UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 5 गीतामृतम्

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name गीतामृतम्
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 5 गीतामृतम्

श्लोकों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) तं तथा ……………………… मधुसूदनः।।

[कृपयाविष्ठमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् (कृपया +आविष्टम् +अश्रुपूर्ण +आकुल + ईक्षणम्) = करुणा से युक्त (दयनीय), आँसुओं से परिपूर्ण व्याकुल नेत्रों वाले (अर्जुन)। विषीदन्तम् = दुःखी होते हुए (विषाद करते हुए)। मधुसूदनः = भगवान् कृष्ण।]

सन्दर्भ – यह श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘गीतामृतम्’ नामक पाठ से उद्धृत है। इस पाठ में कुरुक्षेत्र की रणभूमि में दुःखित होते हुए अर्जुन को भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा प्रबोध दिये जाने का वर्णन
[ विशेष – इस पाठ के समस्त श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

अनुवाद – भगवान् कृष्ण ने उस प्रकार से दयनीय, आँसुओं से परिपूर्ण व्याकुल नेत्रों वाले, (और) दुःखी होते हुए उस (अर्जुन) से यह वाक्य कहा।

(2) क्लै व्यं ……………… परन्तप।

[क्लैव्यम् = कायरता को। मा स्म गमः = मत प्राप्त हो। पार्थ – अर्जुन (पृथा या कुन्ती के पुत्र)। नैतत्त्वय्युपपद्यते (न+एतत् +त्वयि +उपपद्यते) = यह तेरे योग्य नहीं है। क्षुद्रम् -तुच्छ| हृदय- दौर्बल्यम् = हृदय की दुर्बलता को। त्यक्त्वा = छोड़कर। उत्तिष्ठ – उठ खड़ा हो। परन्तप = हे शत्रुओं को ताप (पीड़ा) पहुँचाने वाले (अर्जुन)।]

अनुवाद – हे पृथापुत्र (अर्जुन)! कायरता को मत प्राप्त हो (अर्थात् कायर मत बन)। यह (कायरता की) बात करना तेरे योग्य नहीं है। हे शत्रुसन्तापकारी! तू हृदय की (इस) तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर (युद्ध के लिए) उठ खड़ा हो।।

(3) अशोच्यानन्वशोचस्त्वं …………………………. पण्डिताः ।।

[ अशोच्यानन्वशोचस्त्वं (अशोच्यान् +अन्वशोचः +त्वं) =शोक न करने योग्य लोगों के लिए शोक करता है तू। प्रज्ञावादांश्च (प्रज्ञावादान +च) = और पण्डितों के से वचनों को। गतासूनगतासूश्च (गतासून + अगतासून +च) =मरे हुओं (गत -निकल गये; असून =प्राण जिनके) और जीवितों के लिए। नानुशोचन्ति (न + अनुशोचन्ति) = शोक नहीं करते।]

अनुवाद – (हे अर्जुन!) तुम शोक न करने योग्य (लोगों) के लिए शोक कर रहे हो और बुद्धिमानों जैसी बात (भी) कर रहे हो। (जब कि) मरे हुओं के लिए और जीवितों के लिए पण्डितजन (विद्वान् व्यक्ति) शोक नहीं
करते हैं।

(4) देहिनोऽस्मिन् ……………… न मुह्यति।।

[ देहिनोऽस्मिन् (देहिनः + अस्मिन्) = जीवात्मा की इस (में)। देहे = शरीर में। जरा = वृद्धावस्था। देहान्तरप्राप्तिर्षीरस्तत्र (देहान्तरप्राप्तिः + धीरः +तत्र) – दूसरा शरीर प्राप्त होना। बुद्धिमान् (धीर!) इस विषय में (तत्र)| मुह्यति = मोहित होता है (भ्रम में पड़ता है)।]

अनुवाद – जैसे जीवात्मा को इस शरीर में कुमारावस्था, यौवन तथा बुढ़ापा प्राप्त होता है, वैसे ही दूसरा शरीर भी प्राप्त होता है। इसमें बुद्धिमान् व्यक्ति मोहग्रस्त नहीं होता। आशय यह है कि जैसे व्यक्ति को कौमार्य, यौवन और बुढ़ापे से किसी प्रकार का शोक नहीं होता; क्योंकि वह यह जानता है कि ये तो शरीर के धर्म हैं, जो होंगे ही। इसी प्रकार उसे यह भी समझ लेना चाहिए कि दूसरा शरीर धारण करना अर्थात् पुनर्जन्म होना भी शरीर का ही धर्म है। इससे जीवात्मा नहीं बदलता; अतः शोक का कोई कारण नहीं।

(5) य एनं …………………….. न हन्यते।।

[एनम = इस (आत्मा) को वेति = समझता है। यश्चैनम् (यः +च+एनम्) = और जो इसको। विज्ञानीतो – जानते हैं। अयं = यह। हन्ति = मारता है। हन्यते = मारा जाता है।]

अनुवाद – जो (व्यक्ति) इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा हुआ मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते (अर्थात् अज्ञानी हैं ); क्योंकि यह आत्मा न (तो) मारता है (और) न (ही) मारा जाता है (यह अमर है)।

(6) वासांसि जीर्णानि ………………………. नवानि देही।।

[ वासांसि = वस्त्रों को। जीर्णानि = पुराने। नरोऽपराणि (नरः + अपराणि) = मनुष्य दूसरों को। जीर्णान्यन्यानि (जीर्णानि +अन्यानि) = पुरानों को (त्यागकर) दूसरों (नयों को)। संयाति प्राप्त होता है। देही = जीवात्मा।]

अनुवाद – जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को ग्रहण ( धारण) करता है वैसे (ही) जीवात्मा पुराने शरीर को त्यागकर दूसरे नये शरीरों को प्राप्त होता (ग्रहण करता) है (तब संसार कहता है कि किसी का जन्म हुआ है या मृत्यु हुई है)।

(7) नैनं छिन्दन्ति ……………………….. शोषयति मारुतः।।

[नैनं (न + एनम) = न तो इस (जीवात्मा) को। छिन्दन्ति = काटते हैं। चैनं (च +एनम्) = और इसको। लेदयन्त्यापः (लेदयन्ति +आपः) = जल गीला करते हैं। ]

अनुवाद – इस आत्मा को शस्त्रादि नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गीला कर सकते और (इसको) वायु नहीं सुखा सकती (अर्थात् किसी भी भौतिक पदार्थ से यह नष्ट नहीं किया जा सकता)।

(8) जातस्य हि ……………………….. शोचितुमर्हसि।।

[जातस्य – पैदा होने वाले की| हि – क्योंकि ध्रुवः – निश्चित। तस्मादपरिहार्येऽर्थे (तस्मात + अपरिहार्ये +अर्थे) = इस कारण अनिवार्य विषय में। शोचितुमर्हसि (शोचितुम् +अर्हसि) = शोक करने योग्य हो (तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। ]

अनुवाद – क्योंकि जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है, इसलिए तुम्हें ऐसे विषय में शोक नहीं करना चाहिए, जिसका कोई उपाय न हो (अर्थात् जन्म-मृत्यु के इस क्रम को कोई नहीं बदल सकता। तब फिर इसके विषय में शोक करने से क्या लाभ ?)।

(9) यदृच्छया …………………………….. युद्धमीदृशम्।।
[ यदृच्छया = अपने आप| चोपपन्नम् (च+उपपन्नम्) = और प्राप्त हुए। स्वर्गद्वारमपावृतम् (स्वर्गद्वारम् +अपावृतम्) = खुले हुए स्वर्गद्वार को। सुखिनः = भाग्यवान्। युद्धमीदृशम् (युद्धम् +ईदृशम्)= ऐसा युद्ध।]

अनुवाद – हे अर्जुन! अपने आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार-रूप ऐसे युद्ध को भाग्यवान् क्षत्रिय (ही) पाते हैं (अर्थात् तू भाग्यशाली है कि तुझे यह युद्ध लड़ने का अवसर प्राप्त हो रहा है; क्योंकि धर्मयुद्ध क्षत्रिय को सीधे स्वर्ग प्राप्त कराता है)।

(10) हतो वा ………………….. कृतनिश्चयः।।

[ हतः = मरकर वा = या (तो)। जित्वा = जीतकर। भोक्ष्यसे = (तू) भोगेगा। महीम् = पृथ्वी को। तस्मादुत्तिष्ठ (तस्मात् + उत्तिष्ठ) = इसलिए उठो। कौन्तेय = हे कुन्ती पुत्र (अर्जुन)!! कृतनिश्चयः = निश्चय करके।]

अनुवादे – या तो तू (युद्ध में) मरकर स्वर्ग को प्राप्त होगा या (युद्ध) जीतकर पृथ्वी का भोग करेगा। (इस प्रकार तेरे दोनों हाथों में लड्डू हैं।) इसलिए तू युद्ध (करने) का निश्चय करके उठ खड़ा हो।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 4 हिमालयः

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Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name हिमालयः
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 4 हिमालयः

अवतरणों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) भारतदेशस्य …………………… प्रान्तरे तिष्ठति।
भारतदेशस्य ……………………. प्रदेशाः च सन्तिः ।
भारतदेशस्य …………………….. नाम सुप्रसिद्धम्।
भारतदेशस्य ………………….. उन्नततमानि सन्ति।

[नाम्नाभिधीयते (नाम्ना +अभिधीयते) = नाम से पुकारा जाता है। हिमगिरिरित्यपि (हिमगिरिः + इति + अपि) – हिमगिरि भी। उन्नतानि = ऊँची। आच्छादितानि = ढकी हुई। प्रभृतीनि = इत्यादि। उन्नततमानि – सबसे ऊँचे। अधित्यका = पर्वत के ऊपर की समतल भूमि, पठार। त्रिविष्टप-तिब्बत प्रान्तरे = भूभाग में, प्रदेश में।]

सन्दर्भ – यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘हिमालयः’ शीर्षक पाठ से अवतरित है।
[ विशेष—इस पाठ के अन्य सभी अवतरणों में यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

अनुवाद – भारत देश की अत्यन्त विस्तृत उत्तर दिशा में विद्यमान् पर्वत को लोग ‘पर्वतराज हिमालय’ के नाम से पुकारते हैं। इसकी बहुत ऊँची चोटियाँ संसार के सारे पर्वतों को जीतती हैं; इसी कारण लोग इसे पर्वतों की । राजा कहते हैं। इसकी ऊँची चोटियाँ सदा बर्फ से ढकी रहती हैं, इसलिए यह ‘हिमालय’ (हिम + आलय = बर्फ का घर) या ‘हिमगिरि’ (हिम + गिरि = बर्फ का पहाड़) के नाम से भी सुप्रसिद्ध है। इसके ‘एवरेस्ट’, ‘गौरीशंकर’ जैसे शिखर संसार में सबसे ऊँचे हैं। इसके ऊपरी समतल भाग में (पठार पर) तिब्बत, नेपाल, भूटान पूर्ण सत्तासम्पन्न देश हैं, (और) कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, असम, सिक्किम, मणिपुर जैसे भारतीय प्रदेश हैं। उत्तर भारत का पर्वतीय भाग (गढ़वाल, कुमाऊँ आदि) भी हिमालय के ही अन्तर्वर्ती भू-भाग में ( श्रेणियों के मध्य) स्थित है।

