UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name धातु-रूप-प्रकरणे
Number of Questions 21
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे

धातु-रूप-प्रकरण

पाठ्यक्रम में निर्धारित धातु-रूप निम्नवत् हैं

(1) परस्मैपदी धातु ‘स्था’ (ठहरना)
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(2) परस्मैपदी ‘पा’ (पीना)

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(3) नी (ले जाना)

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(4) कृ (करना)

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[ध्यान दें-नीचे दिये जा रहे धातु रूप पाठ्यक्रम में निर्धारित नहीं है, परन्तु अनुवाद में सहायक होने के कारण यहाँ दिये जा रहे हैं। ]

(5) चुर् (चुराना)

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(6) दा (देना)

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(7) गम् (जाना)

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(8) भू (होना)

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(9) पेच् (पकाना)

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(10) हस् (हँसना)

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(11) पठ् (पढ़ना)

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(12) दिव (क्रीड़ा, जीतने की इच्छा, जुआ खेलना आदि)

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(13) प्रच्छ (पूछना)

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(14) अस् (होना)

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(15) अद् (खाना)

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(16) खाद् (भोजन करना)

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(17) कथ् (कहना)

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पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ में आये धातु-रूपों के हल

पाठ 5:
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पाठ 6:
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पाठ 7:
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पाठ 8:
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पाठ 9:
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पाठ 10:
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विशेष – धातु रूपों से सम्बन्धित बहुविकल्पीय प्रश्नों के प्रारूप-ज्ञान के लिए कुछ प्रश्न नीचे दिये जा रहे है

[ संकेत- काले अक्षरों में छपे विकल्प को उचित विकल्प समझे।।]

(1) ‘स्था’ धातु लृट् लकार, उत्तम पुरुष बहुवचन का रूप होगा
(i) स्थास्यतः
(ii) स्थास्यामः
(iii) स्थास्यथ
(iv) स्थास्यसि

(2) ‘नये:’ रूप होता है, ‘नी’ धातु के
(i) लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन का
(ii) लोट् लकार, उत्तम पुरुष, द्विवचन का
(iii) लृट् लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन का
(iv) विधिलिङ, मध्यम पुरुष, एकवचन का

(3) ‘तिष्ठेताम्’ धातु रूप है-स्था धातु के ……….. का।
(i) लोट् लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन
(ii) लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन
(iii) विधिलिङ, प्रथम पुरुष, द्विवचन
(iv) लट् लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन

(4) ‘खाद्’ धातु के लङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन का रूप होगा
(i) अखादत
(ii) अखादत्
(iii) अखादः
(iv) अखादन्

(5) ‘गम्’ धातु विधिलिङ, मध्यम पुरुष, बहुवचन का रूप होगा
(i) गच्छेत
(ii) गच्छेतम्
(iii) गच्छेताम्।
(iv) गच्छेयुः

(6) ‘भवाम’ रूप होता है भू धातु के
(i) लट् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन का
(ii) लोट् लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन का
(iii) विधिलिङ, उत्तम पुरुष, बहुवचन का
(iv) लृट् लकार, प्रथम पुरुष द्विवचन का

(7) ‘हस्’ धातु के लङ् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन का रूप है
(i) अहसत्
(ii) अहसः
(iii) अहसाव
(iv) अहसम्

(8) ‘खादिष्यथ’ रूप होता है खाद् धातु के
(i) लृट् लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन का
ii) लट् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन का
(iii) लङ् लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन को
(iv) विधिलिङ् लकार, उत्तम पु०, बहुवचन का

(9) ‘स्था’ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन का रूप होगा
(i) तिष्ठन्तु
(ii) तिष्ठ
(iii) तिष्ठाम्
(iv) तिष्ठत

(10) ‘अपिबः’ रूप है पा धातु के
(i) लोट् लकार – मध्यम पुरुष, बहुवचन
(ii) लङ् लकार-मध्यम पुरुष, एकवचन
(iii) लङ् लकार-उत्तम पुरुष, द्विवचन
(iv) लङ् लकार-मध्यम पुरुष, बहुवचन

(11) ‘पद्’ धातु, लङ् लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन का रूप है
(i) अपठः
(ii) अपठम्
(iii) अपठतम्
(iv) अपठत्

(12) ‘गच्छेः ‘ रूप होता है, ‘गम्’ धातु के
(i) लट् लकार-प्रथम पुरुष, एकवचन का
(ii) विधिलिङ् लकारमध्यम पुरुष, एकवचन का
(iii) लोट् लकार–उत्तम पुरुष, बहुवचन का
(iv) लृट् लकार-मध्यम पुरुष, एकवचन का

(13) ‘पद्’ धातु, लङ् लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन का रूप होगा
(i) अपठत्
(ii) अपठाम
(iii) अपठः
(iv) अपठन्।

(14) ‘पठिष्यसि रूप होता है ‘पद्’ धातु के
(i) लृट् लकार – मध्यम पुरुष, एकवचन का
(ii) लृट् लकार – प्रथम पुरुष, बहुवचन का
(ii) लृट् लकार – उत्तम पुरुष, द्विवचन का
(iv) लृट् लकार – मध्यम पुरुष, बहुवचन का

(15) ‘भू’ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन का रूप होगा
(i) भवताम्
(ii) भव
(iii) भवन्तु
(iv) भवानि

(16) ‘अकरोः’ रूप है ‘कृ’ धातु का
(i) लृट् लकार – प्रथम पुरुष, द्विवचन
(ii) लङ् लकार – मध्यम पुरुष, एकवचन
(iii) लोट् लकार-मध्यम पुरुष, बहुवचन
(iv) विधिलिङ् लकार – उत्तम पुरुष, एकवचने

(17) ‘नी’ धातु का लोट् लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन का रूप है
(i) नयनाम्
(ii) नयतु
(iii) नयतम्
(iv) नयाम

(18) ‘अपिबतम्’ रूप है ‘पा’ धातु का
(i) लट् लकार-मध्यम पुरुष, द्विवचन
(ii) लोट् लकार-प्रथम पुरुष, एकवचन
(iii) लङ् लकार-मध्यम पुरुष, द्विवचन
(iv) लङ् लकार-उत्तम पुरुष, एकवचन

(19) ‘पा’ धातु का लोट् लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन का रूप होगा
(i) पिबताम्
(ii) पिबानि
(iii) पिबेतम
(iv) पिबत

(20) ‘कुरुथः’ रूप है ‘कृ’ धातु का
(i) लृट् लकार-प्रथम पुरुष, एकवचन
(ii) लट् लकार मध्यम पुरुष, द्विवचन
(ii) लृट् लकार-मध्यम पुरुष, एकवचन
(iv) लोट् लकार–प्रथम पुरुष, द्विवचन

(21) निम्नलिखित धातुओं के निर्देशानुसार रूप लिखिए
(क) ‘पा’ धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन = पिबन्ति
(ख) स्थाधातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन = तिष्ठन्ति
(ग) “स्था’ धालु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = तिष्ठ
(घ) “पा’ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = पिब
(ङ) “पढ्’ धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन = पठिष्यति
(च) ‘दा’ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = देहि, दत्तात्
(छ) ‘कृ’ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = कुरु, कुरुतात्
(ज) स्था’ धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन = तिष्ठामि
(झ) “पा’ धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन = पिबामि

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name सन्धि-प्रकरण
Number of Questions 57
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण

सन्धि-प्रकरण

नवीनतम पाठ्यक्रम में सन्धि से सम्बन्धित प्रश्नों के लिए कुल 4 अंक निर्धारित हैं। नये प्रारूप के अनुसार अब इससे बहुविकल्पीय प्रश्न ही पूछे जाएंगे। तीन बहुविकल्पीय प्रश्नों में से एक प्रश्न परिभाषा पर, दूसरा प्रश्न सन्धित पद देकर उसके विच्छेद पर और तीसरा प्रश्न विच्छेद देकर उसके सन्धित पद पर आधारित होगा।

सन्धि – सन्धि का अर्थ है ‘मेल’ या जोड़। जब दो शब्द पास-पास आते हैं तो पहले शब्द का अन्तिम वर्ण और दूसरे शब्द का आरम्भिक वर्ण कुछ नियमों के अनुसार आपस में मिलकर एक हो जाते हैं। दो वर्षों के इस एकीकरण को ही ‘सन्धि’ कहते हैं। उदाहरणार्थ-देव+ आलय = देवालय। यहाँ ‘देव’ (= द् + ए+ + अ) शब्द का अन्तिम ‘अ’ और ‘आलय’ शब्द का प्रारम्भिक आ’ मिलकर ‘आ’ बन गये। इसी प्रकार महा + आत्मा = महात्मा (आ + आ = आ), देव + ईश = देवेश (अ + ई = ए) आदि। सन्धि के प्रकार – सन्धि तीन प्रकार की होती है – (अ) स्वर सन्धि, (ब) व्यञ्जन सन्धि तथा (स) विसर्ग सन्धि।

स्वर सन्धि

स्वर के साथ स्वर के मेल को स्वर सन्धि कहते हैं। उपर्युक्त देवालय’, ‘महात्मा’ और ‘देवेश’ स्वर सन्धि के ही उदाहरण हैं। कुछ स्वर सन्धियाँ नीचे दी जा रही हैं

(1) अयादि सन्धि

सूत्र – एचोऽयवायावः
जब एच् (ए, ओ, ऐ, औ) के आगे कोई स्वर आये तो इन ए, ओ, ऐ, औ के स्थान पर क्रमश: अय्, अव्, आय् और आव् हो जाता है; जैसे
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(2) पूर्वरूप सन्धि

सूत्र – एङ पदान्तादति
किसी पद (विभक्तियुक्त शब्द) के अन्त में यदि ‘ए’ या ‘ओ’ आये और उसके बाद (अर्थात्) दूसरे पद के आरम्भ में ‘अ’ आये तो ‘अ’ का लोप हो जाता है और लोप के सूचक-रूप में खण्डित ‘अ’ का चिह्न अवग्रह (ऽ) रख दिया जाता है; जैसे
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(3) पररूप सन्धि

सूत्र – एङि पररूपम्
यदि अकारान्त उपसर्ग के बाद एकारादि या ओकारादि धातु आये तो दोनों के स्थान में ‘ए’ या ‘ओ’ हो जाता है; जैसे

प्र + एजते = प्रेजते (अधिक काँपता है)
उप + ओषति = उपोषति (जलता है)

(4) यण सन्धि

सूत्र – इको यणचि
लू + आकृति = लाकृतिः
अन्वेषणम् = अनु + एषणम्।

(5) दीर्घ सन्धि

सूत्र – एकः सवर्णे दीर्घः
स + अक्षरः = साक्षर:
वधूत्सव = वधू + उत्सवः

व्यञ्जन सन्धि

जिन दो वर्षों में सन्धि की जा रही है, यदि उनमें से एक स्वर और एक व्यञ्जन हो या दोनों व्यञ्जन हों, तो वह व्यञ्जन सन्धि कहलाती है। कुछ व्यञ्जन सन्धियों के विवरण नीचे दिये जा रहे हैं

(1) श्चुत्व सन्धि

सूत्र – स्तोः श्चुनाः श्चुः । जब सकार (= स्) या तवर्ग (त् थ् द् ध् न्) के बाद शकार (श्) या चवर्ग (च् छ् ज् झ् ञ् ) आता है, तब सकार (स) का शकार (श) और तवर्ग का चवर्ग हो जाता है (अर्थात् त् थ् द् ध् न् के स्थान पर क्रमशः च् छु ज् झ् ञ् हो जाता है); जैसे
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(2) टुत्व सन्धि

सकार या तवर्ग के बाद यदि षकार (= षू) या टवर्ग (य् द् ड् ढ् ण) आये तो सकार (= स्) के स्थान पर षकार (= षू) और तवर्ग के स्थान पर टवर्ग हो जाता है (अर्थात् त् थ् द् ध् न् के स्थान पर क्रमश: ट् ठ् ड् ढ् ण् हो जाता है); जैसे

रामस् (रामः) + षष्ठः = रामष्षष्ठः
रामस् + टीकते = रामष्टीकते
तत् + टीका = तट्टीका
चक्रिन् + ढौकसे = चक्रिण्ढौकसे

(3) जश्त्व सन्धि

सूत्रे – झलां जश् झशि
यदि झल् प्रत्याहार (य् व् र लु, ङ् ञ् ण् न् म् को छोड़कर शेष व्यञ्जनों में से किसी भी व्यञ्जन) के बाद झशु (किसी वर्ग का तृतीय या चतुर्थ वर्ण अर्थात् ग् ज् ड् द् ब्, घ् झ् द् ध् भ् में से कोई) आये तो पूर्ववर्ती व्यञ्जन (अर्थात् झल्) के स्थान पर उसी वर्ग का तृतीय वर्ण हो जाता है (अर्थात् ग् ज् ड् द् ब् में से ही वर्गानुसार कोई वर्ण हो जाता है); जैसे

दोघ् + धा = दोग्धा
योध् + धा = योद्धा = योद्धा
वृध् + धः = वृद्धः = वृद्धः
सन्नध् + धः = सन्नद्धः = सन्नद्धः
दुघ् + धम् = दुग्धम्
बुध् + धिः = बुद्धिः = बुद्धिः
सिध् + धिः = सिद्धिः = सिद्धिः
लभ् + धः = लब्धः

(4) चत्वं सन्धि

सूत्र – खरि च
यदि झल् प्रत्याहार (य् व् र लु, ङ् ञ् ण् न् म् को छोड़कर शेष व्यञ्जन अर्थात् वर्गीय प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ वर्ण और श् ष् स् ह में से किसी) के बाद यदि खर् प्रत्याहार का कोई वर्ण (अर्थात् वर्गीय प्रथम, द्वितीय वर्ण एवं श् ष स में से कोई) आये तो पूर्ववर्ती व्यञ्जन (= झल् प्रत्याहार) के स्थान पर चर् प्रत्याहार (वर्गीय प्रथम वर्ण, अर्थात् क् च् र् त् प् में से वर्गानुसार कोई) हो जाती है; जैसे

ककुभ् + प्रान्तः = ककुप्रान्तः
सम्पद् + समयः = सम्पत्समयः
उद् + कीर्णः उत्कीर्णः
आपद् + कालः = आपत्कालः
विपद् + कालः = विपत्कालः
उद् + साहः = उत्साहः
सद् + कारः = सत्कार:

(5) अनुस्वार सन्धि

सूत्र – मोऽनुस्वारः

पदान्त म् (अर्थात् विभक्तियुक्त शब्द के अन्त में आये म्) के बाद यदि कोई व्यञ्जन आये तो म् के स्थान पर अनुस्वार ( . ) हो जाता है; जैसे
हरिम् + वन्दे = हरिं वन्दे
गृहम् + गच्छति = गृहं
गच्छति गृहम् + परितः = गृहं परितः
गृहम् + गच्छ = गृहं गच्छ
गुरुम् + वन्दे = गुरु वन्दे
कृष्णम् + वन्दे = कृष्णं वन्दे
नगरम् + गच्छति = नगरं गच्छति

(6) लत्व सन्धि

सूत्र – तोलि
यदि तवर्ग के किसी वर्ण से परे ल हो तो तवर्गीय वर्ण के स्थान पर लू हो जाता है; जैसे

उत् + लेखः = उल्लेखः
उत् + लिखितम् = उल्लिखितम्
विद्वान् + लिखति = विद्वांल्लिखति
तत् + लीनः = तल्लीनः
जगत् + लयः = जगल्लयः
उत् + लासः = उल्लासः
तत् + लयः = तल्लयः

(7) परसवर्ण सन्धि

सूत्र – अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः
यदि अनुस्वार से परे यय् प्रत्याहार का वर्ण (श् ष स ह को छोड़कर कोई भी व्यंजन) हो तो अनुस्वार के स्थान पर परसवर्ण (अग्रिम वर्ण का सवर्ण, वर्ग का पाँचवाँ वर्ण) हो जाता है।

उदाहरण – धनम् + जयः = धनञ्जयः
त्वम् + करोषि = त्वङ्करोषि

विसर्ग-सन्धि

दो वर्षों के एकीकरण में यदि पहले विसर्ग ( : ) और बाद में स्वर या व्यञ्जन हो तो वह विसर्ग सन्धि कहलाती है।

(1) सत्व सन्धि

सूत्र – विसर्जनीयस्य सः विसर्ग के बाद यदि खर् प्रत्याहार का कोई वर्ण (वर्गीय प्रथम, द्वितीय वर्ण और श ष स में से कोई) आये तो विसर्ग के स्थान पर स् हो जाता है, फिर वह ‘स्’ अपने सामने वाले वर्ण के साथ व्यञ्जन सन्धि के नियमानुसार मिल जाता है; जैसे
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(2) रुत्व सन्धि

सूत्र – (क) ससजुषो रुः
(ख) खरवसानयोर्विसर्जनीयः

पदान्त स् तथा ‘सजुष’ शब्द के के स्थान पर रु (र) हो जाता है। इस र् के बाद खर प्रत्याहार का कोई वर्ण (वर्गीय प्रथम, द्वितीय वर्ण एवं श् ष स्) हो या कोई भी वर्ण न हो तो र् का विसर्ग ( : ) हो जाता है; जैसे

