UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 9 चतुरश्चौरः

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 9
Chapter Name चतुरश्चौरः
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 9 चतुरश्चौरः

अवतरणों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) आसीत् …………………………. विचक्षणाः।।
संवर्द्धनञ्च साधूनां ………….. नीति-विचक्षणाः।।

[तत्रैकदा (तत्र +एकदा) = वहाँ एक बार। चोरयन्तः = चुराते हुए। चत्वारः चौराः = चार चोर। सन्धिद्वारि = सेंध के मुहाने पर प्रशास्तृपुरुषैः = सिपाहियों के द्वारा घातकपुरुषान् = जल्लादों
(वधिकों) को। आदिष्टवान =आज्ञा दी। विमर्दनम् = दमन करना। बुधाः = विद्वानों ने। प्राहुः = कहा है। | दण्डनीति- विचक्षणाः = दण्डनीति में कुशल। ]

सन्दर्भ – यह गद्यखण्ड हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘चतुरश्चौरः’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[ विशेष – इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

अनुवाद – काञ्ची नाम की राजधानी थी। वहाँ सुप्रताप नाम का राजा (राज्य करता) था। वहाँ एक बार किसी धनी का धन चुराते हुए चार चोरों को सेंध के मुख पर सिपाहियों ने जंजीर से बाँधकर राजा से निवेदन किया (राजा के सामने उपस्थित किया और कहा कि इन चारों को सेंध के द्वार पर पकड़ा है। आदेश दें कि क्या दण्ड दिया जाए।) और राजा ने वधिकों (जल्लादों) को आदेश दिया-अरे वधिको! इन्हें ले जाकर मार दो;
क्योंकि

दण्डनीति में कुशल विद्वानों ने सज्जनों की वृद्धि (उन्नति) और दुष्टों के दमन को ही राजधर्म (राजा का कर्तव्य) कहा है।

(2) ततो राजाज्ञया ……………………… नरः।
‘प्रत्यासन्नेऽपि मरणे ……………………. प्रतीकारपरो नरः।

[ राजाज्ञया = राजा की आज्ञा से। शूलम् आरोष्य हताः = सूली पर चढ़ाकर मार दिये गये। प्रत्यासन्नेऽपि = निकट होने पर भी। विधीयते = मारा जाता हुआ। भूभुजा = राजा द्वारा प्रत्यायाति = वापस लौट आता
है। प्रतीकारपरः = उपाय करने में लगा।]

अनुवाद – तब राजा की आज्ञा से तीन चोर सूली पर चढ़ाकर मार दिये गये। चौथे ने सोचामृत्यु निकट होने पर भी (मनुष्य को अपनी) रक्षा का उपाय करना चाहिए। उपाय के सफल होने पर रक्षा हो जाती है (और) निष्फल (व्यर्थ) होने पर मृत्यु से अधिक (बुरा तो) और कुछ (होने वाला) नहीं। रोग से पीड़ित होने या राजा द्वारा मरवाये जाने पर भी मनुष्य यदि (अपने बचाव के) उपाय में तत्पर हो, तो यम के द्वार से (मृत्यु के मुख से) भी लौट आता है।

(3) चौरोऽवदत् ………………………. तिष्ठतु।

[ राजाज्ञया (राजा +आज्ञया) = राजा की आज्ञा से राजसन्निधानं कृत्वा = राजा के पास ले जाकर। यतोऽहमेकाम् (यतः + अहम् + एकाम्) – क्योंकि मैं एक मर्त्यलोके = पृथ्वी पर, संसार में।]

अनुवाद – चोर बोला-“अरे वधिको! तीन चोर तो तुम लोगों ने राजा की आज्ञा से मार ही दिये, किन्तु मुझे राजा के पास ले जाकर मारना; क्योंकि मैं एक महती (बड़ी महत्त्वपूर्ण) विद्या जानता हूँ। मेरे मरने पर वह विद्या लुप्त हो जाएगी। राजा उस (विद्या) को लेकर (सीखकर) मुझे मार दे, जिससे वह विद्या मृत्युलोक (पृथ्वी) में तो रह जाये।

(4) घातका अब्रुवन् …………………….. दातव्या।

[ पापपुरुषाधम = पापी, नीच। किमपरं जीवितुमिच्छसि ? (किम् +अपरम् +जीवितुम् +इच्छसि) = क्या अभी और जीना चाहता है ? पूजयितव्या = सम्मानित होगी। ज्ञातुमिच्छति (ज्ञातुम् + इच्छति) = जानना चाहता है। गृह्णातु – ग्रहण करे। दातव्या = देने योग्य।]

अनुवाद – वधिक बोले-“अरे चोर! पापी! नीच! तू वधस्थल (मारने के स्थान) पर लाया जा चुका है। क्या अभी और जीना चाहता है ? कौन-सी विद्या जानता है ? तुझ नीच की विद्या भेला राजा द्वारा क्यों सम्मानित होगी?” चोर बोला, “अरे वधिको! क्या कह रहे हो ? राजकार्य में विघ्न डालना चाहते हो ? तुम लोग जाकर निवेदन कर दो। राजा यदि जानना चाहे तो वह विद्या ले ले (सीख ले)। उसे (उस विद्या को) भला मैं तुम लोगों को कैसे दे दें ?”

(5) ततश्चौरस्य …………………. वप सुवर्णम्।
ततश्चौरस्य वचनैः ……………………. पश्यतु।
देव ! सर्षप …………………….. वप सुवर्णम्।
राजा च सकौतुकं ………………. वप सुवर्णम्।
ततश्चौरस्य वचनैः ……………. संख्याकानि भवन्ति।

[ राजकार्यानुरोधेन (राजकार्य + अनुरोधेन) = राजकाज (राजा के काम) के महत्व को समझते हुए। सकौतुकम् = कुतूहलपूर्वका सर्षपपरिमाणानि = सरसों के (दाने के) बराबर। उप्यन्ते = बोये जाते हैं। कन्दल्यों – अंकुर। रक्तिकामात्रेण = रत्ती भर पल = 4 कर्ष की एक प्राचीन तौल। एक कर्ष 16 माशे या 80 रत्ती के बराबर था। इस प्रकार पल 64 माशे (या 320 रत्ती) के बराबर था। यहाँ ‘बहुसंख्यक’ से आशय है। पुरतः = सामने। कस्यासत्यभाषणे (कस्या + असत्यभाषणे) = किसकी झूठ बोलने में। व्यभिचरितम्-झूठ हो। ममाप्यन्तो (मम +अपि +अन्तः) = मेरा भी अन्त (या मृत्यु)। वप = बोओ।]

अनुवाद – इसके पश्चात् चोर की बात से और राजा के कार्य के महत्त्व से उन्होंने वह बात राजा से निवेदित की। राजा ने कुतूहलपूर्वक चोर को बुलाकर पूछा—“अरे चोर! कौन-सी विद्या जानते हो ?’ चोर बोला, “महाराज, सरसों के बराबर सोने के बीज बनाकर भूमि में बोये जाते हैं। महीने भर में ही (उनमें) अंकुर और फूल आ जाते हैं। वे फूले सोने के ही होते हैं। रत्तीभर बीज से बहुसंख्या (या बहुत परिमाण में) हो जाते हैं। उसे महाराज स्वयं देख लें।” राजा ने कहा, “चोर! क्या यह सच है ?” चोर बोला, “महाराज के सामने झूठ बोलने की किसमें शक्ति है ? यदि मेरी बात झूठ निकले तो महीनेभर बाद मेरा अन्त (मृत्यु) हो ही जाएगा।” राजा बोला, “भद्र ( भले आदमी)! सोना बोओ।”

(6) ततश्चौरः ………………….. किं न वपति ?
ततश्चौरः सुवर्णः ……………….. स वपतु।

[ ततश्चौरः (ततः + चौरः) = तब चोर ने। दाहयित्वा = तपाकर। परमनिगूढस्थाने = बड़े गुप्त (सुरक्षित) स्थान में। भूपरिष्कारं कृत्वा = जमीन साफ करके। वप्ता = बोने वाला। ]

अनुवाद – तब चोर ने सोने को तपाकर सरसों (के दानों) के बराबर बीज बनाकर राजा के अन्त:पुर के क्रीड़ा सरोवर के किनारे अत्यधिक सुरक्षित स्थान में भूमि साफ करके कहा, “महाराज, खेत और बीज तैयार हैं, कोई बोने वाला दीजिए।” राजा ने कहा, “तुम्हीं क्यों नहीं बोते ?” चोर बोला, “महाराज, यदि सोना बोने का मेरा ही अधिकार होता तो मैं इस विद्या से (अर्थात् इस विद्या के रहते) दु:खी (दरिद्र) क्यों होता ? किन्तु चोर को सोना बोने का अधिकार नहीं है। जिसने कभी कोई चोरी न की हो, वह बोये। महाराज (आप) ही क्यों नहीं बोते ?’

(7) राजाऽवदत् ……………………. चोरिताः।

[ तातचरणानाम् = पूज्य पिताजी का। राजोपजीविनः (राजा +उपजीविनः) = राजा के आश्रित, सेवक। कथमस्तेयिनो (कथम् + अस्तेयिनः) = कैसे चोरी न करने वाले (होंगे)। स्तेय = चोरी। स्तेयी = चोर।
अस्तेयी = जो चोर न हो।]

अनुवाद – राजा ने कहा-“मैंने चारणों ( भाटों) को देने के लिए पूज्य पिताजी का धन चुराया था।” चोर बोला, “तब मन्त्री लोग बोयें।’ मन्त्रियों ने कहा, “हम राजा के सेवक (या आश्रित) हैं। भला चोरी न करने वाले कैसे हो सकते हैं ?” तो चोर बोला, “तब धर्माधिकारी (न्यायाधीश) बोये।” धर्माधिकारी ने कहा-“मैंने बाल्यावस्था में माता के लड्डू चुराये थे।”

(8) चौरोऽवदत् ……………………. वल्लभतां गतः।
चौरोऽवदत् …………………….. स्वसन्निधाने धृतः।।

[ मारणीयोऽस्मि (मारणीयः + अस्मि) = मारने योग्य हैं। हसितवन्तः = हँसे। हास्यरसापनीतक्रोधो (हास्यरस +अपनीत + क्रोधः) – हँसी से क्रोध दूर होने पर। सन्निधाने = समीप। प्रस्तावे = (उपयुक्त) अवसर पर खेलयतु = खिलाये (मनोरंजन करे)| समुच्छिद्य = काटकर वल्लभताम् = प्रेम को। गतः = प्राप्त हुआ। ]

अनुवाद – चोर बोला, “यदि तुम सभी चोर हो, तो अकेला मैं ही मारने योग्य क्यों हूँ ?’ उस चोर की बात सुनकर सभी सभासद हँस पड़े। राजा भी हँसी के कारण क्रोध दूर हो जाने पर हँसकर बोला, “अरे चोर! तू मारने योग्य नहीं है। हे मन्त्रियो! दुर्बुद्धि (बुरी बुद्धि वाला) होने पर भी यह चोर बुद्धिमान् और हास्यरस में कुशल है। तो (यह) मेरे ही पास रहे, (और उपयुक्त) अवसर पर मुझे हँसाये तथा खिलाये (मेरा मनोरंजन करे)।’ यह कहकर राजा ने उस चोर को अपने समीप रख लिया।
चोर से अधिक नीच और कोई नहीं। वह भी हास्य की विद्या से (हँसाने की कला में निपुण होने से) मृत्यु के फन्दे को काटकर राजा का प्रिय बन गया।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सूक्तिपरक निबन्ध

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 13
Chapter Name सूक्तिपरक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi सूक्तिपरक निबन्ध

सूक्तिपरक निबन्ध

 पराधीन सपने सख नाहीं

सम्बद्ध शीर्षक

  • स्वाधीनता का महत्त्व
  • पराधीनता एक अभिशाप है।
  • परतन्त्रता अथवा दासता

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना,
  2. पराधीनता एक अभिशाप है,
  3. पराधीनता के विविध रूप
    (क) राजनीतिक;
    (ख) आर्थिक;
    (ग) सांस्कृतिक;
    (घ) सामाजिक,
    (ङ) धार्मिक,
  4.  स्वाधीनता का महत्त्व,
  5.  उपसंहार।

