UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 3 प्रायश्चित

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name प्रायश्चित (भगवतीचरण वर्मा)
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 3 प्रायश्चित (भगवतीचरण वर्मा)

प्रश्न 1:
‘प्रायश्चित’ कहानी का सारांश या कथानक अपनी भाषा में लिखिए।
उत्तर:
‘प्रायश्चित’ कहानी प्रसिद्ध कथाकार भगवतीचरण वर्मा की यथार्थवादी व्यंग्यात्मक रचना है। इस कहानी का सारांश निम्नवत् है-

कबरी बिल्ली यदि किसी से प्रेम करती थी तो रामू की बहू से और अगर रामू की बहू घर भर में किसी से घृणा करती थी, तो कबरी बिल्ली से। उसकी अभी नयी-नयी शादी हुई थी और वह मायके से ससुराल आयी थी। चौदह वर्ष की ‘बालिका, कभी भण्डार-घर खुला है, तो कभी वहीं बैठे-बैठे सो गयी। कबरी बिल्ली को मौका मिलता, वह घी-दूध पर जुट जाती। रामू की बहू की जान आफत में और कबरी बिल्ली के मजे। रामू की बहू घी, दूध, दही, खीर छिपाते-छिपाते तंग आ गयी। जो भी बचता कबरी के पेट में। इस तरह रामू की बहू कबरी से पूरी तरह तंग आ गयी थी। उसने अपने मन में ठान लिया कि अब इस घर में या तो कबरी रहेगी या मैं। दोनों में मोरचाबन्दी हो गयी और दोनों सतर्क। कबरी के हौसले दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे थे।

एक दिन रामू की पत्नी ने रामू के लिए खीर बनायी। पिस्ता, बादाम, मखाने और तरह-तरह के मेवे दूध में औटाये गये। खीर से भरकर कटोरा कमरे में एक ऐसे ऊँचे स्थान पर रखा गया, जहाँ कबरी न पहुँच सके। उधर कबरी कमरे में आयी, नीचे खड़े होकर उसने ऊपर कटोरे की ओर देखा, सँघा, माल अच्छा है, ताक की ऊँचाई अन्दाजी और छलाँग लगायी। पंजा कटोरे में लगी और कटोरा झनझनाहट की आवाज के साथ फर्श पर गिरा। आवाज सुनकर रामू की बहू दौड़ी, देखा तो कबरी मजे के साथ खीर खा रही है। रामू की बहू को देखकर कबरी भाग गयी। रामू की बहू पर खून सवार हो गया। उसने कुछ सोचा और एक कटोरा दूध कमरे के दरवाजे पर रखकर चली गयी। हाथ में पाटा लेकर लौटी, तो देखती है कि कबरी दूध पर जुटी हुई है। सारा बल लगाकर पाटा उसने कबरी पर पटक दिया। कबरी हिली ने डुली, न चीखी न चिल्लायी, बस एकदम उलट गयी।

घर में मानो मातम छा गया। सब एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। मिसरानी बोलीं-माँ जी, ‘बिल्ली की हत्या और आदमी की हत्या बराबर है।’ पण्डित जी बुलवाये गये। काफी भाव-ताव के बाद पण्डित जी ने उपाय में 11 तोले सोने की बिल्ली, 21 दिन के पाठ, 21 रुपये दक्षिणा और 21 दिन दोनों वक्त का भोजन निश्चित किया। दान के लिए दस मन गेहूँ, एक मन चावल, एक मन दाल, मन भर तिल, पाँच मन जौ और पाँच मन चना, चार पसेरी घी, मन भर नमक निश्चित हुआ। ग्यारह तोले सोने की बिल्ली बनवाकर लाने के लिए पण्डित जी ने रामू की माँ से कहा कि अचानक महरी ने आकर कहा कि बिल्ली तो उठकर भाग गयी।

इस कहानी में लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि चाहे कोई ज्ञानी हो या अज्ञानी, सभी को उद्देश्य धन इकट्ठा करना है। इस कहानी में धर्मभीरुता, रूढ़िवादिता एवं पाखण्डवाद को प्रस्तुत करे स्पष्ट किया गया है कि इनके पीछे मूल कारण धन ही है।

प्रश्न 2:
कहानी-कला के तत्वों के आधार पर प्रायश्चित’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
‘वातावरण’ एवं ‘भाषा-शैली के आधार पर प्रायश्चित कहानी का मूल्यांकन कीजिए।
या
“प्रायश्चित’ कहानी की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
या
‘प्रायश्चित’ कहानी में चरित्र-चित्रण के कौशल पर प्रकाश डालिए।
या
‘प्रायश्चित कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘प्रायश्चित’ कहानी का शीर्षक कितना सार्थक है ? संक्षेप में लिखिए।
या
कथोपकथन की दृष्टि से ‘प्रायश्चित’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
कहानी के तत्त्वों के आधार पर प्रायश्चित’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
श्री भगवतीचरण वर्मा हिन्दी-साहित्य के प्रसिद्ध कथाकार हैं। प्रायश्चित’ कहानी इनकी प्रसिद्ध कहानियों में से एक है। इस कहानी को स्वर यथार्थवाद है। लेखक ने इस कहानी के माध्यम से आधुनिक समाज में धर्म के नाम पर धन की लोलुपता को प्रस्तुत किया है। कहानी की तात्त्विक समीक्षा निम्नवत् है

(1) शीर्षक – इस कहानी का शीर्षक ‘प्रायश्चित है। ‘प्रायश्चित’ शीर्षक वास्तविक कथावस्तु की ओर इंगित करता है। शीर्षक में कौतूहले, सरलती, स्पष्टता, संक्षिप्तता और आकर्षण है। इससे कहानी के केन्द्रीय भाव की, झलक मिलती है, जो पाठक को कहानी पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। शीर्षक की दृष्टि से प्रायश्चित’ एक श्रेष्ठ रचना है। कहानी के अन्तर्गत प्रारम्भ से ‘अन्त तक यह जिज्ञासा बनी रहती है कि बिल्ली के मरने पर पण्डित परमसुख द्वारा रामू के परिवार को कितने रुपये का चूना लगाया गया।

(2) कथानक या कथावस्तु – इस कहानी का कथानक मध्यमवर्गीय ग्रामीण समाज से लिया गया है तथा पुरोहितों में धर्म के नाम पर धनं-हरण के प्रति बढ़ते हुए मोह को कहानी का आधार बनाया गया है। कहानी का प्रारम्भ घर में नयी बहू के आगमन और बिल्ली द्वारा दूध के बने व्यंजनों के येन-केन प्रकारेण चट कर जाने से है। बिल्ली के आये दिन के इस कार्य से नयी बहू परेशान हो जाती है और अन्ततः वह बिल्ली को मार देने का निर्णय करती है तथा उसे पर पाटा चला देती है। पण्डित परमसुख बुलाये जाते हैं और वह बिल्ली की हत्या का जो प्रायश्चित बताते हैं, वह वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तो कई लाख का बैठेगा। परिवारीजन इस बारे में विचार करते ही रहते हैं कि पता चलता है कि बिल्ली भाग गयी।

इस कहानी का कथानक रोचक, सरस, मौलिक, स्वाभाविक, सजीव और प्रभावशाली है। इसमें प्रारम्भ से अन्त तक कौतूहल बना रहता है। कहानी में कहानीकार ने तथाकथित पुरोहित वर्ग और उनके पौरोहित्य कर्म की पोल खोलकर रख दी है तथा सामाजिक रूढ़ियों और धर्मभीरुता के नाम पर शोषण की प्रवृत्ति को अभिव्यक्त किया है। कहानी का अन्त आकर्षक है, जो पाठक पर अपना स्पष्ट प्रभाव छोड़ता है।

(3) पात्र और चरित्र-चित्रण – यह कहानी एक मध्यमवर्गीय हिन्दू ग्रामीण-धर्मभीरु परिवार से सम्बन्धित है। कहानी में पात्रों की संख्या कम है। मुख्य पात्र रामू की बहू, कबरी बिल्ली, पण्डित परमसुख और रामू की माँ हैं। अन्य सभी पात्र–मिसरानी, छन्नू की दादी, महरी, किसनू की माँ आदि गौण पात्र हैं, जो केवल कथावस्तु को विस्तार देने के उद्देश्य से ही प्रयुक्त किये गये हैं। पात्रों के चरित्र-चित्रण में सांकेतिक प्रणाली को अपनाते हुए उनका मूल्यांकन पाठकों पर ही छोड़ दिया गया है। पात्र तथा चरित्र-चित्रण की दृष्टि से यह एक सफल कहानी है।

(4) कथोपकथन (संवाद-योजना) – कहानी की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण कथोपकथन की सार्थक योजना होती है। लेखक ने इस कहानी में सार्थक संवादों का प्रयोग किया है, जिसके आधार पर एक कुशल कहानीकार अपने पात्रों के चरित्र पर प्रकाश डालता है तथा कहानी की कथावस्तु का विकास करता है। प्रस्तुत कहानी के संवाद अत्यन्त संक्षिप्त और सार्थक हैं, उनमें नाटकीयता और सजीवता है। इस कहानी के संवाद सारगर्भित, संक्षिप्त, कहानी को गति देने वाले, वातावरण की सृष्टि तथा पात्रों की मन:स्थिति को स्पष्ट करने में सहायक है। कबरी के मरने पर जो प्रतिक्रिया पारिवारिक और अन्य लोगों के बीच हुई, वह भी स्वाभाविक है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है

महरी बोली-“अरे राम! बिल्ली तो मर गयी, माँ जी, बिल्ली की हत्या बहू से हो गयी, यह तो बुरा हुआ।”
मिसरानी बोली”माँ जी, बिल्ली की हत्या और आदमी की हत्या बराबर है। हम तो रसोई न बनावेंगी, जब तक बहू के सिर हत्या गुहेगी।”
सास जी बोलीं- “हाँ ठीक तो कहती हो, अब जब तक बहू के सिर से हत्या न उतर जाए, तब तक न तो कोई पानी पी सकता है, न खाना खा सकता है। बहू, यह क्या कर डाला?”

(5) देश-काल और वातावरण – प्रायश्चित कहानी को आधार ग्रामीण-सम्भ्रान्त एवं सम्पन्न परिवार है। ‘प्रायश्चित’ एक व्यंग्यमूलक कहानी है, जिसमें सामाजिक पात्रों की स्वार्थबद्धता पर लेखक ने विनोदपूर्ण एवं चुटीला व्यंग्य किया है तथा वातावरण को प्राणवान एवं प्रभावशाली बनाने के लिए विशेष सजगता का परिचय दिया है। रामू के घर का दृश्य ही पूरे घटनाक्रम के लिए पर्याप्त है। समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, पाखण्डवाद, रूढ़िवाद और धर्मभीरुता का लेखक ने व्यंग्यपूर्ण वर्णन किया है। कहानी में आधुनिक समाज के वातावरण की सजीव दृष्टि मिलती है। आज के युग में व्यक्ति अत्यन्त स्वार्थी होता जा रहा है। बेईमानी और भ्रष्टाचार चारों ओर व्याप्त हैं। इस प्रकार प्रस्तुत कहानी में देश-काल और वातावरण का सफलता के साथ चित्रण हुआ है।

(6) भाषा-शैली – इस कहानी की भाषा आम बोल-चाल की-सरल, सरस और स्वाभाविक है। लोकोक्तियों और मुहावरों का सटीक प्रयोग किया गया है। शैली पात्रों के अनुकूल है और उनके भावों को प्रकट करने वाली है, जिसमें व्यंग्यात्मकता का पुट सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है

पण्डित परमसुख मुस्कराये, अपनी तोंद पर हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा”बिल्ली कितने तोले की बनवायी जाय? अरे रामू की माँ, शास्त्रों में तो लिखा है कि बिल्ली के वजन-भर सोने की बिल्ली बनवायी जाय, लेकिन अब कलियुग आ गया है, धर्म-कर्म को नाश हो गया है, श्रद्धा नहीं रही। सो रामू की माँ, बिल्ली के तोलभर की बिल्ली तो क्या बनेगी, क्योंकि बिल्ली बीस-इक्कीस सेर से कम की क्या होगी। हाँ, कम-से-कम इक्कीस तोले की बिल्ली बनवा के दान करवा दो और आगे तो अपनीअपनी श्रद्धा!”
रामू की माँ ने आँखें फाड़कर पण्डित परमसुख को देखा–“अरे बाप रे, इक्कीस तोला सोना! पण्डित जी यह तो बहुत है, तोलाभर की बिल्ली से काम न निकलेगा?”
पण्डित परमसुख हँस पड़े–’रामू की माँ! एक तोला सोने की बिल्ली! अरे रुपया का लोभ बहू से बढ़ गया? बहू के सिर बड़ा पाप है, इसमें इतना लोभ ठीक नहीं?”
वर्मा जी सफल कथाशिल्पी हैं और उनकी भाषा-शैली भावों तथा पात्रों के अनुकूल है।

(7) उद्देश्य – वर्मा जी की इस कहानी का उद्देश्य इस सत्य को अभिव्यंजित करना है कि वर्तमान में मनुष्य का लगाव मात्र धन में केन्द्रित है, शेष सभी रिश्ते-नाते नगण्य होते जा रहे हैं। कहानी में धर्मान्धता पर भी प्रहार किये गये हैं तथा समाज में व्याप्त रिश्वतखोरी, बेईमानी और मतलबपरस्ती पर भी यथार्थवादी व्यंग्यों का प्रहार करते हुए धर्मान्धता के वशीभूत हुए लोगों को इस पाश से निकालने का प्रयास किया गया है। लेखक को कहानी लिखने के उद्देश्य में पूर्ण सफलता मिली है। इस प्रकार प्रायश्चित’ कहानी लेखक की सफल यथार्थवादी रचना है। कहानी का आरम्भ, मध्य और समापन रोचक व औचित्यपूर्ण है। कहानी में अन्त तक यह कौतूहल बना रहता है कि प्रायश्चित में पण्डित परमसुख को क्या मिलेगा ? अन्त अप्रत्याशित और कलात्मक है। कहानी-कला की कसौटी पर ‘प्रायश्चित’ एक सफल, व्यंग्यात्मक तथा यथार्थवादी सामाजिक कहानी के रूप में खरी उतरती है।।

प्रश्न 3:
‘प्रायश्चित कहानी के आधार पर पण्डित परमसुख के चरित्र और व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।
या
‘प्रायश्चित’ के पण्डित परमसुख की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘प्रायश्चित’ कहानी के प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
‘प्रायश्चित’ कहानी भगवतीचरण वर्मा की एक श्रेष्ठ व्यंग्यप्रधान सामाजिक रचना है, जिसमें मानव के स्वभाव को सुन्दर मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है। पण्डित परमसुख कहानी के प्रमुख पात्र हैं। कहानी के प्रारम्भ में बिल्ली की मृत्यु होने के बाद वे सम्पूर्ण कहानी पर छाये हुए हैं। उनके कर्मकाण्ड कम और पाखण्ड के द्वारा वर्मा जी ने उनके चरित्र को उजागर किया है। कहानी के आधार पर उनकी चरित्रगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) कर्मकाण्डी ब्राह्मण – पण्डित परमसुख एक कर्मकाण्डी ब्राह्मण हैं। वह कर्मकाण्ड के स्थान पर प्रकाण्ड पाखण्ड में अधिक विश्वास रखते हैं। नित्य पूजा-पाठ करना उनको धर्म है। लोगों में उनके प्रति आस्था भी है। इसलिए बहू के द्वारा बिल्ली के मारे जाने पर रामू की माँ उन्हें ही बुलवाती है और प्रायश्चित का उपाय पूछती है।

(2) लालची – पण्डित परमसुख परम लालची हैं। लालच के वशीभूत होकर ही वह रामू की माँ को प्रायश्चित । के लिए पूजा और दान की इतनी अधिक सामग्री बताते हैं, जिससे उनके घर के छ: महीनों के अनाज का खर्च निकल जाए।

(3) पाखण्डी – पण्डित परमसुख कर्मकाण्डी कम पाखण्डी अधिक हैं। वह पाखण्ड के सहारे धन एकत्र करना चाहते हैं। बिल्ली के मरने की खबर सुनकर उन्हें प्रसन्नता होती है। जब उन्हें यह खबर मिली, उस समय वे पूजा कर रहे थे। खबर पाते ही वे उठ पड़े, पण्डिताइन से मुस्कराते हुए बोले–* भोजन न बनाना, लाला घासीराम की पतोहू ने बिल्ली मार डाली, प्रायश्चित होगा, पकवानों पर हाथ लगेगा।”

(4) व्यवहारकुशल और दूरदर्शी – पण्डित परमसुख को मानव-स्वभाव की अच्छी परख है। वे जानते हैं कि दान के रूप में किस व्यक्ति से कितना धन ऐंठा जा सकता है। इसीलिए वे पहले इक्कीस तोले सोने की बिल्ली के दान का प्रस्ताव रखते हैं, लेकिन बात कहीं बढ़ न जाए और यजमान कहीं हाथ से न निकल जाए, वे तुरन्त ग्यारह तोले पर आ जाते हैं।

(5) परम पेट्र – पण्डित परमसुख परम पेटू भी हैं। पाँच ब्राह्मणों को दोनों वक्त भोजन कराने के स्थान पर उन्हीं के द्वारा दोनों समय भोजन कर लेना उनके परम भोजनभट्ट होने का प्रमाण है।

(6) साम-दाम-दण्ड-भेद में प्रवीण – पण्डित परमसुख साम-दाम-दण्ड-भेद में अत्यधिक प्रवीण हैं। पूजा के सामान की सूची के बारे में पहले तो उन्होंने प्रेम से रामू की माँ को समझाया परन्तु जब वह ना-नुकुर करने लगी तो तुरन्त ही बिगड़कर अपना पोथी-पत्रा बटोरने लगे और पैर पकड़े जाने पर पुनः आसन जमाकर भोजनादि की बात करने लगे। इससे स्पष्ट होता है कि पण्डित जी इन चारों विद्याओं में निष्णात थे। स्पष्ट होता है कि पण्डित परमसुख उपर्युक्त वर्णित गुणों के मूर्तिमान स्वरूप थे।

प्रश्न 4:
“जिज्ञासा की उत्तरोत्तर वृद्धि ही अच्छी कहानी की पहचान है।” इस कथन के आधार पर प्रायश्चित’ कहानी का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
प्रत्येक अच्छी कहानी आने वाली घटनाओं के प्रति पाठक के मन में उत्सुकता जगाती चलती है। इससे कहानी में पाठक की रुचि बनी रहती है। इसलिए कहानीकार का यह प्रयास रहता है कि उसकी कहानी में जिज्ञासा का तत्त्व अवश्य विद्यमान रहे, जिससे पाठक उसकी आगामी घटनाओं को जानने के लिए उत्सुक बना रहे। ऐसा होने पर पाठक उसे अन्त तक पढ़ने के लिए बेचैन रहता है। कहानी की इस विशेषता के आधार पर ‘प्रायश्चित’ एक अच्छी कहानी है। कहानी का प्रारम्भ बहुत सुन्दर और आकर्षक ढंग से हुआ है तथा पाठक अन्त तक यह जानने के लिए उत्सुक रहता है कि पण्डित परमसुख ने बिल्ली की मृत्यु के परिहार के लिए रामू की माँ को कितने सोना, अनाज, दक्षिणा और भोजन का चूना लगाया।
इस दृष्टि से ‘प्रायश्चित’ एक श्रेष्ठ कहानी है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट

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Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name राजमुकुट (व्यथित हृदय)
Number of Questions
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट (व्यथित हृदय)

प्रश्न 1:
श्री व्यथित हृदय द्वारा लिखित ‘राजमुकुट नाटक का सारांश अथवा कथा-सार संक्षेप में लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक की कथावस्तु (कथानक) संक्षेप में लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के द्वितीय अंक का कथा-सार लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के तृतीय अंक का कथा-सार संक्षेप में लिखिए।
या
‘राजमुकुट नाटक के प्रथम अंक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘राजमुकुट नाटक के किसी एक अंक की कथा संक्षेप में लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के अन्तिम (चतुर्थ) अंक की कथा संक्षिप्त रूप में लिखिए।
या
“राजमुकुट नाटक की कथा एवं अन्तर्कथाओं पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘राजमुकुट नाटक के आधार पर महाराणा प्रताप और अकबर की भेंट का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
‘राजमुकुट’ नाटक, नाटककार श्री व्यथित हृदय का एक ऐतिहासिक नाटक है। इस नाटक में * महाराणा प्रताप की वीरता, बलिदान और त्याग की कथा अंकित है। कथा का प्रारम्भ महाराणा प्रताप के राज्याभिषेक से तथा कथा का अन्त महाराणा प्रताप की मृत्यु पर होता है। महाराणा प्रताप इस नाटक के नायक हैं।
प्रथम अंक – प्रस्तुत नाटक के प्रथम अंक की कथा मेवाड़ के राणा जगमल के महल से आरम्भ होती है। राणा जगमल एक विलासी और क्रूर शासक है। वह अपनी मर्यादा का निर्वाह करना भूल गया था तथा सुरा-सुन्दरी में डूबा रहता था। ऐसे ही समय में राष्ट्रनायक कृष्णजी चन्दावत, राजसभा में पहुँचते हैं तथा राणा जगमल को उसके नीचे कर्मों के लिए भला-बुरा कहते हैं। वे जगमल से मेवाड़ का मुकुट’ उचित पात्र को सौंपने के लिए आग्रह करते हैं। जगमल उनकी बात स्वीकार कर लेते हैं तथा चन्दावत से योग्य उत्तराधिकारी चुनने के लिए कहते हैं। चन्दावत; राणा जगमल से राजमुकुट लेकर प्रताप के शीश पर रख देते हैं। प्रजा में खुशी की लहर दौड़ जाती है। प्रताप विदेशी शासक से लोहा लेने का प्रण करते हैं तथा देश की स्वतन्त्रता की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। यह संकल्प नाटक की कथा को आगे बढ़ाने में सहायक है।

द्वितीय अंक – प्रताप मेवाड़ के राजा बनते ही अपनी प्रजा के खोये हुए सम्मान की रक्षा करते हैं। वे प्रजा में वीरता का संचार करने के लिए अनेक आयोजन भी करते हैं। ऐसे ही एक आयोजन के अवसर पर जंगली सूअर के आखेट को लेकर प्रताप तथा उनके भाई शक्तिसिंह में विवाद हो जाता है। विवाद बढ़ जाने पर दोनों भाई शस्त्र निकालकर एक-दूसरे से भिड़ जाते हैं। भावी अनिष्ट की आशंका या राजकुल को संकट से बचाने के लिए राजपुरोहित अपनी कटार से अपना ही प्राणान्त कर लेते हैं। प्रताप शक्तिसिंह को देश से निर्वासित कर देते हैं। शक्तिसिंह अपने को अपमानित अनुभव करते हैं तथा अकबर के साथ मिल जाते हैं।

तृतीय अंक – मानसिंह राणा प्रताप से बहुत प्रभावित था। एक बार वह राणा प्रताप से मिलने आया। राणा उसे विधर्मी और पतित समझते थे; क्योंकि मानसिंह की बुआ मुगल सम्राट अकबर की विवाहिता पत्नी थीं। इसलिए राणा ने उससे स्वयं भेंट न करके उसके स्वागतार्थ अपने पुत्र अमरसिंह को नियुक्त किया। मानसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और इस अपमान का बदला चुकाने की बात कहकर वहाँ से चला गया तथा दिल्ली के सम्राट अकबर से जा मिला। चतुर अकबर अवसर का लाभ उठाकर महाराणा प्रताप पर आक्रमण कर देता है। हल्दीघाटी के इतिहास-प्रसिद्ध युद्ध में महाराणा प्रताप को बचाने के लिए कृष्णजी चन्दावत, प्रताप के सिर से मुकुट उतारकर स्वयं पहन लेते हैं और युद्धभूमि में देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर देते हैं। प्रताप बच जाते हैं, परन्तु दो मुगल सैनिक प्रताप का पीछा करते हैं। ऐसे समय पर शक्तिसिंह का भ्रातृ-प्रेम जाग्रत होता है और वे पीछा करके दोनों मुगलों को मार देते हैं। शक्तिसिंह और प्रताप आपस में गले मिलते हैं। इसी समय राणा प्रताप का प्रिय घोड़ा चेतक अपने प्राण त्याग देता है।

चतुर्थ अंक – हल्दीघाटी का युद्ध समाप्त हो जाता है, परन्तु राणा हार नहीं मानते। अकबर प्रताप की देशभक्ति, त्याग और वीरता का लोहा मानते हैं तथा वे महाराणा प्रताप के प्रशंसक बन जाते हैं। एक दिन प्रताप के पास एक संन्यासी आती है। प्रताप संन्यासी का उचित सत्कार न कर पाने के कारण अत्यधिक व्यथित हैं। इसी समय राणा की पुत्री चम्पा घास की बनी रोटी लेकर आती है, जिसे एक वन-बिलाव छीनकर भाग जाता है। चम्पा गिर जाती है और पत्थर से टकराकर उसकी मृत्यु हो जाती है। कुछ समय पश्चात् अकबर संन्यासी वेश में वहाँ आता है और कहता है कि “आप उस अकबर से तो सन्धि कर सकते हैं जो भारतमाता को अपनी माँ समझता है, जो आपकी भाँति उसकी जय बोलता है।” इसी समय अकबर राणा को ‘भारतमाता का सपूत’ बताता है और प्रताप के दर्शन करके अपने को धन्य मानता है। संघर्षरत प्रताप रोगग्रस्त हो जाते हैं। वे शक्तिसिंह तथा अपने सभी साथियों से स्वतन्त्रता-प्राप्ति का वचन लेते हैं। भारतमाता की जय’ घोष के साथ ही महाराणां का देहान्त हो जाता है। ‘राजमुकुट’ की यह कथा भारत के स्वर्णिम इतिहास और एक रणबाँकुरे वीर की अमर कहानी है।

प्रश्न 2:
नाट्य-कला (नाट्य तत्त्वीं) की दृष्टि से ‘राजमुकुट’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
कथोपकथन (संवाद-योजना) की दृष्टि से ‘राजमुकुट’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक की संवाद-कला पर प्रकाश डालिए। कथावस्तु की दृष्टि से ‘राजमुकुट नाटक की समीक्षा लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक की भाषा पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
या
भाषा-शैली की दृष्टि से ‘राजमुकुट’ नाटक की समीक्षा लिखिए।
या
‘राजमुकुट नाटक में देश-काल और वातावरण का सफल निर्वाह हुआ है।” इस कथन के विषय में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के वातावरण एवं उद्देश्य पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
‘राजमुकुट नाटक की अभिनेयता पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
रंगमंच की दृष्टि से नाटक की आलोचना कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

‘राजमुकुट’ नाटक की समीक्षा

नाट्य-कला के विभिन्न तत्त्वों के आधार पर श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

(1) कथानक – इस नाटक का कथानक महाराणा प्रताप के शौर्यपूर्ण जीवन से सम्बन्धित है। कथानक का प्रारम्भ महाराणा के राजमुकुट धारण करने से होता है। कथानक के विकास में शक्तिसिंह और राणा का विवाद, अकबर की सेना का प्रताप पर आक्रमण, हल्दीघाटी का युद्ध, प्रताप का वन-वन भटकना, उनकी मृत्यु आदि अनेक घटनाएँ सहायक हुई हैं। कथानक सुगठित, सशक्त, सुन्दर तथा क्रमबद्ध है। इस प्रकार कथानक की दृष्टि से ‘राजमुकुट एक सफल नाटक है।

(2) पात्र तथा चरित्र-चित्रण – नाटक की पात्र-योजना श्रेष्ठ है। नाटक के नायक प्रताप हैं। प्रताप के अतिरिक्त शक्तिसिंह, कृष्णजी चन्दावत, जगमल, मानसिंह, अकबर आदि अन्य प्रमुख पात्र हैं। नारी-पात्रों की भी सुन्दर योजना है। प्रजावती का बलिदान सुन्दर रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रमिला, गुणवती तथा चम्पा अन्य प्रमुख नारी-पात्र हैं। सभी पात्रों का चरित्रांकन श्रेष्ठ है तथा कहानी के विकास में सहायक है। पात्रों की मुख्य विशेषता उनका उदात्त चरित्र है।

(3) संवाद-योजना – नाटक के संवाद सुन्दर, सरल, संक्षिप्त, सरस तथा पात्रों के अनुकूल हैं। ये संवाद मनोभावों को प्रकट करने में भी सक्षम और प्रभावशाली हैं। संवादों में कहीं माधुर्य है तो कहीं ओज। उदाहरणार्थ–“मैं अकबर से सन्धि कर लें ?उस अकबर से सन्धि कर लें, जिसने भारतमाता को दासता की जंजीरों में जकड़ रखा है।” नाटक में स्वगत कथनों की भरमार होने से पाठकों में अरुचि पैदा होने की अधिक सम्भावना है। कहीं-कहीं रंगमंच पर प्रस्तुत घटनाओं को संवादों द्वारा पुनः व्यक्त करके समय का दुरुपयोग भी किया गया है।

(4) देश-काल एवं वातावरण – नाटक में अकबर के समय के वातावरण को चित्रित किया गया है। इस दृष्टि से नाटककार सफल हैं। ऐतिहासिक वातावरण सफलता के साथ प्रस्तुत किया गया है। युद्ध के दृश्य सजीव हैं। नाटक में तत्कालीन राजस्थान का परिवेश मुखरित हो उठा है।

(5) भाषा-शैली – इस नाटक की भाषा साहित्यिक खड़ी बोली है। संस्कृत के शब्दों का बाहुल्य है। माधुर्य के साथ ओज गुण की भी प्रधानता है। अलंकारों, मुहावरों तथा लोकोक्तियों का प्रयोग सुन्दर रूप में किया गया है। भाषा-शैली की दृष्टि से राजमुकुट एक सफल रचना है। उदाहरणार्थ-”वह देश में छाई हुई दासता की निशा पर सचमुच सूर्य बनकर हँसेगा, आलोक-पुंज बनकर ज्योतित होगा। उसका प्रताप अजेय है। उसका पौरुष गेय है।”

(6) उद्देश्य – नाटक की रचना में नाटककार का उद्देश्य देशप्रेम तथा स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए त्याग एवं बलिदान का सन्देश देना है। प्रताप अपनी मृत्यु के समय कहते हैं-”बन्धुओ ! वीरो ! प्रतिज्ञा करो, मुझे वचन दो कि तुम मेरे देश की ……….. अपने देश की स्वतन्त्रता के प्रहरी बनोगे।”

(7) अभिनेयता – अभिनेयता की दृष्टि से नाटक रंगमंच के अनुरूप प्रतीत नहीं होता। दृश्यों की संख्या बहुत अधिक है। युद्ध इत्यादि के दृश्यों का मंचन करना तथा हाथी-घोड़ों का मंच पर प्रस्तुतीकरण भी कठिन है। भाषा की दृष्टि से भी नाटक अभिनेयता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। हाँ, पठनीयता की दृष्टि से ‘राजमुकुट एक सफल रचना है।

प्रश्न 3:
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर महाराणा प्रताप का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ के प्रमुख पात्र (नायक) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के जिस पात्र ने आपको सर्वाधिक प्रभावित किया है, उसके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के किसी एक पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर प्रमुख पात्र के चरित्र पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

महाराणा प्रताप का चरित्र-चित्रण

श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक के नायक महाराणा प्रताप हैं। नाटक में उनके चरित्र का मूल्यांकन . करने वाली; राज्याभिषेक से लेकर मृत्यु तक की घटनाएँ हैं। राणा प्रताप की चारित्रिक विशेषताओं को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है

(1) आदर्श भारतीय नायक – भारतीय नाट्यशास्त्र में आदर्श नायक के जिन गुणों के विषय में बताया गया है, महाराणा प्रताप के चरित्र में वे सभी गुण विद्यमान हैं। उनका चरित्र ‘धीरोदात्त नायक’ का आदर्श चरित्र है। वे उच्च कुल में उत्पन्न हुए वीर, साहसी तथा संयमी व्यक्ति हैं।

(2) प्रजा की आशाओं के आधार – मेवाड़ की प्रजा महाराणा प्रताप को इस आशा के साथ मुकुट पहनाती है। कि वे उसकी तथा देश की रक्षा करेंगे। प्रजा की आशा के अनुरूप प्रताप उसके सच्चे हितैषी सिद्ध होते हैं। प्रजा प्रताप के मुकुट धारण करने से पूर्व ही यह आशा रखती है कि “वह देश में छायी हुई दासता की निशा पर सचमुच सूर्य बनकर हँसेगा; आलोक-पुंज बनकर ज्योतित होगा। उसका प्रताप अजेय है; उसका पौरुष गेय है। वह महीमाता का पुण्य है। भारतमाता की साधना का फल है; अमरफल है।”