रामस् + पठति = रामर् + पठति = रामः पठति UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 6

(3) उत्व सन्धि

सूत्र – (क) अतो रोरप्लुतादप्लुते ।
(ख) हशि च

पिछले नियमानुसार स् के स्थान पर जो र होता है, उसके पहले यदि अ आये और बाद में अ या हश् प्रत्याहार का कोई वर्ण (वर्गीय तृतीय, चतुर्थ, पंचम और य् व् र् ल् ह में से कोई) आये तो र के स्थान पर उ हो जाता है; जैसे

शिवस् + अर्ध्यः = शिवर् + अर्व्यः = शिव + उ + अर्थ्य:
= शिवो + अर्व्यः  = शिवोऽर्थ्यः।

इस उदाहरण में शिवस् के सू का र् आदेश होकर शिवर बना। इसके र से पहले अ है (शिव् + अ = शिव) और बाद में अर्थ्य:’ का अ है; अत: २ का उ हो गया। फिर ‘शिव’ का अ और यह उ मिलकर ‘ओ’ बन गया (शिवो) और तब पूर्वरूप होकर शिवोऽर्थ्यः’ बना।
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(4) रोरि
यदि र से परे र हो तो पूर्व र् का लोप हो जाता है। उस लुप्त ‘र’ से पहले यदि अ, इ, उ हों तो उनका दीर्घ हो जाता है; जैसे
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पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ में आये सन्धित पद

पाठ 1:
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पाठ 2:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 11
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पाठ 3:
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पाठ 4:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 14

पाठ 5:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 15

पाठ 6:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 16
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 17

पाठ 7:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 18

पाठ 8:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 19

पाठ 9:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 20
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 21

सन्धि
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विशेष – विद्यार्थियों से यह अपेक्षित है कि वे पहले दिये गये सभी सन्धियों के नियमों व उनके उदाहरणों को भली प्रकार से तैयार करें। सन्धि के प्रकरण से सम्बन्धित प्रश्न परीक्षा में बहुविकल्पीय रूप में भी पूछे जा सकते हैं। उदाहरणस्वरूप कुछ प्रश्न आगे दिये जा रहे हैं

[संकेत – काले अक्षरों में छपे विकल्प उचित विकल्प हैं।]

(1) ‘नायिका’ को सन्धि-विच्छेद है
(क) ना + इका
(ख) नायि + का,
(ग) नै + इका
(घ) न + आइका

(2) ‘उपोषति’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) उपो + षति
(ख) उप+ ओषति
(ग) उ + पोषति
(घ) उप + ओषति

(3) ‘हरेऽव’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) हरे + अव
(ख) हरे + इव
(ग) हर + इव
(घ) हर + अव

(4) ‘सच्चित्’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) सच् + चित्
(ख) सत् + चित्
(ग) स + च्चित्
(घ) सच्चि + त् ।

(5) ‘विपत्काल’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) विपत + काल
(ख) विपत्ति + काल,
(ग) विपद् + काल
(घ) विपदा + काल

(6) निम्नलिखित में से ‘तोलि’ सन्धि किसमें होगी?
(क) तत् + टीका
(ख) तत् + लयः
(ग) लृ + आकृति
(घ) ला + आकृति

(7) ‘निर् + रोग: की सन्धि होगी”
(क) निरोगः
(ख) नीरोगः
(ग) निरारोगः
(घ) निरोग:

(8) ‘नरस् + चलति’ में सन्धि होगी
(क) नरोचलति
(ख) नराचलति
(ग) नरश्चलति
(घ) नरस्चलति

(9) कुं+ ठित में सन्धि होगी
(क) कुंठित
(ख) कुन्ठित
(ग) कुठित
(घ) कुण्ठित

(10) श्चुत्व सन्धि है
(के) तत् + लयः
(ख) सत् + मार्ग
(ग) रामस्+ चिनोति
(घ) तत् + टीका

(11) ‘प्रेजते’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क) प्रे + जते
(ख) प्रेज + ते
(ग) प्र+ एजते
(घ) प्रए + जते

(12) ‘एचोऽयवायावः’ सन्धि है
(क) ने + अनम्
(ख) उप+ ओषति
(ग) सत् + जन
(घ) विष्णो + अव

(13) ‘सत् + चयन’ की सन्धि होगी–
(क) सज्जयन
(ख) सुश्चयन
(ग) सच्चयन
(घ) सः चयन

(14) निम्नलिखित में से किन्हीं तीन सन्धि-सूत्रों के एक-एक सही उदाहरण चुनकर लिखिए तथा सूत्रों की व्याख्या कीजिए|

(क) सूत्र – एङ पदान्तादति, एचोऽय वायावः, मोऽनुस्वारः, अतो रोरप्लुतादप्लुते, खरि च।।
उदाहरण –  आपत्कालः, गायकः, नगरं गच्छति, वनेऽस्मिन्, सोऽपि।
(ख) सूत्र – एङि पररुपम्, ष्टुनी ष्टुः, विसर्जनीयस्य सः, एचोऽय वायावः, रोरि।
उदाहरण – पुनारमते, नमस्ते, पवन:, उड्डयनम्, प्रेजते।

(क) हल:
(i) एङ पदान्तादति – वनेऽस्मिन् ।
(ii) एचोऽयवायावः – गायकः ।
(iii) मोऽनुस्वार: – नगरं गच्छति।
(iv) अतो रोरप्लुतादप्लुते – सोऽपि।
(v) खरि च – आपत्कालः।

(ख) हल:
(i) एङि पररूपम् – प्रेजते।
(ii) ष्टुना ष्टुः – उड्डयनम्:
(iii) विसर्जनीयस्य सः – नमस्ते
(iv) एचोऽयवायाव:-पवनः
(v) रोरि – पुनारमते।

संकेत – सूत्रों की व्याख्या के लिए सम्बन्धित सन्धियों का अध्ययन करें।

(15) ‘नयनम्’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क) ने + यनम्
(ख) ने + अनम्
(ग) नय + नम्।
(घ) नै + अनम्

(16) ‘ष्टुना टुः’ सन्धि है
(क) रामस्+ टीकते
(ख) लभ् + धः
(ग) सत् + चित्
(घ) सत् + चयन

(17) ‘अयादि’ सन्धि है
(क) सत् + चित्
(ख) प्र + एजते
(ग) पौ+ अकः
(घ) योध् + धा

(18) ‘पावकः’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क) पाव + कः
(ख) पौ+ अकः
(ग) पा + अकः
(घ) पाउ + कः

(19) ‘टुत्व’ सन्धि है
(क) सत् + चित
(ख) तत् + टीका
(ग) लभ् + धः
(घ) सत् + चयन

(20) ‘पूर्णः + चन्द्रः’ की सन्धि होगी
(क) पूणचन्द्रः
(ख) पूर्णश्चन्द्रः
(ग) पूर्णचन्द्रः
(घ) पूर्णचन्द्रः

(21) ‘झलां जश् झशि’ सन्धि है
(क) लभ् + धः
(ख) तत् + लय:
(ग) ने + अनम्
(घ) प्र + एजते
(20) क) पवः

(22) हल् ( व्यञ्जन) सन्धि है
(क) सत् + चित्
(ख) उप + ओषति
(ग) हिम + आलय
(घ) सूर्य + उदय

(23) ‘रुत्व’ सन्धि है
(क) बालस्+ गच्छति
(ख) बाला + गच्छति
(ग) राम + गच्छति
(घ) कृष्ण + वन्दे

(24) ‘गौः + चरति’ की सन्धि होगी
(क) गोस्चरति
(ख) गोचरति
(ग) गौश्चरति
(घ) गौहचरति

(25) ‘ग्रामेऽपि’ को सन्धि-विच्छेद है
(क) ग्रामः + अपि
(ख) ग्राम + एपि
(ग) ग्रामे + अपि
(घ) ग्रामस + अपि

(26) ‘अन् + कित:’ की सन्धि होगी
(क) अम्कितः
(ख) अन्कित:
(ग) अंकितः
(घ) अङ्कितः

(27) ‘रामावग्रतः’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क) रामे + अग्रत:
(ख) रामौ + अग्रतः
(ग) रामो + अग्रतः
(घ) रामः + अग्रतः

(28) ‘रोरि’ सन्धि है
(क) पूर्णः + चन्द्रः
(ख) शम्भुर् + राजते
(ग) शिवस् + अर्घ्य
(घ) शाम् + तः

(29) विष्णो + अत्र की सन्धि होगी
(क) विष्ण्वत्र
(ख) विष्णवत्र
(ग) विष्णावत्र
(घ) विष्णोऽत्र

(30) ‘शत्रावति’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क) शत्रु + अति
(ख) शत्रु + अवति
(ग) शत्रौ + अति
(घ) शत्रवः + अति

(31) ‘उत्कीर्णः’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क) उत् + कीर्णः
(ख) उद + कीर्णः
(ग) उद् + कीर्णः
(घ) उत + कीर्ण

(32) विसर्ग सन्धि है
(क) कः + चित्
(ख) कस् + चित्
(ग) कश् + चित्
(घ) कश + चित्

(33) ‘सुहृद् + क्रीडति’ की सन्धि होगी
(क) सहृद्क्रीडति
(ख) सुहृत्क्रीडति
(ग) सुहृतक्रीडति
(घ) सुहृदक्रीडति

(34) ‘पेष् + ता’ की सन्धि होगी
(क) पेष्टा
(ख) पेष्टता
(ग) प्रेषयता
(घ) प्रेषिता

(35) ‘कवेः+ अभावात्’ की सन्धि होगी
(क) कवेअभावात्
(ख) कवेरभावात्
(ग) कवेराभावात्
(घ) कवेरभवात्

(36) गुण सन्धि (सूत्र-आद्गुणः) होगी
(क) राज + ऋषिः
(ख) ने + अनम्
(ग) मधु + अरिः
(घ) शिव + आलय

(37) ‘नगेन्द्राः’ अथवा ‘नान्यत्र’ का सन्धि
विच्छेद कीजिएनगेन्द्राः = नग + इन्द्राः (आद्गुणः)
नान्यत्र = न + अन्यत्र (अक: सवर्णे दीर्घः)

(38) ‘गायकः’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क) गाय + अक:
(ख) गा + यक:
(ग) गै + अकः
(घ) में + कः।

(39) ‘हरिः + चरति’ की सन्धि है
(क) हरिचरति
(ख) हरिश्चरति
(ग) हरिर्चरति
(घ) हरिच्चरति।

(40) ‘मोऽनुस्वारः’ सन्धि है
(क) विद्वान् + लिखतिः
(ख) ककुम् + प्रान्तः
(ग) चक्रिन् + ढौकसे
(घ) गृहम् + गच्छति

(41) ‘देवस् + वन्द्यः’ की सन्धि होगी
(क) देवो वन्द्यः
(ख) देवर्वन्द्यः
(ग) देवश्वन्द्यः
(घ) देववन्द्यः

(42) ‘खरि च’ सन्धि है
(क) तद् + लीनः
(ख) सत् + चित्
(ग) सम्पद् + समयः
(घ) हरिम् + वन्दे

(43) ‘रामष्षष्ठः’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क)राम + षष्ठः
(ख) राम + षष्ठः
(ग) रामश् + षष्ठः
(घ) रामस् + षष्ठः

(44) ‘विसर्जनीयस्य सः’ सन्धि है
(क) हरिम् + वन्दे
(ख) तत् + टीका
(ग) लघु + उत्सवः
(घ) गौः+ चरति

(45) ‘उज्ज्वल’ का सही सन्धि-विच्छेद है
(क) उद् + ज्वल
(ख) उत् + ज्वल
(ग) उज् + ज्वले
(घ) उच् + ज्वल

(46) ‘पावनम्’ का सही सन्धि-विच्छेद होगा
(क) पाव + अनम्
(ख) पो + अनम्।
(ग) पौ+ अनम्
(घ) पै + अनम्

(47) ‘विसर्जनीयस्य सः’ सन्धि है
(क) चन्द्रः + चकोर:
(ख) रामः + गच्छति
(ग) शिवः + अस्ति
(घ) हरिः + भगति

(48) ‘भावुकः को सन्धि-विच्छेद होगी
(क) भ + अवुकः
(ख) भा + उकः
(ग) भौ+ उकः
(घ) भ + उकः

(49) ‘धनम् + जयः’ की सन्धि है
(क) धानञ्जयः
(ख) धनन्जयः
(ग) धनज्जयः
(घ) धनञ्जयः

(50) विसर्जनीयस्य सः सन्धि है
(क) विष्णुः + त्राता
(ख) त्वम् + करोषि
(ग) प्र + एजते
(घ) उप + ओषति

(51) ‘लब्धम्’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क) लब् + धम्
(ख) लप् + धम्
(ग) लभ् + धम्
(घ) लब्ध् + अम्

(52) ‘एचोऽयवायावः’ सन्धि है
(क) उप + ओषति
(ख) नौ + इकः
(ग) रामस् + च
(घ) तत् + टीका

(53) ‘रोरि’ सन्धि है
(क) रामः + चपलः
(ख) देवः + पठति
(ग) पुनर् + रमते
(घ) बालकः+अपठत्

(54) निम्नलिखित की सन्धि कीजिए और नामोल्लेख कीजिए
(क) विद्या + अर्थी =विद्यार्थी (अक: सवर्णे दीर्घः)
(ख) कवि + इन्द्रः =कवीन्द्रः (अक: सवर्णे दीर्घः)
(ग) गिरि + ईश: =गिरीशः (अक: सवर्णे दीर्घः)

(55) निम्नलिखित को सन्धि-विच्छेद कीजिए और नामोल्लेख कीजिए
(क) हरिश्चन्द्रः= हरिः + चन्द्रः (विसर्जनीयस्य सः)
(ख) नरेन्द्रः = नर + इन्द्रः (आद् गुण:)
(ग) यद्यपि = यदि + अपि (इको यणचि)
(घ) रमेशः =रमा + ईशः (आद् गुण:)

(56) पुत्रस् + षष्ठः’ की सन्धि है
(क) पुत्रस्षष्ठः
(ख) पुत्रोषष्ठः
(ग) पुत्रर्षष्ठः
(घ) पुत्रष्षष्ठः

(57) ससजुषोः रुः सन्धि है
(क) हरिस् + गच्छति
(ख) प्रभुः + चलति
(ग) बालकः + याति
(घ) शिवः + अपि

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi राष्ट्रीय भावनापरक निबन्ध

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name राष्ट्रीय भावनापरक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi राष्ट्रीय भावनापरक निबन्ध

राष्ट्रीय भावनापरक निबन्ध

स्वदेश-प्रेम

सम्बद्ध शीर्षक

  • जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी
  • राष्ट्रधर्म ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है।
  • राष्ट्र के गौरव की सुरक्षा और हमारा कर्तव्य

प्रमुख विचार – बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2. देश प्रेम की स्वाभाविकता,
  3.  देश-प्रेम का अर्थ
  4.  देश-प्रेम का क्षेत्र,
  5. देश के प्रति कर्तव्य,
  6.  भारतीयों का देश-प्रेम,
  7.  देशभक्तों की कामना
  8.  उपसंहार।

प्रस्तावना – ईश्वर द्वारा बनायी गयी सर्वाधिक अद्भुत रचना है ‘जननी’, जो नि:स्वार्थ प्रेम की प्रतीक है, प्रेम का ही पर्याय है, स्नेह की मधुर बयार है, सुरक्षा का अटूट कवच है, संस्कारों के पौधों को ममता के जल से सींचने वाली चतुर उद्यान रक्षिका है, जिसका नाम प्रत्येक शीश को नमन के लिए झुक जाने को प्रेरित कर देता है। यही बात जन्मभूमि के विषय में भी सत्य है। इन दोनों का दुलार जिसने पा लिया उसे स्वर्ग का पूरा-पूरा अनुभव धरा पर ही हो गया। इसीलिए जननी और जन्मभूमि की महिमा को स्वर्ग से भी बढ़कर बताया गया है। यही कारण है कि स्वदेश से दूर जाकर मनुष्य तो क्या पशु-पक्षी भी एक प्रकार की उदासी और रुग्णता का अनुभव करने लगते हैं।

देश-प्रेम की स्वाभाविकता – प्रत्येक देशवासी को अपने देश से अनुपम प्रेम होता है। अपना देश चाहे बर्फ से ढका हुआ हो, चाहे गर्म रेत से भरा हो, चाहे ऊँची-ऊँची पहाड़ियों से घिरा हो, वह सबके लिए प्रिय होता है। इस सम्बन्ध में कविवर रामनरेश त्रिपाठी की निम्नलिखित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं

विषुवत् रेखा का वासी जो, जीता है नित हाँफ-हाँफ कर।
रखता है अनुराग अलौकिक, वह भी अपनी मातृभूमि पर ॥
ध्रुववासी जो हिम में तम में, जी लेता है काँप-काँप कर।
वह भी अपनी मातृभूमि पर, कर देता है प्राण निछावर ॥

प्रात:काल के समय पक्षी भोजन-पानी के लिए कलरव करते हुए दूर स्थानों के लिए चले जाते हैं परन्तु सायंकाल होते ही एक विशेष उमंग और उत्साह के साथ अपने-अपने घोंसलों की ओर लौटने लगते हैं। पशु-पक्षियों में उसके लिए इतना मोह और लगाव हो जाता है कि वे उसके लिए मर-मिटने हेतु भी तत्पर रहते हैं

