UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोकवृत्त

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name आलोकवृत्त (गुलाब खण्डेलवाल)
Number of Questions 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोकवृत्त (गुलाब खण्डेलवाल)

प्रश्न 1:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में बताइए।
या
‘आलोकवृत्त की कथावस्तु (कथानक) पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ का कौन-सा सर्ग आपको सर्वोत्तम प्रतीत होता है और क्यों ? सोदाहरण समझाइए।
या
‘आलोकवृत्त’ के चतुर्थ सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘आलोकवृत्त के आधार पर महात्मा गांधी के जीवनवृत्त की किसी प्रमुख घटना का वर्णन कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर सन् 1942 ई० की जनक्रान्ति पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ काव्य में वर्णित स्वतन्त्रता-प्राप्ति की प्रमुख घटनाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के तृतीय सर्ग के आधार पर गांधी जी के अफ्रीका-प्रवास के जीवन पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के सप्तम सर्ग का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग के आधार पर गांधी जी का जीवन-परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के आधार पर स्वाधीनता की ऐतिहासिक यात्रा की संक्षिप्त समीक्षा कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर देश के स्वतन्त्रता संग्राम में गांधी जी के योगदान का वर्णन कीजिए।
या
” ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य आधुनिक भारत के महान संघर्ष का जीता-जागता सच्चा इतिहास है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की पंचम एवं षष्ठ सर्ग की कथा पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में वर्णित प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
“आलोकवृत्त’ के कथानक में आठ सर्ग हैं, जिनकी कथावस्तु संक्षेप में निम्नलिखित है

प्रथम सर्ग : भारत का स्वर्णिम अतीत

प्रथम सर्ग में कवि ने भारत के अतीत के गौरव तथा तत्कालीन पराधीनता का वर्णन किया है। कवि ने बताया है। कि भारत वेदों की भूमि रही है। भारतवर्ष ने ही संसार को सर्वप्रथम ज्ञान की ज्योति दी थी, किन्तु दुर्भाग्यवश एक समय ऐसा आया कि भारतवासी यह भूल गये कि हम कितने गौरवमण्डित थे ? इसका परिणाम यह हुआ कि भारतवर्ष सैंकड़ों वर्ष तक दासता की बेड़ियों में जकड़ा रहा। सन् 1857 ई० की क्रान्ति के पश्चात् गुजरात के ‘पोरबन्दर’ नामक स्थान पर एक दिव्य ज्योतिर्मय विभूति मोहनदास करमचन्द गांधी के रूप में प्रकट हुई, जिसने हमें विदेशियों की दासता से मुक्त करवाया।

द्वितीय सर्ग : गांधी जी का प्रारम्भिक जीवन

द्वितीय सर्ग में गांधी जी के जीवन के क्रमिक विकास पर प्रकाश डाला गया है। वे बचपन में कुसंगति में फैंस गये थे, किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपने पिता के समक्ष अपनी त्रुटियों पर पश्चात्ताप किया और दुर्गुणों को सदैव के लिए छोड़ने की प्रतिज्ञा की और आजीवन उसका निर्वाह किया। इसके बाद कस्तूरबा के साथ गांधी जी का विवाह हुआ। इसके कुछ समय बाद उनके पिताजी का देहान्त हो गया। वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैण्ड गये। उनकी माँ ने विदेश में रहकर मांस-मदिरा का प्रयोग न करने के लिए समझाया

मद्य-मांस-मदिराक्षी से बचने की शपथ दिलाकर।
माँ ने तो दी विदा पुत्र को मंगल तिलक लगाकर।।

इंग्लैण्ड में सात्त्विक जीवन व्यतीत करते हुए भी वे एक दिन एक कलुषित स्थान पर पहुँच गये, लेकिन उन्होंने अपने चरित्र को कलुषित होने से बचा लिया। वहाँ से वे बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। भारत आने पर उन्हें उनकी माता के देहान्त का दुःखद समाचार मिला। यहीं पर द्वितीय सर्ग की कथा समाप्त हो जाती है।

तृतीय सर्ग : गांधी जी का अफ्रीका-प्रवास

तृतीय सर्ग में गांधी जी के अफ्रीका में निवास का वर्णन है। एक बार रेलगाड़ी में यात्रा करते समय एक गोरे अंग्रेज ने उन्हें काला होने के कारण अपमानित करके रेलगाड़ी से नीचे उतार दिया। रंगभेद की इस कुटिल नीति से गांधी जी के हृदय को बहुत दु:ख पहुँचा। वे भारतीयों की दुर्दशा से चिन्तित हो उठे। यहाँ पर कवि ने गांधी जी के मन में उत्पन्न अन्तर्द्वन्द्व का बड़ा सुन्दर चित्रण किया है। गांधी जी ने सत्य और अहिंसा का सहारा लेकर असत्य और हिंसा का सामना करने का दृढ़ निश्चय किया। अपनी जन्मभूमि से दूर विदेश की भूमि पर उन्होंने मानवता के उद्धार का प्रण लिया

पशु-बल के सम्मुख आत्मा की शक्ति जगानी होगी।
मुझे अहिंसा से हिंसा की आग बुझानी होगी।

सत्य और अहिंसा के इस मार्ग को उन्होंने सत्याग्रह का नाम दिया। गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में सैकड़ों सत्याग्रहियों का नेतृत्व किया। दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष-समाप्ति के साथ ही तृतीय सर्ग समाप्त हो जाता है।

चतुर्थ सर्ग : गांधी जी का भारत आगमन

चतुर्थ सर्ग में गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट आते हैं। भारत आकर गांधी जी ने लोगों को स्वतन्त्रता प्राप्त करने हेतु जाग्रत किया। उन्होंने साबरमती नदी के तट पर अपना आश्रम बनाया। अनेक लोग गांधी जी के अनुयायी हो गये, जिनमें डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, विनोबा भावे, ‘राजगोपालाचारी’, सरोजिनी नायडू, ‘दीनबन्धु’, मदनमोहन मालवीय, सुभाषचन्द्र बोस आदि प्रमुख थे। अंग्रेज देश की जनता पर भारी अत्याचार कर रहे थे। गांधी जी ने चम्पारन में नील की खेती को लेकर आन्दोलन आरम्भ किया; जिसमें वे सफल हुए। एक अंग्रेज द्वारा अपनी पत्नी के हाथों गांधी जी को विष देने तक का प्रयास किया गया, परन्तु वह स्त्री गांधी जी के दर्शन कर ऐसा ने कर सकी। इसके विपरीत उन दोनों को हृदय-परिवर्तन हो गया। इसी सर्ग में ‘खेड़ा-सत्याग्रह का वर्णन भी हुआ है। कवि ने इस सत्याग्रह में सरदार वल्लभभाई पटेल को चरित्र-चित्रण विशेष रूप से किया है।

पंचम सर्ग : असहयोग आन्दोलन

इस सर्ग में कवि ने यह चित्रित किया है कि गांधी जी के नेतृत्व में स्वाधीनता आन्दोलन निरन्तर बढ़ता गया। अंग्रेजों की दमन-नीति भी बढ़ती गयी। गांधी जी के नेतृत्व में स्वतन्त्रता-प्रेमियों का समूह नागपुर पहुँचता है। नागपुर के कांग्रेस-अधिवेशन में गांधी जी के ओजस्वी भाषण ने भारतवर्ष के लोगों में नयी स्फूर्ति भर दी, किन्तु अंग्रेजों की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति ने हिन्दुओं-मुसलमानों में साम्प्रदायिक दंगे करवा दिये। गांधी जी को बन्दी बना लिया गया। उन्होंने सत्याग्रह का कार्यक्रम स्थगित कर दिया। कारागार से छूटने के बाद उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता, शराब-मुक्ति, हरिजनोत्थान, खादी-प्रचार आदि रचनात्मक कार्यों में अपना सम्पूर्ण समय लगाना आरम्भ कर दिया। हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए गांधी जी ने इक्कीस दिनों का उपवास रखा

आत्मशुद्धि का यज्ञ कठिन, यह पूरा होने को जब आया।
बापू ने इक्कीस दिनों के, अनशन का संकल्प सुनाया।

फिर लाहौर में पूर्ण स्वतन्त्रता के प्रस्ताव के साथ ही पाँचवाँ सर्ग समाप्त हो जाता है।

षष्ठ सर्ग : नमक सत्याग्रह

इस सर्ग में गांधी जी द्वारा चलाये गये नमक-सत्याग्रह का वर्णन हुआ है। गांधी जी ने समुद्रतट पर बसे ‘डाण्डी नामक स्थान की पैदल यात्रा 24 दिनों में पूरी की। नमक आन्दोलन में हजारों लोगों को बन्दी बनाया गया। अंग्रेज सरकार ने लन्दन में ‘गोलमेज सम्मेलन बुलाया, जिसमें गांधी जी को आमन्त्रित किया गया। इसके परिणामस्वरूप सन् 1937 ई० में ‘प्रान्तीय स्वराज्य की स्थापना हुई। इसके साथ ही षष्ठ सर्ग समाप्त हो जाता है।

सप्तम सर्ग : सन् 1942 की जनक्रान्ति

द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ हो गया। अंग्रेज सरकार भारतीयों का सहयोग तो चाहती थी, किन्तु उन्हें पूर्ण अधिकार देना नहीं चाहती थी। क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद 1942 ई० में गांधी जी ने अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का नारा दिया। सम्पूर्ण देश में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। इसका वर्णन कवि ने बड़े ही सजीव रूप से किया है

थे महाराष्ट्र-गुजरात उठे, पंजाब-उड़ीसा साथ उठे।
बंगाल इधर, मद्रास उधर, मरुथल में थी ज्वाला घर-घर ॥

कवि ने इस आन्दोलन का वर्णन अत्यधिक ओजस्वी भाषा में किया है। बम्बई अधिवेशन के बाद गांधी जी सहित सभी भारतीय नेता जेल में डाल दिये जाते हैं। पूरे देश में इसकी विद्रोही प्रतिक्रिया होती है। कवि के शब्दों में,

जब क्रान्ति लहर चल पड़ती है, हिमगिरि की चूल उखड़ती है।
साम्राज्य उलटने लगते हैं, इतिहास पलटने लगते हैं।

इस सर्ग में कवि ने गांधी जी एवं कस्तूरबा के मध्य हुए एक वार्तालाप का भी भावपूर्ण चित्रण किया है जिसमें गांधी जी के मानवीय स्वभाव और कस्तूरबा की सेवा-भावना, मूक त्याग और बलिदान का सम्यक् निरूपण किया है।

अष्टम सर्ग : भारतीय स्वतन्त्रता का अरुणोदय

अष्टम सर्ग का आरम्भ भारत की स्वतन्त्रता से किया गया है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् देशभर में हिन्दू-मुस्लिम-साम्प्रदायिक दंगे हो जाते हैं। गांधी जी को इससे बहुत दुःख हुआ। वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं

प्रभो ! इस देश को सत्पथ दिखाओ, लगी जो आग भारत में बुझाओ।
मुझे दो शक्ति इसको शान्त कर दें, लपट में रोष की निज शीश धर दें।

इस कल्याण-कामना के साथ ही यह खण्डकाव्य समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 2:
कवि ने ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की रचना सोद्देश्य की है। इस कथन को समझाइट।
या
” ‘आलोकवृत्त’ मनुष्य के जीवन में आशा और आस्था का आलोक विकीर्ण करता हुआ उसे मानवता के उच्चतम शिखरों की ओर उन्मुख करता है।” इस कथन की सार्थकता सोदाहरण सिद्ध कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य का सन्देश अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य का उद्देश्य महात्मा गांधी के आदर्शों का निदर्शन है। प्रमाणित कीजिए।
या
“‘आलोकवृत्त’ में स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास की झाँकी के दर्शन होते हैं।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ में जीवन के श्रेष्ठ मूल्यों का उद्घोष है। सिद्ध कीजिए।
या
“‘आलोकवृत्त’ पीड़ित मानवता को सत्य और अहिंसा का शाश्वत सन्देश देता है।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं ?
या
“‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में भारत के सांस्कृतिक-ऐतिहासिक इतिहास को वाणी दी गयी है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
” ‘आलोकवृत्त में युग-युग तक मानवता को सत्य, प्रेम और अहिंसा के दिव्य सन्देश से अनुप्राणित करने की भावना है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के उद्देश्य (सन्देश) को स्पष्ट कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में वर्णित जीवन के अनुकरणीय मूल्यों पर अपने विचार उदाहरण सहित लिखिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य राष्ट्रीय चेतना का एक प्रतीक है। सिद्ध कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य का कथानक देश-प्रेम और मानव-कल्याण की भावना से ओत-प्रोत है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
” ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में ऐसे चिरंतन आदर्शों और सार्वभौम मूल्यों का प्रतिपादन है, जो मानव समाज को प्रेरणा देता है।” इस दृष्टि से ‘आलोकवृत्त’ पर अपना विचार प्रस्तुत कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में वर्णित गांधी जी के मानसिक संघर्ष को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
शीर्षक की सार्थकता – कवि गुलाब खण्डेलवाल ने आलोकवृत्त’ में महात्मा गांधी के सदाचार एवं मानवता के गुणों से आलोकित व्यक्तित्व को चित्रित किया है। इस खण्डकाव्य का विषय, उद्देश्य एवं मूल भावना यही है। महात्मा गांधी के जीवन को हम आलोक स्वरूप कह सकते हैं, क्योंकि उन्होंने भारतीय संस्कृति की चेतना को अपने सद्गुणों एवं सविचारों से आलोकित किया है। विश्व में सत्य, प्रेम, अहिंसा आदि मानवीय भावनाओं का आलोक उनके द्वारा ही फैलाया गया; इसलिए उनके जीवन-वृत्त को ‘आलोक-वृत्त’ कहना युक्तियुक्त ही है। इस दृष्टिकोण से यह शीर्षक उपयुक्त है। यह शीर्षक महात्मा गांधी के जीवन, उनके चरित्र, गुणों, सिद्धान्तों एवं दर्शन को पूर्णरूपेण परिभाषित करने में सफल हुआ है। प्रत्येक साहित्यिक रचना के पीछे लेखक का कोई-न-कोई उद्देश्य अवश्य होता है। ‘आलोकवृत्त’ में भी कवि का उद्देश्य निहित है। इसका उद्देश्य या सन्देश निम्नवत् है

(1) स्वदेश-प्रेम की प्रेरणा – इस खण्डकाव्य का सर्वप्रथम उद्देश्य देशवासियों के हृदय में स्वदेश-प्रेम की भावना जाग्रत करना है। कवि ने भारत के गौरवमय अतीत का वर्णन कर लोगों को अपने महान् देश का । वास्तविक स्वरूप दिखाया है

जिसने धरती पर मानवता का, पहला जयघोष किया था।
बर्बर जग को सत्य-अहिंसा का, पावन सन्देश दिया था।

इस प्रकार कवि भारत के अतीत का वर्णन करके भारत की वर्तमान अधोगति के प्रति भारतीय जनता के हृदय में टीस, आक्रोश एवं चेतना जाग्रत करना चाहता है।

(2) सत्य-अहिंसा का महत्त्व – आलोकवृत्त के माध्यम से कवि ने सत्य और अहिंसा को प्रतिष्ठित किया है। कवि ने देश की स्वाधीनता हेतु सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देकर लोगों को श्रेष्ठ आचरणवान् बनने की शिक्षा दी है। कवि ने गांधी जी का उदाहरण प्रस्तुत करके यह सिद्ध किया है कि हम सत्य और अहिंसा के द्वारा अपने प्रत्येक संकल्प को पूरा कर सकते हैं

अहिंसा ने अजब जादू दिखाये।
विरोधी हैं खड़े कन्धा मिलाये ॥

(3) सहयोग एवं राष्ट्रीय एकता – कवि यह अनुभव करता है कि अंग्रेज शासकों ने हमारे देश में तरह-तरह की फूट डालकर देश को विघटित करने का प्रयास किया है। उसका मानना है कि हमारे देश की स्वतन्त्रता, एकता एवं सहयोग की भावना के आधार पर ही सुरक्षित रह सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए आलोकवृत्त’ खण्डकाव्यं में यह सन्देश दिया गया है कि हमें साम्प्रदायिक एवं प्रान्तीय भेदभाव को भूलकर राष्ट्र की एकता बनाये रखनी है

यदि मिलकर इस राष्ट्र-यज्ञ में, सब कर्तव्य निभायें अपना।
एक वर्ष में हो पूरा, मेरा रामराज्य का सपना ॥

(4) मानवमात्र का कल्याण – कवि ने मात्र भारत के ही कल्याण की कामना नहीं की है, वरन् वह तो सम्पूर्ण मानवता का कल्याण चाहता है

जुड़ता जब सम्बन्ध हृदय का, भेदभाव मिट जाता है।
देश-जाति रंगों से गहरा, मानवता का नाता है।

(5) मानवीय-मूल्यों की प्रतिष्ठा-आलोकवृत्त’ के रचनाकार का उद्देश्य यह रहा है कि सर्वत्र सत्य, प्रेम,
सदाचार, न्याय, सहिष्णुता आदि मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा हो; उदाहरणार्थ

प्रेम सृष्टि का मूल्य धर्म, चेतना का नियम सनातन ।
इसके कारण ही विनाश से, बचो आज तक जीवन ॥
X                          X                     X
लोकतन्त्र का रथ समता के, पहियों पर चलता है।

(6) त्याग तथा बलिदान की भावना का सन्देश – कवि का एक सन्देश देश के लिए त्याग एवं बलिदान से सम्बन्धित है। गांधी जी ने देश की स्वतन्त्रता के लिए बड़े से बड़ा बलिदान किया तथा अनेक कष्ट सहे। कवि ने गांधी जी के उदाहरण को प्रस्तुत करके देश के युवकों को देश के लिए त्याग एवं बलिदान का सन्देश दिया है।

(7) पवित्र साधन अपनाने का सन्देश – गांधी जी का विचार था कि उत्तम साध्यों की प्राप्ति के लिए पवित्र साधनों को ही अपनाना चाहिए। गांधी जी ने देश की स्वतन्त्रता के लिए प्रेम, सत्य तथा अहिंसा को ही साधन के रूप में अपनाया था। गांधी जी के जीवन के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कवि ने प्रत्येक को केवल पवित्र साधनों को ही अपनाने का महान् सन्देश दिया है।
इस प्रकार आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य गांधी जी के जीवन-चरित को माध्यम बनाकर राष्ट्रप्रेम, सत्य, अहिंसा, परोपकार, न्याय, समता, सदाचार आदि की प्रेरणा देने के अपने उद्देश्य में पूर्णतः सफल रहा है।

प्रश्न 3:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की समीक्षा कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के संवाद-सौष्ठव की निदर्शना कीजिए।
या
खण्डकाव्य की दृष्टि से ‘आलोकवृत्त’ का मूल्यांकन कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ एक सफल खण्डकाव्य है। इस उक्ति की सप्रमाण पुष्टि कीजिए।
या
इतने बड़े कथानक को ‘आलोकवृत्त’ में समेटकर कवि ने अपनी प्रबन्ध पदता का परिचय दिया है। इस कथन पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
‘आलोकवृत्त’ की कथावस्तु भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित है। कवि ने कल्पना का पुट देकर कथा को सरस तथा हृदयस्पर्शी बना दिया है। कवि ने भारत के अतीत के गौरव का स्मरण करते हुए तत्कालीन स्थिति का वर्णन किया है। आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की मुख्य विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) प्रभावपूर्ण चित्रण और सुगठित घटनाक्रम – ‘आलोकवृत्त’ की कथावस्तु के माध्यम से कवि ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम का संक्षिप्त इतिहास प्रस्तुत किया है। आरम्भ के चार सर्गों में स्वाधीनता-आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार की गयी है और अन्तिम चार सर्गों में दक्षिण अफ्रीका से गांधी जी के भारत-आगमन, स्वतन्त्रता-आन्दोलन, स्वतन्त्रता-प्राप्ति और स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत में हुए साम्प्रदायिक दंगों का इतिहास रोचक शैली में कलात्मक रूप से प्रस्तुत किया है।

(2) सफल चरित्रांकन : गांधी जी की जीवनी – आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य वास्तव में गांधी जी की संक्षिप्त जीवन-कथा है। कवि ने गांधी जी के जन्म; शैशवकालीन घटनाओं; पिता की मृत्यु; कस्तूरबा से विवाह; इंग्लैण्ड-यात्रा; दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटना; चम्पारन-खेड़ा सत्याग्रह; कलकत्ता, कानपुर, लाहौर के कांग्रेस-अधिवेशन; नमक सत्याग्रह; गोलमेज सम्मेलन; 1942 ई० में भारत छोड़ो आन्दोलन; कस्तूरबा की मृत्यु; साम्प्रदायिक संघर्ष; इक्कीस दिनों का अनशन तथा स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद गांधी जी के मन की चिन्ता का क्रमबद्ध वर्णन प्रस्तुत किया है। वास्तव में यह गांधी जी की काव्यात्मक संक्षिप्त जीवनी है।

(3) कथा-संगठन – आलोकवृत्त’ का आरम्भ भारत के गौरवमये अतीत से होता है। इसके साथ ही । गांधीकालीन भारत की दुर्दशा का वर्णन किया गया है, जो बहुत ही प्रेरणाप्रद है। गांधी जी का शिक्षा ग्रहण करने इंग्लैण्ड जाना; वहाँ से बैरिस्टर बनकर दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह करना तथा तत्पश्चात् कथा का उतारे दिखाया गया है। इसके बाद भारतवर्ष तथा विश्व की मंगल-कामना के साथ कथावस्तु का अन्त हो जाता है।

विषमता, फूट, मिथ्याचार भागे, सभी का हो उदय, नव ज्योति जागे।
विजित हों प्यार से तक्षक विषैले, दयामय! विश्व में सद्भाव फैले ॥

इस प्रकार कथावस्तु पाँचों कार्यावस्थाओं की दृष्टि से पूर्ण सफल है।
खण्डकाव्य के शिल्प के अनुसार ‘आलोकवृत्त’ को आठ सर्गों में विभक्त किया गया है। सर्गों का क्रम कवि की रचनात्मक प्रतिभा का द्योतक है। कवि ने इस खण्डकाव्य में महात्मा गांधी के समग्र जीवन-वृत्त को इस रूप में चित्रित किया है कि भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम के पूरे इतिहास के साथ-साथ गांधी जी के सत्य और अहिंसा के सिद्धान्त भी पूरी तरह प्रतिपादित होते हैं।

(4) संवाद-योजना – कथावस्तु के विस्तार के कारण इस खण्डकाव्य में संवाद-योजना को प्रमुखता प्रदान नहीं की गयी है। यद्यपि यह खण्डकाव्य प्रधान रूप से वर्णनात्मक ही है; तथापि विभिन्न स्थानों पर महात्मा गांधी के संक्षिप्त संवाद भी प्रस्तुत किये गये हैं। कुछ अन्य पात्रों द्वारा भी संवादों का प्रयोग हुआ है, किन्तु इसे नगण्य ही कहा जाएगा।

(5) पात्र एवं चरित्र-चित्रण – आलोकवृत्त’ में गांधी जी का चरित्र धीरोदात्त नायक के रूप में विकसित हुआ है। यद्यपि उनमें मानवोचित दुर्बलताएँ हैं; परन्तु अपनी ईमानदारी, सरलता, सत्यनिष्ठा और लगन के बल पर वे उन दुर्बलताओं पर सहज विजय प्राप्त कर लेते हैं। गांधी जी में दम्भ और पाखण्ड का लेशमात्र अंश भी नहीं है। वे अपने प्रेम से विरोधियों तक के हृदय को जीत लेते हैं। मानवता में उनकी अखण्ड आस्था है और इसी आस्था के बल पर वे देश, जाति और भेदभाव पर आधारित सीमाओं का अतिक्रमण करके मानव-एकता को प्रतिष्ठित करते हैं। मानव-हृदय की एकता और सभी के प्रति पारस्परिक समानता का भाव उनके अहिंसा-सिद्धान्त की आधारशिला है। इस प्रकार प्रस्तुत खण्डकाव्य में गांधी जी को चरितनायक बनाकर उनके प्रेरणाप्रद विचारों को वाणी दी गयी है। अन्य पात्रों का समावेश नायक के चरित्र पर प्रकाश डालने हेतु प्रसंगवश ही किया गया है। वे कवि के उद्देश्य को अभिव्यक्ति देने में सहायकमात्र हैं।

(6) वर्णन में भावात्मकता – आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु का आरम्भ बड़ा ही रोचक है। मध्य की घटनाएँ कौतूहल बढ़ाने वाली हैं। कथा का अन्त बड़ा ही मार्मिक एवं प्रभावशाली है। खण्डकाव्य के शिल्प के अनुसार ‘आलोकवृत्त’ की कथा वर्णनात्मक है। वर्णनात्मक स्थलों को भावात्मक स्वरूप प्रदान करने में कवि ने अपना पूरा-पूरा प्रयास किया है। मार्मिक स्थलों के चयन में कवि की प्रतिभा एवं सहृदयता भी पूर्णरूपेण परिलक्षित होती है।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि आलोकवृत्त’ में गांधी जी जैसे महान् लोकनायक के गुणों को आधार बनाकर काव्य-रचना की गयी है। कथा की पृष्ठभूमि विस्तृत है, किन्तु कवि ने गांधी जी की चारित्रिक विशेषताओं को स्पष्ट करने हेतु आवश्यक प्रसंगों का चयनकर उसे इस प्रकार संगठित एवं विकसित किया है कि वह खण्डकाव्य के उपर्युक्त बन गयी है। गौण पात्रों का चित्रण नायक के चरित्र की विशेषताओं को प्रकाशित करने हेतु किया गया है। आदर्शपूर्ण भावनाओं की स्थापना हेतु रचित इस काव्य-ग्रन्थ में यद्यपि रसों एवं छन्दों की विविधता है; तथापि इससे खण्डकाव्य के उद्देश्य एवं उसके विधा सम्बन्धी तत्त्वों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। अतः इस काव्यग्रन्थ को एक आदर्श सफल खण्डकाव्य कहना उपयुक्त होगा।

प्रश्न 4:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर गांधी जी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के नायक (प्रमुख पात्र) गांधी जी का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के आधार पर गांधी जी के जीवन और आदर्शों का उल्लेख कीजिए।
या
” ‘आलोकवृत्त’ में गांधी जी धीरोदात्त नायक और लोकनायक के रूप में चित्रित किये गये हैं।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं? तर्कयुक्त उत्तर दीजिए।
या
” ‘आलोकवृत्त’ में गांधी जी का कृतित्व ही नहीं उनका जीवन-दर्शन और चिन्तन भी अभिव्यक्त हुआ है।” इस कथन की सार्थकता प्रमाणित कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर गांधी जी के चरित्र की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर गांधी जी के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवतु हैं

(1) सामान्य मानवीय दुर्बलताएँ – गांधी जी का आरम्भिक जीवन एक साधारण मनुष्य की भाँति मानवीय दुर्बलताओं वाला रहा है। उन्होंने एक बार अपने गुरु से छुपकर मांस-भक्षण किया था; उदाहरणार्थ

करने लगे मांस-भक्षण, गुरुजन की आँख बचाकर।।

किन्तु बाद में उन्होंने अपनी इन दुर्बलताओं पर अपनी आत्मिक शक्ति के बल पर पूर्ण विजय पा ली।

(2) देश-प्रेमी – आलोकवृत्त’ में गांधी जी के चरित्र की सर्वप्रथम विशेषता उनका देशप्रेम है। वे देशप्रेम के कारण अनेक बार कारागार जाते हैं, जहाँ उन्हें अंग्रेजों के अपमान-अत्याचार सहने पड़ते हैं। उन्होंने अपना सर्वस्व देश के लिए न्योछावर कर दिया। भारत के लिए उनका कहना था

तू चिर प्रशान्त, तू चिर अजेय,
सुर-मुनि-वन्दित, स्थित,’ अप्रमेय
हे सगुण ब्रह्म, वेदादि-गेय,
हे चिर अनादि हे चिर अशेष
मेरे भारत, मेरे स्वदेश।

