शिक्षा अनुदार है जिसका उद्देश्य बुद्धि और न्याय की ओर ध्यान न देकर केवल धन या शारीरिक बल की प्राप्ति है।”
  3. अरस्तू का कथन है, “शिक्षा का उद्देश्य सुख प्राप्त करना है।”
  4. मिल्टन के मतानुसार, “शिक्षा का उद्देश्य शान्ति और युद्ध के काल में निजी तथा सार्वजनिक कार्यों को उचित प्रकार से करने हेतु व्यक्ति को तैयार करना है।”
  5. हरबर्ट स्पेन्सर का मत है, “जीविकोपार्जन के लिए तैयार करना हमारी शिक्षा का आवश्यक अंग
  6. दी० रेमण्ट का कथन है, “अन्ततोगत्वा शिक्षा का उद्देश्य न तो शारीरिक शक्ति उत्पन्न करना है, न ज्ञान की पूर्ण प्राप्ति करना, न विचारधारा का शुद्धीकरण, बल्कि उसका उद्देश्य चरित्र को शक्तिशाली तथा उज्ज्व ल बनाना है।”
  7. हरबर्ट के अनुसार, “शिक्षा की सभी समस्याओं का समाधान नैतिकता’ के अन्तर्गत सीमित है। इसी शब्द से शिक्षा के सभी उद्देश्य व्यक्त होते हैं।’
  8. जॉन डीवी के मतानुसार, “शिक्षा का उद्देश्य इस तरह का वातावरण उत्पन्न करना है जिसके अन्तर्गत व्यक्ति मानव-जाति की सामाजिक जागृति में सफलता से भाग ले सके।”
  9. टी० पी० नन ने लिखा है, “शिक्षा को ऐसी दशाएँ उत्पन्न करनी चाहिए जिनसे वैयक्तिकता का पूर्ण विकास हो और व्यक्ति मानव-जीवन को अपना मौलिक योग दे सके।”
  10. रॉस के शब्दों में, “वास्तव में, जीवन और शिक्षा के उद्देश्यों के रूप में आत्मानुभूति तथा समाज-सेवा में कोई भेद नहीं है, क्योंकि दोनों एक ही हैं।”
  11. अरविन्द घोष ने लिखा है, “शिक्षा का उद्देश्य विकसित होने वाली आत्मा को सर्वोत्तम प्रकार से विकास करने में सहायता देना और श्रेष्ठ कार्य के लिए पूर्ण बनाना होना चाहिए।”
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  12. माध्यमिक शिक्षा आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, “छात्रों को इस प्रकार का चारित्रिक प्रशिक्षण दिया जाए कि वे नागरिकों के रूप में भावी प्रजातान्त्रिक, सामाजिक व्यवस्था में रचनात्मक ढंग से भाग ले सकें और उनकी व्यावहारिक व व्यावसायिक कुशलता में उन्नति की जाए ताकि वे अपने देश की आर्थिक प्रगति करने में अपना योग दे सकें।”
  13. रिऑर्गेनाइजेशन ऑफ सेकेण्डरी स्कूल-रिपोर्ट (यू० एस० ए०)–“शिक्षा का उद्देश्य हर व्यक्ति के ज्ञान, रुचियों, आदर्शों, आदतों और शक्तियों का विकास करना है ताकि उसे अपना उचित स्थान मिल सके। और वह उस स्थान का प्रयोग स्वयं तथा समाज को उच्च उद्देश्यों की ओर ले जाने के लिए कर सके।” विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों के विचार, विद्वानों के मत एवं वैयक्तिक-सामाजिक जीवन-दर्शन शिक्षा के विविध उद्देश्य निर्धारित करने की प्रेरणा देते हैं जिनमें से कुछ प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं–
    • वैयक्तिक उद्देश्य,
    • सामाजिक उद्देश्य,
    • व्यावसायिक उद्देश्य,
    • चरित्र-निर्माण का उद्देश्य,
    • ज्ञानार्जन का उद्देश्य,
    • शारीरिक विकास का उद्देश्य,
    • सांस्कृतिक उद्देश्य,
    • जीवन को पूर्णता प्रदान करने का उद्देश्य,
    • सर्वांगीण विकास का उद्देश्य,
    • वातावरण से अनुकूलन का उद्देश्य तथा
    • अवकाश-काल के सदुपयोग का उद्देश्य।

वास्तव में शिक्षा एक प्रयोजन मूलक प्रक्रिया है। निश्चित उद्देश्यों को ध्यान में रखकर दी जाने वाली शिक्षा ही शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों में चेतना जगा सकती है। ऊपर हमने शिक्षा के अनेक उद्देश्यों का उल्लेख किया है। जो प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण होते हुए भी अपूर्ण तथा एकांगी हैं। इनमें से कोई भी एक उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करने में सक्षम नहीं है। वास्तव में, शिक्षा का वही उद्देश्य पूर्ण कहा जाएगा जो व्यक्ति तथा समाज दोनों के हित में हो तथा जो शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास की सतत प्रक्रिया का प्रेरक बन सके।

प्रश्न 2.
शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्यों का विवाद क्या है? शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य 
का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसके पक्ष तथा विपक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्को का उल्लेख कीजिए।
या
शिक्षा के वैयक्तिक विकास के उद्देश्य से आप क्या समझते हैं। शिक्षा के वैयक्तिक विकास के उद्देश्य से आप क्या समझते हैं ?
या
इस परिप्रेक्ष्य में व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए विकास के किन पक्षों पर बल दिया जाता है ?
उत्तर:

शिक्षा के वैयक्तिक तथा सामाजिक उद्देश्य का विवाद
(Dispute of the Individual and Social Aims of Education)

व्यक्ति और समाज का एक-दूसरे से अटूट सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं और इस प्रकार एक-दूसरे के पूरक भी हैं। व्यक्तियों द्वारा समाज निर्मित होता है और समाज से पृथक् होकर व्यक्ति स्वयं को एकाकी, अशक्त, अयोग्य तथा निष्क्रिय अनुभव करता है। व्यक्ति और समाज के सापेक्षिक महत्त्व के विषय में काफी पहले से ही विभिन्न वैयक्तिक तथा सामाजिक समस्याओं पर विचार-विनिमय एवं वाद-विवाद चला आ रहा है। यह तर्क-वितर्क शिक्षा सम्बन्धी समस्याओं को लेकर भी रहता है कि शिक्षा का लक्ष्य व्यक्ति है अथवा उसका समाज। शिक्षा के वैयक्तिक और सामाजिक उद्देश्यों के सम्बन्ध में कुछ प्रश्नों को लेकर भारी मतभेद हैं; जैसे—शिक्षा पर पहला अधिकार व्यक्ति का है या समाज का? शिक्षा को व्यक्ति की आवश्यकताएँ पूरी करनी चाहिए या समाज की? शिक्षा व्यक्तियों के निर्माण की प्रक्रिया है या समाज के निर्माण की? आधुनिक विचारधारा शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्यों का समन्वय प्रस्तुत करती है। इस विचारधारा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का विकास इस भाँति होना चाहिए कि वह समाज के हित में अधिक-से-अधिक सहयोग दे सके।

शिक्षा के वैयक्तिक और सामाजिक उद्देश्यों में विरोध है अथवा समन्वय–इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए। हमें वैयक्तिक तथा सामाजिक उद्देश्यों का अलग-अलग अध्ययन करना होगा।

वैयक्तिक उद्देश्य
(Individual Aim)

वैयक्तिक उद्देश्य का अर्थ- शिक्षा एक व्यक्तिगत प्रयास है। व्यक्ति को केन्द्र मानकर दी जाने वाली शिक्षा ही वास्तविक एवं वैज्ञानिक शिक्षा है। शिक्षा के माध्यम से बालक के अन्तर्निहित गुणों का विकास होता है। और बालकों का सर्वांगीण विकास समाज की प्रगति का द्योतक है। अत: शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य बालक को स्वतन्त्र रूप से अपनी प्रगति का अवसर देना है। शिक्षा के माध्यम से बालकों की रुचियों, क्षमताओं, प्रवृत्तियों तथा आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ऐसी परिस्थिति पैदा की जानी चाहिए ताकि उनकी वैयक्तिकता का पूर्ण विकास हो और वह भविष्य में सुखमय जीवन बिता सके। प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री सुबोध अदावल का कथन इस मत की पुष्टि करता है, “बालक का निजत्व ही उसका जीवन है और वही न रहा तो उसका समूचा जीवन केवल यन्त्र बनकर रह जाएगा।” क्योंकि सृष्टि की समस्त रचनाओं में व्यक्ति ही सर्वश्रेष्ठ एवं प्रधान है; अतः शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तिगत’ ही होना अभीष्ट है।

शिक्षा की प्राचीन विचारधारा शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य की पक्षधर रही है। भारतीय मनीषियों ने व्यक्ति के विकास एवं हित में ही सम्पूर्ण समाज का कल्याण अनुभव किया। यूनान के सोफिस्टों (Sophists) ने भी शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य का ही समर्थन किया। आधुनिक समय में रूसो, फ्रॉबेल, पेस्टालॉजी तथा टी० पी० नन आदि विचारकों ने शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य पर बल दिया है। रूसो ने व्यक्तिगत गुणों को शिक्षा को आधार मानते हुए बालक को केन्द्र मानकर शिक्षा की योजना बनाई। पेस्टालॉजी ने बालक को मनोवैज्ञानिक अध्ययन का विषय बनाकर उसकी नैसर्गिक प्रवृत्तियों पर आधारित शिक्षा-व्यवस्था दी। टी० पी० नन के अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य बालक के जन्मजात गुणों का अभिप्रकाशन है। उनकी दृष्टि में शिक्षा की वही योजना उत्तम है जो व्यक्ति की उन्नति में सहयोग देती है। नन लिखते हैं, “वैयक्तिकता ही जीवन का आदर्श है। एक शिक्षा की योजना का मूल्यांकन इस बात पर निर्भर करता है कि उससे किसी व्यक्ति को चरम सीमा की कुशलता प्राप्त करने में कितनी सफलता मिली है?”

यूकेन (Eucken) ने वैयक्तिकता को आध्यात्मिक अर्थ देते हुए कहा है, “वैयक्तिक का अर्थ आध्यात्मिक वैयक्तिकता होना चाहिए, जिसे मनुष्य अपने सामने उपस्थित अन्तर्जगत द्वारा अपनी आन्तरिक शक्ति में वृद्धि कर प्राप्त करता है।

वैयक्तिक उद्देश्य का अर्थ समझाते हुए रॉस ने लिखा है, “शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य का अर्थ जो हमारे स्वीकार करने योग्य है, वह केवल यह है-महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व और आध्यात्मिक वैयक्तिकता का विकास।”

वैयक्तिक उद्देश्य को अर्थ स्पष्ट करने वाले विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों के विचार उसी शिक्षा को उचित एवं लाभकारी बताते हैं जो बालक के व्यक्तिगत विकास को ध्यान में रखकर प्रदान की जाती है। आधुनिक समय में मनोवैज्ञानिक शोधों के निष्कर्ष व्यक्तिगत विभिन्नताओं पर आधारित शिक्षा का सशक्त समर्थन करते हैं। अतः कहा जा सकता है कि वैयक्तिक उद्देश्य ही शिक्षा का मौलिक एवं प्रमुख उद्देश्य है।

वैयक्तिक उद्देश्य के पक्ष एवं विपक्ष में तर्क
(Arguments in Favour and Against the Individual Aim)

वैयक्तिक उद्देश्य के समर्थक तथा विरोधी विचारकों ने इसके पक्ष एवं विपक्ष में अपने-अपने तर्क दिए हैं, जो निम्न प्रकार प्रस्तुत हैं–
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प्रश्न 3.
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य से क्या आशय है? शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के पक्ष एवं विपक्ष में प्रस्तुत किए गए तक का उल्लेख कीजिए।
या
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के पक्ष एवं विपक्ष में तर्क दीजिए।
या
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:

सामाजिक उद्देश्य का अर्थ
(Meaning of Social Aims)

प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री रेमण्ट ने लिखा है, “समाजविहीन व्यक्ति कोरी कल्पना है। इसमें सन्देह नहीं कि व्यक्ति समाज के बीच रहकर ही अपनी आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है तथा अपना बहुमुखी विकास । कर प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। समाज के हित में ही व्यक्ति का सभी भाँति हित है और अलग से उसका कोई अस्तित्व भी नहीं है। व्यक्ति और समाज का यह अटूट सम्बन्ध ऐसी शिक्षा का समर्थन करता है। जो समाज का अधिकतम हित कर सके, क्योंकि समाज का विकसित एवं कल्याणकारी स्वरूप स्वयमेव ही व्यक्ति का उत्थान कर देगा। इसके अतिरिक्त समाज अथवा राज्य का स्थान व्यक्ति से कहीं ऊँचा है। इस दृष्टि से शिक्षा का उद्देश्य सामाजिक कल्याण हेतु व्यक्ति को प्रशिक्षित करना है। यही शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य है, जिसे नागरिकता का उद्देश्य (Citizenship Aim) भी कहा जाता है।

शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य व्यक्ति को, आवश्यकता पड़ने पर, समाज के लिए सर्वस्व बलिदान करने की प्रेरणा देता है। विश्व की प्राचीन संस्कृतियों के अन्तर्गत शिक्षा का उद्देश्य नागरिकों को राज्य के हित में अपना सब कुछ न्योछावर करने की भावना पैदा करना था। हीगल तथा काण्ट जैसे विद्वानों ने भी इसी विचारधारा का प्रबल समर्थन किया है।

आधुनिक समय में जॉन डीवी तथा बागले आदि शिक्षाशास्त्रियों के मतानुसार, सामाजिक उद्देश्य को अर्थ सामाजिक कुशलता की प्राप्ति है और तंदनुसार प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक रूप से कुशल तथा दक्ष बनाना ही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है। सामाजिक रूप से कुशल व्यक्ति में स्वयं अपनी आजीविका चलाने की सामर्थ्य होती है तथा वह आत्मनिर्भर होता है। एक श्रेष्ठ नागरिक के रूप में उसे व्यक्तिगत, सामाजिक, राष्ट्रीय तथा सामाजिक समस्याओं की गहरी समझ होती है और वह राज्य एवं उसके नागरिकों की इच्छाओं व आवश्यकताओं का पूरा सम्मान करता है। जैसा कि स्मिथ ने कहा है, “विद्यालय को विस्तृत कार्य सँभालना चाहिए तथा उसे निश्चित रूप से ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे सामाजिक कृतज्ञता एवं सामुदायिक भक्ति के उत्पन्न और पोषित किए जाने का कार्य हो सके।

शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के पक्ष एवं विपक्ष में तर्क
(Arguments in Favour and Against the Social Aim of Education)

शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के पक्षधर तथा विपक्षी विद्वानों ने इसके समर्थन तथा विरोध में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए हैं–
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प्रश्न 4.
“शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्य परस्पर विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
या
“शिक्षा के वैयक्तिक और सामाजिक उद्देश्य एक-दूसरे के पूरक हैं।” कैसे ?
उत्तर:

वैयक्तिक और सामाजिक उद्देश्य : एक-दूसरे के पूरक
(Individual and Social Aims : Complementary to Each Other)

शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्यों की आधारभूत मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि ये दोनों ही उद्देश्य अपनी-अपनी विशिष्टताओं से युक्त होते हुए भी अनेक परिसीमाओं में बँधे हैं। दोनों के ही अपने-अपने गुण तथा दोष हैं। वास्तव में, व्यक्ति और समाज को एक-दूसरे का विरोधी मानने वाले सभी शिक्षाशास्त्रियों ने अपने मत प्रतिपादित करते समय व्यक्ति और समाज को आवश्यकता से अधिक महत्त्व दे डाला। इसका अच्छा परिणाम नहीं निकला और अन्तत: व्यक्ति एवं समाज दोनों ही पक्षों की पर्याप्त हानि हुई। इस हानि को रोकने की दृष्टि से एक समन्वित विचारधारा के अन्तर्गत अग्रलिखित बिन्दुओं पर ध्यान देना उपयोगी है–

1. वैयक्तिक और सामाजिक उद्देश्यः एक-दूसरे के पूरक व्यक्ति एवं समाज तथा इन पर आधारित. शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्यों में से कौन-सा प्रमुख है? इसे लेकर पुराना विवाद है। इस विवाद की समाप्ति के लिए हमें एक मध्य मार्ग चुन लेना चाहिए और दोनों ही पक्षों को एक-दूसरे के समीप लाने का प्रयास करना चाहिए। किसी एक को प्रधानता देकर दूसरे की उपेक्षा करना उचित नहीं है। दोनों को ही समान महत्त्व है। व्यक्तियों के मिलने से समाज बनता है और सामाजिक परम्परा व्यक्ति का निर्माण करती है। दोनों का कहीं कोई विरोध नहीं, अपितु दोनों एक-दूसरे को पूर्ण करने वाली धारणाएँ हैं। मैकाइवर का कथन है, समाजीकरण तथा वैयक्तीकरण एक ही प्रक्रिया के दो पक्ष हैं।” जिस भाँति व्यक्ति’ और ‘समाज’ अपनी प्रगति के लिए एक-दूसरे का सहारा चाहते हैं और एक-दूसरे की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, ठीक वैसे ही शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्य भी एक-दूसरे के पूरक हैं।

2. वैयक्तिक और सामाजिक उद्देश्यों में समन्वय-व्यक्ति और समाज की पारस्परिक घनिष्ठता इतनी है कि उनके बीच कोई सीमा-रेखा नहीं खींची जा सकती। फूलों की माला के विभिन्न फूलों को एक-दूसरे से या अपने ही समूह से कैसे अलग किया जा सकता है? माला तो सभी फूलों का एक समन्वित रूप है। प्रसिद्ध विचारक रॉस (Ross) तथा टी० पी० नन (Nunn) ने वैयक्तिक तथा सामाजिक उद्देश्यों में समन्वय स्थापित किया है। उनकी दृष्टि में व्यक्ति समाज में रहकर समाज-सेवा द्वारा आत्मानुभूति प्राप्त करता है। उसके व्यक्तित्व का विकास, प्रकाशन एवं मूल्यांकन भी समाज में रहकर ही होता है। रॉस ने व्यक्ति के लिए समाज का महत्त्व बताते हुए लिखा है, “वैयक्तिकता का विकास केवल सामाजिक वातावरण में होता है, जहाँ सामान्य रुचियों और सामान्य क्रियाओं से उसका पोषण हो सकता है। यह भी सच है कि अपने व्यक्तित्व के विकास हेतु प्रत्येक व्यक्ति को स्वतन्त्र वातावरण मिलना चाहिए ताकि वह स्वयं को अपनी प्रकृति के अनुसार विकसित कर सके, क्योंकि व्यक्ति और उसका समाज एक-दूसरे के सहयोग से अपना विकास कर सकते हैं। अत: वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्यों को समन्वयात्मक दृष्टि से व्यावहारिक बनाना उपयुक्त है। पुनः रॉस के ही शब्दों में, “वस्तुतः इस बात में कोई पारस्परिक विरोध नहीं है कि

आत्मानुभूति और समाज-सेवा ये दोनों जीवन तथा शिक्षा के उद्देश्य हैं, क्योंकि वे एक ही हैं।” इस प्रकार यह निष्कर्ष निकलता हैं, कि शिक्षा के वैयक्तिक तथा सामाजिक उद्देश्यों में कोई विरोध नहीं है। वे एक-दूसरे के पूरक और समन्वग्नक हैं। इस समन्वयवादी विचारधारा के अन्तर्गत शिक्षा की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें न तो समाजव्यक्ति को अपना दास बना पाए और न व्यक्ति ही इतना स्वतन्त्र हो जाए कि वह सामाजिक विधि-विधानों को ठुकराकर अपनी मनमानी करने लगे। व्यक्ति और समाज की स्वतन्त्रता अपनी परिसीमाओं में उचित है ताकि दोनों का विकास तथा कल्याण हो सके।

प्रश्न 5.
शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य का अर्थ स्पष्ट कीजिए। शिक्षा के इस उद्देश्य के पक्ष तथा 
विपक्ष में प्रस्तुत किए गए तक का भी उल्लेख कीजिए।
या
शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य से क्या तात्पर्य है ? व्यक्ति और समाज की दृष्टि से इस उद्देश्य की उपयोगिता बताइए।
उत्तर:

शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य का अर्थ
(Meaning of the Vocational Aim of Education)

रोटी, कपड़ा, घर, चिकित्सा और शिक्षा- प्रत्येक व्यक्ति की ये पाँच आधारभूत आवश्यकताएँ हैं जो उसके जन्म से प्रारम्भ होकर मृत्यु तक बनी रहती हैं। स्वयं अपने तथा अपने आश्रितों के लिए इन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु व्यक्ति को निश्चय ही कोई-न-कोई व्यवसाय करना पड़ता है। जीविकोपार्जन एवं व्यवसाय की दृष्टि से शिक्षा अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि शिक्षा बालकों को जीविकोपार्जन के लिए सुन्दर, योजनाबद्ध, व्यवस्थित एवं मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार करती है। यही कारण है कि आज के इस आर्थिक युग में शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य का महत्त्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। आधुनिक युग की औद्योगिक क्रान्ति ने तो व्यावसायिक अथवा जीविकोपार्जन के उद्देश्य को सर्वाधिक श्रेष्ठ एवं उपयोगी बना दिया है।

जॉन डीवी का मत है, “यदि व्यक्ति अपनी जीविका स्वयं नहीं कमा सको तो वह दूसरों के काम पर जीवित रहने वाला अर्थात् परजीवी है और जीवन के बहुमूल्य अनुभव खो रहा है। यही कारण है कि मनुष्य के भौतिक, मानसिक, सांवेगिक, नैतिक तथा चारित्रिक विकास के लिए पर्याप्त धनोपार्जन अनिवार्य है। विशेषकर इस भौतिकवादी समय में व्यक्ति की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति उसके जीवन की पहली शर्त है, जिसे पूरा करने

के लिए मनुष्य को उचित ‘आजीविका या व्यवसाय उपलब्ध कराया जाना चाहिए। टी० रेमण्ट ने लिखा है, प्रत्येक नागरिक को स्वयं और अपने आश्रितों का भरण-पोषण करना आवश्यक है। इस कार्य में शिक्षा मनुष्य की सर्वाधिक सहायता करती है।” हरबर्ट स्पेन्सर ने ठीक ही कहा है, “जीविकोपार्जन के लिए तैयार करना हमारी शिक्षा का आवश्यक अंग है।”

शिक्षा में व्यावसायिक उद्देश्य से अभिप्राय है कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जीवन-यापन के लिए किसी विशेष व्यवसाय का प्रशिक्षण प्रदान किया जाए। ताकि वह उस व्यवसाय में दक्षता एवं कुशलता प्राप्त कर धनोपार्जन कर सके। ऑ० जाकिर हुसैन के शब्द व्यावसायिक उद्देश्य स्पष्ट करते हैं, “राज्य का पहला कार्य यह होना चाहिए कि वह नागरिक को किसी लाभप्रद कार्य के लिए वे समाज में किसी निश्चित कार्य के लिए शिक्षित करना अपनी उद्देश्य बनाए।’ शिक्षा में व्यावसायिक उद्देश्य को मान्यता देने का अर्थ समाज (या राज्य) के बालकों को उनकी आवश्यकताओं, रुचियों, अभिरुचियों, योग्यताओं तथा क्षमताओं के अनुसार किसी व्यवसाय या उत्पादन कार्य को सिखाकर इस योग्य बना देने से है ताकि वे अपनी जीविकोपार्जन भली प्रकार कर सकें। व्यावसायिक उद्देश्य बालक को आजीविका की दृष्टि से आत्मनिर्भर तथा स्वावलम्बी बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक प्रयास है। अत: इसे जीविकोपार्जन या उपयोगिता का उद्देश्य भी कहा जाता है। कुछ विद्वानों ने इसे दाल-रोटी का उद्देश्य, ह्वाइट-कॉलर उद्देश्य (White-Collar Aim) या ब्लू जैकिट उद्देश्य (Blue Jacket Aim) का नाम दिया है।

व्यावसायिक उद्देश्य के पक्ष एवं विपक्ष में तर्क
(Arguments in Favour and Against the Vocational Aim)

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व्यावसायिक उद्देश्य की समीक्षा
(Evaluation of Vocational Aim)

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शिक्षा के व्यावसायिक या जीविकोपार्जन उद्देश्य के पक्ष एवं विपक्ष में विभिन्न विचारों का अध्ययन हमें इस सुनिश्चित निष्कर्ष की ओर ले जाता है कि यह उद्देश्य स्वयं में महत्त्वपूर्ण तथा उपयोगी होते हुए भी शिक्षा का , एकमात्र उद्देश्य नहीं है। व्यावसायिक उद्देश्य का दृष्टिकोण किसी प्रकार भी उदार एवं व्यापक प्रतीत नहीं होता, क्योंकि इसके अन्तर्गत मानव-जीवन के मानसिक, सांवेगिक, नैतिक, चारित्रिक तथा आध्यात्मिक विकास की अवहेलना की जाती है। इस भाँति, कुल मिलाकर मनुष्य का सर्वांगीण विकास बाधित होता है।

यद्यपि व्यावसायिक उद्देश्य व्यक्ति को भौतिक सम्पन्नता प्रदान करता है, किन्तु यह उसे न तो जीवन के उच्च आदर्शों को प्राप्त करने में सहायता देता है और न पूर्ण जीवन के लिए तैयार ही करता है। व्यक्ति के जीने के लिए रोटी आवश्यक है, लेकिन व्यक्ति सिर्फ रोटी के लिए ही नहीं जीता। उसे जीवन की कोमल भावनाओं तथा मानवीय गुणों; जैसे—प्रेम, दया, करुणा, सद्भाव, भ्रातृत्व-भाव, सेवा तथा त्याग की वास्तविक अनुभूति भी होनी चाहिए, तभी वह आत्मानुभूति के माध्यम से जीवन की पूर्णता प्राप्त कर सकेगा। इसके विपरीत, व्यावसायिक शिक्षा मनुष्य को प्राकृतिक वातावरण से परे कृत्रिम एवं नीरस वातावरण में ले जाती

मानव इस सृष्टि की उत्कृष्ट रचना है। यदि शिक्षा मानव-जीवन को यथार्थ, सुन्दर तथा कल्याणकारी बनाने के लिए है तो मानव को किसी व्यवसाय या सिर्फ जीविकोपार्जन के लिए तैयार करना ही शिक्षा का उद्देश्य नहीं हो सकता। शिक्षा का उद्देश्य जीविकोपार्जन के साथ ही व्यक्ति में मानवीय एवं दिव्य गुणों का विकास करना है और यही अभिव्यक्ति हमें स्पेंस रिपोर्ट के इन शब्दों से भी मिलती है, “जीविकोपार्जन की तैयारी हमारी शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण अंग है।”

प्रश्न 6.
“मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता और सबसे बड़ा रक्षक चरित्र है, शिक्षा नहीं।” हरबर्ट 
स्पेन्सर के इस कथन की आलोचना कीजिए।
या
“शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य चरित्र का निर्माण है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
शिक्षा के अन्तर्गत चरित्र-निर्माण का उद्देश्य क्यों आवश्यक है?
उत्तर:

मानव-जीवन में चरित्र का महत्त्व
(Importance of Character in Human Life)

एक प्राचीन प्रचलित कहावत् है, ‘यदि धन नष्ट हो गया तो कुछ नष्ट नहीं हुआ, यदि स्वास्थ्य नष्ट हो गया तो कुछ नष्ट हो गया, किन्तु यदि चरित्र नष्ट हो गया तो सभी कुछ नष्ट हो गया।’ (If wealth is lost nothing is lost. If health is lost something is lost. If character is lost everything is lost.) अभिप्राय यह है कि चरित्र व्यक्ति की सर्वाधिक मूल्यवान् वस्तु है। आज व्यक्तिगत, सामूहिक तथा राष्ट्रीय स्तर पर मानवीय मूल्यों का तेजी से पतन हो रहा है, जिससे समाज में दु:ख, तनाव तथा कष्ट बढ़ रहे हैं। इसका एक महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि चरित्र एवं नैतिक मूल्यों की वृद्धि में आधुनिक शिक्षा प्रणाली का योगदान नगण्य है।

डॉ० राधाकृष्णन का कहना है, “भारत सहित सारे संसार के कष्टों का कारण यह है कि शिक्षा का सम्बन्ध नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों की प्राप्ति से न रहकर, केवल मस्तिष्क के विकास से रह गया है। वास्तव में राष्ट्र का निर्माण पत्थर की निर्जीव मूर्तियों से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के दृढ़ चरित्र से होता है। चरित्रहीन एवं अनैतिक लोगों की भीड़ आदर्श समाज का निर्माण नहीं कर सकती। वास्तव में, शिक्षा का उद्देश्य शारीरिक व बौद्धिक शक्तियों का विकास ही नहीं है, वरन् उत्तम चरित्र तथा आध्यात्मिकता में प्रतिष्ठित नैतिकता का सृजन करना है। अतः बालकों में समुचित नैतिक आदर्शों का विकास करने की दृष्टि से चरित्र-प्रधान शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए।

शिक्षा का चरित्र-निर्माण का उद्देश्य
(Character-Formation-An Aim of Education)

अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बालक के चरित्र का निर्माण बताया है। इस मान्यता के अनुसार बालकों को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए जो उनके चरित्र को सुदृढ़ तथा पवित्र बनाने में सहायक हो और इस भाँति उनका आचरण श्रेष्ठ बन सके। शिक्षा में चरित्र-निर्माण के उद्देश्य का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है