(3) मातृभूमि के अनन्य भक्त – प्रताप मातृभूमि के अनन्य भक्त हैं। वे देश की दासता और प्रजा की दुर्दशा से व्यथित हैं-“सारा देश विदेशियों के अत्याचारों से विकम्पित हो चुका है। देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक असन्तोष राग अलाप रहा है। …………. चित्तौड़ का युद्ध भारत का युद्ध होगा।”

(4) दृढ़प्रतिज्ञ तथा कर्तव्यनिष्ठ – महाराणा दृढ़ निश्चयी तथा अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान् हैं। राजमुकुट धारण करने के अवसर पर प्रताप के शब्द हैं – “मेरा जयनाद ! मुझे महाराणा बनाकर मेरा जयनाद न बोलो साथियो! जय बोलो भारत की, मेवाड़ की। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि प्राणों में साँस रहते हुए प्रजा-प्रभु की दी हुई इस भेंट को मलिन न करूंगा। जब तक सारे भारत को दासता से मुक्त न कर लूंगा, सुख की नींद न सोऊँगा।”

(5) स्वतन्त्रता हेतु दृढ़ संकल्प – प्रताप जीवनपर्यन्त स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करते रहे। वे अकबर से हल्दीघाटी में युद्ध करते हैं। सब कुछ खोकर, भी वे अकबर के सामने झुकते नहीं। बच्चे भूखों मर जाते हैं, फिर भी यह लौह-पुरुष अडिग रहता है। मृत्यु के समय भी राणा को एक ही लगन है, एक ही इच्छा है, एक ही अभिलाषा है, वह है देश की स्वतन्त्रता-“बन्धुओ ! वीरो ! प्रतिज्ञा करो, मुझे वचन दो कि तुम मेरे देश की ……………….. अपने देश की स्वतन्त्रता के प्रहरी बनोगे।”

(6) निरभिमानी एवं सत्तालिप्सा से दूर – राणा देशभक्त हैं, स्वतन्त्रता के दीवाने हैं, परन्तु वे राजा बनना नहीं चाहते। राणा प्रताप महान् देशभक्त एवं मेवाड़ के महाराणा हैं, किन्तु उन्हें अभिमान बिल्कुल नहीं है। महान् होकर भी वे स्वयं को महान् नहीं समझते। वे कहते हैं—“मेवाड़ का राणा मैं ! नहीं, नहीं कृष्णजी ! आप भूल रहे हैं। मेवाड़ के महाराणा का पद महान् है, बहुत महान् है।”

(7) भारतीय संस्कृति, धर्म तथा मान-मर्यादा के रक्षक – महाराणा भारतीय संस्कृति के पोषक हैं। वे धर्म की रक्षा करना अपना प्राथमिक कर्तव्य समझते हैं। संन्यासी के रूप में अकबर जब उनके पास पहुँचता है तो वे उसका आदर करते हैं, परन्तु खाने के लिए कुछ भी दे पाने में असमर्थ होने के कारण उन्हें कष्ट होता है। वे कहते हैं-”आज कई दिनों से बच्चे घास की रोटियों पर निर्वाह कर रहे थे तो क्या संन्यासी अतिथि को घास की रोटिन खिलाऊँ।
धर्म के प्रति भी राणा के मन में निष्ठा है। पुरोहित का बलिदान देखकर राणा कहते हैं “देशभक्त पुरोहित तुम धन्य हो ! तुमने अपने अनुरूप ही अपना बलिदान दिया है। ज्ञान और चेतना से दूर हम अधम को तुमने प्रकाश दिखाया है …………..।”

(8) पराक्रमी योद्धा – राणा वीर हैं। हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध उनके शौर्य का साक्षी है। प्रताप अपने सैनिकों से कहते हैं-“चलो युद्ध का राग गाते हुए हम सब हल्दीघाटी की युद्धभूमि में चलें और रक्तदान से चण्डी माता को प्रसन्न करके उनसे विजय का शुभ आशीर्वाद लें।”
इस प्रकार राणा का चरित्र अनेक अमूल्य गुणों की खान है। वे आदर्श देशभक्त हैं और त्यागी, साहसी, उदार, वीर, दृढ़निश्चयी तथा उदात्त पुरुष हैं। वे प्रजा को आत्मीय मित्र मानते हैं। मुगल सम्राट अकबर भी उनकी प्रशंसा करते हैं – “महाराणा प्रताप भारत के अनमोल रत्न हैं।”

प्रश्न 4:
‘राजमुकुट नाटक के आधार पर शक्तिसिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘राजमुकुट के आधार पर शक्तिसिंह की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘राजमुकुट के आधार पर समीक्षा कीजिए कि “शक्तिसिंह देशभक्त और त्याग की प्रतिमा है। उसके पश्चात्ताप और त्याग ने उसके चरित्र को गरिमामय बना दिया है।”
उत्तर:

शक्तिसिंह का चरित्र-चित्रण

शक्तिसिंह; श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक के नायक मेवाड़ के महाराणा प्रताप का छोटा भाई है। महाराणा के इस सुयोग्य अनुज के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) परम देशभक्त – शक्तिसिंह देशप्रेम और त्याग की प्रतिमा है। उसके हृदय में अपने भाई के समान देश की दासता, जनता की व्यथा और शासन के अत्याचारों के विरुद्ध आक्रोश है। वह मेवाड़ के घर-घर में जीवन और जागृति का मन्त्र फेंकना चाहता है। वह अपने देश के मंगल के लिए सब-कुछ करने को तत्पर है – ”माता-मही! तू मेरी भुजाओं में शक्ति दे कि मैं जगमल के सिंहासन को उलट सकें।’ …………….मेवाड़ में सुख-शान्ति स्थापित कर सकें।”

(2) राज्य-वैभव के प्रति अनासक्त – शक्तिसिंह का चरित्र त्याग भाव से परिपूर्ण है। उसे राज्य-वैभव में कोई आसक्ति नहीं है। अहेरिया उत्सव पर वन-शूकर के वध पर महाराणा से तकरार हो जाने पर दोनों में तलवारें खिंच जाती हैं, जिसमें मध्यस्थता करते हुए पुरोहित की हत्या हो जाती है। इस अपराध में उसे राज्य से निर्वासित कर दिया जाता है, जिसे वह सहर्ष स्वीकार कर लेता है।

(3) निर्भीक एवं स्पष्ट वक्ता – शक्तिसिंह में निर्भीकता और स्पष्ट बात कहने का साहस द्रष्टव्य है। वह अकबर की सेना में सम्मिलित तो हो जाता है, किन्तु अकबर द्वारा मेवाड़ का सर्वनाश करने का संकल्प लेने पर वह उसकी सहायता करने को तैयार नहीं होता।

(4) भावुक और प्रकृति-प्रेमी – शक्तिसिंह युवक है। प्राकृतिक सौन्दर्य उसे भाव-विमुग्ध कर देता है। वह उपवन में बैठकर गीत गुनगुनाता है। चन्दावत के पूछने पर वह कहता है “वन मनुष्यों से कहीं अधिक अच्छे होते हैं।”

(5) भ्रातृ-प्रेमी – शक्तिसिंह के हृदय में अपने भाई महाराणा के प्रति अनन्य प्रेम है। राणा प्रताप और शक्तिसिंह का युद्धभूमि में आमना-सामना होता है। युद्ध में ही राणा के घोड़े चेतक की मृत्यु हो जाती है। राणा उसके शव के निकट चिन्तित भाव से बैठे हुए थे, तभी दो मुगल सैनिकों को महाराणा पर प्रहार करते हुए देखकर शक्तिसिंह एक ही वार में दोनों को मौत के घाट उतार देता है और महाराणा से क्षमा-याचना करता है-”वह आया है.मेवाड़ के महाराणा से क्षमा-याचना करने, उनकी स्नेहमयी गोद में बैठकर पश्चात्ताप करने और उनकी वीरता की पवित्र गंगा में अपने कलुषित-कल्मषों को धोने।”

(6) साम्प्रदायिक सद्भावना तथा राष्ट्रीय एकता का पोषक – शक्तिसिंह यह सोचता है कि अकबर और प्रताप मिलकर ऐसे भारत की रचना कर सकते हैं, जिसमें धर्म और सम्प्रदाय का वैमनस्य नहीं होगा। ऐसा भारत ही अखण्ड राष्ट्र हो सकता है। वह हिन्दू और मुस्लिम सम्प्रदायों को मिल-जुलकर रहने का सन्देश देता है-“तुम उन्हें विदेशी और विधर्मी समझ रहे हो, क्या वे फिर काबुल, कंधार और ईरान लौट जाएँगे ? …………. वे अब इसी देश में रहेंगे और उसी प्रकार उसी कण्ठ से भारतमाता की जय बोलेंगे।”

(7) अन्तर्द्वन्द्व से घिरा – शक्तिसिंह उज्ज्वल चरित्र का व्यक्ति है। वह प्रतिशोध की भावना और देशभक्ति के द्वन्द्व से घिर जाता है, किन्तु अन्त में देशभक्ति की भावना की विजय होती है। तब वह सोचता है-”प्रतिहिंसा की भावना से उत्तेजित होकर दानव बन जाना ठीक नहीं।” इन सहज दुर्बलताओं ने उसके चरित्र को यथार्थ । का स्पर्श देकर निखार दिया है।

प्रश्न 5:
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर अकबर को चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

अकबर का चरित्र-चित्रण

श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक में मुगल सम्राट अकबर एक प्रमुख पात्र है। वह महाराणा प्रताप का प्रतिद्वन्द्वी है। उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं

(1) व्यावहारिक और अवसरवादी व्यक्ति – अकबर व्यावहारिक और अवसरवादी व्यक्ति है। अपने इसी गुण के कारण वह शक्तिसिंह के हृदय में जगी प्रतिशोध की भावना को तीव्र कर देता है-”छलिया संसार को छल और प्रपंचों से परास्त करने का पाठ पढ़ो। ……….. संसार में भावुकता से काम नहीं चल सकता शक्ति !”

(2) महत्त्वाकांक्षी – सम्राट् अकबर बहुत महत्त्वाकांक्षी है। क्ह मन-ही-मन मेवाड़-विजय का संकल्प करता है-“मैं अपने जीवन के उस अभाव को पूरा काँगा, मेवाड़ के गौरवमय भाल को झुकाकर अपने साम्राज्य की प्रभुता बढ़ाऊँगा।”

(3) मानव-स्वभाव का पारखी – अकबर बहुत बुद्धिमान है। वह शक्तिसिंह, मानसिंह और राणा प्रताप के चरित्र का सही मूल्यांकन करता है – “एक प्रताप है, जो मातृभूमि के लिए प्राण हथेली पर लिये फिरता है। और एक तुम हो, जो मातृभूमि के सर्वनाश के लिए खाइयाँ खोदते फिरते हो।”

(4) सदगुणों का प्रशंसक – अकबर व्यक्ति के सद्गुणों की प्रशंसा करने से नहीं चूकता, चाहे वे सद्गुण उसके शत्रु में ही क्यों न हों। यह विशेषता उसे महानता प्रदान करती है। वह हृदय से राणा की वीरता और स्वाभिमान की प्रशंसा करता है- “……… धन्य है मेवाड़ ! और धन्य हैं मेवाड़ की गोद में पलने वाले महाराणा प्रताप ! प्रताप मनुष्य रूप में देवता हैं, मानवता की अखण्ड ज्योति हैं।”

(5) साम्प्रदायिक सदभावना का प्रतीक – अकबर हिन्दू-मुसलमानों को एकता के सूत्र में बाँधना चाहता है। उसके द्वारा स्थापित ‘दीन-ए-इलाही’ मत इसी साम्प्रदायिक सद्भावना का प्रतीक है। वह मानवीय गुणों का आदर करता है। वह महाराणा की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाते हुए कहता है—“हमारा और आपका मिलन ! यह दो व्यक्तियों का मिलन नहीं महाराणा ! दो धर्म-प्रवाहों का मिलन है, जिससे इस देश की संस्कृति सुदृढ़ तथा पुष्ट होगी।”

(6) कूटनीतिज्ञ – अकबर कुशल कूटनीतिज्ञ है। वह प्रत्येक निर्णय कूटनीति से लेता है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है-”प्रताप का भाई शक्तिसिंह स्वयं जादू के जाल में फंसकर माया की तरंगों में डुबकियाँ लगा रहा है। उसी को मेवाड़ के विध्वंस का साधन बनाऊँगा।”

प्रश्न 6:
राजमुकुट’ नाटक के नारी-पात्रों पर विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘राजमुकुट नाटक में देशप्रेम एवं त्याग की प्रतिमूर्ति प्रमिला पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
प्रमिला के माध्यम से मेवाड़ की नारी का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

‘राजमुकुट’ के नारी-पात्र

श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट में नारी-पात्रों का समावेश नगण्य है। इसमें प्रमिला, प्रजावती, गुणवती और चम्पा प्रमुख नारी पात्र हैं।

प्रमिला नाटक की एक साधारण स्त्री-पात्र है। वह जगमल के चापलूस सरदार हाथीसिंह की पत्नी है। वह देशप्रेम और त्याग की प्रतिमूर्ति है। वह अपने पति को देश के कल्याण के लिए बलिदान हो जाने का सन्देश देती है। नाटक के तृतीय दृश्य में इसका राष्ट्रप्रेम अभिव्यक्त होता है। वह अपने पति से कहती है – “देश पर जब विपत्तियों के पहाड़ टूट पड़े हों, तब देश के नर-नारियों को अधिक परित्याग करना ही चाहिए। यदि देश का कल्याण करने में माँग का सिन्दूर मिट गया, तो चिन्ता की क्या बात।” जब उसका पति कहता है-”खाँडे का नाम सुनकर ही मेरे प्राणों में भूचाल आने लगता है”-तो प्रमिला उस पर व्यंग्य करती हुई कहती है तो लहँगा पहनकर हाथों में चूड़ियाँ डाल लो। घूघट निकालकर घर के कोने में जाकर बैठे रहो।”

प्रजावती निरपराध, पवित्र, जनहित में लगी रहने वाली, स्वाभिमानिनी, देशप्रेमी व प्रजावत्सल नारी है। नाटककार ‘ने उसे मंच पर उपस्थित नहीं किया है, वरन् अन्य पात्रों के माध्यम से ही उसके चरित्र की विशेषताओं को उजागर किया है। जगमल का एक सैनिक उसके चरित्र पर प्रकाश डालता हुआ कहता है-“वह विक्षिप्ता है महाराज! दिन भर झाड़ियों और कन्दराओं में छिपी रहती है। जब रात होती है तब बाहर निकलकर अपने जीवनगान से सम्पूर्ण उदयपुर को प्रतिध्वनित कर देती है। वह रात भर अपने गान को मेदिनी पर, पाषाणों पर, दीवारों पर लिखती फिरती है। उसका जीवन-गान उदयपुर में धर्म-गीत बन रहा है।” राणा जगमल अपने क्रूर चाटुकारों के कहने से उसका वध करवा देता है। प्रजावती के प्रति अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए प्रजा का नायक चन्दावत कहता है-”वह कृषकों और श्रमिकों के जीवन का प्रकाश थी; उनके प्राणों की आशा थी; उनकी धमनियों का रक्त थी।”
गुणवती मेवाड़ के राणा प्रताप की पत्नी हैं, जो उनके साथ वनवास के कष्टों को सहर्ष सहन करती हैं तथा अपने पति को हर संकट में साथ देती हैं।
चम्पा महाराणा की पुत्री है। वह नाटक के अन्त में मंच पर उपस्थित होती है। उसे अपने पिता के साथ वन में भटकते और कष्ट सहन करते हुए दिखाया गया है। इस प्रकार इस नाटक में नारी-पात्रों की भूमिका बहुत संक्षिप्त है, किन्तु भावनात्मक स्तर पर वे पाठकों को प्रभावित करने में सक्षम हैं।

प्रश्न 7:
मानसिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
मानसिंह; श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक का एक प्रमुख पात्र तथा अकबर का सेनापति है। वह राणा प्रताप से बहुत प्रभावित था। एक बार वह राणा प्रताप से मिलने आया। राणा उसे विधर्मी और पतित समझते थे; क्योंकि मानसिंह की बुआ मुगल सम्राट् अकबर की विवाहिता पत्नी थी, जिसके परिणामस्वरूप राणा ने उससे स्वयं भेंट न करके उसके स्वागतार्थ अपने पुत्र अमरसिंह को नियुक्त किया। मानसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और इस अपमान का बदला चुकाने की बात कहकर वहाँ से लौट गया। वह दिल्ली के सम्राट् अकबर से जाकर मिला और उसके निर्देश और अपने नेतृत्व में एक विशाल मुगल सेना लेकर हल्दीघाटी के मैदान में आ पहुँचा। मुगल और राजपूत दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ।
इस प्रकार मानसिंह एक असंयत मनोवृत्ति का व्यक्ति था, जिसमें सहनशीलता का अभाव था। उसने बदले की भावना से प्रेरित होकर, मुगल सम्राट अकबर की सहायता से राणा पर आक्रमण करके विधर्मी और विश्वासघाती होने को परिचय दिया।

प्रश्न 8:
“राष्ट्रनायक ‘चन्दावत’ राजमुकुट नाटक का एक प्रभावशाली चरित्र है।” इस कथन के आलोक में ‘चन्दावत’ का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
नाटककार श्री व्यथित हृदय ने अपने इस नाटक में ‘चन्दावत’ नामक पात्र का भी वर्णन किया है जो राष्ट्रनायक है और राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्व को भलीभाँति निभाता है, उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) कर्तव्य के प्रति जागरूक – इस नाटक में चन्दावत को राष्ट्रनायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह मर्यादाओं के पालन में विश्वास करने वाला व्यक्ति है। जब राणा जगमल अपने राज-कर्त्तव्य को भूलकर सुरासुन्दरी में डूब जाते हैं, तब इस कारण से राष्ट्रनायक चन्दावत बड़े दुःखी होते हैं। इसलिए वे जगमल को फटकार लगाते हैं और कहते हैं कि अब तुम राजमुकुट की मर्यादाओं का पालन करने में अक्षम हो गये हो; अतः राजमुकुट किसी उचित उत्तराधिकारी को सौंप दो।

(2) महान् त्यागी एवं बलिदानी – चन्दावत महात्यागी एवं बलिदानी व्यक्ति हैं। वे युद्ध के मैदान में देशभक्त राणा के प्राण बचाने के लिए उनको राजमुकुट स्वयं धारण कर लेते हैं और देश पर अपने प्राण बलिदान कर देते हैं।

(3) सच्चा देशभक्त – चन्दावत एक सच्चा देशभक्त है। देशभक्ति की भावना उसमें कूट-कूट कर भरी हुई है। वह देश के प्रति अपने कर्तव्य को भली प्रकार जानता है। युद्ध में राणा के प्राण बचाने के लिए उसका मुकुट स्वयं धारण करना देशभक्ति का एक अप्रतिम उदाहरण उसने प्रस्तुत किया है।

(4) दूरदर्शी – चन्दावत दूर की सोचने वाला व्यक्ति है। जब जगमल सुरासुन्दरी का दास होकर रह जाता है। तथा जनता उसका विरोध करती है, तो वह जगमल से उचित उत्तराधिकारी को राजमुकुट सौंपने को कह देते हैं। और स्वयं राणा को राजमुकुट पहनाते हैं जिससे जनता में खुशी की लहर दौड़ जाती है।
उपर्युक्त बिन्दुओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि चन्दावत एक त्यागी, बलिदानी, दूरदर्शी और एक सच्चा देशभक्त था।

प्रश्न 9:
‘राजमुकुट’ नाटक के शीर्षक का औचित्य (सार्थकता) बताइए।
उत्तर:

शीर्षक का औचित्य

नाटक्रकार श्री व्यथित हृदय ने अपने इस नाटक का नामकरण ‘राजमुकुट’ उचित ही किया है; क्योंकि सम्पूर्ण नाटक की कथा के मूल में राजमुकुट की मान-प्रतिष्ठा ही निहित है। नाटक का आरम्भ ही राजमुकुट की मर्यादाओं की प्रतिष्ठापना से होता है। राणा जगमल अपने राज-कर्त्तव्य को भूलकर सुरासुन्दरी में डूब गये हैं, जिससे राष्ट्र-नायक कृष्णजी चन्दावत बड़े व्यथित हैं। इसीलिए वे जगमल को फटकार लगाते हैं कि अब तुम राजमुकुट की मर्यादाओं का पालन करने में अक्षम हो गये हो; अतः किसी उचित उत्तराधिकारी को राजमुकुट सौंप दो। राजमुकुट के योग्य उत्तराधिकारी को ढूंढने का दायित्व चन्दावत पर ही आता है और वे राजमुकुट को महाराणा प्रताप के सिर पर रख देते हैं। राणा प्रताप देश की स्वतन्त्रता को राजमुकुट की मान-प्रतिष्ठा से जोड़ देते हैं और भरी सभा के सम्मुख स्वतन्त्रता-प्राप्ति का संकल्प लेते हैं। वे अपने इस संकल्प से मरते दम तक नहीं डिगते। आगे चलकर कृष्णजी चन्दावत देशभक्त राणा के प्राण बचाने के लिए, उनका राजमुकुट स्वयं धारण कर लेते हैं और देश के लिए मर-मिटते हैं।
इस प्रकार हम नाटक के शीर्षक राजमुकुट’ को कथानुसार एकदम सटीक और राष्ट्र-भावनाओं के अनुरूप पाते हैं।

प्रश्न 10:
” ‘राजमुकुट’ नाटक में इतिहास एवं कल्पना का उचित समावेश है।” स्पष्ट कीजिए।
या
” ‘राजमुकुट’ नाटक के कथानक का आधार विशुद्ध ऐतिहासिक है, किन्तु यत्र-तत्र’ काल्पनिक तत्त्वों का भी समावेश किया गया है।” इस कथन की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
या
‘राजमुकुट की ऐतिहासिकता की समीक्षा कीजिए। या ऐतिहासिक दृष्टि से राजमुकुट’ नाटक का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:

‘राजमुकुट’ के कथानक की ऐतिहासिकता।

श्री व्यथित हृदय द्वारा रचित नाटक ‘राजमुकुट’ का कथानक विशुद्ध ऐतिहासिक है, किन्तु इसमें यत्र-तत्र काल्पनिक तत्त्वों का भी समावेश किया गया है। नाटक में काल्पनिक तत्त्वों का समावेश ऐतिहासिक तत्त्वों के आधार पर; आधुनिक समाज में व्याप्त समस्याओं का बोध कराने के लिए किया गया है। कथानक में देशप्रेम, राष्ट्रीय एकता, भावात्मक समन्वय तथा अन्तर्राष्ट्रीय चेतना जैसे मानवीय मूल्यों का सुन्दर समायोजन केरके नाटककार ने, नाटक के ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित होने के पश्चात् भी इसे प्रत्येक देश-काल के लिए : उपयोगी बना दिया है। कथानक में प्राचीन भारतीय मूल्यों एवं संस्कृति की श्रेष्ठता को भी प्रदर्शित किया गया है; अत: प्रस्तुत नाटक का कथानक विशुद्ध ऐतिहासिक होने पर भी उद्देश्यपरकता और सशक्तता की कसौटी पर खरा उतरता है।

प्रश्न 11:
‘राजमुकुट’ नाटक के मर्मस्पर्शी स्थलों पर प्रकाश डालिए।
या
“मानव-हित से ही देश-हित सम्भव है।” “राजमुकुट’ नाटक के आधार पर इस कथन का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक यद्यपि वीर रस से परिपूर्ण नाट्यकृति है, तथापि इसमें मर्मस्पर्शी स्थलों का अभाव नहीं है। नाटक का तृतीय अंक इस दृष्टि से बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है। कृष्णजी चन्दावत का राणा प्रताप को बचाने के लिए उनका मुकुट धारण करके आत्मबलिदान करना, राणा का पीछा करते मुगल सैनिकों पर भ्रातृ-प्रेम से व्याकुल होकर शक्तिसिंह का टूट पड़ना, राणा और शक्तिसिंह का आपसी वैमनस्य भूलकर एक-दूसरे के गले लगना तथा चेतक की मृत्यु इस नाटक के सर्वाधिक मर्मस्पर्शी स्थल हैं। इनके अतिरिक्त जंगल में भटकते राणा प्रताप का संन्यासी अतिथि को सत्कार न करने पर व्यथित होना, चम्पा का घास की रोटी लिये आना और वन-बिलाव को रोटी छीनकर भाग जाना, तत्पश्चात् पत्थर से टकराकर चम्पा की मृत्यु होना, रोगग्रस्त राणा प्रताप का शक्तिसिंह तथा अपने साथियों से स्वतन्त्रता-प्राप्ति का वचन लेना एवं राणा प्रताप का स्वर्ग सिधार जाना अन्य महत्त्वपूर्ण मर्मस्पर्शी स्थल हैं, जो कि पाठक और दर्शक के मन में करुणा के साथ-साथ वीर रस का संचार करके देशप्रेम की भावना जगाने में सक्षम हैं।

प्रश्न 12:
‘राजमुकुट’ नाटक के माध्यम से नाटककार क्या सन्देश देना चाहता है?
या
”राजमुकुट’ नाटक का उददेश्य स्पष्ट कीजिए।
या
राजमुकुट में निहित राष्ट्रीय भावना पर प्रकाश डालिए।
या
‘राजमुकुट’ में व्यक्त देशप्रेम और स्वाधीनता की भावना पर प्रकाश डालिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक देश-कल्याण की भावना को जगाने वाली रचना है।” स्पष्ट कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक में अन्तर्निहित उद्देश्य को स्पष्ट कीजिए।
या
‘राजमुकुट नाटक देश-प्रेम और त्याग की भावना का सन्देश देता है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
‘राजमुकुट’ नाटक में नाटककार श्री व्यथित हृदय का उद्देश्य निम्नलिखित सन्देश देना रहा है

(1) जनता की आवाज सर्वोपरि – इस नाटक के माध्यम से लेखक यह सन्देश देता है कि जनता के दमन और शोषण द्वारा कोई भी राजा अपनी प्रजा का प्रिय नहीं हो सकता। यदि वह ऐसा करता है तो एक समय ऐसा आएगा, जब क्रान्ति का बिगुल बज उठेगा। ‘राजमुकुट’ नाटक में चन्दावत एक ऐसा ही पात्र है, जो स्पष्ट कहता है कि “राजा प्रजा का केवल प्रतिनिधि मात्र होता है।” यही आज के भारत की स्वर है।

(2) साम्प्रदायिक सद्भाव – लेखक ने हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य की भावना का आयोजन कर साम्प्रदायिकता पर कुठाराघात किया है। प्रताप और अकबर का मिलन; समन्वय की भावना को प्रदर्शित करता है।

(3) स्वाधीनता, देश-प्रेम और एकता का सन्देश – नाटक ‘राजमुकुट के द्वारा लेखक ने राष्ट्रीय एकता का सन्देश दिया है। प्रताप अन्तिम समय तक अपने राष्ट्र की एकता के लिए संघर्ष करते रहे। वे मरते समय भी अपने वीर साथियों को संघर्ष के लिए प्रोत्साहित करते हैं। नाटक में स्थान-स्थान पर प्रेरणादायक सन्देश हैं; यथा–“मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि ………… जब तक सारे भारत को दासता के बन्धनों से मुक्त न करा लूंगा, सुख की नींद नहीं सोऊँगा।”
लेखक की कामना है कि देश के नवयुवक स्वार्थ की संकुचित भावना से ऊपर उठे, राष्ट्रप्रेम की भावना से ओत-प्रोत हो जाएँ तथा अपनी मातृभूमि के लिए त्याग तथा बलिदान कर सकें। भारतीय संस्कृति की रक्षा, भावात्मक एकता और मानवीय गुणों की स्थापना की ओर भी लेखक ने विशेष ध्यान दिया है। प्रस्तुत नाटक के माध्यम से अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में नाटककार पूर्ण रूप से सफल रहा है।

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UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 5 Human Capital Formation in India

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 5 Human Capital Formation in India (भारत में मानव पूँजी का निर्माण) are part of UP Board Solutions for Class 11 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 5 Human Capital Formation in India (भारत में मानव पूँजी का निर्माण).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 5
Chapter Name Human Capital Formation in India (भारत में मानव पूँजी का निर्माण)
Number of Questions Solved 58
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 5 Human Capital Formation in India (भारत में मानव पूँजी का निर्माण)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किसी देश में मानवीय पूँजी के दो प्रमुख स्रोत क्या होते हैं?
उत्तर
एक देश में मानव पूँजी निर्माण के दो प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं
1. शिक्षा में निवेश,
2. कार्य के दौरान प्रशिक्षण।

प्रश्न 2.
किसी देश की शैक्षिक उपलब्धियों के दो सूचक क्या होंगे?
उत्तर
सामान्यतः शिक्षा से अभिप्राय लोगों के पढ़ने-लिखने तथा समझने की योग्यता से है। यह उच्च आय अर्जित करने का साधन माना जाता है। शिक्षा के दो सूचक इस प्रकार हैं
1. इससे लोगों के मानसिक स्तर का विकास होता है।
2. विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का विकास होता है।

प्रश्न 3.
भारत में शैक्षिक उपलब्धियों में क्षेत्रीय विषमताएँ क्यों दिखाई दे रही हैं?
उत्तर
भारत जैसे विकासशील देश में जहाँ जनसंख्या का एक विशाल वर्ग निर्धनता रेखा से नीचे जीवन बिता रहा है, वे लोग बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं पर पर्याप्त व्यय नहीं कर सकते। अधिकांश जनता, उच्च शिक्षा का भार वहन नहीं कर पाती। जब बुनियादी शिक्षा को नागरिकों को अधिकार मान लिया जाता है, तो यह अनिवार्य हो जाता है कि सभी नागरिकों को सरकार ये सुविधाएँ नि:शुल्क प्रदान करे। आर्थिक विषमर्ताओं के साथ-साथ शैक्षिक उपलब्धियों के क्षेत्र में भी व्यापक असमानताएँ देखने को मिलती हैं; उदाहरण के लिए साक्षरता दर जहाँ हिमाचल प्रदेश में 83.78%, मिजोरम में 91.58%, केरल में 93.91% और दिल्ली में 86.34% है, वहीं आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना में 67.66%, झारखण्ड में 67.63%, जम्मू-कश्मीर में 68.74% और तमिलनाडु में 80.33% है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी व्यापक विषमताएँ विद्यमान हैं।

प्रश्न 4.
मानव पूँजी निर्माण और मानव विकास के भेद को स्पष्ट करें।
उत्तर
मानव पूँजी निर्माण एवं मानव विकास में भेद इस प्रकार है-मानव पूँजी की अवधारणा शिक्षा और स्वास्थ्य को श्रम की उत्पादकता बढ़ाने का माध्यम मानती है। मानव पूंजी का विचार मानव को किसी साध्य की प्राप्ति का साधन मानता है। यह साध्य उत्पादन में वृद्धि का है। इस मतानुसार शिक्षा और स्वास्थ्य पर किया गया निवेश अनुत्पादक है, अगर उसमें वस्तुओं और सेवाओं के निर्गत में वृद्धि न हो। दूसरी ओर मानव विकास के परिप्रेक्ष्य में मानव स्वयं साध्य भी है। भले ही शिक्षा, स्वास्थ्य आदि पर निवेश से श्रम की उच्च उत्पादकता में सुधार न हो किंतु इनके माध्यम से मानव कल्याण का संवर्द्धन तो होना ही चाहिए।

प्रश्न 5.
मानव पूँजी की तुलना में मानव विकास किस प्रकार से अधिक व्यापक है?
उत्तर
मानव पूंजी का विचार मानव को किसी साध्य की प्राप्ति का साधन मानता है। यह साध्य उत्पादकता में वृद्धि का है। इस मतानुसार शिक्षा और निवेश पर किया गया निवेश अनुत्पादक है, अगर उसमें वस्तुओं और सेवाओं के निर्गत में वृद्धि न हो। मानव विकास का संबंध इस बात से है कि स्वास्थ्य एवं शिक्षा मानव भलाई का अंग है। मानव विकास वह अवसर प्रदान करता है जिससे वे उपयोगिता प्राप्त करने में चयन कर सकें। मानव विकास के परिप्रेक्ष्य में मानव स्वयं साध्य भी है। भले ही शिक्षा, स्वास्थ्य आदि पर निवेश से श्रम की उच्च उत्पादकता में सुधार न हो किंतु इनके माध्यम से मानव कल्याण का संवर्द्धन तो होना ही चाहिए। प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य उसके लिए आवश्यक हैं। संक्षेप में मानव पूंजी की अवधारणा का संबंध मानव की उत्पादकता से है जबकि मानव विकास की अवधारणा का संबंध मानव कल्याण से है। दोनों अवधारणाओं में शिक्षा एवं स्वास्थ्य प्रमुख स्रोत हैं। लेकिन निवेश का लक्ष्य अलग-अलग है। मानव विकास से मानवीय उत्पादकता में स्वतः वृद्धि हो । जाएगी। अत: मानव विकास, मानन पूँजी की तुलना में अधिक व्यापक है।