आग लगी इस वृक्ष में, जलते इसके पात,
तुम क्यों जलते पक्षियो! जब पंख तुम्हारे पास?
फल खाये इस वृक्ष के, बीट लथेड़े पात,
यही हमारा धर्म है, जलें इसी के साथ।

पशु-पक्षियों को भी अपने घर से, अपनी मातृभूमि से इतना प्यार है तो भला मानव को अपनी जन्मभूमि से, अपने देश से क्यों प्यार नहीं होगा? वह तो विधाता की सर्वोत्तम सृष्टि, बुद्धिसम्पन्न एवं सर्वाधिक संवेदनशील प्राणी है। माता और जन्मभूमि की तुलना में स्वर्ग का सुख भी तुच्छ है। संस्कृत के किसी महान् कवि ने ठीक ही कहा है – जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।

देश-प्रेम का अर्थ – देश-प्रेम का तात्पर्य है – देश में रहने वाले जड़-चेतन सभी प्राणियों से प्रेम, देश की सभी झोपड़ियों, महलों तथा संस्थाओं से प्रेम, देश के रहन-सहन, रीति-रिवाज, वेश-भूषा से प्रेम, देश के सभी धर्मों, मतों, भूमि, पर्वत, नदी, वन, तृण, लता सभी से प्रेम और अपनत्व रखना व उन सभी के प्रति गर्व की अनुभूति करना। सच्चे देश-प्रेमी के लिए देश का कण-कण पावन और पूज्य होता है।

सच्चा प्रेम वही है, जिसकी तृप्ति आत्मबल पर हो निर्भर ।
त्याग बिना निष्प्राण प्रेम है, करो प्रेम पर प्राण निछावर ॥
देश-प्रेम वह पुण्य क्षेत्र है, अमल असीम त्याग से विलसित ।
आत्मा के विकास से, जिसमें मानवता होती है विकसित ॥

सच्चा देश-प्रेमी वही होता है, जो देश के लिए नि:स्वार्थ भावना से बड़े-से-बड़ा त्याग कर सकता है। स्वदेशी वस्तुओं का स्वयं उपयोग करता है और दूसरों को भी उनके उपयोग के लिए प्रेरित करता है। सच्चा देशभक्त उत्साही, सत्यवादी, महत्त्वाकांक्षी और कर्तव्य की भावना से प्रेरित होता है। वह देश में छिपे हुए गद्दारों से सावधान रहता है और अपने प्राणों को हथेली पर रखकर देश की रक्षा के लिए शत्रुओं का मुकाबला करता है।

देश-प्रेम का क्षेत्र – देश-प्रेम का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में काम करने वाला व्यक्ति देशभक्ति की भावना प्रदर्शित कर सकता है। सैनिक युद्ध-भूमि में प्राणों की बाजी लगाकर, राज-नेता राष्ट्र के उत्थान का मार्ग प्रशस्त. कर, समाज-सुधारक समाज का नवनिर्माण करके, धार्मिक नेता मानव-धर्म का उच्च आदर्श प्रस्तुत करके, साहित्यकार राष्ट्रीय चेतना और जन-जागरण का स्वर फेंककर, कर्मचारी, श्रमिक एवं किसान निष्ठापूर्वक अपने दायित्व का निर्वाह करके, व्यापारी मुनाफाखोरी व तस्करी का त्याग कर अपनी देशभक्ति की भावना प्रदर्शित कर सकता है। ध्यान रहे, सभी को अपना कार्य करते हुए देशहित को सर्वोपरि समझनी चाहिए।

देश के प्रति कर्त्तव्य – जिस देश में हमने जन्म लिया है, जिसका अन्न खाकर और अमृत समान जल पीकर, सुखद वायु का सेवन कर हम बलवान् हुए हैं, जिसकी मिट्टी में खेल-कूदकर हमने पुष्ट शरीर प्राप्त किया है, उस देश के प्रति हमारे अनन्त कर्तव्य हैं। हमें अपने प्रिय देश के लिए कर्तव्यपालन और त्याग की भावना से श्रद्धा, सेवा एवं प्रेम रखना चाहिए। हमें अपने देश की एक इंच भूमि के लिए तथा उसके सम्मान और गौरव की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा देनी चाहिए। यह सब करने पर भी जन्मभूमि या अपने देश से हम कभी भी उऋण नहीं हो सकते हैं।

भारतीयों का देश-प्रेम – भारत माँ ने ऐसे असंख्य नर-रत्नों को जन्म दिया है, जिन्होंने असीम त्याग-भावना से प्रेरित होकर हँसते-हँसते मातृभूमि पर अपने प्राण अर्पित कर दिये। कितने ही ऋषि-मुनियों ने अपने तप और त्याग से देश की महिमा को मण्डित किया है तथा अनेकानेक वीरों ने अपने अद्भुत शौर्य से शत्रुओं के दाँत खट्टे किये हैं। वन-वन भटकने वाले महाराणा प्रताप ने घास की रोटियाँ खाना स्वीकार किया, परन्तु मातृभूमि के शत्रुओं के सामने कभी मस्तक नहीं झुकाया। शिवाजी ने देश और मातृभूमि की सुरक्षा के लिए गुफाओं में छिपकर शत्रु से टक्कर ली और रानी लक्ष्मीबाई ने महलों के सुखों को त्यागकर शत्रुओं से लोहा लेते हुए वीरगति प्राप्त की। भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, अशफाकउल्ला खाँ आदि न जाने कितने देशभक्तों ने विदेशियों की अनेक यातनाएँ सहते हुए, मुख से वन्दे मातरम्’ कहते हुए हँसते-हँसते

जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ॥

भारत का इतिहास ऐसे अनेक वीरों को साक्षी है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा और मान-मर्यादा के लिए अपने सुखों को त्याग दिया और मन में मर-मिटने का अरमान लेकर शत्रु पर टूट पड़े। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, लाला लाजपतराय आदि अनेक देशभक्तों ने अनेक कष्ट सहकर और प्राणों का बलिदान करके देश की स्वाधीनता की ज्योति को प्रज्वलित किया। इसी स्वदेश प्रेम के कारण राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अनेकों कष्ट सहे, जेलों में रहे तथा अन्त में अपने प्राण निछावर कर दिये। डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, सरदार बल्लभभाई पटेल, पं० जवाहरलाल नेहरू आदि देशरत्नों ने आजीवन देश की सेवा की। श्रीमती इन्दिरा गांधी देश की एकता और अखण्डता के लिए नृशंस आतंकवादियों की गोलियों का शिकार बनीं।।

देशभक्तों की कामना – देशभक्तों को सुख-समृद्धि, धन, यश, कंचन और कामिनी की आकांक्षा नहीं होती है। उन्हें तो केवल अपने देश की स्वतन्त्रता, उन्नति और गौरव की कामना होती है। वे देश के लिए जीते हैं और देश के लिए मरते हैं। मृत्यु के समय भी उनकी इच्छा यही होती है कि वे देश के काम आयें। कविवर माखनलाल चतुर्वेदी के शब्दों में एक पुष्प की भी यही कामना है

मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जावें वीर अनेक॥

उपसंहार – खेद का विषय है कि आज हमारे नागरिकों में देश-प्रेम की भावना अत्यन्त दुर्लभ होती जा रही है। नयी पीढ़ी का विदेशों से आयातित वस्तुओं और संस्कृतियों के प्रति अन्धाधुन्ध मोह, स्वदेश के बजाय विदेश में जाकर सेवाएँ अर्पित करने के सजीले सपने वास्तव में चिन्ताजनक हैं। हमारी पुस्तकें भले ही राष्ट्रप्रेम की गाथाएँ पाठ्य-सामग्री में सँजोये रहें, परन्तु वास्तव में नागरिकों के हृदय में गहरा व सच्चा राष्ट्रप्रेम ढूंढ़ने पर भी उपलब्ध नहीं होता। हमारे शिक्षाविदों व बुद्धिजीवियों को इस प्रश्न का समाधान ढूंढ़ना ही होगा कि अब मात्र उपदेश या अतीत के गुणगान से वह प्रेम उत्पन्न नहीं हो सकता। हमें अपने राष्ट्र की दशा व छवि अनिवार्य रूप से सुधारनी होगी।
प्रत्येक देशवासी को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसके देश भारत की देशरूपी बगिया में राज्यरूपी अनेक क्यारियाँ हैं । किसी एक क्यारी की उन्नति एकांगी उन्नति है और सभी क्यारियों की उन्नति देशरूपी उपवन की सर्वांगीण उन्नति है। जिस प्रकार एक माली अपने उपवन की सभी क्यारियों की देखभाल समान भाव से करती है उसी प्रकार हमें भी देश का सर्वांगीण विकास करना चाहिए। किसी जाति या सम्प्रदाय विशेष को लक्ष्य न मानकर समग्रतापूर्ण चिन्तन किया जाना चाहिए, क्योंकि सबकी उन्नति में एक की उन्नति तो अन्तर्निहित होती ही है। प्रत्येक देशवासी का चिन्तन होना चाहिए कि “यह देश मेरा शरीर है और इसकी क्षति मेरी ही क्षति है।’ जब ऐसे भाव प्रत्येक भारतवासी के होंगे तब कोई अपने निहित स्वार्थों के पीछे रेल, बस अथवा सरकारी सम्पत्तियों की होली नहीं जलाएगा और न ही सरकारी सम्पत्ति का दुरुपयोग ही करेगा।
स्वदेश-प्रेम मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। इसे संकुचित रूप में ग्रहण न करे व्यापक रूप में ग्रहण करना चाहिए। संकुचित रूप में ग्रहण करने से विश्व शान्ति को खतरा हो सकता है। हमें स्वदेश-प्रेम की भावना के साथ-साथ समग्र मानवता के कल्याण को भी ध्यान में रखना चाहिए।

 हमारे राष्ट्रीय पर्व

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारत के राष्ट्रीय त्योहार

प्रमुख विचार-बिन्दु 

  1.  प्रस्तावना,
  2.  गणतन्त्र दिवस,
  3.  स्वतन्त्रता दिवस,
  4. गांधी जय
  5. राष्ट्रीय महत्त्व के अन्य पर्व,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना – भारतवर्ष को यदि विविध प्रकार के त्योहारों का देश कह दिया जाए तो कुछ अनुचित न होगा। इस धरा-धाम पर इतनी जातियाँ, धर्म और सम्प्रदायों के लोग निवास करते हैं कि उनके सभी त्योहारों को यदि मनाना शुरू कर दिया जाए तो शायद एक-एक दिन में दो-दो त्योहार मना कर भी वर्ष भर में उन्हें पूरा नहीं किया जा सकता। पर्वो का मानव-जीवन व राष्ट्र के जीवन में विशेष महत्त्व होता है। इनसे नयी प्रेरणा मिलती है, जीवन की नीरसता दूर होती है तथा रोचकता और आनन्द में वृद्धि होती है। पर्व या त्योहार कई तरह के होते हैं; जैसे-धार्मिक, सांस्कृतिक, जातीय, ऋतु सम्बन्धी और राष्ट्रीय। जिन पर्वो का सम्बन्ध किसी व्यक्ति, जाति या धर्म के मानने वालों से न होकर सम्पूर्ण राष्ट्र से होता है तथा जो पूरे देश में सभी नागरिकों द्वारा उत्साहपूर्वक मनाये जाते हैं, उन्हें राष्ट्रीय पर्व कहा जाता है। गणतन्त्र दिवस, स्वतन्त्रता दिवस एव गांधी जयन्ती हमारे राष्ट्रीय पर्व हैं। ये राष्ट्रीय पर्व समस्त भारतीय जन-मानस को एकता के सूत्र में पिरोते हैं। ये उन अमर शहीदों व देशभक्तों का स्मरण कराते हैं, जिन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिए जीवन-पर्यन्त संघर्ष किया और राष्ट्र की स्वतन्त्रता, गौरव व इसकी प्रतिष्ठा को बनाये रखने के लिए अपने प्राणों को भी सहर्ष न्योछावर कर दिया।

गणतन्त्र दिवस – गणतन्त्र दिवस हमारा एक प्रमुख राष्ट्रीय पर्व है, जो प्रति वर्ष 26 जनवरी को देशवासियों द्वारा मनाया जाता है। इसी दिन सन् 1950 ई० में हमारे देश में अपना संविधान लागू हुआ था। इसी दिन हमारा राष्ट्र पूर्ण स्वायत्त गणतन्त्र राज्य बना अर्थात् भारत को पूर्ण प्रभुसत्तासम्पन्न गणराज्य घोषित किया गया। यही दिन हमें 26 जनवरी, 1930 का भी स्मरण कराता है, जब पं० जवाहरलाल नेहरू जी की अध्यक्षता में कांग्रेस अधिवेशन में पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव पारित किया गया था।

गणतन्त्र दिवस का त्योहार बड़ी धूमधाम से यों तो देश के प्रत्येक भाग में मनाया जाता है, पर इसका मुख्य आयोजन देश की राजधानी दिल्ली में ही किया जाता है। इस दिन सबसे पहले देश के प्रधानमन्त्री इण्डिया गेट पर शहीद जवानों की याद में प्रज्वलित की गयी जवान ज्योति पर सम्पूर्ण राष्ट्र की ओर से सलामी देते हैं। उसके बाद प्रधानमन्त्री अपने मन्त्रिमण्डल के सदस्यों के साथ राष्ट्रपति महोदय की अगवानी करते हैं। राष्ट्रपति भवन के सामने स्थित विजय चौक में राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने के साथ ही मुख्य पर्व मनाया जाना आरम्भ होता है। इस दिन विजय चौक से प्रारम्भ होकर लाल किले तक जाने वाली परेड समारोह का प्रमुख आकर्षण होती है। क्रम से तीनों सेनाओं (जल, थल, वायु), सीमा सुरक्षा बल, अन्य सभी प्रकार के बलों, पुलिस आदि की टुकड़ियाँ राष्ट्रपति को सलामी देती हैं। एन० सी० सी०, एन० एस० एस० तथा स्काउट, स्कूलों के बच्चे सलामी के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए गुजरते हैं। इसके उपरान्त सभी प्रदेशों की झाँकियाँ आदि प्रस्तुत की जाती हैं तथा शस्त्रास्त्रों का भी प्रदर्शन किया जाता है। राष्ट्रपति को तोपों की सलामी दी जाती है। परेड और झाँकियों आदि पर हेलीकॉप्टरों-हवाई जहाजों से पुष्प वर्षा की जाती है। यह परेड राष्ट्र की वैज्ञानिक, कला व संस्कृति के उत्थान को दर्शाती है। रात को राष्ट्रपति भवन, संसद भवन और अन्य राष्ट्रीय महत्त्व के स्थलों पर रोशनी की जाती है, आतिशबाजी होती है और इस प्रकार धूम-धाम से यह राष्ट्रीय त्योहार सम्पन्न होता है।

स्वतन्त्रता दिवस – पन्द्रह अगस्त के दिन मनाया जाने वाला स्वतन्त्रता दिवस का त्योहार भारत का दूसरा मुख्य राष्ट्रीय त्योहार माना गया है। इसके आकर्षण और मनाने का मुख्य केन्द्र दिल्ली स्थित लाल किला है। यों तो समस्त नगर और सम्पूर्ण देश में भी अपने-अपने ढंग से इसे मनाने की परम्परा है। स्वतन्त्रता दिवस प्रत्येक वर्ष अगस्त मास की पन्द्रहवीं तिथि को मनाया जाता है। इसी दिन लगभग दो सौ वर्षों के अंग्रेजी दासत्व के पश्चात् हमारा देश स्वतन्त्र हुआ था। इसी दिन ऐतिहासिक लाल किले पर हमारा तिरंगा झण्डा फहराया गया था। यह स्वतन्त्रता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के भगीरथ प्रयासों व अनेक महान् नेताओं तथा देशभक्तों के बलिदान की गाथा है। यह स्वतन्त्रता इसलिए और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि इसे बन्दूकों, तोपों जैसे अस्त्र-शस्त्रों से नहीं वरन् सत्य, अहिंसा जैसे शस्त्रास्त्रों से प्राप्त किया गया। इस दिन सम्पूर्ण राष्ट्र देश की स्वतन्त्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने वाले शहीदों का स्मरण करते हुए देश की स्वतन्त्रता को बनाये रखने की शपथ लेता है। इस दिवस की पूर्व सन्ध्या पर राष्ट्रपति राष्ट्र के नाम अपना सन्देश प्रसारित करते हैं। दिल्ली के लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने से पहले प्रधानमन्त्री सेना की तीनों टुकड़ियों, अन्य सुरक्षा बलों, स्काउटों आदि का निरीक्षण कर सलामी लेते हैं। फिर लाल किले के मुख्य द्वार पर पहुँचकर राष्ट्रीय ध्वज फहरा कर उसे सलामी देते हैं तथा राष्ट्र को सम्बोधित करते हैं। इस सम्बोधन में पिछले वर्ष सरकार द्वारा किये गये कार्यों का लेखा-जोखा, अनेक नवीन योजनाओं तथा देश-विदेश से सम्बन्ध रखने वाली नीतियों के बारे में उद्घोषणा की जाती है। अन्त में राष्ट्रीय गान के साथ यह मुख्य समारोह समाप्त हो जाता है। रात्रि में दीपों की जगमगाहट से विशेषकर संसद भवन व राष्ट्रपति भवन की सजावट देखते ही बनती है।