(2) अयं पर्वतराजः …………………….. कुर्वन्ति।

(उत्तरसीम्नि-उत्तरी सीमा पर। प्रहरीव (प्रहरी +इव) – पहरेदार के समान समुदगम्य = निकलकर। स्वकीयैः = अपने। तीर्थोदकैः (तीर्थ + उदकैः) – पवित्र जलों से। पुनन्ति = पवित्र करती है। शस्यश्यामलाम = धनधान्य से परिपूर्ण।]

अनुवाद – यह पर्वतराज (अर्थात् पर्वतों का राजा) भारतवर्ष की उत्तरी सीमा पर स्थित प्रहरी के सदृश शत्रुओं से निरन्तर उसकी रक्षा करता है। हिमालय से ही गङ्गा, सिन्धु, ब्रह्मपुत्र नामक महानदियाँ (तथा) शतद्रु (सतलज), विपाशा (व्यास), यमुना, सरयू, गण्डकी (गण्डक), नारायणी, कौशिकी (कोसी) जैसी नदियाँ भारत की समस्त उत्तर भूमि को अपने पवित्र जल से न केवल पवित्र करती हैं, अपितु इसे धनधान्य से सम्पन्न (हरा-भरा) भी करती हैं।

(3) अस्योपत्यकासु ……………………. प्रवर्तयति।।

अस्योपत्यकासु (अस्य + उपत्यकासु) =इसकी तलहटी (निम्न भू-भाग) में। वनराजयः = वन समूह (राजि – पंक्ति)| वनस्पतयश्तरवश्च (वनस्पतयः +तरवः +च) = वनस्पतियाँ और वृक्ष। आमयेभ्यो = रोगों से (आमय = रोग)| तरवः (तरु का बहुवचन) = वृक्ष। आसन्यादिगृहोपकरण- निर्माणार्थम (आसन्दी +आदि +गृह +उपकरण + निर्माण +अर्थम्) = कुर्सी आदि घरेलू सामान बनाने के लिए। वर्ष (वर्षा + ऋतौ) = वर्षा ऋतु में। अवरुध्य = रोककर।]

अनुवाद – इसकी तलहटी में विशाल वनसमूह सुशोभित हैं, जहाँ अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियाँ, वनस्पतियाँ और वृक्ष हैं। ये जड़ी-बूटियाँ लोगों की रोगों से रक्षा करती हैं और वृक्ष कुर्सी आदि घरेलू सामान बनाने में प्रयुक्त होते हैं। हिमालय वर्षा ऋतु में दक्षिणी समुद्र से उठने वाले बादलों को रोककर उन्हें बरसने के लिए प्रेरित करता है।

(4) अस्योपत्यकायां …………………. भ्रमणाय आकर्षन्ति ।
अस्योपत्यकायां ……………………… अभिधीयते।
अस्योपत्यकासु ……………………… प्रसिद्ध आसीत्।
अस्योपत्यकायां ……………………… मनो न हति।

[ स्वकीयाभिः = अपनी। सुषमाभिः — सुन्दरता से। संज्ञया = नाम से। अभिहितः भवति = पुकारा जाता है। ततश्च (ततः + च) पूर्वस्यां – और उससे पूर्व (दिशा) में। ग्रीष्मत (ग्रीष्म +ऋतौ) = ग्रीष्म ऋतु में। बलादिव (बलात् +इव) = बलपूर्वक-सा। एभ्योऽपि (एभ्यः +अपि) = इनके भी। भागेऽवस्थितः (भागे + अवस्थितः) – भाग में स्थित कामरूपतया – इच्छानुसार रूप धारण करने के कारण, सुन्दरता के कारण। कामरूप = असम का एक जिला, जहाँ कामाख्या देवी का मन्दिर है।

अनुवाद – इसकी तलहटी (घाटी) में स्थित कश्मीर प्रदेश अपनी शोभा के कारण संसार में ‘पृथ्वी के स्वर्ग के नाम से पुकारा जाता है और उससे पूर्व दिशा में स्थित ‘किन्नर देश’ प्राचीन साहित्य में ‘देवभूमि’ (देवताओं का निवास-स्थान) नाम से प्रसिद्ध था। आज भी ‘कुलू घाटी’ के नाम से प्रसिद्ध यह प्रदेश अपनी सुन्दरता से किसका मन नहीं हरता है। शिमला, देहरादून, मसूरी, नैनीताल जैसे नगर ग्रीष्म ऋतु में देश के धनी लोगों को घूमने के लिए बलपूर्वक अपनी ओर खींचते हैं (अर्थात् देश के धनवान् लोग इसके सौन्दर्य पर आकर्षित होकर ही यहाँ घूमने के लिए आते हैं)। इनसे और भी पूर्व में स्थित सर्वाधिक सुन्दर प्रदेश अपने इच्छानुसार रूप धारण करने के कारण कामरूप’ नाम से पुकारा जाता है।

विशेष – असम का ‘कामरूप जिला प्राचीनकाल से ही अपने जादू-टोने के लिए प्रसिद्ध रहा है। लोगों का विश्वास था कि वहाँ के तन्त्र-मन्त्र विशेषज्ञ किसी भी व्यक्ति को किसी भी रूप (भेड़, बकरी आदि) में बदल सकते थे। इसी कारण इसका नाम ‘कामरूप’ (काम = इच्छानुसार + रूप = रूप धारण कर सकने वाला) पड़ गया।

(5) अस्यैव कन्दरासु …………………. पर्वतराजः इति।
अस्यैव कन्दरासु ………………… तीर्थस्थानानि सन्ति।
अस्यैव कन्दरासु ………………………. स्वीकृतमस्ति ।

[ अस्यैव (अस्य+एव) इसकी ही। कन्दरासु-गुफाओं में। तपस्यन्तः -तप करते हुए सिद्धिमत्वम् – सिद्धि देने वाली शक्ति को। विलोक्यैव (विलोक्य +एव) = देखकर ही। उपल्लरे = गुफा में। गिरीणाम् = पर्वतों की। धिया = बुद्धि से (युक्त)| विप्रोऽजायत (विप्रः +अजायत) = ब्राह्मण हुए। प्रदातुः- देने वाले का। सुतराम् = अत्यधिक समादृतः = सम्मानित। ]

अनुवाद – इसकी गुफाओं में तप करते हुए अनेक ऋषियों और मुनियों ने परम सिद्धि प्राप्त की। इसकी सिद्धि देने की क्षमता को देखकर ही ‘पर्वतों की गुफा में और नदियों के संगम पर ब्राह्मणों (ब्रह्मप्राप्ति के इच्छुक साधकों) ने बुद्धत्व (ज्ञान) प्राप्त किया ऐसा कहते हुए वैदिक ऋषियों ने इसके महत्त्व को स्वीकार किया। पुराणों में सब प्रकार की सिद्धियाँ देने वाले शिव का स्थान इसी पर्वत के कैलास शिखर पर माना गया है।
इसी के प्रदेशों में बदरीनाथ, केदारनाथ, पशुपतिनाथ, हरिद्वार, ऋषिकेश, वैष्णव देवी, ज्वाला देवी आदि तीर्थस्थल हैं। इसलिए यह पर्वतराज हिमालय रक्षक, पालक, समस्त ओषधियों का संरक्षक तथा सभी सिद्धियों का प्रदाता होने से भारतवासियों में ‘पर्वतराज’ (पर्वतों का राजा) के नाम से अति आदर को प्राप्त है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name धातु-रूप-प्रकरणे
Number of Questions 21
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे

धातु-रूप-प्रकरण

पाठ्यक्रम में निर्धारित धातु-रूप निम्नवत् हैं

(1) परस्मैपदी धातु ‘स्था’ (ठहरना)
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 1

(2) परस्मैपदी ‘पा’ (पीना)

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 2
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 3

(3) नी (ले जाना)

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 4

(4) कृ (करना)

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 5
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 6
[ध्यान दें-नीचे दिये जा रहे धातु रूप पाठ्यक्रम में निर्धारित नहीं है, परन्तु अनुवाद में सहायक होने के कारण यहाँ दिये जा रहे हैं। ]

(5) चुर् (चुराना)

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 7

(6) दा (देना)

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 8
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 9

(7) गम् (जाना)

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 10

(8) भू (होना)

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 11

(9) पेच् (पकाना)

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 12
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 13

(10) हस् (हँसना)

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 14

(11) पठ् (पढ़ना)

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 15
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 16

(12) दिव (क्रीड़ा, जीतने की इच्छा, जुआ खेलना आदि)

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 17

(13) प्रच्छ (पूछना)

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 18
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 19

(14) अस् (होना)

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 20

(15) अद् (खाना)

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 21
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 22
(16) खाद् (भोजन करना)

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 23

(17) कथ् (कहना)

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 24
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 25

पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ में आये धातु-रूपों के हल

पाठ 5:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 26

पाठ 6:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 27

पाठ 7:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 28
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 29

पाठ 8:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 30

पाठ 9:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 31

पाठ 10:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi धातु-रूप-प्रकरणे 32
विशेष – धातु रूपों से सम्बन्धित बहुविकल्पीय प्रश्नों के प्रारूप-ज्ञान के लिए कुछ प्रश्न नीचे दिये जा रहे है

[ संकेत- काले अक्षरों में छपे विकल्प को उचित विकल्प समझे।।]

(1) ‘स्था’ धातु लृट् लकार, उत्तम पुरुष बहुवचन का रूप होगा
(i) स्थास्यतः
(ii) स्थास्यामः
(iii) स्थास्यथ
(iv) स्थास्यसि

(2) ‘नये:’ रूप होता है, ‘नी’ धातु के
(i) लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन का
(ii) लोट् लकार, उत्तम पुरुष, द्विवचन का
(iii) लृट् लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन का
(iv) विधिलिङ, मध्यम पुरुष, एकवचन का

(3) ‘तिष्ठेताम्’ धातु रूप है-स्था धातु के ……….. का।
(i) लोट् लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन
(ii) लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन
(iii) विधिलिङ, प्रथम पुरुष, द्विवचन
(iv) लट् लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन

(4) ‘खाद्’ धातु के लङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन का रूप होगा
(i) अखादत
(ii) अखादत्
(iii) अखादः
(iv) अखादन्

(5) ‘गम्’ धातु विधिलिङ, मध्यम पुरुष, बहुवचन का रूप होगा
(i) गच्छेत
(ii) गच्छेतम्
(iii) गच्छेताम्।
(iv) गच्छेयुः

(6) ‘भवाम’ रूप होता है भू धातु के
(i) लट् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन का
(ii) लोट् लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन का
(iii) विधिलिङ, उत्तम पुरुष, बहुवचन का
(iv) लृट् लकार, प्रथम पुरुष द्विवचन का

(7) ‘हस्’ धातु के लङ् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन का रूप है
(i) अहसत्
(ii) अहसः
(iii) अहसाव
(iv) अहसम्

(8) ‘खादिष्यथ’ रूप होता है खाद् धातु के
(i) लृट् लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन का
ii) लट् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन का
(iii) लङ् लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन को
(iv) विधिलिङ् लकार, उत्तम पु०, बहुवचन का