(3) सत्य और अहिंसा के प्रबल समर्थक – गांधी जी देश की स्वतन्त्रता केवल सत्य और अहिंसा के द्वारा ही प्राप्त करना चाहते हैं। असत्य और हिंसा का मार्ग उन्हें अच्छा नहीं लगता। वे कहते हैं

पशुबल के सम्मुख आत्मा की, शक्ति जगानी होगी।
मुझे अहिंसा से हिंसा की, आग बुझानी होगी।

अहिंसा व्रत का पूर्ण रूप से पालन उनके जैसा कोई विरला व्यक्ति ही कर सकता है।

(4) दृढ़ आस्तिक – गांधी जी पुरुषार्थी हैं तो भी वे ईश्वर की सत्ता में अटूट विश्वास रखते हैं। उनका मानना है। कि साधन पवित्र होने चाहिए और परिणाम ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए। वे प्रत्येक कार्य ईश्वर को साक्षी मानकर करते हैं। यही कारण है कि वे मात्र पवित्र साधनों को प्रयोग ही उचित समझते हैं

क्या होगा परिणाम सोच हूँ, पर क्यों सोचें, वह तो।
मेरा क्षेत्र नहीं, स्रष्टा का, जो प्रभु करे वही हो ।।

(5) स्वतन्त्रता-प्रेमी – गांधी जी के जीवन का मूल उद्देश्य भारत को स्वतन्त्र करवाना है। वे भारतमाता की स्वतन्त्रता के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। देशंवासियों को परतन्त्रता की बेड़ियाँ काटने के लिए प्रेरित करते हुए वे कहते हैं

जाग तुझे तेरी अतीत, स्मृतियाँ धिक्कार रही हैं।
जाग-जाग तुझे भावी, पीढ़ियाँ पुकार रही हैं।

(6) मानवतावादी – गांधी जी मानव-मानव में अन्तर नहीं मानते। वे सबके लिए समानता के सिद्धान्त में विश्वास करते हैं। उन्होंने जीवन भर ऊँच-नीच, जाति-पाँति और रंग-भेद का डटकर विरोध किया। अछूत कहे जाने वाले भारतीयों के उद्धार के लिए वे सतत प्रयत्नशील रहे। इस भेदभाव से उन्हें बहुत दुःख होता था

जिसने मारा मुझे, कौन वह, हाथ नहीं क्या मेरी।
मानवता तो एक, भिन्न बस उसका-मेरा घेरा॥

(7) भावात्मक, राष्ट्रीय और हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक – गांधी जी ‘विश्वबन्धुत्व’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से ओत-प्रोत थे। वे सभी को सुखी व समृद्ध देखना चाहते थे। इन्होंने भारत की समग्र जनता को एकता के सूत्र में बाँधने के लिए जीवन-पर्यन्त प्रयास किया और हिन्दू-मुसलमानों को भाई-भाई की तरह रहने की प्रेरणा दी। उनका कहना था

यदि मिलकर इस राष्ट्रयज्ञ में सब कर्तव्य निभायें अपना,
एक वर्ष में ही पूरा हो मेरा रामराज्य का सपना।

(8) आत्मविश्वासी – गांधी जी आत्मविश्वास से परिपूर्ण थे, उन्होंने जो कुछ भी किया पूर्ण आत्मविश्वास के साथ किया और उसमें वे सफल भी हुए। उनका मानना था

शासित की स्वीकृति न मिले तो शासक क्या कर लेगा
यदि आधार मिटे भय का तो एकतन्त्र ठहरेगा।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि एक श्रेष्ठ मानव में जितने भी मानवोचित गुण हो सकते हैं वे सभी महात्मा गांधी में विद्यमान थे।

प्रश्न 5:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के काव्य-सौष्ठव पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के काव्य-वैभव (काव्य-सौन्दर्य) की समीक्षा कीजिए।
या
“काव्य-कला की दृष्टि से ‘आलोक-वृत्त’ एक श्रेष्ठ रचना है।” इस कथन को सिद्ध कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
किसी भी रचना के काव्य-सौन्दर्य के अन्तर्गत उसके भावपक्ष और कलापक्ष के सौन्दर्य की समीक्षा की जाती है। ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य का काव्य-सौन्दर्य अथवा इसकी काव्यगत विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(अ) भावगत विशेषताएँ

(1) कथावस्तु-वर्णन – ‘आलोकवृत्त काव्य में आठ सर्ग हैं। इन सर्गों में कवि ने गांधी जी के सम्पूर्ण जीवन के साथ भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम का इतिहास भी प्रस्तुत किया है। कवि ने इतिहास एवं जीवन-गाथा के साथ-साथ श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों की स्थापना भी की है।

(2) रस-योजना – आलोकवृत्त’ में कवि ने विभिन्न मानव मन:स्थितियों के साथ-साथ वीर, शान्त और करुण रसों को निरूपित किया है; उदाहरणार्थ

वीर रस – जब क्रान्ति लहर चल पड़ती है, हिमगिरि की चूल उखड़ती है।
साम्राज्य उलटने लगते हैं, इतिहास पलटने लगते हैं।
शान्त रस – पर कैसे प्रतिकार असत् का, हिंसा का पशुबल का ।
कैसे सम्भव शमन द्वेष के, इस नरमेध-अनल का ॥
करुण रस – चीत्कार हुआ ज्यों सहसा डूबे रहे जन का
दौड़ा पति सुनकर शब्द प्रिया के क्रन्दन का।
देखा कि साश्रु वह अतिथि-पदों में पड़ी हुई।
सिसकियाँ विकल भरती थी भू में गड़ी हुई।

(3) प्रकृति-चित्रण – कवि ने ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में प्रकृति-चित्रण कम ही किया है। कुछ स्थलों पर प्रकृति को पृष्ठभूमि के रूप में चित्रित किया गया है; उदाहरणार्थ

पद-प्रान्त में सागर गरजता सिंह-सा, झलमल गले से हीरकों के हार-सी।
गंगा तरुणिजा, गोमती, गोदावरी, कृष्णादिका, सिर पर मुकुट हिमवान का ॥

(ब) कलागत विशेषताएँ

(1) भाषा – आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की भाषा सरल, सुबोध, परिमार्जित एवं रोचक खड़ी बोली हिन्दी है। भाषा में माधुर्य, ओज एवं प्रसाद गुण विद्यमान हैं। कवि ने अनेक प्रचलित मुहावरों एवं लोकोक्तियों का प्रयोग भी किया है ।

कट जाता शासन का पत्ता। मुँह के बल गिर पड़ती सत्ता।

इस खण्डकाव्य की भाषा अत्यन्त सरल और बिम्बमय है। सीधे-सादे शब्दों में बड़ी बातें कहने में कवि की । कला सराहनीय है। भाषा की बिम्बमयता का एक उदाहरण देखिए

हँस हँसकर अंगारे चुगते शशि की ओर चकोर चले।
जैसे घन पाहन-वर्षण में पर फैलाये मोर चले।।

ओज गुण का निर्वाह तो खण्डकाव्य में आद्योपान्त किया गया है। प्रसाद गुण तो इसकी प्रत्येक पंक्ति में देखा जा सकता है। जिन प्रसंगों में माधुर्य की अपेक्षा है, वहाँ भाषा अत्यन्त मधुर रूप ग्रहण कर लेती है।

(2) शैली – प्रबन्ध शैली में लिखे गये आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की घटनाओं के वर्णन में वर्णनात्मक शैली की चित्रोपमता और प्रतीकात्मकता के दर्शन होते हैं। यंत्र-तत्र संवादात्मकता भी है, किन्तु शैली का स्वरूप वर्णनात्मक ही है। वर्णनात्मक शैली में भावात्मकता को स्थान देकर इन्होंने अपने भावों को कुशल अभिव्यक्ति दी है।

(3) छन्द-विधान – आलोकवृत्त’ में छन्दों की विविधता है। 16 मात्राओं के छोटे छन्द से लेकर 32 मात्राओं के लम्बे छन्दों का प्रयोग इसमें सफलतापूर्वक किया गया है। प्रथम सर्ग में मुक्त छन्द का प्रयोग हुआ है। सर्गों के मध्य में गीत-योजना भी की गयी है, जिससे राष्ट्रीय भावनाओं की वृद्धि में सहयोग मिला है।

(4) अलंकार-योजना – आलोकवृत्त’ काव्य में कवि ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, यमक, अनुप्रास, श्लेष आदि अलंकारों का सफल प्रयोग किया है। अलंकार-प्रयोग में स्वाभाविकता है। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं

रूपक    –      कैसे सम्भव शमन द्वेष के,
इस नरमेध-अनल का।।
उपमा     –    पद-प्रान्त में सागर गरजता सिंह-सा।
पद-प्रान्त म साग
यमक     –        मन्मथ धन्य प्रथम नायक का,
जिसने मन मथ डाला।

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की रचना महान् लोकनायक गांधी जी के गुणों को आधार बनाकर की गयी है। गौण पात्रों का चरित्रांकन नायक गांधी जी के चरित्र की विशेषताओं को प्रकाशित करने हेतु ही किया गया है। यद्यपि इस खण्डकाव्य में रसों एवं छन्दों की विविधता है तथापि इससे उद्देश्य एवं विधा से सम्बद्ध तत्त्वों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अत: इसे एक सफल खण्डकाव्य कहा जा सकता है।

प्रश्न 6:
‘आलोकवृत्त’ में भारत के स्वाधीनता संग्राम की सही झाँकी मिलती है ? पुष्टि कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के आधार पर भारत के स्वतन्त्रता-संग्राम का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
या
आलोकवृत्त’ नाटक में वर्णित घटनाओं को अपने शब्दों में लिखिए।
या
“‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य आधुनिक भारत के संघर्षों की झाँकी प्रस्तुत करने में सफल है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु आठ सर्गों में विभक्त है। प्रथम सर्ग में भारत के गौरवशाली अतीत का, उसके बाद पराधीनता का और सन् 1857 ई० की क्रान्ति के बाद नयी ज्योति के रूप में गांधी जी के उदय का वर्णन है। द्वितीय सर्ग में गांधी जी के प्रारम्भिक जीवन और फिर इंग्लैण्ड से उच्च शिक्षा प्राप्त कर स्वदेश लौटने तथा उनकी माता की मृत्यु का वर्णन है। तृतीय सर्ग में गांधी जी द्वारा अफ्रीका में रंग-भेद से दु:खी भारतीयों का वर्णन है, जिन्हें दुर्दशा से मुक्ति दिलाने के लिए गांधी जी ने उनका नेतृत्व किया और सत्याग्रह आन्दोलन चलाया। चतुर्थ सर्ग में गांधी जी भारत लौट आये और उन्होंने देशवासियों को स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए जगाया। इसमें चम्पारन और खेड़ा के आन्दोलन का वर्णन है। पंचम सर्ग में अंग्रेजों के दमन, साम्प्रदायिक दंगे भड़कने, गांधी जी को बन्दी बनाने और फिर जेल से छूटने के बाद गांधी जी द्वारा हिन्दी-मुस्लिम एकता, शराब-मुक्ति, हरिजन-उत्थान, खादी-प्रचार आदि कार्यक्रमों का वर्णन है और लाहौर में पूर्ण स्वतन्त्रता प्रस्ताव के वर्णन के साथ यह सर्ग समाप्त हो जाता है। इसी सर्ग में हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए गांधी जी के 21 दिनों के उपवास का भी वर्णन है

आत्म शुद्धि का यज्ञ कठिन यह पूरा होने को जब आया।
बापू ने इक्कीस दिनों के अनशन का संकल्प सुनाया ।।

छठे सर्ग में नमक आन्दोलन, लन्दन के गोलमेज सम्मेलन और 1937 के प्रान्तीय स्वराज्य की स्थापना का वर्णन है। सातवें सर्ग में 1942 के ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो आन्दोलन का और आठवें सर्ग में भारतीय स्वतन्त्रता के अरुणोदय के साथ-साथ विभाजन के कारण भड़के दंगों से दु:खी गांधी जी की कल्याण-कामना का वर्णन है, जिसमें उन्होंने कहा है

प्रभो इस देश को सत्पथ दिखाओ।
लगी जो आग भारत में बुझाओ ॥

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि ‘आलोकवृत्त’ में भारत के स्वाधीनता संग्राम की सही झाँकी मिलती है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर)
Number of Questions 8
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर)

प्रश्न 1:
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्यको कथावस्तु (कथानक) का संक्षेप में परिचय लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के तृतीय सर्ग में कृष्ण और कर्ण के संवाद में दोनों के चरित्र की कौन-सी प्रमुख विशेषताएँ प्रकट हुई हैं ? स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी के सप्तम सर्ग की कथावस्तु का संक्षेप में सोदाहरण वर्णन कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के पंचम सर्ग में वर्णित कुन्ती-कर्ण के संवाद का सारांश लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के तृतीय सर्ग के आधार पर श्रीकृष्ण और कर्ण के संवाद को अपने शब्दों में व्यक्त कीजिए।
या
” रश्मिरथी’ के प्रत्येक सर्ग में संवादात्मक स्थल ही सबसे प्रमुख है।” इस कथन का सतर्क विश्लेषण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण और अर्जुन के युद्ध का वर्णन कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के अन्तिम सर्ग की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा विरचित खण्डकाव्य ‘रश्मिरथी’ की कथा महाभारत से ली गयी है। इस काव्य में परमवीर एवं दानी कर्ण की कथा है। ‘रश्मिरथी के प्रत्येक सर्ग के संवादों में नाटकीयता के गुण विद्यमान हैं। यह नाटकीयता का गुण प्रारम्भ से अन्त तक नाटक के प्रत्येक सर्ग में विद्यमान है। इसमें सरलता, सुबोधता, सुग्राह्यता एवं स्वाभाविकता के साथ-साथ प्रभावशीलता का गुण भी विद्यमान है। कवि ने इस नाटक के संवादों में घटनाओं और परिस्थितियों को भावात्मक धरातल पर सँजोया है। इस खण्डकाव्य की कथावस्तु सात सर्गों में विभाजित है, जो संक्षेप में निम्नवत् है

प्रथम सर्ग : कर्ण का शौर्य-प्रदर्शन

प्रथम सर्ग के आरम्भ में कवि ने अग्नि के समान तेजस्वी एवं पवित्र पुरुषों की पृष्ठभूमि बनाकर कर्ण का परिचय दिया है। कर्ण की माता कुन्ती और पिता सूर्य थे। कर्ण कुन्ती के गर्भ से कौमार्यावस्था में उत्पन्न हुए थे, इसलिए कुन्ती ने लोकलाज के भय से उस नवजात शिशु को नदी में बहा दिया, जिसे एक निम्न जाति (सूत) के व्यक्ति ने पकड़ लिया और उसका पालन-पोषण किया। सूत के घर पलकर भी कर्ण शूरवीर, शीलवान्, पुरुषार्थी और शस्त्र व शास्त्र-मर्मज्ञ बने।

एक बार द्रोणाचार्य ने कौरव व पाण्डव राजकुमारों के शस्त्र-कौशल का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। सभी लोग अर्जुन की बाण-विद्या पर मुग्ध हो गये, किन्तु तभी धनुष-बाण लिये कर्ण भी सभा में उपस्थित हो गया और उसने अर्जुन को द्वन्द्व युद्ध के लिए चुनौती दी

आँख खोलकर देख, कर्ण के हाथों का व्यापार।
फूले सस्ता सुयश प्राप्त कर, उस नर को धिक्कार ॥

कर्ण की इस चुनौती से सम्पूर्ण सभा आश्चर्यचकित रह गयी, तभी कृपाचार्य ने उसका नाम, जाति और गोत्र पूछे। इस पर कर्ण ने अपने को सूत-पुत्र बतलाया। फिर कृपाचार्य ने कहा कि राजपुत्र अर्जुन से समता प्राप्त करने के लिए तुम्हें पहले कहीं का राज्य प्राप्त करना चाहिए। इस पर दुर्योधन ने कर्ण की वीरता से मुग्ध होकर, उसे अंगदेश का राजा बना दिया और अपना मुकुट उतारकर कर्ण के सिर पर रख दिया। इस उपकार के बदले भावविह्वल कर्ण सदैव के लिए दुर्योधन का मित्र बन गया। इधर कौरव कर्ण को ससम्मान अपने साथ ले जाते हैं। और उधर कुन्ती भाग्य की दुःखद विडम्बना पर मन मसोसती लड़खड़ाती हुई अपने रथ के पास पहुँचती है।

द्वितीय सर्ग : आश्रमवास

द्वितीय सर्ग का आरम्भ परशुराम के आश्रम-वर्णन से होता है। पाण्डवों के विरोध के कारण द्रोणाचार्य ने जब कर्ण को अपना शिष्य नहीं बनाया तो कर्ण परशुराम के आश्रम में धनुर्विद्या सीखने के लिए जाता है। परशुराम क्षत्रियों को शिक्षा नहीं देते थे। कर्ण के कवच और कुण्डल देखकर परशुराम ने उसे ब्राह्मण कुमार समझा और अपना शिष्य बना लिया।

एक दिन परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर सो रहे थे कि तभी एक विषैला कोट कर्ण की जंघा को काटने लगा। गुरु की निद्रा न खुल जाए, इस कारण कर्ण अपने स्थान से हिला तक नहीं। जंघा से बहते रक्त की धारा के स्पर्श से परशुराम की निद्रा टूट गयी। कर्ण की इस अद्भुत सहनशक्ति को देखकर परशुराम ने कहा कि ब्राह्मण में इतनी सहनशक्ति नहीं होती, इसलिए तू अवश्य ही क्षत्रिय या अन्य जाति का है। कर्ण स्वीकार कर लेता है कि मैं सूत-पुत्र हूँ। क्रुद्ध परशुराम ने उसे तुरन्त अपने आश्रम से चले जाने को कहा और शाप दिया कि मैंने तुझे जो ब्रह्मास्त्र विद्या सिखलायी है, तू अन्त समय में उसे भूल जाएगा

सिखलाया ब्रह्मास्त्र तुझे जो, काम नहीं वह आएगा।
है यह मेरा शाप समय पर, उसे भूल तू जाएगा।

कर्ण गुरु की चरणधूलि लेकर आँसू-भरे नेत्रों से आश्रम छोड़कर चल देता है।

तृतीय सर्ग : कृष्ण सन्देश

कौरवों से जुए में हारने के कारण पाण्डवों को बारह वर्ष का वनवास तथा एक साल का अज्ञातवास भोगना पड़ा। तेरह वर्ष की यह अवधि व्यतीत कर पाण्डव अपने नगर इन्द्रप्रस्थ लौट आते हैं। पाण्डवों की ओर से श्रीकृष्ण कौरवों से सन्धि का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर जाते हैं। श्रीकृष्ण ने कौरवों को बहुत समझाया, परन्तु दुर्योधन ने सन्धि-प्रस्ताव ठुकरा दिया तथा उल्टे श्रीकृष्ण को ही बन्दी बनाने का असफल प्रयास किया।

दुर्योधन के न मानने पर श्रीकृष्ण ने कर्ण को समझाया कि अब तो युद्ध निश्चित है, परन्तु उसे टालने का एकमात्र यही उपाय है कि तुम दुर्योधन का साथ छोड़ दो; क्योंकि तुम कुन्ती-पुत्र हो। अब तुम ही इस भारी विनाश को रोक सकते हो। इस पर कर्ण आहत होकर व्यंग्यपूर्वक पूछता है कि आप आज मुझे कुन्तीपुत्र बताते हो। उस दिन क्यों नहीं कहा था, जब मैं जाति-गोत्रहीन सूत-पुत्र बना भरी सभा में अपमानित हुआ था। मुझे स्नेह और सम्मान तो दुर्योधन ने ही दिया था। मेरा तो रोम-रोम दुर्योधन का ऋणी है।

फिर भी आप मेरे जन्म का रहस्य युधिष्ठिर को न बताना; क्योंकि मेरे जन्म का रहस्य जानने पर वे ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण अपना राज्य मुझे दे देंगे और मैं वह राज्य दुर्योधन को दे डालूंगा

धरती की तो है क्या बिसात ?
आ जाये अगर बैकुण्ठ हाथ।
उसको भी न्यौछावर कर दें,
कुरुपति के चरणों पर धर हूँ॥

इतना कहकर और श्रीकृष्ण को प्रणाम कर कर्ण चला जाता है।

इस सर्ग की कथा से जहाँ हमें श्रीकृष्ण के महान् कूटनीतिज्ञ और अलौकिक शक्तिसम्पन्न होने की विशिष्टता दृष्टिगोचर होती है वहीं कर्ण के अन्दर हमें सच्चे मित्र और मित्र के प्रति कृतज्ञ होने के गुण दिखाई पड़ते हैं।

चतुर्थ सर्ग : कर्ण के महादान की कथा

इस सर्ग में कर्ण की उदारता एवं दानवीरता का वर्णन किया गया है। कर्ण प्रतिदिन एक प्रहर तक याचकों को दान देता था। श्रीकृष्ण यह बात जानते थे कि जब तक कर्ण के पास सूर्य द्वारा प्रदत्त कवच और कुण्डल हैं, तब तक कर्ण को कोई भी पराजित नहीं कर सकता। इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण के पास उसकी दानशीलता की परीक्षा लेने आये और कर्ण से उसके कवच और कुण्डल दान में माँग लिये। यद्यपि कर्ण ने छद्मवेशी इन्द्र को पहचान लिया, तथापि उसने इन्द्र को कवच और कुण्डल भी दान दे दिये। कर्ण की इस अद्भुत दानशीलता को देख देवराज इन्द्र का मुख ग्लानि से मलिन पड़ गया

अपना कृत्य विचार, कर्ण का करतब देख निराला ।
देवराज का मुखमण्डल पड़ गया ग्लानि से काला॥

इन्द्र ने कर्ण की बहुत प्रशंसा की। उन्होंने कर्ण को महादानी, पवित्र एवं सुधी कहा तथा स्वयं को प्रवंचक, कुटिल वे पापी बताया और कर्ण को एक बार प्रयोग में आने वाला अमोघ एकघ्नी अस्त्र प्रदान किया।

पंचम सर्ग : माता की विनती

इस सर्ग का आरम्भ कुन्ती की चिन्ता से होता है। कुन्ती इस कारण चिन्तित है कि रण में मेरे पुत्र कर्ण और अर्जुन परस्पर युद्ध करेंगे। कुन्ती व्याकुल हो कर्ण से मिलने जाती है। उस समय कर्ण सन्ध्या कर रहा था, आहट पाकर कर्ण का ध्यान टूट जाता है। उसने कुन्ती को प्रणामकर उसका परिचय पूछा। कुन्ती ने बताया कि तू सूत-पुत्र नहीं मेरा पुत्र है। तेरा जन्म मेरी कोख से तब हुआ था, जब मैं अविवाहिता थी। मैंने लोकलज्जा के भय से तुझे मंजूषा (पेटी) में रखकर नदी में बहा दिया था, परन्तु अब मैं यह सहन नहीं कर सकती कि मेरे ही पुत्र एक-दूसरे से युद्ध करें; अतः मैं तुझसे प्रार्थना करने आयी हूँ कि तुम अपने छोटे भ्राताओं के साथ मिलकर राज्य का भोग करो। कर्ण ने कहा कि मुझे अपने जन्म के विषय में सब कुछ ज्ञात है, परन्तु मैं अपने मित्र दुर्योधन का साथ कभी नहीं छोड़ सकता। असहाय कुन्ती ने कहा कि तू सबको दान देता है, क्या अपनी माँ को भीख नहीं दे सकता ?

कर्ण ने कहा कि माँ! मैं तुम्हें एक नहीं चार पुत्र दान में देता हूँ। मैं अर्जुन को छोड़कर तुम्हारे किसी पुत्र को नहीं मारूंगा। यदि अर्जुन के हाथों मैं मारा गया तो तुम पाँच पुत्रों की माँ रहोगी ही, परन्तु यदि मैंने युद्ध में अर्जुन को मार दिया तो विजय दुर्योधन की होगी और मैं दुर्योधन का साथ छोड़कर तुम्हारे पास आ जाऊँगा। तब भी तुम पाँच पुत्रों की ही माँ रहोगी। कुन्ती निराश मन लौट आती है

हो रहा मौन राधेय चरण को छूकर, दो बिन्दु अश्रु के गिरे दृगों से चूकर।
बेटे का मस्तक सँघ बड़े ही दुःख से, कुन्ती लौटी कुछ कहे बिना ही मुख से ।

षष्ठ सर्ग : शक्ति-परीक्षण

युद्ध में आहत भीष्म शरशय्या पर पड़े हुए हैं। कर्ण उनसे युद्ध हेतु आशीर्वाद लेने जाता है। भीष्म पितामह उसे नर-संहार रोकने के लिए समझाते हैं, परन्तु कर्ण नहीं मानता और भीषण युद्ध आरम्भ हो जाता है। कर्ण अर्जुन को युद्ध के लिए ललकारता है, किन्तु श्रीकृष्ण अर्जुन का रथ कर्ण के सामने ही नहीं आने देते; क्योंकि उन्हें भय है कि कर्ण एकघ्नी का प्रयोग करके अर्जुन को मार देगा। अर्जुन को बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने भीम-पुत्र घटोत्कच को युद्धभूमि में उतार दिया। घटोत्कच ने घमासान युद्ध किया, जिससे कौरव-सेना त्राहि-त्राहि कर । उठी। अन्ततः दुर्योधन ने कर्ण से कहा

हे वीर ! विलपते हुए सैन्य का अचिर किसी विधि त्राण करो,
जब नहीं अन्य गति, आँख मूंद एकघ्नी का सन्धान करो।
अरि का मस्तक है दूर, अभी अपनों के सीस बचाओ तो,
जो मरण-पाश है पड़ा, प्रथम, उसमें से हमें छुड़ाओ तो ॥

कर्ण ने भारी नरसंहार करते हुए घटोत्कच पर एकघ्नी का प्रयोग कर दिया, जिससे घटोत्कच मारा गया। घटोत्कच पर एकघ्नी का प्रयोग हो जाने से अर्जुन अभय हो गया। आज युद्ध में विजयी होने पर भी कर्ण एकघ्नी का प्रयोग हो जाने से स्वयं को मन-ही-मन पराजित-सा मान रहा था।

सप्तम सर्ग : कर्ण के बलिदान की कथा

‘रश्मिरथी’ का यह अन्तिम सर्ग है। कौरव सेनापति कर्ण ने पाण्डवों की सेना पर भीषण आक्रमण किया। कर्ण की गर्जना से पाण्डव सेना में भगदड़ मच जाती है। युधिष्ठिर युद्धभूमि से भागने लगते हैं तो कर्ण उन्हें पकड़ लेता है, किन्तु कुन्ती को दिये वचन का स्मरण कर युधिष्ठिर को छोड़ देता है। इसी प्रकार भीम, नकुल और सहदेव को भी पकड़-पकड़कर छोड़ देता है। कर्ण का सारथी शल्य उसके रथ को अर्जुन के रथ के निकट ले आता है। कर्ण के भीषण बाण-प्रहार से अर्जुन मूर्च्छित हो जाता है। चेतना लौटने पर श्रीकृष्ण अर्जुन को पुनः कर्ण से युद्ध करने के लिए उत्तेजित करते हैं। दोनों ओर से घमासान युद्ध होता है। तभी कर्ण के रथ का पहिया रक्त के कीचड़ में फँस जाता है। कर्ण रथ से उतरकर पहिया निकालने लगता है। इसी समय श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्ण पर बाण-प्रहार करने के लिए कहते हैं

खड़ा है देखता क्या मौन भोले!
शरासन तान, बस अवसर यही है,
घड़ी फिर और मिलने की नहीं है।
विशिख कोई गले के पार कर दे,
अभी ही शत्रु का संहार कर दे।

कर्ण धर्म की दुहाई देता है तो श्रीकृष्ण उसे कौरवों के पूर्व कुकर्मों का स्मरण दिलाते हैं। इसी वार्तालाप में अवसर देखकर अर्जुन कर्ण पर प्रहार कर देता है और कर्ण की मृत्यु हो जाती है। अन्त में युधिष्ठिर आदि सभी कर्ण की मृत्यु पर प्रसन्न हैं, किन्तु श्रीकृष्ण दु:खी हैं। वे युधिष्ठिर से कहते हैं कि क्जिय तो अवश्य मिली, पर मिली मर्यादा खोकर। वास्तव में चरित्र की दृष्टि से तो कर्ण ही विजयी रहा। आप लोग कर्ण को भीष्म और द्रोणाचार्य की भाँति ही सम्मान दीजिए। यहाँ पर इस खण्डकाव्य की कथा समाप्त हो जाती है।

