UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 4 पाचन तन्त्र

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 4 पाचन तन्त्र (Digestive System)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 4 पाचन तन्त्र

UP Board Class 11 Home Science Chapter 4 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पाचन तन्त्र से क्या आशय है? मनुष्य के पाचन तन्त्र के अंगों का चित्र सहित सामान्य परिचय दीजिए।
अथवा नामांकित चित्र की सहायता से पाचन तन्त्र का वर्णन कीजिए।
अथवा पाचन तन्त्र के विभिन्न अंगों का चित्र सहित वर्णन कीजिए।
अथवा पाचन तन्त्र का एक नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर:
पाचन तन्त्र का अर्थ (Meaning of Digestive System):
व्यक्ति चाहे जिस प्रकार का आहार ग्रहण करे, परन्तु आहार के तत्त्व व्यक्ति के शरीर के उपयोग में तभी आते हैं, जब उनका समुचित पाचन हो जाता है। भोजन को पचाने, तत्त्वों को अवशोषित करने आदि के लिए हमारे शरीर में एक लम्बी (लगभग 9 मीटर लम्बी) नली जैसी रचना होती है, जो मुखद्वार (mouth) से मलद्वार (anus) तक फैली रहती है। इस नली को पाचन प्रणाली या आहार नाल (alimentary canal) कहते हैं। आहार नाल में विभिन्न अंग या भाग होते हैं, जिनके आकार तथा कार्य भिन्न-भिन्न होते हैं।

आहार नाल के इन विभिन्न अंगों के अतिरिक्त मानव शरीर में कुछ अन्य अंग भी होते हैं, जो आहार के पाचन एवं शोषण में कुछ-न-कुछ सहायता प्रदान करते हैं तथा भोजन के स्वांगीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आहार नाल तथा ये सहायक अंग ही सम्मिलित रूप से मिलकर पाचन तन्त्र (digestive system) का निर्माण करते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि आहार नाल के समस्त अंग तथा आहार नाल के बाहर स्थित पाचन में सहायक अंग सम्मिलित रूप से पाचन तन्त्र कहलाते हैं।

मनुष्य की आहार नाल या पाचन तन्त्र के अवयव (Human Alimentary Canal or Organs of Digestive System):
मनुष्य की आहार नाल के मुख्य भाग निम्नवर्णित हैं-
(1) मुख व मुखगुहा (mouth and buccal cavity);
(2) ग्रसनी (pharynx);
(3) ग्रासनली (oesophagus);
(4) आमाशय (stomach) तथा
(5) आँत (intestine)।
इनका संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है-
1. मुख व मुखगुहा (Mouth and Buccal cavity): दो चल होंठों से घिरा हुआ हमारा मुखद्वार (mouth), मुखगुहा (buccal cavity) में खुलता है। मुखगुहा दोनों जबड़ों तक, गालों से घिरी चौड़ी गुहा है। इसकी छत तालू (palate) कहलाती है। तालू का अगला तथा अधिकांश भाग कठोर होता है, तथा कठोर तालू (hard palate) कहलाता है। इसके पीछे कंकालरहित कोमल तालू (soft palate) होता है जो अन्त में एक कोमल लटकन के रूप में होता है। इसे काग (uvula) कहते हैं। काग के इधर-उधर छोटी-छोटी गाँठों के रूप में गलांकुर (tonsils) होते हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 28
गाल, होंठ, तालू आदि मुखगुहा के अंग अन्दर से चिकने तथा कोमल प्रतीत होते हैं। ये अंग एक विशेष स्राव, श्लेष्मक (mucous) स्रावित करने वाली कोशिकायुक्त कोमल झिल्ली श्लेष्मिक कला से ढके रहते हैं। श्लेष्मक एक लसलसा तरल है और इसके साथ ही कुछ लार (saliva) भी रहती है, जो इसी झिल्ली में उपस्थित कोशिकाओं के द्वारा बनाई जाती है। किन्तु बड़ी तथा विशेष लार ग्रन्थियाँ (salivary glands) अलग से भीतरी भागों में होती हैं, जिनकी नलियाँ होंठों के पीछे तथा अन्य स्थानों में मुखगुहा के अन्दर खुलती हैं। निचले तथा ऊपरी जबड़े में कुल मिलाकर 32 दाँत (teeth) होते हैं। दाँतों की संख्या उम्र के साथ बदलती रहती है।

भोजन को दाँतों के द्वारा चबाए जाने पर मुख में उपस्थित लार इसमें मिल जाती है। लार में एक पाचक रस (एंजाइम) होता है, जिसे टायलिन कहते हैं। इस प्रकार, भोजन एक लुगदी के रूप में बदल दिया जाता है। जीभ भोजन में लार इत्यादि मिलाने में सहायता करती है।

2. ग्रसनी (Pharynx): नीचे जीभ तथा ऊपर काग के पीछे, कीप के आकार का लगभग 12 से 15 सेमी लम्बा भाग ग्रसनी (pharynx) कहलाता है। इसके तीन भाग किए जा सकते है
(क) नासाग्रसनी (nasal pharynx) जो श्वसन मार्ग के पीछे स्थित होता है;
(ख) स्वर-यन्त्री ग्रसनी, जहाँ वायुमार्ग तथा आहार मार्ग एक-दूसरे को काटते (cross) हैं तथा
(ग) मुख-ग्रसनी (oropharynx); . अर्थात् ठीक सामने वाला भाग, जो अन्त में ग्रासनली (oesophagus) में खुलता है।

3. ग्रासनली (Oesophagus): यह लगभग 25 सेमी लम्बी सँकरी नली है, जो गर्दन के पिछले भाग से प्रारम्भ होती है। यह वायु नलिका के साथ-साथ तथा इसके तल पृष्ठ पर स्थित होती है तथा पूरे वक्ष भाग से होती हुई तन्तु पट (diaphragm) को छेदकर उदर गुहा में पहुंचती है।

ग्रासनली की दीवार मोटी व मांसल होती है तथा भीतरी तल पर श्लेष्मिक कला से ढकी रहती है। यह कला एक लसलसा तरल श्लेष्मक स्रावित करती रहती है, जिससे इसकी गुहा मुलायम तथा चिकनी बनी रहती है। दीवार का भीतरी तल कई मोटी-मोटी सिलवटों में सिकुड़ा होने के कारण गुहा के रास्ते को लगभग रुंधा हुआ रखता है। जब भोजन नली में आता है तो वह काफी फैल सकती है। ग्रासनली आमाशय में खुलती है।

4. आमाशय (Stomach): आमाशय उदर गुहा में आड़ी अवस्था में स्थित एक मशक की तरह की रचना है। आहार नाल का यह सबसे चौड़ा भाग है, जिसकी लम्बाई लगभग 25-30 सेमी तथा चौड़ाई 10 सेमी होती है। आमाशय के स्पष्ट रूप से दो भाग किए जा सकते हैं—एक, प्रारम्भ का अधिक चौड़ा भाग, जिसमें ग्रासनली खुलती है-हृदयी भाग (cardiac part) कहलाता है; जबकि दूसरा भाग क्रमशः सँकरा होता जाता है और एक निकास द्वार के द्वारा आँत के प्रथम भाग में खुलता है। इस भाग को पक्वाशयी भाग (pyloric part) तथा निकास द्वार को पक्वाशयी छिद्र (pyloric aperture) कहते हैं।

सम्पूर्ण आहार नाल की अपेक्षा आमाशय की दीवार में सबसे अधिक पेशियाँ (muscles) होती हैं; अत: यह सबसे अधिक मोटी होती है। इसकी श्लेष्म कला में श्लेष्मक उत्पन्न करने वाली कोशिकाओं के अतिरिक्त सहस्रों विशेष ग्रन्थियाँ होती हैं, जिन्हें जठर ग्रन्थियाँ (gastric glands) कहते हैं। ये जठर रस (gastricjuice) नामक पाचक रस बनाती हैं। आमाशय की दीवार में भी अनेक उभरी हुई सिलवटें होती हैं।

5. आँत (Intestine): आहार नाल का शेष भाग आँत कहलाता है तथा यह अत्यधिक कुण्डलित होकर लगभग पूरी उदर गुहा को घेरे रहता है। इसके दो प्रमुख भाग किए जा सकते हैं-छोटी आँत तथा बड़ी आँत।
(क) छोटी आँत (small intestine): यह लगभग 5 मीटर लम्बी अत्यधिक कुण्डलित नली है जिसको तीन भागों में बाँटा जा सकता है-

  • ग्रहणी,
  • मध्यान्त्र तथा (
  • शेषान्त्र।

(i) ग्रहणी या पक्वाशय (duodenum): यह लगभग 25 सेमी लम्बी, छोटी आंत की सबसे छोटी तथा चौड़ी नलिका है। आमाशय इसी में पक्वाशयी छिद्र (pyloric aperture) द्वारा खुलता है। यह भाग आमाशय के साथ लगभग ‘C’ का आकार बनाता है। इसके मुड़े हुए भाग तथा आमाशय के बीच अग्न्याशय (pancreas) नामक ग्रन्थि होती है।

यकृत (liver) ग्रन्थि, जो आहार नाल के बाहर स्थित होती है, शरीर में उपस्थित सबसे बड़ी ग्रन्थि है। इससे पित्त रस बनता है। पित्त रस को लाने वाली पित्त नली (bile duct) तथा अग्न्याशय से आने वाली अग्न्याशयिक नली (pancreatic duct); पक्वाशय में ही खुलती हैं।

(ii) मध्यान्त्र (jejunum): यह लगभग 2.5 मीटर लम्बी, 4 सेमी चौड़ी नलिका है, जो अत्यधिक कुण्डलित होती है।

(iii) शेषान्त्र (ileum): यह लगभग 2.75 मीटर लम्बी व 3.5 सेमी चौड़ी कुण्डलित आँत है। छोटी आंत की दीवारें अपेक्षाकृत पतली होती हैं, किन्तु इनमें मांसपेशियाँ आदि सभी स्तर होते हैं। ग्रहणी को छोड़कर शेष छोटी आंत में भीतरी सतह पर असंख्य छोटे-छोटे उँगली के आकार के उभार आँत की गुहा में लटके रहते हैं। इनको रसांकुर (villi) कहते हैं। इनकी उपस्थिति के कारण आँत की भीतरी दीवार तौलिए की तरह रोएँदार होती है।

प्रत्येक रसांकुर की बनावट उँगली के समान होती है। यह पचे हुए भोजन को सोखने (अवशोषित करने) के लिए, अत्यधिक विशिष्ट संरचना वाली होती है। रसांकुरों के बीच-बीच में, श्लेष्म कला में आन्त्र ग्रन्थियाँ (intestinal glands) होती हैं जो एक पाचक रस, आन्त्री रस (intestinal juice) बनाती हैं।

(ख) बड़ी आँत (large intestine): छोटी आंत के बाद शेष आहार नाल बड़ी आँत का निर्माण करती है। यह लम्बाई में छोटी आंत से छोटी किन्तु अधिक चौड़ी होती है। इसमें तीन भाग स्पष्ट दिखाई देते हैं-

  • उण्डुक,
  • कोलन तथा
  • मलाशय। छोटी आँत, बड़ी आँत के किसी एक भाग में खुलने के बजाय उण्डुक तथा कोलन के संगम स्थान पर खुलती है।

(i) उण्डुक (caecum): यह लगभग 6 सेमी लम्बी, 7.5 सेमी चौड़ी थैली की तरह की संरचना है, जिससे लगभग 9 सेमी लम्बी सँकरी, कड़ी तथा बन्द नलिका निकलती है। इसको कृमिरूप परिशेषिका (vermiform appendix) कहते हैं। वास्तव में यह संरचना मानव शरीर में अनावश्यक है; अत: कई बार यह रोगग्रस्त हो जाती है और तब शल्य क्रिया द्वारा इसे निकाल दिया जाता है।

(ii) कोलन (colon): यह लगभग 1.25 सेमी लम्बी, 6 सेमी चौड़ी नलिका है, जो ‘U’ की तरह पूरी छोटी आँत को घेरे रहती है। इसका अन्तिम भाग मध्य से कुछ बाईं ओर झुककर मलाशय (rectum) में खुलता है।

(iii) मलाशय (rectum): लगभग 12 सेमी लम्बा तथा 4 सेमी चौड़ा नलिका की तरह का यह भाग अपने अन्तिम 3-4 सेमी भाग में काफी सँकरी नली बनाता है। इसे गुदा नाल (anal canal) कहते हैं। इसकी भित्ति में मजबूत संकुचनशील पेशियाँ होती हैं तथा यह एक छिद्र गुदा द्वार (anal aperture) द्वारा बाहर खुलती है। इस छिद्र को भी पेशियाँ बन्द किए रखती हैं।

उपर्युक्त विवरण द्वारा पाचन तन्त्र के मुख्य अंगों का सामान्य परिचय प्राप्त होता है। ये अंग वास्तव में आहार नाल के भाग हैं तथा इनके माध्यम से शरीर में आहार चलता है और उसका व्यर्थ भाग मल के रूप में विसर्जित हो जाता है। परन्तु पाचन तन्त्र के कुछ अन्य अंग भी हैं, जो आहार नाल से बाहर स्थित होते हैं। इस वर्ग के अंग हैं—यकृत (liver), पित्ताशय (gall bladder), अग्न्याशय या क्लोम (pancreas) तथा प्लीहा या तिल्ली (spleen)।

प्रश्न 2.
आहार नाल के एक मुख्य भाग के रूप में आमाशय की संरचना चित्र द्वारा स्पष्ट कीजिए।
अथवा आमाशय की रचना नामांकित चित्र द्वारा समझाइए। आमाशयिक रस से स्रावित होने वाले मुख्य एन्जाइम्स के नाम और कार्य लिखिए।
उत्तर:
आहार नाल का एक भाग : आमाशय (Stomach : A Part of Alimentary Canal):
आहार नाल एवं पाचन तन्त्र में आमाशय (stomach) का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वास्तव में मुख द्वारा ग्रहण किया गया आहार सर्वप्रथम आमाशय में ही जाकर रुकता है तथा वहाँ उसका व्यवस्थित पाचन प्रारम्भ होता है।

आमाशय की संरचना (Structure of Stomach):
यह एक थैले के समान होता है, जो एक सिरे पर चौड़ा परन्तु दूसरे सिरे पर सँकरा होता है। निगल या भोजन नलिका (oesophagus) का अन्तिम सिरा आमाशय से जुड़ा रहता है। इसकी लम्बाई 25-30 सेमी और चौड़ाई 9-10 सेमी होती है। इसमें दो मार्ग होते हैं—एक भोजन आने का मार्ग, जो बाईं ओर हृदय के पास होता है, हृदयी द्वार या कार्डियक छिद्र (cardiac opening) कहलाता है; दूसरा मार्ग आमाशय के निचले भाग में दाहिनी ओर स्थित होता है, जो पाइलोरिक सिरा (pyloric end) है। इस सिरे के छिद्र को पक्वाशयी छिद्र या पाइलोरिक छिद्र (pyloric opening) कहते हैं। आमाशय की भित्ति में श्लेष्मिक कला का अधिच्छद होता है, जिसमें अनेक ग्रन्थियाँ होती हैं। इनसे ही जठर रस या आमाशय रस निकलता है।

आमाशय की अन्दर की भित्ति में चार परतें होती हैं
1. पेरीटोनियम (Peritoneum): यह सबसे बाहर की परत होती है।

2. पेशी स्तर (Muscular layer): इसमें भी दो परतें होती हैं

  • आयाम पेशी स्तर (longitudinal muscle layer): इन मांसपेशियों के तन्तु लम्बाई में लगे होते हैं।
  • वर्तुल पेशी स्तर (circular muscle layer): इन मांसपेशियों के तन्तु गोलाई में लगे होते हैं।

3. अधोश्लेष्मिक स्तर (Submucosa layer): यह तीसरा स्तर है।

4. श्लेष्मिक कला (Mucous membrane): यह आमाशय की भित्ति की सबसे अन्दर की परत या झिल्ली होती है। इस झिल्ली में अनेक रक्त केशिकाएँ फैली होती हैं, इसी कारण इसका रंग लाल दिखाई देता है। इसमें जठर ग्रन्थियाँ भी होती हैं। जठर ग्रन्थि की भित्ति ऐपिथीलियम कोशिकाओं की बनी होती है। जठर ग्रन्थियाँ जठर रस बनाती हैं। यह रस ग्रहण किए गए आहार के पाचन में महत्त्वपूर्ण योगदान करता है। आमाशयिक रस में पेप्सिन तथा रेनिन नामक दो एन्जाइम्स पाए जाते हैं। पेप्सिन का मुख्य कार्य है—आहार की प्रोटीन को घुलनशील पेप्टोन में बदलना। इसके अतिरिक्त रेनिन के प्रभाव से दूध फट जाता है तथा उसकी प्रोटीन अलग हो जाती है अर्थात् यह प्रोटीन के पाचन में सहायक होता है।
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प्रश्न 3.
आहार के पाचन से क्या आशय है? आहार नाल के विभिन्न भागों में होने वाले पाचन का विवरण प्रस्तुत कीजिए। अथवा पाचन से क्या तात्पर्य है? पाचन तन्त्र के भिन्न-भिन्न भागों में भोजन को पचाने में सहायता देने वाले विभिन्न पाचक रसों का उल्लेख करते हुए पाचन क्रिया का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पाचन (Digestion):
पाचन का अर्थ है अघुलनशील (जल में) एवं जटिल भोज्य पदार्थों को घुलनशील एवं सरल अवस्था में बदलकर उन्हें अवशोषण (absorption) के योग्य बनाना, जिससे वे रुधिर में मिलकर शरीर के विभिन्न भागों में पहुँच जाएँ।

पाचन क्रिया वास्तव में कुछ भौतिक और रासायनिक क्रियाओं के द्वारा होती है। इन क्रियाओं में (विशेषकर रासायनिक क्रियाओं में) कुछ सूक्ष्म मात्रा में पाए जाने वाले पदार्थ विशेष महत्त्व के हैं, जो इन क्रियाओं को उत्तेजित करते हैं तथा चलाते हैं। इन्हें विकर या एंजाइम (enzyme) कहते हैं। इस प्रकार ठोस, अघुलनशील व अविसरणशील (indiffusible) खाद्य को पाचक एंजाइम्स (digestive enzymes) द्वारा घुलनशील व विसरणशील रूप में बदलने की क्रिया को पाचन (digestion) कहते हैं। पाचन वास्तव में एंजाइम जल-अपघटन (enzymatic hydrolysis) की क्रिया होती है, जिसमें एंजाइम कार्बनिक उत्प्रेरकों का कार्य करते हैं और जल का एक अणु, भोजन के एक अणु से मिलकर दो भागों में टूटता है। यही प्रक्रम होते रहने से भोजन घुलनशील व विसरणशील अवस्था में आ जाता है। इसके बाद आँत आदि की दीवारों द्वारा अवशोषण (absorption) होता है। पाचन की क्रिया मुख से प्रारम्भ हो जाती है तथा पाचन तन्त्र के विभिन्न भागों में भिन्न-भिन्न रूप में सम्पन्न होती है। पाचन के उपरान्त व्यर्थ बचे पदार्थों का विसर्जन मल के रूप में मलद्वार द्वारा हो जाता है। पाचन क्रिया को विस्तृत रूप से निम्नलिखित पदों में समझा जा सकता है-

1. मुखगुहीय पाचन (Digestion in buccal cavity):
व्यक्ति द्वारा मुख में भोजन ग्रहण करने के बाद मुखगुहा में दाँतों द्वारा चबाया जाता है। इस समय जीभ भोजन को उलटने-पलटने में, गाल भोजन को मुखगुहा में रोके रखने में तथा लार भोजन को पचाने में सहायता करती है।

मुखगुहा में भोजन चबाते समय लार ग्रन्थियों से लार (saliva) इस भोजन में मिलती है। लार कुछ क्षारीय होती है और इसमें मुख्य रूप से टायलिन नामक एंजाइम पाया जाता है। टायलिन से मण्ड घुलनशील शर्करा (maltose) में बदलता है। लार भोजन को चिकना बनाती है जिससे भोजन सरलता से ग्रास नलिका द्वारा आमाशय में जाता है।

2. आमाशयिक पाचन (Gastric digestion):
आमाशय में जैसे ही भोजन पहुँचता है, इसकी दीवारों से गैस्ट्रिन (gastrin) नामक एक हॉर्मोन निकलता है। यह हॉर्मोन रुधिर परिसंचरण के साथ जठर ग्रन्थियों में पहुँचकर उन्हें उत्तेजित करता है। जठर ग्रन्थियों से जठर रस भोजन में मिलकर उसका पाचन करता है।

क्रमाकुंचन गति के कारण यह जठर रस, आमाशय के अन्दर भोजन में अच्छी तरह मिल जाता है। जठर रस में लगभग 90% जल और थोड़ा-सा (लगभग 1%) नमक का अम्ल (HCl) होता है। इसके अतिरिक्त इसमें पेप्सिन (pepsin) तथा रेनिन (renin) नामक दो एंजाइम्स होते हैं। HCl के कारण भोजन में उपस्थित जीवाणु आदि नष्ट हो जाते हैं और भोजन अम्लीय हो जाता है। पेप्सिन इस अम्लीय माध्यम में प्रोटीन को घुलनशील पेप्टोन (peptone) में बदल देता है।

रेनिन (renin) के प्रभाव से दूध (milk) फट जाता है। यह बच्चों में अधिक उपयोगी होता है क्योंकि बच्चों का प्रमुख भोजन दूध होता है। बच्चों के जठर रस में गैस्ट्रिक लाइपेज नाम का एंजाइम भी होता है, जो दूध में उपस्थित वसा को वसा अम्लों व ग्लिसरॉल में बदल देता है।

आमाशय के अन्दर मांसपेशियों की क्रमाकुंचन गति के कारण भोजन अच्छी तरह मथ जाता है और पानी से मिलकर लेई के समान हो जाता है। लेई के समान भोजन की इस लुगदी को काइम (chyme) कहते हैं। काइम बनने के बाद आमाशय का पाइलोरस द्वार धीरे-धीरे खुलने लगता है और काइम ग्रहणी में चला जाता है।

3. आन्त्रीय पाचन (Intestinal digestion):
ग्रहणी (duodenum) की दीवार से दो प्रकार के हॉर्मोन्स स्रावित होते हैं। सीक्रीटिन रुधिर परिसंचरण द्वारा अग्न्याशय (pancreas) में जाकर उसे उत्तेजित करता है, फलतः अग्न्याशय रस (pancreatic juice) निकलकर काइम पर आ जाता है। इसी प्रकार, कोलीसिस्टोकाइनिन यकृत में पहुँचकर पित्ताशय की दीवार को उत्तेजित कर उसे पिचकाता है, फलत: पित्त रस निकलकर काइम पर आ जाता है। पित्त रस क्षारीय होता है, जिसके कारण यह काइम की अम्लीयता को नष्ट कर देता है। इसी अवस्था में अग्न्याशय रस क्रियाशील होता है।

(क) पित्त रस (bile juice) में सोडियम बाइकार्बोनट (Narcos), टारोकोलेट (taurocholate), ग्लाइकोलेट (glycolate) तथा कोलेस्ट्रॉल (cholestrol) आदि कई लवण तथा पित्त रंगाएँ (bile pigments) होते हैं, जो वसाओं को महीन कर, अवशोषण के योग्य बनाते हैं। पित्त की उपस्थिति में अग्न्याशय रस क्रियाशील होकर पाचन कार्य करता है। पित्त जीवाणुनाशक होने के कारण आँत के अन्दर खाद्य पदार्थों को सड़ने से बचाता है।

(ख) अग्न्याशय रस (pancreatic juice) में तीन प्रकार के एंजाइम्स पाए जाते हैं

  • एमाइलोप्सिन (amylopsin): यह मण्ड पर क्रिया कर उसे शर्करा में बदल देता है।
  • ट्रिप्सिन (trypsin): यह प्रोटीन्स पर क्रिया कर उन्हें घुलनशील पेप्टोन (peptones) में बदलता है।
  • स्टीएप्सिन (steapsin) या लाइपेज (lipase)-यह वसाओं को वसीय अम्ल तथा ग्लिसरॉल में बदल देता है।

4. क्षुद्रान्त्री पाचन (Digestion in ileum):
ग्रहणी में भोजन का पाचन लगभग मूर्ण हो चुका होता है। अब ये भोज्य पदार्थ इस अवस्था में क्षुद्रान्त्र (ileum) में पहुँचते हैं। यहाँ क्षुद्रान्त्र की दीवारों से आन्त्र रस आता है, जो अधपचे भोजन के साथ मिलकर इसे पचाने में सहायक होता है। इसमें कई महत्त्वपूर्ण एंजाइम्स होते हैं, जो आहार के बिना पचे प्रोटीन एवं कार्बोहाइड्रेट के पाचन में सहायता करते हैं। क्षुद्रान्त्र में ही भोजन के पचे हुए अवयवों; जैसे-अमीनो अम्ल, ग्लूकोज, ग्लिसरॉल तथा वसीय अम्लों का अवशोषण होता है। अपच भोजन वृहदान्त्र के कोलन (colon) भाग में भेज दिया जाता है।

बड़ी आंत के कार्य (Functions of Large Intestine):
बड़ी आँत के कोलन (colon) भाग में आ जाने तक भोजन के अधिकांश पचे हुए अवयवों का अवशोषण भी हो जाता है। बड़ी आँत का प्रमुख कार्य जल, खनिज लवण तथा कुछ विटामिन्स इत्यादि का अवशोषण करना है। क्षारीय म्यूसिन (mucin) के स्रावण से बड़ी आँत के प्रारम्भिक भाग में शेष भोजन मुलायम बना रहता है तथा इसमें आए एंजाइम्स इत्यादि भोजन पर क्रिया करते रहते हैं। बड़ी आँत में किसी प्रकार का पाचक रस या एंजाइम्स स्रावित नहीं होता है। अधिकांश जल के अवशोषण से अपच भोजन मलाशय में पहुँचते-पहुँचते अर्द्ध-ठोस हो जाता है और मल का रूप ले लेता है। उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि आहार के पाचन में विभिन्न एंजाइम्स महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं।

प्रश्न 4.
यकृत की संरचना स्पष्ट करते हुए इसके पाचन सम्बन्धी कार्यों का उल्लेख कीजिए। अथवा मानव शरीर में यकृत की स्थिति, बनावट और कार्यों का विवरण दीजिए। अथवा यकृत के कार्य लिखिए।
उत्तर:
यकृत की संरचना (Structure of Liver)
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 30
यकृत (liver) कुछ भूरे-लाल रंग की शरीर की सबसे बड़ी ग्रन्थि होती है। यह उदर के ऊपर मध्यपट के नीचे पसलियों के पास स्थित होती है। इसके दो भाग होते हैं, दाहिना भाग बाएँ भाग से कुछ बड़ा होता है। एक स्वस्थ व्यक्ति के यकृत का भार लगभग 1.5 किग्रा होता है। यकृत में रुधिर दो मार्गों द्वारा आता है। एक ओर यकृत में शुद्ध रक्त दो यकृत धमनियों (hepatic arteries) के माध्यम से आता है। ये धमनियाँ महाधमनी की शाखाएँ हैं। दूसरी ओर आहार नाल के विभिन्न भागों से निवाहिका शिरा (hepatic portal vein) के माध्यम से यकृत में शुद्ध रक्त आता है। यकृत से अशुद्ध रुधिर बाहर ले जाने वाली रुधिर वाहिनियाँ, यकृत शिराएँ (hepatic veins) कहलाती हैं।

