UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi परिचयात्मक निबन्ध

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi परिचयात्मक निबन्ध are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi परिचयात्मक निबन्ध.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name परिचयात्मक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi परिचयात्मक निबन्ध

परिचयात्मक निबन्ध

एक महापुरुष की जीवनी (राष्ट्रपिता महात्मा गांधी)

सम्बद्ध शीर्षक

  • मेरा प्रिय राजनेता
  • मेरा आदर्श पुरुष
  • महात्मा गांधी की प्रासंगिकता

प्रमुख विचार-बिन्दु:

  1. प्रस्तावना,
  2.  जीवनवृत्त,
  3. गांधीजी के सिद्धान्त :
    (अ) अहिंसा (व्यक्तिगत एवं सामाजिक अहिंसा, राजनीति में अहिंसा);
    (ब) शिक्षा सम्बन्धी सिद्धान्त,
  4. राष्ट्रभाषा के प्रबल पोषक,
  5.  कुटीर उद्योगों पर बल,
  6.  प्रेरणादायक गुण,
  7. उपसंहार।

प्रस्तावना – मानव जीवन एक रहस्य है। इसके रहस्ये अनेक बार मनुष्य को उस मोड़ पर ला खड़ा करते हैं, जहाँ वह किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में होता है। उसे कुछ सूझता ही नहीं। ऐसी स्थिति में ‘महाजनो येन गताः स पन्था के अनुरूप व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। जीवन की ऐसी उलझनों से सुलझने के लिए जिस महापुरुष ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया; उसका नाम है-मोहनदास करमचन्द गांधी। यही मेरे आदर्श पुरुष हैं। इनके बाह्य व आन्तरिक व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए महाकवि पन्त जी लिखते हैं

तुम मांसहीन, तुम रक्तहीन,
हे अस्थिशेष ! तुम अस्थिहीन,

तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवले,
हे चिर पुराण ! हे चिर नवीन !

यद्यपि बाह्य रूप से देखने में गांधीजी अस्थियों का ढाँचामात्र लगते थे, किन्तु उनमें आत्मिक बल अमित था। वस्तुतः राजनीति जैसे स्थूल और भौतिकवादी क्षेत्र में उन्होंने आत्मा की आवाजे पर बल दिया, नैतिकता का प्रतिपादन किया तथा साध्य के साथ साधन की शुद्धता को भी आवश्यक ठहराया। विश्व राजनीति को यह उनका विशिष्ट योगदान था, जिससे प्रेरणा लेकर कई पराधीन देशों में स्वातन्त्र्य-आन्दोलन चलाये गये और स्वतन्त्रता प्राप्त की गयी।

जीवनवृत्त – मोहनदास करमचन्द गांधी का जन्म 2 अक्टूबर, सन् 1869 ई० को पोरबन्दर (गुजरात) में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री करमचन्द गांधी तथा माँ का नाम श्रीमती पुतलीबाई था। करमचन्द गांधी पोरबन्दर रियासत के दीवान थे। सात वर्ष की अवस्था में मोहनदास गांधी एक गुजराती पाठशाला में पढ़ने गये। बाद में अंग्रेजी स्कूल में भर्ती हुए, जहाँ से उन्होंने अंग्रेजी के साथ-साथ संस्कृत तथा धार्मिक ग्रन्थों का भी अध्ययन किया। इण्टेन्स की परीक्षा पास करने के उपरान्त ये विलायत चले गये।

भारत लौटने पर गांधीजी ने पहले राजकोट और फिर बेम्बई में वकालत शुरू की। उन्हें सेठ अब्दुल्ला फर्म के एक हिस्सेदार के मुकदमे को लेकर दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा। वहाँ पग-पग पर रंगभेद-नीति के फलस्वरूप भारतीयों का अपमान देखकर तथा स्वयं आप बीते कठोर अनुभवों के आधार पर उन्होंने रंगभेद-नीति को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया। प्रिटोरिया में भारतीयों की पहली सभा में गांधीजी ने भाषण दिया और यहीं से इनके सार्वजनिक जीवन का आरम्भ हुआ। सन् 1896 ई० में गांधीजी भारत आये और सपरिवार पुन: अफ्रीका लौट गये। लौटने पर उन्हें गोरों का विशेष विरोध सहना पड़ा, परन्तु गांधीजी ने साहस न छोड़ा और कई आन्दोलनों का संचालन करते रहे। सेवा में उनको अडिग विश्वास था। बोअर-युद्ध (सन् 1899 ई०) तथा जूलू-विद्रोह (सन् 1906 ई०) में स्वयंसेना स्थापित करके उन्होंने पीड़ितों की पर्याप्त सेवा की।

सन् 1914 ई० में वे भारत लौट आये। यहाँ आकर उन्होंने चम्पारन में किसानों पर किये जाने वाले अत्याचारों तथा कारखानों के कर्मचारियों पर मालिकों द्वारा की गयी ज्यादतियों का खुलकर विरोध किया और भारत के सार्वजनिक जीवन में पदार्पण किया। सन् 1924 ई० में वे बेलगाँव में कांग्रेस-अध्यक्ष चुने गये। सन् 1930 ई० में कांग्रेस ने पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव रखा और इस आन्दोलन के समस्त अधिकार गांधीजी को सौंप दिये। 4 मार्च, सन् 1931 ई० को गांधी-इरविन समझौता हुआ। दूसरी गोलमेज कॉन्फ्रेन्स में कांग्रेस-प्रतिनिधि के रूप में गांधीजी इंग्लैण्ड गये और अंग्रेज सरकार से स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि भारत को पूर्ण स्वतन्त्रता न मिली तो कांग्रेस का आन्दोलन भी जारी रहेगा।

अगस्त, सन् 1942 ई० में गांधीजी ने भारत छोड़ो’ का प्रस्ताव पारित किया; जिससे देश में एक महान् आन्दोलन छिड़ा। गांधीजी तथा अन्य नेता जेल में बन्द कर दिये गये। सन् 1946 ई० के हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष में गांधीजी ने नोआखाली की पैदल यात्रा की और वहाँ शान्ति स्थापित करने में सफल हुए। 15 अगस्त, सन् 1947 ई० को भारत को स्वतन्त्रता मिली। देश में उत्पन्न अन्य समस्याओं को सुलझाने में गांधीजी लगे ही थे कि सहसा 30 जनवरी, सन् 1948 ई० को वे शहीदों की परम्परा में चले गये।

गांधीजी के सिद्धान्त (अ) अहिंसा – गांधी जी का सबसे प्रमुख सिद्धान्त था व्यक्तिगत, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में अहिंसा का प्रयोग। अहिंसा आत्मा का बल है। वे अहिंसा का मूल प्रेम में मानते थे। वे लिखते हैं-“पूर्ण अहिंसा समस्त जीवधारियों के प्रति दुर्भावना का पूर्ण अभाव है, इसलिए वह मनुष्य के अलावा दूसरे प्राणियों-यहाँ तक कि विषैले कीड़ों और हिंसक जानवरों का भी आलिंगन करती है।” उन्होंने बार-बार कहा है कि अहिंसा वीर को धर्म है, कायर का नहीं; क्योंकि हिंसा करने की पूरी सामर्थ्य रखते हुए भी जो हिंसा नहीं करता, वही अहिंसा-धर्म का पालन करने में समर्थ होता है।

(1) व्यक्तिगत एवं सामाजिक अहिंसा – अहिंसा का अर्थ है-प्रेम, दया और क्षमा। अपने व्यक्तिगत जीवन, में भी गांधीजी ने इस सिद्धान्त को चरितार्थ करके दिखाया। वे जीव मात्र से प्रेम करते थे। दोनों और दलितों के लिए तो उनके प्रेम और करुणा की कोई सीमा ही न थी। वे इसे मानवता के प्रति घोर अपराध मानते थे कि किसी को नीचा या अस्पृश्य समझा जाये; क्योंकि भगवान् की दृष्टि में समस्त प्राणी समान हैं। इसीलिए उन्होंने अछूतोद्धार का आन्दोलन चलाया, जिसे उन्होंने हरिजनोद्धार कहा। हिन्दू समाज के प्रति यह उनकी बहुत बड़ी सेवा थी। उनके आन्दोलन के फलस्वरूप हरिजनों को मन्दिर में प्रवेश का अधिकार मिला। उनकी दया भावना ने उन्हें प्राणिमात्र की सेवा के लिए प्रेरित किया। परचुरे शास्त्री भयंकर कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। गांधीजी ने उन्हें अपने साथ रखा। इतना ही नहीं, उनके घावों को भी वे स्वयं अपने हाथ से साफ करते थे। इससे उनकी परदुःख-कातरता एवं सेवा-भावना का पता चलता है। अपने साथियों का भी गांधीजी बहुत ध्यान रखते थे। एक अवसर पर एक सज्जन आकर गांधीजी को कुछ फल दे गये, जिनमें चीकू भी थे। गांधीजी ने कुछ चीकू अपने एक साथी को देते हुए कहा- “इन्हें महादेव को दे आओ, उसे चीकू बहुत पसन्द हैं।” | अपने शत्रु को क्षमा करने की घटनाएँ तो उनके जीवन में भरी पड़ी हैं। उन्होंने अपने आश्रम में साँप, बिच्छु
आदि को मारना वर्जित कर दिया था। उन्हें पकड़कर दूर छोड़ दिया जाता था। एक बार एक साँप गांधीजी के कन्धे पर चढ़ गया। उनके साथियों ने उनकी ओढ़ी हुई चादर समेत उसे खींचकर दूर ले जाकर छोड़ दिया। इस प्रकार गांधीजी ने अपने जीवन में भी अहिंसा को चरितार्थ करके दिखाया।

(2) राजनीति में अहिंसा – राजनीति के क्षेत्र में अहिंसा के सिद्धान्त का व्यवहार उन्होंने तीन शस्त्रों के रूप में किया-सत्याग्रह, असहयोग और बलिदान। सत्याग्रह का अर्थ है – सत्य के प्रति आग्रह अर्थात् जो आदमी को ठीक लगे, उस पर पूरी शक्ति और निष्ठा से चलना, किसी के दबाव के आगे झुकना नहीं। असहयोग का अर्थ है-बुराई से, अन्याय से, अत्याचार से सहयोग न करना। यदि कोई सताये, अन्याय करे तो किसी भी काम में उसका साथ न देना। बलिदान का आशय है-सच्चाई के लिए, न्याय के लिए, अपने प्राण तक न्यौछावर कर देना। इन तीनों हथियारों का प्रयोग गांधीजी ने पहले दक्षिण अफ्रीका में किया, फिर भारत में।

(ब) शिक्षा-सम्बन्धी सिद्धान्त – शिक्षा से गांधीजी का तात्पर्य बालक के व्यक्तित्व के पूर्ण विकास से था। इस सम्बन्ध में वे लिखते हैं-“शिक्षा से तात्पर्य उन समस्त शक्तियों के दोहन से है, जो शिशु एवं मानव के शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा में निहित हैं। साथ ही उनके अनुसार, “कोई भी वह शिक्षा पूर्ण नहीं है, जो लड़के-लड़कियों को आदर्श नागरिक नहीं बनाती।”

गांधीजी के शिक्षा-सम्बन्धी विचारों का केन्द्र-बिन्दु है-व्यवसाय और व्यवसाय से उनका आशय हस्तकला से है। वे लिखते हैं-“मैं बालक की शिक्षा का आरम्भ किसी उपयोगी हस्तकला के शिक्षण से करूंगा, जिससे वह आरम्भ से ही अर्जन करने में समर्थ हो सके। इससे एक तो वह शिक्षा का व्यय वहन कर सकेगा और फिर वह अपने भावी जीवन में पूर्ण रूप से आत्म-निर्भर भी हो सकेगा। इस प्रकार शिक्षा बेकारी दूर करने का एक प्रकार से बीमा है। वे विद्यालयों को आत्मनिर्भर देखना चाहते थे अर्थात् शिक्षकों की व्यवस्था विद्यालय के उत्पादन से ही हो सके और राज्य-सरकार छात्रों द्वारा उत्पादित वस्तुओं के खरीदने की व्यवस्था करे।

राष्ट्रभाषा के प्रबल पोषक – गांधीजी राष्ट्रभाषा के बिना किसी स्वतन्त्र राष्ट्र की कल्पना ही नहीं करते थे। उनका स्पष्ट मत था कि किसी विदेशी भाषा के माध्यम से बालक की क्षमताओं का पूर्ण विकास सम्भव नहीं। इसी कारण राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया।

कुटीर उद्योगों पर बल – गांधीजी भारत जैसे विशाल देश की समस्याओं और आवश्यकताओं को बहुत गहराई तक समझते थे। वे जानते थे कि ऐसे देश में जहाँ विशाल जनसंख्या के कारण जनशक्ति की कमी नहीं, आर्थिक आत्म-निर्भरता एवं सम्पन्नता के लिए कुटीर उद्योग ही सर्वाधिक उपयुक्त साधन हैं। गांधीजी ने ग्रामों को आर्थिक स्वावलम्बन प्रदान करने के लिए खादी उद्योग को बढ़ावा दिया और चरखे को अपने आर्थिक सिद्धान्तों को केन्द्रबिन्दु बना लिया तथा प्रत्येक गांधीवादी के लिए प्रतिदिन चरखा चलाना और खादी पहनना अनिवार्य कर दिया।

प्रेरणादायक गुण – गांधीजी में ऐसे अनेक महान् गुण विद्यमान थे, जिनसे प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा लेनी चाहिए। उनका पहला गुण था–समय का सदुपयोग। वे अपना एक क्षण भी व्यर्थ न गॅवाते थे, यहाँ तक कि दूसरों से बात करते समय भी वे कुछ-न-कुछ कोम अवश्य करते रहते थे, चाहे वह आश्रम की सफाई का काम हो या चरखा चलाने का या रोगियों की सेवा-शुश्रूषा का। यही कारण है कि इतनी अधिक व्यस्तता के बावजूद वे अनेक ग्रन्थ और लेखादि लिख सके।

दूसरा महत्त्वपूर्ण गुण था – दूसरों को उपदेश देने से पहले किसी आदर्श को स्वयं अपने जीवन में क्रियान्वित करना। उदाहरणार्थ-वे अपना सारा काम स्वयं अपने ही हाथों करते थे, यहाँ तक कि अपना मल-मूत्र भी स्वयं साफ करते थे। इसके बाद ही वे आश्रमवासियों को भी ऐसा करने की प्रेरणा देते थे।

मितव्ययिता गांधी जी का एक अन्य प्रेरक गुण था। वे तुच्छ-से-तुच्छ वस्तु को भी व्यर्थ नहीं समझते थे, अपितु उसका अधिकतम सदुपयोग करने का प्रयास करते थे। इस सम्बन्ध में आश्रमवासियों को भी उनका कठोर आदेश था। गांधी जी की सारग्रहिणी प्रवृत्ति भी बड़ी प्रेरणाप्रद थी। वे अपने कटुतम आलोचक और विरोधी की बात भी बड़ी शान्ति से सुनते और अपने कटु विरोधी व्यक्ति की उचित बात को साररूप में ग्रहण कर लेते थे। एक बार कोई अंग्रेज युवक एक लम्बे पत्र में गांधीजी को सैकड़ों भद्दी-भद्दी गालियाँ लिखकर स्वयं उनके पास पहुँचा और पत्र उन्हें दिया। पत्र पर दृष्टि डालते ही उन्होंने उसका आशय समझ लिया और उसमें लगी आलपिन को अपने पास रखकर पृष्ठों को रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया। युवक ने उनसे इसका कारण पूछा। गांधीजी ने कहा कि इसमें सार वस्तु केवल इतनी ही थी, जो मैंने ले ली।

उपसंहार – सारांश यह है कि गांधीजी ने अपने नेतृत्व के गुणों से जनता की असीम श्रद्धा अर्जित की। उन्होंने भारत की जनता में स्वाभिमान और आत्म-विश्वास जगाया, अपने अधिकार के लिए लड़ने का मनोबल दिया, देश को स्वतन्त्र कराने की प्रेरणा दी तथा स्वदेशी आन्दोलन द्वारा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के स्वीकरण का मन्त्र दिया। उनके खादी आन्दोलन ने ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा दिया, राष्ट्रभाषा के महत्त्व एवं गौरव के प्रबल समर्थन द्वारा उन्होंने कितने ही हिन्दीतर-भाषियों को हिन्दी सीखने की प्रेरणा दी तथा राष्ट्रभाषा आन्दोलन को देश के कोने-कोने तक पहुँचा दिया। अपने अनेकानेक व्यक्तिगत गुणों के कारण अपने सम्पर्क में आने वालों को उन्होंने अन्दर तक प्रभावित किया और दीन-दु:खियों के सदृश स्वयं भी अधनंगे रहकर तथा निर्धनता और सादगी का जीवन अपनाकर लोगों से “महात्मा” और “बापू’ का प्रेममय सम्बोधन पाया। सचमुच वे वर्तमान भारत की एक महान् विभूति थे।

मेरे प्रिय कवि: तुलसीदास

सम्बद्ध शीर्षक

  • तुलसी का समन्वयवाद
  • हमारे प्रिय जन-कवि : तुलसीदास
  • रामकाव्यधारा के प्रमुख कवि : तुलसीदास
  • कोई लोकप्रिय समाज-सुधारक
  • कविता लसी पा तुलसी की कला