प्रस्तावना – ‘पराधीनता से तात्पर्य दूसरे के अधीन या वश में रहने से है। जब हमारे मनन-चिन्तन और कार्य परं दूसरों की इच्छा और शक्ति का अंकुश लग जाता है तो हम पराधीन कहलाते हैं। इस स्थिति में प्राप्त सुख-सुविधाएँ भी सच्चा आनन्द प्रदान नहीं कर पातीं। सोने के पिंजरे में रहकर विभिन्न फल व स्वादिष्ट पदार्थ खाने वाला पक्षी भी इस बन्धन से छूटकर खुले आकाश में स्वच्छन्द विचरण के लिए उड़ जाना चाहता है। इसलिए गोस्वामी तुलसीदास की उक्ति सत्य चरितार्थ होती है कि ‘पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं। सूखी रोटी खाने वाला और पत्थर की चट्टान पर सोने वाला स्वाधीन व्यक्ति पराधीन व्यक्ति की अपेक्षा कहीं अधिक स्वस्थ, प्रसन्न व निर्भीक होता है। किसी कवि ने उचित ही कहा है

बस एक दिन की दासता, शत कोटि नरक समान है।
क्षण मात्र की स्वाधीनता, शत स्वर्ग की मेहमान है।

पराधीनता एक अभिशाप है – पराधीनता मानव की समस्त शक्तियों को कुण्ठित करने वाला पक्षाघात (लकवा) है। पराधीन व्यक्ति का व्यक्तित्व पंगु हो जाता है, उसकी इच्छाशक्ति मर जाती है और कठपुतली के समान दूसरों के आदेश-निर्देशों का अनुवर्तन ही उसकी नियति बन जाती है। फलतः उसका आत्मविश्वास नष्ट हो जाता है और वह प्रत्येक बात में दूसरों का मुँह ताकता रहता है। इसलिए एक संस्कृत कवि ने कहा है
“पारतन्त्र्यं महहुःखम् स्वातन्त्र्यं परमं सुखम्”, अर्थात् परतन्त्रता से बड़ा दुःख और स्वतन्त्रता से बड़ा सुख और कुछ नहीं है।

पराधीन मनुष्य का हृदय मात्र गति करता है। उसमें भावना के फूल नहीं लहराते। उसकी जिह्वा होती है पर स्वर कहीं खो जाते हैं। उसकी आँखें देखती हैं, किन्तु उनमें प्रतिक्रिया का कोई स्पन्दन नहीं होता, उसमें विचार उपजते हैं किन्तु शीघ्र ही विलीन हो जाने को बाध्य होते हैं। उसमें जीवन होता है किन्तु उसमें और मृतक में कोई विशेष अन्तर नहीं जान पड़ता।

पराधीन मनुष्य को तो कुछ सोचने और करने का अवसर ही नहीं मिलता और यदि मिलता भी है तो पराधीन बनाने वाले व्यक्ति की इच्छा और तेवर के अनुसार यानि वह जो सोचता है और करने को कहता है, पराधीन वही सब कर सकता है, वरन् करने को बाध्य हुआ करता है। अपनी इच्छा और सोच के अनुसार कुछ करने की उसकी चेष्टा पर उसे बड़ी बेशरमी से दण्डित किया जाता है। इस प्रकार धीरे-धीरे उसकी इच्छाएँ, भावनाएँ, सोच-विचार की शक्ति समाप्त हो जाती है। ऐसी अवस्था में उसे किसी सुख की प्राप्ति या अनुभूति. मात्र का भी प्रश्न नहीं उठता। इसके विपरीत स्वाधीन व्यक्ति अपनी इच्छा और भावना के अनुसार सोच-विचार कर वह सब कुछ करने के लिए स्वतन्त्र होता है, जिसे करने से उसे सुख-प्राप्ति होती है। स्वतन्त्रता पूर्व और पश्चात् की भारतवासियों की स्थिति की तुलना करके इस अन्तरे को सरलता के साथ समझा जा सकता हैं। मानव सचमुच स्वाभिमान के लिए ही जीता है। स्वाभिमान से शून्य जीवन नरक भोगने से भी असह्य है और स्वाभिमान की रक्षा बिना स्वाधीनता के सम्भव नहीं। इसीलिए एक लेखक ने कहा है, “It is better to reign in hell than to be a slave in heaven.” अर्थात् स्वर्ग में दास बनकर रहने से नरक में स्वाधीन रहना अच्छा है।

पराधीनता के विविध रूप – पराधीनता चाहे व्यक्ति की हो या राष्ट्र की—दोनों ही गर्हित हैं; क्योंकि व्यक्तिगत पराधीनता व्यक्ति के एवं राष्ट्रगत पराधीनता राष्ट्र के सम्पूर्ण विकास को अवरुद्ध कर उसे पंगु बना देती है। उसकी चेतना शक्ति शून्य और निष्कर्म हो जाती है। पराधीनता के कई रूप हैं, जिनमें मुख्य हैं

(क) राजनीतिक,
(ख) आर्थिक,
(ग) सांस्कृतिक,
(घ) सामाजिक और
(ङ) धार्मिक।

(क) राजनीतिक पराधीनता – इससे आशय है कि किसी देश का दूसरों द्वारा शासित होना। राजनीतिक पराधीनता सबसे भयावह स्थिति है। वह शासित देश के समस्त गौरव का नाश कर उसे संसार में उपहास, घृणा
और दया का पात्र बना देती है। विजेता द्वारा ऐसे देश का सर्वांगीण शोषण करके उसे प्रत्येक दृष्टि से नि:सत्त्व, श्रीहीन और अपदार्थ बना दिया जाता है। भारत का उदाहरण सामने है। जो भारत किसी समय सोने की चिड़िया कहलाता था, वही सैकड़ों वर्षों की गुलामी के परिणामस्वरूप अन्न के दाने-दाने को मोहताज हो गया था। यही कारण है कि प्रत्येक पराधीन देश बड़े-से-बड़ा बलिदान देकर भी सबसे पहले राजनीतिक स्वाधीनता प्राप्त करना चाहता है।

(ख) आर्थिक पराधीनता – आज के युग में किसी देश को राजनीतिक दृष्टि से पराधीन बनाये रखना कठिन हो गया है, इसलिए संसार के शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्रों, मुख्यतः अमेरिका, ने दूसरे देशों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने हेतु यह एक नया हथकण्डा अपनाया है। वे उन्हें आर्थिक सहायता या ऋण देकर उनके आन्तरिक मामलों में मनमाने हस्तक्षेप की अधिकार पा लेते हैं। यह पराधीनता वर्तमान में तो क्षणिक सुखकर अवश्य प्रतीत होती है, परन्तु भविष्य में यह बहुत ही कष्टकर होती है। महाजनों और जमींदारों के अत्याचार ऐसी पराधीनता के ही फल रहे हैं।

(ग) सांस्कृतिक पराधीनता – इसका आशय है किसी देश द्वारा दूसरे देश पर अपनी भाषा और साहित्य थोप कर उसके साहित्य, कला और संस्कृति के सहज विकास को अवरुद्ध कर, वहाँ के बुद्धिजीवियों के स्वतन्त्र चिन्तन को नष्ट कर, उन्हें मानसिक दृष्टि से अपना गुलाम बनाना। भारत पर मुसलमानी शासनकाल में फारसी और अंग्रेजों के शासनकाल में अंग्रेजी भाषा का थोपा जाना इस देश के स्वाभाविक सांस्कृतिक विकास के लिए बहुत घातक सिद्ध हुआ। वस्तुतः राजनीतिक और आर्थिक पराधीनता तो किसी देश के शरीर को ही गुलाम बनाती है, किन्तु सांस्कृतिक पराधीनता उसकी आत्मा को ही बन्धक रख लेती है। मैकाले (Macaulay) ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा की वकालत करते हुए यही तर्क दिया था कि इससे यह देश मानसिक दृष्टि से हमारा गुलाम बन जाएगा और उसकी बात आज अत्यधिक सत्य सिद्ध हो रही है। सन् 1947 ई० में राजनीतिक स्वाधीनता पाकर भी इस देश में पनपे अंग्रेजी के मानस-पुत्रों ने भारत को आज पहले से कहीं भयंकर सांस्कृतिक पराधीनता में जकड़कर खोखला बना दिया है।

(घ) सामाजिक पराधीनता – सामाजिक पराधीनता से आशय है समाज के विभिन्न वर्गों में असमानता का होना, जिससे कुछ वर्ग अधिक सुविधाएँ भोगते हुए दूसरों को दबाकर रखें। हिन्दू समाज में पराधीनता का यह रूप छुआछूत, ऊँच-नीच और स्त्रियों पर अत्याचार के कारण अपनी निकृष्टतम स्थिति में दीख पड़ता है। भारतीय नारी की तो नियति सचमुच दयनीय है; क्योंकि कौमार्यावस्था में पिता, यौवन में पति और वृद्धावस्था में पुत्र उसका अभिभावकत्व करते हैं। इस प्रकार बचपन से वार्धक्य तक वह बेचारी किसी-न-किसी के अधीन रहने को बाध्य है, स्वाधीनता उसके भाग्य में नहीं।

(ङ) धार्मिक पराधीनता – धार्मिक पराधीनता के कारण मनुष्य अनेक नियमों, रीति-रिवाजों, परम्पराओं और अन्धविश्वासों के अधीन हो जाता है। वह पुरोहितों-पुजारियों, मुल्लाओं-मौलवियों और पादरियों का दास बन जाता है। शिक्षा, व्यवसाय, साहित्य, कला आदि में उसे प्रचलित रूढ़िवादिता का अनुकरण करना ही पड़ता है।

स्वाधीनता का महत्त्व – स्वतन्त्रता से मधुर कोई मनोदशा नहीं है। मनुष्य की गरिमा इसी कारण है कि वह स्वतन्त्र है। पशु को इसीलिए पशु कहा जाता है कि वह पाश (बन्धन) में है। जो मनुष्य भी पाश में हो तो उसका जीवन भी पशुवत् ही है। स्वतन्त्रता से उच्च स्वर्ग और कहीं नहीं है। स्वतन्त्र व्यक्तित्व व विचार से युक्त मानव का तेज अलौकिक होता है। जब प्रसिद्ध क्रान्तिकारी बालक चन्द्रशेखर को न्यायालय में पेश किया गया तो न्यायाधीश ने उससे पूछा- तुम्हारा नाम। बालक चन्द्रशेखर ने उत्तर दिया–आजाद’। तुम्हारे पिता का नाम’, न्यायाधीश ने फिर पूछा। स्वतन्त्र, चन्द्रशेखर ने निडरता के साथ उत्तर दिया। तात्पर्य यह है कि मानव का मन स्वतन्त्रता का प्रेमी है, परतन्त्रता तो उसके लिए मरण तुल्य है। वियोगी हरि लिखते हैं कि,

पराधीन जे नर नहीं, स्वर्ग-नरक ता हेत।
पराधीन जे नर नहीं, स्वर्ग-नरक ता हेत ॥

अर्थात् जो मनुष्य पराधीन नहीं हैं, उनके लिए स्वर्ग-नरक में अन्तर है। जो मनुष्य पराधीन हैं, उनके लिए स्वर्ग-नरक में कोई अन्तर नहीं है। निश्चित ही स्वाधीनता का कोई सानी नहीं। स्वाधीनता की शीतल छाया में संस्कृति, सभ्यता और समृद्धि बढ़ती है; देश में खुशहाली आती है; जीवन में उत्साह, स्फूर्ति और प्रसन्नता का संचार होता है; राष्ट्र की जीवन-ज्योति जगमगा उठती है; अज्ञान का अन्धकार हटने लगता है और ज्ञान का प्रकाश बढ़ने लगता है।

