UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 2 आन का मान

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name आन का मान (हरिकृष्ण ‘प्रेमी’)
Number of Questions 8
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 2 आन का मान (हरिकृष्ण ‘प्रेमी’)

प्रश्न 1:
‘आन का मान’ नाटक की कथावस्तु संक्षेप (सारांश) में लिखिए।
या
‘आन का मान’ नाटक की कथावस्तु पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के मार्मिक स्थलों का वर्णन कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के प्रथम अंक की कथा संक्षेप में लिखिए।
या
‘आन का मान नाटक के द्वितीय अंक की कथा का सार अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के तीसरे अंक की घटनाओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के किसी एक अंक की कथावस्तु लिखिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के सर्वाधिक प्रिय अंक का कथासार प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

‘आन का मान’ नाटक का सारांश

प्रथम अंक – श्री हरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘आने का मान’ नाटक का आरम्भ रेगिस्तान के एक मैदान से हुआ है। यह काल भारत में औरंगजेब की सत्ता का है। इस समय जोधपुर में महाराज जसवन्त सिंह का राज्य था। वीर दुर्गादास उन्हीं के कर्तव्यनिष्ठ सेवक हैं जो कि महाराज की मृत्यु के उपरान्त उनके अवयस्क पुत्र अजीत के संरक्षक बनते हैं। नाटक का कथानक दुर्गादास के चारों ओर घूमता है। अकबर द्वितीय के पुत्र बुलन्द अख्तर और पुत्री सफीयतुन्निसा हैं। दोनों भाई-बहन औरंगजेब की राष्ट्र-विरोधी नीतियों का विरोध करते हैं। उनकी बातों से यह भी आभास होता है कि अकबर द्वितीय ने औरंगजेब के अत्याचारों के विरोध में वीर दुर्गादास से मित्रता कर ली थी। दुर्गादास ने अकबर द्वितीय को बादशाह घोषित कर दिया था, परन्तु औरंगजेब की एक चालवश उसे ईरान भाग जाना पड़ा।

सफीयत और बुलन्द दुर्गादास के पास ही रह जाते हैं। अजीतसिंह युवक होकर जोधपुर का शासन सँभाल लेता है। अजीतसिंह सफीयत से प्रेम करता है। सफीयत जानती है कि हिन्दू युवक और मुसलमान युवती का विवाह कठिन होगा। दुर्गादास भी अजीत को राजपूत धर्म की मर्यादा का ध्यान दिलाता है-“मान रखना राजपूत की आन होती है और इस आन को मान रखना उसके जीवन का व्रत होता है।”

द्वितीय अंक – इस नाटक के सर्वाधिक मार्मिक स्थलों से सम्बन्धित कथा दूसरे अंक की है। कथा का प्रारम्भ भीमनदी के तट पर स्थित ब्रह्मपुरी से प्रारम्भ होता है। औरंगजेब ने इस नगरी का नाम ‘इस्लामपुरी’ रख दिया है। औरंगजेब की भी दो पुत्रियाँ हैं-मेहरुन्निसा तथा जीनतुन्निसा। मेहरुन्निसा औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर किये जा रहे अत्याचारों का विरोध करती है। जीनत पिता की समर्थक है। औरंगजेब अपनी पुत्रियों की बात सुनता है। तथा मेहरुन्निसा द्वारा बताये गये अत्याचारों के लिए पश्चात्ताप करता है। औरंगजेब अपने पुत्रों को जनता के साथ उदार व्यवहार करने के लिए कहता है। औरंगजेब अपने अन्तिम समय में अपनी वसीयत करता है कि उसका अन्तिम संस्कार सादगी से किया जाए। इस समय ईश्वरदास; दुर्गादास को बन्दी बनाकर औरंगजेब के. पास लाता है। औरंगजेब अपने पौत्र-पौत्री बुलन्द तथा सफीयत को पाने के लिए दुर्गादास से सौदेबाजी करता है, परन्तु दुर्गादास इसके लिए तैयार, नहीं होते।

तृतीय अंक – नाटक के तीसरे और अन्तिम अंक में अजीतसिंह पुनः सफीयत से जीवन-साथी बनने का निवेदन करता है, परन्तु सफीयत अजीत को लोकहित के लिए स्वहित के त्याग करने का परामर्श देती है। वह कहती है-”महाराज ! प्रेम केवल भोग की ही माँग नहीं करता, वह त्याग और बलिदान भी चाहता है।” बुलन्द तथा दुर्गादास के विरोध की अजीत परवाह नहीं करता तथा सफीयत को अपने साथ चलने के लिए कहता है। दुर्गादास पालकी में सफीयत को ले जाना चाहते हैं। अजीत नाराज होकर पालकी को रोककर कहते हैं-“दुर्गादास जी ! मारवाड़ में आप रहेंगे या मैं रहूँगा ………..“।” दुर्गादास मातृभूमि को अन्तिम प्रणाम करके चले जाते हैं। नाटक की कथा यहीं समाप्त हो जाती है।

उपर्युक्त कथा, कथा-संघटन की दृष्टि से सुगठित और व्यवस्थित है। ऐतिहासिक घटना को कल्पना के सतरंगी रंगों में रँगकर रोचक और प्रभावपूर्ण बना दिया गया है। प्रथम अंक में कथा की प्रस्तावना या आरम्भ है। द्वितीय अंक में अजीत व दुर्गादास के टकराव के समय विकास की अवस्था के उपरान्त कथा अपनी चरमसीमा पर आ जाती है। राज्य-निष्कासन के आदेश और सफीयत के पालकी में बैठने के साथ ही कथा का उतार आ जाता है। सफीयत की विदा के साथ ही कथानक समाप्त हो जाता है। राज्य-निष्कासन को हँसकर स्वीकार कर ‘आन का मान’ रखने वाले दुर्गादास से सम्बन्धित यह कथा अत्यन्त संक्षिप्त है।

प्रश्न 2:
नाटकीय तत्त्वों (नाट्यकला) के आधार पर ‘आन का मान’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के देश-काल चित्रण की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘आन का मान नाटक की भाषा-शैली पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘नाटक की अभिनेयता’ (रंगमंचीयता) पर प्रकाश डालिए।
या
संवाद-योजना और भाषा-शैली की दृष्टि से ‘आन का मान’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
‘संवाद-योजना की दृष्टि से ‘आन का मान’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘आन का मान की पात्र-योजना तथा चरित्र-निर्माण की दृष्टि से समीक्षा कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक में वातावरण पर प्रकाश डालिए।
या
‘आन का मान’ नाटक की भाषा पर प्रकाश डालिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के संवाद-सौष्ठव पर प्रकाश डालिए।
या
‘आन को मान’ नाटक के कथानक का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:

‘आन का मान’ नाटक की तात्विक समीक्षा

नाटकीय तत्त्वों के आधार पर श्री हरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘आन को मान’ नाटक की समीक्षा निम्नलिखित प्रकार से
की जा सकती है

(1) कथानक – इस नाटक का कथानक ऐतिहासिक है। एक छोटी-सी ऐतिहासिक कथा में यथार्थ और कल्पना का सुन्दर समन्वय किया गया है। कथा में एकसूत्रता, सजीवता, घटना-प्रवाह आदि का निर्वाह भली-भाँति हुआ है। नाटक का शीर्षक आकर्षक है। कथानक की दृष्टि से प्रस्तुत नाटक एक सफल रचना है। नाटक के कथानक में औरंगजेब के समय का वर्णन है तथा औरंगजेब के अत्याचारों को प्रस्तुत किया गया है। उसके पुत्र अकबर द्वितीय की दुर्गादास सहायता करते हैं तथा उसे बादशाह घोषित कर देते हैं। औरंगजेब द्वारा उत्पन्न की गयी परिस्थितियोंवश अकबर द्वितीय ईरान भाग जाता है तथा उसके पुत्र और पुत्री दुर्गादास के पास ही रह जाते हैं। अकबर द्वितीय की पुत्री सफीयत से अजीतसिंह प्रेम करता है, परन्तु दुर्गादास इसका विरोध करते हैं और सफीयत के साथ मारवाड़ को ही छोड़ देते हैं। कथानक का मुख्य स्वर राजपूती आन और दुर्गादास का शौर्य है।

(2) पात्र तथा चरित्र-चित्रण – पात्रों की कुल संख्या ग्यारह है, जिनमें तीन स्त्री पात्र हैं। नाटक का नायक दुर्गादास है। पात्र कथानक के विकास में पूर्ण रूप से सहायक हुए हैं। दुर्गादास के चरित्र को आदर्श रूप में प्रस्तुत करना नाटककार का प्रमुख लक्ष्य रहा है। दुर्गादास के सामने अन्य पात्र धूमिल-से प्रतीत होते हैं। दुर्गादास के बाद सफीयतुन्निसा के चरित्र को विशेष रूप से उभारा गया है। सफीयत समझदार मुस्लिम युवती है। औरंगजेब को धर्मान्ध और अत्याचारी शासक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अजीत मारवाड़ का शासक है। तथा उसे सामान्य युवक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। चरित्र-चित्रण की दृष्टि से प्रस्तुत नाटक एक सफल नाटक है।

(3) संवाद-योजना – नाटक के संवादं छोटे, वीरत्व और ओज से पूर्ण, तीखे तथा कहीं-कहीं माधुर्य में डूबे हैं। अधिकांश संवाद मर्मस्पर्शी एवं गतिमात्र हैं। संवाद-योजना ने नाटक की कथा को प्रवहमान किया है; यथा
जीनतुन्निसा – तू चौंकी क्यों?
मेहरुन्निसा – मैं समझी जिन्दा पीर आ गये।
जीनतुन्निसा – हँसी उड़ाती है अब्बाजान की।
उनके सामने तो भीगी बिल्ली बन जाती है। मेहरुन्निसा-बनना ही पड़ता है। उनकी आँखें सिंह की भाँति चमकती हैं – खाने को दौड़ती हैं।
इस प्रकार संवाद की दृष्टि से यह एक सफल नाटक है।

(4) भाषा-शैली – ‘आन का मान’ नाटक की भाषा सरल, सुबोध, प्रवाहपूर्ण तथा प्रसाद-गुणयुक्त है। ओज और माधुर्य गुण भाषा के सौन्दर्यवर्द्धन में सफल रहे हैं। वाक्य आवश्यकतानुसार छोटे और बड़े होते गये हैं। नाटक के मुस्लिम पात्र भी शुद्ध हिन्दी का प्रयोग करते हुए दिखाये गये हैं। कहीं-कहीं उर्दू के शब्दों का भी प्रयोग मिलता है। नाटक में लोकोक्तियों, मुहावरों, सूक्तियों तथा गीतों का बड़ा सटीक प्रयोग किया गया है; जैसे-‘दूध का जला छाछ को फूक मारकर पीता है’, ‘सिर पर कफन बाँधे फिरना’, ‘बद अच्छा बदनाम बुरा इत्यादि। नाटक में तीन गीत हैं। नाटक में वर्णनात्मक तथा संवाद शैली का प्रयोग किया गया है। नाटक में प्रयुक्त स्वाभाविक भाषा का एक उदाहरण द्रष्टव्य है – ”इसलिए कि औरंगजेब हत्यारा होते हुए भी हिसाबी है। वह व्यापारी की भाँति गणित लगाता है। दुर्गादास जानता है कि जहाँपनाह मुझे मारकर भी अपना मनोरथ पूरा नहीं कर सकते। जीवित दुर्गादास की अपेक्षा मृत दुर्गादास मुगल साम्राज्य के लिए अधिक खतरनाक है।”

(5) देश-काल तथा वातावरण – नाटककार ने नाटक की रचना में देश-काल तथा वातावरण का पूर्ण ध्यान रखा है। नाटक में मध्यकालीन मुस्लिम तथा हिन्दू संस्कृतियों का समन्वय हुआ है। नाटक के पात्र ऐसे राजघरानों से सम्बन्धित हैं, जिनमें परस्पर संघर्ष चलता रहता था। पात्रों की वेशभूषा, रहन-सहन आदि समय के अनुरूप ही हैं। औरंगजेब सादगी-पसन्द बादशाह था, अतः उसके राजभवन का प्रदर्शन सामान्य रूप में ही किया गया है। देश-काल एवं वातावरण के चित्रण में नाटककार ऐतिहासिकता की रक्षा करने में पूर्णतया सफल रहा है।

(6) उद्देश्य – प्रेमी जी ने प्रस्तुत नाटक के द्वारा आदर्श मानव-मूल्यों की स्थापना का सुन्दर प्रयास किया है। नाटक को उद्देश्य सत्यता, विश्वबन्धुत्व, राष्ट्रीय एकता, धार्मिक सहिष्णुता, कर्तव्यपरायणता जैसे उदात्त गुणों का चित्रण करना है। नाटक के उद्देश्यों की पूर्ति दुर्गादास के चरित्र-चित्रण से होती है। दुर्गादास कर्त्तव्यपरायण और देशप्रेमी है तथा विश्व-बन्धुत्व में विश्वास रखता है। दुर्गादास को आदर्श मूल्यों को स्थापित करने वाला उदात्त नायक कहा जा सकता है। वह कर्म की सफलता में ही फल के आनन्द का अनुभव करने वाला कर्मयोगी है। अन्य पात्र भी नाटककार के सन्देश को प्रसारित व प्रचारित करने में सहयोग देते हैं।

(7) अभिनेयता – प्रस्तुत नाटक रंगमंच की दृष्टि से एक सफल रचना है। कुशल रंगकर्मी द्वारा रेतीले मैदान, फैली हुई चाँदनी, बहती हुई नदी आदि को प्रवाह चित्रों, प्रकाश व ध्वनि के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है। औरंगजेब के कक्ष की साधारण सजावट ऐतिहासिक सत्य के अनुरूप है। पहले अंक तथा तीसरे अंक का सेट एक ही है। नाटक के प्रस्तुतीकरण में केवल तीन बार परदा गिराने की आवश्यकता होती है। नाटककार ने वेशभूषा तथा अन्य नाटकीय आवश्यकताओं के लिए उचित संकेत दिये हैं। गतिशील कथानक, कम पात्र, सरल भाषा, अंकों तथा सामान्य मंच-विधान की दृष्टि से यह एक सफल नाटक है।

प्रश्न 3:
‘आन का मान के आधार पर वीर दुर्गादास का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के आधार पर दुर्गादास की चारित्रिक विशेषताएँ निरूपित करते हुए उसमें निहित भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता प्रतिपादित कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के प्रमुख पात्र (नायक) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आन का मान’ का कौन पुरुष पात्र आपको सबसे प्रभावशाली प्रतीत होता है। सकारण उत्तर दीजिए।
या
“मानवतावादी दृष्टि मनुष्य को श्रेष्ठ मनुष्य बनाती है।” दुर्गादास के चरित्र के आधार पर इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के नायक की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

दुर्गादास का चरित्र-चित्रण

श्री हरिकृष्ण प्रेमी कृत“आन का माननाटक के नायक बीर दुर्गादास राठौर हैं। दुर्गादास उच्च मानवीय गुणों से युक्त वीर पुरुष हैं। नाटक का सम्पूर्ण घटनाक्रम इनके चारों ओर ही घूमता है। इनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) मानवतावादी दृष्टिकोण – दुर्गादास एक सच्चा व उच्च श्रेणी का मानव है। वह ऐसे किसी भी सिद्धान्त को आदर्श नहीं मानता, जो मानवता के विरुद्ध हो। औरंगजेब के बेटे को मुसलमान होते हुए भी वह अपना मित्र मानता है तथा प्राणों की बाजी लगाकर वह अकबर की बेटी सफीयत की रक्षा करता है। दुर्गादास कहता है-”मानवता का मानव के साथ जो नाता है, वह स्वार्थ का नाता नहीं, शाहजादा हुजूर!”

(2) हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति को समन्वयवादी – दुर्गादास धार्मिक भेदभाव को नहीं मानता। वह हिन्दू और मुस्लिम एकता का प्रबल पोषक है। वह इन संस्कृतियों की पारस्परिक भेदभाव की दीवार को तोड़ना चाहता है। उसकी दृष्टि में मानवता ही श्रेष्ठ धर्म है। वह कहती है “न केवल मुसलमान ही भारत है, और न केवल हिन्दू ही। दोनों को यहीं जीना है, यहीं मरना है।”

(3) आन को पक्का राजपूत – दुर्गादास अपने वचनों के प्रति निष्ठावान् है। उसका मत है-”मान रखना राजपूत की आन होती है और इस आन का मान रखना उसके जीवन का व्रत होता है।”

(4) सत्य, न्याय व देश का प्रेमी – दुर्गादास सत्य का प्रतीक है, न्याय में विश्वास रखता है तथा सच्चा देशभक्त है। वह कहता है-“राजपूतों की तलवार सदा सत्य, न्याय, स्वाभिमान और स्वदेश की रक्षक होकर रही है।”

(5) स्वामिभक्त और निश्छल – वह स्वामिभक्त और निश्छल है। अपने गुणों को दाँव पर लगाकर वह कुँवर अजीतसिंह की रक्षा करता है तथा उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुँचा देता है। कासिम उसके विषय में कहता है-”संसार भर में हाथ में दीपक लेकर घूम आएँगे, तब भी दुर्गादास जैसा शुभचिन्तक, वीर, स्वामिभक्त और निश्छल व्यक्ति न पाएँगे।”

(6) कर्त्तव्यपरायण – दुर्गादास कर्तव्यपरायण व्यक्ति है। वह सदैव अपने कर्तव्य को प्राथमिकता देता है। औरंगजेब भी वीर दुर्गादास के कर्तव्यपरायण होने की बात ईश्वरदास से कहता है।

(7) सच्चा मित्र – वीरवर दुर्गादास एक सच्चा मित्र है। औरंगजेब का पुत्र अकबर द्वितीय उसका मित्र है। वह मित्रता का ईमानदारी व सच्चाई के साथ पालन करता है। अकबर द्वितीय के सभी साथी उसका साथ छोड़ देते हैं, परन्तु दुर्गादास सच्चे मित्र की तरह उसका साथ देता है। वह अकबर द्वितीय को औरंगजेब के हाथों से बचाने के लिए उसे ईरान भेज देता है।

(8) राष्ट्रीयता – दुर्गादास के हृदय में राष्ट्रीयता कूट-कूटकर भरी है। वह भारत को न मुसलमानों का देश मानता है, न हिन्दुओं का। वह हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को पाटकर नये समाज का निर्माण करना चाहता है।

(9) सुशासन का समर्थक – दुर्गादास सदैव अच्छे शासन एवं सुव्यवस्था का समर्थक रहा है। वह कहता है-
”सुशासन को प्रजा; राजा का प्यार और भगवान का वरदान मानती है।”

इस प्रकार वीर दुर्गादास उच्च आदर्शों वाला मानव है। वह स्वामिभक्त, कर्तव्यपरायण, मानवता में विश्वास रखने वाला, सच्चा मित्र तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता का समर्थक है। उसके ये सभी मानवीय गुण उसके उदात्त चरित्र के प्रमाण हैं। वही इस नाटक का नायक अर्थात् प्रमुख पात्र है।

प्रश्न 4:
‘आन का मान’ नाटक के आधार पर औरंगजेब का चरित्र-चित्रण संक्षेप में कीजिए।
उत्तर:

