UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 16 समाजशास्त्र : एक परिचय

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 16 समाजशास्त्र : एक परिचय (Sociology: An Introduction)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 16 समाजशास्त्र : एक परिचय

UP Board Class 11 Home Science Chapter 16 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र (Sociology) से आप क्या समझती हैं? इसकी विभिन्न परिभाषाएँ (Definitions) लिखिए तथा अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
समाजशास्त्र से तात्पर्य (Meaning of Sociology) –
परिचय-किसी भी विषय का व्यवस्थित अध्ययन करने से पूर्व, उस विषय की एक स्पष्ट एवं निश्चित परिभाषा निर्धारित कर लेनी चाहिए। समाजशास्त्र के अध्ययन के लिए भी इसके अर्थ एवं परिभाषा को जान लेना परम आवश्यक है। समाजशास्त्र एक नवविकसित विज्ञान है; अतः इसका अर्थ क्रमश: स्पष्ट एवं सुनिश्चित हो रहा है। यही कारण है कि इस विषय के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों में अभी तक मतैक्य नहीं है, परन्तु फिर भी अब लगभग समान रूप से यह स्वीकार किया जाने लगा है कि समाजशास्त्र वह विज्ञान है, जो मानवीय सम्बन्धों, सम्बन्धों के प्रकार, स्वरूप, क्रियाओं एवं घटनाओं का समाज के सन्दर्भ में वैज्ञानिक अध्ययन करता है।

समाजशास्त्र की विभिन्न परिभाषाएँ (Definitions of Sociology) –
समाजशास्त्र की विभिन्न विद्वानों ने निम्नलिखित परिभाषाएँ दी हैं –

  • रॉस के अनुसार-“समाजशास्त्र, सामाजिक तथ्यों का ज्ञान है।”
  • गिडिंग्स के अनुसार -“विकास क्रम में सामूहिक रूप से लगे हुए भौतिक, जैविक तथा मानसिक कारणों द्वारा हुए समाज के जन्म, विकास, ढाँचे और क्रियाओं का वर्णन समाजशास्त्र है।”
  • मैकाइवर और पेज के अनुसार-“समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों के विषय में है। सामाजिक सम्बन्धों के इस जाल को हम ‘समाज’ कहते हैं।”
  • जिन्सबर्ग के अनुसार-“समाजशास्त्र को समाज के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”
  • एबल के अनुसार-“समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों, उनके प्रकारों, उनके स्वरूपों, जो कुछ उनको प्रभावित करता है और जिसको वे प्रभावित करते हैं, उनका वैज्ञानिक अध्ययन है।” ।
  • मैक्स वेबर के अनुसार-“समाजशास्त्र वह विज्ञान है जोकि सामाजिक क्रियाओं की अर्थपूर्ण व्याख्या करते हुए समझाने की कोशिश करता है।”
  • बेनेट और ट्यूमिन के अनुसार-“समाजशास्त्र सामाजिक जीवन के ढाँचे और कार्यों का विज्ञान है।”
  • ऑगबर्न तथा निमकॉफ के अनुसार-“समाजशास्त्र सामाजिक जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन है।”
  •  ग्रीन के अनुसार-“समाजशास्त्र संश्लेषणात्मक और सामान्यीकरण करने वाला वह विज्ञान है, जो मनुष्यों और सामाजिक सम्बन्धों का अध्ययन करता है।”
  • दुर्थीम के अनुसार-“समाजशास्त्र सामूहिक प्रतिनिधियों का विज्ञान है।”

समाजशास्त्र की परिभाषाओं की सामान्य विवेचना (General Discussion of Definitions of Sociology) –
समाजशास्त्र की उपर्युक्त विभिन्न परिभाषाओं का अध्ययन करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि समाजशास्त्र की परिभाषाओं को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है –

(क) प्रथम भाग के अन्तर्गत उन समाजशास्त्रियों की परिभाषाएँ आती हैं, जो समाजशास्त्र की परिधि में मानव का सम्पूर्ण जीवन ले आते हैं।
(ख) दूसरे वर्ग के अन्तर्गत वे परिभाषाएँ आती हैं जिनमें विद्वान समाजशास्त्र को मानवीय सम्बन्धों के विशेष पक्ष तक ही सीमित रखना चाहते हैं।

यदि उपर्युक्त दोनों भागों या वर्गों की परिभाषाओं का अध्ययन करें तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वास्तव में समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है, जिसमें हम सामाजिक. जीवन, सामाजिक सम्बन्धों, कार्यों तथा समाज के स्वरूप का व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन करते हैं।

प्रश्न 2.
समाजशास्त्र (Sociology) के विषय-क्षेत्र (Scope) की विवेचना कीजिए।
उत्तरः
समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र (Scope of Sociology) –
विषय-क्षेत्र का तात्पर्य एक ऐसी सम्भावित सीमा से होता है जिसके अन्तर्गत ही किसी ज्ञान को विकसित किया जाता है। यद्यपि सभी विद्वान यह मानते हैं कि समाजशास्त्र में सामाजिक सम्बन्धों का अध्ययन होना चाहिए, तथापि इसी प्रश्न को लेकर समाजशास्त्र के अध्ययन-क्षेत्र के विषय में विद्वानों में मतभेद रहा है। इस विवाद ने मुख्य रूप से दो सम्प्रदायों को जन्म दिया है। एक सम्प्रदाय को हम विशेषात्मक अथवा स्वरूपात्मक सम्प्रदाय (Specialistic or Formal School) कहते हैं, जिसके अनुसार समाजशास्त्र एक विशेष सामाजिक विज्ञान है।

दूसरा सम्प्रदाय समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र को व्यापक बनाने के पक्ष में है, इसे हम समन्वयात्मक सम्प्रदाय (Synthetic School) कहते हैं। इसके अनुसार, समाजशास्त्र सामान्य विज्ञान है, जिसमें सभी प्रकार के सामाजिक सम्बन्धों का अध्ययन किया जाना चाहिए। इन दोनों सम्प्रदायों का दृष्टिकोण समझने से समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र को सरलतापूर्वक समझा जा सकता है जो निम्न प्रकार है –

(1) विशेषात्मक सम्प्रदाय (Specialistic School) –
इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक जॉर्ज सिमेल, वीरकान्त, वॉन वीज, मैक्स वेबर, रॉस, पार्क, बर्गेज तथा टानीज आदि हैं। इन विद्वानों के अनुसार समाजशास्त्र एक विशेष विज्ञान के रूप में है; अतः समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र के सम्बन्ध में इस सम्प्रदाय के मानने वाले निम्नलिखित विशेषताएँ बतलाते हैं –

  • इस सम्प्रदाय के समर्थकों के अनुसार समाजशास्त्र का क्षेत्र सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों का अध्ययन करना होना चाहिए।
  • समाज के विभिन्न पक्षों का अध्ययन विभिन्न सामाजिक विज्ञान; जैसे राजनीतिशास्त्र, इतिहास,अर्थशास्त्र आदि करते हैं; अतः समाजशास्त्र में इनके अध्ययन की आवश्यकता नहीं।
  • समाजशास्त्र का एक विशिष्ट निश्चित क्षेत्र होना चाहिए।
  • समाजशास्त्र एक स्वतन्त्र विज्ञान है।
  • समाजशास्त्र एक विश्लेषणात्मक विज्ञान है।

समाजशास्त्र के विशेषात्मक सम्प्रदाय के विचारों को समझने के लिए प्रमुख समाजशास्त्रियों की विचारधाराएँ – इस सम्प्रदाय के प्रमुख विद्वानों के विचार इस प्रकार हैं –

(अ) जॉर्ज सिमेल के विचार-स्वरूपात्मक सम्प्रदाय के प्रमुख समर्थक जॉर्ज सिमेल (George Simmel) ही हैं। जॉर्ज सिमेल ने स्पष्ट किया है कि समाजशास्त्र का सम्बन्ध सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों के अध्ययन से है। समाजशास्त्र विशिष्ट विज्ञान है तथा वह केवल सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों का ही अध्ययन करता है। उसके अनुसार सामाजिक सम्बन्धों की अन्तर्वस्तु का अध्ययन अन्य विशिष्ट सामाजिक विज्ञानों के अन्तर्गत किया जाता है। सिमेल ने मुख्य रूप से प्रतिस्पर्धा, प्रभुत्व, अनुकरण, श्रम-विभाजन तथा अधीनता आदि सामाजिक सम्बन्धों का वर्णन किया है। सिमेल के अनुसार समाजशास्त्र को अन्तर्वस्तु से कोई वास्ता नहीं, उसे तो केवल सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूप का अध्ययन करना है।

(ब) वीरकान्त के विचार-जर्मन समाजशास्त्री वीरकान्त के अनुसार, समाजशास्त्र का कार्य समाज के उन तत्त्वों का अन्वेषण करना है, जिनकी उत्पत्ति सामाजिक सम्बन्धों के कारण होती है; उदाहरण के लिए—प्रेम, द्वेष, लज्जा, सहकारिता आदि। ये वे तत्त्व हैं, जिनसे मानसिक एकता उत्पन्न होती है। अन्य शब्दों में, ये सम्बन्धित व्यक्तियों को एक-दूसरे से बाँधते हैं। समाजशास्त्र में इन मूल तत्त्वों या सम्बन्धों का ही अध्ययन किया जाता है। इनके अनुसार व्यक्तियों और व्यक्ति-समूहों को बाँधने वाले मानसिक बन्धनों या तत्त्वों का अध्ययन समाजशास्त्र का विषय है। इस प्रकार समाजशास्त्र का मुख्य कार्य मनुष्यों के मध्य सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने वाले तत्त्वों का अध्ययन करना है।

(स) मैक्स वेबर के विचार-मैक्स वेबर (Max Weber) के अनुसार, समाजशास्त्र सामाजिक क्रिया को समझने और व्याख्या करने में सहायक होता है। उनके अनुसार सामाजिक व्यवहार दो व्यक्तियों के मध्य तब होता है जबकि वे एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं और परस्पर कोई व्यवहार या अन्त:क्रिया करते हैं। इस पर भी यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक व्यवहार सामाजिक व्यवहार ही हो। उदाहरण के लिए-दो व्यक्ति साइकिल से टकरा जाते हैं, इस प्रकार का टकराना भौतिक घटना है, परन्तु उन व्यक्तियों में से एक का दूसरे की चोट के लिए खेद व्यक्त करना और क्षमा माँगना एक सामाजिक क्रिया है। इस प्रकार वेबर के अनुसार समाजशास्त्र का कार्य सामाजिक क्रिया की व्याख्या करना है।

विशेषात्मक सम्प्रदाय की आलोचना-विशेषात्मक सम्प्रदाय की फ्रेंच तथा ब्रिटिश समाजशास्त्रियों ने निम्नलिखित आलोचना की है –

  • समाजशास्त्र, सामाजिक सम्बन्धों के सूक्ष्म तथा अमूर्त स्वरूपों के अध्ययन तक सीमित नहीं है।
  • इस सम्प्रदाय के समर्थकों के अनुसार स्वरूप और अन्तर्वस्तु एक-दूसरे से अलग हैं, परन्तु यथार्थ में सामाजिक सम्बन्धों में स्वरूप और अन्तर्वस्तु को अलग नहीं किया जा सकता।
  • इस सम्प्रदाय के समर्थकों का यह कहना सत्य प्रतीत नहीं होता कि समाजशास्त्र से ही सामाजिक सम्बन्धों के रूपों का अध्ययन किया जाता है।
  • यह विचारधारा समाज के सदस्यों को कम महत्त्व देती है।
  • इस सम्प्रदाय ने समाजशास्त्र के क्षेत्र को अत्यधिक संकुचित कर दिया है।

(2) समन्वयात्मक सम्प्रदाय (Synthetic School) –
इस सम्प्रदाय के प्रमुख समर्थक फ्रेंच तथा ब्रिटिश समाजशास्त्री हैं। इस सम्प्रदाय के अनुसार समाजशास्त्र को अपना क्षेत्र सीमित व संकुचित न बनाकर विस्तृत तथा व्यापक बनाना चाहिए। इस. सम्प्रदाय के मुख्य समर्थक हैं-दुर्थीम, हॉबहाउस, सोरोकिन, जिन्सबर्ग तथा मोटवानी।

इस सम्प्रदाय के समर्थकों के अनुसार समाजशास्त्र ‘विज्ञानों का विज्ञान’ है। सभी विज्ञान उसके क्षेत्र में आ जाते हैं और वह सभी को अपने में समन्वित करता है। सामाजिक जीवन के समस्त भाग परस्पर सम्बन्धित हैं, इस कारण किसी एक पक्ष का अध्ययन करने से सम्पूर्ण बात को हम नहीं समझ सकते। ऐसी दशा में आवश्यक है कि हम समाजशास्त्र के अन्तर्गत सम्पूर्ण सामाजिक जीवन का व्यवस्थित अध्ययन करें। केवल सूक्ष्म सिद्धान्तों का अध्ययन करने से काम नहीं चलेगा। मोटवानी के अनुसार—“समाजशास्त्र जीवन को पूरी तरह और एक समग्र रूप में देखने का प्रयास करता है।” इस प्रकार समाजशास्त्र के क्षेत्र के अन्दर समाज के सामाजिक सम्बन्धों का सामान्य अध्ययन होना चाहिए।

समाजशास्त्र के इस सम्प्रदाय के विचारों को समझने के लिए प्रमुख समाजशास्त्रियों की विचारधाराएँ –
इस सम्प्रदाय के प्रमुख समर्थक दुर्थीम हैं जिन्होंने समाजशास्त्र को तीन भागों में विभाजित किया है –

  • सामाजिक रचनाशास्त्र-इसके अन्तर्गत वे समस्त विषय आ जाते हैं जिनका आधार भौगोलिक होता है; जैसे-जनसंख्या का घनत्व और उसका वितरण।
  • सामाजिक क्रियाशास्त्र सामाजिक क्रियाशास्त्र में उन प्रक्रियाओं और व्यवस्थाओं का अध्ययन किया जाता है, जो समाज के अस्तित्व और सत्ता को बनाए रखने में सहायक होती हैं। ये प्रक्रियाएँ धार्मिक व राजनीतिक होती हैं।
  • सामान्य समाजशास्त्र-इसके अन्तर्गत विभिन्न सामाजिक विज्ञानों के सामान्य सिद्धान्त तथा नियमों की खोज की जाती है, किसी विशेष पक्ष पर बल नहीं दिया जाता।

दुर्थीम के अनुसार प्रत्येक समाज में कुछ विचार, धारणाएँ एवं भावनाएँ होती हैं, जिनका पालन सम्बन्धित समाज के अधिकांश सदस्य करते हैं। ये विचार एवं धारणाएँ सम्बन्धित समाज के सामाजिक जीवन का सामूहिक प्रतिनिधित्व करती हैं। दुर्थीम के अनुसार समाजशास्त्र का कार्य इसी सामूहिक प्रतिनिधित्व का अध्ययन करना है। इस स्थिति में स्पष्ट है कि समाजशास्त्र को एक सामान्य विज्ञान होना चाहिए।

समन्वयात्मक सम्प्रदाय की आलोचना–समाजशास्त्र के समन्वयात्मक सम्प्रदाय की भी विभिन्न आधारों पर आलोचना की गई है। सामान्य रूप से कहा जाता है कि यदि समन्वयात्मक सम्प्रदाय के विचारों को मान लिया जाए तो उस स्थिति में समाजशास्त्र का महत्त्व ही समाप्त हो जाएगा। समाजशास्त्र उन्हीं तथ्यों का दोबारा अध्ययन करेगा, जिनका अध्ययन पहले ही विभिन्न विज्ञानों द्वारा हो चुका होगा। इसके अतिरिक्त, समाजशास्त्र को सामान्य विज्ञान स्वीकार कर लेने से इसका क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत हो जाएगा, जिसका व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन कर पाना कठिन हो जाएगा।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि समाजशास्त्र की विषय-वस्तु के समुचित अध्ययन के लिए समन्वयात्मक तथा विशेषात्मक दोनों दृष्टिकोणों के समन्वय की आवश्यकता है। केवल एक ही दृष्टिकोण को अपनाने से हमारी समस्याओं का हल नहीं हो पाएगा। अन्य शब्दों में, समाजशास्त्र के पूर्ण अध्ययन के लिए विशिष्ट व सामान्य दोनों पक्षों का अध्ययन आवश्यक है। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो समाजशास्त्र को एक जटिल विज्ञान के रूप में परिणत कर देंगे। यथार्थ में विशेषात्मक और समन्वयात्मक विचारधाराएँ एक-दूसरे की विरोधी नहीं वरन् पूरक हैं।

प्रश्न 3.
गृहविज्ञान विषय में समाजशास्त्रीय ज्ञान का समावेश होना क्यों आवश्यक है? विस्तारपूर्वक लिखिए।
अथवा
गृहविज्ञान की छात्राओं के लिए समाजशास्त्रीय ज्ञान का क्या महत्त्व है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
मुख्य रूप से बालिकाओं को पढ़ाया जाने वाला गृहविज्ञान (Home Science) विषय अपने आप में कोई स्वतन्त्र विषय नहीं है। गृहविज्ञान का संगठन विभिन्न सामाजिक एवं भौतिक विज्ञानों के कुछ ऐसे अंशों के समन्वय से हुआ है, जिनका ज्ञान घर तथा सामाजिक परिवेश के सामान्य क्रिया-कलापों में भाग लेने तथा पारिवारिक जीवन की दैनिक समस्याओं के समाधान हेतु आवश्यक है। इस स्थिति में गृहविज्ञान के अन्तर्गत विभिन्न विषयों का व्यावहारिक दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाता है। अन्य विषयों के साथ-साथ गृहविज्ञान के अन्तर्गत समाजशास्त्र का, विशेष रूप से पारिवारिक समाजशास्त्र का भी अध्ययन किया जाता है। गृहविज्ञान के दृष्टिकोण से समाजशास्त्रीय ज्ञान का विशेष महत्त्व है।

गृहविज्ञान के लिए समाजशास्त्रीय ज्ञान का महत्त्व (Importance of Sociological Knowledge to Home Science) –
गृहविज्ञान एक व्यावहारिक विज्ञान है, जिसके अध्ययन का उद्देश्य व्यक्ति एवं परिवार के जीवन को अधिक उन्नत, समृद्ध, सरल एवं विभिन्न प्रकार की समस्याओं से मुक्त बनाना है। व्यक्ति एवं परिवार का जीवन समाज में ही व्यतीत होता है। अतः समाज एवं समस्त सामाजिक परिस्थितियों का व्यक्ति एवं परिवार के जीवन पर प्रभाव पड़ना नितान्त अनिवार्य है।

सामाजिक मान्यताएँ, प्रथाएँ तथा समस्याएँ निश्चित रूप से व्यक्ति एवं परिवार के जीवन को प्रभावित करती हैं। इस स्थिति में इन समाजशास्त्रीय तथ्यों की समुचित जानकारी आवश्यक है। इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ही गृहविज्ञान के अन्तर्गत समाजशास्त्रीय ज्ञान का समावेश किया जाता है। अब प्रश्न उठता है कि समाजशास्त्रीय ज्ञान का गृहविज्ञान के सन्दर्भ में क्या महत्त्व है? अध्ययन की सुविधा के लिए इस महत्त्व को दो वर्गों में बाँटा जा सकता हैप्रथम वर्ग में गृह के सन्दर्भ में समाजशास्त्रीय ज्ञान के महत्त्व का वर्णन किया जाएगा तथा द्वितीय वर्ग में समाज के सन्दर्भ में समाजशास्त्रीय ज्ञान के महत्त्व को स्पष्ट किया जाएगा।

(1) गृह के सन्दर्भ में समाजशास्त्रीय ज्ञान का महत्त्व –
(i) समाजशास्त्र उत्तम पारिवारिक जीवन-यापन में सहायक है-समाजशास्त्र के अन्तर्गत विवाह एवं परिवार से सम्बन्धित सम्पूर्ण तथ्यों का सैद्धान्तिक अध्ययन किया जाता है। विवाह के नियमों, उद्देश्यों तथा समस्याओं आदि का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। इसी प्रकार ‘परिवार’ नामकं सामाजिक संस्था का भी विस्तृत अध्ययन समाजशास्त्र के अन्तर्गत किया जाता है। समाजशास्त्र से प्राप्त होने वाली यह सम्पूर्ण जानकारी उत्तम पारिवारिक जीवन यापन करने में सहायक सिद्ध होती है। पारिवारिक जीवन के संचालन में स्त्री अर्थात् गृहिणी की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। आज की छात्राएँ ही भावी गृहिणियाँ हैं, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए गृहविज्ञान विषय में समाजशास्त्रीय ज्ञान का समुचित समावेश किया जाता है।

(ii) सामाजिक स्थिति के निर्धारण में सहायक-समाजशास्त्र ही ‘सामाजिक स्थिति’ के आधारों, वर्गों तथा सम्बद्ध भूमिकाओं का अध्ययन करता है। सामान्य रूप से पारम्परिक समाजों में व्यक्ति की स्थिति उसके परिवार के सन्दर्भ में ही निर्धारित होती है। इससे भिन्न, आधुनिक समाजों में व्यक्ति के व्यक्तिगत गुणों, क्षमताओं एवं उपलब्धियों के आधार पर ही उसकी सामाजिक स्थिति निर्धारित की जाती है। गृहविज्ञान के अन्तर्गत जब इन समाजशास्त्रीय तथ्यों का अध्ययन कर लिया जाता है तो गृहिणियाँ अपनी तथा अपने परिवार की सामाजिक स्थिति के प्रति जागरूक रहती हैं। वे अपनी सामाजिक स्थिति को उन्नत बनाने के लिए भी आवश्यक प्रयास कर सकती हैं।

(iii) स्त्रियों के लिए समाजशास्त्रीय ज्ञान का महत्त्व-परिवार में स्त्रियों का क्या स्थान है? स्त्रियों के पारिवारिक अधिकार क्या हैं? पारिवारिक सम्पत्ति में स्त्रियों का क्या अधिकार है? स्त्रियों के शोषण एवं उत्पीड़न के क्या कारण हैं तथा उन पर रोक लगाने वाले कानून कौन-कौन से हैं? इस प्रकार के अनेक तथ्यों की व्यवस्थित जानकारी समाजशास्त्र से प्राप्त होती है। यदि गृहविज्ञान के अन्तर्गत इन उपयोगी समाजशास्त्रीय तथ्यों का समावेश कर दिया जाता है तो आज की छात्राएँ अपने भावी गृहस्थ जीवन में लाभान्वित होती हैं। वे अनेक प्रकार के शोषण से बच जाती हैं तथा अपने अधिकारों की माँग कर सकती हैं। इस दृष्टिकोण से कहा जा सकता है कि स्त्रियों के लिए समाजशास्त्रीय ज्ञान का विशेष महत्त्व है।

(2) समाज के सन्दर्भ में समाजशास्त्रीय ज्ञान का महत्त्व –
आधुनिक युग में स्त्रियों का कार्य-क्षेत्र परिवार तक ही सीमित नहीं रह गया है। अब स्त्रियाँ विस्तृत समाज में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में स्त्रियाँ पुरुषों के समान ही भूमिका निभाती हैं। इस स्थिति में अनिवार्य है कि स्त्रियों को सामाजिक विषयों की समुचित जानकारी हो। यही कारण है कि गृहविज्ञान में समाजशास्त्रीय ज्ञान का समावेश किया जाता है। समाज के सन्दर्भ में समाजशास्त्रीय ज्ञान के महत्त्व का संक्षिप्त विवरण अग्रलिखित है –

(i) सामाजिक नियोजन के लिए उपयोगी-वर्तमान युग नियोजन का युग है। सामाजिक प्रगति एवं विकास के लिए प्रत्येक क्षेत्र में नियोजन की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। इस सामाजिक नियोजन में स्त्रियों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। उदाहरण के लिए-मातृत्व एवं बाल-कल्याण, पिछड़े वर्गों का कल्याण, विकलांगों का पुनर्वास, विस्थापितों का पुनर्वास, श्रमिकों का कल्याण, जन-स्वास्थ्य तथा जनशिक्षा एवं जनसंख्या नियन्त्रण आदि अनेक ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें नियोजन की अत्यधिक आवश्यकता है तथा इन क्षेत्रों में स्त्रियों द्वारा भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जा सकती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए गृहविज्ञान के अन्तर्गत सम्बद्ध समाजशास्त्रीय ज्ञान को सम्मिलित किया जाता है।

(ii) सामाजिक समस्याओं के समाधान में सहायक-प्रत्येक गृहिणी अपने परिवार तथा समाज से सम्बद्ध समस्याओं से किसी-न-किसी रूप में अवश्य ही प्रभावित होती है। सामाजिक समस्याओं का समुचित समाधान एवं निराकरण तभी सम्भव है जबकि समाज की महिलाएँ भी इस दिशा में प्रयास करें। सामाजिक समस्याओं के वास्तविक स्वरूप, उनके कारणों तथा निवारण के उपायों का व्यवस्थित अध्ययन समाजशास्त्र के अन्तर्गत ही किया जाता है।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही समाजशास्त्रीय ज्ञान का समावेश गृहविज्ञान विषय में किया जाता है। इस रूप में सामाजिक समस्याओं का अध्ययन करने के उपरान्त छात्राएँ अपने भावी जीवन में सामाजिक समस्याओं के समाधान एवं उन्मूलन में उल्लेखनीय योगदान दे सकती हैं। हमारे समाज की कुछ उल्लेखनीय सामाजिक समस्याएँ हैं—दहेज प्रथा, छुआछूत, जाति प्रथा, पर्दा प्रथा, बाल विवाह तथा बेमेल विवाह आदि। इसी प्रकार बालक-बालिका भेद तथा लड़कियों का तिरस्कार भी एक गम्भीर सामाजिक समस्या है। इन समस्याओं से मुक्ति के लिए समाजशास्त्रीय ज्ञान आवश्यक है।

(iii) सामाजिक सहिष्णुता की वृद्धि में सहायक-पारम्परिक रूप से ही भारतीय समाज अनेक प्रकार की भिन्नताओं से युक्त रहा है। हमारे समाज में धर्म, जाति, प्रजाति तथा भाषा आदि के दृष्टिकोण से पर्याप्त विविधता है। इस प्रकार की विविधता के परिणामस्वरूप हमारे समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रकार के विरोध भी विकसित होते रहते हैं जो सामाजिक तनाव को भी जन्म दे सकते हैं तथा सामाजिक दूरी को भी बढ़ावा देते हैं।

समाजशास्त्र का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि वास्तव में हमारे समाज एवं संस्कृति में, विविधता में एकता है। बाहरी रूप से दिखाई देने वाली भिन्नता के पीछे एक मौलिक एकता निहित है। इसके साथ-साथ समाजशास्त्रीय ज्ञान से स्पष्ट होता है कि सामाजिक भिन्नता का आशय ऊँच-नीच या भेदभाव नहीं है। इस प्रकार के समाजशास्त्रीय ज्ञान को प्राप्त करके छात्र-छात्राओं में सामाजिक सहिष्णुता का विकास होता है।

उपर्युक्त विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि गृहविज्ञान की छात्राओं को समाजशास्त्रीय ज्ञान प्रदान करना नितान्त आवश्यक है। यह ज्ञान उनके, उनके परिवार के तथा सम्पूर्ण समाज के जीवन को उन्नत एवं समस्यामुक्त बनाने में सहायक हो सकता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 16 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र की प्रकृति स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
समाजशास्त्र की प्रकृति समाजशास्त्र एक विज्ञान है। एक विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र की विशेषताओं का उल्लेख करके हम समाजशास्त्र की प्रकृति को स्पष्ट कर सकते हैं। सर्वप्रथम हम कह सकते हैं कि समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है। समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों का व्यवस्थित अध्ययन करता है। इस प्रकार समाजशास्त्र प्राकृतिक विज्ञानों से भिन्न है। समाजशास्त्र की प्रकृति को स्पष्ट करने वाला दूसरा तथ्य यह है कि समाजशास्त्र आदर्शात्मक विज्ञान नहीं है, यह एक तथ्यात्मक विज्ञान है।

समाजशास्त्र क्या है?’ का अध्ययन करता है, न कि ‘क्या होना चाहिए’ का। समाजशास्त्र अमूर्त सामाजिक सम्बन्धों का अध्ययन करने के कारण एक अमूर्त विज्ञान है। समाजशास्त्र एक व्यावहारिक विज्ञान है; अर्थात् यह विशुद्ध विज्ञान । नहीं है। समाजशास्त्र की एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता यह है कि यह विज्ञान एक सामान्य विज्ञान है; अर्थात् यह विशिष्ट विज्ञान नहीं है।

प्रश्न 2.
गृहविज्ञान के अन्तर्गत समाजशास्त्रीय अध्ययन क्यों किया जाता है?
उत्तरः
गृहविज्ञान के अन्तर्गत समाजशास्त्रीय अध्ययन –
गृहविज्ञान एक व्यावहारिक महत्त्व का विज्ञान है। गृहविज्ञान के अन्तर्गत उन समस्त विषयों का अध्ययन किया जाता है, जो उत्तम जीवन के लिए उपयोगी होते हैं। जहाँ तक समाजशास्त्र के अध्ययन का प्रश्न है, यह अध्ययन अनिवार्य रूप से उत्तम जीवन व्यतीत करने में सहायक होता है। समाजशास्त्र का ज्ञान उत्तम पारिवारिक जीवनयापन में सहायक होता है। इसके ज्ञान से व्यक्ति की सामाजिक स्थिति की समुचित जानकारी प्राप्त की जा सकती है। समाजशास्त्र का ज्ञान महिलाओं को उनके पारिवारिक एवं सामाजिक अधिकारों की उचित जानकारी प्रदान करता है।

इस दृष्टिकोण से गृहविज्ञान के अन्तर्गत समाजशास्त्र का अध्ययन करना आवश्यक माना जाता है। इसके अतिरिक्त समाजशास्त्र के अध्ययन से बालिकाओं को विभिन्न सामाजिक समस्याओं के विषय में तटस्थ ज्ञान की प्राप्ति होती है तथा इस ज्ञान से सामाजिक सहिष्णुता में भी वृद्धि होती है। इस दृष्टिकोण से भी गृहविज्ञान के अन्तर्गत समाजशास्त्र का अध्ययन किया जाता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 16 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
समाज की इकाई क्या है?
उत्तरः
‘परिवार’ समाज की इकाई है।

प्रश्न 2.
समाजशास्त्र की मैकाइवर तथा पेज द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।
उत्तरः
“समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों के विषय में है। सामाजिक सम्बन्धों के इस जाल को हम समाज कहते हैं।”

प्रश्न 3.
समाजशास्त्र के क्षेत्र सम्बन्धी दो प्रमुख सम्प्रदाय कौन-कौन से हैं?
उत्तरः
समाजशास्त्र के क्षेत्र सम्बन्धी दो मुख्य सम्प्रदाय हैं –

  1. विशेषात्मक अथवा स्वरूपात्मक सम्प्रदाय तथा
  2. समन्वयात्मक सम्प्रदाय।

प्रश्न 4.
समाजशास्त्र के विशेषात्मक सम्प्रदाय के मुख्य समर्थक कौन हैं?
उत्तरः
समाजशास्त्र के विशेषात्मक सम्प्रदाय के मुख्य समर्थक हैं—जॉर्ज सिमेल, वीरकान्त, वॉन वीज, मैक्स वेबर, रॉस, पार्क, बर्गेज तथा टानीज।

प्रश्न 5.
समाजशास्त्र के समन्वयात्मक सम्प्रदाय के प्रमुख समर्थक कौन हैं?
उत्तरः
समाजशास्त्र के समन्वयात्मक सम्प्रदाय के प्रमुख समर्थक हैं—दुर्थीम, हॉबहाउस, सोरोकिन, जिन्सबर्ग तथा मोटवानी।

प्रश्न 6.
गृहविज्ञान के अध्ययन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तरः
गृहविज्ञान के अध्ययन का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति एवं परिवार के जीवन को अधिक उन्नत, समृद्ध, सरल एवं विभिन्न प्रकार की समस्याओं से मुक्त बनाना है।

प्रश्न 7.
पारिवारिक जीवन के लिए समाजशास्त्र का ज्ञान क्यों महत्त्वपूर्ण माना जाता है?
उत्तरः
पारिवारिक जीवन के लिए समाजशास्त्र का ज्ञान उत्तम जीवन यापन करने में सहायक सिद्ध होता है।

प्रश्न 8.
स्त्रियों के लिए समाजशास्त्र का ज्ञान क्यों उपयोगी माना जाता है?
उत्तरः
समाजशास्त्र का ज्ञान स्त्रियों को उनके पारिवारिक अधिकारों से अवगत कराने के कारण उपयोगी माना जाता है।

प्रश्न 9.
व्यक्ति का समाज के प्रति क्या कर्त्तव्य होता है?
उत्तरः
व्यक्ति का समाज के प्रति कर्त्तव्य है—विवाह करना, परिवार स्थापित करना तथा सम्पूर्ण समाज की सुख-समृद्धि में आवश्यक योगदान प्रदान करना।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 16 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –
1. मनुष्य –
(क) एकान्तप्रिय प्राणी है
(ख) सामाजिक प्राणी है
(ग) असामाजिक प्राणी है
(घ) बुद्धिहीन प्राणी है।
उत्तरः
(ख) सामाजिक प्राणी है।

2. समाज की इकाई है –
(क) स्कूल
(ख) परिवार
(ग) समुदाय
(घ) घर।
उत्तरः
(ख) परिवार।

3. “समाजशास्त्र सामाजिक जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन है।” यह कथन किसका है –
(क) मैकाइवर तथा पेज
(ख) ऑगबर्न तथा निमकॉफ
(ग) ग्रीन
(घ) दुर्थीम।
उत्तरः
(ख) ऑगबर्न तथा निमकॉफ।