उपसंहार – आज हम स्वाधीन हैं, स्वतन्त्र हैं। हमें सभी प्रकार के व्यापक अधिकार मिले हुए हैं। इसे प्राप्त करने के लिए न जाने कितने लोग कुर्बान हुए और न जाने कितने कष्ट सहे, इसका अनुभव बहुत कम ही लोग कर सके हैं। हमें स्वाधीन होकर भी स्वच्छन्द नहीं होना चाहिए। हमें स्वतन्त्रता को वास्तविक प्रयोग कर देश का सहयोग करना चाहिए, जिससे देश की स्वाधीनता अमर बनी रहे। इसीलिए तो गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है

पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं। करि बिचार देखहु मन माहीं॥

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि स्वाधीनतारूपी अमृत-फल चखने के लिए हमें पराधीनतारूपी कण्टकों को निर्मूल करना होगा, सभी प्रकार की पराधीनता के कलंक को मिटाना होगा। तभी भारतमाता का मुख उज्ज्वल होकर सम्पूर्ण विश्व को अपनी आभा से दीप्त कर सकेगा, उसका मार्गदर्शन कर सकेगा।

परहित सरिस धरम नहि भाई

सम्बद्ध शीर्षक

  • मानवता का आधार : परोपकार
  • परोपकार
  • वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे
  • परोपकार का महत्त्व
  • परपीड़ा सम नहिं अधमाई

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2.  परोपकार की महत्ता अर्थात् परोपकार मानवीय धर्म,
  3.  प्रकृति और परोपकार,
  4.  परोपकार : मानवता का परिचायक,
  5. परोपकार के विविध रूप,
  6.  परोपकार : आत्म-उत्थान का मूल,
  7.  उपसंहार।

प्रस्तावना – “परहित सरिस धरम नहिं भाई। परपीड़ा सम नहिं अधमाई”, अर्थात् दूसरे की भलाई करने से बढ़कर कोई धर्म नहीं और दूसरे को कष्ट पहुँचाने से बढ़कर कोई नीच काम नहीं। महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी की ये पंक्तियाँ धर्म की सुन्दर परिभाषा प्रस्तुत करती हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, अतः समाज में एक-दूसरे का सहयोग किये बिना वह पूर्ण मानव नहीं बन सकता। कोई भी मनुष्य स्वयं में पूर्ण नहीं है, किसी-न-किसी कार्य के लिए वह दूसरे पर आश्रित रहता ही है। हम दूध-दही के लिए पशुओं पर, फल-फूल तथा अन्नादि के लिए वृक्षों पर, जल के लिए बादल एवं नदियों पर आश्रित हैं। ये सभी बिना किसी स्वार्थ के हमें यही सन्देश प्रदान करते हैं।

परोपकार की महत्ता अर्थात् परोपकार मानवीय धर्म – महर्षि दधीचि ने वृत्रासुर वध के लिए देवताओं द्वारा माँगने पर अपनी हड्डियों को प्रदान करते हुए मानवीय परोपकार का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया था। उनकी हड्डियों से निर्मित सर्वाधिक कठोर वज्र के निर्माण से ही देवता वृत्रासुर का वध कर सके। मानव द्वारा देवों की रक्षा करने के लिए त्याग-भावना द्वारा मानव देवताओं से भी महान् दिखाई देने लगता है। महाराज शिवि ने भी करुणा-भावना के वशीभूत एक कबूतर की प्राण रक्षा के लिए अपने हाथों से अपने शरीर का मांस काट-काट कर कबूतर को खाने के लिए आये बाज को खिलाकर परोपकार के क्षेत्र में प्रतिमान उपस्थित किया। वास्तव में ये महान् पुरुष धन्य हैं, जिन्होंने परोपकार के लिए अपने शरीर व प्राणों की भी चिन्ता नहीं की। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने इनकी वन्दना करते हुए उचित ही कहा है

क्षुधार्त रन्तिदेव ने दिया करस्थ थाल भी,
तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी।
उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया,
सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर चर्म भी दिया।
अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

इसी भावना से प्रेरित होकर हमारे हजारों क्रान्तिकारी देशभक्तों ने भी नयी पीढ़ी की स्वतन्त्रती एवं सुख-समृद्धि के लिए परोपकार भावना से अनुप्राणित होकर अपने माता-पिता, पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री एवं परिवार की तनिक भी चिन्ता न करते हुए अपने प्राणों को हँसते-हँसते देश की बलिवेदी पर चढ़ा दिया। संसार में उन्हीं व्यक्तियों के नाम अमर होते हैं, जो दूसरों के लिए मरते और जीवित रहते हैं। सीता की रक्षा में अपने प्राणों की बाजी लगा देने वाले गिद्धराज जटायु से श्रीराम कहते हैं, “तुमने अपने सत्कर्म से ही सद्गति को अधिकार पाया है, इसका। श्रेय मुझे नहीं है

परहित बस जिनके मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥

प्रकृति और परोपकार-प्रकृति में परोपकार का नियम अप्रतिहत गति से कार्य करता हुआ दिखाई देता है। सूर्य बिना किसी जाति, देश, वर्ण के भेदभाव के समानता-असमानता की भावना से, बिना किसी प्रत्युपकार की भावना के, समस्त संसार को अपने प्रकाश और उष्णता से जीवन प्रदान करते हैं। वायु सभी को प्राण प्रदान कर रही है। चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों से सभी को रस एवं शीतलता प्रदान करता है। पृथ्वी रहने को स्थान देती है। मेघ वर्षा ऋतु में आकर फसलों को हरा-भरा कर देते हैं। वृक्ष तो फूल, फल, छाल, शाखाएँ, ऑक्सीजन, जल, पत्ते, लकड़ियाँ, छाया आदि सर्वस्व प्रदान कर मानव-जीवन को आनन्दित बना देते हैं। झरने, प्रपात और नदियाँ अपने अमृतमय जल से पिपासा शान्त करती हुई, विद्युत एवं तैरने के अवसर, नौकाविहार, जलचरों को जीवन प्रदान करती हुई परोपकार की देवी ही बनी हुई है। कहा भी गया है

बृच्छ कबहुँ नहिं फल भखें, नदी न संचै नीर।
परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर ॥

उपर्युल्लिखित सूर्य, चन्द्रमा, वृक्ष, वायु आदि ऐसा किसी प्रतिफल प्राप्ति की भावना से नहीं करते हैं, वे केवल अपने जन्मजात स्वभाववश ही ऐसा करते हैं। तब क्या प्रकृति की ही एक देन, मनुष्य, का यह कर्त्तव्य नहीं है। कि वह दूसरों के हित में अपने जीवन का कुछ समय ही लगा दे।
परोपकार : मानवता का परिचायक – परोपकार ही मानव को महामानव बनाने की सामर्थ्य रखता है। परोपकार से ही हमारी स्वार्थ-भावना नष्ट होती है और हम देवता के समान कहलाने लगते हैं

सूर्य, चन्द्र, बादल, सरिता, भू, पेड़, वायु कर पर उपकार।
बन जाते हैं देवतुल्य क्या, देवों के सचमुच अवतार॥

परोपकारी व्यक्ति समाज में सर्वत्र सम्मान प्राप्त कर देश एवं विश्व के पूज्य बन जाते हैं। परोपकार से ही मनुष्य विश्वबन्धुत्व की भावना की ओर अग्रसर होता है। जनकल्याण, प्राणिसेवा में निरत व्यक्ति परमआदरणीय हो जाती है

जो पराये काम आता, धन्य है जग में वही।
द्रव्य ही को जोड़कर, कोई सुयश पाता नहीं ॥

परोपकार भाईचारे की भावना का विकास करता है। यही घृणा, द्वेष और स्वार्थ का नाशक है। सभी प्राणियों में अपने ईश्वर का अंश देखकर महापुरुष जगत् के कल्याण में प्रवृत्त हो जाते हैं। राजा रन्तिदेव अपना सर्वस्व दान में देकर अड़तालीस दिन तक भूखे रहे। उनचासवें दिन जब भोजन का प्रबन्ध हुआ तो एक याचक आ गया। उन्होंने वह भोजन याचक को खिलाकर सन्तोष धारण किया

ने त्वहं कामये स्वर्ग, न मोक्षं न पुनर्भवम् ।
कामये दुःखतप्तानां, प्राणिनामार्तनाशनम् ॥

राजा रन्तिदेव ने स्वर्ग-मोक्ष न माँग कर मानव ही नहीं सभी प्राणियों की पीड़ा को दूर करने का वरदान माँगा। परोपकारियों को ही सज्जन एवं महापुरुष की पदवी प्रदान की जाती है, जो युगों तक प्रणम्य हो जाते हैं। अट्ठारह पुराणों के रचयिता व्यास जी ने भी परोपकार को पुण्य एवं परपीड़ा को पाप घोषित किया है

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥

परोपकारी व्यक्ति “नि:स्वार्थ परोपकार कर अलौकिक आनन्द का अनुभव करता है। किसी भूखे को भोजन देते समय, प्यासे को पानी पिलाते समय, ठण्ड से ठिठुरते को वस्त्र देते समय, रोगी की सेवा करते समय मानव को जो अपार आनन्द का अनुभव होता है, वह वर्णनातीत है। उस समय वह स्व-पर के भेद से ऊपर उठकर ब्रह्मानन्द की प्राप्ति करता है। हमारी सांस्कृतिक परम्परा में यज्ञ परोपकार ही है, जिसके द्वारा ‘इदं न मम कहते हुए अग्नि में डाली गयी आहुति लाखों लोगों का कल्याण करती हुई विस्तृत हो जाती है।”

परोपकार के विविध रूप – नि:शुल्क लंगर, सदाव्रत, प्याऊ, विद्यालय, धर्मशाला, बगीचा, वृक्षारोपण, जलाशय, औषधालय, वस्त्र-वितरण, निर्धन विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति, पुस्तकालय, गौशाला आदि की व्यवस्था करना परोपकार के ही विविध रूप हैं। परोपकार का क्षेत्र केवल मनुष्यों तक संकुचित नहीं है, उसमें पशु-पक्षी कीट-पतंग सभी सम्मिलित हैं। इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने सभी को प्रणाम करते हुए कहा है

सियाराममय सब जग जानी। कर प्रणाम जोरि जुग पानी।।

रहीम ने परोपकार की महिमा का बखान करते हुए लिखा है कि

रहिमन यों सुख होत है, उपकारी के संग।
बाँटनवारे को लगे, ज्यों मेंहदी के रंग ॥

तात्पर्य यह है कि परोपकारी व्यक्ति को उसी प्रकार स्वतः ही आनन्द की उपलब्धि होती है, जिस प्रकार लगाने वाले के हाथों में मेंहदी का रंग स्वतः ही आ जाता है।

जहाँ पुल, सड़कें नहीं वहाँ पुल, सड़कों का निर्माण करना, कन्याओं के लिए रोजगार सीखने के नि:शुल्क प्रशिक्षण देना, उन्हें स्वावलम्बी बनाना, अकाल, भूकम्प, युद्धादि के अवसर पर अन्न, वस्त्र, निवास की व्यवस्था करना परोपकारी कार्यों की श्रेणी में आते हैं।

सामान्य व्यक्ति तर्क दे सकते हैं कि धन से सम्पन्न व्यक्ति ही परोपकार कर सकता है। विचार करने पर हम अनुभव करेंगे कि परोपकार के लिए धन की कोई आवश्यकता नहीं होती, अपितु एक सेवाभावी मन की आवश्यकता होती है। हम राह भटके हुए को राह दिखा सकते हैं, सड़क के बीच में पड़े हुए केले के छिलके, कंकड़-पत्थर आदि को उठाकर एक किनारे पर फेंक सकते हैं। यह परोपकार ही तो है। हम किसी दुखिया के आँसू पोंछ सकें, किसी आहत व्यक्ति की आहों में साझीदार बन सकें, किसी के सिर पर रखे हुए बोझ को हलका कर सकें, किसी प्यासे को पानी पिला सकें आदि, तो हम परोपकार के आनन्द एवं पुण्य-फल का लाभ प्राप्त करने के सहज अधिकारी बन जाएँगे। निर्धन विद्यार्थियों को निःशुल्क ट्यूशन उत्तम कोटि का परोपकार कहलाएगा।