गांधी जयन्ती – गांधी जयन्ती भी हमारी एक राष्ट्रीय पर्व है, जो प्रति वर्ष गांधी जी के जन्म-दिवस 2 अक्टूबर की शुभ स्मृति में देश भर में मनाया जाता है। स्वाधीनता आन्दोलन में गांधी जी ने अहिंसात्मक रूप से देश का नेतृत्व किया और देश को स्वतन्त्र कराने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने सत्याग्रह, असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन, भारत छोड़ो आन्दोलन से शक्तिशाली अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर विवश कर दिया। गांधी जी ने राष्ट्र एवं दीन-हीनों की सेवा के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। प्रति वर्ष सम्पूर्ण देश उनके त्याग, तपस्या एवं बलिदान के लिए उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है और उनके बताये गये रास्ते पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करता है। इस दिन सम्पूर्ण देश में विभिन्न प्रकार की सभाओं, गोष्ठियों एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। गांधी जी की समाधि राजघाट पर देश के राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री व अन्य विशिष्ट लोग पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। महात्मा गांधी अमर रहें” के नारों से सम्पूर्ण वातावरण गूंज उठता है।

राष्ट्रीय महत्त्व के अन्य पर्व – इन तीन मुख्य पर्वो के अतिरिक्त अन्य कई पर्व भी यहाँ मनाये जाते हैं. और उनका भी राष्ट्रीय महत्त्व स्वीकारा जाता है। ईद, होली, वसन्त पंचमी, बुद्ध पंचमी, वाल्मीकि प्राकट्योत्सव, विजयादशमी, दीपावली आदि इसी प्रकार के पर्व माने जाते हैं। हमारी राष्ट्रीय अस्मिता किसी-न-किसी रूप में इन सभी त्योहारों के साथ जुड़ी हुई है, फिर भी मुख्य महत्त्व उपर्युक्त तीन पर्वो का ही है।

उपसंहार – त्योहार तीन हों या अधिक, सभी का महत्त्व मानवीय एवं राष्ट्रीय अस्मिता को उजागर करना ही होता है। मानव-जीवन में जो एक आनन्दप्रियता, उत्सवप्रियता की भावना और वृत्ति छिपी रहती है, उनका भी इस प्रकार से प्रकटीकरण और स्थापन हो जाया करता है। इस प्रकार के त्योहार सभी देशवासी मिलकर मनाया करते हैं, इससे राष्ट्रीय एकता और ऊर्जा को भी बल मिलता है जो इनका वास्तविक उद्देश्य एवं प्रयोजन होता है। हमारे राष्ट्रीय पर्व राष्ट्रीय एकता के प्रेरणा-स्रोत हैं। ये पर्व सभी भारतीयों के मन में हर्ष, उल्लास और नवीन राष्ट्रीय चेतना का संचार करते हैं। साथ ही देशवासियों को यह संकल्प लेने हेतु भी प्रेरित करते हैं कि वे अमर शहीदों के बलिदानों को व्यर्थ नहीं जाने देंगे तथा अपने देश की रक्षा, गौरव व इसके उत्थान के लिए सदैव समर्पित रहेंगे।

राष्ट्रीय एकता

सम्बद्ध शीर्षक

  • राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक उपाय
  • राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता
  • राष्ट्रीय एकीकरण और उसके मार्ग की बाधाएँ
  • राष्ट्रीय एकता के पोषक तत्त्व
  • राष्ट्रीय अखण्डता – आज की माँग
  • भारत की राष्ट्रीय एकता

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना : राष्ट्रीय एकता से अभिप्राय,
  2. भारत में अनेकता के विविध रूप,
  3.  राष्ट्रीय एकता का आधार,
  4.  राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता,
  5. राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधाए
    (क) साम्प्रदायिकता;
    (ख) क्षेत्रीयता अथवा प्रान्तीयता;
    (ग) भाषावाद;
    (घ) जातिवाद;
    (ङ) संकीर्ण मनोवृत्तिा
  6. राष्ट्रीय एकता बनाये रखने के उपाय
    (क) सर्वधर्म समभाव;
    (ख) समष्टि हित की भावना;
    (ग) एकता का विश्वास;
    (घ) शिक्षा का प्रसार;
    (ङ) राजनीतिक छल-छयों का अन्त,
  7. उपसंहार ।

प्रस्तावना : राष्ट्रीय एकता से अभिप्राय – एकता एक भावात्मक शब्द है, जिसका अर्थ है-‘एक होने का भाव’। इस प्रकार राष्ट्रीय एकता का अभिप्राय है-देश का सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, भौगोलिक, धार्मिक और साहित्यिक दृष्टि से एक होना। भारत में इन दृष्टिकोणों से अनेकता दृष्टिगोचर होती है, किन्तु बाह्य रूप से दिखलाई देने वाली इस अनेकता के मूल में वैचारिक एकता निहित है। अनेकता में एकता ही भारत की प्रमुख विशेषता है। किसी भी राष्ट्र की राष्ट्रीय एकता उसके राष्ट्रीय गौरव की प्रतीक होती है और जिस व्यक्ति को अपने राष्ट्रीय गौरव पर अभिमान नहीं होता, वह मनुष्य नहीं

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है,
वह नर नहीं नरपशु है निरा, और मृतक समान है।

भारत में अनेकता के विविध रूप – भारत एक विशाल देश है। उसमें अनेकता होनी स्वाभाविक ही है। धर्म के क्षेत्र में हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी आदि विविध धर्मावलम्बी यहाँ निवास करते हैं। इतना ही नहीं, एक-एक धर्म में भी कई अवान्तर भेद हैं; जैसे-हिन्दू धर्म के अन्तर्गत वैष्णव, शैव, शाक्त आदि। वैष्णवों में भी रामपूजक और कृष्णपूजक हैं। इसी प्रकार अन्य धर्मों में भी अनेकानेक अवान्तर भेद हैं।

सामाजिक दृष्टि से विभिन्न जातियाँ, उपजातियाँ, गोत्र, प्रवर आदि विविधता के सूचक हैं। सांस्कृतिक दृष्टि से खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा, पूजा-पाठ आदि की भिन्नता ‘अनेकता’ की द्योतक है। राजनीतिक क्षेत्र में समाजवाद, साम्यवाद, मार्क्सवाद, गांधीवाद आदि अनेक वाद राजनीतिक विचार-भिन्नता का संकेत करते हैं। साहित्यिक दृष्टि से भारत की प्राचीन और नवीन भाषाओं में रचित साहित्य की भिन्न-भिन्न शैलियाँ विविधता की सूचक हैं। आर्थिक दृष्टि से पूँजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद आदि विचारधाराएँ भिन्नता दर्शाती हैं। इसी प्रकार भारत की प्राकृतिक शोभा, भौगोलिक स्थिति, ऋतु-परिवर्तन आदि में भी पर्याप्त भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। इतनी विविधताओं के होते हुए भी भारत अत्यन्त प्राचीन काल से एकता के सूत्र में बँधा रहा है।

राष्ट्र की एकता, अखण्डता एवं सार्वभौमिक सत्ता बनाये रखने के लिए राष्ट्रीयता की भावना का उदय होना परमावश्यक है। यही वह भावना है, जिसके कारण राष्ट्र के नागरिक राष्ट्र के सम्मान, गौरव और हितों का चिन्तन करते हैं।

राष्ट्रीय एकता का आधार – हमारे देश की एकता के आधार दर्शन (Philosophy) और साहित्य (Literature) हैं। ये सभी प्रकार की भिन्नताओं और असमानताओं को समाप्त करने वाले हैं। भारतीय दर्शन सर्व-समन्वय की भावना का पोषक है। यह किसी एक भाषा में नहीं लिखा गया है, अपितु यह देश की विभिन्न भाषाओं में लिखा गया है। इसी प्रकार हमारे देश का साहित्य भी विभिन्न क्षेत्र के निवासियों द्वारा लिखे जाने के बावजूद क्षेत्रवादिता या प्रान्तीयता के भावों को उत्पन्न नहीं करता, वरन् सबके लिए भाई-चारे, मेल-मिलाप और सद्भाव का सन्देश देता हुआ देशभक्ति के भावों को जगाता है।
राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता – राष्ट्र की आन्तरिक शान्ति, सुव्यवस्था और बाह्य सुरक्षा की दृष्टि से राष्ट्रीय एकता की परम आवश्यकता है। भारत के सन्तों ने तो प्रारम्भ से ही मनुष्य-मनुष्य के बीच कोई अन्तर नहीं माना। वह तो सम्पूर्ण मनुष्य जाति को एक सूत्र में बाँधने के पक्षधर रहे हैं। नानक का कथन है

अव्वले अल्लाह नूर उपाया, कुदरत दे सब बन्दै।
एक नूर ते सब जग उपज्या, कौन भले कौन मन्दे॥

यदि हम भारतवासी अपने में निहित अनेक विभिन्नताओं के कारण छिन्न-भिन्न हो गये तो हमारी फूट का लाभ उठाकर अन्य देश हमारी स्वतन्त्रता को हड़पने का प्रयास करेंगे। ऐसा ही विचार राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने व्यक्त किया था-‘जब-जब भी हम असंगठित हुए, हमें आर्थिक और राजनीतिक रूप में इसकी कीमत चुकानी पड़ी।” अत: देश की स्वतन्त्रता की रक्षा और राष्ट्र की उन्नति के लिए राष्ट्रीय एकता का होना परम आवश्यक है।

राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधाएँ – मध्यकाल में विदेशी शासकों का शासन हो जाने पर भारत की इस अन्तर्निहित एकता को आघात पहुँचा था, किन्तु उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अनेक समाज-सुधारकों और दूरदर्शी राजपुरुषों के सद्प्रयत्नों से यह आन्तरिक एकता मजबूत हुई थी, किन्तु स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद अनेक तत्त्व इस आन्तरिक एकता को खण्डित करने में सक्रिय रहे हैं, जो निम्नवत् हैं

(क) साम्प्रदायिकता – साम्प्रदायिकता धर्म का संकुचित दृष्टिकोण है। संसार के विविध धर्मों में जितनी बातें बतायी गयी हैं, उनमें से अधिकांश बातें समान हैं; जैसे–प्रेम, सेवा, परोपकार, सच्चाई, समता, नैतिकता, अहिंसा, पवित्रता आदि। सच्चा धर्म कभी भी दूसरे से घृणा करना नहीं सिखाता। वह तो सभी से प्रेम करना, सभी की सहायता करना, सभी को समान समझना सिखाता है। जहाँ भी विरोध और घृणा है, वहाँ धर्म हो ही नहीं सकता। जाति-पाँति के नाम पर लड़ने वालों पर इकबाल कहते हैं-मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।

(ख) क्षेत्रीयता अथवा प्रान्तीयता – अंग्रेज शासकों ने न केवल धर्म, वरन् प्रान्तीयता की अलगाववादी भावना को भी भड़काया है। इसीलिए जब-तब राष्ट्रीय भावना के स्थान पर प्रान्तीय अलगाववादी भावना बलवती होने लगती है और हमें पृथक् अस्तित्व (राष्ट्र) और पृथक् क्षेत्रीय शासन स्थापित करने की माँगें सुनाई पड़ती हैं। एक ओर कुछ तत्त्व खालिस्तान की माँग करते हैं तो कुछ तेलुगूदेशम् और ब्रज प्रदेश के नाम पर मिथिला राज्य चाहते हैं। इस प्रकार क्षेत्रीयता अथवा प्रान्तीयता की भावना भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए बहुत बड़ी बाधी बन गयी है।

(ग) भाषावाद – भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है। यहाँ अनेक भाषाएँ और बोलियाँ प्रचलित हैं। प्रत्येक  भाषा-भाषी अपनी मातृभाषा को दूसरों से बढ़कर मानता है। फलत: विद्वेष और घृणा का प्रचार होता है और अन्ततः राष्ट्रीय एकता प्रभावित होती है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारत को एक संघ के रूप में गठित किया गया और प्रशासनिक सुविधा के लिए चौदह प्रान्तों में विभाजित किया गया, किन्तु धीरे-धीरे भाषावाद के आधार पर प्रान्तों की माँग बलवती होती चली गयी, जिससे भारत के प्रान्तों की भाषा के आधार पर पुनर्गठन किया गया। तदुपरान्त कुछ समय तो शान्ति रही, लेकिन शीघ्र ही अन्य अनेक विभाषी बोली बोलने वाले व्यक्तियों ने अपनी-अपनी विभाषा या बोली के आधार पर अनेक आन्दोलन किये, जिससे राष्ट्रीय एकता की भावना को धक्का पहुंचा।

(घ) जातिवाद – मध्यकाल में भारत के जातिवादी स्वरूप में जो कट्टरता आयी थी, उसने अन्य जातियों के प्रति घृणां और विद्वेष का भाव विकसित कर दिया था। पुराकाल की कर्म पर आधारित वर्ण-व्यवस्था ने जन्म पर आधारित कट्टर जाति-प्रथा का रूप ले लिया और प्रत्येक जाति अपने को दूसरी से ऊँची मानने लगी। इस तरह जातिवाद ने भी भारत की एकता को बुरी तरह प्रभावित किया। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् हरिजनों के लिए आरक्षण की राजकीय नीति का आर्थिक दृष्टि से दुर्बल सवर्ण जातियों ने कड़ा विरोध किया। विगत वर्षों में इस विवाद पर लोगों ने तोड़-फोड़, आगजनी और आत्मदाह जैसे कदम उठाकर देश की राष्ट्रीय एकता को झकझोर दिया। इस प्रकार जातिवाद राष्ट्रीय एकता के मार्ग में आज एक बड़ी बाधा बन गया है।

(ङ) संकीर्ण मनोवृत्ति – जाति, धर्म और सम्प्रदायों के नाम पर जब लोगों की विचारधारा संकीर्ण हो जाती है, तब राष्ट्रीयता की भावना मन्द पड़ जाती है। लोग सम्पूर्ण राष्ट्र का हित न देखकर केवल अपने जाति, धर्म, सम्प्रदाये अथवा वर्ग के स्वार्थ को देखने लगते हैं।

राष्ट्रीय एकता बनाये रखने के उपाय – वर्तमान परिस्थितियों में राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने के लिए निम्नलिखित उपाय प्रस्तुत हैं

(क) सर्वधर्म समभाव – विभिन्न धर्मों में जितनी भी अच्छी बातें हैं, यदि उनकी तुलना अन्य धर्मों की बातों से की जाये तो उनमें एक अद्भुत समानता दिखाई देगी; अतः हमें सभी धर्मों का समान आदर करना चाहिए। धार्मिक या साम्प्रदायिक आधार पर किसी को ऊँचा या नीचा समझना नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से एक पाप है। धार्मिक सहिष्णुता बनाये रखने के लिए गहरे विवेक की आवश्यकता है। सागर के समान उदार वृत्ति रखने वाले इनसे प्रभावित नहीं होते।

(ख) समष्टि-हित की भावना – यदि हम अपनी स्वार्थ-भावना को त्यागकर समष्टि-हित का भाव विकसित कर लें तो धर्म, क्षेत्र, भाषा और जाति के नाम पर न सोचकर समूचे राष्ट्र के नाम पर सोचेंगे और इस प्रकार अलगाववादी भावना के स्थान पर राष्ट्रीय भावना का विकास होगा, जिससे अनेकता रहते हुए भी एकता की भावना सुदृढ़ होगी।

(ग) एकता का विश्वास – भारत में जो दृश्यमान् अनेकता है, उसके अन्दर एकता का भी निवास है—इस बात का प्रचार ढंग से किया जाये, जिससे कि सभी नागरिकों को अन्तर्निहित एकता का विश्वास हो सके। वे पारस्परिक प्रेम और सद्भाव द्वारा एक-दूसरे में अपने प्रति विश्वास जगा सकें।

(घ) शिक्षा का प्रसार – छोटी-छोटी व्यक्तिगत द्वेष की भावनाएँ राष्ट्र को कमजोर बनाती हैं। शिक्षा का सच्चा अर्थ एक व्यापक अन्तर्दृष्टि व विवेक है। इसलिए शिक्षा का अधिकाधिक प्रसार किया जाना चाहिए, जिससे विद्यार्थी की संकुचित भावनाएँ शिथिल हों। विद्यार्थियों को मातृभाषा तथा राष्ट्रभाषा के साथ एक अन्य प्रादेशिक भाषा का भी अध्ययन करना चाहिए। इससे भाषायी स्तर पर ऐक्य स्थापित होने से राष्ट्रीय एकता सुदृढ़ होगी।

