UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 6 श्रवणकुमार

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name श्रवणकुमार (डॉ० शिवबालक शुक्ल)
Number of Questions 9
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 6 श्रवणकुमार (डॉ० शिवबालक शुक्ल)

प्रश्न 1:
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की कथावस्तु (कथानक) पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के ‘दशरथ खण्ड (पञ्चम सर्ग) की कथा का सार लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ में प्रयुक्त सर्गों का उल्लेख करते हुए किसी एक सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ काव्य के ‘श्रवण’ शीर्षक सर्ग का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के अभिशाप’ सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के ‘निर्वाण’ (अष्टम) सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के आखेट सर्ग की कथा संक्षेप में अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार के कथानक के विशेष प्रसंगों को अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ की कथावस्तु के परिप्रेक्ष्य में अयोध्या के परिवेश पर प्रकाश डालिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में वर्णित ‘आश्रम’ शीर्षक सर्ग की प्रमुख विशेषताओं पर अपने विचार लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में वर्णित बाणविद्ध श्रवणकुमार के करुण विलाप का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के ‘अयोध्या’ और ‘आश्रम’ खण्ड की कथा संक्षेप में लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग ‘सन्देश सर्ग’ का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
डॉ० शिवबालक शुक्ल द्वारा रचित खण्डकाव्य श्रवणकुमार’ की कथा ‘वाल्मीकि रामायण’ के ‘अयोध्याकाण्ड’ के श्रवणकुमार प्रसंग पर आधारित है। इस खण्डकाव्य का सर्गानुसार कथानक अग्रवत् है

प्रथम सर्ग : अयोध्या

प्रथम सर्ग में ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के कथानक की पृष्ठभूमि तैयार की गयी है। इसमें अयोध्या नगरी की स्थापना, उसका नामकरण, राज्यकुल के वैभव एवं उसकी गौरवमयी विशेषताओं का वर्णन किया गया है; यथा

सरि सरयू के पावन तट पर है साकेत नगर छविमान।
जिसमें श्री शोभा वैभव के कभी तने थे विपुल वितान॥
मनु-वंशज इक्ष्वाकु भूप की कीर्ति-पताका लोक-ललाम।
अनुपम शोभाधाम अयोध्या चित्ताकर्षक अति अभिराम ॥

कवि ने यह भी बताया कि अयोध्या में सर्वत्र नैतिकता और सदाचार विद्यमान है। इस नगरी में सभी वस्तुओं का विक्रय उचित मूल्य पर होता है। यहाँ के नर-नारी परस्पर यथोचित सम्मान करते हैं। इस प्रकार अयोध्या का जीवन सहज और आनन्द से परिपूर्ण है। इस सर्ग में अयोध्या की रम्य-प्रकृति का चित्रण भी किया गया है।

ऐसी अयोध्या के शब्द-वेध-निपुण राजकुमार दशरथ एक दिन शिकार करने की योजना बनाते हैं

ऐसे वातावरण भव्य में दशरथ-उर में उठी उमंग।
देखें सरयू-वन में मृगया आज दिखाती है क्या रंग ॥

द्वितीय सर्ग : आश्रम

द्वितीय सर्ग के आरम्भ में सरयू नदी के वन-प्रान्तर के रमणीक आश्रम का मनोहारी चित्रण हुआ है, जिसमें श्रवणकुमार और उसके नेत्रहीन माता-पिता सानन्द निवास कर रहे हैं। इस आश्रम में सर्वत्र सुख-शान्ति है जहाँ सदैव शरद् एवं वसन्त का वैभव व्याप्त रहता है। स्वच्छ जल से भरे तालाबों में कमल खिले हुए हैं। यहाँ मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग सब परस्पर सहज प्रेम-भाव से रहते हैं। यहाँ द्वेष और कटुता नाममात्र को भी नहीं है। आश्रम के वर्णन में कवि ने भारतीय दर्शन का चिन्तन प्रस्तुत किया है। आश्रम के शान्त-सौन्दर्यमय प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक वातावरण में ही युवक श्रवणकुमार के चरित्र का विकास होता है। वह माता-पिता की आज्ञानुसार ही नित्य-प्रति कार्य करता है तथा उनकी सेवा में लगा रहता है

जननी और जनक को श्रद्धा-सहित नवाकर शीश।
आह्निक-क्रिया निवृत्ति-हेतु जाता सरयू-तट पी आशीष ॥

तृतीय सर्ग : आखेट

तृतीय सर्ग में एक ओर दशरथ मृग-शावक के वध का स्वप्न देखते हैं। दूसरी ओर श्रवणकुमार जब जल लेने जाता है तो उसकी बायीं आँख फड़कने लगती है। शकुन-अपशकुन तथा स्वप्न विचार से दोनों ही अशुभ हैं। स्वप्न में मृग-शावक-वध से दशरथ व्याकुल हो जाते हैं। वे ब्रह्म-मुहूर्त में जागकर आखेट हेतु वन की ओर चल देते हैं।

दूसरी ओर; उसी समय श्रवणकुमार के माता-पिता को बहुत अधिक प्यास लगती है और वह माता-पिता की आज्ञानुसार नदी से जले लेने चल देता है। जल में पात्र डूबने की ध्वनि को किसी हिंसक पशु की ध्वनि समझकर दशरथ शब्दभेदी बाण चला देते हैं, जो सीधे श्रवणकुमार के हृदय में जाकर लगता है। श्रवणकुमार का चीत्कार सुनकर दशरथ विस्मय, चिन्ता और शोक में डूब जाते हैं। उन्हें हतप्रभ एवं किंकर्तव्यविमूढ़ देख उनका सारथी उन्हें सान्त्वना देता है।

प्रस्तुत सर्ग में श्रवणकुमार की मातृ-पितृ-भक्ति, शकुन-अपशकुन तथा दशरथ की आखेट-रुचि पर प्रकाश डाला गया है।

चतुर्थ सर्ग : श्रवण

चतुर्थ सर्ग का आरम्भ श्रवणकुमार के मार्मिक विलाप से होता है। उसकी समझ में यह नहीं आता कि उसका कोई शत्रु नहीं, फिर भी उस पर किसने बाण छोड़ दिया ? बाण लगने पर भी उसे अपनी चिन्ता नहीं, वरन्। अपने वृद्ध एवं प्यासे माता-पिता की चिन्ता है

मुझे बाण की पीड़ा सम्प्रति इतनी नहीं सताती है।
पितरों के भविष्य की चिन्ता जितनी व्यथा बढ़ाती है॥

दशरथ आहत श्रवणकुमार को देखकर तथा उसके मार्मिक क्रन्दन को सुनकर व्याकुल हो जाते हैं। श्रवणकुमार के आँखें खोलने पर सारथी बताता है कि ये अजपुत्र दशरथ हैं और मृगया (शिकार) के भ्रम में आज इनसे यह भयंकर भूल हो गयी है। श्रवणकुमार कहता है कि राजन्! मुझे मारकर आपने एक नहीं वरन् एक साथ तीन प्राणियों के प्राण लिये हैं। मेरे अन्धे माता-पिता आश्रम में प्यासे बैठे हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। आप यह जल का पात्र लेकर वहाँ जाइए और उन्हें मेरे प्राण-त्यागे की सूचना दे दीजिए। यह कहकर श्रवणकुमार प्राण त्याग देता है। उसके शव को सारथी की देखभाल में छोड़ अत्यन्त दु:खी मन से दशरथ जलपात्र लेकर आश्रम की ओर चल देते हैं।

इस सर्ग में कवि ने श्रवणकुमार के सात्त्विक जीवन, उसके कारुणिक अन्त और दशरथ के मन में उत्पन्न आत्मग्लानि एवं शोकाकुलता का बहुत ही मार्मिक वर्णन किया है।

पंचम सर्ग : दशरथ

पंचम सर्ग का आरम्भ दशरथ के अन्तर्द्वन्द्व, विषाद, आत्मग्लानि और अपराध-भावना से होता है। दशरथ दु:खी एवं चिन्तित भाव से सिर झुकाये आश्रम की ओर जा रहे थे और सोच रहे थे कि इस घटना के कारण हृदय पर लगे घाव का प्रायश्चित्त वे किस प्रकार करें

होय चलेगी युग-युगान्त तक अब मेरी यह पाप कथा।
जो मुझको ही नहीं वंशजों को भी देगी मर्म व्यथा ॥

इसी प्रकार के मानसिक उद्वेगों से आकुल-व्याकुल दशरथ आश्रम पहुँच जाते हैं।

षष्ठ सर्ग : सन्देश

षष्ठ सर्ग में श्रवणकुमार के माता – पिता की असहाय दशा तथा दशरथ के क्षोभ का बड़ा ही मार्मिक चित्रण हुआ है। श्रवणकुमार के माता-पिता उसके आने की प्रतीक्षा में व्याकुल हैं। दशरथ की पदचाप सुनकर वे पूछते हैं

(1) मौलिकतापूर्ण प्रस्तुतीकरण – यद्यपि प्रस्तुत खण्डकाव्य का मूल कथानक वाल्मीकि-रामायण से लिया गया है, परन्तु भावात्मकता से प्रेरित होकर कवि ने उसमें कई स्थानों पर कल्पना का प्रयोग भी किया है; यथा-सारथी की कल्पना, दिव्य चमत्कार एवं देवत्व का प्रतिपादन।

(2) भारतीय संस्कृति का अंकन – कवि ने युगानुरूप वर्ण-व्यवस्था, छुआछूत, समता आदि नवीनताओं का भी समावेश किया है, किन्तु भारतीय संस्कृति के मूल आधार का ध्यान सभी स्थानों पर रखा गया है। भावों और जीवन-मूल्यों का अंकन भी उसी के अनुरूप किया गया है। श्रवण की मातृ-पितृ-भक्ति, दशरथ को अपयश के भय से वन में घटित दुर्घटना का किसी को न बताना, शाप देने के पश्चात् श्रवण के पिता का आत्मबोध कि प्रारब्धवश हुई गलती पर उन्हें अपराधी को दण्ड रूप में शाप नहीं देना चाहिए था। ये सभी बातें भारतीय संस्कृति की संवाहक बनकर आयी हैं।

(3) आदर्श-सृजन – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में कवि ने मानवीय आदर्शों का सृजन किया है। श्रवणकुमार, उसके अन्धे माता-पिता तथा दशरथ के चरित्र आदर्श एवं महान् हैं।

(4) व्यवस्थित – श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य का कथानक पूर्णत: व्यवस्थित है। उसमें कहीं भी भावात्मक अथवा भाषागत असन्तुलन नहीं दिखाई देता।

(5) सर्गबद्धता – प्रस्तुत खण्डकाव्य में नौ सर्ग हैं, जिनमें भावात्मकता को पर्याप्त स्थान दिया गया है। इनमें प्रथम सर्ग मंगलाचरण और अन्तिम उपसंहार है। सर्ग-संयोजना उपयुक्त एवं सुन्दर है।

(6) विषयानुरूपता – इस खण्डकाव्य में विषयानुरूप भाषा-शैली आदि का सफल निर्वाह हुआ है। इसमें रस, छन्द, अलंकार, गुण आदि जहाँ काव्य-सौन्दर्य को बढ़ाने में सहायक हुए हैं, वहीं भावात्मकता की वाहकता में भी पूर्णरूपेण सफल हुए हैं।

(7) स्वाभाविकता – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में पात्र, घटना, वातावरण आदि नितान्त स्वाभाविक लगते हैं। कहीं भी इनके बलपूर्वक थोपे जाने का संकेत नहीं मिलता। पात्रों के चिन्तन में तो सहृदयी भावुकता सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है, चाहे वह चिन्तन श्रवणकुमार का हो, चाहे दशरथ का अथवा श्रवण के अन्धे माता-पिता का।

(8) भारतीयता – इस खण्डकाव्य में भारतीय दर्शन के आदर्श-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच, सन्तोष, तप, संयम, प्रेम, कर्तव्यपरायणती आदि के निर्वाह पर बल दिया गया है, जो कवि की भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम एवं श्रद्धा के प्रतीक हैं। एक कथन द्रष्टव्य है

दम अस्तेय अक्रोध सत्य धृति, विद्या क्षमा बुद्धि सुकुमार।
शौच तथा इन्द्रिय-निग्रह हैं, दस सदस्य मेरे परिवार॥

(9) मातृ-पितृभक्ति – श्रवण के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उसकी भावात्मक मातृ-पितृभक्ति है। मातृ-पितृभक्ति का एक ऐसा आदर्श, जिससे युग-युगान्तरे तक बालक प्रेरणा प्राप्त कर सकें, अन्यत्र दुर्लभ है। इस प्रकार ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की भावात्मक कथावस्तु सुसम्बद्ध, प्रभावशाली, मानवीय आदश तथा भारतीय संस्कृति की प्रेरणा देने वाली है।

प्रश्न 3:
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के नायक (प्रमुख पात्र) श्रवणकुमार का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
श्रवणकुमार का चरित्र-चित्रण करते हुए बताइए कि वह किन आदर्शों का प्रतीक है?
या
“चरित्र ही व्यक्ति को महान् बनाता है।” इस कथन के सन्दर्भ में श्रवणकुमार के चरित्र का मूल्यांकन कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ में वर्णित आदर्श चरित्र से आज के परिप्रेक्ष्य में क्या शिक्षा मिलती है ?
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रवणकुमार के चरित्र की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
श्रवणकुमार प्रस्तुत खण्डकाव्य का प्रमुख पात्र है। ‘श्रवणकुमार’ की कथा आरम्भ से अन्त तक उसी से सम्बद्ध है; अतः इस खण्डकाव्य का नायक श्रवणकुमार है। उसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) मातृ-पितृभक्त – श्रवण कुमार का नाम ही मातृ-पितृभक्ति का पर्याय बन चुका है। श्रवणकुमार अपने माता-पिता का एकमात्र आदर्श पुत्र है। वह प्रात:काल से सायंकाल तक अपने वृद्ध एवं नेत्रहीन माता- पिता की सेवा में लगा रहता है। दशरथ के बाण से बिद्ध होकर भी श्रवणकुमार को अपने प्यासे माता-पिता की ही चिन्ता सता रही है

मुझे बाण की पीड़ा सम्प्रति इतनी नहीं सताती है।
पितरों के भविष्य की चिन्ता जितनी व्यथा बढ़ाती है।

(2) निश्छल एवं सत्यवादी – श्रवणकुमार के पिता वैश्य वर्ण के और माता शूद्र वर्ण की थीं। जब दशरथ ब्रह्म-हत्या की सम्भावना व्यक्त करते हैं तो श्रवणकुमार उन्हें सत्य बता देता है

वैश्य पिता माता शूद्रा थी मैं यों प्रादुर्भूत हुआ।
संस्कार के सत्य भाव से मेरा जीवन पूत हुआ।

श्रवणकुमार स्पष्टवादी है। वह किसी से कुछ नहीं छिपाता। वह सत्यकाम, जाबालि आदि के समान ही अपने कुल, गोत्र आदि का परिचय देता है।

(3) क्षमाशील एवं सरल स्वभाव वाला – श्रवणकुमार का स्वभाव बहुत ही सरल है। उसके मन में किसी के प्रति ईष्र्या, द्वेष, क्रोध एवं वैर नहीं है। दशरथ के बाण से बिद्ध होने पर भी वह अपने समीप आये सन्तप्त दशरथ का सम्मान ही करता है।

(4) भारतीय संस्कृति का सच्चा प्रेमी – श्रवणकुमार भारतीय संस्कृति का सच्चा प्रेमी है। चार वेद और छ: दर्शन ही भारतीय संस्कृति के आधार हैं। धर्म के दस लक्षणों को वह अपने जीवन में धारण किये है

दम अस्तेय अक्रोध सत्य धृति, विद्या क्षमा बुद्धि सुकुमार।
शौच तथा इन्द्रिय-निग्रह हैं, दस सदस्य मेरे परिवार ॥

वेद के अनुसार माता, पिता, गुरु, अतिथि तथा पति के लिए पत्नी और पत्नी के लिए पति ये पाँच ‘देवता’ कहलाते हैं। तथा ये ही पूजा के योग्य हैं। श्रवणकुमार भी माता, पिता, गुरु और अतिथि की देवतुल्य पूजा करता है।

(5) आत्मसन्तोषी – श्रवणकुमार को किसी वस्तु के प्रति लोभ-मोह नहीं है। उसे भोग एवं ऐश्वर्य की तनिक भी चाह नहीं है। वह तो सन्तोषी स्वभाव का है

वल्कल वसन विटप देते हैं, हमको इच्छा के अनुकूल।
नहीं कभी हमको छू पाती, भोग ऐश्वर्य वासन्न-धूल ॥

(6) संस्कारों को महत्त्व देने वाला – श्रवणकुमार संमदर्शी है। वह किसी के प्रति भी भेदभाव नहीं रखता तथा कर्म, शील एवं संस्कारों को महत्त्व देता है। उसके जीवन में पवित्रता संस्कारों के प्रभाव के कारण ही है

विप्र द्विजेतर के शोणित में अन्तर नहीं रहे यह ध्यान।
नहीं जन्म के संस्कार से, मानव को मिलता सम्मान ॥

(7) अतिथि-सत्कारी – भारतीय परम्परा के अनुसार अतिथि का स्वागत-सत्कार महापुण्य का कार्य है। श्रवण कुमारे इस गुण से युक्त है। वह बाण द्वारा घायल पड़ा है, जब दशरथ उसके पास पहुँचते हैं। वह दशरथ को अपना अतिथि मानता है, क्योंकि वह उसके वन में आये हैं। वह देशरथ का स्वागत करना चाहता है। वह उनसे हर प्रकार की कुशल-मंगल पूछता है और अपने नेत्रों के जल से दशरथ के चरण धो लेना चाहता है।

इस प्रकार श्रवणकुमार उदार, परोपकारी, सर्वगुणसम्पन्न तथा खण्डकाव्य का नायक है।

प्रश्न 4:
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के चरित्रों में देवोपम गुणों के साथ-साथ मानव-सुलभ दुर्बलता भी दिखाई देती हैं। इस कथन के सम्बन्ध में अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के चरित्र-चित्रण में काव्यकार डॉ० शिवबालक शुक्ल ने अपनी अनुपम रचनाधर्मिता का परिचय दिया है। उनके द्वारा गढ़े चरित्र जहाँ एक ओर देवोपम हैं, वहीं दूसरी ओर उनमें मानव-सुलभ दुर्बलताएँ भी दृष्टिगत होती हैं। यही उनके चरित्रों की सर्वप्रमुख विशेषता है। पात्र चाहे श्रवणकुमार हो या उसके अन्धे माता-पिता अथवा अयोध्या नरेश दशरथ, सभी पात्रों का चरित्रांकन बड़े मनोयोग से किया गया है।

श्रवणकुमार में सत्यवादिता, संस्कारों को महत्ता देने की प्रवृत्ति, क्षमाशीलता और आत्मसन्तोष जैसे गुण उसे देवोपम बनाते हैं, वहीं माता-पिता से अत्यधिक मोह, मृत्यु से भय आदि दुर्बलताएँ उसे साधारण मानव सिद्ध करते हैं।

दशरथ के चरित्र में भी जहाँ न्यायप्रियता, सत्यवादिता, उदारता और कर्तव्यनिष्ठा जैसे देवोपम गुण विद्यमान हैं, वहीं स्वप्न को देखकर मन में शंकित होना; श्रवण के अन्धे माता-पिता द्वारा शापित होने पर शाप की परिणति के विषय में सोचकर दु:खी होना और इस घटना के लोक में प्रचलित हो जाने पर कुल-परम्परा पर लगने वाले कलंक की चिन्ता करना आदि उनके चरित्र की ऐसी दुर्बलताएँ हैं, जो उन्हें साधारणजन के समकक्ष ला खड़ी करती हैं।

इसी प्रकार श्रवण के पिता का चरित्र भी गुणों एवं दुर्बलताओं से युक्त है। वे जहाँ पुत्र-मृत्यु का समाचार सुनकर अपना विवेक खो बैठते हैं और दशरथ को शाप दे डालते हैं, वहीं बाद में अपने किये पर पश्चात्ताप करते हैं कि मैंने दशरथ को व्यर्थ ही शाप दे डाला। इनका पहला कार्य जहाँ मानव-सुलभ दुर्बलता को परिचायक है, वहीं उस पर पश्चात्ताप करना उनके देवोपम-चरित्र का।

प्रश्न 5:
‘श्रवणकुमार’ के आधार पर दशरथ का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के ‘अभिशाप’ सर्ग के आधार पर राजा दशरथ का चरित्र चित्रण कीजिए।
उत्तर:
रघुवंशी राजा अज के पुत्र दशरथ ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में आरम्भ से अन्त तक विद्यमान हैं। मूल रूप से दशरथ इस खण्डकाव्य के प्राण हैं। दशरथ की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) उत्तम-कुलोत्पन्न – राजा दशरथ उत्तम-कुलोत्पन्न हैं। उनका वंश ‘इक्ष्वाकु’ नाम से प्रसिद्ध है। पृथु, त्रिशंकु, सगर, दिलीप, रघु, हरिश्चन्द्र और अज; दशरथ के इतिहासप्रसिद्ध पूर्वज रहे हैं। उन्हें अपने वंश पर गर्व है

क्षत्रिय हूँ मम शिरा जाल में रघुवंशी है रक्त प्रवाह ।
हस्ति पोत अथवा मृगेन्द्र के पाने की है उत्कट चाह॥

(2) लोकप्रिय-शासक – राजा दशरथ प्रजावत्सल एवं योग्य शासक हैं। उनके राज्य में सबको न्याय मिलता है, चोरी कहीं नहीं होती है, प्रजा सब प्रकार से सुखी व सन्तुष्ट है तथा विद्वज्जनों का यथोचित सत्कार होता है

सुख समृद्धि आमोदपूर्ण था कौशलेश का शुभ शासन।
दुःख था केवल एक दुःख को, जिसे मिला था निर्वासन ।

(3) धनुर्विद्या में निपुण –  कुमार दशरथ धनुर्विद्या में निपुण और शब्दभेदी बाण चलाने में पारंगत हैं। आखेट में उनकी विशेष रुचि है

शब्द-भेद के निपुण अहेरी, रविकुल के भावी भूपाल ।
लक्ष्य करें मृग महिष नाग वृक, शूकर सिंह व्याघ्र विकराल ॥

इसीलिए श्रावण मास में वर्षा के अनन्तर जब चारों ओर हरियाली छाई रहती है, तब वे आखेट का निश्चय करते हैं।

(4) विनम्र एवं दयालु – दशरथ में तनिक भी अहंकार नहीं है। दूसरे का दुःख देखकर वे बहुत अधिक व्याकुल हो जाते हैं। स्वप्न में मृग-शावक के वध से ही वे दु:खी हो उठते हैं

करने को गये समुद्यत, ढाढ मार करके रोदन।
नेत्र खुल गये स्वप्न समझकर किया पाश्र्व का परिवर्तन ।।

(5) संवेदनशील एवं पश्चात्ताप करने वाले – दशरथ अपने किये अनुचित कार्य पर आत्मग्लानि से भर उठते। हैं तथा उसका प्रायश्चित्त करते रहते हैं। श्रवणकुमार की हत्या पर उनके प्रायश्चित्त एवं आत्मग्लानि उनके सच्चे पश्चात्ताप पर किया गया आर्तनाद है

मलहम कौन भयंकर व्रण पर जिसका लेप करूं जाकर।
भू में धसँ गि गिरिवर से सरि में डूब मरूं जाकर ॥

(6) आत्म-तपस्वी – दशरथ न्यायप्रिय होने के साथ-साथ आत्म-तपस्वी भी हैं। वे अपने अपराध को स्वयं
अक्षम्य मानते हैं

करें मुनीश क्षमा वे होंगे, निस्पृह करुणा सिन्धु अगाध ।
पर मेरे मन न्यायालय में क्षम्य नहीं है यह अपराध ॥

(7) अपराध-बोध से ग्रसित – श्रवणकुमार के पिता द्वारा शाप दिये जाने पर दशरथ काँप उठते हैं। वे अयोध्या लौटकर यद्यपि लोकनिन्दा के भय से किसी को भी यह दुर्घटना नहीं बताते, किन्तु अपने अपराध की वेदना उनके हृदय में कसकती ही रहती है। वे जानते हैं कि समस्त प्राणियों को अपने कर्म का फल तो भोगना ही पड़ता है। इसलिए वे किसी से कुछ कहे बिना भी अपना अपराध स्वीकार कर लेते हैं। कवि कहता है

रही खरकती हाय शूल-सी पीड़ा उर में दशरथ के।।
ग्लानि-त्रपा, वेदना विमण्डित शाप-कथा वे कह न सके।

(8) तेजस्वी – दशरथ एक तेजस्वी राजकुमार हैं। जब वह श्रवण कुमार के पास पहुँचते हैं तो वह उनके रूप से प्रभावित हो उठता है। उनके प्रत्येक अंग से मानो तेज फूट पड़ता है। श्रवण उनसे निवेदन करता है

रूपवान् है तेज आपका, अंग-अंग से फूट रहा।
परिचय दें उर उत्सुकता है, सचमुच धीरज छूट रहा ॥

(9) शकुन-अपशकुन तथा स्वप्न विचार में आस्था – रात्रि में सोते समय दशरथ मृग-शावक के वध का स्वप्न देखते हैं, दूसरी ओर श्रवणकुमार जब जल लेने जाता है तो उसकी बायीं आँख फड़कने लगती है। शकुन-अपशकुन तथा स्वप्न विचार से दोनों ही अशुभ हैं।

(10) उदारमना – श्रवणकुमार के माता-पिता दशरथ को शाप देते हैं। उदार मन वाले दशरथ श्रवण के माता-पिता से शाप पाकर भी कुछ नहीं कहते और सोचते हैं कि इस पाप का फल तो भोगना ही है। इसलिए वे बिना कुछ कहे ही अपना अपराध स्वीकार कर लेते हैं और किसी को भी इस घटना के बारे में नहीं बताते।

(11) निरभिमानी – दशरथ का चरित्र महान् है। उच्चकुल में उत्पन्न होने पर भी उनमें लेशमात्र भी अभिमान नहीं था। उनका शासन उत्तम और उनके कार्य महान् थे। प्रायश्चित और आत्मग्लानि की अग्नि में तपकर वे शुद्ध हो जाते हैं।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि दशरथ का चरित्र महान् गुणों से विभूषित है जो कि प्रायश्चित्त और आत्म-ग्लानि की अग्नि में तपकर और भी शुद्ध हो गया है। कवि दशरथ का चरित्र-चित्रण करने में पूर्ण सफल रहा है।

प्रश्न 6:
पंचम एवं सप्तम सर्ग के आधार पर दशरथ के अन्तर्द्वन्द्व पर प्रकाश डालिए।
या
” ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के पंचम सर्ग में दशरथ के अन्तर्द्वन्द्व का व्यापक चित्रण है।” इस कथन को सोदाहरण प्रमाणित कीजिए।
उत्तर:

दशरथ का अन्तर्द्वन्द्व

‘श्रवणकुमार’ के पंचम सर्ग में दशरथ की मानसिकता, पश्चात्ताप तथा आत्मग्लानि से पूर्ण आन्तरिक दशा को व्यापक अभिव्यक्ति दी गयी है। दशरथ के हाथों श्रवणकुमार का प्राणान्त हो चुका है, जिससे वे दुःख, ग्लानि, भय एवं करुणा के भाव में भरे सोच रहे हैं कि क्या श्रवणकुमार के माता-पिता भी श्रवणकुमार की तरह उदार-हृदय होंगे और उन्हें क्षमा कर देंगे अथवा वे उन्हें कठोर शाप दे देंगे। दशरथ के मन में अपने कुल के दुर्भाग्य पर भी भावावेग उमड़ता है। वे सोचते हैं कि क्या उनके कुल के सभी सदस्यों के भाग्य में शापित होना ही लिखा है तथा क्या उनको भी अपने पूर्वजों की तरह (दशरथ के पूर्वज भी विभिन्न कारणों से शापित होते रहे थे) शापित होना पड़ेगा

रघुकुल में शापित होने की, परम्परागत परिपाटी।
पार पड़ेगी करनी ही हाँ, दुःख की यह दुर्गम घाटी ॥

इस सर्ग में लज्जा, ग्लानि, चिन्ता, शंका, भय आदि से ग्रस्त दशरथ के संकल्प-विकल्प प्रकट हुए हैं।
‘श्रवणकुमार’ के सप्तम सर्ग में भी दशरथ के अन्तर्मन में निहित भावों का मार्मिक चित्रण किया गया है। श्रवणकुमार के शव को उठाकर उसके माता-पिता के सामने लाते हुए दशरथ स्वयं भी जीवित लाश के समान ही हैं। वे ग्लानि, पश्चात्ताप, विवशता और करुणा के आधिक्य के कारण अपना विवेक खो बैठे हैं, जिससे उन्हें दिशा और दुर्गम-पथ की कठिनाइयों का ज्ञान नहीं हो रहा है। वे चेतनाशून्य से उस शव को उठाकर श्रवणकुमार के माता-पिता के पास लाते हैं

अनुभव-दिग्सूक्ति का नहीं थी बेचारे दशरथ के पास,
दिग्भ्रम हुआ, पाथ-पथ दुर्गम, हृदय क्षुब्ध, मन हुआ उदास।

किसी के पुत्र को मृत्यु की गोद में सुलाने के पश्चात् उसके शव को लेकर उसके माता-पिता के पास जाने वाले संवेदनशील-सहृदय व्यक्ति की मानसिकता क्या होती है, इसको कवि शिवबालक शुक्ल ने दशरथ के अन्तर्मन की दशा के सजीव चित्रण में भली प्रकार दर्शाया है।

[ संकेत-इस सामग्री के अतिरिक्त दशरथ की मानसिकता में विनम्रता, दयालुता, उदारता तथा आत्मतपस्विता का समन्वय दृष्टिगत होता है। दशरथ के चरित्र-चित्रण से इन गुणों की सामग्री ग्रहण कर उसका यहाँ उल्लेख करना चाहिए।]

प्रश्न 7:
खण्डकाव्य की दृष्टि से ‘श्रवणकुमार’ की विवेचना (समीक्षा) कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के रचना-शिल्प का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के काव्य-सौन्दर्य को सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के काव्य-सौन्दर्य की समीक्षा कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ में अभिव्यक्त करुण रस की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
डॉ० शिवबालक शुक्ल द्वारा रचित खण्डकाव्य ‘श्रवणकुमार’ एक पौराणिक कथानक पर आधारित है। इस रचना में कवि ने अपनी काव्यात्मक प्रतिभा का कुशलता से प्रयोग किया है। इस खण्डकाव्य की विशेषताओं को विवेचन निम्नलिखित रूपों में किया जा सकता है

कथानक – इस खण्डकाव्य का कथानके अत्यन्त लघु है। इसमें श्रवणकुमार को दशरथ का बाण लगना एवं उसके माता-पिता के द्वारा दशरथ को शाप देना-यही मुख्य दो प्रसंग वर्णित हैं। इसके कथानक में दशरथ या श्रवणकुमार के पूर्ण जीवन की कथा नहीं है। किसी खण्डकाव्य के कथानक के रूप में इसका कथानक अत्यन्त उपयुक्त है।

पात्र एवं चरित्र-चित्रण – इस खण्डकोव्य में मात्र चार पात्र हैं-श्रवणकुमार, दशरथ एवं श्रवण कुमार के माता-पिता। इन चारों के चरित्र-चित्रण में ही कवि ने खण्डकाव्य के उदात्त उद्देश्यों को अभिव्यक्ति दी है। पात्रों का चरित्र-चित्रण स्वाभाविक रूप में हुआ है। उनके अन्तर्द्वन्द्वों की अभिव्यक्ति में कवि ने अपनी काव्य-प्रतिभा का परिचय दिया है।

काव्यगत विशेषताएँ – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की काव्यगत विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(क) भावगेत विशेषताएँ

(1) श्रेष्ठ विषयवस्तु – श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की मूल कथा वाल्मीकि-रामायण के अयोध्याकाण्ड की श्रवणकुंमार-वध-कथा पर आधारित है। खण्डकाव्य का आरम्भ, विकास, चरमसीमा, नियताप्ति तथा अन्त प्रभावशाली हैं। कथा में कहीं भी अस्वाभाविकता एवं शिथिलता नहीं है।
(2) सुन्दर प्रकृति-चित्रण – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में कवि ने प्रकृति के बड़े ही मोहक चित्र खींचे हैं। नगर, वन, आश्रम, पेड़-पौधे, नदी, पशु-पक्षी आदि के चित्रण बड़े ही स्वाभाविक एवं मनोहारी हैं। कवि ने प्रकृति के आलम्बन, उद्दीपन, मानवीकरण आदि रूपों को बड़े सुन्दर ढंग से चित्रित किया है; उदाहरणार्थ

पड़ी फुहार प्रथम पावस की बनी ग्रीष्म की अन्तिम श्वास।
जल प्रियतम से मिली विरहिणी धरा छोड़ती मिलनोच्छ्वास ॥

(3) अन्तर्मुखी भावों की अभिव्यक्ति – श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में मानवीय संवेदनाओं एवं अनुभूति के आन्तरिक स्वरूप की कुशल अभिव्यक्ति की गयी है। स्वप्न में श्रवणकुमार को अपने तीर से मरते देखकर उसकी मृत्यु के बाद और अभिशाप सर्ग’ में दशरथ की आन्तरिक संवेदना एवं पश्चात्ताप को अभिव्यक्ति दी गयी है। तीर लगने के बाद श्रवणकुमार की मन:स्थिति का आन्तरिक भाव कुशलता के साथ अभिव्यक्त हुआ है।

(4) भारतीय संस्कृति के गौरव-भाव की कुशल अभिव्यक्ति – कवि ने प्रस्तुत खण्डकाव्य में भारतीय संस्कृति के प्राचीन स्वरूप का गौरव भावात्मक रूप से अभिव्यक्त किया है। सांस्कृतिक गौरव एवं मानवाद की प्राचीन स्थिति का दर्शन कराना ही इस खण्डकाव्य का मूल उद्देश्य रहा है और इसे अभिव्यक्ति में कवि ने अपनी प्रतिभा का पूर्ण परिचय दिया है

हो सकते हैं क्या अभियन्ता भूप-भगीरथ के सम आज।
जिनके श्रम-जल गंगा द्वारा सजें देश के युग-युग साज॥

(5) रस (करुण) का निरूपण – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य का प्रधान रस करुण है। इसके सातवें सर्ग ‘अभिशाप सर्ग’ में इसका सांगोपांग वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त इस खण्डकाव्य में रौद्र, वीभत्स, भयानक, वात्सल्य और शान्त रस का भी मंजुल प्रयोग बन पड़ा है। करुण रस का एक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है

कर स्पर्श से उन दोनों ने लेकर अवलोकन का काम।
सुत-शव के सन्निकट बैठकर मचा दिया भीषण कुहराम ॥

(6) वातावरण चित्रण – प्रस्तुत खण्डकाव्य में प्रकृति-चित्रण के साथ-साथ कवि ने अयोध्या नगरी एवं आश्रम आदि को भी बड़ी मनोरम वर्णन किया है।

(ख) कलागत विशेषताएँ

(1) भाषा – श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हिन्दी है। भाषा पात्र, विषय तथा समयानुकूल है। इस खण्डकाव्य की भाषा में प्रभावात्मकता, प्रवाहमयता, संगीतात्मकता आदि विशेषताएँ विद्यमान हैं; यथा

पड़े हुए सैकत-शय्या पर, मौन तोड़ मुनि हुए मुखर।
आती करुणा को भी करुणा, उनके दीन वचन सुनकर ॥

(2) शैली –  इस खण्डकाव्य में कवि ने इतिवृत्तात्मक शैली को अपनाया है। साथ ही इसमें आलंकारिक, चित्रात्मक, छायावादी और संवादात्मक शैली के भी दर्शन होते हैं। छायावादी शैली पर आधारित मानवीकरण भी प्रयुक्त हुआ है-इठलाई संगीत कक्ष में मृदुल मूच्र्छना सुमधुर भीड़। प्रयोगवादी शैली में दिनरूपी विद्यालय के बन्द हो जाने पर उसके सूर्य रूपी विद्यार्थी को अपना बस्ता किरणरूपी रज्जु से बाँधकर ले जाता हुआ दिखाया गया है।

(3) छन्द-विधान – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में कवि ने 16-15 मात्राओं पर यति और अन्त में गुरु- लघु वाले ‘वीर’ छन्द का प्रयोग किया है। काव्य-प्रवाह में कहीं-कहीं 30 मात्राओं वाले मात्रिक छन्द, ताटंक,, कुकुभ, लावनी आदि का भी प्रयोग किया गया है। छन्द-रचना में कहीं भी अस्वाभाविकता नहीं दिखाई देती।

(4) अलंकार-योजना – कवि ने यमक, श्लेष, उपमा, रूपक, अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश, उत्प्रेक्षा, व्यतिरेक, सन्देह, अर्थान्तरन्यास, परिकर, प्रतीप, वक्रोक्ति, यथासंख्य, परिसंख्या, उदाहरण आदि अलंकारों का प्रयोग किया है। रूपक का एक उदाहरण दर्शनीय है – मेघ-मृदंग संग संगति कर लगे नाचने प्रमुदित मोर। इस खण्डकाव्य में उपमान-विधान के लिए एक विस्तृत भावभूमि का भी चयन किया गया है।

निष्कर्ष-इस प्रकार प्रस्तुत खण्डकाव्य में मात्र श्रवणकुमार के सम्पूर्ण जीवन का चित्रण ही नहीं, वरन् उसकी चारित्रिक विशेषताओं के महत्त्वपूर्ण पक्ष का चित्रांकन भी किया गया है। इसकी कथावस्तु भी लघु है और वह सुसम्बद्ध एवं सुसंगठित है। वर्णन-विस्तार को इस खण्डकाव्य में स्थान नहीं दिया गया है; किन्तु इसकी कथावस्तु में क्रमिक विकास विद्यमान है। इसका नायक उदात्त गुणों से युक्त है।

एक निश्चित एवं आदर्शोन्मुख उद्देश्य के लिए प्रवाहपूर्ण शैली में लिखा गया यह भावनाप्रधान काव्य, खण्डकाव्य की उपर्युक्त सभी मुख्य विशेषताओं से परिपूर्ण है; अतः यह एक सफल खण्डकाव्य है।

प्रश्न 8:
‘श्रवणकुमार’ के रचना-उद्देश्य पर आलोचनात्मक प्रकाश डालिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की रचना किस उद्देश्य को दृष्टि में रखकर की गयी है ? विस्तृत विवेचन कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के माध्यम से कवि युवकों को क्या प्रेरणा और सन्देश देना चाहता है ? स्पष्ट कीजिए।
या
” ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की रचना जीवन में नैतिक आदर्शों की प्राण-प्रतिष्ठा हेतु की गयी है।” इस मत की समीक्षा कीजिए।
या
चारित्रिक पतन के इस युग में ‘श्रवणकुमार’ की सार्थकता पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के उद्देश्य का वर्तमान युग में क्या महत्त्व है? अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
वर्तमान युग में ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की क्या प्रासंगिकता है ? स्पष्ट कीजिए।
या
” ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य एक सोद्देश्य रचना है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
खण्डकाव्य की रचना में ‘डॉ० शिवबालक शुक्ल’ का उद्देश्य राष्ट्र की समृद्धि के लिए देश की किशोर और युवा पीढ़ी को अनैतिकता, उद्दण्डता और अनुशासनहीनता जैसे भयानक रोगों से बचाना एवं करुणा और प्रेम जैसे महत्त्वपूर्ण मनोभावों को जाग्रत करने की आवश्यकता रही है। साथ ही उनमें त्याग, तितिक्षा, सेवा, सहिष्णुता, क्षमाशीलता, भावात्मक एकता, उच्च संस्कार, जातीय अभेदता, नैतिकता और आत्मालोचन जैसे नैतिक आदर्शों एवं उच्च जीवन-मूल्यों की प्राण-प्रतिष्ठा करना भी है। कवि का उद्देश्य रहा है कि श्रवण की शील की रेखाओं के प्रकाश में आज का किशोर और युवा पीढ़ी ‘मातृ देवो भव पितृ देवो भव’ के उदात्त आदर्श पहचान सके, उसके मूल्य और महत्त्व को जान सके। श्रवण कुमार से प्रेरणा लेता हुआ वह इन आदर्शों को अपने आचरण में भी उतार सके तथा श्रवण की तरह कह सके

मुझे बाण की चिन्ता सम्प्रति, उतनी नहीं सताती है,
पितरों के भविष्य की चिन्ता, जितनी व्यथा बढ़ाती है।

शीर्षक की सार्थकता – प्रस्तुत खण्डकाव्य ‘श्रवणकुमार’ में मुख्य पात्र श्रवणकुमार ही है और इस मुख्य पात्र की चारित्रिक विशेषताओं को स्पष्ट करना ही कवि का उद्देश्य रहा है। अत: इसका शीर्षक ‘श्रवणकुमार’ रखा गया है, जो इसके कथानक के अनुसार पूर्णत: उपयुक्त है।

यद्यपि प्रस्तुत खण्डकाव्य में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं मार्मिक प्रसंग दशरथ का श्रवणकुमार के पिता द्वारा शापित होना है, तथापि इन सभी प्रसंगों की अभिव्यक्ति का भाव श्रवणकुमार के व्यक्तित्व से ही जुड़ा हुआ है। दशरथ की भूमिका कथावस्तु में सक्रियता के दृष्टिकोण से सबसे अधिक है; किन्तु दशरथ के चरित्र का उपयोग भी श्रवणकुमार के चरित्र की विशेषताओं को प्रकाशित करने की दृष्टि से ही हुआ है। श्रवणकुमार के माता-पिता का चरित्र भी श्रवणकुमार की ही चारित्रिक विशेषताओं को प्रकट करता है। अतः इस खण्डकाव्य का मुख्य पात्र श्रवणकुमार ही है और इस दृष्टिकोण से उक्त शीर्षक सबसे उपयुक्त है।

किसी भी काव्य का शीर्षक उसके मुख्य भाव को प्रकट करने वाला होना चाहिए। इस खण्डकाव्य का मुख्य भाव श्रवणकुमार की चारित्रिक विशेषताओं को प्रकट करना है; इसलिए इसका शीर्षक ‘श्रवणकुमार’ के अतिरिक्त कुछ और रखा जाना उपयुक्त नहीं प्रतीत होता।

प्रश्न 9:
‘श्रवणकुमार’ के ‘अभिशाप’ सर्ग का काव्य-वैशिष्ट्य लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के सप्तम सर्ग (अभिशाप) की कथावस्तु की उद्धरण देते हुए समीक्षा कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के कारुणिक प्रसंगों ने जनमानस को बहुत अधिक प्रभावित किया है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के मार्मिक स्थलों का सोदाहरण निदर्शन कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ काव्य के अभिशाप सर्ग में करुण रस का सांगोपांग वर्णन है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
रस की दृष्टि से ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की समीक्षा कीजिए।
या
” ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में करुणा और प्रेम की विह्वल मन्दाकिनी प्रवाहित होती है।”
इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
डॉ० शिवबालक शुक्ल द्वारा रचित खण्डकाव्य ‘श्रवणकुमार’ की कथा वाल्मीकि-रामायण के ‘अयोध्याकाण्ड’ के श्रवणकुमार-प्रसंग पर आधारित है। कवि ने इस कथा को युगानुरूप परिवर्तित कर सर्वथा नये रूप में प्रस्तुत किया है। श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की कथा नौ सर्गों में विभक्त है, जिनमें अन्तिम छ: सर्गों में करुण रस की पवित्र धारा प्रवाहित हुई है। बाण लगने पर श्रवण को मार्मिक क्रन्दन, दशरथ की आत्मग्लानि, श्रवण के माता-पिता का करुण-विलाप, उनका दशरथ को शाप देना, श्रवण के माता-पिता का पुत्र-शोक में प्राण त्यागना और दशरथ का दुःखी मन से अयोध्या लौटना ऐसे कारुणिक प्रसंग हैं जिन्हें पढ़कर किसी भी सहृदय पाठक का मन करुणा से आप्लावित हो उठता है। इस कारुणिकता का ही यह प्रभाव है कि यह कथानक भारतीय जनमानस की स्मृति में अमिट हो गया है और श्रवणकुमार का नाम मातृ-पितृ-भक्ति का पर्याय बन गया है। यही इस सर्ग का वैशिष्ट्य है और इसीलिए यह पाठकों को सबसे अधिक प्रभावित भी करता है।

अभिशाप’ इस खण्डकाव्य का सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण सर्ग है, जिसमें वात्सल्य की गंगा और करुण रस की-यमुना का सुन्दर संगम हुआ है। इसमें करुण रस के सभी अंगों की सहज अभिव्यक्ति हुई है। यही इस सर्ग का वैशिष्ट्य भी है। श्रवण का शव, उसके माता-पिता के मनोभावों, पूर्व स्मृतियों एवं शव-स्पर्श, शीशपटकना, रोना आदि में आलम्बन, उद्दीपन एवं अनुभाव के दर्शन होते हैं। प्रलाप, चिन्ता, स्मरण, गुणकथन और अभिलाषा आदि वृत्तियों की सहायता से शोक की करुण रस में परिणति इस सर्ग में द्रष्टव्य है। इसके साथ ही, कथावस्तु का सबसे महत्त्वपूर्ण अंश भी इसी सर्ग में है। इसके अतिरिक्त इस सर्ग में श्रवण के पिता का चरित्र देवत्व और मनुष्यत्व के बीच संघर्ष करता हुआ दिखाई देता है। ऋषि होकर भी वे क्रोध को रोक न सके और पुत्र-वध से उत्पन्न रोष के कारण, दशरथ को शाप दे दिया

पुत्र-शोक में कलप रहा हूँ, जिस प्रकार मैं अजनन्दन ।
सुत-वियोग में प्राण तजोगे, इसी भाँति करके क्रन्दन ॥

श्रवण की माता के विलाप में भी करुण रस का स्रोत निम्नवत् फूट पड़ता है

मणि खोये भुजंग-सी जननी, फन-सा पटक रही थी, शीश।
अन्धी आज बनाकर मुझको, किया न्याय तुमने जगदीश ?