[ विशेष – मुझे इस सर्ग की कथा सर्वाधिक रुचिकर प्रतीत हुई। इस सर्ग में वर्णित कर्ण के शौर्य व साहस की तुलना इतिहास में विरल है। व्यक्ति अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए किस प्रकार पतित हो जाता है, भले ही वह ‘धर्मराज’ कहलाता हो अथवा ‘भगवान्। यह यहाँ इतनी कलात्मकता से दर्शाया गया है कि मन नि:स्पन्द हो जाती है। अन्त में कर्ण की मृत्यु को जीवन’ और ‘विजय’ से कहीं ऊँचा सिद्ध करते हुए कृष्ण कहते हैं

दया कर शत्रु को भी त्राण देकर, खुशी से मित्रता करे प्राण देकर,
गया है कर्ण भू को दीन करके, मनुज-कुल को बहुत बलहीन करके।
    Χ                              Χ                    Χ
समझकर द्रोण मन में भक्ति भरिए, पितामह की तरह सम्मान कारिए
मनुजता का नया नेता उठा है, जगत् से ज्योति का जेता उठा है।

वस्तुतः कर्ण जैसा व्यक्ति और व्यक्तित्व स्रष्टा ने अभी तक कोई अन्य बनाया ही नहीं। वह अपनी तुलना आप है।]

प्रश्न 2:
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के कथा-संगठन की समीक्षा कीजिए।
या
” ‘रश्मिरथी’ में कवि द्वारा आधुनिक युग की सामाजिक विसंगतियों; जातिवाद और वर्णाश्रम; पर करारा प्रहार किया गया है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के कथा संयोजन पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी’ एक उदात्त और आदर्श भावनाओं का काव्य है। इस कथन की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
या
” ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में दिनकर ने महाभारतकालीन संगतियों तथा विसंगतियों का सच्चा लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है।” स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के कथानक में ऐतिहासिकता और धार्मिकता दोनों हैं। तर्कसहित उत्तर दीजिए।
या
किन विशेषताओं के आधार पर ‘रश्मिरथी’ को उच्चकोटि का काव्य माना जाता है?
उत्तर:
कविवर रामधारी सिंह दिनकर ने ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में परमवीर कर्ण के जीवन से सम्बद्ध कुछ प्रसंगों को लेकर कथा का संगठन किया है। रश्मिरथी’ की कथावस्तु की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) प्रभावशाली कथावस्तु – रश्मिरथी’ का आरम्भ शस्त्र-विद्या के प्रदर्शन से होता है। इस प्रदर्शन में कर्ण का जाति व गोत्र के नाम पर अपमान किया जाता है। इस प्रकार कथा का आरम्भ बड़ा ही प्रभावशाली है। इसके बाद परशुराम भी जाति के आधार पर कर्ण को शाप देकर अपने आश्रम से निकाल देते हैं। श्रीकृष्ण और कुन्ती कर्ण को अपनी ओर करना चाहते हैं। यहाँ आकर कथा की चरम सीमा आ जाती है। इसके बाद कर्ण युद्ध में युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव को पकड़ कर छोड़ देता है और घटोत्कच पर एकघ्नी का प्रयोग करता है। यहाँ कथा का उतार है। इसके बाद कर्ण के रथ का पहिया धंस जाता है और अर्जुन निहत्थे कर्ण पर बाण-वर्षा करके मार डालता है। अन्त में श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के वार्तालाप के साथ रश्मिरथी’ का अन्त हो जाता है। इस प्रकार रश्मिरथी’ में कवि ने सभी घटनाओं को बड़े कौशल के साथ प्रभावशाली ढंग से एक सूत्र में पिरोया है। वास्तव में इस काव्य की कथावस्तु पाठक के हृदय और मस्तिष्क पर अमिट प्रभाव छोड़ती है।

(2) ऐतिहासिकता – ‘रश्मिरथी की कथा महाभारत से ली गयी है। महाभारत में भी यह कथा इसी प्रकार है। दिनकर जी ने अपने रचना-कौशल से कथा को अत्यन्त मार्मिक व हृदयस्पर्शी बना दिया है। इस प्रकार ‘रश्मिरथी की सम्पूर्ण कथा ऐतिहासिक है।

(3) प्रेरणाप्रद (उद्देश्य) – ‘रश्मिरथी की एक मुख्य विशेषता यह है कि इसमें कवि ने भारतवर्ष में व्याप्त जाति-पाँतिगत भेदभाव, कौमार्यावस्था में सन्तानोत्पत्ति, राजलिप्सा हेतु परस्पर युद्ध आदि देशगत अन्य समस्याओं का संकेत किया है। कवि आधुनिक भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत ऊँच-नीच के भेदभावों को मिटाकर मानवीय गुणों की प्रतिष्ठा का मार्ग प्रशस्त करता है

धंस जाए वह देश अतल में, गुण की नहीं जहाँ पहचान।
जाति गोत्र के बल से ही, आदर पाते हैं जहाँ सुजान ॥

इसके अतिरिक्त कवि ने युद्ध की समस्या, कुँवारी माताओं के शील की समस्या के माध्यम से आधुनिक भारतीय समाज के ज्वलन्त प्रश्नों, उनके दुष्परिणामों को नयी व्याख्या दी है। इसके साथ ही इस खण्डकाव्य में अदम्य वीरता, असाधारण दानशीलता, सत्यनिष्ठा, अटल मित्रता, कृतज्ञता, सर्वस्व दान, उदारता, सहृदयता आदि महान् गुणों की प्रतिष्ठा हुई है। इससे पाठक महान् बनने की प्रेरणा प्राप्त करता है।

(4) मार्मिकता – कवि ने इस काव्य में अनेक मार्मिक प्रसंगों का चित्रण किया है; जैसे–कर्ण का शौर्य-प्रदर्शन और अपमान, मन मसोसती हुई कुन्ती का रथ की ओर गमन, परशुराम के आश्रम से कर्ण का निष्कासन; कुन्ती का कर्ण से वार्तालाप आदि। ये स्थल इतने अधिक मार्मिक हैं कि पाठक या श्रोता अपने आपको भी भूल जाता है।

इस प्रकार ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु उत्कृष्ट कोटि की है। ‘दिनकर’ का पूरा प्रकाश कथावस्तु को आलोकित रखता है।

प्रश्न 3:
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कर्ण के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के प्रमुख पुरुष पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ में कवि का मुख्य मन्तव्य कर्ण के चरित्र के शीलपक्ष, मैत्रीभाव तथा शौर्य का चित्रण है। सिद्ध कीजिए।
या
” ‘रश्मिरथी’ काव्य में कर्ण के चरित्र-चित्रण में धर्मनिष्ठा और अडिग निष्ठा दिखाई पड़ती है।” स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ में वर्णित वीर कर्ण के गुणों (दानवीरता) पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी के आधार पर कर्ण के मानसिक अन्तर्द्वन्द्व की समीक्षा कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में आधार पर नायक की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
कर्ण के चरित्र में ऐसे कौन-से गुण हैं, जो उसे महामानव की कोटि तक उठा देते हैं ?
या
रश्मिरथी कर्ण धनुर्धर होने के साथ ही महान धर्मनिष्ठ भी था। इस दृष्टि से कर्ण के चरित्र पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
‘रश्मिरथी कर्ण के चरित्र पर आधारित खण्डकाव्य है। कर्ण का चरित्र शील की प्रतिमूर्ति, शौर्य व पौरुष का अगाध सिन्धु, शक्ति का स्रोत, सत्य-साधना-दाने-त्याग का तपोवन तथा आर्य-संस्कृति का आलोकमय तेज है। कर्ण के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) नायक – कर्ण ‘रश्मिरथी’ का नायक है। काव्य की सम्पूर्ण कथा कर्ण के ही चारों ओर घूमती है। काव्य का नामकरण भी कर्ण को ही नायक सिद्ध करता है। रश्मिरथी’ का अर्थ है-वह मनुष्य, जिसका रथ रश्मि अर्थात् पुण्य का हो। इस काव्य में कर्ण का चरित्र ही पुण्यतम है। कर्ण के आगे अन्य किसी पात्र को चरित्र नहीं ठहर-पाता। कर्ण के सम्बन्ध में कवि के ये शब्द द्रष्टव्य हैं

तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी।
जाति गोत्र का नहीं, शील का पौरुष का अभिमानी ॥

(2) साहसी और वीर योद्धा – इस खण्डकाव्य के आरम्भ में ही कर्ण हमें एक वीर योद्धा के रूप में दिखाई देता है। शस्त्र-विद्या-प्रदर्शन के समय वह प्रदर्शन-स्थल पर उपस्थित होकर अर्जुन को ललकारता है तो सब स्तब्ध रह जाते हैं। जब इस पर कृपाचार्य कर्ण से उसकी जाति-गोत्र आदि पूछते हैं तो कर्ण उन्हें सटीक उत्तर देता है

पूछो मेरी जाति, शक्ति हो तो मेरे भुज बल से।
रवि-समान दीपित ललाट से, और कवच कुण्डल से ।।

(3) सच्चा मित्र – दुर्योधन ने जाति-अपमान से कर्ण की रक्षा उसे राजा बनाकर की, तभी से कर्ण दुर्योधन का अभिन्न मित्र बन गया। कृष्ण और कुन्ती के समझाने पर भी कर्ण दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ता। वह स्पष्ट शब्दों में कह देता है

धरती की तो है क्या बिसात ? आ जाये अगर बैकुण्ठ हाथ,
उसको भी न्यौछावर कर दें, कुरुपति के चरणों पर धर हूँ ॥

और अन्त समय तक कर्ण अपनी मित्रता के प्रति पूर्ण समर्पित रहता है।

(4) सच्चा गुरुभक्त – कर्ण गुरु के प्रति परम विनयी एवं श्रद्धालु है। कीट कर्ण की जाँघ काटकर भीतर घुस जाता है, रक्त की धारा बहने लगती है, पर कर्ण पैर नहीं हिलाता; क्योंकि हिलने से उसकी जाँघ पर सिर रखकर सोये गुरु की नींद खुल जाएगी। आँखें खुलने पर गुरु को वह अपनी जाति-गोत्र बता देता है तो वे क्रोधित होकर उसे आश्रम से निकाल देते हैं, परन्तु कर्ण अपनी विनय नहीं छोड़ता और जाते समय गुरु की चरणधूलि लेता है–

परशुधर के चरण की धूलि लेकर, उन्हें, अपने हृदय की भक्ति देकर,
निराशा से विकल, टूटा हुआ-सा, किसी गिरि-शृंग से छूटा हुआ-सा,

(5) परम दानवीर – कर्ण के चरित्र की एक प्रमुख विशेषता यह है कि वह धन-सम्पत्ति की लिप्सा से मुक्त है। इसलिए प्रतिदिन प्रात:काल सन्ध्या-वन्दन करने के बाद वह याचकों को दान देता है। ब्राह्मण-वेश में आये इन्द्र को वह अपने जीवन-रक्षक कवच और कुण्डल तक दान में दे देता है। अपनी माता कुन्ती को युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव को न मारने का अभयदान देता है। कर्ण की दोनशीलता के सम्बन्ध में कवि कहता है

रवि-पूजन के समय सामने, जो भी याचक आता था।
मुँह माँगा वह दान कर्ण से, अनायास ही पाता था।

(6) महान् सेनानी – कौरवों की ओर से कर्ण महाभारत के युद्ध में सेनापति है। वह शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह से युद्ध हेतु आशीर्वाद लेने जाता है। भीष्म उसके विषय में कहते हैं

अर्जुन को मिले कृष्ण जैसे । तुम मिले कौरवों को वैसे ॥

युद्ध में कर्ण ने अपने रण-कौशल से पाण्डवों की सेना में हाहाकार मचा दिया। उसकी वीरता की प्रशंसा करते . हुए श्रीकृष्ण कहते हैं

दाहक प्रचण्ड इसका बल है। यह मनुज नहीं कालानल है॥

(7) जाति-प्रथाका विरोधी – कर्ण को जाति और गोत्र के कारण ही भरी सभा में अपमानित होना पड़ा था। इसी कारण उसके मन में जाति और गोत्र के प्रति गहरा विषाद था। इस सम्बन्ध में कर्ण की तिलमिलाहट बड़ी मार्मिक हैं

ऊपर सिर पर कनक छत्र, भीतर काले के काले।
शरमाते हैं नहीं जगत् में, जाति पूछने वाले ॥

(8) कृतज्ञ – कर्ण के चरित्र में कृतज्ञता का बड़ा गुण विद्यमान है। जब उसे यह पता लग जाता है कि उसकी माता राजरानी कुन्ती है तो भी वह निम्न जाति राधा के उपकौर को नहीं भुलाता; जिसने उसका पालन-पोषण किया था। दुर्योधन ने उसे अंगदेश को राज्य देकर राजपुत्रों के साथ युद्ध का अधिकारी बनाया था, उसके उपकार को भी वह जीवनभर नहीं भुला पाता।

(9) मानसिक अन्तर्द्वन्द्व से ग्रस्त – आरम्भ से अन्त तक कर्ण को मानसिक अन्तर्द्वन्द्व से जूझना पड़ता है। जीवन के प्रत्येक पग पर उसके सामने एक ही प्रश्न खड़ा होता है कि वह अब क्या करे ? शस्त्र-कौशल के समय उसका नाम, जाति तथा गोत्र पूछने पर, द्रोण द्वारा अपना शिष्य न बनाये जाने पर, परशुराम की सेवा करते समय अपनी सहनशक्ति के प्रदर्शन पर, गुरु परशुराम द्वारा शाप देने पर वह दुविधाग्रस्त हो जाता है। श्रीकृष्ण द्वारा उसको उसके जन्म का रहस्य समझाने पर और पाण्डवों के पक्ष में कौरवों का साथ छोड़ देने के लिए कहने पर, माता कुन्ती द्वारा जन्म का रहस्य समझाने तथा कौरवों का साथ छोड़ अपने भाइयों से मिल जाने के लिए कहने आदि अनेक अवसरों पर कर्ण भयंकर अन्तर्द्वन्द्व से ग्रस्त हो जाता है; किन्तु वह प्रत्येक अवसर पर विवेक और धैर्य से अपने अन्तर्द्वन्द्व पर विजय प्राप्त कर; अन्ततः सही निर्णय लेकर अपना मार्ग प्रशस्त करता है।

(10) अन्य विशेषताएँ – कर्ण महाभारत के युद्ध में मारा जाता है, किन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात् श्रीकृष्ण उसकी चारित्रिक विशेषताओं का गुणगान करते हुए युधिष्ठिर से कहते हैं

हृदय का निष्कपट, पावन क्रिया का, दलित हारक, समुद्धारक क्रिया का।
बड़ा बेजोड़ दानी था, सदय था, युधिष्ठिर कर्ण का अदभुत हृदय था।
X                               X                              X
समझकर द्रोण मन में भक्ति भरिए, पितामह की तरह सम्मान करिए।
मनुजता का नया नेता उठा है, जगत् से ज्योति का जेता उठा है ॥

इस प्रकार हम पाते हैं कि कवि का मुख्य मन्तव्य कर्ण के चरित्र के शीलपक्ष, मैत्रीभाव एवं शौर्य का चित्रण करना रहा है, जिसके लिए उसने कर्ण को राज्य और विजय की गलत महत्त्वाकांक्षाओं से पीड़ित न दिखाकर षड्यन्त्रों, परीक्षाओं और प्रलोभनों की स्थितियों में उसे अडिग चित्रित किया है। यही स्थिति उसको खण्डकाव्य का महान् नायक बना देती है।

प्रश्न 4:
रश्मिरथी’ के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कृष्ण के विराट व्यक्तित्व को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ दिखाई देती हैं-

(1) युद्ध-विरोधी – पाण्डवों के वनवास से लौटने के बाद श्रीकृष्ण कौरवों को समझाने के लिए स्वयं हस्तिनापुर जाते हैं और युद्ध टालने का भरसक प्रयास करते हैं, किन्तु हठी दुर्योधन नहीं मानता। इसके बाद वे कर्ण को भी समझाते हैं, परन्तु कर्ण भी अपने प्रण से नहीं हटता। अन्त में श्रीकृष्ण कहते हैं

यश मुकुट मान सिंहासन ले ले, बस एक भीख मुझको दे दे।
कौरव को तज रण रोक सखे, भू का हर भावी शोक सखे ॥

(2) निर्भीक एवं स्पष्टवादी – श्रीकृष्ण केवल अनुनय-विनय ही करना नहीं जानते, वरन् वे निर्भीक एवं स्पष्ट वक्ता भी हैं। जब दुर्योधन समझाने से नहीं मानता तो वे उसे चेतावनी देते हुए कहते हैं

तो ले मैं भी अब जाता हूँ, अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा।

(3) शीलवान व व्यावहारिक – श्रीकृष्ण के सभी कार्य उनके शील के परिचायक हैं। वास्तव में वे एक सदाचारपूर्ण समाज की स्थापना करना चाहते हैं। वे शील को ही जीवन का सार मानते हैं

नहीं पुरुषार्थ केवल जाति में है, विभा का सार शील पुनीत में है।

साथ ही वह सांसारिक सिद्धि और सफलता के सभी सूत्रों से भी अवगत हैं।

(4) गुणों के प्रशंसक – श्रीकृष्ण अपने विरोधी के गुणों का भी आदर करते हैं। कर्ण उनके विरुद्ध लड़ता है, परन्तु श्रीकृष्ण कर्ण का गुणगान करते नहीं थकते

……….. वीर शत बार धन्य, तुझ-सा न मित्र कोई अनन्य।

(5) महान् कूटनीतिज्ञ – श्रीकृष्ण महान् कूटनीतिज्ञ हैं। पाण्डवों की विजय श्रीकृष्ण की कूटनीति के कारण ही हुई। वे पाण्डवों की ओर से कूटनीतिज्ञ का कार्य कर दुर्योधन की बड़ी शक्ति कर्ण को उससे अलग करने का प्रयत्न करते हैं। उनकी कूटनीतिज्ञता का प्रमाण कर्ण से कहा गया उनका यह कथन है

कुन्ती का तू ही तनय श्रेष्ठ, बलशील में परम श्रेष्ठ।
मस्तक पर मुकुट धरेंगे हम, तेरा अभिषेक करेंगे हम ॥

(6) अलौकिक शक्तिसम्पन्न – कवि ने श्रीकृष्ण के चरित्र में जहाँ मानव-स्वभाव के अनुरूप अनेक साधारण विशेषताओं का समावेश किया है, वहीं उन्हें अलौकिक शक्ति-सम्पन्न रूप देकर लीलापुरुष भी सिद्ध किया है। जब दुर्योधन उन्हें कैद करना चाहता है, तब वे अपने विराट् स्वरूप में प्रकट हो जाते हैं-

हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप विस्तार किया।
डगमग डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले
‘जंजीर बढ़ाकर साध मुझे, हाँ हाँ दुर्योधन बाँध मुझे।”

इस प्रकार इस खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण को श्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ, किन्तु महान् लोकोपकारक के रूप में चित्रित करके कवि ने उनके पौराणिक चरित्र को युगानुरूप बनाकर प्रस्तुत किया है। कवि के इस प्रस्तुतीकरण की विशेषता यह है कि इससे कहीं भी उनके पौराणिक स्वरूप को क्षति नहीं पहुँची है। कृष्ण का यह व्यक्तित्व कवि की कविता में युगानुसार प्रकट हुआ है।

प्रश्न 5:
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
“कुन्ती के चरित्र में कवि ने मातृत्व के भीषण अन्तर्द्वन्द्व की सृष्टि की है।” इस कथन के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के किसी प्रमुख नारी पात्र के चरित्र का चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती के चरित्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती के मातृत्व रूप पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी’ खाण्डकाव्य के प्रधान नारी पात्र का चरित्रांकन कीजिए।
उत्तर:
कुन्ती पाण्डवों की माता है। अविवाहिता कुन्ती के गर्भ से सूर्यपुत्र कर्ण का जन्म हुआ था। इस प्रकार कुन्ती के पाँच नहीं वरन् छ: पुत्र थे। कुन्ती की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) वात्सल्यमयी माता – कुन्ती को जब यह ज्ञात होता है कि कर्ण का उसके अन्य पाँच पुत्रों से युद्ध होने वाला है तो वह कर्ण को मनाने उसके पास पहुँच जाती है। उस समय कर्ण सूर्य की उपासना कर रहा था। अपने पुत्र कर्ण के तेजोमय रूप को देख कुन्ती फूली नहीं समाती। सन्ध्या से आँखें खोलने पर कर्ण स्वयं को राधा का पुत्र बताता है तो कुन्ती यह सुनकर व्याकुल हो जाती है

रे कर्ण ! बेध मत मुझे निदारुण शर से ।
राधा का सुत तू नहीं, तनय मेरा है।।

कर्ण के पास से निराश लौटती हुई कुन्ती कर्ण को अपने अंक में भर लेती है, जो उसके वात्सल्य का प्रमाण है।

(2) अन्तर्द्वन्द्वग्रस्त – जब कुन्ती के ही पुत्र परस्पर शत्रु बने खड़े हैं, तब कुन्ती के हृदय में अन्तर्द्वन्द्व की भीषण आँधी उठ रही थी। वह इस समय बड़ी ही उलझन में पड़ी हुई है। पाँचों पाण्डवों और कर्ण में से किसी की हानि हो, पर वह हानि तो कुन्ती की ही होगी। वह अपने पुत्रों का सुख-दु:ख अपना सुख-दु:ख समझती है

दो में किसका उर फटे, फहूँगी मैं ही।
जिसकी भी गर्दन कटे, कहूँगी मैं ही ॥

(3) समाजभीरु – कुन्ती लोक-लाज से बहुत अधिक भयभीत एक भारतीय नारी की प्रतीक है। कौमार्यावस्था में सूर्य से उत्पन्न नवजात शिशु (कर्ण) को वह लोक-निन्दा के भय से गंगा की लहरों में बहा देती है। इस बात को वह कर्ण के समक्ष भी स्वीकार करती है

मंजूषा में धर वज्र कर मन को,
धारा में आयी छोड़ हृदय के धन को।

कर्ण को युवा और वीरत्व की प्रतिमूर्ति बने देखकर भी अपना पुत्र कहने का साहस नहीं कर पाती। जब युद्ध की विभीषिका सम्मुख आ जाती है, तो वह कर्ण से अपनी दयनीय स्थिति को इन शब्दों में व्यक्त करती है-

बेटा धरती पर बड़ी दीन है नारी,
अबला होती, सचमुच योषिता कुमारी।
है कठिन बन्द करना समाज के मुख को,
सिर उठा न पा सकती पतिता निज सुख को।

(4) निश्छल – कुन्ती का हृदय छलरहित है। वह कर्ण के पास मन में कोई छल रखकर नहीं, वरन् निष्कपट भाव से गयी थी। यद्यपि कर्ण उसकी बातें स्वीकार नहीं करता, किन्तु कुन्ती उसके प्रति अपनी ममत्व कम नहीं करती।

(5) बुद्धिमती और वाक्पटु – कुन्ती एक बुद्धिमती नारी है। वह अवसर को पहचानने तथा दूरगामी परिणाम का अनुमान करने में समर्थ है। कर्ण-अर्जुन युद्ध का निश्चय जानकर वह समुचित कदम उठाती है

सोचा कि आज भी चूक अगर जाऊँगी,
भीषण अनर्थ फिर रोक नहीं पाऊँगी।
फिर भी तू जीता रहे, न अपयश जाने,
अब आ क्षणभर मैं तुझे अंक में भर लें ॥

इस प्रकार कवि ने ‘रश्मिरथी’ में कुन्ती के चरित्र में कई उच्चकोटि के गुणों के साथ-साथ मातृत्व के भीषण अन्तर्द्वन्द्व की सृष्टि करके, इस विवश माँ की ममता को महान् बना दिया है।

प्रश्न 7:
‘रश्मिरथी’ के काव्य-सौष्ठव (काव्य-सौन्दर्य) पर प्रकाश डालिए।
या
‘खण्डकाव्य’ की दृष्टि से ‘रश्मिरथी की समीक्षा कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ उच्चकोटि का खण्डकाव्य है-इस कथन को प्रमाणित कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ काव्य का भाषा-शैली की दृष्टि से मूल्यांकन कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ का काव्यगुणों के आधार पर विवेचन कीजिए।
या
रचना-शैली की दृष्टि से ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य का मूल्यांकन कीजिए।
या
रश्मिरथी के संवाद-कौशल की विशेषताएँ बताइए।
या
सिद्ध कीजिए कि ‘रश्मिरथी’ एक प्रगतिशील और सफल खण्डकाव्य है।
या
खण्डकाव्य के लक्षणों के आधार पर ‘रश्मिरथी’ की आलोचना कीजिए।
या
कलापक्ष और भावपक्ष की दृष्टि से ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की लेखनी सदैव देशप्रेम एवं मानवतावादी दृष्टिकोण की समर्थक रही है। प्रस्तुत खण्डकाव्य ‘रश्मिरथी’ भी इस बात का अपवाद नहीं है। इसकी विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) कथानक – ‘रश्मिरथी’ को कथानक महाभारत के प्रसिद्ध पात्र कर्ण के जीवन-प्रसंग पर आधारित है, किन्नु लेखक ने इन प्रसंगों को एक मौलिक स्वरूप देकर कर्ण के व्यक्तित्व की एक नयी छवि प्रस्तुत की है। कथानक का संगठन बड़ा सुनियोजित है। प्रसंगों का समय भिन्न-भिन्न है और उनमें पर्याप्त अन्तराल है; किन्तु उन्हें इस प्रकार श्रृंखलाबद्ध किया गया है कि कथा के प्रवाह में कहीं कोई बाधा नहीं पड़ती और उसका क्रमबद्ध विकास होता रहता है। कथा का अन्त इस प्रकार किया गया है कि वह कर्ण की विशेषताओं को विभूषित करते हुए समाप्त हो जाती है।

(2) पात्र एवं चरित्र-चित्रण – इस खण्डकाव्य में कर्ण के सामाजिक स्तर पर उपेक्षित जीवन की पीड़ा का मर्म उजागर करना और उसकी चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालना ही कवि का उद्देश्य रहा है। इसलिए अन्य पात्रों का चुनाव इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया गया है। कथानक में एक भी अनावश्यक पात्र को स्थान नहीं दिया गया है। कर्ण के चरित्र में वर्तमान युग के सामाजिक रूप से उपेक्षित व्यक्तियों एवं कुन्ती के रूप में समाज के नियमों से प्रताड़ित नारियों की व्यथा को स्वर दिया गया है। इस प्रकार इसे खण्डकाव्य में पात्रों का चरित्र-चित्रण अत्यन्त स्वाभाविक ढंग से हुआ है।

काव्यगत विशेषताएँ

‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की काव्यगत विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(अ) भावगत विशेषताएँ

(1) ऐतिहासिकता – रश्मिरथी’ की कथा महाभारत से ली गयी है। उसकी सभी घटनाएँ एवं पात्र ऐतिहासिक हैं। अविवाहित कुन्ती अपने नवजात शिशु को त्याग देती है। आगे चलकर वही पुत्र कर्ण के नाम से असाधारण पराक्रमी बनकर कुन्ती-पुत्रों के समक्ष उनके शत्रु एवं महान् दानी के रूप में आता है। पग-पग पर उसके साथ छल किया जाता है और अन्त में निहत्थे कर्ण को अर्जुन युद्ध की मर्यादा के विरुद्ध मार देता है। महाभारत के इस आख्यान को ही रश्मिरथी’ काव्य में कवि ने प्रस्तुत किया है।