परोपकार : आत्म-उत्थान का मूल – मनुष्य क्षुद्र से महान् और बिरल से विराट् तभी बन सकता है, जब उसकी परोपकार-वृत्ति विस्तृत होती रहेगी। भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है कि उसने प्राणि-मात्र के हित को मानव-जीवन का लक्ष्य बताया है। यही व्यक्ति का समष्टिमय स्वरूप भी है। ज्यों-ज्यों आत्मा में उदारता बढ़ती जाती है, उसे उतनी ही अधिक आनन्द की उपलब्धि होती जाती है तथा अपने समस्त कर्म जीवमात्र के लिए समर्पित कर देने की भावना तीव्रतर होती जाती है

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत् ॥

तात्पर्य यह है कि सभी लोग सुखी हों, निरोगी हों, कल्याणयुक्त हों। कोई भी दु:ख-कष्ट नहीं भोगे। इसी भावना से संचालित होकर सभी जीवों के कल्याण में रत रहना चाहिए। यही सर्वकल्याणमय भावना सन्तों का मुख्य लक्षण है; क्योंकि वे मन, वचन और काया से सदा परोपकार में लगे रहते हैं

पर उपकार वचन मन काया। सन्त सहज सुभान खगराया।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी के शब्दों में

यही पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

अर्थात् जो अपने लिए जीता है वह पशु है, जो अपने साथ-साथ दूसरों के लिए भी जीता है वह मनुष्य है और जो केवल दूसरों के लिए ही जीता है वह महामानव है, महात्मा है।

उपसंहार – परोपकारी अक्षय कीर्ति को धारण करते हैं। प्रत्येक युग में उनका सम्मान वृद्धि को प्राप्त होता रहता है। महात्मा गांधी, पं० मदनमोहन मालवीय, सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, अशफाक उल्ला खाँ, रामप्रसाद बिस्मिल आदि सदैव ही प्रातः स्मरणीय रहेंगे। तभी तो मैथिलीशरण गुप्त जी ने कहा है कि इस जीवन को अमर बनाने के लिए इसे दूसरों को समर्पित कर दो

विचार लो कि मर्त्य हो नै मृत्यु से डरो कभी,
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करें सभी।

मानव का जीवन क्षणभंगुर है, किन्तु परोपकार के द्वारा वही अमरता को प्राप्त हो जाता है। भगवान् राम, कृष्ण, महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, दयानन्द सरस्वती, राजा राममोहन राय “सर्वभूत हिते रतः” रहकर ही अक्षय यश के भागी हैं।

वर्तमान समय में परोपकार का स्वरूप बदलता जा रहा है। परोपकार के आवरण में लोग अपने स्वार्थों की पूर्ति कर रहे हैं। कोई राजनीतिक नेता ‘गरीबी हटाओ’ का नारा लगाकर गरीबों का वोट अपनी ओर खींचता है तो कोई जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित करवाकर अपना वोट बैंक पक्का करता है। कुछ व्यापारी आयकर में छूट पाने के लिए औषधालय खुलवाते हैं तथा पंजीकृत संस्थाओं में दान देते हैं। यह आज के परोपकार का परिवर्तित स्वरूप है। भारतीय संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’, ‘सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय’ के सदविवेक का सन्देश देती है। आज ऐसी ही भावना की आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति के इन
सन्देशों को अपनाकर ही हम परोपकार के सर्वाधिक समीप पहुँच सकते हैं।

परोपकार किसी भी समाज एवं देश के सुख-संवर्धन का एकमात्र उपाय है। जिस समाज में परोपकारी लोगों का आधिक्य होगा वही सुखी और समृद्ध होगा। डॉ० हरिदत्त गौतम ‘अमर’ के शब्दों में

पर उपकार निरत जो सज्जन कभी नहीं मरते हैं।
चन्द्र सूर्य जब तक हैं उन पर यशः पुष्प झरते हैं।

 दैव-दैव आलसी पुकारा

सम्बद्ध शीर्षक

  • परिश्रम का महत्त्व
  • करम प्रधान बिस्व करि राखा?

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना,
  2.  भाग्यवाद : अकर्मण्यता का सूचक
  3.  प्रकृति भी परिश्रम का पाठ पढ़ाती है,
  4. शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम,
  5.  भाग्य और पुरुषार्थ,
  6. सफलता का रहस्य : श्रम,
  7.  उपसंहार।

फ्रस्तावना – जीवन के उत्थान में परिश्रम का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जीवन में आगे बढ़ने के लिए, ऊँचा उठने के लिए और सुयश प्राप्त करने के लिए श्रम ही आधार है। श्रम से कठिन-से-कठिन कार्य सम्पन्न किये जा सकते हैं। जो श्रम करता है, भाग्य भी उसका ही साथ देता है। जो निष्क्रिय रहता है, उसका भाग्य भी विपरीत है। श्रम के बल पर लोगों ने उफनती जलधाराओं को रोककर बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण कर दिया। इन्होंने श्रम के बल पर उत्तुंग, अगम्य पर्वत-चोटियों पर अपनी विजय का ध्वज फहरा दिया। श्रम के बल पर मनुष्य चन्द्रमा पर पहुँच गया। श्रम के द्वारा ही मानव समुद्र को लॉघ गया, खाइयों को पाट दिया तथा कोयले की खदानों से बहुमूल्य हीरे खोज निकाले। मानव सभ्यता और उन्नति का एकमात्र आधार श्रम ही है। श्रम के सोपानों का अवलम्ब लेकर मनुष्य अपनी मंजिल पर पहुँच जाता है। अतः परिश्रम ही मानव-जीवन का सच्चा सौन्दर्य है; क्योंकि परिश्रम के द्वारा ही मनुष्य अपने को पूर्ण बना सकता है। परिश्रम ही उसके जीवन में सद्भाग्य, उत्कर्ष और महानता लाने वाला है। जयशंकर प्रसाद जी ने भी कहा है

जितने कष्ट कण्टकों में है, जिनका जीवन-सुमन खिला,
गौरव-गन्ध उन्हें उतना ही, यत्र तत्र सर्वत्र मिला।

भाग्यवाद : अकर्मण्यता का सूचक-जिन लोगों ने परिश्रम का महत्त्व नहीं समझा; वे अभाव, गरीबी और दरिद्रता का दुःख भोगते रहे। जो लोग मात्र भाग्य को ही विकास का सहारा मानते हैं, वे भ्रम में हैं। आलसी और अकर्मण्य व्यक्ति सन्त मलूकदास का यह दोहा उद्धृत करते हैं

अजगर करे न चाकरी, पंछी करै न काम।
दास मलूका कह गये, सबके दाता राम ॥

मेहनत से जी चुराने वाले दास मलूका के स्वर में स्वर मिलाकर भाग्य की दुहाई के गीत गा सकते हैं; लेकिन वे नहीं सोचते कि जो चलता है, वही आगे बढ़ता है और मंजिल को प्राप्त करता है। कहा भी है

उद्यमेन ही सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य, प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥

अर्थात् परिश्रम से सभी कार्य सफल होते हैं, केवल कल्पना के महल बनाने से व्यक्ति अपने मनोरथ को पूर्ण नहीं कर सकता। शक्ति और स्फूर्ति से सम्पन्न गुफा में सोया हुआ वनराज शिकार-प्राप्ति के ख्याली पुलाव

पकाती रहे तो उसके उदर की अग्नि कभी भी शान्त नहीं हो सकती। सोया पुरुषार्थ फलता नहीं है। ऐसे ही अकर्मण्य व आलसी व्यक्ति के लिए कहा है

सकल पदारथ एहि जग माहीं। करमहीन नर पावत नाहीं।।

अर्थात् संसार में सुख के सकल पदार्थ होते हुए भी कर्महीन लोग उसका उपभोग नहीं कर पाते। जो कर्म करता हैं, फल उसे ही प्राप्त होता हैं और जीवन भी उसी का जगमगाता है। उसके जीवन उद्यान में ही रंग-बिरंगे सफलता के सुमन खिलते हैं।

परिश्रम से जी चुराना, आलस्य और प्रमोद में जीवन बिताने के समान बड़ा कोई पाप नहीं है। गांधी जी का कहना है कि जो लोग अपने हिस्से का काम किये बिना ही भोजन पाते हैं, वे चोर हैं। वास्तव में काहिली कायरों और दुर्बल जनों की शरण है। ऐसे आलसी मनुष्य में न तो आत्म-विश्वास ही होता है और न ही अपनी शक्ति पर भरोसा। किसी कार्य को करने में न तो उसे कोई उमंग होती है और न स्फूर्ति। परिणामस्वरूप पग-पग पर असफलता और निराशा के काँटे उसके पैरों में चुभते हैं।

प्रकृति भी परिश्रम का पाठ पढ़ाती है – प्रकृति के प्रांगण में झाँककर देखें तो चींटियाँ रात-दिन अथक परिश्रम करती हुई नजर आती हैं। पक्षी दाने की खोज में अनन्त आकाश में उड़ते हुए दिखाई देते हैं। हिरन आहार की खोज में वन-उपवन में कुलाँचे भरते रहते हैं। समस्त सृष्टि में श्रम का चक्र निरन्तर चलता ही रहता है। जो लोग श्रम को त्यागकर आलस्य का आश्रय लेते हैं वे जीवन में कभी सफल नहीं होते, क्योंकि ईश्वर भी उनकी सहायता नहीं करता- “God helps those who help themselves.” परिश्रमी व्यक्ति के लिए सफलता व स्वागत के द्वार स्वयमेव खुल जाते हैं

कर्मवीर के आगे पथ का, हर पत्थर साधक बनता है।
दीवारें भी दिशा बतातीं, जब वह आगे को बढ़ता है।

वस्तुतः परिश्रम द्वारा प्राप्त हुई उपलब्धि से जो मानसिक सन्तोष व आत्मिक तृप्ति प्राप्त होती है वह निष्क्रिय व्यक्ति को कदापि प्राप्त नहीं हो सकती। प्रकृति ने ही यह विधान बनाया है कि बिना परिश्रम के खाये हुए अन्न का पाचन भी सम्भव नहीं। व्यक्ति को विश्राम का आनन्द भी तभी प्राप्त होता है जब उसने भरपूर श्रम किया हो। वस्तुतः श्रम उन्नति, उत्साह, स्वास्थ्य, सफलता, शान्ति व आनन्द का मूलाधार है।

शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम – परिश्रम चाहे शारीरिक हो अथवा मानसिक दोनों ही श्रेष्ठ । सत्य तो यह है क़ि मानसिक श्रम की अपेक्षा शारीरिक श्रम कहीं अधिक श्रेयस्कर है। गांधी जी की मान्यता है कि स्वस्थ, सुखी और समुन्नत जीवन के लिए शारीरिक श्रम अनिवार्य है। शारीरिक श्रम प्रकृति का नियम है और इसकी अवहेलना निश्चय ही हमारे जीवन के लिए बहुत ही दु:खदायी सिद्ध होगी। परन्तु यह बड़ी लज्जा और क्षोभ की बात है कि आज मानसिक श्रम की अपेक्षा शारीरिक श्रम को नीची निगाहों से देखा जाता है। लोग अपना काम अपने हाथों से करने में लज्जा का अनुभव करते हैं।

भाग्य और पुरुषार्थ – भाग्य और पुरुषार्थ जीवन के दो पहिये हैं। भाग्यवादी बनकर हाथ पर हाथ रखकर बैठना मौत की निशानी है। परिश्रम के बल पर ही मनुष्य अपने बिगड़े भाग्य को बदल सकता है। परिश्रम ने महा मरुस्थलों को हरे-भरे उद्यानों में बदल दिया तथा मुरझाये जीवन में यौवन का वसन्त खिला दिया। कवि ने इन भावों को कितनी सुन्दर अभिव्यक्ति दी है

प्रकृति नहीं डरकर झुकती कभी भाग्य के बल से।
सदा हारती वह मनुष्य के उद्यम से श्रम जल से ।।

परिश्रम सुमन का सौरभ है, मनुष्य का भाग्य है, जीवन का नवनीत है व देवताओं के वरदान से बढ़कर है। परिश्रम जीवन को नन्दन वन बना देता है। कवि श्रम का यशोगान करता हुआ कहता है