तो उधर वात्सल्य रस की गंगा भी प्रवाहित होती दिखाई देती है।

धरा स्वर्ग में रहो कहीं भी ‘माँ’ मैं रहूँ सदा अय प्यार।
रहो पुत्र तुम, ठुकराओ मत मुझ दीना का किन्तु दुलार ॥

इस सर्ग के अन्त में ऋषि दम्पति में मानवीय दुर्बलता भी दिखाई गयी है। भले ही उन्होंने क्रोधवश दशरथ को शाप दे दिया गया, किन्तु दशरथ की निरपराध पत्नी के प्रति सहानुभूति भी दिखाई गयी है कि बेचारी नारी गेहूं के साथ घुन की भाँति पिसेगी। अपने पुत्रहन्ता और उसकी पत्नी के प्रति यह संवेदनात्मक भाव, वह भी उस समय जब पुत्र का शव सामने हो, मानवादर्श की चरम सीमा को दर्शाता है।

इस सर्ग में दशरथ की आन्तरिक अनुभूति एवं उनके अन्तर्मन का द्वन्द्व भी अपनी विशिष्टता रखती है। श्चात्ताप और अपराध-बोध से दबा हुआ एक राजेश्वर; श्रवण के माता-पिता के सामने उनके पुत्र के शव के साथ जिस मन:स्थिति में खड़ा है, वह कवि की कल्पना-शक्ति की अनुभवात्मक संवेदना का परिचय देता है और उसकी उस स्थिति की अभिव्यक्ति में रसों का जो अद्भुत समन्वय हुआ है, वह सराहनीय है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : एक

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name गद्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : एक
Number of Questions 74
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : एक

बहुविकल्पीय प्रश्न : एक

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

उचित विकल्प का चयन कीजिए।

(1) ”ये प्राचीनता के पोषक भी थे और नवीनता के उन्नायक भी, वर्तमान के व्याख्याता भी थे। और भविष्य के द्रष्टा भी।” यह कथन किस लेखक से सम्बन्धित है?
(क) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) रामचन्द्र शुक्ल
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(2) कवि वचन सुधा’ और ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ का सम्पादन किया
(क) श्यामसुन्दर दास ने
(ख) सरदार पूर्णसिंह ने
(ग) रामचन्द्र शुक्ल ने
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने

(3) निम्नलिखित में से कौन-सा लेखक खड़ी बोली के प्रारम्भिक उन्नायकों में नहीं गिना जाता?
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) मुंशी सदासुखलाल
(ग) मुंशी इंशाअल्ला खाँ
(घ) लल्लूलाल

(4) हिन्दी गद्य के विकास में भारतेन्दु जी का योगदान महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इन्होंने–
(क) गद्य का सर्वमान्य स्वरूप निर्धारित किया
(ख) गद्य को व्याकरण के अनुशासन में बाँधा
(ग) गद्य को परिमार्जन किया
(घ) अलंकृत और कवित्वपूर्ण गद्य की रचना की।

(5) वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ किस विधा और शैली की रचना है?
(क) निबन्ध और सूत्र शैली
(ख) नाटक और हास्य-व्यंग्य
(ग) निबन्ध और कथा शैली
(घ) नाटक और स्तोत्र शैली

(6) इनमें से कौन भारतेन्दुयुगीन गद्यकार हैं?
(क) प्रतापनारायण मिश्र
(ख) रामचन्द्र शुक्ल
(ग) प्रेमचन्द
(घ) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

(7) ‘सत्यार्थ प्रकाश’ भार एक हिन्दी गद्य-रचना है। इसके लेखक थे
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) प्रतापनारायण मिश्र
(ग) बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’
(घ) स्वामी दयानन्द सरस्वती

(8) ‘भारतेन्दु युग’ के जीवनी लेखक हैं
(क) काका कालेलकर
(ख) लक्ष्मीधर वाजपेयी
(ग) कार्तिक प्रसाद खत्री
(घ) विष्णु प्रभाकर

(9) निम्नलिखित में से कौन-सी रचना भारतेन्दु जी की है?
(क) तितली
(ख) उसने कहा था
(ग) अँधेर नगरी
(घ) नमक का दारोगा

(10) “भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?” के लेखक कौन हैं?
(क) राहुल सांकृत्यायन
(ख) जैनेन्द्र कुमार
(ग) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(11) भारतेन्दु के सहयोगी लेखक/गद्यकार/निबन्धकार हैं
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) वियोगी हरि
(ग) शिवपूजन सहाय
(घ) पं० बालकृष्ण भट्ट

(12) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की रचना नहीं है
(क) सती प्रताप
(ख) नील देवी
(ग) भारत-दुर्दशा
(घ) भाषा-रहस्य

(13) भारतेन्दु युग का नाटक है
(क) लहरों के राजहंस
(ख) अम्बपाली
(ग) ध्रुवस्वामिनी
(घ) नल-दमयन्ती

(14) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की रचना है
(क) वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति
(ख) कलि कौतुक
(ग) नूतन ब्रह्मचारी
(घ) प्रेममोहिनी

(15) हिन्दी का प्रथम यात्रावृत्त है
(क) सरयूपार की यात्रा
(ख) परीक्षागुरु
(ग) कलम का सिपाही
(घ) पथ के साथी

(16) पाठ्य-पुस्तक में ‘बलिया के मेले के अवसर पर दिया गया भाषण’ किस शीर्षक से संगृहीत है?
(क) भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?
(ख) महाकवि माघ का प्रभात वर्णन
(ग) भारतीय साहित्य की विशेषताएँ
(घ) आचरण की सभ्यता

उत्तर
(1) घ, (2) घ, (3) क, (4) क, (5) ख, (6) क, (7) घ, (8) गे, (9) ग, (10) घ, (11) घ, (12) घ, (13) घ, (14) कं, (15) क, (16) क।।

महावीरप्रसाद द्विवेदी

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) हिन्दी में समालोचना के सूत्रधार माने जाते हैं
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(घ) महावीरप्रसाद द्विवेदी

(2) संरस्वती’ पत्रिका के सम्पादक के रूप में प्रसिद्ध हैं
या
‘सरस्वती’ पत्रिका के प्रथम सम्पादक थे।
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) महावीरप्रसाद द्विवेदी

(3) खड़ी बोली का परिष्कार कर उसे व्यवस्थित बनाने का श्रेय है
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को
(ख) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को
(ग) श्यामसुन्दर दास को
(घ) महावीरप्रसाद द्विवेदी को

(4) हिन्दी गद्य के विकास में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का महत्त्व इसलिए है, क्योंकि उन्होंने
(क) हिन्दी गद्य का स्वरूप स्थिर किया
(ख) भाषा का परिष्कार कर उसे व्यवस्थित बनाया
(ग) अलंकृत एवं कवित्वपूर्ण गद्य की रचना की
(घ) यथार्थवादी जीवन-दर्शन को महत्त्व दिया

(5) ‘काव्य-मंजूषा’ निम्नलिखित में से किसकी कविताओं का संग्रह है?
(क) महादेवी वर्मा
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) महावीरप्रसाद द्विवेदी,
(घ) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय

(6) निम्नलिखित में से कौन द्विवेदीकालीन गद्य लेखक/लेखिका हैं?
(क) महादेवी वर्मा
(ख) सरदार पूर्णसिंह
(ग) सियारामशरण गुप्त
(घ) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय

(7) निम्नलिखित में से कौन द्विवेदीयुगीन गद्य लेखक हैं?
(क) राय कृष्णदास
(ख) चन्द्रधर शर्मा गुलेरी
(ग) रामवृक्ष बेनीपुरी
(घ) उपेन्द्रनाथ अश्क’

(8) निम्नलिखित में से कौन द्विवेदी युग के लेखक नहीं हैं?
(क) बाबू श्यामसुन्दर दास
(ख) डॉ० नगेन्द्र
(ग) बालमुकुन्द गुप्त।
(घ) हजारी प्रसाद द्विवेदी

(9) द्विवेदी युग के लेखक हैं
(क) सही०वी० ‘अज्ञेय’
(ख) किशोरीलाल गोस्वामी
(ग) हरिशंकर परसाई
(घ) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर

(10) हिन्दी गद्य के उत्कर्ष का सूर्योदय काल था
(क) छायावादी युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) छायावादोत्तर युग
(घ) भारतेन्दु युग

उत्तर
(1) घ, (2) घ, (3) घ, (4) ख, (5) ग, (6) ख, (7) ख, (8) ख और घ, (9) ख, (10) ख।

श्यामसुन्दर दास

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) “हिन्दी भाषा को सर्वजन सुलभ, वैज्ञानिक और समृद्ध बनाने में इनका योगदान अप्रतिम है।” यह कथन किस लेखक से सम्बन्धित है?
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से
(ख) जयशंकर प्रसाद से
(ग) रामवृक्ष बेनीपुरी से।
(घ) श्यामसुन्दर दास से

(2) साहित्यालोचन’ और ‘हिन्दी साहित्य निर्माता’ इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं
(क) जयशंकर प्रसाद की
(ख) पं० रामचन्द्र शुक्ल की
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की
(घ) श्यामसुन्दर दास की

(3) ‘नासिकेतोपाख्यान’ के रचयिता हैं
(क) महावीर प्रसाद द्विवेदी
(ख) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ग) प्रेमचन्द
(घ) श्यामसुन्दर दास

(4) ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ की स्थापना में इनका सराहनीय योगदान रहा है
(क): भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का
(ख) जयशंकर प्रसाद का
(ग) श्यामसुन्दर दास का
(घ) डॉ० सम्पूर्णानन्द का

(5) निम्नलिखित में से कौन द्विवेदीयुगीन गद्य लेखक/लेखिका हैं? या निम्नलिखित में से कौन छायावादी युग के लेखक नहीं हैं?
(क) महादेवी वर्मा
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) यशपाल
(घ) भगवतीचरण वर्मा

(6) रूपक रहस्य’ के लेखक कौन हैं? यह किस विधा की रचना है?
(क) वियोगी हरि – नाटक
(ख) रामचन्द्र शुक्ल – निबन्ध,
(ग) श्यामसुन्दर दास – आलोचना
(घ) प्रतापनारायण मिश्र – निबन्ध

(7) श्यामसुन्दर दास द्वारा किस पत्रिका का सम्पादन किया गया?
(क) हिन्दी प्रदीप का
(ख) माधुरी का
(ग) इन्दु का
(घ) नागरी प्रचारिणी पत्रिका का

(8) ‘नासिकेतोपाख्यान’ शीर्षक से श्यामसुन्दर दास के अतिरिक्त किस लेखक ने गद्य-रचना की है?
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) सदल मिश्र
(ग) रामचन्द्र शुक्ल
(घ) महावीरप्रसाद द्विवेदी

(9) निम्नलिखित में से कौन-सी रचना श्यामसुन्दर दास की नहीं है?
(क) मेरा जीवन प्रवाह
(ख) साहित्यालोचन
(ग) भाषा रहस्य
(घ) गद्य कुसुमावली

(10) ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ की स्थापना किस युग में हुई?
(क) भारतेन्दु युग में
(ख) द्विवेदी युग में
(ग) छायावाद युग में
(घ) छायावादोत्तर युग में

(11) ‘भारतीय साहित्य की विशेषताएँ’ के लेखक हैं
(क) सरदार पूर्णसिंह
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) अज्ञेय’।
(घ) वासुदेवशरण अग्रवाल

उत्तर
(1) घ, (2) घ, (3) घ, (4) ग, (5) ख, (6) ग, (7) घ, (8) ख, (9) क, (10) क, (11) ख।

सरदार पूर्णसिंह

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) केवल छ: निबन्धलिखकर हिन्दी-साहित्य में अपना स्थायी स्थान बनाने वाले लेखक हैं
(क) मोहन राकेश
(ख) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ग) कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर
(घ) सरदार पूर्णसिंह

(2) ‘मजदूरी और प्रेम’ तथा ‘अमेरिका का मस्त योगी वाल्ट हिटमैन’ निबन्धों के लेखक हैं
(क) जैनेन्द्र कुमार
(ख) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(ग) श्यामसुन्दर दास
(घ) सरदार पूर्णसिंह

(3) निम्नलिखित में से किसके निबन्ध ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित होते रहे?
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के
(ख) जैनेन्द्र कुमार के
(ग) कन्हैयालाल मिश्र के
(घ) सरदार पूर्णसिंह के

(4) ‘सच्ची वीरता’ और ‘मजदूरी और प्रेम’ किस विधा की रचनाएँ हैं?
(क) आत्मकथा
(ख) नाटक
(ग) कहानी
(घ) निबन्ध

(5) किस निबन्ध लेखक के नाम के साथ ‘अध्यापक’ शब्द जुड़ा हुआ है?
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के
(ख) जैनेन्द्र कुमार के
(ग) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ के
(घ) सरदार पूर्णसिंह के

(6) सिक्खों के दस गुरुओं की जीवनी अंग्रेजी में किनके द्वारा लिखी गयी?
(क) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ द्वारा
(ख) सरदार पूर्णसिंह द्वारा
(ग) राहुल सांकृत्यायन द्वारा
(घ) भीष्म साहनी द्वारा

(7) निम्नलिखित में से कौन सरदार पूर्णसिंह के समकालीन निबन्ध लेखक थे?
(क) रामचन्द्र शुक्ल
(ख) बाबू गुलाबराय
(ग) पद्मसिंह शर्मा कमलेश
(घ) श्यामसुन्दर दास

(8) ‘आचरण की सभ्यता के लेखक हैं|
(क) डॉ० सम्पूर्णानन्दः
(ख) राय कृष्णदास
(ग) जैनेन्द्र कुमार,
(घ) सरदार पूर्णसिंह

उत्तर:
(1) घ, (2) घ, (3) घ, (4) घ, (5) घ, (6) ख, (7) ग, (8) घ।

डॉ० सम्पूर्णानन्द

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) ‘आर्यों का आदि देश’ किस, लेखक की रचना है?
(क) सरदार पूर्णसिंह की
(ख) श्यामसुन्दर दास की
(ग) राय कृष्णदास की
(घ) डॉ० सम्पूर्णानन्द की

(2) ‘चिद्विलास’ और ‘जीवन दर्शन’ किस विधा की रचनाएँ हैं?
(क) दर्शन
(ख) नाटक
(ग) निबन्ध
(घ) जीवनी

(3) ‘भाषा की शक्ति’ किस निबन्ध लेखक के निबन्धों का संग्रह है?
(क) श्यामसुन्दर दास
(ख) जी० सुन्दर रेड्डी
(ग) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(घ) हजारीप्रसाद द्विवेदी

(4) ब्राह्मण सावधान’ नामक पुस्तक के लेखक कौन हैं?
(क़) राहुल सांकृत्यायन
(ख) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय
(ग) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(घ) जैनेन्द्र कुमार

(5) ‘मर्यादा’ (मासिक पत्रिका) और ‘टुडे’ (अंग्रेजी दैनिक) के सम्पादन से सम्बद्ध रहे
(क) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(ख) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(ग) प्रो० जी० सुन्दर रेड्डी
(घ) मोहन राकेश

(6) डॉ० सम्पूर्णानन्द द्वारा सम्पादित पत्रिका का नाम है
(क) सरस्वती
(ख) धर्मयुग
(ग) मर्यादा
(घ) हंस

उत्तर:
(1) घ, (2) क, (3) ग, (4) ग, (5) क, (6) गः ।

राय कृष्णदास

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) इनके द्वारा भारत कला भवन’ नाम के एक विशाल संग्रहालय की स्थापना की गयीया वाराणसी में भारत कला भवन’ नामक संग्रहालय की स्थापना करने वाले साहित्यकार थे
(क) रामचन्द्र शुक्ल
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(घ) राय कृष्णदास

(2) इन्होंने हिन्दी में गद्यगीत विधा का प्रवर्तन किया
(क) हरिशंकर परसाई
(ख) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ग) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(घ) राय कृष्णदास

(3) इनके गद्यगीतों के संग्रह ‘छायापथ’ के नाम से प्रकाशित हुए हैं
(क) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) हरिशंकर परसाई
(घ) राय कृष्णदास

(4) नीचे दी गयी रचनाओं में कौन-सी अनूदित रचना है?
(क) साधना
(ख) ऑखों की चाहे
(ग) सुधांशु
(घ) पगला

(5) ‘भारत की चित्रकला’ तथा ‘भारतीय मूर्तिकला’ इनके प्रामाणिक ग्रन्थ हैं
(क) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(ख) राहुल सांकृत्यायन
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) राय कृष्णदास

(6) ‘साधना’ नामक गद्यगीतों के संग्रह के रचयिता कौन हैं?
(क) वृन्दावनलाल वर्मा
(ख) मोहन राकेश
(ग) राय कृष्णदासे
(घ) विनय मोहन शर्मा

(7) ‘आनन्द की खोज, पागल पथिक’ के रचनाकार हैं
(क) राय कृष्णदास
(ख) यशपाल
(ग) बासुदेवशरण अग्रवाल
(घ) रामवृक्ष बेनीपुरी

(8) ‘आनन्दं की खोज’ और ‘मगल पथिक’ का सम्बन्ध किस विधा से है?
(क) संस्मरण
(ख) निबन्ध
(ग) गद्यगीत
(घ) आलोचना

(9) छायावादी युग के गद्य-लेखक हैं’
(क) श्यामसुन्दर दास
(ख) रामचन्द्र शुक्ल
(ग) प्रतापनारायण मिश्र
(घ) राय कृष्णदास

उत्तर:
(1) घ, (2) घ, (3) घ, (4) घ, (5) घ, (6) ग, (7) क, (8) ग, (9) ख, घ।

राहुल सांकृत्यायन

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) कहानी-संग्रह वोल्गा से गंगा’ के लेखक हैं
(क) राय कृष्णदास
(ख) जैनेन्द्र कुमार
(ग) सरदार पूर्णसिंह
(घ) राहुल सांकृत्यायन

(2) ‘महापण्डित’ किस लेखक के नाम के साथ जुड़ा है?
(क) रामचन्द्र शुक्ल
(ख) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ग) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(घ) राहुल सांकृत्यायन

(3) मेरी जीवन यात्रा’ किस विधा की रचना है? इसके रचनाकार कौन हैं?
(क) आत्मकथा-डॉ० सम्पूर्णानन्द
(ख) आत्मकथा-राहुल सांकृत्यायन
(ग) निबन्ध–आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(घ) निबन्ध-श्यामसुन्दर दास

(4) निम्नलिखित में कौन-सी रचना उपन्यास नहीं है?
(क) जीने के लिए
(ख) मधुर स्वप्न
(ग) सप्तसिन्धु
(घ) घुमक्कड़शास्त्र

(5) ‘अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा’ के लेखक हैं
(क) मोहन राकेश
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) राहुल सांकृत्यायन
(घ) सरदार पूर्णसिंह

(6) किनका वास्तविक नाम केदारनाथ पाण्डे था?
(क) कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर
(ख) जैनेन्द्र कुमार
(ग) राहुल सांकृत्यायन
(घ) मोहन राकेश

उत्तर:
(1) घ, (2) घ, (3) ख, (4) घ, (5) ग, (6) ग।

रामवृक्ष बेनीपुरी

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) निबन्धों और रेखाचित्रों के लिए इनकी ख्याति सर्वाधिक है
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) प्रतापनारायण मिश्र
(ग) सरदार पूर्णसिंह
(घ) रामवृक्ष बेनीपुरी

(2) ‘माटी की मूरतें’ इनके श्रेष्ठ रेखाचित्रों का संग्रह है, जिससे बिहार के जन-जीवन को जाना जा सकता है
(क) मोहन राकेश
(ख) राय कृष्णदास
(ग) सरदार पूर्णसिंह
(घ) रामवृक्ष बेनीपुरी

(3) इन्होंने ‘तरुण भारती’ और ‘बालक’ पत्रिका का सम्पादन किया
(क) प्रतापनारायण मिश्र
(ख) सरदार पूर्णसिंह
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) रामवृक्ष बेनीपुरी।

(4) ‘जंजीरें और दीवारें’ तथा ‘मील के पत्थर’ किस विधा की रचनाएँ हैं?
(क) उपन्यास
(ख) कहानी
(ग) निबन्ध
(घ) संस्मरण

(5) पैरों में पंख बाँधकर’ और ‘उड़ते चलें किस विधा की रचनाएँ हैं?
(क) उपन्यास
(ख) यात्रावृत्त
(ग) निबन्ध
(घ) कहानी

(6) ‘सीता की माँ’, ‘अम्बपाली’ किस लेखक द्वारा रचित नाटक हैं?
(क) रामवृक्ष बेनीपुरी
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) डॉ० रामकुमार वर्मा

(7) निम्नलिखित में से छायावादोत्तर युग के प्रमुख गद्य लेखक कौन हैं?
(क) रामवृक्ष बेनीपुरी
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) विद्यानिवास मिश्र
(घ) फणीश्वरनाथ रेणु

उत्तर
(1) घ, (2) घ, (3) घ, (4) घ, (5) ख, (6) क, (7) का

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UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 2 Indian Economy 1950-1990

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 2 Indian Economy 1950-1990 (भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990)) are part of UP Board Solutions for Class 11 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 2 Indian Economy 1950-1990 (भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990)).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 2
Chapter Name Indian Economy 1950-1990 (भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990))
Number of Questions Solved 86
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 2 Indian Economy 1950-1990 (भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990))

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
योजना को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
योजना इसकी व्याख्या करती है कि किसी देश के दुर्लभ संसाधनों का प्रयोग किस प्रकार किया जाए ताकि देश के आर्थिक विकास को गति दी जा सके।

प्रश्न 2.
भारत ने योजना को क्यों चुना?
उत्तर
1947 ई० (स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात्) में भारतीय अर्थव्यवस्था गतिहीन तथा पिछड़ी अर्थव्यवस्था थी। कृषि ही जीवन-निर्वाह का मुख्य साधन थी किंतु कृषि की अवस्था अत्यधिक दयनीय थी। अर्थव्यवस्था के द्वितीयक तथा तृतीयक क्षेत्र अविकसित थे और देश की बहुत बड़ी जनसंख्या घोर निर्धनता का जीवन व्यतीत कर रही थी। अर्थव्यवस्था मुख्यत: माँग और पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों पर आधारित थी। जिसका परिणाम था-निर्धनता, असमानता एवं गतिहीनता। ऐसी अर्थव्यवस्था को बाजार की शक्तियों पर नहीं छोड़ा जा सकता है। अतः इन समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए भारत ने ‘नियोजन’ का मार्ग अपनाया।

प्रश्न 3.
योजनाओं के लक्ष्य क्या होने चाहिए?
उत्तर
किसी योजना के स्पष्टत: निर्दिष्ट लक्ष्य होने चाहिए। भारत में पंचवर्षीय योजनाओं के लक्ष्य हैं

  1. संवृद्धि,
  2. आधुनिकीकरण,
  3. आत्मनिर्भरता,
  4. समानता,
  5. रोजगार। 

प्रश्न 4.
चमत्कारी बीज क्या होते हैं?
उत्तर
उच्च पैदावार वाली किस्मों के बीजों (HYV) को चमत्कारी बीज कहते हैं। इन बीजों का प्रयोग करने से कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है।

प्रश्न 5.
‘विक्रय अधिशेष क्या है?
उत्तर
किसानों द्वारा उत्पादन का बाजार में बेचा गया अंश ही ‘विक्रय अधिशेष’ कहलाता है।

प्रश्न 6.
कृषि क्षेत्रक में लागू किए गए भूमि सुधार की आवश्यकता और उनके प्रकारों की व्याख्या करो।
उत्तर
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत भारत में मूलत: एक कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था ही बनी रही। देश की लगभग 85 प्रतिशत जनसंख्या, जो गाँवों में बसी थी, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि के माध्यम से ही रोजी-रोटी कमा रही थी परंतु फिर भी कृषि क्षेत्र में न तो संवृद्धि हुई और न ही समता रह गई। इन्हीं सब कारणों से भूमि सुधार की आवश्यकता पड़ी। कृषि क्षेत्रक में निम्नलिखित सुधार किए गए हैं

  1. देश में कृषि क्षेत्रक में बिचौलियों का उन्मूलन किया गया।
  2. वास्तविक कृषकों को ही भूमि का स्वामी बनाया गया।
  3. किसी व्यक्ति की कृषि भूमि के स्वामित्व की अधिकतम सीमा का निर्धारण किया गया।
  4. नई तकनीक के प्रयोग पर बल दिया गया।

मध्यस्थों के उन्मूलन का परिणाम यह हुआ कि लगभग 2 करोड़ काश्तकारों को सरकार से सीधा संपर्क हो गया तथा वे जमींदारों द्वारा किए जा रहे शोषण से मुक्त हो गए।

प्रश्न 7.
हरित क्रांति क्या है? इसे क्यों लागू किया गया और इससे किसानों को कैसे लाभ पहुँचा?  संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर
हरित क्रांति से अभिप्राय कृषि उत्पादने में होने वाली भारी वृद्धि से है जो कृषि की नई नीति अपना के कारण हुई है। स्वतंत्रता के समय देश की 25 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर आश्रित थी। इस क्षेत्र में उत्पादकता बहुत कम थी और पुरानी प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जाता था। अधिसंख्य किसानों के पास आधारिक संरचना का अभाव था जिसके कारण कृषिप्रधान देश होने पर भी हम गरीब और विदेशी सहायता पर निर्भर थे। औपनिवेशिक काल में कृषि क्षेत्र में उत्पन्न गतिरोध को दूर करने के लिए हरित क्रांति लाना आवश्यक था। हरित क्रांति के कारण कृषि क्षेत्र की आगतों; जैसे उच्च पैदावार वाली किस्मों के बीजों (HYV), पर्याप्त मात्रा में उर्वरकों, कीटनाशकों तथा निश्चित जल आपूर्ति, नई तकनीक आदि का एक साथ प्रयोग होने लगा। हरित क्रांति प्रौद्योगिकी के प्रसार से खाद्यान्न उत्पादन में अत्यधिक बढोतरी हुई विशेषकर गेहूँ और चावल में। किसानों को बाजार में बेचने के लिए अधिशेष उपज मिलने लगी जिस कारण किसानों की आय में वृद्धि हुई।

प्रश्न 8.
योजना उद्देश्य के रूप में समानता के साथ संवृद्धि’ की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
भारत में पंचवर्षीय योजनाओं के लक्ष्य हैं-संवृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता और समानता। संक्षेप में, आयोजन से जनसामान्य के जीवन-स्तर में सुधार होना चाहिए। केवल संवृद्धि, आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता के द्वारा ही जनसामान्य के जीवन-स्तर में सुधार नहीं आ सकता। किसी देश में उच्च संवृद्धि दर और विकसित प्रौद्योगिकी का प्रयोग होने के बाद भी अधिकांश लोग गरीब हो सकते हैं। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि आर्थिक समृद्धि के लाभ देश के निर्धन वर्ग को भी सुलभ हों, केवल धनी लोगों तक ही सीमित न रहें। अतः संवृद्धि, आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता के साथ-साथ समानता भी महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक भारतीय को भोजन, अच्छा आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करवाने में समर्थ होना चाहिए और धन-वितरण की असमानताएँ भी कम होनी चाहिए। संक्षेप में, आर्थिक संवृद्धि, समानता के अभाव में अर्थहीन होती है।

प्रश्न 9.
‘क्या रोजगार सृजन की दृष्टि से योजना उद्देश्य के रूप में आधुनिकीकरण विरोधाभास उत्पन्न करता है?’ व्याख्या कीजिए।
उत्तर
वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन बढ़ाने के लिए उत्पादकों को नई प्रौद्योगिकी अपनानी पड़ती है। जैसे किसान पुराने बीजों के स्थान पर नई किस्म के बीजों का प्रयोग कर खेतों की पैदावार बढ़ा सकते हैं उसी प्रकार एक फैक्ट्री नई मशीनों का प्रयोग कर उत्पादन बढ़ा सकती है। नई प्रौद्योगिकी को अपनाना ही 
आधुनिकीकरण है। आधुनिकीकरण के जरिए ही नई-नई मशीनों का प्रयोग बढ़ाया जाता है, जिससे विनिर्माण एवं कृषि क्षेत्र में श्रमिकों को स्थान मशीनें ले लेती हैं अर्थात् रोजगार के अवसर इन क्षेत्रों में घटने लगते हैं। किंतु यह प्रभाव अल्पकालीन ही होता है। आधुनिकीकरण द्वारा उत्पादन में वृद्धि होती है, आय बढ़ती है और विविध प्रकार की वस्तुओं की माँग सृजित होती है। इस माँग को संतुष्ट करने के लिए नई-नई वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है जिसके कारण रोजगार के नये अवसर सृजित होने लगते हैं। उपभोक्ता वस्तुओं एवं पूँजीगत वस्तुओं के उत्पादन का विस्तार होता है, नये-नये उद्योगों की स्थापना होती है और द्वितीयक उद्योगों के विस्तार के साथ-साथ तृतीयक क्षेत्र-बैंक, बीमा आदि का विस्तार होता है जिससे रोजगार में वृद्धि होती है।

प्रश्न 10.
भारत जैसे विकासशील देश के रूप में आत्मनिर्भरता का पालन करना क्यों आवश्यक था?
उत्तर
आत्मनिर्भरता का अर्थ है—देश अपनी आवश्यकताओं को खरीदने के लिए पर्याप्त मात्रा में अतिरेक उत्पन्न करे और अपने आयातों का भुगतान करने के लिए सक्षम हो। जो देश अपने आयातों का भुगतान अपने उत्पादन के निर्यातों द्वारा करते हैं, वे आत्मनिर्भर देश कहलाते हैं। विकासशील देश समाान्यतः आत्मनिर्भर नहीं हैं क्योंकि उनके निर्यात उनके आयातों का भुगतान करने के लिए अपर्याप्त हैं। एक 
विकासशील देश के रूप में भारत को आत्मनिर्भरता का पालन करना-निम्नलिखित कारणों से आवश्यक था|

  1. विदेशी सहायता देश की आंतरिक प्रयास क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
  2. विदेशी सहायता विकास विरोधी तथा बचत विरोधी है। |
  3. विदेशी सहायता अधिकांशतः प्रतिबद्ध होती है। अत: इसका इच्छित उपयोग नहीं हो पाती। भारत में पंचवर्षीय योजनाओं का मूल लक्ष्य आत्मनिर्भरता को प्राप्त करना रहा है। उदाहरण के लिए, प्रथम पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई ताकि खाद्यान्नों के मामले में देश आत्मनिर्भर हो सके। बाद में औद्योगिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया

प्रश्न 11.
भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ विशेष अनुकूल परिस्थितियाँ हैं जिनके कारण यह विश्व का
| बाह्य प्रापण केन्द्र बन रहा है। अनुकूल परिस्थितियाँ क्या हैं?
उत्तर
विश्व के बाह्य प्रापण केन्द्र के रूप में भारतीय अर्थव्यवस्था में अनुकूल परिस्थितियाँ। निम्नलिखित हैं|

  1. भारत में तीव्र गति से सूचना प्रौद्योगिकी का विस्तार हुआ है।
  2. भारत में प्रापण सेवाओं की लागत बहुत कम आती है।
  3. कार्य का निष्पादन कुशलतापूर्वक हो जाता हैं।
  4. सेवा दर निम्न है और श्रमशक्ति कुशल है।

प्रश्न 12.
योजना अवधि के दौरान औद्योगिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्रक को ही अग्रणी भूमिका 
क्यों सौंपी गई थी?
उत्तर
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद योजना अवधि के दौरान औद्योगिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्र को अग्रणी भूमिका सौंपने के निम्नलिखित कारण थे-

  1. स्वतंत्रता-प्रप्ति के समय भारत के उद्योगपतियों के पास अर्थव्यवस्था के विकास हेतु उद्योगों में निवेश करने के लिए पर्याप्त पूँजी नहीं थी।
  2. उस समय बाजार भी इतना बड़ा नहीं था, जिसमें उद्योगपतियों को मुख्य परियोजनाएँ शुरू करने के लिए प्रोत्साहन मिलता।
  3. भारतीय अर्थव्यवस्था को समाजवाद के पथ पर अग्रसर करने के लिए यह निर्णय लिया गया कि सरकार अर्थव्यवस्था में बड़े तथा भारी उद्योग पर नियंत्रण करेगी।
  4. देश में क्षेत्रीय एवं सामाजिक विषमता को कम करने के लिए आर्थिक व सामाजिक संकेन्द्रण को कम करना आवश्यक था।

प्रश्न 13.
इस कथन की व्याख्या करें-हरित क्रांति ने सरकार को खाद्यान्नों के प्रापण द्वारा विशाल सुरक्षित भण्डार बनाने के योग्य बनाया, ताकि वह कमी के समय उसका उपयोग कर सके।
उत्तर
औपनिवेशिक काल का कृषि गतिरोध हरित क्रांति से स्थायी रूप से समाप्त हो गया। उच्च पैदावार वाली किस्मों के बीजों (HYV), कीटनाशकों, उर्वरकों, निश्चित जलापूर्ति तथा आधुनिक तकनीक की मशीनों के प्रयोग से कृषि उत्पादन अधिक मात्रा में बढ़ गया। किसान कृषि उपज को बाजार में बेचने लगे। इसके फलस्वरूप खाद्यान्नों की कीमतों में कमी आई। अपनी कुल आय के बहुत बड़े प्रतिशत का भोजन पर खर्च करने वाले निम्न आय वर्गों को कीमतों में इस सापेक्ष कमी से बहुत लाभ हुआ। विपणित अधिशेष की वजह से सरकार पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्नों को प्राप्त कर सुरिक्षत स्टॉक बना सकी जिसे खाद्यान्नों की कमी के समय प्रयोग किया जा सकता था।

प्रश्न 14.
सहायिकी किसानों को नई प्रौद्योगिकी का प्रयोग करने को प्रोत्साहित तो करती है पर उसका सरकारी वित्त पर भारी बोझ पड़ता-इस तथ्य को ध्यान में रखकर सहायिकी की उपयोगिता पर चर्चा करें।
उत्तर
आजकल कृषि क्षेत्र को दी जा रही आर्थिक सहायिकी एक ज्वलंत बहस का विषय बन गथा है। हमारे देश के छोटे किसान अधिकांशत: गरीब हैं; अत: छोटे किसानों को विशेष रूप से HYV प्रौद्योगिकी अपनाने के लिए सहायिकी दी जानी आवश्यक है। सहायता के अभाव में वे नई प्रौद्योकि का उपयोग नहीं कर पाएँगे जिसका कृषि उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। परंतु कुछ अर्थशास्त्रियों का मत है कि एक बार प्रौद्योगिकी का लाभ मिल जाने तथा उसके व्यापक प्रचलन के बाद सहायिकी धीरे-धीरे समाप्त कर देनी चाहिए क्योंकि उर्वरकी सहायता का लाभ बड़ी मात्रा में प्रायः उर्वरक उद्योग तथा अधिक समृद्ध क्षेत्र के किसानों को ही पहुँचता है। अतः यह तर्क दिया जाता है कि उर्वरकों पर सहायिकी जारी रखने का कोई 
औचित्य नहीं है। इनसे लक्षित समूह को लाभ नहीं होगा और सरकारी कोष पर आवश्यक बोझ पड़ेगा। इसके विपरीत कुछ विशेषज्ञों का मत है कि सरकार को कृषि सहायिकी जारी रखनी चाहिए क्योंकि भारत में कृषि एक बहुत ही जोखिम भरा व्यवसाय है। अधिकतर किसान गरीब हैं और सहायिकी को समाप्त करने से वे अपेक्षित आगतों का प्रयोग नहीं कर पाएँगे। इसका नुकसान यह होगा कि गरीब किसान और गरीब हो जाएँगे, कृषि क्षेत्र में उत्पादन स्तर गिरेगा, खाद्यान्नों की कमी से कीमतें बढ़ने लगेंगी जिससे हम विदेशों से सहायता लेने को मजबूर होंगे। इन विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि सहायिकी से बड़े किसानों तथा उर्वरक उद्योगों को अधिक लाभ हो रहा है, तो सही नीति सहायिकी समाप्त करना नहीं है, बल्कि ऐसे कदम उठाना है जिनसे कि केवल निर्धन किसानों को ही इनका लाभ मिले।

प्रश्न 15.
हरित क्रांति के बाद भी 1990 तक हमारी 65 प्रतिशत जनसंख्या कृषि क्षेत्रक में ही क्यों लगी रही? ।
उत्तर
1960 के दशक के अंत तक देश में कृषि उत्पादकता में वृद्धि हुई और देश खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर बन गया। इसके बावजूद नकारात्मक पहलू यह रहा है कि 1990 तक भी देश की 65 प्रतिशत जनसंख्या कृषि में लगी थी। अर्थशास्त्री इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जैस-जैसे देश सम्पन्न होता है, सकल घरेलू उत्पाद में, कृषि के योगदान में और उस पर निर्भर जनसंख्या में पर्याप्त कमी आती है। भारत में 1950-90 की अवधि में कृषि क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान कम हुआ, लेकिन कृषि क्षेत्र पर 
आश्रितों की संख्या में कोई खास कमी नहीं आई। 1950 में 67.5% लोग एवं 1990 में 64.9 प्रतिशत जनसंख्या कृषि कार्य में लगी थी। इसका कारण यह माना जाता है कि उद्योग क्षेत्र और सेवा क्षेत्र, कृषि क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को नहीं खपा पाए। अनेक अर्थशास्त्री इसे 1950-90 के दौरान अपनाई गई नीतियों की विफलता मानते हैं। मूलत: इसका कारण द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों का आशानुकूल विकास न हो पाना है।

प्रश्न 16.
यद्यपि उद्योगों के लिए सार्वजनिक क्षेत्रक बहुत आवश्यक रहा है, पर सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक उपक्रम ऐसे हैं जो भारी हानि उठा रहे हैं और इस क्षेत्रक के अर्थव्यवस्था के संसाधनों की बर्बादी के साधन बने हुए हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक क्षेत्रक के उपक्रमों की उपयोगिता पर चर्चा करें।
उत्तर
स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय भारत के उद्योगपतियों के पास हमारी अर्थव्यवस्था के विकास हेतु उद्योगों में निवेश के लिए पर्याप्त पूँजी नहीं थी। इसी कारण राज्य को औद्योगिक क्षेत्र को प्रोत्साहन देने में व्यापक भूमिका निभानी पड़ी। इसके अतिरिक्त भारतीय अर्थव्यवस्था को समाजवाद के पथ पर अग्रसर करने के लिए यह निर्णय लिया गया कि राज्य उन उद्योगों पर पूरा नियंत्रण रखेगा, जो अर्थव्यवस्था के लिए महत्त्वपूर्ण थे। वस्तुतः औद्योगिक क्षेत्र प्रायः सार्वजनिक क्षेत्रक के कारण विविधतापूर्ण बन गया था। इस क्षेत्रक की भूमिका से कम पूँजी वाले लोगों को भी उद्योग क्षेत्र में प्रवेश का मौका मिल गया। भारतीय अर्थव्यवस्था की संवृद्धि में सार्वजनिक क्षेत्रक द्वारा किए गए योगदान के बावजूद कुछ अर्थशास्त्रियों ने सार्वजनिक क्षेत्रक के अनेक उद्यमों के निष्पादन की कड़ी आलोचना की है। इस क्षेत्रक ने एकाधिकारी शैली में काम किया जिससे निजी क्षेत्रक को पर्याप्त आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिल पाया। 
अब यह व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है कि इस क्षेत्रक को अब उन उद्योगों से हट जाना चाहिए जहाँ निजी क्षेत्रकीक तरह से काम कर सकता है। किंतु अनेक क्षेत्रक ऐसे हैं जहाँ आज भी सार्वजनिक क्षेत्रक की अपरित बनी हुई है। उदाहरण के लिए, उच्च विकास दर के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार आवश्यक है, गैर-लाभकारी किंतु उपयोगी क्षेत्रों में प्रारंभिक विनियोग सार्वजनिक क्षेत्रक का विस्तार आवश्यक है, गैर-लाभकारी किंतु उपयोगी क्षेत्रों में प्रारंभिक विनियोग सार्वजनिक क्षेत्रक द्वारा ही संभव है, जनोपयोगी सेवाओं की स्थापना सार्वजनिक क्षेत्रक में की जा सकती है और सार्वजनिक क्षेत्रक के विस्तार से ही आर्थिक विषमताओं को कम किया जा सकता है। इस प्रकार निम्न क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्रक का विस्तार अपरिहार्य है-

  1. सुरक्षात्मक उद्योग,
  2. भारी विनियोग वाले उद्योग,
  3. लम्बी गर्भावधि वाले उद्योग तथा
  4. जनोपयोगी क्षेत्रक।

प्रश्न 17.
आयात प्रतिस्थापन किस प्रकार घरेलु उद्योगों को संरक्षण प्रदान करता है?
उत्तर
हमारे नीति-निर्माताओं द्वारा अपनाई गई औद्योगिक नीति व्यापार नीति से घनिष्ट रूप से सम्बद्ध थी। हमारी योजनाओं में व्यापार की विशेषता अंतर्मुखी व्यापार नीति थी। तकनीकी रूप से इस नीति को आयात-प्रतिस्थापन कहा जाता है। इस नीति का उद्देश्य आयात के बदले घरेलू उत्पादन द्वारा पूर्ति करना है। इस नीति द्वारा राज्य ने घरेलू उद्योगों की वस्तुओं का उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित किया और विदेशी प्रतिस्पर्धा से घरेलू उद्योगों की रक्षा की। आयात संरेक्षण दो प्रकार के थे-

  1. प्रशुल्क-प्रशुल्क से आयातित वस्तुएँ महँगी हो जाती हैं,
  2. कोटा-कोटे में वस्तुओं की मात्रा तय होती है, जिन्हें आयात किया जा सकता है। प्रशुल्क एवं कोटे का प्रभाव यह होता है कि उनसे आयात प्रतिबंधित हो जाते हैं और विदेशी प्रतिस्पर्धा से देशी फर्मों की रक्षा होती है।

प्रश्न 18.
औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 में निजी क्षेत्रक का नियमन क्यों और कैसे किया गया था?
उत्तर
भारी उद्योगों पर नियंत्रण रखने के राज्य के लक्ष्य के अनुसार औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 को लाया गया था। इस प्रस्थाव को द्वितीय पंचवर्षीय योजना का आधार बनाया गया। इस प्रस्ताव के अनुसार, उद्योगों को तीन वर्गों में विभक्त किया गया। प्रथम वर्ग में वे उद्योग सम्मिलित थे, जिन पर राज्य का अनन्य स्वामित्व था। दूसरे वर्ग में वे उद्योग शामिल थे, जिनके लिए निजी क्षेत्र, सरकारी क्षेत्र के साथ मिलकर प्रयास कर सकते थे, परंतु जिनमें नई इकाइयों को शुरू करने की एकमात्र जिम्मेदारी राज्य की होती। तीसरे वर्ग में वे उद्योग शामिल थे, जो निजी क्षेत्रक के अंतर्गत आते थे लेकिन इस क्षेत्र को लाइसेंस पद्धति के माध्यम से राज्य के नियंत्रण में रखा गया। इस प्रस्ताव में सरकार के लिए ऐसा करना आवश्यक था। इस नीति का प्रयोग पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया। पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग लगाने वाले उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक प्रकार से आर्थिक सहायता प्रदान की गई। इस नीति का उद्देश्य क्षेत्रीय समानता को बढ़ावा देना था।

प्रश्न 19.
निम्नलिखित युग्मों को सुमेलित कीजिए
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 2 Indian Economy 1950-1990 1
उत्तर
.UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 2 Indian Economy 1950-1990 2

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

 बदविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्यतः माँग और पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों पर आधारित थी जिसका परिणाम था
(क) निर्धनता
(ख) असमानता
(ग) गतिहीनता
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 2.
मिश्रित अर्थव्यवस्था को नियन्त्रित अर्थव्यवस्था की संज्ञा किसने दी है?
(क) प्रो० हैन्सन ने
(ख) प्रो० लर्नर ने
(ग) डॉ० डाल्टन ने
(घ) लॉक्स ने
उत्तर
(ख) प्रो० लर्नर ने ।

प्रश्न 3.
भारत सरकार ने औद्योगिक नीति की घोषणा कब की?
(क) 6 अप्रैल, 1948 ई० को
(ख) 2 अक्टूबर, 1943 को
(ग) 1 अप्रैल, 1999 ई० को
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) 6 अप्रैल, 1948 ई० को

प्रश्न 4.
भारत में आर्थिक नियोजन की तकनीक को अपनाया गया|
(क) 1 अप्रैल, 1950 से
(ख) 1 अप्रैल, 1851 से
(ग) 1 अप्रैल, 1951 से
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) 1 अप्रैल, 1951 से।