औरंगजेब का चरित्र-चित्रण

श्री हरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘आन का मान’ नाटक में औरंगजेब; वीर दुर्गादास का प्रतिद्वन्द्वी है तथा उसे खलनायक के रूप में चित्रित किया गया है। वह पूरे भारत पर एकछत्र राज्य की कामना करने वाला मुगल सम्राट् है। वह जीवन भर हिन्दुओं और उनके मन्दिरों के अस्तित्व को खत्म करने के लिए कुचक्र रचता रहता है। उसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) कट्टर धार्मिक और संकीर्ण हृदय व्यक्ति – औरंगजेब संकीर्ण हृदय वाला कट्टर सुन्नी-मुसलमान है। इस्लाम के आगे सभी धर्म उसकी दृष्टि में हेय हैं। मानव-मात्र के लिए वह इस्लाम को ही श्रेयस्कर मानता है। वह जोधपुर के कुमार अजीतसिंह को भी मुसलमान बनाना चाहता है।

(2) नृशंस और निर्दयी-औरंगजेब सत्ता – प्राप्ति के लिए सब-कुछ करने को तैयार हो जाता है। वह अपने भाई दारा और शुजा की हत्या तक कर देता है तथा अपने पिता शाहजहाँ, पुत्र कामबख्श और पुत्री जेबुन्निसा को बन्दी बना लेता है। उसे किसी पर भी दया नहीं आती।

(3) सादा जीवन – औरंगजेब विलासिता से दूर रहकर सादा जीवन व्यतीत करने का पक्षपाती है। वह अपना निजी व्यय सरकारी खजाने से नहीं, वरन् टोपी सिलकर और कुरान की आयतें लिखकर उनकी बिक्री से प्राप्त आय से चलाता है।

(4) आत्मग्लानि से युक्त – औरंगजेब को अपने द्वारा किये गये नृशंस कार्यों के प्रति वृद्धावस्था में ग्लानि होती है। उन्हें सोचकर वह दु:खी होता है। अपनी वसीयत में वह अपने पुत्रों से स्वयं को क्षमा करने की बात लिखता है तथा पुत्र-स्नेह से विह्वल होकर वह अपने पुत्र अकबर को छाती से लगाने के लिए आतुर हो जाता है। मेहरुन्निसा से वह कहता है कि “औरंगजेब बातों के जहर से मरने वाला नहीं है।” मेहर के दण्ड देने की बात सुनकर वह कहता है-“हाथ थक गये हैं बेटी! सिर काटते-काटते।”

(5) स्नेहसिक्त पिता – औरंगजेब जवानी में अपने पिता और सन्तान दोनों के प्रति क्रूरता का व्यवहार करता है, किन्तु बुढ़ापे में आकर उसके हृदय में वात्सल्य का संचार होता है। वह अपने पुत्र अकबर द्वितीय, जो ईरान चला गया है, को हृदय से लगाने के लिए बेचैन है तथा अन्य स्वजनों से मिलने के लिए भी व्याकुल है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि औरंगजेब एक कठोर शासक के रूप में चित्रित किया गया है। अन्तिम समय में उसके चरित्र में परिवर्तन आता है और वह दयालु एवं स्नेही व्यक्ति के रूप में बदल जाता है।

प्रश्न 5:
सफीयतुन्निसा का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक की नायिका या किसी प्रमुख स्त्री पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

सफीयतुन्निसा का चरित्र-चित्रण

सफीयतुन्निसा; श्री हरिकृष्ण प्रेमी द्वारा रचित ‘आन का मान’ नाटक की प्रमुख नारी-पात्र है। वह औरंगजेब के पुत्र अकबर द्वितीय की पुत्री है। अकबर द्वितीय अपने पिता की राष्ट्रविरोधी नीतियों का विरोधी है। दुर्गादास राठौर द्वारा उसे ही सम्राट घोषित कर दिया जाता है, परन्तु औरंगजेब की एक चाल से उसे ईरान भागना पड़ता है। इस स्थिति में दुर्गादास ही उसके पुत्र बुलन्द अख्तर और सफीयतुन्निसा का पालन-पोषण करता है। सफीयतुन्निसा का चरित्र-चित्रण निम्नलिखित विशेषताओं के आधार पर किया जा सकता है

(1) अत्यन्त रूपवती – सफीयतुन्निसा की आयु 17 वर्ष है और वह अत्यन्त आकर्षक रूप वाली है। नाटक के सभी पात्र उसके रूप-सौंन्दर्य पर मुग्ध हैं।
(2) वाक्-पटु – सफीयतुन्निसा विभिन्न परिस्थितियों में अपनी वाक्-पटुता का प्रभावपूर्ण प्रदर्शन करती है। उसके व्यंग्यपूर्ण कथन तर्क पर आधारित और मर्मभेदी हैं।
(3) संगीत में रचि – वह एक उच्चकोटि की संगीत-साधिका है। उसका मधुर स्वर सहज ही दूसरों का हृदय जीत लेता है।
(4) त्याग एवं देशप्रेम की भावना – उसमें त्याग एवं बलिदान की भावना कूट-कूटकर भरी हुई है। राष्ट्रहित में वह अपना सब कुछ बलिदान करने के लिए तत्पर दिखाई देती है।
(5) कर्तव्यनिष्ठ – सफीयतुन्निसा देश के प्रति अपनी अनुकरणीय कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देती है। राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह करने के उद्देश्य से ही वह अपने भाई के हाथ में राखी बाँधकर उसे युद्धभूमि में प्राणोत्सर्ग के लिए भेज देती है।
(6) शान्तिप्रिय एवं हिंसा – विरोधी – सफीयत की कामना है कि उसके देश में सर्वत्र शान्ति का वातावरण रहे। तथा सभी देशवासी सुखी और समृद्ध हों। किसी भी प्रकार के हिंसापूर्ण कार्यों को वह प्रबल विरोध करती है।
(7) आदर्श प्रेमिका – सफीयत जोधपुर के युवा शासक अजीतसिंह से सच्चा प्रेम करती है, किन्तु प्रेम की। उद्वेगपूर्ण स्थिति में भी वह अपना सन्तुलन बनाये रखती है। वह अजीतसिंह को भी धीरज बँधाती है और उसे लोकहित के लिए आत्महित का त्याग करने की सलाह देती हुई कहती है-”महाराज ! प्रेम केवल भोग की ही माँग नहीं करता, वह त्याग और बलिदान भी चाहता है।”

इस प्रकार सफीयतुन्निसा ‘आन का मान’ नाटक की एक आदर्श नारी-पात्र है। नाटक में उसके चरित्र को विशेष रूप से इस दृष्टि से उभारा गया है कि वह अजीतसिंह से प्रेम करते हुए भी राज्य व अजीतसिंह के कल्याणार्थ विवाह के लिए तैयार नहीं होती।।

प्रश्न 6:
” ‘आन को मान’ नाटक में ऐतिहासिकता के साथ-साथ नाटकीयता का सफल एवं सुन्दर समन्वय हुआ है।” अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक की ऐतिहासिकता पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:

‘आन का मान’ की ऐतिहासिकता

श्री हरिकृष्ण प्रेमी द्वारा रचित ‘आन का मान’ एक ऐतिहासिक नाटक है, जिसमें इतिहास और कल्पना का मणिकांचने संयोग हुआ है। नाटक के पात्र और उसकी घटनाएँ भारत के मध्यकालीन इतिहास से सम्बद्ध हैं। नाटक के पात्र औरंगजेब, उसका पुत्र अकबर द्वितीय, पुत्रियाँ जीनतुन्निसा व मेहरुन्निसा, पौत्र बुलन्द अख्तर, पौत्री सफीयतुन्निसा, शुजाअत खाँ तथा राजपूतों में दुर्गादास, अजीतसिंह, मुकुन्दीदास आदि प्रसिद्ध ऐतिहासिक व्यक्ति हैं। जोधपुर के महाराजा जसवन्तसिंह की अफगानिस्तान से लौटते समय मृत्यु होना, मार्ग में उनकी दोनों रानियों द्वारा दो पुत्रों को जन्म देना, औरंगजेब के द्वारा महाराजा के परिवार को इस्लाम धर्म अपनाने पर दबाव डालना, दुर्गादास राठौर के नेतृत्व में राजकुमार अजीतसिंह का निकल भागना, प्रतिशोध में औरंगजेब का जोधपुर पर आक्रमण करना, अकबर द्वितीय की ईरान भाग जाना और उसके पुत्र-पुत्रियों की देख-रेख दुर्गादास द्वारा किया जाना आदि प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएँ हैं। साथ ही औरंगजेब की धर्मान्धता, राज्य–विस्तार नीति, साम्प्रदायिक वैमनस्य, व्यापार व कला का ह्रास आदि ऐतिहासिक तत्त्वों को भी प्रस्तुत नाटक में सफलतापूर्वक दर्शाया गया है।

उपर्युक्त ऐतिहासिक तथ्यों के अतिरिक्त प्रस्तुत नाटक में अनेक काल्पनिक घटनाओं का भी समावेश किया गया है। शिलाखण्ड पर बैठी सफीयत और अजीत का प्रणय-प्रसंग, दुर्गादास का पालकी में कन्धा देना तथा प्रमुख पात्रों के चरित्रांकन में भी कल्पना की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, जिससे नाटक रोचक और सफल बन पड़ा है। इसमें एक सफल नाटक के सभी गुण—-सुगठित कथानक, सीमित और सशक्त पात्र, जीवम कथोपकथन, सटीक देश-काल और वातावरण, उच्च उद्देश्य एवं श्रेष्ठ अभिनेयता विद्यमान हैं। इस प्रकार ‘आन का मान’ एक सफल ऐतिहासिक नाटक है।

प्रश्न 7:
‘आन का मान के आधार पर नाटक के उद्देश्य अथवा सन्देश पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
” ‘आन का मान नाटक में राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय नव-निर्माण के लक्ष्य की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
“आन का मान’ में देशभक्ति एवं राष्ट्रीय एकता का विलक्षण आदर्श प्रस्तुत किया गया है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक की रचना में नाटककार को अपने उद्देश्य को पूर्ण करने में कहाँ तक सफलता मिली है ? संक्षेप में लिखिए।
या
“विश्व-बन्धुत्व और मानवतावाद ‘आन का मान’ नाटक का मूल स्वर है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए। विश्वव्यापी मानव-प्रेम की भावना का वर्णन कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक में मान, मर्यादा और देशभक्ति का अदभुत समन्वय देखने को मिलता है। सप्रमाण उत्तर दीजिए।
या
उदाहरण देते हुए स्पष्ट कीजिए कि ‘आन का मान’ नाटक गांधीवाद से ओत-प्रोत है।
या
‘आन का मान’ नाटक की मूल भावना का प्रकाश डालिए।
या
” ‘आन का मान’ नाटक में भारतीय चिन्तन परम्परा के अनुरूप मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा है।” उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

‘आन का मान’ का सन्देश अथवा उद्देश्य

प्रस्तुत ऐतिहासिक नाटक ‘आन को मान’ हरिकृष्ण प्रेमी जी की एक सफल रचना है। इसमें प्रेमी जी ने आदर्श मानवीय गुणों को चित्रित किया है तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता का सन्देश दिया है। वीर दुर्गादास को भारतीय संस्कृति के आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया है। सदाचार, सद्भाव, सत्य, स्वाभिमान, शौर्य, राष्ट्रीय भावना, साम्प्रदायिक एकता, जनतन्त्र का समर्थन, अत्याचार का विरोध आदि गुणों से अनुप्राणित करके दुर्गादास का चरित्रांकन नाटककार ने इस उद्देश्य से किया है कि आधुनिक भारत के युवक इन गुणों से युक्त होकर नायक दुर्गादास के आदर्श का पालन करते हुए आदर्श देश-प्रेमी तथा सच्चे मनुष्य बनें। इस प्रकार नाटक के बहुमुखी उद्देश्य हैं।

(1) एकता का सन्देश – साम्प्रदायिक एकता का सन्देश भी नाटक का प्रमुख उद्देश्य है। राष्ट्र का उद्बोधन एवं जागरण ही इस नाटक का सन्देश है। दुर्गादास राजपूती गौरव का ज्वलन्त प्रतीक है। उसके अनुसार “राजपूतों की तलवार सदैब सत्य, न्याय, स्वाभिमान और स्वदेश की संरक्षक होकर रही है। भारत ने कभी सीमा से बाहर जाकर साम्राज्य विस्तार के लिए तलवार नहीं उठायी। अगर वह बाहर गया तो ज्ञान का दीपक लेकर।”

(2) लोकहित का महत्त्व – प्रस्तुत नाटक के द्वारा प्रेमी जी ने लोकहित के महत्त्व को भी स्थापित किया है। राष्ट्रीय एकता और नव-निर्माण के लक्ष्य की ओर ध्यान दिया गया है। राष्ट्र-निर्माण का कार्य तभी पूरा हो सकेगा, जब जातीयता और साम्प्रदायिकता का समूल नाश हो जाएगा। आज का सामान्य मनुष्य व्यक्तिवादी हो गया है। ऐसे लोगों को ‘सफीयत’ के द्वारा सन्देश दिया गया है कि लोकहित के लिए आत्महित का त्याग कर देना चाहिए। आज के भौतिकवादी और केवल मांसल प्रेम के लिए इच्छुक युवकों को सन्देश देती हुई ‘सफीयत’ कहती है-“प्रेम केवल भोग की ही माँग नहीं करता, वह त्याग और बलिदान भी चाहता है।”

(3) देश प्रेम या देशभक्ति – नाटककार का उद्देश्य है कि भारतीय युवक देश के प्रति गहन अपनत्व की भावना से परिपूर्ण हो जाएँ और सच्चे देशप्रेमी बनें। इस नाटक में दुर्गादास के चरित्र के माध्यम से देशभक्ति एवं स्वामिभक्ति का विलक्षण आदर्श प्रस्तुत किया गया है। वह कहता है-”दुर्गादास जाता है, और मारवाड़ को यदि दुर्गादास के प्राणों की आवश्यकता हुई तो वह लौटकर आएगा। मैं अपनी जन्मभूमि को अन्तिम प्रणाम करता हूँ।”

(4) प्रलोभन का त्याग – दुर्गादास सच्चा राजपूत उसे ही स्वीकार करता है जो बड़े से बड़ा प्रलोभन मिलने पर भी अपने स्वामी और देश से द्रोह न करे तथा यश-अपयश की परवाह न कर अपना धर्म निभाता रहे।

(5) संगठन में शक्ति – नाटक में प्राय: सभी पात्रों को राष्ट्रीय एकता की दिशा में प्रयत्नशील चित्रित किया गया है। प्रेमी जी मानते हैं कि भारत को शक्तिशाली बनाने के लिए जातीय एकता अनिवार्य है। भावात्मक समन्वय का आदर्श नाटक में कहीं भी धूमिल नहीं हो पाया है।

(6) विश्वबन्धुत्व की भावना – नाटक में विश्व-बन्धुत्व और मानवतावाद, विश्व-शान्ति और अन्तर्राष्ट्रीय समन्वय का सन्देश दिया गया है। दुर्गादास बुलन्द अख्तर से कहता है- “ पिता और पुत्र के नाते से भी बड़ा नाता मानवता का है। मानव को मानव के साथ जो नाता है, वह स्वार्थ का नाता नहीं है, वह पवित्र नाता है।” इस नाटक में अन्तर्राष्ट्रीय एकता और विश्वबन्धुत्व का आदर्श प्राप्त करने के लिए युद्ध विरोधी संस्कारों को अनिवार्य बताया गया है। इस प्रकार प्राचीन ऐतिहासिक कथानक के माध्यम से नाटककार ने आधुनिक समाज को कुछ सन्देश दिये हैं। ये सन्देश हैं-आदर्श मानवीय चरित्र का पालन, क्रूर राजनीति से घृणा, राष्ट्रीय प्रेम का सन्देश, साम्प्रदायिक एकता का सन्देश; कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा। इन सन्देशों को नाटक के माध्यम से समाज को सम्प्रेषित करना ही नाटककार का उद्देश्य है, जिसमें वह पूर्ण रूप से सफल रहा है।

प्रश्न 8:
‘आन का मान’ नाटक के शीर्षक अथवा नामकरण की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
या
‘आन का मान’ नाटक का शीर्षक किस पात्र के माध्यम से रखा गया है ? स्पष्ट कीजिए।
या
‘आन का मान में किसके आन के मान की चर्चा की गयी है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

शीर्षक की सार्थकता

श्री हरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘आन का मान’ नाटक में सर्वत्र राजपूतों द्वारा अपनी ‘आन’ अर्थात् अपने व्रत या परम्परा का निर्वाह प्रदर्शित हुआ है। दुर्गादास द्वारा राजपूतों को संगठित करके राजपूती आन एवं सम्मान की रक्षा हेतु प्रयासरत रहना इसी तथ्य का परिचायक है। दुर्गादास द्वारा अपने स्वामी जसवन्तसिंह के पुत्र अजीतसिंह को राजपूती आन की रक्षार्थ बड़े-से-बड़े संकट से जूझने के लिए तैयार करना, अजीतसिंह में राजपूती परम्परा पर आधारित गुणों का विकास करना तथा अन्तिम समय तक औरंगजेब के पुत्र अकबर द्वितीय के साथ अपनी मित्रता का निर्वाह करना भी, शीर्षक की सार्थकता की ओर ही संकेत करते हैं। दुर्गादास नारी के सम्मान की रक्षा हेतु सदैव तैयार रहता है। वह अपने मित्र अकबर द्वितीय के ईरान चले जाने पर उसके पुत्र-पुत्री का पालन-पोषण स्वयं करता है और इस्लाम धर्म के अनुरूप ही उनकी शिक्षा की व्यवस्था करता है। अपनी आन के अनुरूप वह उन बच्चों की प्रत्येक स्थिति में रक्षा करता है और अन्त में उन बच्चों को अकबर द्वितीय के पिता औरंगजेब को सौंप देता है। अजीतसिंह का विरोध करके भी दुर्गादास; सफीयतुन्निसा की इज्जत की रक्षा करना अपना राजपूती धर्म समझता है।

इस प्रकार ‘आन का मान’ नाटक में राजपूती ‘आन-मान’ के अनुरूप नारी के सम्मान की रक्षा, मित्र के प्रति अपनी वचनबद्धता का निर्वाह, कर्तव्य-पालन को सर्वोपरि मानना, राजपूत जाति के प्रति गौरव की भावना का प्रदर्शन करना आदि ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि प्रस्तुत नाटक अपने शीर्षक अथवा नामकरण की दृष्टि से पूर्णतः सफल नाक है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 1 कुहासा और किरण

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 1 कुहासा और किरण (विष्णु प्रभाकर) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 1 कुहासा और किरण (विष्णु प्रभाकर).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name कुहासा और किरण (विष्णु प्रभाकर)
Number of Questions 8
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 1 कुहासा और किरण (विष्णु प्रभाकर)

प्रश्न 1:
‘कुहासा और किरण’ नाटक की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के सर्वाधिक मार्मिक प्रसंग पर प्रकाश डालिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के द्वितीय अंक की कथा का सारांश लिखिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के तृतीय (अन्तिम) अंक की कथा पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के प्रथम सर्ग की कथा का सार लिखिए।
या
‘कुहासा और किरण’ की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
या
कथानक के ऐतिहासिक आधार पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