(2) रस एवं संवाद-योजना – रश्मिरथी’ में करुण, भयानक, रौद्र एवं वीर रसों का निरूपण हुआ है, किन्तु यह खण्डकाव्य वीर रसप्रधान है। ‘दिनकर जी’ की रस-योजना को सफल बनाने में खण्डकाव्य की संवादात्मक शैली का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है; क्योंकि इन रसों का आलम्बन और उद्दीपन खण्डकाव्य के पात्र ही हैं। पात्रों के भावों का प्रकटीकरण कवि ने उनके संवादों के माध्यम से करके जहाँ उनके चरित्रों को निखारा है, वहीं प्रभाव एवं शैली की दृष्टि से खण्डकाव्य को सशक्त भी बनाया है। खण्डकाव्य में प्रयुक्त संवाद भावों से प्रेरित, स्वाभाविक, पैने और व्यंग्य से परिपूर्ण हैं; उदाहरणार्थ

वीर रसपूर्ण संवाद – धनु की डोरी तन जाने दें,
                             संग्राम तुरत ठन जाने दें।
                            ताण्डवी तेज लहराएगा,
                                संसार ज्योति कुछ पाएगा।

(3) प्रकृति-चित्रण – यद्यपि ‘रश्मिरथी’ काव्य में प्रकृति-चित्रण कवि का विषय नहीं है, तथापि यत्र-तत्र प्रसंगवश प्रकृति-चित्रण हुआ है। रश्मिरथी’ का प्रकृति-चित्रण बहुत ही सजीव है; यथा

हँसती थीं रश्मियाँ रजत से, भरकर वारि विमल को।

परशुराम के आश्रम का एक चित्र द्रष्टव्य है

बैठे हुए सुखद आतप में, मृग रोमन्थन करते हैं।
वन के जीव विवर से बाहर, हो विश्रब्ध विचरते हैं।

(ब) कलागत विशेषताएँ।

(1) भाषा – रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हिन्दी है, किन्तु उसमें साधारण बोलचाल के शब्दों का भी पर्याप्त प्रयोग किया गया है। भाषा में प्रभावात्मकता, प्रवाहमयता तथा विषयानुरूपता है। भाषा ओजगुण प्रधान है। भाषा की स्पष्टता व सुबोधता सर्वत्र देखी जा सकती है। उदाहरणार्थ

तब किसी तरह हिम्मत समेटकर सारी।
आयी मैं तेरे पास भाग्य की मारी ॥

‘रश्मिरथी की संस्कृतनिष्ठ भाषा का भी एक उदाहरण द्रष्टव्य है

तन में रवि का अप्रतिम तेज जगता था।
दीपक ललाट अपराकै सदृश लगता था।

सभी स्थलों के उपयुक्त भाषिक शब्दावली की रचना में कवि सिद्धहस्त है। कवि ने अनेक लोकोक्तियों व मुहावरों का भी उचित स्थल पर प्रयोग किया है; जैसे – हृदय फटना, पुण्य लूटना, मन मसोसना, वज्र गिरना आदि।।

(2) शैली – रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में मुख्य रूप से वर्णनात्मक प्रबन्ध शैली की चित्रोपमता, सूक्ति शैली, संवाद शैली और व्यंग्यात्मक शैली को अपनाया गया है। कवि ने वर्णनात्मक शैली में घटनाओं और परिस्थितियों को भावात्मक धरातल पर सँजोया है। वस्तुत: कवि ने प्रभाववादी शैली का अनुगमन करते हुए वर्णनात्मक शैली की कमियों का पूर्णतः निराकरण कर दिया है

पाकर प्रसन्न आलोक नया, कौरव सेना का शोक गया
आशा की नवल तरंग उठी, जन जन में नयी उमंग उठी।

(3) छन्द-विधान – कवि ने प्रत्येक सर्ग में अलंग-अलग छन्दों का प्रयोग किया है। ये छन्द-परिवर्तन मात्र परिवर्तन के लिए ही नहीं किये गये हैं, वरन् विषय और मानसिक परिस्थितियों तथा घटनाओं की संवेदनात्मक पकड़ को दृष्टि में रखते हुए ही इन छन्दों का आयोजन किया गया है। एक ही सर्ग में अनुभव के संवेदनात्मक तनाव के परिवर्तित होने पर कवि ने छन्द-योजना ही परिवर्तित कर दी है। ‘रश्मिरथी’ में कवि ने ‘सुमेरु’ (एक प्रकार का मात्रिक छन्द जिसके प्रत्येक चरण में 19 मात्राएँ होती हैं, अन्त में यगण होता है, 12 मात्राओं पर यति होती है तथा पहली, आठवीं, पन्द्रहवीं मात्राओं का लघु होना आवश्यक होता है।), ‘हरिगीतिका’, ‘पद्धरी (एक मात्रिक छन्द, जिसके प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं और अन्त में जगण होता है।) आदि मात्रिक छन्दों का सफल प्रयोग किया है।

(4) अलंकार-योजना – ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में कवि ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग किया है; उदाहरणार्थ

उपमा ”वन्य कुसुम-सा खिला कर्ण जग की आँखों से दूर।”
उत्प्रेक्षा – “लौह-दण्ड पर जड़ित पड़ा हो, मानो अर्थ अंशुमाली।”
रूपक – ‘फिर सहसा क्रोधाग्नि भयानक, भभक उठी उनके तन में।”

कवि ने व्यर्थ के आलंकारिक प्रयोगों से भाषा को बोझिल नहीं बनाया है। अलंकारों का प्रयोग इतना स्वाभाविक और वास्तविक लगता है कि वह पाठकों को आलंकारिक भूल-भुलैया में नहीं ले जाता। इस प्रकार ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से एक सफल खण्डकाव्य है, जो आज के समाज की विकृतियों को दूर करने का सशक्त सन्देश देता है तथा वर्तमान युग के लिए अत्यन्त उपयोगी भी है।

प्रश्न 8:
‘रश्मिरथी’ शीर्षक की सार्थकता पर विचार कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में वर्णित उद्देश्य में कवि कितना सफल हुआ है ? अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के माध्यम से कवि समाज को क्या सन्देश देना चाहता है ?
या
‘रश्मिरथी की कथा प्राचीन कलेवर में आधुनिक भारतीय समाज का चित्रण है, पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी’ शीर्षक का अर्थ स्पष्ट करते हुए सिद्ध कीजिए कि कर्ण का यह नाम सर्वथा उपयुक्त है।
या
” रश्मिरथी’ खण्डकाव्य जातिवाद के विष से पीड़ित वर्तमान भारतीय समाज के लिए परोक्ष रूप से एक निदान प्रस्तुत करता है।” इस कथन की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
शीर्षक की सार्थकता – राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ ने इस खण्डकाव्य का नामकरण सर्वथा उचित और उपयुक्त आधार पर किया है। पौराणिक कथा के आधार पर कर्ण सूर्य का पुत्र है; अतः सूर्य की रश्मियों (किरणों) को उसका पुत्र कहना उचित है। इसके अतिरिक्त कर्ण का व्यक्तित्व सूर्य जैसा ही तेजस्वी है। निश्चय ही वह चारित्रिक प्रखर किरणों वाले रथ का रथी है; अत: उसे रश्मिरथी’ कहा जा सकता है। कर्ण की प्रतिभा सूर्य की किरणों के समान दीप्तिमान थी। वह प्रतिभा के इस रथ का रथी था, इसलिए भी उसे ‘रश्मिरथी’ कहा जा सकता है। यदि हम कर्ण को समाज के उपेक्षित वर्ग के प्रतिभासम्पन्न व्यक्तित्व का प्रतीक मान लें तो ऐसी प्रतिभा को किरणों की संज्ञा दी जा सकती है और उस प्रतिभावान् को ‘रश्मिरथी’ कहा जा सकता है। अतः, ‘रश्मिरथी’ ही एक ऐसा उपयुक्त शीर्षक है, जो कर्ण के सम्पूर्ण व्यक्तित्व की पूर्णता को समेटने में समर्थ है।

उद्देश्य – कथानक के पौराणिक होने के पश्चात् भी इस खण्डकाव्य की रचना में कवि का उद्देश्य असाधारण प्रतिभा से सम्पन्न, किन्तु उपेक्षित जनों की ओर समाज का ध्यान आकर्षित करना रहा है। कहीं जन्म के आधार पर, कहीं जाति, वर्ण और कुल के आधार पर जो व्यक्तित्व का हनन होता रहा है, उन अवधारणाओं पर कवि ने प्रकाश डाला है और स्पष्ट किया है कि उपेक्षित प्रतिभाएँ कुण्ठित होकर कुसंगति में पड़ती हैं और समाज के विनाश का कारण बनती हैं। यदि कर्ण को बचपन से यथोचित सम्मान प्राप्त होता तो वह कदाचित् दुर्योधन का साथ देने को विवश न होता और सम्भवतः ऐसी स्थिति में महाभारत का विनाशकारी युद्ध भी न होता। इसके अतिरिक्त भारतीय समाज में नारियों की मनोदशा एवं समाज में उनकी स्थिति पर भी प्रकाश डाला गया है।
[ संकेत – प्रश्न 2 में इसी शीर्षक के अन्तर्गत दी गयी सामग्री का भी अध्ययन करें]

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UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 7 Employment: Growth, Informalisation and Other Issues

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 7 Employment: Growth, Informalisation and Other Issues (रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे) are part of UP Board Solutions for Class 11 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 7 Employment: Growth, Informalisation and Other Issues (रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 7
Chapter Name Employment: Growth, Informalisation and Other Issues (रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे)
Number of Questions Solved 57
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 7 Employment: Growth, Informalisation and Other Issues (रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
श्रमिक किसे कहते हैं?
उत्तर
सकल राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान देने वाले सभी क्रियाकलापों को हम आर्थिक क्रियाएँ कहते हैं। वे सभी व्यक्ति जो आर्थिक क्रियाओं में संलग्न होते हैं, श्रमिक कहलाते हैं।

प्रश्न 2.
श्रमिक-जनसंख्या अनुपात की परिभाषा दें।
उत्तर
श्रमिक जनसंख्या अनुपात एक सूचक है जिसका प्रयोग देश में रोजगार की स्थिति के विश्लेषण करने के लिए किया जाता है। यह अनुपात यह जानने में सहायक है कि जनसंख्या का कितना अनुपात वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में सक्रिय योगदान दे रहा है।

प्रश्न 3.
क्या ये भी श्रमिक हैं: एक भिखारी, एक चोर, एक तस्कर, एक जुआरी? क्यों?
उत्तर
एक भिखारी, एक चोर, एक तस्कर और एक जुआरी श्रमिक नहीं हैं क्योंकि ये आर्थिक क्रियाओं में कोई योगदान नहीं देते हैं।

प्रश्न 4.
इस समूह में कौन असंगत प्रतीत होता है—
(क) नाई की दुकान का मालिक,
(ख) एक मोची,
(ग) मदर डेयरी का कोषपाल,
(घ) ट्यूशन पढ़ाने वाला शिक्षक,
(ङ) परिवहन कम्पनी का संचालक,
(च) निर्माण मजदूर।
उत्तर
(घ) ट्यूशन पढ़ाने वाला शिक्षक इन सब में असंगत है क्योंकि यह स्व: नियोजित की श्रेणी में आता है जबकि शेष किराये के श्रमिक की श्रेणी में आते हैं।

प्रश्न 5.
नए उभरते रोजगार मुख्यतः …………….क्षेत्रक में ही मिल रहे हैं। (सेवा/विनिर्माण)
उत्तर
सेवा।

प्रश्न 6.
चार व्यक्तियों को मजदूरी पर काम देने वाले प्रतिष्ठान को…………..क्षेत्रक कहा जाता है। (औपचारिक/अनौपचारिक)
उत्तर
अनौपचारिक।

प्रश्न 7.
राज स्कूल जाता है। पर जब वह स्कूल में नहीं होता, तो प्रायः अपने खेत में काम करता| दिखाई देता है। क्या आप उसे श्रमिक मानेंगे? क्यों?
उत्तर
वे सभी व्यक्ति जो आर्थिक क्रियाकलाप में भाग लेते हैं, श्रमिक कहलाते हैं। खेत में काम करना भी एक आर्थिक क्रियाकलाप है क्योंकि इससे वस्तुओं के प्रवाह में बढ़ोतरी होती है। अत: राज को एक श्रमिक माना जा सकता है।

प्रश्न 8.
शहरी महिलाओं की अपेक्षा ग्रामीण महिलाएँ अधिक काम करती दिखाई देती हैं। क्यों?
उत्तर
भारत में शहरी क्षेत्रों में केवल 14 प्रतिशत महिलाएँ ही किसी आर्थिक कार्य में व्यस्त हैं तथा ग्रामीण क्षेत्रों में 30 प्रतिशत महिलाएँ आर्थिक कार्यों में लगी हुई हैं। शहरी क्षेत्रों में महिलाओं का प्रतिशत इसलिए कम है क्योंक वहाँ पर पुरुष पर्याप्त रूप से उच्च आय अर्जित करने में सफल रहते हैं और वे परिवार की महिलाओं को घर से बाहर रोजगार प्राप्त करने को प्राय: निरुत्साहित करते हैं। शहरी महिलाएँ घरेलू कामकाज में ही व्यस्त रहती हैं और महिलाओं द्वारा परिवार के लिए किए गए अनेक कार्यों को आर्थिक या उत्पादन कार्य ही नहीं माना जाता।

प्रश्न 9.
मीना एक गृहिणी है। घर के कामों के साथ-साथ वह अपने पति की कपड़े की दुकान के काम में भी हाथ बँटाती है। क्या उसे एक श्रमिक माना जा सकता है? क्यों?
उत्तर
हाँ, मीना को एक श्रमिक माना जा सकता है क्योंकि वह घरेलू कामकाज के साथ-साथ पति की पकड़े की दुकान में भी हाथ बंटाती है जोकि एक आर्थिक क्रियाकलाप है।

प्रश्न 10.
यहाँ किसे असंगत माना जाएगा
(क) किसी अन्य के अधीन रिक्शा चलाने वाला,
(ख) राजमिस्त्री,
(ग) किसी मेकेनिक की दुकान पर काम करने वाला श्रमिक,
(घ) जूते पॉलिश करने वाला लड़का।
उत्तर
यद्यपि उपर्युक्त सभी श्रमिक हैं, क्योंकि ये सभी आर्थिक क्रियाकलाप में संलग्न हैं, फिर भी चारों लोगों में (घ) जूते पॉलिश करने वाला लड़का असंगत है क्योंकि प्रथम तीनों किराए के श्रमिक हैं जबकि जूते पॉलिश करने वाला स्वनियोजित है।

प्रश्न 11.
निम्न सारणी में 1972-73 ई० में भारत में श्रमबल का वितरण दिखा गया है। इसे ध्यान से पढ़कर श्रमबल के वितरण के स्वरूप के कारण बताइए। ध्यान रहे कि ये आँकड़े 30 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 1
उत्तर
उपर्युक्त तालिका में दिए गए तथ्यों के आधार पर निम्न निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं

  1. भारत में कुल श्रमबल (19.4 + 3.9 = 23.3 करोड़) या 233 मिलियन था, जिसमें 194 मिलियन ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत थे, शेष शहरी क्षेत्रों में कार्यरत थे।
  2. कुल श्रमबल में 157 मिलियन पुरुष (68%) तथा 76 मिलियन (32%) महिलाएँ थीं।
  3. 125 मिलियन पुरुष (64%) ग्रामीण क्षेत्रों में काम करते थे।
  4. कुल रोजगार में पुरुष श्रमिकों का प्रतिशत 82 तथा महिलाओं का प्रतिशत 9.18 था।
  5. कुल महिला श्रमिकों में ग्रामीण महिला श्रमिकों का प्रतिशत 91 तथा शहरी क्षेत्रों में महिला श्रमिकों का प्रतिशत 9 था।

प्रश्न 12.
इस सारणी में 1999-2000 में भारत की जनसंख्या और श्रमिक जनानुपात दिखाया गया है। क्या आप भारत के (शहरी और सकल) श्रमबल का अनुमान लगा सकते हैं?
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 5 Human Capital Formation in India 2
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 5 Human Capital Formation in India 3

ग्रामीण क्षेत्र में कुल कार्यबल = 30.12
करोड़ शहरी क्षेत्र में कुल कार्यबल = 961 करोड़
|
कुल कार्यबल =39.66 करोड़

प्रश्न 13.
शहरी क्षेत्रों में नियमित वेतनभोगी कर्मचारी ग्रामीण क्षेत्र से अधिक क्यों होते हैं?
उत्तर
भारत में अधिकांश जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च आय के अवसर सीमित होते हैं। श्रम बाजार में भागीदारी हेतु भी संसाधनों की उनके पास कमी होती है। उनमें से अधिकांश व्यक्ति स्कूल, महाविद्यालय या किसी प्रशिक्षण संस्थान में नहीं जा पाते। यदि कुछ जाते भी हैं तो वे बीच में ही छोड़कर श्रम शक्ति में सम्मिलित हो जाते हैं। इसके विपरीत शहरी लोगों के पास शिक्षा और प्रशिक्षण पाने हेतु अधिक अवसृर होते हैं। शहरी जनसमुदाय को रोजगार के भी विविधतापूर्ण अवसर उपलब्ध हो जाते हैं। वे अपनी शिक्षा और योग्यता के अनुरूप रोजगार की तलाश में रहते हैं किन्तु ग्रामीण क्षेत्र के लोग घर पर नहीं बैठ सकते, क्योंकि उनकी आर्थिक दशा उन्हें ऐसा नहीं करते देती। इस कारण गाँवों की तुलना में शहरों में नियमित वेतनभोगी श्रमिक अधिक पाए जाते हैं।

प्रश्न 14.
नियमित वेतनभोगी कर्मचारियों में महिलाएँ कम क्यों हैं?
उत्तर
जब किसी श्रमिक को कोई व्यक्ति या उद्यम नियमित रूप से काम पर रख उसे मजदूरी देता है, तो वह श्रमिक नियमित वेतनभोगी कर्मचारी कहलाता है। भारत में नियमित वेतनभोगी रोजगारधारियों में पुरुष अधिक अनुपात में लगे हुए हैं। देश के 18 प्रतिशत पुरुष नियमित वेतनभोगी हैं और इस वर्ग में केवल 6 प्रतिशत ही महिलाएँ हैं। महिलाओं की इस कम सहभागिता का एक कारण कौशल स्तर में अन्तर हो सकता है। नियमित वेतनभागी वाले कार्यों में अपेक्षाकृत उच्च कौशल और शिक्षा के उच्च स्तर की आवश्यकता होती है। सम्भवत: इस अभाव के कारण ही अधिक अनुपात में महिलाओं को रोजगार नहीं मिल पा रहे हैं।

प्रश्न 15.
भारत में श्रमबल के क्षेत्रकवार वितरण की हाल की प्रवृत्तियों का विश्लेषण करें।
उत्तर
देश के आर्थिक विकास के क्रम में श्रमबल का प्रवाह कृषि एवं सम्बन्धित क्रयाकलापों से उद्योग एवं सेवा क्षेत्रक की ओर बढ़ा है। आर्थिक संवृद्धि की प्रक्रिया में मजदूर ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों को प्रवसन करते हैं। विकास के अन्तर्गत सेवा क्षेत्रक का अधिक विकास होने पर उद्योग क्षेत्र का रोजगार के मामले में हिस्सा घटने लगता है। भारत में अधिकांश श्रमिकों के रोजगार का प्रमुख स्रोत प्राथमिक क्षेत्रक है। द्वितीयक क्षेत्रक केवल 16 प्रतिशत श्रमबल को ही नियोजित कर रहा है। लगभग 24 प्रतिशत श्रमिक सेवा क्षेत्रक में लगे हुए हैं। ग्रामीण भारत में कृषि, खनन एवं उत्खनन की क्रियाओं में तीन-चौथाई प्रतिशत ग्रामीण रोजगार पाते हैं जबकि विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्रक में रोजगार पाने वाले ग्रामीणों का अनुपात क्रमशः 10 एवं 13 प्रतिशत है। 60 प्रतिशत शहरी श्रमिक सेवा क्षेत्रक में हैं। लगभग 30 प्रतिशत शहरी श्रमिक द्वितीयक क्षेत्रक में नियोजित हैं।

प्रश्न 16.
1970 से अब तक विभिन्न उद्योगों में श्रमबल के वितरण में शायद ही कोई परिवर्तन आया 
है। टिप्पणी करें।
उत्तर
भारत एक कृषिप्रधान देश है। यहाँ की जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग ग्रामीण क्षेत्रों में बसा है एवं कृषि और उससे सम्बन्धित क्रियाओं पर निर्भर है। भारत में विकास योजनाओं का ध्येय कृषि पर निर्भर जनसंख्या के अनुपात को कम करना रहा है। लेकिन कृषि श्रम का गैर-कृषि श्रम के रूप में खिसकाव अपर्याप्त रहा है। वर्ष 1972-73 में प्राथमिक क्षेत्रक में 74 प्रतिशत श्रमबल लगा था, वहीं 1999-2000 ई० में यह अनुपात घटकर 60 प्रतिशत रह गया। द्वितीयक तथा सेवा क्षेत्रक में यह प्रतिशत क्रमशः 11 से बढ़कर 16 तथा 15 से बढ़कर 24 प्रतिशत हो गया है। परन्तु राष्ट्र की विशालता एवं भौतिक प्राकृतिक संसाधनों की तुलना में उक्त बदलाव नगण्य दिखाई पड़ता है।

प्रश्न 17.
क्या आपको लगता है पिछले 50 वर्षों में भारत में रोजगार के सृजन में भी सकल घरेलू उत्पाद के अनुरूप वृद्धि हुई है? कैसे? उत्तर
सकल घरेलू उत्पाद (G.D.P.) एक वर्ष की अवधि में देश में हुए सभी वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन का बाजार मूल्य होता है। 1960-2000 ई० की अवधि में सकल घरेलू उत्पाद में सकारात्मक वृद्धि हुई है और यह संवृद्धि दर रोजगार वृद्धि दर से अधिक रही है। सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में कुछ उतार-चढ़ाव भी आते रहे हैं परन्तु इस अवधि में रोजगार की वृद्धि लगभग 2 प्रतिशत बनी रही। परन्तु 1990 ई० के अन्तिम वर्षों में रोजगार वृद्धि दर कम होकर उसी स्तर पर पहुँच गई जहाँ योजनाकाल के प्रथम चरणों में थी। इस अवधि में सकल घरेलू उत्पाद एवं रोजगार बढ़ोतरी की दरों में अन्तर रहा है। इस प्रकार हम भारतीय अर्थव्यवस्था में रोजगार सृजन के बिना ही अधिक वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करने में सक्षम रहे हैं।

प्रश्न 18.
क्या औपचारिक क्षेत्रक में ही रोजगार का सृजन आवश्यक है? अनौपचारिक में नहीं? कारण बसाइए।
उत्तर
सार्वजनिक क्षेत्रक की सभी इकाइयाँ एवं 10 या अधिक कर्मचारियों को रोजगार देने वाले निजी क्षेत्रक की इकाइयाँ औपचारिक क्षेत्रक माने जाते हैं। इन इकाइयों में काम करने वाले को औपचारिक क्षेत्र के कर्मचारी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी इकाइयाँ और उनमें कार्य कर रहे श्रमिक, अनौपचारिक श्रमिक कहलाते हैं।

औपचारिक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के लाभ मिलते हैं। इनकी आमदनी भी अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों से अधिक होती है। इसके विपरीत अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों की आय नियमित नहीं होती है तथा उनके काम में भी निश्चितता एवं नियमितता नहीं होती। किन्तु दोनों ही क्षेत्रक रोजगार देते हैं, अत: दोनों को ही विकास आवश्यक है। साथ ही अनौपचारिक क्षेत्र को नियमित एवं नियन्त्रित करना भी आवश्यक है।

प्रश्न 19.
विक्टर को दिन में केवल दो घण्टे काम मिल पाता है। बाकी सारे समय वह काम की तलाश में रहता है। क्या वह बेरोजगार है? क्यों? विक्टर जैसे लोग क्या काम करते होंगे?
उत्तर
विक्टर दिन में दो घण्टे काम करता है अर्थात् वह आर्थिक क्रियाकलाप में बहुत कम समय के लिए भाग लेता है। आर्थिक क्रियाकलाप में भाग लेने के कारण उसे श्रमिक कहा जा सकता है। लेकिन विक्टर को पूर्ण रोजगार प्राप्त नहीं है। उसका रोजगार अनियमित है। दूसरे शब्दों में वह अर्द्ध-बेरोजगार है। ऐसे लोग सकल घरेलू उत्पाद में तनिक-सा ही योगदान कर पाते हैं। अत: उनको नियमित रोजगार दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 20.
क्या आप गाँव में रह रहे हैं? यदि आपको ग्राम-पंचायत को सलाह देने को कहा जाए तो आप | गाँव की उन्नति के लिए किस प्रकार के क्रियाकलाप का सुझाव देंगे, जिससे रोजगार सृजन भी हो।
उत्तर
ग्रामवासी होन के नाते मैं ग्राम पंचायत को गाँव की उन्नति के लिए निम्नलिखित सुझाव दूंगा

  1. ग्राम पंचायत आधारित संरचना के विकास पर समुचित ध्यान दे। नालियाँ, पुलियाएँ व सड़क : बनवाएँ। इससे रोजगार के नए-नए अवसर सृजित होंगे।
  2. वह गाँव में कुटीर उद्योगों के विकास पर बल दे। इससे खाली समय में लोगों को रोजगार मिलेगा।
  3. गाँवों में सार्वजनिक निर्माण कार्यों को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार वित्तीय सहायता उपलब्ध | कराए।
  4. ग्रामीणों के लिए रोजगार सुनिश्चित किया जाए।
  5. बेसहारा बुजुर्गों, विधवा महिलाओं और अनाथ बच्चों के लिए सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराए।
  6. ग्राम पंचायत देखे कि गाँव का प्रत्येक बच्चा पढ़ने के लिए पाठशाला जाता है।
  7. ग्राम पंचायत गाँव में बच्चों के लिए स्वस्थ मनोरंजन के साधन उपलब्ध कराए।

प्रश्न 21.
अनियत दिहाड़ी मजदूर कौन होते हैं?
उत्तर
जब एक श्रमिक को जितने समय काम करना चाहिए उससे कम समय काम मिलता है अथवा वर्ष में कुछ महीनों के लिए बेकार रहना पड़ता है तो उसे अनियत दिहाड़ी मजदूर कहा जाता है। अनियत मजदूर को अपने काम के बदले उचित दाम व सामाजिक सुरक्षा के लाभ नहीं मिलते हैं। निर्माण मजदूर अनियत मजदूरी वाले श्रमिक कहलाते हैं।

प्रश्न 22.
आपको यह कैसे पता चलेगा कि कोई व्यक्ति अनौपचारिक क्षेत्रक में काम कर रहा है?
उत्तर
भारत में श्रमबल को औपचारिक तथा अनौपचारिक दो वर्गों में विभाजित किया गया है। सभी सार्वजनिक प्रतिष्ठानों तथा 10 या अधिक कर्मचारियों को रोजगार देने वाले निजी क्षेत्रक में काम करने वाले श्रमिकों को औपचारिक श्रमिक हो जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी उद्यम और उनमें काम कर रहे श्रमिकों को अनौपचारिक श्रमिक हो जाएगा। किसान, मोची, छोटे दुकानदार अनौपचारिक क्षेत्रक में काम करने वाले श्रमिक हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
गाँवों की तुलना में शहरों में नियमित वेतनभोगी श्रमिक पाए जाते हैं
(क) कम
(ख) अधिक
(ग) नगण्य ।
(घ) लगभग बराबर
उत्तर
(ख) अधिक

प्रश्न 2.
जब श्रमिक की उत्पादकता शून्य अथवा ऋणात्मक होती है, उसे कहते हैं
(क) मौसमी बेरोजगारी ।
(ख) स्थायी बेरोजगारी ।
(ग) छिपी हुई बेरोजगारी
(घ) शिक्षित बेरोजगारी
उत्तर
(ग) छिपी हुई बेरोजगारी

प्रश्न 3.
बेरोजगारी का सामाजिक दुष्परिणाम है१
(क) मानव संसाधन का निष्क्रिय पड़ा रहना
(ख) उत्पादन की हानि होना ।
(ग) उत्पादता का स्तर निम्न रहना
(घ) सामाजिक अशान्ति बढ़ना
उत्तर
(घ) सामाजिक अशान्ति बढ़ना