1. चरित्र की महत्ता एवं अपरिहार्यता- विश्वभर में प्राचीनकाल से आज तक मानव व्यक्तित्व के विविध पक्षों के अन्तर्गत चरित्र की प्रतिष्ठा एवं महत्ता सर्वोपरि तथा अक्षुण्ण है। भारतीय धर्मशास्त्रों में कहा गया है—’वृत्तं यत्नेन संरक्षेत वित्तमेति च यातिच’ अर्थात् चरित्र की रक्षा यत्नपूर्वक की जानी चाहिए। धन तो आता है और चला जाता है, किन्तु उत्तम चरित्र मनुष्य का जीवन भर साथ देता है। पाश्चात्य विद्वान् वूल्जे ने कहा है-“संसार में न तो धन का प्रभुत्व है और न बुद्धि का, प्रभुत्व होता है चरित्र और बुद्धि के साथ-साथ उच्च पवित्रता का प्रसिद्ध विचारक बारतोल की दृष्टि में, “सभी धर्म परस्पर भिन्न हैं, क्योंकि उनका निर्माता मनुष्य है; किन्तु चरित्र की महत्ता सर्वत्र एकसमान है, क्योंकि चरित्र ईश्वर बनाता है। वस्तुत: चरित्र उन प्रधान सद्गुणों में से है जिनकी वजह से मानव पशु से श्रेष्ठ समझा जाता है। चरित्रहीन मानव-जीवन पशु से भी अधम जीवन है। अतः मनुष्य के जीवन में चरित्र न केवल महत्त्वपूर्ण, बल्कि अपरिहार्य है।

2. चरित्र क्या है?- चरित्र की महत्ता एवं अपरिहार्यता निश्चय ही यह जिज्ञासा उत्पन्न करती है कि . ‘चरित्र’ क्या है ? बारतोल ने चरित्र की तुलना उस हीरे से की है जो सभी पत्थरों में अधिक मूल्यवान है, किन्तु चरित्र का प्रत्यक्ष सम्बन्ध क्योंकि मानव से है और मानव एक गतिशील, विवेकशील तथा सामाजिक प्राणी है; अत: यहाँ हम चरित्र के दार्शनिक एवं शैक्षिक पक्ष से सम्बन्धित हैं।

कुछ शिक्षाशास्त्री चरित्र का अर्थ आन्तरिक दृढ़ता और व्यक्तित्व की एकता से लगाते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि चरित्रवान् मनुष्य किसी बाहरी दबाव से भयभीत हुए बिना अपने सिद्धान्तों तथा आदर्शों के अनुरूप कार्य करता है, लेकिन उसके सिद्धान्त नैतिक और अनैतिक दोनों ही हो सकते हैं। अत: मात्र चरित्र ही पर्याप्त नहीं है, चरित्र को अनिवार्य रूप से नैतिक होना चाहिए। इस सन्दर्भ में हैण्डरसन लिखते हैं, “इसकी अर्थ यह है कि मनुष्यों को उन सिद्धान्तों के अनुसार काम करना सीखना चाहिए, जिनसे उनमें सर्वोत्तम व्यक्तित्व का विकास हो।” कुछ दार्शनिकों के अनुसार, चरित्र के दो मुख्य आधार-स्तम्भ हैं—नैतिकता एवं आध्यात्मिकता। नैतिक गुणों के अन्तर्गत सत्य, न्याय, ईमानदारी, दया, करुणा, सहानुभूति तथा प्रेम-भावना आदि आते हैं, जिनके समुचित विकास से व्यक्ति श्रेष्ठ एवं नैतिक आचरण करता हुआ सच्चरित्र बनता है। स्पष्टतः चरित्र-निर्माण के उद्देश्य में उत्तम नैतिकता का विकास भी समाहित है। इन समस्त गुणों को, सहज एवं स्वाभाविक रूप से, शैक्षिक प्रक्रिया के माध्यम से उपलब्ध किया जा सकता है।

3. नैतिक चरित्र- निर्माण में शिक्षा की उपयोगिता : सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दृष्टि-नैतिक चरित्र’ मानव का वास्तविक आभूषण है और शिक्षा समाज के लिए सभ्य एवं सुसंस्कृत नागरिक बनाने की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। अत: शिक्षा की प्रक्रिया में व्यक्ति के नैतिक चरित्र-निर्माण का उद्देश्य सहज रूप से समाविष्ट है। शिक्षा के माध्यम से नैतिक एवं चरित्रवान् व्यक्तियों का निर्माण कैसे हो ? यहाँ हम इस विचार-बिन्दु के सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक पक्ष का संक्षिप्त उल्लेख करेंगे

(i) वैदिक शिक्षा और चरित्र-निर्माण-वैदिक काल में शिक्षा का प्रधान उद्देश्य शिक्षार्थियों का चरित्र-निर्माण करना था। मनुस्मृति में सच्चरित्र व्यक्ति को विद्वान् से ऊँचा माना गया है-“उस वेदों के विद्वान् से जिसका जीवन पवित्र नहीं है, वह व्यक्ति कहीं अच्छा है जो सच्चरित्र है, किन्तु वेदों का कम ज्ञान रखता है।”

(ii) गुरुकुलों में चरित्र-निर्माण–प्राचीन समय में गुरुकुलों में चरित्र-निर्माण हेतु छात्रों में नैतिक प्रवृत्तियों का विकास, सदाचार का उपदेश, सद्पुरुषों के महान् आदर्शों का प्रस्तुतीकरण, आत्मसंयम व आत्मनियन्त्रण पर बल, शिक्षालयों का सरल एवं पवित्र वातावरण और कठोर अनुशासन में बँधी दिनचर्या का अभ्यास आदि के माध्यम से 25 वर्ष की अवस्था तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कराया जाता था।

(iii) भारतीय एवं पाश्चात्य शिक्षाशास्त्रियों का मत- आधुनिक भारत के यशस्वी विचारक स्वामी विवेकानन्द ने उत्तम चरित्र को शिक्षा का मुख्य मानदण्ड मानते हुए कहा है-“यदि आपने स्वच्छ विचारों को ग्रहण कर लिया है, उन्हें अपने जीवन और चरित्र का आधार बना लिया है तो आपने उस व्यक्ति से अधिक शिक्षा ग्रहण कर ली है जिसने सम्पूर्ण पुस्तकालय को कण्ठाग्र कर लिया है। पाश्चात्य जगत् के महान् विचारकों तथा दार्शनिकों ने भी बालक में सच्चरित्रता के विकास को सर्वोच्च महत्ता प्रदान की है। अरस्तू ने शिक्षा का उद्देश्य चरित्र-निर्माण बताया था। जॉन डीवी के अनुसार, “समस्त शिक्षा मानसिक और नैतिक चरित्र से सम्बन्धित है।’

(iv) विचारों का परिष्कार- व्यावहारिक दृष्टि से व्यक्ति का आचरण उसकी रुचियों द्वारा निर्धारित होता है और रुचियों का आधार व्यक्ति के अपने विचार होते हैं। बालक का सदाचरणं उसके विचारों की शुद्धता में निहित है। उत्तम चरित्र एवं आचरण का निर्माण विचारों में परिष्कार (सुधार) द्वारा सम्भव है, जिसके लिए अभीष्ट शिक्षा-प्रणाली की आवश्यकता है।

(v) पाठ्यक्रम द्वारा सदाचार की शिक्षा- विचारों में परिष्कार या सुधार लाने के लिए आवश्यक है कि विद्यालयों के पाठ्यक्रम में अच्छे संस्कार उपजाने वाले विषयों का समावेश किया जाए। धर्मशास्त्र, नैतिक शिक्षा, साहित्य, ललित कलाएँ तथा इतिहास आदि विभिन्न विषयों का ज्ञान बालकों के चरित्र-निर्माण में अधिक सहायक हो सकता है। ऐतिहासिक तथा धार्मिक चरित्रों; यथा-शिव, कृष्ण, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, शिवाजी, राजा हरिश्चन्द्र, श्रवण तथा सुभाषचन्द्र बोस का आदर्श प्रस्तुत कर बालक-बालिकाओं को सदाचारी बनने की प्रेरणा दी जा सकती है।

(vi) शिक्षक का आदर्श चरित्र-शिक्षक का व्यक्तित्व एवं चरित्र शिक्षार्थियों के लिए सबसे अधिक अनुकरणीय तथा प्रभावोत्पादक होता है। कक्षागत परिस्थितियों में शिक्षक-छात्र की अन्त:क्रियाएँ एक-दूसरे को अनेक प्रकार से प्रभावित करती हैं। अत: अनिवार्य रूप से शिक्षक को विषय का ज्ञाता, सरल-उदार एवं आदर्श चरित्र वाला तथा मानव-प्रेमी होना चाहिए।

शिक्षाविद् टी० रेमण्ट ने उचित ही कहा है, “अन्ततोगत्वा शिक्षा का उद्देश्य न तो शारीरिक शक्ति उत्पन्न करना है, न ज्ञान की पूर्ण प्राप्ति करना, न विचारधारा का शुद्धीकरण, बल्कि उसका उद्देश्य चरित्र को शक्तिशाली एवं उज्ज्वल बनाना है।”

शिक्षा के चरित्र-निर्माण के उद्देश्य की समीक्षा
(Evaluation of the Aim of Character-Formation by Education)

विभिन्न विद्वानों ने शिक्षा के चरित्र-निर्माण के उद्देश्य के पक्ष एवं विपक्ष में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए विश्व के प्राय: सभी दार्शनिकों, विचारकों तथा शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा-व्यवस्था के अन्तर्गत चरित्र-निर्माण तथा नैतिक विकास के उद्देश्य को एकमत से स्वीकार किया है। जहाँ एक ओर चरित्र-निर्माण के उद्देश्य के समर्थकों ने इसकी महत्ता तथा उपयोगिता की ओर समाज का ध्यान आकर्षित किया है, वहीं दूसरी ओर इसके आलोचकों ने इसे अपूर्ण, अव्यावहारिक, विवादास्पद, एकांगी तथा अमनोवैज्ञानिक सिद्ध किया है। यह सच है कि मात्र चरित्र-निर्माण की शिक्षा के बल पर ही मानवता का हित नहीं किया जा सकता। व्यक्ति एवं समाज के हित में चरित्र-निर्माण शिक्षा का एक अनुपम आदर्श अवश्य है, किन्तु शिक्षा का परम उद्देश्य नहीं है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आधुनिक युग में व्यावसायिक उद्देश्य की उपयोगिता एवं महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
या
शिक्षा का व्यावसायिक उद्देश्य शिक्षित बेरोजगारी को किस प्रकार समाप्त कर सकेगा ?
या
“शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य पर बल देने की आज देशहित में सख्त जरूरत है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
भारत के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शिक्षा का व्यावसायिक उद्देश्य’ अत्यधिक महत्त्व रखता है। स्पष्ट कीजिए।
या
शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य की उपयोगिता बताइट।
या
“शिक्षा जीविकोपार्जन के लिए है।” इस विचार से आप कहाँ तक सहमत हैं? तर्क सहित अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए।
या
“देश के वर्तमान परिदृश्य में शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।” स्पष्ट कीजिए।
या
शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य जीविकोपार्जन होना चाहिए।” क्यों?
उत्तर:

आधुनिक युग में शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य की उपयोगिता एवं महत्त्व
(Utility and Importance of Vocational Aims of Education in Modern Age)

आधुनिक युग में शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य की अत्यधिक उपयोगिता एवं महत्त्व है। अब यह माना जाने लगा है कि शिक्षा जीविकोपार्जन के लिए ही है। शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य के अनुसार, शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार से होनी चाहिए कि उसे प्राप्त करके व्यक्ति समाज द्वारा मान्यता प्राप्त किसी व्यवसाय का वरण कर सके। शिक्षा के व्यावसायिक अथवा जीविकोपार्जन सम्बन्धी उद्देश्य के महत्त्व एवं आवश्यकता का विवरण निम्नवत् है

  1. आधुनिक युग भौतिकवादी प्रतिस्पर्धा का युग है। आवश्यकताओं की कोई सीमा नहीं है और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संसाधन चाहिए। इसीलिए समूचा विश्व अधिक-से-अधिक भौतिक संसाधनों को इकट्ठा करने की होड़ में एक अन्तहीन दौड़, दौड़ रहा है। इस स्थिति में शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य का विशेष महत्त्व है।
  2. इस दौड़ में सफल होने के लिए वर्तमान और भावी पीढ़ियों को पर्याप्त शक्ति, स्फूर्ति, जागरूकता एवं प्रशिक्षण की जरूरत है। अत: प्रत्येक व्यक्ति को आत्मनिर्भरता एवं कार्यकुशलता विकसित करने की दृष्टि से अभीष्ट उत्पादन कार्य से जुड़ना होगा।
  3. देश के बालकों को उत्पादकता से जोड़ने का तात्पर्य उन्हें शिक्षा-प्रक्रिया के अन्तर्गत किसी उपयुक्त एवं अनुकूल उद्योग-धन्धे में प्रशिक्षण देने से है और यही शिक्षा का व्यावसायिक उद्देश्य है।
  4. जब व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त कर देश का प्रत्येक नागरिक आजीविका के क्षेत्र में आत्मनिर्भर • बनेगा तो उसके व्यक्तिगत जीवन का सुख एवं शान्ति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समाज तथा राष्ट्र की प्रगति में अवश्य ही सहयोग प्रदान करेंगे। इस प्रकार व्यावसायिक उद्देश्य देश की प्रगति का निर्धारक है।
  5. इस उद्देश्य को स्वीकार कर राष्ट्रीय स्तर पर बेरोजगारी की ज्वलन्त समस्या का भी समाधान होगा। उल्लेखनीय रूप से बेरोजगारी, निर्धनता तथा भुखमरी आदि के कारण समाज में अनैतिक कार्य बढ़ते हैं, जिनका अन्त व्यावसायिक शिक्षा द्वारा ही हो सकता है। स्पष्टतः आधुनिक भारत की वर्तमान परिस्थितियों में शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य का वैयक्तिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय स्तर पर विशेष महत्त्व है। वर्तमान समय में हमारे देश में शिक्षित बेरोजगारी की जो गम्भीर समस्या है उस समस्या के निवारण के लिए शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को प्राथमिकता देनी होगी। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अब सामान्य रूप से यह माना जाने लगा है कि शिक्षा जीविकोपार्जन के लिए ही है।

प्रश्न 2.
शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य से क्या आशय है ?
उत्तर:

शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य
(Aim of Completion in Education Life)

शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य का अर्थ यह है कि शिक्षा के माध्यम से जीवन के सभी अंगों या पक्षों का विकास किया जाए ताकि व्यक्ति का जीवन पूर्णता की ओर बढ़ सके। व्यक्ति का सर्वांगीण विकासे उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र और परिस्थिति के लिए तैयार कर देता है। इस भाँति, जीवन के विविध पक्षों से ।। सम्बन्धित ज्ञान से युक्त मानव समाज में अपने अधिकार और कर्तव्यों के प्रति सजग हो जाता है। वह भली प्रकार जानता है कि उसे स्वयं अपने लिए, मित्रों, समुदाय तथा राष्ट्र के लिए क्या-क्या कार्य करने हैं। शिक्षा उसे जीवन के समस्त क्रिया-कलापों को सफलतापूर्वक करने के लिए पूरी तरह तैयार कर देती है। इस उद्देश्य के प्रणेता एवं प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री हरबर्ट स्पेन्सर का कथन है, “शिक्षा को हमें पूर्ण जीवन के नियमों और ढंगों से परिचित कराना चाहिए। शिक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य हमें जीवन के लिए इस प्रकार तैयार करना है कि हम उचित प्रकार का व्यवहार कर सकें और शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा का सदुपयोग कर सकें।”

शिक्षा की प्रक्रिया के अन्तर्गत जीवन की पूर्णता के उद्देश्य की पर्याप्त आलोचना-प्रत्यालोचना हुई है। इसके समर्थन एवं विरोध में विद्वानों ने अनेकानेक तर्क प्रस्तुत किए हैं। उद्देश्य के पक्षधरों की दृष्टि में यह शिक्षा का एक सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य है, जब कि आलोचकों ने इसे संकीर्ण, अमनोवैज्ञानिक, अपूर्ण तथा अव्यावहारिक उद्देश्य बताया है। आलोचकों का एक प्रमुख तर्क यह भी है कि शिक्षा में नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की अवहेलना कर मानव-निर्माण की बात करना एकांगी तथा निर्मूल विचार है, लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि हरबर्ट स्पेन्सर महोदय ने पूर्ण जीवन के उद्देश्य का प्रतिपादन करते समय कहीं भी बालक के चारित्रिक एवं आध्यात्मिक पक्षों के विकास का विरोध नहीं किया है। निष्कर्षत: जीवन की पूर्णता के उद्देश्य के अन्तर्गत यदि हम मानव-जीवन के सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक पक्षों को भी सम्मिलित कर लें तो शिक्षा का पाठ्यक्रम सर्वांगी तथा सर्वोत्कृष्ट बन जाएगा।

प्रश्न 3.
शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य के पक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्को का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य’ के पक्ष में तर्क
(Arguments in Favour of Aims of Completion in Education Life)

शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य के पक्ष में मुख्य रूप से निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए गए हैं–

  1. सर्वांगीण एवं व्यापक उद्देश्य- जीवन की पूर्णता का उद्देश्य स्वयं में जीवन के सभी पक्षों को समाहित किए हुए है। यह एकांगी व संकीर्ण न होकर सर्वांगीण व्यापक उद्देश्य है तथा हर प्रकार से श्रेष्ठ है।
  2. समूचे व्यक्तित्व का विकास- इस उद्देश्य के अन्तर्गत मानव व्यक्तित्व के सभी पक्षों का विकास निहित है।
  3. हर परिस्थिति के लिए उपयुक्त-मनुष्य को जीवन में अनेक प्रकार के कार्य करने पड़ते हैं। यह उद्देश्य उसे हर परिस्थिति में जीने के लिए तैयार करता है तथा सभी कार्यों हेतु उपयुक्त बनाता है। स्वयं स्पेन्सर ने लिखा है, “जिस प्रकार एक घोड़ा अपनी आदतों, माँग, शक्ति और गति के अनुसार कभी गाड़ी खींचने के लिए और कभी दौड़ में दौड़ने के लिए प्रयोग किया जाता है, उसी प्रकार मानव-शक्तियों को सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार पूर्ण रूप से उपयोगी बनाया जाना चाहिए।’
  4. प्राथमिक आवश्यकताओं पर बल-जीवन की पूर्णता का उद्देश्य मानव-जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करने पर बल देता है। इस विषय में ग्रीब्ज़ कहते हैं, “हरबर्ट स्पेन्सर विज्ञानों और जीवन की एक नई योजना की सिफारिश करती है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति सम्बन्धित मूल्यों के अनुसार सब प्रकार के लाभों का आनन्द लेता है।”
  5. मूल्यवान् तत्त्वों पर ध्यान इस उद्देश्य से प्रेरित शिक्षा-पद्धति में वैज्ञानिकता, उपयोगिता तथा सामाजिकता आदि सभी मूल्यवान् तत्त्वों पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है।
  6. जीवनोपयोगी विषयों का समावेश- इस उद्देश्य के अन्तर्गत मानव-जीवन के लिए उपयोगी प्रायः सभी विषयों; जैसे—साहित्य, सामाजिक शास्त्र, मनोविज्ञान, गृहशास्त्र, विज्ञान तथा कलाओं का समावेश किया गया है।
  7. सभी उद्देश्यों की पूर्ति- जीवन की पूर्णता का उद्देश्य शिक्षा के अन्य सभी उद्देश्यों की पूर्ति कर देता है। उद्देश्य के समर्थन में शेरवुड ऐंडरसन ने लिखा है, “व्यक्ति को जीवन की विभिन्न समस्याओं के लिए तैयार करना शिक्षा का पूर्ण उद्देश्य है या होना चाहिए।”

प्रश्न 4.
शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य के विपक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य के विपक्ष में तर्क
(Arguments Against Aims of Completion in Education Life)

शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य के विपक्ष में मुख्य रूप से निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए गए हैं—

  1. अनिश्चित एवं विवादग्रस्त- यह निश्चित करना ही कठिन है कि जीवन की पूर्णता क्या है ? विभिन्न विचारकों और दार्शनिकों ने जीवन की पूर्णता के विषय में विभिन्न मत प्रतिपादित किए हैं। ऐसे गम्भीर विषय को अनिश्चित एवं विवादग्रस्त विचारों, अनुमानों या अटकलबाजियों द्वारा भली प्रकार नहीं समझा जा सकता।
  2. अध्यात्म एवं नैतिकता की उपेक्षा- यह उद्देश्य पूरी तरह से लौकिक है, क्योंकि हरबर्ट स्पेन्सर ने इसमें अध्यात्म तथा नैतिकता को कोई स्थान नहीं दिया है। अध्यात्म एवं नैतिकता मानव की भावनाओं से जुड़े जीवन के अति महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं, जिनकी किसी भी प्रकार उपेक्षा नहीं की जा सकती। नैतिकता एवं अध्यात्म में प्रतिष्ठित व्यक्ति का जीवन ही भीतर से पवित्र एवं समृद्ध हो सकता है और ऐसा जीवन ही वास्तव में पूर्णता को प्राप्त होता है।
  3. अमनोवैज्ञानिक पाठ्यक्रम- जीवन की पूर्णता के उद्देश्य की प्राप्ति हेतु सुनिश्चित पाठ्यक्रम अमनोवैज्ञानिक है। विषयों के चुनाव को क्रम सर्वथा मानव-मन के प्रतिकूल है। इसके अलावा पाठ्यक्रम के अध्ययन विषय भी बालकों की स्वतन्त्र रुचियों तथा प्रवृत्तियों से मेल नहीं खाते।
  4. बालक के भविष्य की चिन्ता नहीं-हरबर्ट स्पेन्सर द्वारा प्रतिपादित इस उद्देश्य में सिर्फ वर्तमान को ही ध्यान में रखा गया और बालक के भविष्य की चिन्ता नहीं की गई है। सच तो यह है कि मानव-जीवन का वास्तविक एवं एकमात्र उद्देश्य सांसारिक सुखों को प्राप्त करना ही नहीं है, बल्कि दूसरे अर्थात् पारलौकिक जीवन के लिए तैयार होना भी है।
  5. सीमित एवं संकीर्ण-अनेक विद्वानों ने जीवन की पूर्णता के उद्देश्य को शिक्षा के अभीष्ट एवं व्यापक लक्ष्य से हटकर अपूर्ण, सीमित एवं संकीर्ण मनोवृत्ति का द्योतक बताया है।
  6. शैक्षिक आदर्श के प्रतिकूल-जीवन की पूर्णता का उद्देश्य शिक्षा के उच्च एवं सर्वमान्य आदर्शों के इसलिए प्रतिकूल है, क्योंकि इसके अन्तर्गत शिक्षा-योजना में दूसरे विषयों की अपेक्षा कला एवं साहित्य को गौण स्थान दिया गया। साहित्य, कला एवं संगीत की शिक्षा मानव को सभ्य तथा सुसंस्कृत बनाती है, जिसके अभाव में मनुष्य जंगली हो जाएगा।
  7. अव्यावहारिक तथा भ्रामक बालक के वर्तमान तथा आभ्यन्तर की उपेक्षा करने वाली शिक्षा कभी सम्मान के योग्य नहीं हो सकती। यह कथन सर्वथा भ्रामक, अव्यावहारिक तथा असंगत है कि इस उद्देश्य के माध्यम से समस्त उद्देश्यों की प्राप्ति हो सकती है।

प्रश्न 5.
शिक्षा के ‘शारीरिक विकास के उद्देश्य से क्या आशय है ?
उत्तर:

शिक्षा के शारीरिक विकास के उद्देश्य’ का अर्थ
(Meaning of ‘Physical Development’s Aims of Education)

मनुष्य के जीवन के तीन विशिष्ट पक्ष हैं- शरीर, मन और आत्मा। शरीर, मन एवं आत्मा का आधार है और इसीलिए महत्त्वपूर्ण है। कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क रहता है; अत: प्रत्येक देश और काल के अन्तर्गत शारीरिक विकास को शिक्षा का अनिवार्य तथा श्रेष्ठ उद्देश्य माना गया है। शारीरिक विकास के उद्देश्य के पक्षधरों ने ऐसी शिक्षा-व्यवस्था का समर्थन किया है जो बालक को शरीर स्वस्थ, सुन्दर तथा बलशाली बनाने पर विशेष ध्यान देती है।

प्राचीन समय से ही, बहुत-से देशों में, शारीरिक विकास पर पर्याप्त बल दिया गया। लोग आज भी यूनान स्थित स्पार्टा राज्य के वीरों की शौर्य गाथाएँ चाव से सुनते-सुनाते हैं, क्योंकि उस काल में शारीरिक विकास ही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य था। विश्व प्रसिद्ध विचारक प्लेटो तथा रूसो ने अपनी शिक्षा-योजना में शारीरिक विकास को मुख्य स्थान दिया। रूसो का कथन है, शारीरिक शक्ति से ही व्यक्ति स्फूर्तिवान् और क्रियाशील बनता है। मनुष्य स्वस्थ शरीर लेकर ही अपने जीवन, परिवार एवं समाज की आवश्यकताएँ पूरी कर सकता है। निर्बल शरीर वाला व्यक्ति न तो अपने अस्तित्व की रक्षा कर सकता है और न दूसरों की ही। इसके अतिरिक्त, वही राष्ट्र शक्तिशाली कहा जाता है जिसके नागरिक शारीरिक रूप से बलवान् होते हैं। शारीरिक विकास के समर्थन में रेबेले ने ठीक ही कहा है, “स्वास्थ्य के बिना जीवन, जीवन नहीं है। यह केवल स्फूर्तिहीनता तथा वेदना की दशा है, मृत्यु का प्रतिरूप है।”

प्रश्न 6.
शिक्षा के शारीरिक विकास के उद्देश्य के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के शारीरिक विकास के उद्देश्य’ के पक्ष में तर्क :
(Arguments in Favour of ‘Physical Development’s Aims of Education)

शारीरिक विकास के उद्देश्य के समर्थन में विभिन्न विचारकों द्वास निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए गए हैं

  1. सफलता की कुंजी-स्वस्थ शरीर में मानव-जीवन की सफलता का रहस्य निहित है। शारीरिक शक्ति से मनुष्य स्फूर्तिमान, उत्साही एवं क्रियाशील बना रहता है। वह लगातार काम करने की क्षमता रखता है। और अपने कार्यों में सफलता प्राप्त करता है। शारीरिक विकास का उद्देश्य सफल जीवन की कुंजी है।
  2. मानसिक विकास का आधार- शारीरिक विकास, मानसिक विकास का आधार है। अनेक मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि कमजोर शरीर मानसिक रोगों को घर बन जाता है। कहते हैं। दुर्बलता दुष्टता को जन्म देती है।” अत: चिन्तन, कल्पना, स्मरण तथा सृजन आदि मानसिक शक्तियों के विकास हेतु स्वस्थ एवं हृष्ट-पुष्ट शरीर एक पूर्व आवश्यकता है।
  3. सामाजिक गुणों की अभिवृद्धि- उत्तम स्वास्थ्य से युक्त व्यक्ति सद्गुणों को प्राप्त करता है। स्वस्थ शरीर चारित्रिक, नैतिक एवं सामाजिक गुणों की अभिवृद्धि में सहायक है। डॉ० जानसन कहते हैं, “स्वास्थ्य को बनाए रखना नैतिक और धार्मिक कर्तव्य है, क्योंकि स्वास्थ्य ही सब सामाजिक गुणों का आधार है।” इसलिए शारीरिक विकास का उद्देश्य प्रशंसनीय है।
  4. वैयक्तिक एवं राष्ट्र का हित- इस उद्देश्य में व्यक्ति एवं राष्ट्र, दोनों का हित समाहित है। शारीरिक विकास से व्यक्ति में शक्ति का संचार होता है और व्यक्तियों की शक्ति से राष्ट्र बलशाली होता है। अतः वैयक्तिक एवं राष्ट्रीय उत्थान की दृष्टि से शारीरिक विकास का उद्देश्य सर्वमान्य है।

प्रश्न 7.
शिक्षा के ‘शारीरिक विकास के उद्देश्य के विपक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के शारीरिक विकास के उद्देश्य के विपक्ष में तर्क
(Arguments Against ‘Physical Developments Aims’ of Education)

कुछ विद्वानों ने शारीरिक विकास के उद्देश्ये, की निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर आलोचना की है

  1. एकांगी उद्देश्य- शारीरिक विकास को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य मानकर चलने से शिक्षा का स्वरूप एकांगी हो जाएगा और इससे बालक के सर्वांगीण विकास में बाधा पहुँचेगी।
  2. पाशविक प्रवृत्तियों को बल- शारीरिक शक्ति पर आवश्यकता से अधिक जोर देने के भयंकर दुष्परिणाम देखने में आए हैं। इस उद्देश्य के अन्तर्गत बालक की पाशविक प्रवृत्तियाँ बलशाली हो उठती हैं, जिससे चारित्रिक, नैतिक एवं मानवीय गुणों का विकास बाधित होता है। इस दृष्टि से शारीरिक उद्देश्य अनुचित है।।
  3. संकीर्ण एवं अपूर्ण उद्देश्य- शिक्षा में शारीरिक विकास का उद्देश्य एक संकीर्ण अधूरा उद्देश्य है। सिर्फ शारीरिक शक्ति, पौरुष एवं बल अर्जित करना ही मानव-जीवन का ध्येय नहीं है। मानव-जीवन का चरम लक्ष्य एवं आदर्श तो जनसेवा के माध्यम से मोक्ष या विमुक्ति है। उपर्युक्त तर्कों के आधार पर विद्वानों ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा के शारीरिक विकास के उद्देश्य को एकमात्र उद्देश्य स्वीकार कर लेना उचित नहीं है।

प्रश्न 8.
शिक्षा के सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य से क्या आशय है ?
उत्तर:

शिक्षा के सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य का अर्थ
(Meaning of Cultural Development of Education)

विश्व के अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा के सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य का विशेष महत्त्व प्रतिपादित किया है। सांस्कृतिक उद्देश्य के समर्थकों के मतानुसार, शिक्षा मानव और उसके समाज के सांस्कृतिक उत्थान की सतत प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत मानव साहित्यिक, कलात्मक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अनुभव प्राप्त करता हुआ अपने समुदाय का सभ्य एवं सुसंस्कृत नागरिक बनता है। जो देश, समाज या जाति सांस्कृतिक रूप से जितना उन्नत होती है, जीवन की दौड़ में वह उतना ही आगे बढ़ जाती है।