प्रश्न 6.
मानव पूंजी के निर्माण में किन कारकों का योगदान रहता है?
उत्तर
मानव पूँजी के निर्माण में निम्नलिखित कारकों का योगदान रहता है

  1. शिक्षा,
  2. स्वास्थ्य,
  3. प्रशिक्षण,
  4. संचार तथा
  5. प्रवास।

प्रश्न 7.
शिक्षा एवं स्वास्थ्य को नियंत्रित करने वाले दो-दो सरकारी संगठनों के नाम बताइए।
उत्तर
शिक्षा
1. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद्।
2. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग।
स्वास्थ्य
1. स्वास्थ्य मंत्रालय।
2. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद्।

प्रश्न 8.
शिक्षा को किसी राष्ट्र के विकास में एक महत्त्वपूर्ण आगत माना जाता है, क्यों?
उत्तर
राष्ट्र-निर्माण के लिए शिक्षा का महत्त्वपूर्ण आगत है, क्योंकि

  1. शिक्षा से अच्छे नागरिक उभरकर आते हैं।
  2.  शिक्षा व्यक्ति के साथ-साथ पूरे समाज को लाभान्वित करती है।
  3. शिक्षा से मामव की क्षमता का संवर्द्धन होता है।
  4. शिक्षा से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का विकास होता है।
  5. शिक्षा से लोगों के मानसिक स्तर का विकास होता है।
  6. देश के सभी क्षेत्रों के प्राकृतिक तथा मानवीय साधनों के प्रयोग को शिक्षा सुविधाजनक बनाती है।
  7. शिक्षित मनुष्य आर्थिक-सामाजिक विकास में जयादा योगदान देता है।
  8. शिक्षा अनुसंधान दृष्टिकोण को विकसित करती है।
  9. शिक्षा से देश के निवासियों के सांस्कृतिक स्तर को प्रोत्साहन मिलता है।

प्रश्न 9.
पूँजी निर्माण के निम्नलिखित स्रोतों पर चर्चा कीजिए-
(क) स्वास्थ्य आधारिक संरचना,
(ख) प्रवसन पर व्यय।
उत्तर

(क) स्वास्थ्य आधारिक संरचना
किसी भी कार्य को अच्छी तरह से कौन कर सकता है-एक बीमार व्यक्ति या फिर एक स्वस्थ व्यक्ति? चिकित्सा सुविधाओं के सुलभ नहीं होने पर एक बीमार श्रमिक कार्य से विमुख रहेगा। इससे उत्पादकता में कमी आएगी। अत: इस प्रकार से स्वास्थ्य पर व्यय मानव पूंजी के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। अस्पताल के भवन, मशीनों एवं उपकरणों, एम्बुलेन्स आदि पर किया गया व्यय स्वास्थ्य आधारित संरचना का निर्माण करता है। स्वास्थ्य आधारिक संरचना से स्वास्थ्य में बढोत्तरी होती है और परिणामस्वरूप उत्पादकता में वृद्धि होती है।

(ख) प्रवसन पर व्यय
व्यक्ति अपने मूल स्थान की आय से अधिक आय वाले रोजगार की तलाश में प्रवसन/पलायन करते हैं। भारत में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर प्रवसन मुख्यतः गाँवों में बेरोजगारी के कारण ही होता है। अकुशल श्रमिक देश के अंदर प्रवास करते हैं तथा शिक्षित एवं कुशल व्यक्ति देश के बाहर भी प्रवास के के लिए जाते हैं। प्रवसनों की दोनों ही स्थितियों में परिवहन की लागत और उच्चतर निर्वाह लागत के साथ एक अनजाने सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में रहने की मानसिक लागतें भी प्रवासी श्रमिकों को सहन करनी पड़ती हैं। लेकिन प्रवसित स्थान पर ज्यादा कमाई से प्रवसन काव्यय हल्का हो जाता है। अतः प्रवसन पर किया गया व्यय मानवे पूँजी निर्माण का स्रोत है।

प्रश्न 10.
मानव संसाधनों के प्रभावी प्रयोग के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा पर व्यय संबंधी जानकारी 
प्राप्त करने की आवश्यकता का निरूपण करें।
उत्तर
शिक्षा में निवेश को मानव पूंजी का एक प्रमुख स्रोत माना जाता है। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य में निवेश, कार्य के दौरान प्रशिक्षण, प्रबंधन तथा सूचना आदि में निवेश मानव पूंजी के निर्माण के अन्य स्रोत हैं। व्यक्ति अपनी आय को बढ़ाने के लिए शिक्षा पर निवेश करता है। उसी प्रकार स्वास्थ्य पर व्यय से स्वस्थ श्रमिकों की आपूर्ति बढ़ती है और इस कारण उत्पादकता में भी वृद्धि होती है। बचाव, निदान, स्वच्छ पेयजल, दवाइयों पर व्यय तथा सफाई पर किया गया व्यय आदि स्वास्थ्य व्यय के उदाहरण हैं। जनसामान्य को इन सबकी जानकारी होना आवश्यक है तभी वह इन सुविधाओं का भरपूर लाभ उठा सकता है।

प्रश्न 11.
मानव पूंजी में निवेश आर्थिक संवृद्धि में किस प्रकार सहायक होता है?
उत्तर
हम जानते हैं कि एक साक्षर व्यक्ति का श्रम-कौशल निरक्षर व्यक्ति की अपेक्षा अधिक होता है। इसी कारण वह अपेक्षाकृत अधिक आय अर्जित कर पाता है आर्थिक संवृद्धि का अर्थ देश की वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि से होता है तो फिर स्वाभाविक है कि किसी साक्षर व्यक्ति का योगदान निरक्षर व्यक्ति मी तुलना में कहीं अधिक होगा। एक स्वस्थ व्यक्ति अधिक समय तक व्यवधान रहित श्रम की पूर्ति कर सकता है। इसीलिए स्वास्थ्य भी आर्थिक संवृद्धि का एक महत्त्वपूर्ण कारक बन जाता है। इसी प्रकार कार्य प्रशिक्षण, सूचना एवं प्रवास पर व्यय भी मानव पूँजी निर्माण करते हैं। इन सब पर व्यय से मानव की उत्पादकता में वृद्धि होती है एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण पनपता है। इस प्रकार मानव पूँजी एवं आर्थिक संवृद्धि में सीधा संबंध है।

प्रश्न 12.
विश्व भर में औसत शैक्षिक स्तर में सुधार के साथ-साथ विषमताओं में कमी की प्रवृत्ति| पाई गई है। टिप्पणी करें।
उत्तर
शिक्षा मामेव पूँजी निर्माण का मुख्य स्रोत है। शिक्षा से अच्छे नागरिक उभरकर आते हैं। एक शिक्षित व्यक्ति अशिक्षित व्यक्ति की तुलना में पर्यावरण को ज्यादा बेहतर ढंग से समझ सकता है। शिक्षा से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का विकास होता है। देश के सभी क्षेत्रों के प्राकृतिक तथा मानवीय साधनों के प्रयोग को शिक्षा सुविधाजनक बनाती है। शिक्षा से लोगों के मानसिक स्तर का विकास होता है। शिक्षा से नई तकनीक को स्वीकार करने की योग्यता आती है। अधिक आय उपार्जन हेतु साक्षर मनुष्य एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास कर सकता है। इन सब कारकों से व्यक्ति की आय में वृद्धि होती है। आम आदमी की आय बढ़ने से उच्च एवं निम्न आय वर्ग की दूरी घटने लगती है। इस प्रकार शिक्षा में विषमताओं में कमी की प्रवृत्ति पाई जाती है। दूसरे शब्दों में, शैक्षिक सुधार आर्थिक व सामाजिक विषमताओं में कमी लाता है।

प्रश्न 13.
किसी राष्ट्र के आर्थिक विकास में शिक्षा की भूमिका का विश्लेषण करें।
उत्तर
आर्थिक विकास को आर्थिक संवृद्धि के रूप में देखा जा सकता है यदि संवृद्धि के साथ-साथ साधनों का वितरण समान हो। शिक्षा मानव पूँजी का स्रोत है। किसी साक्षर व्यक्ति के श्रम-कौशल निरक्षर व्यक्ति से अधिक होते हैं। इसी कारण से साक्षर व्यक्ति निरक्षर व्यक्ति की तुलना में अधिक आय अर्जित कर लेता है और आर्थिक संवृद्धि में उसका योगदान भी अधिक होता है। शिक्षा से व्यक्ति ही नहीं समाज भी लाभान्वित होता है। शिक्षा केवल मनुष्य की उत्पादकता को ही नहीं बढ़ाती है बल्कि उसे ज्यादा समझदार, जागरूक व अनुकूलन योग्य बनाती है। शिक्षित श्रम शक्ति की उपलब्धता, नई प्रौद्योगिकी को अपनाने में भी सहायक होती है। इस प्रकार कुशलता से संवर्द्धित व्यक्ति शहर के आर्थिक विकास के लिए ज्यादा योगदान देता है।

प्रश्न 14.
समझाइए कि शिक्षा में निवेश आर्थिक संवृद्धि को किस प्रकार प्रभावित करता है?
उत्तर
व्यक्ति अपनी भावी आय बढ़ाने के लिए शिक्षा पर निवेश करता है। एक साक्षर व्यक्ति को श्रम-कौशल एक निरक्षर की तुलना में अधिक होता है। शिक्षा न केवल श्रम की उत्पादकता को बढ़ाती है। बल्कि यह साथ-ही-साथ परिवर्तन को प्रोत्साहित कर नवीन प्रौद्योगिकी को आत्मसात करने की क्षमता भी विकसित करती है। शिक्षा समाज में परिवर्तनों एवं वैज्ञानिक प्रगति को समझ पाने की क्षमता प्रदान करती है जिससे आविष्कारों एवं नव-परिवर्तनों में सहायता मिलती है। शिक्षित एवं कुशल श्रमिक भौतिक साधनों का  प्रयोग करके ज्यादा और उच्च गुणवत्ता का उत्पादन करके आर्थिक संवृद्धि को जन्म देते हैं। इस प्रकार शिक्षा में निवेश से आर्थिक संवृद्धि में भी बढ़ोत्तरी होती है।

प्रश्न 15.
किसी व्यक्ति के लिए कार्य के दौरान प्रशिक्षण क्यों आवश्यक होता है?
उत्तर
आजकल फर्मे अपने कर्मचारियों के कार्यस्थल पर प्रशिक्षण में व्यय करती हैं। कार्य के दौरान प्रशिक्षण कई प्रकार से दिया जा सकता है; जैसे
1. फर्म के अपने कार्यस्थल पर ही पहले से काम को जानने वाले कुशलकर्मी कर्मचारियों को काम सिखा सकते हैं।
2. कर्मचारियों को किसी अन्य संस्थान/स्थान पर प्रशिक्षण पाने के लिए भेजा जा सकता है। दोनों ही विधियों में फर्म अपने कर्मचारियों के प्रशिक्षण के प्रशिक्षण का कुछ व्यय वहन करती है तथा इस बात पर बल देती है कि प्रशिक्षण के बाद वे कर्मचारी एक निश्चित अवधि तक फर्म के पास ही कार्य करें। इस प्रकार फर्म उनके प्रशिक्षण पर किए गए व्यय की उगाही अधिक उत्पादकता से हुए लाभ के रूप में कर पाने में सफल रहती है। प्रशिक्षण से श्रम-उत्पादकता एवं गुणवत्ता में भी वृद्धि होती है। इस कारण कार्य के दौरान प्रशिक्षण आवश्यक होता है।

प्रश्न 16.
मानव पूँजी और आर्थिक संवृद्धि के बीच संबंध स्पष्ट करें। ”
उत्तर
मानव पूँजी एवं आर्थिक संवृद्धि एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं अर्थात् एक ओर जहाँ प्रवाहित उच्च आय उच्च स्तर पर मानव पूंजी के सृजन का कारण बन सकती है तो दूसरी ओर उच्च स्तर पर मानव पूँजी निर्माण से आय की संवृद्धि में सहायता मिल सकती है।

प्रश्न 17.
भारत में स्त्री शिक्षा के प्रोत्साहन की आवश्यकता पर चर्चा करें।
उत्तर
भारत में स्त्री शिक्षा दर (65.46%) अभी तक पुरुष शिक्षा दर (82.14%) से कम है। ग्रामीण स्त्री शिक्षा दर लगभग 54 है जो शहरी स्त्री शिक्षा दर 87% की अपेक्षा बहुत कम है। इसीलिए आज महिला शिक्षा को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से है

  1. समाज में महिलाओं का सामाजिक स्तर ऊँचा उठाने के लिए।
  2. स्त्रियों को तकनीकी शिक्षा प्रदान करने के लिए।
  3. महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करने के लिए।
  4. महिलाओं की स्वास्थ्य देख-रेख एवं बच्चों की शिक्षा के लिए महिला शिक्षा आवश्यक है। 

प्रश्न 18.
शिक्षा एवं स्वास्थ्य क्षेत्रों में सरकार के विविध प्रकार के हस्तक्षेपों के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर
शिक्षा एवं स्वास्थ्य आधारिक संरचना के मुख्य बिन्दु हैं। शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाएँ निजी क्षेत्र द्वारा भी उपलब्ध कराई जाती हैं और सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा भी। शिक्षा का उच्च स्तर जहाँ कौशल व तकनीकी को विकसित करके उत्पादन क्षमता में वृद्धि करता है वहीं पौष्टिक, प्रदूषण रहित, स्वच्छ व स्वस्थ जीवन श्रम की उत्पादकता में वृद्धि करके राष्ट्रीय आय को संवर्धित करता है। हम जानते हैं कि एक स्वस्थ व साक्षर व्यक्ति एक अस्वस्थ व निरक्षर व्यक्ति की तुलना में अधिक कुशलतापूर्वक कार्य कर सकता है, एक अच्छा प्रबंधनै दुर्लभ राष्ट्रीय संसायधनों के अधिक अच्छे उपयोग को संभव बना सकता है और इस प्रकार राष्ट्रीय एवं प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने में सहायक हो सकता है। इस प्रकार शिक्षा व स्वास्थ्य पर निवेश मानव पूंजी के अच्छे स्रोत हैं और राष्ट्रीय उत्पादकता बढ़ाने में भी सहायक हैं। निजी क्षेत्र लाभ-आधारित होता है और निजी क्षेत्र द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली शैक्षिक व स्वास्थ्य सुविधाएँ अत्यधिक महँगी होती हैं और समाज के सामान्य वर्ग की पहुँच से परे होती हैं। इन सुविधाओं के विस्तार के लिए सरकारी हस्तक्षेप आवश्यक है। इस संबंध में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं

  1. निजी क्षेत्र की एकाधिकारात्मक प्रवृत्ति को रोकना।
  2. निजी क्षेत्र द्वारा शोषण को रोकना।।
  3. सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को स्वास्थ्य एवं शिक्षा सुविधाएँ उपलब्ध कराना।
  4. निर्धनता रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले लोगों को शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराना।
  5. विभिन्न प्रकार की संक्रामक बीमारियों की रोकथाम करना।
  6. संतुलित आहार की उपलब्धता सुनिश्चित करना।

प्रश्न 19.
भारत में मानव पूँजी निर्माण की मुख्य समस्याएँ क्या है?
उत्तर
भारत में मानव पूँजी निर्माण से संबंधित मुख्य समस्याएँ निम्नलिखित हैं

  1. भारत में तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या मानवीय पूँजी की गुणवत्ता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है। यह सामान्य सुविधाओं जैसे—सफाई, शिक्षा, रोजगार, अस्पतालों और आवासों आदि की प्रति व्यक्ति उपलब्धता को कम करती है।
  2. भारत में सर्वोच्च वरीयता कृषि एवं औद्योगिक क्षेत्रों के विकास को दी जाती है तथा उपलब्ध वित्तीय साधनों का प्रयोग अधिकतम इन्हीं क्षेत्रों में किया जाता है। इसके बाद बचे वित्तीय संसाधनों को अन्य क्षेत्रों में प्रयोग किया जाता है। उनमें भी मानव संसाधन क्षेत्र की वरीयता निम्न दर्जे की होती है। अतः इस क्षेत्र का विकास अवरुद्ध है।
  3. भारत में कुल शिक्षा व्यय का एक बहुत बड़ा हिस्सा प्राथमिक शिक्षा पर व्यय होता है। उच्चतर/तृतीयक शिक्षण संस्थाओं पर होने वाला व्यय सबसे कम है।
  4. राज्यों में होने वाले प्रति व्यक्ति शिक्षा व्यय में काफी अंतर है। जहाँ लक्षद्वीप में इसका उच्च स्तर १ 3,440 है, वहीं बिहार में यह मात्र १ 386 है। ये विषमताएँ ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में भी देखने को मिलती हैं।
  5. जहाँ देश में एक ओर कुछ विशिष्ट प्रकार के श्रमिकों का अभाव अनुभव किया जा रहा है वहीं । दूसरी ओर घोर बेरोजगारी भी विद्यमान हैं। परिणामस्वरूप एक ओर श्रम न मिलने के कारण प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रयोग नहीं होता तथा दूसरी ओर श्रमशक्ति व्यर्थ ही नष्ट हो जाती
  6. शिक्षा सिद्धांत प्रधान है, व्यवसाय प्रधान नहीं।
  7. उच्च शिक्षित एवं कौशल युक्त श्रम विदेशों की ओर पलायन (brain drain) कर जाता है।

प्रश्न 20.
क्या आपके विचार में सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों में लिए जाने वाले | शुल्कों की संरचना निर्धारित करनी चाहिए? यदि हाँ, तो क्यों?
उत्तर
हम जानते हैं कि शिक्षा और स्वास्थ्य की देखभाल निजी तथा सामाजिक लाभों को उत्पन्न करती है। इसी कारण इन सेवाओं के बाजार में निजी और सार्वजनिक संस्थाओं को अस्तित्व है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर व्यय महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं और उन्हें आसानी से नहीं बदला जा सकता। इसीलिए सरकारी हस्तक्षेप अनिवार्य है तथा निजी क्षेत्रों के लिए शुल्कों की संरचना निर्धारित करना भी आवश्यक है। मान लीजिए, जब भी किसी बच्चे को किसी स्कूल या फिर स्वास्थ्य देखभाल केन्द्र में भर्ती कर दिया जाता है, जहाँ बच्चे को आवश्यक सुविधाएँ नहीं प्रदान की जा रही हों तब ऐसी स्थिति में किसी दूसरे स्थान पर स्थानान्तरण कर देने पर भी पर्याप्त मात्रा में धन का व्यय हो चुका होगा। यही नहीं, इन सेवाओं के व्यक्तिगत उपभोक्ताओं को सेवाओं की गुणवत्ताओं और लागतों के विषय में पूर्ण जानकारी नहीं होती। इन परिस्थितियों में शिक्षा स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध करा रही संस्थाएँ एकाधिकार प्राप्त कर लेती हैं और शोषण करने लगती हैं। इस समय सरकार की भूमिका यह होनी चाहिए कि वह निजी सेवा प्रदायकों को उचित मानकों के अनुसार सेवाएँ देने और उनकी उचित कीमत लेने को बाध्य करे।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर 

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पूँजी-निर्माण का अर्थ है
(क) बचत करना ।
(ख) बचत नियंत्रित करना
(ग) विनियोग करना
(घ) बचत का वास्तविक पूँजीगत परिसम्पत्तियों में विनियोग करना
उत्तर
(घ) बचत का वास्तविक पूँजीगत परिसम्पत्तियों में विनियोग करना

प्रश्न 2.
“आर्थिक विकास मानवीय प्रयत्नों का परिणाम है।” यह कथन किसका है?
(क) प्रो० रिचार्ड टी० गिल
(ख) प्रो० आर्थर लेविस
(ग) प्रो० शुल्ज
(घ) प्रो० मिंट
उत्तर
(ख) प्रो० आर्थर लेविस

प्रश्न 3.
सन् 2011 में भारत में साक्षरता का प्रलिंशत था
(क) 70.04
(ख) 74.04
(ग) 90
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ख) 7404

प्रश्न 4.
शिक्षा का महत्त्व नहीं है
(क) शिक्षा नागरिकता की भावना का विकास करती है।
(ख) शिक्षा से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का विकास होता है।
(ग) शिक्षा से लोगों के मानसिक स्तर का पतन होता है।
(घ) शिक्षा से देशवासियों के सांस्कृतिक स्तर में अभिवृद्धि होती है।
उत्तर
(ग) शिक्षा से लोगों के मानसिक स्तर का पतन होता है।

प्रश्न 5.
औपचारिक शिक्षा का कार्यक्रम कब शुरू किया गया?
(क) सन् 1995 ई० में
(ख) सन् 1993 ई० में
(ग) सन् 1996 ई० में ।
(घ) सन् 1980 ई० में
उत्तर
(क) सन् 1995 ई० में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जनसंख्या मानव पूंजी में कब बदल जाती है?
उत्तर
जब शिक्षा, प्रशिक्षण एवं चिकित्सा सेवाओं में निवेश किया जाता है तो जनसंख्या मानव पूंजी में बदल जाती है।

प्रश्न 2.
मानव पूँजी से क्या आशय है?
उत्तर
मानव पूँजी से आशय कौशल और मानव में निहित उत्पादन के ज्ञान के स्टॉक से है।

प्रश्न 3.
सकल राष्ट्रीय उत्पाद से क्या आशय है?
उत्तर
किसी अर्थव्यवस्था में जो भी अन्तिम वस्तुएँ और सेवाएँ एक वर्ष की अवधि में उत्पादित की जाती हैं, उन सभी के बाजार मूल्य के योग को सकल राष्ट्रीय उत्पाद कहते हैं।

प्रश्न 4.
जनसंख्या का उत्पादक पक्ष क्या है?
उत्तर
जनसंख्या का उत्पादक पक्ष है—सकल राष्ट्रीय उत्पाद के सृजन में उसके योगदान की क्षमता।

प्रश्न 5.
मानव पूँजी निर्माण क्या है।
उत्तर
शिक्षा, प्रशिक्षण एवं स्वास्थ्य द्वारा मानव संसाधन का विकास ही मानघ’पूँजी निर्माण कहलाता है।

प्रश्न 6.
मानव पूंजी में निवेश का क्या महत्त्व है?
उत्तर
मानव पूंजी में निवेश भौतिक पूँजी की ही भाँति प्रतिफल प्रदान करता है। इससे उत्पादकता बढ़ती है। और उत्पादन बढ़ने से आय बढ़ती है।

प्रश्न 7.
चिकित्सक, अध्यापक, अभियंता तथा दर्जी अर्थव्यवस्था के लिए किस प्रकार परिसम्पत्ति
उत्तर
चिकित्सक, अध्यापक, अभियंता तथा दर्जी अर्थव्यवस्था के लिए उत्पादक क्रियाओं में संलग्न हैं। और परिसम्पत्ति है क्योंकि ये चारों ही सकल राष्ट्रीय उत्पाद में वृद्धि करते हैं।

प्रश्न 8.
मानव पूँजी को उत्पादक परिसम्पत्ति में कैसे बदला जा सकता है?
उत्तर
मानव पूँजी में निवेश (शिक्षा, प्रशिक्षण, स्वास्थ्य, तकनीकी व अनुसंधान) द्वारा मानव पूँजी को उत्पादक परिसम्पत्ति में बदला जा सकता है।

प्रश्न 9.
शिक्षा से क्या लाभ है?
उत्तर
शिक्षा द्वारा श्रम की गुणवत्ता में वृद्धि होती है। इससे देश की कुल उत्पादकता में भी वृद्धि होती है। और इसके फलस्वरूप उसकी आय/मजदूरी में भी वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 10.
जनसंख्या की गुणवत्ता किस पर निर्भर करती है?
उत्तर
जनसंख्या की गुणवत्ता साक्षरता दर, जीवन प्रत्याशा से निरूपित व्यक्तियों के स्वास्थ्य और देश के नागरिकों द्वारा प्राप्त कौशल निर्माण पर निर्भर करती है।

प्रश्न 11.
किस व्यक्ति को साक्षर माना जाता है?
उत्तर
वह व्यक्ति जो स्व-विवेक से किसी भाषा को पढ़-लिख सके, साक्षर माना जाता है।

प्रश्न 12.
सन 1951 में साक्षरता-दर क्या थी?
उत्तर
सन् 1951 में साक्षरता दर 16.67 (पुरुष =24.95 तथा स्त्री = 7.93) थी।

प्रश्न 13.
सन 2011 में साक्षरता-दर क्या थी?
उत्तर
सन् 2011 में साक्षरता दर 74.04 (पुरुष = 82.14 तथा स्त्री = 65.46) थी।

प्रश्न 14.
भारत में पुरुष व महिलाओं में से किनमें साक्षरता-दर अधिक है और क्यों?
उत्तर
भारत में पुरुषों में साक्षरता स्त्रियों से अधिक है क्योंकि पुरुष स्त्रियों की तुलना में अधिक संख्या में शिक्षा ग्रहण करते हैं।

प्रश्न 15.
पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ कम शिक्षित क्यों हैं?
उत्तर
पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ कम शिक्षित हैं क्योंकि वे घर व घर से बाहर गैर-आर्थिक क्रिया-कलापों में प्रायः संलग्न रहती हैं।

प्रश्न 16.
साक्षरता-दर की परिकलन कैसे किया जाता है?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 5 Human Capital Formation in India 1
प्रश्न 17.
समाज के विकास में शिक्षा का क्या योगदान है?
उत्तर
शिक्षा राष्ट्रीय आय और सांस्कृतिक समृद्धि में वृद्धि करती है और प्रशासन की कार्यक्षमता को बढ़ाती है।

प्रश्न 18.
क्या विद्यार्थियों की बढ़ती हुई संख्या को प्रवेश देने के लिए कॉलेजों की संख्या में वृद्धि पर्याप्त है?
उत्तर
नहीं। बढ़ती हुई विद्यार्थियों की संख्या को प्रवेश देने के लिए और अधिक कॉलेजों की स्थापना की जानी चाहिए।

प्रश्न 19.
क्या आप सोचते हैं कि हमें विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ानी चाहिए?
उत्तर
हाँ! विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए और व्यवसायपरक शिक्षा देने के लिए अधिकाधिक विश्वविद्यालय खोले जाने चाहिए।

प्रश्न 20.
संसाधन के रूप में लोग से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर
‘संसाधन के रूप में लोग’ से अभिप्राय वर्तमान उत्पादन कौशल और क्षमताओं के संदर्भ में किसी देश में कार्यरत लोगों के वर्णन करने की एक विधि से है। अन्य संसाधन की भाँति जनसंख्या भी एक साधन है। उसे ‘मानव संसाधन’ कहते हैं।

प्रश्न 21.
मानव संसाधन भूमि और भौतिक पूँजी जैसे अन्य संसाधनों से कैसे भिन्न हैं?
उत्तर
मानव एक सक्रिय संसाधन है जबकि अन्य साधन निष्क्रिय हैं। मानव संसाधन ही भूमि वे भौतिक पूँजी जैसे अन्य संसाधनों का उपयोग करके उन्हें उपयोगी बनाता है, वे अपने आप में उपयोगी नहीं हैं।

प्रश्न 22.
मानव पूँजी निर्माण में शिक्षा की क्या भूमिका है?
उत्तर
शिक्षा मानव संसाधन को कुशल बनाती है। शिक्षा एवं प्रशिक्षण सुविधाएँ उसकी उत्पादकता में वृद्धि करती हैं जिससे उसकी आय बढ़ती है।

प्रश्न 23.
मानव पूँजी निर्माण में स्वास्थ्य की क्या भूमिका है?
उत्तर
मानव पूंजी निर्माण में स्वास्थ्य सेवाएँ भौतिक पूँजी की ही भाँति प्रतिफल प्रदान करती हैं। अधिक स्वस्थ लोगों की उत्पादकता भी अधिक होती है जिससे उनका उपभोग स्तर एवं जीवन-स्तर भी उच्च रहता

प्रश्न 24.
किसी व्यक्ति के कामयाब जीवन में स्वास्थ्य की क्या महत्त्वपूर्ण भूमिका है?
उत्तर
किसी व्यक्ति के कामयाब जीवन में स्वास्थ्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। अच्छा स्वास्थ्य उसे अधिक सक्षम एवं सशक्त बनाता है, रोगों से लड़ने की शक्ति देता है तथा अधिक कार्य करने की क्षमता प्रदान करता है। इससे उसकी उत्पादक़ता एवं आय बढ़ती है। आय की प्राप्ति कामयाबी की सीढ़ी है।

प्रश्न 25.
विरोधाभासी जनशक्ति स्थिति से क्या आशय है?
उत्तर
कुछ विशेष श्रेणियों में जनशक्ति का आधिक्य तथा अन्य श्रेणियों में जनशक्ति की कमी पाई जाती

प्रश्न 26.
श्रमिकों के प्रवास से क्या आशय है?
उत्तर
रोजगार की तलाश में श्रमिकों को गाँवों से शहरों की ओर पलायन ‘श्रमिकों का प्रवास’ कहलाता

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानव पूँजी निर्माण किसे कहते हैं?
उत्तर
जनशक्ति अर्थव्यवस्था के लिए एक परिसम्पत्ति है। जब शिक्षा, प्रशिक्षण और चिकित्सा सेवाओं में निवेश किया जाता है तो जनशक्ति मानव पूंजी में बदल जाती है। वास्तव में मानव पूँजी कौशल और उनमें निहित उत्पादन के ज्ञान का स्टॉक है। जब मानव संसाधन को और अधिक शिक्षा तथा स्वास्थ्य द्वारा और विकसित किया जाता है तो हम इसे मानव पूँजी निर्माण कहते हैं। आर्थिक विकास की दर को तीव्र गति से बढ़ाने की दृष्टि से यह एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है।

प्रश्न 2.
किसी देश के लिए मानव पूंजी निर्माण का क्या महत्त्व है? ।
उत्तर
मानव पूंजी निर्माण के महत्त्व को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

  1. मानव पूंजी निर्माण भौतिक पूँजी निर्माण की ही भाँति देश की उत्पादकता शक्ति में वृद्धि करता है।
  2. शिक्षित और बेहतर प्रशिक्षित लोगों की उत्पादकता में वृद्धि के कारण आय में वृद्धि होती है जिससे उनका उपभोग स्तर और इसके फलस्वरूप जीवन-स्तर उच्च होता है।
  3. आय में वृद्धि से समाज के सभी वर्ग प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित होते हैं।’
  4. शिक्षित, प्रशिक्षित एवं स्वस्थ व्यक्ति उपलब्ध संसाधनों का अधिक बेहतर उपयोग कर सकते हैं।

प्रश्न 3.
जनसंख्या को एक उत्पादक परिसम्पत्ति के रूप में कैसे बदला जा सकता है?
उत्तर
मानव पूंजी के निवेश द्वारा विशाल जनसंख्या को एक उत्पादक सम्पत्ति के रूप में बदला जा सकता है। हम जानते हैं कि मानव पूंजी में निवेश (शिक्षा, प्रशिक्षण और स्वास्थ्य सेवा के द्वारा) भौतिक पूँजी की ही भाँति प्रतिफल प्रदान करता है। अधिक शिक्षित, बेहतर प्रशिक्षित और अधिक स्वस्थ लोगों की उत्पादकता का स्तर उच्च होता है। इससे सकल राष्ट्रीय उत्पाद में वृद्धि होती है, प्रति व्यक्ति आय बढ़ती है और उपभोग का स्तर ऊँचा होता है। फलस्वरूप रहन-स्तर के स्तर में भी सुधार होता है। दूसरे, शिक्षित प्रशिक्षित एवं स्वस्थ लोग निष्क्रिय पड़े संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकते हैं।

प्रश्न 4.
जनसंख्या की गुणवत्ता किन घटकों पर निर्भर करती है? जनसंख्या की गुणवत्ता में सुधार क्यों आवश्यक है?
उत्तर
जनसंख्या की गुणवत्ता निम्नलिखित घटकों पर निर्भर करती है
1. साक्षरता दर,
2. जीवन प्रत्याशा,
3. स्वास्थ्य,
4. कौशल निर्माण। जनसंख्या की गुणवत्ता में सुधार आवश्यक है क्योंकि इससे ही अन्ततः देश की संवृद्धि दर निर्धारित होती है। वास्तव में साक्षर एवं स्वस्थ जनसंख्या ही देश की परिसम्पत्तियाँ होती हैं, जबकि निरक्षर व अस्वस्थ जनसंख्या देश पर एक बोझ होती है।