प्रश्न 4.
भारत का मुख्य व्यवसाय क्या है?
(क) कृषि
(ख) वाणिज्य
(ग) खनन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) कृषि

प्रश्न 5.
भारत में कौन-सी बेरोजगारी की स्थिति बड़ी करुण व दयनीय है?
(क) शिक्षित
(ख) मौसमी
(ग) औद्योगिक
(घ) अदृश्य
उत्तर
(क) शिक्षित

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सकल घरेलू उत्पाद क्या है?
उत्तर
किसी देश में एक वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य इसका सकल घरेलू उत्पाद’ कहलाता है।

प्रश्न 2.
आर्थिक क्रियाएँ क्या हैं?
उत्तर
सकल राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान देने वाले सभी क्रियाकलापों को आर्थिक क्रियाएँ कहते हैं।

प्रश्न 3.
श्रमिक कौन हैं?
उत्तर
वे सभी व्यक्ति जो आर्थिक क्रियाओं में संलग्न होते हैं, श्रमिक कहलाते हैं।

प्रश्न 4.
भारत में रोजगार की प्रकृति कैसी है?
उत्तर
भारत में रोजगार की प्रकृति बहुमुखी है। कुछ लोगों को वर्ष भर रोजगार प्राप्त होता है तो कुछ लोग वर्ष में कुछ महीने ही रोजगार पाते हैं।

प्रश्न 5.
देश में रोजगार की स्थिति के विश्लेषण के लिए किस सूचक का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर
देश में रोजगार की स्थिति के विश्लेषण के लिए ‘श्रमिक जनसंख्या अनुपात’ का प्रयोग किया जाता है। यह सूचक यह जानने में सहायक है कि जनसंख्या का कितना अनुपात वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में सक्रिय रूप से योगदान दे रहा है।

प्रश्न 6.
‘जनसंख्या से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
‘जनसंख्या’ शब्द का अभिप्राय किसी क्षेत्र-विशेष में किसी समय-विशेष पर रह रहे व्यक्तियों की कुल संख्या से है।

प्रश्न 7.
श्रमिक-जनसंख्या अनुपात का आकलन कैसे किया जाता है?
उत्तर
श्रमिक-जनसँख्या अनुपात का आकलन करने के लिए देश में कार्य कर रहे सभी श्रमिकों की संख्या को देश की जनसंख्या से भाग देकर उसे 100 से गुणा कर दिया जाता है। सूत्र रूप में,
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 5 Human Capital Formation in India 4
प्रश्न 8.
‘श्रमबल से क्या आशय है?
उत्तर
‘श्रमबल’ से आशय व्यक्तियों की उस संख्या से है जो वास्तव में काम कर रहे हैं या काम करने के इच्छुक हैं।

प्रश्न 9.
‘कार्यबल से क्या आशय है?
उत्तर
‘कार्यबल’ से आशय व्यक्तियों की उस संख्या से है जो वास्तव में काम कर रहे हैं।

प्रश्न 10.
सहभागिता दर से क्या आशय है?
उत्तर
सहभागिता दर से आय जनसंख्या के उस प्रतिशत से है जो वास्तव में उत्पादन क्रिया में सहभागी होते हैं। इसे देश की कुल जनसंख्या तथा कार्यबल के बीच अनुपात के रूप में मापा जाता है। सूत्र रूप में,
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 5 Human Capital Formation in India 5

प्रश्न 11.
‘मजदूरी रोजगार’ में कौन आते हैं?
उत्तर
‘मजदूरी रोजगार’ में वे व्यक्ति आते हैं जिनको अन्य व्यक्तियों ने रोजगार प्रदान किया हुआ है और इन्हें अपनी सेवाओं के बदले मजदूरी प्राप्त होती है।

प्रश्न 12.
स्वनियोजित किन व्यक्तियों को कहा जाता है?
उत्तर
स्वनियोजित उन व्यक्तियों को कहा जाता है जो अपने उद्यम के स्वामी और संचालक होते हैं। कपड़े की दुकान का स्वामी स्वनियोजित है।

प्रश्न 13.
नियमित वेतनभोगी कर्मचारी कौन हैं?
उत्तर
जब किसी श्रमिक को कोई व्यक्ति या उद्यम नियमित रूप से काम पर रख उसे मजदूरी देता है तो वह श्रमिक नियमित वेतनभोगी कर्मचारी’ कहलाता है।

प्रश्न 14.
देश की आजीविका का सर्वप्रमुख स्रोत क्या है? ”
उत्तर
देश की आजीविका का सर्वप्रमुख स्रात ‘स्वरोजगार है। 50 प्रतिशत से अधिक लोग इसी वर्ग में कार्यरत हैं।

प्रश्न 15.
भारत में अधिकांश श्रमिकों के रोजगार का प्रमुख स्रोत कौन-सा है?
उत्तर
भारत में अधिकांश श्रमिकों के रोजगार का स्रोत प्राथमिक क्षेत्रक (लगभग 60%) है।

प्रश्न 16.
गत 50 वर्षों से योजनाबद्ध विकास का प्रमुख उददेश्य क्या रहा है?
उत्तर
गते 50 वर्षों से योजनाबद्ध विकास का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीय उत्पाद और रोजगार में वृद्धि के माध्यम से अर्थव्यवस्था का प्रसार रहा है।

प्रश्न 17.
श्रमबल में किन श्रमिकों का अनुपात निरन्तर बढ़ रहा है? ”
उत्तर
श्रमबल में अनियत श्रमिकों का अनुपात निरन्तर बढ़ रहा है।

प्रश्न 18.
श्रमबल को किन दो वर्गों में विभाजित किया जाता है?
उत्तर
श्रमबल को निम्नलिखित दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-
1. औपचारिक अथवा संगठित वर्ग,
2. अनौपचारिक अथवा असंगठित वर्ग।।

प्रश्न 19.
संगठित अथवा औपचारिक वर्ग में कौन-कौन से प्रतिष्ठान आते हैं?
उत्तर
सभी सार्वजनिक क्षेत्रक प्रतिष्ठान तथा 10 या अधिक कर्मचारियों को रोजगार देने वाले निजी क्षेत्रक प्रतिष्ठान, संगठित क्षेत्र में सम्मिलित किए जाते हैं।

प्रश्न 20.
अनौपचारिक (असंगठित क्षेत्रक में कौन-कौन से कर्मचारी सम्मिलित होते हैं?
उत्तर
अनौपचारिक (असंगठित) क्षेत्रक में करोड़ों किसान, कृषि श्रमिक, छोटे-छोटे काम धन्धे चलाने वाले और उनके कर्मचारी तथा सभी सुनियोजित व्यक्ति जिनके पास भाड़े के श्रमिक नहीं हैं, सम्मिलित हैं।

प्रश्न 21.
बेरोजगारी से क्या आशय है?
उत्तर
बेरोजगारी वह दशा है जिसमें शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से कार्य करने के योग्य और प्रचलित मजदूरी पर कार्य करने को तत्पर व्यक्ति को कार्य न मिले।।

प्रश्न 22.
ऐच्छिक बेरोजगारी से क्या आशय है?
उत्तर
प्रत्येक समाज में प्रत्येक समय कुछ-न-कुछ व्यक्ति ऐसे अवश्य होते हैं जो काम करने के योग्य होते हुए भी काम करना नहीं चाहते। यह ऐच्छिक बेरोजगारी की अवस्था कहलाती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बेरोजगारी के आर्थिक व सामाजिक दुष्परिणाम बताइए।
उत्तर
बेरोजगारी के आर्थिक दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं

  1. मानव संसाधन निष्क्रिय रहते हैं। यह एक प्रकार का अपव्यय है।
  2. उत्पादन की हानि होती है।
  3. निवेशाधिक्य सृजित न होने के कारण पूँजी-निर्माण की दर धीमी रहती है।
  4. उत्पादकता का स्तर निम्न रहता है।

बेरोजगारी के सामाजिक दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं

  1. जीवन की गुणवत्ता कम होती है।
  2. आय तथा सम्पत्ति के वितरण में असमानता बढ़ती जाती है।
  3. इससे सामाजिक अशान्ति बढ़ती है।
  4. इस अवस्था में वर्ग-संघर्ष पनपता है।

प्रश्न. 2.
रोजगार/बेरोजगारी की सामान्य, साप्ताहिक तथा दैनिक स्थिति को समझाइए।
उत्तर-
1. सामान्य स्तर- यह वह स्थिति है जिसमें एक व्यक्ति अपना अधिकांश समय काम में व्यतीत करता है। भारत में सामान्य तथा 183 दिवस काम को मानक सीमा बिन्दु माना जाता है। जो व्यक्ति वर्ष में 183 या अधिक दिन काम करते हैं, वे सामान्य रोजगार प्राप्त हैं, अन्य सामान्य रूप से बेरोजगार हैं।

2. साप्ताहिक स्तर- यदि अनुबन्धित सप्ताह के दौरान आप कार्यबल का भाग बन जाते हैं तो आपको साप्ताहिक स्तर के आधार पर रोजगार प्राप्त माना जाएगा अन्यथा साप्ताहिक स्तर पर बेरोजगार।

3. दैनिक स्तर- इसका अनुमान व्यक्ति दिवसों के रूप में लगाया जाता है। ‘साप्ताहिक स्तर दीर्घकालीन बेरोजगारी की ओर संकेत करता है जबकि ‘दैनिक स्तर’ दीर्घकालीन तथा छिपी दोनों बेरोजगारियों का संकेत देता है।

प्रश्न 3.
अदृश्य अथवा छिपी बेरोजगारी से क्या आशय है? ।
उत्तर
अदृश्य अथवा छिपी बेरोजगारी आंशिक बेरोजगारी की वह अवस्था है जिसमें रोजगार में संलग्न श्रम शक्ति का उत्पादन में यागदान शून्य या लगभग शून्य होता है। किसी व्यवसाय/उद्योग में आवश्यकता से अधिक श्रम का लगा होना अदृश्य बेरोजगारी को जन्म देता है। अदृश्य बेरोजगारी निम्न दो रूपों में पाई जाती है
1. जब लोग अपनी योग्यता से कम उत्पादन कार्यों में लगे होते हैं। यह सामान्यतः औद्योगिक देशों में पाई जाती है।
2. जब किसी कार्य में आवश्यकता से अधिक लोग लगे होते हैं। यह बेरोजगारी प्रायःअल्पविकसित कृषिप्रधान देशों में पाई जाती है।

अदृश्य बेरोजगारी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. इसका सम्बन्ध अपना निजी काम करने वालों से होता है, मजदूरी पर काम करने वाले लोगों से | नहीं।
  2. यह दीर्घकालीन जनाधिक्य का परिणाम होती है।
  3. इसका कारण पूरक साधनों की कमी का होना है।

प्रश्न 4.
सामान्यतः आर्थिक क्रियाओं को किन वर्गों में विभाजित किया जाता है?
उत्तर
आर्थिक क्रियाओं को निम्न वर्गों में विभाजित किया जाता है–
1. प्राथमिक क्षेत्रक, जिसमें
(क) कृषि तथा
(ख) खनन व उत्खनन सम्मिलित होते हैं।

2. द्वितीयक क्षेत्रक, जिसमें
(क) विनिर्माण,
(ख) विद्युत, गैस एवं जलापूर्ति तथा
(ग) निर्माण 
कार्य सम्मिलित होते हैं।

3. तृतीयक अथवा सेवा क्षेत्रक, जिसमें
(क) वाणिज्य,
(ख) परिवहन और भण्डारण तथा
(ग) सेवाएँ सम्मिलित होती हैं।

प्रश्न 5.
सरकार रोजगार सृजन के लिए क्या प्रयास करती है?
उत्तर
केन्द्र एवं राज्य सरकारें रोजगार सृजन हेतु अवसरों की रचना करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती आ रही हैं। इनके प्रयासों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है—प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष रूप से सरकार अपने विभिन्न विभागों में प्रशासकीय कार्यों के लिए नियुक्तियाँ करती है। सरकार अनेक उद्योग, होटल और परिवहन कम्पनियाँ भी चला रही है। इन सब में वह प्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्रदान करती है। सरकारी उद्यमों में उत्पादकता के स्तर में वृद्धि अन्य उद्यमों के विस्तार को प्रोत्साहित करती है जिससे रोजगार के नए-नए अवसर सृजित होते हैं।देश में निर्धनता निवारण के लिए चलाए ज रहे विभिन्न कार्यक्रम रोजगार सृजन कार्यक्रम ही हैं। से कार्यक्रम केवल रोजगार ही उपलब्ध नहीं कराते अपितु इनके सहारे प्राथमिक, जनस्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा, ग्रामीण आवास, ग्रामीण जलापूर्ति, पोषण, लोगों की आय तथा रोजगार सृजन करने वाली परिसम्पत्तियाँ खरीदने में सहायता, दिहाड़ी रोजगार के सृजन के माध्यम से सामुदायिक परिसम्पत्तियों का विकास, गृह और स्वच्छता सुविधाओं का निर्माण, गृहनिर्माण के लिए सहायता, ग्रामीण सड़कों का निर्माण और बंजर भूमि आदि के विकास के कार्य पूरे किए जाते हैं।

प्रश्न 6.
क्या आप जानते हैं कि भारत जैसे देश में रोजगार वृद्धि की दर को 2 प्रतिशत स्तर पर बनाए रखना इतना आसान काम नहीं है? क्यों?
उत्तर
भारत एक विकासशील देश है। कृषि यहाँ का मुख्य व्यवसाय है। भारत के लगभग 60 प्रतिशत लोग कृषि कार्यों में संलग्न हैं। जनसंख्या की तीव्र वृद्धि के कारण कृषि क्षेत्र में श्रमाधिक्य है। पूँजी व अन्य सहायक साधनों के अभाव में रोजगार के आवश्यक अवसरों का सृजन नहीं हो पाता है। सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में देरी तथा सार्वजनिक रूप से बढ़ते भ्रष्टाचार के कारण ये परियोजनाएँ पूर्णत: सफल नहीं हो पाती हैं। बढ़ती मुद्रा स्फीति के कारण इन परियोजनाओं की लागत भी बढ़ती जाती है। इसके अतिरिक्त, इनके लाभ भी लाभार्थियों तक नहीं पहुँच पाते हैं।

प्रश्न 7.
इनमें से असंगठित क्षेत्रकों की क्रियाओं में लगे व्यक्तियों के सामने चिह्न अंकित करें

  1. एक ऐसे होटल का कर्मचारी, जिसमें सात भाड़े के श्रमिक एवं तीन पारिवारिक सदस्य हैं।
  2. एक ऐसे निजी विद्यालय का शिक्षक, जहाँ 25 शिक्षक कार्यरत हैं।
  3. एक पुलिस सिपाही।
  4. सरकारी अस्पताल की एक नर्स।
  5. एक रिक्शाचालक।
  6. कपड़े की दुकान का मालिक, जिसके यहाँ नौ श्रमिक कार्यरत हैं।
  7. एक ऐसी बेस कम्पनी का चालक, जिसमें 10 से अधिक बसें और 20 चालक, संवाहक तथा अन्य कर्मचारी हैं।
  8. दस कर्मचारियों वाली निर्माण कम्पनी का सिविल अभियन्ता।
  9. राज्य सरकारी कार्यालय में अस्थायी आधार पर नियुक्त कम्प्यूटर ऑपरेटर।
  10. बिजली दफ्तर का एक क्लर्क।

उत्तर
असंगठित क्षेत्रकों की क्रियाओं में संलग्न व्यक्ति हैं-
(1) एक ऐसे होटल का कर्मचारी, जिसमें सात भाड़े के श्रमिक एवं तीन पारिवारिक सदस्य हैं।
(5) एक रिक्शाचालक।
(6) कपड़े की दुकान का मालिक, जिसके यहाँ नौ श्रमिक कार्यरत हैं।
(9) राज्य सरकारी कार्यालय में अस्थायी आधार पर नियुक्त कम्प्यूटर ऑपरेटर। 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बेरोजगारी किसे कहते हैं? भारत में बेरोजगारी के विभिन्न स्वरूप बताइए।
उत्तर
पूर्ण रोजगार के अभाव की स्थिति को बेरोजगारी कहते हैं। यह एक अत्यन्त पतित एवं दूषित स्थिति है जिसे ‘आर्थिक बरबादी’ के नाम से भी पुकारा जाता है। वस्तुतः बेरोजगारी की स्थिति आर्थिक विकास के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है जो सामाजिक और राजनीतिक अशान्ति को जन्म देती है। इसका समस्त समाज पर व्यापक दुष्प्रभाव पड़ता है। अर्थशास्त्रीय दृष्टि से वही व्यक्ति बेरोजगार कहलाता है, जो शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से कार्य करने के योग्य हो। साथ ही, प्रचलित मजदूरी की दर पर कार्य करने को तत्पर भी हो, परंतु उसे कार्य न मिले। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति शारीरिक या मानसिक दृष्टि से कार्य करने के योग्य नहीं है अथवा प्रचलित मजदूरी की दर पर कार्य करने के लिए तत्पर नहीं है (जबकि उसे कार्य उपलब्ध हो) तो उसे 
बेरोजगार नहीं कहा जाएगा। अभिप्राय यह है कि अर्थशास्त्र में ऐच्छिक बेरोजगारी (Voluntary Unemployment) को बेरोजगारी नहीं कहा जाता।

ऐच्छिक बेरोजगारी
प्रत्येक समाज में प्रत्येक समय कुछ-न-कुछ व्यक्ति ऐसे अवश्य पाए जाते हैं जो काम करने के स्रोग्य होते हुए भी काम नहीं करना चाहते। इस प्रकार की बेरोजगारी प्राय: तीन कारणों से उत्पन्न होती है

  1. कुछ व्यक्ति आलसी व कमजोर होने के कारण काम पसन्द नहीं करते जैसी भिखारी, साधु आदि।
  2. कुछ व्यक्ति धनी होने के कारण काम करने की आवश्यकता ही नहीं समझते।
  3. कुछ व्यक्ति उदासीन प्रकृति के होते हैं।

अनैच्छिक बेरोजगारी
जब स्वस्थ, योग्य एवं काम के इच्छुक व्यक्तियों को मजदूरी की प्रचलित दर पर काम नहीं मिल पाता तो इसे अनैच्छिक बेरोजगारी कहते हैं। कीन्स के अनुसार-“इस प्रकार की बेरोजगारी प्रभावपूर्ण माँग में कमी होने के कारण उत्पन्न होती है।”

भारत में बेरोजगारी का स्वरूप

भारत एक विकासशील देश है। अतः यहाँ ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी का स्वरूप एक-सा नहीं पाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी के तीन मुख्य रूप दिखाई देते हैं-खुली बेरोजगारी, मौसमी बेरोजगारी और छिपी हुई बेरोजगारी। शहरों में पाई जाने वाली बेरोजगारी मुख्यतः दो प्रकार की है—औद्योगिक बेरोजगारी और शिक्षित बेरोजगारी।

ग्रामीण बेरोजगारी
भारत में ग्रामीण बेरोज़गारी का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है

1. खुली बेरोजगोरी– इससे हमारा अभिप्राय उन व्यक्तियों से है जिन्हें जीवन-यापन हेतु कोई कार्य नहीं मिलता। इसे स्थायी बेरोजगारी भी कहा जाता है। इस स्थायी बेरोजगारी के अन्तर्गत भारतीय गाँवों में बहुत सारे व्यक्ति बेरोजगार रहते हैं। स्थायी बेरोजगारी का मुख्य कारण कृषि पर जनसंख्या की अत्यधिक निर्भरता है।

2. मौसमी बेरोजगारी– इस प्रकार की बेरोजगारी वर्ष के कुछ महीनों में अधिक दिखाई देती है। श्रम की माँग में होने वाले परिवर्तनों में मौसमी बेरोजगारी की मात्रा भी परिवर्तित होती रहती है। सामान्यतः फसलों के बोने तथा काटने के समय श्रम की अधिक माँग रहती है, परन्तु अन्य मौसमों में रोजगार उपलब्ध नहीं होता। ग्रामीणों को सामान्यतया साल में 128 से 196 दिन तक बेरोजगार रहना पड़ता है।

3. छिपी हुई बेरोजगारी– जब श्रमिक की उत्पादकता शून्य अथवा ऋणात्मक होती है, तब उसे छिपी हुई या अदृश्य बेरोजगारी कहते हैं। इस प्रकार की बेरोजगारी का अनुमान लगाना कठिन है। , देश की लगभग 67% जनसंख्या कृषि में संलग्न है जबकि इतनी जन-शक्ति की वहाँ आवश्यकता नहीं है।

शहरी बेरोजगारी 
भारत की शहरी बेरोजगारी का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है
1. औद्योगिक बेरोजगारी- औद्योगिक क्षेत्र में पाई जाने वाली बेरोजगारी को औद्योगिक बेरोजगारी
कहा जाता है। इस प्रकार की बेरोजगारी चक्रीय बेरोजगारी तथा तकनीकी बेरोजगारी से प्रभावित होती है। शिक्षित बेरोजगारी 

2. शिक्षा के प्रसार के साथ- साथ इस प्रकार की बेरोजगारी का प्रसार हो रहा है। देश में शिक्षित बेरोजगारी की स्थिति बड़ी करुण एवं दयनीय हो गई है। ‘भारत में प्रशिक्षितों की बेरोजगारी‘ नामक पुस्तक में स्थिति का मूल्यांकन इन शब्दों में किया गया है-“हमारे ।
शिक्षित युवकों में बढ़ती हुई बेरोजगारी हमारे राष्ट्रीय स्थायित्व के लिए जबरदस्त खतरा है। उसे नियन्त्रित करने के लिए यदि समायोचित कदम नहीं उठाया गया तो भारी उथल-पुथल का अन्देशा

बेरोजगारी एक अभिशाप है। इससे एक ओर राष्ट्र के बहुमूल्य साधनों की बरबादी होती है तो दूसरी ओर निर्धनता, ऋणग्रस्तता, औद्योगिक अशान्ति को जन्म मिलता है। सामाजिक दृष्टि से अपराधों में वृद्धि होती है तथा राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न होती है, जिसका समस्त समाज पर व्यापक दुष्प्रभाव पड़ता है। अतः राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों में कहा गया है कि आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करना नागरिकों का अधिकार है।

प्रश्न 2.
भारत में बेरोजगारी के प्रमुख कारण बताइए। बेरोजगारी को दूर करने के लिए उपयुक्त| सुझाव दीजिए।
उत्तर
भारत में बेरोजगारी के कारण भारत में बेरोजगारी के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

1. जनसंख्या में तीव्र वृद्धि–देश में जनसंख्या की वृद्धि-दर लगभग 1.93% वार्षिक रही है। इस प्रकार, जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है, लेकिन रोजगार की सुविधाओं में उस अनुपात में वृद्धि नहीं हुई है।

2. कुटीर उद्योगों का अभाव- भारत में कुटीर उद्योगों का ह्रास हो जाने के कारण भी बेरोजगारी में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है क्योंकि उनमें संलग्न लोगों को अन्य क्षेत्रों में रोजगार नहीं मिला है।

3. दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली- हमारे देश में दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली के कारण भी बेरोजगारी में वृद्धि हुई है। भारत में शिक्षा पद्धति व्यवसाय-प्रधान न होकर सिद्धान्त-प्रधान है, जो बेरोजगारी को जन्म दे रही है।

4. यन्त्रीकरण में वृद्धि – विकास की गति को तेज करने के लिए कृषि व उद्योगों में यन्त्रीकरण व आधुनिकीकरण की नीति को अपनाया जा रहा है, जिसके कारण अस्थायी बेरोजगारी को बढ़ावा मिला है।

5. श्रमिकों की गतिशीलता में कमी– शिक्षा का अभाव, पारिवारिक मोह, रूढ़िवादिता,अन्धविश्वास आदि भारतीय श्रमिक की गतिशीलता में बाधक हैं, जिसके कारण व्यक्ति घर पर बेकार रहना पसन्द करता है।

6. अविकसित प्राकृति साधन- यद्यपि हमारे देश में प्राकृतिक साधने पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।तथापि उनका पूर्ण विदोहन नहीं हुआ है, जिसके कारण देश के औद्योगिक विकास की गति धीमी रही है।

7. तकनीकी ज्ञान का अभाव- देश के शिक्षित समुदाय में तकनीकी ज्ञान का अभाव है। वह केवल लिपिक बन सकता है, किसी भी व्यवसाय को आरम्भ करने की क्षमता उसमें नहीं है। इस कारण देश में शिक्षित बेरोजगारी की प्रचुरता है।

8. बचत तथा विनियोग की न्यून दर– प्रति व्यक्ति आय कम होने के कारण हमारे देश में बचत करने की शक्ति कम है, जिसके फलस्वरूप विनियोग भी कम होता है। विनियोग के अभाव में नवीन उद्योग स्थापित नहीं हो पाते।

9. शरणार्थियों का आगमन- म्यांमार, ब्रिटेन, श्रीलंका, कीनिया, युगाण्डा आदि देशों से भारतीयों के लौटने तथा पाकिस्तान के शरणार्थियों के आगमन के कारण बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि रही

10. दोषपूर्ण विचार पद्धति–अधिकांश व्यक्ति पढ़ाई के पश्चात् नौकरी चाहते हैं। वे स्वयं अपना कोई कार्य करना पसन्द नहीं करते, जिससे रोजगार चाहने वालों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही

11. पूँजी-गहन परियोजनाओं पर अधिक बल–द्रिय योजना के प्रारम्भ से ही हमने आधारभूत उद्योगों के विकास पर अधिक बल दिया है, जिससे भारी इन्जीनियरी व रसायन उद्योगों में अधिक पूँजी तो लगाई गई, लेकिन उसमें रोजगार के अवसर ज्यादा नहीं खुल पाए।

12. रोजगार-नीति व अंम-शक्ति नियोजन का अभाव योजनाओं में रोजगार प्रदान करने केसम्बन्ध में कोई व्यापक व प्रगतिशील नीति नहीं अपनाई गई। श्रम-शक्ति नियोजन की दिशा में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। इसके फलस्वरूप देश में बेरोजगारी बढ़ी है।

बेरोजगारी को दूर करने हेतु सुझाव

बेरोजगारी के लिए उत्तरदायी कारणों से स्पष्ट है कि हमारे देश में बेरोजगारी का मूल कारण देश का मन्द आर्थिक विकास है। आज बेरोजगारी समय की सबसे बड़ी चुनौती है; अतः रोजगार की मात्रा में वृद्धि के लिए आर्थिक विकास के कार्यक्रमों की गति देनी ही होगी। इस समस्या को सुलझाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं-

  1. देश में श्रम-शक्ति की वृद्धि को रोकने के लिए जनसंख्या की वृद्धि पर प्रभावपूर्ण नियन्त्रण लगाया | जाए।
  2. जन-शक्ति के उचित उपयोग के लिए जन-शक्ति का नियोजन (Man-power planning) किया जाए।
  3. योजना में वित्तीय लक्ष्यों की उपलब्धि के साथ रोजगार लक्ष्यों की पूर्ति पर ध्यान केन्द्रित होना | चाहिए। अन्य शब्दों में, पंचवर्षीय योजनाओं को पूर्णरूपेण ‘रोजगार-प्रधान’ बनाया जाए।
  4. कुटीर तथा लघु उद्योगों का विकास किया जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में तो ये उद्योग ही सम्भावित रोजगार । के केन्द्रबिन्दु हैं।
  5. कृषि के विकास तथा हरित क्रान्ति को स्थायी बनाने के प्रयास किए जाएँ।
  6. ग्रामीण औद्योगीकरण का विस्तार किया जाए।
  7. बचत तथा विनियोग दर में वृद्धि का हर सम्भव प्रयास किया जाए, क्योंकि अधिक पूँजी का विनियोग रोजगार के अधिक अवसर प्रदान करेगा।
  8. आर्थिक विकास के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करने की दृष्टि से शिक्षा-प्रणाली तथा सामाजिक व्यवस्था में वांछित परिवर्तन किया जाए।
  9. रोजगार कार्यालयों (Employment Exchanges) द्वारा रोजगार सेवाओं का विस्तार किया जाए।
  10. बेरोजगारी विशेषज्ञ समिति का सुझाव है कि रोजगार और जन-शक्ति के आयोजन के लिए एक राष्ट्रीय आयोग स्थापित किया जाए।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत (द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत (द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name सत्य की जीत (द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी)
Number of Questions 9
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत (द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी)

प्रश्न 1:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य का कथानक (कथावस्तु) संक्षेप में लिखिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में वर्णित अत्यधिक मार्मिक प्रसंग का निरूपण कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी और दुःशासन के वार्तालाप को अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘सत्य की जीत’ में धृतराष्ट्र ने लोकमंगल की जिस नीति की उदघोषणा की है, उसका सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘सत्य की जीत’ के आधार पर दुःशासन एवं विकर्ण के शस्त्र एवं शास्त्र सम्बन्धी विचारों की सम्यक विवेचना कीजिए।
या
“शस्त्र को सर्वस्व मानना विनाश का मूल है।” यह बात ‘सत्य की जीत’ में किस प्रकार अभिव्यक्त की गयी है ?
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथा द्रौपदी के चीर-हरण से सम्बद्ध है। यह कथानक महाभारत के सभापर्व में द्यूतक्रीड़ा की घटना पर आधारित है। यह एक अत्यन्त लघुकाव्य है, जिसमें कवि ने पुरातन आख्यान को वर्तमान सन्दर्भो में प्रस्तुत किया है। इसकी कथा संक्षेप में अग्रवत् है–

दुर्योधन पाण्डवों को द्यूतक्रीड़ा के लिए आमन्त्रित करता है। पाण्डव उसके निमन्त्रण को स्वीकार कर लेते हैं। युधिष्ठिर जुए में निरन्तर हारते रहते हैं और अन्त में अपना सर्वस्व हारने के पश्चात् द्रौपदी को भी हार जाते हैं। इस पर कौरव भरी सभा में द्रौपदी को वस्त्रहीन करके अपमानित करना चाहते हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए। दुर्योधन दु:शासन को आदेश देता है कि वह बलपूर्वक द्रौपदी को भरी सभा में लाये। दु:शासन राजमहल से द्रौपदी के केश खींचते हुए सभा में लाता है। द्रौपदी को यह अपमान असह्य हो जाता है। वह सिंहनी के संमान गरजती हुई दुःशासन को ललकारती है। द्रौपदी की गर्जना से पूरा राजमहल हिल जाता है और समस्त सभासद स्तब्ध रह जाते हैं-

ध्वंस विध्वंस प्रलय का दृश्य, भयंकर भीषण हा-हाकार।
मचाने आयी हूँ रे आज, खोल दे राजमहल का द्वार ॥

इसके पश्चात् द्रौपदी और दु:शासन में नारी पर पुरुष द्वारा किये गये अत्याचार, नारी और पुरुष की सामाजिक समानता और उनके अधिकार, उनकी शक्ति, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, शस्त्र और शास्त्र, न्याय-अन्याय आदि विषयों पर वाद-विवाद होता है। अहंकारी दु:शासन भी क्रोध में आ जाता है। ‘भरी सभा में युधिष्ठिर अपना सर्वस्व हार चुके हैं तो मुझे दाँव पर लगाने का उन्हें क्या अधिकार रह गया है ? द्रौपदी के इस तर्क से सभी सभासद प्रभावित होते हैं। वह युधिष्ठिर की सरलता और दुर्योधन आदि कौरवों की कुटिलता का भी रहस्य प्रकट करती है। वह कहती है कि सरल हृदय युधिष्ठिर कौरवों की कुटिल चालों में आकर छले गये हैं; अतः सभा में उपस्थित धर्मज्ञ यह निर्णय दें कि क्या वे अधर्म और कपट की विजय को स्वीकार करते हैं अथवा सत्य और धर्म की हार को अस्वीकार करते हैं ?