(9) ‘स्था’ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन का रूप होगा
(i) तिष्ठन्तु
(ii) तिष्ठ
(iii) तिष्ठाम्
(iv) तिष्ठत

(10) ‘अपिबः’ रूप है पा धातु के
(i) लोट् लकार – मध्यम पुरुष, बहुवचन
(ii) लङ् लकार-मध्यम पुरुष, एकवचन
(iii) लङ् लकार-उत्तम पुरुष, द्विवचन
(iv) लङ् लकार-मध्यम पुरुष, बहुवचन

(11) ‘पद्’ धातु, लङ् लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन का रूप है
(i) अपठः
(ii) अपठम्
(iii) अपठतम्
(iv) अपठत्

(12) ‘गच्छेः ‘ रूप होता है, ‘गम्’ धातु के
(i) लट् लकार-प्रथम पुरुष, एकवचन का
(ii) विधिलिङ् लकारमध्यम पुरुष, एकवचन का
(iii) लोट् लकार–उत्तम पुरुष, बहुवचन का
(iv) लृट् लकार-मध्यम पुरुष, एकवचन का

(13) ‘पद्’ धातु, लङ् लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन का रूप होगा
(i) अपठत्
(ii) अपठाम
(iii) अपठः
(iv) अपठन्।

(14) ‘पठिष्यसि रूप होता है ‘पद्’ धातु के
(i) लृट् लकार – मध्यम पुरुष, एकवचन का
(ii) लृट् लकार – प्रथम पुरुष, बहुवचन का
(ii) लृट् लकार – उत्तम पुरुष, द्विवचन का
(iv) लृट् लकार – मध्यम पुरुष, बहुवचन का

(15) ‘भू’ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन का रूप होगा
(i) भवताम्
(ii) भव
(iii) भवन्तु
(iv) भवानि

(16) ‘अकरोः’ रूप है ‘कृ’ धातु का
(i) लृट् लकार – प्रथम पुरुष, द्विवचन
(ii) लङ् लकार – मध्यम पुरुष, एकवचन
(iii) लोट् लकार-मध्यम पुरुष, बहुवचन
(iv) विधिलिङ् लकार – उत्तम पुरुष, एकवचने

(17) ‘नी’ धातु का लोट् लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन का रूप है
(i) नयनाम्
(ii) नयतु
(iii) नयतम्
(iv) नयाम

(18) ‘अपिबतम्’ रूप है ‘पा’ धातु का
(i) लट् लकार-मध्यम पुरुष, द्विवचन
(ii) लोट् लकार-प्रथम पुरुष, एकवचन
(iii) लङ् लकार-मध्यम पुरुष, द्विवचन
(iv) लङ् लकार-उत्तम पुरुष, एकवचन

(19) ‘पा’ धातु का लोट् लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन का रूप होगा
(i) पिबताम्
(ii) पिबानि
(iii) पिबेतम
(iv) पिबत

(20) ‘कुरुथः’ रूप है ‘कृ’ धातु का
(i) लृट् लकार-प्रथम पुरुष, एकवचन
(ii) लट् लकार मध्यम पुरुष, द्विवचन
(ii) लृट् लकार-मध्यम पुरुष, एकवचन
(iv) लोट् लकार–प्रथम पुरुष, द्विवचन

(21) निम्नलिखित धातुओं के निर्देशानुसार रूप लिखिए
(क) ‘पा’ धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन = पिबन्ति
(ख) स्थाधातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन = तिष्ठन्ति
(ग) “स्था’ धालु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = तिष्ठ
(घ) “पा’ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = पिब
(ङ) “पढ्’ धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन = पठिष्यति
(च) ‘दा’ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = देहि, दत्तात्
(छ) ‘कृ’ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = कुरु, कुरुतात्
(ज) स्था’ धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन = तिष्ठामि
(झ) “पा’ धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन = पिबामि

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name सन्धि-प्रकरण
Number of Questions 57
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण

सन्धि-प्रकरण

नवीनतम पाठ्यक्रम में सन्धि से सम्बन्धित प्रश्नों के लिए कुल 4 अंक निर्धारित हैं। नये प्रारूप के अनुसार अब इससे बहुविकल्पीय प्रश्न ही पूछे जाएंगे। तीन बहुविकल्पीय प्रश्नों में से एक प्रश्न परिभाषा पर, दूसरा प्रश्न सन्धित पद देकर उसके विच्छेद पर और तीसरा प्रश्न विच्छेद देकर उसके सन्धित पद पर आधारित होगा।

सन्धि – सन्धि का अर्थ है ‘मेल’ या जोड़। जब दो शब्द पास-पास आते हैं तो पहले शब्द का अन्तिम वर्ण और दूसरे शब्द का आरम्भिक वर्ण कुछ नियमों के अनुसार आपस में मिलकर एक हो जाते हैं। दो वर्षों के इस एकीकरण को ही ‘सन्धि’ कहते हैं। उदाहरणार्थ-देव+ आलय = देवालय। यहाँ ‘देव’ (= द् + ए+ + अ) शब्द का अन्तिम ‘अ’ और ‘आलय’ शब्द का प्रारम्भिक आ’ मिलकर ‘आ’ बन गये। इसी प्रकार महा + आत्मा = महात्मा (आ + आ = आ), देव + ईश = देवेश (अ + ई = ए) आदि। सन्धि के प्रकार – सन्धि तीन प्रकार की होती है – (अ) स्वर सन्धि, (ब) व्यञ्जन सन्धि तथा (स) विसर्ग सन्धि।

स्वर सन्धि

स्वर के साथ स्वर के मेल को स्वर सन्धि कहते हैं। उपर्युक्त देवालय’, ‘महात्मा’ और ‘देवेश’ स्वर सन्धि के ही उदाहरण हैं। कुछ स्वर सन्धियाँ नीचे दी जा रही हैं

(1) अयादि सन्धि

सूत्र – एचोऽयवायावः
जब एच् (ए, ओ, ऐ, औ) के आगे कोई स्वर आये तो इन ए, ओ, ऐ, औ के स्थान पर क्रमश: अय्, अव्, आय् और आव् हो जाता है; जैसे
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(2) पूर्वरूप सन्धि

सूत्र – एङ पदान्तादति
किसी पद (विभक्तियुक्त शब्द) के अन्त में यदि ‘ए’ या ‘ओ’ आये और उसके बाद (अर्थात्) दूसरे पद के आरम्भ में ‘अ’ आये तो ‘अ’ का लोप हो जाता है और लोप के सूचक-रूप में खण्डित ‘अ’ का चिह्न अवग्रह (ऽ) रख दिया जाता है; जैसे
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(3) पररूप सन्धि

सूत्र – एङि पररूपम्
यदि अकारान्त उपसर्ग के बाद एकारादि या ओकारादि धातु आये तो दोनों के स्थान में ‘ए’ या ‘ओ’ हो जाता है; जैसे

प्र + एजते = प्रेजते (अधिक काँपता है)
उप + ओषति = उपोषति (जलता है)

(4) यण सन्धि

सूत्र – इको यणचि
लू + आकृति = लाकृतिः
अन्वेषणम् = अनु + एषणम्।

(5) दीर्घ सन्धि

सूत्र – एकः सवर्णे दीर्घः
स + अक्षरः = साक्षर:
वधूत्सव = वधू + उत्सवः

व्यञ्जन सन्धि

जिन दो वर्षों में सन्धि की जा रही है, यदि उनमें से एक स्वर और एक व्यञ्जन हो या दोनों व्यञ्जन हों, तो वह व्यञ्जन सन्धि कहलाती है। कुछ व्यञ्जन सन्धियों के विवरण नीचे दिये जा रहे हैं

(1) श्चुत्व सन्धि

सूत्र – स्तोः श्चुनाः श्चुः । जब सकार (= स्) या तवर्ग (त् थ् द् ध् न्) के बाद शकार (श्) या चवर्ग (च् छ् ज् झ् ञ् ) आता है, तब सकार (स) का शकार (श) और तवर्ग का चवर्ग हो जाता है (अर्थात् त् थ् द् ध् न् के स्थान पर क्रमशः च् छु ज् झ् ञ् हो जाता है); जैसे
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(2) टुत्व सन्धि

सकार या तवर्ग के बाद यदि षकार (= षू) या टवर्ग (य् द् ड् ढ् ण) आये तो सकार (= स्) के स्थान पर षकार (= षू) और तवर्ग के स्थान पर टवर्ग हो जाता है (अर्थात् त् थ् द् ध् न् के स्थान पर क्रमश: ट् ठ् ड् ढ् ण् हो जाता है); जैसे

रामस् (रामः) + षष्ठः = रामष्षष्ठः
रामस् + टीकते = रामष्टीकते
तत् + टीका = तट्टीका
चक्रिन् + ढौकसे = चक्रिण्ढौकसे

(3) जश्त्व सन्धि

सूत्रे – झलां जश् झशि
यदि झल् प्रत्याहार (य् व् र लु, ङ् ञ् ण् न् म् को छोड़कर शेष व्यञ्जनों में से किसी भी व्यञ्जन) के बाद झशु (किसी वर्ग का तृतीय या चतुर्थ वर्ण अर्थात् ग् ज् ड् द् ब्, घ् झ् द् ध् भ् में से कोई) आये तो पूर्ववर्ती व्यञ्जन (अर्थात् झल्) के स्थान पर उसी वर्ग का तृतीय वर्ण हो जाता है (अर्थात् ग् ज् ड् द् ब् में से ही वर्गानुसार कोई वर्ण हो जाता है); जैसे

दोघ् + धा = दोग्धा
योध् + धा = योद्धा = योद्धा
वृध् + धः = वृद्धः = वृद्धः
सन्नध् + धः = सन्नद्धः = सन्नद्धः
दुघ् + धम् = दुग्धम्
बुध् + धिः = बुद्धिः = बुद्धिः
सिध् + धिः = सिद्धिः = सिद्धिः
लभ् + धः = लब्धः

(4) चत्वं सन्धि

सूत्र – खरि च
यदि झल् प्रत्याहार (य् व् र लु, ङ् ञ् ण् न् म् को छोड़कर शेष व्यञ्जन अर्थात् वर्गीय प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ वर्ण और श् ष् स् ह में से किसी) के बाद यदि खर् प्रत्याहार का कोई वर्ण (अर्थात् वर्गीय प्रथम, द्वितीय वर्ण एवं श् ष स में से कोई) आये तो पूर्ववर्ती व्यञ्जन (= झल् प्रत्याहार) के स्थान पर चर् प्रत्याहार (वर्गीय प्रथम वर्ण, अर्थात् क् च् र् त् प् में से वर्गानुसार कोई) हो जाती है; जैसे

ककुभ् + प्रान्तः = ककुप्रान्तः
सम्पद् + समयः = सम्पत्समयः
उद् + कीर्णः उत्कीर्णः
आपद् + कालः = आपत्कालः
विपद् + कालः = विपत्कालः
उद् + साहः = उत्साहः
सद् + कारः = सत्कार:

(5) अनुस्वार सन्धि

सूत्र – मोऽनुस्वारः

पदान्त म् (अर्थात् विभक्तियुक्त शब्द के अन्त में आये म्) के बाद यदि कोई व्यञ्जन आये तो म् के स्थान पर अनुस्वार ( . ) हो जाता है; जैसे
हरिम् + वन्दे = हरिं वन्दे
गृहम् + गच्छति = गृहं
गच्छति गृहम् + परितः = गृहं परितः
गृहम् + गच्छ = गृहं गच्छ
गुरुम् + वन्दे = गुरु वन्दे
कृष्णम् + वन्दे = कृष्णं वन्दे
नगरम् + गच्छति = नगरं गच्छति