यकृत के नीचे की ओर पास में ही एक छोटी-सी थैली स्थित होती है, जिसे पित्ताशय (gall bladder) कहते हैं। यकृत में बनने वाला हरे रंग का पित्त रस (bile juice) इसमें इकट्ठा रहता है, जो यकृत से कई छोटी-छोटी नलियों द्वारा इसमें आता है।

पाचन तन्त्र में यकृत के कार्य (Functions of Liver in Digestive System):
यद्यपि यकृत शरीर के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य करता है, तथापि पाचन तन्त्र एवं पाचन क्रिया के लिए भी इसका अत्यधिक महत्त्व है। पाचन तन्त्र और शरीर में भोजन की उपस्थिति से सम्बन्धित यकृत के निम्नलिखित कार्य हैं-

1. पित्त रस का स्त्रावण करता है: यकृत पित्त रस का स्रावण करता है। यह एक क्षारीय द्रव है जिसमें पित्त लवण, कॉलेस्टेरॉल,लेसिथिल तथा पित्त वर्णक कोशिकाएँ पायी जाती हैं। पित्त रस

  • आमाशय से आए भोजन को क्षारीय बनाता है;
  • वसा के इमल्सीकरण में सहायक होता है;
  • भोजन को सड़ने से रोकता है;
  • हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है;
  • पित्त वर्णक, लवण आदि उत्सर्जी पदार्थों को यकृत से बाहर ले जाने का कार्य करता है;
  • आहार नाल में क्रमाकुंचन गति उद्दीप्त करता है।

2. ग्लाइकोजन के रूप में ग्लूकोज का संचय करता है: स्वांगीकरण के समय जब रुधिर में ग्लूकोज की मात्रा अधिक होती है तो यकृत कोशिकाएँ ग्लूकोज को ग्लाइकोजन में बदल देती हैं। इस क्रिया को ग्लाइकोजेनेसिस (glycogenesis) कहते हैं।

3. ग्लुकोजिनोलाइसिस (glucogenolysis): इस क्रिया के अन्तर्गत जब रुधिर में ग्लूकोज की मात्रा कम हो जाती है तो संचित ग्लाइकोजन पुन: ग्लूकोज में बदल जाता है।

4. ग्लाइकोनियोजेनेसिस (glyconeogenesis): इस क्रिया के द्वारा यकृत कोशिकाएँ आवश्यकता पड़ने पर अमीनो अम्ल तथा वसीय अम्लों आदि से भी ग्लूकोज का निर्माण कर लेती हैं।

5. वसा एवं विटामिन्स का संश्लेषण एवं संचय करता है: यकृत कोशिकाएँ ग्लूकोज को वसा में भी बदल सकती हैं। यह वसा, वसीय ऊतकों (adipose tissues) में संग्रह के लिए पहुँचा दी जाती है। इसी प्रकार विटामिन्स का भी संश्लेषण हो जाता है।

6. अकार्बनिक पदार्थों का संचय करता है: यकृत द्वारा अकार्बनिक पदार्थ संचित किए जाते हैं।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 4 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मनुष्य के दाँत कितने प्रकार के होते हैं?
उनके कार्यों का भी उल्लेख कीजिए।
अथवा कृन्तक तथा चर्वणक दाँतों की उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।
अथवा वयस्क मनुष्य में दाँतों के प्रकार व उनके कार्य लिखिए।
उत्तर:
आहार के पाचन की प्रक्रिया में दाँतों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। दाँत ग्रहण किए गए आहार को काटने, फाड़ने तथा चबाने का कार्य करते हैं। मनुष्य के दाँत चार प्रकार के होते हैं, जिनकी संख्या एवं कार्यों का संक्षिप्त परिचय अग्रलिखित है-

  • कृन्तक दाँत: इन्हें छेदक भी कहते हैं। इनके किनारे तेज धार वाले होते हैं। इनका मुख्य कार्य भोजन को कुतरना है। इनकी कुल संख्या 8 होती है। ये बच्चों एवं वयस्कों में समान होते हैं।
  • भेदक दाँत: इन्हें रदनक या श्वसन दाँत भी कहते हैं। ये कृन्तक दाँतों से अधिक लम्बे व नुकीले होते हैं। इनकी संख्या 4 होती है। भोजन को काटना, चीरना व फाड़ना इनका मुख्य कार्य है।
  • अग्रचर्वणक: इनकी संख्या 8 होती है। इनके किनारे चपटे, चौकोर तथा रेखाओं द्वारा बँटे होते हैं।
  • चर्वणक दाँत: इस वर्ग के दाँत केवल वयस्कों में होते हैं अर्थात् छोटे बच्चों में ये नहीं होते। ये संख्या में 12 होते हैं। इनके सिरे चौरस व तेज धार वाले होते हैं। इनका मुख्य कार्य भोजन को चबाना है।

प्रश्न 2.
दाँत की संरचना चित्र सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
दात की संरचना
आकार एवं कार्यों के अनुसार हमारे दाँत चार प्रकार के होते हैं, परन्तु सभी प्रकार के दाँतों की रचना लगभग समान ही होती है। ये जबड़े की अस्थि के गड्ढों में अपने मूल वाले भाग से जमे रहते हैं। एक सीमेण्ट जैसे पदार्थ से दाँत की अस्थि के साथ पकड़ अत्यधिक मजबूत होती है। इसके अतिरिक्त इसके निचले भाग पर मसूड़े चढ़े रहते हैं। सभी दाँत डेण्टाइन नामक पदार्थ से बने होते हैं। यह पदार्थ हड्डी से भी मजबूत होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 31
प्रत्येक दाँत तीन भागों में विभक्त होता है-
1. शिखर (Crown): मसूड़े के आगे बाहर दिखाई देने वाला भाग ही शिखर है। यह सफेद एवं चमकदार होता है। इसकी बाहरी पर्त अत्यन्त कठोर पदार्थ की बनी होती है। इसे दन्तवल्क (enamel) कहते हैं। यह दाँतों को घिसने से बचाता है। दाँतों का यही भाग प्रमुख कार्यकारी भाग है।

2. ग्रीवा (Neck): शिखर एवं मूल के बीच का भाग ग्रीवा कहलाता है।

3. मूल (Root): यह ऊपर से दिखाई नहीं देता और मसूड़ों तथा अस्थि के अन्दर स्थित होता है। प्रत्येक प्रकार के दाँत में इनकी संख्या भिन्न-भिन्न होती है। जैसे-चर्वणक में तीन, अग्र चर्वणक में दो तथा शेष दाँतों में एक-एक मूल होती है, जो अत्यन्त मजबूती से अस्थि में जुड़ी हुई तथा मसूड़ों से चिपकी रहती है।

सभी दाँत अन्दर से खोखले होते हैं। इस खोखले भाग को दन्त गुहा (pulp cavity) कहते हैं, जो दन्त मज्जा से भरी होती है। इसमें अनेक सूक्ष्म रक्त नलिकाएँ, स्नायु जाल तथा तन्तु पाए जाते हैं। प्रत्येक दाँत के मूल में एक छोटा छिद्र होता है। इसी छिद्र से ये केशिकाएँ तथा नलिकाएँ इत्यादि दन्त मज्जा में आती हैं।

प्रश्न 3.
आमाशय के पाचन सम्बन्धी कार्यों का उल्लेख कीजिए। अथवा आमाशय में पाए जाने वाले दो मुख्य एन्जाइमों के नाम एवं कार्य लिखिए। अथवा पाचन तन्त्र में रेनिन का कार्य लिखिए। यह कहाँ पाया जाता है?
उत्तर:
आमाशय में भोजन लार व श्लेष्मक में मिला हुआ तथा काफी पिसी हुई अवस्था में आता है, जिसका कुछ मण्ड (starch) भी शर्कराओं में बदल चुका होता है। यहाँ भोजन को जठर ग्रन्थियों से निकला हुआ जठर रस (gastric juice) मिलता है। इसमें नमक का अम्ल (hydrochloric acid) होता है, जो भोजन को लेई जैसी भूरे रंग की काइम (chyme) के रूप में बदलने में अत्यधिक सहायक होता है। आमाशय में हर समय तरंग गति या क्रमाकुंचन गति (peristalsis) होती रहती है। इसके कारण भोजन जठर रस के साथ खूब मिलने के साथ-साथ पिस भी जाता है। उधर, जठर रस में उपस्थित एंजाइम्स इसे पचने में सहायता करते हैं, विशेषकर इसके प्रोटीन वाले भाग के पाचन में।

जठर रस में दो पाचक एंजाइम्स होते हैं-
(i) रेनिन (renin): यह आमाशय की भित्ति में उपस्थित जठर ग्रन्थियों द्वारा स्रावित जठर रस में पाया जाता है। रेनिन नामक एंजाइम दूध को फाड़कर उसकी प्रोटीन (protein) को अलग कर देता है
और इस प्रकार इसके पचने में सहायता करता है। यहाँ यह ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि रेनिन पहले निष्क्रिय अवस्था (प्रोरेनिन के रूप) में होता है और नमक के अम्ल की उपस्थिति में ही सक्रिय होता है।

(ii) पेप्सिन (pepsin): यह भी पहले निष्क्रिय अवस्था में होता है और अम्ल की उपस्थिति में सक्रिय होता है। यह प्रोटीन पर क्रिया करता है और उसे उसके अवयवों में तोड़ देता है। इससे बनने वाले प्रमुख सरल यौगिक पेप्टोन्स (peptones) तथा प्रोटिओजेज (proteoses) होते हैं। दूध की प्रोटीन (केसीन) पर भी यही एंजाइम क्रिया करता है।

सामान्य स्थिति में ग्रहण किया गया आहार आमाशय में 3-4 घण्टे तक रहता है। यदि व्यक्ति चिन्ता, भय या तनाव से ग्रस्त हो तो आमाशय में आहार अधिक समय तक भी रह सकता है तथा ऐसे में पाचन की क्रिया सुचारु रूप से नहीं चल पाती।

प्रश्न 4.
पाचन तन्त्र में पाए जाने वाले पाचक रसों एवं उनके एंजाइम्स का विवरण प्रस्तुत कीजिए। अथवा आहार नाल में प्राप्त होने वाले मुख्य एंजाइम्स के नाम और उनके कार्यों का वर्णन कीजिए तथा आहार नाल के जिन अंगों से इनका स्त्राव होता है, उनकी सूची तैयार कीजिए। अथवा पाचन तन्त्र में स्रावित होने वाले प्रमुख एंजाइम्स के नाम तथा कार्य लिखिए।
उत्तर:
पाचक रस तथा एंजाइम्स
आहार नाल में पाए जाने वाले विभिन्न पाचक रसों, उनके एंजाइम्स तथा उनके कार्य आदि को निम्नांकित तालिका के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है

पाचक रस उनके एंजाइम्स तथा उनका पाचन क्षेत्र:
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 32
तालिका से स्पष्ट है कि मनुष्य की आँत में भोजन का पाचन मुखगुहा से प्रारम्भ हो जाता है तथा इसके विभिन्न अवयवों का पाचन भिन्न-भिन्न रसों में पाए जाने वाले विभिन्न एंजाइम्स के कारण होता है। भोजन को आहार नाल में आगे बढ़ाने के लिए क्रमाकुंचन नामक एक विशेष प्रकार की गति होती है, जिससे भोजन का पाचक रस के साथ मन्थन भी होता है।

प्रश्न 5.
यकृत का शरीर में महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यकृत का शरीर में महत्त्व
यकृत शरीर में सबसे बड़ी ग्रन्थि है, जो पाचन क्रिया में सहायक अंग की भूमिका निभाती है। इसका शरीर के सम्पूर्ण उपापचय (metabolism) में अत्यधिक महत्त्व है। शरीर की लगभग सभी क्रियाओं में इसका कोई-न-कोई योगदान होता है अथवा क्रिया को करने में यह नियन्त्रक का कार्य करता है। इसके महत्त्व को स्पष्ट करने के लिए निम्नलिखित बिन्दु महत्त्वपूर्ण हैं

  • यह शरीर की अनेक उपापचयी क्रियाओं को चलाता है; जैसे— भोजन में आए विभिन्न पोषक पदार्थों को तोड़ना, जोड़ना अथवा उनका आवश्यकतानुसार स्वरूप परिवर्तित करना।
  • पित्त रस का निर्माण करना, जो शरीर की मुख्य पाचन क्रिया में सहायता करता है। (3) शरीर में आए हुए अथवा उप-उत्पादों के रूप में शरीर में बन गए विषों को नष्ट करना।
  • अनेक हानिकारक अथवा अनुपयोगी पदार्थों का स्वरूप बदलकर उन्हें अहानिकारक तथा उत्सर्जन योग्य बनाना; जैसे-अमोनिया को यूरिया या यूरिक अम्ल में बदलना।।
  • शरीर के लिए संग्राहक (store house) का कार्य करना; जैसे—ग्लाइकोजन के रूप में श्वेतसार (कार्बोज) एकत्र करना।
  • विभिन्न बेकार, मृत तथा टूटी-फूटी कोशिकाओं को नष्ट करना तथा उन्हें पित्त रस के द्वारा शरीर से बाहर निकालने का प्रबन्ध करना। जैसे-यह रुधिर के साथ आई बेकार कोशिकाओं को नष्ट करता है।
  • अनेक पाचन सम्बन्धी कार्यों में महत्त्वपूर्ण योगदान करना।

प्रश्न 6-एक रोगी के यकृत ने काम करना बन्द कर दिया। उस व्यक्ति पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
यदि किसी व्यक्ति का यकृत कार्य करना बन्द कर दे तो उसके शरीर में अमोनिया जैसे विषैले तत्त्वों की मात्रा बढ़ जाती है तथा शरीर की विभिन्न महत्त्वपूर्ण क्रियाएँ भी रुक जाती हैं। ऐसे में व्यक्ति के शरीर पर अत्यधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगते हैं। यकृत के पूरी तरह से काम बन्द कर देने के 24 घण्टे के अन्दर ही व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।

प्रश्न 7.
श्वेतसार के पाचन का विवरण प्रस्तुत कीजिए। अथवा पाचन तन्त्र में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन तथा वसा के पाचन का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
श्वेतसार का पाचन श्वेतसार; जैसे मण्ड का पाचन मुखगुहा में लार से ही प्रारम्भ हो जाता है। टायलिन (ptylin) ‘ नामक एंजाइम यहाँ इस पर क्रिया करके इसे जटिल शर्कराओं में तोड़ देता है। बनने वाली शर्कराओं में माल्टोज, सुक्रोज आदि होती हैं।

मण्ड आदि का आमाशय में पाचन नहीं होता; शेष श्वेतसारों का पाचन ग्रहणी में अग्न्याशय रस (pancreatic juice) के एमाइलेज एंजाइम से होता है। यहाँ भी जटिल शर्कराएँ बनती हैं। जटिल शर्कराओं का पाचन छोटी आँत में आन्त्र रस (intestinal juice) के विभिन्न एंजाइम्स के द्वारा सम्पन्न होता है; जैसे–माल्टोज का माल्टेज के द्वारा, सुक्रोज का सुक्रेज के द्वारा तथा लैक्टोज का लैक्टेज के द्वारा आदि। इस प्रकार, इनके पचने से ग्लूकोज या फ्रक्टोज जैसी जल में पूर्णतः विलेय तथा कोशिकाओं द्वारा ग्राह्य शर्कराएँ बन जाती हैं।
(नोट-प्रोटीन तथा वसा के पाचन का विवरण आगामी प्रश्नों के अन्तर्गत प्रस्तुत किया गया है।)

प्रश्न 8.
प्रोटीन के पाचन का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
प्रोटीन का पाचन आहार में विद्यमान प्रोटीन का पाचन आमाशय से प्रारम्भ होता है। प्रोटीन का पाचन अम्लीय माध्यम में (HCl अम्ल की उपस्थिति में) पेप्सिन (pepsin) नामक एंजाइम द्वारा होता है। यह एंजाइम जठर रस में होता है। इसके प्रभाव से प्रोटीन्स पेप्टोन्स तथा पॉलीपेप्टाइड्स में टूट जाते हैं। सामान्यत: इससे अधिक पाचन आमाशय में नहीं होता। दूध की प्रोटीन (केसीन) पर पेप्सिन का प्रभाव तभी होता है, जब रेनिन नामक एंजाइम इसे दूध से अलग कर देता है। यह एंजाइम भी जठर रस में ही होता है।

ग्रहणी में प्रोटीन से प्राप्त अवयवों पर क्रिया, क्षारीय माध्यम (पित्त रस की उपस्थिति के कारण) में, अग्न्याशय रस के ट्रिप्सिन नामक एंजाइम से होती है। इसके द्वारा पॉलीपेप्टाइड्स, पेप्टोन्स आदि को अमीनो अम्लों में तोड़ दिया जाता है। अमीनो अम्ल ही प्रोटीन के पूर्ण पचित स्वरूप हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि प्रोटीन के अर्द्ध-पचित अवयवों पर छोटी आँत में आने वाले आन्त्र रस को इरेप्सिन नामक एंजाइम के प्रभाव से अमीनो अम्लों में बदल लिया जाता है।

प्रश्न 9.
आहार के माध्यम से ग्रहण की गई वसा के पाचन का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
वसा का पाचन
वसा का पाचन करने से पूर्व आमाशय में अम्ल के साथ क्रमाकुंचन क्रिया के द्वारा तथा बाद में पित्त रस के साथ ग्रहणी में इनका मन्थन तथा इमल्सीकरण आवश्यक होता है। इमल्सीकृत वसाओं पर लाइपेज एंजाइम क्रिया करता है, जो ग्रहणी में अग्न्याशय रस में तथा छोटी आँत में आन्त्र रस में होता है। वसा के पाचन से वसीय अम्ल (fatty acids) तथा ग्लिसरॉल (glycerol) बनते हैं। यही इसके पचे हुए (घुलनशील) स्वरूप हैं।

प्रश्न 10.
शरीर में पचे हुए भोजन के अवशोषण की क्रिया समझाइए।
उत्तर:
पचे हुए भोजन का अवशोषण
भली-भाँति पचे हुए भोजन का अवशोषण मुख्य रूप से छोटी आँत में होता है। छोटी आँत की अवशोषण सतह रसांकुरों के कारण बहुत बढ़ जाती है। घुलित अवस्था में विद्यमान पाचित आहार रसांकुरों में रुधिर केशिकाओं तथा लसीका वाहिनियों के अन्दर उपस्थित तरल अर्थात् रुधिर एवं लसीका में अवशोषित किया जाता है। कार्बोहाइड्रेट तथा प्रोटीन्स के पचे हुए अवयव-ग्लूकोज व अमीनो अम्ल आदि रुधिर में अवशोषित हो जाते हैं। वसाओं के पाचन से प्राप्त ग्लिसरॉल व वसीय अम्ल लसीका वाहिनी में अवशोषित होते हैं। बाद में वसाएँ वापस रुधिर में मिला दी जाती हैं। इस प्रक्रिया से भोजन का अवशोषण हो जाता है, शरीर का पोषण होता है तथा ऊर्जा प्राप्त होती है।

प्रश्न 11.
पाचन तन्त्र के एक सहायक अंग के रूप में पित्ताशय का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
पित्ताशय
पाचन क्रिया में महत्त्वपूर्ण योगदान करने वाला पाचन तन्त्र का एक अंग पित्ताशय (gall bladder) भी है। यह अंग एक थैली के रूप में होता है तथा इसका आकार नाशपाती के समान होता है। शरीर में यह यकृत नामक सबसे बड़ी ग्रन्थि के नीचे पाया जाता है तथा इसका सम्बन्ध भी यकृत से ही होता है। पित्ताशय में यकृत द्वारा बनाया जाने वाला पित्त रस (bile juice) एकत्र रहता है। यह पित्त रस आहार के पाचन में विशेष रूप से सहायक होता है। व्यक्ति द्वारा ग्रहण किया गया आहार जब पक्वाशय में पहुँचता है, तब उसके पाचन के लिए पित्त रस की आवश्यकता होती है। इस अवसर पर पित्ताशय में एकत्र हुआ पित्त रस, पित्त नलिका द्वारा पक्वाशय में पहुँच जाता है।

पित्त रस के प्रभाव से पक्वाशय में पहुँचने वाला आहार क्रमशः क्षारीय बन जाता है; अर्थात् उसकी अम्लीयता समाप्त हो जाती है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि अग्न्याशय से आने वाला पाचक रस केवल क्षारीय माध्यम में ही प्रभावशाली होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि भले ही पित्त रस में कोई एंजाइम विद्यमान नहीं होता, परन्तु अग्न्याशय से आने वाले एंजाइम की सक्रियता के लिए पित्त रस ही आधार प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त पित्त रस के प्रभाव से ही आहार में विद्यमान वसा जल में मिलकर इमल्शन का रूप ग्रहण करती है।

प्रश्न 12.
पाचन तन्त्र के एक सहायक अंग के रूप में अग्न्याशय या क्लोम ग्रन्थि का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
अग्न्याशय या क्लोम ग्रन्थि अग्न्याशय या क्लोम (pancreas) भी एक ग्रन्थि है, जो पाचन तन्त्र का ही एक अंग है। यह ग्रन्थि आमाशय के पीछे उदर की पिछली दीवार से सटी हुई होती है। यह आकार में लम्बी ग्रन्थि है। सामान्य रूप से इसकी लम्बाई 16 सेमी तथा चौड़ाई 4 सेमी होती है। इस ग्रन्थि का बायाँ भाग तिल्ली की ओर तथा दायाँ भाग ग्रहणी या पक्वाशय की ओर होता है। अग्न्याशय द्वारा जो रस बनाया जाता है; उसे अग्न्याशयिक रस (pancreatic juice) कहते हैं।

यह रस एक नलिका द्वारा पक्वाशय में पहुँचाया जाता है। अग्न्याशयिक रस पतला, स्वच्छ तथा खारेपन के गुण से युक्त होता है। इस रस में मुख्य रूप से तीन एंजाइम होते हैं, जो पाचन क्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन एंजाइम्स के नाम हैं क्रमश: एमाइलोप्सिन, स्टिएप्सिन तथा ट्रिप्सिन। एमाइलोप्सिन एंजाइम के प्रभाव से आहार में बिना पचा मण्ड क्रमशः शर्करा में बदल जाता है। स्टिएप्सिन या लाइपेज एंजाइम वसा को क्रमशः ग्लिसरॉल तथा वसा अम्ल में विखण्डित कर देता है। जहाँ तक ट्रिप्सिन नामक एंजाइम का प्रश्न है, यह एंजाइम आहार में विद्यमान प्रोटीन को पेप्टोन में परिवर्तित कर देता है।

प्रश्न 13.
पाचन तन्त्र के एक सहायक अंग के रूप में तिल्ली या प्लीहा का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए। उत्तर
तिल्ली या प्लीहा पाचन तन्त्र से अप्रत्यक्ष रूप से सम्बद्ध एक अंग तिल्ली या प्लीहा (spleen) भी है। यह एक ग्रन्थि है। यह ग्रन्थि हमारे शरीर में आमाशय के बाईं ओर तथा अग्न्याशय के दाईं ओर पायी जाती है। इसका रंग बैंगनी होता है तथा आकार सेम के बीज जैसा होता है। इस ग्रन्थि का वजन लगभग 375 ग्राम होता है तथा यह लगभग 12 सेमी लम्बी होती है। छूने पर यह ग्रन्थि मुलायम तथा पिलपिली-सी होती है।

भले ही तिल्ली का पाचन तन्त्र से सीधा सम्बन्ध न हो, परन्तु इससे पाचन संस्थान तथा पाचन क्रिया को सहायता अवश्य प्राप्त होती है। यदि किसी कारण से तिल्ली बढ़ जाती है तो पाचन क्रिया में व्यवधान आने लगता है तथा पेट में पीड़ा भी होने लगती है। तिल्ली का मुख्य कार्य शरीर में रक्त को संचित रखना है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 4 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पाचन तन्त्र से क्या आशय है?
उत्तर:
आहार नाल के समस्त अंग तथा आहार नाल के बाहर स्थित पाचन में सहायक अंग सम्मिलित रूप से पाचन तन्त्र कहलाते हैं। पाचन तन्त्र का कार्य आहार का पाचन एवं पोषक-तत्त्वों का अवशोषण करना है।

प्रश्न 2.
पाचन तन्त्र के मुख्य अंगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
पाचन तन्त्र के मुख्य अंग हैं-मुख व मुखगुहा, ग्रसनी, ग्रासनली, आमाशय तथा आँत। इनके अतिरिक्त यकृत, पित्ताशय, अग्न्याशय तथा तिल्ली या प्लीहा भी पाचन तन्त्र के ही अंग हैं।

प्रश्न 3.
आहार नाल से क्या आशय है?
उत्तर:
मुखद्वार से मलद्वार तक फैले मार्ग को आहार नाल या पाचन प्रणाली कहते हैं।

प्रश्न 4.
मुख में कौन-सा पाचक रस पाया जाता है तथा उसमें कौन-सा एंजाइम होता है?
उत्तर:
मुख में लार नामक पाचक रस पाया जाता है तथा लार में टायलिन नामक किण्व या एंजाइम होता है।

प्रश्न 5.
टायलिन नामक एंजाइम आहार के किस तत्त्व के पाचन में सहायक होता है?
उत्तर:
टायलिन नामक एंजाइम कार्बोहाइड्रेट के पाचन में सहायक होता है।

प्रश्न 6.
आमाशय में कौन-सा पाचक रस बनता है तथा उसमें कौन-कौन से किण्व या एंजाइम्स पाए जाते हैं?
उत्तर:
आमाशय में जठर रस नामक पाचक रस बनता है तथा इसमें रेनिन एवं पेप्सिन नामक दो किण्व या एंजाइम्स पाए जाते हैं।

प्रश्न 7.
रेनिन कहाँ पाया जाता है? इसका मुख्य कार्य बताइए।
उत्तर:
रेनिन आमाशय की भित्ति में उपस्थित जठर ग्रन्थियों द्वारा स्रावित जठर रस में पाया जाता है। इसका मुख्य कार्य दूध को फाड़कर केसीन नामक प्रोटीन को अलग करना है।

प्रश्न 8.
आमाशय में आहार के किस तत्त्व का पाचन होता है?
उत्तर:
आमाशय में आहार के प्रोटीन नामक तत्त्व का पाचन होता है।

प्रश्न 9.
यकृत द्वारा किस रस का निर्माण किया जाता है? यह कहाँ एकत्र होता है? इसका क्या कार्य है?
उत्तर:
यकृत द्वारा पित्त रस का निर्माण किया जाता है। यह रस पित्ताशय में एकत्र रहता है। इसका मुख्य कार्य आहार के पाचन में सहायता प्रदान करना है।

प्रश्न 10.
अग्न्याशय या क्लोम द्वारा किस रस का निर्माण किया जाता है तथा उस रस में कौन-कौन से एंजाइम्स पाए जाते हैं? .
उत्तर:
अग्न्याशय या क्लोम द्वारा अग्न्याशयिक रस का निर्माण किया जाता है। इस रस में एमाइलोप्सिन, स्टिएप्सिन तथा ट्रिप्सिन नामक तीन एंजाइम्स पाए जाते हैं।

प्रश्न 11.
आहार के पाचन से क्या आशय है?
उत्तर:
आहार के पाचन का अर्थ है अघुलनशील एवं जटिल भोज्य पदार्थों को घुलनशील एवं सरल अवस्था में बदलकर अवशोषण के योग्य बनाना।।

प्रश्न 12.
पचे हुए आहार का अवशोषण आहार नाल के किस भाग में होता है? उत्तर-पचे हुए भोजन का अधिकांश अवशोषण छोटी आंत में होता है। प्रश्न 13-मनुष्य के दाँतों के प्रकार लिखिए।
उत्तर:
मनुष्य के दाँत चार प्रकार के होते हैं-(i) कृन्तकं दाँत, (ii) भेदक दाँत, (ii) अग्र चर्वणक दाँत तथा (iv) चर्वणक दाँत।

प्रश्न 14.
दाँतों के कौन-कौन से तीन भाग होते हैं? उत्तर–दाँतों के तीन भाग होते हैं-(i) शिखर, (ii) ग्रीवा तथा (iii) मूल। प्रश्न 15-इनेमल क्या है? यह कहाँ पाया जाता है?
उत्तर:
दाँतों की बाहरी सुरक्षा परत को इनेमल कहा जाता है। यह दाँतों के शिखर नामक भाग में पाया जाता है।

प्रश्न 16.
कृन्तक तथा चर्वणक दाँतों की उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कृन्तक दाँत खाद्य-सामग्री को कुतरने का कार्य करते हैं तथा चर्वणक दाँत खाद्य-सामग्री को चबाने तथा पीसने का कार्य करते हैं।

प्रश्न 17.
एंजाइम क्या है? पाचन में इनका क्या कार्य है?
उत्तर:
एंजाइम विशेष प्रकार के जटिल पदार्थ हैं, जो सामान्यत: विशेष प्रोटीन होते हैं। ये आहार के जटिल अविलेय पदार्थों को सरल तथा जल में विलेय स्वरूप में बदलते हैं।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 4 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए- .