कहता है कि यदि शास्त्र-बल से शस्त्र-बल ऊँचा और महत्त्वपूर्ण हो जाएगा तो मानवता का विकास अवरुद्ध . हो जाएगा; क्योंकि शस्त्र-बल मानवता को पशुता में बदल देता है। वह इस बात पर बल देता है कि द्रौपदी द्वारा प्रस्तुते तर्क पर धर्मपूर्वक और न्यायसंगत निर्णय होना चाहिए। वह कहता है कि द्रौपदी किसी प्रकार भी कौरवों द्वारा जीती हुई नहीं है।

किन्तु कौरव ‘विकर्ण की बात को स्वीकार नहीं करते। हारे हुए युधिष्ठिर अपने उत्तरीय वस्त्र उतार देते हैं। दुःशासन द्रौपदी के वस्त्र खींचने के लिए हाथ बढ़ाता है। उसके इस कुकर्म पर द्रौपदी अपने सम्पूर्ण आत्मबल के साथ सत्य का सहारा लेकर उसे ललकारती है और वस्त्र खींचने की चुनौती देती है। वह कहती है कि मैं किसी प्रकार भी विजित नहीं हैं और उसके प्राण रहते उसे कोई भी निर्वस्त्र नहीं कर सकता। यह सुनकर मदान्ध दु:शासन द्रौपदी का चीर खींचने के लिए पुन: हाथ बढ़ाता है। द्रौपदी रौद्र रूप धारण कर लेती है। उसके दुर्गा-जैसे तेजोद्दीप्त भयंकर रौद्र-रूप को देख दुःशासन घबरा जाता है और उसके वस्त्र खींचने में स्वयं को असमर्थ पाता है।

द्रौपदी कौरवों को पुनः चीर-हरण करने के लिए ललकारती है। सभी सभासद द्रौपदी के सत्य, तेज और सतीत्व के आगे निस्तेज हो जाते हैं। वे सभी कौरवों की निन्दा तथा द्रौपदी के सत्य और न्यायपूर्ण पक्ष का समर्थन करते हैं। मेदान्ध दुर्योधन, दु:शासन, कर्ण आदि को द्रौपदी पुन: ललकारती हुई कहती है-

और तुमने देखा यह स्वयं, कि होते जिधर सत्य और न्याय ।
जीत होती उनकी ही सदा, समय चाहे कितना लग जाय ॥

वहाँ उपस्थित सभी सभासद कौरवों की निन्दा करते हैं; क्योंकि वे सभी यह अनुभव करते हैं कि यदि पाण्डवों के प्रति होते हुए इस अन्याय को आज रोका नहीं गया तो इसका परिणाम बहुत बुरा होगा।

अन्त में धृतराष्ट्र उठते हैं और पाण्डवों को मुक्त करने तथा उनका राज्य लौटाने के लिए दुर्योधन को आदेश देते। हैं। इसके साथ ही चे द्रौपदी का पक्ष लेते हुए उसका समर्थन करते हैं तथा सत्य, न्याय, धर्म की प्रतिष्ठा तथा संसार का कल्याण करना ही मानवं-जीवन का उद्देश्य बताते हैं। वे पाण्डवों की कल्याण-कामना करते हुए कहते हैं-

तुम्हारे साथ तुम्हारी सत्य, शक्ति श्रद्धा, सेवा औ’ कर्म ।
यही जीवन के शाश्वत मूल्य, इन्हीं पर टिका मनुज का धर्म ॥
इन्हीं को लेकर दृढ़ अवलम्ब, चल रहे हो तुम पथ पर अभय ।
तुम्हारा गौरवपूर्ण भविष्य, प्राप्त होगी पग-पग पर विजय ॥

धृतराष्ट्र द्रौपदी के विचारों को उचित ठहराते हैं। वे उसके प्रति किये गये दुर्व्यवहार के लिए उससे क्षमा माँगते हैं। तथा कहते हैं-

जहाँ है सत्य, जहाँ है धर्म, जहाँ है न्याय, वहाँ है जीत।
तुम्हारे यश-गौरव के दिग्-दिगन्त में गूंजेंगे स्वर, गीत ॥

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि इस खण्डकाव्य की कथा द्रौपदी के चीरहरण की अत्यन्त संक्षिप्त किन्तु मार्मिक घटना पर आधारित है। द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी ने इस कथा को अत्यधिक प्रभावी बनाया है और युग के अनुकूल बनाकर नारी के सम्मान की रक्षा करने के संकल्प को दुहराया है।

प्रश्न 2:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ की कथावस्तु की समीक्षा कीजिए।
या
“वस्तु-सौष्ठव एवं संगठन की दृष्टि से ‘सत्य की जीत’ एक सफल खण्डकाव्य है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
खण्डकाव्य की दृष्टि से ‘सत्य की जीत’ काव्य की समीक्षा (आलोचना) कीजिए।
या
“सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के रचना-कौशल पर प्रकाश डालिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की पात्र-योजना अथवा पात्रों की प्रतीकात्मकता पर अपनी दृष्टि डालिए।
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य कथा-संगठन एवं उसके रचना-शिल्प के अनुसार निम्नलिखित विशेषताओं से युक्त है

(1) प्रसिद्ध पौराणिक घटना पर आधारित – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु द्रौपदी के चीर-हरण’ की पौराणिक घटना पर आधारित है। महाभारत में वर्णित यह मार्मिक प्रसंग सभी युगों में विद्वानों द्वारा विवाद एवं निन्दात्मक समस्या का विषय बना रहा है। तत्कालीन युग में विदुर ने नारी के इस अपमान को भीषण विनाश का पूर्व संकेत माना था और अधिकांश समालोचकों के अनुसार महाभारत के युद्ध का कारण भी प्रमुख रूप से यही था। पाण्डवों को तत्कालीन समाज का भावनात्मक समर्थन भी इसी कारण मिला था। कवि ने इसी मार्मिक घटना को अपने खण्डकाव्य की कथावस्तु बनाया है।

(2) कथावस्तु का संगठन – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने संवादों के माध्यम से कथा का संगठन किया है। प्रसंग लघु होने के कारण संवाद-सूत्र में व्यक्त की गयी इस कथा का संगठन अत्यन्त उत्तम कोटि का है। कवि ने वातावरण, मनोवेग, आक्रोश आदि की अभिव्यक्ति जिन संवादों द्वारा की है, वह अपनी व्यंजना में पूर्णतया सफल रहे हैं। कथावस्तु में केवल राजसभा का एक दृश्य सामने आता है, किन्तु नाटकीय आरम्भ एवं कौतूहलपूर्ण मोड़ों से गुजरती हुई कथावस्तु स्वाभाविक रूप में तथा त्वरित गति से अपनी सीमा की ओर बढ़ी

(3) कथावस्तु की लघुता में विशालता – ‘सत्य की जीत’ का कथा-प्रसंग अत्यन्त लघु है। कवि ने द्रौपदी के चीर-हरण के प्रसंग पर अपने खण्डकाव्य की कथावस्तु-योजना तैयार की है। इस एक घटना को लेकर कवि ने प्रस्तुत खण्डकाव्य में विशद वस्तु-योजना की है, जिसमें महाभारत काल के साथ-साथ वर्तमान युग के समाज की विसंगतियों के प्रति आक्रोश की उद्घोषणा हुई है ।

पुरुष के पौरुष से ही सिर्फ, बनेगी धरा नहीं यह स्वर्ग।
चाहिए नारी का नारीत्व, तभी होगा पूरा.यह सर्ग।

(4) मौलिकता – यद्यपि ‘सत्य की जीत की कथा महाभारत की चीर-हरण घटना पर आधारित है, किन्तु कवि ने उसके प्रस्तुतीकरण में वर्तमान नारी की दशा को प्रस्तुत किया है और कुछ मौलिक परिवर्तन भी किये हैं। वे द्रौपदी के वस्त्र को श्रीकृष्ण द्वारा बढ़ाया जाता हुआ नहीं दिखाते, वरन् स्वयं द्रौपदी को ही अपने आत्मबल के प्रयोग के द्वारा दुःशासन को रोकते हुए दिखाते हैं। माहेश्वरी जी ने इस प्रसंग को स्वाभाविक एवं बुद्धिगम्य बना दिया है।

(5) देशकाल एवं वातावरण – इस खण्डकाव्य में महाभारतकालीन देशकाल एवं वातावरण का अनुभव अत्यन्त कुशलता से कराया गया है। दृश्य तो एक ही है, किन्तु पात्रों के संवाद एवं उनकी छवि के अंकन से इस देशकाल एवं वातावरण का पूर्ण स्वरूप सामने आ जाता है।

(6) नाटकीयती अथवा संवाद-योजना – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने कथोपकथनों के द्वारा कथा को प्रस्तुत किया है। इसके संवाद सशक्त, पात्रानुकूल तथा कथा-सूत्र को आगे बढ़ाने वाले हैं। कवि के इस प्रयास से काव्य में नाटकीयता का समावेश हो गया है, जिस कारण ‘सत्य की जीत काव्य अधिक आकर्षक बन गया है। द्रौपदी का यह संवाद उसकी निडर मनोवृत्ति का परिचायक हैं

अरे ओ दुर्योधन निर्लज्ज, करता यों बढ़-बढ़कर बात।
बाल बाँकी कर पाया नहीं, तुम्हारा वीर विश्वविख्यात ।।

(7) सुसम्बद्धता – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु पात्रों के कथोपकथनों की कड़ियों से सुसम्बद्ध हैं। कवि की कल्पना-शक्ति, अद्भुत प्रस्तुतीकरण और प्रबन्धात्मकता सभी सराहनीय हैं। कथा में आदि से अन्त तक कहीं भी अव्यवस्था नहीं आयी है। इस प्रकार समस्त कथावस्तु सुसम्बद्ध एवं सुव्यवस्थित है।

(8) खण्डकाव्य का सन्देश और उद्देश्य – प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि ने पात्रों के कथोपकथनों तथा तर्कवितर्क द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि असत्य, क्रूरता, अहंकार, अन्याय और अत्याचार की पराजय अवश्य होती है। कवि का उद्देश्य प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथा के द्वारा नारी-जागरण एवं शस्त्रों के भण्डारण के विरुद्ध मानवतावादी भावना को स्वर देना है। राष्ट्र या समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना भी इस खण्डकाव्य की कथावस्तु का उद्देश्य है।

(9) पात्रों की प्रतीकात्मकता – इस खण्डकाव्य में प्रस्तुत किये गये सभी पात्रों का प्रतीकात्मक महत्त्व है। द्रौपदी सत्य, न्याय, धर्म आदि के गुणों की पुंज एवं अपने अधिकारों के लिए सजग और प्रगतिशील नारी को प्रतीक है। दु:शासन और दुर्योधन अनैतिकता एवं हिंसावृत्ति के प्रतीक हैं। पाण्डवों की प्रतीकात्मकता निम्नलिखित पंक्तियों से स्पष्ट है

युधिष्ठिर सत्य, भीम हैं शक्ति, कर्म के अर्जुन हैं अवतार।
नकुल श्रद्धा, सेवा सहदेव, विश्व के हैं ये मूलाधार ॥

(10) पात्रों का चयन एवं समायोजन – कवि ने इस खण्डकाव्य की कथा-योजना में महाभारतकालीन उन्हीं प्रमुख पात्रों को लिया है, जिनका द्रौपदी के चीर-हरण प्रसंग में उपयोग किया जा सकता था। नवीनता यह है कि इन पात्रों में श्रीकृष्ण को किसी भी रूप में सम्मिलित नहीं किया गया है। प्रमुख पात्र द्रौपदी एवं दु:शासन हैं। अन्य पात्रों का उल्लेख केवल वातावरण एवं प्रसंग को उद्दीपन प्रदान करने के लिए हुआ है। पात्रों को चरित्र-चित्रण स्वाभाविक है और उनके मनोभावों की अभिव्यक्ति की बड़ी सुन्दर अभिव्यंजना हुई है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि वस्तु-संगठन की दृष्टि से खण्डकाव्य की कथा लघु होनी चाहिए, नायक या नायिका में उदात्त-गुणों का समावेश होना चाहिए और कथा का विस्तार क्रमिक एवं उद्देश्य आदर्शों की स्थापना होना चाहिए। इन सभी विशेषताओं का समावेश इस खण्डकाव्य में सफलतापूर्वक किया गया है; अतः यह एक सफल खण्डकाव्य है।।

प्रश्न 3:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में निहित सन्देश (उद्देश्य) को स्पष्ट कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ में प्रतिपादित आदर्शों का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
या
” ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने मानवीय आदर्श एवं शाश्वत जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठा की है, इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ की प्रमुख विचारधारा पर प्रकाश डालिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि की सफलता पर प्रकाश डालिए।
या
‘सत्य की जीत’ के प्रमुख विचार-बिन्दुओं पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
या
” ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु पौराणिक होते हुए भी आधुनिक विचारधारा की पोषक है,” उद्धरण देकर सिद्ध कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ में जिन उदात्त जीवन-मूल्यों का चित्रण किया गया है, उन्हें सोदाहरण समझाइए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य से समाज को क्या सन्देश मिलता है ? ‘सत्य की जीत’ शीर्षक की सार्थकता को प्रमाणित कीजिए। ‘सत्य की जीत के आधार पर ‘जीओ और जीने दो’ की समीक्षा कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में नारी विषयक अवधारणा का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
सत्य की जीत’ शीर्षक से स्वतः स्पष्ट है कि कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी प्रस्तुत खण्डकाव्य में असत्य पर सत्य की विजय प्रतिष्ठित करना चाहते हैं। इसे खण्डकाव्य में द्रौपदी के चीर-हरण का प्रसंग वर्णित किया गया है, किन्तु इसमें कथा का रूप सर्वथा मौलिक है। अत्याचारियों के दमन को द्रौपदी झुककर स्वीकार नहीं करती, वरन् वह पूर्ण आत्म-बलं से अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करती है। उसकी पक्ष सत्य एवं न्याय का पक्ष है। अन्ततः उसकी ही जीत होती है और पूरी राजसभा उसके पक्ष में हो जाती है।
प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि का उद्देश्य असत्य पर सत्य की विजय को दर्शाना है तथा खण्डकाव्य का मुख्य आध्यात्मिक भाव भी यही है। इस दृष्टिकोण से इसे खण्डकाव्य का यह शीर्षक पूर्णरूप से उपयुक्त और सार्थक है। इस खण्डकाव्य में निम्नलिखित विचारों का प्रतिपादन हुआ है

(1) नैतिक मानव-मूल्यों की स्थापना – ‘सत्य की जीत’ में कवि ने दुःशासन और दुर्योधन के छल-कपट, दम्भ, ईष्र्या, अनाचार, शस्त्र-बल, परपीड़न आदि की पराजय दिखाकर उन पर सत्य, धर्म, न्याय, प्रेम, मैत्री, करुणा, श्रद्धा आदि शाश्वत मानव-मूल्यों की प्रतिष्ठा की है और कहा है

जहाँ है सत्य, जहाँ है धर्म, जहाँ है न्याय, वहाँ है जीत।

कवि का विचार है कि मानव को भौतिकवाद के गर्त से नैतिक मूल्यों की स्थापना के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

(2) नारी की प्रतिष्ठा – कवि ने प्रस्तुत खण्डकाव्य में द्रौपदी को श्रृंगार व कोमलता की परम्परागत मूर्ति के रूप में नहीं, वरन् दुर्गा के नव रूप में प्रतिष्ठित किया है, जो अपने सतीत्व और मर्यादा की रक्षा के लिए चण्डी और दुर्गा भी बन जाती है। यही कारण है कि भारत में नारी की शक्ति को दुर्गा के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। द्रौपदी दुःशासन से स्पष्ट कह देती है कि नारी पुरुष की सम्पत्ति या भोग्या नहीं है। उसका अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व है। पुरुष और नारी के सहयोग से ही विश्व का मंगल सम्भव है

पुरुष के पौरुष से ही सिर्फ, बनेगी धरा नहीं यह स्वर्ग।
चाहिए नारी का नारीत्व, तभी होगा पूरा यह सर्ग ॥

(3) प्रजातान्त्रिक भावना का प्रतिपादन – प्रस्तुत खण्डकाव्य का सन्देश है कि हम प्रजातान्त्रिक भावनाओं का आदर करें। किसी एक व्यक्ति की निरंकुश नीति को अनाचार की छूट न दें। राजसभा में द्रौपदी के प्रश्न पर जहाँ दुर्योधन, दु:शासन, कर्ण अपना तर्क प्रस्तुत करते हैं वहीं धृतराष्ट्र अपना निर्णय देते समय जन-भावनाओं की अवहेलना भी नहीं करते।

(4) स्वार्थ और ईष्र्या का उन्मूलन – आज का मनुष्य ईर्ष्या व स्वार्थ के चंगुल में फंसा हुआ है। ईर्ष्या और स्वार्थ संघर्ष को जन्म देते हैं। इनके वशीभूत होकर व्यक्ति सब कुछ कर बैठता है-इसे कवि ने कौरवों द्वारा द्रौपदी के चीर-हरण की घटना से व्यक्त किया है। दुर्योधन पाण्डवों से ईर्ष्या रखता है, जिसके कारण वह उन्हें द्यूतक्रीड़ा में हराकर उन्हें नीचा दिखाने तथा द्रौपदी को निर्वस्त्र करके उन्हें अपमानित करना चाहता है। कवि स्वार्थ और ईर्ष्या को पतन का कारण सिद्ध करता है और उनके स्थान पर मैत्री, त्याग और सेवा जैसे लोकमंगलकारी भावों को प्रतिष्ठित करना चाहता है।

(5) सहयोग, सह-अस्तित्व और विश्व-बन्धुत्व का सन्देश – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने आज के युग के अनुरूप यह सन्देश दिया है कि सहयोग और सह-अस्तित्व के विकास से ही विश्व-कल्याण होगा–जियें हम और जियें सब लोग। इससे सत्य, न्याय, मैत्री, करुणा और सदाचार को बल मिलेगा, जिससे व्यक्ति को समस्त संसार एक कुटुम्ब की भाँति प्रतीत होने लगेगा।

(6) शान्ति की कामना – प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित है। वह शस्त्र बल पर सत्य, न्याय और शास्त्र की विजय दिखलाता है। धृतराष्ट्र भी शस्त्रों का प्रयोग स्थायी शान्ति की स्थापना के लिए किये जाने पर बल देते हैं

किये हैं जितने भी एकत्र, शस्त्र तुमने, उनका उपयोग।
युद्ध के हित नहीं, शान्ति हित करो, यही है उनका स्वत्व प्रयोग।

(7) निरंकुशवाद के दोषों का प्रकाशन – प्रस्तुत खण्डकाव्य के द्वारा कवि यह बताना चाहता है कि जब सत्ता निरंकुश हो जाती है तो वह अनैतिक कार्य करने में भी कोई संकोच नहीं करती। ऐसे राज्य में विवेक पूर्णतया कुण्ठित हो जाता है। भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र आदि भी दुर्योधन की सत्ता की निरंकुशता के आगे हतप्रभ हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में भारतीय शाश्वत जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठा की गयी है। इस खण्डकाव्य के द्वारा कंवि अपने पाठकों को सदाचारपूर्ण जीवन की प्रेरणा देना चाहता है। वह उन्नत मानवीय जीवन का सन्देश देता हैं। धृतराष्ट्र की उदारतापूर्ण इस घोषणा में काव्य का उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है

नीति समझो मेरी यह स्पष्ट, जियें हम और जियें सब लोग।
बाँटकर आपस में मिले सभी, धरा का करें बराबर भोगे॥

प्रश्न 4:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर नायिका द्रौपदी का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
” ‘सत्य की जीत’ में द्रौपदी के चरित्र में वर्तमान युग के नारी-जागरण का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।” स्पष्ट कीजिए।
या
“सत्य की जीत’ के किसी मुख्य पात्र की चरित्रगत विशेषताएँ लिखिए।
या
‘सत्य की जीत’ के आधार पर द्रौपदी के चरित्र-चित्रण की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
“नारी अबला नहीं, शक्तिरूपा है।” द्रौपदी के चरित्र के माध्यम से इस कथन की सार्थकता प्रमाणित कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ में कवि ने द्रौपदी के चरित्र में जो नवीनताएँ प्रस्तुत की हैं, उनका उदघाटन करते हुए उसके चरित्र-वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘सत्य की जीत के आधार पर द्रौपदी के संघर्षमय जीवन का चित्रण कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ की नायिका द्रौपदी के चरित्र में समाविष्ट मानवीय आदर्शों का विश्लेषण कीजिए।
या
द्रौपदी का पक्ष सत्य और न्याय का पक्ष है। इस बात को सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) नायिका:  द्रौपदी ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की नायिका है। सम्पूर्ण कथा उसके चारों ओर घूमती है। वह राजा द्रुपद की पुत्री, धृष्टद्युम्न की बहन तथा युधिष्ठिर सहित पाँचों पाण्डवों की पत्नी है। ‘सत्य की जीत खण्डकाव्य में अत्यधिक विकट समय होते हुए भी वह बड़े आत्मविश्वास से दु:शासन को अपना परिचय देती हुई कहती है

जानता नहीं कि मैं हूँ कौन ? द्रौपदी धृष्टद्युम्न की बहन।
पाण्डुकुल वधू भीष्म, धृतराष्ट्र, विदुर को कब रे यह सहन॥

(2) स्वाभिमानिनी सबला – द्रौपदी स्वाभिमानिनी है। वह अपना अपमान नारी-जाति का अपमान समझती है। और वह इसे सहन नहीं करती। ‘सत्य की जीत की द्रौपदी महाभारत की द्रौपदी की भाँति असहाय, अबला और संकोची नारी नहीं है। यह द्रौपदी तो अन्यायी, अधर्मी पुरुषों से जमकर संघर्ष व विरोध करने वाली है। इस प्रकार उसका निम्नलिखित कथन द्रष्टव्य है

समझकर एकाकी, निशंक, दिया मेरे केशों को खींच।
रक्त का पैंट पिये मैं मौन, आ गयी भरी सभा के बीच ॥
इसलिए नहीं कि थी असहाय, एक अबला रमणी का रूप।
किन्तु था नहीं राज-दरबार, देखने मेरा भैरव-रूप ।।

(3) विवेकशीला – द्रौपदी पुरुष के पीछे-पीछे आँख बन्द कर चलने वाली नारी नहीं, वरन् विवेक से कार्य करने वाली नारी है। आज की नारी की भाँति वह अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए सजग है। द्रौपदी की स्पष्ट मान्यता है कि नारी में अपार शक्ति और आत्मबल विद्यमान है। पुरुष स्वयं को संसार में सर्वाधिक शक्तिसम्पन्न समझता है, किन्तु द्रौपदी इस अहंकारपूर्ण मान्यता का खण्डन करती हुई कहती है

नहीं कलिंका कोमल सुकुमार, नहीं रे छुई-मुई-सा गात !
पुरुष की है यह कोरी भूल, उसी के अहंकार की बात ॥

वह केवल दुःशासन ही नहीं वरन् अपने पति को भी प्रश्नों के कटघरे में खड़ा कर स्पष्टीकरण माँगती है। वह भरी सभा में यह सिद्ध कर देती है कि जुए में स्वयं को हारने वाले युधिष्ठिर को मुझे दाँव पर लगाने का कोई अधिकार नहीं है।-

द्रौपदी के वचन सुनकर सम्पूर्ण सभा, स्तब्ध और किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाती है और द्रौपदी के तर्को पर न्यायपूर्वक विचार करने के लिए विवशं हो जाती है। द्रौपदी के ये कथन उसकी वाक्पटुता एवं योग्यता के परिचायक हैं।

(4) साध्वी – द्रौपदी में शक्ति, ओज, तेज, स्वाभिमान और बुद्धि के साथ-साथ सत्य, शील और धर्म का पालन करने की शक्ति भी है। द्रौपदी के चरित्र की श्रेष्ठता से प्रभावित धृतराष्ट्र उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं।

द्रौपदी धर्मनिष्ठ है सती, साध्वी न्याय सत्य साकार।
इसी से आज सभी से प्राप्त, उसे बल सहानुभूति अपार ॥

(5) ओजस्विनी – ‘सत्य की जीत’ की नायिका द्रौपदी ओजस्विनी है। वह अपना अपमान होने पर सिंहनी की भाँति दहाड़ती है

सिंहनी ने कर निडर दहाड़, कर दिया मौन सभा को भंग।

दुःशासन द्वारा केश खींचने के बाद वह रौद्र-रूप धारण कर लेती है। कवि कहती है

खुली वेणी के लम्बे केश, पीठ पर लहराये बन काल।।
उगलते ज्यों विष कालिया नाग, खोलकर मृत्यु-कणों का जाल ।