प्रश्न 5.
शिक्षा का क्या महत्त्व है? इसके विकास के लिए सरकार ने क्या किया है?
उत्तर
शिक्षा एक महत्त्वपूर्ण आगत है। यह राष्ट्रीय आय और सांस्कृ िक समृद्धि में वृद्धि करती है और प्रशासन की कार्यक्षमता बढ़ाती है। सरकार ने शिक्षा के विकास के लिए निम्न कदम उठाए हैं1. प्राथमिक शिक्षा की अनिवार्य किया गया है तथा प्रत्येक जिले में नवोदय विद्यालय खोले गए हैं। इस

  1. दिशा में सर्वशिक्षा अभियान एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
  2. विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा उपलब्ध कराने पर विशेष बल दिया गया है।
  3. शिक्षा पर योजना व्यय बढ़ाया गया है।

प्रश्न 6.
किसी देश में जनसंख्या की स्वास्थ्य स्थिति को सुधारना क्यों आवश्यक है?
उत्तर
अच्छा स्वास्थ्य व्यक्ति को अपनी क्षमता बढ़ाने और बीमारियों से लड़ने की ताकत देता है। वास्तव में स्वास्थ्य स्व-कल्याण की अनिवार्य आधारशिला है। अस्वस्थ लोगों की कार्यक्षमता का स्तर निम्न होता है। जबकि स्वस्थ लोगों की कार्यक्षमता का स्तर उच्च होता है। इसलिए जनसंख्या की स्वास्थ्य स्थिति को सुधारना किसी भी देश की प्राथमिकता होती है और इसीलिए सरकार स्वास्थ्य सेवाओं, परिवार कल्याण और पौष्टिक भोजन पर विशेष ध्यान दे रही है। अब एक विस्तृत स्वास्थ्य आधारित संरचना का निर्माण देश का प्राथमिक लक्ष्य है।

प्रश्न 7.
मानव पूंजी में विनियोग की सीमाएँ बताइए।
उत्तर
मानव पूंजी में विनियोग की सीमाएँ निम्नलिखित हैं

  1. अल्पविकसित देशों में वित्तीय साधनों का अभाव होता है। अत: उपलब्ध संसाधनों को केवल मानव विकास पर ही व्यय नहीं किया जा सकता।
  2. विदेशी तकनीकी सहायता के बिना अल्पविकसित देशों में कौशल निर्माण सम्भव नहीं है। विदेशी तकनीकी सहायता के आयात के लिए विदेशी विनिमय कोषों की आवश्यकता होती है और अल्पविकसित देशों में विदेशी विनिमय कोष पर्याप्त मात्रा में नहीं होते।
  3. अधिकांश अल्पविकसित अर्थव्यवस्थाएँ कृषिप्रधान होती हैं और कृषि के अंतर्गत नव-प्रवर्तन एवं कौशल निर्माण की सम्भावना अत्यधिक कम होती है।
  4. इनका सामाजिक, सांस्कृतिक ढाँचा तकनीकी परिवर्तन के अनुकूल नहीं होता।
  5. इन देशों में ज्ञान व कौशल के प्रति जन-सामान्य उदासीन होता है।
  6. कौशल निर्माण मानवीय साधनों के विकास की एक दीर्घकालीन प्रक्रिया है जिसके लिए पर्याप्त एवं लगातार विनियोग, असीमित धैर्य एवं सतर्कता की आवश्यकता है। अल्पविकसित देशों में ऐसा सम्भव नहीं होता।

प्रश्न 8.
मानव विकास से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
मानव विकास से आशय मानव में गुणात्मक सुधार करना है। सन् 1990 में सर्वप्रथम प्रकाशित Human Development Report के अनुसार, मानव विकास लोगों के सामने विस्तार की प्रक्रिया है। UNDP की मानव विकास रिपोर्ट (1997 ई०) में मानव विकास की अवधारणा को इस प्रकार स्पष्ट किया गया है, “यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जनसामान्य के विकल्पों का विस्तार किया जाता है और इनके द्वारा उनके कल्याण के उन्नत स्तर को प्राप्त किया जाता है। यही मानवीय विकास की धारणा का मूल है। ऐसे सिद्धांत न तो सीमाबद्ध होते हैं और न ही स्थैतिक। परंतु विकास के स्तर को दृष्टि में न रखते हुए जनसामान्य के पास तीन विकल्प हैं—एक लम्बा और स्वस्थ जीवन व्यतीत करना, ज्ञान प्राप्त करना ही अच्छा जीवन स्तर प्राप्त करने के लिए आवश्यक, संसाधनों तक अपनी पहुँच बढ़ाना और भी अनेक विकल्प हैं जिन्हें बहुत-से लोग महत्त्वपूर्ण मानते हैं–राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता से सृजनात्मक और उत्पादक बनने के अवसर और स्वाभिमान एवं गारण्टीकृत मानवीय अधिकारों का लाभ उठाना…..आय केवल एक विकल्प है…. जो लोग आय प्राप्त करना चाहेंगे, चाहे यह बहुत महत्त्वपूर्ण है परंतु यह उनके समग्र जीवन का सार नहीं है। आय एक साधन है जबकि मानव विकास एक साध्य।”

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न प्रश्न

प्रश्न  1.
निर्माण से क्या आशय है? मानव संसाधन विकास के मुख्य स्रोत बताइए।
उत्तर
आर्थिक विकास की प्रक्रिया में अधिकांशतः भौतिक पूँजी के संचय को ही अधिक महत्त्व दिया जाता है जबकि व्यवहार में पूँजी स्टॉक की वृद्धि पर्याप्त सीमा तक मानव पूंजी-निर्माण पर निर्भर रहती हैं। मानव पूंजी-निर्माण, देश के सब लोगों का ज्ञान, कुशलता तथा क्षमताएँ बढ़ाने की प्रक्रिया है। शुल्ज, हार्बिसन, डेनिसन, केण्डूिक, मोसिज, अब्रामोविट्ज़, बैकर, मेरी बोमन, कुजनेस आदि अर्थशास्त्रियों का मत है कि शिक्षा पर व्यय किया गया एक डॉलर राष्ट्रीय आय में उसकी अपेक्षा अधिक वृद्धि करता है, जितना बाँधों, सड़कों, फैक्ट्रियों या अन्य व्यवहार्य पूँजी वस्तुओं पर व्यय किया गया एक डॉलर।

मानव पूँजी निर्माण का अर्थ एवं परिभाषाएँ

मानव पूँजी निर्माण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत मानवीय शक्ति के विकास हेतु भारी मात्रा में विनियोग किया जाता है ताकि देश में मानव-शक्ति तकनीकी कुशलता एवं योग्यता प्राप्त कर सके। इसका संबंध ‘‘ऐसे व्यक्ति उपलब्ध करना और उनकी संख्या में वृद्धि करना है जो कुशल, शिक्षित तथा अनुभवी हों-मानव पूँजी–निर्माण इस प्रकार मानवे में विनियोजन और उसके निर्माणकारी तथा उत्पादक साधन के रूप में विकास से संबंध है।’ इसके अंतर्गत शिक्षा, स्वास्थ्य एवं प्रशिक्षण पर किया गया व्यय सम्मिलित होता है।

प्रो० मायर के अनुसार- “मानवीय पूँजी निर्माण ऐसे लोगों को प्राप्त करने तथा उनकी संख्या को बढ़ाने की प्रक्रिया है जिनके पास ये कुशलताएँ, शिक्षा और अनुभव होता है जो किसी देश के आर्थिक विकास एवं राजनीतिक विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।”

प्रो० हार्बिसन के शब्दों में—“मानव पूँजी निर्माण से अभिप्राय ऐसे व्यक्तियों को उपलब्ध करना और इनकी संख्या में वृद्धि करना है जो कुशल, शिक्षित व अनुभवपूर्ण हों, जिनकी देश के आर्थिक एवं राजनीतिक विकास के लिए नितांत आवश्यकता होती है। मानव पूंजी निर्माण इस प्रकार मानव में विनियोजन और उसके सृजनकारी तथा उत्पादक साधन की माप में विकास से संबंधित है।”

मानव पूँजी निर्माण के स्रोत मानव पूंजी निर्माण के कुछ महत्त्वपूर्ण स्रोत निम्न प्रकार हैं

1. शिक्षा- शिक्षा पर व्यंय मनुष्य को अधिक कुशल बनाकर उसकी उत्पादन क्षमता में वृद्धि करता | है। इससे भविष्य की आय बढ़ने की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं।

2. स्वास्थ्य- एक स्वस्थ व्यक्ति ही किसी कार्य को अच्छी तरह से कर सकता है। चिकित्सासुविधाओं के अभाव में श्रमिक बीमार रहता है और बीमार श्रमिक कार्य से बचता हैं इससे उसकी उत्पादकता कम हो जाती है। स्वास्थ्य पर किया गया व्यय स्वस्थ श्रम बल की पूर्ति को बढ़ाता है। और इस कारण यह मानव पूँजी निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

3. प्रशिक्षण– फमें अपने कर्मचारियों के प्रशिक्षण पर व्यय करती हैं। फमें प्रशिक्षण कार्य की व्यवस्था कारखाने के अंदर भी कर सकती हैं अथवा अपने कर्मचारियों को अन्य प्रशिक्षण संस्थानों में प्रशिक्षण दिला सकती हैं। प्रशिक्षण पर किया गया यह व्यय कर्मचारी की उत्पादकता को बढ़ाता है और इस प्रकार फर्म के लाभ में वृद्धि होती है।

4. प्रवसन तथा सूचना- सामान्यत: लोग अधिक आय की तलाश में अपने मूल स्थान से दूसरे स्थानों को पलायन करते हैं। प्रवसन के दौरान किए जाने वाले व्यय की तुलना में आय में अधिक वृद्धि होती है। इसी प्रकार व्यक्ति श्रम बाजार तथा दूसरे बाजार जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य से संबंधित सूचनाओं को प्राप्त करने के लिए व्यय करते हैं यह जानकारी मानव पूंजी के उपयोग के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होती हैं।

प्रश्न 2.
एक अल्पविकसित अर्थव्यवस्था में मानव पूँजी निर्माण के महत्त्व एवं भूमिका को स्पष्ट | कीजिए।’.
उत्तर
अल्पविकसित अर्थव्यवस्था में मानव पूँजी निर्माण का महत्त्व (भूमिका) किसी भी देश के द्रुत आर्थिक विकास में मानवीय पूँजी का विशेष महत्त्व है। प्रो० आर्थर लेविस के शब्दों में “आर्थिक विकास मानवीय प्रयत्नों का परिणाम है।” प्रो० रिचार्ड टी० गिल के अनुसार 
आर्थिक विकास कोई यांत्रिक प्रक्रिया नहीं बल्कि एक मानवीय उपक्रम है जिसकी प्रगति उन लोगों की कुशलता, गुणों, दृष्टिकोणों एवं अभिरुचियों पर निर्भर करती है। प्रो० शुल्ज के अनुसार-“हमारी आर्थिक प्रणाली का सबसे महत्त्वपूर्ण लक्षण मानवीय पूँजी का विकास है।’

आर्थिक विकास की दृष्टि से मानवीय पूँजी भौतिक पूँजी की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसका कारण यह है कि भौतिक पूँजी का निर्माण भी मानवीय पूँजी के निर्माण पर ही निर्भर करता है। यदि मानवीय पूँजी निर्माण के लिए कम विनियोग किया जाता है, तो अतिरिक्त भौतिक पूँजी के उत्पादक कार्यों में विनियोग की दर कम होगी और आर्थिक विकास की प्रक्रिया धीमी पड़ जाएगी। अधिकांश अल्पविकसित देशों में मानवीय पूँजी निर्माण उपेक्षित रहा है और उन्होंने ‘भौतिक परिसम्पत्ति के निर्माण पर ही अधिक ध्यान दिया है। प्रो० मिंट का यह कथन सत्य है कि “अब यह अधिकाधिक स्वीकार किया जाता है कि बहुत-से अल्पविकसित देशों का विकास बचत की कमी के कारण इतना नहीं | रुका है जितना कि कौशल और ज्ञान की कमी के कारण, जिसकी वजह से उनकी व्यवस्था की उत्पादक विनियोग में पूंजी का अवशोषण करने की क्षमता सीमित हो गई है।”

इसलिए नई तथा विस्तारशील सरकारी सेवाओं में कर्मचारी नियुक्त करने के लिए, भूमि प्रयोग की नई व्यवस्था तथा कृषि के नए तरीके प्रचलित करने के लिए, संचारण के नए साधनों का विकास करने के लिए, औद्योगीकरण को आगे ले जाने के लिए, शिक्षा प्रणाली का निर्माण करने के लिए मानव पूँजी आवश्यक है। वास्तव में, यदि देश के पास पर्याप्त मानव पूंजी हो, तो भौतिक पूँजी अधिक उत्पादक बन जाती है। जैफ रेंज के शब्दों में जो देश अपने आर्थिक विकास की गति बढ़ाने का प्रयत्न कर रहे हैं। उनमें यह देखा गया है कि उन्नत औद्योगिक देशों से आधुनिक विधियों तथा मशीनरी का प्रयोग करने के लिए प्रथम श्रेणी के अभियंताओं द्वारा जमाएँ रूपांकित किए जाते हैं तब भी प्रदा की मात्रा तथा श्रेणी प्रायः असंतोषजनक रहती है। क्यों? क्योंकि अधिकांश स्थितियों में प्रबन्धक तथा श्रमिक अपर्याप्त रूप से

अप्रशिक्षित होते हैं और उनमें अनुभव की कमी होती है। प्रो० शुल्ज का कहना है कि “मानव पूँजी के अभाव में ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे पास साधनों का मानचित्र हो पर उसमें महान नदी और उसकी शाखाएँ न हों। शिक्षा, प्रशिक्षण, स्वास्थ्य में उन्नतियाँ और अर्थव्यवस्था में सूचना के बढ़ते स्टॉक उस विशिष्ट नदी का पोषण करते हैं।’ एक विकासशील अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास की गति को तेज करने तथा उसे पिछड़ेपन से बाहर निकालने में मानव पूंजी निर्माण निम्न प्रकार सहायक हो सकता है

  1. यह अल्पविकसित देशों के समग्र वातावरण में परिवर्तन ला सकता है। यह लोगों की आकांक्षाओं,अभिवृत्तियों एवं अभिप्रेरणाओं को विकासोन्मुखी बनाकर आर्थिक विकास के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करा सकता है।
  2. मानव पूँजी भौतिक पूँजी को अधिक उत्पादक बना देती है।
  3. मानवीय पूँजी निर्माण में निवेश अधिक प्रतिफल प्रदान करता है। यह प्रतिफल लागत से अधिक | होता है।
  4. प्राकृतिक संसाधनों का अधिक बेहतर उपयोग किया जा सकता है।
  5. श्रम बल की गतिशीलता बढ़ती है जिससे उसकी आय में वृद्धि होती है।
  6. श्रमिकों के ज्ञान में वृद्धि होती है।
  7. आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग करके उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है।
  8. श्रम को लाभकारी रोजगार प्राप्त होता है।

संक्षेप में, मानवीय पूँजी निर्माण में किया गया निवेश उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करके आर्थिक विकास की देर में वृद्धि कर सकता है।

प्रश्न 3.
मानवीय पूँजी निर्माण में निवेश के मुख्य क्षेत्र बताइए।
उत्तर
मानवीय पूँजी निर्माण में निवेश के मुख्य क्षेत्र निम्नलिखित हैं
1. शिक्षा एवं प्रशिक्षण सुविधाएँ–शिक्षा एवं प्रशिक्षण सेवाओं पर किया गया विनियोजन मानव 
शक्ति की कार्यकुशलता को बढ़ाता है, जिससे आर्थिक विकास को प्रोत्साहन मिलता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के एक अध्ययन के अनुसार-‘सबसे अधिक प्रगति उन देशों में होगी जहाँ पर शिक्षा विस्तृत होती है और जहाँ पर वह लोगों में प्रयोगात्मक दृष्टिकोणों को विस्तृत करती है। प्रो० सिंगर के अनुसार-“शिक्षा में किया गया विनियोग बहुत अधिक उत्पादक ही नहीं होता है बल्कि वह बढ़ता हुआ प्रतिफल भी देता है क्योंकि कुल तथा शिक्षित व्यक्तियों के सहयोग से काम करता हुआ दल उन व्यक्तियों के समूह में अधिक उपयोगी होता है जिससे कि वह मिलकर बनता है। मानवीय विनियोग के जिस क्षेत्र में भी हम देखते हैं, वहाँ हमें बढ़ता हुआ प्रतिफले ही देखने को मिलता है।’ प्रो० रिचार्ड टी० गिल के शब्दों में—“शिक्षा पर किया गया विनियोग आर्थिक विकास की दृष्टि से सर्वाधिक सार्थक विनियोग माना जाएगा। प्रो० गैलबैथ ने शिक्षा को उपभोग और विनियोग दोनों ही माना है। शिक्षा पर विनियोग करते समय निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए

  1. अर्थव्यवस्था की दशा पर ध्यान देना चाहिए उदाहरण के लिए कृषिप्रधान| अर्थव्यवस्थाओं में कृषि शिक्षा एवं प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
  2. विकास को गति मिलने पर ‘औद्योगिक प्रशिक्षण’ पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
  3. शैक्षिक पद्धति कार्यमूलक होनी चाहिए, सिद्धान्त प्रधान नहीं।
  4. इसके पश्चात्, प्रबन्धकीय व व्यावसायिक शिक्षा पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

2. स्वास्थ्य एवं पोषण— किसी भी देश के आर्थिक विकास के लिए उत्पादकता में वृद्धि’ एक आवश्यक पूर्ण शर्त है और उत्पादकता में वृद्धि के लिए स्वस्थ जनशक्ति का होना आवश्यक है। स्वास्थ्य का निम्न स्तर एवं पोषण की कमी उत्पादकता एवं आर्थिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। अल्पविकसित देशों में अल्पपोषण, चिकित्सा सेवाओं की कमी व स्वास्थ्य के निम्न स्तर 

के कारण उनकी गुणात्मक उत्पादकता कम होती है। उनकी प्रति व्यक्ति आय कम होती है और वे निर्धनता के दूषित चक्र में जड़ जाते हैं। अतः इन देशों में विकास की गति को तेज करने के लिए जनशक्ति के गुणों में सुधार किया जाना आवश्यक है। इसके लिए लोगों को पर्याप्त एवं पौष्टिक भोजन दिया जाना चाहिए, सफाई एवं स्वास्थ्य दशाओं की व्यवस्था की जानी चाहिए वृथा चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए। इन मदों पर किया गया विनियोग लोगों के स्वास्थ्य एवं कार्यक्षमता में सुधार लाएगा, श्रम की कार्यक्षमता एवं उत्पादकता को बढ़ाएगा और

आर्थिक विकास दर को तेज करेगा। 3. आवास सुविधाएँ-आवास व्यवस्था मानवीय स्वास्थ्य एवं कार्यकुशलता को प्रभावित करने

वाली एक महत्त्वपूर्ण घटक है। गंदी बस्तियाँ, बिना हवा एवं रोशनी के छप्परयुक्त झोंपड़ियाँ, सीलन एवं गंदगी से भरी गलियाँ लोगों के स्वास्थ्य को शनैः-शनैः क्षीण करती हैं जिसका उनकी उत्पादकता एवं देश के आर्थिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अतः इन गंदी बस्तियों को स्वस्थ, हवादार एवं स्वच्छ बनाया जाना चाहिए, मकान निर्माण योजनाओं को व्यापक स्तर पर चालू किया जाना चाहिए और कार्य हेतु निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। अच्छी आवास व्यवस्था श्रमिकों की कार्यक्षमता को बढ़ाएगी, उनके उत्पादकता के स्तर को ऊँचा करेगी और आर्थिक विकास की दर को तीव्र करेगी।

प्रश्न 4.
मानवीय पूँजी निर्माण की मुख्य समस्याएँ बताइए। इन समस्याओं को हल करने के लिए उपयुक्त सुझाव दीजिए।
उत्तर
मानवीय पूँजी निर्माण की समस्याएँ मानव पूंजी निर्माण में आने वाली कुछ मुख्य समस्याएँ निम्नलिखित हैं

1. आवश्यक मानव पूँजी के स्टॉक का अनुमान लगाने की समस्या- अल्पविकसित देशों में आर्थिक विकास की दृष्टि से आवश्यक मानव पूंजी के कुल स्टॉक का अनुमान लगाना एक कठिन कार्य है। विशेष रूप से विकास की विभिन्न अवस्थाओं में यह अनुमान लगाना तो और भी कठिन होता है। फिर भी, ईतना निश्चित है कि अल्पविकसित देशों के विकास की प्रारम्भिक अवस्था में शिक्षित व प्रशिक्षित व्यक्तियों के रूप में मानव पूंजी (उद्यमी, संगठक, प्रशासक, वैज्ञानिक, चिकित्सक, अभियंता आदि) की आवश्यकता अधिक होती है।

2. मानव पूँजी निर्माण की वृद्धि दर को व्यक्त करने की समस्या- मानव पूँजी निर्माण की वृद्धि दर को स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करना सम्भव नहीं होता। फिर भी, इस संबंध में यह कहा जाता है कि सामान्य रूप से मानव पूँजी निर्माण की वृद्धि दर, केवल श्रम-शक्ति की वृद्धि दर से ही नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर से भी अधिक होनी चाहिए। हार्बिसन का कहना है कि तकनीकी व्यक्तियों में वृद्धि दर श्रम शक्ति की वृद्धि दर से कम-से-कम तिगुनी तथा क्लर्को, शिल्पियों, प्रबंधकों और प्रशासक सेविवर्ग की वृद्धि से दुगुनी अवश्य होनी चाहिए।

3. शिक्षा में विनियोजन का ढाँचा निर्धारित करने की समस्या–एशिया, अफ्रीका तथा दक्षिणी अमेरिका के अधिकांश देशों में, प्राथमिक शिक्षा पर अधिक बल दिया जाता है जोकि प्रायः निःशुल्क एवं अनिवार्य होती है और माध्यमिक शिक्षा पर कम। ऐसा करने में पर्याप्त अपव्यय होता है और अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों का दबाव बढ़ने से आर्थिक विकास में बाधा पड़ती है।

4. उच्चतर शिक्षा के अनुचित प्रसार की समस्या- अल्पविकसित देश शिक्षा के विद्यमान स्तर में सुधार किए बिना ही उच्चतर शिक्षा हेतु विश्वविद्यालय खोलते रहते हैं। फलस्वरूप शिक्षा के स्तर में गिरावट आ जाती है तथा निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों में रोजगार प्राप्त स्नातकों की दक्षता और उन्नति की सम्भावना घट जाती है। मिंट महोदय का विचार है कि इस प्रकार की शिक्षा नीति एक प्रकार से देश के आर्थिक विकास व मानवीय साधनों का अपव्यय है।।

5. कृषि शिक्षा, स्त्री एवं प्रौढ़ शिक्षा तथा कार्यरत प्रशिक्षण कार्यक्रमों का अभावं- अल्पविकसित देशों में कृषि शिक्षा, स्त्री एवं प्रौढ़ शिक्षा तथा कार्यरत प्रशिक्षण (On the job training) कार्यक्रमों की ओर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। परिणामत: आर्थिक विकास की दृष्टि से उपयुक्त मानसिकता, दृष्टिकोण तथा उत्पादक क्रियाओं का अभाव बना रहता है।

समस्याओं के निवारण हेतु उपयुक्त सुझाव

भारत में मानव पूंजी निर्माण में वृद्धि एवं इसके मार्ग में आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं

  1. जनसंख्या में उच्च वृद्धि दर को कम किया जाए। इससे श्रम-बल में वृद्धि की दर कम होगी, बचत । और निवेश में वृद्धि होगी तथा जनसंख्या की गुणवत्ता में सुधार होगा।
  2. उपयुक्त जनशक्ति नियोजन किया जाए ताकि श्रम की पूर्ति श्रम की माँग के अनुरूप की जा सके।
  3. उपर्युक्त शिक्षा सुधार की योजना बनाई जाए। शिक्षा सिद्धांत प्रधान न होकर व्यवसाय प्रधान हो। शिक्षा विकास के अनुरूप होनी चाहिए।
  4. देश में वर्तमान जनसंख्या के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएँ और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया | जाना चाहिए।
  5. मानव पूँजी निर्माण राष्ट्रीय विकास कार्यक्रम का एक भाग बनाया जाना चाहिए।

प्रश्न 5.
मानव संसाधन विकास के एक आवश्यक तत्त्व के रूप में शिक्षा का महत्त्व एवं स्वरूप बताइए। भारत में शिक्षा क्षेत्र के विकास पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
शिक्षा : मानव संसाधन के विकास का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। शिक्षा से आशय लोगों के पढ़ने-लिखने और समझने की योग्यता से है। भारत में मात्र 74.04% लोग साक्षर हैं, जबकि अन्य विकसित देशों में यह प्रतिशत 90 से 95 तक है।

शिक्षा का महत्त्व

शिक्षा के महत्त्व को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

  1. शिक्षा नागरिकता की भावना का विकास करती है।
  2. शिक्षा से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का विकास होता है।
  3. शिक्षा उपलब्ध प्राकृतिक एवं मानवीय साधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को सुविधाजनक बनाती है।
  4. इससे लोगों के मानसिक स्तर का विकास होता है।
  5. इससे देशवासियों के सांस्कृतिक स्तर में अभिवृद्धि होती है।
  6. यह मानवीय व्यक्तित्व के विकास में सहायक है।
  7. यह विकास प्रक्रिया में जनसहभागिता को संभव बनाती है।

भारत में शिक्षा क्षेत्र का विकास

1. सामान्य शिक्षा का प्रसार- स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देश में सामान्य शिक्षा का व्यापक प्रसार हुआ है। देश में शिक्षण संस्थाओं की संख्या लगभग चार गुना और छात्रों की संख्या लगभग पाँच गुना बढ़ चुकी है। 1951 ई० में कुल जनसंख्या का मात्र 16% ही साक्षर था जो 2011 में बढ़कर लगभग 74.04% हो गया है।

2. प्राथमिक शिक्षा- प्राथमिक शिक्षा में 6 से 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों में कक्षा एक से आठ तक के छात्र आते हैं। योजनाकाल में प्राथमिक स्कूलों की संख्या में काफी वृद्धि हुई। इस समय 6 से 14 वर्ष के आयु समूह में लगभग 90% बच्चे स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं किंतु अभी भी यह प्रतिशत निम्न है। शिक्षा की दृष्टि से अति पिछड़े राज्य हैं-बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश व अरुणाचल प्रदेश। शिक्षा के इस पिछड़ेपन का प्रमुख कारण आर्थिक व सामाजिक पिछड़ापन है।

3. माध्यमिक शिक्षा- वर्ष 2010-11 में देश में लगभग 2 लाख 45 हजार माध्यमिक विद्यालय कार्य कर रहे थे। इनके अतिरिक्त केन्द्रीय विद्यालय’ व ‘नवोदय विद्यालय भी स्थापित किए गए  हैं। किंतु इन विद्यालयों में विद्यार्थियों का दाखिला संतोषजनक नहीं रहा है। यह मात्र 20% है। इसके अतिरिक्त शिक्षा के व्यावसायीकरण में भी विशेष सफलता नहीं मिली है।

4. उच्चतर शिक्षा– भारत में विश्वविद्यालयों एवं विश्वविद्यालय स्तर की संस्थाओं में 20 केन्द्रीय विश्वविद्यालय, 215 राज्य विश्वविद्यालय, 100 समकक्ष विश्वविद्यालय, राज्य अधिनियम के अंतर्गत गठित 5 संस्थाएँ तथा 13 राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान शामिल हैं। ये संस्थान 1800 महिला महाविद्यालयों सहित 17000 महाविद्यालयों के अतिरिक्त हैं। देश में शिक्षा के क्षेत्र में अब प्राइवेट विश्वविद्यालय भी खुल गए हैं।

5. तकनीकी, चिकित्सकीय एवं कृषि शिक्षा– स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थानों में काफी वृद्धि हुई है। वर्तमान में देश में 1215 पॉलीटैक्निकल संस्थाएँ तथा 778 मान्यता प्राप्त इंजीनियरिंग कॉलेज हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में, देश में 268 मेडिकल कॉलेज तथा 126 डेन्टल कॉलेज हैं। देश में अनेक अनुसंधान केन्द्र भी स्थापित किए गए

6. ग्रामीण शिक्षा- ग्रामीण क्षेत्रों में भी शिक्षा के व्यापक प्रसार पर बल दिया जा रहा है। इस हेतु राष्ट्रीय ग्रामीण उच्च शिक्षा परिषद् की स्थापना की जा चुकी है।

7. प्रौढ़ तथा स्त्री शिक्षा- प्रौढ़ शिक्षा के प्रोत्साहन के लिए राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना की गई। 1975 ई० में औपचारिक शिक्षा कार्यक्रम शुरू किया गया है। स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार करने के लिए स्त्री शिक्षा परिषद् की स्थापना की गई है।

8. कुल साक्षरता अभियान– देश में सभी के लिए शिक्षा’ आन्दोलन शुरू किया जा चुका है। | इसके फलस्वरूप साक्षरता में तेजी से वृद्धि हुई है। उपर्युक्त प्रयासों के बावजूद हमने शिक्षा के क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय सफलता अर्जित नहीं की है। आज भी भारत में निरक्षर लोगों की संख्या विश्व में सबसे अधिक है, व्यावसायिक शिक्षा की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है, बालिकाओं का दाखिला प्रतिशत अपेक्षाकृत कम है, ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों में शिक्षा तक पहुँच कम है और निजीकरण से शैक्षिक जगत में असमानताएँ बढ़ी हैं। अतः शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है।

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 4
Chapter Name Poverty (निर्धनता)
Number of Questions Solved 57
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 4 Poverty (निर्धनता)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निर्धनता की परिभाषा दीजिए।
उत्तर
शाहीन रफी खान और डेनियन किल्लेन के शब्दों में-“निर्धनता भूख है। निर्धनता बीमार होने पर चिकित्सक को न दिखा पाने की विवशता है। निर्धनता स्कूल में न जा जाने और निरक्षर रह जाने का नाम है। निर्धनता बेरोजगारी है। निर्धनता भविष्य के प्रति भय है; निर्धनता दिन में एक बार भोजन पाना है। निर्धनता अपने बच्चे को उस बीमारी से मरते देखने को कहते हैं जो अस्वच्छ पानी पीने से होती है। निर्धनता शक्ति, प्रतिनिधित्वहीनता और स्वतंत्रता की हीनता का नाम है।” संक्षेप में, निर्धनता से अभिप्राय है-“जीवन, स्वास्थ्य और कार्यकुशलता के लिए न्यूनतम उपभोग आवश्यकताओं की प्राप्ति की अयोग्यता।”

प्रश्न 2.
काम के बदले अनाज कार्यक्रम का क्या अर्थ है?
उत्तर
‘काम के बदले अनाज’ कार्यक्रम देश के 150 सर्वाधिक पिछड़े जिलों में इस उद्देश्य के साथ शुरू किया गया ताकि पूरक वेतन रोजगार के सृजन को बढ़ाया जा सके। इस कार्यक्रम के अंतर्गत मुख्यतः जल संरक्षण, सूखे से सुरक्षा और भूमि विकास संबंधी कार्य सम्पन्न कराए जाते हैं और मजदूरी के न्यूनतम 25% का भुगतान नकद राशि में तथा शेष भुगतान अनाज के रूप में किया जाता है। इस योजना के अंतर्गत देश में प्रत्येक परिवार के एक सक्षम व्यक्ति को 100 दिनों के लिए न्यूनतम मजदूरी पर रोजगार देने का प्रावधान है। यह कार्यक्रम शत-प्रतिशत केन्द्र प्रायोजित है।

प्रश्न 3.
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वरोजगार का एक-एक उदाहरण दें।
उत्तर
ग्रामीण क्षेत्र में जब एक किसान अपनी भूमि पर अपने निजी संसाधनों का प्रयोग करके फसलों का उत्पादन करता है तो यह स्वरोजगार कहलाएगा। इस प्रकार शहरी क्षेत्र में जब कोई आदमी एक दुकान खोलकर उसे चलाता है तो वह भी स्वरोजगार श्रमिक कहलाएगा।