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2.  तत्कालीन परिस्थितियाँ
  3.  तुलसीकृत रचनाएँ,
  4.  तुलसीदास : एक लोकनायक के रूप में,
  5.  तुलसी के राम,
  6.  तुलसी की निष्काम भक्ति-भावना,
  7.  तुलसी की समन्वय साधना
    (क) सगुण-निर्गुण का समन्वय,
    (ख) कर्म, ज्ञान एवं भक्ति का समन्वय,
    (ग) युगधर्म-समन्वय,
    (घ) साहित्यिक समन्वय,
  8.  तुलसी के दार्शनिक विचार,
  9.  उपसंहार।

प्रस्तावना – यद्यपि मैंने बहुत अधिक अध्ययन नहीं किया है, तथापि भक्तिकालीन कवियों में कबीर, सूर, तुलसी और मीरा तथा आधुनिक कवियों में प्रसाद, पन्त और महादेवी के काव्य का रसास्वादन अवश्य किया है। इन सभी कवियों के काव्य का अध्ययन करते समय तुलसी के काव्य की अलौकिकता के समक्ष मैं सदैव नत-मस्तक होता रहा हूँ। उनकी भक्ति-भावना, समन्वयात्मक दृष्टिकोण तथा काव्य-सौष्ठव ने मुझे स्वाभाविक रूप से आकृष्ट किया है।

तत्कालीन परिस्थितियाँ – तुलसीदास का जन्म ऐसी विषम परिस्थितियों में हुआ था, जब हिन्दू समाज अशक्त होकर विदेशी चंगुल में फंस चुका था। हिन्दू समाज की संस्कृति और सभ्यता प्रायः विनष्ट हो चुकी थी और कहीं कोई पथ-प्रदर्शक नहीं था। इस युग में जहाँ एक ओर मन्दिरों का विध्वंस किया गया, ग्रामों व नगरों का विनाश हुआ, वहीं संस्कारों की भ्रष्टता भी चरम सीमा पर पहुँच गयी। इसके अतिरिक्त तलवार के बल पर धर्मान्तरण कराया जा रहा था। सर्वत्र धार्मिक विषमताओं का ताण्डव हो रहा था और विभिन्न सम्प्रदायों ने अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग अलापना आरम्भ कर दिया था। ऐसी परिस्थिति में भोली-भोली जनता यह समझने में असमर्थ थी कि वह किस सम्प्रदाय का आश्रय ले। उस समय दिग्भ्रमित जनता को ऐसे नाविक की आवश्यकता थी, जो उसके नैतिक जीवन की नौका की पतवार सँभाल ले।

गोस्वामी तुलसीदास ने अन्धकार के गर्त में डूबी हुई जनता के समक्ष भगवान् राम का लोकमंगलकारी रूप प्रस्तुत किया और उसमें अपूर्व आशा एवं शक्ति का संचार किया। युगद्रष्टा तुलसी ने अपनी अमर कृति श्रीरामचरितमानस द्वारा भारतीय समाज में व्याप्त विभिन्न मतों, सम्प्रदायों एवं धाराओं में समन्वय स्थापित किया। उन्होंने अपने युग को नवीन दिशा, नयी गति एवं नवीन प्रेरणा दी। उन्होंने सच्चे लोकनायक के समान समाज में व्याप्त वैमनस्य की चौड़ी खाई को पाटने का सफल प्रयत्न किया।

तुलसीकृत रचनाएँ – तुलसीदास जी द्वारा लिखित 12 ग्रन्थ प्रामाणिक माने जाते हैं। ये ग्रन्थ हैं श्रीरामचरितमानस’, ‘विनयपत्रिका’, ‘गीतावली’, ‘कवितावली’, ‘दोहावली’, ‘रामललानहछू’, ‘पार्वतीमंगल’, ‘जानकीमंगल’, ‘बरवै रामायण’, वैराग्य संदीपनी’, ‘श्रीकृष्णगीतावली’ तथा ‘रामाज्ञाप्रश्नावली’। तुलसी की ये रचनाएँ विश्व-साहित्य की अनुपम निधि हैं।

तुलसीदास : एक लोकनायक के रूप में – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का कथन है “लोकनायक वही हो सकता है, जो समन्वय कर सके; क्योंकि भारतीय समाज में नाना प्रकार की परस्पर विरोधी संस्कृतियाँ, साधनाएँ, जातियाँ आचारनिष्ठा और विचार-पद्धतियाँ प्रचलित हैं। बुद्धदेव समन्वयकारी थे, ‘गीता’ ने समन्वय की चेष्टा की और तुलसीदास भी समन्वयकारी थे।”

तुलसी के राम – तुलसी उन राम के उपासक थे, जो सच्चिदानन्द परब्रह्म हैं, जिन्होंने भूमि का भार हरण करने के लिए पृथ्वी पर अवतार लिया था

जब-जब होइ धरम कै हानी। बाढहिं असुर अधम अभिमानी॥
तब-तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥

तुलसी ने अपने काव्य में सभी देवी-देवताओं की स्तुति की है, लेकिन अन्त में वे यही कहते हैं

माँगत तुलसीदास कर जोरे। बसहिं रामसिय मानस मोरे॥

राम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति अपनी चरम-सीमा छूती है और वे कह उठते हैं कि

कसँ कहाँ तक राम बड़ाई। राम न सकहिं, राम गुन गाही।

तुलसी के समक्ष ऐसे राम का जीवन था, जो मर्यादाशील थे और शक्ति एवं सौन्दर्य के अवतार थे।

तुलसीदास की निष्काम भक्ति-भावना – सच्ची भक्ति वही है, जिसमें लेन-देन का भाव नहीं होता। भक्त के लिए भक्ति का आनन्द ही उसका फल है। तुलसी के अनुसार

मो सम दीन न दीन हित, तुम समान रघुबीर।
अस बिचारि रघुबंसमनि, हरहु विषम भव भीर ॥

तुलसी की समन्वय-साधना – तुलसी के काव्य की सर्वप्रमुख विशेषता उसमें निहित समन्वय की प्रवृत्ति है। इस प्रवृत्ति के कारण ही वे वास्तविक अर्थों में लोकनायक कहलाये। उनके काव्य में समन्वय के निम्नलिखित रूप दृष्टिगत होते हैं

(क) सगुण-निर्गुण का समन्वय – जब ईश्वर के सगुण एवं निर्गुण दोनों रूपों से सम्बन्धित विवाद, दर्शन एवं भक्ति दोनों ही क्षेत्रों में प्रचलित था तो तुलसीदास ने कहा

सगुनहिं अगुनहिं नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥

(ख) कर्म, ज्ञान एवं भक्ति का समन्वय – तुलसी की भक्ति मनुष्य को संसार से विमुख करके अकर्मण्य बनाने वाली नहीं है, उनकी भक्ति तो सत्कर्म की प्रबल प्रेरणा देने वाली है। उनका सिद्धान्त है कि राम के समान आचरण करो, रावण के सदृश दुष्कर्म नहीं

भगतिहिं ग्यानहिं नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव-संभव खेदा॥

तुलसी ने ज्ञान और भक्ति के धागे में राम-नाम का मोती पिरो दिया है

हिय निर्गुन नयनन्हि सगुन, रसना राम सुनाम।
मनहुँ पुरट संपुट लसत, तुलसी ललित ललाम॥

(ग) युगधर्म-समन्वय – भक्ति की प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार के बाह्य तथा आन्तरिक साधनों की आवश्यकता होती है। ये साधन प्रत्येक युग के अनुसार बदलते रहते हैं और उन्हीं को युगधर्म की संज्ञा दी जाती है। तुलसी ने इनका भी विलक्षण समन्वय प्रस्तुत किया है

कृतजुग त्रेता द्वापर, पूजा मख अरु जोग ।
जो गति होइ सो कलि हरि, नाम ते पावहिं लोग।

(घ) साहित्यिक समन्वय – साहित्यिक क्षेत्र में भाषा, छन्द, रस एवं अलंकार आदि की दृष्टि से भी तुलसी ने अनुपम समन्वय स्थापित किया। उस समय साहित्यिक क्षेत्र में विभिन्न भाषाएँ विद्यमान थीं, विभिन्न छन्दों में रचनाएँ की जाती थीं। तुलसी ने अपने काव्य में भी संस्कृत, अवधी तथा ब्रजभाषा का अद्भुत समन्वय किया।

तुलसी के दार्शनिक विचार – तुलसी ने किसी विशेष वाद को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने वैष्णव धर्म को इतना व्यापक रूप प्रदान किया कि उसके अंन्तर्गत शैव, शाक्त और पुष्टिमार्गी भी सरलता से समाविष्ट हो गये। वस्तुतः तुलसी भक्त हैं और इसी आधार पर वह अपना व्यवहार निश्चित करते हैं। उनकी भक्ति सेवक-सेव्य भाव की है। वे स्वयं को राम का सेवक मानते हैं और राम को अपना स्वामी।।

उपसंहार – तुलसी ने अपने युग और भविष्य, स्वदेश और विश्व तथा व्यक्ति और समाज आदि सभी के लिए महत्त्वपूर्ण सामग्री दी है। तुलसी को आधुनिक दृष्टि ही नहीं, प्रत्येक युग की दृष्टि मूल्यवान् मानेगी; क्योंकि मणि की चमक अन्दर से आती है, बाहर से नहीं। तुलसी के सम्बन्ध में हरिऔध जी के हृदय से स्वत: फूट पड़ी प्रशस्ति अपनी समीचीनता में बेजोड़ है

बने रामरसायन की रसिका, रसना रसिकों की हुई सुफला।
अवगाहन मानस में करके, मन-मानस का मल सारा टला ॥
बनी पावन भाव की भूमि भली, हुआ भावुक भावुकता का भला।
कविता करके तुलसी न लसे, कविता लसी पा तुलसी की कला ॥

सचमुच कविता से तुलसी नहीं, तुलसी से कविता गौरवान्वित हुई। उनकी समर्थ लेखनी का सम्बल पा वाणी धन्य हो उठी।
तुलसीदास जी के इन्हीं सभी गुणों का ध्यान आते ही मन श्रद्धा से परिपूरित हो उन्हें अपना प्रिय कवि मानने को विवश हो जाता है।

मेरे प्रिय साहित्यकार (जयशंकर प्रसाद)

सम्बद्ध शीर्षक

  • अपना (मेरा) प्रिय कवि
  • मेरा प्रिय लेखक
  • प्रिय कवि अथवा लेखक

प्रमुख विचार-बिन्दु:

  1.  प्रस्तावना,
  2. साहित्यकार का परिचय,
  3. साहित्यकार की साहित्यसम्पदा
    (क) काव्य,
    (ख) नाटक,
    (ग) उपन्यास,
    (घ) कहानी,
    (ङ) निबन्ध,
  4. छायावाद के श्रेष्ठ कवि,
  5.  श्रेष्ठ गद्यकार,
  6.  उपसंहार।

प्रस्तावना – संसार में सबकी अपनी-अपनी रुचि होती है। किसी व्यक्ति की रुचि चित्रकारी में है तो किसी की संगीत में किसी की रुचि खेलकूद में है तो किसी की साहित्य में। मेरी अपनी रुचि भी साहित्य में रही है। साहित्य प्रत्येक देश और प्रत्येक काल में इतना अधिक रचा गया है कि उन सबका पारायण तो एक जन्म में सम्भव ही नहीं है। फिर साहित्य में भी अनेक विधाएँ हैं–कविता, उपन्यास, नाटक, कहानी, निबन्ध आदि। अतः मैंने सर्वप्रथम हिन्दी-साहित्य का यथाशक्ति अधिकाधिक अध्ययन करने का निश्चय किया और अब तक जितना अध्ययन हो पाया है, उसके आधार पर मेरे सर्वाधिक प्रिय साहित्यकार हैं-जयशंकर प्रसाद प्रसाद जी केवल कवि ही नहीं, नाटककार, उपन्यासकार, कहानीकार और निबन्धकार भी हैं। प्रसाद जी ने हिन्दी-साहित्य में भाव और कला, अनुभूति और अभिव्यक्ति, वस्तु और शिल्प सभी क्षेत्रों में युगान्तकारी परिवर्तन किये हैं। उन्होंने हिन्दी भाषा को एक नवीन अभिव्यंजना-शक्ति प्रदान की है। इन सबने मुझे उनका प्रशंसक बना दिया है और वे मेरे प्रिय साहित्यकार बन गये हैं।

साहित्यकार का परिचय – श्री जयशंकर प्रसाद जी का जन्म सन् 1889 ई० में काशी के प्रसिद्ध हुँघनी-साहु परिवार में हुआ था। आपके पिता का नाम श्री बाबू देवी प्रसाद था। लगभग 11 वर्ष की अवस्था में ही जयशंकर प्रसाद ने काव्य-रचना आरम्भ कर दी थी। सत्रह वर्ष की अवस्था में इनके ऊपर विपत्तियों को पहाड़ टूट पड़ा। इनके पिता, माता व बड़े भाई का देहान्त हो गया और परिवार का समस्त उत्तरदायित्व इनके सुकुमार कन्धों पर आ गया। गुरुतर उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए एवं अनेकानेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना करने के उपरान्त 15 नवम्बर, 1937 ई० को आपका देहावसान हुआ। अड़तालीस वर्ष के छोटे से जीवन में इन्होंने जो बड़े-बड़े काम किये, उनकी कथा सचमुच अकथनीय है।

साहित्यकार की साहित्य-सम्पदा – प्रसाद जी की रचनाएँ सन् 1907-08 ई० में सामयिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थी। ये रचनाएँ ब्रजभाषा की पुरानी शैली में थीं, जिनका संग्रह ‘चित्राधार में हुआ। सन् 1913 ई० में ये खड़ी बोली में लिखने लगे।

प्रसाद जी ने पद्य और गद्य दोनों में साधिकार रचनाएँ कीं। इनका वर्गीकरण निम्नवत् है

(क) काव्य – कानन-कुसुम, प्रेम पथिक, महाराणा का महत्त्व, झरना; आँसू, लहर और कामायनी (महाकाव्य)।
(ख) नाटक – इन्होंने कुल मिलाकर 13 नाटक लिखे। इनके प्रसिद्ध नाटक हैं-चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, अजातशत्रु, जनमेजय का नागयज्ञ, कामना और ध्रुवस्वामिनी।
(ग) उपन्यास – कंकाल, तितली और इरावती।
(घ) कहानी – प्रसाद जी की विविध कहानियों के पाँच संग्रह हैं – छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी और इन्द्रजाल।।
(ङ) निबन्ध – प्रसाद जी ने साहित्य के विविध विषयों से सम्बन्धित निबन्ध लिखे, जिनका संग्रह है-काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध।।

छायावाद के श्रेष्ठ कवि – छायावाद हिन्दी कविता के क्षेत्र का एक आन्दोलन है जिसकी अवधि सन् 1920-36 ई० तक मानी जाती है। प्रसाद जी छायावाद के जन्मदाता माने जाते हैं। छायावाद एक आदर्शवादी काव्यधारा है, जिसमें वैयक्तिकता, रहस्यात्मकता, प्रेम, सौन्दर्य तथा स्वच्छन्दतावाद की सबल अभिव्यक्ति हुई है। प्रसाद जी की ‘आँसु’ नाम की कृति के साथ हिन्दी में छायावाद का जन्म हुआ। आँसू का प्रतिपाद्य हैविप्रलम्भ श्रृंगार। प्रियतम के वियोग की पीड़ा वियोग के समय आँसू बनकर वर्षा की भाँति उमड़ पड़ती है

जो घनीभूत पीड़ा थी, स्मृति-सी नभ में छायी।
दुर्दिन में आँसू बनकर, वह आज बरसने आयी ।।

प्रसाद के काव्य में छायावाद अपने पूर्ण उत्कर्ष पर दिखाई देता है; यथा–सौन्दर्य-निरूपण एवं श्रृंगार भावना, प्रकृति-प्रेम, मानवतावाद, प्रेम भावना, आत्माभिव्यक्ति, प्रकृति पर चेतना का आरोप, वेदना और निराशा को स्वर, देश-प्रेम की अभिव्यक्ति, नारी के सौन्दर्य का वर्णन, तत्त्व-चिन्तन, आधुनिक बौद्धिकता, कल्पना का प्राचुर्य तथा रहस्यवाद की मार्मिक अभिव्यक्ति। अन्यत्र इंगित छायावाद की कलागत विशेषताएँ अपने उत्कृष्ट रूप में इनके काव्य में उभरी हुई दिखाई देती हैं।

आँसू मानवीय विरह का एक प्रबन्ध काव्य है। इसमें स्मृतिजन्य मनोदशा एवं प्रियतम के अलौकिक रूप-सौन्दर्य को मार्मिक वर्णन किया गया है। ‘लहर’. आत्मपरक प्रगीत मुक्तक है, जिसमें कई प्रकार की कविताओं का संग्रह है। प्रकृति के रमणीय पक्ष को लेकर सुन्दर और मधुर रूपकमये यह गीत ‘लहर से संगृहीत है

बीती विभावरी जाग री।
अम्बर-पनघट में डुबो रही;
तारा-घट ऊषा नागरी।

‘प्रसाद की सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचना है – कामयानी महाकाव्य, जिसमें प्रतीकात्मक शैली पर मानव-चेतना के विकास का काव्यमय निरूपण किया गया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में-“यह काव्य बड़ी विशद कल्पनाओं और मार्मिक उक्तियों से पूर्ण है। इसके विचारात्मक आधार के अनुसार श्रद्धा या रागात्मिका वृत्ति ही मनुष्य को इस जीवन में शान्तिमय आनन्द का अनुभव कराती है। वही उसे आनन्द-धाम तक पहुँचाती है, जब कि इड़ा या बुद्धि आनन्द से दूर भगाती है।” अन्त में कवि ने इच्छा, कर्म और ज्ञान तीनों के सामंजस्य पर बल दिया है; यथा

ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा पूरी क्यों हो मन की?
एक दूसरे से मिले न सके, वह विडम्बना जीवन की।

श्रेष्ठ गद्यकार – गद्यकार प्रसाद की सर्वाधिक ख्याति नाटककार के रूप में है। उन्होंने गुप्तकालीन भारत को आधुनिक परिवेश में प्रस्तुत करके गांधीवादी अहिंसामूलक देशभक्ति का सन्देश दिया है। साथ ही अपने समय के सामाजिक आन्दोलनों का सफल चित्रण किया है। नारी की स्वतन्त्रता एवं महिमा पर उन्होंने सर्वाधिक बल दिया है। प्रत्येक नाटक का संचालन सूत्र किसी नारी पात्र के ही हाथ में रहता है। उपन्यास और कहानियों में भी सामाजिक भावना का प्राधान्य है। उनमें दाम्पत्य-प्रेम के आदर्श रूप का चित्रण किया गया है। उनके निबन्ध विचारात्मक एवं चिन्तनप्रधान हैं, जिनके माध्यम से प्रसाद ने काव्य और काव्य-रूपों के विषय में अपने विचार प्रस्तुत किये हैं।

उपसंहार – पद्य और गद्य की सभी रचनाओं में इनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ एवं परिमार्जित हिन्दी है। इनकी शैली आलंकारिक एवं साहित्यिक है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इनकी गद्य-रचनाओं में भी इनका छायावादी कवि-हृदय झाँकता हुआ दिखाई देता है। मानवीय भावों और आदर्शों में उदात्तवृत्ति का सृजन विश्व-कल्याण के प्रति इनकी विशाल-हृदयता का सूचक है। हिन्दी-साहित्य के लिए प्रसाद जी की यह बहुत बड़ी देन है। ‘प्रसाद की रचनाओं में छायावाद पूर्ण प्रौढ़ती, शालीनता, गुरुता और गम्भीरता को प्राप्त दिखाई देता है। अपनी विशिष्ट कल्पना-शक्ति, मौलिक अनुभूति एवं नूतन अभिव्यक्ति पद्धति के फलस्वरूप प्रसाद हिन्दी-साहित्य में मूर्धन्य स्थान पर प्रतिष्ठित हैं। समग्रतः यह कहा जा सकता है कि प्रसाद जी का साहित्यिक व्यक्तित्व बहुत महान् है। जिस कारण वे मेरे सर्वाधिक प्रिय साहित्यकार रहे हैं।

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi परिचयात्मक निबन्ध help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi परिचयात्मक निबन्ध, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi आत्मकथात्मक निबन्ध

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi आत्मकथात्मक निबन्ध are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi आत्मकथात्मक निबन्ध.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 12
Chapter Name आत्मकथात्मक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi आत्मकथात्मक निबन्ध

आत्मकथात्मक निबन्ध

 यदि मैं भारत का प्रधानमन्त्री होता

सम्बद्ध शीर्षक

  • यदि मैं इस प्रदेश का माध्यमिक शिक्षा-मन्त्री होता

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2.  शिक्षा-व्यवस्था में मौलिक परिवर्तन,
  3.  प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और पुनरुद्धार पर बल,
  4. शासनिक और प्रशासनिक सुधार,
  5.  न्याय व्यवस्था में सुधार,
  6. चुनाव प्रणाली में आमूल परिवर्तन,
  7.  औद्योगिक नीति में परिवर्तन,
  8. कर प्रणाली में सुधार,
  9.  परिवार कल्याण योजना का क्रियान्वयन,
  10. गृह और विदेश नीति,
  11. सैन्य-शक्ति का पुनर्गठन,
  12. मनोरंजन और खेलकूद के क्षेत्रों में क्रान्तिकारी परिवर्तन,
  13.  खाद्य-नीति,
  14. सामाजिक और धार्मिक नीति,
  15. उपसंहार।

प्रस्तावना – देश का प्रधानमन्त्री बनना दीर्घकालीन राजनीतिक साधना का परिणाम होता है। वर्तमान समय में प्राचीन काल के राजाओं जैसा युग नहीं है कि जिस पर कृपा हो गयी उसे ही प्रधानमन्त्री बना दिया गया। वर्तमान भारत में राज्य के संचालन के लिए प्रजातन्त्रात्मक शासन-पद्धति प्रचलित है, जिसके अन्तर्गत प्रधानमन्त्री के निर्वाचन का विधान है। इसके लिए सर्वप्रथम मुझे किसी संसदीय क्षेत्र से चुनाव में खड़ा होकर चुनाव जीतना होगा। इसके पश्चात् जिस दल का मैं सदस्य हूँ, यदि उस दल का संसद में बहुमत हो और उस दल द्वारा सर्वसम्मति से मुझे अपना नेता चुन लिया जाए तो मेरे प्रधानमन्त्री बनने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। प्रधानमन्त्री बनने के लिए इतना प्रयत्न तो करना ही पड़ेगा। प्रधानमन्त्री बन ज़ाना फूलों की शय्या नहीं है, यह तो काँटों का ताज है, जिसमें काँटे निरन्तर चुभते ही रहते हैं। यदि मैं प्रधानमन्त्री बन ही जाऊँ तो वर्तमान शासन की गलत नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन करके ऐसी व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास करूंगा कि भारत संसार के सर्वाधिक शक्तिशाली, गौरवशाली और वैभवशाली देशों में गिना जाए। प्रधानमन्त्री बनने के बाद मेरे द्वारा निम्नलिखित कार्य प्राथमिकता के आधार पर सम्पन्न किये जाएँगे

शिक्षा-व्यवस्था में मौलिक परिवर्तन – संसार का कोई भी देश शिक्षा द्वारा ही उन्नति करता है। इसलिए मेरा पहला काम होगा कि मैं भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी को वास्तविक अर्थों में देश की राजभाषा बनाऊँ और अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में भी इसको व्यवहार में लाये जाने को प्रोत्साहित करू। बिना अपनी भाषा को अपनाये संसार का कोई भी देश प्रगति नहीं कर सकता। बाबू भारतेन्दुजी ने कहा ही है

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को सूल।

जापान और चीन के उदाहरण हमारे सामने हैं। अतः संविधान-सभा के निर्णय के अनुसार केन्द्र की भाषा एकमात्र हिन्दी होगी। विभिन्न प्रदेशों में प्रादेशिक भाषाएँ मान्य होंगी। प्रादेशिक सरकारें आपस में तथा केन्द्र से हिन्दी में पत्राचार करेंगी। विश्वविद्यालयों, उच्च न्यायालयों एवं सर्वोच्च न्यायालय की भाषा हिन्दी होगी। भारत में सभी प्रकार की शिक्षा–तकनीकी और गैर-तकनीकी-देशी भाषाओं के माध्यम से ही दी जाएगी। आशय यह है कि अंग्रेजों की दासता की निशानी अंग्रेजी का इस देश से सर्वथा लोप कर दिया जाएगा। केवल उन्हीं लोगों के लिए अंग्रेजी सिखाने की व्यवस्था होगी, जो किसी विशेष उद्देश्य से उसे सीखना चाहेंगे। इस प्रकार अपनी भाषाओं के माध्यम से देश की प्राचीन संस्कृति का पुनरुद्धार होगा तथा राष्ट्रीय स्वाभिमान जागेगा।

प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और पुनरुद्धार पर बल – देश के पुरातत्त्व विभाग को बहुत मजबूत बनाया जाएगा और उसे प्रचुर धन उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे वह देश भर में आवश्यक स्थानों पर अन्वेषण कराकर भारत के प्राचीन इतिहास की खोई हुई कड़ियों को खोजे। जो प्राचीन मूर्तियाँ, भवन, सिक्के या अन्य अवशेष विद्यमान हैं या खोज के परिणामस्वरूप निकलेंगे उनकी सुरक्षा और रख-रखाव की व्यवस्था की जाएगी।

शासनिक और प्रशासनिक सुधार – मैं अपने मन्त्रिमण्डल का आकार बहुत सीमित रखेंगा जिसमें विशेष योग्यतासम्पन्न, ईमानदार, चरित्रवान एवं देशभक्त मन्त्री ही सम्मिलित किये जाएँगे, जिन्हें बहुत सादगी से रहने को प्रेरित किया जाएगा। प्रदेशों में भी ऐसी ही व्यवस्था अपनाये जाने पर बल दिया जाएगा। साथ ही केन्द्रीय सचिवालय एवं अन्यान्य कार्यालयों का आकार घटाकर अतिरिक्त लोगों की कुशलता का लाभ अन्यत्र उठाया जाएगा।

इसी प्रकार प्रशासनिक अधिकारियों को जनता का शासक या शोषक नहीं, जनता का सेवक बनना सिखाया जाएगा। विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों में देशभक्त कर्मचारियों को नियुक्त कर उन्हें बहुत सादगी, कार्यकुशलता एवं निष्ठा से काम करने की प्रेरणा दी जाएगी। उनसे आशा की जाएगी कि वे विदेशों में अपने देश के हित के सजग प्रहरी बनकर रहें।

न्याय-व्यवस्था में सुधार – न्यायालय राजनीतिक या अन्य किसी प्रकार के हस्तक्षेप से पूर्णत: मुक्त रखे जाएँगे। न्याय-प्रक्रिया बहुत सरल और सस्ती बनायी जाएगी। अधिकांश विवादों को आपसी समझौतों से हल करने के प्रयास किये जाएँगे। अधिवक्ताओं पर आधारित प्रक्रिया को एक सीमा तक परिवर्तित करने के प्रयास किये जाएंगे। इससे न्यायालयों में लम्बित मुकदमों की संख्या घटेगी। निर्धनों और असहायों को न्याय नि:शुल्क दिलाया जाएगा और वादों का निपटारा एक निश्चित अवधि के अन्दर करना अनिवार्य होगा।

चुनाव-प्रणाली में आमूल परिवर्तन – सत्ता की राजनीति के स्थान पर सेवा की राजनीति चलाने के लिए चुनाव-प्रणाली में परिवर्तन नितान्त आवश्यक है। इसके लिए सबसे पहले अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति आदि के कृत्रिम और हानिकारक विभाजन समाप्त करके देश की भावात्मक एकता का पथ प्रशस्त किया जाएगा। किसी भी व्यक्ति को जाति, धर्म, सम्प्रदाय या भाषी के आधार पर नहीं, अपितु शुद्ध योग्यता और कार्यक्षमता के आधार पर ही प्रोत्साहन दिया जाएगा। मत देने का वर्तमान क्रम समाप्त करके न्यूनतम अर्हता एवं आयु वाले मतदाता को ही मतदान का अधिकार होगा तथा चुनाव में प्रत्याशी के रूप में खड़े होने वाले के लिए भी कुछ न्यूनतम योग्यता निर्धारित कर दी जाएगी। दल परिवर्तन को कानून द्वारा अवैध घोषित कर दिया जाएगा और दूसरे दल की सदस्यता और किसी भी रूप में दूसरे दल से सम्बद्धता स्वीकार करने पर उसे पुनः मतदाताओं का विश्वास प्राप्त करना होगा। चुनाव-प्रणाली अत्यधिक सस्ती, सरल और आधुनिक बना दी जाएगी।

औद्योगिक नीति में परिवर्तन – कुटीर एवं लघु उद्योग-धन्धों को पूरी लगन से पुनर्जीवित किया जाएगा। डेयरी-उद्योग को बढ़ावा दिया जाएगा तथा उसी से वनस्पति घी के स्थान पर देशी घी प्रचुर मात्रा में सस्ते मूल्य पर उपलब्ध कराया जाएगा। गो-हत्या को पूर्णत: बन्द कर देश के पशुधन को समुचित संरक्षण दिया जाएगा। बड़े उद्योगों को केवल कुछ ही चीजें बनाने की छूट देकर अधिकांश माल लघु उद्योगों से तैयार कराकर सरकार उसकी बिक्री की व्यवस्था करेगी। इससे बेरोजगारी के उन्मूलन में बहुत सहायता मिलेगी। देश के प्रत्येक नागरिक को रोजगार उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व होगा। देश में फैशन और विलासिता की सामग्री के उत्पादन को निरुत्साहित कर सादगी और सात्विकता पर बल दिया जाएगा। देश में तैयार हो रहे माल की गुणवत्ता पर सतर्क दृष्टि रखी जाएगी। आयात कम कर दिया जाएगा और निर्यात को पूरा बढ़ावा दिया जाएगा। विदेशी ऋण लेना बन्द करके देश की आवश्यकताओं और साधनों के अनुरूप लघु विकास-योजनाएँ अल्पकालिक आधार पर बनायी जाएँगी। तस्करी का कठोरतापूर्वक दमन किया जाएगा। कोटा-परमिट आदि कृत्रिम प्रतिबन्ध समाप्त कर उद्योगों को फलने-फूलने के पर्याप्त अवसर प्रदान किये जाएँगे।

कर-प्रणाली में सुधार – देश में विद्यमान सैकड़ों करों के स्थान पर केवल तीन-चार प्रमुख कर रखे जाएँगे। कर-प्रणाली बहुत सरल बनायी जाएगी, जिससे शिक्षित-अशिक्षित प्रत्येक व्यक्ति सुविधापूर्वक अपना कर जमा कर सके। इससे चोरबाजारी का उन्मूलन होगा और कालाधन व सफेद धन का भेद समाप्त होकर सारा धन देश के विकास में लग सकेगा।

परिवार-कल्याण योजना का क्रियान्वयन – अपने प्रधानमन्त्रित्व काल में मैं परिवार को नियोजित करने पर विशेष बल दूंगा; क्योंकि बढ़ती हुई जनसंख्या को सीमित किये बिना देश का समग्र विकास किसी भी स्थिति में सम्भव है ही नहीं।

गृह और विदेश-नीति – भारत में पनप रही अलगाववादी प्रवृत्तियों को गृह-नीति के अन्तर्गत समाप्त किया जाएगा। इसके लिए भारत के सभी प्रदेशों में भारतीयता की भावना जगाने वाले कार्यक्रम चलाये जाएँगे और देश में हिंसा तथा तोड़-फोड़ करने वालों को सख्ती से कुचला जाएगा। राष्ट्रीय भावना को धर्म से ऊपर रखा जाएगा। प्रत्येक प्रदेश को उसके विकास के लिए समुचित धनराशि दी जाएगी और आदिवासियों, जनजातियों आदि को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ने एवं उनको समुचित विकास करने का पूरा प्रयत्न किया जाएगा। ग्राम पंचायतों को उनका पुराना गौरव लौटाया जाएगा। नगरों और ग्रामों में स्वच्छता पर विशेष बल दिया जाएगा, जिससे वातावरण प्रदूषण-मुक्त बने। विदेश-नीति के अन्तर्गत भारत के मित्र देशों को हर प्रकार की सम्भव सहायता दी जाएगी और शत्रु-राष्ट्रों के प्रति कड़ा रुख अपनाया जाएगा।

सैन्य-शक्ति का पुनर्गठन – सेना के तीनों अंगों को अत्यधिक सक्षम बनाया जाएगा। शस्त्रास्त्रों के लिए विदेशों पर निर्भर न रहकर देश को इतना शक्तिशाली बना दिया जाएगा कि संसार का कोई भी देश भारत से टकराने का खतरा मोल न ले। कश्मीर से धारा 370 समाप्त कर शेष भारत के साथ उसकी पूर्ण भावात्मक एकता स्थापित की जाएगी। साथ ही पाकिस्तान तथा चीन द्वारा अनधिकृत रूप से हड़प ली गयी भारतीय भूमि को भी वापस लेने का पूरा प्रयास किया जाएगा।

मनोरंजन और खेलकूद के क्षेत्रों में क्रान्तिकारी परिवर्तन – सिनेमा और दूरदर्शन द्वारा लोगों में अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान जाग्रत करने का अभियान चलाया जाएगा। पश्चिम की नकल पर बने वासना और अपराध के उत्तेजक चित्र बिल्कुल बन्द कर दिये जाएँगे। खेलकूद के क्षेत्र में बाह्य हस्तक्षेप बिल्कुल समाप्त करके योग्यता के आधार पर ही विभिन्न खेलों के लिए खिलाड़ियों का चयन होगा और उन्हें इतना अच्छा प्रशिक्षण और प्रोत्साहन दिया जाएगा कि वे संसार के किसी भी देश के खिलाड़ी से श्रेष्ठतर हों।

खाद्य-नीति – इसके अन्तर्गत विशाल सिंचाई-योजनाओं के स्थान पर स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप लघु सिंचाई योजनाओं को लागू किया जाएगा। रासायनिक खाद के कारखाने बन्द कर दिये जाएँगे; क्योंकि वे भूमि को बंजर बनाने के साथ-साथ अनाज में विष मिला रहे हैं। इनके स्थान पर नदियों में गिरने वाले सीवरों और कारखानों की गन्दगी को मशीनों से साफ कर स्वच्छ जल नदियों में छोड़ा जाएगा और मल को खाद के रूप में खेतों में प्रयुक्त किया जाएगा।