(6) लत्व सन्धि

सूत्र – तोलि
यदि तवर्ग के किसी वर्ण से परे ल हो तो तवर्गीय वर्ण के स्थान पर लू हो जाता है; जैसे

उत् + लेखः = उल्लेखः
उत् + लिखितम् = उल्लिखितम्
विद्वान् + लिखति = विद्वांल्लिखति
तत् + लीनः = तल्लीनः
जगत् + लयः = जगल्लयः
उत् + लासः = उल्लासः
तत् + लयः = तल्लयः

(7) परसवर्ण सन्धि

सूत्र – अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः
यदि अनुस्वार से परे यय् प्रत्याहार का वर्ण (श् ष स ह को छोड़कर कोई भी व्यंजन) हो तो अनुस्वार के स्थान पर परसवर्ण (अग्रिम वर्ण का सवर्ण, वर्ग का पाँचवाँ वर्ण) हो जाता है।

उदाहरण – धनम् + जयः = धनञ्जयः
त्वम् + करोषि = त्वङ्करोषि

विसर्ग-सन्धि

दो वर्षों के एकीकरण में यदि पहले विसर्ग ( : ) और बाद में स्वर या व्यञ्जन हो तो वह विसर्ग सन्धि कहलाती है।

(1) सत्व सन्धि

सूत्र – विसर्जनीयस्य सः विसर्ग के बाद यदि खर् प्रत्याहार का कोई वर्ण (वर्गीय प्रथम, द्वितीय वर्ण और श ष स में से कोई) आये तो विसर्ग के स्थान पर स् हो जाता है, फिर वह ‘स्’ अपने सामने वाले वर्ण के साथ व्यञ्जन सन्धि के नियमानुसार मिल जाता है; जैसे
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(2) रुत्व सन्धि

सूत्र – (क) ससजुषो रुः
(ख) खरवसानयोर्विसर्जनीयः

पदान्त स् तथा ‘सजुष’ शब्द के के स्थान पर रु (र) हो जाता है। इस र् के बाद खर प्रत्याहार का कोई वर्ण (वर्गीय प्रथम, द्वितीय वर्ण एवं श् ष स्) हो या कोई भी वर्ण न हो तो र् का विसर्ग ( : ) हो जाता है; जैसे

रामस् + पठति = रामर् + पठति = रामः पठति UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 6

(3) उत्व सन्धि

सूत्र – (क) अतो रोरप्लुतादप्लुते ।
(ख) हशि च

पिछले नियमानुसार स् के स्थान पर जो र होता है, उसके पहले यदि अ आये और बाद में अ या हश् प्रत्याहार का कोई वर्ण (वर्गीय तृतीय, चतुर्थ, पंचम और य् व् र् ल् ह में से कोई) आये तो र के स्थान पर उ हो जाता है; जैसे

शिवस् + अर्ध्यः = शिवर् + अर्व्यः = शिव + उ + अर्थ्य:
= शिवो + अर्व्यः  = शिवोऽर्थ्यः।

इस उदाहरण में शिवस् के सू का र् आदेश होकर शिवर बना। इसके र से पहले अ है (शिव् + अ = शिव) और बाद में अर्थ्य:’ का अ है; अत: २ का उ हो गया। फिर ‘शिव’ का अ और यह उ मिलकर ‘ओ’ बन गया (शिवो) और तब पूर्वरूप होकर शिवोऽर्थ्यः’ बना।
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(4) रोरि
यदि र से परे र हो तो पूर्व र् का लोप हो जाता है। उस लुप्त ‘र’ से पहले यदि अ, इ, उ हों तो उनका दीर्घ हो जाता है; जैसे
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पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ में आये सन्धित पद

पाठ 1:
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पाठ 2:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 11
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 12

पाठ 3:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 13

पाठ 4:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 14

पाठ 5:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 15

पाठ 6:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 16
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 17

पाठ 7:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 18

पाठ 8:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 19

पाठ 9:
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 20
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सन्धि-प्रकरण 21

सन्धि
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विशेष – विद्यार्थियों से यह अपेक्षित है कि वे पहले दिये गये सभी सन्धियों के नियमों व उनके उदाहरणों को भली प्रकार से तैयार करें। सन्धि के प्रकरण से सम्बन्धित प्रश्न परीक्षा में बहुविकल्पीय रूप में भी पूछे जा सकते हैं। उदाहरणस्वरूप कुछ प्रश्न आगे दिये जा रहे हैं

[संकेत – काले अक्षरों में छपे विकल्प उचित विकल्प हैं।]

(1) ‘नायिका’ को सन्धि-विच्छेद है
(क) ना + इका
(ख) नायि + का,
(ग) नै + इका
(घ) न + आइका

(2) ‘उपोषति’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) उपो + षति
(ख) उप+ ओषति
(ग) उ + पोषति
(घ) उप + ओषति

(3) ‘हरेऽव’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) हरे + अव
(ख) हरे + इव
(ग) हर + इव
(घ) हर + अव

(4) ‘सच्चित्’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) सच् + चित्
(ख) सत् + चित्
(ग) स + च्चित्
(घ) सच्चि + त् ।

(5) ‘विपत्काल’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) विपत + काल
(ख) विपत्ति + काल,
(ग) विपद् + काल
(घ) विपदा + काल

(6) निम्नलिखित में से ‘तोलि’ सन्धि किसमें होगी?
(क) तत् + टीका
(ख) तत् + लयः
(ग) लृ + आकृति
(घ) ला + आकृति

(7) ‘निर् + रोग: की सन्धि होगी”
(क) निरोगः
(ख) नीरोगः
(ग) निरारोगः
(घ) निरोग:

(8) ‘नरस् + चलति’ में सन्धि होगी
(क) नरोचलति
(ख) नराचलति
(ग) नरश्चलति
(घ) नरस्चलति

(9) कुं+ ठित में सन्धि होगी
(क) कुंठित
(ख) कुन्ठित
(ग) कुठित
(घ) कुण्ठित

(10) श्चुत्व सन्धि है
(के) तत् + लयः
(ख) सत् + मार्ग
(ग) रामस्+ चिनोति
(घ) तत् + टीका

(11) ‘प्रेजते’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क) प्रे + जते
(ख) प्रेज + ते
(ग) प्र+ एजते
(घ) प्रए + जते

(12) ‘एचोऽयवायावः’ सन्धि है
(क) ने + अनम्
(ख) उप+ ओषति
(ग) सत् + जन
(घ) विष्णो + अव

(13) ‘सत् + चयन’ की सन्धि होगी–
(क) सज्जयन
(ख) सुश्चयन
(ग) सच्चयन
(घ) सः चयन

(14) निम्नलिखित में से किन्हीं तीन सन्धि-सूत्रों के एक-एक सही उदाहरण चुनकर लिखिए तथा सूत्रों की व्याख्या कीजिए|

(क) सूत्र – एङ पदान्तादति, एचोऽय वायावः, मोऽनुस्वारः, अतो रोरप्लुतादप्लुते, खरि च।।
उदाहरण –  आपत्कालः, गायकः, नगरं गच्छति, वनेऽस्मिन्, सोऽपि।
(ख) सूत्र – एङि पररुपम्, ष्टुनी ष्टुः, विसर्जनीयस्य सः, एचोऽय वायावः, रोरि।
उदाहरण – पुनारमते, नमस्ते, पवन:, उड्डयनम्, प्रेजते।

(क) हल:
(i) एङ पदान्तादति – वनेऽस्मिन् ।
(ii) एचोऽयवायावः – गायकः ।
(iii) मोऽनुस्वार: – नगरं गच्छति।
(iv) अतो रोरप्लुतादप्लुते – सोऽपि।
(v) खरि च – आपत्कालः।

(ख) हल:
(i) एङि पररूपम् – प्रेजते।
(ii) ष्टुना ष्टुः – उड्डयनम्:
(iii) विसर्जनीयस्य सः – नमस्ते
(iv) एचोऽयवायाव:-पवनः
(v) रोरि – पुनारमते।

संकेत – सूत्रों की व्याख्या के लिए सम्बन्धित सन्धियों का अध्ययन करें।

(15) ‘नयनम्’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क) ने + यनम्
(ख) ने + अनम्
(ग) नय + नम्।
(घ) नै + अनम्

(16) ‘ष्टुना टुः’ सन्धि है
(क) रामस्+ टीकते
(ख) लभ् + धः
(ग) सत् + चित्
(घ) सत् + चयन

(17) ‘अयादि’ सन्धि है
(क) सत् + चित्
(ख) प्र + एजते
(ग) पौ+ अकः
(घ) योध् + धा

(18) ‘पावकः’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क) पाव + कः
(ख) पौ+ अकः
(ग) पा + अकः
(घ) पाउ + कः

(19) ‘टुत्व’ सन्धि है
(क) सत् + चित
(ख) तत् + टीका
(ग) लभ् + धः
(घ) सत् + चयन

(20) ‘पूर्णः + चन्द्रः’ की सन्धि होगी
(क) पूणचन्द्रः
(ख) पूर्णश्चन्द्रः
(ग) पूर्णचन्द्रः
(घ) पूर्णचन्द्रः

(21) ‘झलां जश् झशि’ सन्धि है
(क) लभ् + धः
(ख) तत् + लय:
(ग) ने + अनम्
(घ) प्र + एजते
(20) क) पवः

(22) हल् ( व्यञ्जन) सन्धि है
(क) सत् + चित्
(ख) उप + ओषति
(ग) हिम + आलय
(घ) सूर्य + उदय

(23) ‘रुत्व’ सन्धि है
(क) बालस्+ गच्छति
(ख) बाला + गच्छति
(ग) राम + गच्छति
(घ) कृष्ण + वन्दे

(24) ‘गौः + चरति’ की सन्धि होगी
(क) गोस्चरति
(ख) गोचरति
(ग) गौश्चरति
(घ) गौहचरति

(25) ‘ग्रामेऽपि’ को सन्धि-विच्छेद है
(क) ग्रामः + अपि
(ख) ग्राम + एपि
(ग) ग्रामे + अपि
(घ) ग्रामस + अपि

(26) ‘अन् + कित:’ की सन्धि होगी
(क) अम्कितः
(ख) अन्कित:
(ग) अंकितः
(घ) अङ्कितः

(27) ‘रामावग्रतः’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क) रामे + अग्रत:
(ख) रामौ + अग्रतः
(ग) रामो + अग्रतः
(घ) रामः + अग्रतः

(28) ‘रोरि’ सन्धि है
(क) पूर्णः + चन्द्रः
(ख) शम्भुर् + राजते
(ग) शिवस् + अर्घ्य
(घ) शाम् + तः

(29) विष्णो + अत्र की सन्धि होगी
(क) विष्ण्वत्र
(ख) विष्णवत्र
(ग) विष्णावत्र
(घ) विष्णोऽत्र

(30) ‘शत्रावति’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क) शत्रु + अति
(ख) शत्रु + अवति
(ग) शत्रौ + अति
(घ) शत्रवः + अति