प्रश्न 4.
आय अर्जित करने वाली परिसम्पत्तियों के सृजन से निर्धनता की समस्या का समाधान किस प्रकार हो सकता है?
उत्तर
निर्धनों के विकास के लिए विकल्पों की खोज के क्रम में नीति निर्धारकों को लगा कि वर्धनशील परिसम्पत्तियों और कार्य सृजन के साधनों द्वारा निर्धनों के लिए आय और रोजगार को बढ़ाया जा सकता है। इस नीति को तृतीय पंचवर्षीय योजना से आरम्भ किया गया। इस कार्यक्रम के अंतर्गत छोटे उद्योग लगाने के लिए बैंक ऋणों के माध्यम से वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराया जाता है। भूमिहीनों को भूमि आवंटित करके रोजगार के अधिक अवसरों का सृजन होता है। वित्तीय सहायता, भूमि एवं अन्य परिसम्पत्तियों के अर्जन से रोजगार के अवसरों में वृद्धि होती है तथा आमदनी बढ़ती है, जिससे निर्धनता की समस्या हल होती है।

प्रश्न 5.
भारत सरकार द्वारा निर्धनता पर त्रि-आयामी प्रहार की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर
भारत सरकार ने निर्धनता निवारण के लिए त्रि-आयामी नीति अपनाई, जिसका विवरण इस प्रकार है
1. संवृद्धि आधारित रणनीति- यह इस आशा पर आधारित है कि आर्थिक संवृद्धि (अर्थात् सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय में तीव्र वृद्धि) के प्रभाव समाज के सभी वर्गों तक पहुँच जाएँगे। यह माना जा रहा था कि तीव्र दर से औद्योगिक विकास और चुने हुए क्षेत्रों में हरित क्रांति के माध्यम से कृषि का पूर्ण कार्याकल्प हो जाएगा। परंतु जनसंख्या वृद्धि के परिणामस्वरूस प्रति व्यक्ति आय में बहुत कमी आई जिस कारण धनी और निर्धन के बीच की दूरी और बढ़ गई।

2. वर्धनशील परिसम्पत्तियों और कार्य का सृजन- प्रथम आयाम की असफलता के बाद नीति-निर्धारकों को ऐसा लगा कि वर्धनशील परिसम्पत्तियों और कार्य सृजन के साधनों द्वारा निर्धनों के लिए आय और रोजगार को बढ़ाया जा सकता है। इस दूसरी नीति को द्वितीय पंचवर्षी योजना से आरम्भ किया गया। स्वरोजगार एवं मजदूरी आधारित रोजगार कार्यक्रमों को निर्धनता भगाने का मुख्य माध्यम माना जाता है। स्वरोजगार कार्यक्रमों के उदाहरण हैं—ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम (REGP), प्रधानमंत्री रोजगार योजना (PMRY) तथा स्वर्णजयंती शहरी रोजगार योजना (SJSRY)। इन रोजगार कार्यक्रमों एवं वित्तीय सहायता के माध्यम से निम्न आय वर्ग के लोगों को आय अर्जित करने के अवसर प्राप्त हुए हैं।

3. न्यूनतम आधारभूत सुविधाएँ– निर्धनता निवारण की दिशा में तीसरा आयाम न्यूनतम आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराना है। इस नीति के अंतर्गत उपभोग, रोजगार के अवसर, स्वास्थ्य एवं शिक्षा में आपूर्ति बढ़ाने पर बल दिया गया। निर्धनों के खाद्य उपभोग और पोषण-स्तर को प्रभावित करने वाले तीन प्रमुख कार्यक्रम हैं—सार्वजनिक वितरण व्यवस्था, एकीकृत बाल विकास योजना तथा मध्यावकाश भोजन योजना। बेसहारा बुजुर्गों एवं निर्धन महिलाओं के लिए भी सामाजिक सहायता अभियान चलाए जा रहे हैं।

प्रश्न 6.
सरकार ने बुजुर्गों, निर्धनों और असहाय महिलाओं के सहायतार्थ कौन-से कार्यक्रम अपनाए हैं?
उत्तर
सरकार ने बुजुर्गों, निर्धनों और असहाय महिलाओं की सहायतार्थ निम्नलिखित कार्यक्रम अपनाए हैं-सामाजिक सुरक्षा बीमा योजना (1989-80 ई०), राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (1994-95 ई०), राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना (1994-95 ई०), राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना (1994-95 ई०), प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (1997-98 ई०), लक्ष्य आधारित खाद्यान्न वितरण कार्यक्रम (1997-98 ई०), महिला सर्वशक्ति योजना (1998-99 ई०), अन्नपूर्णा योजना (2001 ई०), महिला स्वयंसिद्ध योजना (2001-02 ई०), महिला स्वाधार योजना (2001-02 ई०), वरिष्ठ पेंशन बीमा योजना (2003-04 ई०), जननी सुरक्षा योजना (2003-04 ई०), सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा योजना (2003-04 ई०), आशा योजना (2005 ई०), एकल बालिका नि:शुल्क शिक्षा योजना (2005 ई०), राजीव गांधी किशोरी सशक्तिकरण स्कीम-सबला (2010-11 ई०), इन्दिरागांधी मातृत्व सहयोग योजना (2010-11 ई०)।

प्रश्न 7.
क्या निर्धनता और बेरोजगारी में कोई संबंध होता है? समझाए।
उत्तर
निर्धनता का संबंध व्यक्ति के रोजगार एवं उसके स्वरूप से भी होता है; जैसे—बेरोजगारी, अल्परोजगार, कभी-कभी काम मिलना आदि। अधिकांश शहरी निर्धन या तो बेरोजगार हैं या अनियमित मजदूर हैं, जिन्हें कभी-कभी रोजगार मिलता है। ये अनियमित मजदूर समाज के बहुत ही दयनीय सदस्य हैं। क्योंकि इनके पास रोजगार सुरक्षा, परिसम्पत्तियाँ, वांछित कार्य-कौशल, पर्याप्त अवसर तथा निर्वाह के लिए अधिशेष नहीं होते हैं। इसीलिए भारत सरकार ने अकुशल श्रमिकों के लिए रोजगार कार्यक्रम आरम्भ किए। इसी क्रम में 1970 ई० के दशक में चलाया गया ‘काम के बदले अनाज’ एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम रही। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अकुशल निर्धन लोगों के लिए मजदूरी पर रोजगार के सृजन के लिए भी सरकार के पास अनेक कार्यक्रम हैं। इनमें से प्रमुख हैं-राष्ट्रीय काम के बदले अनाज कार्यक्रम तथा सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना।

प्रश्न 8.
सापेक्ष और निरपेक्ष निर्धनता में क्या अंतर है?
उत्तर
सापेक्ष निर्धनता– सापेक्ष निर्धनता से अभिप्राय विभिन्न वर्गों, प्रदेशों या दूसरे देशों की तुलना में पायी जाने वाली निर्धनता से है। जिस देश या वर्ग के लोगों का जीवन निर्वाह स्तर निम्न होता है वे उच्च निर्वाह स्तर के लोगों या देशों की तुलना में गरीब या सापेक्ष रूप से निर्धन माने जाते हैं।

निरपेक्ष निर्धनता- निरपेक्ष निर्धनता से अभिप्राय किसी देश की आर्थिक अवस्था को ध्यान में रखते हुए निर्धनता के माप से है। भारत में निरपेक्ष निर्धनता का अनुमान लगाने के लिए निर्धनता रेखा की धारणा का प्रयोग किया जाता है। निर्धनता रेखा वह है जो उस प्रति व्यक्ति औसत मासिक व्यय को प्रकट करती है जिसके द्वारा लोग अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को संतुष्ट कर सकते हैं। भारत की कीमतों के आधार पर ३ 328 ग्रामीण क्षेत्र में तथा १ 454 शहरी क्षेत्र में प्रति मास उपभोग को निर्धनता रेखा माना गया है। जिन लोगों का प्रति माह उपभोग व्यय इससे कम है उन्हें निर्धन माना जाता है। कैलोरी की दृष्टि से निर्धनता रेखा की सीमा ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी है।

प्रश्न 9.
मान लीजिए कि आप एक निर्धन परिवार से हैं और छोटी सी दुकान खोलने के लिए सरकारी सहायता पाना चाहते हैं। आप किस योजना के अंतर्गत आवेदन देंगे और क्यों? ”
उत्तर
स्वरोजगार कार्यक्रम के अंतर्गत निर्धन परिवार का कोई भी शिक्षित सदस्य किसी भी प्रकार की छोटी दुकान चलाने के लिए सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकता है। पूर्व रोजगार कार्यक्रमों के तहत परिवारों और व्यक्तियों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है, पर नब्बे के दशक से इस नीति में बदलाव 
आया है। अब इन कार्यक्रमों का लाभ चाहने वालों को स्वयं सहायता समूहों का गठन करने के लिए प्रेरित किया जाता है। प्रारम्भ में उन्हें अपनी ही बचतों को एकत्र कर परस्पर उधार देने को प्रोत्साहित किया जाता है। और बाद में सरकार ‘बैंकों के माध्यम से उन स्वयं सहायता समूहों को आंशिक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है। ये समूह ही निश्चित करते हैं कि किसे ऋण दिया जाए।

प्रश्न 10.
ग्रामीण और शहरी बेरोजगारी में अंतर स्पष्ट करें। क्या यह कहना सही होगा कि निर्धनता गाँवों से शहरों में आ गई है? अपने उत्तर के पक्ष में निर्धनता अनुपात प्रवृत्ति का प्रयोग करें।
उत्तर
दिए गए तालिका’और चित्र भारत में निर्धनता प्रवृत्तियों के ग्रामीण-शहरी परिदृश्य को प्रस्तुत करते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में पायी जाने वाली निर्धनता शहरी निर्धनता की तुलना में अभी भी अधिक है।
तालिका : गरीबी की जनगणना का अनुपात-ग्रामीण, शहरी व कुल 
(प्रतिशत में)
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 4 Poverty 1

इन आँकड़ों से निम्नलिखित निष्कर्ष निकालते हैं

  1. ग्रामीण निर्धनता 1972-73 ई० में 54% से घटकर 1999- 2000 में 27.09% हो गई थी।
  2. शहरी निर्धनता भी 1972-73 ई० में 42% से गिरकर 23.62% हो गई थी।
  3. गाँवों में गरीबी का स्तर शहरों से ज्यादा है।
  4. 1993-94 ई० तथा 1999-2000 ई० में गरीबी के स्तर में सराहनीय,कमी आई।

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 4 Poverty 2
प्रश्न 11.
भारत के कुछ राज्यों में निर्धनता रेखा के नीचे की जनसंख्या का प्रयोग कर सापेक्ष निर्धनता की अवधारणा की व्याख्या करें।
उत्तर
योजना आयोग द्वारा जारी अखिल भारतीय स्तर के आँकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, सिक्किम, तमिलनाडु, कनार्टक व उत्तराखण्ड में निर्धनता अनुपात में 10 प्रतिशत बिन्दु से भी अधिक की कमी वर्ष 2005 से 2010 में दर्ज की गई है, जबकि पूर्वात्तर के राज्यों असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम व नागालैण्ड में निर्धनता अनुपात में वृद्धि हुई है, बिहार, छत्तीसगढ़ व उत्तर प्रदेश जैसे अपेक्षाकृत बड़े राज्यों में निर्धनता अनुपात में मामूली कमी दर्ज की गई है। योजना आयोग के इन आँकड़ों के अनुसार 2009-10 में देश में निर्धनों की सर्वाधिक संख्या वाले राज्य क्रमशः उत्तर प्रदेश, बिहार व महाराष्ट्र रहे हैं, जबकि निर्धनता अनुपात की दृष्टि से पहले तीन स्थान क्रमशः बिहार, छत्तीसगढ़ व मणिपुर के हैं। केन्द्रशासित क्षेत्रों में निर्धनता अनुपात न्यूनतम अण्डमान निकोबार में 0.4 प्रतिशत, पुदुचेरी में 1.2 प्रतिशत व लक्षद्वीप में 6.8 प्रतिशत पाया गया है। राज्यों में न्यूनतम निर्धनता अनुपात वाले राज्य क्रमशः गोवा (8.7 प्रतिशत), जम्मू कश्मीर (9.4 प्रतिशत) व हिमचल प्रदेश (9.5 प्रतिशत) रहे हैं।

प्रश्न 12.
मान लीजिए कि आप किसी गाँव के निवासी हैं। अपने गाँव से निर्धनता निवारण के कुछ | सुझाव दीजिए।
उत्तर
स्वतंत्रता के बाद से हमारी सभी नीतियों का ध्येय समान और सामाजिक न्याय सहित तीव्र और संतुलित आर्थिक विकास रहा है। हमारा निर्धनता निवारण कार्यक्रम प्रगति पर है लेकिन हमें निर्धनता निवारण में सराहनीय सफलता प्राप्त नहीं हुई है। ग्रामीण होने के नोते गाँव से निर्धनता निवारण हेतु मैं निम्नलिखित सुझाव देंगा

  1. सर्वप्रथम निर्धनों की पहचान की जाए।
  2. संवृद्धि कार्यक्रमों में निर्धनों की प्रभावपूर्ण सहभागिता को प्रोत्साहन दिया जाए।
  3. निर्धनता-ग्रस्त क्षेत्रों की पहचान कर वहाँ स्कूल, सड़कें, विद्युत, संचार, सूचना आदि आधारित संरचनाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
  4. संवृद्धि कार्यक्रमों में निर्धनों की प्रभावपूर्ण सहभागिता होनी चाहिए जिससे रोजगार के अवसरों की | रचना होगी और आय के स्तर में सुधार होगा।
  5. स्वरोजगार कार्यक्रमों के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाए।
  6. अकुशल श्रमिकों को प्रशिक्षण दिया जाए।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
केन्द्र आयोजित ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम की पुनर्संरचना की गई
(क) 1 मई, 1999 को
(ख) 1 अप्रैल, 1999 को
(ग) 2 अक्टूबर, 1993 को
(घ) 2 नवम्बर, 1993 को
उत्तर
(ख) 1 अप्रैल, 1999 को

प्रश्न 2.
अन्नपूर्णा योजना के तहत पात्र वयोवृद्ध नागरिकों को प्रतिमाह कितना अनाज निःशुल्क उपलब्ध कराये जाने का प्रावधान है? (क) 5 किग्रा
(ख) 10 किग्रा
(ग) 15 किग्रा
(घ) 20 किग्रा
उत्तर
(ख) 10 किग्रा

प्रश्न 3.
7 सितम्र, 2005 को अधिसूचित मनरेगा कार्यक्रम का उद्देश्य
(क) प्रत्येक ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्य को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 100 दिन का गारण्टीशुदा रोजगार उपलब्ध कराना। (ख) प्रत्येक ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्य को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 90 दिन का| गारण्टीशुदा रोजगार उपलब्ध कराना।
(ग) प्रत्येक ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्य को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 200 दिन का 
गारण्टीशुदा रोजगार उपलब्ध कराना।
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क)प्रत्येक ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्य को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 100 दिन का गारण्टीशुदा 
रोजगार उपलब्ध कराना।

प्रश्न 4.
बारहवीं पंचवर्षीय योजना में विकास का लक्ष्य रखा गया
(क) 6%
(ख) 7%
(ग) 8%
(घ) 9%
उत्तर
(घ) 9%

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निर्धनता से क्या आशय है?
उत्तर
निर्धनता वह सामाजिक स्थिति है जिसमें समाज का एक भाग अपने जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं की संतुष्टि करने में असमर्थ रहता है।

प्रश्न 2.
निर्धनता की परिभाषा का मूल आधार क्या है?
उत्तर
निर्धनता की परिभाषा का मूल आधार न्यूनतम या अच्छे जीवन-स्तर की कल्पना है।

प्रश्न 3.
नगरीय क्षेत्र में निर्धनता की माप का आधार क्या है?
उत्तर
नगरीय क्षेत्र में वह व्यक्ति निर्धन माना जाता है जिसे प्रतिदिन 2,100 कैलोरी प्राप्त नहीं हो पाती।

प्रश्न 4.
ग्रामीण क्षेत्र में निर्धनता की माप का आधार क्या है?
उत्तर
ग्रामीण क्षेत्र में वह व्यक्ति निर्धन माना जाता है जिसे प्रतिदिन 2,400 कैलोरी प्राप्त नहीं हो पाती।

प्रश्न 5.
भारत में निर्धनता का प्रतिशत क्या है?
उत्तर
भारत में निर्धनता का प्रतिशत 26.1 है। इस प्रकार भारत को हर चौथा व्यक्ति निर्धन है।

प्रश्न 6.
कुछ निर्धन वर्गों को बताइए।
उत्तर
गाँवों में भूमिहीन श्रमिक, नगरों में झुग्गियों में रहने वाले लोग, निर्माण स्थलों के दैनिक भोगी श्रमिक, भिक्षु तथा ढाबों में काम करने वाले बाल श्रमिक आदि।

प्रश्न 7.
भूमिहीनता से क्या आशय है?
उत्तर
किसी भूमि का स्वामी न होना भूमिहीनता कहलाती है।

प्रश्न 8.
बेरोजगारी से क्या आशय है?
उत्तर
मजदूरी की प्रचलित दरों पर काम करने के इच्छुक व योग्य व्यक्तियों को काम को न मिल पाना बेरोजगारी कहलाता है।

प्रश्न 9. 
परिवार का आकार क्या होता है?
उत्तर
परिवार में सदस्यों की संख्या को परिवार का आकार कहते हैं।

प्रश्न 10.
निरक्षरता से क्या आशय है?
उत्तर
निरक्षरता से आशय व्यक्ति विशेष में लिखने-पढ़ने की योग्यता का न होना है।

प्रश्न 11.
खराब स्वास्थ्य/कुपोषण क्या होता है?
उत्तर
स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं/पोषण का अभाव खराब स्वास्थ्य/कुपोषण कहलाता है।

प्रश्न 12.
बाल श्रम क्या है?
उत्तर
14 वर्ष से कम आयु में धन कमाने के लिए काम करना बाल श्रम कहलाता है।

प्रश्न 13.
असहायता से क्या आशय है?
उत्तर
असहायता से आशय निम्न लोगों के साथ खेतों, कारखानों, सरकारी कार्यालयों, रेलवे स्टेशनों तथा अन्य स्थानों पर दुर्व्यवहार करने से है।

प्रश्न 14.
सामाजिक अपवर्जन क्या है?
उत्तर
निर्धनों को बेहतर माहौल और अधिक अच्छे वातावरण में रहने वाले सम्पन्न लोगों की सामाजिक समता से वंचित रहकर निकृष्ट वातावरण में दूसरे निर्धनों के साथ रहना सामाजिक अपवर्जन कहलाता है।

प्रश्न 15.
असुरक्षा की अवधारणा क्या है?
उत्तर
असुरक्षा निर्धनता के प्रति एक माप है। किसी भी प्राकृतिक आपदा (बाढ़ अथवा भूकम्प) के कारण अथवा नौकरी न मिलने के कारण, दूसरे लोगों की तुलना में अधिक प्रभावित होने की बड़ी सम्भावना का निरूपण ही असुरक्षा है।

प्रश्न 16.
निर्धनता के आकलन की सर्वमान्य विधि क्या है?
उत्तर
निर्धनता के आकलन की सर्वमान्य विधि ‘आय’ अथवा ‘उपभोग’ स्तर है।

प्रश्न 17.
अमेरिका में किस आदमी को निर्धन माना जाता है?
उत्तर
अमेरिका में उस आदमी को निर्धन माना जाता है जिसके पास कार नहीं है।

प्रश्न 18.
निर्धनता रेखा का आकलन किस संगठन द्वारा किया जाता है?
उत्तर
निर्धनता रेखा का आकलन, प्रतिदर्श सर्वेक्षण के माध्यम से राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (N.S.S.O.) द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 19.
उन सामाजिक समूहों को बताइए जो निर्धनता के प्रति सर्वथा असुरक्षित है?
उत्तर
निम्न सामाजिक समूह निर्धनता के प्रति सर्वथा असुरक्षित हैं-
1. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के परिवार,
2. ग्रामीण कृषि श्रमिक परिवार,
3. नगरीय अनियमित श्रमिक परिवार।

प्रश्न 20.
अनुसूचित जनजातियों में निर्धनता का प्रतिशत क्या है? ।
उत्तर
अनुसूचित जनजातियों में निर्धनता का प्रतिशत 51 है।

प्रश्न 21.
नगरीय क्षेत्रों में अनियमित मजदूरों का निर्धनता का प्रतिशत कितना है?
उत्तर
नगरीय क्षेत्रों में अनियमित मजदूरों का निर्धनता का प्रतिशत 50 है।

प्रश्न 22.
भूमिहीन कृषि श्रमिकों का निर्धनता का प्रतिशत क्या है?
उत्तर
भूमिहीन कृषि श्रमिकों का निर्धनता का प्रतिशत 50 है।

प्रश्न 23.
अनुसूचित जातियों में निर्धनता का प्रतिशत क्या है?
उत्तर
अनुसूचित जातियों में निर्धनता का प्रतिशत 63 है।

प्रश्न 24.
बिहार और छत्तीसगढ़ में निर्धनता का प्रतिशत क्या है? ”
उत्तर
बिहार में निर्धनता का प्रतिशत 53.5 तथा छत्तीसगढ़ में 48.7 है। यह स्थिति वर्ष 2009-10 की

प्रश्न 25.
किन राज्यों में निर्धनता में उल्लेखनीय गिरावट आई है?
उत्तर
केरल, जम्मू कश्मीर, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, गुजरात, पश्चिम बंगाल, पंजाब और हरियाणा में निर्धनता मैं उल्लेखीय गिरावट आई है।

प्रश्न 26.
वर्तमान समय में भारत सरकार की निर्धनता विरोधी रणनीति किन दो कारकों पर निर्भर| करती है?
उत्तर
वर्तमान में भारत सरकार की निर्धनता विरोधी रणनीति निम्न कारकों पर निर्भर करती है
1. आर्थिक संवृद्धि को प्रोत्साहन तथा
2. लक्षित निर्धनता विरोधी कार्यक्रम।।

प्रश्न 27.
‘राष्ट्रीय काम के बदले अनाज कार्यक्रम कब और कितने जिलों में लागू किया गया?
उत्तर
यह कार्यक्रम 2004 ई० में देश के सबसे अधिक पिछड़े 150 जिलों में लागू किया गया।

प्रश्न 28.
प्रधानमंत्री रोजगार योजना, 2003 ई० का उद्देश्य क्या है?
उत्तर
इस कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में शिक्षित बेरोजगार युवाओं के लिए स्वरोजगार के अवसर सृजित करना है।

प्रश्न-29.
स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना 1999 ई० का उद्देश्य क्या है?
उत्तर
इस कार्यक्रम का उद्देश्य सहायता प्राप्त निर्धन परिवारों को स्व-सहायता समूहों में संगठित कर बैंक ऋण और सरकारी सहायता के संयोजन द्वारा निर्धनता रेखा से ऊपर लाना है।

प्रश्न 30. भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
उत्तर
भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती सभी को स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, निर्धनों को उचित सम्मान दिलाना है।

प्रश्न 31.
निर्धनता उन्मूलन के कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?
उत्तर
कार्यक्रमों का उचित क्रियान्वयन किया जाए, उनके परस्पर व्यापी होने के दोष को समाप्त किया जाए तथा उनके उचित परिवीक्षण पर बल दिया जाए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में निर्धनता रेखा का आकलन कैसे किया जाता है? क्या आप समझते हैं कि निर्धनता आकलन को यह तरीका सही है? । उत्तर
भारत में निर्धनता रेखा का आकलन दो स्तरों पर किया जाता है-
1. आय स्तर,
2. उपभोम स्तर।

आय स्तर- आय स्तर के आधार पर वर्ष 2009-10 में किसी व्यक्ति के लिए निर्धनता रेखा का निर्धारण ग्रामीण क्षेत्रों में ३१ 672.8 प्रतिमाह और शहरी क्षेत्रों में १ 859.6 प्रतिमाह किया गया था।

उपभोग स्तर-
उपभोग स्तर के आधार पर भारत में स्वीकृत कैलोरी आवश्यकता ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन और नगरीय क्षेत्रों में 2100 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन है। विभिन्न देशों में निर्धनता आकलन के तरीके भिन्न-भिन्न हैं। प्रत्येक देश एक काल्पनिक रेखा का प्रयोग करता है जिसे विकास एवं उसके स्वीकृत न्यूनतम सामाजिक मानदण्डों के वर्तमान स्तर के अनुरूप माना जाता है; उदाहरण के लिए अमेरिका में उस आदमी को निर्धन माना जाता है जिसके पस कार नहीं है। जबकि भरत में यह उपयोग स्तर पर आधारित हैं निर्धनता आकलन का यह तरीका सही है।

प्रश्न 2.
भारत में 1973 ई० से निर्धनता की प्रवृत्तियों की चर्चा कीजिए।
उत्तर
भारत में निर्धनता अनुपात 1973 ई० में लगभग 55 प्रतिशत था जो 1983 ई० में घटकर 36 प्रतिशत हो गया। वर्ष 2000 में निर्धनता रेखा के नीचे के निर्धनों का अनुपात 26 प्रतिशत पर आ गया। इसमें नगरों में निर्धनता अनुपात 23.62 प्रतिशत तथा ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता अनुपात 27.09 प्रतिशत था। अनुमान है कि यह 2007 ई० में गिरकर 19.3 प्रतिशत रह जाएगा। निरपेक्ष संख्या के रूप में भारत में 1973-74 ई० में 32.13 करोड़ जनसंख्या निर्धन थी। यह 1999-2000 ई० में घटकर 26.02 करोड़ रह गई। वर्ष 2015-16 में यह संख्या 38.14 करोड़ हो गई।

प्रश्न 3.
उन सामाजिक और आर्थिक समूहों की पहचान कीजिए जो भारत में निर्धनता के समक्ष निरुपोय हैं?
उत्तर
निर्धनता अनुपात भारत के सभी सामाजिक समूहों और आर्थिक वर्गों में एक समान नहीं है। जो सामाजिक समूह निर्धनता के प्रति सर्वाधिक असुरक्षित हैं, वे अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के परिवार हैं। इसी प्रकार आर्थिक समूहों में सर्वाधिक असुरक्षित समूह, ग्रामीण कृषि श्रमिक परिवार और नगरीय अनियमित श्रमिक परिवार हैं। भारत में अनुसूचित जनजाति में 51 प्रतिशत, नगरीय क्षेत्र के अनियमित मजदूरों में 50 प्रतिशत, भूमिहीन कृषि श्रमिकों में 50 प्रतिशत तथा अनुसूचित जातियों में 43 प्रतिशत निर्धन हैं।

प्रश्न 4.
भारत में अंतर्राज्यीय निर्धनता में विभिन्नता के कारण बताइए।
उत्तर
भारत में प्रत्येक राज्य में निर्धनता अनुपात में भिन्नता पाई जाती है। कुछ राज्य अति निर्धन बने हुए हैं। तो कुछ राज्यों की निर्धनता अनुपात में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। जहाँ ओडिशा, बिहार, असम व त्रिपुरा आदि में निर्धनता अधिक है, वहीं, गोवा, जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में निर्धनता में काफी कमी आई है। इससे अंतर्राज्यीय असमानताएँ बढ़ी हैं। इसके मुख्य कारण हैं

1. पंजाब व हरियाणा जैसे राज्यों में कृषि विकास दर काफी ऊँची रही है,
2. केरल ने मानव संसाधन के विकास पर काफी बल दिया है,
3. पश्चिम बंगाल ने भू-सुधार कार्यक्रमों के सफल क्रियान्वयन में सफलता प्राप्त की है तथा
4. आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु में सार्वजनिक वितरण प्रणाली बेहद सफल रही है।

प्रश्न 5.
निर्धनता उन्मूलन की वर्तमान सरकारी रणनीति की चर्चा कीजिए।
उत्तर
निर्धनता उन्मूलन ही भारत की विकास रणनीति का प्रमुख उद्देश्य रहा है। सरकार की वर्तमान रणनीति मुख्यतः दो घटों पर आधारित है
1. आर्थिक संवृद्धि को प्रोत्साहन तथा
2. लक्षित निर्धनता विरोधी कार्यक्रम।
1. आर्थिक संवृद्धि को प्रोत्साहन- 1950 से 1980 ई० तक देश में प्रति व्यक्ति आय बहुत धीमी 
गति से बढ़ी (3.5 प्रतिशत)। किंतु 1980-90 ई० के दशक में यह 6 प्रतिशत तक पहुँच गई। दसवीं योजना में विकास लक्ष्य 8 प्रतिशत था। बारहवीं योजना में विकास लक्ष्य 9% रखा गया है। आर्थिक संवृद्धि की उच्च दर ने निर्धनता को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

2. लक्षित निर्धनता विरोधी कार्यक्रम- इनके मुख्य कार्यक्रम निम्न प्रकार हैं-राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम, 2005 ई०; राष्ट्रीय काम के बदले अनाज कार्यक्रम, 2004 ई; प्रधानमंत्री रोजगार योजना, 1993 ई०; ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम 1995 ई; स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, 1999 ई०; प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना, 2000 ई०; अन्त्योदय अन्न योजना।। हाल के वर्षों में इन कार्यक्रमों के उचित पर्यवेक्षण पर बल दिया गया है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर संक्षेप में दीजिए
(क) मानव निर्धनता से आप क्या समझते हैं?
(ख) निर्धनों में भी सबसे निर्धन कौन हैं?
(ग) महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम, 2005 ई० की मुख्यविशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर
(क) मानव निर्धनता से अभिप्राय मनुष्य का जीवन, स्वास्थ्य और कुशलता के लिए न्यूनतम आवश्यकताओं की आपूर्ति न कर पाना है। परंतु आधुनिक समय में निर्धनता को निरक्षरता स्तर, कृपोषण के कारण रोग प्रतिरोध की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, रोजगार के अवसरों की कमी, सुरक्षित पेयजल एवं स्वच्छता तक न पहुँच पाने के संदर्भ में जाना जाता है।
(ख) निर्धनों में सबसे निर्धन अनुसूचित जनजातियाँ, नगरीय अनियमित मजदूर, ग्रामीण खेतिहर मजदूर 
तथा अनुसूचित जातियाँ आदि हैं।
(ग) महात्मा गांधी सृष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम, 2005 ई० की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. यह अधिनियम देश के 200 जिलों में प्रत्येक परिवार को वर्ष में 100 दिन के सुनिश्चित रोजगार का प्रावधान करता है।
  2. धीरे-धीरे इस योजना का विस्तार 600 जिलों में किया जाएगा।
  3. प्रस्तावित रोजगारों का एक-तिहाई रोजगार महिलाओं के लिए आरक्षित है।
  4. यदि आवेदक को 15 दिन के अंदर रोजगार नहीं दिया जा सका, तो वह दैनिक रोजगार भत्ते का हकदार होगा।

प्रश्न 7.
निर्धनता के विभिन्न आयामों को बताइए।
उत्तर
निर्धनता के अनेक आयाम निम्नलिखित हैं
(अ) आर्थिक आयाम

  1. भुखमरी,
  2. आश्रय का न होना,
  3. नियमित रोजगार की कमी।।

(ब) सामाजिक आयाम

  1. निरक्षरता स्तर,
  2. कुपोषण के कारण रोग-प्रतिरोधी क्षमता में कमी
  3. स्वास्थ्य सेवाओं की कमी तथा
  4. सुरक्षित पेयजल एवं स्वच्छता तक पहुँच में कमी।

प्रश्न 8.
भारत में निर्धनता के प्रति सर्वाधिक असुरक्षित समूहों की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
भारत में असुरक्षित समूहों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के परिवार, ग्रामीण कृषि श्रमिक परिवार, नगरीय | अनियमित मजदूर परिवार निर्धनता के प्रति सर्वाधिक असुरक्षित हैं।
  2. इनमें निर्धनता के नीचे जीवन-यापन करने वाले लोगों का प्रतिशत भारत के सभी समूहों के लिए औसत प्रतिशत (26) से अधिक है। यह अनुसूचित जनजातियों में 51, नगरीय अनियमित मजदूरों में 50, भूमिहीनों व कृषि श्रमिकों में 50 तथा अनुसूचित जातियों में 43 प्रतिशत है।
  3. ये समूह आर्थिक व सामाजिक सुविधाओं से वंचित हैं।
  4. अनुसूचित जनजाति परिवारों को छोड़कर अन्य सभी तीनों समूहों में नब्बे के दशक में कमी आई है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निर्धनता को परिभाषित कीजिए। इसके मुख्य स्वरूप बताइए। निर्धनता का आकलन कैसे | किया जाता है?
उत्तर