प्रश्न 5.
“भूमि सुधार व्यक्ति और भूमि के सम्बन्धों में नियोजन और संस्थागत पुनर्गठन है।” यह |  परिभाषा है|
(क) प्रो० बाउले
(ख) डॉ० बी०बी० भट्ट
(ग) रमेश दत्त ।
(घ) प्रो० गुन्नार मिर्डल
उत्तर
(घ) प्रो० गुन्नार मिर्डल।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
पूँजीवाद क्या है?
उत्तर
पूँजीवाद आर्थिक संगठन की एक ऐसी प्रणाली है जिसमें उत्पादन के साधनों पर व्यक्ति का निजी अधिकार होता है तथा वह उत्पादन के साधनों का प्रयोग लाभ कमाने की दृष्टि से करता है।

प्रश्न 2.
समाजवाद क्या है?
उत्तर
समाजवाद आर्थिक संगठन की एक ऐसी प्रणाली है जिसमें उत्पत्ति के साधनों पर सरकार अथवा लोकसत्ता का अधिकार होता है तथा समस्त आर्थिक क्रियाएँ निजी क्षेत्र में न रहकर सार्वजनिक क्षेत्र में रहती

प्रश्न 3.
मिश्रित अर्थव्यवस्था क्या है?
उत्तर
मिश्रित अर्थव्यवस्था पूँजीवाद और समाजवाद के बीच की अवस्था है। इसमें पूँजीवाद व समाजवाद दोनों के दोषों से अर्थव्यवस्था को मुक्त करके दोनों प्रणालियों के गुणों को अपनाया जाता है। इसमें निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र को सह-अस्तित्व पाया जाता है।

प्रश्न 4.
आर्थिक नियोजन से क्या आशय है?
उत्तर
आर्थिक नियोजन से आशय पूर्व-निर्धारित और निश्चित सामाजिक एवं आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अर्थव्यवस्था के सभी अंगों को एकीकृत और समन्वित करते हुए राष्ट्र के संसाधनों के सम्बन्ध में सोच-विचारकर रूपरेखा तैयार करने और केन्द्रीय नियन्त्रण से है।

प्रश्न 5.
दसवीं पंचवर्षीय योजना के दो उद्देश्य बताइए।
उत्तर
(1) सकल राष्ट्रीय उत्पाद में 8% वार्षिक वृद्धि।
(2) श्रमशक्ति को लाभपूर्ण रोजगार प्रदान करना।

प्रश्न 6.
भारतीय कृषि की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
(1) भारत में कृषि उत्पादकता अन्य देशों क तुलना में कम है।
(2) कार्यशील जनसंख्या का लगभग 67.2% भाग कृषि से आजीविका प्राप्त करता है।

प्रश्न 7.
सहकारी कृषि की परिभाषा दीजिए।
उत्तर
“सहकारी कृषि अनिवार्य रूप से ऐसी व्यवस्था को सूचित करती है, जिसमें भूमि का एकत्रीकरण करके उसका संयुक्त प्रबन्ध किया जाता है।”

प्रश्न 8.
भारत में सहकारी कृषि के पक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर
(1) जोतों के आकार में वृद्धि होती है।
(2) कृषि नियोजन में सहायता मिलती है।

प्रश्न 9.
आर्थिक जोत की परिभाषा दीजिए।
उत्तर
“आर्थिक जोत एक ऐसी जोत है, जो किसी परिवार को न्यूनतम जीवन स्तर पर रहने के लिए पर्याप्त आय प्रदान करे।”

प्रश्न 10.
कृषक बीमा आय योजना क्या है?
उत्तर
इस योजना के अन्तर्गत किसानों को उनकी उपज का कुल मूल्य न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आधारित’ मिलने की गारण्टी दी जाएगी।

प्रश्न 11.
नई राष्ट्रीय कृषि नीति की घोषणा कब की गई?
उत्तर
नई राष्ट्रीय कृषि नीति की घोषणा 29 जुलाई, 2000 को संसद में की गई।

प्रश्न 12.
नई कृषि नीति का क्या लक्ष्य है? ।
उत्तर
नई कृषि नीति का लक्ष्य अगले दो दशकों के लिए कृषि क्षेत्र में प्रति वर्ष 4% वृद्धि दर प्राप्त करना है।

प्रश्न 13.
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना का क्या उद्देश्य है?
उत्तर
इस योजना का उद्देश्य है-सूखा, बाढ़, ओला-वृष्टि, चक्रवात, आग, कीट व बीमारियों आदि प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसल को हुई क्षति से किसानों का संरक्षण करना।

 प्रश्न 14.
भू-सुधार से क्या आशय है?
उत्तर
भू-सुधार से आशय छोटे कृषकों एवं कृषि श्रमिकों के लाभार्थ भूमि-स्वामित्व के पुनर्वितरण से लगाया जाता है।

प्रश्न 15.
हरित क्रान्ति से क्या आशय है?
उत्तर
हरत क्रान्ति से आशय सिंचित और असिंचित कृषि क्षेत्रों में अधिक उपज देने वाली किस्मों को आधुनिक कृषि पद्धति से उगाकर कृषि उपज में यथासम्भव अधिक वृद्धि करने से है।

प्रश्न 16.
यान्त्रिक कृषि का अर्थ बताइए।
उत्तर
यान्त्रिक कृषि का अभिप्राय भूमि सम्बन्धी कार्यों में, जिन्हें प्राय: बैलों, घोड़ों अथवा अन्य पशुओं की सहायता से अथवा मानव श्रम द्वारा अथवा पशु एवं मानव श्रम दोनों के द्वारा किया जाता है, में यान्त्रिक शक्ति का प्रयोग करने से है।

प्रश्न 17.
कृषि विपणन से क्या आशय है?
उत्तर
कृषि विपणन के अन्तर्गत उन समस्त क्रियाओं का समावेश किया जाता है, जिनका सम्बन्ध कृषि उत्पादन के कृषक के पास से अन्तिम उपभोक्ताओं तक पहुँचाने में होता है।

प्रश्न 18.
सुव्यवस्थित कृषि विपणन की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
सुव्यवस्थित कृषि विपणन की दो विशेषताएँ हैं-
(1) मध्यस्थों की संख्या न्यूनतम होना तथा
(2) भण्डार-गृहों की पर्याप्त व्यवस्था होना।

प्रश्न 19.
ग्रामीण बाजार में फसल की बिक्री किन रूपों में होती है?
उत्तर
(1) गाँव के विशिष्ट अथवा साप्ताहिक बाजारों में।
(2) गाँव के महाज एवं साहूकारों को।
(3) गाँव में भ्रमण करते व्यापारियों तथा कमीशन एजेण्टों को।

प्रश्न 20.
भारत में कृषि उपज की विक्रय व्यवस्था के दो दोष बताइए।
उत्तर
कृषि उपज की विक्रय व्यवस्था के दो दोष हैं–
(1) घटिया किस्म की कृषि उपज।
(2) बहुत अधिक मध्यस्थों का होना।

प्रश्न 21.
भारत में कृषि विपणन व्यवस्था को सुधारने के लिए दो सुझाव दीजिए।
उत्तर
कृषि विपणन व्यवस्था को सुधारने हेतु दो सुझाव हैं-
(1) कृषि उपज की बिक्री के लिए। स्थान-स्थान पर सहकारी कृषि विपणन समितियों की स्थापना की जाए। |
(2) नियन्त्रित मण्डियों की अधिकाधिक संख्या में स्थापना की जाए।

प्रश्न 22.
गाँवों में फसल की बिक्री की विवशता के लिए उत्तरदायी दो कारण बताइए।
उत्तर
(1) भण्डारण सुविधाओं का अभाव।
(2) किसानों को साहूकारों व महाजनों के ऋण-चंगुल में फैसा रहना।

प्रश्न 23.
अनियमित मण्डियों में कोई दो प्रचलित बुराइयाँ बताइए।
उत्तर
(1) विभिन्न प्रकार की अनुचित कटौतियाँ काटना।
(2) कम माप-तौल द्वारा किसानों को धोखा देना।

प्रश्न 24.
मूल्य स्थिरीकरण का क्या अर्थ है?
उत्तर
मूल्य स्थिरीकरण से आशय मूल्यों में होने वाले उच्चावचनों को एक सीमा तक रखने से है अर्थात् उच्चावचनों को नियन्त्रित करने से है।

प्रश्न 25.
न्यूनतम समर्थन मूल्य से क्या आशय है?
उत्तर
न्यूनतम समर्थन मूल्य से आशय सरकार द्वारा ऐसे आश्वासन से है कि यदि खुले बाजार में मूल्य कम हो जाए तो सरकार न्यूनतम मूल्य पर इसका क्रय करने की व्यवस्था करेगी।

प्रश्न 26.
उपदान (आर्थिक सहायता) से क्या आशय है?
उत्तर
उपदान वह आर्थिक सहायता है जिसे सरकार वस्तुओं के मूल्यों को निम्न स्तर पर बनाए रखने के लिए उत्पादकों, वितरकों व निर्यातकों को प्रदान करती है।

प्रश्न 27.
औद्योगीकरण से क्या आशय है?
उत्तर
औद्योगीकरण से आशय निर्माणी उद्योगों की स्थापना एवं उनके विकास से है।

प्रश्न 28.
भारत में औद्योगीकरण की दो समस्याएँ बताइए।
उत्तर
भारत में औद्योगीकरण की दो समस्याएँ हैं|
(1) तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या भारत के औद्योगिक विकास में बाधक बनी है।
(2) बाजार की सम्पूर्णता एवं जोखिम के आधिक्य के कारण देश में कुशल उद्यमीय क्षमता का अभाव

प्रश्न 29.
“भारत का औद्योगिक विकास मुख्यतः उसके कृषि विकास पर निर्भर करता है। इसके पक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर
इसके पक्ष में दो तर्क हैं-
(1) कृषि; उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराती है।
(2) कृषि खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर बनाकर औद्योगिक विकास के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण 
करती है।

प्रश्न 30.
दसवीं योजना में औद्योगिक विकास रणनीति के दो बिन्दु बताइए।
उत्तर
(1) औद्योगिक उदारीकरण को राज्य स्तर पर ले जाना।
(2) लघु उद्योग क्षेत्र के विकास पर अधिक ध्यान देना।

प्रश्न 31.
1948 की औद्योगिक नीति के दो उद्देश्य बताइए।
उत्तर
(1) समाने अवसर तथा न्याय प्रदान करने वाली सामाजिक-व्यवस्था की स्थापना करना।
(2) सुखद औद्योगिक श्रम सम्बन्धों की स्थापना करना।

प्रश्न 32.
1956 की औद्योगिक नीति के दो उद्देश्य बताइए।
उत्तर
(1) आर्थिक विकास की दर में वृद्धि करना।
(2) रोजगार के अवसरों में वृद्धि करना।

प्रश्न 33.
औद्योगिक नीति, 1991 के दो उद्देश्य बताइए।
उत्तर
(1) लघु उद्योग के विकास को बल देना ताकि यह क्षेत्र अधिक कुशलता एवं तकनीकी सुधार के वातावरण में विकसित होता रहे
(2) श्रमिकों के हितों की रक्षा करना।

प्रश्न 34.
लाइसेन्स नीति के दो उद्देश्य बताइए।
उत्तर
(1) उद्योगों के स्वामित्व के केन्द्रीकरण को रोकना।
(2) क्षेत्रीय आर्थिक असन्तुलनों को दूर करना।

प्रश्न 35.
वर्तमान में लघु उद्योग की निवेश सीमा कितनी है?
उत्तर
Rs. 5 करोड़।

प्रश्न 36.
भारतीय योजना का निर्माता किसे माना जाता है?
उत्तर
पी० सी० महालनोबिस को।

प्रश्न 37.
विपणन अधिशेष किसे कहते हैं?
उत्तर
किसानों द्वारा उत्पादन का बाजार में बेचा गया अंश ‘विपणन अधिशेष’ कहलाता है।

प्रश्न 38.
आयात प्रतिस्थापन नीति का क्या उद्देश्य है?
उत्तर
आयात प्रतिस्थापन नीति का उद्देश्य आयात के बदले घरेलू उत्पाद द्वारा पूर्ति करना है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आर्थिक विकास एवं आर्थिक वृद्धि में अन्तर बताइए।
उत्तर
आर्थिक विकास एवं आर्थिक वृद्धि में अन्तर
आर्थिक विकास एवं आर्थिक वृद्धि में निम्नलिखित अन्तर हैं

  1. विकास के अन्तर्गत उत्पादन में संरचनात्मक परिवर्तन आता है, जबकि वृद्धि के अन्तर्गत संरचनात्मक परिवर्तन स्वाभाविक ढंग से लाए जाते हैं और वर्तमान संरचना को बनाए रखा जाता
  2. आर्थिक विकास के अन्तर्गत क्रान्तिकारी एवं आकस्मिक परिवर्तन तीव्र गति से किए जाते हैं, जबकि आर्थिक वृद्धि के अन्तर्गत संसाधनों में क्रमिक परिवर्तन के अनुरूप मन्द गति से स्वाभाविक परिवर्तन होने दिए जाते हैं।
  3. विकास के अन्तर्गत पुराने सन्तुलन को छिन्न-भिन्न करके नवीन सन्तुलन को अगले चरणों परस्थापित किया जाता है, जबकि वृद्धि में पुराने सन्तुलन में यथासम्भव समायोजन स्थापित किए जाते
  4. विकास को ऐसी अर्थव्यवस्थाओं से सम्बद्ध किया जाता है जो अल्पविकसित हैं लेकिन जिनमें । विकास की सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। इसके विपरीत, आर्थिक वृद्धि में वर्तमान साधनों का | वैकल्पिक एवं अहं उपयोग करके उत्पादन बढ़ाया जाता है।
  5. आर्थिक विकास के अन्तर्गत एक स्थिर अर्थव्यवस्था को बाह्य प्रेरणा एवं सरकारी निर्देशन तथा | नियन्त्रण द्वारा गतिशील किया जाता है, जबकि आर्थिक वृद्धि स्वाभाविक एवं स्वचालित परिवर्तनों का संकेतक होती है।
  6. आर्थिक विकास के अन्तर्गत दीर्घकालीन परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है, जबकि आर्थिक | वृद्धि स्वभाविक परिवर्तनों का अध्ययन करती है।
  7. आर्थिक वृद्धि का अर्थ है-उत्पादन में वृद्धि, जबकि आर्थिक विकास का अर्थ है-उत्पादन में वृद्धि + प्राविधिक एवं संस्थागत परिवर्तन।
    यद्यपि आर्थिक विकास और आर्थिक वृद्धि में भेद करना सम्भव है, किन्तु इस प्रकार का भेद व्यावहारिक दृष्टि से अधिक उपयोगी नहीं हो सकता। पॉल बरान के शब्दों में-“विकास और वृद्धि के विचार किसी पुरानी और बेकार चीज से किसी नई स्थिति की ओर परिवर्तन को बतलाते हैं। इसलिए अच्छा यही होगा कि आर्थिक विकास और आर्थिक वृद्धि दोनों का प्रयोग परिवर्तन की उस प्रक्रिया को बतलाने के लिए किया जाए जिसके द्वारा कोई अर्थव्यवस्था आर्थिक उपलब्धि के ऊँचे स्तर को प्राप्त करती है।”

प्रश्न 2.
अल्पविकसित (विकासशील अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषत ।।
उत्तर
अल्पविकसित (विकासशील) अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. ये देश आर्थिक दृष्टि से पिछड़े होते हैं और इनकी प्रति व्यक्ति आय विकसित देशों की तुलना में बहुत कम होती है।
  2. अधिकांश विकासशील देश कृषिप्रधान होते हैं किन्तु कृषि तकनीकी परम्परागत और कृषि उत्पादकता निम्न होती है।
  3. पूँजी की कमी पायी जाती है जिसके कारण पूँजी निर्माण की दर न्यून रहती है।
  4. आधुनिक संरचना परिवहन व संचार के साधन, बैंकिंग सुविधाओं तथा शिक्षा व चिकित्सा | सुविधाओं का अभाव पाया जाता है।
  5. कृषि पर जनसंख्या का भार अधिक होता है और औद्योगीकरण के अभाव में व्यापक रूप से बेरोजगारी वे अर्द्ध-बेरोजगारी पायी जाती है।
  6. प्राकृतिक साधन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं किन्तु तकनीकी पिछड़ेपन के कारण वे अप्रयुक्त व | अल्प-प्रयुक्त पड़े रहते हैं
  7. आधारभूत उद्योगों के अभाव के कारण इन देशों में औद्योगिक पिछड़ापन पाया जाता है। .
  8. इन देशों में पूँजी की कमी, बाजार की अपूर्णता, तकनीकी ज्ञान की कमी आदि के कारण निर्धनता के दुश्चक्र क्रियाशील रहते हैं।
  9. इन देशों में आर्थिक असमानताएँ पायी जाती हैं। आर्थिक विकास के साथ-साथ असमानताएँ बढ़ी जाती हैं।
  10. जनसंख्या की वार्षिक वृद्धि दर ऊची होती है जिसके कारण इन देशों में जनाधिक्य पाया जाता है।

प्रश्न 3.
भारत में सार्वजनिक उपक्रमों की उपलब्धियाँ बताइए।
उत्तर
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारत सरकार ने देश के त्वरित आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए सार्वजनिक उपक्रमों को स्थापित एवं सुव्यवस्थित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनकी उपलब्धियाँ निम्नलिखित हैं

  1. गत वर्षों में सार्वजनिक उपक्रमों में विनियोग में काफी वृद्धि हुई है।
  2. सार्वजनिक उपक्रमों की बिक्री धनराशि में प्रतिवर्ष वृद्धि हो रही है। इस प्रकार ये उपक्रम अर्थव्यवस्था में वस्तुओं तथा सेवाओं के रूप में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं।
  3. क्षमता उपयोग में सुधार हुआ है।
  4. प्रयुक्त पूँजी पर सकल लाभ के प्रतिशत में भी प्रभावकारी सुधार हुआ है।
  5. सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा घोषित लाभांश गत वर्षों में निरन्तर बढ़ा है।
  6. सार्वजनिक उपक्रमों ने प्रत्यक्ष रूप से अधिकाधिक लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए हैं। इसके साथ ही उनके वेतन एवं मजदूरी में भी आशातीत वृद्धि हुई है।
  7. सार्वजनिक उपक्रम अपने कर्मचारियों को आवास तथा कल्याण सम्बन्धी सुविधाएँ प्रदान कर रहे
  8. सार्वजनिक उपक्रमों में पूरक उद्योगों का विकास हुआ है।
  9. निर्यातों से प्राप्त आय में वृद्धि हुई है।
  10. ये उपक्रम मूल्यवान विदेशी मुद्रा को बचाने में सहायक रहे हैं।

प्रश्न 4.
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व बताइए।
उत्तर
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

  1. भारतीय कृषि राष्ट्रीय आय का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।।
  2. सम्पूर्ण जनसंख्या का लगभग 67% भाग अपनी आजीविका कृषि से ही प्राप्त करता है।
  3. देश के कुल भू-क्षेत्र के लगभग 49.8% भाग में खेती की जाती है।
  4. कृषि देश की 121 करोड़ जनसंख्या को भोजन तथा 36 करोड़ पशुओं को चारा प्रदान करती है।
  5. देश के महत्त्वपूर्ण उद्योग कच्चे माल के लिए कृषि पर ही आश्रित हैं।
  6. चाय, जूट, लाख, शक्कर, ऊन, रुई, मसाले, तिलहन आदि के निर्यात से देश को पर्याप्त विदेशी | मुद्रा प्राप्त होती है। ”
  7. कृषि देश के आन्तरिक व्यापार का प्रमुख आधार है।
  8. कृषि एवं कृषि वस्तुएँ केन्द्र एवं राज्य सरकारों को राजस्व उपलब्ध कराती हैं।
  9. कृषि उत्पादन यातायात को पर्याप्त मात्रा में प्रभावित करता है।

प्रश्न 5.
भारत में कृषि भूमि के उपविभाजन व अपखण्डन के दोष (हानियाँ) बताइए।
उत्तर
भारत में कृषि भूमि के उपविभाजन व अपखण्डन के मुख्य दोष अथवा हानियाँ निम्नलिखित हैं
1. उत्पादन व्यय में वृद्धि– खेतों के छोटे तथा छिटके होने से भूमि, समय, श्रम एवं पूँजी का 
अपव्यय होता है जिससे उत्पादन व्यय में वृद्धि हो जाती है।

2. कृषि सुधार में कठिनाइयाँ– छौटे तथा बिखरे हुए खेतों पर कोई सुधार कार्य नहीं हो ता। | सिंचाई, खाद तथा आधुनिक कृषि उपकरणों की सुविधा इन खेतों को नहीं मिल पाती, जिससे उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

3. भूमि का अपव्यय- छोटे तथा छिटके खेतों में भूमि को दो प्रकार से अपव्यय होता है। कुछ भूमि तो मेंड़ बनाने में नष्ट हो जाती है और शेष अपने लघु आकार के कारण पूर्णत: प्रयोग में नहीं | आ पाती।

4. सिंचाई में बाधा- छोटे-छोटे खेतों पर सिंचाई करना आर्थिक दृष्टि से भी उपयुक्त नहीं होता। डॉ० केप का अनुमान है कि 6 एकड़ तक के खेत पर सिंचाई करने से किसान को १ 55 प्रति एकड़ तक घाटा उठाना पड़ता है, जबकि 25 एकड़ के खेत पर यह घाटा कम होकर केवल १2 प्रति एकड़े रह जाता है।

5. देख- रेख में असुविधा-विखण्डन के कारण किसान को देख-रेख पर बहुत व्यय करना पड़ता है अन्यथा पशु-पक्षी खड़ी फसल को नष्ट कर देते हैं।

6. अन्य दोष- उपविभाजन एवं अपखण्डन के परिणामस्वरूप कुछ अन्य दोष भी उत्पन हो जाते हैं; जैसे-

  1. भूमि की उर्वरा शक्ति में कमी आ जाती है क्योंकि किसान अपने निर्वाह के लिए उस पर निरन्तर खेती करने के लिए बाध्य होता है।
  2.  छोटे-छोटे खेतों के मध्य बाड़, रास्ते आदि को लेकर बहुधा अनावश्यक अदालती झगड़ों को प्रोत्साहन मिलता है, जिससे शक्ति तथा धन दोनों का अपव्यय होता है।
  3. अपखण्ड़ने के कारण गहन खेती को अपनाना कठिन हो जाता है।
  4. कृषकों को पशु पालने में कठिनाई होती है, क्योंकि छोटे खेत से उनके लिए चारे की व्यस्था नहीं हो पाती।
  5. उपविभाजन एवं अपखण्डन देश में व्याप्त अत्यधिक निर्धनता का एक मूल कारण है। इससे अर्द्ध-बेकारी बढ़ती है।

प्रश्न 6.
भू-सुधार के अन्तर्गत कौन-कौन से कार्यक्रम आते हैं?
उत्तर
‘भूमि-सुधार’ एक अत्यन्त व्यापक शब्द है। अत: भूमि-सुधार की दिशा में जो सर्वतोमुखी प्रगति हुई है, उसका विवेचन हम निम्नलिखित शीर्षकों में करेंगे
(अ) मध्यस्थों की समाप्ति-1. जमींदारी उन्मूलन। 2. जागीरदारी उन्मूलन।
(ब) काश्तकारी सुधार-1. लगान नियमन। 2. भू-स्वामित्व की सुरक्षा। 3. खुदकाश्त में भूमि का 
पुनर्ग्रहण। 4. काश्तकारों को मालिक होने का अधिकार।।
(स) जोतों का सीमा-निर्धारण-1. वर्तमान जोतों की अधिकतम सीमा। 2. भावी जोतों की 
अधिकतम सीमा।
(द) कृषि-पुनर्गठन–1. चकबन्दी। 2. भूमि के प्रबन्ध में सुधर। 3. सहकारी खेती। 4. भूमिहीन 
मजदूरों को बसाना तथा भू-दान व ग्राम-दान आदि।

प्रश्न 7.
भारत में साहूकारों की कृषि-वित्त व्यवस्था के दोष बताइए।
उत्तर
भारत में साहूकारों की कृषि-वित्त व्यवस्था के दोष निम्नलिखित रहे हैं

  1. साहूकार की कार्य-पद्धति लोचदार होती है और वह समय, परिस्थिति तथा व्यक्ति के अनुसार उनमें परिवर्तन करता रहता है।
  2. साहूकार अपने ऋणों पर ब्याज की ऊँची दर वसूल करता है।
  3. साहूकार मूलधन देते समय ही पूरे वर्ष का ब्याज अग्रिम रूप में काट लेते हैं और इसकी कोई रसीद नहीं देते हैं।
  4. अनेक साहूकार कोरे कागजों पर हस्ताक्षर या अँगूठे की निशानी ले लेते हैं और बाद में उन अधिक रकम भर लेते हैं।
  5. बहुत-से स्थानों पर ऋण देते समय ऋण की रकम में से अनेक प्रकार के खर्च काट लेते हैं। कभी-कभी यह रकम 5% से 10% तक हो जाती है।
  6. साहूकार कृषकों को अनुत्पादक कार्यों के लिए ऋण देकर उन्हें फिजूलखर्ची बना देते हैं।
  7. साहूकार समय-समय पर हिसाब-किताब में भी गड़बड़ करता रहता है।
  8. साहूकार कृषकों को ऋण देने के बाद उन्हें अपनी फसल कम कीमत पर बेचने के लिए विवश करते हैं।

प्रश्न 8.
एक सुव्यवस्थित कृषि विपणन पद्धति की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
एक सुव्यवस्थित कृषि विपणन पद्धति में निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए

  1. मध्यस्थों की संख्या न्यूनतम होनी चाहिए।
  2. कृषि और कृषि उपज के विक्रेता दोनों के हितों की सुरक्षा होनी चाहिए।
  3. सस्ती व उत्तम परिवहन की व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे माल मण्डियों तक आसानी से तथा कम लागते पर ले जाया जा सके।
  4. कृषकों के पास ब्याज सम्बन्धी सूचनाएँ उचित समय पर उपलब्ध होनी चाहिए।
  5. भण्डार-गृहों की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए।
  6. कृषकों को उचित मूल्य प्राप्त होने तक कृषि-पदार्थों को अपने पास रखने की क्षमता होनी चाहिए।
  7. कृषि उपज की विभिन्न किस्मों के मूल्य में अन्तर होना चाहिए।

प्रश्न 9.
बड़े पैमाने के उद्योगों को प्रोत्साहन देने हेतु भारत सरकार द्वारा क्या-क्या उपाय किए गए
उत्तर
देश में औद्योगिक उत्पादकता को बढ़ाने, सभी को आधारभूत सुविधाएँ प्रदान करने और औद्योगिक वातावरण को सुदृढ़ करने के लिए बड़े पैमाने के उद्योगों की स्थापना की गई है। इन उद्योगों की स्थापना अधिकांशत: सार्वजनिक क्षेत्रों में की गई है, जिनमें बड़ी मात्रा में पूँजी निवेश किया गया है तथा बड़ी संख्या में श्रमिकों को रोजगार दिया गया है। इन उद्योगों के विकास के लिए सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाए

  1. लाइसेन्सिग नीति को उदार बनाया गया है।
  2. राजकोषीय नीति के अन्तर्गत अपर्याप्त कर-रियायतें दी गई हैं।
  3. औद्योगिक विकास एवं नियमन अधिनियम, 1951′ के अन्तर्गत विनिर्माण इकाइयों का पंजीकरणआवश्यक है और इन्हें इस अधिनियम के अन्तर्गत सरकार द्वारा निर्मित नियमों एवं अधिनियमों का | पालन करना होता है।
  4. आधुनिक औद्योगिक तकनीक को अपनाने के लिए अनेक प्रकार की राजकोषीय एवं वित्तीय  प्रेरणाएँ दी जा रही हैं।
  5. उत्पादन लागतों को न्यूनतम करने के लिए सरकार द्वारा सभी प्रकार की सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
  6. प्रौद्योगिकीय सुधार और संयन्त्र आधुनिकीकरण के लिए सरकार ने दो कोषों की स्थापना की है
    (1) प्रौद्योगिकीय सुधार कोष एवं
    (2) पूँजी आधुनिकीकरण कोष।

प्रश्न 10.
भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु एवं कुटीर उद्योगों का महत्त्व बताइए।
उत्तर
भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु एवं कुटीर उद्योगों के महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

  1. इन उद्योगों में लगभग 2.25 करोड़ लोग रोजगार में लगे हैं।
  2. ये उद्योग आय व सम्पत्ति के सम वितरण में सहायक हैं।
  3. श्रमप्रधान उद्योगों के कारण कर्म पूँजी से भी इनका संचालन सम्भव है।
  4. लघु एवं कुटीर उद्योगों में ही कृषि में लगे अतिरिक्त श्रम को स्थानान्तरित किया जा सकता है।
  5. ये उद्योग विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था की स्थापना करते हैं जो आज के युग की माँग है।
  6. इन उद्योगों को उपभोक्ताओं की रुचि के अनुसार समायोजित किया जा सकता है।
  7. ये उद्योग औद्योगिक अशान्ति, हड़ताल, तालाबन्दी आदि से मुक्त रहते हैं और सहानुभूति, समानता, सहकारिता, एकता तथा सहयोग की भावना को जन्म देते हैं।
  8. ये उद्योग विदेशी विनिमय अर्जित करने में अत्यन्त सहायक सिद्ध हुए हैं।
  9. इन उद्योगों को चलाने के लिए विशेष शिक्षा तथा प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। 10. कुटीर तथा लघु उद्योगों का माल अधिक टिकाऊ तथा कलात्मक होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आर्थिक प्रणाली (अर्थव्यवस्था) से क्या आशय है? आर्थिक प्रणाली के प्रमुख लक्षण बताइए।
या अर्थव्यवस्था से क्या आशय है? अर्थव्यवस्था के लक्षण एवं प्रकार बताइए।
उत्तर
आर्थिक प्रणाली का अर्थ एवं परिभाषाएँ
आर्थिक प्रणाली एक ऐसा तंत्र है, जिसके माध्यम से लोगों का जीवन निर्वाह होता है। यह संस्थाओं का एक ढाँचा है, जिसके द्वारा समाज की संपूर्ण आर्थिक क्रियाओं का संचालन किया जाता है। आर्थिक क्रियाएँ वे मानवीय क्रियाएँ हैं, जिनके द्वारा मनुष्य धन अर्जित करने के उद्देश्य से उत्पादन करता है। अथवा निजी सेवाएँ प्रदान करता है। आर्थिक प्रणाली आर्थिक क्रियाओं को सम्पन्न करने का मार्ग निर्धारित करती हैं। दूसरे शब्दों में, आर्थिक प्रणाली यह भी निर्धारित करती है कि देश में किन वस्तुओं को उत्पादन किया जाएगा और विभिन्न साधनों के मध्य इनका वितरण किस प्रकार किया जाएगा; परिवहन, वितरण, बैंकिंग एवं बीमा जैसी सेवाएँ कैसे प्रदान की जाएँगी; उत्पादित वस्तुओं का कितना भाग वर्तमान में उपयोग किया जाएगा और कितना भाग भविष्य के उपयोग के लिए संचित करके रखा जाएगा; आदि। आर्थिक प्रणाली इन विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाओं का योग ही है। 
आर्थिक प्रणाली की मुख्य परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

एजे० ब्राउन के अनुसार- आर्थिक प्रणाली वह व्यवस्था है, जिसके द्वारा मनुष्य अपनी आजीविको कमाता है और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।’

लॉक्स के अनुसार- “आर्थिक प्रणाली एक ऐसा संगठन है, जिसके द्वारा सुलभ उत्पादन साधनों का प्रयोग करके मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है।”

एम० गॉटलिब के अनुसार- “आर्थिक प्रणाली जटिले मानव संबंधों, जो वस्तुओं तथा सेवाओं की विभिन्न निजी तथा सार्वजनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के उद्देश्य से सीमित साधनों के प्रयोग से सुंबंधित हैं, को प्रकट करने वाला एक मॉडल है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि आर्थिक प्रणाली एक ओर आर्थिक क्रियाओं का योग है, तो दूसरी ओर उत्पादकों के परस्पर सहयोग की प्रणाली भी है। वास्तव में, विभिन्न उत्पादन क्रियाएँ परस्पर सम्बद्ध होती हैं और एक साधने की क्रिया दूसरे साधन की क्रिया पर निर्भर करती है। अतः इनमें परस्पर समन्वय एवं सहयोग होना आवश्यक है। उत्पादकों के परस्पर सहयोग की इस प्रणाली को ही आर्थिक प्रणाली कहते हैं; उदाहरण के लिए–एक वस्त्र-निर्माता को वस्त्र निर्मित करने के लिए अनेक वस्तुओं की आवश्यकता पड़ेगी। उसे सर्वप्रथम किसान से कपास प्राप्त करनी होगी तथा कपास की धुनाई, कताई . वे बुनाई के लिए मशीनों की व्यवस्था करनी होगी। मशीन निर्माता को लोहा व कोयला चाहिए, जो संबंधित खानों से प्राप्त होगा। इन साधनों को कारखाने तक लाने व ले जाने के लिए परिवहन के साधनों; यथा—रेल, मोटर, ट्रक, बैलगाड़ी आदि की आवश्यकता होगी और इन सभी क्रियाओं के संचालन के लिए निर्माता को श्रमिकों की सेवाएँ चाहिए। इनमें से किसी भी साधन के अभाव में कपड़े का उत्पादन संभव नहीं है। इसे इस प्रकार भी समझाया जी सकता है–यदि किसान कपास का उत्पादन बंद कर, ३ ‘ अथवा मशीन-निर्माता मशीन बनाना बंद कर दे अथवा श्रमिक काम करना बंद कर दें तो कपड़े का उत्पादन संभव नहीं होगा। इस प्रकार उत्पादन में उत्पादकों एवं उत्पत्ति के साधनों के बीच सहयोग एवं समन्वय होना आवश्यक है।

आर्थिक प्रणाली के लक्षण आर्थिक प्रणाली के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं

  1. यह उन व्यक्तियों का समूह है, जो अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए उत्पादन-प्रक्रिया को | चलाते हैं।
  2. आवश्यकताओं के परिवर्तन के अनुरूप आर्थिक प्रणाली के स्वरूप में भी परिवर्तन होता रहता है।
  3. वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन निरंतर जारी रहता है।
  4. उत्पादित वस्तुओं को विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा उपभोक्ताओं तक पहुँचाया जाता है।
  5. इसमें विभिन्न उत्पादकों के मध्य परस्पर समन्वय एवं सहयोग आवश्यक होता है।

प्रश्न 2.
पूँजीवाद क्या है? पूँजीवाद की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
पूँजीवाद का अर्थ एवं परिभाषाएँ
पूँजीवाद का आशय आर्थिक संगठन की एक ऐसी प्रणाली से है, जिसमें उत्पादन के साधनों पर व्यक्ति का निजी अधिकार होता है तथा वह उत्पादन के साधनों का प्रयोग लाभ कमाने की दृष्टि से करता है। पूँजीवाद की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

लूक्स तथा हूटस के अनुसार-“पूँजीवाद आर्थिक संगठन की ऐसी प्रणाली है, जिसमें प्राकृतिक तथा मनुष्य-निर्मित पूँजीगत साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व होता है और जिनका प्रयोग निजी लाभ के लिए किया जाता है।”

प्रो० पीगू के अनुसार- “एक पूँजीवादी उद्योग वह है, जिसमें उत्पत्ति के भौतिक साधन निजी लोगों की सम्पत्ति होते हैं अथवा उनके द्वारा किराए पर लिए जाते हैं और उनका परिचालन इन लोगों के आदेश पर उनकी सहायता से उत्पन्न होने वाली वस्तुओं को लाभ पर बेचने के लिए किया जाता है। एक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था अथवा पूँजीवादी प्रणाली वह है, जिसके उत्पादन के साधनों का मुख्य भाग पूँजीवादी उद्योग । में लगा होता है।”

पूँजीवाद की विशेषताएँ

पूँजीवादी प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. मूल्य यन्त्र- पूँजीवादी अर्थव्यवस्था मूल्य यंत्र के द्वारा नियंत्रित होती है। वस्तुओं के उत्पादन की मात्रा, उत्पादन के साधनों में बँटवारा, बचत एवं विनियोग तथा महत्त्वपूर्ण आर्थिक निर्णय कीमतों के आधार पर लिए जाते हैं। इसमें ‘मूल्य यंत्र’ स्वतंत्रतापूर्वक कार्य करता है। समन्वय तथा नियंत्रण का कार्य मूल्य यंत्र द्वारा ही किया जाता है।

2.”केन्द्रीय योजना का अभाव– पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में किसी प्रकार की केन्द्रीय आर्थिक योजना नहीं होती। यह प्रणाली व्यक्ति की स्वतंत्र क्रियाओं पर आधारित होती है। सामान्य आर्थिक क्रियाओं में सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता।

3. आर्थिक स्वतंत्रता- ये स्वतंत्रताएँ इस प्रकार हैं

  1. उपभोक्ता की स्वतंत्रता- उपभोक्ता पूर्णतया स्वतंत्र होता है। वह जो चाहे खरीद सकता है तथा अपनी आय को इच्छानुसार व्यर्य कर सकता है।
  2. व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता– व्यक्ति अपनी इच्छानुसार किसी भी व्यवसाय को चुन सकता है।
  3. बचत करने की स्वतंत्रता- प्रत्येक व्यक्ति को यह निर्णय लेने की स्वतंत्रता होती है कि वह अपनी आय का कितना भाग बचाए तथा कितना भाग व्यय करे।
  4. विनियोग करने की स्वतंत्रता— विनियोगकर्ता विनियोग की मात्रा व उसके स्वभाव को निश्चित करने के लिए पूतया स्वतंत्र होता है।
  5. निजी सम्पत्ति— प्रत्येक व्यक्ति को सम्पत्ति रखने तथा उसे उत्तराधिकार में देने का पूरा अधिकार होता है।

4. लाभ उददेश्य- पूँजीवादी व्यवस्था में सभी उत्पादक इकाइयाँ लाभ के उद्देश्य से चलाई जाती हैं। प्रत्येक व्यवसायी का उद्देश्य अधिकाधिक लाभ कमाना होता है। अत: उत्पादक उत्पादन के साधनों का पूर्ण शोषण करते हैं।

5. प्रतियोगिता- पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में प्रतियोगिता पायी जाती है। यह आर्थिक स्वतंत्रता का आवश्यक परिणाम और स्वतंत्र बाजार की अर्थव्यवस्था का आधार होता है।

6. वर्ग-संघर्ष- पूँजीवादी समाज दो वर्गों में विभाजित होता है

  • सम्पत्ति वाला (धनी) वर्ग,
  • बिना सम्पत्ति वाला (निर्धन) वर्ग। इन दोनों वर्गों के मध्य निरंतर संघर्ष बढ़ता रहता है।

7. आर्थिक असमानताएँ- पूँजीवादी व्यवस्था में आर्थिक असमानताएँ पायी जाती हैं, धन का केन्द्रीकरण हो जाता है और कुछ व्यक्ति अमीर तथा कुछ गरीब होते चले जाते हैं।

8. सरकार की भूमिका- पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में सरकार लोगों की आर्थिक क्रियाओं में कोई प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं करती। सरकार को कार्य केवल आर्थिक संगठन पर बाहरी तत्त्वों के प्रभाव | को रोकना और आर्थिक क्रियाओं के हानिकारक प्रभावों को नियंत्रित करना होता है।

9. उपभोक्ता का प्रभुत्व– पूँजीवादी व्यवस्था में उपभोक्ता ही समस्त उत्पादन को नियंत्रित तथा नियमित करता है, इसीलिए इस व्यवस्था में उपभोक्ता को सम्राट कहा जाता है।

प्रश्न 3.
समाजवाद क्या है? समाजवाद की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
समाजवाद का अर्थ एवं परिभाषाएँ समाजवाद आर्थिक संगठन की एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें उत्पत्ति के साधनों पर सरकार अथवा लोकसत्ता का अधिकार होता है, इनका संचालन एक सामान्य योजना के अनुसार सरकारी अथवा समाजिक संस्थाओं द्वारा किया जाता है और समस्त आर्थिक क्रियाएँ निजी क्षेत्र में न रहकर सार्वजनिक क्षेत्र में रहती हैं। समाजवादे की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

प्रो० शुम्पीटर के अनुसार- “समाजवाद एक ऐसी संस्थागत व्यवस्था को कहते हैं, जिसमें उत्पत्ति के साधनों तथा स्वयं उत्पादन पर नियंत्रण एक केन्द्रीय सत्ता के हाथ में होता है या जिसमें सैद्धान्तिक रूप से समाज की आर्थिक क्रियाएँ व्यक्तिगत क्षेत्र के अधिकार में न होकर सार्वजनिक क्षेत्र में होती हैं।”

प्रो० डिकिन्सन के अनुसार- “समाजवाद समाज की एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था है, जिसमें उत्पत्ति के भौतिक साधन समाज के स्वामित्व में होते हैं और इनका संचालन एक सामान्य योजना के अनुसार ऐसी संस्थाओं के द्वारा किया जाता है, जो पूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं तथा पूर्ण समाज के प्रति उत्तरदायी होती हैं। समाज के सभी सदस्य सामान्य अधिकारों के आधार पर समाजीकृत तथा नियोजित उत्पादन के लाभों के अधिकारी होते हैं।”

प्रो० लुक्स के अनुसार- समाजवाद वह आन्दोलन है, जिसका उद्देश्य सभी प्रकार की प्रकृति-प्रदत्त तथा मनुष्यकृत उत्पादित वस्तुओं का जो कि बड़े पैमाने के उत्पादन में प्रयोग की जाती हैं, स्वामित्व तथा प्रबंध व्यक्तियों के स्थान पर समस्त समाज में निहित करना होता है, जिससे बढ़ी हुई राष्ट्रीय आय का इस प्रकार समान वितरण हो सके कि व्यक्ति की आर्थिक प्रेरणा या व्यवसाय तथा उपभोग संबंधी चुनावों की स्वतंत्रता में कोई विशेष हानि न हो।’

समाजवाद की विशेषताएँ

समाजवाद की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. उत्पत्ति के साधनों पर समाज का स्वामित्व— समाजवादी अर्थव्यवस्था में उत्पत्ति के साधन 
व्यक्तिगत अधिकार में न होकर सम्पूर्ण समाज के अधिकार में होते हैं। इनका स्वामित्व, नियमन तथा नियंत्रण राज्य के हाथों में होता हैं। इनका प्रयोग निजी लाभ के लिए नहीं वरन् सामाजिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

2. आर्थिक नियोजन- सामाजिक अर्थव्यवस्था आवश्यक रूप से नियोजित होती है। इस व्यवस्था के पूर्व-निश्चित उद्देश्य होते हैं और उन्हें पहले से निश्चित किए गए प्रयासों द्वारा ही प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता हैं।

3. एक केन्द्रीय सत्ता– समाजवादी व्यवस्था में एक केन्द्रीय सत्ता होती है, जो समाज में आर्थिक उद्देश्यों को निश्चित करती है और उन्हें प्राप्त करने के लिए उचित व्यवस्था एवं प्रबन्ध करती है। इस सत्ता द्वारा ही संपूर्ण अर्थव्यवस्था को निर्देशित किया जाता है।

4. सामाजिक कल्याण- उत्पादन का उद्देश्य लाभ की भावना नहीं, बल्कि सामाजिक कल्याण में वृद्धि करना होता है। कीमत नीति का निर्धारण भी सामाजिक कल्याण के आधार पर किया जाता

5. धन का समान वितरण– उत्पत्ति के भौतिक साधनों पर निजी अधिकार को समाप्त कर दिया जाता है और आर्थिक साधनों के वितरण में अधिक समानता लाने का प्रयास किया जाता है।

6. उपभोग तथा व्यवसाय के चुनाव की स्वतंत्रता- समाजवादी अर्थव्यवस्था में भी लोगों को अपनी इच्छानुसार उपभोग संबंधी वस्तुओं का चुनाव करने की स्वतंत्रता होती है।।

7. मूल्य यंत्र- समाजवादी अर्थव्यवस्था में साधनों का बँटवारा एक पूर्व-निश्चित योजना के अनुसार केन्द्रीय सत्ता द्वारा मूल्य यंत्र की सहायता से किया जाता है, यद्यपि मूल्य यंत्र स्वतंत्रतापूर्वक कार्य नहीं करता। 8. प्रतियोगिता का अभाव–उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व व्यक्तिगत न होकर सामूहिक होता है। | और उत्पादन की मात्रा, किस्म तथा कीमत का निर्धारण प्रतियोगिता द्वारा न होकर केन्द्रीय सत्ता द्वारा होता है।