4. समाजशास्त्र के स्वरूपात्मक सम्प्रदाय के मुख्य समर्थक हैं
(क) जॉर्ज सिमेल
(ख) दुर्थीम
(ग) सोरोकिन
(घ) मोटवानी।
उत्तरः
(क) जॉर्ज सिमेल।

5. समाजशास्त्र के समन्वयात्मक सम्प्रदाय के मुख्य समर्थक हैं –
(क) दुर्थीम
(ख) जॉर्ज सिमेल
(ग) मैक्स वेबर
(घ) वीरकान्त।
उत्तरः
(क) दुर्थीम।

6. गृह के सन्दर्भ में समाजशास्त्रीय ज्ञान का महत्त्व है –
(क) उत्तम पारिवारिक जीवन-यापन में सहायक
(ख) सामाजिक स्थिति के निर्धारण में सहायक
(ग) स्त्रियों के लिए उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व।

7. समाज के सन्दर्भ में समाजशास्त्रीय ज्ञान का महत्त्व है –
(क) सामाजिक नियोजन के लिए उपयोगी
(ख) सामाजिक समस्याओं के समाधान में सहायक
(ग) सामाजिक सहिष्णुता की वृद्धि में सहायक
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व।

UP Board Solutions for Class 11 Home Science

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 23 प्रसवकालीन तैयारियाँ 

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 23 प्रसवकालीन तैयारियाँ (Preparations Regarding Confinement)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 23 प्रसवकालीन तैयारियाँ

UP Board Class 11 Home Science Chapter 23 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
यदि घर पर ही प्रसव कराना हो तो मुख्य रूप से क्या-क्या तैयारियाँ करनी अनिवार्य होती हैं?
अथवा
प्रसव यदि घर पर कराना हो तो इसके लिए नर्स या दाई के चुनाव, स्थान, आवश्यक सामग्री तथा अन्य व्यवस्थाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
घर पर प्रसव –
(Confinement in House)
घर पर प्रसव कराने में बहुत-सी कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जाती हैं जिससे स्त्री और शिशु दोनों को ही कष्ट होता है और कभी-कभी उनका जीवन भी संकट में पड़ जाता है। इस समय डॉक्टरी सहायता बहुत आवश्यक होती है। घर पर यह सुविधा कठिन हो जाती है। फिर भी, यदि घर पर ही प्रसव कराना हो तो निम्नवर्णित तथ्यों एवं तैयारियों को ध्यान में रखना आवश्यक है –

1. नर्स या दाई का चुनाव-प्रसव के लिए योग्य दाई या नर्स का होना आवश्यक है। यदि प्रसव अस्पताल में हो तो नर्स या दाई का नियुक्त होना आवश्यक नहीं है। जब यह स्पष्ट हो जाए कि गर्भिणी को प्रसव-पीड़ा प्रारम्भ हो गई है, उसी समय ऐसी दाई को बुलाना चाहिए जो कि अपने काम में अनुभवी, चतुर और दक्ष हो, प्रसूता से स्नेह और मधुर वचन बोले, उसे धैर्य बँधाए। दाई व नर्स बहरी व गूंगी न हो।

2. प्रसव कक्ष का चुनाव-सर्वप्रथम प्रसूता के लिए चुना गया कमरा अच्छा, हवादार तथा साफ-सुथरा होना चाहिए, जिसमें दुर्गन्ध न आती हो। उसमें सीलन भी न हो और धूप भी आती हो। यह कक्ष किसी शौचालय के पास न हो। प्रसव कक्ष शोरगुल से दूर रहना चाहिए ताकि प्रसूता को पूर्ण विश्राम मिल सके। प्रसूता के लिए समुचित विश्राम अनिवार्य है।
यदि जाड़े हों तो घर में कोयलों की धुआँरहित आग दहकती रखें (क्योंकि धुआँ बालक और प्रसूता दोनों के लिए हानिकारक होता है। जिससे कि ठण्डक उस घर में न आने पाए और वायु भी शुद्ध होती रहे। उस घर की जमीन और दीवार लिपी-पुती और सूखी होनी चाहिए। दरवाजों और खिड़कियों पर परदे लगवा देने चाहिए।

3. प्रसव के लिए आवश्यक सामग्री-घर पर प्रसव कराने की दशा में निम्नलिखित सामग्री की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए
(i) खूब कसा हुआ पलंग, जिस पर गुदगुदा बिछौना हो और मोमजामा बिछा हो। प्रसव के समय इस पलंग का सिरहाना पैताने से एक फुट ऊँचा रहना चाहिए। (ii) पेट पर लपेटने का गाढ़े का कपड़ा। (iii) रेशम। (iv) ब्लेड। (v) गुनगुना पानी। (vi) आग। (vii) तेल। (viii) बेसन या साबुन। (ix) पुराने कपड़े।

प्रसूता के लिए निम्नलिखित वस्तुओं का होना आवश्यक है –
(i) एक पौण्ड उत्तम स्वच्छ रुई। (ii) एक बड़ा रबड़ का टुकड़ा लगभग दो मीटर लम्बा। (iii) तीन … दर्जन सेनेटरी पैड्स। (iv) एक सेनेटरी पेटी। (v) एक डिब्बा सेफ्टी पिन। (vi) एक डिटॉल की शीशी। (vii) हाथ धोने के बर्तन। (viii) एनैमिल का तसला तथा बाल्टी। (ix) नाखून साफ करने का ब्रुश। (x) मछली का तेल लगभग दो औंस। (xi) रबड़ की थैली गर्म पानी के लिए। (xii) दो या तीन साफ तौलिए।

4. शिशु के लिए आवश्यक सामग्री-(i) पाउडर लगभग दो औंस। (ii) उत्तम प्रकार की वैसलीन। (iii) एक बोतल जैतून का तेल। (iv) एक टिकिया उत्तम साबुन। (v) बोरिक पाउडर। (vi) गर्म पानी की बोतल। (vii) एक पैकिट छोटे सेफ्टी पिन। (viii) कुछ अच्छी पट्टियाँ। (ix) कुछ धुले हुए साफ पुराने कपड़े।

5. प्रसूता के लिए वस्त्र आदि – (i) 6 धोती। (ii) 6 ब्लाउज । (iii) 6 पेटीकोट। (iv) 6 चोली।
जाड़ों के दिनों में ऊनी स्वेटर, ऊनी शाल भी होना आवश्यक है। सफेद चादरें पलंग पर बिछाने के लिए, कम-से-कम 4 सफेद धुली चादरें ओढ़ने के लिए, एक दरी, जाड़ों में गद्दा, तकिये, कम्बल या लिहाफ।

6.शिशु के लिए वस्त्र-गर्म शाल शिशु को लपेटने के लिए, गर्म मौजे, फ्रॉक, कुर्ते, दो ढीले कोट रेशमी, 2 ढीले बास्केट। इसके अतिरिक्त डेढ़-दो दर्जन नेपकिन भी अवश्य तैयार रखने चाहिए। पहनने वाले कपड़ों का चुनाव मौसम को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।

घर पर प्रसव कराने की दशा में सर्वाधिक आवश्यक सावधानी है – हर प्रकार की स्वच्छता एवं शुद्धता की व्यवस्था करना। इसके अभाव में संक्रमण की आशंका रहती है। इसके अतिरिक्त प्रसव के लिए अनुभवी महिला चिकित्सक अथवा प्रशिक्षित दाई की व्यवस्था भी आवश्यक होती है। अप्रशिक्षित दाई अथवा किसी घरेलू स्त्री द्वारा प्रसव कराने पर माँ एवं शिशु के जीवन को खतरा हो सकता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 23 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
प्रसव से क्या आशय है? प्रसव के लिए आवश्यक तैयारियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
प्रसव तथा उसके लिए आवश्यक तैयारियाँ –
प्रसव – प्रसव वह प्राकृतिक क्रिया है, जिसके द्वारा गर्भस्थ शिशु गर्भ से बाहर आता है। शिशु का गर्भ से बाहर आना ही प्रसव कहलाता है। इसी को शिशु का जन्म लेना भी कहते हैं। यह अवसर बड़ा महत्त्वपूर्ण होता है। इस अवसर पर स्त्री एवं बच्चे के जीवन की सुरक्षा के लिए बहुत सावधानी से काम लेना पड़ता है। इस अवसर के लिए पहले से कुछ-न-कुछ तैयारी करना आवश्यक होता है।

प्रसव की तैयारियाँ एवं उनका महत्त्व – प्रसव की तैयारी लगभग दो या तीन मास पूर्व कर लेनी चाहिए। इन तैयारियों पर न केवल माता व शिशु की तत्कालीन सुरक्षा अपितु शिशु का सम्पूर्ण भावी जीवन निर्भर रहता है। प्रसव के समय की तैयारी निम्न प्रकार से करनी चाहिए –

  • प्रसव के स्थान का निर्धारण।
  • प्रसव के लिए योग्य नर्स अथवा दाई का चुनाव।
  • प्रसव क्रिया के लिए आवश्यक वस्तुएँ।
  • शिशु के वस्त्र तथा आवश्यक वस्तुएँ।
  • माता के वस्त्र तथा आवश्यक वस्तुएँ। .
  • उचित डॉक्टर का चुनाव।
  • अनुमानित व्यय की व्यवस्था करना।

प्रसव सम्बन्धी तैयारियाँ आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण होती हैं। वास्तव में इन सभी तैयारियों के आधार पर प्रसव को सामान्य बनाया जा सकता है तथा किसी भी परेशानी का सफलतापूर्वक सामना किया जा सकता है। यदि इस प्रकार की तैयारियां पूरी नहीं की जातीं तो प्रसव के समय विभिन्न परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

प्रश्न 2.
अस्पताल में प्रसव कराने के मुख्य लाभों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
अस्पताल में प्रसव कराने के लाभ –
अस्पताल में प्रसव कराने के मुख्य लाभ निम्नलिखित होते हैं –

  • निर्धन स्त्रियों को सरकारी अस्पताल या प्रसव केन्द्रों में नि:शुल्क प्रसव सुविधा मिल जाती है।
  • गर्भवती को अस्पतालों में आवश्यकतानुसार सब प्रकार की डॉक्टरी सहायता तुरन्त प्राप्त हो जाती है। यदि दुर्भाग्यवश प्रसव के समय कोई गम्भीर समस्या उत्पन्न हो जाए तो अस्पताल में विशिष्ट चिकित्सा सहायता मिल जाती है। अस्पताल में ऑक्सीजन, रक्त तथा शल्य क्रिया सम्बन्धी सुविधाएँ सरलता से प्राप्त हो सकती हैं।
  • अस्पताल में प्रसव कराने पर बहुत-सी मानसिक व शारीरिक चिन्ताओं तथा दौड़-धूप से छुटकारा मिल जाता है।
  • अस्पताल में गर्भवती को हवा तथा प्रकाशयुक्त कमरा व सफाई मिल जाती है।

प्रश्न 3.
अस्पताल में प्रसव कराने से होने वाली हानियों या कठिनाइयों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
अस्पताल में प्रसव कराने से हानियाँ –
अस्पताल में प्रसव कराने पर मुख्य रूप से निम्नलिखित हानियाँ या कठिनाइयाँ होती हैं –

  • परिवार की एक स्त्री को प्रसूता के पास अस्पताल में ही रहना पड़ता है। घर पर प्रसूता की देखभाल सुविधापूर्वक की जा सकती है।
  • साधारणतया अस्पतालों में प्रसव कराने पर व्यय भी अधिक करना पड़ता है।
  • आजकल सरकारी अस्पतालों में बहुत अधिक भीड़ होने लगी है। अनेक बार एक-एक बिस्तर पर दो-दो महिलाओं को लेटना पड़ता है अथवा फर्श पर ही लेटना पड़ता है। ऐसी स्थिति में प्रसूता को आवश्यक आराम एवं सुविधा प्राप्त नहीं हो पाती।
  • जहाँ तक प्राइवेट नर्सिंग होम का प्रश्न है, उनमें व्यय बहुत अधिक होता है; अत: साधारण आर्थिक स्थिति वाले परिवारों के लिए इस व्यय को वहन करना कठिन होता है।

प्रश्न 4.
प्रसूता की तात्कालिक परिचर्या का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
प्रसूता की तात्कालिक परिचर्या –
प्रसव के पश्चात् प्रसूता का शक्तिहीन एवं निढाल होना स्वाभाविक है। इस समय उसे पूर्ण आराम की आवश्यकता होती है; अतः प्रसूता की शुद्धता के उपरान्त उसे आराम से सोते रहने देना चाहिए। उसकी इच्छा यदि पीने की हो तो गर्म दूध दे देना चाहिए अन्यथा जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए।

प्रसव के पश्चात् प्रसूता के गर्भ सम्बन्धी अंगों में परिवर्तन हो जाता है, परन्तु उन्हें स्वाभाविक स्थिति में आने के लिए समय चाहिए; अतः प्रसूता को अधिक-से-अधिक विश्राम की अवस्था में रहने देना चाहिए। गर्भाशय का भार इस समय 2 पौण्ड के लगभग हो जाता है, सामान्य अवस्था में उसे 2 औंस रहना चाहिए। इसे पूर्व-स्थिति में आने के लिए लगभग 40 दिन का समय चाहिए। यदि इस समय प्रसूता की परिचर्या नहीं की जाएगी तो गर्भाशय के स्थानान्तरित होने की सम्भावना रहती है; अतः प्रसव के 7वें दिन से प्रसूता को प्रतिदिन कुछ समय विशेष के लिए उल्टा लेटना चाहिए। प्रसव के पश्चात् लगभग 30-35 दिन तक रक्तस्राव होता रहता है, जो सामान्य बात है।

यदि इसके उपरान्त भी रक्तस्राव होता रहे तो डॉक्टर या नर्स से परामर्श लेना चाहिए। आँवलनाल के बाहर निकालने से गर्भाशय में जख्म हो जाते हैं; अत: उसकी पूर्ण स्वच्छता परमावश्यक है, अन्यथा संक्रमण की आशंका रहेगी। गर्भाशय के बार-बार सिकुड़ने से प्रसव के बाद तीन-चार दिन तक पेट में पीड़ा रहती है। इसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए क्योंकि इस सिकुड़न से ही गर्भाशय अपनी पूर्व-स्थिति में आ पाता है।

प्रसूता के आहार की ओर विशेष रूप से सजग होना चाहिए। उसे बहुत हल्का भोजन, दूध, बादाम, अजवायन, खिचड़ी, दलिया आदि देना चाहिए। छिलके वाली दाल दी जानी चाहिए। प्रसूता के लिए गोंद बहुत लाभदायक है। इससे शरीर की पीड़ा व जख्म को लाभ पहुँचता है। प्रसूता को सवा महीने तक पूर्ण विश्राम करना चाहिए। हाँ, वह शिशु के छोटे-छोटे कार्य कर सकती है।
प्रसूता को स्वयं भी अपने स्वास्थ्य के प्रति सावधानी बरतनी चाहिए। यदि किसी प्रकार के कष्ट का अनुभव होता हो तो डॉक्टर को दिखाना चाहिए।

प्रश्न 5.
प्रसूता के द्वारा किए जाने वाले व्यायाम का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तरः
प्रसूता के लिए व्यायाम की विधियाँ –
शिशु के जन्म के पश्चात् प्रसूता का शरीर कुछ ढीला-ढाला या बेडौल-सा हो जाता है; अत: उसे सामान्य स्थिति में लाने के लिए, प्रसूता को प्रसव-निवृत्ति के प्रथम दिन से ही व्यायाम का अभ्यास करना चाहिए ताकि उसका शरीर स्वस्थ, लचीला और सुडौल बना रहे। प्रसूता को शिशु के जन्म के पश्चात् प्रतिदिन इस प्रकार से व्यायाम करना उचित रहता है –

  • पहला दिन – प्रसूता को सबसे पहले दिन आराम की अवस्था में कम-से-कम आठ बार गहरी साँस लेनी चाहिए।
  • दूसरा दिन – दूसरे दिन लेटने की अवस्था में घुटनों को मोड़ना और फैलाना चाहिए। यह विधि कई बार, विश्राम करने के बाद करनी चाहिए।
  • तीसरा दिन – गर्भाशय को ठीक अवस्था में लाने के लिए प्रसूता को लेटे-लेटे ही नितम्ब की मांसपेशियों को शौच जाने की भाँति सिकोड़ना और फैलाना चाहिए।
  • चौथा दिन – प्रसूता को बैठकर 4 या 5 बार अपनी बाँहों को मोड़ना तथा फैलाना चाहिए।
  • पाँचवाँ दिन – पाँचवें दिन चित्त लेटकर घुटने व पेट को सिकोड़कर पीठ ऊपर उठानी चाहिए।
  • छठा दिन – चित्त लेटकर घुटनों को एक-साथ मिलाकर उन पर दबाव डालते हुए पेट के भाग को ऊपर उठाना चाहिए। यह क्रिया 4-5 बार करनी चाहिए।
  • सातवाँ दिन – बैठकर, कूल्हों पर हाथ रखकर, ऊपर के धड़ को बारी-बारी से मोड़ना चाहिए।
  • आठवाँ दिन – सिर सीधा रखकर, प्रसूता को बैठकर कूल्हों पर हाथ रखकर, धड़ को गोल चक्कर से घुमाना चाहिए।
  • नवाँ दिन – लेटी हुई अवस्था में पैरों को भीतर की तरफ मोड़कर फैलाना तथा बिस्तर पर ले जाना चाहिए।
  • दसवाँ दिन – सीधे लेटकर, सिर पलंग के ऊपर उठाकर, ठोड़ी से छाती को छूने का प्रयास करना चाहिए।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 23 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
प्रसव से क्या आशय है?
उत्तरः
प्रसव वह प्राकृतिक क्रिया है, जिसके द्वारा शिशु गर्भ से बाहर आता है। शिशु का गर्भ से बाहर आना ही प्रसव कहलाता है।

प्रश्न 2.
पारम्परिक रूप से प्रसव कहाँ कराया जाता था?
उत्तरः
पारम्परिक रूप से घर पर ही प्रसव कराया जाता था।

प्रश्न 3.
वर्तमान नगरीय समाज में स्त्रियाँ कहाँ प्रसव कराना पसन्द करती हैं?
उत्तरः
वर्तमान नगरीय समाज में स्त्रियाँ अस्पताल में ही प्रसव कराना पसन्द करती हैं।

प्रश्न 4.
घर पर प्रसव कराने पर किस बात का ध्यान रखना आवश्यक है?
उत्तरः
घर पर प्रसव कराने पर सफाई एवं प्रशिक्षित दाई की व्यवस्था को ध्यान में रखना . आवश्यक है।

प्रश्न 5.
गाँव में प्रसव सम्बन्धी क्या समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं?
उत्तरः
गाँव में प्रसव के समय यदि कुशल नर्स/दाई उपस्थित न हो तो प्रसव कराना कठिन होता है। साथ ही प्रसव के लिए आवश्यक दशाएँ भी गाँवों में उपलब्ध नहीं होती हैं।

प्रश्न 6.
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र कहाँ बनाए गए हैं?
उत्तरः
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र ग्रामों में बनाए गए हैं।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 23 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –

1. अस्पताल में प्रसव कराना क्यों लाभकारी है –
(क) माँ और शिशु की उचित देखभाल के लिए
(ख) विशिष्ट चिकित्सा के लाभ के लिए
(ग) अस्पताल के कमरे स्वच्छ, हवादार तथा प्रकाशयुक्त होते हैं
(घ) इनमें से सभी। .
उत्तरः
(घ) इनमें से सभी।

2. सरकारी अस्पताल में प्रसव कराने से हानि है –
(क) कोई डॉक्टरी सहायता उपलब्ध नहीं होती
(ख) स्थान की कमी के कारण अनेक असुविधाएँ होती हैं
(ग) अपमान सहना पड़ता है
(घ) कोई हानि नहीं होती।
उत्तरः
(ख) स्थान की कमी के कारण अनेक असुविधाएँ होती हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Home Science

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 5 भोजन के पोषक तत्त्व

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 5 भोजन के पोषक तत्त्व (Nutritive Elements of Food)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 5 भोजन के पोषक तत्त्व

UP Board Class 11 Home Science Chapter 5 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भोजन या आहार के पोषक तत्त्वों से क्या आशय है? पोषक तत्त्वों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
भोजन में उपस्थित तत्त्व शरीर को पोषण प्रदान करने का कार्य करते हैं, जिन्हें हम भोजन के पोषक तत्त्व कहते हैं। हम भोजन में दूध, दही, मक्खन, पनीर, घी, अण्डा, मांस, मछली, विभिन्न प्रकार के अनाज, शाक-सब्जी, कन्द मूल फल आदि का प्रयोग करते हैं। यदि इनका नियमित और समुचित रूप से प्रयोग न किया जाए तो शारीरिक एवं मानसिक विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार भोजन केवल हमारी भूख को ही शान्त नहीं करता वरन् हमारे शरीर का पोषण भी करता है। ‘आहार एवं पोषण विज्ञान’ के अनुसार शरीर के लिए छह पोषक तत्त्व आवश्यक हैं। आहार के इन पोषक तत्त्वों को क्रमश: प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, खनिज लवण तथा जल कहा गया है।

पोषक तत्त्वों का वर्गीकरण:
भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स, वसा, प्रोटीन, खनिज लवण, विटामिन्स, जल आदि प्रमुख पोषक तत्त्व हैं, जो शरीर के लिए ऊर्जा उत्पादन, शरीर निर्माण एवं मरम्मत तथा रोगों के प्रति प्रतिरोध पैदा करते हैं। पोषक तत्त्वों को कार्यों के आधार पर निम्नलिखित वर्गों में बाँटते हैं-

  • ऊर्जा प्रदान करने वाले तत्त्व (Energy Producing Elements): प्रमुखत: कार्बोहाइड्रेट्स तथा वसा।
  • निर्माणकारी तत्त्व (Synthetic Elements): कोशिकाओं की टूट-फूट की मरम्मत तथा जीवद्रव्य निर्माण करने वाले तत्त्व। इनमें प्रोटीन्स, खनिज तथा जल आदि प्रमुख तत्त्व हैं।
  • प्रतिरक्षा प्रदान करने वाले तत्त्व (Immunity Providing Elements): रोगों के प्रति प्रतिरोधक शक्ति विकसित करने वाले तत्त्व, विभिन्न जैविक क्रियाओं के भली-भाँति संचालन में भी सहायता करते हैं; जैसे विटामिन्स, खनिज लवण आदि।

तालिका-भोजन (खाद्य पदार्थों) के प्रमुख घटक:
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 33

प्रश्न 2.
आहार के एक पोषक तत्त्व के रूप में कार्बोहाइड्रेट का सामान्य परिचय दीजिए। आहार में कार्बोहाइड्रेट के महत्त्व को भी स्पष्ट कीजिए।
अथवा आहार में कार्बोहाइड्रेट का क्या महत्त्व है? आहार में इसकी कमी तथा अधिकता के परिणामस्वरूप होने वाली हानियों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेट्स (carbohydrates) हमारे भोजन के आवश्यक अवयव हैं। ये मुख्यतया पौधों द्वारा उत्पन्न किए जाते हैं तथा प्राकृतिक कार्बनिक यौगिकों का वृहत समूह बनाते हैं। इनके कुछ सामान्य उदाहरण इक्षु-शर्करा, ग्लूकोस तथा स्टार्च (मण्ड) आदि हैं। इनमें से अधिकांश के सूत्र C(H20)y हैं; अत: पहले इन्हें कार्बन के हाइड्रेट माना जाता था।

रासायनिक रूप से, “कार्बोहाइड्रेट को ध्रुवण घूर्णक (optically active) पॉलिहाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड अथवा कीटोन अथवा उन यौगिकों की भाँति परिभाषित किया जा सकता है जो जलअपघटन के उपरान्त इस प्रकार की इकाइयाँ देते हैं।” खाद्यान्न एवं कन्दमूल स्टार्च के प्रमुख स्रोत हैं। इनसे हमें तुरन्त ऊर्जा प्राप्त होती है। कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण हरे पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में किया जाता है। पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा ग्लूकोस का निर्माण करते हैं। ग्लूकोस से स्टार्च, सेलुलोस का निर्माण होता है। पका हुआ स्टार्च सरलता से पच जाता है तथा पूर्णरूप से ग्लूकोस में बदल जाता है। कोशिकाओं में ग्लूकोस के ऑक्सीकरण से ऊर्जा मुक्त होती है। 1 ग्राम ग्लूकोस के पूर्ण ऑक्सीकरण से 4.2 कि० कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। भारत में कार्बोहाइड्रेट के प्रमुख स्रोत गेहूँ, चावल, मक्का, बाजरा, आलू, शकरकन्द, केला आदि हैं।

कार्बोहाइड्रेट्स दो प्रकार के होते हैं-

(क) घुलनशील कार्बोहाइड्रेट्स: इन्हें सामान्य भाषा में शर्करा कहते हैं; जैसे ग्लूकोस, फ्रक्टोस आदि। गन्ना, चुकन्दर, मीठे फल आदि शर्करा के स्रोत हैं।
(ख) अघुलनशील कार्बोहाइड्रेट्स: इन्हें सामान्य भाषा में मण्ड कहते हैं। यह जल में अघुलनशील होते हैं। चावल, गेहूँ, आलू, मक्का, जौ आदि मण्ड के स्रोत हैं। ग्लाइकोजन (जन्तु स्टार्च), सेलुलोस, काइटिन आदि अघुलनशील कार्बोहाइड्रेट्स के अन्य उदाहरण हैं।

कार्बोहाइड्रेट्स का महत्त्व:

  • कार्बोहाइड्रेट्स युक्त भोज्य पदार्थ पेट भरने अर्थात् भूख को शान्त करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। ये भोज्य पदार्थ सरलता से सर्वत्र उपलब्ध हो जाते हैं।
  • शरीर के विभिन्न कार्यों के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान करना, ग्लूकोस ऊर्जा उत्पादन के लिए कोशिकीय ईंधन का काम करती है।
  • यकृत तथा रेखित (कंकाल) पेशियों में संचित ग्लाइकोजन नामक जन्तु स्टार्च ईंधन का काम करते हैं।
  • कार्बोहाइड्रेट वसा ऊतकों में बदलकर संचित भोजन का काम करती है।
  • राइबोस तथा डीऑक्सीराइबोस शर्करा क्रमश: RNA तथा DNA के घटक होते हैं।
  • विभिन्न पॉलीसैकेराइड्स संयोजी ऊतक (connective tissue) निर्माण में भाग लेते हैं।
  • अनेक जन्तुओं में बाह्य कंकाल (exoskeleton) का निर्माण काइटिन से होता है।
  • लेक्टोस शर्करा शरीर में कैल्सियम शोषण में सहायक होती है।
  • कार्बोहाइड्रेट्स शरीर ताप नियमन में सहायक होते हैं।

चूँकि कार्बोहाइड्रेट्स प्रमुख ऊर्जा स्रोत होते हैं, इसीलिए हमारे भोजन में शर्कराओं और अन्य कार्बोहाइड्रेट्स की मात्रा सर्वाधिक होती है। मधुमेह (diabetes) के रोगी की शरीर कोशिकाएँ रक्त से ग्लूकोस का अवशोषण नहीं कर पातीं। मधुमेह रोगी मिठास के लिए कृत्रिम रसायन सैकेरीन (saccharin) का उपयोग करते हैं। इसमें ऊर्जा (कैलोरी) नहीं होती।

कार्बोहाइड्रेट्स की कमी से हानि:

  • शरीर की जैविक क्रियाओं के लिए पर्याप्त मात्रा में ऊर्जा उपलब्ध नहीं होती।
  • शरीर की ऊर्जा सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वसा तथा प्रोटीन्स से ग्लूकोस का संश्लेषण होता है। इससे शरीर की मांसपेशियाँ शिथिल एवं कमजोर होने लगती हैं। आहार में कार्बोहाइड्रेट्स की निरन्तर कमी से व्यक्ति की त्वचा में झर्रियाँ पड़ने लगती हैं।
  • ऊर्जा के अभाव में शीत ऋतु में ठण्ड लगने का भय रहता है।

कार्बोहाइड्रेट्स की अधिकता से हानि:

  • आवश्यकता से अधिक कार्बोहाइड्रेट्स का उपयोग करने से कार्बोहाइड्रेट्स वसा ऊतक (adipose tissue) के रूप में संचित होने लगती है इस कारण मोटापा (obesity) होता है। मोटापा बढ़ने से हृदय रोग, मधुमेह, जोड़ों में दर्द, रक्त चाप आदि की आशंका बढ़ जाती है।
  • मधुमेह रोग में ग्लूकोस मूत्र के साथ उत्सर्जित होने लगता है। शरीर की कोशिकाएँ इसका उपयोग नहीं कर पातीं।
  • भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स की अधिकता व्यक्ति को आलसी बनाती है।

प्रश्न 3.
आहार के एक पोषक तत्त्व के रूप में वसा का सामान्य परिचय दीजिए। आहार में वसा के कार्यों को भी स्पष्ट कीजिए। अथवा आहार में वसा का क्या महत्त्व है? आहार में इसकी कमी तथा अधिकता से होने वाली हानियों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वसा (Fats) आहार का एक अनिवार्य तथा महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। वसा के अणु ग्लिसरॉल तथा वसीय अम्ल के संयोग से बनते हैं। वसा का निर्माण कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन से होता है। वसा में जल की मात्रा कम होने से ये कम स्थान घेरती है। वसा को उनके स्रोत के आधार पर दो वर्गों में बाँटा जा सकता है-
(क) जन्तु वसा तथा
(ख) वनस्पति वसा।

दूध, पनीर, मक्खन, घी, अण्डा, मांस तथा मछली का तेल आदि जन्तु वसा के उदाहरण हैं। वनस्पति वसा मुख्य रूप से तेलों के रूप में उपलब्ध होती है। अखरोट, बादाम, मूंगफली, नारियल, सरसों, तिल, सूरजमुखी आदि से प्राप्त तेल वनस्पति वसा के उदाहरण हैं।

वसा सामान्यतया 20°C ताप पर ठोस या अर्द्धठोस अवस्था में होती है। परन्तु यदि वे इस ताप पर तरल अवस्था में रहें तो इन्हें ‘तेल’ (oil) कहते हैं। वसा अम्ल दो प्रकार के होते हैं
(क) संतृप्त (Saturated) तथा
(ख) असंतृप्त (Unsaturated)।
असंतृप्त वसा अम्ल मछली का तेल एवं वनस्पति तेल होते हैं। नारियल व ताड़ का तेल (Coconut and Palm oil) संतृप्त तेल के उदाहरण हैं। अधिकतर जन्तु वसा संतृप्त होती हैं। सामान्य ताप (20°C) पर ये ठोस होती हैं; जैसे घी, मक्खन आदि।

एक ग्राम वसा के पूर्ण ऑक्सीकरण से 9.3 कि० कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। यह ग्लूकोस की तुलना में 2- 25 गुना अधिक होती है। आहार में संतृप्त वसा (घी, मक्खन) की मात्रा सन्तुलित होनी चाहिए। संतृप्त वसा से कोलेस्टेरॉल बनता है। यह धमनियों में एकत्र होकर रक्त परिसंचरण को बाधित करता है। धमनी की भित्ति मोटी एवं कठोर हो जाती है। इससे हृदय रोग, उच्च रक्त चाप आदि रोग हो जाते हैं। प्रतिदिन हम जितनी वसा ग्रहण करते हैं उसमें 50% जन्तु वसा तथा 50% वनस्पति वसा होनी चाहिए।

वसा के कार्य:

  • सरल वसा ऊर्जा उत्पादन के लिए ईंधन के रूप में प्रयुक्त होती है।
  • वसा का महत्त्व ‘संचित भोजन’ के रूप में अधिक है। यह वसा ऊतक के रूप में संचित रहती है।
  • वसा ऊतक शरीर की सुरक्षा तथा ताप नियन्त्रण एवं नियमन में सहायक होता है।
  • वसा ऊतक शरीर को निश्चित आकार प्रदान करने में सहायक होता है। यह शरीर को सुन्दर और सुडौल बनाता है।
  • वसा ऊतक पेशियों के रूप में कंकाल की सुरक्षा करता है।
  • कार्बोहाइड्रेट्स (ग्लूकोस) के अभाव में वसा ऊर्जा उत्पादन का कार्य करती है।
  • वसा कोशिका कला तथा कोशिकांगों का आवरण बनाती है।

वसा की कमी से हानि:

  • वसा की कमी के कारण शरीर कमजोर और दुबला-पतला, अस्थियों का ढाँचा मात्र दिखाई देता है।
  • वसा की कमी के कारण शीत ऋतु में शरीर ताप नियमन में असुविधा होती है।
  • अस्थि संधियों के मध्य का वसीय तरल सूखने से जोड़ों में दर्द रहता है।
  • वसा की कमी से त्वचा खुरदरी तथा खुश्क हो जाती है। शरीर के बाल झड़ने लगते हैं।
  • वसा चूँकि एक संगृहीत ऊर्जा स्रोत के रूप में कार्य करती है; अतः इसके अभाव में यह कार्य प्रोटीन को करना पड़ता है जिसका शारीरिक वृद्धि पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

वसा की अधिकता से हानि:

  • अत्यधिक वसा संचित होने से मोटापा (obesity) हो जाता है। त्वचा तथा आहार नाल के ऊपर वसीय ऊतक के संचित होने से पेट निकल जाता है। शरीर का वजन बढ़ने लगता है। .
  • रक्त वाहिनियों में वसा (कोलेस्टेरॉल) के संचित हो जाने से रक्त वाहिनियाँ संकुचित हो जाती हैं। उच्च रक्त चाप रोग हो जाता है। हृदय रोग की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं।
  • वृक्कों को अतिरिक्त कार्य करना पड़ता है, इससे वृक्क बेकार होकर अपना कार्य करना बन्द कर देते हैं।
  • आहार में वसा की अधिकता का पाचन-क्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा पाचन-क्रिया बिगड़ जाती है।

प्रश्न 4.
आहार के एक पोषक तत्त्व के रूप में प्रोटीन्स का सामान्य परिचय दीजिए। प्रोटीन के मुख्य कार्यों को भी स्पष्ट कीजिए।
अथवा शरीर एवं स्वास्थ्य के लिए प्रोटीन्स का क्या महत्त्व है? आहार में प्रोटीन्स की कमी तथा अधिकता से होने वाली हानियों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
आहार का एक अति महत्त्वपूर्ण तथा अनिवार्य पोषक तत्त्व प्रोटीन्स (Proteins) है। प्रोटीन्स; कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन से मिलकर बना एक यौगिक होता है। इसके अतिरिक्त प्रोटीन्स में सल्फर, फॉस्फोरस, आयोडीन, लोहा आदि भी पाए जा सकते हैं। प्रोटीन्स सजीव शरीर का लगभग 14% और शरीर के शुष्क भार का लगभग 50 से 75% भाग बनाता है। प्रोटीन शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग बर्जीलियस तथा मुल्डर ने किया था। प्रोटीन्स का निर्माण अमीनो अम्लों से होता है। प्रोटीन की संरचना अत्यधिक जटिल होती है। जैसे-हीमोग्लोबिन (C3032 H4816 O572 N780 S8 Fe4)। इनका अणुभार भी बहुत अधिक होता है। प्रोटीन्स का निर्माण करने वाले 20 प्रकार के अमीनो अम्लों का ज्ञान हो चुका है। इनमें से 10 अमीनो अम्ल हमें भोजन द्वारा प्राप्त होते हैं। शेष 10 अमीनो अम्लों का निर्माण शरीर में ही हो जाता है। जिस भोजन से सभी 10 प्रकार के आवश्यक अमीनो अम्ल उपलब्ध होते हैं, उसे पूर्ण आहार (complete food) कहते हैं।

शारीरिक वृद्धि एवं जैव क्रियाओं के लिए प्रोटीन्स अति आवश्यक होते हैं। इनकी कमी के कारण शारीरिक वृद्धि रुक जाती है।

प्रोटीन्स के स्त्रोत: प्रकृति में प्रोटीन्स के दो प्रकार के स्रोत पाए जाते हैं-
(क)जन्तु प्रोटीन्स: ये जन्तुओं से प्राप्त होती हैं। ये पादप प्रोटीन्स की तुलना में उत्तम होती हैं। दूध, अण्डा, पनीर, मांस, मछली आदि उत्तम प्रोटीन्स प्राप्ति के मुख्य स्रोत हैं। जन्तुओं के मांस में मायोसीन, अण्डे में ऐल्बूमिन, दूध में केसीन प्रोटीन्स न्यूक्लियोप्रोटीन्स आदि के निर्माण में सहायक होती हैं।
(ख) वनस्पति प्रोटीन्स: ये पौधों से प्राप्त भोज्य पदार्थों में पायी जाती हैं। दाल, सोयाबीन, मटर, चना, सेम, बादाम, मूंगफली, पिस्ता, काजू, गेहूँ आदि वनस्पति प्रोटीन्स के प्रमुख स्रोत हैं। गेहूँ के आटे में ग्लूटिनिन, मटर में लेग्यूमिन, दालों में प्रोलैमिन्स आदि प्रोटीन्स होती हैं। वनस्पति प्रोटीन्स जन्तु प्रोटीन्स की अपेक्षा देर से पचती हैं। वनस्पति प्रोटीन्स ‘B’ वर्ग की प्रोटीन्स कहलाती हैं। सोयाबीन में लगभग 34% और मूंगफली में लगभग 26% प्रोटीन पायी जाती है।

प्रोटीन्स के कार्य:

  • प्रोटीन्स ‘एन्जाइम’ बनाती हैं। एन्जाइम जैव उत्प्रेरक का कार्य करते हैं। शरीर में होने वाली समस्त क्रियाएँ एन्जाइम्स द्वारा नियन्त्रित होती हैं।
  • प्रोटीन्स जीवद्रव्य को आवश्यकतानुसार सॉल या जेल (sol or gel) की स्थिति में बनाए रखती हैं।
  • प्रोटीन्स शरीर के विभिन्न अंगकों तथा संयोजी ऊतकों की संरचना में प्रमुख रूप से भाग लेती हैं। संयोजी ऊतक, पेशियाँ, अस्थियाँ, उपास्थियाँ, दाँत आदि के निर्माण में प्रोटीन्स सहायक होती हैं।
  • प्रोटीन्स शारीरिक टूट-फूट की मरम्मत और वृद्धि के लिए आवश्यक होती हैं।
  • कुछ प्रोटीन्स हॉर्मोन्स के रूप में कोशिका की क्रियाओं का नियमन करती हैं।
  • आवश्यकता से अधिक प्रोटीन्स (अमीनो अम्ल) ऊर्जा उत्पादन में भाग लेती हैं।
  • प्रोटीन्स से आवश्यकतानुसार वसा का संश्लेषण भी होता है।
  • प्रोटीन्स परिवहन में सहायक होती हैं और रक्त की हीमोग्लोबिन O, के संवहन का कार्य करती है। लाइपोप्रोटीन्स वसाओं का संवहन करती हैं। कुछ प्रोटीन्स विभिन्न अणुओं को कोशिका कला से आर-पार लाने-ले जाने का कार्य करती हैं।
  • न्यूक्लियोप्रोटीन्स गुणसूत्रों का निर्माण करती हैं। गुणसूत्र आनुवंशिक लक्षणों की वंशागति का कार्य करते हैं।
  • ऐक्टिन तथा मायोसीन (actin & myosin) प्रोटीन्स के कारण पेशियों में संकुचन एवं शिथिलन होता है। पेशियाँ शरीर को गति प्रदान करती हैं।
  • कुछ प्रोटीन्स प्रतिरक्षी (antibodies) प्रोटीन्स हैं। ये शरीर की रोगाणुओं तथा हानिकारक पदार्थों से सुरक्षा करती हैं।
  • रक्त की फाइब्रिनोजन (fibrinogen) तथा शॉम्बिन (thrombin) प्रोटीन्स रक्त का थक्का बनाकर रक्त के बहने को रोकती हैं।

प्रोटीन्स की कमी से हानि:

  • भोजन में पोषक तत्त्वों की कमी कुपोषण कहलाता है। प्रोटीन्स की कमी से शरीर की वृद्धि और विकास रुक जाता है। बच्चों में प्रोटीन की कमी के कारण क्वाशिओरकॉर (Kwashiorkor) तथा मैरेस्मस (Marasmus) रोग हो जाता है।
  • प्रोटीन्स की कमी के कारण बाल रूखे, दो मुँह के, चमकरहित हो जाते हैं। इसके साथ-साथ बाल झड़ने भी लगते हैं।
  • त्वचा शुष्क, रूखी, खुरदरी, निस्तेज हो जाती है। त्वचा पर चकत्ते से पड़ने लगते हैं।
  • प्रोटीन्स की कमी के कारण दन्त क्षय प्रारम्भ हो जाता है।
  • प्रोटीन्स की कमी से अस्थियाँ, मांसपेशियाँ कमजोर होने लगती हैं। इसके फलस्वरूप अस्थि भंग (fracture) तथा पेशियों के टूटने के कारण शरीर के अंग सामान्य कार्य नहीं करते। मांसपेशियाँ अक्सर थकावट की स्थिति में रहती हैं।
  • प्रोटीन्स की कमी के कारण शरीर की रोग निरोधक क्षमता प्रभावित होती है।
  • बच्चों में प्रोटीन्स की कमी के कारण अतिसार, रक्तहीनता ( एनीमिया), आँखों के नीचे धब्बे आदि हो जाते हैं।
  • स्तनपान कराने वाली महिलाओं के आहार में प्रोटीन की कमी होने पर शिशु कुपोषण के कारण भूखा और कमजोर रहता है। गर्भवती महिलाएँ प्रोटीन की कमी से रक्तहीनता (एनीमिया) की शिकार हो जाती हैं और अविकसित शिशुओं को जन्म देती हैं।
  • मांसपेशियाँ शिथिल एवं त्वचा झुर्सदार हो जाने के कारण व्यक्ति समय से पूर्व प्रौढ़ लगने लगता है।
  • प्रोटीन्स की कमी के कारण शरीर के भार में कमी आने लगती है।

प्रोटीन्स की अधिकता से हानि:

  • प्रोटीन्स की अधिकता के कारण अप्रयुक्त प्रोटीन्स (अमीनो अम्लों) को शरीर से बाहर निकालने के लिए यकृत तथा वृक्क को अत्यधिक कार्य करना पड़ता है।
  • प्रोटीन्स गरिष्ठ होती है तथा कठिनता से पचती है; अत: पाचन तन्त्र को अधिक कार्य करना पड़ता है। प्रोटीन्स की अधिकता के कारण कब्ज की शिकायत होने लगती है। पाचक अंग अधिक कार्य करने के कारण जल्दी शिथिल हो जाते हैं।
  • प्रोटीन्स का अधिकता (मांस, अण्डा आदि) में प्रयोग करने से अधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है जो तामसिक प्रवृत्ति उत्पन्न करती है।
  • प्रोटीन्स की अधिकता विशेषकर ग्रीष्म ऋतु में अधिक हानिकारक होती है। अधिक ऊर्जा और ऊष्मा के कारण फोड़े-फुन्सियाँ निकलती हैं।

प्रश्न 5.
‘खनिज लवण’ का सामान्य परिचय दीजिए। मुख्य खनिज लवणों के रूप में कैल्सियम तथा फॉस्फोरस का विवरण दीजिए।
उत्तर:
आहार के अनिवार्य पोषक तत्त्वों में खनिज लवणों (Minarl Salts) का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। हमारे शरीर में अल्प मात्रा में अनेक प्रकार के खनिज लवण पाए जाते हैं। हमारे शरीर में लगभग 4-5% अंश इन्हीं खनिज लवणों का होता है। खनिज लवण हमें भोजन के माध्यम से प्राप्त होते हैं। खनिज लवण शरीर की क्रियाशीलता को बनाए रखने के लिए आवश्यक होते हैं।

इनके अभाव में शरीर स्वस्थ तथा सुचारु रूप से कार्य नहीं कर पाता। इन्हें लघु तत्त्व (minor elements) भी कहते हैं। शरीर क्रियाओं से सम्बन्धित खनिज लवणों में से 10 खनिज लवण शरीर के लिए अति आवश्यक होते हैं। इनके अभाव में शरीर की सामान्य प्रक्रियाओं का संचालन एवं स्वस्थ रहना असम्भव है। खनिज लवणों को रक्षात्मक भोज्य पदार्थ माना जाता है। अन्य पोषक तत्त्वों की तुलना में खनिज लवणों की न्यून मात्रा ही आवश्यक होती है।

1. कैल्सियम (Calcium): शरीर में कुल खनिजों की जितनी मात्रा होती है उसका लगभग 50% कैल्सियम का होता है। 70 किग्रा भार वाले व्यक्ति के शरीर में लगभग 1300 ग्राम कैल्सियम पाया जाता है। इसका लगभग 18% अस्थियों और दाँतों में पाया जाता है, शेष मात्रा मांसपेशियों और रक्त में पायी जाती है। शरीर को प्रतिदिन लगभग 900 मिग्रा से 1.2 ग्राम कैल्सियम की आवश्यकता होती है।

स्रोत: दूध, पनीर, अण्डे, मांस, मछली, हरी सब्जियाँ, फलियाँ, अनाज, बादाम, सोयाबीन, शलजम, शकरकन्द, गाजर, सूखे मेवे आदि। आजकल बाजार में कैल्सियम की गोलियाँ विभिन्न नामों से मिलती हैं। आवश्यकता होने पर चिकित्सक की सलाह से ही इन गोलियों का सेवन करना चाहिए।

कार्य: (1) दाँतों और अस्थियों के विकास एवं वृद्धि के लिए अति आवश्यक है।
(2) क्षतिग्रस्त, अस्थियों तथा मांसपेशियों की मरम्मत एवं उनके रख-रखाव में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(3) रक्त स्कन्दन (थक्का बनने) में सहायता प्रदान करता है।
(4) यह घावों को जल्दी भरने में सहायक होता है।
(5) तन्त्रिकाओं एवं पेशियों की क्रियाशीलता को बनाए रखता है।
(6) शरीर के अम्ल-क्षार सन्तुलन को बनाए रखता है।

कमी से हानि: (1) बच्चों की अस्थियाँ तथा दाँत कमजोर होते हैं। अस्थियाँ भंगुर हो जाती हैं। लचीली होने के कारण अस्थि विकृत हो जाती हैं। इसे रिकेट्स (Rickets) रोग कहते हैं।
(2) बच्चों का शारीरिक विकास कुण्ठित हो जाता है। शरीर दुर्बल रहता है।
(3) कैल्सियम की कमी से अस्थि सन्धियों में दर्द होने लगता है। अस्थियाँ कमजोर हो जाती हैं।
(4) कैल्सियम की कमी के कारण टिटैनी (tetany) नामक रोग हो जाता है। पेशियाँ लम्बे समय तक संकुचित रहती हैं। उपयुक्त उपचार के अभाव में मृत्यु भी हो जाती है।
(5) कैल्सियम की कमी से ओस्टियोपोरोसिस (osteoporosis) नामक रोग हो जाता है।

2. फॉस्फोरस (Phosphorus): कैल्सियम के पश्चात् फॉस्फोरस महत्त्वपूर्ण खनिज है। एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में 400-700 ग्राम फॉस्फोरस पाया जाता है। यह मुख्य रूप से अस्थियों तथा दाँतों में पाया जाता है। 80% फॉस्फोरस अस्थियों और दाँतों में पाया जाता है। स्वस्थ व्यक्ति को प्रतिदिन लगभग 900 मिग्रा से 1.2 ग्राम फॉस्फोरस की आवश्यकता होती है।

स्रोत: दूध, मक्खन, पनीर, मांस, मछली, अण्डा आदि पशुजन्य भोज्य पदार्थों में फॉस्फोरस प्रचर मात्रा में पाया जाता है। वनस्पतिजन्य भोज्य पदार्थों में फॉस्फोरस की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। अनाज, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, दालें, मेवे, फलियाँ आदि इसके अन्य स्रोत हैं।
कार्य: (1) यह कैल्सियम के साथ मिलकर अस्थि और दाँतों के निर्माण में भाग लेता है।
(2) यह शरीर में अम्ल-क्षार सन्तुलन बनाए रखने में सहायक होता है।
(3) यह ATP, DNA, RNA आदि की संरचना में भाग लेता है।
(4) यह मांसपेशियों की क्रियाशीलता एवं उनको स्वस्थ रखने में सहायक होता है।
(5) शरीर के विकास में सहायक होता है।

कमी से हानि: (1) दाँत और अस्थियाँ कमजोर रहती हैं। दाँतों के निकलने में परेशानी होती है।
(2) शरीर की वृद्धि कुण्ठित रहती है।
(3) शरीर की कार्यिकी प्रभावित होती है।

प्रश्न 6.
आहार के आवश्यक तत्त्व के रूप में विटामिन’ का सामान्य परिचय दीजिए। विटामिन ‘A’ का आवश्यक विवरण दीजिए। अथवा विटामिन ‘A’ के स्रोत, उपयोगिता तथा कमी से होने वाली हानियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
आहार के आवश्यक तत्त्वों में ‘विटामिन’ का भी विशेष स्थान है। विटामिन्स शरीर की उपापचय क्रियाओं के लिए अतिमहत्त्वपूर्ण होते हैं। ये ईंधन पदार्थों के संश्लेषण तथा उनके सही उपयोग का नियन्त्रण करते हैं। इनकी कमी से अभावजनित रोग (deficiency diseases) हो जाता है; अत: इन्हें वृद्धि तत्त्व (growth factors) कहते हैं। सर्वप्रथम 1881 में लूनिन (Lunin) ने विटामिनों की खोज की और बताया कि भोजन के साथ ‘अज्ञात’ पदार्थ भी आवश्यक होते हैं। इसका समर्थन 1897 में ईज्कमान (Eijkman) ने किया।

उन्होंने बताया कि पॉलिश किए गए चावल का अधिक उपयोग करने से बेरी-बेरी रोग हो जाता है। हॉप्किन्स एवं फुक ने विटामिन सिद्धान्त (Vitamin Theory) प्रस्तुत किया। इसके अनुसार प्रत्येक रोग आहार में किसी-न-किसी विशेष विटामिन की कमी से होता है। कुंक ने चावल से बेरी-बेरी रोग को रोकने वाले पदार्थ को पृथक् भी किया। इसे उन्होंने विटामिन (जीवन के लिए आवश्यक) नाम दिया। जीवन के लिए आवश्यक 20 विटामिन्स का पता लग चुका है। इन्हें दो प्रमुख समूहों में बाँट लेते हैं

(क) जल में घुलनशील विटामिन्स (Water Soluble Vitamins): जैसे विटामिन ‘B’ तथा ‘C’।
(ख) वसा में घुलनशील विटामिन्स (Fat Soluble Vitamins): जैसे विटामिन ‘A’, ‘D’, ‘E’ तथा ‘K’।

विटामिन ‘A’ या रेटिनॉल (Ratinol):
यह वसा में घुलनशील विटामिन है। हमारे शरीर के लिए प्रतिदिन इसकी 600 ug मात्रा पर्याप्त होती है।
विटामिन ‘A’ के स्रोत: विटामिन ‘A’ विभिन्न सब्जियों तथा फलों में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है; जैसे पपीता, आम, केला, गाजर, टमाटर, पालक, गोभी आदि। यह विटामिन दूध, घी, मक्खन, मांस, मछली में भी काफी मात्रा में पाया जाता है।

उपयोगिता: विटामिन ‘A’ के अनेक उपयोग हैं, इनमें से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है इसका शरीर की वृद्धि में सहायक होना तथा आँखों की दृष्टिरंगा (visual pigments) के संश्लेषण में भाग लेना आदि। यह विटामिन संक्रामक रोगों के प्रति हमारे शरीर में प्रतिरोधक शक्ति उत्पन्न करता है। विटामिन ‘A’ एक सहएन्जाइम के रूप में भी कार्य करता है। यह विटामिन कार्बोहाइड्रेट के उपापचय में सहायता प्रदान करता है।

कमी से हानियाँ: विटामिन ‘A’ की कमी से निम्नलिखित रोग हो सकते हैं-

  • विटामिन ‘A’ की कमी से रतौंधी (night-blindness) नामक रोग उत्पन्न हो जाता है जो कालान्तर में अन्धेपन में बदल सकता है।
  • इस विटामिन की कमी से व्यक्ति की वृद्धि बाधित हो जाती है तथा वजन घटने लगता है।
  • विटामिन ‘A’ की कमी से जीरोफ्थैल्मिया (xerophthalmia) नामक रोग भी हो सकता है। इस रोग में आँखों का कॉर्निया शुष्क हो जाता है।
  • इस विटामिन की कमी से डर्मेटोसिस नामक रोग हो जाता है। इस रोग में शरीर की त्वचा शुष्क, शल्कीय तथा टोड के समान हो जाती है, इसलिए इस रोग को टोड स्किन (toad skin) भी कहते हैं।
  • इस विटामिन की कमी से शरीर के श्वसन पथ, आहार नाल आदि स्थानों की उपकला का अपघटन तथा किरैटीभवन हो सकता है।
  • विटामिन ‘A’ की कमी से वृक्क में पथरी भी हो जाती है।विटामिन ‘A’ की कमी के परिणामस्वरूप होने वाले रोगों के उपचार के लिए आहार में विटामिन ‘A’ युक्त खाद्य-पदार्थों की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए  तथा चिकित्सक के परामर्शानुसार विटामिन ‘A’ की गोलियाँ नियमित रूप से लेनी चाहिए।

प्रश्न 7.
एक मुख्य विटामिन के रूप में विटामिन ‘B’ का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
व्यक्ति के शरीर एवं स्वास्थ्य के लिए एक उपयोगी तथा आवश्यक विटामिन ‘B’ है। यह विटामिनों का एक समूह है। इस समूह के अन्तर्गत 12 विटामिन आते हैं। इनमें से कुछ अति महत्त्वपूर्ण हैं; जैसे ‘B1‘B2‘, ‘B6‘ तथा ‘B12‘ इत्यादि।
विटामिन ‘बी’ के स्त्रोत: विटामिन ‘B’ समूह के अधिकतर विटामिन खमीर, यकृत, मछली, अण्डा, दूध, पनीर, हरी सब्जियों आदि में मिल जाते हैं।

उपयोगिता:

1.विटामिन B1 या थायमीन (Thiamine): इस विटामिन द्वारा शरीर का विकास होता है तथा शरीर स्वस्थ रहता है। यह कार्बोहाइड्रेट्स तथा प्रोटीन के उपापचय में भाग लेता है; इस विटामिन की कमी से भूख लगनी बन्द हो जाती है तथा खाने के प्रति रुचि कम हो जाती है। इसकी कमी से बेरी-बेरी (beri-beri) नामक रोग हो जाता है। इसके अतिरिक्त इस विटामिन की कमी से केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र का कार्य बिगड़ जाता है, जिससे लकवा (paralysis) की आशंका हो जाती है। हृदय की पेशियों का दुर्बल होना, शरीर का निर्बल व आलसी होना आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। इसकी 1-1.5 मिग्रा मात्रा आवश्यक होती है। गर्भवती महिलाओं को तथा रोगग्रस्त स्थिति में इसकी 4-5 मिग्रा मात्रा आवश्यक होती है।

2.विटामिन B2 या राइबोफ्लेविन (Riboflavin): यह विटामिन शरीर के स्वास्थ्य तथा वृद्धि के लिए आवश्यक होता है। आँखों की ज्योति को बनाए रखता है। इसकी कमी से आँखों की रोशनी कम होने लगती है। बाल झड़ने लगते हैं, मुँह के कोने फटने लगते हैं। इस रोग को कीलोसिस (cheilosis) कहते हैं। इसके अतिरिक्त आँखों में जलन, रक्तक्षीणता, कमजोर स्मृति, होठों और नासिका पर पपड़ीदार त्वचा इसकी कमी से होती है।

3.विटामिन B3 या पेन्टोथेनिक अम्ल (Pantothenic acid): यह विटामिन सभी पदार्थों के उपापचय में भाग लेने वाले एक सहएन्जाइम का घटक होता है। प्रायः इसकी कमी नहीं हो पाती। इसकी कमी होने पर चर्म रोग, बालों का सफेद होना, थकावट, मन्द बुद्धि, जनन क्षमता में कमी, वृद्धि का अवरुद्ध होना आदि लक्षण दिखाई देते हैं।

4. विटामिन B5 या निकोटिनिक अम्ल (Nicotinic acid): यह विटामिन भी उपापचय में भाग लेने वाले सहएन्जाइम का घटक है। इसकी कमी से चर्मदाह या पेलाग्रा (pellagra) रोग हो जाता है। इस रोग में त्वचा और जीभ पर दाने तथा पपड़ी पड़ जाती हैं। पाचन क्षमता क्षीण हो जाती है। अतिसार (diarrhoea) रोग हो जाता है। तन्त्रिका तन्त्र प्रभावित होता है। पागलपन भी हो सकता है।

5. विटामिन B6 या पायरीडॉक्सिन (Pyridoxine): यह प्रोटीन तथा इसके अवयवों के उपापचय में महत्त्वपूर्ण और स्नायु तथा मांसपेशियों के स्वास्थ्य के लिए अति आवश्यक विटामिन है। यह मस्तिष्क एवं त्वचा के लिए भी आवश्यक है। इस विटामिन की कमी से चर्म रोग, पेशियों में ऐंठन, लाल रुधिर कणिकाओं की कमी, जी मिचलाना, वृक्क की पथरी आदि रोग हो जाते हैं। दैनिक रूप में इसकी 1-2 मिग्रा मात्रा आवश्यक है।

6. विटामिन B12 या सायनोकोबालैमीन (Cyanocobalamine): न्यूक्लिक अम्लों (DNA, RNA) तथा लाल रुधिर कणिकाओं के निर्माण में यह विटामिन अति आवश्यक है। इसकी कमी से रक्तहीनता, मांसपेशियों में जकड़न तथा कड़ापन, कभी-कभी पक्षाघात (paralysis) तक हो जाता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 5 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
टिप्पणी लिखिए-गन्धक : एक खनिज।
उत्तर:
गन्धक (Sulphur) एक आवश्यक खनिज लवण है। यह मुख्य रूप से प्रोटीन्स में पाया जाता है। यह शरीर में बहुत कम मात्रा में पाया जाता है।

स्त्रोत: यह पशुजन्य भोज्य पदार्थों जैसे अण्डा, मांस, पनीर, मछली आदि में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है तथा वनस्पतिजन्य भोज्य पदार्थों जैसे मक्का, गेहूँ, ज्वार, अंकुरित बीजों, मूंगफली आदि में अल्प मात्रा में पाया जाता है।

कार्य: (1) यह प्रोटीन का महत्त्वपूर्ण घटक होता है। यह बाल, नाखून, त्वचा के वर्णक आदि की वृद्धि में सहायक होता है।
(2) यह मांसपेशियों के विकास में सहायक होता है।
(3) यह कुछ विटामिन्स का घटक होता है।
(4) यह इन्सुलिन हॉर्मोन तथा उपास्थि निर्माण में सहायक होता है।

कमी से हानि: (1) गन्धक की कमी के कारण प्रोटीन्स की कमी हो जाती है।
(2) प्रोटीन उपापचय में गड़बड़ियाँ होती हैं।
(3) बाल कमजोर होकर झड़ने लगते हैं।
(4) शारीरिक विकास प्रभावित होता है।

प्रश्न 2.
एक खनिज के रूप में पोटैशियम का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर: पोटैशियम (Potassium)-यह हमारे शरीर में पाए जाने वाला तीसरा महत्त्वपूर्ण खनिज तत्त्व है। स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में लगभग 210 ग्राम पोटैशियम पाया जाता है। हमें प्रतिदिन लगभग 2 ग्राम पोटैशियम की आवश्यकता होती है। इसकी सर्वाधिक मात्रा तन्त्रिका तन्तुओं में पायी जाती है।

स्रोत: यह दूध, मांस, अनाज, फल तथा सब्जियों में पाया जाता है। वनस्पतिजन्य भोज्य पदार्थ पशुजन्य भोज्य पदार्थों की तुलना में पोटैशियम के अच्छे स्रोत होते हैं। सामान्य रूप से शरीर में पोटैशियम की कमी नहीं होती।

कार्य-(1) यह शरीर में अम्ल-क्षार सन्तुलन को बनाए रखता है।
(2) यह शरीर में जल-सन्तुलन का नियमन एवं नियन्त्रण करता है।
(3) तन्त्रिकाओं की कार्यिकी को नियन्त्रित रखता है। तन्त्रिकाओं में प्रेरणा प्रसारण के लिए आवश्यक होता है।
(4) मांसपेशियों के संकुचन एवं शिथिलन में सहायता करता है।
(5) यह अनेक एन्जाइम्स की क्रियाशीलता को प्रभावित करता है।

कमी से हानि: (1) पोटैशियम की कमी के कारण मांसपेशियाँ दुर्बल हो जाती हैं। इनका कार्य अस्वाभाविक हो जाता है।
(2) अम्ल-क्षार सन्तुलन बिगड़ जाता है।
(3) तन्त्रिकाएँ अपना सामान्य कार्य नहीं करतीं। फलस्वरूप अंगघात या पक्षाघात (paralysis) की आशंका हो जाती है।
(4) जल-सन्तुलन के बिगड़ जाने से निम्न रक्त चाप (low blood pressure) की शिकायत हो जाती है।

प्रश्न 3.
टिप्पणी लिखिए-सोडियम : एक आवश्यक खनिज लवण।
उत्तर:
सोडियम (Sodium) एक महत्त्वपूर्ण खनिज तत्त्व है। यह शरीर में जल-सन्तुलन के लिए अति महत्त्वपूर्ण खनिज तत्त्व है। एक स्वस्थ व्यक्ति में लगभग 120 ग्राम सोडियम पाया जाता है। हमें प्रतिदिन लगभग 2.5-3.2 ग्राम सोडियम की आवश्यकता होती है।

स्रोत: हमारे शरीर की सोडियम आवश्यकता का लगभग 70% नमक के माध्यम से पूर्ण होता है। अनेक हरी पत्तेदार सब्जियों में अल्प मात्रा में सोडियम पाया जाता है। जल में भी सोडियम अल्प मात्रा में पाया जाता है।

कार्य: (1) यह शरीर में जल-सन्तुलन को बनाए रखने का महत्त्वपूर्ण कार्य करता है।
(2) तनिका तन्तुओं की कार्यिकी को प्रभावित करता है। तन्त्रिकाओं में प्रेरणा प्रसारण सोडियम तथा पोटैशियम आयन्स के कारण होता है।
(3) यह शरीर में अम्ल-क्षार सन्तुलन को बनाए रखता है।
(4) यह अनेक खाद्य-पदार्थों के पाचन में सहायक होता है।
(5) मांसपेशियों को क्रियाशील रखने में सहायक होता है।
(6) यह रक्त को शुद्ध करता है।

कमी से हानि: (1) मांसपेशियों में ऐंठन होती है। पेशियों में शिथिलता और थकावट होने लगती है।
(2) भूख नहीं लगती।
(3) निम्न रक्त चाप हो जाता है।
(4) तन्त्रिका तन्तु आवेगों का संवहन ठीक प्रकार से नहीं करते।
उच्च रक्त चाप में नमक (सोडियम) का प्रयोग हानिकारक होता है। अत: चिकित्सक नमक के स्थान पर पोटैशियम के लवण के प्रयोग की सलाह देते हैं। यह मेडिकल स्टोर पर विभिन्न नामों से उपलब्ध होता है।

प्रश्न 4.
लौह खनिज की प्राप्ति के स्रोत, कार्यों तथा कमी से होने वाल हानियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
लौह (Iron) एक आवश्यक खनिज तत्त्व है। यह मुख्य रूप से हीमोग्लोबिन के निर्माण में प्रयुक्त होता है। कुछ मात्रा में यह मांसपेशियों, अस्थिमज्जा, यकृत आदि में भी पाया जाता है। एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में 5-7 ग्राम लौह पाया जाता है। हमें प्रतिदिन लगभग 12 से 35 मिग्रा लौह की आवश्यकता होती है। यह मात्रा मुख्यतया लिंग-भेद से प्रभावित होती है।

स्रोत: दूध, फल (अमरूद, आम, केला, सेब, अनार, अंजीर), पालक आदि हरी सब्जियाँ, . अंकुरित दाल, अनाज, मांस, मछली, अण्डा, मछली का तेल आदि इसके प्रमुख स्रोत हैं।

कार्य: (1) यह रक्त के मुख्य अवयव हीमोग्लोबिन का निर्माण करता है। हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन संवहन का कार्य करता है।
(2) यह मांसपेशियों के निर्माण में सहायक होता है।
(3) यह श्वसन एन्जाइम साइटोक्रोम का मुख्य घटक होता है जो कोशिकाओं में भोजन के ऑक्सीकरण के लिए आवश्यक होता है।
(4) यह शारीरिक वृद्धि के लिए आवश्यक होता है।
(5) यह अनेक एन्जाइम्स को सक्रिय या क्रियाशील बनाता है। ,

कमी से हानि: (1) हीमोग्लोबिन की कमी के कारण रक्तक्षीणता या रक्ताल्पता (एनीमिया-anaemia) रोग हो जाता है। ऑक्सीजन परिवहन प्रभावित होने से शरीर को जैविक क्रियाओं के लिए उचित मात्रा में ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं होती।
(2) पाचन क्रिया प्रभावित होती है। शरीर को उचित मात्रा में पोषक तत्त्व उपलब्ध न होने के कारण कमजोरी, थकान अनुभव होने लगती है।
(3) बाल्यावस्था में लौह की कमी के कारण शारीरिक विकास प्रभावित होता है।
(4) लौह तत्त्व की आवश्यकता महिलाओं को अधिक होती है। इससे मासिक स्राव व गर्भवती होने पर शिशु का विकास प्रभावित होता है।
लौह की कमी होने पर औषधियों के माध्यम से इसे पूरा किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
टिप्पणी लिखिए-आयोडीन : एक खनिज।
उत्तर:
शरीर के लिए आवश्यक खनिज तत्त्वों में आयोडीन (Iodine) का भी विशेष महत्त्व है। मनुष्य को आयोडीन की बहुत कम मात्रा में आवश्यकता होती है। हमारे शरीर में 20-25 ग्राम आयोडीन होती है। हमें प्रतिदिन 20 μg आयोडीन की आवश्यकता होती है। आयोडीन तत्त्व के उपयोग का सम्बन्ध थायरॉइड ग्रन्थि से होता है। इस ग्रन्थि से थायरॉक्सिन हॉर्मोन स्रावित होता है। इसका मुख्य अंश आयोडीन होता है।

स्रोत: आयोडीन की पूर्ति जल तथा नमक से होती है। समुद्री जल में आयोडीन प्रचुर मात्रा में पायी जाती है। तराई क्षेत्रों के जल में आयोडीन की बहुत कमी होती है। इसकी पूर्ति के लिए आयोडीनयुक्त नमक प्रयोग करना चाहिए।