निर्धनता का अर्थ एवं परिभाषा

निर्धनता का अर्थ उस स्थिति से है जिसमें समाज का एक भाग अपने जीवन की आधारभूत/न्यूनतम आवश्यकताओं को संतुष्ट करने में विफल रहता है। इन आधारभूत/न्यूनतम आवश्यकताओं में भोजन, वस्त्र, मकान, शिक्षा तथा स्वास्थ्य संबंधी न्यूनतम मानवीय आवश्यकताएँ सम्मिलित होती हैं। इन न्यूनतम आवश्यकताओं के पूरा न होने पर मनुष्य को कष्ट होता है, इसके स्वास्थ्य का स्तर गिरता है, कार्यकुशलता का ह्रास होता है, उत्पादन की हानि होती है, आय कम होती है। इस प्रकार निर्धनता और उत्पादन के निम्न स्तर का दुश्चक्र बन जाता है।
परिभाषा– निर्धनता से अभिप्राय है-जीवन, स्वास्थ्य तथा कार्यकुशलता के लिए न्यूनतम उपभोग आवश्यकताओं की प्राप्ति की अयोग्यता।

निर्धनता के स्वरूप

निर्धनता को दो रूपों में समझाया जा सकता है
1. सापेक्ष निर्धनता– सापेक्ष निर्धनता से आशय विभिन्न वर्गों, प्रदेशों या दूसरे देशों की तुलना में 
पायी जाने वाली निर्धनता से है। जिस देश या वर्ग के लोगों का जीवन निर्वाह स्तर निम्न होता है, वे सापेक्ष रूप से निर्धन होते हैं।
उदाहरण- मामा अमेरिका की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय, 34,870 डॉलर और भारत की प्रति 
व्यक्ति वार्षिक आय 330 डॉलर है, तो भारत सापेक्षिक रूप से निर्धन है।

2. निरपेक्ष निर्धनत- निरपेक्ष निर्धनता से आशय किसी देश की आर्थिक अवस्था को ध्यान में रखते हुए निर्धनता की माप से है। भारत में निरपेक्ष निर्धनता का अनुमान लगाने के लिए निर्धनता रेखा’ की अवधारणों का प्रयोग किया जाता है।

निर्धनता रेखा- निर्धनता रेखा वह है जो उस प्रति व्यक्ति औसत मासिक आय को प्रकट करती है जिसके द्वारा लोग अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को संतुष्ट कर सकते हैं।

भारत में निर्धनता रेखा- भारत में 2009-10 ई० की कीमतों पर ग्रामीण क्षेत्र में है 672.8 तथा शहरी क्षेत्रों में १ 859.6 प्रति मास उपभोग को निर्धनता रेखा माना गया है। भारत में उन व्यक्तियों को निरपेक्ष रूप से निर्धन माना गया है जिसका मासिक उपभोग व्यय इस रेखा से नीचे है।

निर्धनता का आकलन

भारत में निर्धनता के आकलन का आधार है-
1. कैलोरी आवश्यकता तथा
2. आय आधार।

1. कैलोरी आवश्यकता- भारत में निर्धनता रेखा का आकलन करते समय कैलोरी आवश्यकता को ध्यान में रखा जाता है। खाद्य वस्तुएँ; जैसे-अनाज, दालें, सब्जियाँ, दूध, तेल, चीनी आदि; मिलकर आवश्यक कैलोरी की पूर्ति करती हैं। आयु, लिंग, काम करने की प्रकृति आदि के आधार पर कैलोरी आवश्यकताएँ बदलती रहती हैं। भारत में स्वीकृत कैलोरी की आवश्यकता ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन एवं नगरीय क्षेत्रों में 2100 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन है। चूँकि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग अधिक शारीरिक कार्य करते हैं, अतः ग्रामीण क्षेत्रों की कैलोरी आवश्यकता शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक मानी गई है।

2. आय आधार- खाद्यान्न, चीनी व तेल आदि के रूप में इन कैलोरी आवश्यकताओं को खरीदने के लिए प्रति व्यक्ति मौद्रिक व्यय को, कीमतों में वृद्धि को ध्यान में रखते हुए, समय-समय पर संशोधित किया जाता है। निर्धनता रेखा का आकलन समय-समय पर प्रतिदर्श सर्वेक्षण के माध्यम से किया जाता है। ये सर्वेक्षण एन०एस०एस०ओ० द्वारा समय-समय पर कराए जाते हैं।

प्रश्न 2.
भारत में निर्धनता के क्या कारण हैं? निर्धनता दूर करने के उपाय भी बताइए। .
उत्तर
भारत में निर्धनता के कारण। भारतीय अर्थव्यवस्था एक विकासशील अर्थव्यवस्था है। अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की भाँति भारतीय अर्थव्यवस्था भी गरीबी के दुश्चक्र में फंसी है। भारत में निर्धनता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

(अ) आर्थिक कारण
1. अल्प विकास–
भारत में निर्धनता का सर्वप्रमुख कारण देश का अल्प विकास है। यद्यपि गत 56 वर्षों में हम योजनाबद्ध आर्थिक विकास के मार्ग पर अग्रसर हैं तथापि हमारे विकास की गति बहुत धीमी रही है। धीमे आर्थिक विकास के कारण राष्ट्रीय आय में वांछित वृद्धि नहीं हो सकती है।

2. आय तथा धन के वितरण में असमानता- भारत में आय व धन का वितरण असमान है। रिजर्व बैंक के एक अनुमान के अनुसार समस्त राष्ट्रीय आय का लगभग 30% भाग जनसंख्या के 10% धनी लोगों को प्राप्त होता है, जबकि जनसंख्या के 20% निर्धन वर्ग को राष्ट्रीय आय का केवल 8% भाग ही प्राप्त हो पाता है। ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में शहरी क्षेत्र में आय वितरण की असमानता और भी अधिक है।

3. अपर्याप्त विकास दर- भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर निम्न है। योजनाकाल में औसत विकास दर लगभग 3.5% रही है जिसने गरीबी की जड़ों को और अधिक गहरी कर दिया है।

4. जनसंख्या की उच्च वृद्धि-दर- भारत में जनसंख्या वृद्धि की दर अर्थव्यवस्था की विकास दर की तुलना में ऊँची रही है। इसका दुष्परिणाम यह है कि प्रति व्यक्ति आय व उपभोग कम हो जाता है, अभावे पनपने लगते हैं, जीवन-स्तर में ह्रास होता है और निर्धनता व्यापक रूप धारण कर लेती

5. बेरोजगारी– देश में निरन्तर बढ़ती हुई बेरोजगारी ने निर्धनता को और अधिक व्यापक बनाया है। बेरोजगारी के बढ़ते रहने से निर्धनता अधिक संचयी रूप धारण करती जा रही है। वर्तमान में 3 | करोड़ से भी अधिक लोग बेरोजगार हैं।

6. प्रादेशिक असंतुलन तथा असमानताएँ- असंतुलित प्रादेशिक विकास के साथ-साथा निर्धनता का वितरण भी असमान हो गया है; उदाहरण के लिए उड़ीसा (ओडिशा) में 66.4%, त्रिपुरा में 59.7%, बिहार व मध्य प्रदेश में 57.5% जनसंख्या निर्धनता रेखा से नीचे जीवन व्यतीत कर रही है, जबकि पंजाब में केवल 15.1% तथा हरियाणा में 24.8% जनसंख्या निर्धनता के स्तर से नीचे

7. स्फीतिक दबाव- भारत में सामान्य कीमत स्तर बढ़ता रहा है। कीमतों के बढ़ने पर मुद्रा की क्रय-शक्ति कम हो जाती है और वास्तविक आय गिर जाती है। इसके फलस्वरूप समाज में निम्न तथा मध्यम आय वर्ग के लोगों की निर्धनता बढ़ जाती है।

8. पूँजी की कमी- भारत में प्रति व्यक्ति आय का स्तर निम्न है, जिससे बचत कर्म होती है और पूँजी-निर्माण दर भी कम रहती है। पूँजी की प्रति व्यक्ति निम्न उपलब्धता और पूँजी-निर्माण की निम्न दर ने देश में निर्धनता को जन्म दिया है।

9. औद्योगीकरण का निम्न स्तर- कृषि तथा विनिर्माणी क्षेत्र में परम्परागत उत्पादन तकनीकों ने प्रति व्यक्ति उत्पादकता के स्तर को नीचा बनाए रखा है, जिसके कारण गरीबी और अधिक गहने हुई है।

(ब) सामाजिक कारण

आर्थिक कारणों के अतिरिक्त सामाजिक कारण भी निर्धनता को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुए हैं। भारत में विद्यमान सामाजिक ढाँचे में बँधे रहने के कारण लोग जान-बूझकर निर्धनता से चिपके हुए हैं। सामाजिक सम्मान एवं प्रतिष्ठा की झूठी महत्त्वाकांक्षा ने लोगों को अपव्ययी बना दिया है। जनसाधारण में व्याप्त निक्षरता, भाग्यवादिता, धार्मिक रूढ़िवादिता व अन्धविश्वास ने गरीबी को बढ़ाया है। जातिवाद एवं संयुक्त परिवार प्रणाली ने लोगों को अकर्मण्य बनाया है और उन्हें आधुनिक तकनीक का प्रयोग करने से रोका है और सामाजिक संस्थाओं ने श्रम को अगतिशील बनाकर उनकी प्रगति में बाधा डाली है।।

(स) राजनीतिक कारण
देश की लम्बी दासता ने अर्थव्यवस्था को गतिहीन बना दिया था। विदेशी शासकों ने देश में आधारभूत उद्योगों के विकास में कोई रुचि नहीं ली। उनकी ‘वि-औद्योगीकरण की नीति (Policy of Deindustrialization) ने देश के औद्योगिक आधार को कमजोर बना दिया। देश में सामन्तशाही प्रथा पनपी, जिसने कृषकों को भरपूर शोषण किया। उनकी नीति ने एक ओर जमींदारों को जन्म दिया और दूसरी ओर भूमिहीन किसानों को। फलत: उनके शोषण के साथ-साथ निर्धनता भी बढ़ती चली गई। निर्धनता दूर करने के उपाय भारत में निर्धनता दूर करने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं

1. विकास की गति को तीव्र किया जाए। इससे रोजगार के अधिक अवसर सृजित होंगे और निर्धनता में कमी आएगी।
2. आय एवं धन के वितरण की असमानताओं को कम किया जाए।
3. जनसंख्या की वृद्धि को नियंत्रित करने हेतु प्रयास किए जाएँ। इस संबंध में परिवार कल्याण 
कार्यकम्रमों को सफल बनाने के लिए भरसक प्रयास किए जाएँ।
4. कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के लिए यथासंभव प्रयास किए जाएँ। |
5. कीमत स्थिरता के उत्पादन एवं वितरण व्यवस्था में सुधार किए जाएँ।
6. बेरोजगारी (अर्द्ध-बेरोजगारी, अदृश्य बेरोजगारी, मौसमी बेरोजगारी व शिक्षित बेरोजगारी) को दूर | करने के लिए छोस कदम उठाए जाएँ।
7. उत्पादन तकनीक में आवश्यक परिवर्तन किए जाएँ।
8. न्यूनतम आवश्यर्कता कार्यक्रम’ को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
9. देश के पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जाए।
10. ‘स्वरोजगार के लिए सभी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।

प्रश्न 3.
निर्धनता उन्मूलन के लिए सरकार द्वारा किए गए उपायों की चर्चा कीजिए।
उत्तर

निर्धनता उन्मूलन के लिए भारत सरकार द्वारा किए गए उपाय

भारत में निर्धनता उन्मूलन हेतु सरकार द्वारा अनेक कदम उठाए गए हैं जिनका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है

पंचवर्षीय योजनाओं में निर्धनता उन्मूलन विकास कार्यक्रम

सन् 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ। इसके बाद ग्रामीण विकास एवं किसानों के हितों के लिए ठोस प्रयास किए गएँ। अनेक राज्यों में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन किया गया, पंचायती राज व्यवस्था को नया जीवन दिया गया, सामुदायिक विकास कार्यक्रमों का तेजी से विस्तार किया गया तथा गाँवों में विद्युत, जल, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास तथा ग्रामीण औद्योगीकरण सहित अनेक परियोजनाएँ बनाई गईं। प्रथम तीन

पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान ग्रामीण विकास के लिए निम्नलिखित कार्यक्रमों को अपनाया गया

  1. सामुदायिक विकास कार्यक्रम, 1952 ई०,
  2. व्यावहारिक पोषाहार कार्यक्रम, 1958 ई०,
  3. पंचायती राज व्यवस्था, 1959 ई०,
  4. सघन कृषि जिला कार्यक्रम, 1960 ई०,
  5. पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम, 1962 ई०,
  6. जनजाति क्षेत्र का विकास कार्यक्रम, 1964 ई०,
  7. सघन कृषि क्षेत्र कायर्चक्रम, 1965 ई०,
  8. उन्नत बीज कार्यक्रम, 1965 ई० तथा
  9.  सघन क्षेत्र विकास कार्यक्रम, 1965 ई०॥

तीन वार्षिक योजनाओं तथा चौथी एवं पाँचवीं पंचवर्षीय योजनाओं में निम्नलिखित कार्यक्रमों को लागू किया गया

  1. लघु कृषक मास अभिकरण, 1969 ई०,
  2. सीमांत कृषक एवं कृषि श्रमिक अभिकरण, 1969 ई०,
  3. सूखाग्रत त्र कार्यक्रम, 1974-75 ई०,
  4. ग्रामीण निर्माण कार्यक्रम, 1973 ई०,
  5. ग्रामीण रोजगार हेतु क्रैश कार्यक्रम 1971 ई०,
  6. पायलट परियोजना, 1972 ई०,
  7. न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम, 1974 ई०,
  8. बीस सूत्रीय कार्यक्रम, 1975 ई०,
  9. काम के बदले अनाज कार्यक्रम 1977 ई०,
  10. अन्त्योदय योजना, 1977 ई०,
  11. मरुभूमि विकास कार्यक्रम, 1977 ई०,
  12. कमाण्ड एरिया विकास कार्यक्रम, 1978 तथा जिला उद्योग केंद्र, 1978 ई० तथा
  13. रोजगार गारण्टी कार्यक्रम, 1982 ई०।।

वर्ष 1978-79 से 2000 ई० तक की अवधि में ग्रामीण विकास कार्यक्रमों को एक नई दिशा प्राप्त हुई। इस अवधि में ग्रामीण विकास हेतु प्रमुख रूप से निम्नलिखित कार्यकम्रम आयोजित किए गए-

  1. एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम,
  2. ट्राइसेम कार्यक्रम,
  3. राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम,
  4. राष्ट्रीय महिला एवं बाल विकास कार्यक्रम,
  5. विशेष पशुधन विकास कार्यक्रम,
  6. ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारण्टी कार्यक्रम,
  7. जवाहर रोजगार योजना,
  8. आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग हेतु नई स्वरोजगार योजना,
  9. नेहरू रोजगार योजना,
  10. अकोलग्रस्त क्षेत्र कार्यक्रम,
  11. रोजगार गारण्टी कार्यक्रम तथा
  12. मजदूरी रोजगार कार्यक्रम आदि।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार उपलब्ध कराने के लिए चल रही विभिन्न योजनाओं; समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम कार्यक्रम, ग्रामीण महिला एवं बाल विकास, ट्राइसेम, गंगा विकास योजना, दस लाख कुआँ योजना, ग्रामीण दस्तकारों को उन्नत औजार पूर्ति योजना; को मिलाकर 1 अप्रैल, 1998 ई० से स्वर्ण जयंती स्वरोजगार योजना आरम्भ की गई। ‘जवाहर रोजगार योजना’ को ‘ग्राम समृद्धि योजना में बदल दिया गया और इसका विकास क्षेत्र भी बढ़ाया गया। इन्दिरा आवास योजना की जगह समग्र आवास योजना प्रारम्भ की गई।

वर्ष 2000 के बाद की अवधि- ग्रामीण विकास मंत्रालय ने जनवरी 2001 ई० में सूखा प्रभावित राज्यों के ग्रामीण इलाकों में काम के बदले अनाज’ कार्यक्रम शुरू किया। नौकरी छूट जाने के कारण प्रभावित कर्मचारियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए 10 अक्टूबर, 2001 ई० को ‘आश्रय बीमा योजना शुरू की गई। 2002 ई० में ‘बीमा ग्राम योजना चालू की गई। 27 जनवरी, 2003 ई० को ‘हरियाली परियोजना का शुभारम्भ किया गया। 14 नवम्बर, 2004 ई० को प्रधनमंत्री ने काम के बदले अनाज कार्यक्रम का शुभारम्भ आन्ध्र प्रदेश के रंगा रेड्डी जिले में गाँव अलूर में किया। बजट 2005-06 के प्रस्तावों में इस योजना को राष्ट्रीय ग्रामीण गारण्टी रोजगार योजना में रूपांतरित करने का प्रावधान किया। गया।

कुछ महत्त्वपूर्ण योजनाओं को संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है-

1. प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना (Prime Minister Rural Road Programme PMRRP)
यह योजना 25 दिसम्बर, 2000 ई० को शुरू हुई। देश के सभी गाँवों को पक्के सड़क मार्गों से जोड़ने की प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 500 से अधिक जनसंख्या वाले सभी गाँवों को अच्छी बारहमासी सड़कों से जोड़ दिया जाएगा। इस क्षेत्र में सफलतापूर्वक कार्य 
चल रहा है।

2. ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल हेतु प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना (Prime Minister Gramodaya Yojana-PMGY)-इस कार्यक्रम के तहत राज्यों को धन जारी करने के लिए पेयजलापूर्ति विभाग, भारत सरकार को शीर्षस्थ विभाग है। ग्रामीण जलापूर्ति कार्यक्रम का क्रियान्वयन मिशन द्वारा 1999 ई० में जारी हुआ और अब तक दिए गए निर्देशों के मुताबिक होगा। इस योजना का उद्देश्य उन ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की व्यवस्था करना है, जहाँ पेयजल उपलब्ध नहीं है या आंशिक रूप से उपलब्ध है तथा ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल से लौह तत्त्वों, आर्सेनिक तथा फ्लुओराइड जैसे हानिकारक तत्त्वों को दूर करना हैं।

3. ग्रामीण पेयजल आपूर्ति- ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल सुविधाएँ ‘राज्य स्कन्ध न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम के तहत प्रदान की जाती हैं। केन्द्र सरकार के प्रशासन हेतु राष्ट्रीय एजेण्डे में अगले पाँच वर्षों में सभी के लिए सुरक्षित पेयजल के प्रावधान की घोषणा की गई है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु बनाई गई रणनीति में निम्नलिखित मुद्दे सम्मिलित हैं– बचे हुए ग्रामीण क्षेत्रों तथा ऐसे क्षेत्रों को सुरक्षित पेयजल व्यवस्था शीघ्र प्रदान करना, जहाँ केवल कुछ ही लोगों को पेयजल की सुविधा प्राप्त है, हानिकारक तत्त्वों से प्रभावित क्षेत्रों में जल की गुणवत्ता संबंधी समस्याओं से लड़ना तथा जल गुणवत्ता प्रबन्धन व निगरानी व्यवस्थाओं को संस्थागत करना, तंत्र एवं स्रोत दोनों की निरंतरता को बढ़ाना तथा पेयजल सुविधासम्पन्न ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल की निरंतर आपूर्ति को सुनिश्चित करना।

4. केन्द्र प्रायोजित ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम (Central Rural Sanitation Programme-CRSP)- ग्रामीण स्वच्छता राज्य का विषय होने के कारण ग्रामीण स्वच्छता कार्यकम्रम राज्य क्षेत्र के न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम के तहत राज्य सरकारों द्वारा क्रियान्वित किया जाता है। इस कार्यक्रम की शुरुआत 1986 ई० में हुई। 1 अप्रैल, 1999 ई० को इस कार्यक्रम की पुनर्संरचना की गई। पुनर्गठित केन्द्र प्रायोजित ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम को चरणबद्ध क्रम में निर्धनता निर्धारक तथ्य पर मुख्यत: आधारित प्रदेशवारे निधियों के आबंटन के सिद्धांत से हटाकर माँग प्रेरित’ पहले की ओर केन्द्रित किया जा रहा है। कार्यक्रम में उच्च अनुदान के स्थान पर निम्न अनुदान की ओर झुकाव रहेगा।

5. इन्दिरा आवास योजना (Indira Avas Yojana-IAY)- इन्दिरा आवास योजना वर्ष 1985-86 में RLEGP में एक उपभोक्ता कार्यक्रम के रूप में प्रारम्भ की गई थी, जिस द्देश्य अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों के सबसे निर्धन लोगों तथा मुक्त ए गए बँधुआ श्रमिकों के लिए मकानों का निर्माण कराना है, जो उन्हें नि:शुल्क (Free of Cost) उपलब्ध कराए जाते हैं। वर्ष 1989-90 ई० में RLEGP के जवाहर रोजगार योजना में विलय के बाद इस योजना को भी जवाहर रोज़गार योजना (JRY) का अंग बना दिया गया था, किंतु 1996 ई० में इसे JRY से पृथक् कर एक स्वतंत्र योजना का रूप दे दिया गया। इस प्रकार 1 जनवरी, 1996 ई० से यह एक स्वतंत्र योजना के रूप में लागू है। इस योजना का लक्ष्य अत्यंत निर्धन अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के, मुक्त बँधुआ मजदूरों और गैर-अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों की श्रेणियों में आने वाले ग्रामीण गरीबों को आवासीय इकाइयों के निर्माण और मौजूदा अनुपयोगी कच्चे मकानों को सुधारने में मदद देना है। जिसके लिए उन्हें सहायता अनुदान दिया जाता है।

6. प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना (Prime Minister Gramodaya Yojana- PMGY)-इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के लिए आवासों की कमी को दूर करना तथा इन क्षेत्रों के पर्यावरण के स्वस्थ विकास में सहायता देना है। प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना की रूपरेखा, इन्दिरा आवास योजना पर आधारित है।
ग्रामीण आवासों के लिए ऋण एवं अनुदान की योजना (Credit Cum Subsidy Plan for Rural Housing)-यह योजना 1 अप्रैल, 1999 ई० से शुरू की गई थी। इस योजना में प्रत्येक पात्र परिवार को ३ 10,000 का अनुदारन तथा प्रति परिवार र 40,000 तक का ऋण दिया जाता है। स्वच्छ शौचालय और धुआँरहित चूल्हे ग्रामीणों के आवास के अभिन्न अंग बनाए गए हैं। यह योजना ऐसे ग्रामीण परिवारों को ध्यान में रखकर बनाई गई है, जिनकी वार्षिक आमदनी १ 32,000 तक है। योजना के लिए धनराशि का बँटवारा केन्द्र और राज्यों के बीच 75 : 25 के अनुपात में होता है।

7. समग्र आवास योजना (Samagra Avas Yojana-SAY)-यह योजना 1 अप्रैल, 1999 ई० को शुरू हुई। इसका मुख्य उद्देश्य आवास, स्वच्छता, पेयजल की समग्रे व्यवस्था तथा ग्रामीण क्षेत्रों के सम्पूर्ण पर्यावरण के साथ-साथ लोगों के जीवन में गुणवत्तापूर्ण सुधार लाना है।।

8. ग्रामीण आवास और पर्यावरण विकास का अभिनव कार्यक्रम (New Programme for Rural Housing and Environment Development-PRHED)—यह योजना 1 अप्रैल, 1999 ई० से शुरू हुई। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में नवीन व प्रमाणित आवास प्रौद्योगिकियों, डिजाइनों और ग्रामीण सामग्रियों को बढ़ावा देना व उन्हे प्रचारित करना है।

9. ग्रामीण निर्माण केन्द्र (Rural Construction Centre-RCC)—इस कार्यक्रम की शुरुआत केरल में 1995 ई० में हुई। इसका उद्देश्य प्रशिक्षण तथा किफायती व पर्यावरण के अनुकूल निर्माण सामग्री के उत्पादन के माध्यम से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देना, सूचना-प्रसार तथा कुशलता बढ़ाना है। ग्रामीण निर्माण केन्द्रों को प्रयोगशाला से जमीन तक प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण में सम्मिलित किया जा रहा है। ग्रामीण निर्माण केन्द्र राज्य सरकार, ग्रामीण विकास एजेन्सियों, निजी उद्यमियों, सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं आदि के द्वारा स्थापित किया जा सकता है। ग्रामीण निर्माण केन्द्र की स्थापना हेतु एकमुश्त र 15 लाख की सहायता प्रदान की जा सकती है। राष्ट्रीय आवास और पर्यावरण के लिए राष्ट्रीय मिशन (National Mission for National Housing and Environment)-इस मिशन की स्थापना ग्रामीण आवास क्षेत्र में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए की गई।

10. स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना (Swarna Jayanti Gram Swa-Rojgar Yojana-sGSY)- स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना गाँवों में रहने वाले निर्धनों के लिए स्वरोजगार की एक अकेली योजना है, जो 1 अप्रैल, 1999 ई० को प्रारम्भ की गई। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में भारी संख्या में कुटीर उद्योगों की स्थापना करना है। इस योजना में सहायता प्राप्त व्यक्ति स्वरोजगारी कहलाएँगे, लाभार्थी नहीं। इस योजना का उद्देश्य प्रत्येक सहायता प्राप्त परिवार को धन उपलब्ध होने पर तीन वर्ष में निर्धनता-रेखा से ऊपर उठाना है। आगामी पाँच वर्षों में प्रत्येक विकास खण्ड में रहने वाले निर्धन ग्रामीणों में से 30% को इस योजना के दायरे में लाने का प्रस्ताव है। विकास खण्ड स्तर पर प्रमुख गतिविधियों का चयन पंचायत समितियों द्वारा किया जाएगा। यह योजना एक ऋण एवं अनुदान कार्यक्रम है। ऋण प्रमुख तत्त्व होगा, जबकि अनुदान केवल समर्थनकारी तत्त्व। अनुदान परियोजना लागत के 30% की एक समान दर पर होगी, किंतु इसकी अधिकतम सीमा १ 7,500 होगी। अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए यह सीमा 50% या अधिकतम १ 10,000 होगी। सिंचाई परियोजनाओं के लिए अनुदान की कोई अधिकतम सीमा नहीं होगी। योजना में दी जाने वाली धनराशि को केन्द्र और राज्य सरकारें 75: 25 के अनुपात में वहन करेंगी।

11. जवाहर ग्राम समृद्धि योजना (Jawahar Gram Samriddhi Yojana-JGSY)- यह योजना पहले की जवाहर रोजगार योजना का पुनर्गठित, सुव्यवस्थित और व्यापक स्वरूप है। 1 अप्रैल; 1999 ई० को प्रारम्भ की गई इस योजना का उद्देश्य गाँव में रहने वाले निर्धनों का जीवन-स्तर सुधारना और उन्हें लाभप्रद रोजगार के अवसर प्रदान करना है। इस योजना को दिल्ली और चण्डीगढ़ को छोड़ समग्र देश में सभी ग्राम पंचायतों में लागू किया गया है। योजना में खर्च की जाने वाली राशि 75: 25 के अनुपात में केन्द्र व राज्य सरकारें वहन करेंगी।

12. जिला ग्रामीण विकास एजेन्सी प्रशासन (District Rural Development Agency-DRDA)- प्रशासनिक खर्च के संबंध में विभिन्न कार्यक्रमों में एकरूपता नहीं होने के कारण केन्द्र द्वारा प्रायोजित एक नई जिला ग्रामीण एजेन्सी (DRDA) प्रशासन योजना 1 अप्रैल, 1999 ई० से शुरू की गई। इस योजना का उद्देश्य जिला ग्रामीण विकास एजेन्सियों को सशक्त बनाना तथा इन्हें इनके क्रियान्वयन के लिए अधिक व्यावसायिक बनाना है।

13. सुनिश्चित रोजगार योजना (Sunishchit Rojgar Yojana-SRY)- वर्ष 1997-98 में इस योजना को देश की सभी पंचायतों में लागू कर दिया गया। इस योजना का प्राथमिक उद्देश्य निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले ग्रामीण गरीबों को भीषण मन्दी के दिनों में श्रम कार्यों द्वारा अतिरिक्त मजदूरी रोजगार अवसरों को प्रदान करना है। यह योजना उन सभी निर्धनों के लिए है। जिनको मजदूरी रोजगार की आवश्यकता है। योजना के अंतर्गत संसाधनों का बंटवारा केन्द्र और राज्य सरकारें क्रमशः 25 : 25 के अनुपात में वहन करेंगी।

14. राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (National Social Assistance Programme NSAP)—यह कार्यक्रम 15 अगस्त, 1995 ई० से लागू किया गया। इस कार्यक्रम के तीन निम्नलिखित प्रमुख घटक थे

  1. राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना,
  2. राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना,
  3. राष्ट्रीय प्रसव | लाभ योजना। उपर्युक्त सभी योजनाएँ वृद्धावस्था परिवार के कमाऊ सदस्य की मृत्यु तथा मातृत्व के दौरान सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती हैं।

1. राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना के अंतर्गत निर्धनता रेखा से नीचे वर्ग के 65 वर्ष अथवाउससे अधिक आयु वाले आवेदक को १ 75 प्रति माह की राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन दिए जाने का प्रावधान है।

2.राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना के अंतर्गत परिवार के मुख्य आय अर्जक (महिला अथवापुरुष) की सामान्य मृत्यु होने पर (18 वर्ष से अधिक व 65 वर्ष से कम) निर्धन परिवार को १ 5,000 की एकमुश्त राशि उत्तरजीवी लाभ के रूप में दी जाती है। दुर्घटना से मृत्यु की स्थिति में है 10,000 की सहायता दी जाती है।

3. राष्ट्रीय प्रसव लाभ योजना के अंतर्गत निर्धन परिवारों की 19 वर्ष या उससे अधिक आयु की महिलाओं के लिए पहले दासे बच्चों के जनम पर प्रसव पूर्व और प्रसवोत्तर मातृत्व देखभाल हेतु १ 500 की वित्तीय सहायता दी जाती है। यह कार्यक्रम 100% केन्द्र पोषित कार्यक्रम है, जो पंचायत/नगरपालिका जैसी स्थानीय संस्थाओं द्वारा क्रियान्वित किया जाता है।

15. अन्नपूर्णा योजना Annapurna Yojana)- यह योजना निर्धन एवं बेसहारा वयोवृद्ध नागरिकोंको नि:शुल्क खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिए केन्द्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा मार्च 1991 ई० में प्रारम्भ की गई। 19 मार्च, 1999 ई० को प्रधानमंत्री द्वारा गाजियाबाद जिले के सिखेड़ा गाँव से इस योजना को प्रारम्भ किया गया था। अन्नपूर्णा योजना के तहत पात्र वयोवृद्ध नागरिकों को प्रतिमाह 10 किग्रा अनाज निःशुल्क उपलब्ध कराए जाने का प्रावधान है।

16. कुटीर ज्योति कार्यक्रम (Kutir Jyoti Programme-KJP)–हरिजन और आदिवासीपरिवारों सहित निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले ग्रामीण परिवारों के जीवन-स्तर में सुधार के लिए भारत सरकार ने 1988-89 ई० में ‘कुटीर ज्योति’ कार्यक्रम प्रारम्भ किया। इसके अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों को एक बत्ती का विद्युत कनेक्शन उपलब्ध कराने के लिए ३ 400 की सरकारी सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

17. लोक कार्यक्रम एवं ग्रामीण प्रौद्योगिकी विकास परिषद् (Council for Advancement of People’s Action and Rural Technology : CAPART)-इसका गठन 1 सितम्बर, 1986 को किया गया था। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण समृद्धि के लिए परियोजनाओं के क्रियान्वयन में स्वैच्छिक कार्य को प्रोत्साहन देना और उनमें मदद करना है। कपार्ट की नौ प्रादेशिक समितियाँ/प्रादेशिक केन्द्र हैं। प्रादेशिक समितियों को अपने-अपने प्रदेशों में स्वयंसेवी संस्थाओं की है 20 लाख तक के परिव्यय वाली परियोजनाओं को मंजूरी देने का अधिकार प्राप्त है।

18. एकीकृत बंजर भूमि विकास कार्यक्रम (Integrated Waste Land Development | Programme–IWLDP)–यह कार्यक्रम वर्ष 1989-90 से चलाया जा रहा है। यह पूर्णतया केन्द्र प्रायोजित कार्यकम्रम है। इस कार्यक्रम से बंजर भूमि विकास कार्यक्रमों में लोगों की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उत्पन्न करने में भी मदद मिलती है।