शिक्षा के सांस्कृतिक उद्देश्य का अर्थ भली प्रकार से समझने के लिए संस्कृति शब्द पर ध्यान देना आवश्यक है। संस्कृति से अभिप्राय है-‘सुधरा हुआ’, ‘परिमार्जित’ या ‘परिष्कृत’। संस्कृति व्यक्ति के ज्ञान, आस्था, विश्वास, रीति-रिवाज, परम्परा, विचारधारा, व्यवहार, रहन-सहन, जीवन-मूल्य एवं आदर्श, साहित्य, कला और भौतिक उपलब्धियों आदि का ऐसा सुन्दर व सन्तुलित समाहार है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होता रहता है। ई० बी० टायलर के अनुसार, संस्कृति वेह जटिल समग्रता है जिसमें ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, प्रथा तथा अन्य योग्यताएँ व आदतें सम्मिलित होती हैं, जिनको मनुष्य समाज के सदस्य के रूप में प्राप्त करता है। शिक्षा का कार्य व्यक्ति का विकास करना है, ताकि वह अपने चिन्तन, आचरण एवं व्यवहार को परिमार्जित और परिष्कृत कर सके। इस सन्दर्भ में ओटावे का कथन है, “शिक्षा का एक कार्य समाज के सांस्कृतिक मूल्यों और व्यवहार के प्रतिमानों को अपने तरुण व शक्तिशाली सदस्यों को प्रदान करना है।” बालक पर अच्छे संस्कारों का प्रभाव उसके जीवन को अद्भुते, तेजवान् और कल्याणमय बनाता है।

प्रश्न 9.
शिक्षा के सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य के पक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्को का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य के पक्ष में तर्क
(Arguments in Favour of ‘Cultural Development’s Aims’ of Education)

शिक्षा के सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य के पक्ष में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए गए हैं

  1. सन्तुलित शिक्षा- संस्कृति मानव-जीवन के बाह्य (भौतिक) तथा आन्तरिक (आध्यात्मिक) दोनों ही पक्षों को प्रेरित एवं विकसित करती है। भौतिक दृष्टि से यह मनुष्य के उच्च विचारों, रुचियों, सौन्दर्यानुभूति तथा कलात्मक शक्तियों को प्रेरणा देती है।
  2. अनुभवों से ज्ञान- संस्कृति के अन्तर्गत वे सभी अनुभवं सम्मिलित होते हैं जो मनुष्य जाति ने आदिकाल से अब तक प्राप्त किए हैं। शिक्षा प्रक्रिया के माध्यम से इन अनुभवों को न केवल सुरक्षा मिलती है, बल्कि इनका अधिकतम उपयोग भी होता है। शिक्षा का यह उद्देश्य अनुभवों द्वारा ज्ञान देने का प्रबल पक्षधर
  3. पाशविक वृत्तियों का शोधन- संस्कृति का अर्थ ही परिष्कार या शोधन है। संस्कृति द्वारा मनुष्य की पाशविक वृत्तियों का दमन व शोधन होता है और इस प्रकार उसमें दिव्य मानवीय गुणों का विकास होता है।
  4. जीवनोपयोगी उद्देश्य- शिक्षा के अन्तर्गत सांस्कृतिक विकास का उद्देश्य जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा उपयोगी विचार है। विभिन्न विद्वानों ने इसका समर्थन किया है। महात्मा गांधी के अनुसार, संस्कृति ही मानव-जीवन की आधारशिला एवं प्रमुख वस्तु है। यह आपके आचरण और व्यक्तिगत व्यवहार की छोटी-से-छोटी बात में व्यक्त होनी चाहिए।’ संस्कृति के उपर्युक्त महत्त्वों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न विद्वानों ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य सांस्कृतिक विकास होना चाहिए।

प्रश्न 10.
शिक्षा के सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य के विपक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्कों का उल्लेख 
कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य के विपक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्क
(Arguments Against ‘Cultural Development Aims’ of Education)

इसके विपक्ष में मुख्य रूप से निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए गए हैं—

  1. भ्रामक एवं अक्षम उद्देश्य-संस्कृति’ शब्द आज भी इतना अस्पष्ट, भ्रामक तथा जटिल है कि इसके उपादानों के बारे में कोई सुनिश्चित विचार प्रकट करना प्रायः असम्भव है। उधर समाज में सबसे अधिक सांस्कृतिक रूप से विकसित लोग भी चिन्ताओं, तनावों तथा सन्देहों के शिकार हैं। सच तो यह है कि संस्कृति मानव-मात्र को जीवन के चरम आदर्श एवं मूल्यों को उपलब्ध कराने में पूरी तरह असक्षम रही है। अतः सांस्कृतिक विकास को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य नहीं बनाया जा सकता।
  2. अमनोवैज्ञानिक-सांस्कृतिक उद्देश्य से प्रेरित शिक्षा- प्रणाली बालक की रुचियों, अभिरुचियों, आदतों तथा भावनाओं का दमन करके उसे केवल सांस्कृतिक प्रतिमानों के अनुसार कार्य करने के लिए। विवश करती है। यह उद्देश्य बालक के स्वतन्त्र विकास में बाधक है और पूर्णत: अमनोवैज्ञानिक है। टी० पी० नन कहते हैं, “राष्ट्रीय रीति-रिवाजों का स्थायीपन वैयक्तिक जीवन को एक तुच्छ वस्तु बना देता है।”
  3. रचनात्मक शक्तियाँ कुण्ठित- बालक की रचनात्मक शक्तियाँ ही उसकी उन्नति की वास्तविक आधारशिला हैं। शिक्षा का सांस्कृतिक पक्ष अपने पुरातन एकरूप तथा स्थायी स्वरूप के कारण शिक्षार्थी की रचनात्मक प्रवृत्तियों को कुण्ठित कर देता है। इसके परिणामस्वरूप बालक अपनी रचनात्मक क्षमताओं का उपयोग भविष्य के निर्माण में नहीं कर पाता।।
  4. संकुचित दृष्टिकोण- शिक्षा का सांस्कृतिक उद्देश्य बार-बार अपने अतीत को दोहराकर कोई विस्तृत एवं सन्तुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत नहीं करता। इसके साथ ही वर्तमान में नव-स्फूर्ति उत्पन्न करने के बजाय यह बीते समय की अरुचिकर एवं अर्थहीन बातों पर ध्यान देता है। स्पष्टतः यह एक संकुचित दृष्टिकोण है।
  5. भावी जीवन की तैयारी नहीं- सांस्कृतिक उद्देश्य बालक को भावी जीवन के लिए तैयार करने में असमर्थ है। संगीत, साहित्य, कला, धर्म, प्रथाओं तथा रीति-रिवाजों की शिक्षा से रोटी-रोजी की समस्या हल नहीं होती। इस तरह यह आजीविका की समस्या का कोई समाधान नहीं करती। वस्तुत: शिक्षा के उद्देश्य द्वारा बालक में वे समस्त क्षमताएँ विकसित की जानी चाहिए जो उसे जीवन के संघर्षों से लोहा लेने की शक्ति तथा साहस दे सकें।

प्रश्न 11.
शिक्षा के ‘अवकाश के सदुपयोग के उद्देश्य से क्या आशय है ?
उत्तर:

शिक्षा के ‘अवकाश के सदुपयोग के उद्देश्य’ का अर्थ
(Meaning of ‘Aims of Good use of Vacations’ of Education)

मनुष्य के जीवन में अवकाश का विशेष महत्त्व है। अवकाश के सदुपयोग से अभिप्राय व्यक्ति द्वारा स्वयं को खाली समय में किसी सुरुचिपूर्ण कार्य में व्यस्त रखना है ताकि उसे आनन्द, शक्ति एवं उत्साह मिल सके। इस उद्देश्य के समर्थक विद्वान् मानते हैं कि प्रत्येक मनुष्य चाहे वह बच्चा हो, युवक-युवती, प्रौढ़ अथवा वृद्ध हो अपने दैनिक कार्यों के बाद पर्याप्त अवकाश (खाली समय) रखता है। इस समय का सदुपयोग करने की दृष्टि से शिक्षा की आवश्यकता होती है। इधर आधुनिक युग में विज्ञान एवं तकनीकी की प्रगति ने मनुष्यों के अवकाश की अवधि बढ़ा दी है। आज कम्प्यूटर तथा रोबोट का समय है। प्रायः सभी मशीनें पूर्णत: स्वचालित हैं, जो न्यूनतम समय में अधिकतम उत्पादन कर काफी समय बचाती हैं। शिक्षा इस खाली समय को काटने का एक सशक्त साधन है। यही कारण है कि अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ‘व्यक्ति को समय का सदुपयोग सिखाना’ स्वीकार किया है।

प्रश्न 12.
शिक्षा के ‘अवकाश के सदुपयोग के उद्देश्य के पक्ष में प्रस्तुत किए गए तक का उल्लेख 
कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के ‘अवकाश के सदुपयोग के उद्देश्य’ के पक्ष में तर्क
(Arguments in Favour of ‘Aim of Good Use of Vacation’ Education)

अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा को अवकाश के सदुपयोग से जोड़ते हुए इस उद्देश्य के समर्थन में अपने विचार प्रकट किए हैं। ये विचार इस प्रकार हैं

  1. समय का सदुपयोग कहते हैं ‘खाली मस्तिष्क शैतान का घर है। यदि व्यक्ति अवकाश-काल में मस्तिष्क का उपयोग स्वस्थ एवं उपयोगी कार्यों में नहीं करेगा, तो निश्चय ही वह उसे लड़ाई-झगड़ों, मद-व्यसन तथा समाज-विरोधी कार्यों में व्यतीत करेगा। इस उद्देश्य का सबसे पहला कर्तव्य शिक्षा द्वारा व्यक्ति को समय का सदुपयोग सिखाना है।
  2. सृजनात्मक शक्ति का विकास-इस उद्देश्य से अभिप्रेरित लोग अवकाश के समय सृजनात्मक कार्यों में लगे रहते हैं। इसके परिणामस्वरूप जहाँ एक ओर व्यक्तियों की रचनात्मक शक्ति का विकास होता .. है, वहीं दूसरी ओर समाज की भी प्रगति होती है।
  3. स्वास्थ्य एवं स्फूर्ति-कार्यरत व्यक्ति का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहता है। अवकाश के सदुपयोग से मनुष्य के जीवन में स्फूर्ति, शक्ति व गतिशीलता बनी रहती है।
  4. शिक्षण के साथ मनोरंजन भी- शिक्षा से लोगों का समय बरबाद नहीं होता। खाली समय को रुचिपूर्ण पढ़ाई-लिखाई में व्यतीत कर वे शिक्षण के साथ-साथ अपना मनोरंजन भी करते हैं।
  5. कला एवं सौन्दर्यानुभूति का विकास- शिक्षा का यह उद्देश्य जीवन में कलाओं को प्रोत्साहित करता है, जिसके साथ मनुष्य में सौन्दर्यानुभूति को विकास भी होता है। साहित्य, संगीत, ललित कलाएँ तथा प्रकृति-प्रेम द्वारा मस्तिष्क ताजा एवं सक्रिय होता है। अतः सभी प्रकार से अवकाश के सदुपयोग का उद्देश्य महत्त्वपूर्ण तथा लाभकारी है।

प्रश्न 13.
शिक्षा के अवकाश के सदुपयोग के उद्देश्य के विपक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्को का उल्लेख 
कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के ‘अवकाश के सदुपयोग के उद्देश्य के विपक्ष में तर्क
(Arguments Against ‘Aims of Good Use of Vacation of Education)

शिक्षा के अवकाश के सदुपयोग सम्बन्धी उद्देश्य के विपक्ष में प्रस्तुत किए गए मुख्य तर्क निम्नलिखित

  1. संकुचित उद्देश्य- शिक्षा का यह उद्देश्य संकुचित है। आलोचकों के अनुसार शिक्षा की आवश्यकता सिर्फ उन लोगों को है जिनके पास खाली समय होता है। इस दृष्टि से निरन्तर काम में व्यस्त रहने वाले लोगों को शिक्षा की आवश्यकता ही नहीं है।
  2. धनी एवं विशेष वर्ग तक सीमित-इस उद्देश्य के अनुसार, शिक्षा समाज के धनी और विशिष्ट वर्ग तक ही सीमित रह जाएगी। किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में शिक्षा प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है।
  3. शिक्षा सभी कार्यों के लिए शिक्षा का उद्देश्य प्रत्येक बालक को जीवन के लिए उपयोगी तथा सभी कार्यों के लिए योग्य बनाना है। यह एकमात्र अवकाश काल के लिए ही नहीं है।
  4. अवकाश का उपयोग सन्देहास्पद-शिक्षा के अन्तर्गत अवकाश हेतु प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति अवकाश का सदुपयोग करेगा भी या नहीं, यह एकदम सन्देहास्पद है। उपर्युक्त तक के आधार पर कहा गया है कि अवकाश के सदुपयोग के उद्देश्य’ को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य निर्धारित करना उचित नहीं है।

अतिलघु उत्तरीय प्रत

प्रश्न 1.
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्यों के क्या लाभ हैं?
उत्तर:
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य समाज के हितों के अनुकूल होते हैं। इन उद्देश्यों के अनुसार की गई शिक्षा-व्यवस्था के परिणामस्वरूप व्यक्ति सामाजिक मान्यताओं, आदर्शों एवं सद्गुणों को आत्मसात कर लेता है तथा समाज के अधिकतम उत्थान एवं विकास के लिए कार्य करता है। इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त । व्यक्ति राष्ट्रहितों को सर्वोपरि मानता है।

प्रश्न 2.
स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य साहित्य एवं कलाओं के विकास में बाधक है।
उत्तर:
मानव समाज में साहित्य एवं विभिन्न ललित कलाओं का विशेष महत्त्व है, परन्तु यदि शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य की अवहेलना करके उसके सामाजिक उद्देश्य को प्राथमिकता दी जाए तो उस स्थिति में साहित्य एवं अन्य कलाओं का समुचित विकास नहीं हो पाता। शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के अन्तर्गत व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, इच्छाओं एवं भावनाओं की उपेक्षा होने के कारण व्यक्तिगत प्रयासों पर ध्यान नहीं 
दिया जाता। साहित्य, कला तथा संगीत आदि का विकास तभी सम्भव है जब व्यक्ति स्वयं को अभिव्यक्त करने में स्वतन्त्र हो और उसे व्यक्तिगत प्रयासों के माध्यम से अनवरत अभ्यास करने की पूरी छूट हो। शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के अन्तर्गत यह छूट प्राय: उपलब्ध नहीं होती; अत: हम कह सकते हैं कि शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य साहित्य एवं कलाओं के विकास में बाधक है।

प्रश्न 3.
शिक्षा के व्यक्तिगत उद्देश्य से आप क्या समझते हैं?
या
टिप्पणी लिखिए-शिक्षा का वैयक्तिक उद्देश्य।
उत्तर:
शिक्षा के उस उद्देश्य को शिक्षा का व्यक्तिगत उद्देश्य माना जाता है, जिसमें शिक्षा की व्यवस्था इस ढंग से की जाती है कि उससे व्यक्ति की वैयक्तिकता का अधिक-से-अधिक विकास सम्भव है। इस उद्देश्य के अन्तर्गत बालक को स्वतन्त्र रूप से अपने सर्वांगीण विकास के अवसर प्रदान किए जाते हैं।

प्रश्न 4.
आपके विचार से क्या शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य माना जा सकता है ?
उत्तर:
शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य के अन्तर्गत व्यक्ति के विकास को प्राथमिकता दी जाती है तथा समाज के विकास की ओर प्राय: कोई ध्यान नहीं दिया जाता; अर्थात् उसकी अवहेलना ही की जाती है। शिक्षा के इस उद्देश्य को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य स्वीकार कर लेने की स्थिति में व्यक्ति में अहम् भाव का आवश्यकता से अधिक विकास हो जाने की आशंका रहती है। इस दशा में यह आशंका रहती है कि बालक उद्दण्ड न बन जाए। इन परिस्थितियों में कुछ बालक समाज-विरोधी कार्य भी कर सकते हैं। हमारा विचार है। कि यदि शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य को ही शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य स्वीकार कर लिया जाए तो बच्चों में सामाजिक सद्गुणों (अर्थात् सहयोग, सहानुभूति तथा सामाजिक एकता आदि) का समुचित विकास नहीं हो पाता। इन समस्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य नहीं माना जा सकता।

प्रश्न 5.
आपके विचार से क्या शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य माना जा 
सकता है ?
उत्तर:
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य की मान्यता शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य के विपरीत है। शिक्षा के इस उद्देश्य के अन्तर्गत समाज के अधिक-से-अधिक विकास को शिक्षा का लक्ष्य माना जाता है। इसके विपरीत, व्यक्ति के विकास को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। इसे सैद्धान्तिक मान्यता को स्वीकार कर लेने पर बालकों के कुण्ठाग्रस्त हो जाने की आशंका रहती है। शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य को प्राथमिकता प्रदान करने की स्थिति में संकीर्ण राष्ट्रीयता की भावना प्रबल हो जाती है तथा व्यापक मानवता की अवहेलना हो जाती है। यही नहीं, शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य को अनावश्यक महत्त्व देने की स्थिति में व्यक्ति के जीवन में संस्कृति, सौन्दर्य, कला, धर्म आदि का महत्त्व घट जाता है तथा इन महत्त्वपूर्ण मूल्यों की अवहेलना होने लगती है। इन समस्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य नहीं माना जा सकता।

प्रश्न 6.
शिक्षा के शारीरिक विकास के उद्देश्य का तटस्थ मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक शक्ति को मानसिक एवं आत्मिक शक्तियों से अधिक मूल्य देने से समाज में बलशाली व्यक्तियों का एकाधिकार हो जाएगा। शरीर से कमजोर लोगों पर अत्याचार होंगे और उन्हें अमानवीय यातनाओं व शोषण के दुष्चक्र से गुजरना होगा। निश्चय ही शिक्षा का यह उद्देश्य इस आधुनिक, सभ्य एवं सुसंस्कृत समाज को उस जंगली एवं पाषाण काल में पहुँचा देगा जहाँ से वर्तमान तक आने में कई युग लगे हैं। शरीर के साथ मनुष्य की बुद्धि, चरित्र, नैतिकता, आचरण एवं आत्मा का विकास भी होना चाहिए। डियो लेविस कहते हैं, “स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का निर्माण सबसे बड़ी सांसारिक समस्या और मानव-जाति की सबसे बड़ी आशा है। इस स्थिति में हम कह सकते हैं कि शारीरिक विकास भी शिक्षा का एक उद्देश्य होना चाहिए, परन्तु शारीरिक विकास को ही शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य स्वीकार नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 7.
“शिक्षा आत्मानुभूति है।” यदि ऐसा है, तो इसके क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य का समर्थन करने वाले विद्वानों ने शिक्षा के अर्थ एवं स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा है, शिक्षा आत्मानुभूति है। शिक्षा के इस स्वरूप को स्वीकार कर लेने पर व्यक्ति शिक्षा के माध्यम से अपनी निजी विशेषताओं का समुचित विकास कर सकता है। व्यक्ति की मुख्य निजी विशेषताएँ हैं-व्यक्ति की रुचियाँ, प्रवृत्तियाँ तथा विभिन्न आन्तरिक गुण। यदि व्यक्ति अपनी निजी विशेषताओं का समुचित विकास कर लेता है तो वह एक अच्छा नागरिक तथा अच्छा व्यक्ति बन सकता है। यही शिक्षा का प्रमुख लाभ होगा।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“शिक्षा अर्थपूर्ण और नैतिक क्रिया है। अतः यह कल्पना ही नहीं की जा सकती कि यह उद्देश्यहीन है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
रिवलिन का।

प्रश्न 2.
“उद्देश्यों के ज्ञान के अभाव में शिक्षक उस नाविक के समान है जो अपने लक्ष्य या मंजिल को नहीं जानता और बालक उस पतवारविहीन नौका के समान है जो तट से दूर कहीं बही जा रही है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
बी० डी० भाटिया का।

प्रश्न 3.
आपके अनुसार शिक्षा का कौन-सा उद्देश्य पूर्ण कहा जाएगा ?
उत्तर:
वास्तव में, शिक्षा का वही उद्देश्य पूर्ण कहा जाएगा जो व्यक्ति तथा समाज दोनों के हित में शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास की सतत प्रक्रिया का प्रेरक बन सके।

प्रश्न 4.
आधुनिक युग में मुख्य रूप से किन शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य कासमर्थन किया है ?
उत्तर:
आधुनिक युग में रूसो, फ्रॉबेल, पेस्टालॉजी तथा टी० पी० नन आदि शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य का समर्थन किया है।

प्रश्न 5 शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य की प्रमुख मान्यता क्या है ?
उत्तर:
शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य के अनुसार शिक्षा का प्रमुख कार्य व्यक्ति की निजी विशेषताओं का अधिकतम विकास करना प्रतिपादित किया गया है।

प्रश्न 6.
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के मुख्य प्रतिपादक कौन-कौन-से शिक्षाशास्त्री हैं?
उत्तर:
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के मुख्य प्रतिपादक शिक्षाशास्त्री हैं-हरबर्ट स्पेन्सर, जॉन डीवी, टी० रेमण्ट, प्रो० जेम्स तथा स्मिथ।

प्रश्न 7.
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य की प्रमुख मान्यता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के अनुसार शिक्षा का प्रमुख कार्य समाज का अधिकतम उत्थान एवं विकास करना प्रतिपादित किया गया है।

प्रश्न 8.
आपके विचार से वर्तमान परिस्थितियों में शिक्षा का कौन-सा उद्देश्य अधिक लोकप्रिय है?
उत्तर:
वर्तमान परिस्थितियों में शिक्षा का जीविकोपार्जन सम्बन्धी उद्देश्य अधिक लोकप्रिय है।

प्रश्न 9.
शिक्षा के व्यावसायिक अथवा जीविकोपार्जन सम्बन्धी उद्देश्य से क्या आशय है?
उत्तर:
शिक्षा के जीविकोपार्जन सम्बन्धी उद्देश्य के अनुसार शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार से होनी चाहिए कि उसे प्राप्त करके व्यक्ति समाज द्वारा मान्यता प्राप्त किसी व्यवसाय का वरण कर सके।

प्रश्न 10.
शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को समाज एवं राष्ट्र के लिए क्यों लाभकारी माना जाता है?
उत्तर:
शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को समाज एवं राष्ट्र के लिए लाभकारी माना जाता है, क्योंकि इस प्रकार की शिक्षा-व्यवस्था से समाज एवं राष्ट्र प्रगति के र्ग पर अग्रसर होता है।

प्रश्न 11.
देश में बेरोजगारी की समस्या किस प्रकार की शिक्षा द्वारा हल हो सकती है?
उतर:
देश में बेरोजगारी की समस्या को व्यावसायिक शिक्षा के द्वारा हल किया जा सकता है।

प्रश्न 12.
यदि शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को अधिक महत्त्व दिया जाता है तो समाज के अधिकांश 
व्यक्तियों का दृष्टिकोण कैसा हो जाता है?
उत्तर:
शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को अधिक महत्त्व देने से अधिकांश व्यक्तियों को दृष्टिकोण क्रमशः भौतिकवादी बन जाता है।

प्रश्न 13.
“मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता और सबसे बड़ा रक्षक चरित्र है, शिक्षा नहीं।” यह कथन किस विद्वान् का है ?
उत्तर:
यह कथन हरबर्ट स्पेन्सर का है।

प्रश्न 14.
शिक्षा के चरित्र-निर्माण सम्बन्धी उद्देश्य के विषय में आपका क्या विचार है ?
उत्तर:
व्यक्ति एवं समाज के हित में चरित्र-निर्माण शिक्षा का एक अनुपम उद्देश्य अवश्य है, किन्तु इसे शिक्षा का मुख्य एवं एकमात्र उद्देश्य नहीं माना जा सकता।

प्रश्न 15.
शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य का मुख्य रूप से प्रतिपादन किसने किया है ?
उत्तर:
शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य के मुख्य प्रतिपादक हैं-हरबर्ट स्पेन्सर।

प्रश्न 16.
शिक्षा का कौन-सा उद्देश्य सामाजिक कार्यक्षमता को सर्वाधिक महत्त्व देता है ?
उत्तर:
शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य सामाजिक कार्यक्षमता को सर्वाधिक महत्त्व देता है।

प्रश्न 17.
शिक्षा के ज्ञानार्जन सम्बन्धी उद्देश्य का समर्थन मुख्य रूप से किन विद्वानों ने किया है ?
उत्तर:
शिक्षा के ज्ञानार्जन सम्बन्धी उद्देश्य का समर्थन करने वाले मुख्य विद्वान् हैं—सुकरात, प्लेटो, अरस्तू, दान्ते तथा बेकन।

प्रश्न 18.
शिक्षा का कौन-सा उद्देश्य स्व-अनुभूति पर बहुत जोर देता है ?
उत्तर:
सामाजिक उद्देश्य।

प्रश्न 19.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य–

  1. सुकरात ने शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को ही शिक्षा का एक मात्र उद्देश्य माना था।
  2. शिक्षा के व्यक्तिगत विकास और सामाजिक विकास के उद्देश्य परस्पर विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं।
  3. प्राचीन भारत में शिक्षा का उद्देश्य भौतिक सुखों की प्राप्ति था।
  4. समाज में भौतिकवादी दृष्टिकोण के विकास के परिणामस्वरूप शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य का महत्त्व समाप्त हो गया है।
  5. यदि जीविकोपार्जन को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य स्वीकार कर लिया जाए तो उस दशा में शिक्षा साधन बन जाती है।

उत्तर:

  1. असत्य,
  2. सत्य,
  3. असत्य,
  4. असत्य,
  5. सत्य।

‘बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
“शिक्षा को उद्देश्य सुख प्राप्त करना है।” यह कथन किसका है?
(क) सुकरात को
(ख) प्लेटो का
(ग) अरस्तू का
(घ) मिल्टन का

प्रश्न 2.
प्राचीन भारत में शिक्षा को उद्देश्य क्या था ?
(क) भौतिक उन्नति
(ख) आध्यात्मिक उन्नति
(ग) राष्ट्रीय सेवा की प्राप्ति
(घ) नागरिकता का विकास

प्रश्न 3.
आधुनिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है:
(क) अवकाश का सदुपयोग
(ख) रोजगार की प्राप्ति।
(ग) सांस्कृतिक विकास
(घ) आध्यात्मिक विकास

प्रश्न 4.
शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य का प्रमुख गुण है
(क) व्यक्तिवाद को प्रोत्साहन।
(ख) पौरिवारिक संगठन को प्रोत्साहन
(ग) समाजवाद को बढ़ावा।
(घ) छात्रों के व्यक्तित्व का विकास

प्रश्न 5.
“समाजविहीन व्यक्ति कोरी कल्पना है।” यह कथन किसका है?
(क) हार्नी को
(ख) टी० रेमण्ट का
(ग) टी० पी० नन का
(घ) हरबर्ट स्पेन्सर का

प्रश्न 6.
शिक्षा के उद्देश्यों के सन्दर्भ में कौन-सा कथन सत्य है
(क) व्यक्तिगत विकास का उद्देश्य अधिक महत्त्वपूर्ण है।
(ख) शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य अधिक महत्त्वपूर्ण है।
(ग) शिक्षा के व्यक्तिगत और सामाजिक उद्देश्य परस्पर विरोधी हैं।
(घ) शिक्षा के व्यक्तिगत एवं सामाजिक उद्देश्य परस्पर पूरक हैं।

प्रश्न 7.
शिक्षा के किस उद्देश्य के अनुसार शिक्षा का मुख्य कार्य व्यक्ति को उचित व्यवसाय के वरण के योग्य बनाना है?
(क) शिक्षा का ज्ञानार्जन सम्बन्धी उद्देश्य
(ख) शिक्षा का जीवन की पूर्णता सम्बन्धी उद्देश्य
(ग) शिक्षा का व्यावसायिक उद्देश्य
(घ) शिक्षा का शारीरिक विकास सम्बन्धी उद्देश्य

प्रश्न 8.
“यदि व्यक्ति अपनी जीविका स्वयं नहीं कमा सकता तो वह दूसरों के काम पर जीवित रहने वाला अर्थात् परजीवी है और जीवन के बहुमूल्य अनुभव खो रहा है।”यह कथन किस शिक्षाशास्त्री का है?
(क) जॉन डीवी का
(ख) फ्रॉबेल का
(ग) मैडम मॉण्टेसरी को
(घ) महात्मा गांधी का

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन सामाजिक उद्देश्यों से सम्बन्धित नहीं है?
(क) परिवार
(ख) समाज
(ग) धर्म
(घ) राष्ट्र

प्रश्न 10.
शिंक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य मान लेने पर क्या लाभ है?
(क) समाज एवं राष्ट्र प्रगति कर सकता है।
(ख) व्यक्ति के लिए व्यवसाय का वरण सरल हो जाता है।
(ग) व्यक्ति सामान्य रूप से सक्रिय रहता है।
(घ) उपर्युक्त सभी लाभ हैं

प्रश्न 11.
शिक्षा के ‘शारीरिक विकास सम्बन्धी उद्देश्य’ को एकमात्र उद्देश्य मान लेने से क्या हानियाँ हैं?
(क) व्यक्ति की जीविकोपार्जन सम्बन्धी समस्या प्रबल रहती है।
(ख) व्यक्ति के चारित्रिक तथा आध्यात्मिक विकास की अवहेलना होती है।
(ग) व्यक्ति के कुछ महत्त्वपूर्ण पक्षों के विकास की अवहेलना होती है।
(घ) उपर्युक्त सभी हानियाँ हो सकती हैं।

प्रश्न 12.
शिक्षा में सामाजिक दक्षता का उद्देश्य किसने दिया है? या सामाजिक दक्षता का शैक्षिक उद्देश्य किसने दिया है?
(क) प्लेटो ने
(ख) सुकरात ने
(ग) रूसो ने
(घ) डीवी ने

प्रश्न 13.
शिक्षा के वैयक्तिक विकास के उद्देश्य के दो पक्ष हैं।
(क) आत्मानुभूति एवं आत्माभिव्यक्ति
(ख) आत्माभिव्यक्ति एवं आत्म-सम्मान
(ग) आत्मानुभूति एवं आत्मप्रधानता
(घ) आत्माभिव्यक्ति एवं आत्मप्रशंसा
उत्तर:

