UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 10 गृह स्वच्छता एवं संवातन

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 10 गृह स्वच्छता एवं संवातन (Home Cleanliness and Ventilation)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 10 गृह स्वच्छता एवं संवातन

UP Board Class 11 Home Science Chapter 10 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
घर की स्वच्छता (सफाई) की क्या आवश्यकता है? घर की सफाई कितने प्रकार की होती है? घर की साप्ताहिक सफाई गृहिणी किस प्रकार करे जिससे उसकी शक्ति तथा समय कम-से-कम खर्च हो?
अथवा
घर की सफाई का क्या महत्त्व है? घर की दैनिक व साप्ताहिक सफाई आप किस प्रकार करेंगी? विस्तारपूर्वक लिखिए।
उत्तरः
घर की सफाई का महत्त्व (आवश्यकता) (Importance (Necessity) of Home Cleaning) –
घर में कीमती सामान का होना तथा उसका व्यवस्थित रूप से सजा होना इतना आवश्यक नहीं है जितनी घर की सफाई व स्वच्छता आवश्यक है। घर की सफाई से आशय है – घर में गन्दगी का व्याप्त न होना।

स्वच्छता; घर और घर की वस्तुओं को सुन्दर व आकर्षक बनाती है। उदाहरणार्थ-अत्यन्त कीमती सजावट की वस्तुएँ बैठक में लगी हैं, किन्तु सभी वस्तुओं पर धूल जमी है, मकड़ी के जाले लगे हैं, तो कौन सभ्य मनुष्य वहाँ बैठना पसन्द करेगा जबकि एक साधारण और स्वच्छ बैठक में अधिक आकर्षण होगा। स्वच्छता से मानसिक प्रेरणा प्राप्त होती है, मन प्रसन्न होता है। गन्दगी अनेक बीमारियों की जननी है, कीटाणुओं के पनपने का स्थान है। यदि नालियों में पानी भरा सड़ रहा है तो उसमें दुर्गन्ध तो पैदा होगी ही, साथ ही मक्खी व मच्छर भी बहुतायत में पैदा होंगे जो अनेक रोगों का कारण बनेंगे।

इस प्रकार स्वच्छता; सजावट तथा आकर्षण की पूरक तो है ही, यह रोगों से भी हमको बचाती है और मन को प्रफुल्लित करती है।

सफाई की व्यवस्था, विधि तथा प्रकार (System, Process and Types of Cleaning) –
गृहिणी को घर में अनेक प्रकार के कार्य होने के कारण प्रत्येक वस्तु, स्थान आदि की प्रतिदिन सफाई करना न तो सम्भव है और न ही आवश्यक। अत: घरेलू सफाई को पाँच भागों या प्रकारों में बाँटा जाता है। सफाई के इन भागों को घरेलू सफाई के प्रकार भी माना जाता है। ये प्रकार निम्नलिखित हैं –

  • दैनिक सफाई (Daily Cleaning)
  • साप्ताहिक सफाई (Weekly Cleaning)
  • मासिक सफाई (Monthly Cleaning)
  • वार्षिक सफाई (Annual Cleaning),
  • आकस्मिक सफाई (Casual Cleaning)।

1. दैनिक सफाई (Daily cleaning) –
घर की कुछ सफाई प्रतिदिन ही की जाती है। गृह स्वच्छता के लिए दैनिक सफाई को ही सर्वाधिक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है। दैनिक घरेलू सफाई का संक्षिप्त विवरण अग्रवर्णित है –

(अ) विभिन्न कमरों की सफाई – हवा से उड़कर अथवा जूतों आदि के साथ आई मिट्टी आदि कमरों को तथा कमरे में रखी वस्तुओं को गन्दा करती है। बच्चों वाले घर में बच्चे कागज के टुकड़े, पेंसिल की छीलन आदि फैलाते हैं। अतः इन सबकी सफाई प्रतिदिन ही होनी चाहिए। इसके लिए प्रतिदिन कमरों में झाडू लगाना तथा. फर्नीचर को कपड़े से झाड़ना-पोंछना आवश्यक है। दरवाजे के पास रखे गए पायदान को अवश्य झाड़ना चाहिए। अस्त-व्यस्त फैले हुए सामान एवं कपड़ों को समेटकर यथास्थान रखना अनिवार्य है। बिस्तर को ठीक करना तथा यदि आवश्यक हो तो उठाकर निर्धारित स्थान पर भी रखना चाहिए। यदि घर में फूलदानों में फूल रखे जाते हैं, तो उनकी भी देखभाल करनी चाहिए। फर्श पर गीले कपड़े से पोंछा लगाना अच्छा रहता है। पोंछे के पानी में फिनायल अथवा कोई अन्य नि:संक्रामक अवश्य मिला लेना चाहिए।

(ब) रसोईघर को साफ करना – रसोईघर या पाककक्ष को भी नित्य ही साफ करना अत्यन्त आवश्यक होता है। रसोईघर में जूठे बर्तन, भोजन के टुकड़े अथवा अन्न कण जो फैल जाते हैं, उनकी सफाई प्रतिदिन ही होनी चाहिए। रसोईघर को साफ रखना गृहिणी का मुख्य कर्त्तव्य है।

(स) स्नानगृह एवं शौचालय की सफाई – स्नानगृह एवं शौचालय की सफाई भी नित्य ही करनी चाहिए। स्नानगृह में तो साबुन आदि के कारण काफी गन्दगी हो जाती है। उसी में कपड़े भी धोए जाते हैं जिनका मैल फर्श पर रुक जाता है। अत: नित्य ही स्नानगृह के फर्श को झाडू से रगड़कर साफ करना आवश्यक होता है। स्नानगृह में प्रयोग होने वाली बाल्टी, लोटा, मग आदि को साफ करके उलटकर रखना चाहिए। इसी प्रकार शौचालय की सफाई भी प्रतिदिन होनी चाहिए। शौचालय में फिनायल डालने से वातावरण स्वास्थ्यकर तथा स्वच्छ रहता है।

(द) घर की नालियों एवं अन्य स्थानों की सफाई – घर के अन्दर बनी नालियों, जैसे रसोईघर से पानी निकालने वाली नाली आदि की सफाई भी नित्य होनी चाहिए। इनमें भी फिनायल आदि डाली जाती है। इनके अतिरिक्त आँगन तथा अन्य स्थानों को भी झाड़-बुहारकर साफ रखना चाहिए।

2. साप्ताहिक सफाई (Weekly cleaning) –
घर के सभी स्थानों की सफाई प्रतिदिन की जानी न तो सम्भव है और न ही आवश्यक। अत: कुछ स्थानों एवं वस्तुओं की सफाई सप्ताह में एक बार सामान्यतः छुट्टी के दिन की जाती है। इसे साप्ताहिक सफाई कहते हैं। इसके अन्तर्गत घर की दरियों एवं कालीनों को झाड़ा जाता है, फर्नीचर को पूरी तरह झाड़कर उनकी गद्दियों आदि को ठीक किया जाता है, दरवाजों तथा खिड़कियों के पास लगे मकड़ी के जालों आदि को साफ किया जाता है। कमरे में लगी हुई तस्वीरों, चित्रों एवं सजावट की अन्य वस्तुओं को भी साप्ताहिक सफाई के समय साफ करना चाहिए। यदि आवश्यकता समझी जाए तो कमरों के फर्श को धोया भी जा सकता है।

घर के बिस्तर एवं चादरों को भी एक दिन धूप में कुछ समय के लिए अवश्य डालना चाहिए। सर्दियों में तो यह अति आवश्यक होता है। इससे पलंग आदि की सफाई में सहायता मिलती है। यदि पलंग अथवा चारपाइयों में खटमल हों, तो इस दिन उन्हें मारने के लिए कोई कीटनाशक दवा छिड़कनी चाहिए। साप्ताहिक सफाई के अन्तर्गत रसोईघर में दाल-मसाले आदि रखने वाले डिब्बों को साफ करके तथा सुखाकर यथास्थान रख देना चाहिए। इसी दिन रसोइघर में लगी सिंक एवं अन्य वस्तुओं को विशेष रूप से साफ करना चाहिए और घर के मैले कपड़े एवं चादरें आदि गिनकर धोबी के पास भेज देने चाहिए।

3. मासिक सफाई (Monthly cleaning) –
कुछ वस्तुएँ एवं स्थान ऐसे होते हैं जिनकी साप्ताहिक सफाई नहीं हो पाती। वास्तव में, यह सफाई हर सप्ताह आवश्यक भी नहीं होती है। ऐसी सफाई महीने में एक बार अवश्य हो जानी चाहिए इसलिए इस सफाई को मासिक सफाई कहा जाता है। मासिक सफाई के अन्तर्गत मुख्य रूप से भण्डारगृह अथवा स्टोर रूम की सफाई आती है। भण्डारगृह में रखी सभी वस्तुओं को झाड़-पोंछकर साफ किया जाता है तथा उन्हें धूप में रखा जाता है। इसी प्रकार रसोईघर में रखी वस्तुओं को महीने में एक बार अवश्य धूप में रखना चाहिए। इससे दाल, चावल जैसे खाद्यान्नों में घुन, कीड़ा आदि नहीं लग पाता। अचार, चटनी आदि को महीने में एक बार धूप में रखना अच्छा होता है। इसके साथ ही भारी बिस्तर जैसे रजाई तथा गद्दों को भी धूप में फैलाना आवश्यक होता है। इससे उनमें से नमी की दुर्गन्ध तथा कुछ रोगाणु आदि समाप्त हो जाते हैं। मासिक सफाई का अपना विशेष महत्त्व होता है।

4. वार्षिक सफाई (Annual cleaning) –
दैनिक, साप्ताहिक एवं मासिक सफाई के अतिरिक्त वार्षिक सफाई, जो वर्ष में केवल एक बार ही की जाती है, अनेक कारणों से आवश्यक है। हमारे देश में इस प्रकार की सफाई दीपावली के अवसर पर करने की परम्परा है। यह इसलिए भी उत्तम है क्योंकि दीपावली वर्षा के बाद सर्दियों के प्रारम्भ में होती है। इस समय सबसे अधिक कीड़े-मकोड़े व फफूंद आदि हो सकते हैं। इस अवसर पर घर के सभी सामान को बाहर निकाला जाता है तथा उसे झाड़-पोंछकर एवं साफ करके रखा जाता है।

आवश्यकतानुसार घर की लिपाई-पुताई कराई जाती है, साथ ही छोटी-मोटी टूट-फूट की मरम्मत भी करवा ली जाती है। दरवाजों एवं खिड़कियों पर रंग-रोगन तथा फर्नीचर पर पॉलिश करवाने से इनकी भी सफाई हो जाती है। वार्षिक सफाई के अवसर पर ही घर के सामान को छाँटा जाता है तथा व्यर्थ के सामान को या तो फेंक दिया जाता है अथवा उसे बेच दिया जाता है।

5. आकस्मिक सफाई (Casual cleaning) –
घर की सफाई के उपर्युक्त चार प्रकारों के अतिरिक्त एक अन्य प्रकार का भी उल्लेख किया जा सकता है। यह नियमित सफाई से भिन्न है। उदाहरण के लिए किसी दिन यदि धूलभरी आँधी आ जाए तो उसके बाद की जाने वाली सफाई को आकस्मिक सफाई की श्रेणी में रखा जाएगा। इसी प्रकार यदि घर में कोई उत्सव आयोजित किया गया हो तो उसके पहले तथा बाद में की जाने वाली सफाई को भी अन्य किसी श्रेणी में न रखकर आकस्मिक सफाई की श्रेणी में ही रखा जाता है। आकस्मिक घरेलू सफाई का न तो समय निश्चित होता है और न ही व्यापकता। घर की आकस्मिक सफाई को पूरा करने के लिए गृहिणी तथा परिवार के अन्य सदस्यों को अपनी दैनिक दिनचर्या में कुछ परिवर्तन करना पड़ता है तथा कुछ अतिरिक्त परिश्रम तथा उपाय करने पड़ते हैं।

प्रश्न 2.
घर की सफाई में किस-किस प्रकार के सामान की आवश्यकता होती है? इनका प्रयोग किस प्रकार किया जाता है?
उत्तरः
घर की सफाई में काम आने वाला सामान (Material for Cleaning Home) –
व्यवस्थित ढंग से सफाई करने के लिए कुछ सामग्री आवश्यक होती है। यदि उपकरण तथा सफाई के पदार्थ आवश्यकतानुसार हों, तो सफाई अच्छी भी होती है तथा सरल भी। इस कार्य के लिए निम्नलिखित उपकरण तथा सुविधाएँ होनी उपयुक्त हैं –

1. झाड़-घर की सफाई के लिए सर्वाधिक उपयोग झाड़ का होता है। ये कई प्रकार की होती हैं, जिनमें से मुख्य खजूर की झाड़, नारियल की झाड़ तथा फूल-झाड़ घरों में प्रयोग की जाती हैं। झाड़ घर के कमरों, आँगन, बरामदे आदि के फर्श को बुहारने के काम आती है। ईंटों के फर्श तथा नालियों आदि को साफ करने के लिए सींक वाली कड़ी व मजबूत झाड़ काम में लाई जाती है, फूल-झाड़ मुलायम होती है। इससे चिकने फर्श की सफाई की जाती है।

2. झाड़न एवं पोंछा-झाड़न उस कपड़े को कहा जाता है जिससे वस्तुओं को झाड़ा-पोंछा जाता है। यह पुराने मुलायम कपड़े का बनाया जाता है। सुविधा के लिए इस कपड़े को एक छोटे डण्डे पर बाँधा जा सकता है। झाड़न से फर्नीचर, दरवाजे, खिड़कियाँ तथा घर की सजावट की वस्तुओं अर्थात् तस्वीर, फूलदानों आदि की धूल झाड़ी जा सकती है। इस प्रकार के झाड़न के अतिरिक्त फर्श को साफ करने अथवा पोंछा लगाने के लिए एक मोटा कपड़ा प्रयोग करना चाहिए। पोंछा लगाने के लिए पानी में फिनायल या अन्य कीटाणुनाशक मिलाया जा सकता है।

3. बुश-घर की विभिन्न वस्तुओं एवं दीवारों आदि की सफाई के लिए झाड़ तथा झाड़न के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के ब्रुश प्रयोग में लाए जाते हैं। कुछ ब्रुश पशुओं के नरम बालों अथवा नायलॉन के बने होते हैं। इनसे घर की सजावटी, नक्काशी, कटिंग अथवा अन्य कीमती वस्तुओं की सफाई की जाती है। फर्श अथवा दीवारों को रगड़कर साफ करने के लिए तिनके अथवा सन के ब्रुश उपयोगी होते हैं। छत पर लगे मकड़ी के जालों को साफ करने के लिए भी इसी प्रकार के ब्रुश को बाँस के साथ बाँधकर प्रयोग किया जाता है। पानी के स्थानों पर, जहाँ काई लगी है या अन्य प्रकार की गन्दगी जमने की आशा है, तारों के बने ब्रुश प्रयोग किए जाते हैं। रसोईघर के बर्तनों को साफ करने के लिए मुलायम ब्रुश प्रयोग किए जाते हैं। बोतलों आदि को भी अन्दर से ब्रुश से साफ किया जाता है।

4. सफाई के लिए आवश्यक बर्तन-घर की सफाई करने के लिए कुछ बर्तन भी आवश्यक हैं। सामान्यतः पानी भरने एवं पोंछा लगाने के लिए बाल्टी एवं एक डिब्बा आवश्यक है। कूड़ा एवं गन्दगी डालने के लिए अलग-अलग स्थानों पर छोटे-छोटे कूड़ेदान तथा घर का समस्त कूड़ा डालने के लिए एक बड़ा कूड़ादान होना चाहिए जो मुख्य द्वार के निकट रखा रहे। कूड़ेदान ढक्कन वाले होने ही उचित हैं।

5. अन्य सामग्री-सफाई के लिए उपयोगी साबुन, सर्फ, विम, सोडा आदि तथा वस्तुओं के दाग-धब्बे छुड़ाने के लिए स्प्रिट, बेन्जीन, तारपीन का तेल, हल्का तेजाब आदि की भी आवश्यकता होती है। कुछ कीटाणुनाशक घोल जैसे फिनायल आदि भी घर पर अवश्य होने चाहिए। ।

प्रश्न 3.
वायु के संघटन पर एक नोट लिखिए।वायु में नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड एवं नमी के महत्त्व को समझाइए। अथवा वायु का संघटन बताइए। वायु में ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के महत्त्व को समझाइए।
उत्तरः
वायु विभिन्न गैसों का मिश्रण है। यह स्वादहीन, रंगहीन तथा गन्धहीन होती है। यह हमारी पृथ्वी के चारों ओर एक व्यापक क्षेत्र में उपस्थित है, इसी को वायुमण्डल कहा जाता है।
वायु का संघटन (Composition of Air) –
वैज्ञानिक युग से पहले लोग वायु को तत्त्व समझते थे किन्तु अब यह सर्वविदित है कि वायु प्रमुखत: ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन का मिश्रण है। इन गैसों के अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन, ओजोन, आर्गन, जलवाष्प आदि गैसें भी वायु में उपस्थित रहती हैं। वायु में उपस्थित इन गैसों में से सामान्यत: ऑक्सीजन सक्रिय और नाइट्रोजन निष्क्रिय गैस है। ऑक्सीजन वायु के आयतन का लगभग 1/5 भाग होती है। हमारे श्वसन के लिए यही गैस आवश्यक है। इसके अतिरिक्त इसमें रोगों के कीटाणु, पेड़-पौधों तथा अन्य जीवों के उत्सर्जी पदार्थ, बीजाणु आदि भी होते हैं।
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वायु में विभिन्न गैसों का प्रतिशत निम्नांकित सारणी में दर्शाया गया है –
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यद्यपि समय-समय पर और स्थान-स्थान पर यह संघटन बदलता रहता है, फिर भी अनेक कारणों से प्रकृति में यह संघटन काफी सन्तुलित रहता है और यदि यह सन्तुलित नहीं है, तो वायु को प्रदूषित समझा जाता है। ऐसी वायु निश्चित ही किसी-न-किसी रूप में हानिकारक होती है।

वायु में ऑक्सीजन (O2) का महत्त्व (Importance of Oxygen in Air) –
ऑक्सीजन एक प्राणदायक गैस है। सभी जीव-जन्तु तथा पौधे इसे श्वसन के लिए ग्रहण करते हैं तथा भोजन से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए प्रयोग में लाते हैं। यह गैस वस्तुओं के जलने में सहायता करती है तथा उनके ऑक्साइड बनाती है। ऑक्सीजन एक रंगहीन, गन्धहीन तथा स्वादहीन गैस है।

वायु में नाइट्रोजन (N2) का महत्त्व (Importance of Nitrogen in Air) –
वायु में विद्यमान नाइट्रोजन गैस एक निष्क्रिय गैस है जो ऑक्सीजन इत्यादि की तीव्रता को कम करती है। वैसे वायुमण्डल की नाइट्रोजन इस स्वरूप में सामान्यतया जीवधारियों के लिए किसी काम की नहीं है। दूसरी ओर जीवधारियों में उपस्थित प्रोटीन में नाइट्रोजन पर्याप्त मात्रा में होती है और बिना नाइट्रोजन के इस कोशिकीय पदार्थ के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। इसका अर्थ यह भी है कि नाइट्रोजन प्रोटीन के संगठक तत्त्व के रूप में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह भी सत्य है कि जन्तु इसे सीधे वायु से प्राप्त नहीं कर सकते। वायु की नाइट्रोजन मिट्टी के द्वारा पौधों में तथा वहाँ से सभी जन्तुओं में पहुँचती है। मृदा में नाइट्रोजन निम्नलिखित प्रकार से पहुँचती है –