प्रश्न 4.
मिश्रित अर्थव्यवस्था क्या है? इसकी विशेषताएँ बताइए। इस संदर्भ में भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वरूप को समझाइए।
उत्तर
मिश्रित अर्थव्यवस्था
मिश्रित अर्थव्यवस्था पूँजीवाद और समाजवाद के बीच की अवस्था है। इसमें पूँजीवाद के दोषों से अर्थव्यवस्था को मुक्त करके दोनों प्रणालियों से होने वाले गुणों को अपनाया जाता है। मिश्रित अर्थव्यवस्था में निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्रक दोनों साथ-साथ चलते हैं। इस प्रकार की अर्थव्यवस्था में देश के आर्थिक विकास के लिए निजी क्षेत्र को विशेष महत्त्व देते हुए उस पर आवश्यक सामाजिक नियंत्रण भी रखा जाता है। इसी प्रकार की अर्थव्यवस्था में कुछ उद्योग पूर्णतया सरकारी क्षेत्र में होते हैं, कुछ पूर्णतया निजी क्षेत्र में होते हैं और कुछ उद्योगों में निजी तथा सार्वजनिक दोनों ही क्षेत्रक भाग ले सकते हैं। दोनों के कार्य करने का क्षेत्र निर्धारित कर दिया जाता है, परंतु इसमें निजी क्षेत्र की प्राथमिकता रहती है। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में इस प्रकार मिलकर कार्य करते हैं कि बिना शोषण के देश के सभी वर्गों के आर्थिक कल्याण में वृद्धि तथा तीव्र आर्थिक विकास प्राप्त हो सके।
प्रो० हैन्सन ने मिश्रित अर्थव्यवस्था को दोहरी व्यवस्था तथा प्रो० लर्नर ने इसको नियंत्रित अर्थव्यवस्था कहा है।

मिश्रित अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ

मिश्रित अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1. निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों का सह-अस्तित्व- मिश्रित अर्थव्यवस्था में निजी एवं सार्वजनिक 
क्षेत्र दोनों साथ-साथ कार्य करते हैं। सरकार द्वारा निजी उद्योग तथा सार्वजनिक उद्योगों का अलग-अलग क्षेत्र निश्चित कर दिया जाता है। दोनों ही क्षेत्र एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। निजी क्षेत्र तथा सार्वजनिक क्षेत्र के अतिरिक्त दो क्षेत्र और पाए जाते हैं—संयुक्त क्षेत्र तथा सहकारी क्षेत्र।

2. समाजवाद व पूँजीवाद के तत्त्वों का सम्मिश्रण-
मिश्रित अर्थव्यवस्था में पूँजीवाद के निम्नलिखित तत्त्व पाए जाते हैं

  1. निजी उद्योग में लाभ उद्देश्य,
  2. व्यक्तिगत प्रोत्साहन,
  3. निजी सम्पत्ति की संस्था,
  4. व्यक्तिगत स्वतन्त्रता व प्रतियोगिता।

मिश्रित अर्थव्यवस्था में समाजवाद के निम्नलिखित अंश पाए जाते हैं।

  1. सार्वजनिक क्षेत्र के संचालन में सामाजिक हित,
  2. राष्ट्रीय महत्त्व के उद्योगों का सरकारी स्वामित्व,
  3. राष्ट्रीय हित में निजी व्यापार पर नियन्त्रण। इस प्रकार मिश्रित अर्थव्यवस्था एक ऐसी मिली-जुली व्यवस्था है, जिसमें पूँजीवाद व सामाजिक अर्थव्यवस्था के गुणों को एक-साथ मिलाने का प्रयास किया जाता है।

3. आर्थिक नियोजन- मिश्रित अर्थव्यवस्था में सरकार द्वारा एक पूर्व- निश्चित योजना के अनुसार ही अर्थव्यवस्था का नियन्त्रण एवं नियमन किया जाता है। यह आर्थिक नियोजन द्वारा पूर्व-निश्चित आर्थिक एवं सामाजिक उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयत्न करती है।

4. साधनों का बँटवारा– सार्वजनिक क्षेत्र में साधनों का बँटवारा सामाजिक कल्याण के उद्देश्य से | किया जाता है, जबकि निजी क्षेत्र में साधनों का बँटवारा कीमत प्रणाली द्वारा होता है।

भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था

भारतीय अर्थव्यवस्था एक मिश्रित अर्थव्यवस्था है। इस व्यवस्था में निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र मिलकर आर्थिक विकास के लिए योजनाबद्ध तरीकों से कार्य कर रहे हैं। 6 अप्रैल, 1948 ई० को भारत सरकार ने औद्योगिक नीति की घोषणा की, जिसके अनुसार देश मिश्रित अर्थव्यवस्था का प्रारम्भ हुआ। स्वामित्व के आधार पर उद्योगों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा गया-

  1. निजी क्षेत्र,
  2. सार्वजनिक क्षेत्र।

इस नीति के अनुसार उद्योगों को चार भागों में बाँटा गया

  1. वे उद्योग जिन पर सरकार का स्वामित्व तथा नियन्त्रण रहेगा; जैसे—प्रतिरक्षा उद्योग।
  2.  आधारभूत उद्योग; जैसे-लोहा-इस्पात, कोयला, खनिज तेल, वायुयान व जलयान निर्माण उद्योग।
  3. वे उद्योग जो व्यक्तिगत क्षेत्र में रहेंगे, लेकिन उनका नियन्त्रण व नियमन राज्य द्वारा किया जाएगा।
  4.  निजी क्षेत्र में रहने वाले शेष उद्योग।

सन् 1956 ई० में घोषित औद्योगिक नीति के अनुसार समस्त उद्योगों का वर्गीकरण निम्नलिखित तीन श्रेणियों में किया गया है

प्रथम श्रेणी–
इसमें 17 उद्योग आते हैं; जैसे–प्रतिरक्षा सम्बन्धी समस्त उद्योग, अणु-शक्ति, लोहा व इस्पात आदि। इनका विकास केवल सरकार का उत्तरदायित्व होगा।

द्वितीय श्रेणी- इसमें 12 उद्योग आते हैं; जैसे-खनिज उद्योग, मशीन तथा यन्त्र, उर्वरक, रबड़ आदि। इस वर्ग में निजी एवं सार्वजनिक दोनों ही क्षेत्र कार्य कर सकते हैं।

तृतीय श्रेणी- अन्य उद्योग, जिनका विस्तार एवं विकास पूर्णतया निजी क्षेत्र पर छोड़ दिया गया है।

1991 ई० में घोषित नवीन औद्योगिक नीति के अन्तर्गत भी ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया है, हाँ, इसमें उद्योगों के नियमन व नियन्त्रण में कमी की गई है, सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार को सीमित किया गया है और निजी क्षेत्र को अधिक विस्तृत एवं उदार बनाने पर बल दिया गया है। इस प्रकार भारतवर्ष में मिश्रित अर्थव्यवस्था कार्य कर रही है।

प्रश्न 5.
आर्थिक नियोजन को परिभाषित कीजिए। इसके मुख्य लक्षण बताइए। भारतीय अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में आर्थिक नियोजन के प्रमुख उददेश्यों की चर्चा कीजिए।
उत्तर
आर्थिक नियोजन : अर्थ एवं परिभाषाएँ 
योजना का आधार मनुष्य का विवेकपूर्ण व्यवहार है। आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में, प्रत्येक चरण में, प्रत्येक दिशा में नियोजन अपनाया जाता है। जिस प्रकार एक व्यक्ति अपनी सफलता के लिए विभिन्न 
चरणों में योजनाबद्ध कार्यक्रम अपनाता है, ठीक उसी प्रकार एक राष्ट्र भी अपने सर्वांगीण विकास के लिए विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक नियोजन को अपनाता है। आर्थिक नियोजन के अर्थ, स्वरूप एवं क्षेत्र के सम्बन्ध में सभी विद्वान एकमत नहीं हैं। अतः इसकी कोई एक सर्वमान्य परिभाषा देना कठिन है। आर्थिक नियोजन की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं:

एच०डी० डिकिन्सन के अनुसार- ‘आर्थिक नियोजन से अभिप्राय महत्त्वपूर्ण आर्थिक मामलों में विस्तृत तथा सन्तुलित निर्णय लेना है। दूसरे शब्दों में, क्या तथा कितना उत्पादित किया जाएगा तथा उसका वितरण किस प्रकार होगा, इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक निर्धारक सत्ता द्वारा समस्त अर्थव्यवस्था को एक ही राष्ट्रीय आर्थिक इकाई (व्यवस्था) मानते हुए तथा व्यापक सर्वेक्षण के आधार पर, सचेत तथा विवेकपूर्ण निर्णय के द्वारा, दिया जाता है।”

डॉ० डाल्टन के अनुसार- “विस्तृत अर्थ में आर्थिक नियोजन से अभिप्राय कुछ व्यक्तियों द्वारा, जिनके अधिकार में विशेष प्रसाधन हों, निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आर्थिक क्रिया का संचालन करना है।” भारतीय नियोजन आयोग के अनुसार-“आर्थिक नियोजन निश्चित रूप से सामाजिक उद्देश्यों के हितार्थ उपलब्ध साधनों का संगठन तथा लाभकारी रूप से उपयोग करने का एकमात्र ढंग है। नियोजन के इस विचार के दो प्रमुख तत्त्व हैं-
(अ) वांछित उद्देश्यों का क्रम जिनकी पूर्ति का प्रयास करना है।
(ब) उपलब्ध साधनों और उनके सर्वोत्तम वितरण के सम्बन्ध में ज्ञान।”

राष्ट्रीय नियोजन समिति के अनुसार- “आर्थिक नियोजन उपभोग, उत्पादन, विनियोग, व्यापार तथा राष्ट्रीय लाभांश के वितरण से सम्बन्धित स्वार्थहित विशेषज्ञों का तकनीकी समन्वय है, जो राष्ट्र की प्रतिनिधि संस्थाओं द्वारा निर्धारित विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति हेतु प्राप्त किया जाए। संक्षेप में, आर्थिक नियोजन एक तकनीक है, यह वांछित उद्देश्यों एवं लक्ष्यों को पूरा करने का एक साधन है। ये लुक्ष्य केन्द्रीय नियोजन अधिकारी व केन्द्रीय शक्ति द्वारा पूर्व-निर्धारित तथा स्पष्टतः परिभाषित होने चाहिए। आर्थिक नियोजन की एक उचित परिभाषा निम्न प्रकार दी जा सकती है आर्थिक नियोजन से आशय पूर्व-निर्धारित और निश्चित सामाजिक एवं आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अर्थव्यवस्था के सभी अंगों को एकीकृत और समन्वित करते हुए राष्ट्र के संसाधनों के सम्बन्ध में सोच-विचारकर रूपरेखा तैयार करने और केन्द्रीय नियन्त्रण से है।”

आर्थिक नियोजन की विशेषताएँ (लक्षण)

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर आर्थिक नियोजन की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं

  1. नियोजन आर्थिक संगठन एवं विकास की एक समन्वित प्रणाली है।
  2. आर्थिक नियोजन की समस्त क्रिया-विधि एक केन्द्रीय नियोजन सत्ता द्वारा सम्पन्न की जाती है।
  3. केन्द्रीय नियोजन सत्ता द्वारा देश में उपलब्ध समस्त साधनों का निरीक्षण, सर्वेक्षण तथा संगठन करके, पूर्व-निश्चित उद्देश्यों के साथ समन्वय किया जाता है।
  4. अधिकतम सामाजिक लाभ को प्राप्त करने के उद्देश्य से, साधनों का वितरण विवेकपूर्ण ढंग से तथा प्राथमिकताओं के आधार पर किया जाता है।
  5. उद्देश्य पूर्व-निर्धारित होने चाहिए।
  6. निर्धारित उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की आपूर्ति एक निश्चित अवधि में ही होनी चाहिए।
  7. आर्थिक नियोजन द्वारा समस्त अर्थव्यवस्था प्रभावित होनी चाहिए।
  8. आर्थिक नियोजन की सफलता के लिए जन-सहयोग आवश्यक है।

भारत के सन्दर्भ में आर्थिक नियोजन के उद्देश्य

भारत में आर्थिक नियोजन की तकनीक को 1 अप्रैल, 1951 से अपनाया गया है। अब तक 11 पंचवर्षीय योजनाएँ पूरी हो चुकी हैं। बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) कार्यशील है। भारत में आर्थिक नियोजन के प्रमुख उद्देश्य अग्रलिखित हैं

1. राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि– जनसामान्य के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने की | दृष्टि से आर्थिक नियोजन का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में तीव्र वृद्धि करना रहा है।

2. रोजगार में वृद्धि– भारत में आर्थिक नियोजन का दूसरा उद्देश्य रोजगार के अवसरों में वृद्धि | करना है; अतः कृषि, उद्योग, सेवाओं आदि का विस्तार किया गया है।

3. आत्म-निर्भरता की प्राप्ति- योजनाओं में प्रारम्भ से ही आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की बात कही गई है। तृतीय योजना में इस पर विशेष जोर दिया गया। पाँचवीं व छठी योजनाओं में तो विदेशी सहायता पर निर्भरता को न्यूनतम करने की बात कही गई थी। आठवीं योजना इसी दिशा में एक कदम है।

4. कल्याणकारी राज्य की स्थापना- भारतीय नियोजन का एक उद्देश्य देश में कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। आय एवं सम्पत्ति में वितरण की असमानता को दूर करने की बात प्रत्येक योजना में की गई। पाँचवीं योजना का मुख्य उद्देश्य ‘गरीबी दूर करना ही था। इसके लिए न्यूनतम आवश्यकताओं की व्यवस्था पर भी जोर दिया गया।

5. सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार- भारत में आर्थिक नियोजन का एक उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार करना रहा है, ताकि उन उद्योगों की स्थापना की जा सके जिनमें उद्योगपति पूँजी विनियोग करने में असमर्थ रहते हैं।

6. समाजवादी समाज की स्थापना- इन योजनाओं में समाजवादी समाज की स्थापना पर विशेष जोर दिया गया है। इसके लिए आम जनता को सामाजिक न्याय दिलाने तथा आर्थिक असमानताओं को कम करने का प्रयास किया गया है।

7. अन्य उद्देश्य–

  1. जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण,
  2. पिछड़े क्षेत्रों का विकास,
  3. उद्योग एवं सेवाओं का विस्तार,
  4. खाद्यान्न एवं औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि।

प्रश्न 6.
भारत में आर्थिक नियोजन की प्रमुख उपलब्धियों एवं असफलताओं का विवेचन कीजिए। योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने हेतु उपयुक्त सुझाव दीजिए।
उत्तर
भारत में विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में निर्धारित उद्देश्यों को मुख्य रूप से चार भागों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. विकास,
  2. आधुनिकीकरण,
  3. आत्मनिर्भरता,
  4. सामाजिक न्याय।

इनके आधार पर भारत में आर्थिक नियोजन की सफलताएँ निम्नवत् रही हैं
1.  विकास

  1. योजना विकास की दर बढ़ी है। दसवीं योजना में विकास-दर का निर्धारित लक्ष्य 8 प्रतिशत था।
  2. राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में निरन्तर वृद्धि हुई है।
  3. योजनाकाल में कृषि उत्पादन में तीव्र गति से वृद्धि हुई है।
  4. योजनाकाल में औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि हुई है, उत्पादन में विविधता आई है तथा भारी एवं आधारभूत उद्योगों की स्थापना हुई है।
  5. बचत एवं विनियोग की दरों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
  6. आधारित संरचना का निर्माण हुआ है। रेलवे वे सड़कों का विस्तार हुआ है, जहाजरानी की क्षमता बढ़ी है, हवाई परिवहन, बन्दरगाहों की स्थिति एवं आन्तरिक जलमार्ग का विकास हुआ है, संचार क्रान्ति का आगमन हुआ है, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हुआ है, विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है तथा बैंकिंग एवं बीमा संरचना में उल्लेखनीय सुधार हुए हैं।
  7. योजनाकाल में विदेशी व्यापार में तीव्र गति से वृद्धि हुई है।

2. आधुनिकीकरण

  1. भूमि सुधार कार्यक्रमों का विस्तार किया गया है, उर्वरक व उन्नत बीजों का प्रयोग बढ़ा है तथा आधुनिक कृषि यन्त्रों एवं उपकरणों के प्रयोग को प्रोत्साहन मिला है। सिंचाई व्यवस्था, विपणन व्यवस्था एवं कृषि वित्त व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार हुए हैं।
  2. राष्ट्रीय आय में प्राथमिक क्षेत्र का अनुपात घटा है तथा द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्र का अनुपात बैढ़ा
  3. आधारभूत एवं पूँजीगत उद्योगों की स्थापना की गई है, उद्योगों का विविधीकरण हुआ है एवं उत्पादन तकनीकी में व्यापक सुधार हुए हैं। |
  4. बैंकिंग व्यवस्था को सुव्यवस्थित, सुगठित एवं विस्तृत किया गया है।

3. आत्मनिर्भरता
योजनाकाल में हमारा देश आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हुआ है। आयात प्रतिस्थापन की नीति अपनाई गई है, भारी मशीनें व विद्युत उपकरण देश में ही तैयार किए जाने लगे हैं तथा खाद्यान्नों का उत्पादन तेजी से बढ़ा है।

4. सामाजिक न्याय
देश में आर्थिक एवं सामाजिक समानता लाने के लिए विभिन्न प्रेरणात्मक एवं संवैधानिक उपाय अपनाए गए हैं।

भारत में आर्थिक नियोजन की असफलताएँ

भारत में आर्थिक नियोजन की मुख्य असफलताएँ निम्नलिखित रही हैं

  1. प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है।
  2. जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण बेरोजगारी में वृद्धि हुई है।
  3. सीमित साधनों के कारण विशाल परियोजनाएँ समय पर पूरी नहीं हो सकी हैं।
  4. आर्थिक असमानताएँ बढ़ी हैं।
  5. मूल्यों में बेतहाशा वृद्धि हुई है (विशेष रूप से खाद्यान्नों के मूल्यों में)।
  6. नीति सम्बन्धी ढाँचे का अभाव रहा है तथा नियन्त्रण और नियमन परस्पर असम्बद्ध रहे हैं।
  7. सार्वजनिक उपक्रमों का निष्पादन अकुशल रहा है।
  8. आन्तरिक वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण आन्तरिक एवं बाह्य ऋणों के भार में निरन्तर वृद्धि

उपर्युक्त कमियों के बावजूद योजना की उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता। वास्तव में, आर्थिक नियोजन के फलस्वरूप ही वर्षों से स्थिर अर्थव्यवस्था को गति प्राप्त हुई है।

योजनाओं को सफल बनाने हेतु सुझाव

योजनाओं को सफल बनाने हेतु निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं

  1. जनता के सहयोग से विकास के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार किया जाए।
  2. सार्वजनिक व निजी क्षेत्र के उपक्रमों में समन्वय स्थापित किया जाए।
  3. मूल्य वृद्धि पर प्रभावी नियन्त्रण लगाया जाए।
  4. केन्द्र तथा राज्यों के बीच मधुर सम्बन्ध स्थापित किए जाएँ।
  5. आर्थिक नीतियाँ केवल सैद्धान्तिक दृष्टि से ही नहीं अपितु व्यावहारिक दृष्टि से भी उपयुक्त होनी चाहिए।
  6. ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि पर आधारित कुटीर उद्योगों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए

ताकि आंशिक बेरोजगारी को दूर किया जा सके। शिक्षा प्रणाली को कार्यप्रधान बनाया जाए तथा तकनीकी संस्थाओं का आधुनिकीकरण किया जाए।

अन्य सुझाव

  1. योजनाओं का निर्माण साधनों को ध्यान में रखकर किया जाए।
  2. राजनीतिक अस्थिरता पर प्रभावी नियन्त्रण स्थापित किया जाए।
  3. मौद्रिक एवं राजकोषीय नीतियों में समन्वय स्थापित किया जाए।
  4. पूँजी-निर्माण की दर में वृद्धि की जाए।
  5. प्रशासकीय व्यवस्था को चुस्त एवं दुरुस्त किया जाए।
  6. जनसंख्या नियन्त्रण हेतु व्यापक कार्यक्रम संचालित किए जाएँ।
  7. मानव-शक्ति नियोजन को आर्थिक नियोजन से सम्बद्ध किया जाए, इत्यादि।

प्रश्न 7.
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व बताइए।
उत्तर
विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ मूलतः प्राथमिक अर्थव्यवस्थाएँ नहीं हैं। आयोजन के 56 वर्ष पश्चात् भारत आज भी एक कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था ही है। कृषि हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। महात्मा गांधी के अनुसार–“कृषि भारत की आत्मा है।” योजना आयोग भी आयोजन की सफलता के लिए कृषि को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानता है। भारत में करोड़ों लोगों को भोजन और आजीविका कृषि से ही प्राप्त होती है। कृषि पर ही देश के उद्योग-धन्धे, व्यापार, व्यवसाय, यातायात एवं संचार के साधन निर्भर हैं। लार्ड मेयो के शब्दों में–“भारत की उन्नति धन और सभ्यता के दृष्टिकोण से खेती पर आधारित है। संसार में शायद ही कोई ऐसा देश हो, जिसकी सरकार खेती से इतना प्रत्यक्ष और तात्कालिक लगाव रखती हो। भारत की सरकार मात्र एक सरकार ही नहीं अपितु मुख्य भूमि-स्वामी भी है।”

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्त्व का अनुमान निम्नलिखित तथ्यों से लगाया जा सकता है-

1. राष्ट्रीय आय के प्रमुख स्रोत– भारत की राष्ट्रीय आय का सर्वाधिक अंश कृषि एवं सम्बद्ध व्यवसायों से ही प्राप्त होता है। 2010-11 में लगभग 14.5% राष्ट्रीय आय कृषि से प्राप्त हुई थी, जबकि 1968-69 में 44.4% राष्ट्रीय आय की प्राप्ति कृषि से हुई थी। 1955-56 में तो यह 54% था। स्पष्ट है कि राष्ट्रीय आय का एक बड़ा भाग कृषि से प्राप्त होता है, यद्यपि विकास के 
साथ-साथ राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान निरन्तर कम होता जा रहा है।

2. आजीविका का प्रमुख स्रोत- भारत में कृषि आजीविका का प्रमुख स्रोत है। श्री वी० के० आर० वी० राव के अनुसार, 1991 ई० में सम्पूर्ण जनसंख्या का लगभग 66.3% भाग कृषि एवं सम्बद्ध व्यवसायों से अपनी आजीविका प्राप्त करता था, जबकि ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा आदि देशों में कृषि एवं सम्बद्ध व्यवसायों पर निर्भर रहने वाली जनसंख्या का अंश 20% से भी कम है। देश की कुल जनसंख्या का 77.3% भाग गाँवों में रहता है और गाँवों में मुख्य व्यवसाय कृषि है।

3. सर्वाधिक भूमि का उपयोग- कृषि में देश के भू-क्षेत्र का सर्वाधिक भाग प्रयोग किया जाता है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार कुल भू-क्षेत्र के 49.8% भाग में खेती की जाती है।

4. खाद्यान्न की पूर्ति का साधन- कृषि देश की लगभग 121 करोड़ जनसंख्या को भोजन तथा लगभग 36 करोड़ पशुओं को चारा प्रदान करती है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारतीयों के भोजन में कृषि उत्पादन ही प्रमुख होते हैं। यदि जनसंख्या वृद्धि एवं आर्थिक विकास के परिवेश में खाद्य-सामग्री की पूर्ति को नहीं बढ़ाया जाता है, तो देश के आर्थिक विकास का ढाँचा चरमरा जाता

5. औद्योगिक कच्चे माल की पूर्ति का साधन- देश के महत्त्वपूर्ण उद्योग कच्चे माल के लिए कृषि पर ही निर्भर हैं। सूती वस्त्र, चीनी, जूट, वनस्पति तेल, चाय व कॉफी इसके प्रमुख उदाहरण हैं। संसार के सभी देशों में उद्योगों का विकास कृषि के विकास के बाद ही सम्भव हुआ है। इस प्रकार, औद्योगिक विकास कृषि के विकास पर ही निर्भर है।

6. पशुपालन में सहायक-  हमारे कृषक पशुपालन कार्य एक सहायक धन्धे के रूप में करते हैं। पशुपालन उद्योग से समस्त राष्ट्रीय आय का 7.8% भाग प्राप्त होता है। कृषि तथा पशुपालन उद्योग एक-दूसरे के पूरक तथा सहायक व्यवसाय हैं। कृषि पशुओं को चारा प्रद्मन करती है और पशु कृषि को बहुमूल्य खाद प्रदान करते हैं, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि होती है।

7. हमारे निर्यात व्यापार का मुख्य आधार- देश के निर्यात का अधिकांश भाग कृषि से ही प्राप्त होता है। अप्रैल, 2013-14 में प्रमुख वस्तुओं के निर्यात में बागान उत्पाद, कृषि एवं सहायक उत्पाद में 34% की वृद्धि दर्ज की गई है। कृषि उत्पादों में चाय, जूट, लाख, शक्कर, ऊन, रुई, मसाले, तिलहन आदि प्रमुख हैं।

8. केन्द्र तथा राज्य सरकारों की आय का साधन- यद्यपि कृषि क्षेत्र पर कर का भार अधिक नहीं होता है, तथापि कृषि राजस्व का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। लगान से लगभग 200 करोड़ वार्षिक आय का अनुमान लगाया गया है। इसके अतिरिक्त कृषि वस्तुओं के निर्यात-कर से भी आय प्राप्त होती है। केन्द्रीय सरकार के उत्पादन शुल्कों का एक बहुत बड़ा भाग चाय, तम्बाकू, तिलहन आदि फसलों से प्राप्त होता है।

9. आन्तरिक व्यापार का आधार- भारत में खाद्य-पदार्थों पर राष्ट्रीय आय का अधिकांश भाग व्यय होता है। अनुमान है कि शहरी क्षेत्रों में आय का 60.2% तथा ग्रामीण क्षेत्रों में आय का 69.07% भोजन पर व्यय किया जाता है। स्पष्ट है कि आन्तरिक व्यापार मुख्यत: कृषि पर आधारित होता है और कृषि क्षेत्र में होने वाले प्रत्येक परिवर्तन का प्रभाव आन्तरिक व्यापार पर पड़ता है। थोक तथा खुदरा व्यापार के अतिरिक्त बैंकिंग तथा बीमा व्यवसाय भी कृषि से अत्यधिक प्रभावित होते हैं।

10. यातायात के साधनों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण- कृषि उत्पादन यातायात के साधनों को पर्याप्त मात्रा में प्रभावित करता है। जिस वर्ष कृषि-उत्पादन कम होता है, रेल व सड़क-परिवहन आदि सभी साधनों की आय घट जाती है। इसके विपरीत, अच्छी फसल वाले वर्ष में इन साधनों की आय में पर्याप्त वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 8.
भारत में कृषि उत्पादकता कम होने के प्रमुख कारण बताइए। इसे बढ़ाने के लिए उपयुक्त सुझाव दीजिए।
उत्तर
भारत एक विशाल एवं सम्पन्न देश है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का स्थान सदैव ही सर्वोपरि रहा है। किन्तु भारत में फसलों को प्रति हेक्टेयर उत्पादन विश्व के अनेक देशों की तुलना में अत्यन्त निम्न है। निम्न उत्पादकता की यह स्थिति खाद्य तथा खाद्येतर दोनों फसलों में समान रूप से दृष्टिगत होती है। 
निम्न कृषि उत्पादकता के मूल कारण कृषि की निम्न उत्पादकता के लिए अनेक कारण सामूहिक रूप से उत्तरदायी हैं। इन समस्त कारणों को तीन उपविभागों में बाँटा जा सकता है
(अ) सामान्य कारण,
(ब) संस्थागत कारण,
(स) प्राविधिक कारण।

(अ) सामान्य कारण

1. भूमि पर जनसंख्या का भार- भारत में कृषि-भूमि पर जनसंख्या का भार निरन्तर बढ़ता जा रहा | है, परिणामतः प्रति व्यक्ति कृषि योग्य भूमि की उपलब्धि निरन्तर कम होती जा रही है। सन् 1901 ई० में जहाँ कृषि योग्य भूमि की उपलब्धि प्रति व्यक्ति 2.1 एकड़ थी, आज वह 0.7 एकड़ से भी कम रह गई है।

2. कुशल मानव-शक्ति का अभाव-
भारत का कृषक सामान्यतया निर्धन, निरक्षर एवं भाग्यवादी होता है। अतः वह स्वभावत: अधिक उत्पादन नहीं कर पाता।|

3. भूमि पर लगातार कृषि– अनेक वर्षों से हमारे यहाँ उसी भूमि पर खेती की जा रही है, फलतः | भूमि की उर्वरा-शक्ति निरन्तर कम होती जा रही है। उर्वरा-शक्ति पुनः प्राप्त करने के लिए सामान्यतः ने तो हेर-फेर की प्रणाली को ही प्रयोग किया जाता है और न रासायनिक खादों का प्रयोग होता है।

(ब) संस्थागत कारण

1. खेतों का लघु आकार- उपविभाजन एवं अपखण्डन के परिणामस्वरूप देश में खेतों को आकार अत्यन्त छोटा हो गया है, परिणामतः आधुनिक उपकरणों का प्रयोग नहीं हो पाता। साथ-ही, श्रम | तथा पूँजी के साथ ही समय का भी अपव्यय होता है।

2. अल्प-मात्रा में भूमि सुधार- देश में भूमि सुधार की दिशा में अभी महत्त्वपूर्ण एवं आवश्यक प्रगति नहीं हुई है, जिसके फलस्वरूप कृषकों को न्याय प्राप्त नहीं होता। इसका उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

3. कृषि-सेवाओं का अभाव- भारत में कृषि-सेवाएँ प्रदान करने वाली संस्थाओं का अभाव पाया जाता है, जिससे उत्पादकता में वृद्धि नहीं हो पाती।

(स) प्राविधिक कारण

1. परम्परागत विधियाँ- भारतीय किसान अपने परम्परावादी दृष्टिकोण एवं दरिद्रता के कारण पुरानी और अकुशल विधियों का ही प्रयोग करते हैं, जिससे उत्पादन में वृद्धि नहीं हो पाती।

2. उर्वरकों की कमी- उत्पादन में वृद्धि के लिए उर्वरकों का प्रयोग अत्यन्त आवश्यक है, परन्तु भारत में गोबर एवं आधुनिक रासायनिक खादों (उर्वरकों) दोनों का ही अभाव पाया जाता है। गत वर्षों में इस दिशा में कुछ प्रगति अवश्य हुई है।

3. आधुनिक कृषि- उपकरणों का अभाव-भारत के अधिकांश कृषक पुराने उपकरणों का प्रयोग किया करते हैं, जिससे उत्पादन में उचित वृद्धि नहीं हो पाती। ऐसा प्रतीत होता है कि परम्परागत भारतीय कृषि-उपकरणों में अवश्य कोई मौलिक दोष है। अतः कृषकों को आधुनिक उपकरणों को अपनाना चाहिए।

4. बीजों की उत्तम किस्मों का अभाव- कृषि के न्यून उत्पादन का एक कारण यह भी रहा है कि हमारे किसान बीजों की उत्तम किस्मों के प्रति उदासीन रहे हैं। इस स्थिति के मूलतः तीन कारण हैं-प्रथम, किसानों को उत्तम बीजों की उपयोगिता का पता न होना; द्वितीय, बीजों की समुचित आपूर्ति न होना तथा तृतीय, अच्छी किस्म के बीजों का महँगा होना और कृषकों की निर्धनता।

5. साख- सुविधाओं का अभाव-अभी तक कृषि विकास के लिए पर्याप्त साख-सुविधाएँ कृषकों को उपलब्ध नहीं थीं। इसके मूलतः दो कारण थे—प्रथम, कृषि वित्त संस्थाओं का अभाव व उनका सीमित कार्य-क्षेत्र; द्वितीय, उचित कृषि मूल्य नीति का अभाव।

6. पशुओं की हीन दशा- भारत में पशुओं का अभाव तो नहीं है, हाँ, उनकी अच्छी नस्ल अवश्य | अधिक नहीं पायी जाती। अन्य शब्दों में, पशु-धन की गुणात्मक स्थिति सन्तोषजनक नहीं है। अत: पशु आर्थिक सहयोग प्रदान करने के स्थान पर कृषकों पर भार बन गए हैं।

7. सिंचाई के साधनों का अभाव- भारतीय कृषि की आधारशिला मानसून है क्योंकि आयोजन के | 63 वर्षों के उपरान्त भी कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 35% भाग को ही कृत्रिम सिंचाई की सुविधाएँ उपलब्ध हैं, शेष कृषि-योग्य क्षेत्र अनिश्चित मानसून की कृपा पर निर्भर रहता है। पर्याप्त सिंचाई सुविधाओं के अभाव में उर्वरकों आदि का भी समुचित प्रयोग नहीं हो पाता, जिससे उत्पादकता में विशेष वृद्धि नहीं होती है। उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त कृषि की निम्न उत्पादकता के लिए कुछ अन्य कारण भी उत्तरदायी हैं; जैसे-सामाजिक रूढ़ियाँ, कृषि अनुसन्धान का अभाव, प्राकृतिक प्रकोप, शिथिल प्रशासन आदि। 

भारत में कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के उपाय

भारत में कृषि उत्पादकता में वृद्धि के लिए मुख्य सुझाव निम्नलिखित हैं-

  1. कृषि उत्पादन की आधुनिकतम तकनीकें विकसित की जाएँ।
  2. भूमि-सुधार के सभी कार्यक्रमों को पूर्ण एवं प्रभावशाली ढंग से क्रियान्वित किया जाए।
  3. सिंचाई के साधनों का विकास करके कृषि की प्रकृति पर निर्भरता को कम किया जाए।
  4. खाद, कीटनाशक औषधियाँ तथा उन्नत किस्म के बीजों को उचित मूल्यों पर तथा पर्याप्त भौत्रा में वितरित करने की व्यवस्था की जाए।
  5. विपणन व्यवस्था में सुधार किया जाए।
  6.  किसानों को ऋणग्रस्तता से मुक्त करके, आवश्यक वित्त की आपूर्ति की जाए।
  7. लाभदायक स्तर पर कृषि मूल्यों में पर्याप्त स्थायित्व बनाए रखा जाए।
  8. विभिन्न प्रकार की जोखिमों को न्यूनतम करने के प्रयास किए जाएँ।
  9.  शिक्षा एवं प्रशिक्षण व्यवस्था का विस्तार किया जाए।
  10. विकास कार्यक्रमों में समन्वय व सामंजस्य स्थापित किया जाए।

प्रश्न 9.
भू-सुधार से क्या आशय है? भारत में भू-सुधार कार्यक्रमों की प्रगति का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इसे अधिक सफल बनाने के लिए उपयुक्त सुझाव दीजिए।
उत्तर
भू-सुधार : अर्थ एवं परिभाषाएँ

1. परम्परागत अर्थ में- “भूमि सुधार का आशय छोटे कृषकों एवं कृषि-श्रमिकों के लाभार्थ भूमि-स्वामित्व के पुनर्वितरण से लगाया जाता है।”
2. व्यापक अर्थ में- “कृषि-संगठन अथवा भू-धारण की संस्थागत व्यवस्था में होने वाले प्रत्येक परिवर्तन को भू-धारण में सम्मिलित करते हैं।”
3. प्रो० गुन्नार मिर्डल के शब्दों में- “भूमि सुधार व्यक्ति और भूमि के सम्बन्धों में नियोजन और संस्थागत पुनर्गठन है।”

सामान्यतः भूमि-सुधार को अर्थ मध्यस्थों की समाप्ति, काश्तकारी पद्धति में सुधार तथा जातों के सीमा-निर्धारणं से लिया जाता है, परन्तु व्यापक अर्थ में भूमिहीन श्रमिकों की दशा में सुधार, चकबन्दी तथा भूमि की उन्नति एवं विकास और सहकारी कृषि के विस्तार को भी भूमि-सुधार के अन्तर्गत शामिल किया जाता है। इस प्रकार, भूमि-सुधारों में भू-धारण प्रणाली, जोतों के आकार, कृषि-पद्धति के वे समस्त परिवर्तन, जिनकी सहायता से उत्पादन वृद्धि एवं सामाजिक न्याय का वातावरण बनता है, शामिल होते हैं।

भारत में भू-सुधार कार्यक्रम

भारत में अपनाए गए प्रमुख भू-सुधार कार्यक्रम निम्नलिखित हैं

I. मध्यस्थों की समाप्ति
जिस समय देश, स्वतन्त्र हुआ, लगभग 40% कृषि क्षेत्र पर जमींदारों, जागीरदारों तथा मध्यस्थों का प्रभुत्व था। प्रथम दो पंचवर्षीय योजनाओं में इन मध्यस्थों को पूर्ण उन्मूलन कर दिया गया।

II. काश्तकारी सुधार
काश्तकारी सुधार निम्नवत् थे-

1.  लगान नियमन- पहले काश्तकार तथा बटाईदार सामान्यतः उपज का आधे से अधिक भाग भूस्वामी को लगान के रूप में देते थे। इस सुधार के अन्तर्गत लगान की अधिकतम मात्रा 1/5 या 1/4 निर्धारित कर दी गई।

2. भू-स्वामित्व की सुरक्षा- इसका अर्थ है-काश्तकारों का भूमि पर स्थायी अधिकार होना। द्वितीय योजनाकाल में योजना आयोग ने सुझाव दिया कि ऐच्छिक परित्याग के मामलों का पंजीयन किया जाए तथा यह प्रतिबन्ध लगाया जाए कि ऐच्छिक परित्याग के बाद भी भू-स्वामी केवल काश्त की जाने वाली भूमि की मात्रा का ही स्वामी माना जाएगा।

3. स्वयं काश्त में भूमि का पुनर्ग्रहण- पुनर्ग्रहण नियमों की दृष्टि से समस्त राज्यों को चार भागों में बाँटा जा सकता है

(क) पहले समूह में वे राज्य है, जहाँ काश्तकारों को पूर्ण सुरक्षा प्राप्त हो गई है। इन राज्यों में भू-स्वामियों को पुन: भूमि प्राप्त करने की आज्ञा नहीं मिली है। ये राज्य हैं-बंगाल, उत्तर प्रदेश एवं दिल्ली।

(ख) दूसरे समूह में वे राज्य आते हैं, जहाँ भू-स्वामियों को निजी कृषि के लिए एक सीमिन्न क्षेत्र मिल सकता है, परन्तु साथ में यह शर्त है कि काश्तकार के पास एक न्यूनतम क्षेत्र अवश्य छोड़ना होगा। ये राज्य हैं-बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर तथा केरल।

(ग) तीसरे समूह में पंजाब तथा असम राज्य आते हैं। इन राज्यों में काश्तकारों को अन्यत्र भूमि प्रदान की जाएगी, इसके पश्चात् पुनर्ग्रहण हो सकता है। भूमि ढूँढ़ने का उत्तरदायित्व राज्यों को सौंपा गया है।

(घ) चौथे समूह में आन्ध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु की गिनती होती है, जहाँ भू-स्वामियों को पुनः भूमि प्राप्त करने का अधिकार इस शर्त पर दिया गया है कि वे निर्धारित सीमा से अधिक भूमि नहीं प्राप्त कर सकते, परन्तु काश्तकार के लिए किसी न्यूनतम क्षेत्र का निर्धारण नहीं किया गया। इस अवस्था से काश्तकारों को सम्पूर्ण कृषि योग्य क्षेत्र में 9% भाग में पूर्ण सुरक्षा, 59% भाग में आंशिक सुरक्षा तथा 19% भाग में अस्थायी सुरक्षा प्राप्त हुई है। 13% भाग अभी ऐसा है, जहाँ सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं हो सकी है।।

4काश्तकारों को मालिक होने का अधिकार–परिश्रमी काश्तकारों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से विभिन्न राज्यों ने भू-स्वामित्व के अधिकार सम्बन्धी अधिनियमों को लागू किया है। प्रारम्भ में भूस्वामित्व का अधिकार प्राप्त करना ऐच्छिक था, परन्तु तृतीय योजना में ऐच्छिकता को हटाने का सुझाव दिया गया क्योंकि ऐच्छिक होने पर इन अधिकारों को प्रयोग नहीं हो पाया था। विभिन्न राज्य सरकारों ने यह कार्य भिन्न-भिन्न रीतियों से किया है-

(अ) गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश व राजस्थान में काश्तकारों को मालिक कर दिया गया और पूर्व-मालिकों को उचित किस्तों में पैसा मिलता रहे, इस बात की व्यवस्था कर दी गई।

(ब) दिल्ली में सरकार ने मुआवजा देकर स्वयं स्वामित्व प्राप्त कर लिया और काश्तकारों को | मालिक बना दिया। वहाँ सरकार ने व्यवस्था की है कि उसे उचित किस्तों पर काश्तकारों से मुआवजा मिल जाए।

(स) उत्तर प्रदेश तथा केरल ऐसे राज्य हैं, जहाँ सरकार ने भू-स्वामित्व के अधिकार स्वयं प्राप्त कर लिए और काश्तकारों को छूट दे दी कि वे चाहें तो निर्धारित मुआवजा देकर मालिक बन जाएँ अथवा सामान्य लगान देकर खेती करते रहें। अनुमान है कि अब तक 30 लाख काश्तकारों तथा बटाईदारों को 70 लाख एकड़ भूमि का स्वामित्व प्राप्त हो चुका है। इस दिशा में प्रगति जारी है।

III. जोतों का सीमा-निर्धारण
हमारे देश में भूमि का बँटवारा बहुत ही असन्तुलित है। कृषि जाँच समिति के अनुसार, समस्त कृषि क्षेत्र की 34.4% भूमि पर 4.5% व्यक्ति ही खेती करते हैं, 15.5% भूमि पर 66.9% व्यक्ति खेती करते हैं। और लगभग 19% व्यक्ति भूमिहीन हैं। अत: सामाजिक न्याय तथा समानता की दृष्टि से जोत की सीमा का निर्धारण करना आवश्यक है। इतना ही नहीं, सीमा निर्धारण से भूमि के प्रबन्ध एवं प्रयोग में कुशलता आती है। अतिरिक्त भू-भाग पर भूमिहीन मजदूरों को बसाया जा सकता है तथा अतिरिक्त भूमि का प्रयोग करके अनार्थिक जोतों को आर्थिक जोतों में परिवर्तित किया जा सकता है। भारत के कुछ राज्यों में इस सम्बन्ध में कानून बनाए गए हैं किन्तु उनमें एक तो जोत की सीमा बहुत ऊँची रखी गई है और दूसरे, सीमा-निर्धारण के लिए परिवार को इकाई न मानकर व्यक्ति को इकाई माना गया है। इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार की छूटें भी दी गई हैं। 1972 को नई सीमा नीति का 
निर्धारण किया गया जिसके परिप्रेक्ष्य में गोवा व उत्तर के कुछ राज्यों को छोड़कर सभी राज्यों में अधिकतम सीमा कानून पारित किए। अभी तक मात्र 29.8 लाख हेक्टेयर भूमि को अतिरिक्त भूमि घोषित किया जा सका है जिसमें से 21.8 लाख हेक्टेयर भूमि का वितरण 55.8 लाख लोगों में किया जा सका है।

IV. कृषि पुनर्गठन 

1. चकबन्दी- योजना आयोग प्रारम्भ से ही चकबन्दी कार्यक्रम को सर्वोच्च प्राथमिकता के पक्ष में | रहा है। सरल शब्दों में, कई छोटे-छोटे और बिखरे हुए खेतों को एक बड़े खेत में बदलना ही चकबन्दी (Consolidation) कहलाता है। भारत में चकबन्दी की प्रगति बड़ी मन्द रही है। अब तक लगभग 640.8 लाख हेक्टेयर भूमि की ही चकबन्दी की जा सकी है। चकबन्दी से भूमि के विखण्डन की समस्या सुलझी है तथा कृषि-उपज में भी वृद्धि हुई है। दु:ख का विषय है कि अनेक राज्यों ने चकबन्दी का कार्य बन्द कर दिया है।

2. भूमि के प्रबन्धन में सुधार- भूमि-सुधार के अन्तर्गत प्रथम व द्वितीय योजना में भूमि के कुशल प्रबन्ध पर बल दिया गया। इसके अन्तर्गत भूमि को समतल बनाना, कृषि-योग्य बंजर भूमि का विकास, बीजों की उन्नत किस्मों का प्रयोग, खाद व औजार आदि का प्रयोग व रोगों से रोकथाम आदि कार्य आते हैं। इस दिशा में अभी तक हुई प्रगति विशेष उत्साहवर्द्धक नहीं रही है।

3. सहकारी खेती– देश के कृषि ढाँचे का पुनर्गठन सहकारिता के आधार पर किया जा रहा है, अत: पंचवर्षीय योजनाओं में भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण में सहकारी खेती के महत्त्व पर विशेष जोर दिया गया। प्रथम पंचवर्षीय योजना के अन्त में देश में कुल 1,000 सहकारी कृषि समितियाँ थीं। सन् 1959 ई० के नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने संयुक्त सहकारी खेती को कृषि सुधार का अन्तिम लक्ष्य घोषित किया। फलतः सहकारी कृषि के विकास में गति आई।