  1. (ग) अरस्तू का,
  2. (ख) आध्यात्मिक उन्नति,
  3. (ख) रोजगार की प्राप्ति,
  4. (घ) छात्रों के व्यक्तित्व का विकास,
  5. (ख) रेमण्ट का,
  6. (घ) शिक्षा के व्यक्तिगत एवं सामाजिक उद्देश्य परस्पर पूरक हैं,
  7. (ग) शिक्षा का व्यावसायिक उद्देश्य,
  8. (क) जॉन डीवी का,
  9. (क) परिवार,
  10. (घ) उपर्युक्त सभी लाभ हैं,
  11. (घ) उपर्युक्त सभी हानियाँ हो सकती हैं,
  12. (घ) डीवी ने,
  13. (क) आत्मानुभूति एवं आत्माभिव्यक्ति।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 16 Meaning, Scope, Utility and Importance of Educational Psychology

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 16
Chapter Name Meaning, Scope, Utility and Importance of Educational Psychology (शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ, क्षेत्र, उपयोगिता एवं महत्त्व)
Number of Questions Solved 57
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 16 Meaning, Scope, Utility and Importance of Educational Psychology (शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ, क्षेत्र, उपयोगिता एवं महत्त्व)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए।
या
शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट कीजिए एवं उसकी उपयोगिता की सविस्तार वर्णन कीजिए।
या
एक उपयुक्त परिभाषा द्वारा शिक्षा मनोविज्ञान के अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
या
“मनोविज्ञान आत्मा का विज्ञान है।” कैसे?
या
शिक्षा मनोविज्ञान का वास्तविक अर्थ प्रकट कीजिए।
या
मनोविज्ञान का अर्थ संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वर्तमान समय में शिक्षा मनोविज्ञान को अलग से एक विषय स्वीकार किया जा चुका है। शिक्षा मनोविज्ञान’ वास्तव में शिक्षा तथा मनोविज्ञान विषयों का एक सम्मिलित रूप है। अतः शिक्षा मनोविज्ञान की एक परिभाषा निर्धारित करने के लिए शिक्षा तथा मनोविज्ञान के अर्थ को अलग-अलग स्पष्ट करना प्रासंगिक ही है।

शिक्षा का अर्थ
(Meaning of Education)

1. शिक्षा का शाब्दिक अर्थ- शिक्षा के लिए अंग्रेजी में ‘Education’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। यह शब्द लैटिन भाषा के ‘Educatum’ नामक शब्द से बना है। यह शब्द ‘E’ और ‘Duco’ से मिलकर बना है। ई (E) का अर्थ है-‘अन्दर से’ तथा ड्यूको (Duco) का अर्थ है-आगे बढ़ना या अग्रसर करना। इस प्रकार एजूकेशन का शाब्दिक अर्थ व्यक्ति की आन्तरिक शक्तियों को बाहर की ओर अग्रसर करना हुआ। हिन्दी भाषा के ‘शिक्षा’ शब्द की उत्पत्ति ‘शिक्ष्’ धातु से मानी जाती है, जिसका अर्थ है-‘ज्ञानार्जन करना’ या ‘प्रकाशित करना। इस प्रकार शिक्षा मनुष्य के मस्तिष्क को प्रकाशित करती है।
उपर्युक्त शाब्दिक अर्थों से स्पष्ट है कि शिक्षा का अर्थ बालक के मस्तिष्क में बाहर से कुछ भरना नहीं है, वरन् उसमें जो शक्ति पहले से ही निहित है, उसी का अधिक विकास करना है।

2. शिक्षा का संकुचित अर्थ- संकुचित अर्थ में शिक्षा एक निश्चित स्थान, विद्यालय, कॉलेज या विश्वविद्यालय में प्रदान की जाती है। इस प्रकार संकुचित शिक्षा नियमित होती है तथा यह विद्यालय में सम्पन्न होती है। यह शिक्षा एक प्रकार से पुस्तक-प्रधान होती है।

3. शिक्षा का व्यापक अर्थ- डम्बिल ने विस्तृत शिक्षा की व्याख्या करते हुए लिखा है-“शिक्षा के व्यापक अर्थ में वे सभी कारक सम्मिलित किये जाते हैं, जो व्यक्ति पर उसके जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रभाव डालते हैं।” महात्मा गाँधी के अनुसार, शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक एवं मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा में निहित सर्वोत्तम शक्तियों का सर्वांगीण उद्घाटन है। इस प्रकार व्यापक अर्थ में शिक्षा जीवनभर चलने ” वाली प्रक्रिया है। समस्त विश्व ही शिक्षा संस्था है और बालक, किशोर, युवा तथा वृद्ध सभी विद्यार्थी हैं, जो जीवनभर कुछ-न-कुछ सीखते रहते हैं।

मनोविज्ञान का अर्थ
(Meaning of Psychology)

‘मनोविज्ञान’ शब्द को अंग्रेजी में साइकोलॉजी (Psychology) कहते हैं। यह शब्द यूनानी भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है–‘साइके’ (Psyche) तथा लोगास’ (Logas)। साइके का अर्थ है-“आत्मा’ तथा लोगास का अर्थ है-‘विज्ञान’। इस प्रकार ‘साइकोलॉजी’ का अर्थ हुआ ‘आत्मा का विज्ञान’ (Science of Soul) या’ आत्मा का अध्ययन’। परन्तु मनोविज्ञान के इस अर्थ को अब स्वीकार नहीं किया जाता है। मनोविज्ञान के अर्थ और स्वरूप में निरन्तर परिवर्तन होता रहा है। मनोविज्ञान के अर्थ को भली प्रकार समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि इसके रूप में किस प्रकार परिवर्तन हुआ। ये परिवर्तन निम्नलिखित शीर्षकों में वर्णित किये जा सकते हैं|

1. मनोविज्ञान आत्मा का विज्ञान- प्रारम्भ में मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान माना जाता था। प्लेटो और अरस्तू भी मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान मानते थे, परन्तु कोई दार्शनिक इस बात का उत्तर न दे सका कि आत्मा का स्वरूप क्या है? अत: सोलहवीं शताब्दी में मनोविज्ञान के इस अर्थ को अस्वीकार कर दिया गया।

2. मनोविज्ञान मन का विज्ञान- ‘आत्मा का विज्ञान की परिभाषा को अमान्य समझने के पश्चात् मनोविज्ञान को ‘मन या मस्तिष्क का विज्ञान’ (Science of Mind) समझा जाने लगा, परन्तु मनोविज्ञान के इस अर्थ को स्वीकार करने में भी कठिनाइयाँ आयीं। कोई भी विद्वान मन की प्रकृति और स्वरूप को निश्चित नहीं कर सका। दूसरे शब्दों में, कोई भी यह नहीं बता सका कि मन क्या है? उसका वैज्ञानिक अध्ययन किस प्रकार किया जा सकता है? अतः अस्पष्टता के कारण इस परिभाषा को भी स्वीकार नहीं किया गया।

3. मनोविज्ञान चेतना का विज्ञान- उन्नीसवीं शताब्दी में मनोवैज्ञानिकों ने मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान’ कहकर परिभाषित किया। जब वातावरण में कोई उत्तेजना उपस्थित होती है, तो प्राणी उसके प्रति अवश्य प्रतिक्रिया करता है। इस प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप मन में चेतना अथवा अनुभूति भी होती है। अतः मनोवैज्ञानिकों ने यह मत व्यक्त किया कि मन के अध्ययन के स्थान पर इसी अनुभूति या चेतना को ही मनोविज्ञान का विषय-क्षेत्र होना चाहिए। वुण्ट (Woudt), जेम्स (James) आदि मनोवैज्ञानिक इस मत के प्रतिपादक थे। परन्तु मनोविज्ञान के इस अर्थ को भी स्वीकार नहीं किया जा सका, क्योंकि मनोविश्लेषणवादियों ने यह सिद्ध कर दिया कि चेतना का व्यवहार पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। दूसरे, मानव-व्यवहार को प्रभावित करने वाले चेतन मन के अतिरिक्त अचेतन मन तथा अर्द्धचेतन मन भी हैं। तीसरे, मनोविज्ञान का विषय-क्षेत्र चेतना का अध्ययन मान लेने पर पशु-पक्षियों, बालकों तथा विक्षिप्तों की चेतना अथवा आन्तरिक अनुभूति को अध्ययन सम्भव नहीं हो सकता।

4. मनोविज्ञान व्यवहार का विज्ञान- मनोवैज्ञानिकों ने इस बात का अनुभव किया कि मानसिक अनुभूतियों का अध्ययन केवल अन्तर्निरीक्षण द्वारा सम्भव है। किसी भी प्राणी की अनुभूति का अध्ययन उसे छोड़कर अन्य के द्वारा सम्भव नहीं है। एक तो प्रत्येक व्यक्ति अपनी अनुभूतियों का अध्ययन नहीं कर सकता और कर भी सकता है तो उसके अध्ययन में आत्मगत दोष आ सकता है। वास्तव में मनोवैज्ञानिक विधियों से प्राणी के व्यवहार का वस्तुनिष्ठता के साथ अध्ययन किया जा सकता है। किसी भी प्राणी के व्यवहार का निरीक्षण अन्य किसी भी व्यक्ति के द्वारा किया जा सकता है। इस कारण ही बीसवीं शताब्दी में मनोविज्ञान को ‘व्यवहार का विज्ञान’ स्वीकार किया जाने लगा। ई० वाटसन (E. Watson) के अनुसार, “मनोविज्ञान व्यवहार को विशुद्ध विज्ञान है।” उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि मनोविज्ञान को सर्वप्रथम ‘आत्मा का विज्ञान’ (Science of Soul), फिर ‘मन को विज्ञान’ (Science of Mind) और इसके पश्चात् ‘चेतना का विज्ञान (Science of Consciousness) माना गया। वर्तमान में मनोविज्ञान को ‘व्यवहार का विज्ञान (Science of Behaviour) माना जाता है।

शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ
(Meaning of Educational Psychology)

शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षा और मनोविज्ञान’ दो शब्दों के योग से बना है। इसका शाब्दिक अर्थ है-‘शिक्षा सम्बन्धी मनोविज्ञान। वास्तव में शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान का व्यावहारिक रूप है। दूसरे शब्दों में, मनोविज्ञान के सिद्धान्तों का शिक्षा में निरूपित होना ही शिक्षा मनोविज्ञान है। शिक्षा मनोविज्ञान का आरम्भ कब से हुआ, इस विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। कालसनिक के अनुसार, शिक्षा मनोविज्ञान का विकास प्लेटो (Plato) के समय से ही प्रारम्भ हो गया था। प्लेटो के अनुसार, सीखने की क्रिया एक प्रकार से विचारों का विकास है। उसने अपनी शिक्षण विधि में प्रश्नोत्तर तथा वाद-विवाद को विशेष महत्त्व दिया।

प्लेटो के समान अरस्तू (Aristotle) ने भी शिक्षा में मचोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्रयोग किया। उसने ज्ञानेन्द्रियों की शक्ति पर विशेष बल दिया तथा ज्ञानेन्द्रियों के प्रशिक्षण के लिए अनेक विधियों का प्रयोग किया, परन्तु वास्तव में शिक्षा मनोविज्ञान का सूत्रपात कमेनियस, जॉन लॉक, रूसो, पेस्टालॉजी, हरबर्ट आदि के प्रयासों से हुआ। थॉर्नडाइक (Thorndyke), जुड (Judd), टरमन (Terman) आदि ने भी शिक्षा को मनोवैज्ञानिक बनाने में महत्त्वपूर्ण योग दिया। इन शिक्षाशास्त्रियों के प्रयोगों के फलस्वरूप ही सन् , 1920 तक शिक्षा मनोविज्ञान का स्वरूप पूर्णतया स्पष्ट हो सका। अब शिक्षा मनोविज्ञान को एक स्वतन्त्र विषय के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। इस स्थिति में आकर शैक्षिक परिस्थितियों में व्यक्ति के व्यवहार के अध्ययन को ही शिक्षा मनोविज्ञान माना जाने लगा।

शिक्षा मनोविज्ञान की परिभाषाएँ
(Definitions of Educational Psychology)

शिक्षा मनोविज्ञान की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

  1. स्किनर के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान मानवीय व्यवहार का शैक्षणिक परिस्थितियों में अध्ययन करता है। शिक्षा मनोविज्ञान को सम्बन्ध उन मानवीय व्यवहारों और व्यक्तित्व के अध्ययन से है जिनका उत्थान, विकास और निर्देशन शिक्षा की सामाजिक प्रक्रिया के द्वारा होता है।”
  2. क्रो एवं क्रो के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के जन्म से वृद्धावस्था तक सीखने के अनुभवों का वर्णन और व्याख्या करता है।”
  3. जे० एम० स्टीफन के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान शैक्षणिक विकास का क्रमिक अध्ययन है।”
  4. कालसनिक के अनुसार, शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान के सिद्धान्तों और अनुसन्धाने का शिक्षा में प्रयोग है।”
  5. ट्रो के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान वह विज्ञान है जो शैक्षणिक परिस्थितियों का मनोवैज्ञानिक रूप से अध्ययन करता है।”
  6. जुड के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान जन्म से लेकर परिपक्वावस्था तक विभिन्न परिस्थितियों में गुजरते हुए व्यक्तियों में होने वाले परिवर्तनों की व्याख्या करता है।” विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रतिपादित परिभाषाओं के विश्लेषण द्वारा शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। हम कह सकते हैं कि शिक्षा सम्बन्धी विभिन्न पक्षों का मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से किया गया अध्ययन ही शिक्षा मनोविज्ञान है। वर्तमान समय में शिक्षा मनोविज्ञान को अलग से एक व्यावहारिक एवं उपयोगी विज्ञान के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। इस तथ्य को ही स्वीकार करते हुए भारतीय शिक्षा शास्त्री प्रो० एच० आर० भाटिया ने स्पष्ट रूप से कहा है, “हम शिक्षा मनोविज्ञान को शैक्षिक वातावरण में शिक्षार्थी या मनुष्य के व्यवहार के अध्ययन के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।’

(नोट-शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता का विवरण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 3 में दिया गया है।)

प्रश्न 2
शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन-क्षेत्र का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
शिक्षा मनोविज्ञान का क्षेत्र निर्धारित कीजिए तथा शिक्षा के लिए मनोविज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता भी बताइए।
या
शिक्षा मनोविज्ञान की विषय-सामग्री पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

शिक्षा मनोविज्ञान का क्षेत्र
(Scope of Educational Psychology)

शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र को निर्धारित करते हुए चार्ल्स स्किनर ने लिखा है कि “शिक्षा मनोविज्ञान मानव-व्यवहार का शैक्षिक परिस्थितियों में अध्ययन करता है। इसका सम्बन्ध उन मानव-व्यवहारों और व्यक्तित्व के अध्ययन से है, जिनका उत्थान, विकास और मार्ग-प्रदर्शन शिक्षा की प्रक्रिया द्वारा होता है।

इसी प्रकार डगलस और हालैण्ड ने लिखा है, “शिक्षा मनोविज्ञान की विषय-सामग्री शिक्षा की प्रक्रियाओं में रुचि लेने से व्यक्ति की प्रकृति, मानसिक जीवन और व्यवहार है।” इन मतों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शिक्षा मनोविज्ञान में निम्नलिखित बातों का अध्ययन किया जाता है

1. बाल-विकास की विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन- शिक्षा मनोविज्ञान में बालकों के व्यवहार को समझने के लिए उनके विकास की विभिन्न अवस्थाओं और उनकी शारीरिक क्रियाओं का विशेष रूप से अध्ययन किया जाता है।
2. बालकों की मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन- शिक्षा | शिक्षा मनोविज्ञान में स्मृति, कल्पना, निर्णयशक्ति, संवेदना, प्रत्यक्षीकरण, अवधान आदि मानसिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।
3. वंशानुक्रम और वातावरण का अध्ययन- बालक को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले तत्त्व वंशानुक्रम और वातावरण हैं। अत: इनका अध्ययन भी शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत अनिवार्य रूप से किया जाता है।
4. बालक की संवेगात्मक क्रियाओं का अध्ययन- बालकों के सन्तुलित विकास के लिए भय, क्रोध, हर्ष आदि संवेगों का विस्तार से अध्ययन शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत किया जाता है। बालकों की अभिरुचियों का
5. बालों की अभिरुचियों का अध्ययन- यह जानने के लिए कि बालकों की रुचि या अभिरुचि किस विषय में है, शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत उनकी अभिरुचियों का अध्ययन किया जाता है।
6. शिक्षण विधियों का अध्ययन- शिक्षण को प्रभावशाली और उपयोगी बनाने के लिए विभिन्न विधियों का ज्ञान परम आवश्यक है।
7. अधिगम या सीखना- बालक के सीखने की क्रियाओं का अध्ययन शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत ही किया जाता है। सीखने के नियम, सीखने के सिद्धान्त तथा सीखने का स्थानान्तरण आदि इसी के अन्तर्गत आते हैं।
8, अचेतन मन की क्रियाओं का अध्ययन- बालकों की मानसिक ग्रन्थियों को नष्ट करने के लिए अचेतन मन की क्रियाओं का अध्ययन शिक्षा मनोविज्ञान में किया जाता है।
9. व्यक्तिगत विभिन्नताओं का अध्ययन- प्रत्येक बालक दूसरे बालक से भिन्नता रखता है। शिक्षा मनोविज्ञान बताता है बालकों में परस्पर भिन्नता क्यों होती है तथा किस प्रकार के बालकों को किस प्रकार की शिक्षा दी जानी चाहिए?
10. बालक में विभिन्न प्रकार के विकास का अध्ययन- बालक के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को समझने के लिए शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत बालक के शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक तथा सामाजिक विकास का अध्ययन किया जाता है।
11. बाल-अपराध का अध्ययन- विद्यालय में अनेक छात्र अपराधी प्रवृत्ति के होते हैं। शिक्षा-मनोविज्ञान के अन्तर्गत इस प्रकार के बालकों का विशेष रूप से अध्ययन किया जाता है।
12. पाठ्यक्रम निर्माण के सिद्धान्तों का अध्ययन- समस्त बालकों के लिए एक-सा पाठ्यक्रम निर्धारित करना उचित नहीं है। पाठ्यक्रम का निर्माण बालकों की रुचियों, आयु, क्षमताओं आदि को ध्यान मेंरखकर करना आवश्यक है। इस कारण आधुनिक युग में पाठ्यक्रम को निर्धारित करते समय मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों को ध्यान में रखा जाता है।
13. मापन एवं मूल्यांकन का अध्ययन- इसके अन्तर्गत मापन और मूल्यांकन के सिद्धान्त, बुद्धि और उसका मापन तथा मूल्यांकन से होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है।
14. अनुशासन सम्बन्धी समस्याओं का अध्ययन- विद्यालय में अनुशासन का विशेष महत्त्व होता है। अत: छात्रों में अनुशासन की स्थापना किस प्रकार हो, इसका अध्ययन भी शिक्षा मनोविज्ञान में ही किया जाता है।
15. शैक्षिक परिस्थितियों का अध्ययन- शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत उन शैक्षिक परिस्थितियों का अध्ययन किया जाता है, जिसके अन्दर शिक्षक छात्रों को शिक्षा प्रदान करता है। इसके अन्तर्गत विद्यालय का भवन, शिक्षण-कक्ष, खेलकूद के मैदाने, मनोरंजन, शिक्षक की योग्यताएँ, पाठ्यक्रम, पुस्तकें, शिक्षण-सामग्री आदि बातें आती हैं।
16. मानसिक स्वास्थ्य का अध्ययन- बालकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए शिक्षा मनोविज्ञान में मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान सम्बन्धी बातों का भी विशेष रूप से अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 3
शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता तथा महत्त्व का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
कक्षा-शिक्षण में शिक्षा मनोविज्ञान की क्या उपयोगिता है?
या
“शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षा को नवीन दृष्टिकोण प्रदान करता है।” इसको ध्यान में रखते हुए। शिक्षा मनोविज्ञान के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
या
शिक्षा मनोविज्ञान से शिक्षा जगत में क्रान्ति आई है, कैसे?
या
शिक्षा मनोविज्ञान के महत्त्व का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
शिक्षा मनोविज्ञान के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
या
“शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षक एवं छात्र के लिए महत्त्वपूर्ण है।” स्पष्ट कीजिए।
या
एक अध्यापक के लिए शिक्षा मनोविज्ञान की सम्यक् जानकारी की क्या उपयोगिता है?
या
एक शिक्षक के लिए शिक्षा मनोविज्ञान का ज्ञान क्यों उपयोगी है?
या
“शिक्षा मनोविज्ञान द्वारा शिक्षक को समुचित निर्णय लेने में मदद मिलती है।” इस कथन के सन्दर्भ में शिक्षक के लिए शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक शिक्षा का प्रमुख आधार मनोविज्ञान या शिक्षा मनोविज्ञान है। शिक्षण में सफलता प्राप्त करने के लिए अध्यापक के लिए शिक्षा मनोविज्ञान का ज्ञान परम आवश्यक है। शिक्षा मनोविज्ञान ही अध्यापक को बताता है कि सीखने की सर्वश्रेष्ठ विधि कौन-सी है? बालक को चारित्रिक और मानसिक विकास किस प्रकार हो सकता है तथा बालक को किस अवस्था में किस प्रकार की शिक्षा मिलनी चाहिए?

शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता तथा महत्त्व
(Utility and Importance of Educational Psychology)

शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता और महत्त्व को निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत समझा जा सकता है|

1. अध्यापक को स्वयं का ज्ञान- शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापक को अपने स्वभाव, बुद्धि-स्तर, व्यवहारकुशलता आदि को ज्ञान कराने में सहायक होता है। जब अध्यापक को अपनी कमियों का ज्ञान हो जाता है तो वह उनको सरलता से दूर कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त यह ज्ञान उनके शिक्षण को प्रभावशाली बनाने में भी परम सहायक होता है। शिक्षा मनोविज्ञान की सहायता से अध्यापक अपने पाठ की तैयारी भी सुव्यवस्थित ढंग से कर सकता है।

2. बाल- विकास का ज्ञान शिक्षा मनोविज्ञान द्वारा अध्यापक बाल-विकास की विभिन्न अवस्थाओं का ज्ञान प्राप्त करता है। इन अवस्थाओं का ज्ञान प्राप्त करके वह पाठ्य-सामग्री का चयन करता है। तथा अवस्थाओं के अनुकूल उसका प्रतिपादन करता है।

3. बालक की मूल-प्रवृत्तियों का ज्ञान- मूल-प्रवृत्तियों के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए रॉस (Ross) ने लिखा है-“मूल-प्रवृत्तियाँ वे हैं, जिनसे व्यक्ति के चरित्र का निर्माण किया जाता है। शिक्षा मनोविज्ञान
अध्यापक को बताता है कि बालक की मूल-प्रवृत्तियों में किस प्रकार संशोधन और परिवर्तन किया जा सकता। है। मूल-प्रवृत्तियों के विषय में ज्ञान प्राप्त कर बालक के चरित्र का विकास सरलता से किया जा सकता है।

4. बालक की क्षमताओं का ज्ञान- शिक्षा मनोविज्ञान बालक की क्षमताओं का ज्ञान कराने में सहायक होता है। शिक्षा मनोविज्ञान की सहायता से अध्यापक को यह ज्ञाने हो जाता है कि बालक किस सीमा तक ज्ञानार्जन की क्षमता रखता है तथा किस सीमा तक उसके सामाजिक व्यवहार को सुधारा जा सकता है।

5. बालक की विभिन्न आवश्यकताओं का ज्ञान- शिक्षा प्राप्त करने वाले बालकों की विभिन्न होती है। ये प्रमुख आवश्यकताएँ हैं-स्नेह, आत्मसम्मान, सहयोग, मार्गदर्शन आदि। यदि ये आवश्यकताएँ उचित ढंग से सन्तुष्ट हो जाती हैं तो बालकों का विकास भी स्वाभाविक ढंग से होता है। शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापक को बालक की विभिन्न आवश्यकताओं का ज्ञान कराता है।

6. बाल-व्यवहार का ज्ञान- शिक्षण के कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए बालक के व्यवहार को समझना परम आवश्यक है। शिक्षा मनोविज्ञान इस क्षेत्र में अध्यापक की विशेष सहायता करता है। इस सम्बन्ध में रायबर्न (Ryburn). ने लिखा है-“हमें बाल-स्वभाव और व्यवहार का जितना अधिक ज्ञान होता है, उतना ही प्रभावशाली हमारा बालक से सम्बन्ध होता है। मनोविज्ञान हमें यह ज्ञान कराने में विशेष सहायक सिद्ध हो सकता है।”

7. बालकों के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में सहायक- शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बालकों के व्यक्तित्व का बहुमुखी विकास करना है। शिक्षा के इस उद्देश्य को प्राप्त करने में शिक्षा मनोविज्ञान विशेष रूप से सहायक होता है। शिक्षा मनोविज्ञान बालक के केवल ज्ञानात्मक विकास की ओर ही बल नहीं देता, वरन् वह अध्यापक को उन विधियों से परिचित भी कराता है, जिनको अपनाकर बालक का सर्वांगीण विकास किया। जा सकता है।

8. बालक की व्यक्तिगत विभिन्नताओं का ज्ञान- आधुनिक मनोवैज्ञानिक खोजों ने यह सिद्ध कर दिया है कि बालकों की रुचियों, योग्यर्ताओं तथा क्षमताओं आदि में भिन्नताएँ पायी जाती हैं। अत: उनकी व्यक्तिगत भिन्नताओं को समझना अध्यापक के लिए परम आवश्यक है। मनोविज्ञान द्वारा हमें छात्रों की । व्यक्तिगत भिन्नता, मानसिक स्थितियों, स्वभावों तथा विभिन्न अवस्थाओं में उनकी आवश्यकताओं का ज्ञान होता है। व्यक्तिगत भिन्नताओं की जानकारी प्राप्त करके विभिन्न प्रकार के उपयोगी मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर विभिन्न वर्ग के विद्यार्थियों के लिए उनके अनुकूल उपयोगी शिक्षा-व्यवस्था के आयोजन का अवसर प्राप्त होता है।

9. सामग्री के चयन में सहायक- चेस्टर एण्डरसन के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापक को पाठ्य-सामग्री के उचित चयन तथा उसे व्यवस्थित करने का ज्ञान प्रदान करता है।” पाठ्य-सामग्री के उचित चयन से शिक्षण प्रभावशाली और रोचक हो जाता है।

10. पाठ्यक्रम के निर्धारण में सहायक- शिक्षा मनोविज्ञान उचित पाठ्यक्रम के निर्धारण में विशेष रूप से सहायक होता है, क्योंकि मनोविज्ञान की सहायता से विभिन्न अवस्थाओं के छात्रों की मानसिक क्षमताओं, रुचियों तथा प्रवृत्तियों आदि के विषय में जानकारी हो जाती है। यह जानकारी उपयोगी पाठ्यक्रम के निर्धारण में विशेष रूप से सहायक होती है। स्किनर के अनुसार, “उपयोगी पाठ्यक्रम बालकों के विकास, व्यक्तिगत विभिन्नताओं, प्रेरणाओं, मूल्यों एवं सीखने के सिद्धान्तों के अनुसार मनोविज्ञान पर आधारित होना आवश्यक है।”

11. प्रभावशाली शिक्षण- विधियों का ज्ञान शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापक को शिक्षण की विभिन्न विधियों का ज्ञान कराता है। यह बताता है कि कौन-सी शिक्षण-विधि कहाँ और किस स्तर पर उपयुक्त होती है। स्किनर (Skinner) के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षक को शिक्षण विधियों का चुनाव करने में सहायता देने के लिए सीखने के अनेक सिद्धान्त प्रस्तुत करता है।”

12. कक्षा की समस्याओं के समाधान में सहायक- कक्षा में शिक्षण करते समय शिक्षक के सामने अनेक समस्याएँ आती हैं। कुछ बालकों का ध्यान पढ़ने-लिखने की ओर नहीं जाता, वे केवल बातों में ही दिलचस्पी लेते हैं। शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापक को इस प्रकार की समस्याओं का हल सुझाता है। मनोविज्ञान का ज्ञाता अध्यापक शरारती और पिछड़े बालकों के व्यवहार को भली प्रकार समझकर ही उनका मनोवैज्ञानिक निदान करता है।

13. अनुशासन की स्थापना में सहायक- शिक्षा मनोविज्ञान अनुशासन सम्बन्धी दृष्टिकोण में परिवर्तन उत्पन्न करता है। शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापक को बताता है कि बात-बात पर छात्रों को मारने-पीटने से वास्तविक-अनुशासन की स्थापना नहीं होती। शिक्षा मनोविज्ञान शारीरिक दण्ड के स्थान पर प्रेम, सहानुभूति तथा स्वशासन द्वारा अनुशासन स्थापित करने का पक्षधर है। यह बताता है कि शिक्षण-विधियों में सुधार करके अनुशासन की समस्या को किस भाँति हल किया जा सकता है।

14. मापन और मूल्यांकन का ज्ञान- शिक्षा के क्षेत्र में मनोविज्ञान की प्रमुख देन ‘मापन और मूल्यांकन विधियों का प्रयोग है। इन विधियों के द्वारा बालकों की योग्यताओं का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया जाता है। मापन और मूल्यांकन ने अपव्यय तथा अवरोधन को समाप्त करने में विशेष योगदान दिया है। इसके साथ ही बालकों की रुचि, योग्यता तथा आत्मसम्मान आदि का मापन करके उनके व्यक्तित्व के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

15. शिक्षा के विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक- शिक्षा मनोविज्ञान की सहायता के बिना शिक्षा के विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं की जा सकती। स्किनर के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान आजकल के शिक्षक के जीवन को ज्ञान से समृद्ध कर उसकी शिक्षण-विधि को उन्नत बनाकर उसे उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता पहुँचाता है।” निष्कर्ष (Conclusion)-संक्षेप में हम कह सकते हैं कि अध्यापक की सफलता किसी बड़ी सीमा तक शिक्षा मनोविज्ञान के ज्ञान पर निर्भर करती है। बिना शिक्षा मनोविज्ञान के ज्ञान के अध्यापक न तो छात्रों का बौद्धिक विकास कर सकता है और न ही वह प्रतिदिन अध्यापन करते समय आने वाली विभिन्न समस्याओं का हल निकाल सकता है।