(ङ) राजनीतिक छलछद्मों का अन्त – विदेशी शासनकाल में अंग्रेजों ने भेदभाव फैलाया था, किन्तु अब स्वार्थी राजनेता ऐसे छलछद्म फैलाते हैं कि भारत में एकता के स्थान पर विभेद ही अधिक पनपता है। ये राजनेता साम्प्रदायिक अथवा जातीय विद्वेष, घृणा और हिंसा भड़काते हैं और सम्प्रदाय विशेष को मसीहा बनकर अपना स्वार्थ-सिद्ध करते हैं। इस प्रकार राजनीतिक छलछद्मों का अन्त राजनीतिक वातावरण के स्वच्छ होने से भी एकता का भाव सुदृढ़ करने में सहायता मिलेगी। उपर्युक्त उपायों से भारत की अन्तर्निहित एकता का सभी को ज्ञान हो सकेगा और सभी उसको खण्डित करने के प्रयासों को विफल करने में अपना योगदान कर सकेंगे। इस दिशा में धार्मिक महापुरुषों, समाज-सुधारकों, बुद्धिजीवियों, विद्यार्थियों और महिलाओं को विशेष रूप से सक्रिय होना चाहिए तथा मिल-जुलकर प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने पर सबल राष्ट्र के घटक स्वयं भी अधिक पुष्ट होंगे।

उपसंहार – राष्ट्रीय एकता की भावना एक श्रेष्ठ भावना है और इस भावना को उत्पन्न करने के लिए हमें स्वयं को सबसे पहले मनुष्य समझना होगा, क्योंकि मनुष्य एवं मनुष्य में असमानता की भावना समस्त विद्वेष एवं विवाद का कारण है। इसीलिए जब तक हममें मानवीयता की भावना विकसित नहीं होगी, तब तक राष्ट्रीय एकता का भाव उत्पन्न नहीं हो सकता। यह भाव उपदेशों, भाषणों और राष्ट्रीय गीत के माध्यम से सम्भव नहीं।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi परिचयात्मक निबन्ध

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Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
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परिचयात्मक निबन्ध

एक महापुरुष की जीवनी (राष्ट्रपिता महात्मा गांधी)

सम्बद्ध शीर्षक

  • मेरा प्रिय राजनेता
  • मेरा आदर्श पुरुष
  • महात्मा गांधी की प्रासंगिकता

प्रमुख विचार-बिन्दु:

  1. प्रस्तावना,
  2.  जीवनवृत्त,
  3. गांधीजी के सिद्धान्त :
    (अ) अहिंसा (व्यक्तिगत एवं सामाजिक अहिंसा, राजनीति में अहिंसा);
    (ब) शिक्षा सम्बन्धी सिद्धान्त,
  4. राष्ट्रभाषा के प्रबल पोषक,
  5.  कुटीर उद्योगों पर बल,
  6.  प्रेरणादायक गुण,
  7. उपसंहार।

प्रस्तावना – मानव जीवन एक रहस्य है। इसके रहस्ये अनेक बार मनुष्य को उस मोड़ पर ला खड़ा करते हैं, जहाँ वह किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में होता है। उसे कुछ सूझता ही नहीं। ऐसी स्थिति में ‘महाजनो येन गताः स पन्था के अनुरूप व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। जीवन की ऐसी उलझनों से सुलझने के लिए जिस महापुरुष ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया; उसका नाम है-मोहनदास करमचन्द गांधी। यही मेरे आदर्श पुरुष हैं। इनके बाह्य व आन्तरिक व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए महाकवि पन्त जी लिखते हैं

तुम मांसहीन, तुम रक्तहीन,
हे अस्थिशेष ! तुम अस्थिहीन,

तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवले,
हे चिर पुराण ! हे चिर नवीन !

यद्यपि बाह्य रूप से देखने में गांधीजी अस्थियों का ढाँचामात्र लगते थे, किन्तु उनमें आत्मिक बल अमित था। वस्तुतः राजनीति जैसे स्थूल और भौतिकवादी क्षेत्र में उन्होंने आत्मा की आवाजे पर बल दिया, नैतिकता का प्रतिपादन किया तथा साध्य के साथ साधन की शुद्धता को भी आवश्यक ठहराया। विश्व राजनीति को यह उनका विशिष्ट योगदान था, जिससे प्रेरणा लेकर कई पराधीन देशों में स्वातन्त्र्य-आन्दोलन चलाये गये और स्वतन्त्रता प्राप्त की गयी।

जीवनवृत्त – मोहनदास करमचन्द गांधी का जन्म 2 अक्टूबर, सन् 1869 ई० को पोरबन्दर (गुजरात) में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री करमचन्द गांधी तथा माँ का नाम श्रीमती पुतलीबाई था। करमचन्द गांधी पोरबन्दर रियासत के दीवान थे। सात वर्ष की अवस्था में मोहनदास गांधी एक गुजराती पाठशाला में पढ़ने गये। बाद में अंग्रेजी स्कूल में भर्ती हुए, जहाँ से उन्होंने अंग्रेजी के साथ-साथ संस्कृत तथा धार्मिक ग्रन्थों का भी अध्ययन किया। इण्टेन्स की परीक्षा पास करने के उपरान्त ये विलायत चले गये।

भारत लौटने पर गांधीजी ने पहले राजकोट और फिर बेम्बई में वकालत शुरू की। उन्हें सेठ अब्दुल्ला फर्म के एक हिस्सेदार के मुकदमे को लेकर दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा। वहाँ पग-पग पर रंगभेद-नीति के फलस्वरूप भारतीयों का अपमान देखकर तथा स्वयं आप बीते कठोर अनुभवों के आधार पर उन्होंने रंगभेद-नीति को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया। प्रिटोरिया में भारतीयों की पहली सभा में गांधीजी ने भाषण दिया और यहीं से इनके सार्वजनिक जीवन का आरम्भ हुआ। सन् 1896 ई० में गांधीजी भारत आये और सपरिवार पुन: अफ्रीका लौट गये। लौटने पर उन्हें गोरों का विशेष विरोध सहना पड़ा, परन्तु गांधीजी ने साहस न छोड़ा और कई आन्दोलनों का संचालन करते रहे। सेवा में उनको अडिग विश्वास था। बोअर-युद्ध (सन् 1899 ई०) तथा जूलू-विद्रोह (सन् 1906 ई०) में स्वयंसेना स्थापित करके उन्होंने पीड़ितों की पर्याप्त सेवा की।

सन् 1914 ई० में वे भारत लौट आये। यहाँ आकर उन्होंने चम्पारन में किसानों पर किये जाने वाले अत्याचारों तथा कारखानों के कर्मचारियों पर मालिकों द्वारा की गयी ज्यादतियों का खुलकर विरोध किया और भारत के सार्वजनिक जीवन में पदार्पण किया। सन् 1924 ई० में वे बेलगाँव में कांग्रेस-अध्यक्ष चुने गये। सन् 1930 ई० में कांग्रेस ने पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव रखा और इस आन्दोलन के समस्त अधिकार गांधीजी को सौंप दिये। 4 मार्च, सन् 1931 ई० को गांधी-इरविन समझौता हुआ। दूसरी गोलमेज कॉन्फ्रेन्स में कांग्रेस-प्रतिनिधि के रूप में गांधीजी इंग्लैण्ड गये और अंग्रेज सरकार से स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि भारत को पूर्ण स्वतन्त्रता न मिली तो कांग्रेस का आन्दोलन भी जारी रहेगा।

अगस्त, सन् 1942 ई० में गांधीजी ने भारत छोड़ो’ का प्रस्ताव पारित किया; जिससे देश में एक महान् आन्दोलन छिड़ा। गांधीजी तथा अन्य नेता जेल में बन्द कर दिये गये। सन् 1946 ई० के हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष में गांधीजी ने नोआखाली की पैदल यात्रा की और वहाँ शान्ति स्थापित करने में सफल हुए। 15 अगस्त, सन् 1947 ई० को भारत को स्वतन्त्रता मिली। देश में उत्पन्न अन्य समस्याओं को सुलझाने में गांधीजी लगे ही थे कि सहसा 30 जनवरी, सन् 1948 ई० को वे शहीदों की परम्परा में चले गये।

गांधीजी के सिद्धान्त (अ) अहिंसा – गांधी जी का सबसे प्रमुख सिद्धान्त था व्यक्तिगत, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में अहिंसा का प्रयोग। अहिंसा आत्मा का बल है। वे अहिंसा का मूल प्रेम में मानते थे। वे लिखते हैं-“पूर्ण अहिंसा समस्त जीवधारियों के प्रति दुर्भावना का पूर्ण अभाव है, इसलिए वह मनुष्य के अलावा दूसरे प्राणियों-यहाँ तक कि विषैले कीड़ों और हिंसक जानवरों का भी आलिंगन करती है।” उन्होंने बार-बार कहा है कि अहिंसा वीर को धर्म है, कायर का नहीं; क्योंकि हिंसा करने की पूरी सामर्थ्य रखते हुए भी जो हिंसा नहीं करता, वही अहिंसा-धर्म का पालन करने में समर्थ होता है।

(1) व्यक्तिगत एवं सामाजिक अहिंसा – अहिंसा का अर्थ है-प्रेम, दया और क्षमा। अपने व्यक्तिगत जीवन, में भी गांधीजी ने इस सिद्धान्त को चरितार्थ करके दिखाया। वे जीव मात्र से प्रेम करते थे। दोनों और दलितों के लिए तो उनके प्रेम और करुणा की कोई सीमा ही न थी। वे इसे मानवता के प्रति घोर अपराध मानते थे कि किसी को नीचा या अस्पृश्य समझा जाये; क्योंकि भगवान् की दृष्टि में समस्त प्राणी समान हैं। इसीलिए उन्होंने अछूतोद्धार का आन्दोलन चलाया, जिसे उन्होंने हरिजनोद्धार कहा। हिन्दू समाज के प्रति यह उनकी बहुत बड़ी सेवा थी। उनके आन्दोलन के फलस्वरूप हरिजनों को मन्दिर में प्रवेश का अधिकार मिला। उनकी दया भावना ने उन्हें प्राणिमात्र की सेवा के लिए प्रेरित किया। परचुरे शास्त्री भयंकर कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। गांधीजी ने उन्हें अपने साथ रखा। इतना ही नहीं, उनके घावों को भी वे स्वयं अपने हाथ से साफ करते थे। इससे उनकी परदुःख-कातरता एवं सेवा-भावना का पता चलता है। अपने साथियों का भी गांधीजी बहुत ध्यान रखते थे। एक अवसर पर एक सज्जन आकर गांधीजी को कुछ फल दे गये, जिनमें चीकू भी थे। गांधीजी ने कुछ चीकू अपने एक साथी को देते हुए कहा- “इन्हें महादेव को दे आओ, उसे चीकू बहुत पसन्द हैं।” | अपने शत्रु को क्षमा करने की घटनाएँ तो उनके जीवन में भरी पड़ी हैं। उन्होंने अपने आश्रम में साँप, बिच्छु
आदि को मारना वर्जित कर दिया था। उन्हें पकड़कर दूर छोड़ दिया जाता था। एक बार एक साँप गांधीजी के कन्धे पर चढ़ गया। उनके साथियों ने उनकी ओढ़ी हुई चादर समेत उसे खींचकर दूर ले जाकर छोड़ दिया। इस प्रकार गांधीजी ने अपने जीवन में भी अहिंसा को चरितार्थ करके दिखाया।

(2) राजनीति में अहिंसा – राजनीति के क्षेत्र में अहिंसा के सिद्धान्त का व्यवहार उन्होंने तीन शस्त्रों के रूप में किया-सत्याग्रह, असहयोग और बलिदान। सत्याग्रह का अर्थ है – सत्य के प्रति आग्रह अर्थात् जो आदमी को ठीक लगे, उस पर पूरी शक्ति और निष्ठा से चलना, किसी के दबाव के आगे झुकना नहीं। असहयोग का अर्थ है-बुराई से, अन्याय से, अत्याचार से सहयोग न करना। यदि कोई सताये, अन्याय करे तो किसी भी काम में उसका साथ न देना। बलिदान का आशय है-सच्चाई के लिए, न्याय के लिए, अपने प्राण तक न्यौछावर कर देना। इन तीनों हथियारों का प्रयोग गांधीजी ने पहले दक्षिण अफ्रीका में किया, फिर भारत में।

(ब) शिक्षा-सम्बन्धी सिद्धान्त – शिक्षा से गांधीजी का तात्पर्य बालक के व्यक्तित्व के पूर्ण विकास से था। इस सम्बन्ध में वे लिखते हैं-“शिक्षा से तात्पर्य उन समस्त शक्तियों के दोहन से है, जो शिशु एवं मानव के शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा में निहित हैं। साथ ही उनके अनुसार, “कोई भी वह शिक्षा पूर्ण नहीं है, जो लड़के-लड़कियों को आदर्श नागरिक नहीं बनाती।”

गांधीजी के शिक्षा-सम्बन्धी विचारों का केन्द्र-बिन्दु है-व्यवसाय और व्यवसाय से उनका आशय हस्तकला से है। वे लिखते हैं-“मैं बालक की शिक्षा का आरम्भ किसी उपयोगी हस्तकला के शिक्षण से करूंगा, जिससे वह आरम्भ से ही अर्जन करने में समर्थ हो सके। इससे एक तो वह शिक्षा का व्यय वहन कर सकेगा और फिर वह अपने भावी जीवन में पूर्ण रूप से आत्म-निर्भर भी हो सकेगा। इस प्रकार शिक्षा बेकारी दूर करने का एक प्रकार से बीमा है। वे विद्यालयों को आत्मनिर्भर देखना चाहते थे अर्थात् शिक्षकों की व्यवस्था विद्यालय के उत्पादन से ही हो सके और राज्य-सरकार छात्रों द्वारा उत्पादित वस्तुओं के खरीदने की व्यवस्था करे।

राष्ट्रभाषा के प्रबल पोषक – गांधीजी राष्ट्रभाषा के बिना किसी स्वतन्त्र राष्ट्र की कल्पना ही नहीं करते थे। उनका स्पष्ट मत था कि किसी विदेशी भाषा के माध्यम से बालक की क्षमताओं का पूर्ण विकास सम्भव नहीं। इसी कारण राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया।

कुटीर उद्योगों पर बल – गांधीजी भारत जैसे विशाल देश की समस्याओं और आवश्यकताओं को बहुत गहराई तक समझते थे। वे जानते थे कि ऐसे देश में जहाँ विशाल जनसंख्या के कारण जनशक्ति की कमी नहीं, आर्थिक आत्म-निर्भरता एवं सम्पन्नता के लिए कुटीर उद्योग ही सर्वाधिक उपयुक्त साधन हैं। गांधीजी ने ग्रामों को आर्थिक स्वावलम्बन प्रदान करने के लिए खादी उद्योग को बढ़ावा दिया और चरखे को अपने आर्थिक सिद्धान्तों को केन्द्रबिन्दु बना लिया तथा प्रत्येक गांधीवादी के लिए प्रतिदिन चरखा चलाना और खादी पहनना अनिवार्य कर दिया।

प्रेरणादायक गुण – गांधीजी में ऐसे अनेक महान् गुण विद्यमान थे, जिनसे प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा लेनी चाहिए। उनका पहला गुण था–समय का सदुपयोग। वे अपना एक क्षण भी व्यर्थ न गॅवाते थे, यहाँ तक कि दूसरों से बात करते समय भी वे कुछ-न-कुछ कोम अवश्य करते रहते थे, चाहे वह आश्रम की सफाई का काम हो या चरखा चलाने का या रोगियों की सेवा-शुश्रूषा का। यही कारण है कि इतनी अधिक व्यस्तता के बावजूद वे अनेक ग्रन्थ और लेखादि लिख सके।

दूसरा महत्त्वपूर्ण गुण था – दूसरों को उपदेश देने से पहले किसी आदर्श को स्वयं अपने जीवन में क्रियान्वित करना। उदाहरणार्थ-वे अपना सारा काम स्वयं अपने ही हाथों करते थे, यहाँ तक कि अपना मल-मूत्र भी स्वयं साफ करते थे। इसके बाद ही वे आश्रमवासियों को भी ऐसा करने की प्रेरणा देते थे।

मितव्ययिता गांधी जी का एक अन्य प्रेरक गुण था। वे तुच्छ-से-तुच्छ वस्तु को भी व्यर्थ नहीं समझते थे, अपितु उसका अधिकतम सदुपयोग करने का प्रयास करते थे। इस सम्बन्ध में आश्रमवासियों को भी उनका कठोर आदेश था। गांधी जी की सारग्रहिणी प्रवृत्ति भी बड़ी प्रेरणाप्रद थी। वे अपने कटुतम आलोचक और विरोधी की बात भी बड़ी शान्ति से सुनते और अपने कटु विरोधी व्यक्ति की उचित बात को साररूप में ग्रहण कर लेते थे। एक बार कोई अंग्रेज युवक एक लम्बे पत्र में गांधीजी को सैकड़ों भद्दी-भद्दी गालियाँ लिखकर स्वयं उनके पास पहुँचा और पत्र उन्हें दिया। पत्र पर दृष्टि डालते ही उन्होंने उसका आशय समझ लिया और उसमें लगी आलपिन को अपने पास रखकर पृष्ठों को रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया। युवक ने उनसे इसका कारण पूछा। गांधीजी ने कहा कि इसमें सार वस्तु केवल इतनी ही थी, जो मैंने ले ली।