4. भूमिहीनों को बसाना तथा भू-दान व ग्राम-दान आदि- भारत में भूमिहीन मजदूरों को बसाना एक जटिल समस्या है। आज भी ग्रामीण जनसंख्या का लगभग 19% अंश ऐसा है, जिसे हम ‘भूमिहीन श्रमिक’ (Landless Labour) कहकर पुकारते हैं। यद्यपि प्रथम पंचवर्षीय योजना में ही भूमिहीन मजदूरों को नई भूमि पर बसाने का कार्य प्रारम्भ कर दिया गया था तथापि अभी तक यह समस्या पूर्णतः सुलझी नहीं है।
भूदान एक सामाजिक तथा आर्थिक आन्दोलन है, जिसका सूत्रपात आचार्य विनोबा भावे ने 1951 में किया था। इस आन्दोलन के उद्देश्य की व्याख्या करते हुए आचार्य विनोबा भावे ने कहा था, “इस आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य बिना संघर्ष के इस देश में सामाजिक एवं आर्थिक दुर्व्यवस्था को दूर करना है।” भूदान आन्दोलन भूमिहीन व्यक्तियों को बाँटने के लिए स्वेच्छा से भूमि-दान का अनुरोध करता है। कृषि से भिन्न अन्य क्षेत्रों में यह आन्दोलन जीवन दान, सम्पत्ति दान, साधन दान आदि रूपों में चल रहा है। भूदल आन्दोलन अब पर्याप्त व्यापक हो गया है। इसके अन्तर्गत ग्राम दान, प्रखण्ड दान, जिला दान तथा प्रदेश दान को भी शामिल कर लिया गया है। इस आन्दोलन का लक्ष्य 5 करोड़ हेक्टेयर भूमि प्राप्त करना है, जिससे प्रत्येक भूमिहीन परिवार को कुछ-न-कुछ भूमि दी जा सके। अब तक इस आंदोलन के अंतर्गत 39.16 लाख एकड़ भूमि प्राप्त हो चुकी है और 37,775 गाँव दान में मिल चुके हैं। इस आंदोलन का लक्ष्य 5 करोड़ एकड़ भूमि प्राप्त करना था। अनेक राज्यों में भूदान में मिली भूमि के वितरण को न्यायपूर्ण बनाने के लिए कुछ कानूनों का भी निर्माण किया गया है। राज्य सरकारें इस आन्दोलन को वित्तीय सहायता भी दे रही हैं। भूदान आन्दोलन एक अभिनव आन्दोलन है। श्री नेहरू ने इस आन्दोलन को ऐसा वातावरण तैयार करने वाला बताया है, जिससे हमारी समस्याएँ बहुत कुछ सरल हो गईं। श्रीमन्नारायण ने इस आन्दोलन का मूल्यांकन इन शब्दों में किया है, “भूदान आन्दोलन देश में महत्त्वपूर्ण भूमि-सुधारों के लिए स्वस्थ एवं अनुकूल वातावरण तैयार करने में सफल हुआ है।

आलोचनात्मक मूल्यांकन
भारत के भूमि-सुधार कार्यक्रम की प्राय: निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की जाती है

  1. भूमि-सुधार कार्यक्रम को समन्वित रूप से लागू नहीं किया गया।
  2. सहकारी कृषि समितियों का निर्माण प्राय: बड़े भू-स्वामियों द्वारा किया गया और उन्होंने ही सहकारी सुविधाओं का लाभ उठाया। फलतः भूमि को जोतने वाला वास्तविक कृषक सुविधाओं से वंचित रहा।
  3. भारत में भू-सुधार नीति अत्यन्त विलम्बपूर्ण रही है।
  4. इससे अनावश्यक मुकदमेबाजी (Litigation) को प्रोत्साहन मिला है।
  5. भूमि-सुधार नियमों में होने वाले परिवर्तन ने भू-स्वामियों में अनिश्चितता की भावना उत्पन्न की।
  6.  प्रशासन का दृष्टिकोण भूमि-सुधार में सहायक सिद्ध नहीं हुआ है।
  7. आज भी कई क्षेत्रों में उच्च लगान लागू है।
  8. अनेक राज्यों में आज भी भूमि सम्बन्धी अभिलेख अपूर्ण हैं।

वस्तुत: सत्य तो यह है कि हमारे देश में जो भी भूमि-सुधार सम्बन्धी कार्य हुए हैं, वे मन और उत्साह से नहीं किए गए हैं। इनके कारण कुछ ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गईं, जो सामाजिक न्याय एवं प्रगति की विरोधी हैं। अतः आवश्यकता इस बात की है कि भूमि-सुधारों से सम्बन्धित अनिश्चितता एवं बाधाओं को शीघ्रातिशीघ्र दूर किया जाए तथा इन सुधारों को निष्ठापूर्वक लागू किया जाए, जिससे एक न्यायपूर्ण, शोषणरहित एवं अधिक स्वस्थ समाज का निर्माण हो सके।

सुझाव
भूमि-सुधार कार्यक्रमों को प्रभावशाली ढंग से शीघ्रतापूर्वक लागू करने के लिए कुछ रचनात्मक सुझाव दिए जा सकते हैं; जैसे

  1. केन्द्रीय भूमि-सुधार आयोग की सिफारिशों को यथासम्भव शीघ्र लागू किया जाए। सिंचित क्षेत्रों में भूमि की अधिकतम सीमा 18 एकड़ निर्धारित कर दी जाए।
  2. सीमा से अधिक भूमि को सरकार स्वयं अपने नियन्त्रण में ले ले तथा भूमिहीनों में उचित रूप से उसका तुरन्त आवंटन कर दिया जाए।
  3. कृषकों को बेदखल करने वाले भू-स्वामियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाए।
  4. सरकार बेनामी हस्तान्तरणों को मालूम करके सीमा से अधिक भूमि का स्वयं अधिग्रहण करे।
  5. ग्रामों में भूमिहीनों को आवास हेतु भूखण्ड दिए जाएँ।
  6. कृषि में न्यूनतम वेतन को तुरन्त लागू किया जाए।
  7. सीमावर्ती क्षेत्रों में भू-वितरण में भूतपूर्व सैनिकों को प्राथमिकता प्रदान की जाए।
  8. गलत आवंटन तथा अनुचित हस्तान्तरण में सहयोग देने वाले राजस्व अधिकारियों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही की जाए।
  9. शेष मध्यस्थों की समाप्ति हेतु भी कदम उठाए जाएँ। मध्यस्थों के रूप में भूमि रखने का अधिकार केवल विधवा महिलाओं, नाबालिग बच्चों तथा भूतपूर्व सैनिकों (विशेषकर अपंग सैनिकों) को ही होना चाहिए।
  10. जो लोग अन्य लोगों की भूमि पर खेती करते हैं, उनकी बेदखली को रोका जाए।
  11. परती भूमियों के वितरण हेतु उचित व्यवस्था हो तथा ऐसे क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधाओं का विस्तार किया जाए।

प्रश्न 10.
हरित क्रान्ति से क्या आशय है? भारत में हरित क्रान्ति को जन्म देने वाले घटकों ने 
बताइए। इसके मार्ग में क्या कठिनाइयाँ आई हैं? इसे सफल बनाने के लिए उपयुक्त सुझाव दीजिए। ”
उत्तर

हरित क्रान्ति का अर्थ

साधारण शब्दों में, हरित क्रान्ति से आशय सिंचित और असिंचित कृषि क्षेत्रों में अधिक उपज देने वाली किस्मों को आधुनिक कृषि पद्धति से उगाकर कृषि उपज में यथासम्भव अधिकाधिक वृद्धि करने से है। जार्ज हरार के अनुसार-“हरित क्रान्ति से हमारा आशय पिछले दशक में विभिन्न देशों में खाद्यान्नों के उत्पादन में होने वाली आश्चर्यजनक वृद्धि से है।

हरित क्रान्ति को जन्म देने वाले घटक
भारत में हरित क्रान्ति के लिए निम्नलिखित घटक उत्तरदायी रहे हैं-

  1. अधिक उपज देने वाली किस्मों का प्रयोग।
  2. 1961-62 में सघन कृषि जिला कार्यक्रम नामक योजना का प्रारम्भ।
  3. सघन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम का विस्तार।।
  4. बहु-फसल कार्यक्रम को अपनाना।।
  5. खाद एवं उर्वरकों का अधिकाधिक उपयोग।
  6. उन्नत बीजों का प्रयोग।
  7. आधुनिक कृषि उपकरण एवं संयन्त्रों का प्रयोग।
  8. प्रभावी पौध संरक्षण कार्यक्रमों को लागू करना।
  9. सिंचाई सुविधाओं का विस्तार।
  10. पर्याप्त मात्रा में कृषि साख की उपलब्धि।

भारत में हरित क्रान्ति की असफलताएँ/कठिनाइयाँ

यद्यपि उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरक, आधुनिक विकसित तकनीक आदि के प्रयोग द्वारा कृषि उत्पादकता में काफी वृद्धि हुई, तथापि व्यापक दृष्टि से कृषि के विभिन्न स्तरों पर क्रान्ति लाने में यह असफल रही है। भारत में हरित क्रान्ति की असफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित रहे हैं

  1. कृषि क्रान्ति का प्रभाव केवल कुछ ही फसलों (गेहूँ, ज्वार, बाजरा) तक ही सीमित रहा है। गन्ना, | पटसन, कपास व तिलहन जैसे कृषि पदार्थों पर इसका बिल्कुल प्रभाव नहीं पड़ा है।
  2. कृषि क्रान्ति का प्रभाव केवल कुछ ही विकसित क्षेत्रों (पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु) के कुछ भागों तक सीमित रहा है।
  3. भारत में कृषि-क्रान्ति से केवल बड़े किसान ही लाभान्वित हो सके हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में असमानताएँ बढ़ी हैं और इस प्रकार से धनी कृषक अधिक धनी और निर्धन अधिक निर्धन हो गए
  4. विस्तृत भू-खण्डों पर उत्तम खाद व बीज तथा नवीन तकनीकों के प्रयोग से कृषि योग्य भूमि के कुछ लोगों के हाथों में केन्द्रित होने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
  5. कृषि विकास की गति अत्यधिक धीमी रही है।

हरित क्रान्ति को सफल बनाने के उपाय

हरित क्रान्ति को सफल बनाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं

  1. कृषि उत्पादन से सम्बन्धित सरकारी विभागों में उचित समन्वय होना चाहिए।
  2. उर्वरकों के वितरण की व्यवस्था होनी चाहिए।
  3. उर्वरकों के प्रयोग के बारे में किसानों को उचित प्रशिक्षण सुविधाएँ उपलब्ध होनी चाहिए।
  4. उपयुक्त व उत्तम बीजों के विकास को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
  5. फसल बीमा योजना शीघ्रता एबं व्यापकता से लागू की जानी चाहिए।
  6. कृषि साख की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए। उन्हें सस्ती ब्याज-देर परे, ठीक समय पर, पर्याप्त मात्रा में ऋण-सुविधाएँ मिलनी चाहिए।
  7.  सिंचाई-सुविधाओं का विस्तार किया जा चाहिए।
  8. भू-क्षरण में होने वाली क्षति की रोकथाम के उचित प्रयत्न किए जाने चाहिए।
  9. कृषि उपज के विपणन की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।
  10. भूमि का गहनतम व अधिकतम उपयोग किया जाना चाहिए।
  11. कृषकों को उचित प्रशिक्षण व निर्देशन दिया जाना चाहिए।
  12. भूमि-सुधार कार्यक्रमों का शीघ्र क्रियान्वयन होना चाहिए।
  13. छोटे किसानों को विशेष सुविधाएँ दी जानी चाहिए।
  14. प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार होना चाहिए।
  15. विभिन्न विभागों, सामुदायिक विकास खण्डों, ग्राम पंचायतों, सरकारी संगठनों व साख संस्थाओं में उचित समन्वय होना चाहिए।

प्रश्न 11.
कृषि विपणन से क्या आशय है? भारत में कृषि विपणन की वर्तमान व्यवस्था क्या है?
उत्तर

कृषि विपणन का अर्थ

कृषि विपणन की समस्या कृषि विकास की आधारभूत समस्या है। यदि कृषक को उसे उत्पादन की उचित मूल्य नहीं मिलता तो उसकी आर्थिक स्थिति कभी सुधर नहीं सकती। कृषि विपणन एक व्यापक शब्द है। इसके अन्तर्गत बहुत-सी क्रियाएँ आती हैं; जैसे—कृषि पदार्थों का एकत्रीकरण, श्रेणी विभाजन विधायन, संग्रहण, परिवहन, विपणन के लिए वित्त, पदार्थों को अन्तिम उपभोक्ताओं तक पहुँचाना तथा इन सम्पूर्ण क्रियाओं में निहित जोखिम उठाना आदि। इस प्रकार विपणन के अन्तर्गत उन संमस्त क्रियाओं का समावेश किया जाता है, जिनको सम्बन्ध कृषि उत्पादन के कृषक के पास से अन्तिम उपभोक्ताओं तक पहुँचाने से होता है। 

भारत में कृषि पदार्थों के विपणन की वर्तमान व्यवस्था

भारत में किसान अपनी उपज को निम्नलिखित ढंग से बेचता है-

1. गाँव में बिक्री–भारत में कृषि-उत्पादन का अधिकांश भाग प्रायः गाँव में ही बेच दिया जाता है। ग्रामीण साख सर्वेक्षण समिति इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि कुल फसल का लगभग 65% भाग उत्पत्ति के स्थान पर ही बेच दिया जाता है। इसके अतिरिक्त 15% भाग गाँव के बाजार में, 14% भाग व्यापारियों व कमीशन एजेण्टों को तथा शेष 6% अन्य पद्धतियों से बेचे जाने का अनुमान है। ग्रामीण बाजार में फसल की बिक्री मुख्यत: तीन रूपों में होती है
(क) गाँव की हाटों अथवा साप्ताहिक बाजारों में।।
(ख) गाँव के महाजन तथा साहूकारों को।
(ग) गाँव में भ्रमण करते व्यापारियों तथा कमीशन एजेण्टों को।
प्रायः गाँव में बिकने वाली फसल का किसानों को उचित मूल्य नहीं मिला पाता, परन्तु अनेक कारण किसानों को इस बात के लिए विवश कर देते हैं कि वे अपनी फसल

गाँव में ही बेच दें। गाँव में फसल की बिक्री के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं-
(क) बाजार योग्य अतिरेक (Marketable Surplus) का कम होना।
(ख) यातायात व परिवहन के साधनों का अभाव।
(ग) किसानों की ऋणग्रस्तता।
(घ) गोदामों की सुविधाओं का अभाव।
(ङ) किसानों की अशिक्षा, मण्डियों में होने वाली बेईमानी तथा प्रचलित मूल्यों का ज्ञान न होना।
(च) किसानों की निर्धनता आदि।

2. मण्डियों में बिक्री- भारत में अधिकांश किसान अपनी फसल गाँवों में नहीं बेचते, वे मण्डियों में अपनी फसल बेचा करते हैं। भारत में लगभग 6,700 मण्डियाँ हैं। भारत में दो प्रकार की मण्डियाँ पायी जाती हैं–नियमित तथा अनियमित। नियमित मण्डियाँ प्रायः निजी व्यक्तियों, संस्थाओं अथवा मण्डलों द्वारा संचालित होती हैं। अनयिमित मण्डियों में, जहाँ उनका प्रबन्ध निजी व्यक्तियों के हाथ में होता है, प्राय: सभी प्रकार की अनियमितताएँ होती हैं और मध्यस्थ फसल का अधिकांश भाग हड़प लेते हैं। नियमित मण्डियों में किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य मिल जाता है क्योंकि इनकी व्यवस्था राज्य सरकारों द्वारा की जाती है। केन्द्रीय विपणन निदेशालय इस सम्बन्ध में राज्यों का पथ-प्रदर्शन करता है।

3. सहकारी समितियों द्वारा बिक्री– देश में कृषि उपज की बिक्री की दृष्टि से सहकारी विपणन समितियों (Co-operative Marketing Societies) की स्थापना की गई है, जो अपने सदस्यों के कृषि उत्पादन को एकत्रित करके उसे बड़ी मण्डियों में बेचती हैं।

4. सरकार द्वारा क्रय- गत् कुछ वर्षों से सरकार भी कृषि पदार्थों का क्रय करने लगी है। सन् 1973 ई० में सरकार द्वारा गेहूँ के थोक-व्यापार का राष्ट्रीयकरण कर लेने से कृषि-विपणन में सरकारी एजेन्सियों का महत्त्व बढ़ गया है।

प्रश्न 12.
भारत में कृषि विपणन की मुख्य समस्याएँ/दोष/कठिनाइयाँ क्या हैं? उन्हें सुधारने के उपाय बताइए।
उत्तर
भारत में कृषि उपज के विपणन की समस्याएँ/दोष/कठिनाइयाँ भारत में कृषि उपज की विक्रय-व्यवस्था अनेक दृष्टियों से दोषपूर्ण है, जिसके परिणामस्वरूप किसानों को उपभोक्ताओं द्वारा चुकाए गए मूल्य का आधा भाग ही कठिनता से मिल पाता है। परिणामतः न तो उपभोक्ताओं को लाभ हो पाता है और न ही उत्पादकों को। यह स्थिति आर्थिक विकास की दृष्टि से भी अत्यन्त दोषपूर्ण है, जिसका देश के उत्पादन पर व्यापक प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कृषि उपज के विक्रय के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं
1. कृषि उपज की घटिया किस्म– भारत में कृषि उपज प्रायः घटिया किस्म की होती है क्योंकि किसान कृषि को एक परम्परागत कार्य समझकर करता है और उपज की किस्म पर ध्यान नहीं देता। फलतः कृषक को उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।

2. संगठन का अभाव- भारतीय कृषकों में संगठन का अभाव है, जबकि क्रेता पूर्ण रूप से संगठित होते हैं। अतः असंगठित कृषक अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त नहीं कर पाते।

3. मध्यस्थों की अधिकतम संख्या– कृषि विपणन में बहुत अधिक मध्यस्थ हैं। उपभोक्ता तथा उत्पादक (कृषक) के बीच मध्यस्थों की एक लम्बी लाइन होती है, जो सभी अपनी-अपनी सेवा का कुछ-न-कुछ लेते हैं। राष्ट्रीय नियोजन समिति ने इन मध्यस्थों को कृषक की निर्धनता का एक महत्त्वपूर्ण कारण माना है।

4. श्रेणीकरण का अभाव- भारतीय कृषक अपनी उपज का श्रेणीकरण तथा प्रमापीकरण नहीं करते। समस्त पदार्थों को मिला-जुलाकर बेचते हैं, जिससे वस्तु को उचित मूल्य नहीं मिल पाता।

5. यातायात की असुविधा- ग्रामीण क्षेत्रों में अभी तक यातायात व परिवहन की सुविधाओं का आवश्यक विकास नहीं हुआ है, परिणामतः कृषक गाँवों में ही अपनी उपज बेचने के लिए बाध्य होता है। यातायात की सुविधाओं के अभाव में मध्यस्थों की संख्या में भी वृद्धि हो जाती है।

6. अपर्याप्त एवं अवैज्ञानिक गोदामों की व्यवस्था- भारत में किसानों की उपज के उचित संग्रह हेतु प्रायः कोई सुविधा प्राप्त नहीं होती। वे नमी, धूप, हवा तथा धूल आदि से उपज की रक्षा नहीं कर पाते। चूहे, दीमक आदि भी फसल को नष्ट करते रहते हैं, जिससे प्रतिवर्ष 20 लाख टन उत्पादन नष्ट हो जाता है। भण्डारों की सुविधा न होने के कारण किसानों को अपनी उपज तुरन्त बेच देनी पड़ती है।

7. बाजार में प्रचलित बुराइयाँ तथाअनुचित कटौतियाँ– अनियमित मण्डियों में और कभी-कभी नियमित मण्डियों में विविध प्रकार की कुचालें तथा बेईमानियाँ पायी जाती हैं। राष्ट्रीय नियोजन समिति ने ग्रामीण बिक्री तथा वित्त सम्बन्धी प्रतिवेदन में निम्नलिखित कार्यवाहियों का उल्लेख विशेष रूप से किया है|

  1. विभिन्न प्रकार की माप-तौल द्वारा किसानों को धोखा देना।
  2. चुंगी, तौलाई, दलाली, आढ़त आदि शुल्कों के अतिरिक्त प्याऊ, गौशाला, रामलीला, मन्दिर, अनाथालय आदि के नाम पर अनुचित कटौतियाँ।।
  3. दलालों का आढ़तियों से गुप्त सम्पर्क होना।।
  4. गुप्त रूप से मूल्य निर्धारित करना।।
  5. नमूने के रूप में पर्याप्त मात्रा में कृषि-पदार्थ ले लेना आदि। यही कारण है कि उपर्युक्त कटौतियों से बचने की दृष्टि से किसान गाँवों में अपनी उपज बेचने के लिए प्रोत्साहित होते हैं।

8. कीमतों के बारे में सूचना का अभाव- यातायात, परिवहन तथा संचार सुविधाओं के अभाव व अशिक्षा के कारण किसानों को मण्डी में प्रचलित अथवा सम्भावित कीमतों की सूचना नहीं मिलती और व्यापारी तथा महाजन झूठी सूचनाएँ देकर उन्हें ठग लेते हैं।

9. अन्य दोष-

  1. किसान का रूढ़िवादी, अन्धविश्वासी, अशिक्षित एवं सरल होना, जिसकी वजह से व्यापारी व्यक्तिगत सम्बन्धों की दुहाई देकर तथा सहानुभूति दिखाकर उसे ठगने में सफल हो जाते हैं।
  2. निर्धनता तथा ऋणग्रस्तता के कारण कृषक तत्काल माल बेचने के लिए बाध्य होता है, जिससे उसे कृषि उपज का कम मूल्य प्राप्त होता है।
  3. कृषिपदार्थों में मिलावट होना, जिससे उपज की एक निश्चित मात्रा कटौती के रूप में रख ली जाती है।।
  4. बिक्री के लिए कम अतिरिक्त उपज का होना।
    इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत में कृषि विपणन-व्यवस्था अनेक दोषों से युक्त है।

कृषि उपज की विपणन व्यवस्था को सुधारने के लिए सुझाव

1. कृषक को महाजन-साहूकार के चंगुल से निकालने के लिए सस्ते ब्याज की दर पर वित्तीय | सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
2. परिवहन के सस्ते व पर्याप्त साधन विकसित किए जाएँ, ताकि कृषक अपनी उपज को मण्डी में ले | जाकर उचित कीमतों पर बेच सकें।
3. नियन्त्रित मण्डियों की अधिकाधिक संख्या में स्थापना की जाए।
4. मण्डी में बाँटों का नियमित रूप से निरीक्षण किया जाए।
5. व्यापक स्तर पर भण्डार व गोदाम बनाए जाएँ।
6. कृषि उपज की बिक्री के लिए स्थान-स्थान पर सहकारी कृषि विपणन समितियों की स्थापना की 
जाए।
7. किसानों में शिक्षा का प्रसार किया जाए।

प्रश्न 13.
उपदान (Subsidy) से क्या आशय है? उपदान के पक्ष और विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर
उपदान का अर्थ वस्तुओं के मूल्य में भारी उच्चावचों का अर्थव्यवस्था पर व्यापक दुष्प्रभाव पड़ता है। ये उच्चावच आर्थिक स्थिरता में बाधक बनते हैं। अतः सरकार आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों को नीचे स्तर पर रखने का प्रयास करती है। जब सरकार वस्तुओं के मूल्यों को नीचे स्तर पर बनाए रखने के लिए उत्पादकों, वितरकों तथा निर्यातकों को आर्थिक सहायता प्रदान करती है तो इस प्रकार की आर्थिक सहायता को उपदान कहा जाता है। प्रारम्भ में निर्यात प्रोत्साहन हेतु सरकार आर्थिक सहायता प्रदान करती थी ताक़ि निर्यातक कम मूल्यों पर वस्तुओं का निर्यात कर सकें और निर्यातों में तेजी से वृद्धि हो सके। कम मूल्यों पर वस्तुओं का निर्यात करने से निर्यातकों को जो हानि होती थी, सरकार उसे उपदान देकर पूरा करती थी। आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों को कम रखने के लिए सरकार द्वारा उपदान दिए जाते रहे हैं।

उपदान के पक्ष में तर्क

  1. भारत में कृषि क्षेत्र के विस्तार की सम्भावनाएँ सीमित हैं। अत: कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए गहन कृषि को प्रोत्साहन देना आवश्यक है। गहन कृषि की सफलता आदाओं की उपलब्धता पर निर्भर करती है। ये आदाएँ हैं-पर्याप्त सिंचाई सुविधाएँ, अधिकाधिक उपजदायी बीज तथा रासायनिक उर्वरकों का भरपूर उपयोग। इनकी उपलब्धि सीमित है और उत्पादन लागत ऊँची। निर्धन किसानों के लिए इन सुविधाओं का बाजार मूल्य पर क्रय असम्भव है। अत: इनका कुछ भार सरकार को वहन करना चाहिए।
  2. कम मूल्य पर आदाएँ मिलने से छोटे किसान भी आधुनिक तकनीकी को अपना सकेंगे। इसके परिणामस्वरूप छोटे किसान भी अपनी क्षमता का पूर्ण उपयोग कर सकेंगे।
  3. गहन कृषि से कृषि क्षेत्र में आये और रोजगार में वृद्धि होगी, फसल ढाँचे में परिवर्तन होगा, व्यावसायिक फसलों के उत्पादन में वृद्धि होगी तथा आर्थिक असमानताओं में कमी आएगी।

अपदान के विपक्ष में तर्क
उपदान के विपक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं

1. उपदान पर दी जाने वाली राशि में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। इसका सरकारी बजट पर भारी बोझ पड़ता है।
2. उपदान से संसाधनों का अपव्यय होता है। इस अपव्यय के मुख्य कारण हैं

  • संसाधनों का दोषपूर्ण आवंटन,
  • कम कीमत पर मिलने से साधनों के दुरुपयोग की सम्भावना तथा
  • कुशल प्रबन्धन के लिए प्रेरणा का अभाव।

3. उपदान के वितरण में भारी विषमताएँ विद्यमान हैं। इससे आर्थिक विषमताएँ भी बढ़ने लगती हैं।

प्रश्न 14.
भारत में कृषि वित्त के वर्तमान स्रोतों की चर्चा कीजिए।
उत्तर
भारत में कृषि वित्त के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं
1. ग्रामीण, साहूकार व महाजन- ये प्रायः सम्पन्न किसान तथा भूमिपति होते हैं। ये कृषि के साथ-साथ लेन-देन का भी कार्य करते हैं। ये लोग कृषि के अतिरिक्त अन्य कार्यों के लिए भी पैसा उधार देते हैं।

2. देशी बैंकर- देशी बैंकर दो प्रकार के कार्य करते हैं-बैंकिंग कार्य तथा गैर-बैंकिंग कार्य। बैंकिंग कार्यों में निक्षेपों को स्वीकार करना, ऋण देना तथा हुण्डियों में व्यवसाय सम्मिलित होता है। ये , ऋणों पर-ऊँची ब्याज दर लेते हैं।

3. सरकार- कृषि-वित्त की आवश्यकताओं को देखते हुए सरकार ने अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन ऋण की व्यवस्था की है। ये ऋण ‘तकावी ऋण’ कहे जाते हैं। सरकार भू-सुधार ऋण अधिनियम, 1883 के अनतर्गत दीर्घकालीन ऋण तथा कृषक ऋण अधिनियम, 1884 के अधीन अल्पकालीन ऋण प्रदान करती है। दीर्घकालीन ऋण भूमि पर स्थायी सुधार के उद्देश्य से प्रदान किए जाते हैं, जबकि अल्पकालीन ऋण कृषि सम्बन्धी सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति अथवा अकाल, बाढ़ या अन्य किसी कारण से फसल नष्ट होने पर दिए जाते हैं। सरकार इन ऋणों पर बहुत कम ब्याज लेती है। परन्तु फिर भी ये ऋण अधिक प्रभावशाली तथा लोकप्रिय नहीं हैं।

4. सहकारी समिति- इन समितियों का उद्देश्य कृषि विकास के लिए कम ब्याज की दर पर पर्याप्त साख सुविधाएँ प्रदान करना है। ये समितियाँ अल्पकालीन तथा मध्यकालीन ऋणों के अतिरिक्त अनुत्पादक ऋण भी प्रदान करती हैं। ऋण प्रदान करने के अतिरिक्त इन समितियों का । उद्देश्य किसानों में बचत आन्दोलन को प्रोत्साहित करना एवं उनका मानसिक व नैतिक उत्थान करना भी है।

5. व्यापारिक बैंक-  राष्ट्रीयकरण के बाद कृषि साख के क्षेत्र में व्यापारिक बैंकों का योगदान निरन्तर बढ़ा है। ये बैंक कृषि विस्तार के लिए अल्पकालीन एवं मध्यकालीन ऋण प्रदान करते हैं।

6. भारतीय स्टेट बैंक-  स्टेट बैंक तथा उसके सहायक बैंक सहकारी संस्थाओं के माध्यम से कृषि क्षेत्र को उदारता के साथ साख प्रदान कर रहे हैं। कृषि साख के क्षेत्र में स्टेट बैंक निम्नलिखित प्रकार से योगदान करता है

  • प्रत्यक्ष उधार- फसल के बोने से लेकर काटने तक, सँवारने तथा सुरक्षित रखने और बिक्री करने आदि सभी कार्यों के लिए स्टेट बैंक धन की व्यवस्था करता है। इसके अतिरिक्त पशुपालन, डेयरी व्यवसाय, मुर्गी पालन तथा फलोत्पादन के लिए स्टेट बैंक परिवार ऋण प्रदान करता है।
  • परोक्ष उधार-रासायनिक खाद, बीज, जन्तुनाशक तत्त्व, पम्पिंग सैट तथा ट्रैक्टर के लिए भी स्टेट बैंक ऋण प्रदान करता है।

7. भूमि बन्धक अथवा भूमि विकास बैंक-ये बैंक भूमि की जमानत पर किसानों को दीर्घकालीन ऋण देते हैं। ये बैंक उत्पादक तथा अनुत्पादक दोनों प्रकार का ऋण प्रदान करते हैं।

8. भारतीय रिजर्व बैंक- यह बैंक किसानों को प्रत्यक्ष रूप से सात प्रदान न करके सहकारी बैंकों के माध्यम से साख प्रदान करता है। रिजर्व बैंक अल्पकालीन साख या तो पुनर्कटौती के रूप में अथवा अग्रिमों के रूप में प्रदान करता है। रिजर्व बैंक दीर्घकालीन ऋण भी प्रदान करता है। ये ऋण राज्य सरकारों को दिए जाते हैं, जिससे वे सहकारी साख संस्थाओं के शेयर क्रय कर सकें। इसके अतिरिक्त रिजर्व बैंक केन्द्रीय भूमि बन्धक बैंकों के ऋण-पत्र भी खरीद सकता है।

9. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक- ये बैंक ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे किसानों, सामान्य कारीगरों तथा भूमिहीन श्रमिकों की साख सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। ये कृषकों को उपकरण, यन्त्र और पशु खरीदने तथा गोबर गैस संयन्त्र लगाने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं।

10. कृषि व ग्रामीण विकास के लिए राष्ट्रीय बैंक (NABARD)-12 जुलाई, 1982 ई० से कृषि

एवं ग्रामीण विकास के लिए राष्ट्रीय बैंक (NABARD) की स्थापना की गई, जो कृषि के लिए
निम्नलिखित प्रकार से साख की व्यवस्था करेगा

  1. यह 18 महीने तक की अवधि के लिए अल्पकालीन साख राज्य सहकारी बैंकों, प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थाओं को प्रदान करेगा, ताकि उसका उपयोग कृषि कार्यों के विशिष्ट उत्पादन व बिक्री क्रियाओं के लिए किया जा सके।
  2. 18 महीने से 7 वर्ष के लिए मध्यकालीन ऋण राज्य सहकारी बैंकों व प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों को कृषि विकास व इनके द्वारा निर्धारित अन्य कार्यों के लिए दिए जाएँगे।
  3. पुनर्वित के रूप में दीर्घकालीन ऋण भूमि विकास बैंकों, प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों, अनुसूचित बैंकों, राज्य सहकारी बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थाओं को कृषिगत व ग्रामीण विकास के लिए दिए जाएँगे।
  4. यह राज्य सरकारों को 20 वर्ष तक के लिए ऋण दे सकेगी, ताकि वे प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से सहकारी साख समितियों की शेयर पूँजी में हिस्सा ले सकें।
  5. यह केन्द्रीय सरकार की स्वीकृति पर किसी भी अन्य संस्था को दीर्घकालीन ऋण दे सकेगा, ताकि कृषि व ग्रामीण विकास को प्रोत्साहन दिया जा सके।
    इस बैंक को कृषि पुनर्वित्त एवं विकास निगम (ARDC) तथा राष्ट्रीय कृषि साख (दीर्घकालीन) कोष एवं राष्ट्रीय कृषि साख (स्थायीकरण) कोष के सभी कार्य हस्तान्तरित कर दिए गए हैं।

प्रश्न 15.
औद्योगीकरण से क्या आशय है? उत्पादन के प्रकार व स्वामित्व के आधार पर बड़े पैमाने के उद्योगों का वर्गीकरण कीजिए
उत्तर

औद्योगीकरण का अर्थ

औद्योगीकरण से आशय विज्ञान एवं तकनीक की सहायता से नवीन उपयोगिताओं या मूल्यों के निर्माण से लगाया जाता है। जब उद्योगों की श्रृंखला व्यापक रूप धारण कर लेती है, तो यह प्रक्रिया बन जाती है, जिसे ‘औद्योगीकरण’ कहते हैं। संकुचित अर्थ में, औद्योगीकरण से आशय निर्माण उद्योगों की स्थापना से है परन्तु व्यापक अर्थ में औद्योगीकरण की प्रक्रिया केवल निर्माण उद्योगों की स्थापना तक ही सीमित नहीं है, वरन् इसके द्वारा किसी भी राष्ट्र की सम्पूर्ण आर्थिक संरचना को परिवर्तित किया जा सकता है।

उत्पादन के प्रकार के आधार पर बड़े पैमाने के उद्योगों का वर्गीकरण

उत्पादन के प्रकार के आधार पर बड़े पैमाने के उद्योगों को मोटे तौर पर चार प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत । किया जा सकता है
1. आधारभूत उद्योग- आधारभूत उद्योग वे उद्योग होते हैं, जो सभी महत्त्वपूर्ण उद्योगों और कृषि को 
आवश्यक आदाएँ (इनपुट्स) प्रदान करते हैं। इनमें कच्चा लोहा, कोयला, उर्वरक, कॉस्टिक सोडा, सीमेंट, स्टील, ऐलुमिनियम, बिजली आदि सम्मिलित हैं।

2. पूँजी वस्तु उद्योग- पूँजी वस्तु उद्योग वे उद्योग होते हैं, जो सभी उद्योगों एवं कृषि के लिए मशीनरी व उपकरणों का उत्पादन करते हैं। इन उद्योगों में मशीनी औजार, ट्रैक्टर, बिजली के ट्रान्सफॉर्मर, मोटरवाहन आदि सम्मिलित हैं।

3. मध्यवर्ती वस्तु उद्योग- ये उद्योग उन वस्तुओं का उत्पादन करते हैं, जो किन्हीं दूसरे उद्योगों की उत्पादन प्रक्रिया में प्रयोग की जाती हैं अथवा उद्योगों में पूँजी वस्तुओं के सहायक उपकरणों में प्रयोग की जाती हैं; जैसे-ऑटोमोबाइल, टायर्स और पेट्रोलियम-रिफाइनरी उत्पाद। ।

4. उपभोक्त वस्तु उद्योग- ये उद्योग ऐसी वस्तुओं का उत्पादन करते हैं, जिनको प्रत्यक्ष रूप से उपभोग किया जाता है; जैसे-वस्त्र, चीनी, कागज, बाइसिकल आदि।

उत्पादन के स्वामित्व के आधार पर बड़े पैमाने के उद्योगों का वर्गीकरण

उत्पादन के स्वामित्व के आधार पर देश के बड़े पैमाने के उद्योगों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है

  1. सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग-इन उद्योगों पर सरकार का स्वामित्व होता है।
  2. निजी क्षेत्र के उद्योग-इन उद्योगों पर निजी व्यक्तियों का स्वामित्व होता है।
  3. संयुक्त क्षेत्र के उद्योग-इन उद्योगों पर सरकार एवं निजी व्यक्ति दोनों का स्वामित्व होता है।


प्रश्न 16.
भारतीय उद्योगों के पिछड़ेपन के मुख्य कारण क्या हैं? भारत में बड़े पैमाने के उद्योगों के विकास के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
या भारतीय उद्योगों में निम्न उत्पादकता के क्या कारण हैं। इस दिशा में सरकार ने क्या किया है?
उत्तर

भारतीय उद्योगों के पिछड़ेपन के कारण

या

भारतीय उद्योगों में निम्न उत्पादकता के कारण

स्वतन्त्रता से पूर्व भारत में अपेक्षित औद्योगिक विकास नहीं हो सका था। इसका मुख्य कारण ब्रिटिश सरकार की भारत पर थोपी गई दोषपूर्ण आर्थिक नीति थी। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत सरकार ने इस ओर विशेष ध्यान दिया। सन् 1948 ई० में संसद में भारत सरकार की प्रथम औद्योगिक नीति की घोषणा की गई, जिसमें समय-समय पर संशोधन किए जाते रहे। द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61) में भारत में विशाल स्तरीय एवं आधारभूत उद्योगों की स्थापना पर विशेष बल दिया गया। 67 वर्षों से निरन्तर औद्योगिक विकास पर बल देते रहने के बावजूद हमारा देश आज भी औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। इसके मुख्य कारण अग्रलिखित हैं

1. प्रौद्योगिकी सुधार के लिए प्रेरणाओं का अभाव- भारतीय उत्पादन तकनीक अभी भी पिछड़ी है। भारतीय उद्यमी नवीनतम तकनीक को अपनाने के लिए पर्याप्त रूप से प्रेरित नहीं हो पाते। इसका कारण अभी भी पर्याप्त नियन्त्रणों का पाया जाना है।

2. स्थापित क्षमता का पूर्ण उपयोग न होना- उद्योग अपनी स्थापित क्षमता के 75% भाग को भी | उपयोग नहीं कर पाते हैं, इससे अपव्यय बढ़ जाते हैं।

3. पूँजीगत व्ययों में वृद्धि- भारतीय उद्योगों में पूँजीगत व्यय अत्यधिक ऊँचे हैं, जिसके कारण इन उद्योगों की लाभदायकता का स्तर नीचे गिर गया है।

4. अनुसन्धान एवं विकास कार्यक्रमों का अभाव- उद्योगों का आकार छोटा होने तथा वित्तीय सुविधाओं की कमी के कारण इन उद्योगों में अनुसन्धान एवं विकास कार्यक्रम नहीं हो पाते हैं।

5. अनुत्पादक व्ययों की अधिकता- भारतीय उद्योगों में अनुत्पादक व्यय सामान्य से अधिक रहे हैं, जिसका प्रभाव लागत में वृद्धि व उत्पादकता की कमी के रूप में पड़ा है।

6. उपक्रमों के निर्माण में देरी– देश में उद्योगों की स्थापना में निर्धारित समय से अधिक समय लगता है। इन उद्योगों की कार्यकुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और इनकी निर्माण लागत भी बढ़ जाती है।

7. वित्तीय सुविधाओं का अपर्याप्त होना– भारतं में औद्योगिक बैंकों की पर्याप्त संख्या में स्थापना नहीं हो पायी है, जिससे उद्योगों को समय पर वित्तीय सहायता उपलब्ध नहीं हो पाती।

8. अम-प्रबन्ध संघर्ष- भारत में औद्योगिक प्रबन्ध मधुर नहीं रहे हैं और आए दिन हड़ताल व तालाबन्दी होती रहती हैं। इनको औद्योगिक उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

 बड़े पैमाने के उद्योगों को प्रोत्साहन देने हेतु उठाए गए सरकारी कदम

देश में औद्योगिक उत्पादकता को बढ़ाने, सभी को आधारभूत सुविधाएँ प्रदान करने और औद्योगिक वातावरण को सुदृढ़ करने के लिए बड़े पैमाने के उद्योगों की स्थापना की गई है। इन उद्योगों की स्थापना अधिकांशतः सार्वजनिक क्षेत्रों में की गई है, जिनमें बड़ी मात्रा में पूंजी निवेश किया गया है तथा बड़ी संख्या में श्रमिकों को रोज्गार दिया गया है। इन उद्योगों के विकास के लिए सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं

  1. लाइसेन्सिग नीति को उदार बनाया गया है।
  2. राजकोषीय नीति के अन्तर्गत पर्याप्त कर-रियायतें दी गई हैं।
  3. औद्योगिक विकास एवं नियमन अधिनियम, 1951′ के अन्तर्गत विनिर्माण इकाइयों का पंजीकरण आवश्यक है और इन्हें इस अधिनियम के अन्तर्गत सरकार द्वारा निर्मित नियमों एवं अधिनियमों का पालन करना होता है।
  4. आधुनिक औद्योगिक तकनीक को अपनाने के लिए अनेक प्रकार की राजकोषीय एवं वित्तीय | प्रेरणाएँ दी जा रही हैं।
  5. उत्पादन लागतों को न्यूनतम करने के लिए सरकार द्वारा सभी प्रकार की सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
  6. प्रौद्योगिकीय सुधार और संयन्त्र के आधुनिकीकरण के लिए सरकार ने दो कोषों की स्थापना की है
    (1) प्रौद्योगिकीय सुधार कोष एवं
    (2) पूँजी आधुनिकीकरण कोष।

प्रश्न 17.
लघु एवं कुटीर उद्योग को परिभाषित कीजिए। भारतीय अर्थव्यवस्था में इन उद्योगों के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
या भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु एवं कुटीर उद्योगों के महत्त्व को दर्शाइए।
उत्तर
लघु तथा कुटीर उद्योग विकेन्द्रित आर्थिक प्रगति के द्योतक माने जाते हैं। मॉरिस फ्रीडमैन ने कुटीर एवं लघु उद्योगों के दर्शन (Philosophy) की व्याख्या करते हुए लिखा है-“जहाँ विशाल उद्योगों का उद्देश्य लाभ कमाना और उनका आधार पूँजी है, वहाँ कुटीर एवं लघु उद्योगों का उद्देश्य जीवन की समृद्धि 
और उनका आधार धन न होकर स्वयं मनुष्य है। विशाल उद्योग पूँजी की सेवा करते हैं और लघु उद्योग । मानवता की।”

कुटीर उद्योग की परिभाषा

राजकोषीय आयोग 1949-50 ने कुटीर उद्योगों को इस प्रकार परिभाषित किया है-“एक कुटीर उद्योग वह (उद्दा: । जो कि पूर्णतः अथवा अंशतः श्रमिक के परिवार की सहायता से पूर्णकालीन अथवा अल्पकालीन व्यबसाय के रूप में चलाया जाता है।” कुटीर उद्योगों में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं

  1. कुटीर उद्योग मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों से सम्बद्ध होते हैं।
  2.  ये कृषि व्यवसाय से सम्बद्ध होते हैं।
  3.  इनमें अधिकांश कार्य मानवीय श्रम द्वारा किए जाते हैं।
  4. इन उद्योगों में मुख्यत: परिवार के सदस्य ही कार्यरत रहते हैं।

लघु उद्योग की परिभाषा ।

जहाँ तक लघु उद्योग का प्रश्न है, लघु उद्योगों की परिभाषा विभिन्न दृष्टिकोणों से की गई है। राजकोषीय आयोग (Fiscal Commission), 1949-50 ने लघु उद्योगों को इस प्रकार परिभाषित किया है-“एक लघु उद्योग वह है, जो मुख्यत: किराए के श्रमिकों द्वारा, जिनकी संख्या 10 से 50 तक के मध्य होती है, चलाया जाता है।” लघु उद्योग मण्डल के अनुसार-“वे सभी उद्योग लघु उद्योग में शामिल किए जाते हैं, जिनमें यदि शक्ति का प्रयोग होता है, तब 50 श्रमिक और जब शक्ति का प्रयोग नहीं किया जाता है, तब 100 श्रमिक तक मजदूरी पर रखे जाते हैं तथा जिनमें १ 3 लाख से कम की पूँजी लगी होती है।” उपर्युक्त परिभाषा में श्रमिकों की संख्या तथा पूँजी की मात्रा को परिभाषा का आधार बनाया गया था, परन्तु भारत सरकार ने केन्द्रीय लघु स्तरीय उद्योग बोर्ड (Central Small Scale Industries Board) के सुझावों को स्वीकार करके लघु उद्योगों की एक नवीन परिभाषा दी है, जिसमें श्रम तथा यन्त्रीकरण को आधार न मानकर मशीन तथा संयन्त्रों (Plant and Machinery) में किए गए विनियोग को ही आधार मना है। 1 मार्च, 1967 से उन सभी औद्योगिक इकाइयों को लघु इकाई माना गया है। जिनमें मशीनों तथा संयन्त्रों पर है 7.5 लाख से कम पूँजी लगाई गई हो। वर्ष 1999 में यह राशि १ 1 करोड़ और 2014 में यह राशि के 5 करोड़ है। इस परिभाषा में नियोजित श्रमिकों की संख्या पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में कुटीर तथा लघु उद्योगों का महत्त्व

इस तथ्य को आज भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि 67 वर्षों (स्वतन्त्रता के उपरान्त) से वृहत् स्तर के उद्योगों के विस्तार के बावजूद भारत अभी तक मुख्य रूप से लघु तथा कुटीर उद्योगों का देश है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कुटीर तथा लघु उद्योगों का विशिष्ट महत्त्व देखते हुए ही महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी, योजना आयोग तथा अन्य विभिन्न आयोगों ने एक स्वर से इनके विकास पर बल दिया। गांधी जी के शब्दों में, भारत का मोक्ष उसके कुटीर उद्योगों में निहित है।” संक्षेप में, निम्नलिखित तथ्यों से कुटीर तथा लघु उद्योगों का महत्त्व स्वयमेव ही स्पष्ट हो जाता है
1. रोजगार के स्रोत– भारत में इन उद्योग-धन्धों से लगभग 2.25 करोड़ लोगों को रोजगार प्राप्त | होता है। अकेले हथकरघाउद्योग से ही 75 लाख व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त होता है।