वास्तव में, छात्रों की प्रकृति को समझने एवं उनके व्यवहार में परिवर्तन के लिए। शिक्षा मनोविज्ञान से शक्ति मिलती है। जैसा कि डेविस (Davis) कहते हैं-“शिक्षा मनोविज्ञान ने शिक्षा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। इसका माध्यम रहे हैं—अनेक मनोवैज्ञानिक परीक्षणों से ज्ञात छात्रों की क्षमताएँ तथा व्यक्तिगत भेद। इसने छात्रों के ज्ञान, विकास तथा परिपक्वता को समझने में भी योग दिया है।” इसी प्रकार ब्लेयर (Blair) ने लिखा है-“आधुनिक अध्यापक को सफलता प्राप्त करने के लिए ऐसा विशेषज्ञ होना चाहिए जो बालकों को समझे-वे कैसे विकसित होते हैं, सीखते एवं समायोजित होते हैं। कोई अपरिचित या मनोवैज्ञानिक विधियों से अनभिज्ञ व्यक्ति अध्यापक के दायित्व कार्य को पूरा नहीं कर सकता है।”

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शिक्षा और मनोविज्ञान के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा और मनोविज्ञान का सम्बन्ध
(Relation between Education and Psychology)

शिक्षा द्वारा व्यक्ति के व्यवहारों में परिवर्तन आता है तथा मनोविज्ञान का भी सम्बन्ध व्यक्ति के व्यवहार से होता है। अतः शिक्षा और मनोविज्ञान दोनों ही मानव-व्यवहार से सम्बन्धित हैं। अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने इस बात पर बल दिया है कि शिक्षा का मुख्य आधार मनोविज्ञान होना चाहिए। यहाँ हम प्रमुख शिक्षाशास्त्रियों के मतों का उल्लेख करेंगे|

  1. आर० ए० डेविस के अनुसार, “मनोविज्ञान ने छात्रों की क्षमताओं तथा विभिन्नताओं का विश्लेषण करके शिक्षा को विशिष्ट योगदान दिया है। इसने विद्यालयी जीवन में छात्रों के विकास तथा परिपक्वता का ज्ञान प्राप्ति में भी प्रत्यक्ष योगदान दिया है।”
  2. ईवर के अनुसार, “मनोविज्ञान एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। बिना मनोविज्ञान की सहायता के हम शिक्षा की समस्याओं को हल नहीं कर सकते हैं।”
  3. पेस्टालॉजी के अनुसार, “अध्यापक को बालक के मस्तिष्क का अच्छा ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।”
  4. स्किनर के अनुसार, “शिक्षा का प्रमुख आधारभूत विज्ञान, मनोविज्ञान है।”
  5. मॉण्टेसरी के अनुसार, “शिक्षक जितना अधिक प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का ज्ञान रखता है, उतना अधिक वह जानता है कि कैसे पढ़ाया जाए।
    उपर्युक्त मतों से स्पष्ट होता है कि शिक्षा का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं है, जो कि मनोविज्ञान के प्रभाव से वंचित रहा हो और जिसे स्पष्ट करने में मनोविज्ञान ने कोई विशेष योगदान न दिया हो। स्पष्ट है कि शिक्षा तथा मनोविज्ञान का घनिष्ठ पारस्परिक सम्बन्ध है।

प्रश्न 2
शिक्षा के लिए मनोविज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।
या
आधुनिक शिक्षा में मनोविज्ञान की क्या देन है? विवेचना कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के लिए मनोविज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता
(Need of Study of Psychology for Education)

शिक्षा तथा मनोविज्ञान का घनिष्ठ सम्बन्ध है। शिक्षा अपने आप में एक व्यापक प्रक्रिया है। इस उपयोगी प्रक्रिया के सुचारु संचालन के लिए मनोविज्ञान का ज्ञान एवं अध्ययन विशेष रूप से उपयोगी एवं आवश्यक होता है। मनोविज्ञान के सैद्धान्तिक ज्ञान के आधार पर ही शिक्षा के क्षेत्र में अनेक तथ्यों का निर्धारण किया जाता है। शिक्षा के लिए मनोविज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता के मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं-

  1. मनोवैज्ञानिक- ज्ञान के आधार पर ही शिक्षा के उद्देश्यों को निर्धारित किया जाता है तथा शिक्षा के निर्धारित उद्देश्यों की प्रप्ति के लिए भी मनोविज्ञान का समुचित ज्ञान आवश्यक होता है।
  2. बाल- मनोविज्ञान के क्षेत्र में प्राप्त होने वाले नवीन ज्ञान के आधार पर ही शिक्षा को नवीन दृष्टिकोण प्रदान किया जा सकता है अर्थात् शिक्षा को नयी शिक्षा एवं स्वरूप प्रदान करने के लिए मनोवैज्ञानिक ज्ञान सहायक होता है।
  3. बाल- मनोविज्ञान के ज्ञान के आधार पर ही शिक्षा के क्षेत्र में अनुशासन की सुव्यवस्था की जा सकती है, अर्थात् अनुशासन की समस्या के समाधान में मनोविज्ञान का ज्ञान सहायक होता है।
  4. मनोविज्ञान का ज्ञान ही शिक्षा की नवीन शिक्षण- णालियों को खोजने में सहायक होता है।
  5. मनोविज्ञान के ज्ञान के आधार पर ही व्यक्तिगत भेदों को ध्यान में रखकर शिक्षा की व्यवस्था की जाती
  6. मनोवैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर ही बाल- विकास की अवस्थाओं के अनुसार शिक्षा की व्यवस्था की जाती है।
  7. मनोवैज्ञानिक ज्ञान ही बाल- केन्द्रित शिक्षा को लागू करने में सहायक होता है।

प्रश्न 3
शिक्षा मनोविज्ञान तथा मनोविज्ञान में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा मनोविज्ञान तथा मनोविज्ञान में अन्तर
(Distinction between Educational Psychology and Psychology)

निस्सन्देह शिक्षा मनोविज्ञान तथा मनोविज्ञान में घनिष्ठ सम्बन्ध तथा पर्याप्त समानता है, परन्तु वर्तमान व्यवस्था के अन्तर्गत इन दोनों के अलग-अलग विषय-क्षेत्र के रूप में भी स्वीकार किया जा चुका है। शिक्षा मनोविज्ञान तथा मनोविज्ञान के अन्तर को हम निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं

1.अध्ययन-विषय का अन्तर- भले ही शिक्षा मनोविज्ञान तथा मनोविज्ञान दोनों ही मानवीय व्यवहारों का व्यवस्थित अध्ययन करने वाले शास्त्र हैं, परन्तु इन दोनों शास्त्रों में व्यवहार के अध्ययन की परिस्थितियों का स्पष्ट अन्तर है। शिक्षा मनोविज्ञान द्वारा केवल शैक्षिक परिस्थितियों में ही सम्पन्न होने वाले व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। इससे भिन्न मनोविज्ञान द्वारा सामान्य वातावरण में सम्पन्न होने वाले मानवीय व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।

2. अध्ययन के उद्देश्य का अन्तर- शिक्षा मनोविज्ञान तथा मनोविज्ञान का एक अन्तर उनके अध्ययनउद्देश्य से सम्बन्धित भी है। शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन का उद्देश्य शैक्षिक परिस्थितियों में व्यक्ति के होने वाले व्यवहार का अध्ययन करना तथा शिक्षा की प्रक्रिया को सफल बनाना है। इससे भिन्न मनोविज्ञान के अध्ययनों का मुख्य उद्देश्य व्यवहार सम्बन्धी सिद्धान्तों को खोजना एवं प्रतिपादित करना तथा उनके आधार पर मानवीय व्यवहार के विषय में भविष्यवाणी करना है।

3. क्षेत्र की व्यापकता का अन्तर- शिक्षा मनोविज्ञान केवल शैक्षिक परिस्थितियों में व्यवहार का अध्ययन करता है; अत: शिक्षा मनोविज्ञान का अध्ययन-क्षेत्र सीमित है। इससे भिन्न मनोविज्ञान मानवीय व्यवहार का सामान्य वातावरण में अध्ययन करता है। अत: मनोविज्ञान का अध्ययन क्षेत्र पर्याप्त व्यापक है।

प्रश्न 4
शिक्षा मनोविज्ञान के उद्देश्यों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन का मूल उद्देश्य शिक्षा की प्रक्रिया को अच्छे ढंग से परिचालित करना है। इसके लिए शिक्षा मनोविज्ञान जहाँ एक ओर बालक के व्यक्तित्व के समुचित विकास में सहायता प्रदान करता है वहीं दूसरी ओर शिक्षक को शिक्षण कार्य को उत्तम ढंग से करने में सहायता प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त शिक्षा मनोविज्ञान के कुछ अन्य उद्देश्य भी महत्त्वपूर्ण हैं; जैसे कि

  1. शिक्षकों में छात्रों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण तथा पक्षपातरहित दृष्टिकोण विकसित करना।
  2. सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूप तथा महत्त्व को सही रूप में समझने में सहायता प्रदान करना।
  3. शिक्षकों में इस प्रकार की समझ या अन्तर्दृष्टि विकसित करना जिसके द्वारा वे अपने अध्ययन के परिणामों तथा अन्य शक्तियों के शिक्षा-विषयक अभ्यासों को अच्छी तरह से समझ सकें।
  4. शिक्षा मनोविज्ञान का एक अन्य महत्त्वपूर्ण उद्देश्य अपने तथा अन्य व्यक्तियों के व्यवहार के विश्लेषण तथा व्यवस्थापन के लिए शिक्षकों को सामान्य व्यवस्थापन में सहायक तथ्यों एवं विधियों की जानकारी प्रदान करना है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शिक्षा मनोविज्ञान की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
स्किनर के अनुसार शिक्षा मनोविज्ञान की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

  1. शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान का व्यावहारिक रूप है।
  2. यह शैक्षिक परिस्थितियों में मानव-व्यवहार का अध्ययन करने वाला विज्ञान है।
  3. इसका प्रमुख केन्द्र मानव-व्यवहार है।
  4. शिक्षा मनोविज्ञान अपनी खोजों के लिए वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करता है।
  5. यह प्राप्त निष्कर्षों का प्रयोग शिक्षा की समस्याओं के समाधान के लिए करता है।
  6. शिक्षा मनोविज्ञान यह भविष्यवाणी करता है कि विद्यार्थी में ज्ञान प्राप्त करने

प्रश्न 2
शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हम जानते हैं कि शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत शैक्षिक परिस्थितियों में व्यक्ति के व्यवहार का तटस्थ अध्ययन किया जाता है। यह मनोविज्ञान से सम्बद्ध है। इस स्थिति में शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति को हम वैज्ञानिक कह सकते हैं अर्थात् शिक्षा मनोविज्ञान एक-क्झिान है। अब हमें यह जानना आवश्यक है कि शिक्षा मनोविज्ञान कैसा विज्ञान है? इसके उत्तर में हम कह सकते हैं कि शिक्षा मनोविज्ञान, एक विधायक सामाजिक विज्ञान है। यह सत्य है कि शिक्षा मनोविज्ञान अन्य भौतिक विज्ञानों के समान यथार्थ विज्ञान नहीं है। परन्तु जैसे-जैसे इस विज्ञान का विकास हो रहा है, वैसे-वैसे इसकी यथार्थता में वृद्धि हो रही है।

प्रश्न 3
स्पष्ट कीजिए कि मनोविज्ञान ने शिक्षा को नवीन दृष्टिकोण प्रदान किया है?
उत्तर:
शिक्षा के क्षेत्र में मनोविज्ञान का एक महत्त्वपूर्ण योगदान यह है कि मनोविज्ञान ने शिक्षा को एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया है। वर्तमान मान्यताओं से पूर्व शिक्षा के क्षेत्र में बालक की अर्जित उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल पाठ्यक्रम के अध्ययन तथा परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर ही किया जाता था। परन्तु अब स्थिति बदल गयी है। वर्तमान मान्यताओं के अनुसार छात्रों की शैक्षिक उपलब्धियों के मूल्यांकन के लिए बालक की समस्त गतिविधियों, व्यक्तित्व के विकास तथा विकसित हुई क्षमताओं को भी ध्यान में रखा जाता है। आज कुछ छात्र भले ही पाठ्य-पुस्तकों में अधिक रुचि नहीं लेते, परन्तु वे क्राफ्ट आदि कार्यों को अधिक कुशलतापूर्वक करते हैं। इन बालकों की योग्यता का मूल्यांकन उनकी इस क्षमता के आधार पर किया जाता है।

प्रश्न 4
शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन की आत्म-निरीक्षण विधि का वर्णन कीजिए।
या
शिक्षा मनोविज्ञान की अन्तर्दर्शन विधि क्या है?
या
शिक्षा मनोविज्ञान की अन्तर्दर्शन विधि के अर्थ एवं महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययनों में प्राय: आत्म-निरीक्षण या आत्मदर्शन को भी अपनाया जाता है। अन्तर्दर्शन विधि का अर्थ है, व्यक्ति द्वारा अपने मन की कार्य-पद्धतियों की ओर व्यवस्थित ढंग से ध्यान देना ही अन्तर्दर्शन है। हम जानते हैं कि शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययनों में बालक की कुछ मानसिक क्रियाओं को भी जानना अति आवश्यक होता है। उदाहरण के लिए—कल्पना, चिन्तन, रुचि, ध्यान तथा स्मृति आदि मानसिक क्रियाओं को केवल अन्तर्दर्शन द्वारा ही जाना जा सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि अन्तर्दर्शन भी शिक्षा मनोविज्ञान की एक अध्ययन विधि है। अन्तर्दर्शन विधि कोई शुद्ध वैज्ञानिक विधि नहीं है, अतः इस विधि को अन्य वैज्ञानिक विधियों की सहयोगी विधि के रूप में अपनाया जाता है।

प्रश्न 5
शिक्षा मनोविज्ञान की परिभाषा लिखिए एवं उसके क्षेत्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान की परिभाषा–‘शिक्षा मनोविज्ञान मानवीय व्यवहार का शैक्षणिक परिस्थितियों में अध्ययन करता है। शिक्षा मनोविज्ञान का सम्बन्ध उन मानवीय व्यवहारों और व्यक्तित्व के अध्ययन से है जिनका उत्थान, विकास और निर्देशन शिक्षा की सामाजिक प्रक्रिया के द्वारा होता है।” शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र–शिक्षा मनोविज्ञान में निम्नलिखित क्षेत्रों में अध्ययन किया जाता हैबाल-विकास की विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन, बालकों की मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन, वंशानुक्रम और वातावरण का अध्ययन, बालक की संवेगात्मक क्रियाओं का अध्ययन, बालकों की अभिरुचिओं का अध्ययन, शिक्षण विधियों का अध्ययन तथा अधिगम (सीखना) आदि।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्लेटो, अरस्तू आदि यूनानी दार्शनिकों ने मनोविज्ञान को किस रूप में स्वीकार किया है?
उत्तर:
प्लेटो, अरस्तू आदि यूनानी दार्शनिकों ने मनोविज्ञान को आत्मा के दर्शन के रूप में स्वीकार किया है।

प्रश्न 2
वाटसन, वुडवर्थ, स्किनर आदि मनोवैज्ञानिकों ने मनोविज्ञान को किस रूप में स्वीकार किया
उत्तर:
वाटसन, वुडवर्थ, स्किनर आदि मनोवैज्ञानिकों ने मनोविज्ञान को व्यवहार के विज्ञान के रूप में स्वीकार किया है।

प्रश्न 3
‘शिक्षा मनोविज्ञान का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
‘शिक्षा मनोविज्ञान’ का शाब्दिक अर्थ है–शिक्षा सम्बन्धी मनोविज्ञान।

प्रश्न 4
‘शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन का दृष्टिकोण क्या है?
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन का दृष्टिकोण मनोवैज्ञानिक है।

प्रश्न 5
‘शिक्षा मनोविज्ञान’ की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
“शिक्षा मनोविज्ञान मानवीय व्यवहार का शैक्षणिक परिस्थितियों में अध्ययन करता है। शिक्षा मनोविज्ञान का सम्बन्ध उंन मानवीय व्यवहारों और व्यक्तित्व के अध्ययन से है, जिनका उत्थान, विकास और निर्देशन शिक्षा की सामाजिक प्रक्रिया द्वारा होता है।”

प्रश्न 6
शिक्षा मनोविज्ञान किस विज्ञान की शाखा है?
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान मनोविज्ञान की शाखा है।

प्रश्न 7
कोई ऐसा कथन लिखिए जो शिक्षा के क्षेत्र में मनोविज्ञान के महत्व को स्पष्ट करता हो।
उत्तर:
“मनोविज्ञान एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। बिना मनोविज्ञान की सहायता से हम शिक्षा की समस्याओं को हल नहीं कर सकते हैं।” जेम्स ड्रेक्ट

प्रश्न 8
शिक्षा मनोविज्ञान किस प्रकार का विज्ञान है?
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान व्यावहारिक एवं उपयोगी विधायक विज्ञान है।

प्रश्न 9
शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता के चार मुख्य बिन्दुओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. पाठ्यक्रम निर्धारण में उपयोगी,
  2. शिक्षा-विधियों के चुनाव में उपयोगी,
  3. अनुशासन स्थापित करने में उपयोगी तथा
  4. बालकों के व्यक्तित्व के विकास में सहायक।

प्रश्न 10
“मनोविज्ञान व्यवहार और अनुभव का विज्ञान है।” ऐसा किसने कहा है?
उत्तर:
एन० एल० मन ने।

प्रश्न 11
मनोविज्ञान की परिभाषाओं के विकासात्मक चरण बताइट।
उत्तर:
मनोविज्ञान को क्रमश:

  1. आत्मा के विज्ञान,
  2. मन के विज्ञान
  3. चेतना के विज्ञान तथा
  4. व्यवहार के विज्ञान के रूप में परिभाषित किया गया।

प्रश्न 12
शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति क्या है ?
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति वैज्ञानिक है।

प्रश्न 13
“शिक्षा मनोविज्ञान का व्यावहारिक पक्ष है।” यह कथन सत्य है या असत्य।
उत्तर:
सत्य है।

प्रश्न 14
“मनोविज्ञान के सिद्धान्तों का शैक्षिक परिस्थितियों में उपयोग ही शिक्षा है।” यह कथन सत्य है या असत्य।
उत्तर:
असत्य है।

प्रश्न 15
शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन की आत्मनिष्ठ विधि कौन-सी है ?
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन की आत्मनिष्ठ विधि हैअन्तर्दर्शन विधि।

प्रश्न 16
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. शिक्षा मनोविज्ञान कोई स्वतन्त्र विषय नहीं है, यह तो मनोविज्ञान की एक शाखा मात्र है।
  2. शिक्षा मनोविज्ञान द्वारा पारिवारिक परिस्थितियों में व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।
  3. शिक्षा मनोविज्ञान द्वारा शैक्षणिक परिस्थितियों में मानवीय व्यवहार का अध्ययन किया जाता
  4. शिक्षा तथा मनोविज्ञान का कोई पारस्परिक सम्बन्ध नहीं है।
  5. प्रत्येक शिक्षक के लिए बाल मनोविज्ञान का ज्ञान आवश्यक होता है।
  6. कक्षा-शिक्षण में मनोविज्ञान का ज्ञान अनावश्यक एवं व्यर्थ है।
  7. मनोविज्ञान के सिद्धान्तों का शैक्षिक परिस्थितियों में उपयोग ही शिक्षा है।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. सत्य
  6. असत्य
  7. असत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान आत्मा का विज्ञान है।” यह कथन सम्बन्धित है
(क) पेस्टालॉजी से
(ख) टी० रेमाण्ट से
(ग) प्लेटो से
(घ) इनमें से किसी से नहीं ”

प्रश्न 2.
“बालक एक ऐसी पुस्तक के समान है, जिसे शिक्षक भली-भाँति पढ़ता है।” यह किसका कथन
(क) मैजिनी का
(ख) पेस्टालॉजी का
(ग) हरबर्ट का
(घ) रूसो का

प्रश्न 3.
“शिक्षा को मनोविज्ञान ने बाँध दिया है। मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों की उपयोगिता को जाँचने के लिए सबसे अच्छा स्थान विद्यालय है।” यह कथन है
(क) जॉन एडम्स का
(ख) फ्रॉबेल का
(ग) जॉन डीवी का
(घ) कमेनियस का

प्रश्न 4.
मनोविज्ञान के अनुसार, शिक्षा के क्षेत्र में मुख्य स्थान है
(क) बालक का
(ख) अध्यापक का
(ग) अभिभावक का
(घ) प्रशासक का

प्रश्न 5.
शिक्षा मनोविज्ञान
(क) आत्मा का विज्ञान है :
(ख) मन का विज्ञान है
(ग) चेतना का विज्ञान है
(घ) शैक्षिक विकास का क्रमिक अध्ययन है

प्रश्न 6.
शिक्षा को मनोवैज्ञानिक आधार की आवश्यकता है
(क) शिक्षा के राष्ट्रीयकरण के लिए
(ख) पाठ्य-पुस्तक लेखन के लिए
(ग) अनुशासनहीनता को दूर करने के लिए
(घ) बालक की योग्यताओं का पता लगाने के लिए

प्रश्न 7.
“शिक्षा मनोविज्ञान सीखने के ‘क्यों’ तथा ‘कब’ से सम्बन्धित है।” यह मत किसका है?
(क) बी० एन० झा का
(ख) क्रो एवं क्रो का
(ग) रायबर्न का
(घ) जॉन एडम्स का

प्रश्न 8.
“शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापकों के निर्माण की आधारशिला है।” यह किसका कथन है?
(क) चार्ल्स स्किनर का
(ख) कुप्पूस्वामी का
(ग) पेस्टालॉजी का
(घ) मॉण्टेसरी का

प्रश्न 9.
“मनोविज्ञान शिक्षा का आधारभूत विज्ञान है।” यह कथन है
(क) हरबर्ट को
(ख) जॉन डीवी को
(ग) स्किनर का
(घ) थॉर्नडाइक का

प्रश्न 10.
“शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापक की शिक्षण-विधि का चुनाव करने में सहायता देने के लिए सीखने के अनेक सिद्धान्त प्रस्तुत करता है।” यह कथन किसका है?
(क) चार्ल्स स्किनर का
(ख) क्रो एवं क्रो का
(ग) द्रो का
(घ) बी० एन० झा का

प्रश्न 11.
शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत अध्ययन नहीं किया जाता
(क) शैक्षिक परिस्थितियों में व्यवहार का
(ख) मानसिक स्वास्थ्य का
(ग) औद्योगिक गतिविधियों का
(घ) सीखने की प्रक्रिया का

प्रश्न 12.
शिक्षा मनोविज्ञान का कार्य नहीं है
(क) बालक के स्वरूप का ज्ञान देना।
(ख) अधिगम और शिक्षण के लिए सिद्धान्तों और तकनीकों को प्रस्तुत करना
(ग) बच्चों की अभिवृद्धि और विकास का ज्ञान देना,
(घ) शिक्षा के उद्देश्यों को निश्चित करना

प्रश्न 13.
आधुनिक शिक्षा की प्रमुख मनोवैज्ञानिक विशेषता क्या है?
(क) बालकेन्द्रित शिक्षा
(ख) पुस्तकीय ज्ञान
(ग) पर्यावरण का ज्ञान
(घ) खेलों का महत्त्व

प्रश्न 14.
शिक्षा मनोविज्ञान की आत्मनिष्ठ विधि है
(क) प्रयोगात्मक विधि
(ख) प्रश्नावली विधि
(ग) अन्तर्दर्शन विधि
(घ) जीवन इतिहास विधि

प्रश्न 15.
शिक्षा मनोविज्ञान की लोकप्रिय विधि है
(क) परीक्षण विधि
(ख) सांख्यिकी विधि
(ग) तुलनात्मक विधि
(घ) प्रयोगात्मक विधि

प्रश्न 16.
मनोविज्ञान व्यवहार और अनुभव का विज्ञान है।” यह कथन है
(क) प्लेटो का
(ख) स्किनर को
(ग) थॉर्नडाइक का
(घ) क्रो एण्ड क्रो का

प्रश्न 17.
किसने ‘मनोविज्ञान को व्यवहार, के विज्ञान के रूप में स्वीकार नहीं किया ?
(क) वाटसन
(ख) वुडवर्थ
(ग) स्किनर
(घ) विलियम वुण्ड

प्रश्न 18.
“मनोविज्ञान मानव-प्रकृति का अध्ययन करता है।” यह परिभाषा है
(क) जेम्स की
(ख) स्किनर की
(ग) वाटसन की
(घ) बोरिंग की

प्रश्न 19.
“मनोविज्ञान व्यवहार का निश्चयात्मक विज्ञान है।” यह परिभाषा है
(क) स्किनर की
(ख) जेम्स की
(ग) वाटसन की
(घ) गैरेट की

प्रश्न 20.
शिक्षा-मनोविज्ञान किस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है?
(क) शिक्षार्थी
(ख) शिक्षक एवं शिक्षा व्यवस्था
(ग) अधिगम परिस्थिति का
(घ) ये सभी

प्रश्न 21.
मनोविज्ञान के क्षेत्र के अन्तर्गत अचेतन मस्तिष्क की खोज का श्रेय किसको जाता है?
(क) ऑलपोर्ट को
ख) युंग को
(ग) वाटसन को
(घ) फ्रॉयड को

प्रश्न 22.
मनोविज्ञान के अनुसार शिक्षा होनी चाहिए
(क) बालकेन्द्रित
(ख) अध्यापककेन्द्रित
(ग) राज्यकेन्द्रित
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 23.
शिक्षा मनोविज्ञान का केन्द्रबिन्दु है
(क) शिक्षक
(ख) बालक
(ग) पाठ्यक्रम
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 24.
भारतीय मनोवैज्ञानिक हैं
(क) कुप्पूस्वामी
(ख) राधाकृष्णन
(ग) टरमैन
(घ) सी०वी० रमन

प्रश्न 25.
शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत अध्ययन किया जाता है
(क) अधिगमकर्ता का
(ख) अधिगम प्रक्रिया का
(ग) अधिगम परिस्थिति का
(घ) इन सभी का

प्रश्न 26.
“शैक्षिक परिस्थितियों के मनोवैज्ञानिक पहलुओं का अध्ययन शिक्षा-मनोविज्ञान है।” ऐसा किसने कहा है ?
(क) डॉ० एस०एस० माथुर ने
(ख) डब्ल्यू०जी० ट्रे ने
(ग) स्किनर ने
(घ) क्रो एण्ड क्रो ने

प्रश्न 27.
‘शिक्षा मनोविज्ञान शैक्षिक परिस्थितियों में मानव व्यवहार काअध्ययन करता है”किसने कहा?
(क) क्रो एण्ड क्रो
(ख) टेलफोर्ड
(ग) कुप्पूस्वामी
(घ) स्किनर

प्रश्न 28.
बालक की शिक्षा को प्रभावकारी बनाने की दृष्टि से शिक्षा मनोविज्ञान बल देती है
(क) बालकों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को समझना
(ख) सीखने की एक आनन्दप्रद क्रिया बनाना
(ग) स्कूल में पारिवारिक वातावरण बनाना
(घ) उपर्युक्त सभी

उत्तर:

  1. (ग) प्लेटो से
  2. (घ) रूसो का
  3. (क) जॉन एडम्स का
  4. (क) बालक का
  5. (घ) शैक्षिक विकास का क्रमिक अध्ययन है
  6. (घ) बालक की योग्यताओं का पता लगाने के लिए
  7. (ख) क्रो एवं क्रो का
  8. (क) चार्ल्स स्किनर का
  9. (ग)  थॉर्नडाइक का
  10. (क) चार्ल्स स्किनर का
  11. (ग) औद्योगिक गतिविधियों का
  12. (घ) शिक्षा के उद्देश्यों को निश्चित करना
  13. (क) बालकेन्द्रित शिक्षा
  14. (ग) अन्तर्दर्शन विधि
  15. (घ) प्रयोगात्मक विधि
  16. (ख) स्किनर का
  17. (घ) विलियम वुण्ड
  18. (घ) बोरिंग की
  19. वाटसन की
  20. (घ) ये सभी
  21. (घ) फ्रॉयड को
  22. (क) बालकेन्द्रित
  23. (ख) बालक
  24. (क) कुप्पूस्वामी
  25. (घ) इन सभी का
  26. (ख) डब्ल्यू०जी० ट्रे ने
  27. (घ) स्किनर
  28. (घ) उपर्युक्त सभी

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 20 Mental Development

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 20
Chapter Name Mental Development (मानसिक विकास)
Number of Questions Solved 21
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 20 Mental Development (मानसिक विकास)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
मानसिक विकास से आप क्या समझते हैं? मानसिक विकास की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
मानसिक विकास से आप क्या समझते हैं? मानसिक विकास का शिक्षा में क्या महत्त्व है? अच्छी तरह समझाइए।
उत्तर:

मानसिक विकास का अर्थ
(Meaning of Mental Development)

विकास के एक पक्ष को मानसिक विकास’ कहा जाता है। मानसिक विकास के अन्तर्गत बालक की विभिन्न मानसिक क्षमताओं का क्रमशः विकास होता है। मानसिक विकास के परिणामस्वरूप बालक के व्यवहार में भी उल्लेखनीय परिवर्तन होता है। मानसिक विकास एक सतत प्रक्रिया है। विकास की सभी अवस्थाओं में यह अनवरत् रूप से चलती है। पहले वर्ष से ही उत्तरोत्तर मानसिक विकास में निरन्तर प्रगति होती रहती है। चिन्तन, भाषा तथा कल्पना मानसिक विकास को प्रभावित करती हैं। आन्तरिक अवस्था में चिन्तन, विचार ग्रहण, स्थान, समय, भार तथा दूरी
आदि के प्रत्यय द्वारा मानसिक विकास होता है। मानसिक विकास एवं शिक्षा का पारस्परिक घनिष्ठ सम्बन्ध है। एक ओर सुचारु शिक्षा के लिए समुचित मानसिक विकास अनिवार्य शर्त है तो दूसरी ओर यह भी सत्य है। कि शिक्षा के माध्यम से बालक का मानसिक विकास सुचारु बनता है।

मानसिक विकास की प्रमुख विशेषताएँ
(Major Features of Mental Development)