  • घर्षण विद्युत द्वारा नाइट्रोजन व ऑक्सीजन के संयोग से अनेक ऑक्साइड्स बनते हैं जो वर्षा द्वारा भूमि में पहुँच जाते हैं।
  • मिट्टी में उपस्थित कुछ जीवाणु तथा कुछ शैवाल इस स्वतन्त्र नाइट्रोजन को बन्धित कर लेते हैं।
  • कुछ पौधों की जड़ों में उपस्थित सहजीवी जीवाणु भी इसे बन्धित कर लेते हैं।

मृदा से नाइट्रोजन के यौगिक पौधों में तथा वहाँ से जन्तुओं में पहुँचते हैं। इन जीवों के उत्सर्जन से अथवा मृत जीवों के भूमि पर गिरने तथा बाद में जीवाणुओं द्वारा सड़ने (decompose) से यह नाइट्रोजन स्वतन्त्र होकर वापस वायुमण्डल में आ जाती है और वायु में इसका सन्तुलन बना रहता है। इस प्रकार प्रकृति में नाइट्रोजन-चक्र के लिए वायु की नाइट्रोजन अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।

वायु में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का महत्त्व (Importance of Carbon dioxide in Air) –
शुद्ध वायु में, जो जीवों के श्वसन के लिए अत्यन्त आवश्यक है, कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा अत्यन्त अल्प होती है। आयतन के अनुसार यह लगभग 0.03 % होती है। जीव के द्वारा छोड़ी गई श्वास में इसकी मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है। इसी प्रकार वस्तुओं के जलने से भी यही गैस अधिकतम मात्रा में उत्पन्न होती है। अधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड की वायु में उपस्थिति मनुष्य सहित सभी जन्तुओं के लिए हानिकारक है। यह श्वसन योग्य वायु में एक ओर तो ऑक्सीजन की मात्रा को कम करती है दूसरी ओर धीमे विष के रूप में कार्य करती है।

हरे पौधों के लिए कार्बन डाइऑक्साइड की वायु में उपस्थिति अत्यन्त लाभदायक है। ये पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में इस गैस का प्रयोग कार्बोज तथा बाद में मण्ड आदि बनाने में करते हैं। वास्तव में जो भी खाद्य पदार्थ पृथ्वी पर उपस्थित है अथवा प्राप्त होता है, पौधों को इसी क्रिया से प्राप्त होता है। इस क्रिया को प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) कहते हैं। इस क्रिया में भोजन (कार्बनिक पदार्थ) बनाने के लिए कार्बन, कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) से ही प्राप्त किया जाता है।

उपर्युक्त के अनुसार पृथ्वी पर कार्बन चक्र (carbon cycle) को चलाए रखने के लिए कार्बन डाइऑक्साइड अत्यन्त आवश्यक है।

वायु में नमी का महत्त्व (Importance of Humidity in Air) –
वायु में नमी भी अल्पमात्रा में उपस्थित होती है। इसकी अधिक मात्रा वायु को श्वसन के अयोग्य बनाती है। वायु की नमी अधिक मात्रा में होने पर, जलवाष्प में परिणत होकर जल में बदलती रहती है। इस नमी के प्राकृतिक स्वरूप बादल, कोहरा, धुंध, ओस, वर्षा आदि हैं। ठण्डे स्थानों में गिरने वाली बर्फ भी इसी नमी का अति ठण्डा स्वरूप है। प्रत्येक खुले हुए जल-तल से जलवाष्प नमी के रूप में वायु में सदैव ही मिलती रहती है। पृथ्वी पर आवश्यक रूप में उपस्थित जल चक्र (Water cycle) में इसका अत्यधिक महत्त्व है।

प्रश्न 4.
संवातन से आप क्या समझती हैं? संवातन का सिद्धान्त क्या है? संवातन के साधनों का भी उल्लेख कीजिए।
अथवा
संवातन के प्रमुख साधन लिखिए।
उत्तरः
संवातन (Ventilation) –
किसी स्थान पर वायु के आने-जाने (विसरित होने) की क्रिया को संवातन (Ventilation) कहा जाता है। यह एक प्रकार की व्यवस्था है जो किसी आवासीय स्थान, कार्य करने के स्थान आदि पर विशेष रूप से की जाती है ताकि वहाँ रहने वाले व्यक्तियों को शुद्ध (प्रदूषणरहित) वायु प्राप्त होती रहे। इस प्रकार की व्यवस्था के लिए दो बातों पर ध्यान देना आवश्यक होता है। एक तो कमरे या उक्त स्थान की अशुद्ध वायु को बाहर निकालने की व्यवस्था। दूसरे बाहर से शुद्ध वायु को अन्दर लाने की प्रक्रिया। स्पष्ट है कि खुले स्थान में तो प्रकृति स्वयं ही वायु की शुद्धता को सन्तुलित रखती है।

संवातन का सिद्धान्त (Principle of Ventilation) –
ताप के बढ़ने से वायु हल्की हो जाती है तथा ऊपर उठने लगती है। कमरे की वायु व्यक्तियों की श्वसन क्रिया के कारण अशुद्धियाँ प्राप्त होने के साथ-साथ गर्म भी हो जाती है; अत: छत की ओर ऊपर उठती है, अपेक्षाकृत ठण्डी तथा शुद्ध वायु कमरे के नीचे के स्थानों में रहेगी। गर्म होकर जब किसी आवासीय स्थल की वायु ऊपर उठ जाती है तब वहाँ का स्थान खाली होने लगता है। इस खाली स्थान को भरने के लिए अतिरिक्त वायु की आवश्यकता होती है। इस सैद्धान्तिक तथ्य के आधार पर संवातन की व्यवस्था की जाती है। उत्तम संवातन के लिए कमरे में ऊपरी भाग में अशुद्ध वायु के विसर्जन के लिए रोशनदान होना चाहिए तथा नीचे भाग में शुद्ध वायु के प्रवेश के लिए दरवाजों एवं खिड़कियों का प्रावधान होना चाहिए।

संवातन के साधन (Resources of Ventilation) –
स्वास्थ्य एवं श्वसन की सुविधा के लिए संवातन अनिवार्य है। संवातन की व्यवस्था मुख्य रूप से दो प्रकार के साधनों से होती है – (क) प्राकृतिक साधन तथा (ख) कृत्रिम साधन।

(क) प्राकृतिक साधन-प्रकृति ने स्वयं ही संवातन की व्यवस्था की है। वायु के कुछ गुण, जैसे विसरण का गुण, संवातन में स्वयं ही सहायक होते हैं। जब किसी स्थान पर कोई गैस एकत्रित हो जाती है तो वह स्वयं ही विभिन्न दिशाओं में फैलने लगती है। इस प्रकार इस क्रिया में एक स्थान की गैसें दूसरे स्थान पर चली जाती हैं तथा वहाँ पर अन्य स्थान से वायु आ जाती है। विसरण की क्रिया धीमी गति से होती है। इस प्रकार मन्द गति से विसरण के द्वारा वायु शुद्ध होती रहती है। तेज गति से चलने वाली हवाएँ संवातन का दूसरा प्राकृतिक साधन हैं। विभिन्न प्राकृतिक कारकों से प्रभावित होकर वायुमण्डल में अनेक । बार तेज गति से हवाएँ चलती हैं और वायु का विलोडन कर देती हैं। वातावरण में होने वाले तापमान के अन्तर से भी संवातन की प्रक्रिया को बल मिलता है। यह विसरण की गति को प्रभावित करता है। इस प्रकार वायु गर्म होकर हल्की हो जाती है तथा ऊपर उठ जाती है। खाली स्थान को भरने के लिए अन्य स्थान से वायु बहकर आ जाती है और संवातन होता है।

(ख) कृत्रिम साधन – वातावरण में चलने वाली प्राकृतिक संवातन की क्रियाओं को ध्यान में रखकर हम अपने मकानों में विभिन्न प्रकार की व्यवस्था करते हैं जो कृत्रिम संवातन के अन्तर्गत आती हैं। प्राकृतिक संवातन उत्तम एवं स्वाभाविक होता है। इसका लाभ उठाने के लिए मकान, कार्य करने के स्थान आदि पर खिड़कियाँ, दरवाजे, रोशनदान तथा चिमनियाँ आदि बनाई जाती हैं। इस प्रकार, इन स्थानों में गर्म वायु ऊपर उठकर रोशनदान या चिमनियों से बाहर निकल जाती है और ठण्डी वायु खिड़कियों, दरवाजों के रास्ते अन्दर आ जाती है।

कुछ स्थानों पर संवातन की उपर्युक्त व्यवस्था सम्भव नहीं हो पाती। उदाहरणार्थ-सिनेमाघरों, अस्पतालों तथा अत्यधिक ठण्डे स्थानों में निरन्तर खिड़कियाँ, दरवाजे. खुले नहीं रखे जा सकते हैं। ऐसे स्थानों पर प्राकृतिक संवातन के लाभ प्राप्त नहीं किए जा सकते। इनके अभाव में कृत्रिम संवातन के कुछ अन्य साधनों को अपनाया जाता है। इनमें से कुछ साधन निम्नलिखित हैं

(1) निर्वातक पंखे (Exhaust Fans) कमरे के अन्दर की दूषित वायु को खींचकर बाहर फेंक देते हैं। इस प्रकार अन्दर स्थान खाली हो जाता है जिसे भरने के लिए दूसरी ओर के किसी भी मार्ग से बाहर की शुद्ध वायु भीतर आ जाती है।

(2) कमरे की गन्दी वायु को बाहर से अथवा किसी अन्य साधन से लाई गई शुद्ध वायु के द्वारा कमरे से बाहर धकेल दिया जाता है। उदाहरण-कूलर।।

(3) कमरे की वायु को पाइपों में गर्म भाप प्रवाहित करके गर्म कर दिया जाता है। गर्म होकर हल्की वायु रोशनदानों से बाहर निकल जाती है तथा शुद्ध वायु दरवाजों, खिड़कियों से अन्दर आ जाती है।

(4) वातानुकूलन की विधि द्वारा संवातन किया जाता है। यह अनेक यन्त्रों का बना उपकरण होता है। इसमें कुछ यन्त्र कमरे की दूषित वायु को खींचकर बाहर निकालने का कार्य करते हैं। दूसरे यन्त्र वायु से धूल आदि के कणों को छानकर इसे साफ-सुथरी करते हैं साथ ही इसको उचित ताप पर लाते हैं। तीसरे प्रकार के यन्त्र शुद्ध, आवश्यक रूप में शीतल तथा उचित नमी वाली वायु को अन्दर भेजने का कार्य करते हैं। यह एक महँगी विधि है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 10 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
गृह स्वच्छता से क्या लाभ हैं? गृह स्वच्छता के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तरः
घर को गन्दगी से मुक्त रखना ही गृह स्वच्छता कहलाता है। गृह स्वच्छता के लिए निरन्तर समुचित प्रयास करने पड़ते हैं। व्यक्ति एवं परिवार के लिए गृह स्वच्छता के निम्नलिखित महत्त्व या लाभ हैं –

  • घर की सफाई घर की सजावट में सहायक होती है। घर की सफाई के अभाव में घर की सजावट हो ही नहीं सकती।
  • घर की सफाई घर में जीवाणुओं को पनपने से रोकती है। वास्तव में विभिन्न रोगों के जीवाणु गन्दगी में ही पनपते हैं।
  • घर की सफाई घर में रहने वालों के स्वास्थ्य में भी सहायक होती है। साफ-सुथरे घर में व्यक्ति का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य उत्तम रहता है।
  • घर की सफाई सुचारु गृह-व्यवस्था में सहायक होती है।
  • घर की सफाई से घर के आकर्षण में भी वृद्धि होती है।
  • घर की सफाई वहाँ रहने वालों के जीवन-स्तर को भी उन्नत बनाती है।
  • घर की सफाई से व्यक्ति स्वस्थ, प्रसन्न तथा उत्साहित रहता है। ये कारक व्यक्ति की। व्यावसायिक सफलता में भी सहायक होते हैं।
  • साफ-सुथरे घर की सभी आगन्तुक प्रशंसा करते हैं।

घर की स्वच्छता के पाँच प्रकार हैं-दैनिक सफाई, साप्ताहिक सफाई, मासिक सफाई, वार्षिक सफाई तथा आकस्मिक सफाई।

प्रश्न 2.
घर की सफाई के लिए अपनाए जाने वाले आधुनिक उपकरणों का सामान्य परिचय दीजिए।
अथवा घर की सफाई के दो आधुनिक उपकरणों के नाम व कार्य लिखिए।
उत्तरः
घर की सफाई के आधुनिक उपकरण घर की सफाई के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले मुख्य आधुनिक उपकरण निम्नलिखित हैं –

1. वैक्यूम क्लीनर-वैक्यूम क्लीनर घर की सफाई के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला एक आधुनिक उपकरण है जो बिजली से चलता है। इस उपकरण में ऐसी व्यवस्था रहती है कि यह फर्श पर बिखरी धूल को अपनी ओर खींच लेता है तथा यह धूल साथ में लगी हुई एक कपड़े की थैली में इकट्ठी हो जाती है। बाद में, इस कपड़े की थैली को कूड़ेदान में झाड़ दिया जाता है। वैक्यूम क्लीनर द्वारा घर के फर्श, दीवारों एवं कोनों पर रुकी हुई धूल को सरलता से साफ किया जा सकता है।

2. कारपेट क्लीनर-दरी एवं कालीन को साफ करने के लिए प्रयोग किए जाने वाले उपकरण को कारपेट क्लीनर कहा जाता है। इस उपकरण में एक ब्रुश लगा रहता है जो कालीन आदि की धूल को झाड़कर साफ करता है। यह धूल एक डिब्बे में एकत्र होती रहती है जिसे बाद में खाली किया जा सकता है।

3. बर्तन साफ करने की मशीन-अब बर्तन साफ करने के लिए एक मशीन बना ली गई है। इस मशीन के एक भाग में जो ढोल के आकार का होता है जूठे बर्तन रखकर सोडा अथवा विम डाल दिया जाता है। तत्पश्चात् मशीन को चालू कर दिया जाता है, बर्तन स्वतः ही साफ हो जाते हैं।

प्रश्न 3.
शुद्ध वायु की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
शुद्ध वायु की आवश्यकता –
भोजन से भी अधिक शुद्ध वायु जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह श्वसन क्रिया को चलाती है। इस क्रिया में जीव ऑक्सीजन लेते हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड निकालते हैं। वास्तव में, ऑक्सीजन शरीर के अन्दर विभिन्न कोशिकाओं में रुधिर के हीमोग्लोबिन द्वारा पहुँचकर कोशिकीय श्वसन में काम आती है। इस क्रिया के अन्तर्गत भोज्य पदार्थों का ऑक्सीकरण होता है तथा ऊर्जा उत्पन्न होती है। यही ऊर्जा हमारे शरीर में विभिन्न कार्यों के लिए आवश्यक है। इस क्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न होती है। यह रुधिर के प्लाज्मा द्वारा श्वसन अंगों में पहुँचकर शरीर से बाहर निकल जाती है। इस प्रकार, वायु की ऑक्सीजन का उपयोग सभी जीव करते हैं। फलस्वरूप वायुमण्डल में ऑक्सीजन की कमी होती है तथा’ कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है। कम ऑक्सीजन तथा अधिक कार्बन डाइऑक्साइड वाली वायु श्वसन के योग्य नहीं रहती तथा अनेक कष्टप्रद लक्षण उत्पन्न करती है।

प्रश्न 4.
वायु में पायी जाने वाली अशद्धियाँ कौन-कौन सी होती हैं?
अथवा
वायु में कौन-कौन सी अशुद्धियाँ पायी जाती हैं?
उत्तरः
वायु की अशुद्धियाँ –
वायु में विभिन्न क्रियाओं के परिणामस्वरूप दो प्रकार की अशुद्धियाँ उत्पन्न हो जाती हैं –

(अ) गैसीय अशुद्धियाँ-वायु अपने आप में विभिन्न गैसों का मिश्रण मात्र है। वातावरण में विभिन्न क्रियाओं के परिणामस्वरूप विभिन्न गैसें बनती हैं जो वायु को अशुद्ध बनाती रहती हैं। इस प्रकार की मुख्य गैसें हैं-कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, हाइड्रोक्लोरिक एसिड, अमोनिया आदि।

(ब)ठोस अथवा लटकने वाली अशुद्धियाँ-कुछ हल्के ठोस पदार्थ भी वायु में व्याप्त रहते हैं। वायु की इन ठोस अशुद्धियों को देखा जा सकता है। ये अशुद्धियाँ दो प्रकार की होती हैं –

(i) सजीव अशुद्धियाँ-विभिन्न प्रकार के जीवाणु, बीजाणु, परागकण आदि इसी प्रकार की अशुद्धियाँ हैं। ये अशुद्धियाँ हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।

(ii) निर्जीव अशुद्धियाँ-ये अशुद्धियाँ विभिन्न प्रकार के कणों के रूप में होती हैं। मिट्टी, धुल, रेत आदि के हल्के कण वायु में व्याप्त रहते हैं। इसके अतिरिक्त, वनस्पतियों के कण, ऊन, धागे तथा लकड़ी आदि के महीन कण इसी प्रकार की अशुद्धि को जन्म देते हैं। विभिन्न फैक्ट्रियों आदि की चिमनियों से निकलने वाले धुएँ के साथ कोयले के महीन कण तथा कुछ अन्य धातुओं के कण भी वायु में घुल-मिल जाते हैं। इन सभी प्रकार के कणों को वायु की अशुद्धियाँ ही माना जाता है।

प्रश्न 5.
वायु को अशुद्ध बनाने वाले मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
वायु को अशुद्ध बनाने वाले कारक –
वायु को अशुद्ध करने वाले मुख्य कारक निम्नलिखित हैं –

1. श्वसन क्रिया द्वारा-वायु का सर्वाधिक उपयोग श्वसन क्रिया के लिए होता है। श्वसन क्रिया द्वारा वायुमण्डल से जीव ऑक्सीजन का सेवन कर लेते हैं तथा बदले में कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं। इस क्रिया के परिणामस्वरूप वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती जाती है और वायु अशुद्ध हो जाती है।

2. विभिन्न पदार्थों के जलने से लकड़ी, कोयला, गैस, तेल तथा अन्य अनेक पदार्थों के जलने में ऑक्सीजन प्रयुक्त होती है। इससे वायु में ऑक्सीजन की मात्रा तो घटती ही है, साथ ही कार्बन डाइऑक्साइड गैस की मात्रा में भी बढ़ोतरी होती है। इससे वायु का सन्तुलन बिगड़ जाता है तथा वायु अशुद्ध हो जाती है। जलने की क्रिया से कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी कुछ विषैली गैसें भी उत्पन्न होती हैं, जो वायु को और अधिक दूषित बनाती हैं।

3. व्यावसायिक अशुद्धियाँ-उद्योगों में अनेक प्रकार की रासायनिक क्रियाएँ होती हैं। इससे अनेक प्रकार की विषैली गैसें तथा गन्दगी उत्पन्न होती है। ये सब वायुमण्डल में व्याप्त होती रहती हैं और वायुमण्डल दूषित होता रहता है। भिन्न-भिन्न प्रकार के उद्योग भिन्न-भिन्न प्रकार की अशुद्धियाँ वायुमण्डल में छोड़ते रहते हैं।