सामाजिक और धार्मिक नीति – समाज के प्रत्येक व्यक्ति और वर्ग को आगे बढ़ने का पूर्ण सुयोग उपलब्ध होगा। सामाजिक कुरीतियों एवं अनाचारों; जैसे-दहेज-प्रथा, बाल-विवाह आदि को सख्ती से दबाया जाएगा, नारी-सम्मान की पूर्ण रक्षा की जाएंगी एवं जनसंख्या वृद्धि को नियन्त्रित करने के लिए देश भर में समान नागरिक आचार-संहिता लागू करने के अतिरिक्त अन्यान्य समुचित उपायों को भी दृढ़तापूर्वक अपनाया जाएगा। धार्मिक नीति के अन्तर्गत धार्मिक स्वतन्त्रता तो हर एक को उपलब्ध होगी, परन्तु धर्म को अलगाववाद का हथियार बनाने की छूट न दी जाएगी। देशभक्तों को समुचित प्रोत्साहन एवं संरक्षण देने के साथ-साथ देशद्रोहियों का सख्ती से दमन किया जाएगा।

उपसंहार – भारत संसार को महान् जनतान्त्रिक देश है। इसकी सांस्कृतिक एवं सभ्यता सम्बन्धी परम्पराएँ बड़ी प्राचीन हैं। इसलिए मैं अपने प्रधानमन्त्रित्व काल में देश की सांस्कृतिक उन्नति करूंगा तथा सार्वभौमिक उन्नति के लिए प्रयत्न करता रहूँगा। प्रत्येक स्तर पर देश को स्वावलम्बी बनाने के साथ-साथ कर्तव्यनिष्ठा को पुरस्कृत और कर्तव्यहीनता को दण्डित किया जाएगा। किसी भी विषय में राजनीतिक, प्रशासनिक या अन्य किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप, पक्षपात, भाई-भतीजावाद या अन्याय को सहन नहीं किया जाएगा। मेरा मूलमन्त्र होगा ज्वलन्त राष्ट्रनिष्ठा, मितव्ययिता एवं देशी संसाधनों के भरपूर उपयोग से अर्जित पूर्ण स्वावलम्बन। यह मेरा कथन मात्र नहीं है। यदि मुझे यह सुअवसर प्राप्त हो तो मैं अपने समस्त आदर्श प्रत्यक्ष सत्य कर दिखा देने में पूर्ण सक्षम हूँ

गंगा की आत्मकथा

सम्बद्ध शीर्षक

  • मैं गंगा हूँ।

मैं गंगा हूँ। मुझे त्रिपथगा भी कहते हैं; क्योंकि स्वर्ग, मर्त्य और पाताल–तीनों लोकों में मेरी धाराएँ हैं। स्वर्ग में मैं मन्दाकिनी कहलाती हूँ, पृथ्वी पर भागीरथी तथा पाताल में वैतरणी। आज अपनी आत्मकथा सुनाने चली हूँ तो सभी कुछ बताऊँगी। कुछ भी छिपाकर रखने का मेरा स्वभाव नहीं; क्योंकि लोक-कल्याण ही मेरा व्रत है।। सम्भव है मेरी आत्मकथा से आपका भी कुछ कल्याण हो जाए। वैसे मेरी बड़ी महिमा है। ऋषि-महर्षि मेरा स्तवन करते नहीं थकते, देवगण मेरे गुणों का बखान करते नहीं अघाते, मानव मेरे दर्शन और स्पर्शन कर कृतार्थता का अनुभव करते हैं। इतना ही नहीं, मरने के बाद भी हिन्दू अपना अन्तिम संस्कार मेरे तट पर ही कराना चाहते हैं। आखिर मुझे इतना गौरव मिला कैसे?

वैसे तो मैं हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री कहलाती हूँ। उमा मेरी छोटी बहन है। पर मुख्यत: मैं अपने को ‘विष्णुपदी कहती हूँ; क्योंकि इसी नाम में मेरे महान् गौरव का मूल निहित है। जब भगवान् विष्णु ने वामनावतार धारण करके राजा बलि को छला था, तब उन्होंने विराट् रूप धारणकर दो डगों में तीनों लोकों को नाप लिया था। उस समय उनका एक चरण ब्रह्मलोक में भी पहुंचा था। इससे परम प्रसन्न हो भगवान् ब्रह्मा ने तत्काल उस चरण को जल से धोकर वह पाद्य अपने कमण्डलु में धारण कर लिया। बस, वही जल मेरा मूल उत्स बना है। सर्वलोकेश्वर भगवान् विष्णु के चरणों से उद्भूत होने के कारण ही मैं ‘विष्णुपदी’ कहलायी और यही मेरे अभूतपूर्व माहात्म्य का कारण बना।

मैं भगवान् ब्रह्मा के कमण्डलु में शायद बन्दी ही रह जाती, यदि महाराज सगर के प्रप्रपौत्र, असमंच के प्रपौत्र, अंशुमान् के पौत्र एवं दिलीप के पुत्र महापराक्रमी महाराज भगीरथ ने अमित तेजस्वी महामुनि कपिल के शाप से दग्ध अपने पूर्वजों (सगर के साठ हजार पुत्रों) को सद्गति दिलाने के लिए कठोर तपस्या न की होती। सच तो यह है कि मैं ब्रह्मलोक से पृथ्वी पर आने को राजी न हुई, किन्तु जब तीन-तीन पीढ़ियों की उग्र तपस्या से द्रवित हो भगवान् ब्रह्मा ने मुझे मर्त्यलोक में भेजने का वचन दे दिया, तब मैं क्या करती? महाराज सगर मुझे पृथ्वी पर लाने की चिन्ता करते-करते स्वर्ग सिधार गये। उनके पौत्र अंशुमान् हिमालय पर बत्तीस हजार वर्षों तक कठोर तपस्या करके भी विफल मनोरथ ही दिवंगत हो गये। उनके पुत्र दिलीप ने भी बड़ी तपस्या की, परन्तु यह कार्य सिद्ध न हुआ। अन्त में भगीरथ ने घोर तपस्या द्वारा भगवान् ब्रह्मा को वश में कर ही लिया। उन्होंने यह सिद्ध कर ही दिखाया कि तपस्या से असाध्य भी साध्य हो जाता है।

अस्तु, ब्रह्माजी ने मुझे मर्त्यलोक में भेजने की सहमति तो दे दी, पर एक समस्या भगीरथ के सामने रख दी-“स्वर्ग से उतरते समय मेरे दुर्धर्ष-वेग को सहन करने की क्षमता योगिराज भगवान् शंकर को छोड़कर किसी में नहीं; अतः तुम आराधना द्वारा उन्हें गंगा को धारण करने हेतु सहमत करो।’ धन्य हैं भगीरथ! वे पुनः उग्र तपस्या में लीन हो गये और अन्तत: भगवान् शंकर को भी प्रसन्न कर ही लिया। वे तत्काल हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर जटाएँ फैलाकर खड़े हो गये और भगीरथ से मेरा आह्वान करने को कहा। भगीरथ ने भगवान् ब्रह्मा की स्तुति की और उन्होंने तत्काल अपने कमण्डलु से मुझे उतार दिया। सच कहूँ! मुझमें उस समय असीम अहंकार उत्पन्न हुआ कि भला कौन है, जो मेरे दुर्धर्ष-वेग को सहन कर सकता है। मैं शिव को अपने प्रचण्ड वेग में बहाती, मर्त्यलोक को डुबोती, सीधे रसातल चली जाऊँगी, परन्तु भगवान् शिव तो अन्तर्यामी ठहरे! मेरा अहंकार जानकर उन्हें बड़ा क्रोध आया। फलतः जैसे ही मैं आकाश को निनादित करती, घनपटल को चीरती, वायु को थरथराती और पृथ्वी को कँपकँपाती ब्रह्मलोक से चली तो मेरे वेग से तीनों लोक काँप उठे। अस्तु, जैसे ही मैं उतरी वैसे ही भगवान् शंकर ने मुझे अपनी जटाओं में बाँध लिया। मैंने बहुत जोर मारा, पर बाहर निकलने का रास्ता ही न मिला। तब भगीरथ फिर भगवान् त्रिपुरारि का स्तवन करने लगे। तब उन्होंने मुझे बिन्दुसर में छोड़ी और मैं वहाँ से समस्त पर्वत प्रदेश को अपनी धमक से दहलाती पृथ्वी की ओर दौड़ पड़ी। भगीरथ दिव्य-रथ में मेरा मार्गदर्शन करते हुए मेरे आगे-आगे चल रहे थे। पृथ्वी पर मैं मदमाती, इठलाती, निश्चिन्त हो भागी चली जा रही थी, क्योंकि यहाँ भला कौन बैठा था मेरी गति को रोकने वाला? पर आश्चर्य कि अघटित घटित हो ही गया! जह्न नाम के एक महातपस्वी राजर्षि यज्ञ कर रहे थे। उनका यज्ञमण्डप मेरे मार्ग में पड़ता था। मुझे यह बाधा सहन न हुई और मैं उसे बहा ले चली, परन्तु यहाँ तो एक दूसरे ही शंकर निकल आये। जहु ने क्रुद्ध हो मुझे चुल्लू में भरकर पी लिया और मैं उनके पेट में बन्दी हो गयी। भगीरथ बेचारे ने उन्हें भी मनाया, देवताओं ने आकर उनका गुणगान किया और मुझे उनकी पुत्री बनाया। तब कहीं जाकर उन्होंने मुझे कानों के मार्ग से निकाला। तब से मैं जाह्नवी’ (जह्वपुत्री) कहलायी। बस, फिर सागर तक कोई बाधा न मिली। सागर मुझसे मिलकर खिल उठा, परन्तु मुझे तो भगीरथ का मनोरथ पूरा करना था, इसलिए तत्काल पाताल में जाकर मैंने सगर के साठ हजार पुत्रों की भस्म को अपने जल से आप्लावित कर दिया। उसी क्षण वे सब दिव्य-देह धारणकर स्वर्गलोक को चल दिये। देवता पुष्पवर्षा करने लगे, सिद्ध और महर्षिगण मेरी यशोगाथा गाने लगे, भगीरथ हर्षविभोर हो श्रद्धा से मेरे चरणों पर लेट गये। तो यह है मेरी आपबीती!
अस्तु, तब से मैं निरन्तर बहती हुई लोकहित में लगी हैं। उत्तर भारत की भूमि मुझे पाकर धन्य हो गयी। मैंने जिधर दृष्टि फेरी उधर ही खेत लहलहा उठे और धन-धान्य की वृष्टि होने लगी। मेरे तट पर अगणित नगर और ग्राम बस गये। हिन्दुओं के महान् तीर्थ–हरिद्वार, प्रयाग और काशी – मेरे ही तट पर हैं। यह सब कुछ प्रत्यक्ष

परन्तु तुम्हारा आज का यह युग ठहरी बुद्धिवादी। तर्क-वितर्क के बिना भला ये किसी की महिमा क्यों मानने लगे। इसलिए कुछ लोगों ने कहना शुरू किया कि यह पौराणिक आख्यान प्रतीकात्मक हैं। फिर लगे वे आधुनिक ढंग से उसकी व्याख्या करने। पहली बार उन्होंने यह खोज निकाला कि गंगा नदी नहीं, नहर है। उन्होंने दावा किया कि इसके तल की मिट्टी नदियों जैसी प्राकृतिक है ही नहीं। अब उनकी व्याख्या सुनिए। उत्तर भारत गंगा के आने से पहले मरुभूमि जैसा बंजर था। वर्षा के अनिश्चित जल से काम न चलता था। सर्वत्र हा-हाकार मचा हुआ था। लोग सूखे और गर्मी से दग्ध हुए जा रहे थे। यह हुआ कपिल मुनि के शाप से सगरपुत्रों का दग्ध होना अर्थात् सगर की प्रजा का पीड़ित होना। राजा सगर ने हिमालय में इंजीनियरों को भेजकर खोज करायी। पता

चला वहाँ जल का एक विशाल भण्डार है। यदि उसे पृथ्वी पर उतारा जा सके तो समस्या सदा के लिए हल हो जाए। सगर ने बड़ा प्रयास किया, परन्तु सफल न हुए। अगली तीन पीढ़ियाँ असफल प्रयासों में खप गयीं। यह हुई तीन पीढ़ियों की तपस्या। आखिर में भगीरथ हुए। वे स्वयं महान् इंजीनियर थे। उन्होंने कार्य पूरा करने का बीड़ा उठाया और राजपाट मन्त्रियों पर छोड़ हिमालय पहुँचे। वर्षों हिमालय के अन्तर्वर्ती भू-भाग का सर्वेक्षण किया और समस्या का समाधान ढूंढ़ निकाला। यह हुआ भगोरथ की तपस्या से ब्रह्माजी के प्रसन्न होकर अपने कमण्डलु से गंगा को छोड़े जाने का आख्यान। अस्तु, भगीरथ ने पहले हिमालय की तलहटी से गंगा सागर तक एक विराट नहर खुदवायी। फिर हिमालय में उस विशाल जल-भण्डार के पास एक प्रणाली (नाली) खुदवायी जो अनेक स्थानों पर पर्वत के अन्दर सुरंग के रूप में जाती थी। यह महान् कौशल का कार्य था, जिसमें अनेक वर्ष लग गये और प्रचुर धन व्यय हुआ। अब असली समस्या उस जल-भण्डार को इस प्रणाली से मिलाने की थी जो बड़ा ही भयप्रदायक कार्य था। इसे भी भगीरथ ने कुशल इंजीनियरों के दल के सहयोग से हल किया और जल की एक पतली धार उस प्रणाली में छोड़ी, जिससे वह बाद में जल के वेग से स्वतः ही चौड़ी हो जाए। यह हुआ भगवान् शिव द्वारा गंगा को धारण करना और फिर बिन्दुसर में छोड़ना। कैसी लगी यह बुद्धिवादी व्याख्या? नि:सन्देह आपको रोचक प्रतीत हुई होगी।

अस्तु, मैं पतितपावनी कही जाती हूँ। मेरा जल बरसों पात्र में भरकर रखने पर भी दूषित नहीं होता था, किन्तु । अब वह बात कम होती जा रही है। प्रगति के नाम पर स्थापित कल-कारखाने अपना कचरा और दूषित जल मुझमें छोड़ रहे हैं। सैकड़ों नाले गन्दगी बहाकर मुझमें मिल रहे हैं। मेरा जल दूषित होता जा रहा है। मन में कई बार क्षोभ उत्पन्न होता है कि मैं इस मर्त्यलोक को छोड़कर ब्रह्मलोक को लौट जाऊँ, पर जब लाखों भक्तों को अपने दर्शन से गद्गद होते तथा हजारों सन्त-महात्माओं को अपनी स्तुति करते पाती हूँ, तो उन्हें निराश करने को मुन नहीं होता; इसलिए मैं तुम लोगों को, जो मेरी यह आत्मकथा सुन रहे हो, सावधान करती हूँ कि जाकर अपने उन आत्मघाती, पथभ्रष्ट देशवासियों को समझाओ कि मेरी पवित्रता बनाये रखने में उन्हीं का हित साधन है, अन्यथा मुझे तो कुछ फर्क नहीं पड़ता। मैं सदा के लिए वापस ब्रह्मलोक चली जाऊँगी। शायद इसी भय से कम्पित होकर सरकार ने मुझे पवित्र बनाये रखने हेतु अनेकानेक योजनाएँ कार्यान्वित की हैं।

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi आत्मकथात्मक निबन्ध help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi आत्मकथात्मक निबन्ध, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name विभक्ति-प्रकरण
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण

विभक्ति-प्रकरण

नवीनतम पाठ्यक्रम में कुछ उपपद विभक्ति के नियम निर्धारित है। इसके अन्तर्गत 2 अके प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षा में रखाकित शब्दों में लगी विभक्ति तथा उससे सम्बन्धित सूत्र का उल्लेख करने को कहा जाता है। कभी सूत्र की व्याख्या कर उदाहरण देने को भी कहा जाता है। नीचे निर्धारित नियम दिये जा रहे हैं। इन्हीं नियमों के आधार पर अनुवाद के वाक्य भी पूछे जाएंगे।
ध्यान दे – तारांकित (*) सूत्र नवीनतम पाठ्यक्रम में निर्धारित नहीं हैं। पारस्परिक सम्बद्धता के कारण इनसे भी प्रश्न पूछ लिये जाते हैं। अत: यहां दिये जा रहे हैं।

(अ) सूत्र – अभितः परितः समया निकषा हा प्रतियोगेऽपि।
अभितः (चारों ओर या सभी ओर), परितः (सभी ओर), समया (समीप), निकष (समीप), हा (शोक के । लिए प्रयुक्त शब्द), प्रति (ओर, तरफ) शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति होती है।
उदाहरण:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण 1
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण 2

(ब) सूत्र – येनाङ्गविकारः।
जिस अंग में विकार होने से शरीर विकृत दिखाई दे, उस विकारयुक्त अंग में तृतीया विभक्ति होती है।
उदाहरण:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण 3
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण 4

(स) सूत्र – सहयुक्तेऽप्रधाने।
साथ अर्थ वाले सह, साकम्, सार्धम्, समम् शब्दों के योग में अप्रधान (जिसके साथ जाने वाला जाए) में तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है।
उदाहरण:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण 5

(द) सूत्र – साधकतमं करणम्।
जिसकी सहायता से कार्य पूर्ण होता है, उसमें तृतीया विभक्ति होती है।
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण 6

