UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi उपयोगितापरक निबन्ध

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 10
Chapter Name उपयोगितापरक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi उपयोगितापरक निबन्ध

उपयोगितापरक निबन्ध

 मानव-जीवन में वनों की उपयोगिता

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारत की वन-सम्पदा और पर्यावरण
  • वन-संरक्षण की आवश्यकता
  • वन-संरक्षण का महत्त्व
  • मनुष्य और वृक्ष : पारस्परिक सम्बन्ध
  • वन महोत्सव की उपादेयता
  • वृक्ष हमारे जीवन-साथी
  • वन-सम्पदा और स्वास्थ्य

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2. वनों का प्रत्यक्ष योगदान
    (क) मनोरंजन का साधन;
    (ख) लकड़ी की प्राप्ति;
    (ग) विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चे माल की पूर्ति;
    (घ) प्रचुर फलों की प्राप्ति;
    (ङ) जीवनोपयोगी जड़ी-बूटियां;
    (च) वन्य पशु-पक्षियों को संरक्षण;
    (छ) बहुमूल्य वस्तुओं की प्राप्ति;
    (ज) आध्यात्मिक लाभ,
  3.  वनों का अप्रत्यक्ष योगदान
    (क) वर्षा;
    (ख) पर्यावरण सन्तुलन (शुद्धीकरण);
    (ग) जलवायु पर नियन्त्रण;
    (घ) जल के स्तर में वृद्धि;
    (ङ) भूमि – कटाव पर रोक;
    (च) रेगिस्तान के प्रसार पर रोक;
    (छ) बाढ़ – नियन्त्रण में सहायक,
  4. भारतीय वन – सम्पदा के लिए उत्पन्न समस्याएँ,
  5. वनों के विकास के लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास,
  6.  उपसंहार

प्रस्तावना – वन मानव-जीवन के लिए बहुत उपयोगी हैं, किन्तु सामान्य व्यक्ति इसके महत्त्व को नहीं समझ पा रहा है। जो व्यक्ति वनों में रहते हैं या जिनकी जीविका वनों पर आश्रित है, वे तो वनों के महत्त्व को समझते हैं, लेकिन जो लोग वनों में नहीं रह रहे हैं वे तो इन्हें प्राकृतिक शोभा का साधन ही मानते हैं। पर वनों का मनुष्यों के जीवन से कितना गहरा सम्बन्ध है, इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों में उसका योगदान क्रमिक रूप से द्रष्टव्य है।

वनों का प्रत्यक्ष योगदान

(क) मनोरंजन का साधन – वन, मानव को सैर-सपाटे के लिए रमणीक क्षेत्र प्रस्तुत करते हैं। वृक्षों के अभाव में पर्यावरण शुष्क हो जाता है और सौन्दर्य नष्ट हो जाता है। वृक्ष स्वयं सौन्दर्य की सृष्टि करते हैं। ग्रीष्मकाल में बहुत बड़ी संख्या में लोग पर्वतीय-क्षेत्रों की यात्रा करके इस प्राकृतिक सौन्दर्य का आनन्द लेते हैं।

(ख) लकड़ी की प्राप्ति – वनों से हम अनेक प्रकार की बहुमूल्य लकड़ियाँ प्राप्त करते हैं। ये लकड़ियाँ हमारे अनेक प्रयोगों में आती हैं। इन्हें ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। ये लकड़ियाँ व्यापारिक दृष्टिकोण से भी बहुत उपयोगी होती हैं, जिनमें साल, सागौन, देवदार, चीड़, शीशम, चन्दन, आबनूस आदि की लकड़ियाँ मुख्य हैं। इनका प्रयोग फर्नीचर, इमारती सामान, माचिस, रेल के डिब्बे, स्लीपर, जहाज आदि बनाने के लिए किया जाता है।

(ग) विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चे माल की पूर्ति – वनों से लकड़ी के अतिरिक्त अनेक उपयोगी सहायक वस्तुओं की प्राप्ति होती है, जिनका अनेक उद्योगों में कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है। इनमें गोंद, शहद, जड़ी-बूटियाँ, कत्था, लाख, चमड़ा, बाँस, बेंत, जानवरों के सींग आदि मुख्य हैं। इनका कागज उद्योग, चमड़ा उद्योग, फर्नीचर उद्योग, दियासलाई उद्योग, टिम्बर उद्योग, औषध उद्योग आदि में कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है।

(घ) प्रचुर फलों की प्राप्ति – वन प्रचुर मात्रा में फलों को प्रस्तुत करके मानव का पोषण करते हैं। ये फल अनेक बहुमूल्य खनिज लवणों व विटामिनों का स्रोत हैं।

(ङ) जीवनोपयोगी जड़ी-बूटियाँ – वन अनेक जीवनोपयोगी जड़ी-बूटियों के भण्डार हैं। वनों में ऐसी अनेक वनस्पतियाँ पायी जाती हैं, जिनसे अनेक असाध्य रोगों का निदान सम्भव हो सका है। विजयसार की लकड़ी मधुमेह की अचूक औषध है। लगभग सभी आयुर्वेदिक ओषधियाँ वृक्षों से ही विविध तत्त्वों को एकत्र कर बनायी जाती हैं।

(च) वन्य पशु-पक्षियों को संरक्षण – वन्य पशु-पक्षियों की सौन्दर्य की दृष्टि से अपनी उपयोगिता है। वन अनेक वन्य पशु-पक्षियों को संरक्षण प्रदान करते हैं। वे हिरन, नीलगाय, गीदड़, रीछ, शेर, चीता, हाथी आदि वन्य पशुओं की क्रीड़ास्थली हैं। ये पशु वनों में स्वतन्त्र विचरण करते हैं, भोजन प्राप्त करते हैं और संरक्षण पाते हैं। गाय, भैंस, बकरी, भेड़ आदि पालतू पशुओं के लिए भी वन विशाल चरागाह प्रदान करते हैं।

(छ) बहुमूल्य वस्तुओं की प्राप्ति – वनों से हमें अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। हाथी दाँत, मृग-कस्तूरी, मृग-छाल, शेर की खाल, गैंडे के सींग आदि बहुमूल्य वस्तुएँ वनों की ही देन हैं। वनों से प्राप्त कुछ वनस्पतियों से तो सोना और चाँदी भी निकाले जाते हैं। तेलियाकन्द’ नामक वनस्पति से प्रचुर मात्रा में स्वर्ण प्राप्त होता है।

(ज) आध्यात्मिक लाभ – भौतिक जीवन के अतिरिक्त मानसिक एवं आध्यात्मिक पक्ष में भी वनों का महत्त्व कुछ कम नहीं है। सांसारिक जीवन से क्लान्त मनुष्य यदि वनों में कुछ समय निवास करते हैं तो उन्हें सन्तोष तथा मानसिक शान्ति प्राप्त होती है। इसीलिए हमारी प्राचीन संस्कृति में ऋषि-मुनि वनों में ही निवास करते थे। इस प्रकार हमें वनों का प्रत्यक्ष योगदान देखने को मिलता है, जिनसे सरकार को राजस्व और वनों के ठेकों के रूप में करोड़ों रुपये की आय होती है। साथ ही सरकार चन्दन के तेल, उसकी लकड़ी से बनी कलात्मक वस्तुओं, हाथी दाँत की बनी वस्तुओं, फर्नीचर, लाख, तारपीन के तेल आदि के निर्यात से प्रति वर्ष करोड़ों रुपये की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा अर्जित करती है।

वनों का अप्रत्यक्ष योगदान

(क) वर्षा – भारत एक कृषिप्रधान देश है। सिंचाई के अपर्याप्त साधनों के कारण यह अधिकांशतः मानसून पर निर्भर रहता है। कृषि की मानसून पर निर्भरता की दृष्टि से वनों का बहुत महत्त्व है। वन वर्षा में सहायता करते हैं। इन्हें वर्षा का संचालक कहा जाता है। इस प्रकार वनों से वर्षा होती है और वर्षा से वन बढ़ते हैं।

(ख) पर्यावरण सन्तुलन (शुद्धीकरण) – वन-वृक्ष वातावरण से दूषित-वायु (कार्बन डाइऑक्साइड) ग्रहण करके अपना भोजन बनाते हैं और ऑक्सीजन छोड़कर पर्यावरण को शुद्ध बनाये रखने में सहायक होते हैं। इस प्रकार वन पर्यावरण में सन्तुलन बनाये रखने में सहायक होते हैं।

(ग) जलवायु पर नियन्त्रण – वनों से वातावरण का तापक्रम, नमी और वायु प्रवाह नियन्त्रित होता है, जिससे जलवायु में सन्तुलन बना रहता है। वन जलवायु की भीषण उष्णता को सामान्य बनाये रखते हैं। ये आँधी-तूफानों से हमारी रक्षा करते हैं। ये सारे देश की जलवायु को प्रभावित करते हैं तथा गर्म व तेज हवाओं को रोककर देश की जलवायु को समशीतोष्ण बनाये रखते हैं।

(घ) जल के स्तर में वृद्धि – वने वृक्षों की जड़ों के द्वारा वर्षा के जल को सोखकर भूमि के नीचे के जल-स्तर को बढ़ाते रहते हैं। इससे दूर-दूर तक के क्षेत्र हरे-भरे रहते हैं। साथ ही कुओं आदि में जल का स्तर घटने नहीं पाता है। पहाड़ों पर बहते चश्मे वनों की पर्याप्तता के ही परिणाम हैं। वनों से नदियों के सतत प्रवाहित होते रहने में भी सहायता मिलती है।

(ङ) भूमि-कटाव पर रोक – वनों के कारण वर्षा का जल मन्द गति से प्रवाहित होता है; अत: भूमि का कटाव कम होता है। वर्षा के अतिरिक्त जल को वन सोख लेते हैं और नदियों के प्रवाह को नियन्त्रित करके भूमि के कटाव को रोकते हैं, जिसके फलस्वरूप भूमि ऊबड़-खाबड़ नहीं हो पाती तथा मिट्टी की उर्वरा-शक्ति भी बनी रहती है।

(च) रेगिस्तान के प्रसार पर रोक – वन तेज आँधियों को रोकते हैं तथा वर्षा को आकर्षित भी करते हैं, जिससे मिट्टी के कण उनकी जड़ों में बँध जाते हैं। इससे रेगिस्तान का प्रसार नहीं होने पाता।

(छ) बाढ़-नियन्त्रण में सहायक – वृक्ष की जड़े वर्षा के अतिरिक्त जल को सोख लेती हैं, जिनके कारण नदियों का जल-प्रवाह नियन्त्रित रहता है। इससे बाढ़ की स्थिति में बचाव हो जाता है।

वनों को हरा सोना इसीलिए कहा जाता है क्योंकि इन जैसा मूल्यवान, हितैषी व शोभाकारक मनुष्य के लिए कोई और नहीं। आज भी सन्तप्त मनुष्य वृक्ष के नीचे पहुँचकर राहत का अनुभव करता है। सात्विक भावनाओं के ये सन्देशवाहक प्रकृति का सर्वाधिक प्रेमपूर्ण उपहार हैं। स्वार्थी मनुष्य ने इनसे निरन्तरे दुर्व्यवहार किया है, जिसको प्रतिफल है- भयंकर उष्णता, श्वास सम्बन्धी रोग, हिंसात्मक वृत्तियों का विस्फोट आदि।

भारतीय वन-सम्पदा के लिए उत्पन्न समस्याएँ – वनों के योगदान से स्पष्ट है कि वन हमारे जीवन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूप से बहुत उपयोगी हैं। वनों में अपार सम्पदा पायी जाती है, किन्तु जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती गयी, वनों को मनुष्य के प्रयोग के लिए काटा जाने लगा। अनेक अद्भुत और घने वन आज समाप्त हो गये हैं और हमारी वन-सम्पदा का एक बहुत बड़ा भाग नष्ट हो गया है। वन-सम्पदा के इस संकट ने व्यक्ति और सरकार को वन संरक्षण की ओर सोचने पर विवश कर दिया है। यह निश्चित है कि वनों के संरक्षण के बिना मानव-जीवन दूभर हो जाएगा। आज हमारे देश में वनों का क्षेत्रफल केवल 22.7 प्रतिशत ही रह गया है, जो कम-से-कम एक-तिहाई होना चाहिए था। वनों के असमान वितरण, वनों के पर्याप्त दोहन, नगरीकरण से वनों की समाप्ति, ईंधन व इमारती सामान के लिए वनों की अन्धाधुन्ध कटाई ने भारतीय वन-सम्पदा के लिए अनेक समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं।

वनों के विकास के लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास – सरकार ने वनों के महत्त्व को दृष्टिगत रखते हुए समय-समय पर वनों के संरक्षण और विकास के लिए अनेक कदम उठाये हैं, जिनका संक्षिप्त विवरण अग्रवत् है

  1. सन् 1956 ई० में वन महोत्सव का आयोजन किया गया, जिसका मुख्य नारा था-‘अधिक वृक्ष लगाओ।’ तभी से यह उत्सव प्रति वर्ष 1 से 7 जुलाई तक मनाया जाता है।
  2. सन् 1965 ई० में सरकार ने केन्द्रीय वन आयोग की स्थापना की, जो वनों से सम्बन्धित आँकड़े और सूचनाएँ एकत्रित करके वनों के विकास में लगी हुई संस्थाओं के कार्य में ताल-मेल बैठाता है।
  3.  वनों के विकास के लिए देहरादून में ‘वन अनुसन्धान संस्थान (Forest Research Institute) की स्थापना की गयी, जिसमें वनों के सम्बन्ध में अनुसन्धान किये जाते हैं और वन अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जाता है।
  4. विभिन्न राज्यों में वन निगमों की रचना की गयी है, जिससे वनों की अनियन्त्रित कटाई को रोका जा सके। व्यक्तिगत स्तर पर भी अनेक आन्दोलनों का संचालन करके समाज-सेवियों द्वारा समय-समय पर सरकार को वनों के संरक्षण और विकास के लिए सचेत किया जाता रहा है। इनमें चिपको आन्दोलन प्रमुख रहा है, जिसका श्री सुन्दरलाल बहुगुणा ने सफल नेतृत्व किया।

उपसंहार – नि:सन्देह वन हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी हैं। इसलिए वनों का संरक्षण और संवर्द्धन बहुत आवश्यक है। इसके लिए जनता और सरकार का सहयोग अपेक्षित है। बड़े खेद का विषय है कि एक ओर तो सरकार वनों के संवर्द्धन के लिए विभिन्न आयोगों और निगमों की स्थापना कर रही है तो दूसरी ओर वह कुछ स्वार्थी तत्त्वों के हाथों में खेलकर केवल धन के लाभ की आशा से अमूल्य वनों को नष्ट भी कराती जा रही है। आज मध्य प्रदेश में केवल 18% वन रह गये हैं, जो कि पहले एक-तिहाई हुआ करते थे। इसलिए आवश्यकता है कि सरकार वन-संरक्षण नियमों को कड़ाई से पालन कराकर भावी प्राकृतिक विपदाओं से रक्षा करे। इसके लिए सरकार के साथ-साथ सामान्य जनता का सहयोग भी अपेक्षित है। इसके लिए यदि प्रत्येक व्यक्ति वर्ष में एक बार एक वृक्ष लगाने और उसका भली प्रकार संरक्षण करने का संकल्प लेकर उसे क्रियान्वित भी करे तो यह राष्ट्र के लिए आगे आने वाले कुछ एक वर्षों में अमूल्य योगदान हो सकता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 5 त्यागपथी

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name त्यागपथी (रामेश्वर शुक्ल अञ्चल)
Number of Questions 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 5 त्यागपथी (रामेश्वर शुक्ल अञ्चल)

प्रश्न 1:
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु (कथानक) को संक्षेप में लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ काव्यग्रन्थ की प्रमुख घटनाओं का क्रमबद्ध उल्लेख कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ के पंचम सर्ग की कथा अपनी भाषा में लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ के अन्तिम सर्ग की कथावस्तु की आलोचना कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में उल्लिखित दिवाकर मित्र की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में वर्णित किसी प्रेरणाप्रद घटना का सोदाहरण उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
श्री रामेश्वर शुक्ल अञ्चल द्वारा रचित ‘त्यागपथी ऐतिहासिक खण्डकाव्य की कथा पाँच सर्गों में विभाजित है। इसमें छठी शताब्दी के प्रसिद्ध सम्राट हर्षवर्धन के त्याग, तप और सात्विकता का वर्णन किया गया है। सम्राट हर्ष की वीरता का वर्णन करते हुए कवि ने इस खण्डकाव्य में राजनीतिक एकता और विदेशी आक्रान्ताओं के भारत से भागने का भी वर्णन किया है। इस खण्डकाव्य का सर्गानुसार कथानक अग्रवत् है

प्रथम सर्ग

थानेश्वर के राजकुमार हर्षवर्द्धन वन में आखेट हेतु गये थे। वहीं उन्हें अपने पिता प्रभाकरवर्द्धन के विषम ज्वर-प्रदाह का समाचार मिलता है। कुमार तुरन्त लौट आते हैं। वे पिता के रोग का बहुत उपचार करवाते हैं, परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिलती। हर्षवर्द्धन के बड़े भाई राज्यवर्द्धन उत्तरापथ पर हूणों से युद्ध करने में लगे थे। हर्षवर्द्धन ने दूत के साथ अपने अग्रज को पिता की अस्वस्थता का समाचार पहुँचाया। इधर हर्षवर्द्धन की माता अपने पति की दशा बिगड़ती देख आत्मदाह के लिए तैयार हो जाती हैं। हर्ष ने उन्हें बहुत समझाया, पर वे नहीं मानीं और हर्ष के पिता की मृत्यु से पूर्व ही वे आत्मदाह कर लेती हैं। कुछ समय पश्चात् राजा प्रभाकरवर्द्धन की भी मृत्यु हो जाती है। पिता को अन्तिम संस्कार कर हर्षवर्द्धन शोकाकुल मन से राजमहल में लौट आते हैं। उन्हें इस बात की बड़ी चिन्ता है कि पिता की मृत्यु का समाचार सुनकर अनुजा (बहन) राज्यश्री तथा अग्रज (भाई) राज्यवर्द्धन की क्या दशा होगी ?