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा अंग पाचन तन्त्र का अंग नहीं है
(क) आहार नली
(ख) अग्न्याशय
(ग) फेफड़ा
(घ) छोटी आँत।
उत्तर:
(ग) फेफड़ा।

प्रश्न 2.
हमारे शरीर में मुँह से लेकर मलद्वार तक के मार्ग को कहते हैं
(क) आमाशय
(ख) आँतें
(ग) आहार नाल
(घ) पाचन तन्त्र।
उत्तर:
(ग) आहार नाल।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन-सा अंग आहार नाल का भाग नहीं है
(क) मुख
(ख) ग्रसनी
(ग) आमाशय
(घ) यकृत।
उत्तर:
(घ) यकृत।

प्रश्न 4.
दाँतों को मजबूत करने वाला तत्त्व कौन-सा है
(क) प्रोटीन
(ख) कैल्सियम
(ग) कार्बोहाइड्रेट
(घ) वसा।
उत्तर:
(ख) कैल्सियम।

प्रश्न 5.
आहार नाल का सबसे लम्बा भाग होता है
(क) आमाशय
(ख) छोटी आँत
(ग) बड़ी आँत
(घ) मलाशय।
उत्तर:
(ख) छोटी आँत।

प्रश्न 6.
मनुष्य की लार में कौन-सा एंजाइम (किण्व) पाया जाता है
(क) लाइपेज
(ख) रेनिन
(ग) टायलिन
(घ) ग्लूकोज।
उत्तर:
(ग) टायलिन।

प्रश्न 7.
टायलिन नाम का एंजाइम किस रस में मिलता है
(क) जठर रस
(ख) अग्न्याशय रस
(ग) पित्त रस
(घ) लार।
उत्तर:
(घ) लार।

प्रश्न 8.
मनुष्य के मुँह में कितनी लार ग्रन्थियाँ होती हैं
(क) 6
(ख) 8
(ग) 10
(घ) 2.
उत्तर:
(क) 6.

प्रश्न 9.
मनुष्य के पाचन तन्त्र में आहार के कार्बोहाइड्रेट का पाचन प्रारम्भ हो जाता है
(क) मुखगुहा से
(ख) आमाशय से
(ग) पक्वाशय से
(घ) आँतों से।
उत्तर:
(क) मुखगुहा से।

प्रश्न 10.
आमाशय का आकार कैसा होता है
(क) लम्बा
(ख) गोल
(ग) खोखला
(घ) थैले या मशक जैसा।
उत्तर:
(घ) थैले या मशक जैसा।

प्रश्न 11.
ग्रसनी के बाद भोजन जाता है
(क) छोटी आंत में
(ख) ग्रहणी में
(ग) आमाशय में
(घ) बड़ी आँत में।
उत्तर:
(ग) आमाशय में।

प्रश्न 12.
आमाशय से स्रावित होता है
(क) नाइट्रिक अम्ल
(ख) साइट्रिक अम्ल
(ग) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल
(घ) इन्सुलिन।
उत्तर:
(ग) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल।

प्रश्न 13.
आमाशयिक रस में निम्नलिखित में से कौन-सा एंजाइम पाया जाता है
(क) रेनिन
(ख) एमाइलेज
(ग) ट्रिप्सिन
(घ) टायलिन।
उत्तर:
(क) रेनिन।

प्रश्न 14.
रेनिन नामक एंजाइम जो आमाशय में बनता है
(क) प्रोटीन पर क्रिया करता है
(ख) केवल दूध की प्रोटीन पर क्रिया करता है
(ग) दूध को फाड़कर उसकी प्रोटीन को अलग करता है
(घ) मण्ड को पचाता है।
उत्तर:
(ग) दूध को फाड़कर उसकी प्रोटीन को अलग करता है।

प्रश्न 15.
पेप्सिन नामक एंजाइम पाया जाता है(क) जठर रस में
(ख) पित्त रस में
(ग) आन्त्रीय रस में
(घ) अग्न्याशयिक रस में।
उत्तर:
(क) जठर रस में।

प्रश्न 16.
यकृत का मुख्य कार्य होता है
(क) पित्त संग्रह करना
(ख) विभिन्न एंजाइम्स बनाना
(ग) पित्त रस बनाना
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) पित्त रस बनाना।

प्रश्न 17.
यकृत अतिरिक्त शर्करा को किस वस्तु में परिवर्तित कर देता है
(क) ग्लाइकोजन में
(ख) सेलुलोस में
(ग) एंजाइम में
(घ) मण्ड या स्टॉर्च में।
उत्तर:
(क) ग्लाइकोजन में।

प्रश्न 18.
प्रोटीन के पाचन से बनता है
(क) ऐमीनो अम्ल
(ख) ग्लूकोज
(ग) ग्लिसरॉल व वसीय अम्ल
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) ऐमीनो अम्ल।

प्रश्न 19.
वसा के पाचन से बनता है
(क) ऐमीनो अम्ल
(ख) ग्लाइकोजन
(ग) ग्लिसरॉल तथा वसीय अम्ल
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(ग) ग्लिसरॉल तथा वसीय अम्ल।

प्रश्न 20.
पचे हुए भोजन का अवशोषण आहार नाल के किस भाग में होता है
(क) आमाशय
(ख) पक्वाशय .
(ग) छोटी आँत
(घ) यकृत।
उत्तर:
(ग) छोटी आँत।

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UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 19 भारतीय परिवार और उसके प्रत्येक सदस्य की भूमिका

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 19 भारतीय परिवार और उसके प्रत्येक सदस्य की भूमिका (Indian Family and the Role Played by its Each Member)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 19 भारतीय परिवार और उसके प्रत्येक सदस्य की भूमिका

UP Board Class 11 Home Science Chapter 19 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय परिवार की मुख्य विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।
अथवा
भारतीय परिवार का क्या अर्थ है? भारतीय परिवार में विभिन्न सदस्यों की भूमिकाओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
अथवा
भारतीय परिवार की कौन-सी विशेषताएँ होती हैं? विस्तारपूर्वक लिखिए।
अथवा
भारतीय परिवार की क्या विशेषताएँ हैं? उन पर प्रकाश डालिए।
उत्तरः
भारतीय परिवार की विशेषताएँ (Characteristics of Indian Family) –
परिवार एक सामाजिक संस्था है। समाज के धार्मिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मूल्य तथा सामाजिक परिस्थितियाँ परिवार की विशेषताओं एवं आदर्शों को निर्धारित करती हैं। यही कारण है कि विश्व के विभिन्न समाजों में विद्यमान परिवारों के स्वरूप एवं विशेषताओं में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। भारतीय समाज के परिवार की कुछ मौलिक विशेषताएँ हैं, जो उसे पाश्चात्य समाज के परिवार से भिन्न प्रमाणित करती हैं। भारतीय समाज पारम्परिक रूप से आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख रहा है। यही कारण है कि भारतीय परिवार भी कुछ मौलिक विशेषताओं से युक्त है। पारम्परिक भारतीय परिवार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. संयुक्त परिवार प्रणाली-पारम्परिक भारतीय परिवार की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि हम संयुक्त रूप से रहकर ‘संयुक्त कुटुम्ब प्रणाली’ का पालन करते हैं। संयुक्त परिवार में तीन अथवा तीन से अधिक पीढ़ियों के सदस्य एक साथ रहते हैं। इस प्रणाली के अन्तर्गत माँ-बाप, बच्चे, चाचा-चाची, भाई-भतीजे, बहन आदि मिलकर रहते हैं तथा एक ही साथ रहकर भोजन की व्यवस्था होती है। इस प्रणाली का सबसे बड़ा सिद्धान्त ‘संगठन’ है, जिसके अन्तर्गत सभी सदस्य मिल-जुलकर अपने-अपने उद्देश्यों की प्राप्ति करते हैं।

भारतीय संयुक्त परिवार के आशय को डॉ० इरावती कर्वे ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है“संयुक्त परिवार उन व्यक्तियों का एक समूह है, जो साधारणतया एक मकान में रहते हैं, जो एक रसोई में पका भोजन करते हैं, जो सामान्य सम्पत्ति के स्वामी होते हैं और जो सामान्य उपासना में भाग लेते हैं तथा जो किसी-न-किसी प्रकार से एक-दूसरे के रक्त सम्बन्धी होते हैं।”

2. पितृसत्तात्मक परिवार-हमारे भारतीय परिवार का मुखिया प्रारम्भ से ही पुरुष रहा है तथा उसे ही पूरे परिवार की सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना पड़ता है। ऐसे परिवार को पितृसत्तात्मक परिवार कहते हैं।

आदिम काल में परिवार की देखभाल तथा जिम्मेदारी माता पर निर्भर रहती थी, अत: उसे मातृसत्तात्मक परिवार कहते थे। कुछ क्षेत्रों में; जैसे कि मालाबार इत्यादि में आज भी इस प्रकार की परिवार प्रणाली विद्यमान है जहाँ कि परिवार की सभी जिम्मेदारियाँ माता पर निर्भर हैं।

3. परिवार में स्त्रियों का उच्च स्थान-भारतीय परिवार के अन्तर्गत प्रारम्भ से ही स्त्री को सर्वोच्च एवं सम्मान का स्थान प्रदान किया गया है। परिवार में स्त्री तथा पुरुष को समान अधिकार प्राप्त होते हैं। महर्षि मनु ने स्त्रियों की महत्ता निम्नलिखित रूप में बताई है –

“जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवताओं का वास होता है; जहाँ स्त्रियों की पूजा नहीं होती, वहाँ के सारे कार्य विफल होते हैं; तथा जहाँ स्त्रियाँ तंग की जाती हैं, दुःखी की जाती हैं, वहाँ परिवार बिल्कुल नष्ट हो जाते हैं।”

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि परिवार में स्त्रियों को उच्च स्थान प्रदान करना भारतीय परिवार की एक विशेषता है।

4. संस्कारों एवं आदर्शों को प्राथमिकता-परिवार का गठन विवाह पर आधारित होता है। भारतीय समाज में विवाह एक पवित्र बन्धन एवं धार्मिक संस्कार है, न कि सामाजिक समझौता। इस स्थिति में भारतीय परिवार में संस्कारों एवं आदर्शों को भी विशेष महत्त्व दिया जाता है।

5. भारतीय परिवार का उच्च उद्देश्य-पारम्परिक रूप से भारतीय परिवार में जीवन के उच्च उद्देश्यों को प्राथमिकता दी जाती है। भारतीय परिवार में आध्यात्मिकता का विशेष महत्त्व है। परिवार में सन्तान के आदर्श, पालन-पोषण तथा महान संस्कारों को ध्यान में रखा जाता है। वास्तव में भारतीय परिवार पुरुषार्थों की प्राप्ति का केन्द्र ही है।

6. अतिथि सत्कार भारतीय परिवार में अतिथि को सबसे महान व्यक्ति का दर्जा दिया गया है। जब वह घर में आता है तो उसका आदर सत्कार उच्च रीति से किया जाता है तथा इसमें केवल शिष्टाचार का ही पालन नहीं किया जाता बल्कि अपने को सौभाग्यशाली मानकर उसकी सेवा की जाती है।

7. पारस्परिक अधिकार एवं कर्तव्य-भारतीय परिवार के सदस्यों में एक-दूसरे के प्रति अधिकारों एवं कर्तव्यों की भावना पायी जाती है। बड़े, छोटों को स्नेह देते हैं, उनका समाजीकरण करते हैं तथा यथासम्भव उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयास करते हैं। छोटे, बड़ों का सम्मान करते हैं तथा उनकी आज्ञा का पालन करते हैं।

उपर्युक्त विवरण द्वारा पारम्परिक भारतीय परिवार की मुख्य विशेषताएँ स्पष्ट हो जाती हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि आधुनिक परिस्थितियों में भारतीय परिवार पर पाश्चात्य संस्कृति का गम्भीर प्रभाव पड़ा है तथा इस प्रभाव के परिणामस्वरूप भारतीय परिवार की पारम्परिक विशेषताओं में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है।

(नोट–भारतीय परिवार के विभिन्न सदस्यों की भूमिकाओं के विवरण के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 1, 2 तथा 3 का उत्तर देखें।)

प्रश्न 2.
“व्यक्ति के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास परिवार के विभिन्न सदस्यों पर निर्भर है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
अथवा
“गृह वातावरण व्यक्तित्व निर्माण में विशेष रूप से सहायक है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तरः
व्यक्ति के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास परिवार के विभिन्न सदस्यों या घर के वातावरण पर निर्भर रहना –
बालक परिवार में पैदा होता है। उसके व्यक्तित्व के विकास से परिवार के अन्य सदस्यों का गहरा सम्बन्ध होता है तथा बालक पर उन सदस्यों का पूरा-पूरा प्रभाव पड़ता है। बालक के व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करने वाले पारिवारिक कारकों का विवरण निम्नलिखित है –

1. माता-पिता का प्रभाव-परिवार में व्यक्ति/बालक के व्यक्तित्व पर सबसे अधिक प्रभाव उसके माता-पिता का पड़ता है। जिस प्रकार का माता-पिता का स्वभाव, चरित्र एवं पारस्परिक सम्बन्ध होते हैं, उसी प्रकार से बालक के व्यक्तित्व का विकास होता है।

माता-पिता के दमन की प्रक्रिया के कारण तथा प्यार के अभाव में बालक दब्बू बन जाता है। वह एकान्तप्रिय हो जाता है और कल्पना की दुनिया में विचरण करने लगता है। इस प्रकार माता-पिता के अनुचित व्यवहार से बालक के व्यक्तित्व का विकास ठीक से नहीं हो पाता। बहुत-से माता-पिता बच्चों को गाली से सम्बोधित करके बातें करते हैं। इससे बालक पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

इसके विपरीत कुछ माता-पिता अपने बच्चों को अत्यधिक प्यार करते हैं और अपने बच्चों की प्रत्येक कठिनाई दूर करने के लिए चिन्तित रहते हैं, जिससे बच्चा अधिक परावलम्बी हो जाता है। उसमें स्वतन्त्र इच्छा-शक्ति बिल्कुल नहीं रहती। उसमें आत्म-निर्भरता के गुण का अभाव हो जाता है। उसका व्यक्तित्व भी ठीक से विकसित नहीं होता है। अतः कहा जा सकता है कि अधिक लाड़-प्यार भी बच्चे को बिगाड़ देता है।

माता-पिता के पारस्परिक सम्बन्धों; आचरणों तथा विचारों का प्रभाव भी उनके बच्चों पर कम नहीं पड़ता। जो माँ-बाप स्वयं दिन-रात लड़ाई-झगड़ा करते हैं, एक-दूसरे को गालियाँ दिया करते हैं या अनुचित आचरण करते हैं, उनका अनुकरण उनके बच्चे जानबूझकर और उत्सुकतापूर्वक करते हैं। यदि माता-पिता सदाचरण द्वारा बच्चे के समक्ष अच्छे आदर्श प्रस्तुत करते हैं तो बच्चे अच्छे बनेंगे।

2. जन्म-क्रमका प्रभाव – बालक के व्यक्तित्व पर उसके जन्म-क्रम का भी प्रभाव पड़ता है। बच्चा जब इकलौता होता है तो उसकी सुविधाओं एवं उपलब्ध वस्तुओं में हिस्सा बँटाने वाला कोई नहीं होता। इससे बालक जहाँ एक ओर अत्यधिक परावलम्बी हो जाता है, वहाँ वह निर्दयी भी हो जाता है। कुछ वर्षों तक अकेला रहने के बाद दूसरे बच्चे के जन्म लेने पर वह उसके प्रति ईर्ष्यालु हो सकता है। इसी प्रकार सबसे छोटा बच्चा परिवार में सदा बबुआ ही बने रहने की कोशिश करता है। संक्षेप में कह सकते हैं कि सबसे बड़े बच्चे में लड़ने-झगड़ने तथा नेतागीरी करने की प्रवृत्ति कम होती है तथा आत्म-चिन्तन एवं एकान्तप्रियता का गुण अधिक होता है। बीच के बच्चे तथा छोटे साधारण रहते हैं। इकलौते बच्चे लड़ाकू, जिद्दी, प्रेम के बाह्य प्रदर्शन के इच्छुक और विचारों में अस्थिर होते हैं।

3. परिवार के टूटने का प्रभाव – परिवार के टूट जाने का भी बच्चे के व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ता है। माता की मृत्यु हो जाने पर सौतेली माता के साथ रहना या तलाक के कारण माता-पिता का परिवर्तन हो जाना आदि अवस्थाओं में यदि सौतेली माता अथवा सौतेले पिता का व्यवहार उचित नहीं होता अथवा बालकों को छोटी-छोटी बातों के लिए डाँट या मार सहनी पड़ती है तथा अवहेलना और ताड़ना का सामना करना पड़ता है तो बालक के मन और मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। जो बालक दब्बू होते हैं, वे चिड़चिड़े, एकान्तप्रिय और कल्पनाओं में खोए रहने वाले बन जाते हैं। जो बालक साहसी और उग्र स्वभाव के होते हैं, वे अपराधी प्रवृत्ति के हो जाते हैं। प्राय: वे घर से भाग भी जाते हैं। ऐसे बालकों के व्यक्तित्व का समुचित विकास बहुत ही कम हो पाता है।

4. भाई-बहन का प्रभाव – भाई-बहनों के आचरण का भी बालक पर प्रभाव पड़ता है। यदि परिवार का बड़ा बच्चा दबंग और उद्दण्ड बन जाता है तो परिवार के दूसरे बच्चों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है क्योंकि बच्चे बड़ों का अनुसरण करते हैं।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति (बालक) के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास परिवार के सदस्यों तथा पारिवारिक वातावरण पर निर्भर होता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 19 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
परिवार में पत्नी (माता) की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
परिवार में पत्नी (माता) की भूमिका –
हिन्दू विवाह एक धार्मिक संस्कार माना जाता है। इस संस्कार में बँधकर पत्नी पति को विशेष सम्मान एवं महत्त्व प्रदान करती है। परिवार में घर से बाहर का कार्य पति की जिम्मेदारी पर और घर के अन्दर के कार्यों की देख-रेख पत्नी पर रहती है। आजकल आवश्यकता पड़ने पर पत्नी धनोपार्जन में भी सहयोग देती है।

गृहस्वामिनी के रूप में घर के सब कार्यों को भली प्रकार करना उसका पुनीत कर्त्तव्य है। अपने सास-ससुर की सेवा करना तथा अपने स्वभाव की सरलता के द्वारा एक आदर्श नारी की भूमिका को निभाना भी उसका महत्त्वपूर्ण कर्तव्य है।

माता के रूप में; स्वस्थ सन्तान की उत्पत्ति करना, उसकी सेवा करना, उसका लालन-पालन करना व उसकी प्रतिदिन की आवश्यकताओं की पूर्ति करना, जिससे परिवार में अच्छे बालक और सुयोग्य नागरिक विकसित हो सकें; उसका कर्तव्य है। स्त्री का कर्त्तव्य एक आदर्श पत्नी, आदर्श वधू और आदर्श माँ बनने का होना चाहिए, जिसके अनुसार वह परिवार में अपनी यह सब भूमिका भली प्रकार से निभा सके। सम्मिलित परिवार में तो पत्नी को सबके साथ रहना पड़ता है; अतः उसे अपनी कार्यकुशलता व मधुर स्वभाव से आदर्श वातावरण का निर्माण करना चाहिए। परिवार में पत्नी को एक अन्य भूमिका भी निभानी पड़ती है, यह है-नियन्त्रक की भूमिका। पत्नी को जहाँ एक ओर बच्चों को पारिवारिक मूल्यों के अनुसार नियन्त्रित रखना होता है, वहीं दूसरी ओर अपने पति को भी अनेक क्षेत्रों में विचलित होने से बचाना होता है।

प्रश्न 2.
परिवार में पति (पिता) की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
परिवार में पति (पिता) की भूमिका –
परिवार का जन्म मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु हुआ है, जिसमें पति, जिसको कि दूसरे शब्दों में घर का मुखिया भी कहा जाता है, को महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी की भूमिका निभानी पड़ती है। मुखिया वह स्तम्भ होता है, जिस पर पूरे परिवार का ढाँचा खड़ा रहता है और इस स्तम्भ अथवा मुखिया का मुख्य काम पूरे परिवार के लिए भोजन, वस्त्र, मकान व सुरक्षा सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। साथ ही सामाजिक प्रतिष्ठा तथा भौतिक सुरक्षा की व्यवस्था करना भी उसी का धर्म एवं कर्त्तव्य है।

व्यक्ति के रूप में वह पिता है, उसको अपने बच्चों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना और उनकी पूर्ति करना होता है। अपनी आय को अपने परिवार पर खर्च करना ही उसका परम कर्त्तव्य है।

पति के रूप में पत्नी की आवश्यकताओं को समझना और गृहस्थी के लिए सब साधन जुटाना उसका कर्त्तव्य है। गृहस्थी के भिन्न-भिन्न कार्यों में रुचि लेना और स्त्री के साथ पूर्ण सहयोग देना होता है। इसके अतिरिक्त, पति को घर का मुखिया होने के नाते अनेक प्रकार के उत्तरदायित्वों को समझना होता है। उसे दूर के तथा निकट के नाते-रिश्तेदारों के साथ अपने सम्बन्ध बनाए रखने तथा समय-समय पर अपने सम्बन्धियों की सहायता के लिए तैयार रहना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, सामान्य रूप से पुरुष ही समाज में परिवार का प्रतिनिधित्व करता है। अत: इस रूप में भी पुरुष को विशिष्ट दायित्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ती है।

प्रश्न 3.
परिवार में बच्चों एवं अन्य सदस्यों की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
परिवार में बच्चों एवं अन्य सदस्यों की भूमिका –
प्रत्येक परिवार में पुत्र और पुत्रियों का भिन्न-भिन्न कर्त्तव्य समझा जाता है। सन्तान-रहित परिवार की कल्पना तो असम्भव-सी प्रतीत होती है। प्रत्येक परिवार में; विशेषकर हिन्दू परिवार में पुत्र का न होना नरक में जाने की भाँति पाप समझा जाता है, यद्यपि यह एक अन्धविश्वास-मात्र है। प्रत्येक दम्पती की यही हार्दिक इच्छा होती है कि पुत्र का जन्म हो तथा वह पढ़-लिखकर गुणवान बनकर उनके बुढ़ापे का सहारा बन सके तथा वंश की रक्षा कर सके। पढ़ा-लिखाकर युवावस्था में उसकी शादी एक अच्छी कन्या के साथ कर दी जाती है।

इसी प्रकार पुत्रियों को भी परिवार में विशेष स्थान दिया गया है। उन्हें उचित शिक्षा देकर भविष्य के लिए एक अच्छी गृहिणी के रूप में तैयार किया जाता है। प्राचीन काल में तो कन्याओं को देवी की तरह पूजा जाता था तथा अब भी विशेष अवसरों पर उन्हें देवी की तरह पूजा जाता है। आगे चलकर ये पुत्रियाँ ही किसी की पत्नी, पुत्रवधू आदि के रूप में गृह की नैया को पार लगाती हैं। इस प्रकार सन्तान की परिवार .’ में प्रमुख भूमिका है।

वर्तमान परिवर्तित परिस्थितियों में पुत्र एवं पुत्रियों द्वारा लगभग समान भूमिका निभाई जाती है। यह माना जाता है कि पुत्र एवं पुत्रियों को पढ़-लिखकर परिवार के कल्याण में यथासम्भव योगदान देना चाहिए।

पारम्परिक भारतीय परिवार में पति-पत्नी, सन्तान के अतिरिक्त, संयुक्त परिवार प्रणाली के आधार पर परिवार के अन्य सदस्य; जैसे भाई, भतीजा, चाचा, चाची, ताऊ, ताई आदि भी होते हैं, जिनकी अपनी अलग-अलग भूमिका होती है। इन सदस्यों को अपनी सामर्थ्य, शक्ति एवं आयु के अनुकूल पारिवारिक गतिविधियों में समुचित योगदान अवश्य ही देना चाहिए। परिवार के सभी सदस्यों की सहयोगपूर्ण भूमिका अति अनिवार्य होती है।

इस प्रकार सम्पूर्ण परिवार को सुखी और समृद्धशाली बनाने हेतु परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपने-अपने कर्तव्य का पालन करना अनिवार्य है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 19 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पारम्परिक रूप से भारत में किस प्रकार के परिवार अधिक पाए जाते थे?
उत्तरः
पारम्परिक रूप से भारत में संयुक्त परिवार अधिक पाए जाते थे।

प्रश्न 2.
सत्ता के दृष्टिकोण से भारत में किस प्रकार के परिवार पाए जाते हैं?
उत्तरः
सत्ता के दृष्टिकोण से भारत में मुख्य रूप से पितृसत्तात्मक परिवार पाए जाते हैं।

प्रश्न 3.
भारतीय परिवार में स्त्रियों की स्थिति कैसी है?
उत्तरः
भारतीय परिवार में स्त्रियों की सम्मानजनक स्थिति है।

प्रश्न 4.
वर्तमान नगरीय परिवारों में स्त्री की भूमिका में क्या उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है?
उत्तरः
वर्तमान नगरीय परिवारों में स्त्रियाँ परिवार के लिए धनोपार्जन के लिए भी यथासम्भव कार्य करने लगी हैं।

प्रश्न 5.
भारतीय परिवार में पुरुष की क्या स्थिति है?
उत्तरः
भारतीय परिवार में पुरुष को मुखिया माना जाता है।