जीवन एक सुमन मानो तो सौरभ उसको श्रम है।
देवों की वरदान शक्ति भी इसके आगे कम है।

सफलता का रहस्य श्रम – महापुरुष बनने का प्रथम सोपान परिश्रमशीलता है। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं। सभी कष्ट-सहिष्णुता और श्रम के कारण श्रद्धा, गौरव और यश के पात्र बने। वाल्मीकि, कालिदास, तुलसीदास आदि जन्म से महाकवि नहीं थे। उन्हें ठोकरें लगीं, ज्ञान-नेत्र खुले और अनवरत परिश्रम से महाकवि बने। गांधी जी का सम्मान उनके परिश्रम एवं कष्ट-सहिष्णुता के कारण ही है। इन सबने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण श्रमरत रहकर बिताया। उसी का परिणाम था कि वे सफलता के उच्च शिखर तक पहुँच सके। महान् । राजनेताओं, वैज्ञानिकों, कवियों, साहित्यकारों और ऋषि-मुनियों की सफलता का रहस्य एकमात्र परिश्रम ही है। इतिहास साक्षी है कि भाग्य का आश्रय छोड़कर कर्म में तत्पर होने वाले लोगों ने ही इतिहास का निर्माण किया है, समय पर शासन किया है। कृष्ण यदि भाग्य के सहारे बैठे रहते तो एक ग्वाले का जीवन बिताकर ही काल-कवलित हो गये होते, नादिरशाह ईरान में जीवनपर्यन्त भेड़ों को ही चराता हुआ मर जाता, स्टालिन अपने वंश-परम्परागत व्यवसाय (जूते बनाने) को करता हुआ एक कुशल मोची बनता, खुश्चेव कोयले की खदान का मजदूर ही रह जाता, गोर्की कूड़े-कचरे के ढेर से चीथड़े ही बीनता रहता, बाबर समरकन्द से भागकर हिन्दूकुश की पर्वत-श्रेणियों में ही खो जाता, शेरशाह सूरी बिहार के गाँव में किसी किसान का हलवाहा होता, हैदस्अली सेना का एक सामान्य सिपाही ही बना रहता, प्रेमचन्द एक प्राथमिक पाठशाला के अध्यापक के रूप में अज्ञात रह जाता और लाल बहादुर शास्त्री के लिए प्रधानमन्त्री का पद एक सुहावना सपना ही बना रहता। निश्चय ही इन्होंने जो कुछ पाया वह सब कुछ दृढ़ संकल्प-शक्ति, साहस, धैर्य, अपने ध्येय में अटल विश्वास और कर्म शौर्य के कारण ही पाया। इनकी सफलता के पीछे किसी भाग्य अथवा संयोग का हाथ न था। दुष्यन्त कुमार ने कहा भी है

कौन कहता है कि आसमाँ में सुराख नहीं होता।
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो॥

ऊपर उल्लिखित पुरुषों ने सम्भवत: ऐसा ही कोई कथन अपने जीवन के प्रेरक के रूप में अपनाया होगा। संस्कृत में भी कहा गया है

उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
दैवेन देयमिति का पुरुषा वदन्ति ।
दैवं विहाय पौरुषमात्मकृत्या ।
यले कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः ।।

तात्पर्य यह है कि उद्योगी पुरुष वास्तव में पुरुष-सिंह होता है, लक्ष्मी उसी का वरण करती है। ‘भाग्य देगा यह कायरों का कथन है। भाग्य को अलग रखकर परिश्रम करना चाहिए। यत्न करने पर भी यदि कुछ प्राप्त नहीं होता, तो इसमें तुम्हारा क्या दोष है?

उपसंहार – परिश्रमी व्यक्ति राष्ट्र की बहुमूल्य पूँजी है। श्रम वह महान् गुण है, जिससे व्यक्ति का विकास और राष्ट्र की उन्नति होती है। संसार में महान् बनने और अमर होने के लिए परिश्रमशीलता अनिवार्य है। श्रम से अपार आनन्द मिलता है। महात्मा गांधी ने हमें श्रम की पूजा का पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा“श्रम से स्वावलम्बी बनने का सौभाग्य मिलता है। हम अपने देश को श्रम और स्वावलम्बन से ही ऊँचा उठा सकते हैं।” श्रम की अद्भुत शक्ति को देखकर ही नेपोलियन ने कहा था कि, “संसार में असम्भव कोई काम नहीं। असम्भव शब्द को तो केवल मूर्खा के शब्दकोश में ही हूँढ़ा जा सकता है।” आधुनिक युग विज्ञान का युग है। प्रत्येक बात को तर्क की कसौटी पर कसा जा सकता है। भाग्य जैसी काल्पनिक वस्तुओं से अब जनता का विश्वास उठता जा रहा है। वास्तव में भाग्य श्रम से अधिक कुछ भी नहीं। श्रम का ही दूसरा नाम भाग्य है। जीवन में श्रम की महती आवश्यकता है। बिना श्रम के मानव-जाति का कल्याण नहीं, दु:खों से त्राण नहीं और समाज में उसका कहीं भी सम्मान नहीं। हमें सदैव इस बात को ध्यान रखना चाहिए कि अपने भाग्य के विधाता हम स्वयं हैं। जब हम कर्म करेंगे तो समय आने पर हमें उसका फल अवश्य ही मिलेगा। उसमें प्रकृति के नियमानुसार कुछ समय लगना स्वाभाविक ही है। कबीरदास ने ठीक ही कहा है

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींच सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय ॥

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य-साहित्यका विकास ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित लेखक और उनकी रचनाएँ

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Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
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ध्यातव्य – यहाँ ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित सभी लेखकों की प्रमुख रचनाओं और रचना-विधाओं का उल्लेख किया जा रहा है। प्रथम प्रश्न-पत्र के अन्तर्गत पूछे जा रहे बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तर हेतु इनका अध्ययन आवश्यक होगा। विद्यार्थियों को चाहिए कि वे गद्य-गरिमा’ और ‘कथा- भारती’ पाठ्य-पुस्तकों में दी गयी भूमिका, लेखक-परिचय आदि का भी सम्यक् अध्ययन करें। इनमें भी आपको बहुविकल्पीय प्रश्नों से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण सामग्री प्राप्त होगी।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi साहित्यिक निबन्ध

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Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name साहित्यिक निबन्ध
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साहित्यिक निबन्ध

1. साहित्य और समाज

सम्बद्ध शीर्षक

  • साहित्य समाज का दर्पण है
  • साहित्य और मानव-जीवन
  • साहित्य समाज की अभिव्यक्ति

प्रमुख विचार-बिन्दु:

  1. साहित्य क्या है?
  2. साहित्य की कतिपय परिभाषाएँ,
  3.  समाज क्या है?
  4.  साहित्य और समाज का पारस्परिक सम्बन्ध : साहित्य समाज का दर्पण,
  5. साहित्य की रचनाप्रक्रिया,
  6.  साहित्य का समाज पर प्रभाव,
  7.  उपसंहार।

साहित्य क्या है? – साहित्य’ शब्द ‘सहित’ से बना है। ‘सहित’ का भाव ही साहित्य कहलाता है ( सहितस्य भावः साहित्यः)। ‘सहित’ के दो अर्थ हैं – साथ एवं हितकारी (स + हित = हितसहित) या कल्याणकारी। यहाँ ‘साथ’ से आशय है—शब्द और अर्थ का साथ अर्थात् सार्थक शब्दों का प्रयोग। सार्थक शब्दों का प्रयोग तो ज्ञान-विज्ञान की सभी शाखाएँ करती हैं। तब फिर साहित्य की अपनी क्या विशेषता है? वस्तुत: साहित्य का ज्ञान-विज्ञान की समस्त शाखाओं से स्पष्ट अन्तर है

  1.  ज्ञान-विज्ञान की शाखाएँ बुद्धिप्रधान या तर्कप्रधान होती हैं जब कि साहित्य हृदयप्रधान।
  2.  ये शाखाएँ तथ्यात्मक हैं जब कि साहित्य कल्पनात्मक।
  3. ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं का मुख्य लक्ष्य मानव की भौतिक सुख-समृद्धि एवं सुविधाओं का विधान करना है, पर साहित्य का लक्ष्य तो मानव के अन्त:करण का परिष्कार करते हुए, उसमें सद्वृत्तियों का संचार करना है। आनन्द प्रदान कराना यदि साहित्य की सफलता है, तो मानव-मन का उन्नयन उसकी सार्थकता।
  4. ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं में कथ्य (विचार-तत्त्व) ही प्रधान होता है, कथन-शैली गौण। वस्तुतः भाषा-शैली वहाँ विचाराभिव्यक्ति की साधनमात्र है। दूसरी ओर साहित्य में कथ्य से अधिक शैली का महत्त्व है।

उदाहरणार्थ                                                                              जल उठा स्नेह दीपक-सा
                                                                                            नवनीत हृदये था मेरा,
                                                                                             अब शेष धूमरेखा से
                                                                                            चित्रित कर रहा अँधेरा।

कवि का कहना केवल यह है कि प्रिय के संयोगकाल में जो हृदय हर्षोल्लास से भरा रहता था, वही अब उसके वियोग में गहरे विषाद में डूब गया है। यह एक साधारण व्यापार है, जिसका अनुभव प्रत्येक प्रेमी-हृदय करता है, किन्तु कवि ने दीपक के रूपक द्वारा इसी साधारण-सी बात को अत्यधिक चमत्कारपूर्ण ढंग से कहा है, जो पाठक के हृदय को कहीं गहरी छू लेता है।

स्पष्ट है कि साहित्य में भाव और भाषा, कथ्य और कथन-शैली (अभिव्यक्ति) दोनों का समान महत्त्व है। यह अकेली विशेषता ही साहित्य को ज्ञान-विज्ञान की शेष शाखाओं से अलग करने के लिए पर्याप्त है।

साहित्य की कतिपय परिभाषाएँ – प्रेमचन्द जी साहित्य की परिभाषा इन शब्दों में देते हैं, “सत्य से आत्मा का सम्बन्ध तीन प्रकार का है-एक जिज्ञासा का, दूसरा प्रयोजन का और तीसरा आनन्द का। जिज्ञासा का सम्बन्ध दर्शन का विषय है, प्रयोजन का सम्बन्ध विज्ञान का विषय है और आनन्द का सम्बन्ध केवल साहित्य का विषय है। सत्य जहाँ आनन्द का स्रोत बन जाता है, वहीं वह साहित्य हो जाता है।” इस बात को विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर इन शब्दों में कहते हैं, “जिस अभिव्यक्ति का मुख्य लक्ष्य प्रयोजन के रूप को व्यक्त करना नहीं, अपितु विशुद्ध आनन्द रूप को व्यक्त करना है, उसी को मैं साहित्य कहता हूँ।’ प्रसिद्ध अंग्रेज समालोचक द क्विन्सी (De Quincey) के अनुसार साहित्य का दृष्टिकोण उपयोगितावादी न होकर मानवतावादी है। “ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं का लक्ष्य मानव का ज्ञानवर्द्धन करना है, उसे शिक्षा देना है। इसके विपरीत साहित्य मानव का अन्त:विकास करता है, उसे जीवन जीने की कला सिखाता है, चित्तप्रसादन द्वारा उसमें नूतन प्रेरणा एवं स्फूर्ति का संचार करता है।”

समाज क्या है? – एक ऐसा मानव-समुदाय, जो किसी निश्चित भू-भाग पर रहता हो, समान परम्पराओं, इतिहास, धर्म एवं संस्कृति से आपस में जुड़ा हो तथा एक भाषा बोलता हो, समाज कहलाता है।