द्वितीय सर्ग

राज्यवर्द्धन हूणों को परास्त कर सेनासहित अपने नगर सकुशल लौट आते हैं। शोकविह्वल हर्षवर्द्धन की दशा देख वे बिलख-बिलखकर रोते हैं। माता-पिता की मृत्यु से शोकाकुल राज्यवर्द्धन वैराग्य लेने का निश्चय कर लेते हैं, किन्तु तभी उन्हें समाचार मिलता है कि मालवराज ने उनकी छोटी बहन राज्यश्री के पति गृहवर्मन को मार डाला है तथा राज्यश्री को कारागार में डाल दिया है। राज्यवर्द्धन वैराग्य को भूल मालवराज का विनाश करने चल देते हैं। राज्यवर्द्धन गौड़ नरेश को पराजित कर देते हैं, परन्तु गौड़ नरेश छलपूर्वक उनकी हत्या करवा देता है। हर्षवर्द्धन को जब यह समाचार मिलता है तो वे विशाल सेना लेकर मालवराज से युद्ध करने के लिए चल पड़ते हैं। मार्ग में हर्षवर्द्धन को समाचार मिलता है कि उनकी छोटी बहन राज्यश्री बन्धनमुक्त होकर; विन्ध्याचल की ओर वन में चली गयी है। यह समाचार पाकर हर्षवर्द्धन बहन को खोजने वन की ओर चल देते हैं। वन में दिवाकर मित्र के आश्रम में उन्हें एक भिक्षुक से यह समाचार मिलता है कि राज्यश्री आत्मदाह करने वाली है। वे शीघ्र ही पहुँचकर राज्यश्री को आत्मदाह करने से बचा लेते हैं। वे दिवाकर मित्र और राज्यश्री को अपने साथ ले कन्नौज लौट आते हैं।

तृतीय सर्ग

हर्षवर्द्धन अपनी बहन के छीने हुए राज्य को पुन: प्राप्त करने के लिए अपनी विशाल सेना के साथ कन्नौज पर आक्रमण कर देते हैं। वहाँ अनीतिपूर्वक अधिकार जमाने वाला मालव-कुलपुत्र भाग जाता है। राज्यवर्द्धन का हत्यारा गौड़पति-शशांक भी अपने गौड़-प्रदेश को भाग जाता है। सभी लोग हर्षवर्द्धन से कन्नौज का राजा बनने की प्रार्थना करते हैं, परन्तु हर्ष अपनी बहन का राज्य लेने से मना कर देते हैं। वे अपनी बहन से सिंहासन पर बैठने को कहते हैं, परन्तु बहन भी राज-सिंहासन ग्रहण करने से मना कर देती है। फिर हर्षवर्द्धन ही कन्नौज के संरक्षक बनकर अपनी बहन के नाम से वहाँ का शासन चलाते हैं।

इसके बाद छह वर्षों तक हर्षवर्द्धन का दिग्विजय-अभियान चलता है। उन्होंने कश्मीर, पञ्चनद, सारस्वत, मिथिला, उत्कल, गौड़, नेपाल, वल्लभी, सोरठ आदि सभी राज्यों को जीतकर तथा यवन, हूण और अन्य विदेशी शत्रुओं का नाश करके देश को अखण्ड और शक्तिशाली बनाकर एक सुसंगठित राज्य बनाया। अपनी बहन के स्नेहवश वे अपनी राजधानी भी कन्नौज को ही बनाते हैं और अनेक वर्षों तक धर्मपूर्वक शासन करते हैं। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी तथा धर्म, संस्कृति और कला की भी पर्याप्त उन्नति हो रही थी।

चतुर्थ सर्ग

राज्यश्री एक बड़े राज्य की शासिका होकर भी दुःखी है। वह सब कुछ छोड़कर गेरुए वस्त्र धारण कर भिक्षुणी बनना चाहती है। वह हर्षवर्द्धन से संन्यास ग्रहण करने की आज्ञा माँगने जाती है तो हर्षवर्द्धन उसे समझाते हैं कि तुम तो मन से संन्यासिनी ही हो। यदि तुम गेरुए वस्त्र ही धारण करना चाहती हो तो अपने वचनानुसार मैं भी तुम्हारे साथ ही संन्यास ले लूंगा। तभी दिवाकर मित्र आकर उन्हें समझाते हैं कि वास्तव में आप दोनों भाई-बहन का मन संन्यासी है, किन्तु आज देश की रक्षा एवं सेवा संन्यास-ग्रहण करने से अधिक महत्त्वपूर्ण है। दिवाकर मित्र के समझाने पर दोनों संन्यास का विचार त्याग देशसेवा में लग जाते हैं।

पंचम सर्ग

हर्षवर्द्धन एक आदर्श सम्राट के रूप में शासन करते हैं। उनके राज्य में प्रजा सब प्रकार से सुखी है, विद्वानों की पूजा की जाती है। सभी प्रजाजन आचरणवान्, धर्मपालक, स्वतन्त्र तथा सुरुचिसम्पन्न हैं। महाराज हर्षवर्द्धन सदैव जन-कल्याण एवं शास्त्र-चिन्तन में लगे रहते हैं। अपने भाई के ऐसे धर्मानुशासन को देखकर राज्यश्री भी प्रसन्न रहती है। सम्पूर्ण राज्य एकता के सूत्र में बँधा हुआ है। एक बार हर्षवर्द्धन तीर्थराज प्रयाग में सम्पूर्ण राजकोष को दान कर देने की घोषणा करते हैं

हुई थी घोषणा सम्राट की साम्राज्य भर से,
करेंगे त्याग सारा कोष ले संकल्प कर में।

सब कुछ दान करके वे अपनी बहन से माँगकर वस्त्र पहनते हैं। इसके पश्चात् प्रत्येक पाँच वर्ष बाद वे इसी प्रकार अपना सर्वस्व दान करने लगे। इस दान को वे प्रजा-ऋण से मुक्ति का नाम देते हैं। अपने जीवन में वे छह बार इस प्रकार के सर्वस्व-दान का आयोजन करते हैं। हर्षवर्द्धन संसारभर में भारतीय संस्कृति का प्रसार करते हैं। इस प्रकार कर्तव्यपरायण, त्यागी, परोपकारी, परमवीर, महाराज हर्षवर्द्धन का शासन सब प्रकार से सुर्खकर तथा कल्याणकारी सिद्ध होता है।

प्रश्न 2:
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की विवेचना (समीक्षा) कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ नाटक की विशेषता लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ में वर्णित भारत की राजनीतिक उथल-पुथल एवं सांस्कृतिक वैभव का उल्लेख कीजिए। यह भारत के राजनीतिक संघर्ष का एक दस्तावेज है।” सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) इतिहास और कल्पना का समन्वय – ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में श्री रामेश्वर शुक्ल अञ्चल ने इतिहास और कल्पना का सुन्दर समन्वय किया है। इस खण्डकाव्य में हर्षवर्द्धन, राज्यश्री, प्रभाकरवर्द्धन, राज्यवर्द्धन, शशांक आदि सभी पात्र ऐतिहासिक हैं।
हर्षवर्द्धन के माता-पिता, भाई, बहनोई की मृत्यु, राज्यश्री की खोज, राज्यश्री के नाम पर हर्षवर्द्धन की दिग्विजय, राजधानी थानेश्वर से कन्नौज ले जाना, प्रयाग में हर पाँचवें वर्ष सर्वस्व-दान, हर्षवर्द्धन का धर्मानुशासन आदि सभी ऐतिहासिक तथ्य हैं।
इनके अतिरिक्त यशोमती का चिता-प्रवेश, शोकाकुल हर्षवर्द्धन की व्यथा, राज्यश्री को खोजते-खोजते हर्षवर्द्धन का दिवाकर मित्र के आश्रम में पहुँचना और वहाँ एक भिक्षुक से राज्यश्री के आत्मदाह करने की सूचना प्राप्त करना बाणभट्ट की प्रमुख रचना ‘हर्षचरित’ पर आधारित हैं।
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में माता-पिता और भाई-बहन के प्रति हर्षवर्द्धन की प्रेम-भावाभिव्यक्ति में तथा बौद्ध श्रमण आचार्य दिवाकर मित्र, राज्यश्री, हर्षवर्द्धन के चरित्र-चित्रण में कवि ने कल्पना का प्रयोग किया है। कवि ने इस खण्डकाव्य में ऐतिहासिक एवं काल्पनिक घटनाओं का इतना सुन्दर और सजीव समन्वय किया है। कि सभी घटनाएँ एवं चरित्र बहुत अधिक प्रभावशाली बन गये हैं।

(2) कथा-संगठन की श्रेष्ठता – कुमार हर्षवर्द्धन पर किशोरावस्था में ही दु:खों के पहाड़ टूटने लगते हैं। यहीं से कथानक का आरम्भ होता है। कथा का आरम्भ बहुत ही रोचक एवं प्रभावशाली है। कन्नौज के राजा की मृत्यु का बदला लेने के लिए हर्षवर्द्धन द्वारा ससैन्य प्रयाण तथा उन्हीं पर सम्पूर्ण राज्यभार आ पड़ना कथा का विकास है। हर्षवर्द्धन द्वारा दिग्विजय के बाद तीर्थराज प्रयाग में सर्वस्व त्याग कथानक की चरम सीमा है। यहाँ आकर त्यागपथी हर्षवर्द्धन का लोककल्याण अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है। इसके पश्चात् हर्षवर्द्धन के सुशासन का वर्णन कथानक का उतार है और उनकी मृत्यु तथा उनके महान् चरित्र से प्रेरणा लेने की कामना के साथ ‘त्यागपथी’ के कथानक का अन्त हो जाता है। इस प्रकार इस खण्डकाव्य का सम्पूर्ण कथानक सुगठित और सुविकसित है। प्रसंगों में प्रवाह है और कथा की तारतम्यता कहीं भी शिथिल या बाधित नहीं होती है।

(3) कौतूहलवर्द्धक – ‘त्यागपथी’ की कथावस्तु कौतूहलवर्द्धक है। आखेट के समय हर्षवर्द्धन को पिता के भयंकर ज्वर-दाह की सूचना, माता यशोमती का आत्मदाह, कन्नौज की घटनाएँ, राज्यवर्द्धन की हत्या, राज्यश्री की खोज तथा कन्नौज का शासन ग्रहण करने की समस्या आदि सभी घटनाएँ पाठकों के मन में कौतूहल जगाती

(4) मार्मिकता – प्रस्तुत काव्य में कवि ने मार्मिक घटनाओं का चयन करने में बड़ी सावधानी से काम लिया है। यशोमती को चितारोहण, राज्यवर्द्धन और हर्षवर्द्धन का वैराग्य लेने को तैयार होना, राज्यश्री के वैधव्य का समाचार पाकर हर्ष की व्याकुलता, आत्मदाह के लिए उद्यत राज्यश्री का हर्ष से मिलना इत्यादि ऐसी मार्मिक घटनाएँ हैं, जिनके वर्णन को पढ़कर पाठक का हृदय द्रवित हो जाता है। इस प्रकार ‘त्यागपथी’ की कथावस्तु वास्तव में अत्यन्त मार्मिक, सुसम्बद्ध, इतिहास और कल्पना के सुन्दर समन्वय से रमणीय और प्रेरणाप्रद है।

प्रश्न 3:
‘त्यागपथी’ के नायक अथवा प्रमुख पात्र (हर्षवर्धन) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
” ‘त्यागपथी’ के हर्षवर्द्धन का चरित्र देशप्रेम का प्रखरतम (आदर्श) उदाहरण है।” उपयुक्त उदाहरण देते हुए इस कथन को प्रमाणित कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के आधार पर हर्ष की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
” ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के नायक हर्षवर्द्धन का सम्पूर्ण जीवन सदाचार, उन्नत मानवीय जीवन के प्रति निष्ठा, सहयोग और सदभावना के प्रति जीवन्त आस्था का एक महान् उदाहरण है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘हर्षवर्द्धन मानवीय आदर्शों का प्रतीक है।”त्यागपंथी’ खण्डकाव्य के आधार कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘सोदाहरण सिद्ध कीजिए कि त्यागपथी खण्डकाव्य हर्षवर्द्धन की देशभक्ति, राष्ट्र-रचना और लोक-कल्याणकारी सदवृत्तियों का सम्यक उद्घाटन करता है।’
या
‘हर्षवर्द्धन के चरित्र में लोकमंगल की कामना निहित है। इस कथन के आलोक में ‘त्यागपथी’ के नायक हर्षवर्द्धन का चरित्रांकन कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य महाराजा हर्षवर्द्धन की दानवीरता और राष्ट्रीयता का द्योतक है, कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
थानेश्वर के महाराज प्रभाकरवर्द्धन के छोटे पुत्र हर्षवर्द्धन के चरित्र की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) नायक – हर्षवर्द्धन ‘त्यागपथी’ के नायक हैं। इस खण्डकाव्य की सम्पूर्ण कथा का केन्द्र वही हैं। सम्पूर्ण घटनाचक्र उन्हीं के चारों ओर घूमता है। कथा आरम्भ से अन्त तक हर्षवर्द्धन से ही सम्बद्ध रहती है।

(2) आदर्श पुत्र एवं भाई – इस खण्डकाव्य में हर्षवर्द्धन एक आदर्श पुत्र एवं आदर्श भ्राता के रूप में पाठकों के समक्ष आते हैं। अपने पिता के रुग्ण होने का समाचार पाकर वे आखेट से तुरन्त लौट आते हैं और यथासामर्थ्य उनकी चिकित्सा करवाते हैं। पिता के स्वस्थ न होने तथा माता द्वारा आत्मदाह करने की बात सुनकर वे भाव-विह्वल हो जाते हैं। वे अपनी माता से कहते हैं

मुझ मन्द पुण्य को छोड़ न माँ तुम भी जाओ।
छोड़ो विचार यह, मुझे चरण से लिपटाओ।।

आदर्श पुत्र के समान ही वे आदर्श भाई का कर्तव्य भी पूरा करते हैं। वे अपनी बहन राज्यश्री को अग्निदाह करने एवं संन्यास लेने से रोकते हैं

दोनों करों से घेरकर छोटी बहिन के भाल को।
भूल खड़े थे निकट जलती चिता की ज्वाल को ।।

(3) देश-प्रेमी – हर्षवर्द्धन सच्चे देश-प्रेमी हैं। उन्होंने छोटे राज्यों को एक साथ मिलाकर विशाल राज्य की स्थापना की। देश की एकता एवं रक्षा हेतु वे बड़े-से-बड़ा युद्ध करने से भी नहीं हिचकते थे। उन्होंने एक बड़े राज्य की स्थापना ही नहीं की, वरन् धर्मपूर्वक शासन भी किया। देश-सेवा ही उनके जीवन का व्रत है।

(4) अजेय योद्धा – हर्षवर्द्धन एक अजेय योद्धा हैं। विद्रोही उनके तेजबल के आगे ठहर नहीं पाता। कोई भी राजा उन्हें पराजित नहीं कर सका। भारत के इतिहास में महाराज हर्षवर्द्धन की दिग्विजय, उनका युद्ध-कौशल और उनकी अनुपम वीरता आज भी स्वर्णाक्षरों में लिखी है। उनकी वीरता एवं कुशल शासन का ही यह परिणाम था कि ”उठा पाया न सिर कोई प्रवंचक।”

(5) श्रेष्ठ शासक – महाराज हर्षवर्द्धन एक श्रेष्ठ शासक हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन प्रजा के हितार्थ ही समर्पित है। उनका शासन धर्म-शासन है। उनके शासन में सब जनों को समान न्याय एवं सुख उपलब्ध है।

वे सदैव प्रजा के कल्याण में लगे रहते थे और स्वयं को प्रजा का सेवक समझते थे। उनका मत था

नहीं अधिकार नृप को पास रखे धन प्रजा का,
करे केवल सुरक्षा देश-गौरव की ध्वजा का।

(6) महान् त्यागी – हर्षवर्द्धन महान् त्यागी एवं आत्म संयमी हैं। आत्म संयम एवं सर्वस्व त्याग करने के कारण ही कवि ने उन्हें ‘त्यागपथी’ के नाम से पुकारा है। पिता की मृत्यु के पश्चात् वे अपने बड़े भाई के अधिकार को ग्रहण करना नहीं चाहते। इसी प्रकार कन्नौज का राज्य भी वे अपनी बहन के नाम पर चलाते हैं। प्रयाग में छः बार अपना सर्वस्व प्रजा के लिए दे देना उनके महान् त्याग को प्रमाण है। वे राजकोष को प्रजा की सम्पत्ति मानते हैं। इसीलिए वे उसे प्रजा को ही दान कर देते हैं।