(31) ‘उत्कीर्णः’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क) उत् + कीर्णः
(ख) उद + कीर्णः
(ग) उद् + कीर्णः
(घ) उत + कीर्ण

(32) विसर्ग सन्धि है
(क) कः + चित्
(ख) कस् + चित्
(ग) कश् + चित्
(घ) कश + चित्

(33) ‘सुहृद् + क्रीडति’ की सन्धि होगी
(क) सहृद्क्रीडति
(ख) सुहृत्क्रीडति
(ग) सुहृतक्रीडति
(घ) सुहृदक्रीडति

(34) ‘पेष् + ता’ की सन्धि होगी
(क) पेष्टा
(ख) पेष्टता
(ग) प्रेषयता
(घ) प्रेषिता

(35) ‘कवेः+ अभावात्’ की सन्धि होगी
(क) कवेअभावात्
(ख) कवेरभावात्
(ग) कवेराभावात्
(घ) कवेरभवात्

(36) गुण सन्धि (सूत्र-आद्गुणः) होगी
(क) राज + ऋषिः
(ख) ने + अनम्
(ग) मधु + अरिः
(घ) शिव + आलय

(37) ‘नगेन्द्राः’ अथवा ‘नान्यत्र’ का सन्धि
विच्छेद कीजिएनगेन्द्राः = नग + इन्द्राः (आद्गुणः)
नान्यत्र = न + अन्यत्र (अक: सवर्णे दीर्घः)

(38) ‘गायकः’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क) गाय + अक:
(ख) गा + यक:
(ग) गै + अकः
(घ) में + कः।

(39) ‘हरिः + चरति’ की सन्धि है
(क) हरिचरति
(ख) हरिश्चरति
(ग) हरिर्चरति
(घ) हरिच्चरति।

(40) ‘मोऽनुस्वारः’ सन्धि है
(क) विद्वान् + लिखतिः
(ख) ककुम् + प्रान्तः
(ग) चक्रिन् + ढौकसे
(घ) गृहम् + गच्छति

(41) ‘देवस् + वन्द्यः’ की सन्धि होगी
(क) देवो वन्द्यः
(ख) देवर्वन्द्यः
(ग) देवश्वन्द्यः
(घ) देववन्द्यः

(42) ‘खरि च’ सन्धि है
(क) तद् + लीनः
(ख) सत् + चित्
(ग) सम्पद् + समयः
(घ) हरिम् + वन्दे

(43) ‘रामष्षष्ठः’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क)राम + षष्ठः
(ख) राम + षष्ठः
(ग) रामश् + षष्ठः
(घ) रामस् + षष्ठः

(44) ‘विसर्जनीयस्य सः’ सन्धि है
(क) हरिम् + वन्दे
(ख) तत् + टीका
(ग) लघु + उत्सवः
(घ) गौः+ चरति

(45) ‘उज्ज्वल’ का सही सन्धि-विच्छेद है
(क) उद् + ज्वल
(ख) उत् + ज्वल
(ग) उज् + ज्वले
(घ) उच् + ज्वल

(46) ‘पावनम्’ का सही सन्धि-विच्छेद होगा
(क) पाव + अनम्
(ख) पो + अनम्।
(ग) पौ+ अनम्
(घ) पै + अनम्

(47) ‘विसर्जनीयस्य सः’ सन्धि है
(क) चन्द्रः + चकोर:
(ख) रामः + गच्छति
(ग) शिवः + अस्ति
(घ) हरिः + भगति

(48) ‘भावुकः को सन्धि-विच्छेद होगी
(क) भ + अवुकः
(ख) भा + उकः
(ग) भौ+ उकः
(घ) भ + उकः

(49) ‘धनम् + जयः’ की सन्धि है
(क) धानञ्जयः
(ख) धनन्जयः
(ग) धनज्जयः
(घ) धनञ्जयः

(50) विसर्जनीयस्य सः सन्धि है
(क) विष्णुः + त्राता
(ख) त्वम् + करोषि
(ग) प्र + एजते
(घ) उप + ओषति

(51) ‘लब्धम्’ का सन्धि-विच्छेद होगा
(क) लब् + धम्
(ख) लप् + धम्
(ग) लभ् + धम्
(घ) लब्ध् + अम्

(52) ‘एचोऽयवायावः’ सन्धि है
(क) उप + ओषति
(ख) नौ + इकः
(ग) रामस् + च
(घ) तत् + टीका

(53) ‘रोरि’ सन्धि है
(क) रामः + चपलः
(ख) देवः + पठति
(ग) पुनर् + रमते
(घ) बालकः+अपठत्

(54) निम्नलिखित की सन्धि कीजिए और नामोल्लेख कीजिए
(क) विद्या + अर्थी =विद्यार्थी (अक: सवर्णे दीर्घः)
(ख) कवि + इन्द्रः =कवीन्द्रः (अक: सवर्णे दीर्घः)
(ग) गिरि + ईश: =गिरीशः (अक: सवर्णे दीर्घः)

(55) निम्नलिखित को सन्धि-विच्छेद कीजिए और नामोल्लेख कीजिए
(क) हरिश्चन्द्रः= हरिः + चन्द्रः (विसर्जनीयस्य सः)
(ख) नरेन्द्रः = नर + इन्द्रः (आद् गुण:)
(ग) यद्यपि = यदि + अपि (इको यणचि)
(घ) रमेशः =रमा + ईशः (आद् गुण:)

(56) पुत्रस् + षष्ठः’ की सन्धि है
(क) पुत्रस्षष्ठः
(ख) पुत्रोषष्ठः
(ग) पुत्रर्षष्ठः
(घ) पुत्रष्षष्ठः

(57) ससजुषोः रुः सन्धि है
(क) हरिस् + गच्छति
(ख) प्रभुः + चलति
(ग) बालकः + याति
(घ) शिवः + अपि

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi राष्ट्रीय भावनापरक निबन्ध

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name राष्ट्रीय भावनापरक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi राष्ट्रीय भावनापरक निबन्ध

राष्ट्रीय भावनापरक निबन्ध

स्वदेश-प्रेम

सम्बद्ध शीर्षक

  • जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी
  • राष्ट्रधर्म ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है।
  • राष्ट्र के गौरव की सुरक्षा और हमारा कर्तव्य

प्रमुख विचार – बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2. देश प्रेम की स्वाभाविकता,
  3.  देश-प्रेम का अर्थ
  4.  देश-प्रेम का क्षेत्र,
  5. देश के प्रति कर्तव्य,
  6.  भारतीयों का देश-प्रेम,
  7.  देशभक्तों की कामना
  8.  उपसंहार।

प्रस्तावना – ईश्वर द्वारा बनायी गयी सर्वाधिक अद्भुत रचना है ‘जननी’, जो नि:स्वार्थ प्रेम की प्रतीक है, प्रेम का ही पर्याय है, स्नेह की मधुर बयार है, सुरक्षा का अटूट कवच है, संस्कारों के पौधों को ममता के जल से सींचने वाली चतुर उद्यान रक्षिका है, जिसका नाम प्रत्येक शीश को नमन के लिए झुक जाने को प्रेरित कर देता है। यही बात जन्मभूमि के विषय में भी सत्य है। इन दोनों का दुलार जिसने पा लिया उसे स्वर्ग का पूरा-पूरा अनुभव धरा पर ही हो गया। इसीलिए जननी और जन्मभूमि की महिमा को स्वर्ग से भी बढ़कर बताया गया है। यही कारण है कि स्वदेश से दूर जाकर मनुष्य तो क्या पशु-पक्षी भी एक प्रकार की उदासी और रुग्णता का अनुभव करने लगते हैं।

देश-प्रेम की स्वाभाविकता – प्रत्येक देशवासी को अपने देश से अनुपम प्रेम होता है। अपना देश चाहे बर्फ से ढका हुआ हो, चाहे गर्म रेत से भरा हो, चाहे ऊँची-ऊँची पहाड़ियों से घिरा हो, वह सबके लिए प्रिय होता है। इस सम्बन्ध में कविवर रामनरेश त्रिपाठी की निम्नलिखित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं

विषुवत् रेखा का वासी जो, जीता है नित हाँफ-हाँफ कर।
रखता है अनुराग अलौकिक, वह भी अपनी मातृभूमि पर ॥
ध्रुववासी जो हिम में तम में, जी लेता है काँप-काँप कर।
वह भी अपनी मातृभूमि पर, कर देता है प्राण निछावर ॥

प्रात:काल के समय पक्षी भोजन-पानी के लिए कलरव करते हुए दूर स्थानों के लिए चले जाते हैं परन्तु सायंकाल होते ही एक विशेष उमंग और उत्साह के साथ अपने-अपने घोंसलों की ओर लौटने लगते हैं। पशु-पक्षियों में उसके लिए इतना मोह और लगाव हो जाता है कि वे उसके लिए मर-मिटने हेतु भी तत्पर रहते हैं

आग लगी इस वृक्ष में, जलते इसके पात,
तुम क्यों जलते पक्षियो! जब पंख तुम्हारे पास?
फल खाये इस वृक्ष के, बीट लथेड़े पात,
यही हमारा धर्म है, जलें इसी के साथ।

पशु-पक्षियों को भी अपने घर से, अपनी मातृभूमि से इतना प्यार है तो भला मानव को अपनी जन्मभूमि से, अपने देश से क्यों प्यार नहीं होगा? वह तो विधाता की सर्वोत्तम सृष्टि, बुद्धिसम्पन्न एवं सर्वाधिक संवेदनशील प्राणी है। माता और जन्मभूमि की तुलना में स्वर्ग का सुख भी तुच्छ है। संस्कृत के किसी महान् कवि ने ठीक ही कहा है – जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।

देश-प्रेम का अर्थ – देश-प्रेम का तात्पर्य है – देश में रहने वाले जड़-चेतन सभी प्राणियों से प्रेम, देश की सभी झोपड़ियों, महलों तथा संस्थाओं से प्रेम, देश के रहन-सहन, रीति-रिवाज, वेश-भूषा से प्रेम, देश के सभी धर्मों, मतों, भूमि, पर्वत, नदी, वन, तृण, लता सभी से प्रेम और अपनत्व रखना व उन सभी के प्रति गर्व की अनुभूति करना। सच्चे देश-प्रेमी के लिए देश का कण-कण पावन और पूज्य होता है।

सच्चा प्रेम वही है, जिसकी तृप्ति आत्मबल पर हो निर्भर ।
त्याग बिना निष्प्राण प्रेम है, करो प्रेम पर प्राण निछावर ॥
देश-प्रेम वह पुण्य क्षेत्र है, अमल असीम त्याग से विलसित ।
आत्मा के विकास से, जिसमें मानवता होती है विकसित ॥

सच्चा देश-प्रेमी वही होता है, जो देश के लिए नि:स्वार्थ भावना से बड़े-से-बड़ा त्याग कर सकता है। स्वदेशी वस्तुओं का स्वयं उपयोग करता है और दूसरों को भी उनके उपयोग के लिए प्रेरित करता है। सच्चा देशभक्त उत्साही, सत्यवादी, महत्त्वाकांक्षी और कर्तव्य की भावना से प्रेरित होता है। वह देश में छिपे हुए गद्दारों से सावधान रहता है और अपने प्राणों को हथेली पर रखकर देश की रक्षा के लिए शत्रुओं का मुकाबला करता है।