4. वाहन-डीजल, पेट्रोल, गैस आदि से चलने वाले वाहन भी वायु को निरन्तर अशुद्ध बनाते रहते हैं।

प्रश्न 6.
अशुद्ध वायु का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तरः
अशुद्ध वायु का स्वास्थ्य पर प्रभाव –
शुद्ध वायु हमारे स्वास्थ्य के लिए सहायक एवं लाभदायक होती है। इसके विपरीत, अशुद्ध वायु हमारे स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती है। अधिक समय तक अशुद्ध वायु में साँस लेते रहने से अनेक रोग हो सकते हैं। यदि व्यक्ति को पर्याप्त मात्रा में शुद्ध वायु नहीं मिलती तो उसकी आयु घटकर शीघ्र ही मृत्यु भी हो सकती है। अशुद्ध वायु फेफड़ों को दूषित करती है तथा शरीर में अनेक विजातीय तत्त्व एकत्रित होने लगते हैं। पाचन क्रिया भी अशुद्ध वायु से अस्त-व्यस्त होने लगती है। अशुद्ध वायु शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है। अशुद्ध वायु के निरन्तर सेवन से व्यक्ति का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। ऐसा व्यक्ति कोई भी कार्य ठीक से नहीं कर पाता, वह प्राय: बेचैन-सा रहता है तथा उसके व्यवहार में असामान्यता आ जाती है।

अशुद्ध वायु में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाती है। इससे वायु में विभिन्न रोगों के कीटाणु बढ़ने लगते हैं। इस प्रकार अनेक प्रकार के रोग; जैसे-सिरदर्द, चक्कर आना, भूख न लगना, अजीर्ण, आँखों, गले आदि के रोग, तपेदिक, खाँसी, जुकाम आदि अशुद्ध वायु से फैलते हैं।

प्रश्न 7.
वायु मानव-जीवन के लिए क्यों आवश्यक है?
उत्तरः
वायु मानव-जीवन के लिए आवश्यक है –
वायु, सभी जीवधारियों के लिए प्राणदायिनी है। यह पेड़-पौधों के लिए भी आवश्यक है, जिनसे हमें अनेक प्रकार की आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। यह मनुष्य के लिए दो प्रकार से आवश्यक है –

1. श्वसन क्रिया के लिए आवश्यक गैसों का आदान-प्रदान–शरीर में उपस्थित प्रत्येक जीवित कोशिका, ऊतक आदि को जीवित रहने तथा जैविक कार्यों को करने के लिए प्राणदायक ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। इन जीवित कोशिकाओं में ऑक्सीजन, जो रुधिर के माध्यम से यहाँ पहुँचती है, के द्वारा भोज्य पदार्थों का ऑक्सीकरण होता है। इससे ऊर्जा उत्पन्न होती है। इस क्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड भी उत्पन्न होती है। यह शरीर के लिए अनुपयोगी एवं हानिकारक गैस है। रुधिर के द्वारा ही कार्बन डाइऑक्साइड इन कोशिकाओं तथा ऊतकों से हटाई जाती है।

श्वसन के लिए ऑक्सीजन श्वसनांगों में वायु से ही उपलब्ध होती है तथा कार्बन डाइऑक्साइड रुधिर से वायु में छोड़ी जाती है।

2. शरीर का ताप सामान्य रखना-वायु के सम्पर्क में शरीर का ताप कम होता रहता है; अत: स्थिर बना रहता है। त्वचा पर आए हुए पसीने को भी वायु उड़ा ले जाती है। इससे त्वचा ठण्डी होती है। दूसरी ओर श्वसन क्रिया से भी शरीर के तापक्रम का नियमन होता है।

प्रश्न 8.
अशुद्ध वायु की शुद्धि के प्राकृतिक साधनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
अशुद्ध वायु की शुद्धि के प्राकृतिक साधन –
प्रकृति में ही ऐसे अनेक साधन हैं जो वायु को निरन्तर शुद्ध करते रहते हैं; यथा –

1. पेड़-पौधों द्वारा वायु शुद्ध करना – वायु को शुद्ध करने वाले मुख्य प्राकृतिक साधन पेड़-पौधे हैं जो वायुमण्डल से कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण कर लेते हैं तथा सूर्य के प्रकाश में
ऑक्सीजन छोड़ते हैं। इस क्रिया में जहाँ एक ओर वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा घटती है वहीं दूसरी ओर ऑक्सीजन की मात्रा में वृद्धि होती है।

2. सूर्य के प्रकाश द्वारा वायु का शुद्ध होना – सूर्य के प्रकाश में अत्यधिक ताप होता है। इसकी गर्मी से अनेक अशुद्धियाँ स्वयं ही नष्ट हो जाती हैं; जैसे—विभिन्न रोगों के कीटाणु सूर्य की गर्मी से मर जाते हैं, जलवाष्प की अधिकता सूर्य की गर्मी से कम होती है तथा वस्तुओं के सड़ने-गलने से उत्पन्न होने वाली अशुद्धियाँ तथा दुर्गन्धपूर्ण गैसें सूर्य के प्रकाश एवं गर्मी से ऑक्सीजन की उपस्थिति में नष्ट हो जाती हैं।

3. वर्षा द्वारा वायु का शुद्ध होना – वर्षा का जल वायुमण्डल की अनेक अशुद्धियों को घोलकर अपने साथ बहा ले जाता है। उदाहरणार्थ-वायुमण्डल में उपस्थित धूल-कण एवं अन्य अनेक धातुओं के महीन कण जल के साथ बहकर पृथ्वी पर आते हैं तथा अनेक गैसें जल में घुलनशील होती हैं जो वर्षा के जल में घुलकर पृथ्वी पर आती हैं।

4. वायु की ऑक्सीजन द्वारा वायु का शुद्ध होना – ऑक्सीजन सभी वस्तुओं को ऑक्सीकृत करने वाली गैस है। इस प्रकार वायु में उपस्थित ऑक्सीजन वायु की अनेक अशुद्धियों को ऑक्सीकृत कर देती है। इसी प्रकार की दूसरी गैस तथा ऑक्सीजन का एक रूप ओजोन भी एक तीव्र गैस है। ओजोन अनेक जीवाणुओं को नष्ट कर देती है।

5. तेज हवाओं द्वारा वायु का शुद्ध होना – वायु का शुद्धीकरण तेज गति से बहने वाली हवाओं से भी होता है। ये हवाएँ एक स्थान पर एकत्रित होने वाली अशुद्धियों को तीव्र गति से उड़ाकर दूर क्षेत्रों में पहुँचा देती हैं। इस क्रिया से वायु का विलोडन होता है तथा सभी स्थानों पर सन्तुलन बना रहता है। उदाहरणार्थ-यदि हवाएँ न चलें तो औद्योगिक क्षेत्रों का वातावरण इतना अधिक दूषित हो जाए कि वहाँ रहना असम्भव हो जाए।

6. विसरण द्वारा वायु का शुद्ध होना – विसरण पदार्थों का एक विशेष गुण है, विशेषकर गैसों का; जिसमें एक गैस अपने से अधिक सान्द्रण से कम सान्द्रण वाले स्थान पर स्वयं ही बहती है। यह क्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि उस गैस का दोनों स्थानों (सभी स्थानों) पर बराबर सान्द्रण नहीं हो जाता। इस गुण के कारण वायु की गैसें इधर-उधर बहती रहती हैं। जब किसी एक स्थान पर कुछ विषैली गैसें अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाती हैं तो वे स्वयं ही किसी भी दिशा में विसरित हो जाती हैं। इस प्रकार विसरण से वायु शुद्ध बनी रहती है।

प्रश्न 9.
अशुद्ध वायु की शुद्धि के कृत्रिम साधनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
अशुद्ध वायु की शुद्धि के कृत्रिम साधन –
अशुद्ध वायु को शुद्ध करने के लिए निम्नलिखित कृत्रिम साधनों को मुख्य रूप से अपनाया जाता है –

  • सभी मकानों एवं निवास स्थानों को बनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वायु एवं सूर्य के प्रकाश के आने-जाने की व्यवस्था रहे।
  • घरों में जहाँ अँगीठी आदि जलाई जाती हैं वहाँ से धुआँ निकलने की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। इसके लिए एक ऊँची चिमनी लगा देना उचित है ताकि धुआँ एवं दूषित गैसें घर के अन्दर तथा अन्य निवास स्थानों के पास एकत्रित न होने पाएँ।
  • यदि पशु पालने हों तो उन्हें निवास स्थान से कुछ दूर ही रखना चाहिए।
  • प्रत्येक बस्ती में काफी संख्या में पेड़-पौधे एवं वनस्पति उगानी चाहिए।
  • भूमि खाली नहीं छोड़नी चाहिए। खाली भूमि में धूल उड़ती है जो वायु को दूषित करती है।
  • विभिन्न औद्योगिक संस्थानों तथा फैक्ट्रियों को बस्ती से दूर बनाना चाहिए। इसके साथ ही फैक्ट्रियों का धुआँ निकालने वाली चिमनियाँ काफी ऊँची होनी चाहिए, जिससे दूषित गैसें काफी ऊँचाई पर वायुमण्डल में चली जाएँ।
  • जहाँ अधिक वाहन चलते हैं वहाँ की सड़कें पक्की होनी चाहिए। कच्ची सड़कों से धूल उड़ती है तथा यह धूल वायु को दूषित करती है। कच्ची सड़कों पर धूल को उड़ने से रोकने के लिए पानी छिड़कने की व्यवस्था होनी चाहिए।

प्रश्न 10.
गृह तथा स्कूल में उत्तम संवातन व्यवस्था को क्यों महत्त्वपूर्ण माना जाता है?
अथवा
स्कूलों में संवातन व्यवस्था का महत्त्व लिखिए।
अथवा
टिप्पणी लिखिए-संवातन से लाभ।
उत्तरः
घर तथा स्कूल में संवातन व्यवस्था का महत्त्व –
सभी जीवों को जीवित रहने के लिए शुद्ध वायु आवश्यक है। शुद्ध वायु का अर्थ है ऐसी वायु जिसमें पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन उपस्थित हो। वायुरूपी इस मिश्रण में ऑक्सीजन के अतिरिक्त अन्य संगठक गैसों आदि का प्रतिशत भी सामान्य के इधर-उधर नहीं होना चाहिए अन्यथा यह वायु प्रदूषित कहलाएगी। किसी भी प्रकार से प्रदूषित वायु श्वसन के अयोग्य होती है। घर हो या विद्यालय या अन्य कोई स्थान जहाँ मनुष्य रहता है अथवा एकत्रित होते हैं, सभी जगह श्वसन के लिए शुद्ध तथा श्वसन योग्य वायु का होना आवश्यक है। दूसरी ओर ऐसे स्थान पर रहने वाले व्यक्ति या व्यक्ति समूह वायु में से श्वसन योग्य प्राणदायक ऑक्सीजन को ग्रहण ही नहीं करेंगे वरन् कार्बन डाइऑक्साइड तथा नमी छोड़कर इसे प्रदूषित भी करेंगे। इसका अर्थ यह भी है कि अल्प समय में ही कमरे या किसी भी बन्द स्थान की वायु को ये व्यक्ति केवल श्वसन द्वारा ही श्वसन योग्य नहीं रहने देंगे। बच्चों पर तो प्रदूषित वायु अथवा अशुद्ध वायु का अत्यधिक प्रभाव होता है।

आवश्यक है कि उपर्युक्त स्थानों में ऐसी व्यवस्था अवश्य ही होनी चाहिए कि श्वसन में छोड़ी गई दूषित वायु को कमरे से बाहर निकाला जाए तथा शुद्ध, श्वसन योग्य वायु कमरे में लाई जाए। अत: आवश्यक है कि ऐसे सभी स्थानों पर उचित तथा उपयोगी संवातन व्यवस्था अपनाई जाए। इसके लिए सामान्य प्राकृतिक साधनों को ही कृत्रिम रूप से अपनाकर व्यवस्थित किया जा सकता है, जैसे पारगामी संवातन (Cross Ventilation) तथा छत के आस-पास चिमनी अथवा रोशनदान बनाना।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि गृह तथा स्कूल में संवातन व्यवस्था का अत्यधिक महत्त्व है। स्कूल में प्रत्येक कक्ष पर्याप्त बड़ा होना चाहिए तथा उसमें खिड़की, दरवाजे एवं रोशनदान अवश्य होने चाहिए। स्कूल के कमरों की दिशा वायु की गति के अनुकूल होनी चाहिए ताकि एक दिशा से आने वाले वायु के झोंके दूसरी दिशा वाले दरवाजे खिड़कियों से बाहर निकल जाएँ। कमरों के अतिरिक्त स्कूल का प्रांगण भी पर्याप्त खुला होना चाहिए। स्कूल का निर्माण तंग गलियों में या औद्योगिक क्षेत्र में नहीं किया जाना चाहिए। स्कूल के निकट कोई गन्दा नाला या खत्ता भी नहीं होना चाहिए।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 10 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
गृह स्वच्छता क्या है?
उत्तरः
गृह स्वच्छता का अर्थ है-घर में गन्दगी का न होना। गृह स्वच्छता के लिए घर तथा घर की वस्तुओं की सफाई के विभिन्न उपाय किए जाते हैं तथा घर से कूड़े-करकट को नियमित रूप से विसर्जित किया जाता है।

प्रश्न 2.
गृह स्वच्छता के कितने प्रकार हैं?
उत्तरः
घर की सफाई के मुख्य पाँच प्रकार हैं –

  1. दैनिक सफाई
  2. साप्ताहिक सफाई
  3. मासिक सफाई
  4. वार्षिक सफाई
  5. आकस्मिक सफाई।

प्रश्न 3.
घर की सफाई के दो मुख्य आधुनिक उपकरणों के नाम बताइए।
उत्तरः
घर की सफाई के दो मुख्य आधुनिक उपकरण हैं-वैक्यूम क्लीनर तथा कारपेट क्लीनर।

प्रश्न 4.
घर की सफाई का प्रमुख लाभ क्या है?
उत्तरः
घर की सफाई वहाँ रहने वालों के स्वास्थ्य में सहायक होती है।

प्रश्न 5.
क्या सफाई के अभाव में गृह-सज्जा सम्भव है?
उत्तरः
सफाई के अभाव में गृह-सज्जा कदापि सम्भव नहीं है।

प्रश्न 6.
वायु जीवन के लिए क्यों आवश्यक है?
उत्तर
वायु से ही जीव श्वसन के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करता है तथा वायु में ही वह कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है।

प्रश्न 7.
प्राणदायक गैस कौन-सी है?
उत्तरः
प्राणदायक गैस ऑक्सीजन है। यह श्वसन के लिए आवश्यक होती है।

प्रश्न 8.
वायु कैसे दूषित होती है?
उत्तरः
जीवों के द्वारा की जाने वाली श्वसन-क्रिया, पदार्थों के जलने तथा औद्योगिक संस्थानों के अवशेषों के वायु में मिलने से वह दूषित हो जाती है।

प्रश्न 9.
वायु प्रदूषण को आप कैसे रोकेंगी?
उत्तरः
औद्योगीकरण एवं नगरीकरण में आवश्यक सावधानियाँ रखकर, वाहनों को सुधारकर तथा अधिक-से-अधिक पेड़ लगाकर वायु प्रदूषण को रोका जा सकता है।

प्रश्न 10.
वायु को शुद्ध करने में सर्वाधिक योगदान किसका है?
उत्तरः
वायु को शुद्ध करने में सर्वाधिक योगदान पेड़-पौधों का है।

प्रश्न 11.
संवातन से क्या आशय है? ।
उत्तरः
किसी आवासीय स्थान पर वायु के आने-जाने की उचित व्यवस्था को ‘संवातन’ कहते हैं।

प्रश्न 12.
संवातन का उद्देश्य क्या है?
उत्तरः
संवातन का उद्देश्य आवासीय स्थल पर शुद्ध वायु प्राप्त करना तथा अशुद्ध वायु का विसर्जन है।

प्रश्न 13.
संवातन के प्राकृतिक साधन कौन-कौन से हैं?
उत्तरः
संवातन के प्राकृतिक साधन हैं-वायु की गति, तेज हवाएँ, गैसों के विसरण का गुण तथा ताप पाकर वायु का हल्का होकर ऊपर उठना।

प्रश्न 14.
रोशनदान छत के पास तथा खिड़कियाँ नीचे की ओर होती हैं। ऐसा क्यों होता है?
उत्तरः
ताजी एवं ठण्डी वायु खिड़कियों से कमरे में प्रवेश करती है तथा गर्म एवं अशुद्ध वायु रोशनदान से बाहर निकल जाती है।

प्रश्न 15.
कृत्रिम संवातन का कोई एक उपाय बताइए।
उत्तरः
कृत्रिम संवातन का एक मुख्य उपाय है-निर्वातक पंखा (Exhaust fan)।

प्रश्न 16.
निर्वातक पंखों की क्या उपयोगिता है?
उत्तरः
किसी कक्ष से दूषित वायु को बाहर निकालने के लिए निर्वातक पंखे विशेष रूप से उपयोगी होते हैं। ये कृत्रिम संवातन के प्रमुख साधन होते हैं।

प्रश्न 17.
घर को मक्खी व मच्छरों से मुक्त करने के उपाय लिखिए।
उत्तरः
घर को मक्खी व मच्छरों से मुक्त करने का सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय है-घर में हर प्रकार की सफाई की व्यवस्था करना/रखना। इसके अतिरिक्त घर में नियमित रूप से कीटनाशक दवाओं का छिड़काव किया जाना चाहिए। घर पर फिनायल का पोंछा लगाना चाहिए। घर के सभी बाहरी दरवाजे-खिड़कियाँ जाली वाले होने चाहिए तथा उन्हें सामान्य रूप से बन्द रखना चाहिए।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 10 बहविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –
1. घर की सफाई में सर्वाधिक महत्त्व है –
(क) दैनिक सफाई का
(ख) साप्ताहिक सफाई का
(ग) मासिक सफाई का
(घ) वार्षिक सफाई का।
उत्तरः
(क) दैनिक सफाई का।

2. घर की सफाई महत्त्वपूर्ण है –
(क) शारीरिक स्वास्थ्य के लिए
(ख) मानसिक स्वास्थ्य के लिए
(ग) जीवन में आनन्द-प्राप्ति के लिए
(घ) उपर्युक्त सभी के लिए।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी के लिए।

3. घर की सफाई क्यों आवश्यक है –
(क) रोग के कीटाणुओं की रोकथाम के लिए
(ख) घर की सजावट के लिए
(ग) सुचारु रूप से गृह व्यवस्था के लिए
(घ) इन सभी कारणों के लिए।
उत्तरः
(घ) इन सभी कारणों के लिए।

4. शौचालय की नाली को प्रतिदिन धोना चाहिए –
(क) डी०डी०टी० से
(ख) साबुन से
(ग) फिनायल से
(घ) सादे पानी से।
उत्तरः
(ग) फिनायल से।

5. वायु में पायी जाने वाली मुख्य निष्क्रिय गैस है –
(क) ऑक्सीजन
(ख) नाइट्रोजन
(ग) ओजोन
(घ) कार्बन डाइऑक्साइड।
उत्तरः
(ख) नाइट्रोजन।