बालक के मानसिक विकास की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. शिशु की आयु-वृद्धि के साथ ही मानसिक विकास होने लगता है। नवजात शिशु तीन-चार माह तक संवेगात्मक अवस्था में रहता है। वह केवल भूख, प्यास, ताप, शीत, शोरगुल आदि का ही अनुभव करती है। 4 माह के बाद शिशु के अन्दर प्रत्यक्षीकरण की क्रिया आरम्भ हो जाती है। उसे वातावरण का ज्ञान होने लगता है और वह वस्तुओं को देखकर पहचानने लगता है। इसी समय उसके शब्द भण्डार में भी वृद्धि होने लगती है।

2. दो वर्ष बाद बालक अपनी स्मृति की सहायता से विश्व की प्रत्येक वस्तु को पहचानने लगता है। बाद में उसमें अमूर्त चिन्तन होने लगता है और उसमें प्रत्ययों का भी निर्माण होने लगता है। वह अपने माता-पिता, परिवार के भाई-बहनों व अन्य प्रियजनों को पहचानने लगता है और उन्हें सम्बोधित भी करने लगता है। इसी अवस्था में उसे भाषा का ज्ञान होता है।

3. मानसिक विकास के साथ बालकों की कल्पना-शक्ति विकसित होती है। वह अपनी इच्छाओं को ध्वनि, प्रतीक, शब्दों और धीरे-धीरे वाक्यों में अभिव्यक्त करने लगता है।

4. बुद्धि का विकास मानसिक विकास का एक महत्त्वपूर्ण चरण है। टरमन के अनुसार 15 वर्ष, जीन्स (Jeans) के अनुसार 16 वर्ष और फ्रीमेन के अनुसार 20 वर्ष में बुद्धि परिपक्व होती है। लेकिन माइल्स ने बुद्धि की पूर्ण परिपक्वता 28 वर्ष की आयु में मानी है।

5. मानसिक विकास सभी अवस्थाओं में एकसमान नहीं होता है। किशोरावस्था में तीव्रता से मापक विकास होता है।
6. मानसिक विकास के अन्तर्गत मन के चेतन और अचेतन दोनों पक्षों का विकास होता है।
7. बालिकाओं का विकास बालकों से एक वर्ष पूर्व होता है।
8. शारीरिक, मानसिक और संवेगात्मक विकास एक-दूसरे पर अपना प्रभाव डालते हैं।
9. शारीरिक विकास के समान मानसिक विकास में भी वैयक्तिक भिन्नता होती है।
10. सिर पर आघात लगने से मानसिक विकास में अवरोध आ जाता है और मानसिक रोग तक उत्पन्न हो। जाते हैं।

11. मानसिक विकास के फलस्वरूप ही व्यक्ति अतीत के अनुभवों से लाभ उठाने में समर्थ होता है।
मानसिक विकास का शिक्षा में महत्त्व-मानसिक विकास तथा शिक्षा का पारस्परिक घनिष्ठ सम्बन्ध है। समुचित मानसिक विकास होने पर ही शिक्षा की प्रक्रिया सुचारु रूप से चल सकती है। वास्तव में बालक के मानसिक विकास के स्तर के अनुकूल ही शिक्षा का स्तर होना चाहिए। जैसे-जैसे मानसिक विकास हो वैसे-वैसे शिक्षा के स्तर में वृद्धि की जानी चाहिए। बालक के मानसिक विकास के अनुकूल पाठ्यक्रम का निर्धारण किया जाना चाहिए तथा उसी के अनुकूल शिक्षण विधियों को अपनाया जाना चाहिए। शिक्षा के लिए पाठ्य-पुस्तकों तथा पाठ्य-सहगामी गतिविधियों का निर्धारण भी बालकों के मानसिक विकास के स्तर के अनुसार ही होना चाहिए। इस प्रकार स्पष्ट है कि शिक्षा की व्यवस्था मानसिक विकास के स्तर के अनुसार ही होनी चाहिए। वैसे यह भी सत्य है कि उचित शिक्षा-व्यवस्था के माध्यम से मानसिक-विकास में भी योगदान प्राप्त होता है।

प्रश्न 2
मानसिक विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

मानसिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक
(Factors Influencing Mental Development)

बालक के मानसिक विकास के क्रम का ज्ञान प्राप्त करना प्रत्येक शिक्षक के लिए अत्यन्त आवश्यक है। मानसिक विकास के ज्ञान के साथ-साथ शिक्षक को उन तत्त्वों या कारकों पर भी विचार करना चाहिए, जो बालक के मानसिक विकास को प्रभावित करते हैं। इन कारकों का विवेचन निम्नवत् है-

1. वंशानुक्रम- विभिन्न मनोवैज्ञानिक प्रयोगों तथा अनुसन्धानों से यह सिद्ध हो चुका है कि बालक वंशानुक्रम के आधार पर पर्याप्त मानसिक गुण तथा योग्यताएँ अर्जित करते हैं। थॉर्नडाइक (Thorndyke) के अनुसार, मानसिक योग्यता का आंगे की पीढ़ियों में संक्रमण होता है। मन्द बुद्धि वाले माता-पिता की जो सन्तान होती है, उसका मानसिक विकास भी मन्द गति से होता है।

2. पारिवारिक वातावरण- परिवार का सुखद, शान्त तथा उत्साहवर्द्धक वातावरण, बालक के मानसिक विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक है। जिस परिवार में कलह, निराशा तथा लापरवाही का वातावरण रहता है, वहाँ बालक के मानसिक विकास की बहुत कम सम्भावनाएँ रहती हैं। बालक की विकास आनन्द और स्वतन्त्रता के वातावरण में ही सुचारु रूप से होता है।

3. परिवार की आर्थिक दशा- परिवार की सुदृढ़ आर्थिक स्थिति का भी बालक के मानसिक विकास में महत्त्वपूर्ण योग रहता है। जो बालक आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न परिवारों के होते हैं, उनके मानसिक विकास के मूल कारण हैं-उत्तम शैक्षिक अवसर, पौष्टिक भोजन, आर्थिक चिन्ता से मुक्ति तथा भविष्य की सुरक्षा। टरमन (Terman) के अनुसार, “प्रतिभाशाली बालक प्रायः सम्पन्न परिवारों से ही सम्बन्धित होते हैं।”

4. उत्तम स्वास्थ्य- अरस्तू ने ठीक लिखा है कि “स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क रहता है।” शारीरिक दृष्टि से पुष्ट बालक दुर्बल बालक की अपेक्षा अधिक मानसिक श्रम करके अपना बौद्धिक विकास कर सकता है। रोग ग्रस्त बालक प्रायः मानसिक दृष्टि से पिछड़े होते हैं। ऐसी दशा में बालकों के शारीरिक स्वास्थ्य की ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

5. शिक्षित माता- पिता-स्ट्रांग (Strong) के अनुसार, “माता-पिता की शिक्षा बालकों की मानसिक योग्यता से निश्चित रूप से सम्बन्धित है।” शिक्षित माता-पिता का आचरण बालक की मौलिक आवश्यकताओं, रुचियों और बौद्धिक क्षमताओं को भली प्रकार समझते हैं और उनके अनुकूल ही बालक के साथ व्यवहार करते हैं। इस प्रकार का व्यवहार बालक के मानसिक विकास में महत्त्वपूर्ण योग देता है।

6. विद्यालय का वातावरण- यदि विद्यालय का वातावरण प्रेम, सहयोग तथा सद्भावनाओं पर आधारित है तो विद्यार्थियों का मानसिक विकास सुगमता से होता है। जिस विद्यालय में विद्यार्थियों की रुचियों और आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है तथा विभिन्न क्रियाओं के आयोजन द्वारा विद्यार्थियों को अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान किये जाते हैं, वहाँ के विद्यार्थियों का मानसिक विकास सामान्य विद्यालय की अपेक्षा अधिक होता है।

7. शिक्षक का व्यवहार- शिक्षक का व्यवहार बालक के मानसिक विकास का प्रमुख कारक होता है। यदि शिक्षक बाल-मनोविज्ञान का ज्ञाता है और वह छात्रों के साथ प्रेम, सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार तथा उचित शिक्षण विधियों का प्रयोग करता है तो बालक का मानसिक विकास अनिवार्य रूप से होगा। शिक्षक की उपेक्षा, ताड़ना तथा बात-बात पर दण्डित करने की धमकी देना मानसिक विकास में अवरोध उपस्थित करते है।

8. समाज का स्तर- बालक के मानसिक विकास पर सामाजिक स्तर को भी प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक बालक किसी-न-किसी समाज का सदस्य होता है। यदि बालक के सम्बन्धित समाज का स्तर ऊँचा तथा शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला होता है तो बालक के मानसिक विकास की गति तीव्र रहती है। अमेरिका, इंग्लैण्ड तथा जापान आदि देशों का सामाजिक जीवन सम्पन्न तथा प्रभावशाली होता है। वहाँ प्रत्येक नगर या मोहल्ले में पुस्तकालयों, वाचनालयों, बालभवनों तथा अजायबघरों की व्यवस्था होती है। परिणामस्वरूप अन्य देशों की अपेक्षा इन देशों के बालकों का मानसिक विकास तीव्र गति से होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शैशवावस्था में होने वाले मानसिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

शैशवावस्था में मानसिक विकास
(Mental Development in Infancy)

शैशवावस्था में होने वाले मानसिक विकास को सामान्य विवरण निम्नलिखित है-

1. नवजात शिशु का प्रथम सप्ताह- नवजात शिशु का मस्तिष्क कोरी प्लेट के समान होता है। इस पर भी वह कुछ क्रियाएँ करता है; जैसे-भूख लगने पर वह रोता है, अधिक शीत लगने पर वह प्रतिक्रिया करता है; जैसे कि छींकना, हिचकी लेना तथा तेज आवाज सुनकर चौंकना उसकी प्रमुख क्रियाएँ होती हैं। वास्तव में शैशवावस्था में मानसिक विकास का प्रमुख साधन ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं।

2. दूसरा सप्ताह- जब शिशु 8 या 9 दिन का होता है तो वह प्रकाश की ओर एकटक देखने लगता है। शरमन के अनुसार, “नवजात शिशु प्रकाश के प्रति विशेष संवेदनशील होता है। गन्ध के प्रति उसे संवेदना होने लगती है। यदि माँ के स्तन में पेट्रोल लगा दिया जाए तो वह दूध पीने से इन्कार कर देगा।

3. प्रथम तथा द्वितीय मास- जब बालक एक मास का होता है तो वह वस्तु को पकड़ने की चेष्टा करता है। दो मास का होने पर वह आवाज सुनकर सिर घुमाने लगता है तथा विभिन्न वस्तुओं को ध्यान से देखने लगता है। अब वह अपनी माता के स्पर्श को भी पहचानने लगता है और माँ को देखकर मुस्करा जाता है।

4. चतुर्थ मास- इस मास में शिशु वस्तुओं को दृढ़ता से पकड़ता है। इच्छित वस्तु के न मिलने पर वह क्रोध करता है व रोता है। अब वह खोये हुए खिलौने को खोजने का भी प्रयास करता है।

5. छठा मास- शिशु स्नेहपूर्ण व्यवहार और क्रोध के अन्तर को समझने लगता है। वह सुमी हुई ध्वनि का अनुसरण करने लगता है।

6. सातवाँ मास- अब वह अनेक खिलौनों के मध्य से अपनी रुचि का खिलौना छाँटने लग जाता है और उसे अन्य बालकों के साथ खेलने में आनन्द आने लगता है।

7. दसवाँ मास- दसवें मास में शिशु की अनुकरण शक्ति प्रबल होने लगती है। वह टूटा-फूटा उच्चारण करने लग जाता है। वह अपना खिलौना छीने जाने का विरोध भी करने लगता है।

8. प्रथम वर्ष- एक वर्ष का शिशु बाबा, दादा, पापा, मम्मी आदि शब्दों का उच्चारण करने लगता है। अब वह अन्य व्यक्तियों की क्रियाओं का अनुसरण तेजी से करने लगता है।

9. द्वितीय वर्ष- दो वर्ष का शिशु दो शब्दों का वाक्य बोलने लगता है। दूसरे वर्ष के अन्त तक उसके पास सौ से दो सौ :शब्दों का भण्डार हो जाता है।

10. तीसरा और चौथा वर्ष- तीन या चार वर्ष के बालक का सम्बन्धीकरण ज्ञान पर्याप्त विकसित हो जाता है। एक बार बताने के पश्चात् वह गरम को ‘गरम’ कहने लगता है। वह चार-पाँच तक की गिनती गिन लेता है और छोटी तथा बड़ी रेखाओं के मध्य भी अन्तर करना सीख जाता है। प्रयास करने पर वह अक्षरे भी लिख लेता है।

11. पाँचवाँ वर्ष- पाँच वर्ष का बालक भविष्यकाल का ज्ञान करने लगता है। वह रंगों के अन्तर को समझने लग जाता है तथा हल्के और भारी को भी भेद कर लेता है। अब वह अपना नाम स्पष्ट बोलने लग जाता है तथा नाम भी लिख लेता है। वह दस-दस शब्दों के वाक्यों की पुनरावृत्ति भी कर लेता है।

प्रश्न 2
बाल्यावस्था में होने वाले मानसिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
प्रारम्भिक बाल्यावस्था में मानसिक विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

बाल्यावस्था में मानसिक विकास
(Mental Development in Childhood)

बाल्यावस्था में होने वाले मानसिक विकास का सामान्य विवरण निम्नलिखित है

1. छठा वर्ष-इस आयु में बालक की स्मरण- शक्ति का विकास तीव्रता से होता है। अब बालक उन वस्तुओं के विषय में भी सोचने लगता है, जो कि उसके सामने नहीं होतीं। बालक पूरी गिनती भी सुना देता है। तथा 13-14 पदार्थों को गिन भी लेता है। अब वह शरीर के विभिन्न अंगों के नाम भी बता देता है तथा सामान्य प्रश्नों के उत्तर भी दे देता है।

2. सातवाँ वर्ष- इस आयु में बालक दो वस्तुओं में अन्तर करने लग जाता है। वह छोटी-छोटी घटनाओं तथा सुनी हुई कहानियों को सुना देता है। उसे सात या आठ तक के पहाड़े भी याद हो जाते हैं। वह कठिन वाक्यों का भी प्रयोग कर लेता है।

3. आठवाँ वर्ष- इस अवस्था में बालक लम्बे वाक्यों का प्रयोग करना सीख जाता है। छोटी-छोटी कहानियाँ तथा कविताएँ उसे सरलता से याद हो जाती हैं। वह 16 या 17 शब्दों के वाक्यों को दोहरा लेता है। अब जीवन में आने वाली समस्याओं को खोजने की क्षमता उसमें आ जाती है।

4. नवाँ वर्ष- इस आयु का बालक दिन, समय, तारीख तथा सिक्कों के विषय में ज्ञान प्राप्त कर लेता है। अब वह 6-7 शब्दों को उल्टे क्रम में दोहराने में सफल हो जाता है। शब्दों का प्रयोग वाक्यों में वह सरलता से कर लेता है। वह पाठ्य-पुस्तक के पाठ की सरलता से पढ़ लेता है और पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दे सकता है।

5. दसवाँ वर्ष- दसवें वर्ष के बालक में जिज्ञासा की प्रवृत्ति प्रबल होने लगती है। वह अपने आस-पास के वातावरण को समझने के लिए प्रश्न करने लगती है; जैसे—पानी क्यों बरसता है? बादल क्या है? रात क्यों होती है?

6. ग्यारहवाँ वर्ष- इस आयु का बालक बीस शब्दों के वाक्यों को दोहरा सकता है तथा कठिन शब्दों की व्याख्या भी कर सकता है। इस आयु में उसमें तुलना करने की प्रवृत्ति का भी विकास हो जाता है। वह वाक्यों में गलती निकाल सकता है तथा चित्र को देखकर उसका सम्पूर्ण विवरण दे सकता है।

7. बारहवाँ वर्ष- इस आयु के बालक में तर्क-शक्ति का पर्याप्त विकास हो जाता है। अब वह समस्याओं का समाधान भी करने लगता है। इस आयु का बालक अपनी ओर से व्याख्या कर सकता है तथा किसी बात का कारण भी बता सकता है।

प्रश्न 3
किशोरावस्था में होने वाले मानसिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
“किशोरावस्था में मानसिक विकास उच्चतम सीमा पर पहुँच जाता है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए और इस काल में होने वाले मानसिक विकास का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

किशोरावस्था में मानसिक विकास
(Mental Development in Adolescence)

किशोरावस्था में होने वाले मानसिक विकास का सामान्य विवरण अग्रलिखित है

1. बुद्धि का विकास- किशोरावस्था में बालक का मन प्रायः अस्थिर रहता है, परन्तु उसका बौद्धिक विकास तीव्रता से होता है। हरमन (Harman) के अनुसार, “15 से 16 वर्ष तक की आयु में बुद्धि का विकास चरम सीमा पर पहुँच जाता है।”

2. केन्द्रीकरण की शक्ति का विकास- किशोरावस्था में किसी वस्तु या विषय के प्रति ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता का पर्याप्त विकास हो जाता है। इस आयु में किशोर अमूर्त चिन्तन करता है और किसी वस्तु पर काफी समय तक अपना ध्यान केन्द्रित कर सकता है।

3. मानसिक स्वतन्त्रता का विकास- बाल्यावस्था तक बालक परम्परागत रूढ़ियों को बिना किसी विरोध के स्वीकार करता है, परन्तु किशोरावस्था में तर्क-शक्ति के विकास के कारण उसमें मानसिक स्वतन्त्रता का उदय हो जाता है। अब वह रूढ़ियों, परम्पराओं तथा अन्धविश्वासों को आँखें बन्द करके स्वीकार नहीं करता है।

4. स्मरण- शक्ति का विकास-किशोरावस्था में बालक कल्पना-जगत् में विचरण करता है और दिवा-स्वप्न देखने लगता है। ये दोनों प्रवृत्तियाँ किशोरावस्था में विशेष रूप से विकसित हो जाती हैं। कल्पना-शक्ति के अत्यधिक विकसित हो जाने के कारण बालक तथा बालिकाएँ काव्य और कहानी सृजन में रुचि लेने लगते हैं। कल्पना-शक्ति का विकास बालकों की अपेक्षा बालिकाओं में अधिक होता है। इस प्रकार साहित्य साधन के बीज किशोरावस्था में ही अंकुरित होते हैं।

5. तर्क-शक्ति का विकास-तर्क- शक्ति का विकास किशोरावस्था में पर्याप्त मात्रा में हो जाता है। किशोर बिना तर्क के किसी भी बात को स्वीकार नहीं करता।

6. विभिन्न रुचियों का विकास- किशोरावस्था में बालक की रुचियों का विकास तीव्रता से होता है। कुछ रुचियाँ समान होती है। जैसे-भावी व्यवसाय और जीवन के सम्बन्ध में रुचि, फिल्मी गीत सुनने तथा फिल्में देखने, प्रेम साहित्य पढ़ने, स्वतन्त्र अध्ययन तथा चोरी-छिपे काम-यौन सम्बन्धी साहित्य का अवलोकन करना। लड़कों को जासूसी तथा मारधाड़ की फिल्में देखने में तथा लड़कियों को सामाजिक तथा प्रेम सम्बन्धी फिल्में देखने में विशेष आनन्द आता है। अपनी रुचि के आधार पर किशोर वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर, कवि तथा लेखक आदि बनने का प्रयास करते हैं। कुछ किशोर राजनीति में भी सक्रिय भाग लेने लग जाते हैं। लड़के शारीरिक व्यायाम तथा खेलकूद में और लड़कियाँ साहित्य, संगीत तथा नृत्य आदि में विशेष रुचि लेती हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रत

प्रश्न 1
बालक के मानसिक विकास में शिक्षक के योगदान को स्पष्ट कीजिए।
या
बालक के मानसिक विकास के लिए शिक्षक को क्या करना चाहिए?-स्पष्ट कीजिए।
या
बालक के मानसिक विकास में अध्यापक की क्या भूमिका है?
उत्तर:
शिक्षक का कर्तव्य है कि वह बालकों के मानसिक विकास में अपना सहयोग देने के लिए। मानसिक विकास के क्रम और उसे प्रभावित करने वाले कारकों को समझे तथा उनके अनुकूल ही अपने छात्रों के साथ व्यवहार करे। विद्यालय का उचित वातावरण, समुचित पाठ्यक्रम, प्रभावशाली शिक्षण विधियाँ तथा समाज का उच्च स्तर बालक के मानसिक विकास में परम सहायक होते हैं। अत: इनके समुचित सृजन में शिक्षक को अपना पूर्ण सहयोग देना चाहिए। इस प्रकार सम्पूर्ण शैक्षिक वातावरण बालक के मानसिक विकास के अनुकूल होना चाहिए। इतना ही नहीं शिक्षक का यह भी कर्तव्य है कि वह बालकों के अभिभावकों से सम्पर्क स्थापित करके उन्हें बताये कि कौन-कौन सी बातें बालक के मानसिक विकास में सहायक होती हैं और कौन-सी बाधक। वास्तव में परिवार और विद्यालय दोनों का उचित वातावरण बालक के स्वस्थ मानसिक विकास में सहायक होता है। अत: ऐसी दशा में परिवार और विद्यालय दोनों को ही इस क्षेत्र में परस्पर सहयोग देना चाहिए।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
मानसिक विकास का अर्थ संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
मानसिक क्षमताओं में होने वाले क्रमिक विकास को मानसिक विकास कहते हैं।

प्रश्न 2
मानसिक विकास से सम्बन्धित मुख्य क्षमताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मानसिक विकास से सम्बन्धित मुख्य क्षमताएँ हैं-प्रत्यक्षीकरण, ध्यान एवं रुचि, स्मृति, विचार, कल्पना, विश्वास, तर्क तथा निर्णय की क्षमताएँ।

प्रश्न 3
मानसिक विकास के लिए अनिवार्य प्रमुख शर्त क्या है?
उत्तर:
मानसिक विकास के लिए अनिवार्य प्रमुख शर्त है-पर्यावरण के साथ अन्त:क्रिया।

प्रश्न 4
बालक के सामान्य मानसिक विकास के लिए उसकी जिज्ञासा-वृत्ति के प्रति क्या दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए?
उत्तर:
बालक के सामान्य मानसिक विकास के लिए उसकी जिज्ञासा-वृत्ति को शान्त करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

प्रश्न 5
बालक के मानसिक विकास को प्रभावित करने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. वंशानुक्रम,
  2. परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति
  3. विद्यालय का वातावरण तथा
  4. शिक्षक का व्यवहार

प्रश्न 6
“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क रहता है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन अरस्तू का है।

प्रश्न 7
“माता-पिता की शिक्षा बालकों की मानसिक योग्यता से निश्चित रूप से सम्बन्धित है।”
यह कथन किसका है?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन स्ट्रांग का है।

प्रश्न 8
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. बालक के मानसिक विकास के परिणामस्वरूप मानसिक, शक्तियों का जन्म होता है तथा वे क्रमशः पुष्ट होती हैं।
  2. मानसिक विकास के लिए पर्यावरण के साथ सम्पर्क स्थापित होना अनिवार्य है।
  3. मानसिक विकास का शिक्षा की प्रक्रिया से कोई सम्बन्ध नहीं है।
  4. मानसिक विकास की प्रक्रिया पर व्यक्तिगत भिन्नताओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  5. सुचारु मानसिक विकास के लिए बालक की जिज्ञासा-वृत्ति को नियन्त्रित रखना चाहिए।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. असत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-

प्रश्न 1.
मानसिक विकास से आशय है-
(क) पढ़ना-लिखना सीख लेना
(ख) मानसिक क्षमताओं का पुष्ट होना
(ग) बालक द्वारा व्यक्तियों की पहचान करना
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं

प्रश्न 2.
मानसिक विकास को प्रभावित करते हैं-
(क) आनुवंशिकता
(ख) परिवार का वातावरण
(ग) विद्यालय का वातावरण
(घ) ये सभी

प्रश्न 3.
मानसिक विकास तथा शिक्षा की प्रक्रिया का सम्बन्ध है-
(क) कोई सम्बन्ध नहीं है।
(ख) दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।
(ग) शिक्षा का मानसिक विकास पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता
(घ) मानसिक विकास का शिक्षा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता

प्रश्न 4.
व्यक्ति का मानसिक विकास प्रायः पूर्ण हो जाता है-
(क) बाल्यावस्था के अन्त तक
(ख) किशोरावस्था के अन्त तक
(ग) वृद्धावस्था में आकर
(घ) कभी नहीं

प्रश्न 5.
15 से 20 वर्ष की अवस्था में मानसिक विकास की सीमा-
(क) उच्चतम होती है
(ख) न्यूनतम होती है
(ग) औसत होती है
(घ) असीमित होती है

प्रश्न 6.
सामान्य से अधिक तथा निरन्तर बनी रहने वाली थकान का मानसिक विकास पर क्या प्रभाव पड़ता है?
(क) उत्साहपूर्वक प्रभाव पड़ता है
(ख) कोई प्रभाव नहीं पड़ता
(ग) प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है
(घ) सभी कथन भ्रामक हैं

प्रश्न 7.
“संवेदना ज्ञान की प्रथम सीढ़ी है।”
(क) मानसिक विकास है
(ख) भाषागत विशेषता है
(ग) शारीरिक विशेषता है
(घ) सर्वांगीण विकास है

प्रश्न 8.
“ज्ञान की प्रथम सीढ़ी” कौन-सी है?
(क) संवेदना
(ख) भाषागत विकास
(ग) शारीरिक विकास
(घ) ये सभी

उत्तर:

  1. (ख) मानसिक क्षमताओं का पुष्ट होना
  2. (घ) ये सभी,
  3. (ख) दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं
  4. (ख) किशोरावस्था के अन्त तक
  5. (क) उच्चतम होती है
  6. (ग) प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है
  7. (क) मानसिक विकास है
  8. (क) संवेदना

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 8 Community: As an Agency of Education

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 8
Chapter Name Community: As an Agency of Education
(समुदाय: शिक्षा के अभिकरण के रूप में)
Number of Questions Solved 18
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 8 Community: As an Agency of Education (समुदाय: शिक्षा के अभिकरण के रूप में)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1 समुदाय का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। समुदाय की मुख्य विशेषताओं का भी उल्लेख कीजिए।
उतर:

समुदाय का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Community)

अंग्रेजी का शब्द ‘Community’ (समुदाय) दो लैटिन शब्दों-‘Com’ एवं ‘Munis’ का मिश्रित रूप है। Com का अर्थ ‘एक साथ’ और Munis का अर्थ ‘सेवा करना है। इन शब्दों के आधार पर समुदाय का शाब्दिक अर्थ ‘साथ-साथ मिलकर सेवा करने से है। समुदाय का तात्पर्य व्यक्तियों के ऐसे समूह से है जो निश्चित भूभाग पर सामान्य उद्देश्यों के लिए एकसाथ मिलकर जीवन व्यतीत करते हैं। वे साधारण जीवन व्यतीत करते हुए एक-दूसरे की सहायता करते हैं और अपने अधिकारों का उपयोग भी करते हैं। प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैकाइवर तथा पेज की दृष्टि में समुदाय सामान्य जीवन का क्षेत्र है। समुदाय के आधारभूत तत्त्वों तथा प्रकृति के आधार पर विभिन्न विद्वानों ने समुदाय को निम्नलिखित शब्दों में परिभाषित करने का प्रयास किया है

  1. ऑगबर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “एक सीमित क्षेत्र में सामाजिक जीवन के सम्पूर्ण संगठन को समुदाय कहा जाता है।”
  2. बोगाईस की दृष्टि में, “संमुदाय एक ऐसा सामाजिक समूह है जिसमें कुछ अंशों में ‘हम की भावना पाई जाती है तथा जो एक निश्चित्रं क्षेत्र में रहता है।”
  3. डेविस के अनुसार, “समुदाय सबसे छोटा ऐसा क्षेत्रीय समूह है जिसमें सामाजिक जीवन के सभी पहलू आ जाते हैं।”
  4. मैकाइवर तथा पेज के मतानुसार, “जब किसी छोटे या बड़े समूह के सदस्य साथ-साथ इस प्रकारे रहते हैं कि वे किसी विशेष हित में ही भागीदार न होकर सामान्य जीवन की मूलभूत दशाओं या स्थितियों में भाग लेते हैं तो ऐसे समूह को समुदाय कहा जाता है।

इस प्रकार, “समुदाय सामान्य सामाजिक जीवन में सहभागी लोगों का एक ऐसा समूह है जो किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में साथ-साथ रहता है और जिसमें ‘हम की भावना’ या ‘सामुदायिक भावना पाई जाती है।”

समुदाय की विशेषताएँ
(Characteristics of Community)

समुदाय की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. जन-समूह- व्यक्तियों का समूह (जन-समूह) समुदाय के निर्माण हेतु प्रथम मुख्य आधार है। ..
  2. निश्चित भौगोलिक क्षेत्र- निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में निवास करने वाला समूह ही समुदाय है। गाँव, नगर या राष्ट्र इसलिए समुदाय हैं क्योंकि इनमें से हर एक का निश्चित भौगोलिक क्षेत्र है।
  3. सामुदायिक भावना- समुदाय में रहने वाले लोगों के बीच सामुदायिक भावना पाई जाती है, जिसके तीन तत्त्व हैं-हम की भावना, दायित्व निर्वाह की भावना तथा निर्भरता की भावना।
  4. व्यापक उद्देश्य- समुदाय के उद्देश्य व्यक्ति विशेष, समूह विशेष या वर्ग विशेष के हितों की पूर्ति नहीं करते। ये तो व्यापक रूप से समस्त व्यक्तियों एवं समूहों के सभी प्रकार के लक्ष्यों की पूर्ति हेतु कार्य करते हैं।
  5. सामुदायिक सदस्यता- एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में रहने के कारण समुदाय की सदस्यता स्वतः ही प्राप्त हो जाती है।
  6. स्वतः विकसित- समुदाय का निर्माण जान-बूझकर या नियोजित प्रयासों से नहीं किया जाता। ये तो समय के साथ स्वत: विकसित होते हैं।
  7. विशिष्ट नाम- प्रत्येक समुदाय को अपना एक विशिष्ट नाम समुदाय की विशेषताएँ होता है।जन-समूह
  8. सामान्य नियम व्यवस्था- समुदाय में सामान्य नियमों के निश्चित भौगोलिक क्षेत्र माध्यम से लोगों के व्यवहार को निर्देशित किया जाता है व उन पर १ सामुदायिक भावना नियन्त्रण रखा जाता है।व्यापक उद्देश्य
  9. स्थायित्व- किसी अस्थायी समूह; जैसे-भीड़, श्रोता सामुदायिक सदस्यता समूह या खानाबदोश झुण्ड को समुदाय नहीं कहेंगे। समुदाय एक स्वतः
  10. विकसित निश्चित भू- भाग से स्थायी रूप से जुड़ी रहता है। विशिष्ट नाम
  11. सामान्य जीवन- समुदाय के सभी सदस्य प्रायः एक जैसा सामान्य नियम व्यवस्था सामान्य जीवन जीते हैं। उनके कुछ सामान्य रीति-रिवाज, परम्पराएँ, स्थायित्व त्योहार, विश्वास, उत्सव तथा संस्कार होते हैं जो उन्हें एकता के सूत्र के सामान्य जीवन में बाँध देते हैं।