‘कुहासा और किरण’ का सारांश

विष्णु प्रभाकर जी का ‘कुहासा और किरण’; राजनीतिक वातावरण पर आधारित नाटक है। नाटक की पृष्ठभूमि में स्वतन्त्रता-प्राप्ति से 15 वर्ष पूर्व की कथा छिपी है।।

मुलतान में चन्द्रशेखर, राजेन्द्र, चन्दर, हाशमी तथा कृष्णदेव नाम के देशभक्तों ने अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध क्रान्ति की योजना बंनायी। अंग्रेज सरकार इन लोगों के षड्यन्त्र से बौखला गयी। इसी समय कृष्णदेव सरकार को मुखबिर बन गया। इस कारण शेष चार साथियों को कठोर कारावास मिला। सन् 1946 ई० में ये लोग जेल से मुक्त हुए। हाशमी और चन्दर निर्धनता के कारण समाप्त हो गये। राजेन्द्र ने नौकरी की, परन्तु उसका शरीर कार्य करने में सक्षम न था। चन्द्रशेखर तपेदिक रोग से पीड़ित हो गया और उसकी पत्नी मालती बेसहारा हो गयी। सन् 1947 ई० में देश स्वतन्त्र हुआ। सन् 1942 ई० का धोखेबाज मुखबिर कृष्णदेव अब देशभक्त नेता बन गया। उसने अपना नाम कृष्ण चैतन्य रख लिया। नाटक के सारांश को तीन अंकों में प्रस्तुत किया जा रहा है।

प्रथम अंक – नाटक का प्रारम्भ नेताजी कृष्ण चैतन्य के निवास पर उनकी षष्ठिपूर्ति के अवसर पर उनकी सेक्रेटरी सुनन्दा और अमूल्य के वार्तालाप से होता है। उन्होंने इस अवसर पर नेताजी को बधाई दी। अन्य लोग भी उन्हें बधाई देने के लिए पहुँचे। अब कृष्ण चैतन्य सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में है 250 प्रति माह राजनीतिक पेंशन पाते हैं। वे प्रत्येक प्रकार के गैर-कानूनी कार्य करते हैं। उन्होंने सुनन्दा नामक लड़की को अपनी व्यक्तिगत सचिव नियुक्त किया और उसके माध्यम से ब्लैकमेल जैसे घृणित कार्य भी किये। कृष्ण चैतन्य के ये कार्य उसकी पत्नी गायत्री को नहीं सुहाते थे। देशभक्त राजेन्द्र के पुत्र अमूल्य के नौकरी की तलाश में कृष्ण चैतन्य के पास आने पर वे उसे विपिन बिहारी के यहाँ सम्पादक की नौकरी दिला देते हैं। अमूल्य की रिश्ते की एक बहन प्रभा; चैतन्य के यहाँ आती-जाती है।

चन्द्रशेखर की विक्षिप्त पत्नी मालती; कृष्ण चैतन्य से राजनीतिक पेंशन दिलाने का आग्रह करने हेतु उसके पास आती है और उसको पहचान लेती है। वहाँ उपस्थित अमूल्य को भी उसकी असली स्थिति का आभास हो जाता है।

द्वितीय अंक – द्वितीय अंक का प्रारम्भ विपिन बिहारी के निजी कक्ष से होता है। पाँच-पाँच पत्रिकाओं के मुख्य अधिकारी विपिन बिहारी अपने कक्ष में बैठे हैं। अमूल्य के आवेदन-पत्र को पढ़कर विपिन बिहारी उसके पिता के विषय में पूछते हैं। अमूल्य ने मुलतान षड्यन्त्र केस के विषय में विपिन बिहारी को बताया। सुनन्दा ने विपिन बिहारी से कहा कि कृष्ण चैतन्य कांग्रेस का मुखौटा लगाये एक देशद्रोही है, किन्तु विपिन बिहारी किसी भी कीमत पर कृष्ण चैतन्य का विरोध करने का साहस नहीं कर पाता। सभी को यह पता चल जाता है कि आज का महान् कांग्रेसी नेता कृष्ण चैतन्य देशद्रोही व मित्रघाती-मुखबिर कृष्णदेव है।

अपनी वास्तविकता को प्रकट हुआ देख कृष्ण चैतन्य, अमूल्य को फंसाने का प्रयास करता है। यातनाओं के कारण अमूल्य आत्महत्या करने का भी प्रयास करता है, परन्तु पुलिस उसको बचाकर अस्पताल ले जाती है। कृष्ण चैतन्य की पत्नी गायत्री को यह सब जानकर बहुत ग्लानि होती है और वह अपने पति को सभी बुरे कार्य : छोड़ने का परामर्श देती है। गायत्री की कार एक ट्रक के साथ टकरा जाती है और गायत्री का देहान्त हो जाता है। पत्नी की मृत्यु के बाद चैतन्य को आत्मग्लानि होती है। यहीं पर दूसरा अंक समाप्त हो जाता है।

तृतीय अंक – यह अंक कृष्ण चैतन्य के निवास से आरम्भ होता है। कृष्ण चैतन्य अपनी पत्नी गायत्री के चित्र के सम्मुख बैठकर अपनी भूलों के लिए प्रायश्चित्त करते हैं तथा गायत्री के बलिदान की महत्ता को स्वीकार करते हैं। सभी लोग शंकित हैं कि यह मामला गायत्री की मृत्यु का नहीं वरन् आत्महत्या का है।

सुनन्दा द्वारा दी गयी सूचना पर वहाँ गुप्तचर विभाग के अधिकारी आ जाते हैं। सुनन्दा अमूल्य का परिचय देते हुए उसे निर्दोष बताती है। कृष्ण चैतन्य भी कागज-चोरी की कहानी को मनगढ़न्त बताते हैं। वे विपिन बिहारी और उमेशचन्द्र के कुकृत्यों का भी पर्दाफाश कर देते हैं। तभी मालती अपनी पेंशन के लिए उनके पास पहुँच जाती है। कृष्ण चैतन्य उससे क्षमा याचना करते हुए उसे अपना सर्वस्व सौंप देते हैं। विपिन बिहारी और उमेशचन्द्र को बन्दी बना लिया जाता है। गुप्तचर अधिकारी कृष्ण चैतन्य को भी साथ चलने के लिए कहते हैं। वे अपनी पत्नी के चित्र को प्रणाम करके उनके साथ चल देते हैं। अमूल्य को निर्दोष सिद्ध होने पर छोड़ दिया जाता है। उसके “बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता”.-इस कथन के साथ ही नाटक समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 2:
नाटक के तत्त्वों (नाट्यकला) की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण’ नाटक की समीक्षा (आलोचना) कीजिए।
या
भाषा-शैली की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण’ की समीक्षा कीजिए।
या
पात्र तथा चरित्र-चित्रण की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
संवाद (कथोपकथन) की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ की कथावस्तु (कथानक) की समीक्षा कीजिए।
या
अभिनय की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण के उद्देश्य पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
रंगमंचीयता की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण’ की समीक्षा कीजिए।
या
कुहासा और किरण नाटक के प्रतिपाद्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटकं की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
या
देश-काल और वातावरण की दृष्टि की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण’ की समीक्षा कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक में स्वातन्त्र्योत्तर भारतीय समाज का यथार्थ चित्र अंकित किया गया है।” इस कथन की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
या
“कुहासा और किरण’ नाटक के सन्देश पर प्रकाश डालिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के संवाद प्रभावशाली हैं। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

‘कुहासा और किरण’ की तात्त्विक समीक्षा

प्रस्तुत नाटक भारत की वर्तमान राजनीतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों का सच्चा दर्पण है। नाटककार श्री विष्णु प्रभाकर ने नाटक के रचना-विधान में नाटकीय तत्त्वों के निर्वाह का ध्यान रखा है। नाटकीय तत्त्वों के आधार पर नाटक का विश्लेषण निम्नलिखित है

(1) कथावस्तु – इस नाटक का कथानक भारत की वर्तमान परिस्थितियों पर आधारित है। यह एक । समस्यामूलक कथानक है, जो स्वाधीन भारत के सामाजिक और राजनीतिक जीवन से सम्बन्धित है। अवसरवादी भ्रष्ट नेताओं के कारनामों का कच्चा चिट्ठा नाटक के माध्यम से खोला गया है। देश की स्वतन्त्रता के लिए प्राणों की बाजी लगा देने वाले लोगों की दुर्दशा भी वर्तमान का एक कटु सत्य है, जिसे लेखक ने बड़ी कुशलता से उभारा है। कथावस्तु को तीन अंकों में बाँटा गया है। पहले अंक में कथानक का आरम्भ तथा विकास है, दूसरे में चरम-सीमा तथा तीसरे अंक में उपसंहार और अन्त हुआ है। स्वाभाविकता, रोचकती, यथार्थता, सुसम्बद्धता आदि गुणों की दृष्टि से प्रस्तुत नाटक का कथानक परिपूर्ण है और उसमें आज के जीवन की सजीव झाँकी दिखाई देती है। लेखक ने अपने प्रतिपादित विषय को पूर्ण सफलता के साथ प्रस्तुत किया है। इस प्रकार कथावस्तु की दृष्टि से नाटक एक सशक्त और सफल रचना है।

(2) पात्र तथा चरित्र-चित्रण – कृष्ण चैतन्य (कृष्णदेव), अमूल्य, उमेशचन्द्र तथा विपिन बिहारी नाटक के प्रमुख पुरुष-पात्र हैं, जब कि प्रभा, सुनन्दा, मालती तथा गायत्री नारी-पात्र हैं। अन्य पात्रों में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर, राजेन्द्र, हाशमी तथा चन्दर हैं। इनकी भूमिका गौण है। कृष्ण चैतन्य अवसरवादी मनोवृत्ति का पात्रं है। वह सभी प्रकार के नीच एवं घृणास्पद धन्धों में लिप्त रहता है। अमूल्य प्रसिद्ध देशभक्त राजेन्द्र का बेटा है। वह ईमानदार, परिश्रमी, देशभक्त, पढ़ा-लिखा और उदात्त स्वभाव वाला युवक है। नारी पात्रों में सुनन्दा तथा प्रभा अधिक प्रखर बुद्धिवाली हैं। ये दोनों भ्रष्टाचार का विरोध करती हैं। गायत्री सामान्य भारतीय नारी है। पात्र तथा चरित्र-चित्रण की दृष्टि से यह एक सफल रचना है। नाटक के सभी पात्र जीवन्त प्रतीत होते हैं। उनके व्यवहार में भी वास्तविकता का ध्यान रखा गया है। आज के वातावरण में रचे-बसे पात्रों का चित्रण नाटककार की सफलता का प्रतीक है।

(3) संवाद-योजना – नाटक में संवादों का विशेष महत्त्व होता है। निर्विवाद रूप से संवाद इस नाटक के प्राण हैं। ‘कुहासा और किरण’ की संवाद-रचना उत्तम है। संवाद पात्रों के चरित्र के अनुरूप तथा परिवेश को सजीव बनाने में समर्थ हैं। नाटककार ने छोटे और संक्षिप्त संवादों के द्वारा पात्रों की मानसिक स्थिति, चरित्र और भावों को अत्यन्त कुशलता से चित्रित किया है। नाटक के सरल, गतिशील और स्वाभाविक संवादों को एक नमूना प्रस्तुत हैं

अमूल्य  –  तुम आ गयीं सुनन्दा ?
सुनन्दा  –   इसमें भी सन्देह है ?
अमूल्य  –  (हँसकर) मेरा मतलब यह नहीं था। मैं तो कहना चाहता था कि आज तुम देर से आयी हो, जड़ कि आना जल्दी चाहिए था।
सुनन्दा  –  (पास आकर) क्यों आना चाहिए था ?
अमूल्य  –  क्योंकि आज से ही तो सर का षष्ठिपूर्ति महोत्सव’ आरम्भ होता है।
सुनन्दा  –  ओ’………….”समझी ! (व्यंग्य से) सर के प्रति बड़ी श्रद्धा है तुममें।
संवादों द्वारा पात्रों की मानसिक स्थिति और मनोभावों को कुशलता से चित्रित किया गया है

कृष्ण चैतन्य – (आवेश में आकर) विल यू ऑल शट अप ? (चीखकर) गेट आउट, गेट आउट।
संवादों में सामाजिक व्यंग्य और कृटूक्तियाँ भी प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं; जैसे

(i) हमाम में सभी नंगे हैं और नंगा नंगे को क्या नंगा करेगा ?
(ii) अन्धे को सत्य दिखाते-दिखाते स्वयं अन्धा होने की मेरी जरा भी इच्छा नहीं है।
संवादों में सहजता तथा पैनापन है। ये पात्रों के चरित्र को सफलता से प्रकट करते हैं तथा परिस्थितियों को सही प्रकार से प्रस्तुत करने में सक्षम हैं।।

(4) भाषा-शैली – नाटक की भाषा सामान्य खड़ी बोली है। प्रचलित अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत शब्दों का प्रयोग प्रचुर मात्रा में हुआ है। अंग्रेजी शब्द; जैसे—सर, केस, ब्लैक-मार्केट, इंस्पेक्टर, सोशल, बाइकॉट इत्यादि हैं। उर्दू शब्दों में बेनक़ाब, बेईमान, बेगुनाह, पोशाक, ज़मानत इत्यादि अनेक शब्द हैं। मुहावरों तथा लोकोक्तियों का प्रयोग सुन्दरता से हुआ है; जैसे-‘भाँडा फोड़ना’, ‘लंका में सभी वन गज के’, ‘दूध का धुला’ आदि।। नाटक की शैली रोचक है। इस नाटक की रचना में भारतीय और पचात्य दोनों नाट्य शैलियों का समन्वय प्रस्तुत हुआ है। वस्तुतः नाटक में प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग हुआ है। व्यंग्य तथा चुटीलापन इसकी शैली की मुख्य विशेषता है। भाषा की सक्षमता एवं भावानुरूपता का एक उदाहरण कृष्ण चैतन्य के कथन में द्रष्टव्य है

”दार्शनिकों ने जीवन को दो भागों में बाँटा है। पहले भाग की उद्देश्य है-प्रकृति की सेवा अर्थात् परिवार का पालन-पोषण करना। दूसरे भाग का अर्थ है–संस्कृति की सेवा अर्थात् जीवन के उच्च आदर्शों का अनुशीलन। प्रकृति की मूल प्रेरणा है-अपने प्रवाह को बनाये रखना अर्थात् सन्तान-वृद्धि, और संस्कृति की प्रेरणा जीवन के तत्त्व-रूप आदर्शो की चरितार्थता।”

(5) देश-काल तथा वातावरण – प्रस्तुत नाटक में देश-काल और वातावरण को यथार्थ और उचित निर्वाह हुआ है। आधुनिक युग के सामान्य भारतीय की मूल प्रवृत्ति “कैसे भी पैसा कमाने की नीयत’ को सुन्दर ढंग से चित्रित किया गया है। कृष्ण चैतन्य जैसे कपटी राष्ट्रभक्तों एवं धूर्त समाज-सेवकों के जीवन-स्तर, उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा, काले-धन्धे में लिप्त पूँजीपतियों और पत्रकारों से उनके सम्बन्ध तथा ईमानदार लोगों की सामाजिक-आर्थिक दशा का चित्रण एक सजीव और वास्तविक लगने वाले वातावरण में हुआ है। भारतीयता के माथे पर लगे इस कलंक को अमूल्य, सुनन्दा तथा प्रभा जैसे युवा ही धो सकते हैं। भाषा, वेश-भूषा तथा स्थान इत्यादि के चयन में नाटककार सजग रहे हैं। इस प्रकार ‘कुहासा और किरण’ देश-काल तथा वातावरण की
दृष्टि से एक सफल रचना है।

(6) अभिनेयता – ‘कुहासा और किरण मंचन की दृष्टि से अच्छी रचना है। प्रस्तुत नाटक के पात्र सामान्य वेश-भूषा से युक्त और सीमित संख्या में हैं। अंक भी सीमित हैं। सम्पूर्ण नाटक तीन अंकों में विभाजित है। नाटककार ने आवश्यकतानुसार रंग-संकेत, मंच-सज्जा तथा वातावरण को स्पष्ट किया है। मंचन की दृष्टि से अधिक सामान जुटाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। आधुनिक परिवेश का नाटक होने के कारण सभी प्रकार के वस्त्रादि प्रयोग किये जा सकते हैं। नारी पात्र कम हैं तथा वेशभूषा की कोई समस्या नहीं आती। कहने का तात्पर्य यह है कि नाटक पूर्ण रूप से अभिनेयता की कसौटी पर कसा जा सकता है।

(7) उद्देश्य अथवा सन्देश – नाटककार का उद्देश्य आधुनिक समस्याओं का प्रस्तुतीकरण रहा है। समस्याओं के साथ-साथ लेखक ने उनका समाधान प्रस्तुत करने का भी प्रयास किया है; जैसे – नकली देशभक्तों का स्वार्थ-सिद्धि के लिए राष्ट्र-प्रेम दिखाना। लोकतन्त्र में प्रेस की स्वतन्त्रता है, लेकिन इस नाटक द्वारा नाटककार ने ऐसे सम्पादकों का भण्डाफोड़ किया है, जो सरकार के साथ-साथ जनता को भी भ्रमित करते और लूटते हैं। कृष्ण चैतन्य, विपिन बिहारी और उमेशचन्द्र जैसे मगरमच्छों से जनसाधारण को परिचित कराना भी नाटक का उद्देश्य है। भ्रष्ट आचरण वाले ऐसे व्यक्तियों के मुखौटे उतारकर रख देना, मुखबिरों के रहस्य को खोल देना तथा समाज में व्याप्त चोर दरवाजों को तोड़ देना आदि इस नाटक के मुख्य उद्देश्य हैं। नाटककार का वास्तविक उद्देश्य भारत के नव-निर्माण का है। समाधान के रूप में प्रभाकर जी ने बताया है कि एकता में शक्ति है। सब मिलकर ही समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त कर सकते हैं।

प्रश्न 3:
‘कुहासा और किरण’ नाटक के उस पुरुष-पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए, जिसने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया हो।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के प्रमुख पात्र (नायक) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
अमूल्य के चरित्र-वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक का नायक (प्रमुख पात्र) कौन है? उसकी चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख संक्षेप में कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण नाटक के किसी एक पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

अमूल्य का चरित्र-चित्रण

अमूल्य; श्री विष्णु प्रभाकर कृत ‘कुहासा और किरण’ नाटक का नायक तथा देशभक्त राजेन्द्र का पुत्र है। अमूल्यं ऐसे नवयुवकों का प्रतिनिधित्व करता है, जो देश के भ्रष्ट वातावरण में भी ईमानदारी का जीवन जीना चाहते हैं तथा जिन्हें देश से प्रेम है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) देशभक्त युवक – अमूल्य का पिंता सच्चा देशभक्त था। पिता के गुण अमूल्य में भी विद्यमान हैं। वह देश को व्यक्ति से अधिक मूल्यवान् मानता है। उसका कथन है – “हमारे लिए देश सबसे ऊपर है। देश की स्वतन्त्रता हमने प्राणों की बलि देकर पायी थी, उसे अब कलंकित न होने देंगे।”