19.निवेश संवर्द्धन योजना (Investment Promotion Plan–IPP)-गैर-वन बंजर भूमि के विकास के लिए संसाधनों को एकत्र करने में निगमित क्षेत्र तथा वित्तीय संस्थानों की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1994-95 में निवेश संवर्द्धन योजना शुरू की गई थी। इस योजना के तहत सामान्य वर्ग के लिए केन्द्रीय संवर्द्धन अंशदान/सब्सिडी १ 25 लाख या कृषि आधारित विकास परियोजना लागत को 25 प्रतिशत, जो भी कम हो, तक सीमित हैं; बशर्ते परियोजना में संवर्द्धक का अंशदान परियोजना लागत के 25 प्रतिशत से कम न हो। लघु कृषकों के लिए अनुदान की सीमा 30 प्रतिशत है तथा सीमांत कृषकों व अनुसूचित जाति/जनजाति के कृषकों के लिए कृषि-आधारित विकास गतिविधियों की परियोजना लागत का 50 प्रतिशत है।

20. प्रौद्योगिकी विकास, विस्तार एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम (Technological Development Expansion and Training Programme-TDETP)–वर्ष 1993-94 में बंजर भूमि के सुधार द्वारा खाद्य, ईंधन, लकड़ी, चारा आदि के निरंतर उत्पादन हेतु उपयुक्त प्रौद्योगिकी विकास के लिए एक केन्द्रीय उपक्रम योजना–प्रौद्योगिकी विकास, विस्तार एवं प्रशिक्षण योजना की शुरुआत की गई थी। इस योजना को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, जिला ग्रामीण विकास एजेन्सियों तथा शासकीय संस्थानों, जिनके पास पर्याप्त संस्थागत ढाँचा तथा संगठनात्मक समर्थन हो, के जरिए लागू किया जा रहा है। निजी कृषकों/निगमित निकायों की बंजर भूमि पर लागू परियोजनाओं के मामले में परियोजना लागत को 60:40 के अनुपात में भू-संसाधन विभाग तथा हितग्राहियों के मध्य बॉटना आवश्यक है।

21. सूखा सम्भावित क्षेत्र कार्यक्रम (Drought-prone Area Development Programme DADP)-सूखे की सम्भावना वाले चुनिन्दा क्षेत्रों में यह राष्ट्रीय कार्यक्रम 1973 ई० में प्रारम्भ किया गया था। कार्यक्रम का उद्देश्य इन क्षेत्रों में भूमि, जल व अन्य प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित विकास करके पर्यावरण संतुलन को बहाल करना है। कार्यक्रम हेतु वित्त की व्यवस्था केन्द्र व संबंधित राज्य द्वारा 50: 50 के अनुपात में की जाती है। वर्तमान में यह कार्यक्रम 13 राज्यों के 55 जिलों के 947 ब्लॉकों में चलाया जा रहा है तथा इसके अधीन कुल क्षेत्र 41 लाख हेक्टेयर है।

22. मरुस्थल विकास कार्यक्रम (Oasis Development Programme-ODP)-मरुभूमि को बढ़ने से रोकने, मरुभूमि में सूखे के प्रभाव को समाप्त करने, प्रभावित क्षेत्रों में पारिस्थितिक संतुलन बहाल करने व इन क्षेत्रों में भूमि की उत्पादकता तथा जल संसाधनों को बढ़ाने के उद्देश्य से मरुस्थले विकास कार्यक्रम चुने हुए क्षेत्रों में 1977-78 ई० में प्रारम्भ किया गया था। यह कार्यक्रम शत-प्रतिशत केन्द्रीय सहायता के आधार पर क्रियान्वित किया जा रहा है।

23. महात्मामयी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम (मनरेगा)- गरीबी को प्रभावी तरीके से दूर करने के लिए मजदूरी मिलने वाले रोजगार कार्यक्रमों को तैयार करने के उद्देश्य से केन्द्र सरकार ने 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम बनाया। अपने वैधानिक ढाँचे और अधिकार आधारित दृष्टिकोण की वजह से मनरेगा का यह कार्यक्रम बेरोजगारों को रोजगार देने और पहले से चले आ रहे कार्यक्रमों का एक प्रतिमान बन गया है। 7 सितम्बर, 2005 को अधिसूचित मनरेगा कार्यक्रम का उद्देश्य प्रत्येक ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्य को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 100 दिन का गारण्टीशुदा अकुशल मजदूरी/रोजगार उपलब्ध कराना है। 2 फरवरी, 2006 से लागू इस अधिनियम के अंतर्गत पहले चरण में 200 जिलों को शामिल किया गया और 2007-08 में इसे बढ़ाकर 130 अतिरिक्त जिले शामिल कर लिए गए। अन्य शेष जिलों को एक अप्रैल 2008 को अधिसूचना जारी करके अधिनियम में शामिल कर लिया गया।

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UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 3 Liberalisation, Privatisation and Globalisation: An Appraisal

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 3
Chapter Name Liberalisation, Privatisation and Globalisation: An Appraisal (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा)
Number of Questions Solved 57
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 3 Liberalisation, Privatisation and Globalisation: An Appraisal (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भारत में आर्थिक सुधार क्यों आरम्भ किए गए?
उत्तर
वर्ष 1991 में भारत को विदेशी ऋणों के मामले में संकट का सामना करना पड़ा। सरकार अपने विदेशी ऋण के भुगतान करने की स्थिति में नहीं थी। पेट्रोल आदि आवश्यक वस्तुओं के आयात के लिए सामान्य रूप से रखा गया विदेशी मुद्रा भण्डार पन्द्रह दिनों के लिए आवश्यक आयात का भुगतान करने योग्य भी नहीं बचा था। इस संकट को आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि ने और भी गहन बना दिया था। इन सभी कारणों से आर्थिक सुधार आरम्भ किए गए।

प्रश्न 2.
विश्व व्यापार संगठन के कितने सदस्य देश हैं?
उत्तर
विश्व व्यापार संगठन के 160 सदस्य देश हैं।

प्रश्न 3.
भारतीय रिजर्व बैंक का सबसे प्रमुख कार्य क्या है?
उत्तर
भारतीय रिजर्व बैंक का प्रमुख कार्य मौद्रिक नीति बनाना और उसे लागू करना है।

प्रश्न 4.
रिजर्व बैंक व्यावसायिक बैंकों पर किस प्रकार नियन्त्रण रखता है?
उत्तर
भारत में विसीय क्षेत्र का नियन्त्रण रिजर्व बैंक का दायित्व है। रिजर्व बैंक के विभिन्न नियम और कसौटियों के माध्यम से ही बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थानों के कार्यों का नियमन होता है। भारतीय रिजर्व बैंक निम्नलिखित प्रकार से व्यावसायिक बैंकों पर नियन्त्रण रखता है

  1. कोई बैंक अपने पास कितनी मुद्रा जमा रख सकता है। |
  2. यह ब्याज की दरों को निर्धारित करता है।
  3. विभिन्न क्षेत्रों को उधार देने की प्रकृति इत्यादि को भी यक्लक करता है।

प्रश्न 5.
रुपयों के अवमूल्यन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
विदेशी विनिमय बाजार में विदेशी मुद्रा से तुलना में रुपये के मूल्य को घटाने को रुपये का अवमूल्यन कहा जाता है।

प्रश्न 6.
इनमें भेद करें
(क) युक्तियुक्त और अल्पांश विक्रय।
(ख) द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार।
(ग) प्रशुल्क एवं अप्रशुल्क अवरोधक।
उत्तर

(क) युक्तियुक्त और अल्पांश विक्रय

युक्तियुक्त विक्रय राज्य के स्वामित्व वाली इकाइयों में कमी करने को युक्तियुक्त विक्रय कहते हैं। अल्पांश विक्रय-इसके अन्तर्गत वर्तमान सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के एक हिस्से को निजी क्षेत्र को बेच दिया जाता है।

(ख) द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार

द्विपक्षीय व्यापार इसमें दो देशों को अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में समान अवसर प्राप्त होते हैं।
बहुपक्षीय व्यापार- बहुपक्षीय व्यापार में सभी देशों को विश्व व्यापार में समान अवसर प्राप्त होते, हैं। इसमें विश्व व्यापार संगठन का उद्देश्य ऐसी नियम आधारित व्यवस्था की स्थापना है, जिसमें कोई देश मनमाने ढंग से व्यापार के मार्ग में बाधाएँ खड़ी न कर पाए। इसका उद्देश्य सेवाओं का सृजन और व्यापार को प्रोत्साहन देना भी है ताकि विश्व के संसाधनों का इष्टतम प्रयोग हो सके।

(ग) प्रशुल्क एवं अप्रशुल्क अवरोधक

प्रशुल्क अवरोधक- प्रशुल्क, आयातित वस्तुओं पर लगाया गया कर है जिसके कारण आयातित वस्तुएँ महँगी हो जाती हैं और इससे विदेशी प्रतिस्पर्धा से घरेलू उद्योगों की रक्षा होती है। आयात पर कठोर नियन्त्रण एवं ऊँचे प्रशुल्क द्वारा ये अवरोधक लगाए जाते हैं। इसमें सीमा कर तथा
आयात- निर्यात करों को शामिल किया जाता है। अप्रशुल्क अवरोधक-अप्रशुल्क अवरोधक (जैसे कोटा एवं लाइसेंस) में वस्तुओं की मात्रा निर्दिष्ट की जाती है। ये अवरोधक भी परिमाणात्मक अवरोधक कहलाते हैं।

प्रश्न 7.
प्रशुल्क क्यों लगाए जाते हैं?
उत्तर
देशी उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए प्रशुल्क लगाए जाते हैं।

प्रश्न 8.
परिमाणात्मक प्रतिबन्धों को क्या अर्थ होता है?
उत्तर
देशी उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से संरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से, हमारे नीति-निर्धारकों ने परिमाणात्मक उपाय लागू किए। इसके लिए आयात पर कठोर नियन्त्रणों एवं प्रशुल्कों का प्रयोग होता था। परिमाणात्मक उपाय प्रशुल्क एवं अप्रशुल्क दोनों प्रकार से किए जाते हैं। कोटा, लाइसेंस, प्रशुल्क आदि परिमाणात्मक प्रतिबन्धों के अन्तर्गत आते हैं।

प्रश्न 9.
‘लाभ कमा रहे सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण कर देना चाहिए। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? क्यों?
उत्तर
निजीकरण से तात्पर्य है—किसी सार्वजनिक उपक्रम के स्वामित्व या प्रबन्धन का सरकार द्वारा त्याग। किसी सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों द्वारा जनसामान्य को इक्विटी की बिक्री के माध्यम से निजीकरण को विनिवेश कहा जाता है। निजीकरण का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र की कार्यक्षमता को बढ़ाना है। परन्तु निजीकरण से हमेशा उद्योग क्षेत्र की कार्यक्षमता में बढ़ोतरी नहीं होती है, लेकिन इससे सार्वजनिक क्षेत्र का वित्तीय भार सरकार पर कुछ कम हो जाता है। हमारे विचार से लाभ कमा रहे सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण नहीं किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक व सामाजिक कल्याण करने वाली सार्वजनिक इकाइयों का निजीकरण बिल्कुल नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 10.
क्या आपके विचार में बाह्य प्रापण भारत के लिए अच्छा है? विकसित देशों में इसका विरोध क्यों हो रहा है?
उत्तर
बाह्य प्रापण वैश्वीकरण की प्रक्रिया का एक विशिष्ट परिणाम है। इसमें कम्पनियाँ किसी बाहरी स्रोत (संस्था) से नियमित सेवाएँ प्राप्त करती हैं; जैसे-कानूनी सलाह, कम्प्यूटर सेवा, विज्ञापन, सुरक्षा आदि। संचार के माध्यमों में आई क्रान्ति, विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी के प्रसार, ने अब इन सेवाओं को ही एक विशिष्ट आर्थिक गतिविधि का स्वरूप प्रदान कर दिया है।

आजकल बहुत सारी बाहरी कम्पनियाँ ध्वनि आधारित व्यावसायिक प्रक्रिया प्रतिपादन, अभिलेखांकन, लेखांकन, बैंक सेवाएँ, संगीत की रिकार्डिंग, फिल्म सम्पादन, शिक्षण कार्य आदि सेवाएँ भारत से प्राप्त कर रही हैं। अब तो अधिकांश बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ-साथ अनेक छोटी-बड़ी कम्पनियाँ भी भारत से ये सेवाएँ प्राप्त करने लगी हैं क्योंकि भारत में इस तरह के कार्य बहुत कम लागत में और उचित रूप से निष्पादित हो जाते हैं। इस कार्य से भारत विकसित देशों से काफी विदेशी मुद्रा पारिश्रमिक के रूप में अर्जित कर रहा है। विकसित देश बाह्य प्रापण का इसीलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि भारत ने बाह्य प्रापण के व्यापर में अच्छी प्रगति की है और विकसित देशों को इस बात का डर है कि कहीं उनका देश उक्त सेवाओं पर भारत पर निर्भर न हो जाए।

प्रश्न 11.
भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ विशेष अनुकूल परिस्थितियाँ हैं जिसके कारण यह विश्व का बाह्य प्रापण केन्द्र बन रहा है। ये अनुकूल परिस्थितियाँ क्या हैं?
उत्तर
भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ विशेष अनुकूल परिस्थितियाँ हैं जिसके कारण यह विश्व का बाह्य प्रापण केन्द्र बन रहा है। ये विशेष अनुकूल परिस्थितियाँ निम्नलिखित हैं

  1. भारत में इस तरह के कार्य कम लागत में व उचित रूप से निष्पादित हो जाते हैं क्योंकि यहाँ | मजदूरी दर विकसित देशों की तुलना में काफी कम है।
  2. भारत में जनसंख्या आधिक्य के कारण कुशल श्रमिक बहुत हैं जिसके कारण उक्त सेवाओं में कुशलता एवं शुद्धता का मानक भी भारत रख सकता है।

प्रश्न 12.
क्या भारत सरकार की नवरत्न नीति सार्वजनिक उपक्रमों के निष्पादन को सुधारने में सहायक रही है? कैसे? ।
उत्तर
1996 ई० में नवउदारवादी वातावरण में सार्वजनिक उपक्रमों की कुशलता बढ़ाने, उनके प्रबन्धन में व्यवसायीकरण लाने और उनकी स्पर्धा क्षमता में प्रभावी सुधार लाने के लिए सरकार ने नौ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का चयन कर उन्हें नवरत्न घोषित कर दिया। ये कम्पनियाँ हैं—IOCL, BPCL, HPCL,ONGC, SAIL, IPCL, BHEL, NTPC और BSNL. नवरत्न’ नाम से अलंकरण के बाद इन कम्पनियों के निष्पादन में निश्चय ही सुधार आया है। स्वायत्तता मिलने से ये उपक्रम वित्तीय बाजार से स्वयं संसाधन जुटाने एवं विश्व बाजार में अपना विस्तार करने में सफल होते जा रहे हैं।

प्रश्न 13.
सेवा क्षेत्रंक के तीव्र विकास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारण कौन-से रहे हैं?
उत्तर
सेवा क्षेत्रक के तीव्र विकास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारण इस प्रकार हैं

  1. भारत में मजदूरी की दरें विकसित देशों की तुलना में काफी कम हैं।
  2. जनसंख्या आधिक्य के कारण भारत में कुशल श्रमिकों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।
  3. निम्न मजदूरी-दरें व कुशल श्रम शक्ति की उपलब्धता के कारण बाह्य प्रापण के जरिए भारत विश्व स्तर पर उल्लेखनीय कार्य कर रहा है। यह भी सेवा क्षेत्र के तीव्र विकास का कारण है।

प्रश्न 14.
सुधार प्रक्रिया से कृषि क्षेत्रक दुष्प्रभावित हुआ लगता है। क्यों?
उत्तर
सुधार कार्यों से कृषि को कोई लाभ नहीं हो पाया है और कृषि की संवृद्धि दर कम होती जा रही है। इस पर विचार के लिए हम निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार कर सकते हैं

  1. कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक व्यय; जैसे—सिंचाई, बिजली, सड़क-निर्माण और शोध-प्रसार आदि पर व्यय में काफी कमी आई है।
  2. उर्वरक सहायिकी में कमी ने उत्पादन लागतों को बढ़ा दिया है।
  3. विश्व व्यापार संघ की स्थापना के कारण कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क में कटौती, न्यूनतम समर्थन मूल्यों की समाप्ति का विचार है जिस कारण देशी किसानों को बाहरी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा।
  4. आन्तरिक उपभोग की खाद्यान्न फसलों के स्थान पर निर्यात के लिए नकदी फसलों पर बल दिया जा रहा है। इससे देश में खाद्यान्नों की कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है।
  5. प्रति व्यक्ति खाद्य उपलब्धता एवं गुणवत्ता घट रही है।
  6. सरकार का ध्यान कृषि से उद्योग की ओर परिवर्तित हुआ है।

प्रश्न 15.
सुधार काल में औद्योगिक क्षेत्रक के निराशाजनक निष्पादन के क्या कारण रहे हैं?
उत्तर
आर्थिक सुधारों का औद्योगिक क्षेत्र के विकास पर ऋणात्मक प्रभाव पड़ा है। यह प्रभाव अग्रलिखित है

  1. बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने पदार्थों की बिक्री के लिए भारतीय बाजारों का शोषण कर रही हैं और घरेलू उत्पादक अपनी कमजोर प्रतियोगी शक्ति के कारण पीछे की ओर खिसकते जा रहे हैं।
  2. औद्योगिक उत्पादनका निष्पादन सन्तोषजनक नहीं रहा। यह अस्सी के दशक के निष्पादन स्तर से भी नीचा था।

प्रश्न 16.
सामाजिक न्यायं और जन-कल्याण के परिप्रेक्ष्य में भारत के आर्थिक सुधारों पर चर्चा करें।
उत्तर
उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों के माध्यम से वैश्वीकरण के भारत सहित अनेक देशों पर कुछ सकारात्मक तथा नकारात्मक प्रभाव पड़े हैं। कुछ विद्वानों का विचार है कि वैश्वीकरण विश्व बाजारों में बेहतर पहुँच तथा तकनीकी उन्नयन द्वारा विकासशील देशों के बडे उद्योगों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्त्वपूर्ण बनने का अवसर प्रदान कर रहा है। दूसरी ओर आलोचकों का विचार है कि वैश्वीकरण ने विकसित देशों को विकासशील देशों के आन्तरिक बाजार पर कब्जा करने का भरपूर अवसर प्रदान किया है। इसके कारण गरीब देशवासियों का कल्याण ही नहीं वरन् उनकी पहचान भी तिरे में पड़ गई है। विभिन्न देशों और जनसमुदायों के बीच की खाई और विस्तृत हो रही है। आर्थिक सुधारों ने केवल उच्च आय वर्ग की आमदनी और उपभोग स्तर का उन्नयन किया है तथा सारी संवृद्धि कुछ गिने-चुने क्षेत्रों; जैसे-दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त, मनोरंजन आदि तक सीमित रही है। कृषि विनिर्माण जैसे आधारभूत क्षेत्रक, जो देश के करोड़ों लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं, इन सुधारों से लाभान्वित नहीं हो पाए हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
उदारीकरण का उपाय नहीं है-
(क) लाईसेन्स अथवा पंजीकरण की समाप्ति
(ख) विस्खार तथा उत्पादन की स्वतन्त्रता
(ग) सार्वजनिक क्षेत्र को सीमित करना
(घ) लघु उद्योगों की निवेश सीमा में वृद्धि
उत्तर
(ग) सार्वजनिक क्षेत्र को सीमित करना

प्रश्न 2.
GATT नामक एक बहुपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए
(क) 30 नवम्बर, 1947 को
(ख) 30 अक्टूबर, 1947 को
(ग) 30 सितम्बर, 1950 को
(घ) 30 जनवरी, 1950 को
उत्तर
(ख) 30 अक्टूबर, 1947 को

प्रश्न 3.
विश्व व्यापार संगठन का उद्देश्य है
(क) वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार की प्रसार करना
(ख) सेवाओं के उत्पादन एवं व्यापार का प्रसार करना
(ग) विश्व के संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 4.
भारत में औद्योगिक नीति की प्रक्रिया कब से अपनायी जा रही है?
(क) सन् 1991 ई० से
(ख) सन् 1992 ई० से
(ग) सन् 1993 ई० से
(घ) सन् 1994 ई० से
उत्तर
(क) सन् 1991 ई० से ।

प्रश्न 5.
देश में विदेशी निवेश के संरक्षण के लिए भारत के बहुपक्षीय निवेश गारण्टी एजेन्सी (MIGA) प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर कब किए? (क) 14 अप्रैल, 1991 ई० को ।
(ख) 14 अप्रैल, 1992 ई० को
(ग) 13 अप्रैल, 1992 ई० को
(घ) 13 अप्रैल, 1991 ई० को ।
उत्तर
(ग) 13 अप्रैल, 1992 ई० को ||

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में अपनाई गई मिश्रित अर्थव्यवस्था की क्या विशेष बात थी?
उत्तर
भारत में अपनाई गई मिश्रित अर्थव्यवस्था में बाजार अर्थव्यवस्था की विशेषताओं के साथ नियोजित अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ भी पायी जाती थीं।

प्रश्न 2.
वर्ष 1991 में भारत को किन संकटों का सामना करना पड़ा?
उत्तर
वर्ष 1991 में भारत को निम्नलिखित संकटों का सामना करना पड़ा

  1. विदेशी मुद्रा कोष में कमी के कारण उत्पन्न आयातों का भुगतान करने का संकट,
  2. मूल्यों में तीव्र वृद्धि,
  3. आयातों में वृद्धि।

प्रश्न 3.
वित्तीय संकट का उद्गम स्रोत क्या था?
उत्तर
वित्तीय संकट का वास्तविक उद्गम स्रोत 1980 ई० के दशक में अर्थव्यवस्था में अकुशल प्रबन्धन था।।

प्रश्न 4.
सरकार को अपने राजस्व से अधिक व्यय क्यों करना पड़ा? ।
उत्तर
गरीबी, बेरोजगारी और जनसंख्या विस्फोट के कारण सरकार को अपने राजस्व से अधिक व्यय करना पड़ा।

प्रश्न 5.
किन्हीं दो अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के नाम बताइए।
उत्तर
1. अन्तर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (विश्व बैंक) |
2. अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष।। 

प्रश्न 6.
भारत को ऋण देने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने क्या शर्ते रखीं?
उत्तर
भारत को ऋण देने के लिए सरकार ने निम्नलिखित शर्ते रखीं
1. सरकार उदारीकरण करेगी,
2. निजी क्षेत्र पर लगे प्रतिबन्धों को हल्लाएगी तथा
3. विदेशी व्यापार पर लगे प्रतिबन्ध कम करेगी।

प्रश्न 7.
नई आर्थिक नीति का क्या उद्देश्य था?
उत्तर
नई आर्थिक नीति का उद्देश्य था-अर्थव्यवस्था में अधिक स्पर्धापूर्ण व्यावसायिक वातावरण की रचना करना तथा फर्मों के व्यापार में प्रवेश करने तथा उनकी संवृद्धि के मार्ग के आने वाली बाधाओं को दूर करछा।

प्रश्न 8.
स्थायित्वकारी उपाय के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर
1. भुगतान सन्तुलन में आ गई कुछ त्रुटियों को दूर करने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा भण्डार (बनाना)।
2. मुद्रा स्फीति को नियन्त्रित करना।

प्रश्न 9.
संरचनात्मक सुधार उपाय अपनाने के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर
1. अर्थव्यवस्था की कुशलता को सुधारना,
2. अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रकों की अनम्यताओं (कठोरता) को दूर कर भारत की अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धा-क्षमता को संवर्धित करना।

प्रश्न 10.
उदारीकरण की नीति क्या थी?
उत्तर
उदारीकरण की नीति आर्थिक गतिविधियों पर लगे प्रतिबन्धों को दूर करे अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को मुक्त करने की नीति थी।

प्रश्न 11.
औद्योगिक क्षेत्र के विनियमीकरण की मुख्य बातें क्या हैं?
उत्तर
1. केवल 6 उद्योगों को छोड़कर अन्य सभी उद्योगों के लिए लाइसेन्स व्यवस्था समाप्त कर दी गई।
2. सार्वजनिक क्षेत्रक के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या केवल 3 रखी गई।
3. लघु उद्योगों द्वारा उत्पादित अनेक वस्तुओं को अनारक्षित श्रेणी में रख दिया गया।

प्रश्न 12.
वित्तीयक क्षेत्रक में कौन-कौन से सुधार किए गए हैं?
उत्तर
1. भारतीय और विदेशी निजी बैंकों को बैंकिंग क्षेत्र में पदार्पण की अनुमति दी गई।
2. विदेशी निवेश संस्थाओं तथा व्यापारी बैंक, म्युचुअल फण्ड और पेंशन कोष आदि को भारतीय वित्तीय बाजार में प्रवेश करने की अनुमति दी गई है।

प्रश्न 13.
कर-व्यवस्था में क्या सुधार किए गए?
उत्तर
1. व्यक्तिगत आय-कर पर लगाए गए करों की दरों में निरन्तर कमी की गई है।
2. निगम कर की दरों को धीरे-धीरे कम किया जा रहा है।
3. अप्रत्यक्ष करों की दरों में कमी की गई है तथा कर-संग्रह प्रक्रिया को सरल बनाया गया है।

प्रश्न 14.
विदेशी विनिमय के क्षेत्र में क्या सुधार किए गए हैं?
उत्तर
1. अन्य देशों की तुलना में रुपये का अवमूल्यन किया गया है।
2. विनिमय दरों का निर्धारण बाजार शक्तियों द्वारा ही किया जा रहा है।

प्रश्न 15.
व्यापार नीति में सुधार के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर
1. आयात और निर्यात पर परिमाणात्मक प्रतिबन्धों की समाप्ति।
2. प्रशुल्क दरों में कटौती तथा
3. आयातों के लिए लाइसेन्स प्रक्रिया की समाप्ति।

प्रश्न 16.
सरकार के 1996 ई० में नौ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को नवरत्न घोषित करने के क्या उद्देश्य थे? ”
उत्तर
1. सार्वजनिक उपक्रमों की कुशलता में वृद्धि करना,
2. उनके प्रबन्धन में व्यवसायीकरण लाना तथा
3. उनकी स्पर्धा क्षमता में प्रभावी सुधार करना।।

प्रश्न 17.
निजीकरण से क्या आशय है?
उत्तर
निजीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा सार्वजनिक उपक्रमों के स्वामित्व एवं प्रबन्ध को निजी स्वामित्व, प्रबन्ध एवं संचालन में अन्तरित किया जाता है।

प्रश्न 18.
विनिवेश से क्या आशय है?
उत्तर
किसी सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों द्वारा जनसामान्य को इक्विटी की बिक्री के माध्यम से निजीकरण को विनिवेश कहा जाता है।

प्रश्न 19.
विनिवेश के क्या उददेश्य थे?
उत्तर
1. वित्तीय अनुशासन एवं आधुनिकीकरण,
2. निजी पूँजी और प्रबन्ध क्षमताओं का उपयोग,
3. सार्वजनिक उद्यमों के निष्पादन में सुधार।।

प्रश्न 20.
वैश्वीकरण से क्या आशय है?
उत्तर
वैश्वीकरण उदारीकरण का एक विस्तृत रूप है। इसका मुख्य क्षेत्र राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और शेष विश्व के मध्य नियन्त्रण व प्रतिबन्ध रहित सम्बन्धों का विकास है।

प्रश्न 21.
बाह्य प्रापण का क्या अर्थ है?
उत्तर
बाह्य प्रापण का अर्थ है-कम्पनियों द्वारा किसी बाह्य स्रोत से नियमित सेवाएँ प्राप्त करना।

प्रश्न 22.
विश्व व्यापार संगठन की स्थापना कब और क्यों की गई?
उत्तर
विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना 1995 ई० में निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की गई
1. व्यापार बाधाओं को समाप्त करना,
2. सेवाओं के सृजन और व्यापार को प्रोत्साहन देना,
3. पर्यावरण संरक्षण। 

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आर्थिक सुधारों से क्या आशय है? भारत में आर्थिक सुधारों को लागू करने के उद्देश्य 
बताइए।
उत्तर
आर्थिक सुधार का अर्थ– आर्थिक सुधारों से अभिप्राय उन सभी उपायों से है जिनका उद्देश्य अर्थव्यवस्था को अधिक कुशल एवं प्रतियोगी बनाना है।
आर्थिक सुधारों के उद्देश्य- भारत में आर्थिक सुधारों के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित रहे हैं|

  1. अवसंरचना के विकास द्वारा अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाना।।
  2. आर्थिक विकास एवं आर्थिक स्वामित्व के मध्य उचित समन्वय स्थापित करना।
  3. औद्योगिक उत्पादकता एवं कार्यकुशलता में वृद्धि करना।
  4. वित्तीय क्षेत्र में सुधार करना एवं साख व्यवस्था का आधुनिकीकरण करना।
  5. सार्वजनिक उपक्रमों के कार्य निष्पादन में सुधार लाना।
  6. विदेशी विनियोग, विदेशी तकनीकी एवं विदेशी पूँजी में अन्तर्रवाह को प्रोत्साहित करना।
  7. राजकोषीय अनुशासन को लागू करना।।

प्रश्न 2.
निजीकरऐप से क्या आशय है?
उत्तर
निजीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा सार्वजनिक उपक्रमों के स्वामित्व एवं प्रबन्ध को निजी स्वामित्व, प्रबन्ध एवं संचालन में अन्तरित किया जाता है। ऐसे सार्वजनिक क्षेत्र की असफलताओं को दृष्टिगत रखते हुए किया जा रहा है। इस सम्बन्ध में सन् 1984 ई० में ही तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री राजीव गांधी ने घोषणा की थी, “सार्वजनिक क्षेत्र ऐसे बहुत से क्षेत्रों में फैल गया है, जहाँ इसे नहीं फैलना चाहिए। था। हम अपने सार्वजनिक क्षेत्र का विकास केवल उन क्षेत्रों में करें, जिनमें निजी क्षेत्र अक्षम है, किन्तु अब हम निजी क्षेत्र के लिए बहुत से द्वार खोल देंगे, ताकि वह अपना विस्तार कर सके और अर्थव्यवस्था अधिक स्वतन्त्र रूप से विकसित हो सके। निजी क्षेत्र को अधिक व्यापक क्षेत्र उपलब्ध कराने के लिए अनेक नीतिगत परिवर्तन किए गए, जिनका सम्बन्ध औद्योगिक लाइसेन्सिग नीति को अधिक उदार बनाने, निर्यात-आयात नीति के अन्तर्गत मात्रात्मक प्रतिंबन्धों को समाप्त करने, राजकोषीय एवं विदेशी पूँजी से सम्बन्धित नियन्त्रणों एवं प्रतिबन्धों को कम करने तथा प्रशासनिक सरलीकरण से था।

प्रश्न 3.
भारत में निजीकरण के विस्तार के लिए सरकार ने क्या किया है?
उत्तर
भारत में निजीकरण के विस्तार के लिए सरकार ने निम्नलिखित उपाय किए हैं

  1. सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों में कमी की गई है और निजी क्षेत्र के लिए औद्योगिक क्षेत्र खोले गए हैं।
  2. सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों में अंश पूँजी का अपनिवेश किया जा रहा है ताकि विकास के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाए जा सकें तथा इन उपक्रमों के कार्य निष्पादन में सुधार किया जा सके।
  3. आधारभूत संरचना (परिवहन, संचार एवं बीमा) के क्षेत्र में अधिकाधिक निजी भागीदारी को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
  4. सेवा सुविधाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई जा रही है।
  5.  निजीकरण की नई व्यवस्था चालू की गई है जिसमें स्वामित्व तो सरकार के अधीन रहता है, लेकिन संचालक मण्डल में, शीर्ष स्तर पर निजी संचालकों की नियुक्ति की जा रही है।
  6.  सरकार ने अपनी नई औद्योगिक नीति में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन देने की नीति अपनाई है।

प्रश्न 4.
उदारीकरण से क्या आशय है?
उत्तर
उदारीकरण का अभिप्राय अर्थव्यवस्था पर प्रशासनिक नियन्त्रण को धीरे-धीरे शिथिल करते हुए अन्तत: उन्हें समाप्त कर देने से है। यह आर्थिक कार्यकरण में सरकारी हस्तक्षेप का विरोध है। यह विरोध मूलतः दो मान्यताओं पर आधारित है—प्रथम, सरकारी हस्तक्षेप प्रतियोगिता को कुंठित करता है, कुशलता को घटाता है और उत्पादन लागतों को बढ़ाता है, जिससे अर्थव्यवस्था अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता करने में शिथिल पड़ जाती है। दूसरे, सरकारी नियन्त्रणों के कारण संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग नहीं हो पाता, जिससे मात्रा एवं गुणवत्ता दोनों ही दृष्टियों से उत्पादन पिछड़ जाता है। भारत में यह प्रक्रिया औद्योगिक नीति सन् 1991 ई० से अपनाई जा रही है।