प्रश्न 6.
बच्चों के व्यक्तित्व पर सर्वाधिक प्रभाव किसका पड़ता है?
उत्तरः
बच्चों के व्यक्तित्व पर सर्वाधिक प्रभाव माता-पिता का पड़ता है।

प्रश्न 7.
विघटित परिवार का बच्चों के व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तरः
विघटित परिवार के बच्चों का व्यक्तित्व असामान्य हो जाता है।

प्रश्न 8.
माता-पिता के बीच तनाव का बच्चों पर क्या दुष्प्रभाव पड़ सकता है?
उत्तरः
माता-पिता के बीच तनाव का बच्चों के सामान्य विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है उनका व्यक्तित्व क्रमश: असामान्य होने लगता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 19 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –
1. भारतीय परिवार की विशेषता है –
(क) संयुक्त परिवार प्रणाली का प्रचलन
(ख) पितृसत्तात्मक परिवार
(ग) संस्कारों एवं आदर्शों को प्राथमिकता
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ।

2. परिवार में स्त्री की भूमिका होती है –
(क) पत्नी के रूप में
(ख) माता के रूप में
(ग) गृहिणी के रूप में
(घ) उपर्युक्त सभी रूपों में।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी रूपों में।

3. परिवार में मुखिया का कर्तव्य है –
(क) खाना बनाना
(ख) पैसे देना
(ग) बच्चों को पढ़ाना
(घ) सभी सदस्यों का ध्यान रखना।
उत्तरः
(घ) सभी सदस्यों का ध्यान रखना।

4. निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषता भारतीय परिवार की नहीं है –
(क) यौन-सम्बन्ध
(ख) रक्त सम्बन्ध
(ग) सामाजिक असुरक्षा की भावना पैदा करना
(घ) नैतिक मूल्यों का ज्ञान देना।
उत्तरः
(ग) सामाजिक असुरक्षा की भावना पैदा करना।

UP Board Solutions for Class 11 Home Science 

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 20 बालक-बालिका सम्बन्ध

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 20 बालक-बालिका सम्बन्ध (Boys-Girls Relationship)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 20 बालक-बालिका सम्बन्ध

UP Board Class 11 Home Science Chapter 20 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बालक-बालिका सम्बन्धों एवं मेल-मिलाप पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तरः
छह वर्ष की अवस्था के लगभग लड़के-लड़की बिना भेदभाव के एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। जब बालक तथा बालिकाएँ 7 से 12 वर्ष की आयु में आ जाते हैं तो बहुत कुछ आपस में समझने लगते हैं। उनको अपनी शारीरिक तथा सामाजिक स्थिति का ज्ञान होने लगता है। समाज में 12 वर्ष की अवस्था तक बालक तथा बालिकाएँ एक साथ खेल सकते हैं, पढ़ सकते हैं तथा घूम सकते हैं।

13 से 18 वर्ष की आयु में दोनों ही पक्ष एक-दूसरे को आकर्षित करने का प्रयत्न करते हैं। 18 वर्ष की अवस्था में यह काम-चेतना अपने प्रबलतम रूप में लड़के व लड़कियों में आ जाती है, सामाजिक बन्धन उन्हें बुरे लगने लगते हैं।

कक्षा 8 तक के लड़के और लड़कियाँ एक साथ पढ़ सकते हैं, लेकिन इण्टरमीडिएट कक्षाओं में एक साथ शिक्षा देना अधिक उचित नहीं है। इस अवस्था में उनका मानसिक एवं संवेगात्मक ज्ञान अपरिपक्व होता है। वे भावनाओं की तीव्रता से शीघ्र प्रभावित हो जाते हैं और अनुचित कार्य कर बैठते हैं। वे अपना हित-अहित नहीं समझते हैं।

डिग्री कक्षाओं में पहुँचकर विद्यार्थियों के अनुभव परिपक्व होने लगते हैं। इस स्तर पर छात्र-छात्राओं का तार्किक पक्ष भी काफी विकसित हो जाता है। उनमें उत्तरदायित्व की भावना भी आ जाती है। इस कारण इस स्तर पर यदि लड़का-लड़की मैत्री सम्बन्ध स्थापित करें तो कोई हानि नहीं है।

सह-शिक्षा से वे एक-दूसरे को भली-भाँति समझ लेते हैं। परिचय प्राप्त कर लेने से लड़के-लड़की का वैवाहिक जीवन बहुत सुखपूर्वक बीतता है, क्योंकि वे एक-दूसरे के आदर्शों से परिचित हो जाते हैं। बहुत-से गरीब घराने की लड़कियों की शादी सम्पन्न घराने में हो जाती है क्योंकि लड़के सुन्दर एवं शिक्षित लड़कियों के इच्छुक होते हैं। इस प्रकार लड़कियों के माता-पिता दहेज के चक्रव्यूह से बच जाते हैं।

बालक-बालिका सम्बन्धों का उपर्युक्त विवरण एक पारम्परिक मान्यता से जुड़ा हुआ है। वर्तमान सामाजिक, पारिवारिक तथा व्यावसायिक परिस्थितियाँ बड़ी तेजी से बदल रही हैं तथा इन परिवर्तित परिस्थितियों में बालक-बालिका सम्बन्धों के प्रारूप को भी पुनः निर्धारित करना अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण विचारणीय तथ्य है।

प्रश्न 2.
भारत में लड़के-लड़कियों के स्वतन्त्रतापूर्ण सम्बन्धों पर लगे प्रतिबन्धों के विषय में अपने विचार प्रकट कीजिए।
उत्तरः
भारत में लड़के-लड़कियों के स्वतन्त्रतापूर्ण सम्बन्धों पर प्रतिबन्ध –
भारतीय आदर्शों एवं परम्पराओं में आस्था रखने वाले विद्वानों के मतानुसार यदि लड़के और लड़कियाँ आपस में मिलते-जुलते हैं तो उनके विकास में बाधा उत्पन्न होती है। इसी कारण से बाल्यकाल में सह-शिक्षा के बाद अधिकतर लड़के-लड़कियों के विद्यालय अलग कर दिए जाते थे। परिवार के बाहर भी उनको मेल-मिलाप के अवसर बहुत कम दिए जाते थे। यद्यपि आजकल पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित होकर भारतीय समाज में तरुणावस्था के लड़के-लड़कियों में स्वतन्त्रतापूर्ण सम्बन्धों का प्रचलन बढ़ रहा है, तथापि आदर्श भारतीय समाज में यह आलोचना का विषय बना हुआ है।

किशोरावस्था के लड़के-लड़कियों के विवाह आदि तय करने में माता-पिता का मुख्य हाथ होने से प्रायः सुविधा ही रहती है और किशोरों को अपनी अनुभवहीनता में की गई त्रुटियों से बचाव रहता है। किन्तु कभी-कभी कुछ अवस्थाओं में व्यक्ति के स्वभाव एवं इच्छाओं का सामाजिक बन्धनों के कारण अत्यधिक दमन करना पड़ता है, जिसका परिणाम अधिकतर हानिकारक सिद्ध होता है। वास्तव में किशोरों के मेल-मिलाप में पूर्ण स्वतन्त्रता अथवा कठोर नियन्त्रण दोनों ही उनके विकास में बाधक होते हैं।

प्रश्न 3.
अपने समाज में लड़के-लड़कियों में पाए जाने वाले सामाजिक भेद के विषय में अपने विचार प्रकट कीजिए।
उत्तरः
लड़के-लड़कियों में पाए जाने वाले सामाजिक भेद –
स्त्री तथा पुरुष में शारीरिक भेद के अतिरिक्त उनके आचरण, स्वभाव और व्यवहार में अन्तर पाया जाता है। यह सम्भव हो सकता है कि यह अन्तर शरीर रचना और पारिवारिक व सामाजिक परिस्थितियों के अन्तर के कारण हो। यह भी देखने में आता है कि सामान्यत: बालिकाएँ स्वभाव की कोमल, विनम्र, सहनशील तथा करुणामयी होती हैं और दूसरी तरफ बालक स्वभाव के कठोर होते हैं।

मनोवैज्ञानिक इस बालक-बालिका के अन्तर को उनके पारिवारिक और सामाजिक पर्यावरण के कारण मानते हैं। परिवार में सभी सदस्यों की बालक-बालिका के प्रति एक-सी भावना नहीं होती। बालिकाओं के प्रति प्रारम्भ से ही कुछ भिन्न भावना रहती है, उनको पराया धन समझा जाता है, उनको घर में गृहस्थी का कार्य करना पड़ता है। इसलिए बालिकाएँ स्वभाव से ही सहनशील और विनम्र होती हैं। बालकों को बाबा-दादी तथा अन्य सदस्य सिर पर चढ़ाकर रखते हैं और उनकी प्रत्येक इच्छा को पूरा किया जाता है। इसलिए वे क्रोधी, जिद्दी तथा कठोर स्वभाव के होते हैं।

अत: अन्त में हम इस निष्कर्ष पर पहँचते हैं कि बालक-बालिका, एक ही सृष्टि की रचना होते हुए भी, भिन्न हैं। दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं, जिनमें स्वाभाविक अन्तर होता है। यह अन्तर कुछ तो शारीरिक रचना के कारण होता है और कुछ पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण होता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना अनिवार्य है कि वर्तमान युग में सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ बदल रही हैं। इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप लड़कियों की शिक्षा एवं विकास को भी क्रमश: महत्त्व दिया जाने लगा है। वह दिन दूर नहीं जब हमारे समाज में लड़के-लड़कियों के प्रति समान दृष्टिकोण अपनाया जाने लगेगा।

प्रश्न 4.
किशोरावस्था में बालक और बालिका की एक-दूसरे के प्रति कैसी भावना होती है?
उत्तरः
किशोरावस्था में बालक और बालिका की एक-दूसरे के प्रति भावना –
छह वर्ष तक के लड़के-लड़कियों के सम्बन्ध में लिंग-भेद का कोई आधार नहीं होता। वे अनजान रहकर एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, एक-दूसरे के मित्र बन जाते हैं। जब लड़के-लड़कियाँ 6 से 12 वर्ष के बीच की उम्र के होते हैं तो बहुत कुछ समझने लगते हैं। उनको यह ज्ञान हो जाता है कि उनकी शारीरिक रचना में क्या अन्तर है। हमारे समाज में लड़के को अधिक महत्त्व दिया जाता है, क्योंकि उससे यह आशा की जाती है कि वह बड़ा होकर कुटुम्ब की सेवा करेगा और लड़की कुछ दिनों बाद पराये घर की हो जाएगी। लड़कियाँ समझती हैं कि उनका स्थान लड़कों की अपेक्षा नीचा है। यह ऊँच-नीच की भावना 6-7 वर्ष की आयु के बाद बच्चों में आने लगती है; अत: वे एक-दूसरे से अलग रहने का प्रयत्न करते हैं।

यह विरोध की भावना उस समय तक चलती है, जब तक उनके शरीर में तरुणाई के लक्षण प्रकट नहीं होते हैं। जब उनके शरीर में तरुणाई के लक्षण प्रकट होने लगते हैं तो उनका यह विरोध समाप्त हो जाता है। घृणा प्रेम में बदल जाती है। इस अवस्था (13 से 17 वर्ष) में लड़कियों के शरीर में कुछ परिवर्तन हो जाता है और सौन्दर्य बढ़ जाता है। लड़के भी अपने को अधिक आकर्षक बनाने का प्रयत्न करते हैं। इस समय वे एक-दूसरे के सम्पर्क में लज्जा अनुभव करते हैं। यह अवस्था करीब 16-17 वर्ष की उम्र तक रहती है।

17-18 वर्ष की अवस्था में लड़के-लड़कियों में काम-चेतना अत्यन्त प्रबल रूप धारण करती है। वे एक-दूसरे को अधिक-से-अधिक आकर्षित करने का प्रयत्न करते हैं और प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं। इस समय वे सामाजिक बन्धनों की चिन्ता तक नहीं करते। वे समाज से घृणा करते हैं और समाज से पृथक होकर प्रेमी अथवा प्रेमिका के साथ निर्जन स्थान में अधिक-से-अधिक समय तक रहना पसन्द करते हैं। एक के अभाव में दूसरा प्राण तक दे देता है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री के शब्दों में, “जब दो भिन्न लिंगी एक-दूसरे को देखते हैं, संकेत करते हैं, छिपकर प्रेम करते हैं, भेंट देते हैं या परस्पर स्पर्श करते हैं तो उन्हें चामत्कारिक आनन्द प्राप्त होता है।”

लड़के और लड़कियों के सम्बन्ध की यह अवस्था बड़ी नाजुक होती है। वे कभी-कभी पथभ्रष्ट भी हो जाते हैं। वे पढ़ाई-लिखाई, माता-पिता, धन-सम्पत्ति और मान-मर्यादा की परवाह नहीं करते। प्रेमी-प्रेमिकाओं का घर से भाग जाना, इधर-उधर की ठोकरें खाना साधारण-सी बात है। इसके अतिरिक्त, वे भ्रूण हत्याओं, शारीरिक रोगों, नैतिक और चारित्रिक पतन आदि के लिए उत्तरदायी हो जाते हैं। अज्ञान और भावुकता में वे अपना और समाज दोनों का अहित करते हैं।

विभिन्न अध्ययनों द्वारा यह सिद्ध हो गया है कि बालक और बालिका के परस्पर मिलने-जुलने में जितना बड़ा बन्धन होगा, ‘मिलन भावना’ उतनी ही तीव्र होगी। इसलिए बालक-बालिकाओं के सम्बन्धों को स्वाभाविक रूप से विकसित होने देने के लिए उन्हें परस्पर मिलने-जुलने की कुछ हद तक स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए। सम्पर्क और स्वतन्त्रता को उच्छंखलता की सीमा तक पहुँचने से रोकने के लिए संयम का अंकुश बड़े-बुजुर्गों के हाथ में होना चाहिए।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 20 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बालक-बालिका सम्बन्धों के अध्ययन का मूल आधार क्या है?
उत्तरः
बालक-बालिका सम्बन्धों के अध्ययन का मूल आधार लिंग-भेद है।

प्रश्न 2.
सामान्य रूप से किस अवस्था में लड़के-लड़कियाँ अपने अलग-अलग समूह बनाने लगते हैं?
उत्तरः
सामान्य रूप से किशोरावस्था प्रारम्भ होते ही लड़के-लड़कियाँ अपने अलग-अलग समूह बनाने लगते हैं।

प्रश्न 3.
बालिकाओं के लिए पढ़ाई क्यों जरूरी है?
अथवा
बालिकाओं को शिक्षित करना क्यों आवश्यक है?
उत्तरः
आज की बालिकाएँ ही भावी गृहिणियाँ एवं माताएँ हैं; अतः उत्तम गृह-व्यवस्था तथा बच्चों के उत्तम पालन-पोषण के लिए बालिकाओं की पढ़ाई जरूरी है। वैसे, जिस प्रकार लड़कों के लिए पढ़ाई आवश्यक है, वैसे ही लड़कियों के लिए भी पढ़ाई आवश्यक है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 20 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए –
1. किशोरावस्था में बालक-बालिका सम्बन्ध होने चाहिए –
(क) अत्यधिक घनिष्ठ
(ख) सीमित एवं स्वाभाविक
(ग) कोई सम्बन्ध नहीं होने चाहिए
(घ) विरोधपूर्ण सम्बन्ध।
उत्तरः
(ख) सीमित एवं स्वाभाविक।

2. मानसिक एवं संवेगात्मक ज्ञान किस अवस्था तक अपरिपक्व माना गया है –
(क) किशोरावस्था
(ख) युवावस्था
(ग) प्रौढ़ावस्था
(घ) वृद्धावस्था।
उत्तरः
(क) किशोरावस्था।

3. किशोरावस्था की मुख्य समस्या क्या है –
(क) मकान
(ख) नौकरी
(ग) अनुशासन
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तरः
(ग) अनुशासन।

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UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 21 गृहस्थ परिवार का आय-व्यय लेखा

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 21 गृहस्थ परिवार का आय-व्यय लेखा (Budget of Family)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 21 गृहस्थ परिवार का आय-व्यय लेखा

UP Board Class 11 Home Science Chapter 21 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पारिवारिक आय-व्यय से क्या तात्पर्य है?
उत्तरः
पारिवारिक आवश्यकताओं की सुचारु पूर्ति ही गृह-अर्थव्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए मुख्य रूप से दो कारक आवश्यक हैं जिन्हें क्रमश: “पारिवारिक आय’ तथा ‘पारिवारिक व्यय’ कहा जाता है। पारिवारिक आय-व्यय का सन्तुलन ही उत्तम गृह-अर्थव्यवस्था की मुख्य शर्त है। ‘पारिवारिक आय’ तथा ‘पारिवारिक व्यय’ का अर्थ एवं सामान्य परिचय निम्नवर्णित है –

पारिवारिक आय का अर्थ (Meaning of Family Income) –
गृह – अर्थव्यवस्था में सर्वाधिक महत्त्व पारिवारिक आय का होता है। पारिवारिक आय से आशय उस धनराशि से है, जो किसी परिवार द्वारा एक निश्चित अवधि में अर्जित की जाती है। आय अर्जित करने के लिए कुछ-न-कुछ प्रयास करने पड़ते हैं। व्यापक अर्थ में पारिवारिक आय में आर्थिक प्रयासों के बदले में मिलने वाली धनराशि के अतिरिक्त उन सुविधाओं को भी सम्मिलित किया जाता है, जो इन प्रयासों के बदले में उपलब्ध होती हैं। उदाहरण के लिए किसी सरकारी कार्यालय में नौकरी करने वाले व्यक्ति को प्रतिमाह एक निश्चित वेतन मिलता है तथा इसके साथ-साथ नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा, आवास सुविधा तथा बच्चों की निःशुल्क शिक्षा की सुविधा भी उपलब्ध होती है। इस स्थिति में सम्बन्धित व्यक्ति को मिलने वाला वेतन तथा अन्य समस्त सुविधाएँ सम्मिलित रूप से व्यक्ति की आय मानी जाती हैं।

प्रो० ग्रास एवं केण्डाल ने पारिवारिक आय की परिभाषा इन शब्दों में प्रतिपादित की है – “पारिवारिक आय मुद्रा, वस्तुओं, सेवाओं तथा सन्तोष का वह प्रवाह है, जो परिवार के अधिकार में उसकी आवश्यकताओं और इच्छाओं को पूर्ण करने तथा उत्तरदायित्वों के निर्वाह हेतु आता है।”

उपर्युक्त कथन के आधार पर कहा जा सकता है कि परिवार के मुखिया एवं अन्य सदस्यों द्वारा अर्जित की जाने वाली धनराशि पारिवारिक आय का मुख्य रूप है। यह धनराशि भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रयासों द्वारा अर्जित की जा सकती है; जैसे—नौकरी, व्यवसाय, उद्योग-धन्धे, कृषि, पशुपालन आदि। धनराशि के अतिरिक्त परिवार को उपलब्ध होने वाली विभिन्न प्रकार की सुविधाएँ भी पारिवारिक आय का ही भाग मानी जाती हैं। इस प्रकार की सुविधाएँ अनेक हो सकती हैं; जैसे – फर्नीचरयुक्त निःशुल्क आवास सुविधा, वाहन सम्बन्धी सुविधा, नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा तथा बच्चों की नि:शुल्क शिक्षा सुविधा।

पारिवारिक व्यय का अर्थ (Meaning of Family Expenses) –
अर्थव्यवस्था के दो मुख्य तत्त्व माने गए हैं-आय तथा व्यय। परिवार के सन्दर्भ में भी आय तथा व्यय का समान रूप से महत्त्व है। आय के रूप में धन अर्जित करने का मुख्य उद्देश्य भी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यय का अधिकार प्राप्त करना ही है। पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जिस धन को व्यय किया जाता है, उसे ही ‘पारिवारिक व्यय’ कहा जाता है।

आय के ही समान व्यय का भी निश्चित लेखा-जोखा रखने के लिए इसे एक निश्चित अवधि के सन्दर्भ में आँका जाता है। सामान्य रूप से, परिवार के लिए मासिक अथवा वार्षिक अवधि में होने वाले व्यय को ही पारिवारिक व्यय के रूप में स्वीकार किया जाता है। व्यय वास्तव में आवश्यकताओं की पूर्ति का एक साधन है। आवश्यकताएँ असंख्य हो सकती हैं, किन्तु सभी आवश्यकताओं की पूर्ति सम्भव नहीं है क्योंकि प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ति के लिए कम या अधिक मात्रा में धन की आवश्यकता होती है, परन्तु धन एक सीमित साधन है। धन की उपलब्धता आय पर निर्भर करती है; अत: व्यय का निर्धारण आय के सन्दर्भ में ही होता है।

पारिवारिक व्यय को हम इस प्रकार भी परिभाषित कर सकते हैं – “किसी निश्चित अवधि में सम्बन्धित परिवार द्वारा अर्जित आय के उस अंश को पारिवारिक व्यय माना जा सकता है, जो परिवार के सदस्यों की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यय हुआ है।”

पारिवारिक आवश्यकताएँ अनेक प्रकार की होती हैं; अत: उनकी पूर्ति के लिए किए जाने वाले व्यय को भी भिन्न-भिन्न वर्गों अथवा प्रकारों में बाँटा जा सकता है। पारिवारिक व्यय के मुख्य वर्ग या प्रकार हैं – निश्चित व्यय, अर्द्ध-निश्चित व्यय, अन्य व्यय तथा आकस्मिक व्यय। निश्चित व्यय प्रतिमाह समान रहते हैं; जैसे कि मकान का किराया। अर्द्ध-निश्चित व्यय ऐसे व्ययों को कहा जाता है, जिनमें प्रतिमाह एक निश्चित सीमा तक ही परिवर्तन होता है। जैसे कि परिवार के सदस्यों के वस्त्रों पर होने वाला व्यय। अन्य व्यय की श्रेणी में उन खर्चों को सम्मिलित किया जाता है जो व्यक्ति की आय एवं सुविधा पर निर्भर करते हैं। ये खर्चे अनिवार्य एवं निश्चित नहीं होते।

सुविधा न होने पर इस वर्ग के खर्चों को बिल्कुल घटाया जा सकता है तथा आय के बढ़ जाने तथा सुविधाओं के उपलब्ध हो जाने की स्थिति में जितना चाहे बढ़ाया जा सकता है। मनोरंजन तथा विलासिता सम्बन्धी आवश्यकताओं पर किए जाने वाले व्यय इसी श्रेणी के हैं। आकस्मिक व्यय में उन पारिवारिक खर्चों को सम्मिलित किया जाता है, जिनका कोई पूर्व-ज्ञान नहीं होता। ये खर्चे योजनाबद्ध नहीं हुआ करते। आकस्मिक व्यय साधारण भी हो सकते हैं तथा बहुत अधिक भी, जिससे सम्पूर्ण गृह-अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। उदाहरण के लिए किसी निकट सम्बन्धी के विवाह के अवसर पर होने वाला आकस्मिक व्यय, साधारण व्यय कहला सकता है, परन्तु परिवार के किसी सदस्य के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर होने वाला आकस्मिक व्यय बहुत अधिक भी हो सकता है।

उपर्युक्त विवरण द्वारा पारिवारिक व्यय के अर्थ एवं विभिन्न प्रकारों का सामान्य परिचय प्राप्त हो जाता है। परिवार के प्रत्येक सदस्य, विशेष रूप से परिवार के मुखिया तथा गृहिणी को इन समस्त पारिवारिक खर्चों के प्रति सचेत रहना चाहिए तथा पर्याप्त सूझ-बूझपूर्वक सभी खर्चों का नियोजन करना चाहिए।

प्रश्न 2.
पारिवारिक बजट का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। पारिवारिक बजट के लाभ एवं उपयोगिता भी स्पष्ट कीजिए।
अथवा
पारिवारिक बजट से क्या तात्पर्य है?
अथवा
परिवार के सफलतापूर्वक संचालन के लिए बजट की क्या उपयोगिता है?
अथवा
पारिवारिक बजट को परिभाषित कीजिए। पारिवारिक बजट के लाभों का वर्णन कीजिए।
उत्तरः
परिवार एक ऐसा केन्द्र है, जहाँ जीवनयापन के समस्त उपाय किए जाते हैं। घर पर ही आहार, वस्त्र, मनोरंजन तथा आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सा आदि की व्यवस्था की जाती है। इन समस्त पारिवारिक गतिविधियों को पूरा करने के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है। धन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए आय की व्यवस्था की जाती है। सामान्य रूप से आय सीमित होती है। इस स्थिति में आय तथा व्यय में सन्तुलन बनाए रखना आवश्यक होता है। आय तथा व्यय को नियोजित करने के उपाय को ही ‘बजट’ कहा जाता है। गृह-व्यवस्था के लिए ‘पारिवारिक बजट’ का विशेष महत्त्व होता है।

पारिवारिक बजट का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Family Budget) –
पारिवारिक अर्थव्यवस्था के दो मुख्य तत्त्व होते हैं – पारिवारिक आय तथा पारिवारिक व्यय। पारिवारिक अर्थव्यवस्था को सफल बनाने के लिए पारिवारिक आय तथा पारिवारिक व्यय को नियोजित करना आवश्यक होता है। इस नियोजन के लिए पारिवारिक आय तथा व्यय के विवरण को लिखित रूप दिया जाता है। आय-व्यय का यह लिखित रूप ही ‘पारिवारिक बजट’ कहलाता है। पारिवारिक बजट में परिवार की आय को ध्यान में रखते हुए समस्त सम्भावित खर्चों को नियोजित रूप से लिख लिया जाता है। पारिवारिक आय-व्यय का यह विवरण-प्रपत्र एक निश्चित अवधि के लिए होता है। यह अवधि सामान्य रूप से एक माह या एक वर्ष हुआ करती है।

पारिवारिक बजट को इन शब्दों में परिभाषित कर सकते हैं – “पारिवारिक बजट किसी परिवार का निश्चित अवधि में होने वाले आय-व्यय का प्रपत्र होता है।”
पारिवारिक बजट में आगामी माह या आगामी वर्ष में होने वाले आय-व्यय का अनुमानित प्रारूप भी होता है।

पारिवारिक बजट की उपयोगिता (Utility of Family Budget) –
पारिवारिक बजट से परिवार, अर्थशास्त्रियों, राजनीतिज्ञों तथा समाज-सुधारकों सभी को लाभ पहुँचता है। पारिवारिक बजट के लाभों का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है –

1. परिवार के लिए बजट का महत्त्व एवं लाभ-परिवार की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए प्रत्येक परिवार द्वारा बजट अवश्य बनाना चाहिए। बजट बनाकर व्यय करने से आय तथा व्यय में सन्तुलन बना रहता है। बजट बनाकर विभिन्न आवश्यक वस्तुओं पर होने वाले व्यय को निर्धारित कर सकते हैं। इससे ज्ञात होता रहता है कि किस वस्तु पर होने वाले व्यय को आवश्यकता पड़ने पर घटाया जा सकता है तथा किस प्रकार से सभी आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है। यदि बिना बजट के ही व्यय करते रहते हैं तो कुछ अनावश्यक वस्तुओं पर अपेक्षाकृत अधिक व्यय हो सकता है। इससे कुछ अपेक्षाकृत आवश्यक कार्य करने के लिए धन नहीं बच पाता तथा समय आने पर कठिनाई उठानी पड़ती है; अत: बजट बनाकर ही व्यय करना चाहिए। पारिवारिक बजट बनाने तथा उसके अनुसार व्यय करने से परिवार को निम्नलिखित लाभ होते हैं –