(7) धर्मपरायण – हर्षवर्द्धन के जीवन में धर्मपरायणता कूट-कूटकर भरी हुई है। वे जन-सेवा में ही अपना जीवन लगा देते हैं

रहे कल्याण मानवमात्र का ही धर्म मेरा,
रहे सर्वस्व-त्यागी पुण्य पर विश्वास मेरा।

उन्होंने शैव, शाक्त, वैष्णव और वेद-मत को एक साथ रखा। उन्होंने किसी के प्रति भी भेदभाव नहीं बरता।

(8) कर्त्तव्यनिष्ठ एवं दृढनिश्चयी – सम्राट हर्ष ने आजीवन अपने कर्तव्य का पालन किया। प्रारम्भ में इच्छा न होते हुए भी इन्होंने अपने भाई के कहने पर राज्य सँभाला और प्रत्येक संकटापन्न स्थिति में भी अपने कर्तव्य को निभाया। बहन राज्यश्री को वनों में खोजकर वे अपनी कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हैं। भाई की छल से की गयी हत्या का समाचार सुनकर उन्होंने जो प्रतिज्ञा की थी, उससे उनके दृढ़निश्चय का पता चलता है

लेकर चरण रज आर्य की करता प्रतिज्ञा आज मैं,
निर्मूल कर दूंगा धरा से अधर्म गौड़ समाज मैं।

(9) महादानी – त्यागपथी के हर्षवर्द्धन आत्मसंयमी तथा महादानी हैं। महान् त्यागी होने के कारण ही कवि ने उन्हें ‘त्यागपथी’ नाम से पुकारा है। पिता की मृत्यु के पश्चात् वे अपने बड़े भाई का अधिकार ग्रहण नहीं करना चाहते। कन्नौज विजय के बाद भी वे कन्नौज का सिंहासन राज्यश्री को देना चाहते हैं।

इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि हर्ष का चरित्र एक महान् राजा, आदर्श भाई, आदर्श पुत्र और महान् त्यागी का चरित्र है, जिसके लिए प्रजा की सुख-सुविधा ही सर्वोपरि है और वह अपने मानवीय कर्तव्यों के प्रति भी निष्ठावान् है।

प्रश्न 4:
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के आधार पर राज्यश्री का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ में निरूपित राज्यश्री की चारित्रिक छवि पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।
उत्तर:
राज्यश्री सम्राट् हर्षवर्द्धन की छोटी बहन है। हर्षवर्द्धन के चरित्र के बाद राज्यश्री का चरित्र ही ऐसा है, जो पाठकों के हृदय एवं मस्तिष्क पर छा जाता है। राज्यश्री के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित है

(1) माता-पिता की लाडली – राज्यश्री अपने माता-पिता को प्राणों से भी प्यारी है। कवि कहता है

माँ की ममता की मूर्ति राज्यश्री सुकुमारी।
थी सदा पिता को, माँ को प्राणोपम प्यारी ॥

(2) आदर्श नारी – राज्यश्री आदर्श पुत्री, आदर्श बहन और आदर्श पत्नी के रूप में हमारे समक्ष आती है। वह यौवनावस्था में विधवा हो जाती है तथा गौड़पति द्वारा बन्दिनी बना ली जाती है। भाई राज्यवर्द्धन की मृत्यु के बाद वह कारागार से भाग जाती है और वन में भटकती हुई एक दिन आत्मदाह के लिए उद्यत हो जाती है; किन्तु अपने भाई हर्षवर्द्धन द्वारा बचा लेने पर वह तन-मन-धन से प्रजा की सेवा में ही अपना जीवन अर्पित कर देती है। हर्ष द्वारा राज्य सौंपे जाने पर भी वह राज्य स्वीकार नहीं करती। यही है उसका आदर्श रूप, जो सबको आकर्षित करता है

विपुल साम्राज्य की अग्रज सहित वह शासिका थी,
अभ्यन्तर से तथागत की अनन्य उपासिका थी।

(3) देश-भक्त एवं जन-सेविका – राज्यश्री के मन में देशप्रेम और लोक-कल्याण की भावना कूट-कूटकर भरी हुई है। हर्ष के समझाने पर वह अपने वैधव्य का दुःख झेलती हुई भी देश-सेवा में लगी रहती है। देशप्रेम के कारण राज्यश्री संन्यासिनी बनने का विचार भी छोड़ देती है तथा शेष जीवन को देश-सेवा में ही लगाने का । व्रत लेती है।

(4) करुणामयी नारी – राज्यश्री ने माता-पिता की मृत्यु तथा पति और बड़े भाई की मृत्यु के अनेक दु:ख झेले। इन दु:खों ने उसे करुणा की मूर्ति बना दिया। अपने अग्रज हर्षवर्द्धन से मिलते समय उसकी कारुणिक दशा अत्यन्त मार्मिक प्रतीक होती है

सतत बिलखती थी बहिने माता-पिता की याद कर।
ले नाम सखियों का, उमड़ती थी नदी-सी वारि भर ॥
था सास्तु अग्रज धैर्य देता माथ उसका ढाँपकर।
रोती रही अविरल बहिन बेतस लता-सी काँपकर ॥

(5) त्यागमयी नारी – राज्यश्री का जीवन त्याग की भावना से आलोकित है। भाई हर्षवर्द्धन द्वारा कन्नौज का राज्य दिये जाने पर भी वह उसे स्वीकार नहीं करती। वह कहती है

स्वीकार न मुझको कान्यकुब्ज सिंहासन।
बैठो उस पर तुम करो शौर्य से शासन ।

वह राज्य-कार्य के बन्धन में पड़ना नहीं चाहती; क्योंकि वह मन से संन्यासिनी है। हर्षवर्द्धन के समझाने पर भी वह नाममात्र की ही शासिका बनी रहती है। प्रयाग महोत्सव के समय हर्षवर्द्धन के साथ राज्यश्री भी अपना सर्वस्व प्रजा के हितार्थ त्याग देती है।

(6) सुशिक्षिता एवं ज्ञान – सम्पन्न राज्यश्री सुशिक्षिता एवं शास्त्रों के ज्ञान से सम्पन्न है। जब आचार्य दिवाकर मित्र संन्यास धर्म का तात्त्विक विवेचन करते हुए उसे मानव-कल्याण के कार्य में लगने का उपदेश देते हैं तब राज्यश्री इसे स्वीकार कर लेती है और आचार्य की आज्ञा का पूर्णरूपेण पालन करती है।
इस प्रकार राज्यश्री का चरित्र एक आदर्श भारतीय नारी का चरित्र है। उसके पातिव्रत-धर्म, देश-धर्म, करुणा और कर्तव्यनिष्ठा के आदर्श निश्चय ही अनुकरणीय हैं।

प्रश्न 5:
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के भावपक्ष एवं कलापक्ष की विशेषताएँ बताइए।
या
‘त्यागपथी’ की काव्यगत विशेषताओं (काव्य-सौष्ठव) पर प्रकाश डालिए।
या
खण्डकाव्य की दृष्टि से त्यागपथी की समीक्षा (आलोचना) कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ एक ऐतिहासिक खण्डकाव्य है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
काव्य-शिल्प की दृष्टि से त्यागपथी’ खण्डकाव्य की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की काव्य-शैली की विवेचना कीजिए।
या
खण्डकाव्य के लक्षणों (तत्त्वों) के आधार पर ‘त्यागपथी’ के महत्त्व का मूल्यांकन कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की काव्य-गुणों की दृष्टि से समीक्षा कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की भाषा-शैली की समीक्षा कीजिए।
या
कथावस्तु और चरित्र-चित्रण की दृष्टि से त्यागपथी खण्डकाव्य का मूल्यांकन कीजिए।
या
“त्यागपथी एक सफल खण्डकाव्य है’, इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के संवाद शिल्प पर प्रकाश डालिए।
या
” ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की भाषा कथावस्तु के अनुकूल है।” उचित उदाहरण देते हुए सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
श्री रामेश्वर शुक्ल अञ्चल’ द्वारा रचित खण्डकाव्य ‘त्यागपथी’ एक ऐतिहासिक कथानक पर आधारित खण्डकाव्य है। इस रचना में कवि ने अपनी काव्यात्मक प्रतिभा का प्रयोग अत्यधिक कुशलता से किया है। इस खण्डकाव्य की विशेषताओं का विवेचन अग्रवत् किया जा सकता है।

कथानक की ऐतिहासिकता – ‘त्यागपथी’ में सातवीं शताब्दी के सुप्रसिद्ध सम्राट हर्षवर्द्धन की कथा का वर्णन हुआ है। कवि ने हर्षवर्द्धन के माता-पिता की मृत्यु, भाई और बहनोई की हत्या, कन्नौज में राज्य सँभालना, मालवराज शशांक से युद्ध, दिग्विजय करके धर्म-शासन की स्थापना और हर पाँचवें वर्ष तीर्थराज प्रयाग में सर्वस्व दान करने की ऐतिहासिक घटनाओं को बड़े ही सरल और सुन्दर रूप में प्रस्तुत किया है।

पात्र एवं चरित्र-चित्रण – ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में प्रभाकरवर्द्धन तथा उनकी पत्नी यशोमती; उनके दो पुत्र राज्यवर्द्धन और हर्षवर्द्धन; एक पुत्री राज्यश्री; कन्नौज, मालव, गौड़ प्रदेश के राजाओं के अतिरिक्त आचार्य दिवाकर, सेनापति भण्ड आदि पात्र हैं। इस खण्डकाव्य का नायक हर्षवर्द्धन है तथा इसकी नायिका होने का गौरव उसकी बहन राज्यश्री को प्राप्त है।

‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की काव्यगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(क) भावगत विशेषताएँ

(1) मार्मिकता – इस खण्डकाव्य में कवि ने हर्षवर्द्धन की माता यशोमती का चितारोहण, राज्यवर्द्धन और हर्षवर्द्धन का वैराग्य लेने को तैयार होना, राज्यश्री के विधवा होने की सूचना पाकर हर्षवर्द्धन की व्याकुलता, राज्यश्री द्वारा आत्मदाह के समय हर्षवर्द्धन के मिलन का वर्णन अतीव मार्मिक है।

(2) रस-निरूपण – ‘त्यागपंथी’ में कवि ने करुण, वीर, रौद्र, शान्त आदि रसों का सुन्दर निरूपण किया है।
करुण रस का निम्नलिखित उदाहरण द्रष्टव्य है

मुझ मन्द पुण्य को छोड़ न माँ तुम भी जाओ।
छोड़ो विचार यह, मुझे चरण से लिपटाओ ।
सँवरो देवि ! यह रूप नहीं देखा जाता।
हो पिता अदय, पर सतत वत्सला है माता॥

(3) प्रकृति-चित्रण – ‘त्यागपथी’ में कवि ने प्रकृति के विभिन्न रूपों का सुन्दर चित्रण किया है। आखेट के समय जब हर्षवर्द्धन को राजा के गम्भीर रूप से रोगग्रस्त होने का समाचार मिलता है तो वे तुरन्त राजमहल को लौट आते हैं। उस समय के वन का चित्रण द्रष्टव्य है

वन-पशु अविरत, खर-शर-वर्णन से अकुलाये।
फिर गिरि-श्रेणी में खोहों से बाहर आये ॥

(ख) कलागत विशेषताएँ

(1) भाषा – भारतीय इतिहास में गुप्तकाल स्वर्ण युग के रूप में जाना जाता है। उस काल में भारतीय संस्कृति, कला और साहित्य अपनी उन्नति की चरम सीमा पर थे। ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की भाषा भी वैसी ही गरिमामयी है। इस खण्डकाव्य की भाषा प्रभावशाली, भावानुकूल और समयानुकूल है। इसकी भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हिन्दी है। भाषा में माधुर्य, ओज एवं प्रसाद गुण विद्यमान हैं। प्रारम्भ के दो सर्गों में ओज गुण अधिक है, जब कि अन्त के सर्गों में चित्त की दीप्ति और विस्तार के कारण माधुर्य और प्रसाद गुण अधिक हैं।

उदाहरण(i) था वस्त्र-कर्मान्तिक सजल-दृग आ गया वल्कल लिए।
(ii) जन-जन वहाँ था साश्रु, जब वल्कल उन्होंने ले लिया।

(2) शैली – त्यागपथी में वर्णनप्रधान चित्रात्मकता लिये हुए संवादात्मक और सुललित सूक्ति-शैली का प्रयोग किया गया है। शब्दों के क्रम और ध्वनियों के संयोजन से जिस लय की रचना होती है, वह लय पूरे खण्डकाव्य में समान रूप से निहित है। अर्थ के साथ-साथ यह लय स्वर के आरोह-अवरोह के कारण और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है। पाँचवें सर्ग के अन्त में शैली में एक प्रकार की तीव्रता और आवेग है। इस खण्डकाव्य की शैली में आकर्षण और कौतूहल उत्पन्न करने की क्षमता है, जो खण्डकाव्य के लिए अनिवार्य है।

(3) अलंकार-योजना – ‘त्यागपथी’ में कवि ने स्थान-स्थान पर विभिन्न अलंकारों का प्रयोग किया है। अलंकार-योजना सर्वत्र स्वाभाविक रूप में है। भावोत्कर्ष में अलंकारों का प्रयोग विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण रहा है। कवि ने उपमा, अनुप्रास, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का प्रयोग किया है।

(4) छन्द-विधान – रामेश्वर शुक्ल अञ्चल ने ‘त्यागपथी’ में 26 मात्राओं के ‘गीतिका’ छन्द का प्रयोग किया है। अन्त में आकर कवि ने 34 मात्राओं वाले घनाक्षरी छन्द भी लिखे हैं। अन्त में घनाक्षरी छन्द का प्रयोग रचना की समाप्ति का सूचक ही नहीं, वरन् वर्णन की दृष्टि से प्रशस्ति का भी सूचक है। कवि की छन्द-योजना निस्सन्देह प्रशंसनीय है।
निष्कर्षतः ‘त्यागपथी’ काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से एक सफल खण्डकाव्य है।

प्रश्न 6:
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के रचयिता का मुख्य उद्देश्य अथवा सन्देश क्या है ? संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
या
“सच्ची राष्ट्रधर्मिता को उद्भासित करना ‘त्यागपथी’ का प्रमुख उद्देश्य है।” इस उक्ति की दृष्टि से त्यागपथी की आलोचना कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के आधार पर भारतीय जीवन-शैली और सामाजिक व्यवस्था का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में हर्षकालीन भारतीय समाज एवं जन-जीवन का उदात्त चित्रण मिलता है, सिद्ध कीजिए।
या
“त्यागपथी’ खण्डकाव्य में हर्षकालीन जीवन व समाज का उदात्त चित्रण मिलता है।” स्पष्ट कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के आधार पर उसके उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में हर्षकालीन भारत सजीव हो उठा है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
खण्डकाव्य ‘त्यागपथी’ के नामकरण की सार्थकता एवं उसके उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के नाम की सार्थकता पर विचार कीजिए।
उत्तर:
[ संकेत- ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं के स्पष्टीकरण के लिए प्रश्न सं० 1 के उत्तर का अध्ययन करें और उसे संक्षेप में लिखें। ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में कविवर रामेश्वर शुक्ल ‘अञ्चल’ ने अनेक प्रयोजनों को पल्लवित किया है। इसके मुख्य उद्देश्य या सन्देश निम्नवत् हैं

(1) प्राचीन भारत का गौरवमय चित्र प्रस्तुत करना – अञ्चल जी ने अपने प्रस्तुत काव्य में प्राचीन भारत के गौरवमय चित्र को प्रस्तुत किया है। उस समय समाज में सभी को समान न्याय और सभी प्रकार के सुख उपलब्ध थे। उन्होंने यह दर्शाया है कि प्राचीन भारत धर्म, संस्कृति, सभ्यता, विद्या, अर्थ और सभी दृष्टियों से वैभवसम्पन्न था।

(2) सम्राट् हर्ष के त्यागमय जीवन का आदर्श प्रस्तुत करना – हर्षवर्द्धन ‘त्यागपथी’ के नायक हैं। प्रजा की सेवा और उसका कल्याण ही सम्राट हर्ष के लिए सर्वोपरि था। सम्पूर्ण घटनाचक्र उन्हीं के चारों ओर घूमता है। कवि ने हर्ष के त्यागमय उज्ज्वल चरित्र के माध्यम से यह प्रस्तुत करना चाहा है कि आज के शासक भी उन्हीं की भॉति त्यागमय और सरल जीवन अपनाकर प्रजा के सम्मुख एक आदर्श उपस्थित करें।

(3) मानवीय गुणों की स्थापना करना – कवि ने प्रस्तुत काव्य में बड़ों के प्रति आदर, छोटों से स्नेह, उदारता, विनम्रता के साथ-साथ सांसारिक गरिमा आदि मानवीय गुणों को व्यक्त किया है। उसने हर्षवर्द्धन के माध्यम से सत्य, अहिंसा, त्याग, शान्ति, परोपकार और निष्काम कर्म जैसे गांधीवादी जीवन-मूल्यों की स्थापना की है।