2. आय व सम्पत्ति के सम वितरण में सहायक– कुटीर तथा लघु उद्योग पूँजी-प्रधान नहीं होते, जिससे पूँजी के संकेन्द्रण, आर्थिक सत्ता के केन्द्रीकरण तथा आर्थिक शोषण की प्रवृत्तियाँ उभर नहीं पातीं। इसके विपरीत, देश में स्वतः ही आय और सम्पत्ति के समान वितरण को प्रोत्साहन मिलता है।

3. अल्प पूँजी उद्योग- कुटीर तथा लघु उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था में इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हैं कि ये उद्योग श्रम-प्रधान (Labour Intensive) उद्योग हैं, पूँजी-प्रधान नहीं। कम पूँजी से ही इन उद्योगों की स्थापना हो जाती है।

4. कृषि में सहायक- भारत में कृषि की अल्प उत्पादकता का एक मूल कारण कृषि-भूमि पर जनसंख्या का अत्यधिक दबाव है, जिसके कारण खेतों में उत्पादन अनार्थिक होता चला जा रहा है।अत: कृषि-विकास के लिए यह आवश्यक है कि वहाँ से अतिरिक्त मानव-श्रम को हटाया जाए। यह कार्य लघु तथा कुटीर उद्योगों द्वारा ही सम्भव है। अतः देश में उद्योगों का विकास होना आवश्यक है।

5. विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्ति- बड़े उद्योगों में केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति पायी जाती है, जबकि इसके विपरीत, लघु तथा कुटीर उद्योग विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था की स्थापना करते हैं। आज के युग में विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था का विशेष महत्त्व है।

6. कम सामाजिक लागत पर आर्थिक विकास– सामाजिक लागत से हमारा आशय उस व्यय से है, जो उत्पादन प्राप्त करने के लिए शेष समाज को करना पड़ता है। नगरों में सार्वजनिक स्वास्थ्य, जल, आवास तथा अन्य सुविधाओं पर किया जाने वाला व्यय इस मद के अन्तर्गत आता है। लघु तथा कुटीर उद्योग मुख्यत: गाँवों तथा छोटे नगरों में स्थापित किए जाते हैं। अत: इनकी सामाजिक लागत कम आती है।

7. अन्य लाभ-

  1.  ये उद्योग राष्ट्रीय आत्म-सम्मान के सर्वथा अनुकूल हैं क्योंकि इनमें प्रायः विदेशी पूँजी, श्रम अथवा कौशल आदि की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  2. इन उद्योगों को उपभोक्ताओं की रुचि के अनुसार समायोजित किया जा सकता है।
  3. ये उद्योग औद्योगिक अशान्ति, हड़ताल, तालाबन्दी आदि से मुक्त रहते हैं और सहानुभूति, समानता, सहकारिता, एकता तथा सहयोग की भावना को जन्म देते हैं।
  4. ये उद्योग विदेशी विनिमय अर्जित करने में अत्यन्त सहायक सिद्ध हुए हैं।
  5. इन उद्योगों को चलाने के लिए विशेष शिक्षा तथा प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती।
  6. कुटीर तथा लघु उद्योगों का माल अधिक टिकाऊ तथा कलात्मक होता है।
  7. ये उद्योग बड़े पैमाने के पूरक उद्योगों के रूप में विशेष उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
  8. ये उद्योग कृषकों के लिए वरदान हैं क्योंकि ये उन्हें मौसमी रोजगार प्रदान करते हैं।
  9. इन उद्योगों में बड़े उद्योगों की अपेक्षा कहीं अधिक स्थिरता तथा सुरक्षा पायी जाती है।
  10. मानवीय मूल्यों की दृष्टि से भी इन उद्योगों का विशेष महत्त्व है। ये उद्योग सामाजिक न्याय
    तथा आर्थिक सन्तोष के साथ-साथ समाज में अनुशासन बनाए रखते हैं। श्री बैकुण्ठ मेहता का मत है-“बाल-अपराध तथा दरिद्रता आदि के उन्मूलन के लिए लघु तथा कुटीर उद्योगों के विकास को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है।

प्रश्न 18.
बाजार यन्त्र से क्या आशय है? बाजार यन्त्र की विफलताओं की विवेचना कीजिए। ऐसी दशा में राज्य की क्या भूमिका होनी चाहिए?
उत्तर

बाजार यन्त्र का अर्थ

बाजारे यन्त्र एक स्वतन्त्र अर्थव्यवस्था से सम्बन्धित अवधारणा है। यह आर्थिक संगठन की एक ऐसी प्रणाली है जिसके अन्तर्गत प्रत्ये व्यक्ति-उपभोक्ता, उत्पादक और उत्पत्ति के साधनों के स्वामी के रूप में पूर्ण स्वतंत्रता के साथ आर्थिक क्रियाओं को सम्पन्न करता है। प्रत्येक उपभोक्ता अपने लिए उपभोक्ता वस्तुओं के चुनाव में, प्रत्येक उत्पादक उत्पादन क्षेत्र के चुनाव में तथा प्रत्येक व्यवसयी अपना व्यवसाय चुनने में पूर्णतः स्वतन्त्र रहता है और प्रत्येक उत्पादक परस्पर लाभ के आधार पर माँग एवं पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों के द्वारा निर्धारित कीमतों पर इच्छित मात्रा में क्रय-विक्रय कर सकता है, बजार यन्त्र का प्रमुख कार्य वस्तुओं व सेवाओं की माँग व पूर्ति में सन्तुलन स्थापित करते हुए उत्पादन क्षमता व प्रदा को अधिकतम करना है।

बाजार यन्त्र की असफलता

बाजार यन्त्र पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में ही स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करता है, तभी साधनों का विवेकपूर्ण आवंटन सम्भव होता है। उत्पादक वर्ग उपभोक्ताओं की प्राथमिकताओं एवं रुचियों को बाजार यन्त्र के माध्यम से ही जान पाता है और समाज में उसी के आधार पर उत्पादन की मात्रा और उसका स्वरूप निर्धारित करता है। इसी आधार पर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में कीमतें प्रतियोगितात्मक होती हैं और बाजार यन्त्र स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करता है। ऐसी दशा में साधनों का बँटवारा विवेकपूर्ण होता है और इस प्रकार बाजार यन्त्र अर्थव्यवस्था के संचालक का कार्य करता है। किन्तु बाजार यन्त्र का कार्यकरणे पूर्ण प्रतियोगिता वाले बाजर में ही सम्भव है। पूर्ण प्रतियोगिता एक आदर्श बाजार स्थिति है जो व्यवहार में कहीं नहीं पायी जाती। वास्तविकता यह है कि प्रत्येक बाजार में अपूर्णताएँ पायी जाती हैं जिसके कारण बाजार व्यवस्था का संचालन दोषपूर्ण हो जाता है। बाजार व्यवस्था के असफल रहने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

  1. बाजार में अल्पाधिकार या एकाधिकार की स्थिति को पाया जाना।
  2. बाह्यताओं (Externalities) के कारण लागत व लाभ में अनैच्छिक वृद्धि।
  3. पैमाने के वर्द्धमान प्रतिफल (Increasing Returns to Scale) को लागू होना।
  4. बीमा व भावी बाजार में अपूर्णता का पाया जाना।
  5. समायोजन की प्रक्रिया का धीमी गति से सम्पन्न होना।
  6. विपणन संस्थाओं में लचीलेपन का अभाव।
  7. उपभोक्ताओं व व्यवसायियों में उत्पादों, उत्पादों की कीमतों व उत्पाद सम्भावनाओं के विषय में गलत सूचना।
  8. व्यक्तियों का केवल ‘आर्थिक’ न बने रहना, उन पर परिवार, देशप्रेम, भक्ति आदि भावनाओं का प्रभाव।
  9. कार्यकुशलता का ह्रास।
  10. अधिकतम करने में तटस्थता।

राज्य की भूमिका

बाजार के उपर्युक्त दोषों के कारण बाजार यन्त्र के स्वतन्त्र कार्यकरण में बाधा पड़ी है। अत: अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। आधुनिक युग में सरकार अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य करने लगी है; जैसे-आन्तरिक सुशासन, न्याय एवं व्यवस्था, बाह्य आक्रमणों से सुरक्षा, सार्वजनिक निर्माण कार्य, खोज एवं अनुसन्धान, अनुदान एवं आर्थिक सहायता आदि। इस प्रकार आर्थिक क्षेत्र में सरकार की भूमिका अत्यधिक महत्त्वपूर्ण एवं व्यापक हो गई है।
सरकार के प्रमुख आर्थिक कार्य तीन हैं

  1. प्रतियोगिता को प्रोत्साहित करके, पर्यावरणीय प्रदूषण को कम करते हुए, सार्वजनिक वस्तुओं का निर्माण करके सरकार कार्य दक्षिता में वृद्धि करती है।
  2. सार्वजनिक आगम एवं सार्वजनिक व्यय कार्यक्रमों द्वारा आय का पुनर्वितरण करके सरकार आर्थिक असमानताओं को कम करती है।
  3. राजकोषीय, मौद्रिक, आय एवं कीमत नीति द्वारा बेरोजगारी तथा मुद्रास्फीति को कम करके सरकार स्थायित्व के साथ विकास’ (Growth with Stability) के लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करती है।

योजनाकाल में सरकार भी बचतकर्ता के रूप में पूर्णतः असफल रही। राजकोषीय घाटा बढ़ता रहा और साथ ही लोक व्यय भी। लोक व्यय में अनुत्पादक व्यय की राशि अधिक रही। दूसरे, सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार होता रहा। इसके फलस्वरूप आन्तरिक ऋण में वृद्धि हुई और अर्थव्यवस्था ऋण-जाल में फँस गई। अतः 1980 के दशक में सरकार की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन किया जाने लगा और सरकार की असफलताएँ उजागर होने लगीं। जो परिणाम सामने आए, वे थे–विकास की धीमी गति, बचत दर में गिरावट, मुद्रास्फीति की ऊँची दर ऋणों में तीव्र वृद्धि, निर्धनता एवं बेरोजगारी की व्यापकता आदि। अतः राजनीति बदलकर हस्तक्षेपवादी बन गई। इसमें आयात प्रतिस्थापन पर बल दिया गया, आयातों पर संरक्षण शुल्क लगाए गए, सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका बढ़ाई गई और निजी क्षेत्र को नियमित एवं नियन्त्रित किया गया।
एक ओर केन्द्रीय योजना तथा दूसरी ओर निजी स्वामित्व–इस प्रकार अर्थव्यवस्था का स्वरूप मिश्रित हुआ। धीरे-धीरे निजीकरण, उदारीकरण एवं भूमण्डलीकरण के रूप में आर्थिक सुधार किए गए, नियमनों एवं नियन्त्रणों को ढीला किया गया, साधनों के आवंटन के लिए बाजार यन्त्र को स्वीकार किया जाने लगा और प्रतियोगिता की लाभदायक भूमिका को स्वीकार किया गया। बाजार की असफलताओं को दूर करने, सामाजिक न्याय को पाने और आय के पुनर्वितरण द्वारा आर्थिक असमानताओं को कम करने पर बल दिया गया।

प्रश्न 19.
भारत की औद्योगिक नीति, 1956 की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
सन् 1948 में औद्योगिक नीति की घोषणा के बाद देश के राजनीतिक, आर्थिक तथा दार्शनिक चिन्तन में अनेक परिवर्तन आए। परिणामस्वरूप 30 अप्रैल, 1956 को नई औद्योगिक नीति की घोषणा की गई। इसकी प्रमुख विशेषताएँ, निम्नलिखित थीं
1. उद्योगों का त्रिवर्गीय विभाजन– इस नीति के अन्तर्गत समस्त उद्योगों को तीन समूहों में विभाजित किया गया-

  • प्रथम समूह में वे उद्योग हैं, जो पूर्ण-रूप से राज्य के एकाधिकार में रहेंगे। इस सूची में 17 महत्त्वपूर्ण उद्योग हैं; जैसे-हथियार, गोला-बारूद और रक्षा सम्बन्धी अन्य सामग्री, परमाणु शक्ति, लोहा व इस्पात, लौह-इस्पात की भारी मशीनें, उद्योगों के लिए भारी संयन्त्र, खनिज तेल, लोहा, मैंगनीज, जिप्सम, गन्धक, सोना व हीरों का खनन, वायु तथा रेल परिवहन आदि।
  • द्वितीय समूह में वे उद्योग हैं, जिनके विकास में सरकार उत्तरोत्तर अधिक भाग लेगी। इस सूची में 12 उद्योग शामिल हैं। इसे हम मिश्रित क्षेत्र भी कह सकते हैं, इस वर्ग में छोटे खनिजों को छोड़कर अन्य खनिज, ऐलुमिनियम तथा अलौह धातुएँ, मशीनरी औजार, जीवन निरोधक तथा अन्य दवाएँ, उर्वरक, कृत्रिम रबड़, सड़क परिवहन आदि उद्योग शामिल हैं।
  • तृतीय समूह में शेष सभी उद्योगों को रखा गया है। इस श्रेणी में लगभग सभी उपभोक्ता उद्योग की जाते हैं। सरकार इन उद्योगों के विकास के लिए आवश्यक वित्तीय तथा अन्य सुविधाएँ प्रदान करेगी।

2. कुटीर तथा लघु उद्योग- सरकार कुटीर उद्योगों के विकास के लिए हर सम्भव सहायता देगी। सहायता कार्यक्रमों में इनकी वित्तीय तथा प्राविधिक कठिनाइयों का निवारण, औद्योगिक बस्तियों का विस्तार, ग्रामीण क्षेत्र में कार्यशालाओं की स्थापना, विद्युत सुविधाओं का विस्तार, औद्योगिक सहकारी समितियों का गठन, प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता आदि को शामिल किया गया।

3. निजी क्षेत्र का दायित्व– निजी क्षेत्र योजना आयोग द्वारा निर्धारित आर्थिक नीतियों तथा कार्यक्रमों के अनुसार कार्य करेगा और सरकार निजी क्षेत्र को बिना किसी भेदभाव के सहायता प्रदान करेगी।

अन्य प्रावधान

  1. सरकार भी औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर विशेष ध्यान देगी।
  2. औद्योगिक शान्ति स्थापित करने के लिए सरकार श्रम को प्रबन्ध में उचित स्थान प्रदान करेगी और उनकी कार्य की दशाओं में सुधार करेगी।
  3. सरकार विदेशी पूँजी को आमन्त्रित करेगी तथा विदेशी पूँजी व स्वदेशी पूँजी में भेदभाव नहीं करेगी।
  4. नए-नए प्रशिक्षण कार्यक्रम लागू किए जाएँगे।
  5. भारी एवं आधारभूत उद्योगों की स्थापना की जाएगी।
  6. देश के सभी वर्गों का समर्थन व सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया जाएगा।

प्रश्न 20.
वर्तमान औद्योगिक नीति, 1991 की मुख्य बातें बताइए।
उत्तर
सभी पूर्व औद्योगिक नीतियाँ देश के औद्योगिक विकास को गति नहीं दे सकीं। अतः उद्योगों पर लाइसेन्सिग व्यवस्था के अनावश्यक प्रतिबन्धों को समाप्त करने तथा उद्योगों की कुशलता, विकास और तकनीकी स्तर को ऊँचा करने और विश्व बाजार में उन्हें प्रतियोगी बनाने की दृष्टि से 24 जुलाई, 1991 को तत्कालीन उद्यो: राज्यमन्त्री पी० जे० कुरियन द्वारा लोकसभा में औद्योगिक नीति, 1991 की घोषणा की गई। 
औद्योगिक नीति, 1991 की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(अ) नीतिगत विशेषताएँ

1. उदार औद्योगिक लाइसेन्सिग नीति– इस नीति के अन्तर्गत केवल 18 उद्योगों को छोड़कर अन्य सभी उद्योगों के लिए लाइसेन्सिग व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। इन उद्योगों में कोयला, पेट्रोलियम, चीनी, चमड़ा, मोटरकार, बसें, कागज तथा अखबारी कागज, रक्षा उपकरण, औषध तथा भेषज शामिल हैं। वर्तमान में इनकी संख्या 6 रह गई।

2. विदेशी विनियोग को प्रोत्साहन- अधिकाधिक पूँजी विनियोग और उच्चस्तरीय तकनीक की आवश्यकता वाले उच्च प्राथमिकता प्राप्त उद्योगों में विदेशी पूँजी विनियोग को प्रोत्साहित करने पर बल दिया गया। ऐसे 34 उद्योगों में बिना किसी रोक-टोक तथा लालफीताशाही के 51% तक विदेशी पूँजी के विनियोग की अनुमति दी जाएगी।

3. विदेशी तकनीक- कुछ निश्चित सीमाओं के अन्तर्गत उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में तकनीकी समझौतों को स्वतः स्वीकृति प्रदान की जाएगी। यह व्यवस्था घरेलू बिक्री पर दिए जाने वाले 5%कमीशन और निर्यात पर दिए जाने वाले 8% कमीशन पर भी लागू होगी।

4. सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका- ऐसे सार्वजनिक उपक्रमों को अधिक सहायता प्रदान की जाएगी जो औद्योगिक अर्थव्यवस्था के संचालन के लिए आवश्यक हैं। वर्तमान में सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या 3 है।

(ब) प्रक्रियात्मक विशेषताएँ

1. विद्यमान पंजीकरण योजनाओं की समाप्ति– औद्योगिक इकाइयों के पंजीयन के सम्बन्ध में विद्यमान सभी योजनाएँ समाप्त कर दी गई हैं।

2. स्थानीकरण नीति- ऐसे उद्योगों को छोड़कर, जिनके लिए लाइसेन्स लेना अनिवार्य नहीं है, 10 लाख से कम जनसंख्या वाले नगरों में किसी भी उद्योग के लिए औद्योगिक अनुमति की आवश्यकता नहीं है।

3. विदेशों से पूँजीगत वस्तुओं का आयात– विदेशी पूँजी के विनियोग वाली इकाइयों पर पुर्जे, कच्चे माल सृथा तकनीकी ज्ञान के आयात के मामले में सामान्य नियम लागू होंगे, किन्तु रिजर्व बैंक विदेशों में भेज़े गए लाभांश पर दृष्टि रखेगा।

4. व्यापारिक कम्पनियों में विदेशी अंश पूँजी– अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को बढ़ाने की दृष्टि से निर्यातक व्यापारिक कम्पनियों में भी 51% तक विदेशी पूँजी के विनियोग की अनुमति दी जाएगी।

5. सार्वजनिक उपक्रमों का कार्यकरण– निरन्तर वित्तीय संकट में रहने वाले सार्वजनिक उपक्रमों की जाँच औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (BIFR) करेगा। छंटनी किए गए कर्मचारियों के पुनर्वास के लिए सामाजिक सुरक्षा योजना बनाई जाएगी।

6. विद्यमान इकाइयों का विस्तार एवं विविधीकरण- विद्यमान औद्योगिक इकाइयों को नई विस्तृत पट्टी की सुविधा दी गई है। विद्यमान इकाइयों का विस्तार भी पंजीयन से मुक्त रहेगा।

अन्य विशेषताएँ 

  1. 26 मार्च, 1993 से उन 13 खनिजों को जो पहले सरकारी क्षेत्र के लिए आरक्षित थे, निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया है।
  2. आरम्भ में ही कम्पनियों में रुग्णता का पता लगाने और उपचारात्मक उपायों को तेजी से लागू करने के लिए दिसम्बर, 1993 में रुग्ण औद्योगिक कम्पनी (विशेष उपबन्ध) अधिनियम, 1985 में संशोधन किया गया।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य-साहित्यका विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name गद्य-साहित्यका विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Number of Questions 154
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य-साहित्यका विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
गद्य एवं पद्य का अन्तर दो पंक्तियों में लिखिए।
उत्तर:
वाक्यबद्ध विचारात्मक रचना को गद्य कहते हैं। दैनिक जीवन की बोलचाल में गद्य का ही प्रयोग होता है, जब कि छन्दबद्ध, भावपूर्ण और गेय रचनाएँ पद्य कहलाती हैं।

प्रश्न 2:
हिन्दी की आठ बोलियाँ कौन-कौन-सी हैं?
उत्तर:

  1. ब्रज,
  2. अवधी,
  3. बुन्देली,
  4. बघेली,
  5. छत्तीसगढ़ी,
  6. हरियाणवी,
  7. कन्नौजी तथा
  8.  खड़ी बोली।

प्रश्न 3:
हिन्दी गद्य के प्राचीनतम प्रयोग किन भाषाओं में मिलते हैं?
उत्तर:
हिन्दी गद्य के प्राचीनतम प्रयोग राजस्थानी और ब्रज भाषाओं में मिलते हैं।

प्रश्न 4:
प्राचीन ब्रज भाषा गद्य की दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
गोकुलनाथ कृत ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ और बैकुण्ठमणि कृत ‘अगहन माहात्म्य’; प्राचीन ब्रज भाषा गद्य की रचनाएँ हैं।

प्रश्न 5:
खड़ी बोली गद्य की प्रथम प्रामाणिक रचना तथा उसके लेखक का नाम व समय लिखिए।
या
खड़ी बोली गद्य की प्रामाणिक रचनाएँ कब से प्राप्त होती हैं?
उत्तर:
रचनागोरा बादल की कथा। लेखक – जटमल।
समयसन् 1623 ई० (सत्तरहवीं शताब्दी से)।

प्रश्न 6:
खड़ी बोली गद्य की सबसे प्राचीन रचना कौन-सी है?
उत्तर:
खड़ी बोली गद्य की सबसे प्राचीन रचना कवि गंग द्वारा लिखित ‘चंद छंद बनने की महिमा है।

प्रश्न 7:
खड़ी बोली गद्य के दो प्रारम्भिक उन्नायकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
खड़ी बोली गद्य के दो प्रारम्भिक उन्नायक हैं

  1.  सदल मिश्र तथा
  2.  पं० लल्लूलाल।

प्रश्न 8:
भारतेन्दु से पूर्व हिन्दी गद्य के चार प्रवर्तकों और उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
या
कलकत्ता स्थित फोर्ट विलियम कॉलेज के उन दो हिन्दी-शिक्षकों के नाम लिखिए, जिन्हें खड़ी बोली गद्य का प्रारम्भिक उन्नायक माना जाता है।
या
लल्लूलाल किस कॉलेज में हिन्दी-अध्यापक थे? उनकी प्रसिद्ध रचना का नाम लिखिए।
या
खड़ी बोली के प्रारम्भिक उन्नायकों में विशेष रूप से जिन चार लेखकों का उल्लेख किया जाती है, उनमें से किन्हीं दो की एक-एक रचना का नाम लिखिए।
या
नासिकेतोपाख्यान’ के रचयिता कौन हैं? फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना कहाँ हुई थी?
उत्तर:
भारतेन्दु से पूर्व हिन्दी गद्य के चार प्रवर्तकों के नाम निम्नलिखित हैं

  1.  इंशाअल्ला खाँ-रानी केतकी की कहानी।
  2. सदासुखलाल सुखसागर।।
  3.  लल्लूलाल-प्रेमसागर।
  4. सदल मिश्र – नासिकेतोपाख्यान।

इनमें सदल मिश्र तथा लल्लूलाल कलकत्ता के ‘फोर्ट विलियम कॉलेज में अध्यापक थे।

प्रश्न 9:
भारतेन्दु युग से पूर्व किन दो राजाओं ने हिन्दी गद्य के निर्माण में योग दिया?
या
हिन्दी गद्य की उर्दूप्रधान तथा संस्कृतप्रधान शैलियों के पक्षधर दो राजाओं के नाम लिखिए।
या
भारतेन्दु के उदय से पूर्व की खड़ी बोली के दो भिन्न शैलीकार गद्य-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
भारतेन्दु युग से पूर्व राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द’ ने अरबी-फारसी मिश्रित हिन्दी लिखकर तथा राजा लक्ष्मण सिंह ने संस्कृत मिश्रित खड़ी बोली को अपनाकर हिन्दी गद्य के निर्माण में योगदान दिया।

प्रश्न 10:
हिन्दी गद्य के विकास में ईसाई धर्म-प्रचारकों के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
ईसाई पादरियों ने ईसाई धर्म के प्रचार के लिए ‘बाइबिल’ एवं अन्य धार्मिक पुस्तकों का साधारण बोलचाल की हिन्दी में अनुवाद करवाया।

प्रश्न 11:
भारतीय जागरण को देशव्यापी बनाने में किन संस्थाओं ने विशेष योगदान दिया?
उत्तर:

  1. आर्य समाज,
  2.  प्रार्थना समाज,
  3.  ब्रह्म समाज,
  4.  रामकृष्ण मिशन एवं
  5. थियोसॉफिकल सोसाइटी।।

प्रश्न 12:
मुंशी सदासुखलाल की भाषा की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1. भाषा में अस्पष्टता अधिक है तथा
  2.  वाक्य-रचना पर फारसी शैली का प्रभाव है।

प्रश्न 13:
भारतेन्दु युग के किन्हीं दो लेखकों की दो-दो कृतियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
(1) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

  •  वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति तथा
  • अकबर और औरंगजेब।

(2) प्रतापनारायण मिश्र

  • (i) हठी हम्मीर तथा
  • (ii) देशी कपड़ा।

प्रश्न 14:
भारतेन्दु के समकालीन या भारतेन्दु युग के चार गद्य लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. पं० बालकृष्ण भट्ट,
  2. प्रतापनारायण मिश्र,
  3.  किशोरीलाल गोस्वामी;
  4.  लाला श्रीनिवास दास।

प्रश्न 15:
खड़ी बोली गद्य का व्यवस्थित विकास कब हुआ?
या
हिन्दी गद्य का विकास कब हुआ?
उत्तर:
भारतेन्दु युग में खड़ी बोली गद्य का व्यवस्थित विकास हुआ।

प्रश्न 16:
भारतेन्दु युग की दो पत्रिकाओं एवं उनके सम्पादकों के नाम लिखिए।
या
भारतेन्दु युग की दो प्रसिद्ध पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  ब्राह्मण’-प्रतापनारायण मिश्र,
  2.  हिन्दी प्रदीप’-पं० बालकृष्ण भट्ट्ट।

प्रश्न 17:
भारतेन्दु युग के गद्य की मुख्य विशेषताएँ बताइट।
उत्तर:
भारतेन्दु युग के गद्य की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं

  1.  भारतेन्दु युग का गद्य सरल-सरस है,
  2.  इसमें मुहावरों और लोकोक्तियों का अधिक प्रयोग हुआ है,
  3. इसमें तत्सम शब्दों के साथ-साथ उर्दू, फारसी एवं अंग्रेजी के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है,
  4.  इसमें व्याकरण की त्रुटियाँ हैं।

प्रश्न 18:
भारतेन्दु युग में किन गद्य-विधाओं का विकास हुआ?
उत्तर:
भारतेन्दु युग में नाटक, कहानी, उपन्यास एवं निबन्ध गद्य-विधाओं का विकास हुआ।

प्रश्न 19:
हिन्दी खड़ी बोली गद्य-साहित्य के विकास में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का योगदान बताइए।
या
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के गद्य की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने लोक-प्रचलित शब्दावली, कहावतों, लोकोक्तियों और मुहावरों के प्रभावपूर्ण प्रयोग से अपनी भाषा को अधिकाधिक सशक्त एवं सजीव बनाया तथा नाटक, कहानी, निबन्ध आदि अनेक गद्य-विधाओं में रचनाएँ कीं। इसलिए इन्हें ‘हिन्दी खड़ी बोली गद्य का जनक’ भी कहा जाता है।

प्रश्न 20:
द्विवेदी युग के दो प्रमुख लेखकों की एक-एक रचना का नाम लिखिए।
या
द्विवेदी युग के दो प्रसिद्ध निबन्धकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. बाबू श्यामसुन्दर दास साहित्यालोचन।
  2. आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी – रसज्ञ- रंजन।

प्रश्न 21:
द्विवेदी युग में प्रकाशित चार पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. सरस्वती,
  2. मर्यादा,
  3.  माधुरी तथा
  4.  इन्दु।

प्रश्न 22:
द्विवेदी युग का समय बताइए और उस व्यक्ति का पूरा नाम बताइए, जिसके कारण इसे ‘द्विवेदी युग’ कहा जाता है।
उत्तर:
द्विवेदी युग का समय सन् 1900 ई० से 1920 ई० तक है। इस युग को आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के नाम पर द्विवेदी युग’ कहा जाता है।

प्रश्न 23:
द्विवेदी युग के हिन्दी गद्य की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
द्विवेदी युग का हिन्दी गद्य व्याकरण-सम्मत, परिमार्जित तथा पद-विन्यास व वाक्य-विन्यास से युक्त है। इसमें औदात्य, पाण्डित्य एवं प्रवाह है। इसकी भाषा-शैली अत्यन्त परिष्कृत, सामासिक तथा प्रवाहपूर्ण है।

प्रश्न 24:
‘शुक्ल युग’ को यह नाम क्यों दिया गया है?
या
हिन्दी-काव्य के ‘छायावाद युग के समय को हिन्दी गद्य-साहित्य में शुक्ल युग’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
सन् 1919 ई० से 1938 ई० तक के काल को हिन्दी गद्य-साहित्य में पं० रामचन्द्र शुक्ल के महत्त्वपूर्ण योगदान के कारण ‘शुक्ल युग’ अथवा ‘छायावाद युग’ के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 25:
आलोचना, नाटक, उपन्यास एवं कहानी के क्षेत्र में प्रसिद्ध शुक्ल युग के तीन गद्य-रचनाकारों के नाम बताइट।
उत्तर:
शुक्ल युग के तीन प्रमुख गद्य-रचनाकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, जयशंकर प्रसाद और प्रेमचन्द हैं, जो क्रमशः आलोचना, नाटक, उपन्यास एवं कहानी के क्षेत्र में प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 26:
शुक्ल युग के प्रमुख गद्यकारों के नाम बताइए।
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद, रामचन्द्र शुक्ल, बाबू गुलाबराय, नन्ददुलारे वाजपेयी, महादेवी वर्मा, राय कृष्णदास, हजारीप्रसाद द्विवेदी आदि शुक्ल युग के प्रमुख गद्यकार हैं।

प्रश्न 27:
‘शुक्ल युग’ को अन्य किन नामों से जाना जाता है?
उत्तर:
शुक्ल युग को ‘छायावाद युग’, ‘प्रसाद युग’ एवं ‘प्रेमचन्दयुग’ नामों से जाना जाता है।

प्रश्न 28:
छायावाद युग के किन्हीं दो नाटकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  चन्द्रगुप्त तथा
  2.  अजातशत्रु।।

प्रश्न 29:
छायावाद युग में गद्य को समृद्ध करने वाले प्रमुख लेखकों एवं उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद (चन्द्रगुप्त), प्रेमचन्द (गबन, गोदान), बाबू गुलाबराय (मेरी असफलताएँ) तथा रामचन्द्र शुक्ल (चिन्तामणि) आदि छायावाद युग में गद्य को समृद्ध करने वाले प्रमुख लेखक हैं।

प्रश्न 30:
छायावादयुगीन किन्हीं दो ऐसे गद्य-लेखकों के नाम बताइट जो कवि न हों।
उत्तर:
छायावादयुगीन गद्य-लेखक राहुल सांकृत्यायन एवं बाबू गुलाबराय कवि नहीं थे।

प्रश्न 31:
ऐसे तीन गद्य-लेखकों के नाम लिखिए, जिन्होंने द्विवेदी युग तथा छायावाद युग दोनों में लेखन-कार्य किया।
उत्तर:
द्विवेदी युग और छायावाद युग दोनों में लेखन कार्य करने वाले तीन गद्य-लेखक निम्नलिखित हैं

  1.  आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,
  2. बाबू गुलाबराय तथा
  3. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी।

प्रश्न 32:
छायावादी युग के गद्य की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  1. छायावादी युग का गद्य कलात्मक है तथा
  2.  उसमें विशिष्ट अभिव्यंजना शक्ति, कल्पना की प्रधानता, स्वच्छन्द चेतना, अनुभूति की सघनता और भावुकता विद्यमान है।

प्रश्न 33:
किन्हीं दो छायावादी पद्य-लेखकों की एक-एक गद्य रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  जयशंकर प्रसाद – चन्द्रगुप्त (नाटक)।
  2. ( महादेवी वर्मा – स्मृति की रेखाएँ (संस्मरण)।

प्रश्न 34:
छायावादोत्तर युग की प्रमुख गद्य-विधाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
नाटक, कहानी, उपन्यास, समालोचना, जीवनी, गद्य-गीत, एकांकी, आत्मकथा, रिपोर्ताज, यात्रावृत्त, संस्मरण एवं रेखाचित्र आदि छायावादोत्तर युग की प्रमुख गद्य-विधाएँ हैं।

प्रश्न 35:
छायावादोत्तर युग का प्रारम्भ कब से माना जाता है?
उत्तर:
छायावादोत्तर (शुक्लोत्तर) युग का प्रारम्भ सन् 1938 ई० से और समापन सन् 1947 ई० तक माना जाता है।

प्रश्न 36:
छायावादोत्तर युग के प्रमुख गद्य-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, हरिशंकर परेसाई, यशपाल, रामवृक्ष बेनीपुरी, धर्मवीर भारती, विद्यानिवास मिश्र, कमलेश्वर आदि छायावादोत्तर युग के प्रमुख गद्य-लेखक हैं।

प्रश्न 37:
छायावादोत्तर हिन्दी गद्य (प्रगतिवादी गद्य) की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
छायावादोत्तर काल का हिन्दी गद्य सहज, व्यावहारिक और अलंकारविहीन था। उसमें भावुकतापूर्ण अभिव्यक्ति का स्थान चुटीली उक्तियों ने ले लिया था।

प्रश्न 38:
छायावादोत्तर युग के दो कहानी लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. जैनेन्द्र कुमार तथा
  2. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।

प्रश्न 39:
छायावादोत्तर युग के दो लेखकों की एक-एक गद्य-रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  रामधारी सिंह ‘दिनकर’ – अर्द्धनारीश्वर।
  2. धर्मवीर भारती – गुनाहों के देवता।

प्रश्न 40:
छायावादोत्तरयुगीन साहित्यकारों की दोनों पीढ़ियों के एक-एक साहित्यकार का नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  पहली पीढ़ी – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।
  2. दूसरी पीढ़ी – डॉ० विद्यानिवास मिश्र।।

प्रश्न 41:
छायावादोत्तर युग में प्रारम्भ एवं समृद्ध होने वाली प्रकीर्ण गद्य-विधाओं में से किन्हीं दो विधाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
जीवनी, आत्मकथा, यात्रावृत्त, गद्यकाव्य, संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, डायरी, भेटवार्ता, पत्र-साहित्य आदि हिन्दी की गौण या प्रकीर्ण गद्य-विधाएँ हैं।

प्रश्न 42:
स्वातन्त्र्योत्तर युग के प्रमुख गद्य-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
स्वातन्त्र्योत्तर युग में विद्यानिवास मिश्र, हरिशंकर परसाई, फणीश्वरनाथ रेणु’, धर्मवीर भारती, प्रभाकर माचवे, रजनी पणिक्कर, मोहन राकेश, मन्नू भण्डारी, शिवानी, नागार्जुन आदि प्रमुख गद्य-लेखक हुए।

प्रश्न 43:
हिन्दी गद्य की प्रमुख विधाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
निबन्ध, नाटक, कहानी, उपन्यास, ‘एकांकी तथा आलोचना हिन्दी गद्य की प्रमुख विधाएँ हैं।

प्रश्न 44:
हिन्दी गद्य की विविध विधाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  नाटक,
  2. उपन्यास,
  3.  एकांकी,
  4. कहानी,
  5. निबन्ध,
  6. आलोचना,
  7. आत्मकथा,
  8.  जीवनी,
  9. यात्रावृत्त,
  10.  रेखाचित्र,
  11. संस्मरण,
  12.  गद्यकाव्य,
  13. रिपोर्ताज,
  14.  डायरी,
  15. रेडियो-रूपक,
  16.  भेटवार्ता आदि।

प्रश्न 45:
प्रकीर्ण गद्य-विधाओं का अभूतपूर्व विकास किस युग में हुआ?
उत्तर:
प्रकीर्ण गद्य – विधाओं का अभूतपूर्व विकास छायावादोत्तर युग में हुआ।

प्रश्न 46:
(i) भारतेन्दु युग के निबन्धकारों के नाम लिखिए।
(i) द्विवेदी युग के निबन्धकारों के नाम लिखिए।
(iii) रामचन्द्र शुक्ल और उनके बाद शुक्लोत्तर युग के दो प्रमुख निबन्धकारों के नाम लिखिए।
(iv) स्वातन्त्र्योत्तर युग के दो निबन्धकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(i) भारतेन्दु युग – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट।
(ii) द्विवेदी युग –  आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, पद्मसिंह शर्मा, सरदार पूर्णसिंह।
(iii) शुक्ल युग – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, गुलाबराय, पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।
शुक्लोत्तर युग – डॉ० नगेन्द्र, श्रीमती महादेवी वर्मा, वासुदेवशरण अग्रवाल।
(iv) स्वातन्त्र्योत्तर युग – विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय।

प्रश्न 47:
विषय और शैली की दृष्टि से निबन्ध के प्रमुख कितने भेद हैं? उनके नाम लिखिए।
उत्तर:
विषय और शैली की दृष्टि से निबन्ध के निम्नलिखित प्रमुख चार भेद हैं

  1.  विचारात्मक निबन्ध,
  2. भावात्मक निबन्ध,
  3.  वर्णनात्मक निबन्ध तथा
  4.  विवरणात्मक निबन्ध।

प्रश्न 48:
निबन्ध की परिभाषा लिखिए तथा उसके चार भेदों में से किसी एक का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
निबन्ध उस गद्य-रचना को कहते हैं, जिसमें एक सीमित आकार के अन्तर्गत किसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन; एक विशेष निजीपन, स्वच्छन्दता, सौष्ठव, सजीवता और सम्बद्धता के साथ किया गया हो। निबन्ध का एक भेद, वर्णनात्मक निबन्ध है।

प्रश्न 49:
हिन्दी में निबन्ध-रचना का आरम्भ किस युग में माना जाता है? दो युग-प्रवर्तक निबन्ध लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
हिन्दी में निबन्ध-रचना का आरम्भ भारतेन्दु युग से माना जाता है। हिन्दी के दो युग-प्रवर्तक निबन्धकार आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हैं।

प्रश्न 50:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने किस प्रकार के निबन्धों की रचना की?
उत्तर:
शुक्ल जी ने विचारप्रधान, समीक्षात्मक तथा मनोवैज्ञानिक निबन्धों की रचना की।

प्रश्न 51:
हिन्दी के प्रमुख भावात्मक निबन्धकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
हिन्दी के भावात्मक निबन्ध लिखने वालों में वियोगी हरि, सरदार पूर्णसिंह, राय कृष्णदास, रघुवीर सिंह, महादेवी वर्मा, रामवृक्ष बेनीपुरी तथा विद्यानिवास मिश्र प्रमुख हैं।

प्रश्न 52:
हिन्दी के दो युग-प्रवर्तक निबन्ध लेखकों और उनकी एक-एक निबन्ध पुस्तक के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  महावीर प्रसाद द्विवेदी – ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित निबन्ध।
  2. रामचन्द्र शुक्ल – चिन्तामणि (दो भागों में)।

प्रश्न 53:
प्रमुख ललित निबन्ध लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, धर्मवीर भारती, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, विद्यानिवास मिश्र आदि ललित निबन्धों के प्रमुख लेखक हैं।

प्रश्न 54:
कहानी के कौन-कौन से तत्त्व होते हैं?
उत्तर:
कहानी के सात तत्त्व होते हैं

  1.  शीर्षक,
  2.  कथावस्तु या कथानक,
  3. पात्र और चरित्र-चित्रण,
  4. कथोपकथन या संवाद,
  5. देशकाल या वातावरण,
  6. भाषा-शैली तथा
  7. उद्देश्य।

प्रश्न 55:
कहानी की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1.  लघु कथानक,
  2.  पात्र एवं चरित्र – चित्रण,
  3.  मुख्य रूप से एक ही विषय, भाव अथवा संवेदना का प्रस्तुतीकरण तथा
  4.  निश्चित उद्देश्य – कहानी की मुख्य विशेषताएँ हैं।

प्रश्न 56:
‘कहानी’ एवं ‘नयी कहानी में अन्तर बताइट।
उत्तर:
‘कहानी’ का व्यापक अर्थ नयी एवं पुरानी सभी प्रकार की कहानियों पर प्रभावी है, किन्तु कुछ विद्वान् ‘कहानी’ का अर्थ द्विवेदी युग की ‘आदर्शवादी’ कहानियों से लेते हैं, जिनमें रचनाकार आदर्श कल्पनाओं के आधार पर पात्रों का चरित्र रचते थे। द्विवेदी युग के बाद नयी कहानी’ का अर्थ यथार्थ एवं भोगे हुए सत्य को अभिव्यक्त करने वाली ऐसी कहानियों से लिया जाता है, जिनमें आदर्श की अपेक्षा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण पर बल दिया गया हो।

प्रश्न 57:
नयी कहानी की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर:
नयी कहानी जीवन के किसी मार्मिक तथ्य को नाटकीय प्रभाव के साथ व्यक्त करती है तथा उसमें यथार्थता एवं मनोवैज्ञानिकता होती है।

प्रश्न 58:
हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी का नाम बताइट।
उत्तर:
कहानी-कला की दृष्टि से किशोरीलाल गोस्वामी की ‘इन्दुमती’ हिन्दी-साहित्य की प्रथम मौलिक कहानी है।

प्रश्न 59:
द्विवेदी युग के किन्हीं दो प्रसिद्ध कहानीकारों के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. प्रेमचन्द तथा
  2. जयशंकर प्रसाद।

प्रश्न 60:
हिन्दी के प्रमुख कहानीकारों के नाम बताइट।
उत्तर:
मुंशी प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जैनेन्द्र कुमार, भगवतीचरण वर्मा, यशपाल, चतुरसेन शास्त्री, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’, शैलेश मटियानी, मन्नू भण्डारी, अज्ञेय आदि हिन्दी के प्रमुख कहानीकार हैं।

प्रश्न 61:
प्रेमचन्द जी की प्रमुख कहानियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
मन्त्र, ईदगाह, कफन, पंच परमेश्वर, पूस की रात, शतरंज के खिलाड़ी, नमक का दारोगा आदि प्रेमचन्द की प्रमुख कहानियाँ हैं। प्रश्न

प्रश्न 62:
जयशंकर प्रसाद की प्रमुख कहानियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
आकाशदीप, पुरस्कार, ममता, आँधी, इन्द्रजाल, छाया, प्रतिध्वनि, गुण्डा आदि जयशंकर प्रसाद की प्रमुख कहानियाँ हैं।

प्रश्न 63:
प्रेमचन्दोत्तर किन्हीं दो कहानीकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
प्रेमचन्दोत्तर कथाकारों में यशपाल एवं जैनेन्द्र प्रमुख हैं।

प्रश्न 64:
छायावादोत्तर युग के किन्हीं दो प्रसिद्ध कहानीकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा
  2.  हरिशंकर परसाई।

प्रश्न 65:
प्रेमचन्द्र के समकालीन कहानीकारों में से किन्हीं दो के नाम लिखिए।
उत्तर:
राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह एवं विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’ प्रेमचन्द के समकालीन कहानीकार थे। इनकी कहानियों में क्रमशः ‘कानों में कैंगना’ एवं ‘कलाकार का दण्ड’ लोकप्रिय हैं।।

प्रश्न 66:
आधुनिक युग की किन्हीं दो महिला कथाकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  मन्नू भण्डारी तथा
  2.  उषा प्रियंवदा।।

प्रश्न 67:
आधुनिक युग के किन्हीं दो कहानीकारों के नाम लिखिए।
या
प्रेमचन्द के बाद के किन्हीं दो प्रमुख कहानीकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
जैनेन्द्र कुमार, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा, विष्णु प्रभाकर, अमृतराय आदि आधुनिक युग के प्रसिद्ध कहानीकार हैं।

प्रश्न 68:
छायावादी युग के सबसे प्रसिद्ध कहानीकार का नाम लिखिए।
उत्तर:
छायावादी युग के सबसे प्रसिद्ध कहानीकार जयशंकर प्रसाद थे।

प्रश्न 69:
हिन्दी के कहानी लेखकों में से किन्हीं दो की एक-एक कहानी का नाम लिखिए।
उत्तर:
हिन्दी के कहानी लेखकों में प्रेमचन्द एवं जयशंकर प्रसाद की एक-एक कहानी क्रमशः ‘नमक का दारोगा’ एवं ‘पुरस्कार’ है।

प्रश्न 70:
हिन्दी उपन्यास के विकास में प्रेमचन्द के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रेमचन्द ने ही प्रथम बार उपन्यास साहित्य को चमत्कार, मनोरंजन और प्रचार के स्तर से उठाकर यथार्थ जीवन के सत्य के साथ जोड़ा। उनका मन भारतीय कृषकों के जीवन की विषमताओं का मर्मस्पर्शी चित्रण करने में अधिक रमा।