प्रश्न 5.
सार्वभौमीकरण (भूमण्डलीकरण) से क्या आशय है? इस दृष्टि से भारतीय निवेश नीति (1991 ई०) की मुख्य बातें बताइए।
उत्तर
सार्वभौमीकरण उदारीकरण का ही एक विस्तृत रूप है। इसका मुख्य क्षेत्र राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था 
और शेष विश्व के मध्य नियन्त्रण व प्रतिबन्ध रहित सम्बन्धों का विकास है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् देश में बनने वाली वस्तुओं को प्रोत्साहन देने हेतु विदेशी निवेशकों पर भारत में उद्योग खोलने अथवा भारतीय उद्योगों में पूँजी लगाने पर अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध लगे हुए थे, जो देश के आर्थिक विकास में बाधक बने हुए थे। इस सन्दर्भ में घोषित निवेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

  1. देश में उच्च प्राथमिकता प्राप्त 34 उद्योगों में 51% इक्विटी तक के विदेशी निवेश के लिए स्वतः अनुमोदन की अनुमति के लिए विदेश नीति को अधिक उदार बनाया गया।
  2. प्रवासी भारतीयों (NRIs) को उच्च प्राथमिकता प्राप्त उद्योगों में पूँजी और आय की प्रत्यावर्तनीयता के साथ शत-प्रतिशत इक्विटी तक निवेश करने की अनुमति प्रदान की गई।
  3. भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों को भारतीय रिजर्व बैंक की अनुमति लिए बिना आवासीय सम्पत्ति अधिगृहीत करने का अधिकार प्राप्त हो गया है।
  4. FERA के उपबन्धों को उदार बना दिया गया है। अब इसके स्थान पर FEMA लागू है।
  5. विदेशी कम्पनियों को 14 मई, 1992 ई० से देशी बिक्री के सम्बन्ध में अपने ट्रेडमार्क का प्रयोग करने की अनुमति दे दी गई।
  6. देश में विदेशी निवेश के संरक्षण के लिए 13 अप्रैल, 1992 ई० को भारत ने ‘बहुपक्षीय निवेश गारण्टी एजेन्सी’ (MIGA) प्रोटोकोल पर हस्ताक्षर भी किए हैं।
  7. गैर-प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों में विदेशी निवेश को उदार बनाने के लिए विदेशी निवेश संवर्द्धन (FIPB) का गठन किया गया है, ताकि विदेशी कम्पनियों के निवेश सम्बन्धी मामलों का निपटारा शीघ्रता से किया जा सके।

प्रश्न 6.
भारत सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र सम्बन्धी नीति पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
सार्वजनिक क्षेत्र सम्बन्धी नीति (Public Sector Policy)-सार्वजनिक क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार ने एक नया दृष्टिकोण अपनाया, जिसके मुख्य अंग अग्रलिखित हैं

  1. सार्वजनिक विनियोग के वर्तमान पोर्टफोलियो के यथार्थवाद की कसौटी के आधार पर समीक्षा की जाएगी ताकि इसे उन क्षेत्रों से दूर रखा जा सके जिनमें सामाजिक धारणाएँ महत्त्वपूर्ण नहीं हैं और जहाँ निजी क्षेत्र अधिक कुशल है।
  2. सार्वजनिक क्षेत्र को अपेक्षाकृत अधिक प्रबन्धकीय स्वायत्तता प्रदान की जाएगी।
  3. सार्वजनिक उद्यमों के लिए बजटीय सेमर्थन क्रमशः घटाया जाएगा।
  4. सार्वजनिक व निजी क्षेत्र प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित किया जाएगा तथा कुछ चुने हुए उद्यमों में हिस्सा (शेयर) पूँजी को अत्रिनियोग किया जाएगा।
  5. अति रुग्ण सार्वजनिक उद्यमों को भारी हानियाँ उठाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

इस नीति के अनुपालन के लिए अनेक उपाय अपनाए गए हैं|

  1. सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या को 17 से कम करके 8, फिर 6 और अब 3 कर दिया गया है।
  2. जीर्ण रूप से बीमार सार्वजनिक उद्यमों को, उनके पुनरुत्थान/पुनःस्थापना के लिए औद्योगिक एवं वित्तीय पुनःनिर्माण बोर्ड (BIFR) को सौंप दिया जाएगा।
  3. सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में लाभदायकता एवं प्रत्याय दर बढ़ाने के प्रयास किए जाएँगे।
  4. सरकार की 20% तक हिस्सा पूँजी पारस्परिक निधियों द्वारा चुने गए निजी उद्यमों में विनियोजित की जाएगी।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आर्थिक सुधार से क्या आशय है? भारत में आर्थिक सुधार की प्रक्रिया अपनाने की क्या। आवश्यकता थी?
उत्तर

आर्थिक सुधार का अर्थ

आर्थिक सुधार से आशय आर्थिक संकट को दूर करने की दृष्टि से अपनाए जाने वाले उपायों से है। सरकार ने 1991 ई० में नवीन आर्थिक नीति की घोषणा की और इस नवीन आर्थिक नीति में व्यापक आर्थिक नीतियों को सम्मिलित किया। इन सुधारों का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में अधिक स्पर्धापूर्ण व्यावसायिक वातावरण की रचना करना और फर्मों के व्यापार में प्रवेश करना तथा उनके विकास के मार्ग । में आने वाली बाधाओं को दूर करना था। इसके अल्पकालिक एवं दीर्घकालिक दोनों ही प्रकार के उपायों की घोषणा की गई। अल्पकालिक उपायों का उद्देश्य भुगतान सन्तुलन में आ गई कुछ त्रुटियों को दूर करना और मुद्रा स्फीति को.नियन्त्रित करना था जबकि दीर्घकालिक उपायों का उद्देश्य अर्थव्यवस्था की कुशलता को सुधारना तथा अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रकों की असमानताओं को दूर कर अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धा क्षमता को संवर्धित करना था।

आर्थिक सुधारों की आवश्यकता 

भारत में 1 अप्रैल, 1951 से मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाते हुए, आर्थिक नियोजन का मार्ग अपनाया गया था। अभी तक 11 पंचवर्षीय योजनाएँ तथा पाँच एकवर्षीय योजनाएँ पूरी हो चुकी हैं। योजनाएँ अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में सफल भी रही हैं और असफल भी। सार्वजनिक क्षेत्र को अधिक महत्त्व, निजी क्षेत्र पर नियन्त्रण, उद्योग एवं व्यापार पर प्रतिबन्ध, नौकरशाही एवं लालफीताशाही ने जून 1991 के अन्छ में देश में एक अभूतपूर्व आर्थिक संकट पैदा कर दिया। विदेशी मुद्रा भण्डार में निरन्तर कमी, नए ऋणों में विलम्ब, अनिवासी खातों से धन की निकासी, निरन्तर आसमान छूती महँगाई ने अर्थव्यवस्था को डाँवाँडोल कर दिया। अतः अर्थव्यवस्था को आर्थिक संकट से निकालने, आर्थिक विकास में गति लाने, वित्तीय असन्तुलन को दूर करने, मुद्रा स्फीति को नियन्त्रित करने, भुगतान सन्तुलन को सन्तुलित करने तथा विदेशी विनिमय के भण्डार में वृद्धि करने के लिए नवीन आर्थिक नीति की घोषणा करना और आर्थिक सुधारों को अपनाना आवश्यक हो गया। संक्षेप में, भारत में आर्थिक सुधारों को अपनाने की आवश्यकता मुख्य रूप से निम्नलिखित कारणों से अनुभव की गई

  1. अनुत्पादक व्ययों में निरन्तर वृद्धि होने के कारण सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़ता जा रहा था। इसका अर्थ है कि सरकार के कुल व्यय कुल प्राप्तियों से बहुत अधिक थे जिनकी पूर्ति ऋणों द्वारा की जाती थी। इसके फलस्वरूप ऋण और ऋणों पर ब्याज में वृद्धि होती गई और सरकार के ऋण-जाल में फंसने की सम्भावना बढ़ गई। अत: इस राजकोषीय घाटे को कम करना आवश्येक था।
  2. व्यापार सन्तुलन के निरन्तर प्रतिकूल रहने के कारण भुगतान सन्तुलन की समस्या उत्पन्न हो गई। थी। निर्यातों में वृद्धि की तुलना में आयातों में अधिक तेजी से वृद्धि हुई। घाटे को पूरा करने के लिए विदेशी ऋण लिए गए।
  3. 1991 ई० में ईराक युद्ध के कारण पेट्रोल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई। खाड़ी संकट के कारण भुगतान सन्तुलन का घाटा बहुत अधिक बढ़ गया।
  4. 1990-91 ई० में भारत के विदेशी विनिमय कोष इतने कम हो गए थे कि वे 15 दिन के आयात के लिए भी काफी नहीं थे। उस समय की चन्द्रशेखर सरकार को विदेशी ऋण सेवा का भुगतान करने के लिए सेना गिरवी रखना पड़ा था।
  5. मूल्य स्तर में तेजी से वृद्धि हो रही थी जिसके कारण देश की आर्थिक स्थिति काफी खराब हो गई थी। कीमतों के बढ़ने का मुख्य कारण घाटे की वित्त व्यवस्था थी।
    6. सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का कार्य निष्पादन असन्तोषजनक था। ये उद्यमी परिसम्पत्ति के बजाय 
    दायित्व बनते जा रहे थे।

प्रश्न 2.
उदारीकरण से क्या आशय है? आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत सरकार ने अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कौन-से उपाय अपनाए?
उत्तर
उदारीकरण का अर्थ उदारीकरण का अभिप्राय अर्थव्यवस्था पर प्रशासनिक नियन्त्रण को धीरे-धीरे शिथिल करते हुए अन्ततः उन्हें समाप्त कर देने से है। यह आर्थिक कार्यकरण में सरकारी हस्तक्षेप का विरोध है। यह विरोध मूलतः दो मान्यताओं पर आधारित है–प्रथम, सरकारी हस्तक्षेप प्रतियोगिता को कुण्ठित करता है, कुशलता को घटाता है और उत्पादन लागतों को बढ़ाता है जिससे अर्थव्यवस्था अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता करने में शिथिल पड़ जाती है। दूसरे, सरकारी नियन्त्रणों के कारण संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग नहीं हो पाता, जिससे मात्रा एवं गुणवत्ता दोनों ही दृष्टियों से उत्पादन पिछड़ जाता है। भारत में यह प्रक्रिया सन् 1991 से अपनाई जा रही है।
भारत में 1991 ई० से पूर्व अर्थव्यवस्था पर अनेक प्रकार के नियन्त्रण लगा रखे थे; जैसे–औद्योगिक लाइसेन्स व्यवस्था, आयात लाइसेन्स, विदेशी मुद्रा नियन्त्रण, बड़े घरानों द्वारा निवेश पर प्रतिबन्ध आदि। इन नियन्त्रणों के परिणामस्वरूप, नए उद्योगों की स्थापना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, भ्रष्टाचार, अनावश्यक विलम्ब तथा अकुशलता में वृद्धि हुई तथा आर्थिक प्रगति की दर कम हो गई। अत: सरकार ने उदारीकरण की नीति अपनाई अर्थात् प्रत्यक्ष भौतिक नियन्त्रणों से अर्थव्यवस्था को मुक्ति दिलाने का प्रयास किया।

उदारीकरण के उपाय

ऑर्थिक सुधार कार्यक्रमों के अन्तर्गत सरकार ने उदारीकरण के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए हैं

1. लाइसेन्स अथवा पंजीकरण की समाप्ति- नई औद्योगिक नीति (1991) में सरकार ने नियन्त्रण के स्थान पर ‘उदारवादी नीति अपनाई। अब तक केवल 6 उद्योगों के लिए लाइसेन्स लेने की अनिवार्य व्यवस्था है, शेष उद्योगों के लिए लाइसेन्स लेना अनिवार्य नहीं है। ये उद्योग हैं

  1. शराब,
  2. सिगरेट,
  3. रक्षा उपकरण,
  4. औद्योगिक विस्फोटक,
  5. खतरनाक रसायन,
  6. औषधियाँ।

2. एकाधिकारी कानून से छूट- अब एम०आर०टी०पी० फर्म की अवधारणा को समाप्त कर दिया गया है। अब इन फर्मों को अपना विस्तार करने की स्वतन्त्रता मिल गई है। निर्धारित पूँजी निवेश सीमा भी समाप्त कर दी गई है।

3. विस्तार तथा उत्पादन की स्वतन्त्रता- उदारीकरण की नीति के अन्तर्गत अब उद्योगों को अपना विस्तार तथा उत्पादन करने की स्वतन्त्रता है। अब उत्पादक बाजार की माँग के आधार पर यह निर्णय भी ले सकते हैं कि उन्हें कौन-सी वस्तुओं का उत्पादन करना है।

4. लघु उद्योगों की निवेश सीमा में वृद्धि- लघु उद्योगों की निवेश सीमा को बढ़ाकर 5 करोड़ कर दिया गया है ताकि वे अपना आधुनिकीकरण कर सकें।

5. पूँजीगत पदार्थों के आयात की स्वतन्त्रता- उदारीकरण की नीति के फलस्वरूप भारतीय उद्योग | अपना विस्तार तथा आधुनिकीकरण करने के लिए विदेशों से मशीनें तथा कच्चा माल खरीदने के लिए स्वतन्त्र हैं।

6. तकनीकी आयात की छूट- आधुनिकीकरण के लिए उच्च तकनीक का प्रयोग आवश्यक है। भारतीय उद्योगों को नई तकनीकी उपलब्ध कराने के लिए अब उच्चतम प्राथमिकता वाले उद्योगों को तकनीकी समझौते करने के लिए अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है।

7. ब्याज-दरों का स्वतन्त्र निर्धारण- भारतीय रिजर्व बैंक ने व्यापारिक बैंकों को यह स्वतन्त्रता दे। दी है कि वे बाजार शक्तियों के आधार पर स्वयं ही ब्याज-दर का निर्धारण करें।

प्रश्न 3.
निजीकरण से क्या आशय है? आर्थिक सुधारों में भारत सरकार ने निजीकरण के लिए क्या उपाय अपनाए हैं?
उत्तर

निजीकरण का अर्थ

निजीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा सार्वजनिक उपक्रमों के स्वामित्व एवं प्रबन्ध को निजी स्वामित्व प्रबन्ध एवं संचालन में अन्तरित किया जाता है। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित उद्योगों में से अधिक-से-अधिक उद्योगों को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया जाता है तथा वर्तमान सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को पूर्ण रूप से अथवा आंशिक रूप से निजी क्षेत्र को बेच दिया जाता है। विक्रीत अंश उसका स्वामित्व एवं प्रबन्ध निजी क्षेत्र में आ जाता है। सार्वजनिक क्षेत्र के अकुशल निष्पादन ने निजीकरण की प्रक्रिया को प्रोत्साहन दिया है। निर्णय लेने की स्वतन्त्रता का अभाव, निर्णय लेने में विलम्ब, आर्थिक प्रोत्साहनों की कमी, उत्पादन क्षमता का निम्न प्रयोग एवं प्रबन्धकीय दोषों के कारण सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की उत्पादकता का स्तर निरन्तर गिरता जा रहा था। इससे निजीकरण की प्रक्रिया को बल मिला और यह माना गया कि अकुशल सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपने से अर्थव्यवस्था अधिक कुशल होगी, अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी तथा उत्पादन की गुणवत्ता एवं विविधता में वृद्धि होगी, और इससे सभी उपभोक्ता लाभान्वित होंगे।

निजीकरण के उपाय

आर्थिक सुधार कार्यक्रम के अन्तर्गत सरकार ने निजीकरण के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए हैं
1. सार्वजनिक क्षेत्र को सीमित करना- औद्योगिक नीति में प्रारम्भ से ही सार्वजनिक क्षेत्र को , प्रमुख स्थान दिया गया था। इसके पीछे यह धारणा थी कि सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार से पूँजी संचय में वृद्धि होगी, औद्योगिकीकरण को गति मिलेगी, विकास की दर बढ़ेगी तथा निर्धनता में कमी आएगी। किन्तु परिणाम इसके विपरीत निकले और सार्वजनिक क्षेत्र इन आशाओं में खरा नहीं उतर सका। फलत: सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या 17 से घटाकर 3 कर दी 
गई।

2. विनिवेश – सरकार ने घाटे में चल रहे उपक्रमों को निजी क्षेत्र को पूर्णत: या अंशतः बेचना आरम्भ कर दिया है। अब इनका स्वामित्व तथा प्रबन्ध सरकार के स्थान पर निजी क्षेत्र का हो जाएगा।

प्रश्न 4.
वैश्वीकरण अथवा भूमण्डलीकरण से क्या आशय है? वैश्वीकरण की दिशा में सरकार ने क्या उपाय अपनाए हैं?
उत्तर

वैश्वीकरण का अर्थ

वैश्वीकरण का अर्थ है-देश की अर्थव्यवस्था को संसार के अन्य देशों की अर्थव्यवस्था से मुक्त व्यापार पूँजी और श्रम की मुक्त गतिशीलता आदि के द्वारा सम्बन्धित करना। इसके अन्तर्गत देश की अर्थव्यवस्था विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ एकीकृत कर दी जाती है। किन्तु भारतीय अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में इसका अर्थ इससे अधिक व्यापक है। भारतीय अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में वैश्वीकरण के अन्तर्गत निम्नलिखित बातें सम्मिलित की जाती हैं–अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेश के लिए खोलना, नियन्त्रणों को धीरे-धीरे समाप्त करना, आयात उदारीकरण कार्यक्रमों को व्यापक आधार पर लागू करना तथा निर्यात संवर्द्धन को प्रोत्साहित करना।

वैश्वीकरण के लिए सरकार द्वारा अपनाए गए उपाय

आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत भारत सरकार ने वैश्वीकरण के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए हैं
1. विदेशी पूँजी निवेश की साम्य सीमा में वृद्धि–आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत भारत सरकार ने 
विदेशी पूँजी निवेश की सीमा 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 51 से 100 प्रतिशत तक कर दी। उच्च प्राथमिकता प्राप्त 47 उद्योगों व निर्यातक व्यापारिक घरानों के लिए यह 100 प्रतिशत थी। इस सम्बन्ध में विदेशी मुद्रा नियमन अधिनियम’ (FERA) के स्थान पर ‘विदेशी मुद्रा प्रबन्ध अधिनियम’ (FEMA) लागू किया गया है।

2. आंशिक परिवर्तनशीलता- भारतीय रुपये को आंशिक रूप से परिवर्तनशील बना दिया गया। यह परिवर्तनशीलता पूँजीगत सौदों पर लागू नहीं थी। इस प्रकार राजस्व खाते में रुपया पूर्णत: परिवर्तनशील कर दिया गया।

3. दीर्घकालीस व्यापार नीति- विदेश व्यापार नीति को दीर्घकाल अर्थात् 5 वर्ष के लिए लागू किया गया। इसमें व्यापार में लगे सभी नियन्त्रण व प्रतिबन्धों को हटा दिया गया, प्रशासनिक नियन्त्रणों को न्यूनतम कर दिया गया तथा खुली प्रतियोगिता को प्रोत्साहन दिया गया।

4. प्रशुल्कों में केमी- आर्थिक सुधारों के अनुरूप प्रशुल्कों (आयात-निर्यात शुल्क) को धीरे-धीरे कम किया जा रहा है।

प्रश्न 5.
आर्थिक सुधार कार्यक्रम के अन्तर्गत अपनाए गए राजकोषीय एवं वित्तीय सुधारों को बताइए।
उत्तर

राजकोषीय सुधार

राजकोषीय सुधार से आशय सरकार की आय में वृद्धि करना और सार्वजनिक व्यय को इस प्रकार कम करना है कि उत्पादन तथा आर्थिक कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। इसका उद्देश्य राजकोषीय असन्तुलन को दूर करके राजकोषीय अनुशासन को बनाए रखना है। इसका मुख्य कारण देश में केन्द्र एवं राज्य सरकारों के बढ़ते राजकोषीय घाटे, ऋण एवं ऋणजाल में फँसी अर्थव्यवस्था, ब्याज में वृद्धि, विदेशी विनिमय में कमी आदि के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की निरन्तर बिगड़ती स्थिति। भारतीय अर्थव्यवस्था को इस स्थिति से उबारने के लिए अनेक उपाय अपनाए गए; जैसे-सार्वजनिक व्यय पर नियन्त्रण, करों में वृद्धि, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के शेयरों में वृद्धि तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उत्पादों की कीमतों में वृद्धि। राजा चेलैया समिति की रिपोर्ट के आधार पर राजकोषीय नीति में अनेक सुधार किए गए। मुख्य सुधार निम्नलिखित थे

  1. कर-प्रणाली को अधिक वैज्ञानिक एवं युक्तिसंगत बनाया गया। आयकर की अधिकतम दर को 50 प्रतिशत से घटाकर 30 प्रतिशत कर दिया गया।
  2. विदेशी कम्पनियों के लाभ को कम किया गया।
  3. आयात-निर्यात कर को घटाया गया।
  4. अनेक वस्तुओं पर उत्पादन कर को घटाया गया।
  5. आर्थिक सहायता को कम किया गया।
  6. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को राजकोषीय प्रेरणा प्रदान की गई और पोर्टफोलियो निवेश के.तिए विदेशियों को प्रोत्साहित किया गया।
  7. कर-प्रणाली की संरचना को सरल बनाया गया।
  8. सीमा शुल्क की दरों को युक्तिपरक बनाया गया।

वित्तीय सुधार

वित्तीय सुधारों से आशय देश की बैंकिंग तथा वित्तीय नीतियों में सुधार करने से है। नरसिंहम समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने वित्तीय क्षेत्र में निम्नलिखित सुधार किए

  1. वैधानिक तरलता अनुपात को 38.5 प्रतिशत से कम करके 25 प्रतिशत कर दिया गया।
  2. आरक्षित नकदी अनुपात को धीरे-धीरे कम करके 4.5 प्रतिशत पर लाया गया। किन्तु गत कुछ समय से इसमें निरन्तर वृद्धि की जा रही है। वर्तमान में यह 6.5% प्रतिशत है।
  3. ब्याज-दरों का निर्धारण करने के लिए बैंकों को स्वतन्त्र छोड़ दिया गया।
  4. बैंकिंग प्रणाली की पुनर्संरचना की गई। बैंकिंग क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया।
  5. बैंकों को अधिकाधिक स्वतन्त्रता प्रदान की जा रही है।

प्रश्न 6.
नवीन आर्थिक नीति (आर्थिक सुधार) के प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर
आर्थिक सुधार के लिए अपनाए गए विभिन्न कार्यक्रमों के भारतीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक एवं ऋणात्मक दोनों ही प्रकार के प्रभाव पड़े हैं। इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है 
सकारात्मक (अनुकूल) प्रभाव।

  1. भारतीय अर्थव्यवस्था गतिहीनता से बाहर निकलकर एक सक्रिय अर्थव्यवस्था बन गई है। आर्थिक सुधारों के फलस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियाँ अधिक सक्रिय हुई हैं। इसके फलस्वरूप देश की संवृद्धि दर बढ़ी है। यह लगभग 8 प्रतिशत अनुमानित है।
  2. औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि हुई है। यह वृद्धि लगभग 10 प्रतिशत है। भारत की सूचना प्रौद्योगिकी विश्व में अपना स्थान बनाए हुए है।
  3. निरन्तर बढ़ते राजकोषीय घाटे में कमी आई है। सरकारी राजस्व में वृद्धि हुई है।
  4. मुद्रा स्फीति पर रोक लगी है (यद्यपि गत दो वर्षों से इसमें पुनः वृद्धि आरम्भ हो गई है)।
  5. उपभोक्ता को विविध प्रकार की उत्तम गुणवत्ता वाली वस्तुएँ उचित कीमत पर सरलता से प्राप्त हो | जाती हैं। इसके फलस्वरूप लोगों के जीवन स्तर एवं जनकल्याण में वृद्धि हुई है।
  6. विदेशी विनिमय कोषों में आशा से अधिक वृद्धि हुई है। इसमें भारतीय बाजारों में निवेश के प्रति विदेशियों का
    विश्वास बढ़ा है।
  7. देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। निवेश के साथ पूँजी व तकनीकी का |
    भी अन्तर्रवाह बढ़ा है।
  8. एक उभरती आर्थिक शक्ति के रूप में भारत की पहचान होने लगी है।
  9. भारतीय बाजारों की संरचना में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है। भारतीय बाजार अब अधिक प्रतियोगी| बनते जा रहे हैं। इस प्रकार आर्थिक सुधारों के फलस्वरूप न केवल विकास की प्रक्रिया में तेजी आई है, अपितु इसमें विविधता भी आई है और वैश्विक दृष्टि से भारतीय अर्थव्यवस्था अधिक सुदृढ़ हुई है।

नकारात्मक (प्रतिकूल प्रभाव

1. आर्थिक सुधारों का लाभ उद्योग क्षेत्र को अधिक मिला है, कृषि क्षेत्र उपेक्षित रहा है। उद्यमियों का ध्यान कृषि से उद्योगों की ओर विवर्तित हुआ है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि कृषि क्षेत्र का धीमा विकास औद्योगिक क्षेत्र की विकास प्रक्रिया में बाधा डाल सकता है।
2. विकास प्रक्रिया का स्वरूप नगरीय हो गया है। सभी विदेशी कम्पनियाँशहरी क्षेत्रों को ही अपना 
केन्द्रबिन्दु बनाए हुए हैं। इससे ग्रामीण-शहरी अन्तर बढ़ा है।
3. बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के कारण हमारे देश पर ‘आर्थिक उपनिवेशवाद’ का खतरा मँडराने लगा है। ये कम्पनियाँ भारतीय बाजारों का शोषण कर रही हैं और कमजोर स्पर्धा क्षमता के कारण भारतीय उद्योगपति हताश हो रहे हैं।
4. उपभोक्तावाद के प्रसार के कारण लोग अपव्ययी बनते जा रहे हैं। प्रदर्शन प्रभाव के कारण 
परिवारों की शान्ति भंग हो रही है। 5. भारतीय समाज का सांस्कृतिक ह्रास हो रहा है। आर्थिक सम्पन्नता नैतिक मूल्यों पर हावी हो चुकी
संक्षेप में, आर्थिक सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर अनुकूल व प्रतिकूल दोनों ही प्रकार के प्रभाव छोड़े हैं। कुछ भी अमिश्रित वरदान नहीं है। अत: इनका पालन बड़ी सावधानी से किया जाना चाहिए। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि अन्तर्राष्ट्रीय बड़े खिलाड़ी हम पर हावी न हों और घरेलू अर्थव्यवस्था को कोई हानि न हो।

प्रश्न 7.
विश्व व्यापार संगठन की स्थापना क्यों की गई? इसके कार्य एवं कार्य-प्रणाली पर प्रकाश डालिए।
अथवा विश्व व्यापार संगठन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर

विश्व व्यापार संगठन

30 अक्टूबर, 1947 को GATT’ नामक एक बहुपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। तब से लेकर दिसम्बर, 1994 तक गैट के अन्तर्गत वार्ताओं के आठ दौर सम्पन्न हुए हैं। गैट का आठवाँ दौर बहुचर्चित एवं विवादास्पद रहा क्योंकि इसमें वस्तुओं के व्यापार के साथ-साथ सेवाओं, बौद्धिक सम्पदाओं आदि के सम्मिलित किए जाने के लिए विकसित देशों की ओर से काफी दबाव पड़ा। अन्ततः 15 अप्रैल, 1995 को मराकश (मोरक्को) में समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसके द्वारा नए विषयों को भी विश्व व्यापार के दायरे में शामिल कर लिया गया और विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना की

अनुशंसा की गई। विश्व व्यापार संगठन (WTO) से आशय- विश्व व्यापार संगठन उरुग्वे दौर की वार्ताओं के बाद हुए समझौते को कार्यरूप देने एवं उनके अनुपालन की देख-रेख करने के लिए गठित एक बहुपक्षीय व्यापारिक संगठन है। यह सदस्य देशों के बीच व्यापार सम्बन्धों के लिए एक संस्थागत ढाँचा प्रदान करेगा एवं इससे जुड़े बहुपक्षीय व्यापारिक समझौते से सम्बन्धित बातचीत के लिए एक मंच की तरह कार्य करेगा। विश्व व्यापार संगठन ने 1 जनवरी, 1995 से कार्य करना आरम्भ कर दिया है। इसका मुख्यालय जेनेवा में है। वर्ष 2014 में WTO की सदस्य संख्या 160 थी।

विश्व व्यापार संगठन का प्रशासनिक ढाँचा– विश्व व्यापार संगठन के शीर्ष पर एक मंत्रिस्तरीय सम्मेलन है। इसकी बैठक हर दो वर्ष के अन्तराल पर एक बार बुलाई जाएगी। दो मंत्रिस्तरीय सम्मेलनों के बीच एक महापरिषद् का गठन किया गया है, जिसमें प्रत्येक सदस्य देश का एक-एक प्रतिनिधि शामिल होगा। इस महापरिषद् के अधीन तीन और परिषदें होंगी

  1. सेवाओं के लिए परिषद्,
  2. उत्पादों के लिए परिषद् तथा
  3. बौद्धिक सम्पदा के लिए परिषद्।

इन परिषदों के अधीन अनेक समितियाँ गठित की जाएँगी, जो क्षेत्र के अन्दर आने वाले विशेष मुद्दों पर विचार-विमर्श करेंगी; यथा-

  1. व्यापार एवं विकास के लिए समिति,
  2. भुगतान सन्तुलन के लिए समिति,
  3. बजट के लिए समिति आदि।।

विश्व व्यापार संगठन की कार्य-प्रणाली– विश्व व्यापार संगठन के अन्तर्गत आने वाले सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाएँगे। जिन विषयों पर सर्वसम्मति नहीं हो पाएगी, उन पर मतदान होगा। प्रत्येक सदस्य देश को केवल एक मत देने का अधिकार होगा। किसी भी सदस्य देश को संगठन के प्रति उसके दायित्वों से राहत देने के लिए तीन-चौथाई बहुमत की आवश्यकता होगी, सदस्य राष्ट्रों के बीच व्यापारिक विवादों को हल करने के लिएँ एक विवाद निपटारा विधि (Dispute Settlement Mechanism) की व्यवस्था की गई है। शिकायत मिलने पर विवाद निपटाने के लिए निर्धारित विस्तृत कानूनी प्रक्रिया के अन्तर्गत ही विवाद का निपटारा किया जाएगा। दोषी पाए जाने वाले सदस्य देश के विरुद्ध तो बदले की कार्यवाही (Retaliatory measures) की जाएगी। संगठन में उल्लिखित प्रावध्रानों का उल्लंघन दण्डनीय होगा।

विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य

विश्व व्यापार संगठन की प्रस्तावना में इसके उद्देश्यों को स्पष्ट किया गया है, जो निम्नलिखित हैं

  1. जीवन-स्तर में वृद्धि करना,
  2. पूर्ण रोजगार एवं प्रभावपूर्ण माँग में वृहत् स्तरीय, परन्तु ठोस वृद्धि करना,
  3. वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार का प्रसार करना,
  4. सेवाओं के उत्पादन एवं व्यापार का प्रसार करना,
  5. विश्व के संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना,
  6. अविरत (Sustainable) विकास की अवधारणा को स्वीकार करना तथा
  7. पर्यावरण को संरक्षण एवं उसकी सुरक्षा करना।।

विश्व व्यापार संगठन के कार्य

विश्व व्यापार संगठन (WTO) के कुछ कार्यों का उल्लेख निम्नवत् किया जा सकता है

  1. विश्व व्यापार समझौता एवं बहुपक्षीय तथा बहुवचनीय (Plurilatera) समझौतों के कार्यान्वयन, प्रशासन एवं परिचालन हेतु सुविधाएँ प्रदान करना।
  2. व्यापार एवं प्रशुल्क से सम्बन्धित किसी भी भावी मसले पर सदस्यों के बीच विचार-विमर्श हेतु एक मंच के रूप में कार्य करना।
  3. विवादों के निपटारे (Settlement of Disputes) से सम्बन्धित नियमों एवं प्रक्रियाओं को प्रशासित करना।
  4. व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया (Trade Policy Review Mechanism) से सम्बन्धित नियमों एवं | प्रावधानों को लागू करना।
  5. वैश्विक आर्थिक नीति निर्माण में अधिक सामंजस्य भाव (Coherence) लाने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक से सहयोग करना।।
  6. विश्व संसाधनों (World Resources) का अनुकूलतम प्रयोग करना।

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