कार्य: (1) आयोडीन थायरॉक्सिन हॉर्मोन का मुख्य घटक है।
(2) थायरॉक्सिन शारीरिक व मानसिक विकास को प्रभावित करता है।
(3) थायरॉक्सिन उपापचय शरीर की गतिशीलता को बनाए रखता है।

कमी से हानि: (1) आयोडीन की कमी से घेघा (गलगण्ड-goitre) रोग हो जाता है।
(2) बचपन में आयोडीन (थायरॉक्सिन) की कमी से शरीर की वृद्धि रुक जाती है। व्यक्ति बौने रह जाते हैं। बौने प्रजनन योग्य नहीं होते।
(3) वयस्क में थायरॉक्सिन की कमी से पेशियाँ शिथिल हो जाती हैं। समय से पहले बुढ़ापा आ जाता है। प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। जनन क्षमता कम हो जाती है। इस रोग को मिक्सिडिमा (myxoedema) कहते हैं।
(4) त्वचा शुष्क, खुरदरी हो जाती है। बाल सफेद और रूखे हो जाते हैं।

प्रश्न 6.
‘जिंक’ लवण का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:
उपयोगी खनिज लवणों में जिंक (Zinc) को भी सम्मिलित किया गया है। मनुष्य को जिंक की कम मात्रा में आवश्यकता होती है। प्रतिदिन लगभग 15 मिग्रा जिंक की आवश्यकता होती है।

स्रोत: अनाज, दूध, अण्डा, मांस तथा समुद्री भोजन एवं शैवाल आदि।

कार्य:
(1) यह पाचक एन्जाइम तथा अनेक अन्य एन्जाइम का सहघटक होता है।
(2) यह रक्त निर्माण में सहायक होता है।

कमी से हानि: (1) जिंक की कमी से अरक्तता (anaemia) हो जाती है।
(2) इसकी कमी से शरीर का रोग प्रतिरोधक तन्त्र कमजोर हो जाता है।
(3) इसकी कमी से जनन क्षमता का क्षय होता है।
(4) त्वचा खुरदरी और शुष्क हो जाती है। (
5) वृद्धि रुक जाती है।

प्रश्न 7.
टिप्पणी लिखिए-मैग्नीशियम।
उत्तर:
मैग्नीशियम (Magnesium) भी एक उपयोगी खनिज है। हमारे शरीर में मैग्नीशियम की मात्रा औसतन 20-25 ग्राम तक होती है। यह मुख्य रूप से दाँतों, अस्थियों, तन्त्रिकाओं और पेशियों की क्रियाओं में सहायक होता है। हमें प्रतिदिन लगभग 3.5 मिग्रा मैग्नीशियम की आवश्यकता होती है।

स्रोत: अनाज, हरी सब्जियाँ, फल इसके मुख्य स्रोत हैं।

कार्य: (1) यह उपापचयी अभिक्रियाओं के एन्जाइम्स का सहघटक होता है।
(2) यह ATP निर्माण में सहायक होता है। .
(3) श्वसन की ग्लाइकोलाइसिस अभिक्रियाओं के एन्जाइम्स का घटक होता है।

कमी से हानि: (1) इसकी कमी से उपापचयी अभिक्रियाएँ अनियमित हो जाती हैं।
(2) यह तन्त्रिका तन्त्र की कार्यिकी को मुख्य रूप से प्रभावित करता है।
(3) यह पेशियों और अस्थियों की क्रियाशीलता को प्रभावित करता है।

प्रश्न 8.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए-फ्लुओरीन।
उत्तर:
अन्य खनिज लवणों के ही समान फ्लुओरीन (Fluorine) को भी एक आवश्यक खनिज माना गया। हमारे शरीर में फ्लुओरीन की मात्रा बहुत कम होती है। प्रतिदिन हमें 2.5 मिग्रा फ्लुओरीन की आवश्यकता होती है।

स्रोत: पेयजल, चाय, समुद्री भोजन से हमें फ्लुओरीन प्राप्त होती है। कार्य-अस्थियों और दाँतों के रख-रखाव में सहायक होती है। हानि–
(1) फ्लुओरीन की कमी से दाँत कमजोर हो जाते हैं।
(2) फ्लुओरीन की अधिकता से दाँतों में फ्लुओरोसिस (Fluorosis) रोग हो जाता है जिसमें दाँत चितकबरे हो जाते हैं।

प्रश्न 9.
टिप्पणी लिखिए-आहार का एक आवश्यक तत्त्व-जल।
उत्तर: पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवधारियों के लिए जल का महत्त्व इसी तथ्य से ज्ञात हो जाता है कि पृथ्वी का 3/4 भाग जल से ढका हुआ है। पुरातत्त्वविदों का मानना है कि जीवन की उत्पत्ति जल में हुई थी। जल एक यौगिक है जिसके घटक हैं-हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन। जल का रासायनिक सूत्र H20 है। जीवधारियों के शरीर में जल की मात्रा 45 से 90% होती है। नवजात शिशु में लगभग 75% जल होता है। वयस्क व्यक्ति के शरीर में लगभग 57% जल होता है। 70 किग्रा भार वाले व्यक्ति के शरीर में लगभग • 40 लीटर जल होता है। इसमें से लगभग 25-27 लीटर जल कोशिकाओं के जीवद्रव्य में तथा 12-14 लीटर जल रक्तप्लाज्मा, लसीका, ऊतक द्रव्य आदि के रूप में पाया जाता है। हमें प्रतिदिन लगभग 2 लीटर जल की आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति खाद्य पदार्थों से, जल पीकर तथा उपापचय क्रियाओं के फलस्वरूप मुक्त होने वाले जल से होती है। लगभग इतना ही जल हमारे शरीर से मूत्र, पसीने के रूप में बाहर निकल जाता है। कुछ उपापचय क्रियाओं में व्यय हो जाता है।

जल के कार्य: (1) जल प्रकृति का सबसे उत्तम घोलक या विलायक है।
(2) यह कोशाद्रव्य, ऊतकद्रव्य, रक्त, लसीका, मूत्र, पसीना आदि का आधारभूत तरल बनाता है।
(3) जीवधारियों के शरीर की समस्त जैविक क्रियाएँ जल की उपस्थिति में ही होती हैं।
(4) बाह्य वातावरण से पदार्थों का आदान-प्रदान तथा शरीर में विभिन्न पदार्थों का परिवहन जल के माध्यम से ही होता है।
(5) जल हमारे शरीर के ताप नियन्त्रण में सहायता करता है। यह हमारे शरीर को वातावरण के ताप में अचानक होने वाले परिवर्तनों के दुष्प्रभाव से बचाता है।
(6) जल कोशिकाद्रव्य, ऊतकद्रव्य आदि के अम्ल-क्षार सन्तुलन को बनाए रखता है।
(7) जल शरीर से उत्सर्जी पदार्थों, के निष्कासन में सहायता करता है।
(8) जल भोजन को निगलने, पचाने तथा स्वांगीकरण में सहायक होता है।
(9) जल अंगों को घर्षण के दुष्प्रभाव से बचाने में सहायता करता है।
(10) शरीर में जल की कमी होने पर रक्त गाढ़ा हो जाता है। रक्त हमारे तालु की कोशिकाओं से जल अवशोषित कर लेता है, इसके फलस्वरूप हमारा तालु सूखने लगता है और हमें प्यास का आभास होता है।
(11) शरीर में जल की आवश्यक मात्रा घट जाने को निर्जलीकरण कहते हैं। निर्जलीकरण घातक भी हो सकता है।

प्रश्न 10.
व्यक्ति के शरीर एवं स्वास्थ्य के लिए विटामिनों के महत्त्व तथा उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
विटामिन्स को आहार के सुरक्षात्मक तत्त्व माना जाता है। ये पोषक तत्त्व नहीं हैं, परन्तु व्यक्ति के स्वस्थ एवं रोग-मुक्त रहने के लिए आहार में इनका समावेश होना अति आवश्यक है। विटामिन्सं की उपयोगिता तथा महत्त्व का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित हैं
(1) विटामिन्स का मुख्य महत्त्व तथा उपयोगिता यह है कि आहार में इनका उपस्थिति से शरीर को सम्बन्धित रोगों का मुकाबला करने की शक्ति प्राप्त होती है। यह भी कहा जा सकता है कि आहार में विटामिन्स का समावेश होने की स्थिति में व्यक्ति अभावजनित रोगों का शिकार नहीं होता है। इस स्थिति में यह स्पष्ट है कि यदि आहार में विटामिन्स की कमी या अभाव हो तो व्यक्ति अभावजनित रोगों का शीघ्र ही शिकार हो सकता है।

(2) विटामिन्स का एक महत्त्व यह भी है कि इन्हें आहार के माध्यम से नियमित रूप से ग्रहण करने की स्थिति में व्यक्ति का सामान्य स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है तथा वह चुस्त एवं सक्रिय बना रहता है। यदि व्यक्ति के आहार में विभिन्न विटामिन्स की कमी या अभाव हो जाए तो व्यक्ति निश्चित रूप से सुस्त रहने लगता है तथा उसकी शारीरिक क्रियाशीलता व सामान्य स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

(3) विभिन्न अध्ययनों के आधार पर यह सिद्ध हो गया है कि आहार में विटामिन्स के समुचित मात्रा में समावेश से व्यक्ति की भूख सामान्य बनी रहती है तथा उसकी आहार के प्रति रुचि भी बनी रहती है। इसके विपरीत, यदि व्यक्ति के आहार में विभिन्न विटामिन्स की कमी हो जाए तो व्यक्ति की भूख कम हो जाती है तथा भोजन के प्रति अरुचि भी विकसित होने लगती है। ऐसी स्थिति में निश्चित रूप से सुस्त रहने लगता है तथा उसे हर समय नींद ही आती रहती है।

(4) आहार में विटामिन्स के समुचित समावेश से व्यक्ति की कार्यक्षमता सामान्य बनी रहती तथा वह शारीरिक श्रम वाले कार्य सरलता से कर सकता है। इसके विपरीत, यदि व्यक्ति के आहार में विटामिन्स की कमी होती है तो व्यक्ति कमजोर तथा क्षीण होने लगता है। उसे हर समय थकावट-सी महसूस होती रहती है।

प्रश्न 11.
टिप्पणी लिखिए-विटामिन ‘C’
उत्तर:
यह विटामिन जल में विलेय है तथा इसकी 40-60 मिग्रा मात्रा (एक सामान्य व्यक्ति के लिए) आवश्यक होती है। इसे ऐस्कॉर्बिक अम्ल भी कहा जाता है।

विटामिन ‘C’ के स्रोत: यह विटामिन खट्टे फलों में पाया जाता है; जैसे नीबू, नारंगी, सन्तरा, मुसम्बी, रसभरी, अनन्नास आदि। आँवले में विटामिन ‘C’ अत्यधिक मात्रा में मिलता है।

उपयोगिता: विटामिन ‘C’ रक्त वाहिनियों को स्वस्थ बनाए रखने में सहायक होता है। दाँतों तथा मसूढ़ों को भी इस विटामिन से दृढ़ता प्राप्त होती है। विटामिन ‘C’ विभिन्न संक्रामक रोगों जैसे जुकाम, खाँसी, निमोनिया, तपेदिक आदि से बचाव में सहायक होता है।

कमी के कारण हानियाँ: मुख्य रूप से इसके अभाव में स्कर्वी (Scurvy) रोग हो जाता है। इस रोग में घाव शीघ्र नहीं भरते। कोलैजन तन्तुओं एवं आन्तर कोशिकीय पदार्थ की कमी से घाव भरने में महीनों लग जाते हैं। दाँतों तथा अस्थियों की वृद्धि प्रभावित होती है। शरीर की प्रतिरक्षा क्षमता (immunity) तथा जनन क्षमता (fertility) कम हो जाती है। पेशियाँ फटने लगती हैं। मसूढ़ों से खून आने लगता है। दाँत गिरने लगते हैं।

प्रश्न 12.
टिप्पणी लिखिए-विटामिन ‘D’
उत्तर:
यह वसाओं में विलेय विटामिन है तथा कई विटामिनों का समूह है। इसे कैल्सिफरॉल भी कहा जाता है। इसकी एक सामान्य व्यक्ति को 200 अन्तर्राष्ट्रीय इकाई प्रतिदिन चाहिए। यह अस्थियों को मजबूत बनाए रखने के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। कैल्सियम तथा फॉस्फोरस के स्वांगीकरण के लिए यह अत्यन्त उपयोगी है; अतः गर्भवती तथा स्तनपान कराने वाली महिलाओं को इस विटामिन की सामान्य से अधिक आवश्यकता पड़ती है।

विटामिन ‘D’ के स्रोत: इस विटामिन का सूर्य की किरणों की उपस्थिति में हमारे शरीर में स्वतः ही निर्माण हो जाता है। इसके अतिरिक्त विटामिन ‘D’ मलाई, मक्खन, मछली के तेल तथा घी एवं तेलों में पाया जाता है।

उपयोगिता: इससे हड्डियाँ तथा दाँत मजबूत बनते हैं।

कमी के कारण हानियाँ: इस विटामिन की कमी से बच्चों की अस्थियाँ लचीली, कमजोर और विकृत हो जाती हैं, इसे रिकेट्स (Rickets) रोग कहते हैं। वयस्कों में विटामिन ‘D’ की कमी से अस्थियाँ भंगुर हो जाती हैं। इसे ऑस्टियोमैलेसिया कहते हैं।

प्रश्न 13.
टिप्पणी लिखिए-विटामिन ‘E’।
उत्तर:
यह वसा में विलेय विटामिन है। यह मांसपेशियों को मजबूत बनाने में सहायक है। यह जननांगों को विकसित करने तथा उन्हें कार्यशील बनाने में भी सहायक है। यह गेहूँ, अण्डा, सोयाबीन, तेल आदि में पाया जाता है। इसकी कमी से कंकाल पेशियाँ कमजोर हो जाती हैं। जनन अंग शिथिल हो जाते हैं।

प्रश्न 14.
टिप्पणी लिखिए-विटामिन ‘K’।
उत्तर:
यह विटामिन प्रोथॉम्बिन के संश्लेषण में सहायक होता है। प्रोटॉम्बिन रक्त का थक्का जमने के लिए आवश्यक होता है; अत: यह विटामिन रक्तस्राव को रोकने में सहायता करने वाला कारक है। यह हरी सब्जियों, सोयाबीन, टमाटर, अण्डा, दूध, पनीर में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 5 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आहार या भोजन क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
शरीर की वृद्धि एवं विकास के लिए, ऊर्जा प्राप्त करने के लिए, स्वस्थ रहने के लिए तथा . शरीर के रख-रखाव एवं क्षति-पूर्ति के लिए हमें आहार की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 2.
आहार के आवश्यक तत्त्व कौन-कौन से हैं? अथवा खाद्य पदार्थों में कौन-कौन से पोषक तत्त्व पाए जाते हैं?
उत्तर:
आहार के आवश्यक तत्त्व हैं-प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज लवण, विटामिन तथा जल। .

प्रश्न 3.
प्रोटीन की शरीर में क्या उपयोगिता है?
उत्तर:
शरीर के निर्माण, विकास एवं वृद्धि तथा रख-रखाव के लिए प्रोटीन मुख्य रूप से उपयोगी है।

प्रश्न 4.
कार्बोहाइड्रेट्स की मुख्य उपयोगिता क्या है?
उत्तर:
शरीर को आवश्यक ऊर्जा प्रदान करने के लिए कार्बोहाइड्रेट मुख्य रूप से उपयोगी है।

प्रश्न 5.
आवश्यकता से अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट्स ग्रहण करने से क्या हानियाँ हो सकती हैं?
उत्तर:
आवश्यकता से अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट ग्रहण करने से व्यक्ति मोटापे का शिकार हो जाता है तथा उसकी पाचन-क्रिया बिगड़ जाती है।

प्रश्न 6.
आवश्यकता से अधिक मात्रा में वसा ग्रहण करने से क्या हानियाँ हो सकती हैं?
उत्तर:
आवश्यकता से अधिक मात्रा में वसा ग्रहण करने से व्यक्ति मोटापे का शिकार हो जाता है तथा पित्ताशय की पथरी, उच्च रक्तचाप, मधुमेह व हृदयरोग की आशंका बढ़ जाती है।

प्रश्न 7.
शरीर के लिए अति आवश्यक चार खनिज लवणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शरीर के लिए अति आवश्यक चार खनिज लवण हैं-कैल्सियम, फॉस्फोरस, लौह तथा आयोडीन।

प्रश्न 8.
विटामिनों को किस श्रेणी का तत्त्व माना जाता है? उत्तर-विटामिनों को सुरक्षात्मक श्रेणी का तत्त्व माना जाता है। प्रश्न 9-रतौंधी किस विटामिन की कमी से होती है? इसका उपचार कैसे करेंगी?
उत्तर:
रतौंधी नामक रोग विटामिन ‘A’ की कमी के कारण होता है। इस रोग के उपचार के लिए व्यक्ति के आहार में विटामिन ‘A’ युक्त खाद्य-पदार्थों का अधिक समावेश होना चाहिए।

प्रश्न 10.
विटामिन ‘B’ की कमी से होने वाला मुख्य रोग कौन-सा है?
उत्तर:
विटामिन ‘B’ की कमी से होने वाला मुख्य रोग है-बेरी-बेरी।

प्रश्न 11.
ऐसे चार फलों के नाम लिखिए जिनमें विटामिन ‘C’ प्रचुर मात्रा में पाया जाता है?
उत्तर:
सन्तरा, मुसम्बी, रसभरी तथा अनन्नास। 3

प्रश्न 12.
विटामिन ‘C’ की कमी से होने वाला मुख्य रोग कौन-सा है?
उत्तर:
विटामिन ‘C’ की कमी से होने वाला मुख्य रोग है-स्कर्वी।

प्रश्न 13.
अस्थि-विकृति अथवा रिकेट्स नामक रोग किस विटामिन की कमी के कारण होता है?
उत्तर:
अस्थि-विकृति अथवा रिकेट्स नामक रोग विटामिन ‘D’ की कमी के कारण होता है।

प्रश्न 14.
लौह खनिज की कमी से किस रोग की आशंका हो जाती है?
उत्तर:
लौह खनिज की कमी से रक्ताल्पता अथवा एनीमिया नामक रोग हो जाने की आशंका होती है।

प्रश्न 15.
घेघा नामक रोग किस लवण की कमी के कारण हो जाता है?
उत्तर:
घेघा नामक रोग आयोडीन लवण की कमी के कारण होता है।

प्रश्न 16.
क्वाशिओरकॉर नामक रोग किस पोषक तत्त्व की कमी के कारण होता है?
उत्तर:
क्वाशिओरकॉर नामक रोग प्रोटीन की कमी के कारण होता है।

प्रश्न 17.
मानव शरीर के लिए जल क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
प्यास शान्त करने के लिए, रक्त को तरलता प्रदान करने के लिए, पाचन-क्रिया को सुचारु बनाने के लिए तथा व्यर्थ एवं हानिकारक तत्त्वों के शरीर से विसर्जन के लिए जल आवश्यक होता है।

प्रश्न 18.
मानव शरीर के लिए जल क्यों आवश्यक है? अथवा जल के क्या कार्य हैं?
उत्तर:
प्यास शान्त करने के लिए, रक्त को तरलता प्रदान करने के लिए, पाचन-क्रिया को सुचारु बनाए रखने के लिए तथा व्यर्थ एवं हानिकारक तत्त्वों के शरीर से विसर्जन के लिए जल आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त शरीर की सफाई का कार्य भी जल के ही द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 19.
फलों और सब्जियों की हमारे भोजन में क्या अपयोगिता है?
उत्तर:
फल एवं सब्जियाँ विभिन्न पोषक तत्त्वों के उत्तम स्रोत हैं। इनसे मुख्य रूप से विटामिन तथा खनिज प्राप्त होते हैं। फलों में पर्याप्त मात्रा में कार्बोहाइड्रेट भी होता है। शरीर एवं स्वास्थ्य के लिए फल एवं सब्जियाँ अत्यधिक उपयोगी हैं। .

प्रश्न 20.
वनस्पतिजन्य वसा के चार प्रमुख स्त्रोत बताइए।
उत्तर:
वनस्पतिजन्य वसा के प्रमुख स्रोत हैं-सरसों, नारियल, मूंगफली तथा सोयाबीन।

प्रश्न 21.
जल का रासायनिक सूत्र लिखिए।
उत्तर:
जल का रासायनिक सूत्र है-H2O.

प्रश्न 22.
रक्ताल्पता के रोगी को किस प्रकार का भोजन देना चाहिए?
उत्तर:
रक्ताल्पता के रोगी को लौह-खनिज से भरपूर सन्तुलित आहार देना चाहिए।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 5 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए

प्रश्न 1.
भोजन के क्या कार्य हैं
(क) शरीर को ऊर्जा प्रदान करना
(ख) शरीर की वृद्धि करना
(ग) रोगों से सुरक्षा करना
(घ) इनमें से सभी।
उत्तर:
(घ) इनमें से सभी।

प्रश्न 2.
भोजन में ऊर्जा का प्रमुख साधन कौन-सा होता है
(क) कार्बोहाइड्रेट
(ख) प्रोटीन
(ग) खनिज लवण
(घ) विटामिन।
उत्तर:
(क) कार्बोहाइड्रेट।

प्रश्न 3.
शरीर के निर्माण, विकास एवं वृद्धि में निम्नलिखित में से किसका मुख्य योगदान होता है.
(क) वसा का
(ख) कार्बोहाइड्रेट का
(ग) प्रोटीन का
(घ) विटामिन्स का।
उत्तर:
(ग) प्रोटीन का।

प्रश्न 4.
प्रोटीन प्राप्ति का मुख्य वनस्पतिजन्य स्त्रोत कौन-सा है
(क) सब्जियाँ
(ख) फल
(ग) सोयाबीन एवं दालें
(घ) सलाद।
उत्तर:
(ग) सोयाबीन एवं दालें।

प्रश्न 5.
विटामिन ‘C’ किसमें पाया जाता है
(क) गेहूँ में
(ख) अंकुरित अनाज में
(ग) आँवला में
(घ) केला में।
उत्तर:
(ग) आँवला में।

प्रश्न 6.
कौन-सा विटामिन जल में घुलनशील है(क) विटामिन ‘C’
(ख) विटामिन ‘D’.
(ग) विटामिन ‘A’
(घ) विटामिन ‘E’
उत्तर:
(क) विटामिन ‘C’

प्रश्न 7.
वसा में घुलनशील विटामिन कौन-सा है
(क) विटामिन ‘B’
(ख) विटामिन ‘C’
(ग) विटामिन ‘A’
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) विटामिन ‘A’

प्रश्न 8.
कौन-सा विटामिन वसा में घलनशील नहीं है(क) विटामिन ‘A’
(ख) विटामिन ‘B’
(ग) विटामिन ‘D’
(घ) विटामिन ‘K’
उत्तर.
(ख) विटामिन ‘B’ .

प्रश्न 9.
आयोडीन की कमी से कौन-सा रोग होता है
(क) टिटेनस
(ख) मलेरिया
(ग) घेघा
(घ) रेबीज।
उत्तर:
(ग) घेघा।

प्रश्न 10.
कार्बोहाइड्रेट के अधिक सेवन करने पर कौन-सा रोग हो जाता है
(क) बेरी-बेरी
(ख) मधुमेह
(ग) तपेदिक
(घ) प्लेग।
उत्तर:
(ख) मधुमेह।

प्रश्न 11.
विटामिन ‘A’ की कमी से कौन-सा रोग होता है
(क) दन्त पीड़ा
(ख) अतिसार
(ग) रतौंधी ।
(घ) दाद।
उत्तर:
(ग) रतौंधी।

प्रश्न 12.
विटामिन ‘C’ की कमी से कौन-सा रोग होता है
(क) घेघा
(ख) बेरी-बेरी
(ग) स्क र्वी
(घ) रिकेट्स।
उत्तर:
(ग) स्कीं ।

प्रश्न 13.
विटामिन ‘B’ की कमी से कौन-सा रोग होता है
(क) घेघा
(ख) बेरी-बेरी
(ग) रतौंधी
(घ) स्कीं ।
उत्तर:
(ख) बेरी-बेरी।

प्रश्न 14.
विटामिन ‘A’ किसके लिए सर्वाधिक आवश्यक है
(क) अस्थियों के लिए
(ख) आँख तथा त्वचा के लिए
(ग) मांसपेशियों के लिए
(घ) रक्त निर्माण के लिए।
उत्तर:
(ख) आँख तथा त्वचा के लिए।

प्रश्न 15.
सर्वाधिक प्रोटीन निम्नलिखित में से किसमें पाया जाता है
(क) गेहूँ
(ख) मटर
(ग) सोयाबीन
(घ) ज्वार।
उत्तर:
(ग) सोयाबीन।

प्रश्न 16.
विटामिन ‘D’ प्राप्त करने का निःशुल्क स्रोत क्या है
(क) सूर्य की किरणें
(ख) दूध
(ग) अण्डे की जर्दी
(घ) मक्खन।
उत्तर:
(क) सूर्य की किरणें।

प्रश्न 17.
अंकुरित अनाज में भोजन का कौन-सा तत्त्व पाया जाता है(क) खनिज लवण
(ख) विटामिन ‘B’
(ग) प्रोटीन
(घ) इनमें से सभी।
उत्तर:
(ख) विटामिन ‘B’I

प्रश्न 18. आँवला में कौन-सा तत्त्व अधिक मात्रा में पाया जाता है
(क) प्रोटीन
(ख) वसा
(ग) विटामिन ‘C’
(घ) पानी।
उत्तर:
(ग) विटामिन ‘C’

प्रश्न 19.
प्रौढ़ावस्था में कैल्सियम की कमी से कौन-सा अस्थि रोग हो जाता है
(क) रिकेट्स
(ख) ऑस्टियोमैलेशिया
(ग) एनीमिया
(घ) घेघा।
उत्तर:
(ख) ऑस्टियोमैलेशिया।

UP Board Solutions for Class 11 Home Science

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 17 मानवीय आवश्यकताएँ एवं भग्नाशा

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 17 मानवीय आवश्यकताएँ एवं भग्नाशा (Human Needs and Frustration)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 17 मानवीय आवश्यकताएँ एवं भग्नाशा

UP Board Class 11 Home Science Chapter 17 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
‘आवश्यकता’ से आप क्या समझती हैं? अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए।
उत्तरः
व्यक्ति एवं समाज के जीवन में इच्छाओं एवं आवश्यकताओं का विशेष महत्त्व होता है। वास्तव में इच्छाओं से प्रेरित होकर आवश्यकताओं को.अनुभव करना, आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समुचित प्रयास करना तथा आवश्यकताओं की यथार्थ में पूर्ति करना ही जीवन है। यदि व्यक्ति के जीवन में इच्छाएँ एवं आवश्यकताएँ न हों तो जीवन नीरस, उत्साहरहित तथा निरर्थक बन जाता है। आवश्यकताओं की पूर्ति से व्यक्ति को एक विशेष प्रकार के सन्तोष एवं आनन्द की अनुभूति होती है। इसके विपरीत, यदि व्यक्ति की अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाती तो व्यक्ति क्रमशः निराश, असन्तुष्ट तथा कुण्ठित हो जाता है।

वास्तव में आवश्यकताएँ अनन्त हो सकती हैं तथा समस्त आवश्यकताओं को एकाएक पूरा नहीं किया जा सकता; अत: आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उनकी प्राथमिकता के आधार पर प्रयास किए जाने चाहिए। व्यक्ति की आवश्यकताओं की अनुभूति एवं पूर्ति का मुख्य स्थल घर एवं परिवार ही है। घर एवं परिवार की व्यवस्था एवं प्रबन्ध में गृहिणी की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इस स्थिति में अनिवार्य है कि प्रत्येक गृहिणी को व्यक्तिगत एवं पारिवारिक आवश्यकताओं का सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक ज्ञान हो। यही कारण है कि गृहविज्ञान के अन्तर्गत ‘आवश्यकताओं का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है।

आवश्यकता का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Need) –
सामान्य रूप से ‘इच्छा’ तथा ‘आवश्यकता’ को समान अर्थों में प्रयोग किया जाता है, परन्तु सैद्धान्तिक रूप में इन दोनों प्रत्ययों में स्पष्ट अन्तर है। वास्तव में व्यक्ति के मन में उत्पन्न होने वाली अनन्त इच्छाओं में से कुछ इच्छाएँ ही आगे चलकर आवश्यकता का रूप ग्रहण कर लेती हैं। ‘इच्छा’ जाग्रत होना मनुष्य की एक स्वभावगत विशेषता है। व्यक्ति के मन में असंख्य इच्छाएँ मुक्त रूप से जन्म लेती रहती हैं। समस्त इच्छाएँ व्यक्ति की भावनाओं द्वारा पोषित होती हैं। जो इच्छाएँ भौतिक जगत की यथार्थताओं से समर्थन प्राप्त कर लेती हैं, उन्हें ही ‘आवश्यकता के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है। वास्तव में व्यक्ति की वह इच्छा उसकी आवश्यकता बन जाती है, जो उसके उपलब्ध भौतिक साधनों के अनुरूप होती है। जिस इच्छा की पूर्ति के लिए व्यक्ति समुचित साधन-सम्पन्न होता है, उस इच्छा को व्यक्ति की आवश्यकता मान लिया जाता है।

‘आवश्यकता’ की अवधारणा को विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने दृष्टिकोण एवं ढंग से परिभाषित करने का प्रयास किया है; यथा –

(1) प्रो० पैन्सन ने ‘आवश्यकता’ को इन शब्दों में परिभाषित किया है-“आवश्यकता व्यक्ति की उस इच्छा को कहते हैं, जिसकी पूर्ति के लिए उसके पास पर्याप्त साधन हों और वह उन साधनों को उस इच्छा की पूर्ति हेतु लगाने को तत्पर हो।” प्रस्तुत परिभाषा द्वारा स्पष्ट है कि वास्तव में वे इच्छाएँ ही ‘आवश्यकता के रूप में स्वीकृति प्राप्त करती हैं, जिनकी पूर्ति के लिए व्यक्ति साधन-सम्पन्न होता है तथा उनकी पूर्ति के लिए स्वयं तैयार भी होता है।

(2) लगभग इसी अर्थ को प्रतिपादित करते हुए स्मिथ एवं पैटर्सन ने भी आवश्यकता की परिभाषा प्रस्तुत की है। उनके शब्दों में – “आवश्यकता किसी वस्तु को प्राप्त करने की वह इच्छा है, जिसको पूरा करने के लिए मनुष्य में योग्यता हो और जो उसके लिए व्यय करने को तैयार हो।”

इन परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि उन समस्त इच्छाओं को हम व्यक्ति की आवश्यकताओं के रूप में स्वीकार कर सकते हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए व्यक्ति के पास समुचित साधन हैं तथा साथ-साथ वह व्यक्ति उस इच्छा की पूर्ति के लिए समुचित साधन को प्रयोग में लाने के लिए स्वयं तैयार भी हो। आवश्यकता के इस अर्थ को एक उदाहरण के माध्यम से भी स्पष्ट किया जा सकता है। मान लीजिए, एक व्यक्ति के मन में इच्छा जाग्रत होती है कि उसके पास एक मोटरकार हो।

अपने प्रारम्भिक रूप में यह एक इच्छा-मात्र ही होगी। यदि व्यक्ति के पास मोटरकार खरीदने तथा उसके रखरखाव के लिए पर्याप्त धन नहीं है तो उसकी इस इच्छा को केवल कोरी या कल्पनाजनित इच्छा ही माना जाएगा। उसे हम कदापि ‘आवश्यकता के रूप में स्वीकृति प्रदान नहीं कर सकते। यदि व्यक्ति के पास पर्याप्त धन है तो उसकी यह इच्छा आवश्यकता का रूप ग्रहण कर सकती है।

अब यह देखना होगा कि वह व्यक्ति मोटरकार पर इतना अधिक धन खर्च करने के लिए पूर्ण रूप से तैयार है या नहीं? यदि व्यक्ति सोचता है कि कार खरीदने एवं पेट्रोल आदि का खर्च अनावश्यक है तो उसकी कार खरीदने की इच्छा को आवश्यकता नहीं माना जाएगा। इसके विपरीत, यदि व्यक्ति पूर्णरूप से मोटरकार खरीदने के लिए तैयार हो तो उसकी इस इच्छा को उसकी आवश्यकता स्वीकार किया जा सकता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि प्रायः सभी आवश्यकताएँ सापेक्ष होती हैं; अर्थात् व्यक्ति की परिस्थितियों के साथ-साथ आवश्यकताएँ भी परिवर्तित होती रहती हैं। इसी प्रकार किसी एक व्यक्ति की आवश्यकता किसी अन्य व्यक्ति के लिए व्यर्थ अथवा कोरी काल्पनिक इच्छा ही हो सकती है।

प्रश्न 2.
मानवीय आवश्यकताओं की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा
मानवीय आवश्यकताओं की विशेषताओं का वर्णन उदाहरण सहित कीजिए।
उत्तरः
मानवीय आवश्यकताओं की विशेषताएँ (Characteristics of Human Needs) –
व्यक्ति की आवश्यकताएँ उसके व्यक्तित्व के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। मानवीय आवश्यकताओं की मुख्य विशेषताओं का सामान्य परिचय निम्नलिखित है –