(4) धर्मनिरपेक्षता पर बल देना – अञ्चल जी ने ‘त्यागपथी’ के माध्यम से सर्व-धर्म समभाव की सशक्त अभिव्यंजना की है। कवि ने दिखाया है कि सम्राट हर्ष के समय में सभी धर्मों को अपने प्रचार और प्रसार का समान अवसर प्राप्त था। सभी धर्मावलम्बियों के साथ समान व्यवहार होता था, जिस कारण सर्वत्र सुख और समृद्धि व्याप्त थी।

(5) राष्ट्रप्रेम की अभिव्यक्ति करना – प्रस्तुत काव्य में कवि ने राष्ट्रप्रेम की सशक्त अभिव्यक्ति की है। सम्राट् हर्ष सच्चे देशप्रेमी हैं। उन्होंने छोटे-छोटे राज्यों को मिलाकर विशाल राज्य की स्थापना की। वे देश की एकता और रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहे। उन्होंने अपनी बहन राज्यश्री को भी आत्मदाह करने से रोककर; देश-सेवा करने को प्रेरित किया।

(6) मानवतावाद का प्रसार करना – प्रस्तुत खण्डकाव्य की रचना में कवि ने मानवता के प्रसार को सन्देश दिया है। कवि ने युद्ध और हिंसा के स्थान पर प्रेम को बढ़ावा दिया है, जिससे आज शोषित और उत्पीड़ित मानवता दमन-चक्र से मुक्त हो सके।

शीर्षक की सार्थकता – उपर्युक्त सभी सन्देश काव्यकार ने सम्राट हर्षवर्द्धन के चरित्र के माध्यम से दिये हैं। हर्ष ने सर्वस्व त्याग करके ही इन सभी आदर्शों की स्थापना की। उनका त्याग क्षणिक नहीं है और न ही वह भावावेग में लिया हुआ निर्णय है, वरन् उन्होंने इस त्याग-पथ का चयन भली प्रकार सोच-समझकर किया है। प्रति पाँचवें वर्ष अपना सर्वस्व दान कर देने वाले त्याग-पथ के इस अमर पथिक के लिए ‘त्यागपथी’ के अतिरिक्त और कौन नाम उपयुक्त हो सकता है ? इस प्रकार खण्डकाव्य के नायक के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करने वाला खण्डकाव्य का शीर्षक ‘त्यागपथी’ सर्वथा उपयुक्त और सार्थक है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi पद्य-साहित्य का विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name पद्य-साहित्य का विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Number of Questions 152
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi पद्य-साहित्य का विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

सामान्य प्रश्न

प्रश्न 1:
हिन्दी-काव्य-साहित्य के विविध कालों का समय बताइट।
या
हिन्दी काव्य के इतिहास को कितने काल-खण्डों में विभाजित किया जाता है? उनके नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  आदिकाल (वीरगाथाकाल) – सन् 993 ई० से सन् 1318 ई० तक।
  2. पूर्व-मध्यकाल (भक्तिकाल) – सन् 1318 ई० से सन् 1643 ई० तक।
  3. उत्तर-मध्यकाल (रीतिकाल) – सन् 1643 ई० से सन् 1843 ई० तक।
  4. आधुनिककाल (गद्यकाल) – सन् 1843 ई० से अब तक।

प्रश्न 2:
कविता के बाह्य तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1.  लय,
  2. तुक,
  3.  छन्द,
  4. शब्द-योजना,
  5. चित्रात्मक भाषा तथा
  6.  अलंकार।

प्रश्न 3:
कविता के आन्तरिक तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  1.  अनुभूति की व्यापकता,
  2.  कल्पना की उड़ान,
  3.  रसात्मकता और सौन्दर्य बोध तथा
  4.  भावों का उदात्तीकरण।

प्रश्न 4:
प्रबन्ध काव्य और मुक्तक काव्य में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रबन्ध काव्य में ऐसी धारावाहिक कथा होती है, जिसमें किसी घटना या कार्य का काव्यात्मक वर्णन होता है, किन्तु मुक्तक काव्य में प्रत्येक पद स्वतन्त्र होता है, उनका कथा रूप में सूत्रबद्ध होना अनिवार्य नहीं।

प्रश्न 5:
हिन्दी पद्य-साहित्य के इतिहास के विभिन्न कालों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. वीरगाथाकाल ( आदिकाल),
  2.  भक्तिकाल (पूर्व-मध्यकाल),
  3. रीतिकाल (उत्तरमध्यकाल) एवं
  4.  आधुनिककाल।

प्रश्न 6:
काव्य के कितने भेद होते हैं?
उत्तर:
काव्य के दो भेद होते हैं

  1. श्रव्य काव्य और
  2.  दृश्य काव्य।

प्रश्न 7:
प्रबन्ध काव्य के कितने भेद होते हैं?
उत्तर:
प्रबन्ध काव्य के दो भेद होते हैं

  1.  महाकाव्य और
  2.  खण्डकाव्य।

प्रश्न 8:
महाकाव्य और खण्डकाव्य में अन्तर बताइट।
उत्तर:
महाकाव्य की कथा में जीवन की सर्वांगीण झाँकी होती है, जब कि खण्डकाव्य में जीवन के एक पक्ष का चित्रण होता है। महाकाव्य की विस्तृत कथावस्तु पर अनेक खण्डकाव्य लिखे जा सकते हैं।

प्रश्न 9:
दो महाकाव्यों के नाम लिखिए ।
उत्तर:
दो महाकाव्यों के नाम हैं

  1.  श्रीरामचरितमानस और
  2. कामायनी।

प्रश्न 10:
दो खण्डकाव्यों के नाम लिखिए।
उत्तर:
दो खण्डकाव्यों के नाम हैं

  1. जयद्रथ-वध और
  2. हल्दीघाटी।

प्रश्न 11:
हिन्दी का प्रथम महाकाव्य किसे माना जाता है? उसका रचनाकार कौन है?
उत्तर:
श्रीरामचरितमानस – तुलसीदास।

आदिकाल (वीरगाथाकाल)

प्रश्न 12:
हिन्दी-साहित्य का आदिकाल किस साम्राज्य की समाप्ति के समय से प्रारम्भ होता है?
उत्तर:
वर्द्धन साम्राज्य की समाप्ति के समय से हिन्दी साहित्य का आदिकाल प्रारम्भ होता है।

प्रश्न 13:
हिन्दी के आदिकाल का समय निर्देश कीजिए और हिन्दी के प्रथम कवि का नाम बताइट।
उत्तर:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार आदिकाल का समय 993 ई० से 1318 ई० तक माना जाता है। सरहपा को हिन्दी का प्रथम कवि माना जाता है।

प्रश्न 14:
हिन्दी का प्रथम कवि किसे माना जाता है? उनका रचना-काल कब से प्रारम्भ हुआ?
उत्तर:
सरहपा को हिन्दी का प्रथम कवि माना जाता है। उनका रचना-काल 769 ई० से प्रारम्भ हुआ।

प्रश्न 15:
आदिकाल (वीरगाथाकाल) की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
या
आदिकालीन हिन्दी-साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालिए।
या
आदिकाल (वीरगाथाकाल) की किन्हीं दो प्रमुख काव्य-प्रवृत्तियाँ लिखिए।
या
आदिकाल के योगदान की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
विशेषताएँ – (1) आदिकाल में अधिकांश रासो ग्रन्थ लिखे गये; जैसे–पृथ्वीराज रासो, परमाल रासो आदि। इनमें आश्रयदाताओं की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा है। (2) वीर और श्रृंगार रस की प्रधानता है। (3) युद्धों का सुन्दर और सजीव वर्णन किया गया है। (4) काव्यभाषा के रूप में डिंगल और पिंगल का प्रयोग हुआ है। (5) काव्य-शैलियों में प्रबन्ध और गीति शैलियों का प्रयोग मिलता है। (6) सामूहिक राष्ट्रीयता की भावना को अभाव रहा है।

प्रश्न 16:
आदिकाल (वीरगाथाकाल) के प्रमुख कवियों और उनकी कृतियों के नाम बताइए।
या
वीरगाथाकाल के किन्हीं दो प्रमुख काव्यों (रचनाओं) के नाम लिखिए।
उत्तर:
आदिकाल (वीरगाथाकाल) के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं – चन्दबरदायी (पृथ्वीराज रासो), नरपति-नाल्ह (बीसलदेव रासो), दलपति विजय (खुमान रासो), जगनिक (परमाल रासो या आल्हखण्ड), विद्यापति (पदावली), अब्दुल रहमान (सन्देश रासक), स्वयंभू (पउमचरिउ), धनपाल (भविसयत्तकहा), जोइन्दु (परमात्मप्रकाश), पुष्पदन्त (उत्तरपुराण) एवं अमीर खुसरो की फुटकर रचनाएँ।

प्रश्न 17:
वीरगाथाकाल (आदिकाल) में साहित्य रचना की प्रमुख धाराओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
इस काल की तीन प्रमुख काव्यधाराएँ निम्नलिखित हैं

  1.  संस्कृत काव्यधारा,
  2.  प्राकृत एवं अपभ्रंश काव्यधारा तथा
  3.  हिन्दी काव्यधारा।

प्रश्न 18:
आदिकाल के विभिन्न नाम बताइए।
या
‘वीरगाथाकाल के लिए प्रयुक्त दो अतिरिक्त नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वीरगाथाकाल, अपभ्रंशकाल, सन्धिकाल, आविर्भावकाल, चारणकाल, बीजवपनकाल एवं सिद्ध-सामन्त युग आदि।

प्रश्न 19:
वीरगाथाकाल के चार प्रमुख कवियों के नाम बताइए।
या
आदिकाल के किन्हीं दो कवियों (रचनाकारों) के नाम लिखिए।
उत्तर:
चन्दबरदायी, नरपति नाल्ह, दलपति विजय एवं जगनिक।

प्रश्न 20:
आदिकाल की चार प्रमुख कृतियों के नाम बताइए।
या
दो रासो काव्यों के नाम लिखिए।
उत्तर:
पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव रासो, परमाल रासो (आल्हखण्ड) एवं विद्यापति पदावली।

प्रश्न 21:
वीरगाथाकाल में रचनाएँ कौन-कौन-से काव्य रूपों में लिखी गयीं?
उत्तर:
प्रबन्धकाव्य और वीर गीतों के रूप में।

प्रश्न 22:
वीरगाथाकाल की रचनाओं में कौन-सी भाषा प्रयुक्त हुई है?
या
रासो ग्रन्थों में किन दो भाषाओं का प्रयोग किया गया है?
उत्तर:
डिंगल और पिंगल।

प्रश्न 23:
वीरगाथाकाल (आदिकाल) की दो प्रमुख रचनाओं एवं उनके कवियों के नाम लिखिए।
या
‘पृथ्वीराज रासो’ की रचना किस काल में हुई और उसके रचयिता कौन हैं?
उत्तर:
पृथ्वीराज रासो (चन्दबरदायी), परमाल रासो या आल्हखण्ड (जगनिक) ये वीरगाथाकाल (आदिकाल) की दो प्रमुख रचनाएँ हैं।

प्रश्न 24:
आदिकाल के साहित्य को कितने वर्गों में विभाजित किया जा सकता है?
उत्तर:
पाँच वर्गों में – (1) सिद्ध साहित्य, (2) जैन साहित्य, (3) नाथ साहित्य, (4) रासो साहित्य, (5) लौकिक साहित्य,

प्रश्न 25:
जैन साहित्य का सबसे अधिक लोकप्रिय रूप किन ग्रन्थों में मिलता है?
उत्तर:
जैन साहित्य को सर्वाधिक लोकप्रिय रूप ‘रास ग्रन्थों में मिलता है।

प्रश्न 26:
नाथ साहित्य के प्रणेता कौन थे? नाथ साहित्य के दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
नाथ साहित्य के प्रणेता मत्स्येन्द्र नाथ थे। इस साहित्य के दो प्रमुख कवियों के नाम हैं – गोरखनाथ, तथा जलन्धर।।

प्रश्न 27:
रासो साहित्य से सम्बन्धित किन्हीं दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
पृथ्वीराज रासो-चन्दबरदायी। बीसलदेव रासो-नरपति नाल्ह।

प्रश्न 28:
आदिकाल के सिद्ध साहित्य और जैन साहित्य के एक-एक प्रमुख कवि का नाम लिखिए।
उत्तर:
सिद्ध साहित्य के प्रमुख कवि हैं – सरहपा, शबरपा, लुइपा, डोम्भिपा, कण्हपा आदि जैन साहित्य के प्रमुख कवि हैं-आचार्य देवसेन, मुनिंशमलिभद्र सूरि, विजयसेन सूरि, जिनधर्म सूरि आदि।

प्रश्न 29:
गोरखनाथ के गुरु का क्या नाम था?
उत्तर:
गोरखनाथ के गुरु का नाम मत्स्येन्द्रनाथ (मछन्दरनाथ) था।

भक्तिकाल

प्रश्न 30:
भक्तिकाल की सभी प्रमुख काव्यधाराओं का परिचय दीजिए।
उत्तर:
भक्तिकाल में हिन्दी कविता दो’ धाराओं में प्रवाहित हुई – निर्गुण भक्ति-धारा और सगुण भक्ति-धारा निर्गुणवादियों में भी जिन्होंने ज्ञान को अपनाया, वे ज्ञानमार्गी और जिन्होंने प्रेम को अपनाया, वे मार्गी कहलाये। सगुणवादी जिन कवियों ने भगवान् के दुष्टदलनकारी-लोकरक्षक रूप को सामने रखा, वे शभक्ति शाखा से सम्बद्ध माने गये और जिन्होंने भगवान् के लोकरंजक रूप को सामने रखा, वे कृष्णभक्ति शाखा के कवि कहलाये।

प्रश्न 31:
भक्तिकाल की विभिन्न धाराओं के नाम बताइए।
या
निर्गुण भक्ति की दो शाखाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
भक्तिकाल में दो प्रकार की काव्य-रचना हुई –
(1) निर्गुणमार्गीय तथा
(2) सगुणमार्गीय।

  1. निर्गुण काव्य की दो धाराएँ हैं – (क) ज्ञानाश्रयीं-काव्यधारा तथा (ख) प्रेमाश्रयी काव्यधारा।
  2. सगुण काव्य की भी दो धाराएँ हैं – (क) कृष्णभक्ति-काव्यधारा तथा (ख) रामभक्ति-काव्यधारा।

प्रश्न 32:
सन्तकाव्य का अर्थ स्पष्ट कीजिए। इस धारा के प्रमुख कवि का नाम भी लिखिए।
उत्तर:
सन्तकाव्य से आशय निर्गुण ज्ञानाश्रयी-शाखा से है। ये भक्त निर्गुण-निराकार की उपासना करते हैं। और ज्ञान को उसकी प्राप्ति का साधन मानते हैं। इस धारा के प्रमुख कवि हैं—कबीर, रैदास, नानक, दादू , मलूकदास आदि।

प्रश्न 33:
भक्तिकाल की निर्गुण तथा सगुण भक्ति-धारा का परिचय दीजिए।
या
भक्तिकाल की एक प्रमुख काव्यधारा का परिचय लिखिए।
उत्तर:
जिस धारा में भगवान् के निर्गुण-निराकार रूप की आराधना पर बल दिया गया, वह निर्गुण धारा कहलायी और जिसमें सगुण-साकार रूप की आराधना पर बल दिया गया, वह सगुण धारा कहलायी। निर्गुणवादियों में जिन्होंने भगवत्-प्राप्ति के साधन-रूप में ज्ञान को अपनाया, वे ज्ञानमार्गी और जिन्होंने प्रेम को अपनाया, वे प्रेममार्गी कहलाये। ज्ञानमार्गी शाखा के सबसे प्रमुख कवि कबीर और प्रेममार्गी (सूफी) शाखा के मलिक मुहम्मद जायसी हुए।

प्रश्न 34:
भक्तिकाल की प्रमुख विशेषताओं (प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।
या
ज्ञानाश्रयी भक्ति-शाखा की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। या भक्तिकाल की किन्हीं दो प्रमुख विशेषताओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  सद्गुरु का महत्त्व सर्वाधिक; सत्संग पर भी बल।
  2. निर्गुण की उपासना एवं अवतारवाद का खण्डन।
  3. भगवान् के नाम-स्मरण तथा भजन पर बल।
  4. धर्म के क्षेत्र में रूढ़िवाद, बाह्याचार एवं आडम्बर का विरोध तथा सामाजिक क्षेत्र में विषमता, ऊँच-नीच एवं छुआछूत का खण्डन।
  5. आन्तरिक शुद्धि एवं प्रेम साधना पर बल।
  6.  ईश्वर की एकता पर बल; अर्थात् राम-रहीम अभिन्न हैं।

प्रश्न 35:
ज्ञानाश्रयी शाखा के किसी एक कवि द्वारा रचित दो ग्रन्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कवि-कबीर; रचित ग्रन्थ-बीजक, साखी।