(य) सूत्र – नमः स्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषट्योगाच्च। नमः (नमस्कार), स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा (आहुति), स्वधा (बलि), अलं (समर्थ, पर्याप्त), वषट्। (आहुति)-इन शब्दों के योग में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।
उदाहरण:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण 7
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण 8

(र) सूत्र – ध्रुवमपायेऽपादानम्।
स्वयं से अलग करने वाले अर्थात् ध्रुव (मूल) में पञ्चमी विभक्ति होती है; जैसे-वृक्ष से पत्ते गिरते हैं। इस वाक्य में पत्तों को स्वयं से अलग करने वाला वृक्ष है; अतः वृक्ष में पञ्चमी विभक्ति होगी।
उदाहरण:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण 9

(ल) सूत्र – आख्यातोपयोगे।
नियमपूर्वक विद्या ग्रहण करने में जिससे विद्या ग्रहण की जाती है, उसमें पंचमी विभक्ति होती है।
उदाहरण: उपाध्यायात् अधीते।                 उपाध्याय से पढ़ता है।

(व) सूत्र – भीत्रार्थानां भयहेतुः।
‘भय’ तथा ‘रक्षा’ अर्थ वाली धातुओं के योग में जिससे डरा जाता है या जिससे रक्षा की जाती है, उसमें पंचमी विभक्ति होती है।
उदाहरण: सिंहात् बिभेति।                     सिंह से डरता है।

(श) सूत्र – षष्ठी शेषे।
छ: कारकों के अतिरिक्त सम्बन्ध अर्थ शेष बचता है। सम्बन्ध अर्थ में षष्ठी विभक्ति होती है।
उदाहरण:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण 10

(व) सूत्र – यतश्च निर्धारणम्।
जहाँ बहुतों में से किसी एक को छाँटा जाए, वहाँ जिसमें से छाँटा जाये, उसमें षष्ठी और सप्तमी विभक्तियाँ होती हैं।
उदाहरण:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण 11

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name प्रत्यय-प्रकरण
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण

प्रत्यय-प्रकरण

संस्कृत में धातु या शब्दों के बाद प्रत्यय जोड़कर नये शब्दों का निर्माण होता है। प्रत्यय मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं
(अ) कृत् प्रत्यय तथा
(ब) तद्धित प्रत्यय।

(अ) कृत् प्रत्यय

जिस प्रत्यय को धातु से जोड़कर संज्ञा, विशेषण अथवा अव्यय बनाया जाता है, उसको कृत् प्रत्यय कहते हैं। कृत् प्रत्यय के योग से बनने वाले शब्दों को कृदन्त (अर्थात् जिनके अन्त में कृत् प्रत्यय है) कहते हैं; जैसे – ‘कृ’ धातु में तृच् प्रत्यय जोड़ने से ‘कर्तृ’ शब्द बनता है, यह कृदन्त है। यह संज्ञा शब्द है और इसके रूप अन्य संज्ञाओं की तरह विभिन्न विभक्तियों में चलेंगे (जैसे – प्रथमा विभक्ति में कर्ता, कर्तारौ, कर्तारः आदि)। यहाँ यह द्रष्टव्य है कि जो कृदन्त शब्द संज्ञा या विशेषण होते हैं, उनके रूप तो चलते हैं, पर अव्यय सदा एक रूप रहते हैं (उनके रूप नहीं चलते)।

(क) क्त (तु) – भूतकालिक क्रिया और विशेषण शब्द बनाने के लिए ‘क्त’ प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। ‘क्त’ प्रत्यय का प्रयोग कर्मवाच्य एवं भाववाच्य में किया जाता है। इसका प्रयोग करते समय कर्ता में तृतीया विभक्ति तथा कर्म में प्रथमा विभक्ति रखी जाती है। ‘क्त’ प्रत्ययान्त शब्दों का प्रयोग कर्म के लिङ्ग, विभक्ति और वचनों के अनुसार होता है। कर्ता के लिङ्ग और वचन का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता; जैसे

  1. रामेण पुस्तकं पठितम्।
  2. सीतया ग्रन्थः पठितः।
  3. मया पुस्तिका पठिता।

‘क्त’ प्रत्यय से बने क्रिया-रूपों के कुछ उदाहरण ।
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 1
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 2

(ख) क्त्वा (त्वा) – जब किसी क्रिया के हो जाने पर दूसरी क्रिया आरम्भ होती है, तब सम्पन्न हुई क्रिया को , ‘पूर्वकालिक क्रिया कहते हैं। हिन्दी में इसका बोध करके’ लगाकर होता है। पूर्वकालिक क्रिया का बोध कराने के . लिए संस्कृत में धातु के आगे क्त्वा (त्वा) प्रत्यय जोड़ा जाता है। क्त्वा (त्वा) प्रत्ययान्त धातुओं के रूप नहीं चलते।

‘क्त्वा’ (त्वा) प्रत्यय लगाकर धातुओं के रूप
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 3

(ग) तव्यत् (तव्य), अनीयर् (अनीय) – सामान्यत: क्रिया में विधिलिङ् लकार चाहिए’ के अर्थ में तव्यत् और अनीयर् प्रत्ययों का प्रयोग होता है। इन शब्दों का प्रयोग सकर्मक धातुओं के कर्मवाच्य में तथा अकर्मक धातुओं के भाववाच्य में होता है। कर्तृवाच्य में इनका प्रयोग नहीं होता। ये शब्द योग्य के अर्थ में भी प्रयुक्त होते हैं; जैसे

पठ् + तव्यत् (तव्य) = पठितव्य (पढ़नी चाहिए)।
पठ् + अनीयर् (अनीय) = पठनीय (पढ़नी चाहिए या पढ़ने योग्य)।
मया पुस्तकं पठितव्यम् (पठनीयम्) = मेरे द्वारा पुस्तक पढ़ी जानी चाहिए (या, मुझे पुस्तक पढ़नी चाहिए)। इन प्रत्ययों से बने शब्दों का प्रयोग लिंग, वचन और विभक्ति के अनुसार किया जाता है। इनके रूप पुंल्लिङ्ग में ‘बालक’, नपुंसकलिङ्ग में ‘फल और स्त्रीलिङ्ग में ‘बाला’ के समान बनेंगे।
तव्यत् और अनीयर् प्रत्यय से निर्मित उदाहरण
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 4
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 5

(घ) क्तवतु (तवत्) – ‘क्त’ प्रत्ययान्त शब्दों के परिवर्तनों के अनुसार ही ‘क्तवतु’ प्रत्ययान्त शब्दों के रूपों में भी परिवर्तन होते हैं। केवल उनके अन्त में ‘वत्’ और जोड़ दिया जाता है, क्योंकि इस प्रत्यय का प्रारम्भिक अक्षर भी ‘क्त ही है। ‘क्तवतु’ प्रत्यय का भी उन्हीं धातुओं के साथ प्रयोग होता है, जिनके साथ ‘क्त का प्रयोग होता है। इस प्रत्यय से निर्मित शब्दों का प्रयोग भूतकालिक क्रिया की भाँति ‘कर्तृवाच्य में होता है। इस प्रत्यय से निर्मित शब्दों के रूप पुंल्लिग में ‘श्रीमत् के समान, स्त्रीलिंग में नदी के समान तथा नपुंसकलिंग में जगत् के समान होते हैं।

“क्तवतु’ प्रत्यय से बने क्रिया-रूपों के कुछ उदाहरण
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 6

(ब) तद्धित प्रत्यय

तद्धित प्रत्यय सदा किसी सिद्ध (अर्थात् बनाये हुए) संज्ञा, विशेषण, अव्यय या क्रिया के अनन्तर जोड़कर उससे अन्य संज्ञा, विशेषण, अव्यय, क्रिया आदि बनाने में प्रयुक्त होता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि कृत् प्रत्यय सदा धातु में ही जोड़े जाते हैं, किसी सिद्ध शब्द में नहीं।

(क) मतुप् , वतुप् – संज्ञा से ‘वाला’, ‘वाली’ (गाड़ी वाला, बुद्धि वाली आदि) अर्थ प्रकट करने के लिए ‘मतुप्’ (मत्) तथा वतुप् (वत्) प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। जिन शब्दों के अन्त में ‘अ’ या ‘आ’ होता है, उनमें ‘वत्’ तथा जिन शब्दों के अन्त में ह्रस्व अथवा दीर्घ ‘ई’, ‘उ’, ‘ऋ’ होता है, उनमें ‘मत्’ जुड़ता है। किन्तु यदि अन्त में आने वाले ‘इ’, उ’ व्यंजन ‘म’ में लगे हों तो ‘वत्’ ही जुड़ता है। ‘मतुप्’ या ‘वतुप्’ प्रत्ययान्त शब्दों के रूप पुंल्लिङ्ग में ‘भवत्’ के समान, स्त्रीलिङ्ग में नदी के समान और नपुंसकलिङ्ग में ‘जगत् के समान होते हैं; जैसे
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 7
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 8

ये शब्द विशेषण होते हैं, इसलिए ये अपने विशेष्य के अनुसार ही लिङ्ग, वचन और विभक्ति ग्रहण करते हैं। उदाहरणार्थ, ‘श्रीमत् के पुंल्लिङ्ग में प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों के रूप इस प्रकार होंगे

श्रीमान्          श्रीमन्तौ          श्रीमन्तः।

(ख) त्व, तल् प्रत्यय – संज्ञा और विशेषण शब्दों से भाववाचक संज्ञा बनाने के लिए त्व’ और ‘तलु’ प्रत्ययों का प्रयोग होता है। ‘त्व’ प्रत्ययान्त शब्द नपुंसकलिङ्ग तथा ‘तल्’ प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग होते हैं। इनके रूप भी क्रमशः ‘फलम्’ और ‘बाला’ के समान चलते हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 9

प्रथम – दिये गये पदों में से किन्हीं दो के सम्बन्ध में स्पष्ट कीजिए कि वे किस धातु अथवा शब्द में किस प्रत्यय के योग से बने हैं – गतः, पठनीयम्, बुद्धिमान्।
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 10

द्वितीय – दिये गये पदों में से किन्हीं दो धातु में ‘क्त’ या ‘क्तवतु’ प्रत्यय लगाकर उसके प्रथमा पुंल्लिङ्ग एकवचन और द्विवचन के रूप लिखिए-पठ्, गम्, दा, प्रेष्।
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 11

तृतीय – दिये गये शब्दों में से किसी एक शब्द में उसके सामने लिखा प्रत्यय जोड़कर शब्द का यथानिर्दिष्ट रूप लिखिए-धन + मतुप् (पुंल्लिङ्ग रूप), पठ् + अनीयर् (नपुंसकलिङ्ग रूप)
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 12

पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ में आये प्रत्यययुक्त शब्द

पाठ 2:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 13

पाठ 3:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 14

पाठ 4:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 15

पाठ 6:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 16
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 17

पाठ 7:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 18

पाठ 9:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 19

पाठ 10:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण 20

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विज्ञान सम्बन्धी निबन्ध

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विज्ञान सम्बन्धी निबन्ध are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विज्ञान सम्बन्धी निबन्ध.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 7
Chapter Name विज्ञान सम्बन्धी निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विज्ञान सम्बन्धी निबन्ध

विज्ञान सम्बन्धी निबन्ध

 विज्ञान : वरदान या अभिशाप

सम्बद्ध शीर्षक

  • विज्ञान की उपलब्धियाँ
  • विज्ञान के बढ़ते कदम
  • विज्ञान : वरदान या अभिशाप | विज्ञान के चमत्कार
  • विज्ञान के वरदान
  • विज्ञान : हमारा मित्र एवं शत्रु
  • जीवन में विज्ञान को महत्त्व
  • विज्ञान की प्रगति और विश्वशक्ति

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2.  विज्ञान : वरदान के रूप में
    (क) यातायात के क्षेत्र में;
    (ख) संचार के क्षेत्र में;
    (ग) दैनन्दिन जीवन में;
    (घ) स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के क्षेत्र में;
    (ङ) औद्योगिक क्षेत्र में;
    (च) कृषि के क्षेत्र में;
    (छ) शिक्षा के क्षेत्र में;
    (ज) मनोरंजन के क्षेत्र में,
  3. विज्ञान : अभिशाप के रूप में,
  4. उपसंहार।

प्रस्तावना – आज का युग वैज्ञानिक चमत्कारों का युग है। मानव-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आज विज्ञान ने आश्चर्यजनक क्रान्ति ला दी है। मानव-समाज की सारी गतिविधियाँ आज विज्ञान से परिचालित हैं। दुर्जेय प्रकृति पर विजय प्राप्त कर आज विज्ञान मानव का भाग्यविधाता बन बैठा है। अज्ञात रहस्यों की खोज में उसने आकाश की ऊँचाइयों से लेकर पाताल की गहराइयाँ तक नाप दी हैं। उसने हमारे जीवन को सभी ओर से इतना प्रभावित कर दिया है कि विज्ञान-शून्य विश्व की आज कोई कल्पना तक नहीं कर सकता, किन्तु दूसरी ओर हम यह भी देखते हैं कि अनियन्त्रित वैज्ञानिक प्रगति ने मानव के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है। इस स्थिति में हमें सोचना पड़ता है कि विज्ञान को वरदान समझा जाए या अभिशाप। अतः इन दोनों पक्षों पर समन्वित दृष्टि से विचार करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित होगा।

विज्ञान : वरदान के रूप में – आधुनिक मानव का सम्पूर्ण पर्यावरण विज्ञान के वरदानों के आलोक से आलोकित है। प्रातः जागरण से लेकर रात के सोने तक के सभी क्रिया-कलाप विज्ञान द्वारा प्रदत्त साधनों के सहारे ही संचालित होते हैं। प्रकाश, पंखा, पानी, साबु न, गैस स्टोव, फ्रीज, कूलर, हीटर और यहाँ तक कि शीशा, कंघी से लेकर रिक्शा, साइकिल, स्कूटर, बस, कार, रेल, हवाई जहाज, टी०वी०, सिनेमा, रेडियो आदि जितने भी साधनों का हम अपने दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं, वे सब विज्ञान के ही वरदान हैं। इसीलिए तो कहा जाता है कि आज का अभिनव मनुष्य विज्ञान के माध्यम से प्रकृति पर विजय पा चुका है ।

आज की दुनिया विचित्र नवीन,
प्रकृति पर सर्वत्र है विजयी पुरुष आसीन।
हैं बँधे नर के करों में वारि-विद्युत भाप,
हुक्म पर चढ़ता उतरता है पवन का ताप।
है नहीं बाकी कहीं व्यवधान,
लाँघ सकता नर सरित-गिरि-सिन्धु एक समान॥

विज्ञान के इन विविध वरदानों की उपयोगिता कुछ प्रमुख क्षेत्रों में निम्नलिखित है

(क) यातायात के क्षेत्र में – प्राचीन काल में मनुष्य को लम्बी यात्रा तय करने में बरसों लग जाते थे, किन्तु आज रेल, मोटर, जलपोत, वायुयान आदि के आविष्कार से दूर-से-दूर स्थानों पर बहुत शीघ्र पहुँचा जा सकता है। यातायात और परिवहन की उन्नति से व्यापार की भी कायापलट हो गयी है। मानव केवल धरती ही नहीं, अपितु चन्द्रमा और मंगल जैसे दूरस्थ ग्रहों तक भी पहुँच गया है। अकाल, बाढ़, सूखा आदि प्राकृतिक विपत्तियों से पीड़ित व्यक्तियों की सहायता के लिए भी ये साधन बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं। इन्हीं के चलते आज सम्पूर्ण विश्व एक बाजार बन गया है।

(ख) संचार के क्षेत्र में – बेतार के तौर ने संचार के क्षेत्र में क्रान्ति ला दी है। आकाशवाणी, दूरदर्शन, तार, दूरभाष (टेलीफोन, मोबाइल फोन), दूरमुद्रक (टेलीप्रिण्टर, फैक्स) आदि की सहायता से कोई भी समाचार क्षण भर में विश्व के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचाया जा सकता है। कृत्रिम उपग्रहों ने इस दिशा में और भी चमत्कार कर दिखाया है।

(ग) दैनन्दिन जीवन में – विद्युत् के आविष्कार ने मनुष्य की दैनन्दिन सुख-सुविधाओं को बहुत बढ़ा दिया है। वह हमारे कपड़े धोती है, उन पर प्रेस करती है, खाना पकाती है, सर्दियों में गर्म जल और गर्मियों में शीतल जल उपलब्ध कराती है, गर्मी-सर्दी दोनों से समान रूप से हमारी रक्षा करती है। आज की समस्त औद्योगिक प्रगति इसी पर निर्भर है।

(घ) स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के क्षेत्र में – मानव को भयानक और संक्रामक रोगों से पर्याप्त सीमा तक बचाने का श्रेय विज्ञान को ही है। कैंसर, क्षय (टी० बी०), हृदय रोग एवं अनेक जटिल रोगों का इलाज विज्ञान द्वारा ही सम्भव हुआ है। एक्स-रे एवं अल्ट्रासाउण्ड टेस्ट, ऐन्जियोग्राफी, कैट स्कैन आदि परीक्षणों के माध्यम से शरीर के अन्दर के रोगों का पता सरलतापूर्वक लगाया जा सकता है। भीषण रोगों के लिए आविष्कृत टीकों से इन रोगों की रोकथाम सम्भव हुई है। प्लास्टिक सर्जरी, ऑपरेशन, कृत्रिम अंगों को प्रत्यारोपण आदि उपायों से अनेक प्रकार के रोगों से मुक्ति दिलायी जा रही है। यही नहीं, इससे नेत्रहीनों को नेत्र, कर्णहीनों को कान और अंगहीनों को अंग देना सम्भव हो सका है।