6. वायु है –
(क) एक मिश्रण
(ख) यौगिक
(ग) तत्त्व
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तरः
(क) एक मिश्रण।

7. वर्षा ऋतु में वायु में बढ़ जाती है –
(क) सुगन्ध
(ख) नमी
(ग) ऑक्सीजन
(घ) नाइट्रोजन।
उत्तरः
(ख) नमी।

8. कमरे के अच्छे संवातन के लिए आवश्यक है –
(क) एक खिड़की तथा एक दरवाजा
(ख) एक खिड़की, रोशनदान व एक दरवाजा
(ग) पारगामी संवातन व्यवस्था
(घ) कूलर की व्यवस्था।
उत्तरः
(ग) पारगामी संवातन व्यवस्था।

9. किसी कार्बनिक वस्तु के जलने से उत्पन्न होती है –
(क) ऑक्सीजन
(ख) कार्बन डाइऑक्साइड
(ग) नाइट्रोजन
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तरः
(ख) कार्बन डाइऑक्साइड।

UP Board Solutions for Class 11 Home Science

UP Board Solutions for Class 11 Home Science गृह विज्ञान

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UP Board Solutions for Class 11 Home Science गृह विज्ञान

UP Board Class 11 Home Science खण्ड ‘क’ शरीर क्रिया विज्ञान तथा स्वास्थ्य रक्षा

शरीर क्रिया विज्ञान

स्वास्थ्य रक्षा

UP Board Class 11 Home Science खण्ड ‘ख’ समाजशास्त्र तथा बाल कल्याण

समाजशास्त्र

बाल कल्याण

UP Board Class 11 Home Science प्रयोगात्मक अध्ययन

UP Board Class 11 Home Science Syllabus & Marking Scheme

सरकारी गजट, उ० प्र० में दिनांक 20 जनवरी, 2018 को प्रकाशित माध्यमिक शिक्षा परिषद्, उ० प्र० द्वारा निर्धारित नवीन संशोधित पाठ्यक्रम

इस विषय में 70 अंकों का एक प्रश्न-पत्र तथा 30 अंकों की प्रयोगात्मक परीक्षा होगी।

उत्तीर्ण होने के लिए लिखित और प्रयोगात्मक परीक्षा में कम-से-कम 23 तथा 10 एवं योग में 33 अंक पाना आवश्यक होगा।

खण्ड ‘क’ शरीर क्रिया विज्ञान तथा स्वास्थ्य रक्षा (35 अंक)

शरीर क्रिया विज्ञान

इकाई-1: जीवित ऊतकों की कोशिकीय बनावट। (2 अंक)

इकाई-2: अस्थिपंजर व पेशी तन्त्र का समरेखीय अध्ययन तथा उनकी सामान्य विकास की अवस्थाएँ। (5 अंक)

इकाई-3: पाचन तथा पोषण- (7 अंक)

  • भोजन प्रणाली का वितरण तथा कार्य, यकृत, तिल्ली तथा आमाशय
  • भोजन के विभिन्न तत्त्व
  • विभिन्न परिस्थितियों जैसे-व्यवसाय, आयु तथा जलवायु के अनुसार शरीर की भोजन सम्बन्धी आवश्यकताएँ
  • पोषण में दुग्ध का विशेष स्थान।

इकाई-4: उत्सर्जन तन्त्र-त्वचा, वृक्क तथा आँत और उनके सामान्य कार्य। (3 अंक)

स्वास्थ्य रक्षा

इकाई-1: स्वास्थ्य रक्षा- (10 अंक)

  • व्यक्तिगत स्वास्थ्य रक्षा; जैसे-त्वचा, दन्त, चक्षु आदि
  • घर की हाईजीन; जैसे—संवाहन व स्वच्छता
  • कूड़ा-करकट तथा व्यर्थ-जल के निकास की व्यवस्था, जल निकास, शौचालय
  • जल सम्भरण, खाद्य सम्भरण।

इकाई-2: व्यक्ति का उत्तरदायित्व। (3 अंक)

इकाई-3: उद्यान, खेल के मैदान, खुले स्थान। (2 अंक)

इकाई-4: विकास तथा क्रियात्मक क्षमता पर व्यायाम का प्रभाव। (3 अंक)

खण्ड ‘ख’ समाजशास्त्र तथा बाल कल्याण

समाजशास्त्र

इकाई-1: मानव आवश्यकताएँ तथा परिस्थितियाँ, जिससे भग्नाशा उत्पन्न होती है। (4 अंक)

इकाई-2: मानव आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के रूप में परिवार। (4 अंक)

इकाई-3: भारतीय परिवार तथा परिवार के प्रत्येक सदस्य का कर्त्तव्य। (4 अंक)

इकाई-4: बालक/बालिका सम्बन्ध। (3 अंक)

इकाई-5: गृहस्थ परिवार का आय-व्यय लेखा, नित्य क्रय-विक्रय में मिव्ययिता के सिद्धान्त, परिवार सम्भरण के क्रय तथा गृह-खर्च। (3 अंक)

बाल कल्याण

इकाई-1: प्रत्याशित माता की देख-रेख। (3 अंक)

इकाई-2: प्रसवकालीन तैयारियाँ। (4 अंक)

इकाई-3: नवजात शिशु की देखभाल- 0-3 माह, 3-6 माह, 6-9 माह, 9-12 माह, 01-02 वर्ष सामान्य व्याधियाँ। (7 अंक)

इकाई-4: प्रारम्भिक बाल्यावस्था की देखभाल (3-6 वर्ष) चारित्रिक गुण। (3 अंक)

प्रयोगात्मक (30 अंक)

पाक कला- सूखी सब्जी, रसेदार सब्जी, तरकारी का सूप, तली तथा घोटी हुई (Mesh) सब्जी।
अचार- आम का अचार, प्याज, जंभीरी नीबू तथा मिश्रित तरकारी।
मुरब्बा- आँवला, आम, पेठा तथा गाजर।

सिलाई

1. सिलाई की मशीन तथा उसकी यान्त्रिकी की जानकारी जिसमें मशीन में धागा लगाना, तनाव तथा टाँके के नियम तथा मशीन की साधारण खराबियों को दूर करने का व्यावहारिक ज्ञान।
2. सिलाई, काज आदि के व्यावहारिक प्रयोग के मानक बनाकर सिले वस्त्रों की सूक्ष्मताओं तथा परिष्करण का ज्ञान देना।
3. नीचे दिए गए प्रत्येक वर्ग से एक वस्त्र

  • लेडीज कुर्ता या बुशर्ट।
  • सलवार या मर्दानी कमीज।
  • फ्रॉक या पेटीकोट।
  • सनसूट या ब्लाउज।

प्रत्येक छात्रा को फैन्सी टाँकों की कढ़ाई का एक सेट तैयार करना चाहिए जैसे लंच सेट पर अथवा बेड शीट (सिंगल या डबल सुविधानुसार) डचेस सेट टी सेट।

गृह विज्ञान

अधिकतम अंक-30
न्यूनतम अंक-10
समय : 5 घंटा

  1. पाक कला (4 अंक)
  2. सिलाई (4 अंक)
  3. सत्रीय कार्य (4 अंक)
  4. मौखिक कार्य (मौखिक सभी खण्डों से होना अनिवार्य) (3 अंक)
  5. सत्रीय कार्य (सिलाई एवं फाइल रिकॉर्ड) (6 अंक)
  6. पाक कला (सत्रीय पाठ्यक्रम पर आधारित सभी बिन्दु) (6 अंक)
  7. मौखिक कार्य (सभी खण्ड से) (3 अंक)

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UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 22 प्रत्याशित माता की देख-रेख

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 22 प्रत्याशित माता की देख-रेख (Care of the Expectant Mother)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 22 प्रत्याशित माता की देख-रेख

UP Board Class 11 Home Science Chapter 22 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
गर्भावस्था के समय उत्पन्न होने वाले सामान्य लक्षणों का वर्णन कीजिए। अथवा गर्भावस्था के सामान्य लक्षणों का वर्णन कीजिए। अथवा गर्भधारण करने पर गर्भिणी के लक्षणों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
गर्भावस्था के सामान्य लक्षण (Signs of Pregnancy) –
गर्भाधान की क्रिया के पश्चात् नए जीव के विकास की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है। इस अवस्था को ‘गर्भावस्था’ कहा जाता है। नए जीव के विकास के कारण गर्भवती स्त्री के शरीर में अनेक परिवर्तन होते हैं जो गर्भावस्था के लक्षणों के रूप में प्रकट होने लगते हैं। गर्भावस्था के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं

1. मासिक धर्म का बन्द होना-जब गर्भधारण हो जाता है तो नियमित रूप से होने वाला मासिक रक्तस्राव सामान्य रूप से बन्द हो जाता है। ऐसे समय यदि यह लगातार 3 माह तक बन्द रहता है तो यह समझ लेना चाहिए कि स्त्री निश्चित रूप से गर्भवती है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि किसी स्त्री का मासिक धर्म गर्भधारण के अतिरिक्त कुछ अन्य कारणों से भी बन्द हो सकता है। अत: गर्भधारण के निर्धारण के लिए कुछ अन्य लक्षणों एवं परीक्षणों को भी ध्यान में रखना आवश्यक होता है।

2. सुस्त रहना तथा नींद अधिक आना-गर्भधारण करने के उपरान्त विभिन्न आन्तरिक परिवर्तनों के कारण स्त्रियाँ कुछ सुस्त रहने लगती हैं तथा आलस्य अनुभव करने लगती हैं। इसके साथ ही नींद की अधिक इच्छा होने लगती है।

3. चेहरा-गर्भवती स्त्री के चेहरे पर कुछ परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं, उसकी आँखों के नीचे व ऊपर, होंठों के आस-पास का रंग कुछ काला हो जाता है।

4. स्वभाव सम्बन्धी परिवर्तन गर्भधारण करने के साथ-साथ कुछ स्वभावगत परिवर्तन भी दृष्टिगोचर होने लगते हैं। प्रायः स्त्रियों के स्वभाव में कुछ चिड़चिड़ापन आ जाता है तथा वे बात-बात पर झुंझलाहट अनुभव करने लगती हैं। इस स्वभावगत परिवर्तन को भी गर्भधारण का लक्षण माना जा सकता है।

5. जी का बार-बार मिचलाना-जब गर्भधारण हो जाता है तो अधिकतर स्त्रियों का जी मिचलाने लगता है। कभी-कभी ऐसी स्थिति में उल्टियाँ भी हो जाती हैं। यह क्रिया गर्भधारण करने के लगभग तीन माह पश्चात् प्रारम्भ हो जाती है तथा 1 या 1- माह बाद बन्द हो जाती है।

6. गर्भ की हलचल-जब गर्भधारण किए लगभग 4 या 5 महीने का समय हो जाता है तो गर्भ में हलचल प्रारम्भ हो जाती है। गर्भ में ऐसा अनुभव होता है कि कुछ घूम रहा है।

7. बार-बार मूत्र-त्याग की इच्छा-गर्भधारण के उपरान्त स्त्रियों को बार-बार मूत्र-त्याग की इच्छा होती है। प्रायः गर्भाशय के बढ़ जाने से मूत्राशय पर पड़ने वाले दबाव के कारण ऐसा होता है। इस लक्षण को भी गर्भधारण का एक लक्षण माना जा सकता है।

8. पेट की स्थिति –

  • गर्भधारण करने के दो महीने पश्चात्, पेट अधिक चपटा हो जाता है तथा पेट का आकार भी बढ़ जाता है।
  • कोख अण्डाकार हो जाती है।
  • गर्भाशय में स्थित शिशु के हृदय की धड़कन को स्टेथस्कोप द्वारा सुना जा सकता है।
  • गर्भधारण होने से पेट का आकार बढ़ जाता है तथा उसके चारों तरफ का भाग उभर आता है। छठे महीने से स्तन-मुख से सफेद रंग का दूध जैसा द्रव निकलने लगता है।

9. आन्तरिक लक्षण–गर्भधारण करने को निश्चित करने के लिए मूत्र का एक विशिष्ट परीक्षण भी किया जाता है। इस परीक्षण से ज्ञात हो जाता है कि स्त्री ने गर्भधारण कर लिया है। इसके अतिरिक्त आजकल अल्ट्रासाउण्ड द्वारा भी गर्भधारण की जानकारी प्राप्त की जाती है।
अत: उपर्युक्त सभी लक्षणों के आधार पर भली-भाँति पहचाना जा सकता है कि कोई स्त्री गर्भवती है या नहीं।

प्रश्न 2.
गर्भावस्था के समय स्त्री के सामान्य कष्टों का वर्णन कीजिए। अथवा गर्भावस्था के समय स्त्री के सामान्य कष्ट कौन-कौन से हैं? इन्हें कैसे दूर किया जा सकता है?
उत्तर:
गर्भावस्था के सामान्य कष्ट तथा उन्हें दूर करने के उपाय  (Troubles of Pregnancy and their Treatment) –
गर्भावस्था महिला के लिए सामान्य से पर्याप्त भिन्न अवस्था होती है। इस अवस्था में महिला विभिन्न शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तनों से गुजरती है। इन परिवर्तनों के कारण प्रायः अधिकांश स्त्रियों को गर्भावस्था के काल में कुछ-न-कुछ कष्ट अवश्य होते हैं। इन कष्टों से अधिक चिन्तित नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये स्वाभाविक होते हैं तथा प्रकृति-प्रदत्त हैं, जो कुछ समय उपरान्त स्वतः समाप्त हो जाते हैं। फिर भी यदि कष्ट का अधिक अनुभव होता हो तो निश्चित रूप से डॉक्टर का परामर्श आवश्यक है। इस काल में होने वाले सामान्य कष्टों का संक्षिप्त परिचय निम्नवर्णित है –

1. जी मिचलाना-गर्भावस्था काल में अनेक महिलाओं का प्रायः सुबह के समय कभी-कभी लगभग दो या तीन मास तक जी मिचलाता है। अत: जिन स्त्रियों को चाय की आदत है, वे प्रायः एक प्याला चाय तथा बिस्कुट ले सकती हैं। इसके विपरीत स्थिति पर भुने चने प्रयोग में लाए जा सकते हैं। खाने-पीने के उपरान्त लेटना आवश्यक है। लेटकर जब उठे तो धीरे-धीरे उठना चाहिए, झटके से नहीं। इतने पर भी जी मिचलाना न रुके तो लौंग, इलायची, पिपरमिण्ट आदि लिया जा सकता है।

2. वमन होना-गर्भावस्था में कुछ स्त्रियों को भोजन ग्रहण करने के तुरन्त उपरान्त वमन हो जाता है। अत: उन्हें भोजन ग्रहण करने से पूर्व लगभग आधा घण्टा विश्राम कर लेना चाहिए। तदुपरान्त रेशे वाली हल्की सब्जी के साथ चबा-चबाकर रोटी खानी चाहिए। पानी का प्रयोग कम करना चाहिए। चिकित्सकों के मतानुसार दवा का सेवन करना चाहिए।
गर्भिणी को स्वत: ही अपना ध्यान रखना चाहिए अन्यथा खाने-पीने की गड़बड़ से शिशु का स्वाभाविक विकास न हो सकेगा। उसे स्वच्छ एवं शुद्ध वायु ग्रहण करनी चाहिए।

3. कलेजे में जलन-बहुत देर तक बैठे रहने अथवा रात्रि में देर से भोजन ग्रहण करने पर गर्भवती को कलेजे में जलन का अनुभव होने लगता है। ऐसा इस कारण होता है, क्योंकि भ्रूण बढ़ने के कारण, भोजनोपरान्त आमाशय को फैलने व फूलने का पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाता। इसके लिए तले एवं गरिष्ठ पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। इस अवस्था में पानी में नीबू मिलाकर पीना लाभकारी होता है।

4. मांसपेशियों में ऐंठन-गर्भवती स्त्री के शरीर में यदि कैल्सियम कम हो जाता है तो मांसपेशियाँ ऐंठने लगती हैं। गर्भावस्था के इस कष्ट से बचने के लिए कैल्सियम युक्त विटामिन ‘A’ व ‘D’ का प्रयोग तथा हरी सब्जियों का प्रयोग लाभकारी होता है। खाने के बाद पान खाना भी अच्छा रहता है।

5. टाँगों में सूजन-गर्भावस्था में कभी-कभी कुछ समय तक निरन्तर खड़े रहने से टाँगों व पैरों पर सूजन आ जाती है। ऐसी स्थिति में अधिक समय तक खड़े नहीं रहना चाहिए बल्कि बीच-बीच में विश्राम कर लेना चाहिए। काम आवश्यक हो तो बैठकर पूर्ण करना चाहिए।

6. कब्ज-प्राय: गर्भावस्था में स्त्रियों को कब्ज की शिकायत हो जाती है। इसके फलस्वरूप पेट में गैस बनने लगती है, सिर में दर्द होने लगता है अथवा बवासीर आदि हो जाती है। यदि वमन की शिकायत न हो तो प्रायः शौच जाने से पूर्व ताजा जल ग्रहण करना चाहिए। प्रातः घूमना भी लाभकारी हो सकता है। चोकरयुक्त आटा, छिलके वाली दाल तथा हरी सब्जी का सेवन करना चाहिए। रात्रि में दूध के साथ ईसबगोल की भूसी, मुनक्का, अंजीर आदि ली जा सकती हैं। इतने पर भी कब्ज की शिकायत दूर न हो तो डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।

7. पीठ में दर्द का होना–समयानुसार भ्रूण का विकास होता है। इसके बढ़ने के साथ उसके भार व आकार में भी वृद्धि होती है। फलस्वरूप मांसपेशियों के खिंचाव से पीठ में पीड़ा होने लगती है। इसके लिए समुचित विश्राम अवश्य करना चाहिए तथा आरामदायक बिस्तर पर ही लेटना चाहिए।

8. निद्रा में कमी आना-गर्भावस्था में गर्भ के बढ़ने से लेटना, उठना आदि कठिन हो जाता है, फलस्वरूप नींद भी नहीं आती। अधिक भोजन कर लेने पर भी कठिनाई होती है; अत: हल्का, सुपाच्य व कम भोजन ग्रहण करना चाहिए। रात्रि में भी सोने से लगभग दो घण्टे पूर्व भोजन ग्रहण कर लेना चाहिए, इससे नींद आने में सुविधा होती है। खुली वायु में यदि टहला जाए तो वह भी अच्छा रहता है।

9. कुछ गम्भीर रोग-कभी-कभी बाँह व टाँग में सूजन आ जाती है, रक्त स्राव होने लगता है अथवा पेडू व कमर में पीड़ा होने लगती है। ऐसी स्थिति में तुरन्त डॉक्टर अथवा नर्स को बुलाना चाहिए।