प्रश्न 36:
प्रेमाश्रयी भक्ति-शाखा की प्रमुख प्रवृत्तियाँ (विशेषताएँ) लिखिए।
या
निर्गुण-पन्थ की प्रेमाश्रयी-शाखा की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
या
निर्गुण भक्ति की प्रेमाश्रयी-शाखा का संक्षेप में परिचय दीजिए।
उत्तर:

  1. मुसलमान होकर भी हिन्दू प्रेमगाथाओं का वर्णन, जिनमें हिन्दू संस्कृति का चित्रण मिलता है।
  2. सूफी सिद्धान्तों का निरूपण।
  3.  रहस्यवाद की चरम अभिव्यक्ति।
  4.  लौकिक वर्णनों के माध्यम से अलौकिकता की व्यंजना।
  5. मसनवी शैली का प्रयोग।
  6.  पूर्वी अवधीभाषा तथा दोहा-चौपाई छन्दों का प्रयोग।

प्रश्न 37:
प्रेमाश्रयी शाखा की किन्हीं दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. पद्मावत् तथा
  2.  मृगावती।

प्रश्न 38:
कृष्ण-काव्यधारा की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1. श्रीमद्भागवत का आधार लेकर कृष्णलीला-गान।
  2.  सख्य, वात्सल्य एवं माधुर्य भाव की उपासना एवं लोकपक्ष की उपेक्षा।
  3. काव्य में श्रृंगार एवं वात्सल्य रसों की प्रधानता; मूल आधार कृष्ण के बाल और किशोर रूप का लीला वर्णन।
  4. ब्रज भाषा में मुक्तक काव्य-शैली की प्रधानता, जिसमें अद्भुत संगीतात्मकता का गुण विद्यमान है।

प्रश्न 39:
कृष्णभक्ति-काव्य में वर्णित प्रमुख रसों का नामोल्लेख करते हुए उस रचना का नाम भी बताइए, जिसमें उन सभी रसों का सर्वश्रेष्ठ चित्रण हुआ है।
उत्तर:
कृष्णभक्ति-काव्य में श्रृंगार रस का सांगोपांग एवं वात्सल्य और भक्ति रसों का प्रयोग प्रमुखता से हुआ है। सूरदास के ‘सूरसागर’ में इन सभी रसों का सर्वश्रेष्ठ चित्रण है।

प्रश्न 40:
कृष्ण-काव्यधारा के दो प्रमुख कवियों के नाम बताइट।
या
अष्टछाप के किन्हीं दो कवियों का नाम लिखिए।
या
वल्लभाचार्य के किन्हीं दो शिष्यों के नाम लिखिए।
उत्तर:
अष्टछाप के कवि ही कृष्ण-काव्यधारा के प्रमुख कवि थे। महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के चार शिष्यों एवं अपने चार शिष्यों को मिलाकर महाप्रभु के सुपुत्र गोसाईं विट्ठलनाथ जी ने अष्टछाप की स्थापना की, जिसके आठ कवि थे – सूरदास, कुम्भनदास, परमानन्ददास, कृष्णदास, छीतस्वामी, गोविन्ददास, चतुर्भुजदास, नन्ददास। इनके अतिरिक्त अन्य प्रमुख कवि हैं-मीरा, रसखान, हितहरिवंश और नरोत्तमदास।

प्रश्न 41:
राम-काव्यधारा की प्रमुख विशेषताएँ बताइट।
उत्तर:

  1.  लोकसंग्रह (लोकहित) की भावना के कारण मर्यादा की प्रबल भावना।
  2. राम का परब्रह्मत्व
  3.  दास्य भाव की उपासना।
  4. समन्वय की विराट् चेष्टा।
  5.  स्वान्त:सुखाय काव्य-रचना
  6.  अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं, प्रबन्ध और मुक्तक दोनों काव्य-शैलियों एवं विविध छन्दों का प्रयोग।

प्रश्न 42:
रामाश्रयी शाखा के दो प्रमुख कवियों का नाम दीजिए।
या
राम को नायक मानकर रचना करने वाले दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
गोस्वामी तुलसीदास और आचार्य केशवदास रामाश्रयी शाखा के प्रमुख कवि हैं। इन दोनों ने राम को नायक मानकर अपने काव्यों की रचना की है।

प्रश्न 43:
भक्तिकालीन काव्य को ‘हिन्दी कविता का स्वर्णयुग’ क्यों कहा जाता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भावों की उदात्तता, महती प्रेरकता, अनुभूति-प्रवणता, लोकहित का मुखरित स्वर, भारतीय संस्कृति का मूर्तिमान रूप, समन्वय की विराट् चेष्टा तथा कलापक्ष की समृद्धि इस काल की ऐसी विशेषताएँ हैं, जो किसी अन्य काल के काव्य में इतनी उच्चकोटि की नहीं मिलतीं। इसीलिए भक्तिकाल को हिन्दी काव्य का स्वर्णयुग कहा जाता है।

प्रश्न 44:
निम्नलिखित वाक्यों में से भक्ति-काल की दो सही प्रवृत्तियों को लिखिए
(क) श्रृंगार रस की प्रधानता
(ख) स्वान्तः सुखाय की भावना
(ग) राजप्रशस्ति की अभिव्यक्ति
(घ) भाव-पक्ष एवं कला-पक्ष का समन्वय तर
उत्तर:
(ख) स्वान्तः सुखाय की भावना तथा
(घ ) भाव-पक्ष एवं कला पक्ष को समन्वय

प्रश्न 45:
भक्तिकाव्य की दो प्रमुख शाखाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  निर्गुण – भक्तिशाखा और
  2. सगुण – भक्तिशाखा।।

प्रश्न 46:
भक्तिकाल के चार प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कबीरदास, मलिक मुहम्मद जायसी, सूरदास और तुलसीदास।

प्रश्न 47:
भक्तिकालीन विभिन्न काव्यधाराओं में किस धारा का काव्य सर्वश्रेष्ठ है और उसका सर्वश्रेष्ठ कवि कौन है?
उत्तर:
सर्वश्रेष्ठ काव्यधारा-रामाश्रयी काव्यधारा तथा सर्वश्रेष्ठ कवि–गोस्वामी तुलसीदास।

प्रश्न 48:
भक्तिकाल की चार प्रमुख काव्यकृतियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
बीजके, पद्मावत, सूरसागर तथा श्रीरामचरितमानस।

प्रश्न 49:
तुलसीदास एवं कबीरदास किस भक्तिधारा के कवि हैं?
उत्तर:
तुलसीदास भक्तिकाल क़ी सगुण भक्तिधारा की रामभक्ति-शाखा के कवि हैं तथा कबीरदास भक्तिकाल की निर्गुण भक्तिधारा के ज्ञानमार्गी शाखा के कवि हैं।

प्रश्न 50:
निर्गुण-काव्यधारा की कोई एक प्रमुख विशेषता बताइए और उसके प्रमुख कवि का नामोल्लेख कीजिए।
या
निर्गुण भक्ति-काव्यधारा के दो प्रसिद्ध कवियों के नाम बताइट।
उत्तर:
निर्गुण काव्य में परम ब्रह्म के निराकार स्वरूप की उपासना हुई तथा ज्ञान एवं प्रेम तत्त्व की प्रधानता रही। कबीर एवं मलिक मुहम्मद जायसी इस धारा के प्रमुख कवि हैं।

प्रश्न 51:
सन्त काव्यधारा के चार प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कबीरदास, रैदास, दादू तथा नानक।

प्रश्न 52:
प्रेममार्गी निर्गुण (सूफी) काव्यधारा के प्रमुख कवि का नाम तथा उनकी प्रमुख रचना की उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
कवि-मलिक मुहम्मद जायसी। रचना–पद्मावत (महाकाव्य)।

प्रश्न 53:
सूफी काव्यधारा की कुछ प्रमुख कृतियों के नाम लिखिए।
या
सूफी काव्य के दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
पद्मावत, मृगावती (कुतुबन), मधुमालती (मंझन), चित्रावली (उसमान) आदि।

प्रश्न 54:
“महिका सेसि कि कोहरंहिँ” कहने वाले कवि का नाम क्या था?
उत्तर:
प्रश्न में उल्लिखित पंक्ति कहने वाले कवि का नाम मलिक मुहम्मद जायसी था।

प्रश्न 55:
सगुण कृष्णभक्ति-शाखा के चार प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
सूरदास, मीरा, रसखान, कुम्भनदास, गोविन्ददास, नरोत्तमदास एव परमानन्ददास।

प्रश्न 56:
कृष्णाश्रयी शाखा के दो प्रमुख कवियों के नाम तथा उनकी एक-एक कृति का उल्लेख कीजिए।
या
महाकवि सूरदास की दो रचनाओं के नाम लिखिए।
या
कृष्ण को नायक मानकर रचना करने वाले दो प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. सूरदास-सूरसागर व साहित्यलहरी तथा
  2.  मीराबाई- नरसीजी का मायरा।

प्रश्न 57:
निम्नलिखित में से कौन-सी दो रचनाएँ भक्तिकाल की नहीं हैं?
(क) सूरसागर
(ख) बिहारी सतसई
(ग) बीजक
(घ) आँस
उत्तर:
‘बिहारी सतसई’ (रीतिकाल) और ‘आँसू (छायावाद) भक्तिकाल की रचनाएँ नहीं हैं।

प्रश्न 58:
राम-काव्यधारा के दो प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
तुलसीदास राम-काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि हैं। अन्य प्रमुख कवि हैं – केशवदास, नाभादास एवं सेनापति।

प्रश्न 59:
राम-काव्यधारा की रचना किन भाषाओं में हुई है?
उत्तर:
राम-काव्यधारा की रचना प्रमुख रूप से अवधी तथा ब्रजभाषा में हुई है।

प्रश्न 60:
ब्रजभाषा तथा अवधी भाषा के मध्यकालीन एक-एक प्रसिद्ध महाकाव्य का नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. ब्रजभाषा – सूरसागर तथा
  2. अवधी भाषा – श्रीरामचरितमानस।

प्रश्न 61:
रामाश्रयी एवं कृष्णाश्रयी शाखा के एक-एक प्रमुख काव्य का नाम लिखिए
उत्तर:
रामाश्रयी शाखा का प्रमुख महाकाव्य ‘श्रीरामचरितमानस तथा कृष्णाश्रयी शाखा का प्रमुख महाकाव्य ‘सूरसागर’ है।

प्रश्न 62:
सगुण भक्ति काव्यधारा के दो प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
सगुण भक्ति काव्य-धारा के दो प्रमुख कवियों के नाम हैं – (1) सूरदास (कृष्णाश्रयी काव्यधारा) तथा (2) गोस्वामी तुलसीदास (रेरामाश्रयी काव्यधारा)।

प्रश्न 63:
रामभक्ति-शाखा के किसी एक कवि तथा उसके द्वारा रचित ग्रन्थों के नाम लिखिए।
या
सगुण भक्तिधारा की रामाश्रयी शाखा के किसी एक कवि द्वारा रचित दो ग्रन्थों के नाम लिखिए।
या
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित दो ग्रन्थों के नाम लिखिए।
या
‘गीतावली’ और ‘दोहावली भक्तिकाल के किस कवि की रचनाएँ हैं?
उत्तर:
तुलसीदास जी के चार ग्रन्थों के नाम हैं – (1) श्रीरामचरितमानस, (2) विनयपत्रिका, (3) कवितावली, (4) गीतावली, (5) दोहावली, (6) बरवै रामायण आदि।

प्रश्न 64:
भक्तिकाल की प्रेमाश्रयी शाखा के एक कवि और उनकी एक रचना का नाम लिखिए।
या
निर्गुण भक्ति-शाखा की दो प्रमुख रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
या
मलिक मुहम्मद जायसी प्रणीत दो ग्रन्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कवि – मलिक मुहम्मद जायसी और उनकी रचना का नाम है – पद्मावत और अखरावट।

प्रश्न 65:
भक्तिकाल की तीन सामान्य प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. जीव की नश्वरता का समान रूप से वर्णन है।
  2. प्रभु के नाम-स्मरण तथा गुरु की महत्ता का वर्णन सभी कवियों ने किया है।
  3. कवियों के नामोल्लेख की प्रवृत्ति रही है।

प्रश्न 66:
हिन्दी-साहित्य के विकास में भक्तिकाल के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भक्त कवियों ने हृदय सागर का मन्थन कर मनोरम भावों का नवनीत प्रदान किया है। भाव, भाषा । और शैली की समृद्धि के कारण ही भक्तिकाल को हिन्दी-साहित्य का स्वर्णयुग कहा जाता है।

प्रश्न 67:
तुलसीदास के रचना काल का युग बताते हुए उनके द्वारा विरचित दो प्रसिद्ध काव्यकृतियों के नाम लिखिए जिनमें एक अवधी तथा दूसरी ब्रजभाषा की हो।
या
तुलसीदास किस काल के कवि हैं। उनकी एक प्रमुख रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:
तुलसीदास का रचना काल पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल) में पड़ता है। इनकी कृतियाँ

  1. श्रीरामचरितमानस-अवधी भाषा तथा
  2.  विनय-पत्रिका–ब्रजभाषा।।

प्रश्न 68:
अवधी भाषा में लिखे गये दो प्रमुख महाकाव्यों और उनके रचनाकारों का नाम लिखिए।
उत्तर:
अवधी भाषा में लिखे गये दो प्रमुख महाकाव्यों के नाम हैं

  1.  ‘पद्मावत’ (मलिक मुहम्मद जायसी) तथा
  2. श्रीरामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास)।

प्रश्न 69:
द्वैतवाद के प्रवर्तक का नाम लिखिए।
उत्तर:
द्वैतवाद के प्रवर्तक श्री मध्वाचार्य हैं।

रीतिकाल

प्रश्न 70:
रीतिकाल का यह नाम क्यों पड़ा?
उत्तर:
संस्कृत काव्य – शास्त्र में रीति शब्द काव्यांश विशेष का सूचक रहा है। हिन्दी आचार्यों ने रीति का प्रयोग कवित्त – रीति, कवि – रीति, काव्य – रीति, अलंकार-रीति, रस – रीति, मुक्तक-रीति आदि के लिए किया है। सामान्यतया रीति शब्द काव्य – रचना की पद्धति के लिए प्रयुक्त होता है। रीति – निरूपण के निमित्त रचना में प्रवृत्त होने के कारण इसे ‘रीतिकाल’ की संज्ञा दी गयी।

प्रश्न 71:
रीतिकाल की प्रमुख साहित्यिक विशेषताएँ बताइए।
या
रीतिकालीन काव्य की प्रमुख विशेषताएँ (प्रवृत्तियाँ) लिखिए।
उत्तर:

  1.  राज्याश्रित कवियों द्वारा लक्षण-लक्ष्य पद्धति पर काव्य-रचना की गयी (इस प्रकार की रचना करने वाले कवि रीतिबद्ध कहलाए)।
  2. कुछ कवियों ने उपर्युक्त पद्धति; अर्थात् रीति पद्धति का तिरस्कार क़र स्वतन्त्र काव्य-रचना की (ऐसे कवि रीतिमुक्त कहलाए)।
  3. श्रृंगार रस की प्रधानता, परन्तु वीर रस का भी ओजस्वी वर्णन।
  4.  मुख्यत: मुक्तक शैली एवं ब्रज भाषा का प्रयोग।
  5. भाव पक्ष की अपेक्षा कला पक्ष पर बल।

प्रश्न 72:
रीतिबद्ध काव्य के अभिप्राय को स्पष्ट करते हुए इस प्रवृत्ति की किन्हीं दो रचनाओं और उसके रचयिताओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
जिस काव्य में काव्य-तत्त्वों का लक्षण देकर उदाहरण रूप में काव्य-रचनो प्रस्तुत की जाती है,
उसे रीतिबद्ध काव्य’ कहते हैं। इस प्रवृत्ति की रचनाओं और उनके रचयिताओं के नाम हैं

  1. रस-विलास – आचार्य चिन्तामणि तथा
  2. कविप्रिया-आचार्य केशवदास।

प्रश्न 73:
हिन्दी में रीतिबद्ध और रीतिमुक्त कविता का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
या
रीतिकाव्य कितनी धाराओं में विभाजित है? किन्हीं दो काव्यधाराओं के एक-एक प्रमुख कवि का नाम लिखिए।
या
रीतिकालीन साहित्य को किन दो वर्गों में विभाजित किया गया है?
उत्तर:
रीतिकाव्य मुख्य रूप से दो धाराओं – रीतिबद्ध और रीतिमुक्त – में विभाजित है। एक अन्य गौण विभाजन रीतिसिद्ध भी है। रीतिबद्ध काव्य के अन्तर्गत वे ग्रन्थ आते हैं, जिनमें काव्य-तत्त्वों के लक्षण देकर उदाहरण के रूप में काव्य – रचनाएँ की जाती हैं, जब कि रीतिमुक्त काव्यधारा की रचनाओं में रीति-परम्परा के साहित्यिक बन्धनों एवं रूढ़ियों से मुक्त; स्वच्छन्द रचनाएँ। रीतिमुक्त काव्यधारा के कवियों में घनानन्द का और रीतिबद्ध काव्यकारों में आचार्य चिन्तामणि को प्रमुख स्थान है।

प्रश्न 74:
रीतिकाल के चार प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
या
रीतिकाल के दो महत्त्वपूर्ण कवियों के नाम बताइए।
उत्तर:
केशवदास, बिहारीलाल, देव एवं घनानन्द।