देश-प्रेम का क्षेत्र – देश-प्रेम का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में काम करने वाला व्यक्ति देशभक्ति की भावना प्रदर्शित कर सकता है। सैनिक युद्ध-भूमि में प्राणों की बाजी लगाकर, राज-नेता राष्ट्र के उत्थान का मार्ग प्रशस्त. कर, समाज-सुधारक समाज का नवनिर्माण करके, धार्मिक नेता मानव-धर्म का उच्च आदर्श प्रस्तुत करके, साहित्यकार राष्ट्रीय चेतना और जन-जागरण का स्वर फेंककर, कर्मचारी, श्रमिक एवं किसान निष्ठापूर्वक अपने दायित्व का निर्वाह करके, व्यापारी मुनाफाखोरी व तस्करी का त्याग कर अपनी देशभक्ति की भावना प्रदर्शित कर सकता है। ध्यान रहे, सभी को अपना कार्य करते हुए देशहित को सर्वोपरि समझनी चाहिए।

देश के प्रति कर्त्तव्य – जिस देश में हमने जन्म लिया है, जिसका अन्न खाकर और अमृत समान जल पीकर, सुखद वायु का सेवन कर हम बलवान् हुए हैं, जिसकी मिट्टी में खेल-कूदकर हमने पुष्ट शरीर प्राप्त किया है, उस देश के प्रति हमारे अनन्त कर्तव्य हैं। हमें अपने प्रिय देश के लिए कर्तव्यपालन और त्याग की भावना से श्रद्धा, सेवा एवं प्रेम रखना चाहिए। हमें अपने देश की एक इंच भूमि के लिए तथा उसके सम्मान और गौरव की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा देनी चाहिए। यह सब करने पर भी जन्मभूमि या अपने देश से हम कभी भी उऋण नहीं हो सकते हैं।

भारतीयों का देश-प्रेम – भारत माँ ने ऐसे असंख्य नर-रत्नों को जन्म दिया है, जिन्होंने असीम त्याग-भावना से प्रेरित होकर हँसते-हँसते मातृभूमि पर अपने प्राण अर्पित कर दिये। कितने ही ऋषि-मुनियों ने अपने तप और त्याग से देश की महिमा को मण्डित किया है तथा अनेकानेक वीरों ने अपने अद्भुत शौर्य से शत्रुओं के दाँत खट्टे किये हैं। वन-वन भटकने वाले महाराणा प्रताप ने घास की रोटियाँ खाना स्वीकार किया, परन्तु मातृभूमि के शत्रुओं के सामने कभी मस्तक नहीं झुकाया। शिवाजी ने देश और मातृभूमि की सुरक्षा के लिए गुफाओं में छिपकर शत्रु से टक्कर ली और रानी लक्ष्मीबाई ने महलों के सुखों को त्यागकर शत्रुओं से लोहा लेते हुए वीरगति प्राप्त की। भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, अशफाकउल्ला खाँ आदि न जाने कितने देशभक्तों ने विदेशियों की अनेक यातनाएँ सहते हुए, मुख से वन्दे मातरम्’ कहते हुए हँसते-हँसते

जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ॥

भारत का इतिहास ऐसे अनेक वीरों को साक्षी है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा और मान-मर्यादा के लिए अपने सुखों को त्याग दिया और मन में मर-मिटने का अरमान लेकर शत्रु पर टूट पड़े। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, लाला लाजपतराय आदि अनेक देशभक्तों ने अनेक कष्ट सहकर और प्राणों का बलिदान करके देश की स्वाधीनता की ज्योति को प्रज्वलित किया। इसी स्वदेश प्रेम के कारण राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अनेकों कष्ट सहे, जेलों में रहे तथा अन्त में अपने प्राण निछावर कर दिये। डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, सरदार बल्लभभाई पटेल, पं० जवाहरलाल नेहरू आदि देशरत्नों ने आजीवन देश की सेवा की। श्रीमती इन्दिरा गांधी देश की एकता और अखण्डता के लिए नृशंस आतंकवादियों की गोलियों का शिकार बनीं।।

देशभक्तों की कामना – देशभक्तों को सुख-समृद्धि, धन, यश, कंचन और कामिनी की आकांक्षा नहीं होती है। उन्हें तो केवल अपने देश की स्वतन्त्रता, उन्नति और गौरव की कामना होती है। वे देश के लिए जीते हैं और देश के लिए मरते हैं। मृत्यु के समय भी उनकी इच्छा यही होती है कि वे देश के काम आयें। कविवर माखनलाल चतुर्वेदी के शब्दों में एक पुष्प की भी यही कामना है

मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जावें वीर अनेक॥

उपसंहार – खेद का विषय है कि आज हमारे नागरिकों में देश-प्रेम की भावना अत्यन्त दुर्लभ होती जा रही है। नयी पीढ़ी का विदेशों से आयातित वस्तुओं और संस्कृतियों के प्रति अन्धाधुन्ध मोह, स्वदेश के बजाय विदेश में जाकर सेवाएँ अर्पित करने के सजीले सपने वास्तव में चिन्ताजनक हैं। हमारी पुस्तकें भले ही राष्ट्रप्रेम की गाथाएँ पाठ्य-सामग्री में सँजोये रहें, परन्तु वास्तव में नागरिकों के हृदय में गहरा व सच्चा राष्ट्रप्रेम ढूंढ़ने पर भी उपलब्ध नहीं होता। हमारे शिक्षाविदों व बुद्धिजीवियों को इस प्रश्न का समाधान ढूंढ़ना ही होगा कि अब मात्र उपदेश या अतीत के गुणगान से वह प्रेम उत्पन्न नहीं हो सकता। हमें अपने राष्ट्र की दशा व छवि अनिवार्य रूप से सुधारनी होगी।
प्रत्येक देशवासी को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसके देश भारत की देशरूपी बगिया में राज्यरूपी अनेक क्यारियाँ हैं । किसी एक क्यारी की उन्नति एकांगी उन्नति है और सभी क्यारियों की उन्नति देशरूपी उपवन की सर्वांगीण उन्नति है। जिस प्रकार एक माली अपने उपवन की सभी क्यारियों की देखभाल समान भाव से करती है उसी प्रकार हमें भी देश का सर्वांगीण विकास करना चाहिए। किसी जाति या सम्प्रदाय विशेष को लक्ष्य न मानकर समग्रतापूर्ण चिन्तन किया जाना चाहिए, क्योंकि सबकी उन्नति में एक की उन्नति तो अन्तर्निहित होती ही है। प्रत्येक देशवासी का चिन्तन होना चाहिए कि “यह देश मेरा शरीर है और इसकी क्षति मेरी ही क्षति है।’ जब ऐसे भाव प्रत्येक भारतवासी के होंगे तब कोई अपने निहित स्वार्थों के पीछे रेल, बस अथवा सरकारी सम्पत्तियों की होली नहीं जलाएगा और न ही सरकारी सम्पत्ति का दुरुपयोग ही करेगा।
स्वदेश-प्रेम मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। इसे संकुचित रूप में ग्रहण न करे व्यापक रूप में ग्रहण करना चाहिए। संकुचित रूप में ग्रहण करने से विश्व शान्ति को खतरा हो सकता है। हमें स्वदेश-प्रेम की भावना के साथ-साथ समग्र मानवता के कल्याण को भी ध्यान में रखना चाहिए।

 हमारे राष्ट्रीय पर्व

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारत के राष्ट्रीय त्योहार

प्रमुख विचार-बिन्दु 

  1.  प्रस्तावना,
  2.  गणतन्त्र दिवस,
  3.  स्वतन्त्रता दिवस,
  4. गांधी जय
  5. राष्ट्रीय महत्त्व के अन्य पर्व,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना – भारतवर्ष को यदि विविध प्रकार के त्योहारों का देश कह दिया जाए तो कुछ अनुचित न होगा। इस धरा-धाम पर इतनी जातियाँ, धर्म और सम्प्रदायों के लोग निवास करते हैं कि उनके सभी त्योहारों को यदि मनाना शुरू कर दिया जाए तो शायद एक-एक दिन में दो-दो त्योहार मना कर भी वर्ष भर में उन्हें पूरा नहीं किया जा सकता। पर्वो का मानव-जीवन व राष्ट्र के जीवन में विशेष महत्त्व होता है। इनसे नयी प्रेरणा मिलती है, जीवन की नीरसता दूर होती है तथा रोचकता और आनन्द में वृद्धि होती है। पर्व या त्योहार कई तरह के होते हैं; जैसे-धार्मिक, सांस्कृतिक, जातीय, ऋतु सम्बन्धी और राष्ट्रीय। जिन पर्वो का सम्बन्ध किसी व्यक्ति, जाति या धर्म के मानने वालों से न होकर सम्पूर्ण राष्ट्र से होता है तथा जो पूरे देश में सभी नागरिकों द्वारा उत्साहपूर्वक मनाये जाते हैं, उन्हें राष्ट्रीय पर्व कहा जाता है। गणतन्त्र दिवस, स्वतन्त्रता दिवस एव गांधी जयन्ती हमारे राष्ट्रीय पर्व हैं। ये राष्ट्रीय पर्व समस्त भारतीय जन-मानस को एकता के सूत्र में पिरोते हैं। ये उन अमर शहीदों व देशभक्तों का स्मरण कराते हैं, जिन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिए जीवन-पर्यन्त संघर्ष किया और राष्ट्र की स्वतन्त्रता, गौरव व इसकी प्रतिष्ठा को बनाये रखने के लिए अपने प्राणों को भी सहर्ष न्योछावर कर दिया।

गणतन्त्र दिवस – गणतन्त्र दिवस हमारा एक प्रमुख राष्ट्रीय पर्व है, जो प्रति वर्ष 26 जनवरी को देशवासियों द्वारा मनाया जाता है। इसी दिन सन् 1950 ई० में हमारे देश में अपना संविधान लागू हुआ था। इसी दिन हमारा राष्ट्र पूर्ण स्वायत्त गणतन्त्र राज्य बना अर्थात् भारत को पूर्ण प्रभुसत्तासम्पन्न गणराज्य घोषित किया गया। यही दिन हमें 26 जनवरी, 1930 का भी स्मरण कराता है, जब पं० जवाहरलाल नेहरू जी की अध्यक्षता में कांग्रेस अधिवेशन में पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव पारित किया गया था।