  • बजट बनाने से विभिन्न मदों पर किया जाने वाला व्यय इन मदों की आवश्यकता तथा महत्त्व को ध्यान में रखकर हो सकता है।
  • बजट बनाने से योजनाबद्ध कार्य करने की क्षमता का विकास होता है। सामान्य से अलग, विशेष अवसरों पर इस क्षमता से सहायता मिलती है और अपव्यय से बचा जा सकता है।
  • बजट बनाने से गृहिणी भविष्य के लिए कुछ-न-कुछ बचत करने का तरीका निकाल लेती है। वैसे भी योजनाबद्ध कार्य करने से कुछ-न-कुछ बचाया जा सकता है।
  • अपनी आय के अनुसार परिवार की समस्त आवश्यकताओं की सन्तुष्टि करते हुए बजट के अनुसार व्यय करने से उचित और अनुकूल जीवनयापन का अभ्यास हो जाता है। इस तरह अपव्यय नहीं होता और ऋण लेने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती है।।
  • पारिवारिक व्यय का उचित लेखा रखने में भी बजट से सहायता मिलती है तथा हिसाब-किताब की आदत पड़ जाती है।
  • बजट बनाने से फिजूलखर्ची पर आवश्यक तथा निश्चित नियन्त्रण हो जाता है।
  • पारिवारिक बजट बनाकर व्यय करने से परिवार में सुख-शान्ति एवं व्यवस्था बनी रहती है। इससे पारिवारिक समृद्धि में भी वृद्धि होती है।

2. अर्थशास्त्रियों को लाभ – अर्थशास्त्री पारिवारिक बजटों के अध्ययन से किसी समाज या राष्ट्र के जीवन-स्तर के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। यदि उनका आर्थिक एवं सामाजिक स्तर गिरता दिखाई देता है तो वे उसे सुधारने के लिए प्रयत्नशील हो सकते हैं। पारिवारिक बजट जनता की आय, मनुष्यों की कर देने की क्षमता तथा सरकार को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कर लगाने के सम्बन्ध में भी ज्ञान देता है। पारिवारिक बजट का अध्ययन महत्त्वपूर्ण आर्थिक नियमों के अनुसन्धान में भी सहायक होता है।

3. राजनीतिज्ञों को लाभ – पारिवारिक बजट समाज का आर्थिक नक्शा प्रदान करता है और इस आर्थिक नक्शे में देश का या समाज का राजनीतिक नक्शा खिंचा मिलता है। जिस प्रकार की लोगों की आर्थिक दशा होगी, उसी के आधार पर वे अपनी राजनीतिक विचारधारा का निर्माण करेंगे। राजनीतिज्ञ इस प्रकार से देश की राजनीतिक स्थिति का अध्ययन कर उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने की दिशा में प्रयत्नशील हो सकते हैं। राजनीतिज्ञ जन सामान्य की करदान क्षमता देखकर अपनी नीति निर्धारित करते हैं।

4. समाज-सुधारकों को लाभ – समाज-सुधारक इसके अध्ययन से यह जान सकते हैं कि जनता अपनी आय का सदुपयोग करती है अथवा दुरुपयोग। यदि जनता का धन बुरी आदतों की सन्तुष्टि में अधिक व्यय होता है तो समाज-सुधारक इसके विरुद्ध प्रचार करके जनता की बुरी आदतों पर नियन्त्रण कर सकते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि पारिवारिक बजट समाज के सभी वर्गों के लिए लाभप्रद एवं उपयोगी हो सकता है। इसका समुचित विवेचन परिवार, समाज और देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है। गृहिणियों के लिए ‘पारिवारिक बजट’ का सर्वाधिक महत्त्व एवं उपयोग है क्योंकि गृहिणियाँ ही गृह-अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

प्रश्न 3.
पारिवारिक बजट के विषय में ऐंजिल्स द्वारा प्रतिपादित नियम का आलोचनात्मक विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तरः
पारिवारिक बजट के विषय में ऐंजिल्स का नियम (Engil’s Rule on Family Budget) –
पारिवारिक बजट अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण विषय है; अत: समय-समय पर विभिन्न समाज-वैज्ञानिकों एवं अर्थशास्त्रियों ने इस विषय में अपने-अपने विचार तथा नियम प्रस्तुत किए हैं। इन विद्वानों में जर्मनी के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ० अर्नेस्ट ऐंजिल्स का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ऐंजिल्स ने समाज के विभिन्न वर्गों से सम्बन्धित परिवारों की गृह-अर्थव्यवस्था का विस्तृत अध्ययन किया तथा 1857 ई० में निष्कर्षस्वरूप एक नियम प्रस्तुत किया, जिसे पारिवारिक बजट सम्बन्धी ‘ऐंजिल्स का नियम’ कहा जाता है।

अर्थशास्त्री ऐंजिल्स ने सामाजिक व्यवस्था को तीन वर्गों अर्थात् उच्च (धनी), मध्यम तथा निम्न वर्ग में विभाजित किया। इस वर्गीकरण का आधार केवल पारिवारिक आय को ही स्वीकार किया गया था। अपने अध्ययनों के आधार पर उन्होंने स्पष्ट किया कि पारिवारिक आय के बढ़ने के साथ-साथ परिवार द्वारा भोजन एवं खाद्य-सामग्री पर किए जाने वाले व्ययों का प्रतिशत घटता जाता है तथा शिक्षा, स्वास्थ्य एवं मनोरंजन या विलासिता की मदों पर होने वाले व्ययों का प्रतिशत बढ़ता जाता है। जहाँ तक वस्त्र, गृह, प्रकाश एवं ईंधन जैसी मदों का प्रश्न है, इन पर होने वाले व्ययों का प्रतिशत प्रायः स्थिर ही रहता है। ऐंजिल्स के इन निष्कर्षों को निम्नांकित तालिका के माध्यम से स्पष्ट किया गया है –
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 21 गृहस्थ परिवार का आय-व्यय लेखा 1

ऐंजिल्स ने पारिवारिक बजट सम्बन्धी अपने नियम के निष्कर्षों को निम्नांकित रेखाचित्र के माध्यम से भी दर्शाया है –
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 21 गृहस्थ परिवार का आय-व्यय लेखा 2
ऐंजिल्स ने पारिवारिक बजट के सैद्धान्तिक स्पष्टीकरण के साथ-साथ उसके व्यावहारिक स्वरूप को भी प्रस्तुत किया। उसने समाज के तीनों वर्गों-उच्च, मध्यम और निम्न के प्रतिनिधियों के रूप में डॉक्टर, अध्यापक और श्रमिक को चुना और उनकी तत्कालीन मासिक आय क्रमशः ₹ 3200, ₹ 1600 और ₹ 400 स्वीकार की। आय के इन स्वरूपों को स्वीकार करके ऐंजिल्स ने समाज के मुख्य वर्गों के पारिवारिक बजट के प्रारूप को निम्नांकित तालिका में प्रस्तुत किया –
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 21 गृहस्थ परिवार का आय-व्यय लेखा 3

ऐंजिल्स के पारिवारिक बजट सम्बन्धी नियम की आलोचना –
एक समय था जब विश्व के सभी देशों में पारिवारिक बजट के विषय में ऐंजिल्स के नियम को विशेष महत्त्वपूर्ण माना जाता था, परन्तु वर्तमान परिस्थितियों में इस नियम को केवल ऐतिहासिक महत्त्व ही प्राप्त है। अब सैद्धान्तिक और व्यावहारिक रूप में इस नियम को कोई विशेष महत्त्व नहीं दिया जाता है। इस नियम की निम्नलिखित आलोचनाएँ प्रस्तुत की गई हैं –

  • भोजन व्यय के सन्दर्भ में-आलोचकों का मत है कि ऐंजिल्स द्वारा अपने बजट में अध्यापक तथा डॉक्टर के भोजन के लिए किए गए धन का प्रावधान बहुत अधिक है।
  • आवास व्यय के सन्दर्भ में-आधुनिक परिस्थितियों में आवास समस्या गम्भीर है। अध्यापक तथा डॉक्टर के लिए निर्धारित किया गया धन कम प्रतीत होता है। आय के 12% भाग को व्यय करके ये वर्ग अपनी प्रतिष्ठा के अनुकूल आवास प्राप्त नहीं कर सकते।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य तथा मनोरंजन व्यय के सन्दर्भ में-ऐंजिल्स ने अपने नियम में मध्यम तथा उच्च वर्ग के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य एवं मनोरंजन के मद में जो व्यय का प्रावधान किया है, वह बहुत अधिक प्रतीत होता है।
  • ईंधन, जल तथा प्रकाश के व्यय के सन्दर्भ में ऐंजिल्स ने अपने नियम में स्वीकार किया है कि ईंधन, जल एवं प्रकाश आदि पर होने वाले व्यय का प्रतिशत भाग सदैव स्थिर रहता है। यह मान्यता उचित नहीं है। व्यवहार में देखा गया है कि आय के बढ़ने के साथ-साथ इन मदों पर होने वाले व्यय के प्रतिशत मान में भी कुछ-न-कुछ वृद्धि अवश्य ही होती है।
  • बचत की अवहेलना सम्बन्धी आलोचना-ऐंजिल्स द्वारा प्रतिपादित बजट सम्बन्धी नियम में कहीं भी पारिवारिक बचत का उल्लेख नहीं है। आधुनिक मान्यताओं के अनुसार समाज के प्रत्येक वर्ग के पारिवारिक बजट में अनिवार्य रूप से नियमित बचत का प्रावधान होना चाहिए। एंजिल्स द्वारा पारिवारिक बचत की अवहेलना की कटु आलोचना हुई है।

प्रश्न 4.
ऐंजिल्स के सिद्धान्त के आधार पर एक मध्यम वर्ग के परिवार के बजट की रूपरेखा बनाइए।
अथवा
एक ऐसे परिवार के लिए व्यावहारिक बजट का प्रारूप प्रस्तुत कीजिए, जिसकी मासिक आय ₹ 12000 प्रतिमाह है तथा परिवार में पति-पत्नी के अतिरिक्त दो छोटे बच्चे हैं।
उत्तरः
पारिवारिक बजट का व्यावहारिक प्रारूप (Practical Structure of Family Budget) –
पारिवारिक बजट का सैद्धान्तिक अध्ययन करने के साथ-साथ उसका व्यावहारिक पक्ष जानना भी आवश्यक है। यहाँ एक ऐसे परिवार के पारिवारिक बजट का प्रारूप प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसकी मासिक आय ₹ 12,000 है तथा परिवार में पति-पत्नी के अतिरिक्त दो छोटे बच्चे भी हैं

गृहस्वामी का नाम – सुभाष चन्द्र शर्मा
घर का पता – 2, तिलक रोड, मेरठ।
परिवार की सदस्य संख्या – 4 (पुरुष 1, स्त्री 1, बच्चे 2)
मासिक आय – ₹ 12000
बजट की अवधि – 1-4-2018 से 31-4-2018
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 21 गृहस्थ परिवार का आय-व्यय लेखा 4
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 21 गृहस्थ परिवार का आय-व्यय लेखा 5
नोट – उपर्युक्त बजट का प्रारूप एक प्रतिदर्श बजट है। इस आधार पर ₹ 15000, ₹ 18000 या ₹ 20,000 आदि आय वाले परिवारों के लिए भी बजट बनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त परिवार की परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विभिन्न मदों पर होने वाले व्यय में भी अन्तर किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
मितव्ययिता का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसके आवश्यक तत्त्व बताइए।
अथवा
गृहिणी किन-किन उपायों से गृहस्थी के व्यय में मितव्ययिता कर सकती है?
अथवा
टिप्पणी लिखिए-मितव्ययिता।
उत्तरः
मितव्ययिता का अर्थ (Meaning of Economy) –
परिवार व्यय का केन्द्र है। इस कारण से यहाँ प्रतिदिन किसी-न-किसी प्रकार का व्यय करना पड़ता है। परिवार के सदस्य जो कमाते हैं उसके अधिकांश भाग को वे अपनी और अपने आश्रितों की विविध प्रकार की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि करने के लिए व्यय करते हैं; किन्तु पैसा खर्च करने वाले के समक्ष यह लक्ष्य आवश्यक रूप से रहता है कि वह धन को किस प्रकार से व्यय करे कि उसकी अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाए। जो व्यक्ति धन को व्यय करने की उचित रीतियाँ जानते हैं, वे आर्थिक संकट का सामना नहीं करते; किन्तु इसके विपरीत जो धन को व्यय करने के उचित तरीकों से अनभिज्ञ हैं, वे सदैव आर्थिक संकट से ग्रस्त रहते हैं और धनाभाव से पीड़ित रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों को अनेक बार गम्भीर आर्थिक संकट का भी सामना करना पड़ जाता है तथा परिणामस्वरूप घर-परिवार कलह का केन्द्र बन जाता है।

पारिवारिक अर्थव्यवस्था को सुचारु बनाए रखने तथा पारिवारिक सुख-समृद्धि को बनाए रखने के लिए पारिवारिक व्यय को मितव्ययितापूर्ण बनाना आवश्यक होता है। मितव्ययिता से हमारा अभिप्राय यह है कि कोई व्यक्ति कम खर्च करके भी अधिकतम सन्तोष प्राप्त कर ले। मितव्ययिता का उद्देश्य अपव्यय या फिजूलखर्ची से बचना है। इसका अर्थ कंजूसी करना नहीं है क्योंकि कंजूसी की स्थिति तो दुःख प्रदान करने वाली होती है। किन्तु इसका यह अर्थ अवश्य है कि जिस वस्तु पर 5 रुपये खर्च करने से ही हम सुख-सन्तोष की प्राप्ति कर सकते हैं, उस पर अनावश्यक रूप से 6 रुपये खर्च न करें।

मितव्ययिता के तत्त्व (Elements of Economy) –
मितव्ययितापूर्वक व्यय करने के लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है –
1. वस्तुएँ खरीदने का उचित स्थानं-आजकल प्रत्येक वस्तु के खरीदने के अनेक स्थान होते हैं और उपभोक्ताओं को इनमें से किसी भी स्थान से इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति हो सकती है। कुशल तथा मर्मज्ञ उपभोक्ताओं को यह ज्ञात होता है कि कौन-सी वस्तु किस स्थान से प्राप्त हो सकती है। कहने का अभिप्राय यह है कि प्रत्येक वस्तु की प्राप्ति का एक निश्चित स्थान होता है और इसकी जानकारी समय तथा धन की बचत कराती है।

2. खरीदारी के सिद्धान्त-पैन्सन नामक अर्थशास्त्री ने धन को व्यय करने के सम्बन्ध में वस्तुओं के मूल्य के सम्बन्ध में कुछ सुझाव दिए हैं। ये सुझाव निम्नलिखित हैं

(i) अपनी आवश्यकताओं का पूर्ण ज्ञान-एक सफल खरीदार को अपनी आवश्यकताओं का पूर्ण ज्ञान अवश्य होना चाहिए। बाजार में पहुँचने पर जो भी वस्तु अच्छी लगे, उसे अपनी आवश्यकता के अभाव में भी खरीद लेना अपव्यय है। आवश्यकता न होने पर सस्ती वस्तु का खरीदना भी महँगा एवं अनुचित ही है क्योंकि वह घर में व्यर्थ पड़ी रहेगी। अत: केवल वे ही वस्तुएँ खरीदी जानी चाहिए, जिनकी हमें आवश्यकता है। ऐसा करने पर कम धन व्यय करके अधिकतम सन्तोष प्राप्त किया जा सकता है।

(ii) आवश्यकताओं की तीव्रता का ज्ञान-खरीदार को यह भी पता होना चाहिए कि उसे किस आवश्यकता की तत्काल पूर्ति करनी है तथा किसकी बाद में पूर्ति की जा सकती है। जो व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं का उचित रूप से क्रम निर्धारण कर लेते हैं, वे कम खर्च से ही अधिक सन्तोष प्राप्त कर सकते हैं।

(iii) वस्तु के गुणों का ज्ञान-खरीदार को माल के जाँचने की योग्यता भी होनी चाहिए। मोल-भाव तो कर लिया, किन्तु यह न देखा कि वस्तु अच्छी भी है या नहीं, तो खरीदार धोखा खा सकता है। क्योंकि कभी-कभी सस्ती वस्तु बिल्कुल बेकार सिद्ध हो सकती है; अत: वस्तु के गुणों को देखकर ही उसे खरीदना चाहिए।

(iv) सस्ती वस्तुओं के प्राप्ति स्थान का ज्ञान-खरीदार को यह भी पता होना चाहिए कि सस्ती वस्तु किस दुकान से या किस स्थान से प्राप्त हो सकती है। दूर जाने से बचने के लिए कुछ लोग अपने परिचितों की दुकानों से ही सौदा लेते हैं, भले ही वहाँ उनसे कुछ अधिक मूल्य ले लिया जाए। मोल-भाव करके तथा सस्ती वस्तु की प्राप्ति के स्थान का पता लगाने से भी बचत हो जाती है।

(v) मोल-भाव करने की योग्यता-कुशल खरीदार को सौदा करना भी आना चाहिए। कभी-कभी दुकानदार दो रुपये की वस्तु का मूल्य तीन-चार रुपये तक बता देता है और यदि उनसे ठीक प्रकार से मोल-भाव न किया जाए तो खरीदार को पर्याप्त नुकसान हो सकता है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि छोटी-छोटी बातों पर दुकानदार से व्यर्थ का विवाद किया जाए। कुछ दुकानें ऐसी भी होती हैं, जहाँ वस्तुओं का गलत मूल्य नहीं बताया जाता और अनुभव से खरीदार यह बात जान सकता है।

3. अपव्यय से बचना-मितव्ययिता के लिए आवश्यक है कि हर प्रकार के अपव्यय या फिजूलखर्ची से बचा जाए। यह फिजूलखर्ची वस्तुओं के क्रय से सम्बन्धित भी हो सकती है तथा वस्तुओं या सुविधाओं के अनावश्यक उपभोग से सम्बन्धित भी। घर पर आवश्यकता न होने पर बिजली, पानी तथा ईंधन का प्रयोग नियन्त्रित करना चाहिए। इससे सम्बन्धित बिल कम आते हैं। इसी प्रकार खाद्य-सामग्री या पकवान उतने ही तैयार करने चाहिए जितने कि खाने के काम आ जाएँ। अधिक बनाने से बाद में वे फेंकने पड़ते हैं तथा उनकी लागत व्यर्थ जाती है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 21 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पारिवारिक बजट बनाने के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
पारिवारिक बजट बनाने के उद्देश्य पारिवारिक बजट बनाने के उद्देश्यों को हम निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं –

  • परिवार के सदस्यों की संख्या तथा आमदनी का ज्ञान प्राप्त करना।
  • परिवार के सभी प्रकार के खर्चों का क्रमिक ज्ञान प्राप्त करना।
  • परिवार की आवश्यकताओं और रहन-सहन के स्तर का ध्यान रखना।
  • बजट के खर्चे का इस प्रकार ध्यान रखना आवश्यक है कि आकस्मिक दुर्घटनाओं का सामना आसानी से किया जा सके।
  • गृह-अर्थव्यवस्था में नियमित बचत का प्रावधान रखना।

प्रश्न 2.
टिप्पणी लिखिए-पारिवारिक बजट के प्रकार।
उत्तरः
पारिवारिक बजट के प्रकार –
पारिवारिक बजट के तीन तत्त्व होते हैं-आय, व्यय तथा बचत। इन तत्त्वों के आधार पर पारिवारिक बजट के तीन प्रकार निर्धारित किए जाते हैं। प्रथम प्रकार है –

  • सन्तुलित बजट-इस बजट में पारिवारिक आय के बराबर ही पारिवारिक व्यय का प्रावधान होता है। दूसरा प्रकार है।
  • घाटे का बजट-इस बजट में आय की अपेक्षा अधिक व्यय का प्रावधान होता है तथा तीसरा प्रकार है।
  • बचत का बजट-इस बजट में पारिवारिक आय की तुलना में कम व्यय का प्रावधान होता है। गृह-अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में बचत के बजट को सर्वोत्तम बजट माना जाता है।

प्रश्न 3.
पारिवारिक बचत से क्या आशय है? पारिवारिक बचत के मुख्य लाभों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
बजट में बचत का प्रावधान करना क्यों आवश्यक है?
उत्तरः
पारिवारिक बचत का अर्थ तथा उसके लाभ –
वर्तमान पारिवारिक आय में से परिवार की वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यय करने के उपरान्त जो धनराशि बच जाती है, उसे ‘पारिवारिक बचत’ कहा जाता है। इस प्रकार से की गई बचत को उचित ढंग से विनियोजित कर देने से अधिक लाभ होता है। यही कारण है कि पारिवारिक बजट तैयार करते समय उसमें अनिवार्य रूप से बचत का प्रावधान रखा जाता है। .
नियमित पारिवारिक बचत से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं –

1. भविष्य की विपत्तियों को सहन करने की सामर्थ्य प्राप्त होती है – मनुष्य को धन जीवन में बीमारी, बेरोजगारी, व्यापारिक हानि, भूचाल, बाढ़ आदि विपत्तियाँ सहन करने की सामर्थ्य प्रदान करता है। इसीलिए नियमित पारिवारिक बचत को आवश्यक माना जाता है।

2. पारिवारिक उत्तरदायित्व निभाने की योग्यता उत्पन्न होती है – पारिवारिक उत्तरदायित्व निभाने की योग्यता का आधार बचत ही है। मनुष्य को भविष्य में बच्चों की शिक्षा, विवाह तथा सामाजिक रीति-रिवाजों पर धन व्यय करना पड़ता है, जिनमें बचत विशेष रूप से सहायक होती है।

3. वृद्धावस्था के लिए सुरक्षा – बचत द्वारा एकत्र किया हुआ धन वृद्धावस्था में काम आता है, इसलिए बचत करने पर मनुष्य वृद्धावस्था में सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता है।

4. आश्रितों के पालन-पोषण की व्यवस्था – बचत करते रहने पर मृत्यु के बाद आश्रित परिवार का भरण-पोषण कुछ समय तक ठीक-ठीक होता रहता है, वे एकदम अनाथ होकर भटकते नहीं फिरते हैं।

5. आय वृद्धि – बचत द्वारा आय में वृद्धि होती है। बचाया हुआ धन किसी को उधार देकर या बैंक में जमा करके ब्याज कमाया जा सकता है, जिससे आय और पूँजी बढ़ती है। इसलिए बचत करना सभी प्रकार से लाभकारी है।

6. सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि – नियमित रूप से की गई बचत परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा की वृद्धि में सहायक होती है। कुछ ऐसी परिस्थितियाँ होती हैं, जब परिवार की प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त व्यय करना पड़ता है। यह व्यय पारिवारिक बचत से ही सम्भव हो पाता है।

7. राष्ट्रीय योजनाओं के संचालन में सहायक – नियमित पारिवारिक बचत न केवल परिवार के लिए आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है वरन् यह राष्ट्रीय प्रगति एवं समृद्धि के दृष्टिकोण से भी महत्त्वपूर्ण है। देश के परिवारों द्वारा की गई नियमित अल्प बचतों को राष्ट्रीय बचत योजनाओं में विनियोजित किया जाता है, जिससे सरकार को पर्याप्त धन प्राप्त होता है और उसके द्वारा अनेक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय परियोजनाओं का संचालन किया जाता है।

प्रश्न 4.
स्पष्ट कीजिए कि स्त्री घर पर रहकर भीगृह-अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बना सकती है।
अथवा
गृह-अर्थव्यवस्था में गृहिणी के योगदान को स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
गृह-अर्थव्यवस्था में गृहिणी का योगदान
आधुनिक युग में विभिन्न परिस्थितियों तथा सुविधाओं के कारण नगरों में अनेक स्त्रियाँ घर के कार्यों के अतिरिक्त घर से बाहर भी अनेक प्रकार के कार्य करने लगी हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय प्राप्त होती है, परन्तु कुछ लोग इस बात के विरुद्ध भी हैं। उनका कहना है कि स्त्रियों को घर पर रहकर ही गृह-प्रबन्ध को सुचारु रूप से देखना चाहिए। इस वर्ग के लोगों का विचार है कि उत्तम गृह-प्रबन्ध करके भी स्त्रियाँ पारिवारिक आय को बढ़ाने में सहयोग दे सकती हैं। ऐसी स्थिति में स्त्रियाँ हर वस्तु को सँभालकर व्यय करती हैं तथा किसी वस्तु को नष्ट नहीं होने देतीं।

इसके अतिरिक्त, घर पर रहने वाली स्त्रियाँ घर के सभी कार्य स्वयं कर सकती हैं, जिससे अन्यथा लगाए जाने वाले नौकर या महरी का खर्च बच जाता है। घर से बाहर जाने वाली स्त्रियों को अपने छोटे बच्चों की देखभाल के लिए आया आदि की व्यवस्था करनी पड़ती है। यदि स्त्री घर पर ही है तो यह खर्च भी बच जाता है। यदि स्त्री स्वयं पढ़ी-लिखी है तो वह अपने छोटे बच्चों को स्वयं ही पढ़ा-लिखा सकती है। इससे बच्चों के ट्यूशन आदि पर होने वाला व्यय बच जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि स्त्री घर पर रहकर भी अच्छे ढंग से गृह-प्रबन्ध एवं व्यवस्था करके पारिवारिक आय को बढ़ाने में कुछ सीमा तक सहयोग दे सकती है। वैसे आज के युग में पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ नौकरी आदि करके ही पारिवारिक आय को बढ़ाने में सहयोग देना अधिक पसन्द करती हैं।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 21 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
गृह-अर्थव्यवस्था से क्या आशय है?
उत्तरः
गृह-अर्थव्यवस्था वह व्यवस्था है, जिसके अन्तर्गत घर-परिवार के आय-व्यय को अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों के आधार पर सुनियोजित किया जाता है तथा इस नियोजन के द्वारा परिवार को अधिक-से-अधिक सन्तोष प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 2.
गृह-अर्थव्यवस्था के लिए सर्वाधिक आवश्यक कारक क्या है?
उत्तरः
गृह-अर्थव्यवस्था के लिए सर्वाधिक आवश्यक कारक धन अथवा आय है।

प्रश्न 3.
सुचारु गृह-अर्थव्यवस्था में सर्वाधिक योगदान परिवार के किस सदस्य का होता है?
उत्तरः
सुचारु गृह-अर्थव्यवस्था में सर्वाधिक योगदान गृहिणी का होता है।

प्रश्न 4.
उत्तम अथवा सफल गृह-अर्थव्यवस्था की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तरः
उत्तम अथवा सफल गृह-अर्थव्यवस्था की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं –

  1. परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं की प्राथमिकता का निर्धारण तथा
  2. नियमित बचत का प्रावधान।

प्रश्न 5.
स्वरोजगार एवं रोजगार में क्या अन्तर है?
उत्तरः
जब कोई व्यक्ति मुक्त रूप से अपनी योग्यता एवं कुशलता के आधार पर धन उपार्जन के उपाय करता है तो उसे स्वरोजगार कहा जाता है, जैसे प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाला चिकित्सक, लेखक, नक्शानवीस, कलाकार, गायक आदि। इससे भिन्न जब कोई व्यक्ति किसी संस्थान, कार्यालय या औद्योगिक व्यावसायिक केन्द्र के लिए निर्धारित वेतन तथा कार्य सम्बन्धी निर्धारित शर्तों पर कार्य करता है तो उसे रोजगार कहते हैं।