(ङ) औद्योगिक क्षेत्र में – भारी मशीनों के निर्माण ने बड़े-बड़े कल-कारखानों को जन्म दिया है, जिससे श्रम, समय और धन की बचत के साथ-साथ प्रचुर मात्रा में उत्पादन सम्भव हुआ है। इससे विशाल जनसमूह को
आवश्यक वस्तुएँ सस्ते मूल्य पर उपलब्ध करायी जा सकी हैं।

(च) कृषि के क्षेत्र में – 121.02 करोड़ से ऊपर की जनसंख्या वाला हमारा देश आज यदि कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो सका है तो यह भी विज्ञान की ही देन है। विज्ञान ने किसान को उत्तम बीज, प्रौढ़ एवं विकसित तकनीक, रासायनिक खादे, कीटनाशक, ट्रैक्टर, ट्यूबवेल और बिजली प्रदान की है। छोटे-बड़े बाँधों का निर्माण कर नहरें निकालना भी विज्ञान से ही सम्भव हुआ है।

(छ) शिक्षा के क्षेत्र में मुद्रण – यन्त्रों के आविष्कार ने बड़ी संख्या में पुस्तकों का प्रकाशन सम्भव बनाया है, जिससे पुस्तकें सस्ते मूल्य पर मिल सकी हैं। इसके अतिरिक्त समाचार-पत्र, पत्र-पत्रिकाएँ आदि भी मुद्रण-क्षेत्र में हुई क्रान्ति के फलस्वरूप घर-घर पहुँचकर लोगों का ज्ञानवर्द्धन कर रही हैं। आकाशवाणी दूरदर्शन आदि की सहायता से शिक्षा के प्रसार में बड़ी सहायता मिली है। कम्प्यूटर के विकास ने तो इस क्षेत्र में क्रान्ति ला दी है।

(ज) मनोरंजन के क्षेत्र में – चलचित्र, आकाशवाणी, दूरदर्शन आदि के आविष्कार ने मनोरंजन को सस्ता और सुलभ बना दिया है। टेपरिकॉर्डर, वी० सी० आर०, वी० सी० डी०, डी० वी० डी० आदि ने इस दिशा में क्रान्ति ला दी है और मनुष्य को उच्चकोटि का मनोरंजन सुलभ कराया है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि मानव-जीवन के लिए विज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई वरदान नहीं है।

विज्ञान : अभिशाप के रूप में –  विज्ञान का एक और पक्ष भी है। विज्ञान एक असीम शक्ति प्रदान करने वाला तटस्थ साधन है। मानव चाहे जैसे इसका इस्तेमाल कर सकता है। सभी जानते हैं कि मनुष्य में दैवी प्रवृत्ति भी है। और आसुरी प्रवृत्ति भी। सामान्य रूप से जब मनुष्य की दैवी प्रवृत्ति प्रबल रहती है तो वह मानव-कल्याण से कार्य किया करता है, परन्तु किसी भी समय मनुष्य की आसुरी प्रवृत्ति प्रबल होते ही कल्याणकारी विज्ञान एकाएक प्रबलतम विध्वंस एवं संहारक शक्ति का रूप ग्रहण कर सकता है। इसका उदाहरण गत विश्वयुद्ध का वह दुर्भाग्यपूर्ण पल है, जब हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम-बम गिराया गया था। स्पष्ट है कि विज्ञान मानवमात्र के लिए सबसे बुरा अभिशाप भी सिद्ध हो सकता है। गत विश्वयुद्ध से लेकर अब तक मानव ने विज्ञान के क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति की है; अतः कहा जा सकता है कि आज विज्ञान की विध्वंसक शक्ति पहले की अपेक्षा बहुत बढ़ गयी है।

विध्वंसक साधनों के अतिरिक्त अन्य अनेक प्रकार से भी विज्ञान ने मानव का अहित किया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथ्यात्मक होता है। इस दृष्टिकोण के विकसित हो जाने के परिणामस्वरूप मानव हृदय की कोमल भावनाओं एवं अटूट आस्थाओं को ठेस पहुंची है। विज्ञान ने भौतिकवादी प्रवृत्ति को प्रेरणा दी है, जिसके परिणामस्वरूप धर्म एवं अध्यात्म से सम्बन्धित विश्वास थोथे प्रतीत होने लगे हैं। मानव-जीवन के पारस्परिक सम्बन्ध भी कमजोर होने लगे हैं। अब मानव भौतिक लाभ के आधार पर ही सामाजिक सम्बन्धों को विकसित करता है।

जहाँ एक ओर विज्ञान ने मानव-जीवन को अनेक प्रकार की सुख-सुविधाएँ प्रदान की हैं वहीं दूसरी ओर विज्ञान के ही कारण मानव-जीवन अत्यधिक खतरों से परिपूर्ण तथा असुरक्षित भी हो गया है। कम्प्यूटर तथा दूसरी मशीनों ने यदि मानव को सुविधा के साधन उपलब्ध कराये हैं तो साथ-साथ रोजगार के अवसर भी छीन लिये हैं। विद्युत् विज्ञान द्वारा प्रदत्त एक महान् देन है, परन्तु विद्युत् को एक मामूली झटका ही व्यक्ति की इहलीला समाप्त कर सकता है। विज्ञान ने तरह-तरह के तीव्र गति वाले वाहन मानव को दिये हैं। इन्हीं वाहनों की आपसी टक्कर से प्रतिदिन हजारों व्यक्ति सड़क पर ही अपनी जान गॅवा देते हैं। विज्ञान के दिन-प्रतिदिन होते जा रहे नवीन आविष्कारों के कारण मानव पर्यावरण असन्तुलन के दुष्चक्र में भी फंस चुका है।

अधिक सुख-सुविधाओं के कारण मनुष्य आलसी और आरामतलब बनता जा रहा है, जिससे उसकी शारीरिक शक्ति का ह्रास हो रहा है और अनेक नये-नये रोग भी उत्पन्न हो रहे हैं। मानव में सर्दी और गर्मी सहने की क्षमता घट गयी है।
वाहनों की बढ़ती संख्या से सड़कें पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो रही हैं तो उनसे निकलने वाले ध्वनि प्रदूषक मनुष्य को स्नायु रोग वितरित कर रहे हैं। सड़क दुर्घटनाएँ तो मानो दिनचर्या का एक अंग हो चली हैं। विज्ञापनों ने प्राकृतिक सौन्दर्य को कुचल डाला है। चारों ओर का कृत्रिम आडम्बरयुक्त जीवन इस विज्ञान की ही देन है। औद्योगिक प्रगति ने पर्यावरण-प्रदूषण की विकट समस्या खड़ी कर दी है। साथ ही गैसों के रिसाव से अनेक व्यक्तियों के प्राण भी जा चुके हैं। विज्ञान के इसी विनाशकारी रूप को दृष्टि में रखकर महाकवि दिनकर मानव को चेतावनी देते हुए कहते हैं

सावधान, मनुष्य ! यदि विज्ञान है तलवार।
तो इसे दे फेंक, तजकर मोह, स्मृति के पार॥
खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार ।
काट लेगा अंग, तीखी है बड़ी यह धार॥

उपसंहार – विज्ञान सचमुच तलवार है, जिससे व्यक्ति आत्मरक्षा भी कर सकता है और अनाड़ीपन में अपने अंग भी काट सकता है। इसमें दोष तलवार का नहीं, उसके प्रयोक्ती का है। विज्ञान ने मानव के सम्मुख असीमित विकास का मार्ग खोल दिया है, जिससे मनुष्य संसार से बेरोजगारी, भुखमरी, महामारी आदि को समूल नष्ट कर विश्व को अभूतपूर्व सुख-समृद्धि की ओर ले जा सकता है। अणु-शक्ति का कल्याणकारी कार्यों में उपयोग असीमित सम्भावनाओं का द्वार उन्मुक्त कर सकता है। बड़े-बड़े रेगिस्तानों को लहराते खेतों में बदलना, दुर्लंघ्य पर्वतों पर मार्ग बनाकर दूरस्थ अंचलों में बसे लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना, विशाल बाँधों को निर्माण एवं विद्युत् उत्पादन आदि अगणित कार्यों में इसका उपयोग हो सकता है, किन्तु यह तभी सम्भव है, जब मनुष्य में आध्यात्मिक दृष्टि का विकास हो, मानव-कल्याण की सात्त्विक भावना जगे। अतः स्वयं मानव को ही यह निर्णय करना है कि वह विज्ञान को वरदान रहने दे या अभिशाप बना दे।

आधुनिक यन्त्र-पुरुष : कम्प्यूटर

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारत में कम्प्यूटर का प्रयोग
  • कम्प्यूटर की उपयोगिता
  • लैपटॉप की शैक्षिक उपयोगिता

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना : कम्प्यूटर क्या है?
  2.  कम्प्यूटर के उपयोग
    (क) प्रकाशन के क्षेत्र में;
    (ख) बैंकों में;
    (ग) सूचनाओं के आदान-प्रदान में;
    (घ) आरक्षण के क्षेत्र में;
    (ङ) कम्प्यूटर ग्राफिक्स में,
    (च) कला के क्षेत्र में;
    (छ) संगीत के क्षेत्र में,
    (ज) खगोल-विज्ञान के क्षेत्र में;
    (झ) चुनावों में;
    (त्र) उद्योग-धन्धों में;
    (ट) सैनिक कार्यों में;
    (ठ) अपराध-निवारण में,
  3. कम्प्यूटर तकनीक से हानियां,
  4. कम्प्यूटर और मानव मस्तिष्क,
  5.  उपसंहार।

प्रस्तावना : कम्प्यूटर क्या है? – कम्प्यूटर असीमित क्षमताओं वाला वर्तमान युग का एक क्रान्तिकारी साधन है। यह एक ऐसा यन्त्र-पुरुष है, जिसमें यान्त्रिक मस्तिष्कों का रूपात्मक और समन्वयात्मक योग तथा गुणात्मक घनत्व पाया जाता है। इसके परिणामस्वरूप यह कम-से-कम समय में तीव्रगति से त्रुटिहीन गणनाएँ कर लेता है। आरम्भ में, गणित की जटिल गणनाएँ करने के लिए ही कम्प्यूटर का आविष्कार किया गया था। आधुनिक कम्प्यूटर के प्रथम सिद्धान्तकार चार्ल्स बैबेज (सन् 1792-1871 ई०) ने गणित और खगोल-विज्ञान की सूक्ष्म सारणियाँ तैयार करने के लिए ही एक भव्य कम्प्यूटर की योजना तैयार की थी। पिछली सदी के अन्तिम दशक में अमेरिकी इंजीनियर हरमन होलेरिथ ने जनगणना से सम्बन्धित आँकड़ों का विश्लेषण करने के लिए पंचका पर आधारित कम्प्यूटर का प्रयोग किया था। दूसरे महायुद्ध के दौरान पहली बार बिजली से चलने वाले कम्प्यूटर बने। इनका उपयोग भी गणनाओं के लिए ही हुआ। आज के कम्प्यूटर केवल गणनाएँ करने तक ही सीमित नहीं रह गये हैं। वरन् अक्षरों, शब्दों, आकृतियों और कथनों को ग्रहण करने में अथवा इससे भी अधिक अनेकानेक कार्य करने में समर्थ हैं। आज कम्प्यूटरों का मानव-जीवन के अधिकाधिक क्षेत्रों में उपयोग करना सम्भव हुआ है। अब कम्प्यूटर संचार और नियन्त्रण के भी शक्तिशाली साधन बन गये हैं। कम्प्यूटर के उपयोग-आज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कम्प्यूटरों के व्यापक उपयोग हो रहे हैं

(क) प्रकाशन के क्षेत्र में –  सन् 1971 ई० में माइक्रोप्रॉसेसर का आविष्कार हुआ। इस आविष्कार ने कम्प्यूटरों को छोटा, सस्ता और कई गुना शक्तिशाली बना दिया। माइक्रोप्रॉसेसर के आविष्कार के बाद कम्प्यूटर का अनेक कार्यों में उपयोग सम्भव हुआ। शब्द-संसाधक (वर्ड प्रॉसेसर) कम्प्यूटरों के साथ स्क्रीन व प्रिण्टर जुड़ जाने से इनकी उपयोगिता का खूब विस्तार हुआ है। सर्वप्रथम एक लेख सम्पादित होकर कम्प्यूटर में संचित होता है। टंकित मैटर को कम्प्यूटर की स्क्रीन पर देखा जा सकता है और उसमें संशोधन भी किया जा सकता है। इसके बाद मशीनों से छपाई होती है। अब तो अतिविकसित देशों (ब्रिटेन आदि) में बड़े समाचार-पत्रों में सम्पादकीय विभाग में एक सिरे पर कम्प्यूटरों में मैटर भरा जाता है तथा दूसरे सिरे पर तेज रफ्तार से इलेक्ट्रॉनिक प्रिण्टर समाचार-पत्र छापकर निकाल देते हैं।

(ख) बैंकों में  – कम्प्यूटर का उपयोग बैंकों में किया जाने लगा है। कई राष्ट्रीयकृत बैंकों ने चुम्बकीय संख्याओं वाली चेक-बुक भी जारी कर दी हैं। खातों के संचालन और लेन-देन का हिसाब रखने वाले कम्प्यूटर भी बैंकों में स्थापित हो रहे हैं। आज कम्प्यूटर के द्वारा ही बैंकों में 24 घण्टे पैसों के लेन-देन की ए० टी० एम० (Automated Teller Machine) जैसी सेवाएँ सम्भव हो सकी हैं। यूरोप और अमेरिका में ही नहीं अब भारत में भी ऐसी व्यवस्थाएँ अस्तित्व में आ गयी हैं कि घर के निजी कम्प्यूटरों के जरिये बैंकों से भी लेन-देन का व्यवहार सम्भव हुआ है।

(ग) सूचनाओं के आदान – प्रदान में प्रारम्भ में कम्प्यूटर की गतिविधियाँ वातानुकूलित कक्षों तक ही सीमित थीं, किन्तु अब एक कम्प्यूटर हजारों किलोमीटर दूर के दूसरे कम्प्यूटरों के साथ बातचीत कर सकता है तथा उसे सूचनाएँ भेज सकता है। दो कम्प्यूटरों के बीच यह सम्बन्ध तारों, माइक्रोवेव तथा उपग्रहों के जरिये स्थापित होता है। सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए देश के सभी प्रमुख छोटे-बड़े शहरों को कम्प्यूटर नेटवर्क के जरिये एक-दूसरे से जोड़ने की प्रक्रिया शीघ्र ही पूर्ण होने वाली है। इण्टरनेट जैसी सुविधा से आज देश का प्रत्येक नगर सम्पूर्ण विश्व से जुड़ गया है।

(घ) आरक्षण के क्षेत्र में –  कम्प्यूटर नेटवर्क की अनेक व्यवस्थाएँ अब हमारे देश में स्थापित हो गयी हैं। सभी प्रमुख एयरलाइन्स की हवाई यात्राओं के आरक्षण के लिए अब ऐसी व्यवस्था है कि भारत के किसी भी शहर से आपकी समूची हवाई-यात्रा के आरक्षण के साथ-साथ विदेशों में आपकी इच्छानुसार होटल भी आरक्षित हो जाएगा। कम्प्यूटर नेटवर्क से अब देश के सभी प्रमुख शहरों में रेल-यात्रा के आरक्षण की व्यवस्था भी अस्तित्व में आ गयी है।

(ङ) कम्प्यूटर ग्राफिक्स में  – कम्प्यूटर केवल अंकों और अक्षरों को ही नहीं, वरन् रेखाओं और आकृतियों को भी सँभाल सकते हैं। कम्प्यूटर ग्राफिक्स की इस व्यवस्था के अनेक उपयोग हैं। भवनों, मोटरगाड़ियों, हवाईजहाजों आदि के डिज़ाइन तैयार करने में कम्प्यूटर ग्राफिक्स का व्यापक उपयोग हो रहा है। वास्तुशिल्पी अब अपने डिज़ाइन कम्प्यूटर स्क्रीन पर तैयार करते हैं और संलग्न प्रिण्टर से इनके प्रिण्ट भी प्राप्त कर लेते हैं। यहाँ तक कि कम्प्यूटर चिप्स के सर्किटों के डिज़ाइन भी अब कम्प्यूटर ग्राफिक्स की मदद से तैयार होने लगे हैं। वैज्ञानिक अनुसन्धान भी कम्प्यूटर के स्क्रीन पर किये जा रहे हैं।

(च) कला के क्षेत्र में  – कम्प्यूटर अब चित्रकार की भूमिका भी निभाने लगे हैं। चित्र तैयार करने के लिए अब रंगों, तूलिकाओं, रंग-पट्टिका और कैनवास की कोई आवश्यकता नहीं रह गयी है। चित्रकार अब कम्प्यूटर के सामने बैठता है और अपने नियोजित प्रोग्राम की मदद से अपनी इच्छा के अनुसार स्क्रीन पर रंगीन रेखाएँ प्रस्तुत कर देता है। रेखांकनों से स्क्रीन पर निर्मित कोई भी चित्र ‘प्रिण्ट’ की कुञ्जी दबाते ही, अपने समूचे रंगों के साथ कम्प्यूटर से संलग्न प्रिण्टर द्वारा कागज पर छाप दिया जाता है।