गणतन्त्र दिवस का त्योहार बड़ी धूमधाम से यों तो देश के प्रत्येक भाग में मनाया जाता है, पर इसका मुख्य आयोजन देश की राजधानी दिल्ली में ही किया जाता है। इस दिन सबसे पहले देश के प्रधानमन्त्री इण्डिया गेट पर शहीद जवानों की याद में प्रज्वलित की गयी जवान ज्योति पर सम्पूर्ण राष्ट्र की ओर से सलामी देते हैं। उसके बाद प्रधानमन्त्री अपने मन्त्रिमण्डल के सदस्यों के साथ राष्ट्रपति महोदय की अगवानी करते हैं। राष्ट्रपति भवन के सामने स्थित विजय चौक में राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने के साथ ही मुख्य पर्व मनाया जाना आरम्भ होता है। इस दिन विजय चौक से प्रारम्भ होकर लाल किले तक जाने वाली परेड समारोह का प्रमुख आकर्षण होती है। क्रम से तीनों सेनाओं (जल, थल, वायु), सीमा सुरक्षा बल, अन्य सभी प्रकार के बलों, पुलिस आदि की टुकड़ियाँ राष्ट्रपति को सलामी देती हैं। एन० सी० सी०, एन० एस० एस० तथा स्काउट, स्कूलों के बच्चे सलामी के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए गुजरते हैं। इसके उपरान्त सभी प्रदेशों की झाँकियाँ आदि प्रस्तुत की जाती हैं तथा शस्त्रास्त्रों का भी प्रदर्शन किया जाता है। राष्ट्रपति को तोपों की सलामी दी जाती है। परेड और झाँकियों आदि पर हेलीकॉप्टरों-हवाई जहाजों से पुष्प वर्षा की जाती है। यह परेड राष्ट्र की वैज्ञानिक, कला व संस्कृति के उत्थान को दर्शाती है। रात को राष्ट्रपति भवन, संसद भवन और अन्य राष्ट्रीय महत्त्व के स्थलों पर रोशनी की जाती है, आतिशबाजी होती है और इस प्रकार धूम-धाम से यह राष्ट्रीय त्योहार सम्पन्न होता है।

स्वतन्त्रता दिवस – पन्द्रह अगस्त के दिन मनाया जाने वाला स्वतन्त्रता दिवस का त्योहार भारत का दूसरा मुख्य राष्ट्रीय त्योहार माना गया है। इसके आकर्षण और मनाने का मुख्य केन्द्र दिल्ली स्थित लाल किला है। यों तो समस्त नगर और सम्पूर्ण देश में भी अपने-अपने ढंग से इसे मनाने की परम्परा है। स्वतन्त्रता दिवस प्रत्येक वर्ष अगस्त मास की पन्द्रहवीं तिथि को मनाया जाता है। इसी दिन लगभग दो सौ वर्षों के अंग्रेजी दासत्व के पश्चात् हमारा देश स्वतन्त्र हुआ था। इसी दिन ऐतिहासिक लाल किले पर हमारा तिरंगा झण्डा फहराया गया था। यह स्वतन्त्रता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के भगीरथ प्रयासों व अनेक महान् नेताओं तथा देशभक्तों के बलिदान की गाथा है। यह स्वतन्त्रता इसलिए और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि इसे बन्दूकों, तोपों जैसे अस्त्र-शस्त्रों से नहीं वरन् सत्य, अहिंसा जैसे शस्त्रास्त्रों से प्राप्त किया गया। इस दिन सम्पूर्ण राष्ट्र देश की स्वतन्त्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने वाले शहीदों का स्मरण करते हुए देश की स्वतन्त्रता को बनाये रखने की शपथ लेता है। इस दिवस की पूर्व सन्ध्या पर राष्ट्रपति राष्ट्र के नाम अपना सन्देश प्रसारित करते हैं। दिल्ली के लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने से पहले प्रधानमन्त्री सेना की तीनों टुकड़ियों, अन्य सुरक्षा बलों, स्काउटों आदि का निरीक्षण कर सलामी लेते हैं। फिर लाल किले के मुख्य द्वार पर पहुँचकर राष्ट्रीय ध्वज फहरा कर उसे सलामी देते हैं तथा राष्ट्र को सम्बोधित करते हैं। इस सम्बोधन में पिछले वर्ष सरकार द्वारा किये गये कार्यों का लेखा-जोखा, अनेक नवीन योजनाओं तथा देश-विदेश से सम्बन्ध रखने वाली नीतियों के बारे में उद्घोषणा की जाती है। अन्त में राष्ट्रीय गान के साथ यह मुख्य समारोह समाप्त हो जाता है। रात्रि में दीपों की जगमगाहट से विशेषकर संसद भवन व राष्ट्रपति भवन की सजावट देखते ही बनती है।

गांधी जयन्ती – गांधी जयन्ती भी हमारी एक राष्ट्रीय पर्व है, जो प्रति वर्ष गांधी जी के जन्म-दिवस 2 अक्टूबर की शुभ स्मृति में देश भर में मनाया जाता है। स्वाधीनता आन्दोलन में गांधी जी ने अहिंसात्मक रूप से देश का नेतृत्व किया और देश को स्वतन्त्र कराने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने सत्याग्रह, असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन, भारत छोड़ो आन्दोलन से शक्तिशाली अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर विवश कर दिया। गांधी जी ने राष्ट्र एवं दीन-हीनों की सेवा के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। प्रति वर्ष सम्पूर्ण देश उनके त्याग, तपस्या एवं बलिदान के लिए उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है और उनके बताये गये रास्ते पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करता है। इस दिन सम्पूर्ण देश में विभिन्न प्रकार की सभाओं, गोष्ठियों एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। गांधी जी की समाधि राजघाट पर देश के राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री व अन्य विशिष्ट लोग पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। महात्मा गांधी अमर रहें” के नारों से सम्पूर्ण वातावरण गूंज उठता है।

राष्ट्रीय महत्त्व के अन्य पर्व – इन तीन मुख्य पर्वो के अतिरिक्त अन्य कई पर्व भी यहाँ मनाये जाते हैं. और उनका भी राष्ट्रीय महत्त्व स्वीकारा जाता है। ईद, होली, वसन्त पंचमी, बुद्ध पंचमी, वाल्मीकि प्राकट्योत्सव, विजयादशमी, दीपावली आदि इसी प्रकार के पर्व माने जाते हैं। हमारी राष्ट्रीय अस्मिता किसी-न-किसी रूप में इन सभी त्योहारों के साथ जुड़ी हुई है, फिर भी मुख्य महत्त्व उपर्युक्त तीन पर्वो का ही है।

उपसंहार – त्योहार तीन हों या अधिक, सभी का महत्त्व मानवीय एवं राष्ट्रीय अस्मिता को उजागर करना ही होता है। मानव-जीवन में जो एक आनन्दप्रियता, उत्सवप्रियता की भावना और वृत्ति छिपी रहती है, उनका भी इस प्रकार से प्रकटीकरण और स्थापन हो जाया करता है। इस प्रकार के त्योहार सभी देशवासी मिलकर मनाया करते हैं, इससे राष्ट्रीय एकता और ऊर्जा को भी बल मिलता है जो इनका वास्तविक उद्देश्य एवं प्रयोजन होता है। हमारे राष्ट्रीय पर्व राष्ट्रीय एकता के प्रेरणा-स्रोत हैं। ये पर्व सभी भारतीयों के मन में हर्ष, उल्लास और नवीन राष्ट्रीय चेतना का संचार करते हैं। साथ ही देशवासियों को यह संकल्प लेने हेतु भी प्रेरित करते हैं कि वे अमर शहीदों के बलिदानों को व्यर्थ नहीं जाने देंगे तथा अपने देश की रक्षा, गौरव व इसके उत्थान के लिए सदैव समर्पित रहेंगे।

राष्ट्रीय एकता

सम्बद्ध शीर्षक

  • राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक उपाय
  • राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता
  • राष्ट्रीय एकीकरण और उसके मार्ग की बाधाएँ
  • राष्ट्रीय एकता के पोषक तत्त्व
  • राष्ट्रीय अखण्डता – आज की माँग
  • भारत की राष्ट्रीय एकता

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना : राष्ट्रीय एकता से अभिप्राय,
  2. भारत में अनेकता के विविध रूप,
  3.  राष्ट्रीय एकता का आधार,
  4.  राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता,
  5. राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधाए
    (क) साम्प्रदायिकता;
    (ख) क्षेत्रीयता अथवा प्रान्तीयता;
    (ग) भाषावाद;
    (घ) जातिवाद;
    (ङ) संकीर्ण मनोवृत्तिा
  6. राष्ट्रीय एकता बनाये रखने के उपाय
    (क) सर्वधर्म समभाव;
    (ख) समष्टि हित की भावना;
    (ग) एकता का विश्वास;
    (घ) शिक्षा का प्रसार;
    (ङ) राजनीतिक छल-छयों का अन्त,
  7. उपसंहार ।

प्रस्तावना : राष्ट्रीय एकता से अभिप्राय – एकता एक भावात्मक शब्द है, जिसका अर्थ है-‘एक होने का भाव’। इस प्रकार राष्ट्रीय एकता का अभिप्राय है-देश का सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, भौगोलिक, धार्मिक और साहित्यिक दृष्टि से एक होना। भारत में इन दृष्टिकोणों से अनेकता दृष्टिगोचर होती है, किन्तु बाह्य रूप से दिखलाई देने वाली इस अनेकता के मूल में वैचारिक एकता निहित है। अनेकता में एकता ही भारत की प्रमुख विशेषता है। किसी भी राष्ट्र की राष्ट्रीय एकता उसके राष्ट्रीय गौरव की प्रतीक होती है और जिस व्यक्ति को अपने राष्ट्रीय गौरव पर अभिमान नहीं होता, वह मनुष्य नहीं

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है,
वह नर नहीं नरपशु है निरा, और मृतक समान है।

भारत में अनेकता के विविध रूप – भारत एक विशाल देश है। उसमें अनेकता होनी स्वाभाविक ही है। धर्म के क्षेत्र में हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी आदि विविध धर्मावलम्बी यहाँ निवास करते हैं। इतना ही नहीं, एक-एक धर्म में भी कई अवान्तर भेद हैं; जैसे-हिन्दू धर्म के अन्तर्गत वैष्णव, शैव, शाक्त आदि। वैष्णवों में भी रामपूजक और कृष्णपूजक हैं। इसी प्रकार अन्य धर्मों में भी अनेकानेक अवान्तर भेद हैं।

सामाजिक दृष्टि से विभिन्न जातियाँ, उपजातियाँ, गोत्र, प्रवर आदि विविधता के सूचक हैं। सांस्कृतिक दृष्टि से खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा, पूजा-पाठ आदि की भिन्नता ‘अनेकता’ की द्योतक है। राजनीतिक क्षेत्र में समाजवाद, साम्यवाद, मार्क्सवाद, गांधीवाद आदि अनेक वाद राजनीतिक विचार-भिन्नता का संकेत करते हैं। साहित्यिक दृष्टि से भारत की प्राचीन और नवीन भाषाओं में रचित साहित्य की भिन्न-भिन्न शैलियाँ विविधता की सूचक हैं। आर्थिक दृष्टि से पूँजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद आदि विचारधाराएँ भिन्नता दर्शाती हैं। इसी प्रकार भारत की प्राकृतिक शोभा, भौगोलिक स्थिति, ऋतु-परिवर्तन आदि में भी पर्याप्त भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। इतनी विविधताओं के होते हुए भी भारत अत्यन्त प्राचीन काल से एकता के सूत्र में बँधा रहा है।

राष्ट्र की एकता, अखण्डता एवं सार्वभौमिक सत्ता बनाये रखने के लिए राष्ट्रीयता की भावना का उदय होना परमावश्यक है। यही वह भावना है, जिसके कारण राष्ट्र के नागरिक राष्ट्र के सम्मान, गौरव और हितों का चिन्तन करते हैं।