प्रश्न 6.
आय-व्यय को सन्तुलित रखने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तरः
आय-व्यय को सन्तुलित रखने के लिए पारिवारिक बजट बनाना चाहिए तथा उसका पालन करना चाहिए।

प्रश्न 7.
पारिवारिक बजट बनाने का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
उत्तरः
पारिवारिक बजट बनाने का प्रमुख उद्देश्य गृह-अर्थव्यवस्था को सुचारु बनाना है।

प्रश्न 8.
परिवार में आय-व्यय का लेखा रखने का लाभ लिखिए।
उत्तरः
परिवार में आय-व्यय का लेखा रखने से परिवार का व्यय नियन्त्रित रहता है तथा गृह-अर्थव्यवस्था नहीं बिगड़ती।

प्रश्न 9.
पारिवारिक बजट की सर्वाधिक उपयोगिता किसके लिए है?
उत्तर
पारिवारिक बजट की सर्वाधिक उपयोगिता गृहिणियों के लिए है।

प्रश्न 10.
पारिवारिक बजट के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तरः
पारिवारिक बजट के मुख्य प्रकार हैं –

  • घाटे का बजट
  • सन्तुलित बजट तथा
  • बचत का बजट।

प्रश्न 11.
किस प्रकार के पारिवारिक बजट को सर्वोत्तम माना जाता है?
उत्तरः
बचत के पारिवारिक बजट को सर्वोत्तम माना जाता है।

प्रश्न 12.
पारिवारिक बजट बनाने में उत्पन्न होने वाली मुख्य बाधाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
पारिवारिक बजट बनाने में उत्पन्न होने वाली मुख्य बाधाएँ हैं –

  • ज्ञान की न्यूनता या अशिक्षा
  • बजट के प्रति उदासीनता तथा
  • विभिन्न सामाजिक प्रचलन एवं प्रथाएँ।

प्रश्न 13.
मितव्ययिता से क्या आशय है?
उत्तरः
मितव्ययिता का अर्थ है अपव्यय से बचना। यह कंजूसी नहीं है।

प्रश्न 14.
पारिवारिक बचत से क्या आशय है?
उत्तरः
वर्तमान पारिवारिक आय में से परिवार की वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यय करने के उपरान्त जो धनराशि बच जाती है, उसे ‘पारिवारिक बचत’ कहा जाता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 21 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए

1. अच्छी अर्थव्यवस्था निर्भर करती है –
(क) कम खर्च अधिक आय पर
(ख) आय के अनुसार बजट बनाकर बचत करते हुए खर्च करने पर
(ग) आय से अधिक खर्च करने पर
(घ) अधिक आय पर।
उत्तरः
(ख) आय के अनुसार बजट बनाकर बचत करते हुए खर्च करने पर।

2. आय का वह भाग, जिसका उपयोग आवश्यकताओं की पूर्ति में होता है, कहलाता है –
(क) आय
(ख) व्यय
(ग) बचत
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तरः
(ख) व्यय।

3. आय का वह भाग, जो वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति के पश्चात् शेष बचता है तथा जिसे –
भविष्य के लिए उत्पादक कार्यों में लगा दिया जाता है, कहलाता है –
(क) नि:संचय
(ख) बचत
(ग) आय
(घ) व्यय।
उत्तरः
(ख) बचत।

4. बचत का मुख्य प्रयोजन है –
(क) भविष्य के आवश्यक एवं आकस्मिक व्यय के लिए
(ख) मनोरंजन के लिए
(ग) विलासात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए
(घ) सुख प्राप्ति के लिए।
उत्तरः
(क) भविष्य के आवश्यक एवं आकस्मिक व्यय के लिए।

5. बजट का अर्थ है –
(क) खर्चों की सूची
(ख) आय-व्यय का ब्योरा
(ग) खरीदारी
(घ) बचत।
उत्तरः
(ख) आय-व्यय का ब्योरा।

6. बजट उल्लेख करता है –
(क) परिवार की कुल आय का
(ख) परिवार के कुल व्यय का
(ग) परिवार की कुल बचत का
(घ) उपर्युक्त सभी का।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी का।

7. बजट में निम्नलिखित में से किसके लिए व्यवस्था अवश्य करनी चाहिए –
(क) पुस्तकें
(ख) त्योहार
(ग) बचत
(घ) मनोरंजन।
उत्तरः
(ग) बचत।

8. पारिवारिक बजट अनावश्यक व्यय को –
(क) प्रोत्साहन देता है
(ख) नियन्त्रित करता है
(ग) सहायता प्रदान करता है
(घ) स्वीकृति प्रदान करता है।
उत्तरः
(ख) नियन्त्रित करता है।

9. आय-व्यय में सन्तुलन बनाए रखने के लिए निम्नलिखित बनाना जरूरी है –
(क) समय-सारणी
(ख) बजट
(ग) मीनू
(घ) चार्ट।
उत्तरः
(ख) बजट।

10. आय-व्यय में सन्तुलन हेतु निम्नलिखित में से कौन-सा साधन उपयुक्त होगा –
(क) वार्षिक बजट
(ख) मासिक बजट
(ग) साप्ताहिक बजट
(घ) दैनिक बजट।
उत्तरः
(ख) मासिक बजट।

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UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 2 कंकाल तन्त्र

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 2 कंकाल तन्त्र (Skeletal System)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 2 कंकाल तन्त्र

UP Board Class 11 Home Science Chapter 2 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कंकाल तन्त्र से आप क्या समझती हैं? अस्थियों की सामान्य संरचना भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कंकाल तन्त्र (The Skeletal System):
कशेरुकी प्राणियों अर्थात् रीढ़ की हड्डी वाले प्राणियों के शरीर का अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है कि उनके शरीर का आकार सुनिश्चित होता है। उनके शरीर में एक विशिष्ट प्रकार की दृढ़ता एवं गतिशीलता देखी जा सकती है। इन प्राणियों के शरीर के इन विशिष्ट गुणों एवं गतिविधियों को बनाए रखने के लिए अलग से एक तन्त्र या संस्थान होता है, जिसे अंस्थि संस्थान अथवा कंकाल तन्त्र (skeletal system) कहा जाता है। अस्थि संस्थान में अनेक छोटी-बड़ी अस्थियाँ होती हैं, जो परस्पर व्यवस्थित ढंग से सम्बद्ध होती हैं। ये अस्थियाँ ही सम्मिलित रूप से शरीर को निश्चित आकार तथा व्यवस्थित गति प्रदान करती हैं। अस्थियाँ ही शरीर को साधने का कार्य करती हैं। इन समस्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि अस्थि संस्थान या कंकाल तन्त्र शरीर का वह महत्त्वपूर्ण तन्त्र है, जो विभिन्न अस्थियों की पारस्परिक सम्बद्ध व्यवस्था द्वारा शरीर को आकार, दृढ़ता तथा गति प्रदान करता है। कंकाल तन्त्र के दो भाग माने जाते हैं

(क) बाह्य कंकाल (exoskeleton): ऐसी संरचनाएँ जो शरीर के बाहरी स्तर अर्थात् त्वचा (skin) पर स्थित होती हैं; जैसे—बाल, नाखून आदि।

(ख) अन्तःकंकाल (endoskeleton): यह अनेक पृथक्-पृथक् टुकड़ों से बना एक पिंजर या ढाँचा (framework) है। यह अधिकांशत: अस्थियों (bones) का बना होता है, जिनके सहयोग के लिए अनेक उपास्थियाँ (cartilages) भी होती हैं। एक सामान्य वयस्क व्यक्ति के शरीर में कुल 206 .. अस्थियाँ होती हैं।

अस्थियों की संरचना (Structure of Bones):
अस्थियाँ तथा उपास्थियाँ सजीव होती हैं। अस्थियों का निर्माण भ्रूणावस्था में उपास्थियों के रूप में होता है। इनमें से अधिकांश उपास्थियाँ; विभिन्न खनिजों, जैसे कैल्सियम, मैग्नीशियम आदि के कार्बोनेट्स, फॉस्फेट्स आदि के जमा हो जाने के कारण; अस्थियों के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं तथा कुछ उपास्थियों के ही रूप में रह जाती हैं। उपास्थियों से ‘अस्थियों में परिवर्तन की इस क्रिया को अस्थिभवन (ossification) कहते हैं। अस्थियों को ढकने वाला आवरण अत्यन्त कड़ा होता है। इसे अस्थिच्छद (periosteum) कहते हैं। लम्बी अस्थियाँ खोखली होती हैं। इनकी गुहा को अस्थिगुहा । कहते हैं तथा इसमें एक विशेष गूदे जैसा पदार्थ भरा रहता है, जिसे अस्थि मज्जा (bone marrow) कहते हैं। इसी में अनेक रुधिर केशिकाएँ, तन्त्रिकाएँ आदि भी होती हैं। अस्थि मज्जा में रुधिर कणों का निर्माण होता है।
अन्त:कंकाल को स्थिति के अनुसार निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है

  • अक्षीय कंकाल (axial skeleton) तथा
  • अनुबन्धी कंकाल (appendicular skeleton)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 11

अन्त:कंकाल को अग्रांकित तालिका द्वारा भली प्रकार समझा जा सकता है-
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 12
प्रश्न 2.
शरीर के कंकाल तन्त्र एवं अस्थियों की क्या उपयोगिता है?
अथवा “अस्थियाँ शरीर को आकृति, गति, दृढ़ता एवं सुरक्षा प्रदान करती हैं।” इस कथन को ध्यान में रखते हुए, शरीर में अस्थियों की उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए।
अथवा टिप्पणी लिखिए-अस्थि तन्त्र के कार्य।
अथवा शरीर में अस्थि तन्त्र की क्या भूमिका है?
अथवा मानव शरीर में अस्थियों के क्या कार्य एवं महत्त्व हैं?
उत्तर:
शरीर में कंकाल तन्त्र और अस्थियों की उपयोगिता एवं कार्य (Utility and Functions of Skeletal System and Bones in Body):
कंकाल तन्त्र अर्थात अस्थियों की व्यवस्था शरीर के लिए अत्यन्त उपयोगी है। इनके निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कार्य हैं

शरीर को आकृति प्रदान करना: कंकाल तन्त्र शरीर को आकार प्रदान करता है। अस्थियाँ बाहर से त्वचा द्वारा ढकी रहती हैं। त्वचा तथा अस्थियों के मध्य मांसपेशियाँ होती हैं। यदि शरीर में अस्थियाँ न होती तो शरीर मांस का एक बड़ा-सा लोथड़ा होता तथा उसका सधा रह पाना सम्भव न होता।

शरीर को गति प्रदान करना: प्राणि-शरीर में अस्थि संस्थान का एक महत्त्वपूर्ण कार्य शरीर को गति प्रदान करना भी है। शरीर के विभिन्न अंगों की गति अस्थियों तथा मांसपेशियों के सहयोग से ही सम्भव हो पाती है। शरीर की कुछ अस्थियाँ तो आपस में जुड़कर उत्तोलक के रूप में कार्य करती हैं। शरीर को सुचारु रूप से गतिशील बनाने में अस्थि-संस्थान में अस्थि-सन्धियों की व्यवस्था है।

शरीर के भीतरी कोमल अंगों को सुरक्षा प्रदान करना: हमारे शरीर में कई स्थानों पर अस्थियाँ मिलकर एक खोखला सन्दूक-सा बनाती हैं, जिसमें हमारे शरीर के कोमल अंग सुरक्षित रहते हैं। उदाहरण के लिए खोपड़ी के अन्दर मस्तिष्क, पसलियों आदि से बने पिंजर में हृदय व फेफड़े तथा रीढ़ की अस्थि या कशेरुक दण्ड के तन्त्रिकीय नाल में रीढ़ रज्जु या सुषुम्ना सुरक्षित रहती है।

शरीर को दृढ़ता प्रदान करना: अस्थियों की उपस्थिति के कारण शरीर में दृढ़ता आती है। यदि शरीर में अस्थियाँ न होती तो शरीर में आघात सहने की शक्ति भी नहीं होती। अस्थियों की सहायता से ही हम भारी-से-भारी बोझ उठा सकते हैं।

रक्त कणों का निर्माण: कंकाल की अस्थियों की अस्थि-गुहा में विद्यमान अस्थि-मज्जा में लाल रक्त कणिकाओं का निर्माण होता है। यदि अस्थियों के मज्जा वाले भाग में किसी प्रकार का विकार या अनियमितता आ जाती है तो रक्त कणिकाओं का निर्माण भी अनियमित हो जाता है। अस्थियों द्वारा निरन्तर रक्त कणिकाओं के निर्माण को ध्यान में रखते हुए ही अस्थियों को लाल रक्त कणिकाओं के निर्माण की फैक्ट्रियाँ भी कहा जाता है।

पेशियों को जुड़ने का स्थान देना: विभिन्न मांसपेशियाँ अस्थियों के साथ जुड़ी होती हैं। इसी से अनेक प्रकार की गतियाँ होती हैं तथा शरीर चलने-फिरने एवं अन्य कार्य करने का आधार प्राप्त करता है। वास्तव में अस्थि-सन्धियाँ तथा मांसपेशियाँ मिलकर ही शरीर के अंगों को गतिशीलता प्रदान करती हैं।

बाहरी कंकाल के रूप में उपयोगिता: बाल तथा नाखून भी कंकाल तन्त्र के ही एक रूप हैं। कंकाल तन्त्र का यह बाहरी भाग भी हमारे लिए विशेष उपयोगी है। बाल तथा नाखून भी शरीर को अनेक प्रकार से सुरक्षा प्रदान करते हैं।

श्रवण तथा श्वसन में सहायता प्रदान करना: हमारे कंकाल तन्त्र में विद्यमान विभिन्न उपास्थियाँ श्रवण तथा श्वसन में सहायक होती हैं। वास्तव में कान के अन्दर के भाग, वायु नलिकाओं के छल्ले तथा पसलियों का कुछ भाग उपास्थि से निर्मित होता है। ये उपास्थियाँ श्रवण तथा श्वसन क्रियाओं में सहायक होती हैं।

कैल्सियम को संचित करना: हमारे शरीर के लिए कैल्सियम की विशेष उपयोगिता एवं महत्त्व है। शरीर के लिए आवश्यक कैल्सियम की अधिकांश मात्रा अस्थियों में ही संचित रहती है। इस दृष्टिकोण से भी हम अस्थियों को शरीर के लिए उपयोगी मानते हैं।

प्रश्न 3.
मानव कपाल या खोपड़ी का संक्षिप्त परिचय दीजिए। शरीर के इस भाग में पायी जाने वाली अस्थियों के नाम एवं रचना आदि बताइए।
उत्तर:
मनुष्य की खोपड़ी (skull) में कुल 22 अस्थियाँ पायी जाती हैं। इनमें से 8 अस्थियाँ मस्तिष्क कोष में तथा 14 चेहरे में पायी जाती हैं। ये अस्थियाँ ऊपर से चपटी, दोनों ओर से गोल व पीछे से अण्डाकार होती हैं। खोपड़ी हमारी गर्दन के ऊपरी भाग पर टिकी रहती है। गर्दन के सहारे खोपड़ी को विभिन्न दिशाओं में घुमाया जा सकता है। हम केवल पीछे की दिशा में खोपड़ी को नहीं घुमा सकते।

खोपड़ी की विभिन्न अस्थियाँ (Various Bones of Skull):
मानव कपाल या खोपड़ी को हम दो भागों में बाँट सकते हैं-
(1) मस्तिष्क कोष (cranium),
(2) चेहरा (face)

1. मस्तिष्क कोष (Cranium)
यह आठ अस्थियों से मिलकर बना होता है। यह एक डिब्बे (box) के समान है, जिसके अन्दर मस्तिष्क सुरक्षित रहता है। इन आठों अस्थियों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है

ललाटास्थि (frontal bone): यह कपाल या खोपड़ी के सामने की अस्थि है। इससे ललाट या मस्तक (forehead) बनता है। इसी में हमारी आँखों के दो गड्ढे भी होते हैं। यह संख्या में एक होती है।

पाश्र्वास्थियाँ (parietal bones): ये अस्थियाँ कपाल की सतह तथा अगल-बगल के भाग बनाती हैं। ये सिर की गोलाई के साथ दोनों ओर मुड़ी रहती हैं। ये सामने की ओर ललाटास्थि से पीछे की ओर पश्चादास्थि से जाकर जुड़ती हैं। ये संख्या में दो होती हैं।

पश्चादास्थि (occipital bone): यह खोपड़ी या कपाल के पीछे का भाग तथा कुछ नीचे का भाग बनाती है। इसके निचले भाग में लगभग 4 सेमी का एक गोल छिद्र बना होता है। इसको महाछिद्र (foramen magnum) कहते हैं। इसमें होकर मस्तिष्क तथा सुषुम्ना का आपस में सम्बन्ध रहता है। इस छिद्र के सामने की ओर दो उभार दिखाई देते हैं। इनकी सहायता से एक जोड़ बनता है, जिससे मनुष्य सिर को आगे व पीछे की ओर कर सकता है। यह संख्या में एक होती है।

शंखास्थि (temporal bones): इनके द्वारा कनपटी की अस्थि बनती है। इनके दोनों ओर एक-एक छिद्र होता है, जो कान के अन्दर के भाग से सम्बन्ध रखते हैं। कानों के पीछे का भाग इन्हीं अस्थियों से मिलकर बना है। ये संख्या में दो होती हैं।

जतूकास्थि (sphenoid bone): यह अस्थि देखने में पंख फैलाए चमगादड़ के समान लगती है। यह कपाल के धरातल के नीचे सामने की ओर ललाटास्थि से मिलकर चक्षुगुहा बनाती है। यह खोपड़ी या कपाल की अन्य अस्थियों के बीच जुड़ी रहती है। यह संख्या में एक होती है।

झर्झरास्थि या बहुछिद्रास्थि (ethmoid bone): कपाल में यह एक विचित्र प्रकार की अस्थि होती है जो मस्तिष्क की गुहा को नाक से पृथक् करती है। यह नाक के ऊपरी भाग में दो छिद्र बनाती है। इसमें अनेक छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, जिनमें होकर तन्त्रिकाएँ मस्तिष्क में जाती व आती हैं। ललाटास्थि ये आठों अस्थियाँ आपस में विशेष प्रकार की अचल सन्धियों द्वारा जुड़ी रहती हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 14

2. चेहरा (Face)
इसमें 14 अस्थियाँ पायी जाती हैं, जिनके नाम एवं सामान्य परिचय इस प्रकार है-

ऊपरी जबड़े की अस्थियाँ (upper jaw bones): ये अस्थियाँ मुँह के ऊपरी भाग में होती हैं। प्रत्येक अस्थि में 8 गड्डे होते हैं, जिनके अन्दर ऊपर के 16 दाँत लगे रहते हैं। ऊपर के तालू का भाग भी इन्हीं अस्थियों से मिलकर बनता है। ये संख्या में दो होती हैं।

निचले जबड़े की अस्थि (lower jaw bone): इस अस्थि द्वारा ठोड़ी बनती है। यह चेहरे की सबसे मजबूत अस्थि है। इसमें भी 16 गड्डे पाए जाते हैं, जिनमें नीचे के 16 दाँत लगे रहते हैं। यह एक ही अस्थि होती है।

गाल या कपोलास्थियाँ (cheek bones): ये अस्थियाँ दोनों ओर के गालों का निर्माण करती हैं जिससे गाल उभरे हुए दिखाई देते हैं। ये अस्थियाँ संख्या में दो होती हैं।

तालू की अस्थियाँ (palate bones): इनके द्वारा तालू का पिछला भाग बनता है। ये संख्या में दो होती हैं।

नाक की अस्थियाँ (nasal bones): इनके द्वारा नाक के दोनों नथुनों की बाहरी दीवार बनती है। ये संख्या में दो होती हैं।

स्पंजी अस्थियाँ (spongy bones): इनके द्वारा नाक के अन्दर के भाग बनते हैं। इनका आकार सीप के समान होता है। ये स्पंज के समान मुलायम होती हैं। ये संख्या में दो होती हैं।

अश्रु अस्थियाँ (lachrymal bones): इनका सम्बन्ध अश्रुओं से होता है। इनसे होकर आँसू आँखों से नाक में आ जाते हैं। इनकी संख्या दो होती है।

नाक का पर्दा (vomer bone): इस अस्थि के द्वारा नाक दो भागों में विभाजित हो जाती है। इसकी संख्या एक होती है। इस प्रकार मस्तिष्क कोष की 8 तथा चेहरे की 14 अस्थियाँ मिलकर कपाल या खोपड़ी की कुल 22 अस्थियाँ होती हैं।

प्रश्न 4.
मेरुदण्ड में कितनी कशेरुकाएँ पायी जाती हैं? किसी एक कशेरुका का चित्र सहित वर्णन कीजिए। अथवा रीढ़ की अस्थि में झुकाव क्यों होते हैं? ये कितने होते हैं और शरीर में इनकी क्या उपयोगिता है?
उत्तर:
रीढ़ की अस्थियाँ या कशेरुक दण्ड (Vertebral Column or Back Bone):
मेरुदण्ड या कशेरुक दण्ड शरीर के लिए आधार का कार्य करता है। यह अनेक छल्ले के आकार की टेढ़ी-मेढ़ी अस्थियों की एक श्रृंखला है, जो पीठ के बीचोबीच गर्दन में प्रारम्भ होकर नीचे मलद्वार के 6-7 सेमी ऊपर तक एक स्तम्भ की भाँति फैली होती है। इसमें कुल मिलाकर 26 अस्थियाँ होती हैं। छोटे बच्चे के कशेरुक दण्ड में 33 अस्थियाँ होती हैं, बड़े होने पर नीचे की 9 अस्थियों में से पिछली 5 मिलकर एक और अन्तिम 4 मिलकर एक अस्थि बन जाती है। इस प्रकार कुल 26 अस्थियाँ रह जाती हैं। इन छोटी-छोटी अस्थियों को कशेरुकाएँ कहा जाता है। इनका वर्गीकरण इस प्रकार है-

कशेरुकाओं का वर्गीकरण (Classification of Vertebral):
एक वयस्क व्यक्ति की कशेरुक दण्ड की कुल 26 कशेरुकाओं को उनके स्थान एवं स्थिति के अनुसार पाँच वर्गों में बाँटा जाता है, जिन्हें क्रमश:
(i) ग्रीवा प्रदेश की कशेरुकाएँ,
(ii) वक्षीय कशेरुकाएँ,
(iii) कटिप्रदेशीय कशेरुकाएँ,
(iv) त्रिक कशेरुकाएँ तथा
(v) अनुत्रिक कशेरुकाएँ कहा जाता है। इन पाँचों वर्गों की कशेरुकाओं का सामान्य विवरण निम्नवर्णित है
UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 1 15

ग्रीवा प्रदेश की कशेरुकाएँ (Cervical vertebrae): ये संख्या में 7 होती हैं और गर्दन का भाग बनाती हैं। इनकी पहली और दूसरी कशेरुका पर ही मनुष्य की खोपड़ी टिकी रहती है। कशेरुक दण्ड के इस भाग की प्रथम दो कशेरुकाओं की बनावट अन्य कशेरुकाओं की बनावट से कुछ भिन्न होती है। इनमें से पहली कशेरुका को शीर्षधरा (altas) कहते हैं तथा इसी कशेरुका पर हमारी खोपड़ी टिकी रहती है। दूसरी कशेरुका को अक्षक (axis) कहते हैं।

वक्षीय कशेरुकाएँ (Thoracic vertebrae): ये संख्या में 12 होती हैं, इनके बाहरी किनारों से पसली की अस्थियाँ जुड़ी रहती हैं। ये आगे की ओर छाती की अस्थि से जुड़कर छाती का पिंजर बनाती हैं।

कटिप्रदेशीय कशेरुकाएँ (Lumbar vertebrae): ये आकार में सबसे बड़ी तथा मजबूत होती हैं। ये सारे शरीर का भार सहन करने में सक्षम होती हैं। ये संख्या में 5 होती हैं।

त्रिक कशेरुकाएँ (Sacral vertebrae): आरम्भ में ये 5 होती हैं, किन्तु युवावस्था में आपस में मिलकर एक हो जाती हैं, जिसे त्रिकास्थि कहते हैं।

अनुत्रिक कशेरुकाएँ (Caudal vertebrae): ये अन्तिम 4 कशेरुकाएँ भी बड़े होने पर मिलकर एक हो जाती हैं, जिसे अनुत्रिकास्थि कहते हैं। इनको पूँछ की कशेरुकाएँ भी कह सकते हैं।

कशेरुकाओं की संरचना (Structure of Vertebra):

प्रथम 2 और अन्तिम 9 को छोड़कर सभी कशेरुकाओं की आकृति लगभग समान तथा नगदार अंगूठी के समान होती है। सामान्य रूप से प्रत्येक कशेरुका को तीन भागों में बाँटा जा सकता है

कशेरुककाय (Body): यह अंगूठी के नग की भाँति ठोस एवं मोटा होता है। यह कशेरुका के अगले भाग का निर्माण करता है।।

तन्त्रिका चाप (Neural arch): कशेरुककाय के पिछले भागों से मिलकर जो हिस्सा घेरा बनाता है, उसे तन्त्रिका चाप कहा जाता है। इससे बनी नली में ही सुषुम्ना रहती है।

प्रवर्ध (Projections): कशेरुका के तन्त्रिका चाप से तीन उभार निकलते हैं। घेरे के दोनों ओर के उभारों को अनुप्रस्थ प्रवर्ध तथा बीच के नुकीले उभार को तन्त्रिका कण्टक कहा जाता है।कशेरुकाएँ आपस में इस प्रकार जुड़ी रहती हैं कि मुड़ने या झुकने के बाद भी ये टूटती नहीं हैं। प्रत्येक दो कशेरुकाओं के बीच में एक उपास्थि की तह होती है, जिसके कारण कशेरुकाएँ आपस में रगड़ नहीं खाती हैं। सभी कशेरुकाएँ एक-दूसरे के ऊपर इस प्रकार रखी रहती हैं कि बीच में एक नली-सी बन जाती है, जिसे तन्त्रिका नाल (neural canal) कहते हैं।
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कशेरुक दण्ड की सबसे पहली कशेरुका, जिसे एटलस या शीर्षधरा (atlas) कहते हैं, खोपड़ी के लिए आधार का कार्य करती है। इसके अगले सिरे पर 2 गोल गड्ढे होते हैं, जिनमें खोपड़ी के दोनों पश्च उभार स्थित रहते हैं। इसी प्रकार पहली ग्रीवा कशेरुका, जिसे अक्षीय कशेरुका (axis) कहते हैं, में खोपड़ी कुछ इस प्रकार स्थित रहती है कि खोपड़ी को सरलता से घुमाया जा सकता है। इस जोड़ को खूटीदार जोड़ कहते हैं।

कशेरुक दण्ड के झुकाव (Curvatures of Vertebral Column):
मनुष्यों की रीढ़ की हड्डी या कशेरुक दण्ड बिल्कुल सीधी नहीं होती बल्कि इसमें चार झुकाव होते हैं जिनका विवरण निम्नवर्णित है-
1. गर्दन का झुकाव (पीछे की ओर);
2. वक्ष का झुकाव (आगे की ओर);
3. कमर का झुकाव (पीछे की ओर);
4. श्रोणि का झुकाव (आगे की ओर)।