उपसंहार – सारांश यह है कि गांधीजी ने अपने नेतृत्व के गुणों से जनता की असीम श्रद्धा अर्जित की। उन्होंने भारत की जनता में स्वाभिमान और आत्म-विश्वास जगाया, अपने अधिकार के लिए लड़ने का मनोबल दिया, देश को स्वतन्त्र कराने की प्रेरणा दी तथा स्वदेशी आन्दोलन द्वारा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के स्वीकरण का मन्त्र दिया। उनके खादी आन्दोलन ने ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा दिया, राष्ट्रभाषा के महत्त्व एवं गौरव के प्रबल समर्थन द्वारा उन्होंने कितने ही हिन्दीतर-भाषियों को हिन्दी सीखने की प्रेरणा दी तथा राष्ट्रभाषा आन्दोलन को देश के कोने-कोने तक पहुँचा दिया। अपने अनेकानेक व्यक्तिगत गुणों के कारण अपने सम्पर्क में आने वालों को उन्होंने अन्दर तक प्रभावित किया और दीन-दु:खियों के सदृश स्वयं भी अधनंगे रहकर तथा निर्धनता और सादगी का जीवन अपनाकर लोगों से “महात्मा” और “बापू’ का प्रेममय सम्बोधन पाया। सचमुच वे वर्तमान भारत की एक महान् विभूति थे।

मेरे प्रिय कवि: तुलसीदास

सम्बद्ध शीर्षक

  • तुलसी का समन्वयवाद
  • हमारे प्रिय जन-कवि : तुलसीदास
  • रामकाव्यधारा के प्रमुख कवि : तुलसीदास
  • कोई लोकप्रिय समाज-सुधारक
  • कविता लसी पा तुलसी की कला

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2.  तत्कालीन परिस्थितियाँ
  3.  तुलसीकृत रचनाएँ,
  4.  तुलसीदास : एक लोकनायक के रूप में,
  5.  तुलसी के राम,
  6.  तुलसी की निष्काम भक्ति-भावना,
  7.  तुलसी की समन्वय साधना
    (क) सगुण-निर्गुण का समन्वय,
    (ख) कर्म, ज्ञान एवं भक्ति का समन्वय,
    (ग) युगधर्म-समन्वय,
    (घ) साहित्यिक समन्वय,
  8.  तुलसी के दार्शनिक विचार,
  9.  उपसंहार।

प्रस्तावना – यद्यपि मैंने बहुत अधिक अध्ययन नहीं किया है, तथापि भक्तिकालीन कवियों में कबीर, सूर, तुलसी और मीरा तथा आधुनिक कवियों में प्रसाद, पन्त और महादेवी के काव्य का रसास्वादन अवश्य किया है। इन सभी कवियों के काव्य का अध्ययन करते समय तुलसी के काव्य की अलौकिकता के समक्ष मैं सदैव नत-मस्तक होता रहा हूँ। उनकी भक्ति-भावना, समन्वयात्मक दृष्टिकोण तथा काव्य-सौष्ठव ने मुझे स्वाभाविक रूप से आकृष्ट किया है।

तत्कालीन परिस्थितियाँ – तुलसीदास का जन्म ऐसी विषम परिस्थितियों में हुआ था, जब हिन्दू समाज अशक्त होकर विदेशी चंगुल में फंस चुका था। हिन्दू समाज की संस्कृति और सभ्यता प्रायः विनष्ट हो चुकी थी और कहीं कोई पथ-प्रदर्शक नहीं था। इस युग में जहाँ एक ओर मन्दिरों का विध्वंस किया गया, ग्रामों व नगरों का विनाश हुआ, वहीं संस्कारों की भ्रष्टता भी चरम सीमा पर पहुँच गयी। इसके अतिरिक्त तलवार के बल पर धर्मान्तरण कराया जा रहा था। सर्वत्र धार्मिक विषमताओं का ताण्डव हो रहा था और विभिन्न सम्प्रदायों ने अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग अलापना आरम्भ कर दिया था। ऐसी परिस्थिति में भोली-भोली जनता यह समझने में असमर्थ थी कि वह किस सम्प्रदाय का आश्रय ले। उस समय दिग्भ्रमित जनता को ऐसे नाविक की आवश्यकता थी, जो उसके नैतिक जीवन की नौका की पतवार सँभाल ले।

गोस्वामी तुलसीदास ने अन्धकार के गर्त में डूबी हुई जनता के समक्ष भगवान् राम का लोकमंगलकारी रूप प्रस्तुत किया और उसमें अपूर्व आशा एवं शक्ति का संचार किया। युगद्रष्टा तुलसी ने अपनी अमर कृति श्रीरामचरितमानस द्वारा भारतीय समाज में व्याप्त विभिन्न मतों, सम्प्रदायों एवं धाराओं में समन्वय स्थापित किया। उन्होंने अपने युग को नवीन दिशा, नयी गति एवं नवीन प्रेरणा दी। उन्होंने सच्चे लोकनायक के समान समाज में व्याप्त वैमनस्य की चौड़ी खाई को पाटने का सफल प्रयत्न किया।

तुलसीकृत रचनाएँ – तुलसीदास जी द्वारा लिखित 12 ग्रन्थ प्रामाणिक माने जाते हैं। ये ग्रन्थ हैं श्रीरामचरितमानस’, ‘विनयपत्रिका’, ‘गीतावली’, ‘कवितावली’, ‘दोहावली’, ‘रामललानहछू’, ‘पार्वतीमंगल’, ‘जानकीमंगल’, ‘बरवै रामायण’, वैराग्य संदीपनी’, ‘श्रीकृष्णगीतावली’ तथा ‘रामाज्ञाप्रश्नावली’। तुलसी की ये रचनाएँ विश्व-साहित्य की अनुपम निधि हैं।

तुलसीदास : एक लोकनायक के रूप में – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का कथन है “लोकनायक वही हो सकता है, जो समन्वय कर सके; क्योंकि भारतीय समाज में नाना प्रकार की परस्पर विरोधी संस्कृतियाँ, साधनाएँ, जातियाँ आचारनिष्ठा और विचार-पद्धतियाँ प्रचलित हैं। बुद्धदेव समन्वयकारी थे, ‘गीता’ ने समन्वय की चेष्टा की और तुलसीदास भी समन्वयकारी थे।”

तुलसी के राम – तुलसी उन राम के उपासक थे, जो सच्चिदानन्द परब्रह्म हैं, जिन्होंने भूमि का भार हरण करने के लिए पृथ्वी पर अवतार लिया था

जब-जब होइ धरम कै हानी। बाढहिं असुर अधम अभिमानी॥
तब-तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥

तुलसी ने अपने काव्य में सभी देवी-देवताओं की स्तुति की है, लेकिन अन्त में वे यही कहते हैं

माँगत तुलसीदास कर जोरे। बसहिं रामसिय मानस मोरे॥

राम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति अपनी चरम-सीमा छूती है और वे कह उठते हैं कि

कसँ कहाँ तक राम बड़ाई। राम न सकहिं, राम गुन गाही।

तुलसी के समक्ष ऐसे राम का जीवन था, जो मर्यादाशील थे और शक्ति एवं सौन्दर्य के अवतार थे।

तुलसीदास की निष्काम भक्ति-भावना – सच्ची भक्ति वही है, जिसमें लेन-देन का भाव नहीं होता। भक्त के लिए भक्ति का आनन्द ही उसका फल है। तुलसी के अनुसार

मो सम दीन न दीन हित, तुम समान रघुबीर।
अस बिचारि रघुबंसमनि, हरहु विषम भव भीर ॥

तुलसी की समन्वय-साधना – तुलसी के काव्य की सर्वप्रमुख विशेषता उसमें निहित समन्वय की प्रवृत्ति है। इस प्रवृत्ति के कारण ही वे वास्तविक अर्थों में लोकनायक कहलाये। उनके काव्य में समन्वय के निम्नलिखित रूप दृष्टिगत होते हैं

(क) सगुण-निर्गुण का समन्वय – जब ईश्वर के सगुण एवं निर्गुण दोनों रूपों से सम्बन्धित विवाद, दर्शन एवं भक्ति दोनों ही क्षेत्रों में प्रचलित था तो तुलसीदास ने कहा

सगुनहिं अगुनहिं नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥

(ख) कर्म, ज्ञान एवं भक्ति का समन्वय – तुलसी की भक्ति मनुष्य को संसार से विमुख करके अकर्मण्य बनाने वाली नहीं है, उनकी भक्ति तो सत्कर्म की प्रबल प्रेरणा देने वाली है। उनका सिद्धान्त है कि राम के समान आचरण करो, रावण के सदृश दुष्कर्म नहीं

भगतिहिं ग्यानहिं नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव-संभव खेदा॥

तुलसी ने ज्ञान और भक्ति के धागे में राम-नाम का मोती पिरो दिया है

हिय निर्गुन नयनन्हि सगुन, रसना राम सुनाम।
मनहुँ पुरट संपुट लसत, तुलसी ललित ललाम॥

(ग) युगधर्म-समन्वय – भक्ति की प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार के बाह्य तथा आन्तरिक साधनों की आवश्यकता होती है। ये साधन प्रत्येक युग के अनुसार बदलते रहते हैं और उन्हीं को युगधर्म की संज्ञा दी जाती है। तुलसी ने इनका भी विलक्षण समन्वय प्रस्तुत किया है

कृतजुग त्रेता द्वापर, पूजा मख अरु जोग ।
जो गति होइ सो कलि हरि, नाम ते पावहिं लोग।

(घ) साहित्यिक समन्वय – साहित्यिक क्षेत्र में भाषा, छन्द, रस एवं अलंकार आदि की दृष्टि से भी तुलसी ने अनुपम समन्वय स्थापित किया। उस समय साहित्यिक क्षेत्र में विभिन्न भाषाएँ विद्यमान थीं, विभिन्न छन्दों में रचनाएँ की जाती थीं। तुलसी ने अपने काव्य में भी संस्कृत, अवधी तथा ब्रजभाषा का अद्भुत समन्वय किया।

तुलसी के दार्शनिक विचार – तुलसी ने किसी विशेष वाद को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने वैष्णव धर्म को इतना व्यापक रूप प्रदान किया कि उसके अंन्तर्गत शैव, शाक्त और पुष्टिमार्गी भी सरलता से समाविष्ट हो गये। वस्तुतः तुलसी भक्त हैं और इसी आधार पर वह अपना व्यवहार निश्चित करते हैं। उनकी भक्ति सेवक-सेव्य भाव की है। वे स्वयं को राम का सेवक मानते हैं और राम को अपना स्वामी।।

उपसंहार – तुलसी ने अपने युग और भविष्य, स्वदेश और विश्व तथा व्यक्ति और समाज आदि सभी के लिए महत्त्वपूर्ण सामग्री दी है। तुलसी को आधुनिक दृष्टि ही नहीं, प्रत्येक युग की दृष्टि मूल्यवान् मानेगी; क्योंकि मणि की चमक अन्दर से आती है, बाहर से नहीं। तुलसी के सम्बन्ध में हरिऔध जी के हृदय से स्वत: फूट पड़ी प्रशस्ति अपनी समीचीनता में बेजोड़ है

बने रामरसायन की रसिका, रसना रसिकों की हुई सुफला।
अवगाहन मानस में करके, मन-मानस का मल सारा टला ॥
बनी पावन भाव की भूमि भली, हुआ भावुक भावुकता का भला।
कविता करके तुलसी न लसे, कविता लसी पा तुलसी की कला ॥

सचमुच कविता से तुलसी नहीं, तुलसी से कविता गौरवान्वित हुई। उनकी समर्थ लेखनी का सम्बल पा वाणी धन्य हो उठी।
तुलसीदास जी के इन्हीं सभी गुणों का ध्यान आते ही मन श्रद्धा से परिपूरित हो उन्हें अपना प्रिय कवि मानने को विवश हो जाता है।

मेरे प्रिय साहित्यकार (जयशंकर प्रसाद)

सम्बद्ध शीर्षक

  • अपना (मेरा) प्रिय कवि
  • मेरा प्रिय लेखक
  • प्रिय कवि अथवा लेखक

प्रमुख विचार-बिन्दु:

  1.  प्रस्तावना,
  2. साहित्यकार का परिचय,
  3. साहित्यकार की साहित्यसम्पदा
    (क) काव्य,
    (ख) नाटक,
    (ग) उपन्यास,
    (घ) कहानी,
    (ङ) निबन्ध,
  4. छायावाद के श्रेष्ठ कवि,
  5.  श्रेष्ठ गद्यकार,
  6.  उपसंहार।

प्रस्तावना – संसार में सबकी अपनी-अपनी रुचि होती है। किसी व्यक्ति की रुचि चित्रकारी में है तो किसी की संगीत में किसी की रुचि खेलकूद में है तो किसी की साहित्य में। मेरी अपनी रुचि भी साहित्य में रही है। साहित्य प्रत्येक देश और प्रत्येक काल में इतना अधिक रचा गया है कि उन सबका पारायण तो एक जन्म में सम्भव ही नहीं है। फिर साहित्य में भी अनेक विधाएँ हैं–कविता, उपन्यास, नाटक, कहानी, निबन्ध आदि। अतः मैंने सर्वप्रथम हिन्दी-साहित्य का यथाशक्ति अधिकाधिक अध्ययन करने का निश्चय किया और अब तक जितना अध्ययन हो पाया है, उसके आधार पर मेरे सर्वाधिक प्रिय साहित्यकार हैं-जयशंकर प्रसाद प्रसाद जी केवल कवि ही नहीं, नाटककार, उपन्यासकार, कहानीकार और निबन्धकार भी हैं। प्रसाद जी ने हिन्दी-साहित्य में भाव और कला, अनुभूति और अभिव्यक्ति, वस्तु और शिल्प सभी क्षेत्रों में युगान्तकारी परिवर्तन किये हैं। उन्होंने हिन्दी भाषा को एक नवीन अभिव्यंजना-शक्ति प्रदान की है। इन सबने मुझे उनका प्रशंसक बना दिया है और वे मेरे प्रिय साहित्यकार बन गये हैं।

साहित्यकार का परिचय – श्री जयशंकर प्रसाद जी का जन्म सन् 1889 ई० में काशी के प्रसिद्ध हुँघनी-साहु परिवार में हुआ था। आपके पिता का नाम श्री बाबू देवी प्रसाद था। लगभग 11 वर्ष की अवस्था में ही जयशंकर प्रसाद ने काव्य-रचना आरम्भ कर दी थी। सत्रह वर्ष की अवस्था में इनके ऊपर विपत्तियों को पहाड़ टूट पड़ा। इनके पिता, माता व बड़े भाई का देहान्त हो गया और परिवार का समस्त उत्तरदायित्व इनके सुकुमार कन्धों पर आ गया। गुरुतर उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए एवं अनेकानेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना करने के उपरान्त 15 नवम्बर, 1937 ई० को आपका देहावसान हुआ। अड़तालीस वर्ष के छोटे से जीवन में इन्होंने जो बड़े-बड़े काम किये, उनकी कथा सचमुच अकथनीय है।

साहित्यकार की साहित्य-सम्पदा – प्रसाद जी की रचनाएँ सन् 1907-08 ई० में सामयिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थी। ये रचनाएँ ब्रजभाषा की पुरानी शैली में थीं, जिनका संग्रह ‘चित्राधार में हुआ। सन् 1913 ई० में ये खड़ी बोली में लिखने लगे।

प्रसाद जी ने पद्य और गद्य दोनों में साधिकार रचनाएँ कीं। इनका वर्गीकरण निम्नवत् है

(क) काव्य – कानन-कुसुम, प्रेम पथिक, महाराणा का महत्त्व, झरना; आँसू, लहर और कामायनी (महाकाव्य)।
(ख) नाटक – इन्होंने कुल मिलाकर 13 नाटक लिखे। इनके प्रसिद्ध नाटक हैं-चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, अजातशत्रु, जनमेजय का नागयज्ञ, कामना और ध्रुवस्वामिनी।
(ग) उपन्यास – कंकाल, तितली और इरावती।
(घ) कहानी – प्रसाद जी की विविध कहानियों के पाँच संग्रह हैं – छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी और इन्द्रजाल।।
(ङ) निबन्ध – प्रसाद जी ने साहित्य के विविध विषयों से सम्बन्धित निबन्ध लिखे, जिनका संग्रह है-काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध।।

छायावाद के श्रेष्ठ कवि – छायावाद हिन्दी कविता के क्षेत्र का एक आन्दोलन है जिसकी अवधि सन् 1920-36 ई० तक मानी जाती है। प्रसाद जी छायावाद के जन्मदाता माने जाते हैं। छायावाद एक आदर्शवादी काव्यधारा है, जिसमें वैयक्तिकता, रहस्यात्मकता, प्रेम, सौन्दर्य तथा स्वच्छन्दतावाद की सबल अभिव्यक्ति हुई है। प्रसाद जी की ‘आँसु’ नाम की कृति के साथ हिन्दी में छायावाद का जन्म हुआ। आँसू का प्रतिपाद्य हैविप्रलम्भ श्रृंगार। प्रियतम के वियोग की पीड़ा वियोग के समय आँसू बनकर वर्षा की भाँति उमड़ पड़ती है

जो घनीभूत पीड़ा थी, स्मृति-सी नभ में छायी।
दुर्दिन में आँसू बनकर, वह आज बरसने आयी ।।