प्रश्न 75:
रीतिकाल में वीर रस का प्रमुख कवि कौन था? उसकी एक रचना का नाम लिखिए।
या
रीतिकाल के किस कवि ने वीर रस की रचना लिखी है? यी भूषण किस रस के कवि थे?
उत्तर:
रीतिकाल में वीर रस में रचना करने वाले प्रमुख कवि ‘भूषण’ थे। उनकी प्रमुख रचना का नाम है-‘शिवराज भूषण’।।

प्रश्न 76:
केशवदास की दो प्रमुख काव्य-रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  रामचन्द्रिका तथा
  2.  कविप्रिया।।

प्रश्न 77:
रीतिकाल की दो काव्यकृतियों और उनके रचनाकारों के नाम लिखिए।
या
रीतिकाल के किन्हीं दो कवियों के नाम लिखिए और उनकी एक-एक रचना भी लिखिए।
या
रीतिकाल के एक प्रमुख कवि तथा उसकी रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  सतसई-बिहारी तथा
  2.  रामचन्द्रिका केशवदास।

प्रश्न 78:
रीतिकाल के चार रीतिबद्ध कवियों के नाम लिखिए।
या
रीतिकाल की रीतिबद्ध काव्यधारा के किन्हीं दो कवियों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. चिन्तामणि,
  2. मतिराम,
  3. भूषण तथा,
  4. देवा ।

प्रश्न 79:
रीतिमुक्त काव्यधारा के प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  घनानन्द,
  2.  ठाकुर,
  3.  बोधा,
  4.  आलम।

प्रश्न 80:
रीतिमुक्त काव्यधारा की किन्हीं दो प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
रीतिमुक्तरीतिमुक्त काव्य की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1.  रीतिमुक्त काव्यों में हृदय की शुचिता और पावनता की ही अभिव्यक्ति हुई है।
  2.  रीतिमुक्त काव्यों में भावपक्ष की प्रधानता है, अलंकारादि की बाह्य अतिरंजक प्रवृत्ति नहीं हुई है।

प्रश्न 81:
रीतिकाव्य की प्रमुख प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1.  आश्रयदाताओं की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा।
  2.  श्रृंगार और वीर रस की प्रधानता।
  3. रीतिकाल की कविता का प्रमुख स्वर श्रृंगार का था।
  4.  रीतिकाल के कवियों ने नारी को भोग्या रूप में प्रस्तुत किया।

प्रश्न 82:
रीतिकाल के किन्हीं दो आचार्य कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. आचार्य केशव-रामचन्द्रिका तथा
  2. आचार्य चिन्तामणि-रस-विलास।।

प्रश्न 83:
रीतिकाल में काव्य-रचना जिन छन्दों में की गयी है उनमें से दो प्रमुख छन्दों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. कवित्त तथा
  2.  सवैया।।

प्रश्न 84:
बिहारी तथा घनानन्द्र ‘रीतिकाल की किस धारा के कवि हैं?
उत्तर:
बिहारी रीतिबद्ध काव्यधारा के तथा घनानन्द रीतिमुक्त काव्यधारा के कवि हैं।

प्रश्न 85:
निम्नलिखित कृतियों में कौन-सी दो रीतिकाल की रचनाएँ नहीं हैं
(क) उद्धवशतक,
(ख) शिवराजभूषण,
(ग) ललित ललाम,
(घ) गीतिका।
उत्तर:
उद्धवशतक तथा गीतिको।

प्रश्न 86:
‘कठिन काव्य का प्रेत’ किस कवि को कहा जाता है? उस कवि द्वारा रचित महाकाव्यात्मक कृति का नाम लिखिए
उत्तर:
कठिन काव्य का प्रेत ‘रीतिकालीन कवि आचार्य केशवदास को कहा जाता है। इनकी महाकाव्यात्मक कृति का नाम ‘रामचन्द्रिका’ है।

प्रश्न 87:
“सिवा को सराह, के सराह छत्रसाल को” उक्ति किसने कही थी?
उत्तर:
प्रश्न में उल्लिखित उक्ति महाकवि भूषण ने कही थी।

प्रश्न 88:
किस काल को गद्यकाल की संज्ञा दी गयी हैं।
उत्तर:
कविता के आधुनिककाल को गद्यकाल की संज्ञा दी गयी है।

आधुनिककाल

प्रश्न 89:
कविता के आधुनिककाल के प्रथम युग का नाम लिखिए तथा उस युग के एक प्रमुख कवि (प्रवर्तक कवि) का नाम बताइट।
उत्तर:
कविता के आधुनिककाल का प्रथम युग – भारतेन्दु युग। प्रमुख कवि – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र।

प्रश्न 90:
‘नवजागरण का अग्रदूत’ किस कवि को कहा जाता है? उसके द्वारा सम्पादित किसी एक पत्रिका का नाम लिखिए।
उत्तर:
नवजागरण का अग्रदूत आधुनिक युग के प्रवर्तक कवि-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को कहा जाता है। इनके द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘कवि वचन सुधा’ है।

प्रश्न 91:
पुनर्जागरण काल (भारतेन्दु युग) का समय लिखिए।
उत्तर:
सन् 1857 से 1900 ई० तक।

प्रश्न 92:
हिन्दी काव्य में आधुनिक युग कब से माना जाता है?
उत्तर:
हिन्दी काव्य में आधुनिक युग सन् 1843 से माना जाता है।

प्रश्न 93:
भारतेन्दु युग के दो कवियों के नाम उनकी एक-एक रचना सहित लिखिए।
या
पुनर्जागरण काल की एक काव्यकृति का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1.  बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ – प्रेमघन सर्वस्व तथा
  2.  प्रतापनारायण मिश्र – प्रताप लहरी।

प्रश्न 94:
निम्नलिखित में से किन्हीं दो की एक-एक प्रसिद्ध काव्य-रचना का नाम लिखिए
(1) महादेवी वर्मा,
(2) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’,
(3) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र,
(4) केशवदास।
उत्तर:

  1. महादेवी वर्मा – ‘दीपशिखा’।
  2. सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’ – ‘परिमल’।
  3.  भारतेन्दु हरिश्चन्द्र  –  ‘प्रेम-फुलवारी’।
  4.  केशवदास  –  ‘रामचन्द्रिका’।

प्रश्न 95:
द्विवेदी युग के दो प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
या
आधुनिककाल के दो महाकाव्यों और उनके रचयिताओं के नाम बताइए।
या
द्विवेदी युग के किसी एक महाकाव्य का नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) साकेत – मैथिलीशरण गुप्त।
(2) प्रियप्रवास  – अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’।

प्रश्न 96:
द्विवेदीयुगीन कविता की दो प्रमुख विशेषताओं (प्रवृत्तियों) का वर्णन कीजिए।
या
द्विवेदी युग के काव्य की दो विशेषताएँ (प्रवृत्तियाँ) लिखिए।
उत्तर:
द्विवेदी युग के काव्य की दो विशेषताएँ (प्रवृत्तियाँ) निम्नलिखित हैं

  1.  काव्य में ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली की प्रतिष्ठा हुई।
  2. स्वदेश प्रेम तथा स्वदेशी गौरव पर काव्य-रचनाएँ की गयीं।

प्रश्न 97:
कविता के आधुनिकंकाल के द्वितीय युग का नाम तथा उस युग के एक प्रमुख कवि तथा एक रचनों का नाम लिखिए।
उत्तर:
आधुनिककाल के द्वितीय’ युग का नाम ‘द्विवेदी युग’ है। कवि-मैथिलीशरण गुप्त; रचना–साकेत।

प्रश्न 98:
द्विवेदी युग की समयसीमा बताइए।
उत्तर:
द्विवेदी युग की समय-सीमा 1900 ई० से 1918 ई० तक है।।

प्रश्न 99:
छायावादी काव्य की प्रमुख विशेषताओं (प्रवृत्तियों) का उल्लेख करते हुए किन्हीं दो छायावादी कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  मूलतः सौन्दर्य और प्रेम का काव्य,
  2.  प्रकृति का मानवीकरण,
  3.  अज्ञात के प्रति जिज्ञासा (रहस्यवादी प्रवृत्ति),
  4.  नारी की महिमा का वर्णन,
  5. राष्ट्रीयता की भावना,
  6.  वैराग्य, वेदना और पलायनवादिता,
  7. प्रतीकात्मकता और लाक्षणिकता,
  8.  चित्रात्मकता,
  9.  प्रगतिमयता तथा
  10.  खड़ी बोली का अतिशय परिमार्जन।।

दो छायावादी कवियों के नाम – (1) जयशंकर प्रसाद तथा (2) सुमित्रानन्दन पन्त।

प्रश्न 100:
छायावादी कविता के हास के कारण लिखिए।
उत्तर:
विदेशी शासन के दमन के कारण जनसाधारण की निरन्तर बढ़ती पीड़ा छायावाद के ह्रासं का मुख्य कारण बनी। इस दमन को देखकर कविगण कल्पना लोक से उबरकर यथार्थ के कठोर धरातल पर आ गये। संक्षेप में, छायावादी कविता के ह्रास के कारण इस प्रकार हैं

  1. (1) छायावादी कविता में सूक्ष्म और वायवीय कल्पनाओं की अधिकता थी।
  2. (2) स्थूल जगत् की कठोर वास्तविकता से उसका कोई सम्बन्ध नहीं रह गया था।
  3. (3) समाज में पूँजी के विरुद्ध आवाज उठ रही थी, इसलिए अतिशय कल्पना को छोड़ रोटी, कपड़ा और मकान कविता का विषय बनने लगे थे।

प्रश्न 101:
छायावाद काल की समय-सीमा बताइए।
उत्तर:
सन् 1918 से 1938 ई० तक का समय, छायावाद के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 102:
छायावाद के चार कवि और उनकी दो-दो रचनाएँ लिखिए।
या
छायावाद युग के दो प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
या
छायावाद के दो कवियों के नाम बताइए और उनकी एक-एक रचना का उल्लेख कीजिए।
या
जयशंकर प्रसाद की दो काव्य-कृतियों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1.  जयशंकर प्रसाद कामायनी; आँसू,
  2. सुमित्रानन्दन पन्ते – पल्लव; ग्राम्या,
  3. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ – परिमल; गीतिका,
  4.  महादेवी वर्मा – दीपशिखा; सान्ध्य – गीत।

प्रश्न 103:
गुसाईंदत्त को कवि के रूप में किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
गुसाईंदत्त को कवि के रूप में “सुमित्रानन्दन पन्त” के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 104:
दो रहस्यवादी कवि और उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. सुमित्रानन्दन पन्त कृत ‘पल्लव’ तथा
  2. महादेवी वर्मा कृत ‘दीपशिखा’।

प्रश्न 105:
निम्नलिखित कवियों की एक-एक प्रमुख रचना का नाम लिखिए-जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’, सुमित्रानन्दन पन्त।
उत्तर:

  1. जगन्नाथदास रत्नाकर’, रचना – गंगावतरण।
  2. सुमित्रानन्दन पन्त, रचना – चिदम्बरा।

प्रश्न 106:
निम्नलिखित कवियों में से किन्हीं दो द्वारा रचित एक-एक प्रमुख काव्यग्रन्थ का नाम लिखिए –
(1) सुमित्रानन्दन पन्त,
(2) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’,
(3) अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,
(4) रामधारी सिंह “दिनकर।
उत्तर:

  1.  चिदम्बरा,
  2.  कितनी नावों में कितनी बार,
  3.  प्रियप्रवास तथा
  4.  कुरुक्षेत्र।

प्रश्न 107:
आधुनिक युग के किसी एक महाकाव्य और उसके रचनाकार का नाम लिखिए।
या
‘कामायनी’ महाकाव्य के रचयिता का नाम लिखिए।
उत्तर:
महाकाव्य-कामायनी; रचनाकार – जयशंकर प्रसाद।

प्रश्न 108:
प्रगतिवादी कविता की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
प्रगतिवादी काव्य की दो प्रमूख प्रवृत्तियों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. साम्यवाद का काव्यात्मक रूपान्तर (अर्थात् मार्क्स और रूस को गुणगान, पूँजीवाद का विरोध एवं कृषक-मज़दूर-राज्य की स्थापना का स्वप्न),
  2. यथार्थवाद,
  3.  परम्पराओं और रूढ़ियों का विरोध,
  4.  धर्म और ईश्वर में अविश्वास,
  5.  श्रम की महत्ता की स्थापना,
  6. शोषितों के प्रति सहानुभूति,
  7.  वेदना और निराशा,
  8.  नारी के प्रति आधुनिक यथार्थवादी दृष्टिकोण,
  9. जन-भाषा का आग्रह तथा
  10.  छन्दों और अलंकारों का बहिष्कार।

प्रश्न 109:
प्रगतिवाद के प्रमुख कवियों और उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
नागार्जुन (युगधारा), केदारनाथ अग्रवाल (युग की गंगा), शिवमंगल सिंह ‘सुमन (प्रलय-सृजन), त्रिलोचन शास्त्री (धरती)।

प्रश्न 110:
‘प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन की अध्यक्षता मुंशी प्रेमचन्द ने कहाँ और कब की थी?
उत्तर:
सन् 1936 ईसवी में लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन’ के समय प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई। मुंशी प्रेमचन्द ने इस संस्था के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता की थी।

प्रश्न 111:
प्रगतिवादी युग के दो कवियों तथा उनकी एक-एक रचना का नाम लिखिए।
या
छायावादोत्तर काल के किसी एक कवि तथा उनकी रचना का नाम-निर्देश कीजिए।
उत्तर:

  1.  रामधारी सिंह ‘दिनकर’-उर्वशी तथा
  2. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’–विन्ध्य हिमालय से।

प्रश्न 112:
छायावादोत्तर काल की कविता का काल-विभाजन लिखिए।
उत्तर:

  1. प्रगतिवाद, प्रयोगवाद (1938 – 1959 ई०);
  2.  नयी कविता का काल (1959 ई० से वर्तमान तक)।

प्रश्न 113:
प्रयोगवादी कविता की दो मुख्य विशेषताएँ (प्रवृत्तियाँ) बताइए।
या।
छायावादोत्तर काल की काव्य-प्रवृत्तियाँ लिखिए।
उत्तर:

  1. अति वैयक्तिकता,
  2. निराशा, कुण्ठा और घुटन,
  3.  फ्रायड के प्रभाववश नग्न यौन-चित्रण,
  4. अतियथार्थवाद (नग्न यथार्थ),
  5.  पराजय, पलायन और वेदना,
  6. बौद्धिकता,
  7.  क्षण का महत्त्व,
  8.  अवचेतन के यथावत् प्रकाशन का आग्रह,
  9. अनगढ़ भाषा का प्रयोग एवं
  10. नया शिल्पविधान (नये उपमानों, बिम्बों, प्रतीकों का प्रयोग तथा छन्दहीनता का आग्रह)।

प्रश्न 114:
प्रयोगवाद से आप क्या समझते हैं? ‘नयी कविता’ क्या है?
उत्तर:
सन् 1943 में प्रकाशित ‘तारसप्तक’ की कविताओं में नये बिम्ब-विधानों, नये अलंकारों और नयी भावाभिव्यक्ति को अपनाया गया। काव्य की इसी नयी विधा को ‘प्रयोगवादी काव्य’ के नाम से अभिहित किया गया। नयी कविता इस प्रयोगवादी कविता का ही विकसित रूप है।

प्रश्न 115:
प्रयोगवादी काव्यधारा का नेतृत्व करने वाले कवि का नामोल्लेख कीजिए और उनके एक प्रमुख प्रकाशन का नाम लिखिए।
या
अज्ञेय का पूरा नाम लिखिए। उन्हें किस काव्य-कृति पर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था?
उत्तर:
प्रयोगवादी काव्यधारा का नेतृत्व करने वाले कवि सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ हैं। इन्होंने ‘तारसप्तक’ नामक एक काव्य-संकलन सन् 1943 ई० में प्रकाशित किया। ‘कितनी नावों में कितनी बार इनकी एक प्रमुख रचना है, जिस पर इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार की प्राप्ति हुई है।

प्रश्न 116:
तारसप्तक के कवियों के नाम लिखिए।
या
हिन्दी में प्रयोगवादी काव्यधारा के किन्हीं चार कवियों के नाम लिखिए।
या
किन्हीं दो प्रयोगवादी कवियों के नाम लिखिए।
या
सप्तक परम्परा के दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, गजानन माधव मुक्तिबोध’, गिरिजाकुमार माथुर, प्रभाकर माचवे, नेमिचन्द्र जैन, भारत भूषण और रामविलास शर्मा। सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने। इन सात कवियों की रचनाएँ ‘तारसप्तक’ के नाम से सन् 1943 ई० में प्रकाशित कीं।

प्रश्न 117:
‘तारसप्तक’ का प्रकाशन किसने और किस समय किया? इसके सम्पादक कौन थे?
या
‘तारसप्तक का सम्पादन प्रथम बार कब और किसने किया?
उत्तर:
श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने सन् 1943 ई० में अपनी पीढ़ी के अन्य छह कवियों के सहयोग से ‘तारसप्तक’ का प्रकाशन किया। इसके सम्पादक श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ स्वयं थे।