(2) कर्तव्यपरायण – अमूल्य अपने सभी कर्तव्यों के प्रति जागरूक है। पिता की असमय मृत्यु के पश्चात् भी परिश्रम के बल पर वह अपना अध्ययन पूरा करता है। वह जिस कार्य पर भी लगता है, उसे पूर्ण लगन के साथ पूरा करता है।

(3) सत्यवादी – अमूल्य सत्यवादी है। कृष्ण चैतन्य जैसे व्यक्ति के सम्पर्क में आकर भी वह अपनी ईमानदारी और सच्चाई का रास्ता नहीं छोड़ती। षड्यन्त्र में फंसने पर भी वह दृढ़ रहता है और कहता है-“चलिए, कहीं भी चलिए। मुझे जो कहना है, वह कहूँगा।”

(4) निर्भीक तथा साहसी – अमूल्य साहसी युवक है। वह पुलिस इन्स्पेक्टर से नहीं डरता और विपिन बिहारी को सबके सामने बेईमान कहता है। पुलिस इन्स्पेक्टर के सामने वह साहसपूर्वक कहता है-”यह षड्यन्त्र है. ………”आप सदा ब्लैक से कागज बेचते हैं और मुझे फंसाना चाहते हैं: …………“आप सब नीच ………..“आप देशभक्त की पोशाक पहने देशद्रोही हैं, भेड़िये हैं।”

(5) आदर्श मार्गदर्शक – अमूल्य आधुनिक युवकों के लिए एक आदर्श मार्गदर्शक है। वह भ्रष्ट आचरण वाले व्यक्तियों के मुखौटे उतारने का संकल्प लेता है। देशसेवा के प्रति अमूल्य के शब्दों को देखिए “अब आवश्यकता है कि हम देशसेवा का अर्थ समझे। जो शैतान मुखौटे लगाये शिव बनकर घूम रहे हैं, उनके वे मुखौटे उतारकर उनकी वास्तविकता प्रकट करें।”

(6) सरल स्वभाव वाला – अमूल्य सरल स्वभाव वाला स्वामिभक्त युवक है। सुनन्दा उसके सरल स्वभाव को देखकर ही कहती है-”पिताजी की बात अभी रहने दो। देखा नहीं था तुमने ? उनका नाम सुनकर सब चौंक पड़े थे। उनसे पिताजी की बात मत कहना अभी।”

इस प्रकार ‘कुहासा और किरण’ नाटक का सबसे अनमोल चरित्र अमूल्य का है। वह नाटक का नायक भी है। वह भ्रष्टाचार तथा निराशापूर्ण कुहासे को भेदकर कर्तव्यनिष्ठा, दृढ़ता, सत्यता, देशभक्ति तथा निर्भीकता की स्वर्णिम प्रकाश-किरणों से समाज को आलोकित करना चाहता है। अमूल्य ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के आदर्श का प्रतीक है।।

प्रश्न 4:
‘कुहासा और किरण’ के आधार पर कृष्ण चैतन्य का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
कृष्ण चैतन्य की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
“कुहासा और किरण’ नाटक का खलनायक कौन है ? उसकी चरित्रगत विशेषताएँ बताए।
उत्तर:

कृष्ण चैतन्य का चरित्र-चित्रण

‘कुहासा और किरण’ नाटक में कृष्ण चैतन्य’ का चरित्र अवसरवादी, स्वार्थी तथा सभी प्रकार से भ्रष्ट व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह नाटक का खलनायक है। आज कृष्ण चैतन्य जैसे अनेक नेता अपनी स्वार्थ सिद्धि हेतु; समाज और देश को खोखला करने में लगे हैं। कृष्ण चैतन्य के चरित्र से सम्बद्ध धनात्मक और
ऋणात्मक विशिष्टताओं की विवेचना निम्नलिखित है

(1) अवसरवादी – कृष्ण चैतन्य पक्का अवसरवादी है। वह पहले अंग्रेजों का दलाल बना रहता है, फिर कांग्रेसी नेता बन जाता है।
(2) मित्रघाती – कृष्ण चैतन्य अपने साथियों की मुखबिरी करके उन्हें पकड़वा देता है। इस प्रकार मित्रघाती होने का भी वह दोषी है, जब कि वह इस कलंक को छिपाने की भरसक चेष्टा करता है।
(3) चतुर – चालाक – कृष्ण चैतन्य चतुर तथा चालाक है। उसका मत है कि-”कुछ करने से पहले सौ बार सोच लेना बुद्धिमानी का लक्षण है।”
(4) भ्रष्टाचार का प्रतीक – कृष्ण चैतन्य सभी प्रकार के गलत हथकण्डों में माहिर है। वह ब्लैकमेल करता है, रिश्वत लेता है। इसी प्रकार की दूसरी अनेक बुराइयाँ; जैसे – क्रूरता, कठोरता और धनलिप्सा का आधिक्य भी उसमें विद्यमान है।
(5) देशद्रोही – ‘मुलतान षड्यन्त्र’ की मुखबिरी करके वह देशद्रोही बनता है। इसके उपरान्त भी वह समाज तथा देश के साथ गद्दारी करता ही रहता है।
(6) कृत्रिमता तथा आडम्बर से परिपूर्ण – कृष्ण चैतन्य का जीवन कृत्रिमता तथा आडम्बर से पूर्ण है। वह मुलतान केस में अंग्रेजों का मुखबिर बनकर देश के साथ गद्दारी करता है, किन्तु देश और समाज की सेवा का ढोंग रचता है, जिससे वह शासन और जनता दोनों की आँखों में धूल झोंकता रहता है।
(7) प्रभावशाली व्यक्तित्व – कृष्ण चैतन्य का व्यक्तित्व प्रभावशाली है। उसके प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण ही सरकार व प्रशासन पर उसका पर्याप्त प्रभाव है।
(8) दूरदर्शी – कृष्ण चैतन्य दूरदर्शी व्यक्ति है। अपनी दूरदर्शिता के कारण ही वह अपने वास्तविक नाम ‘कृष्णदेव’ को बदलकर ‘कृष्ण चैतन्य’ रख लेता है। विपिन बिहारी के यहाँ अमूल्य की नियुक्ति उसकी दूरदर्शिता का ही परिचायक है।
(9) आत्मपरिष्कार की भावना – गायत्री का बलिदान कृष्ण चैतन्य में प्रायश्चित्त का भाव उत्पन्न करता है। वह गायत्री के चित्र के सम्मुख पश्चात्ताप करते हुए कहता है-”मेरी आँखें खोलने के लिए तुमने प्राण दे। दिये।”
(10) कूटनीतिज्ञ – कृष्ण चैतन्य एक प्रतिभाशाली और कूटनीतिज्ञ पात्र है। यह ठीक है कि वह अपनी प्रतिभा का दुरुपयोग करता है, जिसके कारण उसका चरित्र घृणित हो जाता है, परन्तु यदि उसकी प्रतिभा का सदुपयोग होता तो वह एक श्रेष्ठ पुरुष बन सकता था।

इस प्रकार कृष्ण चैतन्य के चरित्र में अनेकानेक दोष हैं। अन्त में वह अपनी भूलों के लिए प्रायश्चित्त करते हुए कहता है-“चलिए टमटा साहब, मैंने देश के साथ जो गद्दारी की है, उसकी सजा मुझे मिलनी चाहिए।” इस प्रकार अन्त में अपने दोषों के परिष्कार के प्रयास से वह पाठकों की सहानुभूति का पात्र बन जाता है।

प्रश्न 5:
सुनन्दा के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के प्रमुख नारी-पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

सुनन्दा का चरित्र-चित्रण

श्री विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित ‘कुहासा और किरण’ नाटक की सुनन्दा प्रमुख नारी-पात्र है। उसके चरित्र की . प्रमुख विशेषताएँ अग्रवत् हैं

(1) भ्रष्टाचार की विरोधी नवयुवतियों की प्रतिनिधि – वह उन नवयुवतियों का प्रतिनिधित्व करती है, जो जागरूक एवं सजग हैं। सुनन्दा दूरदर्शी, साहसी, चतुर, विनोदी, कर्तव्यपरायणी एवं देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए संकल्पबद्ध एक सहयोगी तथा कर्मशीला नवयुवती है। उसे अमूल्य से सहानुभूति है तथा वह समाज के पाखण्डियों के रहस्य खोलने में अन्त तक अमूल्य का साथ देती है। मुखौटाधारी भ्रष्टाचारियों से वह कहती है – ”मैं पुकार-पुकार कर कहूँगी कि आप सब भ्रष्ट हैं, नीच हैं, देशद्रोही हैं। आज नहीं तो कल आपको समाज के सामने जवाब देना होगा।”

(2) जागरूक नवयुवती – सुनन्दा, कृष्ण चैतन्य की सेक्रेटरी है। उसकी आयु 25 वर्ष है। वह जागरूक नवयुवती है और समाचार-पत्रों के महत्त्व तथा उसमें निहित शक्ति को पहचानती है। उसी के शब्दों में- “शक्ति-संचालन का सूत्र जितना समाचार-पत्रों के हाथ में है, उतना और किसी के नहीं।”

(3) वाक्पटु – सुनन्दा की वाक्पटुता देखते ही बनती है। वह उमेशचन्द्र और कृष्ण चैतन्य की मिलीभगत से परिचित है। उसकी व्यंग्यपूर्ण वाक्पटुता देखिए-“आकाश जैसे पृथ्वी को आवृत्त किये है, वैसे ही आप उनको ( कृष्ण चैतन्य को) आवृत्त किये हैं। आकाश के कारण ही पृथ्वी अन्नपूर्णा होती है।”

(4) देशद्रोहियों की प्रबल विरोधी – स्वच्छ मुखौटाधारी देशद्रोहियों का सुनन्दा प्रबल विरोध करती है। वह विपिन बिहारी को भी खरी-खोटी सुनाती है। वह उससे कृष्ण चैतन्य के विषय में स्पष्ट कहती है-”क्या आपको अब भी पता नहीं कि कृष्ण चैतन्य वह नहीं हैं जो दिखाई देते हैं। वह मुखौटा लगाये एक देशद्रोही है।

(5) मुखौटाधारियों की विरोधिनी – अवसर आने पर सुनन्दा मुखौटाधारियों का प्रबल विरोध करती हैं। यहाँ तक कि वह चाहती है कि गायत्री द्वारा लिखा गया पत्र पुलिस के हवाले कर दिया जाए, क्योंकि पत्र पुलिस के हाथ में पहुँचने पर कृष्ण चैतन्य की परेशानी बढ़ सकती थी। वह उमेशचन्द्र अग्रवाल को लक्ष्य कर कहती है-”मुझे घिनौने चेहरों से सख्त नफरत है। गायत्री माँ के बलिदान के पीछे जो उदात्त भावना है, वह जनता तक पहुँचनी ही चाहिए।”

(6) सहृदया – सुनन्दा के हृदय में अमूल्य के प्रति सहानुभूति है। वह उसकी विवशता को समझती है। जब अमूल्य चोरी के झूठे जुर्म में गिरफ्तार कर लिया जाता है, तब वह अन्याय से जूझने के लिए तत्पर हो जाती है।

इस प्रकार सुनन्दा एक प्रगतिशील, व्यवहारकुशल व स्वदेश-प्रेमी नवयुवती के रूप में पाठकों पर अपनी विशिष्ट छाप छोड़ती है।

प्रश्न 6:
‘कुहासा और किरण’ नाटक के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
या
विष्णु प्रभाकर ने नाटक का नाम ‘कुहासा और किरण’ क्यों रखा है?
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के शीर्षक का औचित्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

‘कुहासा और किरण’ शीर्षक की सार्थकता

‘कुहासा और किरण’ में नाटककार श्री विष्णु प्रभाकर भ्रष्टाचार, निराशा और छद्म के कुहासा से धुंधलाते वातावरण को देशप्रेम, कर्तव्यनिष्ठा, व्यवहारकुशलता और नवचेतना की किरण से नष्ट करना चाहते हैं। कुहासे के रूप में कृष्ण चैतन्य, विपिन बिहारी, उमेशचन्द्र जैसे पात्र हैं तो किरण के रूप में अमूल्य, सुनन्दा आदि पात्र। ये भ्रष्टाचार और पाखण्ड के कुहासे को अपने आचरण की किरण से दूर करते हैं। इसीलिए लेखक ने इस नाटक का नाम ‘कुहासा और किरण’ रखा है, जो पूर्णरूपेण सार्थक भी है।

प्रश्न 7:
‘कुहासा और किरण’ आधुनिक भारत की सामाजिक और राजनीतिक समस्या को राष्ट्रीय परिवेश में व्यंजित करता है।” इस कथन पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक की समस्या पर प्रकाश डालिए।
या
“कुहासा और किरण’ के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक में सामाजिक समस्याओं और ऐतिहासिक घटनाओं का सुन्दर सामंजस्य है।” स्पष्ट कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ का उद्देश्य शैतान के भीतर के शिव को जगाना है। स्पष्ट कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक में उठायी गयी समस्याओं का उल्लेख करते हुए उसकी विवेचना कीजिए।
उत्तर:
श्री विष्णु प्रभाकर ने प्रस्तुत नाटक ‘कुहासा और किरण’ के माध्यम से आधुनिक भारतीय समाज में फैले भ्रष्टाचाररूपी: कुहासे का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया है। उनका उद्देश्य समाज में व्याप्त बुराइयों को आवरणरहित करना तथा उनका समाधान सुझाना है। कृष्ण चैतन्य जैसे अनेक अवसरवादी नेता आज शासक दल में घुसे हैं। उनका दीन-ईमान मात्र धन है। धन कमाने के लिए इस प्रकार के नेतागण सभी प्रकार के बुरे कार्य कर सकते हैं। नाटक में अनेक समस्याएँ प्रस्तुत की गयी हैं। दिखावटी देशभक्त, भ्रष्ट समाचार-पत्र, लुटेरे समाज-सेवक, चोरबाजारी तथा भयादोहन करने वाले सफेदपोश अपराधी आदि इस नाटक में बुराइयों तथा ज्वलन्त समस्याओं के रूप में प्रस्तुत किये गये हैं।

उपर्युक्त समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयत्न भी विष्णु प्रभाकर जी ने किया है। उनका मत है कि यदि अमूल्य, सुनन्दा, प्रभा तथा मालती जैसे लोग भ्रष्टाचारियों पर प्रहार करें तो भ्रष्ट लोगों के झूठे मुखौटे उतारे जा सकते हैं। प्रभा के शब्दों में- ”मैं मुखौटा लगाये मुखबिरों को, भ्रष्टाचारियों को, देश में फैले छद्मवेशधारियों को बेनकाब करूंगी। मैं पुकारे-पुकारकर कहूँगी कि आप सब भ्रष्ट हैं, नीच हैं, देशद्रोही हैं। आज नहीं तो कल आपको समाज के सामने जवाब देना होगा। गायत्री माँ के बलिदान के पीछे जो उदात्त भावना है, वह जनता तक पहुँचनी ही चाहिए।”

इस प्रकार ‘कुहासा और किरण’ नाटक में आधुनिक भारतीय जीवन के यथार्थ चित्र प्रस्तुत किये गये हैं। समाज के बदनुमा धब्बों को उभारा गया है तथा साथ ही इन दागों को मिटाने का मार्ग भी सुझाया गया है।

प्रश्न 8:
‘कुहासा और किरण’ नाटक में निहित व्यंग्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
श्री विष्णु प्रभाकर ने कुहासा और किरण’ नाटक में आधुनिक भारतीय समाज में व्याप्त भ्रष्टाचाररूपी कुहासे का व्यंग्यपूर्ण चित्रण किया है। इस नाटक के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को आवरणहीन करना तथा उनका समाधान सुझाना है। कृष्ण चैतन्य जैसे अनेक अवसरवादी नेताओं के मुंह पर करारा तमाचा है, जिनका दीन-ईमान मात्र धन है। धन कमाने के लिए इस प्रकार के नेतागण सभी प्रकार के बुरे कार्य कर सकते हैं। दिखावटीं देशभक्त, भ्रष्ट समाचार-पत्र, लुटेरे समाज-सेवक, चोरबाजारी तथा भयादोहन करने वाले सफेदपोश अपराधी आदि इस नाटक में बुराइयों तथा ज्वलन्त समस्याओं के रूप में प्रस्तुत किये गये हैं। भ्रष्ट आचरण वाले व्यक्तियों के मुखौटे उतारकर रख देना, मुखबिरों के रहस्य को खोल देना तथा चोर दरवाजों को तोड़ देना आदि व्यंग्य प्रधास बातें हैं जो आज के युग में व्याप्त हैं। अत: हम कह सकते हैं कि यह नाटक व्यंग्य प्रधान है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 6 आनन्द की खोज, पागल पथिक

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name आनन्द की खोज, पागल पथिक (राय कृष्णदास)
Number of Questions 3
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 6 आनन्द की खोज, पागल पथिक (राय कृष्णदास)

लेखक का साहित्यिक परिचय और भाषा-शैली

प्रश्न:
राय कृष्णदास जी का साहित्यिक परिचय दीजिए।
या
राय कृष्णदास की भाषा-शैली की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
राय कृष्णदास का जीवन-परिचय लिखते हुए उनकी कृतियाँ भी लिखिए तथा भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
हिन्दी में गद्य को काव्य जैसी मधुरता प्रदान करने वाले और अपनी अनुभूतियों और भावनाओं को कवित्व का रूप प्रदान करने वाले राय कृष्णदास, गद्यगीतों के प्रवर्तक माने जाते हैं। इन्होंने जीव और परमात्मा के बीच की क्रीड़ाओं का मनमोहक ढंग से, प्रिय और प्रिया की आँख-मिचौनी के रूप में सजीव चित्र अंकित किया है।

जीवन-परिचय:
राय कृष्णदास का जन्म काशी के एक प्रतिष्ठित अग्रवाल परिवार में सन् 1892 ई० में हुआ था। यह परिवार कला, संस्कृति और साहित्य-प्रेम के लिए प्रसिद्ध था। इनके पिता राये प्रहाददास; भारतेन्दु जी के सम्बन्धी तथा आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के परम मित्र थे। ये काव्यकला के मर्मज्ञ और साहित्यप्रेमी व्यक्ति थे। इस प्रकार राय कृष्णदास को कला और साहित्य-प्रेम पितृदाय रूप में प्राप्त हुआ था। फलतः ये अपने पिता के संस्कारों और साहित्यकार सहयोगियों के सम्पर्क में आकर आठ वर्ष की आयु में ही कविता करने लगे थे।
राय कृष्णदास की स्कूली शिक्षा अधिक समय तक न चल सकी, परन्तु उत्कट ज्ञान-पिपासा के कारण इन्होंने घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी भाषाओं का स्वतन्त्र रूप से अध्ययन किया। तदनन्तर विविध प्रकार से हिन्दी-साहित्य की सेवा करते हुए सन् 1980 ई० में इनकी मृत्यु हो गयी। इसी वर्ष (सन् 1980 ई०) की 26 जनवरी को भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्मभूषण’ अलंकरण से अलंकृत भी किया था।