(छ) संगीत के क्षेत्र में – कम्प्यूटर अब सुर सजाने का काम भी करने लगे हैं। पाश्चात्य संगीत के स्वरांकन को कम्प्यूटर स्क्रीन पर प्रस्तुत करने में कोई कठिनाई. नहीं होती, परन्तु वीणा जैसे भारतीय वाद्य की स्वरलिपि तैयार करने में कठिनाइयाँ आ रही हैं, परन्तु वह दिन दूर नहीं है जब भारतीय संगीत की स्वर-लहरियों को कम्प्यूटर स्क्रीन पर उभारकर उनका विश्लेषण किया जाएगा और संगीत-शिक्षा की नयी तकनीक विकसित की जा सकेगी।

(ज) खगोल-विज्ञान के क्षेत्र में –  कम्प्यूटरों ने वैज्ञानिक अनुसन्धान के अनेक क्षेत्रों का समूचा ढाँचा ही बदल दिया है। पहले खगोलविद् दूरबीनों पर रात-रातभर आँखें गड़ाकर आकाश के पिण्डों का अवलोकन करते थे, किन्तु अब किरणों की मात्रा के अनुसार ठीक-ठीक चित्र उतारने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरण उपलब्ध हो गये हैं। इन चित्रों में निहित जानकारी का व्यापक विश्लेषण अब कम्प्यूटरों से होता है।

(झ) चुनावों में – इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन भी एक सरल कम्प्यूटर ही है। मतदान के लिए ऐसी वोटिंग मशीनों का उपयोग सीमित पैमाने पर ही सही अब हमारे देश में भी हो रहा है।

(ञ) उद्योग-धन्धों में –  कम्प्यूटर उद्योग-नियन्त्रण के भी शक्तिशाली साधन हैं। बड़े-बड़े कारखानों के संचालन का काम अब कम्प्यूटर सँभालने लगे हैं। कम्प्यूटरों से जुड़कर रोबोट अनेक किस्म के औद्योगिक उत्पादनों को सँभाल सकते हैं। कम्प्यूटर भयंकर गर्मी और ठिठुरती सर्दी में भी यथावत् कार्य करते हैं। इनका उस पर कोई असुर नहीं पड़ता। हमारे देश में अब अधिकांश निजी व्यवसायों में कम्प्यूटर का प्रयोग होने लगा है।

(ट) सैनिक कार्यों में –  आज प्रमुख रूप से महायुद्ध की तैयारी के लिए नये-नये शक्तिशाली सुपर कम्प्यूटरों का विकास किया जा रहा है। महाशक्तियों की ‘स्टार वार्स की योजना कम्प्यूटरों के नियन्त्रण पर आधारित है। पहले भारी कीमत देकर हमारे देश में सुपर कम्प्यूटर आयात किये जा रहे थे; परन्तु अब इन सुपर कम्प्यूटरों का निर्माण हमारे देश में भी किया जा रहा है।

(ठ) अपराध-निवारण में – अपराधों के निवारण में भी कम्प्यूटर की अत्यधिक उपयोगिता है। पश्चिम के कई देशों में सभी अधिकृत वाहन मालिकों, चालकों, अपराधियों का रिकॉर्ड पुलिस के एक विशाल कम्प्यूटर में संरक्षित होता है। कम्प्यूटर द्वारा क्षण मात्र में अपेक्षित जानकारी उपलब्ध हो जाती है, जो कि अपराधियों के पकड़ने में सहायक सिद्ध होती है। यही नहीं, किसी भी अपराध से सन्दर्भित अनेकानेक तथ्यों में से विश्लेषण द्वारा कम्प्यूटर नये तथ्य हूँढ़ लेता है तथा किसी अपराधी को कैसा भी चित्र उपलब्ध होने पर वह उसकी सहायता से अपराधी के किसी भी उम्र और स्वरूप की तस्वीर प्रस्तुत कर सकता है।

कम्प्यूटर तकनीक से हानियाँ – जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कम्प्यूटर तकनीकी के निरन्तर बढ़ते जा रहे . व्यापक उपयोगों ने जहाँ एक ओर इसकी उपयोगिता दर्शायी है, वहीं दूसरी ओर इसके भयावह परिणामों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह स्पष्ट प्रतीत हो रही है कि कम्प्यूटर प्रत्येक क्षेत्र में मानव-श्रम को नगण्य बना देगा, जिससे भारत सदृश जनसंख्या बाहुल्य देशों में बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप धारण कर लेगी। विभिन्न विभागों में इसकी स्थापना से कर्मचारी भविष्य के प्रति अनाश्वस्त हो गये हैं। बैंकों आदि में इस व्यवस्था के कुछ दुष्परिणाम भी सामने आये हैं। दूसरों के खातों के कोड नम्बर जानकर प्रति वर्ष करोड़ों रुपयों से बैंकों को ठगना सामान्य बात हो गयी है। ज्योतिष के क्षेत्र में भी कम्प्यूटर के परिणाम शत-प्रतिशत सही नहीं निकलते हैं।

कम्प्यूटर और मानव-मस्तिष्क – कम्प्यूटर के सन्दर्भ में ढेर सारी भ्रान्तियाँ जन-सामान्य के मस्तिष्क में छायी हुई हैं। कुछ लोग इसे सुपर पावर समझ बैठे हैं, जिसमें सब कुछ करने की क्षमता है। किन्तु उनकी धारणाएँ पूर्णरूपेण निराधार हैं। वास्तविकता तो यह है कि कम्प्यूटर एकत्रित आँकड़ों का इलेक्ट्रॉनिक विश्लेषण प्रस्तुत करने वाली एक मशीन मात्र है। यह केवल वही काम कर सकता है, जिसके लिए इसे निर्देशित किया गया हो। यह कोई निर्णय स्वयं नहीं ले सकता और न ही कोई नवीन बात सोच सकता है। यह मानवीय संवेदनाओं, अभिरुचियों, भावनाओं और चित्त से रहित मात्र एक यन्त्र-पुरुष है, जिसकी बुद्धि-लब्धि (Intelligence Quotient : I.O.) मात्र एक मक्खी के बराबर होती है, यानि बुद्धिमत्ता में कम्प्यूटर मनुष्य से कई हजार गुना पीछे है।।

उपसंहार – निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी के भी दो पक्ष हैं। इसको सोच-समझकर उपयोग किया जाए तो यह वरदान सिद्ध हो सकता है, अन्यथा यह मानव-जाति की तबाही का साधन भी बन सकता है। इसीलिए कम्प्यूटर की क्षमताओं को ठीक से समझना जरूरी है। इलेक्ट्रॉनिकी शिक्षा एवं साधन कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी की उपेक्षा नहीं कर सकते, लेकिन इनके लिए यदि बुनियादी शिक्षा की समुचित व्यवस्था की जाती, देश में टेक्नोलॉजी के साधन जुटाये जाते और पाश्चात्य संस्कृति में विकसित हुई इस टेक्नोलॉजी को देश की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर धीरे-धीरे अपनाया जाता तो अच्छा होता।

 इण्टरनेट

सम्बद्ध शीर्षक

  • इण्टरनेट का विकास और उपलब्ध सेवाएँ
  • भारत में इण्टरनेट का विकास
  • जनसंचार के बढ़ते चरण
  • वर्तमान युग में जनसंचार का महत्त्व

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  भूमिका,
  2.  इतिहास और विकास,
  3. इण्टरनेट सम्पर्क,
  4.  इण्टरनेट सेवाएँ,
  5.  भारत में इण्टरनेट,
  6. भविष्य की दिशाएँ,
  7.  उपसंहार।

भूमिका – इण्टरनेट ने विश्व में जैसा क्रान्तिकारी परिवर्तन किया, वैसा किसी भी दूसरी टेक्नोलॉजी ने नहीं किया। नेट के नाम से लोकप्रिय इण्टरनेट अपने उपभोक्ताओं के लिए बहुआयामी साधन प्रणाली है। यह दूर बैठे उपभोक्ताओं के मध्य अन्तर-संवाद का माध्यम है; सूचना या जानकारी में भागीदारी और सामूहिक रूप से काम करने का तरीका है; सूचना को विश्व स्तर पर प्रकाशित करने का जरिया है और सूचनाओं का अपार सागर है। इसके माध्यम से इधर-उधर फैली तमाम सूचनाएँ प्रसंस्करण के बाद ज्ञान में परिवर्तित हो रही हैं। इसने विश्व-नागरिकों के बहुत ही सुघड़ और घनिष्ठ समुदाय का विकास किया है। इण्टरनेट विभिन्न टेक्नोलॉजियों के संयुक्त रूप से कार्य का उपयुक्त उदाहरण है। कम्प्यूटरों के बड़े पैमाने पर उत्पादन, कम्प्यूटर सम्पर्क-जाल का विकास, दूर-संचार सेवाओं की बढ़ती उपलब्धता और घटता खर्च तथा आँकड़ों के भण्डारण और सम्प्रेषण में आयी नवीनता ने नेट के कल्पनातीत विकास और उपयोगिता को बहुमुखी प्रगति प्रदान की है। आज किसी समाज के लिए इण्टरनेट वैसी ही ढाँचागत आवश्यकता है जैसे कि सड़कें, टेलीफोन या विद्युत् ऊर्जा।

इतिहास और विकास – इण्टरनेट का इतिहास पेचीदा है। इसका पहला दृष्टान्त सन् 1962 ई० में मैसाचुसेट्स टेक्नोलॉजी संस्थान के जे० सी० आर० लिकप्लाइडर द्वारा लिखे गये कई ज्ञापनों के रूप में सामने आया था। उन्होंने कम्प्यूटर की ऐसी विश्वव्यापी अन्तर्सम्बन्धित श्रृंखला की कल्पना की थी जिसके जरिये वर्तमान इण्टरनेट की तरह ही आँकड़ों और कार्यक्रमों को तत्काल प्राप्त किया जा सकता था। इस प्रकार के नेटवर्क में सहायक बनी तकनीकी सफलता पहली बार इसी संस्थान के लियोनार्ड क्लिनरोक ने सुझायी थी।

इण्टरनेट के इतिहास में 1973 का वर्ष ऐसा था जिसने अनेक मील के पत्थर जोड़े और इस प्रकार अधिक विश्वसनीय और स्वतन्त्र नेटवर्क की शुरुआत हुई। इसी वर्ष में इण्टरनेट ऐक्टिविटीज बोर्ड की स्थापना की गयी। इस वर्ष के नवम्बर महीने में डोमेन नेमिंग सर्विस (डीएनएस) का पहला विवरण जारी किया गया और वर्ष की आखिरी महत्त्वपूर्ण घटना इण्टरनेट का सेना और आम लोगों के लिए उपयोग के वर्गीकरण द्वारा सार्वजनिक नेटवर्क के उदय के रूप में सामने आया तथा इसी के साथ आज प्रचलित इण्टरनेट ने जन्म लिया। इण्टरनेट का बाद का इतिहास मुख्यतः बहुविध उपयोग का है, जो नेटवर्क की आधारभूत संरचना से ही सम्भव हो सका। बहुविध उपयोग की दिशा में पहला कदम फाइल ट्रांसफर प्रणाली का विकास था। इससे दूर-दराज के कम्प्यूटरों के बीच फाइलों का आदान-प्रदान सम्भव हो सका। सन् 1984 ई० में इण्टरनेट से जुड़े कम्प्यूटरों की संख्या 1000 थी जो सन् 1989 ई० में एक लाख के ऊपर पहुँच चुकी थी। सन् 1990 ई० में ही टिम बर्नर-ली ने वर्ल्ड वाइड वेब (www) का आविष्कार करके सूचना प्रस्तुति का एक नया तरीका सामने रखा, जो सरलता से इस्तेमाल योग्य सिद्ध हुआ।

सन् 1993 ई० में ट्रैफिकल वेब ब्राउजर का आविष्कार इण्टरनेट के क्षेत्र में एक बड़ी घटना थी। इससे न केवल विवरण वरन् चित्रों का भी दिग्दर्शन सम्भव हो गया। इस वेब ब्राउजर को मोजाइक कहा गया। इस समय तक इण्टरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 20 लाख से अधिक हो गयी थी और आज प्रचलित इण्टरनेट आकार ले चुका था।

इण्टरनेट सम्पर्क – इण्टरनेट का आधार राष्ट्रीय या क्षेत्रीय सूचना इन्फ्रास्ट्रक्चर होता है जो सामान्यतः हाइबैण्ड विड्थ टूक लाइनों से बना होता है और जहाँ से विभिन्न सम्पर्क लाइनें कम्प्यूटरों को जोड़ती हैं जिन्हें आश्रयदाता (होस्ट) कम्प्यूटर कहते हैं। ये आश्रयदाता कम्प्यूटर प्रायः बड़े संस्थानों; जैसे—विश्वविद्यालयों, बड़े उद्यमों और इण्टरनेट कम्पनियों से जुड़े होते हैं और इन्हें इण्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर (आईएसपी) कहा जाता है। आश्रयदाता कम्प्यूटर चौबीसों घण्टे काम करते हैं और अपने उपभोक्ताओं को सेवा प्रदान करते हैं। ये कम्प्यूटर विशेष संचार लाइनों के जरिये इण्टरनेट से जुड़े रहते हैं। इनके उपभोक्ताओं/व्यक्तियों के पीसी (पर्सनल कम्प्यूटर) साधारण टेलीफोन लाइन और मोडेम के जरिए इण्टरनेट से जुड़े रहते हैं। एक सामान्य उपभोक्ता एक निश्चित राशि का भुगतान करके आईएसपी से अपना इण्टरनेट खाता प्राप्त कर लेता है। आईएसपी लॉगइन नेम, पासवर्ड (जिसे उपभोक्ता बदल भी सकता है) और नेट से जुड़ने के लिए कुछ एक जानकारियाँ उपलब्ध करा देता है। एक बार इण्टरनेट से जुड़ जाने पर उपभोक्ता इण्टरनेट की तमाम सेवाओं तक अपनी पहुँच बना सकता है। इसके लिए उसे सही कार्यक्रम का चयन करना होता है। ज्यादातर इण्टरनेट सेवाएँ उपभोक्ता-सर्वर रूपाकार पर काम करती हैं। इनमें सर्वर वे कम्प्यूटर हैं जो नेट से जुड़े हुए व्यक्तिगत कम्प्यूटर उपभोक्ताओं को एक या अधिक सेवाएँ उपलब्ध कराते हैं। इस सेवा के वास्तविक प्रयोग के लिए उपभोक्ता को उस विशेष सेवा के लिए आश्रित (क्लाइण्ट) सॉफ्टवेयर की जरूरत होती है।

इण्टरनेट सेवाएँ – इण्टरनेट की उपयोगिता उपभोक्ता को उपलब्ध सेवाओं से निर्धारित होती है। इसके उपभोक्ता को निम्नलिखित सेवाएँ उपलब्ध हैं

(क) ई-मेल – ई-मेल या इलेक्ट्रॉनिक मेल इण्टरनेट का सबसे लोकप्रिय उपयोग है। संवाद के अन्य माध्यमों की तुलना में सस्ता, तेज और अधिक सुविधाजनक होने के कारण इसने दुनिया भर के घरों और कार्यालयों में अपनी जगह बना ली है। इसके द्वारा पहले भाषायी पाठ ही प्रेषित किया जा सकती थी, लेकिन अब सन्देश, चित्र, अनुकृति, ध्वनि, आँकड़े आदि भी प्रेषित किये जा सकते हैं।

(ख) टेलनेट – टेलनेट एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके माध्यम से उपभोक्ता को किसी दूर स्थित कम्प्यूटर से स्वयं को जोड़ने की सुविधा प्राप्त हो जाती है।

(ग) इण्टरनेट चर्चा (चैट) – नयी पीढ़ी में इण्टरनेट रिले चैट यो चर्चा व्यापक रूप से लोकप्रिय है। यह ऐसी गतिविधि है, जिसमें भौगोलिक रूप से दूर स्थित व्यक्ति एक ही चैट सर्वर पर लॉग करके की-बोर्ड के जरिये एक-दूसरे से चर्चा कर सकते हैं। इसके लिए एक वांछित व्यक्ति की आवश्यकता होती है, जो निश्चित समय पर उस लाइन पर सुविधापूर्वक उपलब्ध हो।

(घ) वर्ल्ड वाइड वेब – यह सुविधा इण्टरनेट के सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रचलित उपयोगों में से एक है। यह इतनी आसान है कि इसके प्रयोग में बच्चों को भी कठिनाई नहीं होती। यह मनचाही संख्या वाले अन्तर्सम्बन्धित डॉक्युमेण्ट का समूह है, जिसमें से प्रत्येक डॉक्युमेण्ट की पहचान उसके विशेष पते से की जा सकती है। इस पर उपलब्ध सबसे महत्त्वपूर्ण सेवाओं में से एक सचिंग है। इण्टरनेट में शताधिक सर्च-इंजन कार्यरत हैं जिनमें गूगल सर्वाधिक लोकप्रिय है।

(ङ) ई-कॉमर्स – इण्टरनेट की प्रगति की ही एक परिणति ई-कॉमर्स है। किसी भी प्रकार के व्यवसाय को संचालित करने के लिए इण्टरनेट पर की जाने वाली कार्यवाही को ई-कॉमर्स कहते हैं। इसके अन्तर्गत वस्तुओं का क्रय-विक्रय, विभिन्न व्यक्तियों या कम्पनियों के मध्य सेवा या सूचना आते हैं। इन मुख्य सेवाओं के अतिरिक्त इण्टरनेट द्वारा और भी अनेक सेवाएँ प्रदान की जाती हैं, जिनके असीमित उपयोग हैं।