प्रश्न 118:
‘तारसप्तक’ की कविताएँ किस काव्यधारा से सम्बन्धित हैं?
उत्तर:
‘तारसप्तक’ की कविताएँ प्रयोगवादी काव्यधारा से सम्बन्धित हैं।

प्रश्न 119:
दूसरा सप्तक में संकलित कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
दूसरा सप्तक सन् 1951 ई० में प्रकाशित हुआ। इसमें संकलित कवियों के नाम हैं-भवानी प्रसाद मिश्र, शकुन्त माथुर, हरिनारायण व्यास, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय तथा धर्मवीर भारती।

प्रश्न 120:
तीसरा सप्तक कब प्रकाशित हुआ? संकलित कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
तीसरा सप्तक सन् 1959 ई० में प्रकाशित हुआ। इसमें संकलित कवियों के नाम हैंप्रयागनारायण त्रिपाठी, कीर्ति चौधरी, मदन वात्स्यायन, केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, विजय देवनारायण साही तथा सर्वेश्वरदयाल सक्सेना।

प्रश्न 121:
चौथा सप्तक कब प्रकाशित हुआ? इसमें संकलित कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
सन् 1979 में चौथा सप्तक प्रकाशित हुआ। इसमें संकलित कवियों के नाम हैं-अवधेश कुमार, राजकुमार कुम्भज, स्वदेश भारती, नन्दकिशोर आचार्य, सुमन राजे, श्रीराम वर्मा तथा राजेन्द्र किशोर।

प्रश्न 122:
गजानन माधव मुक्तिबोध’ किस सप्तक में संकलित हैं?
उत्तर:
गजानन माधव मुक्तिबोध’ सन् 1943 में प्रकाशित ‘तारसप्तक’ में संकलित हैं।

प्रश्न 123:
प्रयोगवादी काव्य की पाँच रचनाओं और रचयिताओं के नाम लिखिए।
या
प्रयोगवादी काव्यधारा के किन्हीं दो कवियों की एक-एक रचना का उल्लेख कीजिए।
या
गजानन माधव मुक्तिबोध की किसी एक काव्य-कृति का नाम लिखिए।
उत्तर:
भग्नदूत (सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय’), चाँद का मुंह टेढा (गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’); ओ अप्रस्तुत मन (भारतभूषण अग्रवाल), धूप के धान (गिरिजाकुमार माथुर), गीतफरोश (भवानीप्रसाद मिश्र)।

प्रश्न 124:
आधुनिक युग की कविता की चार मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1.  यथार्थ का उन्मुक्त चित्रण,
  2. नारी-मुक्ति का आह्वान,
  3. लघुता के प्रति सजगता और
  4. गेय तत्त्व की अवहेलना।।

प्रश्न 125:
आधुनिक कविता के प्रमुख वादों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, हालावाद, स्वच्छन्दतावाद आदि आधुनिक कविता के प्रमुख वाद हैं।

प्रश्न 126:
नयी कविता से आप क्या समझते हैं?
या
‘नयी कविता’ पत्रिका के सम्पादक का नाम लिखिए तथा इस पत्रिका का सर्वप्रथम प्रकाशन वर्ष लिखिए।
उत्तर:
नयी कविता का आरम्भ सन् 1954 ई० में जगदीश गुप्त और डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी के सम्पादन में नयी कविता के प्रकाशन से हुआ। यह कविता किसी वाद से बँधकर नहीं चलती।

प्रश्न 127:
नयी कविता को अकविता क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
नयी कविता परम्परागत कविता के स्वरूप से नितान्त भिन्न हो गयी है। यह किसी वाद या दर्शन से जुड़ी नहीं है, इसलिए इसे अकविता कहा जाता है।

प्रश्न 128:
नयी कविता की किन्हीं दो प्रमुख रचनाओं का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1.  युग की गंगा-केदारनाथ अग्रवाल तथा
  2. बूंद एक टपकी-भवानीप्रसाद मिश्र।

प्रश्न 129:
‘नयी कविता’ से सम्बन्धित किन्हीं दो पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. कल्पना’ तथा
  2. ज्ञानोदय’।

प्रश्न 130:
नयी कविता के पाँच प्रमुख कवियों के नाम बताइए।
उत्तर:
जगदीश गुप्त, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, लक्ष्मीकान्त वर्मा तथा सर्वेश्वरदयाल सक्सेना।

प्रश्न 131:
नयी कविता की विंडोषताओं (प्रवृत्तियों) का उल्लेख करते हुए किन्हीं दो प्रतिनिधि कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर;
नयी कविता की प्रमुख विशेषताएँ हैं

  1. यथार्थता,
  2. वर्जनाओं से मुक्ति (अर्थात् सामाजिक मर्यादाओं एवं बन्धनों का तिरस्कार करके नि:संकोच अश्लील चित्रण),
  3.  हृदयपक्ष की अपेक्षा बुद्धिपक्ष की प्रधानता,
  4. निराशा तथा अवसाद (खिन्नता), की प्रबलता,
  5. खिचड़ी भाषा, जिसमें हिन्दी की विभिन्न बोलियों, प्रादेशिक भाषाओं एवं अंग्रेजी आदि के शब्दों का घालमेल,
  6.  प्रतीकों, बिम्बों एवं मुक्त छन्द पर बल। नयी कविता के दो प्रतिनिधि कवि हैं – जगदीश गुप्त और सर्वेश्वरदयाल सक्सेना।

प्रश्न 132:
नवगीत’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
नवगीत’ छायावादी एवं प्रगतिवादी दोनों ही काव्यों की कई विशेषताओं से युक्त ऐसा काव्य है, जिसमें आधारभूत चेतना, जीवन-दृष्टि, भाव-भूमि एवं अभिव्यंजना शैली की व्यापकता, सूक्ष्मता, विविधता, यथार्थता एवं लौकिकता का एकान्तिक संयोग हैं।

प्रश्न 133:
‘नवगीत’ की किन्हीं दो आधारभूत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
नवगीत की दो आधारभूत विशेषताएँ हैं

  1.  सर्वत्र भावानुकूल भाषा का प्रयोग तथा
  2.  स्वस्थ बिम्ब एवं प्रतीक विधान।

प्रश्न 134:
‘नवगीत’ के दो महत्त्वपूर्ण गीतकारों और उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
नवगीत के दो महत्त्वपूर्ण गीतकार और उनकी रचनाएँ हैं

  1.  शम्भूनाथ सिंह (‘उदयाचल’, ‘दिवालोक’, ‘समय की शिला पर’, ‘जहाँ दर्द नील हैं’ आदि।) तथा
  2.  वीरेन्द्र मिश्र (‘गीतम’, ‘लेखनी बेला’, ‘अविराम चल मधुवन्ति’ आदि।)

प्रश्न 135:
नवगीतधारा के प्रमुख कवियों के नाम बताइए।
उत्तर:
रमानाथ अवस्थी, डॉ० शम्भूनाथ सिंह, श्रीपाल सिंह ‘क्षेम’, गुलाब खण्डेलवाल, सुमित्राकुमारी सिन्हा, शान्ति मेहरोत्रा, हंसकुमार तिवारी, सोम ठाकुर, गोपालदास नीरज’, वीरेन्द्र मिश्र तथा डॉ० कुँवर बेचैन।

प्रश्न 136:
साठोत्तरी कविता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
साठोत्तरी कविता मोह-भंग, आक्रोश, अस्वीकार, तनाव और विद्रोह की कविता है। इसका मुहावरा नया है, शैली बेपर्द है और इसमें जिजीविषा का गहरा रंग है।

प्रश्न 137:
साठोत्तरी कविता की किन्हीं दो आधारभूत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
साठोत्तरी कविता की दो आधारभूत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1.  अन्याय के विरुद्ध और शासन द्वारा कही जाने वाली चिकनी-चुपड़ी बातों की आक्रोशयुक्त स्वर में अभिव्यक्ति तथा
  2. व्यक्ति और उसके परिवेश की हर परत की बेपर्द अभिव्यक्ति।

प्रश्न 138:
साठोत्तरी कविता के किन्हीं दो प्रमुख कवियों और उनकी रचनाओं के नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
साठ्येत्तरी कविता के दो महत्त्वपूर्ण कवि और उनकी रचनाएँ हैं

  1. धूमिल (‘संसद से सड़क तक’, ‘कल सुनना मुझे’, ‘सुदामा पाण्डे का प्रजातन्त्र आदि) तथा
  2.  रामदरश मिश्र (‘पथ के गीत’, बैरंग बेनाम चिट्ठियाँ’, ‘पक गयी है धूप’, ‘कन्धे पर सूरज’ आदि)।

प्रश्न 139:
‘नया दोहा’ के प्रमुख संकलनों के नाम लिखिए।
उत्तर:
नया दोहा’ के प्रमुख संकलनों के नाम हैं

  1.  अमलतास की छाँव (पाल भसीन),
  2. आँखों खिले पलाश (पं० देवेन्द्र शर्मा इन्द्र’),
  3.  बटुक सतसई (विश्वप्रकाश दीक्षित ‘बटुक’),
  4. कालाय तस्मै नमः (भारतेन्दु मिश्र) आदि।

प्रश्न 140:
वर्तमान युग के पाँच जीवित कवियों के नाम लिखिए।
या
वर्तमान युग के किन्हीं दो जीवित कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
वर्तमान युग के पाँच जीवित कवियों के नाम हैं-पं० देवेन्द्र शर्मा इन्द्र’, पाल भसीन, विश्वप्रकाश दीक्षित ‘बटुक’, भारतेन्दु मिश्र और दिवाकर आदित्य शर्मा।।

प्रश्न 141:
रीतिकाल के किसी एक भक्त कवि का नामोल्लेख करते हुए उसके द्वारा प्रयुक्त भाषा का नाम लिखिए।
उत्तर:
बिहारी-परिमार्जितः ब्रजभाषा।

प्रश्न 142:
हिन्दी साहित्य के आधुनिक काव्य की दो प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. यथार्थपरक तथा मानक्तावादी दृष्टि तथा
  2.  जीवन के नए प्रतिमानों की स्थापना।

प्रश्न 143:
अवधी भाषा के किन्हीं दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
तुलसीदास तथा मलिक मुहम्मद जायसी।

प्रश्न 144:
‘पद्मावत’ में जायसी द्वारा प्रयुक्त भाषा और शैली का नामोल्लेख कीजिए।
या
जायसी का ‘पद्मावत’ किस भाषा में लिखा गया है?
उत्तर:
भाषा-अवधी, शैली – प्रबन्ध शैली।

प्रश्न 145:
दो प्रमुख प्रयोगवादी कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।
  2.  गजानन माधव मुक्तिबोध’।

प्रश्न 146:
छायावादोत्तर काल के किसी एक कवि तथा उनकी एक रचना का नाम निर्देश कीजिए।
उत्तर:
सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’ -गीतिका।

प्रश्न 147:
‘कवितावर्धिनी सभा’ के संस्थापक तथा उसके मुखपत्र का नाम लिखिए।
उत्तर:
कवितावर्धिनी’ सभा के संस्थापक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र थे। इस सभा के मुखपत्र का नाम ‘कविवचन सुधा’ था।

प्रश्न 148:
जनवाद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जनवाद कला, साहित्य और जीवन के प्रति विशिष्ट दृष्टिकोण है, जो जनसामान्य को महत्त्व देता है। जनवाद मोटे तौर पर मार्क्सवाद से प्रेरित साहित्य है जिसका मूलाधार भौतिक दर्शन पर टिका हुआ है। कार्ल मार्स ने जो समाज और उसके विविध रूपों और विचारों की ऐतिहासिक व्याख्याएँ कीं, वे कला और साहित्य पर भी लागू होती हैं। ऐसे साहित्य की जो मार्क्सवादी विवेचना हुई, उसी से जनवाद का प्रादुर्भाव हुआ।

प्रश्न 149:
जनवादी कविता से आप क्या समझते हैं? इसकी आधारभूत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जनवादी कविता में मानव के सामूहिक भावों की अभिव्यक्ति होती है। व्यक्ति-वैचित्र्य के लिए उसमें स्थान नहीं होता। रचनाकार में शक्ति जनता से आती है, जनता के साथ उसको सम्बन्ध जितना घनिष्ठ होता है, उसमें उतनी ही अधिक रचना-शक्ति आती है और उसकी रचना में उतना ही अधिक सौन्दर्य बढ़ता है। जिस कवि की दृष्टि मात्र अन्तर्मुखी न हो, जिस कवि की विषय-वस्तु में सिर्फ व्यक्ति-निष्ठ भावनाओं का चित्रण न हो। और जिस कवि के काव्य को सम्पर्क जनता के व्यापक जीवन से हो वही कवि जनवादी कवि होता है।

प्रश्न 150:
प्रमुख जनवादी कवियों और उनकी कतिपय रचनाओं का नामोल्लेख कीजिए।
या
जनवादी कविता की वृहत्-त्रयी के लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
जनवादी कविता के लेखकों की वृहतत्रयी नहीं है। वृहत्-त्रयी छायावादी रचनाकारों की मानी जाती है। प्रमुख जनवादी कवि और उनकी कतिपय रचनाएँ निम्नलिखित हैं

  1. नागार्जुन – ‘युगधारा’, ‘सतरंगे पंखों वाली’, ‘प्यासी पथराई आँखें’, ‘भस्मांकुर’, ‘खिचड़ी विप्लव देखा हमने’, ‘पुरानी जूतियों का कोरस’ आदि।
  2.  केदारनाथ अग्रवाल –  ‘नींद के बादल’, ‘युग की गंगा’, ‘फूल नहीं रंग बोलते हैं’, ‘गुल मेंहदी’, ‘कहै केदार खरी-खरी’, ‘आत्म-गंध’ आदि।
  3. धूमिल –  ‘संसद से सड़क तक’, ‘कल सुनना मुझे’, ‘मोचीराम’ आदि।
  4. त्रिलोचन – ‘मिट्टी की बारात’, ‘ताप के ताए हुए दिन’, उस जनपद का कवि हूँ’, ‘अरधान’, ‘धरती’, ‘तुम्हें सौपता हूँ’, ‘अनकहनी भी कुछ कहनी है’ आदि। इनके अतिरिक्त आलोक धन्वा, विनोद कुमार शुक्ल, कुमार विकल आदि भी जनवादी कवि हैं।

प्रश्न 151:
जायसी की दो काव्यकृतियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. पद्मावत तथा
  2. आखरी कलाम।

प्रश्न 152:
‘रसवन्ती के रचनाकार को नाम लिखिए।
उत्तर:
रामधारीसिंह ‘दिनकर’।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 3 सदाचारोपदेशः

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Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name सदाचारोपदेशः
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 3 सदाचारोपदेशः

श्लोकों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) सं गच्छध्वं ………………… उपासते।।

[सं गच्छध्वम्-मिलकर चलो। संवदध्वम् = मिलकर बोलो। वः मनांसि-अपने मनों को। सं जानताममिलकर जानो। पूर्वे सञ्जनानां देवाः – प्राचीनकाल में एक मत में रहने वाले देवगण| भागम् = (अपने) कर्तव्य कर्म के अंशों को। उपासते = करते थे।]

सन्दर्भ – प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘सदाचारोपदेशः’ नामक पाठ से अवतरित है।
[ विशेष – इस पाठ के समस्त श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

अनुवाद – मिलकर चलो (अर्थात् मिलकर कार्य करो)। मिलकर बोलो (अर्थात् काम करने से पहले परस्पर परामर्श करो) तुम सब लोग अपने मनों को मिलकर जानो (अर्थात् आपस में विचारों की एकता स्थापित करो)। जिस प्रकार प्राचीनकाल में देवगण आपस में मिल-जुलकर तथा एक स्थान पर बैठकर (अर्थात् परस्पर परामर्शपूर्वक) अपने-अपने कर्तव्ये कर्म के अंश को करते थे (वैसे ही मिल-जुलकर तुम लोग भी करो)।

(2) कुर्वन्नेवेह ……………………. लिप्यते नरे।।

[कुर्वन्नेवेह (कुर्वन् + एद + इह) – (शास्त्रविहित) कर्म करते हुए। एव = ही। इह = इस संसार में। जिजीविषेच्युतम (जिजीविषेत +शतम्) = सौ (वर्ष तक) जीने की इच्छा करे। समाः = वर्ष! एवम् = इस प्रकार। नान्यथेतोऽस्ति (न +अन्यथा +इतः +अस्ति) = इससे (इतः) भिन्न अन्य कोई उपाय (अन्यथा) नहीं है (न अस्ति)]

अनुवाद – (मनुष्य को) इस संसार में (शास्त्रानुकूल) त्यागपूर्वक कर्म करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए। इस प्रकार (धर्मानुसार त्यागपूर्वक कर्म करने से मनुष्य कमों में लिप्त नहीं होता। इसे छोड़ (कर्म-बन्धन से बचने का) अन्य कोई (उपाय) नहीं है।

(3) मधुमन्मे …………………….. मधुसदृशः।।

[ में- मेरा। निष्क्रमणम् = निकलना, जाना (निकटता स्थापित करना)| मधुमत् = माधुर्ययुक्त। परायणं = दूर हटना (किसी से सम्बन्ध तोड़ना)| वाचा = वाणी से। मधुसदृशः = मधुरूप (या सर्वत्र मधु को ही देखने वाला)| भूयासम् = हो जाऊँ।]