(6) सत्य, न्याय और धर्म की एकनिष्ठ साधिका – द्रौपदी सत्य और न्याय की अजेय शक्ति और असत्य तथा अधर्म की मिथ्या शक्ति का विवेचन बहुत संयत शब्दों में करती हुई कहती है

सत्य का पक्ष, धर्म का पक्ष, न्याय का पक्ष लिये मैं साथ।
अरे, वह कौन विश्व में शक्ति, उठा सकती जो मुझ पर हाथ॥

(7) नारी-जाति की पक्षधर – ‘सत्य की जीत की द्रौपदी आदर्श भारतीय नारी है। भारतीय संस्कृति के आधार वेद हैं और वेदों के अनुसार आदर्श नारी में अपार शक्ति, सामर्थ्य, बुद्धि, आत्म-सम्मान, सत्य, धर्म, व्यवहारकुशलता, वाक्पटुता, सदाचार आदि गुण विद्यमान होते हैं। द्रौपदी में भी ये सभी गुण विद्यमान हैं। अपने सम्मान को ठेस लगने पर वह सभा में गरज उठती है

मौन हो जा मैं सह सकतीन, कभी भी नारी का अपमान।
दिखा देंगी तुझको अभी, गरजती आँखों का तूफान ।।

द्रौपदी को पता है कि नारी में अपार शक्ति-सामर्थ्य, बुद्धि और शील विद्यमान हैं। नारी ही मानव-जाति के सृजन की अक्षय स्रोत है। वह नारी-जाति को पुरुष के आगे हीन सिद्ध नहीं होने देती है। नारी की गरिमा का वर्णन करती हुई वह कहती है

पुरुष उस नारी की ही देन, उसी के हाथों का निर्माण।

(8) वीरांगनां – वह पुरुष को विवश होकर क्षमा कर देने वाली असहाय अबला नहीं वरन् चुनौती देकर दण्ड देने को कटिबद्ध है

अरे ओ दुःशासन निर्लज्ज, देख तू नारी को भी क्रोध ।
किसे कहते उसका अपमान, कराऊँगी मैं उसका बोध ॥

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि द्रौपदी पाण्डव-कुलवधू, वीरांगना, स्वाभिमानी, आत्मगौरव- सम्पन्न, सत्य और न्याय की पक्षधर, सती-साध्वी, नारीत्व के स्वाभिमान से मण्डित एवं नारी जाति का आदर्श है।

प्रश्न 5:
‘सत्य की जीत के आधार पर दुःशासन का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ के एक प्रमुख पुरुष पात्र (दुःशासन) के चरित्र की विशेषताएँ बताइट।
या
‘सत्य की जीत’ में व्यक्त दुःशासन के चरित्र की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत खण्डकाव्य में दुःशासन एक प्रमुख पात्र है जो दुर्योधन का छोटा भाई तथा धृतराष्ट्र का पुत्र है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) अहंकारी एवं बुद्धिहीन – दुःशासन को अपने बल पर बहुत अधिक घमण्ड है। विवेक से उसे कुछ लेना-देना नहीं है। वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण मानता है तथा पाण्डवों का भरी सभा में अपमान करता है। सत्य, प्रेम और अहिंसा की अपेक्षा वह पाशविक शक्तियों को ही सब कुछ मानता है

शस्त्र जो कहे वही है सत्य, शस्त्र जो करे वही है कर्म ।
शस्त्र जो लिखे वही है शास्त्र, शस्त्र-बल पर आधारित धर्म ॥

इसीलिए परिवारजन और सभासदों के बीच द्रौपदी को निर्वस्त्र करने में वह तनिक भी लज्जा नहीं मानता है।

(2) नारी का अपमान करने वाला – द्रौपदी के साथ हुए तर्क-वितर्क में दु:शासन का नारी के प्रति पुरातन और रूढ़िवादी दृष्टिकोण प्रकट हुआ है। दु:शासन नारी को पुरुष की दासी और भोग्या तथा पुरुष से दुर्बल मानता है। नारी की दुर्बलता का उपहास उड़ाते हुए वह कहता है

कहाँ नारी ने, ले तलवार, किया है पुरुषों से संग्राम ।
जानती है वह केवल पुरुष, भुजदण्डों में करना विश्राम ॥

(3) शस्त्र-बल विश्वासी – दु:शासन शस्त्र-बल को सब कुछ समझता है। उसे धर्म-शास्त्र और धर्मज्ञों में कोई विश्वास नहीं है। इन्हें तो वहें शस्त्र के आगे हारने वाले मानता है ।

धर्म क्या है और क्या है सत्य, मुझे क्षणभर चिन्ता इसकी न।
शास्त्र की चर्चा होती वहाँ, जहाँ नर होता शस्त्र-विहीन ।।

(4) दुराचारी – दु:शासन हमारे समक्ष एक दुराचारी व्यक्ति के रूप में आती है। वह मानवोचित व्यवहार भी नहीं जानता। वह अपने बड़ों व गुरुजनों के सामने भी अभद्र व्यवहार करने में संकोच नहीं करता। वह शास्त्रज्ञों, धर्मज्ञों व नीतिज्ञों पर कटाक्ष करता है और उन्हें दुर्बल बताता है

लिया दुर्बल मानव ने ढूँढ, आत्मरक्षा का सरल उपाय।
किन्तु जब होता सम्मुख शस्त्र, शास्त्र हो जाता निरुपाय ॥

(5) धर्म और सत्य का विरोधी – धर्म और सत्य का शत्रु दु:शासन आध्यात्मिक शक्ति का विरोधी एवं भौतिक शक्ति का पुजारी है। वह सत्य, धर्म, न्याय, अहिंसा जैसे उदार आदर्शों की उपेक्षा करता है।

(6) सत्य व सतीत्व से पराजित – दुःशासन की चीर-हरण में असमर्थता इस तथ्य की पुष्टि करती है कि सत्य की ही जीत होती है। वह शक्ति से मदान्ध होकर तथा सत्य, धर्म एवं न्याय की दुहाई देने को दुर्बलता का चिह्न बताता हुआ जैसे ही द्रौपदी का चीर खींचने के लिए हाथ आगे बढ़ाता है, वैसे ही द्रौपदी के शरीर से प्रकट होने वाले सतीत्व की ज्वाला से पराजित हो जाता है।

दुःशासन के चरित्र की दुर्बलताओं या विशेषताओं का उद्घाटन करते हुए डॉ० ओंकार प्रसाद माहेश्वरी लिखते हैं कि “लोकतन्त्रीय चेतना के जागरण के इस युग में अब भी कुछ ऐसे साम्राज्यवादी प्रकृति के दुःशासन हैं, जो दूसरों के बढ़ते मान-सम्मान को नहीं देख सकते तथा दूसरों की भूमि और सम्पत्ति को हड़पने के लिए प्रतिक्षण घात लगाये हुए बैठे रहते हैं। इस काव्य में दुःशासन उन्हीं का प्रतीक है।”

प्रश्न 6:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर दुर्योधन का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
श्री द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी कृत ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में दुर्योधन एक प्रमुख पुरुष पात्र है जो दु:शासन का बड़ा भाई तथा धृतराष्ट्र का पुत्र है। उसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) अभिमानी और विवेकहीन – दुर्योधन को अपने बाहुबल पर अत्यधिक घमण्ड है। विवेक से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। वह बाहुबल में विश्वास रखता है। नैतिकता में उसे बिल्कुल विश्वास नहीं है। वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण मानता है, इसी कारण पाण्डवों का भरी सभा में अपमान करता है। दुर्योधन का नारी के प्रति पुरातन रूढ़िवादी दृष्टिकोण है। वह पाशविक शक्तियों को ही सब कुछ मानता है।

(2) नारी के प्रति उपेक्षा-भाव – द्रौपदी के द्वारा उपहास किये जाने पर वह उससे प्रतिशोध लेने की भावना में दग्ध रहता है। वह नारी को भोग्या और चरणों की धूल समझता है। इसी कारण भरी सभा में द्रौपदी का चीर-हरण करवाता है।

(3) दुराचारी – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में दुर्योधन हमारे सामने एक दुराचारी पुरुष पात्र के रूप में आता है। वह मानवोचित व्यवहार भी नहीं जानता है। वह अपने बड़ों व गुरुजनों के सामने भी अभद्र व्यवहार करने में संकोच नहीं करता।

(4) ईष्र्यालु – दुर्योधन ईष्र्यालु प्रवृत्ति का पुरुष पात्र है, जो हमेशा ही पाण्डवों से ईर्ष्या रखता है। वह पाण्डवों की समृद्धि और मान सम्मान को सहन नहीं कर सकता है।

(5) छल-कपट में विश्वास – दुर्योधन यद्यपि वीर है लेकिन वह छल-कपट में विश्वास रखता है। छल-कपट से ही वह पाण्डवों को जुए के खेल में हरा देता है और उनके राज्य को हड़प लेता है। इस प्रकार उपर्युक्त गुणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि उसके चरित्र में वर्तमान साम्राज्यवादी शासकों की लोलुपता की झलक प्रस्तुत की गयी है।

प्रश्न 7:
‘सत्य की जीत के आधार पर युधिष्ठिर का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्रांकन कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के प्रधान पात्र का चरित्रांकन कीजिए।
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में युधिष्ठिर का चरित्र धृतराष्ट्र और द्रौपदी के कथनों के माध्यम से उजागर हुआ है। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) सत्य और धर्म के अवतार – युधिष्ठिर की सत्य और धर्म में अडिग निष्ठा है। उनके इसी गुण पर मुग्ध धृतराष्ट्र कहते हैं

युधिष्ठिर ! धर्मपरायण श्रेष्ठ, करो अब निर्भय होकर राज्य।

(2) सरल-हृदय व्यक्ति – युधिष्ठिर बहतं सरल-हृदय के व्यक्ति हैं। वे दसरों को भी सरल-हृदय समझते हैं। इसी सरलता के कारण वे शकुनि और दुर्योधन के कपटे जाल में फंस जाते हैं और उसका दुष्परिणाम भोगते हैं। द्रौपदी ठीक ही कहती है

युधिष्ठिर ! धर्मराज थे, सरल हृदय, समझे न कपट की चाल।

(3) सिन्धु-से धीर-गम्भीर – द्रौपदी का अपमान किये जाने पर भी युधिष्ठिर का मौन व शान्त रहने का कारण उनकी दुर्बलता नहीं, वरन् उनकी धीरता, गम्भीरता और सहिष्णुता है

खिंची है मर्यादा की रेखा, वंश के हैं वे उच्च कुलीन।।

(4) अदूरदर्शी – युधिष्ठिर यद्यपि गुणवान हैं, किन्तु द्रौपदी को दाँव पर लगाने जैसा अविवेकी कार्य कर बैठते हैं, जिससे जान पड़ता है कि वह सैद्धान्तिक अधिक किन्तु व्यवहारकुशल कम हैं। वह इस कृत्य का दूरगामी परिणाम दृष्टि से ओझल कर बैठते हैं

युधिष्ठिर धर्मराज का हृदय, सरल-निर्मल-निश्छल-निर्दोष।
भेरा अन्तर-सागर में अमित, भाव-रत्नों का सुन्दर कोष ॥

(5) विश्व-कल्याण के साधक – युधिष्ठिर का लक्ष्य विश्व-मंगल है, यह बात धृतराष्ट्र भी स्वीकार करते हैं

तुम्हारे साथ विश्व है, क्योंकि, तुम्हारा ध्येय विश्व-कल्याण।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि युधिष्ठिर इस खण्डकाव्य के ऐसे पात्र हैं, जो आरम्भ से लेकर अन्त तक मौन रहे हैं। कवि ने उनके मौन से ही उनके चरित्र की उपर्युक्त विशेषताएँ स्पष्ट की हैं।

प्रश्न 8:
‘सत्य की जीत’ की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ की भाषा-शैली की विशेषताएँ बताइए।
या
काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से ‘सत्य की जीत का मूल्यांकन कीजिए।
या
एक खण्डकाव्य के रूप में सत्य की जीत का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ की काव्यगत विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(अ) भावगत विशेषताएँ

(1) सुगठित कथावस्तु – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु अत्यन्त स्पष्ट, सरल और सुगठित है। काव्य की सभी घटनाएँ परस्पर सुसम्बद्ध हैं। कथा में आदि से अन्त तक रोचकता एवं कौतूहल विद्यमान है। कथा में कहीं भी अस्वाभाविकता एवं अरोचकता नहीं है।

(2) विश्व-बन्धुत्व का सन्देश – कवि ने विश्व को ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में प्रेम, सत्य, न्याय, मैत्री, करुणा और सदाचार की शिक्षा देकर सम्पूर्ण संसार को मार्ग दिखाया है

न्याय समता मैत्री भ्रातृत्व, भावना, स्नेहित सह अस्तित्व।
इन्हीं शाश्वत मूल्यों से बने, विश्व का मंगलमय व्यक्तित्व ॥

(3) शान्ति की कामना – ‘सत्य की जीत’ गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित है। केवल शस्त्र-बल पर विश्वास रखने वाले दुर्योधन और दु:शासन दोनों सत्य, न्याय और शास्त्र से पराजित होते हैं। स्थायी शान्ति की स्थापना के लिए धृतराष्ट्र कहते हैं

किये हैं जितने भी एकत्र, शस्त्र तुमने, उनका उपयोग।
युद्ध के हित नहीं, शान्ति हित करो, यही है उनका स्वत्व प्रयोग।

(4) उदात्त आदर्शों का स्वर – प्रस्तुत खण्डकाव्य से नारियों के प्रति श्रद्धा, विनाशकारी आचरण, शस्त्रीकरण का विरोध, प्रजातान्त्रिक आदर्शो, असत्य की निर्बलता एवं सत्य के आत्मबल की शक्ति का स्वर मुखरित होता है। इस खण्डकाव्य में कवि ने द्रौपदी के चीर-हरण को प्रसंग बनाकर उदात्त आदर्शों की. भाव-धारा प्रवाहित की है। यह भाव-धारा ही इस खण्डकाव्य की आत्मा है।

(5) रस-निरूपण – प्रस्तुत खण्डकाव्य में वीर रस की प्रधानता है, किन्तु इसमें रौद्र, शान्त आदि रसों का भी सुन्दर परिपाक हुआ है। ओजस्विनी, वीरांगना, द्रौपदी की ओजमयी वाणी इस काव्य का केन्द्रीय आकर्षण है। रौद्र रस का एक उदाहरण द्रष्टव्य है:

मौन हो जा मैं सह सकती न, कभी भी नारी का अपमान।
दिखा देंगी तुझको अभी, गरजती आँखों का तूफान ।

(6) प्रतीकात्मकता – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में सभी पुरुष तथा स्त्री पात्रों का चरित्र प्रतीकात्मक है। द्रौपदी सत्य, न्याय, धर्म आदि गुणों की प्रतीक और अपने अधिकारों के लिए सजग नारी है। पाण्डवों की प्रतीकात्मकता द्रष्टव्य है

युधिष्ठिर सत्य, भीम है शक्ति, कर्म के अर्जुन हैं अवतार।
नकुल श्रद्धा, सेवा सहदेव, विश्व के हैं ये मूलाधार ॥

इसके बाद भी पाण्डवों के सभी गुण द्रौपदी की तेजस्विता के सम्मुख हीन जान पड़ते हैं।

(ब) कलागत विशेषताएँ

(1) भाषा – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की भाषा सरल, सुबोध और परिष्कृत खड़ी बोली है। इसकी भाषा में प्रवाहमयता, प्रभावात्मकता, स्वाभाविकता, प्रसंगानुकूलता आदि गुण भी विद्यमान हैं। काव्य में संवादों की सजीवता एवं प्रभावपूर्णता निस्सन्देह सराहनीय है। भाषा में कहीं भी अस्वाभाविकता एवं दुरूहता के दर्शन नहीं होते; यथा

किया यदि शस्त्रों से ही मोह, न अपनाया विवेक का पन्थ।
मुझे लगता है, जो कुछ हुई, प्रगति अब तक, उसका रे अन्त ।।

(2) शैली – सारा खण्डकाव्य संवादात्मक शैली में रचित है। इसकी सम्पूर्ण कथावस्तु धृतराष्ट्र की राजसभा में पात्रों के कथोपकथनों के रूप में प्रस्तुत की गयी है। संवादों पर आधारित कथा की प्रगति शैली की प्रमुख विशेषता है

द्रौपदी बढ़-बढ़कर मत बोल, कहा उसने तत्क्षण तत्काल।
पीट मत री नारी का ढोल, उगल मत व्यर्थ अग्नि की ज्वाल॥

संवादों के कारण इस काव्य में नाटकीय-सौन्दर्य आ गया है। काव्य के समस्त घटना-व्यापार को सजीव, प्रवाहपूर्ण, सरल और विचारोत्तेजक संवादों के माध्यम से दृश्यांकित किया गया है। इन संवादों में कवि की अपूर्व मनोवैज्ञानिकता एवं सूझ-बूझ का परिचय मिलता है।

(3) अलंकार-योजना – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास आदि अलंकारों का प्रयोग किया है; यथा

रूपक – खोल जीवन-पुस्तक के पृष्ठ, मुस्कराते समरांगण बीच।
                  शस्त्र से लिखते सच्चे शास्त्र, रक्त के स्वर्णिम अक्षर खींच।
उपमा – माँग में सिन्दूर की यह रेख, मौन विद्युत-सी घन के बीच।
                कि जैसे अवसर पाकर शीघ्र, गिराएगी दुश्मन पर खींच ॥

(4) छन्द-विधान – ‘सत्य की जीत में कवि ने 16-16 मात्राओं के चार पंक्तियों वाले; मुक्त छन्द का प्रयोग किया है।

(5) भाव-चित्रण – मानव-हृदय में किसी भाव के उठने पर कुछ शारीरिक प्रतिक्रियाएँ होती हैं। इन्हें अनुभाव या संचारी भाव कहते हैं। ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने विभिन्न-पात्रों के अनुभावों का चित्रण किया है। यहाँ क्रोधाभिभूत भीम की मुद्राओं का चित्रण देखिए

फड़कने लगे भीम के अंग, शस्त्र-बल की सुनकर ललकार।
नेत्र मुड़े धर्मराज की ओर, झुके पी, मौन रक्त की धार ।

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि उदात्त आदर्शों के लिए सद्गुणी नायिका को आधार बनाकर लिखी गयी यह काव्य-रचना कथा की लघुती, क्रम-विस्तार आदि गुणों से युक्त है, अत: काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से ‘सत्य की जीत’ एक सफल खण्डकाव्य है।

प्रश्न 9:
” ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में आज की आधुनिक जाग्रत नारी का स्वर मुखर हुआ है।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं?
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में द्रौपदी द्वारा प्रतिपादित नारी की शक्ति एवं महत्ता पर प्रकाश डालिटी:
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी और दुःशासन के वार्तालाप (संवाद) को अपने शब्दों में लिखिए।
या
” ‘सत्य की जीत’ में महाभारत युग के साथ वर्तमान युग भी बोल उठा है। इस कथन को समझाइट।
या
‘सत्य की जीत’ कथनक की वर्तमान सामाजिक प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए।
या
नारी जागरण की दृष्टि से सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी ने द्रौपदी के परम्परागत चरित्र में नवीन उद्भावनाएँ करके आज की नारी का मार्गदर्शन किया है। दूसरे शब्दों में, हम यह भी कह सकते हैं कि माहेश्वरी जी ने द्रौपदी के माध्यम से आधुनिक नारी के उभरते स्वर को सशक्त अभिव्यक्ति दी है, जिसका विवेचन निम्नवत् है
दुःशासन द्वारा भरी-सभा में अपमानित हुई द्रौपदी अबला-सी बनकर केवल आँसू नहीं बहाती, वरन् वह साहसी आधुनिक स्त्री की भाँति सिंहनी के समान गरजती हुई क्रोधित होकर उसे चेतावनी देती है

अरे-ओ ! दुःशासन निर्लज्ज ! देख तू नारी का भी क्रोध।
किसे कहते उसका अपमान, कराऊँगी मैं इसका बोध ॥

द्रौपदी दु:शासन को अपमानित करती हुई बड़े आत्मविश्वास से कहती है कि तू मुझे बाल खींचकर भरी-सभा में ले तो अवश्य आया है, किन्तु मैं रक्त के बूंट पीकर केवल इसलिए चुप हूँ; क्योंकि नारी से मार खाकर तू संसार में मुंह दिखाने के योग्य नहीं रह जाएगा।

द्रौपदी के व्यंग्य बाणों से दु:शासन तिलमिला उठता है और कहता है कि “तू नारी की श्रेष्ठता के ढोल मत पीट। क्या कभी किसी नारी ने तलवार अपने हाथ में लेकर कहीं संग्राम किया है ? नारी तो पुरुष पर निर्भर रहती है। वह तो पुरुष के पैरों की धूल के समान है।”

इस पर द्रौपदी नारी-विषयक पुरातन मान्यताओं को तोड़ती हुई दु:शासन को फटकारती हुई कहती है कि “तू अभी नारी की शक्ति को पहचान ही नहीं पाया है। यद्यपि नारी दिखने में कोमल-कलिका के समान अवश्य होती है, परन्तु आवश्यकता पड़ने पर वह पापियों का संहार करने के लिए भैरवी का रूप भी धारण कर सकती है। पुरुष की यह भूल ही है कि वह सारे विश्व पर अपना अधिकार मानता है, नारी पर अकारण ही चोट करता है, जबकि नारी और पुरुष दोनों एक समान हैं।”

द्रौपदी के व्यंग्य-कटाक्षों को काटते हुए दु:शासन पुनः कहता है कि “नारीरूपी सरिताएँ क्या कभी पुरुषरूपी पहाड़ को हिला पायी हैं ? लहरों को तो भूधर के केवल चरण छूकर लौट जाना पड़ता है। स्त्रीरूपी लहर तो पुरुषरूपी किनारा पाकर शान्त हो जाती है।’ दुःशासन पुनः कहता है कि “तू हमारी दासी है, क्योंकि पाण्डव तुझे जुए में हार गये हैं। तू नारीत्व की बात मत कर।”

इस प्रकार द्रौपदी और दु:शासन के वार्तालाप द्वारा कवि ने यह सिद्ध किया है कि मानवता के विकास में नारी और पुरुष दोनों का ही समान महत्त्व है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। ‘पुरुष का स्थान उच्च और नारी का स्थान निम्न है’ ऐसा सोचना नारी के प्रति अन्याय व असत्य का द्योतक है। इस रूप में, ‘सत्य की जीत’ में स्थल-स्थल पर आज की जाग्रत नारी का स्वर ही मुखरित हुआ प्रतीत होता है। ऐसी जाग्रत नारी, जो अपनी सृजनात्मक महत्ता से भली-भाँति परिचित है और जो समय आने पर सीता ही नहीं चण्डी तथा काली भी बन सकती है

पुरुष उस नारी की ही देन, उसी के हाथों का निर्माण।

अन्तत: द्रौपदी और दु:शासन के वार्तालाप का अन्त ‘सत्य की जीत’ से होता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त)
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त)

प्रश्न 1:
‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु (कथानक) संक्षेप में लिखिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ की राष्ट्रीयता और देशभक्ति संकुचित नहीं है।” समीक्षा कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में गांधी युग के स्वर्ण-इतिहास का काव्यात्मक आलेख है।” प्रस्तुत कथन के आधार पर ‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु की व्याख्या कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ के आधार पर स्वतन्त्रता-प्राप्ति और उससे उत्पन्न समस्याओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ का क्या आशय है? स्वपठित खण्डकाव्य ‘मुक्तियज्ञ’ के आधार पर उत्तर दीजिए।
या
‘दमन-चक्र चल पड़ा निरंकुश’, ‘मुक्तियज्ञ’ के इस कथन की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में पन्त जी ने सत्याग्रह आन्दोलन का चित्रण काव्यात्मक ढंग से किया है।” इस कथन की सोदाहरण विवेचना कीजिए।
या
“‘मुक्तिय’ में भारत के स्वतन्त्रता-युद्ध का आद्योपान्त वर्णन है।” इस कथन के पक्ष में अपना विचार लिखिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ में वर्णित मुख्य घटनाओं का वर्णन कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में वर्णित राजनैतिक घटनाओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा विरचित ‘लोकायतन’ महाकाव्य का एक अंश है। इस अंश में भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन की गाथा है। ‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु संक्षेप में निम्नवत् है
गांधी जी साबरमती आश्रम से अंग्रेजों के नमक-कानून को तोड़ने के लिए चौबीस दिनों की यात्रा पूर्ण करके डाण्डी गाँव पहुँचे और सागरतट पर नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा

वह प्रसिद्ध डाण्डी यात्रा थी, जन के राम गये थे फिर वन।
सिन्धु तीर पर लक्ष्य विश्व का, डाण्डी ग्राम बना बलि प्रांगण।

गांधी जी का उद्देश्य नमक बनाना नहीं था, वरन् इसके माध्यम से वे अंग्रेजों के इस कानून का विरोध करना और जनता में चेतना उत्पन्न करना चाहते थे। यद्यपि उनके इस विरोध के आधार सत्य और अहिंसा थे, किन्तु अंग्रेजों का दमन-चक्र पहले की भाँति ही चलने लगा। गांधी जी तथा अन्य नेताओं को अंग्रेजों ने कारागार में डाल दिया। जैसे-जैसे दमन-चक्र बढ़ता गया, वैसे-वैसे ही मुक्तियज्ञ भी तीव्र होता गया। गांधी जी ने भारतीयों को स्वदेशी वस्तु के प्रयोग और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के लिए प्रोत्साहित किया। सम्पूर्ण देश में यह आन्दोलन फैल गया। समस्त देशवासी स्वतन्त्रता आन्दोलन में एकजुट होकर गांधी जी के पीछे हो गये। इस प्रकार गांधी जी ने भारतीयों में एक अपूर्व उत्साह एवं जागृति उत्पन्न कर दी।

गांधी जी ने अछूतों को समाज में सम्मानपूर्ण स्थान दिलवाने के लिए आमरण अनशन आरम्भ किया। महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीयों ने अंग्रेजों से संघर्ष का निर्णय किया। सन् 1927 ई० में साइमन कमीशन भारत आया। भारतीयों द्वारा इस कमीशन का पूर्ण बहिष्कार किया गया। सन् 1942 ई० में गांधी जी ने अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का नारा लगा दिया। उसी रात्रि में गांधी जी व अन्य नेतागण बन्दी बना लिये गये और अंग्रेजों ने बालकों, वृद्धों और स्त्रियों तक पर भीषण अत्याचार आरम्भ कर दिये। इन अत्याचारों के कारण भारतीयों में और अधिक आक्रोश उत्पन्न हो उठा। चारों ओर हड़ताल और तालाबन्दी हो गयी। सब कामकाज ठप्प हो गया। अंग्रेजी शासन इस आन्दोलन से हिल गया। कारागार में ही गांधी जी की पत्नी कस्तूरबा का देहान्त हो गया। पूरे देश में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रबल आक्रोश एवं हिंसा भड़क उठी थी। सन् 1942 ई० में भारत की पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग की गयी। अंग्रेजों के प्रोत्साहन पर मुस्लिम लीग ने भारत विभाजन की माँग की। अन्तत: 15 अगस्त, 1947 ई० को अंग्रेजों ने भारत को मुक्त कर दिया।

अंग्रेजों ने भारत और पाकिस्तान के रूप में देश का विभाजन करवा दिया। एक ओर तो देश में स्वतन्त्रता का उत्सव मनाया जा रहा था, दूसरी ओर नोआखाली में हिन्दू और मुसलमानों के बीच संघर्ष हो गया। गांधी जी ने इससे दु:खी होकर आमरण उपवास रखने का निश्चय किया।

30 जनवरी, 1948 ई० को नाथूराम गोडसे ने गांधी जी की गोली मारकर हत्या कर दी। इस दु:खान्त घटना के पश्चात् कवि द्वारा भारत की एकता की कामना के साथ इस काव्य का अन्त हो जाता है। इस प्रकार इस खण्डकाव्य का आधारे-फलक बहुत विराट् है और उस पर कवि पन्त द्वारा बहुत सुन्दर और प्रभावशाली चित्र खींचे गये हैं। इसमें उस युग का इतिहास अंकित है, जब भारत में एक हलचल मची हुई थी और सम्पूर्ण देश में क्रान्ति की आग सुलग रही थी। इसमें व्यक्त राष्ट्रीयता और देशभक्ति संकुचित नहीं है। निष्कर्ष रूप में मुक्तियज्ञ गांधी-युग के स्वर्णिम इतिहास का काव्यात्मक आलेख है।