प्रसाद के काव्य में छायावाद अपने पूर्ण उत्कर्ष पर दिखाई देता है; यथा–सौन्दर्य-निरूपण एवं श्रृंगार भावना, प्रकृति-प्रेम, मानवतावाद, प्रेम भावना, आत्माभिव्यक्ति, प्रकृति पर चेतना का आरोप, वेदना और निराशा को स्वर, देश-प्रेम की अभिव्यक्ति, नारी के सौन्दर्य का वर्णन, तत्त्व-चिन्तन, आधुनिक बौद्धिकता, कल्पना का प्राचुर्य तथा रहस्यवाद की मार्मिक अभिव्यक्ति। अन्यत्र इंगित छायावाद की कलागत विशेषताएँ अपने उत्कृष्ट रूप में इनके काव्य में उभरी हुई दिखाई देती हैं।

आँसू मानवीय विरह का एक प्रबन्ध काव्य है। इसमें स्मृतिजन्य मनोदशा एवं प्रियतम के अलौकिक रूप-सौन्दर्य को मार्मिक वर्णन किया गया है। ‘लहर’. आत्मपरक प्रगीत मुक्तक है, जिसमें कई प्रकार की कविताओं का संग्रह है। प्रकृति के रमणीय पक्ष को लेकर सुन्दर और मधुर रूपकमये यह गीत ‘लहर से संगृहीत है

बीती विभावरी जाग री।
अम्बर-पनघट में डुबो रही;
तारा-घट ऊषा नागरी।

‘प्रसाद की सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचना है – कामयानी महाकाव्य, जिसमें प्रतीकात्मक शैली पर मानव-चेतना के विकास का काव्यमय निरूपण किया गया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में-“यह काव्य बड़ी विशद कल्पनाओं और मार्मिक उक्तियों से पूर्ण है। इसके विचारात्मक आधार के अनुसार श्रद्धा या रागात्मिका वृत्ति ही मनुष्य को इस जीवन में शान्तिमय आनन्द का अनुभव कराती है। वही उसे आनन्द-धाम तक पहुँचाती है, जब कि इड़ा या बुद्धि आनन्द से दूर भगाती है।” अन्त में कवि ने इच्छा, कर्म और ज्ञान तीनों के सामंजस्य पर बल दिया है; यथा

ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा पूरी क्यों हो मन की?
एक दूसरे से मिले न सके, वह विडम्बना जीवन की।

श्रेष्ठ गद्यकार – गद्यकार प्रसाद की सर्वाधिक ख्याति नाटककार के रूप में है। उन्होंने गुप्तकालीन भारत को आधुनिक परिवेश में प्रस्तुत करके गांधीवादी अहिंसामूलक देशभक्ति का सन्देश दिया है। साथ ही अपने समय के सामाजिक आन्दोलनों का सफल चित्रण किया है। नारी की स्वतन्त्रता एवं महिमा पर उन्होंने सर्वाधिक बल दिया है। प्रत्येक नाटक का संचालन सूत्र किसी नारी पात्र के ही हाथ में रहता है। उपन्यास और कहानियों में भी सामाजिक भावना का प्राधान्य है। उनमें दाम्पत्य-प्रेम के आदर्श रूप का चित्रण किया गया है। उनके निबन्ध विचारात्मक एवं चिन्तनप्रधान हैं, जिनके माध्यम से प्रसाद ने काव्य और काव्य-रूपों के विषय में अपने विचार प्रस्तुत किये हैं।

उपसंहार – पद्य और गद्य की सभी रचनाओं में इनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ एवं परिमार्जित हिन्दी है। इनकी शैली आलंकारिक एवं साहित्यिक है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इनकी गद्य-रचनाओं में भी इनका छायावादी कवि-हृदय झाँकता हुआ दिखाई देता है। मानवीय भावों और आदर्शों में उदात्तवृत्ति का सृजन विश्व-कल्याण के प्रति इनकी विशाल-हृदयता का सूचक है। हिन्दी-साहित्य के लिए प्रसाद जी की यह बहुत बड़ी देन है। ‘प्रसाद की रचनाओं में छायावाद पूर्ण प्रौढ़ती, शालीनता, गुरुता और गम्भीरता को प्राप्त दिखाई देता है। अपनी विशिष्ट कल्पना-शक्ति, मौलिक अनुभूति एवं नूतन अभिव्यक्ति पद्धति के फलस्वरूप प्रसाद हिन्दी-साहित्य में मूर्धन्य स्थान पर प्रतिष्ठित हैं। समग्रतः यह कहा जा सकता है कि प्रसाद जी का साहित्यिक व्यक्तित्व बहुत महान् है। जिस कारण वे मेरे सर्वाधिक प्रिय साहित्यकार रहे हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi आत्मकथात्मक निबन्ध

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 12
Chapter Name आत्मकथात्मक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi आत्मकथात्मक निबन्ध

आत्मकथात्मक निबन्ध

 यदि मैं भारत का प्रधानमन्त्री होता

सम्बद्ध शीर्षक

  • यदि मैं इस प्रदेश का माध्यमिक शिक्षा-मन्त्री होता

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2.  शिक्षा-व्यवस्था में मौलिक परिवर्तन,
  3.  प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और पुनरुद्धार पर बल,
  4. शासनिक और प्रशासनिक सुधार,
  5.  न्याय व्यवस्था में सुधार,
  6. चुनाव प्रणाली में आमूल परिवर्तन,
  7.  औद्योगिक नीति में परिवर्तन,
  8. कर प्रणाली में सुधार,
  9.  परिवार कल्याण योजना का क्रियान्वयन,
  10. गृह और विदेश नीति,
  11. सैन्य-शक्ति का पुनर्गठन,
  12. मनोरंजन और खेलकूद के क्षेत्रों में क्रान्तिकारी परिवर्तन,
  13.  खाद्य-नीति,
  14. सामाजिक और धार्मिक नीति,
  15. उपसंहार।

प्रस्तावना – देश का प्रधानमन्त्री बनना दीर्घकालीन राजनीतिक साधना का परिणाम होता है। वर्तमान समय में प्राचीन काल के राजाओं जैसा युग नहीं है कि जिस पर कृपा हो गयी उसे ही प्रधानमन्त्री बना दिया गया। वर्तमान भारत में राज्य के संचालन के लिए प्रजातन्त्रात्मक शासन-पद्धति प्रचलित है, जिसके अन्तर्गत प्रधानमन्त्री के निर्वाचन का विधान है। इसके लिए सर्वप्रथम मुझे किसी संसदीय क्षेत्र से चुनाव में खड़ा होकर चुनाव जीतना होगा। इसके पश्चात् जिस दल का मैं सदस्य हूँ, यदि उस दल का संसद में बहुमत हो और उस दल द्वारा सर्वसम्मति से मुझे अपना नेता चुन लिया जाए तो मेरे प्रधानमन्त्री बनने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। प्रधानमन्त्री बनने के लिए इतना प्रयत्न तो करना ही पड़ेगा। प्रधानमन्त्री बन ज़ाना फूलों की शय्या नहीं है, यह तो काँटों का ताज है, जिसमें काँटे निरन्तर चुभते ही रहते हैं। यदि मैं प्रधानमन्त्री बन ही जाऊँ तो वर्तमान शासन की गलत नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन करके ऐसी व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास करूंगा कि भारत संसार के सर्वाधिक शक्तिशाली, गौरवशाली और वैभवशाली देशों में गिना जाए। प्रधानमन्त्री बनने के बाद मेरे द्वारा निम्नलिखित कार्य प्राथमिकता के आधार पर सम्पन्न किये जाएँगे

शिक्षा-व्यवस्था में मौलिक परिवर्तन – संसार का कोई भी देश शिक्षा द्वारा ही उन्नति करता है। इसलिए मेरा पहला काम होगा कि मैं भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी को वास्तविक अर्थों में देश की राजभाषा बनाऊँ और अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में भी इसको व्यवहार में लाये जाने को प्रोत्साहित करू। बिना अपनी भाषा को अपनाये संसार का कोई भी देश प्रगति नहीं कर सकता। बाबू भारतेन्दुजी ने कहा ही है

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को सूल।

जापान और चीन के उदाहरण हमारे सामने हैं। अतः संविधान-सभा के निर्णय के अनुसार केन्द्र की भाषा एकमात्र हिन्दी होगी। विभिन्न प्रदेशों में प्रादेशिक भाषाएँ मान्य होंगी। प्रादेशिक सरकारें आपस में तथा केन्द्र से हिन्दी में पत्राचार करेंगी। विश्वविद्यालयों, उच्च न्यायालयों एवं सर्वोच्च न्यायालय की भाषा हिन्दी होगी। भारत में सभी प्रकार की शिक्षा–तकनीकी और गैर-तकनीकी-देशी भाषाओं के माध्यम से ही दी जाएगी। आशय यह है कि अंग्रेजों की दासता की निशानी अंग्रेजी का इस देश से सर्वथा लोप कर दिया जाएगा। केवल उन्हीं लोगों के लिए अंग्रेजी सिखाने की व्यवस्था होगी, जो किसी विशेष उद्देश्य से उसे सीखना चाहेंगे। इस प्रकार अपनी भाषाओं के माध्यम से देश की प्राचीन संस्कृति का पुनरुद्धार होगा तथा राष्ट्रीय स्वाभिमान जागेगा।

प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और पुनरुद्धार पर बल – देश के पुरातत्त्व विभाग को बहुत मजबूत बनाया जाएगा और उसे प्रचुर धन उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे वह देश भर में आवश्यक स्थानों पर अन्वेषण कराकर भारत के प्राचीन इतिहास की खोई हुई कड़ियों को खोजे। जो प्राचीन मूर्तियाँ, भवन, सिक्के या अन्य अवशेष विद्यमान हैं या खोज के परिणामस्वरूप निकलेंगे उनकी सुरक्षा और रख-रखाव की व्यवस्था की जाएगी।

शासनिक और प्रशासनिक सुधार – मैं अपने मन्त्रिमण्डल का आकार बहुत सीमित रखेंगा जिसमें विशेष योग्यतासम्पन्न, ईमानदार, चरित्रवान एवं देशभक्त मन्त्री ही सम्मिलित किये जाएँगे, जिन्हें बहुत सादगी से रहने को प्रेरित किया जाएगा। प्रदेशों में भी ऐसी ही व्यवस्था अपनाये जाने पर बल दिया जाएगा। साथ ही केन्द्रीय सचिवालय एवं अन्यान्य कार्यालयों का आकार घटाकर अतिरिक्त लोगों की कुशलता का लाभ अन्यत्र उठाया जाएगा।

इसी प्रकार प्रशासनिक अधिकारियों को जनता का शासक या शोषक नहीं, जनता का सेवक बनना सिखाया जाएगा। विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों में देशभक्त कर्मचारियों को नियुक्त कर उन्हें बहुत सादगी, कार्यकुशलता एवं निष्ठा से काम करने की प्रेरणा दी जाएगी। उनसे आशा की जाएगी कि वे विदेशों में अपने देश के हित के सजग प्रहरी बनकर रहें।

न्याय-व्यवस्था में सुधार – न्यायालय राजनीतिक या अन्य किसी प्रकार के हस्तक्षेप से पूर्णत: मुक्त रखे जाएँगे। न्याय-प्रक्रिया बहुत सरल और सस्ती बनायी जाएगी। अधिकांश विवादों को आपसी समझौतों से हल करने के प्रयास किये जाएँगे। अधिवक्ताओं पर आधारित प्रक्रिया को एक सीमा तक परिवर्तित करने के प्रयास किये जाएंगे। इससे न्यायालयों में लम्बित मुकदमों की संख्या घटेगी। निर्धनों और असहायों को न्याय नि:शुल्क दिलाया जाएगा और वादों का निपटारा एक निश्चित अवधि के अन्दर करना अनिवार्य होगा।

चुनाव-प्रणाली में आमूल परिवर्तन – सत्ता की राजनीति के स्थान पर सेवा की राजनीति चलाने के लिए चुनाव-प्रणाली में परिवर्तन नितान्त आवश्यक है। इसके लिए सबसे पहले अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति आदि के कृत्रिम और हानिकारक विभाजन समाप्त करके देश की भावात्मक एकता का पथ प्रशस्त किया जाएगा। किसी भी व्यक्ति को जाति, धर्म, सम्प्रदाय या भाषी के आधार पर नहीं, अपितु शुद्ध योग्यता और कार्यक्षमता के आधार पर ही प्रोत्साहन दिया जाएगा। मत देने का वर्तमान क्रम समाप्त करके न्यूनतम अर्हता एवं आयु वाले मतदाता को ही मतदान का अधिकार होगा तथा चुनाव में प्रत्याशी के रूप में खड़े होने वाले के लिए भी कुछ न्यूनतम योग्यता निर्धारित कर दी जाएगी। दल परिवर्तन को कानून द्वारा अवैध घोषित कर दिया जाएगा और दूसरे दल की सदस्यता और किसी भी रूप में दूसरे दल से सम्बद्धता स्वीकार करने पर उसे पुनः मतदाताओं का विश्वास प्राप्त करना होगा। चुनाव-प्रणाली अत्यधिक सस्ती, सरल और आधुनिक बना दी जाएगी।

औद्योगिक नीति में परिवर्तन – कुटीर एवं लघु उद्योग-धन्धों को पूरी लगन से पुनर्जीवित किया जाएगा। डेयरी-उद्योग को बढ़ावा दिया जाएगा तथा उसी से वनस्पति घी के स्थान पर देशी घी प्रचुर मात्रा में सस्ते मूल्य पर उपलब्ध कराया जाएगा। गो-हत्या को पूर्णत: बन्द कर देश के पशुधन को समुचित संरक्षण दिया जाएगा। बड़े उद्योगों को केवल कुछ ही चीजें बनाने की छूट देकर अधिकांश माल लघु उद्योगों से तैयार कराकर सरकार उसकी बिक्री की व्यवस्था करेगी। इससे बेरोजगारी के उन्मूलन में बहुत सहायता मिलेगी। देश के प्रत्येक नागरिक को रोजगार उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व होगा। देश में फैशन और विलासिता की सामग्री के उत्पादन को निरुत्साहित कर सादगी और सात्विकता पर बल दिया जाएगा। देश में तैयार हो रहे माल की गुणवत्ता पर सतर्क दृष्टि रखी जाएगी। आयात कम कर दिया जाएगा और निर्यात को पूरा बढ़ावा दिया जाएगा। विदेशी ऋण लेना बन्द करके देश की आवश्यकताओं और साधनों के अनुरूप लघु विकास-योजनाएँ अल्पकालिक आधार पर बनायी जाएँगी। तस्करी का कठोरतापूर्वक दमन किया जाएगा। कोटा-परमिट आदि कृत्रिम प्रतिबन्ध समाप्त कर उद्योगों को फलने-फूलने के पर्याप्त अवसर प्रदान किये जाएँगे।

कर-प्रणाली में सुधार – देश में विद्यमान सैकड़ों करों के स्थान पर केवल तीन-चार प्रमुख कर रखे जाएँगे। कर-प्रणाली बहुत सरल बनायी जाएगी, जिससे शिक्षित-अशिक्षित प्रत्येक व्यक्ति सुविधापूर्वक अपना कर जमा कर सके। इससे चोरबाजारी का उन्मूलन होगा और कालाधन व सफेद धन का भेद समाप्त होकर सारा धन देश के विकास में लग सकेगा।

परिवार-कल्याण योजना का क्रियान्वयन – अपने प्रधानमन्त्रित्व काल में मैं परिवार को नियोजित करने पर विशेष बल दूंगा; क्योंकि बढ़ती हुई जनसंख्या को सीमित किये बिना देश का समग्र विकास किसी भी स्थिति में सम्भव है ही नहीं।

गृह और विदेश-नीति – भारत में पनप रही अलगाववादी प्रवृत्तियों को गृह-नीति के अन्तर्गत समाप्त किया जाएगा। इसके लिए भारत के सभी प्रदेशों में भारतीयता की भावना जगाने वाले कार्यक्रम चलाये जाएँगे और देश में हिंसा तथा तोड़-फोड़ करने वालों को सख्ती से कुचला जाएगा। राष्ट्रीय भावना को धर्म से ऊपर रखा जाएगा। प्रत्येक प्रदेश को उसके विकास के लिए समुचित धनराशि दी जाएगी और आदिवासियों, जनजातियों आदि को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ने एवं उनको समुचित विकास करने का पूरा प्रयत्न किया जाएगा। ग्राम पंचायतों को उनका पुराना गौरव लौटाया जाएगा। नगरों और ग्रामों में स्वच्छता पर विशेष बल दिया जाएगा, जिससे वातावरण प्रदूषण-मुक्त बने। विदेश-नीति के अन्तर्गत भारत के मित्र देशों को हर प्रकार की सम्भव सहायता दी जाएगी और शत्रु-राष्ट्रों के प्रति कड़ा रुख अपनाया जाएगा।