प्रश्न 3.
गर्भावस्था में आहार में किन-किन भोज्य-तत्त्वों की प्रधानता होनी चाहिए और क्यों? विस्तारपूर्वक लिखिए।
अथवा
“स्वस्थ शिशु के जन्म के लिए माता का भोजन उत्तरदायी है।”इस कथन की पुष्टि कीजिए।
अथवा
एक गर्भवती महिला को सन्तुलित आहार देना क्यों आवश्यक है? गर्भवती महिला के सन्तुलित आहार में किन तत्त्वों की अधिकता होनी चाहिए? कारण सहित समझाइए।
अथवा
एक गर्भवती महिला को सन्तुलित आहार देना क्यों आवश्यक है? सविस्तार वर्णन कीजिए।
अथवा
गर्भिणी के सन्तुलित आहार के अन्तर्गत भोजन के कौन-कौन से तत्त्व आते हैं?
अथवा
गर्भावस्था में किन पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता होती है? ये तत्त्व किन खाद्य-पदार्थों से प्राप्त किए जा सकते हैं?
उत्तर:
गर्भावस्था में स्त्री की देखभाल एवं स्वास्थ्य रक्षा के लिए उसके आहार के प्रति विशेष रूप से सजग रहना अनिवार्य होता है। आहार की दृष्टि से स्त्रियों के लिए गर्भधारण करने की अवस्था एक विशिष्ट अवस्था है। इस अवस्था में अनेक शारीरिक परिवर्तन एवं वृद्धि होने के कारण स्त्री को अधिक पोषक तत्त्वों तथा भिन्न प्रकार के आहार की आवश्यकता होती है। गर्भावस्था में गर्भस्थ भ्रूण के विकास के लिए भी माता को अतिरिक्त पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है। गर्भस्थ भ्रूण अपनी आवश्यकता के समस्त पोषक तत्त्व माता के शरीर से ही ग्रहण करता है। अतः यदि माता के आहार में आवश्यक पोषक तत्त्वों की कमी रहती है तो उस दशा में भ्रूण के विकास के लिए आवश्यक तत्त्व माता के रक्त से ही लिए जाते हैं।

इसका प्रतिकूल प्रभाव माता के स्वास्थ्य पर पड़ता है, साथ ही गर्भस्थ शिशु भी अल्प-पोषण का शिकार बन जाता है। इसके अतिरिक्त यह भी एक तथ्य है कि गर्भावस्था में स्त्रियों को जी मिचलाने तथा उल्टियों की समस्या का भी सामना करना पड़ता है; अत: उनके द्वारा ग्रहण किए गए आहार की कुछ मात्रा तो व्यर्थ ही चली जाती है। साथ-ही-साथ इस अवस्था में कभी-कभी आहार के प्रति अरुचि होने के कारण भी सुचारु रूप से आहार ग्रहण नहीं किया जाता। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए गर्भवती स्त्री के आहार का नियोजन विशेष प्रकार से करना अनिवार्य होता है।

गर्भवती स्त्री को साधारण अवस्था की तुलना में काफी अधिक प्रोटीन, लोहा, कैल्सियम तथा विटामिन दिए जाने चाहिए। गर्भावस्था में उचित पौष्टिक एवं सन्तुलित आहार ग्रहण करने से इस अवस्था की सामान्य समस्याएँ एवं कठिनाइयाँ कम हो जाती हैं तथा गर्भस्थ शिशु स्वस्थ होता है। गर्भस्थ शिशु के जन्म के उपरान्त नवजात शिशु का मुख्य आहार माता का दूध ही होता है। अतः स्तनपान कराने के लिए भी माता को स्वयं पौष्टिक आहार ग्रहण करना अनिवार्य होता है। जन्म के समय एक सामान्य शिशु, जिसका वजन 3.2 किग्रा हो, के शरीर में 500 ग्राम प्रोटीन, 30 ग्राम कैल्सियम, 14 ग्राम फॉस्फेट, 0•4 ग्राम आयरन तथा आवश्यक विटामिन भी संचित होते हैं। ये सब पोषक तत्त्व वह माता के शरीर से ही ग्रहण करता है।

इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि गर्भावस्था में माता एवं गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य के लिए सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार आवश्यक होता है।

गर्भवती के लिए आवश्यक पौष्टिक आहार  (Necessary Nutritious Food for Pregnant Woman) –

1. ऊर्जा – गर्भावस्था में स्त्री को सामान्य से कुछ अधिक मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसका मुख्य कारण गर्भावस्था में स्त्री का वजन बढ़ जाना तथा चयापचय की दर बढ़ जाना होता है। ICMR ने सुझाव दिया है कि गर्भवती महिला को प्रतिदिन लगभग 300 कैलोरी अतिरिक्त ऊर्जा आवश्यक होती है। दूध पिलाने वाली महिला को ऊर्जा की आवश्यकता सामान्य से कुछ अधिक ही होती है। इस अवस्था में सामान्य से 700 कैलोरी ऊर्जा अधिक लेनी चाहिए।

2. प्रोटीन – विशेषज्ञों का विचार है कि गर्भावस्था में महिला को सामान्य से 10 ग्राम अधिक प्रोटीन प्रतिदिन ग्रहण करनी चाहिए। प्रोटीन की यह अधिक मात्रा गर्भस्थ शिशु के शारीरिक विकास के लिए आवश्यक होती है। इसके अतिरिक्त गर्भावस्था में स्त्री के शरीर में कुछ टूट-फूट होती रहती है, जिसकी मरम्मत के लिए प्रोटीन की अधिक मात्रा लेनी पड़ती है। गर्भावस्था के अन्तिम छह माह में प्रोटीन की अधिक मात्रा अवश्य ही ग्रहण करनी चाहिए। प्रोटीन की अधिक मात्रा ग्रहण करने के लिए गर्भवती के आहार में दूध, पनीर, मांस, मछली, अण्डा, दालें और हरी सब्जियाँ तथा सूखे मेवे तथा फलों की मात्रा सामान्य से कुछ अधिक कर देनी चाहिए।

3. कैल्सियम – गर्भावस्था में स्त्री के आहार में कैल्सियम की मात्रा भी साधारण अवस्था से अधिक होनी चाहिए। यह अतिरिक्त कैल्सियम गर्भस्थ शिशु के शरीर की अस्थियों के निर्माण के लिए प्रयुक्त होता है। गर्भस्थ शिशु जन्म से पूर्व लगभग 30 ग्राम कैल्सियम अपने शरीर में संचित कर लेता है। यदि गर्भावस्था में स्त्री के आहार में कैल्सियम की अतिरिक्त मात्रा नहीं होती तो उस स्थिति में गर्भस्थ भ्रूण अपनी आवश्यकता के लिए माता के शरीर से कैल्सियम लेता है। इससे माता की हड्डियाँ एवं दाँत कमजोर हो जाते हैं। यदि गर्भावस्था में स्त्री कैल्सियम की पर्याप्त मात्रा ग्रहण करती रहती है तो जन्म लेने वाले शिशु को दाँत निकलते समय अधिक कष्ट नहीं होता। विशेषज्ञों का विचार है कि गर्भवती के दैनिक आहार में सामान्य से 500 से 600 मिली ग्राम तक कैल्सियम की अधिक मात्रा होनी चाहिए। कैल्सियम की यह अतिरिक्त मात्रा ग्रहण करने के लिए गर्भवती के आहार में अण्डा, दूध, मछली, पनीर, सेम, फूलगोभी, शलजम, गाजर, चुकन्दर, हरी सब्जियों, बादाम आदि की अधिक मात्रा का समावेश होना चाहिए।

4. आयरन – गर्भावस्था में आयरन या लौह तत्त्व की सामान्य से अधिक मात्रा आवश्यक होती है। यदि आयरन की यह अतिरिक्त मात्रा ग्रहण न की जाए तो गर्भावस्था में महिलाओं को प्रायः रक्त-अल्पता की समस्या का सामना करना पड़ जाता है। गर्भस्थ भ्रूण के विकास के लिए भी आयरन की आवश्यकता होती है। इन आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों का सुझाव है कि गर्भावस्था में प्रतिदिन स्त्री को सामान्य से 10 मिग्रा अधिक आयरन ग्रहण करना चाहिए। गर्भावस्था के अन्तिम तीन माह में आयरन की यह आवश्यकता विशेष रूप से अनुभव की जाती है। आयरन की अतिरिक्त मात्रा ग्रहण करने के लिए गर्भवती स्त्री के आहार में हरी सब्जियों, टमाटर, आँवला, अण्डा, सेब, केला तथा नारंगी आदि का समावेश होना चाहिए।

5. विटामिन ‘A’ – ऐसा विश्वास है कि गर्भावस्था में स्त्री को सामान्य से अधिक मात्रा में विटामिन ‘A’ की आवश्यकता होती है। इस विटामिन की आवश्यकता शारीरिक वृद्धि तथा शारीरिक क्रियाओं को. नियमित रखने के लिए होती है। सामान्य रूप से पर्याप्त मात्रा में प्रोटीनयुक्त आहार ग्रहण करने से विटामिन ‘A’ की आवश्यकता पूरी हो जाती है।

भिन्न-भिन्न क्रियाशीलता वाली गर्भवती स्त्रियों के लिए
आवश्यक पौष्टिक तत्त्व

6. विटामिन ‘D’ – गर्भावस्था में स्त्री के लिए विटामिन ‘D’ का भी विशेष महत्त्व होता है। इस अवस्था में स्त्री के आहार में विटामिन ‘D’ की प्रचुर मात्रा का समावेश होना चाहिए। विटामिन ‘D’ कैल्सियम तथा फॉस्फोरस के साथ मिलकर दाँतों व अस्थियों को दृढ़ता प्रदान करने में सहायक होता है। यदि किसी कारणवश गर्भवती स्त्री को विटामिन ‘D’ की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध नहीं होती तो इसका प्रतिकूल प्रभाव स्त्री तथा भावी सन्तान दोनों पर ही पड़ता है। विटामिन ‘D’ की समुचित प्राप्ति के लिए गर्भवती स्त्री के आहार में दूध, मक्खन, अण्डे की जर्दी तथा मछली के तेल का समावेश होना चाहिए। सूर्य की किरणों से भी शरीर में विटामिन ‘D’ का निर्माण होता है।

7. अन्य विटामिन – ICMR के विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि गर्भवती महिला को सामान्य से कुछ अधिक मात्रा में विटामिन्स; जैसे 0.2 मिग्रा थायमिन, 0.2 मिग्रा राइबोफ्लेविन, 0.2 मिग्रा निकोटिनिक एसिड की अधिक आवश्यकता होती है। इसी प्रकार कुछ मात्रा में फोलिक एसिड तथा विटामिन B12 भी अधिक दिया जाना चाहिए। – उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट हो जाता है कि गर्भावस्था में स्त्री तथा गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य एवं शरीर के सुचारु विकास के लिए पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक एवं सन्तुलित आहार दिया जाना अनिवार्य होता है। वास्तव में गर्भस्थ शिशु का स्वास्थ्य भी माता के आहार पर निर्भर करता है। गर्भावस्था में आवश्यक तत्त्वों की मात्रा उपर्युक्त तालिका द्वारा दर्शायी गई है।

प्रश्न 4.
“गर्भावस्था में माता की शारीरिक तथा मानसिक अवस्था का गर्भस्थ शिशु के विकास पर प्रभाव पड़ता है।” इस कथन की पुष्टि विस्तारपूर्वक कीजिए।
उत्तर:
भ्रूण का निर्माण पिता के शुक्राणु तथा माता के अण्डाणु (ovum) के संयोग से होता है, परन्तु भ्रूण का विकास एवं पोषण केवल माता के शरीर से प्राप्त होने वाले तत्त्वों से ही होता है। गर्भस्थ शिशु का विकास पूर्ण रूप से माता के शरीर पर ही निर्भर रहता है। इस स्थिति में गर्भस्थ शिशु का विकास माता की शारीरिक तथा मानसिक अवस्था पर निर्भर रहना नितान्त स्वाभाविक है।

माता की शारीरिक अवस्था का गर्भस्थ शिशु पर प्रभाव  (Effect of Mother’s Physical State on the Child in Womb) –
गर्भस्थ शिशु के शरीर का विकास माता के शरीर से प्राप्त तत्त्वों द्वारा ही होता है। इस स्थिति में यदि माता की शारीरिक अवस्था सामान्य नहीं है तो गर्भस्थ शिशु को पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्त्व प्राप्त नहीं हो पाते तथा गर्भस्थ शिशु दुर्बल एवं अभावग्रस्त रह जाता है। उसकी मांसपेशियों तथा हड्डियों का समुचित विकास नहीं हो पाता। यदि माता के शरीर में कैल्सियम, फॉस्फोरस आदि खनिजों की न्यूनता हो तो निश्चित रूप से गर्भस्थ शिशु की अस्थियों का सामान्य विकास नहीं हो पाता। इसी प्रकार गर्भस्थ शिशु के विकास के लिए प्रोटीन की भी पर्याप्त मात्रा की आवश्यकता होती है।

प्रोटीन की यह मात्रा प्राप्त करने के लिए माता की शारीरिक अवस्था अच्छी होनी आवश्यक है। माता के शरीर में प्रोटीन की कमी होने की दशा में गर्भस्थ शिशु भी प्रोटीन कुपोषण का शिकार हो सकता है। पोषक तत्त्व प्रदान करने के अतिरिक्त एक अन्य रूप में भी गर्भावस्था में माता की शारीरिक अवस्था गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य एवं विकास को प्रभावित करती है। यदि गर्भावस्था में माता किसी गम्भीर संक्रामक रोग की शिकार हो तो निश्चित रूप से रोग का संक्रमण गर्भस्थ शिशु में भी पहुँच जाता है। गर्भस्थ शिशु द्वारा अर्जित किया जाने वाला संक्रमण अत्यधिक गम्भीर होता है तथा इसका गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव शिशु के विकास पर पड़ता है। उदाहरण के लिए गर्भावस्था में यदि माता एड्स, सिफलिस या टी०बी० जैसे किसी संक्रामक रोग से पीड़ित हो तो निश्चित रूप से गर्भस्थ शिशु भी सम्बन्धित रोग का शिकार हो जाता है।

माता की मानसिक अवस्था का गर्भस्थ शिशु पर प्रभाव  (Effect of Mother’s Mental State on the Child in Womb) –
शारीरिक अवस्था के अतिरिक्त, गर्भावस्था में माता की मानसिक अवस्था भी गर्भस्थ शिश के विकास को प्रभावित करती है। यदि गर्भावस्था में माता भय, चिन्ता अथवा क्रोध जैसे प्रबल संवेगों से ग्रस्त रहती है तो निश्चित रूप से गर्भस्थ शिशु के मानसिक एवं संवेगात्मक विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। गर्भस्थ शिशु जन्म लेने के उपरान्त प्रायः संवेगात्मक अस्थिरता का शिकार रहा करता है। वास्तव में यदि गर्भावस्था में माता की मानसिक अवस्था सामान्य नहीं होती तो उसकी विभिन्न अन्तःस्रावी ग्रन्थियों का स्राव भी असन्तुलित हो जाता है। इसका प्रभाव रक्त के माध्यम से गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों का तो यहाँ तक कहना है कि गर्भावस्था में माता की मानसिक व मनोवैज्ञानिक अवस्था का प्रभाव जन्म लेने वाले शिशु के सम्पूर्ण व्यक्तित्व एवं विकास पर पड़ता है।

उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि गर्भावस्था में माता की शारीरिक तथा मानसिक अवस्था का प्रभाव गर्भस्थ शिशु के विकास पर अनिवार्य रूप से पड़ता है। गर्भावस्था में स्त्री को अपने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना चाहिए। हर प्रकार के संक्रमण से बचना चाहिए और यदि किसी प्रकार का संक्रमण हो भी जाए तो उसका तुरन्त उपचार करना चाहिए। गर्भस्थ शिशु के सुचारु विकास के लिए पर्याप्त मात्रा में सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार ग्रहण करना चाहिए। आहार में ऊर्जा, प्रोटीन, कैल्सियम, आयरन तथा विटामिन्स की अतिरिक्त मात्रा ग्रहण करनी चाहिए। इसके साथ-साथ गर्भावस्था में माता को प्रसन्नचित्त रहना चाहिए तथा संवेगात्मक उत्तेजनाओं से बचना चाहिए। उसे धार्मिक एवं आध्यात्मिक विचारों का मनन करना चाहिए। इन समस्त गतिविधियों का अनुकूल प्रभाव गर्भस्थ शिशु के विकास पर पड़ता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 22 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मातृ-कला एवं शिशु-कल्याण से क्या आशय है?
उत्तर:
मातृ-कला एवं शिशु-कल्याण का अर्थ मातृत्व का हमारे समाज के लिए सर्वाधिक महत्त्व है। इसीलिए मातृत्व से सम्बन्धित बहुपक्षीय ज्ञान का व्यवस्थित अध्ययन किया जाने लगा है। मातृत्व सम्बन्धी इस ज्ञान का अध्ययन ‘मातृ-कला’ (mother craft) के अन्तर्गत किया जाता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि ‘मातृ-कला’ वह विषय-क्षेत्र है, जिसके अन्तर्गत मातृत्व सम्बन्धी व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है।

मातृत्व के साथ अनिवार्य रूप से शिशु का जन्म भी सम्बद्ध होता है। शिशु के जन्म तथा जन्म के उपरान्त उसके उचित पालन-पोषण का विशेष महत्त्व होता है। शिशु के पालन-पोषण पर ही उसका भविष्य निर्भर करता है। शिशु के व्यवस्थित पालन-पोषण सम्बन्धी तथ्यों का अध्ययन ‘शिश-कल्याण’ के अन्तर्गत किया जाता है। इस प्रकार ‘शिशु-कल्याण’ वह विषय-क्षेत्र है जिसके अन्तर्गत शिशु के जन्म एवं उसके पालन-पोषण सम्बन्धी नियमों आदि का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है।

उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि ‘मातृ-कला’ तथा ‘शिशु-कल्याण’ दोनों आपस में घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध हैं। इसीलिए इन दोनों विषय-क्षेत्रों का एक साथ ही अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 2.
मातृ-कला एवं शिशु-कल्याण के अध्ययन-क्षेत्र का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
मातृ-कला एवं शिशु-कल्याण का अध्ययन-क्षेत्र –
मातृ-कला एवं शिशु-कल्याण का अध्ययन-क्षेत्र पर्याप्त व्यापक है। संक्षेप में मातृ-कला तथा शिशु-कल्याण के अध्ययन-क्षेत्र का विवरण निम्नवर्णित है –

  • मातृत्व के अर्थ एवं विभिन्न पक्षों का अध्ययन।
  • गर्भावस्था से सम्बन्धित समस्त तथ्यों का अध्ययन।
  • परिवार नियोजन तथा परिवार-कल्याण सम्बन्धी अध्ययन।
  • प्रसूता एवं नवजात शिशु का अध्ययन।
  • बाल्यावस्था तक क्रमिक रूप से होने वाले विकास का अध्ययन।
  • शिशु के स्वास्थ्य का बहुपक्षीय अध्ययन।
  • व्यक्तिगत स्वास्थ्य के नियमों एवं व्यावहारिक पक्ष का अध्ययन।

प्रश्न 3.
मातृ-कला एवं शिशु-कल्याण के महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मातृ-कला एवं शिशु-कल्याण का महत्त्व –
गृहविज्ञान के अन्तर्गत “मातृ-कला’ एवं ‘शिशु-कल्याण’ नामक विषय-क्षेत्र का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। इस विषय के अध्ययन-क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि यह एक विस्तृत विषय-क्षेत्र है तथा इसका सम्बन्ध माता, शिशु तथा इन दोनों के आपसी सम्बन्धों के प्राय: सभी पक्षों से है। मातृ-कला एवं शिशु-कल्याण एक व्यावहारिक एवं उपयोगी विषय है। यह कोई सैद्धान्तिक महत्त्व का विषय नहीं है बल्कि इसका सम्बन्ध दैनिक जीवन से है। प्रत्येक युवती भावी माँ होती है।