साहित्यिक सेवाएँ:
राय कृष्णदासं हिन्दी-साहित्य के भावुक कवि, कहानीकार, निबन्धकार एवं प्रसिद्ध गद्यगीतकार होने के साथ-साथ प्राचीन भारतीय कला एवं संस्कृति के संरक्षक और पुरातत्त्व के मर्मज्ञ विद्वान् भी थे।

हिन्दी-साहित्य में अपने गद्यगीतों के लिए प्रसिद्ध राय कृष्णदास ने हिन्दी-गद्य को नये आयाम प्रदान कर अपनी मौलिकता का परिचय दिया। काशी के साहित्यिक वातावरण में, महान् साहित्यकारों की वरद् छाया में इनका पालन-पोषण हुआ था। साहित्य और कला की अमर संजीवनी से इनका जीवन आप्लावित था। इनकी कविताएँ, कहानियाँ और क्बिन्ध ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित होते थे। जयशंकर प्रसाद और कवीन्द्र रवीन्द्र से प्रभावित होने के कारण इनकी रचनाओं में सर्वत्र आध्यात्मिकता, भावुकता और हृदय की कोमल अनुभूतियाँ विद्यमान हैं। इनकी कहानियों में सात्त्विक भावों और मानवीय गुणों की अभिव्यक्ति की गयी है। संवाद शैली में लिखे गये इनके निबन्धों में भावात्मकता विद्यमान है।

साहित्य-सेवा के साथ-साथ इन्होंने भारतीय कला के उत्थान और विकास के लिए भारत कला भवन’ नामक विशाल संग्रहालय का निर्माण कराया। इन्होंने भारतीय कलाओं पर प्रामाणिक इतिहास और अन्य ग्रन्थों की रचना करके अपने कला-प्रेम को प्रदर्शित किया है। राय कृष्णदास ने भारतीय भूगोल और पौराणिक वंशावली पर शोधपूर्ण निबन्धों की रचना की। ‘गद्य गीत’ विधा के प्रवर्तक राय कृष्णदास जी के गद्य-गीतों में पद्य की तरह तुक तो नहीं है, परन्तु लय और पूर्ण संगीतात्मकता विद्यमान है। इनका शब्द-चयन, वाक्य-विन्यास एवं अलंकारों का प्रयोग भव्य है। इनके गद्यगीत सरल, सरस और आकार में लघु हैं। इस प्रकार राय कृष्णदास भावुक कवि, मर्मज्ञ कलाकार, गद्यगीत प्रवर्तक, कहानीकार, पुरातत्त्व और इतिहास के प्रकाण्ड पण्डित एवं महान् साहित्यकार थे।

रचनाएँ:
राय कृष्णदास ने कविता, कहानी, निबन्ध, गद्यगीत, कला, इतिहास आदि सभी क्षेत्रों में अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय दिया। इनकी रचनाओं का विवरण निम्नलिखित है

(1) कविता – संग्रह-ब्रज भाषा में ‘ब्रजराज’ तथा खड़ी बोली में ‘भावुक हैं। ‘भावुक’ काव्य-संग्रह पर छायावाद का स्पष्ट प्रभाव है।
(2) गद्यगीत – इनके गद्यगीतों के संग्रह ‘छायापथ’ और ‘साधना’ के नाम से प्रकाशित हुए हैं। ‘साधना’ के निबन्धों में जीव और परमात्मा के बीच की क्रीड़ाओं का, प्रिय और प्रिया की आँख – मिचौनी के रूप में मनमोहक और सजीव चित्रण किया गया है।
(3) निबन्ध-संग्रह – ‘संलाप’ और ‘प्रवाल’ संवाद शैली के इनके निबन्धों का संग्रह है।
(4) कहानी-संग्रह – ‘अनाख्या’, सुधांशु’ और ‘आँखों की थाह’।।
(5) अनुवाद – खलील जिब्रान के ‘दि मैडमैन’ को ‘पगला’ नाम से हिन्दी रूपान्तर।
(6) कला-इतिहास – ‘भारत की चित्रकला’ और ‘भारतीय मूर्तिकला’। ये भारतीय चित्रकला और मूर्तिकला के इतिहास से सम्बन्धित प्रामाणिक ग्रन्थ हैं। इनके अतिरिक्त इन्होंने प्राचीन भारतीय भूगोल एवं पौराणिक वंशावली पर भी शोध-निबन्ध लिखे हैं।

भाषा और शैली

(अ) भाषागत विशेषताएँ:
राय कृष्णदास जी की भाषा शुद्ध, परिमार्जित एवं तत्सम शब्दावली से युक्त साहित्यिक खड़ी बोली है। बीच-बीच में तद्भव और देशज शब्दों के प्रयोग से इनकी भाषा सरल और व्यावहारिक हो गयी है। इन्होंने यत्र-तत्र उर्दू-फारसी के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग किया है। मुहावरों के प्रयोग से इनकी भाषा में सजीवता और प्रवाह उत्पन्न होता है। इनका वाक्य-विन्यास सुगठित, शब्द-चयन सटीक और अलंकारों का प्रयोग भव्य है। कवित्वपूर्ण होते हुए भी इनकी भाषा सहज और सरल है।

(ब) शैलीगत विशेषताएँ:
राय कृष्णदास भावुक रचनाकार हैं; अतः इनकी शैली में काव्यमयता, भावुकता, सांकेतिकता एवं अनुभूति की प्रबलता विद्यमान है। इनके गीत इस बात का प्रमाण कि आधुनिक गद्यप्रधान युग में गद्य ने पद्य को भी आत्मसात् कर लिया है। भले ही इनके गद्यगीतों को विधिवत् गाया न जा सके, परन्तु गुनगुनाया तो अवश्य जा सकता है। इनकी रचनाओं में निम्नलिखित शैलियों की प्रधानता है

(1) भावात्मक शैली:
राय कृष्णदास हिन्दी में कवित्वपूर्ण भावात्मक गद्य के सम्राट माने जाते हैं। उनके गद्य में एक सहज मधुरता, भावुकता और कवित्वपूर्ण सौन्दर्य सर्वत्र विद्यमान है।

(2) चित्रात्मक शैली:
प्रकृति चित्रण के सन्दर्भ में राय कृष्णदास जी प्रकृति का ऐसा मार्मिक धरातल प्रस्तुत करते हैं कि एक सौन्दर्यमय दृश्य आँखों के आगे साकार हो उठता है। इस शैली की भाषा में भावुकता पाठक के मन में आह्लाद उत्पन्न करती है।

(3) संवाद शैली:
‘संलाप’ तथा ‘प्रवाल’ में सभी निबन्ध संवाद शैली में लिखे गये हैं। ये संवाद बड़े मार्मिक, भावपूर्ण एवं प्रभावशाली हैं।

(4) आलंकारिक शैली:
राय कृष्णदास की प्राय: सभी रचनाओं में आलंकारिक शैली के दर्शन होते हैं। इस शैली की भाषा चमत्कारपूर्ण और प्रवाहपूर्ण होती है।

(5) गवेषणात्मक शैली:
लेखक ने प्राचीन काल के इतिहास की खोज सम्बन्धी रचनाओं में गवेषणात्मक शैली का प्रयोग किया है। यह शैली गम्भीर एवं गहन होते हुए भी क्लिष्टता से रहित है तथा तार्किकता से युक्त होते हुए। भी इसमें सरसता विद्यमान है।

(6) विवरणात्मक शैली:
लेखक ने अपनी कहानियों में कथा-प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए विवरणात्मक शैली को अपनाया है। इसमें घटना और तथ्यों का विवरण सजीव तथा भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण होती है। इसमें वाक्य। छोटे-छोटे हैं तथा आलंकारिकता और भावुकता का पुट सर्वत्र देखने को मिलता है।

साहित्य में स्थान:
हिन्दी में गद्यगीत’ विधा के प्रवर्तक राय कृष्णदास जी की रचनाओं में भावुकता, कवित्व, आलंकारिकता एवं चित्रात्मकता के ऐसे गुण विद्यमान हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ हैं। इनकी काव्यात्मक भावपूर्ण शैली में दार्शनिक अनुभूति के समन्वय ने चार चाँद लगा दिये हैं। राय कृष्णदास निश्चय ही हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ गद्यगीत लेखक रहे हैं।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

प्रश्न 1:
अन्त को मुझसे न रहा गया। मैं चिल्ला उठा-आनन्द, आनन्द; कहाँ है आनन्द! हाय! तेरी खोज में मैंने । व्यर्थ जीवन गॅवाया। बाह्य प्रकृति ने मेरे शब्दों को दुहराया, किन्तु मेरी आन्तरिक प्रकृति स्तब्ध थी। अतएव मुझे अतीव आश्चर्य हुआ। पर इसी समय ब्रह्माण्ड का प्रत्येक कण सजीव होकर मुझसे पूछ उठा-क्या कभी अपने-आप में भी देखा था? मैं अवाक् था।

(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) अंन्त में लेखक क्यों चिल्ला उठा?
(iv) किसने लेखक के शब्दों को दुहराया?
(v) लेखक कब अवाक् था?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा राय कृष्णदास द्वारा लिखित ‘आनन्द की खोज, पागल पथिक’ शीर्षक गद्यगीत से अवतरित है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
पाठ का नाम – आनन्द की खोज, पागल पथिक।
लेखक का नाम – राय कृष्णदास।
[संकेत – इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – जब लेखक बाह्य जगत् में आनन्द की खोज में भटकते-भटकते थक गया और उसे कहीं भी आनन्द नहीं मिला, तब उसकी आत्मा से अज्ञान का आवरण हट गया। अब
उसने समझा कि उसने इतना मूल्यवान समय व्यर्थ के प्रयत्न में खो दिया है।

(iii) आनन्द की खोज में बाह्य जगत् में भटकने पर लेखक को आनन्द की प्राप्ति नहीं होती। इन सभी क्रियाओं से अन्ततः निराश होकर उससे रहा न गया और वह चिल्ला उठा।
(iv) बाह्य प्रकृति ने लेखक के शब्दों को दुहराया।
(v) जब ब्रह्माण्ड का प्रत्येक कण सजीव होकर उससे पूछ उठा-क्या कभी अपने-आप में भी देखा था? तब लेखक अवाक् था।

प्रश्न 2:
भला इस विश्वमण्डल के बाहर तुम जा कैसे सकते हो? तुम जहाँ से चलोगे फिर वहीं पहुँच जाओगे। यह तो घटाकार न है। फिर, तुम उस स्थान की कल्पना तो इसी आदर्श पर करते हो और जब तुम्हें इस भूल ही में सुख नहीं मिलता तब अनुकरण में उसे कैसे पाओगे? मित्र, यहाँ तो सुख के साथ दु:ख लगा है और उससे सुख को अलग कर लेने के उद्योग में भी एक सुख है। जब उसे ही नहीं पा सकते तब वहाँ का निरन्तर सुख तो तुम्हें एक अपरिवर्तनशील बोझ, नहीं यातना हो जायेगी। अरे, बिना नव्यता के सुख कहाँ? तुम्हारी यह कल्पना और संकल्प नितान्त मिथ्या और निस्सार है, और इसे छोड़ने ही में तुम्हें इतना सुख मिलेगा कि तुम छक जाओगे।’

(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) संसार का आकार कैसा है?
(iv) लेखक ने भूल किसे बताया है?
(v) इस संसार में कौन किसके साथ लगा है और उसके किस उद्योग में सुख है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – तुम सोचो कि बिना नवीनता के भी कहीं सुख मिलता है? अर्थात् सुख के लिए नवीनता आवश्यक है; अत: तुम्हारी कल्पना बिल्कुल झूठी और व्यर्थ है, इसलिए तुम पूर्ण सुख को प्राप्त करने की कल्पना त्याग दो। ऐसा करने से तुम्हें इसी संसार में इतना सुख मिलेगा कि तुम पूरी तरह सन्तुष्ट हो जाओगे, लेकिन वह सुख तुम्हें अपने अन्दर मिलेगा, बाहर नहीं। उसे अपने भीतर ही खोजना पड़ेगा। तुम यही करो।
(iii) संसार का आकार घट जैसा है।
(iv) लेखक ने बाह्य जगत की कल्पना को भूल बताया है।
(v) इस संसार में सुख के साथ दु:ख लगा है और उससे सुख को अलग कर लेने के उद्योग में सुख है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 5 ध्रुवयात्रा

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Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name ध्रुवयात्रा
Number of Questions 3
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 5 ध्रुवयात्रा

प्रश्न 1:
‘धुवयात्रा’ कहानी का सारांश (कथावस्तु) अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘ध्रुवयात्रा’ हिन्दी के सुप्रसिद्ध कहानीकार जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी है। जैनेन्द्र जी मुंशी प्रेमचन्द की परम्परा के अग्रणी कहानीकार हैं। मनोवैज्ञानिक कहानियाँ लिखकर इन्होंने हिन्दी कहानी-कला के क्षेत्र में एक नवीन अध्याय को जोड़ा है। प्रस्तुत कहानी में इन्होंने मानवीय संवेदना को मनोवैज्ञानिक तथा दार्शनिक दृष्टिकोण में समन्वित करके एक नवीन धारा को जन्म दिया और कहानी ‘ध्रुवयात्रा’ की रचना की। इस कहानी का सारांश निम्नवत् है

राजा रिपुदमन बहादुर उत्तरी ध्रुव को जीतकर अर्थात् उत्तरी ध्रुव की यात्रा करके यूरोप के नगरों से बधाइयाँ लेते हुए भारत आ रहे हैं इस खबर को सभी समाचार-पत्रों ने मुखपृष्ठ पर मोटे अक्षरों में प्रकाशित किया। उर्मिला, जो राजा रिपुदमन की प्रेमिका है और जिसने उनसे विवाह किये बिना उनके बच्चे को जन्म दिया है, ने भी इस समाचार को पढ़ा। उसने यह भी पढ़ा कि वे अब बम्बई पहुँच चुके हैं, जहाँ उनके स्वागत की तैयारियाँ जोर-शोर से की जा रही हैं। ………. उन्हें अपने सम्बन्ध में इस प्रकार के प्रदर्शनों में तनिक भी उल्लास नहीं है। ……….. इसलिए वे बम्बई में न ठहरकर प्रातः होने के पूर्व ही दिल्ली पहुँच गये। ……… उनके चाहने वाले उन्हें अवकाश नहीं दे रहे हैं, ऐसा लगता है कि वे आराम के लिए कुछ दिन के लिए अन्यत्र जाएँगे।

राजा रिपुदमन को अपने से ही शिकायत है। उन्हें नींद नहीं आती है। वे अपने किये पर पश्चाताप कर रहे हैं। जब उर्मिला ने उनसे शादी के लिए कहा था तो उन्होंने परिवारीजनों के डर से मना कर दिया था। उनकी वही भूल आज उम्हें पीड़ा प्रदान कर रही है। वह उसके विषय में बहुत चिन्तित हैं।
दिल्ली में आकर वे आचार्य मारुति से मिलते हैं, जिनके बारे में उन्होंने यूरोप में भी बहुत सुन रखा था। आचार्य मारुति तरह-तरह की चिकित्सकीय जाँच के परिणामों को ठीक बताते हुए उन्हें विवाह करने की सलाह देते हैं। लेकिन रिपुदमन स्वयं को विवाह के अयोग्य बताते हुए इसे बन्धन में बँधना कहते हैं। आचार्य मारुति उन्हें प्रेम-बन्धन में बँधने की सलाह देते हैं और कहते हैं कि प्रेम का इनकार स्वयं से इनकार है।’

अगले दिन राजा रिपुदमन उर्मिला से मिलते हैं और अपने बच्चे का नामकरण करते हैं। वे उर्मिला से समाज के विपरीत अपने द्वारा किये गये व्यवहार के लिए क्षमा माँगते हैं और अपने व उर्मिला के सम्बन्धों को एक परिणति देना चाहते हैं। लेकिन उर्मिला मना करती है और उनसे सतत आगे बढ़ते रहने के लिए कहती है। वह पुत्र की ओर दिखाती हुई कहती है कि तुम मेरे ऋण से उऋण हो और मेरी ओर से आगामी गति के लिए मुक्त हो।

रिपुदमन उर्मिला को आचार्य मारुति के विषय में बताता है। वह उसे ढोंगी, महत्त्व को शत्रु और साधारणता का अनुचर बताती है। वह कहती है कि तुम्हारे लिए स्त्रियों की कमी नहीं है, लेकिन मैं तुम्हारी प्रेमिका हूँ और तुम्हें सिद्धि तक पहुँचाना चाहती हैं, जो कि मृत्यु के भी पार है।।

रिपुदमन आचार्य मारुति से मिलता है तथा उसे बताता है कि वह उर्मिला के साथ विवाह करके साथ में रहने के लिए तैयार था, लेकिन उसने मुझे ध्रुवयात्रा के लिए प्रेरित किया और कुछ मेरी स्वयं की भी इच्छा थी। अब वह मुझे सिद्धि तक जाने के लिए प्रेरित कर रही है। आचार्य मारुति स्वीकार करते हैं कि उर्मिला उनकी ही पुत्री है। वे उसे विवाह के लिए समझाएँगे।

जब उर्मिला आचार्य के बुलवाने पर उनके पास जाती है तो वे उससे विवाह के लिए कहते हैं। वह कहती है कि शास्त्र से स्त्री को नहीं जाना जा सकता उसे तो सिर्फ प्रेम से जाना जा सकता है। वे उसे रिपुदमन से विवाह के लिए समझाते हैं, लेकिन वह नहीं मानती। वह स्पष्ट कहती है कि मुक्ति का पथ अकेले का है। अन्त में आचार्य उर्मिला के ऊपर इस रहस्य को प्रकट कर देते हैं कि वे ही उसके पिता हैं। इस अभागिन को भूल जाइएगा यह कहती हुई वह उनके पास से चली जाती है।

रिपुदमन के पूछने पर उर्मिला बताती है कि वह आचार्य से मिल चुकी है। रिपुदमन उसके कहने पर दक्षिणी ध्रुव के शटलैण्ड द्वीप के लिए जहाज तय करते हैं। अब उर्मिला उनको रोकना चाहती है, लेकिन वे नहीं रुकते। वे चले जाते हैं।
रिपुदमन की ध्रुव पर जाने की खबर पूरी दनिया को ज्ञात हो जाती है। उर्मिला को भी अखबारों के माध्यम से सारी खबर ज्ञात होती रहती है और वह इन्हीं कल्पनाओं में डूबी रहती है।
तीसरे दिन के अखबार में उर्मिला राजा रिपुदमन की आत्महत्या की खबर को एक-एक अंश पूरे ध्यान से पढ़ती है। अखबार वालों ने एक पत्र भी छापा थी, जिसमें रिपुदमन ने स्वीकार किया था कि उनकी यह यात्रा नितान्त व्यक्तिगत थीं, जिसे सार्वजनिक किया गया। मैं किसी से मिले आदेश और उसे दिये गये अपने वचन को पूरा नहीं कर पा रहा हूँ, इसलिए होशो हवाश में अपना काम-तमाम कर रहा हूँ। भगवान मेरे प्रिय के अर्थ मेरी आत्मा की रक्षा करे।” यहीं पर कहानी समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 2:
कहानी-कला के तत्वों की दृष्टि से ‘धुवयात्रा’ कहानी की समीक्षा (आलोचना) कीजिए।
या
‘धुवयात्रा’ कहानी की कथावस्तु का विवेचन कीजिए।
या
श्रेष्ठ कहानी की विशेषताएँ बताते हुए ‘ध्रुवयात्रा’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
‘ध्रुवयात्रा’ की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
या
कथा-संगठन की दृष्टि से ‘ध्रुवयात्रा’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
‘ध्रुवयात्रा’ कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
या
कहानी के प्रमुख तत्वों के आधार परे ‘ध्रुवयात्रा’ कहानी की विशेषताएँ बताइए।
या
धुवयात्रा’ कहानी के आधार पर जैनेन्द्र कुमार की कहानी-कला का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
जैनेन्द्र कुमार महान् कथाकार हैं। ये व्यक्तिवादी दृष्टि से पात्रों का मनोविश्लेषण करने में कुशल हैं। प्रेमचन्द की परम्परा के अग्रगामी लेखक होते हुए भी इन्होंने हिन्दी कथा-साहित्य को नवीन शिल्प प्रदान किया। ‘ध्रुवयात्रा’ जैनेन्द्र कुमार की सामाजिक, मनोविश्लेषणात्मक, यथार्थवादी रचना है। कहानी-कला के तत्त्वों के .
आधार पर इस कहानी की समीक्षा निम्नवत् है