प्रश्न 2.
शिक्षा के एक अभिकरण के रूप में समुदाय के शैक्षिक कार्यों की विवेचना कीजिए।
या
“समाज शिक्षा का एक शक्तिशाली अभिकरण है।” इस सन्दर्भ में समाज के शैक्षिक कार्यों को लिखिए।
या
शिक्षा के अभिकरण के रूप में समुदाय की भूमिका का वर्णन कीजिए।
या
“समुदाय शिक्षा का सक्रिय एवं अनौपचारिक अभिकरण है।” विवेचना कीजिए।
या
समाज के शैक्षिक कार्य क्या हैं?
या
समुदाय के शैक्षिक कार्यों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उतर:

शिक्षा के अभिकरण के रूप में समुदाय के कार्य
(Functions of Community as Agency of Education)

शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों में समुदायका महत्त्वपूर्ण स्थान है। समुदाय को अपने सदस्यों विशेष रूप से बच्चों एवं युवा वर्ग के प्रति विशेष दायित्व होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए समुदाय अपने क्षेत्र में विभिन्न शैक्षिक कार्यों को दायित्वपूर्ण ढंग से सम्पन्न करता है। शिक्षा के एक सक्रिय एवं अनौपचारिक अभिकरण के रूप में समुदाय के शैक्षिक कार्यों का विवरण निम्नलिखित है

1. शारीरिक विकास की व्यवस्था-समुदाय के शैक्षिक कर्तव्य में प्रथम है बालक के शारीरिक विकास की व्यवस्था। समुदाय का कर्तव्य है कि वह विद्यालय में शान्त एवं स्वस्थ वातावरण के माध्यम से विद्यार्थियों का समुचित शारीरिक विकास करे। इसके लिए विद्यालय प्रांगण अथवा किसी सार्वजनिक स्थान पर खेलकूद तथा व्यायामशालाओं का पर्याप्त प्रबन्ध किया जाना चाहिए। प्रत्येक ग्राम और नगर में स्थान-स्थान पर सामुदायिक उद्यान, पार्क, क्रीड़ा-स्थल, मनोरंजन के साधन तथा स्वास्थ्य व चिकित्सा केन्द्र स्थापित किए जाने चाहिए। यही नहीं, समुदाय द्वारा निर्धन वर्ग के बच्चों हेतु मुफ्त आहार की व्यवस्था भी की जानी चाहिए।

2. सम्पूर्ण मानसिक विकास- शारीरिक विकास के साथ ही बालक को मानसिक विकास भी अपरिहार्य है। बालक को अपनी क्षमताओं, योग्यताओं तथा विचारों को मुक्त रूप से अभिव्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए और यह शैक्षिक दायित्व भी समुदाय का है। समुदाय का कर्तव्य है कि वह श्रेष्ठ शिक्षण संस्थाओं, पुस्तकालयों, वाचनालयों, पत्र-पत्रिकाओं, नाट्यशालाओं, रेडियो, टी०वी० तथा चलचित्रों जैसे अभिकरणों के माध्यम से बच्चों के बौद्धिक विकास में मदद दे। समुदाय द्वारा बालक को सम्पूर्ण मानसिक विकास के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।

3. नैतिकता का विकास- किसी समुदाय के सदस्यों का नैतिक-चरित्र उसे समाज में उत्कृष्ट तथा गौरवशाली बनाता है। अत: समुदाय का एक महत्त्वपूर्ण दायित्व है कि वह बालकों के नैतिक-चरित्र को उन्नत करे। प्रेम, परोपकार, उदारता, विनम्रता, कर्तव्यपरायणता, सहिष्णुता, बन्धुत्व की भावना एवं पारस्परिक सहयोग-इन सभी मानवीय गुणों से बालक के जीवन में नैतिकता की आधारभूमि निर्मित होती है। समुदाय को ऐसे शैक्षिक साधन सुलभ कराने चाहिए जो बालक का अधिकतम नैतिक विकास कर सकें। बालक में उत्तम गुणों के विकास हेतु जहाँ एक ओर समुदाय के वातावरण को स्वच्छ एवं सुन्दर बनाया जाना चाहिए, वहीं दूसरी ओर बालकों को दूषित एवं अनैतिक वातावरण से दूर रखना सर्वथा उपयुक्त है।

4. धार्मिक सहिष्णुता का विकास- भारतीय सैमॉज के प्रत्येक नागरिक के जीवन में धर्म तथा मानव-सेवा की भावना सर्वोपरि पाई जाती है। समुदाय का कर्तव्य है कि वह बालक में ऐसी भावनाओं का समावेश तथा विकास करे, क्योंकि समाज में विभिन्न मत-मतान्तरों एवं मजहबों के अनुयायी रहते हैं। अतः समुदाय को अपने औपचारिक व अनौपचारिक अभिकरणों के माध्यम से लोगों को धर्म का वास्तविक अर्थ एवं स्वरूप समझाना चाहिए। इससे लोगों में धार्मिक सहिष्णुता तथा समन्वयवादी भावनाओं का विकास होगा। इसके अतिरिक्त समुदाय द्वारा आयोजित किए जाने वाले धार्मिक-पर्व, उत्सव, गोष्ठियाँ, व्याख्यान मालाओं तथा धार्मिक शिक्षा के अभिकरण के रूप में आयोजनों से समाज के नागरिकों में सत्य, अहिंसा, दया, त्याग, समुदाय के कार्य सहयोग, विश्व-शान्ति तथा भाईचारे की मानवीय भावनाओं का ॐ शारीरिक विकास की व्यवस्था विकास भी होगा। सम्पूर्ण मानसिक विकास

5. भावात्मक तथा कलात्मक विकास- मानव-जीवन के दो , नैतिकता का विकास पक्ष अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं- (i) भावपक्ष एवं (ii) कलापक्ष। सुन्दर-विशुद्ध भावनाएँ तथा विविध रूपमयी कलाएँ मनुष्य को जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त करने में सहायता देती हैं। इन दोनों पक्षों के समुचित विकास की दृष्टि से समुदाय को ललित कलाओं, संगीत २ जीविकोपार्जन की समस्या का विद्यालयों, सौन्दर्य स्थलों एवं बाल-उद्यानों आदि की स्थापना करनी समाधान चाहिए। इसके अतिरिक्त समय-समय पर संगीत समारोह, साहित्य के शिक्षा-प्रणाली एवं संस्थाओं पर सम्मेलन, नाटक, प्रदर्शनी एवं उत्सव भी आयोजित किए जाएँ। बालक नियन्त्रण का भावात्मक तथा कलात्मक विकास नि:सन्देह समुदाय का शैक्षिक ” शिक्षा के अनौपचारिक साधनों कर्तव्य है, जिसे पूरा करने हेतु समुदाय को अधिकतम प्रयास करना। की व्यवस्था चाहिए।

6. जीविकोपार्जन की समस्या का समाधान- समुदाय का एक शैक्षिक कर्तव्य यह भी है कि वह बालक के व्यावसायिक विकास में योगदान कर जीविकोपार्जन की समस्या का समाधान करे। इसके लिए एक तो व्यावसायिक एवं औद्योगिक शिक्षा की समुचित व्यवस्था की जाए; दूसरे कृषि, हस्तकौशल तथा विभिन्न व्यवसायों से सम्बन्धित प्रशिक्षण संस्थाएँ स्थापित की जाएँ। समुदाय द्वारा जीविकोपार्जन के उचित अवसर उपलब्ध कराने से बच्चों में आत्मनिर्भरता तथा स्वावलम्बन की भावना जाग्रत होगी।

7. शिक्षा-प्रणाली एवं संस्थाओं पर नियन्त्रणसभी लोकतान्त्रिक देश अपनी शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत शैक्षिक उद्देश्य एवं शिक्षण की विधियों में लोकतान्त्रिक आदर्शों का समावेश चाहते हैं, किन्तु यह कार्य समुदाय के बिना सम्भव नहीं है। यह सामुदायिक नेतृत्व का दायित्व है कि वह समुदाय की आवश्यकतानुसार विभिन्न प्रकार के विद्यालयों; जैसे—बाल-विद्यालय, विकलांग एवं पिछड़े बालकों के लिए विद्यालय, सामान्य बुद्धि के बालकों हेतु विद्यालय, प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र तथा व्यावसायिक व तकनीकी संस्थान की स्थापना करे तथा शिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रमों तथा प्रशासनिक संगठन की रूपरेखा सुनिश्चित करे।

यह दायित्व भी समुदाय का ही है कि वह विद्यालय की शिक्षा-दीक्षा एवं प्रबन्ध-तन्त्र के संचालन हेतु ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति करे जो पर्याप्त रूप से कुशल और अनुभवी हों। इस सन्दर्भ में हावर्थ के अनुसार, ‘विद्यालय समाज के चरित्र का सुधार करने का साधन है। यह सुधार सामाजिक उन्नति की दिशा में है या नहीं, यह विद्यालय के संचालकों के विचारों तथा आदर्शों पर निर्भर रहता है।”

8. शिक्षा के अनौपचारिक साधनों की व्यवस्था शिक्षा के व्यापक दृष्टिकोण के अन्तर्गत शिक्षा के औपचारिक तथा अनौपचारिक सभी साधन सम्मिलित हैं। सिर्फ औपचारिक साधनों की व्यवस्था करके ही समुदाय का शैक्षिक दायित्व पूरा नहीं हो जाता, उसे बालकों के लिए शिक्षा के अनौपचारिक साधनों का प्रबन्ध भी करना चाहिए। इस दृष्टि से समुदाय द्वारा पुस्तकालयों, चित्रशालाओं, संग्रहालयों, संगीतशालाओं, अभिनय केन्द्रों तथा स्वास्थ्य संगठनों की स्थापना होनी आवश्यक है। उल्लेखनीय रूप से इन अनौपचारिक साधनों में भाँति-भाँति के शैक्षिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि शिक्षा के साधन के रूप में समुदाय के अनेक शैक्षिक कर्तव्य हैं। जो बालक की शिक्षा में समुदाय के महत्त्व तथा शैक्षिक प्रभाव का प्रतिपादन करते हैं। वास्तव में समुदाय के सहयोग से ही बालक एक आदर्श नागरिक बनकर व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से समाज की प्रगति में सहायता दे सकता है।

प्रश्न 3.
विद्यालय और समुदाय में सहयोग स्थापित करने की विधियों का उल्लेख कीजिए।
या
उन मुख्य उपायों का संक्षेप में वर्णन कीजिए जो विद्यालय तथा समुदाय के बीच सामंजस्य स्थापित करते हैं।
उतर:

विद्यालय और समुदाय में सहयोग
(Co-operation in School and Community)

एडम्स का यह कथन है, “विद्यालय एक ऐसी संस्था है जहाँ बालक में समाज, देश और युग की आवश्यकतानुसार गुणों का विकास करके उसे एक सुयोग्य नागरिक बनाया जाता है। विद्यालय, समुदाय के घनिष्ठ एवं अटूट सम्बन्ध की पुष्टि करता है। समुदाय शैक्षिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु विद्यालयों की स्थापना करते हैं और विद्यालय शिक्षा के माध्यम से समुदाय की प्रगति में सहयोग करते हैं। इस भाँति विद्यालय और समुदाय दोनों के शैक्षिक उद्देश्य प्रायः एकसमान हैं और इनकी उन्नति भी आपसी सहयोग पर ही निर्भर करती है। अत: दोनों संस्थाओं को मिल-जुलकर सामंजस्यपूर्ण ढंग से कार्य करना चाहिए। विद्यालय और समुदाय में परस्पर सहयोग एवं सामंजस्य स्थापित करने की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित

1. विद्यालयों में कार्यक्रमों का आयोजन- विद्यालय और समुदाय के बीच आपसी सहयोग एवं सामंजस्य बढ़ाने की दृष्टि से विद्यालय के प्रांगण में अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए। समय-समय पर विद्यालयों में वाद-विवाद, निबन्ध एवं भाषण प्रतियोगिताओं, विज्ञान एवं चित्रकला प्रदर्शनियों, संगोष्ठियों तथा सम्मेलनों का आयोजन किया जाए और उनमें समुदाय के सदस्यों को भी आमन्त्रित किया जाए। सामुदायिक समस्याओं के सम्बन्ध में आपसी विचार-विमर्श तथा समाधान की खोज निश्चय ही शिक्षकों, शिक्षार्थियों तथा समुदाय के सदस्यों को निकट लाने में मदद देगी।

2. समुदाय के शैक्षिक साधनों का उपयोग- समुदाय के कुछ शैक्षिक साधन होते हैं; जैसे-शिक्षा-प्रसार विभाग, प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र, साक्षरता केन्द्र, महिला शिक्षा केन्द्र, सांस्कृतिक कार्य केन्द्र आदि। समाज की शिक्षा संस्थाओं को चाहिए कि वे उपलब्ध सामुदायिक शैक्षिक साधनों का उपयोग करके अधिकाधिक लाभ अर्जित करें। स्पष्टत: विद्यालय और समुदाय के पारस्परिक हित एक-दूसरे को अधिक निकट लाने में सहयोग करेंगे।

3. अनुकूल पाठ्यक्रम का निर्माण- विद्यालय का पाठ्यक्रम व्यक्ति और समुदाय दोनों के लिए उपयोगी होना चाहिए। इसके साथ ही शैक्षिक पाठ्यक्रम समुदाय विशेष की प्रकृति, समस्याओं तथा आवश्यकताओं के अनुकूल भी होना चाहिए। इस भाँति जीवन्त तथा उपयोगी पाठ्यक्रम, विद्यालय और समुदाय के मध्य एक महत्त्वपूर्ण कड़ी बनकर दोनों संस्थाओं में सामंजस्य स्थापित करता है।

4. विद्यालय-प्रबन्ध में समुदाय का योगदान- विद्यालय और समुदाय के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध तभी स्थापित हो सकता है जब दोनों एक-दूसरे के विकास हेतु अपना दायित्व समझकर वांछित योगदान करें। इस दृष्टि से विद्यालय के प्रबन्ध-तन्त्र में समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। विद्यालय के प्रबन्ध में समुदाय के सदस्यों के प्रतिनिधित्व तथा योगदान से जहाँ एक ओर विद्यालय अधिकाधिक उन्नति करेगा, वहीं दूसरी ओर विद्यालय तथा समुदाय के मध्य आपसी समझ-बूझ तथा सहयोग की भावना भी बढ़ेगी।

5. समाज-सेवा के कार्य विद्यालयों को उचित एवं यथेष्ठ अवसरों पर समुदाय के अन्तर्गत समाज-सेवा के कार्य करने चाहिए। समाज-सेवा समिति, बालचर संघ, श्रमदान तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी सहायता कार्यों में सक्रिय भाग लेकर शिक्षक एवं छात्र समज-सेवा की भावना से प्रेरित होते हैं तथा समुदाय को लाभ पहुँचाते हैं। यही कारण है कि हर एक शिक्षा संस्थान में स्काउटिंग-गाइडिंग, राष्ट्रीय सेवा योजना, समाज-सेवा, प्राथमिक चिकित्सा, श्रमदान सप्ताह तथा सफाई सप्ताह आदि का आयोजन किया जाना चाहिए। इन सामाजिक कार्यों के परिणामस्वरूप विद्यालय एवं समुदाय के बीच सहयोग की भावना का विकास होगा।

6. शिक्षक-अभिभावक संघ-शिक्षक- अभिभावक संघ भी विद्यालय और समुदाय में सहयोग स्थापित करने की उत्तम विधि है। यह संघ विद्यालय के शिक्षकों तथा विल य भयो। शिक्षार्थियों के अभिभावक-गणों का एक सोद्देश्य संगठन है, जिसके अन्तर्गत शिक्षक और अभिभावक मिलकर समदाय की प्रगति एवं विद्यालय में कार्यक्रमों का विद्यालय की उन्नति के विषय में विचार-विनिमय करते हैं। यह आयोजन विद्यालय तथा समुदाय के बीच घनिष्ठता बढ़ाने का एक द्विमार्गीय उपयोग उपाय है। अत: प्रत्येक विद्यालय में शिक्षक-अभिभावक संघ की स्थापना आवश्यक रूप से की जाए और समय-समय पर उसकी सभाएँ भी आयोजित की जाएँ।

7. पूर्व-छात्र परिषद् विद्यालयों में पूर्व- छात्र परिषद् की , समाज-सेवा के कार्य स्थापना द्वारा विद्यालय तथा समुदाय के पारस्परिक सम्बन्धों को उत्तम शिक्षक-अभिभावक संघ बनाया जा सकता है। विद्यालय से जाने के बाद छात्र समाज के पूर्व-छात्र परिषद् विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करते हैं। वे अपने अनुभवी सुझावों द्वारा आर्थिक सहायता प्रदान करना विद्यालय की मदद कर सकते हैं। अतः पूर्व-छात्र परिषद् की स्थापना के सरस्वती यात्राएँ करके शिक्षा-संस्थाओं में समुदाय के बीच से पुरातन छात्रों को विद्यालय को सामुदायिक जीवन आमन्त्रित करना चाहिए। इस प्रकार की गतिविधियाँ, निश्चय हीका केन्द्र बनाना विद्यालय और समुदाय को अत्यधिक निकट ला देंगी।

8. आर्थिक सहायता प्रदान करना- समुदाय के सक्षम सदस्य विद्यालयों की आर्थिक दशा सुधारने हेतु उन्हें वांछित आर्थिक सहायता प्रदान कर सकते हैं। इसके निमित्त समुदाय के प्रबुद्ध नागरिकों तथा विद्यालय के अधिकारियों को पारस्परिक विचार-विमर्श द्वारा अनिवार्यताओं के क्रम में आर्थिक योजना का प्रारूप तैयार करना चाहिए। आर्थिक सहायता पाकर जहाँ एक ओर विद्यालयों की उन्नति होगी, वहीं दूसरी ओर समुदाय के सदस्य भी अपने शैक्षिक दायित्वों के प्रति अधिकाधिक प्रेरित होंगे।

9. सरस्वती यात्राएँ- सरस्वती यात्राएँ विद्यालय और समुदाय में सहयोग स्थापित करने हेतु महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन यात्राओं के अन्तर्गत समय-समय पर विद्यालय के बच्चों को ऐतिहासिक तथा भौगोलिक स्थलों पर ले जाना चाहिए। उन्हें विभिन्न औद्योगिक संस्थानों, वन्य प्राणि-विहारों, संग्रहालयों तथा दर्शनीय स्थानों का भ्रमण कराना चाहिए। ऐसा करने से बच्चे निरीक्षण एवं अनुभव द्वारा अपना अधिकाधिक ज्ञान बढ़ा सकते हैं। वस्तुतः उनका यह ज्ञान समुदाय एवं विद्यालय के बीच सहयोग बनाने की एक कड़ी के रूप में उपयोगी सिद्ध होता है।

10. विद्यालय को सामुदायिक जीवन का केन्द्र बनाना- विद्यालयी शिक्षा सामुदायिक जीवन से जुड़कर ही अर्थपूर्ण हो सकती है। अतः विद्यालय के प्रांगण में समुदाय के हितों से सम्बद्ध विभिन्न गतिविधियों के केन्द्र स्थापित किए जाने चाहिए। विद्यालयों में प्रौढ़ शिक्षा एवं स्त्री-शिक्षा के केन्द्र, संध्या या रात्रि समय पुस्तकालय व वाचनालय तथा स्वस्थ मनोरंजन सम्बन्धी कार्यक्रमों की व्यवस्था की जानी चाहिए। विद्यालय में उपलब्ध शैक्षिक साधनों का प्रयोग करके समुदाय के लोगों की भावनाएँ विद्यालय के प्रति अधिक सहानुभूतिपूर्ण तथा उदार होती हैं, जिसके परिणामतः वे विद्यालय को अधिकाधिक सहयोग देने हेतु प्रेरित होते हैं।

निष्कर्षतः सर्वांगीण उन्नति एवं विकास की दृष्टि से पारस्परिक सहयोग बढ़ाने के लिए विद्यालय और समुदाय को एक-दूसरे की गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लेना चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
समुदाय के महत्त्व का उल्लेख कीजिए। या शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में समुदाय के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

समुदाय का महत्त्व
(Importance of Community)

  1. समुदाय, गृह अथवा विद्यालय की तरह ही, बालक के व्यवहार में परिवर्तन इस भाँति लाता है ताकि वह एक सदस्य के रूप में समूह के कार्यों में सक्रिय भाग ले सके।
  2. समुदाय बालक की शिक्षा को शुरू से ही प्रभावित करता है। यह शिक्षा के उपयोगी साधनों की व्यवस्था करता है जिससे समुदाय के सभी सदस्यों का सर्वांगीण विकास होता है।
  3. बालक की संस्कृति, बोलचाल, रहन-सहन, स्वभाव, विचारों तथा आदतों पर समुदाय की अप्रत्यक्ष, किन्तु प्रभावपूर्ण छाप होती है। बच्चे को शिक्षित एवं सुसंस्कृत बनाने में समुदाय की विशिष्ट भूमिका रहती है।
  4. समुदाय बालक के समाजीकरण की प्रक्रिया में अधिकतम योगदान देता है। समुदाय विशेष के बीच रहकर अर्जित किए गए अनुभव तथा सामाजिक प्रतिमान बालक को सामाजिक व्यक्ति बनाने में सहयोग प्रदान करते हैं।
  5. समुदाय का वातावरण बालक की अनुकरण करने की जन्मजात प्रवृत्तियों पर विशेष प्रभाव डालता है। बालक गृह-परिवार, आस-पड़ोस, विद्यालय तथा अनेक समूहों के साथ रहकर सम्बन्ध बनाता है और उनसे प्रभावित होकर शिक्षा ग्रहण करता है।
  6. 6. समुदाय को शिक्षा का महत्त्वपूर्ण अभिकरण स्वीकार करते हुए विलियम ए० ईगर ने इस प्रकार लिखा है, “क्योंकि मानव स्वभाव से ही सामाजिक प्राणी है, इसलिए उसने वर्षों के अनुभव से सीख लिया है। कि व्यक्तित्व और सामूहिक क्रियाओं का विकास समुदाय द्वारा ही सर्वोत्तम रूप में किया जा सकता है।”

प्रश्न 2.
बालक की शिक्षा में समुदाय के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

बालक की शिक्षा में समुदाय का योगदान
(Contribution of Community in Child’s Education)

परिवार और विद्यालय के समान समुदाय भी शिक्षा का महत्त्वपूर्ण अभिकरण है। समुदाय बालक के व्यवहार को इस भाँति रूपान्तरित करता है ताकि वह उस समूह के कार्यों में सक्रिय भाग ले सके, जिसका कि वह सदस्य है। बालक समुदाय से औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों ही प्रकार की शिक्षा प्राप्त करता है। व्यापक अर्थ में शिक्षा आजन्म चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत बालक अनौपचारिक तथा स्वाभाविक रूप से प्रत्येक क्षण अपने सामुदायिक जीवन से कुछ-न-कुछ सीखता रहता है। जॉन डीवी का मत है, “विद्यालय को समाज का वास्तविक प्रतिनिधि होना चाहिए।’ विद्यालय शिक्षा की एक औपचारिक संस्था है, जिसकी स्थापना समाज या समुदाय करता है। अत: विद्यालय पर समुदाय का प्रभाव पड़ता ही है। इसी तरह से समुदाय भी विद्यालय शिक्षा के उद्देश्य निर्धारित करने में योगदान देता है।

बालक के व्यक्तित्व के विकास पर समुदाय का गहरा असर पड़ता है। बालक की संस्कृति, आचरण, रहन-सहन, बोलचाल, स्वभाव, विचारों तथा आदतों के निर्माण में भी समुदाय का परोक्ष, प्रभावशाली एवं महत्त्वपूर्ण योगदान है। बालक की अनुकरण करने की जन्मजात प्रवृत्तियों पर समुदाय के वातावरण का विशेष प्रभाव पड़ता है। प्रायः बालक वैसा ही बनता है जैसा कि समुदाय का नेतृत्व उसे बनने की प्रेरणा देता है। सामुदायिक संगति का गहरा और व्यापक असर होता है। प्राय: देखने में आता है कि कलाकार के साथ रहने वाला बालक उसकी कला से प्रभावित हो जाता है और विशिष्ट कला में रुचि रखने लगता है। इसके अतिरिक्त, धार्मिक, सामाजिक, नागरिक एवं शैक्षिक संस्थाएँ; जैसे-विद्यालय, समाज सेवी तथा राजनीतिक दल, समाचार-पत्र, पुलिस, यात्राएँ, घर, पास-पड़ोस तथा क्रीड़ा-स्थल आदि सामुदायिक इकाइयाँ भी बालक की शिक्षा और उसके सर्वांगीण विकास में भूमिका निभाती हैं। स्पष्टतः बालक की शिक्षा में समुदाय का अभीष्ट योगदान रहता है।

प्रश्न 3.
समाज तथा समुदाय में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उतर:

समाज तथा समुदाय में अन्तर

मनुष्यों द्वारा सामूहिक जीवन व्यतीत करने के लिए विभिन्न संगठन गठित किए गए हैं, जिनमें से दो मुख्य हैं–‘समाज’ तथा समुदाय’। समाज तथा समुदाय में विभिन्न समानताएँ होते हुए भी निम्नलिखित अन्तर–

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विद्यालय तथा समुदाय के आपसी सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उतर:
विद्यालय तथा समुदाय का आपसी सम्बन्ध निम्नलिखित विवरण द्वारा स्पष्ट हो जाएगा–

  1. विद्यालय का समुदाय से गहरा सम्बन्ध है और दोनों ही अपने विकास के लिए एक-दूसरे पर आश्रित हैं।
  2. विद्यालय औपचारिक शिक्षा के माध्यम से तथा समुदाय अनौपचारिक शिक्षा द्वारा बालक के व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं। अतः व्यक्तित्व के समुचित विकास हेतु विद्यालय एवं समुदाय में आपसी सहयोग अनिवार्य है।
  3. प्रत्येक समुदाय अपनी प्रगति हेतु विद्यालय की स्थापना करता है। विद्यालय, समुदाय के प्रतिनिधि तथा राष्ट्र के भावी नागरिक के रूप में बालक को शिक्षा प्रदान करता है।
  4. विद्यालय में विभिन्न समुदायों से प्रायः सभी संस्कृतियों के बालक शिक्षा पाने हेतु आते हैं और साथ-साथ रहकर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।
  5. विद्यालय और समुदाय के वातावरण भी एक-दूसरे के साथ अन्त:क्रिया करते हैं। विद्यालय का वातावरण कृत्रिम, किन्तु समुदाय का वातावरण स्वाभाविक होता है। समुदाय की सभी अच्छाइयाँ और बुराइयाँ विद्यालय के संगठन एवं क्रियाकलापों पर गहरा असर रखती हैं।
  6. बालक के शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, नैतिक एवं सांस्कृतिक विकास द्वारा विद्यालय समुदाय के विकास में सहयोग करते हैं। हावर्थ लिखते हैं, “विद्यालय समाज के चरित्र में सुधार करने का साधन है। यह सुधार सामाजिक उन्नति की दिशा में है या नहीं, यह विद्यालय के संचालकों के चरित्र एवं आदर्शों पर निर्भर करता है।”
  7. जॉन डीवी ने सच ही कहा है, “विद्यालय समाज का सच्चा प्रतिनिधि है।”

प्रश्न 2.
गृह अथवा परिवार तथा समुदाय के आपसी सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गृह अथवा परिवार तथा समुदाय के आपसी सम्बन्ध का विवरण निम्नलिखित है-

  1. व्यक्ति, गृह (परिवार) का एक सदस्य है-परिवारों से समुदाय बनते हैं और समुदाय समाज का महत्त्वपूर्ण अंग है। इस प्रकार व्यक्ति, समुदाय एवं समाज का घनिष्ठ सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है।
  2. गृह और समुदाय एक-दूसरे से इतने अधिक सम्बद्ध हैं कि एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही नहीं रहता।
  3. घर में जन्म लेने वाला प्रत्येक बच्चा एक निश्चित समुदाय से जुड़ा होता है। उसके प्रारम्भिक जीवन का अधिकांश समय जिस समुदाय के बीच व्यतीत होता है, उस समुदाय की संस्कृति के अनुसार ही उसके व्यक्तित्व का विकास होता है।
  4. समुदाय अपने शैक्षिक कर्तव्यों के अन्तर्गत परिवार के बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का व्यापक प्रबन्ध करता है।
  5. दूसरी ओर, जहाँ परिवार का सभ्य-सुसंस्कृत वातावरण, चरित्र, आचरण एवं नैतिक आदर्श समुदाय की दिशा निर्धारित करता है, वहीं परिवार के सदस्यों के दोष भी समुदाय के वातावरण पर प्रभाव डालते हैं।
  6. रॉस के अनुसार, ‘‘ऐसे व्यक्ति का कोई भी मूल्य नहीं है जो सामाजिक जीवन से पृथक् हो।”

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘समुदाय’ की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए। उत्तर “समुदाय एक ऐसा सामाजिक समूह है जिसमें कुछ अंशों में हम की भावना पाई जाती है तथा जो एक निश्चित क्षेत्र में रहता है।” 
-बोगस

प्रश्न 2.
‘समुदाय की तीन मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • ‘सामुदायिक भावना’ अथवा ‘हम की भावना’ का पाया जाना,
  • निश्चित भौगोलिक क्षेत्र तथा
  • स्वत: विकास।