1. आवश्यकताएँ असीमित होती हैं – मनुष्य की आवश्यकताएँ अनन्त तथा असीमित होती हैं, उनको वह कभी भी पूर्ण नहीं कर सकता। मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक आवश्यकताओं से घिरा रहता है। बालक जन्म लेता है तो उसी क्षण से उसको माँ के दूध व वस्त्र की आवश्यकता होती है। जैसे-जैसे बालक बढ़ता जाता है, उसकी आवश्यकताएँ भी बढ़ती जाती हैं। मनुष्य जब मृत्यु के कगार पर होता है, तब भी उसको औषधियों की आवश्यकता होती है।

2. आवश्यकताएँ बार-बार उत्पन्न होती हैं – प्रत्येक मनुष्य के जीवन में आवश्यकताएँ बार-बार उत्पन्न होती हैं; अर्थात् एक व्यक्ति किसी आवश्यकता की कुछ समय के लिए ही सन्तुष्टि कर सकता है। जैसे – मनुष्य भूख लगने पर भोजन करता है, परन्तु वह जिन्दगी भर के लिए एक साथ भोजन नहीं कर सकता। वह अपनी निश्चित समय के लिए तो भूख मिटा सकता है, परन्तु उसको कुछ घण्टों पश्चात् फिर भूख लगेगी और भूख मिटाने के लिए वह फिर भोजन करेगा। इस प्रकार आवश्यकताएँ बार-बार उत्पन्न होती हैं और मनुष्य उनको पूर्ण करने की बार-बार चेष्टा करता है।

3. आवश्यकताओं में प्रतियोगिता रहती है – सभी आवश्यकताओं की प्रकृति समान नहीं होती, उनकी तीव्रता में अन्तर रहता है। सन्तुलित भोजन की आवश्यकता सुन्दर वस्त्र से अधिक है। कार की आवश्यकता बालकों की शिक्षा की आवश्यकता से कम है। सीमित आय के कारण प्रत्येक परिवार को आवश्यकता पूर्ति हेतु प्रबल एवं अधिक अनिवार्य आवश्यकताओं का चुनाव करना होता है; अत: सदैव
अधिक महत्त्वपूर्ण आवश्यकताएँ ही चुनी जाती हैं। इस प्रकार की आवश्यकताओं को मौलिक अथवा प्राथमिक आवश्यकता कहा जाता है।

4. एक आवश्यकता में अनेक आवश्यकताएँ निहित हैं – एक आवश्यकता में अनेक आवश्यकताएँ निहित होती हैं। उदाहरणार्थ-हम एक भवन का निर्माण करते हैं तो भवन का निर्माण पूर्ण होते ही हमारे समक्ष अनेक आवश्यकताएँ आ खड़ी होती हैं। जैसे-भवन की सज्जा के लिए विभिन्न साज-सामान की आवश्यकता पड़ती है आदि।

5. आवश्यकताएँ पूरक होती हैं – आवश्यकताएँ एक-दूसरे की पूरक होती हैं। एक आवश्यकता की पूर्ति के लिए बहुधा एक या दो अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करना अनिवार्य होता है। उदाहरण के लिए कार की आवश्यकता के साथ-साथ पेट्रोल की भी आवश्यकता हुआ करती है।

6. आवश्यकताएँ आदत में परिणत हो जाती हैं – जब आवश्यकताओं को बार-बार सन्तुष्ट किया जाता है तो वे आदत में परिणत हो जाती हैं। मनुष्य उनकी पूर्ति का आदी हो जाता है। ऐसी आदतों की पूर्ति के अभाव में उसे कष्ट होता है। जैसे—प्रारम्भ में बहुत-से व्यक्ति शराब या सिगरेट शौक के लिए पीते हैं, बाद में चलकर यही शौक उनकी आदत में बदल जाता है।

7. आवश्यकताएँ ज्ञान की वृद्धि के साथ-साथ बढ़ती हैं – प्राचीनकाल में जब मनुष्य आदिम अवस्था में था तो उसकी आवश्यकताएँ बहुत सीमित थीं; किन्तु जैसे-जैसे उसके ज्ञान एवं साधनों का विकास होता गया वैसे-वैसे उसकी आवश्यकताएँ भी बढ़ती गईं। आज विज्ञान के युग में जैसे-जैसे व्यक्ति को विभिन्न साधनों एवं सेवाओं की जानकारी प्राप्त होती है, वैसे-वैसे व्यक्ति की आवश्यकताओं में भी वृद्धि होती जाती है। आजकल दूरदर्शन पर आधुनिक जीवन-शैली के विस्तृत प्रदर्शन से व्यक्ति एवं परिवार की आवश्यकताओं में निरन्तर वृद्धि हो रही है।

8. आवश्यकता तथा प्रेरक – प्राणी के विभिन्न व्यवहारों के कारणों को समझने के लिए उसकी विभिन्न आवश्यकताओं को समझना आवश्यक है; क्योंकि आवश्यकताएँ ही उसे किसी विशिष्ट दिशा में गतिशील होने के लिए प्रेरणा देती हैं। प्राणियों की आवश्यकताओं में जातीय और वैयक्तिक रुचि का भेद पाया जाता है। उदाहरणार्थ-मनुष्य जाति की आवश्यकता शेर जाति की आवश्यकता से भिन्न होगी और एक व्यक्ति की आवश्यकता दूसरे व्यक्ति की आवश्यकता से भिन्न होगी। वस्तुतः इस भिन्नता के कारण ही जगत का व्यापार इस प्रकार चल रहा है, अन्यथा उसमें या तो शैथिल्य ही आ जाता या उथल-पुथल मच जाती।

9. वर्तमान सम्बन्धी आवश्यकताएँ अधिक प्रबल होती हैं – मानवीय आवश्यकताएँ अनेक प्रकार की होती हैं। कुछ का सम्बन्ध मुख्य रूप से वर्तमान से ही होता है, जबकि कुछ आवश्यकताएँ भविष्य से सम्बन्धित होती हैं। इन दोनों प्रकार की आवश्यकताओं में से वर्तमान सम्बन्धी आवश्यकताएँ अधिक प्रबल होती हैं। अनेक व्यक्ति भविष्य सम्बन्धी आवश्यकताओं की अवहेलना कर देते हैं, भले ही वे आवश्यकताएँ अधिक महत्त्वपूर्ण ही क्यों न हों।

प्रश्न 3.
मनुष्य की आवश्यकताओं का वर्गीकरण करते हुए प्राथमिक एवं गौण आवश्यकताओं की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
अथवा
मनुष्य की आवश्यक आवश्यकताएँ कौन-कौन सी होती हैं? इनकी पूर्ति किस प्रकार की जा सकती है?
अथवा
परिवार की आवश्यकताओं को कितने वर्गों में बाँटा जा सकता है? उनके विषय में विस्तार से लिखिए।
उत्तरः
आवश्यकताओं का वर्गीकरण (Classification of Needs) –
मनुष्य की आवश्यकताएँ अन्य प्राणियों से अधिक होती हैं, क्योंकि वह सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। परन्तु कुछ आवश्यकताएँ ऐसी हैं, जो मनुष्य के अतिरिक्त अन्य सभी प्राणियों में भी समान रूप में पायी जाती हैं; जैसे-साँस लेना, पानी पीना, भोजन करना, मल-मूत्र त्याग करना तथा अपने शरीर के तापक्रम का एक स्थायित्व बनाए रखना।

इन आवश्यकताओं की पूर्ति के अभाव में प्राणी का जीना कठिन हो जाएगा। इसके अतिरिक्त, कुछ अन्य ऐसी आवश्यकताएँ होती हैं, जिनकी पूर्ति के बिना प्राणी का विकास नहीं होगा। जैसे-कुछ लोगों को दूसरों की अपेक्षा अधिक धन अथवा दूसरों से प्रेम या प्रशंसा पाने की आवश्यकता होती है। जिन आवश्यकताओं की पूर्ति के बिना प्राणी का जीना कठिन हो जाता है, उन्हें प्राथमिक अथवा जन्मजात आवश्यकता कहा जा सकता है और अन्य, गौण या अर्जित आवश्यकताएँ कही जा सकती हैं।

आवश्यकताओं के प्राथमिक तथा गौण वर्गीकरण से यह समझना भूल होगी कि प्राथमिक आवश्यकताएँ अधिक प्रबल होती हैं और गौण आवश्यकताएँ अपेक्षाकृत निर्बल हैं। उदाहरणार्थ-किसी व्यक्ति में दूसरों से प्रशंसा प्राप्त करने की इच्छा इतनी प्रबल हो सकती है कि उसकी धुन में वह अपना स्वास्थ्य खोकर मरने के सन्निकट आ सकता है। ऐसी स्थिति में गौण आवश्यकताओं का प्राधान्य हो जाता है और प्राथमिक आवश्यकताएँ अवरोधित हो जाती हैं। एक अर्थ में, गौण आवश्यकता प्राथमिक आवश्यकता से अधिक महत्त्वपूर्ण बन सकती है। उदाहरणार्थ-व्यक्ति अपनी मानहानि अथवा धन का हरण होने पर आत्महत्या करते देखे जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों को मान अथवा धन के बिना जीना व्यर्थ लगता है और वे आत्महत्या तक कर बैठते हैं।

प्राथमिक जन्मजात आवश्यकताओं में हवा, जल, भोजन तथा आत्मरक्षार्थ अन्य साधारण वस्तुओं का नाम लिया जा सकता है। आत्मरक्षा के अतिरिक्त जाति-रक्षा की भी प्राणी में प्रेरणा होती है। इसी आवश्यकता से प्रेरित होकर वह कामेच्छा की पूर्ति करता है तथा सन्तान उत्पन्न करता है। जैसाकि ऊपर स्पष्ट किया गया है; ऐसी आवश्यकताओं को प्राथमिक अथवा स्वाभाविक आवश्यकता ही कहा जाएगा। इन आवश्यकताओं के अतिरिक्त कुछ अन्य ऐसी आवश्यकताएँ होती हैं, जिन्हें व्यक्ति अपने अनुभव के अनुसार अर्जित करता है।

विभिन्न व्यक्तियों के अनुभव भिन्न-भिन्न होते हैं। अतः उनकी अर्जित आवश्यकताओं में भी बड़ा विभेद पाया जा सकता है। इन आवश्यकताओं के विकास में व्यक्ति की इच्छा और आदत का प्रमुख हाथ होता है। किसी व्यक्ति की इच्छा और आदत-पढ़ने-लिखने, दूसरे से प्रशंसा पाने, देशाटन करने अथवा मकान बनवाने की हो सकती है। तदनुसार उसे विभिन्न वस्तुओं अथवा साधनों की आवश्यकता का अनुभव हो सकता है। इस अनुभव से प्रेरित होकर वह विभिन्न प्रकार की क्रियाशीलता प्रदर्शित कर सकता है।

मनुष्य वैसे तो अपने निजी प्रयत्नों के द्वारा ही अपनी समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, किन्तु उसके इस कार्य में समाज एवं राज्य भी पर्याप्त सहायता देते हैं। दोनों संस्थाओं के द्वारा ही उसे वे महत्त्वपूर्ण साधन प्रदान किए जाते हैं, जिनके द्वारा वह अपनी विभिन्न आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करता है। उदाहरणार्थ-समाज तथा राज्य अनेक औद्योगिक एवं व्यावसायिक संस्थानों की स्थापना करते हैं, जिनमें कार्य करके व्यक्ति अपनी अनेक दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धनोपार्जन करता है।

इसी प्रकार से वह अपनी सामाजिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए पारस्परिक सम्बन्धों की स्थापना करता है और समाज के विभिन्न वर्गों की सहायता से ही उसकी शिक्षा, आवास, मनोरंजन तथा अन्य अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। इस प्रकार से हम देखते हैं कि व्यक्तिगत रूप में मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में समाज एवं राज्य पर अवलम्बित होता है।

मनुष्य के जीवन का मुख्य उद्देश्य अपनी आवश्यकताओं की समुचित पूर्ति करना होता है। यदि समुचित प्रयास करने के उपरान्त भी किसी व्यक्ति की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाती तो व्यक्ति के जीवन एवं व्यक्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस स्थिति में कभी-कभी व्यक्ति अपनी अभावग्रस्त दशा के लिए समाज को जिम्मेदार मान बैठता है। इस धारणा के प्रबल हो जाने पर कुछ व्यक्ति समाज-विरोधी बन जाते हैं। उदाहरण के लिए यदि व्यक्ति पर्याप्त परिश्रम करके भी अपना तथा अपने परिवार का पालन-पोषण नहीं कर पाता तो इस स्थिति में इस बात की सम्भावना रहती है कि वह व्यक्ति समाज-विरोधी बन जाए तथा चोरी, डकैती आदि गतिविधियों में लिप्त हो जाए।

यदि परिवार के सन्दर्भ में प्रमुख आवश्यकताओं की चर्चा की जाए तो कहा जा सकता है कि परिवार की प्रमुख आवश्यकताएँ हैं-पर्याप्त तथा सन्तुलित भोजन, समुचित वस्त्र, समुचित आवास – व्यवस्था, बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था, स्वास्थ्य-रक्षा तथा चिकित्सा सुविधा, मनोरंजन की आवश्यकता, बच्चों की देख-भाल, परिवार के सदस्यों में प्रेम, स्नेह तथा सहयोगपूर्ण सम्बन्धों की आवश्यकता तथा पारिवारिक आय एवं बचत की आवश्यकता। इन सभी आवश्यकताओं की समुचित पूर्ति के लिए व्यक्ति एवं परिवार संयुक्त रूप से प्रयास करते हैं। कुछ आवश्यकताएँ धन आदि भौतिक साधनों द्वारा पूरी होती हैं। इसके लिए व्यक्ति एवं परिवार को आर्थिक प्रयास करने पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ आवश्यकताएँ शारीरिक, मानसिक एवं भावात्मक प्रयासों द्वारा पूरी की जाती हैं। व्यक्ति की अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति का केन्द्र परिवार ही होता है।

प्रश्न 4.
व्यक्ति की आवश्यकताओं की उत्पत्ति के सामान्य नियमों का उल्लेख कीजिए। परिवार द्वारा आवश्यकताओं की पूर्ति कैसे होती है?
उत्तरः
यह एक व्यावहारिक दृष्टि से सत्यापित तथ्य है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में असंख्य आवश्यकताएँ अनुभव करता है तथा उनकी पूर्ति के लिए तरह-तरह के प्रयास भी करता है। यदि व्यक्ति की कोई आवश्यकता ही प्रबल न हो तो व्यक्ति की क्रियाशीलता भी घट जाती है। अब प्रश्न उठता है कि कोई व्यक्ति किसी आवश्यकता को क्यों और कैसे अनुभव करता है; अर्थात् आवश्यकताओं की उत्पत्ति कैसे होती है? इस विषय में विभिन्न कारणों को आवश्यकताओं की उत्पत्ति के लिए जिम्मेदार माना गया है। इन कारणों को आवश्यकताओं की उत्पत्ति के नियम भी कहा गया है।

आवश्यकताओं की उत्पत्ति के नियम (Rules of Origin of Needs) –
व्यक्ति की आवश्यकताओं के सम्बन्ध में कुछ प्रमुख नियम हैं, जिनका वर्णन निम्न प्रकार किया जा सकता है –

1. शारीरिक रचना और आवश्यकता – शारीरिक रचना के आधार पर आवश्यकताओं का अनुभव होता है। मनुष्य और जानवरों की आवश्यकताओं में अन्तर होता है। मनुष्यों में आपस में यदि शारीरिक भिन्नता है तो उनकी आवश्यकताओं में अन्तर होगा। जैसे—एक अन्धे व्यक्ति को चश्मे की आवश्यकता नहीं होती, जबकि स्वस्थ व्यक्ति को चश्मे की आवश्यकता हो सकती है। इसी प्रकार दिव्यांग (विकलांग) व्यक्ति को बैसाखियों की आवश्यकता होती है, स्वस्थ व्यक्ति को नहीं। अतः स्पष्ट है कि शारीरिक आवश्यकताओं के निर्धारण में शारीरिक रचना भी एक महत्त्वपूर्ण कारक होता है।

2. आवश्यकताएँ तथा आर्थिक स्थिति – व्यक्ति की आवश्यकताओं की उत्पत्ति के पीछे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति का भी विशेष हाथ होता है। यदि व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती तो उस दशा में व्यक्ति की आवश्यकताएँ सीमित ही रहती हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपनी मूलभूत या प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति ही कठिनता से कर पाता है। इसके विपरीत यदि व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है तथा उसके पास अतिरिक्त धन आ जाता है तो निश्चित रूप से व्यक्ति की आवश्यकताओं में वृद्धि हो जाती है; अर्थात् नित्य नई आवश्यकताएँ उत्पन्न होने लगती हैं। .

3. आवश्यकताएँ और आदत – बहुत-सी आवश्यकताएँ आदत पर निर्भर करती हैं। एक सिगरेट पीने की आदत वाले व्यक्ति को सिगरेट की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, जिस व्यक्ति को सिगरेट पीने की आदत नहीं होती, उसे सिगरेट की कोई आवश्यकता नहीं होती। आदत का आवश्यकताओं पर बहुत प्रभाव पड़ता है। आवश्यकता पड़ने पर ही व्यक्ति चोरी करता है और वह आदत में बदल जाती है। अतः आवश्यकता और आदत में गहरा सम्बन्ध है।

4. आवश्यकताएँ और संस्कृति – बहुत-सी आवश्यकताएँ संस्कृति पर निर्भर करती हैं। जिस समाज में जिस प्रकार के नियम व रीति-रिवाज होते हैं, उन्हीं के आधार पर मनुष्यों की आवश्यकताएँ निर्धारित होती हैं। खान-पान, रहन-सहन के आधार पर आवश्यकताओं का अनुभव होता है। जैसी समाज की संस्कृति होती है, उसी के अनुसार सम्बन्धित व्यक्तियों को चलना पड़ता है। यदि व्यक्ति समाज के नियमों के विपरीत चलेगा तो समाज में उसका अपमान तथा बहिष्कार भी हो सकता है। अतः . आवश्यकताएँ संस्कृति से सम्बन्धित होती हैं।

5. आवश्यकताएँ और वातावरण – वातावरण का भी व्यक्ति की आवश्यकताओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति जैसे वातावरण में रहता है, उसको वैसी ही आवश्यकता महसूस होती है। उदाहरणार्थ—एक रजाई जाड़ों के दिनों में तन ढकने के काम आती है, परन्तु वही रजाई गर्मियों में बेकार है। अत: वातावरण का भी आवश्यकताओं पर प्रभाव पड़ता है। भौतिक वातावरण के अतिरिक्त सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण भी व्यक्ति की आवश्यकताओं के निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

6. व्यक्ति का जीवन के प्रति दृष्टिकोण – व्यक्ति की आवश्यकताओं पर उसके जीवनदर्शन का भी प्रभाव पड़ता है। एक भौतिकवादी दृष्टिकोण वाले व्यक्ति की आवश्यकताएँ, अध्यात्मवादी दृष्टिकोण वाले व्यक्ति की आवश्यकताओं से पर्याप्त भिन्न होती हैं।

7. प्रचलन एवं रीति-रिवाज – सामाजिक प्रचलनों एवं रीति-रिवाजों से भी व्यक्ति की आवश्यकताओं का निर्धारण होता है। बहुत-से व्यक्ति अनेक ऐसी वस्तुएँ खरीदा करते हैं, जो केवल फैशन के लिए ही होती हैं।

8. दिखावा तथा अनुकरण – दिखावे की प्रवृत्ति मनुष्य की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है। व्यक्ति बहुत-से कार्य केवल इस प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप ही करता है। अच्छी तथा कीमती साड़ी खरीदना, दावतों का आयोजन करना आदि कार्य अनेक बार केवल दिखावे के लिए ही किए जाते हैं। इस रूप में दिखावा भी हमारी आवश्यकताओं को प्रभावित करता है।

दिखावे के अतिरिक्त अनुकरण भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है, जो हमारी आवश्यकताओं को प्रभावित करता है। ऐसा प्रायः देखा या सुना जाता है कि अमुक पड़ोसिन ने रंगीन टी०वी० ले लिया है; अतः हम भी लेंगे। अमुक परिवार के बच्चे कॉन्वेण्ट में पढ़ते हैं, इसलिए हमारे बच्चे भी कॉन्वेण्ट में ही पढ़ेंगे। इस प्रकार अनुकरण की भावना से अनेक आवश्यकताएँ निर्धारित होती हैं।

(नोट-‘परिवार द्वारा आवश्यकताओं की पूर्ति कैसे होती है?’ इस प्रश्न के उत्तर के लिए अध्याय 18 का विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 2 का उत्तर देखें।)

प्रश्न 5.
भग्नाशा का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। भग्नाशा की उत्पत्ति के कारणों एवं परिस्थितियों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
भग्नाशा से आप क्या समझती हैं? अथवा भग्नाशा के कारणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
भग्नाशा का क्या आशय है? भग्नाशा उत्पन्न होने के क्या कारण हैं?
उत्तरः
सामान्य रूप से प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में विभिन्न इच्छाओं एवं सम्बन्धित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यथाशक्ति प्रयास किया करता है। अपने प्रयासों से व्यक्ति द्वारा कुछ या अधिकांश आवश्यकताओं को पूरा कर लिया जाता है तथा कुछ आवश्यकताएँ बिना पूरी हुए ही रह जाती हैं या उन्हें प्राप्त करने का प्रयास छोड़ दिया जाता है। इन परिस्थितियों में जीवन सामान्य रूप से चलता रहता है।

इससे भिन्न कुछ व्यक्तियों के जीवन में कुछ परिस्थितियों एवं कारणों के परिणामस्वरूप उनकी अधिकांश इच्छाएँ एवं आवश्यकताएँ पूर्ण नहीं हो पातीं। ऐसे व्यक्तियों के मन में इच्छाएँ भी जाग्रत होती हैं तथा वे सम्बन्धित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यथाशक्ति प्रयास भी करते हैं, परन्तु निरन्तर प्रयास करने के उपरान्त भी उन्हें अभीष्ट सफलता नहीं प्राप्त होती। इस स्थिति में वे निराश होकर प्रयास करना भी छोड़ देते हैं। निराशा की इस स्थिति को ही भग्नाशा या कुण्ठा (frustration) कहा जाता है।

भग्नाशा का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Frustration) –
शाब्दिक रूप से कहा जा सकता है कि व्यक्ति की आशाओं के भग्न हो जाने के परिणामस्वरूप उत्पन्न मानसिक स्थिति ही भग्नाशा है। व्यक्ति के जीवन में अनेक प्रेरणाएँ निरन्तर रूप से सक्रिय रहा करती हैं। ये प्रेरणाएँ व्यक्ति को सम्बन्धित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयास करने को बाध्य करती हैं तथा व्यक्ति प्रयास करता है। कभी-कभी समस्त प्रयास करने पर भी व्यक्ति अपने उद्देश्य को प्राप्त . करने में असफल ही रहता है। इस निरन्तर असफलता के कारण व्यक्ति को निराशा का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार की निराशा व्यक्ति को तनावग्रस्त बना देती है। निरन्तर रहने वाली निराशा एवं तनाव की स्थिति व्यक्ति को पूर्ण रूप से असन्तुष्ट तथा पराजित बना देती है। यही मानसिक स्थिति भग्नाशा या कुण्ठा कहलाती है।

भग्नाशा को प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मन ने इन शब्दों में परिभाषित किया है – “भग्नाशा या कुण्ठा जीव की वह अवस्था है, जो किसी प्रेरणात्मक व्यवहार की सन्तुष्टि के कठिन अथवा असम्भव हो जाने के कारण उत्पन्न होती है।” (“Frustration is a state of organism resulting when the motivated behaviour is rendered difficult or impossible.”- N. L. Munn).

कोलमैन ने भी भग्नाशा की स्थिति का स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया है। उसके अनुसार व्यक्ति की प्रेरणाओं के निरन्तर कण्ठित होने से जो आघात की स्थिति उत्पन्न होती है. उसी के परिणामस्वरूप भग्नाशा की मानसिक स्थिति आ जाती है। इस स्थिति के लिए कोलमैन ने मुख्य रूप से दो कारणों को जिम्मेदार माना है। प्रथम कारण को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि यदि व्यक्ति द्वारा निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति के मार्ग में निरन्तर बाधाएँ आती हैं तो एक स्थिति में भग्नाशा उत्पन्न हो सकती है।

द्वितीय कारण को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि यदि व्यक्ति के सम्मुख कोई निश्चित एवं समुचित उद्देश्य ही न हो तो भी क्रमश: भग्नाशा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यह भी कहा जा सकता है कि यदि व्यक्ति के प्रेरकों की सन्तुष्टि नहीं होती तथा उनमें संघर्ष होते हैं, तो भग्नाशा या कुण्ठा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। भग्नाशा का प्रतिकूल प्रभाव व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर पड़ सकता है।

भग्नाशा के कारण एवं परिस्थितियाँ (Causes and Conditions of Frustration) –
भग्नाशा के उत्पन्न होने के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण एवं परिस्थितियाँ जिम्मेदार होती है –

1. वस्तु द्वारा उत्पन्न बाधा-अनेक बार वस्तु-विशेष के द्वारा भी भग्नाशा की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उदाहरण के लिए मान लीजिए, व्यक्ति कोई महत्त्वपूर्ण पत्र लिखना चाह रहा हो, परन्तु उस समय उसे पर्याप्त खोज करने पर भी अपना पेन या सम्बन्धित व्यक्ति के घर का पता न मिले, तो निश्चित रूप से व्यक्ति की खीज बढ़ जाती है तथा अन्तत: वह भग्नाशा का शिकार हो सकता है। यह भग्नाशा, वस्तु द्वारा उत्पन्न होने वाली भग्नाशा ही कही जाएगी।

2. व्यक्ति द्वारा उत्पन्न बाधा-यह स्थिति पहली स्थिति से अधिक भयंकर है। यदि हम किसी चुनाव में खड़े होते हैं और विजय प्राप्त करना चाहते हैं, तो बिल्कुल यही इच्छा किसी दूसरे व्यक्ति के मन में भी उत्पन्न हो सकती है और परिणामस्वरूप दो विरोधी पक्ष बन जाते हैं। दूसरे व्यक्ति के द्वारा हमारे मार्ग में उत्पन्न बाधा हमें निराश कर देती है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम स्वयं किसी इच्छा की पूर्ति किसी अन्धविश्वास अथवा किसी दूसरे के कहने के कारण नहीं कर पाते और इस प्रकार निराश होकर रह जाते हैं।

3. दो धनात्मक प्रेरकों का संघर्ष-कभी-कभी एक ही व्यक्ति में दो प्रबल भावनाएँ एक साथ कार्य .करती हैं। एक माँ का बालक उच्च शिक्षार्जन के लिए विदेश जा रहा है। एक ओर माँ की ममता उसे अपने पास रखना चाहती है, पर दूसरी ओर पुत्र के हित की भावना उससे पुत्र को विदेश भेजने का आग्रह करती है। इस स्थिति में दोनों प्रेरकों में से एक चुनना पड़ता है। जिस प्रेरक का मार्ग चुना जाता है, उससे सम्बन्धित क्रियाचक्र पूर्ण हो जाता है, परन्तु दूसरे का अधूरा रह जाता है। यह स्थिति भी भग्नाशा को जन्म दे सकती है।

4. एक धनात्मक एवं एक ऋणात्मक प्रेरक का संघर्ष-जब व्यक्ति में एक धनात्मक प्रेरक उसे आगे ले जाने वाला तथा दूसरा ऋणात्मक प्रेरक (सुस्ती, भय, दूसरों द्वारा आलोचना) परस्पर संघर्ष में आ जाए और व्यक्ति दुविधा में पड़ जाए, तो भी भग्नाशा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसे समय में व्यक्ति अपना मार्ग नहीं चुन पाता है।

5. व्यक्तिगत दोष एवं सीमाएँ-कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति के शारीरिक अथवा मानसिक दोष भी भग्नाशा उत्पन्न कर देते हैं। उदाहरण के लिए दिव्यांग (विकलांग) बालक भाग-दौड़ वाले खेलों से वंचित रह जाता है और आगे चलकर जीवन में अधिक परिश्रम न कर सकने के कारण अपनी आवश्यकता के अनुसार धनोपार्जन नहीं कर सकता। इस प्रकार से शारीरिक दोषों के कारण आवश्यकताओं की पूर्ति न हो पाने की वजह से व्यक्ति कुण्ठित हो जाता है।

6. सामर्थ्य से उच्च आकांक्षाएँ-प्रत्येक व्यक्ति की कुछ आकांक्षाएँ होती हैं। प्रत्येक आकांक्षा को पूरा करने के लिए कुछ-न-कुछ सामर्थ्य की आवश्यकता होती है। यदि व्यक्ति की आकांक्षाएँ इतनी ऊँची हों कि उन्हें पूरा करने के लिए व्यक्ति में सामर्थ्य ही न हो, तो इस स्थिति में मानसिक संघर्ष के प्रबल हो जाने पर भग्नाशा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

7. नैतिक परिस्थितियाँ-कुछ नैतिक परिस्थितियाँ एवं सम्बन्धित नैतिक मानदण्ड भी व्यक्ति के जीवन में भग्नाशा या कुण्ठा को जन्म देते हैं। उदाहरण के लिए प्रत्येक समाज में यौन सम्बन्धों के सन्दर्भ में कुछ नैतिक पूर्व-धारणाएँ प्रचलित होती हैं। इन नैतिक मान्यताओं से प्रभावित एवं बाध्य होकर अनेक बार व्यक्ति निराश एवं हताश हो जाते हैं तथा यही निराशा भग्नाशा या कुण्ठा को जन्म देती है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 17 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
व्यक्ति के जीवन में आवश्यकताओं के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
जीवन में आवश्यकताओं का महत्त्व –
व्यक्ति के जीवन में आवश्यकताओं का अत्यधिक महत्त्व होता है। वास्तव में व्यक्ति के जीवन के संचालन में उसकी आवश्यकताओं के द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती है। जीवन का सुचारु संचालन वास्तव में व्यक्ति की आवश्यकताओं के ही माध्यम से होता है। व्यक्ति अनवरत रूप से विभिन्न आवश्यकताओं को अनुभव करता है, अनुभव की गई आवश्यकताओं की प्राथमिकता को निर्धारित करता है तथा तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यथासम्भव प्रयास करता है।

समुचित प्रयासों द्वारा वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति से व्यक्ति को एक प्रकार के सुख एवं सन्तोष की प्राप्ति होती है। इसके साथ-साथ व्यक्ति कुछ अन्य इच्छाओं को आवश्यकता की श्रेणी में सम्मिलित कर लेता है तथा उनकी पूर्ति के लिए प्रयत्नशील हो जाता है। इस प्रकार व्यक्ति का जीवन अग्रसर होता रहता है। आवश्यकताओं के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि ‘आवश्यकताओं का जन्म जीवन के अस्तित्व व सुख के लिए होता है।’

प्रश्न 2.
आवश्यकताओं की पूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले अथवा बाधक कारकों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
मनुष्य की आवश्यकताएँ किन कारणों से अपूर्ण रह जाती हैं?
उत्तरः
आवश्यकताओं की पूर्ति में बाधक कारक –
मनुष्य की आवश्यकताएँ असंख्य होती हैं तथा सभी आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो पातीं। वास्तव में मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के मार्ग में अनेक बाधाएँ उत्पन्न हुआ करती हैं। यह भी कहा जा सकता है कि मानवीय आवश्यकताओं को विभिन्न कारक प्रभावित करते हैं। इस प्रकार के कुछ कारकों का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है –

1. निर्धनता अथवा आर्थिक कारक-व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति के मार्ग में प्रमुख बाधक कारक है धन की कमी या निर्धनता। धनाभाव के कारण मनुष्य अपनी अनिवार्य आवश्यकता को जब पूरा नहीं कर पाता है तो वह समाज का शत्रु बन जाता है। जब उसे भोजन नहीं मिलेगा तो वह चोरी करेगा, लड़ाई-झगड़े करेगा, दूसरे से धन छीनने का प्रयत्न करेगा। गरीब मनुष्य को रिश्तेदार भी हीनता की दृष्टि से देखते हैं। ऐसी अवस्था में व्यक्ति समाज-विरोधी भी बन सकता है।

2. समाज-मनुष्य समाज में रहकर ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। यदि समाज के विभिन्न वर्गों में परस्पर सहयोग की भावना होगी तो आवश्यकताओं की पूर्ति भी सुचारु रूप से होती रहेगी। यदि समाज के विभिन्न वर्ग एक-दूसरे के प्रति विरोधी भावना रखेंगे तो आवश्यकताओं की पूर्ति में बाधा पड़ेगी। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले कारकों में समाज का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

3. अज्ञान-विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सम्बन्धित ज्ञान की भी आवश्यकता होती है। समुचित ज्ञान के अभाव की स्थिति में आवश्यकताओं की पूर्ति प्राय: सम्भव नहीं हो पाती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि अज्ञान भी आवश्यकताओं की पूर्ति के मार्ग में एक बाधा है।

प्रश्न 3.
निरन्तर बनी रहने वाली भग्नाशा की स्थिति के परिणामों का उल्लेख कीजिए। अथवा टिप्पणी लिखिए-भग्नाशा के परिणाम।
उत्तरः
भग्नाशा के परिणाम निरन्तर बनी रहने वाली भग्नाशा का व्यक्ति के जीवन पर गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। वास्तव में यदि व्यक्ति भग्नाशा का शिकार हो तो उसके जीवन में विभिन्न प्रेरणाओं का कोई महत्त्व नहीं रह जाता; अर्थात् उस व्यक्ति के लिए प्रेरणाएँ निरर्थक हो जाती हैं। इस स्थिति में व्यक्ति किसी भी कार्य को करने के लिए प्रेरित नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपने जीवन को सुचारु रूप से नहीं चला पाता; क्योंकि वह जीवन की सामान्य गतिविधियों को पूरा नहीं कर पाता। व्यक्ति अपने जीवन में हर प्रकार से अभावग्रस्त होने लगता है। उसे सुख, सन्तोष एवं आनन्द की कदापि प्राप्ति नहीं हो पाती। वह न तो उन्नति ही कर पाता है और न ही प्रगति। भग्नाशाग्रस्त व्यक्ति प्रायः निराश, हताश एवं उदासीन बना रहता है। निरन्तर भग्नाशा की स्थिति बनी रहने पर विभिन्न मानसिक रोग हो जाने की भी आशंका रहती है। यही नहीं, प्रबल भग्नाशाग्रस्त व्यक्ति आत्महत्या तक कर सकता है।