(1) शीर्षक – कहानी का शीर्षक आकर्षक और जिज्ञासापूर्ण है। सार्थकता तथा सरलता इस शीर्षक की विशेषता है। कहानी का शीर्षक अपने में कहानी के सम्पूर्ण भाव को समेटे हुए है तथा प्रारम्भ से अन्त तक कहानी इसी ध्रुवयात्रा पर ही टिकी है। कहानी का प्रारम्भ नायक के ध्रुवयात्रा से आगमन पर होता है और कहानी का समापन भी ध्रुवयात्रा के प्रारम्भ के पूर्व ही नायक के समापन के साथ होता है। अत: कहानी का शीर्षक स्वयं में पूर्ण और समीचीन है।

(2) कथानक – श्रेष्ठ कथाकार के रूप में स्थापित जैनेन्द्र कुमार जी ने अपनी कहानियों को कहानी-कला की दृष्टि से आधुनिक रूप प्रदान किया है। ये अपनी कहानियों में मानवीय गुणों; यथा–प्रेम, सत्य तथा करुणा; को आदर्श रूप में स्थापित करते हैं।

इस कहानी की कथावस्तु का आरम्भ राजा रिपुदमन की ध्रुवयात्रा से वापस लौटने से प्रारम्भ होता है। कथानक का विकास रिपुदमन और आचार्य मारुति के वार्तालाप, तत्पश्चात् रिपुदमन और उसकी अविवाहिता प्रेमिका उर्मिला के वार्तालाप और उर्मिला तथा आचार्य मारुति के मध्य हुए वार्तालाप से होता है। कहानी के मध्य में ही यह स्पष्ट होता है कि उर्मिला ही मारुति की पुत्री है। कहानी का अन्त और चरमोत्कर्ष राजा रिपुदमन द्वारा आत्मघात किये जाने से होता है।

प्रस्तुत कहानी में कहानीकार ने एक सुसंस्कारित युवती के उत्कृष्ट प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाया है तथा प्रेम को नारी से बिलकुल अलग और सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित किया है। कहानी का प्रत्येक पात्र कर्तव्य के प्रति निष्ठा एवं नैतिकता के प्रति पूर्णरूपेण सतर्क दिखाई पड़ता है और जिसकी पूर्ण परिणति के लिए वह अपना जीवन अर्पण करने से भी नहीं डरता। कहानी मनोवैज्ञानिकता के साथ-साथ दार्शनिकता से भी ओत-प्रोत है और संवेदना प्रधान होने के कारण पाठक के अन्तस्तल पर अपनी अमिट छाप छोड़ती हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि ध्रुवयात्रा एक अत्युत्कृष्ट कहानी है।।

(3) पात्र तथा चरित्र-चित्रण – जैनेन्द्र कुमार जी की प्रस्तुत कहानी में मात्र तीन पात्र हैं-राजा रिपुदमन, रिपुदमन की प्रेमिका उर्मिला और उर्मिला के पिता आचार्य मारुति। तीनों ही एक-दूसरे से पूर्णतया सम्बद्ध और तीनों ही मुख्य एवं समस्तरीय हैं। जैनेन्द्र जी की कहानियों के पात्र हाड़-मांस से निर्मित सामान्य मनुष्य होते हैं, जिनमें बुराइयों के साथ-साथ अंच्छाइयाँ भी विद्यमान होती हैं। इनके पात्र अन्तर्मुखी होते हैं, जो सामान्य एवं विशिष्ट दोनों ही परिस्थितियों में अपना विशिष्ट परिचय प्रस्तुत करते हैं। प्रस्तुत कहानी के पात्र भी ऐसे ही हैं, जिनमें से एक जीवन की परिस्थितियों से असन्तुष्ट हो विद्रोही बन जाता है, दूसरा क्षणिक विद्रोही हो आत्म-त्यागी हो जाता है और तीसरी अन्ततोगत्वा समझौतावादी हो जाता है।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि प्रस्तुत कहानी के पात्रों का चरित्र-चित्रण अत्यन्त स्वाभाविक, मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिकता से युक्त है।

(4) कथोपकथन या संवादे-योजना – कहानी के संवाद छोटे, सरल, पात्रानुकूल तथा कथा के विकास में सहायक हैं। जैनेन्द्र जी अपने पात्रों के मनोभावों को सरलता से व्यक्त करने में सफल हुए हैं। लगभग पूरी कहानी ही संवादों पर आधारित है, अतः संवाद-योजना की दृष्टि से यह एक श्रेष्ठ कहानी है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है

दूर जमुना किनारे पहुँचकर राजा ने कहा, “अब कहो, मुझे क्या कहती हो?”
कहती हैं कि तुम क्यों अपना काम बीच में छोड़कर आये?”
“मेरा काम क्या है?”
“मेरी और मेरे बच्चे की चिन्ता जरूर तुम्हारा काम नहीं है। मैंने कितनी बार तुमसे कहा, तुम उससे ज्यादा के लिए हो?”
“उर्मिला, अब भी मुझसे नाराज हो?”
“नहीं, तुम पर गर्वित हूँ।”
“मैंने तुम्हारा घर छुड़ाया। सब में रुसवा किया। इज्जत ली। तुमको अकेला छोड़ दिया। उर्मिला, मुझे जो कहा जाय, थोड़ा। पर अब बताओ, मुझे क्या करने को कहती हो? मैं तुम्हारा हूँ। रियासत का हूँ, न धुव का हूँ। मैं बस, तुम्हारा हूँ। अब कहो।”

(5) देश-काल तथा वातावरण – प्रस्तुत कहानी सन् 1960 के आस-पास की है। तत्कालीन सामाजिक वातावरण के अनुरूप ही जैनेन्द्र जी ने कहानी के पात्रों तथा उनके व्यवहार को प्रदर्शित किया है। कहानी का वातावरण सजीव है। प्रस्तुत कहानी में जीवन्त वातावरण की पृष्ठभूमि पर मानवीय प्रेम और संवेदना के मर्मस्पर्शी चित्र उकेरे गये हैं, जिसमें कहानीकार को पूर्ण सफलता मिली है। एक उदाहरण देखिए
समय सब पर बह जाता है और अखबार कल को पीछे छोड़ आज पर चलते हैं।राजा रिपु नयेपन से जल्दी छूट गये। ऐसे समय सिनेमा के एक बॉक्स में उर्मिला से उन्होंने भेंट की। उर्मिला बच्चे को साथ लायी थी। राजा सिनेमा के द्वार पर उसे मिले और बच्चे को गोद में लेना चाहा। उर्मिला ने जैसे यह नहीं देखा और अपने कन्धे से उसे लगाये वह उनके साथ जीने पर चढ़ती चली गयी। बॉक्स में आकर सफलतापूर्वक उन्होंने बिजली का पंखा खोल दिया। पूछा, ‘कुछ मँगाऊँ?’ ‘नहीं।’

(6) भाषा-शैली – अपनी कहानियों में जैनेन्द्र जी सरल, स्वाभाविक और व्यावहारिक भाषा का प्रयोग करते हैं, जिसमें संस्कृत के तत्सम, उर्दू, अंग्रेजी तथा देशज शब्दों का भी प्रचुरता से प्रयोग करते हैं। इसी कारण इनकी भाषा सहज, बोधगम्य एवं भावपूर्ण हो जाती है। इनके शब्द-चयन भावों के अनुकूल होते हैं तथा शब्दों की रचना पात्रों की भूमिका को साकार कर देती है। प्रस्तुत कहानी की भाषा की भी ये ही विशेषताएँ हैं। इस कहानी में इन्होंने मुख्य रूप से कथा शैली को अपनाया है, जिसमें वार्ता शैली का प्राचुर्य तथा दृष्टान्त शैली का अल्पांश दृष्टिगोचर होता है। इनकी भाषा-शैली का एक उदाहरण अग्रवत् है

प्रेम से तो नाराज़ नहीं हो?विवाह का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। प्रेम के निमित्त से उसकी सृष्टि है। विवाह की बात तो दुकानदारी की है। सच्चाई की बात प्रेम है। इस बारे में तुम अपने से बात करके देखो। वह बात डायरी में दर्ज कीजिएगा। अब परसों मिलेंगे। निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि भाषा-शैली की दृष्टि से यह एक सफल कहानी है।।

(7) उद्देश्य – प्रस्तुत कहानी में कहानीकार जैनेन्द्र जी ने बताया है कि प्रेम एक पवित्र बन्धन है और विवाह एक सामाजिक बन्धन। प्रेम में पवित्रता होती है और विवाह में स्वार्थता। प्रेम की भावना व्यक्ति को उसके लक्ष्य तक पहुँचने में मदद करती है। उर्मिला कहती है, “हाँ, स्त्री रो रही है, प्रेमिकी प्रसन्न है। स्त्री की मत सुनना, मैं भी पुरुष की नहीं सुनँगी। दोनों जने प्रेम की सुनेंगे। प्रेम जो अपने सिवा किसी दया को, किसी कुछ को नहीं जानता।” निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि प्रेम को ही सर्वोच्च दर्शाना इस कहानी का मुख्य उद्देश्य है, जिसमें कहानीकार
को पूर्ण सफलता मिली है।

प्रश्न 3:
‘धुवयात्रा’ कहानी के आधार पर उर्मिला का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘ध्रुवयात्रा’ कहानी की प्रमुख स्त्री पात्र के चरित्र की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ध्रुवयात्रा’ कहानी के आधार पर उर्मिला के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती है।

(1) सुसंस्कारित युवती – प्रस्तुत कहानी की नायिका उर्मिला’ एक सुसंस्कारित युवती है। उसे बचपन में अपनी माता द्वारा अच्छे संस्कार प्राप्त हुए हैं। इसीलिए वह राजा रिपुदमन को अपने लक्ष्य की ओर उन्मुख होने के लिए प्रेरित करती रहती है।

(2) सच्ची प्रेमिका – अपनी युवावस्था में उर्मिला रिपुदमन के प्रेमपाश में बद्ध हो जाती है। उस समय रिपुदमन किन्हीं सामाजिक कारणों से विवाह करने से मना कर देता है। बाद में जब उसे पता चलता है कि वह माँ बनने वाली है तो वह उससे विवाह के लिए कहता है, तब वह इनकार कर देती है और कहती है कि मुझे तुमसे प्रेम है। प्रेम और विवाह में अन्तर होता है। प्रेम पवित्रतायुक्त होता है और विवाह स्वार्थयुक्त।” अत: वह उसकी सच्ची प्रेमिका ही बने रहना चाहती है, स्त्री नहीं।

(3) स्वतन्त्र विचारों वाली – उर्मिला स्वतन्त्र और स्पष्ट विचारों वाली युवती है। रिपुदमन के पूछने पर कि क्या वह विवाह करना नहीं चाहती। वह विवाह के लिए स्पष्ट मना कर देती है। वह रिपुदमन से कहती है कि, “तुम्हारा शरीर स्वस्थ है और रक्त उष्ण है, तो स्त्रियों की कहीं कमी नहीं है। मै तुम्हारे लिए स्त्री नहीं हूँ, प्रेमिका हूँ।इसलिए किसी स्त्री के प्रति मैं तुममें निषेध नहीं चाह सकती।” निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है। कि वह वर्तमान युग में प्रचलित ‘स्त्री-पुरुष के साथ-साथ रहने की उत्कृष्ट विचारधारा की पोषक है।

(4) दार्शनिक विचारों से युक्त – उर्मिला शिक्षित, स्वतन्त्र और स्पष्ट विचारों वाली युवती तो है ही, कहानी के पढ़ने से स्पष्ट प्रतीत होता है कि उसके विचारों में दार्शनिकता की विद्यमानता भी है। उसके विचार कभी भी छिछले स्तर पर प्रकट नहीं होते, उनमें दार्शनिकता का गम्भीर स्वर गुंजित होता है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है
‘उर्मिला, सिद्धि मृत्यु से पहले कहाँ है ?’
‘वह मृत्यु के भी पार है, राजा! इससे मुझ तक लौटने की आशा लेकर तुम नहीं आओगे। सौभाग्य का क्षण मेरे लिए शाश्वत है। उसका पुनरावर्तन कैसा?’
‘उर्मिला, तो मुझे जाना ही होगा? तुम्हारा प्रेम दया नहीं जानेगा?’
‘यह क्या कहते हो, राजा! मैं तुम्हें पाने के लिए भेजती हूँ, और तुम मुझे पाने के लिए जाते हो। यही तो मिलने की राह है। तुम भूलते क्यों हो?’

(5) ज्ञानवान् – उर्मिला अच्छे संस्कारों में पालित-पोषित हुई ज्ञानवान् स्त्री है। उसके बोलने मात्र से ही उसका यह गुण स्पष्ट हो जाता है। वह प्रेमिका और स्त्री के कर्तव्य को अलग-अलग मानती है। वह कहती है कि
“शास्त्र से स्त्री को नहीं जाना जा सकता। स्त्री को मात्र प्रेम से जाना जा सकता है।”

(6) पित् स्नेही – उर्मिला के मन में अपने पिता के प्रति अपार स्नेह है। वह नहीं जानती कि उसका पिता कौन है? कहानी के उत्तरार्द्ध में आचार्य मारुति यह स्पष्ट करते हैं कि वे ही उसके पिता हैं, तब वह स्तब्ध होकर उनको देखती रह जाती है और यह कहती हुई चली जाती है कि मुझ हतभागिन को भूल जाइएगा।

(7) मातृभाव से युक्त – उर्मिला ने यद्यपि बिना वैवाहिक जीवन में प्रवेश किये ही पुत्र प्राप्त किया है, तथापि उसमें मातृभाव की कमी कदापि नहीं है। वह रिपुदमन से कहती है, ”मेरे लिए क्या यही गौरव कम है कि मैं तुम्हारे पुत्र की माँ हूँ।”दुनिया को भी जताने की जरूरत नहीं है कि मेरा बालक तुम्हारा है। मेरा जानना मेरे गर्व को काफी है।”

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि उर्मिला ही इस कहानी की सर्व प्रमुख पात्र और नायिका के रूप में नायक है। कहानीकार को अपनी कल्पना में किसी स्त्री को जिन-जिन गुणों का होना अभीष्ट प्रतीत हुआ वे सभी गुण उसने प्रस्तुत कहानी की नायिका में समाविष्ट कर उसके चरित्र को अतीव गरिमा प्रदान की है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज (लक्ष्मीनारायण मिश्र) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज (लक्ष्मीनारायण मिश्र).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name गरुड़ध्वज (लक्ष्मीनारायण मिश्र)
Number of Questions 10
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज (लक्ष्मीनारायण मिश्र)

प्रश्न 1:
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की कथावस्तु को संक्षेप में लिखिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के प्रथम अंक का कथासार अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के द्वितीय अंक की कथा संक्षेप में लिखिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के अन्तिम (तृतीय) अंक की घटनाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के किसी एक अंक के कथानक पर प्रकाश डालिए।
या
गरुड़ध्वज’ नाटक के कथानक का सार लिखिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक में कौन-सा अंक आपको सबसे अच्छा लगा और क्यों ?
उत्तर:
श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत ‘गरुड़ध्वज’ नाटक की कथा ऐतिहासिक है। कथा में प्रथम शती ईसा पूर्व के भारतवर्ष की सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक तथा सामाजिक झाँकी प्रस्तुत की गयी है। कहानी में शुंग वंश के अन्तिम सेनापति विक्रमादित्य, मालवा के जननायक ‘विषमशील’ के त्याग और शौर्य की गाथा वर्णित है। विषमशील ही ‘विक्रमादित्य’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

प्रथम अंक – नाटक के प्रथम अंक में पहली घटना विदिशा में घटित होती है। विक्रममित्र स्वयं को सेनापति सम्बोधित कराते हैं, महाराज नहीं। विक्रममित्र के सफल शासन में प्रजा सुखी है। बौद्धों के पाखण्ड को समाप्त करके ब्राह्मण धर्म की स्थापना की गयी है। सेनापति विक्रममित्र ने वासन्ती नामक एक युवती का उद्धार किया है। उसके पिता वासन्ती को किसी यवन को सौंपना चाहते थे। वासन्ती; एकमोर नामक युवक से प्रेम करती है। इसी समय कवि और योद्धा कालिदास प्रवेश करते हैं। कालिदास; विक्रममित्र को आजन्म ब्रह्मचारी रहने के कारण भीष्म पितामह’ कहते हैं। विक्रममित्र इस समय सतासी वर्ष के हैं। इसी समय साकेत के एक यवन-श्रेष्ठी की कन्या कौमुदी का सेनापति देवभूति द्वारा अपहरण करने की सूचना विक्रममित्र को मिलती है। देवभूति कन्या को अपहरण कर उसे काशी ले जाते हैं। विक्रममित्र कालिदास को काशी पर आक्रमण करने की आज्ञा देते हैं।

द्वितीय अंक – नाटक के दूसरे अंक में दो घटनाएँ प्रस्तुत की गयी हैं। प्रथम में तक्षशिला के राजा अन्तिलिक का मन्त्री ‘हलोदर’ विक्रममित्र से अपने राज्य के दूत के रूप में मिलता है। हलोदर भारतीय संस्कृति में आस्था रखता है तथा सीमा विवाद को वार्ता के द्वारा सुलझाना चाहता है। वार्ता सफल रहती है तथा हलोदर विक्रममित्र को अपने राजा की ओर से रत्नजड़ित स्वर्ण गरुड़ध्वज भेटस्वरूप देता है।

विक्रममित्र के आदेशानुसार कालिदास काशी पर आक्रमण करते हैं तथा अपने ज्ञान और विद्वत्ता से काशी के दरबार में बौद्ध आचार्यों को प्रभावित कर देते हैं। वे कौमुदी का अपहरण करने वाले देवभूति तथा काशी नरेश को बन्दी बनाकर विदिशा ले जाते हैं। नाटक के इसी भाग में वासन्ती काशी विजयी ‘कालिदास’ का स्वागत उनके गले में पुष्पमाला डालकर करती है।