इन झुकावों के कारण ही मनुष्य सिर या कन्धों पर भारी बोझ आसानी से ढो सकता है क्योंकि झुकाव होने के कारण ही इनमें अधिक विस्तारण एवं संकुचन की क्षमता होती है। इसके अतिरिक्त कशेरुक दण्ड के इन झुकावों के कारण ही वक्ष तथा उदर के अंगों को आवश्यक सुरक्षा प्राप्त होती है। इन झुकावों के ही परिणामस्वरूप हमारा शरीर सधा रहता है।

इस प्रकार कशेरुक दण्ड मानव शरीर का आधार है, जिस पर सिर टिका रहता है तथा हाथ-पैर जुड़े रहते हैं। वक्ष प्रदेश की कशेरुकाओं में पसलियाँ जुड़ी रहती हैं, जो उनसे मिलकर छाती का पिंजर बनाने में सहायक होती हैं।

प्रश्न 5.
मनुष्य के वक्ष की रचना तथा कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मनुष्य के वक्ष की रचना (Structure of Human Thorax):
वक्ष (thorax) की संरचना दूर से देखने पर सन्दूक (box) के समान दिखाई देती है। इसके अन्दर हृदय, फेफड़े आदि कोमल अंग सुरक्षित रहते हैं। इसका निर्माण आगे की ओर वक्षास्थि या उरोस्थि (sternum) तथा पसलियों (ribs) से तथा पीछे की ओर मेरुदण्ड (vertebral column) से होता है।

(क) उरोस्थि (Sternum):
यह छाती के सामने का भाग होता है, जो चपटा, पतला, चौड़ा तथा मजबूत होता है। इसकी लम्बाई 15 से 18 सेमी होती है। इसका ऊपरी भाग लगभग 12 से 15 सेमी चौड़ा होता है, जो नीचे तक धीरे-धीरे सँकरा होता जाता है। इस पर पसलियाँ (ribs) जुड़ी रहती हैं। उरोस्थि या वक्षास्थि को तीन प्रमुख भागों में बाँटा गया है-

1. मैनुब्रियम (manubrium): स्टर्नम के ऊपरी चौड़े भाग को मैनुब्रियम कहते हैं। इसका ऊपरी भाग अवतल होता है, जिसमें हँसली की अस्थि के भाग जुड़े रहते हैं।

2. ग्लैडियोलस (gladiolus): यह बीच का लम्बा व पतला भाग है। यह कई भागों में बँटा रहता है।

3. जिफाइड (xiphoid): यह स्टर्नम का सबसे निचला भाग है, जो छोटा तथा कार्टिलेज का बना होता है। पूरी उरोस्थि में बराबर दूरी पर 7 गड्ढे होते हैं, जिनमें पसलियों के सिरे उपास्थियों (cartilages) के द्वारा जुड़े रहते हैं।

(ख) पसलियाँ (Ribs):
वक्षास्थि या उरोस्थि (sternum) के साथ मिलकर पसलियाँ वक्ष के पिंजर का निर्माण करती हैं। इसके अन्दर अनेक कोमल अंग; जैसे हृदय, फेफड़े आदि सुरक्षित रहते हैं। पसलियाँ संख्या में 24 होती हैं। ये वक्ष में दोनों ओर 12-12 स्थित होती हैं। एक ओर की पहली 7 पसलियाँ सामने की ओर वक्षास्थि (sternum) से सीधी ही सम्बन्धित हैं। पसलियों के इन 7 जोड़ों को वास्तविक या सच्ची पसलियाँ कहते हैं। इसके बाद की पसलियाँ अर्थात् आठवीं, नवीं और दसवीं पसलियाँ वक्षास्थि से सीधी सम्बन्धित नहीं होतीं वरन् कार्टिलेज की सहायता से अपने ऊपर की पसली से जुड़ी रहती हैं। इसी कारण इन पसलियों को असत्य पसलियाँ कहते हैं।

अन्तिम दो पसलियाँ (ग्यारहवीं और बारहवीं) किसी भी रूप में वक्षास्थि से नहीं जुड़ी होती वरन् ये सामने की ओर स्वतन्त्र होकर निकली रहती हैं। ये काफी छोटी होती हैं। इन्हें प्लावी या तैरने वाली पसलियाँ (floating ribs) कहते हैं। इन दोनों पसलियों के बीच मांसपेशियाँ जुड़ी रहती हैं। ये मांसपेशियाँ साँस लेने में बहुत सहायता करती हैं। साँस लेते समय ये मांसपेशियाँ पसलियों को उठा तथा दबाकर हवा फेफड़ों में भरने तथा फेफड़ों से बाहर निकालने में बहुत सहायता करती हैं। इसी कारण इन मांसपेशियों को अन्तःपर्शका मांसपेशी भी कहते हैं।

प्रश्न 6.
शरीर की अधोशाखाओं अथवा टाँगों की अस्थियों का चित्र सहित विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
अधोशाखाएँ अथवा टाँगों की अस्थियाँ (Bones of Lower Extremities or Hind limbs):
शरीर की अधोशाखा अथवा टाँग की अस्थियों की रचना को स्पष्ट करते हुए कहा जा सकता है कि इसके चार भाग होते हैं, जिनका संक्षिप्त परिचय निम्नवर्णित है

1. जंघा या ऊरु (thigh) की अस्थियाँ-इसके अन्तर्गत श्रोणि मेखला तथा घुटनों के बीच का भाग आता है। जंघा अथवा ऊरु में एक ही लम्बी अस्थि होती है, जिसे ऊर्वास्थि या ऊर्विका कहते हैं। यह शरीर की एक बहुत मजबूत और सबसे लम्बी अस्थि है। इसका ऊपरी सिरा गोल होता है और सिर कहलाता है। यह श्रोणि उलूखल में स्थित रहता है। यहाँ कन्दुक खल्लिका सन्धि पायी जाती है। इसके नीचे का कुछ भाग तिरछा होता है और ग्रीवा कहलाता है। शेष भाग गात्र है। निचला सिरा चौड़ा होता है, इसके दोनों ओर दो उभार तथा बीच में एक खाँच होती है। उसी में घुटने की अस्थि स्थित होती है।

2. पिंडली (shank) की अस्थियाँ–यह भाग घुटने से टखने के बीच पाया जाता है। घुटने के स्थान पर कब्जा सन्धि पायी जाती है। इस भाग में 2 अस्थियाँ होती हैं-
(i) अन्तःजंधिका या टिबिया (tibia) तथा
(ii) बहिःजंघिका या फिबुला (fibula)
अन्त:जंघिका पैर के अंगूठे की ओर होती है और बहि:जंघिका पैर की कनिष्ठा उँगली की ओर की अस्थि है। बहि:जंघिका का ऊपरी सिरा मोटा और चौड़ा होता है। इसका गात्र ऊपर से नीचे की ओर कुछ कम चौड़ा और चपटा होता है। इसके सिरे पर टखने की अस्थियाँ जुड़ती हैं। अन्तःजंघिका अपेक्षाकृत पतली और कमजोर होती है। इसका गात्र भी गोल पतली नली के समान होता है। ऊपरी सिरा चौकोर-सा होता है और ऊर्वास्थि से जुड़ा होता है। नीचे का सिरा एक ओर कुछ उभरा होता है और टखने की अस्थि से जुड़ा होता है।

3. घुटने की अस्थि (knee cap): इसमें एक तिकोनी अस्थि होती है, जिसे जान्त्रिका या पटेला (patella) कहते हैं। यह ऊर्विका के नीचे के सिरे पर एक छोटी अस्थि है और दोनों ओर इन अस्थियों से बँधी रहती है। टाँग की गति होने पर इसका ऊपरी भाग फिसलता हुआ प्रतीत होता है।

4. पैर (foot) की अस्थियाँ: ये तीन भागों में स्थित होती हैं-

  • टखना (ankle): पैर का पिछला भाग टखना (tarsals) कहलाता है। टखने (tarsals) में 7 अस्थियाँ होती हैं। सातों अस्थियाँ एक-दूसरे से आकार में भिन्न होती हैं। इनमें 1 अस्थि, जो सबसे बड़ी होती है, एड़ी बनाती है। सातों अस्थियाँ दो पंक्तियों में बँटकर बराबर से आपस में जुड़ी रहती हैं और नीचे की ओर तलुवे की टिबिया अस्थि से जुड़ती हैं।
  • तलुआ (sole): पैर के तलुवे में 5 अस्थियाँ होती हैं। इन्हें मेटाटार्सल्स (metatarsals) कहते हैं। ये पतली और लम्बी होती हैं, जो ऊपर की ओर टखने की अस्थियों से और नीचे की ओर उँगलियों की अस्थियों से होती हैं।
  • उँगलियाँ या पोर (phalanges): पैर में अँगूठा और 4 उँगलियाँ होती हैं। अँगूठे में 2 और उँगलियों में 3-3 अस्थियाँ पायी जाती हैं। कुल 14 अस्थियाँ होती हैं। एक सिरे पर ये तलवे की अस्थियों से जुड़ी होती हैं तथा इनके दूसरे सिरे पर नाखून होते हैं।

प्रश्न 7.
शरीर की ऊर्ध्व शाखाओं अथवा बाहु की अस्थियों का चित्र सहित विवरण प्रस्तुत कीजिए। अथवा बाँह की हड्डियों का नामांकित सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ऊर्ध्व शाखाएँ अथवा बाहु की अस्थियाँ (Bones of Upper Extremities or Fore limbs):
सम्पूर्ण बाहु को हम तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं

1. ऊपरी बाहु (Upper arm)-कन्धे से कोहनी तक का भाग ऊपरी बाहु कहलाता है। इसमें कन्धे से कोहनी तक केवल एक ही लम्बी अस्थि होती है। इस अस्थि को प्रगण्डिका या रामरस (humerus) कहा जाता है। इस अस्थि के बीच का लम्बा गोल भाग गात्र कहलाता है। ऊपर का उभरा हुआ गोल भाग अस्थि का सिर (head) कहलाता है। इस अस्थि का सिर अंस उलूखल में स्थित होकर स्कन्ध सन्धि बनाता है, जिस पर बाहु घूमती है। यह सन्धि कन्दुक खल्लिका सन्धि होती है। प्रगण्डिका के नीचे के सिरे पर एक उभार होता है, जो कोहनी पर अग्रबाहु की दोनों अस्थियों से जुड़ा रहता है।

2. अग्रबाहु (Forearm)-बाहु के नीचे कोहनी से कलाई तक का भाग अग्रबाहु कहलाता है। कोहनी पर कब्जा सन्धि होती है। इसमें दो अस्थियाँ होती हैं, जिनके नाम रेडियस या बहिःप्रकोष्ठास्थि तथा अल्ना या अन्तःप्रकोष्ठास्थि हैं। हथेली को सामने की ओर फैलाने पर बहि:प्रकोष्ठास्थि बाहर की ओर तथा अन्त:प्रकोष्ठास्थि भीतर की ओर रहती है। ये दोनों अस्थियाँ प्रगण्डिका की अपेक्षा छोटी और पतली होती हैं (अँगूठे की ओर वाली अस्थि बहिःप्रकोष्ठास्थि और कनिष्ठा या छोटी उँगली की ओर वाली अस्थि अन्तःप्रकोष्ठास्थि कहलाती है)। ऊपर की ओर केवल अन्तःप्रकोष्ठास्थि; प्रगण्डास्थि के निचले जान्विका भाग से मिलकर कोहनी की सन्धि बनाती है। नीचे की ओर ये दोनों अस्थियाँ कलाई की 8 अस्थियों में से प्रथम पंक्ति की 4 अस्थियों से मिलकर कलाई या बहिःप्रकोष्ठास्थि मणिबन्ध की सन्धि बनाती हैं।

हाथ की अस्थियों को हम तीन भागों में बाँट सकते हैं-
(i) कलाई,
(ii) हथेली तथा
(iii) उँगलियाँ।
कलाई में विभिन्न आकार की 8 छोटी-छोटी अस्थियाँ होती हैं, जो एक-दूसरे से पृथक् होती हैं, किन्तु दृढ़ स्नायुओं के द्वारा एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं।

3. हाथ (Hand): इसके नीचे हथेली की 5 अंगुलास्थियाँ अस्थियाँ होती हैं, जिन्हें करभास्थि (metacarpals) कहते हैं। इनके ऊपरी सिरे कलाई की ओर कुछ चौकोर से रहते हैं और कलाई की अस्थियों को नीचे की पंक्ति से बाँधे रहते हैं। पाँचों करभास्थियों के आकार में थोड़ा-थोड़ा अन्तर होता है। अंगूठे से जुड़ने वाली अस्थि सबसे छोटी और मोटी होती है। कनिष्ठा उँगली से जुड़ने वाली अस्थि सबसे पतली और बीच की उँगलियों से जुड़ने वाली अस्थि सबसे लम्बी होती है। अँगूठे में 2, शेष चारों उँगलियों में 3-3 अस्थियाँ पायी जाती हैं। इस प्रकार हाथ में कुल 14 अस्थियाँ होती हैं।
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प्रश्न 8.
मानव शरीर की अंस मेखला और श्रोणि मेखला की अस्थि-संरचना का चित्र सहित वर्णन चित्र 2.8-हाथ की अस्थियाँ। कीजिए।
उत्तर:
(क) मनुष्य की अंस मेखला (Pectoral girdle of Man):
मनुष्य की अंस मेखला के दोनों अर्द्ध-भाग अलग-अलग होते हैं। प्रत्येक अर्द्ध-भाग एक तिकोनी और चपटी अस्थि से बना होता है, जिसे स्कैपुला (scapula) कहते हैं। यह भाग पीठ व गर्दन के दोनों ओर तथा पसलियों के पीछे स्थित होता है। अस्थि का चौड़ा भाग ऊपर की ओर तथा नुकीला भाग नीचे की ओर होता है। स्कैपुला के पीछे के भाग में एक उभार होता है, जो एक उठी हुई छोटी-सी दीवार की तरह लगता है। यह कण्टक (spine) कहलाता है। इसी के कारण अंस मेखला दो भागों में विभाजित हो जाती है।

अंस मेखला का ऊपरी भाग चपटा हो जाता है। इसे ऐक्रोमियन प्रवर्ध (acromian process) कहते हैं। इसी भाग से हँसली की अस्थि जुड़ी रहती है, जिससे मनुष्य में उठे हुए कन्धे (shoulders) बन जाते हैं। इसी सिरे के पास स्कैपुला में एक गड्ढा होता है, जिसे अंस उलूखल (glenoid cavity) कहते हैं। इस गड्ढे में अग्रबाहु की प्रगण्डिका (humerus) का गोल सिर स्थित रहता है। यह जोड़ (सन्धि) कन्दुक-खल्लिका सन्धि कहलाता है। इसीलिए हम हाथ को चारों ओर सुविधापूर्वक घुमा सकते हैं। अंस मेखला भी पसलियों के साथ केवल मांसपेशियों से जुड़ी रहती है।
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अंस मेखला के कार्य (Functions of Pectoral girdle):
अंस मेखला विशेष कार्यों के कारण एक महत्त्वपूर्ण अस्थि है। इसके कार्य इस प्रकार हैं

  • कन्धे का निर्माण इस अस्थि के द्वारा ही होता है।
  • हँसली की अस्थि का एक सिरा इसी से जुड़ा रहता है जिसका दूसरा सिरा स्टर्नम से जुड़ा रहता है।
  • इसी अस्थि के अंस उलूखल में अग्रबाहु (प्रगण्डिका) का ऊपरी भाग (सिर) स्थित होता है। एक विशेष प्रकार की सन्धि होने के कारण ही भुजा चारों ओर आसानी से घुमाई जा सकती है।

(ख) श्रोणि मेखला (Pelvic girdle):
मनुष्य के उदर के नीचे कूल्हे के भाग में कई अस्थियों का सम्मिलित रूप होता है, जिसे श्रोणि मेखला (pelvic girdle) कहते हैं।
श्रोणि मेखला दो अर्धांशों से मिलकर बनी होती है। इसके दोनों अर्द्ध-भाग पीछे और सामने आपस में जुड़कर एक घेरा बनाते हैं, जो पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में अधिक चौड़ा होता है। दोनों ओर की श्रोणि मेखलाएँ रचना में समान होती हैं। बालकों में प्रत्येक श्रोणि मेखला अलग-अलग रहती है। बड़े होने पर ये एक-दूसरे से जुड़ हैं और उदर गुहा (abdominal cavity) का निचला भाग बनाती हैं। इसी भाग में अनेक अनुत्रिकास्थि । आन्तरांग सुरक्षित रहते हैं। प्रत्येक कूल्हे की अस्थि के ऊपरी भाग में प्याले के आकार का गड्डा-सा होता है, जिसे श्रोणि उलूखल या ऐसीटाबुलम (acetabulum) कहते हैं। इसी गड्ढे में टाँग की अस्थि ऊर्वास्थि (femur) का सिरा फँसा रहता है। प्रत्येक श्रोणि मेखला के तीन भाग होते हैं-

  • इलियम (ileum) या नितम्बास्थि: यह श्रोणि मेखला का ऊपरी चौड़ा तथा चपटा भाग होता है, जो पीछे की तरफ त्रिकास्थि (sacrum) से जुड़ा रहता है।
  • इश्चियम (ischium) या आसनास्थि: यह नीचे वाला सबसे छोटा तथा गाँठदार भाग है। हमारा शरीर इन्हीं गाँठों पर सधा रहता है तथा इन्हीं से हमें बैठने में सहायता मिलती है।
  • प्यूबिस या जंघास्थि (pubis): श्रोणि मेखला का यह भाग इलियम तथा इश्चियम के मध्य होता है। यह अस्थि छोटे आकार की होती है।

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श्रोणि मेखला के कार्य (Functions of Pelvic girdle):
श्रोणि मेखला के कार्य निम्नलिखित हैं-

  • इससे बैठने तथा शरीर को साधने में सहायता मिलती है।
  • इसके श्रोणि उलूखल में टाँगों की अस्थि का ऊपरी भाग सन्धि बनाता है।
  • इसके द्वारा कूल्हे का निर्माण होता है।
  • इससे हम अपने पैरों को घुमा सकते हैं।

प्रश्न 9.
अस्थि सन्धि से क्या आशय है? शरीर में पायी जाने वाली विभिन्न अस्थि सन्धियों का सामान्य परिचय दीजिए।
अथवा अस्थि सन्धि कितने प्रकार की होती हैं? मानव शरीर में इनका क्या कार्य है?
अथवा चल सन्धि के प्रकार लिखिए। ऐसी किसी एक प्रकार की सन्धि का वर्णन कीजिए।
अथवा चल सन्धियों के प्रकार उदाहरणसहित समझाइए।
अथवा गेंद-गड्डा सन्धि का चित्र बनाइए।
उत्तर:
अस्थि सन्धि (Bone Joints):
कशेरुकीय जन्तुओं के शरीर में अनेक छोटी-बड़ी अस्थियाँ होती हैं, जो किसी-न-किसी रूप में एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं और शरीर का ढाँचा बनाकर इसे विशिष्ट आकार प्रदान करती हैं। शरीर में दो या अधिक अस्थियों के मिलने के स्थान एवं व्यवस्था को अस्थि-सन्धि या अस्थि-जोड़ (joint) कहते हैं। सन्धि स्थल पर कुछ मजबूत सूत्र या तन्तु जुड़े रहते हैं, जो इनको बाँधने में सहायता करते हैं।

इसके अतिरिक्त सन्धि स्थल पर मिलने वाले स्थान उपास्थि आदि से ढके रहते हैं। अस्थि सन्धियों की शरीर में महत्त्वपूर्ण भूमिका एवं कार्य हैं। सन्धियाँ शरीर के विभिन्न अंगों की गति पर नियन्त्रण करती हैं। प्राणियों की शारीरिक गतिविधियों को सम्भव बनाने के लिए ही अस्थि-सन्धियों की व्यवस्था है। अस्थि-सन्धियों के ही कारण व्यक्ति विभिन्न प्रकार की सुव्यवस्थित गतियाँ करता है तथा विशिष्ट कार्य करता है। अस्थि-सन्धियों का प्रमुख कार्य शरीर को गतिशीलता एवं क्रियाशीलता प्रदान करना है।

अस्थि सन्धियो के प्रकार (Kinds of Bone Joints):
अस्थि सन्धियाँ तीन प्रकार की होती हैं-
(1) पूर्ण सन्धि या चल सन्धि,
(2) अपूर्ण सन्धि, तथा
(3) अचल सन्धि।

1. पूर्ण सन्धि (Perfect joint): इन्हें चल सन्धि भी कहते हैं। इस सन्धि में भाग लेने वाली अस्थियों के सिरों पर उपास्थि की टोपी मढ़ी रहती है। दोनों जुड़ने वाली अस्थियों के बीच थोड़ी-सी जगह रहती है, जो साइनोवियल गुहा (synovial cavity) कहलाती है। यह साइनोवियल कला (synovial membrane) से ढकी रहती है। साइनोवियल गुहा में साइनोवियल द्रव (synovial fluid) भरा रहता है। इस प्रकार द्रव भरी एक थैली बन जाती है, जिसे साइनोवियल कैप्सूल कहते हैं। बाहर की ओर दोनों अस्थियों के सिरे स्नायु (ligaments) चित्र द्वारा परस्पर जुड़े रहते हैं। पूर्ण सन्धि या चल सन्धि निम्नलिखित प्रकार की होती हैं-
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कन्दुक-खल्लिका सन्धि (ball and socket अंस मेखला joint): इसे गेंद-गड्डा सन्धि भी कहते हैं। इस सन्धि में एक अस्थि का गोल उभरा सिरा दूसरी अस्थि के सिरे पर पाए जाने वाले गड्डे में स्थित रहता है। इससे उभरे सिरे वाली अस्थि चारों ओर घुमाई जा सकती है। कूल्हे का जोड़ तथा कन्धे का जोड़ इसके उदाहरण हैं।
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कब्जा सन्धि (hinge joint): इस सन्धि के अन्तर्गत एक अस्थि के सिरे का उभार दूसरी अस्थि के गड्डे में इस प्रकार फिट होता है कि उभरे सिरे वाली अस्थि दरवाजे की तरह केवल एक ही दिशा में पूरी मुड़ती है। विपरीत दिशा में गति नहीं हो सकती। घुटने, कुहनी तथा उँगलियों के पोरों के जोड़ इसके उदाहरण हैं। रेडियस
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विवर्त या खुंटी सन्धि (pivot joint): इसमें एक अस्थि खूटी की तरह स्थिर रहती है तथा दूसरी अस्थि इसके गड्डे द्वारा इसके ऊपर फिट होकर चारों ओर घूमती है। स्तनधारियों में दूसरे कशेरुक, प्रथम ग्रीवा कशेरुक के ओडोण्टॉइड प्रवर्ध (odontoid process), शीर्षधरा (atlas) तथा खोपड़ी की सन्धि इसी प्रकार की सन्धि है। इस प्रकार की अस्थि-सन्धि को अंगठे का धुराग्र सन्धि भी कहा जाता है।
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पर्याण या सैडिल सन्धि (saddle joint): यह कार्पल सन्धि कन्दुक-खल्लिका सन्धि से मिलती-जुलती है, परन्तु इसमें बॉल तथा सॉकेट दोनों ही कम विकसित होते हैं। हाथ के अंगठे की चित्र 2.15–सैडिल सन्धिा मेटाकार्पल्स तथा कार्पल्स के बीच ऐसी ही सन्धि होती है। इसी सन्धि के कारण अंगठा अन्य उँगलियों की अपेक्षा रेडियस 7 अल्ना इधर-उधर अधिक घुमाया जा सकता है।

var en farauf het (gliding joint): इसमें दोनों अस्थियाँ एक-दूसरी पर फिसल सकती हैं। कार्पल्स – कशेरुकों के योजी प्रवर्धा (zygapo-physes) के बीच तथा प्रबाहु की रेडियोअल्ना और कलाई के बीच इसी प्रकार की सन्धि पायी जाती है।

2. अपूर्ण सन्धि (Imperfect joint): इस प्रकार की सन्धि में दोनों अस्थियाँ केवल उपास्थियों द्वारा एक-दूसरी से जुड़ी होती हैं। इनमें गति बहुत ही सीमित होती है। दोनों प्यूबिस अस्थियों के बीच ऐसी ही सन्धि होती है।

3. अचल सन्धि (immovable joint): इसमें अस्थियाँ सीवन (sutures) द्वारा परस्पर जुड़ी रहती हैं और हिलने-डुलने में असमर्थ होती हैं। इसीलिए इसे अचल सन्धि कहते हैं। खोपड़ी की अस्थियों में इसी प्रकार की सन्धियाँ होती हैं।
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UP Board Class 11 Home Science Chapter 2 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मानव शरीर में पायी जाने वाली अस्थियों के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
अस्थियों के प्रकार
प्रायः सभी अस्थियों की आन्तरिक रचना एकसमान होती है, परन्तु उनके बाहरी आकार में पर्याप्त भिन्नता पायी जाती है। आकार की भिन्नता के आधार पर मानव शरीर की अस्थियों के निम्नलिखित प्रकार हैं

  • लम्बी अस्थियाँ (Long bones): इनका आकार लम्बा होता है। इन अस्थियों के दो सिरे होते हैं, दोनों सिरों पर ये मुठिया के समान गोल होती हैं। बाँहों तथा टाँगों की अस्थियाँ इसी प्रकार की होती हैं। ये अस्थियाँ ऊपर से कड़ी तथा अन्दर से खोखली होती हैं। इस खोखली जगह को मज्जा गहा कहते हैं जिसमें अस्थि-मज्जा भरा रहता है। मांसपेशियों की सहायता से इन अस्थियों में गति उत्पन्न होती है।
  • चपटी अस्थियाँ (Flat bones): ये अस्थियाँ आकार में चपटी होती हैं और ऐसे स्थानों पर पायी जाती हैं, जहाँ सुरक्षा की आवश्यकता अधिक होती है। इस प्रकार की अस्थियाँ सामान्य रूप से आपस में मिलकर ऐसी रचना का निर्माण करती हैं, जिसमें शरीर के कोमल अंग सुरक्षित रहते हैं। खोपड़ी, चेहरे, पीठ एवं छाती इत्यादि की अस्थियाँ इसी प्रकार की होती हैं।
  • घनाकार अस्थियाँ (Cubical bones): ये अस्थियाँ शरीर में ऐसे स्थानों पर पायी जाती हैं, जहाँ पर शक्ति की आवश्यकता होती है। ये अस्थियाँ ऊपर से कठोर तथा अन्दर से खोखली होती हैं; जैसे—कलाई तथा टखने की अस्थियाँ।
  • छोटी अस्थियाँ (Small bones): ये अस्थियाँ पतली तथा कुछ छोटी होती हैं; जैसे-हथेली तथा उँगलियों की अस्थियाँ।
  • वक्राकार अस्थियाँ (Curved bones): इन अस्थियों का आकार समान नहीं होता है। ये कहीं गोल, कहीं लम्बी, चौड़ी या कहीं नुकीली होती हैं। उदाहरण के लिए रीढ़ की अस्थि, कनपटी तथा जबड़े की अस्थियाँ इत्यादि।
  • विषम अस्थियाँ (Irregular bones): इनका आकार विषम होता है। इस प्रकार का उदाहरण मेरुदण्ड की अस्थियाँ हैं।