अनुवाद – मेरा (किसी व्यक्ति के) निकट जाना (मित्रता स्थापित करना) माधुर्ययुक्त हो अर्थात् किसी के साथ मित्रता आदि का परिणाम मधुर हो। मेरा (किसी से) दूर हटना (सम्बन्ध तोड़ना) भी माधुर्यपूर्ण हो। मैं मीठी बोली बोलू और मधुरूप (सर्वत्र मधु को ही देखने वाला) हो जाऊँ। (आशय यह है कि मेरे कारण कहीं कोई कटुता उत्पन्न न होकर सर्वत्र मधुरता का ही संचार हो और मेरे सम्बन्ध मधुर हों।)

(4) आचाराल्लभते ………………………….. चेह च।।

[ आचारात -सदाचार से। लभते = प्राप्त करता है। ह्यायुः (हि +आयुः) = आयु को। श्रियम् = धन को। प्रेत्य = मरकर परलोक में। चेह (च +इह) – और इस लोक में।]

अनुवाद – सदाचार से मनुष्य (लम्बी) आयु प्राप्त करता है, सदाचार से लक्ष्मी (धन) प्राप्त करता है, सदाचार से इसे लोक और परलोक में कीर्ति (यश) प्राप्त करता है।

(5) ये नास्तिका …………… गतायुषः।।

[नास्तिकाः = ईश्वर को न मानने वाले (मूलतः नास्तिक’ का अर्थ है ‘वेद को न मानने वाला’-नास्तिको वेदनिन्दकः)| निष्क्रियाः = आलसी। गुरुशास्त्रातिलङ्घिनः (गुरुशास्त्र +अतिलङ्घिनः)= गुरु और शास्त्रों (की आज्ञा) का उल्लंघन करने वाले। गतायुषः (गत +आयुषः) = क्षीण आयु वाले। ]

अनुवाद – जो मनुष्य ईश्वर को न मानने वाले, आलसी, गुरु और शास्त्रों के वचनों का उल्लंघन करने वाले, धर्मविहीन एवं दुराचारी होते हैं, उनकी आयु कम हो जाती है और वे मरे हुए के समान होते हैं।

(6) ब्राह्म मुहूर्ते ……………………… कृताञ्जलिः ||

[बुध्येत = जाग जाना चाहिए। धर्मार्थी (धर्म + अथौ) च = धर्म और धन को। अनुचिन्तयेत – चिन्तन करना चाहिए। आचम्य = आचमन (कुल्ला) करके कृताञ्जलिः = हाथ जोड़कर।]

अनुवाद – (मनुष्य को) ब्राह्ममुहूर्त में (सूर्योदय के समय के एक घण्टे पूर्व) जाग जाना चाहिए, धर्म (कर्तव्य) और धन (आय के साधनों) का चिन्तन करना चाहिए। (फिर शय्या से) उठकर तथा आचमन (कुल्ला) करके, हाथ जोड़कर पूर्व सन्ध्या (प्रातः सन्ध्या) के लिए बैठ जाना चाहिए।

(7) अक्रोधनः …………………………. वर्षाणि जीवति।।

[अक्रोधनः = क्रोध न करने वाला भूतानामविहिंसकः (भूतानाम +अविहिंसकः) = जीवों की हिंसा न करने वाला| अनसूयुः = दूसरों से असूया (ईष्र्या, द्वेष) न करने वाला| अजिह्मः = जो जिह्म (कुटिल) न हो,
सरलचित्त।]

अनुवाद – क्रोध न करने वाला, सत्य बोलने वाला, जीवों की हिंसा न करने वाला, दूसरों से ईष्र्या न करने वाला एवं कुटिलता से रहित (सरलचित्त) व्यक्ति सौ वर्ष तक जीता है (अर्थात् दीर्घायु होता है)।

(8) अकीर्तिम् ………….. हन्त्य लक्षणम्।।

[ अनर्थम् = आपत्ति। अलक्षणम् = अशुभ।]

अनुवाद – विनम्रती अपयश को नष्ट करती है, पराक्रम (पुरुषार्थ) अनर्थ (आपत्ति) को नष्ट करता है, क्षमाशीलता सदा क्रोध को नष्ट करती है और सदाचरण (समस्त) अशुभों को नष्ट कर देता है।

(9) अभिवादनशीलस्य ………………… बलम्।।

[अभिवादनशीलस्य = (बड़ों को) प्रणाम करने वाले का। वृद्धोपसेविनः (वृद्ध+उपसेविनः) = बड़े-बूढ़ों की सेवा करने वाला। वर्द्धन्ते = बढ़ते हैं।]

अनुवाद – (अपने से बड़ों को) प्रणाम करने वाले तथा नित्य बड़े-बूढ़ों की सेवा करने वाले की आयु, विद्या, यश और बल-इन चारों की (उत्तरोत्तर) वृद्धि होती है।

(10) वृत्तं यत्नेन ……………….. हतो हतः।।

[वृत्तम् – चरित्र। वित्तमायाति (वित्तम् + आयाति) – धन आता है। याति = चला जाता है। अक्षीणः हानि न होना।]

अनुवाद – चरित्र की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए, (क्योंकि) धन तो आता-जाता रहता है। धन नष्ट होने से व्यक्ति की कोई (विशेष) हानि नहीं होती, किन्तु चरित्र नष्ट होने से व्यक्ति मरे हुए के समान हो जाता है। विशेष – अंग्रेजी की सूक्ति से तुलनीय-If wealth is lost nothing is lost, if health is lost something is lost, if character is lost everything is lost.

(11) सत्येन …………………… रक्ष्यते।।

[योगेन – (निरन्तर) प्रयोग से। मृजया = स्वच्छता, सफाई से। वृत्तेन = चरित्र से। ]

अनुवाद – सत्य से धर्म की रक्षा होती है, प्रयोग (निरन्तर अभ्यास) से विद्या की रक्षा होती है, स्वच्छता से रूप की रक्षा होती है, (और) चरित्र से कुल की रक्षा होती है।

(12) श्रूयतां …………………… समाचरेत् ।

[ धर्मसर्वस्वम् = धर्म के सार को। चाप्यवधार्यताम् (च +अपि +अवधार्यताम्) – च-और, अपि – भी, अवधार्यतां = धारण करो। परेषां – दूसरों का। ]

अनुवाद – धर्म का सार सुनो और सुनकर (मन में) धारण करो (कि) जो कार्य अपने विरुद्ध हो, उसका आचरण दूसरों के साथ न करो (अर्थात् जिस बात को तुम अपने लिए हानिकर समझते हो, उससे दूसरों को भी हानि पहुँचेगी, ऐसा समझकर वैसा कार्य दूसरों के प्रति न करो)।

 

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 2 प्रयाग:

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Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name प्रयाग:
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 2 प्रयाग:

अवतरणों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) भारतवर्षस्य …………………… प्रत्यगच्छत् ।
गङ्गायमुनयोः ……………… आत्मान पावयान्ता ।
भारतवर्षस्य ………………… आत्मानं पावयन्ति।

[ ब्रह्मणः = ब्रह्मा का। प्रकृष्टयागकरणात् = उत्तम यज्ञ करने से। सितासितजले (सित + असित + जले) – श्वेत और श्याम जल में (अर्थात गंगा और यमुना के जल में)। विगतकल्मषाः = पापरहित] अमायाम् =अमावस्या में | सम्मर्दः = भीड़। उषित्वा =रहकर। पावयन्ति=पवित्र करते हैं। प्रत्यगच्छत् = लौट जाता था।]

सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘प्रयागः’ शीर्षक पाठ से अवतरित है। इसमें तीर्थराज प्रयाग का वर्णन किया गया है।
[ विशेष – इस पाठ के समस्त अवतरणों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]
अनुवाद – भारतवर्ष के उत्तर प्रदेश राज्य में प्रयाग का विशेष स्थान है। यहाँ ब्रह्मा द्वारा किये गये श्रेष्ठ यज्ञ के कारण इसका नाम प्रयाग (प्र + याग = प्रकृष्ट यज्ञ) पड़ा। गंगा-यमुना के संगम पर श्वेत-श्याम जल में स्नान करके मनुष्य पापरहित हो जाते हैं, ऐसा लोगों का विश्वास है। अमावस्या, पूर्णिमा और संक्रान्ति पर यहाँ स्नान करने वालों की बड़ी भीड़ होती है। प्रति वर्ष माघ-मास में सूर्य के मकर राशि में स्थित होने पर यहाँ लाखों लोग आते हैं और एक महीने (तक) रहकर संगम के पवित्र जल से एवं विद्वानों-महात्माओं के उपदेशरूपी अमृत से अपने आपको पवित्र करते हैं। इसी पर्व (त्योहार) पर महाराज श्रीहर्ष (हर्षवर्द्धन) प्रत्येक पाँचवें वर्ष यहाँ आकर माँगने वालों को अपना सर्वस्व (सब कुछ) दान में देकर मेघ (बादल) के सदृश पुनः (धन) इकट्ठा करने के लिए अपनी राजधानी को लौट जाते थे।

(2) ऋषेः भरद्वाजस्य …………………… अगच्छत् ।

[दशसहसमिताः = दस हजार) अधीतिनः आसन् = पढ़ते थे, अध्ययन करते थे। वस्तव्यम् = रहना चाहिए, निवास करना चाहिए। प्रष्टुम् – पूछने को। त्वन्निवासयोग्यम् (त्वत् + निवासयोग्यम्) = तुम्हारे रहने योग्य। तेनादिष्टः (तेन +आदिष्टः) =उनसे आज्ञा पाकर। ]

अनुवाद – भरद्वाज ऋषि का आश्रम भी यहीं है। यहाँ प्राचीनकाल में दस हजार विद्यार्थी पढ़ते थे। पिता की आज्ञा का पालन करते हुए पुरुषोत्तम (पुरुषों में श्रेष्ठ) श्रीराम अयोध्या से वन को जा रहे थे तो मुझे कहाँ निवास करना चाहिए’ यह पूछने के लिए (वे) यहीं भरद्वाज (ऋषि) के पास आये। चित्रकूट ही तुम्हारे रहने योग्य उपयुक्त स्थान है’, ऐसी उनसे आज्ञा पाकर सीता और लक्ष्मण के साथ श्रीराम चित्रकूट गये।

(3) पुरा वत्सनामकमेकं ……………………….. दुर्गे सुरक्षितः) ।
पूरा वत्सनामकमेकं ……………………. स्वशिलालेखमकारयत्।

[ इतः = यहाँ से। नातिदूरेऽवर्तत (न + अतिंदरे + अवर्तत) = बहुत दूर नहीं (अर्थात् पास ही) थी। ललितकलाभिज्ञश्चासीत् (ललितकला +अभिज्ञः +च+आसीत्) =और ललित कलाओं के जानकार थे। ध्वंसावशेषाः = खण्डहर। ख्यापयन्ति = प्रकट करते हैं। स्वशिलालेखमकारयत् (स्वशिलालेखम् + अकारयत्) – अपना शिलालेख लिखवाया। योऽधुना (यः + अधुना) = जो अब।]

अनुवाद – प्राचीनकाल में वत्स नाम का एक समृद्ध (धन-धान्य सम्पन्न) राज्य था। इसकी राजधानी ‘कौशाम्बी यहाँ से थोड़ी ही दूर थी। इस राज्य के शासक महाराज उदयनवीर, अत्यधिक सुन्दर और ललित कलाओं के मर्मज्ञ (पारखी) थे। यमुना के किनारे आधुनिक सुजावन’ (नामक) ग्राम में उनके सुयामुन (नामक) महल के खण्डहर उनके सौन्दर्य-प्रेम को प्रकट करते हैं। प्रियदर्शी सम्राट अशोक ने कौशाम्बी में ही अपना शिलालेख लिखवाया था, जो अब कौशाम्बी से लाकर प्रयाग के किले में सुरक्षित (रखा गया) है।

(4) गङ्गायाः पूर्वं …………………… अतिमहत्त्वपूर्णमस्ति।
इतिहासप्रसिद्धः ……………………………. स्थितोऽस्ति।
इतिहासप्रसिद्धः ……………………..……… इत्यकरोत् ।

[ पुरूरवसः =पुरूरवा की। झूसीत्याधुनिकनाम्ना (झूसी +इति +आधुनिक+नाम्ना) = आजकल कँसी के नाम से प्रतिष्ठा=सम्मान। विदुषाम-विद्वानों के स्थित्या = रहने से, निवास से। अक्षुण्णैव (अक्षुण्ण + एव) =अखण्डित ही है। दुष्करम् = कठिन। विज्ञाय = जानकर। परिवृतम् = घिरा हुआ। दुर्गमकारयत (दुर्गम् + अकारयत्) – किला बनवाया। बन्धमप्यकारयत् (बन्धम् + अपि + अकारयत्) = बाँध भी
बनवाया। ]

अनुवाद – गंगा के पूर्व की ओर पुराणों में प्रसिद्ध महाराज पुरूरवा की राजधानी प्रतिष्ठानपुर, आजकल झुंसी नाम से प्रसिद्ध है। इसका गौरव आज भी विद्वानों और महात्माओं के निवास से अखण्डित है (अर्थात् कम नहीं हुआ है)।

इतिहास में प्रसिद्ध, नीतिकुशल अकबर नामक मुगल शासक ने दिल्ली से बहुत दूर पूर्व दिशा में स्थित कड़ा और जौनपुर नामक धन-धान्यसम्पन्न राज्यों की देखभाल कठिन जानकर, उन दोनों (राज्यों) के बीच प्रयाग में गंगा और यमुना से घिरा हुआ एक दृढ़ (मजबूत) किला बनवाया और गंगा के प्रवाह (धारा) से उसकी रक्षा के लिए एक विशाल बाँध का भी निर्माण कराया, जो आज भी नगर (प्रयाग) और गंगा के बीच में सीमा के सदृश स्थित है। इसी (अकबर) ने अपने इलाही’ धर्म के अनुसार प्रयाग का नाम (बदलकर) इलाहाबाद कर दिया। यह किला अत्यधिक विशाल, मजबूत और सुरक्षा की दृष्टि से बड़ा महत्त्वपूर्ण है।

(5) भारतस्य …………………… कर्मभूमिश्च।।

[ आजादोपनामकश्चन्द्रशेखरः (आजाद +उपनामकः + चन्द्रशेखरः) = आजाद उपनामधारी चन्द्रशेखर अर्थात् चन्द्रशेखर आजाद उषित्वा = रहकर।]

अनुवाद – यह नगर भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन का प्रमुख केन्द्र था। श्री मोतीलाल नेहरू, महामना मदनमोहन मालवीय, चन्द्रशेखर आजाद तथा स्वतन्त्रता संग्राम के अन्य सैनिकों ने इसी पवित्र भूमि पर निवास करके आन्दोलन का संचालन किया था। राष्ट्रनायक पण्डित जवाहरलाल नेहरू की यह क्रीड़ा-स्थली एवं कर्मभूमि है।

(6) राष्ट्रभाषा …………………… वर्द्धयति।।
अत्रैव च ………………………… वर्द्धयति।
राष्ट्रभाषा ………………………… शोभते।

अनुवाद – राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार में लगा हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन यहीं स्थित है और हजारों की संख्या में देशी-विदेशी छात्रों से घिरा, विविध-विद्याओं में निष्णात, श्रेष्ठ विद्वानों से सुशोभित, प्रयाग विश्वविद्यालय भरद्वाज (ऋषि) के प्राचीन गुरुकुल के नवीन रूप की भाँति शोभित है। इस स्वतन्त्र भारत में प्रत्येक नागरिक के न्याय-प्राप्ति के अधिकार की मानो घोषणा करता हुआ उच्च न्यायालय इस नगर की प्रतिष्ठा बढ़ा रहा है।

(7) एवं …………………… शरीरबन्धः ।।
समुद्रपन्योर्जल ……… नास्ति शरीरबन्धः।।

[महिमानं वर्णयन = महिमा का वर्णन करते हुए। समुद्रपन्योः = समुद्र की दो पत्नियों (नदियों) के (यहाँ गंगा और यमुना के)| जलसन्निपाते = संगम पर। किल = निश्चय ही। अभिषेकात = स्नान से। तत्त्वावबोधेन (तत्त्व +अवबोधेन) -तत्त्वज्ञान की प्राप्ति से। विनापि (विन + अपि) – बिना ही। भूयस = पुनः, फिर। तनुत्यजाम् =शरीर त्यागने वालों को। शरीरबन्धः =शरीर का बन्धन (पुनः जन्म लेना)।]

अनुवाद – इस प्रकार गंगा-यमुना-सरस्वती के पवित्र संगम पर स्थित, भारतीय संस्कृति के केन्द्र (इस नगर) की महिमा का वर्णन करते हुए महाकवि कालिदास ने सत्य ही कहा था
निश्चय ही यहाँ समुद्र की पत्नियों ( अर्थात् गंगा-यमुना) के जल-संगम में स्नान करने से पवित्र आत्मा वाले मनुष्यों को शरीर त्यागने पर तत्त्वज्ञान के बिना भी पुनः शरीर के बन्धन में नहीं बँधना पड़ता (अर्थात् उन्हें मोक्ष प्राप्त हो जाता है)।

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