प्रश्न 71:
हिन्दी के प्रमुख उपन्यासकारों के नाम बताइट।
या।
हिन्दी के दो प्रसिद्ध उपन्यासकारों के नाम बताइट।
उत्तर:
प्रेमचन्द, भगवतीचरण वर्मा, वृन्दावनलाल वर्मा, यशपाल, जैनेन्द्र कुमार, चतुरसेन शास्त्री, सुदर्शन, इलाचन्द्र जोशी, फणीश्वरनाथ रेणु’, राजेन्द्र यादव, उदयशंकर भट्ट, देवेन्द्र सत्यार्थी आदि।

प्रश्न 72:
हिन्दी के प्रथम मौलिक उपन्यास एवं उसके लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर:
लाला श्रीनिवास दास द्वारा लिखित परीक्षा-गुरु’ नामक उपन्यास, हिन्दी का प्रथम मौलिक उपन्यास है।

प्रश्न 73:
द्विवेदी युग के दो प्रमुख उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
द्विवेदी युग के दो प्रमुख उपन्यासकार हैं

  1.  किशोरीलाल गोस्वामी तथा
  2. देवकीनन्दन खत्री।

प्रश्न 74:
प्रेमचन्द युग के दो उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  प्रेमचन्द तथा
  2.  पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’।

प्रश्न 75:
शी प्रेमचन्द के प्रमुख उपन्यासों के नाम लिखिए।
या
प्रेमचन्द के दो प्रसिद्ध उपन्यासों के नाम लिखिए।
उत्तर:
मुंशी प्रेमचन्द ने गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि, प्रेमाश्रम, सेवासदन, निर्मला आदि उपन्यासों की रचना की।

प्रश्न 76:
जयशंकर प्रसाद के दो उपन्यासों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कंकाल’ और ‘तितली’।

प्रश्न 77:
आधुनिक काल की दो महिला उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  शिवानी तथा
  2. उषा प्रियंवदा।

प्रश्न 78:
एक आंचलिक उपन्यास-उपन्यासकार का नाम लिखिए।
उत्तर:
फणीश्वरनाथ’रेणु’ द्वारा रचित ‘मैला आँचल’ तथा ‘परती परिकथा’ आंचलिक उपन्यास हैं।

प्रश्न 79:
प्रमुख आंचलिक उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
फणीश्वरनाथ रेणु’, रांगेय राघव, हिमांशु जोशी, नागार्जुन, अमृतलाल नागर, देवेन्द्र सत्यार्थी और शिवप्रसाद सिंह।

प्रश्न 80:
प्रेमचन्द के बाद आने वाले आधुनिक युग के प्रमुख उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, जैनेन्द्र कुमार, उपेन्द्रनाथ अश्क’, मोहन राकेश, इलाचन्द्र जोशी, डॉ० धर्मवीर भारती, अमृतलाल नागर, विष्णु प्रभाकर, रांगेय राघव, भगवतीचरण वर्मा आदि प्रेमचन्द के पश्चात् होने वाले प्रमुख उपन्यासकार हैं।

प्रश्न 81:
नाटक श्रव्य-काव्य है अथवा दृश्य-काव्य?
उत्तर:
नाटक दृश्य-काव्य है।

प्रश्न 82:
हिन्दी के प्रथम नाटक एवं उसके रचयिता का नाम लिखिए।
उत्तर:
गोपालचन्द्र गिरिधरदास द्वारा रचित ‘नहुष’ को हिन्दी का प्रथम नाटक माना जाता है।

प्रश्न 83:
हिन्दी के प्रमुख नाटककारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, जयशंकर प्रसाद, वृन्दावनलाल वर्मा, लक्ष्मीनारायण मिश्र, विष्णु प्रभाकर, सेठ गोविन्ददास, हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ आदि हिन्दी के प्रमुख नाटककार हैं।

प्रश्न 84:
जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध नाटकों के नाम लिखिए।
या
‘ध्रुवस्वामिनी’ किस विधा की रचना है?
उत्तर:
चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, राज्यश्री तथा अजातशत्रु-जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध नाटक हैं।

प्रश्न 85:
जयशंकर प्रसाद के नाटक किस विषय पर आधारित हैं?
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद के नाटकों में भारत के अतीत की गौरवपूर्ण संस्कृति, देशप्रेम, जीवन-जगत् की शाश्वत समस्याओं और मानव मन के अन्तर्द्वन्द्व का चित्रण है।

प्रश्न 86:
प्रसादोत्तर (छायावादोत्तर) युग के प्रमुख नाटककारों के नाम लिखिए।
या
आधुनिककाल के प्रमुख नाटककारों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. डॉ० रामकुमार वर्मा,
  2.  सेठ गोविन्ददास,
  3.  मोहन राकेश,
  4.  विष्णु प्रभाकर,
  5. उपेन्द्रनाथ अश्क’,
  6.  डॉ० लक्ष्मीनारायण लाल एवं
  7.  धर्मवीर भारती।

प्रश्न 87:
हिन्दी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटककार का नाम बताते हुए उसके दो नाटकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद छायावादी युग के एक ऐसे नाटककार हैं, जिन्होंने ऐतिहासिक नाटकों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, राज्यश्री, अजातशत्रु आदि इनके ऐतिहासिक नाटक हैं।

प्रश्न 88:
हिन्दी के ऐतिहासिक नाटककारों एवं उनकै एक-एक नाटक का नाम लिखिए।
या
हिन्दी के किसी प्रसिद्ध नाटककार एवं उसके द्वारा रचित नाटक का नाम बताए।
या
‘राजमुकुट के नाटककार कौन हैं?
उत्तर:
हिन्दी के ऐतिहासिक नाटककार और उनके एक-एक नाटक का नाम निम्नलिखित है

  1.  जयशंकर प्रसाद – चन्द्रगुप्त,
  2.  हरिकृष्ण प्रेमी – रक्षाबन्धन,
  3. गोविन्दवल्लभ पन्त – राजमुकुट,
  4.  सेठ गोविन्ददास – हर्ष,
  5.  वृन्दावनलाल वर्मा – झाँसी की रानी,
  6.  लक्ष्मीनारायण मिश्र – वत्सराज।

प्रश्न 89:
हिन्दी एकांकी का जनक किसे माना जाता है?
उत्तर:
हिन्दी एकांकी का आरम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ‘अँधेर नगरी’, ‘प्रेमयोगिनी’ आदि रचनाओं से हुआ; अत: भारतेन्दु जी ही हिन्दी एकांकी के जनक हैं, किन्तु आधुनिक हिन्दी एकांकी का जनक डॉ० रामकुमार वर्मा को माना जाता है।

प्रश्न 90:
हिन्दी के प्रमुख एकांकीकारों के नाम बताइए।
उत्तर:
डॉ० रामकुमार वर्मा, विष्णु प्रभाकर, सेठ गोविन्ददास, उपेन्द्रनाथ अश्क’, हरिकृष्ण ‘प्रेमी’, विनोद रस्तोगी, जगदीशचन्द्र माथुर, उदयशंकर भट्ट, प्रभाकर माचवे, गिरिजाकुमार माथुर आदि हिन्दी के प्रमुख एकांकीकार हैं।

प्रश्न 91:
छायावादोत्तर युग के किन्हीं दो एकांकीकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
डॉ० धर्मवीर भारती एवं डॉ० लक्ष्मीनारायण लाल छायावादोत्तर युग के प्रमुख एकांकीकार हैं।

प्रश्न 92:
आलोचना विधा के चार प्रमुख लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, नन्ददुलारे वाजपेयी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, श्यामसुन्दर दास तथा । डॉ० नगेन्द्र आलोचना विधा के प्रमुख लेखक हैं।।

प्रश्न 93:
द्विवेदी युग के प्रमुख आलोचना लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
द्विवेदी युग के प्रमुख आलोचना लेखकों में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, मिश्रबन्धु, बाबू श्यामसुन्दर दास, पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’, लाला भगवानदीन आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

प्रश्न 94:
शुक्लोत्तर युग के आलोचना लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
डॉ० रामकुमार वर्मा, डॉ० नगेन्द्र, डॉ० रामविलास शर्मा आदि शुक्लोत्तर युग के प्रसिद्ध आलोचना लेखक हैं।

प्रश्न 95:
जीवनी लिखने वाले किसी एक लेखक तथा उसकी रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:
लेखक – अमृतराय। रचना – ‘कलम का सिपाही’

प्रश्न 96:
रामविलास शर्मा किस रूप में प्रसिद्ध हैं?
उत्तर:
आलोचक के रूप में।

प्रश्न 97:
प्रसिद्ध जीवनी-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
बनारसीदास चतुर्वेदी, बाबू गुलाबराय, विष्णु प्रभाकर, अमृतराय आदि प्रमुख जीवनी–लेखक हैं।

प्रश्न 98:
निम्नलिखित जीवनियों के लेखक कौन हैं?

  1.  सुमित्रानन्दन पन्त : जीवन और साहित्य,
  2. निराला की साहित्य-साधना।

उत्तर:

  1. शान्ति जोशी,
  2. डॉ० रामविलास शर्मा।

प्रश्न 99:
छायावादोत्तर युग के दो प्रसिद्ध जीवनी-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. जैनेन्द्र कुमार तथा
  2.  काका कालेलकर।

प्रश्न 100:
जीवनी-लेखन का कार्य किस युग में प्रारम्भ हुआ था?
उत्तर:
जीवनी-लेखन का कार्य भारतेन्दु युग में आरम्भ हो गया था।

प्रश्न 101:
द्विवेदी युग के प्रमुख जीवनी लेखकों के नाम लिखिए। इस युग में किस प्रकार की जीवनियाँ लिखी गयीं?
उत्तर:
द्विवेदी युग के जीवनी लेखकों में-लक्ष्मीधर वाजपेयी, डॉ० सम्पूर्णानन्द, नाथूराम प्रेमी, मुकुन्दीलाल वर्मा-उल्लेखनीय हैं। इस युग में ऐतिहासिक पुरुषों और धार्मिक नेताओं की जीवनियाँ लिखी गयीं।

प्रश्न 102:
छायावाद युग के प्रमुख जीवनी लेखकों के नाम लिखिए। इस युग में कैसी जीवनियाँ लिखी गयीं?
उत्तर:
छायावाद युग के जीवनी लेखकों में रामनरेश त्रिपाठी, गणेशशंकर विद्यार्थी, प्रेमचन्द – उल्लेखनीय हैं। इस युग में राष्ट्रीय महापुरुषों की जीवनियाँ लिखी गयीं।।

प्रश्न 103:
छायावादोत्तर युग के प्रमुख जीवनी लेखकों के नाम लिखिए। इस युग में किस प्रकार की जीवनियाँ लिखी गयीं?
उत्तर:
छायावादोत्तर युग के जीवनी लेखकों में – काका कालेलकर, रामवृक्ष बेनीपुरी, बनारसीदास चतुर्वेदी, राहुल सांकृत्यायन – विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इस युग में लोकप्रिय नेताओं, सन्त-महात्माओं, विदेशी महापुरुषों, वैज्ञानिकों, खिलाड़ियों और साहित्यकारों की जीवनियाँ लिखी गयीं।

प्रश्न 104:
हिन्दी के प्रमुख आत्मकथा-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
बाबू श्यामसुन्दर दास ( मेरी आत्मकहानी), वियोगी हरि ( मेरा जीवन प्रवाह), डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ( मेरी आत्मकथा ) आदि प्रमुख आत्मकथा लेखकों के अतिरिक्त डॉ० हरिवंशराय बच्चन’, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ तथा गुलाबराय आदि श्रेष्ठ आत्मकथाकार हैं।

प्रश्न 105:
निम्नलिखित आत्मकथाओं के लेखकों एवं उनके युग के नाम लिखिए
(1) अपनी कहानी
(2) मेरी असफलताएँ।
उत्तर:

  1.  वृन्दावनलाल वर्मा (शुक्लोत्तर युग) एवं
  2.  बाबू गुलाबराय (शुक्ल युग)।

प्रश्न 106:
रेखाचित्र अथवा आत्मकथा की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
रेखाचित्र – (1) रेखाचित्र में कम-से-कम शब्दों के प्रयोग द्वारा किसी व्यक्ति या वस्तु की विशेषता को उभारा जाता है।
(2) रेखाचित्र में लेखक पूर्णत: तटस्थ होकर, किसी वस्तु या व्यक्ति का चित्रात्मक शैली में सजीव तथा भावपूर्ण चित्र प्रस्तुत करता है।

आत्मकथा – (1) महापुरुषों द्वारा लिखी गयी आत्मकथाएँ पाठकों को उनके जीवन के आत्मीय पहलुओं से परिचय कराती हुई मार्गदर्शन करती हैं और प्रेरणा देती हैं।
(2) लेखक स्वयं अपने जीवन के प्रसंगों को पूर्ण निजता के साथ भावात्मक एवं रोचक शैली में प्रस्तुत करता है।

प्रश्न 107:
आत्मकथा विधा की प्रमुख रचनाओं और उनके लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
आत्मकथा विधा से सम्बन्धित प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखक हैं

  1.  कुछ आपबीती, कुछ जगबीती (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र),
  2. निजे वृत्तान्त (अम्बिकादत्त व्यास),
  3.  कल्याण का पथिक (स्वामी श्रद्धानन्द),
  4. मुझमें दैवी जीवन का विकास (स्वामी सत्यानन्द अग्निहोत्री),
  5.  आपबीती ( भाई परमानन्द),
  6.  तरुण स्वप्न, (सुभाषचन्द्र बोस),
  7.  मेरी कहानी (जवाहरलाल नेहरू),
  8.  सत्य की खोज (एस० राधाकृष्णन),
  9. आधे रास्ते और सीधी चट्टान (कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी),
  10.  मेरी आत्मकथा (डॉ० राजेन्द्र प्रसाद),
  11.  प्रवासी की आत्मकथा (स्वामी भवानीदयाल संन्यासी),
  12.  स्वतन्त्रता की खोज (सत्यदेव परिव्राजक),
  13.  साठ वर्ष : एक रेखांकन (सुमित्रानन्दन पन्त),
  14. परिव्राजक की प्रजा (शान्तिप्रिय द्विवेदी) आदि।

प्रश्न 108:
किन्हीं दो रेखाचित्रकारों के नाम. लिखिए।
या
‘रेखाचित्र विद्या के किसी एक लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  महादेवी वर्मा तथा
  2. रामवृक्ष बेनीपुरी।

प्रश्न 109:
रेखाचित्र विधा में सर्वप्रथम किसने लेखन प्रारम्भ किया?
उत्तर:
कुछ विद्वान् पद्मसिंह शर्मा को रेखाचित्र विधा का जनक मानते हैं, परन्तु इस विधा के नाम से इस विधा में लेखन प्रारम्भ करने का श्रेय श्रीराम शर्मा को है।

प्रश्न 110:
‘छायावादोत्तर युग के प्रमुख रेखाचित्र विधा के लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
रेखाचित्र विधा में लिखने वाले छायावादोत्तर युग के लेखकों में उल्लेखनीय हैं–प्रकाशचन्द्र गुप्त, बनारसीदास चतुर्वेदी, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, विनयमोहन शर्मा, सत्यवती मलिक, रघुवीर सहाय और डॉ० नगेन्द्र।

प्रश्न 111:
‘संस्मरण’ की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1.  संस्मरण में व्यक्तियों, घटनाओं अथवा दृश्यों को स्मृति के सहारे पुन: कल्पना में मूर्त किया जाता है।
  2. संस्मरण में लेखक तटस्थ रहने के बाद भी स्वयं को चित्रित कर देता है।
  3.  संस्मरण व्यक्ति, वस्तु अथवा घटना के वैशिष्ट्य को लक्षित करने वाला होता है।

प्रश्न 112:
हिन्दी के दो संस्मरण लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  महादेवी वर्मा तथा
  2. काका कालेलकर।

प्रश्न 113:
हिन्दी के प्रथम संस्मरण-लेखक का नाम बताइट।
उत्तर:
बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने पं० प्रतापनारायण मिश्र के संस्मरण (1907 ई०) में लिखकर इस विधा का सूत्रपात किया; परन्तु डॉ० गोविन्द त्रिगुणायत संस्मरण का प्रथम लेखक सत्यदेव परिव्राजक को स्वीकार करते हैं।

प्रश्न 114:
महादेवी वर्मा के कुछ संस्मरण-ग्रन्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
महादेवी वर्मा द्वारा रचित ‘पथ के साथी’ (संस्मरण), ‘अतीत के चलचित्र’, ‘स्मृति की रेखाएँ’, ‘स्मारिका’ (रेखाचित्रनुमा संस्मरण) आदि संस्मरण-ग्रन्थ हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

प्रश्न 115.
कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा रचित संस्मरणात्मक रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
‘जिन्दगी मुसकाई, माटी हो गयी सोना’ तथा ‘दीप जले शंख बजे प्रभाकर जी की प्रमुख संस्मरणात्मक रचनाएँ हैं।

प्रश्न 116:
संस्मरण विधा से सम्बन्धित प्रमुख रचनाओं और उनके लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
संस्मरण विधा से सम्बन्धित प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखक निम्नलिखित हैं

  1.  मण्टो मेरा दुश्मन,
  2. ज्यादा अपनी कम परायी (उपेन्द्रनाथ अश्क’),
  3.  कुछ शब्द कुछ रेखाएँ (विष्णु प्रभाकर),
  4. बचपन की स्मृतियाँ,
  5.  जिनका मैं कृतज्ञ,
  6. मेरे असहयोग के साथी (राहुल सांकृत्यायन),
  7.  दस तस्वीरें,
  8.  जिन्होंने जीना सीखा (जगदीशचन्द्र माथुर),
  9. स्मृति-कण,
  10.  चेहरे जाने-पहचाने (सेठ गोविन्ददास),
  11.  चेतना के बिम्ब (डॉ० नगेन्द्र),
  12. समय के पाँव (माखनलाल चतुर्वेदी),
  13. लोकदेव नेहरू,
  14.  संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ (रामधारी सिंह ‘दिनकर’),
  15. नये- पुराने झरोखे (डॉ० हरिवंशराय बच्चन’)।

प्रश्न 117:
‘यात्रावृत्त’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब कोई यात्री अपनी यात्रा के अन्तर्गत मार्ग में आने वाले विविध व्यक्तियों, स्थानों, व्यवस्थाओं आदि के अपने हृदय पर पड़ने वाले प्रभावों का सूक्ष्म और सजीव वर्णन करता है, तब उसे यात्रावृत्त कहते हैं।

प्रश्न 118:
हिन्दी में यात्रावृत्त लिखने का क्रम किस लेखक से प्रारम्भ हुआ तथा सर्वाधिक यात्रावृत्त किस गद्य-युग में लिखे गये?
उत्तर:
यात्रावृत्त लिखने का क्रम भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से प्रारम्भ हुआ तथा सर्वाधिक यात्रावृत्त छायावाद और छायावादोत्तर युग में लिखे गये।

प्रश्न 119:
हिन्दी के यात्री-साहित्य के दो प्रमुख लेखकों और उनकी एक-एक रचना के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  राहुल सांकृत्यायन – घुमक्कड़शास्त्र,
  2. मोहन राकेश – आखिरी चट्टान तक।

प्रश्न 120:
यात्रावृत्त के मुख्य तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
यात्रा से जुड़ी निजी स्मृतियाँ, सहजता, सत्यता, रोचकता और सरसता यात्रावृत्त के मुख्य तत्त्व हैं।

प्रश्न 121:
छायावाद युग के यात्रावृत्त विधा के प्रमुख लेखक और उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
छायावाद युग की यात्रावृत्त विधा के प्रमुख लेखक और उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नवत् हैं

  1. रामनारायण मिश्र – यूरोप यात्रा के छः मास तथा
  2. राहुल सांकृत्यायन – मेरी यूरोप यात्रा, मेरी तिब्बत यात्रा।

प्रश्न 122:
छायावादोत्तर युग की यात्रावृत्त विधा की प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
छायावादोत्तर युग की प्रमुख रचनाएँ एवं उनके लेखक इस प्रकार हैं

  1.  घुमक्कड़शास्त्र,
  2. किन्नर देश में,
  3.  हिमालय परिचय (राहुल सांकृत्यायन),
  4. पैरों में पंख बाँधकर,
  5.  उड़ते चलो, उड़ते चलो (रामवृक्ष बेनीपुरी),
  6.  वह दुनिया (भगवतशरण उपाध्याय),
  7. अरे यायावर रहेगा याद,
  8.  एक बूंद सहसा उछली (सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’),
  9. तन्त्रालोक से यन्त्रालोक तक (डॉ० नगेन्द्र) (2011),
  10.  पृथ्वी-परिक्रमा,
  11.  सुदूर दक्षिण में (सेठ गोविन्ददास),
  12.  धरती गाती है (देवेन्द्र सत्यार्थी),
  13.  तूफानों के बीच (रांगेय राघव),
  14.  आखिरी चट्टान तक (मोहन राकेश),
  15.  आज का जापान (भदन्त आनन्द कौसल्यायन),
  16. लोहे की दीवार के दोनों ओर (यशपाल),
  17.  सुबह के रंग (अमृतराय),
  18.  भू-स्वर्ग कश्मीर (हंसकुमार तिवारी) आदि।

प्रश्न 123:
हिन्दी में रिपोर्ताज लिखने का प्रचलन किस युग में हुआ? प्रमुख रिपोर्ताज लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
हिन्दी में रिपोर्ताज लिखने का प्रचलन छायावादोत्तर युग में हुआ। प्रमुख रिपोर्ताज लेखक इस प्रकार हैं

  1.  धर्मवीर भारती,
  2.  कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’,
  3.  रांगेय राघव,
  4.  विष्णुकान्त शास्त्री आदि।

प्रश्न 124:
हिन्दी की दो नवीन गद्य-विधाओं व उन विधाओं के एक-एक प्रमुख लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. ‘रिपोर्ताज’ हिन्दी गद्य की एक नयी विधा है। इस विधा के प्रमुख लेखक – कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं।
  2. ‘डायरी’ हिन्दी की दूसरी नवीन गद्य विधा है। इस विधा के प्रमुख लेखक – धीरेन्द्र वर्मा हैं।

प्रश्न 125:
रिपोर्ताज विधा की हिन्दी में प्रथम रचना का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
डॉ० शिवदानसिंह चौह्मन ‘विरचित ‘लक्ष्मीपुरा’ (1938 ई०) को हिन्दी गद्य-साहित्य का प्रथम रिपोर्ताज माना जाता है।

प्रश्न 126:
प्रमुख रिपोर्ताज रचनाएँ और उनके लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
रिपोर्ताज विधा की प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखक निम्नलिखित हैं

  1.  पहाड़ों में प्रेममयी संगीति (उपेन्द्रनाथ अश्क’),
  2.  एक तस्वीर के दो पहलू,
  3. क्षण बोले कण मुसकाये,
  4. दिल्ली की यात्रा-स्मृतियाँ (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’),
  5.  वे लड़ेगे हजार साल (शिवसागर मिश्र),
  6.  युद्ध-यात्रा ( धर्मवीर भारती),
  7. प्लाट का मोर्चा (शमशेर बहादुर सिंह)

प्रश्न 127:
रिपोर्ताज विधा के प्रमुख लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
रिपोर्ताज विधा में लेखन करने वाले प्रमुख लेखक हैं

  1. प्रकाशचन्द्र गुप्त,
  2. रामनारायण उपाध्याय,
  3.  भदन्त आनन्द कौसल्यायन,
  4. डॉ० भगवतशरण उपाध्याय,
  5.  फणीश्वरनाथ ‘रेणु’,
  6. जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी,
  7.  निर्मल वर्मा,
  8. कमलेश्वर,
  9.  लक्ष्मीकान्त वर्मा।

प्रश्न 128:
डायरी विधा की प्रथम रचना का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
नरदेव शास्त्री ‘वेदतीर्थ’ को प्रथम डायरी-लेखक माना जाता है। उनकी डायरी नरदेव शास्त्री ‘वेदतीर्थ’ की जेल डायरी” का प्रकाशन 1930 ई० के आस-पास माना जाता है।

प्रश्न 129:
डायरी विधा की प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
हिन्दी गद्य की डायरी विधा के अन्तर्गत घनश्यामदास बिड़ला की डायरी के पन्ने, सुन्दरलाल त्रिपाठी की ‘दैनन्दिनी’, धीरेन्द्र वर्मा की ‘मेरी कॉलेज डायरी’ जैसी कुछ गिनी-चुनी रचनाएँ ही उपलब्ध हैं।

प्रश्न 130:
छायावादोत्तर युग में इायरी विधा में लेखन करने वाले लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
छायावादोत्तर युग में इलाचन्द्र जोशी, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, शमशेर बहादुर सिंह, मोहन राकेश, लक्ष्मीकान्त वर्मा, नरेश मेहता, अजित कुमार, प्रभाकर माचवे आदि की डायरियाँ प्रकाशित हुई हैं।

प्रश्न 131:
हिन्दी में हायरी विधा का आरम्भ किस युग से हुआ? किसी डायरी लेखक की डायरी का नाम लिखिए।
उत्तर:
हिन्दी में डायरी विधा का आरम्भ छायावाद युग से हुआ। डायरी लेखक-धीरेन्द्र वर्मा; रचना-मेरी कॉलेज डायरी।।

प्रश्न 132:
हिन्दी गद्यकाव्य की रचना करने वाले किन्हीं दो लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  राय कृष्णदास तथा
  2.  वियोगी हरि।।

प्रश्न 133:
‘गद्यगीत’ विधा को सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘गद्यगीत’ में गद्य के माध्यम से किसी भावपूर्ण विषय की काव्यात्मक अभिव्यक्ति होती है। उदाहरण – ‘‘मित्र! यहाँ तो सुख के साथ दु:ख लगा है, और उससे सुख को अलग कर लेने के उद्योग में भी एक (राय कृष्णदास)

प्रश्न 134:
‘गद्यगीत’ अथवा ‘गद्यकाव्य’ की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
‘गद्यगीत’ अथवा ‘गद्यकाव्य’ गद्य और काव्य के बीच की विधा है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

  1. इसमें अनुभूति की सघनता होती है।
  2.  इसमें संक्षिप्तता और रहस्यमय सांकेतिकता होती है।

प्रश्न 135:
गद्यगीतों का आरम्भ किस लेखक के किस ग्रन्थ से माना जाता है?
उत्तर:
गद्यगीतों का आरम्भ राय कृष्णदास के ‘साधना-संग्रह’ नामक ग्रन्थ से माना जाता है।

प्रश्न 136:
‘तरंगिणी’ के लेखक तथा उसकी गद्य-विधा का नाम लिखिए।
उत्तर:
लेखक – वियोगी हरि तथा विधा – गद्यकाव्य।

प्रश्न 137:
गद्यकाव्य विधा की प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखकों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
गद्यकाव्य विधा की प्रमुख रचनाएँ और उनके रचनाकारों के नाम हैं

  1. शारदीया,
  2. दुपहरिया,
  3. वंशीरव,
  4.  उन्मन,
  5. स्पन्दन (दिनेशनन्दिनी चौरडया),
  6.  चिन्ता (सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’),
  7. शुभ्रा (रामप्रसाद विद्यार्थी ‘रावी’),
  8. आराधना (राजनारायण मेहरोत्रा ‘रजनीश’),
  9.  श्रद्धाकण,
  10. तरंगिणी (वियोगी हरि),
  11.  मरी खाल की हाय,
  12.  जवाहर (आचार्य चतुरसेन शास्त्री),
  13.  साहित्य देवता (माखनलाल चतुर्वेदी),
  14.  शेष स्मृतियाँ (डॉ० रघुवीर सिंह) ,
  15.  निर्झर,
  16.  पाषाण (तेजनारायण काक’),
  17. निशीथ,
  18.  आँसू भरी धरती,
  19.  उदीची (ब्रह्मदेव),
  20. अन्तरात्मा (रंगनाथ दिवाकर),
  21.  गुरुदेव (महावीरशरण अग्रवाल) आदि।।

प्रश्न 138:
‘चेखव : एक इण्टरव्यू’ तथा भगवान महावीर : एक इण्टरव्यू किस विधा की रचनाएँ हैं ? इनके लेखक कौन हैं?
उत्तर:
उक्त दोनों काल्पनिक भेटवार्ता’ विधा की रचनाएँ हैं। इनके लेखक क्रमश: राजेन्द्र यादव एवं लक्ष्मीचन्द जैन हैं।

प्रश्न 139:
हिन्दी में भेटवार्ता विधा में लेखन का प्रारम्भ किसने किया?
उत्तर:
हिन्दी में भेटवार्ता विधा का श्रीगणेश बनारसीदास चतुर्वेदी ने जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ और प्रेमचन्द से भेंट करने के उपरान्त उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में लिखकर किया।

प्रश्न 140:
भेटवार्ता विधा की प्रमुख रचनाओं का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भेटवार्ता विधा की प्रमुख रचनाएँ हैं

  1.  कवि दर्शन (बेनी माधव शर्मा),
  2.  मैं इनसे मिला। (दो भाग) (डॉ० पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’),
  3.  कला के हस्ताक्षर (देवेन्द्र सत्यार्थी),
  4.  सृजन की मनोभूमि (डॉ० रणवीर रांग्रा),
  5.  हिन्दी कहानी और फैशन (डॉ० सुरेश सिन्हा) आदि।

प्रश्न 141:
छायावादोत्तर युग में भेटवार्ता विधा में लेखन करने वालों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
छायावादोत्तर युग में भेटवार्ता लिखने वालों के नाम हैं –

  1.  प्रभाकर माचवे,
  2.  शिवदानसिंह चौहान,
  3.  रामचरण महेन्द्र,
  4. कैलाश कल्पित,
  5.  राजेन्द्र यादव,
  6.  लक्ष्मीचन्द्र जैन आदि।

प्रश्न 142:
हिन्दी में आधुनिक पद्धति की आलोचना जिन लेखकों ने प्रारम्भ की है, उनमें से किन्हीं दो के नाम लिखिए।
उत्तर:
हिन्दी में आधुनिक पद्धति की आलोचना प्रारम्भ करने वाले लेखक हैं – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और डॉ० नगेन्द्र।

प्रश्र 143:
द्विवेदी युग वे किन्हीं दो गद्य साहित्यकारों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
द्विवेदी युग के दो प्रमुख गद्य साहित्यकार हैं

  1. आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी तथा
  2. बाबू श्यामन्त्र स’ (संकेत- इनके संक्षिप्त परिचय के लिए सम्बन्धित लेखकों का परिचय पढ़े।)

प्रश्न 144:
व्यावहारिक समीक्षा के क्षेत्र में ख्यात आलोचकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
व्यावहारिक समीक्षा के क्षेत्र में ख्यात प्रमुख आलोचक हैं-आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, डॉ० विनय मोहन शर्मा, डॉ० गोविन्द त्रिगुणायत आदि।

प्रश्न 145:
माक्र्सवादी समीक्षा के क्षेत्र में ख्यात आलोचकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
मार्क्सवादी समीक्षा के क्षेत्र में ख्यात प्रमुख आलोचक हैं-डॉ० रामविलास शर्मा, शिवदान सिंह चौहान, डॉ० विश्वम्भरनाथ उपाध्याय आदि।

प्रश्न 146:
सन् 1947 के बाद प्रकाशित दो साहित्यिक पत्रों के संकलन के नाम तथा उनके सम्पादकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  ‘बड़ों के कुछ प्रेरणादायक पत्र’-वियोगी हरि।
  2.  “निराला के पत्र’-जानकीवल्लभ शास्त्री।

प्रश्न 147:
हिन्दी-साहित्य में पत्र-साहित्य की प्रथम रचना कौन-सी है?
उत्तर:
हिन्दी साहित्य में प्रथम पत्र-साहित्य का प्रकाशन 1904 ई० (द्विवेदी युग) में महात्मा मुंशीराम के द्वारा ‘स्वामी दयानन्द से सम्बद्ध पत्रों के संकलन’ से हुआ था।

प्रश्न 148:
छायावाद युग की पन्न-साहित्य की रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:
छायावाद युग में रामकृष्ण आश्रम, देहरादून से ‘विवेकानन्दपत्रावली’ का प्रकाशन हुआ था।

प्रश्न 149:
छायावादोत्तर युग की उल्लेखनीय पत्र-साहित्य रचनाओं को लिखिए।
उत्तर:
छायावादोत्तर युग में प्रकाशित प्रमुख पत्र-साहित्य हैं –

  1.  द्विवेदी पत्रावली (बैजनाथ सिंह ‘विनोद’),
  2.  पद्मसिंह शर्मा के पत्र (बनारसीदास चतुर्वेदी),
  3.  बड़ों के प्रेरणादायक पत्र (वियोगी हरि),
  4. पन्त के दो सौ पत्र बच्चन के नाम (हरिवंशराय बच्चन’),
  5.  भिक्षु के पत्र (भाग 1-2) (भदन्त आनन्द कौसल्यायन),
  6.  यूरोप के पत्र (डॉ० धीरेन्द्र वर्मा),
  7. सोवियत रूस : पिता के पत्रों में (डॉ० जगदीशचन्द्र),
  8.  लन्दन के पत्र (ब्रजमोहन लाला),
  9. बन्दी की चेतना (कमलापति त्रिपाठी),
  10. बापू के पत्र (काका कालेलकर) आदि।

प्रश्न 150:
हिन्दी गद्य के विकास में सबसे अधिक योगदान करने वाली अथवा द्विवेदी युग की सर्वाधिक प्रसिद्ध पत्रिका तथा उसके सम्पादक का नाम लिखिए।
उत्तर:
पत्रिका सरस्वती (सन् 1903 से प्रारम्भ)। सम्पादक–आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी।

प्रश्न 151:
निम्नलिखित में से किन्हीं दो सम्पादकों की पत्रिकाओं के नाम लिखिए
(i) महावीरप्रसाद द्विवेदी,
(u) श्यामसुन्दर दास,
(iii) महादेवी वर्मा,
(iv) धर्मवीर भारती।
उत्तर:
           सम्पादक                                      पत्रिका
(i)  महावीरप्रसाद द्विवेदी    –                     सरस्वती
(ii)  श्यामसुन्दर दास          –             नागरी प्रचारिणी पत्रिका
(iii)  महादेवी वर्मा              –                       चाँद
(iv)  धर्मवीर भारती            –                     धर्मयुग

प्रश्न 152:
‘समालोचक पत्र किस युग में प्रकाशित हुआ था?
उत्तर:
‘समालोचक’ पत्र, द्विवेदी युग में प्रकाशित हुआ था।

प्रश्न 153:
‘नया जीवन पत्रिका के सम्पादक कौन थे?
उत्तर:
‘नया जीवन पत्रिका के सम्पादक कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ थे।

प्रश्न 154:
हिन्दी के नयी पीढ़ी के चार साहित्यिक रचनाकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कमलेश्वर, हृदयेश, मनोहरश्याम जोशी तथा सुदीप नयी पीढ़ी के रचनाकार हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 6 Rural Development

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 6 Rural Development (ग्रामीण विकास) are part of UP Board Solutions for Class 11 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 6 Rural Development (ग्रामीण विकास).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 6
Chapter Name Rural Development (ग्रामीण विकास)
Number of Questions Solved 60
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 6 Rural Development (ग्रामीण विकास)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ग्रामीण विकास का क्या अर्थ है? ग्रामीण विकास से जुड़े मुख्य प्रश्नों का स्पष्ट करें।
उत्तर
ग्रामीण विकास से आशय ग्रामीण विकास एक व्यापक शब्द है। यह मूलतः ग्रामीण अर्थव्यवस्था के उन घटकों के विकास पर बल देता है जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सर्वांगीण विकास में पिछड़ गए हैं। ग्रामीण विकास से जुड़े मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं

  1. साक्षरता, विशेषतः नारी शिक्षा,
  2. स्वास्थ्य एवं स्वच्छता,
  3. भूमि सुधार,
  4. समाज के हर वर्ग के लिए उत्पादक संसाधनों का विकास,
  5. आधारिक संरचना का विकास जैसे—बिजली, सड़कें, अस्पताल, सिंचाई, साख, विपणन आदि तथा
  6. निर्धनता उन्मूलन, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के जीवन-स्तर में सुधार।

प्रश्न 2.
ग्रामीण विकास में साख के महत्त्व पर चर्चा करें।
उत्तर
कृषि साख से अभिप्राय कृषि उत्पादन के लिए आवश्यक भौतिक आगतों को खरीदने की क्षमता से है। ग्रामीण विकास में साख का महत्त्व निम्नलिखित है

  1. किसान को अपनी दैनिक कृषि संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए साख की आवश्यकता होती है।
  2. भारतीय किसानों को अपने पारिवारिक निर्वाह, खर्च, शादी, मृत्यु तथा धार्मिक अनुष्ठानों के लिए | भी साख की आवश्यकता पड़ती है।
  3. किसानों को मशीनरी खरीदने, बाड़ लगवाने, कुआँ खुदवाने जैसे कार्यों के लिए भी साख की । आवश्यकता होती है।
  4. साख की मदद से किसान एवं गैर-किसान मजदूर ऋणजाल से मुक्त हो जाते हैं।
  5. साख की सहायता से कृषि फसलों एवं गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसरों में विविधता उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 3.
गरीबों की ऋण आवश्यकताएँ पूरी करने में अतिलघु साख व्यवस्था की भूमिका की व्याख्या| करें।
उत्तर
औपचारिक साख व्यवस्था में रह गई कमियों को दूर करने के लिए स्वयं सहायता समूहों (एच०एच०जी०) का भी ग्रामीण साख में प्रादुर्भाव हुआ है। स्वयं-सहायता समूहों ने सदस्यों की ओर से न्यूनतम योगदान की सहायता से लघु बचतों को प्रोत्साहित किया है। इन लघु बचतों से एकत्र राशि में से जरूरतमंद सदस्यों को ऋण दिया जाता है। उस ऋण की राशि छोटी-छोटी किस्तों में आसानी से लौटायी जाती है। ब्याज की दर भी उचित व तर्कसंगत रखी जाती है। इस प्रकार की साख उपलब्धता को अतिलघु साख कार्यक्रम भी कहा जाता है। इस प्रकार से स्वयं सहायता समूहों ने महिलाओं के सशक्तीकरण में 
सहायता की है। किंतु अभी तक इन ऋण सुविधाओं का प्रयोग किसी-न-किसी प्रकार के उपयोग के लिए। ही हो रहा है व कृषि कार्यों के लिए बहुत कम राशि ली जा रही है।

प्रश्न 4.
सरकार द्वारा ग्रामीण बाजारों के विकास के लिए किए गए प्रयासों की व्याख्या करें।
उत्तर
ग्रामीण बाजारों के विकास हेतु सरकारी प्रयास सरकार द्वारा ग्रामीण बाजारों के विकास के लिए किए गए प्रयास इस प्रकार हैं

1. व्यवस्थित एवं पारदर्शी विपणन की दशाओं का निर्माण करने के लिए बाजार का नियमन करना-इस नीति से कृषक और उपभोक्ता दोनों ही लाभान्वित हुए हैं, परंतु अभी भी लगभग 27,000 ग्रामीण क्षेत्रों में अनियत मंडियों को विकसित किए जाने की आवश्यकता है।
2. सड़कों, रेलमार्गों, भण्डारगृहों, गोदामों, शीतगृहों और प्रसंस्करण इकाइयों के रूप में भौतिक आधारिक संरचनाओं का प्रावधान–वर्तमान आधारिक सुविधाएँ बढ़ती हुई माँग को देखते हुए अपर्याप्त हैं और उनमें पर्याप्त सुधार की आवश्यकता है।
3. सरकारी विपणन द्वारा किसानों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य सुलभ करना।
4. नीतिगत साधन को अपनाना, जैसे

(क) 24 कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम मूल्य सुनिश्चित करना।।
(ख) भारतीय खाद्य निगम द्वारा गेहूँ और चावल के सुरक्षित भंडारों का रख-रखाव।
(ग) सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से खाद्यान्नों और चीनी का वितरण। इन नीतिगत साधनों का उद्देश्य क्रमशः किसानों को उनकी उपज के उचित दाम दिलाना तथा गरीबों को सहायिकी युक्त कीमत पर वस्तुएँ उपलब्ध कराना रहा है।

प्रश्न 5.
आजीविका को धारणीय बनाने के लिए कृषि का विविधीकरण क्यों आवश्यक है?
उत्तर
कृषि विविधीकरण के दो पहलू हैं1. प्रथम पहलू फसलों के उत्पादन के विविधीकरण से संबंधित है। 2. दूसरा पहलू श्रमशक्ति को खेती से हटाकर अन्य संबंधित कार्यों जैसे–पशुपालन, मुर्गी और मत्स्य पालन आदि; तथा गैर-कृषि क्षेत्र में लगाना है। इस विविधीकरण की इसलिए आवश्यकता है क्योंकि सिर्फ खेती के आधार पर आजीविका कमाने में जोखिम बहुत अधिक होती है। विविधीकरण द्वारा हम न केवल खेती से जोखिम को कम करने में सफल हो सकते हैं बलिक ग्रामीण जन-समुदाय के लिए उत्पादक और वैकल्पिक धारणीय आजीविका के अवसर भी उपलब्ध हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य प्रकार की उत्पादक और लाभप्रद गतिविधियों में प्रसार के माध्यम से ही हम ग्रामीण जनसमुदाय को अधिक आय कमाकर गरीबी तथा अन्य विषम परिस्थितियों का सामना करने में समर्थ बना सकते हैं।

प्रश्न 6.
भारत के ग्रामीण विकास में ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।
उत्तर
भारत में ग्रामीण साख आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुसंस्था व्यवस्था अपनाई गई है। इसके बाद 1982 ई० में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना की गई। यह बैंक सम्पूर्ण ग्रामीण वित्त व्यवस्था के समन्वय के लिए एक शीर्ष संस्थान है। ग्रामीण बैंक की संस्थागत संरचना में आप निम्नलिखित संस्थाएँ शामिल हैं

  1. व्यावसायिक बैंक,
  2. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक,
  3. सहकारी बैंक और
  4. भूमि विकास बैंक।

इसे बहु-संस्था व्यवस्था की रचना का उद्देश्य सस्ती ब्याज दरों पर पर्याप्त ऋण की पूर्ति करना है। परंतु यह औपचारिक साख व्यवस्था अपने उद्देश्यों को पूरा कर पाने में विफल रही है। इससे समन्वित ग्रामीण विकास नहीं हो पाया है। चूंकि इसके लिए ऋणाधार की आवश्यकता थी, अत: बहुसंख्य ग्रामीण परिवारों का एक बड़ा अनुपात इससे अपने आप वंचित रह गया। अतः अर्तिलघु साख प्रणाली को लागू करने के लिए स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया। किंतु अभी भी हमारी बैंकिंग व्यवस्था उचित नहीं बन पायी है। इसका प्रमुख कारण औपचारिक साख संस्थाओं का चिरकालिक निम्न निष्पादन और किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर किस्तों को न चुका पाना है।

प्रश्न 7.
कृषि विपणन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
कृषि विपणन वह प्रक्रिया है जिससे देश भर में उत्पादित कृषि पदार्थों का संग्रह, भण्डारुण, प्रसंस्करण, परिवहन, पैकिंग, वर्गीकरण और वितरण आदि किया जाता है।

प्रश्न 8.
कृषि विपणन प्रक्रिया की कुछ बाधाएँ बताइए।
उत्तर
कृषि विपणन प्रक्रिया की निम्नलिखित बाधाएँ हैं

  1. तोल में हेरा-फेरी।
  2. खातों में गड़बड़ी।
  3. बाजार में प्रचलित भावों का पता न होना।
  4. अच्छी भण्डारण सुविधाओं का अभाव।
  5. किसानों में जागरूकता का अभाव।
  6. किसानों की आय का निम्न स्तर।।
  7. साख विस्तार का अभाव।

प्रश्न 9.
कृषि विपणन के कुछ उपलब्ध वैकल्पिक माध्यमों की उदाहरण सहित चर्चा करें।
उत्तर
आज यह बात सभी सोच रहे हैं कि यदि किसान प्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ता को अपने उत्पाद बेचते हैं। तो इससे उपभोक्ताओं द्वारा अदा की गई कीमत में उसकी हिस्सेदारी बढ़ जाती है। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में अपनी मण्डी, पुणे की हाड़पसार मण्डी, आंध्र प्रदेश की राययूबाज नामक फल-सब्जी मण्डियाँ तथा तमिलनाडु की उझावर के कृषक बाजार आदि वैकल्पिक क्रय-विक्रय माध्यम के कुछ उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त आजकल अनेक देशी एवं बहुराष्ट्रीय खाद्य पदार्थ बनाने वाली कम्पनियाँ भी किसानों के साथ सीधा अनुबंध कर रही हैं। ये कम्पनियाँ कृषि उपज एवं उसकी गुणवत्ता को प्रोत्साहित करने हेतु पूर्व-निर्धारित कीमतों पर किसानों से अनुबंध करती हैं।