प्रश्न 2:
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की समीक्षा कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के कथानक का विश्लेषण कीजिए।
या
” ‘मूक्तियज्ञ’ के आख्यान में काल्पनिक तत्त्वों का समावेश नहीं है।” इस कथन को सिद्ध कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ व्यक्तिप्रधान न होकर समष्टिप्रधान है।” सोदाहरण समझाइए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ की राष्ट्रीयता और देशभक्ति सम्बन्धी भावनाओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ के कवि ने अपनी दृष्टि प्राचीन इतिहास और पुराण से हटाकर आधुनिक इतिहास से काव्य-सामग्री ग्रहण की है-इस कथन को ध्यान में रखते हुष्ट इस खण्डकाव्य की कथावस्तु का विवेचन कीजिए। ”
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में देशभक्ति की भावना रूपायित है।” इस कथन की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ भौतिकता और अध्यात्मपरक चिन्तन के संघर्ष की कथा है।” इस कथन पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
“मुक्तिंय की आत्मा में एक महाकाव्य जैसी गरिमा है’, सावित्री सिन्हा के इस कथन की मीमांसा कीजिए।
या
“मूवितयश’ में अभिव्यक्त गांधीदर्शन की आत्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि को स्पष्ट कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ की राष्ट्रीयता और देशभक्ति संकुचित नहीं हैं। कथन के परिप्रेक्ष्य में मुक्तियज्ञ की कथा-वस्तु की विवेचना कीजिए।
या
‘मुक्तियन’ खण्डकाव्य की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
तर पन्त जी द्वारा रचित ‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु की मुख्य विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) विराट् ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
‘मुक्तियज्ञ’ में (सन् 1921 से 1947 ई० तक के) भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन का इतिहास विद्यमान है। इस प्रकार इस काव्य की कथावस्तु की पृष्ठभूमि अत्यन्त विस्तृत और ऐतिहासिक है। इसके साथ ही इसमें द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान पर गिराये गये परमाणु बमों को भी उल्लेख है। इस समयावधि में घटित घटनाचक्रों में परिस्थितियों की विभिन्नता एवं अनेकरूपता है। इसकी व्यापकता को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इसकी कथावस्तु किसी महाकाव्य में ही समाहित हो सकती थी, किन्तु पन्त जी ने अत्यधिक कुशलता से इस विशाल पृष्ठभूमि को एक छोटे-से खण्डकाव्य में समेट लिया है, जो स्वयं में भारतीय स्वतन्त्रता, संग्राम एवं विश्व-मानवता की व्यापकता को समाहित किये हुए है।

(2) संक्षेपीकरण:
‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु में यद्यपि विस्तृत घटनाएँ हैं; किन्तु उन्हें बहुत ही संक्षिप्त रूप दिया गया है। सन् 1930 ई० की डाण्डी-यात्रा से कथा का आरम्भ होता है। गांधी जी सत्य और अहिंसा के बल पर अंग्रेज सरकार के विरुद्ध संघर्ष करते हैं। ‘गोलमेज सम्मेलन’ से भारत को कोई लाभ नहीं होता। द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत मित्र-राष्ट्रों की सहायता करता है। सन् 1942 ई० में अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का नारा लगता है। अंग्रेज और अधिक अत्याचार करते हैं। सम्पूर्ण देश में विद्रोह भड़क जाता है, अंग्रेजों को यहाँ से भागना पड़ता है और 1947 ई० में भारत स्वतन्त्र हो जाता है। अन्त में 1948 ई० में गांधी जी ‘नाथूराम गोडसे की गोली से मारे जाते हैं।

(3) प्रमुख घटनाओं का काव्यात्मक आलेख:
‘मुक्तियज्ञ सुनियोजित ढंग से सर्गबद्ध कथा नहीं है, वरन् इसमें सन् 1921 से 1947 ई० के बीच घटित भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम की प्रमुख घटनाओं का सुन्दर चित्रण है। ‘मुक्तियज्ञ से पूर्व हिन्दी में जितने भी खण्डकाव्य लिखे गये, उन सभी की कथावस्तु इतिहास एवं पुराणों से ली गयी थी। यद्यपि इन खण्डकाव्यों के रचयिताओं ने इनमें आधुनिक विचारधारा एवं दृष्टिकोण को भी स्थान दिया था, तथापि इनकी कथाओं का आधार प्राचीन इतिहास एवं पुराणों से ही सम्बन्धित रहा। ‘मुक्तियज्ञ’ प्रथम खण्डकाव्य है जिसमें पहली बार किसी कवि ने आधुनिक युग में घटित कुछ ही वर्ष पूर्व की घटनाओं पर दृष्टि डाली। इस प्रकार ‘मुक्तियज्ञ’ गांधी-युग के स्वर्णिम इतिहास का काव्यात्मक आलेख है।

(4) गांधीवाद की राष्ट्रीय विचारधारा को चिन्तन:
‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु इतिहास पर आधारित है। कथा में काव्यात्मकता और भावात्मकता का मिश्रण है, फिर भी इसमें गांधीवादी विचारधारा का समावेश है। वस्तुतः यह भौतिकवादी, आध्यात्मिक और राष्ट्रीयता के विचारों का संग्रह है। इसमें सत्य, अहिंसा, हरिजनोद्धार, नशाबन्दी, नारी-जागरण, आत्म-स्वातन्त्र्य आदि गांधीवादी चिन्तन और विचारधाराओं को सुन्दर काव्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है।

(5) विचारप्राधान्य:
‘मुक्तियज्ञ’ में गांधीवादी वैचारिकता का भावात्मक वर्णन एवं चित्रण हुआ है। यह भौतिकवादी और आध्यात्मिक विचारों के संघर्ष का काव्ये बन गया है। प्रकट विचारों में उत्कृष्टता विद्यमान है। इस प्रकार ‘मुक्तियज्ञ’ पूर्णतया सत्य आधारित, सार्थक और राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत खण्ड-काव्य है। यह वास्तव में व्यक्तिप्रधान काव्य न होकर समष्टिप्रधान काव्य है; क्योंकि इसके नायक महात्मा गांधी का कोई भी कार्य उनके अपने लिए नहीं था, वरन् उन्होंने जो कुछ भी किया, राष्ट्र, समाज और मानवता की उन्नति के लिए ही किया।

प्रश्न 3:
‘मुक्तियज्ञ’ के नायक (प्रमुख पात्र) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ के आधार पर गांधी जी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में महात्मा गांधी के व्यक्तित्व का वही अंश उभारा गया है, जो भारतीय जनता को शक्ति और प्रेरणा देता है।” सतर्क प्रमाणित कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में व्यक्ति गांधी का चित्रण कवि का ध्येय नहीं है, राष्ट्रपिता और राष्ट्रनायक गांधी ही ‘मुक्तियज्ञ’ के मुख्य पुरोधा हैं।” इस कथन के आधार पर गांधी जी के समष्टिप्रधान चरित्र का उद्घाटन कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ का अभिप्राय स्पष्ट करते हुए उसके नायक के कृतित्व पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ के प्रमुख नायक के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।
या
“गांधी जी राष्ट्र के लिए एक समर्पित व्यक्ति हैं।” उक्ति पर प्रकाश डालिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में महात्मा गांधी का यशोमय चित्रण किया गया है।” इस कथन की युक्तिसंगत पुष्टि कीजिए।
या
“गाँधीजी का सम्पूर्ण जीवन विश्वबन्धुत्व व लोकमंगल के लिए था।” इस कथन के आलोक में उनकी चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
‘मुक्तियज्ञ’ काव्य के आधार पर गांधी जी की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) प्रभावशाली-व्यक्तित्व: गांधी जी का आन्तरिक व्यक्तित्व बहुत अधिक प्रभावशाली है। उनकी वाणी में अद्भुत चुम्बकीय प्रभाव था। उनकी डाण्डी यात्रा के सम्बन्ध में कवि ने लिखा है

वह प्रसिद्ध डाण्डी यात्रा थी, जन के राम गये थे फिर वन ।
सिन्धु तीर पर लक्ष्य विश्व का, डाण्डी ग्राम बना बलि प्रांगण ॥

(2) सत्य, प्रेम और अहिंसा के प्रबल समर्थक – ‘मुक्तियज्ञ’ में गांधी जी के जीवन के सिद्धान्तों में सत्य, प्रेम और अहिंसा प्रमुख हैं। अपने इन तीन आध्यात्मिक अस्त्रों के बल पर ही गांधी जी ने अंग्रेज सरकार की नींव हिला दी। इन सिद्धान्तों को वे अपने जीवन में भी अक्षरश: उतारते थे। उन्होंने कठिन-से-कठिन परिस्थिति में भी सत्य, अहिंसा और प्रेम का मार्ग नहीं छोड़ा।

(3) दृढ़-प्रतिज्ञ – ‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गांधी जी ने जो भी कार्य आरम्भ किया, उसे पूरा करके ही छोड़ा। वे अपने निश्चय पर अटल रहते हैं और अंग्रेजी सत्ता के दमन चक्र से तनिक भी विचलित नहीं होते। उन्होंने नमक कानून तोड़ने की प्रतिज्ञा की तो उसे पूरा भी कर दिखाया

प्राण त्याग दूंगा पथ पर ही, उठा सका मैं यदि न नमक-कर।
लौट न आश्रम में आऊँगा, जो स्वराज ला सका नहीं घर ॥

(4) जातिवाद के विरोधी – गांधी जी का मत था कि भारत जाति-पाँति के भेदभाव में पड़कर ही शक्तिहीन हो । रहा है। उनकी दृष्टि में न कोई छोटा था, न अस्पृश्य और न ही तुच्छ। इसी कारण वे जातिवाद के कट्टर विरोधी थे

भारत आत्मा एक अखण्डित, रहते हिन्दुओं में ही हरिजन।
जाति वर्ण अघ्र पोंछ, चाहते, वे संयुक्त रहें भू जनगण ।।

(5) जन-नेता – ‘मुक्तियज्ञ’ के नायकं गांधी जी सम्पूर्ण भारत में जन-जन के प्रिय नेता हैं। उनके एक संकेत मात्र पर ही लाखों नर-नारी अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर रहते हैं; यथा

मुट्ठी-भर हड्डियाँ बुलातीं, छात्र निकल पड़ते सब बाहर।
लोग छोड़ घर-द्वार, मान, पद, हँस-हँस बन्दी-गृह देते भर॥

भारत की जनता ने उनके नेतृत्व में ही स्वतन्त्रता की लड़ाई लड़ी और अंग्रेजों को भगाकर ही दम लिया।

(6) मानवता के अग्रदूत – ‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गांधी जी अपना सम्पूर्ण जीवन मानवता के कल्याण में ही लगा देते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि मानव-मन में उत्पन्न घृणा, घृणा से नहीं अपितु प्रेम से मरती है। वे आपस में प्रेम उत्पन्न कर घृणा एवं हिंसा को दूर करना चाहते थे। वे हिंसा का प्रयोग करके स्वतन्त्रता भी नहीं चाहते थे; क्योंकि उनका मानना था कि हिंसा पर टिकी हुई संस्कृति मानवीयता से रहित होगी

घृणा, घृणा से नहीं मरेगी, बल प्रयोग पशु साधन निर्दय।
हिंसा पर निर्मित भू-संस्कृति, मानवीय होगी न, मुझे भय॥

(7) लोक-पुरुष – मुक्तियज्ञ में गांधी जी एक लोक-पुरुष के रूप में पाठकों के समक्ष आते हैं। इस सम्बन्ध में कवि कहता है

संस्कृति के नवीन त्याग की, मूर्ति, अहिंसा ज्योति, सत्यव्रत ।
लोक-पुरुष स्थितप्रज्ञ, स्नेह धन, युगनायक, निष्काम कर्मरत ॥

(8) साम्प्रदायिक एकता के पक्षधर – स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय देश में हिन्दुओं और मुसलमानों में भीषण संघर्ष हुआ। इससे गांधी जी का हृदय बहुत दु:खी हुआ। साम्प्रदायिक दंगा रोकने के लिए गांधी जी ने आमरण अनशन कर दिया। गांधी जी सोच रहे हैं

मर्म रुधिर पीकर ही बर्बर, भू की प्यास बुझेगी निश्चय।

(9) समद्रष्टा –  गांधी जी सबको समान दृष्टि से देखते थे। उनकी दृष्टि में न कोई बड़ा था और न ही कोई छोटा। छुआछूत को वे समाज का कलंक मानते थे। उनकी दृष्टि में कोई अछूत नहीं था

छुआछूत का भूत भगाने, किया व्रती ने दृढ़ आन्दोलन,
हिले द्विजों के रुद्र हृदय पर, खुले मन्दिरों के जड़ प्रांगण।

इस प्रकार ‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गांधी जी महान् लोकनायक; सत्य, अहिंसा और प्रेम के समर्थक; दृढ़-प्रतिज्ञ, निर्भीक औंरं साहसी पुरुष के रूप में सामने आते हैं। कवि ने गांधी जी में सभी लोक-कल्याणकारी गुणों का समावेश करते हुए उनके चरित्र को एक नया स्वरूप प्रदान किया है।

प्रश्न 4:
‘मुक्तियज्ञ’ के काव्य कौशल पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ के काव्य-सौन्दर्य पर अपना पक्ष प्रस्तुत कीजिए।
या
खण्डकाव्य की दृष्टि से मुक्तियज्ञ’ की समीक्षा कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ की भाषा-शैली की क्या विशेषताएँ हैं ?
या
‘मुक्तियज्ञ’ की भाषा-शैली पर उदाहरण सहित प्रकाश डालिए।
या
आकार की लघुता के बावजूद ‘मुक्तियज्ञ’ की आत्मा में एक महाकाव्य जैसी गरिमा है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के रचना-विधान पर एक टिप्पणी लिखिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु खण्डकाव्य की दृष्टि से कितनी सफल है ? स्पष्ट कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की रचना में कवि की सफलता का विश्लेषण कीजिए।
या
खण्डकाव्य के लक्षणों (विशेषताओं) का ध्यान रखते हुए सिद्ध कीजिए कि ‘मुक्तियज्ञ’ एक सफल खण्डकाव्य है।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में कवि की दृष्टि कथा पर अधिक व कथन की शैली पर कम टिकी है।” इस बात से आप कहाँ तक सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
किसी भी साहित्यिक रचना का काव्य-सौन्दर्य दो प्रकार का होता है – भावपक्षीय तथा कलापक्षीय। यहाँ ‘मुक्तियज्ञ का काव्य-सौन्दर्य निम्नवत् प्रस्तुत है-

(अ) भावगत विशेषताएँ
‘मुक्तियज्ञ काव्य की प्रमुख भावगत् विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) विचारप्रधानता – ‘मुक्तिधज्ञ’ एक विचारप्रधान काव्य है। इस काव्य में गांधी-दर्शन की विशद् व्याख्या की गयी है। कवि ने गांधी जी के विचारों को बड़े ही सरस, सरल और रुचिकर ढंग से प्रस्तुत किया है। कवि ने गांधी जी की विचारधारा को सत्य, अहिंसा, प्रेम, नारी-जागरण, हरिजनोद्धार, भारतीय कला और संस्कृति की रक्षा, अतिभौतिकता का विरोध, मदिरा के विरुद्ध आन्दोलन तथा स्वदेशी वस्तुओं पर बल आदि रूपों में प्रस्तुत किया है। सम्पूर्ण काव्य में गरिमा एवं गम्भीरता है। गांधी दर्शन एवं भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के भावों को सरल ढंग से प्रस्तुत करते हुए उसका सम्बन्ध विश्व-मानवतावाद से जोड़ा है

प्रतिध्वनित होता जगती में, भारत आत्मा को नैतिक पण,
नयी चेतना शिखा जगाता, आत्म-शक्ति से लोक उन्नयन।

(2) युग चित्रण – ‘मुक्तियज्ञ’ काव्य में भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम का इतिहास पूरी तरह वर्णित है। गांधी जी के नेतृत्व में स्वाधीनता आन्दोलन, अंग्रेजों के अत्याचार और अन्त में भारतीयों द्वारा स्वराज्य-प्राप्ति इन सभी घटनाओं का आद्योपान्त वर्णन ‘मुक्तियज्ञ’ में हुआ है। डॉ० सावित्री सिन्हा के अनुसार-आकार की लघुता के बावजूद ‘मुक्तियज्ञ’ की आत्मा में एक महाकाव्य जैसी गरिमा है।”

(3) रस-योजना – रस-निष्पत्ति की दृष्टि से मुक्तियज्ञ’ वीर रसप्रधान काव्य है। इसमें गांधी जी तथा अन्य लोगों के त्याग और बलिदान की साहसपूर्ण कथा लिखी गयी है। भारतीयों के अंग्रेजों के विरुद्ध अहिंसात्मक संघर्ष में वीर रस के दर्शन होते हैं

गूँज रहा रण शंख, गरजती, भेरी, उड़ता, सुर धनु केतन।
ऊर्ध्व असंख्य पदों से धरती, चलती, यह मानवता का रण ॥

कवि ने वीर रस के साथ-साथ अंग्रेजों के दमन में तथा अकाल-चित्रण आदि के मार्मिक स्थलों पर करुण और शान्त रस की भी सुन्दर व्यंजना की है।

(4) प्रकृति-चित्रण की न्यूनता – कविवर सुमित्रानन्दन पन्त प्रकृति के सुकुमार कवि हैं। उनकी प्रायः प्रत्येक काव्य-रचना में प्रकृति का अनेक रूपों में चित्रण हुआ है, किन्तु ‘मुक्तियज्ञ’ में लगता है कि उन्हें प्रकृतिचित्रण का कहीं अवकाश ही नहीं मिला; क्योंकि मुक्तियज्ञ एक विचार एवं समस्या प्रधान काव्य-रचना है।

(ब) कलागत विशेषताएँ

यद्यपि ‘मुक्तियज्ञ’ में पन्त जी की कलात्मक काव्य-प्रतिभा का उपयोग नहीं के बराबर हुआ है, तथापि इस दृष्टि से भी इनकी कलात्मकता के निम्नवत् कई रूपों में दर्शन होते हैं

(1) भाषा – ‘मुक्तियज्ञ की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली और सरल हिन्दी है। यह परिपक्व और व्यंजना-शक्ति से परिपूर्ण है। भाषा में अभिव्यक्ति की सरलता, बोधगम्यता और चित्रात्मकता के साथ-साथ सरसता और सुकुमारता के दर्शन भी होते हैं। कवि ने अनेक स्थलों पर कठिन शब्दावली का भी प्रयोग किया है, जिस कारण कहीं-कहीं भाषा बोझिल-सी बन गयी है। भाषा में ओज, माधुर्य और प्रसाद गुण विद्यमान है। भाषा भावात्मक एवं दार्शनिक विचाराभिव्यक्ति में समर्थ है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है

झोंक आग में तन के कपड़े, गिरते पद पर पागल स्त्री-नर।
भेद कभी इतिहास कहेगा, कौन पुरुष चला युग-भू पर॥

कवि की बिम्ब-योजनाओं का एक उदाहरण द्रष्टव्य है

चरु की स्निग्ध घृताहुतियाँ ज्यों, हों उठतीं मुख-वह्नि प्रज्वलित।
विंनत अहिंसा की नर-बलियाँ, पशु का दर्प हुआ उत्तेजित ॥

(2) शैली – कवि ने ‘मुक्तियज्ञ’ में सीधी-सादी अभिधाप्रधान मूर्त शैली अपनायी है। इसमें गाम्भीर्य है, प्रौढ़ता है और साथ ही संरलता भी है। इसमें कवि ने किसी प्रकार की कलात्मकता अथवा काल्पनिकता का चमत्कारपूर्ण समावेश नहीं किया है। कवि की दृष्टि कथ्य के महत्त्व पर अधिक और कथन की शैली पर कम टिकी है। इनकी भाषा-शैली में इनकी परिपक्व व्यंजना-शैली का परिचय मिलता है; उदाहरणार्थ

मुखर तर्क के शब्द-जाल में, भटक न खो जाए अन्तः स्वर,
गुरुता से सौजन्य, बुद्धि से, हृदय-बोध था उनको प्रियतर।

(3) अलंकार-योजना – ‘मुक्तियज्ञ’ में क़वि ने अलंकारों का प्रयोग विषय की स्पष्टता के लिए ही किया है; क्योंकि उनकी दृष्टि कथन के ढंग पर न होकर कथ्य पर लगी रही है। फिर भी कवि ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास, मानवीकरण आदि अलंकारों का प्रयोग किया है; उदाहरणार्थ

उपमा: उन्नत जन वर देवदारु-से, स्वर्णछत्र सिर पर तारक नभ।
सौम्य आस्य, उन्मुक्त हास्यमय, प्रातः रवि-सा स्निग्ध स्वर्णप्रभ॥
मानवीकरण – जगे खेत खलिहान, बाग फड़, जगे बैल हँसिया हल विस्मित ।
हाट बाट गोचर घर-आँगन, वापी पनघट जगे चमत्कृत ।।

(4) छन्द-विधान – ‘मुक्तियज्ञ’ में कवि ने भावात्मक मुक्त छन्द का प्रयोग किया है। सम्पूर्ण काव्य की रचना में 16 मात्राओं की चार-चार पंक्तियों वाले छन्द का प्रयोग किया गया है। कवि ने कुछ स्थानों पर छन्द-परिवर्तन भी किया है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मुक्तियज्ञ’ की कथा की पृष्ठभूमि का विस्तार अधिक है, फिर भी कवि ने उसके मुख्य प्रसंगों को इस प्रकार क्रमबद्ध किया है कि कथा के क्रमिक विकास में बाधा नहीं आयी है। इस रचना में एक ही रस और एक ही छन्द का प्रयोग किया गया है, इस दृष्टि से भी यह रचना खण्डकाव्य के लिए अपेक्षित विशेषताओं से विभूषित है।

प्रश्न 5:
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में निहित रचनाकार के प्रयोजन को स्पष्ट कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य का उद्देश्य मानव जाति में भाईचारा और एकता की भावना जगाना है।” इस कथन पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की पावन भावना प्रतिपादित हुई है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘मूक्तियज्ञ’ के नामकरण की सार्थकता पर प्रकाश डालिए। ”
या
‘मुक्तियज्ञ’ में भारतीय समाज के उच्च आदर्शों का निरूपण हुआ है।” इस कथन को सिद्ध कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए। ”
या
‘मुक्तियज्ञ’ में गांधी-युग के सैद्धान्तिक और व्यावहारिक पक्ष को ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि पर उतारा गया है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में गांधीवादी विचारधारा के माध्यम से विश्वबन्धुत्व और मानवतावाद की रतिष्ठा की गयी है।” सोदाहरण विवेचना कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ में अभिव्यक्त सामाजिक चेतना पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना का प्रतिपादन किया गया है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य राष्ट्रीयता और देशभक्ति का प्रतिपादन करने वाला खण्डकाव्य है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की आधुनिकता पर प्रकाश डालिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में विश्व-एकता तथा विश्व-कल्याण का स्वर मुखरित हुआ है।” सिद्ध कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ से क्या सन्देश मिलता है ?
उत्तर:
कविवर सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘मुक्तियज्ञ’ एक उद्देश्यप्रधान रचना है। इस खण्डकाव्य में अनेक प्रयोजन मुखर हुए हैं। इसके मुख्य उद्देश्य निम्नवत् हैं

(1) तत्कालीन परिस्थितियों से परिचय – पन्त जी ने ‘मुक्तियज्ञ’ रचना के माध्यम से जन-मानस को भारत के परतन्त्र युग की उन भीषण परिस्थितियों से अवगत कराया है, जो क्रूर सामन्तवाद की निर्दयता का परिचय देती हैं। इस उद्देश्य में कवि पूरी तरह सफल रहा है।

(2) भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम की झलक – प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि ने भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम की झलक प्रस्तुत की है। कवि संघर्ष को प्रेरणादायक मानता है। इसलिए वह चाहता है कि इसकी झलक जनमानस तक पहुँच जाए। कवि कहता है कि अन्यायी क्रूरता से जब भीषण विद्रोह भड़कता है तो वह किसी भी शक्ति के रोके नहीं रुकता

अन्यायी के क्रूर कृत्य से, जब विद्रोह भड़कता है भीषण।
उस अन्तर्गत विप्लव को, रोक नहीं पाते शत रावण ।।

(3) शाश्वत मूल्यों की स्थापनों – इस काव्य-रचना में पन्त जी अराजकता के तत्कालीन एवं आधुनिक युग में भी सत्य, अहिंसा, प्रेम, न्याय और करुणा जैसे शाश्वत गुणों को आधार मानकर जीवन-मूल्यों की स्थापना करते हैं। कवि ने पश्चिमी भौतिकवादी दर्शन और गांधीवादी मूल्यों के बीच संघर्ष का चित्रण किया है और अन्त में गांधीवादी जीवन-मूल्यों की विजय का शंखनाद किया है

मानव आत्मा की विमुक्ति की, भारत मुक्ति प्रतीक असंशय ।
करे विश्व मन के जड़ बन्धन, हुआ चेतना का अरुणोदय ॥

(4) लोक-मंगल का सन्देश –  पन्त जी ने ‘मुक्तियज्ञ’ के माध्यम से संसार को लोक-मंगल का सन्देश दिया है। वे भारत की स्वतन्त्रता में समस्त संसार की मुक्ति को निहारते हैं। कवि ने काव्य के नायक गांधी जी को लोकपुरुष के रूप में चित्रित किया है, जो जातिवाद, साम्प्रदायिकता और रंगभेद के कट्टर विरोधी हैं तथा इन बुराइयों को दूर करने के लिए कृतसंकल्प हैं।

(5) विश्वबन्धुत्व और मानवतावाद को प्रसार – कवि ने प्रस्तुत रचना में सत्य की असत्य पर और अहिंसा की हिंसा पर विजय दिखाकर मानवता के प्रति सच्ची आस्था व्यक्त की है। इससे विश्वबन्धुत्व, प्रेम एवं सहयोग की भावना को बल मिलेगा और विश्व में एकता स्थापित होगी। कवि का यह जीवन-दर्शन भारतीय स्वतन्त्रता के आन्दोलन की पृष्ठभूमि में तथा गांधीवादी दर्शन के रूप में भारतीय परतन्त्रता के परिप्रेक्ष्य में मुखरित होता है और ‘मुक्तियज्ञ’ का यह पावन धुआँ विश्व-मानवता एवं विश्व-प्रेम का विराट स्वरूप धारण कर लेता है

हिरोशिमा नागासाकी पर, भीषण अणुबम का विस्फोटन,
मानवता के मर्मस्थल का, कभी भरेगा क्या दुःसह व्रण।.

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि उपर्युल्लिखित उद्देश्य ही ‘मुक्तियज्ञ’ की रचना के मर्म हैं और कवि ने इसी सैद्धान्तिक पक्ष को व्यावहारिक रूप में सामाजिक पृष्ठभूमि पर उतारा है। गांधीवादी दर्शन को माध्यम बनाकर कवि ने विश्व-बन्धुत्व और मानवतावाद की स्थापना की है।

नामकरण की सार्थकता – ‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य का सम्पूर्ण कथानक भारत के स्वतन्त्रता संग्राम से जुड़ा हुआ है। इस खण्डकाव्य के नायक महात्मा गांधी हैं, जिनके लक्षण परम्परागत नायकों से हटकर हैं। इनका यही व्यक्तित्व भारतीय जनता को शक्ति और प्रेरणा देता है। भारत को स्वतन्त्र कराने के लिए इन्होंने एक प्रकार से एक यज्ञ का ही आयोजन किया था, जिसमें देश के अनेकानेक देशभक्त नवयुवक अपने प्राणों की आहुति देते हैं। देश की मुक्ति के लिए आयोजित किये गये यज्ञ के कारण ही इस खण्डकाव्य का नाम ‘मुक्तियज्ञ’ पूर्णतया सटीक एवं सार्थक है।

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