साहित्य और समाज का पारस्परिक सम्बन्ध : साहित्य समाज का दर्पण – समाज और साहित्य परस्पर घनिष्ठ रूप से आबद्ध हैं। साहित्य का जन्म वस्तुत: समाज से ही होता है। साहित्यकार किसी समाज विशेष का ही घटक होता है। वह अपने समाज की परम्पराओं, इतिहास, धर्म, संस्कृति आदि से ही अनुप्राणित होकर साहित्य-रचना करता है और अपनी कृति में इनका चित्रण करता है। इस प्रकार साहित्यकार अपनी रचना की सामग्री किसी समाज विशेष से ही चुनता है तथा अपने समाज की आशाओं-आकांक्षाओं, सुखों-दुःखों, संघर्षों, अभावों और उपलब्धियों को वाणी देता है तथा उसका प्रामाणिक लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। उसकी समर्थ वाणी का सहारा पाकरे समाज अपने स्वरूप को पहचानती है और अपने रोग का सही निदान पाकर उसके उपचारे को तत्पर होता है। इसी कारण किसी साहित्य विशेष को पढ़कर उस काल के समाज का एक समग्र-चित्र मानसपटल पर अंकित हो सकता है। इसी अर्थ में साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है।

साहित्य की रचना-प्रक्रिया – समर्थ साहित्यकार अपनी अतलस्पर्शिनी प्रतिभा द्वारा सबसे पहले अपने समकालीन सामाजिक जीवन को बारीकी से पर्यवेक्षण करता है, उसकी सफलताओं-असफलताओं, उपलब्धियों-अभावों, क्षमताओं-दुर्बलताओं तथा संगतियों-विसंगतियों की गहराई तक थाह लेता है। इसके पश्चात् विकृतियों और समस्याओं के मूल कारणों का निदान कर अपनी रचना के लिए उपयुक्त सामग्री का चयन करता है और फिर इस समस्त बिखरी हुई, परस्पर असम्बद्ध एवं अति साधारण-सी दीख पड़ने वाली सामग्री को सुसंयोजित कर उसे अपनी ‘नवनवोन्मेषशालिनी कल्पना के साँचे में ढालकर ऐसा कलात्मक रूप एवं सौष्ठव प्रदान करता है कि सहृदय अध्येता रस-विभोर हो नूतन प्रेरणा से अनुप्राणित हो उठता है। कलाकार का वैशिष्ट्य इसी में है कि उसकी रचना की अनुभूति एकाकी होते हुए भी सार्वदेशिक-सार्वकालिक बन जाये तथा अपने युगे की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हुए चिरन्तन मानव-मूल्यों से मण्डित भी हो। उसकी रचना न केवल अपने युग, अपितु आने वाले युगों के लिए भी नवस्फूर्ति का अजस्र स्रोत बन जाये और अपने देश-काल की उपेक्षा न करते हुए देश-कालातीत होकर मानवमात्र की अक्षय निधि बन जाये। यही कारण है। कि महान् साहित्यकार किसी विशेष देश, जाति, धर्म एवं भाषा-शैली के समुदाय में जन्म लेकर भी सारे विश्व का अपना बन जाता है; उदाहरणार्थ-वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, तुलसीदास, होमर, शेक्सपियर आदि किसी देश विशेष के नहीं मानवमात्र के अपने हैं, जो युगों से मानव को नवचेतना प्रदान करते आ रहे हैं।

साहित्य का समाज पर प्रभाव – साहित्यकार अपने समकालीन समाज से ही अपनी रचना के लिए आवश्यक सामग्री का चयन करता है; अतः समाज पर साहित्य का प्रभाव भी स्वाभाविक है। जैसा कि ऊपरे संकेतित किया गया है कि महान् साहित्यकार में एक ऐसी नैसर्गिक या ईश्वरदत्त प्रतिभा होती है, एक ऐसी अतलस्पर्शिनी अन्तर्दृष्टि होती है कि वह विभिन्न दृश्यों, घटनाओं, व्यापारों या समस्याओं के मूल तक तत्क्षण पहुँच जाता है, जब कि राजनीतिज्ञ, समाजशास्त्री या अर्थशास्त्री उसका कारण बाहर टटोलते रह जाते हैं। इतना ही नहीं, साहित्यकार रोग का जो निदान करता और उपचार सुझाता है, वही वास्तविक समाधान होता है। इसी कारण प्रेमचन्द जी ने कहा है कि “साहित्य राजनीति के आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है, राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं।” अंग्रेज कवि शेली ने कवियों को विश्व के अघोषित विधायक’ (unacknowledged legislators of the world) कहा है।

प्राचीन ऋषियों ने कवि को विधाता और. द्रष्टा कहा है – ‘कविर्मनीषी धाता स्वयम्भूः।‘ साहित्यकार कितना बड़ा द्रष्टा होता है, इसका एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा। आज से लगभग 70-75 वर्ष पूर्व श्री देवकीनन्दन खत्री ने अपने तिलिस्मी उपन्यास ‘रोहतासमठ’ में यन्त्रमानव (robot) के कार्यों का विस्मयकारी चित्रण किया था। उस समय यह सर्वथा कपोल-कल्पित लगा; क्योंकि उस काल में यन्त्रमानव की बात किसी ने सोची तक न थी, किन्तु आज विज्ञान ने उस दिशा में बहुत प्रगति कर ली है, यह देख श्री खत्री की नवनवोन्मेष- शालिनी प्रतिभा के सम्मुख नतमस्तक होना पड़ता है। इसी प्रकार आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व पुष्पक विमान के विषय में पढ़ना कल्पनामात्र लगता होगा, परन्तु आज उससे कहीं अधिक प्रगति वैमानिकी ने की है।

साहित्य द्वारा सामाजिक और राजनीतिक क्रान्तियों के उल्लेखों से तो विश्व का इतिहास भरा पड़ा है। सम्पूर्ण यूरोप को गम्भीर रूप से आलोड़ित कर डालने वाली फ्रांस की राज्य क्रान्ति (1789 ई०), रूसो की ‘ला कोंत्री सोसियल’ (La Contract Social–सामाजिक-अनुबन्ध) नामक पुस्तक के प्रकाशने का ही परिणाम थी। आधुनिक काल में चार्ल्स डिकेन्स के उपन्यासों ने इंग्लैण्ड से कितनी ही घातक सामाजिक एवं शैक्षिक रूढ़ियों का उन्मूलन कराकर नूतन स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था का सूत्रपात कराया।

आधुनिक युग में प्रेमचन्द के उपन्यासों में कृषकों पर जमींदारों के बर्बर अत्याचारों एवं महाजनों द्वारा उनके क्रूर शोषण के चित्रों ने समाज को जमींदारी-उन्मूलन एवं ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की स्थापना को प्रेरित किया। उधर बंगाल में शरत्चन्द्र ने अपने उपन्यासों में कन्याओं के बाल-विवाह की अमानवीयता एवं विधवाविवाह-निषेध की नृशंसता को ऐसी सशक्तता से उजागर किया कि अन्तत: बाल-विवाह को कानून द्वारा निषिद्ध घोषित किया गया एवं विधवा-विवाह का प्रचलन हुआ।

उपसंहार – निष्कर्ष यह है कि समाज और साहित्य का परस्पर अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। साहित्य समाज से ही उद्भूत होता है; क्योंकि साहित्यकार किसी समाज विशेष का ही अंग होता है। वह इसी से प्रेरणा ग्रहणकर साहित्य-रचना करता है एवं अपने युग की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता हुआ समकालीन समाज का मार्गदर्शन करता है, किन्तु साहित्यकार की महत्ता इसमें है कि वह अपने युग की उपज होने पर भी उसी से बँधकर नहीं रह जाये, अपितु अपनी रचनाओं से चिरन्तन मानवीय आदर्शों एवं मूल्यों की स्थापना द्वारा देशकालातीत बनकर सम्पूर्ण मानवता को नयी ऊर्जा एवं प्रेरणा से स्पन्दित करे। इसी कारण साहित्य को विश्व-मानव की सर्वोत्तम उपलब्धि माना गया है, जिसकी समकक्षता संसार की मूल्यवान्-से-मूल्यवान् वस्तु भी नहीं कर सकती; क्योंकि संसार का सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान मानवता के शरीर का ही पोषण करता है, जब कि एकमात्र साहित्य ही उसकी आत्मा का पोषक है। एक अंग्रेज विद्वान् ने कहा है कि “यदि कभी सम्पूर्ण अंग्रेज जाति नष्ट भी हो जाये, किन्तु केवल शेक्सपियर बचा रहे तो अंग्रेज जाति नष्ट नहीं हुई मानी जाएगी। ऐसे युगस्रष्टा और युगद्रष्टा कलाकारों के सम्मुख सम्पूर्ण मानवता कृतज्ञतापूर्वक नतमस्तक होकर उन्हें अपने हृदय-सिंहासन पर प्रतिष्ठित करती है एवं उनके यश को दिग्दिगन्तव्यापी बना देती है। अपने पार्थिव शरीर से तिरोहित हो जाने पर भी वे अपने यशरूपी शरीर से इस धराधाम पर सदा अजर-अमर बने रहते हैं

जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः।
नास्ति येषां यशः काये जरामरणजे भयम् ॥

2. मेरा प्रिय ग्रन्थ (श्रीरामचरितमानस)

सम्बद्ध शीर्षक

  • मेरी प्रिय पुस्तक
  • तुलसी और उनका काव्य
  • हिन्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय, अमर साहित्यिक कृति

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना : पुस्तकों का महत्त्व,
  2.  श्रीरामचरितमानस की महत्ता,
  3.  कथा संगठन,
  4.  चरित्र-चित्रण,
  5.  भक्ति-भावना,
  6.  भाव-व्यंजना,
  7. भाषा-शैली,
  8.  आदर्श की स्थापना,
  9. भारत पर तुलसी का ऋण,
  10.  उपसंहार।

प्रस्तावना : पुस्तकों का महत्त्व – किसी विद्वान् ने लिखा है कि व्यक्ति को अपने यौवन में ही किसी लेखक या पुस्तक को अपना प्रिय अवश्य बना लेना चाहिए, जिससे वह उससे आजीवन सोत्साह जीने का सम्बल प्राप्त कर सके। पुस्तकों से अच्छा साथी दूसरा नहीं। वे व्यक्ति को सहारा देती हैं, उससे सहारा नहीं माँगती। हर समय व्यक्ति के पास उपस्थित रहती हैं, किन्तु अपनी उपस्थिति से उसका ध्यान नहीं बँटातीं। एक सन्मित्र की भाँति सदा परामर्श को तत्पर रहती हैं, फिर भी अपनी राय उस पर नहीं थोपतीं।

पुस्तकों की इन्हीं विशेषताओं से प्रभावित होकर मैंने उनमें विशेष रुचि ली और ग्रन्थों का अध्ययन किया, जिसके फलस्वरूप मैंने अनुभव किया कि गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘श्रीरामचरितमानस’ एक सर्वांगपूर्ण रचना है, जो हर दृष्टि से असाधारण है एवं महत्तम मानवीय मूल्यों तथा आदर्शों से स्पन्दित है।

श्रीरामचरितमानस की महत्ता – वाल्मीकि रामायण के काल से लेकर आज तक समस्त रामकाव्यों की यदि तुलसीकृत ‘श्रीरामचरितमानस से तुलना की जाए तो यह स्पष्टतः दीख पड़ेगा कि आदिकाव्य से उद्भूत रामकाव्य-परम्परा ‘मानस में आकर पूर्ण परिणति को प्राप्त हुई है। चाहे वस्तु संघटन कौशल की दृष्टि से देखें, चाहे पात्रों के चरित्र-चित्रण के चरमोत्कर्ष की दृष्टि से और चाहे महाकाव्य एवं नाटकीयता के अद्भुत सामंजस्य द्वारा प्राप्त शैली की विमुग्धकारिणी प्रौढ़ता की दृष्टि से; यह निष्कर्ष तर्कसंगत और साधारे प्रतीत होगा, न कि मात्र भावुकताप्रेरित। फलत: क्या आश्चर्य, यदि ‘मानस’ संसार के कला-पारखियों का हृदयहार रहा है, जिसका ज्वलन्त प्रमाण यह है कि किसी भी रामचरित-विषयक काव्य के विश्व की विभिन्न भाषाओं में इतने अनुवाद उपलब्ध नहीं होते, जितने ‘श्रीरामचरितमानस’ के। एक ओर यदि अमरीकी पादरी ऐटकिन्स ने अपनी आयु के श्रेष्ठ आठ वर्ष लगाकर ‘मानस’ का अंग्रेजी में पद्यानुवाद किया (जब कि इससे पूर्व उस भाषा में इसके कई अनुवाद विद्यमान थे), तो दूसरी ओर अनीश्वरवादी रूस के मूर्धन्य विद्वान् प्रोफेसर वरान्नीकोव ने अपने अमूल्य जीवन का एक बड़ा भाग लगाकर तथा द्वितीय विश्वयुद्ध की भीषण परिस्थिति में कजाकिस्तान में शरणार्थी के रूप में रहकर भी रूसी भाषा में इसका पद्यानुवाद किया। उपर्युक्त मनीषियों के अतिरिक्त गार्साद तासी (फ्रेंच); ग्राउज़, ग्रियर्सन, ग्रीव्ज, कारपेण्टर, हिल (आंग्लभाषी विद्वान) आदि न जाने कितने काव्यमर्मज्ञ तुलसी की प्रतिभा पर मुग्ध हैं।