प्रश्न 4.
भग्नाशा की स्थिति से छुटकारा पाने के लिए उपयोगी सुझाव दीजिए।
उत्तरः
भग्नाशा से छुटकारा पाने के उपयोगी सुझाव –
भग्नाशा को दूर करने के लिए इसको जन्म देने वाले शारीरिक, सामाजिक व मानसिक कारणों को दूर करना आवश्यक है। भग्नाशाग्रस्त व्यक्ति के साथ समाज का व्यवहार कोमल तथा सौहार्दपूर्ण होना चाहिए और उसकी समस्याओं पर सहानुभूति से विचार करना चाहिए। स्वयं व्यक्ति को भी अपने मन में हीनता की भावना नहीं लानी चाहिए और असन्तोष का परित्याग करते हुए जीवनयापन करना चाहिए। किसी प्रबल प्रेरक को जीवन में स्थान देकर भी भग्नाशा से बचा जा सकता है। भग्नाशा के शिकार हुए व्यक्ति के मित्रों, परिवार के सदस्यों तथा अन्य सम्बन्धित व्यक्तियों का यह कर्त्तव्य होता है कि वे उसे प्रोत्साहित करें तथा जीवन की यथार्थता के प्रति अनुकूल दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करें।

एक बार प्रबल प्रेरणा प्राप्त हो जाने पर भग्नाशा से मुक्त होना सरल हो जाता है। कुशल निर्देशन एवं परामर्श द्वारा भी भग्नाशा से मुक्त हो सकते हैं। भग्नाशा के शिकार व्यक्ति को सुझाव देना चाहिए कि उसका जीवन उसके लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है तथा उसे जीवन में अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य करने हैं। भग्नाशा के शिकार व्यक्ति के सम्मुख उन महान व्यक्तियों के उदाहरण प्रस्तुत किए जाने चाहिए, जिन्होंने अपने स्वयं के प्रयासों, परिश्रम एवं आत्म-विश्वास के बल पर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। यदि कुण्ठित व्यक्ति में एक बार आत्म-विश्वास जाग्रत हो जाए तो वह शीघ्र ही भग्नाशा से मुक्त हो सकता है।

प्रश्न 5.
वे कौन-सी विभिन्न आवश्यकताएँ हैं जिनकी बाल्यकाल में पूर्ति न होने के कारण किशोरावस्था में भग्नाशा तथा असामंजस्य उत्पन्न हो जाता है? कारण सहित समझाइए।।
अथवा
वे कौन-सी आवश्यकताएँ हैं जिनकी पूर्ति न होने पर बच्चों में भग्नाशा उत्पन्न हो जाती है?
उत्तरः
प्रत्येक बालक की अनेक ऐसी आवश्यकताएँ होती हैं जो कि उसके बाल्य जीवन में पूर्ण नहीं होती हैं; अतः किशोरावस्था एवं भावी जीवन में उसे भग्नाशा का शिकार होना पड़ता है। बालक की इस प्रकार की मुख्य आवश्यकताएँ निम्नलिखित हैं-

1. उचित पालन-पोषण की आवश्यकता – यदि किसी बालक को खाने के लिए उचित भोजन तथा पहनने के लिए उचित वस्त्र नहीं मिलेंगे तो वह चिड़चिड़े स्वभाव का बन जाता है तथा आगे चलकर जब उसकी किशोरावस्था आती है तो वह समाज के साथ प्रायः सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता। उसका व्यवहार असामान्य हो जाता है तथा वह अनेक बार प्रबल भग्नाशा का शिकार हो जाता है।

2. माता-पिता के प्यार और संरक्षण की आवश्यकता – यदि किसी बच्चे को बचपन में माता-पिता का प्यार नहीं मिलता तो वह किशोरावस्था में अपने माता-पिता के प्रति बिल्कुल भी कर्तव्यपरायण नहीं रहता है तथा उनको घृणा की दृष्टि से देखता है। इस प्रकार का अभावग्रस्त किशोर भी प्राय: असामान्य एवं कुण्ठित व्यक्तित्व वाला बन जाता है।

3. यौन-शिक्षा की आवश्यकता – प्रत्येक व्यक्ति में बचपन से ही यौनेच्छाएँ विद्यमान रहती हैं। यदि बाल्यावस्था से ही उसे उचित यौन शिक्षा नहीं दी जाती है तो वह अनावश्यक व अनैतिक प्रकार के कार्य करने लगता है तथा अपने रास्ते से हटकर, नैतिकता से पतन की दिशा में अग्रसर हो जाता है। स्पष्ट है कि समुचित यौन-शिक्षा के अभाव में व्यक्ति भग्नाशा का शिकार हो सकता है तथा उसका व्यवहार असामान्य हो सकता है।

4. जिज्ञासा और संवेगात्मक भावनाओं की पूर्ति की आवश्यकता – प्रत्येक व्यक्ति में बचपन से ही जिज्ञासा प्रबल होती है। वह यह जानने की पूर्ण कोशिश करता है कि अमुक कार्य कैसे और क्यों किया जा रहा है। अगर उसकी जिज्ञासा प्रवृत्ति प्रारम्भ से ही दबा दी जाती है तो निश्चय ही वह भग्नाशा का शिकार हो जाता है। अत: प्रत्येक बालक की जिज्ञासा तथा संवेगात्मक भावनाओं की पूर्ति का होना नितान्त आवश्यक है।

5. उचित नियन्त्रण की आवश्यकता – प्रत्येक बालक का प्रारम्भ से ही कोमल मस्तिष्क होता है। प्रत्येक बात का प्रभाव उसके मस्तिष्क पर तुरन्त पड़ता है। अगर बालक कोई गलती करता है तो उसे समझा-बुझाकर किसी कार्य को करने के लिए कहना चाहिए। अगर इस बात के स्थान पर उसे मार-पीटकर समझाने की कोशिश की जाएगी तो वह किशोरावस्था में जाकर बिगड़ जाएगा। अत: बाल्यकाल में बालक पर उचित नियन्त्रण की परम आवश्यकता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 17  अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘आवश्यकता’ की एक सरल एवं स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तरः
“आवश्यकता व्यक्ति की उस इच्छा को कहते हैं जिसकी पूर्ति के लिए उसके पास पर्याप्त साधन हों और वह उन साधनों को उस इच्छा की पूर्ति हेतु लगाने को तत्पर हो।” – (पैन्सन)

प्रश्न 2.
मुख्य मानवीय आवश्यकताएँ कौन-कौन सी हैं? अथवा मनुष्य की मूल आवश्यकताएँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तरः
मनुष्य की मुख्य (मूल) आवश्यकताएँ हैं – क्रमशः पर्याप्त तथा सन्तुलित भोजन, समुचित वस्त्र, समुचित आवास-व्यवस्था, बच्चों के लिए शिक्षा-व्यवस्था, स्वास्थ्य-रक्षा तथा चिकित्सा सुविधा, मनोरंजन के साधन तथा बच्चों की देखभाल।

प्रश्न 3.
मानवीय आवश्यकताओं की चार मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः

  1. आवश्यकताएँ असीमित होती हैं।
  2. आवश्यकताएँ बार-बार उत्पन्न होती हैं।
  3. आवश्यकताओं में प्रतियोगिता होती है।
  4. आवश्यकताएँ ज्ञान की वृद्धि के साथ-साथ बढ़ती हैं।

प्रश्न 4.
आवश्यकताओं की पूर्ति में बाधा पड़ने से मनुष्य समाज विरोधी क्यों हो जाता है? उदाहरण दीजिए।
उत्तरः
यदि अत्यधिक प्रयास करने पर भी व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाता तथा उसे विभिन्न बाधाओं का सामना करना पड़ता है तो वह इसके लिए समाज को जिम्मेदार मानने लगता है तथा उसका व्यवहार प्रायः समाज विरोधी हो जाता है। उदाहरण के लिए जीविका-उपार्जन न कर पाने वाला व्यक्ति चोरी कर सकता है।

प्रश्न 5.
भग्नाशा से क्या आशय है?
उत्तरः
व्यक्ति की आशाओं के भग्न हो जाने के परिणामस्वरूप उत्पन्न मानसिक स्थिति को भग्नाशा कहते हैं।

प्रश्न 6.
भग्नाशा के दो कारण लिखिए।
उत्तरः

  1. अधिकांश इच्छाओं एवं आवश्यकताओं का पूर्ण न होना।
  2. जीवन में प्रेरणाओं का अभाव होना।

प्रश्न 7.
निरन्तर भग्नाशा की स्थिति का व्यक्ति के व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तरः
निरन्तर भग्नाशा की स्थिति बनी रहने से व्यक्ति का व्यक्तित्व विघटित हो जाता है।

प्रश्न 8.
व्यक्तियों में भग्नाशा उत्पन्न करने वाले सामान्य प्राकृतिक कारक बताइए।
उत्तरः
व्यक्तियों में भग्नाशा उत्पन्न करने वाले सामान्य प्राकृतिक कारक हैं-भूकम्प, बाढ़ अथवा सूखा तथा महामारी आदि प्राकृतिक आपदाएँ।

प्रश्न 9.
भग्नाशा की स्थिति से मुक्त होने का सर्वोत्तम उपाय क्या है?
उत्तरः
भग्नाशा की स्थिति से मुक्त होने का सर्वोत्तम उपाय है—किसी प्रबल प्रेरणा को उत्पन्न करना।

प्रश्न 10.
बच्चों को भग्नाशा से कैसे बचाया जा सकता है?
उत्तरः
उचित परामर्श द्वारा बच्चों को भग्नाशा से बचाया जा सकता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 17 बहविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –
1. आवश्यकता व्यक्ति की वह इच्छा है, जिसकी पूर्ति के लिए उसके पास पर्याप्त होने चाहिए –
(क) धन
(ख) साधन
(ग) प्रतिष्ठा
(घ) बचत।
उत्तरः
(ख) साधना

2. परिवार की सर्वाधिक अनिवार्य आवश्यकता है –
(क) भव्य भवन
(ख) भोजन
(ग) मोटर कार
(घ) ये सभी।
उत्तरः
(ख) भोजन।

3. मनुष्य की आवश्यक आवश्यकता क्या है –
(क) टी० वी०
(ख) भोजन
(ग) पढ़ाई
(घ) मनोरंजन।
उत्तरः
(ख) भोजन।

4. मानव की मूलभूत आवश्यकताएँ कौन-कौन सी हैं –
(क) मनोरंजन
(ख) घूमना
(ग) रोटी, कपड़ा और मकान
(घ) व्यायाम।
उत्तरः
(ग) रोटी, कपड़ा और मकान।

5. व्यक्ति की गौण आवश्यकता माना जाता है –
(क) सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार
(ख) प्राकृतिक कारकों से रक्षा करने वाले वस्त्र
(ग) भव्य भवन एवं कीमती गहने
(घ) शिक्षा एवं स्वास्थ्य रक्षा।
उत्तरः
(ग) भव्य भवन एवं कीमती गहने।

6. एक से अधिक कारें, भव्य भवन तथा बहुमूल्य गहने किस वर्ग की आवश्यकताएँ हैं –
(क) प्राथमिक आवश्यकता
(ख) आरामदायक आवश्यकता
(ग) विलासात्मक आवश्यकता
(घ) अनावश्यक आवश्यकता।
उत्तरः
(ग) विलासात्मक आवश्यकता।

7. भग्नाशा को समाप्त किया जा सकता है –
(क) विवाह करके
(ख) औषधियों द्वारा
(ग) पर्याप्त धन उपलब्ध कराकर
(घ) प्रबल प्रेरणा द्वारा।
उत्तरः
(घ) प्रबल प्रेरणा द्वारा।

UP Board Solutions for Class 11 Home Science

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 24 नवजात शिशु की देखभाल तथा सामान्य व्याधियाँ (जन्म से एक वर्ष)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 24 नवजात शिशु की देखभाल तथा सामान्य व्याधियाँ (जन्म से एक वर्ष) (Care of the Newly Born Child and Common Ailments (up to one year))

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 24 नवजात शिशु की देखभाल तथा सामान्य व्याधियाँ (जन्म से एक वर्ष)

UP Board Class 11 Home Science Chapter 24 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
एक नवजात शिशु की देखभाल आप कैसे करेंगी? विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए। अथवा नवजात शिशु की परिचर्या किस प्रकार की जाती है? शिशु के उचित विकास के लिए किन-किन बातों पर ध्यान देना चाहिए? विस्तारपूर्वक लिखिए। अथवा नवजात शिशु की देखभाल के बारे में लिखिए।
उत्तरः
जन्म के समय नवजात शिशु बहुत कोमल तथा अशक्त दशा में गर्भ से बाहर आता है। ‘ प्रसूता भी बहुत कमजोर तथा निढाल अवस्था में होती है। तब शिशु का पालन-पोषण दूसरे व्यक्तियों के ऊपर निर्भर होता है। शिशु और माता की देखभाल पूरी तरह से नर्स पर ही निर्भर होती है। शिशु जन्म लेते समय निष्क्रिय अवस्था में होता है। पूर्णतया गर्भ त्यागने के पश्चात् वह कुछ क्रियाशील होता है। इस स्थिति में नवजात शिशु को तुरन्त परिचर्या की आवश्यकता होती है।

जन्म के समय शिशु की परिचर्या (Care of Newly Born Child).
1. फेफड़े का श्वसन – जन्म से पूर्व, शिशु गर्भ में एक झिल्लीनुमा थैली में होता है। शिशु के चारों ओर तरल पदार्थ भरा रहता है। शिशु जब तक गर्भ में रहता है, तब तक उसको साँस नहीं लेनी पड़ती और न ही भोजन करना पड़ता है, इसलिए उसके श्वसन अंग और पाचन संस्थान अक्रियाशील होते हैं। इनके साथ-साथ उत्सर्जन अंग भी क्रिया नहीं करते। परन्तु जैसे ही शिशु गर्भ से बाहर आता है, उसका वातावरण बदल जाता है। बाहर आकर उसे श्वसन क्रिया की आवश्यकता होती है।

शिशु गर्भ से बाहर आते ही रोना आरम्भ कर देता है, जिसके कारण उसके फेफड़े फैल जाते हैं और श्वसन क्रिया होने लगती है। यदि नवजात शिशु स्वयं नहीं रोता तो उसे रुलाना आवश्यक होता है, जिससे श्वसन क्रिया होनी आरम्भ हो जाए और बच्चे का जीवन सुरक्षित रहे। यदि किसी कारण से नवजात शिशु की प्राकृतिक श्वसन-क्रिया तुरन्त प्रारम्भ नहीं होती. तो उसका जीवन खतरे में पड़ सकता है।

2. गर्भनाल को काटना – शिशु के जन्म के समय उसकी नाभि से एक लम्बी नली जुड़ी रहती है, जिसको नाल या गर्भनाल कहते हैं। इसकी लम्बाई लगभग 45 से 60 सेमी तक होती है। शिशु गर्भावस्था में पोषक तत्त्व इसी नाल के माध्यम से माता के रक्त से प्राप्त करता है। जन्म के पश्चात् इसकी आवश्यकता नहीं होती, फिर शिशु अपना भोजन बाहर से स्वयं लेने लगता है। रक्त का संचरण स्वयं होने लगता है; अतः शिशु को माता के शरीर से अलग करना आवश्यक होता है।

इसके लिए शिशु के शरीर से लगभग 10 सेमी छोड़कर गर्भनाल को दो स्थानों पर कसकर बाँध दिया जाता है। इसके बाद इन दोनों बन्धनों के बीच में से गर्भनाल को किसी नि:संक्रमित कैंची से सावधानीपूर्वक काट दिया जाता है। इस प्रकार शिशु माता के शरीर से अलग हो जाता है। कटे स्थान पर डिटोल लगा देना चाहिए। फिर यह कुछ दिनों में सूखकर गिर जाता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि गर्भनाल को उस समय काटना चाहिए जब उसमें होने वाला स्पन्दन रुक जाए।

3. शिशु का वजन – जन्म के उपरान्त ही शिशु का वजन अवश्य लेना चाहिए। शिशु के वजन को निर्धारित चार्ट में लिख लेना चाहिए। इससे शिशु की वृद्धि का व्यवस्थित अध्ययन करने में सहायता मिलती है। सामान्य रूप से नवजात शिशु का वजन लगभग 3 किग्रा होता है।

4. स्नान-जन्म के समय शिशु के शरीर पर श्वेत रंग का मोम जैसा एक चिकना पदार्थ लगा रहता है, जो गर्भ में शिशु की रक्षा करता है।
सबसे पहले साफ रुई से शरीर पर लगे सफेद पदार्थ को छुड़ा देना चाहिए, फिर जैतून के तेल की मालिश करनी चाहिए। इसके पश्चात् अच्छे साबुन से शिशु को स्नान कराना चाहिए। स्नान कराते समय यह ध्यान रहे कि शिशु की नाभि गीली न होने पाए, क्योंकि नाल के गीला होने से संक्रमण की आशंका रहती है। स्नान कराने के पश्चात् शिशु को सूखे तौलिए से पोंछ देना चाहिए।

5. अंगों की स्वच्छता-शिशु की सामान्य स्वच्छता के साथ उसके कुछ विशेष अंगों की सफाई पर भी ध्यान देना चाहिए, जो इस प्रकार हैं –

  • कान – जन्म लेने वाले शिशु की शारीरिक सफाई के अन्तर्गत कानों की सफाई का भी विशेष महत्त्व है। नवजात शिशु के कानों में काफी मात्रा में म्यूकस जमा रहता है। इसे साफ करने के लिए किसी नर्म कपड़े की पतली-सी बत्ती बनाई जाती है तथा उसे शिशु के कान में घुमाया जाता है, इससे काफी सफाई हो जाती है।
  • आँख-शिशु की आँखों की सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इनकी थोड़ी-सी असावधानी होने पर शिशु की आँखों में एक रोग, जिसको रोएँ कहते हैं, हो जाता है। इस रोग में नेत्र सूज जाते हैं और शिशु नेत्रविहीन तक हो सकता है। नवजात शिशु की आँखों की सफाई हल्के बोरिक लोशन से करनी चाहिए। कभी-कभी नवजात शिशु की आँखों से पीले रंग का गन्दला पदार्थ निकलता है। इसे नियमित रूप से साफ करते रहना चाहिए।
  • नाक-शिशु को स्नान कराते समय ही उसकी नाक को साफ रुई से अन्दर व बाहर से साफ कर देना चाहिए। प्राय: नवजात शिशु की नाक में भी काफी मात्रा में म्यूकस जमा रहता है। इसे साफ करने के लिए नर्म कपड़े की पतली-सी बत्ती बनाकर उसे धीरे-धीरे नाक में घुमाया जाता है। इससे यदि बच्चे को छींक आ जाए तो नाक के अन्दर की अच्छी सफाई हो जाती है।
  • गला-शिशु के गले में कुछ श्लेष्म एकत्र हो जाता है; अत: उसकी सफाई के लिए उँगली पर साफ कपड़ा लपेटकर बोरिक लोशन में भिगोकर गले में चारों ओर धीरे-धीरे घुमा देना चाहिए।
  • मल-मूत्र अंग-शिशु के मल-मूत्र अंगों की सफाई भी आवश्यक है। विशेषतया कन्या शिशु के मल-मूत्र अंगों को रुई से बोरिक लोशन में भिगोकर साफ कर देना चाहिए। स्नान कराने के पश्चात् शिशु के शरीर को कपड़े से पोंछकर बेबी पाउडर लगा देना चाहिए।

6. निद्राव बिस्तर-आरम्भ में शिशु दिन में 20-22 घण्टे तक सोता रहता है। वह भूख लगने या मूत्र त्यागने के समय ही रोता है। शिशु को स्नान कराने के पश्चात् पहले से तैयार किए गए पालने में लिटाना चाहिए। पालने में नर्म गद्दी बिछा देनी चाहिए। गद्दी के ऊपर रबड़ का टुकड़ा भी बिछा देना चाहिए, जिससे मूत्र त्याग करने पर गद्दी खराब न हो। इस रबड़ की चादर पर एक सफेद चादर बिछाना भी आवश्यक है और सिर के नीचे नर्म तकिया लगा देना चाहिए। फिर शिशु को लिटाकर उसके शरीर को किसी चादर से ढक देना चाहिए तथा मुँह खुला होना आवश्यक है। इस प्रकार का बिस्तर मिलने पर बच्चा सो जाता है।

7. आहार-शिशु को आरम्भ में प्रति चार या पाँच घण्टे के पश्चात् पानी के साथ शहद या. ग्लूकोज मिलाकर चम्मच से पिलाना चाहिए। इस मिश्रण को रुई की बत्ती से भी शिशु को पिलाया जा सकता है। रुई की बत्ती का एक सिरा बच्चे के मुँह में लगा देना चाहिए, जिससे वह अपनी आवश्यकतानुसार उस मिश्रण को चूस लेगा। शिशु के जन्म के 8 या 10 घण्टे पश्चात् माता का दूध साधारणतया पिला दिया जाता है।

आरम्भ में माता के दूध के स्थान पर एक पीला व प्रोटीनयुक्त तरल पदार्थ निकलता है, जिसको कोलस्ट्रम के नाम से पुकारते हैं। इसको पीने से शिशु की पाचन-क्रिया बढ़ जाती है तथा इसे ग्रहण करने से शिशु में कुछ रोगों के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता का भी विकास होता है। शिशु को कोलस्ट्रम अवश्य देना चाहिए। यह द्रव कुछ पतला होता है, परन्तु धीरे-धीरे यह कुछ गाढ़ा होता चला जाता है। फिर यह दूध का रूप धारण कर लेता है। शिशु को स्तनपान कराने से पूर्व, स्तनों और हाथों को भली प्रकार धो लेना चाहिए। दूध पिलाते समय बच्चे की श्वसन क्रिया का भी ध्यान रखना चाहिए।

आरम्भ में बच्चे को 5 या 6 घण्टे के अन्तर से दूध पिलाना चाहिए, इसके पश्चात् फिर धीरे-धीरे समय बढ़ाकर लगभग 8 घण्टे के अन्तर से दूध पिलाने का अभ्यास डालना चाहिए।
यदि माता बच्चे को किसी कारण से दूध पिलाने में असमर्थ हो तो बोतल का दूध पिलाना चाहिए। बोतल के दूध को पिलाने से पहले दूध को पानी मिलाकर हल्का कर लेना चाहिए। लेटकर दूध कभी नहीं पिलाना चाहिए। इससे बच्चे का कान बह निकलता है।

8. अन्य देखभाल – नवजात शिशु को गोद में लेते समय सावधानी बरतनी चाहिए। शिशु को बिस्तर से गोद में उठाते समय उसके सिर और पीठ को सहारा मिलना चाहिए। इसी प्रकार बच्चे को लिटाते समय सहारा देना आवश्यक है। बच्चे को कन्धे या बाँहों के सहारे कभी नहीं उठाना चाहिए। यदि बाँहों को पकड़कर उठाया जाएगा तो उसकी हँसली की हड्डी उतरने का भय रहता है। शिशु को कन्धे से लगाते समय भी सिर और कमर पर हाथ लगाना आवश्यक है। नवजात शिशु पूर्ण विकसित होता है।

वह जन्म से थोड़े समय बाद ही रक्त-संचालन, श्वसन, पाचन, मूत्र विसर्जन आदि सभी क्रियाएँ करने लगता है। एक पूर्ण शिशु की लम्बाई 40 सेमी से 50 सेमी होती है, यह लम्बाई माता-पिता तथा जलवायु पर निर्भर होती है। उसका भार लगभग 3 से 4 किग्रा तक होता है। खोपड़ी पर बाल होते हैं, परन्तु कुछ शिशुओं की खोपड़ी पर अधिक बाल नहीं होते। शिशु के जन्म के बाद उसके हाथ-पैर चलमे चाहिए। यदि बच्चे का कोई अंग गति न करता हो तो तुरन्त डॉक्टर को दिखाना चाहिए।

प्रश्न 2.
नवजात शिशु के आहार एवं पोषण-व्यवस्था का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तरः
नवजात शिशु स्वयं अपना आहार नहीं ग्रहण कर सकता; अत: उसके पोषण के लिए आहार की व्यवस्था भी उसकी देख-रेख करने वाले व्यक्तियों द्वारा ही की जाती है। प्रकृति ने जन्म लेने वाले शिशु के पोषण की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उसके उपयुक्त आहार की भी व्यवस्था कर दी है। नवजात शिशु का यह प्रकृति-प्रदत्त आहार है-माँ का दूध। प्रसव के साथ-साथ माँ के स्तनों में दूध का उत्पादन भी प्रारम्भ हो जाता है।

सामान्य रूप से प्रसव के उपरान्त कुछ समय के लिए प्रसूता अत्यधिक दुर्बल तथा थकी हुई होती है। इस दशा में वह नवजात शिशु को दूध नहीं पिला सकती। इस स्थिति में नवजात शिशु को पोषण प्रदान करने के लिए शहद चटाया जा सकता है।

आरम्भ में माता के दूध के स्थान पर एक पीला व प्रोटीनयुक्त तरल पदार्थ निकलता है, जिसको कोलस्ट्रम के नाम से पुकारते हैं। इसको पीने से शिशु की पाचन-क्रिया बढ़ जाती है तथा इसे ग्रहण करने से शिशु कुछ रोगों से भी बच जाता है। शिशु को कोलस्ट्रम अवश्य देना चाहिए। यह द्रव कुछ पतला होता है, परन्तु धीरे-धीरे यह कुछ गाढ़ा होता चला जाता है। फिर यह दूध का रूप धारण कर लेता है। शिशु को पानी पिलाते रहना चाहिए। पानी पीने से शिशु के गुर्दे भी कार्य करने लगते हैं। शिशु को स्तनपान कराने से पूर्व, स्तनों और हाथों को भली प्रकार धो लेना चाहिए। दूध पिलाते समय बच्चे की श्वसन क्रिया का भी ध्यान रखना चाहिए।

आरम्भ में बच्चे को 5 या 6 घण्टे के अन्तर से दूध पिलाना चाहिए, इसके पश्चात् फिर धीरे-धीरे समय बढ़ाकर लगभग 8 घण्टे के अन्तर से दूध पिलाने का अभ्यास डालना चाहिए।

नवजात शिशु के लिए माँ के दूध के महत्त्व तथा सम्बन्धित तथ्यों का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है –
1. शिशु के लिए माँ के दूध का महत्त्व – माता का दूध नवजात शिशु के लिए एक सर्वोत्तम भोजन या आहार है। यह प्रकृति की एक अद्भुत देन है कि शिशु के जन्म से पहले ही माता के स्तनों में दूध आ जाता है।
माता के दूध में लगभग सभी पोषक तत्त्व; जैसे कार्बोज, प्रोटीन, वसा, जल, खनिज तथा विटामिन्स उपस्थित रहते हैं। जिस समय शिशु जन्म लेता है तो माता का दूध पतला होता है ताकि बच्चा उसे आसानी से पचा सके, क्योंकि इस समय शिशु के पाचन अंग पूर्ण रूप से विकसित नहीं होते हैं।

शिशु की आयु के बढ़ने के साथ-साथ माता का दूध भी गाढ़ा होता चला जाता है तथा उसमें पोषक तत्त्वों की मात्रा भी बढ़ जाती है। माता के दूध द्वारा शिशु के शरीर में किसी भी प्रकार के संक्रामक रोगों के जीवाणु प्रवेश नहीं कर पाते; अत: शिशु का शरीर विभिन्न संक्रामक रोगों से बचा रहता है। इस प्रकार माता का दूध, उसके स्तनों से प्राप्त करके शिशु अपनी भूख मिटाता है तथा अपनी आहार सम्बन्धी आवश्यकता को पूरा करता है। बच्चे के स्वास्थ्य के लिए स्तनपान विशेष रूप से लाभदायक होता है। प्रकृति ही माता के स्तनों में दूध का निर्माण करती है। दूध का यह निर्माण बच्चे को पिलाने के लिए ही होता है; अत: शरीर की स्वाभाविक क्रिया के रूप में माता को बच्चे को स्तनपान अवश्य ही कराना चाहिए। स्तनपान से माँ एवं बच्चे दोनों को एक विशेष प्रकार का सन्तोष एवं स्वास्थ्य-सुख प्राप्त होता है।

2. स्तनपान कराने की सही विधि – जिस समय माता का प्रथम प्रसव होता है तो उसे स्तनपान कराने का तरीका सीखना पड़ता है। शिशु को भी इस क्रिया के लिए बार-बार प्रयास एवं अभ्यास करना पड़ता है। प्रारम्भ में माता कमजोर होती है; अत: कुछ दिन लेटकर ही शिशु को दूध पिलाती है। इसके बाद धीरे-धीरे बैठकर दूध पिलाना प्रारम्भ कर देती है।

जब माता बैठने लगती है तो शिशु को जिस ओर स्तनपान कराना है उस ओर की बाँह पर शिशु का सिर रखना चाहिए तथा उसका शरीर अग्रबाहु पर रखना चाहिए। शिशु का सिर कुछ ऊँचा रखना चाहिए जिससे उसका मुख स्तन पर पहुँच जाए।

दूध पिलाने से पूर्व, हाथों को भली-भाँति धोकर, रुई के फाहे से स्तन मुख को स्वच्छ करके शिशु के मुख में देना चाहिए। स्तन मुख को हाथ से पीछे की तरफ सँभाले रखना चाहिए नहीं तो शिशु की नाक दबेगी।

3. शिशु को डकार दिलवाना-बच्चे को दूध पिलाते समय कभी-कभी वायु भी प्रवेश कर जाती है। इस वायु विकार से बचने का सर्वोत्तम उपाय है-शिशु को डकार दिलवाना।
बच्चे को दूध पिलाने के पश्चात् कन्धे से लगाकर उसकी पीठ को अत्यन्त हल्के-हल्के हाथ से थपथपा देना चाहिए या नीचे से ऊपर की ओर को उसकी पीठ को धीरे-धीरे सहलाया जाना चाहिए जब तक कि बच्चे को डकार न आ जाए। यदि बच्चा अधिक भूखा हो तो उसे स्तनपान कराते समय एक स्तन से दूध पिलाने के उपरान्त भी एक बार डकार दिलवा देनी चाहिए। डकार दिलवाने के उपरान्त ही दूसरे स्तन से दूध पिलाना चाहिए। यदि बच्चे को ठीक ढंग से डकार दिलवा दी जाए तो बच्चे द्वारा दूध निकालने या उल्टी करने की प्रायः आशंका नहीं रहती।

4.स्तनपान के लिए वर्जित परिस्थितियाँ-शिशु के लिए माँ का दूध ही सर्वोत्तम आहार होता है, परन्तु कुछ परिस्थितियों में शिशु को स्तनपान न कराना ही हितकर होता है। इस प्रकार की मुख्य परिस्थितियाँ निम्नलिखित हैं

  • जब माता लम्बी अवधि से बुखार से पीड़ित हो।
  • यदि माता सिफलिस या किसी अन्य भयंकर संक्रामक रोग से पीड़ित हो।
  • माता को रक्तस्राव होने पर।
  • अधिक चिड़चिड़े व क्रोधी स्वभाव की माता को भी बच्चे को स्तनपान नहीं कराना चाहिए।
  • यदि माता पुनः गर्भधारण कर ले तो उस दशा में पहले शिशु को स्तनपान नहीं कराना चाहिए। इस स्थिति में यदि माता स्तनपान कराती है तो गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

5. शिशु को ऊपरी दूध पिलाना – कुछ असामान्य परिस्थितियों में शिशु को माँ का दूध पिलाना या तो सम्भव नहीं होता अथवा अहितकर होता है। ऐसी परिस्थितियों में शिशु के पोषण के लिए उसे माँ के दूध के अतिरिक्त कोई अन्य दूध देने की व्यवस्था की जाती है। शिशु को गाय, भैंस तथा बकरी का दूध दिया जा सकता है। नवजात शिशु को गाय-भैंस आदि का दूध देने के लिए, उसमें कुछ मात्रा में उबला हुआ पानी मिलाकर पतला किया जाता है। पानी मिला दूध शिशु को पचाना सरल होता है। इसके अतिरिक्त शिशु को सूखा अर्थात् पाउडर दूध भी दिया जा सकता है। इस दूध को दूध का पूरा पानी सुखाकर तैयार किया जाता है। यह दूध भिन्न-भिन्न कम्पनियों द्वारा उत्पादित किया जाता है; जैसे- ग्लैक्सो, ऑस्टर मिल्क, ड्यूमैक्स, बेबी फूड, हॉर्लिक्स, नैसले, अमूल आदि। इन डिब्बों के ऊपर आयु के अनुसार दूध की मात्रा व बनाने की विधि लिखी रहती है।