प्रश्न 2.
मानव कंकाल के मुख्य भागों तथा अस्थियों की संख्या का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मानव कंकाल के मुख्य भाग तथा अस्थियों की संख्या
मनुष्य के अस्थिपंजर अर्थात् कंकाल तन्त्र का अध्ययन प्रमुख रूप से तीन भागों में बाँटकर करते हैं

1. खोपड़ी (Skull): खोपड़ी अन्दर से खोखली होती है, जिसमें मस्तिष्क स्थित होता है। इसके आगे की ओर कुछ विषम अस्थियाँ होती हैं, जिनके द्वारा मनुष्य के चेहरे तथा निचले जबड़े को आकार मिलता है। खोपड़ी कुल 22 अस्थियों के मिलने से बनती है। ऊपरी भाग 8 अस्थियों से मिलकर बना होता है जिसमें मस्तिष्क सुरक्षित रहता है। ये सभी अस्थियाँ चपटी, पतली तथा दृढ़ होती हैं। चेहरे में कुल 14 अस्थियाँ होती हैं, जिनमें कुछ बड़ी तथा कुछ छोटी होती हैं।

2. धड़ (Trunk): कंकाल तन्त्र का यह दूसरा भाग है जो कि कुल 64 अस्थियों से मिलकर बनता है। इसमें 33 अस्थियाँ रीढ़ में होती हैं तथा 24 पसलियाँ होती हैं। इनके अतिरिक्त 1 छाती की, 2 कन्धे की, 2 हँसली की तथा 2 मेखला की अस्थियाँ होती हैं।

3. ऊर्ध्व तथा अधर शाखाएँ (Upper and lower extremities): कंकाल तन्त्र के इस भाग के अन्तर्गत ऊपरी बाहु, अग्रबाहु, हाथ तथा जंघा, घुटना, पैर इत्यादि की अस्थियाँ आती हैं। इन भागों में 60 अस्थियाँ हाथों या बाँहों में तथा 60 ही टाँगों या पैरों में होती हैं।
इस प्रकार मानव कंकाल में कुल मिलाकर 206 अस्थियाँ होती हैं।

प्रश्न 3.
अस्थियाँ लाल रक्त कणों के निर्माण की फैक्टरियाँ क्यों कही जाती हैं? समझाइए।
उत्तर:
मनुष्य सहित सभी स्तनधारियों की लम्बी अस्थियों में खोखले स्थान अर्थात् मज्जा गुहा (marrow cavity) होती है। इस गुहा में एक गूदे के समान पदार्थ भरा रहता है। इस पदार्थ को अस्थि मज्जा (bone marrow) कहते हैं। अस्थि मज्जा में रुधिर केशिकाएँ, तन्त्रिकाएँ आदि होती हैं। इसी मज्जा में लाल रक्त कणिकाओं (red blood corpuscles) का निर्माण होता है। इसीलिए अस्थियों को ‘लाल रक्त कणों के निर्माण की फैक्टरी’ कहा जाता है। मनुष्य में लाल रक्त कण थोड़े ही समय तक जीवित रहते हैं; अत: मृत हुए कणों के स्थान पर नए लाल रक्त कण सदैव ही आवश्यक होते हैं। इसीलिए इनका निर्माण भी सदैव होते रहना चाहिए और यह कार्य अस्थियाँ सदैव करती रहती हैं; अर्थात् इनमें उत्पादन भी सदैव ही होता रहता है।

प्रश्न 4.
हमारे शरीर के कोमल अंगों की सुरक्षा अस्थियाँ किस प्रकार करती हैं? स्पष्ट कीजिए। .
उत्तर:
अस्थियों द्वारा कोमल अंगों की सुरक्षा
अस्थियाँ शरीर के लगभग सभी अंगों को सुरक्षा प्रदान करती हैं, परन्तु शरीर में जो अति कोमल किन्तु विशिष्ट अंग हैं, उनको ये विशेष प्रकार की संरचनाएँ स्थान, कोष्ठ या सन्दूक के समान आकार बनाकर विशेष सुरक्षा प्रदान करती हैं। उदाहरण के लिए आँख, कान, नाक जैसी अति महत्त्वपूर्ण, संवेदनशील तथा कोमल ज्ञानेन्द्रियों को विशेष सुरक्षा; अस्थियाँ अक्षिकोष्ठ (orbit), श्रवण कोष्ठ (auditory capsule) तथा घ्राण कोष्ठ (olfactory chamber) बनाकर देती हैं।

हमें ज्ञात है कि मस्तिष्क एक अति कोमल अंग है और सम्पूर्ण शरीर की समस्त क्रियाओं पर यह किसी-न-किसी प्रकार तन्त्रिकीय नियन्त्रण रखता है। मस्तिष्क करोटि (cranium) में स्थित होता है, जो एक बन्द सन्दूक के समान संरचना है। सुषुम्ना कशेरुक दण्ड की तन्त्रिकीय नाल में सुरक्षित रहती है। फेफड़े, हृदय आदि संरचनाओं को तो अपनी क्रियाशीलता के लिए विशेष स्थान भी चाहिए और असीम सुरक्षा भी। यह सुरक्षा वक्षीय पिंजर (thoracic cage) बनाकर कशेरुक दण्ड, उरोस्थि तथा पसलियाँ देती हैं। अंस मेखला, श्रोणि मेखलाओं आदि की संरचना भी इसी प्रकार मेहराबदार होती है, जो विभिन्न आन्तरांगों को पूर्ण तथा महत्त्वपूर्ण सुरक्षा देने में सक्षम है।

प्रश्न 5.
शरीर के लिए अस्थि सन्धियों के महत्त्व का उल्लेख कीजिए। अथवा मानव शरीर में अस्थि सन्धियों का क्या कार्य है?
उत्तर:
शरीर के लिए अस्थि सन्धियों का महत्त्व अथवा कार्य
अस्थि-संस्थान की सुचारु क्रियाशीलता तथा शरीर की समस्त गतिविधियों के लिए अस्थि सन्धियाँ विशेष रूप से आवश्यक तथा महत्त्वपूर्ण हैं। वास्तव में, शरीर में अस्थि सन्धियों की उपस्थिति के कारण ही विभिन्न गतियाँ होती हैं। गमन भी इसका ही उदाहरण है। यदि शरीर में अस्थि सन्धियाँ न होतीं तो समस्त शरीर एक गतिहीन मूर्ति की भाँति होता तथा चल-फिर भी नहीं पाता। शरीर द्वारा श्वास लेना, शरीर का झुकाव आदि भी अस्थियों के मध्य पायी जाने वाली सन्धियों पर ही निर्भर होता है। विभिन्न प्रकार की इन गतियों के लिए सन्धियों का प्रकार भी निश्चित होता है।

किसी अंग के किसी विशेष दिशा में गति करने के लिए एक विशेष प्रकार की सन्धि की ही व्यवस्था होती है; उदाहरण के लिए कुहनी की सन्धि एक कब्जेदार सन्धि है जो हाथ को पीछे मुड़ने से रोकती है, जबकि कन्धे की सन्धि जो एक कन्दुक-खल्लिका सन्धि है, सम्पूर्ण बाहु को किसी भी दिशा में घूमने देती है। इसी प्रकार कशेरुकदण्ड के साथ खोपड़ी की सन्धि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है जो बिना शरीर घुमाए खोपड़ी को इधर-उधर घुमाने में सहायता प्रदान करती है। यह एक खूटीदार सन्धि है। इसमें गति न होने से इन सन्धियों के मध्य मस्तिष्क सुरक्षित एक स्थान पर स्थिर रहता है। इनकी उपस्थिति के कारण बाल्यावस्था में मस्तिष्क इत्यादि के विकसित होने में कोई बाधा नहीं पड़ती। बाद में ये सन्धियाँ अचल हो जाती हैं और मजबूत कपाल का निर्माण करती हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि अस्थि सन्धियाँ हमारे शरीर के लिए अनेक प्रकार से उपयोगी हैं।

प्रश्न 6.
अस्थि सन्धियों में होने वाली विभिन्न गतियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
अस्थि सन्धियों में होने वाली गतियाँ
हमारे शरीर में विद्यमान अस्थि सन्धियों के परिणामस्वरूप निम्नलिखित गतियाँ होती हैं

1. संकुचन (Contraction): जब एक अंग दूसरे अंग की तरफ खिंचता है तो उसे संकुचन कहते हैं। उदाहरण के लिए कुहनी मोड़कर अग्रबाहु को पश्चबाहु के पास लाया जा सकता है। इसे कुहनी का संकुचन कहेंगे।

2. फैलना (Extension): यह उपर्युक्त क्रिया के विपरीत क्रिया होती है; जैसे-अग्रबाहु का सामने की तरफ फैलने के बाद बाहु से दूर चला जाना।

3. पर्यावर्तन (Circumduction): जब कोई अंग अपने अक्ष पर इस प्रकार घूमे कि चारों ओर घूमकर एक शंकु बन जाए तो इस प्रकार की गति को पर्यावर्तन कहते हैं। अस्थि सन्धियों की उपर्युक्त मुख्य गतियों के अतिरिक्त दो अन्य प्रकार की गतियाँ भी देखी जा सकती हैं, जिन्हें क्रमश: अभिवर्तन तथा अपवर्तन कहा जाता है। अभिवर्तन (Adduction) के अन्तर्गत शरीर के किसी अंग को शरीर की मध्य रेखा की ओर खींचने की क्रिया होती है। इससे भिन्न अपवर्तन (Abduction) के अन्तर्गत शरीर के किसी अंग को शरीर की मध्य रेखा से बाहर की ओर ले जाया जाता है।

प्रश्न 7.
मनुष्यों द्वारा बाहुओं एवं सिर को घुमाने की क्रिया को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मनुष्य अपनी बाहुओं को कन्धे के स्थल से विभिन्न दिशाओं में सरलता से घुमा लेता है तथा सिर को भी विभिन्न दिशाओं में सरलता से घुमा सकता है। बाहुओं एवं सिर की इन गतियों के लिए अस्थि सन्धियाँ ही जिम्मेदार हैं। इन स्थलों पर होने वाली गतियों का स्पष्टीकरण निम्नवर्णित है-

(क) बाहुओं को चारों तरफ घुमाने की क्रिया का स्पष्टीकरण:
मनुष्य की बाहु में एक अस्थि का सिरा गेंद के समान गोल होता है और दूसरी अस्थि का सिरा प्याले की तरह होता है। गेंद वाला सिरा, प्यालेनुमा आकार वाले सिरे में स्थित रहता है और इसे सरलता से चारों ओर घुमाया जा सकता है। कन्धे में प्रगण्डिका (humerus) अस्थि का गोल सिरा अंस फलक के प्यालेनुमा गड्ढे, अंस उलूखल (acetabulum) में स्थित होकर घूमता है; अतः मनुष्य अपनी बाहुओं को चारों तरफ घुमा सकता है।

(ख) सिर को घुमाना:
मनुष्य का सिर (खोपड़ी) रीढ़ की अस्थि (कशेरुक दण्ड) के साथ एक विशेष प्रकार की सन्धि बनाता है। इसको बनाने में प्रथम और द्वितीय कशेरुकाओं की अत्यधिक स्पष्ट भूमिका होती है। वास्तव में प्रथम ग्रीवा कशेरुक, जिसे अक्षीय कशेरुक कहते हैं, से एक खूटी की तरह का प्रवर्ध निकला रहता है, जिस पर खोपड़ी में उपस्थित गड्डा टिका रहता है। इस प्रकार की सन्धि को विवर्त अथवा खूटी सन्धि (pivot joint) कहते हैं। इस प्रकार की सन्धि के कारण ही हम अपने सिर को इधर-उधर, केवल पीछे की दिशा को छोड़कर सरलता से घुमा सकते हैं।

प्रश्न 8.
कोहनी की सन्धि का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कोहनी की सन्धि
यह एक कब्जेदार सन्धि (hinge joint) है। यह ऊपर की ओर प्रगण्डास्थि (humerus) तथा नीचे की ओर बहिःप्रकोष्ठास्थि (radius) व अन्तःप्रकोष्ठास्थि (ulna) के साथ मिलकर बनी सन्धि है। इन अस्थियों में से प्रगण्डास्थि का सिरा तो गोल तथा घिरौं (pulley) की तरह होता है, जिसे ट्रॉक्लिया (trochlea) कहते हैं तथा अन्तःप्रकोष्ठिका अपेक्षाकृत बड़ी होती है और एक प्रवर्ध के रूप में ऊपर की ओर निकली रहती है। इसको ऑलीक्रेनन प्रवर्ध (olecraneon process) कहते हैं। इसी प्रवर्ध के पीछे भीतर की ओर इस अस्थि पर एक गहरा गड्ढा होता है, जिसे सिगमॉइड कूप (sigmoid notch) कहते हैं। इसी खात (गड्डे) में प्रगण्डास्थि की ट्रॉक्लिया फँसी रहती है और चल जोड़ बनाती है। प्रवर्ध के कारण इस जोड़ की विशेषता है कि यह अग्रबाहु को केवल आगे की ओर मुड़ने देता है, बाहर या पीछे की ओर नहीं और एक कब्जे की तरह कार्य करता है।

प्रश्न 9.
यदि अस्थि टूट जाती है तो उसका प्राथमिक उपचार किस प्रकार से होता है? अथवा हड्डी टूट का उपचार लिखिए।
उत्तर:
अस्थि की टूट का उपचार
किसी भी प्रकार से अस्थि के टूट जाने पर तुरन्त किए जाने वाले मुख्य प्राथमिक उपचार निम्नलिखित हैं-

  • तुरन्त किसी अस्थि विशेषज्ञ से सम्पर्क करना चाहिए।
  • जिस अंग की अस्थि टूट गई हो, उस अंग को खपच्चियों का सहारा देकर सही स्थिति में रखकर तिकोनी पट्टी बाँध देनी चाहिए। .
  • यदि कोहनी तथा कलाई के आस-पास की अस्थि टूटी हो तो झोली द्वारा सहारा देना चाहिए। (4) यदि अस्थि के टूटने के साथ-साथ रक्त भी बह रहा हो तो सर्वप्रथम रक्तस्राव रोकना चाहिए।
  • यदि व्यक्ति आघात से अथवा भय से मूछित हो गया हो तो उसे होश में लाने का प्रयत्न करना चाहिए।
  • जिस व्यक्ति की अस्थि टूटी हो उसे इस प्रकार लिटाया जाना चाहिए कि उसे पूरा आराम मिल सके। उसे अधिक हिलाना-डुलाना नहीं चाहिए।
  • घायल व्यक्ति का साहस बढ़ाना चाहिए। उससे सहानुभूति रखनी चाहिए।
  • शरीर को गर्म रखने के लिए कोई गर्म पेय पदार्थ देना चाहिए।

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 2 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘अस्थि संस्थान’ अथवा ‘कंकाल तन्त्र’ का अर्थ एक वाक्य में लिखिए।
उत्तर:
शरीर में विद्यमान समस्त अस्थियों की व्यवस्था को ही अस्थि संस्थान या कंकाल तन्त्र कहते हैं।

प्रश्न 2.
अस्थि संस्थान की उपयोगिता संक्षेप में लिखिए। अथवा शरीर में अस्थियों की क्या उपयोगिता है?
उत्तर:
अस्थि संस्थान शरीर को आकृति, गति, दृढ़ता तथा सुरक्षा प्रदान करता है। यह लाल रक्त कणों के निर्माण का कार्य तथा मांसपेशियों के जुड़ने का स्थान प्रदान करता है।

प्रश्न 3.
शरीर की अस्थियाँ छूने में कैसी प्रतीत होती हैं?
उत्तर:
शरीर की अस्थियाँ छूने में कठोर प्रतीत होती हैं।

प्रश्न 4.
अस्थियों की बनावट कैसी होती है?
उत्तर:
अस्थियाँ बाहर से कठोर तथा अन्दर से खोखली होती हैं।

प्रश्न 5.
अस्थियों के खोखले भाग को क्या कहते हैं?
उत्तर:
अस्थियों के खोखले भाग को ‘अस्थि-गुहा’ कहते हैं।

प्रश्न 6.
उपास्थियों से अस्थियों में परिवर्तन की क्रिया को क्या कहते हैं?
उत्तर:
उपास्थियों से अस्थियों में परिवर्तन की क्रिया को अस्थिभवन (ossification) कहते हैं।

प्रश्न 7.
अस्थियों को मजबूत करने के लिए कौन-सा तत्त्व महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
अस्थियों को मजबूत करने के लिए ‘कैल्सियम’ नामक तत्त्व महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 8.
अस्थि-गहा में क्या भरा रहता है?
उत्तर:
अस्थि-गुहा में ‘अस्थि-मज्जा’ नामक गूदेदार पदार्थ भरा रहता है।

प्रश्न 9.
मानव शरीर में कुल कितनी अस्थियाँ पायी जाती हैं?
उत्तर:
मानव शरीर में कुल 206 अस्थियाँ पायी जाती हैं।

प्रश्न 10.
मानव शरीर में कितने प्रकार की अस्थियाँ पायी जाती हैं?
उत्तर:
मानव शरीर में छह प्रकार की अस्थियाँ पायी जाती हैं, जिन्हें लम्बी, चपटी, घनाकार, छोटी, वक्राकार तथा विषम अस्थियाँ कहा जाता है।

प्रश्न 11.
मानव शरीर में लम्बी अस्थियाँ कहाँ-कहाँ पायी जाती हैं?
उत्तर:
मानव शरीर में लम्बी अस्थियाँ बाँहों तथा टाँगों में पायी जाती हैं।

प्रश्न 12.
मानव कपाल में किस प्रकार की अस्थियाँ पायी जाती हैं?
उत्तर:
मानव कपाल में चपटी अस्थियाँ पायी जाती हैं।

प्रश्न 13.
मानव शरीर में छोटी अस्थियाँ मुख्य रूप से कहाँ-कहाँ पायी जाती हैं?
उत्तर:
मानव शरीर में हाथों तथा पैरों की उँगलियों में छोटी अस्थियाँ पायी जाती हैं।

प्रश्न 14.
खोपड़ी में कुल कितनी अस्थियाँ पायी जाती हैं?
उत्तर:
खोपड़ी में कुल 22 अस्थियाँ होती हैं, जिनमें से 8 कपाल में तथा 14 चेहरे में पायी जाती हैं।

प्रश्न 15.
वयस्क व्यक्ति के मेरुदण्ड में कुल कितनी अस्थियाँ (कशेरुकाएँ) पायी जाती हैं तथा उन्हें क्या कहते हैं?
उत्तर:
वयस्क व्यक्ति के मेरुदण्ड में कुल 26 अस्थियाँ (कशेरुकाएँ) पायी जाती हैं तथा उन्हें .. कशेरुकाएँ कहते हैं।

प्रश्न 16.
शैशवावस्था में मेरुदण्ड में कुल कितनी अस्थियाँ (कशेरुकाएँ) पायी जाती हैं?
उत्तर:
शैशवावस्था में मेरुदण्ड में कुल 33 अस्थियाँ (कशेरुकाएँ) पायी जाती हैं।

प्रश्न 17.
वक्ष में कुल कितनी पसलियाँ पायी जाती हैं?
उत्तर:
वक्ष में कुल 24 पसलियाँ पायी जाती हैं।

प्रश्न 18.
अस्थि सन्धि से क्या आशय है?
उत्तर:
अस्थि संस्थान में जहाँ दो या दो से अधिक अस्थियाँ परस्पर सम्बद्ध होती हैं, उस स्थान एवं व्यवस्था को अस्थि सन्धि कहते हैं।

प्रश्न 19.
शरीर के लिए अस्थि सन्धियों की क्या उपयोगिता है? अथवा शरीर में कंकाल सन्धियों की दो उपयोगिताएँ लिखिए।
उत्तर:
(i) अस्थि सन्धियाँ शरीर को गति प्रदान करती हैं,
(ii) कंकाल तन्त्र को व्यवस्था प्रदान करती हैं।

प्रश्न 20.
अस्थि सन्धि के प्रकार लिखिए।
उत्तर:
अस्थि सन्धियाँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं-चल सन्धियाँ तथा अचल सन्धियाँ। चल सन्धियाँ पाँच प्रकार की होती हैं-कन्दुक-खल्लिका सन्धि, कब्जा सन्धि, विवर्त या खुंटी सन्धि, पर्याण या सैडिल सन्धि तथा प्रसर या विसी सन्धि।

प्रश्न 21.
चल सन्धियाँ किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिन अस्थि सन्धियों में एक अथवा अधिक दिशा में गति होती है, उन्हें चल सन्धि कहते हैं।

प्रश्न 22.
चल सन्धि के प्रकार लिखिए।
उत्तर:
चल सन्धियाँ दो प्रकार की होती हैं—अपूर्ण चल सन्धि तथा पूर्ण चल सन्धि।

प्रश्न 23.
किन्हीं दो सन्धियों के नाम बताइए।
उत्तर:
कन्दुक-खल्लिका सन्धि, कब्जा सन्धि, खूटीदार सन्धि, प्रसर सन्धि तथा पर्याण सन्धि।

प्रश्न 24.
घुटनों तथा कोहनी के स्थान पर किस प्रकार की सन्धि पायी जाती है?
उत्तर:
घुटनों तथा कोहनी के स्थान पर कब्जा सन्धि पायी जाती है।

प्रश्न 25.
पर्याण सन्धि शरीर के किस अंग में पायी जाती है?
उत्तर:
पर्याण सन्धि अँगूठे में पायी जाती है।

प्रश्न 26.
अचल सन्धि से क्या आशय है?
उत्तर:
जब दो या दो से अधिक अस्थियाँ परस्पर इस प्रकार से सम्बद्ध होती हैं कि उनमें किसी भी प्रकार की गति नहीं होती तो उस सन्धि-व्यवस्था को अचल सन्धि कहते हैं।

प्रश्न 27.
हमारे शरीर में अचल सन्धियाँ कहाँ पायी जाती हैं?
उत्तर:
हमारे शरीर में खोपड़ी में अचल सन्धियाँ पायी जाती हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 2 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए

प्रश्न 1.
शरीर को निश्चित आकार तथा व्यवस्थित गति प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका है(क) पेशीतन्त्र की
(ख) कंकाल तन्त्र की
(ग) पाचन तन्त्र की
(घ) उपर्युक्त सभी की।
उत्तर:
(ख) कंकाल तन्त्र की।

प्रश्न 2.
शरीर की विभिन्न अस्थियाँ व्यवस्थित होकर बनाती हैं(क) सम्पूर्ण शरीर को
(ख) अस्थि संस्थान को
(ग) शरीर के आधार को
(घ) शरीर की सुन्दरता को।
उत्तर:
(ख) अस्थि संस्थान को।

प्रश्न 3.
अस्थियों का निर्माण होता है
(क) कैल्सियम से
(ख) रक्त मज्जा से
(ग) अस्थि-कोशिकाओं से
(घ) खनिज लवणों से।
उत्तर:
(ग) अस्थि-कोशिकाओं से।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन-सा तत्त्व अथवा अवयव हड्डी-निर्माण के लिए आवश्यक नहीं
(क) कैल्सियम
(ख) फॉस्फोरस
(ग) सोडियम
(घ) विटामिन ‘D’.
उत्तर:
(ग) सोडियम।

प्रश्न 5.
अस्थि कोशिकाओं का आकार होता है(क) गोल
(ख) पतला एवं लम्बा
(ग) चपटा
(घ) अनियमित।
उत्तर:
(घ) अनियमित।

प्रश्न 6.
अस्थि-संस्थान का कार्य है
(क) शरीर को निश्चित आकृति एवं दृढ़ता प्रदान करना
(ख) लाल रक्त कणों का निर्माण करना
(ग) शरीर को गति प्रदान करना
(घ) उपर्युक्त सभी कार्य।
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी कार्य।

प्रश्न 7.
एक वयस्क मनुष्य के शरीर में कुल कितनी अस्थियाँ पायी जाती हैं
(क) 106
(ख) 206
(ग) 212
(घ) 200.
उत्तर:
(ख) 206.

प्रश्न 8.
अस्थि का कड़ापन किस तत्त्व के कारण होता है
(क) लौह तत्त्व
(ख) सोडियम
(ग) मैग्नीशियम
(घ) कैल्सियम।
उत्तर:
(घ) कैल्सियम।

प्रश्न 9.
मानव के मस्तिष्क कोष में कितनी अस्थियाँ पायी जाती हैं.
(क) 10
(ख) 8
(ग) 22
(घ) 14.
उत्तर:
(ख) 8.

प्रश्न 10.
खोपड़ी में कुल कितनी अस्थियाँ पायी जाती हैं
(क) 22
(ख) 24
(ग) 206
(घ) 306.
उत्तर:
(क) 22.

प्रश्न 11.
चेहरे में कुल कितनी अस्थियाँ होती हैं
(क) 24
(ख) 12
(ग) 14
(घ) 28.
उत्तर:
(ग) 14.

प्रश्न 12.
छोटे बच्चों के शरीर में रीढ़ की अस्थि में कुल कशेरुकाएँ (अस्थियाँ ) होती हैं
(क) 26 .
(ख) 33
(ग) 30
(घ) 31.
उत्तर:
(ख) 33.

प्रश्न 13.
एक वयस्क व्यक्ति की रीढ़ की अस्थि में कुल कशेरुकाएँ होती हैं
(क) 33
(ख) 26
(ग) 30
(घ) 28.
उत्तर:
(ख) 26.

प्रश्न 14.
व्यक्ति के शरीर में कुल पसलियाँ होती हैं
(क) 22
(ख) 26
(ग) 24
(घ) 28.
उत्तर:
(ग) 24.

प्रश्न 15.
मानव शरीर में मुक्त पशुकाएँ ( पसलियाँ) (फ्लोटिंग रिब्स ) कौन-सी होती हैं
(क) नवीं तथा दसवीं
(ख) पहली तथा दूसरी
(ग) पाँचवीं तथा छठी
(घ) ग्यारहवीं तथा बारहवीं।
उत्तर:
(घ) ग्यारहवीं तथा बारहवीं।

प्रश्न 16.
कोहनी का जोड़ कौन-सा जोड़ कहलाता है–
(क) विवर्त
(ख) कब्जेदार
(ग) फिसलने वाला
(घ) खूटीदार।
उत्तर:
(ख) कब्जेदार।

प्रश्न 17.
कूल्हे तथा कन्धे के स्थान पर किस प्रकार की अस्थि सन्धि पायी जाती है
(क) अपूर्ण चल सन्धि
(ख) कब्जेदार सन्धि
(ग) कन्दुक-खल्लिका सन्धि
(घ) फिसलने वाली सन्धि।
उत्तर:
(ग) कन्दुक-खल्लिका सन्धि।

प्रश्न 18.
शंख अस्थियाँ पायी जाती हैं…
(क) कान में
(ख) हाथ में
(ग) कपाल में
(घ) घुटनों में।
उत्तर:
(ग) कपाल में।

प्रश्न 19.
मानव के मस्तिष्क कोष (कपाल) की अस्थियाँ किस प्रकार की सन्धि से जुड़ी रहती हैं
(क) चल सन्धि
(ख) अपूर्ण सन्धि
(ग) अचल सन्धि
(घ) कब्जा सन्धि।
उत्तर:
(ग) अचल सन्धि।

प्रश्न 20.
अचल सन्धि शरीर में कहाँ पायी जाती है
(क) चेहरे में
(ख) कलाई में
(ग) कपाल में
(घ) कोहनी में।
उत्तर:
(ग) कपाल में।

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