प्रश्न 3.
क्या समुदाय भी शिक्षा का अभिकरण है? यदि हाँ, तो यह शिक्षा का किस प्रकार का अभिकरण है? ‘समुदाय शिक्षा के किस अभिकरण का उदाहरण है ?
उत्तर:
समुदाय स्पष्ट रूप से शिक्षा का अभिकरण है। यह शिक्षा का अनौपचारिक अभिकरण है।

प्रश्न 4.
समुदाय द्वारा अपने युवकों की जीविकोपार्जन की समस्या के समाधान में क्या योगदान दिया जाता है?
उत्तर:
समुदाय द्वारा युवकों के औद्योगिक एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था करके उनकी जीविकोपार्जन सम्बन्धी समस्या के समाधान में योगदान दिया जाता है।

प्रश्न 5.
बच्चों की औपचारिक शिक्षा की व्यवस्था में समुदाय द्वारा क्या योगदान दिया जाता है?
उत्तर:
समुदाय विद्यालय एवं अन्य शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करके बच्चों की औपचारिक शिक्षा की व्यवस्था करता है।

प्रश्न 6.
“विद्यालय समाज का सच्चा प्रतिनिधि है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन जॉन डीवी का है।

प्रश्न 7.
कथन सत्य हैं या असत्य

  1. एक सीमित क्षेत्र में सामाजिक जीवन के सम्पूर्ण संगठन को समुदाय कहते हैं।
  2. समुदाय द्वारा बच्चों की शिक्षा-व्यवस्था में कोई उल्लेखनीय योगदान नहीं दिया जाता है।
  3. समुदाय स्पष्ट रूप से शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण औपचारिक अभिकरण है।
  4. विद्यालय तथा समुदाय में घनिष्ठ आपसी सम्बन्ध होता है।
  5. समुदाय द्वारा बच्चों के बहुपक्षीय विकास में विशेष योगदान दिया जाता है।

उत्तर:

  1. सत्य,
  2. असत्य,
  3. असत्य,
  4. सत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
बच्चों की शिक्षा के दृष्टिकोण से समुदाय को माना जाता है|
(क) अनावश्यक अभिकरण
(ख) औपचारिक अभिकरण
(ग) अनौपचारिक अभिकरण
(घ) कामचलाऊ अभिकरण

प्रश्न 2.
बच्चों की शिक्षा-व्यवस्था के दृष्टिकोण से विद्यालय तथा समुदाय का आपसी सम्बन्धहोता है
(क) परस्पर विरोध का
(ख) परस्पर सहयोग का
(ग) समुदाय विद्यालय पर हावी रहता है।
(घ) विद्यालय समुदाय के प्रभाव से मुक्त है।

प्रश्न 3.
‘समुदाय’ का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान है
(क) शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरणों की व्यवस्था करना
(ख) शिक्षा पर आवश्यक नियन्त्रण रखना
(ग) विद्यालय पर आवश्यक नियन्त्रण रखना
(घ) उपर्युक्त सभी योगदान

उत्तर:

1. (ग) अनौपचारिक अभिकरण,
2. (ख) परस्पर सहयोग का,
3. (घ) उपर्युक्त सभी योगदान।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 19 Physical Development

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 19
Chapter Name Physical Development (शारीरिक विकास)
Number of Questions Solved 18
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 19 Physical Development (शारीरिक विकास)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शारीरिक विकास का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

शारीरिक विकास का अर्थ
(Meaning of Physical Development)

डॉ० सीताराम जायसवाल का यह कथन उल्लेखनीय है, “बालक के विकास का विस्तृत अध्ययन शिक्षा मनोविज्ञान में किया जाता है। इसके अन्तर्गत विकास के सभी पक्षों का अध्ययन किया जाता है। बालक का शैक्षिक विकास और व्यावहारिक ज्ञान, उसकी शारीरिक गति तथा विकास से प्रभावित होते हैं।” शरीर के विभिन्न अंगों की वृद्धि, उनकी परिपक्वता तथा क्रियाशीलता शारीरिक विकास के अन्तर्गत आती। है। बालक के शरीर के विभिन्न अंगों के आकार व भार में वृद्धि और उनकी क्रियाशीलता में होने वाले परिवर्तनों तथा उनकी परिपक्वता की प्रक्रिया ही शारीरिक विकास है। मानवीय विकास की सम्पूर्ण प्रक्रिया में शारीरिक विकास का सर्वाधिक महत्त्व है। वास्तव में यदि बालक को शारीरिक विकास सामान्य एवं सुचारु हो, तो विकास के अन्य पक्ष भी सामान्य ही रहते हैं। शारीरिक विकास के असामान्य हो जाने की स्थिति में विकास के अन्य पक्षों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

शारीरिक विकास की प्रमुख विशेषताएँ
(Major Features of Physical Development)

शारीरिक विकास की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. क्रमिक व धीमा विकास- गर्भाधान के पश्चात् ही शिशु का शारीरिक विकास प्रारम्भ हो जाता है। इस अवस्था में विकास की गति बहुत मन्द होती है, लेकिन विकास एक निश्चित क्रम में ही होता है।

2. शारीरिक विकास का चक्र- शरीर का विकास एकसमान गति से नहीं होता है। शरीरशास्त्रियों के अनुसार जन्म से प्रथम दो वर्षों तक शारीरिक विकास अत्यधिक तीव्र गति से होता है। इसके बाद 11 वर्ष की आयु तक विकास की गति धीमी रहती है। 11 से 15 वर्ष की आयु के मध्य पुनः विकास तीव्र गति से होता है। 16 से 18 वर्ष की आयु में विकास की गति पुन: धीमी पड़ जाती है। जब विकास की गति धीमी होती है, उस समय हट्ठियों व मांसपेशियों आदि का पुष्टिकरण होता है। इसी कारण विकास के साथ-साथ अंग मजबूत और पुष्ट होते चलते हैं।

3. शारीरिक विकास की दिशा- मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बालक के विभिन्न अंगों का विकास एक निश्चित क्रमानुसार होता है। इस क्रमिक विकास को सिर-पुच्छीय दिशा कहा जाता है। गर्भ से पहले शिशु का सिर विकसित होता है और फिर धड़ तथा अन्त में हाथ-पैरों का विकास होता है। जन्म के पश्चात् बालक के अंगों की गति और क्रियाओं को विकास भी इसी क्रम से होता है।

4. शारीरिक विकास में अनियमितता- शरीर के सभी अंग एक साथ नहीं बढ़ते हैं और न ही विकसित होते हैं। सभी अंगों का विकास भिन्न-भिन्न समय से होता है; जैसे—सिर का विकास सर्वप्रथम होता है और वह पहले ही परिपक्व भी हो जाता है। इसके अलावा जिन अंगों की एक ही समय में वृद्धि होती है, उनमें भी पृथक्-पृथक् दर से वृद्धि होती है। यही कारण है कि बालक और प्रौढ़ की आँखों के आकार में कोई विशेष अन्तर नहीं होता है, जबकि हाथ-पैर आदि अंगों में काफी अन्तर होता है।

5. लिंग-भेद का प्रभाव- शारीरिक विकास की गति और स्वरूप पर लिंग-भेद का काफी प्रभाव पड़ता है। इसलिए लड़के और लड़कियों का शारीरिक विकास भिन्न-भिन्न रूप में होता है। किशोरावस्था में लड़कों की तुलना में लड़कियों का शारीरिक विकास अधिक तीव्रता से होता है।

6. शारीरिक विकास का बालक के व्यवहार पर प्रभाव- शारीरिक विकास का बालक के व्यवहार पर भी प्रभाव पड़ता है। यदि बालक हृष्ट-पुष्ट होता है तो बड़े होने पर उसमें नेतृत्व करने तथा दूसरों पर अपना प्रभुत्व जमाने की प्रवृत्ति आ जाती है। उसमें अभिमान की भावना आ जाती है और वह सबसे अकड़ कर बोलने लगता है। इसके विपरीत दुर्बल शरीर का बालक डरपोक बन जाता है और उसमें अन्य बालकों से दबकर रहने की प्रवृत्ति आ जाती है।

प्रश्न 2
शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
या
बालकों के शारीरिक विकास पर किन-किन कारकों का प्रभाव पड़ता है? किन्हीं दो कारकों का उल्लेख कीजिए।
या
शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कौन-कौन से कारक हैं? इन कारकों का ज्ञान एक बाल-मनोवैज्ञानिक के लिए किस प्रकार लाभदायक है।
या
बाल्यावस्था में शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों की सविस्तार व्याख्या कीजिए।
उत्तर:

शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक
(Factors Influencing Physical Development)

शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है|

1. वंशानुक्रम- स्वस्थ माता-पिता की सन्तान भी स्वस्थ होती है। जो माता-पिता विभिन्न रोगों से ग्रस्त होते हैं और शारीरिक दृष्टि से दुर्बल होते हैं, उनके बच्चे भी शारीरिक दृष्टि से दुर्बल ही होते हैं। अत: उनका शारीरिक विकास भी ठीक प्रकार से नहीं हो पाता।

2. वातावरण- बालक के शारीरिक विकास में वातावरण का विशेष योगदान रहता है। खुली हवां, पर्याप्त धूप और शान्त तथा स्वच्छ वातावरण शारीरिक विकास के लिए पूर्णतया अनुकूल होता है। इसके विपरीत जो बालक प्रकाशहीन, सीलन भरे तथा तंग मकानों में रहते हैं, उनका शारीरिक विकास ठीक प्रकार से नहीं हो पाता और वे प्रायः विभिन्न रोगों से ग्रस्त रहते हैं। क्रो एवं क्रो के अनुसार, बालक के प्राकृतिक विकास में वातावरण के तत्त्व सहायक या बाधक होते हैं।”

3. पौष्टिक भोजन- पौष्टिक भोजन का भी शारीरिक विकास पर विशेष प्रभाव पड़ता है। पौष्टिक भोजन से बालक के विभिन्न अंगों का उचित विकास होता है। प्रत्येक बालक का वजन, ऊचाई तथा शारीरिक शक्ति बहुत कुछ पौष्टिक भोजन पर निर्भर करते हैं। जिन बालकों को पौष्टिक भोजन मिलता है, उनका विकास भी समुचित होता रहता है। पौष्टिक भोजन के अभाव में बालक के विभिन्न अंगों का समुचित विकास नहीं होता और अनेक रोग आक्रमण कर देते हैं।

4. नियमित दिनचर्या- यमित दिनचर्या शारीरिक विकास का प्रमुख तत्त्व है। जो बालक समय से सोते-उठते हैं, समय से भोजन करते एवं खेलते हैं, उनका शारीरिक विकास अन्य बालकों की अपेक्षा उत्तम ढंग से होता है। नियमित दिनचर्या स्वास्थ्य की आधारशिला है।

5. व्यायाम और खेलकूद- व्यायाम और खेलकूद शारीरिक विकास के लिए परम आवश्यक हैं। व्यायाम और खेलकूद से शरीर के रक्त का परिभ्रमण उचित ढंग से होता है तथा मांसपेशियों में दृढ़ता आती है।

6. निद्रा और विश्राम- शरीर के समुचित विकास के लिए निद्रा और विश्राम का सर्वाधिक महत्त्व है। शैशवकाल में शिशु का अधिकांश समय सोने में ही व्यतीत होता है। बालक और किशोरों को भी निद्रा के लिए
पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। आवश्यकता से अधिक देर तक पढ़ना, बालकों और किशोरों के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ है। विभिन्न शोध कार्यों से ज्ञात हुआ है कि यह उनके शारीरिक विकास में बाधा उत्पन्न करता है।

7. सुरक्षा की भावना- यदि बालक में सुरक्षा की भावना नहीं है तो उसका शारीरिक विकास उचित ढंग से नहीं होगा। सुरक्षा की भावना के अभाव में बालक भय और चिन्ता से ग्रस्त हो जाता है। इस प्रकार उसमें आत्मविश्वास की भावना लुप्त हो जाती है। परिणामस्वरूप उसका विकास स्वाभाविक ढंग से नहीं हो पाता।

8. सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार- बालक की मन:स्थिति का उसके स्वास्थ्य पर विशेष प्रभाव पड़ता है। जिन बालकों को ताड़ना और उपेक्षापूर्ण व्यवहार मिलता है, उनका शारीरिक विकास उचित ढंग से नहीं हो पाता। अनाथ बालक इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। शिक्षक को यह बात ध्यान में रखकर बालकों के साथ यथासम्भव प्रेम और सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिए।

9. दोषपूर्ण सामाजिक परम्पराएँ- अल्प आयु में बालकों और बालिकाओं का विवाह हो जाना शारीरिक विकास के लिए घातक है। जिन बालक-बालिकाओं का विवाह 13 या 15 वर्ष की आयु में हो जाता है, उनका स्वास्थ्य तीव्रता से नष्ट होने लगता है।

10. अन्य कारक- शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कुछ अन्य कारक इस प्रकार हैं।

  1. कोई दुर्घटना या आकस्मिक बीमारी।
  2. दूषित और अस्वस्थ जलवायु।
  3. बालकों में हस्तमैथुन जैसे कुटेवों का विकसित होना।

उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि बालक के शारीरिक विकास को विभिन्न कारक प्रभावित करते हैं। इन कारकों में से किसी एक या अधिक कारकों की अवहेलना हो जाने अथवा उनमें असामान्यता ओ जाने की स्थिति में बालक के शारीरिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। शारीरिक विकास का घनिष्ठ सम्बन्ध बालक के विकास के अन्य सभी पक्षों से भी होता है; अत: शारीरिक विकास के अवरुद्ध हो जाने अथवा असामान्य हो जाने की दशा में बालक के सम्पूर्ण विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले सभी कारकों का ज्ञान बाल-मनोवैज्ञानिकों के लिए आवश्यक एवं लाभकारी है। बाल-मनोवैज्ञानिक इन कारकों को सामान्य रखकर बालक के सम्पूर्ण विकास को सुचारु बना सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शैशवावस्था में होने वाले शारीरिक विकास का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

शैशवावस्था में शारीरिक विकास
(Physical Development in Infancy)

विकास की प्रथम अवस्था को शैशवावस्था कहते हैं। शैशवावस्था में होने वाले शारीरिक विकास का विवरण निम्नवर्णित है-

1. शिशु का भार- गर्भ से बाहर आने के पश्चात् शिशु का भार 6.5 पौण्ड से 8 पौण्ड तक का होता है। बालक 9 से 9.5 पौण्ड तक के भी उत्पन्न हुए हैं। बालिकाओं का भार बालकों से कम होता है। प्रथम 5 वर्ष में बालक का विकास जिस तीव्रता से होता है, उस अनुपात में फिर नहीं होता। प्रथम 6 माह में बालक को भार दुगुना और वर्ष भर में तीन-गुना हो जाता है। पाँचवें वर्ष के अन्त में शिशु का भार 38 एवं 43 पौण्ड के बीच में हो जाता है।

2. शिशु की लम्बाई- जन्म के समय शिशु की लम्बाई 20 इंच के लगभग होती है। लड़कों की लम्बाई लड़कियों से अधिक होती है, परन्तु बाद में लड़कियों की लम्बाई लड़कों से अधिक हो जाती है। प्रथम दो वर्ष में शिशु की लम्बाई 10 इंच और दूसरे वर्ष में 4 या 5 इंच बढ़ती है। तीसरे से पाँचवें वर्ष तक बालक की लम्बाई बढ़ने की गति पूर्व की अपेक्षा कम रहती है।

3. सिर और मस्तिष्क- नवजात शिशु के सिर की लम्बाई उसके शरीर की सम्पूर्ण लम्बाई की 1/4 होती है। प्रथम दो वर्षों में सिर अत्यन्त तीव्रता से विकसित होता है और बाद में विकास की गति मन्द हो जाती है। जन्म के समय शिशु के मस्तिष्क का भार 350 ग्राम होता है। मस्तिष्क का भार दो वर्ष में दुगुना और पाँच वर्ष में लगभग 1000 ग्राम हो जाता है।

4. मांसपेशियाँ- जन्म के समय शिशु की मांसपेशियों का भार सम्पूर्ण शरीर के कुल भार का 23.4 प्रतिशत होता है। इस भार का विकास धीरे-धीरे होता है। भुजाएँ दो वर्ष में प्राय: दो-गुनी तथा अंगों का विकास डेढ़-गुना हो जाता है।

5. अस्थियाँ- नवजात शिशु की अस्थियाँ कोमल तथा लचीली होती हैं। पर्याप्त काल तक खोपड़ी की विभिन्न अस्थियाँ ठीक प्रकार से नहीं जुड़ पातीं। एक वर्ष के अन्त में ऊपर की अस्थियों को छोड़कर शेष अस्थियाँ जुड़ जाती हैं। दूसरे वर्ष ऊपर की अस्थियाँ भी जुड़ जाती हैं। एक नवजात शिशु की अस्थियों की संख्या कुल मिलाकर 212 के लगभग होती है। कैल्सियम, फॉस्फेट की सहायता से अस्थियों में दिन-प्रतिदिन कड़ापन आता जाता है। यह प्रक्रिया अस्थीकरण कहलाती है। बालकों की अपेक्षा बालिकाओं का अस्थीकरण तीव्रता से होता है।

6. दाँत- लगभग 6 से 8 माह के पश्चात् शिशु के दूध के दाँत चमकते हैं। कमजोर शिशु के दाँत देर से निकलते हैं। प्रारम्भ में नीचे के अगले दाँत निकलते हैं। जो वर्ष में 8 के लगभग हो जाते हैं। चार वर्ष की आयु में बालक के समस्त दाँत निकल आते हैं।

7. अन्य अंगों का विकास- प्रथम माह में नवजात शिशु के हृदय की धड़कन एक मिनट में 140 बार होती है। जैसे-जैसे हृदय बड़ा होता जाता है, वैसे-वैसे हृदय की धड़कन में स्थिरता आती जाती है। 6 वर्ष तक शिशु के शरीर के ऊपरी भाग का पर्याप्त विकास हो जाता है। शिशुओं के यौनांगों का विकास धीमी गति से होता है। तीन वर्ष के पश्चात् शिशु के शरीर और मस्तिष्क में सन्तुलन प्रारम्भ हो जाता है। मस्तिष्क का शरीर के अंगों पर नियन्त्रण स्थापित हो जाता है। हाथों और पैरों में दृढ़ता आ जाती है। पाँच वर्ष के अन्त तक बालक पर्याप्त आत्म-निर्भर हो जाता है और वह कुशलता तथा स्वतन्त्रता से कार्य करना प्रारम्भ कर देता है।

प्रश्न 2.
बाल्यावस्था में होने वाले शारीरिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

बाल्यावस्था में शारीरिक विकास
(Physical Development in Childhood)

शैशवावस्था के उपरान्त प्रारम्भ होने वाली अवस्था को बाल्यावस्था कहते हैं। बाल्यावस्था में होने वाले शारीरिक विकास का सामान्य विवरण निम्नलिखित है|

1. भार- इस अवस्था में बालक का भार पर्याप्त तीव्रता से बढ़ता है। 12 वर्ष के अन्त तक बालक का भार 80 और 95 पौण्ड के मध्य होता है। 10 वर्ष तक बालकों का भार अधिक बढ़ता है। तत्पश्चात् बालिकाओं के भार में वृद्धि होती है, क्योंकि उनकी किशोरावस्था जल्दी आती है।

2. लम्बाई- बाल्यावस्था में लम्बाई अधिक तीव्रता से नहीं बढ़ती। 6 से 12 वर्ष के बालक की लम्बाई 3 या 4 इंच तक ही बढ़ती है।

3. अस्थियाँ- इस अवस्था में अस्थियों की संख्या में वृद्धि हो जाती है। बाल्यावस्था में अस्थीकरण तीव्रता से होता है तथा बालक की अस्थियों में पर्याप्त दृढ़ता आ जाती है। बालिकाओं का अस्थीकरण दो वर्ष पूर्व हो जाता है।

4. सिर और मस्तिष्क- इस अवस्था में सिर के आकार में पर्याप्त अन्तर आ जाता है। 5 वर्ष के बालक का सिर 90 प्रतिशत प्रौढ़ के आकार का हो जाता है तथा 10 वर्ष की आयु में 95 प्रतिशत होता है। इस अवस्था में मस्तिष्क का भी पर्याप्त विकास हो जाता है।

5. मांसपेशियाँ- बाल्यावस्था में मांसपेशियों का विकास धीरे-धीरे होता है। 8 वर्ष के बालक की मांसपेशियों का भार शरीर के कुल भार का 27 प्रतिशत हो जाता है। बाल्यावस्था में बालिकाओं की मांसपेशियों में बालक की अपेक्षा अधिक वृद्धि होती है।

6. अन्य अंगों का विकास- इस अवस्था में हृदय की धड़कन निरन्तर कम होती जाती है। 6 वर्ष के बालक के हृदय की धड़कन एक मिनट में 100 बार होती है, जब कि 12 वर्ष में यह घटकर 85 रह जाती है। बालकों के कन्धे पर्याप्त चौड़े हो जाते हैं तथा कूल्हे पतले हो जाते हैं और पैरों में सीधापन व लम्बापन आ जाता है। इसके विपरीत बालिकाओं के कन्धे पतले और कूल्हे चौड़े हो जाते हैं। पैर अन्दर की तरफ झुके होते हैं।

प्रश्न 3
किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
बालक अथवा बालिकाओं में किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

किशोरावस्था में शारीरिक विकास
(Physical Development in Adolescence)

किशोरावस्था में अनेक क्रान्तिकारी शारीरिक परिवर्तन होते हैं। इनमें मुख्य परिवर्तन निम्नलिखित होते हैं-

1. भार- किशोर बालक का भार बालिकाओं की अपेक्षा अधिक तीव्रता से बढ़ता है। 18 वर्ष तक बालकों का भार बालिकाओं से लगभग 25 पौण्ड अधिक हो जाता है।

2. लम्बाई- इस अवस्था में बालकों तथा बालिकाओं की लम्बाई तीव्रता से बढ़ती है, परन्तु यौवन में प्रवेश करते-करते लड़कों की ऊँचाई लड़कियों से 3 से 4 इंच अधिक होती है। बालिकाओं की ऊँचाई 16 वर्ष की अवस्था में अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है।

3. अस्थियाँ- बाल्यावस्था में अस्थियों में जो लचीलापन होता है, वह समाप्त हो जाता है और उनमें दृढ़ता आ जाती है। दूसरे शब्दों में, अस्थीकरण की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है। बालिकाओं को अस्थीकरण बालकों से दो वर्ष पूर्व हो जाता है।

4. सिर और मस्तिष्क- इस अवस्था में भी सिर और मस्तिष्क का विकास जारी रहता है। 16 वर्ष की आयु तक सिर का विकास. पूर्ण हो जाता है। मस्तिष्क का भार 1200 से 1400 ग्राम के मध्य में होता है। मस्तिष्क में पर्याप्त परिपक्वती आ जाती है।

5. मांसपेशियाँ- किशोरावस्था में मांसपेशियों का विकास तीव्र गति से होता है। 16 वर्ष की आयु में मांसपेशियों का भार कुल शरीर के भार का लगभग 44 प्रतिशत हो जाता है।

6. दाँत- किशोरावस्था में बालकों और बालिकाओं के लगभग समस्त स्थायी दाँत निकल आते हैं।

7. अन्य अंगों का विकास- हृदय की धड़कन में पूर्व की अपेक्षा पर्याप्त मन्दी आ जाती है। प्रौढ़ अवस्था में प्रवेश करते समय किशोर की धड़कन एक मिनट में 72 बार होती है। बालकों की मुखाकृति में पर्याप्त परिवर्तन हो जाता है। बालकों की आवाज भारी होने लगती है, परन्तु बालिकाओं की आवाज में कोमलता रहती है। लड़कों के कन्धे पर्याप्त चौड़े हो जाते हैं। बालिकाओं के कूल्हों की चौड़ाई बढ़ जाती है। बालकों के दाढ़ी-मूंछ निकल आती है। गुप्तांगों में पर्याप्त वृद्धि होती है। किशोरों में स्वप्नदोष और बालिकाओं में मासिक धर्म प्रारम्भ हो जाता है। उनके स्तनों का पर्याप्त विकास हो जाता है तथा बगल और गुप्तांग पर बाल उगने आरम्भ हो जाते हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सुचारु शारीरिक विकास के लिए शिक्षा के स्वरूप का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
बालक के सुचारु शारीरिक विकास के लिए बालक की शिक्षा के उचित स्वरूप को अपनाना चाहिए। बालक की शिक्षा में खेल एवं व्यायाम का समुचित समावेश होना चाहिए। सुचारु शारीरिक विकास के लिए शिक्षा की व्यवस्था व्यक्तिगत शारीरिक गुणों को ध्यान में रखकर ही की जानी चाहिए। शारीरिक रूप से दुर्बल अथवा विकलांग बालकों की शिक्षा की व्यवस्था अलग से की जानी चाहिए। सुचारु शारीरिक विकास के लिए बच्चों के उचित पोषण का भी ध्यान रखना चाहिए। इसके लिए शिक्षकों एवं अभिभावकों को परस्पर सहयोग से काम करना चाहिए। इसके अतिरिक्त शिक्षकों का दायित्व है कि वे बच्चों के स्वास्थ्य एवं आदतों का भी ध्यान रखें। समय-समय पर विद्यालय में छात्रों के स्वास्थ्य का परीक्षण होना चाहिए।

प्रश्न 2
शारीरिक विकास पर आहार एवं पोषण का क्या प्रभाव पइता है?
उत्तर:
बालक के शारीरिक विकास पर आहार एवं पोषण का विशेष प्रभाव पड़ता है। यदि बालक को पर्याप्त मात्रा में सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार उपलब्ध होता रहता है तो उसका शारीरिक विकास सुचारु रूप में होता है। वास्तव में सन्तुलित आहार उपलब्ध होने की दशा में बालक विभिन्न अभावजनित रोगों का शिकार नहीं होता तथा उसका स्वास्थ्य अच्छा रहता है। यही नहीं सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार ग्रहण करने से बालक की रोग-प्रतिरोधक क्षमता में भी उल्लेखनीय विकास होता है तथा परिणामस्वरूप बालक स्वस्थ रहता है। अच्छे स्वास्थ्य वाले बालक का शारीरिक विकास सामान्य होता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि सन्तुलित आहार उपलब्ध न होने की दशा में बालक का शारीरिक विकास प्रायः अवरुद्ध हो जाता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
बालक के शारीरिक विकास से क्या आशय है?
उत्तर:
बालक के शरीर के समस्त अंगों की वृद्धि तथा उनकी परिपक्वता एवं क्रियाशीलता में क्रमशः होने वाले परिवर्तन को शारीरिक विकास के रूप में जाना जाता है।

प्रश्न 2
बालक के विकास के विभिन्न पक्षों में से शारीरिक विकास को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
उत्तर:
बालक के विकास के विभिन्न पक्ष किसी-न-किसी रूप में शारीरिक विकास पर ही निर्भर करते हैं। अत: शारीरिक विकास को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

प्रश्न 3
जीवन के किस काल में शारीरिक विकास की दर सर्वाधिक होती है?
उत्तर:
जन्म के उपरान्त शैशवकाल में शारीरिक विकास की दर सर्वाधिक होती है।

प्रश्न 4
शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक हैं-

  1. वंशानुक्रम
  2. वातावरण
  3. पौष्टिक भोजन
  4. नियमित दिनचर्या
  5. निद्रा और विश्राम तथा
  6. सुरक्षा की भावना

प्रश्न 5
सुचारु शारीरिक विकास के लिए शिक्षा में किन गतिविधियों का समावेश होना आवश्यक है?
उत्तर:
सुचारु शारीरिक विकास के लिए शिक्षा में खेल एवं व्यायाम जैसी गतिविधियों का समावेश होना आवश्यक है।

प्रश्न 6
दुर्बल स्वास्थ्य एवं विकलांगता का शारीरिक विकास पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
दुर्बल स्वास्थ्य एवं विकलांगता का शारीरिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। प्रश्न? निम्नलिखित कथन सत्य हैं अथवा असत्य

  1. शरीर के अंगों में आने वाली परिपक्वता शारीरिक विकास को दर्शाती है।
  2. शारीरिक विकास का विकास के अन्य पक्षों से कोई सम्बन्ध नहीं है।
  3. बालक के शारीरिक विकास में आनुवंशिकता का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।
  4. परिवार का सामाजिक-आर्थिक स्तर भी बालक के शारीरिक विकास को प्रभावित करता है।
  5. सुचारु शारीरिक विकास की दशा में बालक की शैक्षिक गतिविधियाँ सामान्य होती हैं।

उत्तर:

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. सत्य
  5. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-

प्रश्न 1.
बालक के शरीर के अंगों की वृद्धि एवं परिपक्वता तथा क्रियाशीलता में होने वाले परिवर्तनों को सम्मिलित रूप में कहते हैं
(क) सामान्य विकास
(ख) शारीरिक विकास
(ग) गामक विकास
(घ) सम्पूर्ण विकास

प्रश्न 2.
शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाला एक मुख्य कारक है
(क) पोषण एवं स्वास्थ्य
(ख) फैशन
(ग) मनोरंजन
(घ) व्यवसाय

प्रश्न 3.
विकास के अन्य पक्षों की तुलना में शारीरिक विकास को अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है
(क) इससे व्यक्तित्व में निखार आता है
(ख) इससे व्यक्ति बलवान बनता है
(ग) इसका अच्छा प्रभाव विकास के अन्य पक्षों पर पड़ता है
(घ) इसका कोई अतिरिक्त महत्त्व नहीं है

प्रश्न 4.
बालक के शारीरिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले कारक हैं
(क) सन्तुलित आहार एवं पोषण
(ख) खेल एवं व्यायाम
(ग) रोग एवं दुर्बल स्वास्थ्य
(घ) नियमित दिनचर्या

प्रश्न 5.
सामान्य शारीरिक विकास के लिए बालक की शिक्षा में समावेश होना चाहिए
(क) नियमित मनोरंजन का
(ख) खेल एवं व्यायाम का
(ग) प्रतिस्पर्धा का
(घ) संघर्ष का

उत्तर:

  1. (ख) शारीरिक विकास
  2. (क) पोषण एवं स्वास्थ्य
  3. (ग) इसका अच्छा प्रभाव विकास के अन्य पक्षों पर पड़ता है
  4. (ग) रोग एवं दुर्बल स्वास्थ्य
  5. (ख) खेल एवं व्यायाम का

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