कथा-संगठन – यदि मानस पर कथावस्तु की दृष्टि से विचार करें तो हम पाएँगे कि इसमें गोस्वामी जी ने पुराने प्रसंगों को नया रूप देकर, कई को अधिक उपयुक्त स्थल पर रखकर, कुछ को संक्षिप्त और कुछ को विस्तृत कर तथा कुछ नये प्रसंगों की उद्भावना कर कथावस्तु को सर्वथा मौलिक बना दिया है। उनके बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड का अधिकांश तो मौलिक है ही, पर अयोध्याकाण्ड में तो उनकी कुशलता देखते ही बनती है। इसके पूर्वार्द्ध के संघर्षमय वातावरण की उन्होंने जिस कलानिपुणता से सृष्टि की है, उस पर उनकी मौलिकता की छाप है और उत्तरार्द्ध को भरत-चरित्र तो उनकी सर्वथा अनूठी रचना है। भरत के माध्यम से उन्होंने अपनी भक्ति-भावना को साकार रूप प्रदान किया है। आरम्भ से अन्त तक ‘मानस’ की कथावस्तु में असाधारण प्रवाह है।

चरित्र-चित्रण – श्रीरामचरितमानस में प्रस्तुत चरित्र-चित्रण अपनी मौलिकता में वाल्मीकीय ‘रामायण’ और अध्यात्म’ को बहुत पीछे छोड़ जाता है। सामान्यतः इसके सभी चरित्र नये साँचे में ढलकर नयी गरिमा से मण्डित हुए हैं, पर राम के चरित्र को इस ग्रन्थ में जिन मौलिक उपादानों से गढ़ा गया है, वे सर्वथा अभूतपूर्व हैं। इस ग्रन्थ में पहली बार राम में नरत्व के साथ परब्रह्म का सामंजस्य स्थापित किया गया है। राम में शक्ति, शील तथा सौन्दर्य की पराकाष्ठा दिखाकर राम के शील का जैसा दिव्य-चित्रण किया गया है, वह सर्वथा अभूतपूर्व और अतुलनीय है।

भक्ति-भावना – ‘श्रीरामचरितमानस में तुलसी की भक्ति सेवक-सेव्य भाव की होते हुए भी परम्परागत भक्ति से भिन्न है। गोस्वामी जी की भक्ति साधन नहीं, स्वयं साध्य है और ज्ञानादि उसके चाकरमात्र हैं। इस ग्रन्थ में गोस्वामी जी ने भरत के रूप में अपनी भक्ति का आदर्श खड़ा किया है और भरत अपनी तन्मयता में राधाभाव के समीप पहुँच जाते हैं; अतः उनके विषय में यह नि:संकोच कहा जा सकता है कि “माधुर्य भाव की उपासना में जो स्थान राधा का है, दास्य भाव की उपासना में वही स्थान भरत का है। इस प्रकार तुलसी की उपासना में जो स्थान राधा की है। स्वीच जैसा कोई भेदभाव नहीं। भक्ति का स्वरूप सर्वथा मौलिक बन पड़ा है जिसमें छुटपन-बड़प्पन या ऊँच-नीच जैसा कोई भेदभाव नहीं। इस भक्तिरूपी रसायन द्वारा श्रीरामचरितमानस के माध्यम से गोस्वामी जी ने मृतप्रायः हिन्दू जाति को नवजीवन प्रदान किया।

भाव-व्यंजना – गोस्वामी जी रससिद्ध कवीश्वर थे, भाव और भाषा के अप्रतिम सम्राट् थे। उन्होंने ‘मानस’ में शास्त्रोक्त नव रसों को तो साकार किया ही, अपनी अलौकिक प्रतिभा से भक्ति-रस नामक एक नूतन रस की भी सृष्टि कर डाली। गोस्वामी जी ने रस-परिपाक के अतिरिक्त संचारी भावों एवं अनुभावों की अलग से भी ऐसी कुशल योजना की है कि उनकी काव्य-प्रतिभा पर दंग रह जाना पड़ता है। श्रीरामचरितमानस’ से संचारियों एवं अनुभावों का लिखित, योजनाबद्ध समग्र चित्र खड़ा करने का कौशल द्रष्टव्य है

उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा॥

भरत के आगमन पर प्रेमजन्य अधीरता एवं हर्षजन्य आवेग के कारण राम जो अति वेगपूर्वक ऊठते हैं, उससे जहाँ एक ओर उनका भरत के प्रति अनुराग साकार हो उठा है, वहीं उनकी मानव सुलभ अधीरता भी चित्रित से जाती है।
‘श्रीरामचरितमानस’ में उपमाओं की सादगी एवं मार्मिकता पर सारा सहृदय समाज मुग्ध है। एक उदाहरण पर्याप्त होगा–सम्पूर्ण लंका में एकमात्र विभीषण ही सन्त-स्वभाव के थे। शेष सारा समाज दुर्जन और परपीड़क था। ऐसों के बीच में रहकर जीने के लिए विवश विभीषण अपनी दशा का वर्णन करते हुए हनुमान जी से कहते हैं

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्ह महँ जीभ बिचारी॥

अर्थात् हे पवनपुत्र! लंका में मैं वैसा ही विवश जीवन जी रहा हूँ, जैसा बत्तीस दाँतों के बीच में रहकर जीने को विवश बेचारी जीभ न दाँतों का संग छोड़ सकती है, न उनसे निश्चिन्त हो सकती है। इसी प्रकार काव्य के समस्त अंगों-उपांगों कर ‘श्रीरामचरितमानस में चित्रण इसे एक नयी अर्थवत्ता प्रदान करता है।

भाषा-शैली – मानस में महाकवि तुलसी ने संस्कृत की महत्ता एवं एकछत्र साम्राज्य के उस युग में अनगढ़ लोकभाषा को अपनाकर उसे बड़े मनोयोग से सजाया-सँवारा। इस ग्रन्थ में इन्होंने अपनी असामान्य प्रतिभा के बल पर रस को रसात्मकता, अलंकार को अलंकरण तथा छन्द को नयी गति-भंगिमा और संगीतात्मकता प्रदान की तथा हमारे आस-पास के सुपरिचित जीवन से उपमानों का चयनकर उनमें नयी अर्थवत्ता और व्यंजकता भर दी। काव्य में नाटकीयता के मणिकांचन योग द्वारा नयी शैली को जन्म दिया, जिसने एक ही ग्रन्थ को श्रव्य-काव्य और दृश्य-काव्य दोनों बना दिया।

आदर्श की स्थापना – ‘मानस’ की रामकथा – एक आदर्श मानव की, एक आदर्श परिवार की, एक आदर्श एवं पूर्ण जीवन की कथा है। तुलसी ने वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक प्रत्येक क्षेत्र में जिन आदर्शों की स्थापना की, वे व्यक्ति के इहलौकिक और पारलौकिक-दोनों ही जीवनों को सँवारने वाले हैं। इसी कारण ‘मानस’ पारिवारिक जीवन का महाकाव्य कहलाता है; क्योंकि परिवार ही व्यक्ति की प्रथम पाठशाला है और पारिवारिक जीवन की सुदृढ़ता शेष समस्त क्षेत्रों को भी सुदृढ़ बनाती है। आदर्श राज्य के रूप में तुलसी के रामराज्य की कल्पना आरम्भ से ही भारतीय जन-मानस को प्रेरणा देती रही है और देती रहेगी।

भारत पर तुलसी का ऋण – इस सम्बन्ध में डॉ० सुनीति कुमार चटर्जी लिखते हैं कि “अपनी भक्ति के साथ-साथ समाज की रक्षा के लिए उनका अपरिसीम आग्रह था और इसी भक्ति और समाज-रक्षा की चेष्टा के फलस्वरूप ‘श्रीरामचरितमानस’ नामक महाग्रन्थ रचित हुआ, जिसकी पूतधारी ने आज तक उत्तर भारत की हिन्दू जनता के चित्त को सरस और शक्तिमान बनाये रखा है और उसके चरित्र को सामाजिक सद्गुणों के आदर्श की ज्योति से सदा आलोकित कर रखा है।”

उपसंहार – अस्तु, मौलिकता का श्रेष्ठतम सम्बल पाकर ही तुलसी का ‘श्रीरामचरितमानस’ लोक-मानस बन सका है, यह तुलसी की कवि-प्रतिभा और उनकी जागरूक कलाकारिता का प्रमाण है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के शब्दों में-“तुलसीदास कवि थे, भक्त थे, समाज-सुधारक थे, लोकनायक थे और भविष्य के स्रष्टा थे। इन रूपों में उनका कोई भी रूप किसी से घटकर नहीं था। यही कारण था कि उन्होंने सब ओर से समता (balance) की रक्षा करते हुए एक अद्वितीय काव्य की सृष्टि की, जो अब तक उत्तर भारत का मार्गदर्शक रहा है और उस दिन भी रहेगा, जिस दिन नवीन भारत का जन्म हो गया होगा।’

तुलसी कृत ‘श्रीरामचरितमानस’ का मूल्यांकन करते हुए डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल लिखते हैं कि, श्रीरामचरितमानस विक्रम की दूसरी सहस्राब्दी का सबसे अधिक प्रभावशाली ग्रन्थ है।” भारतीय वाङ्मय के समुद्र से अनेक विचार-मेघ उठे और बरसे। उनके अमृत-तुल्य जल की जिस मात्रा में जनता को आवश्यकता थी, उसे समेटकर मानो गोसाईं जी ने श्रीरामचरितमानस में भर दिया है। जो अन्यत्र था, वह साररूप से यहाँ आ गया है। तुलसी का ‘श्रीरामचरितमानस’ विक्रम की दूसरी सहस्राब्दी के साहित्याकाशे का खुला नेत्र है, उसे ही तत्कालीन लोक की दर्शनक्षमता या आँख कह सकते हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi वर्णनात्मक निबन्ध

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 11
Chapter Name वर्णनात्मक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi वर्णनात्मक निबन्ध

वर्णनात्मक निबन्ध

किसी रोचक यात्रा का वर्णन

सम्बद्ध शीर्षक

  • मेरे जीवन की अविस्मरणीय घटना
  • किसी तीर्थस्थल का वर्णन
  • कोई यात्रा संस्मरण
  • किसी रोमांचकारी यात्रा का वर्णन
  • किसी अविस्मरणीय यात्रा का वर्णन

प्रमुख विचार-विन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2. यात्रा की योजना,
  3. यात्रा की पूर्व सन्ध्या,
  4.  मार्ग का वर्णन,
  5. बद्रीनाथ धाम का वर्णन,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना – ‘यात्रा’ शब्द इतना आकर्षक है कि ऐसा कौन है, जिसका हृदय इसे सुनकर उत्साह-उमंग से न भर जाए। सच बात तो यह है कि आजीविका हेतु धन अर्जन करते दैनन्दिन जीवन एक ही बँधे-बँधाये ढर्रे पर बिताते-बिताते मन इतना ऊब जाता है कि वह अपने जीवन-चक्र में बदलाव चाहता है। यात्रा इसी इच्छित परिवर्तन का सुखद अवसर प्रस्तुत करती है। साथ ही नये स्थान देखने, नये व्यक्तियों से मिलने एवं नयी भाषा . सुनने का आकर्षण भी कुछ कम प्रबल नहीं होता।