भारत में इण्टरनेट – भारत में इण्टरनेट का आरम्भ आठवें दशक के अन्तिम वर्षों में अनेट (शिक्षा और अनुसन्धान नेटवर्क) के रूप में हुआ था। इसके लिए भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक विभाग और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी थी। इस परियोजना में पाँच प्रमुख संस्थान, पाँचों भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और इलेक्ट्रॉनिक निदेशालय सम्मिलित थे। अनेंट का आज व्यापक प्रसार हो चुका है और वह शिक्षा और शोध समुदाय को देशव्यापी सेवा दे रहा है। एक अन्य प्रमुख नेटवर्क नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेण्टर (एनआईसी) के रूप में सामने आया, जिसने प्रायः सभी जनपद मुख्यालयों को राष्ट्रीय नेटवर्क से जोड़ दिया। आज देश के विभिन्न भागों में यह 1400 से भी अधिक स्थलों को अपने नेटवर्क के जरिये जोड़े हुए है। आम आदमी के लिए भारत में इण्टरनेट का आगमन 15 अगस्त, 1995 ई० को हो गया था, जब विदेश संचार निगम लिमिटेड ने देश में अपनी सेवाओं का आरम्भ किया। प्रारम्भ के कुछ वर्षों तक इण्टरनेट की पहुँच काफी धीमी रही, लेकिन हाल के वर्षों में इसके उपभोक्ता की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई है। सन् 1999 ई० में । टेलीकॉम क्षेत्र निजी कम्पनियों के लिए खोल दिये जाने के परिणामस्वरूप अनेक नये सेवा प्रदाता बेहद प्रतिस्पर्धी विकल्पों के साथ सामने आए। भारत में, इण्टरनेट का उपयोग करने वाले विश्व की तुलना में चौथे स्थान पर हैं। सरकारी एजेंसियाँ इस बात के लिए प्रयासरत हैं कि आईटी का लाभ सामान्य जन तक पहुँचाया जा सके। भारतीय रेल द्वारा कम्प्यूटरीकृत आरक्षण, आन्ध्र प्रदेश सरकार द्वारा शहरों के मध्य सूचना प्रणाली की स्थापना तथा केरल सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा फास्ट रिलायबिल इन्स्टेण्ट एफीशिएण्ट नेटवर्क फॉर डिस्बर्समेण्ट ऑफ सर्विसेज (फ्रेण्ड्स) जैसी पेशकशों ने इस दिशा में देश के आम नागरिकों की अपेक्षाओं को बहुत बढ़ा दिया है।

भविष्य की दिशाएँ – भविष्य के प्रति इण्टरनेट बहुत ही आश्वस्तकारी दिखाई दे रहा है और आज के आधार पर कहीं अधिक प्रगतिशाली सेवाएँ प्रदान करने वाला होगी। भविष्य के नेटवर्क जिन उपकरणों और साधनों को जोड़ेंगे, वे मात्र कम्प्यूटर नहीं होंगे, वरन् माइक्रोचिप से संचालित होने के कारण तकनीकी अर्थों में कम्प्यूटर जैसे होंगे। आने वाले समय में केवल कार्यालय ही नहीं निवास, स्कूल, अस्पताल और हवाई अड्डे एक-दूसरे से जुड़े हुए होंगे। इण्टरनेट व्यक्तियों और समुदायों को परस्पर घनिष्ठ रूप से काम करने के लिए सक्षम बना देगा और भौगोलिक दूरी के कारण आने वाली बाधाओं को समाप्त कर देगा। कम्प्यूटर रचित समुदायों का उदय हो जाएगा और तब दमनकारी शासकों के लिए विश्व में अपनी लोकप्रियता को सुरक्षित रख पाना सम्भव नहीं रह जाएगा। भविष्य में टेक्नोलॉजी का उपयोग संस्कृति, भाषा और विरासत की विविधता की रक्षा के लिए किया जाएगा तथा भविष्य की राजनीतिक व्यवस्था भी इस सबसे अछूती नहीं रहेगी।

उपसंहार – टेक्नोलॉजियों के लोकप्रिय होते ही सामान्य शिक्षित नागरिकों के लिए भी यह पूरी तरह आसान हो जाएगा कि वह कानून-निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी कर सकें। इसके फलस्वरूप कहीं अधिक समर्थ लोकतन्त्र सम्भव हो सकेगा जिसमें निर्वाचित प्रतिनिधियों के उत्तरदायित्व कुछ अलग प्रकार के होंगे। भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती इण्टरनेट टेक्नोलॉजी के दोहन की है जिससे समाज के हर वर्ग तक उसके फायदों की पहुँच सम्भव बनायी जा सके। किसी भी टेक्नोलॉजी का उपयोग हमेशा समूचे समाज के लिए होना चाहिए न कि उसको समाज के कुछ वर्गों को वंचित करने के लिए एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। एक बार यह उपलब्धि हासिल की जा सके तो वास्तव में सम्भावनाओं की कोई सीमा ही नहीं है। संक्षेप में, क्रान्ति तो अभी आरम्भ ही हुई है।

भारत की वैज्ञानिक प्रगति

सम्बद्ध शीर्षक

  • विज्ञान की उपलब्धियाँ
  • राष्ट्रीय विकास में विज्ञान का योगदान

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2.  स्वतन्त्रता पूर्व और पश्चात् की स्थिति,
  3.  विभिन्न क्षेत्रों में हुई वैज्ञानिक प्रगति,
  4. उपसंहार।

प्रस्तावना – सामान्य मनुष्य की मान्यता है कि सृष्टि का रचयिता सर्वशक्तिमान ईश्वर है, जो इस संसार का निर्माता, पालनकर्ता और संहारकर्ता है। आज विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि वह ईश्वर के प्रतिरूप ब्रह्मा (निर्मात्ता), विष्णु (पालनकर्ता) और महेश (संहारकर्ता) को चुनौती देता प्रतीत हो रहा है। कृत्रिम गर्भाधान से परखनली शिशु उत्पन्न करके उसने ब्रह्मा की सत्ता को ललकारा है, बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना कर और लाखों-करोड़ों लोगों को रोजगार देकर उसने विष्णु को चुनौती दी है तथा सर्व-विनाश के लिए परमाणु बम का निर्माण कर उसने शिव को चकित कर दिया है।

विज्ञान का अर्थ है किसी भी विषय में विशेष ज्ञान। विज्ञान मानव के लिए कामधेनु की तरह है जो उसकी सभी कामनाओं की पूर्ति करती है तथा उसकी कल्पनाओं को साकार रूप देता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विज्ञान प्रवेश कर चुका है चाहे वह कला का क्षेत्र हो या संगीत और राजनीति का। विज्ञान ने समस्त पृथ्वी और अन्तरिक्ष को विष्णु के वामनावतार की भाँति तीन डगों में नाप डाला है।

स्वतन्त्रता पूर्व और पश्चात् की स्थिति – बीसवीं शताब्दी को विज्ञान के क्षेत्र में अनेक प्रकार की उपलब्धियाँ हासिल करने के कारण विज्ञान को युग कहा गया है। आज संसार ने ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में बहुत अधिक प्रगति कर ली है। भारत भी इस क्षेत्र में किसी अन्य वैज्ञानिक दृष्टि से उन्नत कहे जाने वाले देशों से यदि आगे नहीं, तो बहुत पीछे या कम भी नहीं है। 15 अगस्त, सन् 1947 में जब अंग्रेजों की गुलामी का जुआ उतार कर भारत स्वतन्त्र हुआ था, तब तक कहा जा सकता है कि भारत वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर शून्य से अधिक कुछ भी नहीं था। सूई तक का आयात इंग्लैण्ड आदि देशों से करना पड़ता था। लेकिन आज सूई से लेकर हवाई जहाज, जलयान, सुपर कम्प्यूटर, उपग्रह तक अपनी तकनीक और बहुत कुछ अपने साधनों से इस देश में ही बनने लगे हैं। लगभग पाँच दशकों में इतनी अधिक वैज्ञानिक प्रगति एवं विकास करके भारत ने केवल . विकासोन्मुख राष्ट्रों को ही नहीं, वरन् उन्नत एवं विकसित कहे जाने वाले राष्ट्रों को भी चकित कर दिया है। भारतीय प्रतिभा का लोहा आज सम्पूर्ण विश्व मानने लगा है।

विभिन्न क्षेत्रों में हुई वैज्ञानिक प्रगति – डाक-तार के उपकरण, तरह-तरह के घरेलू इलेक्ट्रॉनिक सामान, रेडियो-टेलीविजन, कारें, मोटर गाड़ियाँ, ट्रक, रेलवे इंजन और यात्री तथा अन्य प्रकार के डिब्बे, कल-कारखानों में काम आने वाली छोटी-बड़ी मशीनें, कार्यालयों में काम आने वाले सभी प्रकार के सामान, रबर-प्लास्टिक के सभी प्रकार के उन्नत उपकरण, कृषि कार्य करने वाले ट्रैक्टर, पम्पिंग सेट तथा अन्य कटाई-धुनाई–पिसाई की मशीनें आदि सभी प्रकार के आधुनिक विज्ञान की देन माने जाने वाले साधन आज भारत में ही बनने लगे हैं। कम्प्यूटर, छपाई की नवीनतम तकनीक की मशीनें आदि भी आज भारत बनाने लगा है। इतना ही नहीं, आज भारत में अणु शक्ति से चालित धमन भट्टियाँ, बिजली घर, कल-कारखाने आदि भी चलने लगे हैं तथा अणु-शक्ति का उपयोग अनेक शान्तिपूर्ण कार्यों के लिए होने लगा है। पोखरण में भूमिगत अणु-विस्फोट करने की बात तो अब बहुत पुरानी हो चुकी है।

आज भारतीय वैज्ञानिक अपने उपग्रह तक अन्तरिक्ष में उड़ाने तथा कक्षा में स्थापित करने में सफल हो चुके हैं। आवश्यकता होने पर संघातक अणु, कोबॉल्ट और हाइड्रोजन जैसे बम बनाने की दक्षता भी भारतीय वैज्ञानिकों ने हासिल कर ली है। विज्ञान-साधित उपकरणों, शस्त्रास्त्रों का आज सैनिक दृष्टि से बहुत अधिक महत्त्व बढ़ . गया है। अपने घर बैठकर शत्रु देश के दूर-दराज के इलाकों पर आक्रमण कर पाने की वैज्ञानिक विधियाँ और शस्त्रास्त्र आज विशेष महत्त्वपूर्ण हो गये हैं। धरती से धरती तक, धरती से आकाश तक मार कर सकने वाली कई तरह की मिसाइलें भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा बनायी गयी हैं जो आज भारतीय सेना के पास हैं और अन्य अनेकों को विकास कार्यक्रम अनवरत चल रहा है। युद्धक टैंक, विमान, दूर-दूर तक मार करने वाली तोपें आदि भारत में ही बन रही हैं। कहा जा सकता है कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की सहायता से विश्व के सैन्य अभियान जिस दिशा में चल रहे हैं, भारत भी उस दिशा में किसी से पीछे नहीं है। गणतन्त्र दिवस की परेड के अवसर पर प्रदर्शित उपकरणों से यह स्पष्ट हो जाता है। फिर भी भारत को इस दिशा में अभी बहुत कुछ करना है।

विज्ञान ने भारतीयों के रहन-सहन और चिन्तन-शक्ति को पूर्णरूपेण बदल डाला है। भारत हवाई जहाज, समुद्र के वक्षस्थल को चीरने वाले जहाज, आकाश का सीना चीर कर निकल जाने वाले रॉकेट, कृत्रिम उपग्रह आदि के निर्माण में अपना अग्रणी स्थान रखता है। 19 अप्रैल, 1975 को सोवियत प्रक्षेपण केन्द्र से ‘आर्यभट्ट’ नामक उघग्रह का सफल प्रक्षेपण कर भारत ने अन्तरिक्ष युग में प्रवेश किया और तब से आज तक उसने मुड़कर पीछे नहीं देखा। स्क्वैडून लीडर राकेश शर्मा 1984 ई० में रूसी अन्तरिक्ष यात्रियों के साथ अन्तरिक्ष यात्रा भी कर चुके हैं। भास्कर, ऐपल, इन्सेट, रोहिणी जैसे अनेक उपग्रह अन्तरिक्ष में स्थापित कर भारत विश्व की महाशक्तियों के समकक्ष खड़ा है। इन उपग्रहों से हमें मौसम सम्बन्धी जानकारी मिलती है तथा संचार व्यवस्था भी सुदृढ़ हुई है।

आधुनिक विज्ञान की सहायता से आज भारत ने चिकित्सा क्षेत्र में बड़ी प्रगति की है। एक्स-रे, लेज़र किरणें आदि की सहायता से अब भारत में ही असाध्य समझे जाने वाले अनेक रोगों के उपचार होने लगे हैं। हृदय-प्रत्यारोपण, गुर्दे का प्रत्यारोपण, जैसे कठिन-से-कठिन माने जाने वाले ऑपरेशन आज भारतीय शल्य-चिकित्सकों द्वारा सफलतापूर्वक सम्पादित किये जा रहे हैं। सभी प्रकार की बहुमूल्य प्राण-रक्षक ओषधियों का निर्माण भी यहाँ होने लगा है।

ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारतीय वैज्ञानिकों की प्रगति सराहनीय है। इन्होंने नदियों की मदमस्त चाल को बाँधकर उनके जल का उपयोग सिंचाई और विद्युत निर्माण में किया। सौर ऊर्जा, पवनचक्कियाँ, ताप बिजलीघर, परमाणु बिजलीघर आदि ऊर्जा के क्षेत्र में हमारी प्रगति को दर्शाते हैं। महानगरों में गगनचुम्बी इमारतों का निर्माण, सड़कें, फ्लाई ओवर, सब-वे आदि हमारी अभियान्त्रिकीय प्रगति को दर्शाते हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के भीतर से जल, अनेक खनिज और समुद्र को चीर कर तेल के कुएँ भी खोज निकाले हैं। बॉम्बे हाई से तेल का उत्खनन इसका जीता-जागता उदाहरण है।

कुछ एक अपवादों को छोड़कर, भारत में अधिकांश कार्य हाथों के स्थान पर मशीनों से हो सकने सम्भव हो गये । हैं। मानव का कार्य अब इतना ही रह गया है कि वह इन मशीनों पर नियन्त्रण रखे। आटा पीसने से लेकर पूँधने तक, फसल बोने से लेकर अनाज को बोरियों में भरने, वृक्ष काटने से लेकर फर्नीचर बनाने तक सभी कार्य भारत में निर्मित मशीनों द्वारा सम्पन्न होने लगे हैं। विज्ञान ने मानव के दैनिक जीवन के लिए भी अनेक क्रान्तिकारी सुविधाएँ जुटायी हैं। रेडियो, फैक्स, रंगीन टेलीविजन, टेपरिकॉर्डर, वी० सी० आर०, सी० डी० प्लेयर, डी०वी०डी० प्लेयर, दूरभाष, कपड़े धोने की मशीन, धूल-मिट्टी हटाने की मशीन, कूलर, पंखा, फ्रिज, एयरकण्डीशनर, हीटर आदि आरामदायक मशीनें भारत में ही बनने लगी हैं, जिनके अभाव में मानव-जीवन नीरस प्रतीत होता है। घरों में लकड़ी-कोयले से जलने वाली अँगीठी का स्थान कुकिंग गैस ने और गाँवों में उपलों से जलने वाले चूल्हों का स्थान गोबर गैस संयन्त्र ने ले लिया है। चलचित्रों के क्षेत्र में हमारी प्रगति सराहनीय है। कम्प्यूटर को प्रवेश और उसका विस्तार हमारी तकनीकी प्रगति की ओर इंगित करते हैं।

उपसंहार – घर-बाहर, दफ्तर-दुकान, शिक्षा-व्यवसाय, आज कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं जहाँ विज्ञान का प्रवेश न हुओं हो। भारत का होनहार वैज्ञानिक प्रत्येक दिशा, स्थल और क्षेत्र में सक्रिय रहकर अपनी निर्माण एवं नव-नव अनुसन्धान-प्रतिभा का परिचय दे रहा है। इतना ही नहीं भारतीय वैज्ञानिकों ने विदेशों में भी भारतीय वैज्ञानिक प्रतिभा की धूम मचा रखी है। आज भारत में जो कृषि या हरित क्रान्ति, श्वेत क्रान्ति आदि सम्भव हो पायी है, उन सभी को कारण विज्ञान और उसके द्वारा प्रदत्त नये-नये उपकरण तथा ढंग ही हैं। आज हम जो कुछ भी खाते-पीते और पहनते हैं, सभी के पीछे किसी-न-किसी रूप में विज्ञान को कार्यरत पाते हैं। विज्ञान को कार्यरत करने वाले कोई विदेशी नहीं, वरन् भारतीय वैज्ञानिक ही हैं। उन्हीं की लगन, परिश्रम और कार्य-साधना से हमारा देश भारत आज इतनी अधिक वैज्ञानिक प्रगति कर सका है। भविष्य में यह और भी अधिक, सारे संसार से बढ़करे वैज्ञानिक प्रगति कर पाएगा इस बात में कतई कोई सन्देह नहीं।

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विज्ञान सम्बन्धी निबन्ध help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विज्ञान सम्बन्धी निबन्ध, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.