तृतीय अंक – नाटक के तृतीय तथा अन्तिम अंक की कथा ‘अवन्ति’ में प्रस्तुत की गयी है। विषमशील के नेतृत्व में अनेक वीरों ने मालवा को शकों से मुक्त कराया। विषमशील के शौर्य के कारण अनेक राजा उसके समर्थक हो जाते हैं। अवन्ति में महाकाल का एक मन्दिर है, इस पर गरुड़ध्वज फहराता रहता है। मन्दिर का पुजारी मलयवती और वासन्ती को बताता है कि युद्ध की सभी योजनाएँ इसी मन्दिर में बनती हैं। इसी समय विषमशील युद्ध जीतकर आते हैं तथा काशिराज अपनी पुत्री वासन्ती का विवाह कालिदास के साथ विक्रममित्र की आज्ञा लेकर कर देते हैं। इसी अंक में विषमशील का राज्याभिषेक होता है तथा कालिदास को मन्त्री-पद पर नियुक्त किया जाता है। राजमाता जैन आचार्यों को क्षमादान देती हैं। कालिदास की मन्त्रणा से विषमशील का नाम उसके पिता महेन्द्रादित्य तथा किंक्रममित्र के आधार पर विक्रमादित्य रखा जाता है। विक्रममित्र संन्यासी बन जाते हैं तथा कालिदास अपने राजा विक्रमादित्य के नाम पर उसी दिन से विक्रम संवत् का प्रवर्तन करते हैं। नाटक की कथा यहीं समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 2:
नाटक के तत्वों (नाट्यकला की दृष्टि) के आधार पर ‘गरुडध्वज’ नाटक की समीक्षा (आलोचना) कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक में निहित सन्देश पर प्रकाश डालिए।
या
पात्र तथा चरित्र-चित्रण की दृष्टि से ‘गरुड़ध्वज’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
संवाद-योजना (कथोपकथन) की दृष्टि से ‘गरुड़ध्वज’ नाटक की विवेचना कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की भाषा-शैली की समीक्षा कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के देश-काल तथा वातावरण की समीक्षा कीजिए।
या
अभिनेयता अथवा रंगमंच की दृष्टि से ‘गरुडध्वज’ नाटक की सफलता पर प्रकाश डालिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के उद्देश्य पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

‘गरुडध्वज’ की तात्त्विक समीक्षा

नाटक के तत्त्वों की दृष्टि से श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत ‘गरुड़ध्वज’ एक उच्चकोटि की रचना है। इसका तात्त्विक विवेचन निम्नवत् है

(1) कथावस्तु (कथानक) – नाटक की कथावस्तु ऐतिहासिक है। इसमें ईसा से एक शताब्दी पूर्व के प्राचीन भारत का सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनीतिक परिवेश चित्रित किया गया है। प्रथा अंक में कार्य का आरम्भ हुआ है, दूसरे अंक में उसका विकास है तथा तीसरे अंक में चरम-सीमा, उतार तथा समाप्ति है। प्रथम अंक में विक्रममित्र के चरित्र, काशिराज का अनैतिक चरित्र तथा वासन्ती की असन्तुलित मानसिक दशा के साथ ही समाज में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा किये जा रहे अनाचार का चित्रण किया है। विदेशियों के आक्रमण और बौद्ध धर्मावलम्बियों द्वारा राष्ट्रहित को त्यागकर उनकी सहायता इसमें चित्रित की गयी है। दूसरा अंक राष्ट्रहित में धर्म-स्थापना के संघर्ष की है। इस अंक में विक्रममित्र की दृढ़ता एवं वीरता का परिचय प्राप्त होता है। साथ ही , उनके कुशल नीतिज्ञ और एक अच्छे मनुष्य होने का बोध भी होता है। तीसरे अंक के अन्तर्गत युद्ध में विदेशियों की पराजय, कालकाचार्य एवं काशिराज का पश्चात्ताप विक्रममित्र की उदारता तथा आक्रमणकारी हूणों की क्रूर जातिगत प्रकृति को चित्रित किया गया है। इस नाटक का कथानक राज्य के संचालन, धर्म, अहिंसा एवं हिंसा के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालता है।

(2) पात्र और चरित्र-चित्रण – पात्र और चरित्र-चित्रण की दृष्टि से यह एक सफल नाटक है। प्रस्तुत नाटक में 14 पुरुष-पात्रों और 4 स्त्री-पात्रों को मिलाकर कुल 18 पात्र हैं। इसके मुख्य पात्र हैं – विक्रममित्र, विषमशील, कालिदास, मलयवती, वासन्ती, काशी-नरेश और कुमार कार्तिकेय। पात्रों में विविध प्रकार के चरित्र हैं-सदाचारी, वीर, साहित्यकार, संगीतकार, लम्पट तथा देशद्रोही। विक्रममित्र आजीवन ब्रह्मचारी रहने के कारण परिचित जनों द्वारा ‘भीष्म पितामह’ के नाम से पुकारे जाते हैं। पात्रों का चरित्र-चित्रण नाटक के कथ्य के अनुसार ही किया गया है। मुख्य पात्र विक्रममित्र हैं, सम्पूर्ण नाटक इनके चारों ओर ही घूमता है। चरित्रों के द्वारा नाटक के कथ्य को दर्शकों तक पहुँचाने के लिए इसके सभी पात्रों का चित्रण उपयुक्त है। निरर्थक पात्र-योजना का समावेश नहीं किया गया है।

(3) भाषा-शैली – ‘गरुड़ध्वज’ की भाषा सुगम, संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हिन्दी है। नाटक में लक्ष्मीनारायण मिश्र जी ने सहज, सरल एवं सुबोध शैली का प्रयोग किया है। भाषा में कहीं-कहीं क्लिष्टता है, किन्तु मुहावरों तथा लोकोक्तियों का प्रयोग सफलता से हुआ है, जिसने नाटक की भाषा को सहज, सरल और आकर्षक बना दिया है। ऐतिहासिक नामों के प्रयोग विभिन्न घटनाओं के साथ इस प्रकार आये हैं कि उन्हें समझना आसान है। मिश्र जी ने विचारात्मक, दार्शनिक, हास्यात्मक आदि शैलियों का पात्रों के अनुकूल प्रयोग किया है। भाषा-शैली की दृष्टि से यह एक सफल रचना है। नाटक में प्रयुक्त स्वाभाविक भाषा का एक उदाहरण देखिए-”मैं लज्जा और संकोच से मरने लगता हूँ राजदूत! जब इस युग का सारा श्रेय मुझे दिया जाता है। आत्म-स्तुति । से प्रसन्न नास्तिक होते हैं। उसके भीतर जो दैवी अंश था उसी ने उसे कालिदास बना दिया। उसकी शिक्षा और संस्कार में मैं प्रयोजन मात्र बना था। उसका पालन मैंने ठीक इसी तरह किया, जैसे यह मेरे अंश का ही नहीं, मेरे इस शरीर का हो।”

(4) संवाद-योजना (कथोपकथन – नाटक का सबसे सबल तत्त्व उसका संवाद होता है। संवादों के द्वारा ही पात्रों का चरित्र-चित्रण किया जाता है। इस दृष्टि से नाटककार ने संवादों का उचित प्रयोग किया है। नाटक के संवाद सुन्दर हैं। तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप संवादों की रचना की गयी है। संवाद संक्षिप्त, परन्तु प्रभावशाली हैं। वे पात्रों की मनोदशा तथा भावनाओं को स्पष्ट करने में समर्थ हैं; जैसे
वासन्ती-नहीं …….नहीं, बस दो शब्द पूगी कवि ! लौट आओ ……।।
कालिदास—(विस्मय से) क्या है राजकुमारी ?
वासन्ती–यहाँ आइए ! आज मैं कुमार कार्तिकेय का स्वागत करूसँगी। उनका वाहन मोर भी यहीं है।
संवादों में कहीं-कहीं हास्य, व्यंग्य, विनोद तथा संगीतात्मकता का पुट भी मिलता है।

(5) देश-काल तथा वातावरण – नाटक में देश-काल तथा वातावरण का निर्वाह उचित रूप में हुआ है। नाटक में ईसा पूर्व की सांस्कृतिक, धार्मिक तथा राजनीतिक हलचलों को सुन्दर तथा उचित प्रस्तुतीकरण है। नाटककार तत्कालीन समाज के वातावरण का चित्रण करने में पूर्णरूपेण सफल रहा है। तत्कालीन समाज में राजमहल, युद्ध-भूमि, पूजागृह, सभामण्डल आदि का वातावरण अत्यन्त कुशलतापूर्वक चित्रित किया गया है। नाम, स्थान तथा वेशभूषा में देश-काल तथा वातावरण का सुन्दर सामंजस्य देखने को मिलता है।

(6) उद्देश्य अथवा सन्देश – नाटक का उद्देश्य, अतीत की घटनाओं के माध्यम से वर्तमान भारतीयों को उच्च चरित्र, आदर्श मानवता तथा ईमानदारी के साथ-साथ देश के नव-निर्माण का सन्देश देना भी है। नाटककार उदार धार्मिक भावनाओं को व्यंजित करके धर्मनिरपेक्षता पर बल देता है। वह देश की रक्षा और अन्यायियों के विनाश के लिए शस्त्रों के उपयोग का समर्थन करता है। नाटक के तीन अंक हैं। तीनों अंकों में एक-एक मुख्य घटना है। ये घटनाएँ क्रमशः न्याय, राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय शौर्य को प्रदर्शित करती हैं। नाटक की भूमिका में नाटककार स्वयं कहते हैं-”सम्पूर्ण नाटक राष्ट्र की एकता और संस्कृति का सन्देश अपनी घटनाओं में अभिव्यक्त करता है।”

(7) अभिनेयता – ‘गरुड़ध्वज’ नाटक मंच पर अभिनीत किया जा सकता है। नाटक में मात्र तीन अंक हैं। वेशभूषा का प्रबन्ध भी कठिन नहीं है। एकमात्र कठिनाई नाटक की दुरूह भाषा तथा पात्रों के कठिन नाम हैं, जो कहीं-कहीं सफल संवाद-प्रेषण में कठिनाई उत्पन्न कर सकते हैं, परन्तु देश-काल के सजीव चित्रण के लिए, यह आवश्यक था।
इस प्रकार यह नाटक रचना-तत्त्वों की दृष्टि से एक सफल रचना है।

प्रश्न 3:
‘गरुडध्वज’ नाटक के नायक की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के प्रमुख पुरुष पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
विक्रममित्र की चारित्रिक विशेषताओं का उद्घाटन कीजिए।
या
‘गरुडध्वज’ नाटक के आधार पर विक्रममित्र के चरित्र पर प्रकाश डालिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के किसी पुरुष पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

विक्रममित्र का चरित्र-चित्रण

श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत ‘गरुड़ध्वज’ नाटक में विषमशील तथा विक्रममित्र दो प्रमुख पात्र हैं। नाटक के नायक विक्रममित्र हैं, जो नाटक के आरम्भ से अन्त तक की सभी घटनाओं के साथ जुड़े रहते हैं। यह कहा जा सकता है कि सारे कथानक के मेरुदण्ड विक्रममित्र ही हैं, जिन्होंने मूल कथा को सबसे अधिक प्रभावित किया है। विक्रममित्र, पुष्यमित्र शुंग के वंश के अन्तिम शासक हैं। वे ब्रह्मचारी, सदाचारी, वीर, कुशल राजनीतिज्ञ तथा प्रजावत्सल हैं। वह शासन का संचालन कुशलता से करते हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) सज्जन महापुरुष  – विक्रममित्र सज्जन महापुरुष हैं। वे स्वयं को ‘महाराज’ कहलवाना पसन्द नहीं करते, अतः लोग उन्हें सेनापति’ कहते हैं। नारियों के प्रति सम्मान का भाव सदा उनके मन में रहता है।

(2) अनुशासनप्रिय – विक्रममित्र अनुशासनप्रिय हैं तथा कठोर अनुशासन का पालन करने और कराने के पक्षधर हैं। सेनापति के स्थान पर ‘महाराज’ कहे जाने पर सेवक को डर लगता है कि कहीं सेनापति उसे दण्ड न दे दें। विक्रममित्र के शासन में अनुशासन भंग करना और मर्यादा का उल्लंघन करना अक्षम्य अपराध है।

(3) प्रजा के सेवक – विक्रममित्र अपनी प्रजा को अपनी सन्तान की भाँति स्नेह करते हैं। वे अत्याचारी नहीं हैं। उनका मत है-‘सेनापति धर्म और जाति का सबसे बड़ा सेवक है।”

(4) भागवत धर्म के रक्षक – विक्रममित्र भारतवर्ष में मिटती हुई वैदिक संस्कृति तथा ब्राह्मण धर्म के रक्षक हैं। वे भागवत धर्म और उसकी प्रतिष्ठा के लिए आजीवन संघर्ष करते हैं। उनको सेवक कालिदास काशी में हुए शास्त्रार्थ में बौद्धों को निरुत्तर कर देता है।

(5) संगठित राष्ट्र-निर्माता – उस समय देश छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था। विक्रममित्र ने उन्हें इकट्ठा करने का सफल प्रयास किया। विक्रममित्र का मत है – “देश का गौरव, इसके सुख और शान्ति की रक्षा मेरा धर्म है।” वे कालिदास का विवाह काशी-नरेश की पुत्री से कराते हैं। विक्रममित्र के संन्यास के समय तक मगध, साकेत तथा अवन्ति को मिलाकर एक सुदृढ़ राज्य की स्थापना हो चुकी होती है।

(6) निष्काम कर्मवीर –  विक्रममित्र राजा होते हुए भी महाराजा कहलाना पसन्द नहीं करते। वे स्वयं को प्रजा का सेवक ही मानते हैं। विषमशील के योग्य हो जाने पर वे उसे शासक बनाकर स्वयं संन्यासी हो जाते हैं। कालिदास का उन्हें भीष्म पितामह कहना सटीक सम्बोधन है।

(7) नीतिप्रिय – आचार्य विक्रममित्र नीति के अनुसार चलने वाले जननायक हैं। कुमार विषमशील की सफलता का एकमात्र कारण सेनापति विक्रममित्र की नीतियाँ ही हैं। वह नागसेन और पुष्कर से कहते हैं- “तुम जानते हो विक्रममित्र के शासन में अनीति चाहे कितनी छोटी क्यों न हो, छिपी नहीं रह सकती है।”

(8) शरणागतवत्सल – विक्रममित्र अपनी शरण में आये हुए की रक्षा करते हैं। चंचु और कालकाचार्य को क्षमा-दान देना उनकी शरणागतवत्सलता के प्रमाण हैं।

(9) निरभिमानी – विक्रममित्र शासक होते हुए भी अभिमान से कोसों दूर रहते हैं। वे हलोदर से कहते हैं-”मैं लज्जा और संकोच से मरने लगता हूँ; राजदूत! जब इस युग का सारा श्रेय मुझे दिया जाता है।”

इस प्रकार विक्रममित्र न्यायप्रिय, प्रजावत्सल, वीर शासक तथा निष्काम महामानव हैं।

प्रश्न 4:
‘गरुड़ध्वज़’ के आधार पर कालिदास का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘गरुडध्वज’ के अन्य पुरुष-पात्रों की तुलना में कालिदास की चारित्रिक विशेषताओं को प्रकाशित कीजिए।
उत्तर:
‘गरुड़ध्वज’ के पुरुष पात्रों में कालिदास भी एक प्रमुख पात्र हैं। विक्रममित्र शुंगवंशीय शासक एवं वीर सेनापति के रूप में प्रमुख पात्र है। इसके पश्चात् द्वितीय एवं तृतीय क्रम पर क्रमशः विषमशील, कालिदास का ही नाम आता है। विषमशील और विक्रममित्र तो प्रबुद्ध, शासक, सेनापति और शूरवीर पुरुष हैं। कालिदास शकारि विक्रमादित्य के दरबारी रत्नों में एक मुख्य रत्न माने जाते थे। ये एक विद्वान् कवि थे और वीर सैनिक भी थे; अतः वे विषमशील तथा विक्रममित्र से भी कुछ अधिक गुणों के स्वामी हैं। उनकी चरित्र की कुछ प्रमुख विशेषताएँ अग्रवत् हैं

(1) वीरता – कालिदास एक वीर पुरुष हैं। जब देवभूति कौमुदी का अपहरण कर लेता है तो कालिदास उसे काशी में घेर कर पकड़ लाते हैं। उसकी इसी वीरता पर मुग्ध होकर काशी की राजकुमारी वासन्ती उससे प्रेम करने लगती है और काशिराज भी प्रसन्न होकर उन दोनों के विवाह की स्वीकृति देते हैं।

(2) सच्चा-मित्र – कालीदास विषमशील का मित्र है, इसीलिए विषमशील के साथ उसका हास-परिहास चलता रहता है। वह मलयवती के बारे में राजकुमार विषमशील से चुटकी लेता हुआ कहता है
“किस तरह भूल गये विदिशा के प्रासाद का वह उपवन ……….”। घूम-घाम कर मलयवती को आँखों से पी जाना चाहते थे।”

(3) सच्चा-प्रेमी और कवि – वह वासन्ती का सच्चा प्रेमी है। वासन्ती को भी उस पर पूरा विश्वास है। वह वासन्ती के बारे में कहता है-“मैं सब कुछ जानता हूँ। उन्होंने तो उस यवन को देखा भी नहीं, फिर उसकी पवित्रता में शंका उत्पन्न करना तो पार्वती की पवित्रता में शंका उत्पन्न करना होगा। इसके अतिरिक्त वे एक महाकवि भी हैं। जैसा कि मलयवती ने कहा भी है-”क्यों महाकवि को यह क्या सूझी है ?” निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कालिदास ‘गरुड़ध्वज’ के अन्य पुरुष-पात्रों की अपेक्षा विलक्षण हैं। वे वीर, सच्चे मित्र, सच्चे प्रेमी और महाकवि भी हैं। वे शासक भी हैं और शासित भी; वे वीर हैं, न्यायप्रिय हैं, कठोर हैं और कोमल भी हैं।

प्रश्न 5:
‘गरुड़ध्वज’ के आधार पर विषमशील का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
कुमार विषमशील ‘गरुड़ध्वज’ नाटक के दूसरे प्रमुख पात्र हैं। ये धीरोदात्त स्वभाव के उच्च कुलीन श्रेष्ठ पुरुष हैं। आदि से अन्त तक इनके चरित्र का क्रमिक विकास होता है। इनके चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं:

(1) उदार और गुणग्राही – कुमार विषमशील मालवा के गर्दभिल्लवंशी महाराज महेन्द्रादित्य के वीर सुपुत्र हैं। अपने महान् कुल के अनुरूप ही उनमें उदारता और गुणग्राहकता विद्यमान है। कवि कालिदास की विद्वत्ता, वीरता आदि गुणों को देखकर वे उनके गुणों पर ऐसे मुग्ध हो जाते हैं कि उनसे अलग होना नहीं चाहते।

(2) महान् वीर – वीरता कुमार विषमशील के चरित्र की महती विशेषता है। अपनी वीरता के कारण वह शकारि क्षत्रियों को पराजित कर भारी विजय प्राप्त करते हैं। कुमार की वीरता और योग्यता को देखकर ही आचार्य विक्रममित्र उसे सम्राट बनाकर निश्चिन्त हो जाते हैं।