सैन्य-शक्ति का पुनर्गठन – सेना के तीनों अंगों को अत्यधिक सक्षम बनाया जाएगा। शस्त्रास्त्रों के लिए विदेशों पर निर्भर न रहकर देश को इतना शक्तिशाली बना दिया जाएगा कि संसार का कोई भी देश भारत से टकराने का खतरा मोल न ले। कश्मीर से धारा 370 समाप्त कर शेष भारत के साथ उसकी पूर्ण भावात्मक एकता स्थापित की जाएगी। साथ ही पाकिस्तान तथा चीन द्वारा अनधिकृत रूप से हड़प ली गयी भारतीय भूमि को भी वापस लेने का पूरा प्रयास किया जाएगा।

मनोरंजन और खेलकूद के क्षेत्रों में क्रान्तिकारी परिवर्तन – सिनेमा और दूरदर्शन द्वारा लोगों में अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान जाग्रत करने का अभियान चलाया जाएगा। पश्चिम की नकल पर बने वासना और अपराध के उत्तेजक चित्र बिल्कुल बन्द कर दिये जाएँगे। खेलकूद के क्षेत्र में बाह्य हस्तक्षेप बिल्कुल समाप्त करके योग्यता के आधार पर ही विभिन्न खेलों के लिए खिलाड़ियों का चयन होगा और उन्हें इतना अच्छा प्रशिक्षण और प्रोत्साहन दिया जाएगा कि वे संसार के किसी भी देश के खिलाड़ी से श्रेष्ठतर हों।

खाद्य-नीति – इसके अन्तर्गत विशाल सिंचाई-योजनाओं के स्थान पर स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप लघु सिंचाई योजनाओं को लागू किया जाएगा। रासायनिक खाद के कारखाने बन्द कर दिये जाएँगे; क्योंकि वे भूमि को बंजर बनाने के साथ-साथ अनाज में विष मिला रहे हैं। इनके स्थान पर नदियों में गिरने वाले सीवरों और कारखानों की गन्दगी को मशीनों से साफ कर स्वच्छ जल नदियों में छोड़ा जाएगा और मल को खाद के रूप में खेतों में प्रयुक्त किया जाएगा।

सामाजिक और धार्मिक नीति – समाज के प्रत्येक व्यक्ति और वर्ग को आगे बढ़ने का पूर्ण सुयोग उपलब्ध होगा। सामाजिक कुरीतियों एवं अनाचारों; जैसे-दहेज-प्रथा, बाल-विवाह आदि को सख्ती से दबाया जाएगा, नारी-सम्मान की पूर्ण रक्षा की जाएंगी एवं जनसंख्या वृद्धि को नियन्त्रित करने के लिए देश भर में समान नागरिक आचार-संहिता लागू करने के अतिरिक्त अन्यान्य समुचित उपायों को भी दृढ़तापूर्वक अपनाया जाएगा। धार्मिक नीति के अन्तर्गत धार्मिक स्वतन्त्रता तो हर एक को उपलब्ध होगी, परन्तु धर्म को अलगाववाद का हथियार बनाने की छूट न दी जाएगी। देशभक्तों को समुचित प्रोत्साहन एवं संरक्षण देने के साथ-साथ देशद्रोहियों का सख्ती से दमन किया जाएगा।

उपसंहार – भारत संसार को महान् जनतान्त्रिक देश है। इसकी सांस्कृतिक एवं सभ्यता सम्बन्धी परम्पराएँ बड़ी प्राचीन हैं। इसलिए मैं अपने प्रधानमन्त्रित्व काल में देश की सांस्कृतिक उन्नति करूंगा तथा सार्वभौमिक उन्नति के लिए प्रयत्न करता रहूँगा। प्रत्येक स्तर पर देश को स्वावलम्बी बनाने के साथ-साथ कर्तव्यनिष्ठा को पुरस्कृत और कर्तव्यहीनता को दण्डित किया जाएगा। किसी भी विषय में राजनीतिक, प्रशासनिक या अन्य किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप, पक्षपात, भाई-भतीजावाद या अन्याय को सहन नहीं किया जाएगा। मेरा मूलमन्त्र होगा ज्वलन्त राष्ट्रनिष्ठा, मितव्ययिता एवं देशी संसाधनों के भरपूर उपयोग से अर्जित पूर्ण स्वावलम्बन। यह मेरा कथन मात्र नहीं है। यदि मुझे यह सुअवसर प्राप्त हो तो मैं अपने समस्त आदर्श प्रत्यक्ष सत्य कर दिखा देने में पूर्ण सक्षम हूँ

गंगा की आत्मकथा

सम्बद्ध शीर्षक

  • मैं गंगा हूँ।

मैं गंगा हूँ। मुझे त्रिपथगा भी कहते हैं; क्योंकि स्वर्ग, मर्त्य और पाताल–तीनों लोकों में मेरी धाराएँ हैं। स्वर्ग में मैं मन्दाकिनी कहलाती हूँ, पृथ्वी पर भागीरथी तथा पाताल में वैतरणी। आज अपनी आत्मकथा सुनाने चली हूँ तो सभी कुछ बताऊँगी। कुछ भी छिपाकर रखने का मेरा स्वभाव नहीं; क्योंकि लोक-कल्याण ही मेरा व्रत है।। सम्भव है मेरी आत्मकथा से आपका भी कुछ कल्याण हो जाए। वैसे मेरी बड़ी महिमा है। ऋषि-महर्षि मेरा स्तवन करते नहीं थकते, देवगण मेरे गुणों का बखान करते नहीं अघाते, मानव मेरे दर्शन और स्पर्शन कर कृतार्थता का अनुभव करते हैं। इतना ही नहीं, मरने के बाद भी हिन्दू अपना अन्तिम संस्कार मेरे तट पर ही कराना चाहते हैं। आखिर मुझे इतना गौरव मिला कैसे?

वैसे तो मैं हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री कहलाती हूँ। उमा मेरी छोटी बहन है। पर मुख्यत: मैं अपने को ‘विष्णुपदी कहती हूँ; क्योंकि इसी नाम में मेरे महान् गौरव का मूल निहित है। जब भगवान् विष्णु ने वामनावतार धारण करके राजा बलि को छला था, तब उन्होंने विराट् रूप धारणकर दो डगों में तीनों लोकों को नाप लिया था। उस समय उनका एक चरण ब्रह्मलोक में भी पहुंचा था। इससे परम प्रसन्न हो भगवान् ब्रह्मा ने तत्काल उस चरण को जल से धोकर वह पाद्य अपने कमण्डलु में धारण कर लिया। बस, वही जल मेरा मूल उत्स बना है। सर्वलोकेश्वर भगवान् विष्णु के चरणों से उद्भूत होने के कारण ही मैं ‘विष्णुपदी’ कहलायी और यही मेरे अभूतपूर्व माहात्म्य का कारण बना।

मैं भगवान् ब्रह्मा के कमण्डलु में शायद बन्दी ही रह जाती, यदि महाराज सगर के प्रप्रपौत्र, असमंच के प्रपौत्र, अंशुमान् के पौत्र एवं दिलीप के पुत्र महापराक्रमी महाराज भगीरथ ने अमित तेजस्वी महामुनि कपिल के शाप से दग्ध अपने पूर्वजों (सगर के साठ हजार पुत्रों) को सद्गति दिलाने के लिए कठोर तपस्या न की होती। सच तो यह है कि मैं ब्रह्मलोक से पृथ्वी पर आने को राजी न हुई, किन्तु जब तीन-तीन पीढ़ियों की उग्र तपस्या से द्रवित हो भगवान् ब्रह्मा ने मुझे मर्त्यलोक में भेजने का वचन दे दिया, तब मैं क्या करती? महाराज सगर मुझे पृथ्वी पर लाने की चिन्ता करते-करते स्वर्ग सिधार गये। उनके पौत्र अंशुमान् हिमालय पर बत्तीस हजार वर्षों तक कठोर तपस्या करके भी विफल मनोरथ ही दिवंगत हो गये। उनके पुत्र दिलीप ने भी बड़ी तपस्या की, परन्तु यह कार्य सिद्ध न हुआ। अन्त में भगीरथ ने घोर तपस्या द्वारा भगवान् ब्रह्मा को वश में कर ही लिया। उन्होंने यह सिद्ध कर ही दिखाया कि तपस्या से असाध्य भी साध्य हो जाता है।

अस्तु, ब्रह्माजी ने मुझे मर्त्यलोक में भेजने की सहमति तो दे दी, पर एक समस्या भगीरथ के सामने रख दी-“स्वर्ग से उतरते समय मेरे दुर्धर्ष-वेग को सहन करने की क्षमता योगिराज भगवान् शंकर को छोड़कर किसी में नहीं; अतः तुम आराधना द्वारा उन्हें गंगा को धारण करने हेतु सहमत करो।’ धन्य हैं भगीरथ! वे पुनः उग्र तपस्या में लीन हो गये और अन्तत: भगवान् शंकर को भी प्रसन्न कर ही लिया। वे तत्काल हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर जटाएँ फैलाकर खड़े हो गये और भगीरथ से मेरा आह्वान करने को कहा। भगीरथ ने भगवान् ब्रह्मा की स्तुति की और उन्होंने तत्काल अपने कमण्डलु से मुझे उतार दिया। सच कहूँ! मुझमें उस समय असीम अहंकार उत्पन्न हुआ कि भला कौन है, जो मेरे दुर्धर्ष-वेग को सहन कर सकता है। मैं शिव को अपने प्रचण्ड वेग में बहाती, मर्त्यलोक को डुबोती, सीधे रसातल चली जाऊँगी, परन्तु भगवान् शिव तो अन्तर्यामी ठहरे! मेरा अहंकार जानकर उन्हें बड़ा क्रोध आया। फलतः जैसे ही मैं आकाश को निनादित करती, घनपटल को चीरती, वायु को थरथराती और पृथ्वी को कँपकँपाती ब्रह्मलोक से चली तो मेरे वेग से तीनों लोक काँप उठे। अस्तु, जैसे ही मैं उतरी वैसे ही भगवान् शंकर ने मुझे अपनी जटाओं में बाँध लिया। मैंने बहुत जोर मारा, पर बाहर निकलने का रास्ता ही न मिला। तब भगीरथ फिर भगवान् त्रिपुरारि का स्तवन करने लगे। तब उन्होंने मुझे बिन्दुसर में छोड़ी और मैं वहाँ से समस्त पर्वत प्रदेश को अपनी धमक से दहलाती पृथ्वी की ओर दौड़ पड़ी। भगीरथ दिव्य-रथ में मेरा मार्गदर्शन करते हुए मेरे आगे-आगे चल रहे थे। पृथ्वी पर मैं मदमाती, इठलाती, निश्चिन्त हो भागी चली जा रही थी, क्योंकि यहाँ भला कौन बैठा था मेरी गति को रोकने वाला? पर आश्चर्य कि अघटित घटित हो ही गया! जह्न नाम के एक महातपस्वी राजर्षि यज्ञ कर रहे थे। उनका यज्ञमण्डप मेरे मार्ग में पड़ता था। मुझे यह बाधा सहन न हुई और मैं उसे बहा ले चली, परन्तु यहाँ तो एक दूसरे ही शंकर निकल आये। जहु ने क्रुद्ध हो मुझे चुल्लू में भरकर पी लिया और मैं उनके पेट में बन्दी हो गयी। भगीरथ बेचारे ने उन्हें भी मनाया, देवताओं ने आकर उनका गुणगान किया और मुझे उनकी पुत्री बनाया। तब कहीं जाकर उन्होंने मुझे कानों के मार्ग से निकाला। तब से मैं जाह्नवी’ (जह्वपुत्री) कहलायी। बस, फिर सागर तक कोई बाधा न मिली। सागर मुझसे मिलकर खिल उठा, परन्तु मुझे तो भगीरथ का मनोरथ पूरा करना था, इसलिए तत्काल पाताल में जाकर मैंने सगर के साठ हजार पुत्रों की भस्म को अपने जल से आप्लावित कर दिया। उसी क्षण वे सब दिव्य-देह धारणकर स्वर्गलोक को चल दिये। देवता पुष्पवर्षा करने लगे, सिद्ध और महर्षिगण मेरी यशोगाथा गाने लगे, भगीरथ हर्षविभोर हो श्रद्धा से मेरे चरणों पर लेट गये। तो यह है मेरी आपबीती!
अस्तु, तब से मैं निरन्तर बहती हुई लोकहित में लगी हैं। उत्तर भारत की भूमि मुझे पाकर धन्य हो गयी। मैंने जिधर दृष्टि फेरी उधर ही खेत लहलहा उठे और धन-धान्य की वृष्टि होने लगी। मेरे तट पर अगणित नगर और ग्राम बस गये। हिन्दुओं के महान् तीर्थ–हरिद्वार, प्रयाग और काशी – मेरे ही तट पर हैं। यह सब कुछ प्रत्यक्ष

परन्तु तुम्हारा आज का यह युग ठहरी बुद्धिवादी। तर्क-वितर्क के बिना भला ये किसी की महिमा क्यों मानने लगे। इसलिए कुछ लोगों ने कहना शुरू किया कि यह पौराणिक आख्यान प्रतीकात्मक हैं। फिर लगे वे आधुनिक ढंग से उसकी व्याख्या करने। पहली बार उन्होंने यह खोज निकाला कि गंगा नदी नहीं, नहर है। उन्होंने दावा किया कि इसके तल की मिट्टी नदियों जैसी प्राकृतिक है ही नहीं। अब उनकी व्याख्या सुनिए। उत्तर भारत गंगा के आने से पहले मरुभूमि जैसा बंजर था। वर्षा के अनिश्चित जल से काम न चलता था। सर्वत्र हा-हाकार मचा हुआ था। लोग सूखे और गर्मी से दग्ध हुए जा रहे थे। यह हुआ कपिल मुनि के शाप से सगरपुत्रों का दग्ध होना अर्थात् सगर की प्रजा का पीड़ित होना। राजा सगर ने हिमालय में इंजीनियरों को भेजकर खोज करायी। पता

चला वहाँ जल का एक विशाल भण्डार है। यदि उसे पृथ्वी पर उतारा जा सके तो समस्या सदा के लिए हल हो जाए। सगर ने बड़ा प्रयास किया, परन्तु सफल न हुए। अगली तीन पीढ़ियाँ असफल प्रयासों में खप गयीं। यह हुई तीन पीढ़ियों की तपस्या। आखिर में भगीरथ हुए। वे स्वयं महान् इंजीनियर थे। उन्होंने कार्य पूरा करने का बीड़ा उठाया और राजपाट मन्त्रियों पर छोड़ हिमालय पहुँचे। वर्षों हिमालय के अन्तर्वर्ती भू-भाग का सर्वेक्षण किया और समस्या का समाधान ढूंढ़ निकाला। यह हुआ भगोरथ की तपस्या से ब्रह्माजी के प्रसन्न होकर अपने कमण्डलु से गंगा को छोड़े जाने का आख्यान। अस्तु, भगीरथ ने पहले हिमालय की तलहटी से गंगा सागर तक एक विराट नहर खुदवायी। फिर हिमालय में उस विशाल जल-भण्डार के पास एक प्रणाली (नाली) खुदवायी जो अनेक स्थानों पर पर्वत के अन्दर सुरंग के रूप में जाती थी। यह महान् कौशल का कार्य था, जिसमें अनेक वर्ष लग गये और प्रचुर धन व्यय हुआ। अब असली समस्या उस जल-भण्डार को इस प्रणाली से मिलाने की थी जो बड़ा ही भयप्रदायक कार्य था। इसे भी भगीरथ ने कुशल इंजीनियरों के दल के सहयोग से हल किया और जल की एक पतली धार उस प्रणाली में छोड़ी, जिससे वह बाद में जल के वेग से स्वतः ही चौड़ी हो जाए। यह हुआ भगवान् शिव द्वारा गंगा को धारण करना और फिर बिन्दुसर में छोड़ना। कैसी लगी यह बुद्धिवादी व्याख्या? नि:सन्देह आपको रोचक प्रतीत हुई होगी।

अस्तु, मैं पतितपावनी कही जाती हूँ। मेरा जल बरसों पात्र में भरकर रखने पर भी दूषित नहीं होता था, किन्तु । अब वह बात कम होती जा रही है। प्रगति के नाम पर स्थापित कल-कारखाने अपना कचरा और दूषित जल मुझमें छोड़ रहे हैं। सैकड़ों नाले गन्दगी बहाकर मुझमें मिल रहे हैं। मेरा जल दूषित होता जा रहा है। मन में कई बार क्षोभ उत्पन्न होता है कि मैं इस मर्त्यलोक को छोड़कर ब्रह्मलोक को लौट जाऊँ, पर जब लाखों भक्तों को अपने दर्शन से गद्गद होते तथा हजारों सन्त-महात्माओं को अपनी स्तुति करते पाती हूँ, तो उन्हें निराश करने को मुन नहीं होता; इसलिए मैं तुम लोगों को, जो मेरी यह आत्मकथा सुन रहे हो, सावधान करती हूँ कि जाकर अपने उन आत्मघाती, पथभ्रष्ट देशवासियों को समझाओ कि मेरी पवित्रता बनाये रखने में उन्हीं का हित साधन है, अन्यथा मुझे तो कुछ फर्क नहीं पड़ता। मैं सदा के लिए वापस ब्रह्मलोक चली जाऊँगी। शायद इसी भय से कम्पित होकर सरकार ने मुझे पवित्र बनाये रखने हेतु अनेकानेक योजनाएँ कार्यान्वित की हैं।

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