राष्ट्रीय एकता का आधार – हमारे देश की एकता के आधार दर्शन (Philosophy) और साहित्य (Literature) हैं। ये सभी प्रकार की भिन्नताओं और असमानताओं को समाप्त करने वाले हैं। भारतीय दर्शन सर्व-समन्वय की भावना का पोषक है। यह किसी एक भाषा में नहीं लिखा गया है, अपितु यह देश की विभिन्न भाषाओं में लिखा गया है। इसी प्रकार हमारे देश का साहित्य भी विभिन्न क्षेत्र के निवासियों द्वारा लिखे जाने के बावजूद क्षेत्रवादिता या प्रान्तीयता के भावों को उत्पन्न नहीं करता, वरन् सबके लिए भाई-चारे, मेल-मिलाप और सद्भाव का सन्देश देता हुआ देशभक्ति के भावों को जगाता है।
राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता – राष्ट्र की आन्तरिक शान्ति, सुव्यवस्था और बाह्य सुरक्षा की दृष्टि से राष्ट्रीय एकता की परम आवश्यकता है। भारत के सन्तों ने तो प्रारम्भ से ही मनुष्य-मनुष्य के बीच कोई अन्तर नहीं माना। वह तो सम्पूर्ण मनुष्य जाति को एक सूत्र में बाँधने के पक्षधर रहे हैं। नानक का कथन है

अव्वले अल्लाह नूर उपाया, कुदरत दे सब बन्दै।
एक नूर ते सब जग उपज्या, कौन भले कौन मन्दे॥

यदि हम भारतवासी अपने में निहित अनेक विभिन्नताओं के कारण छिन्न-भिन्न हो गये तो हमारी फूट का लाभ उठाकर अन्य देश हमारी स्वतन्त्रता को हड़पने का प्रयास करेंगे। ऐसा ही विचार राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने व्यक्त किया था-‘जब-जब भी हम असंगठित हुए, हमें आर्थिक और राजनीतिक रूप में इसकी कीमत चुकानी पड़ी।” अत: देश की स्वतन्त्रता की रक्षा और राष्ट्र की उन्नति के लिए राष्ट्रीय एकता का होना परम आवश्यक है।

राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधाएँ – मध्यकाल में विदेशी शासकों का शासन हो जाने पर भारत की इस अन्तर्निहित एकता को आघात पहुँचा था, किन्तु उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अनेक समाज-सुधारकों और दूरदर्शी राजपुरुषों के सद्प्रयत्नों से यह आन्तरिक एकता मजबूत हुई थी, किन्तु स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद अनेक तत्त्व इस आन्तरिक एकता को खण्डित करने में सक्रिय रहे हैं, जो निम्नवत् हैं

(क) साम्प्रदायिकता – साम्प्रदायिकता धर्म का संकुचित दृष्टिकोण है। संसार के विविध धर्मों में जितनी बातें बतायी गयी हैं, उनमें से अधिकांश बातें समान हैं; जैसे–प्रेम, सेवा, परोपकार, सच्चाई, समता, नैतिकता, अहिंसा, पवित्रता आदि। सच्चा धर्म कभी भी दूसरे से घृणा करना नहीं सिखाता। वह तो सभी से प्रेम करना, सभी की सहायता करना, सभी को समान समझना सिखाता है। जहाँ भी विरोध और घृणा है, वहाँ धर्म हो ही नहीं सकता। जाति-पाँति के नाम पर लड़ने वालों पर इकबाल कहते हैं-मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।

(ख) क्षेत्रीयता अथवा प्रान्तीयता – अंग्रेज शासकों ने न केवल धर्म, वरन् प्रान्तीयता की अलगाववादी भावना को भी भड़काया है। इसीलिए जब-तब राष्ट्रीय भावना के स्थान पर प्रान्तीय अलगाववादी भावना बलवती होने लगती है और हमें पृथक् अस्तित्व (राष्ट्र) और पृथक् क्षेत्रीय शासन स्थापित करने की माँगें सुनाई पड़ती हैं। एक ओर कुछ तत्त्व खालिस्तान की माँग करते हैं तो कुछ तेलुगूदेशम् और ब्रज प्रदेश के नाम पर मिथिला राज्य चाहते हैं। इस प्रकार क्षेत्रीयता अथवा प्रान्तीयता की भावना भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए बहुत बड़ी बाधी बन गयी है।

(ग) भाषावाद – भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है। यहाँ अनेक भाषाएँ और बोलियाँ प्रचलित हैं। प्रत्येक  भाषा-भाषी अपनी मातृभाषा को दूसरों से बढ़कर मानता है। फलत: विद्वेष और घृणा का प्रचार होता है और अन्ततः राष्ट्रीय एकता प्रभावित होती है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारत को एक संघ के रूप में गठित किया गया और प्रशासनिक सुविधा के लिए चौदह प्रान्तों में विभाजित किया गया, किन्तु धीरे-धीरे भाषावाद के आधार पर प्रान्तों की माँग बलवती होती चली गयी, जिससे भारत के प्रान्तों की भाषा के आधार पर पुनर्गठन किया गया। तदुपरान्त कुछ समय तो शान्ति रही, लेकिन शीघ्र ही अन्य अनेक विभाषी बोली बोलने वाले व्यक्तियों ने अपनी-अपनी विभाषा या बोली के आधार पर अनेक आन्दोलन किये, जिससे राष्ट्रीय एकता की भावना को धक्का पहुंचा।

(घ) जातिवाद – मध्यकाल में भारत के जातिवादी स्वरूप में जो कट्टरता आयी थी, उसने अन्य जातियों के प्रति घृणां और विद्वेष का भाव विकसित कर दिया था। पुराकाल की कर्म पर आधारित वर्ण-व्यवस्था ने जन्म पर आधारित कट्टर जाति-प्रथा का रूप ले लिया और प्रत्येक जाति अपने को दूसरी से ऊँची मानने लगी। इस तरह जातिवाद ने भी भारत की एकता को बुरी तरह प्रभावित किया। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् हरिजनों के लिए आरक्षण की राजकीय नीति का आर्थिक दृष्टि से दुर्बल सवर्ण जातियों ने कड़ा विरोध किया। विगत वर्षों में इस विवाद पर लोगों ने तोड़-फोड़, आगजनी और आत्मदाह जैसे कदम उठाकर देश की राष्ट्रीय एकता को झकझोर दिया। इस प्रकार जातिवाद राष्ट्रीय एकता के मार्ग में आज एक बड़ी बाधा बन गया है।

(ङ) संकीर्ण मनोवृत्ति – जाति, धर्म और सम्प्रदायों के नाम पर जब लोगों की विचारधारा संकीर्ण हो जाती है, तब राष्ट्रीयता की भावना मन्द पड़ जाती है। लोग सम्पूर्ण राष्ट्र का हित न देखकर केवल अपने जाति, धर्म, सम्प्रदाये अथवा वर्ग के स्वार्थ को देखने लगते हैं।

राष्ट्रीय एकता बनाये रखने के उपाय – वर्तमान परिस्थितियों में राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने के लिए निम्नलिखित उपाय प्रस्तुत हैं

(क) सर्वधर्म समभाव – विभिन्न धर्मों में जितनी भी अच्छी बातें हैं, यदि उनकी तुलना अन्य धर्मों की बातों से की जाये तो उनमें एक अद्भुत समानता दिखाई देगी; अतः हमें सभी धर्मों का समान आदर करना चाहिए। धार्मिक या साम्प्रदायिक आधार पर किसी को ऊँचा या नीचा समझना नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से एक पाप है। धार्मिक सहिष्णुता बनाये रखने के लिए गहरे विवेक की आवश्यकता है। सागर के समान उदार वृत्ति रखने वाले इनसे प्रभावित नहीं होते।

(ख) समष्टि-हित की भावना – यदि हम अपनी स्वार्थ-भावना को त्यागकर समष्टि-हित का भाव विकसित कर लें तो धर्म, क्षेत्र, भाषा और जाति के नाम पर न सोचकर समूचे राष्ट्र के नाम पर सोचेंगे और इस प्रकार अलगाववादी भावना के स्थान पर राष्ट्रीय भावना का विकास होगा, जिससे अनेकता रहते हुए भी एकता की भावना सुदृढ़ होगी।

(ग) एकता का विश्वास – भारत में जो दृश्यमान् अनेकता है, उसके अन्दर एकता का भी निवास है—इस बात का प्रचार ढंग से किया जाये, जिससे कि सभी नागरिकों को अन्तर्निहित एकता का विश्वास हो सके। वे पारस्परिक प्रेम और सद्भाव द्वारा एक-दूसरे में अपने प्रति विश्वास जगा सकें।

(घ) शिक्षा का प्रसार – छोटी-छोटी व्यक्तिगत द्वेष की भावनाएँ राष्ट्र को कमजोर बनाती हैं। शिक्षा का सच्चा अर्थ एक व्यापक अन्तर्दृष्टि व विवेक है। इसलिए शिक्षा का अधिकाधिक प्रसार किया जाना चाहिए, जिससे विद्यार्थी की संकुचित भावनाएँ शिथिल हों। विद्यार्थियों को मातृभाषा तथा राष्ट्रभाषा के साथ एक अन्य प्रादेशिक भाषा का भी अध्ययन करना चाहिए। इससे भाषायी स्तर पर ऐक्य स्थापित होने से राष्ट्रीय एकता सुदृढ़ होगी।

(ङ) राजनीतिक छलछद्मों का अन्त – विदेशी शासनकाल में अंग्रेजों ने भेदभाव फैलाया था, किन्तु अब स्वार्थी राजनेता ऐसे छलछद्म फैलाते हैं कि भारत में एकता के स्थान पर विभेद ही अधिक पनपता है। ये राजनेता साम्प्रदायिक अथवा जातीय विद्वेष, घृणा और हिंसा भड़काते हैं और सम्प्रदाय विशेष को मसीहा बनकर अपना स्वार्थ-सिद्ध करते हैं। इस प्रकार राजनीतिक छलछद्मों का अन्त राजनीतिक वातावरण के स्वच्छ होने से भी एकता का भाव सुदृढ़ करने में सहायता मिलेगी। उपर्युक्त उपायों से भारत की अन्तर्निहित एकता का सभी को ज्ञान हो सकेगा और सभी उसको खण्डित करने के प्रयासों को विफल करने में अपना योगदान कर सकेंगे। इस दिशा में धार्मिक महापुरुषों, समाज-सुधारकों, बुद्धिजीवियों, विद्यार्थियों और महिलाओं को विशेष रूप से सक्रिय होना चाहिए तथा मिल-जुलकर प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने पर सबल राष्ट्र के घटक स्वयं भी अधिक पुष्ट होंगे।

उपसंहार – राष्ट्रीय एकता की भावना एक श्रेष्ठ भावना है और इस भावना को उत्पन्न करने के लिए हमें स्वयं को सबसे पहले मनुष्य समझना होगा, क्योंकि मनुष्य एवं मनुष्य में असमानता की भावना समस्त विद्वेष एवं विवाद का कारण है। इसीलिए जब तक हममें मानवीयता की भावना विकसित नहीं होगी, तब तक राष्ट्रीय एकता का भाव उत्पन्न नहीं हो सकता। यह भाव उपदेशों, भाषणों और राष्ट्रीय गीत के माध्यम से सम्भव नहीं।

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