यात्रा की योजना – उत्तर में बदरिकाश्रम हिन्दुओं का अति पवित्र तीर्थस्थल है। नर और नारायण नामक महर्षियों ने यहाँ हजारों वर्षों तक तपस्या करके इस स्थान को विशेष गरिमा प्रदान की है। फिर भगवान् बादरायण (वेदव्यास) ने यहीं गुफा में बैठकर वेदान्त-सूत्रों की रचना की थी। अत: बदरिकाश्रम के दर्शनों की अभिलाषा बहुत दिनों से मन में थी, परन्तु समुद्र से बारह हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित यह स्थान अति दुर्गम है। अभी कुछ दशक पूर्व तक यहाँ की यात्रा पैदल ही करनी पड़ती थी। पर आज खास मन्दिर के निकट तक बस या मोटर जाती है; अतः हम मित्रों ने हिम्मत करके बदरिकाश्रम-यात्रा का विचार बनाया।

यात्रा की पूर्व-सन्ध्या – हम लोग बस द्वारा ऋषिकेश पहुँचे। वहाँ मैंने अपने एक सम्बन्धी को पत्र डालकर टैक्सी तय करने का निर्देश पहले ही दे दिया था; अतः ऋषिकेश पहुँचते ही टैक्सी की व्यवस्था पक्की थी। अगले दिन प्रात: ही निकलना था; क्योंकि मालूम हुआ कि लगातार 14 घण्टे की मोटर-यात्रा के बाद ही गन्तव्य स्थल तक उसी दिन पहुँचा जा सकता है, अन्यथा मार्ग में एक दिन रुकना पड़ेगा। इसका एक कारण यह भी है : कि जोशीमठ से ‘वन वे ट्रैफिक’ (एकमार्गीय यातायात) शुरू हो जाता है। ऐसा अवरोध तीन स्थानों पर है, जिससे पर्याप्त समय लग जाता है; अतः एक ही दिन में बदरिकाश्रम पहुँचना तय रहा।

मार्ग का वर्णन – यद्यपि टैक्सी वाले ने पहले ही दिन आकर सुझाव दिया था कि प्रातः 4 बजे निकल पड़ना अच्छा रहेगा, पर हमें निकलते-निकलते छः बज गये, किन्तु नेपाली टैक्सी-ड्राइवर बहुत कुशल था, इसलिए लगातार चढ़ाई के बावजूद उसने हम लोगों को समय पर श्रीनगर पहुँचा दिया। श्रीनगर ऋषिकेश से 96 किलोमीटर दूर है। एक तो प्रातः का समय, दूसरे श्रीनगर तक दोनों ओर के पर्वतों पर पर्याप्त वनस्पति दीख पड़ती है। बीच-बीच में पर्वत से बहकर आने वाले जलस्रोत बड़ा ही मनोरम दृश्य उपस्थित करते हैं। ये जलस्रोत अक्सर मोटर-मार्ग को काटते हुए लगभग तीन हजार फीट नीचे अलकनन्दा नदी में गिरते हैं। इतनी ऊँचाई से अलकनन्दा एक छोटी नहर-जैसी दीख पड़ती है, पर पहाड़ी नदी होने के कारण उसमें दुर्धर्ष वेग है। विशाल शिलाखण्डों से टकराकर उछलता हुआ उसको जल भीषण-ध्वनि उत्पन्न करके हृदयों को भयकम्पित करता है। शीतल वायु, पर्वतीय पुष्पों की सुगन्ध एवं पक्षियों का कलरव; यात्रियों की थकान को मिटाने के साथ-साथ उनका मन मोह लेता है। इस सारे सुरम्य वातावरण के बावजूद एक ऐसी बात भी थी, जो मेरे लिए अतीव कष्टकर थी और वह यह कि टैक्सी बहुत जल्दी-जल्दी मोड़ ले रही थी। कहीं चढ़ाई तो कहीं सीधा उतार। पेट में उथल-पुथल-सी मचने लगी। जैसे-तैसे श्रीनगर पहुँचकर सभी लोगों ने चाय-नाश्ता लिया और तत्काल चल पड़े; क्योकि अभी हमारे सामने लगभग 11 घण्टे की यात्रा शेष थी। टैक्सी ड्राइवर ने बताया कि यदि हम लोग जोशीमठ’ चार बजे तक नहीं पहुँच पाये तो पुलिस वहीं रोक लेगी; क्योंकि जोशीमठ से आगे का मार्ग अत्यधिक दुर्गम और चढ़ाई एकदम खड़ी है; इसलिए चार बजे तक जोशीमठ पहुँचने वाले यात्रियों को ही आगे बढ़ने की अनुमति दी जाती है।

हम लोग श्रीनगर से लगभग साढ़े दस बजे निकल सके। दुर्गम पहाड़ी मार्गों पर भी हमारा कुशल ड्राइवर टैक्सी को उड़ाता ले चला, पर गन्तव्य दूर से दूरतर होता प्रतीत हुआ। इस समय प्रचण्ड धूप सर्वत्र छा गयी थी। 30 जून सन् 2010 ई० का दिन था। भयंकर गर्मी बढ़ती ही जा रही थी, किन्तु श्रीनगर से आगे बढ़ने पर जैसे-जैसे हम ऊँचाई पर चढ़ते गये। हमें गर्मी से तो राहत मिली ही, साथ ही दोनों ओर पहाड़ों की ढालों पर उगी घनी वनस्पति ने हमारा अभिनन्दन भी किया। विशाल वृक्षों की सान्द्र छाया हमारे मार्ग को शीतल, सुखद और सुरम्ये बना रही थी तथा स्थान-स्थान पर हिरनों के झुण्ड और मयूरों के दल हमारे चित्त को आकर्षित कर रहे थे। श्रीनगर से आगे पहाड़ी रास्ता बहुत जल्दी-जल्दी मोड़ ले रहा था। इससे हमारी गति बहुत बाधित हुई, पर साधुवाद है टैक्सी-ड्राइवर को, जिसने चार बजते-बजते हमें जोशीमठ पहुँचा दिया। यदि हमें पाँच मिनट का भी। विलम्ब हो जाता तो रात वहीं बितानी पड़ती।।

अस्तु, जोशीमठ से एकमार्गीय यातायात के कारण हम रुकते-रुकते जैसे-तैसे हनुमान्-चट्टी पहुंचे। यहाँ क़ी शीतले-पवन के स्पर्श से मन प्रफुल्लित हो उठा था। समय भी लगभग छ: का हो गया था। लोगों ने बताया कि यह अन्तिम बस्ती है। यहाँ पर यात्रियों ने गर्म कपड़े पहन लिये; क्योंकि आगे भीषण ठण्ड की आशंका थी। सभी लोग स्तब्ध भाव से बैठे बहुत सँकरी सड़क पर बड़ी तीव्रगति से चढ़ती-उतरती, मोड़ लेती टैक्सी को देख रहे थे, जिसको अनुभवी और कुशल चालक आत्मविश्वासपूर्वक उस झुटपुटे में भी अविराम गति से दौड़ा रहा था। बायीं ओर से पर्वतों की ढालों पर बर्फ की पतली-चौड़ी धाराएँ पिघली चाँदी का भ्रम उत्पन्न करतीं व धीरे-धीरे बहती हुई अलकनन्दा में गिर रही थीं। वायु में ठण्डक बड़ी तेजी से बढ़ती जा रही थी, जिससे गर्म कपड़ों के बावजूद शरीर ठण्ड से काँप रहा था। यह चढ़ाई यात्री के धैर्य और श्रद्धा की अन्तिम परीक्षा है, जिसमें उत्तीर्ण होने पर ही भगवान् बद्रीनाथ के दिव्य-दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हो सकता है। ढाई घण्टे की स्तब्ध करने वाली भीषण चढ़ाई के बाद दिव्य बद्रीनाथ धाम की बिजली की बत्तियाँ चमकती हुई दिखाई दीं। हमें ऐसा प्रतीत हुआ मानो अन्धकार में भटकते प्राणी को प्रकाश दिख गया हो अथवा मृत्यु के मुख से निकलकर कोई सदेह स्वर्ग पहुँच गया हो। हम लोग लम्बी अविराम, किन्तु सुखद यात्रा के बाद गन्तव्य पर पहुँचने के सन्तोष के साथ भारी थकान का अनुभव करते हुए एक होटल के सुविधाजनक कमरे में रुके।

बद्रीनाथ धाम का वर्णन – कमरे की खिड़की को जरा खोलकर देखा तो झिलमिल आलोक में सामने भगवान् के विशाल मन्दिर को उत्तुंग-शिखर अपनी भव्यता से मण्डित दीख पड़ा। साथ ही अत्यधिक शीतल पवन का झोंको रोम-रोम को थरथरा गया, जिससे तत्काल खिड़की बन्द करनी पड़ी। अगले दिन प्रात: मन्दिर के दर्शनों को चले। इससे पूर्व हम लोगों ने गर्म जल से स्नान किया। यह गर्म जल वहाँ के स्थानीय मजदूर बद्रीनाथ-मन्दिर के निकटस्थ गर्म पानी के एक विशाल-कुण्ड से लाकर आठ रुपये पीपे की दर से दे रहे थे। बहुत-से नर-नारी उस कुण्ड में ही स्नान करके मन्दिर के दर्शन कर रहे थे। यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि पास ही बहती अलकनन्दा यद्यपि बर्फ की मोटी चादर से ढकी थी, चारों ओर के हिमशिखरों पर बर्फ के अम्बार लगे थे, हवा की शीतलता से हड्डियाँ तक कॅप-कॅपा रही थीं, पर उस कुण्ड का जल इतना अधिक गर्म था कि उसे शरीर पर सहन करना भी एक समस्या थी। ऐसी मान्यता है कि इसमें स्नान करने वाले व्यक्ति के चर्मरोग दूर हो जाते हैं। बद्रीनाथ धाम में बड़ी भीड़ थी। भारत के कोने-कोने से आये यात्री भक्तिपूर्ण हृदयों से भगवान् बद्रीविशाल का स्तवन कर रहे थे। भगवान् बद्रीनाथ की प्रतिमा बड़ी दिव्य है। घण्टों के घोष, भक्तों के स्तवन, गन्ध-धूप के आमोद (सुगन्ध) एवं दीपों के आलोक से सम्पूर्ण वातावरण गहरी भक्ति-भावना में डूबा लग रहा था। मन्दिर अत्यधिक ऊँचाई पर है, जहाँ तक पत्थर का सोपानमार्ग जाता है। यहाँ एक विशेष बात यह अनुभव हुई कि चार कदम चलने पर ही पैर इतने भारी हो जाते थे, मानो पत्थर के हों। कुछ लोग थोड़ा चलते ही हाँफने लगते थे। इसका कारण बारह हजार फीट की ऊँचाई पर मिलने वाली वायु में ऑक्सीजन की कमी थी। मन्दिर के पास एक विशाल जन-समूह अपने पूर्वजनों का श्राद्ध करने में संलग्न था। शास्त्रों के अनुसार बद्रीनाथ धाम का श्राद्ध सर्वोत्तम है।

उपसंहार – उसी दिन दोपहर को हम लोग वापसी यात्रा पर चल पड़े, जिसमें कोई विशेष असुविधा न हुई। उतार के कारण टैक्सी ने भी मार्ग 11 घण्टे में पूरा कर रात्रि 10 बजे ऋषिकेश पहुँचा दिया। मन सीमा-सड़क संगठन के अभियन्ताओं के लिए प्रशंसा से भर उठा, जिन्होंने ऐसे दुर्गम स्थान पर सड़क बनाकर अपने अद्भुत कौशल का परिचय देते हुए असम्भव को सम्भव कर दिखाया है। यह यात्रा मेरे जीवन की एक अविस्मरणीय घटना बन गयी है।

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