पाश्चात्य देशों में आधुनिक नवीन वैज्ञानिक रीतियों से यह सूखा दूध तैयार किया जाता है। इसमें सभी पौष्टिक तत्त्व स्वास्थ्य रक्षा के दृष्टिकोण से रखे जाते हैं। डिब्बों में भरने से पूर्व इनकी जाँच कर ली जाती है। इसे गर्म पानी में घोलकर प्रयोग किया जाता है। जिन माताओं का अपना दूध पर्याप्त नहीं होता, वे बच्चों को यह दूध पिला सकती हैं; परन्तु आजकल अनेक आधुनिक महिलाएँ कुछ अन्य कारणों से भी स्तनपान कराना पसन्द नहीं करतीं, यह उचित प्रवृत्ति नहीं है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि नवजात एवं छोटे शिशुओं को केवल विशेष परिस्थितियों में ही ऊपरी दूध दिया जाना चाहिए। शिशु को ऊपरी दूध देते समय बोतल एवं निप्पल की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इस विषय में निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है –

बोतल की स्वच्छता-बच्चे के दूध पीने वाली बोतल की स्वच्छता निम्न प्रकार से की जानी आवश्यक है –

  • सर्वप्रथम बोतल को ठण्डे जल से तथा बाद में साबुन व गर्म जल से धोना चाहिए।
  • कम-से-कम एक बार बोतल को गर्म पानी में डालकर अवश्य उबालना चाहिए। इसके लिए बोतल को गरम पानी में न डालकर ठण्डे पानी में ही रखकर पानी को उबालना चाहिए।
  • बोतल में लगे दूध की सफाई के लिए ब्रुश डालकर बोतल को साफ करना चाहिए।
  • बोतल को जहाँ तक हो सके उचित स्थान पर ढककर रखना चाहिए।

निप्पल की स्वच्छता – बोतल के ऊपर लगी निप्पल की स्वच्छता निम्न प्रकार से रखनी चाहिए

  • दूध निप्पल के अन्दर न जम सके, इसके लिए उसे प्रयोग में लाने के पश्चात् धो लेना चाहिए।
  • निप्पल को उबालना नहीं चाहिए नहीं तो उसकी रबड़ खराब हो जाएगी। उसे खौलते पानी से बुश द्वारा साफ कर देना चाहिए।
  • निप्पल को जार अथवा प्लेट से ढककर रखना चाहिए।
    यदि शिशु के दूध की बोतल तथा निप्पल की स्वच्छता का समुचित ध्यान नहीं रखा जाता तो शिशु के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है तथा वह कुछ संक्रामक रोगों का शिकार हो सकता है।

प्रश्न 3.
पूरक आहार से क्या आशय है? मुख्य पूरक भोज्य पदार्थों का उल्लेख कीजिए तथा पूरक आहार देने में आवश्यक सावधानियों को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
शैशवावस्था में शिशु का मुख्य आहार दूध होता है। यह दूध यदि माँ का हो तो सर्वोत्तम है, नहीं तो गाय, भैंस या बकरी का दूध विधिवत् दिया जा सकता है, परन्तु जैसे-जैसे शिशु बढ़ता है वैसे-वैसे उसकी आहार सम्बन्धी आवश्यकताएँ भी बढ़ती जाती हैं, तब दूध अपर्याप्त होने लगता है। इसके अतिरिक्त कुछ तत्त्व जो कि दूध में कम मात्रा में पाए जाते हैं वे भी अलग से दिए जाने अनिवार्य हैं। शिशु को दूध के अतिरिक्त दिए जाने वाले भोज्य-पदार्थों को ‘पूरक भोज्य-पदार्थ’ (Supplementary food) कहा जाता है। सामान्य रूप से चार-पाँच माह के शिशु को पूरक आहार दिया जाना प्रारम्भ कर दिया जाता है।

शिशु के मुख्य पूरक-भोज्य-पदार्थ –
शिशु को दिए जाने वाले मुख्य पूरक भोज्य-पदार्थ निम्नलिखित हैं –

1. विटामिन ‘D’ युक्त भोज्य-पदार्थ – दूध में विटामिन ‘D’ की कमी होती है। अत: शिशु के पूरक आहार में ऐसे भोज्य-पदार्थ का भी न्यून मात्रा में समावेश होना चाहिए जो कि विटामिन ‘D’ से युक्त हो। इसके लिए शिशु को बहुत कम मात्रा में मछली के लिवर का तेल दिया जा सकता है।

2. फलों का रस-दूध में विटामिन ‘C’ का प्रायः अभाव ही होता है। इस कमी को पूरा करने के लिए शिशु के पूरक आहार में फलों के रस का समावेश होना चाहिए। मुख्य रूप से मुसम्बी, नारंगी तथा सन्तरे एवं टमाटर का रस शिशु को दिया जा सकता है। शिशु को फलों का रस देने से दूध में विद्यमान प्रोटीन का पाचन तथा कैल्सियम का शोषण सरलता से हो जाता है।

3. अण्डे का पीला भाग-आयरन अर्थात् लौह खनिज तथा थायमिन की आवश्यक अतिरिक्त मात्रा की पूर्ति के लिए बच्चे को अण्डे का पीला भाग भी पूरक भोज्य-पदार्थ के रूप में दिया जा सकता है। भारत में अण्डे का प्रचलन पश्चिमी देशों की तुलना में कम है।

4. कुचली एवं छनी हुई सब्जी एवं फल-जब शिशु चार-पाँच माह का हो जाए तो उसे विभिन्न सब्जियाँ उबालकर तथा कुचलकर एवं छानकर दी जा सकती हैं। इससे शिशु को लौह खनिज, विटामिन ‘C’ तथा सेलुलोस प्राप्त हो जाता है तथा सामान्य रूप से कब्ज की शिकायत भी नहीं रहती।

5. पूर्व पकाया हुआ अनाज आहार-पाँच-छह माह के शिशु को पूरक आहार के रूप में पकाया हुआ अनाज भी दिया जा सकता है। यह शारीरिक वृद्धि के लिए सहायक होता है। इसमें पका हुआ दलिया, सूजी की खीर तथा कॉर्न फ्लेक्स आदि सम्मिलित किए जा सकते हैं। अब इस वर्ग के कुछ तैयार शिशु आहार बाजार में डिब्बाबन्द अवस्था में भी उपलब्ध हैं। ये भिन्न-भिन्न स्वाद एवं गुणों वाले हैं। सैरेलैक्स एक ऐसा ही शिशु पूरक-आहार है।

पूरक आहार देने में ध्यान रखने योग्य बातें –
शिशु को दूध के साथ-साथ दिए जाने वाले पूरक आहार के नियोजन एवं देने में मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें ध्यान में रखनी आवश्यक हैं –

  • प्रारम्भ में केवल एक ही भोज्य-पदार्थ पूरक आहार के रूप में देना प्रारम्भ करना चाहिए। जब शिशु इसे सही रूप में ग्रहण करना शुरू कर दे तभी दूसरे भोज्य-पदार्थ का समावेश करना चाहिए।
  • जब कोई भोज्य-पदार्थ पूरक आहार के रूप में अपनाया जाए तो प्रारम्भ में इसकी अल्प मात्रा ही शिशु को दी जानी चाहिए तथा क्रमश: धीरे-धीरे इसकी मात्रा बढ़ाई जानी चाहिए।
  • सामान्य रूप से पूरक आहार में दिए गए अनाज भी तरल रूप में ही होने चाहिए। इसे शिशु के लिए ग्रहण करना सरल होता है। –
  • शिशु को कोई भी पूरक भोज्य पदार्थ अधिक मात्रा में नहीं देना चाहिए और न ही उसे खाने के लिए बाध्य करना चाहिए।
  • यदि ऐसा प्रतीत हो कि किसी पूरक भोज्य-पदार्थ में शिशु की रुचि नहीं है तथा वह अरुचि निरन्तर बनी रहती है तो वह भोज्य-पदार्थ शिशु को नहीं दिया जाना चाहिए तथा उसके स्थान पर कोई अन्य पूरक भोज्य पदार्थ देना ही उचित रहता है।
  • यदि चाहे तो पूरक आहार के भोज्य-पदार्थों में अल्प मात्रा में नमक भी मिलाया जा सकता है।
  • शिशु को अर्द्ध-ठोस पदार्थ तभी देने चाहिए जब उन्हें थोड़ा-बहुत चबाने की क्षमता आ जाए। अन्यथा तरल भोज्य-पदार्थ ही देना उत्तम रहते हैं।
  • पूरक आहार के रूप में कोई से दो भोज्य-पदार्थ मिलाकर भी दिए जा सकते हैं। इससे शिशु की पूरक आहार के प्रति अधिक रुचि बनी रहती है। उदाहरणस्वरूप शिशु को दूध-अण्डा या सूप-क्रीम दी जा सकती है।

प्रश्न 4.
स्तनपान छुड़ाने से क्या आशय है? स्तनपान छुड़ाने में आवश्यक सावधानियों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
शिशु का मुख्य एवं आदर्श आहार माँ का दूध ही है, परन्तु केवल एक सीमित अवधि तक ही शिशु को माँ का दूध उपलब्ध होता है। शिशु को स्तनपान की आदत हो जाती है। अतः एक समय पर शिशु के स्तनपान की आदत को छुड़ाना आवश्यक हो जाता है।

शिशु को माता के दूध से अलग करना ‘स्तन-त्याग’ या ‘स्तनपान छुड़ाना’ कहलाता है। जब शिशु की अवस्था 6 माह से 9 माह के बीच हो तो माता को स्तनपान छुड़ाने का प्रयास प्रारम्भ कर देना चाहिए। इस अवधि में धीरे-धीरे शिशु को ऊपर का दूध तथा अन्य खाद्य पदार्थ देने चाहिए। शिशु को गिलास अथवा प्याले से तरल पदार्थ पिलाने का अभ्यास डालना चाहिए। इससे बच्चे की पाचन क्रिया में वृद्धि होती है। माता को शिशु को अपना दूध पिलाना धीरे-धीरे कम करते जाना चाहिए। प्राकृतिक रूप से भी जैसे-जैसे शिशु के दाँत निकलने शुरू होते हैं, वैसे-वैसे माता की दूध पिलाने की क्षमता भी कम होती जाती है। इससे शुरू से ही शिशु को बोतल से पानी पिलाने का अभ्यास कराना चाहिए, जिससे आगे चलकर दूध पिलाने में भी सुगमता हो।

दूध छुड़ाने के समय माता को अपने भोजन में भी परिवर्तन कर देना चाहिए। उसे दूध, दलिया, चिकनाई आदि का सेवन कम कर देना चाहिए। इससे दूध कम बनेगा। इसके साथ ही स्तन पर कपड़े की पट्टी थोड़ी कसकर बाँध लेने से दूध सूखने में सहायता मिलती है।

शिशु को माता के स्तनों से दूर करना इतना सरल नहीं होता। शिशु काफी कठिनाई से माता का दूध छोड़ता है। कभी-कभी शिशु दूध छोड़ते समय बहुत परेशान होते हैं, रोते हैं, ऊपर का दूध नहीं पीते तथा उनकी नींद भी कम हो जाती है। इससे माता को बहुत परेशानी उठानी पड़ती है। माता को बड़े धैर्य एवं शान्ति से दूध छुड़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। ऊपर का दूध बोतल में भरकर अथवा चम्मच से पिलाना चाहिए। चम्मच में दूध भरकर स्तनों के समीप ले जाकर बच्चे को पिलाना चाहिए, जिससे उसे लगे कि वह माता का दूध पी रहा है।

स्तनपान छुड़ाने में सावधानियाँ –
प्रारम्भ में स्तनपान छुड़ाते समय शिशु को ऊपर का दूध एक बार, फिर दो बार तथा धीरे-धीरे क्रमशः बढ़ाते रहना चाहिए। सामान्य रूप से 9 माह की आयु होने पर स्तनपान छुड़ा देना चाहिए। स्तनपान छुड़ाने में निम्नलिखित सावधानियों को ध्यान में रखना चाहिए –

  • माता का दूध धीरे-धीरे छुड़ाना चाहिए, एकदम नहीं। दूध छुड़ाने के समय बच्चे को दिन में एक-दो बार फलों का रस, मुलायम हरी
  • सब्जी का पानी, केला आदि मसलकर देने का अभ्यास करना चाहिए।
  • शिशु को दिन में एक-दो बार निप्पल वाली बोतल से ऊपर का दूध देना चाहिए।
  • गर्मी की ऋतु में यथासम्भव स्तनपान नहीं छुड़ाना चाहिए, क्योंकि इस ऋतु में पाचन शक्ति क्षीण होती है। इस स्थिति में शिशु ऊपरी दूध को पचाने में असमर्थ होगा।
  • माँ का दूध छुड़ाने के पश्चात् शिशु के आहार में फल, हरी सब्जी, मछली, अण्डे की जर्दी आदि होनी चाहिए।
  • ऊपरी दूध से प्राय: बच्चों को कब्ज हो जाता है, इसलिए बच्चों को फलों का रस, भुना हुआ सेब आदि अवश्य देना चाहिए।
  • दूध छुड़ाने के पश्चात् बच्चे बहुत चिड़चिड़े व जिद्दी हो जाते हैं। अतः उनके आहार के प्रति बहुत सावधान रहना चाहिए तथा उन्हें प्यार से उचित आहार देते रहना चाहिए।
  • आरम्भ से बच्चों को पेय-पदार्थ पहले चम्मच से पिलाने चाहिए, फिर धीरे-धीरे छोटे गिलास से पीने की आदत डालनी चाहिए।

प्रश्न 5.
शिशु के दाँत निकलने की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।आवश्यक सावधानियों तथा दाँतों की सुरक्षा के उपाय भी बताइए।
उत्तरः
शिशु के मुँह में जन्म के समय दाँत नहीं होते। पाचन क्रिया तथा स्वास्थ्य व सुन्दरता के लिए मुँह में दाँतों का होना आवश्यक है। दाँतों का निकलना बच्चे के जीवन में एक विशेष महत्त्व रखता है। दाँत निकलते समय शिशु को कुछ परेशानियाँ भी होती हैं तथा इस काल में उसकी अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता होती है।
मनुष्य के दाँत दो प्रकार के होते हैं-अस्थायी दाँत तथा स्थायी दाँत। शैशवावस्था में केवल अस्थायी दाँत ही निकलते हैं।

अस्थायी दाँत –
इन दाँतों को ‘दूध के दाँत’ के नाम से भी पुकारते हैं। ये दाँत शिशु अवस्था में ही निकलते हैं। शिशु के दाँत 6 से 9 मास की आय में निकलने प्रारम्भ होते हैं। इन दाँतों की संख्या 3 वर्ष तक लगभग 20 हो जाती है। ये दाँत जबड़े की अस्थियों में दबे हुए बच्चे के जन्म से ही रहते हैं। सर्वप्रथम नीचे के जबड़े में मध्य के दो दाँत 6-7 मास की आयु के बीच बाहर निकल आते हैं। इसके पश्चात् लगभग 8-12 मास की आयु में ऊपर के चार छेदक दाँत निकल आते हैं।

बच्चे के एक वर्ष की आयु में 6 दाँत निकल आते हैं। इसके बाद दाँत निकलने बन्द हो जाते हैं। फिर कुछ समय बाद दाँत निकलने प्रारम्भ होते हैं। दो वर्ष के अन्त तक ऊपर तथा नीचे के चार कीले निकल आते हैं। तीन वर्ष की आयु तक चार दाढ़े भी बाहर निकल आती हैं। इस प्रकार पूरे दाँतों की संख्या 20 हो जाती है।

शिशुओं में दाँत निकलने का समय अलग-अलग होता है। कुछ बच्चों में दाँत 4 मास की आयु में ही निकलने लगते हैं। ये दाँत ठीक नहीं होते। इन दाँतों के ऊपर इनेमल का अभाव होता है। कुछ बच्चों में दाँत तब निकलते हैं, जब वे चलने लगते हैं। दाँतों का देरी से या जल्दी से निकलना कोई दोष की बात नहीं होती। कुछ बच्चों के दाँत बिना कष्ट के ही निकल आते हैं, जबकि कुछ बच्चों को अधिक कष्ट होता है।

दाँत निकलने के लक्षण –
दाँत निकलते समय शिशु को विभिन्न परेशानियाँ होती हैं। वास्तव में ये दाँत निकलने के लक्षण ही होते हैं। अधिकतर दाँत निकलते समय बच्चों को दस्त आने लगते हैं। कभी-कभी ज्वर भी होने लगता है। बच्चे प्राय: चिड़चिड़े हो जाते हैं तथा रोया करते हैं। वे दूध पीना बन्द कर देते हैं और अस्वस्थ दिखाई देते हैं तथा काटने का प्रयत्न करते हैं।

दाँत निकलते समय सावधानियाँ –

  • समय-समय पर शहद में सुहागा मिलाकर शिशु को चटाना चाहिए, इससे दाँत आसानी से निकल आते हैं तथा बच्चे का हाज़मा भी ठीक रहता है।
  • अधिक दस्त या ज्वर होने पर बच्चे को डॉक्टर को दिखाना चाहिए।
  • इस काल में बच्चे के सामने जो भी वस्तु आती है, उसी को मुँह से काटने की चेष्टा करता है। इसलिए इस बात की सावधानी बरतनी चाहिए कि वह क्या चबाता है। वस्तु के साथ बच्चे के शरीर में रोग के कीटाणु पहुँचने का भय रहता है।

दाँतों की सुरक्षा

  • स्थायी दाँतों का स्वस्थ होना प्राथमिक दाँतों पर ही निर्भर रहता है। इसलिए प्राथमिक दाँतों की सुरक्षा तथा स्वास्थ्य के विषय में सावधानी रखनी चाहिए।
  • बच्चे के दूध में विटामिन्स, कैल्सियम तथा फॉस्फोरस उपयुक्त मात्रा में घुले होने चाहिए, जिसके होने से दाँत स्वस्थ तथा पुष्ट बनते हैं।
  • बच्चे को भोजन के बाद गाजर या सेब खाने के लिए देना चाहिए। इनसे दाँतों की सफाई होती है।
  • सुबह, शाम तथा प्रत्येक वस्तु खाने के पश्चात् दाँतों को साफ कर देना चाहिए।
  • लगभग 6 या 7 माह के बच्चे को कड़ा सिका हुआ डबलरोटी का टुकड़ा देना चाहिए। इससे दाँतों या मसूड़ों का व्यायाम होता है।

प्रश्न 6.
‘टीकाकरण’ से क्या आशय है? शिशु को लगाए जाने वाले मुख्य टीकों का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तरः
नवजात शिशु को निरन्तर देखभाल की आवश्यकता होती है। जहाँ एक ओर शिशु के आहार, शारीरिक स्वच्छता तथा वस्त्र एवं विश्राम आदि का ध्यान रखना आवश्यक होता है, वहीं दूसरी ओर नवजात शिश को विभिन्न संक्रामक रोगों से भी बचाना आवश्यक होता है। इन संक्रामक रोगों से बचाने के लिए आधुनिक चिकित्साशास्त्र ने विभिन्न दवाएँ खोज ली हैं, जो बच्चों को टीकों के माध्यम से दे दी जाती हैं या पिला दी जाती हैं। इस प्रक्रिया को टीकाकरण कहते हैं।

इन दवाओं से शिशु के शरीर में सम्बन्धित रोगों से बचने के लिए रोग-प्रतिरोध क्षमता का विकास हो जाता है तथा शिशु द्वारा रोगग्रस्त होने की आशंका प्रायः समाप्त हो जाती है। इस प्रकार से विकसित हुई रोग-प्रतिरोध क्षमता को अर्जित रोग प्रतिरोध क्षमता कहते हैं। आजकल सरकार टीकाकरण पर विशेष बल दे रही है। आशा है टीकाकरण के व्यापक अभियान से हम संक्रामक रोगों पर नियन्त्रण प्राप्त कर लेंगे।
अब प्रायः सभी संक्रामक रोगों से बचाव के टीके विकसित कर लिए गए हैं। मुख्य टीकों का सामान्य विवरण निम्नवर्णित है –

1. टी०बी० से बचने का टीका – तपेदिक या टी०बी० एक अति भयंकर रोग है। इस रोग से बचने के लिए लगाए जाने वाले टीके को बी०सी०जी० का टीका कहते हैं। नवजात शिशु को लगाए जाने वाले विभिन्न टीकों में सर्वप्रथम यही रोग-निरोधक टीका लगाया जाता है। सामान्य रूप से जन्म के उपरान्त 24 घण्टे की अवधि में नवजात शिशु को यह टीका अवश्य ही लगा दिया जाना चाहिए। बी०सी०जी० का यह टीका सामान्य रूप से दायीं बाँह के ऊपरी हिस्से में ही लगाया जाता है। बाँह में जिस स्थान पर यह टीका लगाया जाता है, उस स्थान पर बाद में एक गाँठ-सी बन जाती है। बाद में यह गाँठ अपने-आप धीरे-धीरे सूख जाती है, परन्तु इसका निशान हमेशा बना रहता है। यह टीका लगाने से बच्चे को बहुत दर्द होता है।

2. चेचक का टीका – नवजात शिशु को चेचक के रोग से बचाने के लिए ‘चेचक का टीका’ भी लगवाने का प्रावधान है। हमारे देश में अब चेचक नामक रोग पर नियन्त्रण पा लिया गया है। अत: इस रोग के टीके को प्राथमिकता नहीं दी जाती। सामान्य रूप से जन्म से 14 दिन बाद तक ही चेचक का टीका लगवा लेना चाहिए। यदि इस अवधि में यह टीका न लगवाया जा सके तो तीन माह के अन्दर अवश्य लगवा लेना चाहिए। यह टीका सामान्य रूप से शिशु की बाँह में ही लगाया जाता है। आजकल कुछ लोग बच्चों को, विशेष रूप से लड़कियों को, यह टीका कूल्हे पर लगवाया करते हैं। इसका कारण यह है कि इस टीके का पक्का निशान पड़ जाता है तथा बाँह पर निशान अच्छा नहीं लगता है।

चेचक का टीका जिस स्थान पर लगाया जाता है, वह स्थान पहले लाल हो जाता है तथा फिर सूजने लगता है। उस स्थान पर बाद में सफेद रंग का एक प्रकार का छाला-सा बन जाता है। इस छाले में पानी जैसा तरल पदार्थ भरा रहता है। धीरे-धीरे यह छाला सखने लगता है। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि छाला छिलना नहीं चाहिए। छिल जाने पर बहुत दर्द होता है। यह टीका ठीक-ठीक ढंग से सूख जाए तो अपने-आप सूखी त्वचा उतर जाती है। इस समय टीके के स्थान पर गोले का तेल लगाया जा सकता है। चेचक के टीके को लगवाने के बाद उसका फूलना अनिवार्य होता है। यदि किसी कारणवश यह टीका न फूले तो पुनः टीका लगवाने की राय दी जाती है।

3. पोलियो का टीका तथा ट्रिपिल वेक्सीनेशन-पोलियो एक ऐसा रोग है, जो केवल बच्चों को ही हुआ करता है। इस रोग से बचने के लिए भी टीके की खोज हो चुकी है। पोलियो का टीका सुई आदि से नहीं लगाया जाता; अर्थात् इस दवा को सीधे रक्त में नहीं मिलाया जाता। यह टीका द्रव के रूप में होता है तथा बच्चे को पिलाया जाता है।

पोलियो के इस दवारूपी टीका देने के अवसर पर ही एक अन्य टीका (डी०पी०टी०) भी बच्चे को दिया जाता है जिसे ट्रिपिल वेक्सीनेशन कहते हैं। यह टीका काली खाँसी, टिटेनस तथा डिफ्थीरिया नामक संक्रामक रोगों के लिए होता है। यह टीका सुई के माध्यम से दिया जाता है।

पोलियो की दवा सामान्य रूप से जन्म के उपरान्त प्रथम माह में ही पहली बार दे देनी चाहिए, परन्तु इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि चेचक के टीके तथा पोलियो ड्रॉप्स के बीच कम-से-कम 15 दिन का अन्तर अवश्य होना चाहिए। पोलियो की दवा कुल मिलाकर तीन बार दी जाती है। प्रथम खुराक, जन्म के बाद लगभग एक माह के अन्दर ही दे दी जाती है। दूसरी खुराक एक माह के अन्तर से दी जाती है। इसके 1-1(1/2) माह बाद तीसरी खुराक भी दी जाती है। इसके बाद जब बच्चा 1 – 1(1/2) वर्ष का होता है तब एक और खुराक दी जाती है। इस खुराक का उद्देश्य रोग-निरोधक क्षमता में वृद्धि करना होता है।

पोलियो के टीके के समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि बच्चा स्वस्थ हो, उसे दस्त या ज्वर न हो। इस सामान्य व्यवस्था के अतिरिक्त अब भारत सरकार ने देश से पोलियो के पूर्ण उन्मूलन के लिए एक अलग से विस्तृत योजना प्रारम्भ की है, जिसे पल्स पोलियो के नाम से जाना जाता है। इस योजना के अन्तर्गत प्रतिवर्ष देश के पाँच वर्ष तक की आयु वाले समस्त बच्चों को पोलियो से बचाव की दो या तीन खुराक पिलाई जाती हैं। आशा है शीघ्र ही देश से पोलियो नामक रोग का पूर्ण उन्मूलन हो जाएगा।

4. हैजे का टीका – हैजे का टीका नवजात शिशु को नहीं लगाया जाता। सामान्य रूप से यह टीका 1/2 – 2 वर्ष की आयु के बच्चे को प्रथम बार लगाया जाता है। सामान्य रूप से यह टीका गर्मी के मौसम में लगाना लाभदायक माना जाता है। प्रथम बार हैजे का टीका दो या तीन खुराकों में दो-दो सप्ताह के अन्तर से लगाया जाता है। इसके बाद यह टीका प्रतिवर्ष एक बार गर्मियों में लगाया जाता है। इन टीकों का उद्देश्य रोग-निरोधकता बढ़ाना होता है। हैजे का टीका लगवाने से काफी पीड़ा होती है तथा ज्वर भी हो जाता है जोकि अपने-आप एक-दो दिन में ठीक हो जाता है।

5. टाइफॉइड का टीका – टाइफॉइड का टीका भी हैजे के ही समान 11 या 2 वर्ष की आयु के बच्चे को लगाया जाता है। इस टीके में टाइफॉइड तथा पेराटाइफॉइड से बचने की दवा एक-साथ मिली रहती है। कभी-कभी इसी में हैजे की दवा मिली रहती है। टाइफॉइड का मुख्य टीका भी दो-तीन किस्तों में दो-दो सप्ताह के अन्तर से लगाया जाता है। इसके बाद प्रतिवर्ष साधारण टीका लगवाना चाहिए। इस टीके से भी काफी पीड़ा होती है तथा हल्का ज्वर भी हो जाता है जो एक-दो दिन तक रहता है।

6. खसरे का टीका – शैशवावस्था में होने वाला एक मुख्य रोग खसरा भी है। अब खसरे से बचाव का टीका भी खोज लिया गया है। खसरे का टीका सामान्य रूप से 9 माह की आयु में लगाया जाता है।

7.हेपेटाइटिस बी का टीका – हेपेटाइटिस ‘बी’ एक घातक रोग है। इस रोग से बचाव का प्रथम टीका तो जन्म के उपरान्त शीघ्र ही लगा दिया जाता है। इसके उपरान्त दूसरी खुराक 6 सप्ताह की आयु में, तीसरी खुराक 6 से 9 माह की आयु में चौथी खुराक 10 वर्ष की आयु में दी जाती है।

8. एम०एम०आर० का टीका-शैशवावस्था में लगाया जाने वाला एक टीका एम०एम०आर० का भी है। यह टीका तीन भिन्न-भिन्न रोगों से बचाव के लिए लगाया जाता है। ये रोग हैं क्रमश: मीज़ल्स, मम्प्स (कर्णफेर) तथा रुबेला। यह टीका सामान्य रूप से 15 से 18 माह की आयु-अवधि में लगाया जाता है।

प्रश्न 7.
शैशवावस्था में होने वाले सामान्य रोग या व्याधियाँ कौन-कौन-सी हैं? इस अवस्था में प्रायः होने वाले दस्त तथा अतिसार के लक्षणों, कारणों तथा बचाव एवं उपचार के उपायों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
शैशवावस्था में शिशु अबोध होता है। वह अपने खान-पान एवं क्रियाकलाप को नियमित नहीं कर सकता। शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी अल्प-विकसित ही होती है। शिशु अपने आप को सर्दी-गर्मी से भी नहीं बचा सकता। इस अवस्था में बच्चे घुटनों के बल चलने लगते हैं तथा मिट्टी में खेलना तथा जो भी वस्तु दिखाई दे, उसे मुँह में डाल लेना उनकी सामान्य प्रवृत्ति होती है। शिशु की इस प्रकार की गतिविधियों के कारण वह प्राय: किसी-न-किसी रोग से ग्रस्त रहता है। शैशवावस्था में शिशु की पाचन-क्षमता भी अधिक विकसित नहीं होती। अतः खान-पान में थोड़ी-सी भी लापरवाही हो जाने के कारण शिशु रोगग्रस्त हो जाता है।

शैशवावस्था में पाचन-तन्त्र सम्बन्धी रोग अधिक होते हैं। शिशुओं में होने वाले पाचन-तन्त्र सम्बन्धी मुख्य रोग हैं-दस्त, अतिसार, कब्ज, चुनचुने तथा जिगर का बढ़ जाना। इनके अतिरिक्त शैशवावस्था में सूखा रोग, आँख दुखना तथा ज्वर होना भी सामान्य रोग हैं। शैशवावस्था में होने वाले इन सभी रोगों से बचाव के लिए कुछ सावधानियाँ आवश्यक होती हैं। रोग हो जाने पर भी ठीक समय पर उचित उपचार से रोग को नियन्त्रित किया जा सकता है। माताओं को शैशवावस्था में होने वाले रोगों की समुचित जानकारी होनी चाहिए। शैशवावस्था में होने वाले मुख्य रोगों का सामान्य विवरण निम्नवर्णित है –

दस्त
शैशवावस्था में होने वाला पाचन सम्बन्धी एक सामान्य रोग दस्त है। यह रोग प्रायः सभी बच्चों को शैशवावस्था में अनेक बार हुआ करता है। शिशुओं को प्रायः दस्तों की शिकायत रहती है तथा बच्चा कोई भी आहार हजम नहीं कर पाता है। जो भी खाता है, वही पतले पानी की तरह शरीर से मल के साथ बाहर निकालता रहता है।
लक्षण – बच्चों में होने वाले दस्तों के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं –

  • शौच में दही जैसी सफेद रंग की फिटक दिखाई देती है।
  • कभी-कभी झागदार शौच दिखाई पड़ती है।
  • कभी-कभी राख जैसे रंग के दस्त दिखाई देते हैं।
  • दस्त हरे रंग के भी होते हैं।

कारण – छोटे बच्चों में दस्त होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

  • बच्चा यदि अधिक दूध पी लेता है। .
  • यदि बच्चे की माँ कोई हानिकारक, अपाच्य वस्तु खा लेती है।
  • दूध यदि अत्यन्त गाढ़ा होता है।
  • दूध में यदि चीनी अधिक मात्रा में डाल दी जाती है।
  • किसी प्रकार के बाहरी संक्रमण के परिणामस्वरूप भी दस्त हो सकते हैं। यह संक्रमण दूध की बोतल, निप्पल या किसी अन्य बर्तन तथा खिलौनों आदि के माध्यम से हो सकता है।

बचाव के उपाय – शिशुओं को दस्तों से बचाने के लिए निम्नलिखित उपाय करने चाहिए –

  • बच्चे को दूध में उबला पानी मिलाकर देना चाहिए।
  • बकरी, गाय तथा माँ का दूध ही श्रेष्ठ रहता है।
  • माता को दलिया का प्रयोग करना चाहिए।
  • यदि ऊपरी दूध या अन्य आहार दिया जाता है तो दूध एवं आहार-सामग्री के साथ-साथ प्रयोग होने वाले समस्त बर्तनों की पूर्ण सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
  • बच्चों के खिलौने आदि को भी साफ रखना चाहिए। इससे खिलौनों द्वारा होने वाले संक्रमण से बचा जा सकता है।

उपचार – दस्त हो जाने पर निम्नलिखित उपचार किए जा सकते हैं –

  • दस्त होने पर ऊपरी दूध बन्द कर देना चाहिए। यदि ऊपरी दूध देना अनिवार्य हो तो दूध पतला करके देना चाहिए।
  • बच्चे को ठोस आहार बिल्कुल नहीं देना चाहिए।
  • कोई अच्छी बाल घुट्टी पानी में मिलाकर देनी चाहिए।
  • यदि ठण्ड के कारण दस्त हुए हों तो बच्चे को अल्प मात्रा में जायफल घिसकर दिया जा सकता है।
  • दस्त अधिक होने पर शरीर से पानी की अधिक मात्रा निकल जाती है। अत: पानी की कमी को पूरा करने के लिए बच्चे को अच्छी प्रकार से उबला हुआ पानी ठण्डा करके अवश्य देना चाहिए। इस पानी में चीनी तथा नमक या कोई जीवन-रक्षक घोल मिलाकर देना चाहिए।
  • यदि शीघ्र दस्त नहीं रुकते तो अच्छे डॉक्टर से अवश्य परामर्श लेना चाहिए।

अतिसार –
अतिसार भी पाचन सम्बन्धी रोग है। शिशु अधिकतर इस रोग से पीड़ित होते हैं। इस रोग के लक्षण, कारण व उपचार निम्नलिखित हैं –
लक्षण –

  • दिन में लगभग 10-15 बार दस्त आते हैं। ये दस्त बदबूदार, पतले अथवा आँवयुक्त भी हो सकते हैं।
  • शिशु को हल्का बुखार आ जाता है।
  • दस्त हरे रंग के होते हैं।
  • शिशु को उल्टी भी हो जाती है।