प्रश्न 10.
‘स्वर्णिम क्रान्ति की व्याख्या करें।
उत्तर
हम 1991-2003 ई० की अवधि को ‘स्वर्णिम क्रांति के प्रारम्भ का काल मानते हैं। इसी दौरान बागवानी में सुनियोजित निवेश बहुत ही उत्पादक सिद्ध हुआ और इस क्षेत्र में एक धारणीय वैकल्पिक रोजगार का रूप धारण किया। प्रमुख बागवानी फसलें हैं-फल-सब्जियाँ, रेशेदार फसलें, औषधीय तथा सुगन्धित पौधे, मसाले, चाय, कॉफी इत्यादि।

प्रश्न 11.
सरकार द्वारा कृषि विपणन सुधार के लिए अपनाए गए चार उपायों की व्याख्या करें।
उत्तर
लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 4 का उत्तर देखिए।

प्रश्न 12.
ग्रामीण विविधीकरण में गैर-कृषि रोजगार का महत्त्व समझाइए।
उत्तर
कृषि क्षेत्र पर जनसंख्या के अत्यधिक बोझ को खत्म करने के लिए ऋणशक्ति को अन्य गैर-कृषि कार्यों में वैकल्पिक रोजगार के अवसरों की आवश्यकता है। गैर-कृषि रोजगार का महत्त्व इस प्रकार है

  1. इसके द्वारा हमें सिर्फ खेती के आधार पर आजीविका कमाने का जोखिम कम होगा।
  2. इससे निर्धन किसानों की आय में वृद्धि होती है।
  3. यह ग्रामीण क्षेत्रों से निर्धनता उन्मूलन का अच्छा स्रोत है।
  4. गैर-कृषि क्षेत्र में वर्ष भर आय कमाने का रोजगार मिल जाता है।
  5. ये कृषि क्षेत्र में श्रमशक्ति का भार कम करने में सहायक होते हैं।
  6. कृषि कार्यबल को धारणीय जीवन-स्तर जीने के लिए अच्छे स्रोत हैं।

प्रश्न 13.
विविधीकरण के स्रोत के रूप में पशुपालन, मत्स्यपालन और बागवानी के महत्त्व पर टिप्पणी करें।
उत्तर
पशुपालन का महत्त्व

1. मवेशियों के पालन से परिवार की आय में स्थिरता आती है।
2. इससे खाद्य सुरक्षा, परिवहन, ईंधन, पोषण पूरे परिवार के लिए हासिल हो जाते हैं और खाद्य 
उत्पादन की अन्य क्रियाओं पर भी प्रभाव नहीं पड़ता है।
3. यह भूमिहीन कृषकों तथा छोटे व सीमान्त किसानों को आजीविका कमाने का वैकल्पिक साधन है।
4. इस क्षेत्र में महिलाएँ भी बहुत बड़ी संख्या में रोजगार पा रही हैं।
5. यह क्षेत्र अधिशेष कार्यबल को समायोजित कर रहा है।

मत्स्य पालन का महत्त्व

  1. प्रत्येक जलागार; सागर, झीलें, प्राकृतिक तालाब; मत्स्य उद्योग से जुड़े समुदाय के लिए निश्चित जीवन उद्दीपक स्रोत है।
  2. मत्स्य उत्पादन सकल घरेलू उत्पाद का 1.4% है।
  3. समुद्र, झीलों, नदियों, तालाबों के आस-पास रहने वाले लोगों के लिए गैर-कृषि क्रियाकलाप आय का अच्छा स्रोत है।

बागवानी का महत्त्व

  1. बागवानी फसलों से रोज़गार मिलता है।
  2. बागवानी फसलों से भोजन एवं पोषण प्राप्त होता है।
  3. यह क्षेत्र में अधिशेष कार्यबल समायोजित कर रहा है।
  4.  पुष्पारोपण, पौधशाला की देखभाल, फल-फूलों का संवर्द्धन और खाद्य प्रसंस्करण ग्रामीण महिलाओं के लिए अधिक आय वाले रोजगार बन गए हैं।
  5. देश की 19% श्रम शक्ति को इस समय इन्हीं कार्यों से रोजगार मिला हुआ है।

प्रश्न 14.
सूचना प्रौद्योगिकी धारणीय विकास तथा खाद्य सुरक्षा की प्राप्ति में बड़ा महत्त्वपूर्ण योगदान करती है।टिप्पणी करें।
उत्तर
आज सूचना प्रौद्योगिकी ने भारतीय अर्थव्यवस्था के अनेक क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है। धारणीय विकास एवं खाद्य सुरक्षा को हासिल करने में सूचना प्रौद्योगिकी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। सूचना प्रौद्योगिकी का योगदान निम्नलिखित है

  1. सूचनाओं और उपयुक्त सॉफ्टवेयर का प्रयोग कर सरकार सहज ही खाद्य असुरक्षा की आशंका | वाले क्षेत्रों का समय रहते पूर्वानुमान लगा सकती है।
  2. इस प्रौद्योगिकी द्वारा उदीयमान तकनीकों, कीमतों, मौसम तथा विभिन्न फसलों के लिए मृदा की दशाओं की उपयुक्तता की जानकारी का प्रसारण हो सकता है।
  3. ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार सृजन की इसमें क्षमता है।
  4. यह लोगों के लिए ज्ञान एवं क्षमता का सृजन करती है।

प्रश्न 15.
जैविक कृषि क्या है? यह धारणीय विकास को किस प्रकार बढ़ावा देती है?
उत्तर
जैविक कृषि एक धारणीय कृषि प्रणाली है जो भूमि की दीर्घकालीन उपजाऊ शक्ति को बनाए रखती है तथा उच्चकोटि के पौष्टिक खाद्य का उत्पादन करने के लिए भूमि के सीमित संसाधनों का कम उपयोग करती है। भारत में परम्परागत कृषि पूरी तरह से रासायनिक उर्वरकों और विषजन्य कीटनाशकों पर आधारित है। ये विषाक्त तत्त्व हमारी खाद्य पूर्ति व जल स्रोतों में नि:सरित हो जाते हैं और हमारे पशुधन को हानि पहुँचाते हैं। साथ ही इसके कारण मृदा की उर्वरता भी क्षीण हो जाती है और हमारे प्राकृतिक पर्यावरण का विनाश हो जाता है। दूसरी ओर जैविक कृषि में रसायनों का प्रयोग प्रतिबंधित होता है। इसमें कृषि में महँगे बीजों, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशक दवाइयों की जगह स्थानीय आगतों का प्रयोग किया जाता है। अतः इससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुँचता है और नवीन तकनीक के प्रयोग को प्रोत्साहन मिलता है।

प्रश्न 16.
जैविक कृषि के लाभ और सीमाएँ स्पष्ट करें।
उत्तर

जैविक कृषि के लाभ

1. जैविक कृषि महँगे आगतों के स्थान पर स्थानीय रूप से बने जैविक आगतों के प्रयोग पर निर्भर होती है।
2. परम्परागत फसलों की तुलना में जैविक फसलों में अधिक मात्रा में गौण मेटाबोलाइट्स पाए जाते
3. जैविक खेतों की मिट्टी में अधिक पौष्टिक तत्त्व पाए जाते हैं।
4. निवेश पर अच्छा प्रतिफल प्राप्त होता है।
5. जैविक कृषि में अधिक जैव सक्रियता तथा अधिक जैव विविधता पाई जाती है।
6. यह पद्धति हानिरहित एवं पर्यावरण के लिए मित्र हैं।

जैविक कृषि की सीमाएँ

1. जैविक कृषि अत्यधिक श्रमगहन होती है।
2. जैविक उत्पादन गैर-जैविक से अधिक महँगा होता है।
3. भारतीय किसान जैविक कृषि से अनभिज्ञ हैं तथा उसके प्रति उत्सुक भी नहीं है।
4. इसके लिए आधार संरचना अपर्याप्त है।
5. जैविक उत्पादों के लिए बाजार की कमी है।
6. परम्परागत कृषि की तुलना में जैविक कृषि का उत्पादन औसतन 20% कम होता है।
7. बिना मौसम के फसल उगाने के कम विकल्प हैं।

प्रश्न 17.
जैविक कृषि का प्रयोग करने वाले किसानों को प्रारम्भिक वर्षों में किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?
उत्तर
जैविक कृषि में संलग्न कृषकों की समस्याएँ जैविक कृषि का प्रयोग करने वाले किसानों को प्रारम्भिक वर्षों में निम्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है

  1. प्रारम्भिक वर्षों में जैविक कृषि की उत्पादकता रासायनिक कृषि की तुलना में कम रहती है।
  2. छोटे और सीमांत किसानों के लिए बड़े स्तर पर इसे अपनाना कठिन होता है।
  3. जैविक उत्पाद रासायनिक उत्पादों की अपेक्षा शीघ्र खराब हो जाते हैं।
  4. गैर-मौसमी फसलों का जैविक कृषि में उत्पादन बहुत सीमित होता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किस अवधि को ‘स्वर्णिम क्रान्ति के प्रारम्भ का काल माना जाता है?
(क) 1990-2002
(ख) 1991-2003
(ग) 1992-2004
(घ) 1993-2005
उत्तर
(ख) 1991-2003

प्रश्न 2.
“भारत गाँवों का देश है और इसकी आत्मा गाँवों में निवास करती है।”—यह कथन किनका  है?
(क) राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का
(ख) डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम का
(ग) आर० एन० आजाद का ।
(घ) रॉबर्ट चैम्बर्स का
उत्तर
(क) राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना कब की गई?
(क) सन् 1882 में
(ख) सन् 1780 में
(ग) सन् 1982 में
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) सन् 1982 में

प्रश्न 4.
जैविक कृषि
(क) भूमि की दीर्घकालीन उपजाऊ शक्ति को बनाए रखती है।
(ख) भूमि की उपजाऊ शक्ति को नष्ट कर देती है।।
(ग) (क) तथा (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) भूमि की दीर्घकालीन उपजाऊ शक्ति को बनाए रखती है।

प्रश्न 5.
ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे किसानों, सामान्य कारीगरों तथा श्रमिकों की साख सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किन बैंकों की स्थापना की गई है?
(क) स्टेट बैंकों की ।
(ख) पंजाब नेशनल बैंकों की
(ग) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की ।
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की |

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका का प्रमुख साधन क्या है?
उत्तर
ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविकों का प्रमुख साधन कृषि है।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय विकास का केन्द्र-बिन्दु क्या है?
उत्तर
राष्ट्रीय विकास का केन्द्रबिन्दु ‘ग्रामीण विकास’ है।

प्रश्न 3.
ग्रामीण विकास को इतना अधिक महत्त्व क्यों दिया जा रहा है?
उत्तर
आज भारत की लगभग 64% जनसंख्या कृषि पर आधारित है और कृषि की उत्पादकता का स्तर अत्यधिक निम्न हैं यही कारण है कि वह अत्यधिक निर्धन है। अतः भारत की वास्तविक उन्नति के लिए ग्रामीण क्षेत्र की उन्नति आवश्यक है।

प्रश्न 4.
ग्रामीण विकास से क्या आशय है?
उत्तर
ग्रामीण विकास से आशय है—ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अनेकानेक न्यून आय वर्ग के लोगों के जीवन-स्तर में सुधार लाना और उनके विकास-क्रम को आत्मपोषित बनाना।

प्रश्न 5.
गैर-कृषि उत्पादक क्रियाकलापों के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर
गैर-कृषि उत्पादक क्रियाकलापों के कुछ उदाहरण हैं—खाद्य प्रसंस्करण, स्वास्थ्य सुविधाओं की अधिक उपलब्धता, घर और कार्यस्थल पर स्वच्छता संबंधी सुविधाएँ, सभी के लिए शिक्षा आदि।

प्रश्न 6.
सकल घरेलू उत्पाद में किस क्षेत्र का योगदान निरंतर कम होता जा रहा है?
उत्तर
सकल घरेलू उत्पाद में ‘कृषि-क्षेत्र’ का योगदान निरंतर कम होता जा रहा है।

प्रश्न 7.
ग्रामीण विकास में मुख्य बाधाएँ क्या हैं?
उत्तर
ग्रामीण विकास में मुख्य बाधाएँ हैं-कृषि की संवृद्धि दर में ह्रास, अपर्याप्त आधारिक संरचना, वैकल्पिक रोजगार के अवसरों का अभाव, अनियत रोजगार में वृद्धि।।

प्रश्न 8.
कृषि अर्थव्यवस्था की संवृद्धि मुख्य रूप से किस बात पर निर्भर करती है?
उत्तर
कृषि अर्थव्यवस्था की संवृद्धि समय-समय पर कृषि और गैर-कृषि कार्यों में उच्च उत्पादकता प्राप्त करने के लिए पूँजी के प्रयोग पर निर्भर करती है।

प्रश्न 9.
किसानों को किन उद्देश्यों के लिए ऋण लेने पड़ते हैं?
उत्तर
किसानों को उत्पादक (बीज, उर्वरक, यंत्र आदि खरीदने) तथा अनुत्पादक (पारिवारिक, निर्वाह व्यय, शादी, मृत्यु तथा धार्मिक अनुष्ठानों) कार्यों के लिए ऋण लेने पड़ते हैं।

प्रश्न 10.
सन् 1969 में ग्रामीण साख आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किस प्रकार की व्यवस्था| अपनाई गई?
उत्तर
ग्रामीण साख आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सन् 1969 में बहुसंस्था व्यवस्था अपनाई गई थी।

प्रश्न 11.
नाबार्ड क्या है?
उत्तर
सन् 1982 में स्थापित नाबार्ड सम्पूर्ण ग्रामीण वित्त व्यवस्था के समन्वय के लिए एक शीर्ष संस्थान

प्रश्न 12.
ग्रामीण बैंक की संस्थागत संरचना में क्या सम्मिलित हैं?
उत्तर
ग्रामीण बैंक की संस्थागत संरचना में अनेक बहुएजेन्सी संस्थान जैसे-व्यावसायिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सहकारी तथा भूमि विकास बैंक सम्मिलित हैं।

प्रश्न 13.
बहुसंस्था व्यवस्था की रचना का उद्देश्य क्या है?
उत्तर
बहुसंस्था व्यवस्था की रचना का उद्देश्य सस्ती ब्याज दरों पर पर्याप्त ऋण की पूर्ति करना है।

प्रश्न 14.
‘कुटुम्ब श्री क्या है?
उत्तर
‘कुटुम्ब श्री’ एक बचत बैंक है जिसकी स्थापना सरकारी बचत एवं साख सोसायटी के रूप में गरीब महिलाओं के लिए की गई थी।

प्रश्न 15.
अतिलघु साख कार्यक्रम क्या है?
उत्तर
इसमें प्रत्येक सदस्य न्यूनतम अंशदान करता है। इस राशि में से जरूरतमंद सदस्यों को उचित ब्याज दर पर ऋण दिया जाता है।

प्रश्न 16.
कृषि उपज को उपभोक्ताओं तक पहुँचाने का माध्यम क्या है?
उत्तर
कृषि उपज को उपभोक्ताओं तक पहुँचाने का माध्यम ‘बाजार व्यवस्था है।

प्रश्न 17.
कृषि विपणन से क्या आशय है?
उत्तर
कृषि विपणन वह प्रक्रिया है जिससे देशभर में उत्पादित कृषि पदार्थों का संग्रहण, भण्डारण, प्रसंस्करण, परिवहन, पैकिंग, वर्गीकरण, वितरण आदि किया जाता है।।

प्रश्न 18.
किसान को अपनी उपज की कीमत का अधिक अंश कैसे प्राप्त हो सकता है?
उत्तर
यदि किसान स्वयं ही उपभोक्ता को कृषि उत्पाद बेचे तो उसे उपभोक्ता द्वारा चुकाई गई कीमत को अधिक अंश प्राप्त होगा।

प्रश्न 19.
वैकल्पिक क्रय-विक्रय माध्यम के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर
वैकल्पिक क्रय-विक्रय के माध्यम हैं-
1. पुणे की हाड़पसार मण्डी,
2. तमिलनाडु की उझावर मण्डी के कृषक बाजार।

प्रश्न 20
उत्पादक गतिविधियों के विविधीकरण के दो पक्ष कौन-कौन से हैं?
उत्तर
उत्पादक-गतिविधियों के ऐसे दो पक्ष हैं-
1. फसलों के उत्पादन की विविधीकरण।
2. श्रमशक्ति को कृषि से हटाकर गैर कृषि क्षेत्रकों में लगाना।

प्रश्न 21.
विविधीकरण से क्या लाभ होगा?
उत्तर
विविधीकरण द्वारा हम न केवल खेती से जोखिम को कम करने में सफल होंगे बल्कि ग्रामीण जनसमुदाय को उत्पादक और वैकल्पिक धारणीय आजीविका के अवसर भी उपलब्ध हो पाएँगे।

प्रश्न 22.
गैर-कृषि अर्थतंत्र में कुछ गतिशील उपघटकों के नाम बताइए।
उत्तर
ऐसे कुछ उदाहरण हैं—कृषि प्रसंस्करण उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, चर्म उद्योग, पर्यटन आदि।

प्रश्न 23.
पशुपालन से ग्रामीण परिवारों को क्या लाभ हैं?
उत्तर
पशुपालन से ग्रामीण परिवारों की आय में अधिक स्थिरता आती है। इसके अतिरिक्त खाद्य सुरक्षा, परिवहन, ईंधन, पोषण आदि की व्यवस्था भी हो जाती है।

प्रश्न 24.
स्वर्णिम क्रान्ति से क्या आशय है?
उत्तर
बागवानी में सुनियोजित निवेश के फलस्वरूप तीव्र उत्पादकता एवं वैकल्पिक रोजगार की उपलब्धि को ‘स्वर्णिम क्रान्ति’ कहते हैं।

प्रश्न 25.
खाद्य सुरक्षा और धारणीय विकास में सूचना प्रौद्योगिकी का क्या महत्त्व है?
उत्तर
सूचना प्रौद्योगिकी द्वारा सरकार सहज ही खाद्य असुरक्षा की आशंका वाले क्षेत्रों का समय रहते पूर्वानुमान लगा सकती है और विपदाओं के दुष्प्रभावों को कम करने में सफल हो सकती है।

प्रश्न 26.
रासायनिक उर्वरकों और विषजन्य कीटनाशकों के प्रयोग से क्या हानि है?
उत्तर
ये विषाक्त तत्त्व हमारी खाद्य पूर्ति व जल स्रोतों में नि:सरित हो जाते हैं, हमारे पशुधन को हानि पहुँचाते हैं, मृदा की उर्वरता को कम करते हैं और प्राकृतिक पर्यावरण का विनाश करते हैं।

प्रश्न 27.
जैविक कृषि क्या है?
उत्तर
जैविक कृषि खेती करने की वह विधि है जो पर्यावरणीय सन्तुलन को पुनः स्थापित करके उसका संवर्द्धन और संरक्षण करती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्रामीण विकास से क्या आशय है?
उत्तर
भारत को गाँवों का देश कहा जाता है। अत: भारत के सर्वांगीण विकास के लिए यह आवश्यक है। कि गाँवों के विकास पर समुचित ध्यान दिया जाए। ग्रामीण विकास से अभिप्राय है-“ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अनेकानेक न्यून आय वर्ग के लोगों के जीवन-स्तर में सुधार लाना और उनके विकास के क्रम को आत्मपोषित बनाना।” यह एक ऐसी व्यूह-रचना है, जो लोगों के एक विशिष्ट समूह (निर्धन ग्रामीण) के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन को उन्नत बनाने के लिए बनाई गई है। इसका उद्देश्य विकास के लाभों को ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन-यापन की तलाश में लगे निर्धनतम लोगों तक पहुँचाना है। इसके अंतर्गत एक निश्चित ग्रामीण क्षेत्र में, ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग आता है।

प्रश्न 2.
ग्रामीण विकास के अंतर्गत किन-किन बातों का अध्ययन किया जाता है?
उत्तर
ग्रामीण विकास के अंतर्गत वे व्यापक क्रियाएँ आती हैं, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सभी पहलुओं से संबंधित होती हैं तथा जिनमें सभी ग्रामीण वर्गों को सम्मिलित किया जाता है जैसे—कृषक, भूमिहीन श्रमिक, ग्रामीण दस्तकार आदि। इस आधार पर ग्रामीण विकास कार्यक्रम निम्नलिखित घटकों पर आधारित होते हैं

  1. क्षेत्र में उपलब्ध संसाधन एवं उनमें अन्तर्सम्बंध।
  2. क्षेत्र के निवासी एवं उनमें पूरक प्रतिस्पर्धात्मक संबंध। |
  3. आत्मनिर्भरता के उद्देश्य की प्राप्ति की क्षमता।
  4. आवश्यक अवसंरचना।
  5. उचित तकनीक जो उत्पादकता एवं रोजगार में वृद्धि कर सके।
  6. संस्थाएँ, प्रेरणाएँ एवं नीतियाँ जो समन्वित प्रयास के लिए आवश्यक है।

वर्तमान में ग्रामीण विकास के अंतर्गत कृषि एवं सम्बद्ध क्रियाओं; बागवानी, लघु सिंचाई, भूमि विकास, मिट्टी एवं जल संरक्षण, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, मुर्गीपालन, सूअर पालन, मत्स्यपालन, खद्दर एवं खादी उद्योग, सामाजिक वानिकी तथा कृषि एवं वन; पर आधारित उद्योगों की स्थापना पर विशेष बल दिया जाता है। इस प्रकार ग्रामीण विकास में उन नीतियों एवं कार्यक्रमों को अपनाया जाता है, जो ग्रामीण क्षेत्रों का विकास करें तथा कृषि, वानिकी, मत्स्य, ग्रामीण शिल्प एवं उद्योग तथा सामाजिक एवं आर्थिक अवसंरचना के निर्माण आदि क्रियाओं को प्रोन्नत करें।

प्रश्न 3.
भारत में साहूकारों व महाजनों की वित्त व्यवस्था के दोष बताइए।
उत्तर
भारत में पारम्परिक वित्त व्यवस्था के दोष साहूकारों व महाजनों की पारम्परिक कृषि वित्त व्यवस्था के निम्नलिखित दोष रहे हैं

  1. साहूकार की कार्य-पद्धति लोचदार होती है और वह समय, परिस्थिति तथा व्यक्ति के अनुसार उनमें परिवर्तन करता रहता है।
  2. साहूकार अपने ऋणों पर ब्याज की उच्च दर वसूल करता है।
  3. साहूकार मूलधन देते समय ही पूरे वर्ष का ब्याज अग्रिम रूप में काट लेते हैं और इसकी कोई | रसीद भी नहीं देते हैं।
  4. अनेक साहूकार ऋण देते समय कोरे कागजों पर हस्ताक्षर या अँगूठे की निशानी ले लेते हैं और बाद में उनमें अधिक रकम भर लेते हैं।
  5. बहुत-से स्थानों पर ऋण देते समय ऋण की रकम में से अनेक प्रकार के खर्चे काट लेते हैं। कभी-कभी यह रकम 5% से 10% तक हो जाती है।
  6. साहूकार कृषकों को अनुत्पादक कार्यों के लिए ऋण देकर उन्हें फिजूलखर्ची बना देते हैं।
  7. साहूकार समय-समय पर हिसाब-किताब में भी गड़बड़ करती रहती है।
  8. साहूकार कृषकों को ऋण देने के बाद उन्हें अपनी फसल कम कीमत पर बेचने के लिए विवश| करते हैं।

प्रश्न 4.
भारत में कृषि उपज की विक्रय व्यवस्था को सुधारने के लिए उपयुक्त सुझाव दीजिए।
उत्तर
कृषि उपजों के विपणन में सुधार के उपाय कृषि उपज की विक्रम व्यवस्था को निम्नलिखित उपाय अपनाकर सुधारा जा सकता है

  1. कृषक को महजन-साहूकार के चंगुल से निकालने के लिए सस्ती ब्याज दर पर वित्तीय सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
  2. परिवहन के सस्ते व पर्याप्त साधन विकसित किए जाएँ ताकि कृषक अपनी उपजों को मण्डी में ले | जाकर उचित कीमतों पर बेच सकें।
  3. नियंत्रित मण्डियों की अधिकाधिक संख्या में स्थापना की जाए।
  4. मण्डी में बाटों का नियमित रूप से निरीक्षण किया जाए।
  5. व्यापक स्तर पर भण्डार वे गोदाम बनाए जाएँ।
  6. कृषि उपज की बिक्री के लिए स्थान-स्थान पर सहकारी कृषि विपणन समितियों की स्थापना की जाए।
  7. किसानों में शिक्षा का पर्याप्त प्रचार-प्रसार किया जाए। 

प्रश्न 5.
छोटे खेतों के विविधीकरण के पक्ष में उपयुक्त तर्क दीजिए।
उत्तर
छोटे खेतों के विविधीकरण के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं

  1. निर्वाह खेती व्यापारिक खेती में बदलेगी। इससे उनकी आय में वृद्धि होगी।
  2. वे खाली समय में पशुपालन, मत्स्य पालन, कृषि वानिकी व बागवानी आदि गैर-कृषि उत्पादक | कार्यों में लग जाएँगे।
  3. उत्पादन की अनिश्चितता तथा कीमत उच्चावचनों की जोखिम कम हो जाएगी।
  4. फसल-पशुधन, विविधीकृत खेत, चारे, फसल अवशेष तथा अन्य फसल चक्रानुक्रम के निम्न| मूल्य वाले घटकों को अधिक कुशलतापूर्वक उपयोग कर सकेंगे और खाद का लाभ उठा सकेंगे।

प्रश्न 6.
भारत में जैविक कृषि की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
कुछ दशक पहले, कृषि उत्पादन की मात्रा, किस्म व समय संबंधित क्षेत्र की जलवायु द्वारा निर्धारित होते थे, जबकि वर्तमान में यह बाजार की शक्तियों द्वारा निर्धारित होते हैं। आज पौष्टिकता के स्थान पर उत्पादन मात्रा पर अधिक ध्यान दिया जाता है। कृषि में कीटनाशक दवाइयों और अन्य रासायनिक अवशेषों के अधिकाधिक प्रयोग के कारण विभिन्न प्रकार के रोगों में वृद्धि हुई है। कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग से पर्यावरण भी प्रदूषित हुआ है। मिट्टी, पानी व वायु भी प्रदूषित हो रहे हैं जिसका पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इससे कृषि अधारणीय (unsustainable) हुई है तथा अल्प पोषण व कुपोषण बढ़ा है।। उपर्युक्त सभी समस्याओं का समाधान जैविक कृषि में निहित है। यह पर्यावरण व खाद्य की गुणक्ता बढ़ाती है, उत्पादन लागतों को घटाती है और लोगों को पौष्टिक, सुरक्षित तथा स्वास्थ्यप्रद खाद्य उपलब्ध कराती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्रामीण विकास का क्या अर्थ है? ग्रामीण विकास के उद्देश्य बताइए।
उत्तर
ग्रामीण विकास का अर्थ एवं परिभाषाएँ भारतीय अर्थव्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रप्रधान अर्थव्यवस्था है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस संदर्भ में कहा था–“भारत गाँवों का देश है और इसकी आत्मा गाँवों में निवास करती है। अतः ग्रामीण विकास भारतीय आर्थिक नियोजन का केन्द्रबिन्दु बन गया है। ग्रामीण विकास से आशय ग्रामीण क्षेत्रों के समग्र विकास से है। इसका अर्थ है ग्रामीण क्षेत्र में निवास कर रही जनता का आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक उत्थान करके उसके जीवन-स्तर में सुधार लाना।
इसे विभिन्न विद्वानों द्वारा निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है
आर०एन० आजाद के शब्दों में- “ग्रामीण विकास का अर्थ है-आर्थिक विकास की प्रक्रिया हेतु ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यक अवसंरचनात्मक विकास करना, जिसमें लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास तथा विपणन जैसी द्वितीयक एवं तृतीयक सेवाओं का विकास सम्मिलि है।”

उमा लैली के अनुसार- ग्रामीण विकास से अभिप्राय ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अनेकानेक न्यून आय स्तर के लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाना और उनके विकास के क्रम को आत्मपोषित बनाना है।”

रॉबर्ट चैम्बर्स के अनुसार-“ग्रामीण विकास का तात्पर्य जनसंख्या के उस विशेष वर्ग के विकास करने की रणनीति है, जिसमें निर्धन ग्रामीण पुरुष, महिलाएँ व बच्चे सम्मिलित हैं। इनकी इच्छा और जरूरतों को पूरा करना है ताकि इनका जीवन-स्तर ऊपर उठ सके। इनमें ग्रामीण किसान, कारीगर, भूमिहीन कृषक भी सम्मिलित होते हैं जो अपने जीवन-यापन हेतु ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे हैं।” संक्षेप में, “ग्रामीण विकास से तात्पर्य ग्रामीण क्षेत्रों में निवास कर रहे निर्धन लोगों के जीवन-स्तर में सुधार कर, उन्हें आर्थिक विकास की धारा में प्रवाहित करना है जिसके लिए इनकी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ उन्हें पर्याप्त मात्रा में सामाजिक उपरिव्यय सुविधाएँ भी उपलब्ध करानी होंगी।”

ग्रामीण विकास के उद्देश्य


ग्रामीण विकास के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  1. ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि एवं उद्योगों की उत्पादकता में वृद्धि करके कुल उत्पादन को बढ़ाना।
  2. सभी ग्रामीणों के लिए लाभदायक रोजगार पैदा करना।
  3. गाँवों को आत्मनिर्भर एवं आत्मपोषित बनाना।
  4. प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखते हुए मानव एवं प्रकृति के मध्य पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखना।
  5. देश के आर्थिक विकास में ग्रामीणों की भागीदारी बढ़ाना।
  6. स्वार्थरहित नेतृत्व को प्रोत्साहित करना।

प्रश्न 2.
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में ग्रामीण विकास के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
भारत गाँवों का देश है। भारत के समग्र विकास के लिए ग्रामीण क्षेत्रों का समग्र विकास भी अनिवार्य है। अत: ग्रामीण विकास का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों का सर्वांगीण विकास करना है। इसमें सभी क्षेत्रों (कृषि, उद्योग व सेवा) का विकास सम्मिलित है। 
भारतीय अर्थव्यवस्था में ग्रामीण विकास के महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है

1. निर्धनता निवारण में सहायक- ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के फलस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों में विकास संबंधी गतिविधियाँ बढ़ी हैं। इससे ग्रामीण निर्धन लोग भी उत्पादक कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे हैं। फलस्वरूप उनकी निर्धनता का अनुपात गिर रहा है।

2. बेरोजगारी को दूर करने में सहायक– भारत में निर्धनता का एक प्रमुख कारण व्यापक बेरोजगारी को पाया जाना है। ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यकता से अधिक लोग कृषि कार्यों में लगे रहते हैं। ग्राम विकास कार्यक्रमों में बेरोजगार लोगों को रोजगार सुलभ कराने का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त लघु एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना पर बल दिया जा रहा है।

3. कृषि उत्पादकता में वृद्धि कारक- ग्रामीण विकास के फलस्वरूप कृषि कार्यों में सिंचाई, उर्वरक, कीटनाशक, मशीन आदि का प्रयोग बढ़ने से कृषि उत्पादकता में वृद्धि और उसको तीव्र विकास हुआ है। गत वर्षों में खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कृषि क्षेत्र के इस विकास में ग्रामीण विकास रणनीति की उल्लेखनीय भूमिका रही है।

4. आधुनिक तकनीकी का प्रसारक-  ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से विकास कार्यों को चलाए जाने के कारण कृषि, उद्योग तथा अन्य क्षेत्रों में परम्परागत एवं रूढ़िवादी तकनीकी के स्थान पर नई एवं आधुनिक तकनीक का प्रयोग बढ़ा है। इससे ग्रामीण विकास में तेजी आई है।

5. आय एवं धन के वितरण की विषमताओं का नियंत्रक- भारत में ग्रामीण विकास की प्रक्रियाके फलस्वरूप आय और सम्पत्ति की असमानता में कुछ कमी आई है, इसके बावजूद आज भी आय एवं सम्पत्ति की असमानता पर्याप्त रूप में विद्यमान है। ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के फलस्वखर्प शीघ्र ही इन विषमाताओं में भी कमी होने की आशा है।

6. ग्रामीण क्षेत्र के संसाधनों का विदोहन- गाँवों में परिवहन, संचार, बैंक, विपणन आदि सुविधाओं का विस्तार होने से प्राकृतिक संसाधनों का उचित विदोहन सम्भव हुआ है। इससे ग्रामीण जनता को रोजगार के अवसर सुलभ हुए हैं तथा उनके जीवन-स्तर में भी अपेक्षित सुधार हुआ है।

7. शिक्षा, प्रशिक्षण एवं तकनीकी का विस्तारक- गत वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, प्रशिक्षण एवं तकनीकी सुविधाएँ बढ़ी हैं। इसके फलस्वरूप साक्षरता की दर भी बढ़ी है।।

8. राष्ट्र-निर्माण में भागीदार- ग्रामीण विकास के परिणामस्वरूप ग्रामीण लोगों में राष्ट्र-निर्माण के प्रति भागीदारी बढ़ी है। आर्थिक क्षेत्र में भागीदारी के साथ-साथ राजनीतिक क्षेत्र में भी इनके नेतृत्व का क्षेत्र बढ़ा है।

9. ग्रामीण विकास का चक्रीय प्रवाहक- ग्रामीण विकास कार्यक्रमों से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार-परक उद्योगों की स्थापना की गई है, रोजगार बढ़ा है, निर्धनता में कमी आई है,जीवन-स्तर में सुधार हुआ है तथा आय की असमानताएँ घटी हैं।

प्रश्न 3.
किसान को किस प्रकार की आवश्यकताओं के लिए साख की आवश्यकता होती है? भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में साख व्यवस्था पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर
ग्रामीण विकास के लिए वित्त एक अनिवार्य आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याएँ इतनी विशाल हैं कि पर्याप्त वित्तीय सुविधाओं के अभाव में यहाँ विकास नहीं हो सकता। भारत में कृषि कार्य में लिप्त किसान प्राय: एक निर्धन व्यक्ति होता है, इसके पास सम्पत्ति के नाम पर भूमि का छोटा-सा टुकड़ा भी नहीं होता। भूमि, हल, बैल, बीज, खाद तथा सिंचाई सुविधाओं की व्यवस्था के लिए उसे समय पर वित्तीय साधनों की आवश्यकता होती है। ग्रामीण समुदाय की निर्धनता, कृषि उत्पादन की लम्बी प्रक्रिया और उसकी अनिश्चितता आदि तत्त्वों ने वित्त की समस्या को और भी जटिल बना दिया है। कृषि की प्रकृति ऐसी विचित्र है कि कृषक को केवल उत्पादक ऋणों की ही नहीं अपितु अनुत्पादक ऋणों की भी आवश्यकता होती है।

भारतीय कृषकों की साख संबंधी आवश्यकताएँ

सामान्य रूप से किसानों की साख संबंधी आवश्यकताएँ तीन प्रकार की होती हैं-
1. अल्पकालीन ऋण- ये ऋण प्रायः 15 माह की अवधि तक के होते हैं। ये ऋण मुख्यतः बीज, | खाद आदि के खरीदने तथा पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु लिए जाते हैं।

2. मध्यमकालीन ऋण- ये ऋण प्राय: 15 माह से अधिक परंतु 5 वर्ष से कम की अवधि हेतु लिए जाते हैं। इस प्रकार के ऋणों की आवश्यकता प्रायः पशु व कृषि उपकरणों को खरीदने, कुआँ खुदवाने व भूमि-सुधार के लिए पड़ती है।

3. दीर्घकालीन ऋण- इन ऋणों की अवधि प्रायः 6 वर्ष से 20 वर्ष तक की होती है। ये ऋण सामान्यतः पुराने कर्जा को चुकाने, भूमि खरीदने, ट्रैक्टर खरीदने, भूमि पर स्थायी सुधार करने आदि के लिए किसान प्राप्त करता है। जब से कृषि विकास की नई नीति को अपनाया गया है, देश में अल्पकालीन, मध्यमकालीन और दीर्घकालीन सभी प्रकार की साख में पर्याप्त वृद्धि हुई है।

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में साख व्यवस्था

ग्रामीण क्षेत्रों में साख के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं
1. महाजन, साहूकार एवं देशी बैंक– महाजन एवं साहूकार कृषि के साथ-साथ लेन-देन का 
कार्य भी करते हैं। ये लोग कृषि के अतिरिक्त अन्य कार्यों के लिए भी पैसा उधार देते हैं, किन्तु साख के इस स्रोत के अनेक दोष हैं जैसे—उसकी ब्याज दर ऊँची होती है, वह ब्याज मूलधन देने से पूर्व ही काट लेता है, अनेक प्रकार के खर्चे काट लिए जाते हैं। देशी बैंकर बैंकिंग एवं गैर-बैंकिंग दोनों ही प्रकार के कार्य सम्पन्न करते हैं। ये भी ऋणों पर ऊँची ब्याज दर वसूल करते

2. बहुसंस्था व्यस्था का विकास- ग्रामीण साख आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुसंस्था व्यवस्था का सहारा लिया गया है। इसमें निम्नलिखित संस्थाएँ सम्पिलित हैं

  • व्यापारिको बैंक- व्यापारिक बैंक कृषि विस्तार के लिए अल्पकालीन एवं मध्यमकालीन दोनों प्रकार के ऋण प्रदान करते हैं। अब इनकी अधिकांश शाखाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में ही खोली जा रही हैं। राष्ट्रीयकरण के उपरांत कृषि विकास के क्षेत्र में वाणिज्यिक बैंकों की प्रगति संतोषजनक रही है।
  • क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक- ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे किसानों, सामान्य कारीगरों तथा भूमिहीन श्रमिकों की साख संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना की गई है।
  • सहकारी साख समितियाँ– सहकारी साख समितियों का प्रमुख उद्देश्य किसानों को साख प्रदान करना है। भारत में सहकारी साख व्यवस्था स्तूपाकार है–ग्रामीण स्तर पर सहकारी साख समितियाँ, जिला स्तर पर केन्द्रीय सहकारी समितियाँ तथा राज्य स्तर पर राज्य सहकारी बैंक। ये कृषि विकास के लिए कम ब्याज दर पर पर्याप्त साख सुविधाएँ प्रदान करती हैं।
  • भूमि बन्धक अथवा भूमि विकास बैंक—ये बैंक भूमि की जमानत पर किसानों को दीर्घकालीन ऋण देते हैं। भारत में राज्य स्तर पर केन्द्रीय भूमि बन्धक बैंकों की तथा जिला स्तर पर प्राथमिक भूमि बन्धक बैंकों की स्थापना की गई है।
  • नाबार्ड– सन् 1982 में सम्पूर्ण ग्रामीण वित्त के समन्वयन के लिए एक शीर्ष संस्थान-राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना की गई। नाबार्ड द्वारा दिए जाने वाले ऋणों के प्रमुख क्षेत्र हैं-लघु सिंचाई, भूमि विकास, कार्य यन्त्रीकरण, बागान, मुर्गीपालन, भेड़-पालन, सूअर पालन, मत्स्य पालन, दुग्धशालाओं का विकास व संग्रहण आदि।

  • स्वयं सहायता समूह- होल ही में ग्रामीण साख व्यवस्था में स्वयं सहायता समूहों का प्रादुर्भाव हुआ है। इसके अंतर्गत प्रत्येक सदस्य न्यूनतम अंशदान करता है। एकत्रित राशि में से जरूरतमंद सदस्यों को ऋण दिया जाता है। इस ऋण की राशि छोटी-छोटी किस्तों में लौटायी जाती है। ब्याज की दर भी उचित रखी जाती है। इसे अति लघु साख कार्यक्रम कहते हैं।

प्रश्न 4.
अपनी उपज को बेचने के लिए एक किसान को किस प्रकार की सुविधाओं की आवश्यकता| पड़ती है? सरकार की ओर से क्षेत्र में क्या सहायता दी जा रही है?
उत्तर
एक किसान विभिन्न माध्यमों से अपनी उपज को बेचता है। इसके लिए किसान को एक उत्तम विपणन प्रणाली की आवश्यकता होती है, एक ऐसी प्रणाली जो उपभोक्ताओं एवं उत्पादकों दोनों के हितों की रक्षा कर सके साथ ही विपणन व्यय भी न्यूनतम हो।।

कृषि उपज के विपणन की अनिवार्य सुविधाएँ

कृषि उपज को बेचने के लिए एक किसान के लिए निम्नलिखित सुविधाएँ अपेक्षित हैं

  1. उत्पादन एवं विक्रय के मध्यान्तर में उपज़ के संग्रहण की सुविधा।
  2. कृषि उपज को विपणन केन्द्र तक ले जाने के लिए पर्याप्त एवं मितव्ययी यातायात के साधन।
  3. कमीशन लेने वाले व विभिन्न प्रकार की कटौती काटने वाले वे धोखेबाज मध्यस्थों का उन्मूलन।।
  4. बाजार मूल्यों के बारे में निरंतर जानकारी प्राप्त करने के लिए संचार माध्यमों की उपलब्धि।
  5. कृषि उपज की विभिन्न किस्मों के मूल्यों में अंतर होना चाहिए ताकि अच्छी किस्म के कृषि उत्पादों | का यथोचित मूल्य मिल सके।
  6. यदि वह अतिरेक माल को भण्डारण करना चाहता है, तो साख सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए।

कृषि उपज के विपणन में सुधार लाने के लिए सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं

  1. नियमित मर्पियों की स्थापना की गई है तथा उनकी गतिविधियों का मानकीकरण किया गया है।
    ताकि उन्हें मध्यस्थों के शोषण से बचाया जा सके और कृषि उपज को नियमित रूप से मण्डियों में बेचेन के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।
  2. कृषि उपज का श्रेणीकरण (grading) तथा मानकीकरण किया जाता है ताकि किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल सके।
  3. सहकारी कृषि विपणन समितियों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया गया है।
  4. भण्डारण सुविधाओं का विस्तार किया गया है। खाद्यान्नों को गोदामों में रखने का काम भारतीय खाद्य निगम (FCI) करता है।
  5. देश में माप-तौल की मीट्रिक प्रणाली आरम्भ की गई है।
  6. बेहतर एवं सस्ती परिवहन सुविधाएँ प्रदान की गई हैं।
  7. विभिन्न संचार माध्यमों द्वारा महत्त्वपूर्ण कृषि वस्तुओं की बाजार में प्रचलित कीमतों की सूचना किसानों को उपलब्ध कराई जाती है।
  8. देश में कृषि पदार्थों के मूल्यों में अनावश्यक, उतार-चढ़ाव न आए तथा किसानों के हित सुरक्षित | रहें इस दृष्टि से ‘कृषि कीमत एवं लागत आयोग की स्थापना की गई है। इसका मुख्य कार्य ‘न्यूनतम समर्थित मूल्य’ (MSP) की संस्तुति करना है।

प्रश्न 5.
जैविक कृषि क्या है? जैविक कृषि के लाभ व हानियाँ भी बताइए।
उत्तर

जैविक कृषि अर्थ

जैविक कृषि एक धारणीय कृषि प्रणाली है। यह वह प्रणाली है जो पर्यावरणीय संतुलन को पुनः स्थापित करके उसका संरक्षण एवं संवर्द्धन करती है। यह भूमि की दीर्घकालीन उपजाऊ शक्ति को बनाए रखती है, अति पौष्टिक भोजन का उत्पादन करने में सहायक होती है तथा भूमि के सीमित संसाधनों का न्यूनतम उपयोग करती है। इसमें फसल-चक्र, पशु खाद तथा कूड़ा-करकट खाद का उपयोग, यांत्रिक कृषि तथा प्राकृतिक पदार्थों से बने कीटनाशकों से कीट नियंत्रण किया जाता है ताकि भूमि की उपजाऊ शक्ति को नियमित बनाए रखा जा सके, पौधों को उनकी आवश्यकतानुरूप पोषकों की पूर्ति की जा सके। जैविक कृषि के लाभ व हानियाँ लाम–

जैविक कृषि के प्रमुख लाभ निम्नलिखित है

  1. जैविक कृषि करने वाले किसान पेट्रोलियम आधारित संसाधन (जो एक अनव्यीकरण संसाधन है) का प्रयोग नहीं करते।
  2. परम्परागत फसलों की तुलना में जैविक फसलों में अधिक मात्रा में गौण मेटाबोलाइट्स पाए जाते | हैं जिससे पौधों की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ जाती है।
  3. जैविक कृषि से मिट्टी की पौष्टिकता बढ़ जाती है।
  4. इसमें अधिक जैव सक्रियता व जैव विविधता पाई जाती है।
  5. फलोत्पाद अधिक मीठे, स्वादिष्ट व पौष्टिक होते हैं।
  6. जैविक फसलों की उत्पादन दरों में बहुत अधिक उच्चावचन नहीं होते।
  7. जैविक मिट्टी अधिकाधिक उर्वर होती जाती है।
  8. जैविक फसलोत्पाद अधिक पौष्टिक होते हैं। इनमें विटामिन्स के उच्च स्तर पाए जाते हैं।

हानि- जैविक कृषि की प्रमुख हानियाँ निम्नलिखित हैं
1. अजैविक कृषि की तुलना में जैविक कृषि एक महँगी प्रणाली है। इसमें प्रति हैक्टेयर लागत अधिक आती है।
2. यह अधिक श्रम गहन होती है।
3. इसमें पशु खाद का प्रयोग किया जाता है; जिसमें घातक जीवाणु पलते रहते हैं।
4. जैविक खेती के प्रति हेक्टेयर उत्पादन तुलनात्मक रूप से कम होता है।
5. नाशक जीव फसलों को शीघ्र नष्ट कर सकते हैं।

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