(3) सच्चा-प्रेमी – कुमार विषमशील एक भावुक व्यक्ति है। उसके हृदय में दया, प्रेम, उत्साह आदि मानवीय भावनाएँ पर्याप्त मात्रा में पायी जाती हैं। स्वभाव से धीर होते हुए भी कुमारी मलयवती को देखकर उनके हृदय में प्रेम अंकुरित हो जाता है।

(4) विवेकशील – कुमार विषमशील एक विवेकशील व्यक्ति के रूप में चित्रित हुए हैं। वे भली-भाँति समझते हैं कि किस प्रकार, किस अवसर पर अथवा किस स्थान पर किस प्रकार की बात करनी चाहिए। कालिदास के साथ उसका व्यवहार मित्रों जैसा होता है, हास और उपहास भी होता है किन्तु सेनापति विक्रममित्र के सामने वे सर्वत्र संयत और शिष्ट-आचरण करते हैं। वासन्ती और मलयवती के साथ बातें करते समय वह भावुक हो। उठते हैं। किसी काम को करने से पूर्व वह विवेक से काम लेते हैं तथा उसके दूरगामी परिणाम को सोचते हैं। जब सेनापति विक्रममित्र साकेत और पाटलिपुत्र का राज्य भी उसे सौंपते हैं तो वह बहुत विवेक से काम लेता । है। अवन्ति में रहकर सुदूर पूर्व के इन राज्यों की व्यवस्था करना कोई सरल काम नहीं था। इसलिए वह विक्रममित्र से निवेदन करता है ।
“आचार्य! अभी कुछ दिन आप महात्मा काशिराज के साथ उधर की व्यवस्था करें। मैं चाहता हूँ, मेरे सिर पर किसी मनस्वी ब्राह्मण की छाया रहे और फिर मैं यह देख भी नहीं सकता कि जिस क्षेत्र में प्रायः डेढ़ सौ वर्षों से आपके पूर्व-पुरुषों का अनुशासन रहा, वह अकस्मात् इस प्रकार मिट जाये।”

(5) कृतज्ञता – कुमार विषमशील दूसरे के किये हुए उपकार से अपने को उपकृत मानता है। कालिदास के उपकार के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए वह कहता है “और वह राज्य मुझे देकर मुझ पर, मेरे मन, मेरे प्राण पर राज्य करने की युक्ति निकाल ली।………. मैं सुखी हूँ ……… तुम्हारा अधिकार मेरे मन पर सदैव बना रहे ……… महाकाल से मेरी यही कामना है।”

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कुमार विषमशील का चरित्र एक सुयोग्य राजकुमार का चरित्र है। वह स्वभाव से उदार, गुंणग्राही तथा भावुक व्यक्ति है। उसमें वीरता, विवेकशीलता आदि कुछ ऐसे गुण हैं जिनके आधार पर उसमें एक श्रेष्ठ शासक बनने की क्षमता सिद्ध हो जाती है। उसका चरित्र स्वाभाविक तथा मानवीय है।

प्रश्न 6:
‘गरुड़ध्वज’ के आधार पर वासन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के किसी नारी-पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ के प्रमुख नारी-पात्र के विषय में अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की नायिका (प्रमुख नारी-पात्र) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
क्या वासन्ती का चरित्र आधुनिक नारियों के लिए अनुकरणीय है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

वासन्ती का चरित्र-चित्रण

श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत ‘गरुड़ध्वज’ नाटक की नायिका वासन्ती है। वासन्ती काशिराज की इकलौती पुत्री है। बौद्ध धर्म के अनुयायी होने के कारण वे वासन्ती का विवाह किसी राजकुल में नहीं कर पाते, अतः अपनी युवा पुत्री का विवाह शाकल के 50 वर्षीय यवन राजकुमार से निश्चित करते हैं, किन्तु इसी बीच विक्रममित्र के प्रयास से यह विवाह बीच में रोक दिया जाता है और वासन्ती को राजमहल में सुरक्षित पहुँचा दिया जाता है। बाद में वह कालिदास की प्रेयसी के रूप में हमारे सम्मुख आती है। वासन्ती के चरित्र में निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं

(1) अनुपम सुन्दरी – वासन्ती रूप और गुण दोनों में अद्वितीय है। उसका सौन्दर्य कालिदास जैसे संयमी पुरुष को भी आकर्षित कर लेता है। उसके सौन्दर्य की प्रशंसा करते हुए कुमार विषमशील कालिदास से कहते हैं  “और तुम्हारी वासन्ती-रूप और गुण का इतना अद्भुत मिश्रण ………… पता नहीं, कितने कुण्ड इस पर्वतीय स्रोत के सामने फीके पड़ेंगे।”

(2) उदारता और प्रेमभावना से परिपूर्ण – वासन्ती विश्व के समस्त प्राणियों के लिए अपने हृदय में उदार भावना रखती है। उसमें बड़े-छोटे, अपने-पराये सभी के लिए एक समान प्रेमभाव ही भरा हुआ है।

(3) धार्मिक संकीर्णता से त्रस्त – पिता के बौद्ध धर्मानुयायी होने के कारण कोई भी राज-परिवार वासन्ती से विवाह-सम्बन्ध के लिए तैयार नहीं होता। अन्त में उसके पिता काशिराज उसे 50 वर्षीय यवन राजकुमार को सौंप देने का निश्चय कर लेते हैं, जब कि वासन्ती उससे विवाह नहीं करना चाहती। इस प्रकार वासन्ती तत्कालीन समाज में व्याप्त धार्मिक संकीर्णता से त्रस्त है। धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठना चाहिए तथा योग्य व्यक्ति का वरण करना चाहिए।

(4) आत्मग्लानि से विक्षुब्ध – वासन्ती आत्मग्लानि से विक्षुब्ध होकर अपने जीवन से छुटकारा पाना चाहती है। और अपनी जीवन-लीला समाप्त करने का प्रयास करती है, परन्तु विक्रममित्र उसको ऐसा करने से रोक लेते हैं। वह असहाय होकर कहती है-”वह महापुरुष कौन होगा, जो स्वेच्छा से आग के साथ विनोद करेगा।” नारियों को इस तरह की भावना को त्यागकर साहसपूर्वक जीवनयापन करना चाहिए और समाज के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।

(5) स्वाभिमानिनी – वासन्ती धार्मिक संकीर्णता से त्रस्त होने पर भी अपनी स्वाभिमान नहीं खोती। वह किसी ऐसे राजकुमार से विवाह-बन्धन में नहीं बँधना चाहती, जो विक्रममित्र के दबाव के कारण ऐसा करने के लिए विवश हो। अतः आधुनिक नारियों को भी इस तरह संकल्प लेना चाहिए।

(6) सहृदय और विनोदप्रिय – वासन्ती विक्षुब्ध और निराश होने पर भी सहृदय और विनोदप्रिय दृष्टिगोचर . होती है। वह कालिदास के काव्य-रस का पूरा आनन्द लेती है।

(7) आदर्श प्रेमिका – वासन्ती एक सहृदया, सुन्दर, आदर्श प्रेमिका है। वह निष्कलंक और पवित्र है।

सार रूप में यह कहा जा सकता है कि वासन्ती एक आदर्श नारी-पात्र है और इस नाटक की नायिका है|

वासन्ती का चरित्र आधुनिक नारियों के लिए अनुकरणीय है।

प्रश्न 7:
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर मलयवती का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

मलयवती का चरित्र-चित्रण

मलयवती; श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत ‘गरुड़ध्वज’ नाटक के नारी-पात्रों में एक प्रमुख पात्र है। सम्पूर्ण नाटक में अनेक स्थलों पर उसका चरित्र पाठकों को आकर्षित करता है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) अपूर्व सुन्दरी – मलयवती का व्यक्तित्व अत्यन्त प्रभावपूर्ण है। वह मलय देश की राजकुमारी और अपूर्व सुन्दरी है। विदिशा के राजप्रासाद के उपवन में उसके रूप-सौन्दर्य को देखकर कुमार विषमशील भी उस पर मुग्ध हो जाते हैं।

(2) ललित कलाओं में रुचि रखने वाली – मलयवती की ललित-कलाओं में विशेष रुचि है। ललित कलाओं में दक्ष होने के उद्देश्य से ही वह विदिशा जाती है और वहाँ मलय देश की चित्रकला, संगीतकला आदि भी
सीखती है।

(3) विनोदप्रिय – राजकुमारी मलयवती प्रसन्नचित्त और विनोदी स्वभाव की है। वासन्ती उसकी प्रिय सखी है। और वह उसके साथ खुलकर हास-परिहास करती है। जब राजभृत्य उसे बताता है कि महाकवि कह रहे थे कि मलयवती और वासन्ती दोनों को ही राजकुमारी के स्थान पर राजकुमार होना चाहिए था तो मलयवती कहती है-“क्यों महाकवि को यह सूझी है? इस पृथ्वी की सभी कुमारियाँ कुमार हो जाएँ, तब तो अच्छी रही। कह देना महाकवि से इस तरह की उलट-फेर में कुमारों को कुमारियाँ होना होगा और महाकवि भी कहीं उस चक्र में न आ जाएँ।’

(4) आदर्श प्रेमिका – मलयवती के हृदय में कुमार विषमशील के प्रति प्रेम का भाव जाग्रत हो जाता है। वह विषमशील का मन से वरण कर लेने के उपरान्त, एकनिष्ठ भाव से केवल उन्हीं का चिन्तन करती है। वह स्वप्न में भी किसी अन्य की कल्पना करना नहीं चाहती। उसका प्रेम सच्चा है और उसे अपने प्रेम पर पूर्ण विश्वास है। अन्ततः प्रेम की विजय होती है और कुमार विषमशील के साथ उसका विवाह हो जाता है। इस प्रकार मलयवती का चरित्र एवं व्यक्तित्व अनुपम है। वह एक आदर्श राजकुमारी की छवि प्रस्तुत करती है।

प्रश्न 8.
” ‘गरुडध्वज’ नाटक राष्ट्र की एकता और संस्कृति का सन्देश अपनी घटनाओं में अभिव्यक्त करता है।” नाटक की कथावस्तु से इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
” ‘गरुड़ध्वज’ नाटक में राष्ट्र की एकता और संस्कृति का सन्देश है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की राष्ट्रीयता को स्पष्ट कीजिए।
या
“राष्ट्र को गतिशील बनाने वाले जो उच्च विचार हैं, वे ‘गरुड़ध्वज’ नाटक में समाविष्ट हैं।” विवेचना कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक में युगीन समाज का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया गया है? स्पष्ट कीजिए।
या
‘मरुड़ध्वज’ नाटक के शीर्षक की सार्थकता को स्पष्ट कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ में राष्ट्रीय भावना का संयोजन है। स्पष्ट कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक में ‘नीति और संस्कृति के मानदण्ड स्थापित हैं। इस कथन पर प्रकाश डालिए।
या
राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता की दृष्टि से ‘गरुड़ध्वज’ नाटक कितना समर्थ है ? साधार स्पष्ट कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के कथानक में न्याय और राष्ट्रीय एकता पर विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:

‘गरुड़ध्वज’ का महत्त्व

श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र द्वारा रचित ‘गरुड़ध्वज’ नाटक में ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी के भारतीय इतिहास के एक महत्त्वपूर्ण युग के धुंधले स्वरूप को चित्रित किया गया है, जो भारत की राष्ट्रीय एकता और प्राचीन संस्कृति को प्रस्तुत करता है। इसमें तत्कालीन न्यायव्यवस्था का स्वरूप भी परिलक्षित होता है।
राष्ट्रीय एकता और भारतीय संस्कृति का चित्रण – प्रस्तुत नाटक में मगध, साकेत, अवन्ति और मलय देश के एकीकरण की घटना, सुदृढ़ भारत राष्ट्र के निर्माण, राष्ट्रीय अखण्डता तथा एकता की प्रतीक है। विक्रममित्र तथा विषमशील के चरित्र सशक्त राष्ट्र के निर्माता और राष्ट्रीय एकता के संरक्षक-सन्देशवाहक हैं। इस नाटक में नाटककार धार्मिक संकीर्णताओं और स्वार्थों के परिणामस्वरूप देश की विशृंखलता और अध:पतन की ओर पाठकवर्ग का ध्यान आकर्षित करके राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधने का सन्देश देता है। नाटक का नायक विक्रममित्र वैदिक संस्कृति और भागवत् धर्म का उन्नायक है। वह भगवान् विष्णु का उपासक है, इसीलिए उसका राजचिह्न गरुड़ध्वज है, जो उसके लिए सर्वाधिक पवित्र और पूज्य है। वह सनातन भागवत धर्म की ध्वजा सर्वत्र फहरा देता है। इस दृष्टि से नाटक का शीर्षक ‘गरुड़ध्वज’ भी सार्थक हो उठी है।

निष्पक्ष एवं सुदृढ़ न्याय-व्यवस्था – प्राचीन भारत में न्याय निष्पक्ष होता था। शासक द्वारा प्रत्येक नागरिक की भाँति अपने रिवारजनो को भी अपराध के लिए समान कठोर दण्ड दिये जाने की व्यवस्था थी। नाटक के प्रथम अंक’ की घरना इसका उदाहरण है। शुंग वंश के कुमार सेनानी देवभूति ने श्रेष्ठी अमोघ की कन्या कौमुदी को अपहरण विह-मण्डप से कर लिया। इस समाचार से विक्रममित्र बहुत दु:खी हुए। देवभूति शुंग साम्राज्य के शासक हैं, किन्तु विक्रममित्र अपने सैनिकों को तत्काल काशी का घेरा डालने और देवभूति को पकड़ने का आदेश देते हैं। यह तत्कालीन निष्पक्ष एवं सुदृढ़ न्याय-व्यवस्था का स्पष्ट प्रमाण है।

प्रश्न 9:
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की ऐतिहासिकता प्रमाणित कीजिए।
या
‘गरुडध्वज’ नाटक की कथावस्तु के ऐतिहासिक पक्ष को स्पष्ट कीजिए।
या
” ‘गरुडध्वज’ की कथा में ऐतिहासिकता एवं काल्पनिकता का मेल है।” इस कथन का विवेचन कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक में अभिव्यक्त सांस्कृतिक चेतना पर प्रकाश डालिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक में नाटककार ने इतिहास के किस काल को अपनी रचना के विषय रूप में चुना है, प्रकाश डालिए।
उत्तर:

‘गरुड़ध्वज’ की ऐतिहासिकता तथा संस्कृति

श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र द्वारा रचित ‘गरुड़ध्वज’ नाटक में ईसा से एक शती पूर्व के समय का वर्णन है। उस समय भारत में विक्रमादित्य नाम का एक शासक था। नाटक में कुमार विषमशील का नामकरण ‘विक्रमादित्य’ हुआ है। शुंग वंश में सेनापति पुष्यमित्र के वंश में विक्रममित्र अन्तिम ऐतिहासिक व्यक्ति हुए। वंश-परम्परा का लोप, नाटककार के अनुसार विक्रममित्र के आजीवन ब्रह्मचारी रहने के कारण हुआ।

नाटक के प्रसिद्ध पात्र इतिहाससम्मत हैं; जैसे-तक्षशिला की यवन शासक अन्तिलिक, उसका मन्त्री हलोदर, शुंग साम्राज्य में काशी का शासक देवभूति, कालिदास, जैन आचार्य कोलके आदि। नाटक के कुछ स्थानों के नाम भी ऐतिहासिक हैं; जैसे—विदिशा, पाटलिपुत्र, अवन्ति, साकेत, काशी इत्यादि। घटना की दृष्टि से भी नाटक को इतिहास से अनुप्राणित किया गया है। विक्रमादित्य द्वारा शकों को पराजित करने की घटना, कालिदास का विक्रमादित्य का सभासद होना तथा ईसा से 57 वर्ष पूर्व विक्रम संवत् का प्रवर्तन होना इतिहास-सम्मत है। इस काल में भारत के सामाजिक परिवेश पर जैनों, बौद्धों तथा वैदिक धर्माचार्यों का प्रभाव था। नाटककार ने नाटक में सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों का चित्रण करते समय इस तथ्य का ध्यान रखा है। भारत में उस समय अनेक गणराज्य थे। बौद्धों, सनातनियों तथा जैनियों के संघर्ष धार्मिक वातावरण को प्रभावित कर रहे थे। नाटक में नारी अपहरण के साथ-साथ विक्रममित्र द्वारा अपहरणकर्ता को दण्ड, प्रेम-विवाह, बहु-विवाह, संगीत तथा ललित-कलाओं में अभिरुचि का चित्रण करके तत्कालीन धार्मिक और सांस्कृतिक वातावरण को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। विक्रममित्र मूलभूत वैदिक संस्कृति के आधार पर राज्य और समाज को चलाना चाहते थे। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ‘गरुड़ध्वज’ नाटक में ऐतिहासिकता तथा तत्कालीन भारतीय संस्कृति को समन्वित रूप प्रस्तुत करके नाटककार ने स्तुत्य कार्य किया है।

प्रश्न 10:
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की रचना नाटककार ने किन उद्देश्यों से प्रेरित होकर की है ?
या
‘गरुड़ध्वज’ के रचनात्मक उद्देश्य (प्रतिपाद्य) पर प्रकाश डालिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ में किस समस्या को उठाया गया है ?
उत्तर:

‘गरुड़ध्वज’ का उद्देश्य

‘गरुड़ध्वज’ ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी के भारतीय इतिहास के कथानक पर आधारित नाटक है। नाटककार श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र ने आदियुग के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण किन्तु धुंधले स्वरूप को उजागर करने का प्रयास किया है। पाठकों के सम्मुख एक ज्वलन्त ऐतिहासिक तथ्य को प्रस्तुत किया गया है, जिसमें धार्मिक संकीर्णताओं तथा स्वार्थों के कारण देश की एकता के बिखराव और उसके नैतिक पतन की ओर ध्यान आकृष्ट करके नाटककार पूरे राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधने का संकेत देता है। परोक्ष रूप में नाटक के निम्नलिखित उद्देश्य भी हैं

  1.  नाटककार को धार्मिक कट्टरता बिल्कुल भी मान्य नहीं है। वह धर्म और सम्प्रदाय की दीवारों से बाहर होकर लोक-कल्याण की ओर उन्मुख होना चाहता है।
  2. हलोदर के कथन में नाटककार स्वयं बोल रहा है। वह देश की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य मानता है।
  3.  उदार धार्मिक भावना का सन्देश ही नाटक का मूल स्वर है।
  4.  नाटक में राष्ट्रीय एकता एवं जनवादी विचारधारा का समर्थन किया गया है।
  5. वासन्ती, कौमुदी आदि नारियों के उद्धार के पीछे नारी के शील और सम्मान की रक्षा के लिए प्रेरणा देने का उद्देश्य निहित है।
  6. प्रस्तुत नाटक में धर्मनिरपेक्षता का उद्देश्य भी स्पष्ट रूप में चित्रित किया गया है।
  7.  नाटक में स्वस्थ गणराज्य की स्थापना पर बल दिया गया है।
  8. देश की रक्षा तथा अन्यायियों के विनाश के लिए शस्त्रों का उपयोग उचित माना गया है।

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