स्त्री ही चूँकि माँ बनती है। अत: उसके लिए ‘मातृ-कला’ एवं ‘शिशु-कल्याण’ सम्बन्धी ज्ञान परम आवश्यक है। इस ज्ञान से जहाँ एक ओर स्त्रियों का अपना जीवन सरल एवं विभिन्न समस्याओं से मुक्त होता है, वहीं दूसरी ओर बच्चों के उत्तम पालन-पोषण में सहायता प्राप्त होती है। इस विषय के उचित ज्ञान के अभाव में अनेक प्रकार के भ्रम एवं समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। इसीलिए आधुनिक युग में प्रत्येक बालिका, युवती एवं गृहिणी के लिए ‘मातृ-कला’ एवं ‘शिशु-कल्याण’ सम्बन्धी अध्ययन एवं ज्ञान आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

प्रश्न 4.
मातृत्व से पहले महिला को मानसिक रूप से तैयार क्यों होना चाहिए?
उत्तर:
मातृत्व से पहले मानसिक तैयारी मातृत्व एक शारीरिक एवं जैविक प्रक्रिया है तथा इसके लिए महिला को शारीरिक रूप से परिपक्व होना अनिवार्य है, परन्तु इसके साथ-ही-साथ मातृत्व से पहले महिला को मानसिक रूप से भी तैयार होना चाहिए। वास्तव में मातृत्व एक गम्भीर विषय है तथा इसके साथ अनेक दायित्व तथा कार्य सम्बद्ध हैं। जन्म लेने वाले शिशु के उचित पालन-पोषण एवं विकास का दायित्व माता पर होता है। मातृत्व से परिवार का विस्तार होता है। परिवार पर आर्थिक जिम्मेदारियाँ बढ़ती हैं तथा माता-पिता की अपनी दैनिक दिनचर्या में भी अनेक प्रकार के परिवर्तन करने पड़ते हैं। विश्राम एवं मनोरंजन आदि में भी कटौती करनी पड़ती है; अत: इन समस्त तथ्यों को ध्यान में रखकर ही महिला को मानसिक रूप से मातृत्व के लिए तैयार होना चाहिए।

प्रश्न 5.
गर्भवती स्त्री की देखभाल करना क्यों आवश्यक है? गर्भवती स्त्री की देखभाल करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
गर्भवती स्त्री की देखभाल –
गर्भावस्था महिला के जीवन में विशेष महत्त्व की अवस्था या काल होता है। गर्भावस्था में महिला के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु के सुचारु विकास तथा उसके भावी जीवन एवं स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर व्यापक देखभाल की आवश्यकता होती है। वास्तव में गर्भस्थ शिशु हर प्रकार से माँ पर निर्भर करता है तथा उससे घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध होता है। गर्भवती स्त्री की आवश्यक देखभाल के अन्तर्गत मुख्य रूप से निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है –

  • व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना
  • स्वास्थ्य रक्षा का ध्यान रखना
  • सन्तुलित एवं आवश्यक आहार की व्यवस्था करना
  • चिकित्सक से नियमित रूप से जाँच करवाना।

प्रश्न 6.
गर्भावस्था में स्त्री के आहार-नियोजन के लिए ध्यान रखने योग्य बातों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
गर्भावस्था में आहार-नियोजन के लिए
ध्यान रखने योग्य बातें –
एक गर्भवती स्त्री के लिए आहार-नियोजन करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए –

  • यह एक ज्ञात तथ्य है कि गर्भावस्था में स्त्री को साधारण अवस्था की तुलना में अधिक मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऊर्जा की इस अतिरिक्त मात्रा को प्राप्त करने के लिए गर्भवती के आहार में अधिक कार्बोज का समावेश नहीं होना चाहिए बल्कि ऊर्जा प्राप्ति के लिए प्रोटीन, खनिज तथा विटामिन युक्त आहार ग्रहण करना चाहिए। इससे मोटापा नहीं बढ़ता।
  • गर्भावस्था में स्त्री को सदैव बिना छने हुए अर्थात् चोकरयुक्त आटे को ही रोटी के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। इससे कब्ज से बचने में सहायता मिलती है तथा विटामिन्स भी प्राप्त होते हैं।
  • गर्भवती स्त्री के आहार में जहाँ तक सम्भव हो अधिक तली हुई तथा मिर्च मसालेदार खाद्य सामग्री का समावेश नहीं होना चाहिए।
  • गर्भवती स्त्री को सदैव ताजा तथा सफाई से पकाया हुआ आहार ग्रहण करना चाहिए। बासी तथा देर से रखा आहार ग्रहण नहीं करना चाहिए।
  • जहाँ तक सम्भव हो सके गर्भवती स्त्री के दैनिक आहार में दूध एवं दूध से बने पदार्थों का समावेश अवश्य ही होना चाहिए।
  • भोजन के प्रति रुचि बनाए रखने के लिए आहार के मीनू में परिवर्तन करते रहना चाहिए।
  • जहाँ तक सम्भव हो दैनिक आहार में मौसम के फलों का समावेश अवश्य होना चाहिए। ताजे फलों के अतिरिक्त मेवे आदि भी लिए जा सकते हैं।
  • गर्भवती स्त्री के आहार को इस प्रकार से तैयार करना चाहिए कि खाद्य सामग्री के पौष्टिक तत्त्व नष्ट न हों। इसके लिए सब्जियों को या तो छीलें ही नहीं और यदि छीलना अनिवार्य हो तो पतला छिलका ही उतारें। काटने से पहले सब्जी को धोएँ, काटकर न धोएँ। चावलों को अधिक न धोएँ तथा चावलों के माँड को अलग न करें। इसके अतिरिक्त खाद्य सामग्री को अधिक तले या भूने नहीं। इससे पौष्टिक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।
  • यदि सामान्य आहार से सभी विटामिन एवं खनिज समुचित मात्रा में उपलब्ध न हों तो इनकी पूर्ति के लिए अलग से गोलियाँ ली जानी चाहिए।
  • यदि वमन की शिकायत न हो तो गर्भवती स्त्री को काफी मात्रा में पानी भी अवश्य पीना चाहिए।
  • रात का भोजन सोने के दो घण्टे पूर्व अवश्य ही ग्रहण कर लेना चाहिए। इसके साथ-साथ विशेष रूप से ध्यान रखने योग्य बात यह है कि भोजन ग्रहण करते समय गर्भवती स्त्री अपने आपको हर प्रकार की चिन्ता से मुक्त रखे।

प्रश्न 7.
गर्भावस्था में स्त्री के सामान्य कार्य-कलापों तथा विश्राम की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गर्भावस्था में सामान्य कार्य-कलाप तथा विश्राम –
गर्भावस्था सामान्य अवस्था से भिन्न अवस्था है, परन्तु इस अवस्था में भी शरीर की समस्त क्रियाएँ सामान्य रूप से होती हैं। अत: जहाँ तक सम्भव हो महिला को अपनी दिनचर्या सामान्य ही रखनी चाहिए; अर्थात् परिश्रम, व्यायाम तथा विश्राम नियमित रूप से करने चाहिए। केवल विश्राम ही करना उचित नहीं है। स्त्री को अपने घरेलू दैनिक कार्य सामान्य रूप से करते रहना चाहिए।

गर्भवती को उन कार्यों से बचना चाहिए, जिनमें अधिक परिश्रम और शक्ति लगे। रात में पूर्ण विश्राम करना चाहिए। कम-से-कम आठ घण्टे अवश्य सोना चाहिए। इसके अतिरिक्त यदि सम्भव हो तो दिन में भी, भोजन ग्रहण करने के बाद एक-दो घण्टे या तो सो जाए अन्यथा आराम से लेटना चाहिए। गर्भवती स्त्री को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि वह निरन्तर लम्बी अवधि तक कार्य में न लगी रहे। कार्य के बीच-बीच में अल्पकालीन विश्राम करना भी लाभप्रद होता है। किसी भी स्थिति में अधिक थकान नहीं होनी चाहिए।

प्रश्न 8.
स्पष्ट कीजिए कि गर्भावस्था में शारीरिक स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
उत्तर:
गर्भावस्था में शारीरिक स्वच्छता –
गर्भावस्था में स्त्री को हर प्रकार की शारीरिक स्वच्छता का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। उसे नियमित रूप से स्नान करना चाहिए। सामान्य रूप से गुनगुने पानी से ही स्नान करना चाहिए। गर्भावस्था में दाँतों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए कैल्सियम की अधिक मात्रा ग्रहण करनी चाहिए। गर्भावस्था में आँतों की सफाई का भी अधिक ध्यान रखना चाहिए। कब्ज से बचना चाहिए, परन्तु जुलाब की कोई तेज दवा नहीं लेनी चाहिए। गर्भावस्था में स्त्री को अपने स्तनों की स्वच्छता का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। यदि गर्भावस्था में स्तनों की नियमित रूप से सफाई नहीं की जाती तो इस बात की आशंका रहती है कि कहीं स्तन-मुख के दुग्ध निकालने वाले छिद्र बन्द न हो जाएँ। गर्भावस्था में अधिक कसी हुई चोली भी नहीं पहननी चाहिए। गर्भावस्था में स्त्री को अपनी वेशभूषा का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। उसे साफ-सुथरे तथा ढीले-ढाले वस्त्र ही धारण करने चाहिए। गर्भवती को ऊँची एड़ी वाले सैण्डिल नहीं पहनने चाहिए।

प्रश्न 9.
गर्भावस्था में किए जाने वाले व्यायाम का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:
गर्भावस्था में व्यायाम हल्का व्यायाम गर्भिणी स्त्री के लिए विशेष लाभदायक है। बहत-सी स्त्रियाँ गर्भवती होने पर काम छोड़कर आलसी हो जाती हैं, यह गलत है। काम करते रहने से मांसपेशियाँ मजबूत रहती हैं और प्रसव के समय कष्ट नहीं होता है। हाँ, गर्भिणी स्त्री को भारी चीज नहीं उठानी चाहिए। घरेलू काम करना भी एक प्रकार का व्यायाम ही है, तथापि यहाँ व्यायाम सम्बन्धी कुछ ऐसी क्रियाएँ बताई जा रही हैं जो गर्भावस्था में लाभप्रद हैं –

  • पाँव अलग करके खड़ा होना चाहिए और हाथों को कमर पर रखना चाहिए। कमर से शरीर को एक ओर फिर दूसरी ओर झुकाना चाहिए। सिर को सीधा रखना चाहिए और लम्बी साँस खींचनी चाहिए।
  • पाँव लम्बे करके और हाथों को कमर पर रखकर जमीन पर बैठना चाहिए। कन्धों को धीरे-धीरे पीछे गिराना चाहिए।
  • हाथों को साइड में रखकर पीठ के बल लेटना चाहिए। फिर दोनों पैरों को धीरे-धीरे बिना अधिक जोर दिए, जितना ऊँचा हो सके उठाना चाहिए।
  • व्यायाम करते समय ढीले वस्त्र पहनने चाहिए। आरम्भ में प्रत्येक व्यायाम को तीन बार से अधिक नहीं करना चाहिए। व्यायाम इतना करना चाहिए कि अधिक थकावट न हो। व्यायाम करते समय लम्बी साँस अवश्य लेनी चाहिए।

प्रश्न 10.
गर्भवती महिला के स्वास्थ्य से गर्भस्थ शिशु का क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
गर्भवती महिला के स्वास्थ्य का गर्भस्थ शिशु से सम्बन्ध –
गर्भवती महिला के स्वास्थ्य और गर्भस्थ शिशु का घनिष्ठ सम्बन्ध है। वास्तव में गर्भस्थ शिशु माँ के शरीर से सम्बद्ध होता है। उसका पोषण एवं विकास माँ के शरीर के माध्यम से ही होता है। इस स्थिति में यदि माँ स्वस्थ है तो गर्भस्थ शिशु का स्वास्थ्य भी अच्छा होता है एवं उसका विकास भी सामान्य होता है। इसके विपरीत यदि माँ का स्वास्थ्य सामान्य नहीं है अर्थात् वह किसी अभावजनित रोग से पीड़ित है अथवा किसी संक्रामक रोग से पीड़ित है तो उस स्थिति में गर्भस्थ शिशु के विकास एवं स्वास्थ्य के विकृत होने की बहुत अधिक आशंका रहती है। उदाहरण के लिए यदि कोई महिला तपेदिक या एड्स आदि रोगों से ग्रस्त है तो गर्भस्थ शिशु भी संक्रमित हो सकता है। इसी प्रकार गर्भवती महिला के संवेगात्मक असन्तुलन का प्रतिकूल प्रभाव भी गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास पर पड़ सकता है।

प्रश्न 11.
गर्भवती स्त्री को यात्रा में क्या सावधानी रखनी चाहिए?
उत्तर:
गर्भवती स्त्री द्वारा यात्रा के समय सावधानियाँ –
गर्भावस्था में यदि कोई विशेष कष्ट या समस्या न हो तो छोटी यात्रा करने में किसी प्रकार का डर या कष्ट नहीं होता, परन्तु यदि महिला लम्बी रेल या हवाई यात्रा करने की योजना बनाए तो उसे सर्वप्रथम अपनी महिला चिकित्सक से पूरी जाँच करवाकर परामर्श लेना अनिवार्य होता है। यदि चिकित्सक अनुमति दे देती है तो गर्भवती महिला सावधानीपूर्वक यात्रा कर सकती है। गर्भावस्था में यात्रा तभी करनी चाहिए जब रेल में सीट रिजर्व हो और लेटने की सुविधा उपलब्ध हो। लम्बी यात्रा करते समय महिला को ढीले-ढाले वस्त्र धारण करने चाहिए तथा ऊँची एड़ी की सैण्डिल या चप्पल बिल्कुल नहीं पहननी चाहिए। यात्रा के दौरान अपने खान-पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए। यदि महिला को वमन की शिकायत हो तो उसकी भी समुचित व्यवस्था रखनी चाहिए। इसके अतिरिक्त यात्रा के दौरान यह ध्यान रखना चाहिए कि निरन्तर लम्बे समय तक पैर लटकाकर न बैठे। इससे टाँगों में सूजन आ सकती है। यदि चिकित्सक द्वारा कुछ औषधियों के सेवन का परामर्श दिया गया हो तो उन्हें अपने साथ अवश्य रखें तथा ठीक समय पर उनका सेवन करती रहें। यात्रा के दौरान प्रसन्नचित्त रहें, किसी प्रकार का तनाव न लें।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 22 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘मातृ-कला’ से क्या आशय है?
उत्तर:
‘मातृ-कला’ वह विषय-क्षेत्र है जिसके अन्तर्गत मातृत्व सम्बन्धी व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 2.
‘शिशु-कल्याण’ से क्या आशय है?
उत्तर:
‘शिशु-कल्याण’ वह विषय-क्षेत्र है जिसके अन्तर्गत शिशु के जन्म एवं उसके पालन-पोषण सम्बन्धी नियमों आदि का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 3.
गर्भावस्था के चार सामान्य कष्टों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. जी मिचलाना
  2. वमन होना
  3. कलेजे में जलन तथा
  4. कब्ज की शिकायत।

प्रश्न 4.
गर्भावस्था में स्त्री को अतिरिक्त आहार की आवश्यकता क्यों होती है?
अथवा
गर्भावस्था में पोषक तत्त्वों की माँग क्यों बढ़ जाती है?
उत्तर:
गर्भस्थ शिशु की आहार सम्बन्धी आवश्यकता स्त्री के शरीर से ही पूर्ण होती है, इस कारण से गर्भावस्था में स्त्री को अतिरिक्त आहार एवं पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 5.
गर्भवती स्त्री का क्या आहार होना चाहिए?
उत्तर:
गर्भवती स्त्री को पौष्टिक, सन्तुलित तथा सुरुचिकर आहार ग्रहण करना चाहिए। उसके आहार में प्रोटीन, लौह-खनिज, कैल्सियम तथा विटामिनों की मात्रा सामान्य से अधिक होनी चाहिए।

प्रश्न 6.
गर्भावस्था में स्त्री को किन खनिज लवणों की अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
गर्भावस्था में स्त्री को कैल्सियम तथा आयरन नामक खनिज लवणों की अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 7.
कैल्सियम गर्भिणी के लिए क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
गर्भस्थ शिशु की हड्डियों के विकास के लिए गर्भिणी के आहार में कैल्सियम की अधिक मात्रा का समावेश होना चाहिए। यदि गर्भिणी स्त्री के आहार में कैल्सियम की पर्याप्त मात्रा नहीं होती तो गर्भिणी की हड्डियाँ तथा दाँत कमजोर हो जाते हैं।

प्रश्न 8.
रक्ताल्पता से आप क्या समझती हैं?
उत्तर:
रक्ताल्पता का शाब्दिक अर्थ है-रक्त की कमी होना परन्तु वास्तव में रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा घट जाना ही रक्ताल्पता है। गर्भावस्था में प्राय: यह समस्या उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 9.
गर्भावस्था में स्त्री को दैनिक घरेलू कार्य करने चाहिए या छोड़ देने चाहिए?
उत्तर:
गर्भावस्था में स्त्री को समस्त दैनिक घरेलू कार्य करते रहना चाहिए परन्तु अधिक परिश्रम तथा भारी वजन उठाने के कार्यों से बचना चाहिए।

प्रश्न 10.
गर्भावस्था में स्त्री को अपना मानसिक स्वास्थ्य कैसे सामान्य रखना चाहिए?
उत्तर:
गर्भावस्था में स्त्री को प्रसन्नचित्त रहना चाहिए तथा संवेगात्मक उत्तेजनाओं से बचना चाहिए। उसे धार्मिक एवं आध्यात्मिक विचारों का मनन करना चाहिए।

प्रश्न 11.
प्रत्याशित माता को कौन-कौन से टीके लगाए जाते हैं?
उत्तर:
प्रत्याशित माता को सामान्य रूप से टिटेनस से बचाव का टीका लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त आवश्यकता पड़ने पर आयरन तथा विटामिन के टीके भी लगाए जाते हैं। अन्य किसी संक्रमण की आशंका होने पर सम्बन्धित टीके लगाए जाते हैं।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 22 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –

1. विद्यालय में पढ़ने वाली युवतियों के लिए ‘मातृ-कला’ एवं ‘शिशु-कल्याण’ का अध्ययन –
(क) अनावश्यक है
(ख) आवश्यक एवं लाभकारी है
(ग) ऐच्छिक होना चाहिए
(घ) व्यर्थ है।
उत्तर:
(ख) आवश्यक एवं लाभकारी है।

2. गर्भधारण करने के प्रारम्भिक लक्षण हैं –
(क) मासिक धर्म बन्द होना
(ख) जी का बार-बार मिचलाना
(ग) सुस्त रहना तथा नींद अधिक आना
(घ) उपर्युक्त सभी लक्षण।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी लक्षण।

3. गर्भावस्था में सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार आवश्यक होता है –
(क) स्त्री को प्रसन्न करने के लिए
(ख) शिशु को सुन्दर बनाने के लिए
(ग) माता एवं गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य के लिए
(घ) अनावश्यक होता है।
उत्तर:
(ग) माता एवं गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य के लिए।