कारण – अतिसार रोग शिशु के शरीर में निम्नलिखित कारणों से होता है –

  • शिशु को ठण्ड लग जाती है।
  • दूध में शक्कर अधिक मात्रा में डालने से यह रोग हो जाता है।
  • बाहरी संक्रमण के परिणामस्वरूप भी अतिसार हो सकता है। यह संक्रमण जल, दूध, बर्तनों अथवा खिलौने से हो सकता है। मक्खियाँ भी इस रोग की वाहक होती हैं।

उपचार – अतिसार रोग से बचने के लिए शिशु का निम्नलिखित उपचार करना चाहिए –

  • शिशु को कम दूध देना चाहिए।
  • माता को पानी का सेवन अधिक करना चाहिए।
  • ठण्डी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।

यदि साधारण उपचार से लाभ न हो तो चिकित्सक को अवश्य दिखाएँ। इस रोग में इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे के शरीर में पानी की कमी न हो जाए। शरीर में सामान्य से कम मात्रा में जल रह जाना निर्जलीकरण कहलाता है। इस स्थिति में बच्चा कमजोर हो जाता है। उसका गला सूखने लगता है, त्वचा सूखी तथा झुरींदार हो जाती है। मूत्र त्यागने की दर भी घट जाती है। निर्जलीकरण घातक भी हो सकता है। सामान्य रूप से शिशु को अतिसार या वमन से कोई खतरा नहीं होता, परन्तु प्रबल निर्जलीकरण से उसकी मृत्यु तक हो सकती है। इसके उपचार के लिए लगभग एक बड़ा गिलास पानी उबालकर ठण्डा करके रख लें। उसमें चार-पाँच चम्मच चीनी तथा आधा चम्मच नमक मिला लें। इस पानी की थोड़ी-थोड़ी मात्रा थोड़े-थोड़े समय बाद बच्चे को पिलाते रहें। इससे डीहाइड्रेशन (निर्जलीकरण) नहीं होता। आजकल ‘जीवन-रक्षक घोल’ के पैकेट बाजार में उपलब्ध हैं। इस पैकेट में विभिन्न लवण सन्तुलित मात्रा में विद्यमान होते हैं। दस्त एवं उल्टियाँ होने पर यह घोल पिलाने से निर्जलीकरण से बचा जा सकता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 24 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
शिशु के लिए स्तनपान क्यों आवश्यक है?
अथवा
नवजात शिशु के लिए उत्तम आहार क्या है? अपने उत्तर के कारण बताइए।
अथवा
नवजात शिशु का क्या आहार होना चाहिए?
अथवा
माँ का दूध बच्चों के लिए क्यों अच्छा माना गया है? इस पर प्रकाश डालिए।
अथवा
शिशु को स्तनपान कराने से क्या लाभ हैं?
उत्तरः
शिशु के लिए स्तनपान की अनिवार्यता –
माता का दूध बच्चे के लिए एक सर्वोत्तम भोजन या आहार है। यह प्रकृति की एक अद्भुत देन है कि शिशु के जन्म से पहले ही माता के स्तनों में दूध आ जाता है।
माता के दूध में लगभग सभी पोषक तत्त्व जैसे कार्बोज, प्रोटीन, वसा, जल, खनिज तथा विटामिन्स उपस्थित रहते हैं। जिस समय शिशु जन्म लेता है तो माता का दूध पतला होता है ताकि बच्चा उसे आसानी से पचा सके क्योंकि इस समय शिशु के पाचन अंग पूर्ण रूप से विकसित नहीं होते हैं।

शिशु की आयु के बढ़ने के साथ-साथ माता का दूध भी गाढ़ा होता चला जाता है तथा उसमें पोषक तत्त्वों की मात्रा भी बढ़ जाती है। माता के दूध द्वारा शिशु के शरीर में किसी भी प्रकार के संक्रामक रोगों के जीवाणु प्रवेश नहीं कर पाते; अत: शिशु का शरीर विभिन्न संक्रामक रोगों से बचा रहता है। इस प्रकार माता के स्तनों से दूध प्राप्त करके शिशु अपनी भूख मिटाता है तथा अपनी आहार सम्बन्धी आवश्यकता को पूरा करता है। बच्चे के स्वास्थ्य के लिए स्तनपान विशेष रूप से लाभदायक होता है।

प्रकृति ही माता के स्तनों में दूध का निर्माण करती है। दूध का यह निर्माण बच्चे को पिलाने के लिए ही होता है। अत: शरीर की स्वाभाविक क्रिया के रूप में माता को बच्चे को स्तनपान अनिवार्य रूप से कराना चाहिए। स्तनपान से माँ एवं बच्चे दोनों को एक विशेष प्रकार का सन्तोष एवं स्वास्थ्य-सुख प्राप्त होता है। इन समस्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि नवजात शिशु के लिए माँ का दूध ही सर्वोत्तम आहार है।

प्रश्न 2.
शिशु के विकास के लिए पौष्टिक आहार का क्या महत्त्व है?
उत्तरः
शैशवावस्था में आहार एवं पोषण –
पोषण के दृष्टिकोण से शैशवावस्था का विशेष महत्त्व है। शैशवावस्था में शारीरिक विकास एवं वृद्धि की दर सर्वाधिक होती है। शिशु की आवश्यक देखभाल के अन्तर्गत शिशु के आहार एवं पोषण का ध्यान रखना अत्यधिक आवश्यक होता है। इस अवस्था में होने वाले पोषण का प्रभाव शिशु के सम्पूर्ण शारीरिक एवं मानसिक विकास पर पड़ता है। शैशवावस्था में सुपोषण से शिशु की रोग-प्रतिरोध क्षमता का समुचित विकास होता है।

इसके विपरीत यदि शैशवावस्था में पोषण की उचित व्यवस्था नहीं होती तो शिशु के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है तथा वह विभिन्न अभावजनित रोगों का शिकार हो सकता है। शिशु के आहार में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, इमल्सीकृत वसा, विटामिन तथा खनिज की समुचित मात्रा का समावेश होना चाहिए। शिशु को स्टार्चयुक्त भोज्य पदार्थ अधिक नहीं देने चाहिए। शिशु का आहार सुपाच्य होना चाहिए। इस प्रकार स्पष्ट है कि शिशु के विकास के लिए पौष्टिक आहार का विशेष महत्त्व है।

प्रश्न 3.
शिशु को नियमित रूप से मल-मूत्र त्याग की आदत कैसे डाली जा सकती है? अथवा “शिशु में नियमित शौच की आदत डालना आवश्यक है।” क्यों?
उत्तरः
शिशु को नियमित रूप से मल-मूत्र त्यागने की आदत डालना –
जन्म के समय से शिशु द्वारा मल-मूत्र विसर्जन की क्रिया स्वतः होती रहती है। इस काल में इन क्रियाओं पर किसी प्रकार का नियन्त्रण नहीं होता, परन्तु कुछ समय उपरान्त शिशु इन क्रियाओं को नियन्त्रित करने की शक्ति अर्जित कर लेता है। इस अवस्था में आकर शिशु को मल-मूत्र विसर्जन की नियमित आदत डालने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

शिशु को बचपन से ठीक समय पर मल-त्याग की आदत डालनी चाहिए। शिशु को दो मास की आयु से 2 वर्ष की आयु तक जो भी आदत पड़ जाती है, वह जीवन के लम्बे समय तक ही बनी रहती है; अत: इसी अवस्था में शिशु को उचित समय पर मल-त्याग की आदत डाली जा सकती है। इससे बच्चे और माता दोनों को सुविधा रहती है।

शिशु को नियमित समय पर मूत्र-त्याग की आदत डालने से वस्त्र गन्दे होने से बच जाते हैं। बालक को बिस्तर पर लिटाने से पहले मूत्र-त्याग अवश्य करा देना चाहिए। यदि बच्चा रात्रि में रोता है तो उसे बिस्तर से उठाकर मल-मूत्र त्याग के लिए बिठाना चाहिए। सोने से पहले बच्चे को दूध, चाय नहीं देनी चाहिए। जब शिशु छह से आठ माह का हो जाए, तब उसे छोटे कमोड या पॉट पर बैठने की आदत डालनी चाहिए। धीरे-धीरे बच्चा कमोड पर बैठने तथा मल-त्यागने में सह-सम्बन्ध विकसित कर लेता है। इससे मल-त्यागने की आदत नियमित हो जाती है।

प्रश्न 4.
बच्चों के लिए वस्त्र बनवाते समय किन-किन बातों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है?
अथवा
टिप्पणी लिखिए – मौसम के अनुसार बच्चों के वस्त्र।
अथवा
शिशु के वस्त्रों का चयन किस प्रकार करना चाहिए?
उत्तरः
बच्चों के लिए वस्त्र बनवाना –
बच्चों का शरीर बहुत कोमल होता है तथा उनका शारीरिक विकास बहुत तीव्र गति से होता है। अत: बच्चों के लिए वस्त्र बनवाते समय निम्नलिखित बातों को अवश्य ही ध्यान में रखना चाहिए –

  • बच्चों के वस्त्र ढीले-ढाले सिलवाने चाहिए। तंग वस्त्र जल्दी फट जाते हैं।
  • बच्चों के लिए ऐसे वस्त्र बनवाने चाहिए जिनको आसानी से धोया जा सके।
  • गर्मी के मौसम में हल्के, सफेद तथा मुलायम वस्त्र सिलवाने चाहिए।
  • सर्दी के मौसम में ऊनी वस्त्र बनाकर बच्चों को पहनाने चाहिए।
  • बच्चों के लिए ऐसे वस्त्र बनवाने चाहिए जो सिकुड़े नहीं।
  • बच्चों के लिए अधिक कीमती वस्त्र नहीं सिलवाने चाहिए।
  • वस्त्र सिलवाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि उनका गला पर्याप्त खुला रहे जिससे वस्त्र आसानी से पहनाया जा सके।
  • गर्मी की ऋतु में अधिकतर आधी बाँहों के वस्त्र तथा सर्दी की ऋतु में पूरी बाँहों वाले वस्त्र बनवाने चाहिए।

प्रश्न 5.
बच्चों में होने वाली कब्ज के लक्षणों, कारणों तथा उपचार के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
कब्ज –
कब्ज भी पाचन सम्बन्धी रोग है। इस रोग की दशा में शिशु की नियमित मल-त्याग की क्रिया अस्त-व्यस्त हो जाती है। जब शिशु को भोजन नहीं पचता है और खुश्की हो जाती है तो उसके शरीर में कब्ज हो जाता है।

लक्षण – कब्ज के निम्नलिखित लक्षण हैं –

  • शिशु का मल सख्त हो जाता है।
  • मल त्याग में कठिनाई होती है।
  • शिशु नियमित रूप से शौच नहीं जाता है।
  • शिशु को सूखी उल्टी आती है तथा पेट में ऐंठन या दर्द होता है।

कारण – कब्ज के निम्नलिखित कारण हैं –

  • अधिक गाढ़ा दूध पीना।
  • पाचन सम्बन्धी विकार।
  • गर्म वस्तुएँ खाने से भी कब्ज हो जाता है।
  • आवश्यकता से कम मात्रा में आहार मिलने पर।
  • बच्चे के आहार में तरल पदार्थों की कमी होने पर।
  • यदि बच्चे की शारीरिक क्रियाएँ सामान्य से बहुत कम हों तो भी कब्ज हो सकता है।

उपचार – कब्ज से बचने के निम्नलिखित उपाय हैं –

  • शिशु को अधिकतर माता का दूध ही देना चाहिए। यह सुपाच्य होता है।
  • यदि गाय या भैंस का दूध दिया जाए तो उस दूध में उबला हुआ पानी मिलाकर देना चाहिए। बच्चों को भैंस के दूध के स्थान पर बकरी का दूध भी दिया जा सकता है।
  • अगर हो सके तो ऊपरी दूध में अंजीर का शर्बत मिलाकर देना चाहिए।
  • शिशु को घुट्टी, ग्राइपवाटर, ऑस्टोकैल्सियम तथा मिल्क ऑफ मैग्नेशिया देना चाहिए।
  • कब्ज अधिक गम्भीर होने पर बच्चे के मलद्वार में ग्लिसरीन या साबुन की बत्ती लगाई जा सकती है।

प्रश्न 6.
बच्चों में होने वाले चुनचुनों के लक्षण, कारण तथा उपचार के उपाय बताइए।
उत्तरः
चुनचुने –
छोटे बच्चों के पेट में छोटे-छोटे पतले कीड़े हो जाते हैं जिन्हें चुनचुने कहते हैं। इनकी पहचान, कारण व उपचार निम्नलिखित हैं –

लक्षण – बच्चे के पेट में चुनचुने हो जाने के निम्नलिखित लक्षण हैं –

  • बच्चे के पेट में ऐंठन होती है।
  • बच्चा हर समय व्याकुल रहता है।
  • बच्चे का जी मिचलाता है तथा स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।
  • शिशु का चेहरा नीला, पीला पड़ जाता है।
  • शिशु का वजन घटना शुरू हो जाता है।
  • चुनचुने होने पर बच्चे को मल-त्याग में कठिनाई होती है।

कारण – जब शिशु ऐसे दूध का सेवन करता है जिसमें किसी प्रकार की गन्दगी होती है तो गन्दगी के साथ कीड़ों के अण्डे प्रवेश कर जाते हैं, जिससे उसकी आँतों में चुनचुने पड़ जाते हैं। चूसनी आदि से भी ये कीड़े या कीड़ों के अण्डे पेट में पहुँच जाते हैं।

उपचार – बच्चे के शरीर से चुनचुने नष्ट हो जाएँ, इसके लिए निम्नलिखित उपचार आवश्यक हैं –

  • शिशु को स्वच्छ दूध (गन्दगीरहित) पीने के लिए देना चाहिए। दूध सदैव पकाकर देना चाहिए। कच्चा दूध नहीं देना चाहिए।
  • शिशु के मलद्वार पर रात्रि के समय मिट्टी का तेल लगा देना चाहिए।
  • शिशु के पोतड़ों को निःसंक्रामकों द्वारा धोना चाहिए।
  • शिशु के कपड़ों को गर्म पानी में उबालकर धोना चाहिए।
  • बच्चे को चीनी या अन्य मीठे पदार्थ कम खिलाए जाने चाहिए।

प्रश्न 7.
बच्चों में होने वाले जिगर सम्बन्धी विकार का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तरः
जिगर –
आजकल शिशुओं के शरीर में जिगर बढ़ने की शिकायत देखी गई है जिससे उनका पेट ढोल की तरह फूल जाता है। इस रोग के लक्षण, कारण व उपचार निम्नलिखित हैं –

लक्षण – बच्चों में जिगर रोग के लक्षण निम्नलिखित हैं –

  • शिशु का चेहरा पीला पड़ जाता है।
  • पेट अनावश्यक रूप से फूल जाता है।
  • शौच बार-बार जाता है। दस्त कुछ झागदार तथा अधिक मात्रा में होता है।
  • पेट में बदहजमी हो जाती है तथा भूख नहीं लगती है।

कारण – जिगर का प्रमुख कारण बच्चे द्वारा अधिक अन्न ग्रहण करना होता है।

उपचार—जिस बच्चे का जिगर बढ़ गया हो उसका निम्नलिखित उपचार करना चाहिए –

  • शिशु को दूध में गर्म पानी मिलाकर देना चाहिए।
  • लिवर एक्सट्रेक्ट के इंजेक्शन लगवाने चाहिए।
  • लिवर टॉनिक जैसे ‘लिव फिफ्टी टू’ पीने के लिए देना चाहिए।

प्रश्न 8.
बच्चों में होने वाले सूखा रोग (अस्थि-विकृति) का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तरः
सूखा रोग –
पोषक तत्त्वों की न्यूनता के परिणामस्वरूप बच्चों में होने वाला एक सामान्य रोग सूखा रोग (Rickets) या अस्थि विकृति भी है। यह रोग विटामिन ‘D’ की कमी के कारण होता है। विटामिन ‘D’ की कमी के कारण शरीर में कैल्सियम तथा फॉस्फोरस नामक खनिजों का उचित अवशोषण नहीं हो पाता। इस स्थिति में शरीर की अस्थियाँ कमजोर होने लगती हैं तथा परिणामस्वरूप वे टेढ़ी, झुकी हुई अथवा विकारयुक्त हो जाती हैं। इसी स्थिति को ‘अस्थि विकृति’ या ‘सूखा रोग’ कहा जाता है। इस रोग में बच्चों की मांसपेशियाँ भी कमजोर हो जाती हैं तथा उनका समुचित विकास नहीं हो पाता। बच्चों का पेट बढ़ जाता है तथा आगे को निकला हुआ-सा प्रतीत होता है। रोग के बढ़ जाने पर बच्चे की पसलियों में हड्डी और उपास्थि के जोड़ों के स्थान पर गोल उभार दिखाई देने लगता है। इसे रिकेटी रोजरी (Rickety Rosary) कहते हैं। इस रोग से ग्रस्त बालक का स्वभाव चिड़चिड़ा-सा हो जाता है और वह प्रायः थका-थका-सा, परेशान, दुःखी तथा अप्रसन्न-सा दिखाई देता है।

उपचार – सूखा रोग या रिकेट नामक रोग के उपचार के लिए बच्चे को विटामिन ‘D’ की अतिरिक्त मात्रा देनी होती है। विटामिन ‘D’ युक्त आहार अधिक देना चाहिए। बच्चे को काफी समय तक धूप एवं सूर्य के प्रकाश में रखना चाहिए। इसके अतिरिक्त बच्चे का आहार सन्तुलित, पौष्टिक एवं कैल्सियम, खनिज की अतिरिक्त मात्रा से युक्त होना चाहिए।

प्रश्न 9.
टिप्पणी लिखिए-‘आँखें दुखना’।
उत्तरः
आँखें दुखना –
यह रोग बच्चों को संसर्ग व गर्मी के कारण हो जाता है। आँखों की नियमित रूप से सफाई न होने पर, धूल-मिट्टी या गन्दगी पड़ जाने पर भी आँखें दुखने लगती हैं। यह रोग छूत से भी लग सकता है। बच्चों की आँखें दुखने के लक्षण तथा उपचार निम्नलिखित हैं –

लक्षण – आँखों से पानी आना, आँख सूज जाना तथा खुजली होना। आँखों का लाल हो जाना तथा आँखों से पीले रंग का चिपचिपा पदार्थ निकलना भी एक लक्षण है।

उपचार –

  • गर्म पानी में बोरिक एसिड डालकर आँखों को रुई से धोना चाहिए।
  • गुलाबी फिटकरी वाला गुलाब जल आँखों में दिन में तीन बार डालना चाहिए।
  • डॉक्टर से चिकित्सा करानी चाहिए।
  • तेज प्रकाश से बचना चाहिए।

प्रश्न 10.
टिप्पणी लिखिए – ‘बच्चों में ऐंठन’।
उत्तरः
बच्चों में ऐंठन –
आजकल छोटे-छोटे बच्चों का शरीर अचानक ऐंठने लगता है तथा अचानक ही दर्द होने लगता है, इसे ऐंठन कहते हैं। इस रोग के लक्षण तथा उपचार निम्नलिखित हैं –

लक्षण –

  • बच्चे का चेहरा पीला पड़ जाता है।
  • मांसपेशियाँ खिंचने लगती हैं।
  • शरीर ऐंठ जाता है।
  • दर्द होता है।

उपचार –

  • बच्चे के वस्त्र ढीले कर देने चाहिए।
  • बच्चे को गर्म रखना चाहिए।
  • डॉक्टर से चिकित्सा करानी चाहिए।

प्रश्न 11.
टिप्पणी लिखिए–’बच्चों में ज्वर’।
उत्तरः
बच्चों में ज्वर –
मानव शरीर का सामान्य तापक्रम 98. 4°F होता है। यदि किसी कारणवश व्यक्ति के शरीर का तापक्रम इससे अधिक हो जाए तो उस अवस्था को ज्वर की अवस्था कहा जाता है। ज्वर कम अवधि तक भी रह सकता है तथा अधिक अवधि तक भी रह सकता है।

कारण – ज्वर विभिन्न कारणों से हो सकता है। कमजोरी, सर्दी-जुकाम, टॉन्सिल, सन्तुलित आहार का अभाव, किसी प्रकार का संक्रमण ज्वर के मुख्य कारण होते हैं। इसके अतिरिक्त भी विभिन्न कारणों से ज्वर हो सकता है। कुछ गम्भीर रोगों के लक्षणस्वरूप भी ज्वर हो सकता है जैसे कि तपेदिक या गुर्दे का संक्रमण।

लक्षण – ज्वर का प्रमुख लक्षण शरीर का तापक्रम बढ़ जाना है। इसे थर्मामीटर द्वारा सही-सही मापा जा सकता है। इसके अतिरिक्त सुस्ती, निढाल रहना, चेहरा लाल होना, बदन में दर्द होना, बार-बार प्यास लगना तथा बेचैनी होना आदि भी ज्वर के लक्षण होते हैं।

उपचार – ज्वर के उपचार के लिए सर्वप्रथम उसके प्रकार एवं तीव्रता पर ध्यान दिया जाता है। ज्वर के कारणों को ज्ञात करके ही उपचार किया जा सकता है। तीव्र ज्वर की स्थिति में बच्चे के माथे पर ठण्डे पानी की भीगी पट्टियाँ रखनी चाहिए। बच्चे को हर प्रकार से आराम पहुँचाना चाहिए तथा डॉक्टर से परामर्श लेकर औषधि देनी चाहिए।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 24 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
शिशु के जन्म के उपरान्त सर्वप्रथम कौन-सी क्रिया सर्वाधिक आवश्यक होती है?
उत्तरः
शिशु के जन्म के उपरान्त सर्वाधिक आवश्यक क्रिया होती है-फेफड़ों के द्वारा श्वसन क्रिया।

प्रश्न 2.
नवजात शिशु को माँ के शरीर से अलग करने के लिए क्या किया जाता है?
उत्तरः
नवजात शिशु को माँ के शरीर से अलग करने के लिए गर्भनाल को काटना पड़ता है।

प्रश्न 3.
गर्भनाल को काटने में क्या सावधानी अति आवश्यक है?
उत्तरः
गर्भनाल काटने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कैंची भली-भाँति निसंक्रमित होनी चाहिए।

प्रश्न 4.
नवजात शिशु के शरीर के किन अंगों की तुरन्त सफाई की जाती है?
उत्तरः
नवजात शिशु के कान, आँख, नाक, गले तथा मल-मूत्र विसर्जन के अंगों की समुचित एवं तुरन्त सफाई आवश्यक होती है।

प्रश्न 5.
शिशु का मुख्य आहार क्या होता है?
उत्तरः
शिशु का मुख्य आहार माँ का दूध होता है।

प्रश्न 6.
माँ के दूध से शिशु को क्या लाभ होता है?
उत्तरः
माँ के दूध से शिशु को सभी आवश्यक -पोषक तत्त्व उपलब्ध हो जाते हैं, इससे किसी प्रकार के संक्रमण की आशंका नहीं होती। यह सुपाच्य तथा विशेष तुष्टिदायक होता है।

प्रश्न 7.
प्रसव के उपरान्त प्रारम्भ में माँ के स्तनों से जो स्राव प्राप्त होता है, उसे क्या कहते हैं? यह शिशु को पिलाना चाहिए या नहीं?
उत्तरः
प्रसव के उपरान्त प्रारम्भ में जो दूध होता है, उसे कोलस्ट्रम कहते हैं। इसे ग्रहण करने से शिशु की पाचन क्रिया तथा रोग प्रतिरोध क्षमता का विकास होता है। नवजात शिशु को कोलस्ट्रम अवश्य पिलाना चाहिए।

प्रश्न 8.
शिशु को ऊपरी दूध पिलाने में मुख्य सावधानी क्या आवश्यक होती है?
उत्तरः
शिशु को ऊपरी दूध पिलाने में हर प्रकार की सफाई आवश्यक होती है।

प्रश्न 9.
शिशु को दूध पिलाने के उपरान्त डकार दिलवाना क्यों आवश्यक होता है?
उत्तरः
शिशु को दूध पिलाने के उपरान्त डकार दिलवाने से उल्टी करने या दूध निकालने की प्रायः आशंका नहीं रहती है।

प्रश्न 10.
शैशवावस्था में ध्यान रखने वाली प्रमुख बात क्या है?
उत्तरः
शैशवावस्था में शिशु के पोषण एवं संरक्षण का ध्यान रखना प्रमुख बात है।

प्रश्न 11.
पूरक आहार किसे कहते हैं? उत्तर-शिशु को दूध के अतिरिक्त दिए जाने वाला आहार पूरक आहार कहलाता है।

प्रश्न 12.
शिशु को दूध के अतिरिक्त दिए जाने वाले मुख्य पूरक आहारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
शिशु को दूध के अतिरिक्त दिए जाने वाले मुख्य पूरक आहार हैं-कॉड लिवर ऑयल, सन्तरे का रस, दलिया, हरी सब्जियाँ एवं फल तथा अण्डे का पीला भाग।

प्रश्न 13.
स्तनपान छुड़ाने से आप क्या समझती हैं?
उत्तरः
शिशु को माता के दूध से अलग करना तथा उसके स्थान पर अन्य कोई दूध एवं आहार देने की आदत डालना ही स्तनपान छुड़ाना कहलाता है।

प्रश्न 14.
शिशु को प्रथम वर्ष में कौन-कौन से टीके लगवाना आवश्यक होता है?
उत्तरः
शिशु को प्रथम वर्ष में लगाए जाने वाले मुख्य टीके हैं—टी०बी० से बचाव का टीका या बी०सी०जी० का टीका, पोलियो का टीका तथा ट्रिपिल वेक्सीनेशन खसरे का टीका तथा हेपेटाइटिस ‘बी’ का टीका। .

प्रश्न 15.
पोलियो से बचाव के लिए सरकार द्वारा कौन-सी योजना चलाई गई?
उत्तरः
पोलियो से बचाव के लिए सरकार ने ‘पल्स पोलियो’ नामक व्यापक योजना चलाई है।

प्रश्न 16.
‘ट्रिपिल वेक्सीनेशन’ किन रोगों से बचाव करता है?
उत्तरः
ट्रिपिल वेक्सीनेशन से काली खाँसी, टिटेनस तथा डिफ्थीरिया नामक रोगों से बचाव होता है।

प्रश्न 17.
शिशुओं को प्रायः होने वाले पाचन सम्बन्धी मुख्य रोगों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
शिशुओं को प्राय: होने वाले पाचन सम्बन्धी मुख्य रोग हैं-दस्त, अतिसार, कब्ज, चुनचुने तथा जिगर बढ़ जाना।

प्रश्न 18.
किस तत्त्व की कमी से रिकेट्स नामक रोग हो जाता है?
उत्तरः
विटामिन ‘D’ की कमी से रिकेट्स नामक रोग हो जाता है।

प्रश्न 19.
शिशु के वस्त्रों का चुनाव करते समय आप किन बातों का ध्यान रखेंगी?
उत्तरः
शिशु के वस्त्र सूती, नरम तथा ढीले-ढाले एवं अच्छे रंग के होने चाहिए।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 24 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –
1. जन्म के उपरान्त नवजात शिशु के लिए सर्वप्रथम अनिवार्य होता है –
(क) उसका वजन लेना
(ख) उसे स्नान कराना
(ग) मल-मूत्र त्याग कराना
(घ) फेफड़ों से श्वसन-क्रिया कराना।
उत्तरः
(घ) फेफड़ों से श्वसन-क्रिया कराना।

2. नवजात शिशु की परिचर्या के अन्तर्गत आवश्यक है –
(क) फेफड़ों से श्वसन कराना
(ख) गर्भनाल को काटना
(ग) शिशु के अंगों की सफाई करना
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी।

3. शिशु की गर्भनाल को काटना चाहिए –
(क) जन्म से एक घण्टे उपरान्त
(ख) जन्म के तुरन्त उपरान्त
(ग) जब गर्भनाल में स्पन्दन रुक जाए
(घ) चाहे जब।
उत्तरः
(ग) जब गर्भनाल में स्पन्दन रुक जाए।

4. नवजात शिशु का आहार होना चाहिए –
(क) शहद
(ख) आसुत जल
(ग) माँ का दूध
(घ) ग्लूकोजा
उत्तरः
(ग) माँ का दूध।

5. माँ का दूध नवजात शिशु के लिए उत्तम है, क्योंकि –
(क) यह सस्ता होता है
(ख) इससे शिशु का स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है
(ग) इससे माँ का वजन कम होता है
(घ) यह आसानी से उपलब्ध है।
उत्तरः
(ख) इससे शिशु का स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है।

6. अपरिपक्व शिशु वे कहलाते हैं, जिनका वजन इनसे कम होता है –
(क) 2 किग्रा से
(ख) 3 किग्रा से
(ग) 4 किग्रा से
(घ) 5 किग्रा से।
उत्तरः
(क) 2 किग्रा से।

7. जन्म के समय परिपक्व शिशु का औसत भार होता है –
(क) 1.5 किग्रा
(ख) 2 किग्रा
(ग) 3 किग्रा से 3.5 किग्रा
(घ) 5 किग्रा।
उत्तरः
(ग) 3 किग्रा से 3.5 किग्रा।

8. नवजात शिशु के कपड़े होने चाहिए –
(क) ऊनी
(ख) मुलायम सूती
(ग) टेरीकाट के
(घ) रेशमी।
उत्तरः
(ख) मुलायम सूती।

9. किन परिस्थितियों में शिशु को स्तनपान नहीं कराना चाहिए –
(क) यदि माँ दीर्घ अवधि के ज्वर से पीड़ित हो
(ख) यदि माँ किसी भयंकर संक्रामक रोग से पीड़ित हो
(ग) यदि माँ को अधिक रक्त-स्राव हो रहा हो
(घ) उपर्युक्त सभी परिस्थितियों में।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी परिस्थितियों में।

10. शिशु को ऊपरी दूध देते समय ध्यान रखना चाहिए –
(क) दूध गाढ़ा न हो
(ख) दूध अधिक गर्म न हो
(ग) बोतल एवं निप्पल पूर्ण रूप से स्वच्छ हों
(घ) उपर्युक्त सभी बातें।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी बातें।

11. चार-पाँच माह के शिशु को दूध के अतिरिक्त दिया जाने वाला आहार कहलाता है –
(क) पौष्टिक आहार
(ख) गरिष्ठ आहार
(ग) पूरक आहार
(घ) दूध एवं अनाज से बने भोज्य पदार्थ।
उत्तरः
(ग) पूरक आहार।

12. शिशु के आहार में समावेश नहीं होना चाहिए –
(क) खनिज लवण-युक्त आहार
(ख) प्रोटीन-युक्त आहार
(ग) स्टार्च-युक्त आहार
(घ) विटामिन-युक्त आहार।
उत्तरः
(ग) स्टार्च-युक्त आहार।

13. शिशु के आहार में विटामिन ‘D’ की कमी को पूरा करने के लिए दूध में मिलाया जाना चाहिए –
(क) ग्लूकोज
(ख) शहद
(ग) कॉड लिवर ऑयल
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तरः
(ग) कॉड लिवर ऑयल।

14. शिशु को स्तनपान कराने का महत्त्व है –
(क) सन्तुलित आहार प्राप्त होता है
(ख) संक्रमण से बचाव होता है
(ग) माँ का दुलार प्राप्त होता है
(घ) ये सभी महत्त्व।
उत्तरः
(घ) ये सभी महत्त्व।

15. कौन-सा तत्त्व दूध से नहीं प्राप्त होता है –
(क) प्रोटीन
(ख) विटामिन ‘C’
(ग) वसा
(घ) कार्बोहाइड्रेट।
उत्तरः
(ख) विटामिन ‘C’।

16. शिशु के दाँतों को स्वस्थ रखने के लिए किस पोषक तत्त्व की आवश्यकता होती है –
(क) लोहा
(ख) विटामिन
(ग) कैल्सियम
(घ) प्रोटीन।
उत्तरः
(ग) कैल्सियम।

17. शिशुओं को विभिन्न टीके लगाए जाते हैं
(क) वजन बढ़ाने के लिए
(ख) विभिन्न रोगों से बचाव के लिए
(ग) सुन्दर एवं स्वस्थ बनाने के लिए
(घ) शारीरिक वृद्धि एवं विकास के लिए।
उत्तरः
(ख) विभिन्न रोगों से बचाव के लिए।

18. बी०सी०जी० का टीका किस रोग से बचाव करता है –
(क) चेचक
(ख) डिफ्थीरिया
(ग) तपेदिक या टी०बी०
(घ) टाइफॉइड।
उत्तरः
(ग) तपेदिक या टी०बी०।

19. दस्त एवं अतिसार की दशा में अति आवश्यक है –
(क) पौष्टिक आहार देना
(ख) विभिन्न औषधियाँ देना
(ग) लू से बचाव करना
(घ) निर्जलीकरण से बचाव करना।
उत्तरः
(घ) निर्जलीकरण से बचाव करना।

20. डी०पी०टी० का टीका किन रोगों की रोकथाम के लिए लगाया जाता है –
(क) प्लेग, रेबीज़ और कुष्ठरोग
(ख) तपेदिक, मलेरिया और काली खाँसी
(ग) डिफ्थीरिया, कर्णफेर और चेचक
(घ) काली खाँसी, डिफ्थीरिया और टिटेनस।
उत्तरः
(घ) काली खाँसी, डिफ्थीरिया और टिटेनस।

21. बालक में अच्छी आदतें डालने का सही समय है –
(क) किशोरावस्था
(ख) कभी नहीं
(ग) जीवन के प्रथम पाँच वर्ष
(घ) जब भी सुविधा हो।
उत्तरः
(ग) जीवन के प्रथम पाँच वर्ष।

UP Board Solutions for Class 11 Home Science