4. ‘मातृ-कला’ एवं ‘शिशु-कल्याण’ के अन्तर्गत अध्ययन किया जाता है –
(क) गर्भावस्था से सम्बन्धित समस्त तथ्यों का
(ख) प्रसूता एवं नवजात शिशु का
(ग) बाल्यावस्था तक क्रमिक रूप.से होने वाले विकास का
(घ) उपर्युक्त सभी तथ्यों का।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी तथ्यों का।

5. गर्भावस्था में ध्यान रखना चाहिए –
(क) सन्तुलित आहार का –
(ख) समुचित विश्राम का
(ग) शारीरिक स्वच्छता का
(घ) उपर्युक्त सभी का।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी का।

6. गर्भावस्था में धूम्रपान से –
(क) माँ का मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहता है
(ख) गर्भस्थ शिशु पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
(ग) कोई प्रभाव नहीं पड़ता
(घ) माँ एवं शिशु दोनों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
उत्तर:
(घ) माँ एवं शिशु दोनों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

7. गर्भवती महिला को –
(क) असन्तुलित आहार लेना चाहिए
(ख) कम आहार लेना चाहिए
(ग) केवल फल लेना चाहिए
(घ) दोगुना आहार लेना चाहिए।
उत्तर:
(घ) दोगुना आहार लेना चाहिए।

8. गर्भावस्था में महिला को मिलना चाहिए –
(क) केवल फल
(ख) केवल दूध
(ग) सन्तुलित आहार
(घ) जो भी उपलब्ध हो।
उत्तर:
(ग) सन्तुलित आहार।

9. उत्तम स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है –
(क) मक्खन
(ख) मिठाई
(ग) सन्तुलित आहार
(घ) मनपसन्द व्यंजन।
उत्तर:
(ग) सन्तुलित आहार।

UP Board Solutions for Class 11 Home Science

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 14 उद्यान, खेल के मैदान तथा खुले स्थान

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 14 उद्यान, खेल के मैदान तथा खुले स्थान (Gardens, Playground and Open Places)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 14 उद्यान, खेल के मैदान तथा खुले स्थान

UP Board Class 11 Home Science Chapter 14 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उद्यान किसे कहते हैं? ये कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तरः
उद्यान तथा इसके प्रकार –
उद्यान उस स्थान को कहते हैं जहाँ फल-फूल एवं सब्जियों आदि के पेड़-पौधों को प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रदर्शन के दृष्टिकोण से लगाया जाता है। ये स्थल रमणीक तथा आनन्ददायक होते हैं। उद्यान अनेक प्रकार के होते हैं; यथा –

  • जनता उद्यान
  • चिकित्सालय उद्यान
  • पाठशाला उद्यान
  • गृह उद्यान।

इन सभी प्रकार के उद्यानों का प्रमुख उद्देश्य जनता को शुद्ध वायुयुक्त शान्तिप्रिय स्थान प्रदान करने के साथ-साथ प्रकृति का ज्ञान कराना होता है। अधिकांश जनता नगरों की घनी बस्तियों में रहती है, जहाँ मीलों दूर तक पेड़-पौधे दिखाई नहीं देते हैं। इन घनी बस्तियों में रहने वालों के स्वास्थ्य लाभ के लिए ही सरकार नगर के मध्य भाग के ऐसे स्थान पर जनता उद्यान बनवाती है, जहाँ नगर के अधिकांश लोग स्वेच्छा से आकर पेड़-पौधों की सुन्दरता को देखने के साथ-साथ शुद्ध वायु का सेवन करें, मन बहलाएं और इन प्राकृतिक पौधों के विषय में ज्ञान प्राप्त करें।

पाठशाला भवन की सुन्दरता बढ़ाने तथा बच्चों के स्वास्थ्य की दृष्टि से अधिकांश स्कूलों में पाठशाला उद्यान लगाया जाता है। इसी प्रकार चिकित्सालय की सुन्दरता बढ़ाने, रोगियों और उनके साथ रहने वालों के मनोरंजन, चिकित्सालय की वायु को शुद्ध करने आदि के उद्देश्य से अस्पतालों के मैदान में चिकित्सालय उद्यान लगाए जाते हैं। कुछ घरों में भी भवन के आगे अथवा पीछे उपलब्ध खुले स्थान पर लघु वाटिका या उद्यान बना लिया जाता है। इस प्रकार के उद्यान को गृह उद्यान कहा जाता है।

प्रश्न 2.
उद्यानों की उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।
अथवा
नगरों में सार्वजनिक उद्यानों का महत्त्व लिखिए।
अथवा
मानव जीवन में उद्यानों की उपयोगिता लिखिए।
उत्तरः
उद्यानों का महत्त्व प्रत्येक व्यक्ति को शुद्ध वायु की आवश्यकता होती है। शुद्ध वायु के अभाव में अनेक प्रकार के रोग फैलते हैं, जिनसे व्यक्ति का स्वास्थ्य खराब हो जाता है तथा मृत्यु दर बढ़ जाती है। यही कारण है कि जहाँ कहीं भी थोड़े-से स्थान में अधिक लोग रहते हैं या सघन आबादी होती है, वहाँ स्वच्छ वायु और सूर्य के प्रकाश की कमी के कारण रोगों का साम्राज्य होता है तथा बालकों की मृत्यु-दर अधिक होती है। इन्हीं बुराइयों को दूर करने के उद्देश्य से नगर निर्माण के समय इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि प्रत्येक मकान में सूर्य का प्रकाश और वायु का अच्छा आवागमन हो और कूड़े-करकट तथा गन्दे पानी के निकास का उचित प्रबन्ध हो ताकि गन्दगी न फैल सके।

इन स्थानों या मकानों में रहने वालों को बाग की शुद्ध वायु और पेड़-पौधों के सम्पर्क में लाने के लिए सरकार जनता उद्यान बनवाती है। इसके अतिरिक्त यहाँ छायादार सघन वृक्ष लगाए जाते हैं ताकि उनके नीचे बैठकर व्यक्ति प्रकृति का आनन्द उठा सके। यहाँ घुमावदार सुन्दर रास्ते तथा घास के सुन्दर मैदान इत्यादि इसीलिए बनाए जाते हैं ताकि अधिक-से-अधिक लोग यहाँ घूमकर या बैठकर शुद्ध वायु प्राप्त कर सकें। घरों में खुले स्थान का अभाव होने की स्थिति में अनेक व्यक्ति इन उद्यानों में ही आकर व्यायाम अथवा योगाभ्यास करते हैं।

इस प्रकार उद्यान, वायु को शुद्ध करने (वायु प्रदूषण समाप्त करने), मनोरंजन, ज्ञानवर्द्धन, स्वास्थ्य आदि के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान हैं।

प्रश्न 3.
टिप्पणी लिखिए-खेल के मैदान, खले स्थान व पार्क।
अथवा
टिप्पणी लिखिए-खेल के मैदानों तथा खुले स्थानों का महत्त्व।
उत्तरः
खेल के मैदान, खुले स्थान व पार्क –
जनता के स्वास्थ्य एवं मनोरंजन के उद्देश्य से नगरपालिका अथवा कुछ अन्य संस्थाओं द्वारा नगर में खेल के मैदान, खुले स्थानों एवं पार्कों की व्यवस्था की जाती है। इन स्थानों में लोग प्रात:काल या सन्ध्या के समय टहलने आते हैं और दिन के समय बालक, युवा, स्त्री, पुरुष आदि अनेक प्रकार से अपना मनोरंजन करते हैं। कोलकाता, मुम्बई, दिल्ली जैसे बड़े नगरों में, जहाँ 6-7. मंजिल के फ्लैटों में लोग रहते हैं, सन्ध्या के समय अपनी थकान उतारने और मनोरंजन के लिए ये इन स्थानों पर भ्रमण करते हैं इसलिए इन स्थानों में बाल उद्यानों (Children’s Park) के बनाने का विशेष आयोजन किया जाता रहा है।

इन उद्यानों में बालकों के खेलने के सभी प्रकार के उपकरण रखे जाते हैं। यहाँ आकर बच्चे खेल-खेल में शारीरिक व्यायाम और शुद्ध वायु का सेवन दोनों ही कार्य करते हैं। इस प्रकार उद्यानों के द्वारा शारीरिक और मानसिक विकास होता है। शुद्ध वायु और शुद्ध व ताजे फल और सब्जियाँ प्राप्त होती हैं जिनसे व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। स्कूल या पाठशाला में उद्यान बनवाने का भी यही उद्देश्य होता है कि बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास साथ-साथ हो और उनका स्वास्थ्य अच्छा बना रहे।

पार्क नगर की शोभा में भी वृद्धि करते हैं तथा पर्यावरण में आवश्यक सन्तुलन बनाए रखने में भी सहायक होते हैं।

प्रश्न 4.
हमारे लिए वनों का क्या महत्त्व है?
उत्तरः
वनों का महत्त्व –
स्वास्थ्य की दृष्टि से वन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होते हैं। इनके महत्त्व का विवरण इस प्रकार दिया गया है

  • वनों से ही वातावरण का प्रदूषण (Pollution) नियन्त्रित होता है।
  • वनों से वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ी हुई मात्रा कम की जाती है तथा ऑक्सीजन की कमी को पूरा किया जाता है। ऑक्सीजन स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए ही नहीं बल्कि जीवित रहने के लिए भी आवश्यक है।
  • वनों से अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थ प्राप्त होते हैं जो भोजन की समस्या को हल करते हैं।
  • अनेक प्रकार की औषधियाँ वनों से ही प्राप्त होती हैं जो अनेक प्रकार के रोगों से शरीर को – मुक्त कराती हैं।
  • वनों के उचित अनुपात से पृथ्वी के तल का तापमान भी नियमित रहता है तथा अधिक नहीं बढ़ता। यदि पृथ्वी पर वनों का क्षेत्र घटता है तो निश्चित रूप से पृथ्वी तल के तापमान में वृद्धि होगी।
  • वन वर्षा लाने में सहायक होते हैं तथा साथ ही बाढ़-नियन्त्रण में भी योगदान देते हैं। पेड़ मिट्टी के कटाव को रोकते हैं।

प्रश्न 5.
स्कूल में खुले स्थानों तथा खेल के मैदानों के महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
अथवा
विद्यालयों में खेल के मैदान का क्या महत्त्व है?
अथवा
खेल के मैदान की क्या उपयोगिता है?
उत्तरः
अध्ययनरत छात्र-छात्राओं के सर्वांगीण विकास के लिए खेल-कूद, व्यायाम आदि आवश्यक हैं। शारीरिक विकास यदि पूर्ण रूप से नहीं हुआ तो मस्तिष्क भी भली-भाँति विकसित नहीं हो सकेगा। स्वास्थ्य तथा शरीर के भली-भाँति विकास के लिए अन्य बातों के अतिरिक्त दो बातें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं –

  1. शुद्ध अप्रदूषित पर्यावरण तथा
  2. खेल-कूद, व्यायाम, प्राणायाम, योग आदि।

उपर्युक्त दोनों आवश्यकताओं के लिए विद्यार्थियों के प्रयोगार्थ विद्यालय में खुले स्थानों तथा खेल के मैदानों की अति आवश्यकता होती है।

स्कूलों में खुले स्थानों का महत्त्व –
पर्यावरण की शुद्धता, किसी भी स्थान पर, वहाँ उपलब्ध खुले स्थानों पर निर्भर करती है। विद्यालयों में विद्यार्थी यदि अध्ययन कक्ष में ही रहता है तो उसके अध्ययन कक्ष के आस-पास ऐसे खुले स्थान होने आवश्यक हैं जिनसे कमरों में वायु का आवागमन हो सके। मानसिक विकास भी बिना शुद्ध पर्यावरण के सम्भव नहीं है। इसके अतिरिक्त, खुले स्थान विद्यालय का आकर्षण बढ़ाते हैं, इस प्रकार ये मनोरंजन के लिए भी आवश्यक हैं। समय-समय पर अथवा विशेष अवसरों पर सांस्कृतिक, सामाजिक आदि समारोहों, आयोजनों अथवा उत्सवों के लिए भी इस प्रकार के स्थलों का होना महत्त्वपूर्ण है।

स्कूलों में खेल के मैदानों का महत्त्व –
खेल-कूद से मनोरंजन के साथ-साथ शारीरिक विकास में भी सहायता मिलती है। खेल-कूद के अनेक लाभ हैं; जैसे –

  • शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है।
  • समय का सदुपयोग होता है। बच्चा गन्दी आदतों आदि से बचा रहता है।
  • सहकारिता की भावना बढ़ती है क्योंकि वे साथ-साथ खेलते-कूदते हैं।
  • चारित्रिक तथा नैतिक विकास होता है।
  • श्वसन क्षमता में वृद्धि होने से मानसिक पुष्टता में भी वृद्धि होती है। स्पष्ट है खेलकूद के लिए विद्यालयों में खेल के मैदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 14 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उद्यान से क्या आशय है?
उत्तरः
उद्यान उस स्थान को कहते हैं जहाँ फल-फूल एवं सब्जियों आदि के पेड़-पौधों को प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रदर्शन के दृष्टिकोण से लगाया जाता है।

प्रश्न 2.
उद्यानों के मुख्य प्रकार कौन-कौन से होते हैं?
उत्तरः
उद्यानों के मुख्य प्रकार हैं-जनता उद्यान, चिकित्सालय उद्यान, पाठशाला उद्यान तथा गृह उद्यान।

प्रश्न 3.
उद्यान का क्या महत्त्व है? अथवा उद्यानों की उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
उद्यान वायु-प्रदूषण को नियन्त्रित करते हैं। ये जन-सामान्य के लिए मनोरंजन, ज्ञानवर्द्धन तथा स्वास्थ्यवर्द्धन के प्राकृतिक साधन हैं।

प्रश्न 4.
पेड़-पौधों से मुख्य लाभ क्या होता है?
उत्तरः
पेड़-पौधे ऑक्सीजन विसर्जित करके तथा कार्बन डाइ-ऑक्साइड ग्रहण करके वातावरण को शुद्ध बनाए रखते हैं।

प्रश्न 5.
विद्यालय में खेल के मैदान क्यों आवश्यक होते हैं?
उत्तरः
विद्यालय के छात्रों के खेलने तथा उत्तम संवातन के लिए खेल के मैदान आवश्यक होते हैं। प्रश्न 6-वनों का मुख्य महत्त्व क्या है? उत्तर-वन पर्यावरण में सन्तुलन बनाए रखते हैं।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 14 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –
1. नगरों में उद्यानों की उपयोगिता है –
(क) नागरिकों के भ्रमण के स्थल हैं
(ख) बच्चों के खेलने के स्थल हैं
(ग) नगर की शोभा में वृद्धि करते हैं
(घ) उपर्युक्त सभी उपयोगिताएँ।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी उपयोगिताएँ।

2. हमारे लिए वन महत्त्वपूर्ण हैं –
(क) पर्यावरण में सन्तुलन बनाए रखने के लिए
(ख) लकड़ी, औषधियाँ एवं अन्य सामग्रियों की प्राप्ति के लिए
(ग) वर्षा को आकर्षित करने तथा बाढ़-नियन्त्रण के लिए
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व।

UP Board Solutions for Class 11 Home Science

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 6 विभिन्न दशाओं में शरीर की भोजन सम्बन्धी आवश्यकताएँ

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 6 विभिन्न दशाओं में शरीर की भोजन सम्बन्धी आवश्यकताएँ (Food Requirements of the Body Under Various Conditions)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 6 विभिन्न दशाओं में शरीर की भोजन सम्बन्धी आवश्यकताएँ

UP Board Class 11 Home Science Chapter 6 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
शिशु तथा स्कूल जाने वाले बालक/बालिकाओं के उपयुक्त आहार का विवरण .. प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
शिशु का आहार
शिशु का आहार शिशुओं का स्वास्थ्य माता-पिता द्वारा किए गए पालन-पोषण पर निर्भर करता है। शिशु का स्वस्थ विकास एवं पालन-पोषण उसके भविष्य का आधार होता है। इसलिए शिशु अवस्था में ही उसके शारीरिक विकास पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है। शिशु का पालन-पोषण उसकी युवा और प्रौढ़ अवस्था का आधार होता है। इसलिए यह आवश्यक है कि शिशु को सभी पोषक तत्त्व उचित मात्रा में उपलब्ध हों।

शिशु के लिए माता का दूध पूर्ण एवं सर्वोत्तम आहार माना जाता है। माता के दूध में प्रोटीन्स, ‘कार्बोहाइड्रेट्स, वसा, रोग प्रतिरोधक पदार्थ, विटामिन्स आदि उचित मात्रा में पाए जाते हैं। माता के दूध में उपस्थित ये सभी पदार्थ शिशु द्वारा सुगमता से पचा लिए जाते हैं। ये पदार्थ लगभग पचित अवस्था में ही होते हैं। किसी कारणवश यदि शिशु को माता का दूध उपलब्ध नहीं हो पाता तो गाय का दूध सर्वोत्तम विकल्प होता है। गाय और माता के दूध में बहुत कुछ समानता पायी जाती है। गाय के दूध में प्रोटीन तथा वसा की मात्रा कुछ अधिक होती है। लेकिन शर्करा की मात्रा कुछ कम होती है। इसलिए गाय के दूध में पानी मिलाकर शिशुओं को दिया जा सकता है। लेकिन इससे दूध में खनिज तत्त्व तथा विटामिन की कमी हो जाती है। विटामिन C की पूर्ति के लिए सन्तरे का रस और विटामिन ‘D’ की पूर्ति के लिए मछली के तेल की 2-4 बूंद प्रतिदिन आहार में दी जानी चाहिए। 4-5 माह पश्चात् बिना मसाले की उबली हुई सब्जियाँ, फलों का गूदा, पतली दाल आदि देनी चाहिए। दाँत निकलने के पश्चात् ठोस आहार देना चाहिए। एक वर्ष तक के शिशु का मुख्य आहार दूध ही होना चाहिए।

स्कूल जाने वाले बालक/बालिकाओं का आहार:
स्कूल जाने वाले बच्चों (बालक/बालिका) की उम्र तथा उनके बढ़ते हुए शरीर की आवश्यकताओं को देखते हुए उनके आहार में पोषक तत्त्व पर्याप्त एवं सन्तुलित मात्रा में होने चाहिए। बच्चों में विकास बहुत तेजी से होता है। अत्यधिक क्रियाशीलता के कारण उसके शरीर के ऊतकों की क्षति अधिक होती है। अतः इनकी क्षतिपूर्ति और मरम्मत आदि के लिए प्रोटीन्स की आवश्यकता भी अधिक होती है। बच्चे खेलने-कूदने व अन्य कार्यों में अत्यधिक ऊर्जा व्यय करते हैं। ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त मात्रा में कार्बोहाइड्रेट तथा वसाओं का प्रयोग किया जाना चाहिए। खनिज पोषक तत्त्वों और विटामिन्स आदि की पूर्ति के लिए हरी सब्जियों, फल आदि को आहार में उचित स्थान मिलना चाहिए।

खनिज लवणों का उचित मात्रा में उपलब्ध होना अस्थियों, मांसपेशियों और रक्त आदि के निर्माण के लिए आवश्यक होता है। विटामिन रोगों से बचाव में सहायता करने के अतिरिक्त विभिन्न उपापचय क्रियाओं का नियन्त्रण एवं नियमन करते हैं।

बालक और बालिकाओं की भोजन सम्बन्धी आवश्यकताएँ भिन्न होती हैं। बालकों को अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इस कारण इन्हें अधिक मात्रा में भोजन मिलना चाहिए।

13 से 15 वर्ष की आयु के बालकों को 2450 कैलोरी और बालिकाओं को 2060 कैलोरी ऊर्जा की प्रतिदिन आवश्यकता होती है। 16 से 18 वर्ष के किशोर को 2640 तथा किशोरी को 2060 कैलोरी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। 19 से 20 वर्ष के किशोरों की ऊर्जा आवश्यकताएँ बढ़कर 3100 कैलोरी प्रतिदिन तक हो जाती हैं लेकिन किशोरियों की ऊर्जा आवश्यकताएँ लगभग समान बनी रहती हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि खेलकूद में किशोरों की अधिक ऊर्जा व्यय होती है।

तालिका-बालकों के लिए दैनिक आवश्यक आहार:
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 34

प्रश्न 2.
किशोरावस्था में उपयुक्त एवं सन्तुलित आहार का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
किशोरावस्था जीवन की एक विशिष्ट अवस्था होती है। 12-13 वर्ष की आयु से 18-19 वर्ष की आयु के काल को ही ‘किशोरावस्था’ कहा जाता है। किशोरावस्था तीव्र तथा बहुपक्षीय परिवर्तनों का काल होता है। इस काल में न केवल शारीरिक वृद्धि एवं विकास की दर अधिक होती है, बल्कि कुछ मूलभूत गुणात्मक परिवर्तन भी होते हैं। यह भी कहा जा सकता है कि किशोरावस्था में शरीर में विभिन्न बाहरी तथा आन्तरिक परिवर्तन होते हैं। किशोरावस्था में शरीर के सभी तन्त्र अधिक मजबूत तथा अधिक सक्रिय हो जाते हैं। चयापचय की दर में भी परिवर्तन आ जाता है।

किशोरावस्था के लिए उपयुक्त एवं सन्तुलित आहार के निर्धारण हेतु लिंग-भेद को भी ध्यान में रखना आवश्यक हो जाता है। किशोर तथा किशोरियों के पोषक-तत्त्वों तथा आहार की मात्रा में भी अन्तर हो जाता है। सामान्य रूप से लड़कों की तुलना में लड़कियों को कम मात्रा में आहार की आवश्यकता होती है। क्योंकि लड़कियों का शारीरिक वजन तथा लम्बाई कम होती है। किशोरियों के आहार में कुछ विशिष्टता भी होती है। किशोरावस्था में लड़कियों का नियमित मासिक धर्म प्रारम्भ हो जाता है। इससे प्रतिमाह रक्त की कुछ मात्रा का स्राव हो जाता है। इसीलिए किशोरियों के आहार में लौह खनिज की कुछ अधिक मात्रा का समावेश होना चाहिए। किशोरावस्था में लड़कियों के आहार में विभिन्न विटामिनों का भी समुचित मात्रा में समावेश होना चाहिए। भारतीय समाज में विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ लड़कियों का किशोरावस्था में ही विवाह हो जाता है तथा इनमें से कुछ किशोरियाँ गर्भ भी धारण कर लेती हैं। गर्भावस्था तथा स्तनपान की अवस्था में आहार का निर्धारण कुछ भिन्न मापदण्डों के आधार पर किया जाता है।

ICMR ने निम्नांकित तालिकाओं के माध्यम से किशोरावस्था में आवश्यक पोषक तत्वों तथा आहार की मात्रा आदि का व्यवस्थित विवरण प्रस्तुत किया है-

तालिका–किशोरावस्था में आवश्यक पोषक-तत्त्व:
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 35

तालिका–किशोरावस्था में सन्तुलित आहार (ग्राम में):
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 36
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 37

प्रश्न 3.
वयस्क व्यक्तियों के आवश्यक आहार का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
वयस्क व्यक्तियों का आहार
वयस्क पुरुष और स्त्री की पोषक आहार की आवश्यकताएँ उनकी शारीरिक वृद्धि तथा परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं। पुरुषों की ऊर्जा आवश्यकताएँ उनके व्यवसाय तथा वातावरण से प्रभावित होती हैं। आसीन व्यक्ति को लगभग 2400 कैलोरी, साधारण कार्य करने वाले व्यक्ति को 2700-2875 कैलोरी और कठिन परिश्रम करने वाले व्यक्ति को 3800-3900 कैलोरी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। वयस्क स्त्री को पुरुष की अपेक्षा कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। आसीन या सामान्य कार्य करने वाली स्त्री को 1800 कैलोरी, मध्यम कार्य करने वाली स्त्री को 2200 कैलोरी तथा कठिन परिश्रम करने वाली स्त्री को 2600-2900 कैलोरी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह मात्रा कठिनाई के स्तर से प्रभावित होती है। वयस्क पुरुष और स्त्री की औसत आवश्यकता को निम्नांकित तालिका से प्रदर्शित कर सकते हैं-

तालिका-वयस्क पुरुष एवं स्त्री की आहार तालिका:
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 38

प्रश्न 4.
गर्भवती महिला तथा स्तनपान कराने वाली महिला के आहार का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
गर्भवती महिला का आहार
गर्भवती महिला स्वयं के पोषण के साथ-साथ शरीर में विकसित हो रहे भ्रूण का पोषण भी करती है। भ्रूण के पोषण के लिए इसे अतिरिक्त प्रोटीन, कैल्सियम, फॉस्फोरस, विटामिन ‘D’ आदि की आवश्यकता होती है। प्रतिदिन 15 से 25 ग्राम प्रोटीन, 30 ग्राम वसा, 1000 मिग्रा कैल्सियम तथा 40 मिग्रा लौह की अतिरिक्त आवश्यकता होती है। अत: गर्भवती महिला के आहार में इन तत्त्वों से युक्त आहार को सम्मिलित करना आवश्यक होता है। उचित मात्रा में आहार के उपलब्ध न होने पर स्वयं तथा भ्रूण का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। पर्याप्त एवं सन्तुलित आहार के अभाव में शिशु अनेक जन्मजात रोगों से ग्रस्त हो सकता है और जन्म के समय शिशु का वजन कम होता है। राष्ट्रीय पोषण अनुसन्धान के अनुसार गर्भवती महिला को प्रतिदिन अग्रलिखित मात्रा में आहार. उपलब्ध होना चाहिए-

तालिका:
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 39

II. स्तनपान कराने वाली महिला का आहार:
गर्भकाल की भाँति स्तनपान कराने वाली महिला को शिशु पोषण हेतु अतिरिक्त भोजन की आवश्यकता होती है। स्तनपान कराने वाली महिला की ऊर्जा की आवश्यकता कठिन कार्य करने वाली महिला की तुलना में लगभग 400-500 कैलोरी प्रतिदिन बढ़ जाती है। इसके लिए स्तनपान कराने वाली महिला को पर्याप्त, सन्तुलित तथा प्रतिरोधक पदार्थों (खनिजों, विटामिन) से युक्त आहार की आवश्यकता होती है। इसके लिए इनकी प्रोटीन आवश्यकता लगभग 18 से 25 ग्राम प्रतिदिन बढ़ जाती है। इन्हें वसा 45 ग्राम, कैल्सियम 1.5 ग्राम से 2 ग्राम प्रतिदिन की अतिरिक्त आवश्यकता होती है। गर्भकाल की अपेक्षा स्तनपान कराने वाली महिला को शिशु का पोषण करने के अतिरिक्त शारीरिक कार्य भी करना होता है। स्तनपान कराने वाली महिला को सुपाच्य आहार दिया जाना चाहिए।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 6 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
टिप्पणी लिखिए-भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के आहार में अन्तर।
उत्तर:
भोजन मानव शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए अति आवश्यक है। भोजन से शरीर की ऊर्जा सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। शरीर की मरम्मत और निर्माण होता है और भोजन में पाए जाने वाले विभिन्न पोषक तत्त्व शरीर को सुरक्षा प्रदान करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की भोजन सम्बन्धी आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न होती हैं। ये आयु, लिंग, कार्य, मौसम आदि से प्रभावित होती हैं। शारीरिक और मानसिक कार्य करने वाले व्यक्तियों की भोजन सम्बन्धी आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न होती हैं; जैसे शारीरिक श्रम करने वाले किसान या मजदूर को अधिक ऊर्जा प्रदान करने वाले खाद्य पदार्थों की आवश्यकता होती है। अत: इनके भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स तथा वसा की मात्रा अधिक होनी चाहिए। इसके विपरीत मानसिक कार्य करने वाले.अध्यापक, डॉक्टर, इन्जीनियर को प्रोटीनयुक्त भोज्य पदार्थों की आवश्यकता अधिक होती है।

जलवायु भी भोजन सम्बन्धी आवश्यकताओं को प्रभावित करती है। शीत ऋतु में ऊर्जा की आवश्यकता बढ़ जाती है क्योंकि भोजन की ऊर्जा का अधिकांश भाग शरीर ताप को नियमित रखने में व्यय हो जाता है। अतः शीत ऋतु में अधिक वसायुक्त गरिष्ठ भोजन की आवश्यकता होती है। शीत ऋतु में ऐसे मेवा (किशमिश, काजू, बादाम, अखरोट, मूंगफली आदि) अधिक खाए जाते हैं जिनसे अधिक ऊर्जा प्राप्त हो सके। इसके विपरीत ग्रीष्म ऋतु में वसीय पदार्थों का सीमित मात्रा में ही प्रयोग किया जाता है। ग्रीष्म ऋतु में जल तथा खनिज लवणों की आवश्यकता में वृद्धि हो जाती है। स्त्री तथा पुरुषों की ऊर्जा आवश्यकताएँ भी भिन्न होती हैं। पुरुषों को स्त्रियों की अपेक्षा अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। युवा की अपेक्षा प्रौढ़ और प्रौढ़ की अपेक्षा वृद्ध व्यक्तियों को कम भोजन की आवश्यकता होती है। वृद्धों का भोजन हल्का तथा सुपाच्य होना चाहिए।

प्रश्न 2.
टिप्पणी लिखिए-व्यक्ति की ऊर्जा सम्बन्धी आवश्यकता।
उत्तर:
कार्य के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है तथा ऊर्जा भोजन से प्राप्त होती है। ऊर्जा के मापन की इकाई कैलोरी है। ऊर्जा अथवा भोजन के अभाव में मनुष्य की शारीरिक क्रियाएँ प्रभावित होती हैं। ऊर्जा एवं भोजन के अभाव में व्यक्ति दुर्बल तथा अशक्त हो जाता है। वह अपनी क्षमता के अनुसार कार्य नहीं कर पाता।

मानव शरीर की ऊर्जा सम्बन्धी आवश्यकताएँ:
70 किलोग्राम भार के मनुष्य को सामान्य स्वस्थ जीवनयापन के लिए लगभग 70 कैलोरी ऊर्जा प्रति घण्टा की आवश्यकता होती है। इस प्रकार उसे प्रतिदिन लगभग 1700 कैलोरी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। स्त्रियों को अपेक्षाकृत कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। स्त्रियों को सामान्यतया 1400-1500 कैलोरी ऊर्जा की प्रतिदिन आवश्यकता होती है। लिंग तथा व्यवसाय के अनुसार ऊर्जा की आवश्यकता प्रभावित होती है-

तालिका:
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 40
विभिन्न आयु वर्ग के बालक/बालिकाओं द्वारा प्रयुक्त ऊर्जा की मात्रा भिन्न-भिन्न होती है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसन्धान परिषद् (ICMR) द्वारा प्रस्तुत ऊर्जा सम्बन्धी आवश्यकताएँ निम्नवत् हैं-
0-6 माह – 108 कैलोरी प्रति किलोग्राम भार
6-12 माहू – 98 कैलोरी प्रति किलोग्राम भार
1-3 वर्ष – 1240 कैलोरी प्रतिदिन
4-6 वर्ष – 1690 कैलोरी प्रतिदिन
7-9 वर्ष – 1950 कैलोरी प्रतिदिन
10-12 वर्ष – 2190/1970 कैलोरी प्रतिदिन बालक/बालिका
13–15 वर्ष – 2450/2060 कैलोरी प्रतिदिन बालक/बालिका
16–18 वर्ष – 2640/2060 कैलोरी प्रतिदिन बालक/बालिका
उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट होता है कि विभिन्न आयु वर्ग एवं लिंग की ऊर्जा आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न होती हैं।

प्रश्न 3.
वृद्ध व्यक्ति के लिए उपयोगी आहार का विवरण दें।
उत्तर:
सामान्य वयस्क की तुलना में वृद्ध व्यक्ति का भोजन भिन्न होता है। वृद्धावस्था में पाचन क्षमता क्षीण हो जाती है। उसकी कार्य क्षमता घट जाती है। पेशियाँ शिथिल हो जाती हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ शिथिल हो जाने से सामान्य कार्य नहीं कर पातीं। वृद्ध व्यक्ति की शारीरिक तथा मानसिक दुर्बलता के कारण वृद्धावस्था कष्टदायक हो जाती है। ऐसे में वृद्ध व्यक्तियों को ऐसा आहार मिलना चाहिए जो ताजा, गर्म, … हल्का और सुपाच्य हो, जिससे वह सुगमता से भोजन ग्रहण कर सके और उसे पचा सके। भोजन सन्तुलित, पौष्टिक एवं पर्याप्त मात्रा में होना चाहिए। भोजन को भली प्रकार चबाया न जाए तो उसका पाचन प्रभावित होता है, इसलिए वृद्ध व्यक्तियों का भोजन पौष्टिक होने के साथ-साथ सरलता से चबाने योग्य और सुपाच्य भी होना चाहिए जिससे शरीर में पोषक तत्त्वों का अधिकतम अवशोषण हो सके।

भोजन की मात्रा कम या अधिक नहीं होनी चाहिए। दोनों ही स्थितियों में व्यक्ति का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। ऊर्जा उत्पादन हेतु आहार में पर्याप्त मात्रा में कार्बोहाइड्रेट्स तथा वसा का होना आवश्यक है, लेकिन इनकी अधिकता शरीर के भार में वृद्धि करती है जो उनके हित में नहीं होती। वृद्धावस्था में ऊतक क्षीण होने लगते हैं और उनकी मरम्मत के लिए उचित मात्रा में प्रोटीन्स तथा विटामिन्स का होना आवश्यक है जिससे उनकी जीवन शक्ति बनी रहे। इसके लिए वृद्धावस्था में दूध, हरी सब्जियाँ, ताजे फल प्रचुर मात्रा में आहार में सम्मिलित होने चाहिए।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 6 आतं लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
नवजात शिशु का सर्वोत्तम आहार क्या है?
उत्तर:
नवजात शिशु का सर्वोत्तम आहार माँ का दूध ही है।

प्रश्न 2.
शिशु को दूध के अतिरिक्त क्या-क्या दिया जाता है?
उत्तर:
शिशु को दूध के अतिरिक्त विटामिन ‘C’ तथा विटामिन ‘D’ की पूर्ति के लिए सन्तरे का रस तथा मछली के तेल की दो-चार बूंदें दी जाती हैं। चार-पाँच माह के शिशु को उबली हुई सब्जियाँ, फलों का गूदा तथा दाल का पानी दिया जा सकता है।

प्रश्न 3.
स्कूल जाने वाले बालक/बालिकाओं का आहार कैसा होना चाहिए?
उत्तर:
स्कूल जाने वाले बालक/बालिकाओं की आयु तथा उनके बढ़ते हुए शरीर की आवश्यकताओं को देखते हुए उनके आहार में पोषक तत्त्व पर्याप्त एवं सन्तुलित मात्रा में होने चाहिए।

प्रश्न 4.
‘किशोरावस्था का आशय किस आयु-काल से है?
उत्तर:
सामान्य वर्गीकरण के अनुसार 12-13 वर्ष की आयु से 18-19 वर्ष के आयु-काल को किशोरावस्था के रूप में जाना जाता है।

प्रश्न 5.
किशोरावस्था में लड़के-लड़कियों के आहार एवं पोषक तत्त्वों की आवश्यकता में अन्तर क्यों आ जाता है?
उत्तर:
किशोरावस्था में लड़के तथा लड़कियों के शारीरिक संगठन एवं रचना में कुछ अन्तर आ जाते हैं तथा शारीरिक गतिविधियाँ भी कुछ भिन्न हो जाती हैं। इन कारणों से दोनों के आहार तथा पोषक तत्त्वों की मात्रा एवं अनुपात में कुछ अन्तर आ जाता है।

प्रश्न 6.
किशोरावस्था में लड़कियों को किस खनिज की अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता होती है तथा क्यों?
उत्तर:
किशोरावस्था में लड़कियों को लौह खनिज की अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता होती है। इसका मुख्य कारण किशोरियों में मासिक धर्म का प्रारम्भ होना होता है।

प्रश्न 7.
वयस्क व्यक्ति की आहार की आवश्यकता किस कारक पर निर्भर होती है?
उत्तर:
वयस्क व्यक्ति की आहार की आवश्यकता उसकी शारीरिक वृद्धि तथा परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

प्रश्न 8.
गर्भावस्था में महिला को आहार एवं पोषक तत्त्वों की अतिरिक्त मात्रा की क्यों आवश्यकता होती है?
उत्तर:
गर्भावस्था में महिला को आहार एवं पोषक तत्त्वों की अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता का मुख्य कारण यह है कि माँ के शरीर के माध्यम से गर्भस्थ शिशु भी पोषण प्राप्त करता है। .

प्रश्न 9.
वृद्धावस्था में व्यक्ति का आहार कैसा होना चाहिए?
उत्तर:
वृद्धावस्था में व्यक्ति का आहार पौष्टिक एवं सुपाच्य होना चाहिए।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 6 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए

प्रश्न 1.
शिशु के लिए माँ के दूध को सर्वोत्तम आहार माना जाता है
(क) क्योंकि माँ का दूध शिशु के लिए प्रकृति प्रदत्त आहार है
(ख) क्योंकि इसमें आहार के सभी अनिवार्य पोषक तत्त्व पाए जाते हैं
(ग) क्योंकि यह सुविधाजनक तथा संक्रमण की आशंका से मुक्त होता है
(घ) उपर्युक्त सभी कारणों से।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी कारणों से।

प्रश्न 2.
स्कूल जाने वाले बालक/बालिका का आहार निर्धारित करते समय ध्यान रखा जाता है
(क) बालक की शैक्षिक स्थिति का
(ख) शारीरिक वृद्धि तथा क्रियाशीलता का
(ग) पारिवारिक परिस्थितियों का
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(ख) शारीरिक वृद्धि तथा क्रियाशीलता का।

प्रश्न 3.
किशोरावस्था में लड़के-लड़कियों का आहार (मात्रा एवं अनुपात) होता है
(क) पूर्ण रूप से एक जैसा
(ख) लड़कों की अपेक्षा लड़कियों को अधिक मात्रा में
(ग) भिन्न मात्रा एवं अनुपात वाला
(घ) असन्तुलित एवं स्वादिष्ट।
उत्तर:
(ग) भिन्न मात्रा एवं अनुपात वाला।

प्रश्न 4.
वयस्क व्यक्ति के आहार का निर्धारण करते समय ध्यान में रखा जाता है
(क) महिला की आयु एवं वजन
(ख) महिला का व्यवसाय
(ग) महिला की रुचियाँ
(घ) गर्भस्थ शिशु की पोषण सम्बन्धी आवश्यकता।
उत्तर:
(घ) गर्भस्थ शिशु की पोषण सम्बन्धी आवश्यकता।

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